नई दिल्ली, 8 अक्टूबर (आईएएनएस)। दवाओं की बिक्री को बढ़ावा देने के लिए फार्मा कंपनियों द्वारा डॉक्टरों को महंगे तोहफे और सुविधाएं देने की प्रथा पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक विशेष कमेटी का गठन करने और उसकी रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने का आदेश दिया है।
भारत में एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स की उपग्रह आधारित इंटरनेट सेवा स्टारलिंक की शुरुआत को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। एलन मस्क ने भारत में अपनी कंपनी की राह में “कुछ प्रभावशाली उद्योगपतियों” के रोड़े अटकाने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि ये कारोबारी भारतीय जनता पर अपना एकाधिकार और नियंत्रण बनाए रखने के लिए स्टारलिंक को भारत में प्रवेश नहीं करने दे रहे हैं। मस्क ने यहां तक कह दिया कि यह “भारत की जनता के खिलाफ अपराध” है। लेकिन मस्क के इस बयान के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत जैसे संप्रभु देश की सुरक्षा और दूरसंचार नीति अब किसी अरबपति के सोशल मीडिया बयान से तय होगी? उधर, भारत सरकार ने मस्क के आरोप को सीधे खारिज कर दिया है। सरकार का कहना है कि भारत में उपग्रह आधारित संचार सेवाओं के लिए बनाए गए नियम निष्पक्ष और किसी भी कंपनी के साथ भेदभाव से मुक्त हैं। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि इन नियमों को किसी कंपनी के खिलाफ भेदभावपूर्ण बताना पूरी तरह बेबुनियाद और गलत समझ पर आधारित है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत सरकार ने साफ किया है कि स्टारलिंक अकेली कंपनी नहीं है जो मंजूरी की प्रक्रिया में है। सुनील भारती मित्तल समर्थित वनवेब, मुकेश अंबानी की रिलायंस जियो और एलन मस्क की स्टारलिंक, तीनों कंपनियों के मामले में सुरक्षा संबंधी जांच चल रही है। सरकार के मुताबिक तीनों कंपनियां फिलहाल लगभग एक ही नियामकीय चरण में हैं। तो फिर मस्क से पहला सवाल यही पूछा जाना चाहिए कि अगर भारत सरकार तीनों कंपनियों की सुरक्षा जांच कर रही है, तो केवल स्टारलिंक को रोकने का आरोप भारत पर क्यों लगाया जा रहा है? इस विवाद का दूसरा और बेहद अहम पहलू इसके समय से जुड़ा है। एलन मस्क का बयान ऐसे समय आया जब भारत दुनिया के सामने अपनी संचार और डिजिटल जगत की तकनीकी क्षमता का प्रदर्शन करने के लिए तैयार था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंडिया मोबाइल कांग्रेस के दसवें संस्करण का उद्घाटन किया। दुनिया के सौ से अधिक देशों की भागीदारी वाले इस आयोजन में भारत की 5जी तकनीक, डिजिटल संपर्क व्यवस्था, दूरसंचार क्षेत्र की उपलब्धियों और भविष्य की संचार तकनीक को दुनिया के सामने रखा जा रहा है। जब पूरी दुनिया भारत की संचार क्रांति और तकनीकी प्रगति को देखने के लिए जुटी थी, उसी समय स्टारलिंक को लेकर मस्क का तीखा बयान सामने आया। इसलिए सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह महज एक कारोबारी असहमति थी या फिर इस बयान के समय ने भारत की तकनीकी उपलब्धियों से दुनिया का ध्यान हटाकर स्टारलिंक विवाद की तरफ मोड़ दिया? यह सवाल उठेगा ही कि भारत के सबसे बड़े दूरसंचार आयोजनों में से एक के दौरान ही इस तरह का सार्वजनिक आरोप लगाने की जरूरत आखिर एलन मस्क को क्यों पड़ी? अब बात उस मुद्दे की, जिस पर भारत सरकार कोई समझौता नहीं करना चाहती है। वह मुद्दा है राष्ट्रीय सुरक्षा। भारत ने स्टारलिंक को देश में आने से पूरी तरह मना नहीं किया है। कंपनी को भारत में उपग्रह आधारित संचार सेवाएं देने का आवश्यक लाइसेंस मिल चुका है। लेकिन लाइसेंस मिलना सेवा शुरू करने की अंतिम अनुमति नहीं है। इसके बाद सुरक्षा मंजूरी, रेडियो तरंगों के आवंटन और अन्य आवश्यक नियमों का पालन करना पड़ता है। यहीं पर मस्क के आरोप की असली परीक्षा होती है। देखा जाये तो उपग्रह आधारित इंटरनेट सामान्य इंटरनेट सेवा से अलग है। यहां केवल तेज इंटरनेट पहुंचाने का सवाल नहीं है। इसके साथ भारतीय नागरिकों के आंकड़ों की सुरक्षा, आंकड़ों को देश के भीतर रखने, संचार की वैध निगरानी, आपातकालीन परिस्थितियों में सरकारी पहुंच और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर प्रश्न जुड़े हैं। भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि भारतीय उपयोगकर्ताओं का आंकड़ा कहां रखा जाएगा, संचार व्यवस्था पर किसका नियंत्रण होगा और राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों को कानून के तहत आवश्यकता पड़ने पर आवश्यक जानकारी और पहुंच किस प्रकार उपलब्ध होगी? वहीं स्टारलिंक ने भारत की सुरक्षा संबंधी चिंताओं को दूर करने की कोशिश करते हुए दावा किया है कि उसने भारत में लगभग 20 जमीन आधारित केंद्र तैयार किए हैं और भारतीय उपयोगकर्ताओं के आंकड़ों को देश के भीतर रखने के लिए विशेष सुरक्षा व्यवस्था विकसित की है। कंपनी की वरिष्ठ अधिकारी लॉरेन ड्रेयर ने इंडिया मोबाइल कांग्रेस में कहा कि भारत से सभी आवश्यक मंजूरियां मिलने के बाद कंपनी सेवा शुरू करने के लिए तैयार है। लेकिन भारत का रुख बिल्कुल स्पष्ट है, पहले सुरक्षा, उसके बाद सेवा। साथ ही भारत के निष्पक्ष रवैये का एक बड़ा उदाहरण खुद एलन मस्क की दूसरी कंपनी टेस्ला है। भारत ने टेस्ला को देश में कारोबार करने से नहीं रोका। टेस्ला ने मुंबई में अपना पहला शोरूम खोला और भारत में अपनी इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री शुरू की। अगर भारत सरकार वास्तव में मस्क की कंपनियों के खिलाफ होती, तो टेस्ला को भारतीय बाजार में प्रवेश की अनुमति क्यों दी जाती? लेकिन क्या कार बेचने और देश की संचार व्यवस्था का हिस्सा बनने को एक ही तराजू में तौला जा सकता है? बिल्कुल नहीं। कार एक उपभोक्ता वस्तु है, जबकि देश की संचार व्यवस्था सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा, आंकड़ों और रणनीतिक संचार से जुड़ी होती है। इसलिए दोनों क्षेत्रों में सुरक्षा के अलग-अलग मानक होना स्वाभाविक है। यही बात मस्क के आरोपों पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा करती है। अगर भारत स्टारलिंक के साथ भेदभाव कर रहा है, तो वनवेब और रिलायंस जियो भी सुरक्षा जांच की प्रक्रिया से क्यों गुजर रहे हैं? और अगर भारत किसी एक कारोबारी समूह को फायदा पहुंचाना चाहता है, तो फिर मस्क की टेस्ला को भारत में कारोबार करने की अनुमति क्यों दी गई? इसमें कोई दो राय नहीं कि एलन मस्क को भारत के फैसले पर सवाल उठाने का अधिकार है। लेकिन किसी संप्रभु देश की नियामकीय प्रक्रिया पर सवाल उठाने के साथ आरोपों के समर्थन में ठोस प्रमाण देना भी जरूरी है। केवल सोशल मीडिया पर “प्रभावशाली उद्योगपतियों” वाला आरोप लगा देना इस बात का प्रमाण नहीं बन जाता कि भारत की व्यवस्था पक्षपातपूर्ण है। भारत को विदेशी निवेश चाहिए, नई तकनीक चाहिए और दुनिया की बड़ी कंपनियों का स्वागत भी है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि किसी विदेशी कंपनी को राष्ट्रीय सुरक्षा से ऊपर रखा जाए। भारत किसी अरबपति की निजी संपत्ति नहीं है और न ही किसी कारोबारी की सोशल मीडिया टिप्पणी भारत की नीतियां तय कर सकती है। भारत अपने फैसले अपनी संप्रभुता, अपने कानून, अपनी सुरक्षा और अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर करेगा। यही किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र का अधिकार है और यही उसकी जिम्मेदारी भी है। एलन मस्क को यह भी समझना होगा कि भारत की सुरक्षा चिंता को केवल आशंका मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। दुनिया के दूसरे देशों में भी Starlink को लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा और नियंत्रण से जुड़े गंभीर सवाल उठे हैं। ऑस्ट्रेलिया के सरकारी सुरक्षा अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि निजी उपग्रह इंटरनेट कंपनियों पर किसी देश का नियंत्रण सीमित हो सकता है। ऐसे में इन कंपनियों पर जरूरत के मुताबिक निगरानी और नियंत्रण न होने से देश की सुरक्षा और संप्रभुता के लिए खतरा पैदा हो सकता है। यूक्रेन में तो Starlink की भूमिका सीधे युद्ध और सुरक्षा से जुड़ चुकी है। अमेरिकी सरकारी जांच में पाया गया कि Starlink दोहरे उपयोग वाली तकनीक है, जिसका इस्तेमाल नागरिक संचार के साथ-साथ युद्धक्षेत्र में ड्रोन संचालन, तोपों के निशाने और सैन्य संचार के लिए भी हुआ। जांच में यह भी सामने आया कि बड़ी संख्या में Starlink उपकरण ऐसे क्षेत्रों में पहुंच गए थे जहां उनके दुरुपयोग या चोरी का जोखिम था। यही नहीं, 2026 में यूक्रेन ने रूसी ड्रोन के लिए Starlink के अवैध इस्तेमाल को रोकने के उद्देश्य से केवल अधिकृत उपकरणों को सेवा देने की व्यवस्था लागू की। म्यांमार में भी Starlink पर गंभीर आरोप लगे हैं। अंतरराष्ट्रीय जांचों में सामने आया कि मानव तस्करी और साइबर ठगी के लिए चलाए जा रहे कुख्यात ठिकानों में Starlink का इस्तेमाल हो रहा था; एक कार्रवाई में ऐसे ही एक परिसर से 30 Starlink उपकरण जब्त किए गए थे। यहां तक कि अमेरिकी सांसदों ने भी दक्षिण-पूर्व एशिया के इन ठगी केंद्रों में Starlink के इस्तेमाल को लेकर कंपनी से जवाब मांगा है। वैसे इन घटनाओं का अर्थ यह नहीं है कि Starlink स्वयं इन अपराधों में शामिल है, लेकिन ये घटनाएं यह जरूर दिखाती हैं कि इतनी शक्तिशाली और सीमापार काम करने वाली उपग्रह इंटरनेट व्यवस्था के इस्तेमाल पर किसी देश की सरकारें नियंत्रण, निगरानी और राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर इतनी सतर्क क्यों हैं? ऐसे में भारत अगर अपने यहां Starlink को पूरी सुरक्षा जांच और स्पष्ट शर्तों के बाद ही अनुमति देना चाहता है, तो इसमें गलत क्या है? बहरहाल, भारत में कारोबार करने के लिए दुनिया की कंपनियों का स्वागत है, लेकिन भारत की जमीन पर कारोबार करने वाली हर कंपनी को भारत के कानून, भारत के नियम और भारत की सुरक्षा शर्तों का पालन करना ही होगा। भारत तकनीक का स्वागत करेगा, निवेश का स्वागत करेगा और प्रतिस्पर्धा का भी स्वागत करेगा, लेकिन अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा की कीमत पर नहीं। -नीरज कुमार दुबे
ममता के दिल्ली दौरे पर दिलीप घोष का तंज, बोले-याचिकाओं से बंगाल पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा
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नई दिल्ली, 8 अक्टूबर (आईएएनएस)। दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का गुरुवार सुबह गोवा स्थित उनके आवास पर निधन हो गया। 75 वर्षीय अभिनेता के निधन पर कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों और नेताओं ने शोक व्यक्त किया है। सभी ने ईश्वर से प्रार्थना की कि दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान और शोकाकुल परिजनों व प्रशंसकों को यह दुख सहने की शक्ति प्रदान करें।
Bihar Politics: SIR के खिलाफ महागठबंधन का बड़ा प्रदर्शन, पटना में राजभवन मार्च आज
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राहुल-प्रियंका के साथ कथित पुलिस कार्रवाई के खिलाफ आज कांग्रेस का विरोध प्रदर्शन
मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने बुधवार को पार्टी कार्यकर्ताओं से 8 अक्टूबर को राज्यभर में प्रदर्शन करने की अपील की। उन्होंने कहा कि नई दिल्ली में विरोध मार्च के दौरान लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अन्य इंडिया गठबंधन सांसदों के साथ हुई कथित पुलिस कार्रवाई के विरोध में ये प्रदर्शन किए जाएंगे।
राहुल की हुंकार, लोकतांत्रिक आवाज दबेगी नहीं
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर कांग्रेस और INDIA गठबंधन का विरोध प्रदर्शन लगातार दूसरे दिन भी जारी रहा
गुजरात बोर्ड ने कक्षा 10 और 12 की मार्कशीट के लिए 'पारख सेल' और डिजीलॉकर सुविधा शुरू की
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आंध्र प्रदेश के राज्यपाल एस. अब्दुल नजीर ने लोक भवन में 77वें टीबी सील बिक्री अभियान की शुरुआत की
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महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने गृह मंत्री अमित शाह को सूखे की स्थिति से अवगत कराया, केंद्र से सहायता मांगी
'विशाखापत्तनम मेट्रो और बीच कॉरिडोर प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दे केंद्र', सीएम नायडू का पीएम मोदी से आग्रह
वैश्विक खाद्य संकट के काले बादलों के बावजूद भारत की स्थिति दुनिया के अन्य देशों की तुलना में काफी मजबूत और सुरक्षित है।
एसआईआर पर हंगामा, हकीकत से ज्यादा फसाना
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर सियासी पारा लगातार चढ़ा हुआ है। विशेषकर विपक्षी दल जिस तरह से इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं, उससे माहौल में एक भ्रम फैल रहा है। विपक्षी हंगामे और सवालों के चलते ऐसे लोगों की संख्या बढ़ी है, जो मानने लगे हैं कि मतदाता सूची की जांच एक तरह से नागरिकता की जांच हो गई है। लोग एक बारगी वोटर न होने को बर्दाश्त कर भी लें, लेकिन कोई नहीं चाहेगा कि उसकी जन्मजात नागरिकता पर सवाल उठे या वह खतरे में पड़े। कहना न होगा कि विशेषकर पश्चिम बंगाल में हुए एसआईआर के बहाने विपक्ष यह भ्रम और डर-दोनों फैलाने में किंचित सफल रहा है। हालांकि यह भी सच है कि ऐसा भ्रम और डर सिर्फ पश्चिम बंगाल और बिहार के ही कुछ इलाकों में ही दिख रहा है। एसआईआर उत्तर प्रदेश में भी हुआ है और दिल्ली में भी जारी है। एसआईआर तमिलनाडु में भी हुआ है। लेकिन यहां के मतदाताओं के बीच ऐसा भ्रम और डर न के बराबर दिखा है। इसे भी पढ़ें: Voter List विवाद पर पूर्व जज SN Dhingra का बयान, ECI की SIR प्रक्रिया को बताया जरूरी ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर बिहार और पश्चिम बंगाल में ऐसा डर क्यों दिख रहा है? इसकी वजह है, वहां पिछले कुछ दशकों में बांग्लादेश से बढ़ी घुसपैठ। पश्चिम बंगाल में जब सत्ता में वाममोर्चा था, तब यही ममता बनर्जी वहां घुसपैठ के मुद्दे को उछालती रहती थीं और वाममोर्चे पर आरोप लगाती रहती थीं कि वह इसे बढ़ावा दे रहा है। ममता बनर्जी इस बहाने परोक्ष रूप से वाममोर्चा पर आरोप लगाती थीं कि मतदाता बने घुसपैठियों के ही सहारे वह पश्चिम बंगाल की सत्ता में काबिज है। बाद के दिनों में ये मतदाता ममता के समर्थक हो गए और ममता की सत्ता के आधार बनने लगे तो उन्हें भी यह मामला फिजूल का लगने लगा। बिहार का सीमांचल इलाका भी बांग्लादेशी घुसपैठ से प्रभावित रहा है। इसलिए वहां भी ऐसे सवाल और भ्रम उठ रहे हैं। चूंकि एसआईआर में ऐसे अवैध मतदाता ज्यादा सवालों के घेरे में हैं या फिर उनके नाम कट रहे हैं, इस वजह से इन्हीं राज्यों में यह मुद्दा कुछ ज्यादा तुर्श दिख रहा है। मतदाता सूची में सुधार और उसमें चुनाव आयोग एवं मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर भी बड़े सवाल उठे हैं। सवाल यह भी है कि क्या एसआईआर को लेकर उठाए जा रहे सवाल असल में प्रक्रियात्मक और कानूनी हैं या इनके जरिए सिर्फ राजनीति हो रही है? पहले ही कहा जा चुका है कि एसआईआर को लेकर विपक्षी दलों की सबसे ज्यादा आपत्तियां बिहार और पश्चिम बंगाल से जुड़ी बताई जा रही हैं। कुछ राजनेताओं और दलों ने एसआईआर के आधार पर इन राज्यों के चुनावी परिणामों और मतदाता सूची की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। यहां ध्यान रखने की बात है कि एसआईआर केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी हुआ, लेकिन वहां बिहार या पश्चिम बंगाल की तरह इस पर सियासी विवाद नहीं हुआ। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि यदि कुछ राज्यों में एसआईआर को लेकर गंभीर आपत्ति नहीं है तो फिर एक या दो राज्यों में गंभीर आपत्तियां क्या राजनीतिक एजेंडे की वजह से तो नहीं उठाई जा रहीं? एसआईआर को देखने और समझने की एक ही कसौटी हर राज्य में क्यों नहीं लागू की जा रही है? इससे तो यही संकेत जाता है कि इसका सियासी विरोध सेलेक्टिव है और दोहरे मापदंड से भरा हुआ है। क्या है एसआईआर की मानक प्रक्रिया? एसआईआर को लेकर जारी बहस में बड़े पैमाने पर नाम हटाने, तकनीकी प्रणाली के इस्तेमाल और पारदर्शिता जैसे सवाल उठाए गए हैं। मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया निर्धारित कानूनी और प्रशासनिक चरणों के तहत होती है। नाम हटाने से पहले मतदाता को नोटिस जारी करने और उसकी आपत्तियों और तर्कों की सुनवाई की जाती है। इसके बाद आखिरी निर्णय संबंधित निर्वाचन अधिकारी के स्तर पर होता है। इसलिए ड्राफ्ट मतदाता सूची में किसी मतदाता का नाम नहीं होना और अंतिम मतदाता सूची से नाम हट जाना, एक ही बात नहीं है। इसलिए जरूरी है कि दावे, ड्राफ्ट आंकड़े, आपत्तियों और अंतिम निर्णय, इन सभी चरणों को अलग-अलग समझा जाए। हर स्तर पर चूंकि आयोग ने पारदर्शी व्यवस्था अपना रखी है, इसे समझना हो तो अभी दिल्ली के किसी बीएलओ केंद्र का दौरा किया जा सकता है। दिल्ली में खूब नोटिस जारी किए गए हैं, उनके जवाब में लोग बीएलओ यानी बूथ स्तर के अधिकारी के पास पहुंच रहे हैं। लेकिन अफरातफरी, घबराहट या दहशत नहीं दिख रही। बीएलओ लोगों से जरूरी फॉर्म और प्रमाण ले रहे हैं। ज्यादातर नोटिस की वजह पूरा नाम ना होना, नाम की वर्तनी गलत होना, पिता या पति के नाम का पूरा न होना या फिर उनके नाम की वर्तनी में गड़बड़ी या कमी होना है। अधिकारियों का कहना है कि ईसीआईनेट का सॉफ्टवेयर मतदाता सूची के पहले से जारी नाम और आवेदन में कुछ ही गड़बड़ी पाता है तो वह नोटिस जेनरेट कर देता है। उदाहरण के लिए, पहले से किसी का नाम मतदाता सूची में सिर्फ रमेश दर्ज है, जबकि उसका पूरा नाम रमेश शर्मा है, या इसी तरह उसके पिता का पूरा नाम दर्ज नहीं है। लेकिन पहचान के दूसरे दस्तावेजों में उसका पूरा नाम दर्ज है। जब आयोग के अधिकारी ईसीआईनेट पर इसे लोड करते हैं तो सॉफ्टवेयर इस गड़बड़ी या बेमेल तथ्य को पकड़ता है। इसी तरह किसी का पता बदल गया है, जो पहले से दर्ज रिकॉर्ड से अलग है तो उसे भी नोटिस जा रही है। बस इन्हें प्रमाणित करना भर है। लेकिन राजनीतिक दल इसे या तो समझ नहीं रहे या फिर जानबूझकर नासमझी दिखा रहे हैं। वैसे भी इन प्रमाणों को घुसपैठिए या अवैध मतदाता साबित नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए उनके नाम कट रहे हैं या काटे जाने की संभावना बन रही है। एसआईआर को लेकर जारी मौजूदा बहस में नागरिकों के लिए कुछ प्रश्न बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं, क्या पुनरीक्षण निर्धारित संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया के तहत हुआ? क्या किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया? यदि ऐसा हुआ, तो क्या दावा और आपत्ति की प्रक्रिया के जरिए उसे सुधारा गया? क्या अलग-अलग राज्यों में समान प्रक्रियाओं को समान कसौटी पर देखा जा रहा है? इसे भी पढ़ें: आकाशवाणी भवन में जबरन घुसने का आरोप! Rahul Gandhi और Priyanka Gandhi के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने दर्ज की FIR संस्थाओं पर बहस हो, लेकिन तथ्यों के आधार पर एसआईआर, निर्वाचन आयोग और न्यायपालिका पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक तो है, लेकिन आरोप और प्रमाण, ड्राफ्ट सूची और अंतिम सूची, याचिका और न्यायिक आदेश तथा राजनीतिक मांग और कानूनी कार्रवाई, के बीच समझदारी से अंतर बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है। अव्वल तो मतदाता सूची की शुद्धता और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर बहस तथ्यों, कानून और निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर होनी चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। चुनाव आयोग बार-बार यह भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहा है कि एसआईआर मतदाताओं को बेहतर सुविधा देने की व्यवस्था है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य है, कोई भी वैध और योग्य मतदाता छूटे नहीं। मोटे तौर पर एसआईआर का एक ही मकसद है, हर योग्य और वैध मतदाता को सूची में जोड़ना, दिए गए पते पर न रहे मतदाताओं और मृतकों का नाम सूची से हटाना। इसके साथ ही विदेशी और घुसपैठियों को मतदाता सूची से बाहर करना है। एक आरोप यह लग रहा है कि मतदाता सूची तैयार करने में ईसीआईनेट सॉफ्टवेयर की भूमिका बीएलओ और ईआरओ की तुलना में बढ़ गई है, जिसकी वजह से मतदाता सूची को फाइनल करने के ईआरओ के अधिकार दरकिनार हो गए हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। ईसीआईनेट सिर्फ तकनीकी मंच है, जिसकी बुनियाद अधिकारियों द्वारा घर-घर से जुटाए आंकड़े हैं। नहीं भूलना चाहिए कि मतदाता सूची में किसी नाम को जोड़ने या उससे हटाने का निर्णय सिर्फ ईआरओ ही ले सकता है और वह भी जनप्रतिनिधित्व कानून 1950 और मतदाता सूची पंजीयन नियम 1960 के तहत, नोटिस और सुनवाई के बाद ही ऐसा कर सकता है। कहना न होगा कि ऐसा ही हो रहा है। लेकिन राजनीति इसे देखने की बजाय अपने हिसाब से घटनाओं और कार्यों की व्याख्या कर रही है। उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
'सुवेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री रहते विधानसभा नहीं जाऊंगा', हुमायूं कबीर का ऐलान
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Jantar Mantar Protest: Rahul-Priyanka फिर Detain! Gyanesh Kumar को क्यों बचा रही Modi सरकार?
ममता की 2021 की 'खेला होबे' वाली तस्वीर बंगाल की राजनीति में फिर से चर्चा का विषय बनी
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भारतीय चुनावी राजनीति में इन दिनों EVM बनाम बैलेट पेपर की बहस फिर तेज है। विपक्षी दलों का एक वर्ग लगातार मांग कर रहा है कि देश में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की जगह पुराने बैलेट पेपर से चुनाव कराए जाएं। हाल में INDIA ब्लॉक ने भी बैलेट पेपर की वापसी की मांग दोहराई है और चुनाव आयोग के खिलाफ राजनीतिक अभियान तेज किया है। लेकिन इस बहस के बीच एक असहज सवाल विपक्ष से भी पूछा जाना चाहिए कि अगर बैलेट पेपर ही चुनावी निष्पक्षता की गारंटी है, तो हाल में बैलेट पेपर से हुए चुनावों के नतीजों की व्याख्या विपक्ष किस तरह करेगा? हम आपको बता दें कि असम के सिलचर में 3 अक्टूबर को नगर निगम के पहले चुनाव में बैलेट पेपर से मतदान हुआ। परिणाम में भाजपा ने 42 में से 32 सीटें जीतीं और उसकी सहयोगी असम गण परिषद ने दो सीटें हासिल कीं। कांग्रेस को केवल दो सीटें मिलीं, जबकि छह सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवार विजयी रहे। यानी बैलेट पेपर वाले चुनाव में भी भाजपा-नीत NDA ने दो-तिहाई से अधिक सीटें जीत लीं। यह परिणाम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि EVM पर सवाल उठाने वाली राजनीति में अक्सर यह धारणा बनाई जाती है कि यदि चुनाव बैलेट पेपर से हो तो परिणाम अलग होगा। सिलचर का परिणाम कम-से-कम इतना जरूर बताता है कि बैलेट पेपर अपने आप किसी पार्टी के पक्ष या विपक्ष में परिणाम नहीं बदल देता। मतदाता जिस राजनीतिक दल को समर्थन देना चाहता है, वह अपना समर्थन मतदान की किसी भी व्यवस्था में व्यक्त कर सकता है। इसी संदर्भ में इस साल हुए पांच विधानसभा चुनावों यानि असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के पोस्टल बैलेट आंकड़ों की भी चर्चा होनी जरूरी है। निर्वाचन आयोग के चुनाव नतीजों वाले पोर्टल पर प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में EVM वोटों के साथ पोस्टल वोटों का भी अलग विवरण दर्ज है। आप इनका विश्लेषण करेंगे तो पाएंगे कि भाजपा और एनडीए को अच्छी खासी संख्या में पोस्टल बैलेट के जरिये भी मत मिला था। असम में तो कई निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा उम्मीदवारों को पोस्टल बैलेट में मजबूत समर्थन मिला था। पश्चिम बंगाल में भी कई ऐसे निर्वाचन क्षेत्र रहे जहां भाजपा उम्मीदवारों को सैकड़ों पोस्टल वोट मिले और वे परिणाम तय करने में महत्वपूर्ण साबित हुए। हम आपको बता दें कि पोस्टल बैलेट मुख्यतः चुनाव ड्यूटी पर तैनात कर्मचारियों और कानून के तहत पात्र अन्य श्रेणियों के मतदाताओं से जुड़े होते हैं। इसलिए इनके आधार पर पूरे राज्य की जनता की राजनीतिक पसंद का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। लेकिन ये आंकड़े एक महत्वपूर्ण राजनीतिक सवाल जरूर खड़ा करते हैं। सवाल उठता है कि यदि किसी दल का तर्क है कि मतदान की मशीन यानि ईवीएम ही उसकी हार का कारण है, तो उसे उन चुनावों और निर्वाचन क्षेत्रों को भी देखना चाहिए जहां कागज पर वोट पड़े और फिर भी परिणाम उसके पक्ष में नहीं आया। देखा जाये तो विपक्ष के सामने वास्तविक राजनीतिक चुनौती केवल EVM पर सवाल उठाना नहीं, बल्कि यह समझना भी है कि मतदाता लगातार किन मुद्दों, नेतृत्व और संगठनात्मक विकल्पों को प्राथमिकता दे रहा है। चुनाव आयोग या किसी संवैधानिक संस्था की आलोचना करने का लोकतांत्रिक अधिकार विपक्ष के पास है। यदि कहीं चुनावी प्रक्रिया में ठोस अनियमितता का प्रमाण है, तो उसकी जांच और सुधार की मांग भी पूरी तरह जायज है। लेकिन हार के हर परिणाम को पहले से ही संस्थागत साजिश मान लेना और संगठन, उम्मीदवार, जनसंपर्क, स्थानीय मुद्दों तथा राजनीतिक रणनीति की समीक्षा से बचना लोकतांत्रिक राजनीति के लिए स्वस्थ रास्ता नहीं है। ईवीएम और चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहे दलों को समझना होगा कि भारत का लोकतंत्र किसी एक मशीन से बड़ा है। जनता का फैसला EVM, बैलेट पेपर और पोस्टल बैलेट, हर माध्यम से सामने आता है। इसलिए राजनीतिक दलों के लिए सबसे कठिन, लेकिन सबसे जरूरी सवाल यही है कि क्या वे चुनावी व्यवस्था बदलने की मांग से पहले अपने मतदाताओं के बदलते मिजाज को समझने की कोशिश कर रहे हैं?
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मध्य प्रदेश में कांग्रेस की जमीनी लड़ाई की तैयारी, रीवा संभाग की बैठक में हुआ मंथन
2 महीने, 3 सरप्राइज एलीमेंट: बीजेपी हैरान, पुलिस परेशान, क्या है राहुल गांधी की 'धप्पा' पॉलिटिक्स!
संसद से चुनाव आयोग तक का रास्ता छावनी में तब्दील था, चप्पे-चप्पे पर भारी बैरिकेडिंग और अलर्ट मोड में खड़ी पुलिस… लेकिन राहुल गांधी ने एक बार फिर सबको 'धप्पा' दे दिया! मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कांग्रेस का मोर्चा खोलते हुए, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने अचानक आकाशवाणी भवन की ओर रुख किया और सीधे 8 घंटे की नाकाबंदी कर डाली। प्रशासन देखता ही रह गया और राहुल का यह सरप्राइज अटैक पूरी तरह कामयाब रहा। पिछले दो महीनों में यह तीसरी बार है जब राहुल गांधी के इस फ्लैश प्रोटेस्ट ने दिल्ली पुलिस ही नहीं, खुद अपनी पार्टी के नेताओं तक के होश उड़ा दिए हैं। पिछले दो महीनों में यह तीसरी बार है जब राहुल ने अचानक धरना देकर पुलिस और कुछ हद तक कांग्रेस नेताओं को भी चौंका दिया है। जुलाई में, कांग्रेस सांसद ने प्रधानमंत्री आवास के बाहर अचानक विरोध प्रदर्शन किया। पिछले महीने, उनकी नई रणनीति का दूसरा चरण तब देखने को मिला जब वह अचानक संसद मार्ग पुलिस स्टेशन में एक छात्र प्रदर्शनकारी के साथ घुस गए; इस छात्र को 20 जुलाई की हिंसा के दौरान पैलेट गन से चोट लगी थी और राहुल ने FIR दर्ज करने की मांग की। राहुल का यह नया सियासी 'प्लेबुक' अब विरोधियों के लिए बिल्कुल अप्रत्याशित सिरदर्द बन चुका है! इसे भी पढ़ें: Rahul Gandhi और Priyanka Gandhi हिरासत में, CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कर रहे थे प्रदर्शन CEC के विरोध-प्रदर्शन के दौरान राहुल का नया दांव सड़कों पर अचानक होने वाले ऐसे विरोध-प्रदर्शन राहुल के राजनीतिक हथियारों में एक नया हथियार बन गए हैं। मंगलवार को इसका तीसरा चरण देखने को मिला। ऐसा लग रहा था कि दिल्ली पुलिस को विपक्ष के निर्वाचन सदन तक मार्च करने की हर चाल का पहले से अंदाज़ा था। जब विपक्ष का मार्च ECI हेडक्वार्टर से कुछ सौ मीटर दूर नीति आयोग के दफ़्तर के पास पहुँचा, तो प्रदर्शनकारियों का सामना पुलिस से हुआ। इस गहमागहमी के बीच, राहुल ने कैमरों को तस्वीर लेने का मौका दिया। जब कांग्रेस नेता आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे थे, तब वह पुलिस बैरिकेड के ऊपर चढ़ गए और तिरंगा लहराया। हालांकि, पुलिस का सब्र जवाब दे गया। इसके बाद वही जाना-पहचाना नज़ारा देखने को मिला; पुलिस ने नेताओं को हिरासत में लेना और उन्हें बसों में भरना शुरू कर दिया। प्रियंका गांधी एक बस में सवार हुईं, जो आकाशवाणी भवन के पास खड़ी थी। राहुल भी बस में चढ़ने ही वाले थे। तभी हालात बदल गए। TOI और इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, जैसे ही राहुल बस में चढ़ने वाले थे, उन्होंने प्रियंका को कोई इशारा किया। जल्द ही, वायनाड के सांसद नीचे उतरे और गांधी भाई-बहन तेज़ी से आकाशवाणी भवन की ओर दौड़ पड़े। इस अचानक उठाए गए कदम से न सिर्फ़ पुलिस, बल्कि कांग्रेस नेता भी हैरान रह गए। आकाशवाणी भवन के गेट के पास कोई पुलिसकर्मी नहीं था। सुरक्षा गार्डों ने गांधी भाई-बहन को रोकने की कोशिश की, जिससे तनावपूर्ण स्थिति पैदा हो गई, लेकिन आखिरकार दोनों परिसर में दाखिल हो गए। पुलिस को उम्मीद थी कि लोगों को हिरासत में लेने से विरोध प्रदर्शन खत्म हो जाएगा, लेकिन अचानक बदले हालात ने एक नया धरना शुरू कर दिया। इस अफरातफरी के बीच राहुल ने पत्रकारों से कहा कि देश के साथ जो किया गया है, वह देशद्रोह है। इसे भी पढ़ें: CEC नियुक्ति में PM, LoP के साथ CJI भी हों शामिल, Owaisi ने मौजूदा चयन प्रक्रिया पर उठाए सवाल एक पेड़ के नीचे बैठ गए राहुल चाहे पीएम मोदी हों, अमित शाह हों या ज्ञानेश कुमार, किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा। यह पता नहीं चल पाया है कि गांधी भाई-बहन ने अचानक आकाशवाणी भवन में घुसने का फ़ैसला क्यों किया। हो सकता है कि राहुल निर्वाचन सदन जाने के लिए शॉर्टकट के तौर पर इस जगह का इस्तेमाल करना चाहते हों, क्योंकि निर्वाचन सदन आकाशवाणी भवन के पिछले गेट के पास ही है। हालाँकि, पुलिस ने तुरंत पिछला गेट बंद कर दिया, जिसके बाद कांग्रेस सांसदों को आकाशवाणी भवन के परिसर में ही घंटों तक धरना देना पड़ा। राहुल और प्रियंका ब्रॉडकास्टिंग हाउस के अंदर एक पेड़ के नीचे बैठ गए। केसी वेणुगोपाल, पवन खेड़ा और इमरान प्रतापगढ़ी समेत कांग्रेस के दूसरे नेता भी आकाशवाणी के गेट से अंदर घुसने में कामयाब रहे, जबकि पुलिस बल को तैनात करने की कोशिश कर रही थी। बाकी लोगों को बाउंड्री वॉल पर चढ़ते और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग करते हुए नारे लगाते देखा गया। कांग्रेस ने इस मौके का फ़ायदा उठाने में ज़रा भी देर नहीं की। पार्टी ने एक्स पर राहुल के अचानक रास्ते से हटकर कहीं और जाने का एक वीडियो शेयर किया, जिसके साथ मज़ाकिया अंदाज़ में धप्पा कैप्शन लिखा था। यह ड्रामा सूरज डूबने के काफी देर बाद तक चलता रहा। जब कांग्रेस नेताओं ने चुनाव आयुक्तों से मिले बिना वहां से हटने से इनकार कर दिया, तो उनके लिए रोल और एनर्जी ड्रिंक्स मंगवाए गए। इससे एक और विवाद खड़ा हो गया। आप इसके बारे में यहां पढ़ सकते हैं। रात करीब 8 बजे, पुलिस ने आखिरकार आकाशवाणी भवन परिसर को खाली कराना शुरू किया। तस्वीरों में राहुल को परिसर से खींचकर बस की ओर ले जाते हुए देखा गया। नेताओं को किंग्सवे कैंप पुलिस स्टेशन ले जाया गया और हिरासत में रखा गया, जिसके बाद रात 10 बजे उन्हें रिहा कर दिया गया। राहुल का सरप्राइज एलीमेंट वाला प्लेबुक यह पहली बार नहीं था जब राहुल गांधी ने प्रशासन को चकमा दिया हो। 21 जुलाई को संसद की ओर मार्च कर रहे प्रदर्शनकारी छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के ठीक एक दिन बाद, राहुल गांधी और कांग्रेस सांसदों का एक दल अचानक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास के पास पहुंच गया और बिना किसी पूर्व सूचना के धरने पर बैठ गया।इस अचानक हुए प्रदर्शन से पहले खुद कांग्रेस सांसदों को भी अंधेरे में रखा गया था। उन्हें शुरुआत में केवल यह कहकर बुलाया गया था कि वे कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर उनका जन्मदिन मनाने के लिए इकट्ठा हों। जैसे ही सभी नेता एकत्र हुए, उन्हें असल योजना की जानकारी दी गई और उन्होंने 7, लोक कल्याण मार्ग की ओर मार्च करना शुरू कर दिया, जो वहां से महज 2 किलोमीटर दूर है। इस अप्रत्याशित कदम ने पुलिस को पूरी तरह चौंका दिया। यह धरना तब जाकर समाप्त हुआ जब पुलिस ने राहुल गांधी को वहां से हटाया, और इस छीना-झपटी के दौरान उनकी नाक पर चोट भी लग गई थी। अगला घटनाक्रम एक महीने बाद, 21 अगस्त को हुआ। इसे भी पढ़ें: CEC विरोध पर CM Devendra Fadnavis बोले, संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने की है साजिश पैलेट गन पीड़ित को लेकर थाने के बाहर धरने पर बैठे राहुल पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में सब कुछ सामान्य चल रहा था, तभी राहुल वहाँ साहिल लोचब के साथ पहुँचे। साहिल 19 साल का छात्र है, जिसे कथित तौर पर 20 जुलाई के विरोध प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन से चोट लगी थी। राहुल ने मांग की कि इस मामले में तुरंत FIR दर्ज की जाए। जब पुलिस ने टाल-मटोल की, तो राहुल अपनी बात पर अड़े रहे और पुलिस स्टेशन के बाहर धरने पर बैठ गए। जल्द ही, प्रियंका गांधी, कांग्रेस के अन्य नेता और विपक्ष के बड़े नेता भी उनके साथ शामिल हो गए। पुलिस स्टेशन के बाहर सुरक्षा बढ़ा दी गई और वही जाना-पहचाना ड्रामा देखने को मिला। राहुल ने साफ कर दिया कि जब तक FIR दर्ज नहीं हो जाती, वे वहाँ से नहीं हटेंगे, चाहे इसमें कितने भी घंटे क्यों न लगें। सात घंटे बाद यह गतिरोध खत्म हुआ, जब दिल्ली पुलिस ने आखिरकार पैलेट फायरिंग के मामले में FIR दर्ज कर ली। ये घटनाक्रम सरकार के खिलाफ अहम मुद्दों से निपटने के राहुल के तौर-तरीकों में आए बड़े बदलाव का संकेत देते हैं। अब वे किसी मुद्दे पर सिर्फ़ सोशल मीडिया पर बात नहीं करते, बल्कि ऐसे अचानक किए गए विरोध प्रदर्शनों के ज़रिए ज़मीन पर भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं। Dhappa https://t.co/IMP0mIK2NV — Congress (@INCIndia) October 6, 2026
दिल्ली की सड़कों पर इन दिनों जो कुछ दिखाई दे रहा है, उसमें केवल प्रदर्शनकारी और पुलिस आमने-सामने नहीं हैं। उनके बीच अब मोबाइल कैमरा भी खड़ा है, सोशल मीडिया भी खड़ा है और कुछ सेकंड में किसी घटना को देशभर में पहुंचा देने वाली तकनीक भी खड़ी है। शायद इसीलिए दिल्ली पुलिस के लिए आज किसी प्रदर्शन को नियंत्रित करना केवल बैरिकेड लगाने, भीड़ को रोकने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने का मामला नहीं रह गया है। पुलिस को कानून लागू भी करना है, स्वयं को उकसावे से बचाना भी है और साथ-साथ यह सुनिश्चित भी करना है कि अगले कुछ सेकंड में उसकी कोई प्रतिक्रिया काट-छांटकर वायरल वीडियो न बन जाए। दो अक्टूबर से नई दिल्ली क्षेत्र में शुरू हुए प्रदर्शनों ने कुछ ही दिनों में पुलिस के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। अलग-अलग राजनीतिक दलों, छात्र संगठनों, कार्यकर्ताओं और दूसरे समूहों के प्रदर्शन तथा प्रतिबंधित क्षेत्रों की तरफ बढ़ने की कोशिशों के कारण पुलिस को लगातार अपनी रणनीति बदलनी पड़ रही है। केवल एक स्थान पर खड़ी भीड़ के बजाय अलग-अलग दिशाओं में आगे बढ़ते समूहों को संभालना पुलिस के लिए नई चुनौती बन गया है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक असहज सवाल भी उठता है। सवाल यह है कि क्या जुलाई में जंतर-मंतर के प्रदर्शन से जुड़े मामलों में प्राथमिकी निरस्त किए जाने के चलते ही प्रदर्शनकारियों के बीच यह संदेश गया कि पुलिस के साथ टकराव का कानूनी परिणाम गंभीर नहीं होगा? क्या इसी कारण प्रदर्शनकारियों के मन में पुलिस का डर कम हो गया है? क्या इसी कारण कुछ लोग अब पुलिसकर्मियों से आक्रामक भाषा में बात करने, उन्हें चुनौती देने, धक्का-मुक्की करने या जानबूझकर उकसाने का जोखिम अधिक आसानी से उठा रहे हैं? हम आपको याद दिला दें कि जुलाई में हुए प्रदर्शनों के बाद दिल्ली पुलिस ने कई मामले दर्ज किए थे। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने प्राथमिकियों को निरस्त कर दिया था। साथ ही अदालती आदेश में यह भी कहा गया था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन में केवल भागीदारी अपने आप में अपराध नहीं मानी जा सकती। ऐसे में जब महिला पुलिसकर्मियों के साथ बदसलूकी और शारीरिक खींचतान के मामले सामने आ रहे हैं और पुरुष पुलिसकर्मियों पर दुर्व्यवहार के झूठे आरोप तक लगाये जा रहे हैं तब यह सवाल प्रमुखता से उठता है कि क्या एफआईआर निरस्त कर प्रदर्शनकारियों को सुधरने का जो मौका दिया गया था उसका उन्होंने गलत फायदा उठाया? दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस भी आरोप प्रत्यारोप के इस दौर में तकनीक के सहारे अपना बचाव कर रही है। नई दिल्ली क्षेत्र में तैनात पुलिसकर्मियों की वर्दी पर बॉडी-वॉर्न कैमरे लगाए गए हैं। संसद मार्ग पर प्रदर्शन से निपटने के लिए तैयार पुलिसकर्मियों की वर्दी पर ये छोटे कैमरे साफ दिखाई दे रहे हैं। पुलिस की रणनीति में सार्वजनिक उद्घोषणा के लिए लाउडस्पीकर का इस्तेमाल बढ़ाया गया है और कई पुलिसकर्मी डंडों के बिना तैनात दिखाई दिए। देखा जाये तो बॉडीकैम का अर्थ केवल पुलिस को आरोपों से बचाना नहीं है। यदि कोई पुलिसकर्मी सीमा पार करता है तो वही कैमरा उसके खिलाफ भी प्रमाण बन सकता है। यदि कोई प्रदर्शनकारी पुलिस को जानबूझकर उकसाता है, बैरिकेड तोड़ता है, हमला करता है या बाद में घटनाक्रम का अधूरा वीडियो प्रस्तुत करता है तो पुलिस के पास पूरी घटना का अपना दृश्य रिकॉर्ड मौजूद रहेगा। इसके अलावा, सुरक्षा व्यवस्था में दूसरा बड़ा परिवर्तन बहुस्तरीय बैरिकेडिंग है। प्रदर्शनकारियों को प्रतिबंधित क्षेत्रों की ओर बढ़ने से रोकने के लिए कई स्तरों पर अवरोध लगाए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि जुलाई की घटनाओं के बाद दिल्ली पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों ने अपनी तैयारियों की व्यापक समीक्षा की। ताजा प्रदर्शनों से पहले उन स्थानों तक की पहचान की गई जहाँ टूटा हुआ फुटपाथ, पत्थर अथवा दीवार का हिस्सा तनाव बढ़ने पर हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। जुलाई के अनुभवों के बाद सुरक्षा व्यवस्था की इस तरह समीक्षा बताती है कि अब भीड़ प्रबंधन में केवल पुलिस बल की संख्या नहीं, बल्कि प्रदर्शन-स्थल के भौतिक वातावरण को भी सुरक्षा का हिस्सा माना जा रहा है। एक और समस्या सोशल मीडिया की है। पुलिसकर्मी के चेहरे के बिल्कुल सामने कैमरा रख देना, लगातार सवाल करना, नारे लगाना अथवा ऐसी परिस्थिति बनाना जिसमें उससे कोई तीखी प्रतिक्रिया निकल जाए, ऐसे माहौल में पुलिसकर्मी के कुछ सेकंड के नियंत्रण खोने का परिणाम लाखों लोगों तक पहुंचने वाला वीडियो हो सकता है। इसीलिए नई पुलिस रणनीति में आत्मसंयम स्वयं एक सुरक्षा उपकरण बन गया है। इस चुनौती की गंभीरता तब और बढ़ जाती है जब तकनीक के जरिये फर्जी दृश्य भी बनाए जाने लगें। दिल्ली पुलिस ने हाल में एक ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार किया है जिसने एआई की मदद से ऐसा वीडियो बनाया जिसमें एक पुलिसकर्मी को महिला के साथ दुर्व्यवहार करते दिखाया गया था। बहरहाल, इसमें कोई दो राय नहीं कि दिल्ली पुलिस के सामने इस समय बेहद कठिन चुनौती है। उसे प्रदर्शन के लोकतांत्रिक अधिकार की रक्षा करनी है। उसे प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा करनी है। अपने जवानों विशेषकर महिला पुलिसकर्मियों की सुरक्षा करनी है। उसे आरोप लगने पर जवाबदेह भी होना है। साथ ही बैरिकेड टूटने, प्रतिबंधित क्षेत्र में भीड़ घुसने अथवा हिंसा होने की स्थिति में कानून भी लागू करना है। शायद इसीलिए राजधानी की पुलिसिंग तेजी से बदल रही है। वर्दी पर बॉडीकैम, बहुस्तरीय बैरिकेड, लाउडस्पीकर से लगातार चेतावनी और सूचना, अतिरिक्त पुलिस तथा अर्धसैनिक बल, संवेदनशील रास्तों की पहले से पहचान, मोबाइल वीडियो के समानांतर पुलिस की अपनी रिकॉर्डिंग और सोशल मीडिया पर फैलने वाली संदिग्ध सामग्री की डिजिटल जांच। लेकिन तकनीक चाहे जितनी बढ़ जाए, अंततः सबसे बड़ी परीक्षा सड़क पर खड़े पुलिसकर्मी के धैर्य की ही है। जनता भी पुलिस की दिक्कतों को समझ रही है और उसका हौसला बढ़ाने के लिए सड़कों पर उतर रही है। -नीरज कुमार दुबे
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा रेपो रेट में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी के बाद फ्लोटिंग ब्याज दर पर होम लोन लेने वाले ग्राहकों की कर्ज लागत बढ़ सकती है। केंद्रीय बैंक ने बुधवार को रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत कर दिया है।
पीएम मोदी के नेतृत्व के 25 साल पूरे, भाजपा नेताओं ने कहा- हर क्षेत्र में व्यापक बदलाव और विकास हुआ
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'7 अक्टूबर भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में स्वर्णिम दिन', पीएम मोदी के जनसेवा के 25 वर्ष पर अमित शाह ने की प्रशंसा
गुजरात से आई 'सेवा संकल्प बाइक यात्रा' के प्रतिभागियों का काशी में हुआ भव्य स्वागत
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क्या देश में मोदी विरोधी लहर शुरू हो चुकी है? अगर आज चुनाव हुए तो क्या परिणाम हो सकते हैं?
आज जब नरेंद्र मोदी सरकार के मुखिया के रूप में लगातार पच्चीस साल पूरे कर रहे हैं, तब भारतीय राजनीति की एक बेहद दिलचस्प और महत्वपूर्ण तस्वीर सामने आ रही है। सात अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में सरकार की कमान संभालने वाले नरेंद्र मोदी ने पहले गुजरात और फिर देश की सत्ता का नेतृत्व करते हुए बिना किसी लंबे अंतराल के पच्चीस वर्ष पूरे कर लिए हैं। यह अपने आप में भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की असाधारण राजनीतिक यात्रा है। इस अवसर पर सत्ता पक्ष इसे नेतृत्व, सेवा, विकास और निरंतर जनविश्वास की उपलब्धि के रूप में देख रहा है, तो दूसरी ओर विपक्ष ठीक इसी समय चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता, मतदाता सूची और लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर सरकार और चुनाव आयोग को घेर रहा है। यानी नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा के पच्चीसवें वर्ष का यह पड़ाव उस समय आया है जब सत्ता के सामने सबसे बड़ा सवाल शायद विपक्ष की ताकत का नहीं, बल्कि संस्थाओं और जनविश्वास का है। देखा जाये तो सरकार और भारतीय जनता पार्टी के लिए आज का दिन स्वाभाविक रूप से उपलब्धियों को गिनाने का दिन है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने नरेंद्र मोदी के पच्चीस वर्ष के शासन को ऐतिहासिक उपलब्धि बताते हुए उनके गुजरात के मुख्यमंत्रित्व और केंद्र की तीन लगातार सरकारों को सार्वजनिक विश्वास का प्रमाण बताया है। सरकार की ओर से कल्याणकारी योजनाओं, बुनियादी ढांचे, डिजिटल व्यवस्था, आर्थिक सुधार, राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और तकनीकी उपलब्धियों को इस लंबे सफर की प्रमुख उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। प्रधानमंत्री ने भी इस अवसर को सेवा और राष्ट्रहित के भाव से जोड़ा है। लेकिन राजनीति सिर्फ उपलब्धियों की सूची से नहीं चलती। देश की राजनीति का दूसरा चेहरा भी उतनी ही ताकत से दिखाई दे रहा है। छह अक्टूबर को राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के विरोध में प्रदर्शन किया। संसद से चुनाव आयोग की ओर बढ़ते विपक्षी सांसदों को पुलिस ने रोका, जिसके बाद धरना, हिरासत और राजनीतिक टकराव की तस्वीरें सामने आईं। राहुल गांधी का बैरिकेड पर चढ़ना और “ज्ञानेश, इट्स डन ब्रो” जैसी युवा शैली की भाषा सोशल मीडिया पर तेजी से फैली। इस पूरे घटनाक्रम ने चुनाव आयोग और मतदाता सूची के विवाद को अचानक देश की राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया। विपक्ष इस पूरे विवाद को केवल मतदाता सूची की तकनीकी प्रक्रिया नहीं मान रहा। उसके लिए यह लोकतंत्र, मताधिकार और चुनावी निष्पक्षता का सवाल है। कांग्रेस और उसके सहयोगी आरोप लगा रहे हैं कि मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने से नागरिकों के मतदान अधिकार पर असर पड़ सकता है। विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग कर रहा है और इस पूरे मामले को व्यापक राजनीतिक आंदोलन में बदलने की कोशिश कर रहा है। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि कांग्रेस लगातार चुनाव हारने के बाद चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ा कर रही है और उसे अपनी राजनीतिक कमजोरी का जिम्मेदार संस्थाओं को बनाने के बजाय जनता का विश्वास जीतने की कोशिश करनी चाहिए। भाजपा का यह भी सवाल है कि जिस चुनावी व्यवस्था के माध्यम से विपक्ष कई राज्यों में जीत हासिल करता रहा, उसी व्यवस्था को अपनी हार के बाद अविश्वसनीय कैसे कहा जा सकता है। यहीं से इस समय की राजनीति का सबसे बड़ा द्वंद्व सामने आता है। विपक्ष का सवाल है कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर प्रश्न उठे तो लोकतंत्र कैसे सुरक्षित रहेगा? सत्ता पक्ष का सवाल है कि बिना निर्णायक प्रमाण के चुनावी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करने से क्या लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा ही कमजोर नहीं होगा? दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क रख रहे हैं, लेकिन एक तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर बहस अब महज विपक्षी भाषण नहीं रह गई है। हालांकि इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि विपक्ष के सारे आरोप सिद्ध हो चुके हैं। चुनाव आयोग पर गंभीर सवाल उठना एक बात है और “चुनाव चोरी सिद्ध हो जाना” दूसरी बात है। शायद यही वह बिंदु है जहां से आम जनता और राजनीतिक विमर्श के बीच अंतर दिखाई देता है। राजनीति की दुनिया में इस समय SIR, चुनाव आयोग और ज्ञानेश कुमार सबसे बड़ा मुद्दा दिखाई दे रहे हैं। समाचार चैनलों और सोशल मीडिया पर भी यही सबसे अधिक दिखाई दे रहा है। लेकिन जब हम व्यापक जनमत संकेतकों को देखते हैं तो तस्वीर कुछ अलग है। सितंबर 2026 के ताजा इप्सॉस सर्वेक्षण में सात में से लगभग सात भारतीयों ने माना कि देश सही दिशा में जा रहा है और करीब आठ में से आठ ने वर्तमान आर्थिक स्थिति को सकारात्मक माना है। लेकिन उसी सर्वेक्षण में बेरोजगारी भारत की सबसे बड़ी चिंता बनी हुई है। यानी देश के भविष्य को लेकर आशावाद मौजूद है, मगर नौकरी और अवसर को लेकर बेचैनी भी उतनी ही वास्तविक है। यही भारतीय जनमत की वर्तमान जटिलता है। जनता का एक बड़ा हिस्सा यह मान सकता है कि देश आगे बढ़ रहा है, अर्थव्यवस्था टिकाऊ है, बुनियादी ढांचे में बदलाव आया है और भारत की वैश्विक स्थिति मजबूत हुई है, लेकिन उसी व्यक्ति के घर में नौकरी, आमदनी, महंगाई और भविष्य की सुरक्षा की चिंता भी हो सकती है। सितंबर में शहरी उपभोक्ता विश्वास में भी सुधार आया और भारत का उपभोक्ता विश्वास सूचकांक बढ़ा। इसका मतलब यह हुआ कि आर्थिक तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है; फिर भी रोजगार सबसे बड़ा चिंता का विषय बना हुआ है। इससे नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के सामने असली राजनीतिक प्रश्न भी स्पष्ट होता है। चुनौती केवल यह नहीं है कि विपक्ष कितना आक्रामक है। चुनौती यह है कि सरकार आर्थिक उपलब्धियों और बड़े राष्ट्रीय लक्ष्यों की कथा को आम नागरिक की रोजमर्रा की जिंदगी से कितना जोड़ पाती है। जब विकास का अर्थ सड़क, रेल, डिजिटल भुगतान और वैश्विक प्रतिष्ठा से आगे बढ़कर नौकरी, स्थिर आय और युवा के भविष्य में दिखाई देने लगेगा, तभी सरकारी उपलब्धियों का राजनीतिक असर और गहरा होगा। साथ ही नरेंद्र मोदी के व्यक्तिगत नेतृत्व को लेकर तस्वीर अभी भी पूरी तरह बदलती हुई नहीं दिखती। अगस्त 2026 के इंडिया टुडे-सी वोटर सर्वेक्षण में 48.7 प्रतिशत लोगों ने मोदी को अगले प्रधानमंत्री के लिए सबसे पसंदीदा विकल्प माना। हालांकि जनवरी के मुकाबले उनके समर्थन में कुछ कमी आई है। इस गिरावट को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन इसे सीधे मोदी विरोधी लहर भी नहीं कहा जा सकता। दूसरी ओर, राहुल गांधी अभी तक उस राजनीतिक बढ़त को हासिल नहीं कर पाए हैं, जो मोदी के समर्थन में कमी आने पर उन्हें स्वाभाविक रूप से मिल सकती थी। यानी मोदी की राजनीतिक ताकत अभी भी बनी हुई है, लेकिन उसमें एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई दे रहा है। पहले मोदी को लेकर बहस अक्सर इस बात पर केंद्रित रहती थी कि उनके मुकाबले कौन है? अब बहस का एक हिस्सा इस बात पर भी केंद्रित होने लगा है कि सरकार और संवैधानिक संस्थाएं जनता का विश्वास कितना कायम रख पा रही हैं? यही बदलाव आगे चलकर महत्वपूर्ण हो सकता है। सोशल मीडिया पर भी इस समय राजनीति का यही दोहरा चेहरा दिखाई दे रहा है। राहुल गांधी के प्रदर्शन के वीडियो और उनके अंदाज को उनके समर्थक पसंद कर रहे हैं, जबकि विरोधी इसे राजनीतिक दिखावा बता रहे हैं। भाजपा भी सोशल मीडिया के जरिए इसका जवाब दे रही है। यानी सोशल मीडिया ने राजनीतिक बहस को जरूर ज्यादा तेज और आक्रामक बना दिया है, लेकिन वहां दिखाई देने वाली प्रतिक्रियाओं को पूरे देश की राय मान लेना ठीक नहीं होगा। सोशल मीडिया पर वही आवाज ज्यादा सुनाई देती है, जिसके पीछे बड़ी संख्या में सक्रिय और भावनात्मक समर्थक हों। इसलिए सोशल मीडिया का शोर यह तो बताता है कि किसी मुद्दे पर बहस कितनी तेज है, लेकिन यह नहीं बताता कि जनता का बड़ा हिस्सा वास्तव में क्या सोच रहा है। इस पूरे परिदृश्य में युवाओं की बेचैनी को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कॉकरोच जनता पार्टी जैसे युवा केंद्रित आंदोलनों और उनसे जुड़ी डिजिटल राजनीति ने यह दिखाया है कि एक नया राजनीतिक असंतोष उभर रहा है जो जरूरी नहीं कि सीधे कांग्रेस या भाजपा की पारंपरिक राजनीति में समा जाए। रोजगार, परीक्षा व्यवस्था, अवसर और संस्थागत निष्पक्षता जैसे मुद्दे इस नई पीढ़ी को प्रभावित कर रहे हैं। यह नाराज़गी अभी किसी एक पार्टी के पक्ष में संगठित नहीं हुई है, लेकिन इसे हल्के में लेना भी उचित नहीं होगा। इसलिए आज की भारतीय राजनीति को अगर एक वाक्य में समझना हो तो तस्वीर यह है कि नरेंद्र मोदी का जनाधार टूटा नहीं है, मगर उनके नेतृत्व के इर्द-गिर्द सवालों की प्रकृति बदल रही है। व्यक्तिगत लोकप्रियता अभी मजबूत है, सरकार की उपलब्धियों का नैरेटिव अभी जीवित और प्रभावी है, देश की आर्थिक दिशा को लेकर आशावाद भी मौजूद है; लेकिन रोजगार की चिंता, युवा असंतोष और चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता पर उठते सवाल एक नया दबाव पैदा कर रहे हैं। मोदी के लिए असली चुनौती विपक्ष की किसी एक रैली से नहीं, बल्कि इन अलग-अलग चिंताओं के एक साथ जुड़ जाने से पैदा हो सकती है। फिलहाल स्थिति को “मोदी विरोधी लहर” कहना अतिशयोक्ति होगी। लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि जनता के भीतर कोई बेचैनी नहीं है। बेचैनी है, सवाल हैं, संस्थाओं को लेकर आशंका है और युवाओं में अवसर को लेकर अधीरता है। साथ ही देश के बड़े हिस्से में स्थिरता, आर्थिक दिशा और प्रधानमंत्री के नेतृत्व को लेकर भरोसा भी कायम है। दूसरे शब्दों में कहें तो भारतीय मतदाता इस समय न तो पूरी तरह नाराज़ होकर सत्ता से विमुख दिखाई दे रहा है और न ही आंखें बंद करके संतुष्ट है। यही नरेंद्र मोदी के पच्चीसवें वर्ष की सबसे बड़ी राजनीतिक सच्चाई है। यहां यह भी सवाल उठता है कि देश में आज चुनाव हों तो क्या होगा? उपलब्ध ताजा राष्ट्रीय जनमत संकेतक सरकार के लिए चेतावनी जरूर देते हैं लेकिन उसके लिए खतरे का संकेत नहीं दे रहे। अगस्त 2026 के इंडिया टुडे-सी वोटर सर्वेक्षण के मुताबिक आज लोकसभा चुनाव होने पर भाजपा को 261 और एनडीए को 326 सीटें मिल सकती हैं, जबकि इंडिया गठबंधन 185 सीटों तक पहुंच सकता है। यानी भाजपा अपने दम पर बहुमत से नीचे रहेगी, लेकिन एनडीए फिर भी आराम से सरकार बनाने की स्थिति में रहेगा। बहरहाल, मोदी की सबसे बड़ी ताकत आज भी उनका व्यक्तिगत नेतृत्व और जनता के एक बड़े हिस्से से बना सीधा राजनीतिक जुड़ाव है। लेकिन आने वाले वर्षों में उनकी सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि विकास, लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता, रोजगार और युवाओं के भविष्य को लेकर उठ रहे सवालों का सरकार कितना ठोस और भरोसेमंद जवाब दे पाती है। सरकार के मुखिया के रूप में 25 वर्ष पूरे होने पर नरेंद्र मोदी ने 2047 तक आत्मनिर्भर भारत बनाने का संकल्प दोहराते हुए कहा है, “वी विल डू इट।” यह नारा आने वाले भारत के लिए उनके बड़े लक्ष्य और राजनीतिक आत्मविश्वास को दर्शाता है। लेकिन इस लक्ष्य को जमीन पर उतारने के लिए सिर्फ संकल्प नहीं, बल्कि जनता के भरोसे को लगातार मजबूत करना भी जरूरी होगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि 25 वर्षों तक सरकार के मुखिया के रूप में बने रहना इतिहास है, लेकिन इतिहास की असली पहचान इस बात से होती है कि वह भविष्य को किस दिशा में ले जाता है। अब मोदी के सामने चुनौती इसी भविष्य को उपलब्धियों के साथ-साथ जनता के भरोसे का भविष्य बनाने की है। -नीरज कुमार दुबे
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आरबीआई का यह फैसला ऐसे समय आया है जब घरेलू महंगाई के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर भी कीमतों को लेकर दबाव बना हुआ है। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के कारण वैश्विक आर्थिक माहौल चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
Seva Yatra: वाराणसी से वडनगर पहुंची सेवा यात्रा, 500 बाइकर्स की मौजूदगी में आज होगा समापन समारोह
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SIR Protest: बस में बैठाने के बाद राहुल-प्रियंका ने बदला प्लान, आकाशवाणी परिसर में 8 घंटे चला धरना
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दिल्ली में आज विपक्ष का शक्ति प्रदर्शन, CEO कार्यालय पर जुटेंगे AAP-कांग्रेस और लेफ्ट के नेता
वोट चोरी के आरोपों को लेकर आम आदमी पार्टी (आप) समेत विपक्षी दलों ने दिल्ली में सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करने का ऐलान किया है
नितिन नवीन दो दिवसीय वाराणसी दौरे पर, 'सेवा यात्रियों' की जनसभा को करेंगे संबोधित
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अध्यक्ष नितिन नवीन सात और आठ अक्टूबर को उत्तर प्रदेश के दो दिवसीय दौरे पर वाराणसी में रहेंगे
साइबर फ्रॉड पर PM मोदी का बड़ा जोर, टेक्नोलॉजी से मजबूत समाधान विकसित करने की अपील
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ग्लोबल सिस्टम फॉर मोबाइल कम्युनिकेशंस एसोसिएशन (जीएसएमए) के संचालन मंडल के सदस्यों के साथ बातचीत की और मोबाइल संचार उद्योग से साइबर धोखाधड़ी से निपटने के लिए टेक्नोलॉजी आधारित मजबूत समाधानों की आवश्यकता पर बल दिया
दिल्ली में आज विपक्ष का बड़ा मार्च, कांग्रेस-AAP और लेफ्ट 1 बजे CEO कार्यालय तक जाएंगे
कांग्रेस, आम आदमी पार्टी (आप) और वामपंथी दल दोपहर 1 बजे दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) के कार्यालय तक विरोध मार्च निकालेंगे।
भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने मंगलवार को विपक्षी सांसदों के मार्च और मुलाकात को लेकर स्थिति स्पष्ट करते हुए प्रेस नोट जारी किया है
राहुल-प्रियंका हिरासत से रिहा, चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन पर गरमाई सियासत
लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी समेत कांग्रेस नेताओं को किंग्सवे कैंप से रिहा कर दिया गया है। इसके बाद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा किंग्सवे कैंप स्थित न्यू पुलिस लाइन से रवाना हो गए हैं।
देशव्यापी आंदोलन को 'आप' का समर्थन, केजरीवाल बोले- ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देना चाहिए
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अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल और सीएम खांडू ने रणनीतिक अवसंरचना और समावेशी विकास पर चर्चा की
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चंडीगढ़ सीबीआई रेड को लेकर विपक्ष आक्रामक, अकाली दल और कांग्रेस ने 'आप' सरकार को घेरा
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ओवैसी का आरोप- 'फॉर्म 7' के जरिए मुस्लिम वोटरों के नाम हटाने की रची जा रही साजिश
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दिल्ली: ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर हंगामा, विरोध मार्च के दौरान राहुल-प्रियंका हिरासत में
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चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट पर हमला बंद करे कांग्रेस, 2014 से चल रहा है यही नाटक: रिजिजू
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मुंबई के विकास में जनभागीदारी बढ़ाने के लिए ‘पार्टिसिपेट मुंबई’ लॉन्च, सीएम फडणवीस बोले-परियोजनाओं को मिलेगा बढ़ावा
वाराणसी में 'नमो बुक फेस्ट' का आयोजन, एक छत के नीचे पीएम मोदी पर लिखी किताबों का संग्रह
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वडनगर और वाराणसी में बुधवार को होगा भाजपा की 'सेवा संकल्प यात्रा' का भव्य समापन
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'क्या विपक्ष अराजकता फैलाना चाहता है?', रविशंकर प्रसाद ने इंडिया गठबंधन के प्रदर्शन की निंदा की
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खुले बोरवेल पर सख्त कार्रवाई की तैयारी, कर्नाटक शुरू करेगा 'बोरवेल सुरक्षा अभियान'
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सीईसी ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें, नहीं तो पूरा देश बनेगा जंतर-मंतर: अभिजीत दिपके
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Rahul Gandhi की हुंकार, सरकार पर सबसे बड़ा हमला! Gyanesh Kumar संकट में फंस गए PM Modi?
पहाड़ की राजनीति में वैसे तो मौसम कब करवट ले ले, कहा नहीं जा सकता, लेकिन इस बार कांग्रेस के भीतर का मौसम कुछ ज्यादा ही बिगड़ा हुआ नजर आ रहा है। एक तरफ भाजपा लगातार संगठन को चुनावी मोड में ले जा रही है, दूसरी तरफ कांग्रेस अपने ही घर की उठापटक से बाहर निकलने का रास्ता तलाश रही है। इस पूरी कहानी के केंद्र में एक बार फिर वही पुराने चेहरे हरीश रावत हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार सवाल यह है कि लगातार चुनावी पराजयों के बाद भी कांग्रेस आखिर बार-बार उन्हीं पर दांव क्यों लगाये? और क्या अब भी उनके पास उत्तराखंड की राजनीति को निर्णायक रूप से प्रभावित करने की उतनी ही ताकत बची है? हम आपको बता दें कि कांग्रेस हाईकमान ने हरीश रावत की ‘धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा’ को लेकर साफ संदेश दिया है कि चुनावी राज्य में किसी एक नेता का समानांतर अभियान नहीं चल सकता और पार्टी को सामूहिक रूप से चुनाव लड़ना होगा। लेकिन हरीश रावत पीछे हटने की बजाय अपनी यात्रा पर आगे बढ़े। उनका कहना है कि वे कांग्रेस को सत्ता में वापस लाने के लिए जनता के बीच जा रहे हैं। सुनने में यह बात बिल्कुल कांग्रेस के हित में लगती है, लेकिन राजनीति में सिर्फ इरादा नहीं, नतीजे भी देखे जाते हैं और यहीं से हरीश रावत की मौजूदा राजनीतिक हैसियत पर सवाल उठने शुरू होते हैं। हरीश रावत उत्तराखंड के बड़े नेताओं में रहे हैं, इसमें कोई दो राय नहीं। उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली, केंद्र की राजनीति में लंबी पारी खेली और उत्तराखंड कांग्रेस को कई मुश्किल दौर में संभाला। लेकिन राजनीति में किसी नेता का कद सिर्फ उसके पुराने पदों से नहीं मापा जाता। चुनावी राजनीति में जनता का फैसला सबसे बड़ा पैमाना होता है और अगर इसी पैमाने पर हरीश रावत के पिछले कुछ चुनावों को देखा जाए तो तस्वीर बहुत चमकदार नहीं दिखाई देती। 2017 का विधानसभा चुनाव शायद इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। मुख्यमंत्री रहते हुए हरीश रावत ने दो विधानसभा सीटों से चुनाव लड़ने का फैसला किया। हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा, दोनों सीटों पर वह मैदान में उतरे, लेकिन दोनों जगह हार गए। हरिद्वार ग्रामीण में भाजपा के यतीश्वरानंद ने उन्हें 12 हजार से ज्यादा वोटों से हराया, जबकि किच्छा में भाजपा के राजेश शुक्ला ने उन्हें शिकस्त दी। यानी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा उत्तराखंड का सबसे बड़ा कांग्रेसी चेहरा विधानसभा तक नहीं पहुंच सका। उस चुनाव में कांग्रेस की हालत इतनी खराब हुई कि पार्टी 70 में से सिर्फ 11 सीटों पर सिमट गई और भाजपा ने 57 सीटें जीतकर सत्ता पर कब्जा कर लिया। वैसे राजनीति में हार के बाद वापसी संभव होती है और हरीश रावत ने भी कोशिश जारी रखी। 2019 में वे नैनीताल-ऊधमसिंह नगर लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में उतरे, लेकिन भाजपा के अजय भट्ट के सामने टिक नहीं सके। अजय भट्ट को 7.72 लाख से ज्यादा वोट मिले और हरीश रावत करीब 4.33 लाख वोट पर रुक गए। हार का अंतर तीन लाख से ज्यादा रहा। इसके बाद 2022 में विधानसभा चुनाव आया तो रावत ने लालकुआं को अपना रणक्षेत्र बनाया। इस बार भी भाजपा के मोहन सिंह बिष्ट ने उन्हें 17,527 वोटों के अंतर से हरा दिया। यानी 2017 में दो विधानसभा सीटों पर हार, 2019 में लोकसभा की हार और 2022 में विधानसभा की हार, लगातार चुनावी पराजय का यह सिलसिला किसी भी नेता के राजनीतिक भविष्य पर सवाल खड़ा करने के लिए काफी है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। 2024 के लोकसभा चुनाव में हरिद्वार से कांग्रेस ने हरीश रावत के बेटे वीरेंद्र रावत को मैदान में उतारा। मुकाबला भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत से था। नतीजा फिर कांग्रेस के खिलाफ गया। त्रिवेंद्र सिंह रावत ने वीरेंद्र रावत को करीब 1.64 लाख वोटों से हरा दिया। यानी जिस परिवार को कांग्रेस लंबे समय से उत्तराखंड की राजनीति में एक मजबूत आधार मानती रही है, उसके सामने भी चुनावी जमीन उतनी मजबूत दिखाई नहीं दी, जितनी पार्टी शायद मानती रही है। यहीं से सवाल पैदा होता है कि बार-बार हरीश रावत पर ही दांव क्यों लगाया जाये? क्या कांग्रेस के पास उत्तराखंड में कोई नया चेहरा नहीं है? क्या पार्टी ने नई पीढ़ी का नेतृत्व तैयार नहीं किया? क्या संगठन के भीतर ऐसा कोई नेता नहीं है जो हरीश रावत के बिना कांग्रेस को चुनावी मुकाबले में खड़ा कर सके? या फिर कांग्रेस हाईकमान को अब भी लगता है कि चुनाव जीतने की क्षमता भले कम हुई हो, लेकिन हरीश रावत के पास वह राजनीतिक अनुभव, जनसंपर्क और संगठनात्मक पकड़ है जिसे नजरअंदाज करना पार्टी के लिए नुकसानदेह होगा? देखा जाये तो हरीश रावत की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वे उत्तराखंड की राजनीति को बेहद करीब से जानते हैं। वे पहाड़ की भाषा समझते हैं, मैदान की राजनीति को समझते हैं और कांग्रेस के पुराने कार्यकर्ताओं के बीच उनकी पकड़ भी है। वे राजनीतिक मुद्दों को जनता की भाषा में बदलने की कला जानते हैं। लेकिन उनकी सबसे बड़ी कमजोरी भी अब सामने है। उनकी व्यक्तिगत चुनावी विश्वसनीयता पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। जब कोई नेता खुद लगातार चुनाव हार रहा हो तो उसके समर्थकों के लिए यह कहना आसान नहीं होता कि वही नेता पार्टी को सत्ता तक पहुंचा देगा। यही वजह है कि कांग्रेस के भीतर हरीश रावत की भूमिका को लेकर असमंजस दिखाई देता है। पार्टी उन्हें पूरी तरह किनारे नहीं कर सकती, क्योंकि उनका अनुभव और जनाधार अब भी उपयोगी है। लेकिन पार्टी उन्हें पूरी तरह आगे भी नहीं कर सकती, क्योंकि तब बाकी नेताओं और गुटों के बीच असंतोष बढ़ने का खतरा है। अगर हरीश रावत अपनी अलग राजनीतिक गतिविधियां जारी रखते हैं तो हाईकमान को डर है कि चुनाव से पहले ही कांग्रेस का मंच अलग-अलग हिस्सों में बंट जाएगा। देखा जाये तो उत्तराखंड कांग्रेस की असली समस्या यही है। उसके पास नेता बहुत हैं, लेकिन नेतृत्व का सर्वमान्य चेहरा नहीं है। हर नेता अपने समर्थकों के साथ खड़ा है, हर गुट अपनी राजनीतिक जगह चाहता है और दिल्ली चाहती है कि चुनाव आते-आते सभी एक मंच पर दिखाई दें। लेकिन पहाड़ की राजनीति में जितनी ऊंचाई होती है, उतने ही मोड़ भी होते हैं। कांग्रेस के सामने इस समय सबसे बड़ा मोड़ नेतृत्व का ही है। उधर भाजपा की कहानी बिल्कुल अलग दिखाई दे रही है। 2017 में भाजपा ने 70 में से 57 सीटें जीतकर कांग्रेस को सत्ता से बाहर किया था। 2022 में भाजपा का आंकड़ा घटकर 47 जरूर हुआ, लेकिन सत्ता उसके हाथ से नहीं निकली। कांग्रेस 19 सीटों तक पहुंची, लेकिन सरकार बनाने से काफी दूर रही। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उत्तराखंड की पांचों सीटें जीतकर कांग्रेस का खाता तक नहीं खुलने दिया। यानी विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के पास लगातार चुनावी जीत की मनोवैज्ञानिक बढ़त भी है और मजबूत संगठन की ताकत भी। भाजपा की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह पिछली जीत के भरोसे बैठी दिखाई नहीं देती। वह उन सीटों पर भी संगठन मजबूत करने में जुटी है जहां उसे विधानसभा चुनाव में हार मिली थी। पार्टी की तैयारी बूथ स्तर तक दिखाई देती है और उसके सामने चुनाव सिर्फ सरकार बचाने का नहीं, बल्कि उत्तराखंड में अपने राजनीतिक वर्चस्व को और मजबूत करने का है। इसके उलट कांग्रेस के पास सरकार के खिलाफ मुद्दों की कोई कमी नहीं है। बेरोजगारी है, भर्ती परीक्षाओं के सवाल हैं, पलायन है, पहाड़ के गांवों का खाली होना है, जमीन और जंगल के सवाल हैं, युवाओं की नाराजगी है और स्थानीय अस्मिता से जुड़े मुद्दे हैं। लेकिन इन मुद्दों को एक बड़े राजनीतिक अभियान में बदलने से पहले कांग्रेस को अपने भीतर की लड़ाई खत्म करनी होगी। यही वह जगह है जहां भाजपा को सबसे बड़ा फायदा मिल रहा है। हालांकि कांग्रेस के लिए उम्मीद पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। 2024 में बद्रीनाथ और मंगलौर विधानसभा उपचुनाव जीतना यह दिखाता है कि भाजपा अजेय नहीं है। लेकिन केदारनाथ उपचुनाव में भाजपा की जीत ने यह भी साफ कर दिया कि कांग्रेस के सामने चुनौती छोटी नहीं है। उसे सिर्फ भाजपा के खिलाफ माहौल बनाने से काम नहीं चलेगा, उसे अपना संगठन, अपना नेतृत्व और अपना चुनावी संदेश तीनों मजबूत करने होंगे। इसी मोड़ पर हरीश रावत का सवाल सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है। अगर रावत पार्टी को मजबूत करने के लिए जनता के बीच जाना चाहते हैं तो कांग्रेस को उनके अनुभव का इस्तेमाल जरूर करना चाहिए। लेकिन अगर उनकी सक्रियता कांग्रेस के भीतर एक और ध्रुवीकरण पैदा करती है तो वही सक्रियता पार्टी के लिए बोझ बन सकती है। कांग्रेस को यह तय करना होगा कि हरीश रावत उसके लिए एक वरिष्ठ मार्गदर्शक और स्टार प्रचारक हैं या फिर एक बार फिर पूरा चुनाव उन्हीं के इर्द-गिर्द लड़ा जाएगा। क्योंकि इन दोनों रास्तों में जमीन-आसमान का फर्क है। देखा जाये तो उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत का अध्याय अभी खत्म नहीं हुआ है, लेकिन यह भी सच है कि उनका सबसे मजबूत दौर पीछे छूट चुका है। उनकी राजनीतिक प्रासंगिकता अब सिर्फ इस बात से तय नहीं होगी कि वे कितनी बड़ी रैलियां करते हैं या कितने जिलों में यात्रा निकालते हैं। असली सवाल यह होगा कि क्या वे कांग्रेस के भीतर बिखरे हुए नेताओं और कार्यकर्ताओं को एक मंच पर ला सकते हैं और क्या उनकी मौजूदगी पार्टी के वोट में बदल सकती है? वहीं कांग्रेस को भी यह समझना होगा कि उत्तराखंड की जनता सिर्फ पुराने चेहरों की यादों पर वोट नहीं करती। पहाड़ की जनता अपने नेताओं से हिसाब मांगती है। वह पूछती है कि पांच साल में क्या हुआ, रोजगार कहां है, गांव क्यों खाली हो रहे हैं, सड़क और स्वास्थ्य की हालत क्या है और आने वाली पीढ़ी के लिए राज्य में क्या बचा है। इसलिए 2027 का चुनाव अगर कांग्रेस सिर्फ हरीश रावत बनाम भाजपा बनाकर लड़ती है तो यह उसकी रणनीतिक भूल होगी। उसे हरीश रावत के अनुभव को इस्तेमाल करते हुए एक नई राजनीतिक टीम और नया नेतृत्व सामने लाना होगा। वरना खतरा यह है कि कांग्रेस हर बार पुराने चेहरे को देखकर पहाड़ की चढ़ाई शुरू तो कर दे, लेकिन चुनाव की चोटी तक पहुंचने से पहले ही फिर किसी पुराने मोड़ पर लौट आए। क्योंकि सवाल अब सिर्फ हरीश रावत के सियासी वजूद का नहीं है। सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड कांग्रेस अपने पुराने सियासी चेहरे से आगे निकलकर नया नेतृत्व पैदा कर पाएगी, या फिर 2027 में भी पहाड़ वही पुराना सवाल पूछेगा कि कांग्रेस के पास आखिर नया क्या है? -नीरज कुमार दुबे
यूपी राज्यसभा चुनाव : भाजपा ने जमीनी कार्यकर्ताओं पर जताया भरोसा, सपा बोली- छवि सुधारने की कोशिश
यूपी राज्यसभा चुनाव : भाजपा ने जमीनी कार्यकर्ताओं पर जताया भरोसा, सपा बोली- छवि सुधारने की कोशिश
पश्चिम बंगाल का नाम बदलकर होगा 'पश्चिम बंग', विधानसभा में आएगा बिल; अग्निमित्रा पॉल ने विपक्ष पर साधा निशाना
ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें, एसआईआर रद्द हो और बैलेट पेपर से चुनाव हों : इंडिया ब्लॉक
ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें, एसआईआर रद्द हो और बैलेट पेपर से चुनाव हों : इंडिया ब्लॉक
बुआ मायावती ने भतीजे आकाश आनंद को वापस बुलाया या राजनीतिक जाल में फंसा दिया?
लखनऊ की राजनीति बड़ी अजीब चीज है। यहां सामने कुछ दिखाई देता है मगर असली खेल पर्दे के पीछे चल रहा होता है। बसपा सुप्रीमो मायावती और उनके भतीजे आकाश आनंद के मामले में भी कुछ ऐसा ही दिखाई दे रहा है। जिस आकाश आनंद को कुछ समय पहले मायावती ने पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था, आज वही आकाश आनंद फिर बसपा में लौट आए हैं और उन्हें दोबारा पार्टी का राष्ट्रीय संयोजक बना दिया गया है। ऊपर से कहानी इतनी-सी है कि भतीजे ने माफी मांगी, बुआ ने माफ कर दिया और परिवार फिर एकजुट हो गया। लेकिन यूपी की राजनीति में कहानी इतनी सीधी होती तो फिर राजनीति किस बात की? असल सवाल यह है कि मायावती ने आकाश आनंद को वापस क्यों बुलाया और वापस बुलाकर उन्हें राष्ट्रीय संयोजक की जिम्मेदारी ही क्यों दी? क्या यह आकाश पर भरोसा है, या फिर उस राजनीतिक संभावना को रोकने की कोशिश है जो उनके बाहर जाने के बाद पैदा हो रही थी? याद कीजिए, जब मायावती ने आकाश आनंद को पार्टी से बाहर किया था तो वह राजनीति में अकेले नहीं रह गए थे। उनके लिए दूसरे दलों के दरवाजे खुलने लगे थे। चंद्रशेखर आजाद ने उनके लिए जगह होने की बात कही। अखिलेश यादव से जब आकाश को समाजवादी पार्टी में लेने की संभावना पर सवाल हुआ तो उन्होंने भी दरवाजा बंद नहीं किया। निषाद पार्टी की तरफ से न्योता आया। यानी जिस भतीजे को मायावती ने बसपा से बाहर कर दिया था, उसे दूसरे राजनीतिक दल अपने यहां जगह देने के लिए तैयार दिख रहे थे। यहीं से मायावती के लिए असली खतरा पैदा होता था। क्योंकि बात सिर्फ यह नहीं थी कि आकाश आनंद किसी दूसरी पार्टी में चले जाते। असली खतरा यह था कि अगर वह किसी दूसरे दल में जाकर अपनी राजनीतिक जमीन तैयार कर लेते, युवा दलितों के बीच अपनी पहचान बना लेते और धीरे-धीरे मायावती से अलग अपना एक स्वतंत्र राजनीतिक वजूद खड़ा कर लेते, तो फिर भविष्य में वह सिर्फ “मायावती के भतीजे” नहीं रहते। वह अपने आप में एक राजनीतिक ब्रांड बन सकते थे। यही वह चीज है जो शायद मायावती को सबसे ज्यादा खटकती। देखा जाये तो बसपा पहले ही उत्तर प्रदेश की राजनीति में लगातार कमजोर हुई है। कभी जिस पार्टी के बिना यूपी की सत्ता का गणित पूरा नहीं होता था, वह आज विधानसभा और लोकसभा चुनावों में एक सीट जीतने की जद्दोजहद करती दिखाई देती है। 2019 में बसपा को उत्तर प्रदेश में करीब 19 प्रतिशत वोट मिले थे, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में उसका वोट शेयर 10 प्रतिशत से भी नीचे चला गया। इस बीच दलित राजनीति के मैदान में चंद्रशेखर आजाद जैसा नया चेहरा भी उभरा है। यानी बसपा के सामने चुनौती सिर्फ भाजपा या सपा-कांग्रेस गठबंधन की नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक जगह की भी है जिसे कभी बसपा अपना स्थायी इलाका मानती थी। ऐसे माहौल में अगर मायावती का भतीजा पार्टी से निकलकर किसी दूसरे दल में चला जाता और वहां अपनी अलग पहचान बनाने लगता, तो बसपा के लिए मामला और मुश्किल हो सकता था। क्योंकि मायावती के पास अपना मजबूत कोर वोट बैंक भले अभी भी मौजूद हो, लेकिन चुनावी राजनीति में सिर्फ कोर वोट बैंक होना और चुनाव जीतने की स्थिति में होना दो अलग-अलग बातें हैं। मुमकिन है कि मायावती ने इसी खतरे को भांप लिया हो। उन्हें लगा हो कि अगर आकाश दूसरे दल में चले गए और वहां युवा दलित राजनीति का नया चेहरा बन गए तो बसपा के सामने सिर्फ एक नेता के जाने का संकट नहीं होगा, बल्कि नेतृत्व की अगली पीढ़ी का विकल्प भी पार्टी के बाहर तैयार हो जाएगा। बसपा अगर अभी शून्य पर खड़ी दिखाई दे रही है तो आकाश का किसी दूसरे राजनीतिक मंच पर जाकर मजबूत होना इस शून्य को डबल शून्य में बदल सकता है। इसलिए भतीजे को वापस बुलाना जरूरी समझा गया। लेकिन यहां कहानी में एक और पेंच है। आकाश को सिर्फ वापस नहीं बुलाया गया, उन्हें राष्ट्रीय संयोजक बना दिया गया। सुनने में यह बड़ा सम्मान है, लेकिन राजनीति में हर सम्मान के साथ जिम्मेदारी भी आती है। आकाश को अब जो जिम्मेदारी मिली है, वह आसान नहीं है। खासकर तब, जब सामने 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव खड़ा है। अब अगर बसपा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करती है तो मायावती की रणनीति सफल कही जाएगी और आकाश आनंद को इसका फायदा भी मिलेगा। लेकिन अगर बसपा का प्रदर्शन फिर कमजोर रहा तो सवाल सिर्फ मायावती से नहीं होगा। सवाल आकाश से भी होगा। आखिर राष्ट्रीय संयोजक किसलिए बनाए गए थे? संगठन को मजबूत करने के लिए या सिर्फ पद की शोभा बढ़ाने के लिए? युवा वोटरों को बसपा से जोड़ने की जिम्मेदारी किसकी थी? चुनावी रणनीति को जमीन पर उतारने का काम कौन कर रहा था? यानी मायावती ने आकाश को वापस लाकर उन्हें एक ऐसी जिम्मेदारी दे दी है जिसमें सफलता का श्रेय तो मिलेगा ही, लेकिन असफलता का ठीकरा भी सिर पर फूट सकता है। यही वह जगह है जहां सवाल उठता है कि कहीं यह आकाश आनंद की राजनीतिक ब्रांड वैल्यू को मजबूत करने की बजाय धीरे-धीरे खत्म करने की रणनीति तो नहीं? क्योंकि मान लीजिए 2027 में बसपा फिर चुनावी तौर पर कोई खास कमाल नहीं कर पाती। तब आकाश आनंद के पास क्या बचेगा? वह किसी दूसरी पार्टी में जाकर यह भी नहीं कह सकते कि उन्हें बसपा में मौका नहीं मिला था। मौका मिला, राष्ट्रीय संयोजक बनाया गया, संगठन की जिम्मेदारी दी गई और फिर भी पार्टी चुनाव नहीं जीत सकी। ऐसे में दूसरे दलों के लिए आकाश को अपने साथ लेना उतना आकर्षक नहीं रह जाएगा। यानी जिस समय वह बसपा से बाहर थे, उस समय दूसरे दल उन्हें अपने यहां लाने की संभावनाएं तलाश रहे थे। लेकिन अब वह बसपा के राष्ट्रीय संयोजक हैं। अगर बसपा फिर कमजोर प्रदर्शन करती है तो वही दूसरे दल शायद यह सोचें कि जिस नेता को अपनी पार्टी संभालने का मौका मिला और वह उसे नहीं उठा पाया, उसे अपने यहां लाकर क्या हासिल होगा? देखा जाये तो राजनीति में इसे बहुत बारीक तरीके से समझना होगा। मायावती ने आकाश को बाहर जाने से तो रोक लिया, लेकिन साथ ही उन्हें बसपा की किस्मत से बांध भी दिया। अब आकाश की राजनीतिक कामयाबी और बसपा की राजनीतिक कामयाबी एक-दूसरे से अलग नहीं रह सकतीं। इसके अलावा, यहां एक सवाल मायावती से भी पूछा जाना चाहिए। मायावती की राजनीति की सबसे बड़ी पहचान ही परिवारवाद के खिलाफ लड़ाई रही है। कांशीराम ने परिवार की राजनीति नहीं की। उन्होंने मायावती जैसे कार्यकर्ता को आगे बढ़ाया। मायावती ने भी लंबे समय तक यही संदेश दिया कि बसपा किसी एक परिवार की पार्टी नहीं, बल्कि बहुजन समाज की पार्टी है। लेकिन अब पिछले कुछ समय से बसपा के भीतर परिवार के सदस्यों की भूमिका लगातार चर्चा में है। आकाश आनंद को पहले आगे किया गया। फिर हटाया गया। ईशान आनंद को जिम्मेदारी मिली। फिर आकाश को वापस लाया गया। दीपिका आनंद के नाम की चर्चा भी सामने आई। कभी कहा गया कि परिवार के किसी सदस्य को राजनीतिक पद नहीं दिया जाएगा और फिर घटनाक्रम कुछ ही समय में दूसरी दिशा में जाता दिखाई दिया। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर बसपा में परिवार के बाहर नेतृत्व का विकल्प क्यों नहीं दिखाई देता? मायावती दूसरी पार्टियों में परिवारवाद पर सवाल उठाती रही हैं। समाजवादी पार्टी पर परिवारवाद का आरोप लगाने में वह कभी पीछे नहीं रहतीं। लेकिन जनता यह भी देखती है कि अपनी पार्टी के भीतर नेतृत्व की अगली कतार में कौन खड़ा है? यहां मामला सिर्फ आकाश आनंद का नहीं है। सवाल यह है कि क्या बसपा में मायावती के बाद कोई ऐसा गैर-पारिवारिक चेहरा नहीं है, जिसे राष्ट्रीय स्तर की जिम्मेदारी दी जा सके? क्या पार्टी में दशकों से काम कर रहे किसी दलित, पिछड़े, गरीब या वंचित कार्यकर्ता में नेतृत्व की संभावना नहीं बची? अगर है, तो फिर बार-बार परिवार के सदस्यों की तरफ ही क्यों देखा जा रहा है? देखा जाये तो यूपी की राजनीति में जनता बहुत कुछ भूल सकती है, लेकिन विरोधाभास जल्दी नहीं भूलती। अगर दूसरी पार्टियों के परिवारवाद को मायावती राजनीतिक अपराध मानती हैं तो फिर बसपा में परिवार के सदस्यों की बढ़ती भूमिका पर भी सवाल उठेंगे। सवाल सिर्फ विरोधियों की तरफ से नहीं उठेंगे, बसपा के भीतर भी उठेंगे। उधर, आकाश आनंद के लिए भी अब मामला आसान नहीं है। उन्हें राष्ट्रीय संयोजक की कुर्सी जरूर मिल गई है, लेकिन यह कुर्सी फूलों की नहीं, कांटों की है। अब उन्हें यह साबित करना होगा कि वह सिर्फ मायावती के भतीजे नहीं हैं। उन्हें यह दिखाना होगा कि वह संगठन खड़ा कर सकते हैं, युवा दलित मतदाताओं को जोड़ सकते हैं और बसपा को उस राजनीतिक जमीन पर वापस ला सकते हैं, जहां से पार्टी लगातार खिसकती चली गई है। बहरहाल, बुआ ने भतीजे को घर तो वापस बुला लिया, लेकिन अब उसके हाथ में पूरे घर का हिसाब-किताब पकड़ा दिया है। घर बचा तो भतीजे का कद बढ़ेगा और घर डूबा तो सवाल भी उसी से होगा। मगर सबसे बड़ा सवाल फिर भी वही रहेगा कि परिवारवाद के खिलाफ राजनीति की पहचान बनाने वाली मायावती को अब अपनी पार्टी का भविष्य परिवार के बाहर क्यों दिखाई नहीं देता? क्योंकि अगर बसपा सचमुच बहुजन की पार्टी है तो उसका भविष्य किसी एक परिवार की अगली पीढ़ी में नहीं, बल्कि उन लाखों कार्यकर्ताओं में दिखाई देना चाहिए जो दशकों से पार्टी का झंडा उठाए घूम रहे हैं। वरना राष्ट्रीय संयोजक की कुर्सी चाहे जितनी बड़ी हो, जनता पूछेगी जरूर कि यह आकाश आनंद की उड़ान है या मायावती की राजनीतिक छतरी के नीचे सुरक्षित किया गया एक और नाम? -नीरज कुमार दुबे
EC दफ्तर के पास INDIA Bloc का महा-संग्राम! क्या फिर झुकेगी Modi सरकार, Gyanesh Kumar का इस्तीफा तय?
नंदीग्राम पहले से ही भाजपा की जीती हुई सीट, पहली बार रेजीनगर में भी हो सकता है बदलाव : दिलीप घोष
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SIR Protest: दिल्ली में चुनाव आयोग तक विपक्ष का मार्च आज, 19 दलों के सांसद उठाएंगे 3 बड़े मुद्दे
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'ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा हो', सीपीआईएम महासचिव एमए बेबी बोले- नहीं हटे तो करेंगे मजबूर
मतदाता सूची से 13 करोड़ नाम हटाने और 'वोट चोरी' के आरोपों को लेकर चुनाव आयोग और विपक्ष के बीच टकराव अब सड़क पर आने की तैयारी में है
'एक वोट की ताकत': बोंगईगांव मेडिकल कॉलेज का वादा पूरा करने पर बोले सीएम सरमा
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Chai Par Sameeksha: Misra-Masood क्या बचा पाएंगे UP Congress का वजूद? CJP Protest का क्या असर होगा?
प्रभासाक्षी की साप्ताहिक कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में इस सप्ताह हमने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर हो रही राजनीति पर चर्चा की। साथ-साथ उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने जो बदलाव किए हैं उससे भी संबंधित सवाल पूछे। हमेशा की तरह इस कार्यक्रम में मौजूद रहे प्रभासाक्षी के संपादक नीरज दुबे। नीरज दुबे ने साफ तौर पर कहा कि राजनीति के लिए फिलहाल संवैधानिक संस्थाओं को भी विपक्ष की ओर से नहीं छोड़ा जा रहा है। उन्होंने कहा कि मामला सुप्रीम कोर्ट में है और ऐसे में सुप्रीम कोर्ट पर हर किसी को भरोसा रखना चाहिए। नीरज दुबे ने कहा कि चुनाव आयोग ने कई सुधार हाल के दिनों में किए हैं। यह अच्छी बात है कि विपक्ष ने इसको लेकर दबाव बनाया और चुनाव आयोग ने वह सुधार किए हैं। उन्होंने कहा कि सुधार की गुंजाइश हमेशा रहती है और चुनाव आयोग भी वही कर रहा है। उन्होंने कहा कि जब से जंतर मंतर का आंदोलन हुआ है तब से विपक्ष को भी लगने लगा है कि यह सरकार झुक सकती है और हमें लगातार इसको लेकर झुकाने की तैयारी करनी चाहिए। हालांकि नीरज कुमार दुबे ने साफ तौर पर कहा कि डूसू चुनाव या पंजाब विश्वविद्यालय के चुनाव को हम देखें तो वहां भाजपा समर्थित संगठन को जीत मिली। विपक्ष के जो विद्यार्थी संगठन है, उसे हार का सामना करना पड़ा जिसका मतलब साफ है कि अभी भी देश के युवा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ खड़े हैं। ऐसे में विपक्ष को युवाओं के बीच भ्रम फैलाने से बचना चाहिए। इसे भी पढ़ें: Seat Sharing पर Congress सीधे SP चीफ Akhilesh Yadav से करे बात, Dharmendra Yadav ने दी नसीहत नीरज कुमार दुबे ने कहा कि देश तरक्की कर रहा है। लेकिन विपक्ष लगातार भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहा है। जो राजक तत्व है, जो आंदोलनजीवी हैं, वह हमेशा इसी तरीके की बातें करते रहेंगे ताकि देश के लोगों में भ्रम रहे। उन्होंने कहा कि कॉकरोच जनता पार्टी को एक सफलता मिली जिसके बाद उसका आत्मविश्वास बढ़ा हुआ है। लेकिन ऐसा नहीं है कि हर बार उसे सफलता मिल जाए। कांग्रेस को भी यही लगता है कि जब सीजेपी को समर्थन मिल गया तो हम क्यों पीछे रहे? इसलिए कांग्रेस भी इस तरह की चीज कर रही है। फिलहाल सीजेपी और कांग्रेस के बीच ही लड़ाई साफ तौर पर देखने को मिल रही है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के भीतर हुए बदलाव पर हमने नीरज कुमार दुबे से सवाल पूछा। नीरज दुबे ने कहा कि कांग्रेस घूम फिर कर एक परिवार पर ही आ जाती है और उत्तर प्रदेश में भी हमने देखा कि वह एक परिवार के ही व्यक्ति को पार्टी की कमान सौंप दी है। जिस व्यक्ति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी उनके क्षेत्र में मजबूत चुनौती दी थी, उसे चुनाव से 4 महीने पहले हटाने का क्या मतलब है? आप किसी दूसरे पार्टी से नेता को लेकर आते हैं और उसे प्रभारी बनाते हैं। प्रभारी के जरिए आप रिपोर्ट लेते हैं और तब फैसला आप लेते हैं। ऐसे में आप खुद अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के भरोसे पर खड़े नहीं उतर रहे हैं। इमरान मसूद के बयान की वजह से आपके गठबंधन के सहयोगी अखिलेश यादव आपसे नाराज है। बावजूद इसके आप इमरान मसूद को आगे बढ़ाने की कोशिश में लगे हैं।
भरोसे पर भी खरे उतरे सेलिब्रिटिज
विज्ञापनों के प्रति सेलिब्रिटिज की जवाबदेही को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की हालिया टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है कि अपने उत्पादों को बेचने के लिए सेलिब्रिटिज का उपयोग सबसे अधिक किया जाता रहा है। विज्ञापनदाता जानते हैं कि लक्षित उपभोक्ता तक पहुंचने में सेलिब्रिटिज की भागीदारी महत्वपूर्ण हो जाती हैं। लोग सेलिब्रिटिज पर विष्वास करते हैं और विज्ञापनदाता कंपनियां इसी का लाभ अपने उत्पादों को बाजार दिलाने में करते आये हैं। इसीलिए राष्ट्र्पति द्रौपदी मुर्मु की टिप्पणी कि सच्चा सितारा रोशनी फैलाता है, अंधेरापन नहीं, आज के संदर्भ में महत्वपूर्ण होने के साथ ही सितारों और सेलिब्रिटिज को समाज के प्रति जवाबदेही समझने का संकेत भी है। दर असल हो रहा है कि पैसे की चकाचोंध में सेलिब्रिटिज समाज के प्रति जवाबदेही से मुहं मोड़ते दिखाई देते हैं। जब आम जन का सेलेब्रिटिज का भरोसा है तो सेलिब्रिटिज की भी इस भरोसे को बनाए रखने की नैतिक जिम्मेदारी हो जाती है। दरअसल सेलिब्रिटिज को उत्पाद के साथ देखकर आमआदमी आंख मींच कर भरोसे के सहारे खरीदारी करता है। वह उस उत्पाद और सेलिब्रिटिज द्वारा किये जा रहे वादे को सत्य समझता है। ऐसे में सेलिब्रिटी का समाज या लक्षित वर्ग के प्रति और अधिक जिम्मेदारी बन जाती है। विकेता या निर्माता अपने उत्पाद को बेचने पर ध्यान देता है। इसलिए वह अपने उत्पाद के गुणगान अधिक ही करने लगता है तो सेलिब्रिटी के विज्ञापन के सहारे अतिशयोक्तिपूर्ण दावें करने लग जाते हैं। यहां तक कि कई विज्ञापन के दावें तो सत्य के आसपास भी नहीं होते जैसा कि अक्षय कुमार का डॉबर च्यवनप्राश को लेकर विज्ञापन। यह तो एक उदाहरण मात्र है। आज तो सेरोगेट विज्ञापनों का दौर भी चल निकला है। शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्राप का इलायची का विज्ञापन सबके सामने है जिसके माध्यम से छद्म रुप से प्रतिबंधित पान मसाला का विज्ञापन किया जा रहा था। इसी तरह के अनेक विज्ञापन हमारे सामने हैं। हांलाकि इसमें कोई दो राय नहीं कि निर्माता अपने उत्पाद का विज्ञापन करने के लिए सेलिब्रिटिज को बहुत अधिक पेमेंट किया जाता है और इस पेमेंट के चक्कर में सेलिब्रिटिज समाज के प्रति अपने दायित्व और कानूनी प्रावधानों को भी दरकिनार कर देते हैं। यही कारण है कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने दुखती रग पर हाथ रखते हुए 72 वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में पिछले माह सितंबर में आयोजित समारोह में आमआदमी का दर्द सामने रखा। विवादित विज्ञापनों का दौर लंबे समय से चला आता रहा है। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि अपने उत्पाद को बेचने के लिए सेलिब्रिटिज, महिलाओं और बच्चों को केन्द्र में रखा जाता है। दरअसल लक्ष्यित वर्ग को सम्मोहित करना इन विज्ञापनों का खास उद्देश्य हो जाता है। विज्ञापन करते समय कई बार तो सांप्रदायिकता तक सामने आ जाती है। 2020 का तनिष्क का विज्ञापन इसका उदाहरण है तो 2026 का कृति सेनन का गीवा ज्वेलरी का विज्ञापन सामने हैं। विमल इलायची का फिल्म कलाकर त्रय का विज्ञापन सर्वविदित है जिसमें इलायची के नाम पर छद्म रुप से पान मसाला तंबाकू का ही विज्ञापन था। इस तरह के सेरेगेट विज्ञापन आम होते जा रहे हैं। लेविस 501 जिंस का अक्षय कुमार का विज्ञापन, 2021 का आलिया भट्ट का कन्यादान के बहाने कन्यामान विज्ञापन यह फिर 1995 में अजगर से जिस्म को लपेटे मिलिंद सोयन और मधु सप्रे का टफ जूते का विज्ञापन का विवाद आज तक चर्चा में है। 2026 का विक्की कौशल-रश्मिका संधाना का माचो अंडरवियर का विज्ञापन भी विवादों में रहा है। इसे भी पढ़ें: Switzerland के साथ रिश्तों को नई ऊंचाई देकर Modi ने Europe में चली बड़ी कूटनीतिक चाल विज्ञापनों को लेकर सरकार भी गंभीर रही है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 द्वारा जवाबदेही तय की गई है। 10 लाख से 50 लाख तक के जुर्माने के प्रावधान के साथ ही ऐसे विज्ञापनकर्ताओं पर एक साल से तीन साल तक प्रतिबंध के प्रावधान भी है। भ्रामक विज्ञापनों को लेकर माननीय सर्वोच्च न्यायालय भी गंभीर रहा है और समय समय पर टिप्पणियां की गई है। इस दायरें में चार लाख से अधिक कमाई वाले व 5 लाख फालोवर्स वाले सेलिब्रिटिज को रखा गया है। हालात की गंभीरता को इसी से समझना होगा कि फिल्म कलाकारों के समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को इस तरह का संदेश देना पड़ा। वैसे भी जिस पर भरोसा होता है या किया जाता है तो भरोसे वाले व्यक्ति पर भी भरोसे को बनाये रखने का दायित्व हो जाता है। विज्ञापननिर्माताओं को भी समाज के प्रति दायित्व को समझना होगा तभी सभी अपने भरोसे पर खरे उतर सकते हैं। - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
Switzerland के साथ रिश्तों को नई ऊंचाई देकर Modi ने Europe में चली बड़ी कूटनीतिक चाल
दुनिया के बदलते सामरिक और आर्थिक समीकरणों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति लगातार भारत की वैश्विक पहुंच को नए आयाम दे रही है। इसी व्यापक कूटनीतिक रणनीति की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में स्विट्जरलैंड के साथ संबंधों को नई ऊंचाई तक ले जाने की दिशा में आज एक अहम कदम सामने आया। स्विस राष्ट्रपति गाइ पार्मेलिन की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने प्रवास एवं गतिशीलता, युवा पेशेवरों, परिवहन प्रौद्योगिकी, वैज्ञानिक अनुसंधान तथा नवाचार और स्टार्टअप सहयोग से जुड़े पांच महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए। व्यापार और निवेश से आगे बढ़कर रक्षा उत्पादन, परमाणु ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, विज्ञान, उन्नत प्रौद्योगिकी और वैश्विक कूटनीति तक साझेदारी का विस्तार यह संकेत देता है कि भारत–स्विट्जरलैंड संबंध अब एक नए रणनीतिक चरण में प्रवेश कर रहे हैं और मोदी की सक्रिय कूटनीति ने यूरोप के इस महत्वपूर्ण देश के साथ भारत की साझेदारी को जिस तेजी से व्यापक बनाया है, उसने अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों का ध्यान खींचा है। प्रधानमंत्री मोदी और गाइ पार्मेलिन की मुलाकात का सबसे बड़ा संदेश यह है कि भारत और स्विट्जरलैंड अब अपने रिश्ते को बहु-आयामी रणनीतिक साझेदारी में बदलने की कोशिश कर रहे हैं। हैदराबाद हाउस में मोदी और पारमेलिन ने व्यापार एवं निवेश, एआई, नवाचार, रक्षा उत्पादन और सैन्य आदान-प्रदान, परमाणु ऊर्जा, विज्ञान-प्रौद्योगिकी तथा लोगों के बीच संपर्क सहित पूरे संबंधों की समीक्षा की। देखा जाये तो आर्थिक मोर्चे पर भारत–ईएफटीए व्यापार एवं आर्थिक साझेदारी समझौता इस रिश्ते की रीढ़ बनकर उभरा है। यह समझौता अक्टूबर 2025 में लागू हुआ था और स्विट्जरलैंड इसे भारतीय बाजार में स्विस कंपनियों की पहुंच और निवेश के लिए अधिक निश्चितता देने वाला करार मानता है। स्विट्जरलैंड के अनुसार भारत एशिया में उसका दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और देश में 330 से अधिक स्विस कंपनियां सक्रिय हैं। इसे भी पढ़ें: Swiss President से मुलाकात के बाद बोले PM Modi, वैश्विक शांति और संस्थाओं में सुधार जरूरी द्विपक्षीय वार्ता के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि इस समझौते के जरिए अगले 15 वर्षों में भारत में 100 अरब डॉलर के निवेश और 10 लाख प्रत्यक्ष रोजगार का लक्ष्य रखा गया है। भारतीय कृषि उत्पादों, औषधियों, वस्त्रों और इंजीनियरिंग उत्पादों के लिए स्विस बाजार में अवसर बढ़ाने के साथ भारत जैव-प्रौद्योगिकी, जीवन विज्ञान, बैंकिंग, बीमा, खाद्य प्रसंस्करण और सतत विकास जैसे क्षेत्रों में स्विस निवेश आकर्षित करना चाहता है। लेकिन इस साझेदारी का असली रणनीतिक विस्तार रक्षा और उन्नत प्रौद्योगिकी में दिखाई देता है। दोनों पक्षों ने सैन्य आदान-प्रदान और रक्षा उत्पादन में नए अवसर तलाशने तथा परमाणु ऊर्जा सहयोग को और गहरा करने पर सहमति जताई है। यह संकेत इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि स्विट्जरलैंड की उच्च तकनीकी औद्योगिक क्षमता और भारत की बढ़ती रक्षा विनिर्माण महत्वाकांक्षा मिलकर नए तकनीकी और औद्योगिक सहयोग के रास्ते खोल सकती हैं। साथ ही दोनों देशों के बीच बुनियादी ढांचे में भी सहयोग अब जमीन पर दिखाई दे रहा है। वाराणसी रोपवे, नोएडा के जेवर हवाई अड्डे और पर्वतीय क्षेत्रों में रेलवे तथा सुरंग परियोजनाओं का उल्लेख करते हुए मोदी ने परिवहन, गतिशीलता और आधारभूत ढांचे पर नए समझौते को आगे की साझेदारी का आधार बताया। समझौते में विद्युत वाहन, रोपवे, परिपत्र अर्थव्यवस्था, सुरंग और टिकाऊ परिवहन प्रणालियों पर सहयोग शामिल है। साथ ही विज्ञान और नवाचार इस रिश्ते की दूसरी बड़ी धुरी बन रहे हैं। भारतीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग और स्विस राष्ट्रीय विज्ञान प्रतिष्ठान के बीच समझौता दीर्घकालिक संयुक्त अनुसंधान का ढांचा तैयार करेगा। स्वास्थ्य, स्वच्छ ऊर्जा और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में नए संयुक्त शोध की शुरुआत भी प्रस्तावित है। ज्यूरिख विश्वविद्यालय के अनुप्रयुक्त विज्ञान संस्थान के साथ समझौते के जरिए शुरुआती चरण के भारतीय स्टार्टअप को प्रशिक्षण, तकनीकी हस्तांतरण, कार्यशालाओं और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्किंग का अवसर मिलेगा। मानव संसाधन के मोर्चे पर भी बड़ा बदलाव हुआ है। प्रवास एवं गतिशीलता साझेदारी के तहत पांच वर्ष तक वैध बहु-प्रवेश वीजा और प्रत्येक यात्रा में छह महीने तक ठहरने की सुविधा का प्रावधान है। छात्रों के लिए नवीकरणीय एक-वर्षीय अनुमति भी शामिल है। वहीं युवा पेशेवरों के आदान-प्रदान समझौते के तहत हर वर्ष दोनों देशों से 300-300 युवा पेशेवर भेजे जा सकेंगे, जिसे बढ़ाकर 500 तक किया जा सकता है। इसका उद्देश्य युवाओं को काम के साथ पेशेवर और भाषाई कौशल विकसित करने का अवसर देना है। यह समझौता प्रतिभा, तकनीक और पूंजी, तीनों को एक ही गलियारे में जोड़ता है। भारत को वैश्विक प्रतिभा और नवाचार नेटवर्क में प्रवेश मिलता है, जबकि स्विट्जरलैंड को भारत के विशाल प्रतिभा और बाजार आधार से जुड़ने का अवसर मिलता है। इसके अलावा, दोनों देशों ने आगामी भारत–स्विस अनुसंधान प्रमुख कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र की भी घोषणा की है। साथ ही वैश्विक शांति, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार की जरूरत पर दोनों पक्षों ने सहमति जताई है। यूक्रेन और पश्चिम एशिया जैसे संकटों पर भारत ने हर सार्थक शांति प्रयास के समर्थन की अपनी नीति दोहराई। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी इस रिश्ते का अगला मोर्चा है। भारत में 2026 के एआई इम्पैक्ट शिखर सम्मेलन के बाद स्विट्जरलैंड अगले चरण में जिनेवा एआई शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। दोनों देशों की कोशिश जिम्मेदार, समावेशी और मानव-केंद्रित कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए सहयोग बढ़ाने की है। साफ है कि यह यात्रा केवल पांच समझौतों की कहानी नहीं है। इसके पीछे भारत की रणनीति यूरोप में व्यापार, निवेश, उन्नत तकनीक और विश्वसनीय आपूर्ति शृंखलाओं के नए केंद्रों से संबंध मजबूत करने की है, जबकि स्विट्जरलैंड भारत को अपने एशियाई आर्थिक और तकनीकी विस्तार के महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में देख रहा है। 7 अक्टूबर का भारत–ईएफटीए ‘प्रॉस्पेरिटी समिट’ इस पूरी कवायद को निवेश और कारोबारी परियोजनाओं में बदलने की अगली परीक्षा होगा। बहरहाल, रणनीतिक तस्वीर बिल्कुल स्पष्ट है। भारत–स्विट्जरलैंड संबंध अब घड़ियों, पर्यटन और बैंकिंग की पारंपरिक छवि से बाहर निकलकर रक्षा उत्पादन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष, स्वच्छ ऊर्जा, अत्याधुनिक बुनियादी ढांचे, स्टार्टअप और वैश्विक कूटनीति के नए मैदान में प्रवेश कर चुके हैं। -नीरज कुमार दुबे
बैंक ऑफ बड़ौदा में ह्यूमन रिसोर्स पदों पर आवेदन की अंतिम तिथि 16 अक्तूबर तक बढ़ी
नई दिल्ली, बैंक ऑफ बड़ौदा (बीओबी) में नौकरी करने की इच्छा रखने वालों के लिए एक सुनहरा मौका सामने आया है।
भारतीय शेयर बाजार ने लगातार 4 दिन की गिरावट का तोड़ा सिलसिला
मुंबई, अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में तेजी से बढ़ोतरी की आशंकाओं में कमी आने के कारण वैश्विक शेयर बाजारों में तेजी आने से भारतीय शेयर बाजार ने लगातार चार दिनों की गिरावट का सिलसिला तोड़ते हुए हरे निशान में बंद हुआ।
मुंबई में इस साल के पहले नौ महीने में बिके 72,804 घर: रिपोर्ट
मुंबई, मुंबई के आवासीय बाजार में जनवरी-सितंबर के दौरान 2018 के बाद सबसे अधिक बिक्री दर्ज की गई है।
महाराष्ट्र एमएलसी चुनाव पर सभी पांचों सीटों पर जीत दर्ज करेगी महायुति: मुरलीधर मोहोल
महाराष्ट्र एमएलसी चुनाव पर सभी पांचों सीटों पर जीत दर्ज करेगी महायुति: मुरलीधर मोहोल
ब्राजील: राष्ट्रपति चुनाव के पहले दौर में लूला पर बढ़त बनाने वाले बोल्सोनारो कौन?
ब्राजील: राष्ट्रपति चुनाव के पहले दौर में लूला पर बढ़त बनाने वाले बोल्सोनारो कौन?
Gen Z Revolt: मोदी के दोस्त के देश में भी वही हो रहा,जो भारत में हुआ था? भयंकर साज़िश का पर्दाफ़ाश!
पहले विश्व युद्ध के पहले फ्रांस को एक सुपर पावर कह ले या फिर एक प्रमुख ताकत दुनिया की कहा जाता था। आज भी फ्रांस को दुनिया भर में शिक्षा, लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों के लिए, मानव अधिकारों के लिए जाना जाता है। लेकिन आज उसी फ्रांस के स्कूलों के बाहर आग लगी है। बल्कि पेरिस जैसे शहर पूरी तरीके से छात्रों की चपेट में है। स्कूलों के गेट बंद हैं। सड़कों पर आगजनी है। पुलिस और छात्रों के बीच सीधा टकराव है । शुरुआत स्कूल की समस्याओं से हुई थी। लेकिन अब आंदोलन का दायरा बढ़ चुका है। शिक्षक नहीं क्लासरूम में भीड़ है। स्कूलों की इमारतें जर्जर होने का दावा है। लंबे स्कूल के घंटे और युवाओं को लग रहा है कि उनके भविष्य के साथ समझौता किया जा रहा है। 2 अक्टूबर तक करीब 400 हाई स्कूल बंद थे और 1000 से ज़्यादा संस्थानों में किसी ना किसी रूप में प्रोटेस्ट या डिस्ट्रप्शन दर्ज हुआ और फिर आई सबसे चौंकाने वाली तस्वीर सामने कि करीब 2000 गिरफ्तारियां। पुलिस के साथ झड़प, आगजनी, स्कूलों के बाहर बैरिकेड्स और सरकार अब कह रही कि आंदोलन के एक हिस्से पर हिंसक तत्वों का कब्जा हो गया है। लेकिन कहानी सिर्फ इतनी नहीं क्योंकि इन बच्चों के हाथ में सिर्फ पत्थर नहीं इनके हाथ में एक शिकायत भी है कि हमारा भविष्य कहां है। स्कूल के गेट से शुरू हुआ विस्फोट। फ्रांस में मौजूदा आंदोलन की शुरुआत पेरिस रीजन के हाई स्कूलों से हुई। पहले छात्रों ने स्कूल के गेट ब्लॉक किए। फिर दूसरे शहर जुड़े और फिर प्रोटेस्ट फैलता चला गया और कुछ ही दिनों में मामला नेशनल अनरेस्ट में बदलने लगा। 1 अक्टूबर तक फ्रांस के 1000 से ज्यादा हाई स्कूल प्रोटेस्ट या डिस्क्रिप्शन से प्रभावित बताए गए। एजुकेशन मिनिस्ट्री के आंकड़ों के अनुसार 222 स्कूल्स में ब्लॉकेड्स दर्ज हुए हैं। 2 अक्टूबर को करीब 400 स्कूल बंद रखने पड़े। हालात अभी भी वैसे ही हैं। यानी जिस समस्या की शुरुआत एक स्कूल के गेट से हुई थी, अब पूरे फ्रांस की एजुकेशन सिस्टम की वह परीक्षा बन गई है। बच्चों की शिकायत आखिर क्या है जिस पर बात नहीं बन पा रही। अब इस आंदोलन के पीछे की जमीन समझिए। इसे भी पढ़ें: France में छात्रों के उग्र प्रदर्शन से 400 High School बंद, पुलिस पर पथराव और आगजनी छात्रों की सबसे बड़ी शिकायत है टीचर्स की कमी कई जगह क्लासेस में स्टूडेंट्स की संख्या बहुत ज्यादा है। कुछ छात्रों का कहना है कि एक क्लास रूम में 30 से ज्यादा बच्चे हैं। कई स्कूलों में टीचर्स की अनुपस्थिति के कारण क्लासेस कैंसिल हो रही हैं। फ्रांस के एजुकेशन मिनिस्ट्री के आंकड़े कहते हैं कि 2024-25 स्कूल ईयर में पब्लिक सेकेंडरी स्कूल्स में करीब 10% टीचिंग आवर्स पढ़ाए ही नहीं गए। इनमें लगभग 7.5 मिस्ड आवर्स सब्स्टट्यूट टीचर्स ना मिलने के कारण थे। यानी छात्रों की शिकायत सिर्फ सोशल मीडिया का गुस्सा नहीं। इसके पीछे एजुकेशन सिस्टम में वास्तविक स्टाफिंग प्रॉब्लम भी है। स्कूलों के हालत ने गुस्सा और बढ़ाया है। अब दूसरी बड़ी शिकायत है इंफ्रास्ट्रक्चर। कई स्कूलों की इमारतें पुरानी होने का दावा है। क्लासरूम ओवर क्राउडेड है। हीट वेव के दौरान कई क्लासरूम्स में तापमान बेहद ज्यादा रहा। स्टूडेंट्स का कहना है कि अगर उन्हें घंटों ऐसे कमरों में बैठना पड़ता है जहां बेसिक कंफर्ट तक पर्याप्त नहीं है। कई जगह स्टाफ शॉर्टेज के कारण एडमिनिस्ट्रेटिव और टीचिंग वर्क लोड भी बढ़ा हुआ है। यानी छात्र कह रहे हैं कि हमें सिर्फ परीक्षा पास करने के लिए नहीं कहा जा सकता। हमें पढ़ने के लिए सही स्कूल भी चाहिए। इसे भी पढ़ें: G20 Meet: Piyush Goyal ने फ्रांस, कनाडा, सऊदी अरब और दक्षिण कोरिया संग Trade पर की चर्चा स्कूल की दीवारों से बाहर निकला जेन जी का गुस्सा जेनजी का गुस्सा स्कूल की दीवारों से बाहर निकल चुका है और यही इस आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बनता है। प्रदर्शनकारी सिर्फ क्लासरूम कंडीशंस की बात नहीं कर रहे। उनकी चिंता है आगे की जिंदगी, यूनिवर्सिटी एडमिशन, एंप्लॉयमेंट, इकोनॉमिक सिक्योरिटी, स्टूडेंट सपोर्ट और एक ऐसा फ्यूचर जहां उन्हें लग रहा कि कंपटीशन बढ़ रहा है लेकिन अपॉर्चुनिटीज उसी अनुपात में नहीं बढ़ रही। कई छात्रों के लिए स्कूल सिर्फ स्कूल नहीं वो उनके सोशल मोबिलिटी का रास्ता है। अगर पब्लिक एजुकेशन कमजोर होती है तो गरीब और मिडिल क्लास परिवार के बच्चों के लिए आगे बढ़ने के अवसर भी प्रभावित हो सकते हैं। इसीलिए आंदोलन में एजुकेशन फंडिंग के साथ-साथ बॉर्डर इकोनॉमिक कंसर्न्स भी दिखाई दे रहे हैं। फिर आंदोलन हिंसक क्यों हो गया और कैसे हो गया? शांतिपूर्ण प्रोटेस्ट लोकतंत्र का हिस्सा हो सकता है। लेकिन फ्रांस में कई जगह प्रोटेस्ट ने वायलेंट टर्म ले लिया। 2 अक्टूबर तक करीब 400 हाई स्कूल बंद थे और 1000 से ज़्यादा संस्थानों में किसी ना किसी रूप में प्रोटेस्ट या डिस्ट्रप्शन दर्ज हुआ और फिर आई सबसे चौंकाने वाली तस्वीर सामने कि करीब 2000 गिरफ्तारियां। पुलिस के साथ झड़प, आगजनी, स्कूलों के बाहर बैरिकेड्स और सरकार अब कह रही कि आंदोलन के एक हिस्से पर हिंसक तत्वों का कब्जा हो गया है। लेकिन कहानी सिर्फ इतनी नहीं क्योंकि इन बच्चों के हाथ में सिर्फ पत्थर नहीं इनके हाथ में एक शिकायत भी है कि हमारा भविष्य कहां है। स्कूल के गेट से शुरू हुआ विस्फोट। फ्रांस में मौजूदा आंदोलन की शुरुआत पेरिस रीजन के हाई स्कूलों से हुई। पहले छात्रों ने स्कूल के गेट ब्लॉक किए। 3 अक्टूबर तक इस आंदोलन में करीब 5000 से ज्यादा लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। इनमें बड़ी संख्या 15, 16, 14, 12 साल के बच्चों की बताई गई है। 600 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हो चुके हैं और सरकारी संपत्ति को नुकसान लगातार हो रहा है। करोड़ों यूरो में उसकी कीमत पहुंच चुकी है। पुलिस के साथ-साथ शिक्षकों और आम लोगों पर हमले की घटनाएं भी सामने आई है। यहां का जो स्टॉक एक्सचेंज है उसमें भी भीड़ घुस गई है। उसे भी अपने कब्जे में ले लिया है। 3 अक्टूबर की अह राइटर्स की यह रिपोर्ट बताती है कि 1200 से ज़्यादा स्कूल इस आंदोलन से प्रभावित हो चुके थे। यानी जो विरोध कुछ दिन पहले पेरिस के आसपास के इलाकों से शुरू हुआ था वो अब देशव्यापी आंदोलन का रूप ले चुका है। कई शहरों में आग लगाई गई। पुलिस पर पत्थर फेंके गए, बोतलें फेंकी गई। पुलिस वालों को धक्का दिया गया। पुलिसवालों के साथ मारपीट की गई। एक महिला पुलिस वाली को महिला पुलिसकर्मी को लातों से पीटा गया। एक शिक्षक पर पेट्रोल फेंकने की घटना सामने आई। नातेश में एक स्कूल में आगजनी के बाद इमारत को लंबे समय तक बंद रखना पड़ा। कई जगहों पर पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए आंसू गैस के गोले भी छोड़े। इसे भी पढ़ें: भारत को Veto पॉवर दिलाने के लिए रूस ने UN में किया बड़ा धमाका, हिले अमेरिका, चीन समेत दुनिया के बड़े-बड़े देश 1968 में भी एक बड़े छात्र आंदोलन से रूबरू हुआ फ्रांस अब मामला सिर्फ स्कूलों की हालत सुधारों की मांग तक सीमित नहीं रह गया है। यही वजह है कि फ्रांस की सरकार अब इसे सिर्फ छात्र आंदोलन के तौर पर नहीं देख रही है। ऐसा नहीं है कि फ्रांस में छात्रों का आंदोलन ये कोई पहली बार हुआ है। 1968 में भी एक बहुत बड़ा आंदोलन छात्रों का फ्रांस में हुआ था। उसके बाद भी छात्रों के लगातार आंदोलन प्रदर्शन फ्रांस में होते रहे हैं। लेकिन इतना हिंसक कोई भी प्रदर्शन आज तक नहीं हुआ। फ्रांस के प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लिकार्नू ने संकट की के लिए इसमें बैठक बुलाई और मंत्रियों के जितने भी कार्यक्रम थे वह रद्द कर दिए। सरकार का कहना है कि छात्रों की समस्याओं पर बातचीत हो सकती है। हो सकती है। ऐसा नहीं है कि मतलब तुरंत छात्रों की मांगों को मान लिया जाए। लेकिन हिंसा और आगजनी को किसी भी हालत में स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह होना भी नहीं चाहिए। क्योंकि अगले साल फ्रांस में राष्ट्रपति के चुनाव भी होने वाले हैं और पूर्व राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रो दोबारा चुनाव लड़ सकते हैं। ऐसे समय में युवाओं का गुस्सा राजनीतिक पार्टियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। सरकार ने आरोप लगाया कि कट्टर वामपंथी पार्टी एलएफआई छात्रों के गुस्से को राजनीतिक आंदोलन में बदलने की कोशिश कर रही है। और यहां कल एक आपके सामने ही एक्स फॉरेन एक्सपर्ट से मैं बात कर रहा था। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ फ्रांस के छात्रों ने किया हो ऐसा मुमकिन नहीं है। यहां हो सकता है कि कुछ जो इस्लामिक लोग हैं फ्रांस में लगभग 10% मुस्लिम आबादी फ्रांस में है वो लोग भी इसमें शामिल हैं। अबाया पहनने की वो मांग कर रहे हैं। बांग्लादेश-नेपाल या भारत जैसा पैटर्न? बांग्लादेश और नेपाल में हाल ही के यूथ लेड प्रोटेस्ट ने पॉलिटिकल सिस्टम को बड़ा झटका दिया। भारत में भी एजुकेशन मिनिस्टर को इस्तीफा देना पड़ा। अब फ्रांस में भी जेनजी सड़क पर है। लेकिन दोनों परिस्थितियों को एक जैसा बताना अभी जल्दबाजी होगी। फ्रांस एक एस्टैब्लिश यूरोपियन डेमोक्रेसी है। यहां इंस्टिट्यूशनल स्ट्रक्चर मजबूत है और मौजूदा फ्रेंच प्रोटेस्ट का डॉक्यूमेंटेड इमीडिएटेड ट्रिगर एजुकेशन कंडीशंस है। इसलिए फ्रांस में प्रोटेस्ट जरूर है। जेनजी मोबिलाइजेशन भी है। वायलेंस भी बढ़ी है। लेकिन इसे अभी बांग्लादेश या नेपाल जैसी सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया कहना उपलब्ध एविडेंस नहीं है। फिर एक कॉमन फैक्टर जरूर यहां पर दिखाई देता है। नई पीढ़ी का पॉलिटिकल एस्टैब्लिशमेंट और पब्लिक इंस्टिट्यूशन से बढ़ता फ्रस्ट्रेशन। जेनजी की सबसे बड़ी ताकत सोशल मीडिया है। आज के युवाओं का आंदोलन सिर्फ सड़क पर नहीं चलता। वो स्मार्टफोन पर भी चलता है। एक स्कूल में पुलिस क्लैश, दूसरे शहर में बर्निंग, बैरिकेड और तीसरे शहर में स्टूडेंट्स की स्पीच और कुछ ही घंटों में पूरा देश उसे देख सुन सकता है। यही सोशल मीडिया मोबिलाइजेशन को बेहद तेज बनाता है। एक लोकल ग्रिवेंस कुछ घंटों में नेशनल मूवमेंट बन जाता है। और यही चीज सरकारों के लिए आजकल सबसे बड़ी चुनौती है। क्योंकि ट्रेडिशनल पॉलिटिकल ऑर्गेनाइजेशंस की तरह जजी मोबिलाइजेशन को हमेशा एक सिंगल लीडरशिप स्ट्रक्चर की जरूरत नहीं होती। फ्रांस की कहानी में सबसे बड़ा वार्निंग सिग्नल क्या है? इस पूरे घटनाक्रम को सिर्फ बच्चे हिंसा कर रहे हैं कहकर खत्म कर देना आसान नहीं है। उससे अंडरलाइन प्रॉब्लम खत्म ही होगी। दूसरी तरफ सरकार गलत है इसलिए हिंसा जायज है। कहना भी उतना ही खतरनाक होगा। क्योंकि स्कूल, बिल्डिंग्स जलाने, टीचर्स और पुलिस पर हमला करने, पब्लिक प्रॉपर्टी को नष्ट करने से स्टूडेंट्स की लेजिटमेट डिमांड्स कमजोर पड़ सकती हैं। यानी एक आंदोलन को दो अलग तस्वीरों में देखिए। एक तस्वीर बेहतर एजुकेशन की डिमांड करती है जिंजी। दूसरी तस्वीर आगजनी और पुलिस क्लैशेस की है। सरकार को पहली तस्वीर का जवाब पॉलिसी से देना है और दूसरी तस्वीर का जवाब लॉ इनफोर्समेंट से। तो फ्रांस की सड़कों पर इस वक्त सिर्फ छात्र नहीं है। वहां एक पूरी जनरेशन अपनी स्थिति दर्ज करा रही है। उनका मैसेज साफ है। टीचर चाहिए, बेहतर क्लासरूम चाहिए, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए, फ्यूचर चाहिए। किसी भयंकर साजिश की ओर इशारा तो नहीं दिलचस्प बात यह है कि सरकार ने छात्रों की कुछ मांगों पर कदम उठाने की कोशिश भी की। शिक्षा मंत्री ने बातचीत का रास्ता खोलने की बात कही हो और शिक्षा के क्षेत्र में सरकार के बजट को लेकर भी बदलावों की चर्चा हुई है। यह बवाल इसलिए भी फ्रांस में ज्यादा हुआ क्योंकि इस बार जो बजट पेश हुआ उसमें शिक्षा का जो बजट था वो केवल 1.7% ही बढ़ाया गया था। बाकी जमीन पर तनाव कम नहीं हुआ है। छात्र संगठनों ने आने वाले मंगलवार को एक बड़े प्रदर्शन का आह्वान किया है। इसका मतलब साफ है कि फ्रांस की सरकार के सामने अब सिर्फ स्कूलों को खोलने की चुनौती चुनौती नहीं है। उसे तय करना है कि जायज छात्र मांगों को कैसे सुना जाए। उन्हें कैसे पूरा किया जाए और कैसे फ्रांस को जलने से रोका जाए। हिंसा को कैसे रोका जाए और इस पूरे आंदोलन को चुनावी राजनीतिक हथियार बनने से भी रोकना जरूरी है क्योंकि इतिहास बताता है कि फ्रांस में छात्र आंदोलनों की ताकत को कम करके आंकना भारी पड़ सकता है। 1968 का छात्र आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जिसने फ्रांसीसी राजनीति और समाज को हिला कर रख दिया था। आज 2026 में हालात अलग हैं। लेकिन सवाल फिर वही है। क्या यह सिर्फ बेहतर शिक्षा के लिए छात्रों की आवाज है? या फिर छात्रों के गुस्से के पीछे अब राजनीति और हिंसक तत्व भी पूरी तरीके से घुस चुके हैं। शायद 2 साल पहली बात है वो आपको याद होगा किस तरीके से इस्लामिक कट्टरपंथियों ने फ्रांस को जलाया था। हफ्ते भर तक फ्रांस वहां जलता रहा था और आज भी तस्वीर कुछ वैसी ही है।
सोना 0.5 प्रतिशत गिरा, चांदी 2.27 लाख रुपए प्रति किलो के पार
मुंबई, सोने और चांदी की कीमतों में सोमवार को मिलाजुला कारोबार देखा गया। शुरुआत सत्र में सोने में 0.48 प्रतिशत की गिरावट और चांदी में 0.53 प्रतिशत की तेजी देखी गई।
'उद्धव ठाकरे और दिमाग का कोई संबंध नहीं', चुनाव आयोग पर सवाल उठाने पर भड़के नितेश राणे
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सेवा संकल्प अभियान: सीएम धामी ने स्वच्छता कार्यक्रम में लिया हिस्सा, गुरुद्वारा श्री नानकमत्ता साहिब में टेका माथा
पाकिस्तानियों से ज्यादा जीते हैं भारतीय, मगर भारतीयों से भी ज्यादा जीते हैं बांग्लादेशी। विश्व स्वास्थ्य संगठन के ताजा आंकड़े भारत की जीवन-प्रत्याशा की एक दिलचस्प तस्वीर सामने रखते हैं। वर्ष 2023 में एक भारतीय की औसत जीवन-प्रत्याशा 71 वर्ष रही, जबकि पाकिस्तान में यह 68.2 वर्ष थी। लेकिन बांग्लादेश 72.7 वर्ष के साथ भारत से आगे निकल गया। अमेरिका और कनाडा तो इससे भी काफी आगे हैं। यानी भारत ने पाकिस्तान को पीछे जरूर छोड़ा है, लेकिन लंबी जिंदगी के मामले में अभी बांग्लादेश से भी पिछड़ रहा है। कहानी यहीं खत्म नहीं होती। भारतीयों की बढ़ती उम्र के साथ सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस जिंदगी में स्वस्थ रहने के कितने साल शामिल हैं। हम आपको बता दें कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के ताजा वैश्विक स्वास्थ्य आकलन ने भारत की सेहत की ऐसी तस्वीर सामने रखी है, जिसमें एक तरफ महामारी के बाद जीवन-प्रत्याशा तेजी से संभली है, तो दूसरी तरफ हृदय रोग, मधुमेह, पक्षाघात और फेफड़ों की पुरानी बीमारियां मौत की सबसे बड़ी वजह बनती जा रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में स्वस्थ जीवन-प्रत्याशा वर्ष 2023 में केवल 60.6 वर्ष रही। यानी औसतन जीवन के अंतिम करीब दस वर्ष किसी न किसी बीमारी, अक्षमता या स्वास्थ्य संबंधी परेशानी के साथ गुजरने की आशंका बनी रहती है। वर्ष 2019 में यही आंकड़ा 60.5 वर्ष था। महामारी के दौरान यह 2021 में घटकर 58.4 वर्ष रह गया और फिर 2022 में 60.2 तथा 2023 में 60.6 वर्ष तक पहुंचा। इसे भी पढ़ें: Prabhasakshi NewsRoom: Jaishankar की बात एकदम सही निकली, Pakistan के साथ नई Defence Deal कर America ने India के लिए बढ़ाया खतरा! रिपोर्ट के मुताबिक, महामारी के बाद भारत ने जीवन-प्रत्याशा में उल्लेखनीय वापसी की है। वर्ष 2019 में यह 70.5 वर्ष थी, जो 2021 में गिरकर 68.1 वर्ष हो गई। इसके बाद 2022 में यह फिर 70.5 वर्ष और 2023 में 71 वर्ष पहुंच गई। यानी महज दो वर्षों में भारत ने अनुमानित जीवन के 2.9 वर्ष वापस हासिल कर लिए। लेकिन स्वस्थ जीवन-प्रत्याशा की वापसी केवल 2.2 वर्ष रही। यही अंतर भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने सबसे गंभीर चुनौती को उजागर करता है। बुजुर्गों के मामले में भी तस्वीर कुछ बेहतर हुई है। वर्ष 2023 में 60 वर्ष की उम्र तक पहुंच चुके व्यक्ति के औसतन 18.8 वर्ष और जीने की उम्मीद थी, जबकि 2019 में यह 18.4 वर्ष थी। लेकिन इनमें पूरी तरह स्वस्थ रहने वाले वर्षों की संख्या 13.7 वर्ष ही थी। साफ है कि उम्र बढ़ रही है, मगर स्वस्थ उम्र उतनी तेजी से नहीं बढ़ रही। इसके अलावा, भारत की बीमारियों की तस्वीर भी पिछले दो दशकों में पूरी तरह बदल गई है। वर्ष 2000 में देश में मौत के दस प्रमुख कारणों में संक्रामक बीमारियों की हिस्सेदारी करीब 62 प्रतिशत थी, जबकि गैर-संचारी बीमारियों की हिस्सेदारी 34 प्रतिशत थी। वर्ष 2023 तक तस्वीर उलट गई। गैर-संचारी बीमारियां करीब 75 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ मौत की सबसे बड़ी वजह बन गईं, जबकि संक्रामक बीमारियों की हिस्सेदारी घटकर करीब 16 प्रतिशत रह गई। बाकी हिस्सेदारी चोट और दुर्घटनाओं जैसी वजहों की रही। बीमारियों की बदलती तस्वीर को मौत के आंकड़ों से आसानी से समझा जा सकता है। वर्ष 2000 में भारत में क्षय रोग और दस्त जैसी संक्रामक बीमारियां मौत की बड़ी वजह थीं। तब प्रति एक लाख आबादी पर क्षय रोग से 92.4 और दस्त से 87.8 मौतें होती थीं। लेकिन वर्ष 2023 तक तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी थी। अब हृदय रोग सबसे बड़ा जानलेवा कारण बन गया, जिससे प्रति एक लाख आबादी पर 138.5 मौतें दर्ज हुईं। इसके बाद फेफड़ों की पुरानी बीमारी से 83.19, पक्षाघात से 74.8 और मधुमेह से 49.01 मौतें प्रति एक लाख आबादी पर हुईं। यानी भारत अब केवल संक्रमण से नहीं, बल्कि दिल, फेफड़ों, मधुमेह और पक्षाघात जैसी लंबी बीमारियों से भी बड़ी जंग लड़ रहा है। फिर भी संक्रामक बीमारियों को समाप्त मान लेना बड़ी भूल होगी। दस्त, क्षय रोग और निचले श्वसन तंत्र के संक्रमण अब भी भारत में मौत के दस प्रमुख कारणों में शामिल हैं। यानी भारत को एक साथ पुरानी बीमारियों और नई जीवनशैली वाली बीमारियों, दोनों मोर्चों पर लड़ना पड़ रहा है। दूसरी ओर, दुनिया की तस्वीर भी भारत से बहुत अलग नहीं है। वर्ष 2023 में वैश्विक जीवन-प्रत्याशा 73.3 वर्ष पहुंच गई, जो 2019 के 73.4 वर्ष के लगभग बराबर है। लेकिन वैश्विक स्वस्थ जीवन-प्रत्याशा 62.8 वर्ष ही रही, जो 2019 से अब भी 0.4 वर्ष कम है। दुनिया में होने वाली कुल मौतों में गैर-संचारी बीमारियों की हिस्सेदारी 2000 के 58 प्रतिशत से बढ़कर 2023 में 74 प्रतिशत हो गई। दुनिया की दस प्रमुख जानलेवा वजहों में आठ अब गैर-संचारी बीमारियां हैं। बहरहाल, विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक महामारी से स्वास्थ्य संकेतकों को लगा झटका अब काफी हद तक संभल चुका है, लेकिन असली अगली चुनौती लंबी जिंदगी नहीं, स्वस्थ जिंदगी सुनिश्चित करना है। इस तरह भारत के लिए संदेश बिल्कुल साफ है कि सिर्फ लोगों की औसत उम्र बढ़ना स्वास्थ्य क्षेत्र की सफलता का अंतिम पैमाना नहीं हो सकता। अगर बढ़ती उम्र के साथ हृदय रोग, मधुमेह, पक्षाघात और फेफड़ों की बीमारियां भी बढ़ती रहीं, तो देश लंबी जिंदगी तो पाएगा, लेकिन स्वस्थ जिंदगी नहीं। यही वह मोर्चा है, जहां आने वाले वर्षों में भारत की स्वास्थ्य नीतियों की असली परीक्षा होगी।
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दो हफ़्तों में पवित्र शहरों पर दूसरा हमला: धार्मिक स्थलों पर हमलों को रोकने की तत्काल ज़रूरत
पवित्र धार्मिक शहरों पर दूसरा हमला, 2017 के बाद से सबसे गंभीर हमला, मंगलवार, 29 सितंबर 2026 को स्थानीय समयानुसार सुबह 5:11 बजे हुआ। हूतियों ने मदीना में तैबा पावर डिस्ट्रिब्यूशन स्टेशन को निशाना बनाया, जो इस्लाम के दूसरे सबसे पवित्र स्थल 'अल-मस्जिद अन-नबवी' को बिजली सप्लाई करने वाली एक नागरिक सुविधा है। एक वन-वे अटैक ड्रोन ने एक ट्रांसफ़ॉर्मर को बेकार कर दिया। सऊदी गठबंधन ने बताया कि बड़े ग्रिड पर कोई असर नहीं पड़ा और मस्जिद में बिजली गुल नहीं हुई। गठबंधन के प्रवक्ता मेजर जनरल तुर्की अल-माल्की ने पुष्टि की कि मलबे को बरामद कर लिया गया है और ऑपरेशनल रिव्यू से हूतियों की संलिप्तता की पुष्टि हुई है। मक्का पर हमला दो हफ़्ते पहले, मंगलवार, 15 सितंबर 2026 को स्थानीय समयानुसार शाम 6:50 बजे, सऊदी अरब ने मक्का के दक्षिण में एक हूती ड्रोन को ग्रैंड मस्जिद के ऊपर प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र में घुसने से पहले ही रोककर नष्ट कर दिया। 2017 के बाद मक्का पर यह पहली कोशिश थी। सऊदी अधिकारियों ने इस हमले के लिए यमन के हूती विद्रोहियों को ज़िम्मेदार ठहराया; बढ़ते तनाव के बीच इस्लाम के सबसे पवित्र शहर पर यह अपनी तरह की पहली घटना थी। सऊदी एयर डिफेंस ने जेद्दा से लगभग 70 किलोमीटर अंदर ड्रोन को रोक दिया, जिससे वह अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाया। सऊदी-नेतृत्व वाले गठबंधन के प्रवक्ता कर्नल तुर्की अल-मलिकी ने बताया कि मक्का के प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र में घुसने से पहले ही ड्रोन को रोक दिया गया था। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि दो पवित्र मस्जिदों और तीर्थयात्रियों की सुरक्षा एक 'रेड लाइन' (अति-संवेदनशील सीमा) है। उन्होंने इस हमले की निंदा करते हुए इसे 'शर्मनाक हरकत' बताया, जिसका मकसद इबादत करने वालों में डर पैदा करना और आम नागरिकों को नुकसान पहुँचाना था। सऊदी विदेश मंत्रालय ने इसे 'कायरतापूर्ण आतंकवादी हमला' करार दिया। हूथी आंदोलन (अंसार अल्लाह) ने तुरंत और स्पष्ट रूप से इसकी ज़िम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया। 57 मुस्लिम-बहुल देशों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन 'ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन' (ओ आई सी) ने मक्का पर हुए हमले की कड़ी निंदा करते हुए इसे 'घिनौना' बताया। ओ आई सी ने यमन के हूथी आंदोलन को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराया और पवित्र स्थलों की सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय एकजुटता का आह्वान किया। साथ ही, संगठन ने वैश्विक समुदाय से ऐसी हिंसा को रोकने के लिए कदम उठाने का आग्रह किया, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता और धार्मिक सद्भाव को खतरा हो सकता है। सऊदी अरब और जी सी सी ने कहा कि इन हमलों ने 'सभी रेड लाइन्स पार कर ली हैं' और यह 'हालात को गंभीर रूप से बिगाड़ने' (ग्रेव एस्केलेशन) जैसा है। मक्का और मदीना को निशाना बनाकर दुनिया भर के लाखों मुसलमानों को जान-बूझकर उकसाया गया है। यू ए ई, बहरीन, कुवैत, जॉर्डन और तुर्की ने भी एकजुटता दिखाते हुए बयान जारी किए। हूथियों ने ज़िम्मेदारी से इनकार करते हुए कहा कि उन्होंने किसी भी पवित्र स्थल को निशाना नहीं बनाया। उन्होंने सऊदी अरब पर आरोप लगाया कि वह मक्का के बारे में पहले किए गए दावे को साबित न कर पाने की अपनी नाकामी को छिपाने की कोशिश कर रहा है। अब मदीना क्यों? हूथियों ने जुलाई 2026 में सऊदी अरब की समुद्री नाकेबंदी की घोषणा की थी और 2022 में संयुक्त राष्ट्र संघ की युद्धविराम संधि के टूटने के बाद सीमा-पार हमले फिर से शुरू कर दिए थे। सना और लाल सागर के तट पर उनके नियंत्रण की वजह से वे 900 किलोमीटर से ज़्यादा दूरी तक ड्रोन भेजकर मदीना तक पहुँच सकते हैं। पवित्र मस्जिद के पास बिजलीघर पर हमला करने का मकसद धार्मिक आक्रोश को भड़काना, सऊदी अरब पर दबाव बढ़ाना और ईरान-समर्थित क्षमताओं का प्रदर्शन करना है, ताकि यह दिखाया जा सके कि वे ईरान-अमेरिका-इज़राइल के बीच चल रहे संघर्ष के दौरान भी सऊदी अरब के अंदरूनी इलाकों तक हमला कर सकते हैं। इसमें किसी के हताहत होने की खबर नहीं है, लेकिन इसका प्रतीकात्मक असर बहुत बड़ा है। इस्लामी दुनिया में, पैगंबर की मस्जिद (मस्जिद-ए-नबवी) को सेवा देने वाले बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने को पवित्रता पर ही हमला माना जाता है। धार्मिक स्थलों पर हमलों को रोकने वाले अंतरराष्ट्रीय नियम टकराव के दौरान धार्मिक स्थलों को निशाना बनाना युद्ध का एक पुराना और दुखद पहलू रहा है। अंतरराष्ट्रीय कानून में इस मुद्दे पर स्पष्ट नियम हैं, जो सीधे तौर पर ऊपर बताए गए हमलों जैसे मामलों को संबोधित करते हैं। नीचे इन स्थलों के लिए ऐतिहासिक उदाहरण और मुख्य कानूनी सुरक्षा उपाय दिए गए हैं। अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून (आई एच एल) सशस्त्र संघर्षों के दौरान कई तरह से धार्मिक स्थलों की सुरक्षा करता है। इसका मुख्य सिद्धांत यह है कि ये स्थल नागरिकों की संपत्ति हैं और इन पर तब तक हमला नहीं किया जाना चाहिए जब तक कि ये सैन्य लक्ष्य न बन जाएं। 1907 के हेग नियमों का अनुच्छेद 27 कहता है कि घेराबंदी और बमबारी के दौरान, 'धर्म, कला, विज्ञान या धर्मार्थ कार्यों के लिए समर्पित इमारतों, ऐतिहासिक स्मारकों, अस्पतालों... को यथासंभव बचाने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए', बशर्ते कि उनका उपयोग सैन्य उद्देश्यों के लिए न किया जा रहा हो। अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आई सी सी) के रोम स्टैच्यूट के आर्टिकल 8(2)(बी)(ix) और 8(2)(ई)(iv) के तहत, 'धर्म, शिक्षा, कला, विज्ञान या चैरिटी के कामों के लिए बनी इमारतों, ऐतिहासिक स्मारकों या अस्पतालों पर जान-बूझकर हमला करना' इंटरनेशनल और नॉन-इंटरनेशनल आर्म्ड कॉन्फ्लिक्ट (सशस्त्र संघर्ष) में वॉर क्राइम माना जाता है, बशर्ते वे मिलिट्री टारगेट न हों। कस्टमरी इंटरनेशनल लॉ (प्रचलित अंतरराष्ट्रीय कानून) सभी देशों के लिए अनिवार्य नियम के तौर पर धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों की सुरक्षा करता है, चाहे किसी संधि को मंज़ूरी दी गई हो या नहीं। आई सी आर सी और दूसरे संगठन लगातार इस बात पर ज़ोर देते हैं कि इन स्थलों की सुरक्षा करना 'इंटरनेशनल ह्यूमैनिटेरियन लॉ (अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून) के तहत एक अनिवार्य दायित्व और एक बहुत बड़ी नैतिक ज़िम्मेदारी है।' हालांकि धार्मिक स्थलों पर हमलों को रोकने वाला कानूनी ढांचा मज़बूत है, लेकिन जवाबदेही हमेशा सुनिश्चित नहीं हो पाती। मुख्य चुनौती कड़े कानूनी नियमों और कमज़ोर लागूकरण के बीच संतुलन बनाने की है। न्यायिक कार्रवाई अक्सर अंतरराष्ट्रीय अदालतों के अधिकार क्षेत्र या मामलों को आगे बढ़ाने की देशों की इच्छा पर निर्भर करती है। प्रतिबंध जैसे राजनीतिक उपाय असरदार हो सकते हैं, लेकिन भू-राजनीतिक कारणों से अक्सर उन्हें चुनिंदा तौर पर लागू किया जाता है। निष्कर्ष धार्मिक स्थलों पर कई ऐतिहासिक हमलों के बावजूद, अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने ऐसे कामों को स्पष्ट रूप से रोकने के लिए एक मज़बूत कानूनी ढांचा बनाया है। चुनौती नियमों की कमी में नहीं, बल्कि लागूकरण, अधिकार क्षेत्र और राजनीतिक बाधाओं के बीच संतुलन बनाने में है। यही संतुलन तय करता है कि क्या ऊपर बताए गए हमलों के मामलों में इन सुरक्षा उपायों को असरदार ढंग से लागू किया जा सकता है या नहीं।
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पश्चिम एशिया : तनाव मार्केट आउटलुक अगले हफ्ते आरबीआई पॉलिसी
मुंबई, छुट्टियों के कारण छोटे रहे कारोबारी सप्ताह में भारतीय शेयर बाजार पर वैश्विक दबाव हावी रहा और प्रमुख सूचकांक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक स्तरों से नीचे फिसल गए। अब अगले सप्ताह निवेशकों की निगाहें आरबीआई की मौद्रिक नीति समीक्षा, दूसरी तिमाही (क्यू2) के कॉरपोरेट नतीजों और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव पर रहेंगी, जो बाजार की अगली दिशा तय कर सकते हैं।

