विचार मंथन : सत्य, सेवा और सच्ची धार्मिकता के मार्ग में सुविधाओं की अपेक्षा कष्ट ही अधिक उठाने पडते हैं- महात्मा गांधी

बात उन दिनों की है जब मैं दक्षिण अफ्रीका में था। अफ्रीकियों के स्वत्वाधिकार के लिए मेरा आंदोलन सफलतापूर्वक चल रहा था, ब्रिटिश सरकार के इशारे पर एक दिन मीर नामक एक पठान ने मुझ पर हमला कर दिया और मैं गंभीर रूप से घायल हो गया। मैने सोचा मनुष्य का सत्य, सेवा और सच्ची धार्मिकता का मार्ग है ही ऐसा कि इसमें मनुष्य को सुविधाओं की अपेक्षा कष्ट ही अधिक उठाने पडते हैं।   विचार मंथन : भय का निवास न तो अन्धकार में है और न ही वस्तु में, उसका निवास केवल अज्ञान में रूपी अंधेरे का ज्ञान न होने में है- आचार्य श्रीराम शर्मा इस पर पादरी डोक ने मुझसे कहा मि० गांधी आपने ही तो कहा था कि धर्म एक और सनातन है पीडित मानवता की सेवा।' फिर यदि सांप्रदायिक सिद्धन्तों की अवहेलना करके मैं सच्चे धर्म का पालन करूं तो इसमे दुख करने की क्या बात और फिर यह तो मैं स्वांतः सुखाय करता हूं। मनुष्य धर्म की सेवा करते आत्मा को जो पुलक और प्रसन्नता होनी चाहिए, वह प्रसाद मुझे मिल रहा है, इसलिए बाह्य अडचनों, दुःखों और उत्पीडनों की मुझे किंचित भी परवाह नही। पादरी डोक अंत तक भारतीयों का समर्थन करते रहे। उन जैसे महात्माओं के आशीर्वाद का फल है कि हम भारतीय अपने धर्म, आदर्श और सिद्धन्तों पर निष्कंटक चलने के लिए स्वतंत्र है।

पत्रिका 1 Oct 2019 4:07 pm