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आरक्षण : सामाजिक न्याय का ढोंग?

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प्रवक्ता 31 Jul 2026 7:05 pm

गाड़ी खरीदने के बजाय किराये की गाड़ी के प्रयोग के बहुआयामी लाभ

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प्रवक्ता 31 Jul 2026 6:52 pm

जर्सी का रंग नहीं, खेल की गरिमा बचाने की जरूरत

भारतीय हॉकी टीम की नई यूनिफॉर्म में केसरिया रंग के प्रयोग The post जर्सी का रंग नहीं, खेल की गरिमा बचाने की जरूरत appeared first on प्रवक्‍ता.कॉम - Pravakta.Com .

प्रवक्ता 31 Jul 2026 6:47 pm

शिवभक्ति, प्रकृति और भारतीय संस्कृति का शुभ उत्सव है सावन

सनातन परंपरा में सावन की धार्मिक मान्यता और महत्व सीधे तौर पर भगवान शिव से जुड़ा हुआ है। पौराणिक इतिहास और कथाओं के अनुसार,इसी पवित्र महीने में देवों और दानवों के बीच समुद्र मंथन हुआ था। उस मंथन से निकले हलाहल विष को पीकर महादेव ने पूरी सृष्टि की रक्षा की थी। विष के उस तीव्र ताप को शांत करने के लिए सभी The post शिवभक्ति,प्रकृतिऔरभारतीयसंस्कृतिकाशुभउत्सवहैसावन appeared first on प्रवक्‍ता.कॉम - Pravakta.Com .

प्रवक्ता 31 Jul 2026 6:40 pm

आज का एक्सप्लेनर:रकुल प्रीत जैसी तो नहीं थी शूर्पणखा, रावण और सीता की कास्टिंग पर भी डिबेट; असल में कैसे दिखते थे रामायण के किरदार

नितेश तिवारी की 4 हजार करोड़ की लागत से बनी फिल्म 'रामायण' का ट्रेलर आते ही सोशल मीडिया पर डिबेट शुरू हो गई। रकुलप्रीत सिंह के शूर्पणखा वाले 'ग्लैमरस लुक' पर मीम बन रहे। रणबीर कपूर की राम के रूप में कास्टिंग पर भी सवाल उठे और यश के रावण और साई पल्लवी के सीता का किरदार निभाने को लेकर भी लोग दो खेमे में बंटे हैं। असलियत में कैसे दिखते रहे होंगे रामायण के किरदार; इसके लिए हमने सबसे प्रामाणिक ग्रंथ वाल्मीकि रामायण का सहारा लिया है। इन किरदारों को कुछ पुरानी मूर्तियों और पेंटिंग्स के जरिए भी देखेंगे… ----------------------------- ये खबर भी पढ़ें… आज का एक्सप्लेनर:सैयारा ने पहले हफ्ते 175 करोड़ कमाए; पुरानी लव स्टोरी, कोई बड़ा स्टार नहीं, फिर सिनेमाघरों में रो-रोकर बेहोश क्यों हो रहे लोग सैयारा मूवी देखने पहुंची एक लड़की इतना रोई कि थिएटर में ही बेहोश हो गई। एक लड़का दहाड़ें मारकर छाती पीटने लगा। ऐसे वायरल वीडियोज के बीच मोहित सूरी की फिल्म ने एक हफ्ते में 175 करोड़ रुपए कमा लिए हैं। फिल्म क्रिटिक तरण आदर्श इसे ऐतिहासिक मानते हैं। पूरी खबर पढ़ें…

दैनिक भास्कर 31 Jul 2026 6:35 pm

देवकीनन्दन खत्री थे हिन्दी के पहले तिलिस्मी लेखक 

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प्रवक्ता 31 Jul 2026 6:33 pm

हिंदी भाषा की रक्षा और समृद्धि का जीवंत उदाहरण

पद्मश्री कैलाशचंद्र पंत दादा The post हिंदी भाषा की रक्षा और समृद्धि का जीवंत उदाहरण appeared first on प्रवक्‍ता.कॉम - Pravakta.Com .

प्रवक्ता 31 Jul 2026 6:11 pm

आंदोलन की संस्कृतिः अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व भी आवश्यक

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प्रवक्ता 31 Jul 2026 6:07 pm

मुंबई: घर के अंदर नाबालिग दिव्यांग से दुष्कर्म, आरोपी रिश्तेदार गिरफ्तार

महाराष्ट्र के पुणे जिले से रिश्ते को शर्मसार करने वाली एक घटना सामने आई है, जहां एक दिव्यांग नाबालिग लड़की के साथ उसके ही रिश्तेदार द्वारा घर के अंदर दुष्कर्म की घटना को अंजाम दिया गया है।

खास खबर 31 Jul 2026 5:17 pm

दिल्ली के सीलमपुर में पीडब्ल्यूडी का सीसीटीवी डीवीआर चोरी करने के आरोप में तीन लोग गिरफ्तार

दिल्ली पुलिस ने राजधानी के सीलमपुर इलाके में लगे सरकारी पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट (पीडब्ल्यूडी) के सीसीटीवी डीवीआर की चोरी का मामला सुलझा लिया है और इस मामले में तीन लोगों को गिरफ्तार किया है। चोरी का सामान और उसे बेचकर मिली रकम का एक बड़ा हिस्सा भी बरामद कर लिया गया है।

खास खबर 31 Jul 2026 4:45 pm

अंकित शर्मा की जघन्य हत्या की गई, कोर्ट ने ताहिर हुसैन सहित 5 दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई

कड़कड़डूमा कोर्ट ने कहा, अंकित शर्मा की हत्या जघन्य तरीके से की गई थी। कोर्ट ने हत्या के दोषी ताहिर हुसैन, नजीम, कासिम, अनस और जावेद को उम्रकैद की सजा सुनाई है।

खबर इंडिया टीवी 31 Jul 2026 4:29 pm

Rajat Sharma's Blog | क्या हम चीन की परीक्षा प्रणाली से कुछ सीख सकते हैं?

आज मुझे चीन की सालाना कॉलेज एंट्रेंस परीक्षा के बारे में दिलचस्प जानकारी मिली। चीन में हर साल जून में तीन दिन परीक्षा होती है। Undergraduate admissions की इस परीक्षा में एक करोड़ तीस लाख छात्र इम्तिहान देते हैं। वहां इसे Gaokao exam कहते हैं। Gaokao में पेपर सैट करने के लिए 500 शिक्षक चुने जाते हैं।

खबर इंडिया टीवी 31 Jul 2026 4:22 pm

हाथ हैं, लेकिन पैरों से चलती है वंदना की जिंदगी:जिस्म कंपकंपाता है, जुबान साथ नहीं देती; आखिरी ख्वाहिश- अमिताभ बच्चन से मिलना चाहती हूं

दुर्लभ बीमारियों की सीरीज- ‘ऐ जिंदगी’ में आज कहानी वंदना कटारिया की, जिसके लिए मैं नीरज झा पहुंचा हूं गुजरात के जैतपुर शहर- वक्त- शाम के करीब 4 बजे। मूसलाधार बारिश हो रही है। जैतपुर की तंग गलियों से गुजरते हुए एक शख्स से पूछा- वंदना कटारिया का घर कहां है? उसने एक पुरानी तीन मंजिला बिल्डिंग की ओर इशारा करते हुए कहा- वो कोने वाली दुकान वंदना दीदी की है। वहीं मिलेंगी। छोटी-सी दुकान में कुर्सी पर एक औरत बैठी हैं। दुकान पर एक शख्स आया। बोला- वंदना दीदी, चिप्स का पैकेट देना। पास ही एक छोटी टेबल रखी थी। ग्राहक ने उसी पर 10 रुपए रख दिए। वंदना ने इस सिक्के की तरफ हाथ की बजाय पैर बढ़ाया। लेकिन उनके पैर कंपकंपाते हुए पहले दाईं फिर बाईं ओर मुड़ गए। उन्होंने दोबारा कोशिश की। इस बार दोनों पैरों के पंजे से सिक्के को छू तो लिया, लेकिन पकड़ नहीं पाईं। इसके बाद तीसरी, फिर चौथी कोशिश… आखिरकार बड़ी मशक्कत के बाद दाएं पैर की उंगलियां ने किसी तरह सिक्के को दबोच लिया। फिर उन्होंने धीरे-धीरे पैर खींचते हुए सिक्के को टेबल के एक कोने तक सरका लिया। …लेकिन अभी एक और परीक्षा बाकी है। ग्राहक को चिप्स देना। वंदना कुर्सी पर बैठी-बैठी दूसरी ओर मुड़ी। पहले गर्दन, फिर कंधे और फिर कमर, लेकिन शरीर का एक हिस्सा, दूसरे हिस्से का साथ नहीं देता। एक पल के लिए उनका संतुलन बिगड़ा। ऐसा लगा कि कुर्सी से गिर पड़ेंगी। उन्होंने खुद को संभाला और दीवार पर टंगे चिप्स के पैकेट की ओर पैर बढ़ाया। पैरों की उंगलियों से धीरे-धीरे चिप्स का पैकेट खींचकर टेबल पर रख दिया। ग्राहक ने पैकेट उठाया और चला गया। वंदना जस की तस कुर्सी पर बैठ गईं। जो काम अमूमन कुछ सेकंड में हो जाते हैं, उन्हें पूरा करने में वंदना को कई मिनट लग जाते हैं। वजह - शरीर उनके कंट्रोल में नहीं है। हाथ कंपकंपाते हैं। गर्दन सीधी नहीं रहती, बार-बार झटक जाती है। होंठ हिलते हैं, लेकिन शब्द मुंह से बाहर निकलते-निकलते खो जाते हैं। बैठना, चलना, बोलना, खाना, पीना जैसे काम वंदना के लिए हर दिन की जद्दोजहद बन चुके हैं। तभी, एक बुजुर्ग आए। बाल काले-सफेद, चेहरे पर झुर्रियां। उन्होंने अपना नाम अशोक मेहता बताया। वे कहते हैं- 22 साल से मैं इसकी देखभाल कर रहा हूं। न इसकी मां है, न बाप। एक भाई है, वो भी सिर्फ नाम का। बिल्डिंग के गेट के पास मेरी फल की दुकान है। इसलिए वंदना की दुकान भी यहीं खुलवा दी, ताकि नजर रहे। अशोक यह कहते-कहते रुक गए। फिर बोले- दिनभर घर में अकेली बैठी रहे, उससे अच्छा है यहां लोगों के बीच बैठे। पहले इसी दुकान में एसटीडी-पीसीओ चलता था। वक्त बदला, तो उसे बंद करना पड़ा। अब चिप्स, नमकीन और बिस्किट रख दिए हैं। कोई ग्राहक आ जाए, तो 50–100 रुपए मिल जाते हैं। इससे ज्यादा खुशी उसे इस बात पर होती है कि वह अपने दम पर कुछ कर रही है। यह बिल्डिंग, यह मार्केट, सब इसके पिता का है। तभी बच्ची का हाथ थामे सीढ़ियों से एक शख्स उतरा। कुछ पूछने से पहले ही बोला- मैं भावेश हूं, वंदना का छोटा भाई। वंदना के बारे में बात करने से मना करते हुए वो कहते हैं- माफ कीजिए, मैं कुछ नहीं बता पाऊंगा। जो भी बात करनी है, अशोक भाई या उनके छोटे भाई हितेश से कर लीजिए। मेरी बेटी 6 साल की है, लेकिन दिखती 6 महीने की बच्ची जैसी। डॉक्टरों ने कहा है कि उसे वंदना जैसी बीमारी है। अब बताइए, पहले अपनी बेटी को संभालूं या 45 साल की बहन को? इतना कहकर वो चले गए। अशोक कुछ पल तक भावेश को जाते हुए देखते रहे। फिर बोले- बातें बनाना आसान है। अपने खून का साथ आखिर कौन छोड़ता है। मां-बाप थे, तब तक घर भी एक था और परिवार भी। उनके जाने के बाद सब बदल गया। इस बिल्डिंग की दुकानों के एक हिस्से से वंदना को महीने का 12 हजार रुपए किराया मिलता है। इसी से उसका गुजारा चलता है। मैं फल की रेहड़ी लगाता हूं। जितना बनता है, कर देता हूं, लेकिन हर जरूरत पूरी करने की हैसियत कहां है। मेरी आंखें अगर अभी मुंद जाएं, तो इसे पूछने वाला कोई नहीं। मैं तो खुद को धनवान समझता हूं कि भगवान ने इसके लिए मुझे भेजा है। अंतिम सांस तक इसकी सेवा करूंगा। चलिए, अब इसे घर ले चलते हैं। आगे की बात वहीं करेंगे। अशोक वंदना को कुर्सी से उठाते हैं। कुर्सी के पास ही उसकी जूतियां रखी हैं। वंदना दोनों पैरों को धीरे-धीरे जूतियों की तरफ बढ़ाती हैं, लेकिन पैर सीधे जूतियों तक पहुंचते ही नहीं। कभी दायां पैर दूसरी तरफ मुड़ जाता, तो कभी बायां पैर। वह गहरी सांस लेकर फिर कोशिश करती हैं, लेकिन शरीर धोखा दे जाता है। ये सिलसिला करीब 1 मिनट तक चला। तब कहीं जाकर वंदना के दोनों पैर जूतियों के भीतर पहुंचे। अशोक के सहारे वंदना ने धीरे-धीरे कदम आगे बढ़ाए, लेकिन पैर बार-बार अपनी दिशा बदलते हैं। अशोक तुरंत उन्हें संभालते हैं। दो-तीन कदम चलने के बाद वंदना के शरीर का संतुलन डगमगाया। हाथ कांपने लगे। चेहरा भी सिकुड़ गया। ऐसा लगा, जैसे शरीर का हर अंग रुक जाने की जिद कर रहा हो। दोनों धीरे-धीरे कमरे की तरफ बढ़े। चलते-चलते अशोक बताते हैं- छह साल पहले इसकी मां चल बसीं। जब तक वह थीं, वंदना उन्हीं के साथ ऊपर वाले कमरे में रहती थी। इसके भैया-भाभी भी साथ रहते थे। मां का स्वभाव सख्त था, इसलिए सब वंदना का ध्यान रखते थे। उनके जाने के बाद, कोई इसकी देखभाल नहीं करता था। अकेली पड़ी रहती थी। तब मैंने इसे नीचे वाले कमरे में शिफ्ट किया। अब यहीं रहती है। जिस दुकान में आपने इसे बैठे देखा, वहीं मैं खाना भी बनाता हूं। पहले इसे अपने हाथों से खिलाता हूं, फिर खुद खाता हूं। अशोक कमरे के एक कोने की ओर इशारा करते हैं। कहते हैं- वहां फर्श पर गद्दा बिछा है। वंदना वहीं सोती है। बार-बार पलंग पर चढ़ाना-उतारना मुश्किल होता है, इसलिए जमीन पर सुला देता हूं सुबह एक हेल्पर आती है। वही इसे नहलाती है, कपड़े बदलवाती है, झाड़ू-पोंछा करती है। बाकी दिनभर जो बन पड़ता है, मैं कर देता हूं। आप इनके क्या लगते हैं? कुछ पल तक चुप रहने के बाद अशोक बताते हैं- मैं कोई नहीं हूं। न रिश्तेदार, न पड़ोसी। 1998 की बात है। मैं यहीं बिल्डिंग के बाहर फल की रेहड़ी लगाता था। तभी वंदना के पिता मनीलाल कटारिया से पहचान हुई। मनीलाल भाई, वंदना को जान से ज्यादा चाहते थे। हमेशा कहते थे- ये मेरी पहली संतान है। जब तक जिंदा हूं, इसे किसी चीज की कमी नहीं होने दूंगा। उन्हें शराब की लत थी। एक दिन तबीयत इतनी बिगड़ी कि अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। मैं ही लेकर गया था। जांच में पता चला कि पेट में पानी भर गया है। तब वंदना 17 साल की थी। तीसरे दिन डॉक्टरों ने कह दिया कि अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है। आखिरी वक्त में मनीलाल भाई ने मुझे बुलाया। मेरा हाथ पकड़ा और कहा- अशोक भाई, एक जिम्मेदारी देकर जा रहा हूं। मेरे बाद मेरी वंदना का ख्याल रखना। मैं जानता हूं, मेरे जाने के बाद इसे कोई नहीं देखेगा। मैंने उनसे वादा किया- जब तक मेरी सांस चलेगी, तब तक वंदना कभी अकेली नहीं होगी। उस एक वचन ने मेरी पूरी जिंदगी बदल दी। घर में कई बार मेरी शादी की बात चली। हर बार मैंने मना कर दिया। कहा- मैं हनुमान भक्त हूं। ब्रह्मचर्य का पालन करूंगा। न शादी करूंगा, न अपना परिवार बसाऊंगा। डर था, अगर मेरा अपना परिवार हो गया, तो कहीं मनीलाल भाई को दिया हुआ वचन अधूरा न रह जाए। बोलते-बोलते अशोक उठ जाते हैं। कहते हैं- ये सब मत पूछिए। दिल दुखता है। कुछ देर बाद उन्होंने एक स्ट्रॉ लगी बोतल वंदना की तरफ बढ़ा दी। वो पैर से बोतल को पकड़कर मुंह तक ले जाती हैं। एक घूंट पानी खींचती हैं। लेकिन पानी निगलना भी उनके लिए आसान नहीं है। जैसे ही पानी गले से नीचे उतरा, वंदना की गर्दन झटके से पीछे की ओर खिंच गई। चेहरे की मांसपेशियां तन गईं। मानो शरीर में किसी ने करंट दौड़ा दिया हो। अशोक कहते हैं- इसके शरीर का कोई भी अंग इसके कंट्रोल में नहीं है। जो हरकतें आप देख रहे हैं, इन्हीं के साथ इसने पूरी जिंदगी काटी है। 1981 में इसका जन्म हुआ था। तारीख याद नहीं। इसकी मां होतीं, तो आपको बता देतीं। वंदना के जन्म वाले दिन तो किसी को कुछ समझ नहीं आया। लेकिन दूसरे दिन उसके हाथ-पैर अपने आप कांप रहे थे। मां-बाप को लगा कि शायद नवजात बच्चे में ऐसा होता होगा। लेकिन महीने बीतते गए, चिंता बढ़ती गई। वंदना दिनभर बिस्तर पर पड़ी रहती थी। वंदना के पिता उसे पहले जैतपुर के डॉक्टरों के पास ले गए। फिर राजकोट। लेकिन हर जगह डॉक्टरों ने यही कहा- दिमाग या नसों से जुड़ी कोई बड़ी बीमारी है। यहां जांच नहीं होगी। किसी बड़े अस्पताल ले जाइए। इसके बाद, वंदना को अहमदाबाद, मुंबई, डॉक्टरों ने जहां भेजा, मनीलाल वहां पहुंच गए। कई जांचों के बाद डॉक्टरों ने बीमारी का नाम बताया- सेरेब्रल पाल्सी (सीपी)। और कहा- बीमारी के साथ ही इसे जीना होगा। वंदना के चार साल बाद छोटा भाई भावेश हुआ। वो एकदम ठीक था। लेकिन 1998 में मनीलाल भाई की मौत के बाद पूरा घर बिखर गया। मेरा छोटा भाई हितेश ही उनका अस्थि कलश लेकर हरिद्वार गया था। मनीलाल भाई मुझसे कहते थे- अशोक, बेटी के इलाज में 5 लाख रुपए लगा दिए। लेकिन कोई फर्क नहीं पड़़ा। पिता के जाने के बाद वंदना की पूरी दुनिया उसकी मां बन गईं। वो प्राइवेट स्कूल में पढ़ाती थीं। मां ही उसे नहलाती थीं, कपड़े पहनाती थीं, खाना खिलाती थीं। पिता के जाने के बाद भी वंदना की मां ने उम्मीद नहीं छोड़ी थी। 2004 में मुंबई के मशहूर न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. अशोक जौहरी का पता चला। बताया गया कि वह साल में कुछ दिन मुंबई में मरीज देखते हैं, बाकी समय विदेश में रहते हैं। बड़ी मुश्किल से अपॉइंटमेंट मिला। लेकिन किस्मत ने यहां भी साथ नहीं दिया। जिस दिन वंदना को दिखाना था, उससे ठीक दो दिन पहले भावेश का एक्सीडेंट हो गया। वह 15 दिनों तक भर्ती रहा। हालात ऐसे बने कि वंदना को मुंबई नहीं ले जा पाए। धीरे-धीरे परिवार ने भी मान लिया कि जब कोई इलाज ही नहीं है, तो अस्पतालों के चक्कर काटने से क्या फायदा। वक्त गुजरता गया। मां के जाते ही भाई इसी बिल्डिंग में अलग रहने लगा। उसका अपना परिवार है। पत्नी है, बच्चे हैं, उसकी भी अपनी जिम्मेदारियां हैं। इसी बीच मेरी नजर वंदना के कमरे की दीवारों पर पड़ी। जगह-जगह अमिताभ और अभिषेक बच्चन की तस्वीरें लगी हैं। क्या आप अमिताभ बच्चन की फैन हैं? वंदना गर्दन को संभालने की कोशिश करती हैं। शब्दों को बाहर आने में वक्त लगता है। फिर रुकते-रुकते कहती हैं- बचपन से पसंद करती हूं। एक बार उनसे मिलने के लिए फाइल भी तैयार की थी। एक शूटिंग के लिए वो यहां आए थे, लेकिन मुलाकात नहीं हो पाई। आखिरी इच्छा है एक बार अमिताभ बच्चन से मिल लूं। इतना कहते ही वो जमीन पर घिसटते हुए आगे बढ़ने की कोशिश करती हैं। गर्दन को मोड़कर धीमी आवाज में कहती हैं- कई बार दिल करता था कि अपनी जिंदगी खत्म कर दूं। मन में बार-बार सवाल उठता था कि भगवान ने मुझे ऐसी जिंदगी क्यों दी, जहां हर जरूरत के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। फिर मां की बात याद आ जाती है। वो कहती थीं- कोई कमजोर नहीं होता। भगवान हर इंसान को किसी खास वजह से भेजते हैं। बस इन्हीं शब्दों ने मुझे संभाल रखा है। मां की वजह से ही मैं बीकॉम कर पाई। उन्होंने डिस्टेंस लर्निंग से मुझे पढ़ाया। मैं लिख नहीं पाती थी, इसलिए परीक्षा देने मेरे साथ राइटर बैठता था। इतने में अशोक के भाई हितेश आए। वे जैतपुर बस स्टैंड के पास अपनी दुकान चलाते हैं। वे बताते हैं- मेरी अपनी जिम्मेदारियां हैं, लेकिन वंदना को देखकर यही लगता है कि अगर मेरी बच्ची के साथ ऐसा होता, तो क्या मैं उसे अकेला छोड़ देता। इसकी जितनी सेवा बन पड़ती है, हम लोग करते हैं। सरकार की तरफ से आज तक कोई बड़ी मदद नहीं मिली। हर महीने सिर्फ एक हजार रुपए मिलते हैं। कई लोग आए। मदद का भरोसा दिया,. लेकिन आज तक कुछ नहीं हुआ। वंदना से मिलने के बाद बतौर रिपोर्टर मैं अहमदाबाद के रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंस पहुंचा। यहां पीडियाट्रिक न्यूरोसर्जरी विभाग के प्रमुख डॉ. संजीव मेहता से मिला। डॉ. मेहता, वंदना के बारे बताते हैं- हमारे शरीर का हर हिस्सा दिमाग के इशारों पर काम करता है। उठना, बैठना, चलना, बोलना, खाना निगलना और हाथ-पैर हिलाना, हर काम का आदेश दिमाग देता है। अगर दिमाग का वह हिस्सा, जो इन गतिविधियों को नियंत्रित करता है, ठीक से विकसित नहीं होता, तो बच्चे को सेरेब्रल पाल्सी हो सकती है। इसकी शुरुआत अक्सर मां के गर्भ में ही हो जाती है। जब बच्चे का दिमाग बन रहा होता है, तब उसकी कुछ कोशिकाएं और तंत्रिका मार्ग पूरी तरह विकसित नहीं हो पाते। कई मामलों में LIS1, DCX, TUBA1A और ARX जैसे जीन में गड़बड़ी भी इसकी वजह बनती है। हालांकि हर मामला जेनेटिक नहीं होता। गर्भावस्था और प्रसव के दौरान होने वाली दिक्कतें भी इसका कारण बन सकती हैं। डॉ. मेहता बताते हैं कि लेबर पेन शुरू होने के बाद अगर प्रसव लंबा खिंच जाए या समय रहते सामान्य प्रसव और सर्जरी के बीच फैसला न लिया जा सके, तो बच्चे के दिमाग तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती। इससे दिमाग की कोशिकाओं को स्थायी नुकसान हो सकता है। यही कारण है कि जन्म के तुरंत बाद बच्चे का रोना बहुत जरूरी माना जाता है। इससे उसके फेफड़े ठीक से काम करने लगते हैं और शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती है। वंदना के लक्षण एटेक्सिक सेरेब्रल पाल्सी से मिलते हैं। यह बीमारी का सबसे दुर्लभ प्रकार माना जाता है। इसमें शरीर का संतुलन बिगड़ जाता है और हाथ-पैर लगातार कांपते रहते हैं। डॉ. मेहता कहते हैं कि फिलहाल सेरेब्रल पाल्सी का कोई स्थायी इलाज नहीं है। दिमाग के क्षतिग्रस्त हिस्से की सर्जरी भी संभव नहीं है। अगर मरीज खुद बैठ सकता है और कुछ काम कर सकता है, तो उसकी उम्र 50-55 साल तक हो सकती है। गर्भावस्था के 24 से 28 सप्ताह के बाद भ्रूण का एमआरआई करके पता लगाया जा सकता है कि बच्चे का दिमाग विकसित हो रहा है या नहीं। —------------------------------- ऐ जिंदगी सीरीज की यह खबर भी पढ़ें… 1- शादी के दिन आंतें फटीं, 5 महीने खुला रहा पेट:सूप पिया तो छाती से बह निकला, हनीमून पर भी नहीं जा पाया 6 मार्च 2022 की शाम। कोलकाता के एक बैंक्वेट हॉल में हमारी शादी की पार्टी चल रही थी। मेहमानों की भीड़ थी। सभी बधाइयां दे रहे थे, फोटो खिंचवा रहे थे। कोई लिफाफा दे रहा था, तो कोई गिफ्ट। सामने पूरा परिवार, रिश्तेदार और दोस्त गानों की धुन पर झूम रहे थे। इसी बीच, मेरे पेट में तेज दर्द उठा। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें… 2- सिर से जुड़ीं दो बहनें अब अलग नहीं होना चाहतीं: सलमान खान ने बहन बनाया, इलाज का वादा किया, अब फोन तक नहीं उठाते ये हैं सबा और फरहा। उम्र 24 साल। दोनों का जन्म एक दिन, एक समय और एक ही मां की कोख से हुआ, सो ये जुड़वां कहलाती हैं। लेकिन… इनके जिस्म अलग-अलग नहीं, सिर से आपस में जुड़े हैं। वो भी इस तरह कि दोनों एक दूसरे को देख नहीं सकतीं। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें…

दैनिक भास्कर 31 Jul 2026 4:50 am

'धमकी देते हो…' खड़गे के बयान पर सदन में हंगामा:एंटी पेपर लीक बिल पर बहस, 'मनुस्मृति' को लेकर बयान पर सत्ता पक्ष-विपक्ष आमने-सामने

संसद के मानसून सत्र के दौरान गुरुवार को राज्यसभा और लोकसभा, दोनों सदनों में हंगामा और तीखी नोकझोंक देखने को मिली। राज्यसभा में पेपर लीक से जुड़े लोक परीक्षा अनुचित साधन निवारण (संशोधन) विधेयक-2026 पर चर्चा के दौरान नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के बयान पर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने आ गए। खड़गे ने आरोप लगाया कि उन्हें धमकी दी जा रही है। बाद में उनके 'मनुस्मृति' संबंधी बयान पर हंगामा हुआ और सभापति ने टिप्पणी को कार्यवाही के रिकॉर्ड से हटाने के निर्देश दिए। वहीं, लोकसभा में राष्ट्र गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक-2026 ध्वनिमत से पारित हो गया। सुबह 11 बजे राज्यसभा की कार्यवाही शुरू हुई। दोपहर 2 बजे कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने लोक परीक्षा अनुचित साधन निवारण (संशोधन) विधेयक-2026 सदन में पेश किया। विधेयक पर चर्चा के दौरान जितेंद्र सिंह ने कहा कि देश में भर्ती परीक्षाओं के लिए यूपीएससी, एसएससी, आईबीपीएस और उच्च शिक्षा में प्रवेश के लिए एनटीए जैसी प्रमुख एजेंसियां काम कर रही हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा एजेंसी बनाने का सुझाव 1992 में आया था। एनडीए सरकार, यूपीए का अधूरा काम पूरा कर रही है। नेता प्रतिपक्ष खड़गे चर्चा में शामिल हुए। आरोप लगाया कि उन्हें धमकी दी जा रही है। इसी दौरान उन्होंने कहा कि एक दिन संबंधित सदस्य को कमरे से बाहर खींचकर लाएंगे। इस टिप्पणी के बाद सदन में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक शुरू हो गई। खड़गे बोले- शिक्षण संस्थानों में आरएसएस का दखल इसके बाद खड़गे ने शिक्षा व्यवस्था को लेकर सरकार पर हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि शिक्षण संस्थानों में आरएसएस का दखल बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि 'मनुस्मृति' मानने वालों की संख्या बढ़ने से शूद्रों का पढ़ने का अधिकार छिन गया है। इस टिप्पणी पर सत्ता पक्ष ने कड़ा विरोध जताया और सदन में हंगामा शुरू हो गया। नड्‌डा ने कहा- खड़गे का बयान तथ्यों से परे केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने कहा कि खड़गे का बयान तथ्यों से परे है और इससे अशांति फैल सकती है। इसके बाद सभापति सीपी राधाकृष्णन ने 'मनुस्मृति' संबंधी टिप्पणी को कार्यवाही के रिकॉर्ड से हटाने के निर्देश दिए। खड़गे ने कहा कि सरकार ने पेपर लीक रोकने के लिए कानून तो बना दिया, लेकिन उसे रोकने की व्यवस्था क्या की गई, यह ज्यादा महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि जब जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन चल रहा था, तब धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा क्यों नहीं दिया। सरकार जो कहती है, उसका उल्टा करती है। अगर शिक्षा व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया तो आगे भी पेपर लीक की घटनाएं होंगी। उन्होंने कहा कि सरकार ने दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की बात कही थी, लेकिन अब तक किसी को सजा नहीं मिली। 2024 के पेपर लीक मामलों का जिक्र करते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि आरोपियों को क्लीनचिट मिल गई। लोकसभा की कार्यवाही दो बार स्थगित लोकसभा की कार्यवाही सुबह 11 बजे शुरू हुई, लेकिन विपक्ष के हंगामे के कारण कुछ ही देर में दोपहर 2 बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई। विपक्षी सांसदों की मांग थी कि केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह माफी मांगें। दोपहर 2 बजे कार्यवाही दोबारा शुरू हुई। पीठासीन संध्या राय ने सदस्यों से दस्तावेज सदन के पटल पर रखने को कहा। इस दौरान विपक्षी दलों के सांसदों ने नारेबाजी की, जिसके चलते सदन की कार्यवाही फिर 3 बजे तक के लिए स्थगित करनी पड़ी। साढ़े 3 बजे लोकसभा की कार्यवाही दोबारा शुरू हुई। सरकार ने राष्ट्र गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक-2026 सदन में पेश किया, जिस पर चर्चा हुई। सांसद संबित पात्रा ने कहा- गांधी परिवार की सरकारों ने गांधी परिवार को तो ऊपर रखा, लेकिन वंदे मातरम् को ऊपर नहीं रखा।वीडियो देखने के लिए ऊपर थंबनेल पर क्लिक करें…

दैनिक भास्कर 30 Jul 2026 9:31 pm

ब्लैकबोर्ड-मुझे लड़कियां पसंद थी, इसलिए मेरी सलवार उतारकर चेक किया:स्कूल में लड़के कहते- लड़कियों के टॉयलेट में क्यो जाता है, बॉयज टॉयलेट में चल

मैं आठवीं क्लास में था। नाम था अंकिता यादव। मेरे ही क्लास के दूसरे सेक्शन में प्रिया नाम की एक लड़की थी। बहुत पसंद थी वो मुझे। जब भी वो आस-पास होती मुझे अजीब सा महसूस होता। बस लगता कि उसे देखता रहूं। उससे बातें करूं। अब आप सोच रहे होंगे मेरा नाम लड़कियों जैसा, लेकिन बातें तो लड़कों जैसी हैं। सही सोचा आपने। हां, तब मैं शरीर से तो लड़की था, लेकिन मेरे भीतर एक लड़का था। भीतर का वो लड़का हमेशा घुटता रहता। मैं खुद से पूछता, दुनिया के लिए तो मैं लड़की हूं, ऐसे में जिस लड़की से प्यार करता हूं, उसे ये कैसे बताऊं। किस मुंह बताऊं। भास्कर सीरीज ब्लैकबोर्ड में मैं मनीषा भल्ला आज कहानी लाई हूं मनवीर की, जो पहले अंकिता थे, लेकिन सर्जरी से जेंडर चेंज करवा लिया इस दौरान उनके साथ क्या-क्या हुआ, सुनिए उन्हीं की जुबानी… जैसा कि मैंने ऊपर बताया मुझे प्रिया पसंद तो थी, लेकिन उससे कहने की हिम्मत नहीं हुई। तब मैंने उसके बारे में अपनी दोस्त मतलब सहेली आकांक्षा को बताया। वो चौंक गई और कहने लगी- ‘तू तो खुद लड़की है। ये कैसी बातें कर रही है। मैंने उससे कहा- भले ही मैं लड़की दिखता हूं, लेकिन मुझे लड़कों की तरह रहना पसंद है। मुझे शर्ट-पैंट पहनकर घूमना पसंद था। लड़कियों वाले कपड़ों में दम घुटता था। लंबे बाल संवारना मेरे लिए मुसीबत थी। हर बार उन्हें काटकर फेंकने का मन करता था। धीरे-धीरे ये बात पूरे स्कूल में फैल गई। सब मजाक उड़ाने लगे। एक दिन मैं वॉशरूम जा रहा था, तभी क्लास के कुछ लड़कों ने घेर लिया। कहने लगे- ‘तू तो हमारी तरह है ना। तू भी लड़का है ना, तभी तुझे भी हमारी तरह लड़कियां पसंद हैं। ब्यॉज टॉयलेट में चल, लड़कियों के टॉयलेट में क्यों जा रही है।’ ये बातें सुनकर मैं इतना घबरा गया कि पेट दर्द का बहाना बनाकर घर चला गया। अगले दिन पूरे स्कूल में ये बात फैल चुकी थी कि अंकिता दिखती भले ही लड़की है, लेकिन है वो लड़का। जब मैं दोबारा टॉयलेट गया तो कुछ सीनियर्स और क्लास की लड़कियों ने घेर लिया। उन्होंने जबरदस्ती मेरी सलवार उतारी और प्राइवेट पार्ट चेक किया। फिर ये कहते हुए वहां से चले गए- अरे तू तो लड़की है। फिर तुझे लड़कियां क्यों पसंद हैं। उस वक्त मेरे मन में क्या चल रहा था ये शायद ही कोई समझ पाएगा। ऐसा लग रहा था कि आत्महत्या करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है। किसी भी ट्रांसजेंडर की पहली लड़ाई परिवार और स्कूल से शुरू होती है। हम लोग दिल्ली के नजफगढ़ में रहते थे। मैं 6 भाई-बहनों में सबसे छोटा था। पापा चाय की दुकान लगाते थे। इसी से घर के 9 लोगों का खर्च चलता था। मेरे पैदा होने के बाद खर्च और बढ़ गया। ढाई साल का हुआ तो पापा को लकवा मार गया। वो बिस्तर पर आ गए। घर चलाने की जिम्मेदारी मां पर आ गई और वो दुकान पर बैठने लगी। तब किसी रिश्तेदार ने मां से कह दिया कि तुम्हारी छोटी बेटी मनहूस है। जबसे वो पैदा हुई है पूरा घर मुसीबतों से घिरा है। उसके बाद से भाई-बहनों समेत सभी रिश्तेदारों ने मनहूस कहना शुरू कर दिया। समय बीतता गया और मेरे ही घर में मेरे खिलाफ नफरत बढ़ने लगी। एकबार बड़ी बहन को देखने के लिए लड़के वाले घर आ रहे थे। सब तैयारियों में जुटे थे। मैंने मां से पूछा, क्या मेहमान आने वाले हैं? मां से पहले ही बड़ा भाई बोलने लगा- अगर तू उनके सामने आई तो मार-मार के हाथ-पैर तोड़ दूंगा। मनहूस, तेरी वजह से रिश्ता जुड़ने से पहले ही टूट जाएगा। मैं रोते हुए वहां से उठकर चला गया। जब मैं 10-11 साल का था तो मेरी उम्र की लड़कियां गुड्‌डे गुड़ियों से खेलती थीं, लेकिन मुझे तो लड़कों के साथ क्रिकेट खेलना अच्छा लगता था। छठवीं क्लास की बात है। एक दिन कुछ लड़के घर आए। कहने लगे क्रिकेट खेलने चलो। उस वक्त पापा घर पर ही थे। वो सुनते ही चीखने लगे-’लड़कों के साथ खेलने जाएगी, बाहर निकली तो टांगे तोड़ दूंगा। जैसे बाकी बहनें घर पर रहती हैं, वैसे ही तू भी रह।’ पापा को चीखते हुए सुनकर मैं कांपने लगा। फिर भी हिम्मत जुटाकर रोते हुए बड़ी बहन से बोला- पापा से कहो मुझे इनके साथ बाहर जाने दें। मैं भी इनमें से ही हूं।’ लेकिन पापा ने एक न सुनी। मुझे कोई नहीं समझता था। इसलिए मैं अपनी सारी बातें डायरी में लिखता था। ये बात भी मैंने डायरी में लिखी थी। एक दिन किसी ने बड़ी बहन को बता दिया कि मुझे लड़कियां पसंद हैं। उसने घर आकर भाई-बहन, मम्मी, सबको बता दिया। तभी बड़े भाई को मेरी डायरी भी मिल गई। उसने सब पढ़ लिया। उस दिन मम्मी और दादी के अलावा सभी ने मुझे पीटा। तब तक पीटा, जब तक सब थक नहीं गए। उस दिन से भाई मुझे हिजड़ा कहने लगा। धीरे-धीरे पैसों की तंगी होने लगी। भाई ने घर में पैसे देना बंद कर दिया। कहने लगा कि इसे खिलाने के लिए पैसे नहीं हैं। मेरे पास चप्पल तक नहीं थी। नंगे पैर स्कूल जाता था। लड़कों वाले कपड़े पहनता था, वो भी भाई ने जला दिए। रिश्तेदारों से उतरन मांग कर पहनना पड़ा। मजबूरी में फुटपाथ पर चादर बिछा कर सब्जी बेची। कॉस्मेटिक और मिट्‌टी के बर्तन बेचे। जब थककर घर लौटता तो चुपचाप एक कोने में पड़ा रहता। जिस किसी का कोई काम बिगड़ जाता तो वो मुझे जिम्मेदार ठहराकर पीटने लगता। पड़ोस में ही मेरा एक रिश्ते का भाई रहता था। अक्सर घर आया करता था। एकबार वो आया तो घर पर कोई नहीं था। वो मेरे कमरे में घुस आया और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। जब तक मुझे कुछ समझ आता वो जबरदस्ती करने लगा। उसने मेरा रेप किया। मैं मदद के लिए चीख रहा था। उसने मुझे धमकी दी कि तेरी बात पर कौन भरोसा करेगा। घरवाले तो तेरी शक्ल तक नहीं देखना चाहते, घर से भी निकाल देंगे। उस दिन के बाद से उसे जब भी मौका मिलता वो घर आ जाता। रेप करता और धमकी देकर चला जाता। उसने परिवार के कुछ और लड़कों को इसबारे में बता दिया। वो लड़के भी मेरा रेप करने लगे। लगातार तीन साल तक मेरे साथ ये सब होता रहा लेकिन मैं घरवालों को बता नहीं सका। हालांकि मैं उन लड़कों का नाम नहीं लूंगा। वरना मां दुखी हो जाएगी। 2013 में पापा की मौत हो गई। उसके बाद भाई के हौसले और बुलंद हो गए। वो कहने लगा कि मुझे कहीं बेच आएगा। मैं जब भी उसकी सामने आता, पीटने लगता। एक दिन मैं कूलर अपनी तरफ घुमाकर सो गया। इस बात पर उसने मुझे बहुत पीटा। चारपाई से उठाकर नीचे पटक दिया। दीवार पर सिर दे मारा। पास ही एक प्रेस पड़ी थी। वो उठाकर मेरे सिर पर मार दी। खून बहने लगा तो बहन और जीजा अस्पताल ले गए। अगले दिन जब सोकर उठा तो दादी और मां मेरे सिरहाने बैठे थे। कहने लगे कि तू ये घर छोड़कर चला जा। वरना भाई तुझे मार डालेगा। हम तुझे जिंदा देखना चाहते हैं। मैंने मां के पैर पकड़ लिए। गिड़गिड़ाने लगा कि मां, कहां जाऊं मैं। मां ने रोते हुए कहा- कहीं भी चला जा, कम से कम जिंदा तो रहेगा। उसके बाद मैंने घर छोड़ दिया। तब तक बारहवीं हो चुकी थी। सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी मिल गई। नजफगढ़ में ही किराए का कमरा लेकर रहने लगा। कुछ ऐसे लोगों से दोस्ती हुई जो मेरी ही तरह थे यानी लड़की के शरीर में लड़के थे। वो अक्सर मुझसे मिलने आया करते थे। मकान मालिक को वो लोग पसंद नहीं आए और उसने कमरा खाली करवा लिया। तब तक कोरोना भी फैल चुका था। मैं सामान लिए पूरा दिन यहां-वहां भटकता रहा, लेकिन एक भी कमरा नहीं मिला। मैंने अपने कई जानने वालों को भी फोन किया, लेकिन सबने मना कर दिया। जब अंधेरा होने लगा तो वापस घर लौट जाने के अलावा मेरे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा। घर पहुंचकर मां को सारी बात बताई। उन्होंने कहा- ‘भाई से दूर रहना, उसकी नजरों के सामने मत आना।’ एक-दो दिन बीते ही थे कि फिर वही सब होने लगा। रोज-रोज की मारपीट। एक महीने बाद मां और दादी के कहने- लगे घर छोड़ दे। मैंने फिर घर छोड़ दिया। किसी तरह एक कमरा किराए पर लेकर रहने लगा। जब मां से मिलना होता तो नजफगढ़ बैंक या किसी चाय की दुकान पर उन्हें बुला लेता। यूं ही सड़कों पर समय गुजरने लगा। कुछ महीने बाद पता चला कि बड़े भाई की अचानक मौत हो गई। सुनकर बुरा तो लगा लेकिन उतना नहीं। बस यूं कहिए कि जो हुआ ठीक हुआ। भाई की मौत के बाद फिर मेरा घर आना-जाना शुरू हुआ। आखिर मैंने तय किया कि अब सर्जरी करवाऊंगा। मम्मी और दादी को सर्जरी के बारे में बताया। वो कहने लगीं कि अगर तुम ये करवाकर खुश रहोगे तो करवा लो। तुम्हारी खुशी में ही हमारी खुशी है। छोटी-मोटी नौकरी से जो भी पैसे जोड़े थे, उससे इलाज शुरू हुआ। इसके लिए सबसे पहले जीआईडी सर्टिफिकेट यानी जेंडर आईडेंटिटी डिसऑर्डर सर्फिकेट की जरूरत होती है। जिसके लिए मैं मनोचिकित्सक के पास गया। इसमें काउंसलिंग से जायजा लिया गया कि मैं सच में ट्रांस हूं या नहीं। तीन सेशन होने के बाद जीआईडी सर्टिफिकेट मिला। इसके बाद हार्मोन हेल्थ के डॉक्टर यानी एंडोक्रोनॉलिस्ट के पास गया। उसने हार्मोनल टेस्ट करवाए और रिपोर्ट के हिसाब से हार्मोन बदलने वाले इंजेक्शन देने शुरू किए। यह इंजेक्शन किसी भी सर्जरी करवाने वाले को सारी जिंदगी लेने होते हैं। शरीर के हार्मोन जेंडर के अनुसार बदलते रहके हैं, इसलिए हर तीन महीने में ब्लड टेस्ट भी करवाने पड़ते हैं। इसमें हर महीने करीब 5 हजार रुपये का खर्च आता। इस पूरी प्रोसेस में एक से डेढ़ साल लग गया। तब जाकर 2024 के आखिरी में सर्जरी हुई, जिसमें ब्रेस्ट और यूटेरस हटा दिया गया। फिर बारी आई टीजी यानी ट्रांस जेंडर कार्ड लेने की। इसी से सभी दस्तावेजों में नाम और जेंडर बदलता है। इसके लिए मैंने डीएम ऑफिस में अप्लाई किया। तीन साल तक इस कार्ड के लिए चक्कर काटता रहा। एकबार तो वहां बैठे अधिकारी ने इतना तक कह दिया कि 'पैंट उतारकर दिखाओ, तब तो पता चलेगा जेंडर सच में बदला है या नहीं।' ये सुनते ही वहां बैठे सभी लोग हंसने लगे। मैं शर्मिंदा होकर वहां से चला आया। फिर भी कार्ड जरूरी था इसलिए हर रोज पहुंच जाता था। वेरिफिकेश के लिए एक टीम मेरे मोहल्ले में पहुंची और पूछने लगी कि यहां कोई हिजड़ा रहता है, जिसने टीजी कार्ड के लिए अप्लाई किया है। उस दिन के बाद से पूरा मोहल्ला मेरा मजाक उड़ाने लगा। आखिरकार मुझे वो मोहल्ला छोड़ना पड़ा, लेकिन मैंने हार नहीं मानी। 2019 में जो ट्रांसजेंडर एक्ट आया था उसमें इसी साल मार्च में बदलाव भी हुआ है। उसके अनुसार अब डीएम ऑफिस में मेडिकल बोर्ड बैठेगा। जो निर्णय लेगा कि अप्लाई करने वाला ट्रांस है भी या नहीं। टीजी कार्ड के लिए वेबसाइट से ही अप्लाई करना होगा। सर्जरी हुए लगभग दो साल हो चुके हैं लेकिन अब तक मेरा पैन कार्ड नहीं बन पाया है। जिसकी वजह से पीएफ के लिए अप्लाई नहीं कर पा रहा हूं। मुझे पैसों की सख्त जरूरत हैं, इसलिए दिन-रात सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटता हूं। सर्जरी के बाद जिंदगी में काफी कुछ बदल गया, लेकिन पुरानी जिंदगी को जब भी याद करता हूं तो तकलीफ होती है। शायद वो सब जिंदगी में कभी भूल नहीं पाऊंगा। मैं जो भी था, जैसा भी था सब ऊपर वाले ने किया था, लेकिन सजा मुझे मिली। ----------------------------------- ब्लैकबोर्ड की ये कहानियां भी पढ़ें… 1- ब्लैकबोर्ड-8 पुलिसवालों को मारने वाले विकास दुबे की बीवी हूं:आज वो जिंदा होते तो थप्पड़ मारती, बच्चे बाप का नाम तक नहीं सुनना चाहते साल 2020, 2-3 जुलाई की दरमियानी रात। मैं अपने छोटे बेटे के साथ लखनऊ वाले घर पर सो रही थी। बड़ा बेटा उन दिनों छुट्टी पर मॉस्को से इंडिया आया हुआ था और अपनी चाची के घर पर था। रात 2 बजे अचानक फोन बजा। पूरी कहानी यहां पढ़ें… 2- ब्लैकबोर्ड-पत्नी की साड़ी-पेटीकोट धोता हूं, झाडू-पोंछा करता हूं:दोस्त कहते हैं- ये मर्द नहीं, हाउस हसबैंड बनने से भाइयों की शादी नहीं हो रही कहानी ऐसे मर्द की जो पैसे कमाने बाहर नहीं जाता। घर पर रहकर झाड़ू-पोंछा करता है। बरतन धोता है। खाना बनाता है। वो हाउस हसबैंड है। ठीक वैसे ही जैसे हमारे यहां हाउस वाइफ होती हैं। पूरी कहानी यहां पढ़ें

दैनिक भास्कर 30 Jul 2026 4:55 am

राहुल के 'इडियट, अंधभक्त' बयान पर हंगामा:'पैलेट गन' आरोप पर सरकार बोली- गोली मंत्री नहीं, मजिस्ट्रेट चलवाता है; ‘एंटी पेपर लीक बिल’ पास

संसद के मानसून सत्र में बुधवार को एक बार फिर लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में जोरदार हंगामा देखने को मिला। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के बयान ने सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी टकराहट पैदा कर दी। राहुल गांधी ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पैलेट गन चलाने का आदेश देने का आरोप लगाया। इसके अलावा उन्होंने अपने भाषण के दौरान 'विद्यार्थी, इडियट और अंधभक्त' शब्दों का इस्तेमाल किया, जिस पर सत्ता पक्ष के सांसद लगातार टोकते रहे। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने राहुल गांधी से अपने आरोपों के समर्थन में सबूत मांगे, जबकि राहुल ने सदन में आरोप लगाया कि उनका माइक बंद कर दिया गया। लोकसभा की कार्यवाही सुबह 11 बजे शुरू हुई। प्रश्नकाल के दौरान ही विपक्षी दलों के सदस्य नारेबाजी करने लगे। लगातार हंगामे के कारण अध्यक्ष को कार्यवाही दोपहर 12 बजे तक के लिए स्थगित करनी पड़ी। दोपहर 12 बजे सदन की कार्यवाही दोबारा शुरू हुई। पीठासीन सदस्य एनके प्रेमचंद्रन ने सदस्यों से सदन के पटल पर दस्तावेज रखने की प्रक्रिया पूरी कराई, लेकिन विपक्षी सांसद 'गृहमंत्री सदन में आओ' के नारे लगाते रहे। हंगामा थमने के बजाय और तेज होता गया। करीब 12 बजकर 6 मिनट पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला सदन की कार्यवाही संभालने के लिए आसन पर पहुंचे। लगातार हो रही नारेबाजी पर उन्होंने नाराजगी जताई और सदन को चलने देने की अपील की। इसके बाद सदन में लोक परीक्षा (अनुचित साधन निवारण) संशोधन विधेयक, 2026 पर चर्चा शुरू हुई। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) के नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल ने विधेयक पर अपनी बात रखी और परीक्षा प्रणाली तथा नकल रोकने के उपायों को लेकर सरकार से सवाल किए। करीब 12 बजकर 59 मिनट पर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी चर्चा में हिस्सा लेने के लिए खड़े हुए। अपने संबोधन के दौरान उन्होंने केंद्र सरकार और खासकर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पर तीखे हमले किए। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन कर रहे लोगों पर पैलेट गन चलाने का आदेश अमित शाह ने दिया था। उन्होंने छात्रों से जुड़े मुद्दों पर सरकार को घेरते हुए 'विद्यार्थी, इडियट और अंधभक्त' टिप्पणी भी की, जिस पर सत्ता पक्ष के सांसदों ने जोरदार विरोध शुरू कर दिया। राहुल गांधी के आरोपों के बाद सदन का माहौल और गरमा गया। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू तत्काल खड़े हुए और कहा कि नेता प्रतिपक्ष बेहद गंभीर आरोप लगा रहे हैं, इसलिए उन्हें सदन में इसका प्रमाण देना चाहिए। सत्ता पक्ष के सांसद भी राहुल गांधी के बयान का विरोध करते हुए बार-बार उन्हें टोकते रहे। इसी दौरान राहुल गांधी ने लोकसभा अध्यक्ष से शिकायत करते हुए आरोप लगाया कि उनका माइक बंद कर दिया गया है और उन्हें अपनी बात पूरी तरह रखने का अवसर नहीं दिया जा रहा। इस मुद्दे पर भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस छिड़ गई। लगातार बढ़ते शोर-शराबे और हंगामे के बीच अध्यक्ष ने लोकसभा की कार्यवाही दोपहर ढाई बजे तक के लिए स्थगित कर दी। दोपहर बाद जब सदन की कार्यवाही फिर शुरू हुई तो प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह ने राहुल गांधी के आरोपों का जवाब दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी प्रदर्शन के दौरान गोली चलाने का आदेश कोई मंत्री नहीं देता, बल्कि कानून के अनुसार यह अधिकार कार्यपालक मजिस्ट्रेट के पास होता है। उन्होंने राहुल गांधी के बयान को गैरजिम्मेदाराना और तथ्यों से परे बताया। इस दौरान विपक्षी सांसद लगातार नारेबाजी करते रहे, लेकिन हंगामे के बीच ही लोकसभा ने लोक परीक्षा (अनुचित साधन निवारण) संशोधन विधेयक, 2026 को ध्वनिमत से पारित कर दिया। राज्यसभा में भी हंगामा उधर राज्यसभा की कार्यवाही भी सुबह 11 बजे शुरू हुई। सभापति सीपी राधाकृष्णन ने सदस्यों से आवश्यक दस्तावेज सदन के पटल पर रखने को कहा। इसके बाद प्रश्नकाल शुरू हुआ, लेकिन विपक्षी सदस्यों के हंगामे के कारण सदन की कार्यवाही दोपहर 2 बजे तक के लिए स्थगित करनी पड़ी। दोपहर बाद सदन की कार्यवाही शुरू होने पर राष्ट्र गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026 पर चर्चा हुई। बहस के दौरान बिहार से राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के सांसद प्रोफेसर मनोज झा ने सरकार की नीतियों और विधेयक के विभिन्न प्रावधानों पर अपनी बात रखी। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच इस मुद्दे पर भी तीखी बहस देखने को मिली। वीडियो देखने के लिए ऊपर थंबनेल पर क्लिक करें…

दैनिक भास्कर 29 Jul 2026 11:09 pm

आज का एक्सप्लेनर:क्या CJP से किया वादा तोड़ रही सरकार; अब तक दर्जनों FIR वापस नहीं ली, प्रदर्शनकारियों से पूछताछ; क्या दोबारा आंदोलन होगा

अभिजीत दीपके ने दोबारा आंदोलन की चेतावनी दी है। उन्होंने मंगलवार को कहा- 'कई राज्यों में पुलिस स्टूडेंट्स को परेशान कर रही है। सरकार छात्रों को डराना-धमकाना और डिटेन करना बंद करे। अगर ये जारी रहा, तो हम दोबारा बहुत बड़ा आंदोलन करेंगे।’ आखिर जंतर-मंतर के प्रदर्शनकारियों के साथ हो क्या रहा है, क्या वाकई सरकार वादाखिलाफी कर रही, जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: जंतर मंतर के प्रदर्शनकारियों के साथ क्या हो रहा है?जवाबः तीन तरह के बर्ताव सामने आए हैं… 1. प्रोटेस्टर्स को ट्रैक करके अपमानित किया जा रहा 2. कई राज्यों में दर्ज FIR रद्द की जा रहीं 3. कुछ जगह FIR रद्द नहीं, पुलिस एक्शन ले रही सवाल-2: तो क्या सरकार CJP से वादाखिलाफी कर रही है?जवाबः CJP और सरकार के बीच 3 दौर की बातचीत के बाद 25 जुलाई को प्रोटेस्ट खत्म हुआ। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के अलावा दोनों पक्षों के बीच कुछ बातें तय हुई थीं। मसलन- बीजेपी शासित राज्यों में प्रदर्शनकारियों पर दर्ज सभी FIR वापस ली जाएंगी, सरकार मंगलवार तक इसकी लिखित गारंटी देगी, NEET पेपर लीक की वजह से जान गंवाने वाले बच्चों के परिवारों को अधिकतम मुआवजा और शिक्षा सुधार के चार्टर पर सरकार काम करेगी। केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस में इन बातों पर सहमति जताई थी। हालांकि अब कॉकरोच जनता पार्टी सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगा रही है। CJP का कहना है कि अब तक सरकार की तरफ से प्रदर्शनकारियों पर दर्ज FIR वापस करने की लिखित गारंटी नहीं मिली है। उलटे पुलिस प्रोटेस्टर्स के खिलाफ कार्रवाई कर रही है। CJP ने ये भी कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश से पुलिस को दर्ज FIR में जांच जारी रखने की इजाजत मिल गई है। ये सरकार के आश्वासन से बिल्कुल उलट है। इस आदेश को मंजूर नहीं करेंगे। सवाल-3: आखिर सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा क्या कहा, जिसका विरोध कर रहे CJP नेता?जवाबः 28 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने CJP प्रोटेस्ट के दौरान पुलिस कार्रवाई की जांच को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई की। कोर्ट ने कहा कि छात्रों का प्रदर्शन शांतिपूर्ण था और ये संवैधानिक अधिकार है। पहली नजर में स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की जरूरत दिखती है। जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग करने वालों के खिलाफ कार्रवाई होगी। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि कानून तोड़ने वालों को भी सजा मिलनी चाहिए। 250 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। इस पर कोर्ट ने कहा कि सभी पक्षों के आरोपों की निष्पक्ष जांच होगी। कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में कहा- CJP का कहना है कि प्रदर्शनकारियों पर केस खत्म करने में हमें शर्तें मंजूर नहीं। सुप्रीम कोर्ट का राजनीतिक इस्तेमाल सरकार के फायदे के लिए नहीं होना चाहिए। पूरे देश के सामने एक गंभीर आश्वासन दिया गया था। उसका सम्मान किया जाना चाहिए। CJP प्रवक्ता सौरव दास ने कहा कि अगर प्रोटेस्ट में अपराधी खुले घूम रहे थे, तो दिल्ली पुलिस को उनके पुराने मामलों में जमानत रद्द कराने के लिए अदालत का रुख करना चाहिए। सरकार पुराने आरोपियों के बहाने का इस्तेमाल FIR जारी रखने के लिए नहीं कर सकती। अगर सरकार को इसकी छूट दी गई, तो वह निश्चित तौर पर इसका इस्तेमाल करेगी। सवाल-4: क्या जमानत पर चल रहे आरोपी प्रोटेस्ट में शामिल नहीं हो सकते?जवाब: अगर किसी मामले में कोई आरोपी है, तो इससे उसके किसी प्रोटेस्ट में शामिल होने का अधिकार नहीं छीना जा सकता। अभिव्यक्ति की आजादी के तहत उसे प्रोटेस्ट में शामिल होने का अधिकार है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता कहते हैं कि दिल्ली प्रोटेस्ट के मामले में एक पेच ये है कि आयोजकों ने शांतिपूर्ण प्रोटेस्ट की बात कही थी। उन्होंने प्रोटेस्ट के दौरान ये आरोप भी लगाया कि सत्तारूढ़ बीजेपी के इशारे पर अराजक तत्व शामिल हो गए हैं और प्रोटेस्ट को बदनाम करने की कोशिश में है। ऐसे में पुलिस ये जांच कर सकती है कि प्रोटेस्ट में शामिल लोग कौन थे, उनका इरादा प्रोटेस्ट का था या कोई गड़बड़ी करने का था। कानून में ये भी प्रावधान हैं कि अगर किसी व्यक्ति के शांति व्यवस्था बिगड़ने की आशंका हो, तो पुलिस उसे हिरासत में ले सकती है। पश्चिम बंगाल में तो इसके लिए हाल ही में ‘पब्लिक सेफ्टी और कंट्रोल ऑफ एंटी-सोशल एक्ट’ बनाया गया है। सवाल-5: दिल्ली में प्रदर्शनकारियों पर अब तक केस वापस क्यों नहीं लिए गए?जवाबः सामान्य तौर पर कोई मामला दर्ज हो जाए, तो पुलिस चार्जशीट में उसे खत्म कर सकती है, क्लोजर रिपोर्ट लगा सकती है या फिर सुनवाई के दौरान कोर्ट FIR रद्द करने के आदेश दे सकता है।दिल्ली पुलिस का कहना है कि उसे भी अब तक सरकार से कोई आदेश नहीं मिला है। आदेश मिलने पर पुलिस ने अपनी तरफ से जो मामले दर्ज किए हैं, उन्हें वापस लेने के लिए उपराज्यपाल से अनुरोध करेगी। उपराज्यपाल की मंजूरी के बाद पुलिस कोर्ट को इसकी सूचना देगी।कई पत्रकारों ने अपने ऊपर हमले के मामले में केस दर्ज करवाए हैं, वो इतनी आसानी से वापस नहीं होंगे। उसके लिए उनकी सहमति जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने घायल हुए पुलिसकर्मियों पर हमले के मामलों में भी जांच की बात कही है। बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर ने कहा है कि प्रदर्शन की आड़ में पुलिस पर हमला करने या वाहन जलाने वाले उपद्रवियों को किसी भी कीमत पर छोड़ा नहीं जाएगा। इधर सुप्रीम कोर्ट ने जांच के लिए SIT बनाने से पहले केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार को अपना पक्ष रखने का समय दिया है। महाराष्ट्र, बिहार, केरल, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिवों को भी नोटिस जारी करके अपना पक्ष रखने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 3 अगस्त को होगी। ऐसे में कॉकरोच पार्टी और सरकार के बीच ये तनातनी लंबी खिंच सकती है। सवाल-6: क्या कॉकरोच पार्टी दोबारा प्रदर्शन शुरू कर सकती है? जवाब: कॉकरोच पार्टी का प्रोटेस्ट NEET पेपर लीक को लेकर था। CJP का कहना है कि वो आगे भी स्टूडेंट्स के मुद्दे को लेकर एक्टिव रहेगी। इन मुद्दों पर उन्हें युवाओं का समर्थन मिल सकता है। छात्रों पर कोई कार्रवाई न हो, इसका निर्देश सुप्रीम कोर्ट दे ही चुका है। हालांकि प्रोटेस्ट में शामिल पुराने आरोपियों पर दर्ज FIR वापस लेने का मामला पेचीदा है। इस मुद्दे पर CJP दोबारा उतना समर्थन जुटा पाए, ये आसान नहीं है। पॉलिटिकल एनालिस्ट विजय त्रिवेदी कहते हैं, ‘कोई विवाद बातचीत की टेबल तक आ जाए, तो दोबारा उतना नहीं बढ़ता। CJP की कुछ मांगें मान ली गई हैं। आगे भी बातचीत से रास्ता निकलने की उम्मीद है। सरकार भी कोई ऐसा कदम नहीं उठाएगी, जिसे नए सिरे से उसका विरोध शुरू हो जाए।' ये खबर भी पढ़ें… आज का एक्सप्लेनर:क्या पॉलिटिकल पार्टी बनाएंगे 'कॉकरोच' या मूवमेंट जारी रखेंगे; अभिजीत दीपके का आगे का प्लान क्या, फ्यूचर के 3 सिनैरियो

दैनिक भास्कर 29 Jul 2026 6:12 pm

'पैलेट गन किसने चलवाई', प्रियंका के सवाल पर हंगामा:अखिलेश ने कहा- झुकती है सरकार, झुकाने वाला चाहिए; सत्तापक्ष-विपक्ष का हुआ आमना-सामना

करीब एक सप्ताहभर लगातार गतिरोध के बाद मंगलवार को लोकसभा में आखिरकार नीट पेपर लीक और लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 पर चर्चा शुरू हुई। हालांकि चर्चा के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखे आरोप-प्रत्यारोप, तंज और नोकझोंक का दौर चलता रहा। सुबह 11 बजे लोकसभा की कार्यवाही शुरू होते ही विपक्षी सांसदों ने आंदोलनकारी छात्रों पर कथित पुलिस कार्रवाई का मुद्दा उठाया। नारेबाजी के कारण सदन की कार्यवाही पहले दोपहर 2 बजे तक स्थगित करनी पड़ी। इससे पहले सरकार और विपक्ष के बीच चर्चा की अवधि को लेकर सहमति बनी। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि पहले छह घंटे की चर्चा तय हुई थी, फिर इसे 8 घंटे किया गया और यदि विपक्ष चाहे तो सरकार 10 घंटे तक चर्चा कराने को भी तैयार है। जितेंद्र सिंह ने बताया क्यों जरूरी है नया कानून दोपहर 2 बजे सदन की कार्यवाही शुरू होते ही प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह ने लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 पर चर्चा की शुरुआत की। उन्होंने कहा कि 2024 के कानून को और प्रभावी बनाने के लिए संशोधन लाया गया है ताकि संगठित परीक्षा माफिया पर तेजी से कार्रवाई हो सके। गौरव गोगोई ने पूछा- दो साल पहले वाला कानून क्यों फेल हुआ? सरकार की दलीलों का जवाब देते हुए कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने कहा कि 2024 में भी सरकार ने इसी तरह दावा किया था कि अब पेपर लीक नहीं होगा, लेकिन 2026 में फिर नीट परीक्षा लीक हो गई। उन्होंने कहा कि यदि पिछला कानून प्रभावी था तो नया संशोधन लाने की जरूरत क्यों पड़ी। गोगोई ने कहा कि 2024 के मामले में गिरफ्तार अधिकांश आरोपियों को जमानत मिल चुकी है और जिस व्यक्ति को मास्टरमाइंड बताया गया, वह लंबे समय तक फरार रहा। उन्होंने सरकार से पूछा कि राधाकृष्णन समिति की सिफारिशों का क्या हुआ और एनटीए की जवाबदेही तय क्यों नहीं की गई। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि शिक्षा व्यवस्था सुधारने के बजाय सरकार युवाओं की चिंताओं को हल्के में ले रही है। साथ ही पूर्व शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के संसद पहुंचने पर भाजपा सांसदों द्वारा किए गए स्वागत पर भी उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि उनका स्वागत ऐसे किया गया, जैसे वे ‘पाकिस्तान से युद्ध जीतकर लौटे हों।’ बांसुरी स्वराज ने कहा- यह बिल समय की जरूरत भाजपा सांसद बांसुरी स्वराज ने संशोधन विधेयक का समर्थन करते हुए कहा कि परीक्षा माफिया अब संगठित अपराध का रूप ले चुका है और मौजूदा कानून को अधिक कठोर बनाने की आवश्यकता थी। उन्होंने कहा कि संशोधन जांच एजेंसियों के अधिकार स्पष्ट करता है, जांच और ट्रायल को समयबद्ध बनाता है तथा परीक्षा प्रणाली में विश्वास बहाल करेगा। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल की सराहना करते हुए कहा कि सरकार ने समय रहते कानून को और मजबूत किया है। अखिलेश यादव का तंज- झुकती है सरकार... झुकाने वाला चाहिए समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि छात्रों के आंदोलन ने सरकार को झुकने पर मजबूर किया। उन्होंने कहा, सरकार झुकती है सरकार... झुकाने वाला चाहिए। उन्होंने दावा किया कि करोड़ों युवाओं के दबाव के कारण ही धर्मेंद्र प्रधान को पद छोड़ना पड़ा। अखिलेश ने सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि 2024 में भी ऐसा ही कानून लाया गया था, लेकिन उसके बावजूद पेपर लीक नहीं रुके। उन्होंने तंज करते हुए कहा, ‘जो लोग चढ़ावा नहीं बचा सके, वे पेपर लीक कैसे बचाएंगे?’ उन्होंने आरोप लगाया कि अनेक परीक्षाएं रद्द करनी पड़ीं और छात्रों को न्याय के लिए अदालतों का दरवाजा खटखटाना पड़ा। अभिषेक बनर्जी बोले- कानून बदलने से भरोसा नहीं लौटेगा तृणमूल कांग्रेस सांसद अभिषेक बनर्जी ने कहा कि निष्पक्ष परीक्षा हर छात्र का अधिकार है। उन्होंने आरोप लगाया कि जब भी व्यवस्था विफल होती है तो सरकार नई समिति या नया कानून लेकर आ जाती है, लेकिन जवाबदेही तय नहीं करती। उनके भाषण के दौरान सत्ता पक्ष के सांसदों ने आपत्ति जताई, जिससे सदन में कुछ देर के लिए फिर शोर-शराबा हुआ। प्रियंका गांधी ने पूछा- पैलेट गन चलाने का आदेश किसने दिया? चर्चा के दौरान कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने छात्रों पर हुई कथित पुलिस कार्रवाई का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि घायल छात्रा की मां ने उनसे पूछा कि उसकी बेटी पर यह अत्याचार क्यों हुआ। प्रियंका ने सरकार से सवाल किया, ‘देश के युवाओं पर पैलेट गन चलाने का आदेश किसने दिया? बच्चों पर लाठियां किसके आदेश पर चलाई गईं?’ उन्होंने कहा कि यह सवाल सिर्फ कांग्रेस नहीं बल्कि देश के छात्र, अभिभावक और शिक्षक पूछ रहे हैं। प्रियंका ने नए शिक्षा मंत्री की नियुक्ति पर टिप्पणी करते हुए बिलकिस बानो मामले का जिक्र किया। इस पर भाजपा सांसदों ने कड़ा विरोध किया और उनसे माफी मांगने की मांग की। संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने कहा कि किसी मंत्री पर इस तरह की व्यक्तिगत टिप्पणी उचित नहीं है और वरिष्ठ सांसद होने के नाते प्रियंका गांधी को जिम्मेदारी के साथ बोलना चाहिए। इसके बाद सदन में कुछ समय तक तीखी नोकझोंक होती रही। प्रियंका ने कहा प्रधानमंत्री कैमरे का नहीं, दिल का एंगल बदलें, तभी छात्रों की समस्या का समाधान होगा। राज्यसभा में भी हंगामा उधर, राज्यसभा की कार्यवाही भी सुबह 11 बजे शुरू हुई। शून्यकाल के दौरान विपक्षी सांसदों ने छात्रों पर पुलिस कार्रवाई और गृहमंत्री के बयान की मांग को लेकर हंगामा किया। लगातार शोर-शराबे के कारण सभापति सीपी राधाकृष्णन ने सदन की कार्यवाही पहले दोपहर 2 बजे तक स्थगित कर दी। दोबारा कार्यवाही शुरू होने पर उपसभापति हरिवंश ने सदन चलाने की कोशिश की, लेकिन हंगामा जारी रहने पर कार्यवाही अगले दिन सुबह 11 बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई। वीडियो देखने के लिए ऊपर थंबनेल पर क्लिक करें…

दैनिक भास्कर 28 Jul 2026 7:57 pm

आज का एक्सप्लेनर:ऑस्ट्रेलिया की गैराज में ऐसा क्या हुआ कि प्लास्टिक नोट लाने पड़े; जल्द आपके हाथों में भी होंगे, जानिए फायदे-नुकसान

भारत में 10 और 20 रुपए के प्लास्टिक नोट के फील्ड ट्रायल की मंजूरी मिल गई है। 3 हजार करोड़ रुपए कीमत के 200 करोड़ नोट जल्द लोगों की जेब में होंगे। ये बात 27 जुलाई को वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने लोकसभा में बताई। 2012 में मनमोहन सरकार ने भी 10 रुपए के प्लास्टिक नोट के ट्रायल की मंजूरी दी थी, लेकिन यह कभी जमीन पर नहीं आ सके। 2016-17 में ये प्रोजेक्ट ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। प्लास्टिक नोट हैं क्या, पुराना प्रोजेक्ट क्यों अटक गया था और भारत में इन्हें फिर लाने की कोशिश क्यों हो रही; समझेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सबसे पहले प्लास्टिक नोट की शुरुआत का रोचक किस्सा… साल 1966, ऑस्ट्रेलिया ने पाउंड करेंसी छोड़कर ऑस्ट्रेलियाई डॉलर लॉन्च किया। इसमें उस दौर के सारे एडवांस सेफ्टी फीचर मौजूद थे। इसके बावजूद कुछ ही महीनों में मार्केट में 10 डॉलर के नकली नोटों की बाढ़ आ गई। कोई असली-नकली में फर्क नहीं कर पा रहा था। इसके पीछे कोई बड़ा गिरोह नहीं, सिर्फ चार लोग थे- दुकानदार, आर्टिस्ट, फोटोग्राफर और एक टेलर। फोटोग्राफर ने असली नोट की फोटो खींची, आर्टिस्ट ने उसका वॉटरमार्क कॉपी किया और टेलर ने एक हफ्ते की प्रिंटिंग ट्रेनिंग ली। मेलबर्न शहर में दुकानदार के गैराज में नकली नोट छपने लगे। इस पूरे रैकेट को फंड कर रहा था रॉबर्ट किड नाम का एक क्रिमिनल। एक रोज दुकानदार की भाभी अनजाने में घर में पड़ा 10 डॉलर का नोट उठाकर चॉकलेट खरीदने गईं। सेल्सगर्ल को नोट का टेक्सचर अजीब लगा। उसने फौरन पुलिस को बता दिया और यहीं से पूरा गिरोह बेनकाब हुआ। सरकार हैरान थी कि इतनी आसानी से नोट कॉपी किया जा सकता है। 1968 में रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया के गवर्नर डॉ. हर्बर्ट कूंब्स ने देश के टॉप साइंटिस्ट्स को ऐसा नोट बनाने की चुनौती दी, जिसकी नकल न की जा सके। करीब २० साल की रिसर्च के बाद वैज्ञानिकों ने प्लास्टिक नोट तैयार किया, जिसकी कॉपी बनाना लगभग नामुमकिन था। जनवरी 1988 में ऑस्ट्रेलिया ने दुनिया का पहला प्लास्टिक नोट लॉन्च किया और आगे चलकर यह तकनीक 25 से ज्यादा देशों को एक्सपोर्ट भी की। सवाल-1: प्लास्टिक नोट है क्या और बनते कैसे हैं? जवाबः भारत में करेंसी नोट कागज से बनते हैं, लेकिन प्लास्टिक नोट एक खास और हाई क्वालिटी वाले प्लास्टिक से बनते हैं। ध्यान रहे, ये वो प्लास्टिक नहीं, जो घर के सामान में इस्तेमाल होता है। हर प्लास्टिक प्रोडक्ट अलग तरह के पॉलिमर से बनता है और नोट के लिए एक खास पॉलिमर इस्तेमाल होता है। इसे बाय-एक्सिअली ओरिएंटेड पॉलीप्रोपाइलीन, यानी BOPP कहते हैं, जो पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस से बनता है। ये आम प्लास्टिक से ज्यादा लचीला और मजबूत होता है। खिंचाव पड़ने पर इसका आकार नहीं बदलता। सवाल-2: भारत में प्लास्टिक नोट लाने की कोशिश कब से हो रही? जवाबः यह आइडिया 2009 में RBI ने दिया। 10 रुपए के 100 करोड़ नोट पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर छापने की योजना थी। प्लास्टिक नोट वाले प्रोजेक्ट के ठंडे बस्ते में जाने की कोई पुख्ता वजह नहीं मिलती। जानकार ३ वजहें बताते हैं- ATM पॉलिमर नोटों को ठीक से पहचान और डिस्पेंस नहीं कर पा रहे थे, नोट हैंडलिंग में दिक्तत आ रही थी और 2016 में हुई नोटबंदी। 17 साल बाद, 2026 में वही आइडिया लौटा है। इस बार बड़े स्केल पर। वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने बताया कि 10 रुपए के 100 करोड़ नोट और 20 रुपए के 100 करोड़ नोट लॉन्च होंगे। यानी कुल 3000 करोड़ वैल्यू के 200 करोड़ नोट। BRBNMPL ने प्लास्टिक नोट बनाने के लिए दुनिया भर की कंपनियों के प्रस्ताव भी मंगवाए हैं। भारत की पेपर करेंसी में करीब 25% 10 और 20 के नोट ही है। हालांकि कीमत के मामले में यह सिर्फ 1.3% है। सवाल-3: आखिर प्लास्टिक नोट के फायदे क्या हैं? जवाबः RBI की 3 बड़ी मौजूदा चुनौतियों का समाधान प्लास्टिक नोट कर सकती है… 1. कागजी नोट से 6 गुना ज्यादा तक लाइफ 2. छपाई की औसत लागत घटेगी 3. नकली नोटों पर लगाम लगेगी सवाल-4: प्लास्टिक नोट का क्या कोई नुकसान भी है? जवाबः सीधे तौर पर कोई बड़ा नुकसान तो नहीं है, लेकिन 3 चुनौतियां जरूर हैं…1. शुरुआती लागत ज्यादा 2. मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर बदलना पड़ेगा 3. प्लास्टिक नोट भी नकली बनाए जा रहे सवाल-5: क्या भारत में सभी नोट प्लास्टिक के हो जाएंगे, आगे क्या? जवाबः अभी सिर्फ 10 और 20 रुपए के 200 करोड़ नोट का फील्ड ट्रायल होना है। RBI ने पेपर नोट बंद कर प्लास्टिक पर शिफ्ट होने का कोई फैसला नहीं किया। हां, अगर ट्रायल सफल रहता है, तो आगे चलकर ₹50, ₹100, ₹200 और ₹500 के नोट भी प्लास्टिक में आ सकते हैं। लेकिन अभी ऐसी कोई घोषणा नहीं हुई है। पूरी तरह प्लास्टिक नोटों पर शिफ्ट होना कोई एक-दो साल का काम नहीं। ऑस्ट्रेलिया को भी अपनी पूरी करेंसी प्लास्टिक में बदलने में करीब 8 साल लगे थे। आज दुनिया के कुल कैश में सिर्फ 3% हिस्सा ही प्लास्टिक नोटों का है। ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, रोमानिया, कनाडा, वियतनाम और मालदीव जैसे गिने-चुने करीब 12 देश ही पूरी तरह प्लास्टिक करेंसी पर गए हैं, और उन्हें भी इसमें 5 से 8 साल का वक्त लगा। ------------- ये खबर भी पढ़िए… गुलाबी पेट्रोल, टैंक में चींटी के वीडियो वायरल; सरकार पेट्रोल में जबरन एथेनॉल मिलाने पर क्यों तुली है, पीछे की पूरी कहानी कहीं गुलाबी रंग का पेट्रोल, कहीं टैंक से चिपकी चीटियां, कहीं पेट्रोल के साथ दिखता पानी। सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियोज वायरल हैं और सभी के साथ एक ही नाम जुड़ा है- एथेनॉल। इन वीडियोज की असलियत संदिग्ध हो सकती है, लेकिन देश में एथेनॉल पर बहस बिल्कुल असली है। पूरी खबर पढ़िए…

दैनिक भास्कर 28 Jul 2026 6:20 pm

Mughal History: खुद बेहिसाब पीते थे, लेकिन दूसरों पर लगाते थे पाबंदी! जानिए बाबर से औरंगज़ेब तक मुगलों में शराबबंदी का रोचक इतिहास

मुगल इतिहास का एक दिलचस्प विरोधाभास यह रहा है कि अधिकांश मुगल बादशाह खुद जमकर जाम छलकाते थे और कई शहजादों तथा बादशाहों की जानलेवा बीमारियों व असामयिक मौत की वजह शराब और अफीम ही बनी। लेकिन इसके बावजूद, ये शासक शराब के सामाजिक और प्रशासनिक नुकसानों से भली-भांति वाकिफ थे। अपनी लत के बाद भी वे प्रजा को इससे दूर रखने की कोशिशें करते रहे। इसके पीछे लोगों की सेहत, कानून-व्यवस्था, सार्वजनिक अमन-चैन बनाए रखने और धार्मिक आदर्शों का हवाला दिया जाता था। खासकर त्योहारों पर शराब के नशे में होने वाले झगड़ों को रोकने के लिए समय-समय पर सख्त आदेश जारी किए गए, हालांकि व्यावहारिक रूप से ये बेअसर ही साबित हुए।जब खानवा के युद्ध से ठीक पहले बाबर ने की तौबाभारत में मुगल साम्राज्य की नींव रखने वाले बाबर ने अपनी आत्मकथा 'बाबरनामा' में शराब के प्रति अपने प्रेम और महफिलों का बेबाकी से जिक्र किया है। हालांकि, सन 1527 में खानवा के प्रसिद्ध युद्ध से पहले बाबर की सोच में बड़ा बदलाव आया। उसने हमेशा के लिए शराब छोड़ने का कड़ा फैसला लिया और शराब पीने के अपने तमाम कीमती पैमाने (जाम) तुड़वा दिए। इसके बाद उसने अपनी सेना और अफसरों से भी शराब त्यागने की अपील की। खुद उदाहरण पेश करने के कारण उसकी इस अपील ने सैनिकों के मनोबल को बढ़ाने और धार्मिक रूप से उन्हें एकजुट करने में टर्निंग पॉइंट की भूमिका निभाई।अकबर की नीति: 'थोड़ी पियो, लेकिन हर जगह नहीं'हुमायूं के शासनकाल में शराब से ज्यादा अफीम के सेवन का जिक्र मिलता है, लेकिन उसने शराबबंदी की कोई कोशिश नहीं की। उसके बाद सत्ता में आए अकबर को भी शराब से परहेज नहीं था, लेकिन वह संयम से काम लेता था। आइन-ए-अकबरी के अनुसार, अकबर सार्वजनिक नशाखोरी के सख्त खिलाफ था। उसने पूरे साम्राज्य में शराब पर पूरी पाबंदी लगाने के बजाय उसके प्रयोग पर सामाजिक नियंत्रण बनाने की नीति अपनाई। इसके तहत राजधानी में शराब की बिक्री को लाइसेंस प्रणाली के अधीन किया गया और दुकानें सीमित कर दी गईं। दरबार में पीकर आना सख्त मना था।शराबी जहांगीर के शुरुआती फरमानों में ही शामिल थी शराबबंदीमुगल काल में नशे के मामले में जहांगीर का नाम सबसे ऊपर आता है। उसकी अत्यधिक नशाखोरी के कारण ही शासन की असली कमान मल्लिका नूरजहां के हाथों में आ गई थी। अपनी आत्मकथा 'तुज़ुक-ए-जहांगीरी' में उसने खुद कबूल किया है कि वह 18 वर्ष की उम्र से रोजाना 20-20 प्याले शराब पी जाता था। बाद में डॉक्टरों की सलाह पर उसने शराब घटाकर अफीम का सहारा लिया। इसके बावजूद, गद्दी संभालते ही उसने जो 12 शाही फरमान जारी किए, उनमें नशीले पदार्थों के निर्माण और बिक्री पर रोक का आदेश शामिल था। हालांकि, इतिहासकारों के अनुसार जहांगीर का यह आदेश केवल एक नैतिक आदर्श बनकर रह गया और खुद उसकी जान शराब और अफीम की लत के कारण ही गई।शाहजहां: शराब के प्रति संयमित रवैयापिता जहांगीर की तुलना में शाहजहां शराब के मामले में काफी संयमित था। फ्रांसीसी यात्री फ्रांस्वा बर्नियर और इतालवी यात्री निकोलाओ मनूच्ची के यात्रा वृत्तांतों के अनुसार, शाहजहां शराब का गुलाम नहीं था और केवल कभी-कभी ही सीमित मात्रा में पीता था। उसने अपने पिता की तरह कोई औपचारिक शराबबंदी का आदेश जारी नहीं किया और न ही अपने बेटे औरंगज़ेब की तरह कट्टर धार्मिक नीतियां अपनाईं। उसके शासन में दरबार में विदेशी व्यापारियों के लिए शराब उपलब्ध रहती थी, हालांकि सार्वजनिक रूप से खुलेआम नशाखोरी को बढ़ावा नहीं दिया जाता था।औरंगज़ेब की शराबबंदी: जब काजी ही निकला गुप्त पक्कड़अपने पूर्वजों के बिल्कुल उलट औरंगज़ेब हर तरह के नशे से दूर रहता था। 1658 में सत्ता में आने के बाद उसने साम्राज्य में शराब, भांग और अन्य नशों की बिक्री व उत्पादन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के फरमान जारी किए। उसने मुहतसिब (नैतिक निरीक्षक) तैनात किए, जो जुए और शराब की बिक्री पर कड़ी नजर रखते थे। इसके बावजूद, बुतपरस्त और मुस्लिम आबादी वाले इस विशाल साम्राज्य में गुप्त रूप से देसी शराब की भट्टियां चलती रहीं और शराब बिकती रही।साम्राज्य के बड़े-बड़े अमीर और वजीर (जैसे असद खान) हर रोज शराब की तलब में रहते थे। अपनी इस विफलता और अफसरों की लत से झुंझलाकर औरंगज़ेब ने एक बार कहा था, हिंदुस्तान में बस दो ही लोग शराब से तौबा किए हुए हैं– एक मैं खुद और दूसरा क़ाज़ी-ए-मुमालिक अब्दुल वाहब। हालांकि, बादशाह की यह धारणा भी गलत साबित हुई। इतालवी यात्री निकोलाओ मनूच्ची के अनुसार, वह खुद काजी अब्दुल वाहब को गुप्त रूप से सस्ती शराब की बोतलें भेजा करता था, जिसे काजी इतनी राजदारी से पीता था कि बादशाह को कभी इसकी भनक तक नहीं लगी।

न्यूज़ इंडिया लाइव 28 Jul 2026 8:33 am

बुरा मत मानिए, आईना हमेशा सुंदर नहीं होता…

NEET paper leak protest: आज जिस पीढ़ी को जेन-जी कहकर या तो खारिज किया जा रहा है, या फिर उसकी भाषा, उसके मीम्स और उसके जार्गन पर नैतिकता का पहरा बैठाया जा रहा है, शायद उसे समझने की सबसे कम कोशिश की गई है। उसकी भाषा में तल्खी है। गुस्सा है। व्यंग्य है। खिलंदड़पन है। लेकिन उससे भी ज़्यादा उसमें सवाल पूछने की हिम्मत है। यही बात असहज करती है। कई लोग जंतर-मंतर पर जुटे छात्रों के लोकतांत्रिक प्रतिरोध को केवल नीट परीक्षा में कथित धांधली और पेपर लीक के खिलाफ उपजा क्षणिक आक्रोश मान रहे हैं। यह विश्लेषण अधूरा है। हर पीढ़ी का अपना एक निर्णायक क्षण होता है। 1974 में बिहार छात्र आंदोलन, 1990 में मंडल आंदोलन, 2011 में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और 2012 में निर्भया आंदोलन—इन सबने युवाओं की राजनीतिक चेतना को नए रूप दिए। आज की पीढ़ी के लिए शिक्षा, रोजगार, परीक्षा प्रणाली, डिजिटल निगरानी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संस्थाओं की विश्वसनीयता एक-दूसरे से अलग मुद्दे नहीं हैं। वे इन्हें एक ही लोकतांत्रिक प्रश्न के अलग-अलग अध्याय मानते हैं। इस पीढ़ी का सबसे बड़ा अपराध शायद यह है कि इसने आंख मूंदकर भरोसा करना छोड़ दिया है। राजनीति में भक्ति या व्यक्तिपूजा अंततः पतन और तानाशाही का मार्ग बन सकती है। — डॉ. भीमराव अंबेडकर, संविधान सभा का अंतिम भाषण (25 नवम्बर 1949)। यह किसी राजनीतिक दल, किसी वैचारिक खेमे या किसी स्थापित चेहरे को अंतिम सत्य नहीं मानती। यह हर दावे का स्क्रीनशॉट मांगती है, हर बयान का फैक्ट-चेक करती है और हर सत्ता से जवाब चाहती है। उसका निष्कर्ष सही होगा या गलत, इसका फैसला इतिहास करेगा। लेकिन एक बात तय है—उसने अपना दिमाग किराए पर नहीं दिया है। यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। जेन-जी की भाषा पर सबसे अधिक आपत्ति की जाती है। कहा जाता है कि यह असभ्य है, आक्रामक है और मर्यादाहीन है। लेकिन यह बहस तब अधूरी हो जाती है जब भाषा की मर्यादा केवल नागरिकों से अपेक्षित हो और सत्ता से नहीं। आईना अगर चुभ रहा है, तो शायद चेहरा देखने का समय आ गया है जिस देश में संसद के भीतर दिए गए भाषणों के हिस्सों को असंसदीय मानकर कार्यवाही से हटाना पड़ता हो; जिस देश में अनेक जनप्रतिनिधि और मुख्यमंत्री सार्वजनिक मंचों या कैमरे पर अपशब्द बोलते रिकॉर्ड हो चुके हों; जिस देश में राजनीतिक संवाद का स्तर वर्षों से लगातार गिरा हो—वहां भाषायी शुचिता का नैतिक बोझ केवल युवाओं के कंधों पर डाल देना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। मर्यादा यदि मूल्य है, तो वह सबके लिए समान होनी चाहिए लोकतंत्र में भाषा केवल शिष्टाचार का विषय नहीं होती; वह सत्ता और समाज के रिश्ते का भी दर्पण होती है। जब संवाद सम्मानजनक होगा, तो प्रतिरोध भी अधिक सभ्य होगा। लेकिन यदि सार्वजनिक विमर्श लगातार कटु, व्यक्तिगत और अपमानजनक होता जाएगा, तो उसकी प्रतिध्वनि समाज में भी सुनाई देगी। युवा उसी समाज की उपज हैं, किसी दूसरी पृथ्वी के निवासी नहीं। यह भी समझना होगा कि जेन-जी की व्यंग्यात्मक भाषा केवल मनोरंजन नहीं है। मीम, तंज, वायरल वीडियो और नए जार्गन आज के दौर की राजनीतिक अभिव्यक्ति के सबसे प्रभावशाली औज़ार बन चुके हैं। जिस तरह 2014 के बाद भारतीय राजनीति में टेलीविज़न, अखबारों के फ्रंट पेज विज्ञापनों, सोशल मीडिया अभियानों और विशेष रूप से व्हाट्सऐप नेटवर्क के ज़रिए राजनीतिक नैरेटिव गढ़े गए और जनमत को प्रभावित करने का अभूतपूर्व प्रयास हुआ, उसी डिजिटल पारिस्थितिकी को आज जेन-जी ने अपने प्रतिरोध की भाषा बना लिया है। पहले जो काम पोस्टर, पैम्फलेट और नुक्कड़ नाटक करते थे, वही काम आज 30 सेकंड का वीडियो, एक मीम या एक व्यंग्यात्मक वाक्य कर रहा है। माध्यम बदल गया है, लेकिन लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का अधिकार नहीं। सवाल यह नहीं है कि हमें जेन-जी की हर बात पसंद है या नहीं। सवाल यह है कि क्या हम उसकी बात सुनने को तैयार हैं? हर नई पीढ़ी अपने समय की भाषा लेकर आती है। पहले उसे उद्दंड कहा जाता है, फिर उसे खतरनाक बताया जाता है और अंततः वही भाषा समाज का हिस्सा बन जाती है। इतिहास इसका गवाह है। इसलिए, जेन-जी से असहमति रखिए। उसकी भाषा की आलोचना कीजिए। उसे बेहतर तर्क देना सिखाइए। लेकिन उसके सवालों से मत भागिए। क्योंकि लोकतंत्र की असली परीक्षा यह नहीं होती कि सत्ता कितनी शक्तिशाली है। असली परीक्षा यह होती है कि सवाल पूछने वाला युवा कितना निडर है—और जवाब देने वाली व्यवस्था कितनी ईमानदार।

वेब दुनिया 28 Jul 2026 7:33 am