UPI के जरिए होने वाले डिजिटल भुगतान पर लग सकता है MDR चार्ज, SBI चेयरमैन ने कही यह बात
UPI पर संभावित चार्ज को लेकर पैदा हुई आशंकाओं के बीच पेमेंट्स काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) ने स्पष्ट किया है कि ग्राहकों के लिए UPI भुगतान मुफ्त बना रहेगा। छोटे कारोबारियों को भी डिजिटल पेमेंट स्वीकार करने के लिए कोई शुल्क नहीं देना होगा।
योगी सरकार UP के सभी यूनिवर्सिटी-कॉलेजों में नशा विरोधी अभियान शुरू करने जा रही। रोज नशे के खिलाफ शपथ होगी और पदार्थों की ब्रिकी पर रोक होगी।
भारत पर 100 % टैरिफ वाला बिल, यूएस सेनट से पारित हुआ है। भारत समेत 5 देश ऐसे हैं, जहां पर 100 % टैरिफ वाला बिल, यूएस में पास हो गया है। रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 % टैरिफ अब यूएस लगाएगा। 31 अगस्त को यूएस हाउस ओफ रिप्रेजेंटेटिव में रखा जाएगा, लेकिन अमेरिकी सीनेट से ये पारित हो गया है। 86 जो सीनेट के सदस्य हैं, यानि संसद उन्हों ने इसके समर्थन में वोट किया। इसके पारित होने के बाद पांच देशों के खिलाफ 100 % तक का टैरिफ लगाया जा सकता है। हालांकि कि ये पूरा अधिकार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को होगा, लेकिन अगर ये बिल पारित हो जाता है, तो भारत और वैसे देश जो रूस से सबसे अधिक मात्रा में तेल आयात करते हैं, उन पर संकट पैदा हो सकता है।लेकिन ये पूरा अधिकार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को होगा, लेकिन भारत के लिए ये ऐसा बिल है, जो आने वाले वक्त में भारत को मुश्किलों में डाल सकते हैं। इसे भी पढ़ें: Strait of Hormuz पर Iran-Oman के बीच ऐतिहासिक समझौता, US Sanctions के बीच क्या बदलेगी दुनिया की सूरत? यह विधेयक (Bill) क्या है? अमेरिकी सेनेट ने 86-11 के भारी बहुमत से लिंडसे ओ. ग्राहम सेंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 पारित किया है। इस द्विपक्षीय विधेयक का नाम दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम के नाम पर रखा गया है, जो इसके मुख्य वास्तुकारों में से एक थे। बिल का मुख्य उद्देश्य रूस और ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाना और उन देशों पर शिकंजा कसना जो मॉस्को (रूस) के साथ बड़े पैमाने पर ऊर्जा व्यापार जारी रखे हुए हैं। यह कानून अमेरिकी राष्ट्रपति को उन देशों से आयात होने वाले सामानों पर 100% तक का सीमा शुल्क लगाने का अधिकार देता है, जो रूसी तेल या प्राकृतिक गैस के दुनिया के शीर्ष 5 खरीदारों में शामिल हैं। इस विधेयक में और कौन से प्रतिबंध प्रस्तावित हैं? यह विधेयक सिर्फ रूसी तेल खरीदारों पर शुल्क लगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कई अन्य कठोर प्रतिबंध शामिल हैं। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, वरिष्ठ राजनीतिक और सैन्य अधिकारियों, और कुलीन वर्गों पर सीधे प्रतिबंध। रूस के बैंकों, वित्तीय संस्थानों और युद्ध प्रयासों को वित्तपोषित करने वाली संस्थाओं पर पाबंदी। रूस द्वारा मौजूदा प्रतिबंधों से बचने और तेल निर्यात से कमाई जारी रखने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले पुराने और दूसरे देशों के झंडे वाले तेल टैंकरों पर प्रतिबंधों का विस्तार। इसके तहत ईरान के ऊर्जा और हथियार क्षेत्रों पर प्रतिबंधों को आगे बढ़ाया गया है। रूस की अर्थव्यवस्था और उसके सैन्य अभियान को मिलने वाली फंडिंग को रोकना। इसे भी पढ़ें: Iran के पास कभी नहीं होंगे Nuclear Weapons, बातचीत से गिरेंगे Oil Prices, जेडी वेंस का दावा भारत के सामने जल्द क्या चुनौती आ सकती है? यदि यह विधेयक पूरी तरह से कानून बनता है, तो राष्ट्रपति के पास शीर्ष 5 रूसी तेल खरीदारों से अमेरिका आने वाले सामानों पर 100% शुल्क लगाने की शक्ति होगी। भारत और चीन दुनिया में रूसी कच्चे तेल के सबसे बड़े खरीदारों में से हैं। इस कानून की संरचना ऐसे की गई है कि देशों को अमेरिका के साथ व्यापार बनाए रखने और रूस से सस्ता तेल खरीदने में से किसी एक को चुनना पड़े। डार्लीन ग्राहम (दिवंगत सीनेटर की बहन) ने कहा कि यह विधेयक रूस की अर्थव्यवस्था को संभाले रखने वाले प्रमुख देशों को एक सरल लेकिन महत्वपूर्ण विकल्प चुनने के लिए मजबूर करता है – अमेरिका के साथ व्यापार करने का विकल्प या रूस से सस्ता तेल खरीदने का विकल्प। भारत चर्चा में क्यों है? 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से भारत ने रियायती दरों पर रूसी कच्चा तेल खरीदना काफी बढ़ा दिया है। रूस पहले भारत के लिए तेल का कोई बड़ा सप्लायर नहीं था, लेकिन मॉस्को और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू होने और यूरोप द्वारा रूसी कच्चा तेल खरीदना बंद करने के बाद, यह भारत के लिए भारी छूट पर उपलब्ध हो गया। इस बदलाव से भारतीय रिफाइनरों को कच्चे तेल की लागत कम करने और ग्लोबल एनर्जी मार्केट में रुकावटों के बावजूद सप्लाई सुनिश्चित करने में मदद मिली है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से शिपिंग में रुकावटों के बीच रूसी तेल पर निर्भरता और भी महत्वपूर्ण हो गई है, क्योंकि इन रुकावटों ने मध्य पूर्व से ऊर्जा की सप्लाई को प्रभावित किया है। नई दिल्ली ने बार-बार कहा है कि उसकी ऊर्जा खरीद राष्ट्रीय हित, ऊर्जा सुरक्षा और किफायती व भरोसेमंद सप्लाई सुनिश्चित करने की ज़रूरत से तय होती है। भारत पहले से ही टैरिफ़ के दबाव का सामना कर रहा है यह प्रस्तावित कानून तब आया है जब वाशिंगटन पहले ही रूस से तेल खरीदने के लिए भारत पर अतिरिक्त शुल्क लगा चुका है। हालाँकि, पहले उठाए गए कदमों से भारतीय रिफाइनर रूस से कच्चा तेल खरीदने से तुरंत नहीं रुके। मध्य पूर्व में चल रहे संघर्ष से ऊर्जा बाज़ार प्रभावित हो रहे हैं और इस क्षेत्र से होने वाली सप्लाई को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है, ऐसे में भारतीय रिफाइनरों के लिए रूसी कच्चा तेल एक महत्वपूर्ण स्रोत बना हुआ है। एक रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, अकेले जून 2026 में भारत का रूसी तेल का आयात 34% बढ़ गया। अमेरिका ने 100% टैरिफ लगा दिया तो क्या होगा? अगर बड़े पैमाने पर 100% टैरिफ लगाया जाता है, तो अमेरिकी इंपोर्टर्स के लिए भारतीय सामान काफी महंगे हो जाएंगे। इसका असर खास तौर पर इंजीनियरिंग के सामान, फार्मास्यूटिकल्स, केमिकल्स, टेक्सटाइल्स और ऑटो पार्ट्स जैसे एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड सेक्टर पर पड़ सकता है। अगर भारतीय प्रोडक्ट्स काफी महंगे हो जाते हैं, तो अमेरिकी खरीदार दूसरे देशों में वैकल्पिक सप्लायर्स की तलाश कर सकते हैं। नतीजतन, भारतीय एक्सपोर्टर्स को कम डिमांड, कम मार्जिन या कॉम्पिटिटिव बने रहने के लिए अतिरिक्त लागत का कुछ हिस्सा खुद उठाने की ज़रूरत का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे टैरिफ का खतरा भारतीय कंपनियों को अपने एक्सपोर्ट मार्केट में विविधता लाने और पॉलिसी बनाने वालों पर वाशिंगटन के साथ बातचीत करने का दबाव बढ़ाने के लिए भी प्रेरित कर सकता है। कुछ अमेरिकी सांसद क्यों इसके विरोध में हैं? हालांकि बिल को सीनेट का भारी समर्थन मिला, लेकिन कुछ सांसदों ने ट्रंप को टैरिफ लगाने के लिए व्यापक अधिकार देने पर चिंता जताई है। आलोचकों का तर्क है कि टैरिफ से अमेरिकी कंज्यूमर्स और बिज़नेस के लिए लागत बढ़ सकती है, ऐसे समय में जब परिवारों को पहले से ही रहने-सहने के ऊंचे खर्चों का सामना करना पड़ रहा है। सीनेटर रॉन वाइडेन ने कहा कि अमेरिका में ऐसे लोग हैं जो आर्थिक रूप से बहुत मुश्किल हालात (आर्थिक तंगी) से गुज़र रहे हैं। रिपब्लिकन सीनेटर रैंड पॉल और वाइडेन द्वारा नए टैरिफ अधिकार को हटाने के लिए लाए गए एक संशोधन को सीनेट ने खारिज कर दिया। सीनेटर राफेल वार्नॉक, जिन्होंने टैरिफ प्रावधानों पर चिंता जताई थी, ने कहा कि उन्हें ट्रंप प्रशासन से सुरक्षा उपायों के बारे में लिखित आश्वासन मिला है। वार्नॉक ने कहा हमें पुतिन की आक्रामकता पर रोक लगाने और इस राष्ट्रपति के टैरिफ सिस्टम पर रोक लगाने के बीच चुनाव नहीं करना चाहिए। अगर ट्रंप अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल करते हैं, तो हम उन्हें कोर्ट में देखेंगे। विधेयक में ईरान को भी निशाना क्यों बनाया गया है? यह विधेयक ईरान सेंक्शन एक्ट ऑफ 1996 की अवधि को बढ़ाकर 2031 तक करने का प्रस्ताव रखता है। इसका मुख्य उद्देश्य ईरान के ऊर्जा क्षेत्र पर आर्थिक दबाव बनाए रखना है। यह विधेयक वॉशिंगटन (अमेरिका) के दो सबसे बड़े भू-राजनीतिक विरोधियों रूस और ईरान को एक साथ निशाना बनाता है। छूट किसे और कैसे मिल सकती है? विधेयक में कुछ शर्तों के तहत देशों को प्रतिबंधों या टैरिफ से छूट देने का प्रावधान है। जैसे यदि कोई देश रूस के कुल प्राकृतिक गैस निर्यात का 15% से कम आयात करता है और रूसी ऊर्जा पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए कदम उठा रहा है, तो वह छूट का पात्र हो सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति के पास यह अधिकार होगा कि यदि उन्हें लगता है कि ऐसा करना अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है, तो वे किसी भी देश पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों या शुल्कों को टाल या माफ कर सकते हैं। आगे क्या होगा? सेनेट से पारित होने के बाद यह विधेयक अब अमेरिकी संसद के निचले सदन 'हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स' में जाएगा। अगस्त के अंत में जब सांसद छुट्टियों से वापस लौटेंगे, तब इस पर विचार होने की संभावना है। इस बिल को कानून बनने और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के पास हस्ताक्षर के लिए भेजने से पहले निचले सदन द्वारा पास किया जाना अनिवार्य है। इसका मतलब है कि नया टैरिफ लागू होने से पहले अभी भी एक महत्वपूर्ण विधायी और राजनयिक प्रक्रिया बाकी है।
अगर भारत-पाक युद्ध हुआ तो क्या India के खिलाफ अपनी सेना उतारेंगे Turkey और Saudi Arabia?
नाटो के भीतर जब अमेरिका और उसके सहयोगियों के बीच भरोसे की दरारें गहरी हो रही हैं, ठीक उसी समय पश्चिम एशिया में एक नया शक्ति-केंद्र खड़ा करने की कोशिश शुरू हो गई है। मक्का में तुर्किये, सऊदी अरब और पाकिस्तान ने ऐसा रक्षा समझौता किया है, जिसकी सबसे अहम लाइन में साफ कहा गया है कि तीनों में से किसी एक पर हमला हुआ तो उसे तीनों पर हमला माना जाएगा। यही वह बिंदु है, जो इस समझौते को सामान्य सैन्य सहयोग से उठाकर एक संभावित नए क्षेत्रीय सुरक्षा गठबंधन में बदल देता है। हालांकि इसे अभी आधिकारिक तौर पर ‘सुन्नी नाटो’ कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन इसके भीतर उसकी बुनियादी तस्वीर जरूर दिखाई देने लगी है। देखा जाये तो मक्का में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन का एक मंच पर आना अपने आप में बड़ा संदेश है। खास बात यह है कि यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब पश्चिम एशिया पहले ही ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव की आग में झुलस रहा है। सऊदी अरब पर ईरान और उसके सहयोगी संगठनों के हमलों का खतरा है। पाकिस्तान अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है और तुर्किये पश्चिम एशिया में अपनी भूमिका लगातार बढ़ा रहा है। यानी तीनों देश एक-दूसरे की जरूरत बन गए हैं। इसे भी पढ़ें: Iran ने Saudi Arabia, पाकिस्तान और Turkey के रक्षा समझौते को बताया बेअसर क्यों हुआ त्रि-पक्षीय समझौता? वर्तमान हालात को देखें तो सऊदी को चाहिए सुरक्षा, पाकिस्तान को पैसा और तुर्किये को ताकत, इसलिए तीनों एक साथ आ गये हैं। हालांकि इस गठजोड़ को समझने के लिए तीनों देशों के हितों को अलग-अलग देखना होगा। सबसे पहले सऊदी अरब की बात करें तो उसके सामने सबसे बड़ा सवाल सुरक्षा का है। दशकों तक रियाद ने अमेरिकी सुरक्षा छाते पर भरोसा किया। लेकिन अब सऊदी नेतृत्व यह मानकर चल रहा है कि बदलती अमेरिकी नीति में किसी एक बाहरी शक्ति पर पूरी तरह निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। ईरान और उसके सहयोगियों की मिसाइल तथा ड्रोन क्षमता ने इस खतरे को और वास्तविक बना दिया है। ऐसे में सऊदी अरब ने अपना सुरक्षा कवच चौड़ा करना शुरू किया है। पाकिस्तान उसके लिए स्वाभाविक साझेदार है। पाकिस्तानी सेना दशकों से सऊदी सुरक्षा बलों को प्रशिक्षण देती रही है और हाल के महीनों में पाकिस्तान ने सऊदी अरब में सैनिकों, लड़ाकू विमानों, ड्रोन और वायु रक्षा प्रणालियों की मौजूदगी भी बढ़ाई है। वहीं पाकिस्तान की जरूरत बिल्कुल दूसरी है। आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान को सऊदी अरब से निवेश और आर्थिक मदद चाहिए, जबकि तुर्किये से रक्षा तकनीक और सैन्य सहयोग चाहिए। बदले में पाकिस्तान अपनी सेना और परमाणु क्षमता को मुस्लिम दुनिया की सुरक्षा में सबसे बड़ा सैन्य योगदान बताकर अपनी भू-राजनीतिक अहमियत बढ़ाना चाहता है। वहीं तुर्किये की बात करें तो एर्दोगन लंबे समय से अपने देश को सिर्फ नाटो का सदस्य नहीं, बल्कि मुस्लिम दुनिया की एक स्वतंत्र शक्ति के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। तुर्किये के पास अत्याधुनिक ड्रोन, रक्षा उद्योग और बड़ी सैन्य ताकत है। पाकिस्तान के साथ उसका रक्षा सहयोग पहले ही तेजी से बढ़ चुका है। यह गठबंधन किसके खिलाफ है? अब सवाल उठता है कि यह गठबंधन किसके खिलाफ है? इस सवाल का जवाब हालांकि तीनों देशों ने नहीं में दिया है। तुर्किये ने साफ कहा है कि समझौता रक्षात्मक है, यह किसी खास देश या संगठन को निशाना नहीं बनाता और दूसरे क्षेत्रीय देशों के लिए भी खुला है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सिर्फ दस्तावेज की भाषा नहीं देखी जाती, टाइमिंग भी देखी जाती है। और इस समझौते की टाइमिंग बहुत कुछ कहती है क्योंकि इस समय ईरान और सऊदी अरब के बीच तनाव चरम पर है। ईरान समर्थित हूती, इराकी मिलिशिया और अन्य समूहों की गतिविधियों ने खाड़ी देशों की सुरक्षा चिंता बढ़ाई है। दूसरी तरफ इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष ने पूरे क्षेत्र को बारूद के ढेर में बदल दिया है। इसलिए यह समझौता भले ही ईरान का नाम न ले, लेकिन ईरान के लिए इसका संदेश साफ है कि सऊदी अरब अब अकेला नहीं है। ईरान की बढ़ेंगी मुश्किलें वहीं इस समझौते के बाद ईरान के लिए नई चुनौती खड़ी हो गयी है। तेहरान अब तक पश्चिम एशिया में अपने प्रभाव का बड़ा हिस्सा सहयोगी और प्रॉक्सी संगठनों के नेटवर्क के जरिए कायम करता रहा है। लेकिन यदि सऊदी अरब को पाकिस्तान की सैन्य क्षमता और तुर्किये की रक्षा तकनीक का समर्थन मिलने लगे तो क्षेत्रीय समीकरण बदल सकते हैं। यही कारण है कि मक्का समझौते को ईरान के खिलाफ सीधा सैन्य गठबंधन नहीं होते हुए भी ईरान के लिए रणनीतिक चुनौती जरूर माना जा सकता है। इजराइल-अमेरिका को भी संदेश दिलचस्प बात यह है कि इस गठबंधन का एक और बड़ा संदेश इजरायल के लिए भी है। पश्चिम एशिया में जिस ‘सुन्नी धुरी’ की चर्चा लंबे समय से होती रही है, वह अब सिर्फ राजनीतिक अवधारणा नहीं रहना चाहती। साथ ही यह अमेरिका के लिए भी खतरे की घंटी है और यह समझौता वाशिंगटन के लिए भी सुखद खबर नहीं है। दरअसल सऊदी अरब और तुर्किये दोनों अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था के पुराने साझेदार हैं। लेकिन यदि यही देश अपनी सुरक्षा के लिए अलग क्षेत्रीय सैन्य ढांचा बनाने लगें तो इसका अर्थ साफ है कि अमेरिकी सुरक्षा छतरी पर भरोसा कम हो रहा है। यही इस समझौते का सबसे बड़ा दीर्घकालिक रणनीतिक अर्थ हो सकता है। सुन्नी नाटो सिर्फ कल्पना है या हकीकत? इसके अलावा, यदि मक्का मॉडल सफल होता है और उसमें दूसरे सुन्नी देश शामिल होते हैं, तो पश्चिम एशिया में अमेरिका के नेतृत्व वाली सुरक्षा व्यवस्था के समानांतर एक क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचा खड़ा हो सकता है। सवाल उठता है कि इसमें और कौन-से देश शामिल हो सकते हैं? इसके जवाब में कतर, मिस्र, संयुक्त अरब अमीरात और सीरिया जैसे देशों के नाम संभावित सदस्य के रूप में सामने आ रहे हैं। हालांकि यह भी एक तथ्य है कि यूएई की कई क्षेत्रीय मुद्दों पर सऊदी अरब और तुर्किये से अलग नीति रही है। साथ ही मिस्र भी किसी ऐसे सैन्य गठबंधन में फंसना नहीं चाहेगा जो उसे सीधे किसी क्षेत्रीय युद्ध में धकेल दे। वहीं सीरिया अपनी युद्धोत्तर परिस्थितियों से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा है। इसलिए ‘सुन्नी नाटो’ का विस्तार संभव जरूर है, लेकिन आसान नहीं है। त्रि-पक्षीय समझौते का भारत पर क्या होगा असर? अब सवाल यह है कि इस रक्षा समझौते का भारत पर क्या असर पड़ेगा और अगर भारत-पाकिस्तान के बीच फिर सैन्य टकराव हुआ तो क्या तुर्किये और सऊदी अरब पाकिस्तान के साथ खड़े होंगे और भारत के खिलाफ युद्ध लड़ेंगे? देखा जाये तो भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता पाकिस्तान की बढ़ती रणनीतिक क्षमता है। तुर्किये पहले से ही पाकिस्तान का करीबी सैन्य साझेदार है और कश्मीर से लेकर रक्षा सहयोग तक उसका रुख भारत के लिए चिंता का विषय रहा है। 2025 के भारत-पाकिस्तान सैन्य टकराव में भी अंकारा ने खुलकर पाकिस्तान का समर्थन किया था। ऐसे में भविष्य में पाकिस्तान को तुर्किये से ड्रोन, हथियार, तकनीक, खुफिया सहयोग और सैन्य सहायता का अधिक संगठित समर्थन मिल सकता है। हालांकि सऊदी अरब को तुर्किये के साथ एक ही नजर से देखना सही नहीं होगा क्योंकि रियाद के पाकिस्तान से गहरे रक्षा संबंध जरूर हैं, लेकिन भारत भी उसके लिए ऊर्जा, व्यापार, निवेश और रणनीतिक सहयोग का अहम साझेदार है। इसलिए भारत-पाकिस्तान संघर्ष की स्थिति में तुर्किये का पाकिस्तान के पक्ष में खुलकर खड़ा होना ज्यादा संभावित है, जबकि सऊदी अरब के लिए सीधे भारत के खिलाफ युद्ध में उतरना आसान नहीं होगा। वह पाकिस्तान को राजनीतिक, आर्थिक या सीमित सैन्य-लॉजिस्टिक मदद दे सकता है, लेकिन मक्का समझौते की मौजूदा सार्वजनिक भाषा से यह नहीं कहा जा सकता कि पाकिस्तान पर हमले की स्थिति में सऊदी और तुर्किये अपने आप भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ देंगे। यही वजह है कि भारत के लिए असली चिंता इस समझौते की ‘सामूहिक युद्ध’ वाली भाषा से ज्यादा पाकिस्तान को मिलने वाली संभावित अतिरिक्त सैन्य और रणनीतिक ताकत है। पाकिस्तान का विरोधाभास हालांकि इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान का सबसे बड़ा विरोधाभास भी सबके सामने आया है। जिस देश की अपनी सीमाओं पर लगातार तनाव है, जिसे अफगानिस्तान सीमा पर संघर्ष का सामना करना पड़ रहा है, जिसके बलूचिस्तान प्रांत ने आजादी का ऐलान कर दिया है, जिसके अवैध कब्जे वाले पीओके में विद्रोह और दमन तेज होता जा रहा है, वह देश अब मुस्लिम दुनिया की सामूहिक सुरक्षा का प्रहरी बनने की भूमिका तलाश रहा है। देखा जाये तो पाकिस्तान के आंतरिक संकटों के बीच यह समझौता उसके लिए अपनी अंतरराष्ट्रीय प्रासंगिकता दिखाने का अवसर भी बन गया है। कई सवालों के जवाब समय देगा वैसे मक्का समझौते की असली परीक्षा तब होगी जब तीनों में से किसी एक पर वास्तविक सैन्य हमला होगा। अगर सऊदी अरब पर हूती या किसी अन्य ईरान समर्थित समूह का बड़ा हमला होता है, तो क्या पाकिस्तान और तुर्किये युद्ध में उतरेंगे? अगर पाकिस्तान पर हमला होता है, तो क्या सऊदी अरब और तुर्किये सैनिक भेजेंगे? और अगर भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध होता है, तो क्या रियाद अपने भारत संबंधों को दांव पर लगाकर इस्लामाबाद के साथ खड़ा होगा? इन सवालों का जवाब अभी किसी के पास नहीं है। लेकिन एक बात साफ है कि मक्का में सिर्फ एक समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हुए हैं। पश्चिम एशिया में शक्ति के नए समीकरण की नींव रखी गई है। बहरहाल, नाटो की छतरी के नीचे मतभेद बढ़ रहे हैं और उसी समय मुस्लिम दुनिया के तीन देश अपनी सुरक्षा को एक-दूसरे से जोड़ रहे हैं। अभी इसे ‘सुन्नी नाटो’ कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन यदि इसमें दूसरे देश जुड़ते हैं, संयुक्त सैन्य अभ्यास बढ़ते हैं, खुफिया और हथियार सहयोग संस्थागत होता है और ‘एक पर हमला, सभी पर हमला’ सिर्फ कागज की लाइन न रहकर वास्तविक सैन्य नीति बन जाती है, तो आने वाले वर्षों में पश्चिम एशिया का नक्शा बदल सकता है। -नीरज कुमार दुबे
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पंजाब में 2027 का विधानसभा चुनाव बेहद दिलचस्प होने की संभावना है। राज्य में आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, भाजपा और शिरोमणि अकाली दल प्रमुख राजनीतिक ताकतों के रूप में चुनाव मैदान में उतर सकते हैं। यदि भाजपा और अकाली दल के बीच दोबारा गठबंधन होता है, तो इसका असर चुनावी गणित पर पड़ सकता है।
FCRA Bill पर हल्ला मचा रहे विपक्षी दलों और ईसाई संगठनों को मार्को रुबियो का बयान सुनना चाहिए
केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) संशोधन विधेयक को लेकर देश में तो इस समय व्यापक बहस छिड़ी ही हुई है, साथ ही इसकी गूंज अमेरिका तक सुनाई दे रही है। दिलचस्प बात यह है कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो पहले स्वयं यह कह चुके हैं कि किसी भी देश में विदेशी फंड से संचालित संस्थाओं को वहां की संप्रभु सरकार के समानांतर व्यवस्था नहीं चलानी चाहिए और उन्हें मेजबान देश के कानूनों का सम्मान करना चाहिए। इसके बावजूद अमेरिकी सांसद राइली मूर भारत के प्रस्तावित कानून की आलोचना कर रहे हैं। दूसरी ओर, मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात के बाद स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार ने उन्हें आश्वस्त किया है कि प्रस्तावित संशोधन को पूर्व प्रभाव (रेट्रोस्पेक्टिव) से लागू नहीं किया जाएगा। इन घटनाक्रमों के बीच मोदी सरकार का स्पष्ट संदेश है कि विदेशी धन प्राप्त करने वाले संगठनों के संचालन में पारदर्शिता, जवाबदेही और भारतीय कानूनों का पालन सर्वोच्च प्राथमिकता रहेगा। हम आपको बता दें कि केंद्र सरकार के आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में एफसीआरए के तहत पंजीकृत सक्रिय संगठनों की संख्या घटी है, लेकिन विदेशी चंदे का प्रवाह बना हुआ है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2024-25 में 16,200 संगठनों को लगभग 22,963 करोड़ रुपये का विदेशी योगदान प्राप्त हुआ। वहीं बड़ी संख्या में ऐसे संगठनों के एफसीआरए लाइसेंस निरस्त या समाप्त भी किए गए हैं। सरकार का कहना है कि केवल वैध पंजीकरण रखने वाले संगठनों को ही विदेशी धन प्राप्त करने और उसका उपयोग करने का अधिकार होना चाहिए। इसे भी पढ़ें: संसद में सत्ता-विपक्ष की टकरार! Kharge के दावे पर Kiren Rijiju का तीखा वार हम आपको बता दें कि सरकार द्वारा लाए गए संशोधन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यदि किसी संस्था का एफसीआरए पंजीकरण समाप्त हो जाता है, रद्द हो जाता है, नवीनीकृत नहीं होता या संस्था स्वयं उसे छोड़ देती है, तो विदेशी धन से निर्मित परिसंपत्तियों के प्रबंधन के लिए एक नामित प्राधिकरण की व्यवस्था की जाएगी। यदि बाद में संस्था का पंजीकरण बहाल हो जाता है तो संबंधित संपत्तियां और अप्रयुक्त विदेशी योगदान वापस कर दिए जाएंगे। यदि ऐसा नहीं होता, तो कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी। केंद्र सरकार का तर्क है कि यह व्यवस्था किसी नए अधिकार का सृजन नहीं, बल्कि पहले से मौजूद प्रावधानों को अधिक स्पष्ट और व्यवस्थित बनाने का प्रयास है। वहीं प्रस्तावित संशोधन को लेकर कुछ चर्च संगठनों ने आशंकाएं भी व्यक्त की हैं। उनका कहना है कि कानून की कुछ धाराएं अत्यधिक कठोर हैं और उन्हें संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजा जाना चाहिए। इसी उद्देश्य से विभिन्न चर्च संगठनों के प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की और अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं। वहीं मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने अमित शाह के साथ बैठक के बाद कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री ने स्पष्ट आश्वासन दिया है कि प्रस्तावित संशोधन को पूर्व प्रभाव से लागू नहीं किया जाएगा। हम आपको यह भी बता दें कि केंद्र सरकार ने इन आशंकाओं का विस्तार से जवाब भी दिया है। सरकार का कहना है कि प्रस्तावित कानून किसी विशेष धर्म, समुदाय या विचारधारा को निशाना नहीं बनाता। एफसीआरए के प्रावधान सभी विदेशी चंदा प्राप्त करने वाले संगठनों पर समान रूप से लागू होते हैं। केंद्र सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि किसी धार्मिक स्थल से जुड़ी संपत्ति का मामला आता है तो उसके धार्मिक स्वरूप को कानूनन सुरक्षित रखा जाएगा। साथ ही, नामित प्राधिकरण के आदेश अंतिम नहीं होंगे और उनके विरुद्ध न्यायालय में अपील का अधिकार भी उपलब्ध रहेगा। उधर, इस पूरे विवाद का अंतरराष्ट्रीय पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। अमेरिकी सांसद राइली मूर ने आरोप लगाया कि यह कानून चर्चों और ईसाई संस्थाओं के खिलाफ है। हालांकि स्वयं अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने पिछले वर्ष यह कहा था कि विदेशी सहायता कार्यक्रम मेजबान देशों की सरकारों के समानांतर नहीं चलने चाहिए और विदेशी वित्तपोषित संस्थाओं को संबंधित देश की नीतियों और कानूनों के अनुरूप काम करना चाहिए। यही कारण है कि भारत के संदर्भ में उठ रही आलोचना पर दोहरे मापदंड का प्रश्न भी सामने आया है। देखा जाये तो लोकतंत्र में किसी भी कानून पर बहस और समीक्षा का अधिकार सभी को है, लेकिन भारत की संप्रभुता और राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हैं। यदि कोई संगठन विदेशी चंदे के सहारे पूरी पारदर्शिता और भारतीय कानूनों का पालन करते हुए जनकल्याण का कार्य करता है, तो उसके लिए इस कानून से घबराने का कोई कारण नहीं होना चाहिए। इसके विपरीत, जिन संस्थाओं या तत्वों ने विदेशी धन का उपयोग नियमों से इतर गतिविधियों, अपारदर्शी वित्तीय लेन-देन या भारत में अस्थिरता और अशांति फैलाने के प्रयासों के लिए किया है, उनके लिए स्वाभाविक रूप से चिंता की स्थिति पैदा हो सकती है क्योंकि प्रस्तावित संशोधन निगरानी, जवाबदेही और कानूनी अनुपालन को और मजबूत करने का प्रयास करता है। मोदी सरकार का कहना है कि यह कानून किसी धर्म या समुदाय को लक्षित नहीं करता, बल्कि विदेशी अंशदान के नियमन और पारदर्शिता के लिए समान रूप से लागू होगा। ऐसे में यदि विदेशी फंडिंग के नाम पर नियमों की अनदेखी करने वालों की मुश्किलें बढ़ती हैं, तो इसे कानून के दायरे में जवाबदेही सुनिश्चित करने की प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए। बहरहाल, संसद में होने वाली चर्चा के बाद कानून का अंतिम स्वरूप तय होगा, लेकिन यह स्पष्ट है कि विदेशी धन के उपयोग पर प्रभावी निगरानी और राष्ट्रीय हितों की रक्षा किसी भी संप्रभु राष्ट्र की वैध जिम्मेदारी है। -नीरज कुमार दुबे
ड्रग्स-रोधी सहयोग को बढ़ावा देने के लिए एनसीबी ने की भारत-अमेरिका काउंटर नारकोटिक्स वर्किंग ग्रुप की बैठक
'ब्राह्मणों के नाम पर वोट चाहिए, सत्ता सिर्फ परिवार के लिए', ब्रजेश पाठक का सपा पर हमला
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मध्य प्रदेश में शुरू होगा 6 महीने का जन विश्वास अभियान, जनता के बीच जाएंगे मंत्री-अधिकारी
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राजेंद्र माथुर- विचारों की पत्रकारिता के नायक
राजेंद्र माथुर की पूरी जीवन यात्रा एक साधारण आम आदमी की कथा है। वे इतने साधारण हैं कि असाधारण लगने लगते हैं। उन्होंने जो कुछ पाया, एकाएक नहीं पाया; संघर्ष से पाया, नियमित लेखन से पाया और अपनी रचनाशीलता से पाया। इसी संघर्ष की वृत्ति ने उन्हें असाधारण पत्रकार और संपादक बना दिया। राजेंद्र माथुर का पत्रकारीय व्यक्तित्व इस बात से तय होता है कि आखिर उनके लेखन में विचारों की गहराई कितनी है। अपने अखबार को ऊंचाइयों पर ले जाने का उनका संकल्प कितना गहरा है और हमारे समय के प्रश्नों के जवाब तलाशने तथा नए सवाल खड़े करने की कितनी प्रश्नाकुलता संबंधित व्यक्ति में है। राजेंद्र माथुर का संपादकीय और पत्रकारीय व्यक्तित्व इस बात की गवाही देता है कि वे असहज प्रश्नों से मुंह नहीं चुराते, बल्कि उनसे दो-दो हाथ करते हैं। वे सवालों से जूझते हैं और उनके सही एवं प्रासंगिक उत्तर तलाशने की कोशिश करते हैं। वे सही मायने में पत्रकारिता में विचारों के एक ऐसे प्रतीक पुरुष बनकर सामने आए, जिन्होंने अपने लेखन के माध्यम से एक बौद्धिक उत्तेजना का सृजन किया और हिंदी को एक ऐसी भाषा तथा विराट अनुभव-संसार दिया, जिसकी प्रतीक्षा में वह सालो से खड़ी थी। इस मायने में राजेंद्र माथुर की उपस्थिति अपने समय में एक कद्दावर पत्रकार-संपादक की मौजूदगी है। वरिष्ठ पत्रकार श्री सूर्यकांत बाली के मुताबिक,“माथुर साहब जैसा बोलते थे, वैसा ही लिखते थे। वे धाराप्रवाह, विचार-परिपूर्ण और रूपक-अलंकृत बोलते थे, तो धाराप्रवाह, विचार-परिपूर्ण और रूपक-अलंकृत लिखते भी थे।” ऐसे में कहा जा सकता है कि राजेंद्र माथुर के पत्रकारीय एवं संपादकीय व्यक्तित्व में एक बौद्धिक आकर्षण दिखता है। उनके लेखन में भारत-जिज्ञासा, भारत-अनुराग और भारत-स्वप्न पूरी समग्रता में प्रकट होते हैं। वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने लिखा है कि “राजेंद्र माथुर में बौद्धिकता और सच्चरित्रता का असाधारण संगम था, इसीलिए वे हिंदी पत्रकारिता में शिखर स्थान पा सके। वे असाधारण शैलीकार थे। अंग्रेजी साहित्य के प्राध्यापक होने के बावजूद उनकी हिंदी लेखन शैली बिंब-प्रधान थी। उनके मुहावरे अपने होते थे। उनमें अभिव्यंजना की अद्भुत शक्ति थी। हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में वे एक शैलीकार के रूप में याद किए जाएंगे।” इसे भी पढ़ें: अब शिवाजी, चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह जैसे लोग क्यों नहीं मिलते? राजेंद्र माथुर एक श्रेष्ठ संपादक थे। उनकी उपस्थिति ही 'नईदुनिया' और 'नवभारत टाइम्स' को एक ऐसा समाचार पत्र बनाने में सफल हुई, जिस पर हिंदी पत्रकारिता को नाज है। 'नवभारत टाइम्स' में श्री माथुर के सहयोगी रहे श्री विष्णु खरे ने लिखा है कि, “राजेंद्र माथुर महान संपादक होने का अभिनय करने की कोई जरूरत महसूस नहीं करते थे। दरअसल, लिबास से लेकर बोलचाल तक उनकी कोई बनावटी शैली या लहजा नहीं था; वे अपने मामूलीकरण में विश्वास करते थे, वैशिष्ट्य में नहीं। उनकी संपादकीय आदेशों या हुक्मों से नहीं, एक गुणात्मक तथा नैतिक विकिरण से चलती” राजेंद्र माथुर का पत्रकारीय व्यक्तित्व बेहद प्रेरक था। आज की पत्रकारिता और मीडिया संस्थानों में घुस आई तमाम बुराइयों से उनका व्यक्तित्व एकदम अलग था। संपादक की जैसी शास्त्रीय परिभाषाएं बताई गई हैं, श्री माथुर उन पर पूरी तरह फिट बैठते हैं। उनके समकक्ष पत्रकारों की राय में, जिस समय वे दिल्ली में 'नवभारत टाइम्स' जैसे बड़े अखबार के संपादक थे, वे सत्ता के लाभ उठा सकते थे। आज की पत्रकारिता में जिस तरह पत्रकार एवं संपादक सत्ता से लाभ लेकर मंत्री से लेकर राज्यसभा की सीटें ले रहे हैं, श्री माथुर भी ऐसे प्रलोभनों के पास जा सकते थे। किंतु उन्होंने तमाम चर्चाओं के बीच इससे खुद को बचाया। पत्रकार विष्णु खरे अपने लेख में इस बात की पुष्टि भी करते हैं। सही मायने में राजेंद्र माथुर एक ऐसे संपादक के रूप में सामने आते हैं, जिन्होंने अपने पत्रकारीय व्यक्तित्व को वह ऊंचाई दी जिसके लिए पीढ़ियां उन्हें याद कर रही हैं। उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खूबी हिंदी पत्रकारिता को लेकर उनकी चिंताएं हैं। वे हिंदी पत्रकारिता के एक ऐसे संपादक थे, जो लगातार यह सोचते रहे कि हिंदी पत्रकारिता का विचार-दारिद्र्य कैसे दूर किया जाए और कैसे हिंदी में एक संपूर्ण अखबार निकले तथा उसे व्यापक लोकस्वीकृति भी मिल सके। 'नवभारत टाइम्स' के कार्यकारी संपादक रहे स्व. सुरेंद्र प्रताप सिंह ने उनकी इन चिंताओं को निकटता से देखा था। वे लिखते हैं, “माथुर साहब का गहन इतिहास-बोध, शुद्ध श्रद्धा और उससे उत्पन्न गरिमामय अतीत की मरीचिका पर आधारित हिंदी पत्रकारिता की कमजोर आधारभूमि के बारे में उन्हें बार-बार सचेत करता रहता था। वे भूतकाल के वायवीय स्वर्णिम अतीत में जीने वाले नहीं थे। वे स्वप्नदर्शी थे और अपने सपनों की उदात्तता के साथ उन्होंने कभी किसी प्रकार का समझौता नहीं किया। हिंदी पत्रकारिता का वर्तमान परिदृश्य उन्हें बार-बार विचलित तो कर देता था, लेकिन एक कुशल अभियात्री की तरह उन्होंने अपने जहाज की दिशा को क्षणिक प्रलोभनों के लिए किसी अन्य रास्ते पर डालने के बारे में क्षणिक विचार भी नहीं किया।” उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व की विशिष्टता यह भी है कि वे अंग्रेजी के प्राध्यापक और विद्वान होने के बावजूद अपने लेखन की भाषा के नाते हिंदी को चुनते हैं। हिंदी उनकी सांसों में बसती थी। हिंदी पत्रकारिता को नई जमीन तोड़ने के लिए प्रेरित करने और हिंदी लेखकों एवं पत्रकारों की एक पूरी पीढ़ी का निर्माण करने का काम श्री माथुर जीवन भर करते रहे। इंदौर से लेकर दिल्ली तक उनकी पूरी यात्रा में एक भारत-प्रेम, भारत-बोध और हिंदी-प्रेम साफ नजर आता है। शायद इसी के चलते वे देश की पत्रकारिता को एक नई और सही दिशा देने में सफल रहे। श्री मधुसूदन आनंद लिखते हैं, “माथुर साहब ने अंग्रेजी में एम.ए. किया था और अंग्रेजी भाषा पर उनकी पकड़ अंग्रेजी पत्रकारों को भी विस्मय में डालती थी। लेकिन उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को चुना, तो शायद इसलिए कि वे अपनी बात अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना चाहते थे। अगर यह कहा जाए कि हिंदी पत्रकारों की एक पीढ़ी माथुर साहब को पढ़कर पली और बढ़ी है, तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। उनके असामयिक निधन के बाद 'नवभारत टाइम्स' को देश के दूर-दूर के इलाकों से हजारों पत्र प्राप्त हुए थे। ये वे पाठक थे, जो उनके उत्कट राष्ट्र-प्रेम, समाज के प्रति उनके सरोकारों, इतिहास की अतल गहराइयों से अनमोल तथ्य ढूंढ कर लाने के उनके सामर्थ्य और शालीन भाषा में राजनेताओं की खिंचाई करने के उनके साहस पर मुग्ध थे।” उनके व्यक्तित्व की एक बड़ी विशेषता थी, जिसे उनके सहयोगी रहे सूर्यकांत बाली इन शब्दों में रेखांकित करते हैं,“हमारे प्रधान संपादक को कोई पांचवां काम आता है, इस पर तो मुझे पूरा शक है: बस सोचना, पढ़ना, बतियाना और लिखना, उनकी सारी दुनिया इन चार कामों में सिमट चुकी थी।” श्री माथुर के व्यक्तित्व पर यह एक मुकम्मल टिप्पणी है, जो बताती है कि वे किस तरह के पत्रकार-संपादक थे। उनका पत्रकारीय व्यक्तित्व इसीलिए एक अलग किस्म की आभा के साथ सामने आता है, जिसमें एक बौद्धिक तेज और आकर्षण निरंतर दिखता है। उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे एक ऐसे लेखक-संपादक के तौर पर सामने आते हैं, जो पूर्णकालिक पत्रकार थे। वे किसी साहित्य की परंपरा से आने वाले संपादक नहीं थे। अतः उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को साहित्यकार-संपादकों द्वारा दी गई भाषा और उसके मुहावरों से अलग एक अनूठी पत्रकारीय भाषा का अनुभव दिया। हिंदी को संवाद, संचार और सूचना की भाषा बनाने में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। सही मायने में वे एक ऐसे संपादक और लेखक के रूप में सामने आते हैं, जिन्होंने बहुत से अनछुए विषयों को हिंदी के अनुभव का विषय बनाया, जिन पर पहले अंग्रेजी के पत्रकारों का एकाधिकार माना जाता था। उन्होंने भावनाओं से ऊपर विचार और बौद्धिकता को महत्व दिया। इसके चलते हिंदी को एक नई भाषा, एक नया अनुभव और अभिव्यक्ति का एक नया संबल मिला। उनकी बौद्धिकता ने हिंदी पत्रकारिता को अंग्रेजी अखबारों के सामने सम्मान से खड़े होने लायक बनाया, जिससे हिंदी पत्रकारिता ने एक नया आत्मविश्वास और नई ऊर्जा हासिल की। आज हिंदी पत्रकारिता पर जिस तरह बाजारवादी ताकतों का दबाव गहरा रहा है, ऐसे समय में राजेंद्र माथुर के बहाने हिंदी पत्रकारिता की पड़ताल एक आवश्यक विमर्श बन गई है। शायद उनकी स्मृति के बहाने हम कुछ ऐसे रास्ते तलाश पाएं, जो हमें इस कठिन समय में अपने मूल्यों के साथ काम करने का हौसला दे सकें। - प्रो.संजय द्विवेदी (लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)
'Gen Z के लिए आप...' PM मोदी से अब क्या चाहते है दीपके ? NDA के सामने रख दी ये बड़ी डिमांड
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असम के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा ने छात्रों से की अपील, कहा- डिग्री के साथ स्किल भी जरूरी, तभी मिलेंगे रोजगार के मौके
‘अगर हम सड़कों पर उतर आए तो दिल्ली ठप हो जाएगी,' बीसी आरक्षण बिल पर बोलीं के. कविता
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भाजपा नेता ने मौलाना रशीदी की मानसिकता पर उठाए सवाल, भागवत की जेन-जी से बातचीत की सराहना की
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तमिलनाडु: सीएम विजय ने 8 अगस्त को परिसीमन पर सांसदों की बुलाई बैठक
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पंजाब में ऋण चुकाने की लागत कुल राजस्व के 23 प्रतिशत से अधिक: मनीष तिवारी
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'कर्मों का फल भुगतना पड़ता है', अतीक अहमद के बेटे की मौत पर बोले भाजपा विधायक
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रांची : जेपीएससी-जेएसएससी आंदोलन 13वें दिन भी जारी, 13 साल के छात्र जैद ने पेपर लीक और रद्द होने पर जताई पीड़ा
'भाखड़ा बांध पूरी तरह सुरक्षित है', पंजाब के मंत्री ने विधानसभा को बताया
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1 लाख से अधिक गैर-मराठी चालकों ने व्यावहारिक मराठी सीखी: मंत्री प्रताप सरनाइक
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राज्यसभामेंनीरजडांगीकोबड़ीजिम्मेदारी, राजस्थानकांग्रेसकीराजनीतिमेंबढ़ाकदसंगठनमेंबदलेसमीकरण
नईदिल्ली/जयपुर. कांग्रेसनेतृत्वनेराज्यसभासांसदनीरजडांगीकोराज्यसभामेंपार्टीकासचेतक (व्हिप) नियुक्तकरनकेवलसंसदमेंउन्हेंमहत्वपूर्णजिम्मेदारीसौंपीहै, बल्किइसफैसलेकोराजस्थानकांग्रेसकीराजनीतिकेलिहाजसेभीएकबड़ेसंदेशकेरूपमेंदेखाजारहाहै. कांग्रेससंसदीयदलकीअध्यक्षसोनियागांधीकेनिर्देशपरजारीइसनियुक्तिनेयहसंकेतदियाहैकिपार्टीकाशीर्षनेतृत्वनीरजडांगीपरलगातारभरोसाजतारहाहै. राजनीतिकविश्लेषकोंकामाननाहैकियहफैसलाराजस्थानकांग्रेसमेंडांगीकीसंगठनात्मकऔरराजनीतिकभूमिकाकोऔरमजबूतकरेगा. राज्यसभामेंव्हिपकेरूपमेंनीरजडांगीअबपार्टीसांसदोंकेबीचसमन्वयस्थापितकरने, सदनमेंउनकीउपस्थितिसुनिश्चितकरने, महत्वपूर्णविधेयकोंपरपार्टीलाइनकेअनुरूपमतदानकरानेऔरसंसदीयरणनीतिकोप्रभावीढंगसेलागूकरानेकीजिम्मेदारीनिभाएंगे. संसदमेंयहपदसंगठनात्मकदृष्टिसेअत्यंतमहत्वपूर्णमानाजाताहैऔरआमतौरपरयहजिम्मेदारीउन्हींनेताओंकोदीजातीहै, जिनपरपार्टीनेतृत्वकोपूर्णविश्वासहोताहै. डांगीकीनियुक्तिऐसेसमयहुईहैजबकांग्रेसआगामीविधानसभाचुनावोंकीतैयारियोंकेसाथसंगठनकोमजबूतकरनेकीरणनीतिपरकामकररहीहै. ऐसेमेंराजस्थानसेजुड़ेएकनेताकोसंसदमेंअहमजिम्मेदारीमिलनाप्रदेशकीराजनीतिमेंभीविशेषमहत्वरखताहै. इसेकांग्रेसहाईकमानद्वाराराजस्थानइकाईकोदियागयाएकसकारात्मकराजनीतिकसंकेतमानाजारहाहै. राजनीतिकविश्लेषकोंकाकहनाहैकिनीरजडांगीलंबेसमयसेपूर्वमुख्यमंत्रीअशोकगहलोतकेविश्वस्तसहयोगीमानेजातेहैं. हालांकिउनकीनईजिम्मेदारीकोकेवलकिसीएकगुटसेजोड़करदेखनाउचितनहींहोगा. इसेकांग्रेसनेतृत्वद्वारासंगठनात्मकअनुभवऔरसंसदीयक्षमताकेआधारपरकियागयानिर्णयमानाजारहाहै. इससेयहसंकेतभीमिलताहैकिपार्टीराजस्थानकेअनुभवीनेताओंकोराष्ट्रीयस्तरपरअधिकजिम्मेदारियांदेनेकीनीतिपरआगेबढ़रहीहै. डांगीकीनियुक्तिकाअसरराजस्थानकांग्रेसकेभीतरउनकेराजनीतिकप्रभावकोबढ़ानेवालामानाजारहाहै. संगठनात्मकबैठकों, उम्मीदवारचयनऔरसंसदीयमामलोंमेंउनकीरायपहलेकीतुलनामेंअधिकमहत्वपूर्णहोसकतीहै. साथहीकार्यकर्ताओंकेबीचभीउनकाराजनीतिककदमजबूतहोनेकीसंभावनाजताईजारहीहै. हालांकिइससेप्रदेशकांग्रेसकेअंदरकिसीतत्कालराजनीतिकबदलावयाशक्तिसंतुलनमेंपरिवर्तनकानिष्कर्षनिकालनाअभीजल्दबाजीहोगी. नीरजडांगीकाराजनीतिकसफरसंघर्षऔरसंगठनात्मकसक्रियतासेजुड़ारहाहै. वर्ष 2004 से 2009 तकउन्होंनेराजस्थानयुवाकांग्रेसकेप्रदेशअध्यक्षकेरूपमेंसंगठनकोमजबूतकिया. विधानसभाचुनावोंमेंहारकेबावजूदउन्होंनेपार्टीनहींछोड़ीऔरलगातारसंगठनकेलिएकार्यकरतेरहे. इसीनिष्ठाऔरअनुभवकेआधारपरकांग्रेसनेउन्हेंवर्ष 2020 मेंपहलीबारराज्यसभाभेजाऔरवर्ष 2026 मेंलगातारदूसरीबारराज्यसभासदस्यबनाया. अबव्हिपकीजिम्मेदारीदेकरपार्टीनेउनकेप्रतिअपनाविश्वासऔरमजबूतकरदियाहै. राजनीतिकजानकारोंकामाननाहैकिसंसदमेंसक्रियभूमिकानिभानेवालेनेताओंकोभविष्यमेंसंगठनऔरसरकारसेजुड़ेबड़ेदायित्वभीमिलसकतेहैं. हालांकियहभविष्यकीराजनीतिकपरिस्थितियोंऔरपार्टीकेनिर्णयोंपरनिर्भरकरेगा. फिलहालइतनास्पष्टहैकिराज्यसभामेंव्हिपबनाएजानेकेबादनीरजडांगीकाराष्ट्रीयस्तरपरराजनीतिकमहत्वबढ़ाहैऔरराजस्थानकांग्रेसमेंभीउनकीभूमिकापहलेसेअधिकप्रभावशालीमानीजाएगी. कांग्रेसकीयहनियुक्तिकेवलसंसदीयव्यवस्थातकसीमितनहींमानीजारही, बल्किइसेराजस्थानमेंपार्टीसंगठनकोमजबूतकरनेऔरअनुभवीनेतृत्वकोराष्ट्रीयस्तरपरआगेलानेकीरणनीतिकाहिस्साभीमानाजारहाहै. आनेवालेसमयमेंयहदेखनामहत्वपूर्णहोगाकिसंसदऔरसंगठनदोनोंस्तरोंपरनीरजडांगीइसनईजिम्मेदारीकाकिसतरहनिर्वहनकरतेहैंऔरइसकाराजस्थानकांग्रेसकीराजनीतिपरकितनाव्यापकप्रभावपड़ताहै.
सीएम सुवेंदु अधिकारी ने कोलकाता में 27 अवैध इमारतों के मामले में लाइव पूछताछ की चेतावनी दी
सीएम सुवेंदु अधिकारी ने कोलकाता में 27 अवैध इमारतों के मामले में लाइव पूछताछ की चेतावनी दी
बिहार सरकार ने एमएसएमई के लिए अलग निदेशालय बनाया, पहली बार छोटे उद्योगों की चिंता : श्याम सुंदर भीमसरिया
तमिलनाडु: उदयनिधि ने सीएम विजय को कावेरी विवाद पर विपक्ष के सवालों का जवाब देने की चुनौती दी
तमिलनाडु: उदयनिधि ने सीएम विजय को कावेरी विवाद पर विपक्ष के सवालों का जवाब देने की चुनौती दी
सरकार हर मुद्दे पर चर्चा को तैयार, विपक्ष सिर्फ बयानबाजी कर रहा: भाजपा सांसद नरेश बंसल
सरकार हर मुद्दे पर चर्चा को तैयार, विपक्ष सिर्फ बयानबाजी कर रहा: भाजपा सांसद नरेश बंसल
एफसीआरए संशोधन बिल 2014 में ही लाना चाहिए था : पूर्व राज्यपाल तथागत रॉय
एफसीआरए संशोधन बिल 2014 में ही लाना चाहिए था : पूर्व राज्यपाल तथागत रॉय
सीबीआई की कार्रवाई, 2021 बंगाल चुनाव के बाद हिंसा में हुई हत्या के मामले में घोषित अपराधी गिरफ्तार
सीबीआई की कार्रवाई, 2021 बंगाल चुनाव के बाद हिंसा में हुई हत्या के मामले में घोषित अपराधी गिरफ्तार
सदन का वॉकआउट करके कांग्रेस खुद को पहुंचा रही नुकसान, सरकार चर्चा के लिए तैयार : किरेन रिजिजू
सदन का वॉकआउट करके कांग्रेस खुद को पहुंचा रही नुकसान, सरकार चर्चा के लिए तैयार : किरेन रिजिजू
वाईएसआरसीपी सांसदों ने केंद्र सरकार से वाईएस जगन की सुरक्षा पर दखल देने की मांग की
वाईएसआरसीपी सांसदों ने केंद्र सरकार से वाईएस जगन की सुरक्षा पर दखल देने की मांग की
पश्चिम बंगाल में मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने पर सियासत, इमाम बोले- बनाया जा रहा दबाव
पश्चिम बंगाल में मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने पर सियासत, इमाम बोले- बनाया जा रहा दबाव
बिहार में राहुल गांधी और अन्य विपक्षी सांसदों के खिलाफ अदालत में शिकायत दर्ज
बिहार में राहुल गांधी और अन्य विपक्षी सांसदों के खिलाफ अदालत में शिकायत दर्ज
दिल्ली विधानसभा स्पीकर ने मानसून सत्र से पहले सुरक्षा व्यवस्था का लिया जायजा
दिल्ली विधानसभा स्पीकर ने मानसून सत्र से पहले सुरक्षा व्यवस्था का लिया जायजा
राजस्थान के मुख्यमंत्री विधानसभा सत्र से पहले दिल्ली पहुंचे, गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की
राजस्थान के मुख्यमंत्री विधानसभा सत्र से पहले दिल्ली पहुंचे, गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की
प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री की अनुपस्थिति से सदन का संचालन बाधित हो रहा : कांग्रेस
प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री की अनुपस्थिति से सदन का संचालन बाधित हो रहा : कांग्रेस
नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश में भूस्खलन: राहुल गांधी, प्रियंका-खड़गे ने घायलों के जल्द स्वस्थ होने की कामना की
तमिलनाडु ने धान किसानों की सुरक्षा के लिए 34.72 करोड़ रुपए की बीज सब्सिडी शुरू की
तमिलनाडु ने धान किसानों की सुरक्षा के लिए 34.72 करोड़ रुपए की बीज सब्सिडी शुरू की
बृजभूषण शरण सिंह के समर्थन में उमड़ी भीड़ जनता के विश्वास का प्रतीक: प्रतीक भूषण सिंह
बृजभूषण शरण सिंह के समर्थन में उमड़ी भीड़ जनता के विश्वास का प्रतीक: प्रतीक भूषण सिंह
लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे पर दरारें: परियोजना निदेशक बर्खास्त, निर्माण एजेंसी को कारण बताओ नोटिस जारी
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केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू की राहुल गांधी से बात, परिसीमन विधेयक के लिए मांगा समर्थन
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अमरावती, 6 अगस्त (आईएएनएस)। जनसेना के राज्यसभा सांसद लिंगमनेनी रमेश ने आंध्र प्रदेश में दो नए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) स्तर के संस्थानों की स्थापना की मांग की है। उन्होंने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को पत्र लिखकर राज्य में तृतीयक स्वास्थ्य सेवाओं के ढांचे को मजबूत करने के लिए हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया।
इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल में भारत का प्रदर्शन उम्मीद से कहीं बेहतर रहा। भारत ने 13 स्वर्ण, 17 रजत और 9 कांस्य सहित कुल 39 पदक जीते। वह पदक तालिका में चौथे नंबर पर रहा। पहली नजर में यह प्रदर्शन बर्मिंघम 2022 के 61 पदक से कमजोर दिख सकता है, लेकिन आंकड़े अलग कहानी बताते हैं। इस बार ग्लासगो में सिर्फ 10 खेल शामिल थे, जबकि बर्मिंघम में 19 खेल खेले गए थे। बैडमिंटन, कुश्ती, शूटिंग, हॉकी, टेबल टेनिस और क्रिकेट जैसे खेल ग्लासगो गेम्स का हिस्सा नहीं थे, जिनसे 2022 में भारत को 30 पदक मिले थे। इसके अलावा भारत ने 210 खिलाड़ियों की जगह सिर्फ 123 खिलाड़ियों का दल भेजा। इनमें से 38 खिलाड़ी पदक जीतकर लौटे, यानी सफलता की दर 31 प्रतिशत रही। बर्मिंघम में यह आंकड़ा 29 प्रतिशत था। ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल शुरू होने से पहले भारतीय ओलंपिक संघ और विभिन्न खेल महासंघों की आंतरिक रिपोर्ट में भारत को 6 स्वर्ण समेत 31 पदक मिलने का अनुमान लगाया गया था। भारतीय खिलाड़ियों ने अनुमान से दोगुना से भी ज्यादा स्वर्ण जीते। कुल पदक में भी आगे निकल गए। ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल में भारत का सबसे सफल खेल बॉक्सिंग रहा। 14 मुक्केबाजों के दल में से 10 खिलाड़ी पदक जीतकर लौटे। इसमें 7 स्वर्ण और 3 रजत शामिल रहे। यानी 71 प्रतिशत मेडल कन्वर्जन रेट। बर्मिंघम 2022 में यह आंकड़ा 58 प्रतिशत था। पदक वितरण समारोह के दौरान सात बार भारत का राष्ट्रगान बजना न सिर्फ ग्लासगो में मौजूद भारतीय दर्शकों के लिए गर्व का पल था, बल्कि इस बात का सबूत भी था कि इस गैर-पारंपरिक खेल को गांवों और छोटे कस्बों तक ले जाने की पहल काफी हद तक सफल रही है। भारतीय बॉक्सरों के प्रदर्शन की जितनी भी प्रशंसा की जाए वो कम है। इसे भी पढ़ें: राष्ट्रमंडल खेल 2026: चुनौतियों के बीच चमका भारत जूडो में भारत ने पहली बार राष्ट्रमंडल खेल इतिहास में स्वर्ण जीता। अस्मिता डे और हर्ष सिंह ने स्वर्ण जीता। यामिनी मौर्य ने रजत और उन्नति शर्मा ने कांस्य जीतकर कुल चार पदक भारत की झोली में डाले। हालांकि 14 सदस्यीय भारतीय टीम के दो खिलाड़ी अरुण कुमार और तुलिका मान डोपिंग के कारण बाहर हो गए। इसी तरह, एथलीटों और पैरा-एथलीटों ने 16 पदक जीते। इनमें से कुछ ने तो नए राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी बनाए। वेटलिफ्टर्स ने आठ और पदक जीते। इन पदकों में ओलंपियन मीराबाई चानू का जीता हुआ एक स्वर्ण पदक भी शामिल था, जिससे उन्होंने स्वर्ण पदकों की हैट्रिक पूरी की; मणिपुर की इस एथलीट ने इससे पहले 2018 गोल्ड कोस्ट और 2022 बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेल में भी स्वर्ण पदक जीता था। असल में, मीराबाई चानू की शानदार कामयाबी के बावजूद, भारतीय वेटलिफ्टरों का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा। इस निराशा की एक वजह यह है कि डोपिंग के आरोपों के कारण कम से कम दो भारतीय वेटलिफ्टरों की एंट्री वापस लेनी पड़ी। छह अन्य खिलाड़ी—कड़ी टक्कर न होने के बावजूद—लड़ने के जज़्बे की कमी या तकनीकी गलतियों की वजह से स्वर्ण पदक जीतने का मौका चूक गए। एथलेटिक्स ने भारत को 10 पदक दिलाए, लेकिन एक भी स्वर्ण नहीं आया। नीरज चोपड़ा रजत जीत सके। उनके साथ डेब्यू कर रहे यशवीर सिंह ने कांस्य जीता। गुलवीर सिंह ने 10 हजार मीटर में सिल्वर और 5 हजार मीटर रेस में कांस्य जीतकर इतिहास रचा। गुलवीर एक ही कॉमनवेल्थ गेम्स में एथलेटिक्स में दो पदक जीतने वाले वह भारत के पहले खिलाड़ी भी बनें। तेजस्विन शंकर ने डेकाथलन में भारत का पहला राष्ट्रमंडल पदक दिलाया। सरवेश कुशारे, श्रीशंकर, प्रवीण चित्रावेल और सीमा कालीरामना भी पदक जीतने में सफल रहे। हालांकि स्प्रिंट और रिले टीम से बड़ी उम्मीदें थीं, वह खाली हाथ रही। इसमें कोई दो राय नहीं है कि मोदी सरकार के 12 वर्षों के शासन में देश में खेलों का संस्थागत विकास तेजी से हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बार यह दोहराया है कि खेल देश में एकता बढ़ाने, युवाओं को प्रेरित करने और भारत को एक आत्मविश्वासी और उभरती हुई वैश्विक ताकत के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। उनकी यह सोच कार्यों में भी दिखाई देती है, जैसे कि ‘खेलो इंडिया’और ‘टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम यानी टॉप्स’ जैसे प्रमुख कार्यक्रमों के माध्यम से। इन पहलों ने देश में खेलों की पूरी व्यवस्था को नया रूप दिया है और भारत को खेलकूद के प्रति समर्पित एक राष्ट्र बना दिया है। इन योजनाओं के कारण भारतीय खिलाड़ियों को बेहतर वित्तीय सहायता, आधुनिक प्रशिक्षण और अंतरराष्ट्रीय स्तर का एक्सपोजर मिला है, जिसके परिणामस्वरूप ओलंपिक, पैरालंपिक, कॉमनवेल्थ और एशियाई खेलों में भारत का प्रदर्शन लगातार सुधरा है। नई प्रतिभाओं को पदक जीतने वाले खिलाड़ी में बदलने में 'खेलो इंडिया' कार्यक्रम की अहम भूमिका रही है। इस कार्यक्रम के तहत अब तक 2781 से अधिक खिलाड़ियों को प्रशिक्षण, उपकरण, चिकित्सा देखभाल और वित्तीय सहायता दी गई है। सरकार ने खेलो इंडिया योजना पर 36,441 करोड़ रुपये का भारी निवेश मंजूर किया है। वर्ष 2026-31 के लिए संशोधित खेलो इंडिया योजना को मंजूरी दी है। राष्ट्रीय खेल महासंघों को मजबूत बनाने के लिए बड़े पैमाने पर वित्तीय सहायता दी जा रही है। देश के दूर-दराज और ग्रामीण इलाकों से भी उभरती प्रतिभाओं को खोजा जा रहा है। स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण और मार्गदर्शन की सुविधाएं देने के लिए देशभर में 1041 खेलो इंडिया केंद्र स्थापित किए गए हैं। इसके साथ ही, 32 खेलो इंडिया सेंटर ऑफ एक्सीलेंस और 301 खेल अकादमियों को मान्यता दी गई है, जिससे खेलों का पूरा इकोसिस्टम और मजबूत हुआ है। खेलो इंडिया सीओई में खिलाड़ियों को विशेषज्ञ कोचिंग, पोषण और उच्चस्तरीय प्रशिक्षण की सुविधा दी जा रही है। मोदी सरकार की इन पहलों का जमीन पर जबरदस्त असर भी दिख रहा है। 2022 एशियाई खेलों में भारत के 42 पदकों में से 124 पदक विजेता 'खेलो इंडिया' से प्रशिक्षित खिलाड़ी थे। वहीं पेरिस 2024 ओलंपिक में खेलो इंडिया के 28 खिलाड़ियों ने देश का प्रतिनिधित्व किया था। 'खेलो इंडिया' के खिलाड़ियों ने अब तक करीब 6000 राष्ट्रीय रिकॉर्ड और 1400 अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाए हैं, जो भारत के जमीनी स्तर के खेलकूद के कार्यक्रमों की प्रगति को दर्शाता है। कोच और खेल विशेषज्ञ मानते हैं कि कॉन्टिनेंटल या ग्लोबल इवेंट्स में प्रतियोगिता का स्तर कहीं ज्यादा होता है। ऐसे में किसी एथलीट या खिलाड़ी की काबिलियत और कड़ी मेहनत की असली परीक्षा एशियन गेम्स या ओलंपिक्स में होती है। हालांकि कॉमनवेल्थ गेम्स में जीते गए मेडल का महत्व कम नहीं आंका जाना चाहिए। इस बार युवा खिलाड़ियों ने दिखाया है कि भारत का खेल भविष्य पहले से कहीं ज्यादा उज्ज्वल दिख रहा है, कई खेलों में नई पीढ़ी के टैलेंटेड एथलीट सुर्खियां बटोर रहे हैं। राष्ट्रमंडल खेल जैसी प्रतियोगिता में किए गए प्रदर्शन को आम तौर पर भविष्य में सुधार के पैमाने और अपनी खूबियों व कमियों के आकलन के तौर पर देखा जाता है। राष्ट्रमंडल खेल के बाद अब भारतीय खिलाड़ियों की नजर एशियन गेम्स में दमदार प्रदर्शन करने पर है। 20 वें एशियाई खेल का आगाज 19 सितंबर से जापान के नागोया में होग। भारत इस बार हांग्जो 2022 के अपने ऐतिहासिक 107 पदकों के रिकॉर्ड को तोड़ने के इरादे से मैदान में उतरेगा। इसीलिए भारतीय खिलाड़ियों को राष्ट्रमंडल खेल में अपने प्रदर्शन पर गर्व करते हुए एशियन गेम्स में पेश आने वाली चुनौतियों के हिसाब से बिना एक भी पल गवाएं तैयारियां शुरू कर देनी चाहिए। क्योंकि जब विदेशी धरती पर तिरंगा लहराता है और जन-गण-मन गूंजता है, तो वह पल केवल एक खिलाड़ी की जीत नहीं, बल्कि पूरे देश का गौरव बन जाता है। - डॉ. आशीष वशिष्ठ (स्वतंत्र पत्रकार) लखनऊ, उत्तर प्रदेश (भारत)
अमित शाह से मिले TMC के बागी मुस्लिम सांसद, मस्जिद में अजान को लेकर उठाया बड़ा मुद्दा, जाने क्या है पूरा मामला
भारत को क्लीन एनर्जी टेक्नोलॉजी का ग्लोबल प्रोड्यूसर बनना चाहिए: एचडी कुमारस्वामी
नई दिल्ली, 6 अगस्त (आईएएनएस)। केंद्रीय इस्पात और भारी उद्योग मंत्री एचडी कुमारस्वामी ने गुरुवार को कहा कि भारत को क्लीन एनर्जी टेक्नोलॉजी का ग्लोबल प्रोड्यूसर बनना चाहिए। ऐसा इसलिए है, क्योंकि तेजी से बदलती दुनिया में किसी देश की ताकत सिर्फ एनर्जी रिसोर्स तक पहुंच से तय नहीं होती, बल्कि भविष्य को चलाने वाली टेक्नोलॉजी के लिए मैन्युफैक्चरिंग, इनोवेशन और मजबूत सप्लाई चेन बनाने की उसकी क्षमता से तय होती है।
कैबिनेट ने एनएच-15 के गुवाहाटी-तेजपुर कॉरिडोर को मंजूरी दी: प्रधानमंत्री मोदी
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'चुनाव आयोग ने शक्तियों का उल्लंघन कर फैसला दिया', सुप्रीम कोर्ट में 'शिवसेना विवाद' पर सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल की दलील
जेनजी के साथ आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का संवाद स्वागतयोग्य: संजय निरुपम
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सीबीआई ने गुवाहाटी से आरोपी अरूप दास को किया गिरफ्तार, अभिजीत सरकार हत्याकांड में था फरार
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एआईएसए प्रमुख नेहा 7 अगस्त से शुरू होने वाले 'जेनजी राइजिंग' अभियान का नेतृत्व करेंगी
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पंजाब: विधानसभा में अवैध खनन के मुद्दे पर हंगामा, हाउस कमेटी बनाने की मांग
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बीटीसी प्रमुख मोहिलारी ने बाढ़ प्रभावित शिवसागर में राहत अभियान का नेतृत्व किया, सहायता सामग्री भी बांटी
कैबिनेट ने असम में 8,970 करोड़ रुपए की गुवाहाटी-तेजपुर 4-लेन हाईवे परियोजना को दी मंजूरी
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राज्यसभा में राघव चड्ढा ने उठाया डॉक्टरों-डायग्नोस्टिक सेंटरों के 'कट मनी' का मुद्दा, कहा- मरीजों पर पड़ता है बोझ
महिलाओं का सम्मान हमारे संस्कार, शब्द से ठेस पहुंची तो खेद है: अश्वनी शर्मा
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अपहरण मामले में आंध्र प्रदेश की अदालत ने वाईएसआरसीपी नेता मुस्तफा को न्यायिक हिरासत में भेजा
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'वेट्री वानमगल' योजना: तमिलनाडु सरकार महिला किसानों को देगी ड्रोन चलाने का प्रशिक्षण
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कर्नाटक : कैबिनेट विस्तार को लेकर मंत्री यतींद्र ने अपने पिता सिद्धारमैया का किया बचाव
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सीएम विजय ने टीवीके सरकार के पहले बजटों को बताया समावेशी विकास का रोडमैप
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