अमेरिका और ईरान युद्ध रोकने में पाकिस्तान हुआ फेल मध्यस्थता की कोशिशें नाकाम
कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका के बीच अमेरिका ने रूसी तेल पर छूट का बचाव किया
अमेरिका के ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने रूस के तेल पर लगाए गए प्रतिबंधों में दी गई अस्थायी छूट का बचाव किया
कुलभूषण जाधव के अपहरणकर्ताओं का काल बना ,ईरान पाकिस्तान में घुसकर जैश-अल-अदल के आतंकियों को किया ढेर
दुनिया से कट जाएगा भारत? ईरान का खतरनाक प्लान, समुद्र के नीचे बिछी इंटरनेट की नसों पर मंडराया संकट
ट्रंप ने ईरान के साथ युद्धविराम को बिना किसी समय सीमा के बढ़ाया, नौसैनिक नाकेबंदी जारी रहेगी
डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने ईरान के साथ अपने युद्धविराम को बढ़ा दिया है, जबकि व्यापक नौसैनिक नाकेबंदी जारी रखी गई है
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि ग्रीर ने ट्रंप की टैरिफ नीति का बचाव किया
अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि जेमीसन ग्रीर ने ट्रंप प्रशासन की व्यापार नीति का जोरदार बचाव किया
होर्मुज स्ट्रेट में ईरान का हमला, भारत आ रहे जहाज को बनाया निशाना
ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट में एक जहाज पर हमला किया, जो भारत के मुंद्रा बंदरगाह जा रहा था। यह हमला उस घोषणा के कुछ घंटों बाद हुआ, जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अनिश्चितकालीन सीजफायर की बात कही।
‘20 जनवरी 2025 की बात है। शाम के 4 बजे थे। मैं अपने दोनों पोतों को स्कूल से लेकर घर लौट रही थी। रास्ते में मेरा छोटा बेटा नितिन बाइक से आ रहा था। उसने कहा- मम्मी, बाइक पर बैठ जाओ। फिर हम उसके साथ घर आए। नितिन ने बाइक खड़ी की और सीढ़ियां चढ़ते हुए कहा- मां, मैं छत पर कमरे में सोने जा रहा हूं। शादी के बाद से वह छत पर बने कमरे में ही रहता था। उसकी पत्नी मायके गई हुई थी। रात के 9 बज चुके थे। अब तक कमरे में गए उसे 5 घंटे हो चुके थे। मैंने उसकी पसंद की प्याज की भुजिया बनाई थी। खाने के लिए कई आवाजें लगाई, लेकिन नहीं आया। कुछ देर बाद उसकी भाभी ऊपर गईं। दरवाजा खटखटाया, लेकिन जवाब नहीं मिला। वह घबराई हुई नीचे लौटीं और बोली- भइया गेट नहीं खोल रहे। इसके बाद मैं और मेरा बड़ा बेटा सूरज ऊपर गए। दरवाजा पीटा, लेकिन कोई हलचल नहीं हुई। परेशान होकर सूरज ने खिड़की से अंदर झांका तो नितिन की टांगें लटक रही थीं। यह देखते ही वह चीख पड़ा। मैं तो बेहोश हो गई।', यह कहते हुए 51 वर्षीय नितिन की मां राधा पड़ियार फूट-फूटकर रोने लगती हैं। स्याह कहानियों की सीरीज ब्लैकबोर्ड में आज ऐसे पतियों की कहानी, जिन्होंने अपने रिश्ते से तंग आकर आत्महत्या कर ली। इससे पहले राधा से बातचीत के लिए मैं उनके घर इंदौर पहुंचा था। वह आगे बताती हैं- बड़े बेटे सूरज ने दरवाजा तोड़ा और नितिन को नीचे उतारा। उसने प्रेस आयरन की पावर केबल से फांसी लगा ली थी। नितिन ने हर्षा से लव मैरिज की थी। इस तरह बहू ने मेरे बेटे को छीन लिया। सामने दीवार पर नितिन की तस्वीर टंगी है, तभी उनकी नजर उस पर पड़ती है और देखकर उनके आंसू निकल पड़ते हैं। वह धीमी आवाज में कहती हैं- यहां नितिन और हर्षा की कई तस्वीरें लगी थीं। बेटे के जाने के बाद सब हटा दीं। बात 2013 की है। तब नितिन इंदौर में नौकरी के साथ पढ़ाई भी कर रहा था। वहां एक मार्केट में आना-जाना था, जहां हर्षा का परिवार रहता था। वे मूलरूप से राजस्थान के कुचामन के रहने वाले थे। वहीं पर नितिन और हर्षा मिले थे। नितिन ने अपनी पढ़ाई छोड़ दी, लेकिन हर्षा को एमसीए की पढ़ाई कराई। 2018 में हर्षा का परिवार इंदौर से अपने गांव राजस्थान लौट गया। हर्षा भी गई थी, लेकिन कुछ समय बाद इंदौर वापस आकर अपने चाचा के घर रहने लगी। नितिन और उसकी दोबारा मुलाकातें होने लगी। 2019 में दोनों ने शादी कर ली। उस दिन शाम को नितिन के दोस्त का फोन आया। उसने बताया- आंटी, नितिन ने मंदिर में हर्षा से शादी कर ली है। उसके बाद मेरे बड़े बेटे सूरज ने नितिन को फोन लगाया नितिन ने कहा- हां भइया, शादी कर ली है, लेकिन घर नहीं आऊंगा। वह हर्षा के साथ किराए के मकान में रहने लगा। राधा कहती हैं- लेकिन मैं बहुत चिंतित थी, क्योंकि हर्षा की मां इस शादी के खिलाफ थीं। धमकी देती थीं कि अगर मेरे बेटे ने उनकी बेटी से शादी की, तो दोनों को जिंदा जला देंगी। शादी के दो महीने बाद बड़े बेटे सूरज ने नितिन को फोन किया। कहा- मां की तबीयत खराब है, आकर देख लो। नितिन घर आया। मेरी हालत देखकर उसने हर्षा से कहा- अब यहीं रहेंगे। उसके बाद हमने दोनों के लिए रिसेप्शन भी रखा, लेकिन हर्षा के घर से कोई नहीं आया। शुरुआती 7-8 महीने सब ठीक रहा। नितिन ने अपने लिए छत पर एक कमरा बनवाया और वहीं रहने लगा। राधा बताती हैं कि एक दिन हर्षा की बड़ी बहन का फोन आया। उसके बाद दोनों में बातचीत शुरू हुई और कुछ समय बाद वह मेरे घर आने लगी। उसके बाद हर्षा का स्वभाव बदलने लगा। उसकी मायके वालों से बातचीत बढ़ी और घर का माहौल बिगड़ने लगा। वो नितिन से कहती थी- तुम्हारे मां-बाप होते कौन हैं, मुझे कुछ कहने वाले? मैं 9 बजे सोकर उठूं या 11 बजे? धीरे-धीरे उसने नितिन पर अलग घर बसाने का दबाव बनाना शुरू किया। वह कहती थी- परिवार से अलग हो जाओ और मेरे नाम से फ्लैट खरीदो। रिश्ता बचाने के लिए नितिन फिर किराए के मकान में रहने लगा। हर्षा, नितिन से कहती- बाहर खा लिया करो... मेरे लिए भी लाया करो। मैं कोई नौकर नहीं हूं, जो बनाकर खिलाऊं। उस वक्त हर्षा के माता-पिता नितिन से पैसे मांगते, लेकिन लौटाते नहीं। इन वजहों से नितिन टूटने लगा था। इस बातचीत के दौरान, राधा के बड़े बेटे सूरज ऑफिस से घर आ जाते हैं। उन्हें देखते ही राधा थोड़ी देर चुप हो जाती हैं, फिर भर्राई आवाज में कहती हैं- मैं नितिन के बिना रह नहीं पाती। दिवाली का दिन था। उस दिन हर्षा का नितिन से झगड़ा हुआ था। शाम को हम दीये और मिठाई लेकर उसके घर पहुंचे, तो वह एक कोने में बैठा था। उसने कहा- हर्षा कई दिनों से फ्लैट लेने को लेकर लड़ रही है। नाराज है, इसलिए आज उसने खाना नहीं बनाया। उस रात हमने उसके घर दीये जलाए, खाना मंगवाकर खिलाया और लौट आए। कुछ दिन बाद नितिन फिर से हर्षा को लेकर घर आ गया। उस समय हर्षा तीन महीने की गर्भवती थी। इस बार नितिन ने ऊपर कमरे के पास एक छोटा किचन भी बनवा दिया, लेकिन हर्षा का व्यवहार नहीं बदला। एक दिन अचानक वह अपने मायके चली गई। वहां जाकर गर्भपात करवा लिया और नितिन को बताया कि बच्चा खराब हो गया है। उसके बाद नितिन खुद उसे लेकर वापस आया। राधा बताती हैं- 2023 में हर्षा फिर गर्भवती हुई। उसने बेटे को जन्म दिया, तो लगा, सब ठीक हो जाएगा। पोता पांच महीने का था। होली आने वाली थी। हर्षा ने कहा कि उसके मायके में पूजा है, जाना पड़ेगा। हमने रोकने की कोशिश की, लेकिन नहीं मानी। उसके बाद फिर लौटकर नहीं आई। मायके से नितिन को फोन करके कहती- मेरे नाम से फ्लैट खरीदो, तभी आऊंगी। जब नितिन ने फ्लैट नहीं खरीदा, तो उसने राजस्थान के कुचामन में हमारे खिलाफ दहेज प्रताड़ना, रेप का केस दर्ज कराया। हमें जेल हो गई। काफी दिनों बाद जमानत मिली। इसके बाद हमें हर सुनवाई पर राजस्थान जाना पड़ता था। वहां हर्षा का परिवार समझौते के नाम पर 20 लाख रुपए मांगता था। धमकी देता- पैसे दो और मामला खत्म करो... नहीं तो जीना हराम कर देंगे। राधा बताती हैं- आखिरी बार दिसंबर 2024 में हम सुनवाई के लिए गए थे। वहां हर्षा ने कचहरी में नितिन का कॉलर पकड़ लिया और कहा- तू जिंदा क्यों है रे नितिन? 20 लाख नहीं दे सकता, तो मर क्यों नहीं जाता? उस घटना के बाद नितिन बहुत परेशान हो गया। गुमसुम रहने लगा। मुकदमे की अगली तारीख में अभी 10 दिन बाकी थे। उस दिन रात में उसने फांसी लगा ली। यह कहते हुए राधा फिर से रो पड़ती हैं। बगल में बैठे सूरज की भी आंखें भर आती हैं। रुंधे गले से वह कहते हैं- भाई ने 14 पन्नों का सुसाइड नोट लिखा था। नोट में नितिन ने हर्षा, उसकी मां और दोनों बहनों पर आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाया था। भाई की मौत के 10 दिन बाद एफआईआर दर्ज हुई थी। मामले में अभी हर्षा और उसकी मां इंदौर जेल में हैं, जबकि उसकी दोनों बहनें जमानत पर बाहर आ गई हैं। अब इंदौर से निकलकर मैं दिल्ली पहुंचता हूं। वहां छतरपुर में 70 साल की ऊषा बरनवाल से मुलाकात होती है। वह बेटे की मौत के बाद अपनी बेटी मोनिका के साथ रह रही हैं। बातचीत के लिए बैठते ही वह भर्राई आवाज में कहती हैं- पता नहीं, उस औरत को क्या चाहिए था। आखिर उसने मेरे इकलौते बेटे की जान ले ली। ऊषा यह बातें अपने हॉल के सोफे पर बैठकर रही हैं। सामने दीवार पर उनके पति और बेटे निशांत की तस्वीरें टंगी हैं। वह बताती हैं- 2015 की बात है। हम वाराणसी में रहते थे। एक रिश्तेदार ने कहा- आपके बेटे की उम्र 31 साल हो गई है। एक पढ़ी-लिखी लड़की है, परिवार अच्छा है... शादी कर दीजिए। मैंने सोचा, बेटा सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर है, अच्छी कमाई कर रहा है। हमने रिश्ता तय कर दिया। उसी साल अप्रैल में शादी भी हो गई। शादी के बाद बहू निधि एक हफ्ते हमारे साथ रही। फिर निशांत के साथ नोएडा चली गई। कुछ समय बाद वहां दोनों के बीच झगड़े बढ़ने लगे, लेकिन बेटे ने कभी शिकायत नहीं की। 2022 में कोरोना के दौरान लॉकडाउन बढ़ा तो दोनों वाराणसी आ गए। उनका एक बच्चा भी हो चुका था। वहां रहने के दौरान निधि गुस्से में हमारे किराएदारों से लड़ती। कहती- मकान खाली करो, इसमें मुझे रहना है। निशांत मुझसे कहता- ‘मां, किस लड़की से आपने शादी करवा दी? सनकी है।’ उसी बीच 18 सितंबर 2023 को मेरे पति की अचानक मौत हो गई। हमें समझ नहीं आया कि उन्हें क्या हुआ था। उसके बाद घर में तनाव बढ़ गया। बेटे और निधि के बीच झगड़े बढ़ते गए। पति की मौत के बाद मैं दिल्ली बेटी के पास आकर रहने लगी। उस वक्त बेटा बार-बार कहता- मां, मेरे पास आकर रहो। लेकिन मैं कहती- तू ऑफिस चला जाएगा, तो पूरे दिन तेरी पत्नी को कैसे झेलूंगी? कुछ पल रुककर ऊषा कहती हैं- काश बेटे के पास चली जाती तो शायद उसकी जान बच जाती। 14 सितंबर 2024 की रात एक बजे थे। मेरे पति की बरसी में चार दिन बचे थे। वाराणसी से देवर का फोन आया। उन्होंने बताया कि निशांत ने आत्महत्या कर ली है। उन्हें खबर बहू निधि ने दिया। ऊषा रोते हुए कहती हैं- सोचिए, हम नोएडा से ज्यादा दूर नहीं थे... फिर भी बहू ने हमें फोन न करके मेरे देवर को किया। उसके बाद मेरी बेटी ने निधि को फोन किया। जवाब आया- हां, निशांत ने सुसाइड कर लिया है। आ जाओ। हम तुरंत नोएडा निकल पड़े। रास्ते में पुलिस का फोन आया कि वह शव अस्पताल लेकर जा रही है। ऊषा की आवाज कांपने लगती है। वह कहती हैं- उसके बाद हम अस्पताल पहुंचे, तो सामने स्ट्रेचर पर बेटे का शव पड़ा था। निधि पुलिस वालों के साथ खड़ी, बोतल से पानी पी रही थी। उसके चेहरे पर तनिक भी पछतावा नहीं था। सदमे में मेरी बेटी मोनिका बोल पड़ी- तुमने मेरे भाई की जान ले ली न! अस्पताल से लौटकर हम निशांत के फ्लैट पर पहुंचे। जिस कमरे को निधि आत्महत्या की जगह बता रही थी, वहां कटी हुई रस्सियां पड़ी थीं। पंखे में फंदे का हिस्सा अटका था और पास ही एक कैंची रखी थी। यह सब देखकर लगा कि मामला वैसा नहीं है, जैसा बताया जा रहा है। उनका आरोप है कि पुलिस ने उस घर की ठीक से छानबीन नहीं की। जब हमने सीसीटीवी फुटेज देखे, तो पता चला कि पूरी घटना रात साढ़े नौ बजे के बाद की थी। उससे पहले दोनों के बीच झगड़ा हुआ था। ऊषा का दावा है कि घटना से पहले निशांत ने कई वीडियो भी रिकॉर्ड किए थे। वे बाद में उसकी मोबाइल से मिले थे। इसलिए निधि, निशांत का मोबाइल फोन लेना चाह रही थी और अपना फोन छिपाकर रखना चाह रही थी। निशांत का सिम कार्ड निधि के मोबाइल में था। मौत के तुरंत बाद उसने बेटे का सिम अपने फोन में लगा लिया था। ऊषा यह भी दावा करती हैं कि- निधि ने पुलिस से कहा था कि उसने अकेले ही निशांत का शव पंखे से उतारा और गार्ड को बुलाकर बाहर लेकर आई। आखिर जिस महिला के पति की मौत हुई हो, क्या वह अकेले शव उतार पाएगी? कोई जांच-पड़ताल हुई? निशांत की बहन मोनिका आरोप लगाती हैं कि- जांच तो छोड़िए, पुलिस ने निधि से ठीक से पूछताछ तक नहीं की। घटना के तुरंत बाद निधि सामान लेकर मायके रांची चली गई। कमरे में एक पैंट मिली थी, जिसमें गुटखे के पैकेट रखे थे। मेरा भाई गुटखा नहीं खाता था। समझ नहीं आया कि उस रात कमरे में कौन आया था। ठीक से जांच होती, तो शायद सच सामने आ जाता। मोनिका यह भी आरोप लगाती हैं कि- उस फ्लैट को सीज नहीं किया गया और कुछ ही दिनों बाद उसे पेंट कर दिया गया। वह बताती हैं कि नोएडा की सूरजपुर कोर्ट ने मामले की दोबारा जांच के आदेश दिए थे। अभी मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में है। रुंधी आवाज में मोनिका कहती हैं- लगता नहीं कि भाई को न्याय नहीं मिलेगा। अगले दिन सुबह मैं गुरुग्राम पहुंचता हूं, जहां डॉली से मुलाकात होती है। डॉली एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती हैं। धीमी आवाज में कहती हैं- शादी के चार महीने के भीतर ही मेरे भाई ने आत्महत्या कर ली। रिश्ता एक मैट्रिमोनियल साइट के जरिए तय हुआ था। सितंबर 2024 की बात है। हम पटना के रहने वाले हैं। लड़की का परिवार रांची का। 9 नवंबर को हम लड़की देखने गए, लेकिन वहां हमसे बिना ठीक से बातचीत के भाई को अगूंठी पहनाकर सगाई करा दी। उसके बाद लड़की नोएडा स्थित मेरे भाई के फ्लैट पर आने-जाने लगी। उसी साल फरवरी में शादी कर दी गई। एक हफ्ता पटना में रहने के बाद विकास, पत्नी एकता को लेकर नोएडा चला गया। मार्च में दोनों की पहली होली थी। एकता शादी में मिले गिफ्ट और गहनों से खुश नहीं थी। झगड़ा करती थी। बालकनी से कूदने की धमकी देती थी। एक बार तो भाई को पुलिस भी बुलानी पड़ी थी। शादी के करीब दो महीने के बाद एकता की मां भी नोएडा आईं। उनके सामने भी एकता भाई से झगड़े करती। भाई ने परेशान होकर हमें बताया। उसके बाद हमने उसे गुरुग्राम बुला लिया। उधर, मां-बेटी उसका कीमती सामान और गहने लेकर रांची चली भाग गईं और हमारे खिलाफ केस दर्ज करा दिया। एकता ने हमें सोशल मीडिया पर ब्लॉक कर दिया, लेकिन विकास से स्नैपचैट पर बात करती थी। एक दिन उसने विकास से कहा- रांची में मेरा दम घुट रहा है, मुझे ले चलो। उसकी जिद पर जुलाई में भाई विकास, एकता के घर गया। वहां उसके परिवार वालों ने उसे नंगा करके पीटा, कान पकड़कर उठक-बैठक कराई और भगा दिया। उस सदमे में वह एक होटल पहुंचा और हाथ की नस काट ली। पुलिस को खबर मिली, तब उसे अस्पताल ले गई। उसके बाद विकास नोएडा आकर रह रहा था। 3 अगस्त 2025 की बात है। एकता एक दिन अचानक नोएडा भाई के पास पहुंची। दोनों के बीच झगड़ा हुआ। एकता ने विकास के शरीर पर नाखूनों से चोट पहुंचाई और अगले दिन सामान पैक करके वापस रांची चली गई। वह रास्ते में ही रही होगी। 5 अगस्त की रात भाई ने आत्महत्या कर ली। उससे पहले भाई ने हमें एक वीडियो भेजा था। कलाई की नस काटने के बाद फंदा लगा लिया था। वह रुककर कहती हैं- जब तक हम गुरुग्राम से नोएडा पहुंचते, देर हो चुकी थी। मां उस समय छोटी बहन के पास ऑस्ट्रेलिया गई हुई थीं। वो आज भी कहती हैं- अगर वह विदेश नहीं जाती, तो उनका बेटा बच जाता। रुंधे गले से डॉली कहती हैं- भाई की मौत के बाद एफआईआर दर्ज कराने के लिए भटकती रही। जिन लोगों पर शक है, वे आज भी खुले में घूम रहे हैं। मामला सूरजपुर सेशन कोर्ट में है। एकता जमानत पर बाहर है। पुरुष आयोग की अध्यक्ष बरखा त्रेहान कहती हैं, ‘जब भी ऐसे मामले सामने आते हैं तो लगता है कि जो कानून महिलाओं को बचाने के लिए बने थे, उन्हीं को ढाल बनाकर अब पुरुषों को फंसाया जा रहा है। पुरुषों को आगे आकर बोलना पड़ेगा।’ नोट- घरेलू हिंसा का शिकार महिला या पुरुष, कोई भी हो सकता है। ऐसी स्थिति में परिवार, दोस्तों या काउंसलर से मदद लें। आत्महत्या समाधान नहीं है। ---------------------------------------------- 1- ब्लैकबोर्ड-जान बचानी थी, तो सिर पर बांध ली भगवा पट्टी:दंगे की तस्वीर ने मेरी जिंदगी बर्बाद की- हिंदुत्व का चेहरा बना, लेकिन मिला कुछ नहीं 2002 गुजरात दंगे के दो पोस्टर बॉय की कहानी, जिनमें हिंदुत्व का चेहरा बने मोची अशोक परमार आज दो वक्त की रोटी को मोहताज हैं। सर्दी, गर्मी, बरसात सड़क पर सोते हैं। वे उस वक्त 27 साल के थे। आज 51 साल के हैं। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- ब्लैकबोर्ड-वो बेटी जैसी थी, उसके पिता बोले-तूने इसका रेप किया: 25 साल बाद जेल से बरी, आज भी लगता है कोई मारने आ रहा है 57 साल के आजाद खान अपने भाई की किराने की दुकान पर बेसुध बैठे हुए हैं। तीन महीने पहले ही 25 साल बाद जेल से बाइज्जत बरी होकर आए हैं। अकेले में कुछ बुदबुदा रहे हैं। पूछने पर कहते हैं- पूरी जिंदगी काल-कोठरी में गुजार दी। अब किसी से क्या ही बात करूं, क्या ही बचा है! पूरी स्टोरी यहां पढ़ें
पश्चिम बंगाल का नक्सलबाड़ी, यहां की गलियों में आज भी 'लाल' रंग बिखरा है, बस उस रंग की चमक फीकी पड़ गई है। ये लाल रंग नक्सल आंदोलन की निशानी है। सबसे बड़ी निशानी लाल चारदीवारी वाला एक घर है। झंडे लाल, छत भी लाल। दीवार पर अंग्रेजी में लिखा है- कानू सान्याल स्मृति भवन। ये नक्सल आंदोलन के शुरुआती लीडर कानू सान्याल का घर है। कानू सान्याल ने मई, 1967 में चारू मजूमदार के साथ मिलकर नक्सलवाद की शुरुआत की थी। कानू सान्याल के घर के बगल में एक कच्चा घर और है। अंदर एक चारपाई, मिट्टी का चूल्हा और कुछ पुराने बर्तन हैं। ये शांति मुंडा की कुल जमा पूंजी हैं। 84 साल की शांति कभी कानू सान्याल की भरोसेमंद सिपाही थीं। 1967 में जब पुलिस की गोलियां चल रही थीं, तब 25 साल की शांति पीठ पर बेटी को बांधकर इंकलाब के नारे लगा रही थीं। शांति अब लाठी के सहारे चलती हैं। हाथ जोड़कर मिलती हैं, लेकिन आवाज में वही पुरानी ठसक है। वे कहती हैं, 'मोदी हों या ममता, कोई नक्सल आंदोलन को मिटा नहीं सकता। रूस, जर्मनी, चीन में देखिए। बहुत लोग मरे, लेकिन कम्युनिस्ट कभी न खत्म हुआ, न कभी होगा।' नॉर्थ बंगाल की 54 सीटों में 30 BJP के पास, नक्सलबाड़ी में आज वोटिंग केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 30 मार्च को लोकसभा में कहा कि नक्सलवाद अब लगभग पूरी तरह खत्म हो चुका है। इस दावे के बाद नक्सलबाड़ी में पहला विधानसभा चुनाव है। 23 अप्रैल यानी आज वोटिंग है। दार्जिलिंग से करीब 60 किमी दूर बसा नक्सलबाड़ी 2011 से पहले सिलीगुड़ी विधानसभा सीट में था। 2008 में परिसीमन हुआ और 2011 में अलग माटीगाड़ा-नक्सलबाड़ी सीट बनी। तीन बार चुनाव हुए, जिनमें दो बार कांग्रेस जीती। 2021 में पहली बार BJP को जीत मिली। BJP मौजूदा विधायक आनंदमय बर्मन को दोबारा टिकट दिया है। TMC की तरफ से शंकर मलकार मैदान में हैं। चाय बागानों के लिए मशहूर ये एरिया नॉर्थ बंगाल में आता है। 2021 के विधानसभा चुनाव में BJP ने नॉर्थ बंगाल की 54 में से 30 सीटें जीती थीं। TMC को 23 सीटें मिली थीं। इस बार BJP 32 से 38 सीटों पर मजबूत है। पहले फेज की 152 सीटों में 80 से 90 सीटों पर BJP आगे दिख रही है। शांति का दर्द: नेताओं के पास बड़ी गाड़ियां, नातिन के पास 'चाकरी' नहीं शांति मुंडा नक्सली संगठन की महिला समिति में थीं। कानू सान्याल के साथी चारु मजूमदार से बहुत प्रभावित थीं। दो बार चुनाव लड़ीं, लेकिन जीती नहीं। शांति कानू सान्याल के घर के बगल में रहती हैं। नक्सल आंदोलन के बारे में क्या याद है? शांति कहतीं हैं, ‘सब याद है। जमीन की लड़ाई से कहानी शुरू हुई थी। जमींदारों ने एक बिगुल नाम के एक किसान का सिर फोड़ दिया था। जमीन की लड़ाई तब भी थी, आज भी है। हर जगह जमीन बिक रही है, ये लड़ाई खत्म नहीं होगी।’ ‘अब नेता बदल गए हैं। पहले अपना काम देखते हैं। कम्युनिस्ट पार्टी की सोच है कि पहले जनता होनी चाहिए और नेता उनके पीछे। आजकल तो नेता जनता से आगे हैं। उनके पास बड़ी-बड़ी गाड़ियां हैं। अगर हम भी चुनाव जीत गए, तो रावण राजा बन जाएंगे। मैं अब भी कम्युनिस्ट पार्टी के बुलाने पर मीटिंग में जाती हूं, लेकिन विचार अब अलग हो गए हैं।’ ‘मोदी कहते हैं कम्युनिस्ट को खत्म कर देंगे, लेकिन ये मरेगा नहीं’ नक्सलबाड़ी में कम्युनिस्ट पार्टी पीछे रह गई हैं। TMC और BJP में मुकाबला है। इस पर शांति कहती हैं, ‘अरे ममता-मोदी सब एक ही हैं। लोग कहते हैं कि कम्युनिस्ट खत्म हो जाएगा। नरेंद्र मोदी भी बोलते हैं कि खत्म कर देंगे। करिए। पब्लिक है न। हम नहीं करेंगे, नेता भी नहीं करेंगे, जनता फैसला करेगी। कम्युनिस्ट कभी नहीं मरता है।’ मार्क्स, माओ, लेनिन, स्टालिन की मूर्ति; लोग बोले- लाल पार्टी खत्म नक्सलबाड़ी में 25 मई, 1967 को पुलिस फायरिंग में 11 लोग मारे गए, जिनमें 8 महिलाएं और दो बच्चे भी थे। इस जगह शहीद बेदी (वेदी) बनी है। बीच में चारू मजूमदार की मूर्ति है। आसपास कार्ल मार्क्स, लेनिन, स्टालिन और माओत्से तुंग की मूर्ति है। यहां मिले सुनील 1967 के आंदोलन के गवाह हैं। तब वे 13 साल के थे। सुनील कहते हैं, ‘यहां सिर्फ 5-6 भारतीयों की मूर्ति लगी है। बाकी विदेशी हैं। ये लोग खत्म हो गए। साल में एक बार यहां लोग फूल चढ़ाने आते हैं। इन लोगों ने पहले काम किया है। इन्हीं का खून बहा। धीरे-धीरे सब खत्म हो गया। अब यहां TMC और BJP में मुकाबला है। कांग्रेस और लाल पार्टी खत्म हो गई। ‘नक्सलबाड़ी नाम सुनते ही लोग हमें नक्सली समझ लेते हैं’ नक्सलबाड़ी के रेलवे स्टेशन से मार्केट की तरफ जाने वाले रास्ते में दोनों तरफ पार्टियों के झंडे लगे हैं। कई दुकानों पर BJP और TMC के झंडे साथ दिखे। मिठाई की दुकान चलाने वाले सायन कुंडू बताते हैं, ‘यहां से जिसकी रैली निकलती है, वही अपना झंडा लगा देते हैं। हम झंडे नहीं लगाते।’ नक्सलबाड़ी नाम से कभी कोई दिक्कत होती है? सायन जवाब देते हैं, ‘हां, अक्सर होती है। मैं पढ़ाई के लिए बेंगलुरू गया था। वहां दोस्तों को बताया कि मेरा घर नक्सलबाड़ी में है। वे अजीब तरह से देखने लगे। नक्सलबाड़ी नाम सुनते ही नक्सली पर ध्यान जाता है। वे अब भी ऐसा ही सोचते हैं।’ नक्सलबाड़ी के मुद्दे… चाय बागान में मजदूरी नहीं बढ़ी, आदिवासी एरिया में वोट कटने से गुस्सा नक्सलबाड़ी के पास 40 से ज्यादा चाय बागान हैं। सभी मैदानी इलाके में हैं। पहाड़ी एरिया में 80 से ज्यादा बागान हैं। यहां के दो मुद्दे हैं। पहला काम के बदले सिर्फ 250 रुपए मजदूरी और वोटर लिस्ट से नाम कटना। यहां मिलीं अनिता भगत कहतीं हैं, मेरे पति और बेटे का नाम वोटर लिस्ट में है। मेरा और देवर का वोट कट गया। हम चकरमाणी में रहते हैं। दिनभर चाय बागान में काम करते हैं, तब 250 रुपए कमाते हैं। नाम कटने पर राजा मुर्मू कहते हैं, ‘आदिवासी का मतलब ही है सबसे पुराना वासी। इसलिए आदिवासियों का नाम कटना नहीं चाहिए। आसपास 4 से ज्यादा बस्तियां हैं। हर परिवार में किसी न किसी का नाम कटा है। नाम कटने का मतलब है कि हमारा अस्तित्व ही काट दिया।’ एक्सपर्ट की राय: पहले फेज में BJP आगे दिख रही, वजह आदिवासी वोट …………………………….. पश्चिम बंगाल चुनाव पर ये ग्राउंड रिपोर्ट भी पढ़ें… हिंदू बाप-बेटे को काट डाला, बंगाल में चुनावी मुद्दा नहीं 11 अप्रैल 2025 को वक्फ संशोधन कानून के विरोध में मुर्शिदाबाद के जाफराबाद में रैली निकाली गई। बेकाबू भीड़ ने पारुल के पति हरगोविंद दास और बेटे चंदन को घर के सामने ही काट डाला। जाफराबाद में लोग इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बता रहे हैं और TMC को हटाने की बात कर रहे हैं, जबकि यहां से 142 किमी दूर मालदा में इसकी चर्चा भी नहीं है। पढ़ें पूरी खबर...
लंबे समय तक नहीं टिक पाएगी ईरान की व्यवस्था: पूर्व अमेरिकी एनएसए (आईएएनएस एक्सक्लूसिव)
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सीजफायर को बढ़ाने का ऐलान किया
वांग यी ने वैश्विक साझा विकास कार्रवाई मंच के तीसरे उच्च-स्तरीय सम्मेलन में भाग लिया
चीन की राजधानी पेइचिंग में वैश्विक साझा विकास कार्रवाई मंच का तीसरा उच्च-स्तरीय सम्मेलन आयोजित किया गया। चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने उद्घाटन समारोह में भाग लिया और संबोधन दिया
अमेरिका की मध्यस्थता में इजरायल और लेबनान के बीच दूसरे राउंड की वार्ता होने जा रही है। इस बीच लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ आउन ने कहा है कि सीजफायर को बढ़ाने के लिए बातचीत चल रही है
ईरान जंग पर ट्रंप का बड़ा यू-टर्न मुनीर और शरीफ की एक चिट्ठी ने कैसे बदल दी बाजी?
नेपाल द्वारा सख्ती बढ़ाए जाने के बाद भारत से नेपाल जाने वाले रोजमर्रा के सामान जैसे दाल, चीनी, रिफाइंड तेल, कपड़े आदि की कीमतों में 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हो गई है।प
होरमुज की खाड़ी पर ट्रंप की महा घेराबंदी ,ईरान को घुटने पर लाने के लिए अमेरिका ने चला बड़ा दांव
ईरान पर आर्थिक दबाव: हर दिन 50 करोड़ डॉलर का नुकसान
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान की हालिया संघर्ष का अर्थव्यवस्था पर गंभीर दबाव पड़ रहा है। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर एक छोटे से पोस्ट के जरिए अपने अंदाज में ईरान की बदहाली बयां की
अमेरिकी राजदूत का दावा, 100 दिन में तेजी से आगे बढ़े भारत-अमेरिका के रिश्ते
भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने अपने कार्यकाल के 100 दिन पूरे करने के साथ ही भारत-अमेरिका संबंधों में तेज प्रगति की बात कही
इजरायल में युद्ध हमलों के पीड़ितों की राज्य स्मृति सभा आयोजित की गई। इस सभा में राष्ट्रपति इसाक हरजोग, प्रधानमंत्री प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और ईरान युद्ध हमलों के पीड़ित परिवारों के लोग मौजूद रहे
ट्रंप ने बढ़ाया संघर्ष विराम, नाकाबंदी बरकरार
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को ईरान के साथ जारी युद्धविराम को बढ़ाने का ऐलान किया, लेकिन साथ ही नौसैनिक नाकाबंदी जारी रखने का आदेश भी दिया
तारीख- 25 फरवरी 2026, जगह- पूर्णिया एयरपोर्ट। एयरस्ट्रिप पर बिहार के डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी, केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय, बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी समेत कई नेता और अधिकारी खड़े थे। शाम करीब 5 बजे BSF का एक खास विमान उतरा। सफेद कुर्ता-पायजामा और गमछे में गृहमंत्री अमित शाह बाहर निकले। Mi-17 V5 हेलिकॉप्टर से शाह सीधे किशनगंज पहुंचे। अगले तीन दिन शाह ने इलाके के सभी जिला कलेक्टरों, एसपी, केंद्रीय बलों और सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारियों से बात की। 27 फरवरी की शाम वे दिल्ली लौटे। शाह के इस दौरे के बाद एक कॉन्सपिरेसी थ्योरी चली कि केंद्र सरकार एक केंद्र शासित प्रदेश बनाने की तैयारी में है, जिसमें बिहार के सीमांचल इलाके के 4 जिले और पश्चिम बंगाल के चिकन नेक या सिलिगुड़ी कॉरिडोर के 8 जिले शामिल हो सकते हैं। कहा गया कि पश्चिम बंगाल चुनाव से ठीक पहले ये ममता बनर्जी को हराने की स्ट्रैटजी है। चर्चा इतनी जोर से उठी कि प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो यानी PIB को इसे अफवाह बताकर खारिज करना पड़ा। इस कॉन्सपिरेसी थ्योरी की हकीकत और ममता के असली चिकन नेक की पूरी कहानी; जानेंगे आज के इलेक्शन एक्सप्लेनर में… चिकन नेक को UT बनाने की मांग पहले भी उठी उत्तर बंगाल के 8 जिले उस भूगोल पर बसे हैं, जिसे दुनिया सिलिगुड़ी कॉरिडोर या चिकन नेक के नाम से जानती है। महज 40 किमी लंबा और 22 से 30 किमी चौड़ा यह रास्ता पूर्वोत्तर के सातों राज्यों को भारत के बाकी हिस्से से जोड़ता है। एक तरफ नेपाल, दूसरी तरफ बांग्लादेश, और सिर्फ 200 किमी दूर चीन। उत्तर बंगाल को अलग करने की मांग पहली बार जून 2021 में उठी थी, जब अलीपुरद्वार से बीजेपी सांसद जॉन बारला ने कहा कि इन जिलों को मिलाकर केंद्र शासित प्रदेश बनाया जाए। ममता ने तुरंत विरोध किया। लेकिन खुद बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने बारला से ये कहते हुए किनारा कर लिया कि बंगाल बांटना हमारा एजेंडा नहीं। तीन साल बाद जुलाई 2024 में गोड्डा से बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने लोकसभा में इसी मांग को और बड़े दायरे में उठाया। झारखंड के संथाल परगना के 6 जिले, बिहार के सीमांचल के 4 जिले और बंगाल के मालदा, मुर्शिदाबाद समेत उत्तरी बंगाल के कुछ हिस्से- सबको मिलाकर UT बनाने की बात कही। तर्क था कि इन इलाकों में मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ रही है। लेकिन न संसद में चर्चा हुई, न बीजेपी ने इसे आधिकारिक स्टैंड बनाया। अब 2026 में बंगाल चुनाव से ठीक पहले शाह की सीमांचल विजिट के बाद यही चर्चा तीसरी बार उठी। उत्तर बंगाल हथियाने से बीजेपी को खास चुनावी फायदा नहीं राजनीतिक तौर पर यह इलाका फिलहाल बीजेपी की तरफ झुका है। 2021 में इन 8 जिलों की 54 सीटों में से बीजेपी ने 30 और टीएमसी ने 24 जीतीं। 2016 में यहां लेफ्ट ने 25 सीटें जीती थीं, लेकिन 2021 तक उसकी जगह बीजेपी ने ले ली। इसकी वजह डेमोग्राफी है। इन 8 में से 6 जिलों में हिंदू आबादी 73-81% के बीच है। सिर्फ उत्तर दिनाजपुर और मालदा में मुस्लिम आबादी 50% के करीब है और वहां टीएमसी मजबूत है। यानी उत्तर बंगाल में बीजेपी की ताकत और टीएमसी की कमजोरी, दोनों का एक ही कारण है- डेमोग्राफी। लेकिन यह आधी तस्वीर है। असली तस्वीर दक्षिण बंगाल में है। ममता का असली ‘चिकन नेक’ हैं मुस्लिम बहुल ये 6 जिले पश्चिम बंगाल के 23 जिलों में 6 मुस्लिम बहुल जिले हैं- मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण 24 परगना, उत्तर 24 परगना और बीरभूम। विधानसभा की 294 में से 118 सीटें यानी 40% सीटें इन्हीं जिलों में हैं। 2021 में टीएमसी ने कुल 215 सीटें जीती थीं- उनमें से 103 यानी 48% सीटें सिर्फ इन्हीं 6 जिलों से आईं। इन जिलों में टीएमसी का जीत प्रतिशत 87% रहा। बीजेपी को महज 14 सीटें मिलीं। यह सिर्फ संख्या नहीं है। यह ममता की पूरी चुनावी गणित की नींव है। अगर यह नींव हिली, तो ममता की सरकार हिलेगी। और इसीलिए इस वोटबैंक को समझना जरूरी है। 15 साल में कैसे बना टीएमसी का यह गढ़? लेफ्ट के 34 साल के राज में मुस्लिम वोटर 'लाल झंडे' के साथ थे। दो घटनाओं ने यह बदला… 2011 में सत्ता में आने के बाद ममता ने इस रिश्ते को नीतियों में बदला। इमामों-मोअज्जिनों के लिए मासिक भत्ता, ऐक्यश्री स्कॉलरशिप से लाखों अल्पसंख्यक छात्रों को मदद, और मुस्लिम जातियों को OBC में शामिल करके आरक्षण का फायदा। ऊपर से सांस्कृतिक नजदीकी, मसलन- हिजाब पहनकर इफ्तार पार्टी में जाना, इस्लामी दुआएं पढ़ना। बीजेपी इसे तुष्टिकरण कहती है, लेकिन मुस्लिम वोटर इसे अपनी पहचान का सम्मान मानते हैं। जब NRC-CAA के बाद असुरक्षा बढ़ी, तो ममता ने खुद को मुस्लिमों की इकलौती ढाल बताया। यह नैरेटिव इतना मजबूत हुआ कि 2021 में बीजेपी की पूरी ताकत झोंकने के बाद भी मुस्लिम वोट में कोई दरार नहीं आई। पश्चिम बंगाल के सीनियर जर्नलिस्ट प्रभाकर मणि तिवारी मानते हैं कि इस बार SIR में काफी नाम कटे हैं। इससे थोड़ा उलटफेर हो सकता है। लेकिन यहां बीजेपी की एकतरफा जीत नहीं होगी। अगर यहां भ्रष्टाचार के मुद्दे का असर पड़ता तो ममता कई साल पहले हार गईं होती। लेकिन ये मुद्दा असरदार नहीं है। नॉर्थ और साउथ परगना में काफी हद तक ममता ही मजबूत रहने वाली हैं। इसलिए बीजेपी को ममता के गढ़ में चुनौती देना अभी आसान नहीं है। हालांकि उत्तर बंगाल में बीजेपी जरूर मजबूत रहेगी। -------------- बंगाल चुनाव से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए… ममता के सिर पर रॉड मारी, लगा बचेंगी नहीं: बंगाल में जो आता है, क्यों छा जाता है; क्या अब बीजेपी की बारी है जैसे बंगाली रसगुल्ले की चाशनी कपड़ों पर गिर जाए, तो जल्दी छूटती नहीं है। वैसे ही बंगाल में एक बार जो सरकार में आता है, सालों तक टिकता है। आजादी के बाद से पश्चिम बंगाल में सिर्फ तीन पार्टियों ने सत्ता संभाली है। कांग्रेस ने 20 साल, CPI(M) ने 34 साल और TMC ने 15 साल। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक पैटर्न है। पूरी खबर पढ़िए…
पहलगाम की बैसरन घाटी। हरी वादियों और घास के मैदानों से आबाद। कश्मीर आने वाले टूरिस्ट यहां जरूर आते थे। ठीक एक साल पहले 22 अप्रैल को भी आए थे। तभी जंगल की तरफ से तीन आतंकी आए और 13 मिनट में 26 लोगों का कत्ल कर दिया। बैसरन घाटी वीरान हो गई। पूरा साल बीत गया, लेकिन वीरानी अब भी है। यहां अब पहले जैसे टूरिस्ट नहीं आते। लोगों को घाटी घुमाने वाले गाइड बर्बाद हो गए। उनके घोड़े और गाड़ियां तक बिक गईं। पहलगाम में अटैक करने वाले तीनों आतंकी मारे गए, भारत ने ऑपरेशन सिंदूर चलाकर पाकिस्तान से बदला ले लिया, लेकिन बैसरन घाटी में कुछ नहीं बदला। मुंबई की मुनीजा परिवार के साथ कश्मीर घूमने आईं, तो पहलगाम भी पहुंचीं। बैसरन घाटी जाना चाहती थीं, लेकिन नहीं जा पाईं क्योंकि हमले के बाद घाटी दोबारा खुली ही नहीं। पहलगाम अटैक के बाद क्या बदला 1. 48 में से 6 टूरिस्ट स्पॉट अब भी बंद, सिक्योरिटी क्लियरेंस के बाद खुलेंगे हमले के बाद कश्मीर में 48 टूरिस्ट स्पॉट बंद किए गए थे। इनमें 42 दोबारा खुल गए। 6 अब भी बंद हैं। बैसरन घाटी के अलावा चंदनवाणी, गुरेज, अथवटो, बंगस और रामकुंड का सिक्योरिटी रिव्यू हो रहा है। क्लीयरेंस के बाद इन्हें खोला जा सकता है। आतंकी हमले से पहले अप्रैल, जून और जुलाई में हर दिन 10 हजार से ज्यादा टूरिस्ट पहलगाम आते थे। अब 2000 से 2500 ही आते हैं। अब बैसरन घाटी कब खुलेगी, हमने ये सवाल जम्मू-कश्मीर पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारियों से पूछा। वे ऑफिशियली बात करने को नहीं हुए, लेकिन ये बताया कि अभी यहां की सिक्योरिटी देखी जा रही है। क्लीयरेंस मिलने के बाद ही फैसला लिया जाएगा। 2. घोड़े वाले, दुकानदारों की पहचान के लिए QR कोड वाले कार्ड सेंसेटिव टूरिस्ट स्पॉट की लिस्टिंग की गई है। यहां टूरिस्ट के साथ सीधे कॉन्टैक्ट में आने वाले लोकल लोगों का वेरिफिकेशन होगा। उन्हें QR कोड वाला कार्ड जारी किया जा रहा है। इसे स्कैन करते ही, उनकी डिटेल, फोन नंबर, आधार नंबर और एड्रेस की जानकारी मिल जाएगी। इसकी शुरुआत इसी हफ्ते से पहलगाम में हुई है। मुंबई से आईं टूरिस्ट मुनीजा मोहम्मद मेरीशा बताती हैं, ‘पहलगाम अटैक की वजह से थोड़ा डरी हुई थी। यहां घूमने के बाद डर नहीं है। सेफ्टी पर काम हो रहा है। हर घोड़े वाले के पास एक QR कोड है। इसे स्कैन करने पर पता चल जाता है कि हम सही इंसान के साथ घूमने आए हैं।’ मुनीजा इसका अनुभव बताती हैं, ‘मैं एक घोड़े वाले से बैसरन घाटी जाने की बात कर रही थी। उसने अपनी पहचान के लिए QR कोड दिखाया। इसे स्कैन करते ही उसकी पूरी डिटेल आ गई। नाम- मोहिद्दीन मागरे। एड्रेस- पहलगाम। फोन नंबर 9469******। आधार नंबर 4491********। प्रोफेशन-पोनी मैन। पुलिस वेरिफाइड- यस।’ टूरिस्ट गाइड जब्बार अहमद मागरे कहते हैं कि QR कोड शुरू करके सरकार ने अच्छा काम किया है। इससे घोड़े वाले, कैमरे वालों और दुकान वालों की सही पहचान हो रही है। अब तक 165 से ज्यादा घोड़े वालों को कार्ड इश्यू हुए हैं। हम सबसे पहले टूरिस्ट को कार्ड ही दिखाते हैं। गाड़ी वाले और दुकानदार, सभी के अलग-अलग QR कोड हैं। 3. आतंकियों के मददगारों के खिलाफ चार्जशीट पहलगाम अटैक में शामिल तीन पाकिस्तानी आतंकियों की मदद करने वाले ओवरग्राउंड वर्कर्स के खिलाफ जम्मू NIA कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की गई है। ट्रायल शुरू हो गया है। 1300 पेज की चार्जशीट में हमले की साजिश पाकिस्तान में रचे जाने के सबूत दिए गए हैं। पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा और द रेजिस्टेंस फ्रंट समेत 7 आरोपी बनाए गए हैं। चार्जशीट में पाकिस्तानी हैंडलर सजाद जट्ट का नाम भी है। 4. आतंकियों से भिड़ने वाले आदिल की पत्नी को नौकरी, परिवार को घर मिला कश्मीरी युवक सैयद आदिल हुसैन 22 अप्रैल,2025 को टूरिस्ट के साथ बैसरन घाटी गए थे। आतंकियों ने हमला किया, तो वे टूरिस्ट को बचाने के लिए एक आतंकी से भिड़ गए। उसकी राइफल पकड़ ली। आदिल को आतंकी ने तीन गोलियां मार दीं। परिवार की जिम्मेदारी 29 साल के आदिल पर ही थी। जम्मू-कश्मीर सरकार ने उनकी पत्नी गुलनाज अख्तर को सरकारी नौकरी दी है। महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे ने उनके गांव हापतनार में घर बनवाकर दिया है। आदिल के भाई नौशाद कहते हैं, ‘उसकी मौत से हमें तकलीफ तो होती है लेकिन उससे ज्यादा फख्र होता है। उसने आतंकियों के सामने घुटने नहीं टेके।’ टूर ऑपरेटर बोले- EMI नहीं भर पा रहे, बैंक वाले गाड़ी उठा ले जाएंगे जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर से करीब 90 किमी दूर पहलगाम और पहलगाम से 6 किमी दूर बैसरन घाटी है। घास के बड़े मैदान, देवदार के घने जंगल, बर्फ से ढंकी पहाड़ियों की वजह से ये जगह स्विट्जरलैंड का एहसास दिलाती है। इसलिए इसका नाम मिनी स्विट्जरलैंड ही पड़ गया। यहां सिर्फ घोड़े या ट्रैक करके ही जा सकते हैं। जिस जगह से टूरिस्ट सफर शुरू करते थे, वहां काफी घोड़े और गाइड मिल जाते थे। एक साल बाद भी मिले, लेकिन पहले से बहुत कम। घाटी का रास्ता बताने वाला बोर्ड भी हटा दिया गया। पहलगाम से 2-3 किमी दूर कनहमर्ग है। अब गाइड लोगों को वहीं घुमाने ले जाते हैं। बैसरन घाटी की ओर कोई नहीं जा सकता। टूर ऑपरेटर मोहम्मद शफी बताते हैं कि बैसरन घाटी पहलगाम का सबसे पसंदीदा स्पॉट है। आतंकी हमले के बाद 8-9 महीने तक पहलगाम पूरी तरह बंद रहा। डेढ़-दो महीने से टूरिस्ट आना शुरू हुए हैं। बैसरन घाटी के साथ चंदनवाड़ी भी बंद है। इसलिए सिर्फ 20% टूरिस्ट आ रहे हैं। साइट बंद होने से वे भी जल्दी लौट जाते हैं।’ ‘कहा गया है कि जल्द ही घाटी खोली जाएगी, लेकिन अभी फाइनल नहीं हुआ है। पुलिस और एजेंसियां पूरी सिक्योरिटी जांच कर लें। कम से कम चंदनवाड़ी को तो खोलना चाहिए। चंदनवाड़ी में बर्फ होती है। टूरिस्ट वही देखने आते हैं। हमारी गाड़ियों की किस्त बाकी है। अगर ये टूरिस्ट स्पॉट नहीं खोले गए, तो किस्त नहीं भर पाएंगे। बैंक वाले गाड़ी उठा ले जाएंगे। चंदनवाड़ी पर पुलिस चौकी है, आर्मी तैनात है। उसे खोला जा सकता है। बैसरन घाटी भले बंद रखें।’ पहलगाम में पोनी मैन एसोसिएशन के प्रेजिडेंट बिलाल अहमद कहते हैं, ‘एक साल बाद भी हमारा काम बंद है। कई लोगों ने अपने घोड़े और गाड़ियां बेच दीं। कुछ टूरिस्ट साइट खुलने से काम शुरू हुआ है। रोज 200-500 रुपए की कमाई हो रही है। हम मांग कर रहे हैं कि कुछ और साइट खोली जाएं।’ ‘अभी टूरिस्ट आ रहे हैं। हम उन्हें यहां-वहां घुमा देते हैं। इससे टूरिस्ट खुश नहीं होते। वे तो बैसरन घाटी और चंदनवाड़ी घूमने आते हैं। इनमें से कोई भी खुल जाए, तो अच्छा रहेगा। यहां अब बहुत सिक्योरिटी है। हम लोग भी समझ गए हैं कि किस तरह के लोग बुरे हैं और उनसे दूर रहना है।’ 22 अप्रैल, 2025 का दिन, जब बैसरन घाटी में अटैक हुआ दोपहर करीब 2 बजे की बात है। टूरिस्ट के ग्रुप घाटी में वीडियो-फोटो शूट कर रहे थे। उसी वक्त तीन आतंकी जंगल की ओर से आए और गोलियां बरसाने लगे। पहली गोली करीब 2.20 बजे चली। शुरुआत में किसी को समझ नहीं आया कि क्या हुआ है। जब लाशें गिरने लगीं, तब लगा कि हमला हुआ है। लोग बचने के लिए भागे, लेकिन उस मैदान में छिपने की जगह ही नहीं थी। हमले में कुल 26 लोग मारे गए। पहलगाम अटैक के 15 दिन बाद भारत ने 7 मई को रात डेढ़ बजे पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आतंकियों के 9 ठिकानों पर एयर स्ट्राइक की। भारत ने कोटली, बहावलपुर, मुरीदके, बाग और मुजफ्फराबाद में एयर स्ट्राइक की। इसमें आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का हेडक्वॉर्टर और जैश-ए-मोहम्मद के मुखिया मसूद अजहर का ठिकाना शामिल है। मुजफ्फराबाद पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर की राजधानी है और यहीं से आतंकी नेटवर्क ऑपरेट होता है। ऑपरेशन सिंदूर में 100 से ज्यादा आतंकी मारे गए। इनमें कंधार प्लेन हाईजैक, पठानकोट और संसद हमले में शामिल अब्दुल रऊफ अजहर भी शामिल है। रऊफ जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मौलाना मसूद अजहर का भाई था। …………………………….पहलगाम अटैक पर ये स्टोरी भी पढ़िए, ये हमले के 30 दिन पूरे होने पर की गई थी…13 मिनट, 26 कत्ल; वीडियो में देखिए आतंकी कहां से आए, कहां गए कश्मीर की हरी-भरी बायसरन घाटी, उसकी खूबसूरती को निहारते टूरिस्ट, गोलियां, चीखें, बचने-बचाने की कोशिशें और 26 कत्ल, 22 अप्रैल को हुए पहलगाम अटैक की कहानी बस इतनी ही है, लेकिन असर इतना बड़ा कि भारत-पाकिस्तान जंग के मुहाने पर खड़े हो गए। पहलगाम में तीन आतंकी आए और हमेशा का दर्द देकर चले गए। पढ़िए पूरी खबर…
ईरान और होर्मुज स्ट्रेट पर ईयू का कड़ा रुख, प्रतिबंध बढ़ाने के संकेत दिए
यूरोपीय आयोग की उपाध्यक्ष काजा कैलास ने विदेश मामलों की परिषद की बैठक में ईरान और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर कड़ा रुख अपनाया
जापान में टैंक अभ्यास के दौरान हादसा, तीन जवानों की मौत, एक गंभीर रूप से घायल
जापान के दक्षिण-पश्चिम हिस्से में एक ट्रेनिंग रेंज में जबरदस्त हादसा हुआ। टैंक का गोला समय से पहले फटने से तीन रक्षा कर्मियों की मौत हो गई और एक घायल हो गया
अमेरिकी राजनेता और पूर्व गवर्नर निक्की हेली ने इस घटना को लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने दावा किया कि जब्त किया गया जहाज चीन से ईरान की ओर जा रहा था और उस पर मिसाइल निर्माण से जुड़े रसायन मौजूद थे।
ट्रंप के सख्त रुख से लड़खड़ाई अमेरिका-ईरान वार्ता
अमेरिका-ईरान शांति वार्ता असमंजस की स्थिति में लग रही है क्योंकि तेहरान ने पाकिस्तान में होने वाली बातचीत में शामिल होने को लेकर हिचकिचाहट दिखाई है
बलूच कार्यकर्ता का आरोप, मुख्यमंत्री बुगती ‘पाकिस्तानी सैनिकों के दलाल’
बलोच अमेरिकी कांग्रेस के अध्यक्ष तारा चंद ने बलूचिस्तान के मुख्यमंत्री सरफराज बुगती पर तीखा हमला करते हुए उन्हें “पाकिस्तानी सैनिकों का दलाल” करार दिया है
ईरान से डील न हुई तो ‘बम बरसेंगे’, ट्रंप का अल्टीमेटम
ईरान और अमेरिका के बीच जारी गतिरोध के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को कहा कि ईरान के साथ युद्धविराम बुधवार शाम को खत्म हो जाएगा
विवादों के बीच लोरी चावेज़-डेरेमर ने ट्रंप के मंत्रिमंडल से दिया इस्तीफा
अमेरिका की श्रम सचिव लोरी चावेज़-डेरेमर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल के दौरान विवादों के बीच दो महीनों के भीतर कैबिनेट छोड़ने वाली तीसरी सदस्य बन गई हैं
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 'ईरान न्यूक्लियर डील' में भारी रकम देने का किया दावा
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान न्यूक्लियर डील (जेसीपीओए) को लेकर फिर तीखा हमला बोला। उन्होंने इसे अमेरिका की सुरक्षा के लिए बेहद खराब समझौता बताया
शाम 8 बजे का वक्त। गांव का एक घर रंग-बिरंगे बल्ब और हैलोजन की लाइट से रोशन है। ढोल बज रहे हैं। आंगन में महिलाएं एक लाइन से जमीन पर बैठी हैं। सभी के सामने पत्तों से बने दोने रखे हैं। यहां कोई मर्द नहीं है। सिर पर मटका रखे एक महिला आती है। इस मटके में शराब है। जिसे ‘लंदा’ और ‘इड्डिकुल’ कहा जाता है। लंदा, बासी चावल और इड्डिकुल महुआ से बनती है। महिला सिर से मटका उतारकर नीचे रखती है और दोने में सभी महिलाओं को शराब परोसती है। दूसरी महिला सभी के दोने में भुनी सोयाबीन परोसती है। गीत गाती हुई यहां बूढ़ी-जवान, सभी उम्र की महिलाएं शराब पी रही हैं। यहां महिलाएं मेहमान हैं और मेजबान भी। दैनिक भास्कर की सीरीज ‘हम लोग’ में मैं मनीषा भल्ला इस बार लाई हूं कोया समुदाय की कहानी। ओडिशा, आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ में इनकी कुल आबादी 9 लाख है। इनमें से डेढ़ लाख ओडिशा के मलकानगिरी में बसे हैं… ऊपर मैंने जिस दावत का जिक्र किया है वह एक शादी की है। चटक पीली साड़ी, होठों पर हल्की गुलाबी लिपस्टिक, गले में चांदी के सिक्कों की माला पहने एक दुल्हन के कदम धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हैं। दूसरी ओर, सफेद पोशाक में दूल्हा उसका इंतजार कर रहा है। तभी पुरोहित आगे बढ़कर दोनों को पास-पास खड़ा कर देता है। दूल्हे की कलाई में घास की एक गांठ बांधता है। मंत्र पढ़ता है, फिर दुल्हन का हाथ दूल्हे के हाथ में थमा देता है। तभी वहां मौजूद महिलाएं दुल्हन के स्वागत में कोया गीत गाने लगती हैं। यह शादी ओडिशा के नक्सल प्रभावित जिले मलकानगिरी से करीब 35 किलोमीटर दूर बसे गांव राखेलगुड़ा में हो रही है। यहां के एक आदिवासी नेता अडमा राखा के बेटे निरंजन और नई बहू बासंती की शादी का जश्न मनाया जा रहा है। शादी होते ही महिलाएं फिर शराब पीने लगती हैं। कुछ देर बाद ये एक-दूसरे की कमर में हाथ डालकर नाचना शुरू कर देती हैं। करीब 15 मिनट बाद वे थककर बैठ जाती हैं। इसके बाद, पुरोहित दूल्हा-दुल्हन को बेडरूम में छोड़ आते हैं और बाहर से दरवाजे की कुंडी लगा देते हैं। बाहर बैठी महिलाएं फिर से गीत गाने लगती हैं। बुआ की बेटी से शादी न करने पर मिलती है सजा इसी बीच, अडमा राखा आते हैं, जिनके बेटे की शादी है। मैंने उनसे कहा- ‘दुल्हन बहुत सुंदर है।’ वो कहने लगे कि मेरी बहू बासंती तो घर की लड़की है। लगभग पूरा बचपन हमारे सामने बीता है। मैंने हैरान होकर पूछा- ‘घर की लड़की का मतलब?’ वो बोले- ‘मेरे बेटे निरंजन की शादी, मेरी बहन की बेटी यानी उसकी सगी बुआ की बेटी से हुई है। यही हमारा रिवाज है।’ सगी बुआ की बेटी न हो तो? ‘तो पिता की दूर की बहन की बेटी से भी शादी हो जाती है।’ मैंने पूछा- ‘कोई खास वजह।’ अडमा बताते हैं- ‘घर की बेटी है। उसे हमारे परिवार के तौर-तरीकों की समझ है। वह हमें कभी नुकसान नहीं पहुंचाएगी, इसलिए यही परंपरा चली आ रही है।’ ‘अगर कोई ऐसा न करे तो फिर क्या करते हैं?’ ‘समाज से बाहर कर दिया जाता है। जिंदा रहते हुए पिंडदान भी कर देते हैं। कोया लोगों में बाहरी समुदाय में विवाह किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं है।’ अब अडमा ने मुझे इरमा पवासी नाम की महिला से मिलवाते हैं। वो बताती हैं कि ‘हम लोगों में जब भी शादी या किसी रस्म में बड़ी दावत होती है तो खाने की जिम्मेदारी पूरे गांव की होती है। गांव के लोग शादी वाले घर में महुआ की शराब, मुर्गी, बकरी और मछली पहुंचाते हैं। जैसे आज आप जिस शादी में आई हैं, उसके लिए भी महिलाएं कई दिनों से जंगलों से महुआ बीनकर शराब बनाने में लगी थीं।’ इरमा मुझे और मेरे साथी मुन्ना को खाना खाने के लिए कहती हैं। पत्तलों में मछली का सिर, मटन, चिकन, चावल, रायता और पनीर परोसा जाता है। कुछ देर बाद गांव के सभी लोग खाना खाकर अपने घरों को लौटने लगते हैं, लेकिन महिलाओं की महफिल बदस्तूर जारी रहती है। कच्चा घर, लेकिन सफाई ऐसी कि हर कोना चमकता है अगली सुबह मैं फिर अपने साथी मुन्ना के साथ गांव की तरफ निकल पड़ी। यहां हर घर मिट्टी से बना है, लेकिन इन्हें करीने से सजाया गया है। आगे बांस से बने बाड़े और छोटे-छोटे गेट। घरों की छतें ताड़ के पत्तों से ढकी हैं। हवा में महुआ की खुशबू घुली हुई है। लगभग हर घर के सामने महुआ सूख रहा है। मुन्ना बताते हैं कि- ‘हमारे यहां महुआ की शराब के बिना कोई रस्म पूरी नहीं होती।’ मुन्ना सबसे पहले मुझे अपने घर ले गए। बाहर तेज गर्मी है, लेकिन घर में ठंडक महसूस हो रही है। साफ-सफाई भी ऐसी कि जमीन पर गिरी चीज बिना झिझक उठाकर खाई जा सके। आंगन के एक कोने में, खुले में खाना बन रहा है। यही इनकी रसोई है। रसोई में बर्तन भी उतने हैं, जितना खाना बनाने के लिए जरूरी हैं। अंदर केवल एक ही कमरा है। सामने रखी कुर्सी पर मुझे बैठने के लिए कहा गया। खाट पर अनाज रखा है। खाना पकने की खुशबू आ रही है। मुन्ना बताते हैं कि ‘हमारे घरों में एक ही कमरा होता है। यहीं खाते हैं, यहीं सोते हैं। आज खाने में चावल, दाल और मछली के अंडों की भुर्जी बन रही है।’ कुछ देर यहां रुकने के बाद हम अडमा राखा के घर की तरफ चल पड़े। यहां अडमा राखा हमारा इंतजार कर रहे थे। मैंने उनसे हर घर के बाहर सूख रहे महुए का जिक्र किया। तो बोले- ‘चाहे रिश्ता लेकर जाना हो, शादी का मौका हो या किसी की मौत, हर रस्म में हमारे यहां शराब जरूरी है। इसी वजह से महुआ बड़ी मात्रा में इस्तेमाल होता है। जब लड़के वाले रिश्ता लेकर लड़की के घर जाते हैं तो शराब यानी लंदा और इड्डिकुल जरूर ले जाते हैं। इसके बिना बातचीत आगे नहीं बढ़ती। मान लीजिए, रिश्ता पक्का करने के लिए लड़के वालों को लड़की के घर पांच बार जाना पड़े, तो हर बार शराब की मात्रा बढ़ा दी जाती है। पहली बार में एक बोतल, दूसरी बार दो, तीसरी बार तीन। शादी पक्की होने पर लड़के वाले अपनी हैसियत के हिसाब से लड़की के परिवार को नकद, चावल और शराब भेंट करते हैं।’ कोई दूसरी शराब पीने पर 10 हजार रुपए का जुर्माना अडमा बताते हैं- ‘हम लोगों में जीवन के हर पड़ाव पर शराब का महत्व है। बच्चे का जन्म होने पर सबसे पहले शराब चखाई जाती है। मौत के समय भी मुंह में शराब डाली जाती है। हालांकि, हमारे कुछ नियम बेहद सख्त हैं। समुदाय से बाहर शादी करने और पारंपरिक शराब छोड़कर दूसरी शराब पीने पर 10 हजार रुपए का जुर्माना भरना पड़ता है। महिलाओं के शराब पीने को लेकर सवाल किया तो वो हंसने लगे। बोले- ‘ये हमारी परंपरा है। हमारे समाज में महिलाएं और पुरुष बराबर हैं, सबकी खुशी समान है।’ दिन के हिसाब से रखा जाता है बच्चों का नाम अडमा के घर में मौजूद गौरी कवासी बताती हैं- ‘यहां बच्चों के नामकरण का तरीका भी अनोखा है। यहां नाम, दिन के आधार पर रखे जाते हैं- जैसे शुक्रवार को जन्मे बच्चे को ‘शुक्री’ और गुरुवार को जन्मे को ‘गुरु’ कहा जाता है।’ विवाद पर थाने नहीं जाते, खुद करते हैं फैसला मुन्ना बताते हैं- कोया, अपने घरेलू और सार्वजनिक विवाद कभी थाने लेकर नहीं जाते। समुदाय के मामलों में किसी बाहरी व्यक्ति को दखल देने का अधिकार नहीं है। वे तारीखों की व्यवस्था को नहीं मानते। फैसला लेने के लिए हमारे ही समुदाय के एक बुजुर्ग व्यक्ति को चुना जाता है, जिस पर कभी कोई आरोप न लगा हो। इन्हें हम पेद्दा कहते हैं। पेद्दा ही जुर्माने का फैसला करते हैं। इस सीरीज में अगले हफ्ते पढ़िए ऐसे ही अनोखे गालो लोगों की कहानी…. -------------------------------------------- 1- नाचती लड़की का हाथ पकड़ा और भगा ले गया लड़का:मैतेई लोगों में शादी की अनोखी परंपरा, पैदा होते ही बच्चे को खिला देते हैं नमक शाम के 5 बजे हैं। एक सुनसान जगह पर कुछ लोग जमीन को चौकोर खोद रहे हैं। आसपास भीड़ है। आधे घंटे बाद खुदाई करने वालों को गड्ढे में कुछ नजर आया। कुछ पल बाद दो-तीन लोग उस गड्ढे में उतरे और एक लाश बाहर निकालकर रख दी। लाश के कई हिस्से कंकाल में तब्दील हो चुके हैं। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- शरीर के ऊपरी हिस्से पर कपड़े नहीं पहनतीं बोंडा महिलाएं:शादी ठुकराने पर लड़कीवालों का घर तोड़ देते हैं, मृत्युभोज में खाते हैं गाय का मांस सुबह करीब 10 बजे का वक्त। मिट्टी से लिपा-पुता एक कच्चा घर। बाहर सिर मुंडाए दो महिलाएं बैठी हैं। उम्र करीब 38-40 साल। ऊपरी बदन लगभग नंगा। बाकी शरीर पर नाम मात्र के कपड़े। छाती छिपाने के लिए मोतियों और कौड़ियों से बनी मालाएं। पूरी कहानी यहां पढ़ें
भारत में गर्मी का मतलब अब सिर्फ दोपहर की झुलसाने वाली धूप नहीं रह गया है। अब सूरज ढलने के बाद भी राहत नहीं मिलती। रात 11 बजे भी दीवारें गर्म रहती हैं, पंखे गर्म हवा फेंकते हैं और कूलर-एसी भी कई बार बेअसर लगते हैं। वैज्ञानिक इसे ‘वॉर्म नाइट्स’ कहते हैं। इन गर्म रातों का असर सीधे दिल, किडनी और नींद पर पड़ रहा है। देश के 734 जिलों में से 57% जिले अब हाई या बहुत हाई हीट रिस्क जोन में आ चुके हैं, जहां करीब 76% आबादी रहती है। तो आखिर ये वॉर्म नाइट्स क्या हैं, क्यों बढ़ रही हैं और इससे बचने का रास्ता क्या है; भास्कर एक्सप्लेनर में 6 जरूरी सवालों के जवाब… सवाल-1: ‘वॉर्म नाइट’ क्या है और यह पहले से अलग क्यों है? जवाब: भारतीय मौसम विभाग, यानी IMD के मुताबिक जब रात का न्यूनतम तापमान सामान्य से 4.5 से 6.4 डिग्री सेल्सियस ज्यादा हो जाए, तो उसे 'वॉर्म नाइट' कहते हैं। अगर यह फासला इससे भी ज्यादा हो, तो मामला 'बेहद गंभीर' श्रेणी में आ जाता है। पहले हीट वेव का मतलब था- दिन में 40C पार करने वाली लू। उससे बचने के तरीके थे- छांव, पानी, घर के अंदर रहो। लेकिन वॉर्म नाइट में घर भी दुश्मन बन जाता है। दिन भर कंक्रीट की दीवारें और सीमेंट की छत धूप को अपने अंदर सोखती रहती हैं। जब सूरज ढलता है, तो वही गर्मी धीरे-धीरे बाहर निकलने लगती है। ठीक उस वक्त जब आप सोने की कोशिश कर रहे होते हैं। नतीजा? रात 11 बजे भी दीवार को हाथ लगाओ, तो वह गर्म मिलती है और पंखे आग उगलते हैं। पिछले कुछ सालों में वार्म नाइट्स तेजी से बढ़ी हैं… सवाल-2: बढ़ती वार्म नाइट्स के पीछे असली वजह क्या है?जवाबः रात की बढ़ती गर्मी के लिए 3 बड़ी वजहें जिम्मेदार हैं… 60% जिम्मेदारी कंक्रीट की इमारतें और सड़कें हवा में बढ़ती नमी और उमस ग्लोबल वार्मिंग और पेड़ों की कमी सवाल-3: रातें गर्म होने से सेहत पर क्या असर पड़ता है? जवाब: CEEW यानी काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायर्नमेंट एंड वाटर के मुताबिक, रात की गर्मी एक 'साइलेंट किलर' की तरह काम करती है… शरीर की कूलिंग प्रणाली ठप हो जाती है: मानव शरीर का तापमान 37C होता है। रात में बाहर ठंडक होती है, तो शरीर को ठीक होने का वक्त मिलता है। लेकिन अगर रात का तापमान 25C से नीचे न गिरे, तो शरीर खुद को रिकवर नहीं कर पाता। इसे 'हीट स्ट्रेस' कहते हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 2100 तक अत्यधिक गर्म रातों से मौत का खतरा लगभग छह गुना बढ़ जाएगा। दिल पर सीधा हमला: जब शरीर रात में ठंडा नहीं होता, तो दिल को शरीर का तापमान कम करने के लिए लगातार अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है। इससे ब्लड प्रेशर बढ़ता है और नींद के दौरान 'साइलेंट हार्ट अटैक' या हार्ट फेलियर का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। नींद की बर्बादी: जब रात का तापमान 27C से ऊपर जाता है, तो नींद के सबसे जरूरी हिस्से- REM स्लीप और डीप स्लीप बर्बाद होने लगते हैं। दिन की भीषण गर्मी के बाद गर्म रातें नींद की फिजियोलॉजी को सीधे बाधित करती हैं, जिससे स्वास्थ्य के गंभीर खतरे पैदा होते हैं। याददाश्त कमजोर होना, चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन… ये सब गर्म रातों की लंबी कीमत हैं। सवाल-4: वार्म नाइट्स से आर्थिक असर क्या होगा? जवाब: गर्म रातें सेहत के साथ-साथ हमारे और देश के आर्थिक विकास में दिक्कतें खड़ी कर सकती हैं… सवाल-5: क्या वार्म नाइट्स से कूलर-एसी हमें बचा लेंगे? जवाब: नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि भारत में सिर्फ 24% घरों में एसी या कूलर है। शहरों में यह 40% है, गांवों में महज 15%। पश्चिम बंगाल और बिहार में तो सिर्फ 5% घरों में एसी है। ये वही राज्य हैं जहां गर्मी सबसे ज्यादा सितम ढाती है। लेकिन एसी भी कोई जादू की छड़ी नहीं है। एसी कमरे को ठंडा करता है, लेकिन बाहर की हवा को और गर्म। यानी एसी चलाने से हम खुद तो बच जाते हैं, पर पूरे शहर की गर्मी बढ़ती जाती है। सवाल-6: वार्म नाइट्स से निपटने के लिए क्या करना चाहिए? जवाब: CEEW ने अपनी रिपोर्ट में भारत सरकार से सिफारिश की है कि कुछ जरूरी सुझाव अपने हीट एक्शन प्लान में शामिल करें… 1. ज्यादातर प्लान सिर्फ दिन की लू पर फोकस करते हैं। जबकि अब गर्म रातों, भारी उमस को भी प्लान में शामिल करना होगा। राज्यों को मौसम विभाग के पूर्वानुमान और आंकड़ों का इस्तेमाल कर बिजली की मांग और बीमारियों से लड़ने की तैयारी करनी चाहिए। 2. साल 2024 से लू को स्टेट डिजास्टर मिटिगेशन फंड यानी SDMF के तहत फंडिंग के लिए शामिल किया गया है। राज्य इस पैसे का इस्तेमाल कर कूलिंग शेल्टर और अलर्ट सिस्टम बना सकते हैं। इसके अलावा शहरों में पेड़-पौधे या हरियाली बढ़ाने पर जोर दे सकते हैं। 3. जिन राज्यों के आधे से ज्यादा जिले हीट की वजह से हाई-रिस्क पर हैं, उन इलाकों को 'राज्य-विशिष्ट आपदा' घोषित करनी चाहिए। ऐसा करने से SDRF का अतिरिक्त 10% फंड अनलॉक हो जाता है, जिसका इस्तेमाल गर्मी से होने वाली मौतों, खेती के नुकसान और इमरजेंसी ट्रेनिंग के लिए किया जा सकता है। 4. जैसे ही तापमान एक तय सीमा को पार करे, मजदूरों के खातों में तुरंत पैसा पहुंच जाए ताकि उन्हें भीषण गर्मी में काम न करना पड़े। नागालैंड और अहमदाबाद (SEWA) में यह प्रयोग सफल हो चुका हैं। 5. अगर भारत अगले 10 साल में AC की एनर्जी एफिशिएंसी को दोगुना कर दे, तो उपभोक्ताओं के 2.2 लाख करोड़ रुपए बच सकते हैं। इससे न केवल लोगों के बिजली बिल कम होंगे, बल्कि पावर ग्रिड पर दबाव भी कम होगा और गंभीर पावर कट की स्थिति से बचा जा सकेगा। वार्म नाइट्स के दौरान आपको ORS, नींबू पानी और छाछ जैसे पेय पदार्थ पीते रहना चाहिए, जिससे शरीर की कूलिंग प्रणाली को मदद मिले। रात को सोने से पहले छत और दीवार पर पानी छिड़कें, इससे कंक्रीट की संग्रहीत गर्मी जल्दी निकलती है। सूती और हल्के कपड़े पहनें। बुजुर्गों और बच्चों पर ख्यास ध्यान दें। यह स्टोरी दैनिक भास्कर में फेलोशिप कर रहे आकाश कुमार ने लिखी है। ----------------------------------- मार्च में गर्मी ने 15 साल का रिकॉर्ड तोड़ा:14 शहरों में 40 डिग्री के पार क्यों पहुंचा पारा; अप्रैल-मई में कैसी गर्मी पड़ेगी 2026 की फरवरी पिछले 125 सालों में सबसे गर्म और सूखी रही। अब मार्च में भी मौसम के वही तेवर बरकरार हैं। मार्च की गर्मी ने दिल्ली में 50 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरात के 14 शहरों में पारा 40 डिग्री के पार पहुंच गया है। पूरी खबर पढ़ें…
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की दिशा में बड़ा कदम, भारतीय प्रतिनिधिमंडल इस सप्ताह पहुंचेगा वॉशिंगटन
भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों को लेकर भारतीय व्यापार प्रतिनिधिमंडल इस सप्ताह वॉशिंगटन पहुंचने वाला है। राजदूत सर्जियो गोर के अनुसार, दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम है।
भारत की सभी मस्जिदों में महिलाएं बिना रुकावट नमाज पढ़ने जा सकेंगी या नहीं? दाऊदी बोहरा समाज की लड़कियों का खतना क्या गैर-कानूनी हो जाएगा? क्या दूसरे धर्म में शादी करने के बाद भी पारसी महिलाएं अग्नि मंदिर में जा पाएंगी? इन सभी सवालों के जवाब तय होंगे सबरीमाला पर फैसले से। सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की संवैधानिक पीठ सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश मामले पर सुनवाई कर रही है। इसके साथ धार्मिक आस्था से जुड़े 66 मामले और जुड़े हैं। इसी महीने फैसला आने की उम्मीद है। भगवान अयप्पा के जन्म से लेकर सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की कानूनी लड़ाई और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के व्यापक असर की पूरी कहानी; जानेंगे मंडे मेगा स्टोरी में… ***** ग्राफिक्स: दृगचंद भुर्जी और अजीत सिंह ------ यह खबर भी पढ़िए… गजनवी ने सोमनाथ शिवलिंग के टुकड़े मस्जिद में लगवाए:6 टन सोना लूटा; नेहरू मंदिर बनवाने के इतने खिलाफ क्यों थे 6 जनवरी 1026 यानी आज से करीब 1 हजार साल पहले। कश्मीर, मथुरा और ग्वालियर में लूटपाट कर चुका महमूद गजनवी भारत पर अपने आखिरी हमले के लिए सोमनाथ पहुंचा। सोमनाथ के ब्राह्मणों ने कहा, 'शक्तिशाली सोमेश्वर ने भारत के देवताओं के अपमान का बदला लेने इन मुसलमानों को अपने पास बुलाया है।' पूरी खबर पढ़िए
मदुरै से करीब 15 किमी दूर तिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी है। इसकी तलहटी में भगवान मुरुगन का मंदिर है और शिखर पर सूफी संत सिकंदर बदुशा की दरगाह। दरगाह के पास दीपम (कांसे से बना बड़ा दीपक) जलाने के विवाद से ये इलाका दक्षिण भारत का ‘अयोध्या’ बन चुका है। बीते 6 महीने में हिंदूवादी संगठनों के कार्यकर्ता कई बार यहां जमा हो चुके हैं, इसलिए पुलिस ने इलाके की किलेबंदी कर रखी है। भीड़ जुटाने की मनाही है। मामला हाईकोर्ट में है। तमिलनाडु में भगवान मुरुगन वैसे ही पूजे जाते हैं, जैसे उत्तर भारत में भगवान राम, महाराष्ट्र में गणपति और बंगाल में मां काली। मान्यता है कि तिरुपरनकुंद्रम उनके छह पवित्र निवासों में पहला है, जहां उन्होंने देवयानी से विवाह किया था। इसीलिए ये मंदिर दक्षिण भारत में शादी से जुड़ी मुरादें पूरी करने के लिए मशहूर है। तमिलनाडु में 23 अप्रैल को वोटिंग हैं। उससे पहले ही तिरुपरनकुंद्रम धार्मिक अधिकारों की लड़ाई का अखाड़ा बन चुका है। तमिलनाडु में हिंदू-मुस्लिम की राजनीति पहले कभी नहीं हुई। फिर भी BJP ने इसे मुद्दा बनाने की कोशिश की है। 1 दिसबंर को मद्रास हाईकोर्ट ने पहाड़ी के शिखर पर दीपम जलाने की अनुमति दी थी। DMK ने इसे चुनौती दी। पहाड़ी पर चढ़ने की कोशिश कर रहे तमिलनाडु BJP अध्यक्ष नैनार नागेंद्रन और सीनियर लीडर एच. राजा समेत 113 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। 1 मार्च को PM मोदी भी मंदिर में दर्शन के लिए आए थे। छोटा सा कस्बा हिंदुत्व की प्रयोगशाला, 91% हिंदू आबादी2011 की जनगणना में तिरुपरनकुंद्रम की आबादी 48,810 थी। ये बढ़कर करीब 70 हजार हो गई है। 91.8% आबादी हिंदू है और 3.6% मुस्लिम। मंदिर के आसपास की गलियों में हिंदू-मुस्लिम मिलकर रहते हैं। ऐसा भी नहीं है कि कस्बे में धर्म के आधार पर इलाके बंटे हों, लेकिन मंदिर के पास जाते ही ये बंटवारा दिखने लगता है। पुलिस ने बैरिकेड लगाकर दरगाह का रास्ता बंद कर दिया है। आने-जाने वालों से पूछताछ होती है। एक पुलिसवाले ने हमें भी सीढ़ियों से पहले रोक लिया। बोला- आगे जाने के लिए ऊपर से परमिशन लेनी होगी। परमिशन के लिए थाना इंचार्ज को फोन किया, तो उन्होंने कहा, ‘आदेश है कि मीडिया और गैर मुस्लिमों को दरगाह तक नहीं जाने देना है।’ ‘विवाद शुरू हुए डेढ़ साल हो गए, मुस्लिमों से रिश्ते नहीं बदले’दरगाह जाने के रास्ते में जयराजमणि मिले। ऑटो ड्राइवर हैं। कहते हैं, ‘18 महीने से विवाद शुरू हुआ है। माहौल थोड़ा अलग हो गया है। हमेशा मंदिर में ही दीप जलाया गया है। वही परंपरा आज भी है। एक-दो साल से अचानक मांग होने लगी कि दीपम दरगाह के पास जलाया जाना चाहिए। इससे तो माहौल खराब ही होगा न।’ ‘मुस्लिमों से हमारे रिश्तों में कोई बदलाव नहीं आया है। BJP और RSS वोट के लिए इसे हवा दे रहे हैं, लेकिन हमारे लिए ये मुद्दा नहीं है। हमारे लिए असली सवाल यह है कि चुनाव कौन जीतेगा, DMK या AIADMK। इस सीट से DMK ने कृथिका थंगपंडियान और AIADMK ने मौजूदा विधायक वीवी राजन चेल्लपा को टिकट दिया है।' ‘दीपम पहाड़ी पर ही जले, दरगाह नाजायज’मंदिर के सामने 45 साल से मालाएं बेच रहीं प्रसन्नकुमारी ने यहां का माहौल बदलते देखा है। वे कहती हैं ‘मैं तिरुपरनकुंद्रम में हो रहे अन्याय पर चुप नहीं रह सकती। DMK सरकार कानून-व्यवस्था बनाए रखने का दावा करती है। कार्तिगई (तमिल हिंदुओं का त्योहार, जब घरों और मंदिरों में दीये जलाए जाते हैं) के समय सैकड़ों श्रद्धालुओं को पुलिस ने बैरिकेड लगाकर रोक दिया। वे पहाड़ी पर बने दीपस्तंभ पर दीप जलाने जा रहे थे।’ मंदिर के सामने मिले सुंदरमूर्ति करीब 40 साल से यहां आ रहे हैं। दीपम के मसले पर तेज आवाज में कहते हैं, ‘ये मुद्दा बिल्कुल सही है। दीपम पहाड़ी के शिखर पर ही जलाया जाना चाहिए। ये हमारे लिए भावनात्मक मुद्दा है। दरगाह नाजायज है।’ पी. मुरुगन की पीढ़ियां मंदिर में रहते आई हैं। उनका नाम भगवान मुरुगन के नाम पर रखा गया। पेशे से टेलर मुरुगन की राय सुंदरमूर्ति से अलग है। वे कहते हैं, ‘यह सिर्फ उन लोगों का मुद्दा है, जो समाज में फूट डालना चाहते हैं। हिंदू हो या मुस्लिम हम हर त्योहार साथ मनाते हैं। मंदिर का उत्सव हो या दरगाह का, हम वहां जाते हैं और वे यहां आते हैं।’ फिर अचानक इतना बड़ा मुद्दा क्यों बन गया? मुरुगन जवाब देते हैं, ‘यह चुनाव से जुड़ा मामला है। कुछ लोग धर्म का इस्तेमाल कर वोट लेना चाहते हैं। बाहर से लोगों को लाकर विरोध करवाया जा रहा है, ताकि ऐसा लगे कि हिंदू और मुस्लिम आपस में लड़ रहे हैं।’ मुस्लिम बोले- हमारे दिलों में कोई बैर नहीं, लोग विवाद से थक चुकेमुरुगन के पड़ोस में रहने वाले सैयद इब्राहिम मस्जिद से नमाज पढ़कर निकले थे। हमें अपनी कपड़े की दुकान पर ले गए। वे कहते हैं, ‘सदियों से यह पहाड़ी शांति और सौहार्द का प्रतीक रही है। एक तरफ भगवान मुरुगन का मंदिर है और ऊपर पवित्र दरगाह। हमारे दिलों में इस विवाद का कोई असर नहीं पड़ा है। यहां के लोग सच्चाई जानते हैं। सरकारी रिकॉर्ड में भी यह मामला साफ है।’ जैनुलाबुद्दीन 40 साल पहले तिरुपरनकुंद्रम में आकर बसे थे। वे कहते हैं कि मैंने इस विवाद के बारे में कभी नहीं सुना। यहां हिंदू दरगाह जाते हैं और मुस्लिम मंदिर के रथ उत्सव में शामिल होते हैं। परिवार की तरह साथ रहते हैं।’ क्या इस विवाद का असर वोटिंग पैटर्न पर पड़ेगा? जैनुलाबुद्दीन जवाब देते हैं, ‘कुछ लोग प्रभावित हो सकते हैं, लेकिन ज्यादातर लोग इससे थक चुके हैं। हम चाहते हैं कि चुनाव पानी, सड़क और रोजगार जैसे मुद्दों पर हो, न कि इस बात पर कि दीप कहां जलाया जाए।’ दीपम जलाने की मांग के पीछे हिंदू मुन्नानी संगठनहिंदू मुन्नानी नाम का संगठन दीपम को दरगाह के पास जलाने की मांग उठाता रहा है। वही इस मामले को कोर्ट में ले गया। संगठन के अलगारसामी सेल्वाराज 15 साल से इस मुद्दे पर काम कर रहे हैं। कई बार दरगाह के पास दीपम जलाने की कोशिश करते हुए हिरासत में लिए गए हैं। उन पर 12 FIR दर्ज हैं। सेल्वाराज RSS और BJP के समर्थक हैं। वे दावा करते हैं कि PM मोदी 1 मार्च को मंदिर आए थे, तब मैंने उनके स्वागत में 1 लाख रुपए खर्च कर पूरे मदुरै में पोस्टर लगवाए थे। सेल्वाराज कहते हैं- ये पहाड़ी भगवान मुरुगन की है। इस पर हिंदुओं का ही हक है। ऊपर बना स्ट्रक्चर गैरकानूनी है और हटकर रहेगा। DMK से जुड़े नेताओं ने तिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी को सिकंदर हिल कहकर विवाद पैदा किया। हमने सेल्वाराज से पूछा कि ये पहाड़ी भगवान मुरुगन की है, इसके समर्थन में आपके पास क्या सबूत हैं? सेल्वाराज कहते हैं, ‘तमिल साहित्य साबित करता है, लंदन से लेकर मद्रास हाईकोर्ट तक अदालतों ने माना है कि यह पहाड़ी भगवान मुरुगन की है। तमिल राजाओं के समय से लेकर आज तक के प्रशासनिक रिकॉर्ड भी यही पुष्टि करते हैं।’ एक्सपर्ट बोले- तमिलनाडु में हिंदू-मुस्लिम की राजनीति कभी नहीं चलीसीनियर जर्नलिस्ट डी. सुरेश कुमार मंदिर-दरगाह विवाद पर कहते हैं, ‘तमिलनाडु में हिंदू-मुस्लिमों के बीच विवाद की स्थिति नहीं रही। द्रविड़ राजनीति के बड़े किरदारों पेरियार, अन्नादुरै, करुणानिधि, जयललिता जैसे नेताओं ने कभी विवाद की राजनीति को हवा नहीं दी। DMK कहता है- वुन्द्रै कुडम, उर्वदे देवम। मलतब कि हम सब एक हैं और हमारे देवता एक ही हैं। तमिलनाडु के मुसलमान भी तमिल बोलने वाले ही हैं। उर्दू बोलने वाले बहुत कम हैं।’ वहीं, स्थानीय पत्रकार राहुल कहते हैं कि तिरुपरनकुंद्रम मंदिर विवाद का चुनाव में खास असर नहीं होगा। यहां लोग धार्मिक हैं। हर गली-नुक्कड़ पर मंदिर है, लेकिन लोग राजनीति में धार्मिक मुद्दे शामिल करने को पसंद नहीं करते। ………………………….तमिलनाडु से ये ग्राउंड रिपोर्ट भी पढ़िए…लोग बोले- हिंदी हम पर बोझ, तमिल हमारी मां भारत के 28 राज्यों में तमिलनाडु इकलौता है, जिसने अपने यहां तीन भाषा फॉर्मूला लागू नहीं किया। इसका असर चेन्नई सेंट्रल रेलवे स्टेशन से बाहर निकलते ही दिखने लगता है। बिल्डिंग पर तीन भाषाओं तमिल, हिंदी और अंग्रेजी में बोर्ड लगा है। करीब आधा किमी दूर चेन्नई कॉर्पोरेशन की बिल्डिंग है। इस पर लगे बोर्ड से हिंदी गायब है। यहां के लोग तमिल भाषा को लेकर इमोशनल हैं। चेन्नई में मिलीं 40 साल की विजयलक्ष्मी कहती हैं, ‘तमिल मां की तरह है। हम इसमें स्वाभिमान देखते हैं।’ पढ़िए पूरी खबर...

