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CM थलापति विजय का बड़ा बयान: 'सारे सबूत मेरे पास हैं...', आखिर किसे दी खुलासे की धमकी?

CM थलापति विजय का बड़ा बयान: 'सारे सबूत मेरे पास हैं...', आखिर किसे दी खुलासे की धमकी?

समाचार नामा 20 Aug 2026 10:35 am

उपराष्ट्रपति ने मावीरन ओंडिवीरन के बलिदान दिवस और राजीव गांधी की जयंती पर दी श्रद्धांजलि

उपराष्ट्रपति ने मावीरन ओंडिवीरन के बलिदान दिवस और राजीव गांधी की जयंती पर दी श्रद्धांजलि

समाचार नामा 20 Aug 2026 10:25 am

चेन्नई पहुंचे अमित शाह, आज करेंगे परिषद बैठक की अध्यक्षता

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह बुधवार रात चेन्नई पहुंचे, जहां वह गुरुवार को चेन्नई के निकट कोवलम में आयोजित होने वाली दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद (सदर्न जोनल काउंसिल) की 31वीं बैठक की अध्यक्षता करेंगे

देशबन्धु 20 Aug 2026 7:40 am

राजस्थान नगर निकाय चुनाव घोषित, 9 और 11 को मतदान

राजस्थान में नगर निकाय चुनावों का इंतजार खत्म हो गया है। राज्य निर्वाचन आयोग ने बुधवार को राज्य में होने वाले नगर निकाय चुनावों की घोषणा कर दी। चुनाव दो चरणों में 9 और 11 सितंबर को कराए जाएं

देशबन्धु 20 Aug 2026 7:20 am

लोकसभा सीटें अगले 25 साल तक स्थिर- कांग्रेस ने परिसीमन पर रखा स्पष्ट रुख

कांग्रेस ने परिसीमन को लेकर स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा है कि लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों की संख्या अगले 25 वर्षों तक नहीं बढ़ाई जानी चाहिए और इन्हीं सीटों में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण दिया जाना चाहिए

देशबन्धु 19 Aug 2026 10:30 pm

महाराष्ट्र में धर्मांतरण विरोधी कानून पर सपा और कांग्रेस ने जताई आपत्ति

महाराष्ट्र में धर्मांतरण विरोधी कानून पर सपा और कांग्रेस ने जताई आपत्ति

समाचार नामा 19 Aug 2026 10:20 pm

कलकत्ता हाई कोर्ट ने जनगणना में शिक्षकों की ड्यूटी पर फैसला सुरक्षित रखा

कलकत्ता हाई कोर्ट ने जनगणना में शिक्षकों की ड्यूटी पर फैसला सुरक्षित रखा

समाचार नामा 19 Aug 2026 7:12 pm

अखिलेश यादव के वार पर जयंत चौधरी का संयमित पलटवार, पश्चिमी यूपी की राजनीति में नया उबाल

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी का नाम लिए बिना ऐसा तंज कसा है जिसकी गूंज सीधे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सियासी मैदान तक पहुंच गई। अखिलेश ने कहा, “कहां-कहां से आ गए थे, चवन्नी का रुपया बना दिया, फिर भी…”। दरअसल अखिलेश ने अपने इस बयान के जरिये पुराने साथी को राजनीति में आगे बढ़ाने का दावा किया और फिर साथी द्वारा उन्हें छोड़ देने पर अपनी शिकायत दर्ज कराई लेकिन इस दौरान उनके जो तेवर रहे उसने पश्चिमी यूपी की सियासत को गर्मा दिया है। रालोद कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आये हैं और अखिलेश यादव के पुतले फूंक रहे हैं। यही नहीं, रालोद प्रमुख जयंत चौधरी ने भी अखिलेश पर पलटवार करते हुए दर्शा दिया है कि एक्शन का रिएक्शन तत्काल होगा। हालांकि अखिलेश के तंज पर जयंत चौधरी ने पलटवार तल्खी की बजाय बेहद नपे-तुले अंदाज में किया। उन्होंने कहा, “वो अपनी बात कहें तो अच्छा है। उनके साथ खड़े होने वाले हर सहयोगी… इस तरह की बयानबाजी से सोचने को मजबूर हो रहे हैं।” जयंत ने आगे कहा, “लोकतंत्र है, यहां जनता सबको बनाती है और सबको बिगाड़ती है।” जब उनसे पूछा गया कि अखिलेश उन्हें इतना क्यों याद कर रहे हैं, तो उन्होंने गेंद वापस अखिलेश के पाले में डालते हुए कहा, “ये तो आप लोग उनसे जाकर पूछिए।” दरअसल, यह सिर्फ दो नेताओं की निजी राजनीतिक नोकझोंक नहीं है। इसके पीछे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बदलते जातीय और गठबंधन समीकरण की पूरी पटकथा पढ़ी जा सकती है। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा और रालोद ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। इस गठबंधन में जाट-मुस्लिम समीकरण को साधने की कोशिश साफ दिखाई दी थी। अखिलेश यादव ने जयंत चौधरी को राज्यसभा भेजने में भी भूमिका निभाई। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले पूर्व प्रधानमंत्री और जयंत के दादा चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न मिलने के बाद रालोद ने एनडीए का दामन थाम लिया। अब जयंत भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा हैं और केंद्र सरकार में राज्यमंत्री हैं। यही बदलाव अखिलेश के मौजूदा हमले को राजनीतिक धार देता है। सपा प्रमुख लगातार पीडीए यानि पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के सामाजिक समीकरण को मजबूत करने की कोशिश में हैं। पश्चिमी यूपी में उनकी चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि यहां सपा का पारंपरिक मुस्लिम-यादव आधार पूर्वांचल या मध्य यूपी की तरह निर्णायक नहीं रहा है। ऐसे में गुर्जर, दलित, अन्य पिछड़ी जातियों और गैर-जाट मतदाताओं को जोड़ना सपा की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। जयंत चौधरी का रालोद इस गणित में छोटी पार्टी जरूर है, लेकिन पश्चिमी यूपी में उसका प्रभाव उसके चुनावी आंकड़ों से कहीं ज्यादा राजनीतिक वजन रखता है। जाट समुदाय में चौधरी चरण सिंह की विरासत और रालोद की पकड़ अब भी गठबंधन राजनीति के लिए अहम है। भाजपा के साथ जयंत की मौजूदगी एनडीए को पश्चिमी यूपी में जाट समर्थन को साधने का अतिरिक्त आधार देती है। यही कारण है कि अखिलेश का “चवन्नी” वाला तंज महज पुरानी दोस्ती का हिसाब नहीं, बल्कि नए सामाजिक समीकरणों की जंग भी माना जा रहा है। दिलचस्प यह है कि अखिलेश ने हाल में अपने नेताओं-कार्यकर्ताओं को चुनावी समय में सोच-समझकर बयान देने की नसीहत दी थी, ताकि भाजपा को कोई राजनीतिक लाभ न मिले। इसके तुरंत बाद जयंत पर निशाना साधना बताता है कि सियासी प्राथमिकताएं कभी-कभी रणनीतिक संयम पर भारी पड़ जाती हैं। उधर, जयंत ने तीखा पलटवार करने की बजाय संयम चुना। शायद इसलिए कि वह अखिलेश के बनाए जाट बनाम गैर-जाट नैरेटिव में फंसना नहीं चाहते। उनकी सौम्य प्रतिक्रिया का संदेश भी उतना ही राजनीतिक है। इसका अर्थ यह है कि रालोद अब सपा के साथ नहीं बल्कि एनडीए के साथ ही अपना भविष्य देख रहा है। बहरहाल, “चवन्नी” और “रुपया” की यह लड़ाई असल में पश्चिमी यूपी की उस सियासी तिजोरी की लड़ाई है, जिसकी चाबी जाट, मुस्लिम, दलित, गुर्जर और अन्य पिछड़े मतदाताओं के हाथ में है। देखा जाये तो चुनावी राजनीति में सवाल यह नहीं कि किसने किसे रुपया बनाया; असली सवाल यह है कि जनता की नजर में अब कौन कितने का है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 19 Aug 2026 6:23 pm

झारखंड में नियुक्ति घोटाले की सीबीआई जांच हो, 'बड़ी मछ्ली' को बचाने की कोशिश: दीपक प्रकाश

झारखंड में नियुक्ति घोटाले की सीबीआई जांच हो, 'बड़ी मछ्ली' को बचाने की कोशिश: दीपक प्रकाश

समाचार नामा 19 Aug 2026 5:19 pm

नवीन पटनायक ने एमएमडीआर संशोधन बिल का किया विरोध, कहा-ओडिशा की वित्तीय स्वायत्तता को होगा नुकसान

नवीन पटनायक ने एमएमडीआर संशोधन बिल का किया विरोध, कहा-ओडिशा की वित्तीय स्वायत्तता को होगा नुकसान

समाचार नामा 19 Aug 2026 5:12 pm

कोलकाता के होटल में आग लगने से 9 की मौत, भाजपा नेता ने फायर सेफ्टी पर उठाए सवाल

कोलकाता के होटल में आग लगने से 9 की मौत, भाजपा नेता ने फायर सेफ्टी पर उठाए सवाल

समाचार नामा 19 Aug 2026 5:11 pm

राजस्थान: कांग्रेस के 'पंचायत टास्क फोर्स' का गठन, युवाओं को 50 प्रतिशत प्रतिनिधित्व देने की तैयारी

राजस्थान: कांग्रेस के 'पंचायत टास्क फोर्स' का गठन, युवाओं को 50 प्रतिशत प्रतिनिधित्व देने की तैयारी

समाचार नामा 19 Aug 2026 5:08 pm

'बाबा जी, मेरी जवानी के सपने मत देखो’... बाबा रामदेव पर क्यों भड़की कंगना रनौत ? अब एक्ट्रेस ने दिया तीखा जवाब

'बाबा जी, मेरी जवानी के सपने मत देखो’... बाबा रामदेव पर क्यों भड़की कंगना रनौत ?अब एक्ट्रेस ने दिया तीखा जवाब

समाचार नामा 19 Aug 2026 4:35 pm

ईडी को मिली होगी ठोस जानकारी, तभी हुई आज़म खान के ठिकानों पर कार्रवाई: मौलाना शहाबुद्दीन

ईडी को मिली होगी ठोस जानकारी, तभी हुई आज़म खान के ठिकानों पर कार्रवाई: मौलाना शहाबुद्दीन

समाचार नामा 19 Aug 2026 3:28 pm

सिविल ड्रेस में किन लोगों ने छात्रों पर हमला किया था, इसकी जांच होनी चाहिए : रोहित पवार

सिविल ड्रेस में किन लोगों ने छात्रों पर हमला किया था, इसकी जांच होनी चाहिए : रोहित पवार

समाचार नामा 19 Aug 2026 2:17 pm

जेप्टो का ग्राहकों को झटका: फ्री डिलीवरी के लिए बढ़ाई न्यूनतम ऑर्डर राशि, अब ₹199 से ₹299 का करना होगा ऑर्डर

क्विक-कॉमर्स कंपनी जेप्टो ने फ्री डिलीवरी पाने के लिए न्यूनतम ऑर्डर मूल्य (मिनिमम ऑर्डर वैल्यू) बढ़ा दिया है। कंपनी ने सामान्य समय में इसे 149 रुपए से बढ़ाकर 199 रुपए कर दिया है, जबकि अधिक मांग (पीक डिमांड) के दौरान यह सीमा 299 रुपए तक पहुंच रही है। इस बदलाव के साथ जेप्टो की फ्री डिलीवरी नीति अब प्रतिस्पर्धी कंपनियों ब्लिंकिट और इंस्टामार्ट के समान स्तर पर आ गई है।

देशबन्धु 19 Aug 2026 2:07 pm

सपा सांसद अवधेश प्रसाद का दावा, यूपी विधानसभा चुनाव 2027 में 50 सीटें भी नहीं जीत पाएगी भाजपा

सपा सांसद अवधेश प्रसाद का दावा, यूपी विधानसभा चुनाव 2027 में 50 सीटें भी नहीं जीत पाएगी भाजपा

समाचार नामा 19 Aug 2026 2:01 pm

भाजपा ने कहा था- 'ना खाएंगे, ना खाने देंगे', लेकिन भ्रष्टाचार पर कोई एक्शन नहीं लिया गया : रोहित पवार

भाजपा ने कहा था- 'ना खाएंगे, ना खाने देंगे', लेकिन भ्रष्टाचार पर कोई एक्शन नहीं लिया गया : रोहित पवार

समाचार नामा 19 Aug 2026 1:55 pm

सत्येंद्र जैन की गिरफ्तारी पंजाब चुनाव से पहले बीजेपी की साजिश, शाह ने दबाव डाला: केजरीवाल

आम आदमी पार्टी ने एंटी-करप्शन ब्रांच द्वारा सत्येंद्र जैन की गिरफ्तारी को पंजाब चुनावों से ठीक पहले पार्टी को कमजोर करने की बीजेपी की साजिश करार दिया है। इधर, केजरीवाल ने कहा है 'अमित शाह जी बतायें कि उन्होंने जाँच एजेंसी पर दबाव डालकर सत्येन्द्र जैन को क्यों गिरफ़्तार करवाया'।

सत्य हिंदी 19 Aug 2026 1:37 pm

वैश्विक दवाब से सोने-चांदी के दाम गिरे, सिल्वर करीब 2 प्रतिशत फिसला

मुंबई, वैश्विक बाजारों से मिले कमजोर संकेतों के बीच बुधवार को घरेलू सर्राफा और वायदा बाजार में सोने-चांदी की कीमतों में तेज गिरावट दर्ज की गई। बढ़ते अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और वैश्विक स्तर पर सुरक्षित निवेश की बदलती धारणा के कारण कीमती धातुओं पर दबाव बना हुआ है, जिसका असर मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर भी साफ दिखाई दिया, जहां सोना 1.54 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम से नीचे फिसल गया, जबकि चांदी 2.30 लाख रुपए प्रति किलोग्राम के स्तर से नीचे आ गई।

देशबन्धु 19 Aug 2026 1:30 pm

सोनिया गांधी क्यों नहीं बनीं प्रधानमंत्री? अब खुद बताएंगी पूरी कहानी, किताब में अपनों को खोने से लेकर राजनीति तक के किस्से

सोनिया गांधी क्यों नहीं बनीं प्रधानमंत्री? अब खुद बताएंगी पूरी कहानी, किताब में अपनों को खोने से लेकर राजनीति तक के किस्से

समाचार नामा 19 Aug 2026 12:30 pm

तेजस्वी के मार्च को लेकर एनडीए के नेताओं ने कहा- 'करियर बचाओ मार्च'

तेजस्वी के मार्च को लेकर एनडीए के नेताओं ने कहा- 'करियर बचाओ मार्च'

समाचार नामा 19 Aug 2026 12:23 pm

पीएम केयर्स फंड में 8,452 करोड़ रुपये का बैलेंस, खर्च को लेकर कांग्रेस ने सरकार से पूछा सवाल

पीएम केयर्स फंड की ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार 31 मार्च 2025 तक 8,452.07 करोड़ रुपये का बैलेंस था। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने फंड के सीमित इस्तेमाल और पारदर्शिता पर सवाल उठाए।

देशबन्धु 19 Aug 2026 10:06 am

कावेरी विवाद पर राष्ट्रपति से गुहार - तमिलनाडु किसान संगठन 4 सितंबर को दिल्ली में

नेशनल साउथ इंडियन रिवर्स इंटरलिंकिंग फार्मर्स एसोसिएशन के राज्य अध्यक्ष पी. अय्याकन्नू ने मंगलवार को कहा कि संगठन ने अगले महीने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से मिलने का अनुरोध किया है

देशबन्धु 19 Aug 2026 7:40 am

CJP संसद मार्च पर जांच- सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज की अगुवाई में आज बनेगी कमेटी

सुप्रीम कोर्ट ने आज संसद मार्च के दौरान पुलिस की कार्रवाई की जांच के लिए एक हाई-पावर कमेटी बनाने का फैसला किया है

देशबन्धु 19 Aug 2026 7:08 am

जंतर मंतर पुलिस बर्बरताः राहुल का रिजिजू को जवाब- दिमाग से खाली लोग... अपनी ग़लती नहीं दिखती

जंतर मंतर पर पुलिस बर्बरता की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी बनाएगी। लेकिन केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू दिल्ली पुलिस की तारीफें कर रहे हैं। इस पर राहुल गांधी ने कहा कि देश के बच्चों से झूठ मत बोलिए। उनके पास आँखें हैं और याददाश्त भी।

सत्य हिंदी 18 Aug 2026 1:07 pm

निफ्टी कंपनियों के मुनाफे की औसत वृद्धि दर 18 प्रतिशत पर रही

मुंबई, निफ्टी में शामिल कंपनियों के मुनाफे की औसत वृद्धि दर वित्त वर्ष 27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में सालाना आधार पर 18 प्रतिशत रही है।

देशबन्धु 18 Aug 2026 12:59 pm

सोने और चांदी की कीमतों में तेजी

मुंबई, सोने और चांदी की कीमतों में सोमवार के सत्र में तेजी देखी गई। इससे दोनों कीमती धातुओं का दाम करीब 1,800 रुपए बढ़ गया है।

देशबन्धु 18 Aug 2026 12:54 pm

Gyanesh Kumar की तारीफ कर Donald Trump ने भारत में विपक्षी दलों की 'बेचैनी' और बढ़ा दी है

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत की चुनाव व्यवस्था और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की तारीफ कर भारतीय राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। ट्रंप ने भारत में मतदाता पहचान की अनिवार्यता और विशाल स्तर पर चुनाव कराने की क्षमता का हवाला देते हुए अमेरिका में कड़े मतदाता पहचान नियम लागू करने की अपनी मुहिम को फिर हवा दी है। लेकिन इस बयान का असर केवल अमेरिका तक सीमित रहने वाला नहीं है। भारत में यह बयान चुनाव आयोग पर विपक्ष के आरोपों और सत्ता पक्ष की राजनीतिक रणनीति के बीच पहले से चल रही जंग को और तेज कर सकता है। हम आपको बता दें कि ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच ट्रूथ सोशल पर कहा कि ज्ञानेश कुमार ने अमेरिकी प्रशासन से पूछा था कि वैध फोटो पहचान पत्र के बिना अमेरिका में चुनाव कैसे हो सकते हैं? उन्होंने भारत के पिछले आम चुनाव में करीब 64 करोड़ 60 लाख मतदाताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि डाक से मतदान करने वालों की संख्या एक प्रतिशत से भी कम रही और मतदाताओं के लिए वैध फोटो पहचान पत्र जरूरी था। इसके साथ ही उन्होंने अमेरिका में मतदाता पहचान और नागरिकता से जुड़े कड़े नियम लागू करने वाले 'सेव अमेरिका अधिनियम' को पारित करने की मांग दोहराई। इसे भी पढ़ें: Donald Trump ने की भारतीय चुनाव प्रणाली की तारीफ़, भारत की तर्ज पर अमेरिका में भी लागू हो 'SAVE अमेरिका एक्ट' ट्रंप का तर्क है कि मतदाता की पहचान और नागरिकता की कड़ी जांच चुनाव की विश्वसनीयता बढ़ा सकती है। हम आपको बता दें कि इस प्रस्तावित कानून में संघीय चुनावों के लिए पंजीकरण के समय नागरिकता का दस्तावेज, मतदान केंद्र पर फोटो पहचान और डाक से मतदान पर कड़े प्रतिबंध जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। अमेरिका में इस अधिनियम के विरोधियों का तर्क है कि गैर नागरिकों द्वारा चुनावी धोखाधड़ी बहुत दुर्लभ है और कठोर दस्तावेजी नियम उन पात्र मतदाताओं के लिए मुश्किल पैदा कर सकते हैं जिनके पास पासपोर्ट या जन्म प्रमाण पत्र आसानी से उपलब्ध नहीं है। इस बीच, भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने ट्रंप के बयान का समर्थन करते हुए कहा है कि भारत के पिछले चुनाव में 64.6 करोड़ मतदाताओं के लिए पहचान पत्र की अनिवार्यता इस बात का मजबूत उदाहरण है कि अमेरिका को भी सेव अमेरिका अधिनियम लागू करना चाहिए। दूसरी ओर, ट्रंप के बयान के बाद भारत में राजनीति गरमा गयी है। सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी ट्रंप के बयान को विपक्ष के चुनाव संबंधी आरोपों के खिलाफ मजबूत राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है। सत्ता पक्ष का यह भी तर्क है कि दुनिया का एक प्रमुख नेता भारत की विशाल चुनावी व्यवस्था और मतदाता पहचान प्रणाली को उदाहरण के रूप में देख रहा है। वहीं ट्रंप के बयान के बाद विपक्ष के मतदाता सूची में गड़बड़ी, बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित किए जाने और वोट चोरी जैसे आरोपों को हवा निकलती नजर आ रही है। ट्रंप की ओर से ज्ञानेश कुमार की प्रशंसा भारत में विपक्षी दलों को इसलिए भी नहीं पच रही क्योंकि वह संसद में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने के अलावा उनके खिलाफ तमाम राजनीतिक आरोपों से लेकर निजी आक्षेप तक लगा चुके हैं। बदले हालात में विपक्ष यह तर्क दे रहा है कि किसी विदेशी नेता की प्रशंसा से भारत के भीतर चुनाव आयोग को लेकर उठे सवाल खत्म नहीं होते। विपक्ष विशेष गहन पुनरीक्षण यानि एसआईआर की कवायद और मतदाता सूचियों में कथित विसंगतियों को लेकर अपने आरोपों पर भी कायम है। उधर, ज्ञानेश कुमार की सार्वजनिक छवि अब दो बिल्कुल विपरीत खेमों में बंटी दिखाई दे रही है। सत्ता समर्थक और तटस्थ वर्ग उन्हें ऐसी चुनावी व्यवस्था के संचालक के रूप में देख रहा है जिसकी विशालता और तकनीकी क्षमता दुनिया के लिए उदाहरण है। वहीं आलोचक अब भी कह रहे हैं कि अंतरराष्ट्रीय प्रशंसा घरेलू विवादों को मिटा नहीं सकती। वैसे भारतीय चुनाव आयोग पर हमलावर रहने वाले विपक्षी दलों को यह समझना होगा कि अपनी हार के कारणों पर मंथन करने की बजाय भारतीय चुनाव आयोग पर ही सारा ठीकरा फोड़ देने से उन्हें सफलता नहीं मिलेगी। भारतीय निर्वाचन आयोग की पूरी दुनिया में साख है जोकि विपक्ष के राजनीतिक आरोपों से खराब नहीं होगी। भारत की चुनावी ताकत का वैश्विक पहलू बेहद महत्वपूर्ण है। भारतीय चुनाव आयोग के अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण और लोकतांत्रिक प्रबंधन कार्यक्रमों के जरिए सौ से अधिक देशों के चुनाव अधिकारियों को मतदाता पंजीकरण, मतदान केंद्र प्रबंधन, महिला भागीदारी और सुरक्षित तकनीक के प्रशिक्षण का लाभ मिला है। भारतीय चुनाव आयुक्तों ने अतीत में कंबोडिया, यूगोस्लाविया, नामीबिया तथा अन्य तमाम देशों में चुनावी व्यवस्थाओं में भी सहायता की है। यही नहीं, भारत की इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों और फोटो पहचान आधारित व्यवस्था को भी कई विकासशील देशों ने उपयोगी माना है। साथ ही संयुक्त राष्ट्र की ओर से अक्सर विभिन्न देशों में चुनाव के दौरान भारतीय निर्वाचन आयोग के अधिकारियों को पर्यवेक्षक बनाकर भेजा जाता है जोकि गौरव की बात है। बहरहाल, एक ओर दुनिया भारत के चुनाव मॉडल को लोकतंत्र की ताकत मान रही है, दूसरी ओर देश के भीतर उसी व्यवस्था पर सबसे तीखा सियासी हमला जारी है। आने वाले समय में असली लड़ाई केवल मतदाता पहचान की नहीं होगी, बल्कि इस सवाल की होगी कि चुनाव आयोग पर जनता का भरोसा किसके तर्क से बनेगा और किसके आरोप से टूटेगा। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 18 Aug 2026 11:51 am

भाजपा ने तीन राज्यों के प्रभारियों का किया ऐलान, सतीश पूनिया को पंजाब तो विनोद तावड़े को यूपी की कमान

भाजपा ने उत्तर प्रदेश, पंजाब और गुजरात के लिए नए प्रदेश प्रभारियों का ऐलान किया है। विनोद तावड़े को यूपी, सतीश पूनिया को पंजाब और तरुण चुघ को गुजरात की जिम्मेदारी मिली।

देशबन्धु 18 Aug 2026 11:47 am

‘दिमाग़ी नक्सल’ के शोर में असली सवाल गुम क्यों? शिक्षा सुधार की जगह बदनामी की राजनीति क्यों

Dimaagi Naxal PM Modi:‘दिमाग़ी नक्सल’ के नए राजनीतिक शब्द के बीच असली सवाल शिक्षा और युवाओं के भविष्य का है। वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष का सवाल है कि क्या बदनामी की राजनीति से छात्र आंदोलन का जवाब दिया जा सकता है?

सत्य हिंदी 18 Aug 2026 5:56 am

जेएसएससी‑सीजीएल रद्द - 2000 से ज्यादा अभ्यर्थियों की नौकरी पर संकट

झारखंड सरकार द्वारा जेएसएससी-सीजीएल परीक्षा रद्द किए जाने के फैसले के बाद इस परीक्षा के जरिए चयनित होकर विभिन्न पदों पर कार्यरत अभ्यर्थियों में नाराजगी फैल गई

देशबन्धु 17 Aug 2026 10:41 pm

आबकारी केस: हाई कोर्ट ने केजरीवाल-सिसोदिया को सीबीआई की याचिका पर जवाब देने के लिए दिया और समय

आबकारी केस: हाई कोर्ट ने केजरीवाल-सिसोदिया को सीबीआई की याचिका पर जवाब देने के लिए दिया और समय

समाचार नामा 17 Aug 2026 10:26 pm

छात्र आंदोलन की जीत - जेएसएससी‑सीजीएल परीक्षा रद्द, सरकार झुकी

झारखंड में 24 दिनों से चल रहे छात्र आंदोलन के बीच हेमंत सोरेन सरकार ने आंदोलनकारियों की सबसे बड़ी मांग मानते हुए वर्ष 2024 में आयोजित जेएसएससी-सीजीएल परीक्षा को रद्द करने का फैसला किया है

देशबन्धु 17 Aug 2026 10:22 pm

दिल्ली भाजपा ने नितिन नवीन की तिरंगे के साथ फर्जी तस्वीर को लेकर पुलिस में दर्ज कराई शिकायत

दिल्ली भाजपा ने नितिन नवीन की तिरंगे के साथ फर्जी तस्वीर को लेकर पुलिस में दर्ज कराई शिकायत

समाचार नामा 17 Aug 2026 8:38 pm

उत्तर प्रदेश की सत्ता में इंडिया गठबंधन के लिए 27 साल तक कोई वैकेंसी नहीं : मुख्तार अब्बास नकवी

उत्तर प्रदेश की सत्ता में इंडिया गठबंधन के लिए 27 साल तक कोई वैकेंसी नहीं : मुख्तार अब्बास नकवी

समाचार नामा 17 Aug 2026 8:33 pm

बिप्लब देब बने भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव, पूर्वोत्तर के दो अन्य नेताओं को भी मिली अहम जिम्मेदारी

बिप्लब देब बने भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव, पूर्वोत्तर के दो अन्य नेताओं को भी मिली अहम जिम्मेदारी

समाचार नामा 17 Aug 2026 8:28 pm

तृणमूल छात्र विंग स्थापना दिवस पर रैली करने की अनुमति के लिए कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंची

तृणमूल छात्र विंग स्थापना दिवस पर रैली करने की अनुमति के लिए कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंची

समाचार नामा 17 Aug 2026 8:27 pm

कर्नाटक: रिजर्व फॉरेस्‍ट में शिकारियों के 'एनकाउंटर' मामले पर भाजपा ने प्रदेश सरकार से जांच की मांग की

कर्नाटक: रिजर्व फॉरेस्ट में शिकारियों के 'एनकाउंटर' मामले पर भाजपा ने प्रदेश सरकार से जांच की मांग की

समाचार नामा 17 Aug 2026 8:16 pm

डॉ. हेमांग जोशी बने भाजपा युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष, गुजरात के तीन नेताओं को राष्ट्रीय टीम में मिली अहम जिम्मेदारी

डॉ. हेमांग जोशी बने भाजपा युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष, गुजरात के तीन नेताओं को राष्ट्रीय टीम में मिली अहम जिम्मेदारी

समाचार नामा 17 Aug 2026 6:08 pm

भाजपा राष्ट्रीय पदाधिकारियों की नई सूची ने जो सियासी संकेत दिया है वह सबके समझ में आने वाली बात नहीं है

नितिन नबीन की बहुप्रतीक्षित टीम का आज आखिरकार ऐलान हो ही गया। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने संगठन में लंबे समय से चल रही कवायद को अंजाम देते हुए अपनी नई राष्ट्रीय टीम सामने रख दी है। इस टीम में अनुभव, क्षेत्रीय संतुलन, सामाजिक समीकरण और चुनावी जरूरतों का ऐसा मिश्रण तैयार किया गया है, जिसमें पार्टी के पुराने दिग्गजों से लेकर नए चेहरों तक को जिम्मेदारी दी गई है। लेकिन इस पूरी कवायद में दो फैसले राजनीतिक चर्चा के केंद्र में हैं। एक तो अमित मालवीय को आईटी सेल प्रमुख की जिम्मेदारी से बाहर का रास्ता दिखाया गया है, जबकि पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की राष्ट्रीय महासचिव के तौर पर भाजपा के शीर्ष संगठन में वापसी हुई है। हम आपको बता दें कि आईटी और सोशल मीडिया सेल की कमान अब छत्तीसगढ़ के दीपक म्हास्के को दी गई है। वहीं अनिल बलूनी मीडिया प्रभारी की अपनी जिम्मेदारी पर कायम हैं। यानी भाजपा ने डिजिटल मोर्चे पर चेहरे में बदलाव किया है, लेकिन मीडिया प्रबंधन के मौजूदा ढांचे में निरंतरता बनाए रखी है। इस बदलाव को केवल संगठनात्मक फेरबदल मानना मुश्किल है। यह संकेत है कि नितिन नबीन डिजिटल और राजनीतिक नैरेटिव की लड़ाई में नई रणनीति और नए चेहरों के साथ उतरना चाहते हैं। साथ ही चूंकि नितिन नबीन छत्तीसगढ़ में पार्टी के प्रभारी रह चुके हैं ऐसे में वह जानते हैं कि उस राज्य के किस नेता की कार्यक्षमता का उपयोग कहां पर करना पार्टी के लिए ज्यादा फायदेमंद रहेगा। इसे भी पढ़ें: PM Modi का नई BJP टीम पर पूरा भरोसा, बोले- संगठन और जनसेवा पर दें ध्यान इसके अलावा, स्मृति ईरानी की वापसी इस टीम का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश है। उन्हें उत्तर प्रदेश का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है। आक्रामक राजनीतिक शैली, संसदीय अनुभव और विपक्ष के खिलाफ मुखर राजनीतिक लड़ाई के लिए पहचाने जाने वाली स्मृति ईरानी को संगठन के शीर्ष स्तर पर लाना बताता है कि भाजपा उत्तर प्रदेश जैसे निर्णायक राज्य में राजनीतिक सक्रियता को और धार देना चाहती है। राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है। उनके साथ तीरथ सिंह रावत, राम माधव, बैजयंत पांडा, डी. पुरंदेश्वरी, रेखा वर्मा, वर्षाबेन नरेंद्रभाई दोशी, डॉ. भारती प्रवीण पवार, मनप्रीत सिंह बादल, लाल सिंह आर्य, एम. नागराजा, प्रो. तारिक मंसूर और डॉ. मधुचंद्र कर को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली है। छह महिला उपाध्यक्षों की मौजूदगी से महिला प्रतिनिधित्व का संदेश भी स्पष्ट है। इसके अलावा, राष्ट्रीय महासचिवों की टीम में विनोद तावड़े, सुनील बंसल, बिप्लब कुमार देब, स्मृति ईरानी, डॉ. सतीश पूनिया, गजेंद्र पटेल, हरीश द्विवेदी और संजय भाटिया शामिल हैं। संगठन के स्तर पर बीएल संतोष राष्ट्रीय महासचिव संगठन बने हुए हैं, जबकि शिवप्रकाश और सौदान सिंह को राष्ट्रीय संयुक्त महासचिव संगठन की जिम्मेदारी मिली है। इसका अर्थ है कि नबीन ने संगठन की अनुभवी मशीनरी को बनाए रखते हुए राजनीतिक मोर्चे पर अपनी टीम को विस्तार दिया है। साथ ही 16 राष्ट्रीय सचिवों की सूची में भी व्यापक क्षेत्रीय संतुलन दिखाई देता है। कविता पाटीदार, के. सुरेंद्रन, डॉ. भोला सिंह, डॉ. प्रदीप वर्मा, जगदीश ईश्वरभाई पटेल, आम आदमी पार्टी से भाजपा में आये डॉ. संदीप पाठक और फांगनॉन कोन्याक, संगीता यादव, अनिल एंटनी, डॉ. एम. वेंकटेशन, मनोज तिग्गा, सिद्धार्थ शंभू, डॉ. स्वदेश सिंह, मृगांका देब बर्मन, रोहन गुप्ता और जय प्रकाश को राष्ट्रीय सचिव बनाया गया है। इनमें दक्षिण, पूर्वोत्तर, पूर्वी भारत, हिंदी पट्टी और शहरी राजनीतिक पृष्ठभूमि, सभी को जगह मिली है। नई टीम के अन्य हिस्से भी राजनीतिक संकेत दे रहे हैं। केंद्रीय कार्यालय प्रभारी तरुण चुग और केंद्रीय कार्यालय सचिव महेंद्र पांडे बनाए गए हैं। नॉर्थ-ईस्ट कोऑर्डिनेटर की जिम्मेदारी डॉ. संबित पात्रा और संयुक्त कोऑर्डिनेटर की जिम्मेदारी राजीव बब्बर को दी गई है। सभी सेल्स के समन्वय की कमान विष्णु दत्त शर्मा को मिली है, जबकि ऋतुराज सिन्हा और विष्णु वर्धन रेड्डी संयुक्त समन्वयक होंगे। मोर्चों की कमान भी सामाजिक और चुनावी विस्तार को ध्यान में रखकर तय की गई है। युवा मोर्चा के अध्यक्ष डॉ. हेमंग जोशी, महिला मोर्चा की अध्यक्ष रूप कुमारी चौधरी, ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष अमरपाल मौर्य, किसान मोर्चा के अध्यक्ष बंसीलाल गुर्जर, एससी मोर्चा के अध्यक्ष शिवेश कुमार राम, एसटी मोर्चा के अध्यक्ष डॉ. मन्नालाल रावत और अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष कुंवर बसीत अली बनाए गए हैं। इससे भाजपा ने समाज के अलग-अलग वर्गों के बीच संगठनात्मक पहुंच को मजबूत करने की कोशिश की है। वित्तीय मोर्चे पर केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल को राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष और राजस्थान के राजेश मंगल को संयुक्त कोषाध्यक्ष बनाया गया है। पीयूष गोयल के प्रशासनिक और आर्थिक अनुभव का लाभ संगठन के वित्तीय प्रबंधन को मिल सकता है। पीयूष गोयल पहले भी पार्टी के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष रह चुके हैं। यहां सवाल यह है कि अब देखना यह होगा कि 'एक व्यक्ति एक पद' के सिद्धांत को महत्व देने वाली भाजपा क्या पीयूष गोयल से केंद्रीय मंत्री का पद छोड़ने को कहती है या फिर वह दोनों पदों पर बने रहेंगे? कुल मिलाकर नितिन नबीन की टीम का संदेश साफ है कि भाजपा अब संगठन को केवल पदाधिकारियों की सूची के रूप में नहीं, बल्कि चुनावी मशीनरी के रूप में कसना चाहती है। राम माधव की रणनीतिक समझ, वसुंधरा राजे का जनाधार, स्मृति ईरानी की आक्रामक राजनीतिक शैली, सुनील बंसल का संगठनात्मक अनुभव, पीयूष गोयल की प्रशासनिक क्षमता और दक्षिण-पूर्वोत्तर से आए नेताओं का क्षेत्रीय अनुभव पार्टी के लिए अलग-अलग मोर्चों पर उपयोगी साबित हो सकता है। लेकिन असली चुनौती भी यहीं से शुरू होती है। अलग-अलग क्षमताओं और महत्वाकांक्षाओं वाले नेताओं को एक सूत्र में बांधना, राज्यों में गुटबाजी को नियंत्रित करना, डिजिटल नैरेटिव को विपक्ष के हमलों के सामने प्रभावी बनाना, संगठन और सरकार के बीच तालमेल कायम रखना और आगामी चुनावों में इन नियुक्तियों के जरिये साधे गये सामाजिक समीकरणों को वास्तविक वोटों में बदलना आसान नहीं होगा। नितिन नबीन ने टीम चुन ली है; अब इस टीम को परिणाम देने वाली राजनीतिक ताकत में बदलना उनकी सबसे बड़ी परीक्षा होगी। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 17 Aug 2026 5:43 pm

आखिर जन सुराज पार्टी और लोजपा रामविलास के बीच पक रही सियासी खिचड़ी के निहितार्थ क्या हैं? समझिए

बिहार में जन सुराज पार्टी के नवनिर्वाचित विधायक प्रशांत किशोर और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान के बीच जो राजनीतिक खिचड़ी पकने की चर्चा है, वह उत्तरप्रदेश की राजनीति से अभिप्रेरित है। चूंकि प्रशांत किशोर मशहूर चुनावी रणनीतिकार भी हैं और लगभग सभी प्रमुख पार्टियों के रणनीतिक घाटों की पानी का स्वाद चख चुके हैं, इसलिए उनसे जुड़ी इस आशय की चर्चा भी अनायास नहीं है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सामाजिक न्याय क्रांति और मंडल बनाम कमंडल की मतलबी राजनीति की कड़ी में जहां उत्तरप्रदेश में चार-चार बार दलित नेत्री सुश्री मायावती को मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला और उनकी बहुजन समाज पार्टी तीन बार गठबंधन के तहत और एक बार पूर्ण बहुमत से यूपी की सत्ता में आई। लेकिन बिहार में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद, जदयू के हुक्मरान नीतीश कुमार ने लोजपा के राम विलास पासवान और उनके पुत्र चिराग पासवान को कभी पूर्ण रूप से उभरने ही नहीं दिया और गठबंधन में भी कमजोर बनाए रखा। यही वजह है कि बिहार में नए जमाने की राजनीति के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने चिराग पासवान के साथ गठबंधन की सम्भवनाओं को हवा दिलवाकर बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, जनता दल यूनाइटेड के सुप्रीमो नीतीश कुमार और राष्ट्रीय जनता दल नेता तेजस्वी यादव के समक्ष एक तगड़ी चुनौती पेश करने की अपनी मंशा उजागर कर दी है। चिराग पासवान जिस तरह से खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हनुमान करार देते हैं, इससे उनकी भी बेचैनी बढ़ेगी हो। यह ठीक है कि जन सुराज पार्टी और लोजपा रामविलास के बीच किसी औपचारिक गठबंधन की सार्वजनिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है। लेकिन अगस्त 2026 की ताजा राजनीतिक हलचल को देखें तो दोनों के बीच संभावित सियासी तालमेल की चर्चा को महज अफवाह मानकर खारिज करना भी जल्दबाजी होगी। क्योंकि हाल की रिपोर्टों में दोनों के करीब आने और भाजपा-राजद से अलग एक संभावित धुरी की चर्चा सामने आई है। इससे एनडीए की राजनीति में चिराग पासवान का रुतबा बढ़ना भी स्वाभाविक है। फिर भी यदि चिराग पासवान को दलित मुख्यमंत्री बनाने के स्वप्न प्रशांत किशोर यदि दिखाते हैं, या फिर उपमुख्यमंत्री पद का भी सियासी चारा डालते हैं तो मिशन 2029 के संसदीय चुनाव और 2030 के विधानसभा चुनावों को लेकर एनडीए और महागठबंधन के हाथपांव फूलना स्वाभाविक है। इसे भी पढ़ें: Prashant Kishor ने Bihar विधानसभा में ली शपथ, बोले- यह मेरे लिए गर्व और जिम्मेदारी का पल आइए अब यह समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर इस मनोवांछित सियासी खिचड़ी में क्या-क्या पक रहा है? और इसके राजनीतिक स्वाद के मिजाज से इसके क्या क्या मायने हो सकते हैं- पहला, लोजपा युवराज चिराग पासवान के लिए यह NDA के भीतर दबाव की राजनीति हो सकती है, क्योंकि चिराग पासवान पहले भी सीट बंटवारे और NDA के भीतर अपनी राजनीतिक हैसियत को लेकर स्वतंत्र रुख दिखाते रहे हैं। 2025 में भी उनके प्रशांत किशोर से संभावित संपर्क की खबरें सामने आई थीं। इसलिए सियासत में हर खुली हुई सम्भवनाओं और उससे बनने बिगड़ने वाली हवा से इंकार नहीं किया जा सकता है। दूसरा, जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर के लिए लोजपा रामविलास प्रमुख चिराग पासवान एक महत्वपूर्ण सामाजिक-पॉलिटिकल पुल हो सकते हैं। ऐसा इसलिए कि जन सुराज अपने को BJP और RJD—दोनों से अलग विकल्प के रूप में स्थापित करना चाहता है। अब बांकीपुर में किशोर की जीत ने उन्हें सिर्फ आंदोलनकारी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय चुनावी ताकत के रूप में भी स्थापित किया है। तीसरा, सबसे दिलचस्प संभावना है—'माइनस BJP, माइनस RJD' राजनीति। यानी कि ताजा राजनीतिक चर्चाओं में इसी तरह के पुनर्संयोजन की संभावना उठ रही है। इसका अर्थ होगा कि चिराग पासवान अपना दलित/पासवान प्रभाव और जन सुराज पार्टी अपना युवा, गैर-पारंपरिक तथा शहरी-मध्यवर्गीय आधार जोड़ने की कोशिश करे। दोनों ने यदि रणनीतिक रूप से सवर्णों को तरजीह दी तो भाजपा/कांग्रेस के लिए यह किसी झटके की तरह होगा। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि दोनों की राजनीतिक जरूरतें अलग अलग हैं। चाहे चिराग पासवान हों या प्रशांत किशोर, दोनों अपना स्वतंत्र राजनीतिक स्पेस बढ़ाना चाहते हैं, साथ ही खुद को तीसरे विकल्प के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। जहां चिराग पासवान NDA में रहते हुए अपना bargaining power बढ़ाना चाहते हैं, वहीं प्रशांत किशोर BJP और RJD दोनों से दूरी दिखाना चाहते हैं। इस बात में कोई दो राय नही कि उत्तरप्रदेश के जाटवों के वोट बैंक के तरह ही बिहार में भी पासवान वोट का मजबूत आधार है, जबकि प्रशांत किशोर युवा, शिक्षित और बदलाव चाहने वाले मतदाताओं पर जोर देते हैं। वह संगठन और चुनावी नेटवर्क के कार्यसाधक हैं। उनमें नया राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने और अभियान चलाने की अद्भुत क्षमता है। लिहाजा यहीं से असली सवाल पैदा होता है—क्या चिराग NDA के भीतर रहकर जन सुराज से तालमेल करेंगे, या भविष्य में कोई व्यापक वैकल्पिक मोर्चा बनेगा? अलबत्ता, इन चर्चाओं में एक और बड़ा संकेत निहित है। वह यह कि प्रशांत किशोर अब केवल विधानसभा की राजनीति तक सीमित नहीं दिख रहे, बल्कि जन सुराज की नजर विधान परिषद के चुनावी क्षेत्रों पर भी बताई जा रही है। यानी संगठन को लगातार चुनावी मशीनरी में बदलने की कोशिश हो रही है। दूसरी ओर चिराग पासवान ने भी हाल के दिनों में ऐसे मुद्दे उठाए हैं जिन पर सरकार/NDA के भीतर असहजता पैदा हो सकती है। उदाहरण के लिए, उन्होंने गत दिनों बिहार की शराबबंदी नीति की प्रभावशीलता पर खुलकर सवाल उठाया। यानी दोनों के बीच संभावित तालमेल का आधार केवल जातीय गणित नहीं, बल्कि 'एंटी-एस्टैब्लिशमेंट' और 'नया विकल्प' का राजनीतिक नैरेटिव भी बन सकता है। मगर सबसे बड़ी अड़चन भी यही है। खासकर प्रशांत किशोर की राजनीति का मूल दावा ही है कि वे पारंपरिक राजनीतिक दलों के गठजोड़ से अलग व्यवस्था खड़ी करेंगे। 2025 में उन्होंने चिराग के साथ गठबंधन की संभावना को सार्वजनिक रूप से नकारते हुए कहा था कि उनका गठबंधन जनता के साथ है। इसलिए यदि आज दोनों के बीच नजदीकी बढ़ती है, तो इसे सीधा चुनावी गठबंधन मानने के बजाय 'रणनीतिक संवाद' समझना ज्यादा उचित होगा। मेरी नजर में असली खेल के दृष्टिगत 2026 का गठबंधन कम और 2029–30 की जमीन तैयार करने की कवायद ज्यादा हो सकती है। वाकई यदि चिराग + जन सुराज साथ आते हैं तो बिहार में तीन ध्रुव उभर सकते हैं:- पहला, NDA बनाम RJD; दूसरा, महागठबंधन बनाम जन सुराज–LJP(RV जैसा वैकल्पिक ध्रुव। और यदि इस तीसरे ध्रुव में पप्पू यादव, उपेंद्र कुशवाहा या दूसरे छोटे सामाजिक आधार वाले नेता भी किसी रूप में जुड़ते हैं, तो बिहार की पारंपरिक दो-ध्रुवीय राजनीति के लिए यह गंभीर चुनौती बन सकती है। इस परिस्थिति में सामान्य जातियों के वोटबैंक का महत्व और अधिक बढ़ जाएगा। क्योंकि यूपी में भी ओबीसी सियासत से ब्राह्मण परेशान होकर मायावती के साथ हो लिए थे। कुछ ऐसा ही उभार बिहार में भी नजर आ रहा है, खासकर सोशल मीडिया पर सवर्ण विरोधी पोस्टों की बाढ़। फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण संकेत यही है कि दोनों की तरफ से औपचारिक गठबंधन की घोषणा नहीं हुई है। इसलिए 'खिचड़ी पक रही है' कहना राजनीतिक संकेतों के लिहाज से उचित है, लेकिन 'खिचड़ी तैयार हो गई है' कहना अभी तथ्यात्मक रूप से जल्दबाजी होगी। शायद वह बीरबल की खिचड़ी न बन जाए। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 17 Aug 2026 5:40 pm

प्रधानमंत्री मोदी का लालकिले से 'विकसित भारत' का संकल्प

ऐतिहासिक लालकिले की प्राचीर केवल पत्थरों की एक संरचना नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत के उतार-चढ़ाव, उसकी आकांक्षाओं, उसकी नियति और उसके सामूहिक संकल्पों की मूक गवाह रही है। हर वर्ष 15 अगस्त को इस प्राचीर से देश के प्रधानमंत्री जब राष्ट्र को संबोधित करते हैं, तो वह केवल एक औपचारिक भाषण नहीं होता, बल्कि वह आने वाले समय के लिए देश का नीतिगत और वैचारिक रोडमैप होता है। स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी ऐतिहासिक प्राचीर से वर्ष 2047 तक भारत को एक 'विकसित राष्ट्र' बनाने का जो अटूट संकल्प दोहराया है, वह देश की समकालीन राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज के लिए एक युगांतकारी मोड़ है। 'विकसित भारत' का यह विजन महज़ एक राजनीतिक नारा नहीं है, बल्कि यह 140 करोड़ नागरिकों की सामूहिक चेतना को जगाने और उन्हें राष्ट्र निर्माण के एक महायज्ञ में आहुति देने के लिए प्रेरित करने वाला एक व्यापक राष्ट्रीय दर्शन है। जब हम इस विराट संकल्प की बात करते हैं, तो हमें इसके ऐतिहासिक संदर्भ और प्रासंगिकता को गहराई से समझना होगा। भारत ने लगभग दो सदियों तक औपनिवेशिक दासता और आर्थिक शोषण का दंश झेला है। 1947 में जब देश स्वतंत्र हुआ, तब हमारी अर्थव्यवस्था जर्जर थी, साक्षरता दर दयनीय थी और अकाल तथा गरीबी जैसी बुनियादी चुनौतियां हमारे सामने थीं। शुरुआती दशकों में भारत का मुख्य ध्यान आत्मनिर्भरता और बुनियादी अस्तित्व की रक्षा पर था। हमने खाद्यान्न संकट से निपटने के लिए हरित क्रांति की, अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए सैन्य तंत्र को मजबूत किया और धीरे-धीरे एक ठोस औद्योगिक आधार तैयार किया। आज, स्वतंत्रता के इस दौर में, भारत उस स्थिति से बहुत आगे निकल चुका है और अब हम केवल एक अस्तित्व बनाए रखने वाले देश नहीं हैं, बल्कि हम वैश्विक पटल पर एक नई दिशा तय करने वाले राष्ट्र बन चुके हैं। यह संकल्प इस बात का प्रतीक है कि अब भारत अपनी विकासशील छवि के खोल को तोड़कर वैश्विक शक्तियों की अग्रिम पंक्ति में खड़े होने के लिए पूरी तरह तैयार है। 2047 का वर्ष इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमारी स्वतंत्रता का शताब्दी वर्ष होगा, और कोई भी राष्ट्र अपनी स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होने पर दुनिया के सामने अपनी सफलता का क्या प्रमाण प्रस्तुत करता है, यही उसका वास्तविक ऐतिहासिक मूल्यांकन होता है। इस व्यापक संकल्प को धरातल पर उतारने के लिए देश के चार प्रमुख वर्गों को विकास का मुख्य केंद्र बिंदु बनाया गया है, जिन्हें युवा, महिला, किसान और गरीब के रूप में रेखांकित किया गया है। इन चारों स्तंभों के समग्र सशक्तिकरण के बिना किसी भी विकसित समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। भारत आज दुनिया का सबसे युवा देश है और हमारी जनसांख्यिकीय लाभांश हमारी सबसे बड़ी ताकत है। विकसित भारत का सपना तभी सच हो सकता है जब इस युवा ऊर्जा को सही दिशा, उत्कृष्ट शिक्षा और वैश्विक स्तर का कौशल मिले। देश में स्टार्टअप इकोसिस्टम का तेजी से विस्तार और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से शिक्षा को रोजगारोन्मुख बनाना इसी दिशा में उठाए गए बड़े कदम हैं। इसके साथ ही, विकसित भारत का दूसरा अनिवार्य पहलू महिलाओं का सशक्तिकरण और उनके नेतृत्व में होने वाला विकास है। जब तक देश की आधी आबादी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से पूरी तरह सक्रिय नहीं होगी, तब तक विकास की रफ्तार अधूरी रहेगी। सेनाओं में महिलाओं की भागीदारी से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होती महिलाओं की बढ़ती संख्या इस बात का प्रमाण है कि वे अब नीति निर्धारण के केंद्र में आ रही हैं। इसी तरह, भारत की आत्मा आज भी गांवों में बसती है और हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि है। विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए कृषि क्षेत्र में तकनीकी सुधार, आधुनिक खेती को बढ़ावा और वैश्विक कृषि आपूर्ति श्रृंखला में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाना आवश्यक है। किसान जब पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर आधुनिक कृषि-उद्यमी बनेगा, तभी ग्रामीण भारत समृद्ध होगा। अंत में, अंत्योदय की भावना के अनुरूप समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुंचना चाहिए, क्योंकि किसी भी राष्ट्र को तब तक विकसित नहीं कहा जा सकता जब तक कि बहुआयामी गरीबी का पूरी तरह उन्मूलन न हो जाए और हर नागरिक को सम्मानजनक जीवन स्तर न मिल जाए। इसे भी पढ़ें: PM Modi का नई BJP टीम पर पूरा भरोसा, बोले- संगठन और जनसेवा पर दें ध्यान आर्थिक मोर्चे पर, भारत आज दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और शीर्ष वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं की ओर अग्रसर है। लेकिन विकसित देश बनने के लिए हमें केवल सकल घरेलू उत्पाद के आकार को ही नहीं बढ़ाना है, बल्कि प्रति व्यक्ति आय और नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में भी गुणात्मक सुधार करना होगा। इसके लिए विनिर्माण और आत्मनिर्भरता पर विशेष बल देना आवश्यक है। 'मेक इन इंडिया' अभियान के तहत भारत आज मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग, रक्षा उत्पादन और इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में एक वैश्विक केंद्र के रूप में उभर रहा है। रक्षा क्षेत्र में, जहां कभी हम पूरी तरह आयातों पर निर्भर थे, आज हम स्वदेशी अत्याधुनिक सैन्य उपकरणों का निर्माण कर रहे हैं और उनका निर्यात भी बढ़ा रहे हैं। भारतीय कॉर्पोरेट जगत को अब वैश्विक कंपनियों की तर्ज पर अपनी क्षमता का विस्तार करना होगा ताकि भारतीय ब्रांड दुनिया भर के बाजारों में अग्रणी भूमिका निभा सकें। इसके साथ ही, देश के बुनियादी ढांचे का कायाकल्प किया जा रहा है। आधुनिक रेलवे, एक्सप्रेसवे का विस्तृत नेटवर्क, जलमार्गों का विकास और हवाई अड्डों का आधुनिकीकरण देश की लॉजिस्टिक्स लागत को कम करने और व्यापार को सुगम बनाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। एक मजबूत और आधुनिक बुनियादी ढांचा ही विकसित भारत की ठोस नींव बनेगा, जो देश के औद्योगिक विकास को नई गति प्रदान करेगा। तकनीक और नवाचार के इस युग में जो देश अग्रणी रहेगा, वही दुनिया के भविष्य को दिशा देगा। भारत ने डिजिटल क्षेत्र में जो क्रांति की है, उसने दुनिया के विकसित देशों को भी अचंभित किया है। हमारा डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और डिजिटल लेनदेन की व्यवस्था आज वैश्विक स्तर पर एक मिसाल बन चुकी है। भारत ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह केवल तकनीक का उपभोक्ता नहीं है, बल्कि वह विश्व को सस्ती, सुरक्षित और समावेशी तकनीक देने वाला प्रदाता भी है। विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में बढ़ता निवेश इस विजन को और स्पष्ट करता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर मिशन, क्वांटम कंप्यूटिंग, अंतरिक्ष अनुसंधान और ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में भारत का बढ़ता कदम यह दर्शाता है कि हम भविष्य की तकनीकों के मामले में दुनिया के अग्रणी देशों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं। तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर और संप्रभु होना विकसित भारत की एक अनिवार्य शर्त है, जो हमें वैश्विक मंच पर एक अद्वितीय पहचान दिलाएगी। संकल्प जितना विराट होता है, उसकी राह की चुनौतियां भी उतनी ही कठिन होती हैं। विकसित भारत के मार्ग में कई आंतरिक और बाह्य चुनौतियां हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। देश की आर्थिक प्रगति के साथ-साथ क्षेत्रीय और सामाजिक असमानता को पाटना एक बड़ी चुनौती है। विकास का लाभ समाज के हर वर्ग और देश के हर कोने तक समान रूप से पहुंचना चाहिए। इसके अलावा, भारत को पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच एक कुशल संतुलन बनाना होगा। जलवायु परिवर्तन के खतरों को देखते हुए नवीकरणीय ऊर्जा को अपनाना और सतत विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करना युद्धस्तर पर आवश्यक है। प्रशासनिक स्तर पर, हमारी व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और नागरिक-अनुकूल बनना होगा, क्योंकि लालफीताशाही और भ्रष्टाचार विकास की गति को धीमा करते हैं। वैश्विक मोर्चे पर, वर्तमान समय की भू-राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक व्यवधान भी हमारे सामने चुनौतियां खड़ी करते हैं, जिनसे निपटने के लिए भारत को अपनी कूटनीतिक कुशलता और आंतरिक आर्थिक सुदृढ़ता को निरंतर मजबूत बनाए रखना होगा। इस पूरे महायज्ञ में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका देश के नागरिकों की है। कोई भी देश केवल सरकार की नीतियों, बजट या घोषणाओं से विकसित नहीं बनता। सरकार मार्ग प्रशस्त कर सकती है, बुनियादी ढांचा दे सकती है, लेकिन उस पर चलकर देश को आगे ले जाने का काम नागरिकों के सामूहिक प्रयासों से ही संभव होता है। विकसित भारत का संकल्प तब तक अधूरा है जब तक देश का हर नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति पूरी तरह सजग नहीं होता। चाहे वह करों का ईमानदारी से भुगतान करना हो, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना हो, पर्यावरण को बचाना हो, या फिर अपने-अपने कार्यक्षेत्र में पूर्ण ईमानदारी और उत्कृष्टता के साथ योगदान देना हो—ये सभी नागरिक प्रयास मिलकर एक विशाल राष्ट्रीय शक्ति का निर्माण करते हैं। जब देश के नागरिक 'राष्ट्र प्रथम' की भावना को अपने जीवन का मूल मंत्र बना लेंगे, तो भारत की प्रगति को कोई रोक नहीं पाएगा। निष्कर्षतः विकसित भारत का संकल्प केवल आर्थिक आंकड़ों या ऊंची इमारतों तक सीमित नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ एक ऐसे भारत का निर्माण करना है जो आर्थिक रूप से समृद्ध हो, तकनीकी रूप से अग्रणी हो, सामाजिक रूप से समरस और न्यायपूर्ण हो, और सांस्कृतिक रूप से अपनी समृद्ध जड़ों से जुड़ा हुआ हो। यह एक ऐसे भारत का सपना है जहां हर नागरिक को समान अवसर, उत्कृष्ट शिक्षा और स्वास्थ्य सुरक्षा मिले। लालकिले की प्राचीर से गूंजा यह संकल्प देश के लिए एक महान आह्वान है। आने वाले दो दशक भारत के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष होने जा रहे हैं। यदि हम सब मिलकर पूरी निष्ठा और राष्ट्रीय गौरव की भावना के साथ इस संकल्प के प्रति समर्पित हो जाएं, तो निश्चित रूप से वर्ष 2047 में जब भारत अपनी स्वतंत्रता की शताब्दी मना रहा होगा, तब वह विश्व पटल पर एक परम वैभवशाली, समर्थ और विकसित राष्ट्र के रूप में स्थापित होगा। अशोक भाटिया, वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार

प्रभासाक्षी 17 Aug 2026 5:37 pm

उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा मानसून सत्र

संसदीय मर्यादाओं का क्षरण कब तक? आखिर कब हम संसद के एक-एक मिनट का उपयोग करने की पात्रता विकसित करेंगे? आजादी की 80वीं वर्षगांठ की आयोजना से पूर्व भारत में संसद का मानसून सत्र जिस निराशाजनक स्थिति, नाउम्मीदी और उपेक्षापूर्ण स्थितियां के साथ संपन्न हुआ, वह केवल किसी एक दल, सरकार या विपक्ष की विफलता नहीं है, बल्कि हमारी संसदीय संस्कृति के सामने खड़ा एक गंभीर प्रश्नचिह्न है। 25 दिनों तक चले इस सत्र में तीखी राजनीतिक बहस के बजाय हंगामा, नारेबाजी, गतिरोध और कार्यवाही बाधित करने की प्रवृत्ति अधिक प्रभावी रही। प्रश्न यह नहीं है कि सत्ता पक्ष सही था या विपक्ष, प्रश्न यह है कि क्या हमारी संसद अपने मूल दायित्व-जनता के प्रश्नों पर गंभीर विमर्श, सरकार की जवाबदेही और राष्ट्रहित में कानून निर्माण को पूरा कर पा रही है? इस सत्र के आंकड़े स्वयं बहुत कुछ कह रहे हैं। लोकसभा की उत्पादकता बमुश्किल 19 प्रतिशत रही, जबकि राज्यसभा में लगभग 39 प्रतिशत काम हो पाया। लोकसभा में एक भी दिन प्रश्नकाल पूरा नहीं हो सका। यह स्थिति इसलिए अधिक चिंताजनक है क्योंकि प्रश्नकाल संसद की आत्मा माना जाता है। देश की जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों को सरकार से प्रश्न पूछने और सरकार को उनका उत्तर देने का अवसर ही यदि सदन में उपलब्ध न हो, तो लोकतंत्र की जवाबदेही किस रास्ते से सुनिश्चित होगी? 28 जुलाई को लोकसभा में अपेक्षाकृत ठीक काम हुआ, जबकि राज्यसभा में भी केवल कुछ दिन ही सार्थक कार्यवाही हो सकी। शेष समय का बड़ा हिस्सा राजनीतिक टकराव की भेंट चढ़ गया। संसद केवल ईंट-पत्थर से बनी इमारत नहीं है। वह भारत की सामूहिक चेतना का सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच है। वहां देश के करोड़ों नागरिकों की आकांक्षाएं, समस्याएं और सपने पहुंचते हैं। किसान, मजदूर, विद्यार्थी, महिला, व्यापारी, युवा, गरीब और वंचित वर्ग-सभी की आवाज संसद के माध्यम से राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनती है। इसलिए संसद का एक मिनट भी केवल सांसद का समय नहीं होता, वह देश की जनता के धन, विश्वास और लोकतांत्रिक अधिकार का समय होता है। संसद का प्रत्येक व्यर्थ गया मिनट वास्तव में जनता के विश्वास से घटा हुआ एक मिनट है। दुर्भाग्य यह है कि संसद में हंगामा अब अपवाद नहीं, बल्कि संसदीय राजनीति का लगभग नियमित हथियार बनता जा रहा है। मुद्दे उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है, सरकार को घेरना विपक्ष का दायित्व है और असहमति लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन असहमति को संवाद में बदलने के बजाय कार्यवाही रोक देना लोकतंत्र को मजबूत नहीं करता। विरोध की भी एक मर्यादा होती है। यदि विपक्ष अपनी बात रखने के लिए सदन को चलने ही न दे और सत्ता पक्ष विपक्ष की आवाज सुनने की बजाय राजनीतिक बहुमत को ही पर्याप्त समझे, तो दोनों मिलकर संसदीय लोकतंत्र की आत्मा को कमजोर करते हैं। इसे भी पढ़ें: Lok Sabha में मात्र 19% और Rajya Sabha में 39.17% हो सका कामकाज, Parliament के कामकाज का रिपोर्ट कार्ड देखकर खुद तय कीजिये सांसद पास हुए या फेल! इस सत्र में कुछ घटनाएं इस गिरावट को और स्पष्ट करती हैं। लोकसभा अध्यक्ष ने सत्र के समापन पर पारंपरिक समापन भाषण नहीं दिया। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस द्वारा लोकसभा अध्यक्ष के साथ होने वाली चाय पार्टी का बहिष्कार किया जाना भी केवल एक कार्यक्रम का बहिष्कार नहीं माना जा सकता। यह सदन के भीतर बढ़ती राजनीतिक कटुता का संकेत है। लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, मनभेद लोकतंत्र के लिए घातक हैं। संसद में बहस के बाद हाथ मिलाने की संस्कृति विकसित होनी चाहिए, बहस के बाद दूरी बढ़ाने की नहीं। इस मानसून सत्र को नीट-यूजी पेपर लीक, जंतर-मंतर छात्र आंदोलन, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग और राम मंदिर में दान चोरी जैसे मुद्दों के लिए भी याद किया जाएगा। जंतर-मंतर पर हुई हिंसा के बाद विपक्ष केंद्रीय गृहमंत्री से जवाब मांग रहा था। जब सत्र के अंतिम दिनों में गृहमंत्री जवाब देने को तैयार हुए तो विपक्ष द्वारा उनका वक्तव्य सुनने से इनकार करना संसदीय विवेक की कसौटी पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। यदि विपक्ष को सरकार के जवाब से असहमति थी, तो उसे सुनकर तथ्यात्मक प्रतिवाद करना अधिक प्रभावी लोकतांत्रिक रास्ता होता। संसद में जवाब सुनने से इनकार करना प्रश्न का समाधान नहीं, प्रश्न को अनुत्तरित छोड़ना है। यह भी सच है कि तमाम गतिरोध के बीच संसद ने कुछ महत्वपूर्ण काम किए। विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक यानी एफसीआरए को सरकार ने विरोध के बीच संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा। सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 दोनों सदनों में पारित हुआ, जिसका उद्देश्य परीक्षाओं में अनुचित साधनों पर अंकुश लगाना और दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करना है। बैंकिंग रिकॉर्ड को नए डिजिटल ढांचे से जोड़ने, जन्म-मृत्यु के विलंबित पंजीकरण को अधिक कठोर बनाने तथा अन्य विधायी एवं प्रशासनिक सुधारों की दिशा में भी कदम उठे। केरल का नाम विधिवत केरलम किए जाने का निर्णय भी इसी सत्र का हिस्सा रहा। ये उपलब्धियां बताती हैं कि यदि संसद चले तो कम समय में भी महत्वपूर्ण काम संभव है। लेकिन सवाल फिर वही है-जब संसद चल सकती है तो उसे बार-बार रोकने की आवश्यकता क्यों पड़ती है? क्या हम यह भूल गए हैं कि लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव जीतना नहीं है? लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ है-विचारों का सम्मान, असहमति की स्वीकार्यता, संवाद की निरंतरता और निर्णय प्रक्रिया में जनता की भागीदारी। सत्ता पक्ष को यह समझना होगा कि बहुमत उसे शासन करने का अधिकार देता है, लेकिन विपक्ष को सुनने से मुक्त नहीं करता। दूसरी ओर विपक्ष को यह स्वीकार करना होगा कि विरोध का अधिकार संसद को निष्क्रिय करने का अधिकार नहीं है। अतीत में हमारी संसदीय परंपरा ने अनेक कठिन दौर देखे हैं। तीखी बहसें हुईं, वैचारिक संघर्ष हुए, सरकारों की आलोचना हुई, लेकिन संसद को संवाद का मंच बनाए रखने की कोशिश होती रही। आज आवश्यकता है कि हम उस परंपरा को पुनर्जीवित करें। राजनीतिक दलों को अपने भीतर यह आत्ममंथन करना होगा कि क्या वे जनता के बीच जाकर यह कह सकते हैं कि हमने संसद में आपके प्रश्नों के लिए उपलब्ध समय का पूरा उपयोग किया? क्या कोई सांसद गर्व से कह सकता है कि उसने अपने कार्यकाल के प्रत्येक संसदीय अवसर को राष्ट्रहित में लगाया? संसद में हंगामा करना आसान है, लेकिन संसद चलाना चरित्र, संयम और लोकतांत्रिक परिपक्वता मांगता है। नारे लगाने के लिए ऊर्जा चाहिए, लेकिन तथ्यपूर्ण बहस के लिए अध्ययन चाहिए। माइक के सामने खड़े होने के लिए राजनीतिक उत्साह चाहिए, लेकिन कानून बनाने के लिए दूरदृष्टि चाहिए। कार्यवाही रोकने के लिए संख्या पर्याप्त हो सकती है, लेकिन राष्ट्र निर्माण के लिए विवेक, धैर्य और संवाद आवश्यक है। आजादी के 80वें वर्ष की ओर बढ़ते भारत के लिए यह आत्ममंथन का समय है। हमने विज्ञान, अर्थव्यवस्था, तकनीक और वैश्विक प्रतिष्ठा के अनेक क्षेत्रों में बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं। लेकिन क्या हमारी राजनीतिक संस्थाएं भी उसी गति से परिपक्व हुई हैं? क्या हम संसदीय प्रणाली को इतना सशक्त बना पाए हैं कि संसद के एक-एक मिनट का अधिकतम उपयोग कर सकें? क्या हम अपनी असहमति को इतनी गरिमा दे पाए हैं कि विरोध भी हो और संवाद भी बना रहे? क्या हम सत्ता को इतनी विनम्रता और विपक्ष को इतना विवेक दे पाए हैं कि दोनों मिलकर लोकतंत्र को मजबूत करें? इन प्रश्नों के उत्तर केवल संसद भवन के भीतर नहीं खोजे जाने चाहिए। राजनीतिक दलों के नेतृत्व, सांसदों, संसदीय कार्यप्रणाली और अंततः हम नागरिकों-सभी को इस पर विचार करना होगा। जनता को भी यह प्रश्न पूछना चाहिए कि उसका प्रतिनिधि संसद में कितनी बार उपस्थित रहा, कितने प्रश्न पूछे, कितनी बहसों में भाग लिया और राष्ट्र के लिए क्या सार्थक योगदान दिया। लोकतंत्र केवल पांच वर्ष में एक बार वोट देने से मजबूत नहीं होता, लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब जनता अपने प्रतिनिधियों से निरंतर जवाब मांगती है। हंगामा किसी दल की विजय नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की सामूहिक पराजय है। संसद चलेगी तो प्रश्न पूछे जाएंगे, प्रश्न पूछे जाएंगे तो सरकार जवाब देगी, जवाब मिलेगा तो नीतियों की समीक्षा होगी और सार्थक कानून बनेंगे। यही लोकतंत्र की जीवन-धारा है। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

प्रभासाक्षी 17 Aug 2026 5:08 pm

भारत में पाकिस्तानियों को मिल गई नागरिकता?

किसी पाकिस्तानी को आज के दौर में हिंदुस्तान में बसाना, उन्हें पनाह देना या फिर नागरिकता देनी वाली बात, शायद ही किसी के गले उतरे? बसाना तो दूर, ऐसा सोचना मात्र भी, सूरज का पूरब की जगह पश्चिम से निकलने जैसा माना जाएगा। पर, यह कोरी कल्पना पिछले दिनों हकीकत में तब्दील हुई। भारत में 56 साल पहले आए पाकिस्तानियों को नागरिकता दी गई है। वह भी एकाध लोगों को नहीं, बल्कि हजारों को। सरकार ने पिछले महीने बकायदा एक रंगारंग कार्यक्रम कर, ढोल-नगाड़े बजाकर विस्थापित पाकिस्तानियों को नागरिकता प्रमाण पत्र बांटे। ताज्जुब यह भी है कि ऐसा चमत्कार हुकूमत ने ऐसे माहौल में किया, जब समूचे भारत में विभिन्न देशों के घुसपैठियों को निकालकर उन्हें खदेड़ने का अभियान केंद्रीय व राज्य स्तरों पर छिड़ा हो। इस अभियान की बानगी हमने हाल में संपन्न हुए पांच राज्यों के विधाानसभा चुनाव के दौरान भी देखा। जब दो बॉर्डर राज्य, असम और पश्चिम बंगाल, का चुनाव इसी मसले के इर्दगिर्द घूमा। घुसपैठियों के अलावा भारत में कुछ वर्षों से एनआरसी और सीएए का भी शोर है। बावजूद इसके सरकार ने पाकिस्तानियों को नागरिकता देने का बड़ा जाखिम उठाया। सरकार ने यह कदम क्यों उठाया? हालांकि, इस फैसले के सियासी मायने बहुतेरे हैं, जिसकी तस्वीर आने वाले दिनों में दिखाई भी देगी। सरकार ने विस्थापितों को नागरिकता हिंदुस्तान के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में दी है। जिले का नाम है पीलीभीत जो नेपाल बॉर्डर से एकदम सटा हुआ है जिसकी पहचान बांसुरी निमार्ण के अलावा तराई क्षेत्र के लिए भी प्रसिद्ध है। पीलीभीत को मिनी पंजाब भी कहते हैं। प्राकृतिक सौंदर्य से लबरेज, जैव-विविधता के अलावा विश्व प्रसिद्ध टाइगर रिजर्व तो है ही, धान की पैदावार के लिए भी जिला पूरे प्रदेश में विख्यात है। सरकार ने जिन परिवारों को बसाने का फैसला किया है उनमें बंगाली हिन्दू, बौद्ध, जैन और सिख शामिल हैं। भारत के नक्शे में देखें, तो पीलीभीत हिंदुस्तान के एक अलहदे छोर पर बसा है जहां करीब पांच दशक से भी ज्यादा पहले पाकिस्तान से आए विस्थापित लोग बस गए थे। तभी, से वह विभिन्न सरकारों से नागरिकता मांगते आए हैं। सरकारी कागजों के मुताबिक पूर्वी पाकिस्तान से वर्ष 1959 से 1971 के बीच पाकिस्तान से पीड़ित होकर कुछेक परिवार भारत आए थे। शुरूआत में यह परिवार कई राज्यों में भटकते रहे, कहीं ठिकाना नहीं मिला। आखिरकार उन्हें बाद में यही जिला मुफीद लगा। पीलीभीत के अलावा कुछ नागरिकता रामपुर और बिजनौर में बसे विस्थापितों को भी दी गई है। इसे भी पढ़ें: 'हिंदुओं को किसी तरह सहन कर रहे हैं पाकिस्तान के मुसलमान', Zardari के इस बयान पर भड़के Javed Akhtar, Pakistan President को दिखाया आईना पीलीभीत के जिस क्षेत्र में यह परिवार रहते आए हैं वह जगह कभी विरान होती थी। इन लोगों ने इसे रहने लायक बनाया और उबड़खाबड़ जगहों पर मेहनत करके उसे खेतीबाड़ी के लिए तैयार किया। आज इस क्षेत्र में अच्छी फसलें उगती हैं। सभी के पास कागजी दस्तावेजों के रूप में भारतीय आधार कार्ड, पैन कार्ड, राशन कार्ड इत्यादि पहले से मौजूद हैं। साथ ही लंबे वक्त से मतदान भी करते आए हैं। लेकिन नागरिकता और मालिकाना हक से वंचित थे, जिसे मौजूदा योगी सरकार ने पूरा कर दिया। ये परिवार पीलीभीत जिले के अमरिया, न्यूरिया, शारदा डैम की तलहटी सहित आसपास के क्षेत्रों में बसे हैं। सरकार ने उन्हें खेती और आवास के लिए जमीन तो पहले से दी हुई हैं। लेकिन मालिकाना हैसियत नहीं दी, जिसके लिए यह लोग दशकों जद्दोजहद कर रहे थे। प्रत्येक चुनावों में इनसे के झूठा आश्वासन हुआ। पूर्ववर्ती बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी की सरकारों ने भी इनको नागरिकता दिलवाने का दिलासा दिया। पर, कुछ राजनैतिक अड़चनों के चलते वादा पूरा नही ंकर पाए। बीते 2022 के विधानसभा चुनाव में इनके साथ वादा किया गया था, जिसे अब पूरा किया गया। प्रदेश सरकार की पहल पर सभी पीड़ित परिवारों को सूचीबद्ध करके नागरिकता और मालिकाना के प्रमाण बांटे गए हैं। नागरिकता करीब 2500 परिवारों को दी गई हैं जिनकी कुल संख्या 15 हजार के आसपार है। ऐसा करके सरकार ने शायद विपक्षी दलों को बड़ा सियासी मुद्दा बैठे-बिठाए थमा दिया है। ये लोग वर्ष 1960 से 1975 के बीच धार्मिक प्रताड़ना के चलते पूर्वी बंगालादेश जो अब पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा है, से भारत आए थे और उत्तर प्रदेश के तराई के जिले पीलीभीत में आकर बसे। ये क्षेत्र पीलीभीत जिले की कलीनगर व पूरनपुर तहसीलों में आते हैं जहां ये करीब 25-26 गांवों में बसे हैं। पिछले महीने 29 जून को सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का जिले में दौरा हुआ जिसमें मुख्यमंत्री ने इनको ना सिर्फ नागरिकता के प्रमाण पत्र बांटे, बल्कि मालिकाना हक के सरकारी कागज भी दिए। यह फैसला चुनाव के ऐन वक्त लिया गया। प्रदेश में मात्र 6-7 महीनों बाद विधानसभा के चुनाव होने हैं। इसलिए सरकार के इस निर्णय पर प्रदेश की राजनीति जमकर गर्माई हुई है। विपक्षी पार्टियों ने सीधे-सीधे एक बड़े वोटबैंक को साधने का आरोप मौजूदा सरकार पर लगाया है। पाकिस्तानी विस्थापियों को बसाने का यह पहला चरण है, अभी दूसरा चरण शेष है। 35 हजार लोग और हैं जो बहराईच, बाराबंकी, गोंडा, लखीमपुर, बिजनौर जैसे जिलों में बसे हैं। सभी को चिंहित किया जा चुका है, अगले कुछ महीनों बाद इन्हें भी मुकम्मल नागरिकता देने का फैसला हो चुका है। सरकारी आंकड़ों की माने तो प्रदेश के करीब सात-आठ जिलों में कुल 55 हजार विस्थापित पाकिस्तानियों की आबादी है, इनमें प्रत्येक वर्ष तेजी से इजाफा भी हो रहा है। 56 वर्ष पहले धार्मिक प्रताड़ना के रूप में मात्र 12 हजार 380 लोग आए थे। आबादी बढ़ाने के पीछे इनका मकसद था कि बढ़ी आबादी से सरकारों को वोटिंग का लालच देकर किसी भी दल पर दबाव बना सकेंगे। कमोबेश, हुआ भी वैसा ही। अपने योजनाओं में यह लोग आज सफल हुए हैं। - डॉ. रमेश ठाकुर सदस्य, राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान (NIPCCD), भारत सरकार!

प्रभासाक्षी 17 Aug 2026 5:00 pm

कलकत्ता हाई कोर्ट ने 'फर्जी हस्ताक्षर' मामले में अभिषेक बनर्जी को मिली अंतरिम सुरक्षा बढ़ाई

कलकत्ता हाई कोर्ट ने 'फर्जी हस्ताक्षर' मामले में अभिषेक बनर्जी को मिली अंतरिम सुरक्षा बढ़ाई

समाचार नामा 17 Aug 2026 4:27 pm

आपदा के दौरान गुजरात के किसानों, मछुआरों के लिए जीवन रक्षक बना एनडीएमए का 'सचेत' ऐप

आपदा के दौरान गुजरात के किसानों, मछुआरों के लिए जीवन रक्षक बना एनडीएमए का 'सचेत' ऐप

समाचार नामा 17 Aug 2026 4:18 pm

नितिन नबीन की नई BJP टीम का ऐलान, स्मृति ईरानी महासचिव तो वसुंधरा राजे-राम माधव को उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी

नितिन नबीन की नई टीम में स्मृति ईरानी की नियुक्ति को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अमेठी की पूर्व सांसद और केंद्रीय मंत्री रह चुकीं ईरानी को पार्टी संगठन में महासचिव की जिम्मेदारी दी गई है। वह राष्ट्रीय स्तर पर संगठन के कामकाज में अहम भूमिका निभाएंगी।

देशबन्धु 17 Aug 2026 3:38 pm

भारतीय परमाणु हथियारों के विरोध से लेकर

चिदंबरम की भारत और विकास विरोधी मानसिकता उनके हर फैसले में साफ झलकती है। कभी उन्हें डिजिटल इंडिया से समस्या हुई कभी उन्होंने भगवा आतंक का नैरेटिव गढ़ा।

ऑप इंडिया 17 Aug 2026 3:23 pm

झारखंड छात्र आंदोलन पर कांग्रेस का समर्थन, बोली-जायज मांगों का जल्द हो समाधान

झारखंड छात्र आंदोलन पर कांग्रेस का समर्थन, बोली-जायज मांगों का जल्द हो समाधान

समाचार नामा 17 Aug 2026 2:24 pm

टीईटी विवाद: अपनी शिकायतें केंद्र तक ले जाने पर 5 शिक्षकों को सस्पेंड करने के लिए जगन ने चंद्रबाबू नायडू की आलोचना की

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समाचार नामा 17 Aug 2026 2:23 pm

केरल वंदे मातरम विवाद: राजीव चंद्रशेखर के आरोपों पर सीपीएम नेता का पलटवार, किया राज्य सरकार का बचाव

केरल वंदे मातरम विवाद: राजीव चंद्रशेखर के आरोपों पर सीपीएम नेता का पलटवार, किया राज्य सरकार का बचाव

समाचार नामा 17 Aug 2026 2:20 pm

सीएम भूपेंद्र पटेल सैन फ्रांसिस्को पहुंचे, 'वाइब्रेंट गुजरात 2027' से पहले निवेशकों से करेंगे मुलाकात

सीएम भूपेंद्र पटेल सैन फ्रांसिस्को पहुंचे, 'वाइब्रेंट गुजरात 2027' से पहले निवेशकों से करेंगे मुलाकात

समाचार नामा 17 Aug 2026 2:16 pm

अन्नामलाई का मोदी सरकार पर निशाना: 'गुजरात-केंद्रित विकास व निवेश-इवेंट नहीं चलेगा'

तमिलनाडु बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष के. अन्नामलाई ने पार्टी छोड़ने के बाद अब मोदी सरकार पर आरोप लगाया है कि एक ही राज्य में अवसर पैदा करना भारत के विकास का मॉडल नहीं हो सकता। सभी एआई कंपनियों से लेकर कॉमनवेल्थ गेम्स तक गुजरात में जा रहे हैं।

सत्य हिंदी 17 Aug 2026 1:49 pm

'कांग्रेस कितने भी प्रमाण दें, देशभक्त नहीं हो सकते', 'वंदे मातरम' विवाद पर भाजपा सांसद ने बोला हमला

'कांग्रेस कितने भी प्रमाण दें, देशभक्त नहीं हो सकते', 'वंदे मातरम' विवाद पर भाजपा सांसद ने बोला हमला

समाचार नामा 17 Aug 2026 12:42 pm

CJI Surya Kant के प्रति बढ़ रही नाराजगी! NALSAR के बाद NLSIU Bengaluru के छात्रों ने भी जताया विरोध, BCI President Manan Kumar Mishra पर भी उठे सवाल

देश की प्रतिष्ठित कानून यूनिवर्सिटियों के छात्रों की ओर से सीजेआई सूर्यकांत का बढ़ता विरोध हर किसी को चौंका रहा है क्योंकि देश के इतिहास में ऐसा घटनाक्रम पहले कभी देखने में नहीं आया। हम आपको बता दें कि हैदराबाद की NALSAR से उठी छात्रों की असहमति अब बेंगलुरु की NLSIU तक पहुंच गई है और देखते ही देखते यह मामला एक दीक्षांत समारोह के मुख्य अतिथि के विरोध से कहीं बड़ा बन गया है। इस समय स्थिति यह है कि कानून यूनिवर्सिटियों के छात्र अब सीधे उन संस्थाओं और पदों की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं, जिन्हें कानून और न्याय की व्यवस्था का प्रहरी माना जाता है। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में CJI सूर्यकांत को लेकर छात्रों की नाराजगी, BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा की विवादित कार्रवाई और उसके बाद छात्रों के पक्ष में खड़ी होती कानून की युवा पीढ़ी है। सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि दीक्षांत समारोह में कौन आएगा, बल्कि यह है कि क्या असहमति जताने वाले कानून के छात्रों को अपनी आवाज उठाने की कीमत अपने भविष्य से चुकानी पड़ेगी? हम आपको याद दिला दें कि विवाद की शुरुआत NALSAR के छात्रों की उस आपत्ति से हुई, जिसमें उन्होंने विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को मुख्य अतिथि बनाए जाने पर असहमति जताई। छात्रों की नाराजगी का संबंध 20 जुलाई को संसद की ओर हुए छात्रों के मार्च और उस दौरान कथित पुलिस ज्यादती से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई से था। छात्रों ने CJI की अध्यक्षता वाली पीठ के रुख को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी। हालांकि बाद में उन्हीं मामलों में अदालत ने छात्रों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई पर रोक लगाई, वीडियो और CCTV फुटेज सुरक्षित रखने को कहा और स्वतंत्र जांच जैसे विकल्पों पर भी विचार किया। इसे भी पढ़ें: Manan Kumar Mishra कौन हैं? NALSAR विवाद और CJP कैंपेन से सुर्खियों में BCI चेयरमैन इस बीच CJI सूर्यकांत ने स्वयं स्पष्ट कर दिया कि उन्होंने NALSAR का निमंत्रण स्वीकार ही नहीं किया था। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने निमंत्रण स्वीकार नहीं किया तो उनके वहां जाने का सवाल ही नहीं उठता। यानी जिस विवाद ने इतना बड़ा रूप ले लिया, उसमें CJI की ओर से मुख्य अतिथि बनने की सहमति ही नहीं थी। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। असली तूफान तब आया जब इस छात्र विरोध में बार काउंसिल ऑफ इंडिया यानी BCI कूद पड़ा। 13 अगस्त को BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा ने राज्य बार काउंसिलों को निर्देश दिया कि NALSAR के 2026 बैच के छात्रों का अधिवक्ता के रूप में नामांकन अगले आदेश तक रोक दिया जाए। BCI ने यह कदम उन छात्रों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान की जांच का हवाला देते हुए उठाया था। लेकिन यह आदेश कुछ ही घंटों में कानूनी बिरादरी और छात्रों के बीच भारी विरोध का कारण बन गया। सवाल उठा कि आखिर कुछ छात्रों के विरोध के जवाब में उनकी पूरी कक्षा के भविष्य को ही अधर में कैसे डाला जा सकता है? विरोध बढ़ा तो BCI को पीछे हटना पड़ा। संशोधित आदेश में कहा गया कि अधिकांश छात्र निर्दोष हैं और कुछ लोगों के कथित आचरण के लिए पूरी कक्षा को दंडित नहीं किया जा सकता। बाद में मनन कुमार मिश्रा ने छात्रों से माफी भी मांगी। उन्होंने कहा कि उनके किसी शब्द या पत्र से छात्रों की भावनाएं आहत हुई हों तो उन्हें इसका खेद है और छात्रों की भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए। लेकिन माफी के बाद भी सबसे बड़ा सवाल वहीं खड़ा रहा कि क्या BCI को ऐसा आदेश देने का अधिकार था? यही वह बिंदु है जहां मामला महज विवाद से निकलकर कानून के दायरे में पहुंचता है। Advocates Act, 1961 के तहत BCI का काम कानूनी शिक्षा के मानक तय करना, अधिवक्ताओं के पेशेवर आचरण को नियंत्रित करना, अनुशासनात्मक व्यवस्था और राज्य बार काउंसिलों की निगरानी करना है। लेकिन अधिवक्ताओं के रूप में नामांकन राज्य बार काउंसिलों के अधिकार क्षेत्र में आता है। ऐसे में NALSAR के छात्रों का नामांकन रोकने का निर्देश BCI के अधिकार-क्षेत्र की सीमा को लेकर गंभीर सवाल खड़ा करता है। यहीं से विवाद ने एक नया रूप लिया। बेंगलुरु के NLSIU के छात्रों और पूर्व छात्रों ने NALSAR के छात्रों के समर्थन में मोर्चा खोल दिया। 165 स्नातक छात्रों, 409 वर्तमान छात्रों और 128 पूर्व छात्रों सहित 700 से अधिक लोगों ने संयुक्त बयान जारी किया। उन्होंने NALSAR के छात्रों और शिक्षकों के प्रति बिना शर्त समर्थन जताते हुए अपने विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में CJI सूर्यकांत और BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा की उपस्थिति पर भी आपत्ति दर्ज कर दी। NLSIU के छात्रों ने BCI से सार्वजनिक और बिना शर्त माफी की मांग की। उन्होंने छात्रों और शिक्षकों की पहचान बताने के निर्देश को “विच-हंट” बताते हुए कहा कि ऐसी कार्रवाई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर डर पैदा कर सकती है। उनका तर्क है कि संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को अपनी बात कहने का अधिकार देता है और किसी वैधानिक संस्था की शक्ति का इस्तेमाल असहमति दबाने के लिए नहीं किया जा सकता। छात्रों ने BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा के पुराने बयानों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने प्रदर्शनकारी छात्रों को लेकर उनकी कथित टिप्पणियों का हवाला देते हुए कहा कि इस तरह की भाषा ने कानूनी संस्थाओं में भरोसे को नुकसान पहुंचाया है। दूसरी ओर, मनन कुमार मिश्रा ने अब छात्रों को देश के सबसे जागरूक और विवेकशील युवाओं में बताते हुए कहा है कि शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का हिस्सा है और छात्रों को अपने फैसले स्वतंत्र रूप से लेने चाहिए। इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शायद यही है कि कानून पढ़ने वाले छात्र अब केवल कानून के दर्शक नहीं बने रहना चाहते। वे उस कानून को अपने ऊपर लागू होते हुए भी देख रहे हैं और उसी के आधार पर सवाल भी पूछ रहे हैं। NALSAR से NLSIU तक पहुंची यह आवाज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आज के ये छात्र ही कल के वकील, वरिष्ठ अधिवक्ता, शिक्षक और न्यायाधीश होंगे। यदि कानून के संस्थानों से जुड़े सवालों पर सवाल उठाना ही अनुशासनहीनता मान लिया जाएगा, तो लोकतंत्र में असहमति की जगह कहां बचेगी? उधर, BCI के लिए भी यह घटना आत्ममंथन का अवसर है। जिस संस्था पर देश में कानूनी पेशे के स्तर और अनुशासन को बनाए रखने की जिम्मेदारी है, उससे यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वह अपनी हर कार्रवाई को स्पष्ट वैधानिक अधिकार और संस्थागत प्रक्रिया के आधार पर ही करे। NALSAR प्रकरण ने दिखा दिया है कि कानून की सबसे बड़ी ताकत उसका अधिकार नहीं, बल्कि उस अधिकार का संयमित और न्यायपूर्ण इस्तेमाल है। फिलहाल तस्वीर साफ है। एक तरफ देश की कानूनी व्यवस्था के शीर्ष पद हैं, दूसरी तरफ देश की प्रतिष्ठित कानून यूनिवर्सिटियों के छात्र। और इन छात्रों का संदेश भी उतना ही साफ है कि पद बड़ा हो सकता है, लेकिन संविधान उससे बड़ा है; संस्था शक्तिशाली हो सकती है, लेकिन कानून उससे ऊपर है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 17 Aug 2026 11:47 am

'हिंदुओं को किसी तरह सहन कर रहे हैं पाकिस्तान के मुसलमान', Zardari के इस बयान पर भड़के Javed Akhtar, Pakistan President को दिखाया आईना

पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने अपने ही देश की हिंदू आबादी को लेकर ऐसा बयान दिया है, जिसने पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों की स्थिति और वहां की तथाकथित धार्मिक सहिष्णुता के दावों पर फिर से बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। हम आपको बता दें कि स्वतंत्रता दिवस समारोह से जुड़े एक कार्यक्रम में जरदारी ने भारत और पाकिस्तान की तुलना करते हुए पाकिस्तान में रहने वाले हिंदुओं को लेकर ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया, जिसे लेकर तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। सबसे सख्त पलटवार मशहूर लेखक और गीतकार जावेद अख्तर ने किया है। जरदारी ने कहा कि भारत और पाकिस्तान को लेकर दोनों देशों का नजरिया अलग है। उन्होंने कहा कि भारत 'अखंड भारत' की सोच रखता है, जबकि पाकिस्तान एक मुस्लिम देश है। इसके बाद उन्होंने पाकिस्तान की हिंदू आबादी का जिक्र करते हुए कहा कि वहां मुसलमान 3-4 प्रतिशत हिंदू आबादी को 'टॉलरैट' यानी 'सहन' करते हैं। जरदारी ने यह दावा भी किया कि पाकिस्तान में हिंदू उतने ही स्वतंत्र और सुरक्षित हैं, जितने वे कहीं और हो सकते हैं। उन्होंने यहां तक कह दिया कि पाकिस्तान के हिंदू भारत की बजाय पाकिस्तान के साथ रहना ज्यादा पसंद करेंगे। इसे भी पढ़ें: पाकिस्तानी राष्ट्रपति Asif Ali Zardari का दावा- Pakistan में हिंदू सुरक्षित और भारत से ज्यादा यहीं रहना करते हैं पसंद देखा जाये तो यहीं जरदारी के बयान की सबसे बड़ी विडंबना सामने आती है। जिस देश के राष्ट्रपति को अपने नागरिकों की बराबरी, सुरक्षा और सम्मान की बात करनी चाहिए, वही राष्ट्रपति अल्पसंख्यक समुदाय के लिए 'हम उन्हें सहते हैं' जैसी भाषा इस्तेमाल करता दिखाई दे रहा है। देखा जाये तो सवाल सिर्फ एक शब्द का नहीं है। सवाल उस मानसिकता का है जिसमें किसी देश के नागरिकों के अधिकारों को उनके धर्म के आधार पर बहुसंख्यक समुदाय की 'सहनशीलता' से जोड़ दिया जाता है। जरदारी का बयान इसलिए भी निशाने पर है क्योंकि उनके आधिकारिक बयानों में पाकिस्तान को अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने वाला देश बताया जाता रहा है। अगस्त 2025 में अल्पसंख्यक दिवस के मौके पर जरदारी ने संविधान के तहत सभी नागरिकों को समान अधिकार देने, धार्मिक भेदभाव के खिलाफ खड़े होने और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की प्रतिबद्धता जताई थी। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि संवैधानिक बराबरी और सार्वजनिक मंच पर 'हम हिंदुओं को सहते हैं', इन दोनों में से पाकिस्तान की असली सोच कौन-सी है? दूसरी ओर, जरदारी के बयान पर जावेद अख्तर ने बिना किसी लाग-लपेट के सीधा हमला किया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति कहते हैं कि उनके देश में 3-4 प्रतिशत हिंदू आबादी को 'टॉलरैट' किया जाता है। इसके बाद अख्तर ने जरदारी के पुराने चर्चित उपनाम 'Mr Ten Percent' को पकड़ते हुए ऐसा तंज कसा, जिसने पूरे बयान को और ज्यादा राजनीतिक रूप से विस्फोटक बना दिया। जावेद अख्तर ने कहा कि वह समझ सकते हैं कि जरदारी हमेशा से उन लोगों के प्रति असंवेदनशील रहे हैं जो '10 प्रतिशत से कम' हैं। यह एक सीधा और बेहद धारदार व्यंग्य था। जरदारी के 'Mr Ten Percent' उपनाम को उनके हिंदुओं के '3-4 प्रतिशत' वाले बयान से जोड़कर अख्तर ने एक ही वार में उनकी संवेदनशीलता और नैतिकता दोनों पर सवाल खड़ा कर दिया। हम आपको बता दें कि 'Mr Ten Percent' उपनाम जरदारी पर लगे पुराने भ्रष्टाचार के आरोपों से जुड़ा रहा है। 1980 और 1990 के दशक में उन पर सरकारी परियोजनाओं और कारोबारी सौदों में 10 प्रतिशत कमीशन मांगने के आरोप लगाए गए थे। जरदारी ने इन आरोपों से इंकार किया था, लेकिन यह उपनाम लंबे समय तक उनकी राजनीतिक पहचान से जुड़ा रहा। अख्तर ने इसी पुराने संदर्भ को जरदारी के मौजूदा बयान के साथ जोड़कर उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया। वैसे भी जावेद अख्तर की यह प्रतिक्रिया कोई अचानक पैदा हुआ आक्रोश भी नहीं है। वह लंबे समय से पाकिस्तान की आतंकवाद और भारत विरोधी नीतियों पर खुलकर बोलते रहे हैं। पिछले वर्ष मुंबई में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा था कि भारत ने पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने के लिए सांस्कृतिक और दूसरे स्तरों पर प्रयास किए, लेकिन पाकिस्तान की तरफ से रिश्ते सुधारने के लिए ठोस प्रयास नहीं हुए। उन्होंने सीमा पार आतंकवाद और आतंकियों को पनाह देने के मुद्दे पर भी पाकिस्तान को घेरा था। इसके अलावा, जरदारी के बयान ने एक पुराने सवाल को फिर जिंदा कर दिया है कि क्या पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकार वास्तव में नागरिक अधिकार हैं या बहुसंख्यक समाज की 'मेहरबानी'? अगर हिंदुओं को इसलिए 'स्वतंत्र' बताया जा रहा है क्योंकि बहुसंख्यक उन्हें 'सहन' करते हैं, तो फिर बराबरी का दावा खोखला ही नजर आता है। और यही वह बिंदु है जहां जावेद अख्तर का पलटवार जरदारी के बयान से कहीं आगे निकल जाता है। उन्होंने सिर्फ एक राष्ट्रपति के शब्दों पर आपत्ति नहीं जताई, बल्कि उस सोच पर चोट की जिसमें अल्पसंख्यकों के अधिकारों को बहुसंख्यक की सहनशीलता से तौला जाता है। बहरहाल, जरदारी के लिए यह बयान महज एक भाषण की पंक्ति हो सकती है, लेकिन अख्तर ने उसी पंक्ति को आईना बना दिया। '3-4 प्रतिशत' हिंदुओं को 'सहन' करने का दावा करने वाले पाकिस्तान के राष्ट्रपति को जवाब देते हुए उन्होंने '10 प्रतिशत' वाले तंज से यह संदेश साफ कर दिया कि नागरिक अधिकार किसी बहुसंख्यक की दया नहीं होते।

प्रभासाक्षी 17 Aug 2026 11:15 am

बीजेपी संगठन में बड़ा फेरबदल: स्मृति ईरानी और राम माधव की वापसी, अमित मालवीय की छुट्टी

बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन की नई टीम में स्मृति ईरानी को राष्ट्रीय महासचिव और राम माधव को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है, जबकि अमित मालवीय को आईटी सेल प्रमुख के पद से हटा दिया गया है।

सत्य हिंदी 17 Aug 2026 11:06 am

आज से शुरू होगा आंध्र विधानसभा सत्र - किसानों और राजधानी परियोजना पर चर्चा

आंध्र प्रदेश विधानसभा का मानसून सत्र सोमवार से शुरू होगा। इस दौरान एल नीनो के प्रभाव, किसानों से जुड़े मुद्दों और अमरावती राजधानी परियोजना के कामों की प्रगति सहित कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा होने की संभावना है।

देशबन्धु 17 Aug 2026 7:30 am

शहज़ाद पूनावाला ने दूसरी बार इस्तीफा भेजा, आग्रह किया- स्वीकार करें

शहज़ाद पूनावाला का पहला इस्तीफा बीजेपी ने नामंजूर कर दिया था। अब उन्होंने फिर से यह कहते हुए इस्तीफा भेजा है कि वे निजी क्षेत्र में जाना चाहते हैं, उनकी कुछ मजबूरियां भी हैं। शहज़ाद ने प्रवक्ता और पार्टी दोनों से इस्तीफा दिया है।

सत्य हिंदी 17 Aug 2026 6:41 am

मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने मध्य प्रदेश के यूसीसी कानून को बताया संविधान विरोधी, कहा- मुसलमान मानने को बाध्य नहीं

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समाचार नामा 16 Aug 2026 8:25 pm

पश्चिम बंगाल : ममता बनर्जी ने पूर्व तृणमूल विधायक आशीष बनर्जी के निधन पर दुख जताया

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समाचार नामा 16 Aug 2026 8:25 pm

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समाचार नामा 16 Aug 2026 6:35 pm

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समाचार नामा 16 Aug 2026 6:29 pm

राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान का पूरा सम्मान किया जाना चाहिए: सीजेपी प्रवक्ता आशुतोष रांका

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समाचार नामा 16 Aug 2026 6:25 pm

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समाचार नामा 16 Aug 2026 6:21 pm

'दिमागी नक्सल' वाले बयान पर भाजपा ने कांग्रेस को घेरा, चिदंबरम पर नक्सलियों के बचाव करने का लगाया आरोप

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समाचार नामा 16 Aug 2026 4:10 pm

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समाचार नामा 16 Aug 2026 2:34 pm

पश्चिम बंगाल: कांग्रेस नेता और बेटे की हत्या में टीएमसी से जुड़ी महिला पंचायत प्रधान समेत 3 गिरफ्तार

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समाचार नामा 16 Aug 2026 2:24 pm

राहुल गांधी ने की पुणे में 'छात्रों की गूंज' की घोषणा- 'अब लड़कियां बोलेंगी, देश सुनेगा'

राहुल गांधी ने कहा, 'मुझे हर एक युवा पर गर्व है - खासकर उन लड़कियों पर, जिन्हें बीजेपी के गुंडों की बदसलूकी, गाली-गलौज और हिंसा का सामना करना पड़ा, यहां तक कि उन्हें प्रधानमंत्री से माफी मांगने के लिए मजबूर किया गया। लेकिन अब उनकी आवाज़ दबाई नहीं जा सकेगी।'

सत्य हिंदी 16 Aug 2026 1:25 pm

कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम बोले- 'मुझे दिमागी नक्सल होने पर गर्व'

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समाचार नामा 16 Aug 2026 10:11 am

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समाचार नामा 15 Aug 2026 8:03 pm

Gen Alpha को जोड़ने की तैयारी? अभिजीत दीपके ने छेड़ा ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान, प्राइवेट स्कूलों की फीस तय करने की मांग

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समाचार नामा 15 Aug 2026 6:30 pm

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समाचार नामा 15 Aug 2026 6:27 pm

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समाचार नामा 14 Aug 2026 9:36 pm