डिजिटल समाचार स्रोत

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वियतनाम के साथ ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल डील पहले ही हो चुकी है साइन: रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह

मिसाइल बनाने में भारत की बढ़ती विशेषज्ञता और बढ़ती पहुंच पर जोर देते हुए, रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने शनिवार को बताया कि वियतनाम के साथ ब्रह्मोस मिसाइल डील पर हस्ताक्षर हो चुका है

देशबन्धु 30 May 2026 11:27 pm

बांग्लादेश: खसरे से मरने वालों की संख्या 580 के पार, 24 घंटे में 8 बच्चों ने तोड़ा दम

खसरे के प्रकोप के कारण बांग्लादेश में मौतों की संख्या बढ़कर 583 हो गई है। पिछले 24 घंटों में (शुक्रवार से शनिवार सुबह 8 बजे तक) खसरे और इससे मिलते-जुलते लक्षणों के कारण आठ और बच्चों की मौत दर्ज की गई है।

देशबन्धु 30 May 2026 9:35 pm

आज का एक्सप्लेनर:पहले ईरान को तबाह किया, अब ट्रम्प ₹29 लाख करोड़ देकर फिर खड़ा करेंगे; अमेरिका को ऐसी डील क्यों करनी पड़ रही

एक मशहूर कहावत है- नमाज बख्शवाने गए थे, रोजे गले पड़ गए। ट्रम्प के साथ कुछ ऐसा ही हो रहा। तीन महीने पहले ईरान को घुटनों पर लाने निकले थे, आज खुद 300 अरब डॉलर का इन्वेस्टमेंट फंड लेकर उसके दरवाजे पर खड़े हैं। रिपोर्ट्स हैं कि जंग रोकने का मसौदा तैयार हो चुका है। सिर्फ ट्रम्प और खामेनेई के दस्तखत होने बाकी हैं। अमेरिका-ईरान के समझौते की शर्तें क्या हैं, इसमें ईरान कैसे फायदे में और आखिर ट्रम्प को ऐसी डील क्यों करनी पड़ रही; आज के एक्सप्लेनर में समझिए… सवाल-1: अमेरिका और ईरान के बीच किन शर्तों पर डील हो रही है?जवाबः अमेरिकी मीडिया आउटलेट Axios ने 28 मई को रिपोर्ट किया कि अमेरिका और ईरान ६० दिन के लिए सीजफायर बढ़ाने को तैयार हैं। दोनों देशों के बीच एक MoU यानी समझौता ज्ञापन पर सहमति बनी। इस पर प्रेसिडेंट ट्रम्प की फाइनल मंजूरी बाकी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक इस मसौदे में 5 प्रमुख शर्तें हैं… 1. होर्मुज स्ट्रेट खुलेगाः होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों के निकलने पर कोई रोक नहीं होगी। ईरान किसी जहाज से कोई टोल या ट्रांजिट फीस नहीं वसूलेगा। ईरान को 30 दिनों के अंदर होर्मुज स्ट्रेट से सभी बारूदी सुरंगें हटानी होंगी। अमेरिका भी होर्मुज के बाहर ओमान की खाड़ी से अपनी नाकाबंदी हटाएगा। 2. ईरान परमाणु हथियार नहीं बनाएगाः सीजफायर के दौरान ईरान के पास मौजूद एनरिच्ड यूरेनियम के निपटारे पर ही बात की जाएगी। अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक, एक ईरानी ऑफिसर ने बताया कि ईरान अपने न्यूक्लियर प्रोग्राम को रोक देगा। बदले में अमेरिका ये वादा करेगा कि जब तक दोनों देशों में समझौते पर आखिरी बातचीत न हो जाए, तब तक ईरान पर प्रतिबंध नहीं बढ़ाए जाएंगे। 3. ईरान के जब्त पैसे मिलेंगे: विदेशी बैंकों में ईरान के करीब 24 अरब डॉलर फ्रीज हैं। अब समझौते के तहत उसके ये पुराने फंड रिलीज किए जा सकते हैं। अमेरिकी ऑफिसर ने कहा कि अब ईरान के पास अपनी इकॉनमी को बंधन से आजाद करने का मौका है। ईरानी न्यूज एजेंसी तसनीम के मुताबिक, ईरान के 24 अरब डॉलर में से 12 अरब डॉलर देने पर बातचीत आगे बढ़ी है। 4. इजराइल हिजबुल्लाह पर हमले रोकेगा: ईरानी अधिकारियों और एक राजनयिक के अनुसार लेबनान में लड़ाई रोकना भी समझौते में शामिल है। ट्रम्प प्रशासन को उम्मीद है कि ईरान हिजबुल्लाह और हूती जैसे मिलिटेंट ऑर्गेनाइजेशन की मदद पर बात करेगा। 5. 29 लाख करोड़ लगाकर ईरान का रीकन्स्ट्रक्शनः न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, समझौते में सबसे हैरान करने वाला संशोधन ईरान के लिए एक इन्वेस्टमेंट फंड का जिक्र है। ये फंड 300 अरब डॉलर यानी करीब 28.5 लाख करोड़ रुपए का है। एक ईरानी अधिकारी ने इसे ईरान में रीकंस्ट्रक्शन प्रोग्राम बताया। सवाल-2: अगर डील हुई, तो कौन ज्यादा फायदे में होगा?जवाबः मौजूदा समझौते में जितनी शर्तें सामने आई हैं, उनसे ईरान को ज्यादा फायदा है… ट्रम्प सिर्फ एक बात को भुना सकते हैं कि अब ईरान परमाणु बम नहीं बना सकेगा। लेकिन उसमें भी झोल है… पॉलिटिकल रिस्क कंसल्टेंसी फर्म यूरेशिया ग्रुप के सीनियर ईरान एनालिस्ट ग्रेगरी ब्रू कहते हैं, 'ये कुल मिलाकर ईरान की जीत है। उसने एक महीने से ज्यादा समय तक बमबारी झेली। होर्मुज को बंद रखा और अमेरिका के साथ अपनी शर्तों पर समझौता करके ही इसे दोबारा खोलने पर राजी हुआ। ट्रम्प ने जंग के पीछे जो टारगेट बताए थे, उनमें से कुछ भी हासिल नहीं हुआ। न ईरान में शासन बदला, न वेनेजुएला जैसी सफलता मिली, न होर्मुज खुलवा सके और न कोई बड़ा परमाणु समझौता कर पाए।' सवाल-3: आखिर अमेरिका को ऐसी डील क्यों करनी पड़ रही है?जवाबः ईरान से घाटे की डील करने के पीछे ट्रम्प और अमेरिका की 3 बड़ी मजबूरियां हैं… 1. ईरान जंग में फायदे की बजाय नुकसान हुआ 2. ट्रम्प की ईरान पर जीत दिखाने की जल्दी 3. मिड-टर्म चुनाव गंवाना नहीं चाहते ट्रम्प सवाल-4: अमेरिका-ईरान की इस डील में अभी क्या बड़ी अड़चने हैं? जवाबः दोनों देशों ने मसौदा भले तैयार कर लिया है, लेकिन दस्तखत होने से पहले कई अड़चने हैं। सबसे बड़ी अड़चन एनरिच्ड यूरेनियम को लेकर है। ईरान के पास 440 किलो एनरिच्ड यूरेनियम और 10 टन कच्चा यूरेनियम है। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाघई के मुताबिक, 'मौजूदा बातचीत युद्ध खत्म करने तक सीमित है, इसमें यूरेनियम का मुद्दा शामिल नहीं है। ट्रम्प ईरान के इसे किसी तीसरे देश में ले जाने पर सहमत हैं, लेकिन इसे रूस या चीन भेजने पर राजी नहीं हैं। जबकि 2015 में परमाणु समझौते के बाद ईरान ने अपने यूरेनियम का 97% रूस ही भेजा था। ईरानी मामलों के एक्सपर्ट अली वायज के मुताबिक, '10 साल पहले अमेरिका को ईरान से न्यूक्लियर डील करने में ढाई साल लग गए थे। आज के हालात कहीं ज्यादा पेचीदा हैं। अगले 60 दिनों में कोई हल निकलना मुश्किल है। होर्मुज पर भी बात बिगड़ सकती है। ईरान चाहता है कि पहले अमेरिकी नाकेबंदी हटे, फिर होर्मुज पर बात हो। वह बाद में भी ओमान के साथ मिलकर होर्मुज में टोल वसूलना चाहता है, जो ट्रम्प को मंजूर नहीं है। ईरान के भीतर कई कट्टरपंथी संगठन भी डील का विरोध कर रहे हैं। ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 29 मई को तेहरान में बड़ी रौलियां निकलीं, जिनमें अमेरिका के खिलाफ नारेबाजी हुई। ईरान किसी भविष्य में संभावित आंतरिक संघर्ष से बचना चाहता है, इसीलिए वह किसी समझौते तक पहुंचने में समय ले रहा है। सवाल-5: अगर ये डील हो गई, तो सबकुछ पहले जैसा सामान्य होने में कितना वक्त लगेगा? जवाबः ईरान की बिछाई बारूदी सुरंगें हटाने में कई हफ्ते लग सकते हैं। अमेरिकी नाकाबंदी भी ईरान से बातचीत के आधार पर धीरे-धीरे कम होगी। प्रोफेसर राजन कुमार के मुताबिक, ‘मौजूदा हालात में सीजफायर संभव है। युद्ध रुकने के बाद तेल के दाम पहले जैसे होने में 6-9 महीने लग सकते हैं, क्योंकि बड़ी तेल कंपनियां अक्सर पहले से तय कॉन्ट्रैक्ट पर तेल खरीदती-बेचती हैं। कई बार 3-6 महीने पहले ही यह तय हो चुका होता है कि कितना तेल खरीदना है और किस कीमत पर खरीदना है।’ दिल्ली बेस्ड थिंक टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के एक्सपर्ट विवेक मिश्र बताते हैं, ‘होर्मुज में 18-20 हजार जहाज फंसे हुए हैं। इन्हें निकालने में 3 हफ्ते लग सकते हैं। इसके बाद अगले डेढ़ महीने में दोनों तरफ से जहाजों की आवाजाही सामान्य रूप से शुरू हो पाएगी।’ विवेक मिश्र कहते हैं, ‘UAE पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन OPEC से बाहर हो गया है। OPEC के सदस्य देश मिलकर तेल के प्रोडक्शन की मात्रा और तेल की कीमतें तय करते थे। अब UAE जितना चाहे उतना तेल बाजार में उतार सकता है। ऐसे में कीमत पर कंट्रोल रखना आसान नहीं होगा।’ ईरानी मामलों के एक्सपर्ट यासिर अली मिर्जा मानते हैं, ‘फिलहाल दोनों देशों को किसी डील पर पहुंचने में कम से कम 6 महीने और लग सकते हैं। ईरान की स्ट्रैटजी होर्मुज बंद करके वर्ल्ड इकॉनोमी पर दबाव बढ़ाने की है, जिसमें वो काफी हद तक सफल रहा है। ऐसे में वह आसानी से अमेरिका की शर्तें मानने वाला नहीं है।’ ***** रिसर्च सहयोग - प्रथमेश व्यास----------------------------------------------------------- ये खबर भी पढ़ें…ट्रम्प ने क्या मांग लिया, जिससे पाकिस्तान का सीधा इनकार:अमेरिका का गुस्सा मंजूर, इजराइल से दोस्ती क्यों नहीं कर सकता पाकिस्तान अमेरिकी थिंकटैंक अटलांटिक काउंसिल के एक्सपर्ट माइकल कुगेलमैन कहते हैं- ट्रम्प के जितना करीब जाओगे, उतना ही जोखिम बढ़ेगा। वह कुछ ऐसा मांग बैठेंगे, जो देना संभव न हो। पाकिस्तान इस वक्त उसी ‘कुआं और खाई’ की सिचुएशन में आ गिरा है। पढ़ें पूरी खबर…

दैनिक भास्कर 30 May 2026 6:38 pm

ट्रंप ने ईरान के साथ ड्राफ्ट डील पर 'अंतिम फैसला' टाला

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ संभावित समझौते पर अंतिम फैसला फिलहाल टाल दिया है। उन्होंने व्हाइट हाउस के सिचुएशन रूम में अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा टीम के साथ करीब दो घंटे तक बैठक की

देशबन्धु 30 May 2026 8:48 am

ईरान हॉर्मुज स्ट्रेट के प्रबंधन पर अड़ा, कहा- अमेरिका के साथ अभी तक कोई समझौता तय नहीं

ईरान हॉर्मुज स्ट्रेट के प्रबंधन को लेकर अड़ा हुआ है। इसी बीच ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बगाई ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका के साथ अभी तक किसी भी समझौते को अंतिम रूप नहीं दिया गया है

देशबन्धु 30 May 2026 8:21 am

टोरंटो में इंडियन स्टूडेंट की मौत, भारतीय मिशन शव वापस लाने के लिए कर रहा काम

टोरंटो में भारतीय कॉन्सुलेट ने इंडियन स्टूडेंट विधि मेघा की मौत पर दुख जताया

देशबन्धु 30 May 2026 8:06 am

आज का एक्सप्लेनर:बिना गड़बड़ क्यों नहीं हो पा रहे बड़े एग्जाम; NEET में सेना लगानी पड़ रही, CBSE-12th में गलत मार्किंग, इसका इलाज क्या

पेपर लीक के चलते रद्द हुआ NEET-UG का एग्जाम 21 जून को दोबारा होगा। इस बार पेपर पहुंचाने से लेकर बाकी प्रोसेस में एयरफोर्स और आर्मी की मदद ली जाएगी। इधर CBSE ने 12th एग्जाम की कॉपी पहली बार डिजिटल तरीके से चेक करवाईं। बच्चों ने इसमें कई तरीके की खामियां बता दीं। मार्किंग का काम प्राइवेट कंपनी के जिम्मे था। आखिर देश के बड़े एग्जाम बिना गड़बड़ के क्यों नहीं हो पा रहे, सरकार, सिस्टम कहां फेल और इसका इलाज क्या, जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: NEET का रीएग्जाम करवाने में सेना क्यों लगानी पड़ रही? जवाब: 3 मई 2026 को देशभर के 22.79 लाख छात्रों ने NEET-UG 2026 का एग्जाम दिया। 7 मई को खबर आई कि क्वेश्चन-पेपर सोशल मीडिया पर एग्जाम से पहले ही लीक हो चुका था। 12 मई को NTA ने मामले की जांच CBI को सौंपी। अब तक इसमें 13 गिरफ्तारियां हुई हैं। अब एग्जाम 21 जून को दोबारा होगा। 28 मई को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के आवास पर एक हाई-लेवल मीटिंग हुई, जिसमें केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, NTA के निदेशक अभिषेक सिंह के अलावा एयरफोर्स के कई सीनियर अफसर भी मौजूद थे। अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इस बैठक में फैसला हुआ कि क्वेश्चन पेपर की सेटिंग से लेकर छपाई, ट्रांसपोर्टेशन और डिलीवरी की प्रक्रिया में सेना को शामिल किया जाएगा।धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि पहले ये जिम्मेदारी अकेले डाक विभाग की थी, लेकिन इस बार सभी सेंटर पर पेपर पहुंचाने में एयरफोर्स की मदद ली जाएगी। हालांकि, NTA के अधिकारियों का कहना है कि सेना की भूमिका केवल लॉजिस्टिक्स, ट्रांसपोर्टेशन या मौसम से जुड़ी किसी इमरजेंसी के दौरान ही होगी। परीक्षा की निगरानी में कोई भूमिका नहीं होगी। सवाल-2: CBSE 12th के रिजल्ट में गड़बड़ी कैसे हुई? जवाब: देशभर के कुल 17.68 लाख छात्रों ने 17 फरवरी से 10 अप्रैल के बीच 2026 की CBSE 12th बोर्ड के एग्जाम दिए। रिजल्ट आया तो, पिछली बार के 88.39% मुकाबले इस बार 85.2% स्टूडेंट्स ही पास हुए। बोर्ड एग्जाम देने वाले 22% यानी 4 लाख से ज्यादा छात्रों ने अपनी कॉपी दोबारा जांचने यानी री-इवैल्यूएशन के लिए अप्लाई किया है। कई स्टूडेंट्स ने सोशल मीडिया पर फिजिक्स और मैथ्स में कम नंबर आने की शिकायत की। इनमें JEE क्वालिफाई कर चुके स्टूडेंट्स भी हैं। स्टूडेंट्स की आंसर शीट्स में स्कैन कॉपी ब्लर होने पर भी नंबर काटे गए। दिल्ली के एक स्टूडेंट वेदांत श्रीवास्तव ने बताया कि जो फिजिक्स की आंसर शीट भेजी गई, उसमें किसी और की हैंडराइटिंग है। 28 मई को धर्मेंद्र प्रधान ने री-इवैल्यूएशन प्रक्रिया में गड़बड़ियों की बात मानी और कहा कि हर शिकायत का समाधान किया जाएगा। सवाल-3: आखिर देश के बड़े एग्जाम ठीक से क्यों नहीं हो पा रहे? जवाब: अभ्यर्थियों की संख्या के आधार पर सबसे बड़े 3 एग्जाम हैं- मेडिकल कॉलेजेज में एंट्रेंस के लिए NEET-UG, इंजीनियरिंग कॉलेजेज में एडमिशन के लिए IIT-JEE मेन्स और यूनिवर्सिटीज में एंट्रेंस के लिए CUET-UG। इस साल NEET एग्जाम में 22.8 लाख, JEE में 16 लाख और CUET में 18.68 लाख स्टूडेंट्स बैठे थे। संसद की स्थायी समिति की दिसंबर 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में NTA के जरिए हुए 14 एग्जाम में से कम से कम 5 में पेपर लीक, पेपर में गलतियां, रिजल्ट में देरी जैसी दिक्कतें हुईं। UGC-NET, CSIR-NET और NEET-PG के एग्जाम रोकने पड़े और CUET-UG और PG का रिजल्ट आने में देरी हुई। इन बड़े एग्जाम में गड़बड़ के पीछे 3 बड़ी वजहें है… 1. एग्जाम एजेंसी से सेंटर तक पेपर लीक माफिया का मजबूत नेक्सस 2. पेपर की प्रिंटिंग से डिलीवरी तक का काम प्राइवेट फर्म्स पर निर्भर 3. NTA की जवाबदेही नहीं, पेपर लीक का कानून कमजोर सवाल-4: IIT-JEE, UPSC के एग्जाम में NEET जैसी गड़बड़ क्यों नहीं होती? जवाब: NEET-UG एग्जाम एक ही शिफ्ट में पूरे देश में एक साथ होता है। ये अकेला एग्जाम है, जिसे NTA ने ऑफलाइन मोड में करवाता है। इसके पीछे ये तर्क है कि आधे सवाल बायोलॉजी के होते हैं, जो न्यूमेरिक वैल्यू के बजाय सब्जेक्टिव नॉलेज के ज्यादा होते हैं। इसलिए अलग-अलग शिफ्ट में सवालों की कठिनता का स्तर बदलने से कुछ स्टूडेंट्स के साथ भेदभाव हो सकता है। ऋषिकेश शर्मा कहते हैं, ‘720 मार्क्स के NEET में एक-एक नंबर पर हजारों रैंक आती हैं। पेपर आसान होने के चलते स्कोरिंग हाई हो जाती है। सिलेक्शन 85% मार्क्स के ऊपर होता है, इसलिए विंडो बहुत छोटी है। अगर कुछ सवाल भी लीक हो जाएं, तो पूरा पेपर कॉम्प्रोमाइज हो जाता है। इसीलिए इसमें पैसे और कमाई का खेल बहुत ज्यादा होता है।’ वहीं IIT-JEE कई शिफ्ट में होता है। इसके दो एग्जाम होते हैं- मेन्स और एडवांस्ड। इसके अलावा हर शिफ्ट में एग्जाम पेपर अलग होता है। ऋषिकेश शर्मा कहते हैं कि ये पेपर मुश्किल बनाया जाता है। 25% मार्क्स लाने पर भी सिलेक्शन हो जाता है। बच्चों को सिलेक्शन के लिए बड़ी विंडो मिलती है। इसलिए नकल और पेपर लीक के गिरोहों के लिए ये एग्जाम मुफीद नहीं है। अगर किसी शिफ्ट में कोई गड़बड़ हुई भी है, तो पूरे देश में JEE के रिजल्ट पर असर नहीं पड़ता। इसी तरह UPSC के CSE के एग्जाम में बीते 5 सालों में पेपर लीक की कोई रिपोर्ट नहीं है। इसमें 3 फेज यानी प्री, मेन्स और इंटरव्यू के जरिए सिलेक्शन होता है। मेन्स एग्जाम सब्जेक्टिव होता है, यानी जवाब लिखकर देना होता है। ऐसे में नकल के जरिए किसी को पास करवाना मुश्किल होता है। शशि प्रकाश कहते हैं कि UPSC एक सेंट्रल स्ट्रक्चर के तहत एग्जाम करवाता है। साथ ही पूरे प्रोसेस में प्राइवेट वेंडर्स को काम की आउटसोर्सिंग बहुत कम होती है। इसलिए पेपर लीक की गुंजाइश कम हो जाती है। सवाल-5: बड़े एग्जाम में पेपर लीक का इलाज क्या है? जवाब: UPSC ट्यूटर प्रभात रंजन और एलन सेंटर हेड ऋषिकेश शर्मा 5 बातें कहते हैं… ***** रिसर्च सहयोग - प्रथमेश व्यास----------------------------------------------------------- नीट पेपर लीक से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… NEET पेपर लीक का ब्यूटीशियन कनेक्शन:जहां पेन ले जाना भी मना, वहां से बाहर आया पेपर, क्या कोई अफसर मास्टरमाइंड NEET पेपर लीक की कड़ियां अब जुड़ने लगी हैं। इस मामले में पहले केमिस्ट्री प्रोफेसर पीवी कुलकर्णी और फिर बॉटनी लेक्चरर मनीषा मांधरे अरेस्ट हुईं। अब NEET एग्जाम कराने वाली नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) के अफसर के भी शामिल होने की बात सामने आ रही है। पढ़ें पूरी खबर…

दैनिक भास्कर 29 May 2026 7:03 pm

यूक्रेन युद्ध के बीच रूस की तेल अर्थव्यवस्था पर अमेरिकी प्रतिबंध कितने असरदार, नई रणनीति पर बहस तेज

यूक्रेन युद्ध को लेकर अमेरिका की नीति की आलोचना के बीच अमेरिका के ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने कहा है कि ट्रंप प्रशासन ने रूस के तेल क्षेत्र पर किसी भी पूर्व अमेरिकी प्रशासन की तुलना में अधिक कड़े प्रतिबंध लगाए हैं। उन्होंने व्हाइट हाउस में एक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान कहा कि प्रशासन ने रूस की ऊर्जा इंडस्ट्री के खिलाफ अभूतपूर्व कदम उठाए हैं, जिनमें देश की दो सबसे बड़ी तेल कंपनियों पर प्रतिबंध भी शामिल हैं।

देशबन्धु 29 May 2026 11:51 am

न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी की दोटूक: 'बंद हो ईरान युद्ध, आम जनता और अर्थव्यवस्था चुका रही है भारी कीमत'

मेयर ममदानी ने इस युद्ध की मानवीय त्रासदी पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि जंग की सबसे भयावह कीमत उन लोगों को चुकानी पड़ रही है, जिनकी निर्णय लेने की प्रक्रिया में कोई आवाज ही नहीं थी।

देशबन्धु 29 May 2026 10:53 am

ईरान के साथ ‘खराब समझौते’ को स्वीकार नहीं करेंगे ट्रंप: अमेरिकी वित्त मंत्री

अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के साथ किसी भी 'खराब समझौते' को स्वीकार नहीं करेंगे। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी भी समझौते में ईरान के परमाणु कार्यक्रम का समाधान होना चाहिए और होर्मुज जलडमरूमध्य में खुली शिपिंग की गारंटी होनी चाहिए।

देशबन्धु 29 May 2026 9:27 am

30 लाख का कर्ज चुकाने रूस गया रमैया, लौटा शव:मां बोली- एक फोन के बाद बिखरा परिवार, मॉस्को में मौत से लड़ रहे दो भारतीय

16 मई की रात ओडिशा में रहने वाले गणेश के पास छोटे भाई रमैया का फोन आया। बताया कि घर खर्च के लिए 22 हजार रुपए भेज रहा है। डेढ़ महीने पहले ही रमैया कंस्ट्रक्शन साइट पर काम करने के लिए रूस गया था। मां से भी बात हुई। कहा नाइट ड्यूटी पर है और खाना खाकर साइट जाने की तैयारी कर रहा है। सब रोज की तरह सामान्य था। अगले दिन सुबह दोबारा कॉल आया। अबकी फोन रमैया के रूम पार्टनर देवेंद्र का था। उसने बताया कि सुबह करीब 5 बजे कंपनी साइट पर यूक्रेन ने कई ड्रोन हमले किए। रमैया भी साइट पर था और हमले का शिकार हो गया। दोपहर होते-होते उसकी मौत की खबर आ गई। घटना को 10 दिन से ज्यादा बीत चुके हैं, रमैया का अंतिम संस्कार भी कर दिया गया, लेकिन गंजाम में रह रहा उनका परिवार अभी सदमे से उबर नहीं सका है। परिवार परेशान है कि रमैया के जाने के बाद बहनों की शादी के लिए लिया 30 लाख का कर्ज कौन उतारेगा। रमैया के साथ हमले में ओडिशा के दो और युवक घायल हुए हैं। दोनों का मॉस्को में इलाज चल रहा है। हर महीने 35 हजार रुपए घर भेजता, अब परिवार बेसहारा रमैया मास्को में तुर्की की ऑयल और गैस कंपनी में स्टील इरेक्टर के तौर पर काम कर रहे थे। उनके परिवार से मिलने के लिए हम गंजाम के माधबांधा गांव पहुंचे। घर पर मिले रमैया के बड़े भाई गणेश बताते हैं, ‘परिवार में माता-पिता और भाई-बहन सभी दिहाड़ी मजदूर हैं। इसी से घर का खर्च चलता है। बहनों की शादी में लिया कर्ज चुकाने के लिए रमैया रूस गया था।‘ ‘वो करीब एक साल से मास्को में कंस्ट्रक्शन सेक्टर में इलेक्ट्रिकल लाइन और स्ट्रक्चरल काम कर रहा था। इसी साल फरवरी में छुट्टी लेकर गांव लौटा था और फिर 22 मार्च को मॉस्को लौट गया था। रमैया हर महीने करीब 42 हजार रुपए की कमाई से 35 हजार घर भेज देता था। मौत से एक दिन पहले जब उससे बात हुई थी, तब भी वो परिवार की ही फिक्र में था।‘ मां बोली- हम भूखों रहने को मजबूर, अब कौन संभालेगा रमैया की मां रोते हुए कहती हैं ‘वो हमारे परिवार का सबसे बड़ा सहारा था। हम सब मजदूरी करके रोज मुश्किल से 200 से 500 रुपए कमा पाते हैं। कई दिन ऐसे भी होते हैं, जब काम नहीं मिलता और परिवार को भूखे सोना पड़ता है। अब कौन हमें सहारा देगा।‘ परिवार वालों ने बताया कि इस बार रमैया गांव लौटकर अपना छोटा-मोटा काम शुरू करना चाहता था। उसने शादी करने की भी तैयारी की थी। रमैया के चाचा नारायण दिल्ली में मजदूरी करते हैं। वे कहते हैं, ‘गरीबी और काम न मिलने की वजह से गांव के लड़के काम के लिए बाहर जाने को मजबूर हैं। हमारा रमैया भी इसीलिए बाहर गया, वरना कोई जान जोखिम में डालकर रूस क्यों जाता। अब उसके बूढ़े मां-बाप की देखभाल कौन करेगा।‘ मॉस्को में मौत से लड़ रहे ओडिशा के दो और मजदूर मॉस्को में रमैया के साथ ही ओडिशा के खेतराबासी रेड्डी और तेजेश्वर रेड्डी भी हमले का शिकार हुए हैं। दोनों अभी मॉस्को के अस्पताल में भर्ती हैं। उनके परिवारों से मिलने हम गंजाम के कोथारसिंग गांव पहुंचे। खेतराबासी के घर पर उनकी पत्नी मिलीं। उन्होंने बताया, ’गर्दन और चेहरे पर गंभीर चोटें आई हैं। परिवार के पास उन्हें भारत लाकर इलाज कराने के पैसे नहीं हैं, इसलिए वो मॉस्को में ही हैं। कंपनी उनका इलाज करा रही है।’ उन्होंने खेतराबासी से हमारी फोन पर बात भी कराई। वे बताते हैं कि 17 मई को कुल 7 ड्रोन हमले हुए थे और करीब 15 लोग इसकी जद में आए। हमले में अकेले रमैया की ही मौत नहीं हुई, अजरबैजान का एक मजदूर भी मारा गया था। इसके अलावा गोपालपुर के रहने वाले सुनील, पारलाकहेमुंडी के चिनारा और दासरथी के साथ बेनीपुर के दुर्योधन भी घायल हुए हैं। इसके बाद तेजेश्वर रेड्डी के घर हमें उनकी मां मिलीं। उन्होंने बताया, ‘घटना के दिन दोपहर 3 बजे हमें खबर मिली। बेटे का चेहरा और हाथ-पैर सब जख्मी है।’ हमने जब पूछा कि आपके बेटे से कोई बात हुई। वे जवाब में कहती हैं, 'वो अभी बात नहीं कर पा रहा है। सिर्फ वीडियो कॉल पर हमें देखता है।' उन्होंने वीडियो कॉल कर हमें तेजेश्वर की हालत भी दिखाई। 66 लाख रुपए कंपनसेशन तय, परिवार बोला- अभी नहीं मिला रूस में इस वक्त करीब 70 हजार भारतीय काम कर रहे हैं। वहीं ओडिशा के गंजाम और केंद्रापाड़ा जिलों से सबसे ज्यादा युवा रूस में काम कर रहे हैं। गंजाम से हर साल करीब 200 और केंद्रपाड़ा से 150 युवक लोकल एजेंसियों के जरिए रूस जा रहे हैं। रमैया को रूस भेजने वाली मायकोन इंजीनियरिंग ट्रेनिंग एंड टेस्टिंग सेंटर के मालिक बासुदेव रेड्डी बताते हैं कि हमारी एजेंसी स्किल डेवलपमेंट और रिक्रूटमेंट का काम करती है। वे कहते हैं, ‘हादसे की जानकारी मिलते ही हमने मॉस्को में मौजूद कंपनी के अधिकारियों से बात की। फिर ओडिशा सरकार की मदद से डेडबॉडी भारत लाकर परिवार को सौंपी।‘ ‘इसी दौरान हमने रमैया के परिवार की कंपनी डायरेक्टर से बात कराके मुआवजे की रकम भी तय कराई। कंपनी ने 66 लाख रुपए कंपनसेशन देने की बात कही है।‘ हालांकि रमैया के परिवार का कहना है कि अब तक पूरा मुआवजा नहीं मिला है। डेथ सर्टिफिकेट और बाकी जरूरी दस्तावेजों की प्रक्रिया भी पूरी नहीं हुई है। 5 सालों में विदेश में 37,740 भारतीय मजदूरों की मौत भारत से हर साल करीब 6 से 8 लाख लोग इमिग्रेशन चेक रिक्वायर्ड (ECR) कैटेगरी के तहत विदेश काम करने जाते हैं। इसमें बड़ी संख्या दिहाड़ी मजदूरों, कंस्ट्रक्शन वर्कर, ड्राइवर, वेल्डर, इलेक्ट्रिशियन और घरेलू कामगारों की होती है। 2021 से 2025 के बीच विदेश काम करने गए 37,740 भारतीय मजदूरों की मौत दर्ज की गई। अगर इसका औसत आंकड़ा देखें तो हर दिन 20 से ज्यादा भारतीय कामगार विदेश में जान गंवा रहे हैं। सिर्फ 2025 के आंकड़े देखें तो विदेश में काम करने गए 7,854 भारतीय मजदूरों की मौत हुई। इनमें 86% से ज्यादा मौतें खाड़ी देश यूएई और सऊदी अरब में दर्ज की गईं। वहीं केंद्र सरकार ने पिछले एक साल में रूस में 26 भारतीयों की मौत की पुष्टि की है। ……………………… ओडिशा की ये खबर भी पढ़ें… 19 हजार के लिए कंकाल निकाला, अब मिले 15 लाख जीतू मुंडा, उम्र 52 साल। बदन पर सिर्फ एक कपड़ा। कंधे पर बड़ी बहन कलरा का कंकाल। कलरा के बैंक अकाउंट में 19,400 रुपए जमा थे। उनकी मौत के बाद जीतू 27 अप्रैल को पैसे निकालने बैंक पहुंचे। आरोप है कि बैंक मैनेजर ने कहा कि बहन को लाओ, तभी पैसे मिलेंगे। जीतू ने कब्र से बहन का कंकाल निकाला और तीन किमी दूर बैंक लेकर आ गए। मामला ओडिशा के क्योंझर जिले के दियानाली गांव का है। पढ़िए पूरी खबर…

दैनिक भास्कर 29 May 2026 5:06 am

14 की उम्र में शरीर बना 'पेड़ की छाल’:उठो या बैठो फटने लगती है चमड़ी, मन करता है छीलकर फेंक दूं; देश का अकेला केस

दोपहर के 1 बजे हैं। जंगल के ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर कार हिचकोले खा रही है। तेज गर्मी से गला लगातार सूख रहा है। करीब 2 घंटे बाद जंगलों में कुछ झोपड़ियां नजर आती हैं। इन्हीं झोपड़ियों में से एक के सामने हमारी कार रुकी। झोपड़ी के बाहर एक लड़की बेजान सी खड़ी नजर आई। उसकी मटमैली शर्ट और हाफ पैंट के बाहर जितना भी शरीर दिख रहा है, वह बेहद डरावना है। उसकी चमड़ी बंजर जमीन सी फटी-फटी या यूं कह लें पेड़ की छाल जैसी है। उसके शरीर से दुर्गंध आ रही है, मानो मांस का कोई टुकड़ा सड़ रहा हो। एक पल को लगा कि उल्टी हो जाएगी, तो तुरंत बैग से मास्क निकाला और लगा लिया। मुझे देखते ही लड़की सहम गई और मां को आवाज देते हुए दीवार के सहारे अकड़ी-अकड़ी सी भागने लगी। दैनिक भास्कर हर शुक्रवार ला रहा है ऐसी ही दुर्लभ बीमारियों की सीरीज- ऐ जिंदगी। मैं नीरज झा पहले एपिसोड के लिए पहुंचा हूं छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा के कौड़ गांव। गांव अब छाल बन रही इसी लड़की से पहचाना जाता है। मुझे देखकर बच्ची भागी तो उसकी आवाज सुनकर मां बाहर आ गईं। मैंने अपने बारे में बताया और आने की वजह भी। बच्ची की मां का नाम सुबी है। उन्होंने बताया कि बेटी का नाम जागेश्वरी है। वो बताती हैं- ‘साल 2012 था और महीना अप्रैल का, जब जागेश्वरी का जन्म हुआ। तीन महीने की ही हुई थी कि इसके पैर की खाल पर हल्के-हल्के कांटे उभरने लगे। हम पढ़े-लिखे नहीं हैं। लगा किसी ने कुछ तंत्र-मंत्र कर दिया है। ओझा-तांत्रिकों को दिखाया। झाड़-फूंक करवाई। देवी को बलि भी चढ़ाई, लेकिन हुआ कुछ नहीं।’ ‘कुछ महीने बाद जागेश्वरी के शरीर की पूरी चमड़ी कांटे जैसी हो गई। जब भी खेलने घर से बाहर जाती, आस-पास के बच्चे भूत-भूत कहकर चिढ़ाते। आखिर परेशान होकर इसने बाहर निकलना ही छोड़ दिया। अब इस बीमारी के साथ जागेश्वरी भी 14 साल की हो गई है।’ वह बताती हैं, ‘जागेश्वरी अंजान लोगों को देखकर डर जाती, जैसे आपको देखकर डर गई। पहले तो हम दिनभर इसकी देखभाल करते थे, लेकिन इसे ही देखते रहेंगे तो पेट कैसे भरेंगे। अब इसे छोड़कर खेत में काम करने चले जाते हैं। इसे कभी स्कूल नहीं भेजा। बच्चे चिढ़ाते हैं, मास्टर भी कहां ऐसे बच्चे को पढ़ाएंगे। एक दिन, कुछ रिश्तेदार घर आए, तो उन्होंने हमें गीदम कस्बे में इलाज कराने को कहा। जब मैं जागेश्वरी को लेकर गीदम के अस्पताल पहुंची, तो डॉक्टर समेत सभी लोग मुंह बिगाड़ने लगे। बोले- छी! ये लड़की कैसी दिखती है। इसे क्या हो गया?’ जब डॉक्टर को भी कुछ समझ नहीं आया तो हम घर लौट आए। घर से अस्पताल 20 किलोमीटर दूर है। कौन बार-बार जाता। घर में खाने को दाना नहीं, इलाज कहां से कराएं। बुखार-खांसी होती, तो जड़ी-बूटी से ठीक हो जाती। रास्ता तो आपने देखा ही है। यहां पैदल चलना भी मुश्किल है। बारिश में सोचिए क्या हाल होता होगा। अभी आप आए हैं, पता तो चल ही गया होगा। यहां कुछ नहीं है, हमने तो बिजली भी दो साल पहले ही देखी।' मैंने सुबी से कहा कि एक बार जागेश्वरी से बात करनी है। सुबी उसे समझाने लगीं, करीब आधे घंटे बाद वो घर से बाहर आई। बड़ी मुश्किल से उसे एक स्टूल पर बैठाया। जागेश्वरी की आंखों में आंसू थे। सिर से पांव तक, पेट से जांघ और पीठ तक, पूरे शरीर की चमड़ी पेड़ की छाल जैसी हो गई है। कई जगह घाव भी हैं। सिर्फ चेहरा, हथेली और पैर के तलवे अछूते हैं। कान के ऊपरी हिस्से में अभी कांटेदार उभार आ रहे हैं। मैंने जागेश्वरी से पूछा- बहुत दर्द होता है? गर्दन हिलाते हुए जागेश्वरी गोंडी भाषा में बोली- 'हां बहुत ज्यादा। अकड़न की वजह से हाथ-पैर सीधे नहीं कर पाती। लंगड़ाकर, दीवार के सहारे बमुश्किल इस कोने से उस कोने तक चल पाती हूं। शरीर की चमड़ी खिंचती है, मन करता है अपनी खाल को खुरपी से छीलकर फेंक दूं।’ करीब ही खाट पर बैठी सुबी, बेटी जागेश्वरी के कपड़े ऊपर करके पूरा शरीर दिखाती है। कहती हैं- ‘इसकी पूरे शरीर की चमड़ी ऐसी ही है। रोज घुट-घुटकर जीते हुए देख रहे हैं। कहीं जाती नहीं। एक साल पहले इसकी बड़ी बहन की शादी थी, तो एक कोने में दुबकी बैठी रही। बाहर नहीं निकली, नहीं तो रिश्तेदार डर जाते। आज भी पास ही एक गांव में रिश्तेदार के बेटे की शादी है। हमें जाना है।' मैंने पूछा- जागेश्वरी भी जाएगी? चेहरे पर बिना किसी भाव के सुबी बोली- ‘कैसे जाएगी सर? शरीर ही ऐसा है। ठीक से चल-फिर नहीं पाती। बाहर के लोग भी देखते हैं, तो डर जाते हैं। दस तरह के सवाल पूछते हैं।’ सुबी की आवाज में गुस्सा और तंज दोनों है। गुस्सा इसलिए कि जागेश्वरी बस जी रही है और तंज इसलिए कि उसके हालात कभी ठीक नहीं होंगे। थोड़ी देर बाद मैंने फिर सुबी से पूछा- जागेश्वरी को क्या बीमारी है, ये कब पता चला? सुबी बोली- ‘2019 में। यहां डॉक्टर आए थे। लोगों ने कहा- बच्ची को वहां दिखा लो। बड़े डॉक्टर देखेंगे, तो ठीक हो जाएगी। इसके पापा और चाचा इसे डॉक्टरों के पास ले गए। डॉक्टर दंग रह गए। तुरंत एंबुलेंस बुलाई और जागेश्वरी को रायपुर के बड़े अस्पताल भेज दिया। पापा-चाचा भी साथ गए। वहां हफ्तेभर तो डॉक्टरों को पता ही नहीं चला कि जागेश्वरी को कौन-सी बीमारी है। करीब एक महीने तक बेटी भर्ती रही। मुंबई से रिपोर्ट आई। तब हमें बताया कि दुनिया में इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है। मुझे तो बीमारी का नाम भी पता नहीं। इसके बाद, सुबी मुझे एक पर्चा दिखाती हैं। जिसमें बीमारी का नाम- इकथियोसिस हिस्ट्रिक्स लिखा है। सुबी बताती हैं- जब तक यह अस्पताल में भर्ती थी, तो पूरी चमड़ी ठीक हो गई। घर आते वक्त डॉक्टर ने कुछ दवाइयां दी थीं। कुछ दिन दवाई लगाई, लेकिन जब खत्म हो गई, तो बंद कर दी। अब अस्पताल इतना दूर है कि दवा लेने कौन जाए। आने-जाने का भाड़ा भी लगता है, वो कहां से लाएं। डॉक्टर भी सिर्फ नाम के हैं। बच्ची को देखने कोई नहीं आता। मैं अकेली क्या-क्या करूं। सरकार से अब तक केवल 13 हजार रुपए की मदद मिली है। न ही विकलांग सर्टिफिकेट बना है, न ही इस बीमारी का। सुनने में आया है कि ऐसे लोगों को सरकार 600 रुपए महीना देती है। लेकिन वो मदद भी नहीं मिली। इसी बीच, जागेश्वरी जमीन पर बैठने की कोशिश करती है, लेकिन उसके घुटने मुड़ नहीं रहे। हाथों का भी ऐसा ही हाल है। घर में शौचालय नहीं है। मां कहती हैं- जैसे-तैसे खेत में जाती है। 2021 में इसके पिता की गले के कैंसर से मौत हो गई। मेरी उम्र भी ढल चुकी है। मैं कमाऊं या इसकी देखभाल करूं। तीन और बच्चे हैं। सिर्फ इसे ही देखूंगी, तो बाकी का क्या होगा? मेरे बाकी तीनों बच्चे ठीक हैं। पति थे, तो सहारा था। अब जब तक मैं जिंदा हूं, इसकी देखभाल कर रही हूं। मरने के बाद इसका क्या होगा, पता नहीं। मेरी भी उम्र अब कितनी ही बची है।’ सुबी थोड़ा रुककर पूछती हैं- हमें शादी में जाना है। कुछ और तो नहीं पूछना? अब मैं वहां से चल पड़ता हूं। जागेश्वरी की हालत देखने के बाद मन में कई सवाल उठ रहे हैं। जैसे- यह बीमारी क्यों होती है? इसकी दवाएं कौन-कौन सी हैं? क्या बच्ची कभी ठीक हो पाएगी? इन सभी सवालों का जवाब खोजने के लिए मैं दंतेवाड़ा से रायपुर मेडिकल कॉलेज के लिए निकलता हूं। वहां मेरी मुलाकात डर्मेटोलॉजिस्ट डिपार्टमेंट के हेड डॉक्टर मृत्युंजय सिंह से हुई। इन्होंने ही 2019 में जागेश्वरी का इलाज किया था। मैंने उनसे जागेश्वरी की बीमारी का जिक्र किया। थोड़ी देर बाद वो बोले- ‘हां-हां, याद आ गया। अरे वो बहुत खतरनाक केस था। ऐसा केस मेरे सामने क्या, देश में भी शायद पहली बार ही आया होगा। हम लोगों ने इसके बारे में पढ़ा था, लेकिन प्रैक्टिकली देखने को भी मिलेगा, सोचा नहीं था। 2019 में जब जागेश्वरी को यहां लाया गया, तो उसकी हालत बहुत खराब थी। एक महीने तक इलाज चला। तब तो वह ठीक हो गई थी। मैंने बताया कि अब उसकी हालत और बिगड़ गई है। डॉ. मृत्युंजय बोले- ‘हां, बीमारी ही ऐसी है। इस बीमारी से इंसान मरता तो नहीं है, लेकिन आम लोगों की तरह जी भी नहीं पाता। चमड़ी इस कदर सूखकर फटने लगती है। यह ऐसी बीमारी है, जिसका पूरी तरह इलाज संभव नहीं है। इसे सिर्फ मैनेज और कंट्रोल किया जा सकता है। जब वह बच्ची हमारे पास आई, तो सबसे पहले उसे भर्ती किया गया। उसकी बायोप्सी और जेनेटिक एनालिसिस के लिए सैंपल मुंबई भेजे। निजी अस्पतालों में इन जांचों का खर्च करीब 50 हजार रुपए तक पहुंच जाता है, क्योंकि जेनेटिक टेस्ट काफी महंगा होता है।’ जागेश्वरी की हालत देखकर भीतर तक डर और बेचैनी उतर जाती है। शरीर पर पेड़ की छाल जैसी जमी सख्त परतें, हर हरकत में खिंचाव और दर्द… यह सब देखकर अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि वह हर दिन किस तकलीफ से गुजरती होगी। सबसे बड़ा सवाल यही है- जिस दर्द को देखकर बाहर वाले सिहर उठते हैं, उसे 14 साल की यह बच्ची आखिर कब तक सहती रहेगी? 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दैनिक भास्कर 29 May 2026 5:00 am

जापान: वाकायामा और भारत के प्रतिनिधियों ने संबंध बढ़ाने पर की चर्चा

वाकायामा प्रीफेक्चरल असेंबली के जापान-भारत फ्रेंडशिप प्रमोशन ग्रुप के अध्यक्ष ने गुरुवार को टोक्यो में भारतीय दूतावास में जापान में भारत के राजदूत नगमा मलिक से मुलाकात की और पर्यटन और सांस्कृति एक्सचेंज के जरिए वाकायामा और भारत के बीच लोगों के बीच संबंध बढ़ाने पर बातचीत की।

देशबन्धु 29 May 2026 3:31 am

चीन-ऑस्ट्रिया के राष्ट्राध्यक्षों ने एक-दूसरे को बधाई संदेश भेजा

चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग और ऑस्ट्रियाई राष्ट्रपति अलेक्जेंडर वान डेर बेलन ने दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों की स्थापना की 55वीं वर्षगांठ पर एक दूसरे को बधाई संदेश भेजा।

देशबन्धु 28 May 2026 11:46 pm

आज का एक्सप्लेनर:कर्नाटक में सीएम बदलने के पीछे की कहानी; कांग्रेस का मास्टरस्ट्रोक या बीजेपी के भाग्य खुले, दांव पर हैं 62% अहिंदा वोटर्स

कर्नाटक में कांग्रेस ने कार्यकाल के बीच सीएम बदल दिया। 77 साल के सिद्धारमैया की जगह 64 साल के डीके शिवकुमार लेंगे। कहा जा रहा है कि ये फैसला एक सीक्रेट डील के तहत हुआ। लेकिन बीजेपी को दो तैयार मुद्दे मिल गए- ओबीसी नेता की अनदेखी और दागदार छवि वाले नेता को कुर्सी। आखिर कांग्रेस ने अचानक क्यों बदला सीएम और चुनाव से 23 महीने पहले हुआ यह फेरबदल कांग्रेस के लिए फायदेमंद होगा या नुकसानदेह? जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में… बैक-स्टोरीः कर्नाटक में सीएम कुर्सी की खींचतान और एक सीक्रेट डील मई 2023 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव हुए। सिद्धारमैया की सोशल इंजीनियरिंग और डीके शिवकुमार की मेहनत और इलेक्शन मैनेजमेंट की बदौलत कांग्रेस को बहुमत मिला। 224 में से 135 सीटें। सीएम की कुर्सी पर सिद्धारमैया और डीके दोनों ने दावा किया। बंद कमरे में 5 दिन मैराथन बैठकें हुईं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, सोनिया गांधी, महासचिव केसी वेणुगोपाल और कर्नाटक के प्रभारी रणदीप सुरजेवाला शामिल हुए। आखिरकार 19 मई 2023 को कांग्रेस आलाकमान ने सिद्धारमैया को सीएम और डीके को डिप्टी सीएम बनाने की घोषणा हुई। घोषणा के बाद डीके से एक पत्रकार ने पूछा- क्या कर्नाटक में ये सरकार 5 साल चलेगी, सिद्धारमैया के साथ सीएम पद को लेकर विवाद तो नहीं होगा? डीके ने हल्की मुस्कान के साथ कहा- कर्नाटक में 5 साल तक कांग्रेस सरकार चलेगी। सिद्धारमैया के 5 साल सीएम रहने पर उन्होंने कुछ नहीं कहा। डीके के जेस्चर से कयास लगने लगे कि कर्नाटक में ढाई-ढाई साल के सीएम पर बात बनी है। कांग्रेस कवर करने वाले सीनियर जर्नलिस्ट आदेश रावल बताते हैं, ‘कांग्रेस आलाकमान की उस मीटिंग में तय किया गया कि सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार ढाई-ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री बनेंगे। तब डीके चाहते थे कि इस फैसले का ऐलान किया जाए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।' 20 नवंबर 2025 को जब सिद्धारमैया के कार्यकाल के ढाई साल पूरे हुए, तब भी लामबंदियां और बयानबाजियां शुरू हुईं। डीके और उनके समर्थक ‘सीक्रेट डील’ को पूरा करने का दबाव बना रहे थे, जबकि सिद्धारमैया इससे इनकार कर रहे थे। ऐसे में आलाकमान ने दोनों नेताओं को दिल्ली बुलाकर समझाइश दी। इसके बाद मामला ठंडे बस्ते में चला गया। सीएम कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं थे सिद्धारमैया 20 मई 2026 को सिद्धारमैया के 3 साल पूरे हो गए। सीएम बदलने की चर्चा फिर शुरू हुई। कांग्रेस आलाकमान ने सीएम सिद्धारमैया को अचानक दिल्ली तलब किया। कहा गया- आप सुबह 11 बजे तक दिल्ली के इंदिरा भवन (कांग्रेस मुख्यालय) पहुंचे। 5 दशकों से राजनीति करने वाले सिद्धारमैया समझ गए माजरा क्या है। सो उन्होंने इंदिरा भवन जाने से पहले पावर शो किया। दिल्ली के कर्नाटक भवन में अपने वफादारों के साथ ब्रेकफास्ट मीटिंग की। मेज पर सिद्धारमैया के चारों ओर जी परमेश्वर, सतीश जारकीहोली और एचसी महादेवप्पा जैसे उनके खास मंत्री बैठे थे। कुछ विधायक भी मौजूद थे। 11 बजते ही इंदिरा भवन में हलचल शुरू हो गई। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल, कर्नाटक कांग्रेस प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला, सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार एक-एक करके कांग्रेस मुख्यालय पहुंचे। बैठक शुरू हुई। पहली बैठक में खड़गे, राहुल, वेणुगोपाल और सुरजेवाला शामिल हुए। 2 घंटे तक ये बातचीत हुई। इसके बाद सिद्धारमैया और डीके को अंदर बुलाया गया। बातचीत हुई और लंच हुआ। हालांकि राहुल लंच के लिए अपने घर चले गए, जहां उन्होंने सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा से बातचीत की। रिपोर्ट्स के मुताबिक प्रियंका चाहती थीं कि कर्नाटक में सत्ता परिवर्तन हो। इसके बाद राहुल फिर इंदिरा भवन पहुंचे। सीनियर जर्नलिस्ट आदेश रावल के मुताबिक, मीटिंग में सिद्धारमैया को दो ऑफर दिए गए। पहला कि आप राज्यसभा आइए और सेंट्रल लीडरशिप में काम करिए। दूसरा कि आपके बेटे को यतींद्र सिद्धारमैया को कैबिनेट मंत्री बनाया जाए। इस पर सिद्धारमैया ने कहा कि उन्हें परिवार और करीबियों से सलाह-मशवरा करना है। इसके लिए उन्होंने वक्त मांगा। शाम पौने 6 बजे वेणुगोपाल, सुरजेवाला, सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार इंदिरा भवन से बाहर निकले। तब मीडिया से बातचीत करते हुए वेणुगोपाल ने कहा- जो अटकलें लगाई जा रही हैं, वे सिर्फ अटकलें हैं। इनमें कोई सच्चाई नहीं है। बैठक में राज्यसभा और विधान परिषद (MLC) चुनावों पर चर्चा हुई। 28 मई को मंत्रियों के साथ नाश्ता, दोपहर में इस्तीफा 28 मई को सिद्धारमैया ने बेंगलुरू में अपने आवास पर ब्रेकफास्ट मीटिंग की, जिसमें डीके शिवकुमार समेत पूरा मंत्रिमंडल शामिल हुआ। यहां सिद्धारमैया ने ऐलान किया कि मैं कुर्सी छोड़ रहा हूं। संसदीय कार्य मंत्री एचके पाटिल ने बताया कि मीटिंग में डीके शिवकुमार के नाम पर मुहर लगी। वह अगले सीएम होंगे। मीटिंग में डीके ने सिद्धारमैया के पैर छुए। फिर सिद्धारमैया ने उन्हें गले लगा लिया। सिद्धारमैया ने राज्यपाल थावरचंद गहलोत से मुलाकात के लिए समय मांगा था। लेकिन राज्यपाल पारिवारिक स्वास्थ्य कारणों के चलते बेंगलुरू से बाहर हैं। अभी वे इंदौर में हैं। ऐसे में सिद्धारमैया ने लोकभवन पहुंचकर राज्यपाल के विशेष सचिव प्रभु शंकर को अपना इस्तीफा सौंपा। नियमों के मुताबिक, राज्यपाल जब राज्य में न हों, तब सीएम लिखित इस्तीफा राजभवन के अधिकारियों को ई-मेल, फैक्स के जरिए या खुद जाकर दे सकते हैं। राज्यपाल बाद में उसे स्वीकार करते हैं। इस्तीफा मंजूर होने तक मौजूदा सीएम ही पद पर रहेंगे। वहीं, डीके शिवकुमार भी कर्नाटक कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे सकते हैं। कयास लगाए जा रहे हैं कि उनकी जगह सतीश जोरकीहोली ले सकते हैं, जो सिद्धारमैया के खास सिपहसलार हैं और अभी कर्नाटक कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष हैं। डीके के सीएम बनने में अभी एक और पेंच है। खबरें हैं कि डीके शिवकुमार का शपथ ग्रहण समारोह सिद्धारमैया के राज्यसभा नामांकन के बाद होगा। राज्यसभा नामांकन की आखिरी तारीख 8 जून है। चुनाव से 23 महीने पहले सिद्धारमैया से कुर्सी क्यों खाली करवाई गई? अप्रैल-मई 2028 में कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। 23 महीने पहले सीएम बदलने के पीछे एक्सपर्ट्स 5 बड़ी वजहें बताते हैं… 1. आने वाले चुनावों पर फोकस: राहुल गांधी चाहते हैं कि कर्नाटक में ऐसा नेता हो जो अगले 10-15 साल तक राजनीति कर सके। 2028 में फिर से सरकार बनाए और 2029 में लोकसभा की ज्यादा सीटें जिता सके। 2028 तक सिद्धारमैया करीब 80 साल के हो जाएंगे। ये बात डीके के फेवर में जाती है। 2. वक्त रहते पार्टी की बगावत मैनेज करनाः कांग्रेस आलाकमान जानता है कि ज्यादातर विधायक सिद्धारमैया के साथ हैं। वे कांग्रेस के एकमात्र ओबीसी सीएम भी हैं। ऐसे में पार्टी ये बदलाव बेहद सावधानी से करना चाहती है, ताकि सिद्धारमैया का सम्मान बना रहे और बगावत की स्थिति न बने। अगर कोई बगावत जैसी स्थिति बने, तो उसे समय रहते मैनेज किया जा सके। 3. सिद्धारमैया का एंटी-इन्कम्बेंसी फैक्टरः सिद्धारमैया के दूसरे कार्यकाल में भ्रष्टाचार के भी गंभीर आरोप लगे हैं। मैसूर अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी स्कैम में तो सीधे सिद्धारमैया के परिवार को घेरा जा रहा है। इसके चलते उनके परिवार को 14 प्लॉट छोड़ने पड़े। सिद्धारमैया के खिलाफ एंटी-इन्कमबेंसी फैक्टर एक्टिव हो सकता है। जिसे बीजेपी-JDS भुना सकती है। 4. वोक्कालिगा समुदाय का दबावः डीके कर्नाटक के रसूखदार वोक्कालिगा (15%) समुदाय के सबसे बड़े नेता बनकर उभरे हैं। उनके समर्थकों ने साफ कर दिया था कि अगर डीके को नजरअंदाज किया, तो यह पूरे समुदाय का अपमान माना जाएगा। इससे ओल्ड मैसूर में कांग्रेस का आधार पूरी तरह खिसक सकता था। ओल्ड मैसूर बेल्ट में 61 विधानसभा सीटें हैं, जिनमें से 39 कांग्रेस के पास हैं, यानी 64% सीटें। हालांकि यहां की 12 लोकसभा सीटों में से सिर्फ 2 कांग्रेस के पास है। 5. डीके कांग्रेस के संकटमोचकः डीके की छवि कांग्रेस में ‘संकटमोचक’ और ‘फंड मैनेजर’ की है। 2023 के चुनावी हलफनामे के मुताबिक, डीके के पास 1413.7 करोड़ रुपए की संपत्ति है। उनका माइनिंग, रियल एस्टेट, एजुकेशन और ट्रांसपोर्ट का कारोबार है। वो दूसरे राज्यों में भी कांग्रेस के इलेक्शन मैनेजमेंट में माहिर हैं। नवंबर 2025 में उन्होंने कहा था- मेरी कोशिश है कि मैं राज्य में 100 कांग्रेस ऑफिस बनवाऊं। Vote Vibe के फाउंडर और इलेक्शन एनालिस्ट अमिताभ तिवारी मानते हैं कि लीडरशिप चेंज को लेकर कांग्रेस का इंटेंशन अच्छा है, लेकिन ये दांव उल्टा भी पड़ सकता है। तो क्या इस उठापटक का फायदा बीजेपी उठा सकती है? बीजेपी 66 सीटों के साथ अभी कर्नाटक में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है। पिछले दो विधानसभा चुनावों में 36%, जबकि 2024 के लोकसभा में 46% वोट मिले। वहीं उसकी साथी JDS के पास 19 सीटें हैं। उसके पास भी करीब 15% वोट शेयर है। राज्य के लिंगायत (17%) समुदाय में बीजेपी मजबूत है। कद्दावर नेता बीएस येदुरप्पा भी लिंगायत हैं और उनकी इस पर मजबूत पैठ है। एचडी देवगौड़ा की JDS के साथ अलायंस कर बीजेपी ने वोक्कालिगा में भी सेंध लगाई है। दरअसल, देवगौड़ा वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं। उन्हें समुदाय में ‘मण्णिना मगा’ यानी धरतीपुत्र कहा जाता है। सिद्धारमैया की जगह डीके शिवकुमार के सीएम बनाने से बीजेपी दो नैरेटिव बना सकती है… 1. कांग्रेस में अहिंदा वोटर्स की अनदेखी हो रही 2. डीके पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों पर घेराबंदी क्या इस फेरबदल से कांग्रेस को नुकसान होगा? पॉलिटिकल एनालिस्ट बीएस मूर्ति मानते हैं कि पार्टी को इतिहास से सबक लेना चाहिए। जब कांग्रेस ने लिंगायत नेता वीरेंद्र पाटिल को सीएम पद से हटाया था, तब लिंगायत वोटर्स कांग्रेस से अलग हो गए। उत्तर कर्नाटक में कई चुनावों में कांग्रेस को संघर्ष करना पड़ा। सिद्धारमैया के मामले में भी ऐसा हो सकता है। आदेश रावल के मुताबिक अभी जातीय समीकरणों का हिसाब लगाना जल्दबाजी होगा। डीके के सामने चुनौती होगी कि वे वोक्कालिगा वोटर्स को एकजुट कर कांग्रेस से जुड़े और अहिंदा वोटर्स को बरकरार रखें। अमिताभ तिवारी बताते हैं कि कर्नाटक में अभी तक माना जाता था कि बीजेपी लिंगायत, JDS वोक्कालिगा और कांग्रेस अहिंदा सीएम बना सकती है। लेकिन डीके के सीएम बनने से ये नैरेटिव बदल जाएगा। वोक्कालिगा वोटर्स को लगेगा कि कांग्रेस और JDS दोनों ही उनकी कम्युनिटी से सीएम बना सकते हैं। वहीं लिंगायत अभी भी बीजेपी की ओर देख रही है। ऐसे में अकेले पड़ चुके अहिंदा को बीजेपी साध सकती है। इसके लिए बीजेपी डॉमिनेंट क्लास पॉलिटिक्स करने का टैग हटाएगी, जैसा कि उसने बाकी राज्यों में किया। इसी जातीय समीकरण को साधने के लिए डीके शिवकुमार के साथ 2-3 डिप्टी सीएम बनाए जा सकते हैं। इसको लेकर दलित समुदाय के जी परमेश्वर और लिंगायत कम्युनिटी के एमबी पाटिल का नाम सबसे आगे चल रहा है। वहीं इस्तीफा देने के बाद सिद्धारमैया ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इसमें उन्होंने राज्यसभा जाने और नेशनल पॉलिटिक्स में एक्टिव होने का ऑफर ठुकरा दिया। कहा कि 50 साल का मेरा पॉलिटिकल करियर है, जो एक खुली किताब है। सिद्धारमैया ने कहा है कि वे कर्नाटक राजनीति में सक्रिय रहेंगे। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि सिद्धारमैया भीतरखाने कोई दांव न चल दे, जिससे कांग्रेस के लिए मुश्किल हो। फिलहाल सिद्धारमैया ने भी कोई ऐसा बयान या संकेत नहीं दिया है, जो कांग्रेस के लिए दिक्कतें पैदा करे। हालांकि उनका बगावत का इतिहास रहा है। उन्होंने JDS का साथ छोड़कर कांग्रेस का दामन थामा। अब भी उनके पास बड़ा वोटबैंक है और दर्जनों विधायक उनके लॉयलिस्ट हैं। -------- कर्नाटक की राजनीति से जुड़ी खबर भी पढ़िए… कर्नाटक के CM सिद्दारमैया का इस्तीफा: बोले- आलाकमान ने जो कहा, मैंने किया; मंत्री बोले- डीके शिवकुमार अगले मुख्यमंत्री होंगे कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने गुरुवार को इस्तीफा दे दिया। उन्होंने बेंगलुरु में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा, ‘मैंने पहले ही कहा था कि हाईकमान जब कहेगा, मैं इस्तीफा दे दूंगा। कल हाईकमान ने कहा और आज मैंने इस्तीफा दे दिया।’ पूरी खबर पढ़िए…

दैनिक भास्कर 28 May 2026 5:24 pm

ऑस्ट्रेलियाई पीएम बोले- भारत को समझना हो तो ट्रेन से यात्रा करो, भारत के विकास की तारीफ की

ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने भारतीय अर्थव्यवस्था और दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों को लेकर बेहद सकारात्मक और महत्वपूर्ण बयान दिया है। कैनबरा में ऑस्ट्रेलियाई संसद को संबोधित करते हुए अल्बनीज ने भारत की विकास दर की सराहना की और इसे पूरे क्षेत्र के लिए गेम चेंजर बताया।

देशबन्धु 28 May 2026 2:15 pm

कनाडा में एक और गुजराती छात्रा की हत्या, चार साल पहले गई थीं, कर रही थीं पढ़ाई और नौकरी

विधि वहां अपनी पढ़ाई पूरी करने के साथ-साथ अपने खर्चों के लिए एक पार्ट-टाइम नौकरी भी करती थीं। इसके साथ ही वह कनाडा में स्थायी निवास हासिल करने की तैयारी में भी जुटी हुई थीं। गुजरात में रह रहे उनके माता-पिता और परिजनों को उम्मीद थी कि विधि जल्द ही वहां सेटल हो जाएगी, लेकिन इस खौफनाक वारदात ने सब कुछ तबाह कर दिया।

देशबन्धु 28 May 2026 2:00 pm

अमेरिका का ईरान पर बड़ा एक्शन: पर्शियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी को किया ब्लैकलिस्ट

अमेरिका ने ईरान पर दबाव बढ़ाते हुए एक नई पाबंदी लगाई है। अमेरिकी वित्त विभाग ने ईरान के ‘पर्शियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी’ को स्पेशली डिजिग्नेटेड नेशनल्स (एसडीएन) सूची में शामिल कर लिया है। यह प्राधिकरण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में समुद्री यातायात की निगरानी के लिए बनाया गया है।

देशबन्धु 28 May 2026 1:41 pm

अमेरिका के वॉशिंगटन की पेपर मिल केम‍िकल टैंक हादसे में दो की मौत, नौ लापता

अमेरिका में टेक्सास राज्य के लॉन्गव्यू शहर स्थित पेपर मिल में केमिकल टैंक हादसे मरने वालों की संख्या बढ़कर दो हो गई है, और नौ लोग अभी लापता हैं।

देशबन्धु 28 May 2026 11:56 am

अमेरिका पर ईरान का जवाबी हमला, कुवैत में अमेरिकी एयरबेस को बनाया निशाना

कुवैत सरकार ने भी पुष्टि की कि गुरुवार को उसे भारी मिसाइल और ड्रोन हमलों का सामना करना पड़ा। हमले की आहट मिलते ही कुवैत में एयर डिफेंस सिस्टम तुरंत एक्टिव हो गए और पूरे इलाके में सायरन बज उठे।

देशबन्धु 28 May 2026 11:46 am

ट्रंप का ईरान को सख्त संदेश: समझौते में कोई जल्दबाजी नहीं

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि वह मिडटर्म चुनावों के राजनीतिक दबाव की वजह से ईरान के साथ किसी समझौते में जल्दबाजी नहीं करेंगे

देशबन्धु 28 May 2026 10:38 am

दक्षिणी लेबनान में इजरायली हमला: हिजबुल्लाह ठिकानों पर बमबारी, दो की मौत

दक्षिणी लेबनान के डेर आमेस में हिजबुल्लाह के ठिकानों को निशाना बनाकर किए गए इजरायली हवाई हमले में कम से कम दो लोगों की मौत हो गई और एक अन्य घायल हो गया। लेबनान की नेशनल न्यूज एजेंसी ने यह जानकारी दी।

देशबन्धु 28 May 2026 9:15 am

बंगाल में गाय की कुर्बानी पर रोक, हिंदू क्यों नाराज:बोले- दीदी से परेशान होकर सरकार बदली, BJP ने 2500 करोड़ का धंधा बिगाड़ा

पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर में रहने वाले सुखदेव मंडल खेती-किसानी करते हैं। इसी से परिवार का खर्च चलता है। इस साल बेटी की शादी करनी है, इसलिए साल भर पहले बैंक से लोन लेकर मवेशी खरीदे। उम्मीद थी कि बकरीद पर बिक जाएंगे और शादी-ब्याह का खर्च निकल जाएगा, लेकिन बंगाल सरकार के एक फैसले ने उनकी उम्मीद तोड़ दी। 13 मई यानी बकरीद से 15 दिन पहले बंगाल सरकार ने एक नोटिस जारी किया। इसमें गोहत्या से जुड़े 1950 के कानून और 2018 के कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए कहा गया कि बिना 'फिटनेस सर्टिफिकेट' किसी भी गाय-भैंस की कुर्बानी नहीं दी जाएगी। इस फैसले के बाद सुखदेव परेशान हैं कि वो मवेशी लेकर कहां जाएं। उनका खर्च कैसे उठाएं और बैंक का लोन कैसे अदा करें। वे कहते हैं, ‘किसी को फांसी देने से पहले भी वक्त मिलता है, हमें वो भी नहीं मिला।‘ 28 मई यानी आज बकरीद है। फैसले से मुस्लिम भी नाखुश हैं। उन्हें कुर्बानी के लिए जानवर नहीं मिल रहे हैं। हिंदू व्यापारी बोले…दीदी से परेशान होकर सरकार बदली, BJP ने धंधा चौपट किया बंगाल में पशु हाट बाजारों से करीब 3.7 करोड़ लोगों की रोजी-रोटी सीधे जुड़ी है। बंगाल में बकरीद पर करीब तीन हफ्ते के लिए पशुओं का बाजार लगता है। इस दौरान करीब ₹2000 से 2,500 करोड़ का व्यापार होता है। सिर्फ कोलकाता और उसके आसपास के इलाकों में रोज 1 से 2 करोड़ रुपए का कारोबार होता है। इस काम से जुड़े सुखदेव गुस्से में कहते हैं, ‘सरकार के फैसले ने हमारा व्यापार ठप्प कर दिया है। इस उम्मीद में बैंकों से लोन लिया था कि कुर्बानी के बाद पैसा भर देंगे। साल भर गाय-भैंस को खिलाया। जब बेचने की बारी आई, तो नया नियम आ गया। अब सरकार ही बताए कि कर्ज कैसे चुकाएं। बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और परिवार खर्च कहां से निकालें।‘ ‘दीदी के 15 साल की खराब नीतियों के चलते सरकार बदली। जय श्री राम बोलकर राज्य में नई सरकार लाए, लेकिन अब BJP सरकार की नीतियों ने हमारी परेशानी बढ़ा रखी है। अब लगता है कि सुवेंदु बाबू की सरकार भी बदलनी पड़ेगी।’ पूर्व मेदिनीपुर के सिलीपल्ली मोहल्ले में रहने वाले सुखदेव अकेले नहीं हैं। श्यामल मंडल भी रुंधे गले से यही दिक्कतें गिनाते हैं, ‘बैंक वाले घर पर पैसा लेने आ रहे हैं। गहने गिरवी रखकर पशुओं को पाला। अब इस फैसले से सड़क पर आ गए हैं। अगर सरकार ने साथ नहीं दिया, तो जहर खाने के सिवा हमारे पास दूसरा कोई रास्ता नहीं बचेगा।‘ पास में खड़े कृष्णबदर गुस्से में कहते हैं, ‘सरकार मुसलमानों को सबक सिखाने के चक्कर में हिंदुओं का बुरा कर रही है। कुर्बानी मुसलमान देते हैं, लेकिन इसका व्यापार तो हिंदू ही कर रहे हैं। गांव में सभी दलित हिंदुओं ने कुर्बानी के वक्त बेचने के लिए 8 से 10 गाय और बकरियां पाली हैं। साल भर इन्हें दाना-पानी दिया, ताकि मुनाफा कमा सकें।‘ ‘पशु खरीदने और पालने के लिए बैंक से 10 लाख रुपए लोन लिया था। अब सरकार बताए कि ये कैसे भरें। पशुओं को दाना-पानी कैसे खिलाएं।‘ ‘नए नियम-कायदों ने फंसाया, BJP वाले अलग धमका रहे’ इसके बाद हम हावड़ा पहुंचे। यहां संकराली में ज्यादातर परिवार दूध का व्यापार करते हैं। जब गाय या भैंस दूध देना बंद कर देती है, तो उसे बेच देते हैं। यहां मिली सोमा सुधका कहती हैं, ‘पिछले 16 साल से ये काम कर रही हूं। हर साल कुर्बानी के समय पशु बेचते हैं और उसी समय अगले साल के लिए नए खरीद लेते हैं। फिर साल भर उन्हें पालते हैं। अब जब इस साल बिकेंगे ही नहीं, तो इतने पशुओं को हम कहां से खाना खिलाएंगे।’ ’कुर्बानी से पहले फिटनेस टेस्ट करवाने की बात कही गई है। हमें नहीं पता कि इसका टेस्ट कहां होगा। हम सब इन नियम-कायदों में फंस गए हैं। जिनसे एडवांस पैसे लिए हैं, वो वापस मांग रहे हैं।’ यहीं मिले बरुण घोष भी दूध व्यापारी हैं। वो इस बात से परेशान हैं कि अगर अब बुजुर्ग हो चुकी गायें नहीं बिकीं, तो उधार कहां से चुकाएंगे और धंधा कैसे चलाएंगे। वे कहते हैं, ‘हम शहर में रहते हैं, यहां कहीं गाय-भैंसों को चरने के लिए भी नहीं छोड़ सकते हैं। खटाल में इतनी गाय-भैंसों के रहने के लिए जगह नहीं है। सरकार को ये फैसला थोड़ा पहले लेना चाहिए था, ताकि हम जैसे छोटे व्यापारी अपने लिए दूसरा रास्ता तलाश सकें।‘ मुस्लिम पक्ष की बात…‘बकरों के दाम दोगुने हुए, कुर्बानी भी नहीं दे पाएंगे’ गाय की कुर्बानी पर लगी रोक से हिंदू ही नहीं मुस्लिम भी परेशान हैं। मुर्शिदाबाद के रहने वाले समीम रहमान का कहना है कि इस बार बंगाल के कई घरों में कुर्बानी नहीं हो रही है। पहले कुछ परिवार मिलकर गाय-भैंस की कुर्बानी करते थे, लेकिन नए नियम के चलते इन्हें नहीं ले पा रहे हैं। वहीं गाय की बिक्री बंद होने के बाद बकरे के दाम दोगुने हो गए हैं, जिसका खर्च उठा पाना मुमकिन नहीं है। बेलडांगा के रहने वाले रहमान शेख कहते हैं, ‘हमारी मांग है कि सरकार बाकी राज्यों में भी बूचड़खाने बंद करे, लेकिन इससे नुकसान हिंदू भाइयों का ही है।‘ यहीं मिले शाहरुबद्दीन शेख खुद कुर्बानी से पहले बेलडांगा के हाट में गाय बेचते रहे हैं। वे कहते हैं, ‘बकरीद से पहले हाट में लगातार दो-तीन हफ्ते व्यापार होता है। इस बार भी हाट में गाय बेचने लाई गई थीं, लेकिन नया नियम आने के बाद सब कुछ बदल गया। मुझे भी काफी नुकसान हुआ। हिंदू भाईयों को ज्यादा नुकसान हुआ है।‘ ‘मैं खुद गाय की कुर्बानी देता था, लेकिन अबकी बकरे की दूंगा। गाय की बिक्री न होने से इस बार बकरे के दाम भी बढ़ गए हैं।‘ बकरीद पर हर साल कितने पशुओं की कुर्बानी दी जाती है, इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। बंगाल के पशुपालन विभाग से जारी पिछले एक साल का आंकड़ा देखें तो 2025 में राज्य में मांस के लिए करीब 4.76 करोड़ बकरे और करीब 1.33 लाख गाय, बैल, सांड काट दिए गए। मौलाना बोले- अगर गाय की कुर्बानी हुई, तो आंदोलन करेंगे कुर्बानी के फैसले पर आसनसोल के एक मौलाना नाम न लिखने की शर्त कहते हैं, ‘जरूरी नहीं है कि सभी कुर्बानी दें। जो सक्षम हैं, वो बकरे या भेड़ की कुर्बानी दे सकते हैं। इस बार गाय की कुर्बानी नहीं होगी।‘ वहीं, ऑल इंडिया इमाम मुअज्जिन एंड सोशल वेलफेयर ऑर्गनाइजेशन (AIIMSWO) के स्टेट जनरल सेक्रेटरी मौलान अब्दुर रज्जाक कहते हैं, ‘हमने राज्य के सभी 26 जिलों में मस्जिद से ऐलान करवाया है कि इस बार बकरीद पर गाय की कुर्बानी नहीं होगी। कुरान में भी कहीं गाय की कुर्बानी का जिक्र नहीं है।‘ वे आगे कहते हैं, ‘कई मुस्लिम संगठन अलग-अलग जगहों पर गाय की कुर्बानी का बहिष्कार कर रहे हैं। इसके बाद भी अगर कहीं ऐसा हुआ, तो हम वहां आंदोलन करेंगे।’ क्या पहले कभी कुर्बानी को लेकर ऐसे नियम-कायदे बनाए गए। इसके जवाब में वे कहते हैं, ’ऐसा पहली बार हो रहा है, लेकिन इसका कोई सियासी मतलब नहीं है। राजनीतिक पार्टियां आती हैं और चली जाती हैं, लेकिन हमारी एक ही मांग है कि सरकार जो भी कानून बनाए, उसे पूरी तरह लागू करे। ऐसा न हो कि हमें कुर्बानी के लिए मना कर दिया जाए और बाद में गायें कहीं और सप्लाई हो जाएं।’ ………………. ये खबर भी पढ़ें… बंगाल में दीदी को हराने वाले BJP के 5 किरदार बंगाल में BJP की मौजूदा जीत की कहानी के कई किरदार हैं। शुरुआत अमित शाह और उनका दाहिना हाथ रहे सुनील बंसल से। साथ ही तीसरे अहम किरदार शिवप्रकाश सिंह से, जो BJP के राष्ट्रीय सह-संगठन महामंत्री हैं। इसके अलावा दो किरदार और हैं। पढ़िए इस रिपोर्ट में पांचों किरदार की कहानी…

दैनिक भास्कर 28 May 2026 5:20 am

पाकिस्तान ने ट्रम्प की मांग ठुकरा दी, अब आगे क्या:अगर इजरायल से दोस्ती कर ली, तो क्या कयामत आ जाएगी

अमेरिकी थिंकटैंक अटलांटिक काउंसिल के एक्सपर्ट माइकल कुगेलमैन कहते हैं- ट्रम्प के जितना करीब जाओगे, उतना ही जोखिम बढ़ेगा। वह कुछ ऐसा मांग बैठेंगे, जो देना संभव न हो। पाकिस्तान इस वक्त उसी ‘कुआं और खाईं’ की सिचुएशन में आ गिरा है। 25 मई की रात ट्रम्प ने पाकिस्तान समेत 6 मुस्लिम देशों को कहा कि वे 'अब्राहम अकॉर्ड्स' पर दस्तखत करें, यानी इजराइल को देश मानें और उससे दोस्ती करें। सबसे पहले पाकिस्तान ने ही मना कर दिया। आखिर क्यों और अब होगा क्या, जानेंगे भास्कर एक्सप्लेनर में… 1947: पाकिस्तान बनते ही दुश्मनी की शुरूआत बात नवंबर 1947 की है। भारत को आजाद हुए अभी कुछ ही महीने हुए थे और पाकिस्तान भी नया-नया बना था। संयुक्त राष्ट्र में एक अहम वोटिंग हुई- फिलिस्तीन को दो हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव। एक हिस्सा यहूदियों को, एक अरबों को। पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने तब चेतावनी दी कि यह बंटवारा हुआ तो मुस्लिम उम्मा (मुस्लिम देश) खिलाफ उठ खड़ी होगी। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान का अरबों को पूरा समर्थन रहेगा और उस प्रस्ताव के खिलाफ वोट भी किया। 14 मई 1948 को इजराइल बना। पाकिस्तान ने उसे मान्यता देने से इनकार कर दिया। जब पाकिस्तानी पायलट ने इजराइली जेट गिराए यह दुश्मनी सिर्फ कागजी बयानों तक नहीं रही। जून 1967 में अरब-इजराइल के बीच 'छह दिन की जंग' छिड़ी। पाकिस्तान ने अपने पायलट मिस्र, जॉर्डन और सीरिया की वायुसेनाओं में भेजे। 5 जून 1967 को इजराइली जेट जॉर्डन के माफ्रक एयरबेस पर हमला करने आए। जॉर्डन ने पाकिस्तानी पायलट सैफुल आजम को तैनात किया। आजम ने दो इजराइली विमान मार गिराए। अगले दिन उन्हें इराक भेजा गया, जहां उन्होंने दो और इजराइली विमान ध्वस्त किए। यह किस्सा आज भी पाकिस्तान में गर्व के साथ सुनाया जाता है। इस दुश्मनी की गहराई का अंदाजा एक और बात से लगाएं। पाकिस्तान के पासपोर्ट पर आज भी बड़े अक्षरों में छपा है- 'Not Valid for Israel', यानी यह पासपोर्ट इजराइल के लिए मान्य नहीं है। दुनिया में लगभग हर देश का पासपोर्ट हर देश के लिए वैध होता है। लेकिन पाकिस्तान ने अपने नागरिकों के दस्तावेज पर ही अपनी विदेश नीति लिख दी है। जब मुशर्रफ ने दरवाजा खटखटाया, फिर दबे पांव लौट आए इस 78 साल के इतिहास में एक दिलचस्प मोड़ 2005 में आया। पाकिस्तानी जनरल परवेज मुशर्रफ ने पर्दे के पीछे इजराइल से संपर्क शुरू किया। तुर्किए की मदद से 1 सितंबर 2005 को इस्तांबुल में पाकिस्तानी विदेश मंत्री खुर्शीद कसूरी और इजराइली विदेश मंत्री सिल्वान शालोम की मुलाकात हुई। दोनों देशों के बीच यह पहली सार्वजनिक और आधिकारिक बातचीत थी। इसके कुछ दिन बाद मुशर्रफ UN में इजराइली प्रधानमंत्री एरियल शेरॉन से मिले। किसी पाकिस्तानी शासक का इजराइली नेता से पहला सार्वजनिक मेलजोल था। मुशर्रफ इजराइल के बारे में इंटरव्यू देने वाले पहले पाकिस्तानी मुस्लिम नेता बने और अमेरिका में वर्ल्ड जूइश कांग्रेस को संबोधित करने वाले पहले मुस्लिम नेता भी। लेकिन इसके बाद पाकिस्तान में भूचाल आ गया। मुत्ताहिदा मजलिस-ए-अमल, जमात-ए-इस्लामी और जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम जैसे कट्टपंथी धार्मिक संगठनों ने मुशर्रफ के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। सड़कों पर हिंसक प्रदर्शन होने लगे। मुशर्रफ पर ‘इस्लाम और फिलिस्तीन से गद्दारी’ करने के आरोप लगे। अपनी कुर्सी बचाने के लिए मुशर्रफ को कदम पीछे खींचने पड़े। 2003 में जब मुशर्रफ ने कैंप डेविड दौरे पर इजराइल से बेहतर रिश्तों की बात की थी, तब भी इसे फौरन दबा दिया गया था, क्योंकि पाकिस्तान में इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। 2005 की कोशिश भी आगे नहीं बढ़ी। यही पाकिस्तान की असली मुश्किल है। ऊपर से नेता चाहें भी, तो नीचे जनता और धार्मिक संगठन इसे नहीं होने देंगे। आज ट्रम्प ने इजराइल से दोस्ती की मांग क्यों रखी 23 मई को ट्रम्प ने सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्किये, मिस्र और जॉर्डन के नेताओं से वर्चुअल बैठक की। दो दिन बाद ट्रूथ सोशल पर लिखा कि ईरान से बातचीत आगे बढ़ रही है, लेकिन इन सभी देशों को 'अब्राहम अकॉर्ड्स' पर साइन करना होगा। अब्राहम अकॉर्ड्स ट्रम्प ने ही अपने पहले कार्यकाल 2020 में बनाया था। मकसद था कि मुस्लिम देश इजराइल को मान्यता दें और उससे रिश्ते बनाएं। अब तक UAE, बहरीन, मोरक्को, सूडान और कजाकिस्तान इस पर दस्तखत कर चुके हैं। ट्रम्प के पोस्ट में एक लाइन और थी- 'कुछ देशों के पास इसमें शामिल न होने की एक-दो वजहें हो सकती हैं।' जानकार इसे पाकिस्तान के लिए 'बाहर निकलने का दरवाजा' मान रहे हैं। शायद ट्रम्प पाकिस्तान को इससे बाहर रखने के लिए तैयार हों। पाकिस्तान ने साफ मना कर दिया पिछले साल भी चर्चा थी कि पाकिस्तान अब्राहम अकॉर्ड साइन करने वाला है। तब पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने कहा था कि हम तब तक इजरायल को मान्यता नहीं देंगे, जब तक आजाद फिलिस्तीन नहीं बनता। ट्रम्प की मांग के बाद रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने पाकिस्तानी न्यूज चैनल 'समा टीवी' से कहा, 'हम ऐसे किसी समझौते में शामिल नहीं होंगे, जो हमारी सोच के खिलाफ हो।' अमेरिकी थिंकटैंक अटलांटिक काउंसिल में दक्षिण एशिया के सीनियर फेलो माइकल कुगेलमैन मानते हैं कि इजराइल को लेकर पाकिस्तान का रूख अटल है। फिलहाल अब्राहम अकॉर्ड में शामिल होना पाकिस्तान के लिए मुमकिन नहीं है। पाकिस्तान की पूर्व एम्बेसडर डॉ. मलीहा लोधी के मुताबिक, ट्रम्प की मांग को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। ईरान के साथ होने वाले संभावित समझौते की रिपब्लिकन पार्टी और इजरायली लॉबी आलोचना कर रही है। ट्रम्प इसी का जवाब देने की कोशिश कर रहे हैं। पाकिस्तान, सऊदी अरब या कोई भी मुस्लिम देश इजरायल को मान्यता नहीं देगा और अब्राहम अकॉर्ड में शामिल नहीं होगा। यह इनकार इतनी आसानी से क्यों आया? क्योंकि पाकिस्तान के लिए इजराइल को मानने की कीमत सिर्फ कूटनीतिक नहीं, घरेलू राजनीतिक है। पाकिस्तान में इमरान खान की पार्टी पहले से ही सरकार के खिलाफ है। इस पर तहरीक-ए-तालिबान जैसे कट्टरपंथी संगठन भी हैं। इजराइल से दोस्ती की खबर आते ही इन सबको सड़कों पर उतरने का बड़ा मुद्दा मिल जाएगा। इसकी धार्मिक वजह भी है। पाकिस्तान खुद को इस्लामिक दुनिया का मसीहा मानता है और इकलौता इस्लामिक देश है, जिसके पास परमाणु बम है। ऐसे में इजराइल को देश मानना पाकिस्तान की सोच के खिलाफ है। ऐसा करने से इस्लामिक दुनिया में उसकी साख मिट्टी में मिल जाएगी। लेकिन ट्रम्प को 'न' कहना भी महंगा पड़ सकता है पाकिस्तान आर्थिक रूप से बेहद कमजोर स्थिति में है। 2024 में IMF से मिला 7 अरब डॉलर का कर्ज पाकिस्तान का 24वां बेलआउट था। किसी भी देश के लिए सबसे ज्यादा। पाकिस्तान का कुल कर्ज उसकी GDP के 70% से ज्यादा है और सरकार की आधी से ज्यादा कमाई सिर्फ कर्ज का ब्याज चुकाने में चली जाती है। IMF में अमेरिका के पास सबसे ज्यादा 16.5% वोटिंग अधिकार हैं। अगर वाशिंगटन ने पाकिस्तान के खिलाफ खड़े होने का फैसला किया, तो इस्लामाबाद के लिए अगला लोन मिलना मुश्किल हो जाएगा। इसके अलावा पाकिस्तान की वायुसेना का सबसे ताकतवर विमान अमेरिकी F-16 है। इसकी मरम्मत, सॉफ्टवेयर अपडेट और तकनीकी सहायता के लिए पाकिस्तान पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर है। पिछले साल ट्रम्प प्रशासन ने इसके रखरखाव के लिए 397 मिलियन डॉलर मंजूर किए थे। पाकिस्तान ने ईरान और अमेरिका के बीच बिचौलिया बनकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी साख बढ़ाने की कोशिश की। ट्रम्प ने इसके बदले में शहबाज शरीफ को 'दोस्त' और आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर को 'पसंदीदा फील्ड मार्शल' कहा। फिलहाल पाकिस्तान ने ट्रम्प की मांग पर 'नहीं' कह दिया है। अब देखना यह है कि ट्रम्प इस 'नहीं' को सुनते हैं, या अनसुना कर देते हैं। ----------- ये भी खबर बढ़िए… भारत पर अचानक इतना प्यार क्यों लुटाने लगे ट्रम्प; कोई बड़ी जरूरत या सिर्फ डैमेज कंट्रोल, रूबियो की यात्रा के मायने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो हाल ही में दिल्ली आएं। इस बीच पीएम मोदी को व्हाइट हाउस का निमंत्रण मिला है। ट्रम्प का भी बयान आया- ‘मुझे पीएम मोदी से प्यार है, पीएम मोदी महान हैं।’ पिछले कुछ महीनों से दोनों देशों के रिश्तों में खटास थी। फिर यह गर्मजोशी क्यों? ट्रम्प का यह प्यार असली है या सिर्फ डैमेज कंट्रोल? पूरी खबर पढ़िए…

दैनिक भास्कर 28 May 2026 5:19 am

ब्लैकबोर्ड-लड़के को पेड़ से जंजीर में बांधा, ताला जड़ा:कहा- खाट में बांधने पर खाट सिर पर लेकर घूमता है, मां को जंजीर में बांधा

खेत के बीचोबीच एक पेड़ से जंजीरों में बंधा युवक जोर-जोर से चीख रहा है- भाग जाऊंगा… भाग जाऊंगा… नाम है- पीरे खान। वह बीच-बीच में पेशाब जाने के लिए कह रहा है। तभी घर से एक महिला बाहर निकलती हैं। नाम है चांदनी। यह पीरे की भाभी हैं। वह पीरे के पास पहुंचती हैं। पहले जंजीर में लगा ताला खोलती हैं, फिर पीरे को खोलती हैं। ऐसा लग रहा है, जैसे किसी जानवर को खोला जा रहा हो। चांदनी, पीरे को पकड़कर खेत में ले जाती हैं। कुछ देर बाद वापस लौटती हैं। फिर उन्हें उसी पेड़ से जंजीर में बांध देती हैं… और ताला लगा देती हैं। स्याह कहानियों की सीरीज ब्लैकबोर्ड में मैं नीरज झा इस बार कहानी लाया हूं राजस्थान के बाड़मेर से, जहां अस्पताल न होने से मानसिक रूप से बीमार लोगों को जंजीरों में बांधकर रखा गया है। बाड़मेर की शिव तहसील से 40 किलोमीटर दूर कानासर गांव। तापमान करीब 48 डिग्री। यहां एक घर के चारों तरफ जहां तक नजर जा रही है, सिर्फ रेत नजर आ रही है। दुपट्टे से चेहरा छुपाए चांदनी बताती हैं, ‘एक महीने से सोई नहीं हूं। पीरे की मानसिक हालत बहुत खराब है। रोज शाम को जोर-जोर से चीखते हैं। कंकड़-पत्थर जो हाथ लगे, उसी से मारने दौड़ते हैं। जंजीर खोल दूं, तो रात में भाग जाते हैं। अब तो जिंदगी पहाड़ लगने लगी है,’ यह कहकर चांदनी घर में पानी लाने चली जाती हैं। 22 साल के पीरे खान चारपाई पर बेसुध लेटे हैं। करीब ही उनकी 65 साल की मां कम्मी खातून मटमैले कपड़े पहने बैठी हैं। मेरी नजर पेड़ में बंधी जंजीर और उसमें लगे ताले पर पड़ी। पूछने पर कम्मी खातून मारवाड़ी लहजे में कहती हैं- 'क्या करूं? बेटे को भेड़-बकरी की तरह इसी पेड़ में जंजीर से बांधकर रखती हूं। जब भी इसकी जंजीर खुली छोड़ी, कई-कई दिन गायब रहा। बड़ी मुश्किल से मिलता है। अब जंजीर में ताला लगा देती हूं, ताकि यह खोलकर भाग न सके। मैं क्या ही बताऊं। बाड़मेर और जोधपुर के अस्पतालों से लेकर दरगाहों तक के चक्कर लगा चुकी हूं, लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा। पिछले दो सालों से इसे ऐसे ही पेड़ से बांधकर रखा है। खाना-पीना, सोना-जागना, लैट्रिन-पेशाब, सब इसी पेड़ के आस-पास करता है।’ मेरी मोटी जंजीर बंधे पीरे खान के पैर पर जाती है। जंजीर की रगड़ से उनके पैरों की चमड़ी काली पड़ चुकी है। कई जगह छिली हुई है। कम्मी बताती हैं, ‘यह बड़ा बेटा है। 10 साल पहले बीमारी से पति की मौत हो गई। उसके बाद यह भेड़ चराकर कुछ कमाई करता था। अप्रैल 2022 की बात है। अचानक यह बड़बड़ाने लगा। कुछ दिन बाद एक खेत से दूसरे खेत तक दौड़ने लगा। घर के पास ही एक श्मशान घाट है। वहां भी जाता था। गांववाले कहने लगे- यह जरूर श्मशान गया होगा, तभी इसके ऊपर कोई भूत-प्रेत आ गया है। इसे किसी तांत्रिक के पास ले जाओ। एक मौलवी के पास गई। उन्होंने कई ताबीज दिए। बोले- ‘इसके ऊपर भूत का साया है, धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।’ हम भी उसी उम्मीद में इसे घर ले आए, लेकिन कुछ ही महीनों में हालत पहले से भी ज्यादा बिगड़ गई। अब यह अचानक जोर-जोर से चीखने लगा। सामने जो भी आता- ईंट, पत्थर या कोई सामान, उठाकर फेंककर मारता। आखिर मजबूर होकर हमने इसे रस्सियों से खाट में बांधना शुरू कर दिया, लेकिन रस्सियां भी ज्यादा देर इसे रोक नहीं पाती थीं। कई बार तो पूरी खाट सिर पर उठाकर गांव की गलियों में निकल पड़ता। एक बार इसे एक दरगाह पर ले गई। मौलाना ने हल्की झाड़-फूंक के बाद कहा- सुबह ठीक से झाड़-फूंक करूंगा। रातभर वहीं रही। सुबह उठी, तो यह गायब था। कई दिनों की तलाश के बाद यह बाड़मेर में भटकता मिला। तब से मेरे रिश्तेदारों ने इसे लाकर पेड़ से बांध दिया। जंजीर खोलकर भागे न इसलिए उसमें ताला भी लगा दिया। इस बातचीत के दौरान पीरे हमें देख रहे हैं। उनके गले में दो-तीन ताबीज हैं। तभी उनके चचेरा भाई शफी घर आ जाता है। शफी मेरे पास बैठकर बताते हैं- दो बार किसी तरह पैसा जुटाकर बाड़मेर और जोधपुर के अस्पताल ले गए, लेकिन कुछ नहीं हुआ। वहां से भागकर चला आया। क्या करें? दिहाड़ी न करें, तो घर का चूल्हा नहीं जलेगा। दिनभर में ढाई-तीन सौ रुपए ही कमा पाते हैं। कहां से इलाज करवाएं? इससे भी बड़ी दिक्कत बाड़मेर यहां से 90 किलोमीटर और जोधपुर 200 किलोमीटर दूर है।’ शफी बताते हैं- ‘पहले यह बिल्कुल भला-चंगा था, हंसता-बोलता था। लेकिन अब हालत ऐसी हो गई है कि हर त्योहार इसी पेड़ के नीचे पड़ा रहता है। पिछले दो सालों से इसकी पूरी जिंदगी इन्हीं जंजीरों में कैद होकर रह गई है। इसका छोटा भाई नसीर मेरे साथ काम करता है। उसी की कमाई से घर चल रहा है।' वह बताते हैं- बाड़मेर में कई ऐसे गांव हैं, जहां मानसिक रूप से बीमार लोगों को जंजीर से बांधकर रखा गया है। कानासर से करीब 150 किलोमीटर दूर खारी गांव है। वहां भी ऐसा ही मामला है। अब मैं खारी गांव के लिए निकल पड़ता हूं। खारी पहुंचने के बाद पैदल करीब डेढ़ किलोमीटर दूर एक झोपड़ी के पास पहुंचा, जहां 55 साल के दूद्धा राम मिले। उनकी 45 साल की पत्नी मोड़ी देवी झोपड़ी के बाहर जंजीरों में बंधी पड़ी हैं। दूद्धा राम ने मेरे पैर पकड़ लिए, उनकी आंखें भर आई। कांपती आवाज में बोले- ‘तीन साल से पत्नी को जंजीरों में बांधकर रखा है। इसे देखता हूं, तो कलेजा फट जाता है, लेकिन क्या करूं, कोई रास्ता नहीं बचा।’ 5 साल पहले की बात है। बेटी की शादी की थी। तब यह एकदम ठीक थी। उसके बाद पता नहीं क्या हुआ, अचानक लोगों को मारने-पीटने लगी। एक दिन मेरे हाथ पर जोर से डंडा मार दिया। हाथ में घड़ी थी, इसलिए बच गया, नहीं तो हाथ टूट जाता। इसी तरह घर के पास रास्ते से जो भी आता-जाता, उसे पत्थर फेंककर मारती। गांववालों ने डर के मारे इस रास्ते से आना-जाना छोड़ दिया। एक दिन मजबूरी में जंजीर खरीदकर लाया और इसे बांध दिया। तब से यह यहीं दिन-रात पड़ी रहती है।' वह बताते हैं- हमारा एक बेटा और एक बेटी है। मैं बचपन से विकलांग हूं, पैर में लकवा है,’ इतना कहते-कहते दूद्धा राम की आंखें फिर से डबडबा जाती हैं। वह अपने 18 साल के बेटे जोगा राम को घर से डॉक्टर की पर्ची लाने को कहते हैं। आगे बताते हैं- महाजन से 10 हजार रुपए कर्ज लेकर किसी तरह एक बार इसे जोधपुर ले गया था, लेकिन दवा खाते ही और बीमार पड़ गई। इस बीच घर में काफी खोजबीन के बाद जोगा राम सीटी स्कैन की रिपोर्ट लेकर आते हैं। कहते हैं, ‘हम लोग बहुत पढ़े-लिखे नहीं हैं। रिपोर्ट ज्यादा समझ नहीं पाते। आप ही जरा देखिए।' वह रिपोर्ट मुझे पकड़ा देते हैं। जोगा कहते हैं- पापा शुरू से विकलांग हैं। पहले वह दिहाड़ी पर काम करने जाते थे। जब मैं बड़ा हुआ, तो इन्हें काम करने से रोक दिया। अब मेरी ही कमाई से घर चलता है। मम्मी की हालत ऐसी है, क्या करूं? मजबूरी में इन्हें जंजीर से बांधकर रखना पड़ रहा है। किसे अच्छा लगता है कि अपनी मां को जंजीर से बांधकर रखे। कई ओझाओं और तांत्रिकों के पास गया, लेकिन कुछ नहीं हुआ। यहीं के रहने वाले हरीश अब मुझे बताते हैं- ‘यहां से करीब 10-15 किलोमीटर दूर केकड़ गांव है। वहां एक महिला को पिछले 15 सालों से ऐसे ही बांधकर रखा गया है।’ हरीश की बात सुनते ही उनके साथ उस गांव की ओर निकल पड़ा। गांव पहुंचते ही दूर एक झोपड़ी दिखी। अंदर 65 साल की तुग्गी देवी बैठी हैं। सामने रखी सब्जी-रोटी खा रही हैं। जैसे ही उनकी नजर मेरे कैमरे पर पड़ती है, वे अचानक उठ खड़ी हुईं और पास आकर मुझे जोर से धक्का दे दिया। करीब खड़े तुग्गी देवी के जेठ के बेटे दुर्गा राम दौड़कर आए और उन्हें संभाला। वह बताते हैं- 'कैमरा देखकर यह ऐसा ही करने लगती हैं। डर जाती हैं। इनका कोई बच्चा नहीं है। 15-20 साल से ऐसी ही हालत में हैं। इनकी तबीयत अचानक खराब हो गई। गांव-गांव घूमने लगीं। लोगों को डंडे-पत्थर से मारती थीं। कई बार इनका एक्सीडेंट हो चुका। तब जाकर हम लोगों ने इन्हें जंजीर बांधा। अब यहीं पड़ी रहती हैं। इन्हें इस हालत में देखकर तकलीफ होती है। हमारे छोटे बच्चे इन्हें देखकर क्या सोचते होंगे, लेकिन क्या करूं?’ तभी तुग्गी देवी के देवर मंगदा राम आते हैं। पास बैठकर बताते हैं, ‘जब ये ठीक थीं, तो घर का सारा काम करती थीं। पहले अचानक चुप रहने लगीं, फिर लोगों को मारने-पीटने लगीं। हमें लगा कि किसी ने इन पर भूत-प्रेत कर दिया है। ओझाओं से झाड़-फूंक करवाई, ताबीज भी पहनाए, लेकिन कोई असर नहीं हुआ। अब कभी-कभी तो मन में यही आता है कि भगवान इन्हें जल्दी अपने पास बुला ले, ताकि इनकी और हमारी यह तकलीफ खत्म हो सके। इस तरह जंजीर से बांधकर रखना दर्द देता है, लेकिन कर ही क्या सकता हूं।’ इस तरह कई गांव घूमने के बाद अब शाम हो चुकी है। रास्ते में मिट्ठरा गांव आता है। मेरे साथी कहते हैं, ‘यहां भी इसी तरह का एक मरीज है। वह कई महीनों से घर में बंद है। चलेंगे क्या?’ अब यहां से निकल और करीब आधे घंटे में उस घर पर पहुंचा। यहां एक कमरे की खिड़की से एक महिला किसी को लोटे में पानी भरकर देती हैं, लेकिन अचानक भीतर से लोटा बाहर आकर गिरता है। महिला ने जिसे पानी दिया था, उसने लोटा बाहर फेंक दिया था। हम नजदीक पहुंचे। देखा कमरे में एक 20 साल की लड़की परमेश्वरी चटाई पर लेटी हुई है। 40 साल की पारू देवी पल्लू संभालते हुए बोलती हैं, ‘यह मेरी बेटी है। ढाई महीने से ऐसी ही पड़ी है। इसे इतना गुस्सा आता है कि किसी का भी गला पकड़ लेती है। इसीलिए कमरे में बंद करके रखती हूं। अभी पानी दिया, तो लोटा बाहर फेंक दिया। पता नहीं इसे क्या हो गया है। झाड़-फूंक का भी कोई असर नहीं है। एक दिन यह स्कूल से आई। अचानक गीत गाने लगी। हमें लगा इस पर भूत आ गया है। एक ओझा के पास लेकर गई, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। अभी कमरा खोल दूं, तो बाहर निकलकर जो भी हाथ में आएगा, उसी से मारने दौड़ पड़ेगी। इसलिए खिड़की से ही खाना-पानी देती हूं। इस बीच मैंने कई बार परमेश्वरी को आवाज दी, लेकिन वह नहीं बोली। बेसुध लेटी रही। मेरे साथी बताते हैं, ‘यहां मानसिक रोगियों को सही समय पर इलाज नहीं मिलता, इसलिए इनके परिवार इन्हें जंजीर से बांधकर रखने को मजबूर हैं।’ अब मैं बाड़मेर पहुंचता हूं। जिले के चीफ मेडिकल एंड हेल्थ ऑफिसर विष्णु राम विश्नोई के पास। विष्णु राम बताते हैं, ‘बाड़मेर में ही नहीं, पूरे देश में मानसिक रोगी हैं। बाड़मेर में 3 साल पहले मानसिक इलाज की सुविधा नहीं थी, इसलिए लोगों को जोधपुर जाना पड़ता था। अब यहां इलाज है, लेकिन लोग जागरूक नहीं हैं। हम लोग गांव-गांव आशा वर्कर्स से ऐसे मरीजों के बारे में पता लगवाते हैं, लेकिन बड़ी दिक्कत यह है कि यहां घर दूर-दूर हैं। कुछ घरों के बीच एक-एक किलोमीटर की दूरी है। इसलिए हेल्थ वर्कर्स हर घर तक नहीं पहुंच पाते। हमें जहां भी ऐसे मानसिक रोगियों की जानकारी मिलती है, उनका रेस्क्यू कराते हैं। किसी इंसान को जंजीर से बांधकर रखना अमानवीय है। हालांकि, सरकार की अब तक ऐसी कोई विशेष नीति नहीं बना पाई है, जिसके जरिए इन लोगों की पहचान कर ठीक से इलाज किया जा सके। लोगों का झाड़-फूंक में ज्यादा यकीन है। इससे मरीज की हालत बिगड़ती जाती है। परिवार मरीजों का पूरा इलाज नहीं कराते, जिससे बीमारी बढ़ जाती है।’ बातचीत खत्म होने के बाद मैं वापस लौटता हूं। लेकिन रास्ते भर एक सवाल पीछा करता है- आखिर किसी इंसान को जानवर की तरह जंजीर से कैसे बांधा जा सकता है? मरीजों की इस हालत पर मेडिकल अफसर विष्णु राम विश्नोई के चेहरे पर मुझे जरा भी चिंता नहीं दिखी। उनका दावा है कि आशा वर्कर्स गांव-गांव जाकर मानसिक रोगियों की पहचान करती हैं। उन्हें इलाज के लिए अस्पताल भी लाती हैं। लेकिन जिन परिवारों से मेरी बात हुई, उनमें से किसी ने भी नहीं बताया कि उनके यहां कभी कोई आशा वर्कर्स आई थीं। --------------------------------------- 1- ब्लैकबोर्ड-'तुम ईसाई बन गए, बाप की लाश नाले में बहाओ':22 दिन तक सड़ती रही लाश, सरपंच बोला- अंतिम संस्कार किया तो बीवी-बच्चों के बारे में सोच लेना ‘7 जनवरी 2025। सुबह के 10 बजे थे। पापा की किडनी फेल होने की वजह से मौत हो गई थी। देखते ही मां रो-रोकर बेहाल हो गई। शव बरामदे में रखते ही चीख-पुकार मच गई। सभी रिश्तेदार घर पहुंचने लगे। सभी कहने लगे- अंतिम संस्कार की तैयारी करो। जब तक लाश दरवाजे पर रहेगी, सब रोते रहेंगे। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- ब्लैकबोर्ड-पत्नी के घरवालों ने नंगा करके पीटा, नस काटकर सुसाइड:पत्नी ने कॉलर पकड़कर मांगे 20 लाख तो फांसी लगाई; तंग पतियों की स्याह कहानियां ‘20 जनवरी 2025 की बात है। शाम के 4 बजे थे। मैं अपने दोनों पोतों को स्कूल से लेकर घर लौट रही थी। रास्ते में मेरा छोटा बेटा नितिन बाइक से आ रहा था। उसने कहा- मम्मी, बाइक पर बैठ जाओ। फिर हम उसके साथ घर आए। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें

दैनिक भास्कर 28 May 2026 5:19 am

नेपाल: आरएसपी प्रमुख लामिछाने जून में कर सकते हैं भारत दौरा

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह की प्रस्तावित भारत यात्रा को लेकर अनिश्चितता के बीच सत्तारूढ़ राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के अध्यक्ष रबी लामिछाने जून के पहले सप्ताह में नई दिल्ली का दौरा कर सकते हैं।

देशबन्धु 28 May 2026 5:00 am

48वीं विश्व कौशल प्रतियोगिता के लिए लगभग 5,900 लोगों ने पूर्व-पंजीकरण कराया

चीन की राजधानी पेइचिंग में हाल ही में 48वीं विश्व कौशल प्रतियोगिता के लिए आयोजित एक स्वागत समारोह में प्रतियोगिता के लिए लगभग 5,900 लोगों ने पूर्व-पंजीकरण कराया है

देशबन्धु 28 May 2026 4:40 am

चीन ने नया दूरसंचार तकनीक परीक्षा उपग्रह लॉन्च किया

चीन ने 26 मई की देर रात 12 बजकर 16 मिनट पर दक्षिण चीन के हाईनान प्रांत में स्थित वनछांग प्रक्षेपण केंद्र में लॉन्ग मार्च-7 वाहक रॉकेट से सफलता पूर्वक एक नया दूरसंचार तकनीक परीक्षा उपग्रह लॉन्च किया

देशबन्धु 28 May 2026 4:30 am

वेनेजुएला अब अमेरिका का अहम साझेदार बन रहा : ट्रंप

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि वेनेजुएला अब अमेरिका का एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार बनता जा रहा है

देशबन्धु 28 May 2026 4:19 am

चीन में प्रमुख औद्योगिक उद्यमों के मुनाफे में पहले चार महीनों में 18.2% की वृद्धि

चीनी राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो द्वारा बुधवार को जारी आंकड़ों के अनुसार जनवरी से अप्रैल तक, देश भर में प्रमुख औद्योगिक उद्यमों का कुल लाभ 24 ख़रब 35 अरब 84 हजार युआन तक पहुंच गया

देशबन्धु 28 May 2026 3:09 am

इजरायली हमलों से दहला लेबनान, 31 लोगों की मौत, 40 अन्य घायल.. नेतन्याहू ने दिए बड़े आदेश

इजरायल द्वारा लेबनान पर हाल के घंटों में किए गए सिलसिलेवार हमलों में 31 लोग मारे गए और 40 अन्य घायल हो गए।लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने बुधवार को यह जानकारी दी

देशबन्धु 27 May 2026 6:03 pm

क्या है युद्धविराम के पीछे का असली खेल? अमेरिका-इजरायल रिश्तों को लेकर ईरानी विदेश मंत्री ने उठाए सवाल

ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच एक नई बहस छेड़ दी है। अराघची ने अमेर‍िका और इजरायल के एकमत होने पर सवाल खड़े कर द‍िए हैं।

देशबन्धु 27 May 2026 6:01 pm

अब्राहम समझौते को लेकर बुरी तरह फंस गया पाकिस्तान, जानें क्‍या है ट्रंप का मकसद

विश्लेषकों के अनुसार, पाकिस्तान इस मुद्दे पर दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है। यदि वह अब्राहम समझौते का खुलकर विरोध करता है तो अमेरिका के साथ उसके संबंधों पर असर पड़ सकता है। वहीं अगर वह इस पहल के समर्थन में जाता है, तो उसे घरेलू राजनीतिक विरोध और धार्मिक समूहों के दबाव का सामना करना पड़ सकता है

देशबन्धु 27 May 2026 10:39 am

वाशिंगटन की पेपर मिल में बड़ा हादसा, केमिकल टैंक फटने से कई लोगों की मौत

अमेरिका के वाशिंगटन राज्य के लॉन्गव्यू शहर में एक पल्प और पेपर मिल में केमिकल टैंक फटने से कई लोगों की मौत हो गई और कई अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए

देशबन्धु 27 May 2026 9:57 am