अमेरिका-ईरान अगले हफ्ते फिर इस्लामाबाद में बातचीत कर सकते हैं,ट्रंप बोले- ईरान के जवाब का इंतजार
रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका ने ईरान के सामने 14 बिंदुओं वाला एक प्रस्तावित ड्राफ्ट रखा है। इसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम, होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव को कम करने और ईरान के उच्च स्तर पर समृद्ध (एनरिच्ड) यूरेनियम भंडार को किसी तीसरे देश भेजने जैसे अहम मुद्दे शामिल हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान का नया दांव: ‘पेट्रोयुआन’ से अमेरिका की आर्थिक ताकत को चुनौती?
ईरान का अनुमान है कि इस नई व्यवस्था से उसे हर साल 40 से 50 अरब डॉलर तक की आय हो सकती है। इससे अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण कमजोर हुई उसकी अर्थव्यवस्था को राहत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
पोप लियो बोले, हम ऐसे दौर में जहां इंसानियत से ज्यादा युद्ध प्राथमिकता
अमेरिका के पहले पोप माने जाने वाले लियो ने हाल के हफ्तों में युद्ध और तानाशाही के खिलाफ खुलकर बयान दिए हैं। ईरान युद्ध की आलोचना को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी कई बार इंटरनेट मीडिया पर उनकी आलोचना कर चुके हैं।
ये वीडियो शायद आपने देखा हो। इसमें दिख रहे शख्स जीतू मुंडा हैं। उम्र 52 साल। बदन पर सिर्फ एक कपड़ा। कंधे पर बड़ी बहन कलरा का कंकाल। कलरा के बैंक अकाउंट में 19,400 रुपए जमा थे। उनकी मौत के बाद जीतू 27 अप्रैल को पैसे निकालने बैंक पहुंचे। आरोप है कि बैंक मैनेजर ने कहा कि बहन को लाओ, तभी पैसे मिलेंगे। जीतू ने कब्र से बहन का कंकाल निकाला और तीन किमी दूर बैंक लेकर आ गए। मामला ओडिशा के क्योंझर जिले के दियानाली गांव का है। दैनिक भास्कर की टीम जीतू मुंडा के घर पहुंची, तो दो सवाल साथ थे… 1. जीतू को ऐसा क्यों करना पड़ा? 2. उन्हें ऐसा करने के लिए किसने मजबूर किया? पहले सवाल का जवाब ये फोटो है… कभी भी टूटकर गिर जाने की हालत में पहुंच चुका ये मकान जीतू का घर है। कच्चा फर्श, सीलन भरी दीवारें, दरवाजे की चौखट तक उखड़ चुकी है। पहले जीतू और उनकी बहन कलरा इसी घर में रहते थे। दो गाय भी इसी में बंधती थीं। एक साल पहले कलरा को सरकारी घर मिल गया। जीतू के पास कोई काम नहीं है। कलरा को सरकार से मिलने वाले 1 हजार रुपए और 35 किलो चावल में गुजारा होता था। पति की मौत के बाद से कलरा मायके में रह रही थीं। उन्होंने बछड़ा बेचकर 19,400 रुपए पटना ब्लॉक के मल्लीपासी ग्रामीण बैंक में जमा किए थे। जीतू और कलरा बीच-बीच में 100, 200, 500 रुपए निकालने बैंक जाते थे। एक दिन कलरा बीमार पड़ीं और 26 जनवरी को उनकी मौत हो गई। जीतू के गुजारे का सहारा खत्म हो गया। आखिरी आस बैंक में जमा पैसे थे। जीतू वही निकालने बैंक गए थे। 19 हजार के लिए बहन की कब्र खोदी, अब 15 लाख रुपए की मदद मिली जीतू के घर में बहन के अलावा एक भाई और उनका परिवार है। जीतू की शादी नहीं हुई है। वीडियो वायरल होने के बाद उन्हें बैंक में जमा पैसों के अलावा अलग-अलग संगठनों और पार्टियों से करीब 15 लाख रुपए की मदद मिल चुकी है। बहन के घर में बिजली कनेक्शन मिल गया है। जीतू अब उनके घर में ही रह रहे हैं। जीतू का गांव क्योंझर से करीब 40 किमी दूर जंगलों में बसा है। हम उनके घर पहुंचे तो मीडिया और नेताओं की भीड़ लगी थी। जीतू, उनके भाई शंकर और बहन कलरा के घर पास-पास ही हैं, लेकिन जीतू और कलरा साथ में जीतू के घर में रहते थे। फिर कलरा नए घर में रहने लगीं। इसी घर के पास उनकी कब्र बनी है। हमने जीतू से पूछा घर के पास बहन की कब्र क्यों बनाई है? जीतू बोले- मेरी बहन ही मेरा घर है। मुझे डर नहीं लगता। वह मेरे पास ही है। बहन के जाने के बाद अकेला हो गया हूं। माता-पिता के निधन के बाद वही मेरे लिए सब कुछ थीं। मेरे पास न राशन कार्ड है, न कोई कागज। सब बहन का ही था। पति की मौत के बाद बहन मायके आई, कहती थी- भाइयों को छोड़कर नहीं जाऊंगी जीतू इससे आगे नहीं बोल पाते। उनके छोटे भाई शंकर बताते हैं कि जिस दिन जीतू ने बहन की कब्र खोदी थी, मैं घर पर नहीं था। जीतू और कलरा के बीच बहुत अच्छा रिश्ता था। दोनों कई बातों में मुझे भी शामिल नहीं करते थे। मुझे बताए बिना ही बैंक जाते थे। हम चार भाई थे। दो भाइयों का निधन हो चुका है। पति की मौत के बाद कलरा भी हमारे पास आ गई। वह जीतू के साथ रहने लगी। वो कहती थी कि अब भाइयों को छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी। जीतू ने कब्र खोदी, बहन का कंकाल निकाला, तब आसपास के लोगों ने रोका क्यों नहीं? जवाब गांव के मंसूर ने दिया, ‘जीतू उस दिन सुबह करीब 10 बजे बैंक गया था। 11:30 बजे लौटा। 12 बजे के करीब कब्र खोदना शुरू किया। तेज गर्मी की वजह से आसपास सन्नाटा था, इसलिए कोई उसे देख नहीं पाया।’ कलरा की मौत कैसे हुई थी? पड़ोसी करुणाकर महंत बताते हैं, ‘तेज बुखार हुआ था। जीतू बैंक गया और 500 रुपए निकालकर लाया। कलरा को अस्पताल ले गया, लेकिन उसकी मौत हो गई। इसके तीन महीने बाद जीतू पैसे निकालने बैंक गया था। स्टाफ ने उससे कागज मांगे। जीतू पढ़ा-लिखा नहीं है, उसे कागजों के बारे में पता नहीं था। वो एक ही बात कहता रहा कि मेरी बहन के नाम पर पैसा है, मुझे दे दो। स्टाफ ने कहा कि जाओ, बहन को लेकर आओ, तब पैसा मिलेगा।’ ‘हो सकता है बैंकवालों ने यह बात झुंझलाहट में कही हो, लेकिन जीतू उसे समझ नहीं पाया। वो गांव लौटा और कब्र खोदकर बहन का कंकाल निकाला। तीन किलोमीटर दूर बैंक ले गया। मैनेजर से कहा कि मैं बहन को ले आया हूं, अब मेरा पैसा दे दो। स्टाफ ने पुलिस बुला ली। पुलिसवालों ने जीतू को डांटा और कहा कि शव को फिर से दफनाओ। जीतू कंकाल कंधे पर रखकर वापस लाया और उसे फिर से दफना दिया।' पूरे मामले में जिम्मेदार अधिकारी बैंक मैनेजर: मैनेजर के मुताबिक, जीतू पैसे निकालने आया था, तभी उसे पहली बार देखा था। उससे डॉक्युमेंट मांगे थे, डेडबॉडी लाने के लिए नहीं कहा। हालांकि, जीतू का दावा है कि मैनेजर ने ही कहा था कि बहन को लेकर आओ, तब पैसा मिलेगा। जीतू के मुताबिक, मैंने मैनेजर को बताया भी था कि बहन मर चुकी है, तब भी उन्होंने कहा कि बहन को लेकर आओ, नहीं तो पैसा नहीं मिलेगा। जांच में सामने आया है कि जीतू बहन के साथ कई बार बैंक आए थे। आखिरी बार दोनों 26 दिसंबर को 500 रुपए निकालने बैंक गए थे। हम मल्लिपासी ग्रामीण बैंक गए, जहां जीतू की बहन का अकाउंट है। बैंक मैनेजर मौजूद नहीं थे। सिर्फ दो कर्मचारी थे, जिनमें से एक डेपुटेशन पर हैं। उन्होंने बताया कि मैनेजर छुट्टी पर चले गए हैं। पुलिस-प्रशासन: जीतू बहन का कंकाल लेकर वापस जा रहा था, तब पुलिस और प्रशासन के अधिकारी मौजूद थे। सभी पीछे-पीछे चलते रहे, लेकिन जीतू की मदद नहीं की। मानवाधिकार आयोग की गाइडलाइंस के मुताबिक, शव का सम्मान के साथ अंतिम संस्कार प्रशासन का कर्तव्य है। इस बारे में पता करने हम पटना पुलिस स्टेशन पहुंचे। यहां SI धनेश्वर पात्रा मिले। हमने उनसे पूछा कि डेडबॉडी ले जाने के लिए एंबुलेंस या कोई गाड़ी क्यों नहीं दी गई? उन्होंने जवाब दिया कि मैं उस दिन छुट्टी पर था। सब अचानक हुआ। स्टाफ तय नहीं कर पाया कि क्या करना है। जल्दबाजी में ऐसा हो गया। डेथ सर्टिफिकेट जारी करने वाले अफसर: जीतू ने बहन की मौत के बाद 26 फरवरी को डेथ सर्टिफिकेट के लिए सरकारी वेबसाइट पर आवेदन किया गया था। 7 दिन में सर्टिफिकेट मिल जाना चाहिए था, लेकिन अप्रैल तक भी जारी नहीं हुआ। पटना मेडिकल कॉलेज के इंचार्ज सुवेंदु कुमार नायक कहते हैं, ‘कलरा की मौत 26 जनवरी 2026 को हुई थी। ये मामला उनके पास 17 अप्रैल को आया।’ ‘नियम है कि 21 दिन में रजिस्ट्रेशन हो जाना चाहिए। मृत्यु के 7 दिनों के भीतर परिवार के लोग आवेदन करते हैं, तभी प्रक्रिया जल्दी पूरी हो पाती है। कलरा के परिवार ने समय पर आवेदन नहीं किया। बाद में उनकी भाभी गुरुबारी मुंडा ने 30 मार्च को डेथ सर्टिफिकेट के लिए आवेदन किया।’ ‘इसके लिए जो दस्तावेज दिए गए थे, वे स्पष्ट नहीं थे। इसलिए आवेदन वापस कर दिया गया। 25 अप्रैल को दोबारा सही दस्तावेजों के साथ आवेदन किया गया और 29 अप्रैल को डेथ सर्टिफिकेट जारी कर दिया गया। हमारी ओर से लापरवाही नहीं हुई। गुरुबारी मुंडा ने एक एफिडेविट दिया था, जिसमें लिखा था कि मेरे अलावा कलरा मुंडा का कोई और वैध वारिस नहीं है। उन्हें जो दस्तावेज और प्रमाण दिए, उसी आधार पर हमने कार्रवाई की।’ गुरुबारी मुंडा ने भी एफिडेविट देने की बात मानी है। उन्होंने बताया कि अकाउंट से पैसे निकालने में दिक्कत हुई, तब किसी ने ऐसा करने का सुझाव दिया था। एफिडेविट परिवार की सहमति से दिया था।
27 नवंबर 2020 की बात है। एक खबर आई- पश्चिम बंगाल के परिवहन मंत्री और दीदी के 'खास सिपहसालार' सुवेंदु अधिकारी ने इस्तीफा दे दिया है। विधानसभा चुनाव महज 5 महीने दूर थे। सुवेंदु का जाना किसी बड़े किले के ढहने जैसा था। आनन-फानन में डैमेज कंट्रोल की कवायद शुरू हुई। रूठे हुए 'नंदीग्राम के शेर' को मनाने के लिए बिसात बिछाई गई। 1 दिसंबर की सर्द रात। कोलकाता के एक कमरे में 4 दिग्गज जुटे। बागी सुवेंदु अधिकारी, ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी, टीएमसी सांसद सौगत रॉय और चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर। घंटों माथापच्ची हुई। अगली सुबह सौगत रॉय ने ऐलान किया- ‘सब ठीक है। सुवेंदु कहीं नहीं जा रहे, वो हमारे साथ हैं।' लगा कि तूफान टल गया। कुछ ही दिन बीते थे कि सुवेंदु के एक वॉट्सऐप मैसेज ने फिर सियासी धमाका कर दिया। सौगत रॉय को भेजे मैसेज में उन्होंने लिखा- ‘मेरी टीस अभी भी बरकरार है। आपने बिना समाधान निकाले ही सब कुछ मुझ पर थोप दिया। प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुझे अपनी बात कहनी थी, लेकिन आपने पहले ही घोषणा करके मेरा मौका छीन लिया। अब साथ चलना मुमकिन नहीं। मुझे माफ कर दें।’ इधर मेदिनीपुर में सुवेंदु के दफ्तर से ममता दीदी के पोस्टर नदारद हो रहे थे और दीवारों पर भगवा रंग चढ़ने लगा था। 17 दिसंबर को उन्होंने आधिकारिक तौर पर टीएमसी को 'राम-राम' कह दिया। अगले ही दिन दिल्ली से 'जेड' श्रेणी की सुरक्षा का फरमान आया, तो समझ में आ गया कि अब सुवेंदु की मंजिल का पता बदल चुका है। 19 दिसंबर 2020 का वो दिन, मेदिनीपुर का मैदान जनसैलाब से अटा पड़ा था। गृहमंत्री अमित शाह ने सुवेंदु के गले में बीजेपी का गमछा डाला। दोनों ने मिलकर झंडा लहराया। सुवेंदु ने झुककर शाह के पैर छुए और बंगाल फतह के लिए बीजेपी के सारथी बन गए। 3 सीटों वाली बीजेपी 2021 के चुनाव में 77 सीटों तक पहुंची और इस बार 2026 में 207 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया। अब ऑब्जर्वर बनकर बंगाल पहुंचे अमित शाह, सुवेंदु को ही मुख्यमंत्री बनाने का ऐलान कर सकते हैं। 7 ग्राफिक्स में जानिए सुवेंदु अधिकारी से जुड़े कुछ रोचक किस्से… ****** ग्राफिक्स: अंकुर बंसल और महेंद्र वर्मा --------------------------- ये खबर भी पढ़ें…जब ममता ने रातोंरात सोनिया की कांग्रेस को जीरो किया:34 साल की लेफ्ट सरकार को उखाड़ फेंका; अब दीदी की विदाई तय 30 अप्रैल 2026। रात करीब 8 बजे। कोलकाता के सखावत मेमोरियल स्कूल के बाहर भारी बारिश हो रही थी। तभी एक गाड़ी आकर रुकी। सफेद साड़ी, पैरों में रबर की चप्पल। अपने सिग्नेचर स्टाइल में बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी उतरीं, और सीधे स्ट्रॉन्ग रूम की तरफ बढ़ चलीं। पढ़ें पूरी खबर…
ईरान का UAE पर मिसाइल और ड्रोन से हमला, 30 दिन की शांति के बाद मिडिल ईस्ट में फिर बढ़ा तनाव
यह हमला ऐसे समय हुआ है, जब कुछ ही समय पहले अमेरिका और ईरान के बीच भी तनावपूर्ण हालात देखने को मिले थे। एक रात पहले दोनों देशों के बीच मिसाइलों को लेकर टकराव की खबरें सामने आई थीं।
होर्मुज जलडमरूमध्य में टकराव: अमेरिकी जहाजों पर ईरानी मिसाइलें
मध्य पूर्व में हालात एक बार फिर बिगड़ते दिख रहे हैं। अमेरिकी सेना ने दावा किया है कि उसने ईरान के बंदर अब्बास और केशम में सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है
भवानीपुर में दीदी के खिलाफ सुवेंदु की जीत हो या 2021 के विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम से ममता की हार या फिर संदेशखाली केस, सुवेंदु अधिकारी के PA चंद्रनाथ रथ हर मोर्चे पर उनके साथ डटे रहे। 6 मई को कोलकाता के पास उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई। पुलिस इसे प्री-प्लांड मर्डर बता रही है। 42 साल के चंद्रनाथ रथ 6 मई की रात 10.30 बजे अपने घर बारासत जा रहे थे। स्कॉर्पियो में चंद्रनाथ के साथ ड्राइवर और एक शख्स था। चंद्रनाथ अगली सीट पर बैठे थे। पुलिस के मुताबिक, रात करीब 11 बजे कोलकाता से 20 किलोमीटर दूर एक कार ने उनका रास्ता रोक दिया। पीछे से बाइक से आए शूटर्स ने चंद्रनाथ पर 10 गोलियां चलाईं। चंद्रनाथ को तीन गोलियां लगीं। दो सीने से आर-पार हो गईं, एक पेट में लगी। ड्राइवर को भी गोली लगी। चंद्रनाथ की मां का कहना है कि हमें चुनाव के वक्त से ही धमकी मिल रही थी कि 4 तारीख के बाद दिल्ली के बाप भी नहीं बचा पाएंगे। उन्होंने वही कर दिया। जब से सुवेंदु बाबू ने ममता बनर्जी को हराया है, तभी से मेरे परिवार पर खतरा है। ‘TMC के गुंडों से निपटना हो या लीगल केस, चंद्रनाथ ही जरिया‘ इस बार सुवेंदु ममता के खिलाफ भवानीपुर से चुनाव लड़े। इसलिए चंद्रनाथ यहां डटे रहे। चुनाव के लिए राजस्थान से आई टीम में शामिल BJP विधायक गुरवीर सिंह बराड़ बताते हैं, ‘हम लोग भवानीपुर में थे, तब सारे इंतजाम चंद्रनाथ ही करते थे। चुनाव से जुड़ा लीगल मामला हो या TMC के लोगों की गुंडागर्दी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई, सबकी जिम्मेदारी चंद्रभान के पास थी।’ कहीं किसी ने कार्यकर्ताओं को पीट दिया या कोई प्रचार में दिक्कत कर रहा हो, तो हम चंद्रनाथ से ही बात करते थे। चुनाव आयोग या पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराना, सब वही करते थे। 30 अप्रैल और 1 मई की रात भवानीपुर के स्ट्रॉन्ग रूम में EVM में टैंपरिंग और हेरफेर का आरोप लगा, तब चंद्रनाथ कहां थे? BJP में हमारे सोर्स बताते हैं, 'वहीं थे। उन्होंने ही पूरे विवाद का सामना किया। फिर चुनाव आयोग और फोर्स से कोऑर्डिनेट किया। हम सब बाहरी थे। TMC के लोग हमसे उलझते, तब चंद्रनाथ की टीम ही उनसे मुकाबला करती थी।’ वे आगे कहते हैं, ‘उन्हें अंदाजा था कि भवानीपुर में TMC कुछ न कुछ विवाद करेगी। अगर वे पहले से तैयार नहीं होते, तो TMC बड़ा कांड करती। हम प्रचार के लिए कहीं जाते थे, तो TMC के 2-3 लोगों की टीम हमारे वीडियो बनाती थी। ऑफिस के आसपास भी TMC के लोग मंडराते रहते थे।' भवानीपुर-नंदीग्राम में ममता को हार दिलवाई भवानीपुर में BJP के प्रभारी रहे राजस्थान के विधायक राजेंद्र सिंह राठौड़ की कोर टीम में 8 लोग थे। इनमें शामिल सुभाष नील बताते हैं, 'हमें पहले ही दिन चंद्रनाथ से मिलवाया गया। बताया कि यही सारे इंतजाम देखेंगे। मीटिंग फिक्स करने से लेकर बूथ का एजेंट तय करने और रैलियों के रूट तक सबका जिम्मा इनके पास है।' 'डोर टू डोर प्रचार के लिए टीम कैसे जाएगी, रास्ते में खाने की व्यवस्था कहां होगी, वो जगह सुरक्षित है या नहीं, इसकी देखरेख चंद्रनाथ करते थे। 2021 में नंदीग्राम में सुवेंदु ने ममता को शिकस्त दी थी, तब भी मैनेजमेंट चंद्रनाथ के हाथ में था।' भवानीपुर में BJP की चुनाव मैनेजमेंट की टीम में शामिल सोर्स ने बताते हैं, ‘पूरे बंगाल में TMC की गुंडागर्दी चल रही थी, लेकिन भवानीपुर सीट ज्यादा सेंसेटिव थी। यहां TMC के लोगों के निपटने के लिए चंद्रनाथ ने लोकल युवाओं की टीमें बनाईं थीं।’ 'प्रचार के वक्त 2-3 युवाओं की एक टीम हमारे साथ रहती थी। साथ नजर नहीं आती थी, लेकिन आसपास ही रहती थी। अगर कोई हमला करे या मारपीट की नौबत आ जाए, तो वो टीम संभाल ले। कई बार ऐसी स्थितियां बनी भी थीं।' 10 साल से सुवेंदु के साथ थे, हमेशा कमांडो की तरह चौकन्ने रहते सुवेंदु BJP में आने से पहले TMC में थे। पार्टी के एक पदाधिकारी बताते हैं, 'चंद्रनाथ और सुवेंदु को मैंने पहली बार 2016 में साथ देखा था। तब सुवेंदु अधिकारी परिवहन मंत्री बने थे। चाहे रैली हो, रोड शो हो या किसी से मिलने जाना हो, हर जगह दोनों साथ होते। तब तक चंद्रनाथ सरकारी कर्मचारी नहीं थे। वे सुवेंदु के प्राइवेट स्टाफ थे, लेकिन परछाई की तरह साथ रहते थे।' सरकारी स्टाफ कब बने? वो बताते हैं, ‘काफी बाद में। सुवेंदु BJP में शामिल हो गए और नेता प्रतिपक्ष बने, तब चंद्रनाथ उनके सरकारी स्टाफ बने। वे हमेशा किसी कमांडो की तरह चौकन्ने रहते थे।' मां बोलीं- कातिलों को फांसी नहीं, उम्रकैद जरूर हो चंद्रनाथ की हत्या के बाद उनकी मां हासिरानी रथ ने कहा, ‘ये सब इसलिए किया गया क्योंकि BJP सत्ता में आ गई है। हमारे नेता बार-बार राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखने की बात कह रहे हैं, लेकिन ममता की पार्टी के लोग भड़काऊ बातें कर रहे थे। नई सरकार दोषियों को सजा दिलाए। मैं एक मां होने के नाते नहीं चाहती कि किसी दोषी को फांसी दी जाए, लेकिन उम्रकैद जरूर होनी चाहिए।’ पुलिस का दावा- चंद्रनाथ की रेकी हुई, ये प्री-प्लांड मर्डर चंद्रनाथ की हत्या का केस CID ने अपने हाथ में ले लिया है। जांच के लिए स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम बनाई गई है। अब तक 3 लोगों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया है। पुलिस का मानना है कि हमलावर कई दिन से चंद्रनाथ का रूटीन मॉनिटर कर रहे थे। DGP सिद्धनाथ गुप्ता ने बताया कि एक बात तय है कि चंद्रनाथ रथ को मारने के लिए पूरी टीम थी। ये लोग उनके आने-जाने के रूट पर नजर रखे हुए थे। हमला जिस तरह किया गया, वो बिना तय प्लान के नहीं हो सकता। हम इससे ज्यादा अभी कुछ नहीं बता सकते। ……………… पश्चिम बंगाल के भवानीपुर से ये रिपोर्ट भी पढ़ें… भवानीपुर में कचरे के ढेर की वजह से हारीं ममता भवानीपुर ममता बनर्जी का घर है। यहीं जन्मीं। तीन बार चुनाव जीतीं। इस बार सुवेंदु अधिकारी से हार गईं। BJP ने TMC के डर और भवानीपुर की बदहाली, कचरे के ढेर को ममता के खिलाफ सबसे बड़ा मुद्दा बना दिया। पढ़िए पूरी खबर…
नेपाल की भ्रष्टाचार विरोधी संस्था ने गुरुवार को विशेष अदालत में एक भ्रष्टाचार का मामला दर्ज किया।
विदेश मंत्रालय (एमईए) ने बताया कि ईरान के साथ चल रही कूटनीतिक बातचीत के चलते अब तक 11 भारतीय जहाज होर्मुज की खाड़ी से निकल चुके हैं।
पहली तिमाही में चीन के स्मार्ट उपभोक्ता उपकरण उद्योग में तेज वृद्धि
चाइना मीडिया ग्रुप (सीएमजी) से मिली जानकारी के अनुसार, इस वर्ष जनवरी से मार्च तक चीन के स्मार्ट उपभोक्ता उपकरण निर्माण उद्योग में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई
चीनी इलेक्ट्रिक सूचना विनिर्माण उद्योग के अतिरिक्त मूल्य में 13.6 प्रतिशत वृद्धि
चीनी उद्योग और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, इस साल की पहली तिमाही में पैमाने के ऊपर के इलेक्ट्रिक व सूचना विनिर्माण उद्यमों (सालाना कारोबार 2 करोड़ युआन या उससे अधिक) के अतिरिक्त मूल्य साल दर साल 13.6 प्रतिशत बढ़े, जो अलग-अलग तौर पर इसी अवधि में उद्योग और हाईटेक विनिर्माण उद्योग से 7.5 प्रतिशत और 1.1 प्रतिशत अधिक थे।
अबू धाबी में विक्रम मिस्री ने रीम अल हाशिमी से की मुलाकात, भारत-यूएई साझेदारी पर हुई चर्चा
विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने गुरुवार को अबू धाबी में यूएई की अंतरराष्ट्रीय सहयोग मामलों की राज्य मंत्री रीम अल हाशिमी से मुलाकात की
होर्मुज स्ट्रेट मिशन पर अमेरिका को झटका, सऊदी अरब ने नहीं दी एयरस्पेस की अनुमति
अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस मिशन को रोकने की सबसे बड़ी वजह सऊदी अरब का सहयोग न मिलना था। कहा जा रहा है कि सऊदी नेतृत्व ने अमेरिकी सैन्य विमानों को अपने एयरस्पेस और एयरबेस इस्तेमाल करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया, जिससे पूरे ऑपरेशन की रणनीति प्रभावित हो गई।
26 मार्च से 3 अप्रैल 2026 के बीच नासिक में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) की 9 महिला कर्मचारियों ने FIR दर्ज कराई। 9 में से 6 FIR में TCS नासिक के टीम लीडर तौसीफ अत्तार का नाम है। तौसीफ पर सेक्शुअल हैरेसमेंट, जबरन धर्म परिवर्तन और वर्कप्लेस पर डराने-धमकाने जैसे गंभीर आरोप लगे हैं। इसके अलावा 6 टीम लीडर्स और HR मैनेजर निदा खान भी आरोपी बनाए गए हैं। केस सामने आने के करीब एक महीने बाद जांच का अपडेट जानने और TCS ऑफिस का माहौल समझने के लिए हम नासिक पहुंचे। नौकरी खोजने के बहाने अशोका बिजनेस इनक्लेव बिल्डिंग में TCS के दफ्तर पहुंचे। गार्ड ने बताया कि यहां BPO चलता है, अभी काफी वैकेंसी है। अधिकारी से मिलने के लिए कहा, तो मना कर दिया। कुछ कर्मचारियों से जरूर बात हुई। ऑफिस में टेलीकॉलर का काम करने वाले एक कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, ‘केस सामने आने के बाद से करीब 20 लोग रिजाइन दे चुके हैं। हालात अब सामान्य होने लगे हैं, लेकिन ऑफिस में केस पर कोई बात नहीं करता है। ये जरूर है कि पहले कभी एक साथ इतने रिजाइन नहीं हुए थे। नई भर्तियां हो रही हैं, लेकिन पहले जितने लोग नहीं आ रहे हैं।’ निदा खान नहीं, तौसीफ अत्तार मास्टरमाइंड तौसीफ पर हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करने का भी आरोप है। TCS के एक पीड़ित पुरुष कर्मचारी ने आरोप लगाया है कि तौसीफ उसे जबरदस्ती अपने घर ले गया, जहां उसे नमाज पढ़ाई और टोपी पहनने के लिए मजबूर किया। डरा-धमकाकर मांस भी खिलाया। केस की जांच कर रही नासिक पुलिस की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) में शामिल हमारे सोर्स ने बताया, ‘पहला केस सामने आने के बाद हमने TCS जाकर कर्मचारियों को भरोसे में लिया। इसके बाद बाकी पीड़ित सामने आए, इसीलिए एक दिन में 8 FIR दर्ज की गईं। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी और भी पीड़ित सामने आ सकते हैं, क्योंकि कुछ लोग अब भी डरे हुए हैं।‘ मीडिया में निदा खान के केस का मास्टरमाइंड होने की खबरें आई थीं। हालांकि सोर्स का दावा है, ‘अब तक तौसीफ ही मास्टरमाइंड के तौर पर सामने आया है। सभी पीड़ितों और साथी कर्मचारियों ने बातचीत में निदा खान की जगह तौसीफ का नाम लिया है। निदा उसकी साथी थी, लेकिन मास्टरमाइंड तौसीफ ही लग रहा है।‘ ‘पीड़ितों का कहना है कि वही लड़कियों को बहला-फुसलाकर धर्मांतरण के लिए दबाव बनाता था और बाकी आरोपियों को संरक्षण भी देता था। पुलिस को जो वीडियो पुलिस मिले हैं, उसमें भी तौसीफ ही धर्मांतरण करता दिख रहा है।‘ केस में अब तक 7 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है। तौसीफ अत्तार समेत 4 आरोपी पुलिस रिमांड पर हैं, जबकि निदा खान फरार है। पिता बोले- बहू प्रेग्नेंट, तौसीफ को बेल मिले 2 मई को हम नासिक कोर्ट में तौसीफ के पिता और भाई से मिले। उन्होंने बात की लेकिन कैमरे पर आने से इनकार कर दिया। पिता बिलाल फकीर मोहम्मद अत्तार दावा करते हैं कि उन्हें केस से जुड़ी कोई जानकारी नहीं थी। परिवार को भी FIR दर्ज होने के बाद ही पता चला। वे बेटे पर लगे आरोपों को गलत बताते हुए कहते हैं, ‘पूरा मामला झूठा है। हमें अफेयर या ऐसी किसी भी एक्टिविटी के बारे में नहीं पता। लड़कियां ये आरोप किसी के दबाव में लगा रही हैं। तौसीफ की पत्नी की अगले 4-5 दिनों में डिलीवरी होनी है। इसी आधार पर हम बेल की कोशिश कर रहे हैं।’ तौसीफ के पिता मीडिया में आ रही खबरों पर भी नाराजगी जताते हैं। वे कहते हैं कि पता नहीं ये मलेशिया वाली बात कहां से आई, पुलिस ने भी ऐसा कुछ नहीं कहा है। दरअसल तौसीफ और निदा पर आरोप है कि उसने धर्मांतरण कराने के लिए एक पीड़ित को मलेशिया में नौकरी और प्रमोशन दिलाने का लालच दिया था। अब जानिए केस की जांच में क्या पता चला… ’धर्मांतरण जांच का केंद्र, लेकिन अलग से केस नहीं’ SIT में हमारे सोर्स का दावा है कि पुलिस 20 मई तक केस में चार्जशीट दाखिल कर देगी। पुलिस ने अरेस्ट आरोपियों और पीड़ितों से पूछताछ की है। TCS के अन्य कर्मचारियों के बयान भी दर्ज किए हैं। सूत्र बताते हैं, ‘केस से जुड़े कुछ वीडियो रिट्रीव कर लिए गए हैं। TCS से बाकी CCTV फुटेज मांगे गए हैं। 2022 से अब तक के सारे CCTV मिलना मुश्किल हैं। गुड़ी पड़वा पर जब स्टाफ को टोपी पहनाई गई, पुलिस को तब का एक वीडियो मिला है। ये सोशल मीडिया पर भी वायरल है।‘ सोर्स दावा करते हैं कि जांच का मुख्य एंगल धर्मांतरण ही है। पुलिस के पास इसके पुख्ता सबूत भी हैं, लेकिन धर्मांतरण का अलग से कानून नहीं है, इसलिए पुलिस BNS की धारा-299 के तहत केस बनाने की तैयारी में है। इसमें धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का केस बनेगा। निदा अरेस्ट हुई, तो खुल सकता है फंडिंग का एंगल केस में फरार आरोपी निदा खान की तलाश में पुलिस ने 4 टीमें बनाई हैं। महाराष्ट्र के अलग-अलग हिस्सों में तलाश जारी है। सोर्स के मुताबिक, निदा खान से पूछताछ करने पर फंडिंग वाला एंगल और खुल सकता है। अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन हो सकता है कि ये विदेशी फंडिंग का केस भी निकले। हालांकि मामले में अभी और आरोपी जुड़ सकते हैं। निदा खान ने अपनी प्रेग्नेंसी का हवाला देते हुए कोर्ट से प्री-अरेस्ट बेल की मांग की थी, लेकिन नासिक की निचली अदालत ने 2 मई को ये याचिका खारिज कर दी। वकील बोले- धर्मांतरण का केस कमजोर तौसीफ, निदा खान समेत 4 आरोपियों की ओर से केस लड़ रहे सीनियर एडवोकेट राहुल कासलीवाल निदा के सरेंडर ना करने पर कहते हैं, ‘निदा अगर पुलिस को अपनी बात बताए, तो भी उसे अरेस्ट कर लिया जाएगा, जबकि जमानत उनका पहला हक है। अग्रिम जमानत की याचिका निचली अदालत में रिजेक्ट हुई है, तो हाईकोर्ट जाएंगे। ‘ वकील धर्मांतरण का केस ना होने का दावा करते हुए कहते हैं, 9 मामलों में से किसी भी पीड़ित ने धर्म परिवर्तन नहीं किया है, इसलिए कानूनी तौर पर धर्मांतरण का मामला कमजोर है। महाराष्ट्र में जबरन या गैरकानूनी धर्मांतरण के खिलाफ कोई विशेष कानून भी नहीं है। ‘पुलिस ने धारा-299 लगाई है, वो धार्मिक भावनाएं आहत करने से संबंधित है। धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना और धर्मांतरण कराना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।’ राहुल एक दिन में 8 FIR दर्ज होने को भी असामान्य बताते हैं। वे कहते हैं कि अगर सभी घटनाएं एक-दूसरे से जुड़ी थीं, तो एक FIR में जांच हो सकती थी। उनका ये भी आरोप है कि अगर 2022 से ऐसी घटनाएं हो रही थीं, तो पीड़ित पक्ष चार साल चुप क्यों रहा? वे कंपनी छोड़ सकते थे या ऑफिस में लिखित शिकायत कर सकते थे। चार साल तक कोई शिकायत क्यों नहीं की। ‘ये सिस्टमैटिक ब्रेनवॉश, निदा से पूछताछ जरूरी‘ केस में स्पेशल पब्लिक प्रोसिक्यूटर अजय मिश्र बताते हैं कि उन्होंने कोर्ट में दलील दी कि ये सिर्फ व्यक्तिगत विवाद नहीं, बल्कि एक प्लान तरीके से किया जा रहा सिस्टमैटिक ब्रेनवॉश है। निदा खान पर आरोप है कि उसने एक पीड़ित को मलेशिया में नौकरी और प्रमोशन दिलाने का लालच दिया था ताकि उसका धर्मांतरण कराया जा सके। वे दावा करते हैं कि आरोपियों ने एक पीड़ित का नाम बदलकर 'हानिया' रख दिया था। उसे बुर्का पहनने जैसी धार्मिक ट्रेनिंग दी जा रही थी। पीड़ितों को मीडिया से बात न करने की हिदायत पीड़ितों का पक्ष जानने के लिए हम एक पीड़ित के घर भी पहुंचे। TCS कर्मचारी दानिश के खिलाफ शिकायत करने वाली पीड़ित ने हमसे बात करने से मना कर दिया। अन्य पीड़ितों ने भी यही कहा कि पुलिस ने उन्हें मीडिया से दूर रहने की हिदायत दी है। इसके अलावा हमने आरोपी निदा खान के पिता से भी बात करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने भी मना कर दिया। TCS की आंतरिक जांच कहां तक पहुंची है, ये जानने के लिए हमने कंपनी को भी मेल किया है, लेकिन खबर लिखे जाने तक कोई जवाब नहीं मिला है। आगे मिलने पर जोड़ा जाएगा। ………………TCS केस से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… ‘तौसीफ बोला- शिव भगवान नहीं, ब्रह्माजी को गाली दी’ ‘तौसीफ ऑफिस में बिजनेस प्रोसेस लीडर है। हम एक टीम में नहीं थे, फिर भी वो मेरे पास आता और निजी जिंदगी के बारे में बातें करता। पूछता कि क्या तुम्हारा बॉयफ्रेंड है। वो ऑफिस की लड़कियों को सिर से पैर तक घूरता और आंख मारता।‘ ये आपबीती 25 साल की उस लड़की की है, जिसकी शिकायत पर नासिक पुलिस ने TCS के 7 अधिकारियों को गिरफ्तार किया है। पढ़िए पूरी खबर…
भवानीपुर की गलियों में कदम रखते ही महसूस होता है कि कुछ बदल गया। एक तरफ जश्न, दूसरी तरफ खामोशी। ममता की हार के बाद सड़क पर कई जगह TMC के झंडे पड़े दिखे। थोड़ा आगे डीजे की तेज आवाज आई। ‘जय श्री राम’ का उद्घोष और गानों पर नाचते लोग दिखे। बोले, ‘खेला खत्म हो गया, अब शांति से रहेंगे।’ भवानीपुर ममता बनर्जी का घर है। यहीं जन्मीं। तीन बार चुनाव जीतीं। इस बार सुवेंदु अधिकारी से हार गईं। BJP ने TMC के डर और भवानीपुर की बदहाली, कचरे के ढेर को ममता के खिलाफ सबसे बड़ा मुद्दा बना दिया। लेकिन ये हुआ कैसे… उससे पहले हालात की एक कहानी सुवेंदु घर आए तो TMC वालों ने BJP कार्यकर्ता की पत्नी को सफेद साड़ी भेजी कालीघाट के टर्फ रोड एरिया में रहने वाली रीता दत्ता के पति 38 साल से BJP में हैं। एक दिन सुवेंदु अधिकारी उनसे मिलने घर आए। रीता बताती हैं कि सुवेंदु दा के लौटने के 10 मिनट बाद ही तीन लड़के आए। उम्र 20-22 साल होगी। हाथ में एक पैकेट था। बोले- TMC की तरफ से है। पैकेट में सफेद साड़ी थी। उस पर लिखा था- सुवेंदु दो दिन, TMC सारा जीवन। रीता बताती हैं, ‘इसके बाद भी हमें धमकियां मिलती रहीं। कहा गया कि 4 तारीख के बाद देख लेंगे। हाथ-पैर तोड़ देंगे। हमने ये बात सुवेंदु दा तक पहुंचाई। उनकी मदद से कालीघाट पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज कराई। उन लोगों को अरेस्ट करवाया।’ ये हालात बदले कैसे…शुरुआत BJP के ऑफिस बनवाने से राजस्थान के BJP लीडर राजेंद्र राठौड़ भवानीपुर के प्रभारी थे। अमित शाह और सुनील बंसल के करीबी हैं। 7 बार के विधायक हैं। नेता प्रतिपक्ष भी रहे। वे करीब 50 दिन भवानीपुर में रहे। राठौड़ भवानीपुर पहुंचे, तो पता चला कि यहां BJP का ऑफिस ही नहीं है। उनके साथी विधायक गुरबीर बराड़ बताते हैं, ‘TMC के लोग ऑफिस बनने नहीं देते थे। हमने एक जगह तलाशी। उसके मालिक को ऑफिस बनाने के लिए तैयार किया।’ ‘ऑफिस बनाना अब भी मुश्किल था। कंस्ट्रक्शन का सामान पुलिस ने रास्ते में रोक लिया। वहां से गाड़ी छूटी, तो TMC के लोगों ने घेर लिया। धमकाने लगे। हमने CRPF की मदद ली और 4-5 दिन में ऑफिस बनकर तैयार हो गया। ममता को हराने से पहले हमने भवानीपुर में ऑफिस बनाकर उनके गुंडों को चैलेंज किया।’ 8 रणनीतियां, जिन्होंने भवानीपुर की कहानी बदल दी 1. वोटर से मिलने हर घर तक पहुंचीं तीन-तीन लोगों की टीम BJP ने कैसे ममता के मजबूत किले में बिना शोर मचाए सेंध लगा दी। इसका जवाब छिपा है, घर-घर पहुंचने वाली रणनीति में। BJP ने प्रचार के लिए डायरेक्ट कनेक्शन पर जोर दिया। तीन-तीन लोगों की टीमें बनाईं, दो पुरुष और एक महिला। इनका काम था हर घर तक पहुंचना, वोटर से बात करना और महसूस कराना कि उसका वोट मायने रखता है। इसके उलट TMC के लोग झुंड में चुनाव प्रचार के लिए जाते थे। इस वजह से लोग उनसे कतराते थे। 2. गलियों से ज्यादा हाईराइज बिल्डिंगों में प्रचार भवानीपुर की पहचान बहुमंजिला इमारतों से भी है। यहां प्रचार आसान नहीं होता। BJP कार्यकर्ता बिल्डिंग के सिक्योरिटी गार्ड को साथ लेते, फिर लिफ्ट से सबसे ऊपर जाते और वहां से नीचे आते हुए हर फ्लैट में दस्तक देते। हर घर में प्रधानमंत्री का लेटर, संकल्प पत्र और सुवेंदु अधिकारी की प्रोफाइल वाला पर्चा दिया जाता। पूरे प्रचार का सबसे अहम पहलू था सोशल मीडिया से दूरी। BJP ने घर-घर संपर्क की न फोटो पोस्ट कीं और न मीटिंग की जानकारी दी गई। किसी नेता के दौरे को हाईलाइट नहीं किया। पूरा अभियान खामोशी से चला। इससे बिना रुकावट प्रचार चलता रहा। 3. सुबह 10 से शाम 5 बजे का वक्त महिलाओं के लिए प्रचार के दौरान समझ आया कि सुबह जल्दी या देर शाम जाने पर अक्सर घर के पुरुष ही मिलते हैं। इससे घर की महिलाओं तक पहुंच नहीं बन पाती। तय किया गया कार्यकर्ता सुबह 10 बजे के बाद और शाम 5 बजे से पहले घर-घर जाएंगे। इससे सीधे महिलाओं से बात की गई। उनके मुद्दे सुने गए। पुरुषों के लिए सुबह का वक्त चुना, जब वे टहलने निकलते थे। बुद्धिजीवियों, डॉक्टरों, एडवोकेट, पत्रकारों, शिक्षकों, रिटायर्ड कर्मचारियों के साथ अलग से मीटिंग की गई। 4. पुराने कार्यकर्ताओं के लिए कॉलसेंटर, फोन करके एक्टिव किया एक कॉल सेंटर बनाकर पुराने कार्यकर्ताओं को फोन किया गया। उनसे पूछा गया कि वे BJP से कब जुड़े थे। किसने मेंबर बनाया था। अब एक्टिव हैं या नहीं। अगर मीटिंग में बुलाया जाए तो आएंगे या नहीं। ये निष्क्रिय कार्यकर्ताओं को एक्टिव करने का अभियान था। 5. 5 हजार नए और साइलेंट वोटर, जिन्होंने गेम बदल दिया SIR की वजह से भवानीपुर में वोटर लिस्ट से करीब 40 हजार नाम कट गए। 5 हजार से ज्यादा नए नाम जुड़े। इनमें ज्यादातर ऐसे युवा थे, जो पढ़ाई या नौकरी के लिए बाहर चले गए थे और चुनाव के लिए लौटे थे। इन लोगों को खास तौर पर टारगेट किया गया और उनसे संपर्क बनाया गया। भवानीपुर के रहने वाले गौतम कुमार बताते हैं, ‘लोग खुलकर कुछ नहीं बोल रहे थे, लेकिन अंदर ही अंदर फैसला कर चुके थे। इस बार साइलेंट वोटर सबसे बड़ा फैक्टर बने। वे सामने कुछ नहीं बोले, लेकिन वोटिंग के दिन फैसला दे दिया।’ 6. गुजराती, मारवाड़ी, राजस्थानी वोटर के हिसाब से टीमें बनाईं भवानीपुर में लगभग 42% वोटर बंगाली हिंदू और 34% गैर-बंगाली हिंदू हैं। लगभग एक चौथाई वोटर मुस्लिम हैं। बिहार, ओडिशा और झारखंड से आए प्रवासियों के अलावा सिख, मारवाड़ी और राजस्थान के लोग भी रहते हैं। इसलिए टीम में सिख, मारवाड़ी और राज्यों के हिसाब से लीडर रखे गए, ताकि वोटर से सीधा कनेक्ट कर पाएं। 8 वार्ड में 8 अलग-अलग प्रवासी अध्यक्ष भी बनाए। ये सभी राजस्थान से थे। 7. लोगों को भरोसा दिया, जीतें या हारें, सुरक्षा देते रहेंगे भवानीपुर सीट के प्रभारी राजेंद्र राठौड़ बताते हैं, ‘पिछले चुनाव में जिन लोग पर BJP को वोट डालने का शक था, नतीजे आने के बाद उनके घर की पाइपलाइन कटवा दी गई थी। उनके घरों के सामने कचरा फिंकवाया गया था। काउंसलर्स ने इनसे माफीनामा लिखवाया था। इस बार भी लोग हाथ जोड़कर कहते थे कि आप हमारे घर न आएं। अगर TMC फिर जीती, तो हमें जीने नहीं देंगे। हमने लोगों की सुरक्षा के लिए कार्यकर्ताओं के साथ सेंट्रल फोर्स की मदद ली। कहा कि BJP जीते या हारे, आपकी सुरक्षा होगी। 8. गंदी नाली, कचरे के ढेर को ममता के खिलाफ मुद्दा बना दिया राजेंद्र राठौड़ बताते हैं, 'हमने गंदी नालियों और कचरे के ढेर को मुद्दा बनाया। हमने कहा कि क्या ममता बनर्जी के इलाके के लोग गंदी नालियों और कचरे के ढेर के बीच रहने के हकदार हैं।' और इससे हासिल क्या हुआ… ममता हार गईं। 15,105 वोट से। भवानीपुर में पहली बार। 20 राउंड की काउंटिंग में ममता सिर्फ 7 राउंड और सुवेंदु 15 राउंड में आगे रहे, यानी एकतरफा जीत। इससे पहले यहां 5 बार चुनाव हुए थे, हर बार TMC जीती थी। BJP की जीत को कुछ लोग बदलाव और राहत मान रहे हैं, कुछ फिक्रमंद हैं, यानी हर गली की अपनी कहानी है। बबलू दास कहते हैं, ‘माहौल ठीक नहीं है। बहुत तोड़फोड़ हुई है। वहीं राजेश बर्मन कहते हैं, ‘अभी माहौल शांत है, लेकिन लोग थोड़े नाराज जरूर हैं।’ कई महिलाएं और बुजुर्ग मायूस भी नजर आए। कालीघाट की एक गली में मिली लीला शाह बोलीं, ‘हम चाहते थे दीदी जीतें। हमें लक्ष्मी भंडार से फायदा मिलता था, अब पता नहीं क्या होगा।’ ………………………..बंगाल में BJP की जीत पर ये खबर भी पढ़ें बंगाल में दीदी को हराने वाले BJP के 5 किरदार, मंच से पुलिस को धमकी भी स्ट्रैटजी बंगाल में BJP की मौजूदा जीत के 5 किरदार हैं। पहले अमित शाह, दूसरे उनका दाहिना हाथ रहे सुनील बंसल, फिर शिवप्रकाश सिंह, अमित मालवीय और भूपेंद्र यादव। अमित शाह की टीम ने बंगाल में ममता दीदी के खौफ से लेकर BJP के भरोसे तक के सफर के लिए नारे गढ़ने का काम किया। पुलिस को कैसे सरेआम चेतावनी दी जाए। कैसे जनता के बीच ममता के ऊपर शाह की दबंग छवि गढ़ी जाए, ये सब प्लानिंग का हिस्सा थी। पढ़िए पूरी खबर...
अफगानिस्तान के परवान में बम धमाका: युवक की मौत, तीन घायल
अफगानिस्तान के परवान प्रांत में बिना फटे बम को खोलने की कोशिश में हुए धमाके में एक युवक की मौत हो गई और तीन अन्य घायल हो गए
चुनाव हारने के बावजूद सीएम ममता बनर्जी इस्तीफा देने से इनकार कर रही हैं। देश के राजनीतिक इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि चुनाव हारने के बाद कोई सीएम इस्तीफा देने से मना करे। बीजेपी का कहना है कि संवैधानिक प्रक्रिया में विश्वास करने वाला कोई भी व्यक्ति ऐसी बात नहीं कर सकता है। पश्चिम बंगाल की मौजदा स्थिति पर संविधान और जानकार क्या कहते हैं और अगर ममता का जाना तय है, फिर इस्तीफा न देने की चाल क्यों चली; जानेंगे भास्कर एक्सप्लेनर में… सवाल-1: ममता बनर्जी ने इस्तीफा न देने का क्या लॉजिक दिया है?जवाबः ममता बनर्जी ने मंगलवार को कोलकाता में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा… सवाल-2: अगर इस्तीफा नहीं देंती, तो संविधान क्या कहता है? जवाबः संविधान का अनुच्छेद 164 राज्य के मंत्रिपरिषद के गठन और इसमें राज्यपाल की शक्तियों से जुड़ा हुआ है। अनुच्छेद 164(1) कहता है कि मुख्यमंत्री 'राज्यपाल की इच्छा तक' पद पर बने रह सकते हैं। अगर मौजूदा मुख्यमंत्री इस्तीफा नहीं देते, तो राज्यपाल अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए उनकी सरकार को बर्खास्त कर सकते हैं। हालांकि इसकी भी नौबत नहीं आएगी। क्योंकि अनुच्छेद 172 कहता है, ‘हर राज्य की विधानसभा यदि पहले ही विघटित नहीं कर दी जाती है तो, अपने प्रथम अधिवेशन के लिए नियत तारीख से पांच वर्ष तक बनी रहेगी, इससे अधिक नहीं। और पांच वर्ष की उक्त अवधि की समाप्ति का परिणाम विधानसभा का विघटन होगा।’ मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल 7 मई यानी कल तक ही है। उसके बाद न पुराने विधायक बचेंगे, न विधानसभा, न मंत्रिमंडल और न ही मुख्यमंत्री। सवाल-3: इस स्थिति पर एक्सपर्ट्स क्या कहते हैं? जवाबः संविधान के जानकार और सुप्रीम कोर्ट में वकील विराग गुप्ता बताते हैं- विराग गुप्ता का कहना है कि अगर ममता बनर्जी प्रत्यक्ष जाकर राज्यपाल को इस्तीफा नहीं देना चाहतीं, तो वो ईमेल या चिट्ठी के माध्यम से भी भेज सकती हैं। ये भी मान्य होता है। सवाल-4: ममता बनर्जी ने इस्तीफा न देने का दांव क्यों चला? जवाबः ममता ने ये कदम संवैधानिक कम, राजनीतिक वजहों से ज्यादा उठाया है। TMC पहली बार इतनी बड़ी हार झेल रही है। हार के बाद पार्टी में भगदड़, दलबदल और स्थानीय नेताओं के BJP की ओर जाने का खतरा रहता है। ‘मैं नहीं झुकूंगी’ वाला संदेश कार्यकर्ताओं को एकजुट करने की कोशिश हो सकता है। इसके अलावा भी एक्सपर्ट्स कुछ वजहें बताते हैं… ममता के इस्तीफा न देने की बात पर असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा का कहना है, ‘अगर वे रिजाइन नहीं देना चाहती हैं, तो उन्हें डिसमिस कर देना चाहिए। देश उनके हिसाब ने नहीं चलेगा। ममता SIR के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आप गलत हैं और चुनाव आयोग सही। इसका मतलब ये डिबेट पहले ही समाप्त हो चुकी है।’ ------------------------- ये खबर भी पढ़ें…बीजेपी की बंगाल जीत में SIR का कितना रोल:केरलम में 10 साल बाद कांग्रेस कैसे लौटी; नतीजों के पीछे 5 बड़े फैक्टर्स बंगाल में बीजेपी ने हिंदुत्व का वो रूप दिखाया जो उत्तर भारत से बिल्कुल अलग था- माछ भात खाते हुए, मां काली का नाम लेते हुए। असम में मुस्लिम वोट इस तरह बंटे कि विपक्ष का गणित ही बिगड़ गया। केरलम में राहुल गांधी ने भगवान अयप्पा के नाम पर वो नैरेटिव सेट किया, जिसे लेफ्ट काट नहीं पाया। और तमिलनाडु में विजय ने साबित किया कि स्टारडम अगर सही रणनीति से मिले, तो वो असली राजनीतिक ताकत बन जाता है। पढ़ें पूरी खबर…
बीएनपी नेता ने भाजपा की जीत पर खुशी जताते हुए सुवेंदु अधिकारी को बधाई दी। उन्होंने विश्वास जताया कि उनके नेतृत्व में पश्चिम बंगाल में नई सरकार प्रभावी ढंग से काम करेगी।हेलाल ने कहा कि सुवेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री बनने से भारत और बांग्लादेश के बीच संबंधों में और मजबूती आ सकती है।
ईरान-अमेरिका तनाव: ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ खत्म, लेकिन शांति दूर
अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने घोषणा की कि ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ समाप्त हो चुका है
ट्रंप प्रशासन से रूस को दी गई तेल छूट वापस लेने का आग्रह
अमेरिका की राजनीति में रूस और ऊर्जा नीति को लेकर नई बहस छिड़ गई है। कई डेमोक्रेटिक लॉमेकर्स ने ट्रंप प्रशासन से रूस के तेल पर दी गई छूट (वेवर) को तुरंत वापस लेने की मांग की
अमेरिका होर्मुज स्ट्रेट को सुरक्षित बनाने के लिए लगातार अभियान चलाता रहेगा : मार्को रुबियो
अमेरिका ने होर्मुज स्ट्रेट में एक बड़ा नौसैनिक अभियान शुरू किया है। इसका मकसद वहां फंसे व्यापारिक जहाजों को सुरक्षित बाहर निकालना और दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल व्यापार मार्गों में से एक पर फिर से आवाजाही शुरू कराना है
सूडान पर ड्रोन हमले के आरोपों को इथियोपिया ने बताया बेबुनियाद, दोनों देशों में तनाव बढ़ा
इथियोपिया की सरकार ने सूडान के उस आरोप को बेबुनियाद बताया, जिसमें कहा गया था कि इथियोपिया ने ड्रोन हमले किए हैं
'खूबसूरत, मगर नकली... यकीन करने से पहले जांचें', अपनी वायरल तस्वीरों पर इटली की पीएम मेलोनी की सलाह
इटली की प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी भी डीपफेक और एआई के गलत इस्तेमाल का निशाना बनी हैं
होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा में भागीदारी जरूरी, हमसे ज्यादा दुनिया को जलमार्ग की जरूरत: पीट हेगसेथ
संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपने सहयोगी देशों से कहा कि वे होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा की जिम्मेदारी में और ज्यादा हिस्सा लें
रोमानिया में राजनीतिक भूचाल: पीएम इली की सरकार गिर गई
रोमानिया की द्विसदनीय संसद ने प्रधानमंत्री इली बोलोजान की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पास कर दिया
होर्मुज स्ट्रेट पर अमेरिका का 'प्रोजेक्ट फ्रीडम' सैन्य मिशन, जहाजों की सुरक्षा के लिए उठाया कदम
संयुक्त राज्य अमेरिका ने एक सैन्य मिशन शुरू किया है, जिसका मकसद ईरान की होर्मुज स्ट्रेट में वाणिज्यिक जहाजों पर कथित नाकेबंदी को तोड़ना बताया जा रहा है
30 अप्रैल 2026 की दोपहर, ढाका के बरिधारा डिप्लोमैटिक जोन में हलचल थी। बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने भारत के कार्यवाहक उच्चायुक्त पवन बधे को तलब किया। कूटनीति की भाषा में ‘तलब’ एक सीधा और सख्त संदेश होता है। वजह था एक बयान- ‘मैं हर सुबह भगवान से प्रार्थना करता हूं कि भारत-बांग्लादेश संबंधों में और सुधार न हो, ताकि अवैध प्रवासियों को सुविधाजनक जगहों पर ले जाकर रात के अंधेरे में सीमा पार धकेलना जारी रहे।’ यह बयान असम के मौजूदा मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा का था। मौका असम के विधानसभा चुनाव, जहां हिंदू-मुसलमान और अवैध घुसपैठ बड़ा चुनावी मुद्दा है। मौजूदा बीजेपी में हिमंता का रुख कई बार कट्टर बीजेपी कार्यकर्ताओं से भी सख्त होता है। लेकिन वे हमेशा ऐसे नहीं थे। 2015 में भाजपा में आने से पहले वे असम की कांग्रेस सरकार में मंत्री थे और हिंदू-मुस्लिम भाई-भाई की राजनीति करते थे। उस दौर में हिमंता नरेंद्र मोदी के कट्टर आलोचक माने जाते थे। 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार में उन्होंने मोदी पर हमला करते हुए कहा था कि ‘गुजरात में पानी के पाइपों से मुसलमानों का खून बहता है।’ हिमंता की राजनीति हालात और मौके दोनों से बदलती रही है, लेकिन चुनाव में कामयाबी इनकी मुख्य ताकत है। 2026 का चुनाव भी उन्होंने पहले से ज्यादा सीटों से जीता है। यह कहानी उन्हीं हिमंता की है, जो हर बार पाला बदलकर ताकतवर होते गए… 1 फरवरी 1969, असम का जोरहाट। एक शिक्षित ब्राह्मण परिवार में हिमंता का जन्म हुआ। उनके पिता कैलाश नाथ शर्मा जाने-माने लेखक और गीतकार थे। मां मृणालिनी देवी लेखिका थीं, जो आगे चलकर असम साहित्य सभा की उपाध्यक्ष बनीं। दिलचस्प विरोधाभास यह है कि ‘बाहरी बनाम असमिया’ की राजनीति करने वाले हिमंता के पूर्वज खुद उत्तर प्रदेश के कन्नौज से जाकर असम में बसे थे। एक अर्थ में, वे भी कभी 'बाहरी’ थे। शब्दों की विरासत घर से मिली। 10 साल की उम्र तक आते-आते भाषण देने की कला उनकी पहचान बन चुकी थी। कक्षा 5 में ही वे असमिया वक्ता के रूप में मशहूर हो गए थे। अक्सर अपने पिता के लिखे भाषण पढ़ते, लेकिन उसमें जान खुद भरते। कामरूप एकेडमी स्कूल की कक्षा 6 में वे AASU से जुड़ गए थे। इसी समय असम में भाषा और पहचान को लेकर आंदोलन तेज हो रहे थे। इसी दौरान वे AASU के उभरते नेताओं प्रफुल्ल कुमार महंत और भृगु कुमार फूकन के संपर्क में आए। 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद बड़ी संख्या में आए शरणार्थियों आए। इनसे असम की अस्मिता, संस्कृति और जनसंख्या संतुलन जैसे मुद्दे जोर पकड़ने लगे। अप्रैल 1979 में असम के शिवसागर जिले में कुछ छात्रों ने एक हथियारबंद संगठन बनाया- यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम यानी ULFA। असम एक उबलते हुए बर्तन की तरह था और हिमंता इसी उबाल के बीच पल-बढ़ रहे थे। 1985 असम के इतिहास का एक निर्णायक साल था। AASU और ऑल असम गण संग्राम परिषद के नेतृत्व में बाहरियों के खिलाफ आंदोलन अपने चरम पर था। आंदोलनकारियों ने हाईवे बंद कर दिए। तेल की सप्लाई रुक गई, स्कूल-कॉलेज बंद हो गए और सरकारी कामकाज ठप पड़ गया। इससे भी पहले 1983 में नेल्ली नरसंहार हो चुका था। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार उसमें 2,000 से ज्यादा लोग मारे गए। गैर-सरकारी अनुमान 5,000 तक जाते हैं। इस खून-खराबे की चर्चा दुनियाभर में थी। राजीव गांधी इस चैप्टर को बंद करना चाहते थे। समझौते के दो महीने बाद AASU के नेताओं ने असम गण परिषद (AGP) बनाई। दिसंबर 1985 के चुनाव में AGP को बहुमत मिला और महज 32-33 साल की उम्र में प्रफुल्ल कुमार महंत किसी राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने। और 16 साल का हिमंता? वह भी उस इतिहास के बनने की प्रक्रिया में थे। उसी साल उन्होंने गुवाहाटी के कॉटन कॉलेज में दाखिला लिया। ये पूर्वोत्तर की राजनीति का असली पावर सेंटर था। अब तक असम के 7 मुख्यमंत्री इसी कॉलेज से निकले हैं। सीएम प्रफुल्ल महंत के करीबी होने के चलते उन्हें मुख्यमंत्री आवास और सचिवालय तक सीधी पहुंच मिली। कम उम्र में ही उन्होंने देख लिया कि फाइलें कैसे चलती हैं, पुलिस-प्रशासन को कैसे साधा जाता है। कॉटन कॉलेज के छात्र संघ चुनाव में 1988 से 1992 तक लगातार तीन बार महासचिव चुने गए थे। ये एक रिकॉर्ड है। इस बीच 1990 में हालात बदलने लगे। ULFA ने असम में आतंक फैला दिया था। प्रफुल्ल सरकार बेबस दिखने लगी। केंद्र ने राष्ट्रपति शासन लगाया। उस साल AGP चुनाव हार गई और हिमंता की जिंदगी में आया एक बड़ा तूफान। 1990 में असम पुलिस ने उनके हॉस्टल पर छापा मारा। किचन के पीछे से एक रिवॉल्वर और 25 कारतूस बरामद हुए। आर्म्स एक्ट में मामला दर्ज हुआ। 1991 में उन पर ULFA से जुड़े होने के आरोप लगे। कहा गया कि वे व्यापारियों से वसूली कर रहे थे। जनवरी और मार्च 1991 में दो अलग-अलग थानों में आतंक विरोधी कानून TADA के तहत मामले दर्ज हुए। इसी दौरान कांग्रेस नेता मानवेंद्र शर्मा की हत्या हुई और इस केस में भी हिमंता का नाम आया। मार्च 1991 में उन्हें गिरफ्तार किया गया, 15 दिन पुलिस हिरासत में रहे। 22 साल की उम्र में हिमंता समझ चुके थे कि केंद्र के समर्थन के बिना असम की राजनीति में लंबा सफर संभव नहीं है। इन संकटों में फंसे हिमंता ने एक चतुर कदम उठाया। उन्होंने AASU छोड़ा और तत्कालीन मुख्यमंत्री हितेश्वर सैकिया की शरण में चले गए। सैकिया उनके जमीनी नेटवर्क से प्रभावित थे। 1993 में हिमंता आधिकारिक तौर पर कांग्रेस में शामिल हो गए। 1996 तक उनसे जुड़े TADA मामलों की केस डायरी और रिकॉर्ड पुलिस स्टेशनों से रहस्यमय तरीके से गायब हो गए। 1996 में हिमंता ने पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा। सैकिया ने उन्हें जालुकबारी सीट से उतारा, जो AASU के बड़े नेता भृगु कुमार फुकन की सीट थी। रणनीति थी कि आंदोलन से निकला नया चेहरा, उसी आंदोलन के पुराने चेहरे को हरा दे। लेकिन हिमंता खुद हार गए। इस बीच सैकिया का भी निधन हो गया। एक झटके में वे उस नेता से वंचित हो गए, जिन्होंने उन्हें संरक्षण दिया था। निराशा इतनी गहरी थी कि हिमंता ने असम छोड़ने का मन बना लिया। दिल्ली जाकर सुप्रीम कोर्ट में वकालत करना चाहते थे। लेकिन तभी पूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव ने उन्हें रोका। अजीत दत्त की किताब, हिमंता बिस्वा सरमा- फ्रॉम बॉय वंडर टू सीएम, के अनुसार राव ने कहा- ‘जब कोई विधायक अपने क्षेत्र में जाता है तो लोग ध्यान नहीं देते। लेकिन जब हारने वाला उम्मीदवार बार-बार लौटकर लोगों की मदद करता है, तो लोग उसे याद रखते हैं।’ हिमंता जालुकबारी वापस लौटे। सड़क, राशन, कागजी अड़चनों जैसी लोगों की छोटी-बड़ी समस्याएं सुलझाते रहे। जमीन से जुड़े रहे। इसी दौरान उन्होंने तरुण गोगोई के साथ गठबंधन को मजबूत किया, जो दिल्ली के 10 जनपथ के करीबी थे। गोगोई को ऐसे साथी की जरूरत थी, जो मैदान में उतरकर आक्रामक राजनीति कर सके। हिमंता बिल्कुल वैसे ही थे। उन्होंने अपने पुराने AASU नेटवर्क के जरिए यह पता लगाया कि प्रफुल्ल सरकार के दौर में हुई ‘गुप्त हत्याओं’ के पीछे ULFA के पुराने मेंबर्स के संगठन SULFA और राज्य पुलिस के कुछ अफसरों का हाथ था, जिन्हें मुख्यमंत्री कार्यालय का मौन समर्थन था। गोगोई ने इसे अपना चुनावी हथियार बना लिया। हर सभा में एक ही जुमला गूंजता था- ‘असम की माताओं और बहनों, रात को आपके दरवाजे पर जो नकाबपोश दस्तक देते हैं, उन्हें सचिवालय से आशीर्वाद मिला हुआ है।’ इस एक लाइन ने माहौल बदल दिया। सीएम प्रफुल्ल की छवि खराब होती गई और 2001 में कांग्रेस सत्ता में लौटी। हिमंता ने जालुकबारी से भृगु कुमार फुकन को 10 हजार से ज्यादा वोटों से हराकर 1996 की हार का बदला ले लिया। धीरे-धीरे हिमंता, तरुण गोगोई के परिवार जैसे हो गए। गोगोई की पत्नी डॉली गोगोई का भरोसा जीतना उनकी बड़ी सफलता थी। जब भी गोगोई गुवाहाटी आते, हिमंता सबसे पहले एयरपोर्ट पहुंचते। राज्य की हर छोटी-बड़ी राजनीतिक जानकारी उन्हीं के जरिए गोगोई तक पहुंचती। 2002 में गोगोई सरकार के विस्तार में हिमंता राज्य मंत्री बने। कृषि, योजना, वित्त, स्वास्थ्य, शिक्षा- एक के बाद एक बड़े विभाग उनके पास आते गए। धीरे-धीरे सरकार के ज्यादातर फैसले और विधायकों को संभालने का काम भी हिमंता देखने लगे। उन्हें असम का ‘सुपर सीएम’ कहा जाने लगा। 2011 के चुनाव में कांग्रेस ने 126 में से 78 सीटें जीतीं। पार्टी के अंदर सबको पता था- इस जीत के असली आर्किटेक्ट हिमंता थे। लेकिन गोगोई ने अपने बेटे गौरव गोगोई को आगे बढ़ाना शुरू किया। हिमंता को लगने लगा- वे उत्तराधिकारी नहीं, प्रतिद्वंद्वी समझे जा रहे हैं। फिर एक पल आया जिसने रिश्ते को लगभग खत्म कर दिया। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब पत्रकारों ने हिमंता की भूमिका पर सवाल किया, तो गोगोई ने हल्की मुस्कान के साथ कहा- हिमंता बिस्वा सरमा कौन है? आखिरकार वो मेरे एक मंत्री ही तो हैं। हिमंता को साफ हो गया कि गोगोई के रहते मुख्यमंत्री बनना असंभव है। 2012 में तनाव और बढ़ा। असम कांग्रेस के संगठनात्मक चुनाव में गोगोई के उम्मीदवार हारे, हिमंता समर्थित जीत गए। हिमंता ने गुवाहाटी के एक होटल में 50 से ज्यादा कांग्रेस विधायकों को इकट्ठा कर ताकत दिखाई। दिल्ली को संदेश था कि गोगोई का नियंत्रण कमजोर पड़ रहा है। जब पर्यवेक्षक मल्लिकार्जुन खड़गे आए, हिमंता ने गुप्त मतदान की मांग रखी। लेकिन अंत में सोनिया गांधी ने यथास्थिति बनाए रखी। 2014 में हिमंता अपनी शिकायत लेकर राहुल गांधी से मिलने दिल्ली पहुंचे। लेकिन यह मुलाकात एक और झटका बन गई। हिमंता के मुताबिक, बातचीत के दौरान राहुल गांधी का ध्यान अपने पालतू कुत्ते ‘पिडी’ को बिस्कुट खिलाने में था। लेखक अजीत दत्ता अपनी किताब हिमंता बिस्वा सरमा- फ्रॉम बॉय वंडर टू सीएम में हिमंता के हवाले से लिखते हैं कि यहीं से रिश्तों में दरार शुरू हुई। जब हिमंता ने बताया की इस आपसी लड़ाई से कांग्रेस कमजोर हो सकती है और विपक्ष जीत सकता है, तो जवाब मिला- तो क्या हुआ? यह आखिरी संकेत था। अप्रैल 2013 में पश्चिम बंगाल में शारदा समूह का चिटफंड घोटाला सामने आया। लाखों गरीब निवेशकों के पैसे डूब गए। शारदा के मालिक सुदीप्त सेन के साथ हिमंता के संबंधों के आरोप लगे। केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद अगस्त 2014 में CBI ने उनके घर और न्यूज चैनल ‘न्यूज लाइव’ पर छापेमारी की। जुलाई 2015 में एक और मामला सामने आया। अमेरिकी कंपनी लुई बर्जर पर आरोप था कि उसने असम में जल आपूर्ति परियोजनाओं के ठेके लेने के लिए मंत्रियों को रिश्वत दी। हिमंता 2010-11 में गुवाहाटी विकास विभाग के मंत्री थे। गोगोई इन फाइलों का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए कर रहे थे।हिमंता को अहसास हो गया कि कांग्रेस में रहे तो ये फाइलें कभी भी जेल तक ले जा सकती हैं। कैरावैन रिपोर्ट में दर्हैंज है कि जब हिमंता बिस्वा सरमा कांग्रेस छोड़ना चाहते थे, तब वे बीजेपी के संगठन मंत्री राम माधव से मिले। राम माधव ने ही उन्हें बीजेपी में लाने का खाका खींचा। 21 जुलाई 2015 को जब दिल्ली में असम बीजेपी के नेता सर्बानंद सोनोवाल और किरेन रिजिजू प्रेस कॉन्फ्रेंस में हिमंता की गिरफ्तारी की मांग कर रहे थे। उसी समय पर्दे के पीछे शाह से मुलाकात तय हो रही थी। 2016 में छपी कैरावैन की रिपोर्ट में छपा कि अमित शाह नें इस प्रेस वार्ता के बाद असम के बीजेपी अध्यक्ष सिद्धार्थ भट्टाचार्य से कहा- ‘ये तो गलती हुआ। फिर जो गलती हुआ तो उसको सुधारना है।‘ ‘हिमंता बिस्वा सरमा- फ्रॉम बॉय वंडर टू सीएम‘ किताब में अजीत दत्ता लिखते हैं कि मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और असम के प्रभारी दिग्विजय सिंह से जब हिमंता ने तकलीफ साझा की तो उन्होंने भाजपा जॉइन करने की सलाह दी। दिग्विजय का तर्क था कि इधर कांग्रेस में कुछ नहीं होने वाला है। बीजेपी का नेतृत्व गंभीर है। वही पार्टी तुम्हारे लिए बेहतर रहेगी। 23 अगस्त 2015 को दिल्ली में हिमंता ने अमित शाह से मुलाकात की। और आखिरकार हिमंता कांग्रेस से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो गए। हिमंता के आने के बाद भाजपा ने असम गण परिषद (AGP) और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (BPF) के साथ गठबंधन किया। वे इन दलों के नेताओं की नब्ज जानते थे। उन्होंने भाजपा के हिंदुत्व एजेंडे को ‘असमिया अस्मिता’ के साथ जोड़ा और चुनाव को नैरेटिव दिया- ‘35 बनाम 65’ यानी मुस्लिम-हिंदू और ‘स्थानीय बनाम घुसपैठिए’। अपने न्यूज चैनल की मदद से पूरे अभियान को एक इवेंट की तरह चलाया। इमका रैलियां और बयान 24 घंटे दिखती थीं। कई बार तो खुद मुख्यमंत्री उम्मीदवार सोनोवाल से भी ज्यादा। नतीजे आए और भाजपा गठबंधन को 86 सीटें मिलीं। विश्लेषकों का मानना था कि हिमंता के बिना यह आंकड़ा 40-45 पर ठहर जाता। सर्बानंद सोनोवाल मुख्यमंत्री बने। दिल्ली के गलियारों में एक लाइन बार-बार सुनाई देती- चेहरा सोनोवाल का है, दिमाग हिमंता का। कॉटन कॉलेज के दिनों का एक चर्चित किस्सा है। हिमंता की गर्लफ्रेंड रिनिकी भुइयां ने उनसे पूछा था- मैं अपनी मां को तुम्हारे बारे में क्या बताऊं?’ हिमंता ने बिना झिझक जवाब दिया था- मां से कह देना, तुम असम के होने वाले मुख्यमंत्री से शादी करने जा रही हो।’ उस वक्त यह दंभ लगता था। 2021 में यह भविष्यवाणी सच होने वाली थी। 2021 में बीजेपी की दोबारा जीत हुई। लेकिन 2 मई से 9 मई तक यानी ७ दिन असम का अगला मुख्यमंत्री तय नहीं हो पाया। भाजपा के इतिहास में यह दुर्लभ था कि जीतकर आए मौजूदा मुख्यमंत्री को बदलने की बात इतनी खुलकर हो। दिल्ली में तब के बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा के घर बैठकें हुईं। अमित शाह ने दोनों नेताओं से अलग-अलग बात की। हिमंता ने कहा- मैंने 20 साल इस दिन के लिए काम किया है। शाह ने सोनोवाल को समझाया। केंद्र में भूमिका के आश्वासन के बाद वे पीछे हट गए। विधायक दल की बैठक में खुद सोनोवाल ने हिमंता के नाम का प्रस्ताव रखा। 10 मई 2021 को शपथ ग्रहण हुआ। शपथ के बाद पत्नी रिनिकी भावुक हो गईं और बोलीं कि कॉटन कॉलेज में किया गया वादा आज पूरा हुआ। मुख्यमंत्री बनते ही हिमंता ने आक्रामक प्रशासक की छवि बनाई। दशकों से चल रहे उग्रवाद को कमजोर किया। दिसंबर 2023 में ULFA के शांति गुट के साथ समझौता एक ऐतिहासिक मोड़ माना गया। असम-मेघालय और असम-अरुणाचल सीमा विवादों को सुलझाने की दिशा में समझौते हुए। सरकारी मदरसों को सामान्य स्कूलों में बदला गया। कानून-व्यवस्था पर सख्ती के साथ ड्रग्स के खिलाफ बड़े अभियान चले। औद्योगिक मोर्चे पर 2024-25 में जागीरोड में टाटा समूह के 27 हजार करोड़ रुपए के सेमीकंडक्टर प्लांट की आधारशिला रखी गई। ‘ओरुनोदोई योजना’ के जरिए लाखों महिलाओं के बैंक खातों में सीधे पैसे पहुंचे। माइक्रो फाइनेंस कर्ज माफी ने ग्रामीण इलाकों में बड़ा असर डाला। हिमंता ने 2026 का चुनाव भी जीत लिया है और लगातार दूसरी बार सीएम बनने की तैयारी कर रहे हैं। ******References and Further Readings: ---------------------------- ये खबर भी पढ़ें… बंगाल में BJP की सरकार बनती क्यों दिख रही:मछली का भोज, शाह की नई स्ट्रैटजी और SIR; BJP के 5 बड़े दांव पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के बाद हुए ज्यादातर एग्जिट पोल में BJP की सरकार बनती दिख रही है। 7 में से 5 बड़ी एजेंसियों के सर्वे बीजेपी को बहुमत से ज्यादा सीटें दे रहे हैं। नतीजे 4 मई को आएंगे। पढ़ें पूरी खबर…

