नेतन्याहू का बड़ा बयान, दक्षिणी लेबनान में आईडीएफ को कार्रवाई की पूरी छूट
इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि दक्षिणी लेबनान में तैनात इजरायली रक्षा बल (आईडीएफ) के सैनिकों को अपने खिलाफ या उत्तरी इजरायल के निवासियों के खिलाफ किसी भी सीधे या उभरते खतरे को रोकने के लिए पूरी कार्रवाई की स्वतंत्रता है।
पाकिस्तान के रक्षामंत्री ख्वाजा आसिफ ने सीधे शब्दों में कहा- जिस पल हमारे पानी पर खतरा महसूस हुआ, हम बिना शक भारत के खिलाफ जंग छेड़ देंगे। इस खुली धमकी के पीछे है सिंधु जल समझौता, जिसे भारत ने अप्रैल 2025 में निलंबित कर दिया था। पिछले 14 महीनों में पाकिस्तान को कितना नुकसान हुआ, भारत पूरा पानी रोकने की तैयारी कैसे कर रहा और क्या पाकिस्तान वाकई जंग छेड़ देगा; समझेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: सिंधु जल समझौता है क्या और भारत ने इस पर रोक क्यों लगाई? जवाब: ये समझौता भारत-पाकिस्तान के बीच नदियों के पानी का बंटवारा करता है। 19 सितंबर 1960 को भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने इस पर दस्तखत किए थे। इसके जरिए सिंधु जल प्रणाली में पूरब की 3 नदियों का पानी भारत को और पश्चिम की 3 नदियों का पानी पाकिस्तान को देना तय हुआ था। 65 साल तक ये संधि चलती रही, लेकिन अप्रैल 2025 में भारत ने इसे निलंबित कर दिया। दरअसल, 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 लोग मारे गए थे। इसके पीछे पाकिस्तान-समर्थित आतंकियों का हाथ था। जवाब में भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ 5 बड़े एक्शन लिए थे। इनमें से एक था- जब तक पाकिस्तान सीमा पार से आतंकवाद का समर्थन नहीं रोकता, सिंधु जल समझौता निलंबित रहेगा। सवाल-2: संधि निलंबित होने के बाद 14 महीनों में पाकिस्तान पर क्या असर पड़ा? जवाबः संधि रुकते ही सबसे पहले दोनों देशों के बीच नदियों के पानी को लेकर डेटा शेयरिंग बंद हुई। भारत अब नदियों के बहाव, बाढ़ की चेतावनी या बांधों से छोड़े जाने वाले पानी की जानकारी नहीं देता। इससे पाकिस्तान पर 3 बड़े असर पड़े हैं… 1. पंजाब और सिंध में फसल बुआई में देरी 2. पाकिस्तान की नहरों में पानी घटा पाकिस्तान के सिंध प्रांत में सिंधु नदी का पानी सुक्कुर बैराज से नियंत्रित होता है। इससे निकलने वाली नहरों से सिंध प्रांत में सिंचाई होती है। वहां के सिंचाई विभाग के मुताबिक इसकी 3 कैनालों में पानी की कमी हो गई है। यह इस प्रकार है… 3. राज्यों में पानी को लेकर झगड़ा बढ़ा सवाल-3: संधि निलंबित रहने से लंबे वक्त में पाकिस्तान को क्या घाटा होगा? जवाबः पाकिस्तान के पूर्व सिंधु जल कमिश्नर जमात अली शाह के मुताबिक, अभी तक खेती को कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ। लेकिन असली खतरा आगे है। अगर भारत ने पानी स्टोर करने के नए प्रोजेक्ट बनाए, तो अगले 5 से 10 साल में पाकिस्तान पर गंभीर असर पड़ेगा। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक पाकिस्तान की 1.8 करोड़ हेक्टेयर जमीन की सिंचाई सिंधु नदी प्रणाली की नदियों से होती है। यह पाकिस्तान की कृषि भूमि का करीब 80% है। देश के करीब हर चौथे शख्स की आमदनी खेती पर टिकी है। अगर यहां चोट पहुंची, तो पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था बुरी तरह डगमगा जाएगी। अगर भारत ने पानी का बहाव पूरी तरह रोक दिया, तो पाकिस्तान के मंगल और तारबेला हाइड्रोपावर डैम को पानी नहीं मिल पाएगा। इससे पाकिस्तान के बिजली उत्पादन में 30% से 50% तक की कमी आ सकती है। इससे औद्योगिक उत्पादन और रोजगार पर असर पड़ेगा। सवाल-4: क्या भारत सिंधु जल का पानी पूरी तरह पानी रोकने वाला है?जवाबः पिछले साल 12 मई को पीएम मोदी ने कहा था, ‘पानी और खून एक साथ नहीं बह सकता।’ जून 2025 में गृहमंत्री अमित शाह ने एक इंटरव्यू में कहा कि अब इस समझौते को कभी बहाल नहीं किया जाएगा। वो बोले- ‘अंतरराष्ट्रीय समझौतों को एकतरफा रद्द नहीं किया जा सकता, लेकिन हमारे पास इसे स्थगित करने का हक था। वही हमने किया है।’ यूनाइटेड नेशंस में भारत के स्थायी मिशन में प्रथम सचिव अनुपमा सिंह ने 19 जून को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद, यानी UNHRC में भी यही बात दोहराई। उन्होंने पाकिस्तान को 'फ्रैंकस्टीन स्टेट' तक कह दिया। यानी ऐसा देश जो खुद के बनाए आतंकी ढांचे का शिकार बन गया है। जून 2026 में भारत के जल संसाधन मंत्री सी. आर. पाटिल ने एक इंटरव्यू में कहा कि अगले 2 साल में सिंधु नदी का एक बूंद पानी पाकिस्तान नहीं जाएगा। लेकिन सवाल है कि क्या भारत के पास पानी रोकने की क्षमता है? अचानक पानी रोकने से भारत के पंजाब और जम्मू-कश्मीर के इलाकों में बाढ़ की स्थिति भी बन सकती है। भाखरा ब्यास प्रबंधन बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष देवेंद्र कुमार शर्मा के मुताबिक, ‘अगर भारत अपनी भंडारण क्षमता का पानी पाकिस्तान की तरफ बाढ़ लाने के लिए छोड़ेगा, तो पहले भारत के 50-80 किमी क्षेत्र में भी तो बाढ़ आएगा। ऐसा भारत कभी नहीं चाहेगा।’ सवाल-5: क्या सिंधु के पानी के लिए पाकिस्तान वाकई जंग छेड़ देगा? जवाबः पाकिस्तान के नेता और सैन्य अफसर लगातार ऐसे बयान दे रहे हैं… बोस्टन यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल अफेयर्स के प्रोफेसर आदिल नजाम मानते हैं कि पाकिस्तान बार-बार कहता है कि पानी रोकना युद्ध की वजह बनेगा। यह कोई बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात नहीं है। क्योंकि पाकिस्तान सूखा देश है और उसके पास पानी का कोई दूसरा जरिया नहीं है। हालांकि स्वीडन की उप्साला यूनिवर्सिटी में पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट रिसर्च के प्रोफेसर अशोक स्वैन का मानना है कि ये सब राजनीतिक दिखावा है। कोई देश पानी को लेकर मिलिट्री एक्शन ले, इसकी संभावना कम है। दोनों पक्ष अच्छी तरह जानते हैं कि अगर एक-दूसरे के बांधों पर हमला किया, तो यह बहुत बड़ी तबाही होगी। हाल ही में खबरें आईं कि भारत-पाकिस्तान के बीच बैक-चैनल बातचीत हुई हैं। JNU में इंटरनेशनल रिलेशंस के एसोसिएट प्रोफेसर राजन कुमार बताते हैं कि सिंधु जल समझौते को लेकर दोनों देश डिप्लोमेटिक और मिलिट्री लेवल पर कई दौर की बातचीत कर सकते हैं। दोनों अपना पक्ष रखेंगे। जब दोनों सहमत हो जाएंगे, तो इसे वापस बहाल भी किया जा सकता है। ----------------यह खबर भी पढ़िए… पाकिस्तान की नई 'हैंगोर' पनडुब्बी कितनी घातक, क्या बंगाल की खाड़ी में भारत को घेर पाएगी; 1971 में भारतीय युद्धपोत ‘खुखरी’ डुबोया था पाकिस्तानी नौसेना में एक नाम लौट आया है ‘PNS हैंगोर’। ये है चीन में बनी नई पाकिस्तानी पनडुब्बी। ये 11 जून को कराची पहुंची। पाकिस्तान इसे बंगाल की खाड़ी में तैनात करेगा। इसी हैंगोर नाम की पनडुब्बी ने 1971 की जंग में भारतीय युद्धपोत ‘INS खुखरी’ को डुबो दिया था। जंग के दौरान किसी भारतीय पोत के डूबने की यह इकलौती घटना है। पूरी खबर पढ़िए…
जेल में बलूचों पर जुल्म: पाकिस्तान की कालकोठरी में अत्याचार के खिलाफ 9 दिनों से महाधरना
पाकिस्तान के अशांत प्रांत बलूचिस्तान से मानवाधिकारों के हनन और जेलों के भीतर हो रहे अमानवीय बर्ताव को लेकर बेहद विचलित करने वाली खबर सामने आ रही है। पाकिस्तानी जेलों की कालकोठरियों में बंद बलूच कैदियों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर हो रहे भयंकर अत्याचार और उत्पीड़न के खिलाफ पीड़ितों के परिवारों और स्थानीय नागरिकों का गुस्सा फूट पड़ा है। इस दमनकारी नीति के विरोध में प्रदर्शनकारी पिछले 9 दिनों से लगातार खुले आसमान के नीचे धरने पर बैठे हुए हैं। कड़ाके की ठंड, भूख और प्यास की परवाह किए बिना न्याय की गुहार लगा रहे इन बलूचों की सुनने वाला कोई नहीं है। पाकिस्तानी सरकार और स्थानीय प्रशासन की इस अनदेखी ने बलूचिस्तान के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तनाव बढ़ा दिया है।पाकिस्तानी हुकूमत की दमनकारी नीति और लापता लोगों का बढ़ता दर्दबलूचिस्तान के क्वेटा, ग्वादर और कराची जैसे प्रमुख शहरों में इस आंदोलन की गूंज साफ सुनाई दे रही है। धरने पर बैठे प्रदर्शनकारियों और बलूच एकजुटता समितियों का आरोप है कि जेलों में बंद बलूच युवाओं को बुनियादी मानवाधिकारों जैसे चिकित्सा, कानूनी सहायता और परिजनों से मिलने की अनुमति तक नहीं दी जा रही है। इसके अलावा, कई ऐसे बलूच नागरिक भी हैं जो महीनों से पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों की अवैध हिरासत में हैं और उनके ठिकाने के बारे में कोई जानकारी नहीं दी जा रही है। प्रदर्शन कर रही महिलाओं और बच्चों का कहना है कि वे तब तक पीछे नहीं हटेंगे जब तक उनके अपनों को अदालतों के सामने पेश नहीं किया जाता और जेलों में टॉर्चर बंद नहीं होता।कूटनीतिक गलियारों और वैश्विक स्तर पर उठने लगी बलूचों की आवाजपाकिस्तानी मीडिया में इस महाधरने को पूरी तरह से सेंसर करने या दबाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन सोशल मीडिया के माध्यम से यह दर्दनाक कहानी अब पूरी दुनिया के सामने आ चुकी है। नई दिल्ली, वाशिंगटन, लंदन और जिनेवा में सक्रिय मानवाधिकार संगठनों ने इस मामले पर गहरी चिंता व्यक्त की है। विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान सरकार इस मुद्दे को दबाकर बलूचिस्तान में चल रहे स्वतंत्रता और अधिकारों के आंदोलन को कमजोर करना चाहती है। कूटनीतिक जानकारों के मुताबिक, जेलों में हो रहे इस क्रूर अत्याचार और नौ दिनों की लंबी अनदेखी के कारण पाकिस्तान एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों के घेरे में आ गया है।क्या बलूचिस्तान में स्थिति बेकाबू होने का इंतजार कर रहा है प्रशासनधरने के नौवें दिन भी किसी सरकारी प्रतिनिधि या सैन्य अधिकारी द्वारा प्रदर्शनकारियों से बातचीत न करना यह साफ दर्शाता है कि पाकिस्तानी प्रशासन इस गंभीर संकट को लेकर कितना असंवेदनशील है। स्थानीय बलूच नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी जायज मांगें जल्द नहीं मानी गईं और जेलों में बंद कैदियों पर टॉर्चर नहीं रुका, तो यह शांत धरना एक उग्र आंदोलन में तब्दील हो सकता है। पूरे प्रांत में सुरक्षा व्यवस्था को कड़ा कर दिया गया है और कई इलाकों में इंटरनेट सेवाओं पर भी पाबंदी लगा दी गई है, जिससे बलूचिस्तान के जमीनी हालात पल-पल में और अधिक संवेदनशील होते जा रहे हैं।
दुनिया के सबसे बड़े लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) उत्पादक देशों में शुमार कतर से एक बेहद परेशान करने वाली और बड़ी खबर सामने आ रही है। कतर के सबसे प्रमुख और विशालकाय औद्योगिक शहर रास लफान (Ras Laffan Industrial City) स्थित सबसे बड़े गैस प्रोसेसिंग प्लांट में एक भीषण धमाका हुआ है। धमाका इतना जोरदार था कि इसकी आवाज कई किलोमीटर दूर तक सुनी गई और देखते ही देखते प्लांट से हाहाकारी लपटें और काले धुएं का विशाल गुबार आसमान की तरफ उठने लगा। इस अप्रत्याशित हादसे के बाद पूरे औद्योगिक परिसर और आस-पास के रिहायशी इलाकों में हड़कंप मच गया है और चारों तरफ अफरा-तफरी का माहौल देखा जा रहा है।रास लफान कॉम्प्लेक्स में इमरजेंसी घोषित और रेस्क्यू ऑपरेशन शुरूहादसे की भयावहता को देखते हुए कतर की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों और रास लफान के फायर एंड सेफ्टी डिपार्टमेंट ने पूरे इंडस्ट्रियल टाउनशिप में रेड अलर्ट और इमरजेंसी घोषित कर दी है। दर्जनों फायर टेंडर्स और एम्बुलेंस को तुरंत मौके पर रवाना किया गया है। शुरुआती रिपोर्टों के मुताबिक, आग की लपटों पर काबू पाने और प्लांट के भीतर फंसे कर्मचारियों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए बड़े पैमाने पर रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया जा रहा है। कतरी अधिकारियों की ओर से अभी तक हादसे में हताहत होने वाले लोगों की आधिकारिक संख्या जारी नहीं की गई है, लेकिन रिफाइनरी और गैस यूनिट्स को एहतियातन पूरी तरह से शटडाउन कर दिया गया है।वैश्विक एलएनजी सप्लाई ठप होने का डर और भारत की बढ़ेगी टेंशनरास लफान इंडस्ट्रियल सिटी सिर्फ कतर के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) के लिए रीढ़ की हड्डी मानी जाती है। यहीं से दुनिया के कोने-कोने में गैस का निर्यात किया जाता है। दिल्ली, मुंबई सहित भारत के विभिन्न हिस्सों में आयात होने वाली एलएनजी का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी प्लांट से आता है। ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस धमाके के कारण प्लांट को भारी नुकसान पहुंचा है और उत्पादन लंबे समय के लिए ठप होता है, तो वैश्विक बाजार में प्राकृतिक गैस की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है, जिससे भारत जैसी निर्भर अर्थव्यवस्थाओं का बजट बिगड़ सकता है।तकनीकी खराबी या कुछ और, जांच में जुटी कतर की सुरक्षा एजेंसियांइस भीषण विस्फोट की वजह क्या थी, इसे लेकर अभी तक कतर गैस या सरकारी स्तर पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। कतर की सुरक्षा एजेंसियां इस बात की गहन जांच कर रही हैं कि यह हादसा किसी तकनीकी खराबी, गैस पाइपलाइन में लीकेज या प्रेशर बढ़ने की वजह से हुआ है या फिर इसके पीछे कोई अन्य बाहरी कारण है। दुनिया भर के कमोडिटी मार्केट, शेयर बाजारों और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा विश्लेषकों की नजरें इस वक्त दोहा से आने वाले हर छोटे-बड़े अपडेट पर टिकी हुई हैं, क्योंकि इस हादसे के कूटनीतिक और आर्थिक असर बेहद व्यापक हो सकते हैं।
बालेन शाह के बदले सुर: भारत के खिलाफ आग उगलने के बाद बैकफुट पर आए काठमांडू के मेयर
नेपाल की राजनीति और भारत-नेपाल द्विपक्षीय संबंधों के गलियारों से इस वक्त की एक बहुत बड़ी कूटनीतिक खबर सामने आ रही है। भारत के खिलाफ लगातार आक्रामक और तीखी बयानबाजी करने वाले काठमांडू के मेयर बालेन शाह (Balendra Shah) के तेवर अब ढीले पड़ते नजर आ रहे हैं। सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों से भारत को लेकर लंबी-लंबी हांकने और विवादित टिप्पणियां करने के बाद आखिरकार बालेन शाह लाइन पर आ गए हैं। ब्रिटेन की मध्यस्थता को लेकर दिए गए अपने एक बेहद संवेदनशील और विवादित बयान पर चौतरफा घिरने के बाद काठमांडू के मेयर ने अब इस पूरे मामले पर अपनी औपचारिक सफाई पेश की है, जिसने नेपाल से लेकर दिल्ली तक सियासी हलचल तेज कर दी है।ब्रिटेन की मध्यस्थता वाले विवादित बयान पर मचे बवाल से घिरे मेयरपूरा विवाद तब शुरू हुआ था जब बालेन शाह ने भारत और नेपाल के बीच के कुछ द्विपक्षीय मुद्दों को सुलझाने के लिए तीसरे पक्ष यानी ब्रिटेन की मध्यस्थता की वकालत कर दी थी। इस बयान के सामने आते ही न केवल भारत में बल्कि खुद नेपाल के भीतर भी उनके खिलाफ तीखी प्रतिक्रियाएं शुरू हो गईं। नेपाल के कूटनीतिक विशेषज्ञों, पूर्व राजनयिकों और विभिन्न राजनीतिक दलों ने बालेन शाह के इस रुख को बेहद अपरिपक्व और नेपाल की संप्रभुता के खिलाफ बताया। जानकारों का कहना है कि दोनों देशों के बीच सदियों पुराने 'रोटी-बेटी' के संबंधों और सीधे संवाद की व्यवस्था होने के बावजूद तीसरे देश को बीच में घसीटना एक बेहद गंभीर कूटनीतिक भूल थी, जिसने मेयर को बैकफुट पर आने के लिए मजबूर कर दिया।चौतरफा दबाव के बाद बालेन शाह ने दी कूटनीतिक सफाईनेपाल की राजधानी काठमांडू के स्थानीय राजनीतिक गलियारों और राष्ट्रीय मीडिया में लगातार हो रही किरकिरी के बाद मेयर बालेन शाह ने अपने बयान को मोड़ने की कोशिश की है। उन्होंने अपनी नई सफाई में कहा है कि उनके बयान का गलत अर्थ निकाला गया और वे भारत के साथ नेपाल के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों का पूरा सम्मान करते हैं। मेयर सचिवालय की ओर से जारी संकेतों के अनुसार, उनका इरादा दोनों देशों के बीच किसी भी तरह के तनाव को बढ़ाना नहीं था, बल्कि वे केवल स्थानीय और विकास से जुड़े कुछ मुद्दों के संदर्भ में बात कर रहे थे। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बालेन शाह ने यह सफाई केवल चौतरफा कूटनीतिक और राजनीतिक दबाव से बचने के लिए दी है।भारत-नेपाल संबंधों पर क्या होगा इस सियासी ड्रामे का असरनई दिल्ली और काठमांडू के बीच सीमा विवाद, सुगौली संधि और अन्य द्विपक्षीय समझौतों को लेकर पहले से ही संवेदनशीलता बनी हुई है। ऐसे में बालेन शाह जैसे लोकप्रिय और सोशल मीडिया पर एक्टिव रहने वाले नेता द्वारा इस तरह के बयान देना और फिर पलट जाना, नेपाल की आंतरिक राजनीति के उतार-चढ़ाव को दर्शाता है। भारत हमेशा से ही नेपाल के साथ अपने द्विपक्षीय मामलों को बिना किसी तीसरे देश के हस्तक्षेप के, आपसी बातचीत से सुलझाने का पक्षधर रहा है। जानकारों के मुताबिक, बालेन शाह के इस यू-टर्न से यह साफ हो गया है कि भारत जैसे मजबूत पड़ोसी देश के खिलाफ बिना सोचे-समझे की गई बयानबाजी नेपाल के ही नेताओं के लिए भारी पड़ सकती है।
ट्रंप की खुली चेतावनी: सुधर जाओ वरना होगा अब तक का सबसे बड़ा हमला, ईरान से बढ़ा महायुद्ध का खतरा
वैश्विक राजनीति और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे से इस वक्त की बेहद बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक हालिया और बेहद आक्रामक बयान ने मध्य पूर्व (मिडल ईस्ट) सहित पूरी दुनिया में युद्ध की आशंका को गहरा कर दिया है। ट्रंप ने ईरान को बेहद सख्त लहजे में नई धमकी देते हुए साफ कर दिया है कि अगर वह अपनी परमाणु और सैन्य गतिविधियों को तुरंत नहीं रोकता है, तो अमेरिका चुप नहीं बैठेगा। अमेरिकी प्रशासन की ओर से संकेत दिए गए हैं कि यदि ईरान इस अंतिम चेतावनी के बाद भी नहीं माना, तो उस पर एक ऐसा सैन्य हमला किया जाएगा जो इतिहास में पहले कभी नहीं देखा गया है।ट्रंप के सख्त तेवर और व्हाइट हाउस की नई रणनीतिअंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि वाशिंगटन और तेहरान के बीच पहले से जारी तनाव अब अपने सबसे खतरनाक मोड़ पर आ चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने ताजा संबोधन में कहा है कि उनकी सरकार किसी भी कीमत पर अमेरिकी हितों और उसके सहयोगी देशों, विशेष रूप से इजरायल की सुरक्षा से समझौता नहीं करेगी। इस बयान के बाद पेंटागन और अमेरिकी रक्षा विभाग ने भी अपनी रणनीतियों को री-चेक करना शुरू कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप का यह रुख सिर्फ एक चेतावनी नहीं बल्कि एक बड़ी सैन्य कार्रवाई की पूर्वपीठिका भी हो सकता है, जिससे दोनों देशों के बीच सीधे टकराव का रास्ता खुल सकता है।मिडल ईस्ट में हाई अलर्ट और वैश्विक बाजारों पर असरट्रंप की इस नई धमकी के बाद पूरे मिडल ईस्ट के देशों में भारी हलचल देखी जा रही है। सुरक्षा एजेंसियों को हाई अलर्ट पर रख दिया गया है। इस बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tension) का सीधा असर नई दिल्ली, मुंबई, लंदन और न्यूयॉर्क समेत दुनिया भर के शेयर बाजारों और कमोडिटी मार्केट पर भी दिखने लगा है। विशेषज्ञों को डर है कि अगर दोनों देशों के बीच तनाव और अधिक बढ़ता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें आसमान छू सकती हैं, जिसका सीधा असर भारत जैसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं के आयात बिल और महंगाई दर पर पड़ेगा।क्या युद्ध टालने के लिए आगे आएंगे वैश्विक संगठनइस बेहद तनावपूर्ण स्थिति के बीच संयुक्त राष्ट्र (UN) और दुनिया के अन्य प्रमुख देश जैसे भारत, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ लगातार दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील कर रहे हैं। हालांकि, ईरान की ओर से भी अभी तक कोई नरमी के संकेत नहीं मिले हैं, जिससे कूटनीतिक रास्ते बंद होते दिखाई दे रहे हैं। अब पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या ईरान अमेरिकी शर्तों के आगे झुकेगा या फिर दुनिया को एक और भीषण महायुद्ध का सामना करना पड़ेगा। आने वाले कुछ दिन वैश्विक शांति और स्थिरता के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होने वाले हैं।
कतर के रास लाफान गैस प्लांट में धमाका: 54 लोग घायल, 18 लापता, बचाव अभियान तेज
कतर के मुख्य प्राकृतिक गैस निर्यात इंफ्रास्ट्रक्चर में हुए एक धमाके में कम से कम 54 लोग घायल हो गए, जबकि 18 अन्य लोग लापता हैं।
रास लाफान क्षेत्र स्थित बरजान गैस आपूर्ति संयंत्र को ईरान के साथ संघर्ष के दौरान हुए हमलों में भारी नुकसान पहुंचा था। इसके बाद सुरक्षा कारणों से उत्पादन गतिविधियों को रोक दिया गया था।
यदि आप भी आने वाले दिनों में नया आईफोन (iPhone) खरीदने की प्लानिंग कर रहे हैं, तो यह खबर आपके बजट को पूरी तरह बिगाड़ सकती है। टेक दिग्गज ऐपल (Apple) के सीईओ टिम कुक ने खुद इस बात को स्वीकार किया है कि बाजार की मौजूदा परिस्थितियों के चलते अब आईफोन के दाम बढ़ाना कंपनी की मजबूरी बन गया है। हालांकि, इस झटके के तुरंत बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने एक ऐसा बड़ा एलान किया है जिसने पूरी दुनिया के टेक और बिजनेस मार्केट को चौंका दिया है। ट्रंप के मुताबिक, अमेरिकी चिपमेकर कंपनी इंटेल (Intel) और ऐपल के बीच एक ऐतिहासिक डील हुई है, जिसके तहत अब आईफोन के सुपर-फास्ट कंप्यूटर चिप्स का निर्माण पूरी तरह अमेरिका के अंदर ही किया जाएगा।क्यों महंगे होने वाले हैं आईफोन? टिम कुक ने बताई असली वजहऐपल के सीईओ टिम कुक ने 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' को दिए एक बेहद खास इंटरव्यू में साफ किया है कि उनके अपकमिंग प्रोडक्ट्स की कीमतों में होने वाली बढ़ोतरी को अब और ज्यादा समय तक टाला नहीं जा सकता। टिम कुक ने इसके पीछे 'एआई बूम' (AI Boom) को सबसे बड़ा जिम्मेदार ठहराया है।उन्होंने बताया कि इस समय पूरी दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence) तकनीक की मांग तेजी से बढ़ी है, जिसके कारण टेक इंडस्ट्री में इस्तेमाल होने वाले हाई-एंड मेमोरी और स्टोरेज चिप्स की मैन्युफैक्चरिंग लागत (लागत मूल्य) आसमान छू रही है। टिम कुक के मुताबिक, ऐपल ने काफी समय तक इन बढ़े हुए खर्चों का बोझ खुद उठाया ताकि ग्राहकों पर इसका सीधा असर न पड़े, लेकिन अब स्थिति पूरी तरह कंट्रोल से बाहर हो चुकी है। मुनाफा बनाए रखने और एडवांस तकनीक देने के लिए डिवाइस के दाम बढ़ाना ही अब एकमात्र रास्ता बचा है।डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा धमाका: इंटेल और ऐपल आए साथ, ताइवान पर निर्भरता होगी खत्मआईफोन की कीमतें बढ़ने की खबरों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' (Truth Social) पर एक पोस्ट के जरिए इस ऐतिहासिक कूटनीतिक और व्यापारिक डील का खुलासा किया। ट्रंप ने बताया कि इंटेल ने ऐपल के साथ मिलकर अमेरिका की धरती पर ही एडवांस कंप्यूटर चिप्स बनाने का महा-समझौता फाइनल कर लिया है। ट्रंप ने लिखा कि उन्होंने इंटेल की मदद करने का फैसला इसलिए किया क्योंकि अमेरिका को तकनीकी मोर्चे पर आत्मनिर्भर बनने और देश में ही चिप्स डिजाइन व बिल्ड करने की सख्त जरूरत है। इस खबर के सार्वजनिक होते ही वॉल स्ट्रीट पर इंटेल के शेयर्स प्री-मार्केट ट्रेडिंग में ही 9% से ज्यादा उछल गए।इस कदम से ऐपल को अपनी सप्लाई चेन को सुरक्षित करने में बहुत बड़ी मदद मिलेगी। दरअसल, अब तक कैलिफोर्निया स्थित ऐपल कंपनी अपने आईफोन, आईपैड और मैक कंप्यूटरों को पावर देने वाले एडवांस्ड प्रोसेसर और सिलिकॉन चिप्स के लिए पूरी तरह से ताइवान (विशेषकर TSMC) पर निर्भर थी। चीन और ताइवान के बीच लगातार बढ़ते भू-राजनीतिक (Geopolitical) तनाव को देखते हुए ऐपल के लिए यह एक बहुत बड़ा बिजनेस रिस्क था। अब इंटेल के साथ हाथ मिलाने से ऐपल अमेरिका के घरेलू प्लांट में ही अपनी चिप्स का सुरक्षित प्रोडक्शन कर सकेगी।ट्रंप की 'जादुई' इन्वेस्टमेंट: 9 महीनों में अमेरिकी सरकार को हुआ करोड़ों का मुनाफाराष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी पोस्ट में इस बात का भी गर्व से जिक्र किया कि उनके प्रशासन ने पिछले साल अगस्त में इंटेल कंपनी में 8.9 बिलियन डॉलर का बड़ा सरकारी निवेश करके करीब 10% की हिस्सेदारी खरीदी थी। ट्रंप ने चुटकी लेते हुए लिखा कि जब यह सरकारी डील हुई थी, तब इंटेल की कुल मार्केट वैल्यू करीब 100 बिलियन डॉलर थी।लेकिन महज 9 महीनों के भीतर आज इंटेल की वैल्यू बढ़कर 600 बिलियन डॉलर से ज्यादा के रिकॉर्ड स्तर को पार कर चुकी है। इसका सीधा मतलब यह है कि अमेरिकी सरकार की 10% हिस्सेदारी की कीमत अब ₹60 बिलियन डॉलर से ऊपर पहुंच चुकी है, जिससे अमेरिकी खजाने को बंपर मुनाफा हुआ है।राष्ट्रीय सुरक्षा और आत्मनिर्भर अमेरिका का सपनासेमीकंडक्टर (चिपमेकिंग) उद्योग में अमेरिका को दुनिया का सबसे बड़ा और एकछत्र लीडर बनाना ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक है। अमेरिकी सरकार का मानना है कि घरेलू स्तर पर एडवांस चिप्स की मजबूत सप्लाई चेन होने से देश की राष्ट्रीय सुरक्षा (National Security) को कोई खतरा नहीं रहेगा और विदेशी निर्भरता खत्म होगी। हालांकि, इस पूरी मेगा डील और आईफोन की बढ़ी हुई कीमतों पर अभी तक ऐपल की तरफ से कोई आधिकारिक प्रेस नोट जारी नहीं किया गया है, लेकिन टेक एक्सपर्ट्स का मानना है कि आने वाले दिनों में प्रीमियम स्मार्टफोन लवर्स की जेब का ढीला होना पूरी तरह तय है।
स्विट्जरलैंड के बुर्गेनस्टॉक रिजॉर्ट में मिडिल ईस्ट संकट (Middle East Crisis) को सुलझाने के लिए चल रही अमेरिका-ईरान की हाई-लेवल शांति वार्ता सोमवार (22 जून) को एक बेहद तनावपूर्ण और नाटकीय मोड़ पर पहुंच गई। वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति को स्थिर करने के उद्देश्य से बुलाई गई यह महाबैठक देर रात तक चली मैराथन चर्चा के बाद कूटनीतिक भंवर में फंसती नजर आ रही है। न्यूज एजेंसी एएफपी (AFP) को एक अमेरिकी राजनयिक से मिली जानकारी के अनुसार, रात भर चलने वाली इस बातचीत में देर रात एक ऐसा भारी हंगामा हुआ कि ईरानी प्रतिनिधिमंडल बीच में ही बैठक छोड़कर बाहर निकल गया।ट्रंप के एक बयान से भड़का ईरान, कूटनीतिक महामंथन में पड़ा खललवैश्विक शांति की उम्मीदों को उस समय बड़ा झटका लगा जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक हालिया बयान ने तेहरान के अधिकारियों को पूरी तरह भड़का दिया। ट्रंप ने ईरान को सख्त लहजे में चेतावनी दी थी कि वह लेबनान में सक्रिय संगठन हिज्बुल्लाह द्वारा इजरायल पर किए जा रहे हमलों का समर्थन करना तुरंत बंद करे, अन्यथा उसे इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।राष्ट्रपति ट्रंप की इस सीधी धमकी से नाराज ईरानी प्रतिनिधिमंडल कुछ देर के लिए वार्ता की टेबल से उठकर बाहर चला गया। हालांकि, राजनयिक सूत्रों का कहना है कि यह ऐतिहासिक शांति वार्ता अभी पूरी तरह से खत्म या रद्द नहीं हुई है। दोनों देशों के बीच पहले से तय किए गए 60 दिनों के कूटनीतिक रोडमैप के तहत पर्दे के पीछे विचार-विमर्श और संवाद का सिलसिला आने वाले दिनों में भी जारी रहेगा।कैमरों में कैद हुए वैश्विक नेताओं के हाव-भाव, सोशल मीडिया पर वीडियो वायरलबुर्गेनस्टॉक रिजॉर्ट के कूटनीतिक गलियारों में सोमवार सुबह कुछ ऐसे दृश्य देखने को मिले, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय मीडिया और सोशल मीडिया पर एक नई बहस छेड़ दी है। इस हाई-प्रोफाइल कार्यक्रम में शामिल विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों की गतिविधियां, उनके आपसी व्यवहार और शरीर की भाषा (Body Language) कैमरों में कैद हो गई, जिसके वीडियो अब इंटरनेट पर तेजी से वायरल हो रहे हैं:ईरानी डेलीगेशन का कड़ा रुख: बैठक में शामिल ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने अमेरिकी रुख के विरोध में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों की सबसे अहम औपचारिकता यानी 'सामूहिक फोटो सत्र' (Group Photo Session) का पूरी तरह से बायकॉट (बहिष्कार) कर दिया। वे बिना ग्रुप तस्वीर खिंचवाए ही कार्यक्रम स्थल से रवाना हो गए। हालांकि इसका कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं आया है, लेकिन इसे एक कड़ा राजनीतिक संकेत माना जा रहा है।कतर के मंत्री ने दिखाई बेरुखी: रिपोर्टों और वायरल वीडियो के अनुसार, कतर के एक बेहद वरिष्ठ मंत्री और अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस (JD Vance) के बीच औपचारिक अभिवादन (Handshake) को लेकर भी गंभीर सवाल उठे हैं। कतरी मंत्री द्वारा अमेरिकी उपराष्ट्रपति से दूरी बनाए रखने की घटना ने कूटनीतिक तनाव को और स्पष्ट कर दिया।पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख के चेहरे की उड़ी हवाइयांइस पूरी शांति वार्ता में खुद को एक बड़े मध्यस्थ या बिचौलिये के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे पाकिस्तान को इस हंगामे से भारी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा है। बैठक के दौरान जब कतर के मंत्री ने अमेरिकी उपराष्ट्रपति से हाथ मिलाने से संकोच किया और ईरानी डेलिगेशन मीटिंग रूम से बाहर चला गया, तब वहां मौजूद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और उनके शक्तिशाली सेना प्रमुख (आर्मी चीफ) जनरल आसिम मुनीर के चेहरों का रंग उड़ गया।तस्वीरों और वीडियो में दोनों पाकिस्तानी दिग्गज बेहद असहज और तनावग्रस्त नजर आ रहे हैं। सोशल मीडिया पर यूजर्स पाकिस्तानी हुक्मरानों की इस स्थिति पर जमकर प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं और इसे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मंच पर पाकिस्तान की एक और 'असफल मध्यस्थता' के रूप में देख रहे हैं।
ईरान डील पर ट्रंप घिरे – अपनी ही पार्टी में बढ़ा असंतोष
ईरान के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ज्ञापन समझौते की, डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन, दोनों पार्टियों ने लगातार आलोचना की
लॉस एंजिल्स में भीषण आग – गोदाम से उठता धुआं थमा नहीं
अमेरिका के लॉस एंजिल्स में एक गोदाम में भीषण आग लग गई है। आग पर काबू पाने की लगातार कोशिश की जा रही हैं; बावजूद इसके धुआं अभी भी उठ रहा है
स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक रिजॉर्ट में अमेरिका और ईरान के बीच चल रही हाई-लेवल कूटनीतिक बातचीत के तनावपूर्ण माहौल के बीच एक बेहद दिलचस्प और हल्का-फुल्का पल देखने को मिला। अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस (JD Vance) ने अपने पसंदीदा भारतीय और पाकिस्तानी लोगों को लेकर एक ऐसी मजाकिया टिप्पणी की, जिसने अंतरराष्ट्रीय मीडिया में एक नई चर्चा छेड़ दी है। बातचीत के बाद जब जेडी वेंस पत्रकारों से मुखातिब हुए, तो उन्होंने हंसते हुए अपनी जिंदगी के दो सबसे खास किरदारों के नाम उजागर किए, जिनमें से एक भारतीय हैं और दूसरे पाकिस्तानी।मेरी जिंदगी में दो बेहद अहम लोग...- शहबाज शरीफ के सामने वेंस का मजेदार पंचअमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने अपने ही खास अंदाज में भारत और पाकिस्तान के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करते हुए एक बड़ा ही अनूठा किस्सा सुनाया। उन्होंने बताया, जब से फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने इस्लामाबाद में प्रधानमंत्री के साथ हमारा स्वागत किया है, तब से मैं मजाक में एक बात लगातार कहता रहा हूँ। मेरी जिंदगी में इस समय दो बहुत ही महत्वपूर्ण लोग हैं- एक भारतीय और एक पाकिस्तानी। भारतीय मेरी पत्नी (उषा वेंस) हैं और पाकिस्तानी फील्ड मार्शल मुनीर हैं।जेडी वेंस ने जब यह मजेदार बयान दिया, उस वक्त उनके ठीक बगल में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर और कतर के प्रधानमंत्री व विदेश मंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुल रहमान बिन जसीम अल थानी खुद मौजूद थे। वेंस की इस हाजिरजवाबी को सुनकर वहां उपस्थित सभी वैश्विक नेता और राजनयिक अपनी हंसी नहीं रोक पाए।जनरल आसिम मुनीर की तारीफों के बांधे पुल, बताया एक बेहतरीन डिप्लोमैटमजाक के बाद जेडी वेंस ने बेहद गंभीर होते हुए पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की लीडरशिप की खुलकर तारीफ की। उन्होंने वैश्विक मंच पर मुनीर के योगदान को सराहते हुए कहा, पिछले तीन महीनों के दौरान मैंने शायद दुनिया में किसी भी अन्य व्यक्ति या राजनेता के मुकाबले जनरल मुनीर से सबसे ज्यादा बातचीत की है। आज अमेरिका और ईरान जिस शांति समझौते की मेज पर बैठे हैं, उनकी गहरी समझदारी और बेहतरीन मिलिट्री लीडरशिप के बिना हम इस मुकाम तक कभी नहीं पहुंच पाते। उन्होंने संकट के इस दौर में खुद को एक बेहतरीन और दूरदर्शी डिप्लोमैट (राजनयिक) साबित किया है।दिलचस्प बात यह है कि आसिम मुनीर की इतनी बड़ी तारीफ करने से महज कुछ ही दिन पहले जेडी वेंस ने वाशिंगटन में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मजाक में कहा था कि पाकिस्तान में प्रेस को पूरी आजादी नहीं है। उन्होंने यह टिप्पणी तब की थी जब पत्रकार उनसे यह सवाल पूछ रहे थे कि अमेरिका ने ईरान के साथ होने वाले शांति समझौते की शर्तों को सार्वजनिक करने में इतनी देरी क्यों की।वेंस ने सुनाया शादी का किस्सा: जब भारतीय बहू की बात सुनकर मां ने पूछा था- कौन सा कबीला?अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस अक्सर सार्वजनिक मंचों पर अपनी पत्नी उषा वेंस (Usha Vance) के साथ अपनी 12 साल पुरानी इंटर-फेथ (अलग-अलग धर्मों के बीच) शादी के खूबसूरत किस्से साझा करते रहते हैं। उषा वेंस के माता-पिता मूल रूप से भारत के आंध्र प्रदेश के रहने वाले थे, जो बाद में अमेरिका जाकर बस गए थे। हाल ही में एक मशहूर पॉडकास्ट इंटरव्यू के दौरान वेंस ने अपनी मां और उषा से जुड़ा एक बेहद मजेदार और पुराना पारिवारिक वाकया शेयर किया।वेंस ने हंसते हुए बताया कि जब उन्होंने अपनी मां को पहली बार यह जानकारी दी थी कि वह उषा नाम की लड़की से प्यार करते हैं जो कि एक भारतीय (Indian) हैं, तो उनकी मां ने बेहद मासूमियत से पूछा था, अच्छा, पर वह कौन से कबीले (ट्राइब) से ताल्लुक रखती हैं? वेंस ने स्पष्ट किया कि उनकी मां का यह सवाल अमेरिकी समाज के एक हिस्से में दूसरी संस्कृतियों के बारे में सीमित जानकारी को दिखाता है, न कि उषा के बैकग्राउंड या भारत के समृद्ध इतिहास का मजाक उड़ाने या उसे कमतर दिखाने की कोई कोशिश थी।आपको बता दें कि जेडी वेंस और उषा की पहली मुलाकात साल 2010 में येल यूनिवर्सिटी के प्रतिष्ठित लॉ स्कूल में पढ़ाई के दौरान हुई थी। चार साल की गहरी दोस्ती और कोर्टशिप के बाद साल 2014 में इस कपल ने अलग-अलग धर्मों के रीति-रिवाजों के साथ शादी की थी, जिसमें पारंपरिक हिंदू रस्में और फेरे भी शामिल थे। वर्तमान में इस कपल के तीन बच्चे हैं और जल्द ही वे अपने चौथे बच्चे के माता-पिता बनने वाले हैं।
ब्रिटेन की मध्यस्थता वाले बयान पर बालेन शाह की सफाई, बोले- खुद सुलझाएंगे भारत-नेपाल सीमा विवाद
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने भारत-नेपाल सीमा विवाद को सुलझाने में यूनाइटेड किंगडम (यूके) की संभावित भूमिका को लेकर दिए गए अपने पहले बयान पर सफाई दी
16 जून 2026। फ्रांस के एवियन शहर में G7 की सालाना बैठक। मीटिंग शुरू होने से पहले अनौपचारिक बातचीत चल रही थी। इटली की पीएम जॉर्जिया मेलोनी बोलीं- आज सुबह 3 कॉफी पीकर आई हूं। जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने फौरन पूछा- और एक सिगरेट? मेलोनी ने जवाब दिया कि उन्होंने 1 मई से सिगरेट छोड़ दी है। बाकी नेताओं ने तालियां बजाईं, किसी ने कहा- यू आर अ हीरो। ये गपशप वायरल हो गई। लोगों ने देखा कि दुनिया के सबसे ताकतवर लोग भी आपस में हम-आप जैसे ही बातें करते हैं। हालांकि ये हॉट माइक में रिकॉर्ड महज एक मोमेंट था। वर्ल्ड लीडर्स के मिलने, बातें करने, तोहफे देने से जुड़े रोचक किस्से और प्रोटोकॉल; आज मंडे मेगा स्टोरी में… **** ग्राफिक्स: द्रगचंद्र भुर्जी और अंकुर बंसल ---------- यह खबर भी पढ़िए…क्या भारत-पाकिस्तान में फिर दोस्ती होने वाली है:4 देशों में बैकचैनल मीटिंग्स; कोशिशों के पीछे असली वजह और इसका असर क्या होगा 14 मई, 2026, इस्लामाबाद। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की रेगुलर प्रेस ब्रीफिंग चल रही थी। एक पत्रकार ने प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी से पूछा- क्या भारत और पाकिस्तान के बीच बैकचैनल बातचीत हो रही है? अंद्राबी बोले- अगर मैं टिप्पणी करूंगा, तो वो बैकचैनल नहीं रहेगा। पूरी खबर पढ़िए…
ईरान को बैंकिंग छूट – अमेरिकी राजनीति में मचा घमासान
वॉशिंगटन और तेहरान के बीच बन रहे नए कूटनीतिक समझौते के तहत ईरान एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपना तेल बेच सकेगा
स्विट्जरलैंड वार्ता के बीच ट्रंप का धमाका – ईरान को फिर दी हमले की चेतावनी
एक तरफ स्विट्जरलैंड में अमेरिका और ईरान के बीच अगले चरण की समझौता बातचीत चल रही है तो दूसरी ओर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की धमकियां बंद होने का नाम नहीं ले रही हैं
3 दिन की देरी से 4 जून को मानसून ने केरलम में दस्तक दी। फिर धीरे-धीरे देश के कुछ हिस्सों में बढ़ा। अमूमन 15 जून तक देश के आधे हिस्से में बारिश होने लगती थी, लेकिन पिछले 13 दिनों से मानसून बेहद कमजोर हो गया है। इसके चलते 1 से 17 जून तक देश में सामान्य से 38% कम बारिश हुई। आखिर इस बार मानसून इतना कमजोर क्यों है और बारिश क्यों नहीं हो रही; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: शुरुआती 15 दिन में मानसून कितना कमजोर रहा है?जवाब: जून से सितंबर के महीने में देश में दक्षिण-पश्चिमी मानसून के चलते बारिश होती है। पूरे साल की 70-80% बारिश इसी मानसून से होती है। आमतौर पर 1 जून को मानसून केरलम के रास्ते देश में आता है। फिर तेजी से आगे बढ़ता है और जून के आखिर तक उत्तर प्रदेश, दिल्ली और आसपास के इलाकों तक पहुंच जाता है। 15 जुलाई तक पूरे देश में मानसून आ जाता है। हालांकि मानसून समय पर आ जाए, तो भी जरूरी नहीं कि बारिश अच्छी होगी। इस बार यही हुआ। मानसून जैसे-जैसे आगे बढ़ा, कमजोर होता गया। इस बार भारतीय मौसम विज्ञान विभाग, यानी IMD ने 3 दिन की देरी से 4 जून को मानसूनी हवाओं के केरल तट पर टकराने की घोषणा की। शुरुआती मानसून के चलते 1 से 17 जून देश में औसत से 38% कम बारिश हुई। यानी सामान्य 80.6 मिमी बारिश के मुकाबले 48.5 मिमी बारिश हुई। मध्य भारत में सबसे ज्यादा 62% की कमी रही। यहां 73.5 मिमी के मुकाबले 27 मिमी बारिश हुई। अब देखिए किन इलाकों में कितनी बारिश हुई… वेस्टर्न डिस्टर्बेंस एक तरह का मौसमी हवाओं का पैटर्न है। इस बार ऐसे ही कुछ और मौसमी फैक्टर भी हैं, जिन्होंने मानसून को बेहद कमजोर कर दिया। सवाल-2: किन वजहों से इस बार बारिश नहीं ला पा रहा मानसून?जवाब: जून के महीने में जमीन की हवा काफी गर्म हो जाती है, लेकिन समुद्र का पानी और उसके ऊपर की हवा कुछ ठंडी और भारी रहती है। प्रेशर डिफरेंस की वजह से ठंडी हवा समुद्र से उठी भाप को बहाकर जमीन तक ले आती है। इसे मानसूनी हवा कहते हैं। जून से सितंबर तक भारत के दक्षिण-पश्चिम में हिंद महासागर और अरब सागर से नमी वाली हवाएं आती हैं। इसे 'दक्षिण-पश्चिम मानसून' कहते हैं। इस बार 5 मौसमी फैक्टर ने मानसून को बेहद कमजोर किया है... IIT कानपुर में प्रोफेसर रघु मुर्तुगुद्दे कहते हैं कि हवा में नमी की कमी दिक्कत नहीं है, लेकिन इन सभी फैक्टर्स के चलते हवा में बादलों का संघनन नहीं हो पा रहा है। इसके चलते पूरी और उत्तर-पूर्वी भारत में बेहद कम बारिश हो रही है। सवाल-3: अगले कुछ दिनों में बारिश होगी या नहीं?जवाब: मौसम विज्ञानी नवदीप दहिया के मुताबिक, ‘17 जून की सुबह की सैटेलाइट तस्वीरों में मानसून की स्थिति कमजोर दिख रही है। बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में बारिश वाले बादल बेहद कम हैं। 23 जून से पहले इस स्थिति में तेजी से सुधार होने की संभावना नहीं है। IMD ने भी कहा है कि अगले 4 से 5 दिनों में मानसून ओडिशा, झारखंड और बिहार के ज्यादातर हिस्सों और छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों में आगे बढ़ सकता है। लेकिन 24 जून तक ये कमजोर ही बना रहेगा। देश के ज्यादातर हिस्सों में बारिश सामान्य से कम रहने की संभावना है। हालांकि दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत और उत्तर-पूर्वी राज्यों के कुछ हिस्से में अगले हफ्ते सामान्य बारिश होगी। वहीं IMD मुंबई के मुताबिक, 24 और 25 जून के आसपास कोंकण में कुछ बारिश की संभावना जता रहे हैं। हालांकि महाराष्ट्र के बाकी हिस्सों में बारिश की संभावना बेहद कम है। नवनीत के मुताबिक, ‘अगर मानसून इतना ही कमजोर रहा, तो पूरे जून में बारिश की कमी 45% तक हो सकती है। जबकि इसी दौरान किसान खरीफ की फसलों की बुवाई करते हैं, जिसके लिए बारिश की जरूरत होती है।’ सवाल-4: गर्मी से राहत मिलने की उम्मीद कब तक है?जवाब: गर्मी से राहत मानसूनी बारिश से ही मिल सकती है। दक्षिण-पश्चिम मानसून जैसे-जैसे देश में आगे बढ़ता है, हीटवेव खत्म होती जाती है। किसी इलाके में तापमान सामान्य से ज्यादा हो और कम-से-कम दो दिनों तक तेज लू चलने लगे, तो उसे हीटवेव माना जाता है। IMD ने पैरामीटर बनाया है कि किसी इलाके में तापमान सामान्य से 4.5C ज्यादा होने पर हीटवेव और 6.4C ज्यादा होने पर सीवियर हीटवेव होगी। मौसम विभाग ने देश के 5 राज्यों को ‘हीटवेव प्रोन स्टेट’ माना है, जहां अगले 7 दिन हीटवेव रह सकती है। इस लिस्ट में उत्तर प्रदेश, बिहार, तेलंगाना, गोवा और महाराष्ट्र शामिल हैं। जबकि पिछले महीने इस लिस्ट में 10 से ज्यादा राज्य थे। अप्रैल 2026 में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली समेत कई राज्यों में हीटवेव की स्थिति बन गई थी। -----ये खबर भी पढ़ें… आज का एक्सप्लेनर:148 साल पुराने सुपर अल नीनो जैसे हालात, तब 55 लाख मौतें हुईं; समुद्र का पानी 2C गर्म होने से कैसे तबाही मच जाती है 1876-78 का दौर। भारत में 55 लाख से ज्यादा लोग अकाल मौत मारे गए। उस तबाही की जड़ में था- सुपर अल नीनो। प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से 3 डिग्री सेल्सियस ज्यादा उबला और पूरी दुनिया का मौसम पलट गया। अब 148 साल बाद वैसी ही दस्तक फिर सुनाई दे रही है। पूरी खबर पढ़ें…
रूस के गाइडेड एरियल बमों ने यूक्रेन के कई शहरों में मचाई तबाही; पांच की मौत, 26 घायल
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने रूस पर बड़े पैमाने पर हमले जारी रखने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि शनिवार रात किए गए हमले में पांच लोगों की मौत हो गई और 26 लोग घायल हुए हैं। कई शहरों में जान-माल का भारी नुकसान हुआ। जेलेंस्की ने अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों से एयर डिफेंस सिस्टम की आपूर्ति तेज करने की अपील की है।
ब्रिटेन में सियासी महाभूकंप: PM कीर स्टार्मर का इस्तीफा तय, जानिए अब कौन बनेगा अगला प्रधानमंत्री
ब्रिटेन (United Kingdom) की राजनीति में एक बार फिर से भारी अस्थिरता और उठापटक का दौर लौट आया है। साल 2024 के आम चुनावों में लेबर पार्टी को प्रचंड बहुमत दिलाने वाले ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर (Keir Starmer) के पद छोड़ने की अटकलें तेज हो गई हैं। प्रतिष्ठित अखबार 'द ऑब्जर्वर' की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, पार्टी के भीतर बढ़ते दबाव और अंदरूनी बगावत के चलते स्टार्मर सोमवार को अपने पद से इस्तीफा दे सकते हैं। हालांकि, डाउनिंग स्ट्रीट के सरकारी सूत्रों का अब भी यही दावा है कि उनका पूरा फोकस सरकार चलाने और अपनी जिम्मेदारियों पर है।लेबर पार्टी में भारी बगावत, 100 से ज्यादा सांसद खिलाफस्टार्मर की कुर्सी खतरे में पड़ने का सबसे बड़ा कारण उनकी अपनी ही लेबर पार्टी के भीतर पनपा गहरा असंतोष है। बीते कुछ महीनों में सरकार कई बड़े विवादों में घिरी रही है और अपनी ही नीतियों (U-Turns) से पीछे हटने के कारण प्रधानमंत्री की लोकप्रियता इतिहास के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। जनता के जीवन स्तर को सुधारने के वादों पर विफल रहने के कारण पार्टी के 100 से अधिक निर्वाचित सांसद सार्वजनिक तौर पर उनके इस्तीफे या पद छोड़ने की समयसीमा तय करने की मांग कर चुके हैं।एंडी बर्नहैम की जीत ने बढ़ाई कीर स्टार्मर की मुश्किलेंशुक्रवार को हुए मेकरफील्ड उपचुनाव में स्टार्मर के सबसे बड़े राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी एंडी बर्नहैम (Andy Burnham) की शानदार जीत ने आग में घी का काम किया है। बर्नहैम ने दक्षिणपंथी लोकलुभावन नेता नाइजेल फराज की 'रिफॉर्म यूके' पार्टी को करारी मात देकर संसद में वापसी की है। इस बड़ी जीत के साथ ही बर्नहैम के लिए पार्टी नेतृत्व (Leadership Challenge) को चुनौती देने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है।आधिकारिक आवास 'चेकर्स' में परिवार संग मंथनचारों तरफ से बढ़ते दबाव के बीच प्रधानमंत्री स्टार्मर इस वक्त अपने आधिकारिक ग्रामीण आवास 'चेकर्स' में मौजूद हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, वे कोई भी बड़ा और अंतिम फैसला लेने से पहले अपनी पत्नी, कैबिनेट मंत्रियों, प्रमुख दानदाताओं (Donors) और ट्रेड यूनियन के नेताओं के साथ गहन चर्चा कर रहे हैं। इस विचार-विमर्श के बाद स्टार्मर भी अंदरूनी तौर पर मान चुके हैं कि अब उनका प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बने रहना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं रह गया है, भले ही शुक्रवार को उन्होंने लीडरशिप चुनौती का सामना करने का दावा किया था।10 साल में 7वां प्रधानमंत्री देखेगा ब्रिटेन!अगर कीर स्टार्मर इस्तीफा देते हैं या उन्हें पद से हटाया जाता है, तो यह ब्रिटेन के लोकतांत्रिक इतिहास में एक नया रिकॉर्ड होगा। पिछले 200 वर्षों के इतिहास में ऐसा पहली बार होगा जब इतनी जल्दी-जल्दी सत्ता परिवर्तन हुआ हो। पिछले एक दशक में ही ब्रिटेन अपना सातवां प्रधानमंत्री देखेगा। वर्तमान में ब्रिटिश जनता खस्ताहाल सार्वजनिक सेवाओं और अवैध अप्रवासन (Illegal Immigration) जैसे गंभीर राष्ट्रीय संकटों से जूझ रही है।रेस में आगे हैं एंडी बर्नहैम, वित्त मंत्री पर गिर सकती है गाजप्रधानमंत्री पद की रेस में 56 वर्षीय एंडी बर्नहैम सबसे मजबूत दावेदार बनकर उभरे हैं। उत्तरी इंग्लैंड में ग्रेटर मैनचेस्टर के मेयर के रूप में अपनी मजबूत राजनीतिक जमीन तैयार करने वाले बर्नहैम को लेबर पार्टी के अगले तारणहार के रूप में देखा जा रहा है। उनके अलावा वेस स्ट्रीटिंग का नाम भी कतार में है। 'द टाइम्स' की एक इनसाइड रिपोर्ट के मुताबिक, अगर बर्नहैम देश के प्रधानमंत्री बनते हैं, तो उनका पहला बड़ा कदम वर्तमान वित्त मंत्री राहेल रीव्स को बर्खास्त करना हो सकता है, क्योंकि बर्नहैम के सलाहकारों का मानना है कि रीव्स की आर्थिक नीतियां देश में जरूरी बदलाव लाने के बिल्कुल अनुकूल नहीं हैं।
6 अरब डॉलर के बदले अमेरिका ने ईरान के सामने रखी 'परमाणु' शर्त! जानें डील की पूरी इनसाइड स्टोरी
अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे भारी तनाव और युद्ध के हालातों के बीच अब शांति की एक नई उम्मीद जागी है। दोनों देशों के बीच हुए शुरुआती समझौते के बाद अब स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक में ऐतिहासिक आमने-सामने की वार्ता शुरू होने जा रही है। इस अहम बैठक के लिए अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस अपनी टीम के साथ स्विट्जरलैंड पहुंच चुके हैं, वहीं ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने भी वहां डेरा डाल दिया है। इस कूटनीतिक हलचल के बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर भी स्विट्जरलैंड के लिए रवाना हो गए हैं। आइए समझते हैं कि आखिर अमेरिका इस वार्ता में ईरान से क्या चाहता है और इस डील के मायने क्या हैं।6 अरब डॉलर का फंड और परमाणु ठिकानों की शर्तकूटनीतिक जानकारों के अनुसार, लेबनान में इजरायली एयरस्ट्राइक के कारण यह शांति वार्ता पहले टल गई थी, लेकिन अब पहले चरण की बातचीत में अमेरिका अपना सबसे बड़ा दांव चलने जा रहा है। अमेरिका की मुख्य मांग यह है कि ईरान उसे अपने उन संवेदनशील परमाणु स्थलों (Nuclear Sites) का निरीक्षण करने की अनुमति दे, जहां पूर्व में अमेरिकी बमबारी हुई थी। अगर ईरान इस शर्त को मानकर अमेरिकी प्रतिनिधियों को वहां जाने का रास्ता देता है, तो इसके बदले में अमेरिका ईरान का फ्रीज किया हुआ 6 अरब डॉलर का भारी-भरकम फंड तुरंत रिलीज कर सकता है। लगभग चार महीने से जारी छद्म युद्ध को रोकने के लिए इस डील के तकनीकी पहलुओं पर बर्गेनस्टॉक में फाइनल मुहर लगनी है।इजरायल की धमकी और 60 दिनों का अल्टीमेटमअमेरिका और ईरान के बीच बातचीत के लिए 60 दिनों का बेहद अहम समय तय किया गया है। हालांकि, इस शांति वार्ता पर इजरायल के कड़े रुख का खतरा लगातार मंडरा रहा है। इजरायल ने साफ तौर पर स्पष्ट कर दिया है कि वह अमेरिका-ईरान के बीच हो रही इस डील को मान्यता नहीं देता है। इजरायल का कहना है कि वह अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ईरान और उसके समर्थित गुटों पर स्वतंत्र रूप से सैन्य कार्रवाई करने के लिए पूरी तरह आजाद है।ईरान की 'पावरफुल' टीम में कौन-कौन है शामिल?अमेरिका और कतर की मध्यस्थता से इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच सैन्य झड़पें कम करने की कोशिशों के बाद ईरान ने भी अपनी कूटनीतिक ताकत झोंक दी है। स्विट्जरलैंड पहुंची ईरानी टीम का नेतृत्व वहां की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाकिर गालिबाफ कर रहे हैं। इस उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची के साथ-साथ केंद्रीय बैंक और तेल क्षेत्र के शीर्ष अधिकारी भी मौजूद हैं, जो आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने और फंड बहाली पर मोलभाव करेंगे।'होर्मुज' की चेतावनी के बावजूद नहीं रुकी बातचीतइस बहुप्रतीक्षित वार्ता से ठीक एक दिन पहले तनाव तब और बढ़ गया था, जब ईरान ने रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (Strait of Hormuz) को बंद करने का ऐलान कर दिया था। ईरान की संयुक्त सैन्य कमान ने आरोप लगाया था कि लेबनान में इजरायल के लगातार हमले और अमेरिका की 'बदनीयती' युद्ध रोकने के वादों का खुला उल्लंघन है। ईरानी स्टेट टीवी ने चेतावनी दी थी कि अगर आक्रामकता जारी रही तो कड़े कदम उठाए जाएंगे। हालांकि, इस भारी कड़वाहट और बयानबाजी के बावजूद दोनों देश वार्ता की मेज पर आ गए हैं, जिस पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं।
विवाद की शुरुआत गायबांधा जिले के पलाशबाड़ी क्षेत्र से हुई, जहां श्री श्री राधा गोविंद और काली मंदिर परिसर में भगवान राम की 81 फीट ऊंची प्रतिमा का निर्माण कराया जा रहा था। करीब 22 करोड़ टका की लागत वाली इस परियोजना का अधिकांश कार्य पूरा हो चुका था।
मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) से इस समय की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली अंतरराष्ट्रीय खबर सामने आ रही है। अमेरिका और ईरान के बीच हुए ऐतिहासिक सीजफायर समझौते के महज तीन दिन बाद ही शांति की उम्मीदों को बड़ा झटका लगा है। ईरान ने रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग 'होर्मुज स्ट्रेट' (Strait of Hormuz) को सभी प्रकार के कमर्शियल जहाजों के लिए फिर से बंद करने की आधिकारिक घोषणा कर दी है। ईरान ने इसके पीछे लेबनान पर इजरायल की जारी सैन्य कार्रवाई और अमेरिका द्वारा वादों को पूरा न करने का हवाला दिया है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब स्विट्जरलैंड में दोनों देशों के बीच तकनीकी स्तर की बातचीत शुरू होने वाली थी।समझौते के तीन दिन बाद ही पलटा ईरान, अमेरिका पर लगाया वादाखिलाफी का आरोपईरान और अमेरिका के बीच बीते 18 जून को ही तीन महीने से जारी युद्ध को समाप्त करने के लिए एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) पर डिजिटल माध्यम से हस्ताक्षर किए गए थे। इस समझौते पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने सहमति जताई थी, जिसके बाद होर्मुज स्ट्रेट से व्यापारिक जहाजों की आवाजाही बहाल की गई थी।हालांकि, ईरान के शीर्ष संयुक्त सैन्य कमान 'खातम अल-अंबिया सेंट्रल मुख्यालय' ने एक आपातकालीन बयान जारी कर कहा कि अमेरिका और इजरायल ने युद्धविराम समझौते की पहली और सबसे मुख्य शर्त का स्पष्ट उल्लंघन किया है। ईरान का आरोप है कि दक्षिणी लेबनान में इजरायल के हमले लगातार जारी हैं और अमेरिका इस वैचारिक व सैन्य हिंसा को रोकने में पूरी तरह विफल रहा है। तेहरान ने साफ किया कि वादों को न निभाने की वजह से अमेरिका पर से उनका भरोसा उठ गया है और इसी के विरोध में होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा ब्लॉक किया जा रही है।ट्रंप की दोटूक धमकी: 'अगर डील नहीं हुई, तो होर्मुज में वसूलेंगे अमेरिकी टोल टैक्स'दूसरी तरफ, अमेरिका ने ईरान के इस कदम और समुद्री मार्ग पर उसके एकाधिकार के दावे को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। अमेरिकी सेना और सेंट्रल कमांड ने बयान जारी कर कहा कि अमेरिकी बलों ने ईरानी बंदरगाहों और तटीय क्षेत्रों की अपनी समुद्री नाकेबंदी को पहले ही पूरी तरह समाप्त कर दिया था और वे किसी भी जहाज को नहीं रोक रहे हैं।इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सख्त अंदाज में ईरान को सीधी चेतावनी दे डाली है। ट्रंप ने कहा है कि यदि तेहरान के साथ तकनीकी पहलुओं पर अंतिम समझौता नहीं होता है, तो अमेरिका इस वैश्विक शिपिंग लेन (होर्मुज स्ट्रेट) से गुजरने वाले जहाजों पर अपना खुद का 'अमेरिकी टोल टैक्स' लागू कर देगा। ट्रंप की इस नई धमकी के बाद खाड़ी देशों और वैश्विक बाजार में हड़कंप मच गया है, क्योंकि होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के कुल तेल परिवहन का सबसे बड़ा लाइफलाइन मार्ग है।स्विट्जरलैंड पहुंचे मध्यस्थ और प्रतिनिधिमंडल, पाकिस्तान के पीएम और सेना प्रमुख भी शामिलतनाव के इस माहौल के बीच, तकनीकी स्तर की इस महत्वपूर्ण वार्ता को मुकाम तक पहुंचाने के लिए स्विट्जरलैंड में हलचल तेज हो गई है। ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी IRNA के मुताबिक, ईरान का एक हाई-लेवल प्रतिनिधिमंडल स्विट्जरलैंड पहुंच चुका है, जिसकी अगुवाई संसद के अध्यक्ष (स्पीकर) मोहम्मद बाघेरी ग़ालिबाफ कर रहे हैं। ईरानी पक्ष का कहना है कि वे वहां पहले से तय समझौते को लागू करने की प्रक्रिया पर काम करने गए हैं, न कि किसी नए दौर की बातचीत के लिए।स्विट्जरलैंड के विदेश मंत्रालय ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर ईरानी डेलीगेशन का स्वागत करते हुए उनके 'बर्गेनस्टॉक' के लिए रवाना होने की पुष्टि की है। इस महावार्ता में मध्यस्थता और क्षेत्रीय सुरक्षा के मद्देनजर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर भी देर रात स्विट्जरलैंड के लिए रवाना हो गए हैं, जो अमेरिका और ईरान के बीच होने वाली इस तकनीकी बातचीत में अहम भूमिका निभा सकते हैं।क्या था 18 जून का ऐतिहासिक समझौता और ईरान के नए नियम?18 जून को हुए इस डिजिटल समझौते के तहत दोनों देशों ने सभी मोर्चों पर सैन्य कार्रवाइयों को तत्काल और स्थायी रूप से रोकने तथा भविष्य में किसी भी प्रकार के बल प्रयोग या सैन्य धमकी से बचने की कसम खाई थी। इसके तहत रणनीतिक समुद्री मार्ग पर कमर्शियल शिपिंग को सुरक्षित ढंग से बहाल करने के लिए 'पर्शियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी' का गठन भी किया गया था।ईरान ने इसके तहत जहाजों के लिए कड़े नियम बनाए थे, जिसमें पहले से रजिस्ट्रेशन कराना, विशेष अनुमति पत्र लेना और अनिवार्य बीमा औपचारिकताएं शामिल थीं। लेकिन अब सीजफायर टूटने के आरोपों और होर्मुज की नई नाकेबंदी के बाद इस पूरे क्षेत्र में एक बार फिर अमेरिका-ईरान युद्ध के बादल मंडराने लगे हैं।
अमेरिकी उपराष्ट्रपति वेंस स्विट्जरलैंड के लिए हुए रवाना, ईरान के साथ अगले चरण की होगी वार्ता
अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस स्विट्जरलैंड के दौरे पर रवाना हुए हैं। उन्हें उम्मीद है कि ईरान के साथ होने वाली बैठक से तेहरान के परमाणु कार्यक्रम पर चर्चा आगे बढ़ सकेगी
मेलोनी का 'एंग्री लुक': जब इटली की महिला पीएम के तेवरों से कांपे फ्रांस, पाकिस्तान और पोर्न माफिया
इटली की पहली महिला प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी इस समय वैश्विक राजनीति में सबसे चर्चित चेहरा बनी हुई हैं। अपने बेबाक अंदाज, कड़े फैसलों और 'नो-कॉम्प्रोमाइज' नीति के लिए मशहूर मेलोनी ने हाल ही में कई ऐसे कदम उठाए हैं, जिससे न सिर्फ यूरोप बल्कि पूरी दुनिया की राजनीति में हलचल मच गई है। फ्रांस के राष्ट्रपति से सीधे टकराने से लेकर एक बड़ी पोर्न वेबसाइट को हमेशा के लिए बंद करवाने तक, मेलोनी के ये 5 किस्से उनके सबसे आक्रामक और साहसी रूप को बयां करते हैं।फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों से सीधी भिड़ंत, मेलोनी ने दिया करारा जवाबयूरोप के राजनीतिक गलियारों में उस समय तनाव फैल गया जब फ्रांस के ल्योन शहर में एक दक्षिणपंथी कार्यकर्ता क्विंटिन डेरांक की वामपंथी चरमपंथियों द्वारा कथित तौर पर हत्या कर दी गई। इस घटना पर दुख जताते हुए जॉर्जिया मेलोनी ने इसे पूरे यूरोप के लिए एक गहरा घाव बताया। मेलोनी का यह बयान फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को नागवार गुजरा। मैक्रों ने मेलोनी पर निशाना साधते हुए नसीहत दे डाली कि राष्ट्रवादियों को अपने देश तक ही सीमित रहना चाहिए और दूसरों के आंतरिक मामलों में टांग नहीं अड़ानी चाहिए।मेलोनी ने भी बिना वक्त गंवाए मैक्रों को बेहद कड़ा और हैरान करने वाला पलटवार किया। उन्होंने साफ कर दिया कि यूरोप में वैचारिक हिंसा के खिलाफ बोलने से वह कभी पीछे नहीं हटेंगी, चाहे सामने फ्रांस जैसी बड़ी वैश्विक ताकत ही क्यों न खड़ी हो।इस्लामीकरण पर पुराना बयान वायरल, मेलोनी के तेवरों से भड़के पाकिस्तानीसोशल मीडिया पर इन दिनों जॉर्जिया मेलोनी का एक पुराना वीडियो तेजी से ट्रेंड कर रहा है, जिसने पाकिस्तान सहित कई मुस्लिम देशों में खलबली मचा दी है। इस वीडियो में मेलोनी ने बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा था कि इस्लामी संस्कृति की कुछ व्याख्याओं और यूरोपीय सभ्यता के मूल अधिकारों व मूल्यों के बीच सामंजस्य (कम्पैटिबिलिटी) की एक गंभीर समस्या है। उन्होंने यूरोप में बढ़ते इस्लामीकरण और सऊदी अरब द्वारा फंडेड सांस्कृतिक केंद्रों पर खुलकर चिंता व्यक्त की थी।खास बात यह है कि आज प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उनके इन विचारों में कोई नरमी नहीं आई है। वह ब्रिटेन और अल्बानिया जैसे देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी करके अवैध प्रवासियों को वापस भेजने के कड़े और ठोस फैसलों पर लगातार काम कर रही हैं।20 लाख लोगों की हड़ताल फिर भी फिलिस्तीन मुद्दे पर ट्रंप के रुख के साथ अडिगगाजा युद्ध के बीच इटली के भीतर मेलोनी को भारी राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ रहा है। देश में फिलिस्तीन को एक अलग राष्ट्र के रूप में मान्यता देने और इजरायल पर प्रतिबंध लगाने की मांग को लेकर 20 लाख से अधिक लोगों और ट्रेड यूनियनों ने देशव्यापी हड़ताल कर दी। इस भारी घरेलू दबाव के बावजूद मेलोनी अपनी बात पर टस से मस नहीं हुईं।उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा में ब्रिटेन और फ्रांस की राह पर चलने से इनकार करते हुए फिलिस्तीन को तुरंत मान्यता देने से मना कर दिया। मेलोनी ने अपने इस फैसले को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस अल्टीमेटम से जोड़ा, जिसमें हमास द्वारा सभी बंधकों की रिहाई और पूर्ण निरस्त्रीकरण की शर्त शामिल है। घरेलू स्तर पर बड़ा राजनीतिक नुकसान उठाने के बाद भी उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपना स्टैंड नहीं बदला।जब इमाम को कोर्ट ने छोड़ा, तो न्यायपालिका पर ही बरस पड़ीं इटली की पीएममेलोनी का एक और आक्रामक रूप तब देखने को मिला जब वह देश की न्यायपालिका से ही सीधे टकरा गईं। इटली के ट्यूरिन में 7 अक्टूबर के हमास हमलों को 'प्रतिरोध' बताने वाले और हिंसा को जायज ठहराने वाले मिस्र के एक कट्टरपंथी इमाम मोहम्मद शाहिन को स्थानीय अदालत ने रिहा कर दिया। इटली के गृह मंत्रालय ने इस इमाम को देश निकाला (डिपोर्टेशन) का आदेश दिया था, जिसे कोर्ट ने पलट दिया।इस फैसले पर भड़कीं मेलोनी ने सीधे जजों की मंशा पर ही सवाल उठा दिए। उन्होंने बेहद कड़े लहजे में पूछा कि अगर अदालतें आतंकवाद और हिंसा का समर्थन करने वालों को इस तरह खुली छूट देंगी, तो वह इटली के नागरिकों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित कर पाएंगी?मेलोनी के गुस्से से खौफ में आए पोर्न माफिया, बंद करनी पड़ी वेबसाइटजॉर्जिया मेलोनी ने यह साबित कर दिया है कि वह अपनी और महिलाओं की गरिमा के साथ खिलवाड़ कतई बर्दाश्त नहीं कर सकतीं। इंटरनेट पर 'फिका' नाम की एक मशहूर पोर्न वेबसाइट ने मेलोनी, उनकी बहन आरियाना और विपक्ष की नेता एली श्लेन की तस्वीरों को डीपफेक तकनीक के जरिए मॉर्फ करके बेहद अभद्र कैप्शन के साथ अपनी वीआईपी श्रेणी में पोस्ट कर दिया था।जैसे ही यह मामला मेलोनी के संज्ञान में आया, उन्होंने इसे हर महिला के सम्मान पर हमला माना। मेलोनी ने इस पर गहरी नाराजगी और घृणा जताते हुए कानूनी और साइबर एजेंसियों को तत्काल और सबसे सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए। इटली की प्रधानमंत्री के इस रौद्र रूप और आक्रामक रुख को देखकर करीब 7 लाख से अधिक पेड सब्सक्राइबर्स वाली उस बड़ी वेबसाइट के होश उड़ गए और कानूनी कार्रवाई के डर से संचालकों को अपनी पूरी साइट हमेशा के लिए इंटरनेट से डिलीट करनी पड़ी।
बदलते वक्त के साथ दुनिया भर में फैशन के मायने तेजी से बदल रहे हैं। अक्सर पुरुष, महिलाओं के कपड़ों या यूनिसेक्स स्टाइल को अपनाते दिखते थे, लेकिन इस समय चीन (China) में एक बिल्कुल उल्टा और बेहद अनोखा फैशन ट्रेंड आग की तरह फैल रहा है। यहां की युवा महिलाएं अब महिलाओं के पारंपरिक और ट्रेंडी कपड़ों को छोड़कर पुरुषों के कपड़े (Menswear) जैसे शर्ट, ढीली टी-शर्ट, ट्राउजर और शॉर्ट्स को अपनी अलमारी का हिस्सा बना रही हैं।शंघाई की रहने वाली केक्सिन जैसी लाखों चीनी युवतियां अब अपने बॉयफ्रेंड या पिता के लिए नहीं, बल्कि खुद पहनने के लिए मेन्सवियर की धड़ल्ले से शॉपिंग कर रही हैं। सोशल मीडिया से लेकर बाजारों तक फैले इस ट्रेंड ने फैशन पंडितों और कपड़ा उद्योग को सोचने पर मजबूर कर दिया है। आइए गहराई से समझते हैं कि आखिर चीनी महिलाओं के बीच पुरुषों के कपड़े पहनने का यह 'सीक्रेट' क्रेज क्यों चल पड़ा है।सोशल मीडिया पर 'जेंडर-न्यूट्रल' और 'मेन्सवियर' का महा-विस्फोटचीन के सबसे लोकप्रिय लाइफस्टाइल और सोशल मीडिया ऐप शाओहोंग्शु (Xiaohongshu), जिसे वैश्विक स्तर पर 'रेडनोट' (Rednote) भी कहा जाता है, पर महिलाओं द्वारा पुरुषों के कपड़े पहनने वाले वीडियो और पोस्ट्स की बाढ़ आ गई है। आंकड़ों के मुताबिक, ऐप पर 'महिलाएं पुरुषों के कपड़े पहन रही हैं' टैग को अब तक 8 करोड़ (80 मिलियन) से ज्यादा बार देखा जा चुका है।इसके साथ ही, 'जेंडर-न्यूट्रल ड्रेसिंग' (Gender-Neutral Dressing) टैग भी 9 करोड़ के जादुई आंकड़े को पार कर चुका है। इन पोस्ट्स में लड़कियां पुरुषों के कपड़ों के अनगिनत फायदे गिना रही हैं— जैसे बेहतर कॉटन और लिनेन का इस्तेमाल, साफ और सिंपल कट्स, शरीर को आराम देने वाली मुलायम सिलाई, मजबूत फिनिशिंग और सबसे महत्वपूर्ण बात, बेहद कम दाम।लाइवस्ट्रीम की वो एक लाइन, जिसने बदल दी केक्सिन की सोचशंघाई में काम करने वाली केक्सिन बताती हैं कि उनकी अलमारी में यह क्रांतिकारी बदलाव साल 2023 में शुरू हुआ। उस दौरान उनके चीनी सोशल मीडिया फ़ीड पर पुरुषों की टी-शर्ट बेचने वाले लाइवस्ट्रीम (Live Selling) वीडियोज बार-बार आने लगे। शुरुआत में उन्हें लगा कि एल्गोरिदम की किसी गड़बड़ी की वजह से उन्हें पुरुषों के कपड़े दिखाए जा रहे हैं, क्योंकि वह किसी पुरुष के लिए शॉपिंग नहीं कर रही थीं।लेकिन एक दिन उन्होंने लाइवस्ट्रीम को ध्यान से सुना, जिसमें होस्ट बार-बार चिल्लाकर कह रहा था— लड़कियां इसे छोटे साइज (Small Size) में खरीदकर खुद पहन सकती हैं... यह पूरी तरह यूनिसेक्स है! महिलाओं को टारगेट करने वाले आम लाइवस्ट्रीम में अक्सर 'स्लिम' दिखने और चुस्त कपड़े पहनने का दबाव होता है, लेकिन इस लाइवस्ट्रीम में कपड़े की क्वालिटी, थिकनेस (मोटाई) और मटेरियल पर फोकस था।केक्सिन ने जोखिम कम देखते हुए 100 युआन (लगभग ₹1325) से कम की एक मेन्स टी-शर्ट ऑर्डर कर दी। जब पार्सल आया, तो वह हैरान रह गईं। वह टी-शर्ट महिलाओं की महंगी टी-शर्ट्स के मुकाबले कहीं ज्यादा आरामदायक, मोटी, हवादार और टिकाऊ थी, जबकि उसकी कीमत महिलाओं के कपड़ों से एक-तिहाई (One-Third) ही थी। इसके बाद केक्सिन ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और आज उनकी अलमारी पुरुषों के कपड़ों से पटी पड़ी है।वजह 1: '996' वर्किंग कल्चर और आर्थिक मंदी (रिवर्स कन्ज़म्प्शन)इस ट्रेंड के पीछे चीन की मौजूदा कमजोर उपभोक्ता अर्थव्यवस्था (Consumer Economy) और कोविड-19 के बाद बदला हुआ माहौल भी एक बड़ी वजह है। चीन के बड़े शहरों में युवा '996' शेड्यूल (हफ्ते में 6 दिन, सुबह 9 बजे से रात 9 बजे तक काम) पर काम करते हैं। इस अत्यधिक थका देने वाले वर्क कल्चर में महिलाएं ऐसे कपड़े चाहती हैं जो आरामदायक हों, न कि शरीर को कसने वाले।आर्थिक सतर्कता के इस दौर में उपभोक्ताओं ने फास्ट फैशन (तेजी से बदलने वाले फैशन) को छोड़कर 'रिवर्स कन्ज़म्प्शन' (Reverse Consumption) ट्रेंड अपनाया है, यानी कम खर्च में ज्यादा टिकाऊ चीजें खरीदना। केक्सिन कहती हैं, अब मुझे महिलाओं के महंगे कपड़ों पर फालतू खर्च करने का कोई तुक नहीं दिखता। पुरुषों के कपड़े सस्ते होते हैं और कई सीजन तक बिना फटे चलते हैं।वजह 2: महिलाओं के कपड़ों में 'चाइल्ड-साइज़' और बॉडी शेमिंग का झोलइस बदलाव की दूसरी सबसे व्यावहारिक और बड़ी वजह है चीन में महिलाओं के कपड़ों की 'साइजिंग' (Sizing System)। चीनी सोशल मीडिया जैसे डूईन (Douyin) पर इन्फ्लुएंसर्स अक्सर दिखाते हैं कि महिलाओं के कपड़ों में 'XL' (एक्स्ट्रा लार्ज) लिखा हुआ टॉप भी इतना छोटा होता है कि वह मुश्किल से किसी पतली लड़की को फिट आता है। एक वायरल वीडियो में तो एक ब्लॉगर ने महिलाओं का 'L' साइज का टॉप अपने पूडल (पालतू कुत्ते) को पहनाया और वह उसे बिल्कुल फिट आ गया।इस भ्रामक साइजिंग सिस्टम की वजह से औसत और चौड़े कंधे वाली महिलाओं को जबरन 'प्लस साइज' की श्रेणी में धकेल दिया जाता है, जो एक तरह की मानसिक बॉडी शेमिंग (शरीर को लेकर शर्मिंदगी) है। शंघाई की एक 170 सेमी लंबी वकील 'ली' बताती हैं कि चीन में महिलाओं के कपड़े उनके जैसे सामान्य और मजबूत शरीर के लिए बने ही नहीं हैं। जब उन्होंने पुरुषों का 'M' (मीडियम) साइज पहनना शुरू किया, तो उन्हें पहली बार कपड़ों में सही फिटिंग और सुकून का अहसास हुआ।वजह 3: 'पुरुषों की पैंट' की वो बड़ी जेबें, जो महिलाओं के पास नहींवकील ली पुरुषों के कपड़ों की व्यावहारिकता (Practicality) की तरफ एक बहुत ही मजेदार और जरूरी इशारा करती हैं। वह कहती हैं, पुरुषों की 'M' साइज की पैंट की जेबें इतनी बड़ी और गहरी होती हैं कि उनमें मैं अपना 11 इंच का टैबलेट और एक पूरी किताब आराम से रख सकती हूं, और इससे पैंट की फिटिंग पर कोई असर नहीं पड़ता। क्या महिलाओं की पैंट या जींस ऐसा कर सकती है? हमारे कपड़ों की जेब में एक लिपस्टिक या स्मार्टफोन रखने से भी वह भारी और अजीब लगने लगता है। यह पॉकेट-इक्वालिटी (जेबों की समानता) भी महिलाओं को मेन्सवियर की तरफ खींच रही है।वजह 4: कपड़ा उद्योग (Textile Industry) पर दबाव और घटती क्वालिटीएक मध्यम आकार के चीनी फैशन ब्रांड की डिजाइनर 'वांग' के अनुसार, महिलाओं के कपड़ों की गिरती क्वालिटी के पीछे कपड़ा उद्योग का आर्थिक संकट है। साल 2023 में चीन के रिटेल क्लॉथिंग सेक्टर की ग्रोथ जहां 15% थी, वहीं साल 2024 में यह गिरकर महज 0.1% रह गई है।लागत बचाने के लिए कई चीनी ब्रांड्स अब खुद रिसर्च करने के बजाय दक्षिण-पूर्व एशिया से सस्ते और रेडीमेड पैटर्न खरीद रहे हैं, जो चीनी महिलाओं के शरीर की बनावट पर फिट नहीं बैठते। इसके अलावा, पतले और छोटे साइज के कपड़े बनाना निर्माताओं के लिए सस्ता पड़ता है, क्योंकि उसमें कपड़ा कम लगता है और सिलाई जटिल नहीं होती। वांग चेतावनी देती हैं कि आने वाले समय में लागत बढ़ने के कारण महिलाओं के कपड़े और भी पतले और असुविधाजनक हो सकते हैं। यही वजह है कि समझदार चीनी युवतियां अब पूरी तरह पुरुषों के मजबूत और आरामदायक वॉर्डरोब की तरफ शिफ्ट हो रही हैं।
बात 1975 की है। राजस्थान के रहने वाले रविंद्र कौशिक को भारत की खुफिया एजेंसी RAW ने अपना अंडर कवर एजेंट बनाने के लिए तैयार कर लिया था। ट्रेनिंग पूरी हो चुकी थी। एक रोज RAW के अधिकारी ने उसे सुबह-सुबह दफ्तर बुलाया। कहा- ‘तुमने कम वक्त में सब सीख लिया, लेकिन एक कमी रह गई है।’ ‘क्या कमी साहब…?’ रविंद्र ने पूछा। RAW अधिकारी- ‘तुम्हारी पहचान…। ये कागज लो और लिखे पते पर चले जाओ।’ अगले दिन रविंद्र उस पते पर पहुंचा। बंद कमरा। हवा में डिटॉल और सर्जिकल स्पिरिट की तीखी गंध। एक स्ट्रेचर और ऊपर तेज सर्जिकल लाइट। पास ही एक ट्रे में सर्जिकल चाकू और कैंची रखी थी। आला लटकाए वहां खड़े डॉक्टर ने कहा- ‘इसपर लेट जाओ।’ रविंद्र समझ गया कि उसका खतना होने वाला है। थोड़ा रुककर उसने कहा- ‘लेट जाऊं पर क्यों?’ डॉक्टर- ‘ये तुम्हारे पुराने वजूद की आखिरी निशानी है। इसे मिटाने का मतलब समझते हो? तुम फिर कभी 'रविंद्र' नहीं बन पाओगे। अब भी वक्त है, पीछे हट सकते हो।’ रविंद्र ने गहरी सांस लेते हुए कहा- ‘आप अपना काम कीजिए डॉक्टर साहब। मैं पीछे नहीं हटूंगा।’ रविंद्र का खतना कर दिया गया। पुराने कागजात जला दिए गए। नया नाम मिला- ‘नबी अहमद शाकिर।’ अगले दिन रविंद्र, पाकिस्तान जाने वाली बस में सवार हो गया। दैनिक भास्कर की नई सीरीज ‘स्पाई फाइल्स’ रविंद्र कौशिक के पार्ट-1 में इतनी कहानी आप पढ़ चुके हैं। अब आगे की कहानी… अमृतसर से लाहौर जाने वाली बस रफ्तार पकड़ रही थी। खिड़की पर सिर रखकर सो रहे रविंद्र को अचानक झटका लगा। बूटों की ठक-ठक सुनाई पड़ी। आंखें खोलीं तो सामने दो पाकिस्तानी रेंजर खड़े थे। एक कड़क आवाज में बोला- ‘सब अपनी जगह पर बैठे रहो। कोई हिलेगा नहीं। अपने-अपने कागजात निकालो।’ रविंद्र ने जेब में हाथ डाला। दस्तावेजों को टटोला। एक पल के लिए सहमा, लेकिन चेहरे पर शिकन नहीं आने दी। आगे वाली सीट पर बैठा एक अधेड़ कांप रहा था। माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं। ‘कागज दिखाओ।’ रेंजर ने उसे घूरते हुए पूछा। उस आदमी ने कांपते हाथों से दस्तावेज निकालकर रेंजर को दे दिया। पाकिस्तानी रेंजर- ‘नाम क्या है तुम्हारा? कहां से आ रहे हो?’ ‘अ... अली... अली मोहम्मद... अमृतसर से…’ ‘@#$% हिंदुस्तानी।’ रेंजर ने उसका कॉलर पकड़कर खींचा और राइफल की बट पूरी ताकत से उसके सिर पर मार दी। उस आदमी के सिर से खून का फव्वारा निकल पड़ा। खून की बूंदें बगल में बैठे रविंद्र के कुर्ते और चेहरे पर गिरीं। बस में सन्नाट छा गया। अब पाकिस्तानी रेंजर घूमा। रविंद्र को ऊपर से नीचे तक देखा। रविंद्र का दिल धक-धक कर रहा था- ‘अगर आज पकड़ा गया, तो कहानी खत्म।’ उसने बहुत ही तसल्ली से अपना दस्तावेज रेंजर की तरफ बढ़ाए। ‘जनाब। ये रहे कागजात।’ रेंजर कुछ देर तक कागजात देखता रहा। ‘नबी शाकिर…लाहौर में कहां रहते हो।’ ‘वो पुराने बस अड्डे के पीछे वाली गली में। एक बड़ी मस्जिद है। उसके बगल में घर है मेरा।’ रविंद्र ने पूरे आत्मविश्वास से जवाब दिया। पाकिस्तानी रेंजर ने उसकी तरफ कागजात उछाले और ‘ठीक है। आगे बढ़ो।’ कहकर चला गया। रविंद्र ने गहरी सांस ली। चेहरे से खून के छींटे साफ किए और चुपचाप बैठ गया। देर शाम बस लाहौर पहुंची। मुसाफिरों की गहमागहमी के बीच रविंद्र चुपचाप नीचे उतरा। सामने तैनात पाकिस्तानी अफसरों की नजरों से नजरें मिलाते हुए उसने अपने दस्तावेज आगे बढ़ाए। अफसर ने सरसरी निगाह डाली, मुहर लगाई और जाने का इशारा कर दिया। रविंद्र ने गहरी सांस ली। फिर सीधे मेन रोड पर जाने के बजाय एक अंधेरी गली की तरफ मुड़ गया। अजनबी शहर, अनजान लोग और हर कदम पर पकड़े जाने का खौफ। उसने राह चलते एक शख्स से पुराने बस अड्डे का रास्ता पूछा। वहां पहुंचने के बाद वो फर्श पर चादर बिछाकर सो गया। अगली सुबह वो इस्लामाबाद के लिए निकला। दुकान- दुकान घूमा, होटलों के चक्कर लगाए, हर उस दरवाजे पर दस्तक दी, जहां काम मिलने की उम्मीद थी, लेकिन हाथ लगी मायूसी। थक-हारकर उसने कराची का रुख किया। कराची की तपती सड़कों पर भी अगले 10-12 दिन भटकते हुए गुजरे। उम्मीद धुंधला रही थी और पैसे खत्म हो चुके थे। तभी, किस्मत ने करवट ली। उसे एक पाकिस्तानी फौजी के घर पर काम मिल गया। फौजी ज्यादातर वक्त घर से बाहर रहता था, तो रविंद्र का भी ज्यादातर वक्त खाली ही गुजरता था। इस खालीपन में रविंद्र सोचने लगा कि वह यहां सिर्फ जिंदा रहने नहीं, बल्कि एक खास मकसद से आया है। उसने खिड़की से बाहर देखते हुए खुद से कहा- ‘अगर इस मुल्क की रगों में उतरना है, तो इसके सिस्टम का हिस्सा बनना होगा।’ एक शाम, रविंद्र झिझकते हुए फौजी के पास गया। नजरें झुकाकर, आवाज में लाचारी घोलते हुए बोला, ‘हुजूर, मैं आगे पढ़ना चाहता हूं।’ फौजी ने अखबार से नजरें उठाईं। सोचा- बेचारे के मां-बाप तो हैं नहीं, पढ़-लिख जाएगा तो जिंदगी संवार लेगा।’ वह मुस्कुराया और रविंद्र के कंधे पर हाथ रखकर बोला, ‘परेशान न हो, मैं जल्द ही कोई इंतजाम करता हूं।’ कुछ ही दिनों बाद फौजी ने एक अफसर से बात करके कराची यूनिवर्सिटी के लॉ डिपार्टमेंट में उसका दाखिला करा दिया। आगे चलकर रविंद्र पढ़ाई के साथ-साथ सिविल सर्विसेज की तैयारी करने लगा। उसमें एक गजब का हुनर था- एक्टिंग का। वह महफिलों में, दोस्तों के बीच ऐसी अदाकारी करता, ऐसी बातें करता कि लोग उसके कायल हो जाते। देखते ही देखते वह कॉलेज का सबसे चहेता बन गया। वक्त का पहिया घूमा और 1979 आ गया। रविंद्र की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी और उसके हाथ में कानून की डिग्री थी। वह वकालत की प्रैक्टिस करने लगा। इसी बहाने पाकिस्तान की जूडिशरी में भी उसका नेटवर्क बनने लगा। एक सुबह जब रविंद्र ने अखबार खोला, तो उसकी नजरें सेना में भर्ती के विज्ञापन पर टिक गईं। उसने सोचा- 'पाकिस्तानी फौज के भीतर पहुंचना यानी सीधे दुश्मन के दिल में खंजर घोंपना।’ उसने कोड वर्ड में RAW को चिट्ठी लिखी- ‘वह इस भर्ती में शामिल होने जा रहा है।’ कुछ दिनों बाद, उसे RAW से जवाब मिल गया। उसे बताया गया कि इस मिशन से तुरंत पीछे हट जाओ। यहां बड़ा खतरा है। RAW को डर था कि दस्तावेजों की जांच हुई तो रविंद्र का भेद खुल सकता है। रविंद्र ने अफसरों की मनाही के बावजूद फॉर्म भर दिया। दिन-रात एक कर दिए। फिजिकल टेस्ट से लेकर रीटेन तक, उसने हर मोर्चे पर खुद को साबित किया। उसका सिलेक्शन भी हो गया। जब दिल्ली में RAW के हेडक्वार्टर तक यह खबर पहुंची, तो अफसरों को खुशी का ठिकाना नहीं रहा। अब भारत के पास पाकिस्तानी फौज के भीतर एक ऐसा मोहरा था, जो उनकी हर हलचल, हर साजिश और हर तैयारी की खबर सीधे दिल्ली पहुंचा सकता था। दिन, हफ्ते और महीने गुजरते गए। रविंद्र धीरे-धीरे फौज के अनुशासन और तौर-तरीकों में ढल रहा था, लेकिन उसका निशाना कहीं और था। पाकिस्तान की आजादी की तारीख नजदीक आ रही थी। परेड की तैयारियां जोरों पर थीं और रविंद्र इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहा था। रावलपिंडी के आर्मी हेडक्वार्टर में टेलर की एक दुकान थी। एक शाम रविंद्र वहां नई वर्दी सिलाने पहुंचा। नाप देने के दौरान उसकी नजर 20-22 साल की एक लड़की पर पड़ी। वह बड़े सलीके से सिले हुए कपड़ों की तह बनाकर एक तरफ रख रही थी। रविंद्र उसे देखता ही रह गया। ‘साहब, वर्दी एक हफ्ते बाद ही मिल पाएगी। फौज के कई बड़े अफसरों के ऑर्डर पहले से आए हुए हैं’, टेलर की आवाज सुनकर रविंद्र का ध्यान हटा। उसने खुद को संभाला और बनावटी मुस्कान के साथ बोला- ‘ठीक है…’ और वह दुकान से बाहर निकल आया। रात में रविंद्र जब सोने के लिए बिस्तर पर लेटा, तो उसे बार-बार उस लड़की का चेहरा नजर आ रहा था। अगले दिन दफ्तर की जिम्मेदारियों से फारिग होते ही रविंद्र के कदम टेलर की दुकान की तरफ बढ़ गए। वहां पहुंचा, तो देखा कि लड़की कुछ ग्राहकों को सिले हुए कपड़े सौंप रही थी। रविंद्र दुकान के बाहर ही रुक गया और उसके खाली होने का इंतजार करने लगा। जैसे ही आखिरी ग्राहक वहां से गया, वह दुकान के अंदर दाखिल हुआ। ‘सुनिए…कल मैंने वर्दी सिलने के लिए दी थी। क्या वह मुझे जुमे (शुक्रवार) से पहले मिल सकती है?’ लड़की ने बिना नजरें उठाए काउंटर पर रखी मोटी डायरी के पन्ने पलटते हुए पूछा, ‘नाम क्या है आपका?’ ‘नबी अहमद शाकिर। इसी साल फौज में अफसर बना हूं,’ रविंद्र ने मुस्कुराते हुए बताया। लड़की बोली, ‘अभी तो बहुत से कपड़े सिलने बाकी हैं शाकिर साहब। जुमे से पहले मिलना मुश्किल है। अब्बू अभी बाहर गए हैं, उनके आने पर पूछती हूं कि क्या हो सकता है।’ ‘जी शुक्रिया…’ कहकर रविंद्र मुड़ने ही वाला था कि उसके कदम ठिठक गए। उसने हिम्मत जुटाकर पूछ ही लिया, ‘आपका नाम?’ लड़की ने नजरें झुकाकर जवाब दिया, ‘अमानत।’ नाम सुनते ही रविंद्र के दिल में जैसे कोई सितार बज उठा। आखिरकार 12 अगस्त की शाम रविंद्र को उसकी नई वर्दी मिल गई। दो दिन बाद, यानी 14 अगस्त को पाकिस्तान का 'यौम-ए-आजादी' था। रावलपिंडी के परेड ग्राउंड पर जब रविंद्र फौज की वर्दी में कदमताल करते हुए गुजरा, तो मंच पर बैठे आला अफसरों की निगाहें उस पर टिक गईं। उसने खूब वाहवाही बटोरी। परेड खत्म होने के बाद, रविंद्र फौजी लिबास में सीधे टेलर की दुकान पर जा पहुंचा। काउंटर पर अमानत बैठी थी। रविंद्र ने उसके अब्बू से मुखातिब होकर बोला, ‘मास्टर जी, शानदार सिली है वर्दी। परेड में सब इस वर्दी की तारीफ कर रहे थे।’ टेलर ने हाथ जोड़कर कहा, ‘यह तो आपकी मेहरबानी है साहब, जो आपको हमारा काम पसंद आया।’ रविंद्र बात करते हुए अमानत की तरफ देख रहा था। वह चाह रहा था कि अमानत भी इस वर्दी में उसे देखकर तारीफ के दो लफ्ज कहे, लेकिन अमानत ने कुछ नहीं कहा। बस एक मुस्कान के साथ वो दूसरी तरफ मुड़ गई। उस दिन के बाद रविंद्र कभी दुआ-सलाम के लिए तो कभी किसी छोटे-मोटे काम से टेलर की दुकान के चक्कर काटने लगा। वक्त गुजरता गया। धीरे-धीरे अमानत भी उसे पसंद करने लगी। अब रविंद्र सोच में पड़ गया। ये प्यार कहीं उसके मिशन में रोड़ा तो नहीं बनेगा। इसी कश्मकश में उसने RAW को चिट्ठी भेजी- ‘मुझे एक लड़की से प्यार हो गया है। मैं उससे शादी करना चाहता हूं।’ RAW की तरफ से मैसेज मिला- 'ये तो बहुत अच्छी बात है। शादी होने से किसी को शक भी नहीं होगा।’ एक रोज रविंद्र ने अमानत को मिलने के लिए पार्क बुलाया। उसने सीधे कह दिया- ‘देखो अमानत… मुझे तुमसे प्यार हो गया है। मैं जानता हूं कि तुम भी मुझे पसंद करती हो। मैं पहले तू, पहले मैं के चक्कर में नहीं पड़ना चाहता। क्या तुम मुझसे निकाह करोगी? अमानत की नजरें झुक गईं। दिल में जो बात महीनों से दबी थी, आज जैसे खुद-ब-खुद होंठों तक आ गई। 'मैं भी तुम्हें चाहती हूं…’ फिर एक पल रुककर, ‘लेकिन निकाह के लिए अब्बू से बात करनी होगी।’ अगले दिन रविंद्र, अमानत के अब्बू से मिला और बता दिया कि वो उनकी बेटी से निकाह करना चाहता है। ‘फौजी अफसर, हीरो जैसी कद-काठी… ‘ अमानत के अब्बू के लिए ये रिश्ता किसी तोहफे से कम नहीं था। उन्होंने फौरन हामी भर दी। जल्द ही दोनों का निकाह हो गया। वक्त गुजरता गया और अब साल आया 1981, रविंद्र को पता चला कि उसके छोटे भाई राजेश्वर की शादी तय हो गई है। उसने, RAW को चिट्ठी भेजी कि उसे भाई की शादी में शामिल होना है, लेकिन उसे परमिशन नहीं मिली। रविंद्र ने RAW को दोबारा चिट्ठी भेजी। इसके बाद रविंद्र को भारत लाने का इंतजाम किया गया। वह आर्मी को निजी काम का हवाला देकर पहले सउदी अरब पहुंचा और वहां से दुबई के रास्ते दिल्ली और फिर श्रीगंगानगर आ गया। भाई की शादी में उसने खूब मस्ती की। फेवरेट पंजाबी गानों पर डांस किया। इसी दौरान रविंद्र से उसके पिता ने कहा- ‘छोटे भाई की शादी हो गई, तुमने देर की तो फिर शादी भी नहीं होगी।’ रविंद्र इमोशनल हो गया और पिता को पूरी बात बता दी- ‘मैं रॉ के लिए पाकिस्तान में काम करता हूं। वहां फौज में अफसर बन गया हूं। शादी भी कर ली है। जल्द पिता बनने वाला हूं।’ बिना बताए शादी और वो भी पाकिस्तानी लड़की से… रविंद्र के पिता को सदमा सा लगा। रविंद्र के बचपन के दोस्त और पूर्व कांग्रेस विधायक राजकुमार गौड़ बताते हैं- ‘वो भाई की शादी में बहुत खुश था। चार-पांच दिन यहां रहा। हर दिन हम घंटों साथ रहे। एक रोज उसने मुझसे बताया कि वो RAW के लिए पाकिस्तान में काम करता है। उसने पत्नी की फोटो भी दिखाई। उसने कहा था- ‘जल्द मेरी पोस्टिंग दूसरे देश में होगी, फिर आराम से भारत आ सकूंगा। उसकी बहादुरी से मेरा सीना चौड़ा हो गया, लेकिन मैं अपनी खुशी जाहिर नहीं कर पाया। मैंने वो राज अपने तक ही रहने दिया।’ इसके बाद रविंद्र फिर से पाकिस्तान पहुंचा और अपने मिशन में जुट गया। जल्द ही प्रमोट होकर वह मेजर बन गया। इसी दौरान उसे बेटा हुआ। नाम रखा- अरीब। अरीब यानी फतह पाने वाला। यह खुशी उसने चिट्ठी भेजकर पिता से भी शेयर की। ये वो दौर था, जब एक तरफ पाकिस्तान परमाणु बम बनाने की तैयारी कर रहा था और दूसरी तरफ पंजाब में खालिस्तानी उग्रवाद को बढ़ावा दे रहा था। सेना में होने की वजह से रविंद्र को फौज की तैयारियां, मूवमेंट और पोजिशनिंग के बारे में पता लग जाता था। वो ये सारी सूचनाएं भारत भेज देता। उन सूचनाओं की वजह से भारत ने राजस्थान और पंजाब बॉर्डर पर पाकिस्तान की साजिश कामयाब नहीं होने दी। अंग्रेजी अखबार टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक रविंद्र की खुफिया सूचनाओं की वजह से 20 हजार से ज्यादा भारतीय जवानों की जान बची थी। लेकिन 1983 आते-आते अपने ओहदे की वजह से रविंद्र को खुफिया जानकारियां भेजने में दिक्कतें आने लगीं। वह हमेशा सिक्योरिटी के बीच रहता। घर पर भी सुरक्षा गार्ड रहते। उसे अमानत से भी अपना राज छुपाना था। ऐसे में उसकी मदद के लिए RAW ने इनायत मसीह नाम के एजेंट को पाकिस्तान भेजा, लेकिन वह ISI के हत्थे चढ़ गया। ISI ने उसे बुरी तरह टॉर्चर किया। इनायत टूट गया और राज उगल दिया। उसने बताया- ‘पाकिस्तान आर्मी में नबी अहमद नाम का मेजर है, वह भारत का जासूस है। उसी से मिलने के लिए मैं यहां आया हूं।’ ISI ने इनायत से कहा कि वो नबी को मिलने के लिए बुलाए। इनायत ने वैसा ही किया। कराची के जिन्ना गार्डन में दोनों का मिलना तय हुआ। शाम 7.30 बजे रविंद्र गार्डन में पहुंचा। वहां पहले से इनायत उसका इंतजार कर रहा था। इधर, पाकिस्तान आर्मी के जवान और ISI के अधिकारी गार्डन के बाहर छुपे थे। इनायत और रविंद्र दोनों मिले, बातें कीं। फिर इनायत ने रविंद्र को एक डॉक्यूमेंट दिया। तभी पीछे से आकर फौज ने रविंद्र को दबोच लिया। रविंद्र का भेद खुल गया। उसे पाकिस्तान के अलग-अलग जेलों में रखा गया। उस पर कई तरह के जुल्म किए गए। रात-रात भर सोने नहीं दिया जाता। बर्फ की सिल्लियों पर लिटाया जाता। शरीर के हर हिस्से पर जख्म। उस पर नमक लगाकर छोड़ दिया जाता। रविंद्र को डबल एजेंट बनने यानी पाकिस्तान के लिए काम करने का भी ऑफर मिला, लेकिन वो तैयार नहीं हुआ। कुछ दिनों बाद… अमानत सियालकोट जेल में रविंद्र यानी नबी से मिलने पहुंची। साथ में बेटा अरीब भी था। अमानत को देखते ही रविंद्र फफककर रोने लगा। कहने लगा- ‘मुझे माफ कर दो अमानत। मेरी वजह से तुम्हारी जिंदगी बर्बाद हो गई।’ अमानत एकटक नबी को देखती रही। कुछ कह नहीं पाई। काफी देर तक सलाखों के बाहर खड़ी वह सिसकती रही, फिर लौट गई। इसके बाद वो दोबारा रविंद्र से नहीं मिली। सीनियर जर्नलिस्ट हर्षा शर्मा अपनी किताब ‘रॉ सीक्रेट एजेंट्स’ में लिखती हैं- 'जासूसी करना जान हथेली पर लेकर फिरने जैसा है। पकड़े जाने पर यहां चमत्कार की उम्मीद नहीं होती। जिसके लिए आप काम करते हैं, वो भी हाथ खींच लेते हैं। यही इस खेल का अलिखित, लेकिन सीधा नियम है।' रविंद्र के साथ ऐसा ही हुआ। जेल में रहते हुए उन्होंने RAW को कई खत भेजे, पर कोई जवाब नहीं मिला। रविंद्र ने जेल से परिवार को कई खत लिखे। उनके खत उर्दू में लिखे होते थे। पहला खत पिता को मिला। पता चला कि रविंद्र पाकिस्तान की जेल में बंद है… उन्हें गहरा सदमा लगा। उन्होंने परिवार में किसी से इसका जिक्र नहीं किया। कुछ दिनों बाद उनकी मौत हो गई। कई दिनों तक रविंद्र का वो खत पुरानी फाइलों के बीच पड़ा रहा। एक दिन छोटे भाई की नजर उस खत पर पड़ी। पड़ोस से उर्दू जानने वाले को बुलाया गया। तब परिवार को पता चला कि रविंद्र जासूसी के आरोप में पाकिस्तान की जेल में बंद है। परिवार ने रविंद्र की रिहाई के लिए RAW और भारत सरकार से गुहार लगाई। कई खत लिखे, लेकिन कुछ फायदा नहीं हुआ। 1985 में रविंद्र को फांसी की सजा सुनाई गई। 5 साल बाद यानी 1990 में पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा को 25 साल के आजीवन करावास में बदल दिया। 90 के दशक में रविंद्र ने खत लिखकर परिवार को बताया कि उसे टीबी हो गई है। पाकिस्तान में उसकी दवाई नहीं मिल रही। परिवार की तरफ से टीबी की दवाइयां पाकिस्तान भेजी गईं, लेकिन रविंद्र तक पहुंच नहीं पाईं। नाराज और भारी मन से रविंद्र ने 18 नवंबर 2001 को एक खत लिखा- ‘क्या भारत जैसे बड़े देश के लिए कुर्बानी देने वालों को यही सजा मिलती है। अगर मैं अमेरिकी एजेंट होता, तो तीन दिन के भीतर मुझे छुड़ा लिया जाता।’ 3 दिन बाद यानी 21 नवंबर 2001 को रविंद्र जिंदगी की जंग हार गया। उसे मुल्तान जेल में दफना दिया गया। पूर्व विधायक राजकुमार गौड़ कहते हैं- ‘उसके जाने के बाद सबकुछ वीरान हो गया। परिवार ने घर बेच दिया। कुछ लोग जयपुर चले गए तो कुछ दूसरे शहरों में जाकर बस गए। अब तो उसका घर भी तोड़ दिया जाएगा। आखिरी निशानी भी मिट जाएगी।’ 18 साल पाकिस्तानी जेल में कैद रहे रविंद्र की मौत के बाद उनके परिवार को सरकार की तरफ हर महीने 500 रुपए बतौर पेंशन दी जाने लगी। बाद में यह रकम बढ़ाकर 2000 रुपए महीना कर दी गई, लेकिन 2006 में रविंद्र की मां की मौत के बाद पेंशन बंद हो गई। रविंद्र के माता-पिता और छोटे भाई का निधन हो चुका है। 2012 में बेटे अरीब की भी मौत हो गई। पत्नी अमानत कहां हैं, ये किसी को नहीं पता। जासूस रविंद्र कौशिक पार्ट-1 भी पढ़िए… खतना करवाकर पाकिस्तान पहुंचा, लव मैरिज की:आर्मी की खुफिया रिपोर्ट भेजकर 20 हजार जवानों की जान बचाई; जासूस रविंद्र कौशिक, पार्ट-1 21 साल का एक लड़का फौज की वर्दी में स्टेज पर गिरा हुआ था। एकदम लहूलुहान। 4-5 चीनी सैनिकों ने उसे घेर रखा था। ‘उगल दे! तेरी फौज की अगली हरकत क्या है? बता, वर्ना तेरी खाल उतारकर हम अपनी वर्दी सिलवा लेंगे!’ लड़का दर्द से कराहता है, लेकिन फिर ठहाका मारकर हंसता है। उसकी आंखों में जरा भी खौफ नहीं है। वह पूरा जोर लगाकर कहता है- ‘हिंदुस्तानी सिपाही की जुबान सिर्फ तिरंगे के सामने खुलती है, तुम जैसे भेड़ियों के सामने नहीं! मारो! जितना दम है, मार लो!’ तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा हॉल गूंज उठा। पूरी कहानी पढ़िए…
बांग्लादेश में खसरे का कहर जारी, सात और बच्चों की मौत
बांग्लादेश में खसरे (मीजल्स) का प्रकोप लगातार गंभीर होता जा रहा है। शनिवार को सात और बच्चों की मौत के बाद इस साल 15 मार्च से अब तक खसरे से हुई पुष्ट और संदिग्ध मौतों की कुल संख्या बढ़कर 677 हो गई है
ईरान ने फिर बंद किया होर्मुज स्ट्रेट, अमेरिका और इजरायल पर एमओयू का उल्लंघन का आरोप
ईरान ने शनिवार को एक बार फिर होर्मुज स्ट्रेट को जहाजों की आवाजाही के लिए बंद करने की घोषणा की
पाकिस्तानी नौसेना में एक नाम लौट आया है ‘PNS हैंगोर’। ये है चीन में बनी नई पाकिस्तानी पनडुब्बी। ये 11 जून को कराची पहुंची। पाकिस्तान इसे बंगाल की खाड़ी में तैनात करेगा। इसी हैंगोर नाम की पनडुब्बी ने 1971 की जंग में भारतीय युद्धपोत ‘INS खुखरी’ को डुबो दिया था। जंग के दौरान किसी भारतीय पोत के डूबने की यह इकलौती घटना है। आखिर क्या है 1971 का वो पूरा किस्सा, नई हैंगोर पनडुब्बी कितनी ताकतवर है और भारत इससे कैसे निपटेगा; समझेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: हैंगोर पनडुब्बी ने 55 साल पहले भारतीय युद्धपोत को कैसे डुबोया था? जवाब: 1971 की जंग के दौरान 6 दिसंबर को भारतीय नौसेना का पता चला कि एक पाकिस्तानी पनडुब्बी PNS (Pakistan Naval Ship) हैंगोर दीव के पास मौजूद है। जवाब में भारत ने एंटी सबमरीन युद्धपोत 'INS (Indian Naval Ship) खुखरी' और INS कृपाण' को उस इलाके में भेज दिया। PNS का मतलब पाकिस्तान नेवल शिप और INS का मतलब इंडियन नेवल शिप होता है। 'PNS हैंगोर' में 25 किमी दूर तक के युद्धपोत की टोह लेने की क्षमता थी। जबकि खुखरी सिर्फ 2.5 किमी दूर तक ही दुश्मन के पोत या पनडुब्बी को डिटेक्ट कर सकता था। हैंगोर को खुखरी और कृपाण का पहले से पता चल गया। उसने दोनों के नजदीक आने का इंतजार किया। हैंगोर के कैप्टन लेफ्टिनेंट कमांडर तसनीम अहमद ने बाद में एक इंटरव्यू में बताया, 'हमने कृपाण पर जो टॉरपीडो दागा, वो बिना फटे उसके नीचे से गुजर गया। भारतीय युद्धपोतों को हमारी पोजीशन का पता चल चुका था। इसलिए मैंने तेजी से INS खुखरी पर पीछे से दो फायर और किए।’ टॉरपीडो खुखरी के नीचे फटा था। जिससे 3 मिनट के अंदर जहाज डूबने लगा था। इस हमले में खुखरी के कैप्टन महेंद्रनाथ मुल्ला सहित कुल 18 नेवी ऑफिसर्स, 176 क्रू और बाकी स्टाफ सहित कुल 194 लोग शहीद हुए। 'द सिंकिंग ऑफ INS खुखरी: सर्वाइवर्स स्टोरीज' किताब लिखने वाले मेजर जनरल इयान कारडोजो के मुताबिक, 'अगर किसी इलाके में पनडुब्बी का खतरा हो, तो युद्धपोत टेढ़े-मेढ़े तरीके से चलते हैं। खुखरी भी यही कर रहा था, इसलिए उसकी स्पीड कम थी। उसी समय खुखरी पर एक नए किस्म के सोनार का भी परीक्षण चल रहा था, इससे रफ्तार और धीमी हो गई थी। यही वजह थी कि हैंगोर ने उसे आसानी से निशाना बना लिया।' हालांकि इस हमले से 1971 की जंग का नतीजा नहीं बदला। बंगाल की खाड़ी से पाकिस्तानी नेवी को भी वापस लौटना पड़ा था। अब 55 साल बाद अब हैंगोर के नाम पर एक नई पनडुब्बी फिर सुर्खियों में है। सवाल-2: पाकिस्तान की नई हैंगोर पनडुब्बी कितनी घातक है? जवाबः पाकिस्तान की नई हैंगोर क्लास सबमरीन को चीन की सरकारी कंपनी 'चाइना शिपबिल्डिंग एंड ऑफशोर इंटरनेशनल कॉर्पोरेशन लिमिटेड', यानी CSOC ने बनाया है। ये डीजल और इलेक्ट्रिक बैटरी से चलने वाली अटैक सबमरीन है। 2015 में पाकिस्तान ने चीन से करीब 5 अरब डॉलर में 8 हैंगोर पनडुब्बियों का सौदा किया था। अभी पाकिस्तानी नेवी को पहली हैंगोर पनडुब्बी मिली है। तीन और पनडुब्बियों का समुद्र में ट्रायल चल रहा है। बाकी 4 पनडुब्बियां पाकिस्तान में ही बनाई जाएंगी। सवाल-3: हैंगोर पनडुब्बी बंगाल की खाड़ी में क्यों भेजना चाहता है पाकिस्तान? जवाब: इसकी 2 मुख्य वजहें हैं... 1. बंगाल की खाड़ी में पाकिस्तान की मौजूदगी दोबारा बढ़ाना 1971 की जंग हारने के बाद पाकिस्तानी नेवी बंगाल की खाड़ी से गायब हो गई। इस इलाके में भारतीय नौसेना का वर्चस्व है… हैंगोर को चीन से कराची लाने वाली नेवी फ्लीट के कमांडर उमर फारूक ने कहा, 'ये पनडुब्बी गेमचेंजर है। इसके जरिए पाकिस्तान को बंगाल की खाड़ी में अपनी मौजूदगी बनाए रखने में मदद मिलेगी।' बंगाल की खाड़ी से भारत के अलावा बांग्लादेश, म्यांमार, थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया और श्रीलंका जुड़े हैं। खाड़ी में अपने तट से 22 किमी तक के समुद्र को उस देश का 'टेरिटोरियल सी' कहा जाता है। फिर 200 किमी का 'विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र' यानी EEZ होता है। बाकी समुद्र को 'इंटरनेशनल वाटर जोन' कहते हैं, जहां किसी भी देश के सैन्य जहाज या पनडुब्बी आ सकती हैं। इस मैप में देखिए… 2. बांग्लादेश से शुरू हुए रिश्ते मजबूत करना 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना के तख्तापलट के बाद बांग्लादेश के अंतरिम राष्ट्रपति बने मोहम्मद यूनुस का पाकिस्तान की ओर था। उन्होंने 2 बार पाकिस्तानी पीएम शाहबाज शरीफ से मुलाकात की थी। पाक विदेश मंत्री इशाक डार भी ढाका दौरे पर गए। इसके बाद दोनों देशों में 1971 से बंद समुद्री व्यापार दोबारा खुला। 12 साल बाद जनवरी 2026 में इस्लामाबाद-ढाका के बीच सीधी फ्लाइट शुरू हुई। वीजा रूल्स में भी ढील दी गई। दिसंबर 2025 में पाकिस्तान-बांग्लादेश के बीच कारोबार पिछले साल के मुकाबले 20% बढ़ा। दोनों देशों के बीच 100 करोड़ डॉलर के आर्थिक समझौते हुए। इसलिए इस इलाके में पाकिस्तान अपनी नौसैनिक ताकत बढ़ाना चाहता है। सवाल-4: पाकिस्तानी नेवी को कैसे तेजी से मजबूत बना रहा है चीन? जवाब: पाकिस्तान 80% हथियार चीन से खरीदता है। पाकिस्तानी नौसेना को एडवांस बनाने में भी चीन 3 तरह से मदद कर रहा है… सवाल-5: ये भारत के लिए कितनी चिंता की बात है, कैसे जवाब देगा? जवाब: बंगाल की खाड़ी में पाकिस्तान की नौसैनिक गतिविधियां बढ़ती हैं, तो भारत के लिए 3 बड़े खतरे हैं… 1. निशाने पर भारत के अहम ठिकानेः PNS हैंगोर के 6 हैवीवेट टॉरपीडो ट्यूब में पाकिस्तान की 450 किमी रेंज वाली 'बाबर-3' क्रूज मिसाइल लग सकती है। अगर बाबर-3 के साथ पनडुब्बी बंगाल की खाड़ी में उतरी, तो भारत के अहम ठिकाने जैसे- नेवी की ईस्टर्न कमांड, अंडमान निकोबार कमांड और आंध्र प्रदेश में पनडुब्बी अड्डा ‘INS वर्षा’ और ISRO का सतीश धवन स्पेस सेंटर, वगैरह इसकी जद में आ सकते हैं। 2. खुफिया जानकारी चुराने का खतराः पाकिस्तान समुद्री गश्त बढ़ाकर भारतीय जहाजों, बंदरगाहों और नौसैनिक अड्डों की खुफिया जानकारी जुटा सकता है। इसका जंग की स्थिति में इस्तेमाल करेगा। मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस में रिसर्च एनालिस्ट नमिता बर्थवाल के मुताबिक, चिंता की बात ये है कि पर्दे के पीछे चीन है, जिसे ये खुफिया इन्फॉर्मेशन मिलती रहेंगी। 3. महीनों तक एक्टिव सकती है पनडुब्बी: नवंबर 2025 में पाक युद्धपोत 'PNS सैफ' ने 1971 के बाद पहली बार बांग्लादेश के चटगांव पोर्ट का दौरा किया। अगर हैंगोर को बांग्लादेश के पोर्ट्स पर 'लॉजिस्टिक्स सपोर्ट' जैसे- ईंधन, राशन वगैरह मिलने लगा, तो वह इस इलाके में और देर तक रह सकेगी। हालांकि ऐसी चुनौतियों के लिए भारतीय नौसेना पूरी तरह तैयार है… -------------------- ये खबर भी पढ़िए… भारत ने अचानक 12 परमाणु बम क्यों तैनात किए; 3 साल से जखीरा बढ़ा रहा, चीन-पाक से एकसाथ निपटने को तैयार भारत ने पिछले 3 साल में 26 परमाणु हथियार बढ़ाए। अब परमाणु जखीरा 190 तक पहुंच गया है। भारत ने पहली बार 12 न्यूक्लियर बम मिसाइल्स पर लोड करके तैनात कर दिए हैं। ये खुलासा स्वीडिश थिंकटैंक SIPRI की लेटेस्ट रिपोर्ट में हुआ है। पूरी खबर पढ़िए…
ब्रिटेन की राजधानी लंदन के उत्तरी इलाके में स्थित बेडफोर्ड के पास शुक्रवार की शाम दो तेज रफ्तार यात्री ट्रेनों के बीच हुई आमने-सामने की भीषण टक्कर से चारों तरफ कोहराम मच गया। इस दर्दनाक रेल हादसे में एक ट्रेन ड्राइवर की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि 89 यात्री गंभीर रूप से घायल हो गए हैं। अधिकारियों के मुताबिक, घायलों में से 11 की हालत बेहद नाजुक बनी हुई है। टक्कर इतनी जोरदार थी कि दोनों ट्रेनों के कई डिब्बे पटरी से उतर गए और मलबे में तब्दील हो गए। घटना की सूचना मिलते ही एयर एम्बुलेंस और ब्रिटिश विशेषज्ञ बचाव दल (Emergency Rescure Team) तुरंत मौके पर पहुंचे और युद्धस्तर पर राहत कार्य शुरू किया।लंदन सेंट पैनक्रास जा रही थीं दोनों ट्रेनें, पटरी से उतरे कई डिब्बेयह खौफनाक रेल हादसा ब्रिटिश समयानुसार शाम करीब 5:15 बजे बेडफोर्ड और ल्यूटन के बीच हुआ। हादसे का शिकार हुई दोनों ट्रेनें दक्षिण की ओर लंदन के मशहूर सेंट पैनक्रास स्टेशन की तरफ जा रही थीं। आपातकालीन स्वास्थ्य अधिकारियों के अनुसार, इस दुर्घटना में कुल 89 लोग हताहत हुए हैं, जिनमें से 11 लोग आईसीयू में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे हैं। इसके अलावा 22 यात्रियों को गंभीर चोटें आई हैं और 56 अन्य लोगों का प्राथमिक उपचार कर छुट्टी दे दी गई है।चश्मदीदों की जुबानी तबाही का मंजर: कुर्सियां बिखरीं, चेहरे खून से सने और पैर टूटेहादसे के बाद के रोंगटे खड़े कर देने वाले पलों को याद करते हुए ट्रेन में सवार यात्री डॉ. पीट नैप ने बताया कि बिना किसी चेतावनी के अचानक एक जोरदार झटका लगा और हम सब सामने वाली सीट पर जा गिरे। देखते ही देखते चारों तरफ धुआं फैल गया, लोग रो रहे थे और मदद के लिए चिल्ला रहे थे। डॉ. नैप ने इस खौफनाक दृश्य की तुलना किसी बड़े बम धमाके से करते हुए कहा— जब मैं होश में आया, तो कुर्सियां हर तरफ बिखरी पड़ी थीं। मुझे लगा जैसे मैं किसी आतंकी बम धमाके का शिकार हो गया हूं। लोगों के चेहरे खून से सने थे और कई यात्रियों के पैर टूट चुके थे। मैं दुबला होने के कारण दरवाजों के बीच के गैप से किसी तरह बाहर निकलने में सफल रहा।एक अन्य महिला यात्री शोला मेने ने रोते हुए बीबीसी को बताया कि जोरदार धमाके के साथ लोग अपनी सीटों से हवा में उछलकर दूर जा गिरे। एक सह-यात्री हवा में उड़ता हुआ आया और सीधे मेरे पति के चेहरे से टकरा गया, जिससे वह लहूलुहान हो गए। ट्रेन के अंदर हर तरफ केवल खून और चीख-पुकार मची थी।पीएम कीर स्टार्मर ने जताया दुख, आरएमटी यूनियन ने दी मृत ड्राइवर को श्रद्धांजलिइस भीषण दुर्घटना पर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि मेरी पूरी संवेदनाएं उस मृत व्यक्ति के परिवार के साथ हैं जिसने इस दुखद हादसे में अपनी जान गंवाई है, और सरकार गंभीर रूप से घायल सभी लोगों के बेहतर इलाज के लिए प्रतिबद्ध है।नेशनल यूनियन ऑफ रेल, मैरीटाइम एंड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स (RMT) के महासचिव एड्डी डेम्पसी ने पुष्टि की कि हादसे में अपनी जान गंवाने वाला व्यक्ति एक सीनियर ट्रेन ड्राइवर था और आरएमटी का पूर्व प्रतिनिधि भी रह चुका था। ट्रेन ड्राइवर्स यूनियन 'Aslef' के प्रमुख डेव काल्फ ने भी मृत ड्राइवर को अपनी भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की।ईस्ट मिडलैंड्स रेलवे की सभी सेवाएं निलंबित, जांच के आदेशरेल ऑपरेटर ईस्ट मिडलैंड्स रेलवे ने आधिकारिक जानकारी साझा करते हुए बताया कि इस भीषण टक्कर में उसकी शाम 4:40 बजे कॉरबी से लंदन सेंट पैनक्रास जाने वाली ट्रेन और शाम 3:50 बजे नॉटिंघम से उसी गंतव्य को जाने वाली एक्सप्रेस ट्रेन शामिल थी।हादसे के बाद रेलवे प्रशासन ने कड़ा कदम उठाते हुए लंदन सेंट पैनक्रास से आने-जाने वाली सभी मुख्य ट्रेन सेवाओं को अगले आदेश तक के लिए पूरी तरह निलंबित कर दिया है। रेलवे ट्रैक को साफ करने और मरम्मत का काम तेजी से चल रहा है, वहीं ब्रिटिश रेलवे दुर्घटना जांच शाखा (RAIB) ने तकनीकी विफलता या मानवीय चूक के एंगल से दुर्घटना के वास्तविक कारणों की उच्च स्तरीय जांच शुरू कर दी है।
अपनों ने ही खोला मोर्चा, भड़के वेंस ने इजरायल को दी सख्त चेतावनी
ईरान के साथ हुए नए प्रारंभिक शांति समझौते को लेकर अमेरिका में एक बहुत बड़ा राजनीतिक तूफान खड़ा हो गया है। इस समझौते को विपक्ष और नीति आलोचकों द्वारा बेहद कमजोर और तेहरान के सामने 'आत्मसमर्पण' करार दिए जाने के बाद चारों तरफ से घिरे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को खुलकर मोर्चा संभाला। ट्रंप ने इन सभी दावों को सिरे से खारिज करते हुए इस बात से साफ इनकार किया है कि अमेरिका ईरान के सामने झुक गया है या उसे किसी भी तरह की भारी वित्तीय राहत सौंपने जा रहा है।व्हाइट हाउस से बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा— हम किसी बेबसी या लाचारी में ईरान से नहीं मिले थे, बल्कि सच यह है कि ईरान खुद हताश और पूरी तरह खत्म हो चुका था। हम इस 60 दिनों की समीक्षा अवधि को बेहद गंभीरता से देखेंगे। इस समझौते के तहत ईरान को कोई पैसा नहीं मिल रहा है, एक सिंगल सेंट भी नहीं!जी-7 शिखर सम्मेलन (G-7 Summit) में भाग लेने के बाद वर्साय में राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा दूरस्थ रूप से हस्ताक्षरित इस प्रारंभिक समझौते का मुख्य उद्देश्य एक व्यापक और स्थायी शांति स्थापित करने की दिशा में अगले 60 दिनों के भीतर तेज गति से काम शुरू करना था। लेकिन शांति की इस कोशिश ने अमेरिका के भीतर ही एक अभूतपूर्व आंतरिक राजनीतिक युद्ध छेड़ दिया है।रिपब्लिकन खेमे और कैपिटल हिल में खुली बगावत, अपनों ने बताया 'सदी की सबसे बड़ी भूल'इस समझौते ने रिपब्लिकन पार्टी को वैचारिक रूप से दो फाड़ कर दिया है। ट्रंप के सबसे वफादार माने जाने वाले कई रिपब्लिकन सीनेटर अब अपनी ही सरकार के इस कदम के खिलाफ खुलकर खड़े हो गए हैं। रिपब्लिकन सीनेटर बिल कैसिडी उन प्रमुख नेताओं में शामिल हैं जिन्होंने अपनी पार्टी के आधिकारिक रुख से पूरी तरह अलग हटकर इस डील की तीखी आलोचना की है। कैसिडी ने इसे पिछले कई दशकों की सबसे खराब अमेरिकी विदेश नीति की भूल करार दिया है।दूसरी तरफ, यह समझौता लेट-नाइट कॉमेडियन्स और सोशल मीडिया ट्रोल्स के लिए भी एक बड़ा मुद्दा बन गया है। सोशल मीडिया पर लोग इस समझौते का उपहास उड़ाते हुए इसकी तुलना 'एक ऐसा युद्ध जीतने से कर रहे हैं जिसकी जीत की रसीद ही कहीं खो गई हो।' व्हाइट हाउस के लिए सबसे गंभीर और चिंताजनक बात यह है कि इस बार आलोचना की यह धार सिर्फ विरोधी डेमोक्रेट्स तक सीमित नहीं है, बल्कि कैपिटल हिल के वे रिपब्लिकन सांसद भी बगावत पर उतर आए हैं जो आमतौर पर ट्रंप के हर फैसले को पत्थर की लकीर मानते थे।इजरायल-समर्थक गुट हैरान: यूरेनियम संवर्धन पर ट्रंप के बदले सुरराष्ट्रपति ट्रंप ने खुद भी कुछ ऐसे चौंकाने वाले बयान दिए हैं जिससे अमेरिका के भीतर सक्रिय इजरायल-समर्थक (Pro-Israel) लॉबी और गुट पूरी तरह हैरान हैं। ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से ईरान के कुछ बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता रखने के अधिकार का समर्थन कर दिया और तेहरान के संवर्धित यूरेनियम (Enriched Uranium) के भंडार के खतरे को काफी कम करके आंका।अमेरिकी राष्ट्रपति अब अप्रत्यक्ष रूप से ईरान के नागरिक परमाणु कार्यक्रम के अधिकार को भी स्वीकार करते दिख रहे हैं, जो उनके उस पुराने चुनावी वादे से बिल्कुल उलट है जिसमें उन्होंने कसम खाई थी कि अमेरिका, ईरान को यूरेनियम के किसी भी स्तर के संवर्धन की अनुमति कभी नहीं देगा। हालांकि, ट्रंप अब भी इस बात पर मजबूती से अड़े हैं कि ईरान को कभी भी अंतिम रूप से परमाणु हथियार (Nuclear Weapon) बनाने की इजाजत नहीं दी जाएगी।ओबामा की जेसीपीओए बनाम ट्रंप की डील: नीति विशेषज्ञों ने दावों की खोली पोलट्रंप प्रशासन का दावा है कि ईरान के साथ हुआ यह नया समझौता एक कूटनीतिक मास्टरस्ट्रोक है और यह पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के साल 2015 के ऐतिहासिक जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (JCPOA) से कहीं ज्यादा बेहतर और मजबूत है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मामलों के नीति विशेषज्ञ इस सरकारी दावे को खुली चुनौती दे रहे हैं।विशेषज्ञों का साफ कहना है कि जहां ओबामा का परमाणु समझौता कई सौ पन्नों का एक बेहद विस्तृत, जटिल और तकनीकी दस्तावेज था, वहीं ट्रंप का यह नया समझौता महज डेढ़ पन्ने का एक अधूरा मसौदा (Draft) है, जो केवल एक साधारण हाथ मिलाने के बदले तेहरान को सब कुछ सौंप देता है। इसी अधूरेपन के कारण ट्रंप के कोर समर्थक भी इस समझौते को पचा नहीं पा रहे हैं।पाकिस्तान रेस से बाहर, कतर बना अमेरिका-ईरान का नया पसंदीदा बिचौलियाइस महा-समझौते के बीच वेंस की स्विट्जरलैंड यात्रा स्थगित होने से मध्यस्थता करने वाले देशों का क्षेत्रीय भू-राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गया है। पड़ोसी देश पाकिस्तान, जिसने खुद को इस पूरे विवाद में मुख्य राजनयिक मध्यस्थ के रूप में स्थापित किया था और अप्रैल महीने में दोनों देशों के बीच आमने-सामने की वार्ताओं की बड़े गर्व से मेजबानी की थी, वह अचानक इस पूरी रेस से बाहर हो गया है।इस्लामाबाद के शीर्ष अधिकारी इस बड़ी उम्मीद में बैठे थे कि वे अमेरिका और ईरान के बीच इस ऐतिहासिक कूटनीतिक डील को अमली जामा पहनाकर एक बड़ी वैश्विक भू-राजनीतिक जीत हासिल करेंगे। लेकिन कतर (Qatar) के अचानक एक बेहद अमीर, प्रभावशाली और पसंदीदा मध्यस्थ के रूप में उभरने से पाकिस्तान की स्थिति अंतरराष्ट्रीय पटल पर बेहद असहज और अपमानजनक हो गई है। पाकिस्तान की हालत अब उस बिन बुलाए शादी के मेहमान जैसी हो गई है जिसे ऐन वक्त पर पता चला कि शादी का वेन्यू ही बदल चुका है।मागा (MAGA) गठबंधन में दरार: वेंस की यरुशलम को दोटूक, नेतन्याहू का पीछे हटने से इनकारइस कूटनीतिक उथल-पुथल का सबसे बड़ा और वास्तविक नुकसान ट्रंप के अपने 'मागा' (MAGA) गठबंधन की आंतरिक शांति को हुआ है। एक तीखे और बेहद आक्रामक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने पारंपरिक कूटनीतिक शालीनता को ताक पर रखते हुए सीधे यरुशलम पर बड़ा हमला बोला। उन्होंने इजरायली अधिकारियों को दोटूक शब्दों में कहा कि वे गहरी नींद से जागें और जमीनी हकीकत को समझें।वेंस ने इजरायली कैबिनेट को कड़े लहजे में याद दिलाया कि उनके दो-तिहाई रक्षा हथियारों का भारी-भरकम खर्च अमेरिकी टैक्सपेयर्स के पैसों से उठाया जाता है। वेंस ने गुस्से में कहा— अगर मैं आज इजरायल सरकार की कैबिनेट में बैठा होता, तो मैं पूरी दुनिया में बचे अपने इकलौते और सबसे शक्तिशाली सहयोगी (अमेरिका) पर इस तरह के बेतुके हमले नहीं कर रहा होता।यह सार्वजनिक टकराव मागा व्हाइट हाउस और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच संबंधों में आई अचानक और बड़ी गिरावट को साफ उजागर करता है। अपनी ही घरेलू राजनीति में कड़े चुनावों का सामना कर रहे इजरायली पीएम नेतन्याहू ने दक्षिणी लेबनान से अपनी सेना को हटाने से साफ तौर पर इनकार कर दिया है, जो सीधे तौर पर राष्ट्रपति ट्रंप के युद्धविराम (Ceasefire) के प्रस्ताव को खारिज करने जैसा है। इस अभूर्व दरार ने अमेरिका-इजरायल के ऐतिहासिक संबंधों को एक बेहद संवेदनशील और खतरनाक मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है।
खैबर पख्तूनख्वा में यात्री वैन को बनाया निशाना, रेस्क्यू टीम पर भी हमला, 7 लोगों की दर्दनाक मौत
पाकिस्तान का बेहद अशांत और हिंसाग्रस्त इलाका खैबर पख्तूनख्वा प्रांत एक बार फिर भीषण बम धमाकों से दहल उठा है। प्रांत के बन्नू जिले में शनिवार को सड़क किनारे एक के बाद एक हुए दो सिलसिलेवार आईईडी (IED) बम धमाकों में कम से कम सात लोगों की मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई, जबकि तीन अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए हैं। स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने इस खौफनाक आतंकी वारदात की आधिकारिक पुष्टि कर दी है। हालांकि, अभी तक किसी भी सक्रिय आतंकी संगठन या प्रतिबंधित समूह ने इस कायरतापूर्ण आत्मघाती कृत्य की जिम्मेदारी नहीं ली है। घटना के तुरंत बाद भारी संख्या में पहुंचे सुरक्षा बलों ने पूरे इलाके की घेराबंदी कर सर्च ऑपरेशन शुरू कर दिया है।बैक-टू-बैक दो ब्लास्ट: पहले यात्री वैन को उड़ाया, फिर मदद के लिए आए लोगों पर किया हमलापुलिस से मिली शुरुआती जानकारी के अनुसार, आतंकियों ने इस हमले को बेहद सोची-समझी साजिश के तहत अंजाम दिया। पहला रिमोट-कंट्रोल आईईडी विस्फोट बन्नू जिले के मार्का बेरा इलाके में एक आम यात्री वैन को निशाना बनाकर किया गया। यह धमाका इतना जोरदार था कि वैन के परखच्चे उड़ गए और उसमें सवार पांच निर्दोष लोगों की मौके पर ही मौत हो गई।इस घटना के तुरंत बाद जब आस-पास के लोग और राहत व बचाव कार्य (Rescure Team) से जुड़े कर्मी घायलों की मदद के लिए दुर्घटनास्थल पर पहुंचे, तो आतंकियों ने उन्हें निशाना बनाते हुए ठीक उसी जगह पर दूसरा बम धमाका कर दिया। इस दूसरे कायरतापूर्ण ब्लास्ट में दो और लोगों ने अपनी जान गंवा दी और बचाव कार्य में लगी एक गाड़ी भी पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई।हाथी खेल गांव से बन्नू शहर जा रही थी वैन, अस्पताल में पसरा मातमबन्नू के जिला पुलिस अधिकारी (DPO) यासिर अफरीदी ने मीडिया को बताया कि निशाना बनाई गई यात्री वैन हाथी खेल गांव से आम नागरिकों को लेकर बन्नू शहर की तरफ जा रही थी, तभी वह मुख्य सड़क पर लगाए गए इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस की चपेट में आ गई।डीपीओ ने बताया कि सभी मृतकों के शवों और खून से लथपथ घायलों को तुरंत पास के जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां कुछ की हालत नाजुक बनी हुई है। कानून प्रवर्तन एजेंसियों और फॉरेंसिक टीमों ने धमाके वाली जगह से बारूद के सैंपल और अन्य महत्वपूर्ण सबूत इकट्ठा करना शुरू कर दिया है ताकि आतंकियों के सुराग का पता लगाया जा सके।मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी ने की कड़ी निंदा, पुलिस से मांगी विस्तृत रिपोर्टइस भीषण आतंकी हमले के बाद खैबर पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी ने घटना की तीव्र शब्दों में कड़ी निंदा की है। उन्होंने प्रांतीय पुलिस महानिदेशक और संबंधित पुलिस अधिकारियों को मामले की गहनता से जांच करने और इस पर एक विस्तृत विस्तृत रिपोर्ट जल्द से जल्द सौंपने का सख्त निर्देश दिया है।मुख्यमंत्री ने इसे बेहद दुखद और दिल दहला देने वाली घटना बताते हुए पीड़ित परिवारों के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त की। उन्होंने स्थानीय प्रशासन को निर्देश दिया कि घायलों को इलाज में कोई कमी न आए और भरोसा दिलाया कि प्रांतीय सरकार दुख की इस घड़ी में प्रभावित परिवारों की हर संभव आर्थिक और चिकित्सीय मदद करेगी।
बांग्लादेश में धार्मिक असहिष्णुता को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। स्थानीय मीडिया के अनुसार, गाइबांधा जिले में भगवान राम की सबसे ऊंची प्रतिमा बनाने के विरोध में एक प्रदर्शन के दौरान कट्टरपंथी इस्लामवादियों ने कथित तौर पर उनकी तस्वीर का अपमान किया।
सीजफायर के कुछ घंटों बाद ही इजरायल ने लेबनान पर किया हमला , 5 की मौत
दक्षिण लेबनान में इजरायली हमले जारी है। हालिया हमले में 5 लोगों की मौत हो गई है। लेबनान की नेशनल न्यूज एजेंसी (एनएनए) ने शनिवार को बताया कि, हिज्बुल्लाह और इजरायल के बीच युद्धविराम लागू होने के 24 घंटों के भीतर ही दक्षिणी लेबनानी शहर सज्द के निकट स्थित जबल अल-रफी क्षेत्र पर एयर स्ट्राइक की गई।
फैक्ट चेक: क्या जर्मनी का विश्व कप फुटबॉल मैच देखने स्टेडियम में हिटलर का हमशक्ल मौजूद था?
कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक तस्वीर तेजी से वायरल हुई जिसमें दावा किया गया कि जर्मनी की कुरासाओ पर 7-1 की जीत के दौरान स्टेडियम में हिटलर जैसा दिखने वाला एक फुटबॉल फैन मौजूद था. लेकिन क्या यह वायरल तस्वीर असली है? बीते रविवार को फीफा वर्ल्ड कप मैच के दौरान जर्मनी का पूरा ध्यान अपनी राष्ट्रीय टीम की कुरासाओ पर 7-1 की शानदार और एकतरफा जीत पर था. हालांकि, मैदान के बाहर, सोशल मीडिया पर बहुत से लोग एक बिल्कुल अलग चीज पर अटक गए थे. वह था स्टेडियम के अंदर के एक प्रशंसक की तस्वीर, जिसने जर्मनी की जर्सी पहन रखी थी, हाथ में जर्मनी का झंडा थाम रखा था और जिसका चेहरा हूबहू हिटलर से मिल रहा था. यह तस्वीर कई प्लेटफॉर्म पर शेयर की गई और इसे लाखों बार देखा गया. मसलन, एक्स पर इस पोस्ट को 30 लाख से ज्यादा बार देखा गया. जबकि, इंस्टाग्राम पर इस पोस्ट को 4,60,000 से ज्यादा लाइक मिले. यह दावा कई अन्य भाषाओं में भी वायरल हुआ. जैसे, फेसबुक पर स्पेनिश भाषा में और थ्रेड्स पर रूसी भाषा में. कुछ सोशल मीडिया पोस्ट में जर्मन विरोधी भावना का असर भी दिखा. जैसे, रेडिट की एक पोस्ट में ताना मारते हुए लिखा गया था, यह देखना हमेशा ही लाजवाब होता है कि जब प्रशंसक अपनी टीम का हौसला बढ़ाने के लिए इस तरह खुलकर सामने आते हैं!” हालांकि, यह तस्वीर असली नहीं है. डीडब्ल्यू ने फैक्ट चेक में पाया कि यह तस्वीर नकली है और एआई की मदद से छेड़छाड़ करके तैयार की गई है. इस तस्वीर की सच्चाई का पता लगाने के लिए, हमने कई तरीके अपनाए. 1. असली तस्वीर देखें हिटलर जैसे दिखने वाले शख्स की यह कथित तस्वीर मैच के टीवी ब्रॉडकास्ट का एक स्क्रीनशॉट लगती है, जिसमें पहले हाफ के स्टॉपेज टाइम का टाइमस्टैम्प भी है. यह ठीक उसी समय की बात है, जब काई हावेर्त्स ने पेनल्टी को गोल में बदलकर जर्मनी को 3-1 की बढ़त दिला दी थी. उस वक्त स्टेडियम में मौजूद प्रशंसक बेहद खुश थे और जश्न मना रहे थे. जब मैच के असली ब्रॉडकास्ट को दोबारा देखा गया, तो उसमें फैंस का वही समूह हावेर्त्स के गोल के बाद जश्न मनाता हुआ दिखाई देता है, लेकिन उसमें एक अहम अंतर दिखा. हिटलर जैसा दिखने वाला वह कथित शख्स उस पूरी फुटेज में कहीं भी नहीं दिखा. इसके बजाय, असली फुटेज में भूरे बालों वाला एक व्यक्ति दिखता है, जो हिटलर जैसा बिल्कुल नहीं लगता. ऊपर दी गई दोनों तस्वीरों के बीच स्लाइड करके, यह अंतर साफ तौर पर देखा जा सकता है. एक तस्वीर असली ब्रॉडकास्ट की है, जो दाईं ओर जर्मन पब्लिक ब्रॉडकास्टर एआरडी की फुटेज है. जबकि, दूसरी तस्वीर वह है जिससे एआई की मदद से छेड़छाड़ करके तैयार किया गया है. यहां यह समझना जरूरी है कि वर्ल्ड कप जैसे बड़े खेल आयोजनों के लिए, मैच का मुख्य लाइव वीडियो खुद आयोजन करने वाली संस्था तैयार करती है. इस मामले में, फीफा ने तैयार किया है. फिर इसी मुख्य वीडियो फीड को दुनिया भर के पार्टनर चैनलों और ब्रॉडकास्टर्स को सेंट्रल फीड के तौर पर दिया जाता है. इसका मतलब यह है कि सभी चैनलों पर दिखाए जाने वाले मुख्य वीडियो (मैच के दृश्य) बिल्कुल एक जैसे होते हैं. बस, अलग-अलग चैनल अपनी जरूरत के हिसाब से उसमें छोटे-मोटे बदलाव करते हैं, जैसे कि अपना लोगो लगाना या स्कोरबोर्ड का रंग बदलना. लाइव टेलीकास्ट के अलावा, उस फैंस के समूह में कौन-कौन लोग शामिल थे, इसका एक और सुराग उन फोटो एजेंसियों की तस्वीरों को देखकर लगाया जा सकता है जिन्हें इस मैच को कवर करने की आधिकारिक अनुमति मिली हुई थी. उदाहरण के लिए, बर्लिन की एक एजेंसी इमागो की नीचे दी गई तस्वीर देखिए. इमागो अक्सर बड़े खेल आयोजनों को कवर करती है. इस फोटो में प्रशंसकों के उसी समूह को एक अलग एंगल से दिखाया गया है और यहां भी हिटलर जैसा दिखने वाला कोई शख्स मौजूद नहीं है. भले ही, फोटो एजेंसी द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर उस सटीक समय का पता लगाना मुमकिन नहीं था, जब यह तस्वीर खींची गई थी. फिर भी, इसे इस बात का एक और पक्का सबूत माना जा सकता है कि प्रशंसकों के उस समूह में हिटलर जैसा कोई भी आदमी शामिल नहीं था. 2. क्या यह एआई से तैयार की गई तस्वीर है? इस तस्वीर के असली होने की जांच करने का अगला कदम यह पता लगाना है कि क्या इसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का इस्तेमाल करके बनाया गया है या इसमें कोई बदलाव किया गया है. कई एआई चैटबॉट्स अब यह जांच करने की सुविधा भी देते हैं कि क्या उनके सिस्टम का इस्तेमाल किसी तस्वीर को बनाने या उसमें कोई बदलाव करने के लिए किया गया था. यह इसलिए मुमकिन है, क्योंकि ऐसे एआई टूल तस्वीर के अंदर एक डिजिटल वॉटरमार्क छिपा देते हैं. यह वॉटरमार्क हमारी खुली आंखों से दिखाई नहीं देता, लेकिन जब इस तकनीक (टूल) का इस्तेमाल करके तस्वीर की जांच की जाती है, तो इसे आसानी से पकड़ा जा सकता है. चैटजीपीटी बनाने वाली अमेरिकी संस्था ‘ओपनएआई' के जरिए की गई जांच से पता चलता है कि हिटलर जैसे दिखने वाले शख्स की इस तस्वीर को बनाने के लिए वाकई उनके ही एआई टूल का इस्तेमाल किया गया था. ओपनएआई के विश्लेषण में कहा गया कि उसे ‘तस्वीर के भीतर एक सिंथ-आईडी वॉटरमार्क मिला है जो खुद ओपनएआई सिस्टम से ही तैयार हुआ था.” गूगल के जेमिनी टूल की मदद से की गई एक और जांच से कुछ नए सबूत मिलते हैं. इससे पता चलता है कि इमेज में बदलाव करने के लिए, गूगल एआई के किसी सिस्टम का इस्तेमाल नहीं किया गया था, लेकिन इसमें यह भी कहा गया है कि तस्वीर का विश्लेषण करने और उसके संदर्भ की जांच करने से साफ पता चलता है कि इस फोटो में डिजिटल तौर पर बदलाव किया गया है या इसे डिजिटल तरीके से बनाया गया है.” एक तीसरा टूल है, एक्स का ग्रोक. यह टूल इस इमेज को ‘पूरी तरह नकली' बताता है. यह वायरल पोस्ट के नीचे, एक्स पर एक यूजर के सवाल का जवाब देते हुए ऐसा कहता है. इसमें आगे कहा गया है, यह तस्वीर असली नहीं है. इसमें डिजिटल तौर पर बदलाव (एआई या फोटोशॉप) करके, 2026 वर्ल्ड कप की भीड़ में हिटलर को दिखाया गया है. हालांकि, इन टूल का इस्तेमाल हमेशा सावधानी से किया जाना चाहिए, क्योंकि इनसे कभी-कभी गलतियां हो सकती हैं. लेकिन, इस मामले में तीन अलग-अलग टूल एक जैसे नतीजे पर पहुंचे, जिससे ओरिजिनल फुटेज के आधार पर किए गए विश्लेषण की पुष्टि हुई. 3. संदर्भ के बारे में सोचें एक तरफ जहां वर्ल्ड कप को एक बड़े उत्सव के रूप में देखा जाता है जो दुनिया भर के प्रशंसकों और संस्कृतियों को एक साथ लाता है. वहीं, दूसरी तरफ अगर स्टेडियम में सचमुच उस नाजी तानाशाह जैसा कोई प्रशंसक मौजूद होता जिसने दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत की थी और जो होलोकॉस्ट (यहूदियों के नरसंहार) का जिम्मेदार था, तो इससे स्टेडियम में बहुत बड़ा विवाद खड़ा हो जाता. ऐसी घटना पर ब्रॉडकास्टर्स या स्टेडियम के अधिकारियों का ध्यान तुरंत जाता. साथ ही, स्टेडियम में मौजूद कई जर्मन प्रशंसक भी इस पर कड़ा विरोध जताते. इसके अलावा, ध्यान देने वाली बात यह भी है कि इस तस्वीर में हिटलर जैसा दिखने वाला वह कथित शख्स काले, लाल और सुनहरे रंग की जर्मनी की जर्सी पहने हुए दिखाई दे रहा है. ये राष्ट्रीय रंग जर्मनी की लोकतांत्रिक परंपरा और संघीय गणराज्य की पहचान हैं. भले ही, दक्षिणपंथी चरमपंथियों और लोकलुभावन राजनीति करने वाले नेताओं ने लंबे समय से इन रंगों और झंडे को अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश की है, लेकिन काला, लाल और सुनहरा रंग असल में जिन मूल्यों और विचारों का प्रतीक है, वे हिटलर और नाजीवाद की सोच के बिल्कुल खिलाफ हैं. हिटलर की नजर में ये रंग एक कमजोर संसदीय प्रणाली के प्रतीक थे, जिसे उसने आगे चलकर पूरी तरह से खत्म कर दिया था. यह फर्जी तस्वीर झूठी और भ्रामक खबरों के उस बड़े ट्रेंड का हिस्सा है जिसमें से ज्यादातर को एआई की मदद से तैयार किया गया है या बदलाव किया गया है. ऐसी तस्वीरें वर्ल्ड कप शुरू होने से पहले से लेकर मैच खेले जाने के दौरान लगातार इंटरनेट पर वायरल हो रही हैं.
तालिबान के नए कानून से महिलाओं की आजादी पर खतरा, यूएन विशेषज्ञों ने जताई चिंता
संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि पति-पत्नी के अलग होने की शर्तों को तय करने के लिए तालिबान के नए आदेश से न सिर्फ बाल विवाह को बढ़ावा मिल सकता है, बल्कि महिलाओं और लड़कियों के लिए हिंसक और अत्याचार भरे रिश्तों से बाहर निकलना भी बहुत मुश्किल हो सकता है।
इजरायल और हिज्बुल्लाह के बीच संघर्ष में राहत, युद्धविराम पर बनी सहमति
इजरायल और हिज्बुल्लाह के बीच युद्धविराम पर सहमति बन गई है। यह जानकारी शुक्रवार को इजरायली अधिकारियों के हवाले से दी गई।
पाकिस्तानी बलों पर नागरिकों की हत्या और गायब करने का आरोप, मानवाधिकार संगठनों ने की जांच की मांग
बलूचिस्तान में आम लोगों के खिलाफ हिंसा लगातार जारी रहने के बीच, प्रमुख मानवाधिकार संगठनों ने यह आरोप लगाया कि पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने दो नागरिकों की बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के हत्या कर दी और दो अन्य लोगों को जबरन गायब कर दिया।
दैनिक भास्कर की नई सीरीज ‘स्पाई फाइल्स’ के पहले एपिसोड में कहानी ऐसे भारतीय जासूस की जिसने खुफिया जानकारी भेजकर भारत के 20 हजार से ज्यादा सैनिकों की जान बचाई… साल 1981 और जगह पाकिस्तानी सेना का रावलपिंडी हेडक्वार्टर। सुबह की धुंध अभी छंटी नहीं थी। वर्दी पहने 29 साल का एक नौजवान तेज कदमों से अपने दफ्तर की ओर बढ़ रहा था। कसरती बदन, तीखे नैन-नक्श और रौबीली शख्सियत- जैसे किसी फिल्म का हीरो हो। उसकी चमकती नेमप्लेट पर नाम लिखा था- 'मेजर नबी अहमद शाकिर'। मेजर नबी अपने केबिन में दाखिल हुआ। कोट उतारकर कुर्सी पर रखते ही उसकी निगाहें बगल की मेज पर पड़ीं। वहां 'मोस्ट सीक्रेट' की लाल मुहर लगी कुछ नई फाइलें रखी थीं। नबी ने इधर-उधर देखा, कोई हलचल नहीं थी। उसने गहरी सांस ली और फाइल उठाकर पन्ने पलटने लगा। अब मेजर के चेहरे की रंगत उड़ने लगी। माथे पर पसीने की बूंदें उभरने लगीं। फाइल में लिखा था- ‘पाकिस्तानी फौज अब राजस्थान बॉर्डर की तरफ कूच करेगी। टैंक, तोपें और भारी असलाह रवाना करने की तैयारी मुकम्मल की जाए।।’ उसने बुदबुदाते हुए फाइल वापस रख दी। शाम को जब नबी घर पहुंचा, तो बीवी अमानत दरवाजे पर खड़ी थी। ‘अस्सलामु अलैकुम नबी साहब! बड़े थके-थके लग रहे हैं, चाय लाऊं क्या?’ नबी ने बिना नजरें मिलाए धीमे से कहा, ‘नहीं अमानत, मन नहीं है। जरा आराम करना चाहता हूं।’ अमानत का चेहरा उतर गया। ‘आज डिनर भी नहीं करेंगे? आपकी पसंद का शोरबा बना है।’‘जी नहीं अमानत, भूख नहीं है,’ कहकर नबी सीधे अपने कमरे में गया और बिस्तर पर लेट गया। रात के दो बजे। रावलपिंडी शहर गहरी नींद सो रहा था। नबी ने धीरे से करवट बदली और अमानत की तरफ देखा। उसकी गहरी सांसें बता रही थीं कि वह सो चुकी है। नबी दबे पांव उठा और स्टडी रूम में दाखिल हुआ। उसने मेज पर रखे एक कागज पर कोड वर्ड में लिखना शुरू किया- ‘राजस्थान बॉर्डर पर हजारों की संख्या में पाकिस्तानी फोर्स भेजी जा रही है। जंगी हथियार और टैंकों की मूवमेंट शुरू हो चुकी है। बड़े-बड़े अफसर सरहद पर डिप्लॉय किए जा रहे हैं। तुरंत अलर्ट होना होगा।’ नबी ने खत मोड़कर फाइलों के बीच छुपाया और चुपचाप बिस्तर पर जाकर लेट गया। अगली सुबह मेजर नबी जल्दी घर से निकला। दफ्तर जाने के बजाय वे पोस्ट ऑफिस पहुंचा। एक लिफाफा निकाला, जिस पर दुबई का एक पता लिखा था। अपना लिखा कागज का टुकड़ा लिफाफे में डाला और उसे अच्छी तरह सील करके पोस्ट कर दिया। फिर नबी दफ्तर चला गया। कुछ दिनों बाद मेजर नबी का यही खत दुबई के बजाय दिल्ली के लोधी रोड में भारत की खुफिया एजेंसी, रिसर्च एंड एनालिसिस विंग यानी RAW के दफ्तर में एक अधिकारी को मिला। भारत की सुरक्षा एजेसियां तत्काल अलर्ट मोड में आ गईं। राजस्थान बॉर्डर पर भारी तादाद में सैनिक और हथियार भेजे जाने लगे। भारत की युद्ध स्तर की तैयारी और सीमा पर बढ़ते दबाव को देख पाकिस्तान के जनरल ठिठक गए। उन्हें अपने कदम पीछे खींचने पड़े। अंग्रेजी अखबार टेलीग्राफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक मेजर नबी ने खुफिया जानकारी भेजकर करीब 20 हजार भारतीय जवानों की जान बचाई थी। तब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मेजर नबी अहमद की तारीफ करते हुए उन्हें ‘ब्लैक टाइगर’ नाम दिया था। आखिर कौन थे मेजर नबी अहमद, जो पाकिस्तान की फौज में होकर भी भारत के लिए काम कर रहे थे… कहानी की शुरुआती होती है 1973 से। यूपी की राजधानी लखनऊ में नेशनल थियेटर फेस्टिवल हो रहा था। 21 साल का एक लड़का फौज की वर्दी में स्टेज पर गिरा हुआ था। एकदम लहूलुहान। 4-5 चीनी सैनिकों ने उसे घेर रखा था। ‘उगल दे! तेरी फौज की अगली हरकत क्या है? बता, वर्ना तेरी खाल उतारकर हम अपनी वर्दी सिलवा लेंगे!’ लड़का दर्द से कराहता है, लेकिन फिर ठहाका मारकर हंसता है। उसकी आंखों में जरा भी खौफ नहीं है। वह पूरा जोर लगाकर कहता है- ‘हिंदुस्तानी सिपाही की जुबान सिर्फ तिरंगे के सामने खुलती है, तुम जैसे भेड़ियों के सामने नहीं! मारो! जितना दम है, मार लो!’ तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा हॉल गूंज उठा। शो के बाद… वो लड़का अपना मेकअप साफ कर रहा था, तभी भारी जूतों की आहट सुनाई पड़ी। आंखों पर बड़े फ्रेम का चश्मा लगाए एक रोबिला शख्स उसके सामने खड़ा था। साथ में उसी कद-काठी के दो और बंदे दीवार से सटकर खड़े हो गए। वो लड़का चौंका… तभी रोबिला शख्स बोल पड़ा- ‘अदाकारी अच्छी थी मियां, एकदम जान डाल दी।’ लड़का- ‘शुक्रिया जनाब। आप?’ रोबिला शख्स (पास आकर, नीची आवाज में) हम वो पारखी हैं जो असली हीरे की पहचान रखते हैं। क्या रियल लाइफ में भी मुल्क के लिए यही जज्बा दिखा सकते हो? ‘उसके लिए क्या करना होगा?’ लड़के ने पूछा। ‘RAW के लिए काम करोगे?’ 'ये RAW क्या है?' रोबिला शख्स- ‘ये भारत की खुफिया एजेंसी है। इसके लिए काम करना मतलब हथेली पर जान रखकर चलना। दूसरे मुल्क की मांद में जाकर जासूसी करना।’ लड़का थोड़ा रुककर बोलता है- ‘माफ कीजिएगा साहब, मैं अपनी मां को छोड़कर इतनी दूर नहीं जा सकता।’ ‘तुम्हारे पापा एयरफोर्स थे। ये देश भी तो तुम्हारी मां है। तुम इसके लिए आगे नहीं आओगे, तो कौन आएगा… सोचकर बताना हम फिर मिलेंगे।’ उसने लड़के को एक कागज दिया, ‘ये लो। इस पर अगली मुलाकात का पता और वक्त लिखा है। सोच लेना... या तो तालियां बटोरने वाले एक्टर बने रहो, या इतिहास बदलने वाला सिपाही बनो। हम फिर मिलेंगे।’ लड़के ने कागज का टुकड़ा अपनी जेब में रखा और रेलवे स्टेशन की तरफ निकल पड़ा। अगले दिन वो राजस्थान में पाकिस्तान बॉर्डर पर बसे श्रीगंगानगर पहुंच गया। वो लड़का इसी जिले का रहने वाला था और एक कॉलेज से बीकॉम कर रहा था। कॉलेज में उसकी टक्कर का कोई नहीं था। दोस्त उसे विनोद खन्ना कहकर बुलाते थे। एक्टिंग का सपना पूरा करने के लिए ही वो लखनऊ में थिएटर करने गया था। उस लड़के का नाम था- रविंद्र कौशिक। वह चार भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर था। पिता एयरफोर्स से रिटायर्ड होने के बाद श्रीगंगानगर में एक कंपनी में सेल्स ऑफिसर थे। मां घर संभालती थीं। लखनऊ में थिएटर के दौरान जो लोग रविंद्र से मिले थे, वे वाकई RAW के लोग थे और पिछले कई दिनों से उस पर निगाह रखे थे। रविंद्र कौशिक पर लिखी किताब ‘ब्लैक टाइगर एक भारतीय जासूस’ के मुताबिक- ‘लखनऊ से श्रीगंगानगर लौटते ही रविंद्र सीधे अपने कमरे में गया। दीवार पर भगत सिंह की फोटो लगी हुई थी। रातभर वह भगत सिंह के बारे में सोचता रहा। 23 साल की उम्र में कोई फांसी के फंदे को कैसे चूम सकता है? रविंद्र ने खुद से सवाल किया। फिर भगत सिंह की उन आंखों में देखते हुए उसे अपना जवाब मिल गया- ‘जुनून। देश के लिए मर-मिटने का जुनून।’ फिर उसकी आंख लग गई। सुबह मां ने आवाज दी- ‘रवि बेटा उठ जाओ... कॉलेज नहीं जाना क्या?’ रविंद्र तैयार होकर घर से कॉलेज के लिए निकला, लेकिन उसके मन में RAW अधिकारी की बात गूंज रही थी। वो कॉलेज के बजाय RAW अफसरों से मिलने निकल पड़ा। श्रीगंगानगर में रेल की पटरियों के पास एक पुराना कमरा था। उसके करीब से ही एक नाला बहता था। रविंद्र उसी जगह बैठकर इंतजार करने लगा। तभी आवाज आई- ‘रोड पर जो गाड़ी खड़ी है, उसमें बैठ जाओ।’ रविंद्र गाड़ी में बैठ गया। कुछ देर बाद वह एक खंडहरनुमा घर में पहुंचा। RAW का एक अफसर दीवार पर रखे पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर यानी पीओके के नक्शे पर कलम से कुछ निशान लगा रहा था। रविंद्र को देखते ही अफसर ने कहा- ‘तुम मिशन के लिए तैयार हो या नहीं, ये पूछकर मैं वक्त बर्बाद नहीं करूंगा। तैयार हो इसलिए ही यहां हो। आज से तुम्हारा सारा रिकॉर्ड जला दिया जाएगा। तुम कौन हो, कहां से आए हो, सब खत्म। आज रात तुम्हें दिल्ली निकलना है। और याद रखना, ये राज किसी को पता न चले... अपनी मां को भी नहीं।’ रविंद्र के जेहन में एक धमाका सा हुआ। 'आज ही? इतनी जल्दी? क्या मैं वाकई ये कर पाऊंगा?' पर, वो अफसरों से कुछ कह नहीं पाया। घर पहुंचते ही रविंद्र अपने कमरे में गया। काफी देर तक सोचता रहा। फिर मां को बताया- ’मुझे आज ही दिल्ली जाना है। मेरी नौकरी लग गई है।’ मां अमला देवी- ‘एक दो दिन बाद जाते तो कुछ तैयार कर देती तुम्हारे लिए।’ ‘नहीं मां... अगर आज नहीं गया तो ये नौकरी हाथ से निकल जाएगी। बहुत बड़ी कंपनी है, ऐसा मौका दोबारा नहीं मिलेगा।’ रविंद्र ने सामान पैक किया और दिल्ली जाने वाली ट्रेन में बैठ गया। दिल्ली पहुंचे ही वह RAW अधिकारियों से मिला। जल्द ही उसकी ट्रेनिंग भी शुरू हो गई।’ रविंद्र कौशिक की बायोग्राफी लिखने वालीं मीनाक्षी अपनी किताब ‘द ब्लैक टाइगर’ में लिखती हैं- ‘सबसे पहले रविंद्र को इस्लाम धर्म की शिक्षा दी गई। उर्दू बोलना सिखाया गया। पाकिस्तान का भूगोल, नक्शा, रहन-सहन और अलग-अलग शहरों के बारे में बताया गया। मौलवी का काम सिर्फ भाषा सिखाना नहीं था, बल्कि रविंद्र के जेहन में पाकिस्तान की रूह को उतारना था।' एक रोज मौलवी ने रविंद्र से कहा - ‘बेटा, उर्दू सिर्फ लफ्जों का मेल नहीं है, ये तहज़ीब है। तुम्हारे लफ़्जों में वो झलकनी चाहिए। तुम्हारी बातचीत में वो खनक होनी चाहिए जो लाहौर की गलियों में सुनाई देती है।’ रविंद्र ने दिन-रात एक कर दिए। कुरान की आयतें जबान पर चढ़ गईं, नमाज का तरीका रगों में बस गया। उसे सिखाया गया कि एक आम पाकिस्तानी कैसे चाय पीता है, कैसे बड़ों को सलाम करता है। बीच-बीच में रविंद्र, दिल्ली से श्रीगंगानगर आता था। भाई-बहनों के लिए कपड़े लाता था। दोस्तों से मिलता, लेकिन किसी को अपनी ट्रेनिंग के बारे में नहीं बताता।’ 1974 में वो फिर से श्रीगंगानगर आया। उसके जिगरी दोस्त राजकुमार गौड़ की शादी थी, जो बाद में कांग्रेस के विधायक बन गए। शादी में रविंद्र ने खूब मस्ती की। अपने अंदाज में डांस किया। ढेर सारी तस्वीरें खिंचाईं, पर राज को राज ही रहने दिया। राजकुमार गौड़ ने कई बार टोका भी तुम थोड़े बदले-बदले लग रहे हो, पर रविंद्र ने हंसकर उनकी बात टाल दी। गौड़ साहब के पास आज भी रविंद्र की वो तस्वीरें हैं। जिसे दिखाते वक्त उनका मलाल भी जुबान पर आ ही जाता है- ‘वो मुझसे कुछ छुपाता नहीं था। पर उसने कुछ भी जाहिर नहीं होने दिया। अफसोस तो है, लेकिन उस पर नाज भी है कि उसने देश को सबसे आगे रखा।’ पाकिस्तान के एक बड़े हिस्से में पंजाबी बोली जाती है। श्रीगंगानगर, पाकिस्तान बॉर्डर से सटा हुआ है। इस वजह से रविंद्र के पंजाबी बोलने का लहजा भी आम पाकिस्तानियों जैसा था। रविंद्र को दिल्ली के अलावा पाकिस्तान से लगे अमृतसर और पठानकोट में भी ट्रेनिंग दी गई। ताकि, वो पाकिस्तान का कल्चर समझ सके। एक रोज RAW के अधिकारी ने उसे सुबह-सुबह दफ्तर बुलाया। कहा- ‘तुमने बहुत कम वक्त में सब सीख भी लिया, लेकिन एक कमी रह गई है। हम शक की जरा भी गुंजाइश नहीं छोड़ सकते।’ ‘क्या कमी साहब…?’ रविंद्र ने पूछा। RAW अधिकारी- ‘तुम्हारी पहचान…। ये कागज लो और लिखे पते पर चले जाओ।’ अगले दिन रविंद्र उस पते पर पहुंचा। एक बंद कमरा। हवा में डिटॉल और सर्जिकल स्पिरिट की तीखी गंध। एक स्ट्रेचर और ऊपर एक तेज सर्जिकल लाइट। पास ही एक ट्रे में सर्जिकल चाकू और कैंची रखी थी। आला लटकाए वहां खड़े डॉक्टर ने कहा- ‘इसपर लेट जाओ।’ रविंद्र समझ गया कि उसका खतना होने वाला है। थोड़ा रुककर उसने कहा- ‘लेट जाऊं पर क्यों?’ डॉक्टर- ‘ये तुम्हारे पुराने वजूद की आखिरी निशानी है। इसे मिटाने का मतलब समझते हो? इसके बाद तुम फिर कभी 'रविंद्र' नहीं बन पाओगे। अब भी वक्त है, पीछे हट सकते हो।’ रविंद्र के दिमाग में पुरानी बातें घूमने लगीं। ‘मां का मुस्कुराता चेहरा, दोस्तों के साथ थियेटर की मस्ती, और फिर दीवार पर टंगी भगत सिंह की तस्वीर।’ रविंद्र ने गहरी सांस लेते हुए कहा- ‘आप अपना काम कीजिए डॉक्टर साहब। मैं पीछे नहीं हटूंगा।’ डॉक्टर ने एनेस्थीसिया का इंजेक्शन तैयार किया। रविंद्र ने अपनी मुट्ठियां भींच लीं। चेहरे की नसें तन गईं, पर उसके मुंह से कोई चीख नहीं निकली। RAW अफसर- (अंधेरे से बाहर आते हुए) शाबाश… आज से तुम्हारी रगों में दौड़ता हुआ खून भी कहेगा कि तुम एक सच्चे मुसलमान हो। वेलकम टू द वर्ल्ड ऑफ शैडोज।’ अब तक 1975 की शुरुआत हो गई थी। रविंद्र ने RAW अफसर से कहा- ‘सर, मैं मिशन पर जाने से पहले एक बार घर जाना चाहता हूं।’ RAW अफसर- पर क्यों?’ रविंद्र ‘नौकरी के बहाने दिल्ली तो आ गया, लेकिन समझ नहीं आ रहा कि पाकिस्तान जाने की बात घर वालों को कैसे बताऊं, क्या बहाना करूं?’ RAW अधिकारी ने कहा- ‘घर पर बता दो कि तुम्हारी दुबई में नौकरी लग गई है। हम दुबई के पते से तुम्हारे खत परिवार तक भिजवा देंगे। किसी को शक भी नहीं होगा।’ अगली सुबह रविंद्र श्रीगंगानगर पहुंचा। घर में अंदर जाते ही उछलकर बोला- ‘मां, दुबई वाली कंपनी का कन्फर्मेशन आ गया है। शानदार सैलरी है, अब तुम्हारे सारे दुख दूर हो जाएंगे।’ मां खुशी से रविंद्र का सिर चूमती है। ‘कब जाना है बेटा?’ रविंद्र मां के कंधे पर हाथ रखते हुए कहता है - ‘बस, कागजी कार्रवाई के लिए अभी दिल्ली निकलना होगा। वहां से फिर दुबई जाना है।’ इसके बाद रविंद्र ने दिल्ली के लिए ट्रेन पकड़ ली। अगली सुबह वो RAW के दफ्तर में था। रविंद्र के पुराने डॉक्यूमेंट नष्ट कर दिए और नया नाम दिया ‘नबी शाकिर अहमद’। ये नाम उसके भीतर इस तरह भर दिया गया कि वह गलती से भी अपनी पुरानी पहचान जाहिर ना कर सके। उसे बताया गया कि वो इस्लामाबाद का रहने वाला है और उसके अम्मी-अब्बू दंगों में मारे जा चुके हैं। इसके बाद एक रोज रविंद्र को पाकिस्तान जाने वाली बस में बैठा दिया गया। ये बस अमृतसर से लाहौर जाती थी। कुछ देर बाद अचानक बस रुकी। पाकिस्तानी चेक पोस्ट पर दस्तावेज जांचे जा रहे थे। आगे की सीट पर बैठा एक आदमी डरा हुआ था। पाकिस्तान आर्मी वालों ने जैसे ही उसका डॉक्यूमेंट देखा, वे आग बबूला हो गए। गाली देते हुए उसके सिर पर बंदूक की बट मारी, खून के छींटे रविंद्र के कपड़ों पर पड़े। रविंद्र थोड़ा पीछे हटा तभी पाकिस्तानी फौजी बोल पड़ा- ‘मियां तुम भी हिंदुस्तानी तो नहीं हो, कागज निकालो।’ पाकिस्तान जाने के बाद रविंद्र को एक लड़की से प्यार हो गया। वह मन ही मन सोचने लगा कि ये प्यार कहीं उसके मिशन में रोड़ा तो नहीं बनेगा। इसी कश्मकश में उसने RAW को चिट्ठी भेजी- ‘मुझे एक लड़की से प्यार हो गया है। मैं उससे शादी करना चाहता हूं।’ रविंद्र की चिट्ठी के जवाब में RAW ने क्या कहा…पूरी कहानी कल यानी रविवार को पढ़िए ‘ब्लैक टाइगर रविंद्र कौशिक’ पार्ट-2 में…
14 जून को उद्धव ठाकरे ने मातोश्री में सांसदों की बैठक बुलाई। 9 में से सिर्फ 4 सांसद पहुंचे। तभी तय हो गया कि पार्टी में बड़ी फूट होने वाली है। 16 जून को 6 सांसद दिल्ली पहुंचे और 17 जून को लोकसभा स्पीकर से मिले। इसी दिन खबरें आईं कि दो सांसद संजय दीना पाटिल और ओमप्रकाश निंबालकर 18 जून को वापस शिवसेना (उद्धव गुट) की संसदीय बैठक में जा सकते हैं, लेकिन शाम को डिप्टी CM एकनाथ शिंदे ने जूम कॉन्फ्रेंस कॉल पर सभी सांसदों से बात की और वे शिवसेना (शिंदे गुट) में विलय के लिए तैयार हो गए। सोर्स बताते हैं कि शिंदे की यही कॉल टर्निंग पॉइंट रही। शिंदे ने 6 सांसदों को अगले लोकसभा चुनाव में टिकट और फ्यूचर सिक्योर करने का भरोसा दिया। सभी सांसद आज, यानी 20 जून को शिंदे से मिलेंगे और लेटर जारी कर बताएंगे कि उन्होंने उद्धव की शिवसेना क्यों छोड़ी। सोर्स बताते हैं कि शिंदे का अगला टारगेट उद्धव गुट के तीन MLC और BMC के 65 पार्षद हैं। 2 बातें, जो उद्धव का साथ छोड़ने की वजह मानी जा रहीं 1. पार्टी में संजय राउत और उद्धव की पत्नी रश्मि ठाकरे की दखलंदाजी। बागी सांसदों के मुताबिक, संजय का नेताओं के साथ बर्ताव सही नहीं है, लेकिन उद्धव उनके खिलाफ कुछ नहीं सुनते। 2. सांसदों को अपने संसदीय क्षेत्र में काम के लिए फंड नहीं मिलता। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को समाधान बैठक करने और क्षेत्रों का दौरा करने के लिए कहा, लेकिन कुछ नहीं हुआ। 40 मिनट की बातचीत, शिंदे का सांसदों को मैसेज- आपके लिए हमेशा खड़ा हूं शिवसेना से जुड़े सोर्स बताते हैं, ‘दिल्ली पहुंचे उद्धव गुट के 6 बागी सांसद लगातार एकनाथ शिंदे के संपर्क में थे। शिंदे ने करीब 40 मिनट उनसे बात की और कहा कि मैं हर फैसले में आपके साथ खड़ा हूं।’ ’सांसदों को संसदीय क्षेत्र में विकास के लिए पर्याप्त बजट के साथ अगले लोकसभा चुनाव में टिकट की गारंटी और Y-श्रेणी सुरक्षा देने का भरोसा दिया गया। शिंदे से वन-टू-वन बात करने के बाद सभी सांसदों का उद्धव गुट छोड़ने का फैसला और मजबूत हो गया।’ क्या संजय राउत और रश्मि ठाकरे की दखलंदाजी से फिर टूटी पार्टी इसके बाद हमने बागी सांसदों से संपर्क करने की कोशिश की। दो से बात हुई। अभी सांसद औपचारिक तौर पर शिंदे गुट में शामिल नहीं हुए, इसलिए नाम सामने नहीं लाना चाहते। हमने दोनों सांसदों से पूछा कि उद्धव की पार्टी से अलग होने की सबसे बड़ी वजह क्या फंड न मिलना है। पहले सांसद ने जवाब दिया, 'फंड हमारा अधिकार है, लेकिन वो भी भीख की तरह मिलता है। जब फंड ही नहीं होगा, तो हम क्या काम करवाएंगे। फंड का हिसाब ऐसे लेते हैं कि जैसे चोर हों।' दूसरे सांसद ने कहा, फंड का ऑडिट करना ठीक है, लेकिन पहले फंड तो जारी करें। दूसरी बात पार्टी हमारी भी है, इसलिए फैसला लेने में हमारी भी भागीदारी होनी चाहिए। कई बार लगता है कि हम बाहरी हैं। पार्टी बस 3 लोगों की है। कौन तीन लोग, क्या उद्धव, रश्मि और संजय राउत? जवाब मिला- ‘सबको पता है, अब नाम लेकर क्या फायदा।‘ हमने पूछा- पार्टी में फैसले कौन लेता है? पहले सांसद जवाब में कहते हैं, ‘सबको पता है, संजय राउत पार्टी में सबसे ताकतवर नेता हैं। उद्धव उनके खिलाफ कुछ नहीं सुनते। संजय कई बार बिना सोचे समझे किसी को कुछ भी बोल देते हैं। अपमानजनक भाषा तो उनकी जुबान पर रहती है।’ ’हमारे पार्टी छोड़ने को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कैसी भाषा इस्तेमाल की, वो सबने देखा। फिर मीडिया से ये भी कहा कि इन शब्दों को काटे बिना चलाएं। जो मीडिया के सामने ऐसा बोल सकता है, वो पार्टी की बैठकों में कैसा बोलता होगा।’ क्या उद्धव की पत्नी रश्मि ठाकरे भी पार्टी के फैसलों में दखल देती हैं? जवाब मिला, ‘हां बिल्कुल, वो हर फैसले में शामिल होती हैं। उद्धव तक पहुंचने के लिए पहले उन्हीं से परमिशन लेनी पड़ती है। रश्मि ठाकरे भले सामना की एडिटर हों, पार्टी में कोई पद न हो, लेकिन पार्टी में उनका दबदबा बराबर है।’ वे आगे कहते हैं, ’ऐसी पार्टी में कोई क्यों रहेगा, जहां अपमान हो, काम करने की आजादी न हो। पार्टी में चेहरा कोई और पार्टी कोई और चला रहा हो?’ MP फंड जारी न होना सांसदों की नाराजगी की वजह शिवसेना (UBT) के सीनियर लीडर भी कंफर्म करते हैं कि महाराष्ट्र में गैर-महायुति सांसदों को खुलकर काम करने नहीं दिया जाता। सांसदों को मिलने वाला 2 करोड़ का फंड सीधा उनके अकाउंट में नहीं जाता। सांसद को क्षेत्र के विकास के लिए कलेक्टर के पास प्रोजेक्ट जमा करना होता है, तब पैसा रिलीज होता है। कलेक्टर के फंड पास किए बिना सांसद क्षेत्र में काम ही नहीं करा पाएगा। जब काम नहीं होगा, तो वोट कैसे मिलेगा। अपना सियासी भविष्य देखते हुए 6 सांसद बागी बन गए। 7वें सांसद के बागी होने का दावा कितना सच उद्धव खेमे (UBT) के सीनियर लीडर अरविंद सावंत बताते हैं कि शिंदे गुट की 6 नहीं 7 सांसदों पर नजर थी। राजाभाऊ प्रकाश वाजे को भी अप्रोच किया गया, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। इसे लेकर हमने राजाभाऊ से भी बात की, तो उन्होंने कहा- ‘मुझे किसी ने अप्रोच नहीं किया। अरविंद साहब के पास ये जानकारी कहां से आई, मुझे नहीं पता नहीं।’ क्या आपको पार्टी में टूट होने का अंदाजा था? राजाभाऊ कहते हैं, ‘14 जून की बैठक में मुझे लेकर सिर्फ तीन सांसद शामिल हुए थे। एक सांसद संजय दीना पाटिल वर्चुअली जुड़े थे। तभी लगा था कि कुछ तो गड़बड़ है क्योंकि इन सांसदों ने न जुड़ने की कोई सूचना नहीं दी थी।' क्या किसी सांसद से बातचीत के दौरान नाराजगी दिखी। इस पर वे कहते हैं, ‘नहीं, मैं पहली बार MP बना हूं, तो किसी सांसद से ऐसे घरेलू संबंध नहीं।’ फिर मान लें कि आप उद्धव गुट में हैं? जवाब मिला- 'हां, अभी तो हूं। वैसे भी अब टूट हो गई है, दोबारा टूटने के लिए दो तिहाई सांसद चाहिए। अब जाना होगा, तो अरविंद जी को भी लेकर ही जा पाऊंगा। पर अभी मैं उद्धव जी के साथ हूं।' संजय राउत और रश्मि ठाकरे का पार्टी में कितना दखल है? जवाब मिला- ‘संजय राउत तो दखल देंगे ही, रश्मि ठाकरे भी देती हैं। कोई बागी होता है, तो उसे जाने के कारण तलाशने पड़ते हैं। मीडिया को जवाब जो देना होता है।‘ उद्धव की शिवसेना में बालासाहेब की विचारधारा नहीं एकनाथ शिंदे के साथ 2023 में पार्टी छोड़ने वाली MLC नीलम गोहरे कहती हैं, ‘पार्टी कौन चला रहा है, ये सवाल नहीं है। सवाल ये है कि पार्टी चल कैसे रही है? मैंने बालासाहेब ठाकरे के साथ काम किया है। भले कुछ मुद्दों पर मतभेद रहा हो, लेकिन वे हिंदुत्व के मुद्दे पर NDA के साथ थे। अब ये हाल है कि हिंदुत्व शिवसेना (UBT) का मुद्दा ही नहीं।’ विधायक, सांसद अब क्या MLC और पार्षद टूटने की बारी 2023 में पहले ही उद्धव की पार्टी से 3 MLC शिंदे के साथ जा चुके हैं। अब उद्धव ठाकरे समेत 4 बचे हैं। सूत्रों की मानें तो 3 और MLC तोड़ने की स्क्रिप्ट लिखी जा चुकी है। इसकी अगुवाई पूर्व शिवसेना नेता और शिंदे की पार्टी में शिवसेना (UBT) से गए MLC करेंगे। सूत्र ने बताया कि शिवसेना (UBT) के 2 MLC शिंदे गुट के संपर्क में हैं। अगले एक-दो महीने में नए समीकरण सामने आ सकते हैं। महाराष्ट्र के सीनियर जर्नलिस्ट बृजमोहन पांडेय कहते हैं, ‘आने वाले समय में ऑपरेशन टाइगर 3.0 के आसार दिख रहे हैं। इसमें शिवसेना (UBT) के 65 पार्षदों में फूट पड़ सकती है। वजह सिर्फ एक है फंड की कमी। महाराष्ट्र में गैर-महायुति पार्षदों को 25 लाख रुपए पार्टी फंड की तरफ से मिलते हैं। वहीं, महायुति से जुड़े पार्षदों को 2 से 3 करोड़ रुपए तक मिलते हैं।‘ उद्धव सेना में बगावत फडणवीस पर पड़ सकती है भारी महाराष्ट्र में लोकसभा की 48 सीटे हैं। 2024 में सबसे ज्यादा 13 सीटें कांग्रेस को मिली। BJP और शिवसेना (UBT) को 9-9, NCP (शरद पवार) को 8 और शिवसेना (शिंदे गुट) को सिर्फ 7 सीटों पर जीत मिली। NCP (अजीत पवार) एक सीट जीत पाई। एक सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार जीता। इस तरह शिंदे की शिवसेना पांचवें नंबर पर है। उद्धव गुट के 6 सांसदों के आने से शिंदे और कांग्रेस के सांसदों की संख्या बराबर हो जाएगी। पॉलिटिकल एनालिस्ट पांडुरंग म्हस्के कहते हैं, ‘NDA में BJP के 240 सांसद हैं। उसके बाद 16 सांसद TDP और 12 सांसद JDU के हैं। बंगाल चुनाव के बाद TMC के 20 सांसदों के आने से शिंदे का दावा थोड़ा कमजोर पड़ा था, लेकिन UBT के 7 सांसदों के आने से शिंदे के सांसदों की संख्या 13 हो जाएगी। इस तरह शिंदे की पार्टी NDA में चौथे नंबर की पार्टी हो जाएगी।’ ………………ये खबर भी पढ़ें… सैनी-शुभेंदु-योगी, BJP का ट्रिपल इंजन पंजाब मिशन पंजाब में सैनी के कार्यक्रम विधानसभा चुनाव के लिए BJP के ‘पंजाब प्लान’ की झलक है। सोर्स बताते हैं कि पिछले 6-7 महीनों में सैनी पंजाब में 45 से ज्यादा दौरे और 65 से ज्यादा कार्यक्रम कर चुके हैं। इनके जरिए राज्य की 33% OBC आबादी पर नजर है। पंजाब में BJP 117 विधानसभा सीटों में से 40 सीटें टागरेट कर रही है। पढ़िए पूरी खबर…
समझौते में अधिकारों को कमजोर करने की कोशिश हुई तो रक्षा के लिए हर मोर्चे पर तैयार ईरान: आईआरजीसी
ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने एक बार फिर चेतावनी देते हुए कहा कि अगर अमेरिका जरूरत से ज्यादा मांगें रखता है या ईरानी जनता के अधिकारों को कमजोर करने की कोशिश करता है, तो आईआरजीसी उसे पहले से भी बड़ी ऐतिहासिक हार देने के लिए पूरी तरह तैयार है।
एआई, रिसर्च और व्यापार पर भारत-ब्रिटेन की चर्चा, 15 जुलाई से लागू होगा सीईटीए
भारत और ब्रिटेन ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), नई तकनीकों, रिसर्च और इनोवेशन के क्षेत्र में मिलकर काम आगे बढ़ाने पर चर्चा की
ईरान जंग शुरू होने से एक दिन पहले, यानी 27 फरवरी को भारत में 10 ग्राम सोना 1.60 लाख रुपए का था। जंग खत्म होने के एक दिन बाद, यानी 19 जून को कीमत 1.45 लाख प्रति 10 ग्राम हो गई। यानी करीब 10% की गिरावट। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तो इस दौरान 20% गिरावट हुई। अब अमेरिकी बैंकिंग संस्थान जेपी मॉर्गन का अनुमान है कि 2026 के अंत तक सोने के दाम 40% तक बढ़ जाएंगे। आखिर ईरान जंग के दौरान सोने के दाम क्यों घटे? अब कीमत बढ़ने का अनुमान क्यों लगाया जा रहा? और अभी सोना खरीदना ठीक रहेगा या नहीं; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में... सवाल-1: ईरान जंग के दौरान सोने की कीमत क्यों घटी? जवाब: सोना सुरक्षित निवेश माना जाता है। जंग की सुगबुगाहट भी हो, तो निवेशक सोने का रुख करने लगते हैं। डिमांड बढ़ने से सोने की कीमतें भी बढ़ने लगती हैं। इस ट्रेंड से उलट ईरान जंग के दौरान सोने की कीमतें घटीं। इसकी 3 प्रमुख वजहें हैं… 1. डॉलर की मजबूती के चलते सोने की खरीद घटी 2. पहले से महंगा चल रहा सोना बेचकर प्रॉफिट बुकिंग 3. सोना महंगा होने से घरेलू डिमांड घटी सवाल-2: अगले 6 महीने में सोना कितना महंगा हो सकता है? जवाब: 19 जून को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में सोने के दाम 4,170 डॉलर प्रति औंस हैं। वित्तीय संस्थानों और बैंकों के मुताबिक, अगले 6 महीने में इसकी कीमतें 20% से 40% तक बढ़ने का अनुमान लगाया जा रहा है… जेपी मॉर्गन ग्लोबल रिसर्च: 6,000 डॉलर प्रति औंस। यानी 40% से ज्यादा महंगा होने का अनुमान। जर्मनी का डॉयचे बैंक: 6,000 डॉलर प्रति औंस। अमेरिका बेस्ड इन्वेस्टमेंट बैंक गोल्डमैन सैक्स: 5,400 डॉलर प्रति औंस। स्विस इन्वेस्टमेंट बैंक UBS: 5,500 डॉलर प्रति औंस। अमेरिका का सिटीबैंक: 5,000 डॉलर प्रति औंस। जेपी मॉर्गन ने ये भी कहा है कि 2027 के आखिर तक कीमत 6,300 डॉलर तक पहुंच सकती हैं। अगर सोना 20% बढ़ा, तो भारत में 10 ग्राम सोने की कीमत 1.74 लाख रुपए, 30% बढ़ा तो कीमत 1.88 लाख और अगर 40% बढ़ा तो कीमत 2.03 लाख पहुंच जाएगी। सवाल-3: सोने की कीमतें बढ़ने का अनुमान क्यों लगाया जा रहा? जवाब: सोने के दाम बढ़ने की सबसे बड़ी वजह है सेंट्रल बैंक की खरीदारी। दरअसल, 2022 में जब रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ, तो अमेरिका ने यूरोपीय दोस्तों के साथ मिलकर रूस के 300 बिलियन डॉलर के फॉरेन रिजर्व पर रोक लगा दी थी। माना जाने लगा कि अमेरिका अपनी करेंसी को हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकता है। इसके बाद से दुनियाभर के देशों में डॉलर के प्रति भरोसा कम होने लगा और वो अपना फॉरेन रिजर्व दूसरी करेंसी और खासकर सोने में जमा करने लगे। इस वजह से सोने की डिमांड बढ़ने लगी और कीमतें भी। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक, 2025-26 में दुनियाभर के केंद्रीय बैंकों ने कुल 900 टन से ज्यादा सोना खरीदा, जो ज्यादा खरीद का लगातार चौथा साल है। 2026 की पहली तिमाही में बैंकों ने कागज पर 16 टन खरीद दिखाई। जेपी मॉर्गन का मानना है कि असली खरीदारी कहीं ज्यादा हुई। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल 244 टन खरीद का डेटा दे रहा है। सोने की इस खरीद में सबसे आगे है चीन। ‘पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना’ फरवरी 2026 तक हर महीने 1 टन सोना खरीद रहा था। मार्च में उसने 5 टन और अप्रैल में 8 टन सोना खरीदा।’ अब ग्वाटेमाला, इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों के सेंट्रल बैंकों ने भी सोना खरीदना शुरू किया है। इसी वजह से जेपी मॉर्गन ने अनुमान लगाया कि अब सोने की कीमतें बढ़ेगी। इसके अलावा वो 4 फैक्टर अब भी मौजूद हैं, जो पिछले कुछ सालों से सोने की डिमांड बढ़ा रहे थे- सवाल-4: तो अभी सोना-चांदी खरीदना चाहिए या नहीं? जवाब: एक्सपर्ट्स मानते हैं कि अगले 1 से 3 महीने सोना खरीदने के लिए सही समय है। शेयर बाजार, गोल्ड और कमोडिटीज वगैरह से जुड़ी एनालिसिस देने वाली फर्म ‘केड़िया एडवाइजरी’ के डायरेक्टर अजय केड़िया कहते हैं, ‘अमेरिका के फेडरल रिजर्व ने 17 जून संकेत दिए गए कि आगे ब्याज दरें बढ़ सकती हैं। ऐसे में सोने के बजाय डॉलर और बॉन्ड्स में ज्यादा इन्वेस्टमेंट होता है। इसके चलते सोने के दाम अभी कुछ गिर सकते हैं। हालांकि लॉन्गटर्म में सोने के दाम बढ़ेंगे। अगर सोना खरीदना है, तो अब से एक से तीन महीने के बीच खरीदना ठीक रहेगा।’ HDFC सिक्योरिटीज के रिसर्च एनालिस्ट अनुज गुप्ता कहते हैं कि अभी सोने और चांदी दोनों के दाम घटेंगे। इसलिए फिलहाल कुछ महीने सोना इन्वेस्टमेंट के लिए बहुत अच्छा एसेट नहीं है। साल के आखिर तक सोने की इंटरनेशनल मार्केट में कीमत 5 हजार डॉलर प्रति औंस तक आ सकती है। इसलिए लॉन्ग टर्म के लिहाज से सोना खरीदा जा सकता है। सवाल-5: चांदी की कीमत पर क्या असर पड़ने वाला है? जवाब: 1 जनवरी 2025 को चांदी की कीमत 86,017 रुपए थी। जो भारत में तब का ऑल-टाइम हाई था। 2025 में चांदी सबसे ज्यादा 170% बढ़ी और 30 जनवरी 2026 को 3.39 लाख पर बंद हुई। हालांकि ईरान जंग के दौरान दाम गिरे और 18 जून को ये 2.40 लाख रुपए पर है। गहनों के अलावा चांदी का इंडस्ट्रियल यूज भी होता है। अमेरिकी NGO ‘सिल्वर इंस्टीट्यूट’ के मुताबिक, अगले एक साल में सोलर पैनल, EV, डेटा सेंटर और AI सेक्टर में चांदी की बढ़ती खपत से इसकी मांग और दाम बढ़ सकते हैं। डिस्क्लेमर: यह स्टोरी केवल एजुकेशनल उद्देश्यों से लिखी गई है। इन्वेस्टर्स को हमारी सलाह है कि निवेश से जुड़ा कोई भी फैसला लेने से पहले अपने स्तर पर विशेषज्ञों से परामर्श जरूर लें। *****रिसर्च सहयोग - प्रथमेश व्यास-----------------------------------------------------------ये खबर भी पढ़ें… भारत का रुपया एशिया में सबसे तेज गिर रहा:पाकिस्तानी रुपया मजबूत हुआ; आखिर सरकार से कहां चूक हो रही, टॉप एक्सपर्ट्स से समझिए डॉलर के मुकाबले भारत का रुपया एशिया में सबसे तेजी से गिर रहा है। पिछले 5 महीने में 6% से ज्यादा टूटा। जबकि इसी दौरान पाकिस्तानी रुपया 0.5% और चीनी युआन तो 3% मजबूत हो गया। पढ़ें पूरी खबर…
बांग्लादेश में खसरे जैसे लक्षणों से होने वाली मौतों का सिलसिला जारी है। पिछले 24 घंटों में 5 और बच्चों की मौत दर्ज की गई है।
ईरान के साथ हुए समझौते को लेकर अमेरिका में बहस तेज है, लेकिन जेडी वेंस लगातार इसके पक्ष में खुलकर सामने आ रहे हैं। वे टीवी इंटरव्यू, सार्वजनिक कार्यक्रमों और राजनीतिक मंचों पर इस समझौते का बचाव कर रहे हैं।

