चीन के मिसाइल परीक्षण से बढ़ी क्षेत्रीय चिंता, जापान और ताइवान समेत कई देशों ने जताई आपत्ति
चीन की सेना ने सोमवार को परमाणु ऊर्जा से चलने वाली एक पनडुब्बी से सफलतापूर्वक प्रशांत महासागर की ओर एक मिसाइल का परीक्षण किया
5 जुलाई को इजराइली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा- अमेरिका ही नहीं, बल्कि हमारे कुछ और दोस्त भी हैं। जैसे- 1.4 अरब आबादी वाला भारत। नेतन्याहू का ये बयान अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को जवाब था। वेंस ने पिछले महीने कहा था कि ट्रम्प दुनिया के इकलौते ताकतवर देश के नेता हैं, जो इजराइल से सहानुभूति रखते हैं। आखिर नेतन्याहू ने इकलौते भारत का ही जिक्र क्यों किया, दोनों देशों की ‘पक्की दोस्ती’ के पीछे की कहानी, 4 चैप्टर्स में… भारत-इजराइल में औपचारिक राजनयिक संबंध 1992 में बने, लेकिन उससे काफी पहले से इजराइल मुसीबत में भारत की गुपचुप तरीके से मदद करने लगा था… 1962: जब इजराइली झंडे लगे जहाज हथियार लेकर भारत पहुंचे 1965 और 1971: पाकिस्तान के खिलाफ मोर्टारों की खेप भेजी 1999: कारगिल में इजराइली तकनीक से उड़ाए पाकिस्तानी बंकर इजराइल को 14 मई 1948 को आजादी मिली। संयुक्त राष्ट्र में इजराइल और फिलिस्तीन को बांटकर दो देश बनाने का प्रस्ताव पेश हुआ, तो भारत ने इसके खिलाफ वोट किया था। हालांकि, अगले ही साल 17 सितंबर, 1950 को भारत ने आधिकारिक रूप से इजराइल को एक संप्रभु राष्ट्र के बतौर मान्यता दी। 'इंडिया इजराइल पॉलिसी' नाम की किताब लिखने वाले भारत के फॉरेन एक्सपर्ट पी.आर. कुमारस्वामी कहते हैं कि भारत और इजराइल के बीच 1950 से 1992 तक बिना रिश्तों के मान्यता वाला संबंध रहा।' 1971 की जंग में इजराइल ने विदेशी मंचों पर भी भारत का समर्थन किया और पाकिस्तानी सेना के पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में नरसंहार की आलोचना की थी। इजराइली पीएम गोल्डा मीर चाहती थीं कि इसके बदले इंदिरा गांधी इजराइल को पूर्ण राजनयिक मान्यता दें और औपचारिक राजनयिक संबंध कायम हों। हालांकि तब भारत ने मान्यता नहीं दी। उलटा 1988 में जब फिलिस्तीन देश की घोषणा हुई, तो भारत इसे मान्यता देने वाला पहला गैर-अरब देश था। हालांकि 4 साल बाद स्थिति तब बदलनी शुरू हुई, जब पीएम नरसिम्हा राव ने इजराइल से राजनयिक संबंध बनाए और दोनों देशों में पहली बार दूतावास खोले गए। पीएम मोदी के सत्ता में आने के बाद भारत-इजराइल रिश्तों का एक नया दौर शुरू हुआ। 2015 में इतिहास में पहली बार संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में भारत ने फिलिस्तीन में इजराइली हमलों की निंदा करने वाले एक प्रस्ताव पर वोटिंग से परहेज किया। जबकि इसे 45 देशों ने पारित किया था। पीएम मोदी के दौर में इजराइल को खुला समर्थन दिया इजराइली हथियारों की खरीद में भारत की एक-तिहाई हिस्सेदारी भारत-इजराइल के बीच 1 लाख करोड़ का कारोबार 1992 में भारत और इजराइल के बीच द्विपक्षीय रिश्तों की शुरुआत हुई, तब दोनों देशों का व्यापार 202 मिलियन डॉलर का था। 2022-23 तक बढ़कर यह 10.77 बिलियन डॉलर, यानी १ लाख करोड़ पहुंच गया। हालांकि बीते 2 सालों में द्विपक्षीय व्यापार में कमी आई है। इसकी वजह इजराइल-हमास जंग और इसकी वजह से समुद्री रास्ते में आई अड़चने हैं। टाटा, अडाणी जैसी कंपनियों के इजराइल में निवेश नेतन्याहू के बयान के 3 मायने हैं… 1. अकेला पड़ गया है इजराइल: स्ट्रैटजिक एक्सपर्ट ब्रह्म चेलानी के मुताबिक युद्ध के समय नेतन्याहू सरकार के तौर-तरीकों के चलते इजराइल दुनिया में अलग-थलग पड़ गया है। यह लंबे समय में इजराइल के लिए खतरनाक है। वो दूसरे देशों का समर्थन जुटाना चाहता है, इसीलिए भारत का जिक्र किया। भारत और इजराइल के संबंध अहम हैं, लेकिन भारत में इजराइल के लोगों के प्रति सद्भावना है, न कि नेतन्याहू की सरकार के लिए। 2. नेतन्याहू घरेलू राजनीति साध रहे: भारतीय थिंकटैंक ORF में नॉन-रेसिडेंट फेलो और मिडिल ईस्ट मामलों के जानकार कबीर तनेजा कहते हैं, ‘नेतन्याहू के भारत को दोस्त बताने वाले बयान को उनकी घरेलू राजनीति से जोड़कर देखा जाना चाहिए। उन पर मुकदमे चल रहे हैं और चुनाव आने हैं। घरेलू समर्थन कम न हो, इसलिए वे दिखा रहे हैं कि इजराइल अलग-थलग नहीं पड़ा है।' कबीर तनेजा कहते हैं कि इजराइल-भारत की स्ट्रैटजिक पार्टनरशिप खास तौर पर डिफेंस सेक्टर में है। इजराइल भारत को एडवांस हथियार देता है। ये साझेदारी नेतन्याहू के पहले भी थी और उनके बाद भी रहेगी। 3. भारत की संतुलन की पॉलिसी के लिए मुश्किल: जॉर्डन, लीबिया और रूस में भारत के राजदूत रहे अनिल त्रिगुणायत बताते हैं, ‘नेतन्याहू का का यह बयान भारत को गलत ब्रैकेट में डाल रहा है। भारत ने कभी भी इजराइल को बिना शर्त समर्थन नहीं दिया है। इस बयान के बाद भारत, इजराइल के साथ अपने संबंधों का पुनर्मूल्यांकन कर सकता है।’ दरअसल, भारत बाकी देशों से भी अपने रिश्ते संतुलित रखने की कोशिश करता है। मिसाल के लिए जून 2025 में SCO समिट के दौरान भारत ने ईरान पर इजराइल और अमेरिका के हमलों की निंदा वाले प्रस्ताव से दूरी बनाई। हालांकि सितंबर में दोबारा इसी प्रस्ताव की घोषणा पर भारत ने साइन कर दिए थे। -------- ये खबर भी पढ़िए… आज का एक्सप्लेनर:दर्जनभर लोगों से गुजरकर मुजतबा तक पहुंचती है कोई चिट्ठी; पिता को कंधा देने पर सस्पेंस, क्या इजराइल वाकई मार देगा रान के सुप्रीम लीडर रहे आयतुल्लाह अली खामेनेई के अंतिम संस्कार की रस्में जारी हैं। 100 से ज्यादा देशों के नेता पहुंच रहे हैं। काले कपड़ों में रोते-बिलखते लाखों ईरानी अपने ‘रहबर’ का आखिरी दीदार करना चाहते हैं। इन सबके बीच ईरान के नए सुप्रीम लीडर मुजतबा खामेनेई गायब हैं। पिता के जनाजे को कंधा देंगे या नहीं, इस पर भी सस्पेंस है। क्या वो जिंदा भी हैं, अगर हां तो किस हाल में, पूरी खबर पढ़ें…
चीन में तख्तापलट का डर? शी चिनफिंग ने अचानक हटाए 101 टॉप सैन्य कमांडर, सेना में लागू किया 'माओ मॉडल'
चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के भीतर इस समय इतिहास की सबसे बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल मची है। राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने अपनी सत्ता और सेना पर पकड़ मजबूत करने के लिए एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए 101 शीर्ष सैन्य अधिकारियों को पद से बर्खास्त या गायब कर दिया है। चीन की सबसे शक्तिशाली सैन्य संस्था 'केंद्रीय सैन्य आयोग' (CMC) के लगभग खाली होने के बाद, चिनफिंग ने सेना की कमान पूरी तरह अपने दो सबसे भरोसेमंद वफादारों— झांग शुगुआंग और वांग गैंग को सौंप दी है।क्या है खतरनाक 'माओ मॉडल' और बंदूक पर चिनफिंग का कब्जा?शी चिनफिंग के इस आक्रामक कदम को चीन के संस्थापक माओ जेदोंग के ऐतिहासिक 'माओ मॉडल' से जोड़कर देखा जा रहा है। इस रणनीति का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि देश की कम्युनिस्ट पार्टी और 20 लाख सैनिकों वाली दुनिया की सबसे बड़ी सेना का हर बड़ा अधिकारी सिर्फ और सिर्फ राष्ट्रपति के प्रति वफादार रहे। साल 2024 में खुद चिनफिंग ने खुलेआम कहा था कि बंदूक सिर्फ वफादार हाथों में ही रहनी चाहिए। सात सदस्यीय टॉप कमांड सेंटर (CMC) में अब प्रभावी रूप से केवल चिनफिंग और उपाध्यक्ष झांग शेंगमिन ही बचे हैं, बाकी सभी सीटें भ्रष्टाचार जांच और अचानक गायब होने के कारण खाली हो चुकी हैं।भारत और ताइवान सीमा पर नई नियुक्तियों का क्या होगा असर?चिनफिंग द्वारा प्रमोट किए गए दोनों जनरलों की भूमिका बेहद संवेदनशील है:वायुसेना प्रमुख वांग गैंग: 61 वर्षीय वांग गैंग एक पूर्व स्टंट पायलट रहे हैं। भारत के साथ लगी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) और ताइवान मोर्चे पर चीनी हवाई तैनाती, लड़ाकू विमानों, ड्रोन, मिसाइल सपोर्ट और हाई-एल्टीट्यूड सैन्य ऑपरेशन्स के सभी बड़े फैसले अब सीधे वांग गैंग के हाथों में होंगे।भ्रष्टाचार जांच प्रमुख झांग शुगुआंग: 67 वर्षीय झांग शुगुआंग को CMC की भ्रष्टाचार निरोधक इकाई का नया बॉस बनाया गया है। इसका सीधा मतलब है कि चिनफिंग की 'सेना-सफाई' मुहिम के तहत अगले दौर की गिरफ्तारियां और जांच अब शुगुआंग के इशारे पर ही होंगी।सेना में खालीपन से कमजोर पड़ा चीन का युद्ध तंत्रथिंक टैंक सीएसआईएस (CSIS) की रिपोर्ट के अनुसार, चीनी सेना के शीर्ष 176 अहम पदों में से 101 अधिकारियों के हटने से सेना का आंतरिक तालमेल बेहद कमजोर हुआ है। इसका असर चीन की युद्ध तैयारियों पर भी दिखने लगा है। साल 2024 में जहां चीन ताइवान के खिलाफ महज 3 से 4 दिनों में बड़े सैन्य अभ्यास शुरू कर देता था, वहीं साल 2025 और 2026 में शीर्ष कमान में खालीपन के कारण चीन को प्रतिक्रिया देने और युद्धाभ्यास शुरू करने में 12 से 19 दिनों का लंबा वक्त लग गया। अमेरिका के बाद दुनिया में सबसे ज्यादा रक्षा बजट खर्च करने वाले चीन में इस आंतरिक कलह से उसकी लड़ाकू क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
पंजाब नेशनल बैंक (PNB) को अरबों रुपये का चूना लगाकर देश से भागे हीरा कारोबारी नीरव मोदी की मुश्किलें अब अंतिम पड़ाव पर पहुंच गई हैं। नीरव मोदी यूरोपियन कोर्ट ऑफ ह्यूमन राइट्स (ECHR) में अपनी आखिरी कानूनी लड़ाई भी पूरी तरह हार गया है। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद अब ब्रिटेन से उसकी भारत वापसी और प्रत्यर्पण का रास्ता पूरी तरह साफ हो चुका है। कानूनी दस्तावेजों के अनुसार, नीरव मोदी के पास मौजूद सभी अंतरराष्ट्रीय और स्थानीय कानूनी विकल्प अब पूरी तरह खत्म हो गए हैं और ब्रिटिश सरकार उसे किसी भी वक्त भारत को सौंप सकती है।अप्रैल में गुपचुप लगाई थी गुहार, मानवाधिकार अदालत से भी लगा बड़ा झटकाब्रिटेन की निचली अदालतों और हाई कोर्ट से तगड़ा झटका लगने के बाद नीरव मोदी ने अप्रैल 2026 में यूरोपियन कोर्ट ऑफ ह्यूमन राइट्स (ECHR) का दरवाजा खटखटाया था। इस याचिका को अदालत ने शुरुआत में पूरी तरह गुप्त रखा था। नीरव मोदी ने ब्रिटेन की अदालतों में खुद को बचाने के लिए मशहूर 'भंडारी जजमेंट' का हवाला दिया था, जिसमें रक्षा दलाल संजय भंडारी के मामले में भारत की जेलों में प्रताड़ना के डर को आधार मानकर प्रत्यर्पण से इनकार किया गया था। नीरव ने भी यही दलील दी कि भारत की जेलों में उसकी जान को खतरा हो सकता है और उसे प्रताड़ित किया जा सकता है। हालांकि, भारतीय जांच एजेंसी सीबीआई (CBI) के अधिकारियों ने कोर्ट में जेल की स्थितियों को लेकर पुख्ता सबूत और सरकारी आश्वासन पेश किए, जिसके बाद ब्रिटेन के हाई कोर्ट और अब ECHR ने नीरव मोदी के इन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया।मार्च 2019 से लंदन की वैंड्सवर्थ जेल में बंद है पीएनबी घोटाले का मास्टरमाइंडनीरव मोदी मार्च 2019 में लंदन में हुई अपनी गिरफ्तारी के बाद से लगातार वहां की कुख्यात 'वैंड्सवर्थ जेल' (Wandsworth Prison) में बंद है। भारत में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) को पंजाब नेशनल बैंक (PNB) के महाघोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों में उसकी लंबे समय से तलाश है। ब्रिटेन की अदालत ने अपनी अंतिम टिप्पणी में साफ कहा कि नीरव मोदी का मामला कोई असाधारण या मानवाधिकार उल्लंघन का मामला नहीं है और इस केस को दोबारा खोलने का कोई ठोस आधार नहीं बचता है।कूटनीतिक औपचारिकताएं शुरू, भारतीय जांच एजेंसियां लाने को तैयारराजनयिक और कूटनीतिक सूत्रों के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय अदालत से हरी झंडी मिलने के बाद ब्रिटेन के गृह मंत्रालय और प्रशासनिक अधिकारियों ने नीरव मोदी को भारतीय अधिकारियों को सौंपने की अंतिम प्रक्रिया तेज कर दी है। इस हाई-प्रोफाइल मामले में अब सिर्फ कुछ कागजी और प्रशासनिक औपचारिकताएं ही शेष रह गई हैं। भारतीय सुरक्षा और जांच एजेंसियां किसी भी समय लंदन के लिए उड़ान भर सकती हैं और नीरव मोदी को मुंबई या दिल्ली लाकर कानून के शिकंजे में खड़ा किया जा सकता है।
अंतरराष्ट्रीय रक्षा सौदों और खुफिया एजेंसियों के नाम पर धोखाधड़ी का एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है जिसने जकार्ता से लेकर वॉशिंगटन तक हड़कंप मचा दिया है। भारतीय मूल के बिजनेसमैन गौरव श्रीवास्तव पर आरोप लगा है कि उन्होंने खुद को अमेरिकी खुफिया एजेंसी सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (CIA) का गुप्त एजेंट बताकर इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्राबोवो सुबियांतो से नजदीकियां बढ़ाईं। ऑर्गनाइज्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट (OCCRP) की एक खोजी रिपोर्ट के अनुसार, श्रीवास्तव ने इस फर्जी पहचान का इस्तेमाल इंडोनेशियाई सरकार से फाइटर जेट और अत्याधुनिक सैन्य उपकरणों की अरबों डॉलर की डिफेंस डील हासिल करने के लिए किया था।फोन कॉल से हुआ पर्दाफाश और अदालती मुकदमों में बड़े खुलासेइस पूरी अंतरराष्ट्रीय साजिश की पोल तब खुली जब गौरव श्रीवास्तव के पूर्व बिजनेस पार्टनर नील्स ट्रोस्ट ने कैलिफोर्निया और न्यूयॉर्क के दक्षिणी जिले की अदालतों में मुकदमे दायर किए। इन मुकदमों और रिकॉर्ड की गई फोन कॉलों के आधार पर दावा किया गया है कि श्रीवास्तव ने खुद को रसूखदार CIA ऑपरेटिव बताकर इंडोनेशिया के वरिष्ठ अधिकारियों और तत्कालीन रक्षा मंत्री (अब राष्ट्रपति) प्राबोवो सुबियांतो तक सीधी पहुंच बनाई। वे वर्ष 2020 में वॉशिंगटन डीसी और जकार्ता में हुई हाई-लेवल डिफेंस मीटिंग्स में भी शामिल होने में कामयाब रहे, जहां सैन्य साजो-सामान की खरीद पर बड़ी चर्चाएं हुई थीं।शेल कंपनियों के जरिए 13.9 बिलियन डॉलर के F-15 फाइटर जेट्स का जालअपनी इस फर्जी साख के दम पर श्रीवास्तव ने साल 2020 से 2022 के बीच अपनी चार कंपनियों के जरिए इंडोनेशिया के रक्षा मंत्रालय से पांच शुरुआती रक्षा समझौते, 'लेटर ऑफ इंटेंशन' और एक MoU हासिल कर लिए। इन प्रस्तावित सौदों में 36 F-15 फाइटर जेट, UH-60 ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर, C-130 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और एक जॉइंट कमांड सेंटर की आपूर्ति शामिल थी, जिसकी कुल अनुमानित कीमत करीब 13.9 बिलियन डॉलर (लगभग 1.15 लाख करोड़ रुपये) थी। हालांकि, बाद में कॉर्पोरेट जांच में खुलासा हुआ कि ये चारों कंपनियां महज 'शेल एंटिटीज' (कागजी कंपनियां) थीं, जिन्हें डिफेंस सेक्टर का कोई अनुभव नहीं था और टैक्स न भरने के कारण इनका रजिस्ट्रेशन भी रद्द कर दिया गया था। राहत की बात यह रही कि इंडोनेशियाई सरकार ने इनके तहत कोई वास्तविक भुगतान या खरीद नहीं की।राष्ट्रपति के भाई से नजदीकी और 51 मिलियन डॉलर के लोन का खेलअदालती शिकायतों के मुताबिक, गौरव श्रीवास्तव ने केवल सरकारी अधिकारियों को ही नहीं, बल्कि इंडोनेशिया के सबसे प्रभावशाली व्यापारियों को भी अपने जाल में फंसाया। उन्होंने राष्ट्रपति प्राबोवो के भाई और अरसारी ग्रुप के चेयरमैन हाशिम जोजोहादिकुसुमो से गहरी नजदीकियां बनाईं। श्रीवास्तव के कथित रसूख के झांसे में आकर उनके पार्टनर ट्रोस्ट ने अपनी कंपनी की 50% हिस्सेदारी उनके नाम कर दी, जिसके बाद श्रीवास्तव ने उस कंपनी से अरसारी ग्रुप को 51 मिलियन डॉलर का लोन भी दिलवा दिया। दूसरी तरफ, गौरव श्रीवास्तव ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे अपने पूर्व पार्टनर द्वारा मनगढ़ंत कहानी बताया है।
पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में आटे, बिजली और बुनियादी अधिकारों के लिए लगी गदर की आग अब सात समंदर पार ब्रिटेन की राजधानी लंदन तक पहुंच गई है। पीओके में पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों और मानवाधिकारों के हनन के विरोध में लंदन की सड़कों पर भारी संख्या में कश्मीरी समुदाय के लोग उतर आए हैं। प्रदर्शनकारियों ने पाकिस्तानी दूतावास के बाहर और मध्य लंदन के प्रमुख इलाकों में पाकिस्तानी फौज के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इस गंभीर संकट में दखल देने की अपील की।लंदन में पाकिस्तानी दूतावास के बाहर भारी आक्रोश, सेना को पीछे हटने की मांगब्रिटेन में रह रहे मूल रूप से पीओके के निवासियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया। प्रदर्शनकारियों के हाथों में बैनर और तख्तियां थीं, जिन पर पाकिस्तानी सेना द्वारा निर्दोष नागरिकों पर किए जा रहे बल प्रयोग को रोकने की मांग की गई थी। प्रदर्शन के दौरान पाकिस्तानी फौज पीओके खाली करो और कश्मीरियों को इंसाफ दो जैसे नारे गूंजते रहे। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि इस्लामाबाद की सरकार पीओके के प्राकृतिक संसाधनों को लूट रही है और वहां के स्थानीय लोगों को बुनियादी सहूलियतें भी नहीं मिल पा रही हैं।क्यों भड़की है पीओके में गदर की आग?दरअसल, पीओके में पिछले लंबे समय से महंगाई, भारी बिजली बिल, आटे की किल्लत और बेरोजगारी को लेकर आम जनता सड़कों पर है। जब स्थानीय लोगों ने शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन शुरू किया, तो पाकिस्तानी रेंजरों और पुलिस ने उन पर बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े, जिसमें कई नागरिकों की जान चली गई। इसी दमनकारी नीति के विरोध में अब दुनिया भर में रह रहे कश्मीरी एकजुट हो रहे हैं और पाकिस्तानी हुकूमत के दोहरे रवैये को वैश्विक मंच पर बेनकाब कर रहे हैं।वैश्विक मंच पर पाकिस्तान को घेरने की बड़ी तैयारीलंदन में हुए इस बड़े प्रदर्शन को राजनीतिक विश्लेषक पाकिस्तान के लिए एक बड़ा राजनयिक झटका मान रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने ब्रिटिश सरकार और संयुक्त राष्ट्र (UN) को एक ज्ञापन भी सौंपा है, जिसमें पीओके में हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की गई है। कश्मीरियों का कहना है कि वे चुप नहीं बैठेंगे और पाकिस्तान के इस दमन चक्र के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी आवाज बुलंद करते रहेंगे ताकि वहां रह रहे उनके भाई-बहनों को पाकिस्तानी सेना के खौफ से आजादी मिल सके।
नाटो समिट से पहले ट्रंप का मेलोनी पर बड़ा पोस्ट, पुरानी फोटो वायरल होने से मचा सियासी घमासान
नाटो शिखर सम्मेलन शुरू होने से ठीक पहले डोनाल्ड ट्रंप ने इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के साथ अपनी एक पुरानी तस्वीर साझा कर हलचल पैदा कर दी है। ट्रंप के इस पोस्ट ने सोशल मीडिया पर भारी हंगामा खड़ा कर दिया है। राजनीतिक गलियारों में इस अचानक आई पोस्ट के मायने तलाशे जा रहे हैं, जिसे कुछ लोग नाटो की एकजुटता के लिए एक संदेश के रूप में देख रहे हैं।क्यों हो रही है चर्चा?यह पोस्ट ऐसे समय पर आई है जब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक तनाव गहराया हुआ है। ट्रंप और मेलोनी के बीच के रिश्तों को लेकर दुनिया भर के मीडिया में नई बहस छिड़ गई है, जिससे नाटो समिट की गंभीरता और भी बढ़ गई है।
ट्रंप से 90 मिनट की बातचीत के बाद पुतिन का घातक हमला, नाटो बैठक से पहले यूक्रेन में मचा कोहराम
डोनाल्ड ट्रंप के साथ करीब 90 मिनट की टेलीफोनिक बातचीत के तुरंत बाद व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन पर मिसाइलों की बौछार कर दी है। नाटो की आगामी हाई-लेवल बैठक से ठीक पहले हुए इस भीषण हमले ने कीव समेत कई शहरों को दहला दिया है। यह सैन्य कार्रवाई वैश्विक कूटनीति के लिए एक बड़े संदेश के रूप में देखी जा रही है।युद्ध का बढ़ता दायराइस अचानक हुए हमले से यूक्रेन में भारी तबाही की खबर है और क्षेत्रीय तनाव अपने चरम पर पहुंच गया है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पुतिन की इस आक्रामकता ने सुरक्षा विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि नाटो की बैठक से ठीक पहले हुई यह गोलाबारी पूरे यूरोप के लिए बड़ा खतरा बन गई है।
इंडोनेशिया में पीएम मोदी: 90% मुस्लिम आबादी के बीच कैसे जीवित हैं राम-महाभारत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा भारत की 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' को नई ऊंचाई देने के लिए अहम है। इंडोनेशिया दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम बहुल देश है, लेकिन यहाँ की संस्कृति में भारतीय जड़ों की गहरी छाप है। रामायण और महाभारत यहाँ के लोगों के लिए सिर्फ धर्मग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने का दर्शन हैं, जो कला और लोक-परंपराओं में आज भी रचे-बसे हैं।सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासतइंडोनेशियाई संस्कृति में राम और कृष्ण की गाथाओं का इतना गहरा प्रभाव है कि वे इस्लाम के साथ पूरी तरह से एकीकृत हो चुकी हैं। राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के साथ पीएम मोदी का प्रंबनन मंदिर दौरा दोनों देशों के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंधों को नई मजबूती प्रदान करेगा।
अमेरिका और इजरायल के बीच ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंध जगजाहिर हैं, लेकिन अमेरिकी प्रशासन अक्सर यह जताने से बाज नहीं आता कि इजरायल का अस्तित्व केवल उसकी बदौलत है. हाल ही में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस (JD Vance) ने एक इंटरव्यू के दौरान इजरायल पर तंज कसते हुए कहा था कि इस वक्त दुनिया में डोनाल्ड ट्रंप ही इजरायल के प्रति सहानुभूति रखने वाले एकमात्र राष्ट्राध्यक्ष हैं और अमेरिका की मदद के बिना इजरायल दुश्मनों से नहीं बच सकता. इस पर इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी दावे की हवा निकालते हुए भारत का नाम लेकर ऐसा करारा जवाब दिया है कि वाशिंगटन में हड़कंप मच गया है.जेडी वेंस ने इजरायल को दी नसीहत, सैन्य सहायता की दिलाई याददरअसल, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए एक साक्षात्कार में इजरायली नेताओं से अमेरिका-ईरान शांति समझौते की सार्वजनिक आलोचना बंद करने को कहा था. वेंस ने इजरायल को चेतावनी भरे लहजे में कहा, आप केवल 90 लाख की आबादी वाला देश हैं और हर राष्ट्रीय सुरक्षा समस्या को सिर्फ जंग से हल नहीं कर सकते. उन्होंने याद दिलाया कि इजरायल के दो-तिहाई सुरक्षात्मक हथियार अमेरिकी करदाताओं के पैसे से बने हैं. वेंस ने हिजबुल्लाह पर हुए हमलों की भी आलोचना की थी, जिससे अमेरिका-तेहरान वार्ताओं पर बुरा असर पड़ रहा था.140 करोड़ आबादी वाले भारत से मिलता है अगाध प्रेम: नेतन्याहूफॉक्स न्यूज (Fox News) को दिए एक तीखे इंटरव्यू में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने जेडी वेंस के 'अकेले दोस्त' वाले दावे को सिरे से खारिज कर दिया. नेतन्याहू ने कहा, मैं जेडी वेंस का सम्मान करता हूं, लेकिन मैं उनकी हर बात से सहमत नहीं हूं. डोनाल्ड ट्रंप जरूर हमारे सबसे अच्छे दोस्त हैं, लेकिन दुनिया में हमारे कई और मित्र भी हैं. उदाहरण के लिए 'भारत' नाम का एक महान देश है, जिसकी आबादी 1.4 अरब है और वहां से हमें जो जबरदस्त और अटूट समर्थन मिलता है, उसे कोई नकार नहीं सकता.मेरा फेसबुक अकाउंट भारतीयों के प्यार से भरा पड़ा है: इजरायली पीएमनेतन्याहू ने सोशल मीडिया पर मिल रहे जनसमर्थन का जिक्र करते हुए गर्व से कहा, मेरा फेसबुक अकाउंट (Facebook) देखें, वह भारतीय यूजर्स के अपार और भावनात्मक समर्थन से पूरी तरह से भरा रहता है. उन्होंने आगे कहा कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया और कुछ चुनिंदा वर्गों में इजरायल की चाहे जितनी आलोचना हो, लेकिन जमीनी हकीकत अलग है. दुनिया के कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष मुझे व्यक्तिगत तौर पर फोन करते हैं और कहते हैं कि भले ही उनके यहां पब्लिक ओपिनियन की दिक्कत हो, लेकिन वे इजरायल का पूरा सम्मान करते हैं.एआई (AI) और साइबर सुरक्षा में इजरायल का लोहा मानती है दुनियापीएम नेतन्याहू ने साफ किया कि आज पूरी दुनिया इज़राइल के साथ रणनीतिक और तकनीकी साझेदारी करना चाहती है. उन्होंने कहा, वैश्विक नेता हमसे सैन्य रणनीतियों को सीखने की इच्छा जताते हैं. वे हमारी उन्नत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और साइबर विशेषज्ञता का लाभ उठाना चाहते हैं. इजरायल साइबर सुरक्षा के मामले में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है और हमारी तकनीक बेहद एडवांस है। इस बीच, सूत्रों के अनुसार अमेरिकी राष्ट्रपति के नाटो शिखर सम्मेलन से लौटने के बाद अगले हफ्ते डोनाल्ड ट्रंप और नेतन्याहू के बीच एक बड़ी बैठक प्रस्तावित है, जिसमें दोनों देशों के बीच उपजे हालिया मतभेदों को सुलझाया जाएगा.
ताइवान ने चीन की समुद्री गश्त को बताया अवैध, क्षेत्रीय शांति पर जताई चिंता
ताइवान ने चीन के कोस्ट गार्ड (सीसीजी) के पूर्वी समुद्री क्षेत्र में गश्त करने की आलोचना की है। ताइवान ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ अधिकार का अवैध विस्तार बताया है और कहा है कि इससे क्षेत्रीय स्थिरता को खतरा पैदा हो रहा है।
4 जुलाई से ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की अंतिम विदाई की रस्में शुरू हुईं। उनका जनाजा तेहरान, कोम, नजफ और इराक के कर्बला शहर होते हुए, 9 जुलाई को मशहद पहुंचेगा, जहां उन्हें दफन किया जाएगा। इस दौरान 100 से ज्यादा देशों के नेता और 3 करोड़ से ज्यादा लोग ‘शियाओं के रहबर’ का आखिरी दीदार करेंगे। शिया मुसलमानों में मातम इतना अहम क्यों है, खामेनेई की हत्या को कर्बला की शहादत से क्यों जोड़ा जा रहा और इस बड़े जलसे के पीछे असली वजह क्या है; मंडे मेगा स्टोरी में पूरी कहानी… **** ग्राफिक्स: द्रगचंद्र भुर्जी और महेंद्र वर्मा --------- यह खबर भी पढ़िए… दर्जनभर लोगों से गुजरकर मुजतबा तक पहुंचती है कोई चिट्ठी; पिता को कंधा देने पर सस्पेंस, क्या इजराइल वाकई मार देगा ईरान के सुप्रीम लीडर रहे आयतुल्लाह अली खामेनेई के अंतिम संस्कार की रस्में जारी हैं। 100 से ज्यादा देशों के नेता पहुंच रहे हैं। काले कपड़ों में रोते-बिलखते लाखों ईरानी अपने ‘रहबर’ का आखिरी दीदार करना चाहते हैं। इन सबके बीच ईरान के नए सुप्रीम लीडर मुजतबा खामेनेई गायब हैं। पिता के जनाजे को कंधा देंगे या नहीं, इस पर भी सस्पेंस है। पूरी खबर पढ़िए…
नाटो शिखर सम्मेलन से पहले अंकारा में कड़ी सुरक्षा, 46 संदिग्ध हिरासत में लिए गए
तुर्की की राजधानी अंकारा में पुलिस ने 46 लोगों को हिरासत में लिया है। यह कार्रवाई 7-8 जुलाई को होने वाले नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (नाटो) शिखर सम्मेलन से पहले सुरक्षा व्यवस्था के तहत की गई। यह जानकारी रविवार को तुर्की के मीडिया ने दी।
पाकिस्तान एयर फोर्स ग्रुप कैप्टन की गोली मारकर हत्या, महिला की मदद के दौरान हुआ हमला
इस्लामाबाद में शाहीन चौक के पास पाकिस्तान एयरफोर्स (पीएएफ) के ग्रुप कैप्टन की अज्ञात हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी।
फ्रांस-स्पेन सीमा पर आग का कहर – 1,500 हेक्टेयर जंगल राख
फ्रांस-स्पेन सीमा क्षेत्र में जंगल की आग भी जारी रही। पूर्वी पाइरेनीज इलाके में ट्रेविलाच के पास शनिवार रात शुरू हुई भीषण आग तेज हवा और भीषण गर्मी के कारण फिर से भड़क उठी
बांग्लादेश में खसरे का कहर; 24 घंटे में सात बच्चों की मौत, अब तक 738 की मौत
बांग्लादेश में खसरे जैसे लक्षणों के चलते रविवार सुबह 8 बजे तक सात और बच्चों की मौत हो गई है। इससे देश में 2026 में अब तक खसरे (पुष्टि और संदिग्ध दोनों) से हुई कुल मौतों की संख्या बढ़कर 738 हो गई है।
दुनिया भर के देशों को कच्चा तेल बेचने वाला रूस अब दूसरे देशों से पेट्रोल मंगवाने को मजबूर है। भारत से भी पेट्रोल के कई टैंकर भेजे जाने की खबरें हैं। रूसी पेट्रोल पंपों पर पहली बार लंबी-लंबी कतारें लगी हैं। पेट्रोल खरीदने पर पाबंदियां लागू हैं। इसकी वजह है- यूक्रेन के हमले। आखिर यूक्रेन ने रूस में पेट्रोल की किल्लत कैसे पैदा कर दी, क्या वाकई भारत, रूस को पेट्रोल बेच रहा; और रूस, यूक्रेन के हमले क्यों नहीं रोक पा रहा, जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में... सवाल-1: दुनिया को तेल बेचने वाले रूस में तेल की कमी कैसे हो गई है? जवाब: रूस-यूक्रेन जंग शुरू होने के बाद से यूक्रेन लगातार रूसी ऑइल इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बना रहा है। मार्च 2026 से अब तक रूस की ऑयल रिफाइनरी पर 50 से ज्यादा हमले किए हैं। 4 जुलाई को यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने बताया कि यूक्रेन की सीमा से करीब 850 किमी अंदर रूस के सेंट पीटर्सबर्ग की रिफाइनरी पर ड्रोन अटैक किया है। इस रिफाइनरी से हर साल 1.25 करोड़ टन पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स बनते हैं। 3 जून को भी इस रिफाइनरी पर हमला हुआ था। इसके अलावा 18 जून को मॉस्को के बाहरी इलाकों में स्थित रिफाइनरी पर हमला हुआ। यूक्रेनी मीडिया के मुताबिक, रूस की टॉप-10 रिफाइनरियों में से 8 पर यूक्रेन हमले कर चुका है। रिफाइनरियों पर हुए हमले से रूस में पेट्रोल की भारी कमी हो गई है… सवाल-2: क्या इस स्थिति से निपटने में भारत रूस की मदद कर रहा है? जवाब: रॉयटर्स के मुताबिक, भारतीय तेल कंपनी नायरा एनर्जी ने 1 जुलाई को पेट्रोल के 2 टैंकर रूस भेजे हैं। इन टैंकरों में करीब 60,000 मीट्रिक टन पेट्रोल है। नायरा एनर्जी में रूस की सरकारी तेल कंपनी रोसनेफ्ट की 49% हिस्सेदारी है। हालांकि नायरा ने टैंकर भेजने की पुष्टि नहीं की है। रूसी सरकार के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा है कि रूस कई दशकों बाद ईंधन आयात करने की तैयारी में है। दूसरे देशों के संपर्क से ईंधन खरीदने की बातचीत चल रही है। हालांकि भारतीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी का कहना है, 'भारतीय सरकारी या प्राइवेट कंपनियां सीधे रूस को ईंधन नहीं बेच रही हैं। हो सकता है कि रूस अंतरराष्ट्रीय व्यापारियों के जरिए भारतीय मूल का ईंधन खरीद रहा हो।' दरअसल, सीधे व्यापार के बजाय अंतरराष्ट्रीय व्यापारियों के जरिए भी तेल खरीदने का एक विकल्प होता है। ये व्यापारी कई देशों की तेल कंपनियों से तेल खरीदकर उसका पेमेंट करते हैं। फिर ये सारा तेल सिंगापुर, UAE के फुजैरा या यूरोप के रोटरडैम जैसे बड़े बंदरगाहों पर ले जाते हैं। यहां कई बार अलग-अलग देशों का तेल मिक्स भी किया जाता है। फिर जब रूस या किसी अन्य देश को तेल की जरूरत पड़ती है, तो ये व्यापारी उसे तेल के टैंकर बेच देते हैं। सवाल-3: तेल की जरूरत पूरी करने के लिए रूस और क्या कर रहा है? जवाब: रूस 2 मुख्य तरीके अपना रहा है- 1. दूसरे देशों से खरीद 2. पेट्रोल एक्सपोर्ट और बिक्री पर पाबंदी रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने कहा है, ‘रिफाइनरी पर हमलों से ईंधन की कमी तो हुई है, लेकिन यह गंभीर नहीं है। पेट्रोल भंडार में पिछले साल के मुकाबले सिर्फ 4% की कमी आई है।’ सवाल-4: रूस तेल की कमी से कब तक निपट पाएगा? जवाब: ग्लोबल बिजनेस कंसल्टेंसी फर्म मैक्रो-एडवाइजरी लिमिटेड के CEO और एनालिस्ट क्रिस वेफर कहते हैं, ‘रूस में फ्यूल का स्टोरेज पर्याप्त है, लेकिन दिक्कत ये है कि ये गलत जगह पर है। जिन इलाकों में फ्यूल की कमी है, वहां सप्लाई रातोंरात नहीं हो सकती। इस बड़े लॉजिस्टिक्स कई हफ्ते लग सकते हैं। ये एक बड़ा लॉजिस्टिक्स ऑपरेशन है।’ जिन रूसी रिफाइनरीज को यूक्रेनी हमलों में नुकसान पहुंचा है, उनको रिपेयर करना भी मुश्किल है। इनमें कुछ मशीनरी और इक्विपमेंट ऐसी हैं, जिसे विदेशों से इम्पोर्ट किया जाता है, लेकिन रूस पर विदेशी व्यापार को लेकर कई तरह के बैन लगे हैं। वेफर के मुताबिक, मॉस्को रिफाइनरी की मरम्मत में कम से कम 3 महीने लग जाएंगे। इसी से मॉस्को और आसपास के इलाके में जरूरत के 40% फ्यूल की सप्लाई होती है। वहीं ऑयल मार्केट एनालिस्ट गैरी पीच कहते हैं कि मरम्मत के बावजूद रिफाइनरीज पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रही हैं। इनमें इतना ज्यादा नुकसान हुआ है कि गर्मियों के दौरान, यानी अगस्त तक रिफाइनिंग दोबारा पूरी तरह शुरू नहीं हो पाएगी। पीच के मुताबिक, जब तक यूक्रेन-रूस सीजफायर या कोई समझौता नहीं हो पाए, तब तक कई रिफाइनरीज की मरम्मत करने से कोई फायदा नहीं है, क्योंकि इन पर दोबारा हमला कर दिया जाएगा। वेफर कहते हैं कि अगर ऑयल इन्फ्रास्ट्रक्चर को और नुकसान न पहुंचे, तो भी सितंबर तक फ्यूल की कमी बनी रहेगी, क्योंकि इसी दौरान खेती के लिए सबसे ज्यादा तेल की जरूरत होती है। सवाल-5: आखिर रूस यूक्रेन के हमलों का सामना क्यों नहीं कर पा रहा? जवाब: यूक्रेन और रूस के बीच जंग का पांचवां साल चल रहा है। यूक्रेन, रूसी रिफाइनरीज पर ज्यादातर ड्रोन अटैक ही करता है। 3 बड़ी वजहों से रूस इन्हें रोक नहीं पा रहा... 1. यूक्रेन के लॉन्ग-रेंज ड्रोन ट्रैक करना मुश्किल 2. सैकड़ों सस्ते ड्रोन रोकना महंगा 3. रूस का बड़ा इलाका ही उसका दुश्मन --------- यह खबर भी पढ़िए… दर्जनभर लोगों से गुजरकर मुजतबा तक पहुंचती है कोई चिट्ठी; पिता को कंधा देने पर सस्पेंस, क्या इजराइल वाकई मार देगा ईरान के सुप्रीम लीडर रहे आयतुल्लाह अली खामेनेई के अंतिम संस्कार की रस्में जारी हैं। 100 से ज्यादा देशों के नेता पहुंच रहे हैं। काले कपड़ों में रोते-बिलखते लाखों ईरानी अपने ‘रहबर’ का आखिरी दीदार करना चाहते हैं। इन सबके बीच ईरान के नए सुप्रीम लीडर मुजतबा खामेनेई गायब हैं। पिता के जनाजे को कंधा देंगे या नहीं, इस पर भी सस्पेंस है। पूरी खबर पढ़िए…
यह जवाब उस समय सामने आया जब अमेरिकी जिला न्यायाधीश निकोलस गरौफिस ने न्याय विभाग से पूछा कि वह इस मामले को स्थायी रूप से समाप्त करने की मांग क्यों कर रहा है। इससे पहले विभाग ने केस समाप्त करने के लिए आवेदन तो दिया था, लेकिन उसमें निर्णय के पीछे के कारणों का विस्तार से उल्लेख नहीं किया गया था।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चेतावनी के बाद पलटवार करते हुए ईरान ने कहा है कि हॉर्मुज स्ट्रेट बाहरी ताकतों के लिए सैन्य शक्ति प्रदर्शन का मंच नहीं है। ईरान के एक वरिष्ठ राजनयिक ने आगाह किया कि इस रणनीतिक समुद्री मार्ग का इस्तेमाल सैन्य ताकत दिखाने के बजाय क्षेत्रीय स्थिरता और सुरक्षित नौवहन सुनिश्चित करने के लिए किया जाना चाहिए।
अपने संबोधन में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सराहना करते हुए कम्युनिज्म की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि अमेरिका में कम्युनिस्ट विचारधारा के लिए कोई स्थान नहीं है।
‘फर्जी आंसू’ का तंज: खामेनेई के अंतिम संस्कार पर ट्रंप का हमला
तेहरान में दिवंगत सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार कार्यक्रमों के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नया विवादित बयान दिया है
ईरान के दिवंगत सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के अंतिम संस्कार को लेकर वैश्विक राजनीति में एक नया उबाल आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस कार्यक्रम को लेकर बेहद तीखी और विवादास्पद टिप्पणी की है। ट्रंप ने दावा किया कि ईरान की बची हुई पूरी लीडरशिप इस अंतिम संस्कार में एक साथ मौजूद है और यदि वे चाहें, तो एक हमले में पूरी लीडरशिप का सफाया कर सकते हैं। हालांकि, उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि वे ऐसा नहीं करेंगे, क्योंकि उन्हें ईरान के साथ बातचीत का रास्ता खुला रखना है।'फर्जी आंसू' और ट्रंप का तंजईरान में खामेनेई के अंतिम संस्कार के दौरान उमड़ी भारी भीड़ और लोगों को रोते हुए देखकर ट्रंप ने उन पर तंज कसा है। ट्रंप ने कहा, मुझे लगता था कि लोग खामेनेई से नफरत करते हैं, शायद ये आंसू फर्जी हैं। ट्रंप के इस बयान पर ईरान ने कड़ा रुख अपनाते हुए अर्मेनिया स्थित ईरानी दूतावास के जरिए सोशल मीडिया पर जवाब दिया। ईरान ने कहा, ट्रंप इन संवेदनाओं को नहीं समझ सकते, क्योंकि उनके पास न तो सभ्यता है, न इतिहास और न ही सम्मान।सुरक्षा के घेरे में अंतिम संस्कार, ईरान की सख्त चेतावनीखामेनेई के अंतिम संस्कार में दुनिया भर से शिया समुदाय के लोग जुट रहे हैं, जिससे करोड़ों की भीड़ का अनुमान है। भीड़ को संभालने में संभावित चूक और सुरक्षा खतरों के बीच, ईरान को अमेरिका और इजरायल द्वारा हमले का डर सता रहा है। इसी के मद्देनजर ईरानी सरकार ने एक सख्त चेतावनी जारी करते हुए कहा कि यदि इस दौरान किसी भी तरह का हमला हुआ, तो इसका 'तीखा जवाब' दिया जाएगा। सरकारी मीडिया के अनुसार, इतनी बड़ी भीड़ के कारण भगदड़ जैसी स्थिति में हजारों लोगों के हताहत होने की भी आशंका जताई जा रही है।कूटनीति बनाम सैन्य शक्तिट्रंप ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि उनके पास ईरान के शीर्ष नेतृत्व को एक झटके में खत्म करने की क्षमता है, लेकिन वे वार्ता का विकल्प चुन रहे हैं। ट्रंप का तर्क है, अगर मैं उन्हें खत्म कर देता हूं, तो मैं बात किससे करूंगा? यह बयान ऐसे समय आया है जब दोनों देशों के बीच शांति समझौते के आसार बढ़ रहे हैं। गौरतलब है कि खामेनेई का अंतिम संस्कार चार दिनों तक चलेगा और 9 जुलाई को उन्हें उनके गृहनगर मशहद में सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा। ईरान के लिए यह न केवल एक शोक का समय है, बल्कि अपने अस्तित्व और सुरक्षा को साबित करने की एक बड़ी चुनौती भी है।
राष्ट्रपति ट्रम्प ने अमेरिकी आजादी की 250वीं सालगिरह पर एक टाइम कैप्सूल दफनाया है। भारत की आजादी के 25 साल बाद भी ऐसा ही टाइम कैप्सूल दफनाया गया था। आज उसी की कहानी… *** 15 अगस्त 1973, आजादी की 26वीं सालगिरह। तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सुबह-सुबह लाल किला पहुंचीं। रस्मन तिरंगा फहराया, भाषण दिया और नेता-अधिकारियों के साथ लाहोरी दरवाजे की तरफ चल दीं। वहां पहले से 32 फीट गहरा एक कुआं खोदा गया था। इंदिरा ने उस कुएं में तांबे और स्टील से बना एक वैक्यूम-सील्ड, भारी-भरकम टाइम कैप्सूल दफना दिया। कहा गया- ‘काल पत्र’ नाम के इस कैप्सूल को 1 हजार साल बाद निकाला जाएगा। हालांकि, सत्ता बदली और 4 साल बाद ही इसे खुदवा लिया गया। 1970 का दशक। देश में कांग्रेस सरकार की कमान संभाल रही थीं इंदिरा गांधी। 1971 की जंग में पाकिस्तान को शिकस्त देकर वो अपने राजनीतिक करियर के चरम पर थीं। उन्हें ख्याल आया कि भविष्य की पीढ़ी को मौजूदा भारत के बारे में बताना चाहिए। यहीं से तय हुआ कि भारत की आजादी के 25 साल पूरे होने पर एक ‘टाइम कैप्सूल’ दफनाया जाएगा। इसमें देश की आजादी और उसके 25 साल बाद के भारत के बारे में बताने वाले दस्तावेज रखे जाएंगे। इसे तैयार करने की जिम्मेदारी मिली इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च, यानी ICHR को। ICHR ने ऐतिहासिक दस्तावेज तैयार करने का काम मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज में इतिहास के प्रोफेसर एस. कृष्णस्वामी को सौंपा। प्रो. कृष्णस्वामी ने दस्तावेज तो बना दिए, लेकिन उन पर कुछ सलाह चाहते थे। उन्होंने दस्तावेजों की एक कॉपी उस दौर के जाने-माने इतिहासकार और तमिलनाडु के आर्काइव्स कमिश्नर टी. बद्रीनाथ को भेजी। बद्रीनाथ ने मसौदा पढ़ा, तो भड़क गए। उनका मानना था कि ऐतिहासिक तथ्यों को गलत ढंग से पेश किया गया है। उन्होंने मद्रास के प्रेसिडेंसी कॉलेज में छात्रों को संबोधित करते हुए कहा, 'आजादी के 25 साल बाद अकाल का खतरा खत्म हो गया है? दावा किया गया है कि भूमि सुधारों को लागू करने से कृषि क्रांति पूरी हो गई है, क्या ये सच है?' यहीं से इंदिरा गांधी की इस पहल का विरोध शुरू हुआ। आरोप लगा कि वो टाइम कैप्सूल के जरिए खुद की और अपने परिवार की वाहवाही कराने की कोशिश कर रही हैं। इंदिरा गांधी को कहना पड़ा- मुझे टाइम कैप्सूल से जुड़ी चीजों के बारे में कोई जानकारी नहीं है। वहीं, ICHR ने प्रो. कृष्णस्वामी को नोटिस जारी कर दिया। इसके बावजूद प्रोजेक्ट नहीं रुका। इस पूरे वाकये का खुलासा इकोनॉमिस्ट वीके रामचंद्रन के आर्टिकल से होता है। 1974 में 'सोशल साइंटिस्ट' जर्नल में छपे इस लेख का शीर्षक था- 'प्रोजेक्ट टाइम कैप्सूल एंड द इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च'। 15 अगस्त 1973 को इंदिरा ने लाल किले के लाहौरी गेट के पास ये टाइम कैप्सूल दफनाया। १ हजार साल तक सुरक्षित रखने के लिए कई इंतजाम किए गए। मसलन- इसे तांबे और स्टील से बनाया गया, जिससे जंग और नमी का असर न पड़े। वैक्यूम-पैक्ड बनाया गया, ताकि हवा, गैस या धूल का असर न हो। उस वक्त इस पूरे प्रोजेक्ट पर 8 हजार रुपए खर्च हुए थे। हालांकि, टाइम कैप्सूल को लेकर इंदिरा का विरोध जारी रहा। 2 महीने बाद, यानी 15 अक्टूबर को CPI (M) के पोलित ब्यूरो मेंबर पी. राममूर्ति ने इस दस्तावेज का ड्राफ्ट जारी कर दिया। उन्होंने इसे भारतीयों की बेइज्जती बताते हुए कहा- ‘यह भारत का इतिहास नहीं है, बल्कि सत्ता में मौजूद कांग्रेस पार्टी की तथाकथित उपलब्धियों की जानकारी देने वाली कांग्रेस के महासचिव की रिपोर्ट जैसा दिखता है।’ 1975-77 की इमरजेंसी के बाद देश का सियासी माहौल पूरी तरह बदल गया। 1977 में चुनाव हुए और इंदिरा गांधी की सरकार चली गई। उनके धुर विरोधी मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी। उन्होंने चुनावी कैम्पेन में कहा था कि सरकार बनी तो टाइम कैप्सूल निकलवाएंगे और सच सबके सामने लाएंगे। नवंबर 1977 के आखिर में टाइम कैप्सूल की जांच के लिए एक संसदीय समिति बनाई गई। इसकी कमान जनता पार्टी के पंजाब से सांसद यज्ञदत्त शर्मा को मिली। शर्मा ने कहा- सच्चाई उजागर करना और इतिहास से लीपापोती को रोकना जरूरी है। दिसंबर 1977 में कड़ी सुरक्षा के बीच टाइम कैप्सूल की खुदाई शुरू हुई। 8 दिसंबर 1977 को कैप्सूल निकाला गया। इसे निकालने में 58 हजार रुपए खर्च हुए, यानी दफनाने से 7 गुना ज्यादा। रिपोर्ट्स हैं कि मोरारजी देसाई और उनके कुछ मंत्रियों ने कैप्सूल के दस्तावेज देखे थे। टाइम कैप्सूल समिति के अध्यक्ष यज्ञदत्त शर्मा ने घोषणा की थी कि 20 दिसंबर 1977 को इन्हें संसद में पेश किया जाएगा। कैप्सूल से निकाले गए दस्तावेजों को संसद की लाइब्रेरी में रखा गया। इस पर कई बार चर्चा भी हुई, लेकिन उसमें क्या लिखा था, ये बात कभी जनता के सामने नहीं आई। दिसंबर 1973 में इंदिरा गांधी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि टाइम कैप्सूल में संविधान की कई माइक्रोफिल्म्स, इवेंट कैलेंडर और लिखित दस्तावेज हैं। असली विवाद दस्तावेज को लेकर है। 2012 में सीनियर जर्नलिस्ट मधु किश्वर ने टाइम कैप्सूल को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में एक RTI लगाई। PMO ने कहा कि उसके पास इंदिरा गांधी सरकार द्वारा 1973 में दफनाए गए कैप्सूल की चीजों के बारे में कोई जानकारी नहीं है। बाद में मधु किश्वर ने केंद्रीय सूचना आयोग के सामने ये मुद्दा उठाया। फरवरी 2013 में आयोग ने PMO को निर्देश दिया कि वे इस बारे में जानकारी जुटाएं, लेकिन PMO की ओर से कोई ठोस जवाब नहीं आया। 12 साल बाद ये मुद्दा राज्यसभा में भी उठा। 16 दिसंबर 2024 को वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने राज्यसभा में कहा कि इसे 5 हजार साल के लिए दफनाया गया और संसद को नहीं बताया गया। सीतारमण ने कहा कि कैप्सूल के दस्तावेजों में अटल बिहारी वाजपेयी के जनसंघ को सेक्युलर देश का विरोध करने वाली एक उग्रवादी रूढ़िवादी हिंदू पार्टी बताया था। इसमें सी. राजगोपालाचारी, राजेंद्र प्रसाद, डॉ. राधाकृष्णन, जाकिर हुसैन और लाल बहादुर शास्त्री का कोई जिक्र नहीं था। लेखक कनैलाल बसु अपनी किताब 'नेताजी: रीडिस्कवर्ड' में लिखते हैं, 'इंदिरा गांधी और उनके कुछ करीबी लोगों के अलावा किसी को भी इस बात की जानकारी नहीं थी कि उस टाइम कैप्सूल में क्या-क्या है। यहां तक कि सांसदों को भी कुछ पता नहीं था। जब भी सवाल उठाए गए, सरकार ने मामूली या टालने वाले जवाब देकर चुप करा दिया।' मार्च 2010 में तब की राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने IIT कानपुर के कैंपस में एक टाइम कैप्सूल दफनाया। कैप्सूल में IIT कानपुर के रिसर्च पेपर और वहां के शिक्षकों से जुड़ी जानकारियां रखी गई थीं, ताकि दुनिया में कोई बड़ी उथल-पुथल हो जाए तब भी संस्थान का इतिहास सुरक्षित रहे। मई 2010 में तब के गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी ने गांधीनगर में बन रहे महात्मा मंदिर की नींव में एक टाइम कैप्सूल दफनाया। सरकार का दावा था कि 3 फीट लंबे और ढाई फीट चौड़े स्टील के सिलेंडर में गुजरात के 50 साल के इतिहास को संजोया गया है। अंग्रेजी अखबार द टेलीग्राफ के मुताबिक, 90 किलो वजनी कैप्सूल में 14 लिखे दस्तावेज और 29 ऑडिया-वीडियो कॉम्पैक्ट डिस्क रखे हुए हैं, जिसमें 90% चीजें मोदी से जुड़ी हुई हैं। कांग्रेस ने इसका कड़ा विरोध किया और आरोप लगाया कि मोदी खुद का महिमामंडन करा रहे हैं। कहा कि सत्ता में आते ही कैप्सूल निकलवाएंगे, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हो सका है। फिर जनवरी 2019 में 106वीं भारतीय विज्ञान सम्मेलन के दौरान पंजाब के जालंधर की लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी में भी एक टाइम कैप्सूल गाड़ा गया था। इसमें लैपटॉप, स्मार्टफोन, ड्रोन और वीआर चश्मे समेत 100 चीजें दफनाई गईं, जो 100 साल तक सहेजी जा सकती हैं। इसे 3 जनवरी 2119 को निकाला जाएगा। पिछले साल सिक्किम को पूर्ण राज्य का दर्जा मिले 50 साल पूरे होने पर 21 अगस्त 2025 को राजधानी गंगटोक के ताशीलिंग सचिवालय परिसर में मौजूद रुस्तमजी डियर पार्क में सीएम प्रेम सिंह तमांग ने एक टाइम कैप्सूल दफनाया। 32 किलो वजनी गुलाबी-सुनहरे रंग के इस स्टील सिलेंडर में राज्य की 13 आधिकारिक भाषाओं में दस्तावेज, धान और औषधीय पौधों के बीज, पारंपरिक वाद्य यंत्र, नक्शे, मिट्टी, स्मार्टफोन-गैजेट वगैरह रखे गए। इसे 2075 तक के लिए दफनाया गया है। अब आखिर में- अमेरिका की आजादी की 250वीं सालगिरह पर दफनाए गए टाइम कैप्सूल की कहानी… ------------- टाइम कैप्सूल से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए… अमेरिका 250 साल के लिए टाइम कैप्सूल दफन करेगा: 408 किलो वजन, इसमें व्हेल की हड्डी से AI की भविष्यवाणी तक; आखिर इसकी जरूरत क्यों 4 जुलाई को अमेरिका की आजादी के 250 साल पूरे होने के मौके पर 408 किलो का एक टाइम कैप्सूल जमीन में दफनाया जाएगा। इसे फिलाडेल्फिया के इंडिपेंडेंस नेशनल हिस्टोरिकल पार्क में दफनाया जाएगा और 250 साल बाद यानी 2276 में खोला जाएगा। पूरी खबर पढ़िए…
भास्कर सीरीज ‘स्पाई फाइल्स’ में आप पढ़ रहे हैं- ‘ऑपरेशन कहूटा।’ पार्ट-1 में आपने पढ़ा- 1974 में भारत के परमाणु परीक्षण के बाद पाकिस्तान भी एटम बनाने की तैयारी में जुट गया था। इंजीनियर डॉ. अब्दुल कदीर खान ने नीदरलैंड्स के एक न्यूक्लियर लैब से परमाणु बम बनाने की टेक्नोलॉजी चुराई थी। अब्दुल, आजादी से पहले भोपाल में जन्मे थे। भारत की खुफिया एजेंसी RAW और इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद, पाकिस्तान के इस मिशन को भेदने में जुटी थीं। कई तरह की चर्चाएं थीं। कुछ अमेरिका से आईं, तो कुछ फ्रांस से, लेकिन भारत को जरूरत थी पुख्ता सबूत की। पार्ट-2 में उससे आगे की कहानी… साल था 1977 और अक्टूबर महीना। रावलपिंडी में सर्दियों की शुरुआत हो चुकी थी। बाजार में एक कतार में दर्जियों की दुकानें थीं। हर दुकान के बाहर रंग-बिरंगे कपड़ों के थान लटके हुए। इसी गली में तारीक दर्जी की दुकान थी। छोटी-सी, पर काम उसका बेहतरीन था। रावलपिंडी में सब जानते थे, लेकिन तारीक का एक और परिचय था, जो सिर्फ दिल्ली जानती थी। उस रोज तारीक सिलाई मशीन के सामने बैठा था। तभी पड़ोस की दुकान से रफीक ने आवाज लगाई- ‘यार तारीक! जरा इधर आ।’ रफीक उसका पुराना साथी था, उसी गली का दर्जी। उस रोज रफीक के चेहरे पर अजीब-सी चमक थी। ‘क्या हुआ?’ तारीक ने पूछा। ‘फौज का ऑर्डर आया है। बड़ा ऑर्डर। ढेर सारी वर्दियां सिलनी है, वो भी दो रोज के भीतर।’ रफीक ने बताया। तारीक ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘वाह मियां तुम्हारी तो लॉटरी लग गई… पर इतनी वर्दियों की डिमांड क्यों है?’ ‘अब ये तो नहीं पता भाई… बस फौज का एक ड्राइवर बता रहा था कि कहूटा में उनका कोई कैंप लगने वाला है।’ रफीक ने बताया। ‘कहूटा? कहूटा में क्या हो रहा?’ तारीक के दिमाग में ये बात बिजली सी कौंधी, पर उसने खुद को संभालते हुए कहा- ‘हां कोई भर्ती-वर्ती का कैंप होगा। फौज का तो काम ही ऐसा है।’ रफीक ने मुस्कुराते हुए कहा- ‘कुछ वर्दियां तुम भी सिल देना तारीक। मैं अकेले इतना बड़ा ऑर्डर कैसे पूरा कर पाऊंगा।’ तारीक- ‘हां क्यों नहीं…’ इसके बाद तारीक और रफीक, दोनों अपने काम में जुट गए… देर शाम तारीक पुराने बस स्टैंड के पास एक कोने में बने टेलिफोन बूथ में पहुंचा। एक नंबर डायल किया और कोड वर्ड में बता दिया- ‘भारी तादाद में फौजी कहूटा भेजे जा रहे हैं।’ अगली सुबह दिल्ली के लोधी रोड में RAW का दफ्तर। एक अधेड़ उम्र का आदमी चाय की चुस्की लेते हुए वो संदेश पढ़ रहा था। वो थे- रामेश्वर नाथ काव। RAW के प्रमुख और पूर्व पीएम इंदिरा गांधी के सबसे भरोसेमंद ब्यूरोक्रेट। काव ने संदेश दो बार पढ़ा। फिर अपने साथी अफसर की तरफ देखा। ‘हम्म… कहूटा,’ उन्होंने कहा। साथी अफसर समझ गए। ‘सर, वहां की सुरक्षा…’ अफसर ने हिचकिचाते हुए पूछा। काव ने चाय का कप रखते हुए कहा- ‘मुझे पता है। फ्रांस कोशिश कर चुका है। अमेरिका कोशिश कर चुका है। कोई अंदर नहीं घुस पाया है।’ फिर थोड़ा रुककर काव ने कहा- ‘अगर हम अंदर नहीं जा सकते, तो क्या हुआ? जो अंदर से बाहर आ रहा है, हम उसे तो पकड़ सकते हैं।’ ‘मतलब सर?’ अफसर ने पूछा। RAW चीफ- ‘इंसान अपनी पहचान बदल सकता है, लेकिन अपने शरीर का सच नहीं बदल सकता। परमाणु रिएक्टर में काम करने वाले वैज्ञानिकों और फौजियों का शरीर रेडिएशन सोख लेता है। पता है, रेडिएशन के कण सबसे लंबे वक्त तक कहां जमा रहते हैं?’ अफसर चुप रहे। काव ने कहा- ‘बालों और नाखूनों में।’ कहूटा में कहीं ना कहीं नाई की दुकान होगी। वहां फौजी और वैज्ञानिक बाल कटवाने आते होंगे। हमें कहूटा के सैलूनों से वो बाल चाहिए। अगर उन बालों में प्लूटोनियम या यूरेनियम के अंश मिले... तो समझो पाकिस्तान का झूठ बेनकाब हो गया।’ इसके बाद RAW ने अपने एजेंटों को कोड वर्ड में मैसेज भेजकर नई रणनीति बताई। रणनीति थी- ‘कहूटा में मौजूद फौजियों या वैज्ञानिकों के बाल जमा करके भारत भेजना।’ RAW के नौ एजेंट। सब के सब अलग-अलग शहरों में पाकिस्तानी बनकर रह रहे थे। कोई दर्जी, कोई व्यापारी, कोई सब्जीवाला। उन्हें तीन-तीन के गुट में बांटा गया। कहूटा में एक नाई की दुकान थी। प्लान के मुताबिक तारीक, करीम और अरशद, RAW के ये तीन एजेंट सुबह-सुबह सफाईकर्मी और कचरा उठाने वाला बनकर उस बाजार में पहुंचे। फिर मौका पाकर तीनों ने अपनी ड्रेस बदली और सैलून में घुस गए। दुकान छोटी थी। तीन कुर्सियां, एक आईना, दीवार पर पुराने फिल्मी कैलेंडर। नाई उस्ताद रफीक, 50 साल की उम्र, हल्की मूंछें और जिंदगी भर के किस्से। तारीक ने दुकान में घुसते ही क्रिकेट की बहस छेड़ दी। इमरान खान बेहतर है या जहीर अब्बास। उस्ताद रफीक भी क्रिकेट का दीवाना था। पांच मिनट में दुकान में माहौल ऐसा था जैसे किसी चाय के ढाबे पर बहस छिड़ी हो। इसी दौरान दो फौजी सैलून में दनदनाते हुए घुसे। कंधे पर पट्टियां, तीखी नजर। वे बिना बारी का इंतजार किए सीधे जाकर कुर्सियों पर बैठ गए। नाई को डांटते हुए बोले- ‘पहले हमारे बाल काटो। वक्त नहीं है अपने पास।’ नाई बाल काटने लगा। अब तीनों लड़कों की नजरें फौजियों के गिरते हुए बालों पर थीं। वे बारीकी से देख रहे थे कि फौजियों के बाल फर्श पर कहां गिर रहे हैं। कुछ देर बाद बाल कटवाकर फौजी चले गए। अब सैलून वाला झाड़ू लेकर उन बालों को साफ करने के लिए आगे बढ़ा, तभी अरशद और करीम आपस में भिड़ गए। ‘तूने मुझे गाली कैसे दी?’ एक चिल्लाया। ‘तेरी हिम्मत कैसे हुई मुझसे ऐसे बात करने की।’ दूसरे ने उसका कॉलर पकड़ लिया। सैलून में शोर मच गया। नाई झाड़ू छोड़कर दोनों को छुड़ाने के लिए बीच में आ गया। सैलून में बैठे बाकी लोग भी मार-पीट को शांत कराने में जुट गए। इसी अफरा-तफरी के बीच, तारीक ने फर्श पर गिरे फौजियों के बालों को समेटकर एक लिफाफे में डाला और जेब में रखकर चुपचाप निकल गया। वो सीधे रावलपिंडी स्टेशन पहुंचा। वहां से ट्रेन पकड़कर लाहौर आया। प्लेटफॉर्म पर भारत जाने वाली समझौता एक्सप्रेस खड़ी थी। तारीक ने चुपके से बालों वाला लिफाफा दिल्ली जाने वाले एक मुसाफिर के बैग में रख दिया। करीब 10 घंटे बाद ट्रेन दिल्ली पहुंची। जांच के नाम पर एक-एक बैग की तलाशी ली गई। फिर RAW के एक अफसर के हाथ वो लिफाफा लग गया। जब फॉरेंसिक लैब में उन बालों की जांच की गई, तो पता चला कि उसमें 'हाईली एनरिच्ड यूरेनियम' के कण हैं। वही यूरेनियम, जिसका इस्तेमाल परमाणु बम बनाने में होता है।’ RAW जान चुका था कि पाकिस्तान कहूटा में परमाणु बम बना रहा है। अब ये बात भारत के प्रधानमंत्री तक पहुंचानी थी और यहीं से कहानी में ऐसा मोड़ आया, जिससे RAW के मिशन पर पानी फिर गया। दरअसल, इमरजेंसी के बाद हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस हार चुकी थी। जनता पार्टी के मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने थे। RAW से उनका पुराना बैर था। उनका मानना था कि इमरजेंसी के दौरान इंदिरा के कहने पर RAW ने विपक्षी नेताओं की जासूसी की थी। मोरारजी ने RAW का बजट भी 30% कम कर दिया था। उस रोज RAW चीफ आरएन काव कुछ अफसरों के साथ प्रधानमंत्री दफ्तर पहुंचे। फाइलें सामने रखीं। सबूत रखे। फिर कहा- सर, ‘पाकिस्तान कहूटा में परमाणु बम बना रहा है। हमारे पास सबूत हैं। एक एजेंट भी मिला है, जो उनका पूरा ब्लूप्रिंट दे सकता है- दस हजार डॉलर में। अगर आप कहें तो…’ तब 10 हजार डॉलर की कीमत 80-85 हजार रुपए के बराबर थी। मोरारजी ने हाथ उठाया। ‘नहीं। पाकिस्तान के मामले में हम दखल नहीं देंगे।’ कमरे में सन्नाटा छा गया। काव ने एक पल रुककर कहा, ‘सर, अगर पाकिस्तान परमाणु बम बना लेता है तो…’ ‘मैंने अपना फैसला बता दिया।’ मोरारजी ने कहा। काव बाहर निकले और RAW चीफ पद से इस्तीफा दे दिया। उस वक्त जनरल जिया-उल-हक पाकिस्तान के राष्ट्रपति थे। RAW के पूर्व अधिकारी बी. रमन अपनी किताब 'द काउब्वॉयज ऑफ रॉ' में लिखते हैं- ‘जनरल जिया अक्सर मोरारजी देसाई को फोन करते थे। देसी दवाओं और मूत्र चिकित्सा पर सलाह लेने के बहाने। मोरारजी इस पर गदगद हो जाते थे। जिया गंभीरता दिखाते हुए उनसे पूछते- ‘जनाब, एक दिन में कितनी बार मूत्र पीना चाहिए? क्या ये सुबह का पहला मूत्र होना चाहिए या दिन के किसी भी वक्त का?’ दरअसल, मोरारजी देसाई स्वमूत्र पीते थे। वे इसे नेचर थेरेपी मानते थे। एक बार तो अमेरिका में उन्होंने टीवी पर कह दिया था कि वो रोजाना अपना मूत्र पीते हैं। उस रोज भी जनरल जिया का फोन आया था, पर मोरारजी देसाई नेचर थेरेपी बताने के मूड में नहीं थे। वे परेशान थे। गुस्से में थे। पाकिस्तान के ग्रुप कैप्टन रहे एसएम हाली एक आर्टिकल में इस घटना का जिक्र करते हैं- ‘मोरारजी ने फोन पर कहा, ‘जनरल जिया, 'मुझे पता चल गया है। पाकिस्तान परमाणु बम बना रहा है।’ जिया घबरा गए, पर आवाज में मिठास बनाए रखी। ‘नहीं जनाब... यह सब झूठ है। पाकिस्तान ऐसा कुछ नहीं कर रहा।’ ‘तो फिर कहूटा में क्या हो रहा है?’ मोरारजी ने पूछा। इसके बाद फोन कट गया। जिया समझ गए कि उनका एटमी ताकत बनने का राज हिंदुस्तान जान चुका है। उन्होंने फौरन फौज और खुफिया एजेंसियों की बैठक बुलाई। आदेश सीधा था- ‘RAW के जासूसों को ढूंढो और खत्म करो।’ पाकिस्तानी फौज और एजेंसियों ने पिछले कुछ महीनों के सारे फोन कॉल्स खंगाले। खास तौर पर वो कॉल, जो हिंदुस्तान में किए गए थे। उसके बाद चुन-चुनकर RAW एजेंट्स मार दिए गए। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया जाता है कि कम से कम 30-35 जासूस मारे गए थे। अंडर कवर एजेंट तारीक, करीम और अरशद भी नहीं बचे। न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बाद में पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम का ब्लूप्रिंट इस्लामाबाद में एक ड्राय क्लीनर के बैग में मिला था। जब वो ब्लू प्रिंट किसी तरह दिल्ली पहुंचा, तो उसे देखकर वैज्ञानिक हैरान रह गए। पाकिस्तान सिर्फ एटम बम नहीं बना रहा था, उसने तो पूरा ढांचा तैयार कर लिया था। जनवरी 1980, इंदिरा गांधी 353 सीटें जीतकर फिर से प्रधानमंत्री बनीं। उन्होंने दोबारा ऑपरेशन कहूटा शुरू करने का आदेश दिया, लेकिन इस बार मकसद सिर्फ जानकारी जुटाना नहीं था। दरअसल, जून 1981 में इजराइली एयर फोर्स ने इराक के ओसिरक परमाणु संयंत्र पर बमबारी करके उसे तबाह कर दिया था। भारत भी कहूटा में कुछ ऐसा ही करना चाहता था। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने जगुआर विमानों की मदद से कहूटा पर हवाई हमले की योजना बनाई। फरवरी 1983 में सेना के अफसर गोपनीय तरीके से इजराइल भी गए। इजराइल ने भारत को पाकिस्तान के एफ-16 लड़ाकू विमानों के बारे में टेक्निकल जानकारी दी। बदले में भारत ने मिग-23 की जानकारी इजराइल से साझा की। सीनियर सिक्योरिटी एनालिस्ट भरत कर्नाड एक आर्टिकल में लिखते हैं- ‘प्लान के मुताबिक 6 एफ-16 और 6 एफ-15 लड़ाकू विमानों को इजराइल के हाइफा से उड़कर गुजरात के जामनगर पहुंचना था। वहां से हवा में ईंधन भरते हुए उन्हें जम्मू-कश्मीर के उधमपुर जाना था। फिर पाकिस्तानी बॉर्डर में घुसकर हमला करना था। दो एफ-16 कहूटा पर बम गिराने वाले थे। जबकि, एक एफ-16 पाकिस्तानी वायु सेना की किसी भी कार्रवाई का जवाब देने के लिए हवा में मुस्तैद रहने वाला था।' ये सीक्रेट प्लान था, लेकिन सितंबर 1984 में अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA ने पाकिस्तान को बता दिया- ‘भारत हवाई हमला कर सकता है।’ उसी दिन अमेरिकी टेलीविजन चैनल ABC ने भी ये खबर प्रसारित कर दी। मजबूरन RAW को कहूटा पर अटैक करने के प्लान को होल्ड करना पड़ा। एक महीने बाद… 31 अक्टूबर 1984, दिल्ली में हल्की-हल्की सर्दियां पड़नी शुरू हो गई थीं। हमेशा की तरह पीएम इंदिरा गांधी सुबह 6 बजे उठ गईं। नाश्ते में उन्होंने दो टोस्ट, संतरे का जूस और अंडे लिए। इसके बाद वो अखबार पढ़ने लगीं। सुबह 8.30 बजे BBC की एक डॉक्यूमेंट्री के लिए इंदिरा का इंटरव्यू होना था। पीएम को तैयार करने के लिए सुबह-सुबह ही मेकअप आर्टिस्ट उनके घर पहुंच गए थे। सुबह 9.10 बजे, इंदिरा हाथ से बुनी हुईं हल्के नारंगी रंग की साड़ी पहने 1, सफदरजंग रोड से अपने दफ्तर 1, अकबर रोड के लिए निकलीं। वे पैदल ही चल रही थीं। उन्हें धूप से बचाने के लिए कॉन्स्टेबल नारायण सिंह छाता लेकर उनके बगल में चल रहे थे। अकबर रोड गेट पर पहुंचते ही सुरक्षा गार्ड बेअंत सिंह और संतरी बूथ पर तैनात सतवंत सिंह ने इंदिरा को नमस्ते किया। इसी दौरान बेअंत ने पॉइंट 38 बोर की रिवॉल्वर इंदिरा पर तान दी। इंदिरा बोलीं, ‘ये तुम क्या कर रहे हो बेअंत?’ बेअंत ने फायर कर दिया। गोली इंदिरा के पेट में लगी। उसने 4 और गोलियां दागीं। सतवंत घबरा गया। तभी बेअंत चिल्लाया- ‘गोली मारो।’ सतवंत ने स्टेनगन से धड़ाधड़ 25 गोलियां इंदिरा के सीने में उतार दीं। इंदिरा की मौत के बाद RAW का ऑपरेशन कहूटा ठंडे बस्ते में चला गया। इधर, पाकिस्तान ने चोरी-छिपे परमाणु बम बनाने का काम जारी रखा। सत्ता बदलती रही। सरकारें आती-जाती रहीं, पर कहूटा का काम नहीं रुका। अब तारीख आई 11 मई 1998, अटल बिहारी वाजपेयी को दूसरी बार प्रधानमंत्री बने 53 दिन बीत चुके थे। उस रोज प्रधानमंत्री आवास में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार यानी NSA ब्रजेश मिश्रा कुछ नर्वस मालूम पड़ रहे थे। प्रधानमंत्री के सचिव शक्ति सिन्हा वाजपेयी के पास कुछ जरूरी फाइलें लेकर आ रहे थे। उस दिन सिन्हा का जन्मदिन भी था, लेकिन वो जान-बूझ कर बधाई देने वालों के कॉल रिसीव नहीं कर रहे थे। उधर, राजस्थान के पोकरण में बने कंट्रोल रूम में बैठे वैज्ञानिक मौसम विभाग की रिपोर्ट का इंतजार कर रहे थे। शाम के करीब 3 बजे रिपोर्ट आ गई कि सब कुछ ठीक है। सीनियर जर्नलिस्ट राज चेंगप्पा अपनी किताब 'वेपेंस ऑफ पीस' में लिखते हैं- ‘शाम के 3.45 बजे मॉनीटर पर लाल रोशनी आई। फिर एक सेकेंड बाद तीनों मॉनीटरों पर चौंधियाने वाली रोशनी दिखाई दी। अचानक सभी तस्वीरें फ्रीज हो गईं, धरती के अंदर का तापमान हजारों डिग्री सेंटिग्रेड पहुंच गया। वहां मौजूद मशहूर साइंटिस्ट और बाद में राष्ट्रपति बने एपीजे अब्दुल कलाम ने लगभग चिल्लाते हुए कहा- ‘अब एक अरब लोगों के हमारे देश को कोई नहीं कह सकता कि उसे क्या करना है। अब हम तय करेंगे कि हमें क्या करना है।’ थोड़ी देर बाद… प्रधानमंत्री आवास में फोन बजा। पहली ही घंटी पर NSA ब्रजेश मिश्रा ने फोन उठाया। रिसीवर पर कलाम की कांपती हुई आवाज गूंजी, 'सर, वी हैव डन इट।’ ब्रजेश मिश्रा फोन पर ही चिल्लाए, 'गॉड ब्लेस यू।’ अटल बिहारी वाजपेयी के सचिव रहे शक्ति सिन्हा अपनी किताब 'वाजपेयी द इयर्स दैट चेंज्ड इंडिया' में लिखते हैं- ‘लालकृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नांडिस, यशवंत सिन्हा और जसवंत सिंह प्रधानमंत्री आवास में डायनिंग टेबिल के चारों ओर बैठे हुए थे। सोफे पर बैठे वाजपेयी गहरी सोच में डूबे थे। कोई किसी से कुछ नहीं बोल रहा था। उस कमरे में मौजूद हर शख्स की आंखों में आंसू थे। बहुत देर बाद वाजपेयी के चेहरे पर मुस्कान दिखाई दी। उन्होंने जोर का ठहाका लगाया।’ उसी शाम वाजपेयी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया- ‘आज 3.45 बजे भारत ने तीन भूमिगत परमाणु परीक्षण किए हैं। मैं इन्हें सफलतापूर्वक अंजाम देने वाले वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को बधाई देता हूं। दो दिन बाद यानी 13 मई को भारत ने फिर से दो परमाणु परीक्षण किए। दुनिया हैरान रह गई। CIA चौंक गई। उन्हें भनक तक नहीं थी। पाकिस्तान में फिर से हलचल मच गई- ‘हिंदुस्तान ने दो बार परमाणु बम का परीक्षण कर लिया और हम एक के लिए तरस रहे।’ ठीक 17 दिन बाद। 28 मई, 1998 की शाम। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ अचानक टेलीविजन पर आए। उन्होंने कहा- ‘बीते दिनों भारत ने जो एटमी परीक्षण किए, आज हमने उसका भी हिसाब चुका दिया है और पांच एटमी परीक्षण किए हैं।’ उसी भाषण में शरीफ ने दावा किया- 'आज अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने कहा कि हम आपको पांच अरब डॉलर दे रहे हैं। आप मेहरबानी करके एटम धमाका ना करें। मैंने उनसे कहा कि हमारे जमीर का सौदा ना करें, हम बिकने वाली कौम नहीं हैं। क्लिंटन बोले- आप पर प्रतिबंध लग जाएंगे। मैंने कहा- लगा दें पाबंदियां, क्या होगा।' इस तरह ‘ऑपरेशन कहूटा’ के बाद भी पाकिस्तान परमाणु ताकत हासिल करने वाला दुनिया का सातवां देश बन गया। आज भी इस मिशन को लेकर सियासी गलियारों में मोरारजी देसाई के उस कदम को लेकर सवाल उठते हैं। मई 1990 में, पाकिस्तान ने मोरारजी को निशान-ए-पाकिस्तान सम्मान भी दिया। ये पाकिस्तान का सबसे बड़ा सम्मान है। नोट : कहानी में शामिल कुछ असली किरदारों के नाम बदले हुए हैं। ऑपरेशन कहूटा की पहली कड़ी भी पढ़िए… भोपाल में जन्मे अब्दुल ने परमाणु बम की टेक्नोलॉजी चुराई: भागकर रातों-रात पाकिस्तान पहुंचा, बाल चुराकर भारतीय जासूसों ने बिगाड़ा खेल; ऑपरेशन कहूटा पार्ट-1 18 मई 1974, सुबह के ठीक 9 बज रहे थे। आकाशवाणी के दिल्ली स्टेशन पर उस दौर की ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘बॉबी’ का गाना बज रहा था- ‘हम तुम एक कमरे में बंद हों, और चाबी खो जाए...’ अचानक, गाने को बीच में ही रोक दिया गया। रेडियो पर कुछ सेकेंड्स के लिए सन्नाटा पसर गया। फिर अनाउंसर की गंभीर आवाज गूंजी- ‘एक महत्वपूर्ण प्रसारण की प्रतीक्षा करें…पूरी कहानी पढ़िए… ***** रेफरेंस :1. Vajpayee: The Years That Changed India : By Shakti Sinha2. The Kaoboys of RAW : By B Raman3. Kahuta: The Indo-Israeli Plan to Attack Pakistan's Nuclear Plant : Saghir Iqbal4. The man from Pakistan : Douglas Frantz and Catherine Collins5. Weapons of Peace : Raj Chengappa
व्हाइट हाउस में धमाका: ट्रंप बोले– नेतन्याहू जानते हैं बॉस कौन है!
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है कि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू जल्द ही व्हाइट हाउस का दौरा कर सकते हैं
चीनी तटरक्षक बल ने थाईवान द्वीप के पूर्व में स्थित समुद्री क्षेत्र में कानून प्रवर्तन गश्ती की
चीनी तटरक्षक बल के प्रवक्ता च्यांग लुए ने कहा कि चीनी तटरक्षक बल के श्यूशान जहाज बेड़े ने 4 जुलाई को ताईशान जहाज बेड़े का स्थान लेकर चीन के थाईवान द्वीप के पूर्व में स्थित समुद्री क्षेत्र में कानून प्रवर्तन गश्ती की।
मेकांग नदी पर चीन-लाओस-म्यांमार-थाईलैंड की 166वीं संयुक्त गश्ती कार्रवाई संपन्न
मेकांग नदी पर चीन-लाओस-म्यांमार-थाईलैंड की 166वीं संयुक्त गश्ती श्रृंखलाबद्ध कानून प्रवर्तन कार्रवाई सफलतापूर्वक संपन्न हुई।
ईरान के सुप्रीम लीडर रहे आयतुल्लाह अली खामेनेई के अंतिम संस्कार की रस्में जारी हैं। 100 से ज्यादा देशों के नेता पहुंच रहे हैं। काले कपड़ों में रोते-बिलखते लाखों ईरानी अपने ‘रहबर’ का आखिरी दीदार करना चाहते हैं। इन सबके बीच ईरान के नए सुप्रीम लीडर मुजतबा खामेनेई गायब हैं। पिता के जनाजे को कंधा देंगे या नहीं, इस पर भी सस्पेंस है। क्या वो जिंदा भी हैं, अगर हां तो किस हाल में, क्या उनकी जान को अब भी खतरा; आज का एक्सप्लेनर इसी बात पर… सवाल-1: मुजतबा खामेनेई जिंदा भी हैं या नहीं? जवाब: मुजतबा खामेनेई घायल हुए थे, लेकिन जिंदा हैं… सवाल-2: जिंदा हैं, तो किस हाल में हैं मुजतबा? जवाब: कोई पुख्ता जानकारी नहीं, 3 तरह के दावे हैं… 1. ब्रिटिश अखबार ‘द टाइम्स’ ने अप्रैल में रिपोर्ट की थी कि मुजतबा होश में नहीं हैं और वे कोमा में भी हो सकते हैं। उन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि ईरान में क्या हो रहा है। अन्य ब्रिटिश अखबार 'द सन' के मुताबिक वेंटिलेटर पर हैं। वो बिना सपोर्ट के सांस भी नहीं ले पा रहे हैं। 2. अमेरिकी अखबार ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ के मुताबिक बुरी तरह से घायल हैं, लेकिन दिमाग सक्रिय है और वे फैसले ले रहे हैं। उनके पैर की 3 बार सर्जरी हो चुकी है। उन्हें प्रोस्थेटिक, यानी कृत्रिम पैर लगाया जाना है। उनका चेहरा और होंठ बुरी तरह जल गए हैं। उनके हाथ में भी चोट लगी है। 3. सुप्रीम लीडर के दफ्तर में प्रोटोकॉल महानिदेशक मजाहेर होसैनी के मुताबिक, सुप्रीम लीडर के कान के पीछे छोटी खरोंच है। ईरान के स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि सुप्रीम लीडर के घाव में कुछ टांके लगे, लेकिन उन्हें कोई गंभीर चोट नहीं आई है। सवाल-3: क्या मुजतबा फिलहाल ईरान में नहीं हैं? जवाब: कुवैत के अखबार अल-जरीदा ने रिपोर्ट किया था कि मुजतबा रूस की राजधानी मॉस्को में इलाज करवा रहे हैं। उन्हें राष्ट्रपति पुतिन के सुझाव पर रूसी प्लेन से मॉस्को ले जाया गया है। यहीं उनकी सर्जरी हुई है और वे रिकवर हो रहे हैं। पुतिन के ही किसी घर में उन्हें ठहराया गया है। अल-जरीदा के मुताबिक, मुजतबा की गंभीर चोटों को विशेष इलाज और देखरेख की जरूरत थी, जो ईरान में जंग के बीच मुमकिन नहीं था। इजराइल की धमकी के बाद ईरान में उनकी सुरक्षा को खतरा हो सकता था। हालांकि, मॉस्को में ईरान के राजदूत काजेम जलाली ने इन दावों को खारिज कर दिया। अमेरिकी मीडिया के मुताबिक भी मुजतबा ईरान में ही किसी सीक्रेट लोकेशन पर हैं। अमेरिकी न्यूज चैनल CBS ने अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से बताया है कि ईरान के बड़े अधिकारियों को भी नहीं पता है कि मुजतबा कहां हैं। लोकेशन लीक न हो, इसलिए ईरान के सीनियर नेता और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के अधिकारी मिलने या हाल-चाल पूछने भी नहीं जाते हैं। सवाल-4: तो फिर सुप्रीम लीडर तक सूचनाएं कैसे पहुंचती हैं? जवाब: किसी भी डिजिटल ट्रैकिंग से बचकर मुजतबा तक मैसेज पहुंचाने के लिए पुराने जमाने का तरीका अपनाया जाता है। अमेरिकी अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स और इजराइली अखबार इजराइल हायोम की रिपोर्ट्स के मुताबिक… अमेरिकी खुफिया अधिकारियों ने इसे 'कोरियरों का भूलभुलैया' बताया है। इसी वजह से अमेरिका-ईरान की बातचीत या फैसलों में देरी हुई है। एक ईरानी अधिकारी ने इजराइली अखबार 'द जेरूसलम पोस्ट' को बताया कि जब तक सुप्रीम लीडर की मंजूरी मिलती है, तब तक वो शर्त या सूचना पुरानी हो चुकी होती है। क्योंकि जवाब आने में काफी वक्त लगता है। न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, कुछ मामलों में सीक्रेट ऑडियो लिंक के जरिए भी मुजतबा बैठकों में शामिल होते हैं। सवाल-5: ऐसे में ईरान चला कौन रहा है? जवाब: न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, 1979 की क्रांति के बाद, पहली बार ईरान के पास कोई एक ऐसा धार्मिक नेता नहीं है जो हर फैसले पर आखिरी मुहर लगाए। कागजी तौर पर भले मुजतबा सुप्रीम लीडर हैं, लेकिन हकीकत ये है कि ईरान को IRGC के टॉप कमांडर्स और मुजतबा के वफादार सलाहकारों का ग्रुप चला रहा है। दरअसल, आयतुल्लाह खामेनेई ने मरने से पहले ही अपनी गैरमौजूदगी को भरने के लिए अलग-अलग स्तर पर जिम्मेदारियां बांट दी थी। न्यू यॉर्क टाइम्स के मुताबिक बड़े सैन्य और सरकारी पदों पर 4 स्तर के विकल्प तैयार किए गए थे, जिससे किसी की मृत्यु होने पर अगला व्यक्ति तुरंत जिम्मेदारी संभाल ले। इसके अलावा उन्होंने पहले ही IRGC को कई अधिकार दे दिए थे। ब्रिटिश थिंकटैंक चाथम हाउस में मिडिल ईस्ट प्रोग्राम के डायरेक्टर सनम वकील के मुताबिक, 'ईरान में अभी कोई एक कमांडर नहीं है। यहां एक सिस्टम चल रहा है, जहां बहुत सारे लोग कमांड कर रहे हैं। हर कोई अपने लिए लड़ रहा है।' अमेरिका की इंडियाना यूनिवर्सिटी ऑफ ब्लूमिंगटन में ईरानी राजनीति के प्रोफेसर हुसैन बनाई के मुताबिक, 'ईरान में सुप्रीम लीडर की शक्तियां कम होने के कई सबूत हैं। राष्ट्रपति जो चाहते हैं, कहते हैं। स्पीकर को जो ठीक लगता है, वो कह देते हैं। किसी में कोई सामंजस्य नहीं है।' रॉयटर्स ने सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट किया है कि अब मुजतबा की भूमिका सहमति की मुहर लगाने भर की रह गई है। बड़े फैसले जनरल लेते हैं और मुजतबा उन्हें अपनी धार्मिक-संवैधानिक वैधता देते हैं। ईरान मामलों के जानकार आरश अजीजी के मुताबिक, जरूरी मसौदे शायद मुजतबा से होकर गुजरते होंगे, लेकिन यह मुश्किल है कि वे नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के फैसले पलट सकें। यहां तक कि राष्ट्रपति पजशकियान भी कई बड़े फैसलों से बाहर रखे गए हैं। सवाल-6: जंग खत्म हो गई, क्या अब भी मुजतबा की जान को खतरा है? जवाब: 4 मार्च, 2026 को इजराइल के रक्षा मंत्री काट्ज ने धमकी दी- ‘जो भी ईरान का लीडर बनेगा, वो इजराइल का टारगेट होगा।’ उन्होंने 1 जुलाई को फिर दोहराया कि ईरान के सुप्रीम लीडर मुजतबा को मारना हमारा टारगेट है। इजराइल टारगेट किलिंग में एक्सपर्ट है। उसने दशकों की मेहनत के बाद ईरान में अपना खुफिया नेटवर्क बहुत मजबूत कर लिया है। करीब ३ महीने की जंग में इजराइल ने ईरान में 250 से ज्यादा टारगेट किलिंग की हैं। स्वीडन की उप्साला यूनिवर्सिटी में इस्लामी धर्मशास्त्र के प्रोफेसर मोहम्मद फजलहाशमी के मुताबिक, 'इजराइल और अमेरिका का खुफिया तंत्र ईरान से मजबूत है। ईरान में इजराइल के एजेंट तैनात हैं। मुजतबा जैसे ही सामने आएंगे, अमेरिका और इजराइल उन्हें अपना निशाना बना लेंगे।' इजराइल पहले भी सार्वजनिक कार्यक्रमों में बड़े हमले कर चुका है। 2024 में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजशकियान के शपथ ग्रहण में पहुंचे हमास प्रमुख इस्माइल हानिया को इजराइल ने मिसाइल हमले में मार दिया था। 1992 में हिज्बुल्लाह के महासचिव अब्बास अल-मुसावी पर लेबनान में एक रैली से लौटते हुए हमला किया था। सवाल-7: क्या वाकई पिता के जनाजे में नहीं पहुंचेंगे मुजतबा?जवाब: भारत में मुजतबा खामेनेई के प्रतिनिधि आयतुल्लाह हाकिम इलाही ने 3 जुलाई को बताया कि सुप्रीम लीडर जनाजे में शामिल होना चाहते थे। वो अपने लोगों से मिलना चाहते थे। लेकिन सुरक्षाबलों ने उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया। ईरान के आंतरिक सुरक्षा मामलों के डिप्टी मिनिस्टर और समारोहों की देखरेख करने वाली समिति के सचिव अली अकबर पोरजमशीदियन ने कहा कि सुप्रीम लीडर के जनाजे में शामिल होने का फैसला उनके कार्यालय के हाथों में है। आयोजकों को इस बारे में कोई जानकारी नहीं मिली है कि वे शामिल होंगे या नहीं। अगर मुजतबा शामिल नहीं होंगे, तो उनकी जगह जनाजे की नमाज कौन अदा करेगा, इसकी घोषणा भी अभी नहीं हुई है। ------------ ये खबर भी पढ़िए…खामेनेई के जनाजे में न पीएम मोदी जाएंगे, न विदेश मंत्री; राज्यपाल और राज्यमंत्री क्यों भेज रहे, भारत की स्ट्रैटेजी क्या अयातुल्लाह अली खामेनेई को हत्या के 131 दिन बाद सुपुर्द-ए-खाक किया जाना है। 6 दिन के राजकीय जनाजे में ईरान दुनियाभर से नेताओं को बुला रहा है। 23 जून को राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने पीएम मोदी को भी न्योता दिया। लेकिन पीएम मोदी नहीं पहुंचे। पूरी खबर पढ़िए…
सुप्रीम लीडर को अंतिम विदाई देने के लिए ईरान को दी एक हफ्ते की मोहलत: ट्रंप
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने स्वतंत्रता दिवस संबोधन में ईरान को लेकर एक बार फिर विवादित और तीखा बयान दिया है। ट्रंप ने दक्षिण डकोटा में दावा किया कि उन्होंने मानवता के नाते सुप्रीम लीडर के अंतिम संस्कार की रस्में अदा करने के लिए ईरान को 'वीक ऑफ' (एक हफ्ते की राहत) दिया है।
बलूचिस्तान में BLA का खूनी तांडव: ग्वादर में 30 से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों की मौत, मचा हाहाकार
पाकिस्तान के अशांत प्रांत बलूचिस्तान में बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) ने एक बार फिर अपनी ताकत का खौफनाक प्रदर्शन किया है। ग्वादर में हुए इस बड़े हमले में 30 से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों के मारे जाने की खबर से सुरक्षा प्रतिष्ठानों में हड़कंप मच गया है। पिछले कुछ महीनों में यह सुरक्षा बलों पर हुआ अब तक का सबसे बड़ा और घातक हमला माना जा रहा है। ग्वादर, जो चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का केंद्र है, वहां हुए इस हमले ने पाकिस्तान की सुरक्षा नीतियों और बलूचिस्तान के बिगड़ते हालातों पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।ग्वादर में BLA का 'ऑपरेशन' और हताहतों की संख्याप्राप्त जानकारी के अनुसार, बलूच लिबरेशन आर्मी के लड़ाकों ने ग्वादर के कई सैन्य चौकियों को एक साथ निशाना बनाया। यह हमला इतना सुनियोजित था कि पाकिस्तानी सेना को संभलने का मौका तक नहीं मिला। स्थानीय सूत्रों और बलूच संगठनों के दावों के अनुसार, इस मुठभेड़ में 30 से ज्यादा सैनिक मारे गए हैं और कई अन्य गंभीर रूप से घायल बताए जा रहे हैं। BLA ने इस हमले की जिम्मेदारी लेते हुए इसे 'बलूच भूमि की आजादी' की लड़ाई का हिस्सा बताया है। हमले के बाद पूरे इलाके में कर्फ्यू जैसे हालात हैं और सेना ने घेराबंदी तेज कर दी है।CPEC के गढ़ में सुरक्षा पर सवालग्वादर का इलाका सामरिक और आर्थिक दृष्टि से पाकिस्तान और चीन के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। ऐसे में यहां सुरक्षा बलों पर इतने बड़े हमले ने पाकिस्तान की 'अजेय' होने की छवि को चकनाचूर कर दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि BLA अपनी रणनीति बदल रहा है और अब सीधे तौर पर सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर सरकार पर दबाव बना रहा है। बलूचिस्तान में जारी इस विद्रोह ने न केवल स्थानीय प्रशासन को पंगु बना दिया है, बल्कि चीन के निवेश और वहां काम करने वाले विदेशी नागरिकों की सुरक्षा के लिए भी एक बड़ा खतरा उत्पन्न कर दिया है।क्या है बलूचिस्तान में जारी तनाव की असल जड़?बलूचिस्तान में अलगाववादी लंबे समय से बलूच संसाधनों के दोहन और सेना के कथित अत्याचारों का विरोध कर रहे हैं। BLA का दावा है कि पाकिस्तान सरकार बलूचिस्तान की प्राकृतिक संपदा को लूटकर अन्य प्रांतों में भेज रही है। इस हमले के बाद पाकिस्तान सरकार ने भारी सैन्य बल की तैनाती की घोषणा की है, लेकिन सवाल यही उठता है कि क्या केवल सैन्य कार्रवाई से इस विद्रोह को दबाया जा सकता है? बलूच नेताओं का मानना है कि जब तक राजनीतिक बातचीत और उनके अधिकारों का सम्मान नहीं किया जाता, तब तक इस तरह के खूनी संघर्ष रुकने वाले नहीं हैं। ग्वादर में हुआ यह हमला पाकिस्तान के लिए एक बड़ी चेतावनी है कि बलूचिस्तान की आग अब और भी भड़क चुकी है।
इन दिनों दुनिया के दो बड़े छोर भीषण गर्मी की चपेट में हैं। एक ओर यूरोप का पारा 43 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है, तो दूसरी ओर चीन का तापमान 50 डिग्री के जादुई और खतरनाक आंकड़े को छू रहा है। सोशल मीडिया पर एक बड़ी बहस छिड़ी है—क्या कारण है कि एक जगह लोग मोम की तरह पिघल रहे हैं, जबकि दूसरी जगह तापमान अधिक होने के बावजूद हालात थोड़े अलग हैं? विज्ञान की भाषा में इसका जवाब सिर्फ तापमान में नहीं, बल्कि 'हीट इंडेक्स' और वहां की भौगोलिक स्थिति में छिपा है।आद्रता (Humidity) ही है असली विलेनयूरोप में पड़ रही गर्मी और चीन की गर्मी में सबसे बड़ा अंतर 'ह्यूमिडिटी' का है। यूरोप में हवा में नमी का स्तर अधिक होने के कारण वहां का 'फील लाइक' तापमान (Feel-like Temperature) बहुत ज्यादा हो जाता है। जब तापमान 43 डिग्री होता है और हवा में नमी अधिक हो, तो शरीर का पसीना सूख नहीं पाता, जिससे शरीर की कूलिंग प्रक्रिया ठप हो जाती है। यही कारण है कि लोग वहां ज्यादा बेहाल हैं। इसके विपरीत, चीन के कई हिस्सों में गर्मी 'ड्राई हीट' (शुष्क गर्मी) वाली होती है। वहां तापमान 50 डिग्री होने के बावजूद हवा में नमी कम होने से पसीना तेजी से वाष्पित (evaporate) होता है, जिससे शरीर को थोड़ी राहत महसूस होती है।भौगोलिक स्थितियां और कंक्रीट का असरयूरोप के अधिकांश शहर सदियों पुराने हैं, जो पत्थर और ऐसे मटेरियल से बने हैं जो गर्मी को सोखकर उसे देर रात तक छोड़ते हैं, जिसे 'अर्बन हीट आइलैंड' इफेक्ट कहा जाता है। वहां के घरों में एसी (AC) का चलन भी कम है, जिससे अंदर का तापमान बाहर से भी अधिक महसूस होता है। वहीं चीन के आधुनिक महानगरों में कंक्रीट के ऊंचे-ऊंचे स्ट्रक्चर और आधुनिक कूलिंग सिस्टम के चलते हीट मैनेजमेंट थोड़ा बेहतर हो पाता है। इसके अलावा, यूरोप का वातावरण ठंडे मौसम का आदी है, जिससे वहां की वनस्पति और मानव शरीर दोनों ही इस अचानक आए 'हीट वेव' के लिए तैयार नहीं होते, जो इसे एक आपदा में बदल देता है।साइंस क्या कहता है?वैज्ञानिकों के अनुसार, शरीर को ठंडा रखने के लिए हमारे पसीने का वाष्पित होना जरूरी है। अगर वातावरण में आर्द्रता 60% से ऊपर हो, तो 40 डिग्री तापमान भी जानलेवा साबित हो सकता है। यूरोप में 'ह्यूमिड हीट' ने लोगों को शारीरिक रूप से ज्यादा प्रभावित किया है, जबकि चीन में 'एक्सट्रीम टेंपरेचर' बुनियादी ढांचे की परीक्षा ले रहा है। यह ग्लोबल वार्मिंग का वह नया चेहरा है, जहां तापमान की संख्या से ज्यादा यह मायने रखता है कि आप किस तरह के क्लाइमेट जोन में रह रहे हैं। बढ़ते तापमान के साथ अब हमें सिर्फ डिग्री नहीं, बल्कि 'हीट इंडेक्स' को गंभीरता से समझने की जरूरत है, क्योंकि आने वाले समय में ये हीट वेव और भी घातक हो सकती हैं।
Iran: अयातुल्ला अली खामेनेई की विदाई, जनाजे पर फूट-फूटकर रोए गालिबाफ-अराघची
तेहरान की सड़कों पर लाखों लोग जुट रहे हैं। पुरुषों, महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की मौजूदगी के बीच लगातार श्रद्धांजलि और समर्थन के नारे लगाए जा रहे हैं। ईरानी सत्ता प्रतिष्ठान के शीर्ष नेता भी मोसाला परिसर पहुंचकर श्रद्धांजलि दे चुके हैं।
पुतिन ने यूक्रेन का शांति प्रस्ताव ठुकराया, कहा- लक्ष्य पूरे होने तक जारी रहेगा युद्ध
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन की ओर से आए युद्धविराम प्रस्ताव को खारिज करते हुए कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में सैन्य अभियान रोकने का कोई सवाल नहीं उठता। उनके अनुसार, रूस अपने रणनीतिक और सुरक्षा संबंधी लक्ष्यों को हासिल किए बिना पीछे नहीं हटेगा।
रूस का बड़ा दावा: पूर्वी यूक्रेन के कोंस्तांतिनोवका पर कब्जा
रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के प्रयासों के बीच क्रेमलिन ने बड़ा दावा किया है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने कहा कि रूसी सेना ने पूर्वी यूक्रेन के कोंस्तांतिनोवका शहर पर पूरा नियंत्रण स्थापित कर लिया है
स्पेन में जंगल की आग: 2,300 हेक्टेयर वन क्षेत्र राख
स्पेन के उत्तरपूर्वी क्षेत्र कैटालोनिया में भीषण आग लग गई, जिससे 2,300 हेक्टेयर वन क्षेत्र जलकर राख हो गया
गाजा में स्वास्थ्य व्यवस्था ढहने की कगार पर, 11,000 से ज्यादा सर्जरी टलीं : फिलिस्तीनी राजदूत
भारत में फिलिस्तीनी राजदूत अब्दुल्ला एम. अबू शावेश ने गाजा की स्थिति को 'बहुत खराब' बताया। उन्होंने कहा कि वहां का स्वास्थ्य सिस्टम लगभग पूरी तरह से टूटने की कगार पर है और 11,000 से ज्यादा सर्जरी टाल दी गई हैं।
ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह सैयद अली खामेनेई के अंतिम संस्कार की श्रद्धांजलि सभा में राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने अमेरिका-इजरायल पर कड़ा रुख अपनाया
यूक्रेन युद्ध की विभीषिका और ईरान-लेबनान सीमा पर बढ़ते तनाव के बीच दुनिया की नजरें अगले सप्ताह होने वाले नाटो (NATO) शिखर सम्मेलन पर टिकी हैं। तुर्किये की राजधानी अंकारा में आयोजित इस हाई-प्रोफाइल समिट में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भागीदारी इसे और भी महत्वपूर्ण बना रही है। सम्मेलन का मुख्य केंद्र 'सामूहिक सुरक्षा' पर एक नया 'चट्टानी संकल्प' (Rock-solid resolution) पारित करना है, जो सदस्य देशों की एकजुटता को नई मजबूती देगा। ब्रसेल्स स्थित नाटो मुख्यालय में इस प्रस्ताव का मसौदा पहले ही तैयार किया जा चुका है, जिस पर सभी सदस्य देश अपनी मुहर लगाएंगे।यूक्रेन को 2027 के लिए बड़ी सैन्य मदद की तैयारी रूस के खिलाफ संघर्षरत यूक्रेन के लिए यह शिखर सम्मेलन एक नई उम्मीद लेकर आ रहा है। नाटो सदस्य देशों ने 2026 में यूक्रेन को 80 अरब डॉलर की सैन्य सहायता देने का संकल्प पहले ही ले रखा है। अब इस सम्मेलन में 2027 के लिए भी समान राशि, यानी 80 अरब डॉलर की अतिरिक्त सैन्य मदद की घोषणा होने की प्रबल संभावना है। यह सैन्य पैकेज यूक्रेन की रक्षा तैयारियों को और अधिक सशक्त बनाने के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।ट्रंप का रुख और गठबंधन की चुनौतियां इस सम्मेलन पर दुनिया की निगाहें इसलिए भी हैं क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रक्षा खर्च को लेकर नाटो देशों के प्रति हमेशा सख्त रवैया रहा है। ट्रंप अपने पिछले अनुभवों के आधार पर सहयोगी देशों पर रक्षा बजट न बढ़ाने को लेकर दबाव डालते रहे हैं। ईरान के मुद्दे पर नाटो देशों के असहयोग को लेकर भी वे नाराजगी जता चुके हैं। अंकारा में सात और आठ जुलाई को होने वाले इस सम्मेलन में ट्रंप का क्या स्टैंड रहता है, यह देखने वाली बात होगी। साथ ही, तुर्किये और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव के कारण इस मुस्लिम बहुल नाटो सदस्य देश की मेजबानी भी इस समिट को बेहद संवेदनशील बनाती है।
बात 1977 की है। पाकिस्तानी फौज के हेडक्वार्टर रावलपिंडी से करीब 50 किलोमीटर दूर कहूटा। छोटा सा शहर। भारत के जम्मू-कश्मीर का पुंछ यहां से महज 70 किलोमीटर है। सुबह का वक्त था। एक सैलून में बाल कटाने वालों की भीड़ थी। कैंचियों की 'खिच-खिच' और रेडियो पर बजते फिल्मी गानों बीच कई लोग अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। तभी सैलून का दरवाजा खुला। दो फौजी अफसर अंदर दाखिल हुए। उन्होंने कड़क आवाज में कहा, ‘पहले हमारे बाल काटो…वक्त नहीं है अपने पास।’ वे सीधे जाकर कुर्सी पर बैठ गए। सैलून के कोने में बैठे तीन लड़के अखबार पढ़ रहे थे। कड़क आवाज सुनते ही उनकी नजरें फौजियों पर टिक गईं। अब नाई ने बाल काटना शुरू किया। लड़कों की नजर फर्श पर गिर रहे फौजियों के बालों पर थी। थोड़ी देर बाद फौजी बाल कटवाकर चले गए। अब सैलून वाला झाड़ू लेकर उन बालों को साफ करने के लिए आगे बढ़ा, तभी तीन में से दो लड़के आपस में भिड़ गए। ‘तूने मुझे गाली कैसे दी?’ एक चिल्लाया। ‘तेरी हिम्मत कैसे हुई मुझसे ऐसे बात करने की।’ दूसरे ने उसका कॉलर पकड़ लिया। सैलून में हड़कंप मच गया। नाई झाड़ू छोड़कर दोनों को छुड़ाने लगा। सैलून में बैठे बाकी लोग भी मार-पीट को शांत कराने में जुट गए। इधर, चुपचाप बैठा तीसरा लड़का धीरे से उठा। फर्श पर गिरे फौजियों के बालों को समेटकर एक लिफाफे में डाला और जेब में रखकर चुपचाप निकल गया। लड़का भागता हुआ रावलपिंडी स्टेशन पहुंचा। वहां से ट्रेन पकड़कर लाहौर आया। प्लेटफॉर्म पर भारत जाने वाली समझौता एक्सप्रेस खड़ी थी। लड़का खिड़कियों से अंदर झांकते हुए आगे बढ़ा। अचानक उसने एक शख्स से पूछा- ‘जनाब दिल्ली जा रहे हैं क्या? शख्स ने सिर हिलाया- जी हां।’ थोड़ी देर बाद, भीड़ का फायदा उठाकर लड़का बोगी के अंदर गया और लोगों की नजरों से बचकर उस अनजान मुसाफिर के बैग में वो लिफाफा रख दिया। करीब 10 घंटे बाद ट्रेन पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंची। भारत की खुफिया एजेंसी RAW के अफसर वहां मौजूद थे। जांच के नाम पर एक-एक बैग की तलाशी ली गई। फिर एक अफसर के हाथ वो लिफाफा लग गया। अफसर उस लिफाफे को लेकर फौरन एक फॉरेन्सिक लैब पहुंचा। उसने एक अधिकारी से कहा- ‘अर्जेंट है। प्लीज इस सैंपल की जांच कीजिए।’ वैज्ञानिक ने लिफाफे से बाल निकाले और एक मशीन के भीतर रखकर स्विच ऑन कर दिया। मशीन की लाल लाइटें चमकने लगीं और मॉनिटर का ग्राफ तेजी से ऊपर होने लगा। वैज्ञानिक ने घबराहट में री-चेकिंग की, पर नतीजा नहीं बदला। आखिर उन बालों में क्या था? पाकिस्तान के किस राज से पर्दा उठने वाला था? आज ‘स्पाई फाइल्स’ सीरीज में कहानी भारत के खुफिया ‘ऑपरेशन कहूटा’ की… कहानी की शुरुआत होती है 1962 के भारत-चीन जंग से। चीन ने लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश के एक हिस्से पर अचानक हमला कर दिया। एक महीने तक जंग चली। भारत बुरी तरह हार गया। करीब 38 हजार वर्ग किलोमीटर जमीन पर चीन ने कब्जा कर लिया। नेहरू की सरकार कठघरे में थी। देश की सुरक्षा और आधुनिक हथियारों की जरूरतों को लेकर बहस छिड़ी हुई थी। इसी बीच 1964 में चीन ने परमाणु परीक्षण कर दिया। पूरी दुनिया चौंक गई। देश में यह मांग जोर पकड़ने लगी कि भारत को बचे रहना है, तो हर हाल में परमाणु बम बनाना होगा। 1965 की एक तपती दोपहर। कराची में पाकिस्तान के विदेश मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो पत्रकारों से बात कर रहे थे। एक पत्रकार ने सवाल दागा- ‘भुट्टो साहब, अगर हिंदुस्तान ने परमाणु बम बना लिया, तो पाकिस्तान क्या करेगा?’ भुट्टो के चेहरे के भाव बदल गए। उन्होंने गुस्से में कहा- ‘अगर हिंदुस्तान परमाणु बम बनाता है, तो हम भी बनाएंगे। इसके सिवा हमारे पास और कोई रास्ता नहीं है। भले ही हमें घास खानी पड़े या पत्ते चबाने पड़ें। जरूरत पड़ी, तो हम भूखे पेट भी सो जाएंगे।’ इधर, पाकिस्तान, भारत पर हमले की तैयारी कर रहा था। वह यह सोच बैठा था कि चीन से मात खाने के बाद हिंदुस्तान कमजोर पड़ चुका है। अप्रैल 1965 में उसने गुजरात के कच्छ में कुछ इलाकों पर कब्जा कर लिया। कुछ दिनों बाद दोनों देशों के बीच सुलह हुई, लेकिन जुलाई में पाकिस्तान ने कश्मीर को भारत से अलग करने के लिए ऑपरेशन जिब्राल्टर शुरू कर दिया। भारत ने फौरन जवाबी कार्रवाई शुरू की और अगस्त महीने में पीओके के दाना और दर्रा हाजीपीर इलाके पर कब्जा कर लिया, लेकिन इतना काफी नहीं था। फिर आई 6 सितंबर की सुबह। भारत की फौज लाहौर के बाहरी इलाके तक पहुंच गई। जोरदार हमला कर दिया। तब पाकिस्तान को लगा कि कश्मीर हथियाने के चक्कर में कहीं उसका लाहौर न छीन जाए। आखिरकार यूनाइटेड नेशन्स की पहल पर 23 सितंबर को दोनों देश सीज फायर पर राजी हो गए। ठीक 15 दिन बाद… 8 अक्टूबर को भारत के मशहूर परमाणु वैज्ञानिक डॉ. होमी भाभा ने ऑल इंडिया रेडियो पर ऐलान किया- ‘अगर मुझे छूट दी जाए तो भारत 18 महीने के भीतर परमाणु बम बना सकता है।’ तीन महीने बाद यानी 10 जनवरी 1966 को भारत और पाकिस्तान के बीच ताशकंद में समझौता हुआ, लेकिन 12 घंटे बाद ही आधी रात में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मौत हो गई। अचानक हुई शास्त्री की मौत पर साजिश की बात चल ही रही थी कि 24 जनवरी को लंदन जा रहे एक विमान हादसे में परमाणु वैज्ञानिक होमी भाभा का निधन हो गया। चर्चा होने लगी कि दोनों मौतों में कोई ना कोई कड़ी तो है। 7 साल बाद… 3 अगस्त 1972, अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA ने पाकिस्तान सरकार को बताया कि भारत बहुत जल्द परमाणु परीक्षण करने वाला है। 1971 की जंग हार चुका पाकिस्तान बेचैन हो उठा, लेकिन परीक्षण कब होगा, कहां होगा और किस रूप में होगा, इसकी जानकारी CIA को भी नहीं थी। पाकिस्तान इधर-उधर हाथ-पैर मारता रहा। 2 साल बाद, तारीख-13 मई 1974 और जगह- राजस्थान का पोकरण। भारत के परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष होमी सेठना की देखरेख में वैज्ञानिकों ने परमाणु डिवाइस असेंबल करना शुरू किया। 14 मई की रात ढलने से पहले, उस डिवाइस को L शेप के एक गहरे गड्ढे में पहुंचा दिया गया। काम का पहला चरण पूरा हो चुका था, अब बारी थी फैसले की। अगली सुबह, सेठना साहब ने दिल्ली का रुख किया। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मुलाकात का वक्त पहले से मुकर्रर था। सेठना ने इंदिरा से कहा- ‘मैडम… हमने उस डिवाइस को असेंबल कर दिया है। अब आप यह मत कहिएगा कि उसे बाहर निकालो। ऐसा करना मुमकिन नहीं है। अब आप भी हमें आगे बढ़ने से नहीं रोक सकतीं।’ इंदिरा के चेहरे पर न कोई शिकन थी, न कोई हिचकिचाहट। उन्होंने बड़ी सहजता से कहा- ‘क्या तुम्हें डर लग रहा है, सेठना?’ सेठना के होठों पर मुस्कान उभर आई, बोले- ‘बिल्कुल नहीं, प्रधानमंत्री जी। मैं तो बस आपको बता रहा था कि अब इस रास्ते पर वापसी का कोई मोड़ नहीं है।’ इंदिरा ने मुस्कुराते हुए कहा- ‘गो अहेड।’ अगले दिन सेठना वापस पोकरण पहुंचे। टीम को एक जगह जमा किया। माहौल में एक अजीब सा सन्नाटा था। सेठना ने सबकी तरफ देखा और पूछा- ‘साथियों, अगर यह मिशन नाकाम रहा, तो किसका सिर काटा जाना चाहिए?’ बम का डिजाइन तैयार करने वाले राजगोपाल चिदंबरम ने झट से जवाब दिया- ‘मेरा, मेरा सिर काट लीजिएगा।’ 18 मई 1974, सुबह के ठीक 9 बज रहे थे। आकाशवाणी के दिल्ली स्टेशन पर उस दौर की ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘बॉबी’ का गाना बज रहा था- ‘हम तुम एक कमरे में बंद हों, और चाबी खो जाए...’ अचानक, गाने को बीच में ही रोक दिया गया। रेडियो पर कुछ सेकेंड्स के लिए सन्नाटा पसर गया। फिर अनाउंसर की गंभीर आवाज गूंजी- ‘एक महत्वपूर्ण प्रसारण की प्रतीक्षा करें…’ रेडियो सुन रहे लोगों की सांसें थम गईं। कुछ ही सेकेंड्स के बाद अनाउंसर ने बताया- ‘आज सुबह 8 बजकर 5 मिनट पर भारत ने एक अज्ञात जगह पर भूमिगत परमाणु परीक्षण किया है।’ यह भारत का 'स्माइलिंग बुद्धा' मिशन था। यानी भारत ने परमाणु बम बनाने की टेक्नोलॉजी हासिल कर ली थी। जब ये खबर रेडियो पर चल रही थी, तब नीदरलैंड्स में बैठा एक शख्स भी कान लगाए हुए था। उसका नाम था- ‘अब्दुल कदीर खान।’ आजादी से पहले भोपाल में जन्मे कदीर खान उन दिनों नीदरलैंड्स में एक जर्मन यूरेनियम लैबोरेटरी में काम कर रहे थे। अमेरिकी पत्रिका ‘फॉरेन अफेयर्स’ के मुताबिक- 'जैसे ही कदीर खान को पता चला कि हिंदुस्तान ने परमाणु बम बना लिया है, उन्होंने सीधे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को चिट्ठी लिखी। कदीर खान ने लिखा- ‘हिंदुस्तान के परमाणु परीक्षण ने हमारे अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है। पाकिस्तान को बिना देर किए परमाणु बम बनाना चाहिए। मेरे पास वह समझ और पहुंच है, जो पाकिस्तान को परमाणु ताकत वाला मुल्क बना सकता है। मैं काम करने को तैयार हूं।’ चिट्ठी मिलते ही भुट्टो ने कदीर खान के इस ऑफर को मान लिया और हर मुमकिन मदद का भरोसा भी दिया। कदीर खान अपने मिशन में जुट गए। इधर, अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA और नीदरलैंड्स की खुफिया एजेंसियां उनके पीछे पड़ गईं। एजेंसियों को पता चल चुका था कि खान चोरी-छिपे परमाणु बम बनाने की टेक्नोलॉजी और डिजाइनों का अध्ययन कर रहे हैं। हालांकि, एजेंसियों ने तुरंत गिरफ्तार करने के बजाय, उनकी जासूसी करने का फैसला किया। क्योंकि, उनकी नजर सिर्फ एक व्यक्ति तक नहीं थी। वे पाकिस्तान के पूरे नेटवर्क का पता लगाना चाहते थे। कदीर खान भी कम शातिर वैज्ञानिक नहीं थे। जल्द ही उन्हें आभास हो गया कि चौबीसों घंटे उनकी निगरानी की जा रही है। उनके फोन टैप हो रहे हैं। अगर वे जरा भी चूके, तो यूरोप की जेलों में उन्हें सड़ना होगा। दिसंबर 1975 की एक सर्द रात। नीदरलैंड्स के यूरेनियम प्लांट के बरामदे में सन्नाटा पसरा था। भारी ओवरकोट पहने कदीर खान तेजी से आगे बढ़ रहे थे। अचानक उनके कदम एक दरवाजे के सामने रुक गए, जिस पर लाल अक्षरों में लिखा था- ‘प्रतिबंधित एरिया’। खान ने गर्दन घुमाकर चारों तरफ देखा। कोई नजर नहीं आ रहा था। उन्होंने कोट की अंदरूनी जेब से एक मास्टर चाबी निकाली। चाबी घूमते ही महीन सी 'क्लिक' की आवाज हुई और दरवाजा खुल गया। अंदर टेबल पर एक ब्रीफकेस रखा था। खान ने फुर्ती से उसका लॉक खोला। भीतर रखे डिजाइन्स और ब्लूप्रिंट्स को निकालकर ओवरकोट में छुपा लिया। दबे पांव बाहर निकले। दरवाजा बंद किया और अंधेरे में गुम हो गए। कुछ देर बाद… खान अपने घर के एक बंद कमरे में थे। टेबल लैंप की मद्धम रोशनी में उनके साथ 35-40 साल का भरोसेमंद असिस्टेंट बैठा था। खान एक-एक कर सीक्रेट फाइलें बढ़ाते जा रहे थे और असिस्टेंट उनका अंग्रेजी में अनुवाद करता जा रहा था। दो घंटे की मशक्कत के बाद अनुवाद पूरा हो गया। तड़के 4 बजे। एम्सटर्डम एयरपोर्ट कोहरे की चादर से लिपटा हुआ था। कदीर खान बीवी और बच्चों के साथ पाकिस्तान जाने वाले जहाज में बैठ चुके थे। जैसे ही जहाज आसमान की ऊंचाइयों में ओझल हुआ, खान ने खिड़की से बाहर देखते हुए गहरी सांस ली।…'Now we are safe.' उधर, एम्सटर्डम एयरपोर्ट के कंट्रोल रूम में डच खुफिया एजेंसी के अफसरों के होश उड़े थे। वे बदहवासी में सुरक्षा कैमरों की फुटेज खंगाल रहे थे। कुछ अफसर गाड़ियां दौड़ाते हुए खान के घर की तरफ भागे, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। अगले दिन, इस्लामाबाद में प्रधानमंत्री आवास। बंद कमरे में प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो, सेना के टॉप अफसर और ISI प्रमुख के सामने वो फाइल और ब्लूप्रिंट्स रखे थे। भुट्टो ने सिगार का धुआं छोड़ते हुए खान से कहा- ‘डॉक्टर साहब, क्या इन कागजातों के दम पर हम एटम बम बना लेंगे।?’ खान की आंखों में एक चमक उभरी, ‘बिल्कुल जनाब। अगर हमें इसका सामान मिल जाए, तो एटम बम सिर्फ एक ख्वाब नहीं, हकीकत होगा।’ भुट्टो के चेहरे पर मुस्कान तैर गई। उन्होंने मेज पर मुट्ठी मारी और मंजूरी दे दी- ‘चलिए, अपने काम में जुट जाइए। हुकूमत आपके साथ है।' कुछ दिन बाद…रावलपिंडी के पास कहूटा की बंजर, पथरीली और वीरान पहाड़ियां फौज के बूटों की थाप से गूंज उठीं। भारी मशीनें दिन-रात कंक्रीट उगल रही थीं। देखते ही देखते, एक बड़ी सी बिल्डिंग के मेन गेट पर बोर्ड टांग दिया गया, जिस पर लिखा था- ‘खान रिसर्च लैबोरेट्रिज'। धूल और कंक्रीट के उस बवंडर के बीच, सिर पर सेफ्टी हेलमेट पहने कदीर खान एक ऊंची पहाड़ी पर खड़े थे। तभी एक सीनियर अफसर उनके पास आया। बोला- ‘मुबारक हो डॉक्टर खान… आज से आप इस लैब के डायरेक्टर और चीफ साइंटिस्ट हैं। हिंदुस्तान को बता दीजिए कि अब हमारे पास भी एटमी ताकत है।’ खान ने कहूटा की पहाड़ियों को देखा। कुछ कहा नहीं, बस मुस्कुराते रहे। कदीर खान के पास बम बनाने की चोरी की गई टेक्नोलॉजी तो थी, लेकिन उसके लिए जरूरी कच्चा माल और क्रिटिकल पार्ट्स पाकिस्तान में उपलब्ध नहीं थे। उस दौर में यूरोप की कुछ गिनी-चुनी कंपनियां ही ऐसे संवेदनशील टेक्निकल पार्ट्स बनाती थीं। पाकिस्तान सीधे उन कंपनियों से डील करता, तो उसका मिशन लीक हो जाता। RAW या अमेरिका की CIA को तुरंत भनक लग जाती कि पाकिस्तान एटम बम बना रहा है। इस सीक्रेसी को बनाए रखने के लिए पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों ने एक तरकीब निकाली। उन्होंने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों जैसे- स्विट्जरलैंड, ब्रिटेन, जर्मनी और दुबई में फर्जी कंपनियां बना लीं। इन फर्जी कंपनियों के जरिए इंडस्ट्रियल सामान खरीदने के बहाने बम बनाने के पार्ट्स खरीदे जाने लगे। इन पार्ट्स को अलग-अलग रास्तों से घुमाकर पाकिस्तान लाया जाने लगा। इस मिशन को नाम दिया गया- ‘प्रोजेक्ट 706.’ इसी दौरान, भारत में बड़ा सियासी उलटफेर हुआ। देश में लगे आपातकाल के बाद मार्च 1977 में लोकसभा चुनाव हुए। कांग्रेस को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। इंदिरा गांधी खुद चुनाव हार गईं। जनता पार्टी ने 542 में से 296 सीटें जीत लीं। पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। कभी इंदिरा गांधी सरकार में वित्त मंत्री रहे मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बन गए। इसके कुछ ही महीनों बाद, सरहद पार पाकिस्तान में भी एक खूनी उलटफेर हो गया। 5 जुलाई 1977 को जनरल जिया-उल-हक ने सैन्य तख्तापलट करते हुए प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को सत्ता से बेदखल कर दिया। देश में मार्शल लॉ लागू कर दिया, केंद्र और सभी प्रांतीय सरकारों को भंग करके खुद को पाकिस्तान का राष्ट्रपति घोषित कर दिया। दो साल बाद यानी 1979 में भुट्टो को भ्रष्टाचार के एक मामले में फांसी दे दी गई। अब पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम की कमान सीधे जनरल जिया-उल-हक के हाथों में आ चुकी थी। कहूटा में फौज का दखल और सख्त हो गया। खान रिसर्च लैबोरेट्रिज की सुरक्षा ऐसी सख्त कर दी गई कि परिंदा भी पर नहीं मार सकता था। चारों तरफ तोपें और मॉडर्न रडार तैनात कर दिए गए। पाकिस्तान सोच रहा था कि उसका यह राज कोई जान नहीं पाएगा, लेकिन मार्च 1979 में जर्मन ब्रॉडकास्टर ZDF ने एक डाक्यूमेंट्री जारी कर दी। इस डॉक्यूमेंट्री में बताया गया कि कदीर खान ने नीदरलैंड्स से परमाणु बम बनाने की डिजाइन चुराई है। वे पाकिस्तान में परमाणु बम बना रहे हैं।' पाकिस्तान परमाणु बम बना रहा है, लेकिन कहां?… इसकी पुख्ता जानकारी किसी एजेंसी के पास नहीं थी। पाकिस्तान में मौजूद RAW के अंडरकवर एजेंट्स दिन-रात कड़ियों से कड़ियां जोड़ने में लगे थे, लेकिन उनके हाथ कोई खास सुराग नहीं लग रहा था। तभी इस मिशन में एंट्री हुई- इजराइल के मोसाद की। मोसाद दुनिया की सबसे खतरनाक खुफिया एजेंसी मानी जाती है। इजराइल हरगिज नहीं चाहता था कि किसी इस्लामिक मुल्क के पास परमाणु बम हो। उसे डर था कि इस 'इस्लामिक बम' का इस्तेमाल आगे चलकर उसके विनाश का कारण बन सकता है। यहां से ‘RAW’ और 'मोसाद' के बीच एक सीक्रेट और अघोषित साझेदारी की शुरुआत हुई। दोनों एजेंसियां पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को भेदने में जुट गईं। उसी दौरान, अमेरिकी खुफिया विभाग में काम करने वाले एक सीनियर अफसर रॉबर्ट गैलुची किसी तरह कहूटा जा पहुंचे, लेकिन पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियों ने उनकी गाड़ी रोक ली। गैलुची ने बताया कि वे कहूटा की पहाड़ियों में पिकनिक मनाने आए हैं। कहूटा पिकनिक स्पॉट था तो जरूर, लेकिन पाकिस्तानी फौज इतनी मूर्ख नहीं थी। उन्होंने अमेरिकी अधिकारी को फौरन इस्लामाबाद भेज दिया। कुछ महीने बाद पाकिस्तान में तैनात फ्रांस के राजदूत ने भी कहूटा जाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन पाकिस्तानी फौज की नजर से वे बच नहीं सके। फौज ने न सिर्फ उनकी गाड़ी रोकी, बल्कि बेरहमी से पिटाई भी कर दी। इसके चलते फ्रांस और पाकिस्तान के बीच मनमुटाव भी हो गया। कहूटा के चारों तरफ बिखरी इन घटनाओं ने भारत की खुफिया एजेंसी RAW के कान खड़े कर दिए थे, लेकिन अभी तक जो भी जानकारियां थीं, वे महज कयास, सुनी-सुनाई बातें या विदेशी रिपोर्टों पर आधारित थीं। कहूटा के भीतर झांकने और उस परमाणु प्रोजेक्ट को बेनकाब करने के लिए भारत को एक ऐसे सबूत की जरूरत थी, जिसे झुठलाया न जा सके। तभी भारत के जासूसों के हाथ कुछ ऐसा लगा जिसे जानकर दुनिया चौंक गई। ***** पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल जिया अक्सर भारत के पीएम मोरारजी देसाई को फोन करते थे। देसी दवाओं और मूत्र चिकित्सा पर सलाह लेने के बहाने। मोरारजी इस पर गद्गद हो जाते थे। जिया गंभीरता दिखाते हुए उनसे पूछते- ‘जनाब, एक दिन में कितनी बार मूत्र पीना चाहिए? क्या ये सुबह का पहला मूत्र होना चाहिए या दिन के किसी भी वक्त का?’ उस रोज भी जनरल जिया का फोन आया था, पर उस दिन मोरारजी देसाई नेचर थेरेपी बताने के मूड में नहीं थे। वे परेशान थे। गुस्से में थे। पूरी कहानी कल यानी रविवार को पढ़िए 'ऑपरेशन कहूटा' पार्ट-2… रेफरेंस : 1. Raja ramanna years of pilgrimage.2. Kahuta: The Indo-Israeli Plan to Attack Pakistan's Nuclear Plant.3. The man from Pakistan.
ह लीफंग ने वित्तीय प्रणाली में पार्टी के निर्माण से जुड़े कार्य सम्मेलन में भाषण दिया
वित्तीय प्रणाली में पार्टी के निर्माण से जुड़े कार्य सम्मेलन 2 और 3 जुलाई को चीन की राजधानी पेइचिंग में आयोजित हुआ
गोलीबारी से दहला मिशिगन: मॉल में अंधाधुंध फायरिंग, दो की मौत
अमेरिका में लगातार हो रही गोलीबारी की घटनाओं ने एक बार फिर लोगों को दहला दिया है
विंबलडन: नाओमी ओसाका ने कसाटकिना को हराकर चौथे दौर में जगह बनाई
नाओमी ओसाका ने शुक्रवार को शानदार प्रदर्शन करते हुए पहली बार विंबलडन के चौथे दौर में जगह बना ली
शीत्सांग स्वायत्त प्रदेश सरकार के सूचना कार्यालय ने हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की, जिसमें 14वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान शीत्सांग की व्यापक परिवहन विकास की उपलब्धियों और परिवहन के लिए 15वीं पंचवर्षीय योजना के प्रमुख बिंदुओं का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया गया।
2026 में चीन की कुल फिल्म बॉक्स ऑफिस कमाई 17.5 अरब युआन से अधिक
नेटवर्क प्लेटफॉर्म डेटा के अनुसार, अब तक चीन में 2026 वर्ष की कुल फिल्म बॉक्स ऑफिस कमाई 17.5 अरब युआन से अधिक हो गई है। 2026 फिल्म अर्थव्यवस्था संवर्धन वर्ष है।
गिरते पड़ते दक्षिण अफ्रीका से भागते विदेशी
10 साल से भी ज्यादा समय तक त्वाइबु ने डरबन शहर में दर्जी का काम किया
ट्रंप का धमाका: नाटो रिश्तों को बताया 'बेतुका'!
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के साथ अमेरिका का संबंध एकतरफा है और ऐसे रिश्ते को बनाए रखना बेतुका है
पाकिस्तान : बलूचिस्तान में भारी बारिश के कारण चार लोगों की मौत, कई घायल
पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के कुछ हिस्सों में भारी मानसूनी बारिश के बाद झोब और खुजदार इलाकों में दो घरों की छतें ढहने से चार लोगों की मौत हो गई, जबकि 10 से ज्यादा लोग घायल हो गए।
इजरायल का 'किलिंग मिशन' फेल: ईरान के बड़े नेताओं पर मंडराया था खतरा, अमेरिका ने कैसे पलटी बाजी
मध्य-पूर्व में तनाव का पारा एक बार फिर तब आसमान छू गया जब ईरान के दो बड़े चेहरों, विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालिबाफ की जान पर बन आई। खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, इजरायल ने इन दोनों हस्तियों को निशाना बनाने के लिए अपने फाइटर जेट्स को पूरी तरह तैयार कर लिया था और ऑपरेशन के लिए 'ग्रीन सिग्नल' का इंतजार किया जा रहा था। हालांकि, ठीक वक्त पर अमेरिका की सक्रियता ने इस संभावित कत्लेआम को रोक लिया और एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध की चिंगारी को बुझा दिया। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि तेहरान और वाशिंगटन के बीच पर्दे के पीछे का खेल कितना जटिल और खतरनाक है।इजरायल का प्लान और अमेरिका का 'सेफगार्ड'सूत्रों के मुताबिक, इजरायल का खुफिया तंत्र इन दोनों ईरानी नेताओं की गतिविधियों पर पैनी नजर रखे हुए था। जैसे ही वे एक संवेदनशील मिशन पर निकले, इजरायली वायुसेना के फाइटर जेट्स ने उड़ान भर ली थी। बताया जा रहा है कि इजरायल ने इस हमले को अंजाम देने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी, लेकिन अमेरिका को इसकी भनक लग गई। बाइडन प्रशासन, जो पहले से ही क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के लिए दबाव में है, ने इस संभावित हमले को रोकने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। अमेरिका ने न केवल अपने खुफिया चैनलों का इस्तेमाल किया, बल्कि इजरायल पर सीधा कूटनीतिक दबाव भी बनाया ताकि स्थिति नियंत्रण से बाहर न हो जाए।पर्दे के पीछे की कूटनीति और भविष्य का खतराअमेरिका का ईरान के इन नेताओं को बचाना महज एक मानवीय फैसला नहीं था, बल्कि इसके पीछे गहरा भू-राजनीतिक स्वार्थ भी छिपा है। वाशिंगटन को डर था कि अगर इजरायल इन हाई-प्रोफाइल नेताओं को मार गिराता है, तो ईरान का जवाब इतना भीषण होगा कि पूरा खाड़ी क्षेत्र युद्ध की आग में जल उठेगा, जिससे दुनिया भर में तेल की आपूर्ति और वैश्विक शांति खतरे में पड़ सकती थी। हालांकि यह संकट अभी टल गया है, लेकिन इजरायल और ईरान के बीच बढ़ती यह दुश्मनी किसी भी वक्त एक बड़े धमाके का रूप ले सकती है। तेहरान की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन इस घटना ने मध्य-पूर्व की सुरक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से हिलाकर रख दिया है।
पाकिस्तान में बड़ा सड़क हादसा: खाई में गिरी अनियंत्रित बस, 40 यात्रियों की दर्दनाक मौत से मचा कोहराम
पड़ोसी देश पाकिस्तान से एक दिल दहला देने वाली खबर सामने आई है, जहां एक भीषण सड़क हादसे ने दर्जनों परिवारों को मातम में डूबो दिया है। जानकारी के अनुसार, यात्रियों से खचाखच भरी एक ओवरलोडेड बस अनियंत्रित होकर गहरी खाई में जा गिरी। यह हादसा इतना भयानक था कि बस के परखच्चे उड़ गए और मौके पर ही 40 लोगों ने दम तोड़ दिया। चीख-पुकार सुनकर स्थानीय लोग फौरन बचाव कार्य के लिए दौड़े, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। घटना स्थल की तस्वीरें विचलित कर देने वाली हैं, जहां बचाव दल कड़ी मशक्कत के बाद शवों को बाहर निकालने में जुटा है।खस्ताहाल सड़कें और ओवरलोडिंग बनी कालशुरुआती जांच में इस हादसे के पीछे बड़ी लापरवाही सामने आ रही है। बस न केवल क्षमता से अधिक ओवरलोडेड थी, बल्कि जिस रास्ते से यह गुजर रही थी, वहां की सड़कें भी बेहद संकरी और खतरनाक हैं। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि चालक ने एक मोड़ पर बस से नियंत्रण खो दिया, जिसके बाद वाहन सीधे खाई में जा गिरा। स्थानीय प्रशासन और राहत कर्मियों के अनुसार, मृतकों का आंकड़ा अभी और भी बढ़ सकता है, क्योंकि कई यात्री अभी भी मलबे में दबे हो सकते हैं और घायलों की हालत बेहद नाजुक बनी हुई है। घायलों को इलाज के लिए नजदीकी अस्पतालों में भर्ती कराया गया है, जहां डॉक्टरों ने आपातकाल घोषित कर दिया है।सरकार ने दिए जांच के आदेशइस हृदयविदारक घटना पर आला अधिकारियों ने गहरा दुख व्यक्त करते हुए घटना की उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस रूट पर अक्सर बसें ओवरलोडिंग करती हैं और प्रशासन की ढिलाई के कारण आए दिन ऐसे हादसे होते रहते हैं। फिलहाल, पूरे इलाके में मातम पसरा हुआ है और पीड़ित परिवारों को मुआवजे की मांग को लेकर प्रशासन पर दबाव बनाया जा रहा है। बचाव अभियान अभी भी जारी है, और सुरक्षा बलों ने घटनास्थल को पूरी तरह से सील कर दिया है ताकि राहत कार्यों में किसी प्रकार की बाधा न आए।
जमीन के नीचे दबा था मौत का खजाना! खुदाई के दौरान मिली ऐसी चीज कि रातों-रात खाली कराना पड़ा शहर
किसी भी निर्माण कार्य के लिए की जा रही खुदाई जब अचानक खौफ में बदल जाए, तो क्या होगा? कुछ ऐसा ही मंजर देखने को मिला, जब मजदूर अपने नियमित काम में लगे थे कि तभी फावड़े की टक्कर किसी ऐसी चीज से हुई जिसने पूरे प्रशासन के होश उड़ा दिए। यह कोई मामूली खजाना या पुरानी ईंटें नहीं थीं, बल्कि एक ऐसी 'तबाही' थी जो बरसों से जमीन के सीने में दफन थी। जैसे ही मजदूरों ने इसकी सूचना अधिकारियों को दी, मौके पर पहुंचे आला अफसरों ने जो देखा, उसके बाद बिना एक पल गंवाए पूरे शहर को खाली करने के आदेश जारी कर दिए गए। अफरा-तफरी का ऐसा माहौल बना कि लोग अपना सब कुछ छोड़कर सुरक्षित ठिकानों की ओर भागने पर मजबूर हो गए।खतरा इतना बड़ा कि थम गई सांसेंखुदाई के दौरान मिले उस खतरनाक अवशेष ने न केवल इलाके की सुरक्षा को खतरे में डाल दिया, बल्कि भविष्य में होने वाली एक बड़ी अनहोनी की आहट भी दे दी। विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर इसे समय रहते नहीं पहचाना जाता तो एक बड़ी त्रासदी पूरे शहर को नक्शे से मिटा सकती थी। खुदाई स्थल से निकली वो रहस्यमयी चीज कितनी घातक है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बम निरोधक दस्ते और सुरक्षा बलों ने पूरे क्षेत्र को अपने घेरे में ले लिया है। फिलहाल, क्षेत्र के सभी रास्तों को सील कर दिया गया है और स्थानीय लोगों को प्रशासन की ओर से सख्त हिदायत दी गई है कि वे उस इलाके के आसपास भी न भटकें।प्रशासन की सख्ती और दहशत में शहरशहर खाली कराने के पीछे प्रशासन का मुख्य उद्देश्य जनहानि को रोकना है। हालांकि, अचानक मिले इस 'खतरे' के बाद स्थानीय लोगों में भारी गुस्सा और डर का मिला-जुला असर है। लोगों का कहना है कि उन्हें इस बारे में कोई पूर्व सूचना नहीं थी और अचानक शहर को उजड़ते देखना बेहद दर्दनाक है। दूसरी ओर, सरकार और पुरातत्व विभाग के अधिकारी इस मामले की गहन जांच में जुट गए हैं कि आखिर वह क्या चीज थी जो जमीन के इतने नीचे दबी हुई थी। क्या यह कोई पुराना बारूद है या फिर कोई प्राकृतिक आपदा का संकेत? फिलहाल, पूरे शहर की नजरें जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं और लोग इस उम्मीद में हैं कि कब वे अपने घरों में सुरक्षित वापस लौट सकेंगे।
ईरान और अमेरिका के बीच चल रहा तनाव फिलहाल भले ही शांत होता दिख रहा हो, लेकिन पूर्वी यूरोप में रूस और यूक्रेन के बीच जारी खूनी संघर्ष ने दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। यूक्रेन पर रूसी सेना का हमला एक बार फिर तेज हो गया है, जिससे पूरे क्षेत्र में दहशत का माहौल है। रूसी मिसाइलों और तोपों की बौछार से यूक्रेन के कई शहर मलबे में तब्दील हो गए हैं। इस भीषण हमले में राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की को भी चोटें आई हैं, लेकिन उन्होंने अस्पताल के बिस्तर से ही रूस को करारा जवाब देने की कसम खाई है। जेलेंस्की ने कहा कि यूक्रेन का हर एक नागरिक इस अत्याचार के खिलाफ अपनी आखिरी सांस तक लड़ेगा और रूस के इस आक्रामक रवैये का बदला जरूर लिया जाएगा।जेलेंस्की का संकल्प और यूक्रेन की चुनौतीयूक्रेनी रक्षा मंत्रालय की ओर से जारी रिपोर्ट में बताया गया है कि रूसी हमलों की तीव्रता में भारी इजाफा हुआ है। अस्पतालों और रिहायशी इलाकों को निशाना बनाए जाने के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी स्तब्ध है। हालांकि हमले में घायल होने के बावजूद राष्ट्रपति जेलेंस्की का मनोबल नहीं टूटा है। उन्होंने अपने कमांडरों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि बचाव के साथ-साथ जवाबी हमले की रणनीति को और अधिक आक्रामक बनाया जाए। उन्होंने वैश्विक नेताओं से तत्काल और अधिक घातक हथियारों की मांग करते हुए कहा है कि यह युद्ध अब केवल यूक्रेन का अस्तित्व बचाने की लड़ाई नहीं, बल्कि लोकतंत्र को बचाने की जंग बन चुका है।वैश्विक भू-राजनीति पर युद्ध का गहरा असरविश्लेषकों का मानना है कि जहां मध्य-पूर्व में ईरान-अमेरिका के बीच एक अस्थाई शांति बनी है, वहीं यूक्रेन संकट का लंबा खिंचना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है। रूस द्वारा लगातार किए जा रहे ये हमले न केवल ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित कर रहे हैं, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को भी बुरी तरह बाधित कर रहे हैं। आने वाले दिनों में पश्चिमी देशों की ओर से रूस पर और अधिक कड़े प्रतिबंधों की घोषणा की जा सकती है। फिलहाल, यूक्रेन के आसमान में मंडराते रूसी ड्रोन और मिसाइलों के बीच आम जनता का जीवन दांव पर लगा है, और दुनिया की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि जेलेंस्की का 'बदले का संकल्प' युद्ध की दिशा को क्या नया मोड़ देगा।
पाकिस्तान में दो विदेशी महिलाओं के अपहरण और सामूहिक दुष्कर्म का आरोप, चार गिरफ्तार
पुलिस के अनुसार, पीड़ित महिलाओं में एक नीदरलैंड (डच) और दूसरी वेनेजुएला की नागरिक हैं। शिकायत में कहा गया है कि दोनों की मुलाकात अक्टूबर 2025 में सिंगापुर में मोहम्मद रजा दार नामक व्यक्ति से हुई थी।
रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका को डर था कि यदि ईरानी प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख नेताओं पर हमला हुआ, तो दोनों देशों के बीच जारी वार्ता और संभावित शांति प्रयास गंभीर रूप से प्रभावित हो सकते हैं।
फ्रांस के जंगलों में धधकी आग, , 800 से अधिक दमकलकर्मी मोर्चे पर, भीषण गर्मी ने बढ़ाई मुश्किलें
दक्षिणी फ्रांस में लगातार पड़ रही भीषण गर्मी और लंबे समय से बने सूखे के बीच जंगलों में लगी आग ने हालात को गंभीर बना दिया है। औडे (Aude) और हेराल्ट (Hrault) क्षेत्रों में गुरुवार को भड़की आग तेजी से फैलकर लगभग 900 हेक्टेयर वन क्षेत्र को अपनी चपेट में ले चुकी है।
वेनेजुएला में पिछले हफ्ते आए भूकंप के बाद धीरे-धीरे हालात स्थिर हो रहे हैं। परिवहन मंत्रालय की ओर से साझा जानकारी के अनुसार, लॉस टेक्स शहर में मास-ट्रांजिट रेल सेवा फिर से शुरू हो गई है
ईरान की अमेरिका को चेतावनी, होर्मुज स्ट्रेट में दखल दिया तो मिलेगा करारा जवाब
ईरान की मुख्य सैन्य कमान खातम अल-अनबिया सेंट्रल हेडक्वार्टर ने गुरुवार को चेतावनी दी कि अगर अमेरिका होर्मुज स्ट्रेट में किसी भी तरह का हस्तक्षेप करता है, तो ईरानी सशस्त्र बल 'तेज और निर्णायक' जवाबी कार्रवाई करेंगे।
सीरिया की राजधानी दमिश्क में एक कैफे में भीषण धमाका, 9 लोगों की मौत
सीरिया की राजधानी दमिश्क में एक कैफे में भीषण धमाके में 9 लोगों की जान चली गई है, जबकि 20 लोग घायल हो गए हैं। सीरिया के गृह मंत्रालय की ओर से बीती रात ये जानकारी दी गई कि मध्य दमिश्क के एक कैफे में धमाका हुआ और 9 लोगों की मौत हो गई।
अमेरिका में कॉलेज एथलीट्स को टैक्स में राहत देने पर विचार
अमेरिकी सांसदों ने कॉलेज खिलाड़ियों को भारी-भरकम टैक्स के बोझ से बचाने के लिए सुधारों की मांग की है। उनका कहना है कि नेम, इमेज एंड लाइकेनेस (एनआईएल) समझौतों के तेजी से बढ़ते चलन के कारण कई युवा खिलाड़ी पर्याप्त मार्गदर्शन के अभाव में जटिल कर व्यवस्था को समझने और उसका पालन करने में कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं।
अमेरिका: ओहियो के मोटल में लगी भीषण आग, गुजरात के एक परिवार के तीन सदस्यों की मौत
ओहियो (अमेरिका) के वूस्टर शहर में एक मोटल में लगी आग में गुजरात के एक परिवार के तीन सदस्यों की मौत हो गई। यह आग बुधवार देर रात लगी

