आंध्र प्रदेश के CM चंद्रबाबू नायडू ने 16 मई को कहा, 'राज्य में तीसरे बच्चे के जन्म पर परिवार को 30 हजार रुपए और चौथे के जन्म पर 40 हजार रुपए दिए जाएंगे। एक समय मैंने जनसंख्या कंट्रोल करने के लिए बहुत मेहनत की थी, लेकिन अब जन्म दर बढ़ाने की जरूरत है।' आखिर आंध्र प्रदेश सरकार क्यों चाहती है कि लोग ज्यादा बच्चे पैदा करें, क्या पैसे देने से जन्म दर बढ़ जाएगी और भारत जैसे सबसे बड़ी आबादी वाले देश में ये कितना सही; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: आंध्र प्रदेश में बच्चे पैदा होने पर पैसा मिलने की नई पॉलिसी क्या है? जवाब: 16 मई को CM नायडू ने श्रीकाकुलम जिले में एक जनसभा के दौरान बच्चे पैदा करने पर पैसे देने की योजना की घोषणा करते हुए कहा, 'बच्चों को बोझ नहीं, बल्कि देश की संपत्ति के रूप में देखा जाना चाहिए। जनसंख्या ही भविष्य की असली दौलत है। जापान और साउथ कोरिया जैसे देशों में घटती आबादी और बुजुर्ग होती जनसंख्या का इकोनॉमी पर बुरा असर पड़ा है। इसीलिए मैं लंबे समय से जनसंख्या बढ़ाने पर जोर दे रहा हूं।’ दरअसल, आंध्र प्रदेश सरकार ने 5 मार्च को विधानसभा में एक नई पॉलिसी पेश की थी। इसे 'जनसंख्या प्रबंधन नीति' कहा गया। इसमें प्रस्ताव दिया था कि दूसरा बच्चा पैदा होने पर परिवार को 25 हजार रुपए मिलेंगे। अब तीसरे और चौथे बच्चे के पैदा होने पर पैसे की घोषणा को इसी नीति का विस्तार बताया जा रहा है। यानी अब 4 बच्चे पैदा होने पर कुल 95 हजार रुपए मिलेंगे। नायडू ने अप्रैल 2025 में भी महिलाओं से ज्यादा बच्चों को जन्म देने की अपील की थी। साथ ही घोषणा की थी कि सरकारी महिला कर्मचारियों के बच्चों की संख्या चाहे जितनी हो, हर बच्चे पर 26 हफ्ते यानी 6 महीने की मैटरनिटी लीव मिलेगी।’ इसके पहले तक 6 महीने का मातृत्व अवकाश सिर्फ पहले दो बच्चों पर मिलता था। दो से ज्यादा होने पर 3 महीने की छुट्टी का नियम था। नायडू सरकार की जनसंख्या प्रबंधन नीति के मुताबिक, 2 से ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले परिवारों को पैसे के अलावा कई दूसरी सुविधाएं भी मिलेंगी… आंध्र प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सत्य कुमार ने बताया कि 'सहायता राशि देने का मकसद प्रेग्नेंसी के दौरान हेल्थ फैसिलिटी, बच्चे की देखभाल और डिलीवरी के बाद कामकाजी महिलाओं को नौकरी या काम करने में मदद करना है। इसके अलावा नायडू सरकार मौजूदा 'तल्लीकी वंदनम योजना' के विस्तार का भी प्लान बना रही है, जिसके तहत अभी स्कूल जाने वाले बच्चों की मांओं को हर साल 15 हजार रुपए दिए जाते हैं। सवाल-2: नायडू सरकार क्यों चाहती है कि लोग ज्यादा बच्चे पैदा करें? जवाब: CM नायडू के इस फैसले के पीछे आंध्र प्रदेश की आबादी से जुड़े तीन फैक्टर हैं… 1. बच्चे पैदा होने की दर 3 दशकों में आधी हुई 2. महिलाओं की प्रजनन क्षमता कम हुई 3. राज्य के लोगों की औसत आयु देश से 4 साल कम सवाल-3: क्या नायडू के इस फैसले के पीछे कोई राजनीतिक वजह? जवाब: नायडू के इस फैसले को देश में संभावित लोकसभा सीटों के नए परिसीमन से भी जोड़कर देखा जा रहा है। दरअसल, केंद्र सरकार अप्रैल 2026 में परिसीमन बिल, 2026 ला चुकी है। हालांकि ये पास नहीं हो पाया था। तब गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में कहा था कि सभी राज्यों की लोकसभा में कुल सीटें 543 से बढ़कर 850 हो जाएंगी। राज्यों में कुल सीटों में 50% की आनुपातिक बढ़ोत्तरी होगी। यानी जिस राज्य में जितनी सीटें हैं, उससे करीब डेढ़ गुना सीटें हो जाएंगी। हालांकि ये बात किसी बिल में नहीं थी। वहीं दक्षिणी राज्यों ने परिवार नियोजन अपनाकर आबादी काबू में रखी है। उत्तरी राज्यों के मुकाबले इनकी आबादी कम है। इसलिए इन राज्यों को डर है कि जनगणना के आधार पर परिसीमन होने से लोकसभा में उनकी सीटें उत्तरी राज्यों के मुकाबले कम हो जाएंगी। क्योंकि 1976 और 2001 में भी परिसीमन इसीलिए टाला गया था, क्योंकि उत्तर और दक्षिण की जनसंख्या में बड़ा अंतर था। 2011 की जनगणना के मुताबिक, हिंदीभाषी राज्यों की औसत जनसंख्या वृद्धि दर 21.6%, जबकि दक्षिण भारतीय राज्यों में ये आंकड़ा 12.1% है। दिलचस्प बात ये है कि जब केंद्र सरकार परिसीमन बिल लाई, तो नायडू ने इसका समर्थन किया। क्योंकि वो केंद्र सरकार में बीजेपी के साथ साझेदार हैं। जबकि तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन, तेलंगाना के सीएम रेवंत रेड्डी और कर्नाटक के सीएम सिद्धारमैया इसका विरोध किया था। केंद्र सरकार में शामिल होने के कारण नायडू की पार्टी टीडीपी ने परिसीमन बिल के समर्थन में वोट दिया, लेकिन नायडू राज्य की घटती जन्म दर को लेकर चिंता जताते रहे हैं… इसके अलावा बीते महीने ही अमरावती आंध्र प्रदेश की आधिकारिक राजधानी बन गई है। नायडू अमरावती को मेगा सिटी बनाने के लिए यहां आबादी बढ़ाना चाहते हैं। ये उनका ड्रीम प्रोजेक्ट है। दरअसल, 2014 में आंध्र प्रदेश से अलग हुए तेलंगाना को बतौर राजधानी हैदराबाद मिल गया। तब नायडू की सरकार ने विजयवाड़ा के पास कृष्णा नदी के किनारे एक नई राजधानी बनाने का फैसला किया और इसका नाम रखा- अमरावती। इसमें 2050 तक 35 लाख लोगों को बसाने का टारगेट है। 2024 में टीडीपी के दोबारा सत्ता में आने के बाद अमरावती प्रोजेक्ट तेज हुआ है। सेंटर फॉर इकोनॉमिक्स एंड सोशल स्टडीज, हैदराबाद के रिटायर्ड प्रोफेसर डॉ. चिगुरुपाटी रामचंद्रैया कहते हैं, ‘नायडू की राज्य की जनसंख्या बढ़ाने की चिंता का संबंध उनके अमरावती को मेगासिटी बनाने के प्रोजेक्ट से प्रेरित है।' हालांकि डॉ. रामचंद्रैया कहते हैं कि अमरावती की आबादी तेजी से बढ़ना आसान नहीं है। क्योंकि अमरावती जिन दो जिलों- गुंटूर और कृष्णा में बसा है, वहां जनसंख्या वृद्धि दर दो दशकों में तेजी से घटी है। अभी अमरावती शहर की आबादी सिर्फ 2.7 लाख है। पूरे कैपिटल रीजन की आबादी 58.1 लाख है। सिंगापुर के सलाहकारों का अनुमान है कि ये आबादी 20 साल में 1.01 करोड़ तक पहुंच जाएगी। इतनी बढ़ोत्तरी होना बेहद मुश्किल है। सवाल-4: क्या पैसे देकर जन्म दर बढ़ाई जा सकती है? जवाब: भारत में प्रजनन दर बढ़ाने के लिए परिवारों को सीधे कैश बांटने की स्कीम पहली बार आंध्र प्रदेश में ही लाई गई है। हालांकि, दुनिया के कई देशों में ऐसे एक्सपेरिमेंट्स किए जा चुके हैं… 1. दक्षिण कोरिया: 26 हजार करोड़ खर्च, नतीजा उल्टा 2. हंगरी: GDP का 6% खर्च, फिर भी ज्यादा असर नहीं 3. सिंगापुर: पहले बच्चे के जन्म पर 8 लाख रुपए से ज्यादा बांटे अमेरिका के विल्सन मेटरनल हेल्थ सेंटर की डायरेक्टर सारा बार्न्स के मुताबिक, 'अगर सरकारें महिलाओं की शिक्षा, नौकरी और काम के अवसर करें, तो उसका असर सिर्फ 'ज्यादा बच्चे पैदा करो' जैसी नीतियों से ज्यादा अच्छा होगा। दिसंबर 2024 में नीदरलैंड्स में हुई एक रिसर्च के मुताबिक, 'जब सरकार बच्चे पैदा करने पर आर्थिक मदद देती है, तो ज्यादातर लोग दोबारा बच्चे पैदा करने का फैसला नहीं करते, बल्कि जो लोग बच्चा चाहते थे, वे सिर्फ थोड़ा जल्दी बच्चा प्लान कर लेते हैं। इससे कुछ समय के लिए TFR बढ़ाता है, लेकिन लंबे समय में कोई खास फर्क नहीं पड़ता।’ सवाल-5: आबादी बढ़ाने के लिए नकद स्कीम का देश पर क्या असर होगा? जवाब: भारत दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है। अप्रैल 2024 में इसने 141.26 करोड़ की आबादी वाले चीन को पीछे छोड़ दिया था। संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी संस्था UNFPA के मुताबिक, अप्रैल 2025 तक भारत की जनसंख्या 146.39 करोड़ थी। रियल टाइम डेटा वेबसाइट वर्ल्डोमीटर के मुताबिक, मौजूदा समय में ये आंकड़ा 147 करोड़ से ज्यादा है। इसमें से करीब 68% आबादी युवा है। भारत में UNFPA की प्रतिनिधि एंड्रिया एम. वोजनार के मुताबिक, ‘यहां बेहतर शिक्षा और मेटरनिटी हेल्थ केयर की मदद से प्रजनन दर कम करने में सफलता पाई है। 1970 में पांच बच्चे प्रति महिला से भारत आज लगभग दो बच्चे प्रति महिला पर खड़ा है।’ आंध्र प्रदेश में हर साल करीब 6.7 लाख बच्चे जन्म लेते हैं। जनसंख्या बढ़ने से पानी, घर और मेडिकल फैसिलिटीज जैसे संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है। इसके अलावा अभी राज्य के वर्कफोर्स में कामकाजी महिलाओं की हिस्सेदारी सिर्फ 31% हैं। ये हिस्सेदारी और घट सकती है। इस स्कीम को दूसरे दक्षिणी राज्य भी लागू कर सकते हैं। इससे देश की जनसंख्या और बढ़ सकती है, जिससे सरकार को योजनाओं पर ज्यादा खर्च करना पड़ेगा। ******* रिसर्च- प्रथमेश व्यास ---------------------------------------- ये खबर भी पढ़ें… शराब दुकानें बंद, 200 यूनिट बिजली फ्री, गोल्ड चेन भी देंगे; फिल्मी हीरो जैसे फैसले ले रहे CM विजय, कितना महंगा पड़ेगा CM बनते ही थलापति विजय किसी फिल्मी नायक की तरह फैसले ले रहे हैं। 48 घंटे में ही 700 से ज्यादा शराब की दुकानें बंद कराने का आदेश दिया। शपथ के मंच से ही 200 यूनिट फ्री बिजली का ऐलान कर दिया था। सोने की चेन, अंगूठी और कैश देने का भी वादा किया है। पढ़ें पूरी खबर…
होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों के लिए नया ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम लागू करेगा ईरान, बताया पूरा प्लान
ईरानी सांसद इब्राहिम अजीजी ने बताया कि नया सिस्टम जहाजों की आवाजाही को नियंत्रित करने के लिए तैयार किया जा रहा है। इसके तहत जहाजों के लिए निश्चित समुद्री रास्ते तय किए जाएंगे और सुरक्षा तथा नेविगेशन सेवाओं के लिए शुल्क वसूला जाएगा।
सिंधु जल संधि पर भारत का सख्त रुख, हेग कोर्ट के फैसले को बताया अवैध, जानें क्या है मामला
नई दिल्ली, आइएएनएस: : Hague Court Verdict: भारत ने सिंधु जल संधि से जुड़े मामले में हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (पीसीए) के ताजा फैसले को पूरी तरह खारिज कर दिया है। केंद्र सरकार ने साफ कहा है कि यह तथाकथित मध्यस्थता न्यायालय “अवैध रूप से गठित” किया गया था और उसके सभी फैसले भारत के लिए अमान्य हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि 15 मई को जारी फैसला अधिकतम जल संचयन से संबंधित है और यह पहले दिए गए फैसले का पूरक मात्र है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत इस निर्णय को उसी तरह अस्वीकार करता है, जैसे वह पहले के सभी फैसलों को खारिज करता आया है। “भारत ने कभी नहीं दी मान्यता” विदेश मंत्रालय ने दो टूक शब्दों में कहा कि भारत ने इस मध्यस्थता न्यायालय को कभी मान्यता नहीं दी। प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “इस तथाकथित मध्यस्थता न्यायालय द्वारा जारी कोई भी कार्यवाही, आदेश या फैसला भारत के लिए मान्य नहीं है।” भारत का कहना है कि जिस तरीके से यह न्यायाधिकरण गठित किया गया, वह स्वयं सिंधु जल संधि की मूल भावना और प्रक्रिया के खिलाफ है। नई दिल्ली लगातार यह दावा करती रही है कि पाकिस्तान ने संधि के प्रावधानों का गलत इस्तेमाल करते हुए इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया। सिंधु जल संधि पर रोक जारी रहेगी भारत ने इस अवसर पर यह भी दोहराया कि सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का फैसला अभी भी लागू है। केंद्र सरकार का कहना है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को विश्वसनीय और पूरी तरह बंद नहीं करता, तब तक संधि पर रोक जारी रहेगी। विदेश मंत्रालय के अनुसार भारत की प्राथमिकता अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिकों की सुरक्षा है। सरकार का मानना है कि आतंकवाद और द्विपक्षीय सहयोग साथ-साथ नहीं चल सकते। क्या है सिंधु जल संधि? भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि पर वर्ष 1960 में हस्ताक्षर हुए थे। विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई इस संधि के तहत सिंधु नदी प्रणाली के जल का बंटवारा दोनों देशों के बीच तय किया गया था। इस समझौते के अनुसार पूर्वी नदियों रावी, ब्यास और सतलुज का नियंत्रण भारत को मिला, जबकि पश्चिमी नदियों सिंधु, झेलम और चिनाब के अधिकांश जल उपयोग का अधिकार पाकिस्तान को दिया गया। दशकों तक यह संधि दोनों देशों के बीच जारी तनाव के बावजूद लागू रही और इसे दुनिया के सबसे सफल जल समझौतों में गिना जाता रहा है। किशनगंगा और रैटल परियोजनाओं पर विवाद हाल के वर्षों में पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर में भारत की किशनगंगा और रैटल जलविद्युत परियोजनाओं पर आपत्ति जताई थी। पाकिस्तान का आरोप है कि इन परियोजनाओं से सिंधु जल संधि के प्रावधान प्रभावित हो रहे हैं। इसी विवाद को लेकर मामला स्थायी मध्यस्थता न्यायालय तक पहुंचा। हालांकि भारत लगातार कहता रहा है कि इस विवाद के समाधान के लिए संधि में पहले से तय प्रक्रिया मौजूद है और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायालय का गठन उचित नहीं था। भारत का यह भी कहना है कि पाकिस्तान ने तकनीकी मुद्दों को राजनीतिक रंग देकर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने की कोशिश की है। पाकिस्तान पर लगाया ध्यान भटकाने का आरोप विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय मंचों का दुरुपयोग करने का आरोप लगाया। भारत का कहना है कि पाकिस्तान बार-बार ऐसे मुद्दों को उठाकर सीमा पार आतंकवाद जैसे गंभीर मामलों से वैश्विक ध्यान हटाने की कोशिश करता है। सरकार के अनुसार पाकिस्तान की नीति लंबे समय से भारत विरोधी प्रचार और कूटनीतिक दबाव बनाने पर केंद्रित रही है, जबकि भारत ने हमेशा द्विपक्षीय बातचीत और कानूनी प्रक्रियाओं के जरिए समाधान का समर्थन किया है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद बदला रुख पिछले वर्ष हुए पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ कई कड़े कदम उठाए थे। इसी दौरान सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का निर्णय भी लिया गया था। भारत ने उस समय स्पष्ट किया था कि आतंकवाद को समर्थन देने वाले देश के साथ सामान्य सहयोग जारी रखना संभव नहीं है। सरकार का मानना है कि पाकिस्तान को पहले आतंकवाद के खिलाफ ठोस और विश्वसनीय कार्रवाई करनी होगी।
अमेरिका ने पोलैंड में 4,000 सैनिकों की तैनाती रोकी
अमेरिका ने यूरोप में सैन्य पुनर्गठन के तहत पोलैंड में 4,000 सैनिकों की तैनाती रद्द कर दी है. इस फैसले पर सहयोगियों और अमेरिकी नेताओं ने चिंता जताई, जबकि जर्मनी से सैनिक हटाने की प्रक्रिया भी जारी है
यूरोप की सबसे बड़ी कंपनी एएसएमएल से टाटा की डील
एएसएमएल और टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स के बीच हुए समझौते से भारत में सेमीकंडक्टर उत्पादन को बड़ा बढ़ावा मिलेगा. प्रधानमंत्री मोदी की नीदरलैंड्स यात्रा के दौरान हुए इस करार से तकनीक, निवेश और रोजगार के नए अवसर खुलने की उम्मीद है
भारत-नीदरलैंड रणनीतिक साझेदारी: पीएम मोदी और पीएम जेटन का संयुक्त बयान
नीदरलैंड के प्रधानमंत्री रॉब जेटन के निमंत्रण पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार को यहां पहुंचे। शनिवार को नीदरलैंड के प्रधानमंत्री और किंग विलेम अलेक्जेंडर और क्वीन मैक्सिमा से मुलाकात की
एक बार मैं नहर किनारे बैठा था। पानी में एक पॉलिथीन तैरती दिखी। मुझे लगा नारियल होगा, ऐसे ही पॉलिथीन में नारियल बहकर आते थे। मैंने तुरंत पानी में छलांग लगा दी और पॉलिथीन खींचकर किनारे ले आया। पॉलिथीन बहुत भारी थी। जैसे ही उसे खोला, मेरी सांसें अटक गईं। अंदर दो कटे हुए हाथ थे। जो पूरी तरह सड़ चुके थे। कुछ पल के लिए शरीर सुन्न पड़ गया। हाथ से पॉलिथीन छूट गई। धीरे-धीरे नहर से उस लाश के कई हिस्से निकले। वह एक बूढ़े की लाश थी। पुलिस आई तो पता चला कि महज डेढ़ लाख रुपए के लिए उसके भाइयों ने ही उसे मारकर, काटकर नहर में फेंक दिया था। लाश के टुकड़े देखने के बाद मैं कई दिन तक सो नहीं पाया। अब जब भी पानी में कोई पॉलिथीन दिखती तो लगता है वही लाश होगी। मैं गोताखोर परगट सिंह। हरियाणा के कुरुक्षेत्र के छोटे से गांव दबखेड़ी का रहने वाला हूं। 40 साल का हूं। पिछले 18 सालों में 20 हजार से ज्यादा लाशें नहरों से निकाल चुका हूं। इनमें से ज्यादातर लाशें गल चुकी थीं। जब उनका अंतिम संस्कार हुआ तो मांस, हड्डी से एकदम अलग हो चुका था। 16 साल का था, जब नहर से पहली बार लाश निकाली थी। एक दिन की बात है। मैंने नहर से नारियल निकाला और किनारे बैठकर खा रहा था। तभी 20 साल की लड़की की लाश बहती हुई आई। पीछे-पीछे उसका परिवार भी रोते हुए आ गया। ये लोग पंजाब के देवीगढ़ के रहने वाले थे। वे लोहे की रॉड और डंडों से लाश को बाहर निकालने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन निकाल नहीं पा रहे थे। फिर मुझसे गुजारिश करने लगे कि शव को किनारे लगा दो। मैं फौरन नहर में कूद गया और लाश के कपड़े पकड़कर किनारे ले आया। परिवार ने बहुत शुक्रिया किया। उसके बाद पुलिस पहुंची। अगले दिन पुलिस के साथ अखबार में मेरी फोटो छपी, यहीं से जिंदगी बदल गई। गांव में खबर फैल गई कि आज अखबार में परगट की फोटो छपी है। तब से नहर से लाशें निकालने का सिलसिला ऐसे ही चलता रहा। न जाने कितनी बार अखबार में मेरी फोटो छपी। अब मोबाइल का जमाना है। सोशल मीडिया पर मेरे वीडियो वायरल होने लगे हैं। दरअसल, जिस परिवार की लाश निकालता वही लोग मेरा नंबर अपने परिचितों को दे देते। धीरे-धीरे ये सिलसिला बढ़ता गया। आप जिस नहर को देख रही हैं, यह हमारे यहां की नरवाना ब्रांच नहर है। इसी में पंजाब की तरफ से सबसे ज्यादा लाशें बहकर आती हैं। यह भाखड़ा मेन लाइन की शाखा है। यह पंजाब के राजपुरा से शुरू होकर हरियाणा से होते हुए दिल्ली तक जाती है। इसका पानी जितना शांत दिखाई देता है, उतना है नहीं। बचपन में जब नहर में नहाने आता था, तब सोचा नहीं था कि एक दिन इसी नहर से सड़ी-गली लाशें निकालूंगा। पढ़ाई में मन नहीं लगता था। 8वीं में फेल हो गया। तब गुस्से में पिताजी ने पढ़ाई भी छुड़वा दी। धीरे-धीरे गोताखोर बन गया। अब तो गहरे पानी और तेज रफ्तार वाली नहरों से लाशें निकालने देशभर में जाता हूं। तैराकी तो आसान है। वह मजे के लिए होती है, जबकि गोताखोरी बहुत मुश्किल। शुरुआत में तो उन लाशों को निकालता था, जो पानी के ऊपर तैर रही होती थीं। फिर यूट्यूब से गोताखोरी सीखी। हालांकि, पेशेवर गोताखोरी सीखने के बाद भी पानी के अंदर से लाशें नहीं निकाल पाता था; लेकिन नहर की तलहटी से कीमती सामान-जैसे बाइक, गाड़ियां, सिलेंडर, चश्मे, मोबाइल और गहने, निकालना सीख लिया था। फिर धीरे-धीरे, पानी से लाशें निकालना भी शुरू कर दिया। अब जब नहर में 40 फीट नीचे सिलेंडर लगाकर जाता हूं तो दिमाग में दो बातें होती हैं। एक वह जो नहर किनारे खड़ा बेसब्री से मेरा इंतजार कर रहा होता है। दूसरा कि कहीं इतने गहरे पानी में ही न मर जाऊं कि लोग मेरी लाश ढूंढे़ं। उत्तर प्रदेश का एक किस्सा है। जब रुड़की नहर में एक 14 साल के बच्चे की लाश ढूंढ़ रहा था। नहर में 15 फीट नीचे गया था। शरीर में बंधी रस्सी एक पेड़ में फंस गई और सांस लेने के लिए मुंह पर लगी पाइप निकल गई। मुझे लगा कि अब नहीं बचूंगा। छटपटा रहा था। मेरे सहयोगी ने बड़ी मुश्किल से मुझे बाहर निकाला। 20 मिनट तक ठीक से सांस नहीं ले सका, फिर वही काम करने लगा। कई बार तो मगरमच्छों वाली नहर में भी गोते लगाए हैं। गोताखोरी के दौरान मौत की दर्दनाक कहानियां सामने आईं। पलभर के गुस्से में आकर लोग बिना सोचे नहर में छलांग लगा देते हैं। पीछे से उनके परिवार वाले चार-चार, पांच-पांच दिन तक गर्मी में, सर्दी में नहर किनारे लाश खोजते हैं। जब तक लाश नहीं मिलती है वे खाना तक नहीं खाते। चार दिन पहले की बात है। हरियाणा के कुरुक्षेत्र के झांसा गांव के पास सतलुज-यमुना लिंक नहर के किनारे एक लावारिस कार मिली। कैथल जिले के कॉल गांव के 30 साल के पुनीत ने नहर में छलांग लगा दी थी। नहर किनारे पूरा परिवार रातभर बैठा रहा। मैंने बड़ी मुश्किल से उस लाश को निकाला। लाश सड़ने लगी थी। दरअसल, गर्मियों में कोई लाश तीन से चार दिन तक पानी में रहे तो उसकी बुरी हालत हो जाती है। दो दिन पहले मैंने नरवाना नहर से लाश निकाली। पूरी तरह सड़ चुकी थी। पैंट की जेब से एक फोन मिला। पुलिस को बताया तो पता लगा कि उसने पांच महीने पहले पंजाब के राजपुरा की नहर में छलांग लगाई थी। परिवार कल ही लाश को लेकर अपने घर गया है। यह काम करते 18 साल हो चुके हैं। कुछ केस तो कभी नहीं भूल पाऊंगा। एक केस करनाल के मधुबन नहर का है। पति-पत्नी का झगड़ा हुआ था। गुस्साए पति ने अपने दो साल, छह साल और 9 साल के बच्चे को मोटरसाइकिल पर बिठाया और एक-एक करके उन्हें नहर में फेंक दिया। गांव में खबर पहुंची तो बच्चों के दादा को हार्ट अटैक आ गया और उनकी भी मौत हो गई। उसके बाद पत्नी ने सोचा कि सिर्फ एक झगड़े ने उसके बच्चे छीन लिए। उसने भी आत्महत्या कर ली। पिता को जेल हुई। 10 दिन बाद जेल में ही उसने फांसी लगाकर जान दे दी। सोचिए महज 15 दिन में पूरा परिवार खत्म हो गया। इस केस में 9 साल की लड़की का शव तीसरे दिन मिला, बेटे का चौथे दिन। लेकिन दो साल के बच्चे का पता नहीं चला। उसे या तो मछलियां खा गई होंगी या मगरमच्छ। यह केस मुझे बहुत दर्द देता है। एक साल पहले की बात है। सर्दियों की रात थी और घड़ी में करीब 12 बजे थे। कुछ मजदूर अपना काम खत्म करके नरवाना ब्रांच नहर के किनारे दबखेड़ी पुल के पास पहुंचे थे। उनमें से एक के पास मेरा नंबर था। उसने मुझे फोन किया। बताया कि नहर में किसी औरत के चीखने की आवाज आ रही है। मैंने फौरन बाइक उठाई और नहर की तरफ भागा। वहां एक औरत मरे हुए मुर्गों से भरी एक बोरी पकड़कर चार किलोमीटर तैरकर आई थी। मुझे देखकर जोर से चिल्लाने लगी। तुरंत पानी में कूदा और उसे बाहर निकाला। उसने बताया कि पति ने उसे नहर में धक्का दे दिया था। वह कुरुक्षेत्र की थी। किसी घरेलू झगड़े के चलते उसके पति ने धक्का दे दिया था। वह आज भी कभी-कभी फोन करके मुझे शुक्रिया कहती है। सबसे ज्यादा दुख तब होता है, जब किसी बुजुर्ग की लाश मिलती है। उनके हाथ-पांव बंधे होते हैं या उन्हें किसी वजनदार चीज से बांधकर डुबोया गया होता है। कई बार कूलर में उनकी बॉडी बांधकर फेंक दी जाती है। ऐसे ही एक जवान लड़के की लाश मिली थी। उसके पेट में 26 बार चाकू घोंपा गया था। सिर फटा हुआ था। टांगों को रॉड मार-मार कर जख्मी कर दिया गया था। उस लाश को देखकर लगा कि इंसानी रिश्ते किस तरह से स्वाहा हो चुके हैं। लोगों की सहनशीलता बहुत कम हो गई है। पिछले 24 घंटे में पांच लाशें निकाल चुका हूं। ये हर दिन का एवरेज है। मुझे सबसे खराब लगता है नहर किनारे किसी अपने की लाश का इंतजार करना। खासकर किसी मां का अपने बच्चे की लाश का इंतजार करना। एक बार नरवाना ब्रांच की नहर में एक मां अपने बच्चे की लाश का इंतजार करती रही। मैंने बहुत कोशिश की, लेकिन नहीं मिली। वह रातभर वहीं रही। उसके बाद भी कई बार आई। अंबाला का एक मामला है। पति-पत्नी के बीच झगड़ा हुआ था। महिला अपनी 6 महीने और दो साल की बच्ची के साथ नहर में कूद गई थी। 6 महीने की बच्ची तो किसी तरह किनारे आ गई और लोगों ने उसे बचा लिया, लेकिन महिला की लाश मिलने के बाद भी उसकी दो साल की दूसरी बच्ची का कुछ पता नहीं चल सका। अपनी बात करूं तो यह काम आसान नहीं है। गोताखोरी के शुरुआत के तीन साल बहुत कष्ट देने वाले रहे। पहले जब किसी की लाश निकालकर घर आता तो मां-बाप गालियां देते थे। घर के अंदर नहीं आने देते थे। बोलते- नहाकर, कपड़े बदलने के बाद ही घर में घुसना। कई बार तो घर से बाहर निकाल देते थे। खाना नहीं देते थे। उस वक्त नहर पर चला जाता था और रात में वहीं सोता था। जब मेरी शादी हुई तो पत्नी ने भी मुझसे बहुत झगड़े किए। वह चाहती थी कि यह काम छोड़ दूं, लेकिन नहीं छोड़ पाया। आज मेरी चार बेटियां हैं। बड़ी बेटी 18 साल की है और सबसे छोटी 5 साल की है। जब कोई लाश निकालकर आता तो पत्नी बेटियों को हाथ नहीं लगाने देती थीं। रिश्तेदार कहते हैं कि तू जाट है। खेती करना तेरा काम है न कि नहर से मुर्दे निकालना। वे बोलते थे कि बच्चे कैसे पालोगे? लेकिन उनकी बातों का मुझ पर ज्यादा असर नहीं होता। घर से निकलता हूं तो सीधे नहर पर ही पहुंचता हूं। (परगट सिंह ने अपने ये जज्बात भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से साझा किए) ------------------------------------------------ 1- संडे जज्बात- ‘साथ नहीं नाचूंगी’ कहते ही रिवॉल्वर तानकर नचाया:एक ने कमर में हाथ डालकर पूछा- कितना लोगी? डांसर हूं, शरीर बेचने वाली नहीं मैं अंजली चौधरी। पंजाब के लुधियाना की उस गली में रहती हूं, जहां से कई मशहूर कलाकार निकले हैं। बचपन में जब उन कलाकारों के किस्से सुनती थी, तो लगता था- स्टेज यानी मंच की जिंदगी कितनी अच्छी होती होगी। तेज म्यूजिक होती है। लोगों की तालियां बजती हैं, नाम होता है... और अच्छे पैसे भी मिलते हैं। 2- संडे जज्बात-हम अधेड़ कुंवारे कौवों जैसे अपशकुन माने जाते हैं:सरकार हमें देती है पेंशन, जाने कितने जानवरों से रेप करते पकड़े गए लोग मुझे मेरे नाम से कम, रं@#% कहकर ज्यादा बुलाते हैं। मुझे शुभ कामों से दूर रखा जाता है। गलती से पहुंच जाऊं तो लोगों का चेहरा उतर जाता है। मैं वीरेंद्र दून। हरियाणा के जिला हांसी के गांव पेटवाड़ का रहने वाला हूं। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें
भारत के सेमीकंडक्टर मिशन को मिला वैश्विक समर्थन, टाटा-एएसएमएल के बीच समझौता
भारत में सेमीकंडक्टर निर्माण को नई गति देने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए डच कंपनी एएसएमएल और टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए
11वीं सदी के चोल ताम्रपत्र नीदरलैंड से भारत वापस लाए जाएंगे: पीएम मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को घोषणा की कि 11वीं सदी के चोल ताम्रपत्र जल्द ही नीदरलैंड से भारत वापस लाए जाएंगे।
500 सालों में 50 से ज्यादा शिप्स और दर्जनों प्लेन एक खास इलाके से गुजरते हुए गायब हो गए। न मलबा मिला, न कोई लाश। बरमूडा ट्रायंगल की यही मिस्ट्री दुनिया को डराती रही है। अब वैज्ञानिकों ने वहां के समुद्र में कुछ ऐसा खोजा है, जो पूरी दुनिया में कहीं नहीं है। तो क्या इसबार बरमूडा ट्रायंगल का रहस्य खुल गया? इसी से जुड़े सवाल समझेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: बरमूडा ट्रायंगल से कैसे गायब होते रहे हैं शिप्स और प्लेन? जवाब: उत्तरी अटलांटिक महासागर में अमेरिका के फ्लोरिडा तट, ब्रिटेन के बरमूडा द्वीप और प्यूर्टो रिको द्वीप को मिलाएं, तो एक त्रिभुज बनता है। इसे ही बरमूडा ट्रायंगल कहते हैं। इसका एरिया करीब 13 लाख वर्ग किलोमीटर है। साल 1492 की बात है। क्रिस्टोफर कोलंबस तीन बड़ी नौकाओं और 90 लोगों के साथ इस इलाके से गुजर रहे थे, तो कुछ अनोखा देखा। जहाज की लॉगबुक में दर्ज किया- समुद्र में आग की लपटें थीं और कंपास की रीडिंग भी असामान्य हो गई। कोलंबस वही नाविक हैं, जिन्होंने अमेरिका खोजा था। बरमूडा ट्रायंगल से शिप गायब होने का पहला बड़ा मामला 31 दिसंबर 1812 का है। ‘पैट्रियट’ नाम का अमेरिकी जहाज साउथ कैरोलिना से न्यूयॉर्क के लिए निकला। इसमें तब के अमेरिकी उपराष्ट्रपति हारून बर्र की बेटी थियोडोसिया सवार थीं। पैट्रियट बरमूडा ट्रायंगल में अचानक गायब हो गया। 3 साल बाद USS एपेरवियर भी वहीं गायब हुआ। न इसका मलबा मिला और न इसमें सवार 135 लोगों में किसी की लाश। मार्च 1918 में अमेरिका का ‘USS साइक्लोप्स’ जहाज गायब होने के बाद दुनिया भर में खतरनाक बरमूडा ट्रायंगल की चर्चा तेज हो गई। इसमें 10 हजार टन मैंगनीज और 309 लोग सवार थे। इसके मलबे और जहाज की जानकारी 108 साल बाद भी नहीं है। बरमूडा ट्रायंगल के ऊपर से गुजरने वाले विमानों और जहाजों के गायब होने के करीब 50 इंसीडेंट्स दर्ज हैं… सवाल-2: बरमूडा में विमान, जहाज गायब होने के पीछे क्या वजह बताई जाती है? जवाब: बरमूडा ट्रायंगल के रहस्य से जुड़ी 5 प्रमुख थ्योरी और दावे किए जाते हैं… 1. नुकीले बादल एयर बम बनाते हैं 2. मीथेन गैस विस्फोट थ्योरी 3. मैग्नेटिक इफेक्ट की थ्योरी 4. 'इलेक्ट्रॉनिक फॉग' और 'टाइम वार्प' थ्योरी 5. विशालकाय भटकती लहरें ये भी कहा जाता है कि बरमूडा ट्रायंगल में पानी के अंदर एलियंस का एक स्पेस शिप है, जो अपनी तकनीक से गुजरते जहाजों और विमानों को निशाना बनाता है। 1974 में चार्ल्स बर्लिट्ज की किताब 'The Bermuda Triangle' से प्रचलित हुआ कि बरमूडा ट्रायंगल के नीचे 'खोया हुआ पौराणिक शहर 'अटलांटिस' है। उस सभ्यता की उन्नत तकनीक आज भी एक्टिव है, जो गुजरने वाले जहाजों और विमानों को खींचती है। सवाल-3: अब वैज्ञानिकों को इस इलाके के बारे में क्या पता चला है? जवाब: अमेरिका के कार्नेगी इंस्टीट्यूशन फॉर साइंस और येल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक विलियम फ्रेजर और जेफरी पार्क की टीम ने एक रिसर्च की है। कार्नेगी इंस्टीट्यूशन फॉर साइंस की वेबसाइट पर 8 मई को ये रिसर्च छपी है। इससे पता चला कि बरमूडा द्वीप के नीचे एक ऐसा खास स्ट्रक्चर है, जिसे दुनिया में और कहीं नहीं देखा गया है। दरअसल, समुद्र के बीच में ज्वालामुखी का पहाड़ या द्वीप उसके नीचे के 'मेंटल प्लम' के ऊपर बनता है। ‘मेंटल प्लम’ यानी धरती के अंदर का बेहद गर्म चट्टानों का गुबार। ये समुद्र की तली को ऊपर की तरफ धकेलता है। हालांकि समय के साथ टेक्टोनिक प्लेटें खिसकती हैं और ये द्वीप वापस नीचे की तरफ धंसने लगते हैं। जबकि बरमूडा द्वीप के मामले में ऐसा नहीं है। 3 करोड़ साल से भी ज्यादा समय से बरमूडा के नीचे ज्वालामुखी पूरी तरह शांत है। फिरे भी बरमूडा द्वीप समुद्र तल से लगभग 1600 फीट की ऊंचाई पर टिका हुआ है। इस गुत्थी को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने बरमूडा के इलाके में भूकंप की तरंगों के जरिए द्वीप के 20 मील नीचे की एक तस्वीर तैयार की। इससे पता चला कि समुद्री क्रस्ट के नीचे 12 मील मोटी एक अजीबोगरीब चट्टान की परत है। ये परत आसपास के मेंटल की तुलना में बहुत हल्की और कम घनत्व वाली है। ये हल्की चट्टान एक नाव की तरह काम कर रही है। इसी के सहारे बरमूडा और उसके आसपास का समुद्री तल तैर रहा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, अब ये खोजना बाकी है कि क्या दुनिया के किसी और द्वीप के नीचे भी इसी तरह की कोई हल्की चट्टान है या नहीं। सवाल-4: क्या इस नई खोज से बरमूडा ट्रायंगल का रहस्य खुल जाएगा? जवाब: नहीं, ये रिसर्च सिर्फ बरमूडा द्वीप के भूगर्भ से जुड़ी है। बरमूडा द्वीप का एरिया सिर्फ 54 वर्गकिमी है। जबकि बरमूडा ट्रायंगल 13 लाख वर्ग किमी का समुद्री इलाका है। वैज्ञानिकों ने भी इस रिसर्च में बरमूडा ट्रायंगल में जहाज डूबने या विमानों के हादसे का जिक्र नहीं किया है। हालांकि बरमूडा द्वीप को लेकर ये जानकारी नई जरूर है, साथ ही किसी और द्वीप के नीचे इस तरह के अनोखे स्ट्रक्चर की जानकारी अब तक नहीं है, इसलिए इसे बरमूडा ट्रायंगल के रहस्यों से जोड़कर देखा जा रहा है। जानकारों का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है, जो बरमूडा ट्रायंगल में जहाजों और विमानों के गायब होने के पीछे किसी रहस्यमयी थ्योरी से इनकार करता है। सवाल-5: बरमूडा ट्रायंगल में वाकई कोई रहस्य छिपा है, या सिर्फ सामान्य हादसे हैं? जवाब: अमेरिकी मौसम विभाग से जुड़ी संस्था ‘नेशनल ओशियनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन’, यानी NOAA के मुताबिक, ‘बरमूडा ट्रायंगल इलाके में होने वाले हादसे खराब मौसम, मुश्किल नेविगेशन और इंसानी गलतियों की वजह से होते हैं। इनके पीछे कोई सुपरनैचुरल पावर नहीं है।’ इसी तरह अमेरिकी रिसर्चर लॉरेंस डेविड कुस्चे अपनी किताब 'द बरमूडा ट्रायंगल मिस्ट्री सॉल्व्ड' में लिखते हैं, 'ट्रायंगल पर हुए हादसों पर जो रिपोर्ट्स सामने आईं, उनमें से ज्यादातर बढ़ा-चढ़ाकर लिखी गई हैं। ये हादसे दुनिया के दूसरे समुद्री रास्तों पर होने वाले हादसों से ज्यादा नहीं हैं।’ हवाई जहाजों और शिप्स का इंश्योरेंस करने वाली कंपनी ‘लॉयड ऑफ लंदन’ को अपनी रिसर्च में बरमूडा ट्रायंगल के ज्यादा खतरनाक होने के पुख्ता सबूत नहीं मिले। इसके बाद 1970 के दशक में कंपनी ने बरमूडा ट्रायंगल से गुजरने वाले जहाजों के लिए बीमा के बदले एक्सट्रा प्रीमियम लेना बंद कर दिया। सिंगापुर के रिसर्चर डेरिक ली ने 2021 में दुनिया भर के 85 हजार से ज्यादा विमान हादसों का एनालिसिस किया। इसमें बरमूडा ट्रायंगल के अंदर महज 56 हादसे मिले। डेरिक के मुताबिक, 'इन हादसों के पैटर्न खोजने पर कुछ भी असामान्य या रहस्यमयी नहीं मिला। ये मौसम की खराबी से जुड़े साधारण हादसे थे, जो दुनिया की बाकी जगहों पर भी देखने को मिलते हैं। अक्टूबर 2024 में नाइजीरिया के प्रोफेसर चिगोजी एके ने कहा था कि कुछ न्यूज चैनलों ने बरमूडा ट्रायंगल की खबरों को सनसनीखेज बना दिया, जिससे लोगों में डर पैदा हुआ और इसे सच माना जाने लगा। दुनिया में कई समुद्री इलाके हैं, जिन्हें बरमूडा से भी ज्यादा खतरनाक माना जाता है। उदाहरण के लिए ड्रेक पैसेज, अर्जेंटीना। चिली के केप हॉर्न और अंटार्कटिका के साउथ शेटलैंड द्वीपों के बीच मौजूद ड्रेक पैसेज में लहरें अक्सर 40 फीट तक पहुंच जाती हैं। यहां लगभग 800 जहाज तबाह हो चुके हैं और करीब 20 हजार नाविकों की मौत हो चुकी है। सबसे चर्चित हादसा 1819 में स्पेन के जहाज ‘सैन टेल्मो’ के डूबने का है, जिसमें 644 लोगों की मौत हुई थी। आस्ट्रेलियाई साइंटिस्ट डॉ. कार्ल क्रुजेलनिकी कहते हैं कि बरमूडा ट्रायंगल के हादसों के लिए एलियंस के बजाय खराब प्लानिंग को जिम्मेदार ठहराना चाहिए। ये कोई सुपरनैचुरल पावर नहीं, बल्कि प्रकृति की ताकत और इंसानी गलतियों का नतीजा है। ---------- रिसर्च सहयोग - प्रथमेश व्यास------------------------------------- ये खबर भी पढ़ें… चुटकी में हैक कर लेता है बैंक, दुनियाभर की सरकारों को Mythos AI का डर; क्या खातों में जमा आपका पैसा भी खतरे में है एंथ्रोपिक का नया AI मॉडल 'क्लॉड मिथोस' इतना खतरनाक है कि इसे आम लोगों के लिए रिलीज ही नहीं किया गया। हालांकि ये किसी तरह लीक हो गया है। एंथ्रोपिक के मुखिया डेरियो अमोदेई ने खुद इसके खतरे की चेतावनी दी है। दुनियाभर की सरकारें आशंका से डरी हुई हैं। 23 अप्रैल को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी एक हाई-लेवल बैठक बुलाई। इसमें चर्चा हुई कि भारत के बैंकिंग सिस्टम को मिथोस से कैसे बचाया जाए। सरकार एंथ्रोपिक के सीनियर ऑफिसर्स से भी बात कर रही है। पढ़ें पूरी खबर…
ट्रंप का बड़ा बयान: बाइडन दौर में गिरता हुआ देश बन गया था अमेरिका
डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लंबा पोस्ट लिखते हुए दावा किया कि जो बाइडन की नीतियों ने अमेरिका को आर्थिक, सामाजिक और सुरक्षा के स्तर पर कमजोर कर दिया। उन्होंने कहा कि खुली सीमा नीति के कारण अमेरिका में अवैध प्रवासियों की संख्या तेजी से बढ़ी और इससे देश की सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित हुई।
ट्रंप और जिनपिंग के बीच ताइवान, साइबर सुरक्षा, व्यापार और एआई पर हुई 'ऐतिहासिक' चर्चा
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि उनकी चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ कई अहम मुद्दों पर लंबी बातचीत हुई
चीन टैरिफ से बचना चाहता है तो अमेरिका में बनाए कारखाने : ट्रंप
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अगर चीन अमेरिका से टैरिफ से बचना चाहता है, तो उसे अमेरिका में कारखाने लगाने चाहिए और अमेरिकियों को नौकरी देनी चाहिए
पेंटागन ने पोलैंड में 4,000 से अधिक अमेरिकी सैनिकों को तैनात करने की योजना रद्द की
पेंटागन ने अमेरिका में तैनात 4,000 से अधिक सैनिकों को अस्थायी रूप से पोलैंड भेजने की योजना रद्द कर दी है। कई अमेरिकी मीडिया संस्थानों ने अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से यह जानकारी दी। इसके साथ ही
इजरायली सेना के प्रमुख इयाल जमीर और दूसरे सीनियर अफसरों ने ईरान के साथ हाल ही में हुए युद्ध के दौरान चुपके से यूनाइटेड अरब अमीरात (यूएई) का दौरा किया
पीएम मोदी ने 10 मई को लोगों से सोना न खरीदने की अपील की। उन्होंने कहा- हमें यह तय करना होगा कि सालभर तक घर में कोई कार्यक्रम हो, हम सोने के गहने नहीं खरीदेंगे। 15 मई को कांग्रेस महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला ने निशाना साधा- ‘आप बोलते हैं कि एक मंगलसूत्र मत खरीदो। जेवर मत खरीदो… और मोदी सरकार 7 महीने में 85.88 मीट्रिक टन सोना खरीद रही है। ऐसा क्यों?’ ये सवाल आपके मन में भी हो सकता है। इसी को समझेंगे भास्कर एक्सप्लेनर में… पहले जानते हैं कि क्या सरकार ने वाकई सोने की खरीद बढ़ा दी है? जवाब है- हां। लेकिन उतना नहीं, जितना सुरजेवाला दावा कर रहे। भारतीय रिजर्व बैंक, यानी RBI के पास अभी 880.5 टन गोल्ड रिजर्व है। ये ऑल टाइम हाई है। भारत आज गोल्ड रिजर्व की ग्लोबल रैंकिंग में 5वें नंबर पर है। 2021 से 2025 के बीच 185 टन सोना खरीदा गया। पिछले 10 साल में RBI का गोल्ड रिजर्व 560 टन से बढ़कर 880.5 टन हो गया, यानी 57% की बढ़त। फिलहाल भारत के कुल फॉरेन रिजर्व, यानी विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी 16.7% है, जो पिछले साल से 5% ज्यादा है। दिलचस्प बात ये है कि RBI विदेशों बैंकों की बजाय अब अपनी तिजोरियों में सोना जमा कर रहा है। 2023 में RBI के गोल्ड रिजर्व का सिर्फ 38% देश में था, जो आज 77% हो गया है। फिलहाल 680.05 टन सोना देश में है, बाकी का करीब 197.67 टन सोना विदेशी तिजोरियों में रखा है। वहीं 2.8 टन गोल्ड डिपोजिट में है, यानी ब्याज कमाने के लिए निवेश किया गया है। सोने की ये घरवापसी पिछले 3 कारोबारी साल में बढ़ी है। ये ग्राफिक देखिए- आखिर सरकार लगातार सोना क्यों खरीद रही है? सोना खरीदने का ट्रेंड सिर्फ भारत में नहीं है। चीन, ब्राजील, तुर्किये, पोलैंड जैसे कई देशों के सेंट्रल बैंक गोल्ड रिजर्व बढ़ा रहे हैं। चीन तो पिछले 18 महीने से लगातार सोना जुटा रहा है। अभी उसके पास 2313.46 टन गोल्ड रिजर्व है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक, कारोबारी साल 2025-26 में दुनियाभर के केंद्रीय बैंकों ने कुल 900 टन से ज्यादा सोना खरीदा, जो औसत से ज्यादा खरीद का लगातार चौथा साल है। सोने की ताबड़तोड़ खरीदी का डायरेक्ट कनेक्शन अमेरिकी डॉलर से है। सेंट्रल बैंक गोल्ड रिजर्व सर्वे-2025 की ये दो फाइंडिंग्स देखिए… दुनिया भर में चर्चा है कि कारोबार और बचत के लिए अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम की जाए। इस चर्चा की सबसे बड़ी वजह है- अमेरिका का एक फैसला। दरअसल, 2022 में जब रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ, तो अमेरिका ने अपने यूरोपीय दोस्तों के साथ मिलकर रूस के 300 बिलियन डॉलर के फॉरेन रिजर्व पर रोक लगा दी थी। दरअसल, रूस का जो पैसा अमेरिकी ट्रेजरी बिल में जमा रखा था, अमेरिका ने उसे कैश करने से मना कर दिया था। अमेरिका के इस कदम से एक झटके में पूरी दुनिया सहम गई। माना जाने लगा कि अमेरिका अपनी करेंसी को हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकता है। इसके बाद से दुनियाभर के देशों में डॉलर के प्रति भरोसा कम होने लगा और वो अपना फॉरेन रिजर्व दूसरी करेंसी और खासकर सोने में जमा करने लगे। 2016 में दुनियाभर के कुल फॉरेन रिजर्व में 65% अमेरिकी डॉलर था, जो अब घटकर 57% रह गया है। भारत ने भी ऐसा किया है। दरअसल, RBI सोना खरीद कर फॉरेन रिजर्व में डॉलर पर निर्भरता घटाना चाहता है। डॉलर में उतार-चढ़ाव आता रहता है। अमेरिका ऐन वक्त पर इसे कैश करने में दगाबाजी भी कर सकता है। लेकिन सोना ऐसी चीज है, जिससे हम किसी भी देश से कोई भी सामान खरीद सकते हैं या सोने से कोई भी करेंसी खरीद सकते हैं। जब सरकार को लग रहा है कि सोना मुश्किल वक्त में काम आएगा, तब वो लोगों को सोना खरीदने से क्यों रोक रही है? इसका जवाब भारत के आयात बिल और विदेशी मुद्रा भंडार से जुड़ा है। दरअसल, भारत अपने इस्तेमाल का करीब 99% सोना विदेशों से खरीदता है। इसके लिए डॉलर चुकाए जाते हैं और ये डॉलर फॉरेन रिजर्व यानी विदेशी मुद्रा भंडार से खर्च होते हैं। यानी ज्यादा सोना खरीदा, तो ज्यादा डॉलर चुकाने पड़ेंगे। इससे आयात बिल बढ़ेगा और फॉरेन रिजर्व घटेगा। फिलहाल भारत के आयात बिल, यानी विदेशों से खरीदे जाने वाले सामान के कुल खर्चे में 9% की हिस्सेदारी के साथ सोना दूसरे नंबर पर है। पिछले कारोबारी साल में भारत ने 6.4 लाख करोड़ रुपए का सोना खरीदा गया। इसमें भी दिलचस्प बात ये है कि 2025-26 में पिछले कारोबारी साल के मुकाबले 4.76% कम मात्रा में सोना खरीदा, लेकिन सोने के इम्पोर्ट बिल में 24% तक का उछाल आया। इसकी सबसे बड़ी वजह थी- सोने की तेजी से बढ़ती कीमतें। सोने का दाम 76 हजार डॉलर प्रति किलो से बढ़कर 1 लाख डॉलर प्रति किलो तक पहुंच गया। अभी सोने की कीमत करीब 1.52 लाख डॉलर प्रति किलो है। इन कीमतों पर सोना खरीदने से भारत के फॉरेन रिजर्व में डॉलर तेजी से घटेगा। सोने की बढ़ी कीमतों के चलते गोल्ड इम्पोर्टर्स हाथ पीछे खींच रहे हैं और कम सोना भारत आ रहा है। जनवरी में करीब 100 टन, फरवरी में करीब 65 टन और मार्च में करीब 22 टन सोना खरीदा गया। अप्रैल में अनुमान है कि सिर्फ 15 टन सोना खरीदा जाएगा, जो पिछले 30 सालों के सबसे निचले स्तर में से एक है। सोने की घरेलू कीमतें करीब 1.60 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम हैं, जिसका असर कस्टमर की जेब पर पड़ रहा है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक 2026 की पहली तिमाही में भारत में निवेश के लिए सोने की मांग गहनों से भी ज्यादा है। यानी अगर आप सोना नहीं खरीदेंगे, तो भारत का इम्पोर्ट बिल घटेगा। इससे फॉरेन रिजर्व में डॉलर स्थिर बना रहेगा और रुपया तेजी से कमजोर नहीं होगा। -------- महंगाई से जुड़े ये खबर भी पढ़िए… 48 घंटे के भीतर पेट्रोल, सोना और दूध महंगा हुआ, अगला नंबर किसका; क्या सरकार के हाथों से चीजें निकल रही हैं बुधवार की रात सोना महंगा हुआ। गुरुवार सुबह दूध। शुक्रवार को पेट्रोल-डीजल और CNG महंगे हो गए। इन सबके बीच आंकड़ा आया कि थोक महंगाई 42 महीने में सबसे ज्यादा और डॉलर के मुकाबले रुपया अब तक के सबसे निचले स्तर पर है। 48 घंटे में महंगाई की चौतरफा मार। लेकिन यह शुरुआत है। पूरी खबर पढ़िए…
ईरान को उम्मीद 'सुनहरे द्वार' चाबहार बंदरगाह पर भारत जारी रखेगा काम : अराघची
ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने चाबहार बंदरगाह को भारत और ईरान के बीच सहयोग का एक प्रतीक बताया
चीनी राष्ट्रीय आपदा निवारण एवं शमन दिवस का मुख्य कार्यक्रम च्यांगशी प्रांत के नानछांग में आयोजित
हाल ही में चीन के राष्ट्रीय आपदा निवारण एवं शमन दिवस और आपदा निवारण एवं शमन प्रचार सप्ताह के मुख्य कार्यक्रम का आयोजन राष्ट्रीय आपदा निवारण, शमन एवं राहत समिति के कार्यालय, आपातकालीन प्रबंधन मंत्रालय, चाइना मीडिया ग्रुप और च्यांगशी प्रांत की स्थानीय सरकार द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है।
ईरान स्थिति पर चीन ने कहा: संवाद के दरवाजे एक बार खुले तो फिर बंद नहीं होने चाहिए
चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में चीन-अमेरिका शिखर बैठक में ईरान मुद्दे पर चर्चा होने या न होने के सवाल के जवाब में कहा कि हाल ही में, अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम हुआ है और दोनों पक्षों ने वार्ता के माध्यम से समाधान तलाशने की शुरुआत की है, जिसका क्षेत्रीय देशों और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने स्वागत किया है।
बुधवार की रात सोना महंगा हुआ। गुरुवार सुबह दूध। शुक्रवार को पेट्रोल-डीजल और CNG महंगे हो गए। इन सबके बीच आंकड़ा आया कि थोक महंगाई 42 महीने में सबसे ऊपर और डॉलर के मुकाबले रुपया अब तक के सबसे निचले स्तर पर है। 48 घंटे में महंगाई की चौतरफा मार। लेकिन यह शुरुआत है। आगे और क्या महंगा होगा, आपकी जेब पर कितना बोझ पड़ेगा, और क्या वाकई सरकार के हाथ से चीजें निकल रही हैं; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: पिछले 48 घंटे में क्या-क्या महंगा हुआ? जवाब: 10 और 11 मई को पीएम मोदी ने लोगों से सोना न खरीदने, पेट्रोल कम खर्च करने जैसी 7 अपीलों से संकेत दे दिए थे। इसके बाद 4 चीजों के दाम सीधे बढ़े हैं- 1. इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ाने से सोना-चांदी महंगे हुए 2. दूध के दाम 2 रुपए प्रति लीटर बढ़े 3. पेट्रोल-डीजल 3-3 रुपए महंगा हुआ 4. CNG के दाम 2 रुपए किलो बढ़े इससे पहले मई की शुरूआत में कमर्शियल LPG (19 किलो) की कीमत 993 रुपए बढ़कर अगल-अलग शहरों में 3,315 रुपए तक हो गई थी। ईरान जंग शुरू होने के बाद से 3 बार इसकी कीमत बढ़ चुकी है। वहीं घरेलू LPG (14.2 किलो) की कीमत 7 मार्च को 60 रुपए से बढ़ी थी। मार्च में प्रीमियम पेट्रोल की कीमत भी 2 से 2.35 रुपए तक बढ़ी थी। इसके अलावा कई प्राइवेट प्रोवाइडर्स जैसे नायरा एनर्जी और शेल इंडिया ने भी मार्च और अप्रैल में पेट्रोल के दाम 5 से 7.4 रुपए प्रति लीटर तक बढ़ाए थे। सवाल-2: इन चीजों के दाम बढ़ने से आम आदमी पर कितना बोझ बढ़ेगा? जवाब: पहले कीमतें बढ़ने का सीधा असर समझते हैं… पेट्रोल-डीजल: अगर आप महीने में 50 लीटर पेट्रोल खर्च करते हैं, तो 3 रुपए प्रति लीटर कीमत बढ़ने से महीने का खर्च 150 रुपए बढ़ जाएगा। ऐसा ही डीजल के मामले में होगा। दूध: अगर हर दिन 2 लीटर दूध इस्तेमाल करते हैं, तो महीने का खर्च 120 रुपए बढ़ेगा। CNG: हर महीने 50 किलो CNG खरीदते हैं, तो महीने का 100 रुपए खर्च बढ़ेगा। सोना-चांदी: इनके दाम हर दिन बढ़ते-घटते हैं। आज के भाव के हिसाब से 10 ग्राम सोना खरीदना 8,148 रुपए और एक किलो चांदी खरीदना 9,313 रुपए महंगा हो गया है। (मार्केट बंद होने के बाद फाइनल डेटा) हालांकि इन चीजों के डायरेक्ट असर से बड़े हैं इनडायरेक्ट असर जैसे... सवाल-3: अभी और किन चीजों के दाम बढ़ सकते हैं? जवाब: अभी 4 और चीजों के दाम बढ़ सकते हैं… 1. पेट्रोल-डीजल 13-14 रुपए और महंगा हो सकता है अब सवाल आता है कितना? 14 मई का मोटा-मोटी कैलकुलेशन है कि कंपनियों को अपना घाटा पूरा करने के लिए पेट्रोल पर 16 रुपए और डीजल 17 रुपए बढ़ाने की जरूरत है। इसमें अभी सिर्फ 3 रुपए दाम बढ़े हैं, बाकी बढ़ोत्तरी आगे हो सकती है। हिसाब नीचे ग्राफिक में देख लीजिए- 2. खाने का तेल 5% महंगा हो सकता है 3. रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीजों के दाम 10% तक बढ़ सकते हैं 4. दवाइयां और मेडिकल डिवाइस के दाम बढ़ सकते हैं सवाल-4: क्या हालात अब सरकार के कंट्रोल से बाहर जा रहे हैं? जवाब: 5 संकेत, जो बताते हैं कि चीजें सरकार के मन-मुताबिक नहीं चल रही हैं… 1. डॉलर के मुकाबले रुपया ऑल-टाइम लो 2. थोक महंगाई दर 42 महीने में सबसे ज्यादा 3. फॉरेक्स रिजर्व में बड़ी गिरावट 4. विदेशी निवेशकों ने निकाले 2 लाख करोड़ 5. सरकार के घाटे में 0.3% का इजाफा इकॉनोमिक एक्सपर्ट शरद कोहली कहते हैं रुपए की कमजोरी, महंगाई या विदेशी निवेश में कमी जैसी दिक्कतों के पीछे रूट कॉज एक ही है- क्रूड ऑयल की कीमत बढ़ना। फिलहाल ग्लोबल स्थितियों के हिसाब से ही भारत के हालात बदलेंगे। शरद कहते हैं कि पूरी दुनिया में इस समय ‘स्टैगफ्लेशन’ का दौर है, यानी एकसाथ आर्थिक वृद्धि में कमी, बेरोजगारी और महंगाई। होर्मुज स्ट्रेट खुलने से ही ग्लोबल इकोनॉमी दोबारा पटरी पर आ सकती है। इस बीच आम भारतीयों को अपना बजट बनाना चाहिए। जिन खर्चों में कटौती की जा सकती है, उनमें कटौती करनी चाहिए। -------------------------------- ये खबर भी पढ़ें…आज का एक्सप्लेनर:पीएम मोदी क्यों चाहते हैं कि आप सोना न खरीदें, ऐसी 7 अपील के पीछे की कहानी; क्या आपको चिंता करनी चाहिए पीएम मोदी ने रविवार को तेलंगाना की एक रैली में देश से 7 अपीलें कीं। इनमें एक अपील सोना न खरीदने की भी थी। पीएम मोदी ने कहा- देशहित में हमें यह तय करना होगा कि सालभर तक घर में कोई कार्यक्रम हो, हम सोने के गहने नहीं खरीदेंगे। हालांकि सरकार ने खुद पिछले कुछ सालों से RBI के जरिए सोने की खरीद बढ़ा दी है। पढ़ें पूरी खबर…
ट्रंप-शी वार्ता में ताइवान को लेकर चीन की कड़ी चेतावनी, ईरान और व्यापार पर बनी सहमति
चीन के विदेश मंत्रालय के अनुसार, शी चिनफिंग ने बैठक में ताइवान को चीन-अमेरिका संबंधों का सबसे संवेदनशील मुद्दा बताया। उन्होंने कहा कि यह विषय बीजिंग की ‘रेड लाइन’ है और इसमें किसी भी प्रकार की गलती या उकसावे की स्थिति बेहद खतरनाक हो सकती है।
इस्लामाबाद की राजनयिक गलतियों के चलते पाकिस्तान-यूएई संबंधों में बढ़ रहा तनाव: रिपोर्ट
पाकिस्तान और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच राजनयिक तनाव अब महज छोटी-मोटी रुकावट नहीं लगता, बल्कि द्विपक्षीय साझेदारी को हुआ नुकसान अब स्थायी प्रतीत होता है
ब्रिक्स बैठक में अराघची ने अमेरिकी प्रतिबंधों को बताया स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की बाधा
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में मौजूदा बाधाओं के लिए अमेरिका के प्रतिबंध जिम्मेदार हैं। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज उन सभी वाणिज्यिक जहाजों के लिए खुला है, जो ईरानी नौसेना के साथ सहयोग करते हैं
जल्द खत्म नहीं होगा पश्चिम एशिया का संकट, मंदी का खतरा बढ़ा: सिंगापुर पीएम
दुनिया भर के नेताओं ने ईरान युद्ध और उससे पैदा हो रहे बड़े आर्थिक संकट को लेकर चेतावनी देनी शुरू कर दी है। इसी बीच सिंगापुर के प्रधानमंत्री लॉरेंस वोंग ने भी कहा कि पश्चिम एशिया का यह संकट जल्दी खत्म होने वाला नहीं है और इसके आर्थिक नुकसान और बढ़ सकते हैं।
पैर की एक नस में बना खून का थक्का, खामोशी से बहते हुए फेफड़े तक पहुंचा और 13 मई की सुबह अचानक सपा मुखिया अखिलेश यादव के भाई प्रतीक यादव की मौत हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में निकला- 'पल्मोनरी थ्रॉम्बो एम्बोलिज्म’। उनके शरीर में 6 जगह चोट के निशान भी मिले हैं। पल्मोनरी एम्बोलिज्म कैसी बीमारी है और इसका प्रतीक के शरीर पर मिले चोट के निशान से क्या कोई कनेक्शन है; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: प्रतीक यादव की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में क्या निकला?जवाब: मुलायम सिंह यादव की दूसरी पत्नी साधना के बेटे प्रतीक की 13 मई की सुबह अचानक तबीयत बिगड़ी। लखनऊ के सिविल अस्पताल में चीफ मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. डीसी पांडेय के मुताबिक- जब प्रतीक को लाया गया, तब उनकी पल्स पूरी तरह डाउन थी। दिल भी रुक चुका था। लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज, यानी KGMU में प्रतीक का पोस्टमॉर्टम हुआ। 13 मई की शाम जारी शुरुआती पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में बताया गया कि प्रतीक के फेफड़ों में बड़ी मात्रा में खून के थक्के जम गए थे। जिससे दिल और फेफड़ों ने काम करना बंद कर दिया। सवाल-2: आखिर क्या है पल्मोनरी थ्रॉम्बो एम्बोलिज्म?जवाब: प्रतीक की मौत के पीछे जो बीमारी बताई गई, उसमें 3 टर्म हैं- पल्मोनरी, यानी फेफड़े से जुड़ी दिक्कत, थ्रॉम्बो, यानी खून का थक्का और एम्बोलिज्म, यानी शरीर की धमनियों में कोई रुकावट। 'पल्मोनरी थ्रॉम्बो-एम्बोलिज्म' को डॉक्टरी जुबान में PE कहा जाता है। इसमें शरीर के किसी दूसरे हिस्से से खून का थक्का फेफड़े के अंदर या फेफड़े तक जाने वाली नसों तक पहुंच जाता है और खून के फ्लो को ब्लॉक कर देता है। इससे फेफड़े काम नहीं कर पाते और ऑक्सीजन शरीर के दूसरे हिस्सों में नहीं पहुंच पाती। इससे कार्डियक अरेस्ट आता है और मौत हो जाती है। आम तौर पर ये थक्का पैर या पेल्विस के इलाके की नसों में बनना शुरू होता है। फिर ये टूटकर खून के फ्लो के साथ-साथ फेफड़ों तक पहुंच जाता है। ग्राफिक में पूरा प्रॉसेस देख लीजिए- अमेरिका के मेडिकल सेंटर क्लीवलैंड क्लिनिक की रिपोर्ट के मुताबिक, PE के चलते अमेरिका में हर साल कम से कम एक लाख लोगों की मौत होती है। हालांकि भारत में इस बीमारी से मौतों का कोई पुख्ता रिकॉर्ड मौजूद नहीं है। सवाल-3: ये बीमारी कैसे हो जाती है?जवाबः PE के ज्यादातर मामलों की शुरुआत DVT, यानी 'डीप वेन थ्रॉम्बोसिस' से होती है। इसमें आमतौर पर पैर की नस में खून का थक्का बनने लगता है। DVT 4 बड़ी वजहों से हो सकती है... 1. लंबे समय तक निष्क्रिय रहना 2. कोई सर्जरी या चोट लगना 3. खून में थक्का बनने के डिसऑर्डर 4. कैंसर या कुछ और बीमारियां हॉर्मोन थेरेपी और कुछ गर्भनिरोधक गोलियों से भी PE का खतरा हो सकता है। इसके अलावा मोटापे, किडनी की बीमारी, नसों की बीमारी 'वैरिकोज वेंस', परिवार में किसी को DVT या PE होने, स्टेरॉयड्स जैसी कुछ दवाएं लेने, धूम्रपान और किसी तरह के इन्फेक्शन से भी DVT और PE हो सकता है। सवाल-4: इस बीमारी में अचानक मौत होना कितना कॉमन है?जवाब: आमतौर पर PE के लक्षण अचानक ही नजर आते हैं। कुछ मामलों में पैरों में दर्द, सूजन और गर्मी महसूस हो सकती है। क्लीवलैंड के मुताबिक, PE की चपेट में आए करीब एक-तिहाई लोगों की कुछ ही घंटे के अंदर मौत हो जाती है। अक्सर इलाज मिलने से पहले ही। सवाल-5: क्या प्रतीक की अचानक मौत के पीछे PE ही इकलौती वजह है?जवाब: मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रतीक करीब 5 साल से हाई ब्लड प्रेशर और DVT से पीड़ित थे और उनका इलाज चल रहा था। प्रतीक की पत्नी अपर्णा की करीबी मित्र रीना सिंह ने बताया कि 4 महीने पहले उन्हें पता चला था कि प्रतीक को फेफड़े में इन्फेक्शन हुआ है, जिसका ऑपरेशन हुआ था। 30 अप्रैल को भी प्रतीक सांस लेने में तकलीफ और सीने में दर्द की शिकायत के चलते एडमिट हुए थे। 3 दिन में उन्हें थोड़ा आराम मिला। रिपोर्ट्स हैं कि वो अपनी मर्जी से बिना छुट्टी लिए घर चले गए। मेदांता हॉस्पिटल में मेडिसिन विभाग की एसोसिएट डायरेक्टर डॉ. रुचिता शर्मा ने बताया, प्रतीक हमारे पुराने मरीज थे। मैं काफी समय से उनके हाई ब्लड प्रेशर, हाइपरटेंशन और DVT जैसी दिक्कतों के लिए देख रही थी। कुछ ही दिन पहले, उन्हें पल्मोनरी एम्बोलिज्म होने के बाद सांस फूलने के चलते यहां एडमिट किया गया था। दरअसल, PE के इलाज के लिए कुछ दिनों तक खून को पतला करने वाली ‘ब्लड थिनर’, यानी एंटीकोगुलेंट दवाएं दी जाती हैं। गंभीर मामला हो तो ऑपरेशन या सर्जरी करके भी थक्के को निकाला जाता है। कुछ मामलों में पेट की एक बड़ी नस में एक जाल डाल दिया जाता है, ताकि थक्का फेफड़े तक न पहुंचे। डॉ. रुचिता शर्मा के मुताबिक, प्रतीक खून पतला करने वाली और बीपी की दवाइयां रेगुलर ले रहे थे। इस बार क्या हुआ, ये कहना मुश्किल है। उत्तर प्रदेश में लाइफलाइन हॉस्पिटल के संचालक और सीनियर न्यूरोसर्जन डॉ. सतीश कुमार कहते हैं, PE के मरीजों को अस्पताल में रखकर इलाज करना जरूरी है, ताकि कंडीशन लगातार मॉनिटर की जा सके। अगर PE का इलाज पूरा न हो पाए, तो कुछ खून के थक्के बचे रह सकते हैं। DVT के चलते भी दोबारा थक्के बन सकते हैं और PE हो सकता है। डॉ. सतीश के मुताबिक, हो सकता है कि प्रतीक की थेरेपी पूरी न हुई और उन्होंने बिना पूरी डोज लिए अस्पताल से डिस्चार्ज ले लिया। ऐसे में सबसे प्रबल संभावना है कि उन्हें अचानक PE हुआ, जिससे उनके फेफड़े और फिर दिल ने काम करना बंद कर दिया। सवाल-6: क्या प्रतीक के शरीर पर चोट के निशान से इसका कोई कनेक्शन है?जवाब: पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक, प्रतीक की छाती, दाएं हाथ, कोहनी, बाएं हाथ सहित कुल 6 जगहों पर चोट के निशान पाए गए… इन सभी को ‘कन्ट्यूजन’, यानी अंदरूनी चोट का निशान बताया गया है। साथ ही सभी चोटों के नीचे एकीमॉसिस, यानी खून जमने के निशान पाए गए। रिपोर्ट में कहा गया है कि सभी चोटें मौत लगने से पहले की हैं। पहली, दूसरी और तीसरी चोट 5 से 7 दिन, जबकि चौथी, पांचवीं और छठी चोट करीब 1 दिन पुरानी है। डॉ. सतीश कुमार के मुताबिक, ‘पैर पर तो PE या DVT के चलते चोट का निशान हो सकता है, लेकिन जिस तरह के निशान प्रतीक के शरीर पर हैं, उनका इस बीमारी से संबंध होना मुश्किल है। इस तरह के निशान किसी और मेडिकल कंडीशन, एलर्जी या दवाइयों के चलते भी हो सकते हैं।’ सवाल-7: प्रतीक की मौत पर किन सवालों के जवाब अभी तक नहीं मिले?जवाब: प्रतीक के शरीर पर चोट के निशान उनकी मौत के पहले के हैं। ये निशान कैसे पड़े, अभी इसको लेकर कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है। प्रतीक की मौत पर सपा मुखिया अखिलेश यादव ने अपने पहले बयान में संकेत दिया था कि प्रतीक फाइनेंशियल स्थितियों के चलते तनाव में थे। 19 जनवरी को प्रतीक ने अचानक इंस्टाग्राम पोस्ट पर अपर्णा से तलाक की घोषणा करते हुए कहा था- अपर्णा ने मेरी जिंदगी नरक बना दी।’ हालांकि, 9 दिन बाद दोनों में सुलह हो गई थी। प्रतीक ने अपर्णा के साथ तस्वीर शेयर करते हुए लिखा था- ‘All is Good’, यानी सब अच्छा है। ऐसे में सोशल मीडिया पर लोग कई सवाल उठा रहे हैं…. पूरे हार्ट और फेफड़ों के थ्रोम्बोएम्बोलिक मटेरियल, यानी थक्के वाले हिस्सों को आगे की जांच के लिए सुरक्षित रखा गया है। इसके अलावा विसरा, यानी अंदरूनी अंगों के सैंपल भी सुरक्षित किए गए हैं, ताकि किसी जहर या केमिकल की पुष्टि की जा सके। सपा नेता रविदास मेहरोत्रा ने मांग की है कि हाई कोर्ट के किसी पूर्व जज से प्रतीक की मौत की जांच करवाई जाए। ---- ये खबर भी पढ़ें… प्रतीक यादव की मौत से ससुराल वाले शॉक्ड:उत्तरकाशी में अपर्णा के भाई बोले- परिवार के साथ गलत हुआ; पूरे मामले की जांच होनी चाहिए सपा प्रमुख अखिलेश यादव के भाई और भाजपा नेता अपर्णा यादव के पति प्रतीक यादव के निधन की खबर बुधवार को उत्तरकाशी के डुंडा ब्लॉक स्थित गढ़बरसाली (कुरा) गांव तक पहुंची तो पूरे इलाके में शोक की लहर दौड़ गई। पूरी खबर पढ़ें..
2026 चीन-अमेरिका रिश्तों का ऐतिहासिक साल बताएंगे : राष्ट्रपति शी
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि 2026 एक ऐतिहासिक, लैंडमार्क साल होगा, जो चीन-अमेरिका संबंधों में एक नया अध्याय शुरू करेगा।
चीन के ग्रेट हॉल में ट्रंप का भव्य स्वागत
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चीन के दौरे पर पहुंचे हुए हैं। चीन के ग्रेट हॉल में गुरुवार को राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने राष्ट्रपति ट्रंप का स्वागत किया
अमेरिकी अर्थव्यवस्था की एक बड़ी विशेषता उसकी खुली निवेश प्रणाली है। दुनिया का कोई भी देश या निवेशक अमेरिका में आसानी से निवेश कर सकता है और जरूरत पड़ने पर पैसा निकाल भी सकता है। यही व्यवस्था अब अमेरिका के लिए जोखिम का कारण बनती दिख रही है।
बलूचिस्तान में मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप, एक नागरिक की मौत, दो लोग जबरन गायब
बुधवार को एक प्रमुख मानवाधिकार संगठन ने कहा कि पाकिस्तान की सुरक्षा बलों की ओर से बलूचिस्तान में कम से कम एक आम नागरिक को बिना कानूनी प्रक्रिया के मार दिया गया और दो अन्य लोगों को जबरन गायब कर दिया गया।
‘7 जनवरी 2025। सुबह के 10 बजे थे। पापा की किडनी फेल होने की वजह से मौत हो गई थी। देखते ही मां रो-रो कर बेहाल हो गई। शव बरामदे में रखते ही चीख-पुकार मच गई। सभी रिश्तेदार घर पहुंचने लगे। सभी कहने लगे- अंतिम संस्कार की तैयारी करो। जब तक लाश दरवाजे पर रहेगी, सब रोते रहेंगे। हम लोग अर्थी सजा रहे थे, तभी गांव के लोगों के साथ सरपंच आए। उनके साथ थानेदार और तहसीलदार भी थे। कुछ देर तक शव देखते खड़े रहे, फिर कड़क आवाज में बोले- ‘देखो, तुम अपने बाप की लाश गांव के कब्रिस्तान में नहीं दफना सकते। वहां केवल दलित हिंदू ही शव दफना सकते हैं। तुम लोगों ने धर्म बदला है। इसलिए गांव के बाहर लाश दफनाओ'। तुम लोगों ने महार जाति के खिलाफ जाकर ईसाई धर्म अपनाया है। इसलिए लाश को गांव के बाहर दफनाओ'। खाट पर बैठे रमेश बघेल अपने पापा की मौत का दिन याद करते हुए ये वाकया बताते हैं। स्याह कहानियों की सीरीज ब्लैकबोर्ड में आज ऐसे परिवारों की कहानी, जिन्होंने ईसाई धर्म अपनाया तो गांव के लोगों ने विरोध किया। परिवार में किसी की मृत्यु हुई तो उसके शव को ईसाई धर्म के मुताबिक दफनाने से रोक दिया। छत्तीसगढ़ के जगदलपुर से करीब 60 किलोमीटर दूर छिंदावाड़ा गांव। रास्ते में कई जगह ईंट से बनी कब्र नजर आ रही हैं। गांव पहुंचते ही मेरी मुलाकात 42 साल के रमेश बघेल से हुई। रमेश बताते हैं, ‘उस दिन हम सभी पापा की लाश के पास बैठकर रो रहे थे। अचानक सरपंच और गांव के लोग कहने लगे- लाश को गांव की सीमा से बाहर दफनाओ या फिर किसी नाली या गटर में फेंक दो। तुम लोगों ने महार जाति के खिलाफ जाकर ईसाई धर्म अपनाया है, इसलिए लाश यहां नहीं दफना सकते। सोचने लगा कि लोग तो कुत्ते-बिल्ली को भी मौत के बाद अपनी जमीन में दफनाते हैं। मुझसे पापा की लाश नाली में फेंकने को कहा गया, जबकि पापा तो 13 एकड़ जमीन के मालिक थे। मरने के बाद उन्हें दो गज जमीन भी न दे सका।' रमेश कहते हैं- 'उनकी बातें सुनते ही मैं लोगों से मिन्नतें करने लगा। कहने लगा कि सिर्फ मूर्ति पूजा में यकीन नहीं करता हूं, इसलिए ईसा-मसीह को मानता हूं। मैंने घर पर बनी चर्च में भी ईसा मसीह की मूर्ति नहीं लगाई है। पक्का ईसाई नहीं हूं। मेरे पापा को कब्रिस्तान में जगह मिलनी चाहिए। जो आदमी इस गांव में पैदा हुआ। पला-बढ़ा, उसे मरने के बाद गांव की मिट्टी नसीब होनी चाहिए। इतनी गुहार लगाने पर सरपंच ने गाली देते हुए कहा- क्या तुम लोगों ने हमसे पूछकर धर्म बदला था? किसी भी कीमत पर तुम्हें ये लाश गांव में नहीं दफनाने देंगे। तुम ही नहीं, तुम्हारे पापा भी ईसाई धर्म मानते थे। ईसाइयों के कब्रिस्तान जहां हों, वहां लाश लेकर जाओ। यह सुनते ही मैं फूट-फूटकर रोने लगा। फिर से हाथ जोड़ते हुए कहा- अगर गांव के कब्रिस्तान में नहीं दफना सकता, तो अपनी जमीन में दफनाऊंगा। पापा ने बड़ी मेहनत-मजदूरी करके 13 एकड़ जमीन खरीदी थी। अपने भाइयों से कहा कि पापा की अर्थी तैयार करो। सरपंच और बाकी लोग फिर से भड़क गए। बोले- पंचायत ने फैसला लिया है कि तुम अपनी जमीन में भी लाश नहीं दफना सकते। पंचायत का फैसला तुम्हें मानना पड़ेगा। हमने एक साल पहले ही तय कर लिया था कि अब से ईसाई धर्म को मानने वाले लोगों को गांव के कब्रिस्तान में शव नहीं दफनाने देंगे। केवल दलित हिंदू ही यहां शव दफना सकते हैं। अगर तुमने गांव वालों के खिलाफ जाकर शव दफनाया, तो बीवी-बच्चों के बारे में सोच लेना। ये बताते हुए रमेश की आंखें भर आईं। खुद को संभालते हुए वो बोले- उस वक्त ऐसा लगा कि सच में अनाथ हूं।' 'उनसे कहा- देखता हूं, कैसे आप लोग पापा की लाश को नहीं दफनाने देंगे। मामले को कोर्ट में लेकर जाऊंगा। जब तक न्याय नहीं मिलेगा, पापा की लाश दफनाऊंगा नहीं। सुनते ही पुलिस बोली- अभी फिलहाल, लाश को जगदलपुर पोस्टमार्टम हाउस लेकर जाना होगा। उधर, पुलिस पापा की लाश पोस्टमार्टम हाउस लेकर गई और मैं रोते हुए तुरंत बिलासपुर हाईकोर्ट के लिए निकल पड़ा।' रमेश बघेल को उनके पिता की लाश न दफनाने देने का यह पहला मामला नहीं था। गांव में ऐसे कई ईसाई परिवारों को शव दफनाने से रोका गया था। रमेश ने बिलासपुर पहुंचकर एक वकील की मदद से हाईकोर्ट में अपील दायर की। कोर्ट ने करीब एक हफ्ते बाद फैसला सुनाया- 'ईसाई धर्म को मानने वाले लोगों के अंतिम संस्कार के लिए पहले से कब्रिस्तान बने हैं। वहीं ले जाना होगा। गांव में दफनाने का आदेश देने से माहौल खराब हो जाएगा।' कोर्ट के फैसले से मुझे बहुत निराशा हुई। उसके बाद दिल्ली के लिए फ्लाइट ली और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।' रमेश आगे बताते हैं कि, 'सर्वोच्च अदालत ने राज्य सरकार को नोटिस जारी किया। कहा- बहुत दुख की बात है कि एक बेटे को अपने पिता का शव दफनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट आना पड़ा। 4 महीने में राज्य सरकार अपनी रिपोर्ट दे। सरकार ईसाई धर्म को मानने वाले लोगों के लिए अलग से कब्रिस्तान की व्यवस्था करे। लेकिन उस रिपोर्ट का क्या हुआ, आज तक पता नहीं चला।' 'पिता की कोई तस्वीर है आपके पास?' मैंने पूछा ‘है न! बड़ी तस्वीर है, लेकिन एक बक्से में है। उनकी तस्वीर देखता हूं तो ये सारी बातें याद आने लगती हैं। मां भी उस तस्वीर को देखकर रोने लगती हैं। फिलहाल रुकिए, दिखाता हूं।’ रमेश घर से पास्टर यानी ईसाई धर्म के प्रचारक पिता सुरेश बघेल की एक बड़ी-सी तस्वीर निकालकर लाते हैं। उनकी नजर बार-बार उस तस्वीर पर रुक जा रही है। मानो वह खुद को रोने से रोक रहे हों। वह कहते हैं- 'पापा का शव 22 दिन तक जगदलपुर पोस्टमार्टम हाउस में पड़ा रहा। जब सुप्रीम कोर्ट से भी न्याय नहीं मिला तो उन्हें जगदलपुर में ही बने ईसाई कब्रिस्तान में दफनाया। गांव नहीं ला पाया, जिसका जिंदगीभर मलाल रहेगा। उन 22 दिनों तक घर का चूल्हा नहीं जला। शव को अंतिम संस्कार किए बिना चूल्हा कैसे जला सकते थे? पड़ोसी हमें खाना खिला रहे थे। आखिर केस लड़ने में ही हमारे लाख-दो लाख खर्च हो गए, लेकिन पिता की लाश को न्याय दिलाने का खर्च गिनाते हुए अच्छा नहीं लग रहा। वो सब याद करके रो देता हूं। अब एक साल बीत चुके हैं। दिसंबर 2024 की बात है। पिता को हाई लेवल डायबिटीज था। तबीयत लगातार खराब होती जा रही थी। करीब हफ्तेभर उन्हें जगदलपुर के अस्पताल में भर्ती रखा। 24 तारीख को हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होकर घर आए थे। एकदम ठीक लग रहे थे। उसके 14 दिन बाद यानी 7 जनवरी 2025 की बात है। सुबह के 8 बजे थे। पत्नी ने नाश्ते में दलिया बनाया था। कहने लगीं- बाबूजी, अभी तक सो कर नहीं उठे हैं, रोज तो जल्दी उठ जाते थे। मैंने मां से पिताजी को जगाने के लिए कहा। मां ने आवाज दी, हिला-डुलाया। जब नहीं जगे तो रोने लगीं। पापा की मौत हो चुकी थी।' इस बातचीत के दौरान सामने एक अलग तरह का सफेद रंग का मकान दिख रहा है। बार-बार मेरी नजर उस पर जा रही है। रमेश कहते हैं- ‘यही मेरा चर्च है। पिताजी ने 1994 में बनवाया था। वह भी ईसा मसीह को मानते थे। दरअसल, मेरे घर में अक्सर लोगों पर देवी-देवता सवार हो जाते थे। झाड़-फूंक चलती रहती थी।’ रमेश कहते हैं कि- 'ओझा ने बताया था कि हमारी पड़ोसन ने करिश्मा कर दिया है। तुम्हारे परिवार पर भूत भेज दिया है। उससे कई बार पड़ोसियों से झगड़े हुए और मार-पिटाई भी। परेशान होकर पिताजी चर्च में जाने लगे। धीरे-धीरे उनका ईसाई धर्म के प्रति झुकाव बढ़ता गया और हिंदू धर्म से विश्वास उठने लगा। उसके बाद मेरा पूरा परिवार चर्च में प्रार्थना करने जाने लगा। ईसाई धर्म मानने के बाद हमारे घर में भूत-प्रेत की समस्या हमेशा के लिए खत्म हो गई। उसके बाद पिताजी ने यह चर्च बनवाया। हमने चर्च में आज भी ईसा मसीह की मूर्ति नहीं रखी है। इसमें सिर्फ प्रार्थना करते हैं। आखिर इसमें बुराई क्या है?' बातचीत के बीच रमेश बघेल की मां आ जाती हैं। रमेश इशारा करते हैं- 'अब बातचीत बंद कीजिए। मां यह सब सुनेंगी, तो रोने लगेंगी। वह बताते हैं कि अब तो ईसाई धर्म मानने वाले लोगों की एक टीम तैयार कर ली है। जिसके घर में कोई दिक्कत आती है, जाकर हम उसकी मदद करते हैं। किसी के घर में मृत्यु होने पर इलाके में उसके दफनाने की व्यवस्था करते हैं। काश, पिता को अपनी जमीन में दफना पाता और उनकी कब्र पर जाकर उन्हें याद कर पाता!' रमेश बघेल के घर से दो किलोमीटर दूर चंद्रवती का घर है। कच्चे मकान के आंगन में वह कई घंटे से बैठी हैं। साथ में बेटी ओजमनी भी हैं। चंद्रवती को गोंडी भाषा ही आती है। उनकी बेटी ओजमनी बताती हैं- 'मैं तो अपने पापा के शव को गांव लेकर आई ही नहीं। कैसे आती? उनकी मृत्यु से पहले ही गांव के लोग घर के बाहर जुट गए थे। कह रहे थे- गांव में शव को लेकर आए, तो पूरे घर को तोड़ देंगे। 21 जनवरी 2026 की बात है। विशाखापट्टनम में पढ़ाई करती थी। घर से खबर आई कि पिता की तबीयत खराब है। उनके ब्रेन में खून जम गया है। मम्मी और मेरे भाई पापा को लेकर रायपुर भागे। दो दिन वहां भर्ती रहे। 23 तारीख की सुबह उनकी सर्जरी हुई। उसके कुछ घंटे बाद ही मौत हो गई। उस वक्त हम नहीं चाहते थे कि किसी तरह का झगड़ा-विवाद हो। इसलिए पापा के शव को जगदलपुर के ईसाई कब्रिस्तान में ले जाकर दफनाया।' मैंने ओजमनी से पूछा- ‘धर्म कब बदला?’जवाब मिला- 'बहुत साल पहले। अब तो 25 साल की हूं। ईसाई धर्म में ही पैदा हुई। मम्मी बताती हैं कि मेरे छोटे चाचा पास्टर यानी ईसाई धर्म के प्रचारक थे। उस वक्त मम्मी को जितने भी बच्चे होते, सभी की मौत हो जाती थी। चाचा के कहने पर मम्मी चर्च जाकर प्रार्थना करने लगीं। हम पैदा हुए और सभी बच गए। हम लोग तीन बहन और एक भाई हैं। तब से हम ईसाई धर्म को मानने लगे। लेकिन बस्तर और मेरे गांव में हाल-फिलहाल में जो कुछ हुआ है, वह तो कुछ भी नहीं है। यहां कई इलाके तो ऐसे हैं, जहां ईसाई धर्म मानने की वजह से कई दफनाए हुए शवों को कब्र से बाहर निकाल दिया गया।' उनकी बात सुनकर मेरी भौहें तन जाती हैं। मन-ही-मन सवाल उठ रहा है- शायद यह लड़ाई कफन और दफन की है। इसके बाद मैं बस्तर के उस इलाके के लिए निकल पड़ता हूं, जहां एक शख्स के पिता का शव 90 गांव के लोग कब्र से निकालकर ले गए। पूरी कहानी अगले गुरुवार, 21 मई को ‘ब्लैकबोर्ड’ की नई सीरीज में… ---------------------------------------------- 1- ब्लैकबोर्ड-सुहागरात पर ड्रग्स लेने गया, रातभर नहीं लौटा:हर हफ्ते लड़कियां बदलता, सड़क पर अंडरवियर में मिला; नशे के लिए 25 लाख की नौकरी छोड़ी 'जुलाई 2022 की वो रात… जिस रात के लिए ज्यादातर लोग सपने बुनते हैं। उस दिन मेरी सुहागरात थी। कमरा सज चुका था। रिश्तेदार थककर सो गए थे। दुल्हन मेरे कमरे में इंतजार कर रही थी। मैं उसके कमरे में गया और उससे बात किए बिना बगल में लेट गया। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 1- ब्लैकबोर्ड-पत्नी के घरवालों ने नंगा करके पीटा, नस काटकर सुसाइड:पत्नी ने कॉलर पकड़कर मांगे 20 लाख तो फांसी लगाई; तंग पतियों की स्याह कहानियां ‘20 जनवरी 2025 की बात है। शाम के 4 बजे थे। मैं अपने दोनों पोतों को स्कूल से लेकर घर लौट रही थी। रास्ते में मेरा छोटा बेटा नितिन बाइक से आ रहा था। उसने कहा- मम्मी, बाइक पर बैठ जाओ। फिर हम उसके साथ घर आए। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें

