ट्रंप का धमाका: नाटो रिश्तों को बताया 'बेतुका'!
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के साथ अमेरिका का संबंध एकतरफा है और ऐसे रिश्ते को बनाए रखना बेतुका है
दुनिया के सबसे अमीर शख्स इलॉन मस्क का एक पोस्ट वायरल है। वो लिखते हैं- मेरा बेटा मैंडरिन (चाइनीज भाषा) सीख रहा है। मई 2026 में मस्क अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ चीन दौरे पर गए, तब भी 6 साल का बेटा चीन की पारंपरिक कढ़ाई वाली जैकेट पहने साथ दिखा था। ट्रम्प की पोती से जुकरबर्ग की बेटी तक, चाइनीज सीखने वाले अरबपतियों के बच्चों की लंबी लिस्ट है। आखिर बच्चों को मैंडरिन क्यों सिखा रहे दुनिया के सबसे ताकतवर लोग; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: किन ताकतवर हस्तियों के बच्चे चाइनीज सीख रहे हैं? जवाब: अलग-मौकों पर इन शख्सियतों के बच्चों के चाइनीज सीखने का खुलासा हुआ… डोनाल्ड ट्रम्प की पोती: चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग 2026 में अमेरिका गए थे। तब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की 6 साल की पोती अरैबेला और 4 साल के पोते जोसेफ ने चाइनीज में गाना सुनाया था। इसके बाद रिपोर्ट्स आईं कि अमेरिका में चीनी नैनी की डिमांड बढ़ गई थी। ट्रम्प की बेटी इवांका भी मैंडरिन बोल-समझ सकती हैं। व्लादिमीर पुतिन की पोती: रूसी राष्ट्रपति ने 2024 में बताया था कि उनके घर के बच्चे चीनी बोलते हैं। पुतिन के प्रेस सेक्रेटरी दिमित्री पेस्कोव की बेटी भी रूसी भाषा से पहले चाइनीज बोलने लगी थी, क्योंकि उसकी नैनी चीनी मूल की थी। मई 2026 में चीन दौरे पर पहुंचे पुतिन ने बताया था कि एक लाख से ज्यादा रूसी चाइनीज सीख रहे हैं। जेफ बेजोस के चारों बच्चेः अमेजन के फाउंडर जेफ बेजोस की पूर्व पत्नी मैकेंजी ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उनके चारों बच्चे मैंडरिन सीखते हैं। किंग चार्ल्स का पोता: ब्रिटेन के किंग चार्ल्स के पोते और राजगद्दी के दूसरे वारिस प्रिंस जॉर्ज को स्कूल में चाइनीज सिखाई गई है। प्रिंस जॉर्ज अभी 12 साल के हैं। मार्क जुकरबर्ग की बेटी: फेसबुक फाउंडर ने 2014 में बीजिंग की सिंगहुआ यूनिवर्सिटी में छात्रों से चाइनीज में बात की था। पत्नी प्रिसिला चैन चीनी मूल की हैं। उनकी तीनों बेटियों को शुरुआत से ही अंग्रेजी और चाइनीज सिखाई गई है। बड़ी बेटी मैक्स का तो चीनी नाम भी है। इसी तरह अमेरिकी इन्वेस्टर और लेखक जिम रॉजर्स की 2 बेटियों- हैप्पी और बी रॉजर्स ने मैंडरिन सीखी है। 2017 में दोनों का चीनी गाना गाते हुए वीडियो वायरल हुआ था। रॉजर्स का मानना है कि 21वीं सदी में चीन बहुत जरूरी देश होगा। बच्चों को चीनी वातावरण देने के लिए परिवार सिंगापुर शिफ्ट हो गया था। सवाल-2: आखिर अरबपतियों के बच्चे चाइनीज क्यों सीख रहे हैं? जवाब: लंदन के किंग्स कॉलेज में चाइनीज स्टडीज के प्रोफेसर केरी ब्राउन के मुताबिक, इसकी वजह सिर्फ और सिर्फ स्वार्थ है। चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और मैनुफैक्चरिंग हब है। तेज इनोवेशन के साथ ग्लोबल डॉमिनेंस बढ़ा रहा है। अरबपतियों का मानना है कि आने वाला दौर चीन का है, इसलिए वो अपने बच्चों को चीनी भाषा सिखा रहे हैं। इतिहास में भी देश के ताकतवर होते ही उसकी भाषा फैलती रही है… मैनहैटन के कैरोसेल ऑफ लैंग्वेजेज की फाउंडर पैट्रिजिया कॉर्मन मानती हैं कि यह बच्चों के भविष्य में एक बड़ा निवेश है। सिर्फ चीन के उभरते बाजार की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए भी कि चाइनीज दुनिया की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली मातृभाषा है। बच्चे भी इसे सीखना पसंद करते हैं, क्योंकि इसमें ध्वनियां हैं। सवाल-4: अंग्रेजी की तरह क्या अब चाइनीज ग्लोबल लैंग्वेज बनने वाली है? जवाब: इस पर एक्सपर्ट्स की अलग-अलग राय हैं… दरअसल, अंग्रेजी में सिर्फ 26 अक्षर हैं, जिन्हें आसानी से सीखा जा सकता है। जबकि चाइनीज में एक लाख से ज्यादा सिंबल्स हैं। पढ़ने-लिखने के लिए कम से कम 3500 सिंबल्स रटने पड़ते हैं और उन्हें अलग-अलग टोन में सीखना पड़ता है। ये प्रोसेस गैर-चीनी लोगों के लिए काफी कठिन है। कोडिंग, इंटरनेट, एल्गोरिदम, रिसर्च पेपर, ग्लोबल ट्रेड, साइंस जैसे तमाम अहम क्षेत्रों में अंग्रेजी ही ज्यादातर इस्तेमाल होती है। यहां तक कि चीन के कॉलेज-यूनिवर्सिटी और कंपनियों में इंटरनेशनल डायलॉग्स के लिए अक्सर अंग्रेजी का इस्तेमाल होता है। ऐसे में चाइनीज भाषा अचानक से अंग्रेजी को ग्लोबल लैंग्वेज के तौर पर रिप्लेस नहीं कर सकती है। हालांकि भविष्य में इसकी संभावना को नकारा नहीं जा सकता। सवाल-5: हिंदी की स्थिति क्या है, क्या इसे बोलने वाले भी बढ़ रहे हैं?जवाबः अंग्रेजी और मैंडरिन के बाद हिंदी तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है… लेकिन दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा अंग्रेजी है। 1999 से 2025 के बीच हिंदी के प्राइमरी स्पीकर्स, यानी जिनकी पहली भाषा हिंदी हो, लगभग दोगुने हुए हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह आबादी का बढ़ना है। 2001 की जनगणना के मुताबिक भारत के 42.2 करोड़ लोग हिंदी बोलते थे, जो 2011 तक बढ़कर 52.83 करोड़ हो गए। यानी 25% से ज्यादा की बढ़त। देश के 85% से ज्यादा हिंदी बोलने वाले उत्तर भारत के हिंदी बेल्ट जैसे- उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान वगैरह से आते हैं। हिंदी बेल्ट में जनसंख्या दक्षिण भारत के मुकाबले कहीं तेजी से बढ़ रही है। नतीजतन 1991 से 2011 के बीच जनगणना में तेलुगु, तमिल, कन्नड़, मलयालम, मराठी और उर्दू जैसी भाषाओं का हिस्सा घटा, जबकि हिंदी अकेली ऐसी बड़ी भाषा रही जिसका राष्ट्रीय हिस्सा लगातार बढ़ा है। --------- ये खबर भी पढ़िए… पासपोर्ट-आधार भी नागरिकता का सबूत नहीं, फिर कैसे तय होगा कि आप भारत के नागरिक; क्या NRC की तैयारी है ‘पासपोर्ट एक यात्रा दस्तावेज है, न कि नागरिकता का प्रमाणपत्र।’ विदेश मंत्रालय के अधिकारी का ये बयान सुर्खियों में है। सवाल उठ रहे हैं कि अगर पासपोर्ट नहीं, तो भारत के नागरिक होने का सबूत क्या है? क्या सरकार नागरिकता के लिए कुछ नया करने जा रही है, पूरी खबर पढ़िए…
पाकिस्तान : बलूचिस्तान में भारी बारिश के कारण चार लोगों की मौत, कई घायल
पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के कुछ हिस्सों में भारी मानसूनी बारिश के बाद झोब और खुजदार इलाकों में दो घरों की छतें ढहने से चार लोगों की मौत हो गई, जबकि 10 से ज्यादा लोग घायल हो गए।
इजरायल का 'किलिंग मिशन' फेल: ईरान के बड़े नेताओं पर मंडराया था खतरा, अमेरिका ने कैसे पलटी बाजी
मध्य-पूर्व में तनाव का पारा एक बार फिर तब आसमान छू गया जब ईरान के दो बड़े चेहरों, विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालिबाफ की जान पर बन आई। खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, इजरायल ने इन दोनों हस्तियों को निशाना बनाने के लिए अपने फाइटर जेट्स को पूरी तरह तैयार कर लिया था और ऑपरेशन के लिए 'ग्रीन सिग्नल' का इंतजार किया जा रहा था। हालांकि, ठीक वक्त पर अमेरिका की सक्रियता ने इस संभावित कत्लेआम को रोक लिया और एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध की चिंगारी को बुझा दिया। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि तेहरान और वाशिंगटन के बीच पर्दे के पीछे का खेल कितना जटिल और खतरनाक है।इजरायल का प्लान और अमेरिका का 'सेफगार्ड'सूत्रों के मुताबिक, इजरायल का खुफिया तंत्र इन दोनों ईरानी नेताओं की गतिविधियों पर पैनी नजर रखे हुए था। जैसे ही वे एक संवेदनशील मिशन पर निकले, इजरायली वायुसेना के फाइटर जेट्स ने उड़ान भर ली थी। बताया जा रहा है कि इजरायल ने इस हमले को अंजाम देने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी, लेकिन अमेरिका को इसकी भनक लग गई। बाइडन प्रशासन, जो पहले से ही क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के लिए दबाव में है, ने इस संभावित हमले को रोकने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। अमेरिका ने न केवल अपने खुफिया चैनलों का इस्तेमाल किया, बल्कि इजरायल पर सीधा कूटनीतिक दबाव भी बनाया ताकि स्थिति नियंत्रण से बाहर न हो जाए।पर्दे के पीछे की कूटनीति और भविष्य का खतराअमेरिका का ईरान के इन नेताओं को बचाना महज एक मानवीय फैसला नहीं था, बल्कि इसके पीछे गहरा भू-राजनीतिक स्वार्थ भी छिपा है। वाशिंगटन को डर था कि अगर इजरायल इन हाई-प्रोफाइल नेताओं को मार गिराता है, तो ईरान का जवाब इतना भीषण होगा कि पूरा खाड़ी क्षेत्र युद्ध की आग में जल उठेगा, जिससे दुनिया भर में तेल की आपूर्ति और वैश्विक शांति खतरे में पड़ सकती थी। हालांकि यह संकट अभी टल गया है, लेकिन इजरायल और ईरान के बीच बढ़ती यह दुश्मनी किसी भी वक्त एक बड़े धमाके का रूप ले सकती है। तेहरान की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन इस घटना ने मध्य-पूर्व की सुरक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से हिलाकर रख दिया है।
पाकिस्तान में बड़ा सड़क हादसा: खाई में गिरी अनियंत्रित बस, 40 यात्रियों की दर्दनाक मौत से मचा कोहराम
पड़ोसी देश पाकिस्तान से एक दिल दहला देने वाली खबर सामने आई है, जहां एक भीषण सड़क हादसे ने दर्जनों परिवारों को मातम में डूबो दिया है। जानकारी के अनुसार, यात्रियों से खचाखच भरी एक ओवरलोडेड बस अनियंत्रित होकर गहरी खाई में जा गिरी। यह हादसा इतना भयानक था कि बस के परखच्चे उड़ गए और मौके पर ही 40 लोगों ने दम तोड़ दिया। चीख-पुकार सुनकर स्थानीय लोग फौरन बचाव कार्य के लिए दौड़े, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। घटना स्थल की तस्वीरें विचलित कर देने वाली हैं, जहां बचाव दल कड़ी मशक्कत के बाद शवों को बाहर निकालने में जुटा है।खस्ताहाल सड़कें और ओवरलोडिंग बनी कालशुरुआती जांच में इस हादसे के पीछे बड़ी लापरवाही सामने आ रही है। बस न केवल क्षमता से अधिक ओवरलोडेड थी, बल्कि जिस रास्ते से यह गुजर रही थी, वहां की सड़कें भी बेहद संकरी और खतरनाक हैं। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि चालक ने एक मोड़ पर बस से नियंत्रण खो दिया, जिसके बाद वाहन सीधे खाई में जा गिरा। स्थानीय प्रशासन और राहत कर्मियों के अनुसार, मृतकों का आंकड़ा अभी और भी बढ़ सकता है, क्योंकि कई यात्री अभी भी मलबे में दबे हो सकते हैं और घायलों की हालत बेहद नाजुक बनी हुई है। घायलों को इलाज के लिए नजदीकी अस्पतालों में भर्ती कराया गया है, जहां डॉक्टरों ने आपातकाल घोषित कर दिया है।सरकार ने दिए जांच के आदेशइस हृदयविदारक घटना पर आला अधिकारियों ने गहरा दुख व्यक्त करते हुए घटना की उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस रूट पर अक्सर बसें ओवरलोडिंग करती हैं और प्रशासन की ढिलाई के कारण आए दिन ऐसे हादसे होते रहते हैं। फिलहाल, पूरे इलाके में मातम पसरा हुआ है और पीड़ित परिवारों को मुआवजे की मांग को लेकर प्रशासन पर दबाव बनाया जा रहा है। बचाव अभियान अभी भी जारी है, और सुरक्षा बलों ने घटनास्थल को पूरी तरह से सील कर दिया है ताकि राहत कार्यों में किसी प्रकार की बाधा न आए।
जमीन के नीचे दबा था मौत का खजाना! खुदाई के दौरान मिली ऐसी चीज कि रातों-रात खाली कराना पड़ा शहर
किसी भी निर्माण कार्य के लिए की जा रही खुदाई जब अचानक खौफ में बदल जाए, तो क्या होगा? कुछ ऐसा ही मंजर देखने को मिला, जब मजदूर अपने नियमित काम में लगे थे कि तभी फावड़े की टक्कर किसी ऐसी चीज से हुई जिसने पूरे प्रशासन के होश उड़ा दिए। यह कोई मामूली खजाना या पुरानी ईंटें नहीं थीं, बल्कि एक ऐसी 'तबाही' थी जो बरसों से जमीन के सीने में दफन थी। जैसे ही मजदूरों ने इसकी सूचना अधिकारियों को दी, मौके पर पहुंचे आला अफसरों ने जो देखा, उसके बाद बिना एक पल गंवाए पूरे शहर को खाली करने के आदेश जारी कर दिए गए। अफरा-तफरी का ऐसा माहौल बना कि लोग अपना सब कुछ छोड़कर सुरक्षित ठिकानों की ओर भागने पर मजबूर हो गए।खतरा इतना बड़ा कि थम गई सांसेंखुदाई के दौरान मिले उस खतरनाक अवशेष ने न केवल इलाके की सुरक्षा को खतरे में डाल दिया, बल्कि भविष्य में होने वाली एक बड़ी अनहोनी की आहट भी दे दी। विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर इसे समय रहते नहीं पहचाना जाता तो एक बड़ी त्रासदी पूरे शहर को नक्शे से मिटा सकती थी। खुदाई स्थल से निकली वो रहस्यमयी चीज कितनी घातक है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बम निरोधक दस्ते और सुरक्षा बलों ने पूरे क्षेत्र को अपने घेरे में ले लिया है। फिलहाल, क्षेत्र के सभी रास्तों को सील कर दिया गया है और स्थानीय लोगों को प्रशासन की ओर से सख्त हिदायत दी गई है कि वे उस इलाके के आसपास भी न भटकें।प्रशासन की सख्ती और दहशत में शहरशहर खाली कराने के पीछे प्रशासन का मुख्य उद्देश्य जनहानि को रोकना है। हालांकि, अचानक मिले इस 'खतरे' के बाद स्थानीय लोगों में भारी गुस्सा और डर का मिला-जुला असर है। लोगों का कहना है कि उन्हें इस बारे में कोई पूर्व सूचना नहीं थी और अचानक शहर को उजड़ते देखना बेहद दर्दनाक है। दूसरी ओर, सरकार और पुरातत्व विभाग के अधिकारी इस मामले की गहन जांच में जुट गए हैं कि आखिर वह क्या चीज थी जो जमीन के इतने नीचे दबी हुई थी। क्या यह कोई पुराना बारूद है या फिर कोई प्राकृतिक आपदा का संकेत? फिलहाल, पूरे शहर की नजरें जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं और लोग इस उम्मीद में हैं कि कब वे अपने घरों में सुरक्षित वापस लौट सकेंगे।
पाकिस्तान में दो विदेशी महिलाओं के अपहरण और सामूहिक दुष्कर्म का आरोप, चार गिरफ्तार
पुलिस के अनुसार, पीड़ित महिलाओं में एक नीदरलैंड (डच) और दूसरी वेनेजुएला की नागरिक हैं। शिकायत में कहा गया है कि दोनों की मुलाकात अक्टूबर 2025 में सिंगापुर में मोहम्मद रजा दार नामक व्यक्ति से हुई थी।
रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका को डर था कि यदि ईरानी प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख नेताओं पर हमला हुआ, तो दोनों देशों के बीच जारी वार्ता और संभावित शांति प्रयास गंभीर रूप से प्रभावित हो सकते हैं।
फ्रांस के जंगलों में धधकी आग, , 800 से अधिक दमकलकर्मी मोर्चे पर, भीषण गर्मी ने बढ़ाई मुश्किलें
दक्षिणी फ्रांस में लगातार पड़ रही भीषण गर्मी और लंबे समय से बने सूखे के बीच जंगलों में लगी आग ने हालात को गंभीर बना दिया है। औडे (Aude) और हेराल्ट (Hrault) क्षेत्रों में गुरुवार को भड़की आग तेजी से फैलकर लगभग 900 हेक्टेयर वन क्षेत्र को अपनी चपेट में ले चुकी है।
‘चीन को कभी पनामा नहर पर कब्जा नहीं करने देंगे’, ट्रंप ने 1999 के समझौते को बताया ऐतिहासिक भूल
अपने संबोधन में ट्रंप ने कहा कि पनामा को नियंत्रण मिलने के बाद जहाजों से वसूले जाने वाले ट्रांजिट शुल्क में पहले चार गुना वृद्धि की गई और बाद में इसे और बढ़ा दिया गया।
वेनेजुएला में पिछले हफ्ते आए भूकंप के बाद धीरे-धीरे हालात स्थिर हो रहे हैं। परिवहन मंत्रालय की ओर से साझा जानकारी के अनुसार, लॉस टेक्स शहर में मास-ट्रांजिट रेल सेवा फिर से शुरू हो गई है
ईरान की अमेरिका को चेतावनी, होर्मुज स्ट्रेट में दखल दिया तो मिलेगा करारा जवाब
ईरान की मुख्य सैन्य कमान खातम अल-अनबिया सेंट्रल हेडक्वार्टर ने गुरुवार को चेतावनी दी कि अगर अमेरिका होर्मुज स्ट्रेट में किसी भी तरह का हस्तक्षेप करता है, तो ईरानी सशस्त्र बल 'तेज और निर्णायक' जवाबी कार्रवाई करेंगे।
सीरिया की राजधानी दमिश्क में एक कैफे में भीषण धमाका, 9 लोगों की मौत
सीरिया की राजधानी दमिश्क में एक कैफे में भीषण धमाके में 9 लोगों की जान चली गई है, जबकि 20 लोग घायल हो गए हैं। सीरिया के गृह मंत्रालय की ओर से बीती रात ये जानकारी दी गई कि मध्य दमिश्क के एक कैफे में धमाका हुआ और 9 लोगों की मौत हो गई।
अमेरिका में कॉलेज एथलीट्स को टैक्स में राहत देने पर विचार
अमेरिकी सांसदों ने कॉलेज खिलाड़ियों को भारी-भरकम टैक्स के बोझ से बचाने के लिए सुधारों की मांग की है। उनका कहना है कि नेम, इमेज एंड लाइकेनेस (एनआईएल) समझौतों के तेजी से बढ़ते चलन के कारण कई युवा खिलाड़ी पर्याप्त मार्गदर्शन के अभाव में जटिल कर व्यवस्था को समझने और उसका पालन करने में कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं।
8 साल का जावेद स्कूल के मैदान में क्रिकेट खेलते-खेलते अचानक गिर पड़ा। दोस्तों ने उसे उठाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं उठा। जमीन पर पड़ा कराहने लगा। टीचर भागते हुए आए, उन्होंने भी उठाने की कोशिश की। वो बार-बार कहता रहा- मेरे घुटने और कोहनियों में बहुत दर्द है। पैर मुड़ ही नहीं रहे। मैं उठ नहीं पाऊंगा। अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पाऊंगा। प्लीज, अम्मी-अब्बू को फोन करके बुला दीजिए। घर पर फोन पहुंचते ही उसके अम्मी-अब्बू फौरन स्कूल पहुंचे। जावेद को गोद में उठाया और लेकर अस्पताल भागे। डॉक्टरों ने कुछ दवाइयां देकर घर भेज दिया। बोले- मांसपेशियां खिंच गई होंगी, कुछ दिन में ठीक हो जाएगा। जावेद की हालत हर दिन और खराब होती चली गई। फिर किसी ने मौलवी के पास जाने की सलाह दी। वहां भी लेकर गए। मौलवी ने 10 हजार की तेल की बॉटल थमा दी। कई हफ्तों तक उस तेल से मालिश की, लेकिन जावेद बिस्तर से नहीं उठा। आज इस बात को 18 साल बीत गए हैं, लेकिन जावेद आज तक बेड से उठ नहीं पाया। कूल्हे, कोहनी, घुटने, कलाई जहां-जहां भी जोड़ (ज्चाइंट) थे, वहां-वहां सूजन बढ़ती चली गई। दुर्लभ बीमारियों की सीरीज- ‘ऐ जिंदगी’ में आज कहानी जावेद की। जिसके लिए मैं नीरज झा पहुंचा हूं गुजरात के अहमदाबाद शहर… जिस जावेद का ऊपर जिक्र किया है, अब उसकी उम्र 26 साल हो चुकी है। जावेद के अब्बू को एक डॉक्टर ने उसका जेनेटिक टेस्ट करवाने की सलाह दी थी। रिपोर्ट में पता चला कि उसे दुर्लभ बीमारी है, जिसका कोई इलाज नहीं है। दरअसल, जावेद के अब्बू की शादी खाला की बेटी से हुई है। करीबी रिश्तों में जब शादियां होती हैं, तो उनके बच्चों में ऐसी बीमारी की संभावना बढ़ जाती है। इस बीमारी को एंजाइम थेरेपी से थोड़ा ठीक किया जा सकता है, लेकिन इसका खर्च हर साल 4 करोड़ रुपए है। जब मैं जावेद के घर पहुंचा तो सुबह के 11 बज रहे थे। लाल-दरवाजे के पास एक घर है। यहां दस्तक देते ही एक बुजुर्ग दरवाजा खोलते हैं। वे अपना नाम- मोहम्मद आजी बताते हैं। घर के अंदर जाते ही किसी के कराहने और चीखने की आवाजें आती हैं। मोहम्मद आजी बताते हैं- ये मेरे बेटे जावेद के कराहने की आवाज है। वे मुझे उसके कमरे में ले गए। जावेद बेड पर लेटा है। दर्द से तड़प रहा है, हांफ रहा है। उसे देखकर लग रहा है मानो, शरीर से हडि्डयां बाहर झांक रही हों। उसके हाथ-पैर टेढ़े हो चुके हैं। वो कुछ देर बाद, उठने की कोशिश करता है, लेकिन दर्द के कारण लुढ़क जाता है। 15 मिनट तक वह कोशिश करता है, लेकिन उठ नहीं पाता। मो. आजी बताते हैं- शादी के दो साल बाद 3 मार्च 2000 को मेरा बेटा जावेद पैदा हुआ। शुरुआत में तो वैसा ही था, जैसे सबके बच्चे होते हैं। जब दो महीने का हुआ, तो धीरे-धीरे शरीर सूखने लगा। सिर भी शरीर के मुकाबले काफी बड़ा लग रहा था। इसकी दादी मजाक में कहती भी थी कि सरदार का बच्चा कहां से पैदा हो गया। डॉक्टर को दिखाया, तो उन्होंने कुछ दवाइयां दे दीं। तीन महीने बाद भी जब कुछ असर नहीं दिखा तो फिर डॉक्टर के पास पहुंचे। उन्होंने बोला कि जब बड़ा होगा तो ठीक हो जाएगा। तबसे हमने ध्यान देना बंद कर दिया। कई बार जावेद चलते-चलते गिर जाता था। हमें लगता था कि पैर कमजोर हैं। मालिश करेंगे तो ठीक हो जाएगा। लेकिन धीरे-धीरे इसका शरीर और सूखने लगा। एकबार कुछ रिश्तेदार घर आए और इसे देखते ही बोले- जावेद बड़ा कमजोर है। बीमार है क्या? इसको डॉक्टर को दिखाइए। तबसे हमारी चिंता और बढ़ गई। 2010 की बात है। सूरत में पत्नी की नौकरी लगे दो साल ही हुए थे। जावेद तब तीसरी कक्षा में था। मैं ही इसकी देखभाल कहता था। इसका ट्यूशन घर से 2 किलोमीटर दूर था। एक दिन यह ट्यूशन गया, लेकिन वापस नहीं लौटा। मैं घर पर उसका इंतजार कर रहा था। शाम हुई, तो मेरे जानने वाले शख्स दौड़ते हुए घर आए। बताया- तुम्हारा बेटा रास्ते में गिर गया है, उठ ही नहीं पा रहा है। जोर-जोर से चीख रहा है। मैं पहुंचा तो देखा जावेद बेहोश पड़ा था। उसके घुटने और कोहनियों में बहुत ज्यादा सूजन आ गई थी। उसे घर लाया। पत्नी को फोन करके सूरत से अहमदाबाद बुलाया। पूरी रात हम तेल से मालिश करते रहे, लेकिन दर्द कम नहीं हुआ। दोबारा डॉक्टर के पास ले गए तो उन्होंने कहा- इसे कोई भी भारी सामान नहीं उठाने देना, यहां तक की स्कूल बैग भी नहीं। आधा किलो से ज्यादा वजन इसका शरीर बर्दाश्त नहीं कर पाएगा। मोहम्मद आजी बात ही कर रहे थे, तभी जावेद बिस्तर से उठने की कोशिश करने लगा, लेकिन दर्द के कारण वह बार-बार बिस्तर पर ही लुढ़क जा रहा था। 15 मिनट तक उसने कोशिश की, लेकिन उठ नहीं पाया। आखिरकार पिता के सहारे उसने आहिस्ता-आहिस्ता अपने पैर बेड से नीचे लटकाए और चप्पल पहनने लगा। इसके बाद, मोहम्मद उसे वॉशरूम की ओर ले गए। वह किसी बच्चे की तरह पैर घसीटते हुए धीरे-धीरे कदम आगे बढ़ा रहा है। उसका घुटना जरा सा भी नहीं मुड़ रहा है। झुंझलाते हुए जावेद कहता है- ‘मुझे तो हर दिन आधे घंटे बिस्तर से उठने और आधे घंटे लेटने में लग जाते हैं। इतने दर्द में कहने को तो जिंदा हूं, लेकिन हालत किसी 90 साल के बूढ़े जैसी है। मेरे मां-बाप हैं जो मुझे ढो रहे हैं। उन्ही की वजह से जिंदा हूं। मेरे सारे काम यही लोग करते हैं। ऐसी बेकार जिंदगी है मेरी, 26 साल का हूं फिर भी पापा नहलाते हैं। मुझे शर्म आती है।’ ‘करीब एक साल पहले की बात है। मैं वॉशरूम गया था। अचानक घुटनों और कोहनियों में तेज दर्द उठा। पूरा शरीर सुन्न पड़ गया। मैं कमोड से उठ नहीं पा रहा था। करीब 15 मिनट तक जूझता रहा, लेकिन उठ नहीं पाया और न ही पैंट पहन पाया। आखिर मैंने चीखते हुए अब्बू को आवाज दी। पहले तो उन्हें मेरी आवाज भी सुनाई नहीं दी। काफी देर बाद जब मैं बाहर नहीं निकला तो वो खुद आए। आवाज देकर पूछा- जावेद तुम ठीक हो? मैंने रोते हुए जवाब दिया- अब्बू मेरा शरीर सुन्न पड़ गया है। घुटने जाम हो गए हैं। मैं उठ नहीं पा रहा हूं। मुझे यहां से बाहर निकालो। अब्बू भागते हुए गए और पड़ोसी को बुलाकर लाए। दोनों ने मिलकर वॉशरूम का दरवाजा तोड़ा। अंदर आए, मुझे पैंट पहनाई और बाहर निकाला। उस दिन के बाद से आज तक, मैंने कभी वॉशरूम का दरवाजा बंद नहीं किया। डर लगता है कि अगर दोबारा वैसा ही दर्द उठा, तो क्या करूंगा।’ मोहम्मद आजी कहते हैं कि- ये एक कदम भी बिना सहारे के नहीं चल पाता। तीन साल पहले की बात है। मैंने घर के पास ही एक दुकान से बिस्किट लाने भेजा। बमुश्किल 500 मीटर दूर। काफी देर तक लौटा नहीं। तब मैंने इसके नंबर पर फोन लगाया। किसी और ने जावेद का फोन उठाकर बोला- आपका बेटा बीच रोड में पड़ा है। इसे यहां से ले जाइए। मैं फौरन जावेद को लेने पहुंचा। उसने बस एक ही रट लगा रखी था- पापा, मर जाऊंगा। जल्दी ले चलो। मैं ऑटो वाले को बुलाकर लाया। जल्दी-जल्दी इसके जोड़ों में तेल और बाम लगाया। दवाई दी, लेकिन दर्द कम नहीं हुआ। जाने कितने दिनों तक ये तड़पता रहा। तीन महीने तक बिस्तर से नहीं उठा। कूल्हे, कोहनी, घुटने, कलाई जहां-जहां भी जोड़ जॉइंट्स थे, वहां-वहां सूजन बढ़ रही थी। जब आराम नहीं मिला तो हड्डी के डॉक्टरों को दिखाया। उन्होंने जेनेटिक टेस्ट कराने के लिए कहा। दो महीने बाद रिपोर्ट आई, तब डॉक्टरों ने बताया कि जावेद को मार्कियो डिजीज (म्यूकोपॉलीसेकेराइडोसिस टाइप IV ) है। ये एक जेनेटिक बीमारी है। दुनिया में इसका कोई इलाज नहीं है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ेगी, हडि्डयां जाम होती जाएंगी। हार्ट अटैक का खतरा बढ़ता जाएगा। आंखों की रोशनी कम होती जाएगी। इसके बाद दूसरे अस्पतालों में दिखाया। वहां डॉक्टर ने एंजाइम थेरेपी के बारे में बताया, लेकिन उसका खर्च 3 से 4 करोड़ रुपए सालाना है, जो हमारी हैसियत से कहीं ज्यादा था। अब तक जावेद की बीमारी में 6 से 8 लाख रुपए खर्च हो चुके हैं। इसमें से 50 हजार रुपए तो जेनेटिक टेस्ट में लगे हैं। इसके बाद बेटी हिब्बा और दूसरे बेटे का भी टेस्ट कराया। ये दोनों जुड़वा हैं और जावेद से 4 साल छोटे हैं। जब दोनों की रिपोर्ट आई तो बेटी को भी यही बीमारी निकली, लेकिन छोटा बेटा बच गया। तभी किचन से एक महिला चाय लेकर आती हैं। मोहम्मद कहते हैं- यह मेरी पत्नी अजीजा बानो हैं। अजीजा कहती हैं- ‘मैं सरकारी टीचर हूं। अभी सूरत में पोस्टिंग है। हर हफ्ते बेटे को देखने के लिए आती हूं। कई बार ट्रांसफर की अर्जी लगाई, लेकिन सरकार में कोई सुनने वाला नहीं है। ऐसी हालत में कौन मां अपने बेटे से दूर रहेगी, लेकिन मुझे रहना पड़ता है। क्या करूं, इसी नौकरी के भरोसे तो पूरा घर चल रहा है। सोचती हूं, जब हम दोनों नहीं रहेंगे, उस दिन इसका क्या होगा।’ बोलते-बोलते अजीजा के आंसू निकल आते हैं। कुछ देर बाद फिर कहती हैं- बेटा कभी-कभी कहता है मेरी शादी करा दो, लेकिन किससे कराएं। कौन लड़की इससे ब्याह करेगी। मेरी बेटी हिब्बा बानो को भी यही बीमारी है। उसके घुटनों में भी हल्का-हल्का दर्द रहता है। हाथ-पैर की उंगलियां हल्की टेढ़ी हैं, लेकिन उसकी हालत इससे थोड़ी बेहतर है। वह 22 साल की हो चुकी है। अपना काम खुद कर लेती है। उसके लिए दो-तीन रिश्ते आ चुके हैं, लेकिन उसकी बीमारी के बारे में सुनते ही सब लौट जाते हैं। दोबारा मुड़कर नहीं देखते। अब डर लगता है कि बेटी की भी शादी होगी या नहीं। मो. आजी कहते हैं- ‘बचपन में जब जावेद को देखता था, तो सोचता था बड़ा बेटा है। बुढ़ापे का सहारा बनेगा, लेकिन ढलती उम्र में मुझे ही इसे सहारा देना पड़ रहा है। इसके सामने मैं खुद अपने घुटनों का दर्द भूल गया हूं। 9वीं तक इसे पढ़ाया। दोस्त हमेशा जावेद से पूछते थे- तुम ऐसे मरे हुए क्यों दिखते हो, कितनी छोटी हाइट है तुम्हारी। तुम इतने कमजोर क्यों हो। जावेद को बहुत बुरा लगता था। इसलिए एक दिन कह दिया कि आगे की पढ़ाई नहीं करूंगा। 2014 में इसने स्कूल छोड़ दिया। उसके बाद धीरे-धीरे इसका शरीर और सूखने लना। कुछ साल पहले तक ये जमीन पर बैठता भी था, अब तो वो भी नहीं। मेरे दोस्त भी कहते हैं- बेटे का इलाज तो करवाओ। अब उन्हें क्या बताऊं कि मेरा बेटा ऐसी बीमारी से जूझ रहा है, जिससे वो कभी जीत नहीं पाएगा। मैंने तो पूरी-पूरी रात जागकर बेटे को दर्द में तड़पते देखा है। जब भी कराहता है तो एक ही दुआ करता हूं, अल्लाह, इसे उठा ले। सच कहूं, तो यह कुछ नहीं कर सकता है। इसके कमर का हिस्सा इतना छोटा है कि बैठ भी नहीं सकता। जावेद को 18 साल से यह दर्द है। इतने सालों में कभी भी रात में मेरी नींद पूरी नहीं हुई। जावेद और हिब्बा की हालत देखने के बाद बतौर रिपोर्टर मैं इस बीमारी से जुड़े सवालों का जवाब पाने के लिए अहमदाबाद के ‘न्यूबर्ग सेंटर फॉर जिनोमिक मेडिसिन’ के जिनोमिक्स डेवलपमेंट एंड इम्प्लीमेनटेशन डिपार्टमेंट पहुंचा। मेरी मुलाकात यहां की डायरेक्टर डॉ. शीतल शारदा से हुई। डॉ. शारदा बताती हैं- मार्कियो सिंड्रोम की शुरुआत बहुत चुपके से होती है। जब करीबी रिश्तों में शादियां होती हैं, तो होने वाले बच्चों में जेनेटिक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। वजह-ऐसे दंपतियों के जींस काफी हद तक एक जैसे होते हैं। दक्षिण भारत में इस तरह के मामले ज्यादा सामने आते हैं। डॉ. शारदा बताती हैं- शुरुआत के एक-दो साल तक माता-पिता को अंदाजा नहीं होता कि उनके बच्चे के शरीर के भीतर कोई बीमारी पनप रही है, लेकिन जैसे ही बच्चा तीसरे साल में कदम रखता है, उसका शारीरिक विकास रुकने लगता है। हाइट रुक जाती है, हाथ-पैर हल्के-हल्के टेढ़े होने लगते हैं। इस बीमारी से पीड़ित मरीजों की उम्र बमुश्किल 30 से 40 साल होती है। यह बीमारी क्यों होती है? डॉ. शारदा बताती हैं- जब हम कुछ खाते हैं, तो हमारे शरीर को शुगर मिलती है। एक स्वस्थ शरीर में 'GALNS' और 'GLB1' नाम के दो जीन इस शुगर को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ने में मदद करते हैं। मगर मार्कियो के मरीजों में यही दोनों जीन खराब हो जाते हैं। नतीजा- शुगर के ये बारीक कण यानी GAGs जोड़ों, कॉर्निया, फेफड़ों और हार्ट के वॉल्व के आसपास जमने लगते हैं। इससे आंखें कमजोर होने लगती हैं। हार्ट अटैक का खतरा भी बढ़ जाता है। वह बताती हैं- हमारी हड्डियों के जोड़ों के बीच एक गद्देदार परत होती है, जिसे कार्टिलेज कहते हैं। यह हड्डियों को आपस में टकराने से रोकती है, लेकिन जब शुगर जोड़ों में जमा होती है, तो कार्टिलेज में सूजन आ जाती है। धीरे-धीरे शरीर के सारे जॉइंट्स (कूल्हा, कोहनी, घुटने) पत्थर की तरह सख्त होने लगते हैं। रीढ़ की हड्डी टेढ़ी हो जाती है और हाथ-पैर सीधे नहीं हो पाते। जब भी दो हड्डियां आपस में रगड़ खाती हैं या उन पर दबाव पड़ता है, तो मरीज को तेज दर्द होता है। कई मामलों में तो इंसान पूरी तरह से बिस्तर पर आ जाता है और उसका चलना-फिरना बंद हो जाता है। इसका दुनिया में कोई स्थाई इलाज नहीं है। डॉ. शारदा बताती हैं- ऐसे मरीजों के लिए एंजाइम थेरेपी एक विकल्प है, लेकिन इससे भी बीमारी पूरी तरह ठीक नहीं होती। इस थेरेपी के जरिए हर हफ्ते इंजेक्शन से एंजाइम शरीर में डाला जाता है। इससे जोड़ों में शुगर कम जमती है। मरीज का दर्द थोड़ा कम होता है और फेफड़े बेहतर काम करते हैं। लेकिन, जो हड्डियां एक बार टेढ़ी या जाम हो चुकी हैं, उन्हें यह दोबारा सीधा नहीं कर पाता। यह एंजाइम थेरेपी जिंदगी भर लेनी पड़ती है और इसका सालाना खर्च 3-4 करोड़ रुपए है। ------------------------------------- ऐ जिंदगी सीरीज की यह खबर भी पड़ें… 1- उम्र-29, हाइट 3 फीट, खांसने से टूटती हैं हड्डियां: भगवान से हर रोज कहती हूं- मुझसे पहले मेरी बेटी को उठा लेना तखत पर एक लड़की करवट लिए लेटी है। बाल छोटे-छोटे। लंबाई बमुश्किल 3 फीट, लेकिन उम्र 29 बरस। इस लड़की ने आज तक आइसक्रीम नहीं खाई। जानते हैं क्यों? पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- 14 की उम्र में शरीर बना 'पेड़ की छाल’: उठो या बैठो फटने लगती है चमड़ी, मन करता है छीलकर फेंक दूं; देश का अकेला केस दोपहर के 1 बजे हैं। जंगल के ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर कार हिचकोले खा रही है। तेज गर्मी से गला लगातार सूख रहा है। करीब 2 घंटे बाद जंगलों में कुछ झोपड़ियां नजर आती हैं। इन्हीं झोपड़ियों में से एक के सामने हमारी कार रुकी। झोपड़ी के बाहर एक लड़की बेजान सी खड़ी नजर आई। उसकी मटमैली शर्ट और हाफ पैंट के बाहर जितना भी शरीर दिख रहा है, वह बेहद डरावना है। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें…
कहीं गुलाबी रंग का पेट्रोल, कहीं टैंक से चिपकी चीटियां, कहीं पेट्रोल के साथ दिखता पानी। सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियोज वायरल हैं और सभी के साथ एक ही नाम जुड़ा है- एथेनॉल। इन वीडियोज की असलियत संदिग्ध हो सकती है, लेकिन देश में एथेनॉल पर बहस बिल्कुल असली है। आखिर पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने पर क्यों तुली है सरकार, क्या हैं इसके फायदे-नुकसान और आगे का रास्ता; आज के एक्सप्लेनर में पूरी कहानी… सवाल-1: सरकार एथेनॉल को लेकर क्या एक्सपेरिमेंट कर रही है?जवाबः एथेनॉल एक तरह का अल्कोहल है, जो गन्ना, मक्का और चावल वगैरह से बनता है। ये ज्वलनशील होता है। इसे पेट्रोल में मिलाकर ईंधन की तरह इस्तेमाल करने पर कई स्टडी हुईं और सरकार के मुताबिक इसके अच्छे नतीजे आए। भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा तेल आयात करता है। जबकि एथेनॉल बनाने के लिए जरूरी गन्ना, मक्का और चावल जैसी फसलें देश में ही पैदा होती हैं। इसलिए 2001 में भारत सरकार ने एक पायलट प्रोजेक्ट के तहत कुछ पेट्रोल पंपों पर 5% एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल सप्लाई की। ये सफल रहा। इसके बाद 2003 में शुरू हुआ एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम… इसके अलावा देश के 48 पेट्रोल पंपों पर E85 पेट्रोल भी रोलआउट हो चुका है। यानी 85% एथेनॉल और सिर्फ 15% पेट्रोल। दिसंबर 2026 तक इसे 500 पंपों तक पहुंचाने का लक्ष्य है। 10 जून को नितिन गडकरी ने कहा कि उनकी सरकार ने 100% एथेनॉल पर चलने वाले वाहनों को भी मंजूरी दे दी है। सवाल-2: पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने के फायदे क्या हैं?जवाबः सरकार 3 बड़े फायदे गिना रही है…1. 1.84 लाख करोड़ विदेशी मुद्रा की बचत: पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की वजह से भारत को 302 लाख मीट्रिक टन कम तेल आयात करना पड़ा। इससे पिछले 12 सालों में 1.84 लाख करोड़ रुपए विदेशी मुद्रा की बचत हुई है। 2. किसानों की आय में 1.58 लाख करोड़ की बढ़ोतरी: एथेनॉल बनाने में तीन फसलों का सबसे ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है- मक्का, गन्ना और चावल। 2025-26 में 91.89 लाख हेक्टेयर जमीन पर मक्के की खेती हुई है, जो पिछले साल से 10.5% ज्यादा है। इसी तरह गन्ना और चावल की बुआई भी बढ़ी है। पेट्रोलियम मंत्रालय के मुताबिक पिछले १२ साल में एथेनॉल प्रोजेक्ट से किसानों को 1.58 लाख करोड़ रूपए की कमाई हुई है। 3. प्रदूषण में 65% तक की कमीः NITI आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक पेट्रोल की तुलना में गन्ने और मक्के से बनने वाले एथेनॉल के इस्तेमाल करने से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन 60% से 65% तक कम होगा। पेट्रोलियम मंत्रालय के मुताबिक १२ साल में एथेनॉल प्रोजेक्ट से 909 लाख मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में कटौती हुई है। सवाल-3: सरकार इतने फायदे गिना रही, तो फिर इसमें दिक्कत क्या है?जवाबः भारत के एथेनॉल प्रोजेक्ट में मोटेतौर पर 5 दिक्कतें हैं... 1. कम माइलेज और इंजन में खराबी की शिकायत 2. एथेनॉल सस्ता, लेकिन जनता को पेट्रोल के रेट पर मिल रहा 3. एक लीटर एथेनॉल बनाने में 10 हजार लीटर तक पानी खर्च 4. मक्का-गन्ने की खपत बढ़ी, तो दाल-तिलहन पर संकट 5. नितिन गडकरी पर सवाल सवाल-5: सरकार क्या कदम उठाए, तो चीजें ठीक हो सकती हैं? जवाबः एक्सपर्ट्स 5 रास्ते बताते हैं…1. फ्लेक्स इंजन गाड़ियों की बिक्री बढ़ाएं और ब्लेंडिंग की रफ्तार धीमी करें 2. एथेनॉल अनिवार्य न किया जाए, लोगों को विकल्प मिले 3. पारदर्शिता लाई जानी चाहिए 4. ईंधन की कीमत घटाई जाए 5. गन्ने-मक्के का विकल्प ढूंढना अब आखिर में एथेनॉल से जुड़ा एक नॉलेज कैप्सूल… ---------- ये खबर भी पढ़िए… पासपोर्ट-आधार भी नागरिकता का सबूत नहीं, फिर कैसे तय होगा कि आप भारत के नागरिक; क्या NRC की तैयारी है ‘पासपोर्ट एक यात्रा दस्तावेज है, न कि नागरिकता का प्रमाणपत्र।’ विदेश मंत्रालय के अधिकारी का ये बयान सुर्खियों में है। सवाल उठ रहे हैं कि अगर पासपोर्ट नहीं, तो भारत के नागरिक होने का सबूत क्या है? क्या सरकार नागरिकता के लिए कुछ नया करने जा रही है, पूरी खबर पढ़िए…
भारत में समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर चल रही बहसों के बीच पड़ोसी देश चीन ने एक ऐसा कदम उठाया है जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल मचा दी है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की सरकार ने देश में चुपचाप 'यूनिफॉर्म सिविल कोड' जैसा एक विवादास्पद कानून लागू कर दिया है, जिसे आधिकारिक तौर पर 'एथनिक यूनिटी कानून' (Ethnic Unity Law) का नाम दिया गया है। मानवाधिकार संगठनों की कड़ी आलोचनाओं और वैश्विक विरोध को दरकिनार करते हुए बीजिंग ने इस कानून के जरिए देश की विविधता को एक सांचे में ढालने की कवायद तेज कर दी है।क्या है चीन का नया 'एथनिक यूनिटी' कानूनचीनी संसद द्वारा इसी साल पारित किए गए इस कानून का मुख्य उद्देश्य देश के 55 मान्यता प्राप्त अल्पसंख्यक समुदायों को 'हान' बहुसंख्यक संस्कृति में विलय करना माना जा रहा है। सरकार का तर्क है कि यह कानून सामाजिक एकता को मजबूत करने और कट्टरपंथ को रोकने के लिए लाया गया है। इस नए नियम के तहत हिंसक आतंकवादी गतिविधियों, धार्मिक कट्टरपंथ और जातीय अलगाववाद को गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा गया है। चीन के करीब 12.5 करोड़ अल्पसंख्यक, जो कुल आबादी का लगभग 8.9 फीसदी हैं, अब सीधे तौर पर इस कानून के दायरे में आ गए हैं।भाषा पर प्रहार: मंदारिन अनिवार्य, बाकी बोलियां हाशिए परइस कानून का सबसे विवादास्पद पहलू शैक्षणिक संस्थानों में भाषा को लेकर है। नए नियमों के अनुसार, अब चीन के सभी स्कूलों और शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई का मुख्य माध्यम अनिवार्य रूप से 'मंदारिन' भाषा होगी। छात्रों के लिए कोर्स पूरा करने के लिए मंदारिन में निपुण होना अब एक अनिवार्य शर्त है। हालांकि कानून में किसी विशेष अल्पसंख्यक भाषा का उल्लेख नहीं है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इसका सीधा असर तिब्बती, मंगोलियन और उइगर समुदायों की अपनी मातृभाषाओं पर पड़ेगा। लंबे समय से चीन पर आरोप लगते रहे हैं कि वह तिब्बत और इनर मंगोलिया जैसे इलाकों में स्थानीय संस्कृति को मिटाकर उसे हान संस्कृति में बदलने की कोशिश कर रहा है।वैश्विक विरोध के बावजूद अडिग बीजिंगचीन का यह कदम सामाजिक एकता के नाम पर सांस्कृतिक एकीकरण की एक बड़ी कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। सरकार का कहना है कि चीन एक बड़े सामाजिक बदलाव के दौर से गुजर रहा है, इसलिए देश में एकजुटता अनिवार्य है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समूहों ने इसे सांस्कृतिक नरसंहार (Cultural Genocide) की संज्ञा दी है। आलोचकों का कहना है कि यह कानून विविधता को खत्म कर उन अल्पसंख्यक समूहों की पहचान मिटाने का एक जरिया है जो सदियों से अपनी विशिष्ट भाषाओं और परंपराओं के साथ रहते आए हैं। शी जिनपिंग का यह 'गेम प्लान' अब वैश्विक कूटनीतिक मंचों पर चीन की छवि को और अधिक विवादास्पद बना रहा है।
ब्रिटेन की शरणार्थी प्रणाली और सुरक्षा जांच पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। फ्रांस की अदालतों से मानव तस्करी के मामले में पांच साल की सजा काट चुका कुख्यात इराकी सरगना ट्वाना जमाल अब ब्रिटेन की धरती पर सुरक्षित पनाहगाह तलाशता पाया गया है। लीसेस्टरशायर के छोटे से ब्लैबी गांव में छिपकर रह रहा यह अपराधी फर्जी पहचान और दस्तावेजों के दम पर शरण के फैसले का इंतजार कर रहा था, जबकि उसका अतीत बेहद खौफनाक रहा है।'पाशा' बनकर चलाता था तस्करी का साम्राज्यबीबीसी की एक खोजी रिपोर्ट के अनुसार, ट्वाना जमाल उत्तरी फ्रांस के प्रवासी शिविरों से अपना तस्करी का नेटवर्क संचालित करता था। उसे स्थानीय स्तर पर 'पाशा' (बॉस) के नाम से जाना जाता था। जमाल का नेटवर्क इतना संगठित था कि वह ब्रिटेन जाने वाले हर प्रवासी से औसतन 4500 पाउंड वसूलता था। वह प्रवासियों को प्याज और पनीर से लदे ट्रकों में छिपाकर सीमा पार कराता था। ट्रकों से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड डिटेक्टरों को चकमा देने में मदद करती थी, जिससे उसका धंधा बिना किसी रुकावट के चलता रहा। इस अवैध कारोबार से वह हर हफ्ते करीब 1 लाख पाउंड यानी भारतीय मुद्रा में लगभग 1.27 करोड़ रुपये की कमाई कर रहा था।ब्रिटेन के नियमों को दी खुली चुनौतीहैरानी की बात यह है कि फ्रांस में पांच साल की जेल काट चुका जमाल ब्रिटेन में घुसने के बाद भी कानूनी प्रक्रिया का फायदा उठा रहा है। ब्रिटेन के मौजूदा आव्रजन नियमों के अनुसार, विदेश में एक साल से अधिक की सजा काट चुके व्यक्ति का शरण आवेदन स्वतः खारिज हो जाना चाहिए, लेकिन जमाल का आवेदन अभी भी पेंडिंग है। ब्लैबी गांव में रहने के दौरान वह न केवल फर्जी नाम का इस्तेमाल कर रहा था, बल्कि बिना ड्राइविंग लाइसेंस के गाड़ी भी चला रहा था। एक सीक्रेट रिकॉर्डिंग में उसने शेखी बघारते हुए कहा था, यह शहर हमारा है, यहां हमें कोई हाथ नहीं लगा सकता।क्या है दूसरा तस्कर 'करदो जाफ' का कनेक्शन?इस मामले की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, एक और बड़ा खुलासा हुआ। करदो जाफ नामक एक अन्य तस्कर भी ब्रिटेन की सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर आया है। खुद को 'करदो रान्या' बताने वाला यह शख्स अफगानिस्तान से ब्रिटेन तक फैले अंतरराष्ट्रीय तस्करी नेटवर्क का सरगना माना जाता है। सीक्रेट बातचीत में जाफ ने दावा किया कि उसके पास ब्रिटेन भेजने के लिए ट्रक, विमान और नाव तक उपलब्ध हैं। उसका यह नेटवर्क इराक के कुर्दिस्तान क्षेत्र से संचालित होता है, जो वर्तमान में मानव तस्करी के सक्रिय अड्डों में से एक बन चुका है।सरकार की सफाई और बढ़ती चिंताइन खुलासों के बाद ब्रिटेन के गृह मंत्रालय (Home Office) ने सफाई दी है कि सभी शरण चाहने वालों की कड़ाई से सुरक्षा और आपराधिक पृष्ठभूमि की जांच की जाती है। हालांकि, जमाल और जाफ जैसे अपराधियों की मौजूदगी ने ब्रिटिश सरकार की सुरक्षा नीतियों पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। यह मामला यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या अवैध घुसपैठियों के लिए ब्रिटेन एक सुरक्षित ठिकाना बन गया है? फिलहाल, इन तस्करों के खुलासे के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने अपनी जांच तेज कर दी है।
पुतिन-जिनपिंग की महा-जुगलबंदी: क्या सच में होने वाली है परमाणु जंग
आज की सबसे बड़ी वैश्विक हलचल महाशक्तियों के गलियारों से आ रही है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बढ़ती नजदीकियों ने एक बार फिर पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका और नाटो (NATO) सहयोगियों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। हाल ही में सामने आई एक लीक खुफिया रिपोर्ट ने दावा किया है कि दोनों देश बेहद गोपनीय तरीके से बड़े स्तर पर सैन्य अभ्यास कर रहे हैं, जो आम नहीं बल्कि परमाणु और केमिकल वॉर (परमाणु और रासायनिक युद्ध) से जुड़ा है।चीन के सुदूर इलाकों में चल रही है सीक्रेट ट्रेनिंगलीक हुई खुफिया जानकारियों के मुताबिक, चीन के बेहद सुरक्षित और संवेदनशील सैन्य ठिकानों पर यह सीक्रेट ट्रेनिंग चल रही है। इस अभ्यास में रूस के परमाणु विशेषज्ञ और चीनी पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी (PLA) के शीर्ष कमांडर हिस्सा ले रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस ट्रेनिंग का मुख्य उद्देश्य परमाणु हमले की स्थिति में दोनों देशों के बीच तुरंत तालमेल बिठाना और जवाबी कार्रवाई को अंजाम देना है। इसके अलावा, रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल और उनसे बचाव की तकनीकों का भी कड़ा अभ्यास किया जा रहा है।लीक रिपोर्ट से आखिर क्यों कांप उठे पश्चिमी देशइस सीक्रेट मिशन की खबर बाहर आते ही वाशिंगटन से लेकर लंदन तक हड़कंप मच गया है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अब तक रूस और चीन केवल आर्थिक या सामान्य सैन्य स्तर पर एक-दूसरे का साथ दे रहे थे, लेकिन परमाणु स्तर पर इस तरह का खुफिया गठबंधन पूरी दुनिया के पावर बैलेंस (शक्ति संतुलन) को बदल सकता है। पश्चिमी खुफिया एजेंसियां अब इस बात की गहराई से जांच कर रही हैं कि इस ट्रेनिंग का दायरा कितना बड़ा है और क्या इसमें नए जमाने के हाइपरसोनिक मिसाइल सिस्टम को भी शामिल किया गया है।एशिया-प्रशांत क्षेत्र और वैश्विक सुरक्षा पर बड़ा असरयह हलचल ऐसे समय में हो रही है जब ताइवान संकट और यूक्रेन युद्ध को लेकर पहले से ही वैश्विक स्तर पर तनाव चरम पर है। स्थानीय और भौगोलिक दृष्टि से देखें तो इस सीक्रेट ट्रेनिंग का सबसे पहला और सीधा असर एशिया-प्रशांत (Asia-Pacific) क्षेत्र पर पड़ेगा। भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे पड़ोसी देश भी इस नई सैन्य धुरी पर पैनी नजर बनाए हुए हैं। भू-राजनीतिक (Geopolitical) जानकारों का मानना है कि यदि रूस और चीन का यह परमाणु समीकरण मजबूत होता है, तो आने वाले दिनों में वैश्विक सुरक्षा के नियम पूरी तरह बदल जाएंगे।
कीव में तबाही की रात: रूस ने यूक्रेन पर किया भीषण हमला, घंटों गूंजते रहे सायरन और जोरदार धमाके
रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध अब बेहद खतरनाक और विनाशकारी मोड़ पर पहुंच गया है। रूसी सेना ने यूक्रेन की राजधानी कीव सहित कई प्रमुख शहरों को निशाना बनाते हुए एक बड़ा और चौतरफा हवाई हमला बोल दिया है। इस अचानक हुए हमले से पूरी यूक्रेन की राजधानी दहल उठी। चश्मदीदों और स्थानीय मीडिया के मुताबिक, राजधानी कीव में कई घंटों तक लगातार हवाई हमले के सायरन (Air Raid Sirens) बजते रहे और एक के बाद एक कई जोरदार धमाकों की आवाजें सुनाई देती रहीं। इस ताजा हमले ने एक बार फिर दोनों देशों के बीच तनाव को चरम पर पहुंचा दिया है।मिसाइलों और सुसाइड ड्रोन्स से कीव को बनाया निशानासैन्य विश्लेषकों के अनुसार, रूस ने इस हमले में अपनी आधुनिक क्रूज मिसाइलों, बैलिस्टिक मिसाइलों और अत्यधिक खतरनाक सुसाइड ड्रोन्स (कमिकेज़ ड्रोन) के झुंड का इस्तेमाल किया है। यूक्रेनी एयर डिफेंस सिस्टम (वायु सेना) ने कई मिसाइलों और ड्रोन्स को हवा में ही मार गिराने का दावा किया है, लेकिन इसके बावजूद कई रिहायशी इलाकों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों (पावर ग्रिड और एनर्जी सप्लाई) को भारी नुकसान पहुंचने की खबरें हैं। हमले के बाद कीव के कई हिस्सों में बिजली और पानी की सप्लाई ठप हो गई है।बंकरों में दुबकने को मजबूर हुए लोग और बढ़ा मानवीय संकटधमाकों की तीव्रता इतनी अधिक थी कि स्थानीय प्रशासन को तुरंत नागरिकों को नजदीकी बंकरों और अंडरग्राउंड मेट्रो स्टेशनों में शरण लेने के लिए एडवायजरी जारी करनी पड़ी। डरे-सहमे लोग पूरी रात बंकरों में गुजारने को मजबूर रहे। इस बड़े हमले से प्रभावित इलाकों में रेस्क्यू और एम्बुलेंस की टीमें मलबे को हटाने और घायलों को अस्पताल पहुंचाने में जुटी हैं। युद्ध के इस नए चरण ने स्थानीय आबादी के सामने एक बार फिर गहरा मानवीय संकट खड़ा कर दिया है।वैश्विक स्तर और क्षेत्रीय सुरक्षा पर हमले का बड़ा असरयूक्रेन पर हुए इस हालिया बड़े हमले ने दुनिया भर के देशों की चिंता बढ़ा दी है। पश्चिमी देशों और नाटो (NATO) ने रूस के इस कदम की कड़े शब्दों में निंदा की है और यूक्रेन को और अधिक एडवांस डिफेंस सिस्टम देने की बात कही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस हमले के बाद वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों और लॉजिस्टिक्स चेन पर भी इसका सीधा असर देखने को मिल सकता है, जिससे दुनिया भर में आर्थिक अनिश्चितता का माहौल और गहरा हो गया है।
इंटरनेशनल मैरीटाइम बाउंड्री के करीब अरब सागर (Arabian Sea) के पानी में अमेरिकी सेना के एक हेलीकॉप्टर को बेहद आपातकालीन स्थितियों में उतारना पड़ा है। मिली जानकारी के मुताबिक, उड़ान के दौरान अचानक आई गंभीर तकनीकी खराबी के बाद पायलटों ने सूझबूझ दिखाते हुए हेलीकॉप्टर की समुद्र के पानी में ही क्रैश लैंडिंग (इमरजेंसी लैंडिंग) कराई। इस बड़े हादसे के बाद अमेरिकी नौसेना और स्थानीय रेस्क्यू टीमों ने तुरंत मोर्चा संभाल लिया है। हेलीकॉप्टर में सवार क्रू मेंबर्स को बचाने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन शुरुआती रेस्क्यू के बाद भी एक क्रू मेंबर के लापता होने की खबर से हड़कंप मच गया है।आसमान में आई अचानक खराबी और पायलट का बड़ा फैसलायह हादसा उस समय हुआ जब अमेरिकी सैन्य हेलीकॉप्टर अरब सागर के ऊपर से अपनी नियमित या रणनीतिक उड़ान भर रहा था। अचानक बीच आसमान में इसके रोटर या इंजन में खराबी आ गई, जिसके बाद पायलटों के पास इसे नजदीकी जमीन तक ले जाने का समय नहीं बचा था। क्रैश से बचने के लिए विमान को सीधे समुद्र की लहरों पर उतारने का फैसला लिया गया। पानी पर लैंडिंग इतनी चुनौतीपूर्ण थी कि हेलीकॉप्टर को काफी नुकसान पहुंचा है। घटना की जानकारी मिलते ही पास के बेड़े में मौजूद अमेरिकी युद्धपोतों और खोजी विमानों को तुरंत घटना स्थल की ओर रवाना कर दिया गया।लापता क्रू मेंबर की तलाश में समंदर में महाअभियान जारीहादसे के तुरंत बाद चलाए गए आपातकालीन रेस्क्यू ऑपरेशन में हेलीकॉप्टर के अधिकांश क्रू मेंबर्स को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया है और उन्हें प्राथमिक इलाज के लिए मिलिट्री मेडिकल फैसिलिटी में भेजा गया है। हालांकि, दल का एक सदस्य अभी भी लापता बताया जा रहा है। समंदर की तेज लहरों और गहरे पानी के बीच लापता सैनिक को ढूंढने के लिए हाई-टेक सोनार उपकरणों, गोताखोरों और नाइट-विज़न हेलीकॉप्टरों की मदद ली जा रही है। अमेरिकी सैन्य कमांड ने अभी तक लापता सदस्य की पहचान उजागर नहीं की है।अरब सागर के रणनीतिक रूट पर इस घटना का स्थानीय असरजियोपॉलिटिकल और सुरक्षा के लिहाज से अरब सागर बेहद संवेदनशील इलाका माना जाता है, जहां से दुनिया का एक बड़ा व्यापारिक जहाजों का बेड़ा गुजरता है। इस क्षेत्र में अमेरिकी और सहयोगी देशों की नौसेनाएं लगातार गश्त करती रहती हैं। इस मिलिट्री हेलीकॉप्टर हादसे के बाद से इस पूरे समुद्री रूट पर सुरक्षा अलर्ट को बढ़ा दिया गया है। स्थानीय तटीय सुरक्षा एजेंसियों और पड़ोसी देशों की नौसेनाओं को भी इस रेस्क्यू ऑपरेशन के मद्देनजर सूचित कर दिया गया है ताकि जरूरत पड़ने पर स्थानीय मदद ली जा सके। अमेरिकी रक्षा विभाग ने इस पूरी घटना की उच्च स्तरीय जांच के आदेश दे दिए हैं।
दक्षिण एशिया की जियोपॉलिटिक्स में इस समय एक बड़ा घटनाक्रम देखने को मिल रहा है। भारत के सबसे करीबी पड़ोसी देशों में शुमार बांग्लादेश के हालिया कदमों से दोनों देशों के कूटनीतिक रिश्तों में तनाव की स्थिति पैदा हो गई है। जानकारों के मुताबिक, बांग्लादेश एक बार फिर भारत के रणनीतिक हितों को नजरअंदाज करने की राह पर चल पड़ा है। पहले भारत के सबसे संवेदनशील हिस्से यानी सिलीगुड़ी कॉरिडोर के करीब चीन को बड़ी भूमिका देने की कोशिशें हुईं और अब तीस्ता नदी के पानी को लेकर ढाका की ओर से तीखे तेवर दिखाए जा रहे हैं, जिसने भारतीय सुरक्षा और रणनीतिक हलकों में चिंता बढ़ा दी है।सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास चीन की एंट्री से बढ़ी भारत की चिंताभारत के पूर्वोत्तर राज्यों को पूरे देश से जोड़ने वाली संकरी पट्टी जिसे 'चिकन नेक' या सिलीगुड़ी कॉरिडोर कहा जाता है, सामरिक दृष्टिकोण से बेहद संवेदनशील है। हाल ही में बांग्लादेश द्वारा इस इलाके के बेहद करीब चीनी निवेश और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को मंजूरी दिए जाने की खबरें सामने आई हैं। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस इलाके में ड्रैगन (चीन) की किसी भी तरह की मौजूदगी सीधे तौर पर भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा साबित हो सकती है। भारत हमेशा से ही इस क्षेत्र में बाहरी ताकतों के दखल का विरोध करता रहा है।तीस्ता नदी के पानी पर बांग्लादेशी नेताओं के बिगड़े बोलचिकन नेक विवाद के बीच अब तीस्ता नदी जल बंटवारे का मुद्दा भी गरमा गया है। बांग्लादेश के राजनीतिक गलियारों और प्रशासनिक अधिकारियों की तरफ से तीस्ता नदी को लेकर तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है। दशकों पुराने इस जल विवाद पर जहां दोनों देश बातचीत के जरिए समाधान तलाशने का दावा करते रहे हैं, वहीं अब बांग्लादेश की ओर से अचानक आक्रामक रुख अपनाया जा रहा है। वहां के कुछ गुटों द्वारा तीस्ता परियोजना पर भारत को दरकिनार कर चीन से वित्तीय मदद लेने की वकालत की जा रही है, जिसे सीधे तौर पर नई दिल्ली को आंख दिखाने के रूप में देखा जा रहा है।स्थानीय स्तर और क्षेत्रीय सुरक्षा पर भारत-बांग्लादेश सीमा पर पड़ेगा असरइस कूटनीतिक तनातनी का सीधा असर भारत के सीमावर्ती राज्यों विशेषकर पश्चिम बंगाल और असम के स्थानीय क्षेत्रों पर देखने को मिल सकता है। तीस्ता नदी का पानी पश्चिम बंगाल के उत्तरी जिलों के किसानों और कृषि के लिए लाइफलाइन माना जाता है। यदि बांग्लादेश इस मुद्दे पर चीन के साथ मिलकर कोई एकतरफा कदम उठाता है, तो इससे सीमा पर न केवल तनाव बढ़ेगा बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था और जल सुरक्षा पर भी गहरा संकट आ सकता है। यही वजह है कि केंद्र सरकार और रणनीतिक एक्सपर्ट्स इस पूरे घटनाक्रम पर पैनी नजर बनाए हुए हैं।
ट्रंप का बड़ा बयान: कम्युनिज्म अमेरिका का सबसे बड़ा खतरा
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नॉर्थ डकोटा में आयोजित थियोडोर रूजवेल्ट प्रेसिडेंशियल लाइब्रेरी के उद्घाटन समारोह में पूर्व राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट को याद करते हुए साम्यवाद (कम्युनिज्म) पर निशाना साधा। ट्रंप ने संबोधन में कहा कि आज के समय में कम्युनिज्म अमेरिका के सामने सबसे बड़ा खतरा बनकर उभर रहा है और इससे समय रहते निपटना बेहद जरूरी है।
दुनिया के सबसे बड़े और एडवांस रेलवे नेटवर्क वाले देश चीन ने इंजीनियरिंग की दुनिया में एक और हैरतअंगेज कारनामा कर दिखाया है. चीन ने अपने देश के सेंट्रल (मध्य) और वेस्टर्न (पश्चिमी) हिस्सों को आपस में जोड़ने के लिए 350 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ने वाली एक बेहद आधुनिक हाई-स्पीड बुलेट ट्रेन सर्विस की शुरुआत कर दी है. मंगलवार सुबह जैसे ही चमचमाती नई G3966 बुलेट ट्रेन शिआन ईस्ट रेलवे स्टेशन से हरी झंडी दिखाकर रवाना की गई, वैसे ही शिआन-शियान हाई-स्पीड रेलवे ट्रैक पर आधिकारिक तौर पर परिचालन शुरू हो गया. इस नए रूट के शुरू होने से चीन के दो बड़े औद्योगिक और सांस्कृतिक हब के बीच की दूरी अब चंद घंटों में सिमट गई है.6 घंटे का सफर अब सिर्फ मिनटों में, वुहान तक का रास्ता हुआ बेहद आसान257 किलोमीटर लंबी इस नई हाई-स्पीड रेल लाइन ने शिआन (Shaanxi प्रांत) और शियान (Hubei प्रांत) के बीच यात्रा करने के समय में 6 घंटे से अधिक की भारी कटौती कर दी है. यानी जो सफर पहले पूरा दिन खा जाता था, वह अब मिनटों में पूरा हो रहा है. सबसे खास बात यह है कि यह नई रेल लाइन पहले से चल रही वुहान-शियान हाई-स्पीड रेलवे से भी जाकर कनेक्ट होती है. इस बेहतरीन कनेक्टिविटी का नतीजा यह हुआ है कि अब शिआन से लेकर वुहान तक का एक बहुत लंबा सफर यात्री केवल 2 घंटे 41 मिनट में बेहद आराम से पूरा कर सकेंगे.'प्राकृतिक भूवैज्ञानिक संग्रहालय' को चीरकर बनी रेल लाइन, 90% रास्ता पुल और सुरंगों मेंयह प्रोजेक्ट चीन के रेल इतिहास के सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण प्रोजेक्ट्स में से एक माना जा रहा है. यह रेलवे लाइन सीधे 'किनलिंग पर्वतों' (Qinling Mountains) के सीने को चीरकर गुजरती है, जिन्हें उत्तरी और दक्षिणी चीन के बीच की एक बेहद दुर्गम प्राकृतिक सीमा माना जाता है. इसके साथ ही यह ट्रेन हानजियांग नदी को भी पार करती है, जो चीन की मशहूर यांग्त्ज़ी नदी की सबसे प्रमुख सहायक नदी है.इस ऐतिहासिक परियोजना के मुख्य डिजाइनर माओ लेई के मुताबिक, यह रेलवे जिस इलाके से गुजरती है, उसे अपनी बेहद जटिल बनावट के कारण 'प्राकृतिक भूवैज्ञानिक संग्रहालय' (Natural Geological Museum) कहा जाता है. इस खतरनाक और ऊंचे पहाड़ी क्षेत्र के कारण पूरी रेल लाइन का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा जमीन पर नहीं, बल्कि हवा में तैरते पुलों और पहाड़ों के पेट को काटकर बनाई गई बेहद लंबी सुरंगों (Tunnels) के अंदर बनाया गया है.47 अरब युआन का भारी-भरकम खर्च और 2021 से चल रही थी मेहनतइस पूरे इलाके की कठिन भौगोलिक और पथरीली परिस्थितियों के कारण यहां लंबे समय से हैवी ट्रांसपोर्टेशन और बड़ी आर्थिक गतिविधियां लगभग ठप या बेहद सीमित थीं. इसी बड़ी चुनौती को मात देने के लिए चीन सरकार ने साल 2021 में इस महत्वाकांक्षी परियोजना का निर्माण कार्य युद्धस्तर पर शुरू किया था. इस बेहद आधुनिक और सुरक्षित ट्रैक को तैयार करने में चीन ने कुल 47.68 अरब युआन (यानी करीब 7 अरब अमेरिकी डॉलर) का भारी-भरकम बजट पानी की तरह बहाया है, जिसका असर अब साफ दिखने लगा है.5G और BeiDou सैटेलाइट से लैस है नया शिआन ईस्ट रेलवे स्टेशनइस नई बुलेट ट्रेन सेवा के स्वागत के लिए चीन ने शिआन ईस्ट रेलवे स्टेशन को एक नए जमाने के डिजिटल हब के रूप में तैयार किया है. उत्तर-पश्चिम चीन का यह सबसे बड़ा परिवहन केंद्र (Transport Hub) 1 लाख वर्ग मीटर से भी अधिक के विशालकाय क्षेत्र में फैला हुआ है. इस स्टेशन के निर्माण में अत्याधुनिक 5G कनेक्टिविटी, चीन के अपने 'BeiDou नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम' पर आधारित हाई-प्रिसिजन पोजिशनिंग और इंटेलिजेंट रोबोटिक कंस्ट्रक्शन तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है.ग्रीन एनर्जी को बढ़ावा देने के लिए स्टेशन की विशाल छत पर 30,000 वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्र में हाई-एफिशिएंसी सोलर पैनल लगाए गए हैं. इन सोलर पैनल्स से हर साल लगभग 70 लाख kWh स्वच्छ और हरित बिजली (Green Electricity) पैदा होगी, जिससे पूरे स्टेशन की बिजली की जरूरतें खुद-ब-खुद पूरी हो जाएंगी.15वीं पंचवर्षीय योजना: चीन का महा-विस्तार प्लानचीन ने अपनी नई 15वीं पंचवर्षीय योजना (2026-2030) के तहत देशभर के परिवहन इन्फ्रास्ट्रक्चर को और ज्यादा हाईटेक करने तथा आधुनिक हाई-स्पीड रेल नेटवर्क को देश के आखिरी कोने तक ले जाने का एक बहुत बड़ा लक्ष्य रखा है. रक्षा और आर्थिक मामलों के जानकारों का मानना है कि यह नई शिआन-शियान हाई-स्पीड रेलवे चीन की इसी दूरगामी रणनीतिक और आर्थिक मजबूती का एक बेहद अहम हिस्सा है.
क्या आपने कभी सोचा है कि लोहे और प्लास्टिक से बनी कोई मशीन आपके सुख-दुख को एक सच्चे साथी की तरह समझ सकती है? चीन की दिग्गज रोबोटिक्स कंपनी यूबीटेक (UBTech) ने इस साइंस-फिक्शन कल्पना को पूरी तरह हकीकत में बदल दिया है. कंपनी ने दुनिया का पहला ऐसा शानदार ह्यूमनॉइड (इंसानों जैसा) रोबोट लॉन्च किया है, जो फैक्ट्रियों में भारी काम करने के लिए नहीं, बल्कि इंसानों का अकेलापन दूर करने के लिए खास तौर पर डिजाइन किया गया है. इसका नाम UWORLD U1 है, जो न सिर्फ हूबहू इंसानों जैसा दिखता है बल्कि उनके बदलते इमोशंस और हाव-भाव को भी गहराई से महसूस कर सकता है.असली त्वचा का अहसास और 88 जॉइंट्स का कमालचीन के टेक हब शेंझेन में 30 जून को इस अनोखे रोबोट UWORLD U1 को पहली बार दुनिया के सामने पेश किया गया, जिसने आते ही टेक इंडस्ट्री में तहलका मचा दिया है. इस रोबोट की सबसे बड़ी यूएसपी यह है कि इसके पूरे ढांचे पर एडवांस सिलिकॉन की परत चढ़ाई गई है, जिससे छूने पर इसकी त्वचा बिल्कुल असली इंसान जैसी ही फील होती है.यह रोबोट दो अलग-अलग वर्शन्स में मार्केट में उतारा गया है, जिसमें पुरुष रोबोट की लंबाई 183 सेंटीमीटर और महिला रोबोट की लंबाई 168 सेंटीमीटर है. इसके पूरे शरीर में 88 सर्वो जॉइंट्स (Servo Joints) यानी कृत्रिम जोड़ दिए गए हैं, जिसकी मदद से यह इंसानों की तरह ही बेहद लचीले और नेचुरल तरीके से अपने हाथ-पैर हिला सकता है और चल-फिर सकता है.दिल की बात समझेगा इमोशनल AI, बिना 'वेक वर्ड' के करेगा कामUWORLD U1 को सिर्फ एक निर्जीव मशीन समझना बहुत बड़ी भूल होगी क्योंकि इसके भीतर बेहद एडवांस 'इमोशनल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' (Emotional AI) सिस्टम फिट किया गया है. कंपनी का आधिकारिक दावा है कि यह रोबोट इंसानों के 20 से ज्यादा अलग-अलग इमोशनल स्टेट्स (जैसे गुस्सा, दुख, खुशी, तनाव) को पल भर में पहचान सकता है.जब आप इससे कोई बात शेयर करेंगे, तो यह रोबोट आई-कॉन्टैक्ट (आँखों में आँखें डालकर) बनाकर बात करेगा. इतना ही नहीं, इसमें लॉन्ग-टर्म मेमोरी और डीप लर्निंग की क्षमता है, जिससे यह पुरानी बातें याद रखता है और समय के साथ आपके स्वभाव को समझकर एक सच्चे दोस्त की तरह रिस्पॉन्ड करता है. इसके साथ बात करने के लिए आपको 'अलेक्सा' या 'हे सिरी' जैसे किसी वेक वर्ड को बोलने की जरूरत नहीं है, यह आपके मूड को देखकर खुद ही बातचीत शुरू कर देता है.वेरिएंट्स और कीमत: ₹14 लाख से शुरू होकर ₹1.15 करोड़ तकमेटावर्स और एआई के इस दौर में इस रोबोट को ग्राहकों की जरूरत के हिसाब से तीन अलग-अलग वेरिएंट्स में पेश किया गया है, जिनके नाम लाइट (Light), प्रो (Pro) और अल्ट्रा (Ultra) रखे गए हैं. अगर इसकी कीमत की बात करें तो इसकी शुरुआती वेरिएंट की कीमत 1,19,800 युआन यानी करीब 14 लाख रुपये है, जबकि इसके सबसे एडवांस टॉप-एंड मॉडल (Ultra) की कीमत 9,90,000 युआन यानी करीब 1.15 करोड़ रुपये तक जाती है. इस रोबोट को लेकर ग्लोबल मार्केट में इस कदर दीवानगी देखी जा रही है कि लॉन्चिंग के पहले ही दिन कंपनी को इसके 13,361 यूनिट्स के बंपर प्री-ऑर्डर मिल चुके थे.डेटा लीक का नो टेंशन, लोकल प्रोसेसर पर रहेगा आपका सीक्रेटअक्सर किसी भी एडवांस एआई डिवाइस या रोबोट के साथ पर्सनल डेटा लीक होने और बातचीत रिकॉर्ड होने का बड़ा खतरा बना रहता है, लेकिन यूबीटेक ने सुरक्षा के मोर्चे पर अभेद्य दीवार खड़ी की है. UWORLD U1 का पूरा इमोशनल एआई मॉडल रॉकचिप के सुपरफास्ट RK3588 प्रोसेसर पर पूरी तरह लोकल लेवल (On-Device AI) पर काम करता है.इसका सीधा मतलब यह है कि आपकी जो भी बातचीत या भावनाएं रोबोट के साथ शेयर होंगी, उसका डेटा किसी भी क्लाउड सर्वर पर अपलोड नहीं होगा, बल्कि रोबोट की इंटरनल मेमोरी में ही एनक्रिप्टेड रहेगा. कंपनी ने इसमें 'थ्री-लेयर प्राइवेसी आर्किटेक्चर' दिया है, जिससे यूजर की प्राइवेसी 100% सुरक्षित रहती है और डेटा चोरी होने का कोई डर नहीं रहता.बुजुर्गों की देखभाल से लेकर होटलों के रिसेप्शन तक संभालेगा कमानUBTech के सीईओ जेम्स झोउ ने लॉन्चिंग इवेंट के दौरान कहा, रोबोटिक्स की दुनिया अब एक बिल्कुल नए और क्रांतिकारी दौर में कदम रख चुकी है. पहले रोबोट सिर्फ फैक्ट्रियों में इंसानों के थका देने वाले या खतरनाक काम करते थे, लेकिन अब वे हमारे घरों में हमारे सच्चे हमसफर बन रहे हैं.इस रोबोट का इस्तेमाल अकेले रह रहे बुजुर्गों की देखभाल, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, बड़े कॉर्पोरेट होटलों, रिसेप्शन एरिया और प्रीमियम होम सर्विसेज में बखूबी किया जा सकेगा. सुरक्षा और संवेदनशीलता को देखते हुए कंपनी ने साफ किया है कि यह रोबोट अभी सिर्फ वयस्कों (Adult Buyers) के लिए ही बिक्री के लिए उपलब्ध कराया जाएगा.
मिडिल ईस्ट में जारी भारी सैन्य तनाव के बीच अरब सागर (Arabian Sea) से एक बहुत बड़ी और चिंताजनक खबर सामने आ रही है. अमेरिकी नौसेना (US Navy) के एक बेहद आधुनिक और आक्रामक लड़ाकू हेलीकॉप्टर MH-60S सी हॉक (Sea Hawk) को बुधवार सुबह अचानक आई गंभीर तकनीकी खराबी के चलते गहरे समंदर में आपातकालीन लैंडिंग (Emergency Water Landing) करनी पड़ी है. इस हाई-प्रोफाइल हादसे के तुरंत बाद युद्धस्तर पर चलाए गए बचाव अभियान में हेलीकॉप्टर में सवार चार क्रू मेंबर्स में से तीन को तो सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया है, लेकिन एक क्रू मेंबर अब भी लापता बताया जा रहा है, जिसकी तलाश में अमेरिकी नौसेना ने समंदर में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है.किसी हमले का संकेत नहीं, कमान ने जारी किया आधिकारिक बयानयूएस नेवल फोर्सेज सेंट्रल कमांड (US Naval Forces Central Command) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर एक आधिकारिक पोस्ट साझा करते हुए इस गंभीर घटना की पुष्टि की है. नेवल कमान के मुताबिक, यह हादसा ईस्टर्न टाइम के अनुसार सुबह करीब 3:30 बजे के आसपास हुआ. शुरुआती जांच और उपलब्ध डेटा के आधार पर अमेरिकी अधिकारियों ने साफ किया है कि इस इमरजेंसी लैंडिंग के पीछे किसी दुश्मन देश की कार्रवाई या मिसाइल हमले का कोई संकेत नहीं मिला है, बल्कि यह पूरी तरह से एक तकनीकी विफलता का मामला लग रहा है.एयरक्राफ्ट कैरियर 'जॉर्ज बुश' पर चल रहा है इलाज, समंदर में महा-सर्च ऑपरेशननौसेना ने बताया कि जिन तीन क्रू मेंबर्स को समंदर की लहरों से सुरक्षित निकाला गया है, उन्हें तुरंत अमेरिकी नौसेना के विशालकाय और परमाणु ऊर्जा से चलने वाले एयरक्राफ्ट कैरियर 'यूएसएस जॉर्ज एच. डब्ल्यू. बुश (USS George H.W. Bush) पर ले जाया गया है. वहां मौजूद मिलिट्री डॉक्टर्स की टीम उनका सघन इलाज कर रही है और फिलहाल तीनों की हालत पूरी तरह स्थिर बताई जा रही है.दूसरी ओर, लापता चौथे जांबाज एयरक्रूमैन को ढूंढने के लिए अरब सागर के उस खास रणनीतिक इलाके में अमेरिकी नौसेना के कई अत्याधुनिक युद्धपोत, टोही विमान (Reconnaissance Aircraft) और हंटर हेलीकॉप्टर लगातार रात-दिन सर्च ऑपरेशन चला रहे हैं. इसके साथ ही क्रैश के सटीक कारणों को डिकोड करने के लिए एक हाई-लेवल इन्वेस्टिगेशन कमेटी भी बना दी गई है.होर्मुज स्ट्रेट के पास क्यों तैनात है अमेरिकी नौसेना का यह घातक दस्ता?हादसे का शिकार हुआ ट्विन-इंजन MH-60S सी हॉक हेलीकॉप्टर अमेरिकी नौसेना का मुख्य हथियार माना जाता है, जिसका इस्तेमाल एंटी-सबमरीन वॉरफेयर, सर्च एंड रेस्क्यू, स्पेशल ऑपरेशन्स और युद्ध के मैदान में रसद पहुंचाने जैसे बेहद खतरनाक मिशनों के लिए किया जाता है. यह हेलीकॉप्टर 'यूएसएस जॉर्ज एच. डब्ल्यू. बुश' पर ही तैनात था, जो अप्रैल के आखिर से मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) के समंदर में लगातार गश्त कर रहा है.दरअसल, इस अशांत इलाके में अमेरिकी हितों की रक्षा के लिए तैनात दो परमाणु एयरक्राफ्ट कैरियर्स में से यह एक है. हालांकि अमेरिका ने होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) से गुजरने वाले कमर्शियल तेल टैंकरों और जहाजों पर लगाई गई अपनी नाकाबंदी को हाल ही में अस्थाई रूप से हटा लिया है, लेकिन ईरान के साथ चल रही तनातनी और क्षेत्रीय संकट को देखते हुए वहां अभी भी अमेरिकी सेना का भारी जमावड़ा लगा हुआ है.'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' में अमेरिका को लग रहे हैं तगड़े झटकेयह ताजा हादसा ऐसे नाजुक समय में हुआ है जब मिडिल ईस्ट में अमेरिकी ऑपरेशन्स काफी जोखिम भरे और चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं. मई के मध्य में अमेरिकी कांग्रेस को सौंपी गई एक सीक्रेट मिलिट्री रिपोर्ट के मुताबिक, 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' (Operation Epic Fury) के शुरू होने से लेकर अब तक यूनाइटेड स्टेट्स इस क्षेत्र में अपने 42 फिक्स्ड-विंग विमान और रोटरी एयरक्राफ्ट (हेलीकॉप्टर) गंवा चुका है.वैश्विक रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इस भारी नुकसान की सूची में जून की शुरुआत में हुई वह सनसनीखेज घटना शामिल नहीं है, जहां एक ईरानी आत्मघाती ड्रोन ने अमेरिकी अपाचे हेलीकॉप्टर को मार गिराया था. हालांकि, उस अपाचे हादसे में दोनों अमेरिकी पायलट चमत्कारिक रूप से सुरक्षित बच गए थे, जिसके बाद भड़के अमेरिका को ईरान समर्थित ठिकानों के खिलाफ 'सेल्फ-डीफेंस एयरस्ट्राइक' करने के लिए मजबूर होना पड़ा था. इस ताजा हादसे ने एक बार फिर अरब सागर में अमेरिकी उड़ानों की सुरक्षा और उनकी मेंटेनेंस पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं.
मलबे का ढेर क्यों नहीं बनता जापान? हर साल 1500 भूकंप झेलने वाले देश की जादुई तकनीक
सोचिए अगर किसी देश में हर साल 1500 से ज्यादा बार धरती हिले, तो वहां का नजारा कैसा होगा? दुनिया के किसी भी दूसरे कोने में अगर इतना बड़ा प्राकृतिक संकट आ जाए, तो आलीशान शहर के शहर पल भर में मलबे के ढेर में तब्दील हो जाएंगे. लेकिन जापान एक ऐसा अनोखा देश है जो इस भयानक चुनौती को रोज हंसते-हंसते झेलता है और फिर भी पूरी दुनिया के सामने सीना ताने शान से खड़ा रहता है. चार सबसे खतरनाक टेक्टोनिक प्लेटों के मिलन बिंदु (जंक्शन) पर बसे होने के बाद भी यहां की गगनचुंबी इमारतें ताश के पत्तों की तरह नहीं बिखरतीं. इसके पीछे कोई कुदरती चमत्कार नहीं है, बल्कि जापानी वैज्ञानिकों की दशकों की कड़ी रिसर्च, बेहतरीन एंटी-अर्थक्वेक इंजीनियरिंग और आपदा से लड़ने की उनकी कमाल की तैयारी है.चार टेक्टोनिक प्लेटों का वो जानलेवा जाल, जिसने जापान को घेराजापान की भौगोलिक स्थिति (Geographical Location) ही उसकी सबसे बड़ी दुश्मन है. यह देश पैसिफिक, फिलीपीन सी, यूरेशियन और नॉर्थ अमेरिकन नामक चार बड़ी और बेहद सक्रिय टेक्टोनिक प्लेटों के ठीक ऊपर स्थित है. ये प्लेटें जमीन के अंदर लगातार आपस में टकराती हैं और एक-दूसरे के नीचे खिसकती रहती हैं. इसी भूगर्भीय उथल-पुथल के कारण दुनिया भर में आने वाले कुल खतरनाक भूकंपों का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा अकेले जापान और उसके आसपास के समुद्री इलाकों में दर्ज किया जाता है. प्रशांत महासागर के 'रिंग ऑफ फायर' (Ring of Fire) पर स्थित होना इसे दुनिया का सबसे संवेदनशील डेंजर जोन बनाता है.भूकंप से लड़ती नहीं, बल्कि पानी की तरह हिलती हैं यहां की इमारतेंजापान ने प्रकृति से लड़ने के बजाय उसके साथ तालमेल बिठाना सीखा है. यहां के आधुनिक गगनचुंबी भवनों में 'बेस आइसोलेशन' (Base Isolation Technology) तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है. इस तकनीक में इमारत की मुख्य नींव और ऊपरी ढांचे के बीच रबर, लीड और स्टील के बेहद मोटे और लचीले बेयरिंग लगाए जाते हैं. जब भी कोई तगड़ा भूकंप आता है, तो ये बेयरिंग जमीन के खतरनाक झटके को सोख (Absorb) लेते हैं, जिससे नींव तो हिलती है लेकिन ऊपरी इमारत पूरी तरह स्थिर और सुरक्षित रहती है. इसके अलावा, जिस तरह कारों में शॉक एब्जॉर्बर होते हैं, ठीक वैसे ही इमारतों में भी भारी-भरकम डैम्पर्स (Tuned Mass Dampers) लगाए जाते हैं, जो भूकंप के कंपन की ऊर्जा को हवा में ही खत्म कर देते हैं.सख्त कानून की जिद: दुनिया के सबसे बड़े सिम्युलेटर 'E-Defense' पर टेस्टजापान ने अपने इतिहास में कई ऐसे जख्म झेले हैं जिन्होंने पूरे देश को तबाह कर दिया था, जैसे 1923 का 'ग्रेट कांतो भूकंप' और 1995 का 'कोबे भूकंप'. इन महा-हादसों से सीख लेकर जापान ने अपने 'बिल्डिंग कोड' (Building Safety Laws) को दुनिया में सबसे सख्त और कड़ा बना दिया है. यहां कानूनन ऐसी इमारतें बनाना अनिवार्य है जो रिक्टर स्केल पर 8 या 9 की तीव्रता वाले भीषण झटके भी बिना गिरे आसानी से झेल सकें. जापानी वैज्ञानिक 'E-Defense' नामक दुनिया के सबसे बड़े शेकिंग टेबल (भूकंप सिम्युलेटर) पर असली बहुमंजिला इमारतों का लाइव टेस्ट करते हैं ताकि निर्माण की छोटी से छोटी कमी को भी समय रहते सुधारा जा सके.पलक झपकते ही अलर्ट: बुलेट ट्रेन में लग जाते हैं ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेकजापान के पास दुनिया का सबसे तेज और सटीक 'अर्थक्वेक अर्ली वार्निंग सिस्टम' (EEW) है. जैसे ही जमीन के सैकड़ों किलोमीटर अंदर प्राथमिक तरंगें (P-waves) उठती हैं, देश भर में फैले सेंसर्स उन्हें मिलीसेकंड में पकड़ लेते हैं. विनाशकारी तरंगों (S-waves) के धरातल पर पहुंचने से कुछ सेकंड पहले ही पूरे देश के नागरिकों के मोबाइल पर एक खास इमरजेंसी अलार्म और अलर्ट चला जाता है. इतने कम समय में देश की बड़ी फैक्ट्रियों की मशीनें अपने आप रुक जाती हैं, बिल्डिंग्स की लिफ्ट नजदीकी सुरक्षित फ्लोर पर ठहर कर खुल जाती हैं और लोगों को संभलने का कीमती मौका मिल जाता है.इतना ही नहीं, जापान की मशहूर 'शिंकानसेन' (Shinkansen Bullet Train) सीधे इस राष्ट्रीय भूकंप डिटेक्शन नेटवर्क से जुड़ी हुई है. जैसे ही सेंसर्स को हल्के से झटके का भी आभास होता है, 300 किमी/घंटा की रफ्तार से दौड़ रही बुलेट ट्रेनों में ऑटोमैटिक तरीके से इमरजेंसी ब्रेक एक्टिव हो जाते हैं. विनाशकारी लहरों के आने से पहले ही ट्रेनें सुरक्षित रूप से ट्रैक पर रुक जाती हैं, यही वजह है कि दशकों से इतने भूकंप आने के बावजूद जापान में आज तक कोई बड़ा बुलेट ट्रेन हादसा नहीं हुआ है.सदियों पुरानी लकड़ी की मीनारों (Pagodas) से चुराई आधुनिक तकनीकदिलचस्प बात यह है कि भूकंप से बचने की यह जापानी समझ सिर्फ आधुनिक विज्ञान की देन नहीं है. सदियों पुरानी लकड़ी से बनी जापानी मीनारें (Pagodas) बड़े से बड़े भूकंप में भी हमेशा सुरक्षित खड़ी रही हैं. प्राचीन इंजीनियरों ने उनके बीच में एक मुख्य और भारी लकड़ी का खंभा लगाया था, जिसे 'शिनबाशिरा' (Shinbashira) कहा जाता है. भूकंप के समय यह खंभा पूरी मीनार को एक सांप की तरह लचीलापन देता है, जिससे इमारत के अलग-अलग हिस्से विपरीत दिशाओं में हिलकर ऊर्जा को संतुलित कर लेते हैं. आज के आधुनिक जापानी इंजीनियर इसी प्राचीन कला और आर्किटेक्चर का गहराई से अध्ययन करके दुनिया की सबसे सुरक्षित गगनचुंबी इमारतें तैयार कर रहे हैं.
अमेरिका-ईरान में बनी सीक्रेट डील? दोहा की बंद कमरों वाली बातचीत से आए चौंकाने वाले संकेत
मिडिल ईस्ट में लंबे समय से जारी भारी तनाव के बीच एक बेहद चौंकाने वाली और बड़ी खबर सामने आ रही है. कतर की राजधानी दोहा में अमेरिका और ईरान के बीच बेहद गोपनीय और अप्रत्यक्ष (Indirect) बातचीत हुई है, जिसने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है. इस ताजा बैठक से कुछ ऐसे सकारात्मक संकेत मिले हैं जो आने वाले दिनों में खाड़ी देशों की सूरत बदल सकते हैं. दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने पहले से तय समझौता ज्ञापन (MoU) को अमलीजामा पहनाने के रास्तों पर घंटों माथापच्ची की. इस हाई-प्रोफाइल चर्चा में ईरान की अरबों डॉलर की फ्रीज संपत्तियों को अनलॉक करने, समझौते के उल्लंघन पर नजर रखने के लिए एक एकदम नया और कड़ा सिस्टम बनाने और दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री रास्ते 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' की सुरक्षा जैसे बेहद संवेदनशील मुद्दों को टेबल पर रखा गया. हालांकि कई मोर्चों पर दोनों महाशक्तियों के बीच मतभेद अब भी बरकरार हैं, लेकिन इस बातचीत को पटरी पर लाने में जुटे मध्यस्थ देशों ने जो फीडबैक दिया है, वह वाकई उत्साहजनक है.आमने-सामने नहीं बैठे प्रतिनिधि, कतर और पाकिस्तान ने संभाली कमानईरान की सरकारी समाचार एजेंसी IRNA के हवाले से एक बड़ा अपडेट देते हुए उप विदेश मंत्री काज़ेम ग़रीबाबादी ने पुष्टि की है कि MoU को लागू करने को लेकर चल रहा यह महत्वपूर्ण चरण अब पूरा हो चुका है. दिलचस्प बात यह है कि दोहा के आलीशान होटलों में दोनों धुर विरोधी देशों के राजनयिक एक बार भी आमने-सामने नहीं बैठे. पूरी बातचीत को कतर और पाकिस्तान के मध्यस्थों ने अलग-अलग कमरों में बैठकर अंजाम दिया. इस दौरान दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई को पाटने के लिए एक ऐतिहासिक सहमति बनी है. दोनों पक्ष अब इस बात पर राजी हो गए हैं कि समझौते के किसी भी संभावित उल्लंघन को रोकने, उसकी तुरंत जानकारी साझा करने और एक-एक चीज का पुख्ता रिकॉर्ड रखने के लिए बहुत जल्द एक 'विशेष संचार चैनल' (Special Communication Channel) यानी हॉटलाइन स्थापित की जाएगी. गरीबाबादी का मानना है कि यह नया ढांचा भविष्य में किसी भी अचानक पैदा होने वाले बड़े विवाद को बातचीत के जरिए सुलझाने में लाइफलाइन साबित होगा.3 अरब डॉलर के फंड पर फंसा पेंच, अमेरिका ने रखी कड़क शर्तइस सीक्रेट मीटिंग के बाद अरब मीडिया की गलियों से एक और सनसनीखेज दावा सामने आया. रिपोर्ट्स में कहा गया कि दोहा वार्ता में ईरान की फ्रीज पड़ी संपत्ति में से लगभग 3 अरब डॉलर की भारी-भरकम राशि जारी करने पर एक शुरुआती सहमति बन गई है, जिसे किश्तों में ईरान को सौंपने का प्लान है. लेकिन जैसे ही यह खबर फैली, अमेरिकी खेमे ने इस पर तुरंत ब्रेक लगा दिया. एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी ने साफ लहजे में स्पष्ट किया कि फिलहाल वॉशिंगटन ने ईरान का एक भी डॉलर रिलीज नहीं किया है. अमेरिका ने अपनी शर्त साफ कर दी है कि तेहरान को फंड तभी मिलेगा जब वह MoU की हर एक शर्त को पूरी तरह मानेगा. इतना ही नहीं, अगर भविष्य में यह रकम जारी भी होती है, तो ईरान अपनी मर्जी से इसे खर्च नहीं कर पाएगा. अमेरिका की अंतिम मंजूरी के बाद इस धन का उपयोग सिर्फ मानवीय जरूरतों, खासकर अमेरिकी किसानों से कृषि उत्पाद खरीदकर ईरान की आम जनता तक खाना और जरूरी सामान पहुंचाने के लिए ही किया जा सकेगा.स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और लेबनान विवाद पर आर-पार की बहसत्रिपक्षीय बैठक में सिर्फ पैसों की बात नहीं हुई, बल्कि मिडिल ईस्ट के सबसे सुलगते क्षेत्र लेबनान और 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' के रणनीतिक रूट पर भी तीखी बहस हुई. ईरान ने सीधे तौर पर आरोप लगाया कि लेबनान के भीतर इजरायल की सैन्य मौजूदगी इस शांति समझौते को जमीन पर उतारने में सबसे बड़ी रुकावट बनी हुई है. इसके साथ ही तेहरान ने वैश्विक मंच पर एक बार फिर हुंकार भरते हुए कहा कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ईरान और ओमान की संप्रभुता का हर हाल में सम्मान होना चाहिए. ईरान ने साफ किया है कि किसी भी बड़ी और व्यापक डील से पहले उसकी 5 प्रमुख शर्तों को मानना होगा. दूसरी ओर, ओमान की तरफ से भी टेबल पर एक नया शांति प्रस्ताव रखा गया है, जिस पर दोनों देशों के प्रतिनिधि अपने-अपने मुख्यालयों में शीर्ष नेतृत्व से सलाह-मशविरा करने के बाद ही अगला कदम उठाएंगे.ट्रंप के करीबियों ने तैयार की थी स्क्रिप्ट, 60 दिनों का मिला है अल्टीमेटमकतर के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता माजिद अल-अंसारी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पहले ट्विटर) पर इस पूरी बातचीत को 'सकारात्मक प्रगति' करार दिया है. उन्होंने बताया कि इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन से जुड़े कई पेचीदा मुद्दों पर दोनों पक्ष आगे बढ़ने को तैयार हैं. हालांकि, अगली बैठक ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता के अंतिम संस्कार के कार्यक्रमों के संपन्न होने के बाद ही बुलाई जाएगी. अंदरूनी सूत्रों की मानें तो इस पूरी वार्ता की पटकथा बेहद सधे हुए अंदाज में लिखी गई थी. मंगलवार रात से शुरू होकर बुधवार तक चली इस मैराथन बैठक से ठीक पहले अमेरिकी प्रतिनिधि स्टीव विटकॉफ और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बेहद करीबी सलाहकार व दामाद जारेड कुशनर ने कतर के प्रधानमंत्री के साथ एक क्लोज-डोर मीटिंग की थी, जहां इस बातचीत का पूरा ब्लूप्रिंट तैयार किया गया.अमेरिका का सीधा गणित है कि यदि ईरान एक व्यापक परमाणु समझौते को मान लेता है, तो उसे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होने वाली कमाई की तुलना में कहीं ज्यादा बड़ा वैश्विक आर्थिक फायदा मिल सकता है. दोनों देशों ने पहले समझौता ज्ञापन पर साइन करते समय 60 दिनों के भीतर इस महा-परमाणु समझौते को पूरा करने का टारगेट रखा था, और दोहा की यह बैठक उसी दिशा में सबसे बड़ा और निर्णायक कदम मानी जा रही है.
एक बेटी मां से कहकर गई थी कि NEET परीक्षा से लौटते वक्त- 'मोमोज लेकर आऊंगी।' दूसरी बेटी परीक्षा केंद्र से एग्जाम देकर निकलते ही पिता से बोली थी- ‘अब तो आपकी बेटी डॉक्टर बन गई समझो।’ दोनों घरों में डॉक्टर बनने के सपने सज रहे थे। लेकिन नीट का पेपर लीक हो गया। उसके कुछ ही दिनों बाद एक घर में पंखे से लटका शव मिला और दूसरे घर में नीट की दोबारा परीक्षा के दिन नर्मदा किनारे बेटी की लाश। अब दोनों परिवारों के पास बची हैं सिर्फ बेटियों की तस्वीरें, अधूरे सपने और अनगिनत सवाल। इस बार ब्लैकबोर्ड में मैं नीरज झा कहानी लाया हूं मध्य प्रदेश के दो परिवारों की। दोनों ने अपने बच्चों को डॉक्टर बनाने का सपना देखा, लेकिन NEET पेपर लीक के बाद दोनों बच्चों ने आत्महत्या कर ली। रीवा शहर से 60 किलोमीटर दूर महूगंज जिले का मांगलिया गांव। यहां एक भी पक्का मकान नहीं हैं। ऊबड़-खाबड़ रास्तों से होते हुए थोड़ा आगे बढ़ने पर एक घर दिखाई दिया। यह कृष्ण कुमार चतुर्वेदी का पुश्तैनी मकान है। मिट्टी, छप्पर और खपरैल का बना। 49 साल के कृष्ण कुमार चतुर्वेदी बताते हैं- ‘अगर मुझे पता होता कि डॉक्टर बनाने का सपना बेटी की जान ले लेगा, तो मैं उसे कभी डॉक्टर बनाने की न सोचता। यह कहते हुए चुप हो जाते हैं। आंखें भर आती हैं। कुछ पल बाद मोबाइल निकालते हैं और बेटी आकांक्षा की तस्वीर दिखाने लगते हैं। रुंधे गले से कहते हैं- अब तो कुछ बचा ही नहीं है। सब बेटी आकांक्षा के साथ चला गया। हंसता, मुस्कुराता चेहरा… अभी चाय पी रहा था, तो आखों के सामने उसका चेहरा नाचने लगा। कहती थी- पापा अब तो डॉक्टर बन ही जाऊंगी। बस कुछ साल की तकलीफें हैं। पता होता कि उसकी जान एक परीक्षा की वजह से चली जाएगी, तो कभी डॉक्टर बनाने का सपना न देखता। उसे मना कर देता। कम-से-कम जिंदा तो रहती। पेपर लीक के बाद वह उदास रहने लगी थी। पर वो फांसी लगा लेगी…ऐसा भला मैं कैसे सोचता। फांसी लगाने से पहले एक बार तो कुछ बोलती। हमारा चेहरा ही देख लेती कि इस बाप का क्या होगा।' कृष्ण कुमार बताते हैं- 'हम परिवार के साथ नागपुर में रहते हैं। 20 मई की बात है। सुबह का वक्त था। मेरी बेटी ने तरबूज और कुछ फल काटकर मुझे खाने को दिए। मार्केट से कुछ काम निपटाकर वापस घर आया, तो वह सो रही थी। मैंने कहा- बेटा खाना खा लो, फिर सोना। बोली- नहीं पापा, नींद बहुत आ रही है। आप खा लो। खाना खाने के बाद मैं, पत्नी और बेटा बरामदे में सो गए। जबकि बेटी सोने के लिए अपने कमरे में चली गई। करीब 2 घंटे बाद, दोपहर के 3 बजे थे। उसकी मां ने पुकारा, लेकिन कमरे से कोई आवाज नहीं आई। कुछ देर बाद गेट ठकठकाया, तब भी कोई आवाज नहीं आई। खिड़की से झांककर देखा, तो वह पंखे से दुपट्टा लगाकर लटकी हुई थी। हाय मेरी आकांक्षा…! यह कहते कृष्ण कुमार फफककर रोने लगते हैं। इस दौरान बारिश शुरू हो जाती है। वह कुछ देर चुप रहकर बताते हैं- ‘कोई अगर कहे कि आपकी बेटी आसमान में मिलेगी, तो मैं उसे आसमान से लाने चला जाऊंगा।' अगले दिन हम लाश को नागपुर से घर लाए। यहां अर्थी सजी। सभी लाश को प्रयागराज लेकर गए। मुझे साथ नहीं ले गए। अच्छा हुआ वर्ना बेटी की चिता में कूदकर उसी के साथ चला जाता। अब तो लगता है जिंदगी में कुछ बचा ही नहीं। किसके लिए जीना। एक बेटा है, 15 साल का। उसके लिए सोचता हूं कि अगर मुझे कुछ हो गया, तो वह और पत्नी किसके सहारे रहेंगे। आकांक्षा 19 साल की थी। 2025 में ही उसने 12वीं किया था। 3 मई 2026 को उसका NEET एग्जाम का पहला अटेम्प्ट था। उस दिन एग्जाम दिलाने मैं ही साथ गया था। जब सेंटर से बाहर आई, तो कहने लगी- 'पापा 720 नंबर में से 650 तो कोई रोकने वाला नहीं है। पेपर अच्छा गया है। समझो अब आपकी बेटी डॉक्टर बन गई। उसके बाद हम दोनों ने एक दुकान पर साथ में लस्सी पी थी। मैंने मन ही मन सोचा- तब तो मैं डॉक्टर का बाप कहलाऊंगा। मैं उसे प्यार से लल्ला कहता था। एक दिन मैंने यूं ही कहा- लल्ला ये बता, जब तुम डॉक्टर बनोगी, तो डिग्री लेते वक्त जब मैं मंच पर जाऊंगा तो क्या बोलूंगा? यह कि रोटी बनाने वाले की बेटी डॉक्टर बन गई है? दरअसल, मैं नागपुर शादी-ब्याह में कैटरिंग यानी खाना बनाने और परोसने का काम करता हूं। ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं हूं। उस दिन वह हंसकर बोली- पापा मैं आपकी परी बेटी हूं। देखिए कैसे, मेरे गाल पर डिंपल आते हैं। कितनी सुंदर लगती हूं। आपको सब सिखा दूंगी। अंग्रेजी भी। भाई की तो आप चिंता ही मत कीजिए। उसे मैं पढ़ाऊंगी। बस डॉक्टर बन जाने दीजिए, लेकिन अब सब कुछ खत्म हो गया।’ इस दौरान कृष्ण कुमार अपनी मोबाइल में आकांक्षा की तस्वीर बार-बार देख रहे हैं। पास में एक पेपर भी लिए हैं, जिस पर कुछ लिखा है। वह रुंधे गले से उस नोट को दिखाते हुए कहते हैं- ‘सुसाइड करने से पहले उसने यही लिखा था- ‘मम्मी-पापा, आपका मुझ पर बहुत भरोसा था कि बेटी डॉक्टर बनेगी, लेकिन दोबारा नीट पेपर देने की हिम्मत नहीं है मेरे अंदर। पहले नीट के पेपर में अच्छे मार्क्स आते, लेकिन दोबारा पेपर अच्छा जाएगा, इसकी क्या गारंटी? सॉरी मम्मी-पापा। मैंने सब बर्बाद कर दिया आप दोनों का…। - स्नेहा’। स्नेहा उसका घर का नाम था। दिनभर में इस नोट को कई दफा पढ़ लेता हूं। उसे याद करके रात-रातभर जगा रह जाता हूं। मेरे हाथ में बहुत दर्द होता है। नींद नहीं आती। पागल सा हो गया हूं।’ यह कहते हुए वह बार-बार अपना दाहिना हाथ सहलाते हैं। पूछने पर कहते हैं- ‘इसमें लकवा मारा गया था, तब से काफी दर्द होता है। दो बार तो हार्ट की सर्जरी हो चुकी है। उसी में 6-7 लाख रुपए लग गए। ये 2020 की बात है। उसी के बाद बेटी ने डॉक्टर बनने की ठानी। कहती थी- पापा आपका इलाज मैं करूंगी। आपके हाथ ठीक कर दूंगी। डॉक्टर बनकर देश की सेवा करूंगी। जिनके पास पैसे नहीं होंगे, उनका फ्री इलाज करूंगी।' मोबाइल में उसकी तस्वीर दिखाते हुए वह कहते हैं- सोचिए, बाप को छोड़कर ऐसे ही हंसते हुए चली गई। 10-12 लाख रुपए कर्ज है। बेटी की कोचिंग और अपने इलाज के लिए लिया था। अब उसी के बारे में सोचकर मरे जा रहा हूं। अभी तो कोई नहीं मांग रहा, लेकिन कुछ महीने, साल में सब मांगेंगे? बहन से 6 लाख कर्ज लिया था। फिर बैंक से लोन लिया। जब बैंक वाले परेशान करने लगे, तब बड़े भाई से ढाई लाख रुपए लेकर बैंक को चुकाया। अब बाकी लोगों के पैसे कैसे दूंगा? नागपुर कब गए? ‘1993 में। पढ़ा-लिखा कम हूं। कमाने के लिए नागपुर गया। वहां कुछ महीने होटल में काम किया, फिर कैटरिंग का काम करने लगा। शादी-ब्याह में खाना बनाने का। जब बच्चे हुए, तो दिन-रात जाग-जागकर काम किया, ताकि उन्हें पढ़ा सकूं। 2020 के बाद जब हाथ में लकवा मार गया, तब तो सब खत्म हो गया। थोड़ा-बहुत हेल्पर के तौर पर काम कर पाता हूं। इसी से जो कमाई होती, घर चलता था। वहां किराए के मकान में रहता हूं। वहीं आकांक्षा भी नीट की तैयारी कर रही थी। जब हाथ का ऑपरेशन हुआ तो डॉक्टर ने पराठा, ज्यादा तला-भुना खाना खाने से रोक दिया, लेकिन बेटी से चुपके से पराठे मांग लेता था। उस पर वह कहती- गलत बात है पापा। जब आप ठीक हो जाएंगे, तब खूब अच्छा बनाकर खिलाऊंगी। अभी तो सादी रोटी से काम चलाओ। वह मुझे गोल-गोल रोटियां बनाकर खिलाती थी। निक्की यादव की लाश नर्मदा नदी के किनारे मिली इसके बाद अगले दिन मैं इंदौर के मांगलिया इलाके में रहने वाली 18 साल की निक्की यादव के परिवार से मिलने पहुंचा। निक्की ने 21 जून को दूसरी बार हुए नीट परीक्षा के दिन सुसाइड कर लिया। यहां एक दोमंजिला मकान में निक्की की मां इंदु यादव और पिता रामानंद यादव मिले। इंदु मुझे देखकर सिसक-सिसकर रोने लगीं। वह बताती हैं- '21 जून... यह तारीख अब भी मेरी आंखों के सामने घूमती है। उससे दो दिन पहले, शुक्रवार को मैं और पति शिरडी साईं बाबा के दर्शन के लिए निकले थे। पिछले साल जब उसका NEET क्लीयर नहीं हुआ, तो हमने मन्नत मांगी थी। हम साईं बाबा के दर्शन करके रविवार को करीब 12 बजे घर लौटे। पूरे रास्ते बस यही मना रही थी कि इस बार बेटी का पेपर अच्छा हो जाए। घर पहुंचते ही बड़ी बेटी ने बताया- मम्मी, निक्की परीक्षा देने निकल गई है। उसका सेंटर करीब 50 किलोमीटर दूर महूगंज में था। परीक्षा दोपहर 2 बजे शुरू होनी थी, लेकिन सेंटर पर 12 बजे तक पहुंचना था। इसलिए वह पहले चली गई। केवल एक कप चाय पी कर परीक्षा देने गई थी। सोचा था लौटकर आएगी तो उसकी पसंद का खाना बनाऊंगी।' यह कहते हुए इंदु रोने लगती हैं। थोड़ी चुप रहकर फिर बताती हैं- जब भी टीवी या अखबार में किसी छात्र के आत्महत्या की खबर आती तो निक्की कहती- मम्मी, ये लोग सुसाइड क्यों कर लेते हैं? जिंदगी में कोई-न-कोई रास्ता निकल ही आता है। मैं उसकी बातें सुनकर कहती थी- हां बेटा, कभी हार नहीं माननी चाहिए, लेकिन क्या पता था कि वैसा ही कदम मेरी बेटी भी उठा लेगी। 21 जून की सुबह जब निक्की घर से निकल रही थी, तब उसके चेहरे पर एग्जाम का तनाव नहीं, बल्कि हमेशा वाली मुस्कान थी। वह परीक्षा के जा रही थी तो बड़ी बहन से बोली- ‘दीदी या भाई शिवम मुझे एग्जाम सेंटर छोड़ देंगे। वापस बस से आ जाऊंगी। बोली थी- वापस आते वक्त मोमोज लेकर आएगी।’ इंदु की नजर सामने रखी निक्की की तस्वीर पर टिक जाती है। कहती हैं- वह मोमोज लेकर नहीं आई। अब न वह दरवाजा खोलते ही मुझे अब आवाज लगाएगी, न पीछे से आकर मेरे गले से झूलेगी। सोचकर बहुत तकलीफ होती है कि उसे घर से निकलते हुए आखिरी बार देख नहीं पाई। वह बताती हैं- भगवान जानें, उस दिन क्या हुआ। 21 की शाम आखिरी बार उससे बात हुई। 7-8 बजे उसने किसी दूसरे के मोबाइल से कॉल किया, बोली- मम्मी मैं इंदौर आ गई हूं। यहां से अपना घर 15 किलोमीटर दूर है। पापा को बोलना, एक घंटे बाद पंचवटी आ जाएं। मैं बस से आ रही हूं। मेरा फोन बंद हो गया है। इतना कहते हुए इंदु के फिर से आंसू बहने लगते हैं। बगल में बैठी उनकी दूसरी बेटी रूबी यादव कंधे पर हाथ रखकर सहारा देते हुए कहती हैं- 'निक्की के कमरे में उसकी एक बड़ी-सी तस्वीर फ्रेम कराके अखबार से लपेटी हुई रखी है, लेकिन हमारी हिम्मत नहीं कि उसे दीवार पर टांग दें। ऐसा लगता है, वह किसी कमरे से खिलखिला रही है। वह थोड़ी मोटी थी। हम प्यार से उसे छोटा हाथी कहकर बुलाते थे।’ एग्जाम से एक दिन पहले शाम को निक्की को लेकर हम एक कैफे में डिनर के लिए गए थे। उसे एग्जाम की कोई चिंता नहीं थी। हमने खूब मस्ती की। करीब 2-3 घंटे बाद वापस घर लौटे थे। 21 जून की सुबह उसने थोड़ा-बहुत घर का काम किया। झाड़ू लगाकर बोली- दीदी, अब तैयार होने जा रही हूं। वापस आने के लिए बस का किराया दे दो। मैंने उसे 500 रुपए दिए। बोली- अरे! ये तो ज्यादा हो गया। फिर बोली- चलो मोमोज लेकर आऊंगी। रूबी बताती हैं- हम चार बहनों में वह सबसे छोटी थी। भाई शिवम से बड़ी। उस दिन शिवम सेंटरछोड़ने गया। वापस आते वक्त उसे पानी की बोतल खरीदकर दी थी। शाम 5 बजे उसका एग्जाम खत्म हुआ। 5 घंटे बाद भी जब वह घर नहीं लौटी, तब हमें लगा कि कुछ गड़बड़ है। रात 9 बजे से लगातार उसे 50 से ज्यादा कॉल किए, लेकिन किसी का जवाब नहीं आया। मैंने मैसेज भी किया- ‘निक्की, प्लीज अटैंड दि कॉल’, लेकिन कोई रिप्लाई नहीं आया। इस दौरान मां इंदु सुबकते हुए बोलीं- ‘भइया अब कैमरा बंद कर दीजिए। हम लोगों को मत कुरेदिए। बेटी चली गई… अब क्या ही बात करूं।’ कुछ देर चुप रहकर फिर कहती हैं। उस रात हमने थाने में शिकायत की, तो पुलिस ने उसकी उम्र पूछी। हमने 20 साल बताया, तो कहने लगी- अरे! किसी के साथ भाग गई होगी। आ जाएगी कल तक। उस दिन समय रहते पुलिस छानबीन करती, तो शायद बेटी जिंदा मिल जाती। वो कहती थी- मेरी दो बहनें सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। मैं तो डॉक्टर बनूंगी।’ यह कहते हुए इंदु फिर रोने लगती हैं। अब मैं कैमरा बंद कर देता हूं। घर के भीतर से निक्की के पिता रामानंद यादव आए। वह बताते हैं- ‘ब्रश कर रहा था। हफ्तेभर हो गए हैं ठीक से कुछ खाया-पीया नहीं है। सोचता हूं अगर मैं टूट गया, तो बच्चे, पत्नी… सब बिखर जाएंगे। रात 9 बजे तक वह जब घर नहीं आई, तो मैं अपने बेटे के साथ बस स्टैंड गया। हर बस को रोककर उसमें झांक-झांककर देखने लगा। उधर, बेटी उसे लगातार कॉल कर रही थी। जब आधे घंटे बाद भी कुछ पता नहीं चला, तब आसपास के हॉस्पिटल पहुंचे- यह सोचकर कि कहीं एक्सीडेंट तो नहीं हो गया। आखिरकार, हारकर लसूड़िया पुलिस स्टेशन गया। पुलिस ने कहा- लोकेशन ट्रेस करने में 24 घंटे लगेंगे। हम वापस घर आ गए। रातभर जागे रहे कि कहीं से कोई अच्छी खबर मिल जाए। सुबह हुई तो फिर से साइबर पुलिस के पास गए। पता चला कि बेटी की अंतिम लोकेशन बड़वाह में मिली है, जो खरगोन जिले में आती है। सोचने लगा कि जब उसने आखिरी बार कॉल किया था, तो बताया था कि वह इंदौर के भंवरकुआं पहुंच गई है। वहां से 85 किलोमीटर दूर आखिर बड़वाह कैसे पहुंच गई? उसके बाद मेरी बेटियों ने बड़वाह के अलग-अलग हॉस्पिटल, थानों में फोन करना शुरू किया। शाम होते-होते पता चला कि खरगोन के महेश्वर में नर्मदा नदी के एक टापू पर 20 साल की लड़की की लाश मिली है। पुलिस ने लाश को रेस्क्यू कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया था। हम अस्पताल पहुंचे। वहां डॉक्टर ने बताया कि मौत 21 जून की रात में ही हो चुकी थी। उसके साथ कुछ गलत नहीं हुआ है। पिंक कलर की सूट-सलवार पहनी लाश…।’, रामानंद यह बताते हुए फफककर रोने लगते हैं। थोड़ी देर बाद कहते हैं- अब उसके कमरे में जाने का दिल नहीं करता। उसकी बनाई हुई पेंटिंग, स्टडी टेबल, कुर्सी, किताब से भरी अलमारी… सब यूं ही पड़ा है। 2024 में उसने NEET का पहला अटेंम्प्ट दिया था। उसका डेंटल के लिए सिलेक्शन भी हो गया था, लेकिन उसने कहा था- पापा MBBS करना है और तैयारी करूंगी। मैंने उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा था- तुम्हें जितना पढ़ना है, पढ़ो। वह इतना पढ़ती थी कि कई-कई दिन घर से बाहर नहीं निकलती थी। पेपर लीक नहीं हुआ होता, तो मेरी बच्ची आज हमारे बीच होती। नीट का पहला एग्जाम देकर आई थी, तो बोली थी- पापा इस बार क्रैक हो जाएगा, लेकिन 21 जून का पेपर पता नहीं कैसा हुआ। उसकी आखिरी आवाज सुनने को दिल तरस गया। अब तो उसकी आत्मा को शांति तभी मिलेगी, जब हमें पता चल जाएगा कि उस रात मेरी बेटी खरगोन कैसे पहुंची? पुलिस बता रही है कि रैपिडो करके ओंकारेश्वर गई थी। भला इतना दूर कोई रैपिडो करेगा? निष्पक्ष जांच चाहता हूं। ------------------------------------------- ब्लैकबोर्ड की ये कहानियां भी पढ़ें… 1- ब्लैकबोर्ड- तानों से परेशान होकर ब्रेस्ट इम्प्लांट करवाया:ऑडिशन वाले कहते थे- तुम्हारा फिगर ठीक नहीं, अब आधी कमाई सर्जरी की EMI में जा रही एकबार मैं ऑडिशन के लिए गई थी। वहां मुझे ट्रायल के लिए एक बिकिनी दी गई। 10-15 मर्दों के सामने जैसे ही बिकिनी पहनकर बाहर आई, तो सब हंसने लगे। कहने लगे- 'अरे मैडम, ये सब आपके लिए नहीं है। आप तो एकदम फ्लैट हैं।' पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- ब्लैकबोर्ड- भाई का अपहरण किया, जिससे जिंदा साबित हो जाऊं: सिंदूर लगाने वाली पत्नी विधवा पेंशन मांगने पहुंची, लेकिन मुझे जिंदा नहीं माना साल 1975। लाल बिहारी 20 साल के थे। शादी के 10 साल बाद अभी-अभी गौना हुआ था और पत्नी घर आई थी। मां ने कहा- गांव की जमीन गिरवी रखकर बैंक से कुछ लोन ले लो। अपना काम-धंधा शुरू करो, वर्ना आगे बाल-बच्चों को कैसे पालोगे? पूरी स्टोरी यहां पढ़ें
मानवाधिकार संगठनों ने आरोप लगाया कि बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने तीन और आम नागरिकों को कथित रूप से जबरन लापता कर दिया गया।
चीन में सेवानिवृत्त सैनिकों के रोजगार और उद्यमिता बढ़ाने पर नियम लागू होगा
चीनी प्रधानमंत्री ली छ्यांग ने हाल में राज्य परिषद का आदेश दिया। सेवानिवृत्त सैनिकों के रोजगार और उद्यमिता बढ़ाने पर नियम इस साल 1 अगस्त को लागू होगा।
अमेरिका में तीन क्यूबाई नागरिक हिरासत में, रुबियो ने रद्द किया कानूनी दर्जा
स्टेट डिपार्टमेंट ने बताया कि क्यूबा के तीन नागरिकों को फेडरल कस्टडी में ले लिया गया है। इनमें क्यूबा सरकार से जुड़ी एक ऐसी संस्था का पूर्व कर्मचारी भी शामिल है, जिस पर इस महीने की शुरुआत में अमेरिका ने प्रतिबंध लगाया था। सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मार्को रुबियो की ओर से उनका कानूनी दर्जा खत्म किए जाने के बाद यह कार्रवाई की गई।
वेनेजुएला में आए भूकंप के 6 दिन बाद, मलबे में फंसे 3 साल के एक बच्चे को जीवित निकाल लिया गया। 50 हजार से ज्यादा लोग अब भी लापता हैं। हर गुजरते घंटे के साथ उनके जिंदा बचने की उम्मीद भी घटती जा रही है। आखिर मलबे में दबे लोग कितने दिन जिंदा रह सकते हैं, मलबे से निकालने के बाद भी कैसे मौत हो जाती है और भूकंप आने पर बचने की संभावना कैसे बढ़ा सकते हैं; आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: मलबे में दबे लोग कितने दिन तक जिंदा रह सकते हैं?जवाबः भूकंप जैसी आपदा के बाद बचाव के लिए शुरुआती 72 घंटे ‘गोल्डेन पीरियड’ होते हैं। ऑस्ट्रेलिया की रॉयल मेलबर्न इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी की रिसर्च के मुताबिक, जिंदा बचने की संभावना समय के साथ ऐसे गिरती जाती है… हालांकि मलबे में कितनी देर जिंदा रहेंगे, ये कई फैक्टर पर निर्भर करता है। मसलन- कोई गंभीर चोट तो नहीं लगी। WHO में इमरजेंसी प्रोग्राम की अधिकारी डॉ. जेत्री रेग्मी का कहना है कि अगर रीढ़, सिर या छाती में चोट लगी हो और शरीर से ज्यादा खून बह जाए, तो मौत कुछ घंटे में ही हो सकती है। इसके अलावा हवा, पानी और खाना मिलना भी जरूरी फैक्टर्स हैं। अमेरिका के मैसाचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल में इमरजेंसी और डिजास्टर मेडिसिन के एक्सपर्ट डॉ. जैरोन ली के मुताबिक, ‘5-7 दिन बाद मलबे में मिले लोगों का जिंदा बचना बहुत दुर्लभ होता है।' सवाल-2: वेनेजुएला भूकंप के बाद अभी कितने लोगों के दबे होने की आशंका है?जवाबः वेनेजुएला में 24 जून को 7.2 और 7.5 तीव्रता के दो भूकंप के झटके आए थे। 30 जून तक 1,943 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। 10 हजार से ज्यादा घायल हैं और 50 हजार से ज्यादा लोग अब भी लापता हैं। लापता लोगों में कई मलबे में दबे हो सकते हैं। वेनेजुएला की आपदा प्रबंधन एजेंसी सिविल प्रोटेक्शन और सेना रेसक्यू ऑपरेशन चला रही है। शुरुआती ऑपरेशन्स के दौरान कई जगहों पर मलबा हटाने वाली बैकहो लोडर मशीनें देर से पहुंची। लेकिन बाद में अंतरराष्ट्रीय सहयोग से बचाव कार्य ने तेजी पकड़ी। दुनिया भर के 30 देशों से 2,600 से ज्यादा रेसक्यू वर्कर्स वेनेजुएला पहुंचे हैं। इनके साथ 160 से ज्यादा खोजी कुत्ते भी हैं। भारत से भी 41 सदस्य का दल रेसक्यू के लिए पहुंचा है। अमेरिका ने 73 विशेषज्ञों की टीम भेजी है। इनके साथ 38 हजार किलो की मशीनें हैं, जो बड़ी-बड़ी इमारतों के मलबे को तोड़कर लोगों को निकाल रही है। अमेरिका ने 5 MQ-9 ड्रोन्स भी तैनात किए हैं, जो रेसक्यू ऑपरेशन के लिए इंटेलिजेंस दे रहे हैं। थर्मल डिटेक्टर, खोजी कुत्तों और साउंड सेंसर के जरिए भी फंसे लोगों का पता लगाया जा रहा है। सवाल-3: मलबे में दबे लोगों का बचाव अभियान कब तक जारी रहेगा?जवाबः वेनेजुएला में भूकंप आए 8 दिन हो चुके हैं। 7वें दिन सिर्फ 3 साल के एक बच्चे को ही जीवित निकाला जा सका। मलबों से अब ज्यादातर शव मिल रहे हैं। दरअसल, ऐसी आपदा के बाद कम से कम 72 घंटे तो रेसक्यू ऑपरेशन चलाया ही जाता है। इसके बाद जारी रखना है या नहीं, ये मौसम की स्थिति, लोगों के जिंदा बचे होने के वैज्ञानिक अनुमान पर निर्भर करता है। आज कल थर्मल कैमरों और साउंड सेंसर की मदद से मलबे के नीचे दबे लोगों के जिंदा होने या न होने का पता लगाया जा सकता है। खोजी कुत्ते भी इसमें मदद करते हैं। अगर 1-2 दिन और जीवित लोग नहीं निकलते, तो वेनेजुएला में रेसक्यू ऑपरेशन बंद किया जा सकता है।सवाल-4: मलबे से निकलने के बाद मौत क्यों हो जाती है?जवाबः कई बार लोग मलबे में कई दिन जीवित रहते हैं, लेकिन बाहर निकालने के बाद उनकी मौत हो जाती है। इसकी वजह है- क्रश सिंड्रोम। इसके 4 स्टेप हैं… क्रश सिंड्रोम के कारण ही रेस्क्यू टीमें अक्सर मलबे से निकालने से पहले ही पीड़ित को खास तरह की IV फ्लूइड देती हैं, उसकी निगरानी करती हैं और धीरे-धीरे बाहर निकालती हैं, ताकि शरीर इस टॉक्सिन-फ्लो को झेल सके। सवाल-5: भूकंप से बचने के लिए आप क्या तैयारी कर सकते हैं?जवाबः मोटेतौर पर 3 हिस्सों में तैयारी करनी चाहिए… 1. घर में सुरक्षा के इंतजाम: अलमारी, रैक, फ्रिज जैसे भारी फर्नीचर को दीवार में ऐसे फिक्स करें कि वो झटकों में गिरें नहीं। बेड और सोफे के ऊपर भारी फ्रेम या शीशा न लगाएं। गैस पाइप और बिजली की वायरिंग चेक करवाते रहें। 2. इमरजेंसी किट: कम से कम 3 दिन के लिए पीने का पानी और सूखा खाना जैसे- बिस्किट, ड्राई फ्रूट्स, चने वगैरह जुटाएं। टॉर्च, पावर बैंक, बैटरी साथ रखें। फर्स्ट-एड बॉक्स और जरूरी दवाइयां जमा करें। जरूरी डॉक्यूमेंट्स जैसे- आधार, बीमा कागजात वगैरह की कॉपी और कुछ कैश एक वाटरप्रूफ बैग में रखें। 3. रेस्क्यू प्लान: घर में 'ड्रॉप, कवर, होल्ड ऑन' प्रैक्टिस करें। यानी, झटका महसूस होते ही तुरंत नीचे बैठें, किसी मजबूत टेबल के नीचे सिर छुपाएं और उसे पकड़कर रखें। सवाल-6: भूकंप आने के बाद आपको क्या करना चाहिए?जवाबः भूकंप आने के बाद खुद को सुरक्षित रखने के लिए UNESCO ने 4 नियम बताए हैं... 1. शांत रहो और इंतजार करो: बड़े भूकंप के दौरान, लोगों के पास अक्सर भागने का समय नहीं होता, इसलिए बेहतर है कि पास के किसी सुरक्षित कोने में जाकर बैठ जाएं या शरीर को जितना हो सके मोड़ लें, ताकि शरीर का भार कम हो सके। सिर और रीढ़ की हड्डी की सुरक्षा का ध्यान रखें। 2. परिस्थिति के हिसाब से बचाव करो: अगर किसी बड़े बंगले में हैं, तो पलंग के नीचे छिप जाएं। अगर शहरी इमारत में हैं, तो हीटिंग पाइप के पास जाए। इसके वेंटिलेशन से सांस आती रहती है। पाइपलाइन में मौजूद पानी से जीवित रहा जा सकता है। 3. त्रिकोणीय जगह खोजो: झटके रुकने के बाद छत और सामान गिरने से बने प्राकृतिक त्रिकोणीय स्थान को खोजें। यहां से हवा मिलेगी। 4. पानी के पास, आग से दूर रहो: आग, गैस रिसाव और बिजली के शॉर्ट सर्किट के सीधे खतरे से बचने के लिए चूल्हे, गैस लाइन और घरेलू उपकरणों के पास रहने से बचें। पानी के पास रहें, जिससे मदद आने में देर भी हो तो जिंदा रह सकें। ---------- ये खबर भी पढ़िए… ‘भारत के खिलाफ जंग छेड़ देंगे’, ऐसा क्यों बोले पाकिस्तानी रक्षामंत्री; उनकी नहरों में 82% तक पानी घटा, भारत क्या कर रहा पाकिस्तान के रक्षामंत्री ख्वाजा आसिफ ने सीधे शब्दों में कहा- जिस पल हमारे पानी पर खतरा महसूस हुआ, हम बिना शक भारत के खिलाफ जंग छेड़ देंगे। इस खुली धमकी के पीछे है सिंधु जल समझौता, जिसे भारत ने अप्रैल 2025 में निलंबित कर दिया था। पूरी खबर पढ़िए…
1500 साल पुराना रिश्ता रचने जा रहा है नया इतिहास, जानें महाशक्तियों का क्या है महाप्लान
भारत और जापान के बीच के संबंध सिर्फ कूटनीतिक या व्यापारिक नहीं हैं, बल्कि इनकी जड़ें 1500 साल पुराने गहरे ऐतिहासिक और आध्यात्मिक सांस्कृतिक बंधनों से जुड़ी हुई हैं। छठी शताब्दी में जब बौद्ध धर्म भारत से चीन और कोरिया होते हुए जापान पहुंचा, तभी से दोनों देशों के बीच एक अटूट सांस्कृतिक सेतु का निर्माण हो गया था। अब यही प्राचीन और मजबूत ऐतिहासिक रिश्ता एक नई उड़ान भरने के लिए पूरी तरह तैयार है, जो आने वाले समय में वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के भविष्य की एक नई इबारत लिखेगा।सांस्कृतिक विरासत से लेकर आधुनिक साझेदारी तक का सफरसदियों पुराने इस जुड़ाव को आधुनिक युग में एक नई दिशा मिली है। आज भारत और जापान सिर्फ दो मित्र देश नहीं हैं, बल्कि एशिया-प्रशांत (इंडो-पैसिफिक) क्षेत्र में स्थिरता, शांति और समृद्धि के सबसे बड़े स्तंभ बनकर उभरे हैं। बौद्ध धर्म की साझी विरासत से शुरू हुआ यह सफर अब बुलेट ट्रेन, हाई-टेक इंफ्रास्ट्रक्चर, डिफेंस डील और सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन तक पहुंच चुका है। दोनों देशों का यह बढ़ता तालमेल न केवल द्विपक्षीय हितों को साध रहा है, बल्कि वैश्विक मंच पर एक नया शक्ति संतुलन भी पैदा कर रहा है।रणनीतिक और आर्थिक मोर्चे पर भविष्य की नई इबारतमौजूदा वैश्विक परिदृश्य में भारत और जापान की यह रणनीतिक साझेदारी बेहद अहम हो चुकी है। रक्षा, सुरक्षित तकनीक, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा और डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन जैसे क्षेत्रों में दोनों देश मिलकर काम कर रहे हैं। जापान का निवेश और भारत का विशाल बाजार तथा कुशल कार्यबल मिलकर आने वाले कल की तस्वीर बदल रहे हैं। दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व ने यह साफ कर दिया है कि यह दोस्ती आने वाले समय में और अधिक मजबूत होगी, जो न केवल एशिया बल्कि पूरी दुनिया के आर्थिक और रणनीतिक भविष्य को तय करने में बड़ी भूमिका निभाएगी।
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट फैसले से इमिग्रेशन से जुड़ी मुश्किलों में फंसे एच-1बी वर्क वीजा पर रह रहे करीब तीन लाख भारतीयों को बड़ी राहत मिली है। कोर्ट के फैसले में अमेरिका में जन्म लेने वाले सभी बच्चों की नागरिकता के अधिकार को बरकरार रखा गया है।
नेतन्याहू ने कहा कि इजराइल अब आर्थिक रूप से इतना सक्षम हो चुका है कि उसे अमेरिकी आर्थिक सहायता की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने यह भी दोहराया कि यदि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरत पड़ी तो इजराइल ईरान के खिलाफ फिर से सैन्य कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा।
बांग्लादेश की सियासत में एक बड़े घटनाक्रम के तहत, पूर्व सूचना मंत्री और 1971 मुक्ति संग्राम के अनुभवी सेनानी हसनुल हक इनु को 10 साल की जेल की सजा सुनाई गई है। इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल ने इनु को अगस्त 2024 के सरकार विरोधी छात्र आंदोलनों के दौरान पुलिस को घातक बल प्रयोग के लिए उकसाने और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दमनकारी नीति अपनाने का दोषी पाया है। यह फैसला शेख हसीना के कार्यकाल के दौरान हुई हिंसा को लेकर गठित विशेष न्यायाधिकरणों की एक और कड़ी कार्रवाई है।211 पन्नों का ऐतिहासिक फैसला और आरोपट्रिब्यूनल ने 211 पन्नों के अपने विस्तृत फैसले में इनु को जुलाई 2024 के विद्रोह के दौरान कुश्तिया जिले में छह प्रदर्शनकारियों की हत्या से संबंधित अपराधों के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार माना है। अभियोजन पक्ष ने साक्ष्य पेश किए कि 19 जुलाई 2024 को प्रधानमंत्री आवास पर हुई 14-दलीय गठबंधन की उच्च-स्तरीय बैठक में इनु मौजूद थे, जहां सेना की तैनाती और प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने का विवादित निर्णय लिया गया था। इसके अलावा, उन पर पुलिस को प्रदर्शनकारियों की सूची बनाकर उन पर कार्रवाई करने और टीवी इंटरव्यू के जरिए आंदोलनकारियों को 'आतंकवादी' कहकर बदनाम करने का आरोप भी साबित हुआ है।'अग्निपरीक्षा' करार देकर नकारा फैसलासजा सुनाए जाने के बाद इनु ने इस पूरी कानूनी कार्यवाही को महज एक 'नाटक' करार दिया है। अदालत कक्ष से बाहर निकलते हुए उन्होंने संवाददाताओं से कहा कि यह एक फर्जी मुकदमा है और वे इस 'अग्निपरीक्षा' से गुजर रहे हैं। उनकी पत्नी अफरोजा हक रीना ने भी इस फैसले पर कड़ी नाराजगी जाहिर की है और संकेत दिया है कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और अधिवक्ताओं से सलाह लेने के बाद परिवार ऊपरी अदालत में अपील दायर करने पर विचार करेगा।शेख हसीना के शासन में इनु का रसूखहसनुल हक इनु ने 2012 से 2018 तक सूचना मंत्री के रूप में बांग्लादेश की कैबिनेट में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हालांकि, 2024 की अशांति के दौरान उनका राजनीतिक प्रभाव पहले के मुकाबले कम हो गया था, लेकिन अभियोजन पक्ष ने अदालत को यह समझाने में सफलता हासिल की कि हसीना सरकार के गिरने के अंतिम क्षणों तक इनु फैसले लेने वाली कोर टीम का हिस्सा थे। यह सजा इस बात का संकेत है कि अंतरिम सरकार के बाद गठित न्यायाधिकरण, पिछली सरकार के उन मंत्रियों और सलाहकारों के खिलाफ शिकंजा कसने के लिए प्रतिबद्ध हैं, जिनकी भूमिका छात्र आंदोलन को कुचलने में रही थी।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर 'बर्थराइट सिटिजनशिप' (जन्मजात नागरिकता) के मुद्दे पर मुखर हो गए हैं। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा जन्म के आधार पर नागरिकता देने के अधिकार को बरकरार रखने के बाद ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर तंज कसते हुए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को इस फैसले के लिए 'बधाई' दी है। ट्रंप ने इसे अमेरिका के लिए एक दुर्भाग्यपूर्ण दिन बताते हुए कहा कि यह देश के लिए बेहद महंगा और अनुचित कदम है। उन्होंने साफ कर दिया है कि वे हार मानने वाले नहीं हैं और इस व्यवस्था को बदलने के लिए कांग्रेस के जरिए नए कानून लाने की पुरजोर कोशिश करेंगे।कांग्रेस से लगाई कानून बनाने की गुहारट्रंप ने अमेरिकी कांग्रेस से अपील की है कि वे बिना किसी देरी के 'बर्थराइट सिटिजनशिप' को खत्म करने के लिए कानून बनाने की प्रक्रिया शुरू करें। ट्रंप के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि संविधान में बड़े बदलाव के बजाय कानूनी प्रक्रिया अपनाई जाए, तो इसे बदला जा सकता है। उन्होंने कांग्रेस को अपना पूर्ण समर्थन देने का भरोसा दिलाया है। राष्ट्रपति का मानना है कि एक ठोस कानून के माध्यम से इस दशकों पुरानी व्यवस्था को समाप्त कर अमेरिका की सीमाओं की सुरक्षा और प्रवासियों के नियमों को सख्त किया जा सकता है।सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के 14वें संशोधन पर लगाई मुहरअमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने अपने बहुमत के फैसले में संविधान के 14वें संशोधन की व्याख्या करते हुए ट्रंप के उस कार्यकारी आदेश को खारिज कर दिया, जो अवैध या अस्थायी प्रवासियों के बच्चों को नागरिकता देने से रोकता था। चीफ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा, नागरिकता, तब भी और अब भी अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था में शामिल होने का अधिकार है। 14वें संशोधन को बनाने वालों ने इस देश में पैदा हुए हर व्यक्ति से यह वादा किया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जन्मजात नागरिकता का सिद्धांत अमेरिकी लोकतंत्र की नींव का एक हिस्सा है और इसे कानूनी व्याख्याओं के माध्यम से पलटा नहीं जा सकता।क्या था ट्रंप प्रशासन का तर्क?ट्रंप प्रशासन लंबे समय से यह दलील देता रहा है कि 14वें संशोधन का मूल उद्देश्य गृहयुद्ध के बाद पूर्व दासों और उनके वंशजों को अधिकार देना था, न कि अवैध प्रवासियों या अल्पकालिक पर्यटकों और विदेशी छात्रों के बच्चों को नागरिकता प्रदान करना। प्रशासन का कहना था कि यह व्यवस्था गलत इस्तेमाल की जा रही है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को नकारते हुए संवैधानिक वादे को निभाने पर जोर दिया। अब देखना यह होगा कि क्या ट्रंप की अपील पर अमेरिकी कांग्रेस कोई नया विधेयक पेश करती है या यह मामला एक बार फिर लंबी कानूनी और राजनीतिक खींचतान का केंद्र बनता है।
अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच चल रहा सीमा विवाद अब युद्ध जैसी स्थिति में बदल गया है। जून के अंत में पाकिस्तान द्वारा अफगानिस्तान की सीमा में घुसकर किए गए हवाई हमलों का तालिबान ने बेहद आक्रामक जवाब दिया है। अफगान वायुसेना ने पाकिस्तानी सीमा के अंदर बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा प्रांतों में ड्रोन और हवाई हमलों को अंजाम दिया है। तालिबान का दावा है कि ये हमले उन आतंकी ठिकानों पर किए गए हैं, जहाँ से इस्लामिक स्टेट खुरासान (ISIS-K) के आतंकी अफगानिस्तान में अस्थिरता फैलाने की साजिश रच रहे थे।तालिबान का बड़ा दावा: आतंकी ठिकाने ध्वस्त, आम नागरिक सुरक्षितअफगान समाचार एजेंसी 'टोलो न्यूज' के अनुसार, इस्लामिक अमीरात के रक्षा मंत्रालय ने इन एयरस्ट्राइक्स की आधिकारिक पुष्टि की है। मंत्रालय के प्रवक्ता ने साफ शब्दों में कहा कि जिन ठिकानों को निशाना बनाया गया, वहाँ से अफगानिस्तान के भीतर बेगुनाह नागरिकों की हत्या और बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ की योजनाएँ बनाई जा रही थीं। तालिबान ने यह स्पष्ट किया है कि यह ऑपरेशन पूरी सटीकता (Precision) के साथ किया गया है, जिसमें आतंकियों को भारी नुकसान पहुँचा है, जबकि इस जवाबी कार्रवाई में किसी भी आम नागरिक के हताहत होने की कोई खबर नहीं है।क्यों भड़का है अफगानिस्तानयह जवाबी हमला पाकिस्तान द्वारा हाल ही में अफगानिस्तान के भीतर किए गए उन हवाई हमलों का नतीजा है, जिनमें तालिबान सरकार के अनुसार, कम से कम 38 अफगान नागरिक मारे गए थे और 163 लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएँ और बच्चे शामिल थे। संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन (UNAMA) ने भी इन हमलों की भयावहता की पुष्टि की थी। इसके विपरीत, पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने दावा किया था कि उन्होंने उन हमलों में 29 आतंकियों को मार गिराया है, लेकिन अफगानिस्तान ने इस दावे को पूरी तरह नकार दिया है।भारत की सख्त चेतावनी: संप्रभुता पर हमला बर्दाश्त नहींइस पूरे घटनाक्रम पर भारत ने भी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने पाकिस्तानी एयरस्ट्राइक्स को अफगानिस्तान की संप्रभुता का उल्लंघन और क्षेत्रीय शांति के लिए सीधा खतरा करार दिया है। भारत का स्पष्ट मानना है कि पाकिस्तान अपनी आंतरिक विफलताओं और आर्थिक तंगी से ध्यान भटकाने के लिए इस तरह के लापरवाह कदम उठा रहा है। तालिबान ने भी विश्व को चेतावनी दी है कि वे भविष्य में अफगानिस्तान की सुरक्षा को अस्थिर करने वाले किसी भी ठिकाने या आतंकी को बख्शने वाले नहीं हैं, चाहे वह सीमा के उस पार ही क्यों न स्थित हो।
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने जन्मजात नागरिकता को बरकरार रखा, ट्रंप का कार्यकारी आदेश असंवैधानिक
अदालत ने 6-3 के बहुमत से दिए गए फैसले में स्पष्ट किया कि अमेरिका में जन्म लेने वाला लगभग हर व्यक्ति संविधान के तहत जन्म से ही अमेरिकी नागरिक है।
अयातुल्लाह अली खामेनेई को हत्या के 131 दिन बाद सुपुर्द-ए-खाक किया जाना है। 6 दिन के राजकीय जनाजे में ईरान दुनियाभर से नेताओं को बुला रहा है। 23 जून को राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने पीएम मोदी को भी न्योता दिया। ईरानी और भारतीय सूत्रों के मुताबिक भारत सरकार ने एक डेलीगेशन भेजने का फैसला किया, जिसमें न पीएम शामिल हैं और न विदेश मंत्री। आखिर न्योता मिलने के बावजूद पीएम मोदी खुद क्यों नहीं जा रहे, अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच भारत किस दुविधा में है और क्या संतुलन साध पाएगा; आज के एक्सप्लेनर में... सवाल-1: पीएम मोदी नहीं, तो ईरान कौन जा रहा है? जवाबः खामेनेई के जनाजे में शामिल होने के लिए भारतीय डेलीगेशन में दो प्रमुख शख्सियतें हैं… 1. ले. ज. (रि.) सैयद अता हसनैन, बिहार के राज्यपाल डेलिगेशन में क्यों चुना गया: ईरान शिया बहुल इस्लामिक देश है और अयातुल्ला खामेनेई शियाओं के सर्वोच्च धार्मिक और राजनीतिक नेता थे। सैयद अता हसनैन भी शिया हैं। रिटायर्ड आर्मी अफसर और राज्यपाल जैसा संवैधानिक ओहदा भी रखते हैं। 2. पबित्र मार्गरिटा, केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री डेलिगेशन में क्यों चुना गया: सीधे विदेश मंत्रालय का हिस्सा हैं। हाई प्रोफाइल भी नहीं हैं और न ज्यादा लो-प्रोफाइल। ईरान को लेकर भारत के मौजूदा स्टैंड पर फिट बैठते हैं। सवाल-2: पीएम मोदी का बुलावा था, फिर वो खुद क्यों नहीं गए? जवाबः पहले जाहिर वजहों की बात। पीएम मोदी का शेड्यूल पहले से तय है। 1 से 3 जुलाई तक जापान की पीएम सनाए ताकाइची भारत दौरे पर रहेंगी, जिनसे पीएम मोदी मुलाकात करेंगे। 4 जुलाई को पीएम मोदी राजस्थान के जोधपुर जाएंगे। फिर 6 से 11 जुलाई तक वे इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की यात्रा करेंगे। हालांकि एक्सपर्ट्स पीएम मोदी के ईरान न जाने के पीछे 3 छिपी वजहें भी बताते हैं। JNU में मिडिल-ईस्ट स्टडीज के प्रोफेसर पीआर कुमारस्वामी और इंटरनेशनल स्टडीज के एसोसिएट प्रोफेसर राजन कुमार के मुताबिक… 1. खामेनेई का जनाजा बेहद उग्र हो सकता हैः खामेनेई की मौत एक हमले में हुई है। शिया परंपरा के मुताबिक उनका जनाजा सिर्फ एक शोक सभा नहीं, बल्कि न्याय और प्रतिरोध का धार्मिक और राजनीतिक रूप ले लेगा। 6 दिन के अंतिम संस्कार में लोग मुहर्रम की तरह विलाप करेंगे और खुद को पीटेंगे। ये बहुत ज्यादा उग्र होगा। इसमें शामिल होने का मतलब होता कि पीएम मोदी भी खुलकर ईरान के प्रतिरोध के साथ खड़े हैं। भारत इससे बचना चाहता है। 2. अचानक स्टैंड बदलने से आलोचना का खतरा: खामेनेई की मौत पर भारत ने चुप्पी साध रखी थी। 5 दिन बाद पहली सार्वजनिक प्रतिक्रिया दी, जब विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने ईरानी दूतावास जाकर शोक जताया। अब 4 महीने बाद अचानक पीएम मोदी का खामेनेई के जनाजे में जाना पूरी तरह स्टैंड बदलना होगा। 3. साझेदार देशों को गलत मैसेज जाने की चिंता: खामेनेई के जनाजे में पीएम मोदी की मौजूदगी भारत के साझेदार और ईरान के विरोधी देशों को नाराज कर सकती है। इनमें अमेरिका, इजराइल के अलावा सऊदी अरब, यूएई जैसे सुन्नी बहुल देश भी हैं। सवाल-3: ईरान को लेकर भारत के सामने दुविधा क्या है? जवाबः ईरान से जुड़ा हर फैसला भारत के लिए तीन मोर्चों पर एक साथ संतुलन मांगता है... 1. आर्थिक दुविधा: ईरान की तरफ झुका, अमेरिका से खतरा होर्मुज स्ट्रेट पर अब भी ईरान का कब्जा है। भारत का 40% कच्चा तेल, 50% LNG और 90% LPG इसी रूट से आता है। यहां जरा सी रुकावट भारत में तेल संकट खड़ा कर सकती है। दूसरी तरफ अमेरिका भारत का बड़ा ट्रेड पार्टनर है, और जल्द ही दोनों देशों के बीच बड़ी ट्रेड डील होने वाली है। यानी, ईरान से नाता टूटा तो ऊर्जा संकट, अमेरिका से दूरी बढ़ी तो व्यापार को नुकसान। 2. सांस्कृतिक दुविधा: भारतीय लोगों की हमदर्दी ईरान के साथभारत और ईरान के रिश्ते सदियों पुराने हैं। भाषा, व्यापार और सभ्यता के स्तर पर गहरे जुड़े हैं। यही वजह है कि जंग के दौरान भी भारत ने ईरान की खुलकर निंदा नहीं की। खामेनेई की मौत पर भी भारत ने सीधी चुप्पी नहीं, बल्कि शालीन शोक जताया। 3. रक्षा दुविधा: इजराइल बड़ा डिफेंस पार्टनर, खाड़ी देशों में भारतीयइजराइल भारत का भरोसेमंद रक्षा साझेदार है, जो हर मुश्किल वक्त में खुलकर साथ खड़ा रहा है। वहीं खाड़ी देशों में रह रहे 1 करोड़ से ज्यादा भारतीयों की सुरक्षा भी उतनी ही अहम है। जंग के दौरान भारत ने इजराइल या अमेरिका की आलोचना नहीं की, लेकिन खाड़ी देशों पर हुए हमलों की निंदा जरूर की। पाकिस्तान के ईरान के प्रति सहानुभूति दिखाने के बाद UAE ने कई पाकिस्तानी वर्कर्स को डिपोर्ट कर दिया था। भारत ऐसी कोई गलती दोहराना नहीं चाहता। सवाल-4: क्या भारत अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच संतुलन बना पाएगा? जवाबः 1989 में जब ईरान के सुप्रीम लीडर अली खुमैनी की मृत्यु हुई थी, तो उनके अंतिम संस्कार में भारत ने विदेश मंत्री पी. वी. नरसिंहा राव को भेजा था। 2024 में जब ईरान के राष्ट्रपति अब्राहिम रइसी की हेलिकॉप्टर क्रैश में मौत हुई थी, तो भारत के उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ अंतिम संस्कार में शामिल हुए थे। लेकिन इस बार ईरान के सुप्रीम लीडर के अंतिम संस्कार में किसी मंत्री स्तर के नेता को नहीं भेजा जा रहा है। सवाल-5: खामेनेई के अंतिम संस्कार में क्या-क्या होना है? जवाबः 28 फरवरी को खामेनेई की मौत के बाद, 4 मार्च को उनका अंतिम संस्कार होना था लेकिन लगातार होते हमलों की वजह से यह टल गया। अब 4 जुलाई को अंतिम संस्कार कार्यक्रम की शुरूआत होगी… --------- ये खबर भी पढ़िए… आज का एक्सप्लेनर: CM विजय, गृहमंत्री शाह से मुलाकात, सैन्य कमांड का दौरा; ट्रम्प के दूत सर्जियो गोर आखिर भारत में कर क्या रहे हैं अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर 22 जून को तमिलनाडु के सीएम विजय थलापति से मिलने चेन्नई पहुंच गए। उससे 4 दिन पहले, 18 जून को गृहमंत्री अमित शाह से दिल्ली में मुलाकात की। 6 महीने में 6 मुख्यमंत्रियों से मिले। दिल्ली के उपराज्यपाल और राजस्थान की डिप्टी सीएम तक से मीटिंग की। भारतीय सेना के पश्चिमी कमान हेडक्वार्टर के दौरे पर तो हंगामा भी हुआ था। पूरी खबर पढ़िए
भारत ने एफएटीएफ का किया समर्थन, टेरर फंडिंग रोकने वाली संस्था पर पाक के हमलों को किया खारिज
भारत ने अंतरराष्ट्रीय आतंक-वित्तपोषण निगरानी संस्था पर पाकिस्तान द्वारा किए गए हमलों का बचाव करते हुए कहा है कि ये आलोचनाएं “जांच के डर” से प्रेरित हैं।
पड़ोसी देश पाकिस्तान की ओर से अफगानिस्तान की सीमा के भीतर किए गए औचक हमले के बाद दक्षिण एशिया में भू-राजनीतिक (Geopolitical) तनाव चरम पर पहुंच गया है। बिना किसी ठोस उकसावे के किए गए इस सैन्य एक्शन के बाद पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के निशाने पर आ गया है और हर तरफ उसकी इस आक्रामक नीति की थू-थू हो रही है। इस नाजुक मोड़ पर भारत ने एक बार फिर अपनी मजबूत कूटनीति का परिचय देते हुए अपने पुराने और भरोसेमंद दोस्त अफगानिस्तान के प्रति अटूट समर्थन जताया है। नई दिल्ली की ओर से आए इस रणनीतिक रुख ने अंतरराष्ट्रीय गलियारों में हलचल तेज कर दी है।हवाई और जमीनी हमले के बाद पाकिस्तान की चौतरफा घेराबंदी शुरूस्थानीय और अंतरराष्ट्रीय खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तानी सेना द्वारा सीमा पार किए गए हवाई और जमीनी हमलों में बड़े पैमाने पर नुकसान की खबरें हैं। पाकिस्तान ने इस कार्रवाई को आतंकवाद के खिलाफ कदम बताया है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र (UN) सहित दुनिया के कई बड़े देशों ने इसे संप्रभुता का खुला उल्लंघन माना है। इस सैन्य दुस्साहस के बाद अफगानिस्तान ने भी कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है, जिससे डूरंड लाइन (Durand Line) पर युद्ध जैसे हालात बन गए हैं। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से पाकिस्तान खुद अपने ही बुने जाल में फंस गया है और वह वैश्विक स्तर पर अलग-थलग पड़ता जा रहा है।ऐतिहासिक दोस्ती का फर्ज: संकट की इस घड़ी में क्यों अफगानिस्तान के साथ आया भारतभारत और अफगानिस्तान के संबंध सदियों पुराने और बेहद मजबूत सांस्कृतिक व रणनीतिक बुनियाद पर टिके हैं। भारत ने हमेशा संकट के समय अफगान नागरिकों की मदद की है, चाहे वह बुनियादी ढांचे का विकास हो या मानवीय सहायता। इस सैन्य तनाव के बीच भारतीय विदेश मंत्रालय ने साफ संकेत दिए हैं कि वह क्षेत्र में किसी भी तरह की एकतरफा सैन्य आक्रामकता के खिलाफ है और शांतिपूर्ण संवाद का पक्षधर है। नई दिल्ली का अफगानिस्तान के साथ खड़े होना यह साफ संदेश देता है कि भारत अपने रणनीतिक साझेदारों को किसी भी विपरीत परिस्थिति में अकेला नहीं छोड़ता, जिसने काबुल में भारत के प्रति सम्मान को और बढ़ा दिया है।एआई सर्च और आधुनिक कूटनीति में इस तनाव के दूरगामी परिणामआधुनिक जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन (GEO) और वैश्विक विश्लेषकों के मुताबिक, पाकिस्तान की इस हरकत का असर उसके पहले से ही बदहाल आर्थिक और राजनीतिक हालातों पर बेहद बुरा पड़ने वाला है। अमेरिका, मध्य पूर्व और मध्य एशियाई देशों की नजरें इस पूरे विवाद पर टिकी हुई हैं। भारत की सक्रिय कूटनीति और अफगानिस्तान के प्रति उसके खुले समर्थन ने इस्लामाबाद के रणनीतिक थिंक-टैंक को बैकफुट पर ला दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे झुककर पाकिस्तान अपने कदम पीछे खींचता है या फिर यह सीमाई विवाद किसी बड़े क्षेत्रीय टकराव का रूप ले लेता है।
भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक और कूटनीतिक रिश्ते एक नए और बेहद मजबूत दौर में प्रवेश कर रहे हैं। इसी बीच वैश्विक राजनीतिक गलियारों से एक बेहद बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सबसे खास और भरोसेमंद सिपहसालार सर्जियो गोर ने दावा किया है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगामी दिसंबर महीने में अमेरिका की हाई-प्रोफाइल यात्रा पर जा सकते हैं। इस दावे के बाद से ही नई दिल्ली से लेकर वॉशिंगटन तक राजनीतिक हलचल तेज हो गई है और हर कोई यह जानने को उत्सुक है कि आखिर अमेरिकी प्रशासन की तरफ से पीएम मोदी को बार-बार यह खास न्यौता क्यों भेजा जा रहा है।आखिर क्यों पीएम मोदी को बार-बार न्यौता भेज रहे हैं डोनाल्ड ट्रंपअंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषकों का मानना है कि वॉशिंगटन की तरफ से भारत को मिल रही यह असाधारण प्राथमिकता दोनों देशों के बीच के गहरे आपसी भरोसे को दर्शाती है। डोनाल्ड ट्रंप और पीएम मोदी की निजी केमिस्ट्री जगजाहिर है, लेकिन इस बार का बुलावा सिर्फ दोस्ती तक सीमित नहीं है। अमेरिका इस समय वैश्विक मंच पर कई बड़े भू-राजनीतिक (Geopolitical) बदलावों से गुजर रहा है, जहां उसे एशिया-प्रशांत क्षेत्र और वैश्विक आर्थिक मोर्चे पर भारत के मजबूत साथ की बेहद जरूरत है। यही वजह है कि ट्रंप प्रशासन साल के अंत तक पीएम मोदी के साथ एक बेहद अहम और निर्णायक बैठक करना चाहता है।रक्षा सौदों से लेकर व्यापार तक इन बड़े मुद्दों पर टिकी हैं दुनिया की नजरेंअगर पीएम मोदी की यह दिसंबर यात्रा फाइनल होती है, तो यह कई मायनों में ऐतिहासिक साबित होने वाली है। इस संभावित दौरे के दौरान दोनों महाशक्तियों के बीच कई अरब डॉलर के अत्याधुनिक रक्षा सौदों, क्रिटिकल टेक्नोलॉजी (iCET) की साझेदारी और इंडो-पैसिफिक रीजन में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने जैसे गंभीर मुद्दों पर अंतिम मुहर लग सकती है। इसके साथ ही, अमेरिकी बाजार में भारतीय कंपनियों की पहुंच और दोनों देशों के बीच व्यापारिक बाधाओं को दूर करने के लिए भी इस बैठक को बेहद मील का पत्थर माना जा रहा है, जिसका सीधा असर ग्लोबल मार्केट पर पड़ेगा।नई दिल्ली और वॉशिंगटन की जुगलबंदी से बढ़ी ड्रैगन की बेचैनीसर्जियो गोर के इस बड़े खुलासे और भारत-अमेरिका की इस बढ़ती नजदीकी ने पड़ोसी देश चीन की चिंताएं बढ़ा दी हैं। एआई सर्च और आधुनिक जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन (GEO) के दौर में कूटनीतिक जानकार मान रहे हैं कि दिसंबर का यह संभावित दौरा वैश्विक राजनीति का नया रुख तय करेगा। भारत जिस तरह से वैश्विक सप्लाई चेन का नया केंद्र बनकर उभर रहा है, उसे देखते हुए अमेरिका भारत को अपने सबसे मजबूत और स्थायी साझेदार के रूप में स्थापित करना चाहता है। अब पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि पीएमओ (PMO) की तरफ से इस यात्रा को लेकर आधिकारिक तौर पर क्या तारीखें सामने आती हैं।
पाकिस्तान से अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों को निशाना बनाए जाने की एक बेहद हैरान करने वाली और दर्दनाक खबर सामने आई है। पिछले कुछ समय से 'कृष्ण गली' और 'राम गली' जैसे ऐतिहासिक इलाकों के नाम बदलने को लेकर चल रहे ड्रामे के बीच, अब पाकिस्तानी प्रशासन ने अपना असली रंग दिखा दिया है। सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत को पूरी तरह से दरकिनार करते हुए, वहां करीब 125 साल पुराने एक ऐतिहासिक गुरुद्वारे को जमींदोज कर दिया गया है। इस कार्रवाई के बाद न केवल पाकिस्तान में रहने वाले सिख और हिंदू परिवारों में दहशत का माहौल है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी मानवाधिकार संगठनों ने इस पर गहरी नाराजगी जताई है।रातों-रात मलबे में तब्दील कर दी गई सदियों पुरानी सिख विरासतस्थानीय सूत्रों और सोशल मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक, इस ऐतिहासिक गुरुद्वारे को बिना किसी पूर्व सूचना या कानूनी नोटिस के बेहद गुपचुप तरीके से ढहाया गया। स्थानीय प्रशासन ने भारी सुरक्षा बलों की तैनाती के बीच इस पूरी कार्रवाई को अंजाम दिया, ताकि कोई भी इसका विरोध न कर सके। विभाजन से पहले के बने इस गुरुद्वारे से न केवल सिख समुदाय की धार्मिक भावनाएं जुड़ी थीं, बल्कि यह उस इलाके की ऐतिहासिक पहचान का एक बेहद अहम हिस्सा था। इस प्राचीन ढांचे को मलबे में तब्दील किए जाने की तस्वीरों और वीडियो ने दुनिया भर के सिख और अल्पसंख्यक समुदायों को झकझोर कर रख दिया है।नाम बदलने के विवाद की आड़ में रची गई बड़ी साजिशविशेषज्ञों का मानना है कि पिछले कुछ दिनों से कृष्ण गली और राम गली के नाम बदलने को लेकर जो विवाद खड़ा किया गया था, वह असल में इस ऐतिहासिक ढांचे को हटाने की एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा था। पाकिस्तान में अक्सर अल्पसंख्यकों के प्राचीन और ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों को भू-माफियाओं और स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत से निशाना बनाया जाता रहा है। इस बार भी विकास और अतिक्रमण हटाने के नाम पर इस पूरी कार्रवाई को अंजाम दिया गया है, जिसने पाकिस्तान के धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के दावों की पूरी तरह से पोल खोलकर रख दी है।अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान को घेरने की तैयारी तेजइस क्रूर और दमनकारी कदम के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की चौतरफा थू-थू हो रही है। भारत सहित दुनिया भर के विभिन्न मानवाधिकार और सिख संगठनों ने संयुक्त राष्ट्र (UN) और वैश्विक कूटनीतिक मंचों से पाकिस्तान के इस कदम पर सख्त कार्रवाई करने की मांग की है। विशेषज्ञों के अनुसार, प्राचीन और धार्मिक विरासतों को इस तरह नष्ट करना अंतरराष्ट्रीय नियमों का खुला उल्लंघन है। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि पड़ोसी देश में अल्पसंख्यकों के धार्मिक और नागरिक अधिकार कितने असुरक्षित और गंभीर खतरे में हैं।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के केंद्र में इन दिनों अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा शह और मात का खेल है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को सोशल मीडिया पर एक सनसनीखेज दावा किया कि ईरान ने अमेरिकी अधिकारियों के साथ बैठक का अनुरोध किया है। ट्रंप के इस बयान ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है, लेकिन दूसरी ओर से मिला जवाब इसे एक बड़ी कूटनीतिक गुत्थी बना रहा है। ईरानी अधिकारियों ने ऐसी किसी भी बैठक की योजना से साफ इनकार कर दिया है, जिससे साफ हो गया है कि दोनों देशों के बीच तनाव अभी भी अपने चरम पर है।दोहा वार्ता पर ट्रंप बनाम ईरान: सच क्या है?ट्रंप ने दावा किया था कि ईरान के साथ बातचीत मंगलवार को कतर के दोहा में आयोजित होगी। वहीं, ईरान के वरिष्ठ वार्ताकार काजिम गरीबाबादी ने इसे सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि तकनीकी स्तर पर बातचीत की कोई पुष्टि नहीं हुई है, हालांकि कतर के साथ अन्य मामलों पर संवाद जारी है। विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप का यह दावा घरेलू राजनीति से भी प्रेरित हो सकता है, जहां वे यह दिखाना चाहते हैं कि उनका 'मैक्सिमम प्रेशर' काम कर रहा है और ईरान बातचीत के लिए मजबूर है।6 अरब डॉलर की संपत्ति और पेजेश्कियान का दांवईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने हाल ही में जब्त की गई 6 अरब डॉलर की ईरानी संपत्ति के कतर के माध्यम से जारी होने का जिक्र किया है। यह कदम ईरानी जनता को अंतरिम समझौते के लिए राजी करने की एक कोशिश मानी जा रही है। दिलचस्प यह है कि अमेरिकी अधिकारी लगातार यह दोहरा रहे हैं कि ईरान की किसी भी संपत्ति से रोक अभी नहीं हटाई गई है। होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव के बीच यह वित्तीय मुद्दा दोनों देशों के बीच समझौते की मुख्य कड़ी बना हुआ है।होर्मुज जलडमरूमध्य: दुनिया के लिए क्यों खतरनाक है यह तनाव?होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल गलियारा है, जहां से वैश्विक व्यापार का करीब 20% तेल और गैस गुजरती है। हाल के दिनों में वहां जहाजों पर हुए हमलों और अमेरिकी सैन्य प्रतिक्रिया ने क्षेत्र को युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया है। यदि ईरान और अमेरिका के बीच वार्ता विफल रहती है, तो वैश्विक ऊर्जा संकट गहरा सकता है और तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं। ट्रंप के लिए यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वे अमेरिकी नागरिकों को यह भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि अमेरिका में महंगाई घट रही है, लेकिन होर्मुज का तनाव उनके इस दावे को सीधे चुनौती दे रहा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक बड़ा कानूनी अवरोध पैदा हो गया है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए राष्ट्रपति ट्रंप के फेडरल रिजर्व गवर्नर लिसा कुक को बर्खास्त करने के प्रयास पर रोक लगा दी है। 5-4 के बहुमत से आए इस फैसले ने ट्रंप प्रशासन की कार्यकारी शक्तियों को एक बड़ा झटका दिया है। यह पहली बार है जब 1913 में फेडरल रिजर्व की स्थापना के बाद किसी राष्ट्रपति द्वारा केंद्रीय बैंक के किसी उच्च अधिकारी को हटाने की कोशिश को सर्वोच्च अदालत ने सिरे से खारिज किया है।सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की ट्रंप प्रशासन की अपीलसुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय पीठ ने ट्रंप प्रशासन की उस याचिका को ठुकरा दिया, जिसमें कुक को बर्खास्त करने से रोकने वाले निचली अदालत के आदेश को चुनौती दी गई थी। जिला न्यायाधीश जिया कॉब ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया था कि बिना उचित नोटिस और सुनवाई के लिसा कुक को हटाना 'उचित प्रक्रिया' (Due Process) का सीधा उल्लंघन है। इसके बाद कोलंबिया सर्किट अपील अदालत ने भी इस निर्णय को बरकरार रखा था, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने अपनी मुहर लगाकर अंतिम रूप दे दिया है।क्या है विवाद की जड़?अगस्त 2025 में राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया के जरिए कुक को बर्खास्त करने का पत्र जारी किया था। उन्होंने लिसा कुक पर धोखाधड़ी के आरोप लगाए थे, जिसे कुक और उनके समर्थकों ने पूरी तरह खारिज किया है। लिसा कुक, जो फेडरल रिजर्व की पहली अश्वेत महिला गवर्नर हैं, का कहना है कि यह कार्रवाई वास्तव में मौद्रिक नीति को लेकर चल रहे वैचारिक मतभेदों के कारण की जा रही है। उनका कार्यकाल 2038 तक निर्धारित है और उन्हें 2022 में नियुक्त किया गया था। इस फैसले के बाद ट्रंप ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए अदालत की कार्यवाही को 'पूरी तरह प्रक्रियात्मक' करार दिया है।फेडरल रिजर्व की स्वतंत्रता और ट्रंप का रुखदुनिया के सबसे प्रभावशाली केंद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व की स्वायत्तता अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए रीढ़ की हड्डी मानी जाती है। ट्रंप की सत्ता में वापसी के बाद से ही फेडरल रिजर्व उनके निशाने पर रहा है। इससे पहले वे फेड चेयरमैन जेरोम पॉवेल के कार्यकाल के दौरान भी अपनी नाराजगी जता चुके हैं। केविन वॉर्श के नए चेयरमैन बनने के बाद भी ट्रंप प्रशासन और फेडरल रिजर्व के बीच खींचतान जारी है। लिसा कुक के मामले में आए इस फैसले ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि राष्ट्रपति अपनी मर्जी से केंद्रीय बैंक के अधिकारियों को पद से नहीं हटा सकते, जो अमेरिकी संस्थागत लोकतंत्र के लिए एक बड़ी जीत मानी जा रही है।

