विदेश यात्रा पड़ी भारी तो छिन सकता है स्थायी निवास, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
अगर आप अमेरिका में ग्रीन कार्ड होल्डर हैं और आप पर किसी भी तरह का आपराधिक मामला लंबित है, तो अब आपकी अंतरराष्ट्रीय यात्रा आपको भारी मुसीबत में डाल सकती है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ने ग्रीन कार्ड धारकों के लिए इमिग्रेशन के नियमों को बेहद सख्त बना दिया है। 'ब्लांच बनाम लाउ' (Blanch v. Lau) मामले में आए 6-3 के बहुमत के इस फैसले के बाद, सीमा अधिकारी अब लौटने वाले ग्रीन कार्ड धारकों को 'देश में प्रवेश चाहने वाले व्यक्ति' (Applicant for Admission) के रूप में मान सकते हैं, बजाय उन्हें स्वचालित रूप से प्रवेश देने के।क्या है फैसला और क्यों है यह खतरनाक?इस फैसले ने कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन (CBP) अधिकारियों को व्यापक अधिकार दे दिए हैं। अब अधिकारी केवल किसी लंबित आपराधिक आरोप या संदेह के आधार पर ही किसी ग्रीन कार्ड धारक को रोक सकते हैं, उनका ग्रीन कार्ड जब्त कर सकते हैं और उन पर निष्कासन (Deportation) की कार्यवाही शुरू कर सकते हैं। इमिग्रेशन विशेषज्ञों के अनुसार, इसका मतलब यह है कि आपको अमेरिका में प्रवेश करने के लिए अब वह अधिकार नहीं मिलेगा, जो पहले एक स्थायी निवासी को मिलता था। अब आप पर यह साबित करने का बोझ होगा कि आप अमेरिका में रहने के योग्य हैं।दुकान से चोरी जैसा छोटा अपराध भी बन सकता है 'मुसीबत'न्यूयॉर्क के जाने-माने इमिग्रेशन वकील साइरस डी. मेहता ने चेतावनी दी है कि अब आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे किसी भी व्यक्ति के लिए विदेश यात्रा करना जोखिम भरा है। यहां तक कि दुकान से चोरी (Shop-lifting) जैसे मामूली अपराधों के आरोप भी आपकी स्थायी नागरिकता और रोजगार के अधिकारों को खतरे में डाल सकते हैं। मेहता का स्पष्ट कहना है कि जब तक आपका केस पूरी तरह से सुलझ न जाए और आप दोषमुक्त न हो जाएं, तब तक अंतरराष्ट्रीय यात्रा से बचना ही सबसे सुरक्षित विकल्प है।साबित करना होगा खुद को 'निर्दोष'सिएटल की वकील कृपा उपाध्याय ने इस फैसले को इमिग्रेशन के दृष्टिकोण से 'गेम-चेंजर' बताया है। पहले के नियमों में सरकार को आरोपी के खिलाफ आरोप साबित करने होते थे, लेकिन अब स्थिति उलट गई है। यदि आपको सीमा पर हिरासत में लिया जाता है, तो 'निर्दोष साबित करने का बोझ' (Burden of Proof) अब आप पर होगा। यह स्थिति संवैधानिक सुरक्षा को कमजोर करती है और आपको लंबी कानूनी लड़ाई या हिरासत का सामना करना पड़ सकता है।यात्रा से पहले इमिग्रेशन वकील से सलाह लेंरेखा शर्मा-क्रॉफर्ड जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला 'निर्दोष होने की धारणा' को खत्म करता है। यदि आपके खिलाफ कोई भी पुरानी गिरफ्तारी, दोषसिद्धि या अनसुलझा आपराधिक मामला लंबित है, तो एयरपोर्ट जाने से पहले एक बार इमिग्रेशन वकील से कानूनी परामर्श जरूर लें। अमेरिका से बाहर निकलने से पहले यह जान लेना आवश्यक है कि आपकी यात्रा के दौरान आपकी वापसी की राह सुरक्षित है या नहीं। यह फैसला उन हजारों लोगों के लिए एक बड़ा सबक है जो अपनी पिछली गलतियों या लंबित मामलों को नजरअंदाज करके विदेश यात्रा करते हैं।
वेनेजुएला के इतिहास में 24 जून 2026 की रात एक ऐसे काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गई है, जिसने इस देश को दशकों पीछे धकेल दिया है। रात करीब 10 बजे यारकुय प्रांत की राजधानी सैन फेलिपे के पास रिक्टर स्केल पर 7.2 तीव्रता का पहला शक्तिशाली भूकंप आया। इस भयानक झटके से लोग संभल भी नहीं पाए थे कि महज 40 सेकंड बाद युमारे शहर के पास 7.5 तीव्रता का दूसरा और उससे भी अधिक विनाशकारी भूकंप आया।इन दोनों लगातार आए भूकंपों का केंद्र राजधानी कराकस से लगभग 284 से 293 किलोमीटर पश्चिम में था। इन झटकों ने पूरे वेनेजुएला को मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया है। राजधानी कराकस में कई गगनचुंबी इमारतें और एक प्रमुख बैंक की बिल्डिंग ताश के पत्तों की तरह ढह गई। देश के मुख्य सिमोन बोलिवर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को भारी नुकसान पहुंचा है, जिसके कारण सभी उड़ानें रद्द करनी पड़ी हैं। इसके अलावा ट्रुजिल्लो, काराबोबो, अरागुआ, मिरांडा और ला गुएरा जैसे राज्यों से भी बड़े पैमाने पर तबाही की खबरें आ रही हैं।अमेरिकी जियोलॉजिकल सर्वे (USGS) की शुरुआती और डरावनी चेतावनी के मुताबिक, इस आपदा में 10 हजार से लेकर 1 लाख लोगों की मौत होने की आशंका जताई गई है। लेकिन वेनेजुएला के लिए सिर्फ इंसानी जानों का नुकसान ही एकमात्र संकट नहीं है। सालों से गंभीर आर्थिक तंगहाली झेल रहे इस देश के लिए यह भूकंप एक ऐसा 'तीसरा झटका' है, जिससे बाहर निकलने में देश को कई दशक लग सकते हैं।दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार, फिर भी कंगाल है देशवेनेजुएला का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि इसके पास 303 अरब बैरल तेल का रिजर्व है, जो दुनिया में सबसे बड़ा है और अमेरिका के कुल तेल भंडार से करीब पांच गुना अधिक है। इसके बावजूद गलत नीतियों और प्रतिबंधों के कारण देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह वेंटिलेटर पर है।GDP में ऐतिहासिक गिरावट: साल 2013 से 2025 के बीच वेनेजुएला की जीडीपी (GDP) में लगभग 80% की ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई, जो सोवियत संघ के विघटन के समय आए संकट से भी बदतर है।उत्पादन ठप: जो देश 1998 में हर दिन 35 लाख बैरल तेल निकालता था, उसका उत्पादन 2020 तक गिरकर महज 3.92 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया था।रिकॉर्ड तोड़ महंगाई: साल 2025 में वेनेजुएला में महंगाई दर (Inflation Rate) 475% के पार पहुंच गई, जो दुनिया में सबसे ज्यादा थी। यहां आम आदमी की औसत मासिक आय केवल 100 से 300 डॉलर के बीच है। संयुक्त राष्ट्र (UN) के अनुसार, साल 2025 तक देश की एक-तिहाई आबादी (लगभग 80 लाख लोग) पूरी तरह से मानवीय सहायता पर निर्भर हो चुकी थी।राजनीतिक बदलाव से लौटी थी उम्मीदें, पर किस्मत को कुछ और मंजूर थाइसी साल जनवरी 2026 में वेनेजुएला में एक बहुत बड़ा राजनीतिक यू-टर्न आया था। 3 जनवरी को अमेरिकी सेना द्वारा पूर्व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार किए जाने के बाद, देश की कमान उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज को कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में सौंपी गई। रोड्रिगेज ने कड़े आर्थिक सुधार लागू किए, सरकारी तेल कंपनी PDVSA के एकाधिकार को खत्म किया और विदेशी निवेश के दरवाजे खोल दिए।अमेरिका की शेवरॉन (Chevron), स्पेन की रेप्सोल (Repsol) और इटली की एनी (Eni) जैसी वैश्विक कंपनियों के साथ नए तेल समझौते किए गए, जिससे देश का तेल उत्पादन दोबारा बढ़कर 10 लाख बैरल प्रतिदिन के पार पहुंच गया था। अर्थशास्त्रियों को पूरी उम्मीद थी कि साल 2026 में वेनेजुएला 12.1% की शानदार जीडीपी ग्रोथ दर्ज करेगा। लेकिन इस भीषण भूकंप ने इन सभी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।100 अरब डॉलर के नुकसान की आशंका: अर्थव्यवस्था के बराबर है तबाहीUSGS की PAGER (प्रॉम्प्ट असेसमेंट ऑफ ग्लोबल अर्थक्वेक्स फॉर रिस्पांस) सिस्टम के शुरुआती अनुमानों के अनुसार, इस भूकंप से वेनेजुएला को 10 अरब डॉलर से लेकर 100 अरब डॉलर से भी ज्यादा का आर्थिक नुकसान हो सकता है, जिसकी संभावना 39% तक है। यह विनाशकारी राशि वेनेजुएला की कुल वर्तमान अर्थव्यवस्था के आकार के बराबर है।सबसे बड़ी चुनौती यह है कि देश के पास पुनर्निर्माण (Reconstruction) के लिए फूटी कौड़ी भी नहीं है। वेनेजुएला पहले से ही 170 अरब डॉलर के भारी-भरकम विदेशी कर्ज के नीचे दबा हुआ है। इसके अलावा, तेल की बिक्री से मिलने वाला अधिकांश राजस्व कानूनी दांव-पेच के कारण अमेरिका की निगरानी वाले एस्क्रो खातों में जमा होता है, ताकि कर्जदाता उसे जब्त न कर सकें। ऐसे में कार्यवाहक सरकार के पास राहत कार्यों के लिए वित्तीय संसाधन बेहद सीमित हैं।विशेषज्ञों की बड़ी चिंता: तेल रिफाइनरियों और गैस लाइनों में आग का खतराकैलटेक की प्रसिद्ध भूकंप वैज्ञानिक डॉ. लूसी जोन्स के अनुसार, ऐसे बड़े भूकंपों के बाद केवल इमारतों का गिरना ही एकमात्र खतरा नहीं होता। असली तबाही तब शुरू होती है जब जमीन के नीचे बिछी मुख्य गैस पाइपलाइनें और बिजली के ग्रिड टूट जाते हैं, जिससे पूरे शहर में भीषण आग लग जाती है।चूंकि भूकंप के कारण पानी की सप्लाई लाइनें भी टूट जाती हैं, इसलिए दमकल विभागों के लिए इस आग पर काबू पाना असंभव हो जाता है। इसके अलावा, वेनेजुएला का हेल्थ सिस्टम (अस्पताल और दवाएं) पहले से ही बदहाल है, जिससे हजारों घायलों का इलाज करना एक बड़ी चुनौती होगी। यदि इस आपदा में देश की तेल रिफाइनरियों और ऑयल इन्फ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचता है, तो देश की आय का मुख्य स्रोत (जो कुल राजस्व का 50-60% और जीडीपी का 20% है) पूरी तरह ठप हो जाएगा।अंतिम निष्कर्ष: सामान्य होने में लग जाएंगे 10 से 15 सालआर्थिक और आपदा प्रबंधन विशेषज्ञ इस संकट की तुलना साल 2010 में हैती में आए 7.0 तीव्रता के भूकंप से कर रहे हैं, जिसके 16 साल बीत जाने के बाद भी हैती आज तक पूरी तरह उबर नहीं पाया है।विशेषज्ञों का मानना है कि इस भूकंप के कारण वेनेजुएला की जीडीपी को सीधे 2% से 20% तक का सीधा झटका लगेगा। जब तक वैश्विक समुदाय आगे आकर वेनेजुएला का कर्ज माफ या पुनर्गठित (Debt Restructuring) नहीं करता, बड़े पैमाने पर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहायता नहीं मिलती और देश में राजनीतिक स्थिरता नहीं रहती, तब तक वेनेजुएला को इस महा-संकट से पूरी तरह उबरने और पटरी पर लौटने में कम से कम 10 साल या उससे भी अधिक का समय लग सकता है।
नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (नाटो) के महासचिव मार्क रूटे ने ईरान के खिलाफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीति और कार्रवाई का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका के कदम ने ईरान को परमाणु हथियार क्षमता हासिल करने से रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। साथ ही, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रंप नाटो और ट्रांस-अटलांटिक गठबंधन के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।
जापान में 6.9 तीव्रता का भूकंप, वेनेजुएला में दोहरे झटकों से बढ़ी तबाही की आशंका
जापान और वेनेजुएला के कुछ हिस्से गुरुवार सुबह भूकंप के तेज झटकों से दहल गए। जापान के उत्तर-पूर्वी हिस्से में गुरुवार सुबह 6.9 तीव्रता का जबरदस्त भूकंप महसूस किया गया, जबकि वेनेजुएला में कुछ मिनटों के भीतर दो बड़े भूकंप आए।
वेनेजुएला में एक के बाद एक दो शक्तिशाली भूकंप आए, जिससे राजधानी काराकस में तेज झटके महसूस किए गए। वेनेजुएला में लगातार आए दो भूकंप ने भारी तबाही मचाई है। अधिकारियों ने पुष्टि की है कि कई लोगों की जानें गई हैं, लेकिन उन्होंने मरने वालों की आधिकारिक संख्या जारी नहीं की है। संयुक्त राज्य भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने अनुमान लगाया है कि जिस तीव्रता से भूकंप आया है, उसमें हजारों की संख्या में मौत का आंकड़ा सामने आ सकता है।
वेनेजुएला में कुदरत का भीषण तांडव, 7.5 तीव्रता के भूकंप से मची भारी तबाही
दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला से इस वक्त की बेहद दुखद और बड़ी खबर सामने आ रही है। वेनेजुएला में आज तड़के आए एक बेहद शक्तिशाली और विनाशकारी भूकंप ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई है। रिक्टर स्केल पर इस भूकंप की तीव्रता 7.5 मापी गई है, जो बेहद खतरनाक मानी जाती है। भूकंप के तेज और भीषण झटकों के कारण देश के कई हिस्सों में पल भर में गगनचुंबी इमारतें और रिहायशी मकान ताश के पत्तों की तरह जमींदोज हो गए हैं। अचानक आई इस प्राकृतिक आपदा के बाद पूरे देश में हाहाकार मच गया है और हजारों मौतों की गंभीर आशंका जताई जा रही है।पल भर में मलबे के ढेर में तब्दील हुए कई शहरचश्मदीदों और स्थानीय प्रशासन से मिल रही शुरुआती जानकारी के अनुसार, भूकंप के झटके इतने तेज थे कि लोगों को संभलने तक का मौका नहीं मिला। राजधानी काराकास सहित कई प्रमुख शहरों और कस्बों में सड़कें फट गई हैं, बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा है और बिजली-इंटरनेट जैसी जरूरी सेवाएं पूरी तरह ठप हो गई हैं। कई बहुमंजिला इमारतों के ढहने के कारण उनके मलबे के नीचे बड़ी संख्या में लोगों के दबे होने की खबर है, जिससे स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है।राहत और बचाव कार्य जारी, मलबे से अपनों को तलाश रहे लोगभूकंप की खबर मिलते ही स्थानीय आपदा प्रबंधन टीमें, सेना और राहत कर्मी युद्ध स्तर पर रेस्क्यू ऑपरेशन में जुट गए हैं। मलबे को हटाने और फंसे हुए लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए भारी मशीनरी का इस्तेमाल किया जा रहा है। अस्पतालों में इमरजेंसी घोषित कर दी गई है और घायलों के इलाज के लिए विशेष टीमें तैनात की गई हैं। हालांकि, प्रभावित इलाकों में बार-बार आ रहे आफ्टरशॉक्स (भूकंप के बाद के हल्के झटके) और बिजली गुल होने के कारण बचाव कार्य में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।भौगोलिक और लोकल स्तर पर नुकसान की भयावह स्थितिइस शक्तिशाली भूकंप का केंद्र जिस इलाके में था, वहां के स्थानीय गांवों और कस्बों में सबसे ज्यादा तबाही देखने को मिल रही है। पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन (Landslide) होने से कई संपर्क मार्ग पूरी तरह बंद हो गए हैं, जिससे दूरदराज के क्षेत्रों तक राहत सामग्री और मेडिकल टीमें पहुंचाना एक बड़ी चुनौती बन गया है। अंतरराष्ट्रीय संगठनों और पड़ोसी देशों ने भी इस संकट की घड़ी में वेनेजुएला की मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाए हैं और जल्द ही इंटरनेशनल रेस्क्यू टीमें भी वहां पहुंच सकती हैं।एआई और ग्लोबल सर्च पर दुनिया भर की नजरेंदुनिया भर के आधुनिक एआई सर्च इंजन और जनरेटिव प्लेटफॉर्म्स इस समय वेनेजुएला भूकंप से जुड़ी पल-पल की लाइव अपडेट्स और सुरक्षित ठिकानों की जानकारी यूजर्स तक पहुंचा रहे हैं। ग्लोबल एक्सपर्ट्स का कहना है कि 7.5 तीव्रता का भूकंप आना किसी भी देश के लिए बेहद विनाशकारी होता है। सरकार की ओर से नागरिकों को खुले मैदानों में रहने और जर्जर इमारतों से दूर रहने की सख्त हिदायत दी गई है। आने वाले कुछ घंटे वेनेजुएला के लिए बेहद नाजुक और चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं।
मोदी-पाशिन्यान वार्ता – भारत-आर्मेनिया रिश्तों को नई मजबूती
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आर्मेनिया के प्रधानमंत्री निकोल पाशिन्यान और उनकी पार्टी को संसदीय चुनावों में जीत की बधाई दी
7 फरवरी, 2026 की बात है। मणिपुर के उखरुल जिले के लिटान सरईखोंग गांव में एक नगा टीचर स्कूल से घर जा रहे थे। उन्होंने कुछ लड़कों को सड़क पर बैठकर शराब पीते देखा। टीचर ने स्कूल के पास शराब पीने से मना किया। आरोप है ये लड़के कुकी समुदाय से थे। उन्होंने टीचर को पीटा और धमकी दी कि जिंदा रहना है, तो उखरुल छोड़ दो। इस मारपीट ने जातीय रंग ले लिया। 8 और 9 फरवरी की रात भीड़ ने लिटान सरईखोंग के आसपास के नगा गांवों में 20 से ज्यादा घर जला दिए। माहौल बिगड़ता देख सरकार ने 10 फरवरी को उखरुल और कांगपोकपी जिलों में इंटरनेट सर्विस सस्पेंड कर दी। दोनों जिलों की सीमाओं पर अब भी सेना का पहरा है। मणिपुर में मई 2023 से मैतेई और कुकी समुदाय के बीच जातीय हिंसा शुरू हुई थी। बीते 3 साल में ज्यादातर वक्त हिंसा के बीच ही गुजरा। मणिपुर में राष्ट्रपति शासन हटने के बाद मैतेई-कुकी के बीच लड़ाई थम गई, लेकिन अब कुकी और नगा समुदायों के बीच शुरू हुई हिंसा ने राज्य में तीसरी दरार पैदा कर दी है। 4 महीने से मणिपुर फिर जल रहा है। फरवरी से जून तक 48 लोग किडनैप किए गए, 20 की हत्या कर दी और 50 से ज्यादा घर जला दिए गए। ऐसा ही डर 1992 में था, जब 5 साल चले संघर्ष में एक हजार लोग मारे गए थे। ‘कुकी पति को गाड़ी से उठा ले गए, 27वें दिन डेडबॉडी मिली’ 10 जून को कुकी-नगा समुदायों के बीच तनाव बढ़ गया, जब खारम वैफेई गांव के पास 6 नगा लोगों के अधकटे शव मिले। इन लोगों को 13 मई को कांगपोकपी से अगवा किया गया था। इनमें दिलीप थियूमई भी थे। दिलीप की पत्नी विनीलियू ने बताया, ‘मैं और दिलीप बच्चे के लिए दवा लेने कांगपोकपी बाजार गए थे। लौटते वक्त कुकी लोगों के ग्रुप ने हमारी गाड़ी रोक ली। उन्होंने सभी सवारियों को बाहर निकाला, आंखों पर पट्टी बांधी और अलग-अलग गाड़ियों में बैठाकर ले गए। अगले दिन सारी महिलाओं को छोड़ दिया, लेकिन पुरुषों को नहीं छोड़ा।' ‘मैंने बंदूक लिए लोगों से पति के बारे में पूछा, तो उन्होंने गुस्से में कहा कि तुम लोगों ने हमारे 3 पादरियों को मारा है। हम इसका बदला लेंगे। 26 दिन तक मेरे पति का कुछ पता नहीं चला। 10 जून को 6 शव मिले। हमें बॉडी की पहचान के लिए इंफाल अस्पताल बुलाया गया। लाशों पर हर जगह चोट के निशान थे। चेहरा पहचान में नहीं आ रहा था। मैंने कपड़ों से दिलीप की डेडबॉडी को पहचाना।’ जॉइंट ट्राइब्स काउंसिल (JTC) और यूनाइटेड नगा काउंसिल (UNC) मणिपुर में नगा समुदाय के सबसे बड़े संगठन हैं। हमने JTC के प्रमुख सदस्य मेराचाओ इंका से बात की। वे बताते हैं कि पुलिस ने 6 लोगों के शव सौंपे थे। हमारे भाइयों को बंधक बनाकर यातनाएं दी गईं। शव लेने से पहले हमने सरकार के सामने तीन मांगें रखी हैं। 1. अपहरण में शामिल लोगों, खासकर कुकी नेशनल फ्रंट के कैडर पर सख्त कार्रवाई हो, उन पर प्रतिबंध लगे। 2. महिला संगठन की प्रमुख लालबाई वैफेई और मणिपुर पुलिस के कर्मी थांग्गिलियन ने हमारे लोगों के अपहरण का आदेश दिया। उन्हें गिरफ्तार किया जाए। 3. मारे गए लोगों के परिवार को आर्थिक मदद मिले, उनके बच्चों की पढ़ाई फ्री की जाए। 1992 का कुकी-नगा टकराव याद आया, तब 1 हजार लोग मारे गए थे मणिपुर की आबादी में करीब 24% नगा हैं। ये ज्यादातर पहाड़ी जिलों उखरुल, सेनापति, चंदेल, तेंगनौपाल और तमेंगलोंग में बसे हैं। मैतेई-कुकी संघर्ष से ये समुदाय दूर ही रहा। शांति बहाली के बाद 4 फरवरी को मणिपुर में राष्ट्रपति शासन खत्म हुआ और नई सरकार बनी। युमनाम खेमचंद सिंह CM बने। तीन दिन बाद, यानी 7 फरवरी से मणिपुर में नगा-कुकी समुदायों के बीच हिंसा भड़क गई। असम राइफल्स से जुड़े सीनियर अधिकारी ने भास्कर को बताया, ‘बीते 40 दिनों में हुईं हिंसक घटनाओं को देखते हुए हमारी चिंता मैतेई-कुकी संघर्ष से हटकर नगा-कुकी की नई लड़ाई की तरफ मुड़ गई है।’ फ्रंटियर मणिपुर के संपादक धीरेन सदोकपम इस पर कहते हैं, ‘मणिपुर में नगा और कुकी के बीच संघर्ष का लंबा इतिहास रहा है। दोनों समुदायों के बीच आखिरी टकराव 1992 में हुआ था। ये 5 साल तक चला। लगभग 1 हजार लोग मारे गए थे। हजारों लोगों को बेघर होना पड़ा था। हिंसा नहीं रुकी, तो उससे भी बदतर हालात हो सकते हैं।’ वजह पूछने पर धीरेन कहते हैं, ‘बड़ी वजह स्थानीय घुसपैठ है। घाटी से विस्थापन के बाद कुकी समुदाय के कई लोग पहाड़ियों पर चले गए। वहां पहले से नगा बहुल गांव थे। कुकी के पास अपने ग्रुप और हथियार हैं। इससे पहाड़ों पर उनका प्रभाव बढ़ रहा है। ये देखकर नगा समुदाय में चिंता बढ़ गई है। इसलिए छोटे विवाद भी बड़े टकराव में बदलने लगे हैं।’ कुकी लीडर बोले- हमारे खाने की सप्लाई रोकी, नगा-मैतेई हालात और बिगाड़ेंगे कांगपोकपी जिले में बिगड़ते हालात पर कुकी लीडर महंगाई और खाने-पीने की किल्लत को बड़ा फैक्टर मानते हैं। एक लीडर ने पहचान उजागर न करने की शर्त पर बात की। वे बताते हैं कि कांगपोकपी और चुराचांदपुर में जरूरी चीजें बहुत महंगी हो गई हैं। गैस और पेट्रोल नहीं मिल रहा। गैस सिलेंडर 5 हजार रुपए तक बिक रहा है। तंगखुल समुदाय के लोगों ने कुकी इलाकों में जाने वाले खाने-पीने के सामान की सप्लाई रोक दी है। इससे लोगों को बहुत मुश्किल हो गई। उधर, कुकी स्टूडेंट ऑर्गेनाइजेशन के लीडर रूबोल मणिपुर के विवाद में नगा और मैतेई समुदाय के साथ होने का दावा करते हैं। वे कहते हैं- दोनों समुदाय पहले से मिले हुए हैं। नगा और मैतेई की वजह से हालात और खराब हो सकते हैं। हम अपना बचाव करके चल रहे हैं। सरकार से मदद की उम्मीद है, लेकिन अब तक हमारे लिए कुछ किया नहीं गया। नगा समुदाय का आरोप है कि सुरक्षाबल कुकी लोगों को बचा रहे हैं? रूबोल जवाब देते हैं, ’ सेना किसी एक का पक्ष नहीं ले रही। वो बस बीच-बचाव करने की कोशिश कर रही है। हमें सुरक्षा बलों से ही रिपोर्ट मिली है कि खोपूम घाटी में 200 से 300 लोग कुकी इलाकों पर हमला करने की तैयारी में हैं।’ अब तक 10 गिरफ्तारी, कांगपोकपी, इंफाल और चुराचांदपुर में NIA एक्टिव कुकी-नगा समुदायों के बीच हिंसा पर मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह ने यूनाइटेड नागा काउंसिल और कुकी समुदाय के डेलिगेशन के साथ बैठक की। उन्होंने 6 नगा और मई 2026 में कांगपोकपी में 3 पादरियों की हत्या की जांच NIA को सौंपी दी। उखरुल और कांगपोकपी जिलों में सेना के सर्च ऑपरेशन का हिस्सा रहे CRPF के सीनियर अधिकारी कहते हैं, ‘डेडबॉडी मिलने के बाद मणिपुर पुलिस, असम राइफल्स और CRPF ने कांगपोकपी, इंफाल और चुराचांदपुर में जॉइंट ऑपरेशन चलाया। 10 लोगों को गिरफ्तार किया गया है।’ NIA के मुताबिक, ये गिरफ्तारियां इंफाल ईस्ट, इंफाल वेस्ट, बिष्णुपुर, चुराचांदपुर, उखरुल, चंदेल और फेरजॉल जिलों से की गई हैं। नवंबर 2024 में जिरीबाम में एक महिला की हत्या, जून 2024 में इंफाल से जिरीबाम जाते समय पूर्व CM एन बीरेन सिंह के काफिले पर हमले और नवंबर 2023 में उखरुल में बैंक डकैती के मामले में भी अरेस्टिंग की गई है। ये रिपोर्ट भी पढ़ें10 मंदिर उड़ाने की धमकी, कौन है खालिस्तान नेशनल आर्मी 4 जून की सुबह 9:54 बजे पंचकूला के मेयर श्यामलाल बंसल को धमकी भरा ई-मेल मिला। इसमें दिल्ली-हरियाणा के 6 बड़े मंदिरों में ब्लास्ट करने की धमकी थी। मेल मिलते ही लोकल पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट हो गईं। डॉग स्क्वाड और एंटी-बम स्क्वाड बुलाई गईं। मंदिर खाली कराए गए, लेकिन कुछ नहीं मिला। जांच आगे बढ़ी, तो पता चला कि धमकी के पीछे पाकिस्तान में एक्टिव खालिस्तान नेशनल आर्मी है। पढ़ें पूरी खबर…
आज ब्लैकबोर्ड में कहानी ऐसे पति-पत्नी की जिनकी दो बेटियां हैं। इन्होंने एकबार फिर मां-बाप बनने का फैसला किया, लेकिन उम्र आड़े आ गई। डॉक्टर ने सलाह दी- ‘IVF आजमाइए।’ डॉक्टर ने पत्नी के एग्स और पति के स्पर्म को लैब में फर्टिलाइज करके भ्रूण को गर्भाशय में ट्रांसफर कर दिया। रोजाना दर्जनों गोलियां और कैप्सूल खाए। दोनों जांघों पर सैकड़ों इंजेक्शन लगे। आखिरकार 9 महीने तकलीफ झेलने के बाद इनके घर जुड़वां बच्चियों ने जन्म लिया। सब बहुत खुश थे, लेकिन रिश्तेदार सवाल उठाने लगे कि इनकी शक्ल-सूरत मां-बाप से काफी अलग है। जब कई लोगों ने बार-बार ये कहा तो पति को शक हुआ- कहीं IVF में गड़बड़ तो नहीं कर दी गई। उसने बच्चियों का डीएनए टेस्ट करवा लिया। आखिर वही हुआ जिसका उन्हें शक था। बच्चियों का डीएनए न तो मां से मैच हुआ न पिता से। अस्पताल में भ्रूण बदल दिए गए। अब मां ने इन्हें 9 महीने अपनी कोख में रखा है इसलिए बच्चों से लगाव तो हैं, लेकिन इससे भी ज्यादा चिंता इस बात की है कि उनके अपने बच्चे कहां हैं।’ ये कहानी है गुड़गांव में रहने वाले मीनू और राहुल राठौर की। सुबह के 10 बजे हैं। गुड़गांव के पालम विहार की सड़कों पर धूप ऐसी चुभ रही है कि मानो दोपहर के 12 बजे हों। आसमान छू रही इमारत के एक चमकते फ्लैट में रहते हैं मीनू और राहुल राठौर। बिल्डिंग के गेट पर पहुंचते ही मैंने राहुल को फोन किया। वो बोले- आप सोसाइटी के क्लब हाउस में हमारा इंतजार करिए। सॉरी, हम आपको घर नहीं बुला सकते। हमारे घर का माहौल ठीक नहीं है ना। कुछ ही देर में धीमें कदमों से दोनों क्लब हाउस आ गए। सबसे पहले नजर मीनू पर पड़ी। मुझे देखते ही वो बेमन मुस्कुराई। चेहरे पर नई मां वाली थकान साफ झलक रही है। राहुल ने उन्हें सहारा देकर कुर्सी पर बैठाया। दोनों का चेहरा भी इतना मायूस, मानो सबकुछ खो गया हो। राहुल के चेहरे से ये साफ है कि कई रातों से सोए नहीं हैं। मैं कुछ पूछती उससे पहले ही वो हाथ जोड़कर कहने लगे- ‘हमारी मदद कर दीजिए, प्लीज। कोई तो तरीका होगा, जिससे हम अपने बच्चों तक पहुंच पाएं। मुझे बस इतना पता चल जाए कि वो ठीक हैं और सही हाथों में हैं। इतनी बड़ी दुनिया में हम अपने बच्चे कैसे तलाशें, कहां तलाशें। पुलिस, अदालत, हेल्थ डिपार्टमेंट, कहीं सुनवाई नहीं हो रही है।’ ये कहते हुए दोनों सुबकने लगे। खुद को संभालते हुए डबडबाई आंखों से मीनू कहती हैं, ‘मुझे बड़ा परिवार पसंद है। इसलिए दो बेटियां होने के बाद, 39 साल की उम्र में मैंने एकबार फिर मां बनने का फैसला किया। दोनों बेटियों के बीच 10 साल का फर्क है। मुझे लगता था कि दुनिया में मां बनना सबसे अच्छी चीज है। नौ महीने तक बच्चे को कोख में रखने का जो अहसास होता है न, उस खुशी की बराबरी किसी चीज से नहीं की जा सकती। जिस दिन से कंसीव किया, उस दिन से मैं केवल शबद, रामायण और गीता का पाठ करती थी। मां बनने की खुशी इतनी ज्यादा थी कि IVF की तकलीफ भी आसानी से झेल रही थी। दरअसल, IVF शुरू करने से पहले क्लीनिक वाले ये कभी नहीं बताते कि प्रोसेस कितना तकलीफदेह है। बस यही बोलते हैं कि शुरुआत के 10-11 दिन परेशानी होगी। बच्चे की खुशी में हर कोई इंजेक्शन लगवाने की तकलीफ 10 से 11 दिन तक हंसकर झेल जाता है। जब 11 दिन के बाद आपके एग्स कलेक्ट किए जाते हैं तो प्रक्रिया और तकलीफ वाली हो जाती है। इसके बाद आप पीछे भी नहीं हट सकते हैं। कई बार तो मेरी तकलीफ देखकर राहुल ने ये तक कह दिया था कि पता नहीं, क्यों हमने IVF का फैसला लिया। मीनू बताती हैं- ‘हर दिन मैं किलो के हिसाब से दवाएं खाती थी। लगातार 4 महीने तक जांघों पर इंजेक्शन लगे। एक दिन दो, फिर अगले दिन तीन, फिर उसके बाद चार। जांघों में थक्के जम गए थे, खाल नीली पड़ गई थी। इतनी बुरी हालत थी कि नर्स कह देती थी, आइसिंग करो ताकि इंजेक्शन लगाने के लिए मसल्स मिल सके। प्रेग्नेंसी के दौरान मैं न तो बैठ सकती थी और न ही चल सकती थी। जिस दिन कमर पर इंजेक्शन लगते, पीठ दर्द के मारे अकड़ जाती। शरीर सुन्न हो जाता था। ये सब सहन करके भी मैं खुश थी, सिर्फ अपने बच्चों के लिए।’ मीनू की आंखों से आंसू भरभराकर बहने लगते हैं। वो राहुल का हाथ पकड़ कर कहती हैं- डिलीवरी का तीसरा दिन था। मैं बेड पर लेटी थी और परिवार के बाकी लोग सोफे पर बैठकर बात कर रहे थे। अचानक मेरे कानों में आवाज आई कि बच्चों का डीएनए होना है। सुनते ही मैं बेहोश हो गई, ICU पहुंच गई। मुझे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि परिवार ने यह फैसला क्यों लिया। दरअसल, छोटी बेटी को देखते ही मेरी ननद को शक हो गया था। उन्हें लगा कि उसके नैन-नक्श परिवार से मिलते नहीं। हालांकि राहुल ने कहा कि ऐसा नहीं है। फिर ननद ने राहुल और मेरी दोनों बड़ी बेटियों की फोटो से बच्चियों की शक्ल मिलाई। सच में वो बच्चियां थोड़ा अलग दिख रही थीं। फिर सभी ने डीएनए टेस्ट का फैसला लिया। मीनू कहती हैं कि पहली रिपोर्ट में पिता के साथ डीएनए मैच नहीं हुआ। दूसरे दिन जो रिपोर्ट आई उसमें मेरे साथ भी मैच नहीं हुआ। रोते हुए वह कहती हैं कि अगर मेरे अकेले के साथ डीएनए मैच हो जाता, तो वो मेरी आखिरी सांस होती। अस्पताल से डिस्चार्ज होकर घर पहुंची तो एंग्जाइटी होने लगी। घबराहट में दौरे आने लगे। बीस दिन तक मैं बेहोशी की हालत में थी। मुझे केवल परिवार का तनाव दिख रहा था। अपना दर्द बताने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं, नर्क भोगा है हमने। मेरा दिमाग सुन्न हो चुका था। ट्रॉमा की वजह से दूध आना बंद हो गया था। बच्चों ने मां का दूध तक नहीं पीया।’ मीनू कहती हैं- ‘मेरी हालत देखकर भांजी चक्कर खाकर गिर गई। परिवार की ऐसी हालत देखकर मैं पत्थर बन गई। आसान नहीं था अपनी आंखों के सामने परिवार को तड़पते और रोते हुए देखना। आज भी यही हालत है। कोई एक फैमिली मेंबर बच्चों को संभालता है, फिर थकान का बहाना बनाकर बच्चा किसी दूसरे को दे देता। खुद बाहर जाकर रोता है, फिर नॉर्मल होकर अंदर आता है। हम लोग बाथरूम में छिपकर रोते हैं। सब रोते हैं, लेकिन एक दूसरे से सूजी हुई आंखे छिपाते हैं।’ राहुल बताते हैं- ‘14 जनवरी 2026 को हमें पता लगा कि बच्चों का डीएनए हम दोनों से मैच नहीं हुआ। तब से लेकर आज तक मैं परिवार संभाल रहा हूं, नए बच्चों को भी देख रहा हूं। उन्हें उनके हिस्से का प्यार देता हूं। मेरी मां अंदर से टूट गई हैं। पापा एकदम चुप हो गए हैं। मीनू और मेरी बहनों का रो-रोकर बुरा हाल है। 12 भाई बहनों में मैं सबसे छोटा हूं। आज तक सभी मुझे छोटा बच्चा ही समझते हैं। पहली बार लग रहा है कि मैं बड़ा हो गया हूं। नर्क दिखा दिया इस सिस्टम ने हमें। पहले तीन महीने पुलिस स्टेशनों के चक्कर लगाते रहे। फिर एंटी ह्युमन ट्रैफिकिंग डिपार्टमेंट, अदालत, मानवाधिकार, महिला और बाल आयोग सब जगह गए, लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं। यहां तक कि 4 जून को अदालत ने पुलिस को जांच करने और बहुत सारे डॉक्यूमेंट्स सीज करने के लिए कह दिया है। फिर भी कोई टस से मस नहीं हो रहा है। हमें पैसे ऑफर किए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि आपके एंब्रियो बनाकर मल्टीपल लड़कियों में इम्प्लांट कर देंगे। ये तो बच्चों की तस्करी है। बार-बार हाथ जोड़कर, आंसू पोंछ कर बस इतना कहते हैं, हमें इतना पता लग जाए कि हमारे बच्चे किसके पास हैं। बात करते हुए राहुल कांपने लगते हैं। कहते हैं कि कल की ही खबर है कि दिल्ली में डॉक्टर बच्चे बेच रहे हैं। अपने बच्चों का ख्याल आता है तो रूह कांप जाती है। घर में चीख पुकार, रोना धोना देखकर थक चुका हूं। हम इतने बदनसीब हैं कि बच्चों के बारे में पता नहीं लगा तो तड़प-तड़प कर मर जाएंगे। न जाने हमारे बच्चे किस हालात में होंगे। यही सोच-सोच कर जान निकल जाएगी। जिंदगी में पहली बार पुलिस स्टेशन, अदालत देखी है। जब तक अपने बच्चों को अपनी आंखों से देख नहीं लेता, तब तक न थकूंगा, न रूकूंगा। इन्हें बताना होगा कि कि मेरे बच्चे कहां है। मैं तनाव में नए बच्चों के साथ वक्त तक नहीं गुजार पा रहा हूं। क्योंकि यह सिस्टम क्रिमिनल है। सुबह मीडिया, पुलिस स्टेशन, रात को घर आता हूं। छह महीने से हम लड़ रहे हैं। यही किसी बड़े नेता के बच्चे होते तो सिस्टम रातों-रात बदल जाता। राहुल कहते हैं कि- मीनू ने 9 महीने बच्चियों को कोख में पाला है। हम उन्हें अपने बच्चे जैसा ही प्यार करते हैं। पूरा परिवार इनके साथ खेलता है। हर महीने इनका जन्मदिन मनाया जाता है। परियों की तरह इन्हें सजाते हैं। हम वो सब कर रहे हैं, जो अपने बच्चे के लिए सोचा था। रात-रात भर इन्हें गोद में लेकर घूमते हैं। बच्चों को उनके हर रिश्ते का प्यार मिल रहा है, जिसके वे हकदार हैं। मेरी मां ने सख्त हिदायत दी है कि इन बच्चों के लिए तुम्हारे प्यार में जरा भी फर्क नहीं आना चाहिए। प्यार बेशक ज्यादा हो जाए, लेकिन कम नहीं होना चाहिए। एक बेटी का नाम चित्रांगदा और दूसरी का दिव्यांगदा रखा है। राहुल कहते हैं कि जब तक इन बच्चियों के मम्मी-पापा नहीं मिल जाते हम ही इनके सबकुछ हैं। कन्यादान तक इनके माता-पिता लेने आते हैं तो हम इन्हें जाने देंगे। नहीं तो मैं इन दोनों को इतना पढ़ाउंगा कि दुनिया देखेगी। मैं चाहता हूं, मेरे बच्चे भी मिल जाएं और मैं इन्हें भी रखूं। मैं सभी को रख लूंगा। आखिरी में मीनू ये कहते हुए कुर्सी से उठकर चली जाती हैं कि मैम, हमारी मदद कोई नहीं कर रहा है। हमारे बच्चे ढूंढ दो। सारे कागजात बदले जा रहे हैं। सारा सिस्टम अस्पताल को बचाने में लगा है। इस बारे में हॉस्पिटल मालिक डॉ. शिवानी सचदेव से बात करने की कोशिश की गई। मैसेज भी किया गया, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। साउथ दिल्ली के डीसीपी अनंत मित्तल ने बताया कि पुलिस इस मामले की जांच कर रही है। जांच प्रभावित न हो, इसलिए ज्यादा जानकारी साझा नहीं कर सकते। नोट- दोनों बच्चियों का नाम बदला हुआ है। -------------------------------- 1- ब्लैकबोर्ड- तानों से परेशान होकर ब्रेस्ट इम्प्लांट करवाया:ऑडिशन वाले कहते थे- तुम्हारा फिगर ठीक नहीं, अब आधी कमाई सर्जरी की EMI में जा रही एकबार मैं ऑडिशन के लिए गई थी। वहां मुझे ट्रायल के लिए एक बिकिनी दी गई। 10-15 मर्दों के सामने जैसे ही बिकिनी पहनकर बाहर आई, तो सब हंसने लगे। कहने लगे- 'अरे मैडम, ये सब आपके लिए नहीं है। आप तो एकदम फ्लैट हैं।' पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- ब्लैकबोर्ड- भाई का अपहरण किया, जिससे जिंदा साबित हो जाऊं: सिंदूर लगाने वाली पत्नी विधवा पेंशन मांगने पहुंची, लेकिन मुझे जिंदा नहीं माना साल 1975। लाल बिहारी 20 साल के थे। शादी के 10 साल बाद अभी-अभी गौना हुआ था और पत्नी घर आई थी। मां ने कहा- गांव की जमीन गिरवी रखकर बैंक से कुछ लोन ले लो। अपना काम-धंधा शुरू करो, वर्ना आगे बाल-बच्चों को कैसे पालोगे? पूरी स्टोरी यहां पढ़ें
प्रतिबंध खत्म करके और वादों को पूरा करने के बाद ही तय होगी परमाणु मुद्दे की दिशा: गरीबाबादी
ईरान ने अपने परमाणु ठिकानों को लेकर रुख स्पष्ट करते हुए बताया कि अंतिम समझौते और दूसरे पक्ष के ठोस कदमों के बाद ही परमाणु केंद्रों तक पहुंच तय की जाएगी।
ईरान शांति वार्ता: कतर और पाकिस्तान की भूमिका पर अमेरिका में उठे सवाल, सीनेटरों ने जताई चिंता
अमेरिकी रिपब्लिकन पार्टी के दो सीनेटरों ने ईरान के साथ युद्धविराम बातचीत में कतर और पाकिस्तान की मध्यस्थ भूमिका पर सवाल उठाए
पाकिस्तान: बलूच कार्यकर्ताओं को उम्रकैद की सजा के विरोध में बलूचिस्तान बंद
बलूच यकजेहती कमेटी (बीवाईसी) की नेता माहरंग बलूच समेत कार्यकर्ताओं को उम्रकैद की सजा के विरोध में बुधवार को बलूचिस्तान के कई इलाकों को पूरी तरह बंद रखा गया
पुणे शहर से 64 किमी दूर लोहागढ़ किला। 18 जून 2026 की सुबह करीब 10 बजे किले की चोटी से एक चीख गूंजी। गार्ड्स पहुंचे, तो वहां मौजूद 20 साल की सिया ने बताया- मेरा मंगेतर केतन फिसलकर खाई में गिर गया है। सिया ने ही घरवालों को भी फोन किया। अगले दिन इंस्टाग्राम पर लिखा- ‘केतन तुम मुझे मेरे जन्मदिन पर अकेला छोड़ गए। वापस आ जाओ।’ अब पुणे पुलिस ने खुलासा किया है कि केतन की मौत कोई हादसा नहीं, मर्डर था। इसे खुद सिया ने अपने बॉयफ्रेंड के साथ मिलकर अंजाम दिया, क्योंकि वो शादी नहीं करना चाहती थी। आज के एक्सप्लेनर में इस केस की सभी बिखरी कड़ियां जोड़ेंगे, साथ ही जानेंगे कि सिया ने शादी से मना करने की जगह सीधे हत्या क्यों कर दी… पुणे पुलिस को घटना के अगले दिन, यानी 19 जून को 340 फीट गहरी खाई से केतन का शव मिला। लोनावला ग्रामीण पुलिस स्टेशन में एक्सीडेंटल डेथ की रिपोर्ट दर्ज की गई। 20 जून को केतन का अंतिम संस्कार हो गया, लेकिन आगे के घटनाक्रम में पुलिस को 4 बड़े सुराग मिले… पहला सुरागः सिया के हावभाव से केतन की बहन को शक हुआ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 21 जून को सिया केतन के घर पहुंची। केतन की बहन ने पूछा- केतन कैसे गिरा? इस सवाल पर सिया के हावभाव अचानक बदल गए। वो ठीक से जवाब नहीं दे पा रही थी। केतन की बहन को शक हुआ और उसने पिता विशाल अग्रवाल से कहा- भाई अच्छा ट्रेकर है, उसकी मौत एक्सीडेंट नहीं हो सकती। सिया ठीक से जवाब नहीं दे रही। विशाल को भी पहले से शक था कि कुछ तो ठीक नहीं है। इसके बाद विशाल दोबारा पुणे पुलिस से मिले और सिया पर शक जताया। उन्होंने ये भी कहा कि सिया किसी लड़के से बात करती है, उसकी भी जांच की जानी चाहिए। दूसरा सुरागः किले के CCTV फुटेज में गर्मी में हुडी पहने लड़का दिखा पुलिस ने लोहागढ़ किले के सीसीटीवी फुटेज निकाले। इनमें 18 जून के दिन वहां पहुंचे केतन और सिया के आसपास कई बार एक शख्स दिखा। गर्मी का मौसम, ऊपर से किले की चढ़ाई, उसके बावजूद किले की सीढ़ियों के फुटेज में दिखा कि वो हुडी पहने था। पुलिस के मुताबिक, लड़का अपना चेहरा छिपाने की कोशिश कर रहा था। तीसरा सुरागः सिया की एक नंबर पर 2000 से ज्यादा कॉल्स पुलिस ने सिया के कॉल-रिकॉर्ड खंगाले। इनमें एक मोबाइल नंबर पर जनवरी से केतन की हत्या वाले दिन सुबह 7 बजे तक सिया ने 2004 कॉल में करीब 338 घंटे की बातचीत की थी। यानी दोनों रोजाना करीब 11 कॉल्स में 2 घंटे बात करते थे। ये नंबर पुणे के ही एक और व्यापारी परिवार के लड़के चेतन चौधरी का था। चेतन का घर पुणे के उसी इलाके में था, जहां सिया के पिता का ऑफिस है। चौथा सुरागः हत्या वाले दिन चेतन का इंटरनेट पूरे दिन बंद पुलिस को शक था कि किले के CCTV फुटेज में हुडी वाला लड़का चेतन है। हालांकि 18 जून के दिन चेतन के फोन की लोकेशन निकाली गई, तो वो पुणे में उसके ऑफिस की मिली। चेतन के फोन रिकॉर्ड में पुलिस को एक और अजीब चीज मिली। 18 जून को उसके फोन पर कॉल्स तो आ रहे थे, लेकिन उसका इंटरनेट पूरे दिन बंद था। पुलिस पूछताछ के लिए चेतन के ऑफिस पहुंची, तो उसने कहा कि 18 जून को वो ऑफिस में ही था। हालांकि पूछताछ में ऑफिस के एक कमर्चारी ने बताया कि चेतन 18 जून को उसका फोन लेकर गया था। इस नंबर की लोकेशन खंगाली गई, तो पता चला 18 जून को कर्मचारी वाला फोन लोहागढ़ किले में ही था। इससे तस्वीर साफ होने लगी। 22 जून को पुलिस ने चेतन को गिरफ्तार कर लिया। अगले दिन सिया को भी गिरफ्तार कर लिया। पुलिस के मुताबिक, पूछताछ के बाद दोनों ने अपना जुर्म कबूल लिया। पुलिस और केतन के पिता विशाल अग्रवाल के मुताबिक, सिया ने 18 जून के पहले भी दो बार केतन को पहाड़ी पर ले जाकर उसकी हत्या करने का प्लान बनाया था। तीसरी बार में वो कामयाब हो गई। ये पूरी कहानी 11 फरवरी 2026 को केतन और सिया की सगाई के बाद शुरू हुई… 31 मई: सिया को केतन की हत्या का प्लान सूझा 5 जून: किले पर जाने की जिद की, केतन नहीं गया 14 जून: दूसरी कोशिश, धक्का दिया, लेकिन केतन बच गया 18 जून: तीसरी कोशिश में बॉयफ्रेंड के साथ मिलकर धक्का दे दिया पुलिस के मुताबिक, केतन की हत्या के पीछे सिया का मोटिव उससे शादी से बचना था। दरअसल, विशाल अग्रवाल की पुणे में ‘सक्सेस ग्रुप’ नाम से रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन कंपनी है। केतन ने 2023 में अमेरिका के बैबसन कॉलेज से एंटरप्रेन्योरियल स्टडीज में 'मास्टर ऑफ साइंस' किया। उसके बाद सक्सेस ग्रुप में डायरेक्टर के बतौर काम शुरू कर दिया। वहीं सिया कॉमर्स की स्टूडेंट है। पिता पुणे के बड़े मसाला कारोबारी हैं। सिया और केतन के पिता 35 साल से एक-दूसरे को जानते थे। इसलिए दोनों परिवारों ने केतन और सिया की शादी तय कर दी। 11 फरवरी को सगाई हुई और 25 नवंबर को जयपुर के एक पैलेस में 17 करोड़ रुपए के खर्च से दोनों की शादी होनी थी। दोनों परिवारों के पहुंचने के लिए 2 चार्टर्ड प्लेन भी बुक थे। इधर सिया 4 साल से चेतन के संपर्क में थी। चेतन के पिता बाबू लाल चौधरी भी पुणे के बड़े कारोबारी हैं। संदीप सिंह गिल के मुताबिक, दोनों के बीच एक साल से प्रेम संबंध था। इसलिए सिया केतन के साथ शादी से बचना चाहती थी। इसी पैटर्न पर पिछले दिनों 2 और हत्याएं भी हुईं... पार्टनर से पीछा छुड़ाने के लिए सीधे हत्या पर आमादा हो जाने का ये पैटर्न जितना सीधा दिखता है, उतना है नहीं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इसके पीछे 3 अहम साइकोलॉजिकल वजहें हैं… 1. कोई और आसान रास्ता न दिखना: दिल्ली के सर गंगाराम हॉस्पिटल की कंसल्टेंट साइकोलॉजिस्ट डॉ. रोमा कहती हैं कि समाज में समग्र रूप से आपराधिकता बढ़ रही है। युवा बिना परिणाम सोचे एक घातक प्लान बना लेते हैं। उन्हें लगता है कि यही अकेला और आसान रास्ता है। अपने तय टारगेट्स को पूरा करने के लिए वो सही-गलत सोचे बिना अपराध कर जाते हैं। क्राइम के समय वो खुद को सेफ करने का प्लान तो बनाते हैं, लेकिन ये नहीं सोचते कि वो दूसरे का भी बुरा कर रहे हैं। 2. पुराना और अनसुलझा ट्रॉमा: दिल्ली के मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट राशि सहाय के मुताबिक, ‘ऐसी हत्याएं अक्सर किसी पुराने अनसुलझे ट्रॉमा, यानी मानसिक आघात, किसी अधूरी भावनात्मक जरूरत के लिए या खुद की वैल्यू और पहचान न होने की सोच के चलते होती हैं। ये सोच अचानक नहीं, धीरे-धीरे पनपती है।’ 3. तुरंत सजा देने का इरादा: क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. कृति भार्गव के मुताबिक, लोगों को लगता है कि वे हत्या करके अपने दुश्मन को तुरंत सजा दे रहे हैं और इससे उन्हें तुरंत संतुष्टि मिल जाएगी। हिंसा से दूर रहने के लिए इमोशनल मैच्योरिटी की जरूरत होती है और ज्यादातर लोगों में ये नहीं होती। डॉ. कृति भार्गव के मुताबिक, ‘महिलाओं और पुरुषों में हत्या के मोटिव अलग हो सकते हैं। हमेशा नहीं लेकिन आमतौर पर पुरुष ताकत दिखाने, हक जताने या अपमान का बदला लेने के लिए हत्या करते हैं। वहीं महिलाएं खतरा महसूस होने पर, हताश होने पर या लंबे समय से अत्याचार सहने पर हत्याएं करती हैं।’ --------- ये खबर भी पढ़िए… CM विजय, गृहमंत्री शाह से मुलाकात, सैन्य कमांड का दौरा; ट्रम्प के दूत सर्जियो गोर आखिर भारत में कर क्या रहे हैं अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर 22 जून को तमिलनाडु के सीएम विजय थलापति से मिलने चेन्नई पहुंच गए। उससे 4 दिन पहले, 18 जून को गृहमंत्री अमित शाह से दिल्ली में मुलाकात की। 6 महीने में 6 मुख्यमंत्रियों से मिले। दिल्ली के उपराज्यपाल और राजस्थान की डिप्टी सीएम तक से मीटिंग की। भारतीय सेना के पश्चिमी कमान हेडक्वार्टर के दौरे पर तो हंगामा भी हुआ था। पूरी खबर पढ़िए…
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि वार्ता के दौरान ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम से संबंधित जांच के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनिश्चितकाल तक निरीक्षण की अनुमति देने पर सहमति जताई है। उनके अनुसार, यह समझौता क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
यूएन महासचिव ने कहा, AI कंपनियां दें बिजली, पानी और जमीन का हिसाब
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेष ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंपनियों से अपने कार्बन उत्सर्जन से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करने की अपील की है
ट्रंप का दावा, ईरान ने परमाणु हथियार न बनाने पर दी सहमति
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान परमाणु हथियार न बनाने पर सहमत हो गया है
हंगरी में भारत के राजदूत अंशुमन गौर ने मंगलवार को वहां की राष्ट्रीय संसद (नेशनल असेंबली) की स्पीकर एग्नेस फॉर्स्टहोफर से मुलाकात की
निर्मला सीतारमण और अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल की अहम बैठक, आर्थिक सहयोग बढ़ाने पर जोर
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने नई दिल्ली में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर के नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात कर द्विपक्षीय व्यापार, निवेश और नए विकास अवसरों पर चर्चा की।
लेबनान से नहीं हटेंगे इजरायली सैनिक, अमेरिका-ईरान शांति समझौते से इजरायल को किस बात का डर
पश्चिम एशिया में शांति की बहाली के लिए अमेरिका और ईरान के बीच हुए नए समझौते ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को गहरी चिंता में डाल दिया है। हाल ही में हुए 14-सूत्रीय समझौते (MoU) के बाद जहां दुनिया उम्मीद कर रही है कि तनाव कम होगा, वहीं इजरायल को लग रहा है कि यह समझौता लेबनान में ईरान और उसके सहयोगी हिजबुल्लाह को नई ताकत दे सकता है। इसी आशंका के चलते नेतन्याहू ने स्पष्ट कर दिया है कि इजरायली सेना तब तक दक्षिणी लेबनान से नहीं हटेगी जब तक उन्हें अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए वहां मौजूदगी जरूरी महसूस होगी।क्या है विवाद की जड़?फरवरी 2026 में अमेरिका-इजरायल के संयुक्त हमलों के साथ शुरू हुआ यह संघर्ष अब एक नए कूटनीतिक मोड़ पर है। अमेरिका और ईरान के बीच हुए ताजा समझौता ज्ञापन (MoU) में युद्ध को स्थायी रूप से खत्म करने और लेबनान की क्षेत्रीय अखंडता सुनिश्चित करने की बात कही गई है। हालांकि, इजरायल इसे एक खतरे के रूप में देख रहा है। इजरायली सरकार को शक है कि इस समझौते की आड़ में वाशिंगटन लेबनान में ईरान के प्रभाव को अनजाने में मजबूत कर रहा है, जो भविष्य में इजरायल की सुरक्षा के लिए घातक हो सकता है।इजरायल को सता रहा है इन तीन बड़े खतरों का डरइजरायली रणनीतिकारों और सरकारी सूत्रों का मानना है कि यह समझौता इजरायल की सैन्य क्षमता को सीमित कर सकता है:सैन्य कार्रवाई पर लगाम: अब तक इजरायल हिजबुल्लाह के ठिकानों पर जब चाहे हमला करने को स्वतंत्र था। उन्हें डर है कि अब वाशिंगटन हर हमले पर आपत्ति दर्ज कराएगा और इजरायल की 'ऑपरेशनल फ्रीडम' खत्म हो जाएगी।सैनिकों की वापसी का दबाव: ऐसी रिपोर्ट्स हैं कि ट्रंप प्रशासन इजरायल पर दक्षिणी लेबनान से अपनी सेना हटाने का दबाव बना सकता है, जिसे नेतन्याहू मानने को तैयार नहीं हैं।हिजबुल्लाह को संजीवनी: इजरायल का मानना है कि यह समझौता हिजबुल्लाह के खिलाफ जारी संयुक्त प्रयासों को कमजोर कर रहा है, जिससे आतंकी संगठन को फिर से संगठित होने का मौका मिल सकता है।'बीबी' की बढ़ती बेचैनीसूत्रों के मुताबिक, नेतन्याहू—जिन्हें इजरायल में प्यार से 'बीबी' कहा जाता है—इस समझौते को लेकर बेहद परेशान हैं। इजरायल का तर्क है कि इस अंतरिम समझौते में ईरान के परमाणु कार्यक्रम से ज्यादा खतरनाक 'लेबनान वाला हिस्सा' है। इजरायली सरकार का मानना है कि अमेरिका और ईरान की यह नजदीकी न केवल सुरक्षा संतुलन को बिगाड़ रही है, बल्कि इससे इजरायल की भविष्य की सुरक्षा रणनीति भी दांव पर लग गई है। अब देखना यह है कि क्या ट्रंप प्रशासन इजरायल के इन संदेहों को दूर कर पाएगा या नेतन्याहू अपनी सुरक्षा नीतियों पर अडिग रहेंगे।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की बढ़ती रफ्तार ने दुनिया भर की सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। दुनिया के पांच सबसे शक्तिशाली देशों के इंटेलिजेंस गठबंधन 'फाइव आइज' (Five Eyes) ने एक साझा बयान जारी कर चेतावनी दी है कि अगली पीढ़ी के AI सिस्टम साइबर सुरक्षा के पूरे परिदृश्य को सालों के बजाय महज कुछ महीनों में बदलकर रख देंगे। यह गठबंधन ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड, यूके और अमेरिका की खुफिया एजेंसियों का समूह है, जिसने सरकारों और निजी कंपनियों को 'साइबर रेजिलिएंस' को तुरंत प्राथमिकता देने की नसीहत दी है।'फ्रंटियर AI' का बढ़ता हुआ आक्रामक रुखफाइव आइज इंटेलिजेंस ओवरसाइट एंड रिव्यू काउंसिल (FIORC) ने अपने बयान में किसी विशेष कंपनी का नाम तो नहीं लिया, लेकिन 'फ्रंटियर AI सिस्टम्स' को लेकर आगाह किया है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ये नए AI मॉडल न केवल साइबर हमलों की रफ्तार और दायरे को बढ़ा रहे हैं, बल्कि उनकी जटिलता को भी एक अलग स्तर पर ले गए हैं। बयान के मुताबिक, AI अब किसी भी सॉफ्टवेयर या नेटवर्क में मौजूद कमजोरियों (Vulnerabilities) को खोजने और उसका फायदा उठाने के बीच के समय (Time-to-exploit) को तेजी से कम कर रहा है।साइबर खतरा अब सिर्फ 'तकनीकी समस्या' नहींखुफिया एजेंसियों ने साफ कहा है कि साइबर जोखिमों को अब केवल एक तकनीकी या आईटी विभाग की समस्या मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। यह अब सीधे तौर पर 'कॉर्पोरेट रिस्क' और शीर्ष नेतृत्व (Leadership) की जिम्मेदारी बन चुकी है। बयान में स्पष्ट किया गया है कि:AI पहले से ही मौजूद है: यह भविष्य की तकनीक नहीं, बल्कि वर्तमान की हकीकत है।लीडरशिप की भूमिका: बोर्ड के सदस्यों और वरिष्ठ अधिकारियों को साइबर सुरक्षा के उपायों को सिर्फ कागजों तक सीमित न रखकर उन्हें वास्तविक घटनाओं के लिए तैयार करना होगा।पुरानी मान्यताओं का त्याग: बदलती तकनीक के साथ कंपनियों को अपनी सुरक्षा नीतियों में हर महीने बदलाव करने के लिए तैयार रहना चाहिए, क्योंकि पुरानी सुरक्षा रणनीतियां बहुत जल्द पुरानी और बेकार हो सकती हैं।कंपनियों के लिए 'फाइव आइज' की कार्ययोजनागठबंधन ने कॉरपोरेट लीडर्स को साइबर हमलों से निपटने के लिए निम्नलिखित कदम उठाने का सुझाव दिया है:जोखिमों का आकलन: अपने संगठनों में AI से उत्पन्न होने वाले नए और जटिल साइबर जोखिमों की नियमित समीक्षा करें।संसाधनों की तैनाती: साइबर सुरक्षा टीमों को पर्याप्त अधिकार और आधुनिक संसाधन मुहैया कराएं।सक्रिय सुरक्षा: केवल एफिशिएंसी बढ़ाने के लिए AI का उपयोग न करें, बल्कि सुरक्षा को मजबूत करने के लिए इसका रणनीतिक और सोच-समझकर इस्तेमाल करें।
हाल ही में स्विट्जरलैंड में हुई शांति वार्ता के दौरान एक वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गया। फुटेज में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को नजरअंदाज करते हुए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को गले लगाते दिखे। दुनिया भर में चर्चा छिड़ गई कि ईरान ने अमेरिका का सरेआम अपमान किया है। लेकिन अब खुद जेडी वेंस ने इस वायरल वीडियो का 'इनसाइड स्टोरी' खोलते हुए चुप्पी तोड़ी है।वायरल वीडियो का 'कन्फ्यूजिंग' सचजेडी वेंस ने इस वायरल वीडियो के दावों को खारिज करते हुए कहा कि मीडिया को सोशल मीडिया की सनसनीखेज खबरों से आगे देखना चाहिए। उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि ईरानी राजनयिक बेहद उलझाने वाले वार्ताकार होते हैं। वेंस ने खुलासा किया कि सोशल मीडिया पर चल रहे उस 'अपमान' के विवादित फुटेज के ठीक बाद, अमेरिकी और ईरानी प्रतिनिधिमंडल के बीच लगातार 9 घंटे तक मैराथन बैठक चली। उनके अनुसार, कैमरे की कड़वाहट के पीछे कूटनीति की एक गहरी कहानी छिपी थी।9 घंटे की बैठक: होर्मुज और युद्धविराम पर बड़ी डीलकैमरे के सामने दिखी तल्खी के विपरीत, बंद कमरों में हुई 9 घंटे की यह चर्चा बेहद परिणामोन्मुखी रही। वेंस ने बताया कि इस बैठक में मुख्य रूप से दो बड़े मुद्दों पर सहमति बनी है:होर्मुज जलडमरूमध्य: वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए जीवन रेखा माने जाने वाले इस रास्ते को सुरक्षित और खुला रखने के लिए एक नए सिस्टम पर दोनों देश सहमत हुए हैं।लेबनान युद्धविराम: दक्षिणी लेबनान में जारी हिंसा को रोकने और शांति बनाए रखने के लिए सकारात्मक दिशा में बातचीत हुई है।60 दिनों की 'डेडलाइन' और ट्रंप का रुखअमेरिका और ईरान के बीच हुए इस अंतरिम समझौते के लिए 60 दिनों की डेडलाइन तय की गई है। इस दौरान दोनों देशों की तकनीकी टीमें परमाणु कार्यक्रम और अन्य विवादित बिंदुओं पर अंतिम समाधान ढूंढने के लिए काम करेंगी। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस पूरी कूटनीतिक पहल की सराहना करते हुए स्पष्ट किया है कि शांति का रास्ता 'आपसी सम्मान' से होकर गुजरता है।जबकि वेंस अमेरिका लौट आए हैं, बैक-चैनल कूटनीति अभी भी सक्रिय है। यह 9 घंटे की बैठक संकेत देती है कि ईरान और अमेरिका के बीच चल रहा तनाव अब बातचीत की मेज पर सुलझने की ओर अग्रसर है।
अमेरिका के जॉर्जिया राज्य के 'अलेक्जेंडर हाई स्कूल' से एक ऐसी घटना सामने आई है जिसने पूरे शिक्षा जगत को झकझोर कर रख दिया है। स्कूल की 25 वर्षीय बायोलॉजी शिक्षिका मारिस निकोल्स पर एक नाबालिग छात्र के साथ शारीरिक संबंध बनाने का गंभीर आरोप लगा है। इस मामले में पुलिस की नई रिपोर्ट ने कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं, जिसमें शिक्षिका के खिलाफ छात्रों की ब्लैकमेलिंग का एंगल भी सामने आया है।क्लोजेट और कार में बनाए शारीरिक संबंधपुलिस रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षिका मारिस निकोल्स पर आरोप है कि उन्होंने स्कूल के क्लासरूम के एक क्लोजेट (स्टोर रूम) में और बाद में अपनी गाड़ी के अंदर छात्र के साथ आपत्तिजनक हरकतें कीं। निकोल्स स्कूल की फुटबॉल टीम की ऑपरेशंस मैनेजर भी थीं, जिसका फायदा उठाकर उन्होंने कथित तौर पर छात्र से नजदीकियां बढ़ाईं। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि शिक्षिका ने छात्रों को कई आपत्तिजनक संदेश और वीडियो भेजे थे, जो बाद में पूरी तरह से अनियंत्रित हो गए।वीडियो लीक का डर और छात्रों की 'ब्लैकमेलिंग'मामले का सबसे हैरान करने वाला पहलू तब सामने आया जब शिक्षिका का एक प्राइवेट वीडियो छात्रों के बीच वायरल हो गया। इसके बाद स्कूल के कुछ अन्य छात्रों ने निकोल्स को ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया। छात्रों ने शिक्षिका पर दबाव डाला कि यदि उन्हें परीक्षा में बेहतर ग्रेड (नंबर) नहीं दिए गए, तो वे उनके 'ओनलीफैंस' (OnlyFans) अकाउंट के आपत्तिजनक वीडियो लीक कर देंगे। इस ब्लैकमेलिंग के चलते मामला और भी गंभीर हो गया और अंततः पुलिस तक पहुंच गया।कानूनी कार्रवाई और अदालती रोकपुलिस ने इस मामले में अब तक 27 अलग-अलग वारंट जारी किए हैं। मारिस निकोल्स पर सबूतों से छेड़छाड़, बाल शोषण और एक स्कूल कर्मचारी द्वारा अनुचित शारीरिक संबंध बनाने जैसी गंभीर धाराएं लगाई गई हैं। फिलहाल निकोल्स जमानत पर बाहर हैं, लेकिन अदालत ने कड़ी शर्तें लागू की हैं। उन्हें अपनी बेटी के अलावा किसी भी अन्य नाबालिग से मिलने की अनुमति नहीं है। बचाव पक्ष के वकील ने उनके 17 वर्षीय भाई से मिलने की अपील की है, जिस पर अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। पुलिस मामले की जांच जारी रखे हुए है, जिसने स्कूल परिसर में छात्रों की सुरक्षा को लेकर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर 22 जून को तमिलनाडु के सीएम विजय थलापति से मिलने चेन्नई पहुंच गए। उससे 4 दिन पहले, 18 जून को गृहमंत्री अमित शाह से दिल्ली में मुलाकात की। 6 महीने में 6 मुख्यमंत्रियों से मिले। दिल्ली के उपराज्यपाल और राजस्थान की डिप्टी सीएम तक से मीटिंग की। भारतीय सेना के पश्चिमी कमान हेडक्वार्टर के दौरे पर तो हंगामा भी हुआ था। आखिर ट्रम्प के खास दूत इतनी भागदौड़ क्यों कर रहे, घोषित एजेंडे से अलग असली मकसद क्या है और क्या भारत को सतर्क रहना चाहिए; समझेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: सर्जियो गोर ने पिछले दिनों किन नेताओं से मुलाकात की? जवाब: सर्जियो गोर अगस्त 2025 में भारत में अमेरिका के राजदूत बनाए गए। शपथ ग्रहण से पहले ही सर्जियो अक्टूबर में भारत दौर पर आए। तब पीएम मोदी, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, NSA अजित डोभाल से मुलाकात की। नवंबर में ट्रम्प ने सर्जियो को शपथ दिलाई और जनवरी 2026 में उन्होंने भारत आकर कामकाज संभाला… 11 फरवरी को पूर्व विदेश सचिव और राज्यसभा सांसद हर्षवर्धन श्रृंगला ने दिल्ली में सर्जियो गोर के सम्मान में एक डिनर पार्टी रखी थी। इसमें कई सांसद और दिग्गज नेता शामिल हुए। इसकी भी चर्चा रही थी। सवाल-2: सर्जियो के किन संवेदनशील जगहों के दौरे पर विवाद हुआ? जवाबः भारत में सर्जियो के कुछ दौरों पर विवाद हुआ... 1. सेना की पश्चिमी कमान के हेडक्वार्टर का दौरा 2. डिफेंस, स्पेस रिसर्च और एटॉमिक सेंटर का दौरा सर्जियो गोर को भारत में काम-काज संभाले अभी सिर्फ 6 महीने हुए हैं। वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला लिखते हैं, 'गोर को सिर्फ विदेशी राष्ट्रपति का नामित दूत नहीं, बल्कि सत्ता के हर गलियारे में बेरोक-टोक पहुंचने वाला अमेरिकी वायसराय समझा जा सकता है।' सवाल-3: क्या सर्जियो गोर भारत में कुछ ज्यादा ही भागदौड़ मचा रहे हैं? जवाब: 1961 के अंतर्राष्ट्रीय कानून ‘वियना कन्वेंशन ऑन डिप्लोमैटिक रिलेशंस’ के आर्टिकल-3 में राजदूतों के 5 घोषित काम हैं… भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल बताते हैं कि किसी भी राजदूत का काम होता है की अपने देश के हितों को दूसरे देश की लीडरशिप तक पहुंचाए। द्विपक्षीय रिश्तों को मजबूत करे। समझौतों को आगे बढ़ाए। कई बार अपनी लीडरशिप के सख्त संदेशों को आसानी से दूसरे देश तक पहुंचाना होता है। हालांकि वियना कन्वेंशन के आर्टिकल 41 में लिखा है कि राजनयिक इन ड्यूटीज के दौरान दूसरे देश के कानून का सम्मान करेंगे और उसके अंदरूनी मामलों में दखल नहीं देंगे। सर्जियो भारत में जिस तेजी से एक्टिव हैं, वैसा आमतौर पर देखने को नहीं मिलता। उन्होंने द्रौपदी मुर्मु को अपना परिचय पत्र देने से पहले ही अपना कार्यभार संभाल लिया था। प्रभु चावला लिखते हैं, ‘यूरोप, जापान, चीन और रूस के राजदूत दिल्ली में छिपे हुए से रहते हैं। सिर्फ औपचारिक बैठकों और हाथ मिलाने तक ही सीमित रहते हैं। गोर से पहले के अमेरिकी राजदूत एरिक गार्सेटी भी एनर्जेटिक होने के बावजूद, संयमित थे। उनके दौर में राजकीय दौरे तो होते थे, लेकिन गोर की तह सैन्य दौरे, उद्योगपतियों से मेलजोल और सांसदों का मिलना-जुलना कभी नहीं होता था।' अमेरिकी जियो-पॉलिटिकल स्ट्रैटेजिस्ट अल मेसन मानते हैं कि आज इंडो-पेसिफिक रीजन ग्लोबल स्ट्रैटजी तय कर रहा है और भारत इसमें अहम भूमिका में है। ऐसे में ट्रम्प ने अपने खास सिपहसलार सर्जियो को दिल्ली भेजा है। सवाल-4: क्या सर्जियो की इस भागदौड़ के पीछे असली मकसद कुछ और है?जवाबः किसी देश के राजदूत के कुछ अघोषित काम भी होते हैं। मसलन- अमेरिकी दूतावासों पर मेजबान देश की जासूसी के आरोप भी लगते रहे हैं। मैगजीन द डिप्लोमैट के मुताबिक, कई बार तो अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA के एजेंट्स को दूतावासों में तैनात किया जाता है। यहां वे जासूसी करके अपने देश तक संवेदनशील जानकारी पहुंचाते हैं। 11 नवंबर 2025 को जब सर्जियो ने शपथ ली, तब ट्रम्प ने कहा था, ‘मुझे सर्जियो पर पूरा भरोसा है। वे हमारे सबसे अहम इंटरनेशनल रिलेशंस में से एक भारत के साथ रिश्ते को मजबूत करेंगे।’ हालांकि तब अमेरिका के पूर्व NSA जॉन बोल्टन ने भारत से जुड़ा कूटनीतिक अनुभव न होने के चलते सर्जियो को अयोग्य बताया था। कहा था कि सर्जियो ऐसे ठेठ हैं, जो बारीकियां समझने के बजाय वफादारी साबित करने में माहिर हैं। दक्षिण एशियाई मामलों के जानकार माइकल कुगेलमैन ने तो सर्जियो को ट्रम्प प्रशासन में भारत की कानाफूसी करने वाला कहा था। सर्जियो के मकसद को 3 कैटेगरी में बांट सकते हैं… 1. खुद की राजनीतिक साख बढ़ाना 2. भारत में अमेरिकी एजेंडा फैलना 3. सब-डिप्लोमेसी और निवेश बढ़ाने की कोशिश सवाल-5: इसमें भारत के लिए कोई चिंता की बात तो नहीं? जवाब: विवेक मिश्र कहते हैं कि सर्जियो भले ट्रम्प के बेहद करीबी हों, लेकिन बतौर राजदूत उनके अधिकार सीमित हैं। वे भारत की पॉलिटिकल और फॉरेन पॉलिसी में दखल नहीं कर सकते। BHU में यूनेस्को चेयर फॉर पीस के प्रोफेसर और 45 सालों तक अमेरिकी राजदूतों के साथ काम कर चुके प्रो. प्रियंकर उपाध्याय मानते हैं कि सर्जियो गोर की एक्टिविटी को शक की नजर से नहीं देखना चाहिए। उपाध्याय कहते हैं, 'अगर चीन या पाकिस्तान के राजदूत इतना एक्टिव होते, तो शक की बात होती। बीते कुछ दशकों में भारत के पॉलिटिकल और डिप्लोमैटिक गलियारों में ये सामान्य हो चुका है कि अमेरिकी राजदूत नेताओं और अधिकारियों से मिलते हैं। कई बार तो वे खुद जनता के बीच जाना चाहते हैं।' हालांकि प्रभु चावला कहते हैं, ‘सर्जियो ने राजदूत की भूमिका को घुमंतू उप-राजशाही में बदल दिया है। इसका बड़ा खतरा है। इस कल्चर को बढ़ावा देकर, भारतीय पावर स्ट्रक्चर में अपनी पैठ बनाकर सर्जियो इस साख को मजबूत कर रहे हैं कि भारत अमेरिका की धुन पर नाचता है। अगर कोई दूत, उस संस्था से ऊपर हो जाए, जिसकी सेवा करने का वह दिखावा करता है, तो वो मेजबान देश की संप्रभुता से समझौता करने लगता है।’ कंवल सिब्बल मानते हैं कि सर्जियो की हरकतों पर भारत को चिंता करने की जरूरत है। सर्जियो भारत के फैसलों को प्रभावित करने के लिए लामबंदी कर रहे हैं। हाल ही में चर्चा शुरू हुई कि भारत पाकिस्तान से बात करे, इसके पीछे कहीं न कहीं अमेरिकी लॉबी है। --------------- ये भी खबर पढ़िए… अमेरिका-ईरान जंग में कौन जीता, क्या पाकिस्तान नहीं, कतर ने करवाई डील, पेट्रोल-डीजल कब सस्ता होगा; 7 सवालों में पूरी कहानी 107 दिनों की तबाही के बाद आखिरकार अमेरिका और ईरान जंग खत्म करने को राजी हैं। रविवार को ट्रम्प ने लिखा- समझौता हो गया। ईरान ने भी बयान जारी किया। दोनों देश ने MoU पर साइन भी कर दिया। पूरी खबर पढ़िए…
ब्रिटेन की राजनीति में मचे भारी घमासान और प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के इस्तीफे के ऐलान के बाद वैश्विक सियासत पूरी तरह से गरमा गई है। इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ब्रिटेन के निवर्तमान प्रधानमंत्री और लेबर पार्टी के नेता कीर स्टार्मर की बेहद तीखी और सीधी आलोचना की है। सोमवार (22 जून, 2026) को व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने स्टार्मर पर करारा हमला बोला। ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा कि स्टार्मर ने देश की ऊर्जा नीति, इमिग्रेशन (प्रवासन संकट) और वॉशिंगटन (अमेरिका) के साथ कूटनीतिक संबंधों को संभालने में बेहद बचकाना रवैया अपनाया, जिसकी वजह से उन्हें खुद को और पूरे ब्रिटेन को बहुत बड़ा नुकसान पहुंचाना पड़ा।हालांकि बातचीत की शुरुआत में ट्रंप ने थोड़ा नरम रुख दिखाते हुए कहा, मुझे लगता है कि वह एक अच्छे इंसान हैं। लेकिन इसके तुरंत बाद उन्होंने स्टार्मर की नीतियों की धज्जियां उड़ा दीं। ट्रंप ने आरोप लगाया कि स्टार्मर नॉर्थ सी (उत्तरी सागर) में मौजूद विशाल तेल भंडारों का दोहन करने में पूरी तरह फेल रहे और पर्यावरण के नाम पर हर जगह केवल पवन चक्कियां (Windmills) लगाने की अनुमति देकर उन्होंने ब्रिटेन की पूरी ऊर्जा व्यवस्था को बिगाड़ कर रख दिया।'नॉर्वे से तेल खरीदता है यूके, जबकि खुद के पास है खजाना'अमेरिकी राष्ट्रपति ने ब्रिटेन की फॉसिल फ्यूल नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि ब्रिटेन आज अपनी ऊर्जा और ईंधन का एक बहुत बड़ा हिस्सा पड़ोसी देश नॉर्वे से खरीदता है। अब सवाल यह है कि नॉर्वे खुद तेल कहां से लाता है? वह भी नॉर्थ सी से ही निकालता है। ट्रंप ने कहा कि नॉर्थ सी का एक बहुत बड़ा और बेहतर हिस्सा ब्रिटेन के अधिकार क्षेत्र में आता है, लेकिन पर्यावरण एक्टिविस्टों के दबाव में आकर वहां की सरकार अपने ही संसाधनों का इस्तेमाल नहीं करना चाहती, जो कि बेहद हास्यास्पद और आर्थिक रूप से आत्मघाती कदम है।ट्रंप ने पहले ही कर दी थी स्टार्मर के पतन की भविष्यवाणीडोनाल्ड ट्रंप ने इस बात का भी दावा किया कि उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर बहुत पहले ही कीर स्टार्मर के इस्तीफे की सटीक भविष्यवाणी कर दी थी। ट्रंप के मुताबिक, स्टार्मर व्यक्तिगत तौर पर उनके दोस्त जैसे हैं, लेकिन एक प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर, विशेषकर नाटो (NATO) और ईरान के साथ चल रहे मौजूदा युद्ध में अमेरिका का जैसा और जितना समर्थन मिलना चाहिए था, वैसा बिल्कुल नहीं किया।साइप्रस के ब्रिटिश सैन्य अड्डे को लेकर था दोनों सुपरपावर्स में मतभेददोनों वैश्विक नेताओं के बीच सबसे बड़ा और गंभीर मतभेद ईरान पर हवाई हमलों के लिए साइप्रस द्वीप पर स्थित ब्रिटिश मिलिट्री बेस के इस्तेमाल को लेकर पैदा हुआ था। ट्रंप ने खुले तौर पर अपनी गहरी निराशा जाहिर करते हुए कहा कि साइप्रस में रॉयल एयर फोर्स (RAF) के 'अक्रोटिरी बेस' से अमेरिकी लड़ाकू विमानों को ईरान के ठिकानों पर बमबारी करने की इजाजत देने में ब्रिटेन ने जरूरत से ज्यादा वक्त गंवा दिया था।ट्रंप ने बताया, शुरुआत में ब्रिटिश सरकार ने हमसे कहा कि वे हमें इस द्वीप पर लैंडिंग की अनुमति नहीं दे सकते। हमारे साझा सैन्य इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था। हालांकि, स्टार्मर आखिरकार भारी दबाव के बाद मान तो गए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उनका यह ढुलमुल रवैया एक बेहद बुरा कदम था, जिसने उनकी अंतरराष्ट्रीय साख को भारी चोट पहुंचाई।ऊर्जा, प्रवासन और अपराध: स्टार्मर के सामने थीं ये 3 बड़ी चुनौतियांकड़े प्रहारों के बाद ट्रंप ने स्टार्मर के निजी भविष्य के लिए शुभकामनाएं भी दीं। उन्होंने कहा, मैं उन्हें भविष्य के लिए शुभकामनाएं देता हूं, लेकिन यह सच है कि उनके कार्यकाल में तीन सबसे बड़े संकट थे— ऊर्जा, इमिग्रेशन और बेकाबू होता अपराध। ट्रंप की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब ब्रिटेन आर्थिक मंदी के दबाव, प्रवासन नीति की विफलता और कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर घरेलू स्तर पर पहले से ही भयंकर घेराबंदी का सामना कर रहा है।एक दशक में 7वां प्रधानमंत्री देखने को तैयार है ब्रिटेनस्थानीय चुनावों में लेबर पार्टी की बेहद करारी शिकस्त के बाद अपनी ही पार्टी के सांसदों और कैबिनेट मंत्रियों के भारी आंतरिक विद्रोह के आगे झुकते हुए कीर स्टार्मर ने आखिरकार सोमवार को लेबर पार्टी के नेता पद से इस्तीफा दे दिया। हालांकि, देश में सुचारू रूप से सत्ता के हस्तांतरण (Handover) तक वे कार्यवाहक प्रधानमंत्री के तौर पर काम करते रहेंगे।ब्रिटिश राजनीतिक गलियारों में इस समय लेबर पार्टी के बेहद अनुभवी नेता और ग्रेटर मैनचेस्टर के पूर्व लोकप्रिय मेयर एंडी बर्नहैम के संसद में लौटने के बाद नए प्रधानमंत्री बनने की संभावनाएं सबसे ज्यादा मजबूत हैं। अगर आने वाले दिनों में एंडी बर्नहैम ब्रिटेन की कमान संभालते हैं, तो वह पिछले महज एक दशक (10 साल) के भीतर ब्रिटेन की गद्दी पर बैठने वाले सातवें प्रधानमंत्री होंगे, जो यूके की डांवाडोल राजनीतिक स्थिरता को दर्शाता है।
पश्चिम एशिया से एक बेहद परेशान करने वाली और बड़ी खबर सामने आ रही है। ईरान और अमेरिका के बीच समझौते के बाद दुनिया ने राहत की सांस जरूर ली थी कि शायद अब महायुद्ध का खतरा टल जाएगा, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। गाजा पट्टी में बेकसूर लोगों और बच्चों की मौतों का सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है। 10 अक्टूबर 2025 को हुए आधिकारिक सीजफायर (युद्धविराम) के ऐलान के बाद भी गाजा में लगभग हर दिन रॉकेट और गोलियां बरस रही हैं। इजरायली सेना और हमास के बीच युद्ध विराम की घोषणा के बावजूद, 9 जून 2026 तक सीजफायर उल्लंघन के 3,201 से अधिक मामले दर्ज किए जा चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया नेटवर्क अल जजीरा की एक खोजी रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायल ने युद्धविराम के पिछले 243 दिनों में से 218 दिनों तक गाजा पर एक्टिव हमले किए हैं। पूरे आठ महीनों में सिर्फ 25 दिन ही ऐसे रहे, जब गाजा से खूनखराबे की खबर नहीं आई।गाजा के सरकारी मीडिया कार्यालय की रिपोर्ट के अनुसार, इजरायली सैनिकों ने तय 'येलो लाइन' को पार कर रिहायशी बस्तियों में 97 बार भीषण छापेमारी की है और इस दौरान 83 फिलिस्तीनियों को बंदी बना लिया। सीजफायर के दौरान ही गाजा पर कुल 1,109 बार हवाई बमबारी और तोपों से गोलाबारी की गई, जिसमें 273 से ज्यादा नागरिकों की निजी संपत्तियां मलबे में तब्दील हो गईं। स्थानीय प्रशासन ने इजरायल पर मानवीय सहायता (भोजन-दवाई) को सीमा पर रोकने और जानबूझकर बुनियादी ढांचे को तबाह करने का गंभीर आरोप लगाया है।ईरान संकट के पीछे छिप गई मासूम बच्चों की मौत की चीखेंजब कुछ महीने पहले इजरायल-अमेरिका का ईरान के साथ सीधे युद्ध का संकट शुरू हुआ, तो पूरी दुनिया के मीडिया का ध्यान गाजा से हट गया। इसी का नतीजा रहा कि गाजा में इजरायली हमलों में मारे जा रहे फिलिस्तीनियों की खबरें अंतरराष्ट्रीय पटल पर कहीं दबकर रह गईं। डेटा के मुताबिक, 10 अक्टूबर से 9 जून के बीच जब दुनिया ईरान-अमेरिका तनाव देख रही थी, तब गाजा में चुपके से 981 लोग मार दिए गए, जिनमें बड़ी संख्या बच्चों की है। हाल ही में 20 जून को हुए एक ताजा हमले में भी 6 लोगों की जान चली गई, जिसमें 2 मासूम बच्चे शामिल थे।तकरीबन दो हफ्ते पहले वेस्ट बैंक के हेब्रोन इलाके के पास इजरायली सैनिकों की ओपन फायरिंग में सैम फहद अबू हैकल नाम के महज 7 महीने के एक नवजात बच्चे की मौत हो गई थी। इसके अलावा गाजा में बोर्ड परीक्षा देने जा रही 18 साल की एक फिलिस्तीनी छात्रा को भी इजरायली सैनिकों द्वारा गोली मारने का संगीन आरोप लगा है।गाजा के दो-तिहाई हिस्से पर इजरायली सेना का कब्जा, मंडराया भुखमरी का सायाईरान और अमेरिका के बीच ऐतिहासिक शांति समझौते की घोषणा के बाद माना जा रहा था कि मिडिल ईस्ट में स्थिरता आएगी, लेकिन इजरायल और हमास की यह जंग खत्म होने का नाम नहीं ले रही। गाजा मीडिया कार्यालय के ताजा और आधिकारिक दावे के मुताबिक, इजरायली सेना ने रणनीतिक तौर पर आगे बढ़ते हुए गाजा के लगभग 64 प्रतिशत हिस्से पर पूरी तरह से अपना सैन्य कब्जा जमा लिया है। इतना ही नहीं, इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की तरफ से सेना को इस घेरे को और ज्यादा बढ़ाने के गुप्त निर्देश भी मिल चुके हैं।मार्च के महीने में जब पूरी दुनिया का फोकस ईरान पर था, तब इजरायली सेना ने फिलिस्तीनियों के लिए काम करने वाली ग्लोबल रिलीफ एजेंसियों को नए नक्शे सौंपे थे। इन नक्शों से साफ पता चलता है कि सेना तय 'येलो लाइन' से 11 फीसदी और आगे घुस चुकी है। इस कब्जे का सबसे भयावह पहलू यह है कि अब गाजा के आम नागरिक अपने ही देश के दो-तिहाई हिस्से में कदम भी नहीं रख सकते। गाजा की सबसे उपजाऊ और खेती योग्य जमीन अब इजरायल के कंट्रोल में है, जिसके कारण आने वाले दिनों में यहां अकाल और भुखमरी की स्थिति बेहद डरावनी होने वाली है।72 हजार से ज्यादा मौतें; आखिर ईरान-अमेरिका डील से फिलिस्तीन को क्या मिला?गाजा में फिलिस्तीनी स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी किए गए ताजा और रूह कंपा देने वाले आंकड़ों के मुताबिक, 7 अक्टूबर 2023 से लेकर 10 जून 2026 तक इस युद्ध में कम से कम 72,991 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। सबसे ज्यादा दुखद बात यह है कि इस कुल आंकड़े में 20,179 केवल छोटे बच्चे शामिल हैं। इसके अलावा 1,73,212 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल या अपंग हो चुके हैं। इस सर्वविनाश के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि ईरान और अमेरिका की इस ग्लोबल डील से फिलिस्तीन के हाथ क्या आया? जवाब है— कुछ भी नहीं। सुपरपावर्स के समझौतों के बाद भी गाजा के लोगों को सिर्फ बारूद और मौतें ही मिल रही हैं।गाजा की राह पर बढ़ा दक्षिणी लेबनान, 12 लाख लोग बेघरइस पूरे विवाद का एक और खतरनाक मोर्चा दक्षिणी लेबनान में खुला हुआ है, जहां इजरायली सेना हमास की ही तरह हिज्बुल्लाह के ठिकानों पर भीषण हमले कर रही है। हालांकि ईरान का दावा है कि उसने अमेरिका के साथ हुए युद्धविराम समझौते में लेबनान सुरक्षा की शर्त को भी शामिल कराया था, लेकिन इजरायल इस अंतरराष्ट्रीय समझौते को पूरी तरह खारिज कर रहा है। इजरायली सेना ने दक्षिणी लेबनान के लगभग पांचवें हिस्से को तुरंत खाली करने का अल्टीमेटम जारी कर दिया है, जिसके चलते रातों-रात 12 लाख से अधिक लेबनानी नागरिक बेघर होकर शरणार्थी शिविरों में रहने को मजबूर हैं। जमीनी हालात को देखकर वैश्विक मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि दक्षिणी लेबनान भी बहुत तेजी से दूसरे 'गाजा' बनने की ओर अग्रसर है।
ईरान युद्ध में इजराइल और महाशक्ति अमेरिका से भी ज्यादा भारतीय नागरिक अपनी जान गंवा चुके हैं। यह बेहद चौंकाने वाली और दर्दनाक हकीकत तब सामने आई है, जब भारत इस विनाशकारी जंग में किसी भी तरह से शामिल नहीं है। सोमवार (22 जून, 2026) को कतर के रास लाफान पर हुए एक भीषण हमले में 12 भारतीय कामगारों की मौत हो गई, जिसके बाद इस युद्ध की चपेट में आकर मरने वाले बेकसूर भारतीयों की कुल संख्या 25 पर पहुंच गई है। वहीं, अगर जंग में सीधे तौर पर शामिल देशों की बात करें, तो इस लड़ाई में अब तक अमेरिका के 13 और इजराइल के 24 नागरिक मारे गए हैं। इस युद्ध की विभीषिका का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इजराइल के हमलों से अब तक सबसे ज्यादा लेबनान के 4 हजार और ईरान के 3600 लोग मारे जा चुके हैं।इस खाड़ी युद्ध की शुरुआत इसी साल 28 फरवरी को हुई थी। इन चंद महीनों की जंग में ईरान को बहुत बड़े झटके लगे हैं। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई से लेकर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) के प्रमुख मोहम्मद पाकपूर और ईरान सर्वोच्च सुरक्षा परिषद के सचिव अली लारिजानी जैसे शीर्ष नेताओं की इस युद्ध में हत्या की जा चुकी है।कब और कहां कितने भारतीयों ने गंवाई अपनी जान?कतर के रास लाफान में हुए ताजा हमले में 12 भारतीयों की मौत के अलावा, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में भी भारत के 6 नागरिक मारे गए हैं। होर्मुज में हुए एक अमेरिकी हमले में 3 भारतीय नागरिकों की मौत हो गई थी, जिस पर भारत सरकार ने अमेरिका के खिलाफ बेहद कड़ी नाराजगी जाहिर की थी। खुद भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री को फोन कर इस पर कड़ा विरोध और प्रतिरोध दर्ज कराया था। इसके अलावा कतर में ही पिछले दिनों हुए एक अन्य हमले में एक भारतीय की मौत हुई थी, जबकि एक भारतीय की मौत कुवैत में ईरानी हमले के दौरान हुई थी। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में भी भारतीय नागरिक इस युद्ध का शिकार बन चुके हैं। इन सब को मिलाकर अब तक कुल 25 भारतीय नागरिकों की मौत हो चुकी है।युद्ध में इजराइल और अमेरिका से ज्यादा भारतीय क्यों मारे गए?बिना किसी दुश्मनी और बिना युद्ध में शामिल हुए भारतीयों की इतनी बड़ी तादाद में मौत के पीछे तीन सबसे मुख्य और जमीनी कारण हैं:कुवैत और यूएई पर अंधाधुंध हमले और इजराइली बंकर: ईरान ने इस जंग के दौरान इजराइल से कहीं ज्यादा कुवैत और यूएई के इलाकों को निशाना बनाया है। इजराइल पर ईरान ने सिर्फ शुरुआत में ही कुछ बड़े अटैक किए थे, जिसमें कुछ इजराइली नागरिक मारे गए। इसके तुरंत बाद इजराइल ने अपने सभी नागरिकों को बेहद सुरक्षित अंडरग्राउंड बंकरों में शिफ्ट कर दिया, जिसके कारण ईरान इजराइल के नागरिकों को ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचा पाया। दूसरी तरफ, दूरदर्शी अमेरिका ने जंग छिड़ने के संकेत मिलते ही अपने नागरिकों को खाड़ी देशों से वापस बुला लिया था, इसलिए जंग में सिर्फ अमेरिकी सैनिक ही हताहत हुए हैं।खाड़ी देशों में प्रवासियों की भारी तादाद: खाड़ी (Gulf) के देशों में भारतीय मूल के लोगों की आबादी बहुत बड़ी है। आंकड़ों के मुताबिक, सऊदी अरब में करीब 27 लाख और यूएई में 43 लाख भारतीय रहते हैं। इसी तरह कुवैत में 10 लाख और कतर में 8 लाख प्रवासी भारतीय कार्यरत हैं। कतर का रास लाफान जहां सोमवार को हमला हुआ, वह एक बड़ा औद्योगिक क्षेत्र है और वहां भारी संख्या में भारतीय मजदूर और इंजीनियर काम करते हैं, जो सीधे तौर पर इस हमले की चपेट में आ गए।होर्मुज में फंसे जहाजों पर भारतीय क्रू मेंबर्स: होर्मुज की खाड़ी में जो व्यापारिक जहाज फंसे हुए हैं, उनमें काम करने वाले अधिकांश कामगार और नाविक भारतीय ही हैं। हालिया डेटा के अनुसार, इस डेंजर जोन में फंसे लगभग 550 जहाजों पर 18 हजार से ज्यादा भारतीय कामगार मौजूद हैं। जब भी इन जहाजों पर हवाई या मिसाइल हमले होते हैं, तो वहां तैनात भारतीय इसकी चपेट में आ जाते हैं।बेकसूर भारतीयों की इन मौतों के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है?इस खाड़ी युद्ध में मारे गए कुल भारतीयों में से आधे से अधिक लोगों की मौत सीधे तौर पर ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों की वजह से हुई है। वहीं, 3 भारतीयों की मौत अमेरिकी सेना के हमले में हुई। अमेरिका ने इसी महीने की शुरुआत में होर्मुज की नाकाबंदी को पार करने की कोशिश कर रहे एक संदिग्ध वाणिज्यिक जहाज को निशाना बनाया था, जिसमें भारतीय सवार थे। इसके विपरीत रास लाफान, कुवैत और कतर के रिहायशी व औद्योगिक इलाकों में जो भारतीय मारे गए हैं, वो ईरान के हमलों का शिकार हुए हैं। हालांकि, वैश्विक दबाव के बीच दोनों ही देशों (अमेरिका और ईरान) ने सफाई देते हुए कहा है कि ये मौतें सक्रिय युद्ध क्षेत्र (War Zone) में होने के कारण हुई हैं, यानी किसी भी भारतीय को जानबूझकर या टारगेट करके नहीं मारा गया है।
अमेरिका ने वादा तो कर दिया, पर ईरान को 300 अरब डॉलर देगा कौन? खाड़ी जा रहे मार्को रुबियो देंगे जवाब!
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक वित्तीय बाजारों के गलियारों से इस वक्त एक बेहद हैरान करने वाली खबर सामने आ रही है। वॉशिंगटन से लेकर मध्य पूर्व (Middle East) तक इस बात की जबरदस्त चर्चा है कि क्या अमेरिका ईरान को 300 अरब डॉलर (करीब 25 लाख करोड़ रुपये) का भारी-भरकम फंड सौंपने की तैयारी कर रहा है। व्हाइट हाउस की तरफ से इस सिलसिले में कुछ बड़े संकेत तो दिए गए हैं, लेकिन इस वक्त सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह खड़ा हो गया है कि आर्थिक मोर्चे पर खुद कई चुनौतियों से जूझ रहा अमेरिका आखिर इतनी बड़ी रकम लाएगा कहां से? इस बीच अमेरिकी विदेश नीति के अहम सिपहसालार मार्को रुबियो का अचानक खाड़ी देशों (Gulf Countries) का दौरा करना इस पूरी मिस्ट्री को और गहरा कर रहा है। माना जा रहा है कि इस महा-डील की असली चाबी रुबियो के इसी दौरे में छिपी हुई है।इस सीक्रेट महा-डील के पीछे का पूरा बैकग्राउंड क्या हैएक वरिष्ठ रणनीतिक रिपोर्टर की नजर से अगर इस पूरे घटनाक्रम को देखें, तो यह मामला ईरान पर लगे पुराने प्रतिबंधों, तेल व्यापार और अंतरराष्ट्रीय फ्रीज किए गए एसेट्स (जब्त संपत्तियों) से जुड़ा हुआ है। अमेरिका और पश्चिमी देशों ने लंबे समय से ईरान के अरबों डॉलर विदेशी बैंकों में फ्रीज कर रखे हैं। अब वैश्विक भू-राजनीतिक समीकरणों को साधने और खाड़ी क्षेत्र में शांति स्थापित करने के नाम पर इस फंड को कुछ शर्तों के साथ रिलीज करने का एक खाका तैयार किया जा रहा है। लेकिन इस वादे को जमीन पर उतारना इतना आसान नहीं है। अमेरिकी संसद (Congress) के भीतर ही इस बात को लेकर भारी विरोध शुरू हो गया है कि आतंकवाद को फंड करने के आरोपी देश को इतनी बड़ी वित्तीय राहत कैसे दी जा सकती है।मार्को रुबियो का खाड़ी दौरा और मध्य पूर्व का नया समीकरणइस पूरी गुत्थी को सुलझाने के लिए अमेरिकी सीनेटर और विदेश नीति के दिग्गज मार्को रुबियो इस समय खाड़ी देशों के बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील दौरे पर हैं। सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे अमीर देशों के शीर्ष नेतृत्व के साथ रुबियो की बंद कमरों में होने वाली बैठकों का मुख्य एजेंडा यही है कि ईरान से जुड़ी इस वित्तीय डील की गारंटी कौन लेगा। जानकारों का कहना है कि अमेरिका खुद अपनी जेब से यह पैसा देने के बजाय खाड़ी देशों के जरिए एक ऐसा त्रिकोणीय वित्तीय ढांचा (Triangular Financial Framework) तैयार करना चाहता है, जिससे ईरान को तेल सप्लाई और क्षेत्रीय सुरक्षा के बदले यह रकम किस्तों में मिल सके। मार्को रुबियो इस दौरे में खाड़ी के सुल्तानों को इस बात के लिए राजी करने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं।भारत समेत वैश्विक बाजारों पर इस फैसले का क्या होगा असरअगर यह 300 अरब डॉलर की डील किसी भी तरह से परवान चढ़ती है, तो इसका सीधा और गहरा असर वैश्विक तेल बाजार (Crude Oil Market) पर पड़ने वाला है। ईरान के पास तेल का विशाल भंडार है और वित्तीय पाबंदियां हटने से वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की सप्लाई तेजी से बढ़ेगी, जिससे तेल की कीमतें धड़ाम से गिर सकती हैं। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए यह एक बहुत बड़ी राहत की खबर साबित हो सकती है, क्योंकि इससे घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल की कीमतें कम होने और महंगाई से राहत मिलने का रास्ता साफ होगा। हालांकि, जब तक मार्को रुबियो के इस दौरे का कोई आधिकारिक नतीजा सामने नहीं आता, तब तक अंतरराष्ट्रीय राजनीति के इस सबसे बड़े सस्पेंस पर सट्टेबाजी का दौर जारी रहेगा।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और खाड़ी देशों के भू-राजनीतिक गलियारों से एक बेहद ही चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है, जिसने पाकिस्तान की पूरी रणनीतिक विफलता को दुनिया के सामने लाकर रख दिया है। ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाकर कालिबाफ ने एक बेहद ही सनसनीखेज इनसाइड स्टोरी बयां की है। इस खुलासे के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सख्त नीतियों और ईरान के प्रति उनके कड़े रुख के कारण पाकिस्तान और ईरान के बीच होने वाली एक बेहद महत्वपूर्ण द्विपक्षीय डील पूरी तरह से तबाह हो गई थी। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान ईरान के सख्त तेवरों और अमेरिकी प्रतिबंधों के दोहरे डर से पाकिस्तान की हालत ऐसी हो गई थी कि वह अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी साख बचाने के लिए गिड़गिड़ाने पर मजबूर हो गया था।गैस पाइपलाइन और रणनीतिक समझौते की वो इनसाइड स्टोरीअगर हम इस पूरे मामले की तह में जाएं, तो यह विवाद मुख्य रूप से ईरान-पाकिस्तान (IP) गैस पाइपलाइन परियोजना से जुड़ा हुआ है, जिसे 'पीस पाइपलाइन' के नाम से भी जाना जाता है। ईरान ने अपने हिस्से की पाइपलाइन का निर्माण काफी पहले ही पूरा कर लिया था और वह पाकिस्तान पर अपने हिस्से का काम पूरा करने का लगातार दबाव बना रहा था। ईरान की इस सख्त अकड़ के सामने पाकिस्तान के पसीने छूट रहे थे क्योंकि इस्लामाबाद को डर था कि अगर उसने ईरान के साथ काम आगे बढ़ाया तो अमेरिकी प्रतिबंध उसे पूरी तरह बर्बाद कर देंगे। कालिबाफ के खुलासे ने यह साफ कर दिया है कि ईरान इस सौदे को लेकर किसी भी तरह के समझौते के मूड में नहीं था, जिससे पाकिस्तान पूरी तरह अलग-थलग पड़ गया था।डोनाल्ड ट्रंप की एंट्री और इस्लामाबाद का मास्टर प्लान फेलइस पूरी कहानी में सबसे बड़ा ट्विस्ट तब आया जब डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में रहते हुए ईरान पर अब तक के सबसे कड़े प्रतिबंध (Sanctions) लगा दिए। ट्रंप प्रशासन की इस आक्रामक नीति ने पाकिस्तान के तत्कालीन नेतृत्व को हिलाकर रख दिया। ट्रंप ने साफ चेतावनी दी थी कि जो भी देश ईरान के साथ व्यापारिक या रणनीतिक संबंध रखेगा, उसे अमेरिकी वित्तीय तंत्र से बाहर कर दिया जाएगा। इस एक फैसले ने पाकिस्तान के उस मास्टर प्लान को पूरी तरह चौपट कर दिया जिसके जरिए वह सस्ती ईरानी गैस हासिल करने की उम्मीद लगाए बैठा था। वाशिंगटन के इस कड़े रुख के बाद पाकिस्तान के पास डील से पीछे हटने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था, जिससे ईरान भड़क गया और उसने पाकिस्तान पर अरबों डॉलर के जुर्माने की तलवार लटका दी।कंगाली के दौर में पाकिस्तान के सामने अब क्या है रास्ताईरान की संसद में हुए इस खुलासे ने पाकिस्तान की दोहरी नीति और उसकी लाचारी को एक बार फिर दुनिया के सामने उजागर कर दिया है। आज के समय में जब पाकिस्तान पहले से ही रिकॉर्डतोड़ महंगाई, विदेशी मुद्रा भंडार के संकट और आईएमएफ (IMF) के कड़े कर्ज के जाल में फंसा हुआ है, ईरान के साथ बढ़ता यह कानूनी और रणनीतिक तनाव उसकी मुश्किलें कई गुना बढ़ाने वाला है। ईरान ने साफ कर दिया है कि वह अपनी अंतरराष्ट्रीय अदालतों में इस मामले को ले जाने के अधिकार से पीछे नहीं हटेगा। इस जमीनी रिपोर्टर की मानें तो पाकिस्तान अब एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहां एक तरफ अमेरिका की नाराजगी का कुआं है और दूसरी तरफ ईरान के भारी जुर्माने की खाई, जिससे पार पाना शाहबाज शरीफ सरकार के लिए फिलहाल नामुमकिन नजर आ रहा है।
ये वतन हमारा है... PoK में कश्मीरियों का महा-गदर, मुनीर की आर्मी को मिला 24 घंटे का खुला अल्टीमेटम
पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) से इस वक्त एक बेहद बड़ी और सनसनीखेज खबर सामने आ रही है। नियंत्रण रेखा (LoC) के उस पार बसे मुजफ्फराबाद, पुंछ और मीरपुर समेत कई इलाकों में कश्मीरी जनता ने पाकिस्तानी हुकूमत और वहां की फौज के खिलाफ खुली बगावत कर दी है। ये वतन हमारा है, इसका फैसला हम करेंगे के नारों के साथ लाखों की तादाद में लोग सड़कों पर उतर आए हैं। इस बड़े जन-आंदोलन का नेतृत्व कर रहे स्थानीय नेताओं ने पाकिस्तान के आर्मी चीफ जनरल असीम मुनीर की सेना को 24 घंटे का सख्त अल्टीमेटम दे दिया है। पीओके में भड़के इस जबरदस्त गदर ने इस्लामाबाद से लेकर रावलपिंडी के सैन्य मुख्यालय तक हड़कंप मचा दिया है।आखिर क्यों सुलग उठा PoK और क्यों भड़की कश्मीरी जनतावरिष्ठ पत्रकारों और अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक मामलों के जानकारों के मुताबिक, पीओके में यह गुस्सा अचानक नहीं भड़का है, बल्कि यह सालों से हो रहे दमन और सौतेले व्यवहार का नतीजा है। स्थानीय कश्मीरी जनता पिछले काफी समय से आटे की किल्लत, आसमान छूती महंगाई, भारी-भरकम बिजली बिलों और बुनियादी अधिकारों के हनन को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रही थी। लेकिन पाकिस्तानी रेंजर्स और फौज ने जब शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर लाठियां भांजी और आंसू गैस के गोले छोड़े, तो यह आंदोलन हिंसक विद्रोह में बदल गया। अब पीओके के नागरिकों का साफ कहना है कि उनके संसाधनों की लूट बहुत हो चुकी, अब वे पाकिस्तान के अवैध कब्जे को और बर्दाश्त नहीं करेंगे।मुनीर की फौज को 24 घंटे का अल्टीमेटम और आर-पार की जंगपीओके की कोर कमेटी और स्थानीय अवामी एक्शन कमेटी ने पाकिस्तानी सुरक्षा बलों को चेतावनी देते हुए साफ कहा है कि अगर अगले 24 घंटों के भीतर गिरफ्तार किए गए स्थानीय युवाओं को रिहा नहीं किया गया और भारी सैन्य तैनाती को वापस नहीं बुलाया गया, तो वे पूरे खित्ते का चक्का जाम कर देंगे। कश्मीरी प्रदर्शनकारियों ने सरकारी दफ्तरों को घेरना शुरू कर दिया है और कई जगहों पर पाकिस्तानी झंडे हटाकर अपनी नाराजगी जाहिर की है। हालात इतने बेकाबू हो चुके हैं कि पाकिस्तानी सेना के जवानों को पीछे हटना पड़ रहा है। इस अल्टीमेटम के बाद पूरे इलाके में तनाव चरम पर पहुंच गया है और किसी बड़े सैन्य टकराव की आशंका बनी हुई है।नई दिल्ली की पैनी नजर और वैश्विक मंच पर पाकिस्तान की किरकिरीपीओके में चल रहे इस गदर पर भारत सरकार और सुरक्षा एजेंसियों की भी पैनी नजर बनी हुई है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि पीओके की जनता अब खुलकर यह समझ चुकी है कि भारत के जम्मू-कश्मीर में जिस तरह से विकास, शांति और खुशहाली लौट रही है, उसके ठीक उलट पाकिस्तान उन्हें सिर्फ भुखमरी और कंगाली दे रहा है। सोशल मीडिया पर भी 'PoK Wants Freedom' ट्रेंड कर रहा है, जिससे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान के उस प्रोपेगैंडा की हवा निकल गई है जो वह कश्मीर को लेकर हमेशा अलापता रहता है। अब देखना यह है कि जनरल असीम मुनीर की आर्मी इस 24 घंटे के अल्टीमेटम का सामना कैसे करती है या फिर पीओके में आजादी की यह चिंगारी कोई नया इतिहास लिख देती है।
ब्रिटिश पीएम कीर स्टॉर्मर का भावुक इस्तीफा, क्या अब अधर में लटक जाएगा भारत-ब्रिटेन व्यापार समझौता
ब्रिटेन (UK) की राजनीति से इस वक्त की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टॉर्मर ने अपने पद से इस्तीफा देने का एलान कर दिया है। 10 डाउनिंग स्ट्रीट के बाहर देश को संबोधित करते हुए स्टॉर्मर बेहद भावुक नजर आए और उन्होंने अपने इस फैसले से पूरी दुनिया को हैरान कर दिया। ब्रिटेन में चल रहे आंतरिक राजनीतिक घटनाक्रमों और बढ़ते दबाव के बीच आया यह इस्तीफा न सिर्फ ब्रिटिश राजनीति के लिए एक बड़ा मोड़ है, बल्कि इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर भी पड़ने वाला है। इस वक्त नई दिल्ली से लेकर लंदन तक सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि पिछले काफी समय से अधर में लटका भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौता (India-UK FTA) अब किस दिशा में जाएगा।कीर स्टॉर्मर के अचानक विदा होने के पीछे की बड़ी वजहेंएक सीनियर रिपोर्टर के तौर पर अगर हम लंदन के राजनीतिक गलियारों में चल रही हलचलों को देखें, तो कीर स्टॉर्मर का यह फैसला अप्रत्याशित नहीं था, लेकिन इसकी टाइमिंग ने सबको चौंकाया है। पिछले कुछ महीनों से देश की सुस्त अर्थव्यवस्था, लेबर पार्टी के भीतर आंतरिक मतभेद और आव्रजन (Immigration) के मुद्दों पर स्टॉर्मर सरकार लगातार चौतरफा घिरी हुई थी। अपनी ही पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं के असंतोष और देश में घटती लोकप्रियता के बाद स्टॉर्मर ने बेहद भावुक अंदाज में सत्ता की कमान छोड़ने का फैसला किया। उन्होंने कहा कि देश के हित और पार्टी की एकजुटता के लिए उनका पीछे हटना जरूरी हो गया था। इस इस्तीफे के बाद अब ब्रिटेन में नए नेतृत्व को चुनने की कवायद तेज हो गई है।भारत-ब्रिटेन फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर मंडराने लगे अनिश्चितता के बादलइस बड़े राजनीतिक उलटफेर का सबसे गहरा असर भारत और ब्रिटेन के बीच होने वाले महत्वाकांक्षी मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर पड़ने की आशंका है। दोनों देश पिछले कई दौर की वार्ताओं के बाद इस डील को अंतिम रूप देने के बेहद करीब पहुंच चुके थे। कीर स्टॉर्मर और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुई हालिया मुलाकातों में इस समझौते को जल्द से जल्द लागू करने पर सहमति बनी थी। लेकिन अब ब्रिटेन के शीर्ष नेतृत्व में आए इस खालीपन के कारण इस समझौते की रफ्तार एक बार फिर धीमी हो सकती है। जब तक ब्रिटेन में नई सरकार का गठन नहीं हो जाता और नया प्रधानमंत्री कार्यभार नहीं संभाल लेता, तब तक नीतिगत फैसलों पर रोक लग सकती है।क्या नई ब्रिटिश सरकार बदलेगी भारत के प्रति अपना रुखग्लोबल डिप्लोमेसी और आर्थिक जानकारों का मानना है कि ब्रिटेन चाहे जो भी नया प्रधानमंत्री चुने, भारत के साथ व्यापारिक रिश्तों को नजरअंदाज करना उसके लिए मुमकिन नहीं होगा। ब्रिटेन इस वक्त खुद आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है और उसे भारतीय बाजार की सख्त जरूरत है। हालांकि, लेबर पार्टी के भीतर या विपक्ष के नए गुटों की प्राथमिकताओं में थोड़ा बदलाव आ सकता है, जिससे वीजा नियमों, आईटी प्रोफेशल्स की आवाजाही और स्कॉच व्हिस्की जैसी चीजों पर कस्टम ड्यूटी को लेकर चल रही बातचीत में नए सिरे से मोलभाव करना पड़ सकता है। भारतीय वाणिज्य मंत्रालय भी इस पूरे राजनीतिक संकट पर नजर बनाए हुए है और नई सरकार के गठन के बाद दोबारा बातचीत को पटरी पर लाने की उम्मीद कर रहा है।
कैलिफोर्निया में पारंपरिक जंगल की आग (वाइल्डफायर) का मौसम अपने चरम पर पहुंचने से पहले ही इस साल दमकलकर्मी 2,580 से अधिक वाइल्डफायर की घटनाओं पर प्रतिक्रिया दे चुके हैं। बढ़ते तापमान और तेजी से सूखती वनस्पति के कारण अधिकारियों की चिंता बढ़ गई है। अधिकारी अब इसे केवल मौसमी नहीं बल्कि पूरे साल बने रहने वाले आग के खतरे के रूप में देख रहे हैं।
फेडरल जज का बड़ा झटका – ट्रंप सरकार का गोपनीय डेटाबेस ब्लॉक
अमेरिका के एक फेडरल जज ने ट्रंप सरकार के उस डेटाबेस को रद्द कर दिया जिसमें अमेरिकी नागरिकों की गुप्त जानकारी थी
विक्रम दिल्ली के पालिका भवन में काम करते हैं। तीन साल पहले पुरानी कार खरीदी। एक साल बाद ही कार के फ्यूल सिस्टम में दिक्कत आ गई। पता चला कि कार में सिर्फ 10% एथेनॉल (E10) वाला पेट्रोल ही डाल सकते थे, लेकिन 20% एथेनॉल वाला, यानी E20 फ्यूल डाल दिया गया। इसका असर कार के माइलेज पर भी दिख रहा है। पहले साल में कार की सर्विसिंग में 15-20 हजार रुपए खर्च हुए। अगले साल खर्च दोगुना हो गया। पालिका भवन में ही 22 साल के कुणाल कार रिपेयर कराने पहुंचे। वे कहते हैं, ‘जब से पेट्रोल में चींटी लगने का वीडियो देखा, तब से गाड़ी खराब होने का डर सताने लगा। इसलिए पावर पेट्रोल ही भरवा रहा हूं।‘ गाड़ियों को लेकर ये फिक्र अकेले विक्रम या कुणाल की नहीं है। सोशल मीडिया पर भी एथेनॉल फ्यूल से गाड़ियों में गड़बड़ी का दावा करने वाले ढेरों वीडियो शेयर हो रहे हैं। देश में 5 जून को फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए डिजाइन 85% एथेनॉल वाला E85 भी लॉन्च कर दिया गया। आगे 100% एथेनॉल फ्यूल लाने की तैयारी है। अभी E20 फ्यूल का गाड़ियों पर क्या असर हो रहा है, ये जानने के लिए हम दिल्ली के सबसे बड़े कार रिपेयरिंग मार्केट पालिका पहुंचे। ‘फ्यूल टैंक में काली फंगस जमने से जंग लग रही’ दीपक राज यहां 20 साल से कार रिपेयरिंग का काम कर रहे हैं। वो कहते हैं, ‘2 साल से गाड़ियों में फ्यूल से जुड़ी दिक्कतें बढ़ गई हैं। फ्यूल टैंक में काई जमा होने की शिकायतें मिल रही हैं। दरअसल एथेनॉल में पानी सोखने की क्षमता होती है, जिसकी वजह से फ्यूल के सेंसर खराब हो रहे हैं। टैंक में काली परत सी जमी दिखती है, जिसकी वजह से फ्यूल पंप में जंग लग रही है।‘ दीपक आगे कहते हैं, ‘जब से पेट्रोल में एथेनॉल की मात्रा बढ़ी है, तब से फ्यूल से जुड़े पार्ट्स फ्यूल सेंसर, पंप और फिल्टर तीनों में दिक्कत आ रही है। पिछले 1 महीने में मर्सिडीज की 6-7 गाड़ियों में एक जैसी ही दिक्कत देखी गई।‘ कार चलते-चलते अचानक बंद होने की शिकायतें बढ़ीं मोहसिन 2006 से कार रिपेयरिंग का काम कर रहे हैं। वो कहते हैं कि गाड़ियों में एथेनॉल वाला पेट्रोल डलने के बाद से शिकायतें बढ़ी हैं। गाड़ियों फ्यूल पंप और हाई प्रेशर पंप बैठ जाते हैं। नई कारें भी चलते-चलते अचानक बंद हो जाती हैं। इंजन के इंजेक्टर, फ्यूल फिल्टर, फ्यूल पंप, पिस्टन, वाल्व सभी पार्ट्स में खराबी आ रही है। मोहसिन कहते हैं, ‘नई गाड़ियां E-20 पेट्रोल के हिसाब से बनी हैं। अब अगर एथेनॉल की मात्रा पहले से बढ़ाई गई, तो ये गाड़ियां कैसे चलेंगी। जो गाड़ियां सिर्फ पेट्रोल या फिर E-10 के लिए बनी हैं, उनमें तो गड़बड़ी आनी शुरू हो चुकी है।’ 8-10 साल में खराब होने वाला फ्यूल पंप एक साल में बेकार मयंक मलिक दिल्ली में कार डीलर हैं। वे ऑडी, BMW, मर्सिडीज जैसी प्रीमियम कारों में डील करते हैं। मयंक कहते हैं कि एथेनॉल का सबसे ज्यादा असर गाड़ियों में इस्तेमाल होने वाले रबर और प्लास्टिक पार्ट्स पर हुआ है। वो गलकर जल्दी खराब हो रहे हैं। गाड़ी में रिपेयर वर्क ज्यादा आ रहा है। माइलेज भी घटा है। पुरानी कारों पर असर सबसे ज्यादा है। कार के ऑटोपार्ट्स की दुकान चलाने वाले राजेश कहते हैं कि पहले गाड़ियों में 8-10 साल बाद ही फ्यूल पंप खराब होता था, लेकिन अब एक साल पुरानी गाड़ियों के फ्यूल पंप खराब हो रहे हैं। ये गड़बड़ी भी पेट्रोल गाड़ियों में ही देखने को मिल रही है। डीजल गाड़ी में ये शिकायतें नहीं आ रहीं। एथेनॉल फ्यूल के बाद बाइक में 5 शिकायतें आ रहीं… बाइक मैकेनिक चंद्रप्रकाश 35 साल से काम कर रहे हैं। वे कहते हैं कि पिछले एक साल से बाइक में फ्यूल फिल्टर और थ्रोटल बॉडी में ज्यादा शिकायतें आ रही हैं। थ्रोटल बॉडी एक्सीलरेटर के मुताबिक इंजन में जाने वाली हवा की मात्रा को कंट्रोल करती है। मार्केट में अलग-अलग मैकेनिक और डीलर्स से बात करने पर बाइक में आने वाली ये 5 दिक्कतें समझ आईं… 1. कोल्ड स्टार्ट: ऐसी बाइकें जो E-20 फ्यूल के लिए नहीं बनी हैं, उन्हें सुबह के वक्त स्टार्ट करने में दिक्कत आ रही है। ठंड के मौसम में परेशानी बढ़ जाती है। 2. रबर और प्लास्टिक पार्ट पर असर: इससे फ्यूल से जुड़े पार्ट्स जैसे- सील, होज और गैस्केट जल्दी खराब हो रहे हैं। E-20 फ्यूल को सपोर्ट करने वाली नई बाइक में ये दिक्कतें नहीं आ रहीं। 3 फ्यूल टैंक में नमी और जंग: पिछले एक से डेढ़ साल में देखा गया कि लंबे समय तक बाइक बंद पड़ी रहने पर फ्यूल सिस्टम में जंग लग जाती है। इससे जुड़े पार्ट्स भी खराब हो जाते हैं। 4. माइलेज में कमी: माइलेज में करीब 5-7% की कमी देखी गई। 5. इंजन की परफॉर्मेंस: गाड़ी के पिकअप और थ्रोटल रिस्पॉन्स में फर्क महसूस हो रहा है। ‘माइलेज और इंजन की टेस्टिंग का डेटा तैयार करना जरूरी’ ऑटोमोटिव एक्सपर्ट टूटू धवन कहते हैं, ‘एथेनॉल से लोग गाड़ियों का माइलेज कम होने की शिकायत कर रहे हैं, लेकिन इसकी सही तरीके से टेस्टिंग नहीं हो रही है। सरकार और एजेंसी को माइलेज की टेस्टिंग करके डेटा पेश करना चाहिए।’ ‘एथेनॉल के नमी सोखने से इंजन में कितनी दिक्कत हो रही है, इस पर डिटेल स्टडी की जरूरत है। इंजन के रबर और प्लास्टिक पार्ट पर भी असर होना तय है। पुरानी गाड़ियों के इंजन पर असर होगा, लेकिन ऐसा नहीं है कि गाड़ी 2-3 दिन में ही खराब हो जाए। इसमें वक्त लगेगा।’ पुरानी कार वाले ओनर्स के लिए वे 3 सलाह देते हैं… 1. गाड़ी लंबे वक्त तक खड़ी न रखें, बीच-बीच में चलाते रहें। 2. फ्यूल से जुड़े पार्ट्स को समय-समय पर मॉनीटर करें। 3. पेट्रोल के साथ 0.5% टू-टी ऑयल डालें। एथेनॉल की वजह से गाड़ियों में आ रही दिक्कतों को लेकर हमने सरकार का पक्ष जानने की कोशिश की। हमने पेट्रोलियम मिनिस्ट्री को सवाल भी भेजे हैं, जिनका जवाब मिलने पर खबर में शामिल करेंगे। ……………… ये खबर भी पढ़ें… 100% इथेनॉल से चलेंगी गाड़ियां, सरकार ने दी मंजूरी केंद्र सरकार ने देश में 100% शुद्ध इथेनॉल को बतौर ईंधन इस्तेमाल करने की मंजूरी दे दी है। केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने शनिवार, 13 जून को नागपुर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान इसकी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस फैसले से जुड़े नियमों और रेगुलेशंस को अंतिम रूप देने वाली फाइल पर उन्होंने साइन कर दिए हैं। पूरी खबर पढ़िए…
स्विट्जरलैंड वार्ता के बीच अमेरिका का बड़ा कदम, ईरानी तेल निर्यात को अगस्त तक मिली राहत
अमेरिका ने सोमवार को ईरानी तेल के निर्यात पर लगी कुछ पाबंदियों में अगस्त तक के लिए ढील दे दी
नेतन्याहू का बड़ा बयान, दक्षिणी लेबनान में आईडीएफ को कार्रवाई की पूरी छूट
इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि दक्षिणी लेबनान में तैनात इजरायली रक्षा बल (आईडीएफ) के सैनिकों को अपने खिलाफ या उत्तरी इजरायल के निवासियों के खिलाफ किसी भी सीधे या उभरते खतरे को रोकने के लिए पूरी कार्रवाई की स्वतंत्रता है।
पाकिस्तान के रक्षामंत्री ख्वाजा आसिफ ने सीधे शब्दों में कहा- जिस पल हमारे पानी पर खतरा महसूस हुआ, हम बिना शक भारत के खिलाफ जंग छेड़ देंगे। इस खुली धमकी के पीछे है सिंधु जल समझौता, जिसे भारत ने अप्रैल 2025 में निलंबित कर दिया था। पिछले 14 महीनों में पाकिस्तान को कितना नुकसान हुआ, भारत पूरा पानी रोकने की तैयारी कैसे कर रहा और क्या पाकिस्तान वाकई जंग छेड़ देगा; समझेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: सिंधु जल समझौता है क्या और भारत ने इस पर रोक क्यों लगाई? जवाब: ये समझौता भारत-पाकिस्तान के बीच नदियों के पानी का बंटवारा करता है। 19 सितंबर 1960 को भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने इस पर दस्तखत किए थे। इसके जरिए सिंधु जल प्रणाली में पूरब की 3 नदियों का पानी भारत को और पश्चिम की 3 नदियों का पानी पाकिस्तान को देना तय हुआ था। 65 साल तक ये संधि चलती रही, लेकिन अप्रैल 2025 में भारत ने इसे निलंबित कर दिया। दरअसल, 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 लोग मारे गए थे। इसके पीछे पाकिस्तान-समर्थित आतंकियों का हाथ था। जवाब में भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ 5 बड़े एक्शन लिए थे। इनमें से एक था- जब तक पाकिस्तान सीमा पार से आतंकवाद का समर्थन नहीं रोकता, सिंधु जल समझौता निलंबित रहेगा। सवाल-2: संधि निलंबित होने के बाद 14 महीनों में पाकिस्तान पर क्या असर पड़ा? जवाबः संधि रुकते ही सबसे पहले दोनों देशों के बीच नदियों के पानी को लेकर डेटा शेयरिंग बंद हुई। भारत अब नदियों के बहाव, बाढ़ की चेतावनी या बांधों से छोड़े जाने वाले पानी की जानकारी नहीं देता। इससे पाकिस्तान पर 3 बड़े असर पड़े हैं… 1. पंजाब और सिंध में फसल बुआई में देरी 2. पाकिस्तान की नहरों में पानी घटा पाकिस्तान के सिंध प्रांत में सिंधु नदी का पानी सुक्कुर बैराज से नियंत्रित होता है। इससे निकलने वाली नहरों से सिंध प्रांत में सिंचाई होती है। वहां के सिंचाई विभाग के मुताबिक इसकी 3 कैनालों में पानी की कमी हो गई है। यह इस प्रकार है… 3. राज्यों में पानी को लेकर झगड़ा बढ़ा सवाल-3: संधि निलंबित रहने से लंबे वक्त में पाकिस्तान को क्या घाटा होगा? जवाबः पाकिस्तान के पूर्व सिंधु जल कमिश्नर जमात अली शाह के मुताबिक, अभी तक खेती को कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ। लेकिन असली खतरा आगे है। अगर भारत ने पानी स्टोर करने के नए प्रोजेक्ट बनाए, तो अगले 5 से 10 साल में पाकिस्तान पर गंभीर असर पड़ेगा। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक पाकिस्तान की 1.8 करोड़ हेक्टेयर जमीन की सिंचाई सिंधु नदी प्रणाली की नदियों से होती है। यह पाकिस्तान की कृषि भूमि का करीब 80% है। देश के करीब हर चौथे शख्स की आमदनी खेती पर टिकी है। अगर यहां चोट पहुंची, तो पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था बुरी तरह डगमगा जाएगी। अगर भारत ने पानी का बहाव पूरी तरह रोक दिया, तो पाकिस्तान के मंगल और तारबेला हाइड्रोपावर डैम को पानी नहीं मिल पाएगा। इससे पाकिस्तान के बिजली उत्पादन में 30% से 50% तक की कमी आ सकती है। इससे औद्योगिक उत्पादन और रोजगार पर असर पड़ेगा। सवाल-4: क्या भारत सिंधु जल का पानी पूरी तरह पानी रोकने वाला है?जवाबः पिछले साल 12 मई को पीएम मोदी ने कहा था, ‘पानी और खून एक साथ नहीं बह सकता।’ जून 2025 में गृहमंत्री अमित शाह ने एक इंटरव्यू में कहा कि अब इस समझौते को कभी बहाल नहीं किया जाएगा। वो बोले- ‘अंतरराष्ट्रीय समझौतों को एकतरफा रद्द नहीं किया जा सकता, लेकिन हमारे पास इसे स्थगित करने का हक था। वही हमने किया है।’ यूनाइटेड नेशंस में भारत के स्थायी मिशन में प्रथम सचिव अनुपमा सिंह ने 19 जून को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद, यानी UNHRC में भी यही बात दोहराई। उन्होंने पाकिस्तान को 'फ्रैंकस्टीन स्टेट' तक कह दिया। यानी ऐसा देश जो खुद के बनाए आतंकी ढांचे का शिकार बन गया है। जून 2026 में भारत के जल संसाधन मंत्री सी. आर. पाटिल ने एक इंटरव्यू में कहा कि अगले 2 साल में सिंधु नदी का एक बूंद पानी पाकिस्तान नहीं जाएगा। लेकिन सवाल है कि क्या भारत के पास पानी रोकने की क्षमता है? अचानक पानी रोकने से भारत के पंजाब और जम्मू-कश्मीर के इलाकों में बाढ़ की स्थिति भी बन सकती है। भाखरा ब्यास प्रबंधन बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष देवेंद्र कुमार शर्मा के मुताबिक, ‘अगर भारत अपनी भंडारण क्षमता का पानी पाकिस्तान की तरफ बाढ़ लाने के लिए छोड़ेगा, तो पहले भारत के 50-80 किमी क्षेत्र में भी तो बाढ़ आएगा। ऐसा भारत कभी नहीं चाहेगा।’ सवाल-5: क्या सिंधु के पानी के लिए पाकिस्तान वाकई जंग छेड़ देगा? जवाबः पाकिस्तान के नेता और सैन्य अफसर लगातार ऐसे बयान दे रहे हैं… बोस्टन यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल अफेयर्स के प्रोफेसर आदिल नजाम मानते हैं कि पाकिस्तान बार-बार कहता है कि पानी रोकना युद्ध की वजह बनेगा। यह कोई बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात नहीं है। क्योंकि पाकिस्तान सूखा देश है और उसके पास पानी का कोई दूसरा जरिया नहीं है। हालांकि स्वीडन की उप्साला यूनिवर्सिटी में पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट रिसर्च के प्रोफेसर अशोक स्वैन का मानना है कि ये सब राजनीतिक दिखावा है। कोई देश पानी को लेकर मिलिट्री एक्शन ले, इसकी संभावना कम है। दोनों पक्ष अच्छी तरह जानते हैं कि अगर एक-दूसरे के बांधों पर हमला किया, तो यह बहुत बड़ी तबाही होगी। हाल ही में खबरें आईं कि भारत-पाकिस्तान के बीच बैक-चैनल बातचीत हुई हैं। JNU में इंटरनेशनल रिलेशंस के एसोसिएट प्रोफेसर राजन कुमार बताते हैं कि सिंधु जल समझौते को लेकर दोनों देश डिप्लोमेटिक और मिलिट्री लेवल पर कई दौर की बातचीत कर सकते हैं। दोनों अपना पक्ष रखेंगे। जब दोनों सहमत हो जाएंगे, तो इसे वापस बहाल भी किया जा सकता है। ----------------यह खबर भी पढ़िए… पाकिस्तान की नई 'हैंगोर' पनडुब्बी कितनी घातक, क्या बंगाल की खाड़ी में भारत को घेर पाएगी; 1971 में भारतीय युद्धपोत ‘खुखरी’ डुबोया था पाकिस्तानी नौसेना में एक नाम लौट आया है ‘PNS हैंगोर’। ये है चीन में बनी नई पाकिस्तानी पनडुब्बी। ये 11 जून को कराची पहुंची। पाकिस्तान इसे बंगाल की खाड़ी में तैनात करेगा। इसी हैंगोर नाम की पनडुब्बी ने 1971 की जंग में भारतीय युद्धपोत ‘INS खुखरी’ को डुबो दिया था। जंग के दौरान किसी भारतीय पोत के डूबने की यह इकलौती घटना है। पूरी खबर पढ़िए…
जेल में बलूचों पर जुल्म: पाकिस्तान की कालकोठरी में अत्याचार के खिलाफ 9 दिनों से महाधरना
पाकिस्तान के अशांत प्रांत बलूचिस्तान से मानवाधिकारों के हनन और जेलों के भीतर हो रहे अमानवीय बर्ताव को लेकर बेहद विचलित करने वाली खबर सामने आ रही है। पाकिस्तानी जेलों की कालकोठरियों में बंद बलूच कैदियों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर हो रहे भयंकर अत्याचार और उत्पीड़न के खिलाफ पीड़ितों के परिवारों और स्थानीय नागरिकों का गुस्सा फूट पड़ा है। इस दमनकारी नीति के विरोध में प्रदर्शनकारी पिछले 9 दिनों से लगातार खुले आसमान के नीचे धरने पर बैठे हुए हैं। कड़ाके की ठंड, भूख और प्यास की परवाह किए बिना न्याय की गुहार लगा रहे इन बलूचों की सुनने वाला कोई नहीं है। पाकिस्तानी सरकार और स्थानीय प्रशासन की इस अनदेखी ने बलूचिस्तान के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तनाव बढ़ा दिया है।पाकिस्तानी हुकूमत की दमनकारी नीति और लापता लोगों का बढ़ता दर्दबलूचिस्तान के क्वेटा, ग्वादर और कराची जैसे प्रमुख शहरों में इस आंदोलन की गूंज साफ सुनाई दे रही है। धरने पर बैठे प्रदर्शनकारियों और बलूच एकजुटता समितियों का आरोप है कि जेलों में बंद बलूच युवाओं को बुनियादी मानवाधिकारों जैसे चिकित्सा, कानूनी सहायता और परिजनों से मिलने की अनुमति तक नहीं दी जा रही है। इसके अलावा, कई ऐसे बलूच नागरिक भी हैं जो महीनों से पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों की अवैध हिरासत में हैं और उनके ठिकाने के बारे में कोई जानकारी नहीं दी जा रही है। प्रदर्शन कर रही महिलाओं और बच्चों का कहना है कि वे तब तक पीछे नहीं हटेंगे जब तक उनके अपनों को अदालतों के सामने पेश नहीं किया जाता और जेलों में टॉर्चर बंद नहीं होता।कूटनीतिक गलियारों और वैश्विक स्तर पर उठने लगी बलूचों की आवाजपाकिस्तानी मीडिया में इस महाधरने को पूरी तरह से सेंसर करने या दबाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन सोशल मीडिया के माध्यम से यह दर्दनाक कहानी अब पूरी दुनिया के सामने आ चुकी है। नई दिल्ली, वाशिंगटन, लंदन और जिनेवा में सक्रिय मानवाधिकार संगठनों ने इस मामले पर गहरी चिंता व्यक्त की है। विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान सरकार इस मुद्दे को दबाकर बलूचिस्तान में चल रहे स्वतंत्रता और अधिकारों के आंदोलन को कमजोर करना चाहती है। कूटनीतिक जानकारों के मुताबिक, जेलों में हो रहे इस क्रूर अत्याचार और नौ दिनों की लंबी अनदेखी के कारण पाकिस्तान एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों के घेरे में आ गया है।क्या बलूचिस्तान में स्थिति बेकाबू होने का इंतजार कर रहा है प्रशासनधरने के नौवें दिन भी किसी सरकारी प्रतिनिधि या सैन्य अधिकारी द्वारा प्रदर्शनकारियों से बातचीत न करना यह साफ दर्शाता है कि पाकिस्तानी प्रशासन इस गंभीर संकट को लेकर कितना असंवेदनशील है। स्थानीय बलूच नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी जायज मांगें जल्द नहीं मानी गईं और जेलों में बंद कैदियों पर टॉर्चर नहीं रुका, तो यह शांत धरना एक उग्र आंदोलन में तब्दील हो सकता है। पूरे प्रांत में सुरक्षा व्यवस्था को कड़ा कर दिया गया है और कई इलाकों में इंटरनेट सेवाओं पर भी पाबंदी लगा दी गई है, जिससे बलूचिस्तान के जमीनी हालात पल-पल में और अधिक संवेदनशील होते जा रहे हैं।
दुनिया के सबसे बड़े लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) उत्पादक देशों में शुमार कतर से एक बेहद परेशान करने वाली और बड़ी खबर सामने आ रही है। कतर के सबसे प्रमुख और विशालकाय औद्योगिक शहर रास लफान (Ras Laffan Industrial City) स्थित सबसे बड़े गैस प्रोसेसिंग प्लांट में एक भीषण धमाका हुआ है। धमाका इतना जोरदार था कि इसकी आवाज कई किलोमीटर दूर तक सुनी गई और देखते ही देखते प्लांट से हाहाकारी लपटें और काले धुएं का विशाल गुबार आसमान की तरफ उठने लगा। इस अप्रत्याशित हादसे के बाद पूरे औद्योगिक परिसर और आस-पास के रिहायशी इलाकों में हड़कंप मच गया है और चारों तरफ अफरा-तफरी का माहौल देखा जा रहा है।रास लफान कॉम्प्लेक्स में इमरजेंसी घोषित और रेस्क्यू ऑपरेशन शुरूहादसे की भयावहता को देखते हुए कतर की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों और रास लफान के फायर एंड सेफ्टी डिपार्टमेंट ने पूरे इंडस्ट्रियल टाउनशिप में रेड अलर्ट और इमरजेंसी घोषित कर दी है। दर्जनों फायर टेंडर्स और एम्बुलेंस को तुरंत मौके पर रवाना किया गया है। शुरुआती रिपोर्टों के मुताबिक, आग की लपटों पर काबू पाने और प्लांट के भीतर फंसे कर्मचारियों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए बड़े पैमाने पर रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया जा रहा है। कतरी अधिकारियों की ओर से अभी तक हादसे में हताहत होने वाले लोगों की आधिकारिक संख्या जारी नहीं की गई है, लेकिन रिफाइनरी और गैस यूनिट्स को एहतियातन पूरी तरह से शटडाउन कर दिया गया है।वैश्विक एलएनजी सप्लाई ठप होने का डर और भारत की बढ़ेगी टेंशनरास लफान इंडस्ट्रियल सिटी सिर्फ कतर के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) के लिए रीढ़ की हड्डी मानी जाती है। यहीं से दुनिया के कोने-कोने में गैस का निर्यात किया जाता है। दिल्ली, मुंबई सहित भारत के विभिन्न हिस्सों में आयात होने वाली एलएनजी का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी प्लांट से आता है। ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस धमाके के कारण प्लांट को भारी नुकसान पहुंचा है और उत्पादन लंबे समय के लिए ठप होता है, तो वैश्विक बाजार में प्राकृतिक गैस की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है, जिससे भारत जैसी निर्भर अर्थव्यवस्थाओं का बजट बिगड़ सकता है।तकनीकी खराबी या कुछ और, जांच में जुटी कतर की सुरक्षा एजेंसियांइस भीषण विस्फोट की वजह क्या थी, इसे लेकर अभी तक कतर गैस या सरकारी स्तर पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। कतर की सुरक्षा एजेंसियां इस बात की गहन जांच कर रही हैं कि यह हादसा किसी तकनीकी खराबी, गैस पाइपलाइन में लीकेज या प्रेशर बढ़ने की वजह से हुआ है या फिर इसके पीछे कोई अन्य बाहरी कारण है। दुनिया भर के कमोडिटी मार्केट, शेयर बाजारों और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा विश्लेषकों की नजरें इस वक्त दोहा से आने वाले हर छोटे-बड़े अपडेट पर टिकी हुई हैं, क्योंकि इस हादसे के कूटनीतिक और आर्थिक असर बेहद व्यापक हो सकते हैं।
ट्रंप की खुली चेतावनी: सुधर जाओ वरना होगा अब तक का सबसे बड़ा हमला, ईरान से बढ़ा महायुद्ध का खतरा
वैश्विक राजनीति और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे से इस वक्त की बेहद बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक हालिया और बेहद आक्रामक बयान ने मध्य पूर्व (मिडल ईस्ट) सहित पूरी दुनिया में युद्ध की आशंका को गहरा कर दिया है। ट्रंप ने ईरान को बेहद सख्त लहजे में नई धमकी देते हुए साफ कर दिया है कि अगर वह अपनी परमाणु और सैन्य गतिविधियों को तुरंत नहीं रोकता है, तो अमेरिका चुप नहीं बैठेगा। अमेरिकी प्रशासन की ओर से संकेत दिए गए हैं कि यदि ईरान इस अंतिम चेतावनी के बाद भी नहीं माना, तो उस पर एक ऐसा सैन्य हमला किया जाएगा जो इतिहास में पहले कभी नहीं देखा गया है।ट्रंप के सख्त तेवर और व्हाइट हाउस की नई रणनीतिअंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि वाशिंगटन और तेहरान के बीच पहले से जारी तनाव अब अपने सबसे खतरनाक मोड़ पर आ चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने ताजा संबोधन में कहा है कि उनकी सरकार किसी भी कीमत पर अमेरिकी हितों और उसके सहयोगी देशों, विशेष रूप से इजरायल की सुरक्षा से समझौता नहीं करेगी। इस बयान के बाद पेंटागन और अमेरिकी रक्षा विभाग ने भी अपनी रणनीतियों को री-चेक करना शुरू कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप का यह रुख सिर्फ एक चेतावनी नहीं बल्कि एक बड़ी सैन्य कार्रवाई की पूर्वपीठिका भी हो सकता है, जिससे दोनों देशों के बीच सीधे टकराव का रास्ता खुल सकता है।मिडल ईस्ट में हाई अलर्ट और वैश्विक बाजारों पर असरट्रंप की इस नई धमकी के बाद पूरे मिडल ईस्ट के देशों में भारी हलचल देखी जा रही है। सुरक्षा एजेंसियों को हाई अलर्ट पर रख दिया गया है। इस बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tension) का सीधा असर नई दिल्ली, मुंबई, लंदन और न्यूयॉर्क समेत दुनिया भर के शेयर बाजारों और कमोडिटी मार्केट पर भी दिखने लगा है। विशेषज्ञों को डर है कि अगर दोनों देशों के बीच तनाव और अधिक बढ़ता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें आसमान छू सकती हैं, जिसका सीधा असर भारत जैसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं के आयात बिल और महंगाई दर पर पड़ेगा।क्या युद्ध टालने के लिए आगे आएंगे वैश्विक संगठनइस बेहद तनावपूर्ण स्थिति के बीच संयुक्त राष्ट्र (UN) और दुनिया के अन्य प्रमुख देश जैसे भारत, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ लगातार दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील कर रहे हैं। हालांकि, ईरान की ओर से भी अभी तक कोई नरमी के संकेत नहीं मिले हैं, जिससे कूटनीतिक रास्ते बंद होते दिखाई दे रहे हैं। अब पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या ईरान अमेरिकी शर्तों के आगे झुकेगा या फिर दुनिया को एक और भीषण महायुद्ध का सामना करना पड़ेगा। आने वाले कुछ दिन वैश्विक शांति और स्थिरता के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होने वाले हैं।
ट्रंप की धमकी से बिगड़ा माहौल, सिर्फ 80 मिनट ही चली अमेरिका-ईरान वार्ता
प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकिर गलीबाफ ने वार्ता के दौरान ट्रंप की टिप्पणियों पर कड़ा विरोध जताया। उन्होंने कहा कि अमेरिकी धमकियों का तेहरान पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता और ईरान अपनी सुरक्षा और हितों की रक्षा के लिए हर स्थिति का सामना करने के लिए तैयार है।
कतर के रास लाफान गैस प्लांट में धमाका: 54 लोग घायल, 18 लापता, बचाव अभियान तेज
कतर के मुख्य प्राकृतिक गैस निर्यात इंफ्रास्ट्रक्चर में हुए एक धमाके में कम से कम 54 लोग घायल हो गए, जबकि 18 अन्य लोग लापता हैं।
रास लाफान क्षेत्र स्थित बरजान गैस आपूर्ति संयंत्र को ईरान के साथ संघर्ष के दौरान हुए हमलों में भारी नुकसान पहुंचा था। इसके बाद सुरक्षा कारणों से उत्पादन गतिविधियों को रोक दिया गया था।
यदि आप भी आने वाले दिनों में नया आईफोन (iPhone) खरीदने की प्लानिंग कर रहे हैं, तो यह खबर आपके बजट को पूरी तरह बिगाड़ सकती है। टेक दिग्गज ऐपल (Apple) के सीईओ टिम कुक ने खुद इस बात को स्वीकार किया है कि बाजार की मौजूदा परिस्थितियों के चलते अब आईफोन के दाम बढ़ाना कंपनी की मजबूरी बन गया है। हालांकि, इस झटके के तुरंत बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने एक ऐसा बड़ा एलान किया है जिसने पूरी दुनिया के टेक और बिजनेस मार्केट को चौंका दिया है। ट्रंप के मुताबिक, अमेरिकी चिपमेकर कंपनी इंटेल (Intel) और ऐपल के बीच एक ऐतिहासिक डील हुई है, जिसके तहत अब आईफोन के सुपर-फास्ट कंप्यूटर चिप्स का निर्माण पूरी तरह अमेरिका के अंदर ही किया जाएगा।क्यों महंगे होने वाले हैं आईफोन? टिम कुक ने बताई असली वजहऐपल के सीईओ टिम कुक ने 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' को दिए एक बेहद खास इंटरव्यू में साफ किया है कि उनके अपकमिंग प्रोडक्ट्स की कीमतों में होने वाली बढ़ोतरी को अब और ज्यादा समय तक टाला नहीं जा सकता। टिम कुक ने इसके पीछे 'एआई बूम' (AI Boom) को सबसे बड़ा जिम्मेदार ठहराया है।उन्होंने बताया कि इस समय पूरी दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence) तकनीक की मांग तेजी से बढ़ी है, जिसके कारण टेक इंडस्ट्री में इस्तेमाल होने वाले हाई-एंड मेमोरी और स्टोरेज चिप्स की मैन्युफैक्चरिंग लागत (लागत मूल्य) आसमान छू रही है। टिम कुक के मुताबिक, ऐपल ने काफी समय तक इन बढ़े हुए खर्चों का बोझ खुद उठाया ताकि ग्राहकों पर इसका सीधा असर न पड़े, लेकिन अब स्थिति पूरी तरह कंट्रोल से बाहर हो चुकी है। मुनाफा बनाए रखने और एडवांस तकनीक देने के लिए डिवाइस के दाम बढ़ाना ही अब एकमात्र रास्ता बचा है।डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा धमाका: इंटेल और ऐपल आए साथ, ताइवान पर निर्भरता होगी खत्मआईफोन की कीमतें बढ़ने की खबरों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' (Truth Social) पर एक पोस्ट के जरिए इस ऐतिहासिक कूटनीतिक और व्यापारिक डील का खुलासा किया। ट्रंप ने बताया कि इंटेल ने ऐपल के साथ मिलकर अमेरिका की धरती पर ही एडवांस कंप्यूटर चिप्स बनाने का महा-समझौता फाइनल कर लिया है। ट्रंप ने लिखा कि उन्होंने इंटेल की मदद करने का फैसला इसलिए किया क्योंकि अमेरिका को तकनीकी मोर्चे पर आत्मनिर्भर बनने और देश में ही चिप्स डिजाइन व बिल्ड करने की सख्त जरूरत है। इस खबर के सार्वजनिक होते ही वॉल स्ट्रीट पर इंटेल के शेयर्स प्री-मार्केट ट्रेडिंग में ही 9% से ज्यादा उछल गए।इस कदम से ऐपल को अपनी सप्लाई चेन को सुरक्षित करने में बहुत बड़ी मदद मिलेगी। दरअसल, अब तक कैलिफोर्निया स्थित ऐपल कंपनी अपने आईफोन, आईपैड और मैक कंप्यूटरों को पावर देने वाले एडवांस्ड प्रोसेसर और सिलिकॉन चिप्स के लिए पूरी तरह से ताइवान (विशेषकर TSMC) पर निर्भर थी। चीन और ताइवान के बीच लगातार बढ़ते भू-राजनीतिक (Geopolitical) तनाव को देखते हुए ऐपल के लिए यह एक बहुत बड़ा बिजनेस रिस्क था। अब इंटेल के साथ हाथ मिलाने से ऐपल अमेरिका के घरेलू प्लांट में ही अपनी चिप्स का सुरक्षित प्रोडक्शन कर सकेगी।ट्रंप की 'जादुई' इन्वेस्टमेंट: 9 महीनों में अमेरिकी सरकार को हुआ करोड़ों का मुनाफाराष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी पोस्ट में इस बात का भी गर्व से जिक्र किया कि उनके प्रशासन ने पिछले साल अगस्त में इंटेल कंपनी में 8.9 बिलियन डॉलर का बड़ा सरकारी निवेश करके करीब 10% की हिस्सेदारी खरीदी थी। ट्रंप ने चुटकी लेते हुए लिखा कि जब यह सरकारी डील हुई थी, तब इंटेल की कुल मार्केट वैल्यू करीब 100 बिलियन डॉलर थी।लेकिन महज 9 महीनों के भीतर आज इंटेल की वैल्यू बढ़कर 600 बिलियन डॉलर से ज्यादा के रिकॉर्ड स्तर को पार कर चुकी है। इसका सीधा मतलब यह है कि अमेरिकी सरकार की 10% हिस्सेदारी की कीमत अब ₹60 बिलियन डॉलर से ऊपर पहुंच चुकी है, जिससे अमेरिकी खजाने को बंपर मुनाफा हुआ है।राष्ट्रीय सुरक्षा और आत्मनिर्भर अमेरिका का सपनासेमीकंडक्टर (चिपमेकिंग) उद्योग में अमेरिका को दुनिया का सबसे बड़ा और एकछत्र लीडर बनाना ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक है। अमेरिकी सरकार का मानना है कि घरेलू स्तर पर एडवांस चिप्स की मजबूत सप्लाई चेन होने से देश की राष्ट्रीय सुरक्षा (National Security) को कोई खतरा नहीं रहेगा और विदेशी निर्भरता खत्म होगी। हालांकि, इस पूरी मेगा डील और आईफोन की बढ़ी हुई कीमतों पर अभी तक ऐपल की तरफ से कोई आधिकारिक प्रेस नोट जारी नहीं किया गया है, लेकिन टेक एक्सपर्ट्स का मानना है कि आने वाले दिनों में प्रीमियम स्मार्टफोन लवर्स की जेब का ढीला होना पूरी तरह तय है।
स्विट्जरलैंड के बुर्गेनस्टॉक रिजॉर्ट में मिडिल ईस्ट संकट (Middle East Crisis) को सुलझाने के लिए चल रही अमेरिका-ईरान की हाई-लेवल शांति वार्ता सोमवार (22 जून) को एक बेहद तनावपूर्ण और नाटकीय मोड़ पर पहुंच गई। वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति को स्थिर करने के उद्देश्य से बुलाई गई यह महाबैठक देर रात तक चली मैराथन चर्चा के बाद कूटनीतिक भंवर में फंसती नजर आ रही है। न्यूज एजेंसी एएफपी (AFP) को एक अमेरिकी राजनयिक से मिली जानकारी के अनुसार, रात भर चलने वाली इस बातचीत में देर रात एक ऐसा भारी हंगामा हुआ कि ईरानी प्रतिनिधिमंडल बीच में ही बैठक छोड़कर बाहर निकल गया।ट्रंप के एक बयान से भड़का ईरान, कूटनीतिक महामंथन में पड़ा खललवैश्विक शांति की उम्मीदों को उस समय बड़ा झटका लगा जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक हालिया बयान ने तेहरान के अधिकारियों को पूरी तरह भड़का दिया। ट्रंप ने ईरान को सख्त लहजे में चेतावनी दी थी कि वह लेबनान में सक्रिय संगठन हिज्बुल्लाह द्वारा इजरायल पर किए जा रहे हमलों का समर्थन करना तुरंत बंद करे, अन्यथा उसे इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।राष्ट्रपति ट्रंप की इस सीधी धमकी से नाराज ईरानी प्रतिनिधिमंडल कुछ देर के लिए वार्ता की टेबल से उठकर बाहर चला गया। हालांकि, राजनयिक सूत्रों का कहना है कि यह ऐतिहासिक शांति वार्ता अभी पूरी तरह से खत्म या रद्द नहीं हुई है। दोनों देशों के बीच पहले से तय किए गए 60 दिनों के कूटनीतिक रोडमैप के तहत पर्दे के पीछे विचार-विमर्श और संवाद का सिलसिला आने वाले दिनों में भी जारी रहेगा।कैमरों में कैद हुए वैश्विक नेताओं के हाव-भाव, सोशल मीडिया पर वीडियो वायरलबुर्गेनस्टॉक रिजॉर्ट के कूटनीतिक गलियारों में सोमवार सुबह कुछ ऐसे दृश्य देखने को मिले, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय मीडिया और सोशल मीडिया पर एक नई बहस छेड़ दी है। इस हाई-प्रोफाइल कार्यक्रम में शामिल विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों की गतिविधियां, उनके आपसी व्यवहार और शरीर की भाषा (Body Language) कैमरों में कैद हो गई, जिसके वीडियो अब इंटरनेट पर तेजी से वायरल हो रहे हैं:ईरानी डेलीगेशन का कड़ा रुख: बैठक में शामिल ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने अमेरिकी रुख के विरोध में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों की सबसे अहम औपचारिकता यानी 'सामूहिक फोटो सत्र' (Group Photo Session) का पूरी तरह से बायकॉट (बहिष्कार) कर दिया। वे बिना ग्रुप तस्वीर खिंचवाए ही कार्यक्रम स्थल से रवाना हो गए। हालांकि इसका कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं आया है, लेकिन इसे एक कड़ा राजनीतिक संकेत माना जा रहा है।कतर के मंत्री ने दिखाई बेरुखी: रिपोर्टों और वायरल वीडियो के अनुसार, कतर के एक बेहद वरिष्ठ मंत्री और अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस (JD Vance) के बीच औपचारिक अभिवादन (Handshake) को लेकर भी गंभीर सवाल उठे हैं। कतरी मंत्री द्वारा अमेरिकी उपराष्ट्रपति से दूरी बनाए रखने की घटना ने कूटनीतिक तनाव को और स्पष्ट कर दिया।पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख के चेहरे की उड़ी हवाइयांइस पूरी शांति वार्ता में खुद को एक बड़े मध्यस्थ या बिचौलिये के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे पाकिस्तान को इस हंगामे से भारी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा है। बैठक के दौरान जब कतर के मंत्री ने अमेरिकी उपराष्ट्रपति से हाथ मिलाने से संकोच किया और ईरानी डेलिगेशन मीटिंग रूम से बाहर चला गया, तब वहां मौजूद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और उनके शक्तिशाली सेना प्रमुख (आर्मी चीफ) जनरल आसिम मुनीर के चेहरों का रंग उड़ गया।तस्वीरों और वीडियो में दोनों पाकिस्तानी दिग्गज बेहद असहज और तनावग्रस्त नजर आ रहे हैं। सोशल मीडिया पर यूजर्स पाकिस्तानी हुक्मरानों की इस स्थिति पर जमकर प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं और इसे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मंच पर पाकिस्तान की एक और 'असफल मध्यस्थता' के रूप में देख रहे हैं।
ईरान डील पर ट्रंप घिरे – अपनी ही पार्टी में बढ़ा असंतोष
ईरान के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ज्ञापन समझौते की, डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन, दोनों पार्टियों ने लगातार आलोचना की
लॉस एंजिल्स में भीषण आग – गोदाम से उठता धुआं थमा नहीं
अमेरिका के लॉस एंजिल्स में एक गोदाम में भीषण आग लग गई है। आग पर काबू पाने की लगातार कोशिश की जा रही हैं; बावजूद इसके धुआं अभी भी उठ रहा है
ब्रिटेन की मध्यस्थता वाले बयान पर बालेन शाह की सफाई, बोले- खुद सुलझाएंगे भारत-नेपाल सीमा विवाद
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने भारत-नेपाल सीमा विवाद को सुलझाने में यूनाइटेड किंगडम (यूके) की संभावित भूमिका को लेकर दिए गए अपने पहले बयान पर सफाई दी

