हिंदू ध्रुवीकरण के मुकाबले ‘सम्मान की राजनीति’ को Congress बना रही नया हथियार
हिंदू ध्रुवीकरण के मुकाबले ‘सम्मान की राजनीति’ को Congress बना रही नया हथियार
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के ''अमेरिकी सम्बोधन' के अंतर्राष्ट्रीय सामाजिक कूटनीतिक मायने
आधुनिक भारत का सामाजिक चाणक्य समझे जाने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत एक असाधारण व्यक्तित्व के स्वामी हैं, क्योंकि उन्होंने भाजपा के 'गाबाज' नेतृत्व को बदलवाकर कांग्रेसियों/समाजवादियों को उनके ही राजनीतिक पीच पर 2014 में जो सियासी शिकस्त दिलवाई, उससे आम भारतीयों की राजनीतिक सोच ही बदल गई। फलसफा यह निकला कि आज भारत के जर्रे-जर्रे में भगवा ध्वज शान से लहरा रहा है और आरएसएस-भाजपा खुद SC-ST-OBC-EWS का हिमायती बन चुकी है, ताकि देशद्रोही सियासत के लिए कोई सामाजिक स्पेस ही न छोड़ी जाए। इससे सवर्ण बुद्धिजीवियों में हलचल जरूर है, लेकिन जो व्यक्ति भगवान परशुराम को 'लकड़हारा यानी 'बढ़ई जाति' से जोड़कर एक नया 'ओबीसी ब्राह्मण दर्शन' पैदा कर चुका हो, उसकी 'चाणक्य नीति' और 'श्रीरामजी आदर्श नीति' का आप सहज ही अंदाजा लगा सकते हैं। इसे भी पढ़ें: 'हमने किसी देश पर कब्ज़ा नहीं किया, न ही धर्म बदला', टोरंटो में मोहन भागवत ने भारत के 'यूनिवर्सल DNA' पर की बात | Mohan Bhagwat Toronto Speech पूरी दुनिया ने देखा कि एक मुस्लिम अमेरिकी महापौर (न्यूयॉर्क) ममदानी के विरोध के बावजूद मोहन भागवत सात समंदर पार अमेरिका पहुंचे और 29 अगस्त 2026 को न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में जो संबोधन दिया, वह केवल प्रवासी भारतीयों को संबोधित भाषण नहीं था, बल्कि इसे RSS के शताब्दी-वर्ष में हिंदुत्व की वैश्विक प्रस्तुति और भारत की सांस्कृतिक कूटनीति (वसुधैव कुटुम्बकम) के एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में पढ़ा जा सकता है। जिस प्रकार से मोहन भागवत ने वहां “एक विश्व–एक मानवता”, विविधता में एकता, मानवता और प्रवासी भारतीयों की जिम्मेदारी पर जो जोर दिया, वह यदि अगले 100 सालों में विश्व का सांस्कृतिक नक्शा बदल दे तो आपको हैरत में नहीं पड़ना चाहिए। क्योंकि कहा ही गया है कि अग्रसोचि सदा सुखी। इससे 100 साल पहले के आरएसएस और 100 बाद के आरएसएस की जो झलक उनकी इस यात्रा गत सम्बोधन में मिलती है, वह इस प्रकार है:- पहला, सबसे बड़ा संदेश है हिंदुत्व की वैश्विक री-ब्रांडिंग: भागवत ने अमेरिका में यह रेखांकित किया कि हिंदुत्व मुस्लिम-विरोधी विचार नहीं है और यदि कोई हिंदू यह मानता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए तो वह वास्तविक अर्थ में हिंदू नहीं है। अंतरराष्ट्रीय श्रोता के लिए इसका महत्व बहुत बड़ा है। RSS की पश्चिमी छवि लंबे समय से Hindu nationalism, majoritarianism और minority rights की बहस से जुड़ी रही है। ऐसे में भागवत ने उसी विचारधारा को pluralism, diversity और universal humanity की भाषा में प्रस्तुत करने का प्रयास किया। इसे एक तरह की वैचारिक कूटनीति (ideological diplomacy) कहा जा सकता है। दूसरा, अमेरिका को दिया गया दूसरा संदेश है “भारतीय बनो, लेकिन अमेरिकी भी रहो”: भागवत ने भारतीय-अमेरिकी समुदाय से अपनी karmabhoomi यानी अमेरिका के प्रति निष्ठा और योगदान की बात कही। इसका अर्थ है कि RSS की वैश्विक परियोजना केवल भारत के बाहर बसे हिंदुओं को संगठित करना नहीं, बल्कि उन्हें स्थानीय समाज में प्रभावशाली और जिम्मेदार नागरिक रहते हुए भारतीय सभ्यतागत पहचान से जोड़ना भी है। यह मॉडल भविष्य में अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और अन्य पश्चिमी देशों में भारतीय diaspora की राजनीतिक-सामाजिक शक्ति को बढ़ा सकता है। तीसरा, “भारत की विविधता” को अमेरिका में प्रस्तुत करना—बहुत सोचा-समझा संदेश: अमेरिका स्वयं को pluralistic society मानता है। भागवत ने इसी अमेरिकी संवेदनशीलता से संवाद करते हुए कहा कि America = pluralism and, Bharat = unity in diversity. उन्होंने कहा कि विविधता भारत के DNA में है और उसे स्वीकारना व सम्मानित करना चाहिए। यह महज सांस्कृतिक कथन नहीं है। यह भारत की soft power narrative को अमेरिका के राजनीतिक-सांस्कृतिक विमर्श के अनुरूप ढालने का प्रयास भी है। चौथा, लेकिन अमेरिका ने इसे एकतरफा स्वीकार नहीं किया: यहीं इस यात्रा का दूसरा और अधिक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय पहलू सामने आता है। भागवत के कार्यक्रम से पहले ही New York Mayor Zohran Mamdani ने RSS की विचारधारा को लेकर आपत्ति जताई थी। अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग USCIRF ने तो RSS से जुड़े लोगों पर targeted sanctions और भागवत का visa revoke करने जैसी सिफारिशें तक की थीं। भारत ने इन आरोपों को पक्षपातपूर्ण बताया है। यानी भागवत अमेरिका में जिस “inclusive Hinduism” को प्रस्तुत कर रहे थे, अमेरिकी आलोचकों का एक वर्ग RSS के भारतीय रिकॉर्ड और minority rights को उसके ठीक विपरीत देखता है। इससे उनकी अमेरिकी यात्रा का एक अनपेक्षित परिणाम भी हुआ: वह यह कि RSS अब केवल भारतीय राजनीति का विषय नहीं रहा; वह अमेरिकी public discourse में भी India, religion, democracy और minority rights की बहस का हिस्सा बन गया है। पांचवां, भारत-अमेरिका संबंधों के लिए क्या अर्थ?: सरकार-से-सरकार कूटनीति से अलग एक नया people-to-people / diaspora-to-politics channel मजबूत होता दिख रहा है। अमेरिका में भारतीय मूल की आबादी आर्थिक, तकनीकी और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली है। यदि RSS इस समुदाय में अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक स्वीकार्यता बढ़ाता है तो उसका असर भविष्य मेंअमेरिकी राजनीति में India-related lobbying, भारत की image-building, Hindu-American organisations, भारत-अमेरिका strategic relationship, धार्मिक स्वतंत्रता और minority-rights debates पर पड़ सकता है। छठा, सबसे दिलचस्प बदलाव: “हिंदू राष्ट्र” से “विश्व मानवता” तक: आपके पिछले सवाल से इसे जोड़ें तो सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यही है। भागवत की वैचारिक भाषा में एक trajectory दिखाई देती है: हिंदू संगठन → हिंदू राष्ट्र → सामाजिक समरसता → विश्वगुरु → “One World, One Humanity” न्यूयॉर्क में उन्होंने कहा कि RSS की दृष्टि दुनिया को एक परिवार/एक मानवता के रूप में देखने की है। इसलिए इसे “विश्व विजय” कहना शायद अतिशयोक्ति होगा; लेकिन भारतीय सभ्यतागत विचार को वैश्विक वैचारिक प्रभाव में बदलने की कोशिश कहना अधिक सटीक है। सातवां, और यही सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है: भागवत के अमेरिकी भाषण ने RSS के सामने एक नई कसौटी खड़ी कर दी है: यदि हिंदुत्व वास्तव में विविधता, मानव-एकता और मुसलमानों सहित सभी समुदायों की बराबर जगह को स्वीकार करता है, तो क्या यही सिद्धांत भारत के घरेलू सामाजिक-राजनीतिक व्यवहार में भी उसी स्पष्टता से दिखाई देगा? इसी प्रश्न को लेकर भारत में विपक्ष ने उनके अमेरिकी वक्तव्य पर सवाल उठाए हैं—आलोचकों ने इसे “doublespeak” तक कहा है। मेरे आकलन में अमेरिकी भाषण का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय मायना यही है: RSS पहली बार इतने बड़े वैश्विक मंच पर अपने को केवल Hindu organisation के रूप में नहीं, बल्कि मानवता, विविधता और वैश्विक सामाजिक व्यवस्था के बारे में एक वैकल्पिक सभ्यतागत विचार देने वाली संस्था के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। और यदि यह रणनीति आगे ब्रिटेन, कनाडा और अन्य देशों में भी जारी रहती है, तो RSS की शताब्दी के बाद का दशक भारत के भीतर वैचारिक प्रभाव से आगे बढ़कर वैश्विक वैचारिक प्रभाव की प्रतिस्पर्धा का दशक बन सकता है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
कांग्रेस कोटे से पर्यटन मंत्री राजेश कुमार ने साफ शब्दों में कहा है कि अगर TVK ने 2029 में राहुल गांधी के प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी का समर्थन नहीं किया तो कांग्रेस के मंत्री सरकार से बाहर हो सकते हैं।
वित्त वर्ष 27 में भारत की रियल जीडीपी वृद्धि दर 7-7.2 प्रतिशत रहने की उम्मीद
नई दिल्ली, भारत की रियल जीडीपी वृद्धि दर वित्त वर्ष 27 में 7-7.2 प्रतिशत के बीच रहने की उम्मीद है।
एक तरफ उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शौकत मिर्जियोयेव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ गले मिल रहे थे, भारत के साथ दीर्घकालिक यूरेनियम आपूर्ति का ऐलान हो रहा था और दूसरी तरफ उसी उज्बेकिस्तान की धरती पर चीन के J-10CE लड़ाकू विमान उतर रहे थे। यही है नई दुनिया की राजनीति, जहां मुस्कुराहटों के पीछे हित हैं, समझौतों के पीछे शक्ति है और दोस्ती की असली कीमत रणनीतिक क्षमता से तय होती है। भारत को इस तस्वीर को सिर्फ एक रक्षा सौदे के रूप में देखने की भूल नहीं करनी चाहिए। मध्य एशिया में चीन अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए सिर्फ सड़कें और निवेश नहीं, अब लड़ाकू विमान भी भेज रहा है। हम आपको बता दें कि उज्बेक वायुसेना ने चीन के चेंगदू एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन के J-10CE मल्टीरोल लड़ाकू विमानों की पहली खेप हासिल कर ली है। पाकिस्तान के बाद उज्बेकिस्तान इस चीनी लड़ाकू विमान को संचालित करने वाला दूसरा विदेशी देश बन गया है। रिपोर्टों के अनुसार उज्बेकिस्तान ने 24 J-10CE विमानों का ऑर्डर दिया है और इसमें कम से कम छह विमान देश को मिल चुके हैं। ये विमान उज्बेकिस्तान के 35वें स्वतंत्रता दिवस से ठीक पहले पहुंचे। सवाल उठता है कि चीन आखिर मध्य एशिया के आसमान में अपनी सैन्य मौजूदगी क्यों बढ़ाना चाहता है? इसे भी पढ़ें: Modi-Putin ने दुनिया को दिया बड़ा संदेश, भारत के आसमान को मिलेंगी 5 और S-400 Triumf, जमीन पर Indo-Russian AK-203 Sher Rifles मचाएंगी तहलका उल्लेखनीय है कि J-10CE कोई साधारण विमान नहीं है। चीन इसे अपनी एयरोस्पेस ताकत के प्रतीक के रूप में पेश करता है। ‘विगोरस ड्रैगन’ नाम वाला यह लड़ाकू विमान आधुनिक AESA रडार, इन्फ्रारेड सर्च एंड ट्रैक सिस्टम और उन्नत एवियोनिक्स से लैस है। इसके पास लंबी दूरी की हवा से हवा में मार करने वाली PL-15 मिसाइल है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तानी विमानों द्वारा इस्तेमाल की गई ऐसी मिसाइलों से जुड़े अवशेष पंजाब के खेतों में मिलने की खबरों ने भारतीय सुरक्षा प्रतिष्ठान का ध्यान इस चीनी हथियार प्रणाली की ओर खींचा था। साथ ही चीनी संस्करणों में PL-17 जैसी अत्यंत लंबी दूरी की मिसाइल भी शामिल है, जिसकी घोषित रेंज 400 किलोमीटर से अधिक है। ऐसी मिसाइलों का उद्देश्य लड़ाकू विमानों के पीछे छिपे बड़े रणनीतिक प्लेटफॉर्म जैसे AEW&CS और हवाई ईंधन भरने वाले विमान, आदि को निशाना बनाना होता है। यानी चीन केवल फाइटर जेट नहीं बेच रहा। वह हथियार, सेंसर, प्रशिक्षण, रखरखाव और भविष्य की सैन्य निर्भरता का पूरा पैकेज बेच रहा है। यही चीन की असली रणनीति है। वैसे J-10CE चीन का सबसे आधुनिक लड़ाकू विमान नहीं है। वह भूमिका J-20 जैसे स्टील्थ विमानों की है। लेकिन निर्यात बाजार में J-10CE कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हथियार साबित हो सकता है। एक इंजन वाला यह विमान अपेक्षाकृत कम लागत में आधुनिक रडार, मिसाइल और एवियोनिक्स उपलब्ध कराता है। हालांकि इसकी सीमाएं भी हैं। ट्विन-इंजन विमानों की तुलना में कम रेंज, सिंगल-इंजन सर्वाइवलिटी का जोखिम, रूसी इंजनों पर पुरानी निर्भरता और रडार पर अधिक दृश्यता इसे अत्याधुनिक विमानों की अपेक्षा कमजोर बनाती हैं। लेकिन सस्ता और आधुनिक विकल्प तलाश रहे देशों के लिए ये कमियां ज्यादा मायने नहीं रखतीं। हम आपको बता दें कि पाकिस्तान के पास करीब 20 J-10 विमान हैं, जबकि चीनी वायुसेना के पास 600 से अधिक बताए जाते हैं। अब उज्बेकिस्तान भी इस क्लब में शामिल हो गया है। बांग्लादेश भी इस विमान को हासिल करने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। अगर बांग्लादेश भी J-10CE खरीदता है, तो भारत के आसपास और व्यापक क्षेत्र में चीनी लड़ाकू विमानों की मौजूदगी बढ़ सकती है। इसलिए यह भारत के लिए चिंता की बात भी है। हालांकि रिपोर्टें यह भी कहती हैं कि चीन के रक्षा निर्यात में वैश्विक स्तर पर गिरावट आई है। SIPRI के अनुसार वैश्विक हथियार खरीद बढ़ने के बावजूद चीन की बाजार हिस्सेदारी घटी है। यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप में हथियारों की मांग विस्फोटक रूप से बढ़ी, लेकिन चीन इस बाजार का बड़ा लाभ नहीं उठा पाया। चीन के रक्षा निर्यात का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान पर केंद्रित रहा है। ऐसे में उज्बेकिस्तान का सौदा चीन के लिए व्यापार के साथ-साथ मध्य एशिया में सैन्य दरवाजा खोलने का मौका है। उधर, भारत-उज्बेकिस्तान के संबंधों की बात करें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उज्बेक राष्ट्रपति मिर्जियोयेव ने दीर्घकालिक यूरेनियम आपूर्ति व्यवस्था स्थापित करने की घोषणा की है। देखा जाये तो भारत के लिए यह मामूली समझौता नहीं है। भारत अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता का विस्तार कर रहा है और इसके लिए विश्वसनीय यूरेनियम आपूर्ति बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए उज्बेकिस्तान के साथ यह व्यवस्था सीधे भारत की ऊर्जा सुरक्षा और दीर्घकालिक रणनीतिक स्वायत्तता से जुड़ती है। प्रधानमंत्री मोदी की उज्बेकिस्तान यात्रा के दौरान उन्हें देश के सर्वोच्च राजकीय सम्मान ‘ओली दर्जाली दोस्तलिक’ से भी सम्मानित किया गया। दोनों नेताओं का गर्मजोशी से मिलना और गले लगना भारत-उज्बेकिस्तान संबंधों की बढ़ती निकटता का स्पष्ट संदेश था। लेकिन राष्ट्रहित की राजनीति में भावनाओं के लिए कोई जगह नहीं होती। उज्बेकिस्तान भारत का साझेदार हो सकता है, लेकिन वह चीन से हथियार भी खरीदेगा। क्योंकि ताशकंद अपनी विदेश नीति अपने राष्ट्रीय हित के हिसाब से चलाएगा। भारत भी यही कर रहा है मगर अब और भी ज्यादा आक्रामक तरीके से इसे करना होगा। देखा जाये तो भारत दशकों तक मध्य एशिया के साथ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों की बात करता रहा है। लेकिन अब मुकाबला इतिहास का नहीं, हार्ड पावर का है। चीन निवेश लेकर आता है, इंफ्रास्ट्रक्चर लेकर आता है और अब आधुनिक हथियार लेकर भी पहुंच रहा है। नई दिल्ली को समझना होगा कि केवल दोस्ती, सम्मेलन और सांस्कृतिक रिश्ते पर्याप्त नहीं हैं। जहां चीन फाइटर जेट बेच रहा है, वहां भारत को भी अपनी रक्षा क्षमता लेकर पहुंचना होगा। भारत के पास ब्रह्मोस जैसी मिसाइलें हैं, तेजस जैसे लड़ाकू विमान हैं, आकाश जैसी वायु रक्षा प्रणाली है और तेजी से विकसित होता रक्षा उद्योग है। भारत को मध्य एशिया में रक्षा निर्यात, संयुक्त उत्पादन, सैन्य प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग को अपनी विदेश नीति का केंद्रीय हथियार बनाना होगा। भारत को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि मध्य एशिया पूरी तरह चीनी सैन्य उपकरणों, स्पेयर पार्ट्स और तकनीकी सहायता पर निर्भर न हो जाए। क्योंकि एक बार कोई देश किसी रक्षा प्लेटफॉर्म के इकोसिस्टम में फंसता है तो उसके साथ दशकों की निर्भरता जुड़ जाती है। यही चीन की सबसे खतरनाक रणनीतिक ताकत है। आज विमान बिकता है, कल मिसाइल बिकती है। फिर प्रशिक्षण आता है, रखरखाव आता है, स्पेयर पार्ट्स आते हैं और अंततः सैन्य रिश्तों की ऐसी जंजीर बन जाती है जिसे तोड़ना आसान नहीं होता। देखा जाये तो उज्बेकिस्तान का J-10CE सौदा भारत के खिलाफ कोई सीधा सैन्य मोर्चा नहीं है। लेकिन इसे नजरअंदाज करना रणनीतिक भूल होगी। चीन मध्य एशिया में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है और भारत को इसका जवाब केवल बयानबाजी से नहीं, बल्कि आर्थिक, तकनीकी और सैन्य शक्ति से देना होगा। ताशकंद का यह पूरा घटनाक्रम भारत के सामने नई सच्चाई रखता है। एक तरफ मोदी के साथ यूरेनियम की साझेदारी है। दूसरी तरफ चीन के साथ फाइटर जेट की डील है। यानी मैदान खुला है और मुकाबला जारी है। भारत के लिए संदेश साफ है कि मध्य एशिया में जगह किसी की विरासत से तय नहीं होगी, बल्कि उसकी ताकत से तय होगी। चीन वहां पहुंच चुका है। अब भारत को सिर्फ पहुंचना नहीं है, भारत को अपनी मौजूदगी इतनी मजबूत करनी होगी कि मध्य एशिया की रणनीतिक राजनीति में नई दिल्ली को नजरअंदाज करना किसी भी देश के लिए संभव न रहे। -नीरज कुमार दुबे
राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर पर बोले राम कृपाल यादव, कहा-परेशान हैं राहुल, भविष्य नहीं दिख रहा
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3 लैंडफिल साइटों से 2.16 करोड़ टन कचरा साफ, 100 एकड़ जमीन मुक्त: सीएम रेखा गुप्ता
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'वेलिगोंडा प्रोजेक्ट का विजन और विकास वाईएसआर का था', वाईएसआरसीपी का सीएम नायडू पर हमला
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'2028 में कांग्रेस की सरकार बनी तो खत्म कर देंगे यूसीसी', मध्य प्रदेश में विपक्ष के नेता उमंग सिंघार
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‘शुद्धिकरण’ विवाद पर प्रकाश आंबेडकर का राहुल गांधी पर निशाना, पूछा- ‘एक्शन’ कब होगा?
‘शुद्धिकरण’ विवाद पर प्रकाश आंबेडकर का राहुल गांधी पर निशाना, पूछा- ‘एक्शन’ कब होगा?
विजया रहाटकर ने महिलाओं को ‘जीरो एफआईआर’ दर्ज कराने के अधिकार के बारे में बताया
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तमिलनाडु में जल्द सस्ता मिलेगा प्याज
चेन्नई, खुदरा कीमतों में वृद्धि के कारण राज्य भर में आम लोगों के बजट पर दबाव पड़ने के बाद, तमिलनाडु का सहकारी क्षेत्र राशन की दुकानों के माध्यम से रियायती कीमतों पर प्याज बेचने की तैयारी कर रहा है।
अखिलेश यादव का बड़ा एलान, भाजपा राज में बंद 26 हजार स्कूलों को फिर खोलेगी सपा सरकार
अखिलेश यादव ने ऐलान किया कि सपा सरकार बनने पर भाजपा शासन में बंद किए गए करीब 26 हजार स्कूलों को फिर खोला जाएगा। उन्होंने रोजगार, भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था को लेकर भाजपा पर निशाना साधा।
'बहुत ही सुखद', सीएम सुवेंदु अधिकारी ने 'मन की बात' में उत्तम कुमार का जिक्र करने के लिए पीएम मोदी का किया धन्यवाद
लखनऊ में राजनाथ सिंह बोले, अंतरराष्ट्रीय मंच पर अब भारत की बात पूरी दुनिया कान खोलकर सुनती है
लखनऊ में राजनाथ सिंह बोले, अंतरराष्ट्रीय मंच पर अब भारत की बात पूरी दुनिया कान खोलकर सुनती है
मोहन भागवत के 'हिंदू-मुस्लिम' वाले बयान का भाजपा नेताओं ने किया समर्थन, कहा- यही भारत की असली पहचान
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सीएम योगी बोले- लखनऊ छावनी बनेगी ‘मॉडल छावनी', राजधानी में विरासत के साथ आधुनिकता का संगम
सीएम योगी बोले- लखनऊ छावनी बनेगी ‘मॉडल छावनी', राजधानी में विरासत के साथ आधुनिकता का संगम
मन की बात: पीएम मोदी ने एवोकाडो की खेती का किया जिक्र, कहा - 'इनोवेटिव किसानों ने कमाई की ढूंढ ली नई रेसिपी'
तारीख पर तारीख की प्रवृत्ति में बदलनी होगी, 5 साल से पुराने राजस्व मामलों का हो निस्तारण: सीएम योगी
तारीख पर तारीख की प्रवृत्ति में बदलनी होगी, 5 साल से पुराने राजस्व मामलों का हो निस्तारण: सीएम योगी
भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने गुणवत्ता मानकों का उल्लंघन पाए जाने पर एवरेस्ट फ़ूड प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड की सभी वैरिएंट वाली कंपाउंडेड हींग की बिक्री पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगा दिया है। यह कार्रवाई खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 के तहत जारी निषेध आदेश के माध्यम से की गई है। एफएसएसएआई ने इसी मामले में मेसर्स लालजी गोधू एंड कंपनी के खिलाफ भी कार्रवाई करते हुए उसकी कंपाउंडेड हींग के निर्माण और बिक्री पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है।
राहुल गांधी राजनीतिक फायदे के लिए जातीय उन्माद फैलाने की कोशिश कर रहे: सुबोध उनियाल
राहुल गांधी राजनीतिक फायदे के लिए जातीय उन्माद फैलाने की कोशिश कर रहे: सुबोध उनियाल
बंगाल: एंटाली पुलिस स्टेशन पर विरोध प्रदर्शन के लिए भाजपा ने सुदीप राम को निलंबित किया
बंगाल: एंटाली पुलिस स्टेशन पर विरोध प्रदर्शन के लिए भाजपा ने सुदीप राम को निलंबित किया
डोभाल की कूटनीति और भारत-चीन संबंधों की नई करवट
भारत और चीन के संबंधों में पिछले कुछ वर्षों की तल्खी के बाद अब संवाद, संयम और व्यावहारिक सहयोग का एक नया दौर दिखाई दे रहा है। इसे किसी अचानक आए परिवर्तन के रूप में नहीं, बल्कि सुरक्षा, कूटनीति और राष्ट्रीय हितों को साथ लेकर चलने वाली एक दीर्घकालिक प्रक्रिया के रूप में देखना चाहिए। इस बदलते परिदृश्य में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण बनकर सामने आई है। 25 अगस्त को बीजिंग में चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ हुई 25वें दौर की विशेष प्रतिनिधि वार्ता ने इस प्रक्रिया को ठोस आधार दिया है। दोनों पक्षों ने सीमा पर शांति बनाए रखने, सीमा निर्धारण की दिशा में शीघ्र एवं सार्थक प्रगति करने तथा सैन्य-द्विपक्षीय संपर्क व्यवस्था को मजबूत करने पर सहमति बनाई है। डोभाल की बीजिंग यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह केवल सीमा विवाद पर बातचीत नहीं थी। यह उस व्यापक प्रश्न पर विमर्श था कि क्या भारत और चीन प्रतिस्पर्धा के बावजूद सह-अस्तित्व, स्थिरता और पारस्परिक हितों का रास्ता तलाश सकते हैं। दोनों देशों ने दो अतिरिक्त सैन्य संपर्क-बिंदु और पूर्वी तथा मध्य क्षेत्रों में दो अतिरिक्त सैन्य दूरभाष संपर्क स्थापित करने पर सहमति जताई है। सीमा व्यापार, कैलाश-मानसरोवर यात्रा और सीमा-पार सहयोग को भी आगे बढ़ाने का निर्णय हुआ है। अजीत डोभाल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे सुरक्षा और कूटनीति को परस्पर विरोधी नहीं मानते। उनका दृष्टिकोण स्पष्ट है-मजबूत सुरक्षा-व्यवस्था ही प्रभावी कूटनीति की आधारभूमि बन सकती है। चीन के संदर्भ में भी भारत का संदेश यही रहा है कि सीमा पर शांति और स्थिरता के बिना द्विपक्षीय संबंधों का पूर्ण सामान्यीकरण संभव नहीं है। 25वें दौर की वार्ता में यही भारतीय दृष्टिकोण प्रमुखता से सामने आया। डोभाल का व्यक्तित्व केवल वार्ताकार का नहीं, बल्कि सुरक्षा रणनीतिकार का है। वे लंबे समय तक खुफिया तंत्र में रहे, विभिन्न संवेदनशील क्षेत्रों में काम किया और बाद में खुफिया ब्यूरो के प्रमुख बने। भारत सरकार के अनुसार, उन्होंने पूर्वोत्तर, सिक्किम, जम्मू-कश्मीर, पंजाब और पाकिस्तान से जुड़े सुरक्षा मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे देश के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं। उनकी कार्यशैली में एक उल्लेखनीय संतुलन दिखाई देता है-जहां आवश्यक हो वहां कठोरता और जहां अवसर हो वहां संवाद। उड़ी के बाद की सर्जिकल कार्रवाई, बालाकोट की कार्रवाई, डोकलाम संकट के दौरान कूटनीतिक प्रयास और आंतरिक सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने में उनकी भूमिका इसी व्यापक दृष्टिकोण के उदाहरण माने जाते हैं। 2026 में उन्हें लोकमान्य तिलक राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने में उनके योगदान को विशेष रूप से रेखांकित किया। इसे भी पढ़ें: जयशंकर और डोभाल की रूस-चीन यात्रा के कूटनीतिक संदेश को ऐसे समझिए भारत-चीन संबंधों का सबसे कठिन दौर वर्ष 2020 में गलवान घाटी की हिंसक झड़प के बाद आया। चार वर्षों तक सीमा पर सैन्य तनाव बना रहा। अक्टूबर 2024 में दोनों देशों के बीच सैनिकों की पूर्ण वापसी और संबंधित विवादों के समाधान के बाद संबंधों को धीरे-धीरे पटरी पर लाने की प्रक्रिया शुरू हुई। उसी वर्ष कजान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात में दोनों नेताओं ने सीमा पर शांति तथा मतभेदों को संबंधों की समग्र दिशा को प्रभावित न करने देने पर जोर दिया था। यही वह बिंदु था जहां डोभाल की भूमिका और महत्वपूर्ण हो गई। दिसंबर 2024 में विशेष प्रतिनिधि स्तर की बातचीत से शुरू हुई प्रक्रिया अब 25वें दौर तक पहुंची है। इस बार आठ बिंदुओं पर बनी सहमति संकेत देती है कि बातचीत केवल औपचारिकता नहीं रह गई है। सीमा निर्धारण और सीमा प्रबंधन के लिए विशेषज्ञ तथा कार्य समूहों को सक्रिय करना, वास्तविक नियंत्रण रेखा पर गलतफहमी रोकने के लिए मौजूदा सैन्य एवं कूटनीतिक माध्यमों का उपयोग और नए संपर्क तंत्र बनाना व्यावहारिक विश्वास निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। भारत-चीन संबंध केवल सैनिक चौकियों और राजनयिक बैठकों तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच सभ्यतागत संपर्क भी रहा है। कैलाश-मानसरोवर यात्रा की पुनर्बहाली और विस्तार, सीमा व्यापार मार्गों को फिर खोलना तथा लोगों के बीच संपर्क बढ़ाना इसी व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा है। 2026 में कैलाश-मानसरोवर यात्रा लिपुलेख और नाथू ला, दोनों मार्गों से संचालित हुई है। 25वें दौर की वार्ता में तीन निर्धारित सीमा व्यापार केंद्रों को फिर खोलने की प्रगति का स्वागत किया गया तथा व्यापार और तीर्थयात्रा को और मजबूत करने पर सहमति बनी। यह छोटा कदम नहीं है। सीमा पर सैनिकों की संख्या घटाना एक सुरक्षा उपाय है, लेकिन सीमा के दोनों ओर रहने वाले लोगों के लिए व्यापार और सांस्कृतिक संपर्क बढ़ाना दीर्घकालिक शांति की सामाजिक नींव तैयार करता है। शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा एक अवसर भी है, परीक्षा भी है। इसी पृष्ठभूमि में 12-13 सितंबर, 2026 को नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन पर पूरी दुनिया की नजर है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा की संभावना जताई जा रही है। यदि यह यात्रा होती है तो यह सात वर्षों में उनकी पहली भारत यात्रा होगी। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार उनके साथ लगभग चार सौ अधिकारियों का बड़ा प्रतिनिधिमंडल भी आ सकता है। हालांकि 27 अगस्त तक चीन की ओर से उनकी यात्रा की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए शी की संभावित यात्रा को केवल एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भागीदारी नहीं माना जाना चाहिए। यह भारत-चीन संबंधों की वास्तविक दिशा को परखने का अवसर हो सकती है। वर्ष 2019 का चेन्नई संवाद अपेक्षाकृत सौहार्दपूर्ण वातावरण में हुआ था, लेकिन उसके एक वर्ष बाद गलवान ने संबंधों को गहरे संकट में डाल दिया। अब यदि शी नई दिल्ली आते हैं तो दोनों देशों के पास उस टूटे हुए विश्वास को सावधानी से जोड़ने का अवसर होगा। लेकिन भारत को उत्साह में अपनी मूल सुरक्षा चिंताओं को पीछे नहीं छोड़ना चाहिए। अरुणाचल प्रदेश पर चीन के दावे, सीमा निर्धारण का लंबित प्रश्न और वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पारदर्शिता जैसी चुनौतियां अभी समाप्त नहीं हुई हैं। इसलिए भारत की नीति मित्रता की आकांक्षा, लेकिन राष्ट्रीय हितों पर कोई समझौता नहीं होनी चाहिए। डोभाल की विशेषता यही है कि वे संवाद को कमजोरी नहीं बनने देते और शक्ति को टकराव का पर्याय भी नहीं बनाते। उनकी कूटनीति में संदेश स्पष्ट है-भारत शांति चाहता है, लेकिन अपनी सुरक्षा कीमत पर नहीं, सहयोग चाहता है, लेकिन समानता के आधार परय संबंध सुधारना चाहता है, लेकिन सीमा की वास्तविकताओं को भुलाकर नहीं। आज भारत-चीन संबंध जिस मोड़ पर खड़े हैं, वहां डोभाल की भूमिका संकटमोचक से आगे बढ़कर विश्वास-निर्माता और सुरक्षा-आधारित कूटनीति के सूत्रधार की बनती दिखाई देती है। 25वें दौर की वार्ता में हुई आठ सूत्रीय सहमति इसका प्रमाण है कि कठिनतम मतभेदों के बीच भी संवाद के रास्ते खुले रखे जा सकते हैं। शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा इस प्रक्रिया को शीर्ष नेतृत्व की राजनीतिक दिशा दे सकती है। किंतु असली सफलता किसी एक शिखर बैठक की तस्वीर में नहीं, बल्कि सीमा पर स्थायी शांति, पारस्परिक विश्वास, व्यापारिक संपर्क और विवादों के न्यायसंगत समाधान में होगी। भारत को चीन से संबंध सुधारने हैं, लेकिन अपनी सामरिक स्वायत्तता और सुरक्षा-सजगता के साथ। डोभाल की कूटनीति का सार भी यही है-संवाद के दरवाजे खुले रहें, पर राष्ट्रीय हितों की चौखट कभी कमजोर न हो। यही दृष्टिकोण भारत-चीन संबंधों को टकराव से प्रतिस्पर्धी सह-अस्तित्व और अंततः स्थायी शांति की ओर ले जाने की सबसे व्यावहारिक राह बन सकता है। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
संकट में Nepal के काम India ही आया, Kathmandu को China की 'दोस्ती' का सच आखिरकार समझ आया
नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ ने सिर्फ सैकड़ों जिंदगियां नहीं लील लीं, बल्कि हिमालयी क्षेत्र की राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा और पड़ोसी देशों के रिश्तों का एक बेहद महत्वपूर्ण आईना भी सामने रख दिया है। बुधवार को नेपाल-तिब्बत सीमा के आसपास ग्लेशियर के ढहने और उसके बाद मलबे के साथ आए भयावह जलप्रवाह ने रसुवा, नुवाकोट और आसपास के इलाकों में भारी तबाही मचाई। सड़कें, पुल, मकान और जलविद्युत परियोजनाएं बह गईं। इस आपदा ने नेपाल की बिजली व्यवस्था को भी ऐसा झटका दिया कि अब वही नेपाल, जो मानसून में भारत को बिजली बेचता है, जरूरत पड़ने पर भारत से बिजली मांग सकता है। यही इस त्रासदी का सबसे बड़ा विडंबनापूर्ण पहलू है। नेपाल की करीब 4,300 मेगावाट की स्थापित बिजली क्षमता में 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी जलविद्युत की है। बाढ़ ने करीब 13 जलविद्युत संयंत्रों और एक सौर परियोजना को प्रभावित किया और लगभग 360 मेगावाट उत्पादन क्षमता पर असर पड़ा। भारत को बिजली देने वाला 14 मेगावाट का देविघाट संयंत्र भी इसकी चपेट में आया। 26 अगस्त को बाढ़ के दिन भारत नेपाल से एक समय में 963.4 मेगावाट तक बिजली ले रहा था, लेकिन अगले ही दिन बिजली आपूर्ति लगभग आधी रह गई। इसे भी पढ़ें: Nepal Flood में 600 से ज्यादा मौतें, जीवित बचे लोगों ने सुनाई आपदा से जंग की दास्तान और अब तस्वीर उलट सकती है। आमतौर पर गर्मियों में भारत नेपाल से बिजली खरीदता है और सर्दियों में, जब नेपाल की जलविद्युत उत्पादन क्षमता घटती है, भारत नेपाल को बिजली देता है। लेकिन इस बार आपदा ने परिस्थितियां ऐसी बना दी हैं कि मानसून के इसी मौसम में भारत को नेपाल की मदद के लिए बिजली निर्यात करनी पड़ सकती है। दोनों देशों के बीच पहले से ही 1,000 मेगावाट की आयात-निर्यात क्षमता है, जिसे बढ़ाकर 1,400 मेगावाट से अधिक करने पर सहमति भी बन चुकी है। लेकिन बिजली से बड़ी कहानी भरोसे की है। आपदा तिब्बत से लगे इलाके में शुरू हुई। उपलब्ध वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार इसका संबंध ग्लेशियर के ढहने और भारी मलबे के नदी में आने से है। चीन ने यह आपदा पैदा की या नहीं, इसका जवाब तो वैज्ञानिक ही देंगे लेकिन आम लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि हिमालय के इस संवेदनशील भूभाग में सीमा के दोनों ओर होने वाली गतिविधियों, बुनियादी ढांचे और आपदा-प्रबंधन को लेकर भारत, नेपाल और चीन के बीच पारदर्शिता कितनी है? हालात इतने गंभीर थे कि तिब्बत की ओर एक नए ‘बैरियर लेक’ के बनने और उसके टूटने की आशंका ने नेपाल में फिर खतरे की घंटी बजा दी। इसी संकट में भारत और चीन के रवैये का फर्क नेपाल के सामने साफ दिखाई देता है। बाढ़ के कुछ ही घंटों के भीतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह से बात की और हरसंभव मानवीय सहायता का भरोसा दिया। उसी रात भारतीय वायुसेना का C-130J विमान हिंडन से काठमांडू पहुंचा और 10 टन राहत सामग्री तथा जरूरी दवाइयां भेजी गईं। इसके बाद राहत सामग्री की कुल मात्रा 47 टन से अधिक हो गई। भारत ने 24 घंटे काम करने वाला नियंत्रण कक्ष और हेल्पलाइन भी सक्रिय की। नेपाल के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और जनता जिस तरह भारत का शुक्रिया कर रहे हैं उससे उनका भारत के प्रति विश्वास भी परिलक्षित हो रहा है। देखा जाये तो यही अंतर है, मुसीबत में कौन आपके साथ खड़ा होता है और कौन सिर्फ सीमा के उस पार मौजूद रहता है। नेपाल के लिए यह समय किसी देश के पक्ष में राजनीतिक नारा लगाने का नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हित को ठंडे दिमाग से देखने का है। भारत से नेपाल का रिश्ता सिर्फ बिजली खरीदने-बेचने का नहीं है। खुली सीमा, गहरे सामाजिक रिश्ते, व्यापार, रोजगार, धार्मिक यात्राएं और रोजमर्रा की मानवीय आवाजाही दोनों देशों को असाधारण रूप से जोड़ती है। जब नेपाल में संकट आया तो भारत ने इन रिश्तों को कागज पर नहीं, जमीन और आसमान पर साबित किया। शायद नेपाल को इस संकट में एक पुरानी बात नए सिरे से समझ आई होगी, दोस्त वही नहीं जो सामान्य दिनों में साथ दिखे, दोस्त वह है जो आपदा में सबसे पहले पहुंच जाए। और चीन के साथ संबंधों को लेकर भी काठमांडू को यह तय करना होगा कि रणनीतिक साझेदारी का अर्थ केवल बड़े-बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट और निवेश नहीं है। असली साझेदारी संकट के समय दिखाई देती है। भारत और चीन के बीच नेपाल को किसी एक को चुनने की मजबूरी नहीं होनी चाहिए, लेकिन नेपाल यह जरूर देख सकता है कि उसके लिए कौन-सा पड़ोसी भरोसे का स्थायी आधार है। बहरहाल, इस बाढ़ ने नेपाल की बिजली व्यवस्था को झकझोर दिया है, लेकिन शायद इससे भी बड़ा संदेश उसकी विदेश नीति के लिए आया है। हिमालय ने एक बार फिर याद दिलाया है कि नक्शे पर सबसे नजदीक पड़ोसी ही संकट की घड़ी में सबसे उपयोगी पड़ोसी भी साबित हो सकता है। नीरज कुमार दुबे
निकाय चुनाव से ठीक पहले BJP में बगावत! पूर्व जिला महामंत्री राकेश भाटी ने थामा हाथ का साथ!
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America में Mohan Bhagwat का विरोध और Mamdani का दांव फेल! | Prabhu Chawla Analysis
वैश्विक तनावों के बीच बाजार में गिरावट
मुंबई, वैश्विक ब्याज दरों की दिशा को लेकर बनी अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव और निवेशकों की सतर्कता के बीच भारतीय शेयर बाजार ने लगातार तीसरे सप्ताह गिरावट दर्ज की।
सरकार ने शुरू की केंद्रीय बजट की तैयारियां
नई दिल्ली, केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2027-28 के केंद्रीय बजट की तैयारियां औपचारिक रूप से शुरू कर दी हैं।
भारत के हाथ आया Javelin हथियार, अब दुश्मनों के टैंकों की खैर नहीं! America से हुआ बड़ा रक्षा सौदा
भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग अब सिर्फ हथियार खरीदने तक सीमित नहीं रह गया है। भारतीय सेना द्वारा अमेरिकी Javelin एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल सिस्टम की खरीद के लिए Letter of Offer and Acceptance (LOA) पर हस्ताक्षर इस बदलते रिश्ते का एक महत्वपूर्ण संकेत है। अमेरिकी दूतावास ने इसे भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी को अधिक गहरा, सक्षम और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाने वाला कदम बताया है। खास बात यह है कि इस समझौते के साथ भविष्य में दोनों देशों के रक्षा उद्योगों के बीच सह-उत्पादन यानी co-production की संभावनाओं का रास्ता भी खुला है। Javelin की खासियत केवल यह नहीं है कि वह एक आधुनिक एंटी-टैंक मिसाइल है। यह एक man-portable, fire-and-forget प्रणाली है, यानी सैनिक मिसाइल दागने के बाद लक्ष्य पर लगातार नजर बनाए रखने के लिए उसी स्थान पर मौजूद रहने को मजबूर नहीं होता। यही क्षमता युद्धक्षेत्र में सैनिकों की survivability बढ़ाती है। अमेरिकी दूतावास के मुताबिक Javelin भारी बख्तरबंद वाहनों के अलावा कई दूसरे battlefield targets को भी निशाना बना सकती है और अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों में इस्तेमाल की जा सकती है। तेज engagement और उसके बाद तुरंत position बदलने की क्षमता इसे infantry के लिए खास तौर पर उपयोगी बनाती है। इसे भी पढ़ें: Shaurya Path: Kirana Hills और Skardu को लेकर पूर्व CDS Anil Chauhan के खुलासों से चौंकी दुनिया, Pakistan बात करना चाह रहा था, मगर India... भारत के लिए यह जरूरत अचानक पैदा नहीं हुई है। भारतीय सेना करीब 2009 से ही आधुनिक तीसरी पीढ़ी की anti-tank guided missile प्रणाली की तलाश में रही है। जरूरत ऐसी मिसाइल की थी जो हल्की हो, सटीक हो और fire-and-forget क्षमता से लैस हो, ताकि पुरानी wire-guided प्रणालियों की सीमाओं से बाहर निकला जा सके। लेकिन तकनीक हस्तांतरण, लागत, खरीद प्रक्रिया और बाद में स्वदेशी विकास पर जोर जैसी वजहों से आधुनिक ATGM की तलाश लंबे समय तक खिंचती रही। यही वजह है कि Javelin का मौजूदा सौदा केवल एक और विदेशी हथियार खरीद के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह भारतीय सेना की तत्काल operational जरूरत और दीर्घकालिक रक्षा औद्योगिक रणनीति के बीच एक पुल बन सकता है। अमेरिकी दूतावास ने साफ तौर पर कहा है कि LOA पर हस्ताक्षर के बाद भारत Javelin system का ग्राहक बन गया है और यह समझौता दोनों देशों के रक्षा उद्योगों के बीच भविष्य के सहयोग के लिए दरवाजा खोलता है। यानी असली रणनीतिक महत्व मिसाइलों की संख्या से कहीं आगे है। देखा जाये तो इस सौदे का सामरिक महत्व भी बेहद स्पष्ट है। भारत को ऐसे युद्धक्षेत्र में अपनी infantry की anti-armour क्षमता मजबूत करनी है जहां बख्तरबंद वाहनों के खिलाफ तेजी से प्रतिक्रिया और सटीक प्रहार महत्वपूर्ण हो जाते हैं। Javelin की portability का अर्थ है कि इसे अग्रिम मोर्चे पर तैनात सैनिक अपेक्षाकृत लचीले ढंग से इस्तेमाल कर सकते हैं। Fire-and-forget क्षमता सैनिक को launch के बाद तुरंत reposition करने की सुविधा देती है। ऐसे में missile केवल दुश्मन के armour को निशाना बनाने का साधन नहीं रहती, बल्कि छोटे infantry units की tactical flexibility बढ़ाने वाला हथियार बन जाती है। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों की दिशा का है। अमेरिकी राजदूत Sergio Gor ने कहा है कि यह समझौता अमेरिकी समर्थन की गहराई को दिखाता है और दोनों देशों के रक्षा उद्योगों के लिए नए अवसर पैदा करता है। वॉशिंगटन की नजर में भारत केवल हथियारों का खरीदार नहीं, बल्कि भविष्य के defence industrial cooperation का साझेदार भी बन सकता है। अमेरिकी दूतावास ने दोनों देशों के defence industrial bases को मजबूत करने की संभावना पर विशेष जोर दिया है। देखा जाये तो यहीं से इस सौदे का रणनीतिक महत्व बढ़ जाता है। भारत एक ओर अपनी सैन्य क्षमता को तेजी से आधुनिक बनाना चाहता है, वहीं दूसरी ओर रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में यदि Javelin के क्षेत्र में co-production की संभावना वास्तविक औद्योगिक साझेदारी में बदलती है, तो भारत को केवल तैयार हथियार हासिल करने की बजाय अमेरिकी defence technology और manufacturing ecosystem के साथ अधिक गहरा जुड़ाव मिल सकता है। यह भारत के लिए लंबी अवधि में अधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी। हालांकि एक बात अभी साफ नहीं है कि भारत कितने Javelin systems खरीद रहा है और इस खरीद की कुल कीमत कितनी है। अमेरिकी दूतावास और रक्षा मंत्रालय ने इन विवरणों को सार्वजनिक नहीं किया है। इसलिए इस सौदे को तत्काल बड़े पैमाने की anti-tank क्षमता में बदलाव मानना जल्दबाजी होगी। फिलहाल इसकी सबसे बड़ी अहमियत यह है कि भारत ने Javelin को अपने सैन्य विकल्पों में शामिल कर लिया है और साथ ही अमेरिका के साथ रक्षा औद्योगिक सहयोग का एक और दरवाजा खोल दिया है। बहरहाल, Javelin सौदे का संदेश दो स्तरों पर है। युद्धक्षेत्र के लिए भारत अपनी infantry को ज्यादा सटीक, मोबाइल और survivable anti-armour क्षमता देना चाहता है; और रणनीतिक स्तर पर वॉशिंगटन के साथ रक्षा संबंध को खरीददार-विक्रेता के रिश्ते से आगे ले जाना चाहता है। अगर co-production की बात जमीन पर उतरती है, तो यही सौदा आने वाले वर्षों में भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी के अगले चरण की शुरुआत साबित हो सकता है। नीरज कुमार दुबे
BJP Social Media Campaign: क्या विरोधियों को ताकत से कुचलेगी Modi Govt?
'यह संस्मरण है या उसका सियासीकरण', सोनिया गांधी की किताब पर विवाद को लेकर बोले मुख्तार अब्बास नकवी
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दिल्ली-एनसीआर में महंगी हुई CNG: ₹3.89 प्रति किग्रा बढ़े दाम, जानें नई दरें
दिल्ली-एनसीआर में सीएनजी की कीमतों में 3.89 रुपये प्रति किलोग्राम की वृद्धि के बाद शनिवार को लोगों ने इस वृद्धि के प्रभाव पर चिंता व्यक्त की और इसे बढ़ती मुद्रास्फीति के बीच मध्यम वर्ग पर एक अतिरिक्त बोझ बताया है।
Kharge 'शुद्धिकरण' पर बवाल! Rahul Gandhi ने Dalit अपमान पर Modi को घेरा
भाजपा में घमासान, जुएल ओराम का बड़ा आरोप- मुझे केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटाने की रच रहे साजिश
केंद्रीय मंत्री जुएल ओराम ने भाजपा के कुछ नेताओं पर उन्हें मंत्रिमंडल से हटाने और बदनाम करने की साजिश का आरोप लगाया। उनके ‘हाथ काटने’ वाले बयान पर विपक्ष ने निशाना साधा।
पश्चिम बंगाल का जादवपुर विश्वविद्यालय एक समय देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में गिना जाता था, लेकिन आज कैंपस से ज्ञान, शोध और अकादमिक विमर्श की बजाय ‘आजादी’ के नारे और विवादित राजनीतिक गतिविधियों की खबरें सुर्खियां बन रही हैं। यहां सवाल उस मानसिकता का है जो भारत में रहते हुए भारत से ही ‘आजादी’ की मांग करने तक पहुंच जाती है। देखा जाए तो ‘कश्मीर मांगे आजादी’ जैसे उद्घोष और माओवादी नेता किशनजी के समर्थन में लिखे नारों ने एक बेहद असहज सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर विश्वविद्यालय के भीतर किस तरह की राजनीति और किस तरह की मानसिकता को जगह दी जा रही है? ऐसे लोगों को लेकर पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का रुख बिल्कुल स्पष्ट और सख्त है। उन्होंने दो टूक अंदाज में कहा है कि वे इस ‘बीमारी’ को जानते हैं और इसकी ‘दवा और इलाज’ भी जानते हैं। इसे भी पढ़ें: Suvendu Adhikari ने फुटपाथ वाली महिला को दिया आवास का भरोसा, TMC पर साधा निशाना देखा जाए तो जादवपुर की घटना ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि विश्वविद्यालयों को वैचारिक स्वतंत्रता का केंद्र बनाए रखा जाए या ऐसी राजनीति का अखाड़ा बनने दिया जाए, जो धीरे-धीरे पूरे अकादमिक माहौल को विषाक्त कर देती है। यह सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि ‘आजादी’ शब्द अपने आप में समस्या नहीं है। लोकतंत्र में हर नागरिक को अपनी बात कहने, असहमति जताने और सरकार की आलोचना करने का अधिकार है। लेकिन जब ‘आजादी’ का नारा भारत की संप्रभुता और अखंडता पर सवाल उठाने वाले नारों के साथ जुड़ता है, तब उसे महज छात्र राजनीति या वैचारिक असहमति कहकर टाल देना भी उचित नहीं होगा। जादवपुर में उठे नारों के संदर्भ में यही सबसे बड़ा प्रश्न है कि आखिर किससे और किस चीज से आजादी मांगी जा रही है? शुभेंदु अधिकारी ने इसी सवाल को बेहद तीखे अंदाज में उठाया है। विश्वविद्यालय के बाहर करीब दस हजार लोगों की मौजूदगी में ‘वंदे मातरम्’ कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि शिक्षा परिसरों में इस तरह के नारे बंद होने चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि जिस आजादी के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस, खुदीराम बोस, भगत सिंह, मातंगिनी हाजरा और अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना जीवन बलिदान कर दिया, उस आजादी को हासिल किए दशकों बीत चुके हैं। शुभेंदु अधिकारी के इस कड़े रुख की तारीफ इसलिए होनी चाहिए कि उन्होंने उस असहज सवाल को उठाने का साहस किया है जिसे अक्सर राजनीतिक शुद्धता के नाम पर दबा दिया जाता है। विश्वविद्यालय विचारों की प्रयोगशाला हो सकता है, लेकिन वह राष्ट्र-विरोधी हिंसक विचारधाराओं का सुरक्षित अड्डा नहीं बन सकता। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और देश की अखंडता को चुनौती देने के बीच एक स्पष्ट रेखा है। उस रेखा को जानबूझकर धुंधला करना लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा नहीं, बल्कि उनका दुरुपयोग है। सबसे चिंता की बात यह है कि जादवपुर की घटना को अलग-थलग घटना मानकर छोड़ देना वास्तविक समस्या से आंखें मूंदना होगा। देश के कई विश्वविद्यालयों में पिछले वर्षों में ऐसे नारे और ऐसी राजनीति कैंपस के अकादमिक वातावरण पर भारी पड़ी है। जेएनयू हो, हैदराबाद विश्वविद्यालय हो या दूसरे परिसरों में उभरे अतिवादी छात्र राजनीतिक संघर्ष हों, जब विश्वविद्यालय में पढ़ाई से ज्यादा पहचान की राजनीति, वैचारिक ध्रुवीकरण, हिंसक टकराव और उकसाऊ नारों को महत्व मिलने लगता है तो अंततः सबसे बड़ा नुकसान छात्रों की शिक्षा और संस्थान की प्रतिष्ठा को होता है। जादवपुर को लेकर शुभेंदु अधिकारी ने इसी संदर्भ में जेएनयू और उस्मानिया विश्वविद्यालय का उदाहरण देते हुए कैंपस को ‘सुधारने’ की बात कही है। यहां एक और सवाल पूछा जाना चाहिए। जो लोग हर मुद्दे पर ‘आजादी’ का नारा लगाते हैं, क्या वे देश के संविधान, लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों को भी उसी गंभीरता से स्वीकार करते हैं? क्या उन्हें उन सैनिकों की चिंता है जो देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए शहीद हो जाते हैं? क्या उन्हें उन नागरिकों की चिंता है जो आतंकवाद का शिकार होते हैं? और यदि उनकी लड़ाई अन्याय के खिलाफ है तो वह लड़ाई विश्वविद्यालय की कक्षाओं, शोध और लोकतांत्रिक बहस के जरिए क्यों नहीं लड़ी जाती? बेशक, सरकार या मुख्यमंत्री को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि वैध असहमति को दबाया न जाए। किसी छात्र को केवल विचार रखने के कारण देशद्रोही करार देना भी लोकतांत्रिक रास्ता नहीं है। लेकिन यही सिद्धांत दूसरी तरफ भी लागू होना चाहिए कि विचारधारा के नाम पर देश की संप्रभुता और अखंडता को चुनौती देने वाले नारों को भी ‘छात्र अधिकार’ का कवच नहीं मिल सकता। देखा जाए तो जादवपुर का सवाल इसलिए सिर्फ एक विश्वविद्यालय का सवाल नहीं है। यह उस दिशा का सवाल है जिसमें देश के विश्वविद्यालय आगे बढ़ेंगे। क्या वे ज्ञान, शोध, तर्क और राष्ट्रनिर्माण के केंद्र बनेंगे या राजनीतिक कट्टरता के अखाड़े? शुभेंदु अधिकारी ने कम से कम इस बहस को सामने लाने का काम किया है। अब जरूरत है कि विश्वविद्यालय प्रशासन भी साफ करे कि कैंपस में विचारों की आजादी होगी, लेकिन हिंसा, धमकी और देश की अखंडता के खिलाफ उकसावे के लिए कोई आजादी नहीं होगी। बहरहाल, आखिर विश्वविद्यालय वह जगह है जहां आने वाली पीढ़ियां देश का भविष्य लिखती हैं। वहां अगर ‘आजादी’ का अर्थ भारत से आजादी तक पहुंचने लगे, तो सवाल नारे लगाने वालों से पूछा ही जाना चाहिए कि जिस देश ने आपको बोलने की आजादी दी, आखिर उसी देश से आपको किस आजादी की तलाश है?
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उपराष्ट्रपति ने बच्चों संग तो ओम बिरला ने लाड़ली बहनों संग मनाया त्योहार, नितिन नवीन को महिला कार्यकर्ताओं ने बांधी राखी
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नेपाल बाढ़ त्रासदी में 160 से ज्यादा मौतें, भारत हर संभव मदद के लिए तैयार: संजय निरुपम
रक्षाबंधन 2026: एक राखी, अनेक संकल्प
“येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥” जिस रक्षा सूत्र से महाबली राजा बलि को बाँधा गया था, उसी रक्षा-सूत्र से मैं तुम्हें बाँधता हूँ। हे रक्षासूत्र! तुम अडिग रहना, अपने संकल्प से कभी विचलित मत होना। रक्षाबंधन पर धागों पर बंधन एक संकल्प है। वह धागा राखी का नहीं, रिश्तों का होता है। बहन जब भाई की कलाई पर राखी बाँधती है तो वह केवल धागा नहीं बाँधती। वह अपने बचपन को बाँधती है, अपनी स्मृतियों को बाँधती है, अपने विश्वास को बाँधती है। उसकी आँखों में एक मौन प्रार्थना होती है- “भैया! जीवन चाहे जितना बदल जाए, हमारे रिश्ते का यह विश्वास कभी मत बदलना।” और भाई भी जब बहन की ओर देखता है तो उसके मन में एक संकल्प जन्म लेता है- “तुम्हारे जीवन में कोई कठिनाई आए तो मैं तुम्हारे साथ खड़ा रहूँगा।” यही रक्षाबंधन है। भारतीय संस्कृति की सुंदरता यह है कि वह किसी पर्व को केवल व्यक्तिगत संबंध तक सीमित नहीं रखती। वह एक छोटे से पारिवारिक संस्कार को भी व्यापक सामाजिक संदेश में बदल देती है। रक्षा केवल बहन की नहीं करनी है। रक्षा रिश्तों की करनी है। रक्षा संस्कारों की करनी है। रक्षा समाज की करनी है। रक्षा संस्कृति की करनी है। रक्षा राष्ट्र की करनी है। और रक्षा उस प्रकृति की करनी है, जिसके बिना हमारा अस्तित्व ही संभव नहीं। इसे भी पढ़ें: रिश्तों की पवित्रता और सुरक्षा के संकल्प का पर्व रक्षाबंधन हम अक्सर कहते हैं कि देश की रक्षा सैनिक करते हैं। यह सत्य है और इस सत्य के सामने हमारा सिर श्रद्धा से झुक जाता है। सीमा पर खड़ा सैनिक अपने घर की राखी छोड़कर राष्ट्र की रक्षा के लिए तैनात रहता है। वह जानता है कि उसके पीछे करोड़ों परिवार चैन की नींद सो रहे हैं। किसी सैनिक की कलाई पर बँधी राखी में भारत माता की रक्षा का आशीर्वाद भी होता है। कल्पना कीजिए उस बहन की, जो अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधते हुए मन ही मन कहती होगी- “भैया! तुम देश की सीमा पर रहकर लाखों बहनों की रक्षा करना, मैं यहाँ तुम्हारे लौटने की प्रार्थना करूँगी।” यह भाव केवल एक परिवार का नहीं है। यह पूरे राष्ट्र का भाव है। लेकिन राष्ट्र की रक्षा केवल सीमा पर नहीं होती। जब कोई शिक्षक अपने विद्यार्थियों में चरित्र का निर्माण करता है, तब वह राष्ट्र की रक्षा करता है। जब कोई किसान कठिन परिश्रम करके खेत में अन्न उगाता है, तब वह राष्ट्र की रक्षा करता है। जब कोई चिकित्सक ईमानदारी से रोगी का उपचार करता है, तब वह राष्ट्र की रक्षा करता है। जब कोई वैज्ञानिक देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए अनुसंधान करता है, तब वह राष्ट्र की रक्षा करता है। और जब एक सामान्य नागरिक ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाता है, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करता है, कानून का सम्मान करता है और देश की एकता को मजबूत करता है, तब वह भी राष्ट्र की रक्षा करता है। इस रक्षाबंधन पर हमें अपने भीतर एक अदृश्य राखी बाँधनी चाहिए, जो कर्तव्य करने का संकल्प बन सके। हम आधुनिक बनें, विज्ञान और तकनीक में आगे बढ़ें, दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाएँ- यह आवश्यक है। आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों को भूल जाना नहीं है। राखी केवल बाजार से खरीदा हुआ धागा नहीं है। उसके पीछे हजारों वर्षों की सांस्कृतिक चेतना है। वे यह समझें कि भारतीय पर्व जीवन मूल्यों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुँचाने वाले माध्यम हैं। हमारे त्योहार हमें जोड़ते हैं। वे हमें बताते हैं कि जीवन केवल स्वयं के लिए जीने का नाम नहीं है। हमारे पर्व वास्तव में हमारी संस्कृति की जीवित पाठशालाएँ हैं। इसलिए संस्कृति की रक्षा का अर्थ केवल पुरानी परंपराओं को दोहराना नहीं है। संस्कृति की रक्षा का अर्थ है- उसके मूल्यों को अपने जीवन में उतारना। प्रकृति हमें बार-बार संकेत दे रही है कि अब उसकी रक्षा का समय आ गया है। तो क्यों न इस रक्षाबंधन पर एक नई परंपरा शुरू की जाए? एक राखी भाई की कलाई पर और एक राखी वृक्ष की शाखा पर। यदि एक परिवार हर वर्ष एक वृक्ष की जिम्मेदारी ले ले, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए कितनी बड़ी विरासत तैयार हो सकती है। रक्षा का अर्थ अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व है। हर अधिकार के साथ एक उत्तरदायित्व जुड़ा होता है। जिसकी रक्षा करने का संकल्प लेते हैं, उसके प्रति हमारी जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है। एक राखी, अनेक संकल्प। इस बार जब बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधे तो भाई केवल उपहार देने तक सीमित न रहे। दोनों मिलकर कुछ संकल्प लें- माता-पिता का सम्मान करेंगे। परिवार में संवाद बनाए रखेंगे। बुजुर्गों को अकेला नहीं छोड़ेंगे। बच्चों को संस्कार देंगे। जरूरतमंद की सहायता करेंगे। देश की संपत्ति को अपनी संपत्ति समझेंगे। प्रकृति को नुकसान नहीं पहुँचाएँगे। यदि रक्षाबंधन इन संकल्पों का पर्व बन जाए तो समाज की कितनी समस्याएँ अपने आप कम हो सकती हैं। वस्तुएँ कुछ समय बाद पुरानी हो जाती हैं, लेकिन संकल्प जीवनभर साथ रहता है। रक्षाबंधन की राखी कलाई पर बँधती है, लेकिन उसका अर्थ हृदय में उतरना चाहिए। उसकी डोर हमें बचपन से जोड़ती है, परिवार से जोड़ती है, समाज से जोड़ती है, संस्कृति से जोड़ती है और अंततः राष्ट्र से जोड़ती है। यह धागा हमें बताता है कि जीवन में केवल अपने सुख की चिंता करना पर्याप्त नहीं है। इसलिए इस रक्षाबंधन पर एक राखी कलाई पर बाँधिए और एक संकल्प हृदय में। एक रिश्ता बचाइए। एक बुजुर्ग का हाथ थामिए। एक वृक्ष बचाइए। एक जलस्रोत को स्वच्छ रखिए। तभी राखी का धागा सचमुच मजबूत होगा। यही रक्षाबंधन की सार्थकता है। - डॉ. वन्दना सेन पार्वती बाई गोखले विज्ञान महाविद्यालय जीवाजीगंज, लश्कर ग्वालियर म. प्र.
नेपाल में ग्लेशियर ढहने से आई विनाशकारी बाढ़ ने सिर्फ हिमालय की नाजुक भौगोलिक संरचना को उजागर नहीं किया है, बल्कि भारत की सीमा से सटे तिब्बत में चीन के निर्माणाधीन 60,000 मेगावाट के मेदोग हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट को लेकर भी खतरे की घंटी तेज कर दी है। नेपाल में सैंकड़ों लोगों की मौत और 750 लोगों के लापता होने की खबरों के बीच अब यह सवाल और गंभीर हो गया है कि दुनिया के सबसे सक्रिय भूकंपीय क्षेत्रों में से एक हिमालय में इतना विशाल बांध आखिर कितना सुरक्षित है। हम आपको बता दें कि शुरुआत में नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र में आई इस आपदा को 4.4 तीव्रता के भूकंप से जोड़कर देखा गया था। लेकिन अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (यूएसजीएस) के नए विश्लेषण ने तस्वीर बदल दी। यूएसजीएस के अनुसार, अतिरिक्त भूकंपीय आंकड़ों और उपग्रह तस्वीरों के अध्ययन से पता चला कि यह भूकंप नहीं था, बल्कि ग्लेशियर के ढहने और उसके बाद मलबे के तेज बहाव से उत्पन्न कंपन थे। ऊंचाई वाले इलाके से टूटकर नीचे आया बर्फ और मलबे का विशाल हिस्सा देखते ही देखते विनाशकारी जलप्रवाह में बदल गया और नेपाल के रसुवा तथा धादिंग जिलों में भारी तबाही मचा दी। इसे भी पढ़ें: 15 दिनों के भीतर दो बार एक मंच पर आएंगे मोदी-पुतिन और शी, ट्रंप की बेचैनी बढ़ी इस आपदा में 133 भारतीय नागरिकों समेत सैकड़ों लोग लापता बताए गए हैं। बड़ी संख्या में कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए श्रद्धालुओं के भी प्रभावित होने की खबर है। घर, सड़कें और बिजली परियोजनाएं पानी के तेज बहाव में बह गईं। भू-आकृति विशेषज्ञ डेनियल शुगर के आकलन के मुताबिक, ऊंचाई वाले क्षेत्र में ग्लेशियर के खिसककर टूटने और पिघलती बर्फ से बने पानी ने इस भयावह घटना को जन्म दिया। लेकिन नेपाल की यह त्रासदी अब भारत के लिए एक बड़ी चेतावनी के रूप में देखी जा रही है। इसकी वजह है चीन का मेदोग या मोटुओ हाइड्रोपावर स्टेशन, जिसका निर्माण यारलुंग त्सांगपो नदी पर किया जा रहा है। यही नदी भारत में प्रवेश करते ही अरुणाचल प्रदेश में सियांग और आगे असम में ब्रह्मपुत्र कहलाती है। करीब 60 गीगावाट क्षमता वाली यह परियोजना पूरी होने पर दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना बन सकती है। इसके 2033 तक चालू होने का लक्ष्य बताया गया है। परियोजना की अनुमानित लागत 137 अरब डॉलर से 170 अरब डॉलर के बीच है और इसमें यारलुंग त्सांगपो के विशाल मोड़ वाले क्षेत्र में पांच चरणों में जलविद्युत ढांचा विकसित करने की योजना है। सबसे बड़ा सवाल इसकी विशालता नहीं, बल्कि इसका स्थान है। मेदोग परियोजना उस हिमालयी क्षेत्र में बनाई जा रही है जहां भारतीय और यूरेशियाई टेक्टोनिक प्लेटों का टकराव होता है। जुलाई में चीन की सरकारी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण व्यवस्था से जुड़े भूवैज्ञानिकों के एक अध्ययन ने भी परियोजना स्थल के नीचे सक्रिय पाइझेन फॉल्ट होने की बात कही थी। यानी जिस क्षेत्र में धरती की हलचल स्वयं एक स्थायी खतरा है, वहीं दुनिया का सबसे विशाल बांध खड़ा किया जा रहा है। रणनीतिक विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने इसे “वॉटर बम” की संज्ञा देते हुए चेतावनी दी है कि किसी बड़े भूकंप, भूस्खलन, हिमस्खलन या अचानक जलप्रवाह की स्थिति में इसका असर भारत के पूर्वोत्तर और आगे बांग्लादेश तक पड़ सकता है। पूर्व राजदूत राजीव डोगरा ने भी अरुणाचल और असम के लिए कहीं बड़ी तबाही की आशंका जताई है। वहीं भारत की चिंता केवल संभावित बांध दुर्घटना तक सीमित नहीं है। चीन नदी के ऊपरी हिस्से को नियंत्रित करता है। हालांकि ब्रह्मपुत्र के जल का बड़ा हिस्सा भारत में मानसूनी सहायक नदियों से आता है, फिर भी तिब्बत से छोड़े जाने वाले पानी की मात्रा और समय में बड़े बदलाव अरुणाचल और असम के लिए गंभीर समस्या पैदा कर सकते हैं। भारी बारिश के दौरान अचानक बड़ी मात्रा में पानी छोड़ा गया तो बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है, जबकि सूखे दौर में प्रवाह कम होने से कृषि, मत्स्य पालन और स्थानीय समुदाय प्रभावित हो सकते हैं। अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू पहले ही इस परियोजना को अस्तित्व से जुड़ा खतरा बता चुके हैं। भारत ने जवाबी रणनीति के तौर पर सियांग नदी पर 11,000 मेगावाट की अपर सियांग मल्टीपर्पज परियोजना को आगे बढ़ाया है, जिसका एक उद्देश्य ऊपरी हिस्से से आने वाले अचानक जलप्रवाह को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा कवच तैयार करना है। हालांकि इस परियोजना को लेकर अपर सियांग की आदि जनजातीय समुदायों में विस्थापन और पारदर्शिता को लेकर विरोध भी मौजूद है। देखा जाये तो नेपाल की त्रासदी ने पूर्व चेतावनी का एक गंभीर सवाल खड़ा किया। आरोप है कि तिब्बत की ओर से आने वाली इस विशाल जलराशि के बारे में नेपाल को समय पर सूचना नहीं मिली। भारत के लिए भी यह चिंता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन और भारत के बीच ऐसा कोई व्यापक जल-साझेदारी समझौता नहीं है, जिसके तहत वास्तविक समय में व्यापक हाइड्रोलॉजिकल जानकारी साझा करना अनिवार्य हो। हिमालय ने नेपाल की बाढ़ के जरिए एक बार फिर बता दिया है कि यहां खतरा केवल भूकंप का नहीं है। ग्लेशियर ढह सकते हैं, पहाड़ टूट सकते हैं, भूस्खलन नदी का रास्ता बदल सकते हैं और देखते ही देखते शांत जलधारा विनाश की दीवार बन सकती है। ऐसे में सक्रिय फॉल्ट लाइन के ऊपर खड़ा हो रहा चीन का मेदोग मेगा डैम केवल इंजीनियरिंग परियोजना नहीं, बल्कि भारत की जल सुरक्षा, पर्यावरण, आपदा प्रबंधन और रणनीतिक सुरक्षा से जुड़ा एक गंभीर प्रश्न है। बहरहाल, नेपाल की तबाही एक स्थानीय आपदा भर नहीं है। यह पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए चेतावनी है, क्योंकि पहाड़ जब करवट लेता है, तो सीमाएं उसकी तबाही को रोक नहीं पातीं। -नीरज कुमार दुबे
फरक्का समझौता को बिहार-झारखंड के लिए अभिशाप नहीं वरदान बनाइए, समझिए कैसे बनेगा?
“फरक्का समझौता बिहार-झारखंड के लिए अभिशाप है” यह कहना एक राजनीतिक व क्षेत्रीय तर्क के रूप में तो समझ में आता है, लेकिन तथ्यात्मक रूप से एक जरूरी फर्क यह भी है कि वास्तविक समस्या केवल 1996 के भारत-बांग्लादेश जल-बंटवारा समझौते की नहीं, बल्कि फरक्का बैराज की जल-प्रवाह व्यवस्था, गाद (silt) जमाव और उससे पैदा हुए नदी-भूगोल की भी है, जिस पर गहन चिंतन मनन आवश्यक है ताकि बिहार को बाढ़ के मामले में 1972 के बाद से ही जिस अप्राकृतिक और अमानवीय परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, उससे मुक्ति मिले। यही नहीं, इस केंद्रीय नीति से बिहार को बाढ़ जनित होने वाली वार्षिक जन-धन की हानि व फसल क्षति और आधारभूत संरचना यानी सड़क/रेल आदि की व्यापक क्षति का वार्षिक मुआवजा मिले, जो कि फरक्का बराज से लाभान्वित होने वाले समूहों से वसूला जाए। चूंकि इस मानव कृत आपदा से यूपी के दो जिले गाजीपुर और बलिया जनपद तक प्रभावित होते हैं। इसलिए मुआवजा उन्हें भी मिलना चाहिए। इसे भी पढ़ें: Mecca Defence Pact के बहाने बदल रहा है Bangladesh का रणनीतिक खेल, भारत को चारों ओर से घेरने की तैयारी! यह बात मैं नहीं, बल्कि इस मामले से जुड़े लोगों ने अपने गहन अनुभवों के द्वारा समय समय पर अभिव्यक्त किया है, जो मेरी स्मृतियों में अब तक सुरक्षित है। वक्त वक्त पर इस पूरे क्षेत्र की बाढ़ आपदा मीडिया रिपोर्टिंग टीम का अंग होने नाते भी इस बारे में विविधता पूर्ण जानकारी मुझे हासिल है। पीड़ित बुजुर्ग खुद बताते आये हैं कि 1972 के बाद बाढ़ आपदा स्थायी हुई है, पहले तो पानी आता और चला जाता, इतना जमता नहीं! मुझे खुशी है कि अपनी प्रभुत्व वाली सत्ता जाने के बाद ही सही लेकिन जनता दल यूनाइटेड को सद्बुद्धि आ गई है और उसके राज्य सभा सदस्य संजय झा इस मामले में मुखर हैं। इसी में राज्य हित भी निहित है। सीधा सवाल है कि आखिर जब केंद्र सरकार बिहार के दूरगामी हितों की रक्षा नहीं करेगी तो फिर कौन करेगा? वो भी तब, जब बिहार-पश्चिम बंगाल में और केंद्र में भी भाजपा/एनडीए गठबंधन की ही सरकार हो? वहीं, इस समझौते से लाभान्वित होने वाला बंगलादेश अब भारत का हितैषी नहीं, बल्कि चीन-पाकिस्तान की प्रतिशोधी भाषा बोलने को अभिशप्त हो! ऐसे में उसे कूटनीतिक पाठ पढ़ाने का भी यही असली मौका है। # जानिए की बिहार के लिए संकट कहाँ है? पहला, गंगा की प्राकृतिक धारा में हस्तक्षेप: फरक्का बैराज 1975 में चालू हुआ। इसका मूल उद्देश्य गंगा से पानी हुगली में मोड़कर कोलकाता बंदरगाह में गाद जमने की समस्या कम करना था। समस्या यह है कि गंगा जैसी अत्यधिक गाद वाली नदी को बैराज से नियंत्रित करने पर ऊपर की ओर sediment deposition और नदी की morphology में बदलाव होता है। शोध में भागलपुर से फरक्का तक के क्षेत्र में 1973–2019 के दौरान नदी के स्वरूप, कटाव और द्वीप/बालू जमाव में बड़े बदलाव दर्ज किए गए हैं; अध्ययन ने फरक्का बैराज को upstream flooding और planform बदलाव की बढ़ी दर से जोड़ा है। दूसरा, बिहार का “बाढ़–कटाव” संकट: गंगा की तलहटी में गाद बढ़ने से नदी की जलधारण क्षमता घट सकती है। एक शोध में कहा गया है कि निचली गंगा के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर siltation से channel capacity कम हुई है, जिसके कारण अपेक्षाकृत कम discharge पर भी गंभीर बाढ़ हो सकती है; शोध ने फरक्का को नदी की morphology प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण कारकों में शामिल किया है। यही वजह है कि भागलपुर, मुंगेर, कटिहार और आसपास के गंगा-तटीय इलाकों में बाढ़ तथा कटाव को फरक्का के प्रश्न से अलग करके देखना अधूरा होगा—हालाँकि यह कहना भी वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा कि इन जिलों की हर बाढ़ केवल फरक्का के कारण होती है। लेकिन यह हकीकत है कि पश्चिम बंगाल के ऊपरी जिलों में पानी पहुंचाने के लिए जब तक बराज का गेट बंद रखा जाता है तो रुका हुआ पानी पूर्वी उत्तरप्रदेश के दो जिलों तक के जल स्तर को ऊंचा उठा देता है, जो कृत्रिम बाढ़ समझा जाता है। तीसरा, झारखंड पर भी अप्रत्यक्ष असर: राजमहल–साहिबगंज क्षेत्र गंगा के उसी नदी-तंत्र में है। फरक्का के ऊपर नदी के प्रवाह, sediment deposition और channel migration में बदलाव का असर झारखंड के साहिबगंज–राजमहल क्षेत्र की तटीय भूमि और कटाव पर पड़ सकता है। अध्ययन में राजमहल क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण deposition दर्ज किया गया है। # असली राजनीतिक सवाल यह कि पानी किसका? 1996 की गंगा जल बंटवारा संधि में भारत और बांग्लादेश के बीच फरक्का पर जनवरी से मई तक lean season में पानी बांटने का फार्मूला तय किया गया था। यह संधि 30 वर्ष के लिए थी और 2026 में इसकी अवधि समाप्त हो रही है। यहीं बिहार का तर्क ज्यादा गंभीर हो जाता है: सवाल है कि जब गंगा का पानी बिहार से होकर गुजरता है और बाढ़, कटाव तथा गाद का बोझ बिहार झेलता है, तो भविष्य की जल-संधि बनाते समय बिहार की जल-आवश्यकताओं और नदी-प्रबंधन को निर्णायक महत्व क्यों न मिले? मसलन, संधि में फरक्का पर उपलब्ध जल के आधार पर भारत-बांग्लादेश के बीच हिस्सेदारी का फार्मूला है—70,000 क्यूसेक या उससे कम पर 50:50 आदि। लेकिन बिहार की बाढ़, गाद, भूजल, सिंचाई, पेयजल और भविष्य की जल-जरूरत को उसी स्तर पर द्विपक्षीय जल-बंटवारे के केंद्र में नहीं रखा गया। यही वह जगह है जहाँ बिहार को लगता है कि वह नदी का ऊपरी प्रवाह क्षेत्र का हितधारक होते हुए भी निर्णय-प्रक्रिया में पर्याप्त आवाज नहीं रखता। लेकिन यहां पर एक महत्वपूर्ण सावधानी भी बरतनी है। इसे केवल “फरक्का समझौते ने बिहार को बर्बाद कर दिया” कहना अतिशयोक्ति होगी। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार गंगा की अस्थिरता के पीछे प्राकृतिक sediment load, सहायक नदियाँ, नदी की बहुत कम ढाल, जलवायु/वर्षा, upstream water abstraction और मानवीय हस्तक्षेप—कई कारण हैं। फरक्का उनमें एक महत्वपूर्ण कारक है, अकेला कारण नहीं। इसलिए 2026 में बिहार की मांग क्या होनी चाहिए? यक्ष प्रश्न है। मेरे हिसाब से मुद्दा “बांग्लादेश को पानी देना बंद करो” नहीं होना चाहिए, बल्कि “भारत-बांग्लादेश समझौता + बिहार-झारखंड की जल-सुरक्षा + राष्ट्रीय गाद प्रबंधन नीति + गंगा की ecological flow को दृष्टिगत रखते हुए एक समग्र समझौता” होना चाहिए। और इसमें पाँच बातें अनिवार्य होनी चाहिए— एक, बिहार की न्यूनतम जल-आवश्यकता पहले निर्धारित हो। दो, गंगा की गाद के वैज्ञानिक प्रबंधन की राष्ट्रीय नीति बने। तीन, भागलपुर–मुंगेर–साहिबगंज–राजमहल क्षेत्र के कटाव को अंतरराज्यीय/राष्ट्रीय परियोजना माना जला। चार, फरक्का के gate operation का real-time scientific review हो। पांच, भविष्य की भारत-बांग्लादेश संधि में बिहार और झारखंड की संस्थागत भागीदारी हो। यानी असली सवाल “फरक्का रहे या हटे?” से आगे है—“फरक्का के कारण पैदा हुए जल, गाद और बाढ़ के लाभ-हानि का न्यायपूर्ण बंटवारा कौन सुनिश्चित करेगा?” और यही बिहार की सबसे मजबूत दलील बन सकती है। इसलिए फरक्का समझौता को बिहार-झारखंड के लिए अभिशाप नहीं वरदान बनाइए। अगर उपर्युक्त बातों पर गौर करेंगे तो यह असंभव नहीं होगा। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
15 दिनों के भीतर दो बार एक मंच पर आएंगे मोदी-पुतिन और शी, ट्रंप की बेचैनी बढ़ी
भारतीय विदेश मंत्रालय ने आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एससीओ शिखर सम्मेलन में शिरकत करने की पुष्टि करते हुए उनके उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान दौरे के कार्यक्रम के बारे में जानकारी दी जिसके बाद पूरी दुनिया में हलचल-सी मच गयी है। हलचल इसलिए मची है क्योंकि जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक बार फिर एक साथ दिखाई देंगे, तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सीने पर पिछले साल की तरह फिर से सांप लोट सकते हैं। पिछली बार चीन के तियानजिन में एससीओ मंच पर इन तीन नेताओं की तस्वीर ने अमेरिकी रणनीतिक हलकों में बेचैनी बढ़ा दी थी। तब पूर्व अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने ट्रंप की टैरिफ नीतियों को भारत-अमेरिका रिश्तों को दशकों पीछे धकेलने वाला कदम बताया था और कहा था कि ऐसी नीतियों ने मोदी को पुतिन और शी के और करीब पहुंचा दिया। अब दृश्य और बड़ा है। पहले मध्य एशिया, फिर नई दिल्ली यानि पहले एससीओ और उसके तुरंत बाद ब्रिक्स। संदेश साफ है कि भारत किसी की रणनीतिक जागीर नहीं है। देखा जाये तो प्रधानमंत्री मोदी की उज्बेकिस्तान यात्रा और किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में 31 अगस्त से 1 सितंबर तक होने वाला एससीओ शिखर सम्मेलन ऐसे समय पर हो रहा है, जब मध्य एशिया वैश्विक शक्ति संघर्ष का नया मैदान बन चुका है। चीन बेल्ट एंड रोड के जरिए अपनी पकड़ बढ़ा रहा है, रूस इस क्षेत्र को अपने पारंपरिक प्रभाव क्षेत्र के रूप में देखता है और अमेरिका भी यहां अपनी मौजूदगी तथा रणनीतिक पहुंच बनाए रखने की कोशिश में है। ऐसे में मोदी की सक्रिय कूटनीति भारत को खेल का महत्वपूर्ण खिलाड़ी बना रही है। इसे भी पढ़ें: दुश्मनों पर दनादन बरसेंगी मिसाइलें, भारत में Private Companies भी बनाएंगी Missiles, Rajnath Singh ने DRDO की Technology Transfer को दी मंजूरी उज्बेकिस्तान इस रणनीति का अहम केंद्र है। मोदी की प्रस्तावित ताशकंद यात्रा व्यापार, रक्षा, निवेश, कनेक्टिविटी, डिजिटल तकनीक, ऊर्जा और महत्वपूर्ण खनिजों जैसे क्षेत्रों में सहयोग को नई गति दे सकती है। पिछले पांच वर्षों में भारत-उज्बेकिस्तान व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और द्विपक्षीय कारोबार लगभग 1.3 अरब डॉलर तक पहुंचने का उल्लेख किया गया है। भारत का निवेश फार्मास्यूटिकल्स, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में फैला है, जबकि भारतीय विश्वविद्यालय भी उज्बेकिस्तान में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। लेकिन इस यात्रा की असली ताकत केवल व्यापार के आंकड़ों में नहीं है। उज्बेकिस्तान भारत की मध्य एशिया रणनीति का महत्वपूर्ण प्रवेश द्वार है। पाकिस्तान द्वारा भूमि मार्ग अवरुद्ध रखने के कारण भारत के सामने संपर्क का प्रश्न लंबे समय से चुनौती बना हुआ है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा यानि आईएनएसटीसी और चाबहार बंदरगाह भारत के लिए सामरिक महत्व रखते हैं। ईरान और पश्चिम एशिया की मौजूदा अस्थिरता ने इन परियोजनाओं की राह कठिन जरूर बनाई है, लेकिन भारत के लिए विकल्प तलाशना अब मजबूरी नहीं, रणनीतिक आवश्यकता है। अफगानिस्तान भी मोदी-मिर्जियोयेव वार्ता का बड़ा मुद्दा हो सकता है। स्थिर अफगानिस्तान के बिना दक्षिण और मध्य एशिया की कनेक्टिविटी, व्यापार और सुरक्षा की कोई भी बड़ी योजना अधूरी है। ताशकंद और नई दिल्ली पुनर्निर्माण, आर्थिक विकास और क्षेत्रीय स्थिरता पर अधिक निकट समन्वय विकसित कर सकते हैं। इसके साथ ही रक्षा सहयोग, ‘दुस्तलिक’ सैन्य अभ्यास, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, विज्ञान-तकनीक और महत्वपूर्ण खनिजों में साझेदारी भारत की मध्य एशिया नीति को नई धार दे सकती है। इसके बाद बिश्केक में एससीओ का मंच मोदी को रूस और चीन समेत प्रमुख यूरेशियाई शक्तियों के साथ सीधे संवाद का अवसर देगा। भारत के लिए एससीओ केवल फोटो-ऑप नहीं है। आतंकवाद, ऊर्जा सुरक्षा, कनेक्टिविटी, आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता, ये सभी भारत के प्रत्यक्ष राष्ट्रीय हित से जुड़े प्रश्न हैं। नई दिल्ली लगातार यह भी रेखांकित करती रही है कि कनेक्टिविटी परियोजनाएं संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करें तथा आतंकवाद के खिलाफ दोहरे मानदंड स्वीकार नहीं किए जा सकते। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू मोदी-पुतिन संबंध हैं। हम आपको बता दें कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर की मॉस्को यात्रा के दौरान पुतिन ने मोदी से एससीओ में मिलने की इच्छा जताई और भारत के लिए उर्वरक आपूर्ति बढ़ाने की बात कही। दोनों देशों के बीच ऊर्जा, व्यापार, परमाणु सहयोग और कृषि जरूरतों से जुड़े रिश्ते लगातार महत्वपूर्ण बने हुए हैं। भारत ने पश्चिमी दबाव के बावजूद अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर रूस के साथ आर्थिक संबंध बनाए रखे हैं और यही मोदी की रणनीतिक स्वायत्तता का सबसे बड़ा प्रमाण है। लेकिन असली भू-राजनीतिक धमाका इसके बाद हो सकता है। 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में पुतिन और शी चिनफिंग की मौजूदगी की संभावना भारत की कूटनीतिक हैसियत को और मजबूत करेगी। यदि मोदी, पुतिन और शी एक ही मंच पर लगातार दो बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में मिलते हैं, तो यह किसी औपचारिक मित्रता की घोषणा नहीं होगी; लेकिन यह जरूर दिखाएगा कि विश्व राजनीति अब एकध्रुवीय निर्देशों पर नहीं चलती। भारत, रूस और चीन के बीच मतभेद मौजूद हैं, विशेषकर भारत-चीन संबंधों में। इसलिए इसे किसी स्थायी त्रिपक्षीय गठबंधन के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। मगर बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, वैश्विक शासन सुधार, ग्लोबल साउथ की आवाज, ऊर्जा सुरक्षा और वैकल्पिक आर्थिक संस्थाओं के सवाल पर तीनों देशों की बातचीत का प्रभाव अमेरिका और पश्चिमी शक्तियों तक जरूर पहुंचेगा। मोदी की उज्बेकिस्तान से बिश्केक और फिर नई दिल्ली तक फैली यह कूटनीतिक श्रृंखला एक बड़े संदेश का निर्माण करती है। संदेश यह है कि भारत अब मध्य एशिया में अपनी पहुंच बढ़ा रहा है, रूस के साथ पुराने रणनीतिक संबंधों को नए आर्थिक आधार दे रहा है, चीन के साथ प्रतिस्पर्धा और संवाद, दोनों को एक साथ साध रहा है और ब्रिक्स जैसे मंचों के जरिए ग्लोबल साउथ की राजनीति को नई दिशा देने की कोशिश कर रहा है। वॉशिंगटन के लिए संदेश इसलिए असहज हो सकता है, क्योंकि दबाव, टैरिफ और रणनीतिक ध्रुवीकरण की राजनीति भारत को किसी खेमे में बांधने की गारंटी नहीं देती। बहरहाल, मोदी की कूटनीति का मूल मंत्र साफ दिखाई देता है कि जहां भारत का हित, वहीं भारत का हाथ। अगले कुछ सप्ताह में ताशकंद, बिश्केक और नई दिल्ली के मंच शायद यही साबित कर दें कि बदलती विश्व व्यवस्था में भारत अपनी शर्तों पर चाल चलने वाला निर्णायक खिलाड़ी है। -नीरज कुमार दुबे
मराठी अस्मिताबोध की नई अभिव्यक्ति
महाराष्ट्र के ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए कामचलाऊ मराठी भाषा जरूरी किए जाने को लेकर विवाद उठना स्वाभाविक है। यह विवाद बांबे हाईकोर्ट भी पहुंच गया है। महाराष्ट्र सरकार ने इस नियम को लागू करते हुए तर्क दिया है कि इससे यात्रियों और टैक्सी-ऑटो चालकों के बीच भरोसा बढ़ेगा और यात्रियों में सुरक्षा का भाव रहेगा। मोटे तौर पर सरकार की यह दलील बेहतर लगती है, लेकिन जब राज्य की टैक्सियों और ऑटो की संख्या और उनके चालकों पर ध्यान देते हैं तो यह सवाल सिर्फ भाषा का नहीं रह जाता, बल्कि उपराष्ट्रीयता के उभार और उसके बहाने राष्ट्रीयता के विचार को चुनौती का भी हो जाता है। इस सोच का सिरा आगे बढ़ते हुए हिंदी विरोध और प्रकारांतर से पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के प्रवासियों की मुखालफत तक जा पहुंचता है। भारतीय राष्ट्रीयता के समर्थन में ‘विविधता में एकता’ का पाठ हर भारतीय को स्कूली घुट्टी में मिला है। लेकिन जीवन की कठोर राहों पर उतरते हैं तो पता चलता है कि राष्ट्रीयता की असल धारा जितनी गहरे तक हिंदी हृदय प्रदेशों में बहती है, उतनी गैर हिंदीभाषी प्रदेशों में नजर नहीं आती। दिलचस्प यह है कि राष्ट्रीयता के पुरजोर पोषक इन इलाकों को उपहास में कभी बीमारू कहा जाता था। इस पर गोबरपट्टी और गोबरनाडु का विशेषण खास धारा की वैचारिकी ने जो चस्पा कर रखा है। इस सोच की प्रमुख वजह आर्थिक रूप से इन इलाकों का अपेक्षाकृत उपराष्ट्रीयता वाले इलाकों से पिछड़े रहना है। इसी वजह से रोजी-रोटी की खातिर महाराष्ट्र के टैक्सी और ऑटो चालकों में सबसे बड़ी संख्या भदेस माने वाले बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश आदि के प्रवासी शामिल हैं। जाहिर है कि मराठी का कामचलाऊ ज्ञान रखने के नियम का शिकार यही लोग ज्यादा हुए हैं। इससे इनकी ही रोजी-रोटी पर संकट बढ़ा है। इसे भी पढ़ें: Maharashtra में Auto Rickshaw, Taxi Drivers के लिए Marathi Mandatory क्यों की गयी? मराठी सीखने के लिए दबाव क्यों डालना? महाराष्ट्र के ताजा आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, राज्य में 12 लाख 96 हजार से ज्यादा ऑटो हैं, जबकि करीब पांच लाख टैक्सियां हैं। यहां के परिवहन विभाग के मुताबिक, अकेले ग्रेटर मुंबई इलाके में करीब पांच लाख टैक्सियां और ऑटो रिक्शा चल रहे हैं। इनमें करीब 75 फीसद ऑटो-टैक्सी चालक गैर मराठी और हिंदीभाषी इलाकों के ही हैं। राज्य के दूसरे इलाकों में करीब आधे ऑटो-टैक्सी चालक हिंदीभाषी हैं। महाराष्ट्र ही क्यों, किसी भी राज्य के सेवा क्षेत्र में कार्य करने वाले लोगों को वहां की स्थानीय भाषा आनी चाहिए। उनके रोजाना का काम स्थानीय भाषा के कामचलाऊ ज्ञान से चल सकता है। बड़ा सवाल यह है कि मराठी के कामचलाऊ ज्ञान का पैमाना क्या हो, महाराष्ट्र सरकार का आदेश इस मसले में स्पष्ट नहीं है। विवाद और परेशानी इस वजह से भी है। सर्विस सेक्टर और रेहड़ी-पटरी लगाने वाले अक्सर कामकाज करते-करते स्थानीय भाषा सीख लेते हैं। दिल्ली के कनॉट प्लेस में हथकरघा और दस्तगारी का सामान बेचने वाली गुजराती महिलाएं कम शिक्षित हैं। लेकिन वे हिंदी ही नहीं, अंग्रेजी, जर्मन और स्पेनिश भी धाराप्रवाह बोल लेती हैं। तमिलनाडु को लेकर धारणा है कि वहां घोर हिंदी विरोधी माहौल है। लेकिन वहां के प्रमुख पर्यटन स्थल महाबलीपुरम् में भीख मांगने वाले भी बहुभाषी मिल जाते हैं, जो हिंदीभाषी सैलानियों से हिंदी में भीख मांगते हैं। वहां घूम-घूमकर छोटे-मोटे सामान बेचने वाली लड़कियां भी तकरीबन अनपढ़ हैं, लेकिन वे हिंदी, गुजराती, बांग्ला आदि बोल लेती हैं। चाहे कनॉट प्लेस के फुटपाथ पर दस्तगारी का सामान बेचने वाली गुजराती महिलाएं हों या कोलकाता की गलियों में दुकान लगाने वाले बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग हों, अगर वे अंग्रेजी और बांग्ला आदि बोलते हैं तो इसकी वजह कोई स्कूली शिक्षा नहीं, बल्कि रोजाना का संपर्क और जरूरत है। ऐसा नहीं कि महाराष्ट्र के ऑटो-टैक्सी चालक मराठी का कामचलाऊ ज्ञान या समझ नहीं रखते। यहां ध्यान रखने की बात है कि अपनी माटी से दूर जब कोई ऑटो या टैक्सी चलाने का काम चुनता है तो वह तत्काल सड़क पर नहीं उतरता। वह पहले सड़कों को पहचानता है, उनकी भाषा को समझने की कोशिश करता है। भाषा विज्ञान की नजर से देखें तो मराठी, गुजराती और राजस्थानी ऐसी भाषाएं नहीं है, जिन्हें आम हिंदीभाषी समझ नहीं सकता। ठीक इसी तरह इन भाषा-भाषियों के लिए हिंदी भी ऐसी भाषा नहीं है, जिसे वे न समझ सकें। भाषा को लेकर जब भी कोई विवाद उठता है, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन का एक इंटरव्यू याद आता है। जिसमें उन्होंने अपनी दादी की चारधाम यात्रा का जिक्र किया था। उनकी दादी ने शायद पिछली सदी के दूसरे दशक में तमिलनाडुके पालघाट इलाके के अपने गांव से चारधाम की यात्रा की थी और महीनों बाद सकुशल वापस लौट आई थीं। शेषन ने कहा था कि उनकी दादी तमिल के अलावा कोई अन्य भाषा नहीं जानती थीं, लेकिन उन्हें चारधाम यात्रा से दिक्कत नहीं हुई। सिर्फ शेषन ही नहीं, सदियों से लोग भारत के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक तीर्थ यात्राएं करते रहे हैं। आज तो तकनीक का विस्तार हो गया है, संचार क्रांति हो चुकी है। जब ये सहूलियतें नहीं थीं, तब क्या तीर्थ यात्राएं रूकीं। तब क्या भाषाएं बाधा बनीं। ऐसे में सवाल यह है कि फिर आज भाषा कैसे चुनौती बन सकती है। कम ही लोग स्वीकार करेंगे, लेकिन राज्यों के पुनर्गठन के लिए बनाए गए फजलुर्रहमान आयोग की रिपोर्ट ही भाषायी उपराष्ट्रीयता को बढ़ावा देने वाली रही। आयोग ने भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की सिफारिश की थी। इसी के नजीतन भारतीय उपराष्ट्रीयताओं को अपनी भाषाओं के बहाने अपना वर्चस्व साबित करने का आधार मिल गया। इसी वजह से आए दिन राज्यों में अपनी भाषाओं को लेकर अस्मिताबोध जागता रहता है। इस बोध के निशाने पर अक्सर हिंदीभाषी ही रहते हैं। महाराष्ट्र सरकार में शामिल एकनाथ शिंदे की शिवसेना के मूल में भी मराठी उपराष्ट्रीयता और अस्मिताबोध रहा है। इस अस्मिताबोध को शिवसेना संस्थापक बाला साहब ठाकरे ने पहली अभिव्यक्ति 1960 के दशक में मुंबई में मलयाली भाषा-भाषियों के खिलाफ आंदोलन के जरिए दी और बाद के दिनों में उनके भतीजे राज ठाकरे तो इस अस्मिताबोध के दबंग पैरोकार बनकर उभरे। केंद्र सरकार और बैंकों आदि की नौकरियों के लिए परीक्षा देने मुंबई-नासिक आदि पहुंचे हिंदीभाषी छात्रों को बाकायदा पीटकर इस भाषा बोध को राज ठाकरे के कथित सैनिक दिखाते रहे। वे भूल गए कि बंग-भंग के खिलाफ आंदोलन के दौरान 1905 में मराठी मानुष के पूज्य पुरूष बाल गंगाधर तिलक ने वाराणसी की यात्रा की थी। इस दौरान ‘काशी नागरी प्रचारिणी सभा’ में दिए एक व्याख्यान में उन्होंने पुरजोर तरीके से ‘हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा ‘ घोषित किया था। मराठी अस्मिताबोध के शोर में तिलक की यह आवाज अक्सर खोती रही है। एक खतरा यह भी है कि मराठी के कामचलाऊ ज्ञान की शर्त राज्य के दूसरे धंधे में काम कर रहे लोगों पर भी बाद में लागू हो सकती है। चूंकि उपराष्ट्रीयता वाले इलाकों में अपनी भाषा और संस्कृति का मसला लोगों के मर्म को छूता है, इसलिए राजनीति अक्सर इसे उभारने की कोशिश करती है। मौका देखकर आने वाले दिनों में राज्य में कार्यरत निर्माण मजदूरों आदि पर भी यह शर्त थोपी जा सकती है। इससे निश्चित तौर पर प्रवासी हिंदीभाषियों के लिए संकट पैदा होगा, उससे पलायन भी बढ़ सकता है। जिसकी कीमत राज्य की अर्थव्यवस्था और उद्योग को भी चुकानी पड़ सकती है। इसलिए जरूरी है कि इस मसले पर सर्वमान्य और सर्वस्वीकार्य रास्ता तलाशा जाए। नियमों को बेड़ी नहीं, लोक का सहयोगी होना चाहिए। इस नजरिए से भी इस बारे में विचार होना चाहिए। आखिर में इस भाषा विवाद का एक सिरा देवेंद्र फड़णवीस के राजनीतिक करीयर से भी जुड़ता है। भारतीय जनता पार्टी का एक वर्ग उनमें राष्ट्रीय राजनीति की संभावना देखता है। महाराष्ट्र तक तो उनका मराठी अस्मिताबोध स्वीकार्य हो सकता है, लेकिन जब वे राष्ट्रीय राजनीति में सफल होने की कोशिश करेंगे, अपनी भाषा बोध के बहाने हिंदीभाषियों का विरोध उनकी राह की बाधा बन सकता है। - उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक हैं..
Yogi Adityanath New Strategy! क्या Gen Z और Women Voters जिताएंगे UP Election?
'बातचीत और हड़ताल साथ-साथ नहीं चल सकते', पंजाब में सरकारी कर्मचारियों के प्रदर्शन पर बोले सीएम भगवंत मान
जम्मू-कश्मीर को लेकर सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। वीडियो में कथित तौर पर भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) की एक महिला कर्मचारी भारत और जम्मू-कश्मीर को लेकर राष्ट्रविरोधी टिप्पणियां करती सुनाई दे रही है। इस मामले की जांच के आदेश दिए गए हैं। इस बीच सोशल मीडिया पर भी यह मामला खासा चर्चा में आ गया है ओर उस महिला की सोच, उसके तर्क और सरकारी पद पर रहते हुए उसके कथित बयानों को लेकर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। हालांकि सबसे पहले यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि वीडियो की प्रामाणिकता, उसमें सुनाई दे रही आवाज और वीडियो में दिख रही महिला की पहचान की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। एफसीआई ने मामले की जांच शुरू की है और कहा है कि संबंधित कर्मचारी को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब मांगा जाएगा। जांच के बाद ही यह तय होगा कि वीडियो में दिख रही महिला वास्तव में एफसीआई की कर्मचारी है या नहीं और आवाज उसी की है या नहीं। जहां तक वायरल वीडियो के कंटेंट की बात है तो आपको बता दें कि वीडियो में महिला यह भी कहती हुई सुनाई देती है कि सरकारी नौकरी करने का मतलब यह नहीं है कि कोई व्यक्ति मुख्यधारा का हिस्सा बन गया है। वह कहती है, ‘‘अगर हम किसी प्रतिरोध आंदोलन का हिस्सा हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि हम इंसान नहीं हैं। हमारी भी जरूरतें होती हैं और उन जरूरतों को पूरा करने के लिए नौकरी की जरूरत पड़ सकती है। अगर अच्छी नौकरी मिलती है, तो हम वो नौकरी करते हैं।’’ महिला ने यह भी कहा कि नौकरी मिलने से ‘‘भारत को लेकर उसके रुख’’ में कोई बदलाव नहीं आएगा। उसने कहा, ‘‘कश्मीर पर भारत का कब्जा अन्यायपूर्ण है और यह अन्यायपूर्ण ही रहेगा।’’ महिला ने पिछले तीन दशकों में कश्मीर में हुई मौत का भी जिक्र किया और कहा, ‘‘हम नौकरी के बदले उनका सौदा नहीं कर सकते।’’ इसे भी पढ़ें: Shaurya Path: Kirana Hills और Skardu को लेकर पूर्व CDS Anil Chauhan के खुलासों से चौंकी दुनिया, Pakistan बात करना चाह रहा था, मगर India... वीडियो की प्रामाणिकता और उसमें दिख रही महिला की पहचान की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है लेकिन अगर जांच में वीडियो सही साबित होता है, तो सवाल सिर्फ एक कर्मचारी के बयान का नहीं रहेगा। सवाल उस मानसिकता का होगा जो भारत की सरकारी व्यवस्था का हिस्सा रहते हुए भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर ही सवाल उठाती दिखाई देती है। वीडियो में कथित तौर पर कहा गया कि कश्मीर पर भारत का कब्जा “अन्यायपूर्ण” है। यहीं से सवालों की लंबी श्रृंखला शुरू होती है। पहला सवाल यह है कि आखिर जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानने से इंकार करने का आधार क्या है? जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, था और रहेगा। यह भारत की संवैधानिक और राष्ट्रीय स्थिति है। सवाल यह भी है कि क्या कश्मीर के इतिहास, जम्मू-कश्मीर के भारत में विधिवत विलय और उसके बाद के संवैधानिक ढांचे को नजरअंदाज कर केवल राजनीतिक नारेबाजी को इतिहास मान लिया जाएगा? सवाल यह भी है कि अगर जम्मू-कश्मीर का भारत में होना “कब्जा” है, तो पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर यानी पीओके पर पाकिस्तान के नियंत्रण को क्या कहा जाएगा? यही वह बुनियादी अंतर है जिसे जानबूझकर धुंधला करने की कोशिश की जाती है। देखा जाये तो भारत का जम्मू-कश्मीर पर कोई “अन्यायपूर्ण कब्जा” नहीं है। असली विवाद उस क्षेत्र का है जिस पर पाकिस्तान ने नियंत्रण कायम कर रखा है। पीओके पर पाकिस्तान का कब्जा ही वह प्रश्न है, जिस पर अक्सर भारत-विरोधी नैरेटिव चुप्पी साध लेता है। ऐसे लोगों से सवाल है कि पीओके में आम लोगों के विरोध प्रदर्शनों, आर्थिक संकट, महंगाई और शासन के खिलाफ उठती आवाजों पर चुप्पी क्यों है? हाल के दिनों में पीओके में बिजली दरों, करों, महंगाई, संसाधनों और राजनीतिक अधिकारों को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध देखने को मिला है। कई मौकों पर प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हिंसक टकराव की खबरें सामने आईं। वहां के लोगों ने पाकिस्तान सरकार और प्रशासन पर उपेक्षा तथा अन्यायपूर्ण दमन के आरोप लगाए लेकिन भारत से सवाल पूछने वालों ने पाकिस्तान से एक भी सवाल नहीं पूछा। जब पीओके के लोग सड़कों पर उतरकर अपने अधिकारों की बात करते हैं, तो मानवाधिकार की चिंता करने वाले कथित बुद्धिजीवी उस समय इतने खामोश क्यों हो जाते हैं? अब वापस उस वायरल वीडियो पर आते हैं। अगर जांच में यह साबित होता है कि वीडियो में बोल रही महिला वास्तव में केंद्र सरकार के अधीन एफसीआई की कर्मचारी है और कथित बयान उसी के हैं, तो सवाल उठता है कि क्या भारत सरकार की नौकरी केवल वेतन लेने का साधन है और भारत के खिलाफ वैचारिक युद्ध छेड़ने का लाइसेंस भी है? भारतीय करदाताओं के पैसे से मिलने वाली तनख्वाह स्वीकार करना और उसी देश की क्षेत्रीय अखंडता को “अन्यायपूर्ण” बताना, क्या यह गंभीर नैतिक विरोधाभास नहीं है? अगर नौकरी केवल “जरूरत” है और विचार भारत-विरोधी ही बने रहेंगे, तो फिर सार्वजनिक पद की जिम्मेदारी का अर्थ क्या है? क्या कोई व्यक्ति सरकारी सेवा के लाभ तो स्वीकार कर सकता है, लेकिन उसी राज्य की संवैधानिक संप्रभुता को खुलकर चुनौती देता रह सकता है? क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि संवैधानिक व्यवस्था के भीतर रहकर उसी व्यवस्था की वैधता को मनमाने ढंग से खारिज कर दिया जाए? क्या सरकारी कर्मचारी के लिए सेवा नियम, आचरण संहिता और संवैधानिक जिम्मेदारियां कोई मायने नहीं रखतीं? क्या भारत से मिलने वाले अवसर स्वीकार करना और फिर भारत को ही “कब्जेदार” बताना वैचारिक ईमानदारी है? अगर भारत वास्तव में उतना ही “अन्यायपूर्ण” है, जैसा वीडियो में कथित तौर पर कहा गया, तो उसी व्यवस्था के तहत मिलने वाली नौकरी, वेतन, सुविधाएं और सुरक्षा स्वीकार करने में कोई नैतिक द्वंद्व क्यों नहीं है? क्या “प्रतिरोध” के नाम पर राष्ट्र की संप्रभुता पर सवाल उठाना स्वतः ही नैतिक रूप से उचित हो जाता है? क्या कश्मीर में पिछले दशकों की हिंसा पर चर्चा करते समय आतंकवाद के शिकार नागरिकों, सुरक्षाबलों और कश्मीरी पंडितों के दर्द को भी समान रूप से याद किया जाता है? कथित बयान देने वाली महिला चूंकि सरकारी पद पर है तो सवाल यह भी उठता है कि क्या किसी व्यक्ति की निजी राजनीतिक राय उसे अपने सार्वजनिक पद से जुड़ी जवाबदेही से मुक्त कर देती है? क्या राष्ट्र की एकता और अखंडता पर सवाल उठाने के बाद भी कोई व्यक्ति केवल “मेरी निजी राय है” कहकर अपनी जिम्मेदारी से बच सकता है? भारत में रहकर, भारत की सरकारी व्यवस्था का हिस्सा बनकर और भारतीय करदाताओं के पैसे से वेतन प्राप्त करते हुए अगर कोई व्यक्ति भारत की संप्रभुता को ही चुनौती देता है, तो क्या देश को उसकी इस सोच पर सवाल पूछने का अधिकार नहीं है? देखा जाये तो यह मामला केवल भावनाओं का नहीं, बल्कि तथ्यों और जवाबदेही का भी है। एफसीआई ने जांच के आदेश दिए हैं और यही उचित प्रक्रिया है। किसी भी व्यक्ति को केवल वायरल वीडियो के आधार पर दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं होगा। लेकिन यदि जांच में वीडियो की प्रामाणिकता और संबंधित कर्मचारी की पहचान की पुष्टि होती है, तो संबंधित संस्था को सेवा नियमों और कानून के दायरे में उचित कार्रवाई करनी ही होगी। वैसे इस मामले को गंभीरता से लेते हुए भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) ने उस वीडियो की जांच के आदेश दिए हैं जिसमें कथित तौर पर निगम की एक महिला कर्मचारी भारत के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करती नजर आ रही है। निगम ने कहा कि सोशल मीडिया पर वायरल इस वीडियो के संबंध में वह कर्मचारी को कारण बताओ नोटिस जारी करेगा। माना जाता है कि महिला एफसीआई की प्रबंधक या गुणवत्ता नियंत्रण अधिकारी है। एफसीआई के महाप्रबंधक आई.के. चौधरी ने कहा कि निगम ने इस मामले को गंभीरता से लिया है। यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि क्या वीडियो में दिख रही महिला, निगम कर्मचारी है और क्या वीडियो क्लिप में सुनाई दे रही आवाज उसी की है। चौधरी ने पत्रकारों से कहा, ‘‘मैं उसका जवाब जानने के लिए कल उसे कारण बताओ नोटिस जारी करूंगा। उसके बाद मामले की पूरी जांच की जाएगी। अगर महिला मान लेती है कि वीडियो उसी का है, या जांच में यह साबित हो जाता है कि वीडियो में वही थी, तो हम उक्त कर्मचारी के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेंगे।’’ चौधरी ने बताया कि निगम अपने सभी कर्मचारियों का पुलिस सत्यापन करवाता है। उन्होंने कहा कि अगर जांच में यह साबित हो जाता है कि महिला एफसीआई की कर्मचारी है और उसी ने ये बातें कही हैं, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। हालांकि, चौधरी ने यह भी कहा कि जांच पूरी होने से पहले यह नतीजा निकालना जल्दबाजी होगी कि वीडियो या उसमें सुनाई दे रही आवाज उसी कर्मचारी की है।
सच्चाई vs भ्रम: मनुस्मृति में नारी को लेकर ऐसा लिखा क्या है? जिस पर होता है बवाल
हजार साल पुराना है उनका गुस्सा, हजारों साल पुरानी है उनकी नफरत गोरख पांडे के इन शब्दों को अगर आज के समाज की असलियत कहा जाए तो कोई गलती नहीं होगी। सोचिए एक किताब जिसे कुछ लोग धर्म की बुनियाद मानते हैं और वहीं कुछ लोग उसे सरेआम जलाकर अपना गुस्सा जाहिर करते हैं। हम बात कर रहे हैं प्राचीन भारत के सबसे असरदार और शायद सबसे विवादित ग्रंथ की मनुस्मृति की। आप में से कितने लोगों ने मनुस्मृति को पढ़ा है? आप में से बहुत सारे लोगों ने गीता को पढ़ा होगा। रामचरितमानस को पढ़ा होगा, महाभारत को पढ़ा होगा। कुछ लोगों ने प्राचीन पुस्तकों को जो अलग-अलग पुस्तकें हैं उन्हें पढ़ा होगा। वेदों को पढ़ा होगा और इनसे आपने बहुत कुछ सीखा भी होगा। ऐसी ही एक प्राचीन पुस्तक है जिसे हम कहते हैं मनुस्मृति। राहुल गांधी ने एक बार फिर से मनुस्मृति को अपना निशाना बनाया है। पुणे में छात्रों की गूंज नाम के अपने कार्यक्रम में राहुल गांधी ने छात्रों से बात की थी और इस दौरान राहुल गांधी ने मनुस्मृति में एक श्लोक का जिक्र करते हुए कहा कि कैसे यह किताब महिलाओं की आजादी के खिलाफ है और इस पर हमें शर्म आनी चाहिए। ऐसा राहुल गांधी ने कहा। अब सवाल यह है कि आखिर राहुल गांधी बार-बार मनुस्मृति को ही अपना निशाना क्यों बनाते हैं? इस किताब का पूरा नाम मानव धर्म शास्त्र है। तो आज सबसे पहले आपको मनुस्मृति के बारे में बताते हैं। इसे भी पढ़ें: क्यों ठुकराई PM की कुर्सी? प्रियंका पर राहुल को तरजीह, बच्चन परिवार से क्यों बिगड़े रिश्ते, 10 नवंबर को सोनिया गांधी बड़ा खुलासा करने वाली हैं! दो प्रकार के ग्रंथ देखने को मिलते हैं जब हम भारत में धर्म ग्रंथों की बात करते हैं तो अमूमन शुरुआत में दो प्रकार के ग्रंथ देखने को मिलते हैं। एक जिनको हम श्रुति ग्रंथ कहते हैं जिनको सुना गया समझा गया। एक उनको स्मृति ग्रंथ जिनको सुनने के बाद याद किया गया और फिर उसे लिखा गया। कई बार इनको उनके डिसाइपल्स द्वारा लिखा गया। तो श्रुति के बाद स्मृतियों का जो महत्व है। हिंदू धर्म में या सनातन धर्म की अगर बात करें तो प्राचीन में बहुत सारे ग्रंथ जो थे वो इन्हीं विधियों से होकर आगे बढ़े हैं। वेदों की बात करें या अरण्यकों की बात करें। ब्राह्मस्य की बात करें या उन स्मृतियों की बात करें जिनमें से एक मनुस्मृति है। स्मृतियों की बात करें तो कुल लगभग 18 स्मृति है। अगर हम धर्मशास्त्र की बात करें तो 18 स्मृति है। जैसे मनुस्मृति, याज्ञवल्क स्मृति, पराशर स्मृति, विष्णु स्मृति और बहुत सारी। इनमें से पहली स्मृति मनुस्मृति को कहा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि जो ब्रह्मा थे उन्होंने मनु को ज्ञान दिया। ठीक है? मनु ने यही ज्ञान अपने शिष्य भृगु को दिया और भृगु ने अपने इस ज्ञान को आगे मानवता तक बढ़ाया। शुरुआत में ज्ञान की परंपरा को ऐसे बताया गया है। सृष्टि के पहले इंसान ने लिखी पुस्तक इस किताब में 12 अध्याय हैं और लगभग 2694 श्लोक इस किताब में हैं। हिंदुओं की ऐसी मान्यताएं है कि इस पुस्तक को सृष्टि के पहले इंसान ने लिखा था और उन्होंने ही इसके जरिए मानवता को तमाम तरह के कानून दिए। मतलब जो सृष्टि में पहला मनुष्य है उसने इसे लिखा। इसीलिए इसे मनुस्मृति कहा जाता है। यहां मनु का मतलब है पहला मनुष्य। हालांकि कई विद्वानों का ऐसा मानना है कि यह पुस्तक आज से लगभग 2000 वर्ष पहले यानी 200 ईसा पूर्व से लेकर के के आसपास लिखी गई है और 200 ईसा पूर्व से 200 ईसवी के बीच इसे लिखा गया है। इस ग्रंथ में मनु ने जीवन दर्शन, प्रशासन, समाज की रचना, नीतियां और कानून के बारे में विस्तार से बताया है। यानी समाज को कैसे चलाना है। राजा से लेकर प्रजा तक सबका धर्म क्या होना चाहिए? आचार विचार क्या होना चाहिए? व्यवहार कैसा होना चाहिए? ये सारी बातें इस पुस्तक में बताई गई है। यह जीवन जीने की एक पूरी पद्धति है। ध्यान देने वाली बात यह है कि जिस समय यह पुस्तक लिखी गई तब तक ना तो बाइबल लिखी गई थी और ना ही कुरान लिखी गई थी। शासन और प्रशासन और सामाजिक व्यवस्था में इस पुस्तक का इस्तेमाल ना सिर्फ भारत में बल्कि कंबोडिया और इंडोनेशिया जैसे देशों में भी हुआ जहां पर हिंदू साम्राज्य हुआ करते थे। ब्रिटिश काल में अंग्रेजों ने हिंदू कोड बनाने में इस ग्रंथ का काफी इस्तेमाल किया था। लेकिन आजाद भारत के कानून में हमारे संविधान में इस पुस्तक की कोई जगह नहीं है। इसे भी पढ़ें: Cheeni Kum hai! एथनॉल का असर या त्योहारों का, अचानक क्यों आसमान छूने लगे चीनी के दाम? 10 लाइन में समझें पूरा मामला महिलाओं के पक्ष में भी लिखी गई कई बातें यत्र नार्यस्तु पूजयंते रमंते तत्र देवता। हिंदी में इसका मतलब है जहां महिलाओं का सम्मान होता है वहां देवता निवास करते हैं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यह पुस्तक आज से लगभग 2000 वर्ष पहले लिखी गई थी। इसे आज की नैतिकता से जज नहीं किया जा सकता। बाइबल दास प्रथा को, स्लेवरी को समर्थन देती है। और कई जानकारों का दावा है कि कुरान में भी कई ऐसी बातें हैं जो महिला विरोधी हैं और इस पर आज भी बहस होती रहती है। यह एक विवाद का विषय है। जबकि ये दोनों ही पुस्तकें मनुस्मृति के कई 100 वर्ष बाद लिखी गई थी। यह किताब दहेज के भी खिलाफ है। और तो और इसमें यह भी कहा गया है कि शूद्रों और महिलाओं को भी धर्म के रास्ते पर चलने का पूरा हक है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में भी जिक्र 2026 के एक फैसले में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक विधवा के गुजारे भत्ते के अधिकार को सही ठहराने के लिए मनुस्मृति का ही हवाला दिया था। ये दिखाता है कि ये महज इतिहास के पन्नों में दबी हुई कोई किताब नहीं है। और ये कोई एक आध बार नहीं हुआ है। 2019 से पहले ही सुप्रीम कोर्ट सात से भी ज्यादा बार अपने फैसलों में मनुस्मृति का जिक्र कर चुका था। अगर हाई कोर्ट्स की बात करें तो वहां तो इसका इस्तेमाल और भी ज्यादा होता रहा है। पहले जलाया फिर महिलाओं को हक दिलाने में श्लोकों का किया इस्तेमाल 25 दिसंबर, 1927 का दिन था जब डॉ. अंबेडकर ने मनुस्मृति का सार्वजनिक दहन किया। अंबेडकर ने पहले से घोषणा कर दी थी कि वह इस हिंदू ग्रंथ को जलाएंगे। जो जगह उन्होंने इसके लिए चुनी वो महाड़ नाम का महाराष्ट्र का तटीय इलाका था, जो कोलाबा (अब रायगढ़) जिले में था। अंबेडकर मनुस्मृति को जातिवादी और पितृसत्तात्मक मानदंडों के खिलाफ मानते थे। बकौल उनके, मनुस्मृति ऐसा हिंदू ग्रंथ है, जो जाति उत्पीड़न को संस्थागत बनाता था। निचली जातियों, विशेषकर दलितों और महिलाओं के शोषण और भेदभाव को उचित ठहराता था। डॉक्टर अंबेडकर ने मनुस्मृति को जलाकर इसका विरोध किया था उन्हीं ने बाद में हिंदू कोड बिल की बहस में महिलाओं को प्रॉपर्टी में हक दिलाने के लिए मनुस्मृति के ही कुछ प्रोग्रेसिव श्लोकों का इस्तेमाल किया। डॉ. बी आर आंबेडकर ने यह तर्क दिया था कि महिलाओं को संपत्ति में अधिकार देने की बात ऋषि मनु जैसे स्मृतिकारों द्वारा कही गई थी। 24 फरवरी 1949 को संविधान सभा की बहस के दौरान उन्होंने कहा था: इसमें कोई संदेह नहीं है कि जिन दो स्मृतिकारों का मैंने उल्लेख किया है—याज्ञवल्क्य और मनु—वे उन 137 स्मृतिकारों में सर्वोच्च स्थान रखते हैं जिन्होंने स्मृतियों की रचना करने का प्रयास किया था। इन दोनों ने ही यह व्यवस्था दी है कि पुत्री एक-चौथाई हिस्से की हकदार है। यह अत्यंत खेदजनक है कि किसी न किसी कारणवश कुरीतियों और प्रथाओं ने इस मूल विधान के प्रभाव को नष्ट कर दिया; अन्यथा हमारी अपनी स्मृतियों के आधार पर भी पुत्री एक-चौथाई हिस्सा पाने की पूरी हकदार होती। उन्होंने आगे कानूनों की तुलना में रीति-रिवाजों और प्रथाओं को प्राथमिकता देने के लिए प्रिवी काउंसिल को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि यदि ऐसा न हुआ होता, तो मनुस्मृति ने वर्षों पहले ही महिलाओं और संपत्ति में उनके उत्तराधिकार के अधिकारों को सशक्त बना दिया होता।
गुजरात में अलग-अलग सेक्टर में ज्यादा इन्वेस्ट करने के लिए उत्सुक हैं निवेशक : सीएम भूपेंद्र पटेल
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जंतर-मंतर के प्रदर्शन को पुलिसकर्मियों का भी मिला समर्थन! CJP संस्थापक ने सुनाया पूरा किस्सा
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America में RSS पर Ban की मांग! Mohan Bhagwat के US दौरे पर क्यों भड़का USCIRF?
महाराष्ट्र में बीजेपी महायुति सहयोगियों शिवसेना और एनसीपी से रिश्ते सुधारने में जुट गई है। राहुल गांधी के पुणे में छात्रों की गूंज कार्यक्रम के बाद देवेंद्र फडणवीस ने समन्वय बैठक बुलाई। वादों को निभाने का भरोसा दिया गया। क्या यह दूरियाँ मिटाने की पहल नहीं है?
एक लाख नौकरियां खत्म, क्यों ढीले हुए फोल्क्सवागन के कल पुर्जे
2016 में फोल्क्सवागन बिक्री के लिहाज से दुनिया की सबस बड़ी कार कंपनी बनी, लेकिन 10 साल बाद कंपनी अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ती दिख रही है
गुजरात : सुरेंद्रनगर का वढ़वाण 'बांधणी कला' का हब, 75 फीसदी आबादी की आजीविका का बना सहारा
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विरोध प्रदर्शन करें पर ना हो सीमाओं का अतिक्रमण
आये दिन होने वाले प्रदर्शनों के चलते सामान्य जनजीवन को बंधक बना देने की प्रवृति पर दिल्ली उच्च न्यायालय की टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है कि प्रदर्शनों के कारण कई बार तो जीवन मरण तक के हालात पैदा हो जाते हैं। अन्य सब कारणों और परिणामों को थोड़ी देर के लिए अलग कर भी दिया जाएं तो भी हालात यहां तक हो जाते हैं कि यातायात प्रभावित होने से तत्काल मेडिकल रिलिफ की आवश्यकता वाले बीमारों तक का जीवन संकट में पड़ जाता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि लोकतंत्र में अपनी बात कहने, अपनी बात रखने और अपना विरोध अंकित कराने का सबको अधिकार है। केई गलत हो रहा है तो उसका विरोध भी होना चाहिए पर इसका मतलब यह तो नहीं होना चाहिए कि हम अपनी बात कहने के चक्कर में दूसरों को अपने सामान्य नागरिक अधिकारों से वंचित कर दें। विरोध प्रदर्शन के साथ ही साथ दायित्व भी होता है। शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का विरोध भी नहीं होता पर कब इस तरह के प्रदर्शन हिंसक हो जाते हैं और कानून व्यवस्था के गंभीर हालात हो जाते हैं इसका खामियाजा प्रदर्शनकारियों को नहीं अपितु प्रशासन और आमजन को भुगतना पड़ता है। सीजीपी के हालिया प्रदर्शनों के दौरान दिल्ली में जो हालात बने और जयपुर में पिछले दिनों सीजीपी द्वारा स्कूल प्रकरण को लेकर ग्रामवासियों और सीजीपी लोगों के साथ हालात बने यह अपने आप में गंभीर हो जाता है। रांची और देश के अन्य स्थानों के प्रदर्शनों को भी इसी संदर्भ में देखना होगा। शहर की सामान्य व्यवस्था को ही प्रभावित करने वाले स्थानों पर प्रदर्शन स्वीकृति पर भी प्रश्न उठना स्वाभाविक है। न्यायमूर्ति अमित महाजन की यह टिप्पणी महत्वपूर्ण हो जाती है कि शहर के बीच प्रदर्शन की अनुमति क्यों कर दी जानी चाहिए। दरअसल सीजीपी द्वारा जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किये गये और यह प्रदर्शन देखते देखते हिंसक हो गया। इसके बाद प्रदर्शनकारियों और पुलिस प्रशासन और पक्ष प्रतिपक्ष द्वारा एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल जाता है पर मूल कारण को नजरअंदाज कर दिया जाता है। इससे पहले 2017-18 में जलकट्टू घटना के संदर्भ में गठित न्यायमूर्ति राजेश्वरन आयोग की सिफारिशें भी महत्वपूर्ण हो जाती है। लोकतंत्र में विरोध अधिकार हो सकता है पर विरोध का एक तरीका होता है। शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का सबको अधिकार है पर अपने विरोध प्रदर्शन के चक्कर में अन्य और वह भी आमनागरिकों का जनजीवन प्रभावित करने का किसी को अधिकार नहीं हो सकता। विरोध के चलते कानून हाथ में लेना या क्षेत्राधिकार से बाहर जाना एक सभ्य समाज और सभ्य नागरिक की पहचान नहीं हो सकती। सरकारी या निजी संपत्ती को नुकसान पहुंचाना या कानून को हाथ में लेने का अधिकार किसी को नहीं दिया जा सकता। एक बात यह भी समझनी होगी कि पुलिस प्रशासन भी आखिर आदमी है और देखा जाएं तो उनका मरण दोनों तरफ से हो जाता है। यदि प्रदर्शनकारियों को एक सीमा से अधिक बढ़ने पर रोके नहीं तो प्रशासन की विफलता कहने में कोई देरी नहीं लगाता, यहां तक कि प्रशासन की इंटेलिजेंस फैलियर जैसे आरोप लग जाते हैं। प्रदर्शन के हिंसक होने पर प्रशासन द्वारा कार्रवाई की आलोचना आम हो जाती है पर जब कई बार प्रदर्शनकारियों द्वारा प्रदर्शन के दौरान बेरिकेड़ तोड़ने, पत्थरबाजी, तोड़फोड़ और निरपराध आमजन को निशाने पर लेने लगते हैं तो एक बात साफ हो जानी चाहिए कि फिर प्रशासन गुलाब के फूल देकर तो प्रदर्शन को नियंत्रित नहीं कर सकता हांलाकि प्रशासन को भी संयम बरतते हुए ही कदम उठाने चाहिए। दरअसल तस्वीर के दोनों पक्षों को देखना होगा। यदि प्रदर्शन सामान्य होता है और अनुमति प्राप्त शांतिपूर्ण प्रदर्शन हो तो उस पर पुलिस प्रशासन की सख्ती को किसी भी हालात में स्वीकारा नहीं जा सकता पर प्रदर्शनकारियों द्वारा लक्ष्मण रेखा लांघी जाती है तो उस पर प्रशासन को भी कानूनी दायरें में रहते हुए कार्रवाई तो करनी ही पड़ेगी। इसे भी पढ़ें: जयपुर से लेकर भोपाल और गया से उन्नाव तक...Gen Z तो झांकी थी, पूरी पिक्चर दिखा रहे Gen अल्फा? अब जयपुर के स्कूल की घटना का विश्लेषण करें तो हालात की ओर ध्यान दिलाना एक उचित कदम हो सकता है पर स्कूल या किसी भी सरकारी-गैरसरकारी संस्थान का निरीक्षण का अधिकार किस कानून ने दे दिया है। एक सीमा तक प्रदर्शन आपका अधिकार हो सकता है पर प्रदर्शन से माहौल को तनावपूर्ण और द्वेषतापूर्ण बनाने की किसी भी व्यवस्था में अनुमति नहीं दी जा सकती और नहीं दी भी जानी चाहिए। प्रशासन, प्रदर्शनकारियों और आमजन को अपनी सीमाओं को समझना होगा। सुर्खियों में बनने के लिए कदम उठाना किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता। क्या कभी सोचा है कि हमारे प्रदर्शन से प्रदर्शन वाले शहरवासियों को कितना प्रभावित करता है। प्रदर्शन वाले शहर का कहीं ज्यादा तो कहीं कम यातायात प्रभावित हो जाता है। निजी व सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था बाधित हो जाती है। मरीजों व जरुरी काम वालों को बीच रास्ते अटकना पड़ जाता है। नौकरीपेशा या धंधे पर जाने वाले रास्ते में ही अटक जाते है। दैनिक काम के आधार पर रोजी रोटी कमाने वालों की मजदूरी अटक जाती है। शहर की सभी तरह की सप्लाई चैन बाधित हो जाती है। पुलिस प्रशासन व्यवस्था बनाये रखने के लिए व्यस्त हो जाता है तो लोगों में असुरक्षा की भावना बनती है और बाहर निकलने से पहले सोचने को मजबूर हो जाते हैं। और अब तो प्रशासन द्वारा ऐसे शहरों में इंटरनेट बंद करने तक का निर्णय कर लिया जाता है जिससे सामान्य गतिविधियां, बैंकिंग व्यवस्था, सूचनाओं का आदान-प्रदान और पढ़ाई-लिखाई तक पर असर पड़ता है। ऐसे में दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अमित महाजन की यह टिप्पणी कि शहर को बेवजह बंधक बनाने की इजाजत कैसे दी जा सकती है। प्रशासन भी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। पहले तो प्रशासन को भी चाहिए कि प्रदर्शन आदि के लिए ऐसा स्थान निर्धारित हो जहां से सामान्य जनजीवन किसी तरह से प्रभावित ना हो सके। आम जन, शहरी यातायात, शहर का दैनिक जनजीवन किसी तरह से प्रभावित ना हो। ऐसी व्यवस्था हो जिससे प्रदर्शनकारियों की बात वे जहां पहुंचाना चाहते हैं वहां तक पहुंचाई जा सके। प्रदर्शनकारियों को भी प्रदर्शन के दौरान शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखनी चाहिए। असामाजिक तत्वों को किसी तरह का मौका ही नहीं दिया जाना चाहिए। जब किसी प्रदर्शन के दौरान हिंसा या गलत गतिविधियां होने लगती है और व्यवस्था हाथों से निकलने लगती है व प्रशासन द्वारा सख्ती होती है तो यह सामान्य जबाव होता है कि हिंसा या हालात बिगाड़ने वाले असामाजिक तत्व उनमें से नहीं थे पर ऐसा कहने मात्र से जिम्मेदारी से नहीं बचा जा सकता। इसलिए दिल्ली उच्च न्यायालय व न्यायालयों द्वारा पूर्व में भी दी गई टिप्पणियों को गंभीरता से प्रदर्शनकर्ताओं और प्रशासन दोनों को समझना होगा व दोषारोपण के नाम पर जिम्मेदारी से भागने की इजाजत किसी भी हालत में नहीं दी जा सकती। अपनी बात कहने के अधिकार के साथ दूसरों के मौलिक अधिकारों का भी सम्मान करना होगा। कानून व्यवस्था को हाथ में लेने या सीमाओं को लांघने का अधिकार किसी को नहीं दिया जा सकता। - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
जातिगत जनगणना सम्बन्धी कांग्रेस-भाजपा के सियासी दांव-पेचों को यूँ जानिए
जातिगत जनगणना पर कांग्रेस का भाजपा के खिलाफ मौजूदा हमला केवल “जाति गिनी जाए या नहीं” का सवाल नहीं है, बल्कि असली लड़ाई अब डेटा की विश्वसनीयता, सामाजिक न्याय की राजनीति और उससे बनने वाले नए राजनीतिक समीकरण की है। यही वजह है कि अगस्त 2026 में राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर मौजूदा जाति-जनगणना पद्धति पर आपत्ति जताई है। इसलिए जातिगत जनगणना सम्बन्धी कांग्रेस-भाजपा के सियासी दांव-पेचों को ऐसे जानिए। कांग्रेस का तर्क है कि यदि जातियों के नाम दर्ज करने के लिए स्पष्ट, पूर्व-निर्धारित सूची/कोडिंग व्यवस्था नहीं होगी, तो अलग-अलग नाम, वर्तनी और उपजातियों के कारण आंकड़े अविश्वसनीय हो सकते हैं। इसलिए उसने इसे दुरुस्त करने की मांग उठाई, ताकि जातिगत जनगणना सही तरह से हो सके। मजे की बात तो यह है कि कांग्रेस ने 2011 में जिस जातिगत जनगणना के आंकड़ों को छुपाने में ही अपनी भलाई समझी थी, उसी ने अब भाजपा पर दबाव बना दिया कि जातिगत जनगणना करवाओ और भाजपा को यह बात माननी पड़ी, क्योंकि लालू-नीतीश की समझदारी के सामने भाजपा नेतृत्व विवश हो गया। इसे भी पढ़ें: क्यों ठुकराई PM की कुर्सी? प्रियंका पर राहुल को तरजीह, बच्चन परिवार से क्यों बिगड़े रिश्ते, 10 नवंबर को सोनिया गांधी बड़ा खुलासा करने वाली हैं! चाहे लालू प्रसाद हों या नीतीश कुमार, इन्होंने सबके लिए कम और अपनी जातियों और उससे पहले दोस्तों के लिए बहुत कुछ सोचा। इसलिए डेढ़-दो दशक बाद ही सही, लेकिन दोनों को सत्ता से बेदखल होना पड़ा। यही वजह है कि जब केंद्र सरकार ने पिछले साल जब जाति जनगणना कराने की तारीखों का ऐलान किया, तभी स्पष्ट था कि यह काम चुनौतीपूर्ण रहने वाला है। देश की राजनीति में जाति हमेशा अहम रही है, लेकिन इसे निश्चित करना उतना ही मुश्किल। अभी जनगणना की प्रक्रिया शुरू ही हुई है और जाति की गणना दूसरे चरण में की जाएगी, लेकिन सवाल उठने शुरू हो गए हैं। कांग्रेस का आरोप है कि जाति जनगणना में अन्य पिछड़ी जातियों (OBC) का कॉलम नहीं है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने आंकड़े जुटाने के सरकारी तरीकों पर भी अंगुली उठाई और कहा कि जाति जनगणना में जाति का कॉलम खुला रखकर एक सवाल छोड़ दिया गया है, यानी यहां सभी को अपनी जाति खुद लिखनी है। अब चूंकि देश के विभिन्न हिस्सों में एक ही जाति को अलग-अलग नामों से जाना जाता है, तो आंकड़े उलझे हुए मिल सकते हैं। इससे कोई निष्कर्ष निकालना बहुत मुश्किल होगा। वाकई, इस आशंका को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता। क्योंकि 2011 की सामाजिक-आर्थिक और जातिगत जनगणना में भी इसी फॉर्मेट का इस्तेमाल किया गया था। तब 46 लाख से ज्यादा जातियां, उपजातियां, उपनाम दर्ज हो गए थे। इन आंकड़ों में इतनी विसंगति थी कि सरकार ने इनको जारी ही नहीं किया। इसलिए कांग्रेस का ताजा सुझाव है कि लोगों पर छोड़ने के बजाय जातियों की पहले से एक तय सूची/लिस्ट होनी चाहिए। इससे एक जाति एक ही नाम से दर्ज होगी और स्पेलिंग की भी गलती नहीं होगी। उल्लेखनीय है कि जाति जनगणना का उद्देश्य केवल यह पता लगाना नहीं है कि देश में कितनी जातियां और उनकी कितनी आबादी है, बल्कि यह जानना भी आवश्यक है कि अलग-अलग सामाजिक समूहों की वास्तविक स्थिति क्या है। अबतक असमानता दूर करने के लिए लागू की गई नीतियां कितनी कारगर रहीं और आगे उनमें किन बदलावों की दरकार है, इसकी सही तस्वीर जानने के लिए आंकड़ों की शुद्धता मायने रखती है। इसी से शिक्षा, रोजगार और सरकारी योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा। और अगर किसी तरह का सवाल या संदेह है, तो उसे पहले ही दूर कर लिया जाना चाहिए। इसके लिए जो भी सुझाव आते हैं, उन पर विचार-विमर्श करने में हर्ज नहीं है। साथ ही, यह भी स्पष्ट रहना बहुत जरूरी है कि जुटाए गए आंकड़ों का इस्तेमाल किस तरह किया जाएगा। चूंकि जाति जनगणना का देश की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति पर गहरा असर पड़ने वाला है। इसलिए प्रक्रिया पूरी तरह भरोसेमंद और सवालों के परे होनी चाहिए। अब आइए सबसे पहले इस जातिगत जनगणना के लाभ-हानि को समझने की कोशिश करते हैं। # जातिगत जनगणना के संभावित फायदे इस प्रकार हैं:- पहला, नीति पहली बार वास्तविक सामाजिक आंकड़ों पर टिक सकती है। किस जाति की कितनी आबादी है, उसकी शिक्षा, रोजगार, आय और सरकारी योजनाओं तक पहुंच कैसी है—इसका बेहतर आधार मिल सकता है। इससे कल्याणकारी योजनाओं को अधिक लक्षित किया जा सकता है। दूसरा, आरक्षण पर बहस अधिक तथ्य आधारित हो सकती है। अभी अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की वास्तविक जनसंख्या को लेकर अलग-अलग अनुमान हैं। इसलिए विश्वसनीय आंकड़े मिलने पर प्रतिनिधित्व और आरक्षण की समीक्षा का आधार मजबूत हो सकता है। तीसरा, “जिसकी जितनी संख्या...” राजनीति को आंकड़ों की परीक्षा से गुजरना पड़ेगा। कांग्रेस लंबे समय से इसी तर्क को आगे बढ़ा रही है। लेकिन आंकड़े आने के बाद यह नारा भी चुनौती में बदल सकता है—क्योंकि हर जाति अपने वास्तविक सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन और प्रतिनिधित्व का हिसाब मांगेगी। # जातिगत जनगणना के संभावित नुकसान भी कम गंभीर नहीं होंगे पहली बड़ी समस्या जाति की पहचान को स्थायी राजनीतिक पहचान बना देने का खतरा है। अगर आंकड़ों का इस्तेमाल केवल चुनावी टिकट, आरक्षण और वोट-बैंक की राजनीति के लिए हुआ तो सामाजिक विभाजन और तीखा हो सकता है। दूसरी बड़ी समस्या डेटा की गुणवत्ता है। भारत में हजारों जातियां और उपजातियां हैं; एक ही समुदाय के अलग-अलग स्थानीय नाम और वर्तनी हैं। 2011 के सामाजिक-आर्थिक एवं जाति आंकड़ों में ऐसी तकनीकी समस्याओं का हवाला सरकार पहले भी दे चुकी है। इसलिए कांग्रेस की मौजूदा आपत्ति पूरी तरह खारिज करने लायक भी नहीं है। सवाल यह है कि जाति गिनने के बाद उसे सही ढंग से वर्गीकृत और सत्यापित कैसे किया जाएगा। # फिर भाजपा पर कांग्रेस इतनी आक्रामक क्यों है? यहीं इस विवाद का राजनीतिक अर्थ सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है। चूंकि 2024 के बाद कांग्रेस ने “जाति जनगणना + सामाजिक न्याय + प्रतिनिधित्व” को अपनी राजनीति का महत्वपूर्ण आधार बनाया। भाजपा ने अप्रैल 2025 में आगामी जनगणना में जाति को शामिल करने का निर्णय लिया और इसे सामाजिक न्याय की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया। अर्थात कांग्रेस की पुरानी मांग को स्वीकार करके भाजपा ने कांग्रेस का एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा अपने हाथ में ले लिया। इसलिए अब कांग्रेस की रणनीति है: “जाति जनगणना हुई तो सही, लेकिन ऐसी हो कि उसका आंकड़ा ही भरोसेमंद न रहे—तो इसका क्या फायदा?” यही कारण है कि कांग्रेस अब जनगणना कराने के फैसले का विरोध नहीं, बल्कि उसकी पद्धति पर हमला कर रही है। हालिया रिपोर्टों में कांग्रेस ने बिहार और तेलंगाना की तरह पूर्व-निर्धारित जाति सूची और बेहतर कोडिंग/सत्यापन की मांग की है। # भाजपा के लिए असली राजनीतिक चुनौती को ऐसे समझिए भाजपा के सामने दिलचस्प स्थिति है। अगर जातिगत जनगणना से पता चलता है कि OBC आबादी और उसकी आंतरिक संरचना बहुत बड़ी है, तो OBC प्रतिनिधित्व और आरक्षण की मांग और मजबूत हो सकती है। लेकिन भाजपा के पास इसका दूसरा राजनीतिक रास्ता भी है—वह कह सकती है कि जाति की संख्या महत्वपूर्ण है, लेकिन गरीब, महिला, युवा, किसान और वंचित व्यक्ति की आर्थिक-सामाजिक स्थिति उससे भी महत्वपूर्ण है। यानी भाजपा की राजनीति “OBC पहचान” को व्यापक “गरीब/वंचित कल्याण” के नैरेटिव में समाहित करने की कोशिश कर सकती है। # कांग्रेस के लिए भी यह दोधारी तलवार है कांग्रेस यदि जातिगत जनगणना को अपनी बड़ी राजनीतिक जीत बनाती है, तो उसे आगे यह भी बताना पड़ेगा कि जाति के आंकड़े आने के बाद वह वास्तव में करेगी क्या? क्या आरक्षण की सीमा बदलेगी? क्या OBC के भीतर अति-पिछड़ों को अलग लाभ मिलेगा? क्या निजी क्षेत्र में प्रतिनिधित्व की मांग उठेगी? क्या आर्थिक पिछड़ेपन को भी समान महत्व मिलेगा? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या जातिगत आंकड़ों के आधार पर संसाधनों का पुनर्वितरण होगा? इन सवालों का ठोस जवाब देना आसान नहीं होगा। अलबत्ता, मेरी दृष्टि में असली मुद्दा यह है कि जातिगत जनगणना अपने-आप में न लाभ है, न नुकसान। उससे निकले आंकड़ों का इस्तेमाल किस नीति के लिए होता है, यही निर्णायक होगा। एक अच्छी व्यवस्था में: जाति की गणना - सामाजिक-आर्थिक स्थिति - शिक्षा/रोजगार - सरकारी प्रतिनिधित्व - योजनाओं का वास्तविक लाभ समयबद्ध समीक्षा, इन सभी को जोड़ना चाहिए। और सबसे महत्वपूर्ण बात—जातिगत जनगणना को जातिगत संघर्ष की जनगणना नहीं, सामाजिक असमानता की वैज्ञानिक मैपिंग बनाना होगा। यही वह बिंदु है जहां कांग्रेस का भाजपा पर हमला राजनीतिक रूप से समझ में आता है, लेकिन भाजपा की ओर से उठाया गया “हमने तो जाति जनगणना कराने का निर्णय कर ही दिया” वाला पलटवार भी उतना ही प्रभावी हो सकता है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि कांग्रेस का वर्तमान हमला केवल जातिगत जनगणना के खिलाफ नहीं, बल्कि “कौन सही आंकड़ा देगा और उस आंकड़े की राजनीतिक व्याख्या कौन करेगा”—इस लड़ाई का हिस्सा है। आने वाले वर्षों में यही डेटा आरक्षण, परिसीमन, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और OBC राजनीति की दिशा बदल सकता है। याद दिला दें कि कांग्रेस नेता राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने एक बार कहा था कि जाति खत्म होनी चाहिए, पर जब तक यह है तब तक जानना जरूरी है कि इससे प्रभावित लोगों की हालत वास्तव में कैसी है। लेकिन उनके अनुयायी कांग्रेसी राजनीतिज्ञों, नौकरशाहों, न्यायविदों और उद्योगपतियों ने, उनके नाम पर सियासत करने वाले समाजवादियों व राष्ट्रवादियों ने जाति गत पहचान को, इससे जुड़ी व्यवस्थाओं को खत्म तो नहीं ही किया, बल्कि ऐसी-ऐसी नीतियां बना डालीं जिससे कि यह व्यवस्था खूब फल फूल रही है और नेताओं के वोट बैंक बन चुकी है। एक ओर तो दो अलग-अलग जातियों के स्त्री-पुरूष के सहयोग से पैदा हुए वर्णसंकर बच्चे की जाति क्या होगी, स्पष्ट कानून नहीं है, जिससे यह जमात फल फूल रही है। वहीं, दूसरी ओर विभिन्न जातियों में आरक्षण वाली जो अंधी प्रतियोगिता पैदा हो गई, उसने जाति व्यवस्था को और अधिक मजबूती प्रदान कर दी। इससे अंतरजातीय/अंतर्धार्मिक विवाह को मिला प्रोत्साहन भी निरर्थक साबित हुआ। आलम यह है कि आज विभिन्न जातियों के बीच गठबंधन बनाकर एक दूसरे को सियासी व सामाजिक मात देने की रणनीति बनने लगी है। दलितों, आदिवासियों और ओबीसीज के लोग एक दूसरे में शामिल होने की होड़ मचाये हुए हैं। वहीं, इनके लोग सत्तागत नाकामियों, और प्रशासनिक उदासीनता का सारा ठीकरा सामान्य यानी सवर्ण जातियों पर फोड़ देते हैं। शायद इसलिए कि समाज का इंजन समझे जाने वाले सवर्ण लोगों ने भी ऐसी नीतियां नहीं बनवाई, जिससे सबको फायदा पहुंचे। उन्होंने ऐसे उपाय किए कि उनके राजनीतिक वंशवाद की तरह दलितों, आदिवासियों और ओबीसीज में भी परिवार विशेष को बढ़ावा मिला और पीढ़ी दर पीढ़ी आरक्षण का फायदा ऐसे लोग उठाते रहें। इससे उनके ही कोटि के अन्य लोग वंचित रह गए और सामाजिक न्याय व आरक्षण की नीति अपने मूल उद्देश्यों से भटक गई। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
Rahul Gandhi's Masterstroke: Manusmriti का नाम सुनते ही BJP-RSS में खलबली क्यों?
उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन और पीएम मोदी ने तेलंगाना के सूर्यापेट में हुई बस दुर्घटना पर जताया दुख
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Om Birla Action on Rebel TMC MPs! क्या Supreme Court के दबाव में झुके Speaker?
भारतीय शेयर बाजार में तेजी के साथ कारोबार शुरू
मुंबई, मजबूत वैश्विक संकेतों के चलते भारतीय शेयर बाजार बुधवार के कारोबारी सत्र में तेजी के साथ खुला। सेंसेक्स 236.01 अंक या 0.30 प्रतिशत की तेजी के साथ 77,892.10 और निफ्टी 7.40 अंक की मामूली तेजी के साथ 24,341.95 पर था।
'अब बेटियों की सुरक्षा में सेंध लगाने वालों को सीधे जेल या जहन्नुम मिलता है', सीएम योगी का सपा पर हमला
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए भारत की युद्ध-तैयारी को नई धार देने की दिशा में बड़ा फैसला किया है। DRDO द्वारा विकसित पारंपरिक मिसाइल प्रणालियों की तकनीक निजी भारतीय कंपनियों को देने की मंजूरी देकर भारत ने चीन और पाकिस्तान को भी चौंकाने वाला संदेश दिया है। जहां चीन और पाकिस्तान में मिसाइल निर्माण मुख्यतः सरकारी रक्षा कंपनियों के हाथों में केंद्रित है, वहीं भारत अब सरकारी उपक्रमों के साथ-साथ निजी उद्योगों को भी इस सामरिक उत्पादन श्रृंखला में उतार रहा है। इसका मतलब है कि भविष्य में युद्ध की स्थिति में भारत के पास मिसाइल उत्पादन के कई स्रोत होंगे। यदि कभी चीन और पाकिस्तान के साथ एक साथ दो मोर्चों पर संघर्ष की स्थिति बनी, तो भारत केवल अपने मौजूदा भंडार पर निर्भर नहीं रहेगा, बल्कि व्यापक औद्योगिक नेटवर्क के सहारे उत्पादन बढ़ाकर दे दनादन, दे दनादन मिसाइलों की मारक क्षमता बनाए रखने की स्थिति में होगा। यह फैसला केवल ‘मेक इन इंडिया’ नहीं, बल्कि युद्ध के समय मिसाइल सप्लाई चेन को अटूट बनाए रखने की रणनीति है। देखा जाये तो भारत ने अपनी रक्षा नीति में एक ऐसा निर्णायक कदम उठाया है, जो आने वाले वर्षों में देश की युद्ध क्षमता, सैन्य आपूर्ति श्रृंखला और सामरिक आत्मनिर्भरता की तस्वीर बदल सकता है। भारत की रक्षा नीति में जो बदलाव हुआ है उसका अर्थ यह है कि देश अब रक्षा अनुसंधान को सरकारी प्रयोगशाला से निकालकर बड़े पैमाने के औद्योगिक उत्पादन में बदलना चाहता है। इसे भी पढ़ें: क्या Gen-Z होना सुरक्षा नियम तोड़ने का लाइसेंस है? Kargil में महिला पर्यटक के आचरण से उठे कई गंभीर सवाल इस नीति के दायरे में वायु रक्षा, हवा से हवा में मार करने वाली, टैंक रोधी और सतह से सतह पर मार करने वाली अनेक मिसाइल प्रणालियों की तकनीक उद्योग तक पहुंच सकती है। इसमें आकाश, नाग, VSHORADS, अस्त्र, रुद्रम, प्रलय और मैन-पोर्टेबल एंटी-टैंक मिसाइलों जैसी प्रणालियां शामिल हैं। मिसाइल तकनीक का हस्तांतरण पात्रता, प्रमाणन और नियामकीय शर्तों के अधीन होगा। इसका सबसे बड़ा सामरिक लाभ यह है कि युद्ध के समय किसी एक सरकारी उत्पादन इकाई या सीमित आपूर्तिकर्ता पर निर्भरता कम होगी और देश के भीतर व्यापक उत्पादन नेटवर्क तैयार किया जा सकेगा। देखा जाये तो ईरान के साथ 2026 के संघर्ष ने दुनिया को एक कठोर सैन्य सबक दिया है। सबक यह है कि युद्ध में केवल मिसाइल तकनीक होना पर्याप्त नहीं है, उनके विशाल और लगातार भरते रहने वाले भंडार भी जरूरी हैं। CSIS के आकलन के अनुसार ईरान संघर्ष के दौरान अमेरिका के Patriot और THAAD इंटरसेप्टर भंडार पर भारी दबाव पड़ा; Patriot की उपलब्ध संख्या एक हजार से नीचे और THAAD लगभग 250 तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया। विश्लेषण में यह भी चेतावनी दी गई कि घटते भंडार अमेरिका को भविष्य के संघर्षों में इंटरसेप्शन के मामले में अधिक जोखिम लेने के लिए मजबूर कर सकते हैं। यही नहीं, कुछ आकलनों में अमेरिका द्वारा अपने पूर्व-युद्ध Patriot भंडार का लगभग दो-तिहाई तक इस्तेमाल होने की बात कही गई है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि उत्पादन क्षमता बढ़ाने के प्रयासों के बावजूद Patriot और अन्य उन्नत इंटरसेप्टरों के भंडार को पुराने स्तर तक पहुंचाने में करीब तीन वर्ष या उससे अधिक लग सकते हैं। अन्य विश्लेषण यह भी बताते हैं कि Tomahawk जैसी मिसाइलों के नए उत्पादन में लंबा समय लगता है और उन्नत हथियारों की कमी दूर करना वर्षों का काम है। इसके अलावा, इस तरह की भी रिपोर्टें आईं कि अमेरिका को दूसरे देशों में मौजूद अपने सैन्य अड्डों से मिसाइलें वापस मंगवानी पड़ीं। रिपोर्टों में कहा गया कि मध्य-पूर्व में मौजूद अमेरिकी और सहयोगी सैन्य नेटवर्क के संसाधनों, तैनाती और उत्पादन क्षमता पर भारी दबाव पड़ा और पेंटागन को भंडार भरने तथा उत्पादन तेज करने के लिए अतिरिक्त कदम उठाने पड़े। यही इस पूरे घटनाक्रम का वास्तविक रणनीतिक संदेश है कि यदि एक बड़ी शक्ति का मिसाइल भंडार एक क्षेत्रीय युद्ध से इतना दबाव महसूस कर सकता है, तो एक साथ दो मोर्चों या किसी बड़े शक्ति संघर्ष की स्थिति कितनी चुनौतीपूर्ण हो सकती है। भारत के लिए यही सबसे महत्वपूर्ण चेतावनी है। चीन और पाकिस्तान की दोहरी चुनौती वाले वातावरण में भारत किसी एक उत्पादन लाइन के भरोसे नहीं रह सकता। युद्ध लंबा खिंचा तो मिसाइलों का प्रश्न केवल “कौन सी मिसाइल बेहतर है” नहीं, बल्कि “कितनी जल्दी और कितनी संख्या में फिर बनाई जा सकती है” बन जाता है। हम आपको यह भी बता दें कि भारत अंतरिक्ष क्षेत्र में इसका सफल प्रयोग पहले ही कर चुका है। निजी क्षेत्र के लिए अंतरिक्ष गतिविधियां खोलने और IN-SPACe जैसे ढांचे के बाद Skyroot Aerospace और Agnikul Cosmos ने सब-ऑर्बिटल लॉन्च का सफल प्रदर्शन किया। Dhruva Space के नैनो-सैटेलाइट PSLV मिशन से लॉन्च हुए, जबकि Pixxel ने अपने पृथ्वी अवलोकन उपग्रह अंतरिक्ष में भेजे। निजी कंपनियों को ISRO की सुविधाओं और तकनीकी समर्थन तक पहुंच भी दी गई। अब रक्षा क्षेत्र, विशेषकर मिसाइल उत्पादन में वैसी ही औद्योगिक ऊर्जा पैदा करने की कोशिश दिखाई दे रही है। DRDO के Development-cum-Production Partner मॉडल के तहत मार्च 2026 तक 134 कंपनियां भागीदार बन चुकी थीं, 2180 तकनीक हस्तांतरण समझौते हुए और 2,780 से अधिक बौद्धिक संपदा अधिकार उद्योग के उपयोग के लिए खोले गए। साथ ही रक्षा क्षेत्र में निजी भागीदारी बढ़ने का आर्थिक प्रभाव भी स्पष्ट है। 2025-26 में भारत का रक्षा उत्पादन रिकॉर्ड 1.78 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा, जिसमें निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी 24 प्रतिशत रही। रक्षा निर्यात 2013-14 के 686 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में रिकॉर्ड 38,424 करोड़ रुपये पहुंच गया और भारत 80 से अधिक देशों को रक्षा उत्पाद निर्यात कर रहा है। इस निर्यात में निजी क्षेत्र का योगदान 17,353 करोड़ रुपये, यानी 45.16 प्रतिशत रहा। यही कारण है कि मिसाइल तकनीक हस्तांतरण को केवल औद्योगिक नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय युद्ध तैयारी की नीति के रूप में देखना चाहिए। अधिक कंपनियां उत्पादन में उतरेंगी तो क्षमता बढ़ेगी, आपूर्ति श्रृंखला फैलेगी, MSME जुड़ेंगे, तकनीकी प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और युद्धकाल में उत्पादन को तेजी से बढ़ाने की संभावना मजबूत होगी। बहरहाल, अब भारत का सामरिक लक्ष्य सिर्फ मिसाइल बनाना ही नहीं, बल्कि युद्ध के दौरान उन्हें लगातार बनाते रहने की क्षमता हासिल करना है। अमेरिका-ईरान संघर्ष ने बता दिया है कि आधुनिक युद्ध में गोला बारूद और मिसाइलों का भंडार किसी भी महाशक्ति की कमजोर नस बन सकता है। भारत ने समय रहते इस सबक को समझ लिया तो DRDO की तकनीक और निजी उद्योग की उत्पादन क्षमता का यह गठजोड़ आने वाले दशक में भारत की सबसे बड़ी सामरिक ताकतों में से एक साबित हो सकता है।
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जयशंकर और डोभाल की रूस-चीन यात्रा के कूटनीतिक संदेश को ऐसे समझिए
महान भारतीय कूटनीतिज्ञ आचार्य चाणक्य ने कहा था कि हर मित्रता के पीछे कुछ स्वार्थ होता है। स्वार्थ के बिना कोई मित्रता नहीं हो सकती। यह एक कड़वा सच है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर उनकी बात हू-ब-हू लागू होती है। उनकी इसी बात से प्रेरणा लेते हुए समकालीन भारतीय नेतृत्व यानी भारत दुनिया की किसी एक शक्ति-धुरी में बंधने के बजाय रूस, चीन और पश्चिम—तीनों के साथ अपने हितों के अनुसार समानांतर कूटनीति चला रहा है। स्वाभाविक है कि कूटनीतिक संतुलन में बाधाएं आएंगी ही और सम्बन्धों में थोड़ी सी गफलत भारत को बहुत क्षति पहुंचा सकती है। इसलिए जब जब ऐसी सम्भावनाएं बलवती दिखाई देती हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भरोसेमंद सिपहसालार सक्रिय हो जाते हैं। वाकई, यह संयोग नहीं है कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर रूस में और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल चीन में लगभग एक ही समय में अपने अपने होमवर्क को दुरुस्त करने को लेकर सक्रिय हैं। गत 23–24 अगस्त को जयशंकर ने मॉस्को में भारत-रूस सहयोग पर बातचीत की, जबकि डोभाल 24–25 अगस्त को बीजिंग में चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ भारत-चीन सीमा विवाद पर 25वें विशेष प्रतिनिधि दौर में हिस्सा लिए। इसके गहरे कूटनीतिक निहितार्थ हैं। इसे भी पढ़ें: Russia में Jaishankar, China में Doval, Japan में Piyush Goyal ने संभाला मोर्चा, आखिर क्या है Modi का मिशन? अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो एक ही समय में भारत की तरफ से दो महत्वपूर्ण कूटनीतिक यात्राएं चल रही है, जिसके दृष्टिगत विदेश मंत्री एस. जयशंकर रूस में हैं, जबकि NSA अजीत डोभाल चीन में रणनीतिक बातचीत कर रहे हैं। दरअसल, ये यात्राएं भारत की उस कुशल विदेश नीति का हिस्सा है, जिसमें सर्वाधिक मजबूत दुश्मन देश चीन के साथ तनाव कम करने का प्रयास तो शामिल है ही, लगे हाथ अपने पुराने वफादार मित्र रूस संग पुराने संबंधों को बदली हुई परिस्थितियों में और मजबूती देने की भगीरथ कोशिश चल रही है। इसी के तरहत राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल सीमा विवाद को लेकर होने वाली बातचीत में हिस्सा लिए। इस दौरान द्विपक्षीय संबंधों से जुड़े कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। खासकर अक्टूबर 2024 में रूस के कजान में हुए ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की मुलाकात ने द्विपक्षीय संबंधों में आए तनाव को जो कम करने की शुरुआत की थी, उसके बाद से ही दोनों देशों के बीच संवाद बढ़ा है जबकि यह गलवान झड़प के बाद थम सा गया था। हालांकि सुधार के संकेतों के बावजूद यह नहीं कह सकते कि भरोसा पूरी तरह लौट आया है, क्योंकि हाल में अरुणाचल प्रदेश को लेकर पेइचिंग द्वारा अपनाया गया रुख इसका सच्चा सबूत है। यही वजह है कि चीन और रूस दोनों से पुनः बातचीत की जरूरत आन पड़ी है। वहीं ब्रिक्स की मेजबानी से पहले उपजे अरुणाचल गतिरोध के पीछे भी चीनी चाल को समझने की जरूरत है। यह ठीक है कि दोनों ही देशों का हित सीमा पर शांति और स्थिरता में निहित है। उसके मद्देनजर यह यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि सितंबर में भारत को ब्रिक्स सम्मेलन की मेजबानी करनी है। इसमें शी चिनफिंग के भी आने की चर्चा है, लेकिन उन्होंने कन्नी काटने के बहाने ढूंढ लिए हैं। उल्लेखनीय है कि पिछले साल अगस्त के आखिर में जब पीएम मोदी SCO समिट के लिए चीन के तियानजिन गए थे, तो वहां शी के साथ मुलाकात ने द्विपक्षीय संबंधों को गति देने में मदद की थी। तब दोनों ने दोहराया था कि भारत और चीन विकास के साझेदार है और आपसी मतभेद विवाद में नहीं बदलने चाहिए। यह बात आज भी उतना ही सच है। उधर, भारत पर बढ़ते अमेरिकी दबाव के बीच जयशंकर की मॉस्को यात्रा की अहमियत भी मौजूदा भू-राजनीति को देखते हुए अहम हो जाती है, क्योंकि गत सोमवार को उन्होंने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की। फिर वे अपने समकक्ष से मिले। इस दौरान बातचीत के अजेंडे में व्यापार और ऊर्जा से लेकर वैश्विक मुद्दे तक शामिल रहे है, क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय कसौटी पर ये खरे उतरे हुए द्विपक्षीय सम्बन्ध हैं। यद्यपि नई दिल्ली-मॉस्को संबंधों को लगातार अमेरिकी दबाव का सामना करना पड़ा है। खासकर यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में ईरान जिस तरह उलझा पड़ा है, आगे कूटनीतिक चुनौती और बड़ी हो सकती है। याद रहे कि जब बेहद मुश्किल हालात में भी तियानजिन से मोदी, पूतिन और चिनफिंग की तस्वीर आई तो उसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा था, खासकर अमेरिका-यूरोप का। उस समय ट्रंप प्रशासन ने टैरिफ वॉर छेड़ रखी थी। जबकि आज वैश्विक परिस्थितियां तब से ज्यादा जटिल है। दुनिया का थानेदार अमेरिका अब भी टैरिफ को हथियार बनाने की कोशिश कर रहा है और ऊर्जा. संकट बरकरार है। लिहाजा भारत को संतुलित नीति अपनाने की जरूरत है। मेरे विचार में विदेश मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की कूटनीतिक यात्रा का सबसे बड़ा संदेश यह है कि— पहला, रूस में जयशंकर: पुरानी दोस्ती को नए आर्थिक आधार देना पसंद किए हैं। जयशंकर की मॉस्को यात्रा सिर्फ रक्षा संबंधों की औपचारिक समीक्षा नहीं थी, बल्कि व्यापार, ऊर्जा, उर्वरक, परमाणु ऊर्जा, विज्ञान-तकनीक और अन्य क्षेत्रों में सहयोग को आगे बढ़ाना इसका महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। इसका अर्थ है कि भारत रूस को केवल हथियारों के पुराने आपूर्तिकर्ता के रूप में नहीं, बल्कि ऊर्जा, परमाणु, तकनीक और व्यापार का दीर्घकालीन साझेदार बनाना चाहता है। और यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि रूस पर पश्चिमी दबाव के बावजूद भारत अपने रणनीतिक स्वायत्तता के सिद्धांत को छोड़ना नहीं चाहता। दूसरा, चीन में डोभाल सीमा विवाद को 'सुरक्षा चैनल' में संभालना चाहते हैं। डोभाल का बीजिंग जाना बिल्कुल अलग प्रकृति की कूटनीति है। वे वांग यी के साथ सीमा प्रश्न पर विशेष प्रतिनिधि वार्ता कर रहे हैं। 2020 के गलवान संकट के बाद भारत-चीन संबंधों में सबसे बड़ी समस्या यही रही है कि सीमा पर शांति के बिना सामान्य संबंध कितने आगे बढ़ सकते हैं। भारत का संदेश पहले ही स्पष्ट किया गया है—सीमा पर शांति और स्थिरता अच्छे द्विपक्षीय संबंधों की बुनियादी शर्त है। इसलिए डोभाल की बातचीत का वास्तविक परीक्षण यह होगा कि क्या LAC पर स्थायी सैन्य स्थिरता, गश्त व्यवस्था और विश्वास बहाली की दिशा में कोई ठोस प्रगति होती है। तीसरा, दोनों यात्राओं को साथ रखकर देखें तो असली रणनीति दिखाई देती है। वह यह कि यहाँ भारत की कूटनीति का एक दिलचस्प ढांचा दिखाई देता है: मॉस्को — सामरिक/ऊर्जा/आर्थिक सुरक्षा। नई दिल्ली — बहुपक्षीय नेतृत्व और BRICS। बीजिंग — सीमा सुरक्षा और तनाव प्रबंधन। और इसके समानांतर अमेरिका, यूरोप, जापान तथा QUAD के साथ भारत के संबंध भी चलते रहेंगे। अर्थात भारत का विकल्प Russia या USA अथवा China या USA नहीं है। विकल्प है—जहाँ भारतीय हित जिस साझेदारी की मांग करें, वहाँ उस साझेदारी को आगे बढ़ाना। यही रणनीतिक स्वायत्तता का व्यावहारिक रूप है। भारत की बहु-संरेखीय कूटनीति पर विशेषज्ञ विश्लेषण भी इसी व्यापक प्रवृत्ति की ओर संकेत करता है। चौथा, सबसे महत्वपूर्ण कड़ी—शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा है। इस पूरे घटनाक्रम को सितंबर में प्रस्तावित BRICS शिखर सम्मेलन से अलग करके देखना कठिन है। Reuters के अनुसार शी जिनपिंग के सितंबर में नई दिल्ली आने की संभावना है, हालांकि यात्रा की आधिकारिक पुष्टि उस रिपोर्ट के समय तक नहीं हुई थी। इसलिए डोभाल-वांग बातचीत को केवल सीमा वार्ता मानना अधूरा होगा। भारत शायद पहले यह सुनिश्चित करना चाहता है कि LAC पर तनाव नियंत्रित हो → सैन्य जोखिम घटे → राजनीतिक संवाद बढ़े → मोदी-शी मुलाकात के लिए वातावरण बने → BRICS में भारत अपनी प्राथमिकताएँ आगे बढ़ाए। पांचवां, लेकिन भारत चीन पर 'नरम' नहीं हुआ है। यह अंतर समझना बहुत जरूरी है। संवाद ≠ समझौता। तनाव कम करना ≠ सीमा विवाद छोड़ना। व्यापार बढ़ाना ≠ रणनीतिक भरोसा लौटना। भारत चीन के साथ संवाद बढ़ा रहा है क्योंकि दोनों परमाणु शक्ति संपन्न पड़ोसी हैं और लंबी सीमा पर लगातार तनाव भारत के लिए आर्थिक और सैन्य दोनों दृष्टि से महंगा है। इसलिए डोभाल का बीजिंग जाना कमजोरी का संकेत नहीं बल्कि नियंत्रित प्रतिस्पर्धा (managed competition) की रणनीति के रूप में देखा जा सकता है। छठा, रूस और चीन—दोनों को एक साथ संभालने की चुनौती है। भारत के लिए असली कूटनीतिक परीक्षा यह है कि रूस और चीन की बढ़ती निकटता के बीच मॉस्को से अपने विशेष संबंध बचाए जाएँ और बीजिंग के साथ सीमा तनाव भी नियंत्रित किया जाए। यदि भारत रूस से बहुत दूर जाता है तो चीन-रूस धुरी मजबूत हो सकती है। यदि भारत चीन के साथ अत्यधिक तनाव रखता है तो दो मोर्चों पर रणनीतिक दबाव बढ़ सकता है। इसलिए जयशंकर और डोभाल की यात्राएँ एक व्यापक रणनीति का हिस्सा दिखाई देती हैं: रूस को दूर मत जाने दो। चीन को अनियंत्रित मत होने दो। अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर मत हो। और भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखो। सातवां, आने वाले महीनों में चार परिणाम सबसे महत्वपूर्ण होंगे। पहला—LAC: क्या चीन सीमा पर स्थायी सैन्य स्थिरता के लिए तैयार होता है? दूसरा—रूस: क्या भारत-रूस व्यापार और भुगतान व्यवस्था रक्षा से आगे बढ़कर ऊर्जा, तकनीक और निवेश तक पहुँचती है? तीसरा—BRICS: क्या भारत रूस-चीन प्रभाव के बीच BRICS को अपने आर्थिक और वैश्विक दक्षिण के एजेंडे के लिए इस्तेमाल कर पाता है? चौथा—अमेरिका: क्या Washington भारत की रूस-नीति और चीन से संवाद को स्वीकार करते हुए भारत को Indo-Pacific में अपना प्रमुख साझेदार बनाए रखता है? निष्कर्ष यह कि जयशंकर का मॉस्को और डोभाल का बीजिंग दौरा वास्तव में दो अलग-अलग यात्राएँ नहीं, बल्कि एक ही भारतीय रणनीति के दो पहलू हैं। जयशंकर रणनीतिक गहराई संभाल रहे हैं और डोभाल सीमा सुरक्षा। भारत का लक्ष्य शायद रूस और चीन में से किसी एक को चुनना नहीं, बल्कि दोनों के साथ संबंधों को इस तरह संतुलित करना है कि भारत की सामरिक स्वायत्तता, आर्थिक सुरक्षा और सीमा-सुरक्षा—तीनों एक साथ मजबूत हों। और सितंबर का BRICS सम्मेलन इस कूटनीतिक कवायद की अगली बड़ी परीक्षा बन सकता है। इसलिए कूटनीतिक संतुलनअपरिहार्य है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
वन्देमातरम् को लेकर संग्राम क्यों? क्या कांग्रेस जिन्ना के मार्ग पर जा रही है?
वन्देमातरम आज विवाद का विषय बना दिया है। जबकि यह सत्य है कि जब बंकिम बाबू ने इसकी रचना की थी, तब उनके मन में किसी के मन को आहत करने का कोई विचार नहीं था। उनका भाव केवल मातृभूमि के वंदन का था। देश में वन्देमातरम के अंतिम दो भाग का पहली बार विरोध विभाजन की मानसिकता रखने वाले मोहम्मद अली जिन्ना ने किया। आज उसी मार्ग पर कांग्रेस कदम बढ़ाती दिख रही है। यह बात सही है कि देश का सम्मान करने वाली किसी भी बात पर राजनीति नहीं होना चाहिए, लेकिन केवल वोट की चाहत के चलते ऐसा करना और भी खतरनाक हो जाता है। वन्दे मातरम् भारत की स्वतंत्रता चेतना, मातृभूमि के प्रति समर्पण और राष्ट्रीय स्वाभिमान का ऐसा उद्घोष है, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में असंख्य भारतीयों के भीतर देशभक्ति की ज्वाला प्रज्वलित की। यही कारण है कि आज जब वन्दे मातरम् के पूर्ण या आंशिक गायन को लेकर राजनीतिक बहस खड़ी होती है, तो प्रश्न केवल गीत की पंक्तियों का नहीं रह जाता, बल्कि राष्ट्रीय चेतना और राजनीतिक दृष्टिकोण का भी बन जाता है। इसे भी पढ़ें: क्यों ठुकराई PM की कुर्सी? प्रियंका पर राहुल को तरजीह, बच्चन परिवार से क्यों बिगड़े रिश्ते, 10 नवंबर को सोनिया गांधी बड़ा खुलासा करने वाली हैं! आज सवाल यह है कि वन्दे मातरम् पर संग्राम क्यों? कांग्रेस की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि 1937 में इसके दो पदों के गायन को लेकर निर्णय हुआ था, इसलिए उसी परंपरा का पालन होना चाहिए। लेकिन 1937 की परिस्थितियों को 2026 के भारत पर उसी रूप में लागू करना कितना उचित है, इस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। 1937 में भारत स्वतंत्र नहीं था। अंग्रेजी शासन था, साम्प्रदायिक तनाव थे और देश की राजनीतिक परिस्थितियां अत्यंत जटिल थीं। कांग्रेस उस समय आज की तरह सत्ता प्राप्त करने वाला चुनावी राजनीतिक दल नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख राजनीतिक मंच थी। जिसमें सभी देश भक्त शामिल थे। आज की कांग्रेस उससे अलग है। वन्दे मातरम् को लेकर कांग्रेस के भीतर भी यह चर्चा हुई कि इसके कुछ अंशों को लेकर मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग की आपत्तियों को कैसे देखा जाए। ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि कांग्रेस कार्यसमिति ने 1937 में इस विषय पर विचार किया था और सार्वजनिक अवसरों पर पहले दो पदों के प्रयोग की व्यवस्था बनी। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या उस समय की राजनीतिक परिस्थिति आज के स्वतंत्र भारत के लिए भी अंतिम मानक होनी चाहिए? भारत आज एक संप्रभु गणराज्य है। संविधान सभा ने 24 जनवरी 1950 को वन्दे मातरम् के ऐतिहासिक महत्व को स्वीकार करते हुए इसे राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान सम्मान देने की व्यवस्था की थी। वन्दे मातरम् को राष्ट्रीय गीत का दर्जा प्राप्त है। इसलिए इसे केवल कांग्रेस, भाजपा या किसी अन्य राजनीतिक दल के चश्मे से देखना उचित नहीं है। यहां यह सवाल भी उठता है कि जब यह राष्ट्र गीत है, तब इसे लेकर अराष्ट्रीय कार्य करने की राजनीति क्यों की जा रही है। यह आत्म मंथन का विषय हो सकता है। यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट करना भी आवश्यक है। वन्दे मातरम् संविधान के मूल पाठ में लिखकर नागरिकों के लिए अनिवार्य गायन के रूप में शामिल नहीं था। लेकिन चूँकि वन्देमातरम गाने को लेकर क़ानून बन गया है, तब सभी को इसका पालन करना ही चाहिए, कांग्रेस को भी। आज अगर कांग्रेस इसका विरोध करती है, तो इसे संविधान का अपमान ही कहा जाना उचित होगा। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय गीत को लेकर नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं और इसके पूर्ण छह अंतरे वाले संस्करण को सार्वजनिक प्रसारण में बढ़ावा दिया गया है। जुलाई 2026 में राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण कानून में संशोधन का प्रस्ताव भी लाया गया, जिसमें राष्ट्रीय गीत को जानबूझकर रोकने या उसके गायन में व्यवधान डालने के विरुद्ध कानूनी संरक्षण देने की बात है। इसलिए बहस को तथ्यों के आधार पर ही आगे बढ़ाना चाहिए। वन्दे मातरम् की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी पहचान किसी एक राजनीतिक दल से नहीं जुड़ी। कांग्रेस के अधिवेशनों में इसका गायन हुआ। 1896 में कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे गाया था। स्वतंत्रता आंदोलन में यह अंग्रेजी शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बना। ऐसे में यह कहना कि वन्दे मातरम् भाजपा की देन है, इतिहास के साथ अन्याय होगा। भाजपा तो स्वतंत्रता के बाद बनी; वन्दे मातरम् उससे बहुत पहले भारतीय राष्ट्रचेतना का हिस्सा बन चुका था। फिर वही प्रश्न उठता है कि आज इसके दो पदों या पूरे गीत को लेकर इतना राजनीतिक संघर्ष क्यों? क्या इसके पीछे वोट बैंक की राजनीति है? इस प्रश्न का उत्तर किसी एक दल के बारे में निश्चित रूप से देना उचित नहीं होगा, क्योंकि राजनीतिक मंशा का प्रमाण तथ्यों से ही स्थापित किया जा सकता है। लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि जब राष्ट्रीय प्रतीकों को बार-बार चुनावी गणित से जोड़ दिया जाता है, तब राष्ट्रहित पीछे और राजनीतिक हित आगे दिखाई देने लगता है। वन्दे मातरम् का सम्मान करना किसी धर्म विशेष का समर्थन करना नहीं है। यह मातृभूमि के प्रति सम्मान और स्वतंत्रता संघर्ष की स्मृति से जुड़ा राष्ट्रीय भाव है। भारत की शक्ति ही उसकी विविधता है। यहां पूजा-पद्धतियां अलग हो सकती हैं, भाषाएं अलग हो सकती हैं, पर मातृभूमि के प्रति सम्मान का भाव साझा हो सकता है। इसलिए वन्दे मातरम् को हिन्दू बनाम मुस्लिम विवाद में बदल देना उसके ऐतिहासिक और राष्ट्रीय स्वरूप को छोटा करना है। कांग्रेस के लिए भी यह आत्ममंथन का समय है। यदि 1937 के निर्णय को आज भी राजनीतिक ढाल बनाया जाएगा, तो यह प्रश्न उठेगा कि क्या स्वतंत्र भारत की परिस्थितियों में भी वही दृष्टिकोण अपरिवर्तित रहना चाहिए? और यदि कांग्रेस स्वयं वन्दे मातरम् के इतिहास की भागीदार रही है, तो उसे इस गीत को लेकर अस्पष्टता के बजाय स्पष्ट राष्ट्रीय दृष्टिकोण सामने रखना चाहिए। इसी प्रकार सत्ता पक्ष को भी यह ध्यान रखना होगा कि राष्ट्रभक्ति किसी पर थोपी जाने वाली भावना नहीं है। राष्ट्रगीत का सम्मान बढ़े, उसके इतिहास को नई पीढ़ी जाने और उसके प्रति स्वाभाविक श्रद्धा विकसित हो, यह अधिक स्थायी रास्ता है। कानून और राजनीतिक आह्वान अपनी जगह हैं, लेकिन राष्ट्रभाव अंततः मन से पैदा होता है। वन्दे मातरम् को राजनीति के अखाड़े से निकालकर राष्ट्रचेतना के केंद्र में स्थापित करने की आवश्यकता है। इसे कांग्रेस बनाम भाजपा का विषय बनाना भी गलत है और हिन्दू बनाम मुस्लिम का विषय बनाना भी। यह भारत की स्वतंत्रता यात्रा का अमूल्य अध्याय है। कांग्रेस को अपने राजनीतिक उत्थान से आगे बढ़कर देश के उत्थान के बारे में सोचना चाहिए। वन्दे मातरम् किसी दल की संपत्ति नहीं, भारत की राष्ट्रीय विरासत है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम पूछें जब इसके शब्दों में मातृभूमि के प्रति वंदन है, इसके इतिहास में स्वतंत्रता का संघर्ष है और इसकी स्मृति में असंख्य देशभक्तों का त्याग है, तब इसे विवाद का नहीं, संवाद का विषय बनाया जाना चाहिए। राजनीति अपनी जगह रहे, लेकिन राष्ट्र सबसे ऊपर रहे। वन्दे मातरम् केवल गाया न जाए, उसकी भावना को जीवन में उतारा जाए। यही भारत के प्रति सच्ची वंदना होगी। - सुरेश हिंदुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार 103 अग्रवाल अपार्टमेंट कैलाश टॉकीज के पास, नई सड़क लश्कर ग्वालियर मध्यप्रदेश
खबरों की दुनिया में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की चुनौती, यहां आंखों देखा और कानों सुना भी झूठ हो सकता है!
मीडिया की दुनिया के लिए यह सबसे कठिन समय है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) ने सब कुछ हिलाकर रख दिया है। अगले पांच वर्षों में न्यूज रुम का चेहरा बदलने के संकल्प के साथ इस नए ज्ञान क्षेत्र ने जितने कम समय में अपनी उपयोगिता बनाई है, वह चकित करने वाली है। जिस दौर में समूचा मीडिया विश्वसनीयता और प्रामणिकता के संकट से जूझ रहा है, ऐसे समय में एआई के लिए मीडिया समूहों का उत्साह और उसकी स्वीकार्यता वास्तव में आश्चर्य में डालने वाली है। सही मायनों में यह वह समय है जब आंखों देखी तथा कानों सुनी बातें भी छलावा और धोखा साबित हो रही हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीपफेक तकनीक ने सूचनाओं का ऐसा धुंधला समंदर रच दिया है, जहाँ कुछ क्षणों में फर्जी खबरें सच का लिबास पहनकर तैरने लगती हैं। ऐसे में सवाल केवल यह नहीं है कि खबर कितनी तेजी से आप तक पहुँच रही है, बल्कि असली चुनौती यह है कि उस पर भरोसा कितना किया जाए। मशीनी एल्गोरिदम शब्दों को सजा सकता है, आंकड़े जोड़ सकता है, लेकिन सच को तलाशने की नैतिक हिम्मत और मानवीय संवेदना केवल एक निष्पक्ष पत्रकार के पास ही होती है। डीपफेक से मुकाबला- युद्ध और राजनीतिक भाषणों के फर्जी वीडियो और आडियो वायरल हो जाना अब नई बात नहीं रही। पिछले चुनाव में भी कई दिवंगत नेताओं के वीडियो चले जिसमें वे अपनी पार्टी के वोट की अपीलें कर रहे हैं। जनमत को प्रभावित करने के लिए ऐसे प्रयास चरम पर हैं, जिनकी विश्वसनीयता शून्य है। 'वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम' की एक रिर्पोट में एआई जनित गलत सूचनाओं को दुनिया के बड़े खतरों में बताया गया है। आज दुनिया और देश के अनेक बड़े मीडिया हाउस आधिकारिक तौर पर एआई का उपयोग डेटा विश्लेषण और अनुवाद के लिए कर रहे हैं। इसमें दो राय नहीं कि कई हजार पेज के डेटा का आंकलन -विश्लेषण सामान्य मनुष्य के लिए कई महीनों का काम है जिसे एआई के टूल्स मिनटों में संभव कर रहे हैं। बावजूद इसके अनेक मीडिया आउटलेट्स एआई से खबरें या विश्लेषण लिखवाकर हंसी के पात्र बन रहे हैं। ऐसे में संशोधन, सुधार और मानवीय हस्तक्षेप से मुक्त सामग्री से कचरा तो बढ़ ही रहा है, विश्वनीयता के नए संकट सामने हैं। बड़े भाषा माडल (एलएलएम) कभी पूरी तरह से काल्पनिक आंकड़े, अदालत के फैसला और ऐतिहासिक घटनाएं गढ़ते हुए दिखते हैं। जिसे सामान्य पाठक सच समझ बैठता है। तकनीकी विशेषज्ञ इसे हैलुसिनेशन कह रहे हैं। जिसका सीधा आशय यह है कि जिन चीजों के सटीक जवाब एआई के पास नहीं होते वह उनके मनगढंत उत्तर प्रस्तुत कर देता है। सजग संपादक और संपादकीय दृष्टि के अभाव में यह सामग्री कई तरह से संकट पैदा कर सकती है। इसे भी पढ़ें: नितिन नवीन की नई टीमः नई ऊर्जा और नया संतुलन खबरों में सच की तलाश- सच और झूठ का फासला बहुत कम हो गया है। खबरों का सत्यापन पत्रकारिता की पहली शर्त है। लेकिन होड़ और दौड़ में वह धूमिल हो रही है। सामान्य से लगते कामों में एआई का उपयोग तो किया जा रहा है किया भी जाना चाहिए। किंतु किसी खोजी रिपोर्ट के लिए जमीनी स्तर पर जाकर काम करना, कागजात की जांच करना पत्रकारों की ही जिम्मेदारी है। तकनीक पर अति निर्भरता के समय में हमें उसके गंभीर खतरों का भी भान होना चाहिए। मैदानी पत्रकारिता में मिट्टी की जो खुशबू है वह मैदान में उतरे बिना प्रामणिक और भरोसेमंद नहीं हो सकती। मानवीय संस्पर्श और संवेदना किसी खबर का वितान बड़ा कर सकती है। जाहिर तौर पर पत्रकारिता की निर्भरता पूरी तरह एआई टूल्स पर संभव नहीं है। पत्रकारिता जहां निष्पक्षता, समाज के हित-सद्भाव, दलगत राजनीति से ऊपर उठकर चिंतन को प्राथमिकता देती है, वहीं एल्गोरिदम का पूर्वाग्रह संभव है। अतः इसे समझने की जरुरत है। एआई माडल उसी डेटा से सीखते हैं जो उपलब्ध है। ऐसे में उपलब्ध डेटा अगर किसी प्रकार के पूर्वाग्रह से ग्रस्त है तो एआई भी उसी प्रकार के परिणाम देगा। कई शोध बताते हैं कि पश्चिमी मानकों पर ट्रेंड एआई माडल अक्सर विकासशील देशों के सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों पर गलत संदर्भ प्रस्तुत करते हैं। आसानी से अर्जित नहीं होता भरोसा- भरोसा या विश्वास वह शब्द है जिसे प्राप्त करना आसान नहीं है। आप भले एआई का उपयोग करें किंतु जैसे ही आप यह लिखते हैं कि –“खबर एआई द्वारा बनी है और इसे मानव संपादक के द्वारा देख लिया गया है।” पाठक का भरोसा एआई जनित खबर पर तुरंत कम हो जाता है। पाठक वास्तविक पत्रकारों और लेखकों द्वारा लिखी गई सामग्री को ज्यादा भरोसेमंद मानते हैं। कोई भी अखबार या मीडिया हाउस सालों-साल में यह प्रतिष्ठा अर्जित करता है। उसे एआई के नए माध्यम तुरंत समाप्त कर सकते हैं। दूसरी ओर कापीराइट और बौद्धिक संपदा से जुड़े संकट भी सामने खड़े हैं। कई प्रमुख मीडिया संगठन इस बात पर आपत्ति कर रहे हैं तो कई ने बिना अनुमति और बिना भुगतान उनकी सामग्री के उपयोग के लिए एआई कंपनियों पर मुकदमे भी किए थे। ऐसे में तमाम ऐसे विवाद अभी भी एआई के साथ जुड़े हुए हैं। बताया जाता है कि इंटरनेट पर हजारों की संख्या में ऐसी वेबसाइट्स तैर रही हैं जो केवल विज्ञापन से पैसे कमाने के लिए झूठ का व्यापार कर रही हैं। वे हर पल एआई से झूठी खबरें गढ़ते हुए पोस्ट करती रहती हैं। मीडिया वाचडाग न्यूज गार्ड ने ऐसे तमाम अविश्वसनीय वेबसाइटों की पहचान की है। ऐसे में सच और झूठ के बीच मीडिया के सत्यान्वेषण का धर्म सहम कर रह जाता है। हम सब मानते हैं संपादकीय विवेक का कभी कोई विकल्प नहीं हो सकता। इस दौर में भी यह एक सच्चाई है। नैतिक विवेक और समाज की गहरी समझ के बिना किया गया कोई भी संवाद या संचार संकट ही खड़ा करेगा। मुख्यधारा के मीडिया की ओर लौटना होगा- सारी तकनीकी क्रांति के बाद भी मुख्यधारा के मीडिया का वजूद बचा रहेगा क्योंकि एआई जनित भ्रमों, फर्जी खबरों की बाढ़ के बीच हमें सत्यापित जानकारी की ओर लौटना ही है। ऐसे में ‘प्रिंट इज डेड’ जैसी अवधारणाओं के बीच भी मुख्यधारा का मीडिया अपनी विशेषताओं के कारण, संपादकीय गुणवत्ता के कारण बना और बचा रहेगा। सत्य आसानी से नहीं मिलता, इसे समाज भी स्वीकारेगा। इसके साथ ही प्रामणिक और भरोसेमंद मंचों की ओर लौटना ही होगा। क्योंकि यहां प्रामणिक मंच केवल खबरों का व्यापार नहीं कर रहे होगें बल्कि वे अपनी खबरों के सच होने के गारंटी भी देगें। जाहिर है पारंपरिक मीडिया के लिए वह दिन बहुत खास होगा। डीपफेक और एल्गोरिदम के समय में अब चुनौती ही असली और सही खबर पाना है। क्या वो आपके पास है? - प्रो.संजय द्विवेदी (लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)
नेहरू ने जिसे बोला था भाई वो निभाता रहा दुश्मनी, मगर अब 'दोस्त' बन कर दिल्ली आ रहा है!
नेहरू ने जिस चीन को कभी ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के नारे के साथ गले लगाया था, उसने भारत के साथ दोस्ती से ज्यादा दुश्मनी निभाई। 1962 की धोखाधड़ी से लेकर गलवान की खूनी झड़प तक, सीमा पर तनाव, घुसपैठ और सामरिक दबाव, बीजिंग का ट्रैक रिकॉर्ड भारत के सामने साफ है। लेकिन अब वही चीन दोस्ती, स्थिरता और सहयोग की भाषा बोलते हुए दिल्ली आने की तैयारी कर रहा है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के अगले महीने नई दिल्ली में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन में शामिल होने की संभावना है। यहां सवाल यह है कि क्या चीन वास्तव में रिश्ते सुधारना चाहता है, या बदलती वैश्विक परिस्थितियों में भारत के साथ सामरिक समीकरण को अपने हित में ढालना चाहता है? माना जा रहा है कि शी जिनपिंग 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए भारत आ सकते हैं। यह यात्रा कई मायनों में असाधारण होगी। यदि यह योजना अंतिम रूप लेती है तो शी जिनपिंग करीब सात साल बाद भारत आएंगे। इस यात्रा की सबसे दिलचस्प बात उनके साथ आने वाला विशाल चीनी प्रतिनिधिमंडल है। बताया जा रहा है कि शी जिनपिंग के साथ करीब 400 अधिकारी भारत आ सकते हैं। यह संख्या उनकी 2019 की भारत यात्रा के दौरान आए चीनी अधिकारियों की तुलना में दोगुनी से भी ज्यादा है। उस समय प्रतिनिधिमंडल में 200 से कम अधिकारी शामिल थे। इसे भी पढ़ें: BRICS Summit 2026: हंसो, बना रखी है क्यूं ये सूरत रोनी? एक जगह अगर जमा होंगे तीनों- मोदी-जिनपिंग और पुतिन भारतीय सूत्रों के अनुसार, चीनी अधिकारी होटल, सुरक्षा व्यवस्था और यात्रा से जुड़े प्रोटोकॉल को अंतिम रूप देने में जुटे हुए हैं। हालांकि शी जिनपिंग की यात्रा योजना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ संभावित द्विपक्षीय बैठक का एजेंडा अभी अंतिम रूप नहीं ले पाया है। चीनी विदेश मंत्रालय ने भी फिलहाल यात्रा की औपचारिक पुष्टि नहीं की है, लेकिन इतना जरूर कहा है कि चीन BRICS सहयोग को बहुत महत्व देता है और भारत की अध्यक्षता में होने वाले इस वर्ष के BRICS शिखर सम्मेलन की सफलता का समर्थन करता है। यानी संदेश साफ है कि बीजिंग अभी अंतिम घोषणा से बच रहा है, लेकिन दिल्ली की दिशा में उसकी कूटनीतिक गतिविधियां तेज हैं। देखा जाये तो भारत और चीन के बीच संबंध किसी सामान्य कूटनीतिक उतार-चढ़ाव का परिणाम नहीं हैं। दोनों देशों के बीच अविश्वास की जड़ें गहरी हैं और इसका सबसे बड़ा कारण है चीन का सीमा पर लगातार आक्रामक रवैया। 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प ने दोनों देशों के रिश्तों को लगभग सबसे निचले स्तर पर पहुंचा दिया था। इस संघर्ष में 20 भारतीय जवान शहीद हुए, जबकि चीन को भी बड़ा सैन्य नुकसान हुआ। इसके बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC पर दोनों देशों के बीच लंबे समय तक भारी सैन्य तनाव बना रहा। हजारों सैनिक, भारी हथियार, तोपखाना और सैन्य ढांचा सीमा के संवेदनशील इलाकों में तैनात रहा। आखिरकार अक्टूबर 2024 में दोनों देशों के बीच डिसइंगेजमेंट समझौते के बाद तनाव कम करने की दिशा में प्रगति हुई। लेकिन सीमा विवाद खत्म नहीं हुआ है। सैन्य गतिरोध के कुछ मोर्चे शांत जरूर हुए हैं, मगर मूल विवाद अब भी जस का तस है। यही कारण है कि चीन की मौजूदा ‘दोस्ती’ को केवल उसके शब्दों से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार से परखा जाएगा। उधर, शी जिनपिंग की संभावित यात्रा से पहले भारत और चीन के बीच उच्चस्तरीय कूटनीतिक संपर्क तेज हो गए हैं। भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और भारत-चीन सीमा प्रश्न पर विशेष प्रतिनिधि अजित डोभाल बीजिंग में हैं। 25 अगस्त को डोभाल ने चीन के उपराष्ट्रपति हान झेंग से मुलाकात की। दोनों पक्षों ने सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखने के साथ-साथ आर्थिक, राजनीतिक और बहुपक्षीय मंचों पर द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के उपायों पर चर्चा की। डोभाल ने चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ भारत-चीन सीमा प्रश्न पर विशेष प्रतिनिधियों की वार्ता के 25वें दौर में भी हिस्सा लिया। इन वार्ताओं में केवल सीमा विवाद ही नहीं, बल्कि द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी चर्चा हुई। यहां भारत की रणनीति को समझना बेहद जरूरी है। दिल्ली ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि भारत-चीन संबंधों को केवल व्यापार, BRICS या बहुपक्षीय सहयोग के सहारे सामान्य नहीं बनाया जा सकता। सीमा पर शांति और स्थिरता ही व्यापक रिश्तों की बुनियाद होगी। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत अब 1962 से पहले वाली उस कूटनीतिक भूल को दोहराने के मूड में नहीं दिखता, जिसमें राजनीतिक दोस्ती के नारों के बीच सामरिक खतरे को नजरअंदाज कर दिया गया था। वहीं शी जिनपिंग के साथ संभावित रूप से 400 अधिकारियों का आना महज प्रोटोकॉल की बात नहीं है। इतना बड़ा प्रतिनिधिमंडल इस बात का संकेत है कि चीन इस यात्रा को केवल एक औपचारिक BRICS सम्मेलन के रूप में नहीं देख रहा। इसमें कई स्तरों पर बातचीत की संभावनाएं हो सकती हैं। मसलन अर्थव्यवस्था, व्यापार, निवेश, प्रौद्योगिकी, सीमा प्रबंधन, बहुपक्षीय सहयोग और वैश्विक रणनीतिक मुद्दों पर चर्चा हो सकती है। चीन संभवतः यह भी देखना चाहता है कि भारत के साथ संबंधों में कितनी तेजी से सामान्यीकरण संभव है और किन क्षेत्रों में दोनों देश प्रतिस्पर्धा के बावजूद सहयोग कर सकते हैं। लेकिन यही भारत के लिए सबसे बड़ी सावधानी का विषय भी है। चीन के साथ संबंधों की सबसे बड़ी चुनौती यह रही है कि बीजिंग अक्सर आर्थिक और राजनीतिक संबंधों को आगे बढ़ाने की कोशिश करता है, जबकि सीमा विवाद को अलग खांचे में रखने की बात करता है। भारत अब इस दृष्टिकोण को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं दिखता। गलवान के बाद नई दिल्ली की सोच साफ है कि जब सीमा पर बंदूकें तनी हों, तब बाकी रिश्तों में सामान्यता का दिखावा लंबे समय तक नहीं चल सकता। साथ ही शी जिनपिंग की संभावित दिल्ली यात्रा को केवल भारत-चीन द्विपक्षीय रिश्तों के चश्मे से देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे वैश्विक शक्ति संतुलन की बड़ी राजनीति भी है। देखा जाये तो BRICS आज केवल एक आर्थिक मंच नहीं रह गया है। यह उस उभरती विश्व व्यवस्था का प्रतीक बन रहा है जिसमें अमेरिका और पश्चिमी देशों के प्रभुत्व को चुनौती देने वाली शक्तियां अपनी भूमिका मजबूत करना चाहती हैं। चीन के लिए भारत की अहमियत कई कारणों से बढ़ी है। भारत ग्लोबल साउथ की एक प्रमुख आवाज है, दुनिया की सबसे तेजी से उभरती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और हिंद-प्रशांत से लेकर पश्चिम एशिया, रूस और अमेरिका तक जटिल कूटनीतिक संतुलन बनाए हुए है। यही चीन की रणनीतिक दुविधा भी है। एक तरफ वह भारत को एशिया में अपना प्रमुख प्रतिद्वंद्वी मानता है, दूसरी तरफ अमेरिका के साथ बढ़ती प्रतिस्पर्धा और वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में वह भारत को पूरी तरह अपने खिलाफ धकेलने का जोखिम भी नहीं लेना चाहता। यानी बीजिंग की गणना शायद यह है कि भारत से टकराव की लागत कम की जाए, लेकिन एशिया में अपनी रणनीतिक बढ़त भी छोड़ी न जाए। वहीं भारत के सामने चुनौती दोहरी है। एक तरफ चीन के साथ स्थायी तनाव बनाए रखना आर्थिक, सैन्य और कूटनीतिक रूप से महंगा पड़ सकता है। दूसरी तरफ बिना ठोस सुरक्षा गारंटी के संबंधों को तेजी से सामान्य करना रणनीतिक जोखिम पैदा कर सकता है। इसलिए भारत को चीन के साथ संबंधों में तीन स्तरों पर आगे बढ़ना होगा। एक तो सीमा पर वास्तविक और सत्यापित स्थिरता बने। केवल बैठकों और बयानों से काम नहीं चलेगा। LAC पर सैन्य गतिविधियों, सैनिकों की तैनाती और बुनियादी ढांचे के सवाल पर ठोस प्रगति जरूरी होगी। दूसरा, आर्थिक संबंधों में रणनीतिक सावधानी बरतनी होगी। भारत और चीन के बीच व्यापारिक संबंधों की अपनी अहमियत है, लेकिन महत्वपूर्ण तकनीकी क्षेत्रों, महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे और संवेदनशील आपूर्ति श्रृंखलाओं में राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी। इसके अलावा, बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग बढ़ाना होगा लेकिन सामरिक स्वायत्तता के साथ। BRICS हो, SCO हो या अन्य वैश्विक मंच, भारत चीन के साथ वहां काम कर सकता है जहां उसके हित मिलते हों, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति या हिंद-प्रशांत में अपनी रणनीतिक स्थिति से समझौता करेगा। उधर, नई दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय बैठक होती है तो यह संबंधों को नई दिशा देने का महत्वपूर्ण अवसर हो सकता है। अक्टूबर 2024 के डिसइंगेजमेंट समझौते के बाद दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय संपर्कों में धीरे-धीरे बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में दिल्ली में होने वाली संभावित बैठक यह तय कर सकती है कि दोनों देश सिर्फ तनाव प्रबंधन तक सीमित रहेंगे या संबंधों को चरणबद्ध तरीके से सामान्य करने की दिशा में आगे बढ़ेंगे। लेकिन भारत के लिए यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि कोई भी कूटनीतिक गर्मजोशी गलवान की स्मृति और सीमा विवाद की वास्तविकता पर पर्दा न डाल दे। क्योंकि भारत और चीन के रिश्तों में असली परीक्षा फोटो-ऑप, हाथ मिलाने और साझा बयान नहीं हैं। असली परीक्षा हिमालय की उन चोटियों पर होगी जहां दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने खड़ी हैं। बहरहाल, शी जिनपिंग का संभावित भारत दौरा निश्चित रूप से एक बड़ा कूटनीतिक घटनाक्रम है। सात साल बाद चीन के राष्ट्रपति का भारत आना, 400 अधिकारियों के बड़े प्रतिनिधिमंडल की तैयारी और अजित डोभाल की बीजिंग में सक्रिय कूटनीति, ये सभी संकेत देते हैं कि दोनों देश संबंधों के नए समीकरण तलाश रहे हैं। लेकिन भारत के लिए यह केवल रिश्ते सुधारने का अवसर नहीं, बल्कि अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करने की परीक्षा भी है। नेहरू के दौर में चीन को ‘भाई’ मानने की राजनीति का अंत 1962 की कड़वी हकीकत के साथ हुआ था। गलवान ने यह याद दिलाया कि इतिहास के सबक भुलाए नहीं जा सकते। अब अगर वही चीन दोस्ती का हाथ लेकर दिल्ली आता है तो भारत को हाथ मिलाने से परहेज नहीं करना चाहिए, लेकिन हाथ मिलाते समय अपनी सीमा, अपनी सुरक्षा और अपनी सामरिक शक्ति पर पकड़ ढीली नहीं पड़नी चाहिए। दिल्ली की नई चीन नीति शायद इसी एक वाक्य में समेटी जा सकती है कि बातचीत होगी, व्यापार भी होगा, सहयोग भी होगा; लेकिन भरोसा अब शब्दों पर नहीं, जमीन पर चीन के व्यवहार से तय होगा। -नीरज कुमार दुबे
संसद कमेटी की बैठक में बवाल, पैलेट गन पर चर्चा की जिद पर अड़ा विपक्ष
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बांके बिहारी मंदिर विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने दान और चढ़ावे की सुरक्षा पर जताई सख्ती, जानिए क्या कहा
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पश्चिम बंगाल एसआईआर मामला: 37 लाख अपीलों पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता
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मायावती का बड़ा ऐलान: पंजाब में अकेले चुनाव लड़ेगी बसपा, बोलीं- गठबंधन से होता है नुकसान
मायावती ने ऐलान किया कि बसपा पंजाब विधानसभा चुनाव अकेले लड़ेगी। लखनऊ बैठक में उन्होंने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने और ईमानदार उम्मीदवारों को मैदान में उतारने के निर्देश दिए।
गडकरी ने 'अब इतना काम नहीं कर पाउँगा' वाले बयान पर दी सफाई, रिटायरमेंट की अटकलों को नकारा
नितिन गडकरी के रिटायरमेंट की अटकलें तब लगीं जब एक वीडियो में वह नई पीढ़ी को मौके देने की बात करते सुने गए। गडकरी ने कहा था, 'अब मैं उतना काम नहीं कर सकता... मैं लोगों से अपील करता हूँ कि वे युवाओं को ज़्यादा काम दें।'
हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनूर मालूम है, जिस तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा। भारत की तरफ से अमेरिका को पैगाम साफ साफ दिया जा रहा है। सवाल है कि अमेरिका बार बार अमेरिका के हुनर का इम्तिहान क्यों ले रहा है? इम्तिहान कुछ ऐसा कि जो जवाब मिलेगा वो पचा नहीं पाएंगे।डोनाल्ड ट्रंप अब भारत पर टैरिफ लगा रहे हैं। रूस से तेल क्यों लेते हो ये कहकर आंखें दिखा रहे हैं। नैतिकता का पाठ पढ़ा रहे हैं। एक बार चाणक्य ने विदेशी संबंधों को लेकर कहा था कि किसी भी देश को ऐसी मित्रता या गठबंधन तुरंत समाप्त कर देना चाहिए। जिससे भविष्य में उसे नुकसान हो। अमेरिका से भारत की मित्रता या गठबंधन खत्म तो नहीं हो सकता। लेकिन अमेरिका को भारत ने कुछ चीजें स्पष्ट कर दी है। सबसे पहले तो हमारे लिए हमारा राष्ट्रहित सर्वोपरि है और भारत किसी भी दबाव के आगे झुकने वाला देश नहीं है। अगले महीने नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन समेत दुनिया के कई बड़े नेता शामिल हो सकते हैं। भारत 5 साल बाद इस सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है। यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) और यूरोप में युद्ध के कारण दुनिया भर में तनाव का माहौल है। ब्रिक्स संगठन अब एशिया, अफ्रीका, मिडिल ईस्ट और लैटिन अमेरिका तक फैल चुका है, और इस सम्मेलन में समूह के कई देशों के शीर्ष नेताओं के जुटने की उम्मीद है। सम्मेलन में शामिल होने वाले संभावित प्रमुख नेता: राष्ट्रपति दक्षिण अफ्रीका: सिरिल रामफोसा मिस्र: अब्देल फतह अल-सीसी बेलारूस: अलेक्सांद्र लुकाशेंको कजाकिस्तान: कासिम-जोमार्ट तोकायेव इंडोनेशिया: प्रबोवो सुबियांतो क्यूबा: मिगुएल डियाज-कैनेल नाइजीरिया: बोला टीनूबू उज्बेकिस्तान: शौकत मिर्जियोयेव प्रधानमंत्री मलेशिया: अनवर इब्राहिम थाईलैंड: अनुतिन चार्नविराकुल इथियोपिया: अबी अहमद अन्य देशों के प्रतिनिधि ब्राजील: घरेलू व्यस्तताओं के कारण राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला डा सिल्वा के शामिल होने की उम्मीद नहीं है; उनकी जगह विदेश मंत्री मौरो विएरा देश का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। युगांडा: उपराष्ट्रपति जेसिका अलुपो शामिल हो सकती हैं। वियतनाम: प्रधानमंत्री ले मिन्ह हुंग प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। संयुक्त अरब अमीरात (UAE): राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की जगह अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के आने की संभावना है। इसे भी पढ़ें: Russia के सबसे अजीब इलाके को बचाएगा भारत, पुतिन-जयशंकर की मुलाकात पर बड़ा खुलासा! इस बार का एजेंडा क्या है? कागज़ पर तो एजेंडा व्यापार, विकास के लिए फ़ंडिंग और ग्लोबल संस्थाओं में सुधार पर केंद्रित है, लेकिन बंद दरवाज़ों के पीछे होने वाली बैठकों में मिडिल ईस्ट के टकराव और ईरान व UAE के बीच मतभेदों का मुद्दा हावी रहने की संभावना है। उम्मीद है कि ईरान समिट के घोषणा-पत्र में हालिया टकराव, हमलों और प्रतिबंधों पर अपना पक्ष रखने के लिए ज़ोर देगा, जिससे बातचीत काफ़ी मुश्किल हो सकती है। ब्रिक्स आम सहमति के आधार पर काम करता है, जिसका मतलब है कि कोई एक प्रतिनिधिमंडल भी किसी विवादित पैराग्राफ़ पर सहमति को रोक सकता है। पश्चिम एशिया से जुड़े शब्दों को लेकर ही दबाव है। हर किसी की अपनी रेड लाइन हैं। इसे भी पढ़ें: 60 अरब डॉलर, रूस से विदेश मंत्री जयशंकर का बड़ा ऐलान शी-पुतिन की मुलाक़ात व्लादिमीर पुतिन और शी जिनपिंग की मौजूदगी भारत की कूटनीतिक संतुलन बनाने की कोशिशों में एक नया पहलू जोड़ेगी। न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स ने अधिकारियों के हवाले से बताया है कि शी के साथ लगभग 400 अधिकारियों का एक बड़ा दल शिखर सम्मेलन में शामिल हो सकता है। यह सात वर्षों में उनकी पहली यात्रा होगी और दोनों प्रतिद्वंद्वियों के बीच रिश्तों में सुधार का एक नया संकेत होगा। चीनी नेता की मौजूदगी पर BRICS के एजेंडे से ज़्यादा इस बात पर नज़र रहेगी कि यह 2020 में सीमा पर हुई घातक झड़पों के बाद बीजिंग और नई दिल्ली के रिश्तों को स्थिर करने की कोशिशों के बारे में क्या संकेत देता है। रूसी राष्ट्रपति पुतिन भी एक क्षेत्रीय मंच पर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात करना चाहते हैं और साथ ही दोनों देशों के बीच व्यापार सहयोग बढ़ाने पर ज़ोर दे रहे हैं। क्रेमलिन में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ हुई बैठक में, पुतिन ने पिछले साल आई गिरावट के बाद रूस और भारत के बीच व्यापार में हुई रिकवरी का ज़िक्र किया। इसके बाद उन्होंने विदेश मंत्री से प्रधानमंत्री तक अपनी शुभकामनाएँ पहुँचाने को कहा। पश्चिमी देशों के दबाव के बावजूद, भारत रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा के क्षेत्र में करीबी संबंध बनाए हुए है। वहीं, 'लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल' पर सालों तक चले सैन्य तनाव के बाद चीन के साथ रिश्ते बेहतर हुए हैं, हालांकि दोनों देशों के बीच रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता अभी भी बनी हुई है।
अरविंद केजरीवाल को अभिजीत दीपके ने बताया बेस्ट सीएम, स्टालिन और विजयन का भी लिया नाम
सीजेपी संस्थापक अभिजीत दीपके ने जवाहरलाल नेहरू को पसंदीदा प्रधानमंत्री बताया और एमके स्टालिन, पिनराई विजयन व अरविंद केजरीवाल के काम की तारीफ की। सीजेपी ने पांच सितंबर के दिल्ली मार्च का भी ऐलान किया।
डोनाल्ड ट्रंप पिछले दिनों चीन की यात्रा कर चुके हैं और अब उन्होंने दावा किया है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग दो सप्ताह के भीतर अमेरिका आने वाले हैं। सामने से दिख रहा है कि दोनों देशों के नेता बातचीत कर रहे हैं, उच्चस्तरीय संपर्क बनाए हुए हैं और दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं तनाव को नियंत्रित करने का संदेश दे रही हैं। लेकिन इस कूटनीतिक मुस्कान के पीछे हकीकत बिल्कुल अलग है। वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच एक नया शीत युद्ध पूरी रफ्तार से चल रहा है और उससे भी ज्यादा खतरनाक बात यह है कि दोनों पक्ष भविष्य के संभावित युद्ध की तैयारी अभी से कर रहे हैं। हम आपको बता दें कि व्यापार, तकनीक, ताइवान, दक्षिण चीन सागर और इंडो-पैसिफिक में प्रभाव की लड़ाई अब कूटनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रह गयी है। चीन अपनी मिसाइल और हाइपरसोनिक ताकत को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहा है, जबकि अमेरिका प्रशांत महासागर के द्वीपों, सैन्य ठिकानों और सहयोगी देशों के नेटवर्क के जरिए बीजिंग को घेरने की रणनीति तैयार कर रहा है। यानी सामने बातचीत है, लेकिन पर्दे के पीछे युद्ध की शतरंज बिछ चुकी है। इसे भी पढ़ें: Russia में Jaishankar, China में Doval, Japan में Piyush Goyal ने संभाला मोर्चा, आखिर क्या है Modi का मिशन? चीन का नया हाइपरसोनिक दांव, अमेरिका की युद्ध मशीन पर सीधा निशाना इस उभरते टकराव में चीन का सबसे नया और सबसे खतरनाक कदम उसकी हाइपरसोनिक क्षमता से जुड़ा है। रिपोर्टों के मुताबिक चीनी सेना ने ऐसे हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल विकसित किए हैं, जो हवा से हवा में मार करने वाले हथियार लॉन्च कर सकते हैं। यह क्षमता अमेरिका के उन महंगे और अत्यंत महत्वपूर्ण विमानों के लिए बड़ा खतरा बन सकती है, जो अब तक युद्धक्षेत्र से हजारों किलोमीटर दूर रहकर अपेक्षाकृत सुरक्षित माने जाते थे। चीन का निशाना केवल किसी लड़ाकू विमान को गिराना नहीं है। उसकी रणनीति अमेरिका की पूरी एयर ऑपरेशन आर्किटेक्चर को चोट पहुंचाने की है। अमेरिकी टैंकर विमान, एयरबोर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम और E-4B Nightwatch जैसे उड़ते कमांड पोस्ट अमेरिका की सैन्य ताकत की रीढ़ हैं। टैंकर लड़ाकू विमानों को लंबी दूरी तक पहुंच देते हैं, AWACS दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखता है और एयरबोर्न कमांड प्लेटफॉर्म युद्ध संचालन को नियंत्रित करते हैं। अगर चीन इन “दूर लेकिन निर्णायक” लक्ष्यों तक पहुंचने की क्षमता हासिल कर लेता है, तो अमेरिका की पूरी हवाई युद्ध प्रणाली दबाव में आ सकती है। चीन की मिसाइल ताकत का पैमाना भी इस खतरे को और गंभीर बनाता है। अमेरिकी आकलन के अनुसार चीन के पास 2024 तक कम से कम 3,150 बैलिस्टिक मिसाइलें और लगभग 300 ग्राउंड लॉन्च्ड क्रूज मिसाइलें थीं। DF-17 से लॉन्च किया गया हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल लगभग 1,500 मील तक जा सकता है, जबकि DF-27 की अनुमानित रेंज लगभग 5,000 मील है। यानी चीन अब केवल अपने तटीय क्षेत्र की रक्षा की तैयारी नहीं कर रहा, बल्कि अमेरिकी सैन्य ठिकानों और दूरस्थ ऑपरेशनल नेटवर्क को भी खतरे में लाने की क्षमता बढ़ा रहा है। हालांकि इस हथियार के इस्तेमाल की अपनी जटिलताएं भी हैं। हजारों किलोमीटर दूर उड़ते विमान को निशाना बनाने के लिए बेहद सटीक और लगातार अपडेट होने वाली टारगेटिंग जानकारी चाहिए। मिसाइल की लंबी “किल चेन” को बाधित किया जा सकता है और बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्च को परमाणु हमले के रूप में गलत समझे जाने का खतरा भी मौजूद है। लेकिन अगर चीन इन तकनीकी चुनौतियों को प्रभावी ढंग से पार कर लेता है, तो अमेरिका के लिए यह रणनीतिक सिरदर्द बन सकता है। अमेरिका की घेराबंदी, चीन का जवाब अमेरिका की रणनीति भी कम आक्रामक नहीं है। वॉशिंगटन प्रशांत क्षेत्र में जापान, ताइवान और फिलीपींस जैसे सहयोगियों के सहारे चीन को पहली द्वीप श्रृंखला के भीतर सीमित रखने की कोशिश कर रहा है। दूसरी ओर गुआम, कैरोलाइन द्वीप और टिनियन जैसे ठिकाने अमेरिकी सैन्य अभियानों के महत्वपूर्ण लॉन्चपैड हैं। अमेरिका की योजना है कि छोटे-छोटे द्वीपों और ठिकानों पर अपनी सैन्य क्षमता को फैलाया जाए ताकि चीन के सामने एक ही बड़ा लक्ष्य न रहे, बल्कि उसे असंख्य ठिकानों और लॉन्च पोजीशन से जूझना पड़े। इन द्वीपों को समुद्र में किलों की तरह इस्तेमाल करने की तैयारी है। NMESIS जैसे लगभग 300 किलोमीटर रेंज वाले हथियारों के जरिए चीन की नौसेना के लिए समुद्री इलाकों को खतरनाक बनाने की रणनीति तैयार की जा रही है। इसके पीछे अंतरिक्ष, हवा, जमीन और समुद्र के नीचे तक फैला निगरानी नेटवर्क काम करेगा। लेकिन चीन भी इस अमेरिकी घेराबंदी को समझ चुका है। बीजिंग की रॉकेट फोर्स अब उन्हीं अमेरिकी एयरबेस और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की तैयारी कर रही है, जिनके सहारे वॉशिंगटन भविष्य के किसी संघर्ष में चीन पर दबाव बनाना चाहता है। यही इस नए हथियारों के मुकाबले की असली तस्वीर है। यानि अमेरिका चीन को द्वीपों से घेरना चाहता है, जबकि चीन मिसाइलों से उन द्वीपों और अमेरिकी ठिकानों को निशाने पर लेना चाहता है। ट्रंप और जिनपिंग की मुलाकात, लेकिन तनाव जस का तस इस बीच डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की है कि शी जिनपिंग दो सप्ताह में अमेरिका आ सकते हैं। ट्रंप ने अपने चीन दौरे और बीजिंग के ग्रेट हॉल का उल्लेख करते हुए व्हाइट हाउस परिसर में नए निर्माण, बॉलरूम और एक सैन्य परिसर की योजना का भी जिक्र किया। हालांकि जिनपिंग की प्रस्तावित यात्रा को लेकर चीन की ओर से उपलब्ध सामग्री में कोई अलग आधिकारिक घोषणा नहीं थी। यह संभावित मुलाकात दोनों देशों के बीच संवाद जारी रहने का संकेत जरूर है, लेकिन इससे रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता खत्म होने के कोई संकेत नहीं मिलते। ताइवान, व्यापार, तकनीक, दक्षिण चीन सागर और इंडो-पैसिफिक पर दोनों देशों के हित सीधे टकराते हैं। इसलिए कूटनीतिक बातचीत का एक उद्देश्य तनाव को नियंत्रित करना भी है, ताकि यह प्रतिस्पर्धा अनियंत्रित सैन्य टकराव में न बदल जाए। अमेरिका की सबसे बड़ी कमजोरी है खाली होते हथियार भंडार उधर, शिंगटन के लिए सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि जिस समय वह चीन के साथ संभावित लंबे संघर्ष की तैयारी कर रहा है, उसके हथियार भंडार पहले ही भारी दबाव में हैं। यूक्रेन युद्ध के दौरान अमेरिका और उसके सहयोगियों ने बड़े पैमाने पर हथियार उपलब्ध कराए। इसके बाद ईरान के साथ संघर्ष ने प्रिसिजन हथियारों और एयर डिफेंस इंटरसेप्टर की मांग और बढ़ा दी। स्थिति इतनी गंभीर है कि अमेरिका के सामने अब केवल महंगे और अत्याधुनिक हथियारों का उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं माना जा रहा। कई सिस्टमों की उत्पादन अवधि तीन से चार साल तक हो सकती है। इसलिए अब “प्रिसाइज मास” की सोच पर जोर दिया जा रहा है। यानी बड़ी संख्या में सस्ते ड्रोन, सेंसर और ऐसे हथियार तैयार करना जिन्हें तेजी से बनाया जा सके और युद्ध में बड़ी संख्या में इस्तेमाल किया जा सके। बहरहाल, ट्रंप और जिनपिंग की मुलाकातें दुनिया को तनाव कम होने का संदेश दे सकती हैं, लेकिन जमीन पर अमेरिका और चीन दोनों भविष्य के संघर्ष के लिए अपनी-अपनी सैन्य मशीन को तैयार कर रहे हैं। चीन हाइपरसोनिक हथियारों और विशाल मिसाइल शक्ति से अमेरिकी सैन्य नेटवर्क की नसों पर वार करने की क्षमता विकसित कर रहा है। वहीं अमेरिका द्वीपों, गठबंधनों, पनडुब्बियों और फैले हुए सैन्य ठिकानों के जरिए चीन को घेरने की कोशिश कर रहा है। अब सवाल यह उठता है कि बातचीत की मेज के पीछे दोनों महाशक्तियां जिस युद्ध की तैयारी कर रही हैं, अगर वह कभी वास्तविक संघर्ष में बदल गया तो प्रशांत महासागर में पहला वार कौन करेगा और कौन उसे सहने के लिए ज्यादा तैयार होगा? -नीरज कुमार दुबे

