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ईरान की लंबी दूरी की म‍िसाइल क्षमता क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती : इजरायली राष्‍ट्रपत‍ि

ईरान के जवाबी मिसाइल हमलों में इजरायल के दक्षिणी शहर अराद में भारी तबाही के बाद राष्ट्रपति इसहाक हर्ज़ोग ने क्षेत्र का दौरा क‍िया

देशबन्धु 23 Mar 2026 7:10 am

ईरान हार क्यों नहीं मान रहा:23 दिन की जंग में किसका कितना नुकसान; ट्रम्प जंग से निकलने का रास्ता कैसे खोज रहे

28 फरवरी 2026 यानी ईरान जंग का पहला दिन। अमेरिका और इजराइल ने ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई समेत दर्जनों टॉप लीडर्स को मार दिया। शुरुआती 100 घंटे में ही 50 हजार करोड़ रुपए के बम बरसाए गए। ट्रम्प और नेतन्याहू को जल्द से जल्द जीत की उम्मीद थी। 22 मार्च 2026 यानी ईरान जंग का 23वां दिन। ईरान ने इजराइल के डिमोना और अराद शहर पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। इसमें 300 से ज्यादा लोग घायल हुए। यानी अब भी ईरान पूरी ताकत से पलटवार कर रहा है। जंग के शुरुआती 23 दिनों में किसका-कितना नुकसान, आखिर कौन जीत रहा और आगे क्या सिनैरियो बन रहे; मंडे मेगा स्टोरी में पूरी कहानी… ***** ग्राफिक्स: अंकुर बंसल और अजीत सिंह -------- ये खबर भी पढ़िए…क्या पूरे मिडिल ईस्ट पर नेतन्याहू की नजर:'ग्रेटर इजराइल' क्या है, जिसके लिए ईरान जंग के बीच लेबनान पर कब्जा कर रहा इजराइल पूरी दुनिया की नजर ईरान जंग पर टिकी है। उधर इजराइल तेजी से लेबनान पर जमीनी कब्जा करने में जुटा है। इजराइल का कहना है कि वो हिजबुल्ला के सैन्य ढांचे और हथियारों को खत्म करना चाहता है। कई विश्लेषकों का मानना है कि नेतन्याहू ‘ग्रेटर इजराइल’ को हकीकत बनाने में जुटे हैं। पूरी खबर पढ़िए…

दैनिक भास्कर 23 Mar 2026 5:04 am

‘ईरान-अजरबैजान बॉर्डर पर फंसे, धमाकों में रात काटनी मुश्किल‘:इंडियन स्टूडेंट्स बोले- 1.5 लाख का टिकिट बेकार, नया लेने के पैसे नहीं

‘जंग के बीच गुजरता हर दिन पहले से ज्यादा भारी है। न चैन से सो पा रहे हैं, न जी पा रहे हैं। हमें तो रोज के खाने के लिए भी जद्दोजहद करनी पड़ रही है। हमारी मेंटल हेल्थ दिन ब दिन बिगड़ती जा रही है। अब बिल्कुल लाचार महसूस कर रहे हैं। ये भी नहीं जानते कि आगे क्या होने वाला है।‘ ईरान में मेडिकल की पढ़ाई कर रहीं कश्मीर की फलक घर नहीं लौट पा रहीं। वो तेहरान से तो सुरक्षित निकल गईं, लेकिन ईरान और अजरबैजान बॉर्डर पर अस्तारा चौकी के पास फंसी हुई हैं। बॉर्डर पर वो अकेली नहीं हैं। उनके साथ ही 180 भारतीय स्टूडेंट्स फंसे हुए हैं। इनकी शिकायत है कि एंबेसी ने टिकिट और वीजा कराने को कहा था, जिसके बाद कोम शहर से इवैकुएशन शुरू हुआ लेकिन अजरबैजान के बॉर्डर पर आकर फंस गए। न कंट्री कोड मिला और न घर लौट सके। बुक कराए फ्लाइट टिकिट भी बर्बाद हो गए लेकिन एंबेसी से कोई जवाब नहीं मिला।‘ ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच चल रही जंग में अब तक 2565 लोगों की मौतें हो चुकी है। अभी जंग थमने के आसार नहीं दिख रहे हैं। वहीं ईरान में करीब 1200 भारतीय स्टूडेंट फंसे हैं, जिनमें 900 जम्मू-कश्मीर के हैं। दैनिक भास्कर ने जंग के बीच बॉर्डर पर फंसे स्टूडेंट्स और उनकी फैमिली से बातचीत की। ‘1 से 1.5 लाख की टिकिट खरीदी, लेकिन घर नहीं लौट सके‘श्रीनगर की रहने वाली फलक तेहरान यूनिवर्सिटी से मेडिकल की पढ़ाई कर रही हैं। वे बताती हैं, ‘भारत सरकार अब तक हमें इवेक्युएट नहीं कर सकी है। हमसे यही कहा जा रहा है कि खुद के खर्च पर लौटना होगा। इससे पहले जब तेहरान से रेस्क्यू कर हमें कोम शहर लाया गया था, तब भी हम वहां भी 10 दिन फंसे रहे। एंबेसी से कोई जवाब नहीं मिल रहा था।‘ ‘फिर बताया गया कि हमें अजरबैजान के रास्ते भारत भेजा जा सकता है लेकिन पूरा खर्च हमें खुद उठाना होगा। हम भी अब और रिस्क नहीं लेना चाहते थे इसलिए हामी भर दी। हमसे कहा गया था कि PNR नंबर और कंफर्म टिकिट देने के बाद ही हमें कोम शहर से आगे भेजा जाएगा।‘ ‘हमने 1 से 1.5 लाख रुपए खर्च कर टिकिट कराया, बाकी इंतजाम भी कर लिए। सारे डॉक्यूमेंट्स जमा करने के बाद हमें ईरान-अजरबैजान बॉर्डर पर अस्तारा पोस्ट के पास लाया गया लेकिन भारत लौटने के लिए क्लीयरेंस नहीं मिला। हम करीब 180 स्टूडेंट्स यहीं फंसे हुए हैं।' ‘हमें भरोसा दिलाया गया था कि हर दिन 50 स्टूडेंट्स को बॉर्डर क्रॉस करने की परमिशन दी जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अब हमें टिकिट कैंसिल कराने और नुकसान उठाने को कहा जा रहा है। हमें एंबेसी से भी कोई मदद नहीं मिल रही है।‘ 20 दिन से एक से दूसरे शहर में घूम रहे, अब बॉर्डर पर फंसेफलक आगे कहती हैं, ‘हम पिछले 20 दिनों से यहां फंसे हुए हैं। अब तो चैन से नींद भी नहीं आ रही है। खाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। हमारी मानसिक स्थिति बिगड़ती जा रही है। हमें बताया गया है कि हमारे लिए होटल में ठहरने का इंतजाम है, लेकिन यहां कुछ नहीं मिला। खाने-पीने और बाकी जरूरतों के इंतजाम खुद करने पड़ रहे हैं।‘ ‘बस एक काम जो हम नहीं कर सकते, वो ईरान से बाहर निकलने का है। हमें अजरबैजान से बॉर्डर क्रॉस करने का क्लीयरेंस नहीं मिल रहा है।‘ ‘हम दूर-दराज वाले ऐसे इलाके में फंसे हैं, जहां नेटवर्क लगभग ना के बराबर है। फैमिली से भी बात नहीं हो पा रही है। कई स्टूडेंट्स के पास पैसे खत्म हो रहे हैं, कार्ड काम नहीं कर रहे और बैंकिंग सिस्टम साथ नहीं दे रहा है। हम इतना लाचार महसूस कर रहे हैं कि समझ नहीं पा रहे, आगे क्या करें।‘ ‘ईरान में हालात अभी अस्थिर हैं। हमें बार-बार एक जगह से दूसरी जगह शिफ्ट किया जा रहा है। इस खौफ और अनिश्चितता के माहौल में हम मेंटली बिल्कुल थक चुके हैं। हमारी बस यही गुजारिश हैं कि कुछ भी करके हमें यहां से जल्द निकालें। अगर अपने पैसे खर्च करने के बाद भी हम यहां से नहीं निकल पा रहे, तो अब हमारे पास रास्ता ही क्या बचता है।‘ स्टूडेंट बोले- ये जंग पहले से ज्यादा भयानक ईरान में फंसे श्रीनगर के एक स्टूडेंट ने पहचान जाहिर न करने की शर्त पर हमसे बात की। वो कहते हैं, ‘अभी ईरान में फंसा हूं। पिछले एक साल में ये तीसरी बार है, जब हमें जंग के कारण देश लौटने के लिए कहा जा रहा है। ‘पहली बार तब कहा गया, जब करीब 10-12 दिनों तक जंग के हालात रहे थे। तब भी हम डरे हुए थे, लेकिन अब के हालात पहले से कहीं ज्यादा भयानक है। पहले ये सिर्फ दो देशों की लड़ाई थी लेकिन अब इसमें कई देश शामिल हो गए हैं। अबकी हालात कंट्रोल से बाहर लग रहे हैं।‘ ‘हमें लगातार हवाई हमलों, ड्रोन और ब्लास्ट की आवाजें सुनाई देती हैं। कई बार धमाके बहुत करीब से महसूस होते हैं। रात काटनी मुश्किल हो जाती है, हम सो नहीं पाते और हर वक्त खौफ में जीते हैं। हमें रीलोकेट कर दिया गया है। तेहरान के हाई रिस्क इलाकों से निकालकर सेफ जगहों पर लाया गया है, लेकिन खतरा कम नहीं हुआ है।‘ ‘हमारे साथ कई स्टूडेंट्स को इवैक्यूएशन के लिए आर्मेनिया और अजरबैजान जैसे बॉर्डर इलाकों में शिफ्ट किया गया है। कुछ आर्मेनिया के रास्ते भारत लौटने में कामयाब रहे, लेकिन हम सब कई दिनों से अजरबैजान में फंसे हुए हैं। हमने महंगे टिकिट बुक करा लिए, सभी डॉक्यूमेंट्स जमा कर दिए और हर गाइडलाइन फॉलो की लेकिन फिर भी कोई क्लियर जवाब नहीं मिला।‘ ‘हमारे पैसे खत्म हो रहे हैं। कुछ स्टूडेंट्स बीमार पड़ रहे हैं। टेंशन बहुत बढ़ चुकी है। हमारे साथ-साथ घर वाले भी परेशान हैं। बार-बार इवैक्यूएशन के स्थिति ने पढ़ाई-लिखाई चौपट कर दी है। MBBS का कोर्स, जो 5–6 साल में पूरा हो जाना चाहिए। अब वो 7 साल या उससे ज्यादा भी खिंच सकता है। क्योंकि जंग की वजह से एग्जाम टलेंगे, इसका असर करियर पर पड़ेगा।‘ पेरेंट्स परेशान, बोले- बस बच्चे सुरक्षित लौट आएंश्रीनगर की रहने वाली शाहीन अख्तर का बेटा ईरान से मेडिकल की पढ़ाई कर रहा है। वे कहती हैं, ‘जंग में बेटा भी फंसा है। बाकी पेरेंट्स की तरह हम भी उसकी सलामती को लेकर परेशान हैं।‘ ‘ईरान से कई स्टूडेंट्स को आर्मेनिया के रास्ते पहले ही निकाला जा चुका है, लेकिन अब भी बड़ी संख्या में स्टूडेंट्स क्लीयरेंस न मिलने के कारण अजरबैजान बॉर्डर पर फंसे हैं। इनमें मेरा बेटा भी है।‘ ‘हम लगातार ऑफिशियल चैनल के जरिए अथॉरिटीज के संपर्क में थे। मीटिंग्स भी हुईं। हमसे बच्चों के लिए टिकिट और वीजा करने के लिए कहा गया। भरोसा दिलाया गया कि उन्हें सुरक्षित रास्तों से बॉर्डर तक पहुंचाया जाएगा और फिर भारत इवैकुएट कर लिया जाएगा।‘ ‘स्टूडेंट्स को लगभग 50-50 के ग्रुप में भेजने के लिए कहा गया था। इस पर यकीन करते हुए तय तारीखों पर हमने टिकिट भी बुक कर दी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कई पेरेंट्स ने तो पहली टिकिट कैंसिल होने के बाद दोबारा भी टिकिट बुक कराई, लेकिन अब तक बच्चे नहीं लौटे।‘ ‘स्टू़डेंट्स से कुछ ग्रुप्स निकाले गए, कई अब भी फंसे‘शाहीन आगे बताती हैं, ‘जिन स्टूडेंट्स के निकलने के लिए 18, 19 और 21 तारीख तय की गई थी, वो अब भी ईरान-अजरबैजान के बॉर्डर पर फंसे हैं। उनके पास वैलिड टिकिट भी है, लेकिन मौजूदा पाबंदियों के कारण उन्हें बॉर्डर क्रॉस करने की परमिशन नहीं मिल रही है।‘ ‘कुछ स्टूडेंट 15-16 दिनों से इंतजार कर रहे हैं। बॉर्डर बंद होने की वजह से उनमें कुछ के टिकिट पहले ही कैंसिल हो चुके हैं। स्टूडेंट्स और उनके परिवार दोनों परेशान हैं। मेरी भारत सरकार, खासकर विदेश मंत्रालय से अपील है कि ये मुद्दा तुरंत अजरबैजान सरकार के सामने उठाया जाए ताकि बॉर्डर क्लीयरेंस मिल सके और बच्चे घर लौट सकें।’ हम मिडिल क्लास परिवार, हमारे पैसे बर्बाद-बच्चे भी नहीं लौटेइसके बाद हमने श्रीनगर में रहने वाले मोहम्मद अनवर से बात की। उनकी बेटी भी अजरबैजान में फंसी है। वे कहते हैं, ’हम सब मिडिल क्लास परिवारों से हैं, कोई भी हाईफाई फैमिली से नहीं है। हमने पहले जो टिकिट बुक की, वो एग्जिट कोड न मिलने से बेकार हो गई। इसके बाद दोबारा टिकिट बुक करनी पड़ी। इस बार कीमत लगभग तीन गुना ज्यादा थी।’ ’टिकिट और वीजा का इंतजाम करना हमारी जिम्मेदारी थी, हमने पूरी की। अब एग्जिट कोड जारी करना हमारे हाथ में नहीं है, ये तो अधिकारियों की जिम्मेदारी है। अब हमारे बच्चे भाग-भागकर सिर्फ शारीरिक तौर पर ही नहीं, मेंटली भी बहुत परेशान हो चुके हैं। घबराहट और तनाव में बीमार भी पड़ रहे हैं। सरकार से यही गुजारिश है कि इस मुश्किल वक्त में दखल देकर हमारी मदद करें।’ ये खराब मैनेजमेंट और कोऑर्डिनेशन का नतीजाबडगाम के रहने वाले सुहैल मुजम्मिल का बेटा भी अजरबैजान बॉर्डर पर फंसा है। उनका मानना है कि इवैकुएशन में आ रही दिक्कत की सबसे बड़ी वजह खराब कोऑर्डिनेशन है। वे कहते हैं, ‘अजरबैजान बॉर्डर पर बच्चे इसलिए फंसे हैं क्योंकि उनके इवैक्यूएशन की जिम्मेदारी संभालने वालों का तरीका सही नहीं है। जिन स्टूडेंट्स को बाद की तारीख मिली थी, वो पहले बॉर्डर क्रॉस कर चुके हैं, जबकि जिनकी बुकिंग पहले की थी, वे अब भी फंसे हुए हैं।‘ ‘यही खराब मैनेजमेंट पूरे संकट की जड़ है। एंबेसी से कॉन्टैक्ट करने का भी कोई सही जरिया नहीं है। पेरेंट्स की बच्चों से भी बात नहीं हो पा रही है, जब उनमें से कोई कॉल करता है तभी बात हो पाती है।‘ ये सिर्फ इवैक्यूएशन नहीं, उनके फ्यूचर का सवालजेकेएसए कंवीनर नासिर खुएहामी का कहना है कि पिछले तीन हफ्तों में ईरान और इजराइल के बीच जारी संघर्ष ने भारतीय स्टूडेंट्स, खासकर कश्मीर के बच्चों के लिए मुश्किल हालात पैदा कर दिए हैं। कश्मीर घाटी से करीब 2,000 स्टूडेंट्स ईरान के मशहद, शिराज, अराक और तेहरान जैसे शहरों में पढ़ रहे हैं। ‘पिछले एक साल में ये तीसरी बार है, जब जंग के चलते स्टूडेंट्स को इवैक्यूएशन का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि मौजूदा स्थिति पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक है। बड़ी संख्या में स्टूडेंट्स बाकी औपचारिकताएं पूरी करने के बावजूद अजरबैजान बॉर्डर पर फंसे हुए हैं।‘ ‘स्टूडेंट्स की सेफ्टी तो मसला है ही। साथ ही बार-बार होने वाले इवैक्यूएशन ने उनका एकेडमिक फ्यूचर बर्बाद कर दिया है। MBBS जैसा कोर्स अब 7-7.5 साल तक खिंच सकता है। इससे उनका आगे का करियर भी प्रभावित हो सकता है। इसलिए ये सिर्फ इवैक्यूएशन का मुद्दा नहीं है, बल्कि हजारों स्टूडेंट्स के फ्यूचर और उनके परिवारों से जुड़ा बड़ा सवाल है। इस वक्त तत्काल और सख्त एक्शन की जरूरत है।‘ ……………….ये खबर भी पढ़िए ‘हॉस्टल के पास मिसाइलें गिरीं, पता नहीं बचूंगी या नहीं’ कश्मीर के अनंतनाग में रहने वाले बिलाल अहमद भट्ट की बेटी ईरान की राजधानी तेहरान में MBBS की पढ़ाई कर रही है। 9 मार्च की रात 3 बजे बिलाल के पास उसका फोन आया। वो रो रही थी। बिलखते हुए बोली- ‘अब्बू, मेरे हॉस्टल के पास मिसाइलें गिरने की आवाज आ रही हैं, बमबारी हो रही है। पता नहीं आज रात बचूंगी या नहीं। मुझे बचा लो।’ पढ़िए पूरी खबर…

दैनिक भास्कर 23 Mar 2026 4:58 am

हमने होर्मुज को नहीं किया बंद, अगर तेहरान के इंफ्रास्ट्रक्चर पर हुआ हमला तो मिलेगी सजा: ईरान

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 48 घंटे वाले अल्टीमेटम का ईरान के सबसे बड़े मिलिट्री कमांड यूनिट खातम-अल-अंबिया ने जवाब दिया है

देशबन्धु 23 Mar 2026 4:10 am

ईरान रणनीति पर रिपब्लिकन सीनेटर की नाराज़गी: ट्रंप प्रशासन पर सवाल

एक प्रभावशाली रिपब्लिकन सीनेटर ने ईरान संघर्ष में ट्रंप प्रशासन के उद्देश्यों की अस्पष्टता पर चिंता जताई है। उन्होंने चेतावनी दी कि यह रुख प्रमुख सहयोगियों के साथ संबंधों को कमजोर कर सकता है

देशबन्धु 23 Mar 2026 3:30 am

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की ‘माइन स्वीपिंग’ आखिर क्या? क्यों जापान ने दिखाई दिलचस्पी

जापान के विदेश मंत्री तोशिमित्सु मोटेगी का हालिया बयान एक ऐसे सैन्य ऑपरेशन की ओर इशारा करता है, जो दिखने में सफाई जैसा लगता है

देशबन्धु 22 Mar 2026 11:20 pm

ट्रंप की धमकी एयरपोर्ट सुरक्षा के लिए आईसीई एजेंट तैनात करेंगे

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गृह सुरक्षा विभाग (डीएचएस) के बंद होने के बीच एयरपोर्ट पर सिक्योरिटी के लिए आव्रजन और सीमा शुल्क प्रवर्तन (आईसीई) एजेंट्स को तैनात करने की धमकी दी है

देशबन्धु 22 Mar 2026 10:24 am

ट्रंप की चेतावनी 48 घंटे में होर्मुज स्ट्रेट न खुला तो ईरानी पावर प्लांट्स पर हमला

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने धमकी दी है कि अगर ईरान 48 घंटों के भीतर होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह से नहीं खोलता है तो संयुक्त राज्य अमेरिका ईरानी पावर प्लांट्स को निशाना बनाएगा

देशबन्धु 22 Mar 2026 9:07 am

यूएन महासचिव की अपील नस्लवाद मिटाने के लिए दुनिया आए एकजुट

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने दुनिया भर में बढ़ते नस्लवाद को लेकर चिंता जताई है और इसे खत्म करने के लिए एकजुट होकर काम करने की अपील की है

देशबन्धु 22 Mar 2026 8:55 am

युद्ध शुरू होने के बाद से अमेरिका और इजरायल ने 80,000 से ज्यादा नागरिक स्थानों पर हमले किए: ईरानी अधिकारी

ईरान रेड क्रेसेंट सोसायटी के अध्यक्ष पीरहुसैन कोलिवंद ने कहा है कि अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ अपनी “आक्रामक कार्रवाई” की शुरुआत से अब तक 80,000 से ज्यादा नागरिक स्थानों पर हमले किए हैं

देशबन्धु 22 Mar 2026 8:49 am

ईरान का बड़ा मिसाइल हमला इजरायल के न्यूक्लियर सिटी डिमोना और अराद में तबाही

इजरायल के दक्षिणी शहरों में न्यूक्लियर सिटी डिमोना के साथ अराद में ईरान ने बड़ा मिसाइल अटैक किया है। शनिवार को दक्षिणी शहरों डिमोना और अराद में ईरानी हमलों में 100 से ज्यादा लोग घायल हो गए

देशबन्धु 22 Mar 2026 8:45 am

संडे जज्बात-हादसों में इंटरनेशनल खिलाड़ी बेटे-बेटी को गंवाया:हार नहीं माने- 55 की उम्र में फिर पिता बने; अब बेटी को अंडर-12, अंडर-14 में विश्व चैंपियन बनाया

मेरी कहानी एक साधारण स्पोर्ट्स कोच की नहीं, उस पिता की है, जिसने अपने दोनों अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बच्चों को खो दिया… लेकिन खेल और सपने को मरने नहीं दिया। 2004 में नेशनल चैंपियन तीरंदाज बेटी वोल्गा एक सड़क हादसे में चली गई। अकादमी बंद हो गई। परिवार बिखरने लगा। उसके बाद बेटे लेनिन ने MBBS छोड़ धनुष उठा लिया- अपने लिए नहीं, मेरे और अपनी बहन के अधूरे सपने के लिए। धीरे-धीरे वह इंटरनेशनल खिलाड़ी बना, कोच बना और अकादमी को फिर से खड़ा किया। लेकिन 2010 में, जिस दिन उसे राज्य सम्मान मिला, उसी दिन लौटते वक्त रास्ते में एक सड़क हादसे में उसकी भी मौत हो गई। बाद में, 55 साल की उम्र में मैं फिर पिता बना। बेटी शिवानी पैदा हुई। मैंने दो साल की उम्र में ही उसके हाथ में धनुष थमा दिया। आज वह भी इंटरनेशनल खिलाड़ी बन चुकी है। अब यही कहूंगा- ‘मेरा बेटा लेनिन गया नहीं… वह शिवानी के रूप में जिंदा है।’ मैं सत्यनारायण चेरूकुरी हूं। ‘चेरूकुरी वोल्गा आर्चरी अकादमी’ चलाता हूं। 1959 में आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले के नंदीवाड़ा गांव में पैदा हुआ। हम कुल पांच भाई-बहन थे- दो भाई और तीन बहनें। वक्त के साथ सब छूटते चले गए… और अब मैं ही अकेला बचा हूं। उस वक्त हमारा इलाका हर साल बाढ़ से जूझता था। खेती पर निर्भर परिवार के लिए हालात आसान नहीं थे- हर साल कुछ न कुछ उजड़ जाता था। इसी वजह से, 1964 में मेरी नानी के कहने पर पूरा परिवार विजयवाड़ा आ गया। यहां हालात थोड़ा संभले। नानी ने पिता को एक बैलगाड़ी दिला दी, जिससे उन्होंने सामान ढोने का काम शुरू किया। घर चलने लगा। पिता सिर्फ किसान या मजदूर नहीं थे, उन्हें नाचने का भी शौक था। शायद वहीं से मेरे अंदर भी कला और खेल दोनों का बीज पड़ा। पिता चाहते थे कि मैं कुचिपुड़ी डांसर बनूं। उनके कहने पर मैंने बाकायदा डांस सीखना शुरू भी किया। इस समय तक आंध्र में डांस में भी मेरी एक पहचान बन चुकी थी। सब ठीक चल रहा था, लेकिन तभी शादी हो गई… और फिर धीरे-धीरे डांस छूट गया। जिंदगी ने जैसे उस मोड़ पर एक अलग दिशा पकड़ ली। डांस छूटने के बाद मेरा झुकाव छात्र राजनीति की तरफ बढ़ा। उस दौर में मैं सीपीआई के छात्र संगठन एआईएसएफ यानी ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन से जुड़ा और संगठन के काम में लगातार सक्रिय रहा। इसी सिलसिले में मुझे लंबे समय तक रूस में रहने का मौका मिला। रूस में सोच बदलने वाला दौर था। वहां मैंने लेनिन को पढ़ा और धीरे-धीरे उनसे प्रभावित होता चला गया। वहां अक्सर कहा जाता कि ‘लेनिन’ का मतलब लिखने वाला पेन होता है। उसी समय मन में एक बात बैठ गई- अगर कभी बेटा हुआ, तो उसका नाम लेनिन रखूंगा। कुछ साल बाद जब मैं वापस भारत लौटा, तो जिंदगी अपने सामान्य ढर्रे पर लौट आई। पहले मुझे बेटी पैदा हुई। उसका नाम मैंने वोल्गा रखा और उसके डेढ़ साल बाद बेटा हुआ। उसका नाम लेनिन रखा। इधर, पार्टी के काम के सिलसिले में मेरा जंगलों और आदिवासी इलाकों में भी आना-जाना लगा रहता। कई बार वहां दिनों-दिन रुकना पड़ता। वहीं मैंने पहली बार तीरंदाजी को करीब से देखा। धीरे-धीरे मैंने भी तीर चलाना सीख लिया। जब घर लौटा, तो लगा कि जो सीखा है, उसे आगे बढ़ाना चाहिए। मैंने लेनिन को भी तीरंदाजी सिखाने की कोशिश की। लेकिन उस समय उसकी दिलचस्पी कुचिपुड़ी डांस में ज्यादा थी। वह उसी में मशगूल रहता था। हां, बीच-बीच में शौक के तौर पर तीर पकड़ लेता था। लेकिन एक बात साफ थी- लेनिन के जन्म के साथ ही मैंने एक सपना देख लिया था कि उसे तीरंदाजी में आगे ले जाना है। सिर्फ खेलने तक नहीं, बल्कि एक दिन उसे इंटरनेशनल खिलाड़ी और कोच के रूप में देखना है। इसी सोच के साथ 1997 में मैंने छह बच्चों के साथ ‘कृष्णा डिस्ट्रिक्ट आर्चरी अकादमी’ शुरू की। लेनिन और वोल्गा- दोनों वहीं प्रैक्टिस करने लगे। हालांकि उस वक्त तक लेनिन ने तय नहीं किया था कि वह तीरंदाजी को करियर बनाएगा। वह डांस में भी उतना ही जुड़ा हुआ था। फिर 2000 में एक मोड़ आया। स्कूल गेम्स में लेनिन ने तीरंदाजी में नेशनल चैंपियनशिप जीत ली। यहीं से मैंने ठान लिया- अब इसे इसी में आगे बढ़ाना है। मैंने उस समय देश के जाने-माने कोच लिंबा राम और मंगल सिंह को अकादमी से जोड़ा। उनसे कहा- लेनिन को तैयार करना है। ट्रेनिंग शुरू हुई। लेनिन ने भी खुद को पूरी तरह तीरंदाजी में झोंक दिया। 2003 तक वह यूनिवर्सिटी चैंपियन बन चुका था। नाम बनने लगा था। लेकिन घर के अंदर एक अलग ही बात चलती थी। मेरी बेटी वोल्गा चाहती थी कि उसका भाई डॉक्टर बने। दोनों में डेढ़ साल का ही फर्क था, लेकिन रिश्ता बहुत गहरा था। वोल्गा को जो भी चाहिए होता- वह मुझसे नहीं, सीधे लेनिन से कहती थी। उसे थम्स अप पीना बहुत पसंद था। लेनिन उसे मना करता, डांटता भी था… लेकिन फिर खुद ही जाकर लाता था। पॉपकॉर्न, चिकन- सब वही लाता था उसके लिए। असल में, वोल्गा के लिए लेनिन सिर्फ भाई नहीं- उसका सबसे भरोसेमंद साथी था। और इस दौरान वोल्गा खुद भी पीछे नहीं थी। 2004 तक वह अंडर-14, 17 और 19 कैटेगरी में खेल चुकी थी। पांच बार गोल्ड मेडल जीत चुकी थी। तीरंदाजी में नेशनल चैंपियन थी। घर में एक तरफ मेरा सपना था- लेनिन तीरंदाजी में आगे बढ़े और दूसरी तरफ वोल्गा का सपना- भाई डॉक्टर बने। दोनों अपने-अपने तरीके से एक-दूसरे के लिए जी रहे थे। लेनिन मेडिकल एंट्रेंस की तैयारी भी कर रहा था। वह वोल्गा का सपना पूरा करना चाहता था- डॉक्टर बनने का। लेकिन 29 नवंबर 2004 को सब कुछ अचानक रुक गया। दोपहर करीब साढ़े 12 बजे का वक्त था। मैं और लेनिन स्टेडियम में थे। बच्चे प्रैक्टिस कर रहे थे। मैं उन्हें तीर पकड़ने का तरीका समझा रहा था। सब कुछ सामान्य था। तभी फोन आया। उधर से मेरी पत्नी की रोने की आवाज थी। उन्होंने बस इतना कहा- ‘जल्दी घर आओ… वोल्गा…’ आवाज साफ नहीं थी, लेकिन बात समझ आ गई- कुछ गंभीर हुआ है। मैंने लेनिन की तरफ देखा और कहा, ‘चलो, घर चलते हैं।’ हम तुरंत स्टेडियम से निकले। रास्ते भर मन में एक ही सवाल था- क्या हुआ होगा? घर के पास पहुंचे तो भीड़ दिखी। दिल बैठ गया। मैं भागते हुए अंदर गया। लेनिन पीछे था। अंदर देखा- वोल्गा जमीन पर पड़ी थी। कोई कुछ नहीं बोल रहा था। कुछ ही देर में साफ हो गया- वह नहीं रही। कॉलेज से स्कूटी पर लौट रही थी। घर से थोड़ी ही दूरी पर बस ने टक्कर मार दी। मौके पर ही मौत हो गई। सुबह जाते वक्त बस इतना कहा था- ‘पापा, कॉलेज जा रही हूं… शाम को ग्राउंड चलेंगे।’ वह रोज की तरह ही गई थी। लेकिन उस दिन… वह शाम कभी नहीं आई। वोल्गा के जाने के बाद कुछ समझ नहीं आ रहा था। अकादमी बंद कर दी। घर का माहौल पूरी तरह बदल गया। मेरी पत्नी वोल्गा को याद कर-करके रोतीं। मैं उन्हें संभालने की कोशिश करता, लेकिन खुद भी भीतर से टूट चुका था। लेनिन सबसे ज्यादा बदला हुआ दिख रहा था। वह लगभग चुप हो गया था। कम बोलता था। बस कभी-कभी पूछता- ‘पापा, ये क्या हो गया… भगवान दीदी को क्यों ले गए?’ इन सबके बीच भी लेनिन ने तीरंदाजी नहीं छोड़ी। वह प्रैक्टिस के लिए जाता रहा। शायद वही उसका सहारा था। कुछ दिन बाद उसका एमबीबीएस में एडमिशन हो गया। उसने पढ़ाई शुरू कर दी। लेकिन घर का सन्नाटा बना रहा। करीब दो साल तक हम पति-पत्नी घर से बाहर नहीं निकले। न किसी से मिलना, न बात करना। घर में पहले जो आवाजें थीं- हंसी, नोक-झोंक, सब खत्म हो गई। इसी बीच लेनिन ने एक दिन साफ कहा- ‘पापा, मैं एमबीबीएस नहीं करूंगा। मैं तीरंदाजी करना चाहता हूं। हमें फिर से अकादमी शुरू करनी चाहिए।’ उस दिन वह हमें अकादमी ले गया। पहले दिन अकादमी पहुंचे तो सब सूना था। मैदान खाली पड़ा था। कुछ पुराने टारगेट धूल में पड़े थे। लेनिन ने खुद जाकर तीर-कमान उठाए। कुछ बच्चों को बुलाया, जो पहले यहां आते थे। धीरे-धीरे 4-5 बच्चे आ गए। वह उन्हें लाइन में खड़ा करता, तीर पकड़ने का तरीका बताता। खुद डेमो देता। ‘ऐसे पकड़ो… ध्यान सीधा रखो…’ मैं और मेरी पत्नी एक तरफ खड़े देख रहते थे। थोड़े दिन में उस मैदान में फिर से आवाजें सुनाई दे रही थीं- तीर के लगने की आवाज, बच्चों की हलचल। अकादमी फिर चल पड़ी। धीरे-धीरे बच्चे बढ़ने लगे… और वह जगह फिर से जिंदा होने लगी। अकादमी दोबारा शुरू हुई, तो लेनिन ने एक और फैसला लिया। उसने कहा- अब इसका नाम ‘वोल्गा आर्चरी अकादमी’ होगा। उसका तर्क साफ था- ‘वोल्गा को दुनिया जानेगी। उसका नाम यहीं से जिंदा रहेगा।’ और उसी नाम से अकादमी चलने लगी। इसके बाद लेनिन पूरी तरह इसमें जुट गया। खुद भी ट्रेनिंग लेता और छोटे बच्चों को सिखाता। सुबह से शाम तक मैदान में रहता। धीरे-धीरे असर दिखने लगा बच्चे बढ़ने लगे। पुराने खिलाड़ी लौटे। कुछ नए जुड़े। अकादमी फिर से नेशनल लेवल तक खिलाड़ियों को भेजने लगी। इसी दौरान उसने एक बड़ा फैसला लिया। एमबीबीएस छोड़ दिया। वह जानता था कि तीरंदाजी मेरे लिए सिर्फ खेल नहीं, जिंदगी है। शायद यह भी समझ गया था कि मैं अब अकेले इसे संभाल नहीं पाऊंगा। उसने कुचिपुड़ी डांस भी छोड़ दिया। धीरे-धीरे उसने अपने सारे रास्ते समेटकर एक ही दिशा चुन ली- तीरंदाजी की। असल में, वह सिर्फ अपना करियर नहीं बना रहा था। वह मेरा सपना और वोल्गा की याद- दोनों को साथ लेकर चल रहा था। 2005 तक हालात पूरी तरह बदल चुके थे। देश के अलग-अलग हिस्सों से बच्चे यहां आने लगे थे। उधर, लेनिन खुद भी आगे बढ़ रहा था। केरल में उसने नेशनल चैंपियनशिप जीती। आंध्र प्रदेश के लिए गोल्ड मेडल लाया और फिर- उसका चयन इंडियन टीम में हो गया। अब वह सिर्फ कोच का बेटा नहीं, खुद एक उभरता हुआ इंटरनेशनल खिलाड़ी बन गया था। बेटी के जाने के बाद घर में सन्नाटा था, लेकिन अब पूरा ध्यान लेनिन पर था। वही उम्मीद था। वही सहारा। धीरे-धीरे हम तीनों- मैं, मेरी पत्नी और लेनिन वोल्गा की याद के साथ उसी सपने को जीने लगे। लेनिन ने भी खुद को पूरी तरह तीरंदाजी में झोंक दिया। कम उम्र में ही उसकी पहचान बनने लगी। महज 18 साल की उम्र में वह लेवल-3 कोच बन गया। तीरंदाजी की टेकनीक ‘कंपाउंड बो’ में उसका प्रदर्शन लगातार बेहतर होता गया। नेशनल जीता, फिर इंटरनेशनल सर्किट में नाम बना। वह सिंगापुर गया, वहां ट्रेनिंग ली। वहीं के एक कोच ने मुझसे कहा था- ‘लेनिन बहुत आगे जाएगा।’ उस वक्त यह बात हौसला देती थी… और बाद में सच भी साबित हुई। 2010 तक आते-आते लेनिन एक जाना-माना खिलाड़ी था। उसी साल कॉमनवेल्थ गेम्स में हमारे अकादमी के खिलाड़ियों ने सिल्वर मेडल जीते। राज्य सरकार ने 23 सितंबर को हैदराबाद में उसे सम्मानित करने के लिए बुलाया। कार्यक्रम खत्म हुआ। बारिश तेज थी। हम कार से विजयवाड़ा लौट रहे थे। विजयवाड़ा में हजारों लोग उसके स्वागत के इंतजार में थे। शाम करीब 4:40 बजे थे। विजयवाड़ा से कुछ दूरी पहले अचानक सामने एक ऑटो ने यू-टर्न लिया। लेनिन गाड़ी चला रहा था। उसने बचाने की कोशिश की, ब्रेक मारी… गाड़ी उछली… और कुछ सेकंड में सब खत्म हो गया। लेनिन दूर जा गिरा। मौके पर ही उसकी मौत हो गई। मैं भी घायल था। सिर में चोट थी, हाथ टूट गया था… लेकिन उससे बड़ा झटका यह था कि जिस दिन उसे सम्मान मिला, उसी दिन वह चला गया। 24 साल का मेरा बेटा, जो देश के लिए खेल रहा था… नहीं रहा। उसने अपने छोटे से करियर में बहुत कुछ किया था। नेशनल चैंपियन रहा, इंडियन टीम का हिस्सा रहा। रेलवे में नौकरी मिली और सबसे अहम- अकादमी को खड़ा किया। अब जब मैं अकादमी में देखता, तो हर कोना उसकी याद दिलाता है। उसके जाने के बाद एक पल को लगा- सब खत्म हो गया। लेकिन फिर एक सवाल सामने था- जो बच्चे यहां सीख रहे हैं, उनका क्या होगा? मैंने उसी दिन तय किया- अकादमी बंद नहीं होगी। जिस दिन लेनिन की मौत हुई… उसी दिन मैं अकादमी गया। काम किया। शाम को बच्चे मेरे पास आए। बोले- ‘सर, हम सब लेनिन हैं… आप अकेले नहीं हैं।’ उनकी बात सुनकर लगा- शायद यही रास्ता है। उस दिन के बाद अकादमी एक दिन के लिए भी बंद नहीं हुई। लेकिन लेनिन के जाने के बाद दोबारा हिम्मत मेरी पत्नी ने दी। उसने कहा कि अब घर में नहीं रहना है। पहले हम अकादमी से थोड़ा दूर रहते थे। लेनिन के जाने के बाद मैं और मेरी पत्नी अकादमी में ही शिफ्ट हो गए। हम यहीं रहने लगे। पत्नी ने कहा कि अकादमी के बच्चे अब हमारे बच्चे हैं। फिर वोल्गा और लेनिन दोनों के नाम की जायदाद मैंने अकादमी में लगा दी। लेनिन को गए करीब डेढ़ साल हो चुके थे। घर और अकादमी- दोनों ही जैसे चुप थे। उसी दौरान एक दिन मेरी पत्नी ने कहा- उसे बच्चा चाहिए। मेरी उम्र 55 साल थी। एक पल को लगा- क्या यह सही समय है? लेकिन फिर लगा, शायद यही आगे बढ़ने का रास्ता है। मैंने हां कह दी। 2012 में हमारे घर शिवानी पैदा हुई। शुरू से ही उसमें कुछ अलग था। मैं उसे देखता… तो बार-बार लेनिन याद आता। धीरे-धीरे यह एहसास और गहरा होता गया- उसके हाव-भाव, चलने का तरीका, खेलने का अंदाज… सब कुछ कहीं न कहीं लेनिन जैसा लगता। दो साल की हुई, तो मैंने उसके हाथ में धनुष दे दिया। यह कोई तय फैसला नहीं था, बस यूं ही। उसने उसे पकड़ लिया… और फिर छोड़ना नहीं चाहा। वह इसी अकादमी में पली-बढ़ी। मैदान, टारगेट, तीर- यही सब उसके खिलौने थे। समय के साथ उसने अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी है। आज वह अंडर-9 तीरंदाजी में देश की चैंपियन है और अंडर-12 और अंडर-14 में विश्व चैंपियान तीरंदाज। अमेरिका और जर्मनी से लोग उस पर डॉक्युमेंट्री बनाने भी आए। अब वह आगे की तैयारी कर रही है। टारगेट है- ओलंपिक मेडल लाना। मैं अक्सर कहता हूं- मुझे शिवानी नहीं, उसमें लेनिन दिखाई देता है। मेरे दो बच्चे चले गए… लेकिन मेरे लिए लेनिन कहीं गया नहीं। वह हर दिन यहीं है- शिवानी की आदतों में, उसकी मेहनत में, उसके खेल में। शायद इसलिए मैं अब पीछे मुड़कर ज्यादा नहीं देखता। बस एक ही बात दिमाग में रहती है- लेनिन का नाम आगे बढ़ाना है। लेकिन इस वक्त मेरे साथ सदमा देने वाली बात हुई है। मेरी अकादमी से तैयार अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों को कुछ कोच ने पैसे देकर खरीद लिया है। उन चैंपियन ने पैसे लेकर उन्हें अपना कोच बता दिया है, जबकि उनका कोच मेरा बेटा लेनिन था। मैंने इस मामले को अदालत में चुनौती दी है। मेरा मन बहुत दुखी हुआ जब गुरु-शिष्या की परंपरा को तोड़कर कुछ लोग पैसों के लिए बिक गए। दुखी होता हूं जब वे इंटरव्यू में लेनिन की बजाय किसी और का नाम लिया जाता है। (सत्यानाराण चेरूकुरी ने अपने ये जज्बात भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से साझा किए) 1- संडे जज्बात-पुलिस ने मेरे प्राइवेट पार्ट पर ईंट बांधी:सिर कुर्सी में बांधकर उल्टा टांगा, मैं वकील बनकर केस खुद लड़ा- 12 साल बाद जीता 18 साल की उम्र में पुलिस ने मुझे हत्या के मामले में आरोपी बना दिया। मैंने अपने केस की खुद पैरवी की और 12 साल बाद बाइज्जत बरी हुआ। अपना केस लड़ने के लिए लॉ किया और अब मैं एडवोकेट अमित चौधरी हूं। मेरठ बार एसोसिएशन का सदस्य भी हूं। मेरी जिंदगी पर जल्द ही एक फिल्म बन रही है, जो नेटफ्लिक्स पर रिलीज होगी। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- संडे जज्बात-दोस्त की प्रेमिका प्रेग्नेंट हुई, रेप केस मुझपर चला:पंचायत ने 6 लाख में सौदा किया, 5 साल जेल में रहा, अब बाइज्जत बरी बिहार के दरभंगा जिले का रहने वाला मैं मुकेश कुशवाहा। मुझ पर 17 साल की लड़की के रेप और पॉक्सो एक्ट के तहत मुकदमा चला। वो लड़की मेरे दोस्त की प्रेमिका थी। दोस्त ने उसे प्रेग्नेंट किया था, लेकिन मुकदमा मुझ पर चला। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें

दैनिक भास्कर 22 Mar 2026 5:47 am

धुरंधर-2 में अतीक अहमद की कहानी सच या प्रोपेगैंडा:ISI से कनेक्शन के सबूत मिले, नोटबंदी और फेक करेंसी वाली स्टोरी कितनी सच

इलाहाबाद का चकिया। सफेद कुर्ता, सिर पर साफा पहने, चेहरे पर मुस्कान लिए एक माफिया। फिल्म धुरंधर-2 शुरुआती सीन से ही आपको सीधे यूपी के माफिया और सांसद रहे अतीक अहमद के दौर में ले जाएगी। 15 अप्रैल, 2023 को पुलिस के सुरक्षा घेरे में अतीक और उसके भाई अशरफ अहमद की हत्या कर दी गई थी। धुरंधर-2 के किरदार आतिफ अहमद ने अतीक अहमद को फिर से चर्चा में ला दिया है। आतिफ अहमद के तार पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI, आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा और अंडरवर्ल्ड से जुड़े दिखाए गए हैं। फिल्म में भले ही डिस्क्लेमर है, लेकिन आतिफ का किरदार हूबहू अतीक अहमद से मिल रहा है। हमने फिल्म में दिखाए आतिफ अहमद से जुड़े हर सीन और डायलॉग्स को देखा। फिल्म के दावे और अतीक की मौत पर यूपी पुलिस की जांच रिपोर्ट और चार्जशीट के फैक्ट्स से तुलना की। फिल्म में 3 बार माफिया आतिफ की एंट्रीधुरंधर-2 फिल्म 3 घंटे 52 मिनट की है। फिल्म ने ओपनिंग डे पर वर्ल्डवाइड 236 करोड़ रुपए की कमाई कर नया रिकॉर्ड बनाया है। सीन: 1 चकिया का ड्रग्स किंगपहले सीन में इलाहाबाद में उसके दबदबे और ड्रग्स के बिजनेस को दिखाया गया है। आतिफ किसी से मिलने नहीं जाता था, बल्कि लोग उससे चरस, अफीम, हशीश और टॉर्च पाउडर जैसी ड्रग्स खरीदने इलाहाबाद के चकिया आते थे। सीन: 2पाकिस्तान से कनेक्शनदूसरे सीन में यूपी के DGP संजय कुमार को दिखाया है। ये किरदार पूर्व DGP प्रशांत कुमार की तरह दिखता है। इस सीन में यूपी पुलिस को पहली बार पता चलता है कि आतिफ का कनेक्शन पाकिस्तान से है। वो भारत में फेक करंसी और ड्रग्स की सप्लाई में शामिल है। यूपी पुलिस को ये बात पता चलती है तो आतिफ की गैंग पर कार्रवाई शुरू हो जाती है। आतिफ और उसके भाई अशरफ को गिरफ्तार किया जाता है। फिल्म में दावा: 2016 में हुई नोटबंदी ISI और अंडरवर्ल्ड सरगना दाऊद इब्राहिम के फेक करेंसी रैकेट को बेनकाब करने का मास्टरप्लान था। भारतीय सुरक्षा एजेंसी ने यूपी पुलिस को बताया कि पाकिस्तान से जुडे़ फेक करेंसी रैकेट में यूपी का आतिफ अहमद शामिल है। हकीकत: अतीक अहमद से जुड़े उमेश पाल हत्याकांड और हथियार तस्करी मामले की जांच प्रयागराज पुलिस और UP-STF ने की थी। अतीक के विदेशी लिंक होने की वजह से जांच में ATS को भी शामिल किया गया। 13 जुलाई, 2023 को CJM कोर्ट में जांच एजेंसी ने पहली चार्जशीट दाखिल की। चार्जशीट में अतीक अहमद के कबूलनामे और सबूतों के आधार पर बताया गया कि अतीक की गैंग IS-227 का ISI से सीधा कनेक्शन था। हालांकि, यूपी पुलिस की चार्जशीट में अतीक से जुड़े फेक करंसी रैकेट का जिक्र कहीं भी नहीं किया गया है। लिहाजा, फिल्म में अतीक से जुड़ा फेक करंसी का दावा सच नहीं है। फिल्म में दावा: नोटबंदी से पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने UP के DGP के साथ मिलकर आतिफ अहमद को गिरफ्तार कराया।हकीकत: नवंबर 2016 में नोटबंदी के समय उत्तर प्रदेश के DGP सैयद जावेद अहमद थे। वे 1 जनवरी 2016 को DGP बनाए गए थे। फिल्म में DGP संजय कुमार का किरदार यूपी के पूर्व DGP प्रशांत कुमार की तरह दिखता है। 1990 बैच के IPS अधिकारी प्रशांत कुमार उस समय DGP नहीं थे। प्रशांत कुमार फरवरी 2024 में DGP बने और मई 2025 में रिटायर हुए। फिल्म में दिखाई गई टाइमलाइन सही नहीं है। फिल्म में दावा: आतिफ अहमद का ISI और आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से कनेक्शन था। वो नेपाल और पंजाब के रास्ते भारत में अवैध हथियारों की तस्करी में शामिल था।हकीकत: यूपी पुलिस ने दावा किया था कि मौत से पहले प्रयागराज के शाहगंज थाने में पूछताछ के दौरान अतीक ने कबूल किया था कि उसका ISI और लश्कर-ए-तैयबा से संपर्क था। पुलिस के दावे के मुताबिक, अतीक ने कहा था- ‘मेरे पास हथियारों की कमी नहीं है। मेरे सीधे संबंध ISI और लश्कर-ए-तैयबा से हैं। पाकिस्तान से ड्रोन के जरिए पंजाब बॉर्डर पर हथियार गिराए जाते हैं और ISI से जुड़े लोग उन लोकेशन पर जाकर हथियार उठा लेते हैं। मैं ISI और लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े कुछ लोगों के ठिकाने जानता हूं। मेरे भाई अशरफ को बाकी लोगों की पूरी जानकारी है।’ अतीक ने पुलिस को बताया कि मुझे उन जगहों की जानकारी है, जहां ये हथियार छिपाकर रखे गए हैं। वहां कोई मकान नंबर नहीं हैं। अगर पुलिस मुझे और मेरे भाई को साथ ले चलें, तो हम उन जगहों की पहचान कर सकते हैं। इस कबूलनामे के बाद UP-STF अतीक और अशरफ को चकिया के कसारी-मसारी के जंगल में ले गई थी। वहां हथियार छिपाए गए थे। इसके बाद दोनों को रूटीन मेडिकल चेकअप के लिए ले जाया गया। यहीं उनकी हत्या कर दी गई। अतीक को लेकर किया गया यूपी पुलिस का ये दावा कभी साबित नहीं हो पाया। जम्मू-कश्मीर के पूर्व DGP एसपी वैद्य कहते हैं, ‘अतीक अहमद सांसद होते हुए भी कुख्यात गैंगस्टर था। उसके पास से ब्रिटिश बुलडॉग रिवॉल्‍वर 455 बोर और एक वाल्‍थर पी88 जैसी विदेशी पिस्‍टल बरामद की गई। ये दोनों ही हाई-प्रोफाइल वेपन हैं, जो आसानी से नहीं मिल सकते।’ उत्तर प्रदेश पुलिस के पूर्व डीजीपी डॉ. विक्रम सिंह कहते हैं, ‘अतीक अहमद ने कबूला था उमेश पाल की हत्या में ISI के भेजे हथियार इस्तेमाल हुए थे। ये हथियार पंजाब से यूपी लाए गए थे। अतीक के इस बयान के बाद STF ने उसके घर और दूसरे ठिकानों पर छापा मारा तो बड़ी संख्या में पाकिस्तान ऑर्डिनेंस फैक्ट्री की मुहर लगे कारतूस और हथियार मिले थे।’ सीन: 3आतिफ और अशरफ का मर्डरआखिरी सीन पुलिस सुरक्षा घेरे में आतिफ अहमद की हत्या का है। इस सीन में हर एंगल को ठीक वैसा ही दिखाया गया है, जैसे 15 अप्रैल 2023 की रात 10:30 बजे पुलिस कस्टडी में, मीडिया के कैमरों के सामने अतीक अहमद की हत्या हुई थी। हमलावर पत्रकार बनकर पुलिस सुरक्षा के अंदर आ जाते हैं। अतीक अहमद मीडिया के सामने कहता है- 'मेन बात है कि गुड्डू मुस्लिम'... तभी अचानक हमलावर नजदीक आकर उसके सिर पर गोली मारते हैं। अतीक और उसके भाई अशरफ को मारने के बाद तीनों हमलावर पुलिस के सामने सरेंडर कर देते हैं। फिल्म में दावा: पाकिस्तान में बैठा ISI अधिकारी इलियास कश्मीरी उर्फ मेजर इकबाल (अर्जुन रामपाल) अतीक की मौत का LIVE वीडियो देख रहा था। अतीक-अशरफ की हत्या से उसकी प्लानिंग फेल हो गई। हकीकत: 3 जून 2011 को अमेरिका के ड्रोन हमले में इलियास कश्मीरी मारा गया था। उस वक्त वो साथियों के साथ सेब के बगीचे में बैठा था। वहीं, अतीक की हत्या 2023 में हुई। यहां भी टाइमलाइन मैच नहीं करती है। STF और RAW को मिला था अतीक का ISI कनेक्शन दैनिक भास्कर ने अतीक के ISI कनेक्शन पर यूपी STF के एक सीनियर ऑफिसर से बात की। उन्होंने बताया, ‘अतीक अहमद की मौत से पहले 2021 में UP-STF और खुफिया एजेंसी रॉ ने एक जॉइंट ऑपरेशन चलाया। सितंबर 2021 में जीशान कमर नाम के आतंकी को पकड़ा गया था। जीशान उस पाकिस्तानी कैंप में जुड़ा था, जहां कसाब को ट्रेनिंग दी गई थी।’ ‘जीशान ने UP-STF को बताया कि 2017 में वो प्रयागराज से पाकिस्तान गया था। तब अतीक के भाई अशरफ ने पासपोर्ट अधिकारी को लेटर भेजा था, ताकि पासपोर्ट जल्द मिल जाए। इस तरह पहली बार अतीक के ISI कनेक्शन का पता चला था।’ ……………… अतीक से जुड़ी ये ग्राउंड रिपोर्ट भी पढ़ें कहां है अतीक की पत्नी शाइस्ता और गुड्डू बमबाज 24 फरवरी, 2023 जया पाल की जिंदगी की सबसे बुरी तारीख है। इस दिन उनके पति और पेशे से वकील उमेश पाल की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। हत्याकांड का मास्टरमाइंड अतीक अहमद था। उमेश की हत्या में शामिल 10 में से 6 आरोपी मारे जा चुके हैं। अतीक की पत्नी शाइस्ता, गुड्डू मुस्लिम के अलावा शूटर अरमान और साबिर पकड़े नहीं गए। पढ़ें पूरी खबर...

दैनिक भास्कर 22 Mar 2026 5:45 am

पश्चिम एशिया संकट: अमेरिकी एयरलाइंस को डर, 'कच्चे तेल की कीमत पहुंच सकती है 175 डॉलर प्रति बैरल'

पश्चिम एशिया तनाव का असर पूरी दुनिया पर धीरे-धीरे दिखने लगा है। विभिन्न देशों ने ईंधन कटौती के उपाय किए हैं; इस बीच अमेरिका की एक एयरलाइन को आशंका है कि हालात ऐसे ही रहे तो क्रूड की कीमत 175 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है

देशबन्धु 22 Mar 2026 3:15 am

तुर्कमेनिस्तान के राष्ट्रीय नेता और पीपुल्स काउंसिल के अध्यक्ष गुरबांगुली बर्दिमुहामेदोव के साथ विशेष साक्षात्कार

हाल ही में चाइना मीडिया ग्रुप ने 'उच्च स्तरीय इंटरव्यू' कार्यक्रम के तहत तुर्कमेनिस्तान के राष्ट्रीय नेता और पीपुल्स काउंसिल के अध्यक्ष गुरबांगुली बर्दिमुहामेदोव का साक्षात्कार लिया

देशबन्धु 21 Mar 2026 10:46 pm

ईरान के दो वार और हांफने लगा अमेरिका: जानें कैसे नरम पड़े ट्रंप के तेवर, युद्ध खत्म करने की कर रहे बात

ट्रंप प्रशासन को पहला बड़ा झटका तब लगा जब ईरान ने कतर के रास लाफान गैस हब को निशाना बनाया। यह दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी (लिक्विफाइड नेचुरल गैस) उत्पादन केंद्रों में से एक है और वैश्विक गैस आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा यहीं से संचालित होता है।

देशबन्धु 21 Mar 2026 3:04 pm

ईरान ने तुर्की-ओमान हमलों से किया इनकार

Iran Denies Trkiye-Oman Attacks

देशबन्धु 21 Mar 2026 10:51 am

ईरान राष्ट्रपति पेजेश्कियान बोले – मुस्लिम देशों से नहीं चाहते युद्ध

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने स्पष्ट किया है कि उनका देश मुस्लिम देशों के साथ किसी भी तरह का युद्ध या टकराव नहीं चाहता

देशबन्धु 21 Mar 2026 10:46 am

ईरान का ब्रिटेन को सख्त संदेश – बढ़ी भागीदारी तो मिलेगा जवाब

इजरायल-अमेरिका के साथ जारी संघर्ष के बीच ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने यूनाइटेड किंगडम को कड़ी चेतावनी दी है

देशबन्धु 21 Mar 2026 10:40 am

दक्षिण कोरिया: ऑटो पार्ट्स फैक्ट्री आग में 10 की मौत, 59 घायल

दक्षिण कोरिया के डेजॉन में एक कार पार्ट्स फैक्ट्री में लगी भीषण आग में 10 लोगों की मौत हो गई जबकि चार अन्य अब भी लापता हैं

देशबन्धु 21 Mar 2026 10:36 am

होर्मुज जलडमरूमध्य में नेपाली नागरिक हिरासत में

नेपाल सरकार ने पुष्टि की कि होर्मुज जलडमरूमध्य के समुद्री मार्ग में चल रहे एक जहाज पर कार्यरत एक नेपाली नागरिक को ईरानी अधिकारियों ने हिरासत में ले लिया है

देशबन्धु 21 Mar 2026 8:16 am

ईरान की सैन्य क्षमता पूरी तरह खत्म : ट्रंप

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि ईरान की सेना “पूरी तरह खत्म” हो चुकी है, जबकि जमीनी स्तर पर लड़ाई जारी है और तेल आपूर्ति मार्गों व क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर दुनिया भर में चिंता बनी हुई है

देशबन्धु 21 Mar 2026 8:12 am

Cuba Crisis: क्यूबा पर मंडराते संकट के बादल, ट्रंप की 'आसन्न कार्रवाई' की चेतावनी से हड़कंप

ट्रंप प्रशासन ने क्यूबा की घेराबंदी तेज कर दी है। आम जनता बुनियादी संसाधनों की कमी से जूझ रही है। अमेरिकी प्रतिबंधों, तेल की किल्लत के कारण पूरे क्यूबा में ब्लैकआउट (बिजली कटौती) की स्थिति है।

देशबन्धु 20 Mar 2026 2:05 pm

US Iran War: अमेरिकी F-35 लाइटनिंग विमान पर हमले का दावा, आपात लैंडिंग की पुष्टि

अमेरिकी रक्षा अधिकारियों के हवाले से सामने आई रिपोर्ट्स में कहा गया है कि मिसाइल हमले के बाद संबंधित एफ-35 को आपात स्थिति में लैंडिंग करनी पड़ी, लेकिन विमान और पायलट दोनों सुरक्षित हैं।

देशबन्धु 20 Mar 2026 12:59 pm

नेतन्याहू बोले- US को युद्ध में हमने नहीं घसीटा, दावा- ईरान की परमाणु-मिसाइल क्षमता लगभग खत्म

पत्रकारों से बातचीत में नेतन्याहू ने कहा, “हम जीत रहे हैं और ईरान तबाह हो रहा है।” उन्होंने यह भी कहा कि ईरान के मिसाइल और ड्रोन भंडार को भारी नुकसान पहुंचाया जा रहा है और इन्हें पूरी तरह नष्ट कर दिया जाएगा।

देशबन्धु 20 Mar 2026 12:15 pm

तुलसी गबार्ड ने कहा, ईरान में अमेरिका एवं इजरायल के युद्ध के उद्देश्य एक जैसे नहीं

गबार्ड के बयान से यह स्पष्ट हुआ कि भले ही अमेरिका और इजराइल एक ही मोर्चे पर खड़े हों, लेकिन उनके सैन्य लक्ष्य अलग-अलग हैं। इजराइल ने हाल के हमलों में ईरान के धार्मिक नेताओं और सैन्य कमांडरों को सीधे निशाना बनाया है।

देशबन्धु 20 Mar 2026 11:28 am

अमेरिकी कांग्रेस में 200 बिलियन डॉलर युद्ध फंडिंग पर तीखी बहस

ईरान युद्ध की बढ़ती लागत और इसके वैश्विक बाजारों पर प्रभाव ने अमेरिकी कांग्रेस में विभाजन को और गहरा कर दिया है

देशबन्धु 20 Mar 2026 11:11 am

मध्य पूर्व तनाव के बीच व्हाइट हाउस में ट्रंप और सनाए ताकाइची की मुलाकात, ईरान संकट और ऊर्जा व्यापार पर हुई बात

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची के बीच व्हाइट हाउस में हुई बैठक ने वैश्विक राजनीति में एक अहम संदेश दिया

देशबन्धु 20 Mar 2026 9:07 am

2026 में अधिक सक्रिय राजकोषीय नीति का कार्यान्वयन जारी रहेगा : चीनी वित्त मंत्रालय

चीनी वित्त मंत्रालय ने '2025 में चीन की राजकोषीय नीति के कार्यान्वयन पर रिपोर्ट' जारी की है, जिसमें बताया गया है कि वर्ष 2025 में चीन की अर्थव्यवस्था ने समग्र रूप से स्थिर और सुचारू प्रगति बनाए रखी तथा राजकोषीय संचालन व्यवस्थित और संतुलित रहा

देशबन्धु 20 Mar 2026 6:45 am

आईएमओ बैठक: ईरान को होर्मुज पर कड़ा संदेश

अबू धाबी में अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (आईएमओ) की परिषद के 36वें असाधारण सत्र में एक अहम निर्णय ल‍िया गया

देशबन्धु 20 Mar 2026 3:20 am

चीन-यूरोप रेलवे एक्सप्रेस खुली विश्व अर्थव्यवस्था को गति दे रही है : सीजीटीएन सर्वे

इस वर्ष के पहले दो महीनों में चीन-यूरोप रेलवे एक्सप्रेस ने कुल 3,501 रेलगाड़ियों का संचालन किया और 3 लाख 52 हजार टीईयू (टीईयू) माल का परिवहन किया

देशबन्धु 19 Mar 2026 11:38 pm

चीन-यूएई संबंधों को नई मजबूती देने पर जोर, तिंग श्वेएश्यांग ने यूएई दूत से की मुलाकात

चीन की राजधानी पेइचिंग में सीपीसी केंद्रीय समिति के पोलित ब्यूरो की स्थायी समिति के सदस्य और चीनी राज्य परिषद के उप प्रधानमंत्री तिंग श्वेएश्यांग ने संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के राष्ट्रपति के चीन मामलों के विशेष दूत खालदून खलीफा अल मुबारक से मुलाकात की

देशबन्धु 19 Mar 2026 11:29 pm

शी चिनफिंग ने तुर्कमेनिस्तान के राष्ट्रीय नेता से मुलाकात की

चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने राजधानी पेइचिंग स्थित त्याओयुथाई स्टेट गेस्टहाउस में तुर्कमेनिस्तान के राष्ट्रीय नेता और पीपुल्स काउंसिल के अध्यक्ष गुरबांगुली बर्दिमुहामेदोव से मुलाकात की

देशबन्धु 19 Mar 2026 11:15 pm

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में चीनी प्रतिनिधि ने भाषण दिया

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 61वें सत्र में मानवाधिकार मुद्दों पर आम बहस आयोजित की गई

देशबन्धु 19 Mar 2026 11:11 pm

चीन-अमेरिका व्यापार परामर्श तंत्र की भूमिका का लाभ उठाना जारी रखें : चीनी वाणिज्य मंत्रालय

चीनी वाणिज्य मंत्रालय ने आयोजित नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस में पेरिस में हुई चीन-अमेरिका व्यापार वार्ता पर जानकारी दी

देशबन्धु 19 Mar 2026 11:00 pm

बेटी के घर जाना बना अली लारीजानी की मौत का कारण, कैसे ईरानी सुरक्षा प्रमुख को इजरायली सेना ने खोजा

खामेनेई के मारे जाने के बाद इजरायल के लिए लारीजानी सबसे बड़ा लक्ष्य बन गए थे। इजरायली खुफिया एजेंसियां लगातार उनकी लोकेशन ट्रैक करने की कोशिश कर रही थीं। हालांकि, लारीजानी को भी इस खतरे का पूरा अंदाजा था। इसी वजह से उन्होंने अपनी सुरक्षा बढ़ा दी थी और लगातार ठिकाना बदल रहे थे।

देशबन्धु 19 Mar 2026 12:33 pm

हमलों से ईरान हुआ कमजोर, लेकिन खतरा अभी खत्म नहीं: अमेरिकी इंटेलिजेंस

अमेरिकी इंटेलिजेंस अधिकारियों ने सीनेटरों को बताया कि हाल के अमेरिकी अभियानों से ईरान की सैन्य और रणनीतिक क्षमताएं काफी कम हो गई हैं

देशबन्धु 19 Mar 2026 10:57 am

कतर हमले पर ट्रंप का गुस्सा: ईरान को तबाह करने की चेतावनी

इजरायल ने ईरान के सबसे बड़े पार्स गैस फील्ड पर भीषण हमला किया है। साउथ पार्स दुनिया की सबसे बड़ी प्राकृतिक गैस फील्ड मानी जाती है

देशबन्धु 19 Mar 2026 10:50 am

अमेरिका में इमिग्रेशन पर सख्त रुख, मार्कवेन मुलिन बोले-कानून तोड़ने वालों पर होगी कार्रवाई

अमेरिका के गृह सुरक्षा सचिव पद के नामित मार्कवेन मुलिन ने कहा कि वे कानूनी आव्रजन का समर्थन करते हैं

देशबन्धु 19 Mar 2026 9:28 am

पाकिस्तान और अफगानिस्तान ने ईद के अवसर पर की युद्धविराम की घोषणा

पाकिस्तान और अफगानिस्तान ने ईद-उल-फ़ितर के अवसर पर शत्रुता में “अस्थायी विराम” की घोषणा की। यह कदम सऊदी अरब, तुर्की और क़तर की अपीलों के बाद उठाया गया

देशबन्धु 19 Mar 2026 9:26 am

पेंटागन की चेतावनी: रूस-चीन को एक साथ रोकना ‘अभूतपूर्व चुनौती’

वरिष्ठ रक्षा अधिकारियों ने विधायकों को बताया कि संयुक्त राज्य अमेरिका को एक ही समय में दो परमाणु शक्तियों को रोकने की “अभूतपूर्व चुनौती” का सामना करना पड़ रहा है

देशबन्धु 19 Mar 2026 7:59 am

ब्लैकबोर्ड-सिर्फ पीरियड्स में नहा पाती हैं महिलाएं:कम खाती हैं, ताकि शौच न जाना पड़े; बोलीं- नमक के खेत में ही पैदा हुए, इसी में मर जाएंगे

चिलचिलाती धूप में दूर तक फैला नमक का मैदान इतनी तेज चमक रहा है कि आंखों में चुभ रहा है। दूर तक कहीं छांव नहीं। अचानक एक महिला, रमिला, काम छोड़कर धीरे से कहती है- ‘दिन में हम शौच नहीं जाते… लोग देख लेंगे। इसलिए खाना भी कम खाते हैं… ताकि बार-बार जाना न पड़े। सरकारी पानी का टैंकर महीने में सिर्फ एक बार आता है। उसमें भी खारा पानी होता है। जब पीने के लिए पानी नहीं, तो नहाने के लिए कहां से मिलेगा। महीने में एक बार… और वो भी पीरियड के बाद ही नहाती हूं। पीरियड में तो नहाना जरूरी होता है न! लगता है… नमक में पैदा हुए हैं… और नमक में ही मर जाएंगे।' स्याह कहानियों की सीरीज ‘ब्लैकबोर्ड’ में नमक की खेती करने वाले किसानों की कहानी। ये किसान 8 महीने तंबू में रहते हैं। महीनों नहा नहीं पाते। उनके पैरों की चमड़ी खराब हो जाती है और एक किलो नमक के सिर्फ 30 पैसे मिलते हैं। मैं गुजरात के सुरेंद्रनगर से करीब 70 किलोमीटर दूर ‘लिटिल रण ऑफ कच्छ’ में हूं। यहां देश का करीब 30 फीसदी नमक पैदा होता है। सुबह के 8 बजे ही लगभग 12 लाख एकड़ यानी 5,000 वर्ग किमी में फैले रण में सूरज सिर के ऊपर जलता हुआ दिखाई दे रहा है। इसी मैदान में रमिला अपनी मां सोनल के साथ नमक का ढेर समेट रही हैं। रमिला के पैरों में चप्पल और मोजे हैं, जबकि उनकी मां नंगे पैर लकड़ी के फावड़े से नमक समेट रही हैं। मेरे कुछ पूछने से पहले ही रमिला कहती हैं, ‘खाली पैर रहने पर तलवों में घाव हो जाता है। ये घाव सालों-साल नहीं सूखते। हमेशा खुजली और जलन बनी रहती है। कभी-कभी तलवा इतना नोच देती हूं कि खून आ जाता है। मन करता है, पैर काटकर फेंक दूं।’ ‘मां को तो नंगे पैर रहने की आदत हो गई है। मुझसे नहीं हो पाता। जूते पहनती हूं, तो उनमें नमक के मोटे दाने फंस जाते हैं। इससे और खुजली होने लगती है। इसलिए मोजे ही पहनती हूं। अब नमक पक चुका है। 15-20 दिन में पूरा खेत खाली हो जाएगा।’ रमिला बताती हैं, ‘साल के 12 में से 8 महीने हमें इसी नमकीन दलदली रण के बीच रहना पड़ता है। अगस्त-सितंबर आते-आते पूरा गांव तंबू लेकर यहीं आ जाता है। जब हम आते हैं, तो यह पूरा इलाका दलदल होता है। इसी में तंबू गाड़कर रहना पड़ता है।’ ‘नमक की खेती शुरू होने से पहले ही आंधी-तूफान, चिलचिलाती धूप और फिर शून्य डिग्री तापमान… हर मौसम की मार झेलनी पड़ती है।’ कब से नमक की खेती कर रही हैं?' रमिला की जवाब देतीं उससे पहले ही उनकी मां सोनल बोल पड़ीं, 'पैदा होते ही नमक के खेत में आ गए। रमिला को मैं अपनी पीठ पर साड़ी में बांधकर खेती करती थी। पति इतना शराब पीता था कि एक-एक रुपए की मोहताज रहती थी। जब ये 5-6 साल की हुई, तो मेरे साथ खेत में आने लगी। अब इसकी 4 महीने की बेटी है। इसी तंबू में ही पैदा हुई है। यहीं खेलते-कूदते बड़ी हो जाएगी और हमारी तरह खेत में नमक तैयार करने लगेगी।’ मां की बात सुनते ही रमिला तुरंत टोकती हैं, ‘नहीं चाहती हूं कि मेरे बच्चे भी नमक की खेती करें। इस खेती से जख्म के अलावा क्या मिलता है। अगर दूसरा काम होता, तो यहां यूं जिंदगी नहीं खपा रहे होते। हम तो साल का बड़ा हिस्सा इसी नमक में गुजार देते हैं। आप मेरे तंबू में चलिए, दिखाती हूं हम कैसे रहते हैं।’ ये बातें कर ही रही थीं कि 21 साल की रमिला की गोद में उनकी 4 महीने की बेटी आ जाती है। पड़ोसन अभी-अभी उसे तंबू से उठाकर लाई है। बातचीत के बीच रमिला उसे दूध पिलाने लगती हैं। कहती हैं, ‘हमें तो दूध भी नसीब नहीं होता। अब ये नवजात है, तो अपना दूध तो पिलाना पड़ेगा न… बहुत देर से भूखी होगी।’ उसके बाद रमिला मेरे साथ अपने तंबू की ओर चल पड़ती हैं। धूप और तेज होती जा रही है। रमिला चलते-चलते कहती हैं, ‘काम न करूं, तो मालिक दिहाड़ी काट लेगा। तेज धूप में काम रोकना पड़ता है। सफेद नमक पर धूप पड़ती है, तो और खतरनाक हो जाता है। हमें त्वचा और आंखों की बीमारी हो जाती है।’ तंबू के पास उनकी पड़ोसन बर्तन धो रही हैं। रमिला वहीं सोलर प्लेट की छांव में बेटी को खाट पर सुला देती हैं। खुद बैठते हुए कहती हैं, ‘यही हमारा ठिकाना है। रण में पानी का टैंकर 20-30 दिन में एक बार आता है। वही पानी पीना पड़ता है। जब पीरियड्स आता है, तभी हम महिलाएं नहाती हैं। पीने का पानी नहीं, तो नहाने का कहां से आएगा… आप यकीन नहीं करेंगे, हम कम खाते हैं, ताकि रात में ही शौच जाना पड़े।’ ‘रात में?’ ‘क्या करूं… हमारी भी तो इज्जत है। यहां दूर-दूर तक घास का तिनका नजर नहीं आएगा। दिन में कहां जाएं? कोई देख लेगा। इसलिए खाना भी कम खाते हैं, ताकि दिन में न जाना पड़े। बरसात में चूल्हे की लकड़ी भीग जाती है, तो भूखे रहना पड़ता है। उस समय आटा घोलकर पी लेते हैं। छप्पर से पानी टपकता है, तो रातभर जागकर गुजारनी पड़ती है। गोद में छोटा बच्चा है… कहीं कोई जानवर आकर उसे न ले जाए, यही डर लगा रहता है।’ तंबू के एक कोने में रखी गुदड़ियों की ओर इशारा करते हुए रमिला कहती हैं, ‘अभी जितनी गर्मी है, उससे भी ज्यादा कड़ाके की ठंड पड़ती है। पेट की खातिर रहना तो है ही यहांं। यही गुदड़ियां ओढ़कर रात काटती हूं, फिर भी ठंड से कांपती रहती हूं। उस वक्त मोबाइल पर देखती हूं- देश में क्या-क्या हो रहा है… हमारी जिंदगी तो पहले जैसी थी, आज भी वैसी ही है। हां, कुछ साल पहले तक जेनरेटर चलाकर रहना पड़ता था। जमीन से पानी खींचते थे, बल्ब जलाना पड़ता था। अब सरकार ने सोलर लगवा दिए हैं।’ लेकिन सोलर सिस्टम खराब हो जाए, तो मोमबत्ती भी यहां नहीं टिकती। तेज हवा चलती है। तब टॉर्च की रोशनी में खाना बनाना पड़ता है।’ जिस खेत में रमिला काम कर रही हैं, वहां मालिक जोर-जोर से आवाज देने लगता है। बातचीत करते-करते वह नमक का ढेर लगाने वापस चली जाती हैं। खेत में पहुंचते ही उनकी मां सोनल कहती हैंकि जल्दी-जल्दी काम खत्म करो। बात करने से थोड़े न पेट भरेगा। धूप तेज हो रही है, चमड़ी जलने लगेगी। सोनल की उम्र 60 के करीब लगती है। पूछने पर तंज कसते हुए कहती हैं- ‘आपको तो हर चीज खाने-पीने को मिलता होगा। हमें दूध-दही नसीब नहीं होता। बस पेट भरने के लिए जो मिल जाए, खा लेते हैं। मेरी उम्र 45 साल है। अब 8 महीने घर से दूर रहूंगी। कड़कड़ाती धूप में नमक पकाती हूं, तो उम्र तो घटेगी ही न। हाथ-पैर की चमड़ी बीमारी फैल गई है। जैसे मछली की चमड़ी उखड़ती है, वैसे ही हमारे हाथ-पैर की चमड़ी उखड़ती है। खुजली भी बनी रहती है। हर साल का यही हाल है।’ अब रमिला और सोनल खेत में नमक का ढेर खींचने में लग जाती हैं। तीन-चार लोग ट्रैक्टर और फावड़े से ढेर जमा रहे हैं। यहीं पास में जगदीश सवारियां ट्रैक्टर चला रहे हैं। वह कहते हैं, ‘मेरी उम्र देख लीजिए- 30 साल का हूं। आप भी करीब 30 के होंगे, लेकिन हम दोनों में कितना फर्क दिख रहा है। इसी से आप हमारी मेहनत समझ सकते हैं। 10वीं तक पढ़ा हूं। एक महीने पहले तक मेरी गर्भवती पत्नी इसी तंबू में रहती थी। अचानक उसे दर्द हुआ, तो एंबुलेंस बुलाकर अस्पताल ले गया। बच्चा होने के बाद से गांव में है। कुछ दिन बाद फिर यहीं आ जाएगी। अभी बच्चे को यहां नहीं ला रहा। कुछ हो गया तो… आप देख ही रहे हैं कि कितनी गर्मी है। बाद में बच्चा भी आएगा और मां उसे पीठ पर बांधकर काम करेगी। ऐसे ही हमारे बच्चों की जिंदगी नमक के खेत से शुरू होती है। अब नमक तैयार हो चुका है। कुछ समय बाद रण में पानी भर जाएगा, इसलिए नमक को इकट्ठा करके शहर में स्टॉक किया जा रहा है। अगर रोज खेत में फावड़ा और दंतालो नहीं चलाओ, तो नमक खराब हो जाता है। सेठ से कर्ज लेकर खेती करता हूं। नुकसान हो गया, तो कैसे चुकाऊंगा।’ सामने दो बड़े टैंकर ट्रक खड़े हैं। इनमें नमक बनने के बाद बचा हुआ पानी खींचा जा रहा है। जगदीश कहते हैं- यह पानी फैक्ट्री में जाता है। इससे केमिकल बनता है। एक टैंकर के हजार रुपए मिलते हैं। करीब 50 फीट गहराई से बोरवेल के जरिए पानी निकाला जाता है। इसी पानी में नमक होता है, जिसे क्यारियां बनाकर जमाते हैं और नमक तैयार करते हैं।’ कितना मुनाफा होता है? जगदीश हंसते हुए कहते हैं, ‘यह पूरा रण पाटड़ी के दरबार जैसा है। हम सेठ से खेत लीज पर लेकर नमक जमाते हैं। हर साल अलग-अलग जगह पर तीन-चार बोरवेल डालने पड़ते हैं। जहां ज्यादा पानी निकलता है, वहीं खेती करने लगते हैं। एक किलो नमक के करीब 30 पैसे मिलते हैं। इससे क्या होने वाला है? हम सेठ से ही पैसा लेकर खेती करते हैं। फिर जो नमक बिकता है, उसका आधा हिस्सा सेठ को देना होता है। एक सीजन में मुश्किल से 50 हजार रुपए बचते हैं। वो भी खाने-पीने में खर्च हो जाते है। फिर अगले सीजन में सेठ से दोबारा कर्ज लेना पड़ता है। ऐसे ही यहां जिंदगी चलती है।’ इतनी मुश्किल है, तो क्यों करते हो नमक की खेती? पूछते ही जगदीश कहते हैं, ‘हम लोगों के पास खेती की एक धुर जमीन भी नहीं है। फिर क्या करें? कोई दूसरा काम नहीं आता। पुरखों से यही काम सीखा है। मैं तो नमक के खेत में ही पैदा हुआ था। यहां पढ़ने का कोई साधन नहीं है। हम लोग सिर्फ 4 महीने ही गांव में रह पाते हैं, फिर 70 किलोमीटर दूर इस रण में आ जाते हैं। कुछ सालों से सरकार ने ‘बस वाला स्कूल’ शुरू किया है। यहां 7वीं तक के बच्चे पढ़ पाते हैं। इसके बाद पढ़ने का कोई साधन नहीं है। अब हम अपने बच्चों को शहर भेजने की सोच रहे हैं।’ धूप तेज हो चुकी है। मेरे लोकल साथी भरत भाई कहते हैं, ‘दूसरे तंबू में चलते हैं। 12 बजे के बाद यहां रुकना मुश्किल हो जाएगा।’ हम यहां से पास के दूसरे तंबू की ओर चल पड़ते हैं। यहां 15 साल का राकेश नमक के खेत में दंतालो नाम का एक औजार चला रहा है। उसके पैर में काला बूट है। वह कहता है, ‘खाली पैर नमक के खेत में चलेंगे, तो पैर सड़ जाएंगे। इसलिए जूते पहनने पड़ते हैं। नमक की खेती की वजह से पढ़ाई छोड़ दी। अब 8 महीने यही रहूंगा। पूरे खेत में दंतालो न चलाऊं, तो नमक जमकर पीला पड़ जाता है। फिर व्यापारी दाम नहीं देते। दंतालो चलाने से ही नमक छोटे-छोटे टुकड़ों में जमकर इकट्ठा होता है।’ राकेश के सामने ही खेत की मेड़ पर कालू सुरेला खड़े हैं। वह कहते हैं, ‘शुरू से हम लोग यही करते आ रहे हैं। दूसरा कोई काम करने का रास्ता नहीं है। इस इलाके में नमक की खेती और फैक्ट्री के अलावा कुछ नहीं है। इस तरह रण में करीब 4,800 से ज्यादा परिवार नमक की खेती करते हैं। हमने अपनी जवानी नमक में खपा दी। अब नहीं चाहते कि हमारी अगली पीढ़ी भी यही करे। इसमें पूरी जिंदगी तबाह हो जाती है। मुनाफा तो व्यापारियों को होता है। व्यापारी हमारा नमक 30 पैसे में खरीदकर उसे प्रॉसेस करके 30 रुपए में बेचते हैं। हमें मिलता है बस- बेउम्र बुढ़ापा। 40-45 की उम्र पार करते ही फेफड़ों की बीमारी हो जाती है। आंखों से कम दिखने लगता है। चमड़ी सूखने से शरीर काला पड़ जाता है। यही हमारी किस्मत है।’ सामने नजर डालने पर एक ‘बस स्कूल’ दिखाई देता है। मैं उसकी ओर चल पड़ता हूं। बिना इंजन की एक बस खड़ी है। इसमें 20 से ज्यादा बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। इसी में 10 साल की अरुणा भी पढ़ रही है। वह सहमी हुई आवाज में वह कहती है, ‘सर! मैं नहीं चाहती कि बड़ी होकर नमक की खेती करूं, इसलिए पढ़ रही हूं। मां-पापा को देखती हूं कि वे कितना दुख सहकर नमक पकाते हैं। अभी 7वीं में हूं। इसके बाद यहां पढ़ाई नहीं होती। इस ‘बस स्कूल’ में भी नाम भर की पढ़ाई होती है। मैं क्या कर सकती हूं… कोई सुनने वाला नहीं है।’ अब धूप और तेज हो रही है। सफेद चमकते नमक की ओर देखना भी मुश्किल हो गया है। खेत में काम कर रहे सभी किसान अपने तंबुओं की ओर लौटने लगे हैं। मैं भी इन बच्चों की आंखों में नमक की खेती का स्याह भविष्य देखकर वहां से वापस चल पड़ता हूं। जाते-जाते मन में यही सवाल उठता है- शायद ही इन बच्चों के पढ़ने का सपना सच हो पाए। जिस नमक को हम खाते हैं, उसकी कितनी बड़ी कीमत ये किसान और उनके बच्चे अपनी जिंदगी से चुकाते हैं! ---------------------------- 1- ब्लैकबोर्ड- भूख के बजाय, दवाओं के ट्रायल से मरना अच्छा:बच्चों को तो 25 लाख मिल जाएंगे; उन्हें रिसर्च के लिए खून चाहिए, हमें पैसा ‘किसे अच्छा लगता है कि वह पैसे के लिए अपनी जान की बाजी लगाए, लेकिन मुझे लगानी पड़ती है। अगर मर भी गई तो बच्चों को 20-25 लाख मिलेंगे। कम से कम उनकी जिंदगी तो बेहतर हो जाएगी। अभी तक खुद पर दवाओं के ट्रायल में 4 बार पास हुई हूं।’ पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- ब्लैकबोर्ड-5 करोड़ मुआवजा शानो-शौकत में उड़ाया:3 करोड़ की जमीन खरीदी, 1 करोड़ का मकान; 80-80 लाख की शादियां- अब रोज कमाने से घर चल रहा एक सच्ची कहानी- ग्रेटर नोएडा के किसान रामेश्वर सिंह की। 12 एकड़ जमीन सरकार ने ली और बदले में उन्हें सवा 5 करोड़ रुपए दिए। पैसा खाते में आते ही जिंदगी बदल गई। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें

दैनिक भास्कर 19 Mar 2026 5:08 am

एशिया के सबसे बड़े नोएडा एयरपोर्ट का फर्स्ट लुक:गंगा घाट की तरह एंट्री गेट, हवेली जैसा आर्किटेक्चर, चेहरा स्कैन होते ही एंट्री

यूपी के जेवर में बन रहा नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट आपके सफर के लिए तैयार है। फर्स्ट फेज में 3300 एकड़ में बने एक टर्मिनल और रनवे का काम पूरा हो चुका है। बस फिनिशिंग बाकी है। एक रनवे के साथ इस टर्मिनल की सालाना क्षमता 3 करोड़ पैसेंजर संभालने की होगी। एयरपोर्ट के फर्स्ट फेज की लागत करीब 11 हजार करोड़ है। 28 मार्च को PM मोदी इसका उद्घाटन करेंगे। सभी 4 फेज का काम पूरा हो जाने के बाद ये एशिया का सबसे बड़ा और दुनिया का छठा बड़ा एयरपोर्ट होगा। हालांकि पूरा बनने की डेडलाइन 2040 है। भास्कर सबसे पहले इस एयरपोर्ट के अंदर पहुंचा है। पढ़िए आपके काम की सारी बातें… 1. टर्मिनल बिल्डिंग 2. एंट्री गेट 3. डिपार्चर एरिया 4. सेल्फ बैगेज ड्रॉप फैसिलिटी 5. सिक्योरिटी चेक 6. बोर्डिंग एरिया 7. लाउंज एरिया 8. टेंपल ऑफ बेल्स 9. एयरोब्रिज 10. सुरक्षा नोएडा एयरपोर्ट की खास बातें 1. रनवे के लिहाज से एशिया का सबसे बड़ा एयरपोर्ट नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर 5 रनवे बनाए जाने हैं। यहां छठवां रनवे भी बनाया जा सकता है। इसके बाद ये एशिया का सबसे बड़ा और दुनिया का छठवें नंबर का एयरपोर्ट होगा। रनवे के लिहाज से एशिया में चीन का शंघाई पुडोंग इंटरनेशनल एयरपोर्ट सबसे बड़ा है। 2. एरिया के लिहाज से भी एशिया में सबसे बड़ानोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट कुल 52 स्क्वायर किमी में बनना प्रस्तावित है। अगर ऐसा हुआ तो एरिया वाइज भी ये एशिया का सबसे बड़ा एयरपोर्ट बन जाएगा। अभी एशिया का सबसे बड़ा एयरपोर्ट चीन का बीजिंग डेक्सिंग इंटरनेशनल एयरपोर्ट है। इसका एरिया 47 स्क्वायर किमी है। 3. पूरा बनने के बाद देश का सबसे बड़ा एयरपोर्ट होगानोएडा एयरपोर्ट के पहले स्टेज के लिए यमुना डेवलपमेंट अथॉरिटी ने 3300 एकड़ जमीन अलॉट की है। ये एरिया करीब 13.35 स्क्वायर किमी है। दूसरे स्टेज में एयरपोर्ट का कुल एरिया बढ़कर करीब 7200 एकड़ या 29 स्क्वायर किमी हो जाएगा। अभी देश का सबसे बड़ा एयरपोर्ट हैदराबाद का राजीव गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट है, जो करीब 5500 एकड़ यानी 22.25 स्क्वायर किमी में बना है। 28 मार्च को उद्घाटन, अप्रैल में पहली उड़ाननोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट का उद्घाटन PM मोदी 28 मार्च को करेंगे। हालांकि फ्लाइट अप्रैल से शुरू होंगी। नोएडा एयरपोर्ट अथॉरिटी से जुड़े अफसरों ने बताया कि किराया अभी तय नहीं है, लेकिन ये दिल्ली एयरपोर्ट मुकाबले कम हो सकता है क्योंकि यहां एयरलाइंस के लिए डेवलपमेंट चार्ज कम रखा गया है।

दैनिक भास्कर 19 Mar 2026 5:03 am