अगर मुंह के छालों से कान में रहती है टीस तो यहां जानिए कारण और होम्योपैथिक उपचार
मुंह के पिछले हिस्से के छालों से जुड़ी नसों के कारण कान में होने वाले दर्द (रेफर्ड पेन) को होम्योपैथी आंतरिक असंतुलन का लक्षण मानती है। पेट की गड़बड़ी, तनाव और रोग प्रतिरोधक क्षमता की कमी से होने वाली इस तकलीफ में मर्क सॉल, नाइट्रिक एसिड और बोरेक्स जैसी दवाएं लक्षणों के आधार पर स्थायी राहत देती हैं।
शारीरिक कमजोरी, तनाव और पुनर्वास : स्वस्थ जीवन की ओर वापसी
शारीरिक निष्क्रियता के कारण मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं। पुनर्वास के दौरान लक्षित व्यायामों से मांसपेशियों की ताकत और सहनशक्ति (Stamina) वापस लौटती है।
Aja Ekadashi 2026: अजा एकादशी व्रत से होता है सभी पापों का नाश
आज अजा एकादशी है, हिन्दू धर्म में इस व्रत की खास मान्यता है। इस व्रत को रखने से व्यक्ति के द्वारा अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति मिलती है और जीवन में भी सुख शांति मिलती है तो आइए हम आपको अजा एकादशी व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं। जानें अजा एकादशी व्रत के बारे में धार्मिक मान्यताओं के अनुसार 'अजा' शब्द का संबंध सनातन धार्मिक परंपरा में आध्यात्मिक अर्थ से जोड़ा गया है। अजा एकादशी भगवान विष्णु की आराधना से जुड़ी एक महत्वपूर्ण एकादशी मानी जाती है। इस दिन व्रत करने के पीछे मुख्य भावना आत्मसंयम, भक्ति और अपने कर्मों को सात्त्विक दिशा देना है। पंडितों के अनुसार अजा एकादशी का व्रत व्यक्ति को अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखने, भोजन में संयम बरतने और आध्यात्मिक चिंतन में अधिक समय लगाने का अवसर देता है। सनातन परंपरा में अजा एकादशी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। जगत के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित यह पावन व्रत जीवन के संचित पापों, दरिद्रता और संकटों को समाप्त करने वाला माना गया है। धर्मग्रंथों के अनुसार जो व्यक्ति इस दिन श्रद्धा से उपवास करता है, उसे एक हजार अश्वमेध यज्ञों के बराबर पुण्य प्राप्त होता है। जानें अजा एकादशी का शुभ मुहूर्त हिन्दू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 6 सितंबर 2026 को शाम 7:30 बजे आरंभ होगी और अगले दिन 7 सितंबर को शाम 5:05 बजे समाप्त होगी। व्रत के लिए उदया तिथि को मान्यता दी जाती है। इसलिए अजा एकादशी का व्रत 7 सितंबर 2026, सोमवार को रखा जाएगा। इसे भी पढ़ें: Aja Ekadashi 2026: अजा एकादशी आज, जानिए Muhurat, पूजन विधि और व्रत का महत्व अजा एकादशी पर दान का है खास महत्व सनातन परंपरा में व्रत के साथ दान का विशेष महत्व है। अजा एकादशी के अवसर पर अपनी क्षमता के अनुसार जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता करना पुण्य और परोपकार की भावना को मजबूत करता है। जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या आवश्यक सामग्री भी दान की जाती है। अजा एकादशी व्रत का पारण भी होता है विशेष पंडितों के अनुसार अजा एकादशी व्रत का पारण 8 सितंबर 2026 को किया जाएगा। पंचांग के अनुसार, इस दिन सुबह 6:02 बजे से 8:33 बजे तक पारण का शुभ समय रहेगा। व्रती इस अवधि में स्नान, पूजा और भगवान विष्णु की आराधना करने के बाद व्रत खोल सकते हैं। अजा एकादशी व्रत पर ऐसे करें पूजा, होगा लाभ अजा एकादशी का दिन बहुत खास होता है इसलिए इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल की सफाई कर गंगाजल से शुद्धिकरण करें और व्रत का संकल्प लें। पीले या लाल कपड़े पर भगवान विष्णु की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें। भगवान को पीला चंदन, अक्षत, फूल, माला और वस्त्र अर्पित करें। पूजा में तुलसी दल अवश्य शामिल करें। खीर, मिठाई और मौसमी फलों का भोग लगाएं। घी का दीपक और धूप जलाकर भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें। इसके बाद विष्णु चालीसा और अजा एकादशी व्रत कथा का पाठ करें। अंत में भगवान विष्णु और एकादशी माता की आरती करें। अगले दिन द्वादशी तिथि में पूजा करने के बाद निर्धारित समय में व्रत का पारण करें। अजा एकादशी व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा भी है खास शास्त्रों के अनुसार युधिष्ठिर ने एक बार भगवान कृष्ण से भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकादशी के बारे में पूछा था। कृष्ण ने उन्हें सत्यवादी हरिश्चंद्र के बारे में बताकर उत्तर दिया - वह राजा जो अपनी जान बचाने के लिए भी झूठ नहीं बोलते थे। महर्षि विश्वामित्र द्वारा परखे जाने पर, हरिश्चंद्र ने एक वचन का सम्मान करने के लिए अपना पूरा राज्य त्याग दिया। उनके पास अपने वचन के अलावा कुछ नहीं बचा था, उन्हें अपनी रानी तारामती और अपने पुत्र रोहितश्व को दासता में बेचने के लिए मजबूर किया गया, और स्वयं को एक चांडाल को बेच दिया गया जो काशी के श्मशान घाटों की देखभाल करता था। अयोध्या के सम्राट अब अपने दिन चिताओं पर कर वसूलने में बिताते थे। फिर सबसे क्रूर प्रहार: उनके पुत्र रोहितश्व की सर्प दंश से मृत्यु हो गई। तारामती बच्चे के शव को दाह संस्कार के लिए श्मशान ले गई - और हरिश्चंद्र को, अपने कर्तव्य से बंधे हुए, अपनी शोकाकुल पत्नी से दाह संस्कार शुल्क मांगना पड़ा जो उन्हें पता था कि वह नहीं दे सकती थी। उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने झूठ नहीं बोला। यह सबसे निचले बिंदु पर था कि ऋषि गौतम ने उन्हें ढूंढ निकाला और उन्हें अजा एकादशी के बारे में बताया उन्हें इस तिथि पर पूर्ण विश्वास के साथ उपवास करने की सलाह दी। हरिश्चंद्र ने व्रत का पालन किया। और उस एक दिन के पुण्य ने सब कुछ बदल दिया: देवता अवतरित हुए, रोहितश्व को जीवनदान मिला, तारामती ने अपनी शाही गरिमा वापस पा ली, और हरिश्चंद्र को उनका राज्य और, समय के साथ, उच्च लोकों में एक स्थान वापस मिल गया। अजा एकादशी व्रत पर ये न करें, होगी हानि पंडितों के अनुसार अजा एकादशी के दिन चावल और सभी प्रकार के अनाजों से बचें। इसके अलावा प्याज, लहसुन और सभी मांसाहारी भोजन से दूर रहें। मसूर दाल, चना और अधिकांश दालें न खाएं। शहद, और कांस्य के बर्तन से भोजन न करें। क्रोध, गपशप, कटु वचन और झगड़े न करें, ये व्रत को भोजन की तरह ही तोड़ते हैं। इसके अलावा अजा एकादशी के दिन बाल या नाखून न काटें, साथ ही शेविंग भी न करें। अजा एकादशी पर ये करें, होंगे लाभ अजा एकादशी पर फल, दूध, दही, और सूखे मेवे खाएं, इससे ऊर्जा बनी रहेगी। साथ ही साबूदाना, सिंघाड़ा आटा, कुट्टू आटा, समा चावल खाएं। इसके अलावा जो निर्जला व्रत रखते हैं, उन्हें पारण समय खुलने तक इसे नहीं छूना चाहिए। इसके अलावा आलू, शकरकंद, कद्दू और सेंधा नमक खाएं। अजा एकादशी ये भी करें, मिलेगा पुण्य धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सूर्योदय से पहले स्नान करें, अपने पानी में कुछ बूंदें गंगाजल डालें। साफ पीले या सफेद वस्त्र पहनें। व्रत का औपचारिक संकल्प लें। एक साफ चौकी पर भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र रखें। उसके बगल में एक तांबे का कलश स्थापित करें, जिसमें पानी भरा हो और आम के पत्तों और एक नारियल से ढका हो। चंदन, रोली, अक्षत, फूल, धूप और एक शुद्ध देसी घी का दीपक अर्पित करें। कोई भी विष्णु पूजा तुलसी के पत्तों के बिना अधूरी है। उन्हें पिछली शाम को तोड़ लें - तुलसी को एकादशी पर कभी नहीं तोड़ना चाहिए। पंचमेवा, फल और खीर अर्पित करें। प्रत्येक प्रसाद में तुलसी शामिल होनी चाहिए। दिन भर ॐ नमो भगवते वासुदेवाय या विष्णु सहस्रनाम का जाप करें। अजा एकादशी व्रत कथा पढ़ें या सुनें, फिर एक आरती थाली और भीमसेनी कपूर के साथ आरती करें।जो सबसे सख्त रूप का पालन करते हैं, वे रात भर भजन और कीर्तन में जागते रहते हैं। - प्रज्ञा पाण्डेय
Aja Ekadashi 2026: अजा एकादशी आज, जानिए Muhurat, पूजन विधि और व्रत का महत्व
हर साल भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को अजा एकादशी का व्रत किया जाता है। इस बार आज यानी की 07 सितंबर 2026 को यह व्रत किया जा रहा है। अन्य एकादशी तिथियों की तरह अजा एकादशी का व्रत जगत के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन व्रत करने और श्रद्धा व भक्तिभाव के साथ भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करने से समस्त पापों का नाश होता है। साथ ही जीवन से दुख-दरिद्रता दूर होती है। अजा एकादशी का व्रत करने से जातक को अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य की प्राप्ति होती है। तो आइए जानते हैं अजा एकादशी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे में... तिथि व शुभ मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक 06 सितंबर 2026 की शात 07:29 मिनट से अजा एकादशी तिथि की शुरूआत हो रही हैं। वहीं आज यानी की 07 सितंबर 2026 की शाम 05:03 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 07 सितंबर 2026 को अजा एकादशी का व्रत किया जा रहा है। वहीं द्वादशी तिथि के भीतर एकादशी व्रत का पारण सही समय पर करना शुभ माना जाता है। इसलिए 08 सितंबर को सुबह 06:02 बजे से सुबह 08:33 बजे तक पारण कर सकते हैं। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। अगर संभव हो तो इस दिन पीले कपड़े पहनें। फिर भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें और सूर्य देव को अर्घ्य दें। अब पूजा स्थल की सफाई करें और एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर उस पर श्रीहरि विष्णु की मूर्ति स्थापित करें। अब भगवा विष्णु के सामने घी का दीपक जलाएं और धूप जलाएं। फिर श्रीहरि को पीले फूल, रोली, मौली, अक्षत और फल आदि अर्पित करें। भगवान विष्णु को फल और मिठाई आदि का भोग अर्पित करें। वहीं भोग में तुलसी दल को शामिल करना न भूलें। इसके बाद अजा एकादशी व्रत कथा का पाठ करें। वहीं पूजा के दौरान भगवान विष्णु के मंत्र 'ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नम:' मंत्र का 108 बार जाप करें। अंत में पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें। धार्मिक मान्यताएं धार्मिक मान्यता के मुताबिक अजा एकादशी का व्रत करने से जातक को पापों से मुक्ति मिलती है। इस दिन जो भी भक्त भगवान विष्णु की सच्चे मन से पूजा-अर्चना करता है और व्रत करता है, उसको श्रीहरि की विशेष कृपा प्राप्त होती है। भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
Dahi Handi 2026: Vajra Yoga में मनेगा दही हांडी का पर्व, जानें Shubh Muhurat और Puja Vidhi
आज यानी की 05 सितंबर 2026 को श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ा दही हांडी का पर्व मनाया जा रहा है। यह जन्माष्टमी के अगले दिन मनाया जाता है। इस दिन श्रीकृष्ण की माखन लीला को याद किया जाता है। दही हांडी पर्व पर जगह-जगह गोविंदा की टोलियां एक-दूसरे के कंधे पर चढ़कर मानव पिरामिड बनाती हैं और ऊंचाई पर रखी मटकी को फोड़ा जाता है। देश के कई हिस्सों में इस पर्व की रौनक देखने को मिलती है। तो आइए जानते हैं कि जन्माष्टमी के अगले दिन दही हांडी का पर्व क्यों मनाया जाता है और इसका शुभ मुहू्र्त क्या है और पूजा कैसे करें। तिथि और मुहूर्त आज यानी की 05 सितंबर 2026 को वज्र योग रहेगा। वहीं दोपहर 12:00 बजे से लेकर 12:50 तक अभिजीत मुहूर्त रहेगा। यह सबसे शुभ समय माना जाता है। इस दौरान पूजा-अर्चना और शुभ कार्य किए जा सकते हैं। वहीं दोपहर 01:16 मिनट से लेकर 02:45 मिनट तक अमृत काल रहेगा। इसे भी पढ़ें: Krishna Janmashtami 2026: Krishna Janmashtami पर बना दुर्लभ संयोग, नोट करें Shubh Muhurat और Puja Vidhi क्यों मनाया जाता है दही हांडी का पर्व जन्माष्टमी की रात में श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का मुख्य अनुष्ठान किया जाता है। फिर अगले दिन श्रीकृष्ण के बाल रूप और नटखटपन की लीलाओं का उत्सव मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक श्रीकृष्ण को माखन बहुत पसंद था। कान्हा अक्सर गोपियों का माखन चुराते थे। माखन चोरी से परेशान होकर गोपियों ने मटकी को जमीन से ऊंचाई पर टांगना शुरू कर दिया, जिससे कि बाल कृष्ण वहां तक न पहुंचे। लेकिन नटखट कृष्ण अपने सखाओं के साथ आते और एक-दूसरे पर चढ़कर मानव पिरामिड बनाते थे। वहीं सबसे ऊपर रहने वाला साथी मटकी को फोड़ देता था। जिसके बाद सब दही और माखन का आनंद लेते थे। कान्हा की इस लीला की याद में दही हांडी का पर्व मनाया जाता है। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद श्रीकृष्ण या फिर लड्डू गोपाल की पूजा करें। इसके बाद भगवान पंचामृत से स्नान कराएं और फिर बाद में साफ जल से स्नान कराने के बाद नए कपड़े पहनें। अब कान्हा को बांसुरी, मुकुट और चंदन का तिलक लगाएं और उनका सुंदर सा श्रृंगार करें। कान्हा को सजाने के बाद उनको झूले में बिठाएं और श्रद्धा व भक्ति के साथ उनको झूला झुलाएं। एक छोटी मटकी में मक्खन, दही, पोहा, सूखे मेवे और कुछ सिक्के डालकर पूजा घर में रखें। भगवान श्रीकृष्ण को पंचमेवा, मक्खन-मिश्री और गोपालकाला का भोग अर्पित करें। पूजा के अंत में घी का दीपक और कपूर जलाकर श्रीकृष्ण की आरती करें। पूजा पूरी होने के बाद सभी लोगों में प्रसाद वितरित करें।
रूखे-बेजान बालों में जान फूंकने के 5 आसान हेयर वॉश हैक्स बिना महंगे प्रोडक्ट्स के मिलेंगे रेशमी बाल
बालों की खूबसूरती केवल महंगे ब्रांडेड प्रोडक्ट्स या पार्लर के महंगे ट्रीटमेंट पर निर्भर नहीं करती। अक्सर हमारी रोज़मर्रा की छोटी-छोटी गलतियां बालों की कुदरती नमी छीन लेती हैं। यदि आपके बाल भी धोने के बाद उलझे रूखे और बेजान दिखने लगते हैं तो अपनी हेयर वॉश तकनीक में ये बदलाव करके देखें।
How to Buy Your First Health Policy for Parents in Their 60s
Most families arrive at this decision the same way. A parent retires, the employer coverage stops on the last working day, and nothing replaces it because nobody was ill that year.
Kajari Teej Vrat: अखंड सौभाग्य का पर्व Kajari Teej आज, जानें Puja Vidhi और चंद्रोदय का समय
हर साल भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को कजरी तीज का व्रत रखा जाता है। इस बार आज यानी की 31 अगस्त 2026 को कजरी तीज का व्रत किया जा रहा है। इस व्रत को महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अखंड सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए करती हैं। यह व्रत भगवान शिव और मां पार्वती को समर्पति होता है। इसलिए इस दिन भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा-अर्चना की जाती है। वहीं कुंवारी लड़कियां अच्छे वर की कामना से यह व्रत करती हैं। तो आइए जानते हैं कजरी तीज की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक 30 अगस्त की रात 09:39 मिनट से भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि की शुरुआत होगी। वहीं इस तिथि की समाप्ति आज यानी की 31 अगस्त की रात 08:53 मिनट पर होगी। ऐसे में उदयातिथि के आधार पर 31 अगस्त 2026 को कजरी तीज का व्रत किया जा रहा है। पूजा विधि इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करें। फिर पूजा का संकल्प लें और सूर्य देव को अर्घ्य दें। अब पूजा स्थल को साफ करें और भगवान शिव, मां पार्वती और नीमड़ी माता की प्रतिमा को स्थापित करें। इसके बाद भगवान शिव को दूध, गंगाजल, दही और बेलपत्र आदि अर्पित करें। वहीं मां पार्वती को सिंदूर, कुमकुम, चूड़ी, बिंदी और श्रृंगार सामग्री अर्पित कर विधिविधान से पूजा करें। पूजा के बाद भगवान शिव और मां पार्वती की आरती करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें। चंद्रमा को दे अर्घ्य कजरी तीज व्रत में भगवान शिव, मां पार्वती, नीमड़ी मां की पूजा करें। फिर चंद्र देव को अर्घ्य देने के बाद व्रत खोलें। चंद्रोदय होने पर एक लोटे में जल, दूध, अक्षत, रोली और फूल से अर्घ्य दें। वहीं इसके बाद एक ही जगह पर खड़े होकर चार बार परिक्रमा करें। महत्व विवाहित महिलाओं के लिए इस पर्व का विशेष महत्व होता है। इस दिन व्रत और पूजा करने से दांपत्य जीवन सुखमय होता है। इस दिन शादीशुदा महिलाएं सोलह श्रृंगार करके व्रत रखती हैं। यह व्रत सौभाग्य और समर्पण का प्रतीक है। कजरी तीज पर गीत-संगीत और लोक-नृत्य का विशेष महत्व होता है।
आज यानी की 28 अगस्त 2026 को वरलक्ष्मी व्रत रखा जा रहा है। यह मां लक्ष्मी के स्वरूप वरलक्ष्मी को समर्पित विशेष व्रत है। मुख्य रूप में विवाहित महिलाएं वरलक्ष्मी व्रत पति और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए करती हैं। हालांकि पहली बार यह व्रत करने वाली महिलाओं को पूजा विधि और नियमों के बारे में जानना बेहद जरूरी है। तो आइए जानते हैं वरलक्ष्मी व्रत की तिथि, मुहू्र्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक 28 अगस्त 2026 को सावन का आखिरी शुक्रवार है। इसलिए इस दिन वरलक्ष्मी का व्रत किया जाएगा। इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा स्थिर लग्न में की जाती है। आज मां लक्ष्मी की पूजा के लिए 4 शुभ मुहूर्त हैं। आज ब्रह्म मुहूर्त सुबह 04:28 मिनट से लेकर 05:12 मिनट तक है। वहीं अभिजीत मुहूर्त 11:56 से लेकर दोपहर 12:48 मिनट तक है। व्रत रखने के नियम इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करें और साफ कपड़े पहनें। पूजा स्थान को अच्छे से साफ करके वहां चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। फिर मां वरलक्ष्मी की प्रतिमा को स्थापित करें। वहीं कई जगह पर कलश स्थापना की परंपरा है। कलश में जल भरकर इसके ऊपर आम के पत्ते या नारियल रखें। फिर पूजा के समय मां को फल, फूल, मिठाई, कुमकुम, हल्दी और अन्य श्रृंगार सामग्री अर्पित करें। अब वरलक्ष्मी का ध्यान करें और परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की कामना करें। व्रत के दौरान मन, कर्म और वचनों में शुद्धता बनाए रखें। महत्व बता दें कि वरलक्ष्मी को महालक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि वर और लक्ष्मी के मेल से बना वरलक्ष्मी सभी मनोकामनाओं को पूरा करने वाली देवी का प्रतीक है। इस व्रत को करने से घर में सुख-शांति और समृद्धि आती है। धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत को करने से आर्थिक समस्याओं से निजात मिलती है और घर-परिवार का कल्याण होता है। वहीं कई महिलाएं संतान सुख और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से भी यह व्रत करती हैं।
Raksha Bandhan 2026: 28 अगस्त को भद्रा मुक्त शुभ मुहूर्त, जानें Rakhi बांधने का सटीक Time और Rituals
आज यानी की 28 अगस्त 2026 को भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और स्नेह का प्रतीक रक्षाबंधन का पर्व मनाया जा रहा है। इस त्योहार के प्रति बहनों और भाइयों में अधिक उत्सुकता देखने को मिलती है। इस बार सावन माह की पूर्णिमा 27 अगस्त 2026 की सुबह शुरू होकर 28 अगस्त 2026 की सुबह समाप्त होगी। ऐसे में 28 अगस्त को यह पर्व मनाया जा रहा है। तो आइए जानते हैं इस पर्व की तिथि, मुहूर्त और पूजन विधि के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक 28 अगस्त 2026 की सुबह 05:57 मिनट से 09:48 मिनट तक राखी बांधने का मुहूर्त है। इस दौरान करीब 3 घंटे 51 मिनट का समय मिलेगा। सुबह का यह मुहूर्त पूर्णिमा तिथि से जुड़ा होने की वजह से विशेष महत्व रखता है। सुबह 7:33 बजे से लेकर 9:10 बजे तक लाभ मुहूर्त रहेगा। वहीं इसके बाद 09:10 बजे से लेकर 9:48 बजे तक अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त रहेगा। धार्मिक मान्यता है कि इन मुहूर्त में राखी बांधना शुभ होता है। जानें भद्रा की स्थिति रक्षाबंधन के समय भद्रा की स्थिति को लेकर लोगों के बीच खासी सावधानी रहती है। धार्मिक परंपरा के मुताबिक भद्रा के समय राखी बांधने से बचा जाता है। लेकिन भद्राकाल 27 अगस्त 2026 को समाप्त हो जाएगा। इसलिए 28 अगस्त को रक्षाबंधन के पर्व पर भद्रा का साया नहीं रहेगा। भाई-बहन का पर्व आमतौर पर रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के रिश्ते से जोड़कर देखा जाता है। बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती हैं और उनके सुख-समृद्धि, सेहत और दीर्घायु होने की कामना करती हैं। वहीं भाई भी अपनी बहन की सुरक्षा और हर परिस्थिति में साथ देने का संकल्प लेता है। ऐसे बांधे राखी इस दिन राखी बांधने से पहले घर के मुख्य द्वार या दीवार पर गेरू और चावल के घोल से श्रवण कुमार का चित्र बनाएं। फिर इस चित्र की पूजा करें। वहीं इस दिन भगवान गणेश की पूजा का भी विशेष महत्व होता है। अब अपने भाई को को लकड़ी के पाट पर बैठाएं और इस दौरान उनका मुंह पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए। पूजा थाली में कुमकुम, रोली, हल्दी, अक्षत, दीपक, राखी और मिठाई रखें। फिर दीपक जलाएं और भाई के सिर पर रुमाल या साफ कपड़ा रखें। अब हल्दी, कुमकुम और अक्षत से भाई के माथे पर मंगल टीका लगाएं। तिलक लगाने के बाद आरती करें और भाई की दाहिनी कलाई पर राखी बांधें। धार्मिक मान्यता है कि राखी में तीन गांठें लगाना शुभ होता है। यह तीन गांठें, सुख-सुरक्षा और समृद्धि के लिए होती है।
रक्षाबंधन पर एथनिक फैशन गोल्स दे रही हैं शालिनी पांडे, देखें उनके 5 सबसे खूबसूरत लुक्स
अगर आप भी इस रक्षाबंधन अपने स्टाइल को खास बनाना चाहती हैं, तो शालिनी पांडे के ये खूबसूरत एथनिक लुक्स आपके लिए परफेक्ट इंस्पिरेशन साबित हो सकते हैं। साड़ियों से लेकर खूबसूरत ट्रेडिशनल आउटफिट्स तक, शालिनी ने कई बार साबित किया है कि एथनिक फैशन में उनका अंदाज़ सबसे अलग और बेहद आकर्षक है।
सुकर्मा योग में पूरे दिन बहनें बांध सकेंगी राखी, इस बार रक्षाबंधन पर नहीं है भद्रा का साया
रक्षाबंधन का त्योहार बहन-भाई के बीच प्रेम का प्रतीक है। इसमें बहन भाई को तिलक लगाकर उसके दीर्घायु की कामना करती है। भाई भी जीवन भर बहन के सुख-दुख में साथ निभाने का वादा करता है और स्नेह स्वरूप बहन को उपहार भी देता है। इस त्योहार को प्राचीन काल से मनाने की परंपरा चली आ रही है। इस पर्व को हिंदी पंचांग के श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। पूर्णिमा के दिन मनाएं जाने कि वजह से कई जगह इसे राखी पूर्णिमा भी कहते हैं। इस वर्ष रक्षाबंधन 28 अगस्त 2026 को है। पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि इस बार रक्षाबंधन का पर्व बेहद खास रहने वाला है। 28 अगस्त 2026 को पूरे दिन राखी बांधने के लिए शुभ समय रहेगा, क्योंकि भद्राकाल का साया नहीं रहेगा। पूर्णिमा पर आमतौर पर भद्रा रहती है और भद्राकाल में कोई भी शुभ कार्य करना वर्जित माना जाता है। इस बार रक्षाबंधन पर भद्रा का कोई व्यवधान नहीं रहेगा। पंचांग की गणना के अनुसार 27 अगस्त को सुबह 9:09 मिनट से भद्रा शुरू होगी, जो रात 9:25 मिनट तक रहेगी। जिससे 28 अगस्त को रक्षाबंधन का पूरा दिन शुभ रहेगा। खास बात यह है कि इस बार रक्षाबंधन पर भद्राकाल का साया नहीं रहेगा, यानी बहनें सुबह से लेकर शाम तक कभी भी अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांध सकेंगी। श्रावणी पूर्णिमा पर 28 अगस्त को शतभिषा नक्षत्र, सुकर्मा योग, बव उपरांत कौलव करण तथा मीन राशि के चंद्रमा की साक्षी में मनाया जाएगा। धर्मशास्त्रीय मान्यता के अनुसार बहनें भाई की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और मंगलकामना के लिए उसकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधेंगी। शुक्रवार के दिन सुकर्मा योग होने से भी यह दिन विशेष शुभ फलदायी माना जा रहा है। ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि रक्षाबंधन का त्योहार बहन-भाई के बीच प्रेम का प्रतीक है। इसमें बहन भाई को तिलक लगाकर उसके दीर्घायु की कामना करती है। भाई भी जीवन भर बहन के सुख-दुख में साथ निभाने का वादा करता है और स्नेह स्वरूप बहन को उपहार भी देता है। इस त्योहार को प्राचीन काल से मनाने की परंपरा चली आ रही है। रक्षाबंधन पर अबकी बार भद्रा का साया नहीं है। रक्षाबंधन पर अक्सर ऐसा होता है कि भद्रा का अशुभ साया भाई-बहन के इस पवित्र त्योहार में खलल डाल देता है और त्योहार का मजा किरकिरा हो जाता है। खुशी की बात यह है कि इस बार भद्रा नहीं है और भाई-बहन पूरे आनंद और प्रेम सौहार्द के साथ इस त्योहार को मनाएंगे। रक्षाबंधन श्रावण मास की पूर्णिमा को होता है। इस दिन बहनें राखी के रूप में अपने भाई की कलाई पर रक्षासूत्र बांधती हैं और भाई इसके बदले में बहनों को उनकी रक्षा करने का वचन देते हैं। इसे भी पढ़ें: Famous Temple: मां बगलामुखी मंदिर क्यों है खास, Celebs और VIPs की आस्था का केंद्र बना Himachal Pradesh का यह सिद्ध धाम नहीं रहेगा भद्रा का साया ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि इस बार रक्षाबंधन पर भद्रा का कोई व्यवधान नहीं रहेगा। पंचांग की गणना के अनुसार 27 अगस्त को सुबह 9:09 मिनट से भद्रा शुरू होगी, जो रात 9:25 मिनट तक रहेगी। जिससे 28 अगस्त को रक्षाबंधन का पूरा दिन शुभ रहेगा। रक्षाबंधन तिथि भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि रक्षाबंधन 28 अगस्त को मनाया जाएगा। सावन के महीने के आखिरी दिन यानी के श्रावण पूर्णिमा को रक्षाबंधन मनाया जाता है। श्रवण शुक्ल पूर्णिमा, 28 अगस्त 2026 (शुक्रवार) को रक्षाबन्धन है। इस दिन पूर्णिमा तिथि प्रातः 9:48 तक है। रक्षाबंधन पर्व पर भद्रा का साया नहीं होगा। पूर्णिमायां भद्रारहितायां त्रिमुहूर्त्ताधिकोदय व्यापिन्यामपराह्न प्रदोषे वा कार्यम् - धर्मसिन्धु । रक्षा बंधन : - 28 अगस्त 2026 पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: - 27 अगस्त को सुबह 09:08 मिनट से शुरू पूर्णिमा तिथि समापन: - 28 अगस्त को सुबह 09:48 मिनट तक रक्षा बंधन का शुभ मुहूर्त चर-लाभ-अमृत का चौघड़िया प्रातः 06:08 से प्रातः 10:53 तक शुभ का चौघड़िया दोपहर 12:28 से दोपहर 02-03 तक अपराह्न दोपहर 01:44 से सायं 04:16 तक चर का चौघड़िया सायं 05-13 से सायं 05 06.48 तक अभिजित दोपहर 12:04 से दोपहर 12:53 तक है। राखी बांधने का सही तरीका भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि राखी बंधवाते समय भाई का मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। बहनों को पूजा की थाली में चावल, रौली, राखी, दीपक आदि रखना चाहिए। इसके बाद बहन को भाई के अनामिका अंगुली से तिलक करना चाहिए। तिलक के बाद भाई के माथे पर अक्षत लगाएं। अक्षत अखंड शुभता को दर्शाते हैं। उसके बाद भाई की आरती उतारनी चाहिए और उसके जीवन की मंगल कामना करनी चाहिए। कुछ जगहों पर भाई की सिक्के से नजर उतारने की भी परंपरा है। भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास से जानते हैं राशि अनुसार बहनें अपने भाई के हाथ पर कोनसे कलर की राखी बांधें। मेष :- राशि के भाई को मालपुए खिलाएं एवं लाल डोरी से निर्मित राखी बांधे। वृषभ :- राशि के भाई को दूध से निर्मित मिठाई खिलाएं एवं सफेद रेशमी डोरी वाली राखी बांधे। मिथुन :- राशि के भाई को बेसन से निर्मित मिठाई खिलाएं एवं हरी डोरी वाली राखी बांधे। कर्क :- राशि के भाई को रबड़ी खिलाएं एवं पीली रेशम वाली राखी बांधे। सिंह :- राशि के भाई को रस वाली मिठाई खिलाएं एवं पंचरंगी डोरे वाली राखी बांधे। कन्या :- राशि के भाई को मोतीचूर के लड्डू खिलाएं एवं गणेशजी के प्रतीक वाली राखी बांधे। तुला :-राशि के भाई को हलवा या घर में निर्मित मिठाई खिलाएं एवं रेशमी हल्के पीले डोरे वाली राखी बांधे। वृश्चिक :- राशि के भाई को गुड़ से बनी मिठाई खिलाएं एवं गुलाबी डोरे वाली राखी बांधे। धनु :- राशि के भाई को रसगुल्ले खिलाएं एवं पीली व सफेद डोरी से बनी राखी बांधे। मकर :- राशि के भाई को मिठाई खिलाएं एवं मिलेजुले धागे वाली राखी बांधे। कुंभ :- राशि के भाई को ग्रीन मिठाई खिलाएं एवं नीले रंग से सजी राखी बांधे। मीन :- राशि के भाई को मिल्क केक खिलाएं एवं पीले-नीले जरी की राखी बांधे। - डा. अनीष व्यास भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक
How Much Health Insurance Cover Do You Actually Need in 2026?
Choosing the right health insurance cover in 2026 requires more than picking a large sum insured
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Eid Milad-un-Nabi 2026: 25 या 26 अगस्त? जानें भारत में कब है Prophet Muhammad का जन्मदिन और महत्व
इस्लाम धर्म में ईद मिलाद-उन-नबी को पाक और अजतम (गौरवशाली) दिनों में शामिल किया गया है। खासतौर पर यह पाक मौका है, जब पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की विलादत-ए-मुबारक यानी 'जन्म की बधाई' को मनाते हैं। दुनियाभर के कई देशों में ईद मिलाद-उन-नबी, भारत में भी इसे अकीदत और एहतराम के साथ मनाया जाता है। भारत में भी इस दिन को मनाया जाता है। इसे नबी दिवस, मौलिद, मोहम्मद का जन्मदिन या पैगंबर मुहम्मद के जन्मदिन के रुप में जानते हैं। इस दिन सार्वजनिक अवकाश होता है। भारत में अधिकांश स्कूल और व्यवसाय इस दिन बंद होते हैं। भारत में कब ईद मिलाद-उन-नबी? इस्लाम धर्म में यह पवित्र त्योहार कब मनाया जाएगा, इसकी तारीख को लेकर काफी कन्यफूय्ज है। आइए आपको बताते हैं ईद मिलाद-उन-नबी का त्योहार 26 अगस्त 2026, बुधवार के दिन मनाया जाएगा। वैसे यह त्योहार इस्लामी तारीख चांद पर आधारित होती है, जिसके कारण अलग-अलग कैलेंडर और चांद देखने के तरीकों के कारण से ग्रेगोरियन तारीख में काफी अंतर देखने को मिलता है। वैसे कुछ इस्लामी कैलेंडरों में 12 रबी-उल-अव्वल 1448 हिजरी की तारीख 25 अगस्त है। वहीं, कुछ कैलेंडर और मुकामी रिवायतों में इसे 26 अगस्त को मनाया जाएगा। ईद मिलाद-उन-नबी के दिन लोग क्या करते हैं? इस दिन मुसलमान पैगंबर मुहम्मद के जन्म और उनकी शिक्षाओं को याद करते हैं, उन पर चर्चा करते हैं और जश्न मनाते हैं। कई सुन्नी मुसलमान इस अवसर को इस्लामी महीने रबी अल-अव्वल की 12 तारीख को मनाते हैं, बल्कि शिया समुदाय के लोग इसे रबी अल-अव्वल की 17 तारीख को मनाते हैं। इस दिन कई तरह की गतिविधियां की जाती हैं- - रात भर प्रार्थना सभाएं चलती हैं। - बड़ी भीड़ वाली पदयात्राएं और जुलूस निकलते हैं। - इतना ही नहीं, घरों, मस्जिदों और अन्य इमारतों को उत्सव के बैनर और झंडे से सजाया जाता है। - मस्जिदों से लेकर सामुदायिक भवनों में सामूहिक भोजन का आयोजन किया जाता है। - इसके अलावा, मुहम्मद के जीवन, कार्यों और उनकी शिक्षाओं के बारे में कहानियों और कविताओं के जरिए लोगों का मार्गदर्शन करते हैं।
Why Corporate Professionals Are Prioritizing Ergonomic Seating Designs
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Nag Panchami 2026: नाग पंचमी पर कैसे पाएं दोष से मुक्ति, जानें Nag Panchami 2026 की पूजा विधि
हिंदू धर्म में नागपंचमी पर्व का विशेष महत्व होता है। श्रावण माह की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को यह पर्व मनाया जाता है। इस दिन नाग देवता की पूजा-आराधना की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन नागों की पूजा-अर्चना करने से सर्प भय, कालसर्प दोष और सर्पदंश जैसी बाधाओं से मुक्ति मिलती है। वहीं आज लोग नाग देवता को दूध अर्पित करते हैं और उनको स्नान कराकर पूजा आदि करते हैं। साथ ही नाग देवता से सुरक्षा और समृद्धि की कामना करते हैं। तो आइए जानते हैं नाग पंचमी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक 16 अगस्त की शाम 04:51 मिनट से पंचमी तिथि की शुरूआत होगी। वहीं 17 अगस्त ती शाम 05:00 बजे इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से आज यानी की 17 अगस्त को नागपंचमी का पर्व मनाया जा रहा है। इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त 06:15 मिनट से लेकर 08:31 मिनट तक है। क्यों की जाती है नाग देवता की पूजा भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों से नागों का संबंध जुड़ा माना गया है। जहां भगवान शिव के गले में वासुकी नाग सुशोभित होते हैं। तो वहीं शेषनाग भगवान विष्णु की शैया हैं। श्रीकृष्ण के जन्म के बाद शेषनाग ने उनको और वासुदेव को यमुना पार कराने में मदद की थी। इसके अलावा समुद्र मंथन में भी वासुकी नाग की अहम भूमिका मानी जाती है। यह दिन नाग देवताओं के प्रति सम्मान प्रकट करने का पर्व है। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें और सूर्य देव को अर्घ्य दें। इसके बाद गाय के गोबर से नाग देवता का चित्र बनाएं और उनका आह्वान करें। अगर आपको व्रत करना हो, तो व्रत का संकल्प करें और फिर गुलाल, अबीर, मेहंदी, मेवा, फूल और दूध आदि अर्पित करें। इसके बाद मंत्रों का जाप करें और पूजा के बाद मनोकामना की पूर्ति के लिए प्रार्थना करें।
Hariyali Teej 2026: अखंड सौभाग्य के लिए किया जाता है हरियाली तीज का पर्व, जानिए पूजन विधि और महत्व
सावन का पवित्र महीना चल रहा है। हर साल सावन महीने के शुक्ल पत्र की तृतीया तिथि को हरियाली तीज का पर्व मनाया जाता है। इस बार आज यानी की 15 अगस्त 2026 को हरियाली तीज का पर्व मनाया जा रहा है। सुहागिन महिलाओं के लिए यह पर्व खास होता है। इस दिन भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा का विधान होता है। इस तिथि पर बारिश का मौसम रहता है और चारों ओर हरियाली रहती है। जिस कारण इसको हरियाली तीज का पर्व कहा जाता है। इस दिन व्रत और पूजन करने से वैवाहिक जीवन सुखमय होता है। तो आइए जानते हैं हरियाली तीज की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में... इसे भी पढ़ें: Hariyali Teej 2026: शिव-पार्वती के दिव्य मिलन का प्रतीक पर्व ‘हरियाली तीज’ तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक सावन माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि की शुरूआत 14 अगस्त की शाम 06:47 मिनट पर हुई है। वहीं इस तिथि की समाप्ति आज यानी 15 अगस्त की शाम 05:29 मिनट पर होगी। उदयातिथि के मुताबिक 15 अगस्त 2026 को हरियाली तीज का पर्व मनाया जा रहा है। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद सूर्य देव को अर्घ्य दें। इसके बाद बालू से भगवान शिव और मां पार्वती की प्रतिमा बनाएं। इसके बाद लकड़ी की चौकी पर कपड़ा बिछाकर उस पर भगवान शिव और मां पार्वती की प्रतिमा को स्थापित करें। इसके बाद मां पार्वती को सुहाग का सामान जैसे बिंदी, चूड़ियां, सिंदूर और कंघी आदि को थाली में सजाकर अर्पित करें। वहीं नैवेद्य में खीर, पूरी, हलुआ या मालपुए चढ़ाएं। इसके बाद हरियाली तीज की कथा सुनें। पूजा के अंत में आरती करें और सुखमय वैवाहिक जीवन की कामना करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें। महत्व सावन के महीने में आने वाली हरियाली तीज के पर्व का विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक मां पार्वती ने शिव को पति रूप में पाने के लिए वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। मां पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनको अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। तब से हर साल सावन माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरियाली तीज का पर्व मनाया जाता है।
भारतीय संस्कृति में प्रत्येक पर्व का अपना विशेष महत्व है। इन्हीं पावन पर्वों में हरियाली तीज का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पर्व श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। वर्षा ऋतु के आगमन से जब धरती हरियाली की चादर ओढ़ लेती है, तब प्रकृति का यह अनुपम सौंदर्य हरियाली तीज के उत्सव को और भी मनोहारी बना देता है। यह पर्व विशेष रूप से महिलाओं के लिए सौभाग्य, प्रेम, समृद्धि और आनंद का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया। इसी दिव्य मिलन की स्मृति में हरियाली तीज का पर्व मनाया जाता है। विवाहित महिलाएँ अपने पति की दीर्घायु एवं सुख-समृद्धि की कामना करती हैं, जबकि अविवाहित कन्याएँ योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए व्रत रखती हैं और माता पार्वती तथा भगवान शिव की पूजा करती हैं। इसे भी पढ़ें: Famous Shiv Temple: हिमाचल के इन Famous Shiva Temples के दर्शन से मिलेगी अपार शांति, देखें पूरी Travel Guide हरियाली तीज का उत्सव पूरे देश में उल्लास और उत्साह के साथ मनाया जाता है। महिलाएँ हरे रंग के वस्त्र धारण करती हैं, हाथों में मेहंदी रचाती हैं, चूड़ियाँ पहनती हैं और पारंपरिक आभूषणों से श्रृंगार करती हैं। बाग-बगीचों में झूले डाले जाते हैं, लोकगीत गाए जाते हैं और नृत्य के माध्यम से उत्सव की खुशी व्यक्त की जाती है। विशेष रूप से राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और बिहार जैसे राज्यों में इस पर्व की भव्यता देखने योग्य होती है। अनेक स्थानों पर भगवान शिव और माता पार्वती की शोभायात्राएँ भी निकाली जाती हैं। यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का ही नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान और पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश देता है। वर्षा ऋतु में चारों ओर फैली हरियाली हमें वृक्षों और वनस्पतियों के महत्व का स्मरण कराती है। हरियाली तीज हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने तथा पर्यावरण को सुरक्षित रखने की प्रेरणा देती है। आज के आधुनिक जीवन में भी हरियाली तीज की प्रासंगिकता बनी हुई है। यह पर्व परिवार में प्रेम, विश्वास और सौहार्द को मजबूत करता है तथा हमारी सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ने का अवसर प्रदान करता है। नई पीढ़ी को भी इस पर्व के सांस्कृतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक महत्व से परिचित कराना आवश्यक है। हरियाली तीज भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपराओं, प्रकृति-प्रेम और दांपत्य जीवन की पवित्रता का अनुपम उत्सव है। यह पर्व जीवन में उल्लास, प्रेम, आस्था और हरियाली का संदेश देता है। - शुभा दुबे
Hariyali Amavasya 2026: सावन की अमावस्या पर बन रहे विशेष संयोग, जानें Puja Vidhi और दान का महत्व
आज यानी की 12 अगस्त 2026 को हरियाली अमावस्या मनाई जा रही है। सावन शिवरात्रि के ठीक अगले दिन और हरियाली तीज से 3 दिन पहले यह अमावस्या आती है। सावन के महीने में पड़ने की वजह से इसको हरियाली अमावस्या कहा जाता है। हरियाली अमावस्या के दिन पूजा-पाठ, दान, पितरों का स्मरण करना बेहद फलदायी माना जाता है। ऐसे में आइए जानते हैं हरियाली अमावस्या की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक श्रावण माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि की शुरूआत 12 अगस्त की सुबह 01:53 मिनट पर हो रही है। वहीं इस तिथि की समाप्ति रात 11:07 मिनट पर होगी। ऐसे में हरियाली अमावस्या 12 अगस्त 2026 को मनाई जा रही है। स्नान-दान मुहूर्त सावन माह के दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान-दान करना शुभ माना जाता है। 12 अगस्त को सुबह 04:23 मिनट से लेकर 05:06 मिनट तक ब्रह्म मुहूर्त रहेगा। वहीं पूजा के लिए अभिजित मुहूर्त दोपहर 11:59 मिनट से लेकर 12:52 मिनट तक रहेगा। पूजन विधि हरियाली अमावस्या को पितरों के तर्पण के लिए सुबह जल्दी उठकर गंगाजल से स्नान आदि करें। इसके बाद अपने ईष्ट का ध्यान करें और भगवान शिव की पूजा-अर्चना करें। भगवान शिव को मदार और आक के फूल चढ़ाएं और पीपल के पेड़ की पूजा करें। इससे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा आती है। महत्व हरियाली अमावस्या को चितलगी अमावस्या, गटारी अमावस्या और चुक्कला अमावस्या के नाम से भी जानते हैं। इस दिन भगवान शिव की पूजा का विधान है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक जो भी जातक इस दिन विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और कष्टों से मुक्ति मिलती है।
Sawan Shivratri 2026: सावन शिवरात्रि पर जानें जलाभिषेक का Muhurat और भद्रा काल का समय
हिंदू धर्म में सावन शिवरात्रि का विशेष महत्व होता है। सावन का महीना भगवान शिव को अतिप्रिय होता है। इसलिए सावन माह में भगवान शिव की पूजा-अर्चना का विशेष महत्व माना जाता है। इस दौरान भगवान शिव का पूजन, जप, जलाभिषेक और रुद्राभिषेक करने से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और बाधाओं का नाश होता है। सावन महीने की शिवरात्रि का विशेष महत्व होता है। सावन शिवरात्रि पर भगवान शिव की पूजा और आराधना शुभ और फलदायी मानी जाती है। तो आइए जानते हैं सावन शिवरात्रि की तिथि, मुहूर्त और पूजन विधि के बारे में... तिथि और मुहूर्त हर साल सावन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को सावन शिवरात्रि मनाई जाती है। पंचांग के मुताबिक इस साल चतुर्दशी तिथि की शुरूआत 11 अगस्त 2026 की सुबह 04:53 मिनट से हुई है। वहीं इस तिथि की समाप्ति अगले दिन यानी की 12 अगस्त को देर रात 01:51 मिनट पर होगी। उदयातिथि के मुताबिक 11 अगस्त को सावन शिवरात्रि मनाई जा रही है। शिवरात्रि पर रात्रि के चारों प्रहर में शिव और पार्वती की पूजा का विशेष महत्व होता है। भद्रा का साया इस बार सावन शिवरात्रि पर भद्राकाल का साया रहेगा। धार्मिक शास्त्रों में भद्राकाल को शुभ नहीं माना जाता है। आज सुबह से भद्रा लग जाएगी, जोकि दोपहर 03:22 मिनट तक रहेगी। लेकिन भगवान शिव की पूजा-अर्चना और जलाभिषेक में भद्रा दोष मान्य नहीं होगा। ऐसे में शिवभक्त बिना किसी डर के भद्राकाल में भगवान शिव की पूजा कर सकते हैं। पूजन विधि इस दिन सूर्योदय से पहले उठें और स्नान आदि करके साफ कपड़े पहनें। फिर घर के मंदिर की साफ-सफाई करें और पास में स्थित शिवालय में जाकर भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा करें। शिवलिंग पर जल, गंगाजल, दही, दूध, घी, शहद और शक्कर से अभिषेक करें। फिर शिवलिंग का दोबारा जल से अभिषेक करें। इसके बाद धतूरा, बेलपत्र, भांग, फूल और सफेद चंदन आदि अर्पित करें। अब भगवान शिव को फल और मिष्ठान आदि अर्पित कर नैवेद्य अर्पित करें। फिर 'ऊँ नम: शिवाय' मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र और शिव चालीसा का पाठ करें। अंत में भगवान शिव की आरती करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें।
Sawan Pradosh Vrat 2026: सोम प्रदोष व्रत पर शिवलिंग पूजा का महत्व, जानें Puja Timing और शुभ मुहूर्त
सावन के महीने में भगवान शिव की पूजा-आराधना का विशेष महत्व होता है। सावन माह में पड़ने वाले व्रत भी पुण्यदायी व्रतों में से एक माने जाते हैं। सावन में प्रदोष व्रत का विशेष महत्व होता है। वहीं प्रदोष व्रत सोमवार के दिन पड़ता है, इसको सोम प्रदोष व्रत भी कहा जाता है। प्रदोष में व्रत रखना और भगवान शिव की पूजा-आराधना करने से विशेष फलों की प्राप्ति होती है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक इस व्रत में प्रदोष काल में शिवलिंग का जलाभिषेक, रुद्राभिषेक, बेलपत्र और भांग-धतूरा आदि अर्पित किए जाते हैं। वहीं शिव मंत्रों के जाप से भगवान शिव और मां पार्वती की विशेष कृपा मिलती है। प्रदोष व्रत करने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति, संतान सुख और रोग आदि से छुटकारा मिलता है। इस बार 10 अगस्त को सोम प्रदोष व्रत किया जा रहा है। तो आइए जानते हैं सोम प्रदोष व्रत की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे मे... तिथि और मुहूर्त हिंदू पंचांग के अनुसार, सावन माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि की शुरुआत 10 अगस्त को सुबह 8 बजे से होगी और इस तिथि का समापन 11 अगस्त को 4 बजकर 55 मिनट पर होगा। सावन सोम प्रदोष व्रत पर पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 7 बजकर 05 मिनट से लेकर रात 09 बजकर 14 मिनट तक रहेगा। इस मुहूर्त में पूजा करना शुभ और फलदायी होता है। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करें और फिर भगवान शिव का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प करें। फिर भगवान शिव का दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से अभिषेक करें। इसके बाद 11 या 21 बेलपत्र, आक के फूल, धतूरा, फल, सुपारी, इलायची, लौंग, धूप, दीप, फूल, गंध, चावल और नैवेद्य अर्पित करें। पूजा के दौरान घी और शक्कर से बनी मिठाई का भोग लगाएं। इसके बाद शिव मंत्रों का जाप करें और शिव चालीसा का पाठ करें। प्रदोष व्रत कथा पढ़े और पूजा के अंत में घी के दीपक से भगवान शिव की आरती करें। पूरा दिन व्रत रखते हुए मन में भगवान शिव का स्मरण करें और शाम को फिर से स्नान आदि करके प्रदोष काल में भगवान शिव की फिर से विधि-विधान से पूजा-अर्चना करें। महत्व प्रदोष व्रत पर भगवान शिव की पूजा-अर्चना का महत्व होता है। वहीं सावन में प्रदोष व्रत का महत्व बढ़ जाता है। भगवान शिव की पूजा के लिए सबसे अच्छा मुहूर्त प्रदोष काल होता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक प्रदोष का समय होता है, जब भगवान शिव कैलाश पर तांडव करते हैं और सभी देवी-देवता उनकी आराधना करते हैं। प्रदोष व्रत रखने और प्रदोष काल में पूजा करने, दीपदान करने, शिव चालीसा और रुद्राष्टक का पाठ करने से सभी तरह के पापों का अंत हो जाता है।
ख़राब पेट से मानसिक तनाव हमारा जीवन बर्बाद
डिप्रेशन पेट से किसी संक्रमण की तरह फैलता नहीं है, लेकिन पेट (Gut) और दिमाग (Brain) का सीधा संबंध होता है
हर मच्छर का अपना 'फेवरेट' इंसान! 119 लोगों पर हुई रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा
अगर आपको लगता है कि मच्छर आपको दूसरों से ज्यादा काटते हैं, तो हो सकता है कि आप किसी खास प्रजाति के मच्छर के 'फेवरेट' हों। लेकिन जरूरी नहीं कि हर मच्छर आपको पसंद करे।
एक बड़ा बाउल मुरमुरे, एक बड़ा प्याज बारीक कटा, एक शिमला मिर्च बड़ी कटी हुई,
Gajanan Sankranti 2026: सावन की गजानन चतुर्थी आज, इन Mantras के जाप से चमक सकती है आपकी Fortune
हिंदू धर्म में हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया जाता है। यह व्रत भगवान गणेश को समर्पित होता है। वहीं सावन महीने में पड़ने वाली संकष्टी चतुर्थी को गजानन संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन जो भी व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान गणेश की पूजा करते हैं, उनके जीवन की सभी परेशानियां दूर होती हैं। साथ ही सुख-समृद्धि आती है। इस बार आज यानी की 02 अगस्त को गजानन संक्रांति का व्रत किया जा रहा है। तो आइए जानते हैं इस दिन की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और मंत्र आदि के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक 01 अगस्त की रात 11:07 मिनट से सावन कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि की शुरूआत हुई है। वहीं आज यानी की 02 अगस्त की सुबह 11:15 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के मुताबिक 02 अगस्त संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया जाएगा। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर भगवान गणेश का ध्यान करें और व्रत का संकल्प लें। वहीं शाम को पूजा स्थान पर लकड़ी की चौकी लगाकर लाल कपड़ा बिछाएं। उस पर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें। फिर धूप-दीप जलाएं और भगवान गणेश को चंदन, रोली और फूल आदि अर्पित करें। भगवान गणेश को मोदक या लड्डू का भोग लगाएं और दूर्वा अर्पित करें। इसके बाद संकष्टी व्रत कथा का पाठ करें और आरती करें। वहीं चंद्रमा निकलने पर दूध, जल, फूल और अक्षत मिलाकर चंद्रदेव को अर्घ्य दें। इसके बाद प्रसाद ग्रहण करके व्रत का पारण करें। मंत्र वक्रतुंड महाकाय, सूर्यकोटि समप्रभ, निर्विघ्नम कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।। ॐ गण गणपतए नमः।। गजाननं भूतगणादि सेवितं, कपित्थ जंबू फल चारु भक्षणम, उमा शतम् शोक विनाश कार्यक्रम, नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम।।
Jaya Parvati Vrat 2026: जया पार्वती व्रत का समापन, जानिए Puja Vidhi और Udyapan का सही समय और नियम
सावन माह की शुरूआत को चुकी है। वहीं आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी से जया-विजया पार्वती व्रत शुरू हुआ था। जोकि सावन कृष्ण तृतीया यानी की 5 दिनों तक रखा जाता है। जया पार्वती व्रत भगवान शिव और मां पार्वती को समर्पित है। यह व्रत महिलाएं अखंड सुहाग और खुशहाल वैवाहिक जीवन के लिए रखती हैं और कुंवारी कन्याएं मनचाए वर की प्राप्ति के लिए रखती हैं। इस बार आज यानी की 01 अगस्त को जया पार्वती व्रत का समापन किया जाएगा। कैसे करें समापन जया पार्वती व्रत 5 दिनों तक चलने वाला विशेष व्रत है। इसको मुख्य रूप से सुहागिन महिलाएं और कुंवारी कन्याएं रखती हैं। वहीं व्रत के अंतिम दिन विधि-विधान से उद्यापन और समापन करना शुभ माना जाता है। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद भगवान शिव और मां पार्वती का पूजन करें। पूजा में भगवान शिव और मां पार्वती को अक्षत, फूल, फल, धूप-दीप और नैवेद्य आदि अर्पित करें। इसके बाद व्रत कथा का पाठ करें। क्योंकि माना जाता है कि बिना कथा सुने व्रत का पूजा पूरा फल मिलता है। मां पार्वती को सुहाग की सामग्री अर्पित करें और इसमें चूड़ियां, बिंदी, चुनरी, सिंदूर, मेहंदी और श्रृंगार की अन्य वस्तुएं शामिल करें। इसके बाद आरती करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए मां पार्वती और भगवान शिव से क्षमायाचना करें। वहीं अपनी श्रद्धा अनुसार ब्राह्मण, जरूरतमंद या किसी सुहागिन को फल, वस्त्र, दक्षिणा या अन्न का दान करें। प्रसाद वितरित करें और सात्विक भोजन ग्रहण कर व्रत का पारण करें। धार्मिक मान्यता धार्मिक मान्यता है कि जो भी महिला विधिपूर्वक यह व्रत करके समापन करती हैं, उनका वैवाहिक जीवन खुशहाल रहता है और अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है। वहीं अविवाहित कन्याओं को मनचाहे वर की प्राप्ति होती है।

