कल यानी 19 मार्च से चैत्र नवरात्रि की शुरुआत हो रही है। छत्तीसगढ़ के देवी मंदिरों में भी तैयारियां लगभग पूरी हो चुकी हैं। बस्तर के मां दंतेश्वरी, डोंगरगढ़ के मां बम्लेश्वरी, बिलासपुर के महामाया मंदिर, रायपुर के महामाया मंदिर समेत 10 मंदिरों में विशेष आरती के साथ मनोकामना ज्योति कलश प्रज्जवलित किए जाएंगे। वहीं, विदेशी और NRI ने भी ज्योति कलश जलवाने के लिए एडवांस बुकिंग की है। इस दौरान डोंगरगढ़ में 10 एक्सप्रेस ट्रेनों का स्टॉपेज भी दिया गया है। 19 से 27 मार्च तक 4 लोकल गाड़ियों का विस्तार भी किया गया है, डोंगरगढ़-दुर्ग के बीच स्पेशल ट्रेन भी चलाई जाएगी। रायपुर के ज्योतिषाचार्य अमिताभ दुबे और पं. मनोज शुक्ला के मुताबिक, वर्षों बाद ऐसा हो रहा है कि कलश स्थापना अमावस्या तिथि में की जाएगी, जिसे बहुत शुभ माना जाता है। 19 मार्च को शुक्ल और ब्रह्म योग का दुर्लभ मेल भी बन रहा है, जिससे इस नवरात्रि का महत्व और बढ़ गया है। खास बात यह है कि प्रतिपदा तिथि का अभाव होने के बावजूद नवरात्रि पूरे 9 दिनों तक चलेगी। दैनिक भास्कर आपको बता रहा है प्रदेश के प्रमुख मंदिरों में क्या-क्या कार्यक्रम होंगे। इन मंदिरों में इस साल चैत्र नवरात्रि में क्या खास है, श्रद्धालुओं को क्या सुविधाएं मिलेंगी, दर्शन-पूजन और ज्योति कलश की क्या व्यवस्थाएं हैं, पढ़िए इस रिपोर्ट में... छत्तीसगढ़ की 5 शक्ति पीठों के बारे में जानिए... मां महामाया 52 शक्ति पीठों में से एक है बिलासपुर जिले के रतनपुर स्थित महामाया मंदिर महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती को समर्पित है। ये 52 शक्ति पीठों में से एक है। देवी महामाया को कोसलेश्वरी के रूप में भी जाना जाता है, जो पुराने दक्षिण कोसल क्षेत्र की अधिष्ठात्री देवी हैं। अब जानिए डोंगरगढ़ में पहाड़ी पर स्थित मां बम्लेश्वरी के बारे में मां बम्लेश्वरी देवी का विख्यात मंदिर आस्था का केंद्र डोंगरगढ़ की पहाड़ी पर स्थित मां बम्लेश्वरी देवी का विख्यात मंदिर आस्था का केंद्र है। बड़ी बम्लेश्वरी के समतल पर स्थित मंदिर छोटी बम्लेश्वरी के नाम से प्रसिद्ध है। बम्लेश्वरी शक्ति पीठ का इतिहास करीब 2000 वर्ष पुराना है। इसे वैभवशाली कामाख्या नगरी के रूप में जाना जाता था। मां बम्लेश्वरी को मध्य प्रदेश के उज्जयिनी के प्रतापी राजा विक्रमादित्य की कुलदेवी भी कहा जाता है। इतिहासकारों ने इस क्षेत्र को कल्चुरी काल का पाया है। मंदिर की अधिष्ठात्री देवी मां बगलामुखी हैं। उन्हें मां दुर्गा का स्वरूप माना जाता है। उन्हें यहां मां बम्लेश्वरी के रूप में पूजा जाता है। मां बम्लेश्वरी देवी के भक्तों के लिए बढ़ाई गई ट्रेन सुविधाएं काले पत्थर से तराश कर बनाई गई मां दंतेश्वरी की मूर्ति देश के 52 शक्ति पीठों में से एक दंतेश्वरी मंदिर है। मान्यता है कि यहां देवी का दांत गिरा था। 14वीं शताब्दी में बना यह मंदिर दंतेवाड़ा में स्थित है। मां की मूर्ति काले पत्थर से तराश कर बनाई गई है। मंदिर को चार भागों में विभाजित किया गया है। गर्भगृह और महा मंडप का निर्माण पत्थर के टुकड़ों से किया गया था। मंदिर के प्रवेश द्वार के सामने एक गरुड़ स्तंभ है। मंदिर खुद एक विशाल प्रांगण में स्थित है जो विशाल दीवारों से घिरा हुआ है। शिखर को मूर्तिकला से सजाया गया है। अंबिकापुर का नाम ही महामाया अंबिका देवी के नाम पर है। किवदंति है कि महामाया का सिर रतनपुर और धड़ अम्बिकापुर में है। माता की प्रतिमा छिन्न मस्तिका है। महामाया के बगल में विंध्यवासिनी विराजी हैं। विंध्यवासिनी की प्राण प्रतिष्ठा विंध्याचल से लाकर की गई है। शारदीय नवरात्र में छिन्न मस्तिका महामाया के शीश का निर्माण राजपरिवार के कुम्हार हर साल करते हैं। जिस प्रतिमा को मां महामाया के नाम से लोग पूजते हैं, पहले इनका नाम समलाया था। महामाया मंदिर में ही दो मूर्तियां स्थापित थी। पहले महामाया को बड़ी समलाया कहा जाता था और समलाया मंदिर में विराजी मां समलाया को छोटी समलाया कहते थे। बाद में समलाया मंदिर में छोटी समलाया को स्थापित किया गया, तब महामाया कहा जाने लगा। अब जानिए चंद्रपुर की मां चंद्रहासिनी के बारे में सक्ती जिले के चंद्रपुर की छोटी सी पहाड़ी के ऊपर विराजित है मां चंद्रहासिनी। मान्यता है कि देवी सती का अधोदन्त (दाढ़) चंद्रपुर में गिरा था। यह मां दुर्गा के 52 शक्ति पीठों में से एक है। यहां बनी पौराणिक और धार्मिक कथाओं की झाकियां, करीब 100 फीट विशालकाय महादेव पार्वती की मूर्ति आदि आने वाले श्रद्धालुओं का मन मोह लेती है। अब जानिए अंचल की देवियों के बारे में... 1400 साल पहले रायपुर के महामाया मंदिर का निर्माण हैहयवंशी राजाओं ने करवाया था। महामाया मंदिर का गर्भगृह और गुंबद का निर्माण श्रीयंत्र के रूप में हुआ है। मंदिर में मां महालक्ष्मी, मां महामाया और मां समलेश्वरी तीनों की पूजा आराधना एक साथ की जाती है। घटस्थापना से होती है चैत्र नवरात्रि की शुरुआत नवरात्रि के पहले दिन घरों और मंदिरों में घटस्थापना यानी कलश स्थापना की जाती है। कलश को माता दुर्गा का प्रतीक माना जाता है। घटस्थापना के साथ ही 9 दिनों तक चलने वाली पूजा शुरू हो जाती है। कई लोग इन दिनों व्रत रखते हैं और सुबह-शाम माता की आरती करते हैं। मंत्र जप, ध्यान और देवी मां के ग्रंथों का पाठ करते हैं। इन दिनों में देवी के 51 शक्तिपीठों में काफी भक्त पहुंचते हैं। रायपुर की पुरानी बस्ती स्थित मां महामाया मंदिर ट्रस्ट ने भक्तों के लिए घर बैठे दान और दर्शन की सुविधा दी है। इसे लेकर UPI भी जारी किया गया है। माता को शृंगार का सामान चढ़ाने और अपने नाम से भोग लगाने के लिए लोग घर बैठे इस सुविधा का फायदा ले सकते हैं। यह मंदिर कोरेश के जमींदार परिवार ने बनवाया था। त्रिलोकी नाथ मंदिर, काली मंदिर और ज्योति कलश भवन से घिरा हुआ है। वहां भी एक गुफा है, जो नदी के नीचे जाती है और दूसरी तरफ निकलती है। गंगरेल में 52 गांव डूबने के बाद मां अंगार मोती माता की स्थापना की गई थी। माता के चरण पादुका मंदिर में अभी भी विराजित है। महासमुंद जिले के बागबहारा घुंचापाली में मां चंडी का मंदिर स्थित है। किंवदन्ती है कि करीब 150 साल पहले ये तंत्र-मंत्र की साधना स्थल हुआ करता था। यहां महिलाओं का जाना प्रतिबंधित था। प्राकृतिक रूप से माता चंडी के स्वरूप में शिला (पत्थर) ने आकार लिया। वैदिक रीति रिवाज से पूजा-अर्चना शुरू हो गई। इसके बाद महिलाओं का चंडी माता की पूजा करने का प्रतिबंध समाप्त हुआ। बरफानी धाम राजनांदगांव शहर में स्थित है। मंदिर के शीर्ष पर एक बड़ा शिवलिंग देखा जा सकता है। उसके सामने एक बड़ी नंदी प्रतिमा है। मंदिर तीन स्तरों में बनाया जाता है। नीचे की परत में पाताल भैरवी का मंदिर है, दूसरे में नवदुर्गा या त्रिपुर सुंदरी और ऊपरी स्तर में भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों की प्रतिमा है।
मोगा जिले में चोरी और लूट की वारदातें लगातार सामने आ रही हैं। ताजा घटना थाना बधनी के अंतर्गत आने वाले गांव बुट्टर से है, जहां विदेश से लौटे एक बुजुर्ग NRI से दिनदहाड़े सोने की अंगूठी उतार ली। घटना के बाद इलाके में दहशत का माहौल है। वह 10 दिन पहले ही विदेश से लौटा था। जानकारी के अनुसार पीड़ित बुजुर्ग बुद्ध सिंह अपने घर के पास एक मैकेनिक की दुकान के सामने बैठे थे। इसी दौरान मोटरसाइकिल पर सवार दो युवक उनके पास आए। कुछ ही देर बाद एक स्विफ्ट कार भी वहां रुकी, जिसमें से तीन से चार अन्य युवक उतरे और बुजुर्ग से बातचीत करने लगे। वारदात के बाद आरोपी फरार लुटेरों ने बातों में उलझाकर बुजुर्ग के हाथ से सोने की अंगूठी उतार ली और तुरंत मौके से फरार हो गए। यह पूरी वारदात दिनदहाड़े अंजाम दी गई। घटना की सूचना मिलने के बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है। पुलिस आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाल रही है ताकि आरोपियों की पहचान की जा सके। आरोपियों को गिरफ्तार करने की मांग पीड़ित बुजुर्ग बुद्ध सिंह ने पुलिस को शिकायत दर्ज कराई है। उन्होंने मांग की है कि आरोपियों को जल्द से जल्द गिरफ्तार किया जाए और उनकी लूटी हुई अंगूठी वापस दिलाई जाए। गौरतलब है कि शहर में इससे पहले भी कई ऐसी वारदातें हो चुकी हैं।
पेनसिल्वेनिया स्थित भारतीय मंदिर में 19वां गणगौर महोत्सव श्रद्धा, उत्साह और सांस्कृतिक गरिमा के साथ मनाया गया। इस अवसर पर उत्तर–पूर्वी अमेरिका के विभिन्न राज्यों से 500 से अधिक प्रवासी भारतीय एवं राजस्थानी समुदाय के लोग एकत्र हुए। ईसर-गौरी माता की पावन परंपरा का उत्सव मनाया। इसकी जानकारी फिलाडेल्फिया राजस्थानी मंडल (PARAM) के अध्यक्ष डॉ. रवि मुरारका ने दी। यह आयोजन भारतीय मंदिर के संस्थापक नंद टोडी तथा PARAM के अध्यक्ष डॉ. रवि मुरारका के नेतृत्व में आयोजित किया गया। इस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में बिनय श्रीकांत प्रधान, न्यूयॉर्क स्थित भारत के महावाणिज्य दूत (Consul General of India, New York) उपस्थित रहे। कार्यक्रम में राजस्थान एसोसिएशन ऑफ नॉर्थ अमेरिका (RANA), न्यूयॉर्क के अध्यक्ष प्रेम भंडारी गेस्ट ऑफ ऑनर के रूप में शामिल हुए। इसके अतिरिक्त अमेरिकी सांसद ब्रायन फिट्जपैट्रिक, एम्बलर के मेयर तथा अनेक सामुदायिक नेता भी कार्यक्रम में उपस्थित थे। RANA के ये सदस्य उपस्थित रहे प्रेम भंडारी के साथ RANA न्यूयॉर्क के कई सदस्य भी उपस्थित रहे। इनमें नव नियुक्त संरक्षक जुगल किशोर लड्डा, सचिव रवि जरगढ़ तथा सदस्य राज गर्ग, विनय जैन, शरद अग्रवाल और हरीश ठक्कर शामिल थे। महोत्सव के दौरान गौरी माता की पूजा, भव्य गणगौर शोभायात्रा, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां तथा पारंपरिक राजस्थानी व्यंजनों का आयोजन किया गया। इनमें दाल-बाटी-चूरमा, गट्टे की सब्जी और छाछ विशेष आकर्षण रहे। अपने संबोधन में भारत के महावाणिज्य दूत एंबेसडर बिनय श्रीकांत प्रधान ने कहा- अमेरिका में रहने वाले भारतीय प्रवासी समुदाय को आपसी सहयोग और एकजुटता के साथ उन मुद्दों और चुनौतियों का सामना करना चाहिए। इनका सामना भारतीय समुदाय यहां करता है। उन्होंने कहा- भारतीय डायस्पोरा अमेरिका-भारत संबंधों को और सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। एंबेसडर प्रधान ने प्रवासी भारतीयों को उद्यमिता, व्यापार और आपसी सहयोग के माध्यम से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने पर बल दिया। उन्होंने कहा- समय के साथ अमेरिका-भारत संबंधों की प्रकृति भी बदली है। पहले आर्थिक सहायता की आवश्यकता प्रमुख थी, वहीं आज के दौर में दोनों देशों के बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), व्यापार साझेदारी और तकनीकी सहयोग जैसे क्षेत्रों में साझेदारी को और मजबूत करने की आवश्यकता है। अपने संबोधन में प्रेम भंडारी ने राजस्थानी भाषा को भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की लंबे समय से चल रही मांग पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा- यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि राजस्थान विधानसभा द्वारा 25 अगस्त 2003 को सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव के बावजूद पिछले 23 सालों में इस दिशा में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है। भंडारी ने कहा- इस विलंब के लिए सभी राजनीतिक दल जिम्मेदार हैं। उन्होंने बताया- पिछले 16 सालों से वे सड़क से लेकर भारत के राष्ट्रपति भवन तक विभिन्न आंदोलनों और प्रदर्शनों में भाग लेते रहे हैं, परंतु राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में अब तक कोई निर्णय नहीं हो पाया है। उन्होंने यह भी कहा कि यह समझ से परे है कि राजस्थान सरकार ने अब तक राजस्थान में राजस्थानी भाषा को दूसरी राजभाषा का दर्जा क्यों नहीं दिया। अपने संबोधन में भंडारी ने न्यूयॉर्क स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास को वर्ष के 365 दिन समुदाय के लिए सक्रिय और सुलभ बनाए रखने तथा प्रवासी भारतीयों से निरंतर संवाद बनाए रखने के लिए महावाणिज्य दूत एंबेसडर बिनय श्रीकांत प्रधान की सराहना की। उन्होंने भारतीय मंदिर के संस्थापक और समाजसेवी नंद टोडी की भी प्रशंसा की, जिन्होंने फिलाडेल्फिया में एक शेल्टर होम के निर्माण के लिए 10 लाख डॉलर का उदार दान दिया है। 9 बच्चों को सम्मानित किया महोत्सव के दौरान आयोजित पोस्टर प्रतियोगिता में विजेता बने 9 बच्चों को सम्मानित किया गया। इन 9 बच्चों को RANA), New York की ओर से नकद पुरस्कार एवं प्रमाणपत्र प्रदान किए गए। बच्चों ने राजस्थान के पर्यटन स्थलों, ऐतिहासिक किलों तथा राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता मिलने के महत्व पर सुंदर पोस्टर तैयार किए थे। इस अवसर पर 25 से अधिक भारतीय सामुदायिक संगठनों के नेताओं के साथ एक विशेष बैठक भी आयोजित की गई, जिसमें महावाणिज्य दूत बिनय श्रीकांत प्रधान और प्रेम भंडारी के साथ सामुदायिक विषयों पर विस्तृत चर्चा की गई।इस दौरान सभी संगठनों की ओर से प्रधान व भंडारी का शॉल ओढ़ा कर स्वागत भी किया गया । गणगौर महोत्सव प्रवासी भारतीयों के बीच राजस्थानी संस्कृति, परंपरा और एकता को मजबूत करने का एक महत्वपूर्ण मंच बन चुका है।
प्रवासी भारतीय दिवस : गांधीजी की विरासत से वैश्विक भारत तक
इतिहास की कुछ तिथियां केवल अतीत की स्मृति नहीं, भविष्य की दिशा भी तय करती हैं

