नेपाल में भ्रष्ट नेताओं और उनके अमीर बच्चों को मुद्दा बनाने वाली पार्टी बहुमत की ओर
नेपाल में तीन साल पुरानी राष्ट्रीय स्वतंत्रता पार्टी बहुमत की ओर बढ़ रही है. राजनेताओं के अमीर बच्चों, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाने वाली इस पार्टी की कमान 35 साल के बालेंद्र शाह संभाल रहे हैं.
ईरान युद्ध: रूस क्यों नहीं आ रहा ईरान की मदद के लिए सामने?
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी कम सहयोगियों वाली ईरानी सरकार, अमेरिका और इस्राएल के जारी हमलों के बीच मॉस्को के समर्थन की उम्मीद कर रही थी. लेकिन अब तक तो उसे केवल निराशा ही हासिल हुई है
अली लारीजानी, जो पर्दे के पीछे से चला रहे हैं ईरान की हुकूमत
अमेरिका और इस्राएल के हवाई हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई और अन्य बड़े नेताओं के मारे जाने के बाद, अब अनुभवी नेता अली लारीजानी ही सारे बड़े फैसले ले रहे हैं
युद्ध खत्म होने के बाद कैसा दिख सकता है ईरान का भविष्य
अभी कोई नहीं जानता कि अमेरिका, इस्राएल और ईरान के बीच छिड़ी यह जंग कब खत्म होगी. यह कहना भी मुश्किल है कि लड़ाई के बाद ईरान की हालत कैसी होगी
क्या ईरान पर हमले के दौरान तोड़ा गया अंतरराष्ट्रीय कानून?
विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान पर किया गया हमला और वहां के सर्वोच्च नेता की हत्या संयुक्त राष्ट्र के नियमों का उल्लंघन है. इस्राएल इसे आत्मरक्षा बता रहा है, लेकिन कानूनी विशेषज्ञ इसे गलत मान रहे हैं
अधिकांश जर्मन मतदाता ईरान युद्ध के खिलाफ; डर का माहौल
जर्मनी के एक नए सर्वे के अनुसार जर्मन मतदाता ईरान पर अमेरिका-इस्राएल हमलों और मध्य पूर्व की स्थिति के वैश्विक प्रभावों को लेकर चिंतित हैं. अमेरिका पर जर्मन लोगों का भरोसा कम हो गया है
ईरान के खिलाफ कार्रवाई अपने लक्ष्य की ओर, भविष्य के नेतृत्व पर नजर : अमेरिका
व्हाइट हाउस ने कहा है कि ईरान के खिलाफ अमेरिकी सेना की कार्रवाई अपने लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ रही है। इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप देश में हथियारों के उत्पादन को बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं
व्हाइट हाउस ने पेश की नई साइबर रणनीति
व्हाइट हाउस ने अमेरिका के लिए एक साइबर रणनीति जारी की है, जिसमें साइबर सुरक्षा को मजबूत करने, प्रतिद्वंद्वियों से डिजिटल खतरों का मुकाबला करने और वैश्विक भागीदारों के साथ सहयोग को गहरा करने की एक व्यापक योजना की रूपरेखा दी गई है।
ग्रीन टेक्नोलॉजी पर बांग्लादेश का फोकस, यही दुनिया का भविष्य : हाफिजुर रहमान
रनर ग्रुप ऑफ कंपनीज के चेयरमैन हाफिजुर रहमान खान ने शनिवार को कहा कि भविष्य के बाजार में धीरे-धीरे इलेक्ट्रिक वाहनों और हरित प्रौद्योगिकी (ग्रीन टेक्नोलॉजी) जैसे डीएमआई तकनीक, पीएचईवी वाहनों की ओर रुझान बढ़ेगा
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने किया ईरान को बड़े सैन्य नुकसान का दावा
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को बड़े सैन्य नुकसान का दावा किया है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी सैन्य ऑपरेशन ने ईरान के सशस्त्र बलों को बहुत कमजोर कर दिया है और उसके सैन्य ढांचे को लगभग तबाह कर दिया है।
अमेरिका रूस पर तेल प्रतिबंधों में ढील देने पर विचार
स्कॉट बेसेंट ने संकेत दिया कि मध्य-पूर्व संघर्ष के दौरान वैश्विक ऊर्जा बाजार को स्थिर रखने के लिए वॉशिंगटन रूस के तेल आपूर्ति पर लगे कुछ प्रतिबंधों में अस्थायी ढील दे सकता है
नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के ऐलान के साथ ही बिहार में पहली बार बीजेपी का मुख्यमंत्री बनना तय है। भले ही नतीजों के लगभग चार महीने बाद ऐसा होने जा रहा है, लेकिन इसकी स्क्रिप्ट बीजेपी ने चुनाव से पहले ही लिख रखी थी। सीटों के बंटवारे से लेकर नीतीश के लिए मजबूती से कैंपेन करना, बीजेपी की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था। 4 पॉइंट में जानेंगे बीजेपी ने कैसे लिखी स्क्रिप्ट… लेकिन उससे पहले बैकग्राउंड समझ लेते हैं… 2020 बिहार चुनाव में मुकाबला दो बड़े गठबंधनों के बीच था। एक तरफ बीजेपी, जेडीयू, मांझी की हम और साहनी की वीआईपी पार्टी वाला एनडीए और दूसरी तरफ आरजेडी, कांग्रेस और लेफ्ट का महागठबंधन। ढाई साल पहले ही नीतीश पाला बदलकर वापस बीजेपी के साथ आए थे। एनडीए की तरफ से सीएम का चेहरा भी वहीं थे। पर पर्दे के पीछे से बीजेपी अपना सीएम बनाने की जुगत में थी। उसने जदयू के बराबर सीटों पर चुनाव लड़ने की मांग की, लेकिन नीतीश इसके लिए तैयार नहीं हुए। नीतीश को पता था कि बीजेपी ज्यादा सीटें जीत गई, तो सीएम की कुर्सी पर दावा ठोक देगी। इसलिए वे खुद बड़े भाई की भूमिका में रहना चाहते थे। चिराग की पार्टी एलजेपी तब एनडीए में शामिल होना चाहती थी। खुद को मोदी का हनुमान कहने वाले चिराग ने एलजेपी के लिए 40 सीटों की मांग कर दी। नीतीश इसके लिए भी तैयार नहीं हुए। उन्होंने साफ कह दिया कि बीजेपी, एलजेपी को गठबंधन में शामिल करना चाहती है, तो अपने कोटे से सीटें दे दें। बीजेपी ने इनकार कर दिया। ऐसे में एलजेपी अकेले मैदान में उतरी और सोची समझी रणनीति के तहत नीतीश की सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए। इनमें से ज्यादातर उम्मीदवार बीजेपी छोड़कर आए थे। कई तो सीधे तौर पर संघ से ताल्लुक रखने वाले थे। तब सियासी गलियारों में चर्चा छिड़ी कि नीतीश को कमजोर करने के लिए एलजेपी, बीजेपी की बी टीम बनकर चुनाव लड़ रही है। चिराग ने भी कुछ ऐसा ही कैंपेन किया। जब नतीजे आए तो 115 सीटों पर लड़ने वाली जदयू 43 सीटों पर सिमट गई। 34 सीटों पर चिराग की पार्टी ने वोट काटकर उसे हरवा दिया। जबकि बीजेपी ने 110 सीटों पर लड़कर 74 सीटें जीत ली। 74 सीटें जीतकर बीजेपी NDA में सबसे बड़ी पार्टी बन गई। HAM और VIP को मिलाकर वह 82 तक पहुंच गई, लेकिन नीतीश के बिना बहुमत के लिए जरूरी 122 से काफी पीछे रह गई। यानी उसे सत्ता के लिए नीतीश का साथ जरूरी हो गया। कम सीट जीतने के बाद भी नीतीश ने ही मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। तब कहा गया कि कुछ समय बाद बीजेपी अपना सीएम बनाएगी। बीजेपी की तरफ से ऐसी कोशिशें भी हुईं। पर दो साल बाद ही नीतीश ने पाला बदलकर फिर से राजद के साथ सरकार बना ली। नीतीश ने आरोप भी लगाया कि उनकी पार्टी तोड़ने की साजिश रची जा रही थी। दो साल बाद यानी 2024 में जदयू फिर से एनडीए में लौटी, लेकिन इस बार भी बीजेपी अपना सीएम नहीं बना पाई। मुख्यमंत्री नीतीश ही बने। क्योंकि मैजिक फिगर नीतीश के साथ ही था। अब तक तो सियासी गलियारों में यह मान लिया गया कि नीतीश जब तक चाहेंगे वे सीएम रहेंगे और जिसके साथ जब जी करे सरकार बना लेंगे। लगातार चार बार पलटी मारकर उन्होंने यह बात बहुत हद तक साबित भी कर दी थी। नीतीश के लिए बीजेपी ने 2025 के चुनाव में 4 खास स्ट्रैटजी अपनाई… 1. बराबर-बराबर सीटों पर चुनाव लड़ना 2019 के लोकसभा में बीजेपी और जदयू बराबर-बराबर सीटों पर लड़ीं, लेकिन 2020 के विधानसभा में नीतीश ही बिग ब्रदर रहे। 2025 के चुनाव में बीजेपी ने साफ कर दिया था कि वह बराबर सीटों पर ही चुनाव लड़ेगी। इसलिए ही बीजेपी ने आखिर-आखिर तक चिराग फैक्टर को मौजू बनाए रखा। आखिरकार जदयू और बीजेपी 101-101 सीटों पर लड़ने के लिए राजी हो गए। वजह: बराबर सीटों पर लड़कर बड़ी पार्टी बनना। नतीजे भी बीजेपी के फेवर में आए और वो सबसे बड़ी पार्टी बनी। 2. सहयोगियों को ज्यादा से ज्यादा सीटें देना बीजेपी समझ चुकी थी कि नीतीश इस बार चिराग को अलग चुनाव लड़ाने की गलती नहीं करेंगे। ऐसे में चिराग ने फिर से 40 सीटों की मांग कर दी। शुरुआत में तो जदयू ना नुकर करती रही, लेकिन फिर वो राजी हो गई। इस तरह 43 सीटें सहयोगियों के खाते में चली गईं। इनमें से 29 सीटें चिराग की पार्टी को मिलीं। NDA के भीतर बिहार में पहली बार गैर बीजेपी-जदयू वाले दलों को 43 सीटें मिलीं। वजह: बिहार के सीनियर जर्नलिस्ट अमरनाथ तिवारी बताते हैं- ‘बीजेपी चाहती थी कि जदयू कम से कम सीटों पर लड़े। ऐसा तभी संभव था जब एनडीए के भीतर सहयोगियों को ज्यादा से ज्यादा सीटें मिले। और हुआ भी वैसा ही। चिराग को 29, मांझी-कुशवाहा को 6-6 सीटें मिलीं। यानी 43 सीट। इस तरह एनडीए में बिना नीतीश आंकड़ा 143 पहुंच गया। बीजेपी यहीं चाहती थी कि वो नीतीश के बिना वह बहुमत के आंकड़े के करीब पहुंच सके।’ 3. चुनाव से पहले नीतीश के नाम पर भ्रम फैलाना ये 5 बयान पढ़िए… वजह: अमरनाथ तिवारी के मुताबिक बीजेपी चाहती थी कि पूरा चुनाव इस बात पर हो कि नीतीश सीएम होंगे या नहीं। राजद और कांग्रेस ने बार-बार कहा कि बीजेपी, नीतीश को सीएम नहीं बनाएगी। इन बयानों से जनता के बीच ये मैसेज चला गया कि नीतीश कमजोर हुए तो बीजेपी अपना सीएम बनाएगी। ऐसे में नीतीश के वोटर और पिछड़े तबके ने तय कर लिया कि नीतीश को इतना मजबूत बना दें कि बीजेपी उन्हें हटा नहीं पाए। कई लोगों ने नीतीश के आखिरी चुनाव समझकर भी उन्हें वोट किया। नतीजों में भी यह साफ दिखा। जदयू ने 101 में से 85 सीटें जीत ली। इसका सीधा नुकसान राजद को हुआ। 4. जदयू की सीटों पर मजबूती से प्रचार करना प्रधानमंत्री मोदी ने बिहार चुनाव के दौरान कुल 16 रैलियां कीं। कुल 122 सीटें कवर कीं। इनमें से 42 सीटों पर जदयू लड़ रही थी। नतीजे आए तो 32 सीटें जदयू को मिलीं। इनमें से ज्यादातर वो सीटें थीं, जो 2020 में जदयू हार गई थी। इसी तरह गृहमंत्री अमित शाह ने 28 रैलियों से 141 सीटें कवर कीं। इनमें से 58 सीटों पर जदयू लड़ रही थी। 42 पर उसे जीत भी मिल गई। यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने 25 रैलियों से कुल 122 सीटें कवर कीं। इनमें से 47 सीटें जदयू के खाते की थीं। 40 पर उसे जीत भी मिल गई। यानी पीएम मोदी, शाह और योगी ने जहां रैली की वहां कुल 86 सीटों पर जदयू चुनाव लड़ रही थी। इनमें से 74 पर उसे जीत मिली। यानी स्ट्राइक रेट 86% रहा। वजह: करीब 65% सीटों पर जदयू की सीधी लड़ाई आरजेडी से ही थी। बीजेपी चाहती थी कि आमने-सामने की टक्कर की ज्यादातर सीटें जदयू जीत ले और राजद कमजोर पड़ जाए। हुआ भी ऐसा ही। बीजेपी के मनमुताबिक नतीजे आए, नीतीश का पाला बदलना मुश्किल नतीजे आए तो बीजेपी को 89, जदयू को 85, चिराग की पार्टी को 19, हम को 5 और कुशवाहा की पार्टी आरएलएम को 4 सीटें मिलीं। इस तरह NDA का आंकड़ा 202 पहुंच गया। जबकि आरजेडी को 25, कांग्रेस को 6 और बाकी सहयोगियों को 4 सीटें मिलीं। यानी महागठबंधन को 35 सीटें मिलीं। इस तरह एकतरफा सीटें NDA के खाते में आ गईं और राजद बेहद कमजोर हो गई। इसे ऐसे समझिए… नीतीश के बिना बहुमत के करीब पहुंच गई NDA नीतीश राजद के साथ गए तो भी बहुमत से दूर अगर नीतीश पाला बदलकर राजद के साथ जाते, तो भी बहुमत के आंकड़े से दूर रह जाते। गणित को ऐसा ही है। नीतीश की जदयू (85)+ राजद (25)+ कांग्रेस (6) + लेफ्ट+ (4)= 120 यानी बहुमत के लिए 122 से 2 कम। बीजेपी ने अपना सीएम बनाने के लिए तीन महीने इंतजार क्यों किया? चुनावी नतीजे बीजेपी के फेवर में थे। वह तब भी अपना मुख्यमंत्री बना सकती थी, लेकिन उसने नीतीश को सीएम बनाया। आखिर क्यों…? बिहार के सीनियर जर्नलिस्ट अमरनाथ तिवारी बताते हैं- बीजेपी, नीतीश या विपक्ष को विक्टिम कार्ड खेलने का मौका नहीं देना चाहती थी। क्योंकि चुनाव नीतीश के नेतृत्व में लड़ा गया था और बीजेपी अपना सीएम बनाती तो पिछड़े वर्ग के वोटर नाराज हो सकते थे। नीतीश के कोर वोटर्स यानी कोईरी-कुर्मी बीजेपी से हमेशा के लिए कट सकते थे। ऐसे में बीजेपी चाहती थी कि नीतीश खुद आगे आकर सत्ता सौंपे। राज्यसभा के चुनाव उसके लिए सबसे मुफीद रहा। बीजेपी के प्लान के मुताबिक नीतीश ने राज्यसभा के लिए नामांकन किया और खुद ही सत्ता छोड़ने का ऐलान कर दिया। ------------- बिहार से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए…बिहार में बीजेपी का सीएम बनना ही था: 6 राज्यों में बीजेपी की राजनीति से समझिए, आखिर नीतीश को क्यों जाना पड़ा राज्यसभा मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के ठीक 105 दिन बाद नीतीश कुमार ने राज्यसभा का पर्चा भर दिया। मतलब वे सीएम नहीं रहेंगे। अब बिहार में पहली बार बीजेपी का सीएम बन सकता है। पूरी खबर पढ़िए…
‘गफ धेरै भयो, अब काम चाहिन्छ,नेपालको मुहार फेर्ने, बालेन चाहिन्छ।पुरानोलाई बिदाइ, नयांलाई अवसर,सबैको एउटै नारा- 'अबकी बार, बालेन सरकार'। एक महीने पहले तक ये एक गाना था। अब नेपाल की हकीकत है। नेपाल में बालेन सरकार आनी तय है। 165 सीटों पर हुए चुनाव में बालेन शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी 6 मार्च की रात 10 बजे तक 115 सीटों पर आगे थी। नेपाल में सरकार बनाने के लिए 138 सीटों की जरूरत है। बालेन शाह राजनीति में आने से पहले रैपर रहे हैं। नेपाल चुनाव में पहली बार ऐसा हुआ कि किसी नेता के लिए पॉप कल्चर का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ। इसे ऊपर दिए गीत के हिंदी में मतलब से समझिए-‘बातें बहुत हो गईं, अब काम चाहिए, नेपाल की सूरत बदलने के लिए बालेन चाहिए।’‘पुरानों को विदाई और नए को अवसर, सबका एक ही नारा है- अबकी बार, बालेन सरकार।’ बालेन शाह छापा-5 सीट से आगे चल रहे हैं। उनकी पार्टी जीत रही है, लेकिन ये भारत के लिए बुरी खबर हो सकती है। छोटे से पॉलिटिकल करियर में बालेन शाह भारत के खिलाफ खुलकर बयानबाजी करते रहे हैं। नेपाल सरकार और कोर्ट को भारत का गुलाम बता चुके हैं। बालेन ने नवंबर 2025 में सोशल मीडिया पर भारत, चीन और अमेरिका के लिए गाली लिख दी थी। बालेन शाह के सत्ता में आने पर क्या नेपाल-भारत के रिश्ते बिगड़ेंगे, नेपाल के लोग भारत के साथ कैसे रिश्ते चाहते हैं? इस पर हमने काठमांडू में आम लोगों, Gen Z लीडर्स, बालेन की पार्टी के नेताओं और एक्सपर्ट से बात की। राजनीति में आते ही बालेन का भारत विरोध शुरूनेपाल में 5 मार्च को वोटिंग हुई थी। चुनाव के अभी सिर्फ रुझान आए हैं, पूरे नतीजे 20 मार्च तक आएंगे। शुरुआती रुझानों में बालेन शाह की पार्टी एकतरफा जीत रही है। मई, 2022 में बालेन शाह काठमांडू के मेयर बने थे। इसके बाद से ही भारत विरोधी रुख के लिए चर्चा में रहे हैं। उन्होंने अपनी छवि राष्ट्रवादी नेता के तौर पर बनाई है। 2022 में मेयर रहते हुए फिल्म ‘आदिपुरुष’ से नाराज होकर काठमांडू में भारतीय फिल्में बैन कर दी थीं। उनका आरोप था कि आदिपुरुष में सीता को भारत की बेटी बताया गया है, जो नेपाल का अपमान है। हालांकि कोर्ट के फैसले के बाद बैन हट गया। बालेन शाह का गुस्सा शांत नहीं हुआ। उन्होंने सोशल मीडिया पर नेपाल सरकार और कोर्ट का भारत का गुलाम बता दिया। भारत के साथ चीन के भी विरोधी2023 में भारतीय संसद में अखंड भारत का नक्शा दिखाए जाने के जवाब में बालेन शाह ने अपने ऑफिस में ग्रेटर नेपाल का मैप लगा लिया। इसमें भारत की कई जगहों को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया था। सबसे ज्यादा विवाद नवंबर 2025 में फेसबुक पर की उनकी पोस्ट के बाद हुआ। बालेन शाह ने भारत, चीन समेत कुछ और देशों के लिए अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हुए पोस्ट किया। बाद में इसे डिलीट भी कर दिया। हालांकि, तब तक ये पोस्ट वायरल हो चुकी थी। लोग बोले- राजनीति के लिए भारत से दोस्ती न टूटेबालेन शाह का रुख भले ही भारत विरोधी रहा हो, लेकिन नेपाल के लोग भारत से अच्छे रिश्ते चाहते है। काठमांडू यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले 23 साल के समीर मानते हैं कि भारत, नेपाल और चीन को मिलकर रहना चाहिए। बालेन शाह के भारत और चीन विरोधी बयानों को समीर राजनीति बताते हैं। वे कहते हैं, ‘नेपाल के लोगों में भारत के खिलाफ कोई भावना नहीं है। हम भारत से प्यार करते हैं। हमारा रोटी-बेटी का रिश्ता है। कई बार नेता अपने फायदे और वोट के लिए अलग-अलग बातें करते हैं।’ ‘भारत भी बालेन शाह पर भरोसा दिखाए’55 साल के कृष्णा विश्वकर्मा नई सरकार से भारत के साथ दोस्ताना बर्ताव की उम्मीद जताते हैं। वे कहते हैं कि हमारे बीच भाईचारा होना चाहिए। चीन पड़ोसी देश है, इसलिए उसे भी साथ लेकर चलना चाहिए। कृष्णा मानते हैं कि भारत और नेपाल के बीच धार्मिक, सांस्कृतिक और भाषाई रिश्ते बहुत गहरे हैं। वे कहते हैं कि अभी लोगों में बालेन शाह के नेतृत्व को लेकर उम्मीद और भरोसा दिख रहा है। 40 साल के मिलन मानते हैं कि नेपाल को भारत और चीन का छोड़कर अपने बारे में सोचना चाहिए। बालेन शाह को भारत विरोधी बयानों पर मिलन कहते हैं, ‘भारत और नेपाल के रिश्तों के खिलाफ बोलना सही नहीं है। कुछ नेता या लोग अपने-अपने तरीके से बातें करते हैं, लेकिन आम लोगों की सोच ऐसी नहीं है। हमें आपसी रिश्तों को खराब करने की बजाय बेहतर बनाए रखने की कोशिश करनी चाहिए।’ Gen Z लीडर बोले- बांटने वाली राजनीति से बचें बालेननेपाल में सितंबर में Gen Z प्रोटेस्ट हुआ था। इसके बाद प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को इस्तीफा देना पड़ा। उस वक्त भी बालेन शाह के प्रधानमंत्री बनने की खबरें थी। वे युवाओं में पॉपुलर भी हैं। हमने Gen Z प्रोटेस्ट को लीड करने वाले नेताओं से भी बात की। 25 साल की तनुजा पांडे प्रोटेस्ट के बड़े चेहरों में से एक हैं। वे बालेन शाह की राजनीति को पॉपुलिस्ट और बांटने वाली मानती हैं। तनुजा कहती हैं कि बालेन युवा नेता हैं और लोगों को उनसे उम्मीदें हैं, लेकिन काठमांडू का मेयर रहते हुए उन्होंने काम नहीं किए। उनके ‘हम बनाम वे’ की राजनीति और उकसाने वाले बयान सुनकर फिक्र होती है। हम प्रोटेस्ट के समय इसी तरह की राजनीति से छुटकारा चाहते थे। तनुजा आगे कहती हैं कि नेपाल अपनी लोकेशन की वजह से अहम देश है। इसमें भारत और चीन जैसे पड़ोसी देशों की दिलचस्पी स्वाभाविक है। हमारी लीडरशिप पर निर्भर करता है कि वह इसे मौके में कैसे बदले। Gen Z प्रोटेस्ट के लीडर टंका धामी भी बालेन शाह से नाराज हैं। वे कहते हैं- हमें बालेन शाह के एजेंडे और डेवलपमेंट के रोडमैप पर शक है। हमें साफ दिखना चाहिए कि वे देश को आगे कैसे ले जाना चाहते हैं। टंका कहते हैं, ‘हम चाहते हैं कि भारत नेपाल की तरक्की में मदद करे। कुछ लोग एंटी-इंडिया प्रचार करने की कोशिश करते हैं, लेकिन हम भारत के लिए गलत भावना नहीं रखते। हम दोनों देशों के बीच मजबूत रिश्ते चाहते हैं।’ एक्सपर्ट बोले- राजनीति से अलग भारत से अच्छे रिश्ते मजबूरीबालेन शाह ने दिसंबर 2025 में ही राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी जॉइन की थी। ये पार्टी नेपाल के मशहूर होस्ट रहे रवि लामिछाने ने बनाई थी। रवि चितवन-2 सीट से आगे चल रहे हैं। बालेन और रवि दोनों ही फायरब्रांड और भारत विरोधी नेता माने जाते हैं। दोनों की राजनीति समझने के लिए हमने नेपाल के पत्रकारों से बात की। नेपाल की हिंदी साप्ताहिक पत्रिका हिमालिनी के मैनेजिंग डायरेक्टर सच्चिदानंद मिश्र मानते हैं, ‘आने वाली सरकार को भारत से अच्छे संबंध रखने ही होंगे। वे कहते हैं, ‘बालेन शाह और रवि दोनों भारत विरोध के लिए जाने जाते हैं, लेकिन इस चुनाव में दोनों पूरी तरह शांत रहे। वे जानते हैं कि तराई का वोट भारत से जुड़े रिश्तों से प्रभावित होता है।’ ‘चीन भी इस बार खुलकर दखल करता नहीं दिख रहा। वह चुपचाप सब देख रहा है। उसकी चिंता दलाई लामा समर्थकों को लेकर ज्यादा है। खुलकर कोई भी पार्टी दलाई लामा के समर्थन में सामने नहीं आएगी, लेकिन हर पार्टी में कुछ न कुछ समर्थक मौजूद हैं।’ सीनियर पत्रकार कृष्णा डुंगाना भी मानते हैं नई सरकार को भारत और चीन दोनों से संबंध बनाए रखने होंगे। यही नेपाल की विदेश नीति रही है। वे कहते हैं, ‘उम्मीद है कि भारत सहित सभी देश चुनाव परिणाम को मानेंगे।’ सीनियर जर्नलिस्ट युबराज घिमिरे बताते हैं कि 2006 के बाद से भारत की छवि नेपाल में कमजोर हुई है। 2015 की अघोषित नाकाबंदी अब भी लोगों को याद है। दूसरी ओर, चीन ने निवेश के साथ अपनी मौजूदगी बढ़ाई है। नेपाल में लोग बाहरी दखल से सावधान हैं। युबराज बालेन की सरकार बनने की स्थिति में Gen Z आंदोलन के वादे पूरे करने को चुनौती मानते हैं। बालेन की पार्टी बोली- भारत से अच्छे रिश्ते बनाए रखेंगेहमने राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के सीनियर लीडर कुमार आनंद मिश्र से बात की। वे पार्टी को बहुमत मिलने की उम्मीद जताते हैं। साथ ही दावा करते हैं कि अगर अपने घोषणा-पत्र के वादे पूरे नहीं किए, तो अगली बार वोट मांगने नहीं आएंगे। भारत और नेपाल के रिश्तों पर कुमार आनंद कहते हैं कि हमारी नीति संतुलित और व्यवहारिक रहेगी। आप अपने पड़ोसी नहीं बदल सकते। नेपाल खुशनसीब है कि उसके दोनों ओर बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं। बालेन शाह के भारत विरोधी बयानों पर कुमार आनंद कहते हैं कि वे राष्ट्रीय नेता हैं। चुनाव अभियान में उनका फोकस विकास और सुशासन पर है। पार्टी की नीतियां सामूहिक निर्णय से चलती हैं। किसी भी देश के साथ रिश्ते बिगाड़ने का कोई इरादा नहीं है। हमारा मानना है कि नेपाल अपने दोनों पड़ोसियों के साथ अच्छे रिश्ते बनाए रखेगा। नेपाल से ये ग्राउंड रिपोर्ट भी पढ़ें...1. सेक्स वर्क के लिए बदनाम थामेल की नाइट लाइफ ठप नेपाल की राजधानी काठमांडू का थामेल एरिया विदेशी टूरिस्ट्स की पहली पसंद है। सबसे मशहूर बार-पब यहीं हैं। नेपाल में 5 मार्च को चुनाव हैं। थामेल में भी इसका असर साफ दिखता है। यहां स्पा सेंटर के नाम पर जिस्मफरोशी का धंधा चलता है। चुनाव में सख्ती और पुलिस की गश्ती की वजह से बीते 10-12 दिन से सब बंद है। पुलिस की सख्ती की वजह से एजेंट भी रिस्क नहीं लेना चाहते। पढ़ें पूरी खबर… 2. चुनाव में कहां गायब हैं सरकार गिराने वाले Gen Z लीडर नेपाल में हुए Gen Z प्रोटेस्ट के बड़े चेहरों में से एक टंका धामी आने वाले चुनाव को लेकर उत्साहित हैं। वे मानते हैं कि प्रोटेस्ट ने चुनाव में पॉलिटिकल पार्टियों की प्राथमिकताएं बदल दी हैं। हालांकि एक और Gen Z लीडर तनुजा पांडे की राय इससे अलग है। वे कहती हैं, ‘सियासी दलों ने हमारे आंदोलन का जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल किया और फिर नजरअंदाज कर दिया।‘ पढ़ें पूरी खबर...
जेफरी एपस्टीन केस में नए एफबीआई दस्तावेज जारी, महिला ने ट्रंप पर लगाए गंभीर आरोप
न्याय विभाग द्वारा जारी किए गए दस्तावेजों के अनुसार, एफबीआई एजेंटों ने 2019 में इस अज्ञात महिला से चार बार पूछताछ की थी। ये साक्षात्कार जेफरी एपस्टीन के खिलाफ चल रही जांच के दौरान लिए गए थे।
दुनिया भर में अमेरिकी तख्ता पलट की कोशिशों का दागदार इतिहास
कई अमेरिकी राष्ट्रपति विदेशों में अलोकप्रिय शासकों को हटाने के लिए पहले भी सैन्य बल भेज चुके हैं. ट्रैक रिकॉर्ड मिला जुला रहा है. ईरान युद्ध के शुरु में ट्रंप ने दावा किया था कि उनका एक लक्ष्य ईरान में सत्ता परिवर्तन था. ईरान के साथ मौजूदा युद्ध की शुरुआत में, अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप अपने उद्देश्यों को लेकर साफ थे. तेहरान को न तो परमाणु और न ही पारंपरिक सैन्य खतरा पैदा करने की हालत में होना चाहिए, और कमजोर हुए मुल्ला शासन सत्ता को सत्ता से हटा दिया जाना चाहिए. उसके बाद से, ट्रंप और दूसरे वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारियों ने ईरान पर हवाई हमलों के लिए अलग-अलग कारण बताए हैं. अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने सोमवार को यहां तक कहा कि वर्तमान संघर्ष कथित सत्ता-परिवर्तन का युद्ध नहीं है.” लेकिन अमेरिकी इतिहास को देखते हुए, हैरानी नहीं होगी अगर ट्रंप का मूल तर्क ही मौजूदा सैन्य हस्तक्षेप के प्रेरक कारकों में से एक हो. आखिरकार, अमेरिका का तथाकथित तख्ता पलट” अभियानों को लेकर किसी भी अन्य देश से ज्यादा अनुभव है. 2019 के एक अध्ययन के अनुसार, केवल शीत युद्ध (1947–1989) के दौरान ही, अमेरिका ने विदेशों में सत्ता संतुलन अपने पक्ष में बदलने के लिए 72 प्रयास किए थे. इनमें से 64 मामले अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के जासूसी अभियान थे, जिनकी सफलता दर लगभग 40 प्रतिशत रही थी. उदाहरण के लिए, 1953 में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने ब्रिटिश एमआई6 के साथ मिलकर ईरान के प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग को सत्ता से हटा दिया था. इसके कारण ईरान के नए शासक शाह मोहम्मद रजा पहलवी को अमेरिका की कठपुतली” के रूप में देखा जाने लगा और 1979 की इस्लामी क्रांति में उनको सत्ता से बेदखल कर गया. उस समय स्थापित हुई धार्मिक और अधिक दमनकारी सत्ता आज हवाई हमलों के केंद्र में है. एक सफल दिखने वाला सत्ता-परिवर्तन अभियान भी लंबे समय में नई समस्याएं पैदा कर सकता है. अमेरिका से जुड़े कुछ खुफिया और कुछ खुलेआम हुए सत्ता परिवर्तन अभियानों पर एक नजर. लीबिया (2011) 2011 में जब अरब वसंत के दौरान उत्तरी अफ्रीका में बदलाव की उम्मीदें जगी थी, तब लीबिया में लंबे समय से शासन कर रहे मुअम्मर अल-गद्दाफी के खिलाफ भी प्रतिरोध बढ़ा था. अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा के नेतृत्व में अमेरिका ने तुरंत विरोधी पक्ष के नेशनल ट्रांजिशनल काउंसिल का साथ दिया था. अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन ने जल्द ही नाटो के ऑपरेशन यूनिफाइड प्रोटेक्टर के तहत हवाई हमले शुरू कर दिए थे. उसी साल अक्टूबर में, एक अमेरिकी ड्रोन और फ्रांसीसी लड़ाकू विमान ने गद्दाफी के काफिले पर हमला बोल दिया था, जिसके बाद नेशनल ट्रांजिशनल काउंसिल के लड़ाकों ने उन्हें मार दिया था. लगभग 15 साल बाद लीबिया आज भी राजनीतिक रूप से विभाजित और अस्थिर है. इराक (2003) 1 मई 2003 को तानाशाह सद्दाम हुसैन के पतन के कुछ ही हफ्ते बाद, तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने इराक युद्ध के अंत की घोषणा की थी. अमेरिकी नौसेना के विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन पर लगे बैनर पर लिखा था मिशन पूरा हुआ.” बुश ने कहा था, तानाशाही से लोकतंत्र में बदलाव आने में समय तो लगेगा, लेकिन यह एक जरूरी प्रयास है. हमारा गठबंधन तब तक बना रहेगा जब तक यह काम पूरा नहीं हो जाता. उसके बाद हम वापस लौट जाएंगे और अपने पीछे एक स्वतंत्र इराक को छोड़कर जाएंगे.” हालांकि, इसके बाद के कब्जे वाले दौर में भी न तो शांति आई और न ही स्थिरता. सरकारी संस्थाएं कमजोर रहीं, और पड़ोसी ईरान ने स्थानीय शिया मिलिशिया का समर्थन किया, जो सुन्नी गुटों के साथ हिंसक झड़पों में उलझे रहे. सत्ता के शून्य के बीच तथाकथित इस्लामिक स्टेट आतंकी संगठन बना और एक शक्तिशाली खिलाड़ी के रूप में उभरा, जिसने इराक, सीरिया और पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया. अमेरिकी इतिहासकार जोसेफ स्टीब के अनुसार, अमेरिकी लोग इस गलतफहमी में थे कि ऐसे माहौल में उदार लोकतंत्र अपने आप फल-फूल जाएगा. स्टीब ने कहा, उनका मानना था कि इराक जैसे शासन को गिराने के बाद उन्हें बदलना अपेक्षाकृत आसान होगा.” अफगानिस्तान (2001) इराक पर हमला जॉर्ज डब्ल्यू बुश का इकलौता सत्ता-परिवर्तन” युद्ध नहीं था. 11 सितंबर 2001 के आतंकवादी हमलों के चार हफ्ते बाद, अमेरिका ने ऑपरेशन एंड्योरिंग फ्रीडम” शुरू किया था. तालिबान शासन को जल्द ही बेदखल करने के बाद भी अमेरिका समर्थित सरकार लंबे समय तक टिक नहीं पाई. 2014 में जर्मनी सहित अंतरराष्ट्रीय सेनाओं के अपने सैनिकों की संख्या घटाने के बाद, तालिबान ने धीरे-धीरे खोई जमीन वापस पाना शुरू कर दिया. अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में ट्रंप ने अपने कार्यकाल के अंतिम वर्ष में तालिबान से बचे हुए अमेरिकी सैनिकों की वापसी का समझौता किया और बदले में उन पर हमला न करने का वादा किया. लेकिन 2021 में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के शासन के दौरान अंतिम सैनिकों की वापसी के तुरंत बाद तालिबान ने पूरे देश पर फिर से नियंत्रण स्थापित कर लिया और अमेरिकी हमले से पहले की राजनीतिक व्यवस्था को बहाल कर दिया. पनामा (1989) 1980 के दशक में पनामा में तानाशाह मानुएल नोरिएगा का शासन था. सालों तक सीआईए से पैसा लेते रहने के बाद, नोरिएगा अमेरिकी सरकार के लिए बोझ बन गया था. उसके शासन में पनामा ड्रग्स की तस्करी का अड्डा था, और अमेरिका को डर था कि पनामा नहर के विस्तार में उसे दरकिनार कर दिया जाएगा. 1980 के दशक में अमेरिका के साथ नोरिएगा के रिश्ते बिगड़ते गए. मई 1989 में विपक्षी नेता गिल्येर्मो एंदारा ने चुनाव जीता, लेकिन नोरिएगा ने चुनावी नतीजों को मानने से इनकार कर दिया. आखिरकार दिसंबर में तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज एच डब्ल्यू बुश ने नोरिएगा को सत्ता से हटाने के लिए ऑपरेशन जस्ट कॉज” का आदेश दे दिया. पनामा पर हमले के बाद नोरिएगा को पकड़ लिया गया और अमेरिका ले जाया गया और मुकदमा चलाया गया. बाद में उन्होंने अमेरिका, फ्रांस और पनामा में अलग-अलग जेलों में सजा काटी और 2017 में उनकी मौत हो गई. इस अमेरिकी सैन्य अभियान की कीमत 33.1 करोड़ डॉलर बताई गई. ग्रेनेडा (1983) 1979 से कैरेबियाई देश ग्रेनेडा ने अपनी राजनीति सोवियत संघ के साथ तेजी के साथ जोड़ दिया. जब प्रधानमंत्री मॉरिस बिशप ने अमेरिका को खुश करने की कोशिश की, तो उन्हें सैनिक गुटों ने गद्दी से हटा दिया और उनकी हत्या कर दी. इस पृष्ठभूमि में, अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने कई कैरेबियाई देशों के समर्थन से ग्रेनेडा पर आक्रमण कर दिया था. हालांकि, ब्रिटेन ने इसका कड़ा विरोध किया था. वह कॉमनवेल्थ सदस्य ग्रेनेडा को अपने प्रभावक्षेत्र में मानता था. अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद, एक ब्रिटिश गवर्नर ने 1984 में वहां सत्ता परिवर्तन और चुनावों की देखरेख की थी. डोमिनिकन रिपब्लिक (1965) कई तख्तापलटों के बाद, 1965 में डोमिनिकन रिपब्लिक गृहयुद्ध की कगार पर था. राष्ट्रपति लिंडन बी जॉनसन ने अमेरिकी देशों के संगठन (OAS) के वोट के बाद, सैन्य आक्रमण कर दिया था. इसका आधिकारिक उद्देश्य अमेरिकी नागरिकों की सुरक्षा था. लेकिन, अनौपचारिक तौर पर इसका लक्ष्य शीत युद्ध के दरम्यान अमेरिका के पड़ोस में स्थित डोमिनिकन रिपब्लिक को एक समाजवादी राज्य यानि की दूसरा क्यूबा बनने से रोकना था. वहां तैनात 44,000 सैनिकों की मदद से अमेरिका ने ये सुनिश्चित किया कि उसके पसंदीदा सरकार प्रमुख ने सत्ता संभाली. वेनेजुएला (2026) सबसे हालिया संभावित सत्ता परिवर्तन” का ऑपरेशन इतना नया है कि इसका अंतिम मूल्यांकन अभी मुमकिन नहीं है. जनवरी 2026 की शुरुआत में, राष्ट्रपति ट्रंप ने एक सैनिक ऑपरेशन के जरिए वेनेजुएला के नेता निकोलस मादुरो के अपहरण को अंजाम दिया. मादुरो पर न्यूयॉर्क में ड्रग टेररिज्म” का मुकदमा चलाया जाएगा. वेनेजुएला में उनकी सहयोगी उप राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज अब सत्ता के शीर्ष पर बैठी हैं. मादुरो की सत्ता का हिस्सा होने के बावजूद ट्रंप ने घोषणा की है कि वह रोड्रिगेज के साथ सहयोग करेंगे. बदले में अमेरिका को वेनेजुएला के विशाल तेल भंडारों तक पहुंच मिलेगी. हालांकि, 2025 की नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और ट्रंप समर्थक मारिया कोरीना मचाडो ने वेनेजुएला लौटने और लोकतंत्र की राह पर उसका नेतृत्व करने की इच्छा जताई है. अमेरिका के सैन्य हमले के दो महीने बाद भी वेनेजुएला का भविष्य अनिश्चित है. यह लेख मूल रूप से जर्मन में प्रकाशित हुआ था.
जर्मनी में सैन्यीकरण की बहस के बीच बर्लिन की एक फैक्टरी सुर्खियों में
बर्लिन की एक फैक्ट्री के बाहर आंदोलनकारी प्रदर्शन कर रहे हैं क्योंकि ऑटो पार्ट्स बनाने वाली यह फैक्ट्री अब हथियार बनाएगी. लेकिन मजदूर और यूनियन बंटे हुए हैं. वे शांति चाहते हैं. अलबत्ता हथियार नौकरी की गारंटी देते हैं
नेपाल चुनाव 2026: शुरुआती रुझानों में बालेन शाह की पार्टी सबसे आगे, बड़े नेताओं को कड़ी चुनौती
मतगणना के शुरुआती दौर में नेपाल की राजनीति के कई दिग्गज नेताओं को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। रुझानों के अनुसार पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली अपने निर्वाचन क्षेत्र में हजार से ज्यादा वोटों से पीछे चल रहे हैं।
व्हाइट हाउस में ट्रंप ने फुटबॉल स्टार लियोनेल मेसी और इंटर मियामी टीम को किया सम्मानित
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में आयोजित समारोह में 2025 मेजर लीग सॉकर (एमएलएस) चैंपियन इंटर मियामी टीम की मेजबानी की
इजरायल की चेतावनी, 'विदेशों में रहने वाले यहूदियों पर हमले का खतरा बढ़ा', सतर्क रहने की सलाह
ईरान के साथ जारी संघर्ष के बीच इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (एनएससी) की घोषणा की है
ईरान के खिलाफ बढ़ेंगे अमेरिका-इजरायल के हमले, पेंटागन ने दिया संकेत
अमेरिका ने संकेत दिया है कि ईरान के खिलाफ उसका सैन्य अभियान 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' आने वाले समय में आगे बढ़ सकता है। अमेरिकी और इजरायली सेना तेहरान की सेना और मिसाइल इंफ्रास्ट्रक्चर को खत्म करने के मकसद से हमले तेज करने की तैयारी कर रही है।
ईरान-चीन के दुष्प्रचार का मुकाबला करने को कूटनीति व संदेशों का इस्तेमाल कर रहा अमेरिका
अमेरिका के विदेश उप सचिव सारा रोजर्स ने एक संसदीय सुनवाई के दौरान सांसदों को बताया कि संयुक्त राज्य अमेरिका ईरान और चीन जैसे देशों के दुष्प्रचार और प्रभाव अभियानों का मुकाबला करने के लिए अपने सार्वजनिक कूटनीति प्रयासों को मजबूत कर रहा है
ट्रंप ने दिए क्यूबा को लेकर अमेरिका की नीति में बदलाव के संकेत
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने क्यूबा को लेकर अमेरिका की नीति में संभावित बदलाव के संकेत दिए हैं। उन्होंने कहा कि इस दिशा में कुछ प्रगति हो रही है और विदेश नीति से जुड़े मौजूदा मुद्दों से निपटने के बाद क्यूबा को लेकर नई पहल की जा सकती है।
ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमले को 5 दिन हो गए। एक हजार से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। 10 और देश इस जंग की जद में हैं। इजराइल के धुरविरोधी विपक्षी नेता भी प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के ईरान पर 8 महीने में दूसरी बार किए हमले का समर्थन कर रहे हैं। दैनिक भास्कर ने इजराइल के विपक्षी दल येश अतीद की सांसद शैली टाल मेरोन से बात की। प्रधानमंत्री नेतन्याहू लिकुद पार्टी के हैं, जो दक्षिणपंथी रुझान रखती है। येश अतीद सेंटर लेफ्ट लिबरल पार्टी है। इजराइल की खासियत यही है कि राष्ट्रीय मुद्दों पर यहां सेंटर, लेफ्ट, राइट नहीं देखा जाता। देखिए और पढ़िए इजराइल की विपक्षी सांसद शैली से खास बातचीत… सवाल: इजराइल ने एक साल में दूसरी बार ईरान के खिलाफ युद्ध छेड़ा है, वजह न्यूक्लियर हथियार होना बताया। इस संघर्ष का अंतिम लक्ष्य क्या है, ये हमेशा के लिए कब रुकेगा?जवाब: एक दिन पहले ही हमने देखा कि एक ईरानी मिसाइल सिनागॉग (यहूदियों की इबादतगाह) पर गिरी और वो जगह तबाह हो गई। 9 लोगों की मौत हुई और कई घायल हो गए। मैंने खुद वहां का दौरा किया और देखा कि एक बैलेस्टिक मिसाइल कितनी तबाही करती है। हमें ये समझना होगा कि सिर्फ न्यूक्लियर बम ही हमारे लिए खतरा नहीं है, बल्कि बैलेस्टिक मिसाइल भी बड़ा खतरा है। हमें दूसरी बार ईरान पर ऑपरेशन अमेरिका के साथ मिलकर इसलिए करना पड़ा ताकि हम ईरान को न्यूक्लियर बम बनाने से रोक पाएं या बैलेस्टिक मिसाइल प्लान पर काम करने से रोक पाएं। ईरान के पास 20 हजार बैलेस्टिक मिसाइल बताई जाती हैं। और अगर इतनी मिसाइल हैं, तो ये एक तरह से परमाणु बम ही है। इजराइल ईरान की दोनों क्षमताओं को खत्म करेगा। हमें ईरानी लोगों से नफरत नहीं है, वे हमारे भाई-बहन की तरह हैं। हम उनकी भलाई की कामना करते हैं। हमारा मानना है कि अयातुल्ला अली खामेनेई की सत्ता हटेगी और फिर ईरान शांतिप्रिय देश बनेगा। खामेनेई की सत्ता ने अपने ही 30 हजार लोगों की हत्या की है। आप सोच सकते हैं कि वो दूसरे देश के लोगों के साथ क्या करते हैं। हम पिछले 5 दिन से देख रहे हैं कि वे अपने अरब पड़ोसियों पर ही हमले कर रहे हैं। ये सिर्फ इजराइल-अमेरिका की बात नहीं, पूरी दुनिया की बात है। सवाल: कभी न्यूक्लियर प्रोग्राम, कभी सरकार बदलना, और अब मिसाइल प्रोग्राम खत्म करना, बार-बार लक्ष्य बदल रहा है, ऐसा क्यों?जवाब: हम एक साथ कई सारी चीजों पर काम कर रहे हैं। मिलिट्री के स्तर पर न्यूक्लियर और बैलेस्टिक मिसाइल ठिकानों को स्ट्राइक कर तबाह करना है। ये मिलिट्री एक्शन हम इसलिए कर रहे हैं, ताकि ये ईरान के लोगों के लिए सत्ता पलटने की जमीन तैयार करे। इजराइल का सत्ता पलटने में पूरी तरह नियंत्रण नहीं है, लेकिन ईरान के लोगों के पास सत्ता पलटने के लिए सारा इंफ्रास्ट्रक्चर होगा, ताकि वे नई सरकार के साथ आम जिंदगी जी सकें। ऐसी सरकार जो लोगों की मदद करें, न कि उन्हें प्रदर्शन करते हुए मार दे। एक तरफ हम मिलिट्री एक्शन कर रहे हैं, दूसरा काम वहां के लोगों को करना है। सवाल: इजराइल-अमेरिका की स्ट्राइक से ईरान में सत्ता बदलने के लिए माहौल बनेगा?जवाब: हमें यही उम्मीद है, लेकिन मैं अपने स्तर पर ये बात नहीं कह सकती कि सत्ता परिवर्तन होगा या नहीं। हमें लगता है कि ईरान में खामेनेई का न होना ईरान के लिए बेहतर भविष्य होगा। सवाल: युद्ध में इजराइल और ईरान के साथ पश्चिम एशिया के अलग-अलग मुल्कों में सैकड़ों लोगों की मौत हो गई है। आपको नहीं लगता कि अगर युद्ध आगे खिंचा, तो बड़े पैमाने पर नुकसान होगा?जवाब: आम नागरिकों के मारे जाने पर मुझे बहुत दुख होता है। ऐसा नहीं होना चाहिए। अमेरिका और इजराइल ने जानबूझकर नागरिकों पर हमला नहीं किया। हमारा लक्ष्य मिलिट्री और सत्ता के ठिकाने हैं। ईरान सिर्फ नागरिकों पर ही हमला कर रहा है। वो इजराइल को खत्म करना चाहता है। सवाल: ईरान कह रहा है कि इजराइल ने अपने हित के लिए अमेरिका को युद्ध में खींच लिया। आपका इस पर क्या कहना है?जवाब: ईरान झूठ बोल रहा है। हम उसके किसी भी आरोप को गंभीरता से नहीं लेते। ईरान ने पूरी दुनिया में प्रॉक्सी खड़े किए हैं। हूती, हिजबुल्ला और हमास जैसे सभी आतंकी संगठन ईरानी सत्ता से ही चलते हैं। ईरानी सत्ता सरकार नहीं है, बल्कि आतंकी सरगना है, जो दुनियाभर मे आतंकी संगठन तैयार कर रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि इजराइल ने अमेरिका का साथ दिया, न कि अमेरिका ने इजराइल का साथ दिया। ईरान तेजी से बैलेस्टिक मिसाइल बना रहा था। वो तेजी से यूरेनियम का भंडारण कर रहे थे। ईरान की पहुंच एशिया से लेकर यूरोप तक हो चुकी थी। मैं अमेरिका के प्रशासन और ट्रम्प का धन्यवाद करती हूं। इजराइल और अमेरिका मिलकर दुनिया बचाने की कोशिश में लगे हैं। सवाल: पिछले साल जून में इजराइल ने ईरान पर हमला किया था, तब और इस बार के युद्ध में क्या फर्क दिख रहा है?जवाब: इजराइल के लोग धाकड़ लोग हैं। हम जानते हैं कि युद्ध में कैसे एकजुट रहना है। दोनों ऑपरेशन पेचीदा रहे हैं, लेकिन हमने बहादुरी दिखाई है। पिछली बार वे एक ही बार में ज्यादा मिसाइलें दाग रहे थे। इस बार वे कई बार में थोड़ी-थोड़ी मिसाइलें दाग रहे हैं। हमने इजराइल में ईरान और हिजबुल्ला दोनों तरफ से एक साथ, एक ही समय में मिसाइलें झेली हैं। इस बार दुनिया समझ गई है कि ये लड़ाई हमें कामयाबी के साथ खत्म करनी है। हमें परमाणु बम-बैलेस्टिक मिसाइल का खात्मा और सत्ता परिवर्तन दोनों ही करना है। ईरान ने इस युद्ध में अपने साथ हिजबुल्ला को उतार दिया है। हम लेबनान के लोगों से भी कहेंगे कि हम उनके साथ हैं। हिजबुल्ला लेबनान को जंग में ले जा रहा है। सवाल: क्या आपको नहीं लगता कि ईरान में सत्ता परिवर्तन के लिए बूट्स ऑन द ग्राउंड मतलब सैनिकों को जमीन पर उतारकर लड़ाई लड़नी होगी। क्या इजराइल-अमेरिका जमीनी ऑपरेशन के लिए तैयार हैं?जवाब: मैं अमेरिका की तरफ से बात नहीं कर सकती। वे खुद अपना फैसला लेंगे। मैं इंटरव्यू में नहीं बता सकती कि जमीन पर लड़ाई के लिए सैनिक उतारने होंगे कि नहीं। हम ये चर्चा अंदरूनी स्तर पर करेंगे और वक्त आने पर अमेरिका के साथ करेंगे। आर्मी हर तरह की चुनौती के लिए तैयार है। सवाल: ईरान कह रहा है कि वो 6 महीने के युद्ध के लिए तैयार हैं। 6 महीने नहीं, लेकिन एक महीने भी जंग चलती है, तो इजराइल को भी बहुत नुकसान होगा?जवाब: मैं इस ऑपरेशन के लिए समयसीमा नहीं बता सकती। मुझे नहीं पता कि क्या होगा। मुझे लगता है कि हमें अपने लक्ष्य पूरे करने के लिए वक्त चाहिए। कोई लंबा युद्ध नहीं चाहता। इजराइल ने युद्ध में बहुत कुछ खोया है। भविष्य के लिए जो भी जरूरी होगा, हम वो करेंगे। सवाल: युद्ध शुरू होने के लिए दो दिन पहले ही PM मोदी इजराइल में स्टेट विजिट पर थे। युद्ध के बीच इजराइल में भारत को लेकर क्या बात हो रही है?जवाब: पीएम मोदी का दौरा ऐतिहासिक रहा है। हमने उन्हें संसद में सम्मान दिया। उन्होंने शानदार भाषण दिया। हमने ट्रेड, स्पेस, मिलिट्री, एआई, एग्रीकल्चर जैसे मुद्दों पर सहयोग का वादा किया है। दोनों देश एक दूसरे की मदद के लिए खड़े हैं। सवाल: इस युद्ध में भारत अमेरिका और इजराइल के साथ खड़ा दिख रहा है। युद्ध के बीच आप भारत के लोगों और सरकार से क्या कहेंगी?जवाब: भारत के लोग इजराइल का दर्द समझ सकते हैं, क्योंकि हम दोनों ही आतंक से परेशान हैं। 1948 में इजराइल बनने के बाद से हम पर आतंक का साया रहा। हम आतंक के खिलाफ और लोकतंत्र के लिए लड़ रहे हैं। हमारी टेरर को लेकर जीरो टॉलरेंस पॉलिसी है। हमें इस पर एकजुट रहना चाहिए। मैं भारत के साथ के लिए शुक्रिया अदा करती हूं। ………………………… ईरान जंग पर ये स्टोरी भी पढ़िए1. ईरान 6 महीने जंग को तैयार, अमेरिका महीनेभर नहीं टिकेगा ईरान के थिंक टैंक डिप्लोमैटिक हाउस के डायरेक्टर हामिद रेजा गोलामजादेह कहते हैं कि ईरान ने 6 महीने जंग की तैयारी कर रखी है। अमेरिका अभी से नेवी पीछे हटाने लगा है। अभी ईरान पुरानी मिसाइलें ही इस्तेमाल कर रहा है, मॉडर्न मिसाइलें तो बाकी हैं। पढ़िए पूरी खबर... 2. ईरान पर अजरबैजान में ड्रोन हमले का आरोप, अजरबैजानी राष्ट्रपति बोले- माफी मांगो अजरबैजान ने खुद पर हुए ड्रोन हमले के लिए ईरान को जिम्मेदार ठहराया है। राष्ट्रपति इलहाम अलीयेव ने कहा कि इस घटना पर ईरान को माफी मांगनी चाहिए। इसके अलावा ईरानी राजदूत को तलब कर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। अजरबैजान के विदेश मंत्रालय के अनुसार एक ड्रोन नखचिवान इंटरनेशनल एयरपोर्ट के टर्मिनल भवन से टकराया। एयरपोर्ट टर्मिनल को नुकसान पहुंचा है। पढ़िए पूरी खबर…
ईरान का जोरदार बदला... फारस की खाड़ी में अमेरिकी टैंकर पर भीषण हमला
इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स की नौसेना ने उत्तरी फारस की खाड़ी में एक अमेरिकी तेल टैंकर को सफलतापूर्वक निशाना बनाया। IRGC के जनसंपर्क विभाग ने एक बयान जारी करते हुए कहा कि यह हमला ईरानी युद्धपोत पर किए गए हमले के जवाब में किया गया है।
मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के ठीक 105 दिन बाद नीतीश कुमार ने राज्यसभा का पर्चा भर दिया। मतलब वे सीएम नहीं रहेंगे। अब बिहार में पहली बार बीजेपी का सीएम बन सकता है। बीजेपी अबतक गठबंधन के सहारे सत्ता में आकर 3 राज्यों पर कब्जा कर चुकी है। 2-3 राज्यों में ऐसी कोशिशें अभी चल रही हैं। वहीं 3 राज्यों में ऐसी कोशिशें नाकाम भी हुई हैं। दोस्त पार्टियों के बूते पहले ताकत हासिल करना फिर पूरी तरह सत्ता पर काबिज होना, क्या यह बीजेपी का पैटर्न है? कई एक्सपर्ट बिहार के घटनाक्रम को ‘ऑपरेशन लोटस’ का क्लोन कह रहे हैं। भास्कर एक्सप्लेनर में जानेंगे बीजेपी की राजनीति के इस खास पैटर्न की पूरी कहानी… सवाल-1: क्या बिहार में नीतीश कुमार की जगह बीजेपी का सीएम बनना तय? जवाब: 89 सीट के साथ बीजेपी बिहार में सबसे बड़ी पार्टी है। इसलिए पूरी संभावना है कि बिहार सरकार का अगला सीएम BJP से होगा। BJP के राष्ट्रीय स्तर के एक नेता ने भास्कर को बताया कि वे अब किसी भी सूरत में कोई दूसरा नीतीश कुमार नहीं बनाना चाहते हैं। दरअसल, 2000 के बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 67 सीटें मिली थीं और नीतीश की अगुवाई वाली समता पार्टी को 34 सीटें मिली थीं। इसके बाद भी अटल बिहार वाजपेयी की अगुवाई वाली बीजेपी ने नीतीश को अपना नेता चुना था और वह पहली बार बिहार के CM बने थे। हालांकि, तब विधानसभा में फ्लोर टेस्ट के दौरान लालू यादव ने नीतीश को पटखनी दे दी थी। और 7 दिन ही सरकार चली थी, लेकिन BJP के लिए नेता नीतीश ही रह गए और BJP उनकी पिछलग्गू बनी रह गई। कहा जा रहा है कि BJP में खास तौर पर गृह मंत्री अमित शाह नहीं चाहते थे कि 20 नवंबर 2025 को गांधी मैदान में नीतीश कुमार CM पद की शपथ लें। BJP की तरफ से ऑफर दिया गया कि नीतीश कुमार अपनी पसंद के किसी नेता का नाम बता दें। वे जिसे अपनी पसंद बता देंगे, BJP उसे CM स्वीकार कर लेगी। नीतीश कुमार ने तब ये प्रपोजल स्वीकार नहीं किया। न ही उनके रणनीतिकार इस पर राजी थे। JDU की तरफ से कहा गया कि मैंडेट नीतीश कुमार के नाम पर मिला है, तो CM भी वही बनेंगे। इसके बाद उन्होंने CM पद की शपथ ली। हालांकि चुनाव के दौरान ही नीतीश कुमार के स्वास्थ्य को लेकर लगातार सवाल उठने लगे थे। ऐसे में JDU नेताओं की तरफ से मांग की जा रही है कि नीतीश कुमार की पसंद के नेता को CM बना दिया जाए। सवाल-2: इससे पहले किन राज्यों में सहयोगी दलों को कमजोर करके बीजेपी सत्ता में आई? जवाब: बीजेपी ने बीते कुछ सालों में एक खास रणनीति के तहत कई क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन करके सत्ता में हिस्सेदारी ली। उसके बाद अपना कैडर और वोट बेस तैयार किया। सहयोगी दलों की पार्टी के असंतुष्ट नेताओं को भी शामिल किया। दूसरे दलों में फूट डालने के आरोप भी लगे। इसके बाद बीजेपी खुद राज्य में नंबर एक पार्टी बन गई, जबकि सहयोगी दल कमजोर पड़ते गए… महाराष्ट्र में ‘छोटे भाई’ से ‘बड़े भाई’ का सफर ओडिशा में BJD की सहयोगी पार्टी से नंबर 1 का सफर गोवा में छोटे दलों के साथ बिना बहुमत के सरकार बनाई सवाल-3: केंद्र में बीजेपी ने किन पार्टियों के सहारे सत्ता हासिल की? जवाब: बीजेपी की पुरानी पार्टी यानी जनसंघ की नींव 1951 में ही रख दी गई थी, लेकिन सत्ता तक पहुंचने में उसे 26 साल लग गए। बात 1974-75 की है। केंद्र की इंदिरा सरकार के खिलाफ बिहार के जय प्रकाश नारायण यानी जेपी ने मोर्चा संभाल रखा था। उन्होंने विपक्षी दलों को अपनी विचारधारा छोड़कर आंदोलन में शामिल होने का आह्वान कर दिया। तब भारतीय लोकदल, कांग्रेस (O) और सोशलिस्ट पार्टी के साथ भारतीय जनसंघ भी जेपी के साथ हो गई। जेपी के सहारे पहली बार मिली सत्ताशांतनु गुप्ता अपनी किताब भारतीय जनता पार्टी की गौरव गाथा में लिखते हैं- ‘जेपी जनसंघ पर निर्भर थे, क्योंकि जनसंघ और ABVP के पास एक अनुशासित और शक्तिशाली कैडर था। जेपी ने तो यहां तक कह दिया था कि अगर जनसंघ फासीवादी है, तो मैं भी फासीवादी हूं।’ नवंबर 1974 में दिल्ली में विपक्षी दलों की बैठक हुई। इंदिरा सरकार के खिलाफ एक विशाल प्रदर्शन का ऐलान हुआ। इसके लिए 6 मार्च 1975 की तारीख तय की गई। जेपी ने कहा कि इस प्रदर्शन में पार्टियां अपने-अपने झंडे या बैनर लेकर न आएं। प्रदर्शन किसी एक ही बैनर तले होना चाहिए। जनसंघ ने इस मौके को लपक लिया। जनवरी 1975 में जनसंघ ने प्रस्ताव पास कर दिया कि एक सीट पर विपक्ष का एक ही उम्मीदवार मैदान में उतरना चाहिए। और हुआ भी वहीं। इमरजेंसी के बाद 1977 के लोकसभा चुनाव में विपक्षी दल जनता पार्टी के बैनर तले जेपी की अगुवाई में लड़े। 542 में से 295 सीटें जनता पार्टी को मिली और कांग्रेस 154 पर सिमट गई। जनता पार्टी के मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। जनसंघ से कुल 5 लोग केंद्र में मंत्री बने। अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री बने और लाल कृष्ण आडवाणी सूचना एवं प्रसारण मंत्री। इस तरह पहली बार जनसंघ ने सत्ता का स्वाद चखा। जनता पार्टी छोड़ बीजेपी नाम से नई पार्टी बनाई1979 आते-आते जनता पार्टी के भीतर जनसंघ को लेकर दोहरी सदस्यता का विवाद छिड़ गया। जनसंघ के लोगों से RSS की सदस्यता छोड़ने की मांग उठने लगी। अटल, आडवाणी जैसे नेताओं ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। 1979 में जनता पार्टी की सरकार गिर गई। 6 अप्रैल 1980 को जनसंघ के नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी यानी BJP नाम से नई पार्टी का ऐलान कर दिया। बीजेपी को अपने पहले चुनाव यानी 1984 में सिर्फ 2 सीटें मिलीं। वीपी सिंह को समर्थन देकर गैर-कांग्रेसी सरकार बनवाई, फिर गिरा दी1987-88 में कांग्रेस सरकार में रक्षा मंत्री रहे वीपी सिंह ने बगावत करके 'जनता दल' बना लिया। 1989 के चुनाव में जनता दल को 143 सीटें मिलीं। 85 सीटें लाने वाली बीजेपी ने बाहर से समर्थन देकर जनता दल की सरकार बनवा दी। यानी कांग्रेस एक बार फिर से सत्ता से बाहर हो गई। अक्टूबर 1990 में राम रथ यात्रा के दौरान जनता दल के लालू यादव ने बिहार में आडवाणी का रथ रोक दिया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद बीजेपी ने समर्थन वापस लेकर वीपी सिंह की सरकार गिरा दी। 1991 के चुनाव में कांग्रेस ने वापसी की और नरसिम्हा राव पीएम बने। उसके बाद 1996 के चुनाव में बीजेपी 161 सीटें जीतकर फिर से सबसे बड़ी पार्टी बनी। अटल बिहार प्रधानमंत्री बने, लेकिन बहुमत साबित नहीं कर पाने की वजह से 13 दिन बाद ही उनकी सरकार गिर गई। अकेले बहुमत नहीं मिला तो 20 से ज्यादा दलों को मिलाकर सत्ता हासिल की1998 में बीजेपी 182 सीटें जीतकर फिर से बड़ी पार्टी बनी। इसके बार उसने अलग-अलग दलों को मिलाकर नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस यानी NDA बनाया। इसमें शिवसेना, समता पार्टी, बीजू जनता दल, टीएमसी, शिरोमणि अकाली दल और जयललिता की पार्टी AIADMK जैसे दल शामिल थे। हालांकि, 13 महीने बाद जयललिता ने समर्थन वापस लेकर सरकार गिरा दी। 1999 के चुनाव में फिर से बीजेपी को 182 सीटें मिलीं। इस बार भी बीजेपी ने 20 से ज्यादा अलग-अलग दलों को मिलाकर सरकार बना ली। ये सरकार पूरे 5 साल चली। लेकिन 2004 के चुनाव में TMC, DMK और TDP जैसी पार्टियों ने बीजेपी का साथ छोड़ दिया। नतीजा ये हुआ कि बीजेपी 2004 से 2014 तक सत्ता से बाहर रही। सवाल- 4: अभी बीजेपी के निशाने पर आगे कौन से राज्य हैं? जवाब: 2026 में पांच विधानसभा चुनाव होने हैं। ये राज्य असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी हैं। असम में बीजेपी सत्ता में है। पुडुचेरी में अलायंस की स्थिति मजबूत है। वहीं पश्चिम बंगाल और केरल में छोटी-छोटी पार्टियों के साथ अलायंस करके चुनाव लड़ने की तैयारी में है। तमिलनाडु में कहानी कुछ अलग है… सवाल-5: किन राज्यों में बीजेपी की ये स्ट्रैटेजी फेल हो गई? जवाब: हालिया राजनीति को देखें तो 3 राज्य ऐसे हैं, जहां बीजेपी की ये स्ट्रैटजी नाकाम रही… 1. पश्चिम बंगाल: कई TMC नेता जुटाए, फिर भी नाकाम 2. झारखंड: ऑपरेशन लोटस के आरोप लगे 3. पंजाब: अकाली दल का साथ छोड़कर नुकसान उठाया ------------------------------------ बिहार से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… नीतीश ने राज्यसभा के लिए नामांकन किया:बोले- नई सरकार को सहयोग रहेगा; JDU ऑफिस में तोड़फोड़, तेजस्वी ने कहा- BJP ने हाईजैक किया बिहार के CM नीतीश कुमार ने गुरुवार को विधानसभा पहुंचकर राज्यसभा कैंडिडेट के लिए नामांकन किया। CM के साथ बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन, रामनाथ ठाकुर, उपेन्द्र कुशवाहा और शिवेश कुमार ने भी नामांकन दाखिल किया। इस दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी मौजूद रहे। पढ़िए पूरी खबर…
कार्नी ने अपने भारत दौरे के दौरान पीएम मोदी से हुई मुलाकात का भी जिक्र किया और कहा कि मोदी के साथ बातचीत के दौरान उन्हें उनकी कार्यशैली और अनुशासन को करीब से समझने का अवसर मिला। उनके अनुसार, मोदी एक ऐसे नेता हैं जिनकी प्राथमिकता हमेशा देश और उसके नागरिक होते हैं।
यूरोप में चीन की दबाव बनाने की रणनीति से अमेरिका चिंतित
अमेरिकी सांसदों, विदेशी नेताओं और विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि चीन यूरोप में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। उन्होंने कहा कि चीन निवेश, दबाव और गुप्त रणनीति का इस्तेमाल कर रहा है
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के खिलाफ चलाए जा रहे सैन्य अभियान और गृह सुरक्षा विभाग (डीएचएस) से जुड़े वित्तीय विवाद को लेकर बुधवार को सदन के डेमोक्रेट और रिपब्लिकन सांसदों के बीच तीखी बहस हुई
होर्मुज जलडमरू मध्य से टैंकरों को सुरक्षित निकालने के लिए एस्कॉर्ट कर सकता है अमेरिका
व्हाइट हाउस ने कहा है कि यदि आवश्यक हुआ तो संयुक्त राज्य अमेरिका होर्मुज जलडमरू मध्य से गुजरने वाले तेल टैंकरों के लिए नौसैनिक सुरक्षा दल तैनात कर सकता है
महिला सशक्तिकरण में भारत की बैंकिंग योजना की अहम भूमिका : यूएन
महिला सशक्तिकरण के लिए काम करने वाले एक संयुक्त राष्ट्र अधिकारी ने भारत की 29 करोड़ से अधिक महिलाओं को बैंकिंग सेवाएं प्रदान करने वाली योजना की सराहना की है। साथ ही, इसे महिलाओं और लड़कियों के लिए एक परिवर्तनकारी मार्ग के वैश्विक मॉडल के रूप में उजागर किया है।
डोनाल्ड ट्रंप का दावा, 'एआई की दौड़ में चीन से काफी आगे है अमेरिका'
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के क्षेत्र में अमेरिका ने चीन पर स्पष्ट बढ़त बना ली है
मिडिल ईस्ट में तनाव के बीच अपने नागरिकों को निकालने के लिए अमेरिका ने शुरू कीं चार्टर्ड फ्लाइट
मिडिल ईस्ट में जारी भीषण तनाव के बीच अमेरिका ने अपने हजारों नागरिकों की सुरक्षित घर वापसी के लिए चार्टर्ड फ्लाइट शुरू कर दी हैं।
ट्रंप की नई एआई ऊर्जा पहल: टेक कंपनियां खुद बनाएंगी बिजली
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) में तेजी और घरेलू उपभोक्ताओं के लिए बिजली की कीमतों में कटौती के उद्देश्य से नई पहल का ऐलान किया है
ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमले को 5 दिन हो गए। ईरान में एक हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। ईरान के हमलों से इजराइल में 10 से ज्यादा मौतें हुई हैं। सवाल है कि क्या ईरान इस लड़ाई में कमजोर पड़ रहा है? ईरान के थिंक टैंक डिप्लोमैटिक हाउस के डायरेक्टर हामिद रेजा गोलामजादेह ऐसा नहीं मानते। वे कहते हैं कि ईरान ने 6 महीने जंग की तैयारी कर रखी है। अमेरिका अभी से नेवी पीछे हटाने लगा है। अभी ईरान पुरानी मिसाइलें ही इस्तेमाल कर रहा है, मॉडर्न मिसाइलें तो बाकी हैं। ईरान-अमेरिका संघर्ष पर दैनिक भास्कर ने हामिद रेजा गोलामजादेह से डिटेल में बात की। पढ़िए पूरा इंटरव्यू… सवाल: अभी ईरान में क्या हालात हैं, पिछले साल जून में हुए इजराइल के हमलों से ये जंग कितनी अलग है?जवाब: 28 फरवरी से अब तक हमने अमेरिका से ज्यादा इजराइल के हमले झेले हैं। राजधानी तेहरान के अलावा देशभर में कई ठिकानों पर हमले हुए हैं। जून की जंग में जिन जगहों को टारगेट किया गया था, इस बार भी ठीक वही लोकेशन टारगेट की गई हैं। इजराइल के पास पुराना डेटा बेस है। अब भी इजराइल पुराने ठिकानों पर ही हमला कर रहा है। मैंने सुबह से सिर्फ एक धमाके की आवाज सुनी है। मेरे ऑफिस के रास्ते में पुलिस का ऑफिस है। उस पर जून में भी हमला किया गया था और अभी फिर से हमला हुआ है। सवाल: क्या मिलिट्री बेस के अलावा रिहायशी इलाकों में भी हमले हुए हैं?जवाब: पिछले साल जून में 12 दिन चली जंग में हमने ज्यादा तबाही और खौफ देखा था। इस बार उतना ज्यादा नहीं है। पुलिस बेस और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के ठिकानों पर हमले हुए हैं। अब कुछ मस्जिदों पर भी हमले शुरू हो गए हैं। स्कूल पर हमला किया गया। इसमें करीब 140 बच्चे मारे गए। इस बार जून के मुकाबले ज्यादा लोगों की मौत हुई है। स्ट्राइक के बाद रेस्क्यू टीमें पहुंचती हैं, इजराइल-अमेरिका तभी हमला कर रहे हैं। सवाल: सुप्रीम लीडर खामेनेई की हत्या कैसे हो गई, क्या ये इंटेल लीक था? जवाब: सुप्रीम लीडर की हत्या पहले दिन की गई। इसके बाद कुछ मिलिट्री कमांडरों को मारा गया। कुछ नेताओं की हत्या की भी कोशिश हुई। ईरान के मिलिट्री बेस, नेवी बेस को निशाना बनाया गया। बसीज आर्मी पर भी हमले बढ़़ गए हैं। उन्हें पता नहीं है कि पहले ही ये बेस और ठिकाने खाली कर दिए हैं। अपने दफ्तर कहीं और अंडरग्राउंड शिफ्ट कर लिए हैं। हम देख पा रहे हैं कि अमेरिका और इजराइल ने पहले कहा कि वे न्यूक्लियर प्रोग्राम की वजह से हमला कर रहे हैं। फिर कहते हैं कि सत्ता बदलना चाहते हैं। सवाल: क्या अमेरिका ईरान में सत्ता बदल सकता है?जवाब: उन्होंने जनवरी में दंगे करवाने की कोशिश की थी। उससे कुछ नहीं हुआ। 2-3 दिन में दंगे खत्म हो गए। अब अमेरिका और इजराइल पहले दोनों ट्रेंड यानी एक तरफ हमले और दूसरी तरफ राजनीतिक प्रदर्शन-दंगे करके सत्ता बदलना चाहते हैं। वे अपने एजेंटों के जरिए दंगा भड़काना चाहते हैं। लोग जानते हैं कि ईरान की आर्मी दुश्मन को हराने के लिए काफी है। अमेरिका-इजराइल समझते हैं कि 80-85% लोग इस्लामिक सत्ता के खिलाफ हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। लोग सत्ता के साथ हैं। सवाल: क्या अमेरिका की तरफ से जमीनी हमले का भी डर है?जवाब: सीरिया और इराक की तरफ से जिन कैदियों को जेल से रिहा किया गया है, वे कुर्दों के साथ मिलकर ईरान पर हमला कर सकते हैं। अमेरिका इन कैदियों को रिहा करके ईरान में जमीनी हमला करना चाहता है। ये बात तय है कि सैनिक उतारना अमेरिका की सबसे बड़ी गलती होगी। ईरान ने बहुत पहले से युद्ध की तैयारी की है, अगर अमेरिका जमीनी हमला करता है तो बड़ी तबाही देखने के लिए तैयार रहे। सवाल: क्या खामेनेई की मौत के बाद ईरान ज्यादा एकजुट हो गया है?जवाब: अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या नहीं हुई, बल्कि लोगों जज्बात की हत्या हुई है। खामेनेई ईरान में सबसे ज्यादा पसंद किए जाते हैं। सुप्रीम लीडर की मौत के बाद से जितने लोग सड़कों पर निकले हैं, उतने कभी नहीं निकले। खामेनेई की मौत का ऐलान होने के बाद एक घंटे के अंदर तेहरान की सड़कें भर गईं। करीब 10 घंटे तक लोग सड़कों से नहीं हटे। पूरी-पूरी रात लोग सड़कों पर प्रदर्शन और नारेबाजी कर रहे हैं। ये सब रमजान में कर रहे हैं। ईरान के लोग अभी सबसे ज्यादा एकजुट हैं। सवाल: सुप्रीम लीडर खामेनेई की मौत के बाद अब सत्ता कैसे चल रही है, इसका भविष्य क्या है?जवाब: ईरान की लीडरशिप की सबसे बड़ी खासियत है कि अगर कोई अचानक नहीं रहता, फिर भी सिस्टम चलता रहेगा। जो नहीं है, उसकी जगह कोई और लेगा। 12 दिन के युद्ध के बाद खामेनेई ने हर अधिकारी को आदेश दिया था कि वे अपने विकल्प के तौर पर 5 नाम तैयार रखें। अगर किसी की भी मौत होती है, तो उसके बाद कमान किसके पास होगी, ये साफ रहे। 36 साल से सुप्रीम लीडर होने की वजह से वे ऐसा देश बना पाए, जो हर तरह से खुद की रक्षा कर पाता है। सुप्रीम लीडर ने हमेशा लोकतंत्र और कानून का सम्मान किया। अमेरिका और इजराइल का पहला हमला होने के बाद 2 घंटे के अंदर कमांडर्स ने अपनी जगह ले ली और जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी। इससे साफ हो जाता है कि सिस्टम एकदम सही तरह से काम कर रहा है। ईरानी संविधान के मुताबिक, अगर हमारे लीडर नहीं रहे तो उसके बाद हमारे पास सुप्रीम काउंसिल है। इसमें तीन पद प्रेसिडेंट, चीफ जस्टिस और गार्डियन काउंसिल के प्रमुख होते हैं। अभी सारे फैसले यही सुप्रीम काउंसिल ले रही है। अगले सुप्रीम लीडर का चुनाव असेंबली एक्सपर्ट कमेटी करेगी। हर 6 महीने पर ये कमेटी अपने नामों पर रिव्यू करती है। इसलिए उनके पास पहले से सुप्रीम लीडर के लिए कई सारे नाम होंगे। सवाल: अमेरिका और इजराइल दावा कर रहे हैं कि ईरान के आसमान पर अब उनका कब्जा है, क्या ये सही है? जवाब: हां, हमारे आसमान पर इजराइल और अमेरिका का कंट्रोल है, लेकिन जहां उनके बेस हैं, वहां के आसमान पर हमारा भी कंट्रोल है। ईरानी मिसाइल इजराइल और अमेरिका के बेस पर हमला कर रही हैं। मिसाइलें टारगेट पर गिर रही हैं। ईरान फाइटर जेट्स के खिलाफ डिफेंस सिस्टम में कमजोर हो सकता है, लेकिन हमने तय किया है कि दुश्मन के मिलिट्री बेस पर हमला करके हम बढ़त बनाएंगे। कतर, सऊदी अरब, यूएई, बहरीन में हमने अमेरिकी बेस पर हमले किए हैं। अमेरिका ईरान से काफी दूर है, इसलिए उसके पास हमला करने के लिए बहुत लिमिटेड जगहें हैं। ईरान ने कतर में अमेरिका के रडार सिस्टम पर हमला किया है। इसके बाद ईरानी मिसाइल इजराइल पर आसानी से हमला कर पा रही हैं। अमेरिका ने इस रीजन से अपनी नौसेना निकाल ली है। ये इस बात का सबूत है कि ईरान का हमला तेज हो रहा है। अमेरिका ने कहा था कि वो खुद को 45 दिनों तक डिफेंड कर सकते हैं और आज सिर्फ चौथा दिन है। सवाल: ईरान कितने दिन तक जवाबी हमला जारी रख सकता है, क्या अमेरिका और इजराइल का डिफेंस कमजोर पड़ता दिख रहा है?जवाब: ईरान 6 महीने तक लड़ने के लिए तैयार है। अमेरिका और इजराइल एक महीने से ज्यादा ये जंग नहीं झेल पाएंगे। अमेरिका ने कहा है कि वो 4 हफ्ते की जंग के लिए तैयार हैं। ईरान के पास इतने हथियार हैं, जो 6 महीने तक चल सकते हैं। ईरान ने अब तक अपनी मॉडर्न मिसाइलों का इस्तेमाल नहीं किया है। ईरान अब भी पुराने ड्रोन और मिसाइल इस्तेमाल कर रहा है। हम पुरानी मिसाइल से हमला करते हुए भी कामयाब हो रहे हैं। अमेरिकी और इजराइली ठिकाने बर्बाद हो रहे हैं। ईरान के सस्ते ड्रोन से अमेरिका-इजराइल के महंगे डिफेंस सिस्टम बर्बाद हो रहे हैं। उनके पास डिफेंस के लिए सीमित संसाधन हैं। हर बीतते दिन के साथ उनका डिफेंस सिस्टम कमजोर हो रहा है। सवाल: अमेरिका पहले कह रहा था कि ईरान में सत्ता बदलना है, अब ये बात नहीं कर रहा। क्या अमेरिका अपना मकसद बदल रहा है?जवाब: अमेरिका अब भी चाहता है कि ईरान की सरकार गिर जाए, लेकिन वो नहीं कर पा रहा है। कल को अमेरिका ये भी कह सकता है कि हम सिर्फ सुप्रीम लीडर को मारना चाहते थे, लेकिन ये सही बात नहीं है। हम तब तक युद्ध लड़ेंगे, जब तक कि वो अपनी गलती नहीं मान लेता। सवाल: गलती मानने का क्या मतलब है, ईरान इस जंग से क्या चाहता है?जवाब: अमेरिका को ये रीजन हमेशा के लिए छोड़ना होगा। इजराइल का खात्मा किया जाना चाहिए, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि ईरान अभी तुरंत ये करना चाहता है। अब हमें उन्हें मारने की जरूरत नहीं है, वे खुद ही अपने आप को नक्शे से गायब करने पर जुटे हैं। उन्हें ये मानना होगा कि वे ईरान में सत्ता नहीं बदलवा सकते। सवाल: ईरान अभी किस क्षमता से हमले कर रहा है?जवाब: ईरान अभी मैग्नीट्यूड के पैमाने पर 6-7 के लेवल के हमले कर रहा है। आने वाले दिनों में हम 9-10 लेवल के हमले शुरू करेंगे। अभी हम पुराने ड्रोन इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन जल्द ही अपने ताकतवर ड्रोन भेजना शुरू करेंगे। हमारे ड्रोन सिर्फ 20 हजार डॉलर के हैं, वहीं उनके रडार लाखों डॉलर के हैं। अभी तो लड़ाई शुरू हुई है, हम जल्द ही इसे तेज करेंगे। ईरान की रणनीति है कि पहले दुश्मन के रडार और डिफेंस तोड़ो। आसमान खाली हो जाएगा, तब हम टारगेट करना शुरू करेंगे। सवाल: ईरान में लोग रोजे पर हैं। जंग की वजह से उन्हें किस तरह की दिक्कतें हो रही हैं?जवाब: हमले में मारे जाने वालों में आम लोग ज्यादा हैं। ये सच है कि अमेरिका के ज्यादातर टारगेट मिलिट्री और सरकारी ठिकाने हैं। एक दिन पहले रिहायशी इलाकों पर हमले हुए हैं। उन्होंने इस्फेहान में एक फैक्ट्री पर हमला किया, जहां आम लोग थे। सवाल: भारत ने ईरान में चाबहार पोर्ट डेवलप किया है, ये पोर्ट सुरक्षित है या नहीं?जवाब: चाबहार पोर्ट के पास हमला हुआ है। ये नहीं पता कि पोर्ट तबाह हुआ है या ठीक है। सवाल: भारत और ईरान के पुराने संबंध रहे हैं। आप भारत सरकार से क्या चाहते हैं?जवाब: हमारी संस्कृति और सभ्यता का लंबा इतिहास रहा है। हम पड़ोसी रहे हैं। भारत की मौजूदा राजनीति इजराइल की तरफ झुकी हुई है। इसे संतुलित होना चाहिए। इजराइल पिछले 2 साल से गाजा में लोगों को मार रहा है, लेकिन भारत कुछ नहीं कर रहा। भारत सरकार और इजराइल के संबंध मजबूत बने हुए हैं। मुझे पता है कि राजनीति विचारधारा से अलग होती है, लेकिन हम इंसान हैं। हमें इंसानियत के बारे में सोचना होगा। भारत को सोचना चाहिए कि सही इतिहास किसका है। अमेरिका और इजराइल एप्सटीन की सत्ता हैं। आप उनके साथ नहीं खड़े हो सकते। भारत को गाजा और ईरान के साथ खड़ा होना चाहिए। हम विक्टिम हैं और खुद की रक्षा कर रहे हैं। हम पर मिलिट्री प्रेशर बढ़ाने की कोशिश हो रही है। ईरान ने कभी किसी देश पर हमला नहीं किया। …………………… ईरान जंग पर ये खबर भी पढ़ें ट्रम्प बोले- ईरान के 48 नेता एक झटके में खत्म, 9 जहाज डुबोए इजराइल और अमेरिका ने ईरान पर लगातार दूसरे दिन हमला किया। हमले में ईरानी इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के हेडक्वार्टर को निशाना बनाया गया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि इन हमलों में 48 ईरानी नेता मारे गए हैं। अमेरिका ने ईरान के 9 जहाज डुबो दिए हैं। पढ़ें पूरी खबर...
‘अंग्रेजों की सरकार हमारे फ्रीडम फाइटर्स को टेररिस्ट कहती थी, लेकिन फिर भी उन्हें जेल में साथ रखती थी। देश आजाद होने के 70-80 साल बाद एक पॉलिटकल पार्टी की सरकार आई। उसने अपने राजनीतिक विरोधियों को ही जेल में डाल दिया। ये भी इंश्योर किया कि हम जेल में भी एक दूसरे से न मिल सकें।‘ ये आरोप दिल्ली के पूर्व डिप्टी CM मनीष सिसोदिया लगा रहे हैं। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने शराब नीति केस में अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया समेत सभी 23 आरोपियों को बरी कर दिया है। शराब घोटाले के आरोप में सिसोदिया को करीब 17 महीने जेल में रहना पड़ा था। इस दौरान कई उतार-चढ़ाव भी देखे। जेल में बिताए दिनों को याद कर वे आज भी भावुक हो जाते हैं। दैनिक भास्कर से बातचीत में मनीष सिसोदिया ने जेल में गुजारे दिन, कोर्ट से मिली क्लीनचिट और पार्टी की आगे की स्ट्रैटजी को लेकर बात की। पढ़िए पूरा इंटरव्यू… सवाल: आप करीब 17 महीने या कहें 550 दिन से भी ज्यादा जेल में रहे। इस बीच आपकी पत्नी बीमार थीं, कई बार एडमिट भी हुईं। सब कैसे संभाला? जवाब: आप दिन गिन रही हैं, मैं तो घंटे गिनता था। डेढ़ साल बहुत तकलीफ भरे थे। पत्नी बीमार थीं। बेटा विदेश (टोरंटो) पढ़ने गया ही था और मैं जेल चला गया। पर्सनल लाइफ तो फुल ऑफ पेन थी ही। इन सबके बीच एक बड़ा दर्द ये था कि हम राजनीति में एक सपना लेकर आए थे, उस पर ब्रेक लग गया। हमने काफी मेहनत करके अपने विचार जमीन पर लाने का काम शुरू किया। मेरा सपना था कि देश की राजनीति में एजुकेशन के बीज डालूं। जेल गया तो लगा जैसे किसी किसान ने जमीन में बीज डालें हो, उसमें अंकुर आए ही हों और कोई मॉन्स्टर (शैतान) आकर उसे तहस-नहस कर दे। पिछले 8-10 साल में हमने एजुकेशन के लिए बहुत काम किया था। हैप्पीनेस प्रोग्राम और देशभक्ति के प्रोग्राम चलाए। टीचर्स को ट्रेनिंग के लिए फिनलैंड भेजा। सरकारी स्कूलों की एजुकेशन को वर्ल्ड क्लास बनाने का सपना देखा। हम उसे पूरा करने के बहुत करीब थे, लेकिन पहले ये आरोप लगे और फिर जेल जाना पड़ा। लगा कि सबकुछ एक झटके में तहस-नहस हो गया। सवाल: आरोप लगाने वाले सरकार में थे, कभी तो डर लगा होगा कि छूटेंगे या नहीं?जवाब: मैं जेल में एजुकेशन से जुड़ी कुछ किताबें लेकर गया था। उन्हें पढ़ता तो लगता कि पढ़ तो रहा हूं, लेकिन क्या कभी इसकी जानकारी इस्तेमाल भी कर पाऊंगा। शुरू में तो लगा था कि 2-3 महीने में वापस आ जाऊंगा, लेकिन बेल रिजेक्ट होने लगी, तो भरोसा कमजोर होने लगा। जांच एजेंसियां कोर्ट में कहती थीं कि बस 2-3 महीने में ट्रायल खत्म हो जाएगा, लेकिन कुछ हो ही नहीं रहा था। जाहिर है कि ये सब BJP अपने वकीलों से कहलवा और करवा रही थी। हालांकि कोर्ट और संविधान पर भरोसा था, क्योंकि जानता था कि जब ये केस कोर्ट में जाएगा तो जिरह होगी। जज सबूत मांगेंगे, तो इनके पास कोई जवाब नहीं होगा। फिर भी उस वक्त अनिश्चितता तो थी। सवाल: पत्नी से बात होती थी, तो वे क्या कहती थीं? जवाब: उन्हें किसी वक्त तो लगा ही होगा कि कहीं फंस तो नहीं गए। एक सामान्य घर की महिला होने के नाते, पत्नी होने के नाते, वो कभी तो सोचती होगी कि पति जेल में है। वो खुद बीमार भी थी। उलझन तो रही होगी, लेकिन उन्होंने कभी जाहिर नहीं किया। कई लोग हमें सलाह देते थे कि उन लोगों से समझौता कर लो, जेल में कब तक सड़ोगे। आपको एक किस्सा सुनाता हूं। मैंने एक बार पत्नी से कहा कि मान लो मैं सलाह मानकर BJP जॉइन कर लूं तो वो वॉलियंटियर्स क्या सोचेंगे, जो अपना कामकाज छोड़कर दिन-रात हमारे साथ लगे रहे। उन्हें क्या मुंह दिखाऊंगा। मेरी पत्नी ने फौरन कहा, 'उन्हें छोड़िए आप मुझे क्या मुंह दिखाएंगे।' उनकी इस बात से मुझे लगा मैं गलत रास्ते पर नहीं हूं। बेटा विदेश गया तो मैंने उसे एक खत लिखा कि तेरे लिए परेशान हूं। इस वक्त मुझे तेरे साथ होना चाहिए था। दुनियाभर के बच्चे वहां होंगे, हिम्मत रखना। मैंने वो सब लिखा, जैसा एक पिता महसूस करता है। उसने भी लिखकर ही जवाब दिया, अगर आप मेरे लिए परेशान हैं तो ये मेरी देशभक्ति पर सवाल है। आप मेरी चिंता मत करो। आप जिस मिशन पर हो, उसकी फिक्र करो। तब मुझे पहली बार लगा कि बेटा बड़ा हो गया है। सवाल: आप, अरविंद केजरीवाल, सत्येंद्र जैन तीनों एक ही वक्त एक ही जेल में थे। तीनों कितना मिल पाते थे, क्या बातें होती थीं? जवाब: हम कभी नहीं मिले। इन लोगों ने इंश्योर किया था कि हम कभी एक दूसरे से न मिलें। आप सोचिए अंग्रेज हमारे फ्रीडम फाइटर्स को टेररिस्ट कहते थे। तब भी उन्हें एक साथ जेल में रखते थे। हमें तिहाड़ में भी अलग-अलग जेलों में रखा गया था। जेल के अंदर कई जेले हैं। फिर वार्ड, बैरक और सेल हैं। जैसे मैं अपनी सेल में हूं, तो सिर्फ अपनी बैरक में ही घूम सकता हूं। एक बैरक में कई सेल होती हैं। मैं अपनी सेल में अकेला था, जबकि बाकी सेलों में कई लोग थे। ऐसे समझिए कि तिहाड़ के अंदर की सभी जेलें इंडिपेंडेंट हैं। यहां तक कि बैरक भी एक अलग जेल ही हैं। इसलिए हम एक-दूसरे को देख भी नहीं सकते थे। आपको बताऊं तो अंग्रेजों ने जैसा सलूक हमारे फ्रीडम फाइटर्स के साथ किया था, उससे भी बुरा सलूक हमारे साथ हुआ। सवाल: सुना है आप जेल में भगवद गीता और उपनिषद पढ़ते थे?जवाब: मुझे किसी ने सलाह दी कि आप राजनीतिक कैदी हैं। ये वक्त बर्बाद मत करिएगा और न ही मेंटल लेवल डाउन होने देना। इसलिए जेल में मैंने भगवद गीता के डिफरेंट वर्जन पढ़े। ओशो की किताबें, उपनिषद, बुद्ध का इंटरनेशनल लिटरेचर और गांधी सबको पढ़ा। मेडिटेशन भी किया। इसमें सबसे अच्छे उपनिषद लगे। इसे पढ़कर मुझे हिंदू नॉलेज पर बहुत गर्व हुआ। अफसोस भी हुआ कि हमने इसे गलत कर्मकांडों और व्याख्यायों में बर्बाद कर दिया। अब क्वांटम साइंस हमारे हिंदू दर्शन को प्रूफ कर रही है। आप यकीन नहीं मानेंगी अब कभी-कभी सोचता हूं कि अगर जेल नहीं जाता, तो शायद उपनिषद नहीं पढ़ पाता। सवाल: जब कोर्ट ने बरी करने का फैसला सुनाया तो पहला रिएक्शन क्या था? जवाब: जब फैसला आया तो मैंने कोर्ट के बाहर से ही सबसे पहले पत्नी को फोन किया और फिर बेटे को। वो बहुत इमोशनल पल था। सवाल: 2000 करोड़ से ज्यादा के इस स्कैम के केंद्र में आप थे। केजरीवाल तो इसलिए फंसे क्योंकि वो दिल्ली के CM थे। अगर सजा होती तो भी आप ही केंद्र में होते?जवाब: इस मनोहर कहानी के केंद्र में… देखिए, पॉलिटिकल एजेंडा के लिए एजेंसियों का इस्तेमाल करके आप किसी को गिरफ्तार कर सकते हैं। ट्रिक लगाकर तारीख ले सकते हैं, बेल रिजेक्ट करा सकते हैं, लेकिन प्रूफ नहीं दे सकते। अपराधी नहीं साबित कर सकते। सु्प्रीम कोर्ट में मेरी बेल एप्लीकेशन सुनी जा रही थी, तब जस्टिस संजीव खन्ना जी ने कहा था कि हम अभी बेल सुन रहे हैं, ट्रायल नहीं कर रहे। अगर ये केस ट्रायल में जाएगा, तो दो लाइन में फ्लैट हो जाएगा। मुझे पता था कि ये केस नहीं टिकेगा। ये सारा खेल बस बेल होने तक था। सवाल: जांच एजेंसी ने इस केस को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया है, 9 मार्च को सुनवाई है, आपकी क्या तैयारी है?जवाब: लीगल टीम की अपनी तैयारी है, लेकिन अभी कोर्ट ने बिल्कुल क्लियर लिखा है कि आपने पहले अपनी कहानी लिख ली। फिर जब आप छापा मारने गए तो आपको उस कहानी का भी कोई सबूत नहीं मिला। तब आपने कुछ लोगों को अरेस्ट किया और उनसे ये कहानी नैरेट करवा ली। आपने अरेस्ट हुए बिजनेसमैन में से दो को पहले आरोपी बनाया, फिर उन्हें ही सरकारी गवाह बना लिया। फिर उनसे ये कहानी नैरेट करवा दी। जांच एजेंसी को न कोई मनीट्रेल मिली, न पैसा मांगने का सबूत मिला और न किसी से मिलने का सबूत मिला। ये कहानी पहले आरोपी फिर सरकारी गवाह बने व्यक्ति के बयान के इर्द-गिर्द है, तो ये किसी कोर्ट में नहीं टिकेगी। सवाल: दिल्ली की CM रेखा गुप्ता कह रही हैं कि जनता चुनाव में न्याय का फैसला सुना चुकी है, अब हाईकोर्ट भी सुनाएगी? जवाब: दिल्ली की जनता को एक साल में सरकार ने जितना प्रताड़ित कर दिया है, उतनी प्रताड़ित वो कभी नहीं रही। जेल में रखकर हमें और हमारे परिवारों को तो सजा दिला दी, लेकिन दिल्ली की जनता को क्यों सजा दे रहे हैं। स्कूल बंद कर रहे हैं, मोहल्ला क्लिनिक बंद हो रही हैं। कॉन्ट्रैक्ट की जॉब कर रहे लोगों को निकाला जा रहा है। आखिर क्यों हजारों लड़के-लड़कियां, DTC के कर्मचारी, मार्शल्स और मोहल्ला क्लिनिक के कर्मचारियों को बाहर कर दिया गया। सवाल: दिल्ली चुनाव में लिकर स्कैम सबसे बड़ा मुद्दा था, क्या पार्टी ने कुछ आकलन किया कि इस आरोप की वजह से कितनी सीटें गईं?जवाब: लाइफ और राजनीति ऐसे मैथमैटिक्स से नहीं हो सकती। हम जिस काम के लिए निकले हैं, उसमें ये सब पहले भी हुआ है और आगे भी होता रहेगा। हम इससे घबराने वाले नहीं। इसी देश में देश के लिए काम करने वालों को आतंकवादी तक कहा गया। हमें तो बस इन्होंने कट्टर बेईमान ही कहा है। हम जिस मिशन को लेकर निकले हैं, वो पूरा करके रहेंगे। सवाल: करप्शन के आरोप की वजह से दिल्ली की सत्ता हाथ से निकल गई। अब आगे की क्या स्ट्रैटजी है? जवाब: हम लोगों तक जाएंगे, उन्हें बताएंगे कि क्या हुआ। फिर अपने काम पर लगेंगे। बताएंगे कि इस देश को मोदी से बचाना होगा। उनके झूठ और साजिशें सबके पास लेकर जाएंगे। सवाल: पंजाब भी इस वक्त भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा है। वहां चुनाव करीब हैं ऐसे में पंजाब कहीं दिल्ली न बन जाए, इसके लिए क्या कर रहे? जवाब: ये सब दिल्ली की तरह ही बनाया गया प्रोपेगैंडा है। हमने नशे के खिलाफ अभियान चलाया, अपने किसी व्यक्ति को नहीं बचाया। गिरफ्तारी करवाई, जेल में डलवाया। अब नशे के तस्कर, व्यापारी हरियाणा आ गए हैं। यहां खुलेआम अंधाधुंध नशा बिक रहा है। मैंने अभी एक वीडियो देखा था, जिसमें कैसे एक पुलिस अधिकारी ने कहा कि मुझ पर नशा न रोकने का दबाव था। सवाल: आप दिल्ली हारे और इसे छोड़कर पंजाब में बस गए। BJP और जनता ने भगोड़े का टैग लगाया, आखिर क्यों भागे? जवाब: हम कहीं नहीं भागे। पंजाब में चुनाव होने थे तो मुझे प्रभार सौंपा गया था। मैंने वहां कोई स्थायी घर नहीं लिया। कभी इस जिले तो कभी उस जिले जाता रहता हूं। चुनाव वहां पर हैं, तो वहीं लगना पड़ेगा। सवाल: अरविंद केजरीवाल, सत्येंद्र जैन और AAP के नामीगिरामी नेताओं ने पंजाब में सरकारी बंगले ले लिए, ऐसा क्यों? जवाब: ये बिल्कुल झूठ है। किसी को कोई बंगला नहीं मिला। ये सब प्रोपेगैंडा है। सवाल: अब अरविंद केजरीवाल के फोकस में दिल्ली होगी या पूरा देश, क्योंकि गुजरात, गोवा, पंजाब में चुनाव हैं, क्या स्ट्रैटजी है? जवाब: देखिए पूरा देश ही फोकस में है। अरविंद केजरीवाल जी पार्टी के संयोजक हैं, तो पूरे देश में रहेंगे। दिल्ली तो हमारी थी तो यहां से फोकस कभी नहीं हट सकता।……………………ये खबर भी पढ़ें… शराब घोटाले से रिहाई, अब क्या करेंगे केजरीवाल दिल्ली में BJP सरकार का एक साल पूरा होने पर आम आदमी पार्टी ने कैंपेन शुरू किया है। इसका नारा है- एक साल, दिल्ली बेहाल, याद आ रहे केजरीवाल। एक मार्च को जंतर-मंतर पर पार्टी BJP के खिलाफ रैली करने वाली थी। इससे दो दिन पहले 27 फरवरी को AAP संयोजक अरविंद केजरीवाल, पूर्व डिप्टी CM मनीष सिसोदिया समेत 23 आरोपियों को शराब घोटाले से डिस्चार्ज यानी आरोप तय होने से पहले आरोपमुक्त कर दिया गया। पढ़िए पूरी खबर…
‘उस दिन बहुत तेज बारिश हो रही थी। जैसे कि आसमान टूट पड़ा हो। मैं नौकरी करके लौटा था। घर के पास पुल के ऊपर से पानी उफान मारते हुए बह रहा था। स्थानीय पंचायत सदस्य वहां खड़े थे। उन्होंने मुझे आगे जाने से रोका, लेकिन मैं नहीं माना। रात के अंधेरे में घर पहुंच गया। घर पहुंचा तो पत्नी, बच्चे सहमे हुए थे। मैंने उन्होंने ढांढस बंधाया- कुछ नहीं होगा। कहकर सभी ने साथ बैठकर खाना खाया और सो गए। करीब रात के डेढ़ बजे अचानक धरती कांपी। बहुत तेज आवाज आई। नींद खुली तो समझ में नहीं आया कि क्या हो रहा है। कुछ ही सेकंड में पानी, मलबा और बड़े-बड़े पत्थर घर को चीरते हुए भीतर घुस आए। दीवारें कांपने लगीं। मेरी पत्नी, मेरे माता-पिता, मेरी बहनें घर के सभी 12 लोग मेरी आंखों के सामने बह गए। वे चीख रहे थे, लेकिन अंधेरे, शोर और तबाही के उस पल में किसी का हाथ नहीं पकड़ सका। मैं कुछ नहीं कर सका। मैंने छत के साथ बनी एक स्लैब पकड़ ली। पानी, पत्थर शरीर से टकरा रहे थे। कुछ देर बाद बचाव दल के लोग पहुंचे। नेवी के जवानों ने मुझे मलबे से बाहर निकाला।’, उन्नीकृष्णन। ब्लैकबोर्ड में इस बार वायनाड लैंडस्लाइड में बच गए लोगों की स्याह कहानी, जिनकी आंखों के सामने उनका पूरा परिवार मलबे में समा गया; दो साल बाद भी वे सहमे रहते हैं, बच्चों और परिवार को भुलाने के लिए शराब का सहारा लेते हैं। 30 जुलाई 2024 की आधी रात, केरल के वायनाड में भूस्खलन यानि लैंडस्लाइड हुई। मेप्पाड़ी पंचायत के मुंडक्कई, चूरलमाला, अट्टामाला और पुंजिरिमट्टम मलबे में समा गए। उस वक्त लोग गहरी नींद में थे, उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि कुछ ही मिनटों में उनका घर, उनका परिवार और उनकी दुनिया खत्म हो जाएगी। दो साल बीत चुके हैं। सरकार ने वहां से लगभग 13 किलोमीटर दूर कल्पेट्टा में उनके लिए नई कॉलोनी बसाई है- पक्की दीवारें, सीमेंट की छतें, बिजली के बल्ब। लेकिन इन घरों में सन्नाटा बसता है। रात होते ही नींद गायब हो जाती है। जरा-सी बारिश की आवाज आती है, तो लोग बिस्तर पर उठकर बैठ जाते हैं- जैसे बारिश में पहाड़ फिर दरकने वाला हो। नई कॉलोनी की एक गली में 50 साल के उन्नीकृष्णन मिलते हैं। आंखें लाल हैं। आवाज धीमी। शराब की गंध साफ महसूस होती है। भूस्खलन ने उनके परिवार के 12 लोगों को निगल लिया था। वे सीधे कहते हैं, ‘मैं होश में नहीं रहना चाहता। जिस दिन नहीं पीता, सब कुछ सामने आ जाता है- पत्नी… माता-पिता… उनकी लाशें। अब आंख बंद करता हूं तो वही रात दिखती है। मेरे दो बेटे बच गए- एक नौकरी करता है, दूसरा पढ़ता है। लेकिन उस मलबे की तबाही अब भी मेरी आंखों में अटकी है। दो साल हो गए, मैं ठीक से सोया नहीं हूं। सरकार ने मनोचिकित्सकों को भेजा। कॉलोनी में काउंसलिंग कैंप लगे। लेकिन मैं नहीं गया- बात करने से क्या होगा? जो चला गया, वह लौटेगा क्या? आज भी बारिश की हल्की आवाज होती है तो वे चौंककर दरवाजे की तरफ देखता हूं।नई दीवारें हैं, नई छत है- लेकिन हमारे दिलो-दिमाग में वही टूटा हुआ घर बसता है। यहां उन्नीकृष्णन के बाद मेरी मुलाकात 42 वर्षीय सुबेर से होती है। वायनाड लैंडस्लाइड में उन्होंने अपने दो बेटों समेत 10 लोगों का परिवार खो दिया। बात करते हुए वे चेहरा दूसरी ओर घुमा लेते हैं। उनके हाथ अनायास कांपने लगते हैं। गहरे मानसिक ट्रॉमा में नजर आते हैं। हिंदी ठीक से नहीं आती, फिर भी टूटे शब्दों में अपनी कहानी सुनाते हैं। सुबेर कहते हैं, ‘उस रात वायनाड में बारिश कहर बनकर बरस रही थी। मैंने वैसी बारिश पहले कभी नहीं देखी थी। पांच दिन से लगातार हो रही थी, रुकने का नाम नहीं ले रही थी। बहुत चिंतित था। बार-बार पत्नी और बच्चों को फोन कर हाल-चाल पूछ रहा था। उस वक्त केरल के कुन्नूर में नौकरी कर रहा था। फोन पर मेरे बड़े बेटे सहल ने कहा- अब्बू, आप यूं ही डर रहे हैं। यहां ऐसी बारिश होती रहती है। आप चिंता मत कीजिए, आराम से सो जाइए। लेकिन पता नहीं क्यों, उस रात मुझे नींद नहीं आ रही थी। रात 1 बजकर 48 मिनट पर लैंडस्लाइड हुई। मलबे का सैलाब आया और मेरे परिवार समेत बाकी लोगों को बहा ले गया। कुछ देर बाद एक दोस्त का फोन आया। उसने बताया कि वायनाड में लैंडस्लाइड हुई है और मेरा हाल-चाल जानने के लिए फोन किया है। मैं घबरा गया। रात के करीब 2 बज रहे थे। मैंने तुरंत घर पर पत्नी को फोन लगाया। फोन नहीं उठा। उसके बाद एक-एक करके घर के बाकी लोगों फोन किया, लेकिन किसी ने फोन नहीं उठाया। तभी समझ गया कि शायद मेरी दुनिया लुट चुकी है। मैंने तुरंत बस पकड़ी। अगले दिन घर पहुंचा तो इलाके में भीड़ थी। बचाव कार्य चल रहा था। मेरा घर बह चुका था… और मेरा पूरा परिवार भी। मेरे दो बच्चे… मेरे पिता… बहनें… बहनोई और उनके बच्चे- सब चले गए। एक ही रात में।’ यह कहते हुए सुबेर का गला रुंध जाता है। आवाज भर्राने लगती है। सुबेर कुछ देर तक जमीन की ओर देखते रहते हैं। फिर जैसे भीतर जमा शब्द खुद बाहर आने लगते हैं। ‘दो साल हो गए… मैं ठीक से सो नहीं पाया। दिन-रात शराब पीता हूं। नशे में रहूं तो थोड़ी देर के लिए सब धुंधला हो जाता है। होश में रहूं तो बच्चों के चेहरे साफ दिखते हैं। उस रात सहल मुझे समझा रहा था- अब्बू, आप बेवजह डर रहे हैं और कुछ ही मिनटों बाद पहाड़ टूट पड़ा।’ यह कहते हुए वह कुछ पल के लिए चुप हो जाते हैं। फिर कहते हैं, ‘जब सहल की लाश मिली, तो पहचान भी नहीं हो रही थी। डीएनए टेस्ट से पता चला कि वह मेरा बेटा है। लेकिन रसल… मेरा 9 साल का रसल… वह आज तक नहीं मिला। 32 लोग लापता थे। उनमें मेरा बच्चा भी था। कोई मुझे मेरा रसल लौटा दे… कम से कम उसका चेहरा तो आखिरी बार देख लेता।’ यह कहते हुए वह दोनों हाथों से चेहरा ढक लेते हैं। फिर कहते हैं, ‘अब क्या बचा है? मेरी पत्नी की एक टांग चली गई। वह चल नहीं पातीं। हम सुबह उठते हैं… घर में बैठे रहते हैं… जैसे समय रुक गया हो। घर की दीवारों को देखते रहते हैं। मैं कल्पेट्टा में एक कपड़ों की दुकान पर काम करता हूं… जैसे-तैसे दिन कट जाता है। लेकिन रात आंखों में नाचती रहती है। शराब पीता हूं तो थोड़ी मन को राहत मिलती है। यह बताते हुए साफ नजर आ रहा था कि उनकी आंखें लाल हैं। शायद नशे में हैं या फिर कम सोए हैं। फिर कहते हैं- लोग कहते हैं डॉक्टर को दिखाओ, पर डॉक्टर क्या करेगा? मुझे मेरा बच्चा ला सकता है क्या? यह कहते हुए वे जेब से मोबाइल निकालते हैं। स्क्रीन पर दो बच्चों की तस्वीरें उभरती है। वह उंगली से तस्वीर छूते हैं, जैसे उन बच्चों के चेहरे को सहला रहे हों। दिखाते हैं- यह सहल और यह रसल है। मैं इनकी तस्वीरें साथ लेकर चलता हूं… कहीं भूल न जाऊं। कॉलोनी में ऐसे कई घर हैं, जहां लोग बच तो गए, लेकिन भीतर से टूट चुके हैं। जिंदगी चल रही है- पर जैसे बिना धड़कन के। सुबेर के बाद बालकृष्णन बताते हैं, ‘मैं यहीं पैदा हुआ और यहीं मेरी परवरिश हुई। जो इलाका आप सामने देख रहे हैं, वहीं उस रात पहाड़ टूटा था। पांच दिन तक लगातार बारिश होती रही। घने काले बादलों ने पूरे वायनाड को ढक रखा था। पहाड़ टूटा, तो लगा जैसे कोई बांध फट गया हो। पानी, कीचड़, मिट्टी, पत्थर- सब एक साथ, पूरी ताकत से नीचे आया। घर, दुकानें, पेड़… सब बह गए। कई सौ घर थे यहां। मिनटों में सब मलबा बन गए। लोग चीख रहे थे… और हम बस देखते रह गए। हाथ-पांव जैसे काम ही नहीं कर रहे थे। कुछ लोग उसी वक्त मर गए। हम कुछ नहीं कर पाए… बस खड़े रहे, बेबस। अब सोचता हूं मैं क्यों बच गया।’ बालकृष्णन आगे बताते हैं, ‘यह घटना रात करीब 1 बजे की है। मैं उसी वक्त वहां से भागा था। वापस लौटकर मलबे में से पहला शव मैंने ही निकाला था। वह एक महिला का शव था। मैंने एक साथ इतनी लाशें पहले कभी नहीं देखी थीं। पहाड़ से शव बहकर नीचे आ रहे थे। सड़क किनारे यूं पड़े थे, जैसे किसी ने सब कुछ फेंक दिया हो। मेरे तीन दोस्त भी वहां मदद के लिए आ गए थे। हम लोग बचाव कार्य में जुटे ही थे कि तभी एक और लैंडस्लाइड हो गई। दोस्तों के साथ हम फिर से भागे। पास के दूसरे पहाड़ पर चढ़ गए। लेकिन मेरा दोस्त ब्रजेश फंस गया। वह अपनी जीप लेकर मदद के लिए आया था। अचानक उसकी जीप मिट्टी में धंस गई और ब्रजेश भी उसी में दब गया। मेरी आंखों के सामने उसकी मौत हो गई। हम कुछ नहीं कर पाए। दूसरी लैंडस्लाइड के साथ फिर तेज पानी आया। उसके साथ भी शव बहते हुए आ रहे थे। कुछ को हमने खींचकर पास के छोटे पेड़ों से बांध दिया, वरना वे भी बह जाते।' वे कहते हैं, ‘मैंने यहां रहते हुए कई भूस्खलन देखे हैं, लेकिन ऐसा कभी नहीं देखा। जहां कभी चार सौ परिवार रहते थे, वहां अब कोई नहीं है। सब कुछ खाली हो गया है। लैंडस्लाइड से बचे लोगों को नया आशियाना जरूर मिल गया है, लेकिन इन घरों में अब भी रुदन और सन्नाटा बसता है। आंसू थमते नहीं। ------------------------------------------------------ 1- ब्लैकबोर्ड-घूंघट नहीं किया तो जेठ ने निर्वस्त्र करके पीटा:कम कपड़ों में होती तो दरवाजे पर चढ़कर झांकता था- पति और प्रेमी ने गर्भवती कर छोड़ा ‘पापा ने मेरी शादी के लिए दो एकड़ जमीन बेच दी थी। उस समय मैं 20 साल की थी। जून का महीना था जब मेरी शादी हुई और मैं ससुराल आई। सुहागरात के अगले दिन सुबह-सुबह मेरे जेठ और ननदोई मेरे कमरे में आए। उन्होंने पूछा- तुम्हारी पहली रात कैसी रही? कोई परेशानी तो नहीं हुई? पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- ब्लैकबोर्ड-5 करोड़ मुआवजा शानो-शौकत में उड़ाया:3 करोड़ की जमीन खरीदी, 1 करोड़ का मकान; 80-80 लाख की शादियां- अब रोज कमाने से घर चल रहा एक सच्ची कहानी- ग्रेटर नोएडा के किसान रामेश्वर सिंह की। 12 एकड़ जमीन सरकार ने ली और बदले में उन्हें सवा 5 करोड़ रुपए दिए। पैसा खाते में आते ही जिंदगी बदल गई। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें
4 मार्च 2026 की बड़ी खबरें और न्यूज अपडेट्स
पांच दिन से जारी ईरान युद्ध का असर अब धीरे धीरे पूरी दुनिया पर दिखना शुरू हो रहा है. विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर यह युद्ध लंबा चला तो दुनिया भर में सामान की किल्लत और महंगाई जैसी समस्याएं सामने लगेंगी
क्या ईरान युद्ध तेल की कीमतों को ले जाएगा 100 डॉलर प्रति बैरल के पार?
अमेरिका और इस्राएल के ईरान पर हमले और जवाबी कार्रवाई के बाद तेल बाजार में कीमतें बढ़ने की आशंकाएं फैली हैं. ईरान एक अहम तेल उत्पादक देश है
जेन-जी विद्रोह के बाद नेपाल में संसदीय चुनाव, मतदाताओं से निर्भय होकर मतदान करने की अपील
नेपाल में संसदीय चुनाव होने जा रहे हैं। इस बीच कार्यवाहक मुख्य निर्वाचन आयुक्त राम प्रसाद भंडारी ने देशभर के मतदाताओं से बिना किसी डर के अपने मताधिकार का प्रयोग करने की अपील की है।
मोजतबा खामेनेई पर अटकलों के बीच ईरानी सरकार का खंडन, इस्राइल की धमकी के बाद तेज हुई चर्चाएं
इस घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब इस्राइल के रक्षा मंत्री इस्राइल काट्ज ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर बयान देते हुए कहा कि ईरान जिस भी व्यक्ति को अगला सुप्रीम लीडर चुनेगा, उसे “निशाने पर लिया जाएगा।”
ब्रिटेन के बाद स्पेन ने एयर बेस इस्तेमाल से किया मना, ट्रंप ने व्यापारिक संबंध खत्म करने की दी धमकी
यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के तहत ईरान के खिलाफ हवाई और नौसैनिक कार्रवाई कर रहा है। इससे पहले ब्रिटेन द्वारा भी अपने एयरबेस के उपयोग को लेकर अनिच्छा जताने पर ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से ब्रिटिश प्रधानमंत्री की आलोचना की थी।
ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल बेड़े को नष्ट करना अमेरिका-इजरायल के लिए चुनौती
विशेषज्ञ 1991 के ‘डेजर्ट स्टॉर्म’ अभियान का हवाला देते हैं, जब अमेरिका ने इराक की ‘स्कड’ मिसाइलों को खोजने और नष्ट करने का प्रयास किया था। उस समय व्यापक हवाई बमबारी के बावजूद मोबाइल लांचरों और छिपे ठिकानों को पूरी तरह समाप्त करना संभव नहीं हो सका था।
पाकिस्तानी आतंकी संगठनों का समुद्री क्षमता पर फोकस, क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए बढ़ता खतरा: रिपोर्ट
पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा द्वारा एक समुद्री विंग के गठन को उसकी रणनीति में बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है, जो भारतीय उपमहाद्वीप की क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर समुद्री आतंकी खतरा पैदा कर सकता है। यह जानकारी अमेरिका स्थित थिंक टैंक मध्य पूर्व मीडिया अनुसंधान संस्थान (एमईएमआरआई) की एक रिपोर्ट में सामने आई है।
रंग-गुलाल, पिचकारी, गुजिया, ठंडई और फाग गीत… इन सबसे बनती है होली। कहां से आईं ये चीजें और होली का अटूट हिस्सा कैसे बनीं; भास्कर एक्सप्लेनर में जानिए पूरी कहानी… ***** ग्राफिक्स: दृगचंद्र भुर्जी ------ होली से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए… केमिकल वाले रंग बिगाड़ सकते हैं आपका त्योहार:डिटर्जेंट से नहीं छूटता कलर, चेहरे के लिए बेसन-दही वाला नुस्खा बेस्ट; बीपी-शुगर वाले संभलकर खेलें होली होलिका दहन के साथ ही पूरे देश में होली सेलिब्रेशन की शुरूआत हो जाएगी। इस दौरान अतिरिक्त उत्साह में कई दफा आप केमिकल रंगों का उपयोग करते हैं, ये खतरनाक है। होली तो खूब मजे से खेलते हैं, लेकिन रंग निकालने की हड़बड़ी में अपनी ही बॉडी पर कई तरह के प्रयोग करने लगते हैं। पूरी खबर पढ़िए…
नेपाल में 5 मार्च को होने वाला चुनाव सरकार बनाने की लड़ाई तो है ही, पुराने नेताओं और Gen Z के बीच पहला टकराव भी है। चुनावी शोर सड़कों से ज्यादा स्मार्टफोन की स्क्रीन पर है। वोट मांगने वाले पीएम मोदी और अमिताभ बच्चन के फर्जी वीडियो वायरल हैं। इनमें वे Gen Z के बीच पॉपुलर लीडर बालेन शाह को जीत की बधाई दे रहे हैं। अब तक नेपाल में ज्यादातर नेपाली कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियां ही सत्ता बांटती रही हैं। इस बार बालेन शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी रेस में नई एंट्री है। पार्टी का सीधा मुकाबला नेपाली कांग्रेस से है। नेपाल की संसद में 275 सीटे हैं। इनमें 165 पर सीधे चुनाव होते हैं। 110 सीटों पर पार्टी को मिले वोट के हिसाब से हिस्सेदारी मिलती है। सर्वे बता रहे हैं कि राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को चुनाव वाली 165 सीटों में से 80 से 90 सीटें मिल सकती हैं। सबसे पुरानी नेपाली कांग्रेस को 60 से 70 सीटें मिलने का अनुमान है। बहुमत किसी को मिलता नहीं दिख रहा। अगर राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी सबसे मजबूत बनकर उभरी, तो 35 साल के बालेन शाह प्रधानमंत्री बन सकते हैं। नेपाल में हवा का रुख किस तरफ है और यहां भारत कितना बड़ा मुद्दा है, पढ़िए ये रिपोर्ट… पहले आम लोगों की बात नए वोटर्स में बालेन शाह की बातें, PM देखने की ख्वाहिशनेपाल में इस बार बड़ी रैलियों की जगह सड़कों के किनारे सभाएं ज्यादा हो रही हैं। जमीन से ज्यादा माहौल सोशल मीडिया पर है। नए चेहरे बालेन शाह के नारे लग रहे हैं। पुराने नेताओं में नेपाली कांग्रेस के गगन थापा का नाम सुनाई देता है। प्रधानमंत्री रह चुके पुष्प कमल दहल प्रचंड और केपी शर्मा ओली जमीन पर कम नजर आ रहे हैं। 23 साल के नवराज पोद्देल काठमांडू में सिविल इंजीनियर की पढ़ाई कर रहे हैं। बालेन शाह के समर्थक हैं। नवराज कहते हैं, ‘Gen Z प्रोटेस्ट के दौरान हिंसा हुई, तो युवाओं को लगा कि उनकी आवाज को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। सिस्टम करप्ट हो चुका है, इसलिए लोग बदलाव चाहते हैं। 26 साल के विनोद जोशी भी बालेन शाह को सपोर्ट करते हैं। बैंक में नौकरी कर रहे विनोद कहते हैं कि बालेन से लोगों की उम्मीदें जुड़ी हैं। सब चाहते हैं कि इस बार युवा सरकार आए। पुरानी सरकारों से लोग निराश ही हुए हैं। वे आगे कहते हैं, गगन थापा भी अच्छे उम्मीदवार हैं, लेकिन उनके पुराने काम और पॉलिटिकल बैकग्राउंड से सभी लोग खुश नहीं हैं। उम्मीद है कि बालेन हमारे मुद्दे उठाएंगे और उस पर काम करेंगे। 24 साल की स्टूडेंट मोनिका भी बालेन शाह का समर्थन करती हैं। वे चाहती हैं कि देश में स्थिर सरकार बने क्योंकि 17 साल में 14 प्रधानमंत्री हो चुके हैं। वे कहती हैं, ‘यह चुनाव बदलाव के लिए ही हो रहा है। हमें बालेन शाह जैसा नया लीडर चाहिए।’ नेपाली कांग्रेस के गगन थापा भी मजबूत 52 साल के सोम सतपड़ा ब्रिटेन से वोट देने आए हैं। नेपाली कांग्रेस के लीडर गगन थापा के सपोर्टर हैं। वे कहते हैं कि इस बार चुनाव में विदेशों में रह रहे करीब 90 लाख से ज्यादा नेपाली भी दिलचस्पी ले रहे हैं। मिडिल ईस्ट में चल रही जंग के बीच लोग वोट डालने आए हैं। सोम नेपाली कांग्रेस में लीडरशिप बदलने से खुश हैं। वे कहते हैं कि आंदोलन के बाद नेपाल की राजनीति में बदलाव आया है, चाहे पार्टियों के भीतर हो या मतदाताओं के मन में। इससे उम्मीद बढ़ी है। सोम की तरह काठमांडू के रहने वाले अग्नि ढकाल भी गगन थापा को पसंद करते हैं। वे कहते हैं कि सही लीडरशिप आएगी, तो नेपाल में बदलाव हो सकता है। देश हल्लाबाजी से नहीं चलता, मजबूत और समझदार लीडरशिप चाहिए।’ वे बालेन शाह का नाम लिए बिना कहते हैं, ‘युवाओं के आंदोलन का फायदा लेने के लिए अब कई लोग आगे आ रहे हैं। कुछ पार्टियां तब आंदोलन का हिस्सा नहीं थीं, अब फायदा लेने की कोशिश कर रही हैं।’ गठबंधन सरकार के आसार, बालेन की पार्टी सबसे आगेनेपाल की हिंदी साप्ताहिक पत्रिका हिमालिनी के मैनेजिंग डायरेक्टर सच्चिदानंद मानते हैं कि इस बार भी देश में गठबंधन सरकार बनेगी। उनकी मुताबिक, चुनाव वाली 165 सीटों में से बालेन की पार्टी को 50 से 60 सीटें, नेपाली कांग्रेस को 40 से 50 और कम्युनिस्ट पार्टियां 15 से 30 सीटें मिल सकती हैं। मधेशी दलों को 6-7 सीटें मिल सकती हैं। वहीं सीनियर जर्नलिस्ट कृष्णा डंगाना भी बालेन शाह की पार्टी को सबसे मजबूत देख रहे हैं। जर्नलिस्ट लीलानाथ सीटों का अनुमान लगाने से बचने की सलाह देते हैं। वे कहते हैं कि सटीक अनुमान लगाना अभी मुश्किल है। हालांकि वे मानते हैं कि बालेन शाह की पार्टी बहुमत नहीं ला पाएगी, लेकिन 100 सीटों के आसपास जाकर ठहर सकती है। राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के नेता कुमार आनंद मिश्र बहुमत मिलने की उम्मीद जताते हैं। वे दावा करते हैं कि 100 से कम सीटें मिलने पर हम सरकार बनाने की कोशिश नहीं करेंगे, बल्कि विपक्ष में बैठेंगे। भारत और चीन के साथ रिश्तों पर आनंद कहते हैं कि सत्ता में आने पर हमारी पॉलिसी संतुलित रहेगी। नेपाल भाग्यशाली है कि उसके दोनों ओर बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं। भारत के साथ रोटी-बेटी के संबंध हैं। चीन के साथ भी दोस्ती है। हमने नेपाली कांग्रेस के सीनियर लीडर शेखर कोइराला और मित्रा बंधु से भी बात करने की कोशिश की, लेकिन संपर्क नहीं हो पाया। एक्सपर्ट बोले- Gen Z आंदोलन का असर, पुराने नेता पिछड़ेनेपाल के सीनियर जर्नलिस्ट युबराज घिमरे मानते हैं कि इस बार चुनाव में वोट प्रतिशत घट सकता है, क्योंकि लोगों को बहुत मजबूत विकल्प नहीं दिख रहा है। वे जिन चेहरों को कई साल से देखते आ रहे हैं, वही मैदान में हैं।’ बालेन पर युबराज कहते हैं, ‘बालेन शाह नए चेहरे जरूर हैं, लेकिन उनकी पार्टी खुद करप्शन के आरोपों से घिरी रही है। आंदोलन के मुद्दे चुनाव में नहीं उठे। आंदोलन का राजनीतिक इस्तेमाल किया गया। आंदोलन में 77 लोगों की मौत की जांच रिपोर्ट भी सार्वजनिक नहीं हुई। इसलिए लोगों को साफ विकल्प नहीं दिख रहा।’ सच्चिदानंद मिश्र मानते हैं कि बालेन शाह बाकी नेताओं से आगे हैं। वे कहते हैं कि Gen Z प्रोटेस्ट का चुनाव पर असर पड़ा है। इससे पुराने नेता पिछड़ रहे हैं, नए चेहरे आगे दिख रहे हैं। शहरों में बालेन और गांव में गगन थापा आगेसच्चिदानंद ने ग्राउंड पर सर्वे किया है। वे बताते हैं कि गांवों में पुराने दलों का असर अब भी है। शहरों और बाहर के इलाकों में बालेन की पार्टी के सिंबल घंटी की आवाज ज्यादा सुनाई दे रही है। साफ दिख रहा है कि युवा पीढ़ी नई पार्टियों के साथ है। पुराने लोग अब भी पुरानी पार्टियों को समर्थन दे रहे हैं। दूरदराज के इलाकों में भी युवा वोटर्स बालेन शाह के साथ दिख रहे हैं।’ सीनियर जर्नलिस्ट कृष्णा डंगाना कहते हैं- नेपाली कांग्रेस के पास देशभर में मजबूत नेटवर्क है। युवा लीडर के तौर पर गगन थापा सामने हैं। दूसरी तरफ बालेन शाह की पार्टी है, जिसके पक्ष में जबरदस्त लहर दिखाई दे रही है। इन्हीं दोनों पार्टियों के बीच मुकाबला है। जर्नलिस्ट लीलानाथ गौतम भी मानते हैं कि बालेन शाह को Gen Z आंदोलन का फायदा मिलेगा। हालांकि, नेपाली कांग्रेस की स्थिति भी ठीक है। उसमें लीडरशिप बदली है और गगन थापा को युवा नेतृत्व के तौर पर देखा जा रहा है। लीलानाथ कहते हैं, ‘अगर पुराना नेतृत्व ही रहता, तो शायद स्थिति अलग होती। पहले मुझे लगता था कि नेपाली कांग्रेस और राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के बीच मुकाबला होगा, लेकिन अब राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी आगे लग रही है।’ चुनाव में बदलाव और करप्शन मुद्दाचुनाव के मुद्दों पर सच्चिदानंंद कहते हैं कि बदलाव और करप्शन ही मुद्दा है। पुराने नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप रहे हैं। नई पार्टियां उसी को मुद्दा बना रही हैं। वे बताते हैं कि 2 फरवरी की शाम से प्रचार बंद हो गया। इसके बाद नेपाल में मौन अवधि शुरू हो जाती है। इस दौरान प्रचार बंद रहता है। इसे मजाक में मनी अवधि भी कहा जाता है। यानी जिसके पास संसाधन ज्यादा होंगे, इस दौरान वही असर डाल पाएगा। सच्चिदानंद कहते हैं, ‘नई पार्टियां सोशल मीडिया का बेहतर इस्तेमाल कर रही हैं। पुरानी पार्टियां पीछे हैं। भारत के PM मोदी और अमिताभ बच्चन के नाम से बालेन को बधाई देने वाले फेक वीडियो वायरल हैं। नेपाल कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियां पिछड़े सीनियर जर्नलिस्ट युबराज पुरानी पार्टियों के पिछड़ने की वजह उनकी खराब छवि को बताते हैं। वे कहते हैं कि पिछले 20 साल से नेपाली कांग्रेस, एमाले और माओवादी केंद्र बारी-बारी से सत्ता में रही हैं। उन पर भ्रष्टाचार और अस्थिरता की छवि चिपकी हुई है। प्रचंड की पार्टी की हालत कमजोर दिख रही है। वे अपनी मजबूत सीट की ओर लौटे हैं, जहां जीत तय है। फिर भी उनकी पार्टी का असर घट सकता है।’ वहीं सच्चिदानंद मिश्र मानते हैं कि नेपाली कांग्रेस दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन सकती है। वे कहते हैं कि पार्टी ने गगन थापा को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया है। थापा काठमांडू छोड़कर सरलाही से चुनाव लड़ रहे हैं। उन्होंने पहले जीती सीट छोड़ दी, जो ठीक नहीं था। बाकी दलों को लेकर सच्चिदानंद कहते हैं कि कम्युनिस्ट दलों के पिछड़ने की वजह सत्ता में रहते हुए किया पक्षपात है। उनकी सरकार में ईमानदार लोगों को जगह नहीं मिली। सच्चिदानंद के मुताबिक, राजशाही समर्थक दल संघर्ष कर रहे हैं। उनका असर सीमित है। हिंदू धर्म के नाम पर समर्थन मिलता दिख रहा है, लेकिन राजा के नाम पर सहानुभूति नहीं बन पा रही। भारत के खिलाफ बयान देने वाले नेता शांत सच्चिदानंद मानते हैं कि भारत को लेकर इस बार सभी पार्टियां सावधान हैं। भारत की स्थिति तटस्थ दिख रही है। किसी की भी सरकार बनेगी, उसे भारत से अच्छे संबंध रखने ही होंगे। भारत के खिलाफ बयान देते रहे बालेन शाह इस बार शांत हैं। वे जानते हैं कि तराई का वोट भारत से जुड़े रिश्तों से प्रभावित होता है।’ ‘चीन भी इस बार खुलकर दखल देता नहीं दिख रहा। वह चुपचाप सब देख रहा है। उसकी चिंता दलाई लामा समर्थकों को लेकर ज्यादा है। खुलकर कोई भी पार्टी दलाई लामा के समर्थन में सामने नहीं आएगी, लेकिन हर पार्टी में उनके समर्थक मौजूद हैं।’ …………………. नेपाल से ये ग्राउंड रिपोर्ट भी पढ़ें...1. सेक्स वर्क के लिए बदनाम थामेल की नाइट लाइफ ठप नेपाल की राजधानी काठमांडू का थामेल एरिया विदेशी टूरिस्ट्स की पहली पसंद है। सबसे मशहूर बार-पब यहीं हैं। नेपाल में 5 मार्च को चुनाव हैं। थामेल में भी इसका असर साफ दिखता है। यहां स्पा सेंटर के नाम पर जिस्मफरोशी का धंधा चलता है। चुनाव में सख्ती और पुलिस की गश्ती की वजह से बीते 10-12 दिन से सब बंद है। पुलिस की सख्ती की वजह से एजेंट भी रिस्क नहीं लेना चाहते। पढ़ें पूरी खबर… 2. चुनाव में कहां गायब हैं सरकार गिराने वाले Gen Z लीडर नेपाल में हुए Gen Z प्रोटेस्ट के बड़े चेहरों में से एक टंका धामी आने वाले चुनाव को लेकर उत्साहित हैं। वे मानते हैं कि प्रोटेस्ट ने चुनाव में पॉलिटिकल पार्टियों की प्राथमिकताएं बदल दी हैं। हालांकि एक और Gen Z लीडर तनुजा पांडे की राय इससे अलग है। वे कहती हैं, ‘सियासी दलों ने हमारे आंदोलन का जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल किया और फिर नजरअंदाज कर दिया।‘ पढ़ें पूरी खबर...
भारतीय उच्चायुक्त की बीएनपी सरकार से मुलाकात, भारत-बांग्लादेश संबंधों को मजबूत करने पर हुई चर्चा
बांग्लादेश में भारत के उच्चायुक्त प्रणय वर्मा ने मंगलवार को नव-निर्मित बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी सरकार के मंत्रियों के साथ बैठकें कीं। इस दौरान दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय सहयोग को बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा की गई।
अराघची ने कहा, “हमने अपने सशस्त्र बलों को पहले ही सामान्य निर्देश दे दिए हैं कि वे चुने गए लक्ष्यों के प्रति सतर्क रहें। हमारी सैन्य इकाइयां अब वास्तव में स्वतंत्र हैं और पहले से तय सामान्य दिशानिर्देशों के आधार पर कार्रवाई कर रही हैं।”
ईरान में अमेरिकी सैनिकों की तैनाती पर ट्रंप का बड़ा बयान
दुनिया में इस वक्त काफी तनावपूर्ण माहौल बना हुआ है। इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने विदेशों में युद्ध में उलझने के अपने पहले के रुख से अलग संकेत दिए हैं
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच दो बांग्लादेशी नागरिकों की मौत, सात घायल
मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच विभिन्न देशों में हुए मिसाइल और ड्रोन हमलों में कम से कम दो बांग्लादेशी नागरिकों की मौत हो गई, जबकि सात अन्य घायल हो गए हैं। बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने सोमवार को इसकी पुष्टि की।
अब हमला करने में सक्षम नहीं रहेगा ईरान, लीडरशिप को रास्ता बदलना होगा : इजरायली राजदूत
भारत में इजरायल के राजदूत रियुवेन अजार ने कहा कि इजरायल और संयुक्त राज्य अमेरिका मिलकर ईरान के आसमान पर नियंत्रण बनाए हुए हैं और 2,500 से अधिक सैन्य ठिकानों को निशाना बना रहे हैं
ट्रंप का 2026 ट्रेड एजेंडा: “अमेरिका वापस आ गया है”
व्हाइट हाउस ने सोमवार को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का 2026 का व्यापार नीति एजेंडा पेश किया
यूपी के मेरठ का मवाना खुर्द इलाका। 21 फरवरी को यहां फार्म हाउस के पास खेत में एक लड़की की लाश मिली। चेहरा जला हुआ था इसलिए पहचानना मुश्किल था। पांच दिन बाद ही 26 फरवरी को मेरठ पुलिस ने मर्डर केस का खुलासा किया और 4 आरोपियों को अरेस्ट कर लिया। पुलिस ने दावा किया कि 500 से ज्यादा CCTV कैमरों की जांच के बाद आरोपी पकड़े गए हैं। पुलिस ने डेडबॉडी दिल्ली की रहने वाली अर्चिता अरोड़ा की बताई। पीसी में कहा कि वो अक्सर मेरठ के एक होटल में आती थी। उस दिन नशे में होटल मालिक और उसके साथियों से उसकी कहासुनी हुई। अर्चिता ने रेप केस में फंसाने की धमकी दी, तो आरोपियों ने कंबल से मुंह दबाकर उसकी हत्या कर दी। फिर पहचान छिपाने के लिए तेजाब से चेहरा जलाकर लाश खेत में फेंक दी। पुलिस ने 5 दिन में ब्लाइंड मर्डर मिस्ट्री तो सुलझा दी, लेकिन एक सवाल फिर भी उलझा रहा। वो ये कि अर्चिता की फैमिली या ब्लड रिलेशन से कोई उसकी डेडबॉडी लेने क्यों नहीं आया। दैनिक भास्कर ने मेरठ के SSP, SP देहात, CO और SHO मवाना से ये सवाल किया तो जवाब मिला कि अभी इसका पता लगाया जा रहा है। लड़की की पहचान आधार कार्ड से की गई है। दैनिक भास्कर ने पड़ताल की, तो लड़की की पहचान ही बदल गई। आधार कार्ड पर नाम अर्चिता अरोड़ा, फोटो विदेशी लड़की कीतुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान की दो महिलाओं ने लाश को लेकर दो दावे किए। ये पुलिस के दावों से अलग थे। दोनों महिलाओं का कहना है कि 25 फरवरी को उन्होंने पुलिस को बता दिया था कि मरने वाली लड़की भारतीय नहीं, बल्कि तुर्कमेनिस्तान की रहने वाली मुहब्बत है। वो 15 साल पहले भारत आई थी। दलालों ने पासपोर्ट जब्त कर उसे सेक्स रैकेट में फंसा दिया। उसकी बॉडी पर बने टैटू छिपाने के लिए उसे जगह-जगह जलाया गया। इन दावों को लेकर सबसे पहले हमने मेरठ पुलिस से बात की। देहात SP अभिजीत कुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया था कि लड़की के आधार कार्ड पर नाम अर्चिता अरोड़ा दर्ज है। हालांकि पुलिस ने मीडिया के सामने आधार कार्ड नहीं दिखाया। हमने पुलिस में अपने सोर्स के जरिए आधार कार्ड की कॉपी देखी। उस पर नाम अर्चिता अरोड़ा और जन्मतिथि 27 अप्रैल 1984 है। पता दिल्ली के कोटला मुबारकपुर का है। आधार कार्ड पर लगी फोटो भारतीय नहीं, बल्कि विदेशी लड़की की है। इस पर हमारा शक गहराया। इसका पता लगाने के लिए हमने मेरठ पुलिस के जांच अधिकारियों से संपर्क किया। पता चला कि 26 फरवरी की शाम एक विदेशी महिला आई थी। उसने भी यही दावा किया कि जिस लड़की की लाश मिली है, वो तुर्कमेनिस्तान की रहने वाली थी। हालांकि पुलिस ने हमें थाने में आई उस महिला की डिटेल नहीं दी। तुर्कमेनिस्तान में मां ने ईयरिंग-ब्लैकटॉप से बेटी को पहचानाकाफी खोजबीन के बाद हमें 28 फरवरी को थाने में आई महिला की डिटेल मिली। नाम अजीजा बताया गया। वो उज्बेकिस्तान की रहने वाली हैं। हमने उनसे पूछा कि मेरठ में मिली लड़की की डेडबॉडी के बारे में आपको कैसे पता चला, आपने पुलिस को क्या बताया था? इस पर अजीजा ने बताया, ‘हमारे पास चंडीगढ़ में रहने वाली एलीना का फोन आया था। 25 फरवरी की शाम मेरठ पुलिस ने उसे फोन किया और लड़की (मुहब्बत) की लाश की फोटो भी भेजी थी। उसकी कॉल डिटेल में आखिरी नंबर एलीना का ही था। वो मुहब्बत की परिचित थी।‘ ‘एलीना ने लड़की (मुहब्बत) की मां नाहमदिनोवा गुलनारा को उसकी तस्वीर भेजी। तस्वीर में लड़की ने ब्लैक टॉप पहन रखा था। चेहरा जला हुआ था इसलिए पहचानना मुश्किल था। हालांकि ईयर रिंग से मां ने उसे पहचान लिया।’ मां बोली- पुलिस भले DNA टेस्ट करा ले, लेकिन अस्थियां दे देगुलनारा तुर्कमेनिस्तान में रह रही हैं। दैनिक भास्कर ने अजीजा के जरिए उनसे वीडियो कॉल पर बात की। हमने पूछा कि आधार कार्ड में इस लड़की का नाम अर्चिता अरोड़ा लिखा है। आप फिर कैसे इसे मुहब्बत बता रही हैं? इस पर वो कहती हैं, ‘ये मेरी बेटी मुहब्बत ही है। उसकी पैदाइश 25 नवंबर 1985 की है। वो करीब 15 साल पहले नौकरी के लिए इंडिया गई थी। तब से वहीं है। आधार कार्ड पर गलत नाम लिखा है। उसका पासपोर्ट कुछ लोगों ने जब्त कर लिया है।’ हमने पूछा कि आपने डेडबॉडी की फोटो देखकर कैसे पहचाना कि वो आपकी बेटी ही है। गुलनारा कहती हैं, ’उसके कपड़ों और ईयर रिंग से पहचाना। पुलिस को उसके पास से जो आधार कार्ड मिला है, उस पर मेरी बेटी की असली फोटो है। मरने वाली मेरी बेटी मुहब्बत ही है।’ ’अगर पुलिस के पास DNA सैंपल है, तो मेरी जांच करा सकते हैं। हालांकि हमें बताया गया कि पुलिस ने खबर दिए बगैर उसकी लाश जला दी। ये गलत है। मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि खुद भारत आ सकूं।’ ’हमने अजीजा के जरिए तुर्कमेनिस्तान एंबेंसी को लेटर भेजा है, ताकि हमारी गैरमौजूदगी में अजीजा ही पुलिस से संपर्क करे। कम से कम अब हमारी बेटी की अस्थियों की राख ही हमें सौंप दी जाए, ताकि हम अपने रीति रिवाज से उसे विदाई दे सकें।’ पुलिस असलियत जानती थी, करीबी का दावा- 16 फरवरी से फोन बंद था अब सवाल ये है कि पुलिस ने जब 26 फरवरी को प्रेस कॉन्फ्रेंस की, तो क्या वो नहीं जानती थी कि मरने वाली अर्चिता अरोड़ा नहीं बल्कि मुहब्बत है। दैनिक भास्कर ने इसकी भी पड़ताल की। 26 फरवरी को मेरठ देहात SP अभिजीत कुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। मीडिया को ऑफिशियल प्रेस नोट भी भेजा था। मेरठ पुलिस की प्रेस नोट में साफ लिखा है कि मरने वाली लड़की अर्चिता अरोड़ा थी। उसकी हत्या के आरोप में 4 लोग गिरफ्तार किए गए हैं। आरोपियों के नाम अरविंद उर्फ मोनू, संदीप उर्फ राहुल, चंचल उर्फ बंटी और विवेक उर्फ काका हैं। पुलिस ने प्रेस नोट और प्रेस कॉन्फ्रेंस दोनों में एक ही दावा किया। पुलिस के मुताबिक, अर्चिता पहले पंजाब के अंबाला में रहती थी। फिर दिल्ली आ गई थी। उसके आधार कार्ड से इसकी पुष्टि हुई है। अब सवाल उठता है कि क्या पुलिस को अर्चिता अरोड़ा की असली पहचान के बारे में नहीं पता था। हमारी पड़ताल में पता चला है कि चंडीगढ़ में रहने वाली एलीना के पास 25 फरवरी की रात 8 बजे के आसपास ही मेरठ पुलिस के सब इंस्पेक्टर सुमित तोमर का फोन आया था। ये फोन 7460984*** नंबर से आया था। जांच टीम में सुमित तोमर भी शामिल हैं। हमने अजीजा के जरिए एलीना से भी बात की। वे बताती हैं, ‘पुलिस का फोन आया था कि कुछ दिन पहले एक लड़की की लाश मिली थी। चेहरा जला था। एक आधार कार्ड मिला है। उस पर अर्चिता अरोड़ा का नाम है। लड़की के फोन की कॉल डिटेल से आपका नंबर मिला। क्या आपकी पहचान वाली कोई लड़की गायब है।‘ ‘मैंने बताया कि हां, एक लड़की 12 फरवरी को मेरठ गई थी। 16 फरवरी को उससे आखिरी बार बात हुई थी। तब से उसका फोन बंद है, लेकिन उसका असली नाम अर्चिता अरोड़ा नहीं है। वो पहले अंबाला में थी। फिर दिल्ली चली गई थी। फिर पुलिसवाले ने एक लाश की फोटो भेजी। चेहरा झुलसा हुआ। कपड़ों से हमने पहचान लिया कि ये मुहब्बत ही है, लेकिन पुलिस को यकीन नहीं हुआ।‘ ‘लिहाजा हमने दिल्ली में रहने वाले अजीजा को 26 फरवरी को ही पुलिस के पास भेज दिया था। उन्होंने भी पुलिस को मुहब्बत के बारे में बताया, लेकिन पुलिस सच छिपा रही है।‘ हमारे पूछने पर एलीना ने सब इंस्पेक्टर की इनकमिंग और आउटगोइंग का पूरा रिकॉर्ड भी भेजा। चैट में राहुल ने लिखा था मुहब्बत आ गई, फिर पुलिस अनजान कैसे मरने वाली लड़की तुर्कमेनिस्तान की मुहब्बत ही है। इसे लेकर हमें एक और सबूत मिला है। मेरठ पुलिस ने जिन 4 लोगों को अरेस्ट किया है। उनमें से राहुल और मोनू दोनों सीधे विदेशी लड़कियों के संपर्क में रहते थे। वही लड़कियों को होटल बुलाते थे। राहुल का मैनेजर मोनू है। राहुल ही चैट कर विदेशी लड़कियों को बुलाता था। इसके बाद की जिम्मेदारी मोनू की थी। दैनिक भास्कर को राहुल की एक चैट मिली है। ये 7 फरवरी के आसपास की है। इसमें एक शख्स राहुल से पूछा- काम कैसा है। राहुल ने जवाब दिया- अभी रशियन स्टाफ है। फिर शख्स ने पूछा- मुहब्बत आ गई है। राहुल ने जवाब दिया- हां जी। फिर दोनों में वॉइस नोट भेजकर बात होती है। एक और चैट से पता चलता है कि गिरफ्तार राहुल और मोनू को मुहब्बत के बारे में जानकारी थी। पुलिस ने इनसे पूछताछ भी की, लेकिन कोई जानकारी नहीं दी। हालांकि हमने जैसे ही ये सवाल केस की जांच से जुड़े एक सीनियर अधिकारी से पूछा, तो वो जवाब देने में टालमटोल करने लगे। फिर थोड़ी ही देर बाद उस अधिकारी ने अजीजा को कॉल किया। वे पूछने लगे कि मुहब्बत नाम की लड़की से जुड़ी डिटेल हमें भी भेजिए। ऐसा इसलिए हुआ कि 26 फरवरी को अजीजा मेरठ पुलिस से मिली थी, लेकिन पुलिस ने उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया था। पासपोर्ट और आधार में एक फोटो, टैटू तेजाब से जलाए तुर्केमेनिस्तान से मुहब्बत की मां ने हमें उसकी कई फोटो भेजी हैं। इन्हें देखकर पता चलता है कि मुहब्बत के दाहिने हाथ और कमर पर टैटू बना था। फोटो आधार कार्ड वाली ही है, लेकिन नाम और पता गलत लिखा है। 21 फरवरी को लड़की की लाश मिली थी, तब उसका चेहरा जला हुआ था। उसके हाथ और कमर पर भी जगह-जगह तेजाब से जलाया गया था। यानी साफ है कि लड़की के पहचान के निशान खत्म करने की कोशिश की गई। पुलिस ने इस पर आरोपियों से सवाल नहीं पूछा। हमने एसपी देहात अभिजीत कुमार से पूछा कि जिस होटल में लड़की आई थी, उसके CCTV फुटेज से पहचान हो सकती है। उन्होंने बताया कि CCTV फुटेज हटा दिए गए हैं। उसकी रिकवरी की कोशिश कर रहे हैं। एक्सपर्ट बोले- आधार कार्ड नागरिकता का सबूत नहींक्या तुर्कमेनिस्तान की मुहब्बत ने फर्जी आधार कार्ड बनवाया था या फिर परिवार और जानने वालों का ये दावा ही है। इसे समझने के लिए हमने ह्यूमन ट्रैफिकिंग के जाल से विदेशी लड़कियों को रेस्क्यू कराने वाले NGO से जुड़े हेमंत शर्मा से बात की। वे कहते हैं, ‘ज्यादातर विदेशी लड़कियों के पास भारत की फेक आईडी मिलती हैं। कई बार वे मर्जी से आधार कार्ड बनवाती हैं, कई बार एजेंट बनवाते हैं। इन्हें सेक्स रैकेट के लिए तस्करी कर लाया जाता है। होटलों और क्लब में भेजने पर उन्हें भारतीय पहचान पत्र की जरूरत पड़ती है।‘ हेमंत आगे कहते हैं, ‘तुर्कमेनिस्तान में एक महिला ने अब दावा किया है कि मरने वाली लड़की मेरी बेटी थी। उन्होंने पासपोर्ट भी दिखाया है। आधार कार्ड हमारे देश में सिर्फ पहचान पत्र है। नागरिकता का आधार नहीं है। ये बात सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है। इसलिए पुलिस का सिर्फ आधार कार्ड पर लिखे नाम और पते देखकर चुप्पी साध लेना गलत है। उन्हें जैसे ही विदेशी लड़की होने की जानकारी मिली तब तुरंत जांच करने की जरूरत थी।‘ इस पर मेरठ देहात के एसपी अभिजीत कुमार का कहना है कि डॉक्यूमेंट और आरोपियों के बयान के आधार पर जांच की गई है। आने वाले दिनों में कोई और सबूत मिलते हैं, तो उसे भी जांच में शामिल किया जाएगा। ………………….ये खबर भी पढ़ें… घाटी में कौन बना रहा कश्मीरी पंडितों की ‘डेथ लिस्ट’ कश्मीर में पहलगाम के पास मट्टन में कश्मीरी पंडितों की बस्ती है। आबादी करीब 300 की है। यहां की गलियों में दिन के 4 बजते ही सन्नाटा पसर जाता है। मट्टन में रहने वाले रमेश कौल (बदला हुआ नाम) अब अनजान नंबरों से आने वाले फोन नहीं उठाते। वजह पूछने पर बताते हैं, ‘कश्मीरी पंडितों को जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं। पढ़िए पूरी खबर…
नेपाल की राजधानी काठमांडू का थामेल एरिया विदेशी टूरिस्ट्स की पहली पसंद है। सबसे मशहूर बार-पब यहीं हैं। पार्टी करने के शौकीन थामेल ही आते हैं। शाम के वक्त ये जगह जगमगाती लाइटों से गुलजार रहती है। यहां स्पा सेंटर के नाम पर जिस्मफरोशी का धंधा चलता है। लोग बताते हैं कि बीते कुछ साल में ये तेजी से बढ़ा है। बार-पब से निकलने वाले टूरिस्ट के आसपास सेक्स वर्कर्स और एजेंट्स घूमते दिख जाते हैं। नेपाल में 5 मार्च को चुनाव हैं। थामेल में भी इसका असर साफ दिखता है। सड़कों पर बाइक रैलियां निकल रही हैं। अलग-अलग पार्टियों के लोग नारेबाजी करते गुजरते हैं। नारे गूंज रहे हैं- अबकी बार बालेन सरकार। सड़कों पर पार्टियों के बैनर-पोस्टर से सजीं गाड़ियां दौड़ रही हैं। चुनाव ड्यूटी में लगे पुलिस के जवान गश्त कर रहे हैं। चुनाव की वजह से ज्यादातर दुकानें बंद हैं, इसीलिए भीड़ भी कम है। चुनाव की कवरेज के दौरान हम थामेल पहुंचे। यहां पब और रेस्टोरेंट वालों, व्यापारियों और रिटेल शॉप चलाने वालों से चुनाव, उनके मुद्दों और सरकार बदलने वाले Gen Z प्रोटेस्ट पर बात की। चुनाव में पुलिस गश्त बढ़ी, एजेंट गायब, 10-12 दिन से धंधा बंदथामेल नेपाल का सबसे बड़ा मार्केट और काठमांडू का सबसे महंगा एरिया है। यहां छोटी दुकानों का किराया 70-80 हजार से 3 लाख रुपए तक है। यहां नाइट लाइफ, बड़े होटल, बजट होटल, रेस्टोरेंट सब हैं। इसीलिए नेपाल आने वाले टूरिस्ट यहां जरूर आते हैं। टूरिज्म का अच्छा सीजन मार्च, अप्रैल, मई में होता है। फिर सितंबर, अक्टूबर, नवंबर में ट्रैकिंग के लिए बढ़िया वक्त है। ऑफ-सीजन में भी यहां काफी लोग आते हैं। इस इलाके में काफी स्पा सेंटर हैं। लोग बताते हैं कि थामेल में पिछले कुछ साल से स्पा सेंटर के नाम पर सेक्स वर्क चल रहा है। रात के 10 बजते ही मार्केट बंद होने लगता है और सड़कों पर एजेंट घूमने लगते हैं। हमने यहां के व्यापारियों से सेक्स वर्क पर बात की, तो कैमरे पर कुछ भी कहने से बचते रहे। हालांकि कैमरा बंद करते ही मानते हैं कि रात में यहां सेक्स वर्क होता है। बिहार से आए मोहम्मद वसीम अकरम 2017 से थामेल में रह रहे हैं। उनका नेपाली हैंडमेड आइटम एक्सपोर्ट का बिजनेस है। वसीम भी इस पर खुलकर बात नहीं करते। वे कहते हैं कि रात में सेक्स वर्क जैसी चीजों के बारे में मुझे पता नहीं है। मैं 9-10 बजे तक दुकान बंद कर देता हूं। क्लब खुले रहते हैं, लोग जाते हैं, लेकिन वहां क्या होता है, मैं नहीं जानता। एक कारोबारी अग्नि ढकाल मानते हैं कि हर अच्छी जगह कुछ खराब चीजें होती हैं। वे कहते हैं, ‘कानूनी और गैरकानूनी दोनों तरह की बातें कहीं भी हो सकती हैं। सिर्फ थामेल को गलत ठहराना सही नहीं है। कुछ लोग बातें बढ़ा-चढ़ाकर कहते हैं, लेकिन मैं इसे पूरी तरह गलत नहीं कह सकता और न ही पूरी तरह सही।’ एक व्यापारी ऑफ रिकॉर्ड बताते हैं कि सेक्स वर्क होता जरूर है, लेकिन चुनाव में सख्ती और पुलिस की गश्ती की वजह से बीते 10-12 दिन से सब बंद है। वे कहते हैं, ‘लड़कियां चुनाव में घर गई हैं। पुलिस की सख्ती की वजह से एजेंट भी रिस्क नहीं लेना चाहते। इसीलिए सब बंद है। चुनाव बाद फिर शुरू हो जाएगा।’ थामेल में पूर्व मेयर बालेन शाह का अच्छा समर्थनकाठमांडू में 2 मार्च को होली मनाई गई। थामेल में भी टूरिस्ट, व्यापारी और आम लोग होली के रंगों में रंगे थे। होली खेल रहे नौजवानों का एक ग्रुप राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के मुखिया बालेन शाह के समर्थन में नारे लगा रहा था- अबकी बार बालेन सरकार। उन्हें देखकर कुछ दुकानदार समर्थन में तालियां बजाने लगे। काठमांडू के मेयर रह चुके बालेन शाह का थामेल में अच्छा समर्थन दिखाई पड़ता है। हालांकि नेताओं का नाम लेकर बात करने पर लोग बचते हैं। इशारों में मन की बात जरूर कह जाते हैं। नेपाल में Gen Z प्रोटेस्ट के बाद से लोग राजनीति पर खुलकर बात नहीं करते। नेपाल में बीते साल 8-9 सितंबर को Gen Z प्रोटेस्ट हुआ था। इसके बाद प्रधानमंत्री केपी ओली और उनके मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा। तभी से सुशीला कार्की देश की अंतरिम प्रधानमंत्री हैं। लोग बोले- Gen Z की सरकार आने वाली है 50 साल के शंकर खनाल पत्नी और बेटे के साथ 31 साल से थामेल में हैंडीक्राफ्ट का बिजनेस कर रहे हैं। उनकी बातों में नई पीढ़ी के लिए उम्मीद और पुराने सिस्टम के लिए गुस्सा साफ दिखता है। वे कहते हैं कि Gen Z प्रोटेस्ट के बाद कारोबार में बहुत सुधार नहीं दिखा, लेकिन करप्शन, हेल्थ और एजुकेशन पर युवाओं की मांगें ठीक हैं। शंकर Gen Z प्रोटेस्ट का चेहरा बने बालेन शाह का नाम नहीं लेते, लेकिन मानते हैं कि नेपाल में अब Gen Z की सरकार आने वाली है। वे कहते हैं- उम्मीद है कि चुनाव के बाद चीजें बदलेंगी। अगर नई सरकार युवाओं की मांगों को समझकर काम करेगी, भ्रष्टाचार रोकेगी, शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार करेगी, तो सब ठीक हो सकता है। ‘पुराने लोग हटें, सरकार में नए लोग आएं’24 साल के कविराज थामेल में रिटेल शॉप चलाते हैं। वे कहते हैं कि अभी बिजनेस ठीक नहीं है। इलेक्शन की वजह से बहुत लोग गांव चले गए हैं। कविराज बताते हैं कि प्रोटेस्ट की वजह से टूरिज्म पर असर पड़ा था। वे कहते हैं, ‘प्रोटेस्ट के बाद टूरिस्ट आधे रह गए थे। अभी होली है, लेकिन पहले जैसी भीड़ नहीं है। पहले यहां पैर रखने की जगह नहीं होती थी। कॉन्सर्ट होते थे। अब वैसा माहौल नहीं है।’ बालेन शाह पर भी राय बंटी, लोग बोले- हल्ला मचाने से देश नहीं चलताऐसा नहीं है कि थामेल के मार्केट में सिर्फ बालेन शाह के सपोर्टर हैं। ऐसे भी लोग हैं, जो मानते हैं कि सिस्टम बदलने की जरूरत है, लेकिन स्थिरता न हो, तो सभी का नुकसान है। 30 साल से थामेल में दुकान चला रहे अग्नि ढकाल चुनाव में पॉलिटिकल स्टेबिलिटी को जरूरी मानते हैं। वे कहते हैं कि पॉलिटिकल करप्शन को रोकना होगा। अगर करप्शन बंद नहीं होगा, तो कोई भी पार्टी आ जाए, खास फर्क नहीं पड़ेगा। अग्नि बिना नाम लिए बालेन शाह से असहमति जताते हैं। वे कहते हैं, ‘युवाओं के आंदोलन का फायदा लेने के लिए अब कई लोग आगे आ रहे हैं। कुछ पार्टियां उस समय आंदोलन का हिस्सा नहीं थीं, लेकिन अब फायदा लेने की कोशिश कर रही हैं। लोग कई बार झूठी बातें करते हैं।’ टूरिज्म का सीजन, लेकिन इजराइल-ईरान युद्ध का असरशॉल बनाने वाली फैक्ट्री के मालिक बोयेसरा सिटोला भी मानते हैं कि अभी बिजनेस अच्छा नहीं चल रहा। वे कहते हैं कि चुनाव का माहौल है। इजराइल-ईरान-अमेरिका के बीच युद्ध चल रहा है। इसका असर भी पड़ा है। इस समय सीजन होता है और टूरिस्ट आने चाहिए, लेकिन टूरिस्ट कम हो गए हैं। बोयेसरा कहते हैं, ‘प्रोटेस्ट की शुरुआत में बिजनेस बहुत कमजोर था। बाद में हालात थोड़े ठीक हुए। काम बेहतर चलने लगा। अभी काम कम है, लेकिन चुनाव के बाद बिजनेस ठीक होने की उम्मीद है। यहां के लोग शांति चाहते हैं। अगर देश में शांति और राजनीतिक स्थिरता होगी, तो टूरिस्ट बढ़ेंगे और बिजनेस अच्छा होगा। नई पीढ़ी और सरकार से उम्मीद है कि देश में शांति लाएंगे और करप्शन कम करेंगे।’ लोकेंद्र बहादुर 26 साल से आर्ट का बिजनेस करते हैं। वे युवाओं के आंदोलन से खुश हैं। कहते हैं कि युवा आगे आएंगे और करप्शन नहीं होगा तो अच्छा रहेगा। दुनिया देख रही है कि नई पीढ़ी सामने आई है। लगता है कि चुनाव के बाद स्थिति बेहतर होगी। पढ़े-लिखे लोग आएंगे तो अच्छे नीति-नियम बनाएंगे। अच्छे नियम होंगे तो बिजनेस भी अपने-आप सुधरेगा। चुनाव पर टूरिज्म और होटल वाले क्या बोलेकुमार गौतम 16 साल से थामेल में हॉस्टल और ट्रैकिंग कंपनी चलाते हैं। वे बताते हैं कि पिछले कुछ साल में बिजनेस में उतार-चढ़ाव रहा है। प्रोटेस्ट के वक्त हालत बहुत खराब थी। अब बेहतर है। चुनाव के बाद जो भी पार्टी आए, टूरिज्म के लिए काम करे। कुमार आगे कहते हैं, ‘नेपाल की सबसे बड़ी ताकत टूरिज्म है। यहां हिमालय है, राफ्टिंग है, बहुत सारी एडवेंचर एक्टिविटीज हैं। हिंदुओं के लिए सबसे बड़ा मंदिर पशुपतिनाथ है। बुद्ध का जन्मस्थान भी यहीं है। अगर सरकार इन रिसोर्सेज की अच्छी मार्केटिंग करे, तो और ज्यादा टूरिस्ट आएंगे। लोग नई पार्टी के लिए सोच रहे हैं। बहुत साल से पुरानी पार्टियां मिलकर काम कर रही हैं। अगर पढ़े-लिखे नए लोग राजनीति में आएंगे, तो कुछ अच्छा बदलाव जरूर होगा।’ ……………………..नेपाल से ये ग्राउंड रिपोर्ट भी पढ़ें चुनाव में कहां गायब हैं सरकार गिराने वाले GenZ लीडर नेपाल में हुए Gen Z प्रोटेस्ट के बड़े चेहरों में से एक टंका धामी आने वाले चुनाव को लेकर उत्साहित हैं। वे मानते हैं कि प्रोटेस्ट ने चुनाव में पॉलिटिकल पार्टियों की प्राथमिकताएं बदल दी हैं। हालांकि एक और Gen Z लीडर तनुजा पांडे की राय इससे अलग है। वे कहती हैं, ‘सियासी दलों ने हमारे आंदोलन का जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल किया और फिर नजरअंदाज कर दिया।‘ पढ़ें पूरी खबर...
जून 2025 में 12 दिन की जंग के दौरान ट्रम्प ने कहा था- ‘हमें पता है खामेनेई कहां हैं, लेकिन अभी नहीं मारेंगे।’ 22 जून को सीजफायर हो गया। आठ महीने बाद 28 फरवरी 2026 को वही खामेनेई एक सटीक हवाई हमले में मारे गए। जबकि इस दौरान दोनो देश डील पर लगातार बातचीत कर रहे थे। अमेरिकी हमले के कौन से संकेत मिल रहे, फिर भी सुप्रीम लीडर को क्यों नहीं बचा सका ईरान; अमेरिकी धोखे की कहानी जानेंगे भास्कर एक्सप्लेनर में… सवाल-1: खामेनेई पर हमले के कौन से संकेत मिल रहे थे? जवाब: न्यूक्लियर डील पर बातचीत के बीच जनवरी 2025 से ही अमेरिका ने ईरान को घेरना शुरू कर दिया था। फरवरी में दूसरे हफ्ते से अमेरिकी कैरियर USS जेराल्ड फोर्ड और USS अब्राहम लिंकन भी पहुंच चुके थे। मिडिल ईस्ट में 2003 में इराक पर हमले के बाद से ये अमेरिका की सबसे बड़ी सैन्य तैनाती थी। 17 फरवरी को अमेरिका और ईरान के बीच डील पर जेनेवा में दूसरे दौर की बातचीत असफल हो गई। इसके बाद अमेरिका ने अपने करीब 150 फाइटर जेट्स, फ्यूल टैंकर विमान आदि तैनात करने शुरू कर दिए। 24 फरवरी को इजराइल के बेन गुरियन हवाई अड्डे और इजराइल के ओवदा एयरबेस पर 12 F-22 तैनात किए गए। ईरान अब तक डिफेंसिव ही था। ईरान ने UNSC को लिखे पत्र में कहा कि वह तनाव या युद्ध नहीं चाहता और पहले हमला नहीं करेगा। इस बीच 3 बड़े संकेत मिले कि खामेनेई पर हमला हो सकता है… संकेत 1: ट्रम्प की खुली धमकी- ईरान की सत्ता बदलेंगे संकेत 2: मीडिया रिपोर्ट्स में सुप्रीम लीडर पर अटैक का जिक्र संकेत 3: खामेनेई ने खुद कहा- हत्या की कोशिश के लिए तैयार रहें सवाल 2: अमेरिका-इजराइल ने ईरान को कैसे चकमा दिया? जवाब: CNN की रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू ने 11 फरवरी को ट्रम्प से साथ मीटिंग की। उन्हें लग रहा था कि न्यूक्लियर डील पर बातचीत से कोई फायदा नहीं होगा, इसलिए वे ईरान पर हमला करना चाहते थे। तब ट्रम्प ने बातचीत जारी रखने पर जोर दिया। इसके बाद 17 फरवरी और फिर 26 फरवरी को जेनेवा में ट्रम्प के दूत स्टीव विटकॉफ और दामाद जेरेड कुशनर ने न्यूक्लियर डील पर ईरानी टीम से तीसरे दौर की बातचीत की। ईरानी विदेश मंत्री अराघची ने कहा, ‘समझौते तक पहुंचने का रास्ता शुरू हो चुका है। दोनों पक्ष सहमत हैं।’ मध्यस्थता कर रहे ओमान के विदेश मंत्री बदर अलबुसैदी ने भी कहा कि समझौते पर सहमति बनने में अब कोई रोड़ा नहीं है। डील के तकनीकी पहलुओं पर अगले हफ्ते जेनेवा में दोबारा बातचीत होनी थी। यहूदी धर्म में शुक्रवार शब्बात का दिन होता है। यानी छुट्टी लेकर परिवार के साथ आराम और ईश्वर की प्रार्थना का दिन। खामेनेई की हत्या के बाद 1 मार्च को छपी टाइम्स ऑफ इजराइल की एक खबर के मुताबिक, 27 फरवरी को शुक्रवार की शाम इजराइली सैन्य ऑफिसर ने छुट्टी ली। कोई बड़ा मिलिट्री एक्शन होने वाला हो, तो ऑफिसर्स मिलिट्री हेडक्वार्टर में मौजूद रहते हैं। लेकिन 27 की शाम IDF के चीफ ऑफ स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल इयाल जमीर और बाकी सीनियर ऑफिसर्स शब्बात को अपने घर चले गए और परिवार के साथ डिनर किया। ऐसा इसलिए किया गया ताकि ईरानी स्पाई नेटवर्क को सब कुछ सामान्य लगे और शक न हो कि कोई बड़ा ऑपरेशन होने वाला है। इसके अलावा अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA ने ऐन मौके पर ऐसा इनपुट दिया कि हमले की टाइमिंग रात के बजाय दिन में तय दी गई, जबकि दिन में खामेनेई खुद को सेफ महसूस कर रहे थे। सवाल-3: CIA के इनपुट के बाद खामेनेई पर हमले की टाइमिंग कैसे बदली? जवाब: NYT ने इस ऑपरेशन से जुड़े सोर्सेज के हवाले से 1 मार्च को खामेनेई की हत्या के बाद एक रिपोर्ट जारी की। इसमें कहा गया कि अमेरिकी एजेंसी CIA महीनों से खामेनेई पर गुपचुप नजर रख रही थी। वह खामेनेई की एक्टिविटी और उनके ठिकाने के बारे में जानकारी जुटा रही थी। जून 2025 में ईरान-इजराइल के बीच 12 दिन तक चली जंग के दौरान CIA का नेटवर्क मजबूत हो गया था। उसे इसकी भी सटीक जानकारी मिल रही थी कि खामेनेई कहां रहते हैं, किससे मिलते हैं, कैसे बातचीत करते हैं और खतरे के हालात में वे कहां छिप सकते हैं। आम तौर पर खामेनेई ईरान की राजधानी तेहरान में एक हाई सिक्योरिटी कैंपस में रहते थे। इसे ‘बेत-रहबरी’ यानी सर्वोच्च लीडर का घर कहा जाता है। वे बहुत कम ही बिल्डिंग से बाहर निकलते थे। उनका सारा कामकाज इसी बिल्डिंग से चलता था। यहीं सेना के कमांडर हफ्ते में एक बार मीटिंग के लिए आते थे। CIA को पता चला कि 28 फरवरी यानी शनिवार की सुबह तेहरान के इसी हाई सिक्योरिटी कैंपस की एक बिल्डिंग में टॉप ईरानी ऑफिसर्स की एक बैठक होने वाली है। सबसे खास बात ये पता चली कि खामेनेई भी इसमें शामिल होंगे। अमेरिकी न्यूज चैनल CNN ने एक इजराइली सोर्स के हवाले से बताया कि खामेनेई दिन के उजाले में खुद को ज्यादा सुरक्षित महसूस करते थे। उन्होंने अपनी सतर्कता कम कर ली थी। इसी कैंपस में ईरानी राष्ट्रपति का ऑफिस, खामेनेई का ऑफिस और ईरानी नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल का ऑफिस था। CIA ने अपनी ये हाई फिडेलिटी यानी 'उच्च स्तर की सटीकता' की जानकारी इजराइल को दी। इस दौरान IDF चीफ इयाल जमीर, इजराइली मिलिट्री इंटेलिजेंस के चीफ मेजर जनरल श्लोमी बाइंडर और मोसाद के डायरेक्टर डेविड बर्निया वाशिंगटन में थे। इस जानकारी के आधार पर अमेरिका और इजराइल ने अपने हमले का टाइम बदला। अमेरिका-इजराइल पहले शुक्रवार की रात में हमला करने वाले थे। फिर बदले हुए प्लान के मुताबिक, इजराइल के फाइटर जेट्स ने शनिवार सुबह करीब 6 बजे अपने ठिकानों से उड़ान भरी। इस हमले के लिए कम विमानों की जरूरत थी, लेकिन ये ज्यादा दूरी तक सटीक हमला करने वाले हथियारों से लैस थे। उड़ान भरने के करीब 2 घंटे बाद तेहरान में सुबह करीब 9 बजकर 40 मिनट पर इजराइली मिसाइल्स का हमला हुआ। इस समय एक इमारत में इजराइली सैन्य ऑफिसर और दूसरी इमारत में खामेनेई मौजूद थे। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, CIA की डिटेल्ड एनालिसिस और AI सिस्टम की मदद से हमले की टाइमिंग और टारगेट तय किए गए। इन हमलों में सटीक हमला करने वाले प्रिसिशन गाइडेड बंकर बस्टर बम, लॉन्ग रेंज मिसाइल्स और एक तरफा अटैक करने वाले ड्रोन का इस्तेमाल किया गया। सवाल-4: पिछले साल इजराइल के हमलों में खामेनेई कैसे बचे थे? जवाब: 13 जून 2025 को इजराइल ने ईरान के न्यूक्लियर ठिकानों पर हमला शुरू किया। इसके बाद 15 जून को इजराइल ने अपनी सीमा से 2,300 किमी दूर पूर्वी ईरान के मशहद एयरपोर्ट को निशाना बनाया। इसे खामेनेई की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा माना गया, जिसके बाद उन्हें तेहरान शहर से 343 किमी दूर उत्तर-पूर्वी लाविजान इलाके में बने एक बंकर में शिफ्ट किया गया। इजराइल ने तेहरान में खामेनेई के कंपाउंड पर भी बम गिराए थे, लेकिन खामेनेई वहां मौजूद नहीं थे। खामेनेई की आधिकारिक वेबसाइट Khamenei.ir पर जारी किए गए उनके कुछ वीडियोज की एनालिसिस करके कई मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया कि ये किसी नई जगह से जारी किए गए लो-क्वालिटी वीडियो हैं। खामेनेई, अपने बेटे मोज्तबा खामेनेई और बाकी परिवार के साथ लाविजान के बंकर में रह रहे हैं। अप्रैल और अक्टूबर 2024 में जब ईरान ने इजराइल पर एयरस्ट्राइक की थी, तब भी खामेनेई यहीं छिप गए थे। खामेनेई इसी बंकर से मैसेज जारी कर रहे थे। उनसे मिलने आने वाले वाले ऑफिसर्स को फोन का इस्तेमाल करने की मनाही थी। उन्हें आंखों पर पट्टी बांधकर खामेनेई के पास लेकर जाया जाता था। ये बंकर जमीन से 200 फीट नीचे है। इतनी गहराई में बने बंकर को आम मिसाइल्स या बमों से तबाह करना मुश्किल होता है। 22 जून को अमेरिकी B2 बॉम्बर विमानों ने ईरान की न्यूक्लियर लैबोरेट्री पर बमबारी की, लेकिन ऐसी कोई खबर नहीं आई कि खामेनेई के ठिकानों पर हमले की कोशिश की गई है। सवाल-5: फिर इस बार खामेनेई सीक्रेट बंकर में क्यों नहीं गए? जवाब: अमेरिकी और ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों के मुताबिक खामेनेई ने प्लान B तैयार किया था। कहा गया कि अगर ईरान में चल रहे विरोध प्रदर्शन काबू में नहीं आए, तो खामेनेई अपने बेटे और 20 अन्य करीबी लोगों के साथ रूस भाग जाएंगे। इजराइली इंटेलिजेंस ऑफिसर कह रहे थे कि खामेनेई के लिए रूस भागना ही आखिरी चारा है। सीरिया के तानाशाह बशर अल असद ने भी दिसंबर 2024 में रूस में शरण ली थी। हालांकि ईरान के एक सीनियर ऑफिसर ने खामेनेई की मौत के बाद अमेरिकी वेबसाइट ड्रॉप साइट से कहा कि खामेनेई का ऐसा कोई प्लान नहीं था। ये सब ट्रम्प को ज्यादा प्रभावशाली दिखाने के लिए गढ़ा गया एक नाटक था। 17 फरवरी 2026 को खामेनेई सार्वजनिक रूप से तेहरान में आयोजित एक सभा में नजर आए। उन्होंने ईरान की हथियारों की जरूरत को लेकर भाषण भी दिया। ऑफिसर के मुताबिक, ‘ईरान की नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने खामेनेई को सलाह दी थी कि वह अपने रहने और काम करने की जगह बदल दें, लेकिन खामेनेई का नजरिया बिल्कुल अलग था। वह सुरक्षा के उपाय बढ़ाने के बजाय बिना चीजों को जहां तक हो सके सामान्य रखने पर जोर दे रहे थे।’ अमेरिकी NGO फाउंडेशन फॉर डिफेंस डेमोक्रेसीज यानी FDD ने 19 फरवरी को लिखा कि खामेनेई का लहजा विनाशकारी हो गया था। वे उन ऐतिहासिक शिया धार्मिक नेताओं का हवाला दे रहे थे, जिन्होंने समझौते के बजाय शहादत चुनी। जब ट्रम्प ने ईरान को बिना शर्त समर्पण की चेतानवी दी, तो खामेनेई ने अपने बयान में कहा था, 'तुम यह नहीं कर पाओगे।' खामेनेई के गुरु और पूर्व सुप्रीम लीडर खोमैनी ने भी 1979 में अमेरिका को इसी तरह जवाब दिया था। 22 जनवरी को खामेनेई ने सभी ऑफिसर्स और नेताओं को चार लेयर तक अपने उत्तराधिकारी तय करने को भी कह दिया था। उन्होंने अपने बयान में कहा, ‘हम डरेंगे नहीं, अमेरिका को ऐसा झटका देंगे कि वो उठ न सके।’ 24 फरवरी को फॉरेन पॉलिसी में एक एनालिसिस छपी। इसमें खामेनेई की ईरान पर हमले से पहले की सोच के बारे में लिखा गया। रिपोर्ट के मुताबिक, ‘खामेनेई के यूनिवर्स में शहादत एक पवित्र और नैतिक जीत है और प्रतिरोध करते हुए मौत होना हार नहीं है। उनकी सोच थी कि समझौता कमजोरी का संकेत है। दबाव में पीछे हटने और दबाव बढ़ता है। वह खोमैनी के उस इतिहास को दोहराना नहीं चाहते थे, जब उन्होंने 1988 में इराक से जंग रोकने के लिए समझौता किया था।’ कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के सीनियर फेलो करीम सजादपुर कहते हैं, ‘ईरानी रिजीम दुनिया की सबसे अकेली सत्ताओं में से एक है। ईरानी ऑफिसर्स के लिए कोई अच्छा एक्जिट प्लान नहीं है। दुनिया में बहुत कम ऐसी जगहें हैं, जहां वे निर्वासन में रह सकते हैं। इसीलिए उनमें से ज्यादातर मानते हैं कि उन्हें या तो मारना होगा या मरना होगा।’ ---- ये खबर भी पढ़ें… नेतन्याहू की लड़ाई में क्यों कूदे ट्रम्प:ईरान की तबाही से अमेरिका नहीं, इजराइल को असली फायदा; सऊदी कैसे खेल कर रहा जून 2025- अमेरिका-ईरान में न्यूक्लियर डील पर बातचीत चल रही थी। ऐन मौके पर इजराइल ने ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को अपने लिए खतरा बताते हुए उस पर हमला कर दिया। अमेरिका भी इसमें शामिल हो गया। जबकि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को ईरान के न्यूक्लियर हथियार बनाने के कोई सबूत नहीं मिले थे। पूरी खबर पढ़ें…

