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Karwa Chauth 2026: पति-पत्नी के पवित्र रिश्तों का पर्व है करवा चौथ

भारत एक धर्म प्रधान देश हैं। यहां साल के सभी दिनो का महत्व होता है तथा साल का हर दिन पवित्र माना जाता है। भारत में करवा चौथ हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। यह भारत के राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और पंजाब का पर्व है। यह कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। यह व्रत सुबह सूर्योदय से पहले करीब 4 बजे के बाद शुरू होकर रात में चन्द्रमा दर्शन के बाद सम्पूर्ण होता है। ग्रामीण स्त्रियों से लेकर आधुनिक महिलायें करवा चौथ का व्रत बड़ी श्रद्धा एवं उत्साह के साथ रखती हैं। यह व्रत लगातार 12 अथवा 16 वर्ष तक हर वर्ष किया जाता है। अवधि पूरी होने के पश्चात इस व्रत का उद्यापन किया जाता है। जो सुहागिन स्त्रियां आजीवन रखना चाहें वे जीवनभर इस व्रत को कर सकती हैं। करवा चौथ का व्रत हर साल महिलाओं द्वारा अपने पतियों के लिए किया जाता हैं और यह न केवल एक त्यौहार है बल्कि यह पति-पत्नी के पवित्र रिश्तों का पर्व है। कहने को तो करवा चौथ का त्यौहार एक व्रत है लेकिन यह नारी शक्ति औऱ उसकी क्षमताओं का सवश्रेष्ठ उदहारण हैं। क्योंकि नारी अपने दृढ़ संकल्प से यमराज से भी अपने पति के प्राण ले आती हैं तो फ़िर वह क्या नहीं कर सकती हैं। आज के नये जमाने में भी हमारे देश में महिलायें हर वर्ष करवा चौथ का व्रत पहले की तरह पूरी निष्ठा व भावना से मनाती है। करवा चौथ सभी विवाहित महिलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण त्योहार है। सूर्योदय से लेकर चंद्रोदय तक पत्नियाँ अपने पति की सलामती के लिए व्रत रखती हैं। पूरे दिन बिना पानी पिए और कुछ भी खाए व्रत रखना आसान नहीं है, लेकिन स्नेही पत्नियाँ अपने पति के प्रति पूरे प्रेम और सम्मान के साथ ये सभी रस्में निभाती हैं। यह त्यौहार हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। इसे भी पढ़ें: Karwa Chauth 2026: प्रेम, विश्वास और अखंड सौभाग्य का पर्व है करवा चौथ शास्त्रों के अनुसार पति की दीर्घायु एवं अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए इस दिन भालचन्द्र गणेश जी की पूजा-अर्चना की जाती है। करवा चौथ में दिन भर उपवास रखकर रात में चन्द्रमा को अर्ध्य देने के उपरान्त ही भोजन करने का विधान है। वर्तमान समय में करवा चौथव्रतोत्सव ज्यादातर महिलाएं अपने परिवार में प्रचलित प्रथा के अनुसार ही मनाती हैं। लेकिन अधिकतर स्त्रियां निराहार रहकर चन्द्रोदय की प्रतीक्षा करती हैं। सायंकाल चंद्रमा के उदित हो जाने पर चंद्रमा का पूजन कर अर्ध्य प्रदान करें। इसके पश्चात ब्राह्मण, सुहागिन स्त्रियों व पति के माता-पिता को भोजन कराएं। भोजन के पश्चात ब्राह्मणों को यथाशक्ति दक्षिणा दें। अपनी सासूजी को वस्त्र व विशेष करवा भेंट कर आशीर्वाद लें। यदि वे न हों तो उनके तुल्य किसी अन्य स्त्री को भेंट करें। इसके पश्चात स्वयं व परिवार के अन्य सदस्य भोजन करें। कार्तिक कृष्ण पक्ष की चंद्रोदय व्यापिनी चतुर्थी अर्थात उस चतुर्थी की रात्रि को जिसमें चंद्रमा दिखाई देने वाला है। उस दिन प्रातः स्नान करके अपने पति की आयु, आरोग्य, सौभाग्य का संकल्प लेकर दिनभर निराहार रहें। उस दिन भगवान शिव-पार्वती, स्वामी कार्तिकेय, गणेश एवं चंद्रमा का पूजन करें। शुद्ध घी में आटे को सेंककर उसमें शक्कर अथवा खांड मिलाकर नैवेद्य हेतु लड्डू बनाएं। काली मिट्टी में शक्कर की चासनी मिलाकर उस मिट्टी से तैयार किए गए मिट्टी के अथवा तांबे के बने हुए अपनी सामथ्र्य अनुसार 10 अथवा 13 करवे रखें। करवा चौथ के बारे में व्रत करने वाली महिलाएं कहानी सुनती है। एक बार पांडु पुत्र अर्जुन तपस्या करने नीलगिरी नामक पर्वत पर गए। इधर द्रोपदी बहुत परेशान थीं। उनकी कोई खबर न मिलने पर उन्होंने कृष्ण भगवान का ध्यान किया और अपनी चिंता व्यक्त की। कृष्ण भगवान ने कहा बहना इसी तरह का प्रश्न एक बार माता पार्वती ने शंकरजी से किया था। पूजन कर चंद्रमा को अर्ध्य देकर भोजन ग्रहण किया जाता है। सोने, चाँदी या मिट्टी के करवे का आपस में आदान-प्रदान किया जाता है। जो आपसी प्रेम-भाव को बढ़ाता है। पूजन करने के बाद महिलाएँ अपने सास-ससुर एवं बड़ों को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लेती हैं। तब शंकरजी ने माता पार्वती को करवा चौथ का व्रत बतलाया। आधुनिक होते समाज में भी महिलायें अपने पति की दीर्घायु को लेकर सचेत रहती है। इसीलिये वो पति की लम्बी उम्र की कामना के साथ करवा चौथ का व्रत रखना नहीं भूलती है। पत्नी का अपने पति से कितने भी गिले-शिकवे रहें हो मगर करवा चौथ आते-आते सब भूलकर वो एकाग्र चित्त से अपने सुहाग की लम्बी उम्र की कामना से व्रत जरूर करती है। करवा चौथ शब्द करवा अर्थात मिट्टी का बर्तन और चौथ अर्थात चतुर्थी से मिलकर बना है। इस पर्व पर मिट्टी के करवे का विशेष महत्व होता है। सभी विवाहित महिलाएं पूरे वर्ष इस त्योहार की प्रतीक्षा करती हैं और इसकी सभी रस्मों को श्रद्धा के साथ निभाती हैं। किसी भी आयु, जाति, वर्ण, संप्रदाय की सौभाग्यवती स्त्रियों को ही यह व्रत करने का अधिकार है। जो सुहागिन स्त्रियां अपने पति की आयु, स्वास्थ्य व सौभाग्य की कामना करती हैं वे व्रत रखती हैं। बालू अथवा सफेद मिट्टी की वेदी पर शिव-पार्वती, स्वामी कार्तिकेय, गणेश एवं चंद्रमा की स्थापना करें। मूर्ति के अभाव में सुपारी पर नाल बांधकर ईश्वर का स्मरण कर स्थापित करें। पश्चात यथाशक्ति देवों का पूजन करें। करवों में लड्डू का नैवेद्य रखकर नैवेद्य अर्पित करें। एक लोटा, एक वस्त्र व एक विशेष करवा दक्षिणा के रूप में अर्पित कर पूजन समापन करें। दिन में करवाचौथ व्रत की कथा पढ़ें अथवा सुनें। इस व्रत को करने से स्त्रियां अपने सुहाग की रक्षा हर आने वाले संकट से वैसे ही कर सकती हैं जैसे एक ब्राह्मण ने की थी। प्राचीनकाल में एक ब्राह्मण था। उसके चार लडके एवं एक गुणवती लडकी थी। एक बार लडकी मायके में थी। तब करवा चौथ का व्रत पड़ा। उसने व्रत को विधिपूर्वक किया। पूरे दिन निर्जला रही। कुछ खाया-पीया नहीं, पर उसके चारों भाई परेशान थे कि बहन को प्यास लगी होगी, भूख लगी होगी, पर बहन चंद्रोदय के बाद ही जल ग्रहण करेगी।भाइयों से न रहा गया उन्होंने शाम होते ही बहन को बनावटी चंद्रोदय दिखा दिया। एक भाई पीपल की पेड़ पर छलनी लेकर चढ़ गया और दीपक जलाकर छलनी से रोशनी उत्पन्न कर दी। तभी दूसरे भाई ने नीचे से बहन को आवाज दी देखो बहन चंद्रमा निकल आया है। पूजन कर भोजन ग्रहण करो। बहन ने भोजन ग्रहण किया। भोजन ग्रहण करते ही उसके पति की मृत्यु हो गई। अब वह दुःखी हो विलाप करने लगी। तभी वहां से रानी इंद्राणी निकल रही थीं। उनसे उसका दुःख न देखा गया। ब्राह्मण कन्या ने उनके पैर पकड़ लिए और अपने दुःख का कारण पूछा। तब इंद्राणी ने बताया कि तूने बिना चंद्र दर्शन किए करवा चौथ का व्रत तोड़ दिया इसलिए यह कष्ट मिला। अब तू वर्ष भर की चौथ का व्रत नियमपूर्वक करना तो तेरा पति जीवित हो जाएगा। उसने इंद्राणी के कहे अनुसार चौथव्रत किया तो पुनः सौभाग्यवती हो गई। इसलिए प्रत्येक स्त्री को अपने पति की दीर्घायु के लिए यह व्रत करना चाहिए। द्रोपदी ने यह व्रत किया और अर्जुन सकुशल मनोवांछित फल प्राप्त कर वापस लौट आए। तभी से हिन्दू महिलाएं अपने अखंड सुहाग के लिए करवा चौथ व्रत करती हैं। कहते हैं इस प्रकार यदि कोई मनुष्य छल-कपट, अहंकार, लोभ, लालच को त्याग कर श्रद्धा और भक्तिभाव पूर्वक चतुर्थी का व्रत को पूर्ण करता है। तो वह जीवन में सभी प्रकार के दुखों और क्लेशों से मुक्त होता है और सुखमय जीवन व्यतीत करता है। भारत देश में चौथमाता का सबसे अधिक ख्याति प्राप्त मंदिर राजस्थान राज्य के सवाई माधोपुर जिले के चौथ का बरवाड़ा गांव में स्थित है। चौथ माता के नाम पर इस गांव का नाम बरवाड़ा से चौथ का बरवाड़ा पड़ गया। यहां के चौथ माता मंदिर की स्थापना महाराजा भीमसिंह चौहान ने करवायाथा। - रमेश सर्राफ धमोरा (लेखक राजस्थान सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

प्रभासाक्षी 28 Oct 2026 5:54 pm

सोआ में छिपे हैं सेहत के लिए जरूरी पोषक तत्व, शरीर को बीमारियों से लड़ने में करता है मदद

हरी सब्जियां हमारी सेहत के लिए अच्छी होती हैं। ये शरीर को जरूरी पोषक तत्व देती हैं और हमें स्वस्थ रखने में मदद करती हैं। सोआ भी ऐसी ही एक हरी पत्तेदार सब्जी है। इसमें कई विटामिन और खनिज पाए जाते हैं, जो शरीर के अलग-अलग कामों में मदद करते हैं। इसे खाने से शरीर को कुछ जरूरी पोषक तत्व मिलते हैं।

खास खबर 27 Oct 2026 11:39 am

Kojagari Puja की रात चंद्रमा की रोशनी में रखी खीर अर्पित करने से आएगी समृद्धि

शरद पूर्णिमा की रात में मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करने का विशेष महत्व होता है। इस मौके पर कोजागरी पूजा भी की जाती है। इस दौरान कई श्रद्धालु पूरी रात जागकर देवी लक्ष्मी की पूजा-आराधना करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन मां लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने से घर में सुख-शांति और समृद्धि आती है। तो आइए जानते हैं कोजागरी पूजा की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और धार्मिक महत्व के बारे में... कोजागरी पूजा 2026 इस बार आज यानी की 25 अक्टूबर 2026 को कोजागरी पूजा मनाई जा रही है। इसको कोजागरी पूर्णिमा और बंगाली लक्ष्मी पूजा के नाम से जाना जाता है। पश्चिम बंगाल में इस पर्व को बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा और रात्रि जागरण करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन जरूरतमंदों को दान देना शुभ होता है। तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक आश्विन माह की पूर्णिमा तिथि की शुरूआत 25 अक्टूबर की सुबह 11:55 मिनट पर हुई है। वहीं अगले दिन यानी की 26 अक्टूबर की सुबह 09:41 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में25 अक्टूबर की रात 11:40 से 26 अक्टूबर की रात 12:31 मिनट तक निशिता काल रहेगा। धार्मिक महत्व धार्मिक मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात में मां लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और देखती हैं कौन उनकी आराधना के लिए जाग रहा है। इसी को कोजागरी के नाम से जुड़ा माना जाता है। मान्यता है कि जो भी जातक इस रात सच्चे मन से मां लक्ष्मी की पूजा और जागरण करता है। उसके घर और जीवन में खुशहाली आती है। वहीं मां लक्ष्मी की कृपा से घर-परिवार की सुख-समृद्धि, उन्नति और आर्थिक संपन्नता आती है। मां लक्ष्मी की पूजा इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर घर और मंदिर की साफ-सफाई करें। इसके बाद घर के मुख्य द्वार पर दीपक जलाएं और रंगोली बनाकर घर को सजाएं। रात में मां लक्ष्मी की प्रतिमा को स्थापित कर दीपक जलाएं और मां लक्ष्मी को फल, मिठाई, फूल और सात्विक पकवान अर्पित करें। इस दिन अष्टलक्ष्मी का पूजन करें और श्रीसूक्त या लक्ष्मी चालीसा का पाठ करें। मां लक्ष्मी के मंत्रों का जाप करें और घर-परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें। क्यों लगाते हैं खीर का भोग शरद पूर्णिमा के मौके पर खीर बनाकर चंद्रमा की रोशनी में रातभर रखने की परंपरा है। इसको भक्त मां लक्ष्मी को अर्पित करते हैं और फिर प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। खीर को साफ बर्तन में रखकर महीन जाली से ढक देना चाहिए।

प्रभासाक्षी 25 Oct 2026 9:34 am

Shukra Pradosh Vrat 2026: आश्विन शुक्र प्रदोष व्रत से जीवन में आती है सुख-समृद्धि

आज आश्विन शुक्र प्रदोष व्रत है, यह व्रत माता लक्ष्मी और सुख-सौभाग्य की कामना से सम्बन्धित होता है। शुक्र प्रदोष व्रत शिव-शक्ति की उपासना के साथ-साथ पारिवारिक सुख, मानसिक शांति और जीवन में सकारात्मकता की प्रार्थना का अवसर प्रदान करता है तो आइए हम आपको आश्विन शुक्र प्रदोष व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं। जानें आश्विन शुक्र प्रदोष व्रत के बारे में हिंदू धर्म में शुक्र प्रदोष व्रत का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित होता है। प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखा जाता है। शिव की उपासना केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, लोभ और नकारात्मक विचारों को दूर करने का संकल्प भी है। माता पार्वती शक्ति, प्रेम, धैर्य और समर्पण की प्रतीक हैं। शिव और पार्वती की संयुक्त आराधना जीवन में संतुलन, पारिवारिक सौहार्द और कर्तव्यनिष्ठा का संदेश देती है। पंडितों के अनुसार शुक्र प्रदोष व्रत के अवसर पर भक्त अपने परिवार की सुख-समृद्धि, संबंधों में मधुरता और जीवन में सद्भाव बनाए रखने की प्रार्थना करते हैं। जब त्रयोदशी तिथि शुक्रवार के दिन पड़ती है, तब इसे शुक्र प्रदोष व्रत कहा जाता है। वर्ष 2026 में 23 अक्टूबर, शुक्रवार को शुक्र प्रदोष व्रत मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन श्रद्धापूर्वक भगवान शिव की आराधना करने से जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इसे भी पढ़ें: Dravidian Architecture का बेजोड़ नमूना है Chamundeshwari Temple, शिखर पर हैं 7 स्वर्ण कलश जानें आश्विन शुक्र प्रदोष व्रत का शुभ मुहूर्त वर्ष 2026 में अगला शुक्र प्रदोष व्रत 23 अक्टूबर, शुक्रवार को है। इस दिन प्रदोष काल की पूजा का शुभ समय शाम 5 बजकर 43 मिनट से रात 8 बजकर 16 मिनट तक है (कुल 2 घंटे 33 मिनट)। त्रयोदशी तिथि 23 अक्टूबर को दोपहर 2:34 बजे से शुरू होकर 24 अक्टूबर को दोपहर 1:35 बजे समाप्त होगी। आश्विन शुक्र प्रदोष व्रत का महत्व भी है खास पंडितों के अनुसार प्रदोष काल सूर्यास्त के आसपास का वह विशेष समय होता है, जिसमें भगवान शिव की पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इस समय शिव-आराधना, मंत्र-जप, ध्यान और दीपदान का विशेष महत्व बताया गया है। यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती की संयुक्त आराधना के लिए रखा जाता है। शुक्रवार को पड़ने के कारण इसे शुक्र प्रदोष कहा जाता है, जो दांपत्य जीवन में मधुरता, प्रेम, ऐश्वर्य और सुख-समृद्धि प्रदान करता है। भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना का एक पावन अवसर है। यह पर्व हमें श्रद्धा, संयम, करुणा और पारिवारिक प्रेम का महत्व समझाता है। भगवान शिव की पूजा करते हुए हमें अपने जीवन में सत्य, सदाचार और सेवा के मूल्यों को अपनाने का संकल्प लेना चाहिए। शुक्र प्रदोष व्रत का वास्तविक महत्व केवल उपवास रखने या पूजा करने तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य मन को निर्मल बनाना, नकारात्मक विचारों से दूर रहना और दूसरों के प्रति प्रेम तथा सहानुभूति का भाव विकसित करना भी है। आश्विन शुक्र प्रदोष व्रत के दिन ऐसे करें पूजा, होगा लाभ पंडितों के अनुसार आश्विन शुक्र प्रदोष व्रत का दिन विशेष होता है इसलिए इस दिन प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। व्रत अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार रखें। शाम को प्रदोष काल में पूजा की तैयारी करें। पूजा स्थल को स्वच्छ करके भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। शिवलिंग उपलब्ध हो तो श्रद्धापूर्वक जल अर्पित करें। परंपरा के अनुसार दूध, पुष्प, बेलपत्र, चंदन, धूप और दीप का उपयोग भी करें। पूजा सामग्री अर्पित करते समय स्वच्छता और श्रद्धा का ध्यान रखें। इसके बाद भगवान शिव के मंत्र ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप करें। शिव चालीसा, प्रदोष व्रत कथा अथवा शिव स्तुति का पाठ करें। अंत में भगवान शिव और माता पार्वती की आरती करके परिवार तथा समाज के कल्याण की प्रार्थना करें। व्रत रखने वाले श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार फलाहार कर सकते हैं। पूजा में दिखावे के बजाय श्रद्धा, संयम और सद्भाव को प्राथमिकता देनी चाहिए। आश्विन शुक्र प्रदोष व्रत की पौराणिक कथा भी है खास प्रदोष व्रत से संबंधित विभिन्न धार्मिक कथाएं प्रचलित हैं। इन कथाओं में भगवान शिव की करुणा, भक्तों की निष्ठा और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है। पंडितों के अनुसार जो व्यक्ति सच्चे मन से भगवान शिव की उपासना करता है, वह कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने और अपने जीवन को सदाचार की दिशा में आगे बढ़ाने की प्रेरणा प्राप्त करता है। प्रदोष व्रत की कथा सुनने का उद्देश्य केवल पुण्य प्राप्ति की कामना करना नहीं, बल्कि उसके नैतिक संदेश को अपने जीवन में उतारना भी है। सत्य बोलना, दूसरों के प्रति दया रखना, माता-पिता और गुरुजनों का सम्मान करना तथा जरूरतमंदों की सहायता करना भी शिवभक्ति के महत्वपूर्ण अंग हैं। आश्विन शुक्र प्रदोष व्रत करने से होंगे ये लाभ धार्मिक विश्वास के अनुसार, शुक्र प्रदोष व्रत करने से भक्त को भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस व्रत को सुख-सौभाग्य, पारिवारिक शांति और समृद्धि की कामना से जोड़ा जाता है। पूजा, ध्यान और मंत्र-जाप से मन को एकाग्र करने में सहायता मिल सकती है। शिव-पार्वती की आराधना परिवार में प्रेम, सम्मान और सहयोग की भावना विकसित करने की प्रेरणा देती है। व्रत और प्रार्थना व्यक्ति को आत्मचिंतन तथा संयम का अवसर प्रदान करते हैं। जरूरतमंदों की सहायता करना करुणा और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को मजबूत करता है। भगवान शिव का स्मरण आत्मअनुशासन, वैराग्य और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। इन लाभों को धार्मिक आस्था और आध्यात्मिक परंपरा के संदर्भ में समझना चाहिए। आश्विन शुक्र प्रदोष व्रत में ध्यान रखने योग्य बातें पंडितों के अनुसार आश्विन शुक्र प्रदोष व्रत के दिन मन, वचन और कर्म की शुद्धता बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। किसी के प्रति कटु वचन न बोलें और यथासंभव विवादों से दूर रहें। अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र अथवा अन्य उपयोगी सामग्री दान कर सकते हैं। व्रत के दौरान स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी आवश्यक है। बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं या किसी स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे लोगों को उपवास संबंधी निर्णय अपनी आवश्यकताओं और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार लेना चाहिए। भगवान के प्रति सच्ची श्रद्धा के लिए शरीर को कष्ट देना आवश्यक नहीं है। - प्रज्ञा पाण्डेय

प्रभासाक्षी 23 Oct 2026 1:15 pm

Dussehra 2026: देशभर में आज मनेगा विजयादशमी पर्व, शाम को है रावण दहन का शुभ मुहूर्त

आज यानी की 20 अक्तूबर 2026 को देशभर में दशहरा का पर्व मनाया जा रहा है। हर साल यह पर्व आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण का वध कर देवी सीता को उनकी कैद से आजाद कराया था। दशहरा के दिन को विजयादशमी भी कहा जाता है। इस दिन भगवान श्रीराम की पूजा, शस्त्र पूजन, दान-पुण्य और रावण दहन किया जाता है। तो आइए जानते हैं इस पर्व की तिथि, रावण दहन का मुहूर्त और धार्मिक महत्व के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक आश्विन माह की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि 20 अक्तूबर 2026 को दोपहर 12:51 मिनट पर शुरू होगी। वहीं इस तिथि की समाप्ति 21 अक्तूबर की दोपहर 02:11 मिनट पर होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 20 अक्तूबर 2026 को दशहरा का पर्व मनाया जा रहा है। शस्त्र पूजा का मुहूर्त विजयादशमी के मौके पर शस्त्र पूजन की परंपरा होती है। इस दिन शस्त्र की पूजा करके साहस, शक्ति और विजय की कामना की जाती है। माना जाता है कि विजयादशमी पर शस्त्र की पूजा करने से व्यक्ति की कभी पराजय नहीं होती है। आज शस्त्र पूजा के लिए विजय मुहूर्त दोपहर 01:59 मिनट से लेकर 02:45 मिनट तक है। वहीं अपराह्व पूजा मुहूर्त दोपहर 01:14 मिनट से लेकर शाम 03:30 मिनट तक है। रावण दहन का मुहूर्त दशहरे का पर्व बुराई पर अच्छाई का प्रतीक है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक रावण दहन के लिए प्रदोष काल का समय शुभ माना जाता है। इस दौरान सूर्यास्त के आसपास का समय भगवान की विजय का उत्सव मनाया जाता है और साथ ही रावण दहन किया जाता है। आज 20 अक्तूबर को प्रदोष काल का समय शाम 05:47 मिनट से लेकर रात 08:23 मिनट तक रहेगा। वहीं अबूझ मुहूर्त को रावण दहन के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। वहीं रात 11:41 मिनट से लेकर रात 12:31 मिनट तक निशिता काल में भी पूजा की जाती है। अपराजिता देवी की पूजा दशहरे के मौके पर अपराजिता देवी की पूजा करना शुभ होता है। यह पूजा रावण दहन से पहले करनी चाहिए। धार्मिक मान्यता है कि देवी अपराजिता की पूजा होने से जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है। देवी अपराजिता की पूजा करने से व्यक्ति का कार्य कोई असफल नहीं होता है। इसके लिए पूजा का स्थान साफ कर लें और एक चौकी पर साफ कपड़ा बिछाएं। फिर देवी अपराजिता देवी की प्रतिमा स्थापित करें। इसके बाद माता का जल और पंचामृत से अभिषेक करें और उनको अक्षत, फूल, वस्त्र, कुमकुम, फल, धूप और श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें। इसके बाद देवी अपराजिता की चालीसा का पाठ करें। साथ ही 'ऊँ अपराजिताये नम:' मंत्र का जाप करें। देवी को सफेद या पीले रंग की मिठाई, फल या खीर का भोग अर्पित करें। पूजा के अंत में देवी अपराजिता की आरती करें। साथ ही पूजा में हुई भूल चूक के लिए क्षमायाचना करें।

प्रभासाक्षी 20 Oct 2026 9:55 am

Maha Navami पर मां सिद्धिदात्री को लगाएं सफेद तिल का भोग, मंत्र जाप के साथ करें हवन अनुष्ठान

आज यानी की 19 अक्तूबर को शारदीय नवरात्रि के महाष्टमी और महानवमी से जुड़े अनुष्ठान किए जा रहे हैं। क्योंकि तिथियों के संयोग की वजह से अष्टमी औऱ नवमी तिथि एक ही दिन है। ऐसे में दोनों तिथियों की पूजा एक ही दिन की जा रही है। वहीं नवमी तिथि को मां दुर्गा के 9वें स्वरूप मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। इस दौरान हवन, कन्या पूजन और व्रत पारण भी किया जाता है। महानवमी तिथि वैदिक पंचांग के मुताबिक 19 अक्तूबर को सुबह 10:51 मिनट से नवमी तिथि की शुरूआत हो रही है। वहीं इस तिथि की समाप्ति अगले दिन यानी की 20 अक्तूबर की दोपहर 12:50 मिनट पर होगी। उदयातिथि के स्पर्श के हिसाब से महानवमी भी 19 अक्तूबर को मनाई जा रही है। कन्या पूजन शारदीय नवरात्रि में अष्टमी औऱ नवमी दोनों तिथियों पर कन्या पूजन किया जाता है। ऐसे में आप भी अष्टमी और नवमी दोनों तिथि पर कन्या पूजन कर सकते हैं। 19 अक्तूबर को अष्टमी और नवमी पर कन्या पूजन के लिए पहला शुभ मुहूर्त सुबह 07:28 मिनट से लेकर सुबह 09:16 मिनट तक रहने वाला है। इसके बाद सुबह 11:43 मिनट से लेकर दोपहर 12:29 मिनट तक भी कन्या पूजन किया जा सकता है। क्योंकि इस दौरान अभिजीत मुहूर्त मान्य रहेगा। महानवमी पर सिद्धिदात्री की पूजा नवरात्रि के 9वें दिन मां दुर्गा के सिद्धदात्री स्वरूप की पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक मां सिद्धिदात्री को विवेक, ज्ञान और सिद्धि देने वाली देवी माना जाता है। इस दिन भी हवन और कन्या पूजन का विधान होता है। इस दिन मां सिद्धिदात्री को फल, फूल, दीप, नैवेद्य आदि अर्पित करें। वहीं पूजा के दौरान 'ऊँ देवी सिद्धिदात्र्यै नम:' मंत्र का जाप करें। मां सिद्धिदात्री को सफेद तिल से बनी चीजों का भोग अर्पित करें और आरती करें। आप इस दिन हवन भी कर सकते हैं। हवन और व्रत पारण विधि नवरात्रि के अंतिम दिनों में हवन करके पूजा का समापन किया जाता है। नवरात्रि में कन्या पूजन और हवन आदि करने के बाद व्रत का पारण किया जाता है। हालांकि कुछ लोग नवमी को व्रत पारण करते हैं, तो वहीं कुछ लोग दशमी को व्रत खोलते हैं।

प्रभासाक्षी 19 Oct 2026 9:57 am

दुर्गा अष्टमी, महा नवमी और सरस्वती विसर्जन: शक्ति, सिद्धि और ज्ञान की आराधना का महापर्व

शारदीय नवरात्रि के अंतिम चरण में आने वाली दुर्गा अष्टमी, महा नवमी और सरस्वती विसर्जन भारतीय सनातन परंपरा के अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व हैं। ये तीनों अवसर शक्ति, ज्ञान, साधना, आत्मसंयम और अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश देते हैं। वर्ष 2026 में दुर्गा अष्टमी, महा नवमी और सरस्वती विसर्जन का संयोग 19 अक्टूबर, सोमवार को पड़ रहा है। दिल्ली सहित उत्तर भारत के पंचांगों के अनुसार अष्टमी तिथि 18 अक्टूबर की सुबह से शुरू होकर 19 अक्टूबर को लगभग 10:51 बजे समाप्त होगी, जिसके बाद नवमी तिथि आरंभ होगी। इस कारण 19 अक्टूबर को ही दुर्गा अष्टमी और महा नवमी दोनों के पर्व मनाए जाएंगे। 2026 में कब हैं ये पर्व? दुर्गा अष्टमी / महाष्टमी 19 अक्टूबर 2026 सोमवार महा नवमी 19 अक्टूबर 2026 सोमवार सरस्वती विसर्जन 19 अक्टूबर 2026 सोमवार विजयादशमी / दशहरा 20 अक्टूबर 2026 मंगलवार पंचांग के अनुसार 2026 में अष्टमी और नवमी का तिथि-संयोग ऐसा है कि दोनों पर्व 19 अक्टूबर को पड़ रहे हैं। इसी दिन सरस्वती विसर्जन भी निर्धारित है। दुर्गा अष्टमी का धार्मिक महत्व दुर्गा अष्टमी को महाष्टमी या महादुर्गाष्टमी भी कहा जाता है। नवरात्रि के इस दिन देवी दुर्गा के महागौरी स्वरूप की पूजा की जाती है। यह दिन देवी की शक्ति और उनके दैवी स्वरूप की आराधना का विशेष अवसर माना जाता है। मान्यता है कि देवी ने दुष्ट शक्तियों का संहार कर संसार में धर्म और व्यवस्था की स्थापना की। इसलिए महाष्टमी का संदेश है कि जब अधर्म और अत्याचार बढ़ता है, तब दैवी शक्ति धर्म की रक्षा के लिए प्रकट होती है। इसे भी पढ़ें: Navratri Kanya Pujan Samagri: थाली, चुनरी से लेकर हलवा-चना भोग तक, कन्या पूजन में शामिल करें ये चीजें कई परंपराओं में इसी दिन संधि पूजा का विशेष महत्व होता है। अष्टमी और नवमी के संधिकाल को अत्यंत पवित्र माना जाता है। 2026 में दिल्ली के पंचांग के अनुसार संधि पूजा का समय लगभग सुबह 10:27 से 11:15 बजे के बीच बताया गया है। स्थानीय पंचांग के अनुसार समय में थोड़ा अंतर हो सकता है। दुर्गा अष्टमी की पूजा विधि सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल को स्वच्छ करें। इसके बाद देवी दुर्गा का ध्यान करें। दीपक और धूप प्रज्वलित करें। देवी को लाल या पीले वस्त्र, पुष्प और अक्षत अर्पित करें। रोली, सिंदूर, फल, मिष्ठान और नैवेद्य अर्पित करें। दुर्गा सप्तशती अथवा देवी के मंत्रों का पाठ करें। देवी की आरती करें। श्रद्धानुसार कन्या पूजन करें। कन्याओं को भोजन कराकर दक्षिणा एवं उपहार दें। महाष्टमी पर कन्या पूजन विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। छोटी कन्याओं को देवी के स्वरूप के रूप में सम्मान देकर भोजन कराया जाता है। महा नवमी : साधना की पूर्णता का दिन नवरात्रि का नवम दिन महा नवमी कहलाता है। देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों में इस दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। वहीं दुर्गा पूजा की परंपरा में देवी को महिषासुरमर्दिनी के रूप में भी आराध्य माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी कालखंड में देवी ने महिषासुर का वध किया था। महा नवमी नवरात्रि की साधना के समापन की ओर बढ़ने का प्रतीक है। इस दिन किया जाने वाला नवमी हवन विशेष महत्व रखता है। 2026 में नवमी तिथि 19 अक्टूबर को लगभग 10:51 बजे प्रारंभ होकर 20 अक्टूबर को लगभग 12:50 बजे तक रहेगी। महा नवमी की पूजा विधि महा नवमी पर प्रातः स्नान करके पूजा स्थान पर देवी की स्थापना के सामने दीप जलाएं। इसके बाद देवी सिद्धिदात्री का ध्यान करें। देवी को पुष्प, अक्षत, रोली, फल और नैवेद्य अर्पित करें। दुर्गा सप्तशती अथवा नवमी से संबंधित मंत्रों का पाठ करें। श्रद्धानुसार कन्या पूजन करें। नवमी हवन करें। हवन के बाद देवी की आरती करें। परिवार की सुख-शांति और समृद्धि के लिए प्रार्थना करें। नवमी हवन को नवरात्रि साधना का महत्वपूर्ण अंग माना जाता है और पारंपरिक रूप से नवमी पूजा के अंत में हवन किया जाता है। सरस्वती विसर्जन : ज्ञान की देवी को विदाई शारदीय नवरात्रि में कई परंपराओं में देवी सरस्वती की भी विशेष पूजा की जाती है। विशेष रूप से दक्षिण भारत और कुछ अन्य क्षेत्रों में नवरात्रि के दौरान सरस्वती आवाहन, पूजा और विसर्जन की परंपरा है। देवी सरस्वती को विद्या, बुद्धि, वाणी, संगीत और ज्ञान की देवी माना जाता है। इसलिए सरस्वती विसर्जन केवल प्रतिमा को विदा करने की परंपरा नहीं, बल्कि देवी से प्राप्त ज्ञान को जीवन में धारण करने का प्रतीकात्मक अवसर भी है। 2026 में सरस्वती विसर्जन 19 अक्टूबर, सोमवार को है। कुछ पंचांगों में श्रवण नक्षत्र के आधार पर विसर्जन का समय निर्धारित किया जाता है। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश के सिरसी क्षेत्र के पंचांग में 19 अक्टूबर को श्रवण नक्षत्र के दौरान लगभग दोपहर 3:38 बजे से रात 10:14 बजे तक विसर्जन का समय दिया गया है। स्थानीय नगर के पंचांग के अनुसार मुहूर्त अलग हो सकता है। सरस्वती विसर्जन की पूजा विधि विसर्जन से पहले देवी सरस्वती की विधिवत पूजा की जाती है। फिर देवी को पुष्प अर्पित करें। अक्षत, चंदन और नैवेद्य चढ़ाएं। पुस्तकों, वाद्य यंत्रों और अध्ययन सामग्री की भी पूजा करें। सरस्वती मंत्र का जाप करें। ज्ञान और विवेक की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करें। आरती करें। इसके बाद श्रद्धा और स्थानीय परंपरा के अनुसार देवी की प्रतिमा का विसर्जन करें। पंचांग परंपरा में सरस्वती विसर्जन को सरस्वती उद्वासन भी कहा जाता है। दुर्गा अष्टमी और महा नवमी की व्रत कथा दुर्गा अष्टमी और महा नवमी से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा महिषासुर वध की है। पौराणिक कथा के अनुसार महिषासुर नामक असुर ने कठोर तपस्या करके ऐसा वर प्राप्त किया कि उसका वध किसी पुरुष के हाथों न हो सके। वरदान के प्रभाव से वह अत्यंत शक्तिशाली हो गया और उसने देवताओं तथा पृथ्वी पर अत्याचार करना शुरू कर दिया। महिषासुर के अत्याचार से परेशान देवताओं ने अपनी-अपनी शक्तियों का तेज एकत्र किया। इसी दिव्य शक्ति से आदि शक्ति देवी दुर्गा का प्राकट्य हुआ। देवताओं ने देवी को अनेक दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। देवी ने महिषासुर और उसकी विशाल सेना के विरुद्ध युद्ध किया। यह युद्ध कई दिनों तक चला। अंततः देवी ने महिषासुर का वध किया और संसार को उसके आतंक से मुक्त कराया। इसीलिए नवरात्रि को शक्ति की उपासना और महा नवमी को अधर्म पर धर्म की विजय के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। नवरात्रि की यह कथा विभिन्न पुराणों और देवी परंपराओं में अलग-अलग विवरणों के साथ मिलती है; इसलिए इसे धार्मिक मान्यता के रूप में समझना उचित है। कन्या पूजन का विशेष महत्व अष्टमी और नवमी पर कन्या पूजन की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है। इसमें छोटी कन्याओं को देवी के स्वरूप के रूप में सम्मान दिया जाता है। कन्याओं के चरण धोकर उन्हें भोजन कराया जाता है और सामर्थ्य के अनुसार वस्त्र, फल, मिठाई या दक्षिणा दी जाती है। कई परिवारों में एक छोटे बालक को भैरव स्वरूप मानकर कन्याओं के साथ भोजन कराया जाता है। इस परंपरा का मूल संदेश यह है कि नारी शक्ति का सम्मान केवल पूजा के दिन नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक दिन होना चाहिए। 2026 में एक विशेष संयोग वर्ष 2026 की शारदीय नवरात्रि में 19 अक्टूबर विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहेगा, क्योंकि इसी दिन दुर्गा अष्टमी, महा नवमी और सरस्वती विसर्जन का उल्लेख विभिन्न पंचांगों में मिलता है। अगले दिन 20 अक्टूबर को विजयादशमी और दुर्गा विसर्जन होगा। इस प्रकार नवरात्रि के ये अंतिम दिन तीन महत्वपूर्ण भावनाओं को एक साथ सामने रखते हैं। अष्टमी— शक्ति की आराधना। नवमी— साधना और सिद्धि की पूर्णता। सरस्वती विसर्जन— ज्ञान और विवेक को जीवन में धारण करने का संकल्प। - शुभा दुबे

प्रभासाक्षी 18 Oct 2026 1:48 pm

Sharadiya Navratri के 5वें दिन उपांग Lalita Vrat, जानिए देवी पूजा की विधि और मुहूर्त

शारदीय नवरात्रि के 5वें दिन उपांग ललिता व्रत किया जाता है। इसको ललिता पंचमी भी कहा जाता है। इस बार आज यानी की 15 अक्तूबर 2026 को उपांग ललिता व्रत किया जा रहा है। इस दिन देवी ललिता की पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन देवी ललिता की पूजा करने से जीवन में सुख-सौभाग्य और समृद्धि का आगमन होता है। वहीं देवी ललिता को राजेश्वरी, त्रिपुरा सुंदरी और षोडशी के नाम से भी जाना जाता है। तो आइए जानते हैं उपांग ललिता व्रत की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक आश्विन माह की पंचमी तिथि की शुरूआत 15 अक्टूबर 2026 को सुबह 01:13 बजे से मिनट से हो रही है। वहीं अगले दिन यानी की 16 अक्तूबर 2026 की सुबह 03:25 बजे इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 15 अक्तूबर 2026 को उपांग ललिता व्रत किया जा रहा है। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ लाल या पीले कपड़े पहनें। फिर घर के मंदिर की साफ-सफाई करें और एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर देवी ललिता की प्रतिमा को स्थापित करें। अब शुद्ध दीपक जलाकर पूजा का संकल्प लें। फिर देवी ललिता को लाल पुष्प, कुमकुम, रोली, अक्षत, इत्र, गंध, ऋतुफल और सात्विक नैवेद्य आदि अर्पित करें। नवरात्रि के पांचवे दिन देवी स्कंदमाता के साथ देवी ललिता और भोलेनाथ की पूजा करें। इस दिन ललिता सहस्त्रनाम या ललिता त्रिशती का पाठ करना चाहिए। वहीं आर्थिक संकट से मुक्ति पाने और समृद्धि की कामना के लिए मां ललिता के मूल मंत्र 'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौ: ॐ ह्रीं श्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौ: ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं नमः' का जाप करना चाहिए। अंत में आरती करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें। महत्व धार्मिक मान्यता के अनुसार, देवी ललिता शक्ति, सौंदर्य, समृद्धि और सौभाग्य की देवी हैं। पौराणिक कथा में उल्लेख मिलता है कि कामदेव के भस्म होने के बाद राख से भांडासुर नाम का एक असुर उत्पन्न हुआ। भांडासुर ने देवताओं पर अत्याचार करना शुरूकर दिया। उस असुर से मुक्ति दिलाने के लिए देवी ललिता का प्राकट्य हुआ और उन्होंने भांडासुर का वध किया। मान्यता है कि ललिता पंचमी का व्रत नवविवाहित महिलाओं और परिवार की सुख-शांति, समृद्धि, दीर्घायु और विद्या की कामना के लिए विशेष फलदायी होता है।

प्रभासाक्षी 15 Oct 2026 9:02 am

कोमल पावस्कर के 5 फैशन लुक्स, जिन्होंने अपने स्टाइल से बटोरी सुर्खियां

चाहे बोल्ड कलर हो, आकर्षक सिल्हूट या फिर सादगी से भरा अंदाज, उनके फैशन चॉइसेज में मॉडर्न स्टाइल और टाइमलेस चार्म का खूबसूरत मेल देखने को मिलता है। तो आइए, उनके पांच ऐसे लुक्स पर नजर डालते हैं, जिनसे फैशन इंस्पिरेशन ली जा सकती है।

खास खबर 14 Oct 2026 1:31 pm

Shardiya Navratri 2026: नारी सशक्तिकरण का पर्व है नवरात्रि

भारत त्योहारों का देश है जहां हर पर्व का अपना एक विशेष महत्व और पौराणिक कथा होती है। ऐसा ही एक महत्वपूर्ण पर्व है नवरात्रि । यह पर्व मां दुर्गा के नौ रूपों की उपासना और शक्ति आराधना का प्रतीक है। नवरात्रि मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा और आराधना के लिए समर्पित है। जिन्हें शक्ति, साहस, और नारी सशक्तिकरण का प्रतीक माना जाता है। नवरात्रि का अर्थ है नौ रातें। इस दौरान भक्त देवी दुर्गा की विशेष पूजा करते हैं, उपवास रखते हैं, और भक्ति में लीन रहते हैं। इन नो दिनों का भारतीय धर्म एवं दर्शन में ऐतिहासिक महत्व है और इन्हीं दिनों में बहुत सी दिव्य घटनाओं के घटने की जानकारी हिन्दू पौराणिक ग्रन्थों में मिलती है। माता के इन नौ रूपों को नवदुर्गा के नाम से भी जाना जाता है जो इस प्रकार हैं -शैलपुत्री, ब्रह्माचारिणी, चन्द्रघन्टा, कूष्माण्डा, स्कन्द माता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी और सिध्दिदात्री। नवरात्रि का त्योहार एक बार वसंत ऋतु के दौरान चैत्र नवरात्रि और शरद ऋतु के दौरान शरद नवरात्रि के रूप में मनाया जाता है। शरद नवरात्रि अश्विन के महीने के दौरान मनाई जाती है जो आमतौर पर सितंबर या अक्टूबर में आती है। वहीं चैत्र नवरात्रि हिन्दू कैलेंडर के चैत्र महीने के दौरान मनाई जाती है। चैत्र नवरात्रि आमतौर पर मार्च या अप्रैल महीने में मनाई जाती है। नवरात्रि एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ होता है नौ रातें। इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान शक्ति- देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। दसवां दिन दशहरा के नाम से प्रसिद्ध है। इसे भी पढ़ें: Navratri 2026 Kanya Pujan: जानिए महा अष्टमी और नवमी पर कंजक खिलाने का शुभ मुहूर्त नवरात्रि से हमें अधर्म पर धर्म और बुराई पर अच्छाई के जीत की सीख मिलती हैं। यह हमें बताती है की इंसान अपने अंदर की मूलभूत अच्छाइयों से नकारात्मकता पर विजय प्राप्ती और स्वयं के अलौकिक स्वरूप से साक्षात्कार कैसे कर सकता है। भारतीय जन-जीवन में धर्म की महत्ता अपरम्पार है। यह भारत की गंगा-जमुना तहजीब का ही नतीजा है कि सब धर्मों को मानने वाले लोग अपने-अपने धर्म को मानते हुए इस देश में भाईचारे की भावना के साथ सदियों से एक साथ रहते चले आ रहे हैं। यही कारण है की पूरे विश्व में भारत की धर्म व संस्कृति सर्वोतम मानी गयी है। विभिन्न धर्मों के साथ जुड़े कई पर्व भी है जिसे भारत के कोने - कोने में श्रध्दा, भक्ति और धूमधाम से मनाया जाता है। उन्ही में से एक है नवरात्रि। वसन्त की शुरुआत और शरद ऋतु की शुरुआत, जलवायु और सूरज के प्रभावों का महत्वपूर्ण संगम माना जाता है। इन दो समय मां दुर्गा की पूजा के लिए पवित्र अवसर माने जाते है। त्योहार की तिथियां चन्द्र कैलेंडर के अनुसार निर्धारित होती हैं। यह पूजा वैदिक युग से पहले प्रागैतिहासिक काल से है। नवरात्रि के पहले तीन दिन देवी दुर्गा की पूजा करने के लिए समर्पित किए गए हैं। यह पूजा उनकी ऊर्जा और शक्ति की की जाती है। प्रत्येक दिन दुर्गा के एक अलग रूप को समर्पित है। नवरात्रि वर्ष में चार बार आता है। चैत्र, आषाढ़, अश्विन, पौष प्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाता है। नवरात्रि के नौ रातों में तीन देवियों महालक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा के नौ स्वरुपों की पूजा होती है जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। दुर्गा का मतलब जीवन के दुख को हटानेवाली होता है। नवरात्रि एक महत्वपूर्ण प्रमुख त्योहार है जिसे पूरे भारत में पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है। नवरात्रि का त्यौहार असत्य पर सत्य की जीत को दर्शाता है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि साल में दो बार मनाया जाता है। हिंदी महीनो के मुताबिक पहला नवरात्रि चैत्र महीने में मनाया जाता है और दूसरी बार अश्विन महीने में मनाया जाता है। नवरात्रि नौ दिनों तक निरंतर चलता है जिसमे देवी माँ के अलग अलग स्वरूपों की लोग भक्ति और निष्ठा के साथ पूजा करते है। भारत में नवरात्रि अलग अलग राज्यों में विभिन्न तरीको और विधियों के संग मनाई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन्हीं नौ दिनों में मां दुर्गा धरती पर आती है। उनके आने की खुशी में इन दिनों को दुर्गा उत्सव के तौर पर देशभर में धूमधाम से मनाया जाता हैं। नवरात्रि के पहले दिन बालिकाओं की पूजा की जाती है। दूसरे दिन युवती की पूजा की जाती है। तीसरे दिन जो महिला परिपक्वता के चरण में पहुंच गयी है, उसकि पूजा की जाती है। नवरात्रि के चैथे, पांचवें और छठे दिन लक्ष्मी- समृद्धि और शांति की देवी की पूजा करने के लिए समर्पित है। आठवे दिन पर एक यज्ञ किया जाता है। नौवा दिन नवरात्रि समारोह का अंतिम दिन है। यह महानवमी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन उन नौ जवान लड़कियों की पूजा होती है जो अभी तक यौवन की अवस्था तक नहीं पहुंची है। इन नौ लड़कियों को देवी दुर्गा के नौ रूपों का प्रतीक माना जाता है। लड़कियों का सम्मान तथा स्वागत करने के लिए उनके पैर धोए जाते हैं। पूजा के अंत में लड़कियों को उपहार के रूप में नए कपड़े, वस्तुयें, फल प्रदान किए जाते हैं। शक्ति की उपासना का पर्व शारदीय नवरात्र प्रतिपदा से नवमी तक निश्चित नौ तिथि, नौ नक्षत्र, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाया जा रहा है। आदिशक्ति के हर रूप की नवरात्र के नौ दिनों में क्रमशरू अलग-अलग पूजा की जाती है। मां दुर्गा की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है। ये सभी प्रकार की सिद्धियां देने वाली हैं। इनका वाहन सिंह है और कमल पुष्प पर ही आसीन होती हैं। नवरात्रि के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है। इस पर्व से जुड़ी एक कथा अनुसार देवी दुर्गा ने एक भैंस रूपी असुर अर्थात महिषासुर का वध किया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार महिषासुर के एकाग्र ध्यान से बाध्य होकर देवताओं ने उसे अजय होने का वरदान दे दिया। उसको वरदान देने के बाद देवताओं को चिंता हुई कि वह अब अपनी शक्ति का गलत प्रयोग करेगा। महिषासुर ने अपने साम्राज्य का विस्तार स्वर्ग के द्वार तक कर दिया और उसके इस कृत्य को देख देवता विस्मय की स्थिति में आ गए। महिषासुर ने सूर्य, इन्द्र, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, यम, वरुण और अन्य देवताओं के सभी अधिकार छीन लिए और स्वयं स्वर्गलोक का मालिक बन बैठा। देवताओं को महिषासुर के प्रकोप से पृथ्वी पर विचरण करना पड़ रहा था तब महिषासुर के इस दुस्साहस से क्रोधित होकर देवताओं ने देवी दुर्गा की रचना की। ऐसा माना जाता है कि देवी दुर्गा के निर्माण में सारे देवताओं का एक समान बल लगाया गया था। महिषासुर का नाश करने के लिए सभी देवताओं ने अपने अपने अस्त्र देवी दुर्गा को दिए थे और कहा जाता है कि इन देवताओं के सम्मिलित प्रयास से देवी दुर्गा और बलवान हो गईं थी। इन नौ दिन देवी-महिषासुर संग्राम हुआ और अन्ततरू महिषासुर-वध कर महिषासुर मर्दिनी कहलायीं। नवदुर्गा और दस महाविद्याओं में काली ही प्रथम प्रमुख हैं। भगवान शिव की शक्तियों में उग्र और सौम्य, दो रूपों में अनेक रूप धारण करने वाली दशमहाविद्या अनंत सिद्धियां प्रदान करने में समर्थ हैं। दसवें स्थान पर कमला वैष्णवी शक्ति हैं, जो प्राकृतिक संपत्तियों की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी हैं। देवता, मानव, दानव सभी इनकी कृपा के बिना पंगु हैं, इसलिए आगम-निगम दोनों में इनकी उपासना समान रूप से वर्णित है। सभी देवता, राक्षस, मनुष्य, गंधर्व इनकी कृपा-प्रसाद के लिए लालायित रहते हैं। नवरात्रि के दौरान उपवास करने से शरीर से विषाक्त पदार्थ निकल जाते हैं, जिससे शरीर स्वस्थ और निरोगी रहता है। नवरात्रि के दौरान ध्यान, योग और भक्ति करने से मन को शांति मिलती है, जिससे तनाव और चिंता कम होती है। नवरात्रि व्रत का मूल उद्देश्य है इंद्रियों का संयम और आध्यात्मिक शक्ति का संचय। वस्तुत: नवरात्र अंत:शुद्धि का महापर्व है। आज वातावरण में चारों तरफ विचारों का प्रदूषण है। ऐसी स्थिति में नवरात्र का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। - रमेश सर्राफ धमोरा (लेखक राजस्थान सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार है।)

प्रभासाक्षी 13 Oct 2026 5:56 pm

Sarva Pitru Amavasya 2026: पूर्वजों के प्रति सम्मान का प्रतीक है सर्वपितृ अमावस्या

आज सर्वपितृ अमावस्या है, हिंदू धर्म में पितृ पक्ष को अपने दिवंगत पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, स्मरण और कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष अवसर माना गया है। इसे महालय अमावस्या, पितृ विसर्जनी अमावस्या और सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है तो आइए हम आपको सर्वपितृ अमावस्या व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं। जानें सर्वपितृ अमावस्या के बारे में पंडितों के अनुसार सर्वपितृ अमावस्या की विशेषता यह है कि इस दिन उन सभी पितरों का श्राद्ध और तर्पण किया जा सकता है, जिनकी मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं है या जिनका श्राद्ध किसी कारणवश निर्धारित तिथि पर नहीं हो पाया। 10 अक्टूबर को पितृ पक्ष समाप्त होगा और 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि प्रारंभ होगी। इस प्रकार सर्वपितृ अमावस्या पितृ पक्ष और देवी पक्ष के बीच एक महत्वपूर्ण संक्रमण दिवस है। इसलिए पितृ पक्ष के सभी दिनों में इस अमावस्या को विशेष महत्व प्राप्त है। शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या पड़ रही है। अमावस्या तिथि के साथ पितृ पक्ष भी खत्म हो जाते हैं। इस साल की सर्वपितृ अमावस्या आध्यात्मिक नजरिए से बेहद खास हैं, क्योंकि इस वर्ष यह शनिवार के दिन पड़ रही है। जिस वजह से इसे 'शनिश्चरी अमावस्या' के नाम से भी जाना जाता है। इसे भी पढ़ें: Sarvapitri Amavasya पर Shradh और Pind Daan से होगा Pitru Paksha का समापन जानें सर्वपितृ अमावस्या का शुभ मुहूर्त सर्वपितृ अमावस्या शनिवार, 10 अक्टूबर 2026 को मनाई जाएगी। यह पितृ पक्ष का अंतिम दिन है और इसे महालय अमावस्या, पितृ विसर्जनी अमावस्या तथा सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या भी कहा जाता है। - दिन: शनिवार, 10 अक्टूबर 2026 - तिथि: आश्विन कृष्ण अमावस्या - अमावस्या तिथि प्रारंभ: 9 अक्टूबर रात लगभग 9:35 बजे - अमावस्या तिथि समाप्त: 10 अक्टूबर रात लगभग 9:19 बजे - पितृ पक्ष का समापन: 10 अक्टूबर - शारदीय नवरात्रि का आरंभ: 11 अक्टूबर 2026 सर्वपितृ अमावस्या का महत्व भी है विशेष शास्त्रों के अनुसार सर्वपितृ अमावस्या उन सभी पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने का विशेष अवसर है जिनका श्राद्ध उनकी निश्चित तिथि पर नहीं हो पाया हो। जिन पितरों की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं है, उनके लिए भी इस दिन श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार पितृ पक्ष के दौरान पितरों का स्मरण और तर्पण करने से परिवार अपने पितृ ऋण के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है। इस दिन किया गया श्राद्ध केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों के प्रति स्मरण, सम्मान और कृतज्ञता का प्रतीक भी माना जाता है। सर्वपितृ अमावस्या के दिन ये करें, होंगे लाभान्वित पंडितों के अनुसार प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पितरों का स्मरण करके तर्पण करें। काले तिल, जल और कुश से तर्पण करने की परंपरा है। सामर्थ्य के अनुसार पिंडदान और श्राद्ध करें। ब्राह्मण अथवा जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराएं। अन्न, वस्त्र, तिल आदि का दान करें। गाय, कौए और कुत्ते को भोजन कराने की परंपरा भी है। पितरों की शांति के लिए प्रार्थना करें। इसलिए महत्वपूर्ण है सर्वपितृ अमावस्या भारतीय परंपरा में मनुष्य के जीवन को केवल वर्तमान तक सीमित नहीं माना गया है। परिवार, समाज और आने वाली पीढ़ियों के साथ-साथ पूर्वजों के योगदान को भी जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है। इसी भावना से पितृ पक्ष में पूर्वजों का स्मरण किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृ पक्ष के दौरान पितरों का स्मरण, तर्पण, श्राद्ध और दान करने से उन्हें शांति प्राप्त होती है और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है। सर्वपितृ अमावस्या उन परिवारों के लिए विशेष अवसर है, जो किसी कारण से अपने पूर्वजों का श्राद्ध उनकी निर्धारित तिथि पर नहीं कर पाए। यह दिन हमें यह भी याद दिलाता है कि हमारी वर्तमान पीढ़ी का अस्तित्व पिछली पीढ़ियों से जुड़ा हुआ है। इसलिए श्राद्ध केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने की परंपरा भी है। इन पितरों के लिए किया जाता है सर्वपितृ अमावस्या श्राद्ध शास्त्रों के अनुसार सर्वपितृ अमावस्या पर परिवार के ऐसे सभी दिवंगत सदस्यों का श्राद्ध किया जा सकता है जिनकी मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं है। इसके अलावा यदि पितृ पक्ष के दौरान किसी कारण से किसी पितर का श्राद्ध नहीं किया जा सका हो, तो इस दिन उनका श्राद्ध करने की परंपरा है। परिवार के दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी तथा अन्य पूर्वजों का स्मरण करके तर्पण और पिंडदान किया जाता है। कई परिवारों में इस दिन अपने वंश के सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों को सामूहिक रूप से श्रद्धांजलि दी जाती है। ऐसे किया जाता है सर्वपितृ अमावस्या का श्राद्ध पंडितों के अनुसार इस दिन प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करने की परंपरा है। इसके बाद पितरों का ध्यान करके तर्पण किया जाता है। तर्पण में सामान्यतः जल, काले तिल और कुश का प्रयोग किया जाता है। श्राद्ध की विधि परिवार की परंपरा और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। जिन परिवारों में पिंडदान की परंपरा है, वे पितरों के निमित्त पिंडदान करते हैं। इसके बाद ब्राह्मण अथवा जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराने और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान करने की परंपरा है। कई स्थानों पर श्राद्ध के बाद गाय, कौए और कुत्ते को भोजन कराने की भी परंपरा है। इसके पीछे यह भावना है कि भोजन और सेवा के माध्यम से जीव-जगत के प्रति भी करुणा और सम्मान व्यक्त किया जाए। सर्वपितृ अमावस्या पर तर्पण और सेवा का है खास महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृ पक्ष में तर्पण को विशेष महत्व दिया जाता है। 'तर्पण' का अर्थ है श्रद्धा और समर्पण के साथ जल अर्पित करना। माना जाता है कि जल अर्पित करते समय पूर्वजों का स्मरण करने से उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त होती है। तर्पण करते समय व्यक्ति अपने पूर्वजों को याद करता है और उनके प्रति सम्मान प्रकट करता है। धार्मिक मान्यताओं में इसे पितृ ऋण से जुड़ा महत्वपूर्ण कर्म माना गया है। सर्वपितृ अमावस्या पर दान करने की भी परंपरा है। व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार अन्न, वस्त्र, तिल, फल और अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान कर सकता है। जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराना भी पुण्यकारी माना जाता है। आज के संदर्भ में इस परंपरा को समाज के कमजोर और जरूरतमंद वर्गों की सहायता से भी जोड़ा जा सकता है। किसी भूखे व्यक्ति को भोजन कराना, गरीब परिवार को राशन देना, बुजुर्गों की सहायता करना या किसी जरूरतमंद विद्यार्थी की पढ़ाई में सहयोग करना भी सेवा और मानवीय संवेदना का माध्यम बन सकता है। सर्वपितृ अमावस्या से जुड़ी पौराणिक मान्यता भी है रोचक शास्त्रों में पितृ पक्ष और श्राद्ध से जुड़ी अनेक कथाएं प्रचलित है। इनमें महाभारत के कर्ण की कथा विशेष रूप से प्रसिद्ध है। मान्यता के अनुसार जब कर्ण की मृत्यु के बाद उन्हें पितृलोक प्राप्त हुआ, तो वहां उन्हें भोजन के स्थान पर स्वर्ण और रत्न प्राप्त हुए। कर्ण ने इसका कारण पूछा तो उन्हें बताया गया कि उन्होंने जीवनभर स्वर्ण आदि का दान तो किया, लेकिन अपने पूर्वजों के लिए अन्न का दान और श्राद्ध नहीं किया। इसके बाद उन्हें पृथ्वी पर लौटकर अपने पितरों के लिए श्राद्ध और अन्नदान करने का अवसर मिला। इसी कथा को पितृ पक्ष की परंपरा से जोड़ा जाता है। कथा का मूल संदेश यह है कि केवल धन-संपत्ति का दान ही पर्याप्त नहीं, बल्कि पूर्वजों का स्मरण और अन्नदान भी महत्वपूर्ण है। सर्वपितृ अमावस्या के दिन ये करें और ये न करें पंडितों के अनुसार सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्रद्धा और संयम के साथ धार्मिक कार्य करने की परंपरा है। इस दिन पितरों का स्मरण, तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान, अन्नदान और जरूरतमंदों की सहायता करना शुभ माना जाता है। वहीं, अनावश्यक क्रोध, विवाद और दिखावे से बचने की सलाह दी जाती है। श्राद्ध कर्म को अपनी पारिवारिक परंपरा और सामर्थ्य के अनुसार करना चाहिए। धार्मिक कर्मकांड में सबसे महत्वपूर्ण भावना श्रद्धा है, न कि खर्च या प्रदर्शन। पितृ पक्ष के बाद शुरू होगा नवरात्रि पर्व सर्वपितृ अमावस्या के साथ पितृ पक्ष का समापन होगा। इसके अगले दिन से शारदीय नवरात्रि का आरंभ होगा। इस दृष्टि से भी सर्वपितृ अमावस्या भारतीय धार्मिक कैलेंडर में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है एक ओर यह पूर्वजों के प्रति श्रद्धांजलि का अवसर है, वहीं इसके बाद शक्ति और देवी उपासना का पर्व शुरू होता है। - प्रज्ञा पाण्डेय

प्रभासाक्षी 10 Oct 2026 12:51 pm

Shardiya Navratri 2026: 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि की शुरुआत, घटस्थापना और पूजा सामग्री की पूरी लिस्ट

सनातन धर्म में नवरात्रि पर्व का विशेष महत्व है। इस बार 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि की शुरुआत हो रही है और इसका समापन 19 अक्टूबर 2026 को होगा। नौ दिनों तक मां दुर्गा के 9 स्वरुपों की पूजा विधिवत रुप से की जाएगी। नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना के साथ पूजा की शुरुआत होती है। नवरात्र में भक्तजन अपने पूजा स्थल को सजाकर माता रानी की प्रतिमा स्थापित करते हैं और कलश पूजन किया जाता है। ऐसे में कई घरों में परंपरा के अनुसार जौ बोए जाते हैं और पूरे नौ दिनों तक अखंड ज्योत भी प्रज्वलित की जाती है। आइए आपको बताते हैं नवरात्रि में मां दुर्गा की पूजा करने की तैयारी कैसे करें, जानें पूजन सामग्री, घटस्थापना और जौ बोने के लिए किन चीजों की आवश्यकता होती है। नवरात्रि पूजा सामग्री की पूरी लिस्ट - मां दुर्गा की तस्वीर या प्रतिमा - भगवान गणेश की प्रतिमा -पूजा की चौकी और आसन -चौकी पर बिछाने के लिए लाल कपड़ा -कलावा या मौली -फूल और फूलों की माला -माता रानी के लिए लाल चुनरी -श्रृंगार की सामग्री -मौसमी फल और प्रसाद -दुर्गा सप्तशती -नारियल -धूप और अगरबत्ती -दीपक, रुई की बाती और घी -आरती की थाली और घंटी -पान के पत्ते और सुपारी -कुमकुम और चंदन -हल्दी और अक्षत -जल रखने के लिए छोटा पात्र -कपूर -अष्टदल कमल -हल्दी और कुमकुम से रंगे चावल -घटस्थापना के लिए जरुरी सामग्री कलश स्थापना के लिए जरूरी सामग्री -मिट्टी या तांबे का कलश -शुद्ध जल एक सिक्का -अक्षत यानी साबुत चावल -नारियल -आम के पत्ते -दो साबुत सुपारी -दो इलायची -हल्दी की एक गांठ -लाल कलावा या मौली -दो साबुत लौंग -नारियल पर बांधने के लिए छोटी लाल चुनरी -नवरात्रि में जौ बोने के लिए सामग्री जौ बोने के लिए जरूरी वस्तुएं -मिट्टी का चौड़ा और बड़ा पात्र -साफ मिट्टी -जौ के दाने -गेहूं के दाने, यदि परंपरा में शामिल हों -पानी -कलावा या मौली नवरात्रि में पूजा कैसे करें? - इस दिन सबसे पहले आप किसी मंदिर या किसी साफ स्थान पर पूजा की चौकी रखें। इस पर लाल कपड़ा बिछाएं और पूजा की सभी वस्तुओं को व्यवस्थित कर लें। - अब चौकी पर अक्षत रखकर माता रानी की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें। इसके साथ ही भगवान गणेश की प्रतिमा भी साथ ही स्थापित करें। - इसके बाद कलश में शुद्ध जल भरें और परंपरा के अनुसार, इसमें सिक्का, अक्षत तथा अन्य निर्धारित सामग्री डाल दें। अब कलश के मुख पर आम के पत्ते लगाएं और ऊपर लाल चुनरी से सजा नारियल रखें। घटस्थापना के लिए अपने क्षेत्र की मान्य परंपरा और पंचांग में बताए गए नियमों का जरुर पालन करें। - अगर आपके घर में जौ बोने की परंपरा है, तो मिट्टी के पात्र में साफी मिट्टी भरकर जौ के दाने डाल दें। अब इसमें थोड़ा पानी छिड़कें और पात्र को पूजा स्थल के पास ही रख दें। - इसके बाद घी का दीपक जलाएं। अगर आप अखंड ज्योति जलाना चाहते हैं, तो उसे सुरक्षित स्थान पर रखें और पूरे समय अग्नि सुरक्षा का ध्यान रखें। अब आरती के लिए अलग से दीपक भी जलाएं। - अब आप भगवान गणेश, मां दुर्गा, कलश और दीपक पर परंपरा के अनुसार हल्दी, कुमकुम और अक्षत अर्पित करें। जिसके बाद फूल, माला और माता रानी को चुनरी और श्रृंगार की सामग्री अर्पित है। - इसके बाद मां दुर्गा को श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार फल, मिश्री, बताशे या अन्य सात्विक प्रसाद अर्पित कर सकते हैं। - पूजा के समय मां दुर्गा के मंत्रों का जाप करें और दुर्गा सप्तशती का पाठ करें। आखिर में विधिवत रुप से माता रानी की आरती करें और परिवार की सुख-शांति के लिए प्रार्थना करें।

प्रभासाक्षी 9 Oct 2026 5:03 pm

ब्रेन स्ट्रोक से जंग : BE FAST अपनाएं, जिंदगी और मुस्कान बचाएं

ब्रेन स्ट्रोक मस्तिष्क में रक्त का प्रवाह रुकने या नस फटने से होने वाली जानलेवा आपात स्थिति है, जिसमें दिमाग की कोशिकाएं तेजी से नष्ट होती हैं। ऐसे में 'BE FAST' सूत्र—संतुलन बिगड़ना, आंखों से धुंधला दिखना, चेहरा टेढ़ा होना, हाथ में कमजोरी, बोली लड़खड़ाना और तुरंत अस्पताल पहुंचना—जीवनरक्षक साबित होता है। शुरुआती 3 से 4.5 घंटे के 'गोल्डन आवर' में उचित इलाज मिलने से मरीज की जान बच सकती है और वह स्थायी अपंगता से पूरी तरह मुक्त हो सकता है।

खास खबर 7 Oct 2026 1:28 pm

हमारा शरीर पांच तत्वों से मिलकर बना है - पाँच तत्वों का महत्व—यहां पढ़ें

प्राचीन समय से ही विद्वानों का मत रहा है कि इस सृष्टि की संरचना पांच तत्वों से मिलकर हुई है। सृष्टि में इन पंचतत्वों का संतुलन बना हुआ है।

खास खबर 3 Oct 2026 3:38 pm

फ्लाईदुबई घटना भले ही हमारे देश में नहीं हुई लेकिन करेंगे गहन जांच: UAE

दुबई से तेल अवीव जा रहे विमान में बड़ा हादसा होते-होते टला। विमान ने दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट से उड़ान भरी थी लेकिन फिर क्रैश कराने की कोशिश के बीच रास्ता बदला गया और आखिरकार इसे सऊदी के तबूक में ही लैंड कराया गया।

खास खबर 1 Oct 2026 5:06 pm

पिता का स्वाभिमान और बेटी का भरोसा: जीवन के वो 8 अनमोल सबक

पिता अपनी सीमित आमदनी, महीने के आखिरी दिनों की तंगी और मन में उठते सैकड़ों सवालों के बावजूद, बेटी की एक आवाज पर वे अपनी हर मजबूरी को किनारे रख देते हैं।...

खास खबर 1 Oct 2026 8:17 am

Vighnaraj Sankashti Chaturthi पर बना Angarki योग, गणेश पूजन का शुभ मुहूर्त और विधि

आज यानी की 29 सितंबर 2026 को विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी मनाई जा रही है। यह पर्व भगवान गणेश को समर्पित है। मंगलवार को यह पर्व पड़ने से इसको अंगारकी संकष्टी चतुर्थी भी कहा जाएगा। इस दिन भगवान गणेश की पूजा का विधान है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन जो भी जातक श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान गणेश की पूजा-अर्चना करता है, उसके जीवन में आने वाले सभी संकट और कष्ट दूर होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। तो आइए जानते हैं विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक 29 सितंबर की शाम 05:09 मिनट से आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि की शुरूआत होगी। वहीं अगले दिन यानी की 30 सितंबर की दोपहर 02:55 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 29 सितंबर 2026 को विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया जा रहा है। पूजन विधि इस दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें और फिर सूर्य देव को अर्घ्य दें। अब व्रत का संकल्प लें और फिर पूजा स्थल की साफ-सफाई करें। इसके बाद एक लकड़ी की चौकी पर पीला या लाल कपड़ा बिछाएं और उस पर गणपति की प्रतिमा को स्थापित करें। अब बप्पा को जल, दूर्वा, फूल, रोली, अक्षत और फल आदि अर्पित करें। इसके बाद मोदक और उनका प्रिय भोग चढ़ाएं। फिर गणेश मंत्र का जाप करें और गणेश चालीसा या गणेश स्त्रोत का पाठ करें। फिर शाम को विधिविधान से भगवान गणेश की पूजा करें। इसके बाद चंद्र दर्शन करें और चंद्र देव को अर्घ्य दें और फिर व्रत खोलें। महत्व भगवान गणेश को विघ्नहर्ता कहा जाता है। यही कारण है कि इस व्रत का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन बप्पा की पूजा-अर्चना करने से बाधाएं दूर होती हैं। संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा करने से संकटों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख-समृ्द्धि और सौभाग्य का आगमन होता है।

प्रभासाक्षी 29 Sep 2026 9:51 am

विश्व हृदय दिवस 2026: दिल की सेहत का रखें ख्याल, जानें इस वर्ष की थीम और इतिहास

हृदय या दिल मानव शरीर का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है, जो पूरे शरीर में रक्त को पंप करता है।

खास खबर 28 Sep 2026 5:28 pm

विश्व रेबीज दिवस: हर नौ मिनट में एक व्यक्ति की मौत, 'प्राणघातक' वायरस से ऐसे करें बचाव

हर वर्ष 28 सितंबर को विश्व रेबीज दिवस मनाया जाता है। यह दुनिया का पहला रेबीज टीका विकसित करने वाले फ्रांसीसी वैज्ञानिक लुई पाश्चर की पुण्यतिथि अवसर पर मनाया जाता है।

खास खबर 28 Sep 2026 11:01 am

Pitru Paksha 2026: पितरों के आशीर्वाद के लिए दक्षिण दिशा में करें श्राद्ध, कुशा और काले तिल का प्रयोग अनिवार्य

आज यानी की 27 सितंबर 2026 से पितृपक्ष की शुरूआत हो रही है। इस दौरान पितरों को तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक पितृपक्ष के दौरान पूर्वज पृथ्वी पर आते हैं और अपने वंशजों से तर्पण ग्रहण कर उनपर कृपा बरसाते हैं। पितरों की आत्मशांति और उनका आशीर्वाद पाने के लिए विधिविधान से श्राद्ध कर्म किया जाता है। इस दौरान पूरे 15 दिनों तक कई नियमों का पालन भी किया जाता है। माना जाता है कि यह समय अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का होता है। पितृपक्ष 2026 26 सितंबर - पूर्णिमा श्राद्ध 27 सितंबर - प्रतिपदा श्राद्ध 28 सितंबर - द्वितीया श्राद्ध 29 सितंबर - तृतीया श्राद्ध 30 सितंबर - चतुर्थी और पंचमी श्राद्ध 01 अक्तूबर - षष्ठी श्राद्ध 02 अक्तूबर - सप्तमी श्राद्ध 03 अक्तूबर - अष्टमी श्राद्ध 04 अक्तूबर - नवमी श्राद्ध 05 अक्तूबर - दशमी श्राद्ध 06 अक्तूबर - एकादशी श्राद्ध 07 अक्तूबर - द्वादशी श्राद्ध 08 अक्तूबर - त्रयोदशी श्राद्ध 09 अक्तूबर - चतुर्दशी श्राद्ध 10 अक्तूबर - सर्वपितृ श्राद्ध श्राद्ध करने का समय और जगह श्राद्ध या तर्पण हमेशा दोपहर के समय करना चाहिए। कभी भी सूर्यास्त के बाद यह कर्म नहीं करना चाहिए। पूजा के समय अपना मुंह हमेशा दक्षिण दिशा की ओर रखना चाहिए। इससे पितरों की दिशा माना जाता है। वहीं ध्यान रहे कि हमेशा श्रद्धा जमीन, किसी मंदिर या पवित्र नदी के किनारे ही करना चाहिए। वहीं किसी दूसरे के घर पर श्राद्ध कर्म नहीं करना चाहिए। तर्पण के दौरान कुशा और काले तिल का इस्तेमाल जरूरी माना जाता है। ब्राह्मण भोज और पंचबली का महत्व श्राद्ध वाले दिन कम से कम 3 ब्राह्मणों को घर पर बुलाकर पूरे सम्मान के साथ सात्विक भोजन कराना चाहिए। उनको दान-दक्षिणा देकर विदा करना चाहिए। क्योंकि बिना दान के श्राद्ध अधूरा माना जाता है। इसके साथ ही भोजन का एक हिस्सा गाय, देवताओं, कौवे, कुत्ते और चींटियों के लिए जरूर निकालें। इसको पंचबली कहा जाता है, जोकि पितरों तक खाना पहुंचाने का जरिया माना जाता है।

प्रभासाक्षी 27 Sep 2026 8:02 am

Bhadrapada Anant Chaturdashi पर करें Lakshmi Narayan पूजन, इस विधि से मिलेगा व्रत का फल

आज यानी की 25 सितंबर 2026 को अनंत चतुर्दशी का पर्व मनाया जा रहा है। इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा-अर्चना होती है और इसी के साथ 10 दिनों तक चलने वाले गणेश उत्सव पर गणेश जी की प्रतिमा का विसर्जन होता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन पूजा-अर्चना करने और विशेष उपायों को करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है। इस दिन पूजा के दौरान अनंत सूत्र बांधने की भी परंपरा है। तो आइए जानते हैं अनंत चतुर्दशी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक 24 सितंबर 2026 की रात 11:18 मिनट से भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि की शुरूआत हुई है। वहीं आज यानी की 25 सितंबर 2026 की रात 11:06 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के आधार पर 25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी का व्रत किया जा रहा है। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर सू्र्य देव को अर्घ्य दें और भगवान विष्णु का मन में स्मरण करते हुए व्रत का संकल्प लें। इसके बाद पूजा स्थल की सफाई करें और गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें। फिर एक लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं और कलश स्थापित करें। चौकी पर लक्ष्मी-नारायण की प्रतिमा को स्थापित करें। कलश पर अष्टदल और फूल आदि अर्पित करें और फिर विधि-विधान से भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करें। 14 गांठों वाला अनंत सूत्र अनंत चतुर्दशी की पूजा में अनंत सूत्र का खास महत्व माना जाता है। इसके लिए सूती, कुशा या रेशमी सूत्र लेकर इसमें हल्की और कुमकुम लगाएं, फिर इस सूत्र में 14 गांठें लगाएं। अब इस सूत्र को भगवान श्रीहरि को अर्पित करें। फिर धूप-दीप जलाएं और भगवान विष्णु को भोग लगाएं। इसके बाद अनंत चतुर्दशी व्रत कथा का पाठ करें। पूजा के दौरान 'अनंत संसार महासुमद्रे मग्रं समभ्युद्धर वासुदेव, अनंतरूपे विनियोजयस्व ह्रानंतसूत्राय नमो नमस्ते' मंत्र का जाप करें। इसके बाद महिलाओं बाएं हाथ में और पुरुष दाहिने हाथ में अनंत सूत्र बांधें। पूजा आदि होने के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराएं और यथासंभव दान दें। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन पूजा और व्रत करने से जीवन में सुख-शांति और समृद्धि का आगमन होता है।

प्रभासाक्षी 25 Sep 2026 9:36 am

Vamana Jayanti: Vaman Dwadashi पर पंचामृत अभिषेक और तुलसी दल से करें पूजन, जीवन में आएगी सुख-समृद्धि

हिंदू धर्म में भगवान विष्णु को जगत का पालनहार माना जाता है और श्रीहरि के विभिन्न अवतारों के विशेष महत्व के बारे में भी बताया गया है। भगवान विष्णु के इन्हीं अवतारों में एक अवतार भगवान वामन का अवतार है। हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को वामन जयंती का पर्व मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान वामन की पूजा करने से जीवन में सुख-शांति और समृद्धि की कामना की जाती है। तिथि और मुहूर्त द्रिक पंचांग के मुताबिक 22 सितंबर की रात 09:43 बजे से भाद्रपद शुक्ल द्वादशी तिथि की शुरुआत हुई है। वहीं आज यानी की 23 सितंबर की रात 10:50 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 23 सितंबर 2026 को वामन जयंती मनाई जा रही है। इसको वामन द्वादशी के नाम से भी जानते हैं। कौन सा अवतार हैं वामन पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक भगवान विष्णु के दशावतारों में पांचवें अवतार भगवान वामन हैं। मत्स्य, कूर्म, वराह और नरसिंह अवतार के बाद श्रीहरि ने वामन रूप धारण किया था। धार्मिक मान्यता है कि वामन भगवान का जन्म भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को हुआ था। इनके माता अदिति और पिता ऋषि कश्यप माने जाते हैं। भगवान वामन ने अपने इस अवतार से राजा बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी थी। पूजन विधि इस दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि करें और साफ कपड़े पहनें। फिर भगवान वामन का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें और सूर्य देव को जल अर्पित करें। फिर एक चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं और उस पर भगवान विष्णु या भगवान वामन की प्रतिमा को स्थापित करें। फिर 'ॐ नमो भगवते वामनाय नमः' मंत्र का जाप करते हुए भगवान विष्णु का पहले पंचामृत और बाद में साफ पानी से अभिषेक करें। भगवान विष्णु को पीले पुष्प, अक्षत, चंदन, पीले वस्त्र और तुलसी दल आदि अर्पित करें। फिर धूप-दीप जलाकर भगवान को तुलसी दल के साथ सात्विक भोग और फल अर्पित करें। इसके बाद वामन अवतार से जुड़ी कथा का पाठ करें और आरती करें। वहीं पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें और सुख-समृद्धि की कामना करें। महत्व इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा-आराधना की जाती है। इस दिन जो भी जातक भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना और उनके वामन स्वरूप की पूजा करता है। व्रत, पूजा, कथा और दान-पुण्य जैसे कार्य करता है। उसके जीवन में सुख-शांति और सौभाग्य आता है।

प्रभासाक्षी 23 Sep 2026 9:21 am

Parivartini Ekadashi व्रत से मिलेगा वाजपेय यज्ञ जैसा पुण्य, योगनिद्रा में करवट बदलेंगे श्रीहरि

हर साल भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को पार्श्व एकादशी का व्रत किया जाता है। इस बार 22 सितंबर 2026 को पार्श्व एकादशी का व्रत किया जा रहा है। इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना की जाती है। पार्श्व एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी भी कहा जाता है। पार्श्व एकादशी का व्रत करने से जातक के सभी पाप नष्ट होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। तो आइए जानते हैं पार्श्व एकादशी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और धार्मिक महत्व के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक 21 सितंबर को रात 08:00 बजे से एकादशी तिथि की शुरूआत हुई है। वहीं आज यानी की 22 सितंबर 2026 की रात 09:43 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। इसलिए उदयातिथि के आधार पर 22 सितंबर 2026 को पार्श्व एकादशी का व्रत किया जा रहा है। पूजन विधि इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठने के बाद साफ कपड़े पहनें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद पूजा स्थल की साफ-सफाई करें और एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं। इसके बाद भगवान विष्णु या वामन देव की मूर्ति को स्थापित करें। फिर पानी से भरा तांबे का कलश रखें और इसके ऊपर आम के पत्ते रखें और फिर एक नारियल रखें। अब भगवान विष्णु की मूर्ति को गंगाजल और पंचामृत से साफ करें और फिर साफ पानी से धोकर पोछें। श्रीहरि को चंदन का तिलक करें और रोली, अक्षत, पीले फूल, धूप-दीप और शुद्ध देसी घी का दीपक जलाएं। भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी का इस्तेमाल जरूर करें। तुलसी दल को एकादशी के एक दिन पहले तोड़ कर रख लेना चाहिए। भगवान विष्णु को फल, पंचमेवा और खीर का भोग अर्पित करें। वहीं हर भोग में तुलसी दल का इस्तेमाल जरूर करें। फिर विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें और परिवर्तनी एकादशी व्रत कथा जरूर पढ़ें। पूजा के अंत में आरती करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें। महत्व पार्श्व एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी भी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन स्वरूप की पूजा-अर्चना की जाती है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के मुताबिक एकादशी के दिन भगवान विष्णु क्षीर सागर में योगनिद्रा के दौरान बाएं से दाएं करवट बदलते हैं। माना जाता है कि पार्श्व एकादशी का व्रत करने से जातक को वाजपेय यज्ञ के बराबर पुण्यफल की प्राप्ति होती है। वहीं इस व्रत के प्रभाव से पापों का नाश होता है।

प्रभासाक्षी 22 Sep 2026 9:27 am

Mahalaxmi Vrat Puja: Mahalakshmi Vrat आज से शुरू, धन समृद्धि के लिए इस तरह करें कलश स्थापना और पूजन

मां लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए और घर में सुख-सौभाग्य व धन की वृद्धि के लिए महालक्ष्मी का व्रत फलदायी माना जाता है। 15 दिनों तक चलने वाले इस महालक्ष्मी व्रत में धन की देवी की विधि-विधान से पूजा की जाती है। महालक्ष्मी व्रत करने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है। यह व्रत 19 सितंबर से शुरू होकर 03 अक्तूबर तक चलेगा। वहीं व्रत के पहले दिन कलश स्थापना का विशेष महत्व होता है। तो आइए जानते हैं महालक्ष्मी व्रत की तिथि, कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग क मुताबिक महालक्ष्मी व्रत के लिए 18 सितंबर की दोपहर 01:00 मिनट से भाद्रपद माह के शुक्ल अष्टमी तिथि की शुरूआत हुई है। जोकि आज यानी की 19 सितंबर की दोपहर 03:26 मिनट तक रहेगी। ऐसे में उदयातिथि के मुताबिक 19 सितंबर 2026 से महालक्ष्मी व्रत शुरू हो रहा है। इसे भी पढ़ें: Radha Ashtami पर देवी राधा और श्रीकृष्ण की पूजा से मिलेगा सुख-सौभाग्य, जानिए पूजन विधि और महत्व कलश स्थापना का मुहूर्त महालक्ष्मी व्रत मां लक्ष्मी को समर्पित व्रत है। माना जाता है कि जो भी व्यक्ति इस व्रत को पूरी श्रद्धा और नियम के साथ करता है, उसको मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख-समृद्धि व शांति बनी रहती है। प्रातःकाल मुहूर्त- सुबह 04:57 मिनट से लेकर 06:08 मिनट तक है। दूसरा शुभ मुहूर्त- सुबह 07:40 मिनट से लेकर 09:11 मिनट तक है। मध्याह्न शुभ मुहूर्त- सुबह 11:01 मिनट से लेकर दोपहर 01:28 मिनट तक है। ऐसे करें कलश स्थापना इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद पूजा स्थल की सफाई करें और गंगाजल का छिड़का करें। फिर एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर मां लक्ष्मी की तस्वीर स्थापित करें। अब एक तांबे के कलश में साफ जल भरें और इसमें सिक्का और अक्षत डालें। फिर कलश के ऊपरी भाग पर आम के पत्ते लगाएं और कलश के मुंह पर नारियल रखे। फिर कलश पर रोली और कुमकुम से स्वास्तिक बनाएं। पूजन विधि कलश स्थापना के बाद मन में मां लक्ष्मी का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। इसके बाद मां लक्ष्मी को फूल, अक्षत, कुमकुम, चंदन और धूप-दीप आदि अर्पित करें। मां लक्ष्मी को श्रृंगार की सामग्री और 16 गांठों वाला डोरा अर्पित करें। फिर विधि-विधान और श्रद्धा के साथ मां लक्ष्मी की पूजा करें। इस दौरान श्रीसूक्त और महालक्ष्मी अष्टकम का पाठ करना शुभ माना जाता है। पूजा के अंत में मां लक्ष्मी को खीर, फल, मिठाई या पंचमेवा आदि का भोग लगाएं और घी का दीपक जलाकर आरती करें। महत्व जो व्यक्ति महालक्ष्मी व्रत करता है, उसके जीवन में दरिद्रता नहीं आती है। मां लक्ष्मी की कृपा से धन संकट का सामना नहीं करना पड़ता है। वहीं व्यक्ति के अन्न, भोजन, धन, जमीन, भवन, प्रसिद्धि, आयु और सफलता में वृद्धि होती है।

प्रभासाक्षी 19 Sep 2026 9:23 am

Radha Ashtami पर देवी राधा और श्रीकृष्ण की पूजा से मिलेगा सुख-सौभाग्य, जानिए पूजन विधि और महत्व

आज यानी की 19 सितंबर 2026 को राधा अष्टमी का पर्व मनाया जा रहा है। यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण की प्रिय राधारानी के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को राधा अष्टमी का व्रत और पूजन किया जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी की विधि-विधान से पूजा और व्रत किया जाता है। इस दिन पूजा और व्रत करने से जीवन में सुख-सौभाग्य और समृद्धि का आगमन होता है। तो आइए जानते हैं राधा अष्टमी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरूआत 18 सिंतबर 2026 की दोपहर 01:00 बजे शुरू होगी। वहीं अगले दिन यानी की 19 सितंबर 2026 की दोपहर 03:26 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के मुताबिक 19 सितंबर 2026 को राधा अष्टमी का पर्व मनाया जा रहा है। पूजन विधि इस दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठें और स्नान आदि करके साफ कपड़े पहनें। फिर सूर्य देव को अर्घ्य दें और पूजा स्थल की साफ-सफाई करें। अब एक चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर उस पर भगवान श्रीकृष्ण और देवी राधा की प्रतिमा को स्थापित करें। फिर देवी राधा का मन में ध्यान करते हुए उनको जल, पंचामृत, पुष्प, रोली, धूप, अक्षत और दीप आदि अर्पित करें। राधा रानी को श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें। इस दौरान देवी राधा के मंत्र का जाप करें। फिर आरती करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें। धार्मिक महत्व देवी राधा को कृष्ण भक्ति और प्रेम भक्ति का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व राधा-कृष्ण की आराधना, भक्ति और आध्यात्मिक साधना का विशेष अवसर है। इस दिन मंदिरों को सजाया जाता है और भगवान श्रीकृष्ण-देवी राधा का विशेष श्रृंगार किया जाता है। इसके साथ ही भजन-कीर्तन और पूजा का आयोजन किया जाता है।

प्रभासाक्षी 19 Sep 2026 8:58 am

Vishwakarma Puja 2026: Shubh Muhurat के साथ जानिए Puja Vidhi का धार्मिक और औद्योगिक महत्व

सनातन धर्म में भगवान विश्वकर्मा को सृष्टि का दिव्य शिल्पकार, वास्तुकार और निर्माण कला का अधिष्ठाता देव माना जाता है। मशीनों, औजारों, उद्योगों, कारखानों, कार्यशालाओं और निर्माण कार्यों से जुड़े लोगों के लिए विश्वकर्मा पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन श्रद्धालु भगवान विश्वकर्मा की पूजा कर अपने कार्य में उन्नति, सफलता, सुरक्षा और समृद्धि की कामना करते हैं। विश्वकर्मा पूजा को विशेष रूप से शिल्पकारों, इंजीनियरों, वास्तुकारों, तकनीकी कर्मियों, कारीगरों, वाहन चालकों तथा उद्योग और निर्माण क्षेत्र से जुड़े लोगों का प्रमुख पर्व माना जाता है। कई स्थानों पर इस अवसर पर औजारों, मशीनों और कार्यस्थल की भी विशेष पूजा की जाती है। विश्वकर्मा पूजा 2026 की तिथि वर्ष 2026 में विश्वकर्मा पूजा गुरुवार, 17 सितंबर को मनाई जाएगी। यह पर्व सामान्यतः कन्या संक्रांति के अवसर पर मनाया जाता है, जब सूर्य देव कन्या राशि में प्रवेश करते हैं। विश्वकर्मा पूजा की तिथि सौर गणना और संक्रांति पर आधारित होने के कारण इसे कई क्षेत्रों में प्रतिवर्ष लगभग 17 सितंबर के आसपास मनाया जाता है। पूजा का सटीक समय स्थानीय पंचांग और सूर्य संक्रांति के समय के अनुसार निर्धारित किया जा सकता है। इसे भी पढ़ें: विश्वकर्मा पूजा: श्रम, कौशल और सृजन को नमन भगवान विश्वकर्मा का महत्व पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विश्वकर्मा को देवताओं का दिव्य वास्तुकार और शिल्पकार माना गया है। उन्होंने अपनी अद्भुत निर्माण कला और शिल्प कौशल से अनेक दिव्य नगरों, भवनों और अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण किया। प्रचलित पौराणिक मान्यताओं में भगवान विश्वकर्मा द्वारा किए गए प्रमुख निर्माण कार्यों में देवताओं के लिए दिव्य भवन और महल, भगवान विष्णु के लिए सुदर्शन चक्र, भगवान शिव के लिए त्रिशूल, इंद्र के लिए वज्र, श्रीकृष्ण के लिए द्वारका नगरी और रावण के लिए स्वर्णमयी लंका जैसे निर्माण कार्यों का उल्लेख मिलता है। भगवान विश्वकर्मा केवल निर्माण और शिल्प के देवता ही नहीं, बल्कि रचनात्मकता, तकनीकी ज्ञान, परिश्रम और कौशल के भी प्रतीक हैं। विश्वकर्मा पूजा हमें अपने कार्य और कार्य में प्रयुक्त साधनों के प्रति सम्मान व्यक्त करने की प्रेरणा देती है। विश्वकर्मा पूजा की पूजन विधि विश्वकर्मा पूजा के दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर, दुकान, कारखाने, कार्यालय या कार्यस्थल की अच्छी तरह सफाई करें। इसके बाद भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा या चित्र को पूजा स्थल पर स्थापित करें। पूजन सामग्री पूजा में सामान्यतः निम्न सामग्री का उपयोग किया जाता है— भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा या चित्र कलश रोली और चंदन अक्षत पुष्प और माला धूप और दीप फल और मिठाई पंचामृत और स्वच्छ जल नारियल पान और सुपारी कार्य में उपयोग होने वाले औजार और उपकरण पूजा की विधि सबसे पहले भगवान गणेश का स्मरण कर पूजा का संकल्प लें। इसके बाद भगवान विश्वकर्मा का ध्यान करते हुए उन्हें चंदन, अक्षत, पुष्प और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करें। पूजा स्थल पर रखे औजारों, मशीनों और कार्य उपकरणों को साफ करके उन पर रोली, चंदन और पुष्प अर्पित करें। कई स्थानों पर वाहनों और मशीनों की भी पूजा की जाती है। धूप-दीप प्रज्ज्वलित कर भगवान विश्वकर्मा की आरती करें और कार्य में सफलता, सुरक्षा तथा उन्नति की प्रार्थना करें। पूजा के बाद प्रसाद का वितरण किया जाता है। इस दिन कार्यस्थल की स्वच्छता और उपकरणों की देखभाल को भी विशेष महत्व दिया जाता है। आधुनिक संदर्भ में इसे कार्य के प्रति सम्मान और सुरक्षित कार्य संस्कृति के संदेश के रूप में भी देखा जा सकता है। विश्वकर्मा पूजा का व्रत और नियम विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर कुछ श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत भी रखते हैं। हालांकि, इस पर्व में पूजा और कार्य के साधनों के सम्मान को अधिक प्रमुखता दी जाती है। श्रद्धालु इस दिन सात्त्विक भोजन ग्रहण करते हैं और अपनी श्रद्धा के अनुसार दान-पुण्य भी करते हैं। कुछ उद्योगों और कार्यस्थलों पर पूजा के बाद कर्मचारियों तथा श्रमिकों के लिए सामूहिक प्रसाद या भोजन का आयोजन किया जाता है। विश्वकर्मा पूजा की पौराणिक कथा पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान विश्वकर्मा ब्रह्मांड के प्रथम शिल्पकार और दिव्य वास्तुकार हैं। देवताओं को जब भी किसी विशेष भवन, नगर, अस्त्र या दिव्य उपकरण की आवश्यकता होती थी, तब भगवान विश्वकर्मा अपनी अद्भुत कला और ज्ञान से उसका निर्माण करते थे। एक प्रचलित कथा के अनुसार भगवान विश्वकर्मा ने देवताओं के लिए स्वर्ग के भव्य भवनों और दिव्य सभाओं का निर्माण किया। उन्होंने अपने कौशल से अनेक अद्भुत नगरों और महलों की रचना की। मान्यता है कि भगवान विश्वकर्मा ने भगवान विष्णु के लिए सुदर्शन चक्र और भगवान शिव के लिए त्रिशूल जैसे दिव्य अस्त्रों का निर्माण किया। इंद्र के वज्र को भी उनकी दिव्य शिल्पकला से जोड़ा जाता है। श्रीराम से संबंधित परंपराओं में स्वर्णमयी लंका के निर्माण का संबंध भी भगवान विश्वकर्मा से माना जाता है। कहा जाता है कि यह भव्य नगरी मूल रूप से कुबेर के लिए निर्मित की गई थी और बाद में रावण ने उस पर अधिकार कर लिया। इसी प्रकार श्रीकृष्ण की द्वारका नगरी के निर्माण से भी भगवान विश्वकर्मा का संबंध बताया जाता है। समुद्र तट पर स्थित इस दिव्य नगरी को अपनी अद्भुत वास्तुकला और सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध माना गया। इन कथाओं के माध्यम से भगवान विश्वकर्मा की सृजनात्मक शक्ति, तकनीकी दक्षता और निर्माण कौशल का महत्व सामने आता है। यही कारण है कि शिल्प, वास्तुकला और तकनीकी कार्यों से जुड़े लोग भगवान विश्वकर्मा को अपना आराध्य मानते हैं। विश्वकर्मा पूजा का संदेश विश्वकर्मा पूजा केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं है, बल्कि यह परिश्रम, कौशल और सृजनशीलता के सम्मान का भी अवसर है। यह पर्व हमें सिखाता है कि किसी भी निर्माण, उद्योग या तकनीकी उपलब्धि के पीछे मानव की मेहनत, ज्ञान और कौशल का महत्वपूर्ण योगदान होता है। यह दिन हमें अपने औजारों, मशीनों और कार्यस्थल के प्रति जिम्मेदार बनने की प्रेरणा भी देता है। कार्यस्थल की स्वच्छता, उपकरणों की उचित देखभाल और सुरक्षित ढंग से कार्य करना इस पर्व के संदेश को आधुनिक जीवन से जोड़ता है। इस प्रकार, विश्वकर्मा पूजा सृजन, तकनीकी ज्ञान, श्रम और कौशल के सम्मान का पावन पर्व है। भगवान विश्वकर्मा को दिव्य वास्तुकार और शिल्पकार के रूप में स्मरण करते हुए श्रद्धालु अपने कार्य और कार्य में उपयोग होने वाले उपकरणों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। वर्ष 2026 में विश्वकर्मा पूजा 17 सितंबर, गुरुवार को मनाई जाएगी। इस अवसर पर घरों, दुकानों, कारखानों, कार्यालयों और कार्यशालाओं में भगवान विश्वकर्मा की पूजा कर सुख, समृद्धि, कार्य में सफलता और उन्नति की कामना की जाएगी। - शुभा दुबे

प्रभासाक्षी 17 Sep 2026 12:08 pm

Vishwakarma Jayanti पर अष्टदल रंगोली और सात अनाजों से करें मशीनों व औजारों की पूजा

हिंदू धर्म में भगवान विश्वकर्मा को वास्तुकला, निर्माण, शिल्प और तकनीकी कौशल से जुड़ा देवता माना जाता है। इस पर्व का विशेष महत्व होता है। खासतौर पर यह पर्व इंजीनियरों, कारीगरों, फैक्ट्री कर्मचारियों, मेकैनिक, व्यापारियों, बिल्डरों और मशीनों व उपकरणों के साथ काम करने वाले लोगों के लिए अहम होता है। इस बार आज यानी की 17 सितंबर को विश्वकर्मा जयंती मनाई जा रही है। इस दिन लोग मशीनों और औजारों की पूजा करते हैं और भगवान विश्वक्रमा से काम में सफलता, तरक्की और सुरक्षा आदि की कामना करते हैं। तो आइए जानते हैं विश्वकर्मा जयंती की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे में... तिथि और मुहूर्त इस बार 17 सितंबर 2026 को विश्वकर्मा पूजा मनाई जाएगी। यह पर्व कन्या संक्रांति के दिन मनाया जाता है, जब सूर्य देव सिंह राशि से निकलकर कन्या राशि में गोचर करेंगे। इस बार कन्या संक्रांति का समय सुबह करीब 07:58 मिनट माना गया है। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। इसके बाद ऑफिस, कार्यस्थल, कारखाने, मशीने और औजारों को अच्छे से साफ कर लें। फिर चारों ओर गंगाजल से छिड़काव करे। अब अष्टदल रंगोली बनाएं और उस पर सात तरह के अनाजों को रखें। फिर भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा को स्थापित करें और मशीनों व उपकरणों पर फूल, तिलक और कलावा आदि अर्पित करें। अब धूप-दीप जलाकर पूजा करें और अंत में भगवान विश्वकर्मा की आरती करें। महत्व धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक भगवान विश्वकर्मा को देवताओं के दिव्य निर्माणकर्ता के रूप में जाना जाता है। भगवान विश्वकर्मा ने देवताओं के लिए कई भव्य और दिव्य भवनों और नगरों का निर्माण किया है। इस कारण भगवान विश्वकर्मा को निर्माण, सृजन और शिल्पकला का देवता माना जाता है। मंत्र ॐ विश्वकर्मणे नमः

प्रभासाक्षी 17 Sep 2026 9:08 am

Ganesh Chaturthi Puja: कलश स्थापना, पंचामृत स्नान और मोदक भोग के साथ करें बप्पा की आराधना

हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश चतुर्थी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन से गणेश उत्सव शुरू होता है। इस बार आज यानी की 14 सितंबर 2026 को गणेश चतुर्थी का पर्व मनाया जा रहा है। इस दौरान बप्पा की स्थापना की जाती है और उनकी पूजा होती है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक बप्पा की पूजा करने से जीवन में आने वाले संकट दूर होते हैं। क्योंकि गणेश भगवान का एक नाम विघ्नहर्ता भी है। तो आइए जानते हैं गणेश चतुर्थी कीतिथि, पूजा विधि और शुभ मुहूर्त आदि के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के इस बार 14 सितंबर को 07:06 मिनट पर भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि की शुरुआत हो रही है। वहीं इस तिथि की समाप्ति अगले दिन यानी की 15 सितंबर 2026 की सुबह 07:44 मिनट पर होगी। मान्यताओं के मुताबिक बप्पा का जन्म मध्याह्न काल के दौरान हुआ था। ऐसे में गणेश चतुर्थी का पर्व 14 सितंबर 2026 को मनाया जा रहा है। गणपति स्थापना और पूजा मुहूर्त गणेश चतुर्थी पर पूजा का मुहूर्त सुबह 11:02 मिनट से लेकर दोपहर 01:31 मिनट तक रहेगा। इस दौरान आप गणपति बप्पा की विधि-विधान से स्थापना और पूजा कर सकते हैं। अगर इस दौरान पूजा नहीं कर पाते हैं, तो आप अभिजीत मुहूर्त में भी बप्पा की पूजा-अर्चना कर सकते हैं। पूजन विधि पूजा शुरू करने से पहले भगवान गणेश का स्मरण करें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद कलश की स्थापना करें और कलश में चावल, जल, सुपानी और एक सिक्का डालें। अब भगवान गणेश की प्रतिमा का पंचामृत से स्नान कराएं। फिर बप्पा को हल्दी, कुमकुम और चंदन का तिलक करें। गणपति को दूर्वा जरूर अर्पित करें। वहीं भोग में लड्डू, मोदक और अन्य प्रसाद अर्पित करें। पूजा के अंत में आरती करें और 'ऊँ गणेशाय नम:' मंत्र का जाप करते रहें। पूजा खत्म होने के बाद सभी को प्रसाद बांटें। मंत्र वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥

प्रभासाक्षी 14 Sep 2026 8:48 am

Varaha Jayanti पर पंचामृत से करें श्रीहरि का अभिषेक, 13 सितंबर को बन रहा पूजा का शुभ संयोग

भगवान विष्णु की पूजा सृष्टि के पालनहार के रूप में की जाती है। जब-जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है और सृष्टि का संतुलन बिगड़ता है, तब-तब भगवान विष्णु अलग-अलग रूपों में अवतार लेकर धर्म की रक्षा करते हैं और अधर्म का नाश करते हैं। भगवान विष्णु के इन्हीं अवतारों में वराह अवतार है। भगवान विष्णु ने समुद्र में डूबी पृथ्वी को बाहर निकालने के लिए और असुर हिरण्याक्ष का वध करने के लिए वराह अवतार लिया था। इस बार 13 सितंबर 2026 को वराह जयंती मनाई जा रही है। भगवान श्रीहरि के इस स्वरूप में साहस, शक्ति और संरक्षण का संगम देखने को मिलता है। तो आइए जानते हैं वराह जंयती की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और पौराणिक कथा के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि की शुरूआत 13 सितंबर 2026 की सुबह 07:08 मिनट पर हो रहा है। वहीं अगले दिन यानी की 14 सितंबर 2026 की सुबह 07:08 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। वहीं उदयातिथि के आधार पर 13 सितंबर 2026 को वराह जयंती मनाई जा रही है। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें और फिर व्रत और पूजा का संकल्प लें। अब सू्र्य देव को अर्घ्य दें और भगवान विष्णु के वराह स्वरूप की प्रतिमा को पूजा स्थान पर स्थापित करें। इसके बाद जल से भरा कलश रखें और भगवान श्रीहरि के वराह स्वरूप का पंचामृत से अभिषेक करें। भगवान वराह को पीले फूल, फल और पीले वस्त्र आदि अर्पित करें। फिर धूप-दीप जलाकर श्रीहरि की आरती करें। पूजा के दौरान 'ॐ वाराहाय नमः' मंत्र का जाप करें। पूजा के अंत में श्रीहरि विष्णु से परिवार की सुख-शांति व समृद्धि के लिए कामना करें। पौराणिक कथा धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक हिरण्याक्ष नामक एक शक्तिशाली असुर तीनों लोकों में आतंक मचाने लगा। उसके अत्याचार से देवता, ऋषि-मुनि और अन्य प्राणी परेशान थे। वहीं हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को समुद्र के गहरे जल में ले जाकर छिपा दिया। पृथ्वी के जल में समा जाने से सृष्टि का संतुलन बिगड़ने लगा और चारों तरफ संकट पैदा होने लगा। तब पृथ्वी की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने वराह अवतार लिया और वह गहरे समुद्र में उतरे। भगवान वराह ने अपने दांतों पर पृथ्वी को उठाया और जल से बाहर ले आए। फिर हिरण्याक्ष के लिए भगवान विष्णु का भयंकर युद्ध हुआ। अंत में भगवान वराह ने हिरण्याक्ष का वध कर पृथ्वी को उसके आतंक से मुक्त कराया। इस कारण से भगवान विष्णु के वराह अवतार को उन रूपों में गिना जाता है, जिन्होंने सृष्टि की रक्षा और अधर्म का विनाश किया। धार्मिक महत्व वराह जयंती श्रीहरि विष्णु की शक्ति और उनके रक्षक स्वरूप की याद दिलाने वाला पर्व है। जो भी व्यक्ति इस दिन श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान वराह की पूजा-अर्चना करता है, उसके जीवन में आने वाले सभी दोष और परेशानियां दूर होती हैं और व्यक्ति को भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।

प्रभासाक्षी 13 Sep 2026 8:45 am

Hartalika Teej 2026: तिथि, महत्व, पूजन विधि और व्रत कथा

सनातन धर्म में हरतालिका तीज का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। यह पर्व मुख्य रूप से भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना को समर्पित है। विवाहित महिलाएं पति की दीर्घायु, सुखी दांपत्य जीवन और परिवार के मंगल की कामना से यह व्रत रखती हैं, जबकि अविवाहित कन्याएं मनोवांछित एवं योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा करती हैं। हरतालिका तीज को श्रद्धा, तप, प्रेम और अटूट संकल्प का पर्व माना जाता है। इस दिन माता पार्वती के कठोर तप और भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने की कथा का स्मरण किया जाता है। हरतालिका तीज 2026 की तिथि वर्ष 2026 में हरतालिका तीज का व्रत मुख्य रूप से सोमवार, 14 सितंबर 2026 को मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि 13 सितंबर को प्रातः लगभग 7:08 बजे प्रारंभ होकर 14 सितंबर को प्रातः लगभग 7:06 बजे समाप्त हो रही है। उदयातिथि के आधार पर अधिकांश पंचांग 14 सितंबर को हरतालिका तीज मानते हैं। हालांकि, कुछ क्षेत्रों और पारिवारिक परंपराओं में प्रदोषकाल या स्थानीय मान्यता के अनुसार 13 सितंबर को भी व्रत रखा जा सकता है। इसलिए श्रद्धालुओं को अपने परिवार की परंपरा और स्थानीय पंचांग का पालन करना चाहिए। इसे भी पढ़ें: Unique Temple: संतान सुख और नौकरी के लिए इन प्रसिद्ध Temple में चढ़ाते हैं Resume व लौकी हरतालिका तीज का महत्व हरतालिका तीज माता पार्वती के भगवान शिव के प्रति अटूट प्रेम और तपस्या का प्रतीक है। पौराणिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तप किया था। उनकी दृढ़ भक्ति और संकल्प से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इस व्रत के माध्यम से श्रद्धालु विशेष रूप से निम्न कामनाएं करते हैं— सुखी और समृद्ध दांपत्य जीवन पति की दीर्घायु और उत्तम स्वास्थ्य परिवार में सुख-शांति मनोवांछित एवं योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद हरतालिका तीज का नाम भी इसकी पौराणिक कथा से जुड़ा है। प्रचलित व्याख्या के अनुसार ‘हरत’ या ‘हरण’ का संबंध किसी को दूर ले जाने से और ‘आलिका’ का अर्थ सखी से माना जाता है। कथा के अनुसार माता पार्वती की सखी उन्हें वन में ले गई थीं, ताकि वे अपनी इच्छा के विरुद्ध होने वाले विवाह से बच सकें और भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए तपस्या कर सकें। हरतालिका तीज की पूजन विधि हरतालिका तीज के दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और भगवान शिव तथा माता पार्वती का स्मरण करते हुए व्रत का संकल्प लें। पूजा स्थल को स्वच्छ करके चौकी स्थापित करें। परंपरा के अनुसार भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा स्थापित की जाती है। कई स्थानों पर मिट्टी, रेत या अन्य पारंपरिक सामग्री से शिव-पार्वती की प्रतीकात्मक प्रतिमाएं भी बनाई जाती हैं। पूजन सामग्री पूजा में सामान्यतः निम्न सामग्री का उपयोग किया जाता है— भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा या चित्र गणेश जी की प्रतिमा या चित्र बेलपत्र धतूरा, आक आदि, स्थानीय परंपरा के अनुसार पुष्प और माला रोली, चंदन और अक्षत धूप और दीप फल एवं नैवेद्य सुहाग की सामग्री, जैसे चूड़ियां, सिंदूर और बिंदी वस्त्र या चुनरी पंचामृत और स्वच्छ जल पूजा की विधि सबसे पहले भगवान गणेश का स्मरण करें। इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान कर उन्हें जल, चंदन, अक्षत, पुष्प और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करें। माता पार्वती को सुहाग की सामग्री और श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित की जाती हैं। भगवान शिव को बेलपत्र और अन्य प्रिय सामग्री श्रद्धापूर्वक चढ़ाई जाती है। इसके बाद हरतालिका तीज की व्रत कथा सुनी या पढ़ी जाती है। अंत में भगवान शिव और माता पार्वती की आरती कर सुखी वैवाहिक जीवन और परिवार के मंगल की प्रार्थना की जाती है। प्रातःकाल पूजा को विशेष रूप से शुभ माना जाता है। यदि किसी कारण से प्रातःकाल पूजा संभव न हो, तो कई परंपराओं में प्रदोषकाल में भी शिव-पार्वती की पूजा की जाती है। हरतालिका तीज के व्रत का महत्व हरतालिका तीज का व्रत अनेक परिवारों में निर्जला व्रत के रूप में रखा जाता है। हालांकि, व्रत के नियम क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। व्रत का वास्तविक उद्देश्य केवल भोजन और जल का त्याग नहीं, बल्कि श्रद्धा, संयम, आत्मनियंत्रण और भगवान के प्रति समर्पण भी है। इसलिए श्रद्धालुओं को अपनी शारीरिक क्षमता और पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत का पालन करना चाहिए। हरतालिका तीज की व्रत कथा पौराणिक कथा के अनुसार पर्वतराज हिमवान की पुत्री माता पार्वती बचपन से ही भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त करना चाहती थीं। उन्होंने मन ही मन भगवान शिव को अपना सर्वस्व मान लिया था। माता पार्वती की इच्छा से अनजान उनके पिता हिमवान ने उनका विवाह भगवान विष्णु से करने का विचार किया। जब माता पार्वती को इस बात का पता चला, तो वे अत्यंत दुखी हुईं। उनकी एक प्रिय सखी ने उन्हें सलाह दी कि यदि वे भगवान शिव को ही पति रूप में प्राप्त करना चाहती हैं, तो उन्हें एकांत स्थान पर जाकर कठोर तपस्या करनी चाहिए। कथा के अनुसार माता पार्वती की सखी उन्हें घर से दूर घने वन में ले गईं। वहां माता पार्वती ने भगवान शिव की आराधना करते हुए कठोर तप किया और अन्न-जल का त्याग कर अपनी भक्ति में लीन रहीं। उनकी कठिन तपस्या और अटूट श्रद्धा से भगवान शिव प्रसन्न हुए और उनके समक्ष प्रकट हुए। भगवान शिव ने माता पार्वती से उनकी इच्छा पूछी। माता पार्वती ने विनम्रतापूर्वक भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की। भगवान शिव ने उनकी तपस्या और दृढ़ संकल्प से प्रसन्न होकर उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया। बाद में पर्वतराज हिमवान ने भी भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के लिए सहमति दे दी। इस प्रकार माता पार्वती की अटूट भक्ति, तपस्या और दृढ़ निश्चय सफल हुआ। तभी से भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा प्राप्त करने के लिए हरतालिका तीज का व्रत और पूजन करने की परंपरा प्रचलित मानी जाती है। इस प्रकार, हरतालिका तीज केवल एक धार्मिक व्रत नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, तपस्या और दृढ़ संकल्प का संदेश देने वाला पर्व है। माता पार्वती का जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि सच्ची श्रद्धा और अटल संकल्प के साथ किए गए प्रयास जीवन में सकारात्मक दिशा प्रदान कर सकते हैं। वर्ष 2026 में हरतालिका तीज मुख्य रूप से 14 सितंबर, सोमवार को मनाई जाएगी। तिथि को लेकर क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपराओं में अंतर संभव है, इसलिए स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा-व्रत का निर्णय करना उचित रहेगा। इस पावन अवसर पर श्रद्धालु भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना कर सुख, शांति, सौभाग्य और मंगलमय जीवन की कामना कर सकते हैं। - शुभा दुबे

प्रभासाक्षी 12 Sep 2026 5:57 pm

Aja Ekadashi 2026: अजा एकादशी व्रत से होता है सभी पापों का नाश

आज अजा एकादशी है, हिन्दू धर्म में इस व्रत की खास मान्यता है। इस व्रत को रखने से व्यक्ति के द्वारा अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति मिलती है और जीवन में भी सुख शांति मिलती है तो आइए हम आपको अजा एकादशी व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं। जानें अजा एकादशी व्रत के बारे में धार्मिक मान्यताओं के अनुसार 'अजा' शब्द का संबंध सनातन धार्मिक परंपरा में आध्यात्मिक अर्थ से जोड़ा गया है। अजा एकादशी भगवान विष्णु की आराधना से जुड़ी एक महत्वपूर्ण एकादशी मानी जाती है। इस दिन व्रत करने के पीछे मुख्य भावना आत्मसंयम, भक्ति और अपने कर्मों को सात्त्विक दिशा देना है। पंडितों के अनुसार अजा एकादशी का व्रत व्यक्ति को अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखने, भोजन में संयम बरतने और आध्यात्मिक चिंतन में अधिक समय लगाने का अवसर देता है। सनातन परंपरा में अजा एकादशी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। जगत के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित यह पावन व्रत जीवन के संचित पापों, दरिद्रता और संकटों को समाप्त करने वाला माना गया है। धर्मग्रंथों के अनुसार जो व्यक्ति इस दिन श्रद्धा से उपवास करता है, उसे एक हजार अश्वमेध यज्ञों के बराबर पुण्य प्राप्त होता है। जानें अजा एकादशी का शुभ मुहूर्त हिन्दू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 6 सितंबर 2026 को शाम 7:30 बजे आरंभ होगी और अगले दिन 7 सितंबर को शाम 5:05 बजे समाप्त होगी। व्रत के लिए उदया तिथि को मान्यता दी जाती है। इसलिए अजा एकादशी का व्रत 7 सितंबर 2026, सोमवार को रखा जाएगा। इसे भी पढ़ें: Aja Ekadashi 2026: अजा एकादशी आज, जानिए Muhurat, पूजन विधि और व्रत का महत्व अजा एकादशी पर दान का है खास महत्व सनातन परंपरा में व्रत के साथ दान का विशेष महत्व है। अजा एकादशी के अवसर पर अपनी क्षमता के अनुसार जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता करना पुण्य और परोपकार की भावना को मजबूत करता है। जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या आवश्यक सामग्री भी दान की जाती है। अजा एकादशी व्रत का पारण भी होता है विशेष पंडितों के अनुसार अजा एकादशी व्रत का पारण 8 सितंबर 2026 को किया जाएगा। पंचांग के अनुसार, इस दिन सुबह 6:02 बजे से 8:33 बजे तक पारण का शुभ समय रहेगा। व्रती इस अवधि में स्नान, पूजा और भगवान विष्णु की आराधना करने के बाद व्रत खोल सकते हैं। अजा एकादशी व्रत पर ऐसे करें पूजा, होगा लाभ अजा एकादशी का दिन बहुत खास होता है इसलिए इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल की सफाई कर गंगाजल से शुद्धिकरण करें और व्रत का संकल्प लें। पीले या लाल कपड़े पर भगवान विष्णु की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें। भगवान को पीला चंदन, अक्षत, फूल, माला और वस्त्र अर्पित करें। पूजा में तुलसी दल अवश्य शामिल करें। खीर, मिठाई और मौसमी फलों का भोग लगाएं। घी का दीपक और धूप जलाकर भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें। इसके बाद विष्णु चालीसा और अजा एकादशी व्रत कथा का पाठ करें। अंत में भगवान विष्णु और एकादशी माता की आरती करें। अगले दिन द्वादशी तिथि में पूजा करने के बाद निर्धारित समय में व्रत का पारण करें। अजा एकादशी व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा भी है खास शास्त्रों के अनुसार युधिष्ठिर ने एक बार भगवान कृष्ण से भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकादशी के बारे में पूछा था। कृष्ण ने उन्हें सत्यवादी हरिश्चंद्र के बारे में बताकर उत्तर दिया - वह राजा जो अपनी जान बचाने के लिए भी झूठ नहीं बोलते थे। महर्षि विश्वामित्र द्वारा परखे जाने पर, हरिश्चंद्र ने एक वचन का सम्मान करने के लिए अपना पूरा राज्य त्याग दिया। उनके पास अपने वचन के अलावा कुछ नहीं बचा था, उन्हें अपनी रानी तारामती और अपने पुत्र रोहितश्व को दासता में बेचने के लिए मजबूर किया गया, और स्वयं को एक चांडाल को बेच दिया गया जो काशी के श्मशान घाटों की देखभाल करता था। अयोध्या के सम्राट अब अपने दिन चिताओं पर कर वसूलने में बिताते थे। फिर सबसे क्रूर प्रहार: उनके पुत्र रोहितश्व की सर्प दंश से मृत्यु हो गई। तारामती बच्चे के शव को दाह संस्कार के लिए श्मशान ले गई - और हरिश्चंद्र को, अपने कर्तव्य से बंधे हुए, अपनी शोकाकुल पत्नी से दाह संस्कार शुल्क मांगना पड़ा जो उन्हें पता था कि वह नहीं दे सकती थी। उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने झूठ नहीं बोला। यह सबसे निचले बिंदु पर था कि ऋषि गौतम ने उन्हें ढूंढ निकाला और उन्हें अजा एकादशी के बारे में बताया उन्हें इस तिथि पर पूर्ण विश्वास के साथ उपवास करने की सलाह दी। हरिश्चंद्र ने व्रत का पालन किया। और उस एक दिन के पुण्य ने सब कुछ बदल दिया: देवता अवतरित हुए, रोहितश्व को जीवनदान मिला, तारामती ने अपनी शाही गरिमा वापस पा ली, और हरिश्चंद्र को उनका राज्य और, समय के साथ, उच्च लोकों में एक स्थान वापस मिल गया। अजा एकादशी व्रत पर ये न करें, होगी हानि पंडितों के अनुसार अजा एकादशी के दिन चावल और सभी प्रकार के अनाजों से बचें। इसके अलावा प्याज, लहसुन और सभी मांसाहारी भोजन से दूर रहें। मसूर दाल, चना और अधिकांश दालें न खाएं। शहद, और कांस्य के बर्तन से भोजन न करें। क्रोध, गपशप, कटु वचन और झगड़े न करें, ये व्रत को भोजन की तरह ही तोड़ते हैं। इसके अलावा अजा एकादशी के दिन बाल या नाखून न काटें, साथ ही शेविंग भी न करें। अजा एकादशी पर ये करें, होंगे लाभ अजा एकादशी पर फल, दूध, दही, और सूखे मेवे खाएं, इससे ऊर्जा बनी रहेगी। साथ ही साबूदाना, सिंघाड़ा आटा, कुट्टू आटा, समा चावल खाएं। इसके अलावा जो निर्जला व्रत रखते हैं, उन्हें पारण समय खुलने तक इसे नहीं छूना चाहिए। इसके अलावा आलू, शकरकंद, कद्दू और सेंधा नमक खाएं। अजा एकादशी ये भी करें, मिलेगा पुण्य धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सूर्योदय से पहले स्नान करें, अपने पानी में कुछ बूंदें गंगाजल डालें। साफ पीले या सफेद वस्त्र पहनें। व्रत का औपचारिक संकल्प लें। एक साफ चौकी पर भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र रखें। उसके बगल में एक तांबे का कलश स्थापित करें, जिसमें पानी भरा हो और आम के पत्तों और एक नारियल से ढका हो। चंदन, रोली, अक्षत, फूल, धूप और एक शुद्ध देसी घी का दीपक अर्पित करें। कोई भी विष्णु पूजा तुलसी के पत्तों के बिना अधूरी है। उन्हें पिछली शाम को तोड़ लें - तुलसी को एकादशी पर कभी नहीं तोड़ना चाहिए। पंचमेवा, फल और खीर अर्पित करें। प्रत्येक प्रसाद में तुलसी शामिल होनी चाहिए। दिन भर ॐ नमो भगवते वासुदेवाय या विष्णु सहस्रनाम का जाप करें। अजा एकादशी व्रत कथा पढ़ें या सुनें, फिर एक आरती थाली और भीमसेनी कपूर के साथ आरती करें।जो सबसे सख्त रूप का पालन करते हैं, वे रात भर भजन और कीर्तन में जागते रहते हैं। - प्रज्ञा पाण्डेय

प्रभासाक्षी 7 Sep 2026 12:04 pm

Aja Ekadashi 2026: अजा एकादशी आज, जानिए Muhurat, पूजन विधि और व्रत का महत्व

हर साल भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को अजा एकादशी का व्रत किया जाता है। इस बार आज यानी की 07 सितंबर 2026 को यह व्रत किया जा रहा है। अन्य एकादशी तिथियों की तरह अजा एकादशी का व्रत जगत के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन व्रत करने और श्रद्धा व भक्तिभाव के साथ भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करने से समस्त पापों का नाश होता है। साथ ही जीवन से दुख-दरिद्रता दूर होती है। अजा एकादशी का व्रत करने से जातक को अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य की प्राप्ति होती है। तो आइए जानते हैं अजा एकादशी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे में... तिथि व शुभ मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक 06 सितंबर 2026 की शात 07:29 मिनट से अजा एकादशी तिथि की शुरूआत हो रही हैं। वहीं आज यानी की 07 सितंबर 2026 की शाम 05:03 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 07 सितंबर 2026 को अजा एकादशी का व्रत किया जा रहा है। वहीं द्वादशी तिथि के भीतर एकादशी व्रत का पारण सही समय पर करना शुभ माना जाता है। इसलिए 08 सितंबर को सुबह 06:02 बजे से सुबह 08:33 बजे तक पारण कर सकते हैं। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। अगर संभव हो तो इस दिन पीले कपड़े पहनें। फिर भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें और सूर्य देव को अर्घ्य दें। अब पूजा स्थल की सफाई करें और एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर उस पर श्रीहरि विष्णु की मूर्ति स्थापित करें। अब भगवा विष्णु के सामने घी का दीपक जलाएं और धूप जलाएं। फिर श्रीहरि को पीले फूल, रोली, मौली, अक्षत और फल आदि अर्पित करें। भगवान विष्णु को फल और मिठाई आदि का भोग अर्पित करें। वहीं भोग में तुलसी दल को शामिल करना न भूलें। इसके बाद अजा एकादशी व्रत कथा का पाठ करें। वहीं पूजा के दौरान भगवान विष्णु के मंत्र 'ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नम:' मंत्र का 108 बार जाप करें। अंत में पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें। धार्मिक मान्यताएं धार्मिक मान्यता के मुताबिक अजा एकादशी का व्रत करने से जातक को पापों से मुक्ति मिलती है। इस दिन जो भी भक्त भगवान विष्णु की सच्चे मन से पूजा-अर्चना करता है और व्रत करता है, उसको श्रीहरि की विशेष कृपा प्राप्त होती है। भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

प्रभासाक्षी 7 Sep 2026 9:07 am

Dahi Handi 2026: Vajra Yoga में मनेगा दही हांडी का पर्व, जानें Shubh Muhurat और Puja Vidhi

आज यानी की 05 सितंबर 2026 को श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ा दही हांडी का पर्व मनाया जा रहा है। यह जन्माष्टमी के अगले दिन मनाया जाता है। इस दिन श्रीकृष्ण की माखन लीला को याद किया जाता है। दही हांडी पर्व पर जगह-जगह गोविंदा की टोलियां एक-दूसरे के कंधे पर चढ़कर मानव पिरामिड बनाती हैं और ऊंचाई पर रखी मटकी को फोड़ा जाता है। देश के कई हिस्सों में इस पर्व की रौनक देखने को मिलती है। तो आइए जानते हैं कि जन्माष्टमी के अगले दिन दही हांडी का पर्व क्यों मनाया जाता है और इसका शुभ मुहू्र्त क्या है और पूजा कैसे करें। तिथि और मुहूर्त आज यानी की 05 सितंबर 2026 को वज्र योग रहेगा। वहीं दोपहर 12:00 बजे से लेकर 12:50 तक अभिजीत मुहूर्त रहेगा। यह सबसे शुभ समय माना जाता है। इस दौरान पूजा-अर्चना और शुभ कार्य किए जा सकते हैं। वहीं दोपहर 01:16 मिनट से लेकर 02:45 मिनट तक अमृत काल रहेगा। इसे भी पढ़ें: Krishna Janmashtami 2026: Krishna Janmashtami पर बना दुर्लभ संयोग, नोट करें Shubh Muhurat और Puja Vidhi क्यों मनाया जाता है दही हांडी का पर्व जन्माष्टमी की रात में श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का मुख्य अनुष्ठान किया जाता है। फिर अगले दिन श्रीकृष्ण के बाल रूप और नटखटपन की लीलाओं का उत्सव मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक श्रीकृष्ण को माखन बहुत पसंद था। कान्हा अक्सर गोपियों का माखन चुराते थे। माखन चोरी से परेशान होकर गोपियों ने मटकी को जमीन से ऊंचाई पर टांगना शुरू कर दिया, जिससे कि बाल कृष्ण वहां तक न पहुंचे। लेकिन नटखट कृष्ण अपने सखाओं के साथ आते और एक-दूसरे पर चढ़कर मानव पिरामिड बनाते थे। वहीं सबसे ऊपर रहने वाला साथी मटकी को फोड़ देता था। जिसके बाद सब दही और माखन का आनंद लेते थे। कान्हा की इस लीला की याद में दही हांडी का पर्व मनाया जाता है। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद श्रीकृष्ण या फिर लड्डू गोपाल की पूजा करें। इसके बाद भगवान पंचामृत से स्नान कराएं और फिर बाद में साफ जल से स्नान कराने के बाद नए कपड़े पहनें। अब कान्हा को बांसुरी, मुकुट और चंदन का तिलक लगाएं और उनका सुंदर सा श्रृंगार करें। कान्हा को सजाने के बाद उनको झूले में बिठाएं और श्रद्धा व भक्ति के साथ उनको झूला झुलाएं। एक छोटी मटकी में मक्खन, दही, पोहा, सूखे मेवे और कुछ सिक्के डालकर पूजा घर में रखें। भगवान श्रीकृष्ण को पंचमेवा, मक्खन-मिश्री और गोपालकाला का भोग अर्पित करें। पूजा के अंत में घी का दीपक और कपूर जलाकर श्रीकृष्ण की आरती करें। पूजा पूरी होने के बाद सभी लोगों में प्रसाद वितरित करें।

प्रभासाक्षी 5 Sep 2026 9:09 am

Shri Krishna Janmashtami 2026: रोहिणी नक्षत्र में होगा कान्हा का जन्म, जानें Shubh Muhurat और पूरी पूजा विधि

सनातन धर्म में भगवान श्रीकृष्ण को भगवान विष्णु का आठवाँ अवतार माना जाता है। उनका जीवन प्रेम, धर्म, नीति, करुणा, कर्म और भक्ति का अद्भुत संदेश देता है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में पूरे भारत और विश्व के अनेक देशों में श्रद्धा एवं उल्लास के साथ मनाई जाती है। हालांकि मथुरा, वृंदावन, द्वारका और देश के विभिन्न श्रीकृष्ण मंदिरों में इस पर्व की छटा अत्यंत मनोहर रूप लिये हुए होती है। भक्त इस दिन व्रत रखते हैं, भगवान श्रीकृष्ण का श्रृंगार करते हैं, झांकियां सजाते हैं और मध्यरात्रि में उनके जन्मोत्सव का आयोजन करते हैं। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 2026 की तिथि वर्ष 2026 में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी शुक्रवार, 4 सितंबर को मनाई जाएगी। यह पर्व भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को, विशेष रूप से रोहिणी नक्षत्र के संयोग में मनाया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मध्यरात्रि में हुआ था, इसलिए जन्माष्टमी की पूजा का विशेष आयोजन रात्रि में किया जाता है। तिथि और पूजा के समय में स्थान तथा स्थानीय पंचांग के अनुसार कुछ अंतर हो सकता है, अतः श्रद्धालुओं को अपने क्षेत्र के पंचांग के अनुसार पूजा मुहूर्त की पुष्टि करनी चाहिए। इसे भी पढ़ें: Krishna Janmashtami 2026: ऐश्वर्य एवं वैराग्य का अद्भुत संगम है श्रीकृष्ण श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का महत्व श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव नहीं है, बल्कि यह अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक भी है। पौराणिक मान्यता के अनुसार जब मथुरा के अत्याचारी राजा कंस के अत्याचार बढ़ गए और धर्म की स्थापना के लिए भगवान विष्णु के अवतार की आवश्यकता हुई, तब भगवान श्रीकृष्ण ने देवकी और वसुदेव के पुत्र के रूप में जन्म लिया। भगवान श्रीकृष्ण का जीवन अनेक प्रेरणाओं से भरा हुआ है। बाल्यकाल में उन्होंने पूतना, तृणावर्त और कालिय नाग जैसे दुष्टों का अंत किया तथा गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा की। आगे चलकर उन्होंने महाभारत के युद्ध में अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश दिया, जिसमें निष्काम कर्म, भक्ति और ज्ञान का संदेश दिया गया। जन्माष्टमी का पर्व भक्तों को यह प्रेरणा देता है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिन परिस्थितियां हों, सत्य, धर्म और कर्तव्य का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की पूजन विधि जन्माष्टमी के दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करते हुए व्रत और पूजा का संकल्प लें। पूजा स्थल को स्वच्छ करके भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल की प्रतिमा स्थापित करें। यदि प्रतिमा पहले से स्थापित है तो उसे स्नान कराकर नए वस्त्र और आभूषणों से सजाया जा सकता है। पूजा के लिए सामान्यतः निम्न सामग्री का उपयोग किया जाता है— लड्डू गोपाल अथवा भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा पंचामृत गंगाजल या स्वच्छ जल चंदन और रोली अक्षत पुष्प और माला तुलसी दल माखन और मिश्री फल और मिठाई धूप और दीप नए वस्त्र और श्रृंगार सामग्री संध्या अथवा रात्रि में पूजा स्थल को सुंदर ढंग से सजाएं और भगवान श्रीकृष्ण की झांकी तैयार करें। मध्यरात्रि में भगवान के जन्म का उत्सव मनाया जाता है। लड्डू गोपाल को पंचामृत और जल से स्नान कराएं। इसके बाद उन्हें स्वच्छ वस्त्र पहनाकर चंदन, पुष्प और तुलसी दल अर्पित करें। माखन-मिश्री, फल और अन्य सात्त्विक भोग लगाएं। धूप-दीप प्रज्ज्वलित कर भगवान श्रीकृष्ण की आरती करें और प्रसाद वितरित करें। पूजा के दौरान श्रद्धालु “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप कर सकते हैं। श्रीकृष्ण के नामों का स्मरण, भजन-कीर्तन और श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ भी इस दिन विशेष रूप से किया जाता है। जन्माष्टमी व्रत का महत्व जन्माष्टमी के दिन श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और शारीरिक क्षमता के अनुसार व्रत रखते हैं। कई लोग दिनभर फलाहार करते हैं और भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के बाद अथवा अगले दिन व्रत का पारण करते हैं। व्रत के दौरान मन, वचन और कर्म की पवित्रता बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। क्रोध, असत्य और नकारात्मक विचारों से दूर रहकर भगवान का स्मरण, भजन और सेवा करना इस पर्व का प्रमुख भाव है। परंपराओं के अनुसार व्रत की विधि और पारण का समय अलग-अलग हो सकता है, इसलिए अपने परिवार की धार्मिक परंपरा या स्थानीय पंचांग का पालन करना उचित है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की व्रत कथा पौराणिक कथा के अनुसार मथुरा के राजा उग्रसेन के पुत्र कंस ने अपनी बहन देवकी का विवाह वसुदेव के साथ किया। विवाह के समय आकाशवाणी हुई कि देवकी का आठवाँ पुत्र कंस के वध का कारण बनेगा। यह सुनकर कंस भयभीत और क्रोधित हो गया। उसने देवकी और वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया। देवकी की संतानों के जन्म लेते ही कंस उन्हें मार देता था। समय बीतता गया और देवकी के आठवें पुत्र के जन्म का समय आया। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की मध्यरात्रि में भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में देवकी की कोख से अवतार लिया। कहा जाता है कि भगवान के जन्म के समय कारागार के पहरेदार गहरी निद्रा में चले गए और कारागार के द्वार स्वयं खुल गए। वसुदेव भगवान श्रीकृष्ण को एक टोकरी में लेकर यमुना नदी पार कर गोकुल पहुंचे। गोकुल में नंद बाबा और माता यशोदा के घर उसी समय एक कन्या ने जन्म लिया था। वसुदेव श्रीकृष्ण को यशोदा के पास छोड़कर उस कन्या को लेकर वापस कारागार लौट आए। जब कंस को देवकी की आठवीं संतान के जन्म की सूचना मिली, तो वह उसे मारने के लिए पहुंचा। लेकिन जैसे ही उसने उस कन्या को पकड़कर भूमि पर पटकने का प्रयास किया, वह दिव्य रूप धारण कर आकाश में प्रकट हो गई। देवी ने कंस से कहा कि उसका वध करने वाला जन्म ले चुका है और वह सुरक्षित स्थान पर पहुंच गया है। यह सुनकर कंस और अधिक भयभीत हो गया। आगे चलकर भगवान श्रीकृष्ण ने अपने बाल्यकाल में अनेक दुष्ट शक्तियों का अंत किया और अंततः मथुरा पहुंचकर अत्याचारी कंस का वध किया। इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने धर्म की स्थापना और अधर्म का विनाश किया। इस प्रकार, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी आस्था, भक्ति और आनंद का महान पर्व है। भगवान श्रीकृष्ण का जीवन हमें प्रेम, करुणा, साहस, कर्तव्य और धर्म का संदेश देता है। उनकी शिक्षाएं आज भी मानव जीवन को सही दिशा प्रदान करती हैं। वर्ष 2026 में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 4 सितंबर, शुक्रवार को मनाई जाएगी। इस पावन अवसर पर श्रद्धालु व्रत, पूजा, भजन-कीर्तन और श्रीकृष्ण जन्म की कथा का श्रवण कर भगवान से सुख, शांति, समृद्धि और सद्बुद्धि की कामना कर सकते हैं। जय श्रीकृष्ण! - शुभा दुबे

प्रभासाक्षी 3 Sep 2026 5:18 pm

Kajari Teej Vrat: अखंड सौभाग्य का पर्व Kajari Teej आज, जानें Puja Vidhi और चंद्रोदय का समय

हर साल भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को कजरी तीज का व्रत रखा जाता है। इस बार आज यानी की 31 अगस्त 2026 को कजरी तीज का व्रत किया जा रहा है। इस व्रत को महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अखंड सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए करती हैं। यह व्रत भगवान शिव और मां पार्वती को समर्पति होता है। इसलिए इस दिन भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा-अर्चना की जाती है। वहीं कुंवारी लड़कियां अच्छे वर की कामना से यह व्रत करती हैं। तो आइए जानते हैं कजरी तीज की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक 30 अगस्त की रात 09:39 मिनट से भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि की शुरुआत होगी। वहीं इस तिथि की समाप्ति आज यानी की 31 अगस्त की रात 08:53 मिनट पर होगी। ऐसे में उदयातिथि के आधार पर 31 अगस्त 2026 को कजरी तीज का व्रत किया जा रहा है। पूजा विधि इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करें। फिर पूजा का संकल्प लें और सूर्य देव को अर्घ्य दें। अब पूजा स्थल को साफ करें और भगवान शिव, मां पार्वती और नीमड़ी माता की प्रतिमा को स्थापित करें। इसके बाद भगवान शिव को दूध, गंगाजल, दही और बेलपत्र आदि अर्पित करें। वहीं मां पार्वती को सिंदूर, कुमकुम, चूड़ी, बिंदी और श्रृंगार सामग्री अर्पित कर विधिविधान से पूजा करें। पूजा के बाद भगवान शिव और मां पार्वती की आरती करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें। चंद्रमा को दे अर्घ्य कजरी तीज व्रत में भगवान शिव, मां पार्वती, नीमड़ी मां की पूजा करें। फिर चंद्र देव को अर्घ्य देने के बाद व्रत खोलें। चंद्रोदय होने पर एक लोटे में जल, दूध, अक्षत, रोली और फूल से अर्घ्य दें। वहीं इसके बाद एक ही जगह पर खड़े होकर चार बार परिक्रमा करें। महत्व विवाहित महिलाओं के लिए इस पर्व का विशेष महत्व होता है। इस दिन व्रत और पूजा करने से दांपत्य जीवन सुखमय होता है। इस दिन शादीशुदा महिलाएं सोलह श्रृंगार करके व्रत रखती हैं। यह व्रत सौभाग्य और समर्पण का प्रतीक है। कजरी तीज पर गीत-संगीत और लोक-नृत्य का विशेष महत्व होता है।

प्रभासाक्षी 31 Aug 2026 9:43 am

Varalakshmi Vrat 2026: वरलक्ष्मी व्रत पर बरसेगी मां की असीम कृपा, जानें Importance और कलश स्थापना के नियम

आज यानी की 28 अगस्त 2026 को वरलक्ष्मी व्रत रखा जा रहा है। यह मां लक्ष्मी के स्वरूप वरलक्ष्मी को समर्पित विशेष व्रत है। मुख्य रूप में विवाहित महिलाएं वरलक्ष्मी व्रत पति और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए करती हैं। हालांकि पहली बार यह व्रत करने वाली महिलाओं को पूजा विधि और नियमों के बारे में जानना बेहद जरूरी है। तो आइए जानते हैं वरलक्ष्मी व्रत की तिथि, मुहू्र्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक 28 अगस्त 2026 को सावन का आखिरी शुक्रवार है। इसलिए इस दिन वरलक्ष्मी का व्रत किया जाएगा। इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा स्थिर लग्न में की जाती है। आज मां लक्ष्मी की पूजा के लिए 4 शुभ मुहूर्त हैं। आज ब्रह्म मुहूर्त सुबह 04:28 मिनट से लेकर 05:12 मिनट तक है। वहीं अभिजीत मुहूर्त 11:56 से लेकर दोपहर 12:48 मिनट तक है। व्रत रखने के नियम इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करें और साफ कपड़े पहनें। पूजा स्थान को अच्छे से साफ करके वहां चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। फिर मां वरलक्ष्मी की प्रतिमा को स्थापित करें। वहीं कई जगह पर कलश स्थापना की परंपरा है। कलश में जल भरकर इसके ऊपर आम के पत्ते या नारियल रखें। फिर पूजा के समय मां को फल, फूल, मिठाई, कुमकुम, हल्दी और अन्य श्रृंगार सामग्री अर्पित करें। अब वरलक्ष्मी का ध्यान करें और परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की कामना करें। व्रत के दौरान मन, कर्म और वचनों में शुद्धता बनाए रखें। महत्व बता दें कि वरलक्ष्मी को महालक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि वर और लक्ष्मी के मेल से बना वरलक्ष्मी सभी मनोकामनाओं को पूरा करने वाली देवी का प्रतीक है। इस व्रत को करने से घर में सुख-शांति और समृद्धि आती है। धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत को करने से आर्थिक समस्याओं से निजात मिलती है और घर-परिवार का कल्याण होता है। वहीं कई महिलाएं संतान सुख और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से भी यह व्रत करती हैं।

प्रभासाक्षी 28 Aug 2026 9:47 am

Raksha Bandhan 2026: 28 अगस्त को भद्रा मुक्त शुभ मुहूर्त, जानें Rakhi बांधने का सटीक Time और Rituals

आज यानी की 28 अगस्त 2026 को भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और स्नेह का प्रतीक रक्षाबंधन का पर्व मनाया जा रहा है। इस त्योहार के प्रति बहनों और भाइयों में अधिक उत्सुकता देखने को मिलती है। इस बार सावन माह की पूर्णिमा 27 अगस्त 2026 की सुबह शुरू होकर 28 अगस्त 2026 की सुबह समाप्त होगी। ऐसे में 28 अगस्त को यह पर्व मनाया जा रहा है। तो आइए जानते हैं इस पर्व की तिथि, मुहूर्त और पूजन विधि के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक 28 अगस्त 2026 की सुबह 05:57 मिनट से 09:48 मिनट तक राखी बांधने का मुहूर्त है। इस दौरान करीब 3 घंटे 51 मिनट का समय मिलेगा। सुबह का यह मुहूर्त पूर्णिमा तिथि से जुड़ा होने की वजह से विशेष महत्व रखता है। सुबह 7:33 बजे से लेकर 9:10 बजे तक लाभ मुहूर्त रहेगा। वहीं इसके बाद 09:10 बजे से लेकर 9:48 बजे तक अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त रहेगा। धार्मिक मान्यता है कि इन मुहूर्त में राखी बांधना शुभ होता है। जानें भद्रा की स्थिति रक्षाबंधन के समय भद्रा की स्थिति को लेकर लोगों के बीच खासी सावधानी रहती है। धार्मिक परंपरा के मुताबिक भद्रा के समय राखी बांधने से बचा जाता है। लेकिन भद्राकाल 27 अगस्त 2026 को समाप्त हो जाएगा। इसलिए 28 अगस्त को रक्षाबंधन के पर्व पर भद्रा का साया नहीं रहेगा। भाई-बहन का पर्व आमतौर पर रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के रिश्ते से जोड़कर देखा जाता है। बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती हैं और उनके सुख-समृद्धि, सेहत और दीर्घायु होने की कामना करती हैं। वहीं भाई भी अपनी बहन की सुरक्षा और हर परिस्थिति में साथ देने का संकल्प लेता है। ऐसे बांधे राखी इस दिन राखी बांधने से पहले घर के मुख्य द्वार या दीवार पर गेरू और चावल के घोल से श्रवण कुमार का चित्र बनाएं। फिर इस चित्र की पूजा करें। वहीं इस दिन भगवान गणेश की पूजा का भी विशेष महत्व होता है। अब अपने भाई को को लकड़ी के पाट पर बैठाएं और इस दौरान उनका मुंह पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए। पूजा थाली में कुमकुम, रोली, हल्दी, अक्षत, दीपक, राखी और मिठाई रखें। फिर दीपक जलाएं और भाई के सिर पर रुमाल या साफ कपड़ा रखें। अब हल्दी, कुमकुम और अक्षत से भाई के माथे पर मंगल टीका लगाएं। तिलक लगाने के बाद आरती करें और भाई की दाहिनी कलाई पर राखी बांधें। धार्मिक मान्यता है कि राखी में तीन गांठें लगाना शुभ होता है। यह तीन गांठें, सुख-सुरक्षा और समृद्धि के लिए होती है।

प्रभासाक्षी 28 Aug 2026 9:35 am

सुकर्मा योग में पूरे दिन बहनें बांध सकेंगी राखी, इस बार रक्षाबंधन पर नहीं है भद्रा का साया

रक्षाबंधन का त्योहार बहन-भाई के बीच प्रेम का प्रतीक है। इसमें बहन भाई को तिलक लगाकर उसके दीर्घायु की कामना करती है। भाई भी जीवन भर बहन के सुख-दुख में साथ निभाने का वादा करता है और स्नेह स्वरूप बहन को उपहार भी देता है। इस त्योहार को प्राचीन काल से मनाने की परंपरा चली आ रही है। इस पर्व को हिंदी पंचांग के श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। पूर्णिमा के दिन मनाएं जाने कि वजह से कई जगह इसे राखी पूर्णिमा भी कहते हैं। इस वर्ष रक्षाबंधन 28 अगस्त 2026 को है। पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि इस बार रक्षाबंधन का पर्व बेहद खास रहने वाला है। 28 अगस्त 2026 को पूरे दिन राखी बांधने के लिए शुभ समय रहेगा, क्योंकि भद्राकाल का साया नहीं रहेगा। पूर्णिमा पर आमतौर पर भद्रा रहती है और भद्राकाल में कोई भी शुभ कार्य करना वर्जित माना जाता है। इस बार रक्षाबंधन पर भद्रा का कोई व्यवधान नहीं रहेगा। पंचांग की गणना के अनुसार 27 अगस्त को सुबह 9:09 मिनट से भद्रा शुरू होगी, जो रात 9:25 मिनट तक रहेगी। जिससे 28 अगस्त को रक्षाबंधन का पूरा दिन शुभ रहेगा। खास बात यह है कि इस बार रक्षाबंधन पर भद्राकाल का साया नहीं रहेगा, यानी बहनें सुबह से लेकर शाम तक कभी भी अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांध सकेंगी। श्रावणी पूर्णिमा पर 28 अगस्त को शतभिषा नक्षत्र, सुकर्मा योग, बव उपरांत कौलव करण तथा मीन राशि के चंद्रमा की साक्षी में मनाया जाएगा। धर्मशास्त्रीय मान्यता के अनुसार बहनें भाई की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और मंगलकामना के लिए उसकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधेंगी। शुक्रवार के दिन सुकर्मा योग होने से भी यह दिन विशेष शुभ फलदायी माना जा रहा है। ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि रक्षाबंधन का त्योहार बहन-भाई के बीच प्रेम का प्रतीक है। इसमें बहन भाई को तिलक लगाकर उसके दीर्घायु की कामना करती है। भाई भी जीवन भर बहन के सुख-दुख में साथ निभाने का वादा करता है और स्नेह स्वरूप बहन को उपहार भी देता है। इस त्योहार को प्राचीन काल से मनाने की परंपरा चली आ रही है। रक्षाबंधन पर अबकी बार भद्रा का साया नहीं है। रक्षाबंधन पर अक्सर ऐसा होता है कि भद्रा का अशुभ साया भाई-बहन के इस पवित्र त्योहार में खलल डाल देता है और त्योहार का मजा किरकिरा हो जाता है। खुशी की बात यह है कि इस बार भद्रा नहीं है और भाई-बहन पूरे आनंद और प्रेम सौहार्द के साथ इस त्योहार को मनाएंगे। रक्षाबंधन श्रावण मास की पूर्णिमा को होता है। इस दिन बहनें राखी के रूप में अपने भाई की कलाई पर रक्षासूत्र बांधती हैं और भाई इसके बदले में बहनों को उनकी रक्षा करने का वचन देते हैं। इसे भी पढ़ें: Famous Temple: मां बगलामुखी मंदिर क्यों है खास, Celebs और VIPs की आस्था का केंद्र बना Himachal Pradesh का यह सिद्ध धाम नहीं रहेगा भद्रा का साया ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि इस बार रक्षाबंधन पर भद्रा का कोई व्यवधान नहीं रहेगा। पंचांग की गणना के अनुसार 27 अगस्त को सुबह 9:09 मिनट से भद्रा शुरू होगी, जो रात 9:25 मिनट तक रहेगी। जिससे 28 अगस्त को रक्षाबंधन का पूरा दिन शुभ रहेगा। रक्षाबंधन तिथि भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि रक्षाबंधन 28 अगस्त को मनाया जाएगा। सावन के महीने के आखिरी दिन यानी के श्रावण पूर्णिमा को रक्षाबंधन मनाया जाता है। श्रवण शुक्ल पूर्णिमा, 28 अगस्त 2026 (शुक्रवार) को रक्षाबन्धन है। इस दिन पूर्णिमा तिथि प्रातः 9:48 तक है। रक्षाबंधन पर्व पर भद्रा का साया नहीं होगा। पूर्णिमायां भद्रारहितायां त्रिमुहूर्त्ताधिकोदय व्यापिन्यामपराह्न प्रदोषे वा कार्यम् - धर्मसिन्धु । रक्षा बंधन : - 28 अगस्त 2026 पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: - 27 अगस्त को सुबह 09:08 मिनट से शुरू पूर्णिमा तिथि समापन: - 28 अगस्त को सुबह 09:48 मिनट तक रक्षा बंधन का शुभ मुहूर्त चर-लाभ-अमृत का चौघड़िया प्रातः 06:08 से प्रातः 10:53 तक शुभ का चौघड़िया दोपहर 12:28 से दोपहर 02-03 तक अपराह्न दोपहर 01:44 से सायं 04:16 तक चर का चौघड़िया सायं 05-13 से सायं 05 06.48 तक अभिजित दोपहर 12:04 से दोपहर 12:53 तक है। राखी बांधने का सही तरीका भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि राखी बंधवाते समय भाई का मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। बहनों को पूजा की थाली में चावल, रौली, राखी, दीपक आदि रखना चाहिए। इसके बाद बहन को भाई के अनामिका अंगुली से तिलक करना चाहिए। तिलक के बाद भाई के माथे पर अक्षत लगाएं। अक्षत अखंड शुभता को दर्शाते हैं। उसके बाद भाई की आरती उतारनी चाहिए और उसके जीवन की मंगल कामना करनी चाहिए। कुछ जगहों पर भाई की सिक्के से नजर उतारने की भी परंपरा है। भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास से जानते हैं राशि अनुसार बहनें अपने भाई के हाथ पर कोनसे कलर की राखी बांधें। मेष :- राशि के भाई को मालपुए खिलाएं एवं लाल डोरी से निर्मित राखी बांधे। वृषभ :- राशि के भाई को दूध से निर्मित मिठाई खिलाएं एवं सफेद रेशमी डोरी वाली राखी बांधे। मिथुन :- राशि के भाई को बेसन से निर्मित मिठाई खिलाएं एवं हरी डोरी वाली राखी बांधे। कर्क :- राशि के भाई को रबड़ी खिलाएं एवं पीली रेशम वाली राखी बांधे। सिंह :- राशि के भाई को रस वाली मिठाई खिलाएं एवं पंचरंगी डोरे वाली राखी बांधे। कन्या :- राशि के भाई को मोतीचूर के लड्डू खिलाएं एवं गणेशजी के प्रतीक वाली राखी बांधे। तुला :-राशि के भाई को हलवा या घर में निर्मित मिठाई खिलाएं एवं रेशमी हल्के पीले डोरे वाली राखी बांधे। वृश्चिक :- राशि के भाई को गुड़ से बनी मिठाई खिलाएं एवं गुलाबी डोरे वाली राखी बांधे। धनु :- राशि के भाई को रसगुल्ले खिलाएं एवं पीली व सफेद डोरी से बनी राखी बांधे। मकर :- राशि के भाई को मिठाई खिलाएं एवं मिलेजुले धागे वाली राखी बांधे। कुंभ :- राशि के भाई को ग्रीन मिठाई खिलाएं एवं नीले रंग से सजी राखी बांधे। मीन :- राशि के भाई को मिल्क केक खिलाएं एवं पीले-नीले जरी की राखी बांधे। - डा. अनीष व्यास भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक

प्रभासाक्षी 26 Aug 2026 5:50 pm

Eid Milad-un-Nabi 2026: 25 या 26 अगस्त? जानें भारत में कब है Prophet Muhammad का जन्मदिन और महत्व

इस्लाम धर्म में ईद मिलाद-उन-नबी को पाक और अजतम (गौरवशाली) दिनों में शामिल किया गया है। खासतौर पर यह पाक मौका है, जब पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की विलादत-ए-मुबारक यानी 'जन्म की बधाई' को मनाते हैं। दुनियाभर के कई देशों में ईद मिलाद-उन-नबी, भारत में भी इसे अकीदत और एहतराम के साथ मनाया जाता है। भारत में भी इस दिन को मनाया जाता है। इसे नबी दिवस, मौलिद, मोहम्मद का जन्मदिन या पैगंबर मुहम्मद के जन्मदिन के रुप में जानते हैं। इस दिन सार्वजनिक अवकाश होता है। भारत में अधिकांश स्कूल और व्यवसाय इस दिन बंद होते हैं। भारत में कब ईद मिलाद-उन-नबी? इस्लाम धर्म में यह पवित्र त्योहार कब मनाया जाएगा, इसकी तारीख को लेकर काफी कन्यफूय्ज है। आइए आपको बताते हैं ईद मिलाद-उन-नबी का त्योहार 26 अगस्त 2026, बुधवार के दिन मनाया जाएगा। वैसे यह त्योहार इस्लामी तारीख चांद पर आधारित होती है, जिसके कारण अलग-अलग कैलेंडर और चांद देखने के तरीकों के कारण से ग्रेगोरियन तारीख में काफी अंतर देखने को मिलता है। वैसे कुछ इस्लामी कैलेंडरों में 12 रबी-उल-अव्वल 1448 हिजरी की तारीख 25 अगस्त है। वहीं, कुछ कैलेंडर और मुकामी रिवायतों में इसे 26 अगस्त को मनाया जाएगा। ईद मिलाद-उन-नबी के दिन लोग क्या करते हैं? इस दिन मुसलमान पैगंबर मुहम्मद के जन्म और उनकी शिक्षाओं को याद करते हैं, उन पर चर्चा करते हैं और जश्न मनाते हैं। कई सुन्नी मुसलमान इस अवसर को इस्लामी महीने रबी अल-अव्वल की 12 तारीख को मनाते हैं, बल्कि शिया समुदाय के लोग इसे रबी अल-अव्वल की 17 तारीख को मनाते हैं। इस दिन कई तरह की गतिविधियां की जाती हैं- - रात भर प्रार्थना सभाएं चलती हैं। - बड़ी भीड़ वाली पदयात्राएं और जुलूस निकलते हैं। - इतना ही नहीं, घरों, मस्जिदों और अन्य इमारतों को उत्सव के बैनर और झंडे से सजाया जाता है। - मस्जिदों से लेकर सामुदायिक भवनों में सामूहिक भोजन का आयोजन किया जाता है। - इसके अलावा, मुहम्मद के जीवन, कार्यों और उनकी शिक्षाओं के बारे में कहानियों और कविताओं के जरिए लोगों का मार्गदर्शन करते हैं।

प्रभासाक्षी 21 Aug 2026 5:08 pm

Nag Panchami 2026: नाग पंचमी पर कैसे पाएं दोष से मुक्ति, जानें Nag Panchami 2026 की पूजा विधि

हिंदू धर्म में नागपंचमी पर्व का विशेष महत्व होता है। श्रावण माह की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को यह पर्व मनाया जाता है। इस दिन नाग देवता की पूजा-आराधना की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन नागों की पूजा-अर्चना करने से सर्प भय, कालसर्प दोष और सर्पदंश जैसी बाधाओं से मुक्ति मिलती है। वहीं आज लोग नाग देवता को दूध अर्पित करते हैं और उनको स्नान कराकर पूजा आदि करते हैं। साथ ही नाग देवता से सुरक्षा और समृद्धि की कामना करते हैं। तो आइए जानते हैं नाग पंचमी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक 16 अगस्त की शाम 04:51 मिनट से पंचमी तिथि की शुरूआत होगी। वहीं 17 अगस्त ती शाम 05:00 बजे इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से आज यानी की 17 अगस्त को नागपंचमी का पर्व मनाया जा रहा है। इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त 06:15 मिनट से लेकर 08:31 मिनट तक है। क्यों की जाती है नाग देवता की पूजा भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों से नागों का संबंध जुड़ा माना गया है। जहां भगवान शिव के गले में वासुकी नाग सुशोभित होते हैं। तो वहीं शेषनाग भगवान विष्णु की शैया हैं। श्रीकृष्ण के जन्म के बाद शेषनाग ने उनको और वासुदेव को यमुना पार कराने में मदद की थी। इसके अलावा समुद्र मंथन में भी वासुकी नाग की अहम भूमिका मानी जाती है। यह दिन नाग देवताओं के प्रति सम्मान प्रकट करने का पर्व है। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें और सूर्य देव को अर्घ्य दें। इसके बाद गाय के गोबर से नाग देवता का चित्र बनाएं और उनका आह्वान करें। अगर आपको व्रत करना हो, तो व्रत का संकल्प करें और फिर गुलाल, अबीर, मेहंदी, मेवा, फूल और दूध आदि अर्पित करें। इसके बाद मंत्रों का जाप करें और पूजा के बाद मनोकामना की पूर्ति के लिए प्रार्थना करें।

प्रभासाक्षी 17 Aug 2026 9:16 am

Hariyali Teej 2026: अखंड सौभाग्य के लिए किया जाता है हरियाली तीज का पर्व, जानिए पूजन विधि और महत्व

सावन का पवित्र महीना चल रहा है। हर साल सावन महीने के शुक्ल पत्र की तृतीया तिथि को हरियाली तीज का पर्व मनाया जाता है। इस बार आज यानी की 15 अगस्त 2026 को हरियाली तीज का पर्व मनाया जा रहा है। सुहागिन महिलाओं के लिए यह पर्व खास होता है। इस दिन भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा का विधान होता है। इस तिथि पर बारिश का मौसम रहता है और चारों ओर हरियाली रहती है। जिस कारण इसको हरियाली तीज का पर्व कहा जाता है। इस दिन व्रत और पूजन करने से वैवाहिक जीवन सुखमय होता है। तो आइए जानते हैं हरियाली तीज की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में... इसे भी पढ़ें: Hariyali Teej 2026: शिव-पार्वती के दिव्य मिलन का प्रतीक पर्व ‘हरियाली तीज’ तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक सावन माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि की शुरूआत 14 अगस्त की शाम 06:47 मिनट पर हुई है। वहीं इस तिथि की समाप्ति आज यानी 15 अगस्त की शाम 05:29 मिनट पर होगी। उदयातिथि के मुताबिक 15 अगस्त 2026 को हरियाली तीज का पर्व मनाया जा रहा है। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद सूर्य देव को अर्घ्य दें। इसके बाद बालू से भगवान शिव और मां पार्वती की प्रतिमा बनाएं। इसके बाद लकड़ी की चौकी पर कपड़ा बिछाकर उस पर भगवान शिव और मां पार्वती की प्रतिमा को स्थापित करें। इसके बाद मां पार्वती को सुहाग का सामान जैसे बिंदी, चूड़ियां, सिंदूर और कंघी आदि को थाली में सजाकर अर्पित करें। वहीं नैवेद्य में खीर, पूरी, हलुआ या मालपुए चढ़ाएं। इसके बाद हरियाली तीज की कथा सुनें। पूजा के अंत में आरती करें और सुखमय वैवाहिक जीवन की कामना करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें। महत्व सावन के महीने में आने वाली हरियाली तीज के पर्व का विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक मां पार्वती ने शिव को पति रूप में पाने के लिए वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। मां पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनको अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। तब से हर साल सावन माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरियाली तीज का पर्व मनाया जाता है।

प्रभासाक्षी 15 Aug 2026 9:50 am

Hariyali Teej 2026: समृद्ध परंपराओं, प्रकृति-प्रेम और दांपत्य जीवन की पवित्रता का अनुपम उत्सव है हरियाली तीज

भारतीय संस्कृति में प्रत्येक पर्व का अपना विशेष महत्व है। इन्हीं पावन पर्वों में हरियाली तीज का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पर्व श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। वर्षा ऋतु के आगमन से जब धरती हरियाली की चादर ओढ़ लेती है, तब प्रकृति का यह अनुपम सौंदर्य हरियाली तीज के उत्सव को और भी मनोहारी बना देता है। यह पर्व विशेष रूप से महिलाओं के लिए सौभाग्य, प्रेम, समृद्धि और आनंद का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया। इसी दिव्य मिलन की स्मृति में हरियाली तीज का पर्व मनाया जाता है। विवाहित महिलाएँ अपने पति की दीर्घायु एवं सुख-समृद्धि की कामना करती हैं, जबकि अविवाहित कन्याएँ योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए व्रत रखती हैं और माता पार्वती तथा भगवान शिव की पूजा करती हैं। इसे भी पढ़ें: Famous Shiv Temple: हिमाचल के इन Famous Shiva Temples के दर्शन से मिलेगी अपार शांति, देखें पूरी Travel Guide हरियाली तीज का उत्सव पूरे देश में उल्लास और उत्साह के साथ मनाया जाता है। महिलाएँ हरे रंग के वस्त्र धारण करती हैं, हाथों में मेहंदी रचाती हैं, चूड़ियाँ पहनती हैं और पारंपरिक आभूषणों से श्रृंगार करती हैं। बाग-बगीचों में झूले डाले जाते हैं, लोकगीत गाए जाते हैं और नृत्य के माध्यम से उत्सव की खुशी व्यक्त की जाती है। विशेष रूप से राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और बिहार जैसे राज्यों में इस पर्व की भव्यता देखने योग्य होती है। अनेक स्थानों पर भगवान शिव और माता पार्वती की शोभायात्राएँ भी निकाली जाती हैं। यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का ही नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान और पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश देता है। वर्षा ऋतु में चारों ओर फैली हरियाली हमें वृक्षों और वनस्पतियों के महत्व का स्मरण कराती है। हरियाली तीज हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने तथा पर्यावरण को सुरक्षित रखने की प्रेरणा देती है। आज के आधुनिक जीवन में भी हरियाली तीज की प्रासंगिकता बनी हुई है। यह पर्व परिवार में प्रेम, विश्वास और सौहार्द को मजबूत करता है तथा हमारी सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ने का अवसर प्रदान करता है। नई पीढ़ी को भी इस पर्व के सांस्कृतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक महत्व से परिचित कराना आवश्यक है। हरियाली तीज भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपराओं, प्रकृति-प्रेम और दांपत्य जीवन की पवित्रता का अनुपम उत्सव है। यह पर्व जीवन में उल्लास, प्रेम, आस्था और हरियाली का संदेश देता है। - शुभा दुबे

प्रभासाक्षी 13 Aug 2026 4:49 pm

Hariyali Amavasya 2026: सावन की अमावस्या पर बन रहे विशेष संयोग, जानें Puja Vidhi और दान का महत्व

आज यानी की 12 अगस्त 2026 को हरियाली अमावस्या मनाई जा रही है। सावन शिवरात्रि के ठीक अगले दिन और हरियाली तीज से 3 दिन पहले यह अमावस्या आती है। सावन के महीने में पड़ने की वजह से इसको हरियाली अमावस्या कहा जाता है। हरियाली अमावस्या के दिन पूजा-पाठ, दान, पितरों का स्मरण करना बेहद फलदायी माना जाता है। ऐसे में आइए जानते हैं हरियाली अमावस्या की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक श्रावण माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि की शुरूआत 12 अगस्त की सुबह 01:53 मिनट पर हो रही है। वहीं इस तिथि की समाप्ति रात 11:07 मिनट पर होगी। ऐसे में हरियाली अमावस्या 12 अगस्त 2026 को मनाई जा रही है। स्नान-दान मुहूर्त सावन माह के दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान-दान करना शुभ माना जाता है। 12 अगस्त को सुबह 04:23 मिनट से लेकर 05:06 मिनट तक ब्रह्म मुहूर्त रहेगा। वहीं पूजा के लिए अभिजित मुहूर्त दोपहर 11:59 मिनट से लेकर 12:52 मिनट तक रहेगा। पूजन विधि हरियाली अमावस्या को पितरों के तर्पण के लिए सुबह जल्दी उठकर गंगाजल से स्नान आदि करें। इसके बाद अपने ईष्ट का ध्यान करें और भगवान शिव की पूजा-अर्चना करें। भगवान शिव को मदार और आक के फूल चढ़ाएं और पीपल के पेड़ की पूजा करें। इससे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा आती है। महत्व हरियाली अमावस्या को चितलगी अमावस्या, गटारी अमावस्या और चुक्कला अमावस्या के नाम से भी जानते हैं। इस दिन भगवान शिव की पूजा का विधान है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक जो भी जातक इस दिन विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और कष्टों से मुक्ति मिलती है।

प्रभासाक्षी 12 Aug 2026 9:37 am

Sawan Shivratri 2026: सावन शिवरात्रि पर जानें जलाभिषेक का Muhurat और भद्रा काल का समय

हिंदू धर्म में सावन शिवरात्रि का विशेष महत्व होता है। सावन का महीना भगवान शिव को अतिप्रिय होता है। इसलिए सावन माह में भगवान शिव की पूजा-अर्चना का विशेष महत्व माना जाता है। इस दौरान भगवान शिव का पूजन, जप, जलाभिषेक और रुद्राभिषेक करने से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और बाधाओं का नाश होता है। सावन महीने की शिवरात्रि का विशेष महत्व होता है। सावन शिवरात्रि पर भगवान शिव की पूजा और आराधना शुभ और फलदायी मानी जाती है। तो आइए जानते हैं सावन शिवरात्रि की तिथि, मुहूर्त और पूजन विधि के बारे में... तिथि और मुहूर्त हर साल सावन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को सावन शिवरात्रि मनाई जाती है। पंचांग के मुताबिक इस साल चतुर्दशी तिथि की शुरूआत 11 अगस्त 2026 की सुबह 04:53 मिनट से हुई है। वहीं इस तिथि की समाप्ति अगले दिन यानी की 12 अगस्त को देर रात 01:51 मिनट पर होगी। उदयातिथि के मुताबिक 11 अगस्त को सावन शिवरात्रि मनाई जा रही है। शिवरात्रि पर रात्रि के चारों प्रहर में शिव और पार्वती की पूजा का विशेष महत्व होता है। भद्रा का साया इस बार सावन शिवरात्रि पर भद्राकाल का साया रहेगा। धार्मिक शास्त्रों में भद्राकाल को शुभ नहीं माना जाता है। आज सुबह से भद्रा लग जाएगी, जोकि दोपहर 03:22 मिनट तक रहेगी। लेकिन भगवान शिव की पूजा-अर्चना और जलाभिषेक में भद्रा दोष मान्य नहीं होगा। ऐसे में शिवभक्त बिना किसी डर के भद्राकाल में भगवान शिव की पूजा कर सकते हैं। पूजन विधि इस दिन सूर्योदय से पहले उठें और स्नान आदि करके साफ कपड़े पहनें। फिर घर के मंदिर की साफ-सफाई करें और पास में स्थित शिवालय में जाकर भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा करें। शिवलिंग पर जल, गंगाजल, दही, दूध, घी, शहद और शक्कर से अभिषेक करें। फिर शिवलिंग का दोबारा जल से अभिषेक करें। इसके बाद धतूरा, बेलपत्र, भांग, फूल और सफेद चंदन आदि अर्पित करें। अब भगवान शिव को फल और मिष्ठान आदि अर्पित कर नैवेद्य अर्पित करें। फिर 'ऊँ नम: शिवाय' मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र और शिव चालीसा का पाठ करें। अंत में भगवान शिव की आरती करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें।

प्रभासाक्षी 11 Aug 2026 9:36 am

Sawan Pradosh Vrat 2026: सोम प्रदोष व्रत पर शिवलिंग पूजा का महत्व, जानें Puja Timing और शुभ मुहूर्त

सावन के महीने में भगवान शिव की पूजा-आराधना का विशेष महत्व होता है। सावन माह में पड़ने वाले व्रत भी पुण्यदायी व्रतों में से एक माने जाते हैं। सावन में प्रदोष व्रत का विशेष महत्व होता है। वहीं प्रदोष व्रत सोमवार के दिन पड़ता है, इसको सोम प्रदोष व्रत भी कहा जाता है। प्रदोष में व्रत रखना और भगवान शिव की पूजा-आराधना करने से विशेष फलों की प्राप्ति होती है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक इस व्रत में प्रदोष काल में शिवलिंग का जलाभिषेक, रुद्राभिषेक, बेलपत्र और भांग-धतूरा आदि अर्पित किए जाते हैं। वहीं शिव मंत्रों के जाप से भगवान शिव और मां पार्वती की विशेष कृपा मिलती है। प्रदोष व्रत करने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति, संतान सुख और रोग आदि से छुटकारा मिलता है। इस बार 10 अगस्त को सोम प्रदोष व्रत किया जा रहा है। तो आइए जानते हैं सोम प्रदोष व्रत की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे मे... तिथि और मुहूर्त हिंदू पंचांग के अनुसार, सावन माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि की शुरुआत 10 अगस्त को सुबह 8 बजे से होगी और इस तिथि का समापन 11 अगस्त को 4 बजकर 55 मिनट पर होगा। सावन सोम प्रदोष व्रत पर पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 7 बजकर 05 मिनट से लेकर रात 09 बजकर 14 मिनट तक रहेगा। इस मुहूर्त में पूजा करना शुभ और फलदायी होता है। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करें और फिर भगवान शिव का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प करें। फिर भगवान शिव का दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से अभिषेक करें। इसके बाद 11 या 21 बेलपत्र, आक के फूल, धतूरा, फल, सुपारी, इलायची, लौंग, धूप, दीप, फूल, गंध, चावल और नैवेद्य अर्पित करें। पूजा के दौरान घी और शक्कर से बनी मिठाई का भोग लगाएं। इसके बाद शिव मंत्रों का जाप करें और शिव चालीसा का पाठ करें। प्रदोष व्रत कथा पढ़े और पूजा के अंत में घी के दीपक से भगवान शिव की आरती करें। पूरा दिन व्रत रखते हुए मन में भगवान शिव का स्मरण करें और शाम को फिर से स्नान आदि करके प्रदोष काल में भगवान शिव की फिर से विधि-विधान से पूजा-अर्चना करें। महत्व प्रदोष व्रत पर भगवान शिव की पूजा-अर्चना का महत्व होता है। वहीं सावन में प्रदोष व्रत का महत्व बढ़ जाता है। भगवान शिव की पूजा के लिए सबसे अच्छा मुहूर्त प्रदोष काल होता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक प्रदोष का समय होता है, जब भगवान शिव कैलाश पर तांडव करते हैं और सभी देवी-देवता उनकी आराधना करते हैं। प्रदोष व्रत रखने और प्रदोष काल में पूजा करने, दीपदान करने, शिव चालीसा और रुद्राष्टक का पाठ करने से सभी तरह के पापों का अंत हो जाता है।

प्रभासाक्षी 10 Aug 2026 9:39 am

Kamika Ekadashi 2026: सावन में कामिका एकादशी व्रत का क्या है आध्यात्मिक महत्व? नोट करें Shubh Muhurat

हिंदू धर्म में कामिका एकादशी का विशेष महत्व होता है। हिंदू पंचांग के मुताबिक सावन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को कामिका एकादशी कहा जाता है। सावन महीने में पड़ने वाली इस एकादशी तिथि का विशेष महत्व होता है। क्योंकि सावन का महीना भगवान शिव को अतिप्रिय होता है। वहीं एकादशी तिथि पर भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना के लिए सबसे अच्छा माना जाता है। एकादशी का व्रत करने पर और भगवान विष्णु की पूजा करने से जातक के सभी तरह के पाप नष्ट हो जाते हैं और मृत्यु लोक के बाद व्यक्ति विष्णु लोक को प्राप्त होता है। कामिका एकादशी का व्रत करने से गंगा स्नान, काशी, गया, पुष्कर और कुरुक्षेत्र जैसे महान तीर्थों के बराबर पुण्यफल प्राप्त होता है। तो आइए जानते हैं कामिका एकादशी की तिथि, मुहूर्त और पूजन विधि के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक सावन माह के कृष्ण पक्ष एकादशी तिथि की शुरूआत 08 अगस्त 2026 की दोपहर 01:59 मिनट पर शुरू होगी। वहीं अगले दिन यानी की 09 अगस्त की सुबह 11:04 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। उदयातिथि के मुताबिक कामिका एकादशी का व्रत 09 अगस्त 2026 को रखा जाएगा। वहीं व्रत का पारण 10 अगस्त को सुबह 05:47 मिनट से लेकर 80:00 बजे तक होगा। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर भगवान विष्णु को पंचामृत, जल से स्नान कराने के बाद हल्दी और चंदन लगाएं। इसके बाद पीले फूल, तुलसी दल और भोग आदि अर्पित करें। फिर धूप-दीप जलाकर भगवान विष्णु से प्रार्थना करें। इसके बाद विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें और एकादशी व्रत कथा सुनें। इसके बाद अगले दिन व्रत का पारण करें। मंत्र ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात। ॐ श्रीं श्री लक्ष्मी-नारायणाभ्यां नमः। ॐ विष्णवे नमः।

प्रभासाक्षी 9 Aug 2026 9:17 am

Jaya Parvati Vrat 2026: जया पार्वती व्रत का समापन, जानिए Puja Vidhi और Udyapan का सही समय और नियम

सावन माह की शुरूआत को चुकी है। वहीं आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी से जया-विजया पार्वती व्रत शुरू हुआ था। जोकि सावन कृष्ण तृतीया यानी की 5 दिनों तक रखा जाता है। जया पार्वती व्रत भगवान शिव और मां पार्वती को समर्पित है। यह व्रत महिलाएं अखंड सुहाग और खुशहाल वैवाहिक जीवन के लिए रखती हैं और कुंवारी कन्याएं मनचाए वर की प्राप्ति के लिए रखती हैं। इस बार आज यानी की 01 अगस्त को जया पार्वती व्रत का समापन किया जाएगा। कैसे करें समापन जया पार्वती व्रत 5 दिनों तक चलने वाला विशेष व्रत है। इसको मुख्य रूप से सुहागिन महिलाएं और कुंवारी कन्याएं रखती हैं। वहीं व्रत के अंतिम दिन विधि-विधान से उद्यापन और समापन करना शुभ माना जाता है। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद भगवान शिव और मां पार्वती का पूजन करें। पूजा में भगवान शिव और मां पार्वती को अक्षत, फूल, फल, धूप-दीप और नैवेद्य आदि अर्पित करें। इसके बाद व्रत कथा का पाठ करें। क्योंकि माना जाता है कि बिना कथा सुने व्रत का पूजा पूरा फल मिलता है। मां पार्वती को सुहाग की सामग्री अर्पित करें और इसमें चूड़ियां, बिंदी, चुनरी, सिंदूर, मेहंदी और श्रृंगार की अन्य वस्तुएं शामिल करें। इसके बाद आरती करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए मां पार्वती और भगवान शिव से क्षमायाचना करें। वहीं अपनी श्रद्धा अनुसार ब्राह्मण, जरूरतमंद या किसी सुहागिन को फल, वस्त्र, दक्षिणा या अन्न का दान करें। प्रसाद वितरित करें और सात्विक भोजन ग्रहण कर व्रत का पारण करें। धार्मिक मान्यता धार्मिक मान्यता है कि जो भी महिला विधिपूर्वक यह व्रत करके समापन करती हैं, उनका वैवाहिक जीवन खुशहाल रहता है और अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है। वहीं अविवाहित कन्याओं को मनचाहे वर की प्राप्ति होती है।

प्रभासाक्षी 1 Aug 2026 8:46 am