तेलंगाना: एससी-एसटी समुदायों के यौन उत्पीड़न पीड़ितों को 'ग्रीन चैनल' से फंड जारी करने का निर्देश
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भाजपा की संगठनात्मक भूमिका जिम्मेदारी है, पद नहीं : हरियाणा सीएम सैनी
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चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग की तीन दिवसीय अमेरिका यात्रा के कूटनीतिक मायने
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निमंत्रण पर 23 से 25 सितंबर 2026 तक अमेरिका की राजकीय यात्रा पर रहेंगे। शी जिनपिंग 23 सितंबर को वाशिंगटन पहुंचेंगे। उनका यह दौरा 25 सितंबर को समाप्त होगा, जिसके बाद उनकी वापसी होगी। इस दौरान दोनों नेताओं के बीच शिखर वार्ता होगी, जिसमें व्यापार, टैरिफ, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और अन्य वैश्विक मुद्दों पर चर्चा की जाएगी। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की अमेरिका यात्रा वैश्विक भू-राजनीति (Geopolitics) और दोनों देशों के रिश्तों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा शी जिनपिंग का स्वागत करने और स्टेट डिनर देने के फैसले से साफ है कि दोनों महाशक्तियां तनाव को कम कर नए तालमेल की ओर बढ़ना चाहती हैं। लिहाजा इस यात्रा पर पूरी दुनिया के कूटनीतिज्ञों की नजर होगी। इस पर रूस और भारत की खास नजर बनी रहेगी, क्योंकि अमेरिका चाहेगा कि रूस और भारत से प्रगाढ़ हो रहे चीन के रिश्तों में कुछ खलल पैदा किया जाए। चूंकि अमेरिका ने सोवियत संघ और भारत के खिलाफ चीन को रणनीतिक मजबूती दी थी, लेकिन बाद में भी उसकी भूल साबित हुई। चीन को काबू में रखने के लिए अमेरिका ने भारत को शह दिया, लेकिन यहां भी उसका दांव उल्टा पड़ गया। इसलिए अमेरिका अब रूस और चीन से वन टू वन, और फिर जी-3 के माध्यम से बातचीत करने को उतावला है ताकि भारत, जापान, फ्रांस, दक्षिण कोरिया, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और ईरान जैसे महत्वाकांक्षी देशों को काबू में रखा जा सके। लेकिन यदि चीन व्यवहारिक कूटनीति को छोड़कर अमेरिकी मायाजाल में फंसता है तो फिर कहीं का नहीं रहेगा, क्योंकि भारत और रूस की समझदारी इतनी परिपक्व व मजबूत है कि उन्हें आंख दिखाने वाले उसी अंतर्राष्ट्रीय फजीहत को प्राप्त करेंगे, जैसा कि अभी अमेरिका भुगत रहा है। # इस यात्रा के प्रमुख कूटनीतिक मायने: एक, व्यापार युद्ध और टैरिफ में संतुलन: अमेरिका द्वारा चीनी सामानों पर अत्यधिक टैरिफ और निर्यात प्रतिबंध लगाने के बावजूद चीन ने रेयर अर्थ खनिजों और महत्वपूर्ण तकनीकों की सप्लाई रोककर कड़ा रुख अपनाया। इस यात्रा का प्राथमिक उद्देश्य नए व्यापारिक समझौते की रूपरेखा तैयार करना और दोनों देशों के बीच जारी आर्थिक/व्यापारिक तनाव को कम करना है। दो, रेयर अर्थ और AI की होड़: स्मार्टफोन, रक्षा सामग्री, इलेक्ट्रिक वाहनों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के लिए आवश्यक रेयर अर्थ खनिजों की वैश्विक आपूर्ति पर चीन का नियंत्रण है। अमेरिका अपनी सप्लाई चेन को सुरक्षित रखना चाहता है, जबकि चीन अमेरिका द्वारा सेमीकंडक्टर/चिप तकनीक पर लगाए गए प्रतिबंधों में ढील चाहता है। तीन, वैश्विक स्थिरता और मध्य-पूर्व संकट: दुनिया के दो बड़े नेताओं का मिलना वैश्विक बाजारों और अर्थव्यवस्था में स्थिरता का संदेश देता है। वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ते तनाव और रणनीतिक समुद्री रास्तों को सुचारू रखने जैसे मुद्दों पर दोनों देश कूटनीतिक सहयोग की गुंजाइश तलाश रहे हैं। चार, ताइवान और क्षेत्रीय सुरक्षा: चीन हमेशा से ताइवान पर अपने संप्रभु अधिकारों का दावा करता आया है। इस बैठक में अमेरिकी हथियारों की ताइवान को बिक्री पर चर्चा हो सकती है। बीजिंग इस मंच का इस्तेमाल अमेरिका को ताइवान के मामले में हस्तक्षेप कम करने का कूटनीतिक दबाव बनाने के लिए करेगा। # कूटनीतिक संदर्भ के क्षेत्र, अमेरिकी हित और चीनी हित व्यापार में अमेरिकी सोयाबीन व कृषि उत्पादों की बिक्री व बाजार पहुंच पर डील करेगा, जबकि चीन टैरिफ दरों में कमी और आर्थिक स्थिरता पर जोर देगा। - तकनीक में अमेरिका AI और सेमीकंडक्टर क्षेत्र में अपनी बढ़त बनाए रखना चाहेगा, जबकि चीन अमेरिकी टेक एक्सपोर्ट बैन और प्रतिबंधों से राहत चाहेगा। - सप्लाई चेन में अमेरिका रेयर अर्थ मिनरल्स की बिना बाधा आपूर्ति चाहेगा, जबकि चीन वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग में केंद्रीय भूमिका बनाए रखना चाहेगा। # अमेरिका और चीन की डील से भारत और रूस पर क्या- क्या असर पड़ सकते हैं? अमेरिका और चीन की यह द्विपक्षीय बातचीत और 'प्रबंधित प्रतिस्पर्धा' की दिशा में कदम भारत और रूस के रणनीतिक और आर्थिक हितों पर गहरा प्रभाव डालते हैं, क्योंकि अमेरिका और चीन पुराने अंतर्राष्ट्रीय सहयोगी रहे हैं? # अमेरिका और चीन की डील से भारत पर असर एक, सामरिक दबाव : भारत के लिए अमेरिका-चीन का संबंध एक दोधारी तलवार है। यदि अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक या रणनीतिक सहमति बनती है, तो भारत को डर रहता है कि अमेरिका इंडो-पैसिफिक रीजन में चीन के खिलाफ उतनी सख्ती नहीं दिखाएगा, जितनी भारत अपनी सुरक्षा (जैसे LAC विवाद) के लिए चाहता है। दो, क्वाड (QUAD) का भविष्य: यदि ट्रंप-शी वार्ता से दोनों देशों के बीच तनाव कम होता है, तो 'क्वाड' (अमेरिका, भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया) का जो सैन्य और रणनीतिक जोर चीन को घेरने पर था, वह थोड़ा सुस्त पड़ सकता है। तीन, सप्लाई चेन और व्यापार: चीन और अमेरिका के बीच व्यापारिक गतिरोध कम होने से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में जो विकल्प भारत (Make in India) के रूप में उभर रहा था, उस गति पर असर पड़ सकता है। हालांकि, अमेरिका-चीन की तकनीकी प्रतिस्पर्धा बनी रहने के कारण भारत को टेक/सेमीकंडक्टर निर्माण में फायदा मिलता रहेगा। चार, भारत को वैश्विक बाजार और तेल की कीमतों में स्थिरता का लाभ मिलता है जबकि चीन के खिलाफ अमेरिका का कड़ा समर्थन कम होने और ट्रेड में दबाव का जोखिम बना रहेगा। # अमेरिका और चीन की डील से रूस पर असर एक, चीन पर बढ़ती निर्भरता: रूस और चीन वर्तमान में असीमित साझेदारी में हैं। लेकिन यदि चीन और अमेरिका अपने आर्थिक रिश्तों को सुधार लेते हैं, तो रूस को डर रहेगा कि चीन अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव में आकर रूस को मिलने वाली आर्थिक और तकनीकी मदद को सीमित कर सकता है। दो, रूस-यूक्रेन युद्ध और कूटनीति: अमेरिका-चीन शिखर वार्ता में यदि रूस-यूक्रेन संघर्ष या वैश्विक प्रतिबंधों पर कोई गुप्त सहमति बनती है, तो मॉस्को के लिए पश्चिमी प्रतिबंधों से बचने के रास्ते (जैसे चीन के जरिए व्यापार) कठिन हो सकते हैं। तीन, मॉस्को की रणनीतिक स्थिति: रूस नहीं चाहता कि अमेरिका और चीन इतने करीब आ जाएं कि दुनिया में फिर से अमेरिका-चीन की G2 (दो महाशक्तियों का प्रभुत्व) वाली व्यवस्था स्थापित हो जाए, क्योंकि इससे रूस का वैश्विक वजन कम होता है। चार, रूस को चीन से आर्थिक व्यापार जारी रहने की उम्मीद रहेगी। जबकि चीन द्वारा अमेरिकी प्रतिबंधों के डर से रूस को दी जाने वाली मदद सीमित करने का जोखिम बना रहेगा। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
नशे के खिलाफ भाजपा के अभियान से 'आप' की भगवंत मान सरकार घबरा गई : अनिल विज
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संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रासंगिकता पर उठते सवाल
अमेरिका-ईरान युद्ध हो या फिर रुस यूक्रेन युद्ध और इसी तरह दुनिया के देशों के सामने आ रही गंभीर समस्याओं के चलते संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रासंगिकता पर सवाल उठने लगे हैं। अमेरिका-ईरान युद्ध के चलते आज दुनिया के देश ईंधन की समस्या से दो चार हो रहे हैं। शक्तिशाली देशों के दादागिरी चरम पर पहुंचती जा रही है। आज हार्मुज का रास्ता बंद है तो अन्य वैकल्पिक रास्तों पर भी अवरोध आ रहे हैं। दुनिया के अन्य देशों की समस्याओं के प्रति कोई गंभीर नहीं है। पेट्रोल पदार्थों और एलपीजी की आवाजाही प्रभावित होने से ईंधन के भावों में बेतहासा बढ़ोतरी हो रही है। ऊर्जा संकट हो रहा है। आवागमन के साधनों का प्रमुख माध्यम पेट्रोल-डीजल आदि है और उनकी उपलब्धता पर पड़ रहे असर के कारण सभी देशों में सीधे आमजन प्रभावित हो रहे हैं। आखिर ऐसे समय में ही संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। पर जो तस्वीर सामने आ रही हैं वह साफ है कि युद्ध करने वाले देशों पर दबाव ड़ालने की स्थिति में ना तो कोई वैश्विक संस्था रह गई है और ना ही कोई सर्वमान्य वैश्विक नेता। आखिर यह कोई एक दिन का पराभव तो नहीं हैं बल्कि देखा जाएं तो संयुक्त राष्ट्र को तो योजनाबद्ध तरीके से शक्तिहीन किया गया है। अमेरिका जैसे देशों द्वारा बिना बजह फण्डिंग बाधित या कम की जाती है तो वीटो पॉवर स्वयं में नकारात्मक भूमिका में है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में नए सदस्यों के प्रवेश को टाला जा रहा है तो इसे पंगु बनाने में कोई कमी नहीं छोड़ी जा रही है। इसमें कोई दो राय नहीं कि कोविड के दौरान संयुक्त राष्ट्र संघ ने सकारात्मक भूमिका निभाई। देशों के बीच परस्पर सहयोग व समन्वय का परिणाम यह रहा कि दुनिया के देश कोविड वैश्विक संकट से मुकाबला करने में सफल रहे। खैर पर दुनिया के देशों के बीच युद्ध, युद्ध के हालात और तनाव की स्थिति को कम करने में संयुक्त राष्ट्र संघ पूरी तरह विफल रहा है। इस विफलता के कारणों का अलग से विश्लेषण किया जा सकता है। पर एक बात साफ है कि आज संयुक्त राष्ट्र संघ पर समग्र रुप से देखा जाएं तो भरोसा 57 प्रतिशत ही रह गया है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रति नकारात्मक विचार रखने वालों का प्रतिशत 37 प्रतिशत ही है। भरोसे के यह आंकड़ें अगस्त 26 के ही हैं और यह प्यू रिसर्च की हालिया रिपोर्ट में सामने आये हैं। दुनिया के देशों में संयुक्त राष्ट्र संघ पर सबसे कम भरोसा करने वाला देश इजरायल है। इजरायल के 79 प्रतिशत लोग संयुक्त राष्ट्र संघ पर भरोसा नहीं रखते। इजरायल ही क्या जापान, तुर्की, पाकिस्तान, ग्रीस, फिलिस्तीनी क्षेत्र के देश आदि ऐसे देष है जो यूएन पर भरोसे के मामले में लकारात्मक सोच रखते हैं। हांलाकि कनाड़ा, अमेरिका, नाइजीरिया, अधिकांश योरोपीय देश, घाना, केन्या व अधिकांश एशिया प्रशांत के देशों का भरोसा अधिक है। यह देश संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रति सोच सकारात्मक रखते हैं। नाइजीरिया, फ्रांस यहां तक कि अमेरिका आदि में संयुक्त राष्ट्र् के प्रति सकारात्मकता में अच्छी खासी गिरावट देखने को मिली है। दुनिया के देशों में एकमात्र श्रीलका ऐसा देश है जहां संयुक्त राष्ट्र् संघ के प्रति भरोसे में बढ़ोतरी देखी गई है। इसे भी पढ़ें: Imran Khan की पार्टी के कार्यकर्ताओं की हड्डी-पसली तोड़ने की तैयारी! Pakistan में बड़ी संख्या में लोगों के घायल होने की संभावना के चलते खाली कराये जा रहे अस्पताल सौ टके का सवाल यह है कि आज यूएन दुनिया के देशों के बीच संघर्ष या तनाव कम करने में निर्णायक भूमिका नहीं निभा पा रहा है। अमेरिका-ईरान या रुस-यूक्रेन युद्ध सबके सामने है। यह कोई दो देशों के बीच युद्ध नहीं है अपितु इन युद्धों की आंच दुनिया के अधिकांश देशों पर किसी ना किसी रुप में पहुंच रही है। आज वर्चस्व सिद्ध करने या दादागिरी ही एक मात्र ध्येय रह गया है। पर रुस और अमेरिका अभी भी यह नहीं समझ पा रहे कि युद्धारंभ से पहले चंद घंटों या चंद दिनों का युद्ध समझ कर जोश में आ गए थे आज हालात उनके लिए ना निगलते बन रही हैं और ना ही निगलते बन रही है। इन युद्धों ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि सामने वाला देश कितना भी छोटा क्यों ना हो पर युद्ध को लंबा किसनी की क्षमता उसमें हैं। अमेरिका इजरायल ने जब ईरान पर आक्रमण किया तब उन्होंने बहुत गाल बजाएं थे पर आज जो हालात है वह सबके सामने हैं। यही रुस यूक्रेन की बात है चंद दिनों का युद्ध कब सालों लंबा युद्ध होता जा रहा है यह सबके सामने हैं। आज संयुक्त राष्ट्र संघ प्रभावी या कारगर होता तो हालात इतने खराब नहीं होते। आज संयुक्त राष्ट्र संघ नख-दंत विहीन संस्था रह गया है। अमेरिका सहित विकसित देश फण्डिंग में कमी कर देते हैं या रोक देते हें तो यूएन अपने आप में इतना सक्षम नहीं है कि देशों पर दबाव बना सके। सुरक्षा परिषद का वीटो का अधिकार भी एक प्रमुख बाधा ही है। सुरक्षा परिषद में भारत के प्रवेश को लंबे समय से रोका जा रहा है। नए सदस्य किसी को स्वीकार ही नहीं हो रहे। एक बात साफ हो जानी चाहिए कि संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन एक सकारात्मक संदेश के साथ हुआ था। समय आ गया है जब दुनिया के देशों को संयुक्त राष्ट्र् संघ की भूमिका नए सीरे से तय करनी होगी। यूएन को दिखावटी संस्था के स्थान पर अधिकारपूर्ण और निर्णय क्षमता युक्त संस्था बनानी होगी। लोगों में विश्वास बनाना होगा कि यूएन केवल संस्था नहीं अपितु वह अपने दायित्वों को पूरा करने और दादागिरी करने वाले देशों पर लगाम लगाने की स्थिति में हो या ना हो पर एक ऐसा भ्रम तो पैदा करने की स्थिति में हो ताकि शक्तिशाली देशों की मोनोपोली को सीमित किया जा सके। - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
मध्य प्रदेश के कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने अपने बयान पर खेद जताया
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न्यूयॉर्क में भारत ने पेश किया डिजिटल हेल्थ का मॉडल, स्वास्थ्य सचिव बोलीं-'एआई से बदलेगी तस्वीर'
नई दिल्ली, 22 सितंबर (आईएएनएस)। स्वास्थ्य सचिव पुण्या सलिला श्रीवास्तव ने न्यूयॉर्क में भारत के वाणिज्य दूतावास में आयोजित 'ग्राउंडिंग द फ्रंटियर: ए ग्लोबल साउथ एआई फ्रेमवर्क' विषय पर चर्चा के दौरान ग्लोबल साउथ के लिए एआई और डिजिटल हेल्थ इनोवेशन में भारत के अनुभव को साझा किया। उन्होंने कहा कि भारत यह दिखा रहा है कि कैसे मजबूत डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और संदर्भ-आधारित डेटा से चलने वाली एआई बड़े पैमाने पर हेल्थकेयर सर्विस को बदल सकती है।
108 एम्बुलेंस हड़ताल मामला : कर्नाटक भाजपा ने सेवा में रुकावट के खिलाफ चेतावनी दी, तुरंत कार्रवाई की मांग
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चीन पर चढ़ा Made In India का खुमार, 5 महीने में 9.36 अरब की शॉपिंग
जिस चीन के साथ भारत का व्यापार लंबे समय से एकतरफा नजर आता रहा है। अब भारतीय सामान की डिमांड तेजी से यहां बढ़ रही है। सिर्फ 5 महीने में चीन ने भारत से करीब ₹9.6 अरब डॉलर यानी लगभग ₹80,000 करोड़ का सामान खरीदा है। लेकिन इसको लेकर सबसे बड़ी बात यह है कि यह आंकड़ा पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले करीब 39% ज्यादा है। यानी दुनिया के सबसे बड़े मैन्युफैक्चरिंग देशों में शामिल चीन अब भारत से भी ज्यादा सामान मंगवाने लगा है। लेकिन आखिर ऐसा क्यों बदल रहा है? चीन के बाजार में मेड इन इंडिया की पकड़ बढ़ती कैसे दिखाई दे रही है? क्या यह भारत चीन की व्यापारिक किशस्तों में किसी बड़े बदलाव का संकेत है? ताजा कॉमर्स मिनिस्ट्री के आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल से अगस्त तक 2026 के दौरान भारत का चीन को निर्यात कुल 39% बढ़कर यहां पर 9.6 अरब डॉलर पहुंच गया है। ये आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस अवधि में भारत के पुराने ब्रिक्स सम साझेदार चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका को कुल भारतीय निर्यात 34% बढ़कर यहां पर 19.9 अरब डॉलर हो गया है। यानी इन चार देशों के बीच चीन भारत के निर्यात का सबसे बड़ा बाजार रहा। यह बढ़ोतरी ऐसे समय में हुई है जब भारत अपने मैन्युफैक्चरिंग बेस को बढ़ाना चाहता है और ग्लोबल सप्लाई चेन में बड़ी भूमिका निभाना चाहता है। इस कोशिश में इलेक्ट्रॉनिक्स एक अहम सेक्टर बनकर उभरा है। सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि अप्रैल-अगस्त की अवधि में चीन को इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट पिछले साल के मुकाबले 15 प्रतिशत से ज़्यादा बढ़ा। इससे पहले पिछले फाइनेंशियल ईयर के दौरान इलेक्ट्रॉनिक्स शिपमेंट में ज़बरदस्त बढ़ोतरी हुई थी। इसे भी पढ़ें: Iranian Airlines के Flight संचालन पर गहराएगा संकट, US प्रतिबंधों पर China से बातचीत जारी चीन भारत से खरीद क्यों रहा है? हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इलेक्ट्रॉनिक्स इस बढ़ोतरी के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में शामिल है। भारत से चीन जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक्स सामान जो हैं इसमें प्रिंटेड सर्किट बोर्ड्स हैं, स्मार्टफोनस हैं, डिस्प्ले मॉड्यूल्स और टेलीकॉम इक्विपमेंट जैसी तमाम चीजें शामिल हैं। ऐसे में वैश्विक स्तर पर एआई डाटा सेंटर्स और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की जो मांग है इससे बढ़ रही है जिससे इलेक्ट्रॉनिक सप्लाई चेन में भी ज्यादा बदलाव देखने को मिल रहा है और भारत इस बढ़ती मांग का एक हिस्सा पकड़ने की कोशिश कर रहा है। इसका मतलब यही है कि चीन ने भारतीय सामान के लिए अपना पूरा बाजार खोल दिया है। या फिर यह इसको आप ऐसे नहीं देख सकते कि भारत चीन का व्यापार संतुलित अभी धीरे-धीरे होता नजर आएगा। उदाहरण के लिए अगर आपको समझाएं तो अप्रैल और अगस्त 2026 27 के दौरान भारत ने चीन से करीब 65.49 अरब डॉलर का सामान आयत किया। यानी भारत का चीन से आयत अभी भी चीन को किए जाने वाले निर्यात से कई गुना ज्यादा है। इस 5 महीने की अवधि में चीन भारत का सबसे बड़ा इंपोर्ट सोर्स रहा है। इसलिए 9 6 अरब डॉलर का आंकड़ा एक सकारात्मक एक्सपोर्ट डेवलपमेंट जरूर है। लेकिन इसे भारत चीन के व्यापार घाटी के खत्म होने के तौर पर देखना सही नहीं होगा। इसे भी पढ़ें: Chinese Communist Party ने Zhang Youxia और Liu Zhenli को सेना व पार्टी से निकाला AI की मांग से इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट में बढ़ोतरी मार्च में खत्म हुए फाइनेंशियल ईयर में चीन को भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट तीन गुना बढ़कर $3.18 बिलियन हो गया, हालांकि यह बढ़ोतरी एक कम शुरुआती स्तर से हुई थी। इन शिपमेंट्स में प्रिंटेड सर्किट बोर्ड असेंबली, स्मार्टफोन, डिस्प्ले मॉड्यूल और टेलीकॉम इक्विपमेंट शामिल थे। इंडस्ट्री के अधिकारियों का कहना है कि AI और डेटा सेंटर्स के ग्लोबल विस्तार से भारतीय मैन्युफैक्चरर्स के इक्विपमेंट और कंपोनेंट्स की मांग बढ़ रही है। यह बढ़ोतरी भारत के मैन्युफैक्चरिंग लक्ष्यों के लिए अहम है क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक्स उन सेक्टर्स में से एक है जिसे नई दिल्ली बढ़ाना चाहती है, क्योंकि कंपनियां अपनी सप्लाई चेन में विविधता ला रही हैं। इसे भी पढ़ें: टैरिफ पर अमेरिकी सांसद ने दी धमकी तो भारत ने भी तगड़ा सुना दिया, ट्रैप हैरान! इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट में भी बढ़ोतरी चीन को होने वाले एक्सपोर्ट में बढ़ोतरी सिर्फ़ इलेक्ट्रॉनिक्स तक ही सीमित नहीं है। ब्लूमबर्ग न्यूज़ के अनुसार, अप्रैल-अगस्त की अवधि में इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट पिछले साल के मुकाबले लगभग 21 प्रतिशत बढ़ा। इस बढ़ोतरी में मशीनरी और उसके पार्ट्स, ऑटो कंपोनेंट्स और हैंड टूल्स शामिल थे। इस व्यापक बढ़ोतरी से पता चलता है कि भारतीय मैन्युफैक्चरर्स को चीनी बाज़ार में नए मौके मिल रहे हैं। लेकिन एक्सपोर्टर्स को इस रफ़्तार को बनाए रखना होगा और ज़्यादा तरह के प्रोडक्ट्स का एक्सपोर्ट करना होगा, ताकि इन फ़ायदों का दोनों देशों के बीच व्यापार पर कोई ठोस असर पड़ सके। भारतीय एक्सपोर्ट के लिए चीन अभी भी एक छोटा बाज़ार है हाल की बढ़ोतरी के बावजूद, भारतीय सामान के लिए चीन अभी भी एक छोटा बाज़ार बना हुआ है। मार्च में खत्म हुए फाइनेंशियल ईयर में भारत के कुल एक्सपोर्ट में चीन की हिस्सेदारी लगभग 4.4 प्रतिशत रही, जो एक साल पहले 3 प्रतिशत से थोड़ी ज़्यादा थी। अमेरिका, जो भारत का सबसे बड़ा एक्सपोर्ट बाज़ार है, भारत के कुल एक्सपोर्ट का लगभग पांचवां हिस्सा है। इससे भारतीय कंपनियों के लिए चीन में अपने कारोबार को बढ़ाने, खासकर मैन्युफैक्चर्ड सामान के मामले में, काफी गुंजाइश बनती है। लेकिन भारत जो सामान चीन को बेचता है और जो वहां से खरीदता है, उसके बीच भी काफी बड़ा अंतर है। ट्रेड डेफिसिट (व्यापार घाटा) एक बड़ी समस्या बनी हुई है ब्लूमबर्ग न्यूज़ की रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च में खत्म हुए साल में भारत ने 131.6 अरब डॉलर का चीनी सामान आयात किया। भारत के कुल आयात में चीनी सामान की हिस्सेदारी लगभग 17 प्रतिशत थी। इसलिए, चीन से भारत के इंपोर्ट की वैल्यू, चीन को भारत के एक्सपोर्ट की तुलना में कई गुना ज़्यादा थी। इस वजह से, हाल ही में एक्सपोर्ट बढ़ने के बावजूद दोनों देशों के बीच ट्रेड डेफिसिट (व्यापार घाटा) में कोई खास बदलाव नहीं आया। इस बढ़ोतरी के स्वरूप को लेकर भी कुछ अनिश्चितता है। चीन के कस्टम्स डेटा में भारत से प्रिंटेड सर्किट बोर्ड के इंपोर्ट में ऐसी कोई बढ़ोतरी नहीं दिखती है। इसके बजाय, ज़्यादातर बढ़ोतरी स्मार्टफ़ोन और दूसरे टेलीकॉम प्रोडक्ट्स के मामले में दिखती है। इंडस्ट्री के अधिकारियों का कहना है कि दोनों देशों के सामानों को क्लासिफ़ाई करने के तरीकों में अंतर की वजह से यह ठीक-ठीक पता लगाना मुश्किल है कि इस बढ़ोतरी की असल वजह क्या है। दिशा में बदलाव, लेकिन अभी पूरी तरह उलटाव नहीं हाल के वर्षों में रिश्ते काफी खराब होने के बाद, भारत और चीन अपने आर्थिक संबंधों को बेहतर बनाने की कोशिश कर रहे हैं, और इसी वजह से एक्सपोर्ट में बढ़ोतरी हुई है। ग्लोबल ट्रेड के तौर-तरीकों में बदलाव के साथ-साथ, दोनों पक्ष ट्रेड और सप्लाई-चेन से जुड़े मुद्दों पर भी ध्यान दे रहे हैं। भारत के लिए, चीन को एक्सपोर्ट बढ़ने से उसकी मैन्युफैक्चरिंग क्षमताएं बढ़ाने और ग्लोबल वैल्यू चेन में बड़ी भूमिका निभाने की कोशिशों को मदद मिल सकती है। लेकिन हाल के आंकड़े अभी कुल ट्रेड संबंधों में किसी बड़े बदलाव का संकेत नहीं देते हैं। भारत चीन को ज़्यादा इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग का सामान और दूसरे मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट बेच रहा है। साथ ही, भारत के ट्रेड में चीनी सामान का हिस्सा अभी भी बहुत बड़ा है। भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए तुरंत चुनौती यह है कि वे हाल की ग्रोथ को बनाए रखें और इसे कंपोनेंट्स, सब-असेंबली और तैयार प्रोडक्ट्स तक फैलाएं। बहरहाल, भारत और चीन के बीच पिछले कुछ सालों से सीमा और रणनीतिक मुद्दों को लेकर तनाव रहा है। इसके बावजूद दोनों देशों के बीच व्यापार जारी है। अब अगर राजनीतिक स्तर पर संबंध और आर्थिक संपर्क में सुधार आता है तो व्यापार के कुछ क्षेत्रों में इसका असर साफ दिखाई दे सकता है। लेकिन व्यापार के आंकड़ों से अभी यह निष्कर्ष निकाला नहीं जा सकता कि दोनों देशों के रिश्तों में व्यापक बदलाव हो चुका है।
अमेरिका अब किसी विदेशी नागरिक को अपने देश से बाहर निकालने के लिए उसके मूल देश के दरवाजे पर दस्तक देने और वहां से हरी झंडी मिलने का इंतजार नहीं करता। ट्रंप प्रशासन ने निर्वासन की पूरी परिभाषा ही बदल दी है। जिस व्यक्ति को अमेरिका से बाहर करना है, उसका देश उसे वापस लेगा या नहीं, इस बात पर अब अमेरिका माथापच्ची करने में समय नहीं गंवाता। अमेरिका अब खुद उसके लिए कोई तीसरा ठिकाना तलाश रहा है और उसे वहां पहुंचाने के लिए अपनी तिजोरी से धन खर्च कर रहा है। यानी जिस व्यक्ति को अमेरिका नहीं रखना चाहता, उसे उसके अपने देश में भेजने की बजाय किसी ऐसे देश में धकेला जा रहा है, जिससे उसका कोई नाता तक नहीं है। इस पूरी कवायद में अमेरिका उन देशों को पैसा भी दे रहा है, ताकि वे इन लोगों को अपने यहां रखने के लिए तैयार हो जाएं। यह केवल निर्वासन नहीं, बल्कि अमेरिकी धन, कूटनीतिक दबाव और वैश्विक प्रभाव के सहारे खड़ा किया जा रहा एक ऐसा तंत्र है, जिसमें अमेरिका तय कर रहा है कि उसके यहां से निकाला गया व्यक्ति आखिर दुनिया के किस कोने में पहुंचेगा। देखा जाये तो अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की आव्रजन नीति अब केवल सीमा बंद करने, गिरफ्तारी और निर्वासन तक सीमित नहीं रह गई है। अमेरिकी समाचार पत्र वॉशिंगटन पोस्ट ने अपनी एक पड़ताल में जो खुलासा किया है उससे पूरी दुनिया में हड़कंप मच गया है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिकी विदेश विभाग के जिस तंत्र का मूल काम दुनिया भर से उत्पीड़ित लोगों को शरण और पुनर्वास दिलाना था, उसी को अब दूसरे देशों में लोगों को धकेलने वाली एक विशाल निर्वासन व्यवस्था में बदल दिया गया है। इस पूरी कवायद के लिए कम से कम 410 करोड़ डॉलर की राशि स्वीकृत या प्रतिबद्ध की जा चुकी है और 31 देशों के साथ समझौते किए गए हैं। इसे भी पढ़ें: Prabhasakshi NewsRoom: Donald Trump की लोकप्रियता धड़ाम! 32% पर पहुंची Approval Rating, अमेरिकी जनता का भरोसा टूटा रिपोर्ट के मुताबिक इस पूरी व्यवस्था के केंद्र में विदेश विभाग के भीतर बनाया गया नया कार्यालय है। इसका नेतृत्व क्रिश्चियन एरहार्ट कर रहे हैं, जो पहले करीब दो दशक तक अमेरिकी दूतावासों की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े रहे थे। अब वही अधिकारी अफ्रीका और दूसरे क्षेत्रों में घूम-घूमकर सरकारों को ऐसे लोगों को स्वीकार करने के लिए तैयार कर रहे हैं, जिनका उन देशों से कोई संबंध तक नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक क्रिश्चियन एरहार्ट को कई विदेशी सरकारों के सामने सामान्य अधिकारी नहीं, बल्कि सीधे व्हाइट हाउस के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। उनके पीछे ट्रंप प्रशासन के प्रभावशाली अधिकारी स्टीफन मिलर की निर्णायक भूमिका बताई गई है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अमेरिका इन देशों को केवल कूटनीतिक दबाव से नहीं मना रहा, बल्कि भारी आर्थिक प्रोत्साहन भी दे रहा है। कम से कम 81 करोड़ डॉलर सीधे 13 विदेशी सरकारों को देने की प्रतिबद्धता सामने आई है। इसके अतिरिक्त अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन के लिए 179 करोड़ डॉलर और संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी संस्था के लिए 124 करोड़ डॉलर की राशि का प्रावधान किया गया है। इन संस्थाओं को इन समझौतों का प्रत्यक्ष पक्ष नहीं बताया गया है, लेकिन संबंधित देशों को निर्वासित लोगों को स्वीकार करने के लिए तैयार करने की प्रक्रिया में इन पैसों को प्रोत्साहन के रूप में इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई है। यानी तस्वीर बेहद साफ है। जिस व्यवस्था में कभी अमेरिका दूसरे देशों से भागकर आए लोगों को सुरक्षित जीवन देने के लिए धन लगाता था, अब उसी धन का इस्तेमाल ऐसे देशों को तैयार करने में हो रहा है जो अमेरिका से निकाले गए लोगों को अपने यहां रखने के लिए राजी हों। ट्रंप प्रशासन ने शरणार्थी पुनर्वास की पुरानी दिशा को पलटकर उसे निर्वासन केंद्रित बना दिया है। प्रशासन के अपने एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्वीकार किया है कि संबंधित विभाग की दिशा पूरी तरह बदल दी गई है। बताया जा रहा है कि कोस्टा रिका भेजी गई उड़ानों में चीन, रूस, ईरान और अफगानिस्तान के लोग थे। इस्वातिनी भेजे गए लोगों में वियतनाम, लाओस, क्यूबा और जमैका के नागरिक शामिल थे। युगांडा केवल अफ्रीकी नागरिकों को लेने पर सहमत हुआ, जबकि कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य ने अफ्रीकी नागरिकों को ही स्वीकार करने से इंकार कर दिया। कुछ देश गंभीर अपराधों के आरोपियों को भी लेने के लिए तैयार हैं, जबकि कुछ ने अपराध की प्रकृति के आधार पर सीमाएं तय की हैं। अब तक 25 हजार से अधिक लोगों को कम से कम 28 तीसरे देशों में भेजे जाने का अनुमान है। इनमें करीब 20 हजार लोग मेक्सिको भेजे गए। बाकी लोगों को मुख्यतः अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों में धकेला गया। अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि इनमें ऐसे लोग हैं जिनके खिलाफ अंतिम निर्वासन आदेश हैं, लेकिन उनके अपने देश उन्हें वापस लेने से इंकार करते हैं या उन्हें वहां भेजने पर उत्पीड़न का खतरा है। प्रशासन का दावा है कि तीसरे देश का रास्ता ऐसे कठिन मामलों को निपटाने का साधन है। लेकिन यहीं से इस नीति का सबसे गंभीर कानूनी पक्ष शुरू होता है। आलोचकों और आव्रजन वकीलों का आरोप है कि तीसरे देश में भेजकर वहां से संबंधित व्यक्ति को उसके मूल देश में जबरन भेजे जाने का रास्ता बनाया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय शरणार्थी कानून में ऐसे स्थान पर भेजना जहां व्यक्ति को उत्पीड़न या यातना का खतरा हो, गंभीर कानूनी सवाल खड़े करता है। गत शुक्रवार को एक संघीय अपीली अदालत ने इस नीति को गैरकानूनी ठहराते हुए कहा कि प्रभावित लोगों को तीसरे देश में भेजे जाने से पहले पर्याप्त सूचना और अपने भय या खतरे से जुड़े दावे रखने का अवसर नहीं दिया गया। हालांकि प्रशासन से इस फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देने की उम्मीद है। दूसरी ओर, पनामा का मामला इस पूरी व्यवस्था की असली तस्वीर दिखाता है। जनवरी 2025 में अमेरिका ने 299 लोगों को पनामा भेजा, जबकि उनका पनामा से कोई संबंध नहीं था। इनमें ईरानी नागरिक अरसलान सालेह फर्द भी थे। उन्हें न स्थायी निवास मिला, न काम करने का अधिकार और न ही अपने भविष्य की कोई स्पष्ट राह। भाषा की समस्या, आर्थिक तंगी और कानूनी अनिश्चितता ने उन्हें ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया जहां वह महीनों तक एक अस्थायी व्यवस्था में फंसे रहे। इस पूरी नीति का सामरिक महत्व केवल आव्रजन तक सीमित नहीं है। दरअसल, अमेरिका अब निर्वासन को विदेश नीति के एक औजार में बदलता दिखाई दे रहा है। अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कमजोर या आर्थिक रूप से निर्भर देशों को धन देकर लोगों को स्वीकार कराने से वॉशिंगटन को उन सरकारों पर नया प्रभाव हासिल करने का अवसर मिलता है। लेकिन इससे मानवाधिकारों पर अमेरिकी विश्वसनीयता भी कमजोर पड़ सकती है, क्योंकि जिन देशों में गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों की अमेरिकी रिपोर्टें स्वयं मौजूद हैं, उन्हीं देशों के साथ निर्वासन समझौते किए जा रहे हैं। साथ ही रणनीतिक स्तर पर ट्रंप प्रशासन एक और संदेश दे रहा है। अमेरिका में प्रवेश या वहां टिके रहना ही नहीं, बल्कि निर्वासन के बाद आपका अगला ठिकाना भी वॉशिंगटन तय कर सकता है। यह व्यवस्था संभावित प्रवासियों के बीच भय पैदा करने के लिए भी इस्तेमाल हो रही है। यानी निर्वासन अब वैश्विक स्तर पर बनाया गया निवारक दबाव तंत्र बनता जा रहा है। यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि अमेरिका ने शरणार्थियों के संरक्षण के लिए बने अपने पुराने ढांचे को इतनी तेजी से उलटकर निर्वासन की मशीनरी क्यों बना दिया? उससे भी बड़ा सवाल यह है कि जब इस व्यवस्था के लिए अरबों डॉलर की आर्थिक प्रतिबद्धताएं की जा रही हैं, दर्जनों देशों को धन के सहारे तैयार किया जा रहा है और हजारों लोगों को ऐसे देशों में भेजा जा रहा है जिनसे उनका कोई रिश्ता नहीं, तो क्या यह केवल सीमा नियंत्रण की नीति है या अमेरिकी विदेश नीति के चरित्र में एक बुनियादी बदलाव है? बहरहाल, वॉशिंगटन पोस्ट की पड़ताल का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है कि अमेरिका की शरणार्थी व्यवस्था का एक हिस्सा अब शरण देने की बजाय लोगों को अमेरिका से बाहर धकेलने के लिए इस्तेमाल हो रहा है। साथ ही इस पूरी मशीनरी के पीछे केवल सीमा नहीं, पैसा, कूटनीति, दबाव और वैश्विक शक्ति का इस्तेमाल दिखाई दे रहा है। -नीरज कुमार दुबे
ओम प्रकाश राजभर ने Modi का नाम लेकर कर दिया बड़ा दावा, क्या वाकई UP के चार टुकड़े होने वाले हैं?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनावी मौसम अभी पूरी तरह चढ़ा भी नहीं है, लेकिन सियासी चौपाल पर ऐसा मुद्दा उछल गया है, जिसकी गूंज लखनऊ से लेकर दिल्ली तक सुनाई दे रही है। उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के प्रमुख ओम प्रकाश राजभर ने दावा किया है कि आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश चार हिस्सों में बंटेगा और जातीय जनगणना के बाद इस दिशा में रास्ता साफ हो जाएगा। इतना ही नहीं, राजभर ने पूर्वांचल के अलग राज्य बनने पर उसके पहले मुख्यमंत्री के तौर पर अपने समाज के व्यक्ति का दावा भी ठोक दिया। देवरिया और अंबेडकरनगर में दिए गए अपने बयानों में ओम प्रकाश राजभर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कथित बातचीत का हवाला देते हुए कहा कि जातीय जनगणना के बाद राज्य के पुनर्गठन में कोई दिक्कत नहीं रहेगी। राजभर ने जिन चार हिस्सों की बात की, उनमें पूर्वांचल, मध्यांचल, बुंदेलखंड और हरित प्रदेश शामिल हैं। उन्होंने यह भी कहा कि पूर्वांचल में राजभर समाज का बड़ा वोट आधार है, इसलिए अलग राज्य बनने पर पहला मुख्यमंत्री राजभर समाज का बेटा होगा। उल्लेखनीय है कि यह बयान ऐसे समय आया है जब उत्तर प्रदेश 2027 के विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रहा है। इसे भी पढ़ें: 2027 का उत्तर प्रदेश दंगल: समाजवाद की नई राजनीतिक रंगोली या महज अवसरवाद का मुखौटा? देखा जाये तो राजभर ने सिर्फ राज्य के नक्शे पर लकीर खींचने की बात नहीं की है बल्कि उस लकीर के पार सत्ता की कुर्सी पर भी अपना सामाजिक दावा रख दिया है। यही वजह है कि यह मामला महज प्रशासनिक पुनर्गठन की बहस नहीं रह जाता, बल्कि उत्तर प्रदेश की जातीय और क्षेत्रीय राजनीति के बीच सीधा उतर जाता है। मायावती ने 2011 में चलाई थी बड़ी चाल वैसे राजभर ने कोई नया कुआं नहीं खोदा है। उत्तर प्रदेश को छोटे राज्यों में बांटने की मांग दो दशक से ज्यादा समय से अलग-अलग रूपों में उठती रही है। सबसे ठोस पहल नवंबर 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती की सरकार ने की थी। तत्कालीन विधानसभा ने उत्तर प्रदेश को पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध प्रदेश और पश्चिम प्रदेश में बांटने का प्रस्ताव पारित किया था। मायावती सरकार का तर्क था कि इतने विशाल राज्य में प्रशासन और विकास को प्रभावी ढंग से चलाना कठिन है और छोटे राज्य क्षेत्रीय जरूरतों पर ज्यादा फोकस कर सकते हैं। प्रस्ताव केंद्र को भेजा गया, लेकिन आगे मामला नहीं बढ़ा। 2014 में केंद्र सरकार ने संसद में बताया था कि 2011 का प्रस्ताव प्राप्त हुआ था, राज्य सरकार से अतिरिक्त जानकारी मांगी गई थी, लेकिन उस समय उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से वह जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई और केंद्र के पास उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं था। पश्चिम से पूर्वांचल तक अलग-अलग सुर यह भी उल्लेखनीय है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अलग राज्य या हरित प्रदेश की मांग भी पुरानी है। राष्ट्रीय लोक दल के संस्थापक अजित सिंह समेत कई नेताओं ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए अलग राज्य की वकालत की थी। गन्ना, खेती, कारोबार, उद्योग और दिल्ली की नजदीकी को इसके पक्ष में प्रमुख तर्कों के तौर पर रखा जाता रहा है। मगर पूर्वांचल की कहानी अलग है। यहां समर्थक कहते रहे हैं कि विशाल आबादी, आर्थिक पिछड़ापन, रोजगार के लिए पलायन और लखनऊ से दूरी के कारण क्षेत्र को अलग प्रशासनिक इकाई मिलनी चाहिए। बुंदेलखंड के लिए भी अलग राज्य की मांग लंबे समय से उठती रही है, लेकिन उसकी पेचीदगी यह है कि प्रस्तावित क्षेत्र उत्तर प्रदेश के साथ-साथ मध्य प्रदेश तक फैला हुआ है। देखा जाये तो मोटे तौर पर पुराने प्रस्तावों में पश्चिम प्रदेश में पश्चिमी और कुछ मध्य-पश्चिमी जिलों का बड़ा हिस्सा, अवध प्रदेश में मध्य क्षेत्र, बुंदेलखंड में झांसी, जालौन, ललितपुर, हमीरपुर, महोबा, बांदा और चित्रकूट जैसे जिले तथा पूर्वांचल में वाराणसी, गोरखपुर, आजमगढ़, बलिया, गाजीपुर, प्रयागराज, मिर्जापुर, सोनभद्र समेत पूर्वी उत्तर प्रदेश का बड़ा इलाका शामिल रहा है। इन सीमाओं को लेकर अलग-अलग प्रस्तावों में फर्क भी रहा है। सवाल सिर्फ नक्शे का नहीं, नीयत और व्यवस्था का भी है छोटे राज्यों के समर्थकों का तर्क है कि छोटा प्रशासन ज्यादा चुस्त होगा, क्षेत्रीय समस्याओं पर सरकार की पकड़ बढ़ेगी और विकास की प्राथमिकताएं स्थानीय जरूरतों के हिसाब से तय की जा सकेंगी। विरोध में यह सवाल भी उठता है कि क्या केवल राज्य छोटा कर देने से गरीबी, बेरोजगारी, पलायन और क्षेत्रीय असमानता खत्म हो जाएगी? नए राज्यों के गठन के साथ राजधानी, विधानसभा, उच्च न्यायालय, सरकारी कर्मचारियों, संपत्तियों, कर्ज, राजस्व और संस्थानों के बंटवारे जैसी बड़ी प्रशासनिक और वित्तीय चुनौतियां भी सामने आती हैं। आखिरी फैसला लखनऊ नहीं, संसद करेगी यहां यह भी उल्लेखनीय है कि संविधान का अनुच्छेद 3 साफ करता है कि नए राज्य का गठन, मौजूदा राज्य की सीमा या क्षेत्र में बदलाव का अधिकार संसद के पास है। ऐसा विधेयक राष्ट्रपति की सिफारिश के बिना संसद में पेश नहीं किया जा सकता। प्रभावित राज्य की विधानसभा से उसके विचार मांगे जाते हैं, लेकिन उसकी सहमति अनिवार्य नहीं है। यानी अगर कभी उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन की वास्तविक प्रक्रिया शुरू होती है तो मामला लंबी संवैधानिक और राजनीतिक प्रक्रिया से होकर गुजरेगा। बहरहाल, फिलहाल ओम प्रकाश राजभर ने उत्तर प्रदेश की सियासत में पुरानी चिंगारी पर फिर से फूंक मार दी है। अब देखना यह है कि यह सिर्फ चुनावी मौसम की गरमागरम हुंकार बनकर रह जाती है या सचमुच उत्तर प्रदेश के नक्शे पर नई लकीर खींचने की कवायद शुरू होती है। क्योंकि यूपी की राजनीति में एक बात बड़ी पुरानी है, यहां चुनाव आते ही मुद्दे सिर्फ उठते नहीं, कई बार पूरे भूगोल को ही हिला देने लगते हैं। राजभर के बयान पर प्रतिक्रियाएं आने भी लग गयी हैं। भाजपा के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने इसे चुनावी जुमला बताते हुए कहा है कि केंद्र या प्रदेश सरकार की ऐसी कोई मंशा नहीं है, जबकि भाजपा नेता संजीव बालियान ने यूपी को चार हिस्सों में बांटने के विचार का समर्थन किया है। वहीं विपक्ष ने कहा है कि सत्ता पक्ष की ओर से ध्यान भटकाने के प्रयास हो रहे हैं ताकि मूल मुद्दों की ओर जनता का ध्यान नहीं जाये। -नीरज कुमार दुबे
चांदी 2.40 लाख रुपये प्रति किलो नीचे
मुंबई, सोने और चांदी मंगलवार को सपाट खुले और शुरुआत कारोबार में दोनों कीमती धातु एक सीमित दायरे में बने हुए थे।
तमिलनाडु : सीएम विजय छठी से आठवीं कक्षा के लिए विस्तारित 'कामराज नाश्ता योजना' शुरू करेंगे
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'हिंदुओं के खिलाफ बोलने से इज्जत नहीं बढ़ेगी', हामिद अंसारी पर यासिर जिलानी का जुबानी हमला
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मोबाइल रिटेलर्स एसोसिएशन ने वित्त मंत्री से की यूपीआई पेमेंट शुल्क से पूरी तरह छूट की मांग
नई दिल्ली, 21 सितंबर (आईएएनएस)। ऑल इंडिया मोबाइल रिटेलर्स एसोसिएशन (एआईएमआरए) ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से छोटे और मध्यम मोबाइल फोन विक्रेताओं को प्रस्तावित मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) या यूपीआई ट्रांजैक्शन शुल्क से पूरी तरह छूट देने की मांग की है। संगठन का कहना है कि मोबाइल रिटेलर्स पहले से ही बेहद सीमित मुनाफे पर कारोबार कर रहे हैं और अतिरिक्त शुल्क उनके लिए बड़ा बोझ साबित हो सकता है।
असम में इसरो की एडवांस्ड रडार रिसर्च फैसिलिटी की आधारशिला रखी गई, अंतरिक्ष निगरानी क्षमता होगी मजबूत
गुवाहाटी, 21 सितंबर (आईएएनएस)। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने सोमवार को चंद्रपुर में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के इस्ट्रैक एडवांस्ड रडार रिसर्च फैसिलिटी का भूमि पूजन किया और आधारशिला रखी। इसे असम के वैज्ञानिक और तकनीकी बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
पश्चिम बंगाल : हावड़ा स्टेशन पर 67 लाख रुपए कैश के साथ यात्री गिरफ्तार, जांच जारी
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नीतीश कुमार ने बख्तियारपुर स्थित पैतृक आवास का किया दौरा, बड़ी संख्या में जुटे स्थानीय लोग
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राहुल गांधी की 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम स्क्रिप्टेड, मां का मजाक उड़ाना शर्मनाक: विश्वास सारंग
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Chai Par Sameeksha: UCC, UPI और Nandigram पर जमकर हो रही राजनीति, उलझ गया सभी दलों का गणित!
प्रभासाक्षी न्यूज़ नेटवर्क के खास साप्ताहिक कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में इस सप्ताह UCC, पश्चिम बंगाल विधानसभा उपचुनाव, UPI पेमेंट पर MDR आदि मुद्दों पर चर्चा हुई। प्रभासाक्षी संपादक नीरज कुमार दुबे ने सवालों के जवाब दिये। UCC पर उन्होंने कहा कि देश में इस समय समान नागरिक संहिता को लेकर जमकर बहस हो रही है। इसके पक्ष और विपक्ष में तमाम तरह के तर्क दिये जा रहे हैं। कोई इसे अपने धर्म के खिलाफ बता रहा है तो कोई कह रहा है कि इससे हमारी संस्कृति और पहचान को खतरा हो जायेगा। आश्चर्यजनक बात यह है कि अभी केंद्र सरकार ने समान नागरिक संहिता संबंधी कानून का मसौदा प्रस्ताव देश के समक्ष नहीं रखा है। यानि किसी को पता नहीं है कि समान नागरिक संहिता में क्या-क्या प्रावधान होंगे लेकिन फिर भी बिना कुछ जाने समझे लोग इससे भयभीत हो रहे हैं और दूसरों के बीच भी भ्रम फैला रहे हैं नीरज दुबे ने कहा कि केंद्रीय स्तर पर इसे लागू करना आसान नहीं होगा इसलिए इसे राज्यवर लागू करने की कोशिश भाजपा सरकार करेंगी। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में इसे लागू कर दिया गया है और वहां से कोई शिकायत नहीं मिल रही है। साथ ही उन्होंने कहा कि 370 हो या राम मंदिर बनना हो या समान नागरिक संहिता, यह भाजपा के कोर मुद्दे रहे हैं और भाजपा इनमें से दो को पहले पूरा कर चुकी है। यूनिफॉर्म सिविल कोड अभी बाकी है जिसे भाजपा शासित राज्यों में पहले लागू किया जा सकता है, जैसा कि अमित शाह के बयान से समझ में भी आता है। लेकिन इसको लेकर अभी से ही बिना मसौदा पढ़े भ्रम फैलाने की जो कोशिश हो रही है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। बिहार में जदयू की अपनी राजनीति है और वह उसे हिसाब से आगे बढ़ेगी। इसे भी पढ़ें: ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से भारत को क्या लाभ? बंगाल पर उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी का राजनीतिक सफर एक छात्र राजनीति की साहसी नायिका से लेकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनने और वर्तमान समय में घोर राजनीतिक व कानूनी संकटों से घिरने तक की एक बड़ी दास्तान है। जो ‘दीदी’ कभी सड़कों पर वामपंथ के 34 साल के किले को ढहाने के लिए जानी जाती थीं, वे आज अपनी राजनीतिक यात्रा के सबसे कठिन दौर से गुजर रही हैं। वर्तमान परिस्थितियों में ममता बनर्जी पर मुश्किलों के पहाड़ टूटने के मुख्य कारण इस प्रकार हैं- पहला, ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक झटका 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में लगा, जहाँ उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को हार का सामना करना पड़ा और राज्य में भाजपा की सरकार बनी। खुद ममता बनर्जी को भी अपनी पारंपरिक सीट भवानीपुर से शुभेंदु अधिकारी के हाथों करारी हार झेलनी पड़ी। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि ममता ने अपने शासन में जैसा किया है, वैसा ही उन्हें राजनीतिक तोर पर देखने को मिल रहा है। UPI पेमेंट को लेकर हो रहे बवाल पर उन्होंने कहा कि झूठ की गूंज एक्सप्रेस चलाने वाले कांग्रेस नेता राहुल गांधी के नेतृत्व वाला इंडी गठबंधन इस निर्णय के लिए सरकार पर अमेरिकी दबाव में झुकने, घुटने टेकने जैसे आरोप लगा रहा है। विपक्ष सोशल मीडिया पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर शुल्क को मोदी टैक्स बताकर इसे तत्काल वापस लेने की मांग कर रहा है। 2000 से ऊपर के कारोबारी भुगतान के इस 0.4 प्रतिशत शुल्क पर विपक्ष के झूठ की गूंज सोशल मीडिया से लेकर व्यापारियों तक पहुंच चुकी है। नीरज दुबे ने कहा कि कोई भी सेवा हमेशा के लिए फ्री में नहीं रखा जा सकता है। हालांकि, सरकार ने जो कदम उठाए है उससे आम आदमी को ज्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला है।
गुजरात सरकार का बड़ा फैसला: टॉप जिला-तालुका अधिकारियों को मिलेगा 'अटल सुशासन पुरस्कार'
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अक्सर विवादित बयान देकर सुर्खियों में रहने वाले पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के हालिया बयान ने भारतीय राजनीति में एक बार फिर राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता और कांग्रेस की वैचारिक दिशा को लेकर तीखी बहस छेड़ दी है। नई दिल्ली में एजी नूरानी की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में अंसारी ने नूरानी की 2019 में प्रकाशित पुस्तक The RSS: A Menace to India का हवाला देते हुए जवाहरलाल नेहरू की एक कथित टिप्पणी दोहराई थी। अंसारी के अनुसार, नेहरू ने कहा था कि भारत के लिए खतरा कम्युनिज्म नहीं, बल्कि “हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता” है। इसी संदर्भ में उन्होंने नागरिक राष्ट्रवाद की जगह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के उभार पर भी सवाल उठाए थे। यहां सियासी सवाल खड़ा होता है कि क्या आज के भारत को देखने का नजरिया अब भी दशकों पुराने वैचारिक चश्मे से तय किया जाएगा? सवाल उठता है कि क्या हिंदू दक्षिणपंथ को भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा बताना ही देश की वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक वास्तविकताओं की पर्याप्त व्याख्या है? उधर, बीजेपी ने अंसारी के बयान को हाथोंहाथ लिया और कांग्रेस की वैचारिक दिशा पर ही सवाल दाग दिया। बीजेपी सांसद और राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने तंज कसते हुए कहा कि अंसारी ने अनजाने में कांग्रेस की वर्तमान राजनीति को “पूरी तरह बेनकाब” कर दिया है। उन्होंने कहा कि जिस कांग्रेस ने कभी कम्युनिज्म को चुनौती माना था, वह आज “अल्ट्रा-लेफ्ट” की ओर चली गई है। डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने अंसारी द्वारा नेहरू के हवाले को राहुल गांधी की वर्तमान राजनीतिक भाषा से जोड़ते हुए पूछा कि क्या आज की कांग्रेस की वैचारिक जड़ें उसी सोच में हैं? उन्होंने कांग्रेस को “मुस्लिम लीग-माओवादी कांग्रेस” तक कह डाला। इसे भी पढ़ें: पूर्व उपराष्ट्रपति Hamid Ansari के बयान पर CM Yogi Adityanath का पलटवार, सनातन परंपरा के अपमान का लगाया आरोप लेकिन अंसारी के बयान का दूसरा और अधिक गंभीर राजनीतिक पहलू भी है। उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में ऐसे रुझान उभरे हैं जो नागरिक राष्ट्रवाद की स्थापित अवधारणा को चुनौती देकर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को आगे बढ़ाते हैं। उनके मुताबिक इसमें चुनावी बहुमत को धार्मिक बहुमत के रूप में प्रस्तुत करने और राजनीतिक सत्ता पर एकाधिकार की प्रवृत्ति दिखाई देती है। यह महज इतिहास का संदर्भ नहीं, बल्कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था पर सीधा वैचारिक आरोप है। इसी मुद्दे पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस पर और तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि संवैधानिक पद पर रह चुके व्यक्ति से पद की गरिमा बनाए रखने की अपेक्षा होती है। योगी ने अंसारी के बयान को भारतीय परंपराओं और सनातन संस्कृति के प्रति अपमानजनक बताया तथा आरोप लगाया कि इससे भारत की वैश्विक छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश होती है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बयान में हिंदू परंपरा को आतंकवाद से जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है। उधर, भाजपा नेता सैयद शाहनवाज हुसैन ने भी अंसारी से माफी की मांग की और दावा किया कि उनकी टिप्पणी से मुस्लिम समुदाय के भी अनेक लोग असहज हुए हैं। साथ ही भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने विभाजन के बाद भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप और विभिन्न धार्मिक समुदायों के साथ रहने की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि समाज में विभाजन पैदा करने की कोशिश सफल नहीं होगी। यही नहीं, कई अन्य मुस्लिम धार्मिक नेताओं द्वारा भी अंसारी की टिप्पणियों से दूरी बनाने और सामाजिक सौहार्द पर जोर देने की खबरें सामने आई हैं। बहरहाल, अब असली राजनीतिक बहस यही है कि क्या भारत को समझने के लिए हिंदू बनाम कम्युनिज्म की पुरानी वैचारिक तुलना पर्याप्त है? क्या हिंदू राष्ट्रवाद को स्वतः “खतरा” मानना उचित है? क्या नेहरू के दशकों पुराने कथन को आज की राजनीतिक परिस्थितियों का निर्णायक प्रमाण माना जा सकता है? देखा जाये तो इस विवाद ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि भारत की राजनीति में राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता, सनातन परंपरा और सांस्कृतिक पहचान की चर्चा अब केवल इतिहास की बहस नहीं रही, यह मौजूदा सत्ता-संघर्ष के केंद्र में है।
पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी से 'पद्म श्री' पुरस्कार वापस लेने की मांग, हिंदू सेना ने लिखा अमित शाह को पत्र
राशन इकट्ठा कर लो...यूरोप में क्या बड़ा होने वाला है! ब्रिटेन-फ्रांस अचानक क्यों करने लगे ये अपील?
क्या यूरोप एक बहुत बड़े महायुद्ध के मुहाने पर आकर खड़ा हो गया है? क्या तीसरे विश्वयुद्ध की आहट अब इतनी करीब आ चुकी है कि सरकारों ने अपने नागरिकों से सीधे तौर पर राशन और पानी जमा करने को कह दिया है? ये कोई अफवाह नहीं, बल्कि इस वक्त पूरे यूरोप की जमीनी हकीकत बन चुकी है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों खुले तौर पर कह रहे हैं कि यह वक्त बेहद मुश्किल है और सबको एक साथ खड़ा होना होगा। ब्रिटेन से लेकर फ्रांस तक, यूरोप के तमाम मुल्कों में जनता को बाकायदा हिदायत दी जा रही है कि घरों में राशन, सूखा खाना, पीने का पानी और ईंधन स्टॉक करना शुरू कर दें। यूरोप का शायद ही कोई ऐसा अखबार बचा हो जिसकी हेडलाइन में यह खौफ साफ न छलक रहा हो। दूसरी तरफ नजर डालेंगे तो अमेरिका लगभग ग्रीनलैंड की सुरक्षा का पूरा जिम्मा अपने हाथ में ले चुका है और साफ कह दिया है कि अब इस पूरे इलाके की रक्षा अमेरिकी बूट्स करेंगे। लेकिन इन सब के बीच सबसे बड़ा सवाल कि आखिर रूस की तरफ से यूरोप की खुफिया एजेंसियों को ऐसे कौन से इनपुट्स मिले हैं, जिसने पूरे महाद्वीप को हिलाकर रख दिया है? क्यों यूरोपीय राजधानियों में बंकरों की धूल झाड़ी जा रही है और सेनाओं को स्टैंडबाय पर रहने का फरमान जारी हो चुका है? क्या मॉस्को से कोई ऐसा बड़ा तूफान उठने वाला है जो पूरे यूरोप को अपनी जद में ले लेगा? आज इसी का एमआरआई स्कैन करते हैं। इसे भी पढ़ें: Congress का Election Commission पर हमला, SIR प्रक्रिया को बताया मतदाताओं के नाम हटाने की साजिश 1600 ड्रोंस से रूस पर अटैक यूक्रेन ने 20 सितंबर को यहां कई ड्रोन हमले किए हैं। आप इसका अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि रशिया ने दावा किया है कि यूक्रेन की तरफ से आने वाले 1600 ड्रोंस को उसने इंटरसेप्ट किया है और वीडियो से भी इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस हमले में दो लोगों की मौत हुई है। यूक्रेन ने रशिया की राजधानी मॉस्को की एक ऑयल रिफाइनरी और सेना के लॉजिस्टिक ठिकाने को टारगेट किया। कई इमारतों को इसमें नुकसान भी पहुंचा है। यह हमला ऐसे समय में हुआ जब रूस में संसदीय चुनाव के लिए वोटिंग चल रही थी। वोटिंग का अंतिम दिन था। लोअर हाउस जो संसद है रूस का उसके लोअर हाउस के लिए यह वोटिंग थी। यूक्रेनी राष्ट्रपति वडदमीर जेलस्की ने खुद हमले की जानकारी दी। उन्होंने सोशल मीडिया पर वीडियो पोस्ट कर लिखा, हमने रूस की ऑयल रिफाइनरी और सेना के लॉजिस्टिक ठिकाने को टारगेट किया। यह वही अरबों डॉलर का तंत्र है जहां रूस अपने डिफेंस का सामान तैयार करता है। जेलस्की ने यह भी बताया हमले में यूक्रेन ने क्या-क्या इस्तेमाल किया है। इसे भी पढ़ें: Shafali Verma के शतक से Asian Games सेमीफाइनल में India ने बनाए 195 रन चुनाव के अंतिम दिन क्यों हुआ हमला यूक्रेन ने हमले के लिए ठीक ऐसा वक्त चुना जब व्लादमीर पुतिन के 26 साल के एक छत्रराज को नई ताकत देने के लिए वोट डाले जा रहे थे। ठीक उसी वक्त जेलस्की के ड्रोन ब्रिगेड ने ऑपरेशन मॉस्को को अंजाम दे दिया। रूसी अधिकारियों के मुताबिक ड्रोन हमलों में तीन लोगों की जान चली गई जबकि 20 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। मतलब साफ है कि यह सिर्फ आसमान में उड़ते हुए यूक्रेन के ड्रोंस नहीं थे बल्कि रूस के दिल माने जाने वाले क्रिमिया पर यूक्रेन का लॉन्ग रेंज अटैक था। मॉस्को के आसमान में जिस तरह से एक के बाद एक धमाके हुए उससे रूस की एयर डिफेंस क्षमता पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं। क्योंकि यूक्रेन के हमलों का निशाना बना है मॉस्को का सबसे बड़ा ऑयल रिफाइनरी कॉम्प्लेक्स जो धमाकों के बाद पूरी तरह से स्वाहा हो गया है। यूक्रेन पिछले कई महीनों से रूस के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बना रहा है। क्योंकि तेल और गैस से होने वाली कमाई रूस की युद्ध मशीन के लिए बेहद अहम मानी जाती है। ऐसे में रूसी तेल रिफाइनिंग क्षमता पर यूक्रेनी हमलों से रूसी ईंधन की सप्लाई और कीमतों पर भी असर पड़ना तय है। उधर मॉस्को में 21 मंजिला एक रिहााइशी इमारत में ड्रोन टकराने से भीषण आग लग गई। इस बीच यूक्रेन के इस सबसे बड़े ड्रोन अटैक पर बड़ा सवाल यह उठने लगा है कि आखिर चुनाव के अंतिम दिन मॉस्को पर इतना बड़ा हमला क्यों किया गया? इसके जवाब में मॉस्को के मेयर सरगई सोबियानिन ने बताया कि यूक्रेन के हमले का सीधा मकसद रूसी संसदीय चुनाव में खलल डालना था। NATO के खिलाफ निर्णायक जंग छेड़ने की तैयारी में पुतिन रूसी भाषा में बोलते व्लादिमीर पुतिन का एक बयान सामने आया है। जिसमें वो कह रहे हैं कि नाटो हमारी तरफ एक्सपेंड करने की कोशिश कर रहा है। नए-नए इलाके में घुसने कोशिश कर रहा है। अब हमने फैसला किया है कि उनके खिलाफ अब निर्णायक जंग छेड़ दिया जाए। अब हुआ यह कि जैसे ही एक तो रूस के राष्ट्रपति ने कह दिया कि मारेंगे जरूर चाहे जो हो जाए और ऊपर से वहां राशन पानी इकट्ठा करने की बात हो ही गई। सारे यूरोप वाले कह रहे हैं कि हमारी रक्षा तो अमेरिका करता था। तो अमेरिका बचाएगा कि नहीं हमें? डोनाल्ड ट्रंप अलग ही मूड में नजर आ रहे हैं। उन्होंने अनाउंस किया कि हम यूक्रेन में अपने सैनिक तैनात है वापस ले रहे हैं। इतना ही नहीं उन्होंने कहा है कि गल्फ नेशन में जो अमेरिकन सैनिक हैं हम ईरान के हाथों मरने नहीं दे सकते। उसको भी वापस ले लेंगे। क्या नाटो की सीमा पर बड़ा धमाका होने वाला है यूरोपीय खुफिया एजेंसियों की तरफ से आई एक ताजा और बेहद सनसनीखेज रिपोर्ट ने पूरे पश्चिमी खेमे में खलबली मचा दी है। खुफिया अधिकारियों का दावा है कि रूस बहुत जल्द नाटो की ताकत और उसकी एकजुटता की परीक्षा ले सकता है, और यह संभावित हमला सालों में नहीं, बल्कि कुछ ही महीनों के भीतर देखने को मिल सकता है। पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने अपनी संसद में साफ लफ्जों में चेतावनी दी है कि मॉस्को आने वाले महीनों में ड्रोन या मिसाइलों के जरिए नाटो की जमीन को निशाना बना सकता है। टस्क के मुताबिक, पुतिन का सीधा मकसद यह साबित करना है कि नाटो का सबसे ताकतवर सुरक्षा कवच यानी आर्टिकल 5, जमीन पर सिर्फ एक किताबी थ्योरी है, हकीकत नहीं। इस चेतावनी की गंभीरता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने टस्क के इन दावों को बेहद सटीक और पुख्ता सबूतों पर आधारित बताया है। हालात इतने नाजुक हो चुके हैं कि मैक्रों ने पेरिस में तमाम राजनीतिक दलों के नेताओं और राष्ट्रपति पद के दावेदारों की एक आपातकालीन बैठक तलब कर ली, जहां रूस के इस बढ़ते खतरे पर बंद कमरों में रणनीति तैयार की जा रही है। यह चिंता तब बढ़ रही है जब इस हफ़्ते के आखिर में न्यूयॉर्क में UN जनरल असेंबली की बैठक होने वाली है और साथ ही रूस-यूक्रेन युद्ध में दोनों तरफ़ से हवाई हमले तेज़ हो गए हैं। रविवार तड़के कीव ने मॉस्को और रूस के दूसरे इलाकों पर सैकड़ों ड्रोन और मिसाइलें दागीं। यह इस युद्ध के दौरान किए गए सबसे बड़े हवाई हमलों में से एक था। द गार्जियन को दिए गए अलग-अलग साक्षात्कारों में पश्चिमी खुफिया प्रमुखों ने पुतिन के अगले खतरनाक कदम का जो खाका खींचा है, उसने नाटो मुख्यालय से लेकर तमाम यूरोपीय देशों की नींद उड़ा दी है। चेक गणराज्य की सुरक्षा सेवा 'बीआईएस' के प्रमुख माइकल कोउडेल्का ने प्राग स्थित अपने मुख्यालय में एक दुर्लभ इंटरव्यू के दौरान बेहद सनसनीखेज अंदेशा जताया है। कोउडेल्का के मुताबिक, केवल ड्रोन और मिसाइल स्ट्राइक ही नहीं, बल्कि रूस से सटी नाटो सीमा पर रूसी सेना की एक सीमित जमीनी घुसपैठ यानी 'स्मॉल-स्केल इनवेजन' भी क्रेमलिन के प्लान का सीधा हिस्सा हो सकता है। माइकल कोउडेल्का ने चेताते हुए साफ कहा यह पूरी तरह मुमकिन है। रूस की योजना में एक सीमित सैन्य घुसपैठ, फॉल्स-फ्लैग उकसावे वाली साजिशें और नाटो देशों के भीतर एक बड़े पैमाने का इनफ्लुएंस कैंपेन शामिल हो सकता है। और यह खतरा सालों दूर नहीं, बल्कि महज कुछ महीनों के भीतर हकीकत का रूप ले सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि पश्चिमी सुरक्षा एजेंसियां दिन-रात एक कर रही हैं ताकि हालात इस खौफनाक स्तर तक न पहुँचें। क्या अमेरिका की रणनीतिक चूक से बिगड़े हालात! यह लड़ाई अब तेजी से फैलती दिख रही है। अमेरिका को अपने नागरिकों के लिए अलर्ट जारी करना पड़ा है, डोनल्ड ट्रंप छुट्टी खत्म होने से पहले ही वापस लौट आए। वॉशिंगटन इन हालात से पूरी तरह पल्ला नहीं झाड़ सकता है। ईरान पर हमले से लेकर उसके साथ हुए अंतरिम समझौते को तोड़ने तक, कई मौकों पर गंभीर चूक हुई है। ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन यह आकलन करने में बुरी तरह नाकाम रहा कि संघर्ष किस हद तक जा सकता है। उसने पश्चिम एशिया में अपने सहयोगियों की चिंताओं को भी नजरअंदाज किया और हूतियों का बढ़ता खतरा उसी का नतीजा है।अमेरिकी राष्ट्रपति ने पिछले हफ्ते कहा था कि मास्को और कीव एक-दूसरे के ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमले रोकने के लिए सहमत हुए हैं। पिछले दिनों जब उनकी स्पेशल टीम ने दोनों देशों का दौरा किया था, तब उसे भी इस बात के रूप में प्रचारित किया गया कि अमेरिका अब वास्तविक बातचीत चाहता है । पर रूस पर अमेरिकी प्रतिबंधों वाले नए बिल और इन ताजा हमलों ने सारी कोशिशों को पीछे धकेल दिया है।
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों : केवाईसी कॉपी प्रमाणन की प्रक्रिया को किया आसान
नई दिल्ली, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के लिए अनुपालन प्रक्रिया को आसान कर दिया है। इसके तहत भारतीय बैंक अब विदेशों में अधिकृत अधिकारियों द्वारा प्रमाणित कुछ निर्दिष्ट केवाईसी दस्तावेजों की मूल प्रमाणित प्रतियां स्वीकार कर सकेंगे।
जम्मू-कश्मीर विधानसभा सत्र को लेकर नेताओं ने जताई उम्मीदें
जम्मू-कश्मीर विधानसभा सत्र को लेकर नेताओं ने जताई उम्मीदें
न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 21वें सत्र की शुरुआत के साथ ही भारत की कूटनीतिक सक्रियता तेज हो गई है। इस बार भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जगह विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे। जयशंकर 26 सितंबर को महासभा को संबोधित करेंगे और इस दौरान कई देशों के नेताओं तथा विदेश मंत्रियों के साथ महत्वपूर्ण द्विपक्षीय और बहुपक्षीय बैठकें भी करेंगे। ऐसे समय में जब दुनिया युद्ध, ऊर्जा संकट, व्यापारिक टकराव और बदलते शक्ति संतुलन से जूझ रही है तब इस सत्र से काफी उम्मीदें की जा रही हैं। हम आपको बता दें कि इस सत्र में संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष, शासनाध्यक्ष और वरिष्ठ प्रतिनिधि जुट रहे हैं। इस बार का केंद्रीय विषय है, विश्वास बहाल करना, बदलाव को संभालना और ऐसा संयुक्त राष्ट्र बनाना जो सभी के लिए परिणाम दे। महासचिव अंतोनियो गुतारेस ने वैश्विक नेताओं से शांति, गरिमा, न्याय और मानवता के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग मजबूत करने की अपील की है। यह उनके कार्यकाल का अंतिम महासभा सत्र भी है। ऐसे माहौल में भारत के सामने अपनी विदेश नीति की प्राथमिकताओं को बेहद स्पष्ट और मजबूती से रखने का अवसर है। इसे भी पढ़ें: BRICS की शानदार सफलता के बाद भारत ने पड़ोस में छेड़ा 'महा-अभियान', हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक तेजी से एक्टिव हुआ India देखा जाये तो जयशंकर की यात्रा का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि भारत-अमेरिका संबंध इस समय कई कठिन सवालों से गुजर रहे हैं। रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका द्वारा भारी शुल्क लगाने की व्यवस्था ने नई दिल्ली की ऊर्जा सुरक्षा और वाशिंगटन के साथ व्यापारिक संबंधों के बीच तनाव पैदा किया है। हम आपको बता दें कि अमेरिकी कानून राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से ऊर्जा खरीद जारी रखने वाले देशों पर सौ प्रतिशत तक शुल्क लगाने की शक्ति देता है। लेकिन भारत ने स्पष्ट किया है कि उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता अपने लगभग एक अरब चालीस करोड़ नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा है और वह अलग-अलग स्रोतों से ऊर्जा की आपूर्ति जारी रखेगा। यहीं से जयशंकर की न्यूयॉर्क यात्रा का असली सामरिक महत्व सामने आता है। भारत को एक साथ रूस के साथ अपने ऊर्जा और सामरिक संबंधों, अमेरिका के साथ व्यापार और सुरक्षा साझेदारी तथा ग्लोबल साउथ की चिंताओं को साधना है। संयुक्त राष्ट्र महासभा इस संतुलन को साधने के लिए सबसे बड़ा कूटनीतिक मंच उपलब्ध कराती है। जयशंकर की दर्जनों मुलाकातों में ऊर्जा, सुरक्षा, व्यापार, विकास और ग्लोबल साउथ के मुद्दे स्वाभाविक रूप से प्रमुख रहेंगे। इसके अलावा, भारत के लिए इस महासभा का एक अहम उद्देश्य 2028 से शुरू होने वाले दो वर्षीय कार्यकाल के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सदस्यता हासिल करने के समर्थन में विभिन्न देशों को साथ लाना भी है। इसके लिए जयशंकर अलग-अलग देशों के प्रतिनिधियों के सामने भारत का छह सूत्रीय घोषणापत्र रखेंगे और सुरक्षा परिषद में भारत की प्राथमिकताओं को स्पष्ट करेंगे। साथ ही, ग्लोबल साउथ के देशों के विकास में भारत की भूमिका, आर्थिक एवं मानवीय सहायता तथा संयुक्त राष्ट्र और अन्य बहुपक्षीय संस्थाओं के माध्यम से चलाए जा रहे कार्यक्रमों पर भी चर्चा होगी। पिछले वर्ष महासभा के दौरान जयशंकर ने 47 द्विपक्षीय और 10 बहुपक्षीय बैठकें की थीं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस बार भी भारत की कूटनीतिक गतिविधियां कितनी व्यापक रहने वाली हैं। उधर, कूटनीतिक हलकों में संयुक्त राष्ट्र महासभा के वार्षिक सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गैरमौजूदगी को लेकर सवाल उठ रहा है। उल्लेखनीय है कि 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के वार्षिक सत्र को चार बार यानि 2014, 2019, 2020 और 2021 में संबोधित किया। 2020 में महामारी के कारण उनका संबोधन पहले से रिकॉर्ड वीडियो के माध्यम से हुआ था। प्रधानमंत्री मोदी के तीसरे कार्यकाल को देखें तो स्थिति और भी स्पष्ट है। 2024 में मोदी न्यूयॉर्क गए और भविष्य के शिखर सम्मेलन को संबोधित किया, लेकिन महासभा की सामान्य बहस में भारत का राष्ट्रीय वक्तव्य विदेश मंत्री जयशंकर ने दिया। 2025 में भी सामान्य बहस में भारत का प्रतिनिधित्व जयशंकर ने किया और अब 2026 में भी भारत की कमान विदेश मंत्री के हाथ में है। इस तरह तीसरे कार्यकाल में अब तक मोदी ने महासभा की सामान्य उच्चस्तरीय बहस को अब तक संबोधित नहीं किया है। सवाल उठ रहा है कि क्या मोदी अमेरिका इसलिए नहीं जा रहे ताकि ट्रंप से मुलाकात से बच सकें? देखा जाये तो भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव जरूर है और रूसी तेल तथा अमेरिकी शुल्क का विवाद गंभीर है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी और ट्रंप की जून 2026 में फ्रांस में हुई मुलाकात में दोनों नेताओं ने व्यापार, ऊर्जा, रक्षा और प्रौद्योगिकी सहयोग आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई थी। इसलिए केवल संयुक्त राष्ट्र महासभा में मोदी की गैरमौजूदगी को ट्रंप से मुलाकात से बचने की रणनीति के रूप में देखा जाना गलत होगा। बहरहाल, न्यूयॉर्क में जयशंकर का संबोधन केवल संयुक्त राष्ट्र में भारत का भाषण नहीं होगा। यह संदेश देने का अवसर होगा कि भारत दबावों के बीच अपनी ऊर्जा सुरक्षा, सामरिक स्वायत्तता, ग्लोबल साउथ की आवाज और सुरक्षा परिषद में बड़ी भूमिका, इन चारों लक्ष्यों को एक साथ आगे बढ़ाना चाहता है। महासभा के मंच से भारत की कूटनीति की धार इसी संतुलन और दृढ़ता से दिखाई देगी। -नीरज कुमार दुबे
ओवैसी ने यूपी में विपक्षी गठबंधन पर कहा-'हम 2 अक्टूबर तक अपने गठबंधन का ऐलान करेंगे'
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दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव 2026 के परिणाम घोषित हो चुके हैं, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समर्थित छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने शानदार प्रदर्शन करते हुए केंद्रीय पैनल के चार में से तीन मुख्य पदों (अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव) पर जीत हासिल की है। वहीं उपाध्यक्ष पद पर एक बड़ा उलटफेर देखने को मिला, जहाँ निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन ने बड़ी जीत दर्ज की है। इस चुनाव में कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई का खाता भी नहीं खुल सका। इससे साफ है कि जेन-जी युवाओं का रूझान अब भी एबीवीपी के साथ बना हुआ है। चर्चित जेन-जी आंदोलन (CJP) के बाद आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जेन-जी युवाओं को खुद से जोड़े रखने का जो बीड़ा उठाया, वह सफल रहा। इसके राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव भी दूरगामी होंगे। चुनाव परिणामों का पूरा विवरण इस प्रकार है:- पद- विजेता उम्मीदवार- संबद्ध छात्र संगठन- प्राप्त वोट - निकटतम प्रतिद्वंद्वी एक, अध्यक्ष- यश डबास- एबीवीपी - 24,576विजय शंकर मीणा/NSUI - 22,523 वोट। दो, उपाध्यक्ष- दीपांशु शौकीन- निर्दलीय- 30,615- इशू मौर्या (ABVP) - 16,910 वोट। तीन, सचिव- रिया छावड़ी- एबीवीपी - 21,650- नम्रता चौधरी/NSUI - 14,869 वोट। चार, संयुक्त सचिव- लक्ष्यराज सिंह- ABVP - 16,615- विशेष यादव, निर्दलीय/SCS - 15,778 वोट। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव 2026 में कांटे की टक्कर हुई। अध्यक्ष पद के लिए मतगणना के दौरान कई राउंड तक ABVP के यश डबास और NSUI के विजय मीणा के बीच बेहद करीबी मुकाबला देखा गया, लेकिन अंतिम राउंड्स में यश डबास ने बाजी मार ली। इस साल 18 सितंबर को हुए मतदान में 40.46% वोटिंग दर्ज की गई थी, जो कि पिछले 3 वर्षों में सबसे अधिक रही। दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश के बाद चुनाव नतीजों के बाद किसी भी तरह के विजय जुलूस या रैलियों पर पूरी तरह से रोक लगाई गई थी। समझिए इसके राजनीतिक निहितार्थ:- देखा जाए तो दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव के परिणाम केवल एक छात्र संगठन की जीत या हार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह देश के सबसे बड़े छात्र निर्वाचन क्षेत्रों में से एक—जहाँ युवा (जेन जी) मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं—के वैचारिक और सामाजिक रुझान को दर्शाते हैं। इस चुनाव परिणाम और रुझान के राजनीतिक व सामाजिक मायने निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझे जा सकते हैं:- इसे भी पढ़ें: DUSU Election में पैसे के दम पर हुई ABVP की जीत, CJP नेता Abhijeet Dipke का आरोप एक, 'जेन जी' (Gen Z) का व्यावहारिक राजनीति की ओर झुकाव: जेन जी (1997-2012 के बीच जन्मे युवा) को अक्सर वैचारिक रूप से स्वतंत्र माना जाता है। एबीवीपी की मजबूत उपस्थिति यह दर्शाती है कि संगठन ने केवल पारंपरिक या राष्ट्रीय मुद्दों पर ध्यान केंद्रित न करके कैंपस की व्यावहारिक समस्याओं (जैसे हॉस्टल, वाई-फाई, स्पोर्ट्स इंफ्रास्ट्रक्चर और फीस) को अपने एजेंडे में शामिल किया। युवाओं ने अमूर्त नारों के बजाय धरातल पर काम करने वाले संगठन पर भरोसा जताया। दो, एनएसयूआई (NSUI) के संगठनात्मक संकट का संकेत: एनएसयूआई का पिछड़ना या कमजोर प्रदर्शन यह दिखाता है कि मुख्य विपक्षी छात्र संगठन कैडर स्तर पर युवाओं से जुड़ने और उन्हें पोलिंग बूथ तक लाने में पूरी तरह सफल नहीं हो पा रहा है। - कैडर आधारित नेटवर्क की कमी: एबीवीपी का संगठनात्मक ढांचा वर्षभर कैंपस गतिविधियों में सक्रिय रहता है, जबकि एनएसयूआई का चुनावी तंत्र अक्सर चुनाव घोषित होने के बाद अधिक सक्रिय दिखता है। - विकल्प प्रस्तुत करने में विफलता: विपक्ष के रूप में केवल सत्ताधारी पार्टी या संगठन की आलोचना करना ही पर्याप्त नहीं होता; युवाओं के सामने एक ठोस और आकर्षक एजेंडा पेश करना आवश्यक होता है। तीन, वामपंथी (Left) राजनीति की घटती पकड़: दिल्ली विश्वविद्यालय के परिसरों में वामपंथी छात्र संगठनों (AISA, SFI आदि) का आधार ऐतिहासिक रूप से सीमित रहा है, लेकिन इस चुनाव में उनकी नगण्य उपस्थिति यह साबित करती है कि मुख्यधारा के परिसरों में अति-सैद्धांतिक (Hyper-ideological) राजनीति अब युवा छात्रों को आकर्षित नहीं कर पा रही है। चार, राष्ट्रीय मुख्यधारा की राजनीति का प्रतिबिंब: डूसू के चुनाव हमेशा से देश की राष्ट्रीय राजनीति का रुझान तय करने वाले सूचकांक (Barometer) माने जाते हैं। एबीवीपी को मिला समर्थन यह संकेत देता है कि शहरी, शिक्षित और पहली बार वोट करने वाले युवाओं का बड़ा वर्ग केंद्र में मौजूदा राजनीतिक विचारधारा और उसके छात्र पंख के प्रति सहज रुख रखता है। पांच, निर्दलीय/स्वतंत्र उम्मीदवारों का उभरता प्रभाव: इस चुनाव में मुख्य पदों पर निर्दलीय उम्मीदवारों द्वारा दी गई कड़ी टक्कर और जीत (जैसे उपाध्यक्ष पद पर) यह स्पष्ट करती है कि 'जेन जी' किसी एक पार्टी या कैडर के प्रति आंख मूंदकर वफादार नहीं है। यदि मुख्य संगठन सही प्रत्याशी या एजेंडा तय नहीं करते, तो युवा वोटर्स निर्दलीय या नए विकल्पों को चुनने में संकोच नहीं करते। वस्तुत: डूसू चुनाव के ये नतीजे यह स्पष्ट करते हैं कि आज की युवा पीढ़ी (Gen Z) केवल भावनात्मक या पारंपरिक राजनीतिक नारों पर वोट नहीं देती। जो संगठन मजबूत कैडर, कैंपस की ज़मीनी समस्याओं के समाधान और युवाओं के साथ वर्षभर सीधा संवाद बनाए रखेगा, वही छात्र राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रख पाएगा। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
कम्युनिज्म की राह पर जा रहे राहुल गांधी, उनकी पार्टी बनी 'मुस्लिम लीग माओइस्ट कांग्रेस' : सुधांशु त्रिवेदी
पाकिस्तान ने एक बार फिर अफगानिस्तान की संप्रभुता का उल्लंघन करते हुए हवाई हमला किया है, लेकिन इस बार तालिबान ने भी इस्लामाबाद को कड़ा सबक सिखाने की ठानते हुए खुली और सख्त चेतावनी जारी कर दी है। हम आपको बता दें कि अफगानिस्तान के कुनार प्रांत में पाकिस्तानी एयर स्ट्राइक में कम से कम तीन लोगों की मौत और कई लोगों के घायल होने की खबर है। पाकिस्तानी कार्रवाई ऐसे समय हुई है, जब कुछ ही दिन पहले तालिबान प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने साफ कहा था कि अफगान जमीन पर किसी भी पाकिस्तानी सैन्य कार्रवाई का जवाब दिया जाएगा और इसे उन्होंने “क्रशिंग रिस्पॉन्स” यानी करारा जवाब बताया था। कुनार पर हमला, टकराव का खतरा बढ़ा रिपोर्टों के मुताबिक पाकिस्तान ने कुनार के अलावा पक्तिका प्रांत में भी हवाई कार्रवाई की। अफगान अधिकारियों ने जहां तीन लोगों के मारे जाने की जानकारी दी है, वहीं पाकिस्तान की ओर से तत्काल आधिकारिक प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं हुई। दूसरी ओर, पाकिस्तानी पक्ष का दावा है कि उसकी कार्रवाई संदिग्ध आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाकर की गई। यह कार्रवाई पाकिस्तान में हाल में हुए घातक आतंकी हमलों के बाद हुई है। हम आपको याद दिला दें कि पिछले सप्ताह कोहाट में पुलिस परिसर के पास हुए हमले में बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई थी और पाकिस्तानी सुरक्षा प्रतिष्ठान ने इसके पीछे अफगानिस्तान से संचालित आतंकवादी नेटवर्क की आशंका जताई है। इसे भी पढ़ें: Khyber Pakhtunkhwa में TTP आतंकियों के साथ मुठभेड़, 6 सुरक्षाकर्मियों समेत 14 की मौत इसी मुद्दे को लेकर अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच पुराना आरोप-प्रत्यारोप अब सीधे सैन्य टकराव में बदलता दिखाई दे रहा है। पाकिस्तान लगातार आरोप लगाता रहा है कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी TTP के लड़ाके अफगान जमीन का इस्तेमाल कर पाकिस्तान में हमले करते हैं। तालिबान इन आरोपों को लगातार खारिज करता है और कहता है कि वह अफगानिस्तान की धरती को दूसरे देशों के खिलाफ हमलों के लिए इस्तेमाल नहीं होने देता। तालिबान की दो टूक चेतावनी पाकिस्तान के सैन्य प्रवक्ता की ओर से अफगानिस्तान में आतंकवादी समूहों की भर्ती, प्रशिक्षण और हथियारबंदी के आरोपों के जवाब में तालिबान प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने कहा कि अगर पाकिस्तान आत्मरक्षा के नाम पर अफगान क्षेत्र में कार्रवाई करता है तो काबुल को अपनी संप्रभुता की रक्षा का अधिकार है। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान को अपनी आंतरिक सुरक्षा समस्याओं की समीक्षा करनी चाहिए, क्योंकि TTP और बलूच सशस्त्र समूहों से जुड़ी हिंसा तालिबान के 2021 में सत्ता में लौटने से पहले से मौजूद है। हालांकि तालिबान की भाषा में सैन्य चेतावनी जितनी कठोर है, उतना ही महत्वपूर्ण उसका दूसरा संदेश भी है। काबुल ने बातचीत का दरवाजा बंद नहीं किया है। मुजाहिद ने पाकिस्तान के साथ बेहतर खुफिया सहयोग और सीमा सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत बताई है तथा सऊदी अरब को दोनों देशों के बीच मध्यस्थता की संभावित भूमिका के लिए समर्थन दिया है। यानी काबुल एक तरफ सैन्य जवाब की चेतावनी दे रहा है, तो दूसरी तरफ राजनयिक रास्ता खुला रखने की कोशिश भी कर रहा है। पाकिस्तान के भीतर भी बढ़ता दबाव इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा और बेहद महत्वपूर्ण पहलू पाकिस्तान की घरेलू स्थिति है। इस्लामाबाद इस समय एक साथ सुरक्षा, राजनीति और अर्थव्यवस्था के दबाव से जूझ रहा है। देश में इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ यानी PTI ने 27 सितंबर को इस्लामाबाद मार्च का ऐलान किया है, जबकि जमात-ए-इस्लामी भी पेट्रोलियम लेवी के खिलाफ राजधानी की ओर मार्च कर रही है। सरकार ने प्रदर्शनकारियों को राजधानी में पहुंचने से रोकने की तैयारी शुरू कर दी है। पाकिस्तान के वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब ने चेतावनी दी है कि हड़ताल, धरना, लंबे मार्च और सड़कों की नाकेबंदी से अर्थव्यवस्था को रोजाना करीब 120 अरब पाकिस्तानी रुपये, यानी लगभग 400-434 मिलियन डॉलर का नुकसान हो सकता है। अनुमान के मुताबिक सेवाक्षेत्र को करीब 86 अरब रुपये, उद्योग को 25 अरब और कृषि को 9 अरब रुपये प्रतिदिन का नुकसान हो सकता है। सरकार ने यह भी चेताया है कि इंटरनेट बाधित होने की स्थिति में आईटी निर्यात पर गंभीर असर पड़ सकता है। देखा जाए तो इस्लामाबाद के सामने चुनौती केवल अफगान सीमा तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के भीतर भी राजनीतिक और सुरक्षा संकट गहराता जा रहा है। राजधानी में संभावित विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए सुरक्षा कड़ी कर दी गई है, प्रवेश मार्गों पर कंटेनर लगाए जा रहे हैं और प्रमुख अस्पतालों को हाई अलर्ट पर रखा गया है। इसी बीच पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के खैबर पख्तूनख्वा अध्यक्ष जुनैद अकबर के एक बयान ने सरकार की चिंता और बढ़ा दी है। 27 सितंबर के प्रस्तावित इस्लामाबाद मार्च से पहले एक कार्यकर्ता सम्मेलन को संबोधित करते हुए अकबर ने कहा कि PTI कार्यकर्ता मोटरवे, जीटी रोड और मार्गल्ला हिल्स समेत कई रास्तों से राजधानी में प्रवेश करेंगे और “हम इस्लामाबाद को सोमनाथ बना देंगे।” पाकिस्तान सरकार ने इसे सीधे तौर पर हिंसा की धमकी और राजधानी में अराजकता फैलाने की मंशा का संकेत बताया है। उधर, अफगानिस्तान पर पाकिस्तान के नये हमले के बाद सबसे बड़ा खतरा यह है कि एक सीमित एयर स्ट्राइक जवाबी गोलीबारी, सीमा संघर्ष और फिर व्यापक सैन्य टकराव में बदल सकती है। हम आपको याद दिला दें कि इस साल फरवरी में भी दोनों देशों के बीच वर्षों का सबसे गंभीर सैन्य टकराव हो चुका है और ताजा घटनाक्रम उसी चक्र की वापसी का संकेत देता है। बहरहाल, देखना होगा कि कुनार की यह बमबारी यहीं रुकती है या पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा एक बार फिर खुले सैन्य संघर्ष का नया मोर्चा बनती है। - नीरज कुमार दुबे
मुंबई, सोने और चांदी की कीमतों में सोमवार को गिरावट देखने को मिली और इससे दोनों की कीमती धातुओं का दाम करीब 0.70 प्रतिशत घट गया।
'हर देश को अपने हालात के हिसाब से कानून बनाने का हक,' इटली में बुर्का बैन पर बोले मुफ्ती कासमी
'हर देश को अपने हालात के हिसाब से कानून बनाने का हक,' इटली में बुर्का बैन पर बोले मुफ्ती कासमी
अयोध्या: राम मंदिर के नए सीईओ जितेंद्र मिश्रा आज से शुरू करेंगे कामकाज
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UP Election 2027: Mayawati का बड़ा U-Turn, Congress-AIMIM गठबंधन पर फंसा पेंच !
अमरोहा में नई सियासी हलचल : मोहम्मद शमी की जयंत चौधरी से मुलाकात, चुनावी अटकलें तेज
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले क्रिकेटर मोहम्मद शमी और राष्ट्रीय लोक दल अध्यक्ष जयंत चौधरी की मुलाकात ने राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। अमरोहा से लेकर दिल्ली तक इस मुलाकात को लेकर सियासी हलचल बढ़ गई है
भाजपा मुख्यालय में 'प्रकोष्ठ–संकुल राष्ट्रीय कार्यशाला', नितिन नवीन ने संगठन को मजबूत करने की समीक्षा की
'आंध्र प्रदेश की गठबंधन सरकार विशाखापत्तनम के विकास को कर रही कमजोर', वाईएसआरसीपी का आरोप
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'जनता ने डबल इंजन पर जताया भरोसा', राजस्थान निकाय चुनाव में भाजपा के प्रदर्शन पर बोले भूपेंद्र यादव
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पंजाब की 'आप' सरकार नशे के समाधान में बुरी तरह विफल हुई: शिवराज सिंह चौहान
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पंजाब को नशामुक्त बनाकर विकसित राज्य बनाएगी भाजपा: अर्जुन राम मेघवाल
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गोवा में 'दिशा 2.0' कार्यशाला 21 सितंबर से, नागरिकों को कानूनी अधिकारों के प्रति किया जाएगा जागरूक
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उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन 22 सितंबर को पांच दिवसीय वैश्विक जल प्रबंधन कार्यक्रम का उद्घाटन करेंगे
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'छात्रों की गूंज' मिमिक्री विवाद पर भड़के केंद्रीय मंत्री रिजिजू, बोले-'कांग्रेस कॉमेडियन और जोकरों की पार्टी बन गई है'
ओमप्रकाश राजभर का अखिलेश पर हमला, बोले-दलित महापुरुषों से चिढ़ते हैं सपा प्रमुख
ओमप्रकाश राजभर का अखिलेश पर हमला, बोले-दलित महापुरुषों से चिढ़ते हैं सपा प्रमुख
24 सितंबर को रायबरेली जाएंगे अखिलेश यादव
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव 24 सितंबर को रायबरेली जाएंगे। अखिलेश यादव यहां पार्टी विधायक राहुल लोधी के घर पर चाय पिएंगे और सियासी चर्चा करेंगे
1 अक्टूबर से एलपीजी सब्सिडी के लिए आधार जरूरी
घरेलू एलपीजी उपभोक्ताओं को सरकारी सब्सिडी के साथ निर्धारित कीमत पर रसोई गैस सिलेंडर की बुकिंग जारी रखने के लिए 1 अक्टूबर 2026 से बायोमेट्रिक आधार प्रमाणीकरण पूरा करना अनिवार्य होगा।
'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम के बाद राहुल गांधी पर सीएम मोहन यादव का पलटवार, शिक्षा और रोजगार के आंकड़े रखे सामने
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव: 'जेनजी देश के साथ खड़ी है', एबीवीपी की जीत पर यश डबास का बयान
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'ड्रग्स के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ें', पंजाब के लोगों से केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान की अपील
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बंगाल उपचुनाव: चुनाव आयोग ने एजेयूपी और एआईएसएफ को दिए नए चुनाव चिह्न, नंदीग्राम-रेजीनगर में नए सिंबल पर लड़ेंगे उम्मीदवार
एबीवीपी की डूसू में जीत 'राष्ट्र प्रथम' की विचारधारा में युवाओं का भरोसा : अमित शाह
एबीवीपी की डूसू में जीत 'राष्ट्र प्रथम' की विचारधारा में युवाओं का भरोसा : अमित शाह
उत्तर प्रदेश 2027 का विधानसभा चुनाव: भाजपा का डेमेज कंट्रोल का प्रयास
उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में साल 2024 का लोकसभा चुनाव एक ऐसे मोड़ के रूप में दर्ज हो चुका है, जिसने सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की अजेय मानी जाने वाली छवि को गहरा धक्का पहुँचाया। दिल्ली की सत्ता पर लगातार तीसरी बार काबिज होने के बावजूद, देश के सबसे बड़े और राजनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश में पार्टी की सीटों का आंकड़ा लगभग आधा रह जाना एक ऐसी चेतावनी थी, जिसे नजरअंदाज करना आत्मघाती साबित हो सकता था। इस चुनावी झटके ने जहाँ एक ओर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन को नई ऊर्जा दी, वहीं दूसरी ओर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को आत्ममंथन और अपनी रणनीतियों को नए सिरे से परिभाषित करने पर मजबूर कर दिया। अब जबकि राज्य साल 2027 के विधानसभा चुनाव के मुहाने पर खड़ा है, भाजपा का पूरा ध्यान केवल सत्ता बचाने पर नहीं, बल्कि अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन को वापस पाने और 'मिशन हैट्रिक' को सफल बनाने के लिए एक व्यापक, आक्रामक और बहुआयामी 'डैमेज कंट्रोल' (क्षति नियंत्रण) अभियान पर केंद्रित हो चुका है। यह संपादकीय विश्लेषण इसी बात की पड़ताल करता है कि कैसे भाजपा अपनी पिछली गलतियों से सीखकर 2027 के महासंग्राम के लिए एक अभेद्य चक्रव्यूह रचने का प्रयास कर रही है।यदि 2027 में लखनऊ की गद्दी पर दोबारा भगवा ध्वज लहराना है, तो संगठन की बुनियादी कमियों को दूर करना और सामाजिक व सांगठनिक समीकरणों को नए सिरे से साधना पहली और अनिवार्य शर्त बन चुकी है। सांगठनिक कसावट के साथ-साथ भाजपा का यह डैमेज कंट्रोल केवल पार्टी कैडर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सहयोगियों और प्रमुख चेहरों को जोड़े रखने के लिए एक आक्रामक राजनीतिक घेराबंदी में बदल चुका है। इसी कड़ी में हाल ही में दो बेहद महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम सामने आए हैं, जो भाजपा की इस गंभीर रणनीति को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। पहला घटनाक्रम रायबरेली सदर से भाजपा विधायक अदिति सिंह का है। पिछले कुछ समय से राजनीतिक गलियारों में अदिति सिंह की कांग्रेस में संभावित वापसी को लेकर तरह-तरह की अटकलें और कयास लगाए जा रही थे। इन अटकलों को पूरी तरह खारिज करते हुए और विपक्ष के मनोबल को तोड़ने के लिए अदिति सिंह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से एक उच्च स्तरीय मुलाकात की। इस बैठक ने न केवल सभी अफवाहों पर पूरी तरह विराम लगा दिया, बल्कि यह भी साफ कर दिया कि रायबरेली जैसे गांधी परिवार के पारंपरिक गढ़ में भाजपा अपने किले को अभेद्य रखने के लिए पूरी तरह मुस्तैद है। इसे भी पढ़ें: UP में अगले 6 महीने में 1 लाख युवाओं को मिलेगी सरकारी नौकरी, CM Yogi का ऐलान इसी रणनीति का दूसरा और अधिक महत्वपूर्ण हिस्सा अपने नाराज सहयोगियों को संभालना है, जिसमें भाजपा का शीर्ष नेतृत्व कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। लोकसभा चुनाव के बाद से ही अपनी उपेक्षा और अति-पिछड़ों के आरक्षण के मुद्दे को लेकर सार्वजनिक रूप से नाराजगी जाहिर कर रहे निषाद पार्टी के अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री संजय निषाद को मनाने के लिए भाजपा के प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े खुद उनके आवास पर पहुंचे। दोनों नेताओं के बीच हुई इस मैराथन बैठक का मुख्य उद्देश्य सहयोगी दलों के भीतर पनप रहे असंतोष को समय रहते दबाना और 2027 से पहले एनडीए के कुनबे को पूरी तरह एकजुट रखना है। भाजपा भली-भांति जानती है कि उत्तर प्रदेश जैसी जटिल राजनीतिक पिच पर अनुप्रिया पटेल की अपना दल (एस), ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा और संजय निषाद की निषाद पार्टी जैसे छोटे दल अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। विनोद तावड़े का खुद चलकर संजय निषाद के घर जाना यह दिखाता है कि भाजपा अब किसी भी बड़े या छोटे सहयोगी को खोने का जोखिम नहीं उठा सकती और वह गठबंधन के भीतर सत्ता और सम्मान का नया संतुलन बनाने के लिए तैयार है। इसके अतिरिक्त, युवाओं और रोजगार के मुद्दे पर विपक्ष के आक्रामक हमलों को कुंद करने के लिए सरकार ने अपनी प्रशासनिक मशीनरी को पूरी तरह से झोंक दिया है। पिछले कुछ समय में हुए पेपर लीक मामलों ने सरकार की साख पर जो बट्टा लगाया था, उसे धोने के लिए कड़े कानून बनाए गए हैं और पारदर्शी तरीके से भर्ती परीक्षाओं के आयोजन पर जोर दिया जा रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं युवाओं को नियुक्ति पत्र बांटने के कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं, ताकि यह संदेश दिया जा सके कि सरकार युवाओं के भविष्य के प्रति अत्यंत संवेदनशील है। इसके समानांतर, 'वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट' और राज्य में आ रहे भारी-भरकम औद्योगिक निवेश के जरिए स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर सृजित करने के दावों को सोशल मीडिया और जमीनी अभियानों के माध्यम से जनता के बीच ले जाया जा रहा है। विपक्ष द्वारा महंगाई और बेरोजगारी पर बनाए जा रहे माहौल का मुकाबला करने के लिए भाजपा अपनी 'डबल इंजन सरकार' के विकास कार्यों—जैसे एक्सप्रेसवे का जाल, हवाई अड्डों का विकास और बेहतर कानून-व्यवस्था—को मुख्य ढाल बना रही है। एक और महत्वपूर्ण मोर्चा जिस पर भाजपा बहुत बारीकी से काम कर रही है, वह है टिकट वितरण और एंटी-इन्कंबेंसी का प्रबंधन। पार्टी के आंतरिक सूत्रों और स्वतंत्र एजेंसियों के माध्यम से प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र का गहन और बहुस्तरीय जमीनी सर्वे कराया जा रहा है। इस सर्वे में न केवल विधायकों की लोकप्रियता और उनके कामकाज का आकलन किया जा रहा है, बल्कि जनता के बीच उनकी छवि और कार्यकर्ताओं के साथ उनके व्यवहार को भी मापा जा रहा है। इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि सत्ता विरोधी लहर को काटने और जनता के गुस्से को शांत करने के लिए भाजपा 2027 के चुनावों में 30 से 40 प्रतिशत मौजूदा विधायकों के टिकट काट सकती है या उनके क्षेत्र बदल सकती है। नए, युवा और स्थानीय स्तर पर स्वीकार्य चेहरों को मौका देकर पार्टी एक 'नया और ऊर्जावान' विकल्प पेश करने की तैयारी में है, जिससे बगावत के खतरों को कम से कम किया जा सके। आजमगढ़, अयोध्या, सहारनपुर और मुरादाबाद जैसे मंडलों की हारी हुई सीटों और विशेषकर उन 16 जिलों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है जहाँ पार्टी का प्रदर्शन सबसे खराब रहा था, और इन क्षेत्रों की कमान सीधे वरिष्ठ मंत्रियों और संगठन के शीर्ष पदाधिकारियों को सौंप दी गई है। अंततः, उत्तर प्रदेश 2027 का चुनाव केवल देश के सबसे बड़े राज्य की सत्ता का फैसला नहीं करेगा, बल्कि यह 2029 के अगले लोकसभा चुनाव की दशा और दिशा भी तय करेगा। भाजपा भली-भांति जानती है कि दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर ही गुजरता है और यूपी में किसी भी प्रकार की शिथिलता उसके राष्ट्रीय राजनीतिक प्रभुत्व को संकट में डाल सकती है। वर्तमान में भाजपा द्वारा किए जा रहे डैमेज कंट्रोल के प्रयास—चाहे वह अदिति सिंह की मुख्यमंत्री से मुलाकात हो या विनोद तावड़े का संजय निषाद के घर पहुंचना—यह दर्शाते हैं कि पार्टी अपनी पराजय को स्वीकार कर आत्मसंतुष्टि के जाल से बाहर निकल चुकी है और एक अनुशासित सेना की तरह अपनी कमियों को सुधारने में जुट गई है। विपक्ष के सामाजिक नैरेटिव को तोड़ना, कार्यकर्ताओं को दोबारा सक्रिय करना, सहयोगियों को संतुष्ट रखना और सुशासन के दावों पर जनता का विश्वास बहाल करना एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य है। लेकिन चुनावी राजनीति के माहिर खिलाड़ी के रूप में भाजपा ने जिस तरह से माइक्रो-मैनेजमेंट और सामाजिक समीकरणों को नए सिरे से गढ़ने का ब्लूप्रिंट तैयार किया है, उसने 2027 की लड़ाई को बेहद दिलचस्प और कड़ा बना दिया है। आगामी महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भाजपा की यह नई बिसात विपक्ष के बढ़ते हौसलों को पस्त करने में कितनी कारगर साबित होती है। - अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार
सत्ता से संघर्ष तकः ममता बनर्जी का राजनीतिक यथार्थ
ममता बनर्जी का राजनीतिक सफर एक छात्र राजनीति की साहसी नायिका से लेकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनने और वर्तमान समय में घोर राजनीतिक व कानूनी संकटों से घिरने तक की एक बड़ी दास्तान है। जो ‘दीदी’ कभी सड़कों पर वामपंथ के 34 साल के किले को ढहाने के लिए जानी जाती थीं, वे आज अपनी राजनीतिक यात्रा के सबसे कठिन दौर से गुजर रही हैं। वर्तमान परिस्थितियों में ममता बनर्जी पर मुश्किलों के पहाड़ टूटने के मुख्य कारण इस प्रकार हैं- पहला, ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक झटका 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में लगा, जहाँ उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को हार का सामना करना पड़ा और राज्य में भाजपा की सरकार बनी। खुद ममता बनर्जी को भी अपनी पारंपरिक सीट भवानीपुर से शुभेंदु अधिकारी के हाथों करारी हार झेलनी पड़ी। 15 साल तक राज्य पर राज करने के बाद सत्ता से बाहर होना उनके राजनीतिक पतन की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। दूसरा, ममता बनर्जी की राजनीतिक ताकत हमेशा उनकी पार्टी पर उनकी मजबूत पकड़ थी। लेकिन वर्तमान में टीएमसी के भीतर एक बड़ी बगावत छिड़ गई है। कई विधायकों और सांसदों ने अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव और पार्टी में तानाशाही रवैये को लेकर बगावती रुख अख्तियार कर लिया है, जिससे पार्टी दो फाड़ होने की कगार पर पहुंच गई है। तीसरा, ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा कानूनी और भावनात्मक झटका तब लगा जब चुनाव आयोग ने पार्टी में आंतरिक विवाद के कारण तृणमूल कांग्रेस के नाम और उनके प्रसिद्ध चुनाव चिह्न ‘जोड़ा फूल’ को फ्रीज (रोक लगा दी) कर दिया। आयोग ने दोनों गुटों को अस्थाई रूप से नए नाम और सिंबल दिए हैं। ममता बनर्जी ने इसे भारतीय लोकतंत्र का ‘काला दिन’ बताया है और इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। चौथा, सत्ता से हटते ही ममता बनर्जी के खिलाफ कानूनी शिकंजा लगातार कसता जा रहा है- चुनाव प्रचार के दौरान कथित तौर पर भड़काऊ और सांप्रदायिक बयान देने के आरोप में उनके खिलाफ कोलकाता और सिलीगुड़ी में एफआईआर दर्ज की गई हैं। इसे भी पढ़ें: TMC संकट Mamata Banerjee के अहंकार और भगवान राम के शाप का परिणाम: Suvendu Adhikari अगस्त 2026 में कोलकाता में छात्र संगठन (टीएमसीपी) की रैली के दौरान कलकत्ता हाई कोर्ट के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करने और कानून व्यवस्था बिगाड़ने के आरोप में भी पुलिस ने उन पर मामला दर्ज किया है। उनकी पिछली सरकार पर एक विज्ञापन एजेंसी को रु. 635 करोड़ से अधिक का टेंडर देने में गड़बड़ी जैसे भ्रष्टाचार के नए आरोप लग रहे हैं। पांचवां, ममता बनर्जी ने हमेशा खुद को जनता की लड़ाई लड़ने वाली और महिलाओं के अधिकारों की रक्षक के रूप में पेश किया था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में राज्य में हुए महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर उनके विवादित बयानों और भ्रष्टाचार के मामलों (जैसे शिक्षक भर्ती घोटाला आदि) ने उनकी छवि को गंभीर नुकसान पहुंचाया। जनता में पैदा हुए इसी आक्रोश और सत्ता-विरोधी लहर ने उन्हें बैकफुट पर धकेल दिया। संघर्ष की नायिका का वर्तमान रुख, इन सब मुश्किलों के बावजूद, 17 साल की उम्र में दूध के बूथ और स्टेनोग्राफर का काम करके अपने परिवार को संभालने वाली ममता बनर्जी ने हार मानने से साफ इनकार किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे राजनीतिक संन्यास नहीं लेंगी और वे इस ‘गंदे खेल’ के खिलाफ सड़कों पर उतरकर लड़ाई जारी रखेंगी। आगामी उपचुनावों के लिए उन्होंने रणनीति बदलते हुए कांग्रेस उम्मीदवारों को समर्थन देने की घोषणा भी की है। भारतीय राजनीति के इतिहास में ममता बनर्जी का नाम एक ऐसी जननेता के रूप में दर्ज रहा है, जिन्होंने शून्य से उठकर जन आंदोलनों के बल पर दशकों पुरानी राजनीतिक संरचनाओं को हिला दिया। छात्र राजनीति के समय से ही उनकी पहचान एक बेबाक और निर्भीक व्यक्तित्व के रूप में रही है। तीन दशकों से अधिक लंबे वामपंथी शासन को उखाड़ फेंकने वाली दीदी ने पूरे पंद्रह वर्षों तक पश्चिम बंगाल की सत्ता पर एकछत्र राज किया। परंतु समय का चक्र ऐसा घूमा है कि वही जुझारू नेत्री आज अपनी ही राजनीतिक यात्रा के सबसे कठिन दौर से गुजर रही हैं। हालिया विधानसभा चुनावों में मिली पराजय, दल के भीतर भड़की बगावत, चौतरफा वैधानिक कार्यवाहियों का शिकंजा और दल की मूल पहचान यानी नाम तथा चुनाव चिह्न का छिन जाना, इन सबने मिलकर उनके समक्ष अस्तित्व रक्षा की अभूतपूर्व चुनौती खड़ी कर दी है। हाल के विधानसभा चुनाव पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास में एक बड़े मोड़ के रूप में सामने आए। पंद्रह वर्षों के निरंतर शासन के बाद तृणमूल कांग्रेस को जन-असंतोष और प्रचंड विरोध का सामना करना पड़ा। चुनावी नतीजों में न केवल उनकी पार्टी को करारी हार झेलनी पड़ी, बल्कि ममता बनर्जी को स्वयं अपनी पारंपरिक सीट भवानीपुर से पराजय का स्वाद चखना पड़ा। इस परिणाम ने यह सिद्ध कर दिया कि राज्य में बदलाव की लहर अत्यधिक तीव्र थी। निरंतर शासन से उपजी असंतुष्टि, विभिन्न भर्ती घोटालों के आरोप तथा स्थानीय स्तर पर उपजे जन-रोष ने मिलकर उनकी दलगत जड़ों को कमजोर कर दिया, जिससे राज्य में एक नए राजनीतिक समीकरण का उदय हुआ। किसी भी क्षेत्रीय दल की वास्तविक शक्ति उसका सुदृढ़ संगठन, शालीन भाषा, लोकतांत्रिक मर्यादा और नेतृत्व के प्रति अटूट निष्ठा होती है। तृणमूल कांग्रेस में लगभग तीन दशकों तक ममता बनर्जी ही सर्वमान्य चेहरा और अंतिम निर्णयकर्ता रहीं। किंतु चुनावी असफलता के उपरांत पार्टी के भीतर दबा हुआ असंतोष अचानक बाहर आ गया। विधायकों और सांसदों के एक बड़े धड़े ने शीर्ष नेतृत्व की कार्यशैली पर प्रश्न चिह्न खड़े कर दिए। तृणमूल कांग्रेस में आंतरिक विभाजन के बाद दोनों गुटों द्वारा अधिकार जताए जाने के कारण आयोग को कड़ा कदम उठाना पड़ा। वर्षों पूर्व जिस पहचान को उन्होंने अपने कड़े परिश्रम और संघर्ष से सींचा था, उसी से वंचित हो जाना उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा संवैधानिक झटका माना जा रहा है। यद्यपि उन्होंने इस निर्णय को लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध बताते हुए शीर्ष अदालत का द्वार खटखटाया है, परंतु तत्काल रूप से इस स्थिति ने दल के कार्यकर्ताओं में भारी असमंजस पैदा कर दिया है। सत्ता से बाहर होते ही ममता बनर्जी बहुआयामी कानूनी चुनौतियों से भी घिर गई हैं। चुनावी अभियानों के दौरान दिए गए बयानों को लेकर उनके खिलाफ विभिन्न स्थानों पर प्राथमिक दर्ज कराई गई हैं। जनसभाओं और रैलियों के संचालन में उच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के उल्लंघन तथा व्यवस्था बिगाड़ने के आरोपों में भी दंडात्मक कार्यवाहियाँ शुरू की गई हैं। ये तमाम कानूनी उलझनें न केवल उनकी प्रशासनिक छवि पर प्रश्न खड़े करती हैं, बल्कि उन्हें राजनीतिक पुनर्निर्माण के स्थान पर कानूनी बचाव की मुद्रा में ला खड़ा करती हैं। ममता बनर्जी की वास्तविक पूंजी उनकी साख थी, जो एक साधारण, त्यागपूर्ण और आम जनता की रक्षक के रूप में बनी थी। जनाक्रोश और सत्ता-विरोधी लहर ने उन्हें बैकफुट पर धकेल दिया। इसके बावजूद विपरीत परिस्थितियों में पली-बढ़ी ममता बनर्जी ने आसानी से घुटने न टेकने का संकल्प दोहराया है। राजनीति से संन्यास लेने की बातों को खारिज करते हुए उन्होंने पुनः जन-सड़कों पर उतरकर संघर्ष करने का मार्ग चुना है। वर्तमान परिस्थितियों में उन्होंने अपनी रणनीति बदलते हुए अन्य विपक्षी दलों के साथ हाथ मिलाना शुरू किया है। नंदीग्राम उपचुनाव में अपने प्रत्याशी का नाम वापस लेकर कांग्रेस उम्मीदवार का समर्थन करना इसी रणनीति का भाग है। संक्षेप में कहा जाए तो ममता बनर्जी का वर्तमान समय उनके राजनीतिक जीवन की सबसे कसौटी पूर्ण परीक्षा का काल है। एक ओर दल में टूट, नाम व प्रतीक का स्थगन और मुकदमों का अंबार है, तो दूसरी ओर अपनी खोई साख को पुनः प्राप्त करने की विशाल चुनौती। इतिहास साक्षी है कि वे संकटों से उभरकर वापसी करने में माहिर रही हैं, किंतु इस बार चुनौती केवल राजनीतिक विरोधियों से नहीं, बल्कि अपनी ही बिखरी हुई विरासत को समेटने की है। अब यह देखना अत्यंत दिलचस्प होगा कि क्या वे अपने जनआंदोलन की पुरानी शैली के बल पर इस राजनीतिक चक्रव्यूह को भेद पाती हैं या नहीं। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
'मर्यादा में होना चाहिए राजनीतिक विरोध', सपा के डिजिटल कैंपेन पर भड़के मनोज पांडे
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डूसू चुनाव में एबीवीपी की जीत पर यश डबास बोले, जेन जी हमारे साथ
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इंदौर में राहुल बोले- '6 लोग देश का सिस्टम चला रहे, मोदी, अमित शाह, डोभाल, भागवत, अडानी-अंबानी'
Rahul Gandhi Chhatron Ki Goonj Indore: राहुल गांधी ने इंदौर में छात्रों की गूंज प्रोग्राम में कहा कि छात्र सवाल पूछते हैं और यही बात कथित ‘सिस्टम’ को पसंद नहीं है। अंधभक्त उन्हें सवाल पूछने से रोकते हैं। नेता विपक्ष राहुल गांधी ने अंधभक्त की परिभाषा भी बताई।
अनंत सिंह से विवाद पर जेडीयू प्रवक्ता नीरज कुमार का पलटवार, कहा- 'हम आग और पानी से बने हैं'
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भारतीयों की ऊर्जा सुरक्षा के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कुछ भी कर गुजरने को तैयार हो जाते हैं। पश्चिम एशिया में होर्मुज और बाब-अल-मंदेब जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर दबाव बढ़ा तो भारत ने हाथ पर हाथ रखकर बैठने की बजाय अपनी ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए नए रास्तों की तलाश तेज कर दी। इसी कूटनीतिक और रणनीतिक सक्रियता के बीच ओमान ने भारत के सामने ऐसा जोरदार प्रस्ताव रख दिया है, जो आने वाले समय में खाड़ी क्षेत्र से भारत तक तेल और ऊर्जा संसाधनों की निर्बाध आपूर्ति के लिए बेहद अहम साबित हो सकता है। हम आपको बता दें कि ओमान ने भारत को अपने सोहार बंदरगाह में निवेश का न्योता दिया है। यह ऐसा बंदरगाह है जो होर्मुज जलडमरूमध्य से दूर है और संकट के समय भारत के लिए खाड़ी तक पहुंच का एक वैकल्पिक और सुरक्षित द्वार बन सकता है। नई दिल्ली में 16 सितंबर को आयोजित कार्यक्रम में सोहार मुक्त क्षेत्र और सोहार बंदरगाह के प्रमुख रईद अल रुवैई ने भारतीय कंपनियों और निवेशकों को सोहार में निवेश का आमंत्रण दिया। उनका कहना था कि भारत सोहार के अंतरराष्ट्रीय निवेश परिदृश्य का महत्वपूर्ण और लगातार बढ़ता हिस्सा है। भारतीय कंपनियां पहले से ही वहां के औद्योगिक तंत्र में मौजूद हैं और भविष्य में निवेश से औद्योगिक समूहों, आपूर्ति शृंखलाओं और क्षेत्रीय व्यापार को और मजबूती मिल सकती है। ओमान के राजदूत ईसा सालेह अल शिबानी ने भी भारतीय विनिर्माण क्षेत्र के लिए सोहार सहित ओमान के बंदरगाहों को देश और व्यापक क्षेत्र में विस्तार के द्वार के रूप में प्रस्तुत किया। इसे भी पढ़ें: PM Modi ने Rozgar Mela में बांटे 51,000 Appointment Letters, कहा- Viksit Bharat ही मुख्य लक्ष्य होर्मुज से दूरी ही सोहार की सबसे बड़ी ताकत हम आपको बता दें कि सोहार की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उसका भौगोलिक स्थान है। यह ओमान के उत्तर-पूर्वी तट पर स्थित है और होर्मुज जलडमरूमध्य से दूर है। यही दूरी मौजूदा संकट में इसे विशेष महत्व देती है। यदि होर्मुज के रास्ते जहाजों की आवाजाही बाधित होती है, तो सोहार भारत और अन्य एशियाई देशों के लिए खाड़ी क्षेत्र तक पहुंच बनाए रखने वाला एक वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध करा सकता है। इसका महत्व केवल सैद्धांतिक नहीं है। सोहार संयुक्त अरब अमीरात और पूर्वी सऊदी अरब की महत्वपूर्ण ऊर्जा अवसंरचनाओं के निकट है। पश्चिम एशिया में पाइपलाइनों और बंदरगाहों पर हमलों के बाद समुद्री मार्गों के पुनर्गठन की आवश्यकता बढ़ी है। ऐसी स्थिति में सोहार से कच्चे तेल की जहाजों के माध्यम से आपूर्ति की संभावनाओं पर भी ध्यान बढ़ रहा है। केवल बंदरगाह नहीं, पूरा औद्योगिक तंत्र साथ ही सोहार की शक्ति केवल समुद्री स्थिति में नहीं है। वर्ष 2004 से संचालित यह विशाल गहरे समुद्र का बंदरगाह लगभग 2.1 करोड़ वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला है। यहां रसद, पेट्रोरसायन और धातु जैसे प्रमुख औद्योगिक समूह मौजूद हैं। इसके साथ खाद्य क्षेत्र भी विकसित किया गया है और कृषि उत्पादों के लिए ओमान का पहला विशेष टर्मिनल यहां स्थापित है। हम आपको यह भी बता दें कि सोहार बंदरगाह और मुक्त क्षेत्र में 30 अरब डॉलर से अधिक का निवेश हो चुका है और अधिकारियों के अनुसार इसकी वार्षिक माल संभालने की क्षमता 7.2 करोड़ टन है। वर्ष 2026 की पहली छमाही में कंटेनर यातायात में पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 40 प्रतिशत वृद्धि हुई। इस अवधि में कुल माल आवागमन 5.2 करोड़ टन तक पहुंच गया। भारतीय कंपनियों की मौजूदगी भी इसे भारत के लिए अधिक महत्वपूर्ण बनाती है। नवीन जिंदल समूह की इस क्षेत्र में इस्पात इकाई है, जिसकी वार्षिक उत्पादन क्षमता 20 लाख टन बताई गई है। इससे यह स्पष्ट होता है कि सोहार भारतीय कारोबार के लिए केवल संभावित नया पड़ाव नहीं, बल्कि पहले से विकसित औद्योगिक साझेदारी का आधार भी है। खाड़ी तक भारत की पहुंच को मिलेगा नया विकल्प इसके अलावा, सोहार की एक और बड़ी ताकत संयुक्त अरब अमीरात के साथ उसकी निकटता है। सोहार से सड़क मार्ग के जरिए संयुक्त अरब अमीरात और आगे खाड़ी सहयोग परिषद के अन्य देशों तक माल पहुंचाया जा सकता है। सोहार और जेबेल अली के बीच हरित गलियारे की योजना तथा ओमान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच प्रस्तावित रेल संपर्क इस व्यवस्था को और मजबूत कर सकते हैं। ओमानी अधिकारियों के अनुसार यह रेल संपर्क 2028 तक चालू होने की संभावना है। भारत और सोहार के बीच समुद्री संपर्क भी पश्चिम एशिया संकट के बाद बढ़ा है। सोहार को खाड़ी सहयोग परिषद और अफ्रीकी बाजारों के लिए माल के पुनर्वितरण केंद्र के रूप में विकसित करने की संभावनाएं भी तलाशी जा रही हैं। ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा बड़ा रणनीतिक अर्थ देखा जाये तो भारत के लिए इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा अर्थ ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति मार्गों के विविधीकरण में छिपा है। भारत की ऊर्जा जरूरतों के बड़े हिस्से का संबंध पश्चिम एशिया से है। ऐसे में किसी एक समुद्री मार्ग पर अत्यधिक निर्भरता जोखिम बढ़ा सकती है। सोहार जैसे वैकल्पिक मार्ग उस जोखिम को बांटने में मदद कर सकते हैं। ओमान के सलालाह और दुक्म बंदरगाह भी इस व्यापक रणनीति के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। सलालाह पूर्वी अफ्रीका और अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी से जुड़ा प्रमुख केंद्र है, जबकि दुक्म बड़े औद्योगिक और रसद विकास के लिए तैयार किया जा रहा है। इस तरह तीनों बंदरगाहों की भूमिकाएं अलग-अलग हैं। सोहार खाड़ी और औद्योगिक व्यापार पर केंद्रित है, सलालाह अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी और अफ्रीकी संपर्क को मजबूती देता है, जबकि दुक्म बड़े औद्योगिक निवेश के लिए अवसर प्रदान करता है। इसके अलावा, भारत और ओमान के बीच 1 जून 2026 से लागू व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता भी इस बढ़ते संबंध को व्यापारिक आधार देता है। हालांकि सोहार की वास्तविक दीर्घकालिक उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि मौजूदा संकट से पैदा हुआ अतिरिक्त माल आवागमन स्थायी निवेश, नियमित जहाज सेवाओं और मजबूत वितरण तंत्र में कितना बदलता है। बहरहाल, होर्मुज संकट ने सोहार के महत्व को अचानक बढ़ा दिया है, लेकिन इसकी क्षमता केवल संकट के समय के वैकल्पिक मार्ग तक सीमित नहीं है। गहरे समुद्र का बंदरगाह, औद्योगिक समूह, मुक्त क्षेत्र, संयुक्त अरब अमीरात से संपर्क और भारत के साथ बढ़ती व्यापारिक निकटता इसे भारत की खाड़ी नीति और आपूर्ति शृंखला विविधीकरण में दीर्घकालिक महत्व का केंद्र बना सकती है। भारत के लिए इसका मूल संदेश साफ है। ऊर्जा सुरक्षा केवल तेल खरीदने से नहीं, बल्कि उसे सुरक्षित रूप से भारत तक पहुंचाने वाले अनेक भरोसेमंद मार्ग तैयार करने से सुनिश्चित होती है। -नीरज कुमार दुबे
बागी तृणमूल गुट के 'लिफाफा' निशान पर विवाद, एआईएसएफ कोर्ट जाने की तैयारी में
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बांग्लादेश को आखिरकार भारत की जरूरत का एहसास होने लगा है! जिस समय नई दिल्ली ने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान को ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में आमंत्रित कर पड़ोसी संबंधों को आगे बढ़ाने का अवसर दिया, उस समय ढाका ने दूरी बनाए रखना पसंद किया। शायद उसे लगा कि दिल्ली जाने से अच्छा है इस्लामाबाद या मक्का जाया जाये और मक्का पैक्ट में शामिल हुआ जाये। लेकिन मक्का में हूतियों का हमला और मक्का पैक्ट की हवा निकलते देख बांग्लादेश को शायद अपनी गलती का अहसास होने लगा है। अब बांग्लादेश के सामने दो तस्वीरें हैं। एक ओर भारत में आयोजित ब्रिक्स की शानदार सफलता की पूरी दुनिया में गूंज उसे सुनाई दे रही है और दूसरी तरफ 'एक पर हमला सब पर हमला' की घोषित नीति के बावजूद सऊदी अरब की मदद के लिए नहीं उतरने की पाकिस्तान और तुर्की की वादाखिलाफी दिखाई दे रही है। इसके चलते तस्वीर अब तेजी से बदलती दिखाई दे रही है। ब्रिक्स सम्मेलन संपन्न होने के ठीक बाद भारत तथा बांग्लादेश के बीच उच्चस्तरीय बातचीत फिर शुरू हो गई है। बताया जा रहा है कि दोनों देश नवंबर में तारिक रहमान की भारत यात्रा की संभावित तारीखों पर विचार कर रहे हैं। यह पिछले कुछ समय से तनावपूर्ण चल रहे भारत-बांग्लादेश संबंधों को फिर पटरी पर लाने की कोशिश है। हम आपको याद दिला दें कि तारिक रहमान के फरवरी में प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद भारत ने उन्हें अलग से द्विपक्षीय यात्रा का निमंत्रण दिया था। अगस्त में भी यात्रा की संभावना बनी थी, लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की भारत से की गई सार्वजनिक टिप्पणी के बाद ढाका में पैदा हुए आक्रोश ने पूरा घटनाक्रम उलट दिया। अब दोनों पक्ष नवंबर की किसी उपयुक्त तारीख पर सहमति बनाने की कोशिश कर रहे हैं। भारतीय उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी ने ढाका में कई वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात कर इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया है। भारतीय पक्ष की कोशिश यह है कि यात्रा ऐसी तारीख पर हो जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम के अनुकूल भी हो। यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत-बांग्लादेश संबंध वर्ष 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद गंभीर तनाव से गुजरे हैं। हसीना के भारत में रहने और उनके प्रत्यर्पण की मांग को लेकर ढाका लगातार दबाव बनाता रहा है। अगस्त में शेख हसीना की ओर से मीडिया कार्यक्रम को संबोधित करने के बाद यह तनाव और बढ़ गया। बांग्लादेश की मौजूदा सरकार चाहती है कि शेख हसीना का प्रत्यर्पण हो और उनकी सार्वजनिक बयानबाजी पर रोक लगे। इस पर भारत की ओर से फिलहाल यही कहा गया है कि प्रत्यर्पण अनुरोध की जांच की जा रही है। साथ ही नई दिल्ली व्यापक संबंधों को पारस्परिक हितों और पारस्परिकता के आधार पर आगे बढ़ाने पर जोर दे रही है। इसे भी पढ़ें: बांग्लादेश को दुश्मन खेमे में जाने से रोकने के लिए भारत ने चला बड़ा दांव! India-Banladesh के बीच फिर से शुरू हो सकती है रेल सेवाएं दोनों पक्ष इस टकराव के बीच ऐसा रास्ता खोज रहे हैं जिसमें किसी एक मुद्दे के कारण दोनों देशों के व्यापक हित प्रभावित न हों। यही कारण है कि नवंबर में प्रस्तावित तारिक रहमान यात्रा को दोनों राजधानियां बेहद महत्वपूर्ण मान रही हैं। रणनीतिक स्तर पर देखें तो भारत और बांग्लादेश के बीच मजबूत संबंध केवल दो सरकारों का मामला नहीं है। बंगाल की खाड़ी, पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा, सीमा प्रबंधन, नदी जल, व्यापार, संपर्क और क्षेत्रीय सहयोग, इन सभी मोर्चों पर दोनों देशों के हित एक-दूसरे से जुड़े हैं। आर्थिक मोर्चे पर भी बातचीत का एजेंडा महत्वपूर्ण है। दोनों देशों के अधिकारी द्विपक्षीय व्यापार को नियमित करने के उपायों पर विचार कर रहे हैं, क्योंकि राजनीतिक अस्थिरता के कारण व्यापार प्रभावित हुआ है। इसके साथ ही गंगा जल संधि के नवीनीकरण का प्रश्न भी एजेंडे में शामिल है। जल संसाधन से जुड़े मुद्दे दोनों देशों के लिए अत्यंत संवेदनशील हैं और इनके समाधान का सीधा प्रभाव सीमावर्ती क्षेत्रों तथा करोड़ों लोगों के हितों पर पड़ता है। इसके अलावा, ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में तारिक रहमान को आमंत्रण मिलना भी इस पूरे घटनाक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बांग्लादेश को यह निमंत्रण इसलिए दिया गया था क्योंकि वह बहुक्षेत्रीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग के लिए बंगाल की खाड़ी पहल यानि बिम्सटेक का वर्तमान अध्यक्ष है। इसके बावजूद बांग्लादेश ने सम्मेलन में अपना प्रतिनिधि नहीं भेजा। उसके विदेश मंत्रालय के राज्य मंत्री ने तब कहा था कि ढाका भारत के साथ संबंधों को नए सिरे से व्यवस्थित करना चाहता है और इसके लिए उपयुक्त समय पर द्विपक्षीय यात्रा को प्राथमिकता देगा। अब वही द्विपक्षीय रास्ता सक्रिय होता दिखाई दे रहा है। इस पूरी कहानी का एक और महत्वपूर्ण पहलू तारिक रहमान और भारत के बीच पुराने संपर्क हैं। बताया जा रहा है कि तारिक रहमान ने लंदन में निर्वासन के वर्षों के दौरान भी भारत से संपर्क बनाए रखा था। फरवरी 2024 में उनके एक दूत ने नई दिल्ली आकर भारत का रुख समझने की कोशिश की थी। इससे संकेत मिलता है कि मौजूदा संपर्क अचानक शुरू नहीं हुए, बल्कि इनके पीछे लंबे समय से चल रही राजनीतिक और कूटनीतिक बातचीत की एक पृष्ठभूमि मौजूद है। हम आपको याद दिला दें कि 2018 में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल नई दिल्ली आया था। उस यात्रा का उद्देश्य भारत के प्रति पार्टी की नीति में सुधार करना था और पार्टी नेतृत्व ने यह स्वीकार किया था कि भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण नीति गलत दिशा में थी। 2024 के चुनाव से पहले भी पार्टी के वरिष्ठ नेता नई दिल्ली पहुंचे थे और भारत से बांग्लादेश की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के समर्थन की अपील की थी। इसलिए नवंबर में तारिक रहमान की संभावित भारत यात्रा उस प्रक्रिया का हिस्सा है जिसमें ढाका और नई दिल्ली अपने संबंधों में आई खटास को पीछे छोड़कर व्यावहारिक हितों पर लौटने की कोशिश कर रहे हैं। बांग्लादेश के लिए भारत के साथ स्थिर संबंध व्यापार, जल, सीमा, संपर्क और सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं, जबकि भारत के लिए बांग्लादेश पूर्वी सीमा और बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में एक अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ोसी है। हालांकि गंगा जल संधि पर अब भारत-बांग्लादेश संबंधों की अगली बड़ी परीक्षा होने वाली है। हम आपको बता दें कि 1996 में हुई तीस वर्ष की यह संधि दिसंबर 2026 में समाप्त हो रही है और ढाका ने इसके नवीनीकरण के लिए बातचीत की मांग पहले ही रख दी है। बांग्लादेश के जल संसाधन मंत्री शाहिदुद्दीन चौधरी अनी ने यहां तक कहा है कि नए समझौते में जल की उपलब्धता की गारंटी वाली धारा होनी चाहिए और अपने जल अधिकारों की रक्षा के लिए बांग्लादेश अंतरराष्ट्रीय मंचों का रुख भी कर सकता है। दूसरी ओर भारत में सत्तारुढ़ गठबंधन एनडीए के महत्वपूर्ण घटक जनता दल यूनाइटेड के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने संधि को दोबारा लागू करने की बजाय दिसंबर में इसे समाप्त करने की मांग की है और बिहार के हिस्से के पानी को लेकर गंभीर आपत्ति जताई है। हालांकि केंद्र ने अभी संधि के भविष्य पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने जनता दल यूनाइटेड को आश्वासन दिया है कि बिहार की पेयजल और औद्योगिक जरूरतों को ध्यान में रखकर उचित निर्णय किया जाएगा। ऐसे में तारिक रहमान की संभावित भारत यात्रा के दौरान गंगा जल संधि सबसे कठिन मुद्दों में से एक बन सकती है। दिलचस्प बात यह है कि बांग्लादेश तत्काल बातचीत और जल की गारंटी चाहता है, जबकि भारत के भीतर ही बिहार के हितों को लेकर संधि की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। साथ ही विशेषज्ञों का कहना है कि 1996 के बाद नदी की जलविज्ञान संबंधी परिस्थितियां, वर्षा का स्वरूप, जलवायु परिवर्तन और ऊपरी हिस्सों में पानी की बढ़ती मांग काफी बदल चुकी है; इसलिए अगला समझौता हुआ तो वह पुराने प्रावधानों की पुनरावृत्ति न होकर नई परिस्थितियों के अनुरूप हो सकता है। बहरहाल, तारिक रहमान की नवंबर में होने वाली संभावित भारत यात्रा इसी परीक्षा का अगला बड़ा पड़ाव होगी। यदि दोनों पक्ष किसी मध्य मार्ग पर पहुंचते हैं, तो यह संबंधों में नई शुरुआत का आधार बन सकता है। फिलहाल सबसे बड़ा संकेत यही है कि जिस संवाद पर विराम लगा था, वह फिर शुरू हो चुका है और इस बार बातचीत का केंद्र टकराव नहीं, बल्कि संबंधों को फिर से व्यवस्थित करने की कोशिश है। -नीरज कुमार दुबे
कनाडा के इतिहास के सबसे भीषण आतंकवादी हमले की जांच को लेकर एक बार फिर ऐसा विवाद खड़ा हो गया है, जिसने चार दशक पुराने कनिष्क विमान कांड के पीड़ित परिवारों के जख्म ताजा कर दिए हैं। आरोप है कि कनाडा की संघीय पुलिस अब 1985 में एयर इंडिया के विमान संख्या 182 में हुए बम विस्फोट की जांच को सीमित करने और मामले को निष्क्रिय श्रेणी में डालने पर विचार कर रही है। यदि ऐसा होता है तो सवाल सिर्फ एक जांच के भविष्य का नहीं होगा, बल्कि यह भी पूछा जाएगा कि 329 लोगों की हत्या के पीछे मौजूद पूरे षड्यंत्र का सच सामने लाने की जिम्मेदारी से कनाडा आखिर कब तक बचता रहेगा? उल्लेखनीय है कि 23 जून 1985 को मॉन्ट्रियल से लंदन जा रहे कनिष्क विमान में आयरलैंड के तट से दूर अटलांटिक महासागर के ऊपर बम विस्फोट हुआ था। विमान में सवार सभी 329 लोगों की मौत हो गई थी। इनमें 268 कनाडाई नागरिक थे। इसी साजिश से जुड़े एक अन्य बम विस्फोट में जापान के नारिता हवाई अड्डे पर दो सामान कर्मियों की भी जान गई थी। कनाडा स्वयं इस हमले को अपने इतिहास का सबसे घातक आतंकवादी हमला मानता रहा है। इसे भी पढ़ें: Vishwakhabram: Trump दबाव बनाते रह गये, Modi-Putin-Jinping गाड़ी आगे बढ़ाते चले गये, त्रिमूर्ति ने मिलकर बदल डाला World Order अब 41 साल बाद पीड़ित परिवारों को बताया जा रहा है कि जांच को सीमित किया जा सकता है। 12 सितंबर को टोरंटो में हुई बैठक में कनाडा की संघीय पुलिस के अधिकारियों ने कथित तौर पर परिवारों को जांच दल का आकार घटाने और मामले को निष्क्रिय स्थिति में ले जाने की संभावित योजना की जानकारी दी। बैठक में मौजूद परिवारों की प्रतिक्रिया बेहद तीखी रही और कई लोग भावुक होकर टूट गए। परिवारों के लिए यह चार दशक से चले आ रहे न्याय के संघर्ष पर चोट है। इसको देखते हुए कनिष्क फाउंडेशन के अध्यक्ष संजय लाजर ने कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी को लिखे पत्र में इस संभावित कदम का कड़ा विरोध किया है। लाजर ने 16 सितंबर के अपने पत्र में बताया कि उन्होंने इस हमले में अपने पिता, मां और शिशु बहन को खो दिया। चार दशक से अधिक समय तक न्याय की तलाश में लगे परिवार के सदस्य के लिए यह सवाल स्वाभाविक है कि जिस मामले को कनाडा की अपनी व्यवस्था ने कभी अपने इतिहास की सबसे जटिल और बड़ी जांचों में शामिल किया, उसे अब अचानक ठंडे बस्ते में डालने की तैयारी क्यों हो रही है? सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या जांच की सभी संभावित दिशाएं वास्तव में समाप्त हो चुकी हैं? यदि हां, तो कनाडा सरकार को यह सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना चाहिए कि कौन-कौन से रास्ते आजमाए गए, किन सबूतों की पड़ताल हुई और किन कारणों से यह निष्कर्ष निकाला गया कि अब आगे कुछ नहीं किया जा सकता। केवल नए सुराग नहीं मिलने को चार दशक पुराने मामले को निष्क्रिय करने का पर्याप्त आधार मानना क्या पीड़ित परिवारों के साथ न्याय होगा? इस मामले का इतिहास कनाडा की सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। कनाडा की न्यायमूर्ति मेजर की अध्यक्षता वाले जांच आयोग ने हमले से पहले और बाद की सुरक्षा तथा खुफिया व्यवस्था में कई गंभीर कमियों की पड़ताल की थी। खतरे से जुड़ी सूचनाओं के आदान-प्रदान, विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय, गवाहों की सुरक्षा और हमले के बाद की जांच जैसे विषय आयोग के केंद्र में रहे। यानी कनिष्क कांड केवल आतंकवादियों की साजिश की कहानी नहीं है, बल्कि यह कनाडा की संस्थागत विफलताओं का भी दस्तावेज है। आपराधिक मुकदमों का परिणाम भी परिवारों के लिए संतोषजनक नहीं रहा। दो मुकदमे चले। इंदरजीत सिंह रेयात को विस्फोटों से संबंधित मामले में दोषी ठहराया गया, जबकि दो अन्य आरोपितों को 2005 में बरी कर दिया गया। आयोग के अनुसार इसके बाद किसी और व्यक्ति पर आरोप नहीं लगाया गया। ऐसे में 329 मौतों के पीछे मौजूद व्यापक साजिश का पूरा सच आज भी सवालों के घेरे में है। परिवारों की नाराजगी इसलिए भी गहरी है क्योंकि उनका आरोप है कि जांच के दौरान महत्वपूर्ण साक्ष्य गायब हुए, निगरानी से जुड़ी कुछ रिकॉर्डिंग मिट गईं और कुछ गवाहों की मृत्यु हुई या उन्हें धमकियों का सामना करना पड़ा। इन दावों को आधिकारिक निष्कर्षों से अलग रखते हुए भी यह सवाल अपनी जगह कायम है कि यदि अतीत में जांच के दौरान कमियां रही हैं तो क्या उनका समाधान जांच बंद करना होना चाहिए या उन अधूरे पहलुओं को फिर से खंगालना होना चाहिए? सबसे विचित्र बात यह है कि अब परिवारों से ही नए सुराग लाने की अपेक्षा की जा रही है। चार दशक तक जांच का भार सरकारी एजेंसियों के पास रहा। ऐसे में पीड़ितों से यह कहना कि वे नए सुराग लेकर आएं, परिवारों के लिए बेहद पीड़ादायक है। उनका सवाल है कि क्या सरकार की जांच व्यवस्था अब अपनी जिम्मेदारी पीड़ितों के कंधों पर डाल रही है? परिवारों ने इसका विकल्प भी सामने रखा है। 1995 में कनाडा सरकार और संघीय पुलिस ने हमले के दोषियों से जुड़ी जानकारी देने पर दस लाख कनाडाई डॉलर के इनाम की घोषणा की थी, जो अब तक दावा रहित है। परिवार चाहते हैं कि इस इनाम को फिर से लागू किया जाए, राशि बढ़ाई जाए और व्यापक स्तर पर नई अपील की जाए। उनका तर्क है कि यदि पुराने सुराग खत्म हो चुके हैं तो नए सुराग पैदा करने की कोशिश क्यों न की जाए? परिवार यह भी कह रहे हैं कि यदि मौजूदा जांच दल आगे बढ़ने में सक्षम नहीं है तो किसी दूसरे दल या अतिरिक्त विशेषज्ञता के जरिए जांच को आगे बढ़ाया जाए। आखिर जांच दल की क्षमता की सीमा को पूरे मामले की सीमा क्यों मान लिया जाए? यहां कनाडा सरकार के सामने एक और गंभीर सवाल है। यदि सरकार स्वयं हर वर्ष इस हमले के 329 पीड़ितों को याद करती है और कनिष्क विमान विस्फोट को कनाडा के इतिहास का सबसे घातक आतंकवादी हमला मानती है, तो फिर न्याय की तलाश को प्रशासनिक निष्क्रियता के हवाले करने की नौबत क्यों आ रही है? जून 2026 में प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने भी हमले की 41वीं बरसी पर 329 पीड़ितों को याद किया था। क्या उनकी सरकार इस मामले को दबते हुए देखते रहेगी? कनिष्क फाउंडेशन के अध्यक्ष संजय लाजर ने अपने पत्र में पूर्व प्रधानमंत्री स्टीफन हार्पर द्वारा परिवारों को दिए गए आश्वासन का भी उल्लेख किया है कि दोषियों की पहचान और मामले को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने के प्रयास जारी रहेंगे। अब यही सवाल मार्क कार्नी के सामने है। सवाल यह है कि क्या वह आश्वासन केवल स्मरण समारोहों तक सीमित रहेगा या कनाडा सरकार वास्तव में इस मामले की अधूरी कड़ियों को जोड़ने की कोशिश करेगी? इस विवाद का एक और महत्वपूर्ण पहलू पीड़ित परिवारों से परामर्श का है। कनिष्क त्रासदी से जुड़े कई परिवार और संगठन दशकों से इस मामले में सक्रिय रहे हैं। ऐसे में किसी एक समूह से बातचीत को सभी पीड़ित परिवारों की सहमति मान लेना भी सवालों के घेरे में आ सकता है। भले कनिष्क कांड को 41 साल बीत चुके हैं, लेकिन समय बीतने से सवाल खत्म नहीं हुए। उलटे सवाल और ज्यादा असहज हो गए हैं। अगर साक्ष्य कमजोर हुए तो क्यों? अगर गवाह खो गए तो क्यों? अगर जांच में कमियां थीं तो उन्हें दूर करने की कोशिश कितनी हुई? और अगर अब जांच रोकने की बात हो रही है तो क्या कनाडा ने सचमुच हर संभव रास्ता आजमा लिया है? बहरहाल, 329 लोगों की मौत का हिसाब केवल इतिहास की किताबों में दर्ज आंकड़ा नहीं है। उनके परिवार आज भी जवाब मांग रहे हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या कनाडा 329 लोगों के लिए न्याय की तलाश को प्रशासनिक सुविधा के नाम पर समाप्त कर सकता है? चार दशक बाद भी यदि इतने सवाल अनुत्तरित हैं, तो जांच बंद करने से सवाल खत्म नहीं होंगे बल्कि वह कनाडा की व्यवस्था पर और गहरे सवाल बनकर लौटेंगे। -नीरज कुमार दुबे
EC के बड़े झटके के बाद Mamata Banerjee का U-Turn! Mamata-Rahul मिलकर देंगे BJP को मात?
मध्य प्रदेश के इंदौर में आज राहुल गांधी का 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम, युवाओं से करेंगे संवाद
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राहुल गांधी के इंदौर कार्यक्रम पर कांग्रेस ने उठाए सवाल
कांग्रेस सांसद पवन खेड़ा ने लोकसभा में विपक्ष के नेता (एलओपी) राहुल गांधी के इंदौर में होने वाले 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम के आयोजन में पार्टी को आ रही दिक्कतों पर सवाल उठाए।
पंजाब में राघव चड्ढा और संदीप पाठक पर अंडे फेंके गए
आम आदमी पार्टी (आप) और भाजपा के बीच पंजाब में सियासी घमासान तेज हो गया है। आम आदमी पार्टी (आप) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक पोस्ट करके बड़ा दावा कर दिया।
नंदीग्राम उपचुनाव से पहले कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान गिरफ्तार
पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर जिले की नंदीग्राम विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव के लिए कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को शुक्रवार को एक पुराने मामले में गिरफ्तार कर लिया गया। पूर्व मेदिनीपुर जिला पुलिस के एक अधिकारी ने गिरफ्तारी की पुष्टि की है।
सोशल मीडिया की भीड़ में अकेला होता व्यक्ति
तकनीक ने मनुष्य को संवाद के ऐसे साधन उपलब्ध करा दिए हैं, जिनकी कल्पना कुछ दशक पहले तक असंभव लगती थी। अब एक क्लिक पर दुनिया के किसी भी कोने में बैठे व्यक्ति से संपर्क स्थापित हो जाता है। हजारों मित्र, सैकड़ों समूह, लगातार आती सूचनाएं और हर क्षण सक्रिय रहने वाली आभासी दुनिया ने यह भ्रम पैदा कर दिया है कि मनुष्य पहले से कहीं अधिक जुड़ा हुआ है। लेकिन इस चमकदार तस्वीर के पीछे एक गंभीर सामाजिक विडंबना भी आकार ले रही है, संपर्क बढ़ रहे हैं, संवाद घट रहा है और भीड़ बढ़ने के बावजूद मनुष्य भीतर से अकेला होता जा रहा है। उसे आत्मीयता भरे शब्दों की प्रतीक्षा रहती है। लेकिन दुनिया के व्यक्ति केवल ज्ञान देने तक ही सीमित रहते हैं, साथ चलने को कोई तैयार नहीं होता। सोशल मीडिया ने दूरी अवश्य कम की है, लेकिन निकटता की परिभाषा बदल दी है। पहले किसी अपने से मिलने के लिए समय निकालना पड़ता था। आमने-सामने बैठकर बातचीत होती थी, चेहरे के भाव पढ़े जाते थे और मौन भी संवाद का हिस्सा होता था। अब किसी के जीवन में हमारी उपस्थिति कई बार केवल एक ‘लाइक’, एक इमोजी या कुछ शब्दों की टिप्पणी तक सीमित हो गई है। जन्मदिन पर दर्जनों शुभकामनाएं मिल जाती हैं, लेकिन संकट की घड़ी में कंधा देने वाला व्यक्ति तलाशना कठिन हो रहा है। इसी कारण आज हर कोई अकेलेपन की गहराई में लगातार घुसता ही जा रहा है। यह बात सच है कि जो व्यक्ति से मिल सकता है, उसे तकनीक कभी नहीं दे सकती। यह स्थिति केवल व्यक्तिगत संबंधों तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव परिवार और समाज की संरचना पर भी दिखाई दे रहा है। एक ही घर में रहने वाले लोग कई बार अपने-अपने मोबाइल की स्क्रीन में व्यस्त रहते हैं। भोजन की मेज पर बातचीत के बजाय सूचनाओं की जांच होती है। बच्चे माता-पिता के साथ समय बिताने के बजाय डिजिटल मनोरंजन में डूबे रहते हैं और माता-पिता भी अपनी आभासी दुनिया में व्यस्त रहते हैं। परिणाम यह है कि घर भौतिक रूप से साथ होते हुए भी भावनात्मक रूप से दूर होते जा रहे हैं। इसी से परिवार के सदस्यों के बीच दूरियां बढ़ती जाती हैं, और यही परिवार टूटने का एक बड़ा कारण भी है। इससे भी व्यक्ति अवसाद की ओर अग्रसर होता जाता है। सोशल मीडिया की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उसने मनुष्य को स्वयं को प्रस्तुत करने का अभूतपूर्व मंच दिया, लेकिन स्वयं को समझने का अवसर कम कर दिया। यहां हर व्यक्ति अपने जीवन का चुना हुआ हिस्सा प्रदर्शित करता है। दूसरों के जीवन की दिखाई देने वाली चमक जब लगातार हमारी आंखों के सामने रहती है, तो अनजाने में तुलना शुरू हो जाती है। हमें लगता है कि दूसरे हमसे अधिक सफल, अधिक खुश और अधिक संतुष्ट हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाला जीवन अक्सर संपूर्ण जीवन नहीं, उसका चयनित अंश होता है। जीवन वही सार्थक है, जिसमें समाज और परिवार का साथ हो। किसी भी प्रकार की तुलना करना हानिकारक ही है। यही तुलना धीरे-धीरे आत्मसंतोष को प्रभावित करती है। व्यक्ति अपने जीवन की वास्तविक उपलब्धियों के बजाय दूसरों की आभासी उपलब्धियों से स्वयं को मापने लगता है। लाइक और कमेंट सामाजिक स्वीकृति के नए पैमाने बन जाते हैं। पोस्ट पर प्रतिक्रिया कम मिले तो बेचैनी और अधिक मिले तो क्षणिक संतोष प्राप्त होता है। यह चक्र व्यक्ति को बाहरी मान्यता पर निर्भर करता जाता है। विडंबना यह है कि हजारों लोगों की प्रतिक्रिया प्राप्त करने वाला व्यक्ति भी अपने मन की बात कहने के लिए एक विश्वसनीय व्यक्ति की तलाश कर सकता है। समाज के सामने एक दूसरी चुनौती संवाद की गुणवत्ता की है। सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति को आसान बनाया है, लेकिन हर अभिव्यक्ति संवाद नहीं होती। संवाद में सुनना भी शामिल है, जबकि डिजिटल संसार में प्रतिक्रिया देने की जल्दबाजी कई बार सुनने की क्षमता को पीछे छोड़ देती है। असहमति होते ही बहस व्यक्तिगत आरोपों में बदल जाती है। विचारों का आदान प्रदान धीरे-धीरे विचारों की टकराहट में बदलने लगता है। इससे सामाजिक विश्वास कमजोर होता है। यहां यह समझना आवश्यक है कि समस्या सोशल मीडिया स्वयं नहीं है। तकनीक एक साधन है, उसका उपयोग उसे उपयोगी या नुकसानदेह बनाता है। सोशल मीडिया ने आपदा के समय सहायता पहुंचाने, ज्ञान साझा करने, रोजगार और व्यवसाय के अवसर पैदा करने तथा दूर रह रहे परिवारों को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। समस्या तब पैदा होती है जब साधन जीवन का विकल्प बनने लगे। इसलिए समाधान तकनीक से पलायन नहीं, बल्कि उसके विवेकपूर्ण उपयोग में है। परिवारों को प्रतिदिन कुछ समय ऐसा निर्धारित करना होगा, जब मोबाइल और अन्य स्क्रीन किनारे रखकर केवल एक-दूसरे से बात की जाए। बच्चों के साथ संवाद को केवल उनकी पढ़ाई और अनुशासन तक सीमित न रखकर उनके विचारों, मित्रताओं, भय और सपनों तक ले जाना होगा। बुजुर्गों को डिजिटल दुनिया में शामिल करने के साथ-साथ उनके अनुभवों को सुनने के लिए भी समय देना होगा। इसे भी पढ़ें: Social Media Post पर गिरफ्तारी Supreme Court के आदेश का उल्लंघन, Rahul Gandhi पर बरसे KTR सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें ‘कनेक्टेड’ होने और ‘जुड़े’ होने के अंतर को समझना होगा। कनेक्शन तकनीक बनाती है, संबंध मनुष्य बनाता है। हजारों संपर्कों की सूची किसी एक सच्चे मित्र का स्थान नहीं ले सकती। सैकड़ों प्रतिक्रियाएं उस एक आत्मीय बातचीत का विकल्प नहीं बन सकतीं, जिसमें सामने वाला हमारी बात केवल सुनता ही नहीं, समझता भी है। आज आवश्यकता सोशल मीडिया छोड़ने की नहीं, बल्कि उसके बीच अपनी सामाजिक संवेदनशीलता बचाए रखने की है। हमें फिर से पड़ोसी से परिचय, मित्र से मुलाकात, परिवार के साथ भोजन और बिना किसी स्क्रीन के बातचीत जैसी छोटी-छोटी मानवीय परंपराओं को जीवन में स्थान देना होगा। क्योंकि मनुष्य को केवल सूचना नहीं, उसे आत्मीयता भी चाहिए। उसे केवल दर्शक नहीं, श्रोता चाहिए, केवल फॉलोअर नहीं, साथी चाहिए। यदि तकनीक हमें हजारों लोगों तक पहुंचा सकती है, तो हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उन हजारों संपर्कों के बीच अपने लोगों से हमारा वास्तविक संबंध कमजोर न हो। सोशल मीडिया की भीड़ में अकेला होता समाज हमारी नियति नहीं है। यह एक चेतावनी है। तकनीक हमारे हाथ में रहे, जीवन पर उसका नियंत्रण न हो, यही संतुलन आधुनिक समाज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। - सुरेश हिंदुस्तानी
कर्नाटक सरकार ने 'मरीन बायोटेक पॉलिसी' को दी मंजूरी, उडुपी में ब्लू इकोनॉमी इंस्टीट्यूट बनाने का भी फैसला
महाराष्ट्र: विभिन्न देशों के महावाणिज्यदूतों ने सीएम फडणवीस के आवास 'वर्षा' पर श्री गणेश के दर्शन किए
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भारत की जीडीपी वृद्धि दर 7 प्रतिशत तक रहने की उम्मीद: वित्त वर्ष 2027
नई दिल्ली, भारत चालू वित्त वर्ष में वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 6.5-7 प्रतिशत हासिल करने की राह पर है।
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भारत का प्रत्यक्ष कर संग्रह 12.12 लाख करोड़ रुपए पहुंचा
नई दिल्ली, भारत का प्रत्यक्ष कर संग्रह चालू वित्त वर्ष में अब तक (1 अप्रैल से 17 सितंबर तक) सालाना आधार पर 13 प्रतिशत बढ़कर 12.12 लाख करोड़ रुपए पर पहुंच गया है।
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टाटा समूह में बढ़ी खींचतान, चंद्रशेखरन के दूसरे कार्यकाल पर ट्रस्ट्स ने जताई आपत्ति
टाटा संस की ओर से जारी बयान के मुताबिक, चंद्रशेखरन ने बोर्ड के अनुरोध पर पहले पद छोड़ने के अपने निर्णय पर पुनर्विचार किया। इसके बाद बोर्ड ने उनके मौजूदा कार्यकाल के बाद अगले पांच वर्षों के लिए पुनर्नियुक्ति का प्रस्ताव बहुमत से मंजूर किया।
बदलता डाकघर, बदलते भारत की नई तस्वीर : ज्योतिरादित्य सिंधिया
बदलता डाकघर, बदलते भारत की नई तस्वीर : ज्योतिरादित्य सिंधिया
बसपा प्रमुख मायावती ने अपने भतीजे को पार्टी की सभी जिम्मेदारियों से मुक्त करते हुए शायद यह सोचा होगा कि उन्होंने आकाश आनंद की राजनीति शुरू होने से पहले ही खत्म कर दी, लेकिन बसपा से बाहर निकलते ही तस्वीर बदल गई। उत्तर प्रदेश का पूरा राजनीतिक वर्ग बांहें फैलाकर आकाश आनंद का इंतजार करता दिखाई दे रहा है। सत्तापक्ष एनडीए के सहयोगी दलों से लेकर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन आंदोलन की राजनीति करने वाले नेताओं तक, हर कोई आकाश आनंद को अपने पाले में लाने की कोशिश में जुट गया है। 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले शुरू हुई यह कवायद बताती है कि निशाना भले ही आकाश आनंद हों, लेकिन असली नजर उस बहुजन सामाजिक आधार पर है, जिसे बसपा ने दशकों में तैयार किया है। मायावती भले ही चुनावी गठजोड़ से लगातार दूरी बनाए हुए हैं, लेकिन आकाश के बहाने उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन वोट की नई गोलबंदी की संभावनाएं तलाशने का खेल शुरू हो चुका है। सबसे पहले निषाद पार्टी के मुखिया और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सहयोगी संजय निषाद ने आकाश आनंद को खुला न्योता दिया। उन्होंने बाबा साहेब आंबेडकर और कांशीराम से जुड़े बहुजन आंदोलन के पुराने नारे का हवाला देते हुए आकाश से आगे आने और अपनी टीम के साथ मुख्यधारा में शामिल होकर कांशीराम के सपने को पूरा करने की अपील की। यानी मामला महज एक नेता को पार्टी में शामिल करने का नहीं, बल्कि बहुजन राजनीति की विरासत को अपने राजनीतिक खेमे में जोड़ने की कोशिश का है। उधर आजाद समाज पार्टी के प्रमुख और नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद ने भी आकाश आनंद के लिए अपने दरवाजे खोल दिए। खास बात यह है कि दोनों नेताओं के बीच पहले तल्खियां रही हैं। इसके बावजूद चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि अगर आकाश बहुजन मिशन को आगे बढ़ाना चाहते हैं और उनकी पार्टी में आना चाहते हैं तो उनका स्वागत है और दोनों साथ काम करेंगे। लेकिन असली दिलचस्पी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के रुख में है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने कहा कि लोकतांत्रिक तरीके से राजनीति में आने वाले किसी भी व्यक्ति के साथ काम करने की संभावना पर विचार किया जा सकता है। उन्होंने मायावती पर भारतीय जनता पार्टी के साथ होने का आरोप भी लगाया और कहा कि आकाश आनंद ने भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ बात की थी। यह बयान बताता है कि कांग्रेस भी इस घटनाक्रम को महज बहुजन समाज पार्टी का अंदरूनी मामला मानकर नहीं चल रही है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव का जवाब तो और भी सीधा था। जब उनसे पूछा गया कि क्या आकाश आनंद को समाजवादी पार्टी में जगह दी जाएगी, तो उन्होंने कहा कि अगर उन्हें उनके पास लाया जाता है तो वे उन्हें ले लेंगे। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह फैसला बहुजन समाज पार्टी का है और दूसरी पार्टियों के लोग उस पर कुछ नहीं कह सकते। यहां सवाल उठता है कि आखिर आकाश आनंद को लेकर इतनी बेचैनी क्यों है? जवाब उत्तर प्रदेश के चुनावी आंकड़ों में छिपा है। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी को 22.23 प्रतिशत मत मिले थे और उसके 19 विधायक जीते थे। वर्ष 2022 में मत प्रतिशत घटकर 12.88 प्रतिशत रह गया और पार्टी महज एक सीट जीत सकी। लोकसभा चुनाव में भी तस्वीर बदली। वर्ष 2019 में उत्तर प्रदेश में पार्टी को करीब 19.43 प्रतिशत मत और 10 सीटें मिली थीं, जबकि वर्ष 2024 में मत प्रतिशत करीब 9.39 प्रतिशत रह गया और पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी। इसके बावजूद बहुजन समाज पार्टी का सामाजिक आधार पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। खासकर जाटव समेत दलित मतदाताओं के एक हिस्से पर पार्टी का प्रभाव अभी भी उत्तर प्रदेश की चुनावी गणित में महत्वपूर्ण माना जाता है। यही वजह है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले हर दल अपने सामाजिक समीकरण को मजबूत करने के लिए संभावित रास्ते तलाश रहा है। इस पूरी कवायद की जड़ में मायावती का 10 सितंबर का फैसला है। इससे पहले 3 सितंबर को आकाश आनंद को राष्ट्रीय संयोजक की अहम जिम्मेदारी से हटाया गया था। इसके बाद उनके ससुर और पूर्व राज्यसभा सदस्य अशोक सिद्धार्थ ने सक्रिय राजनीति से संन्यास की घोषणा की। इसके बावजूद मायावती ने आकाश को पार्टी से पूरी तरह मुक्त कर दिया। मायावती ने आकाश पर पार्टी और आंदोलन के मुकाबले पारिवारिक संबंधों को ज्यादा महत्व देने का आरोप लगाया और उनके रुख को लेकर सवाल उठाए। दिलचस्प बात यह भी है कि आकाश आनंद का राजनीतिक सफर खुद उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। मायावती ने उन्हें दिसंबर 2023 में अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया था। इसके बाद उन्हें संगठन में बड़ी जिम्मेदारियां मिलीं, फिर हटाया गया, दोबारा जिम्मेदारी दी गई और फिर बाहर किया गया। अब एक बार फिर वे पार्टी से बाहर हैं। उधर, मायावती लगातार चुनावी गठबंधन से इंकार करती रही हैं। ऐसे में 2027 की लड़ाई में दूसरे दलों के सामने सवाल है कि बहुजन समाज पार्टी के साथ सीधे तालमेल का रास्ता बंद है तो उसके सामाजिक आधार तक पहुंचने का रास्ता क्या हो? आकाश आनंद को लेकर दिखाई दे रही राजनीतिक हलचल शायद इसी सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश है। बहरहाल, उत्तर प्रदेश की राजनीति में कहानी सिर्फ मायावती बनाम आकाश आनंद की नहीं रह गई है। अब यह सवाल बहुजन राजनीति की अगली दिशा का भी है। आकाश आनंद किसके साथ जाएंगे, जाएंगे भी या नहीं, यह अभी भविष्य के गर्भ में है। लेकिन इतना जरूर साफ है कि मायावती के दरवाजे से बाहर निकलते ही कई सियासी दरवाजे उनके लिए खुल गए हैं और 2027 से पहले उत्तर प्रदेश में बहुजन वोट की बाजी पर दांव शुरू हो चुका है। -नीरज कुमार दुबे
हूतियों के हमले से परेशान सऊदी अरब ने मदद के लिए पाकिस्तान का दरवाजा खटखटाया, लेकिन पाकिस्तान ने सीधे यमन के युद्धक्षेत्र में उतरने से दूरी बनाए रखी। सऊदी अरब ने फिर अमेरिका से सैन्य मदद मांगी, मगर वाशिंगटन ने भी हूतियों के खिलाफ सीधे हमले से इंकार कर दिया। इसके बाद रियाद ने उस इजराइल की ओर भी रुख किया, जिसके साथ उसके औपचारिक राजनयिक संबंध तक नहीं हैं। वहां से खुफिया और सुरक्षा सहयोग मिला, लेकिन वह भी सऊदी अरब की जरूरत के मुताबिक निर्णायक सैन्य समाधान साबित नहीं हुआ। आखिरकार रियाद को चीन की ओर देखना पड़ा और यहीं से पश्चिम एशिया के शक्ति संतुलन की तस्वीर अचानक बदलती दिखाई दी। चीन ने सीधे हूतियों पर हमला करने की बजाय उनके सबसे महत्वपूर्ण समर्थक ईरान पर दबाव डालने का रास्ता चुना है। हम आपको याद दिला दें कि सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने अगस्त में मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। समझौते में किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमला तीनों पर हमला माना गया है और सामूहिक प्रतिरोध तथा रक्षा सहयोग मजबूत करने की बात कही गई है। लेकिन हूतियों के खिलाफ यमन में सीधे सैन्य अभियान के सवाल पर पाकिस्तान ने पलटी मार ली। यानी कागज पर सामूहिक सुरक्षा की भाषा जितनी मजबूत है, युद्ध के मैदान में उसकी व्यावहारिक सीमा उतनी ही स्पष्ट दिखाई दे रही है। इसे भी पढ़ें: BRICS की शानदार सफलता के बाद भारत ने पड़ोस में छेड़ा 'महा-अभियान', हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक तेजी से एक्टिव हुआ India वहीं सऊदी अरब की अगली उम्मीद अमेरिका से थी। रियाद ने सीधे अमेरिकी सैन्य समर्थन की मांग की, लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हूतियों के खिलाफ सऊदी अभियान में सीधे अमेरिकी हमलों की मंजूरी नहीं दी। वाशिंगटन ने खुफिया और लक्ष्य संबंधी सहयोग तक अपनी भूमिका सीमित रखी। यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सऊदी अरब और अमेरिका के बीच सात दशकों से ज्यादा पुराना सुरक्षा-सहयोग ढांचा है। वर्ष 1951 के पारस्परिक रक्षा सहायता समझौते से शुरू हुआ यह रिश्ता बाद में हथियारों की आपूर्ति, सैन्य प्रशिक्षण, वायु और मिसाइल रक्षा तथा व्यापक सुरक्षा सहयोग में बदल गया। अमेरिका खुद सऊदी अरब को दशकों से क्षेत्रीय सुरक्षा साझेदार और अपने सबसे बड़े रक्षा उपकरण खरीदारों में एक बताता रहा है। यही वजह है कि आज सऊदी अरब को हूतियों के हमलों के बीच अकेले जूझते देख उन तमाम देशों में भी बेचैनी पैदा हो गयी है, जिन्होंने लंबे समय से अमेरिकी सुरक्षा छतरी पर भरोसा करते हुए अपनी स्वतंत्र सैन्य क्षमता को उसी अनुपात में विकसित नहीं किया। खाड़ी और पश्चिम एशिया के वे देश, जो अमेरिकी सुरक्षा साझेदारी को बाहरी खतरों से बचाव की महत्वपूर्ण गारंटी मानते रहे हैं, अब यह सवाल पूछने पर मजबूर हैं कि संकट की घड़ी में अमेरिकी सुरक्षा प्रतिबद्धता की वास्तविक सीमा आखिर कितनी है। सऊदी अरब के मामले ने इस बहस को और तीखा कर दिया है। देखा जाये तो यदि इतना पुराना और गहरा सुरक्षा साझेदार भी सीधे सैन्य समर्थन के लिए वाशिंगटन की ओर देखता रह जाए, तो अमेरिकी सुरक्षा आश्वासनों पर निर्भर दूसरे देशों के रणनीतिक गणित पर इसका असर पड़ना तय है। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे असहज करने वाला पहलू यह है कि वाशिंगटन ने अपने लिए सुरक्षा का रास्ता निकालने में हूतियों से गोपनीय बातचीत करने में भी संकोच नहीं किया। ओमान की राजधानी मस्कट में अमेरिकी अधिकारियों और हूती प्रतिनिधियों के बीच गुप्त बैठक हुई। सूत्रों के अनुसार हूतियों ने अमेरिकी जहाजों को निशाना नहीं बनाने और वर्ष 2025 के युद्धविराम के प्रति प्रतिबद्ध रहने का आश्वासन दिया। इसके बाद अमेरिका ने सऊदी अरब के लिए सीधे युद्ध में उतरने से दूरी बनाए रखी। इस घटनाक्रम ने सऊदी अरब के सामने एक बेहद कठोर रणनीतिक सवाल खड़ा कर दिया है कि जिस अमेरिका के साथ उसने दशकों तक सुरक्षा साझेदारी बनाई, उसी अमेरिका ने अपने हितों की रक्षा के लिए हूतियों से संवाद का रास्ता खोल लिया, लेकिन सऊदी अरब की तत्काल सैन्य सहायता की मांग पर प्रत्यक्ष युद्ध में उतरने से इंकार कर दिया। यही वह कारण है जहां अमेरिकी सुरक्षा छतरी पर भरोसा करने वाले दूसरे देशों की चिंताएं भी गहरी होती हैं। इसके अलावा, जब पारंपरिक सहयोगियों से अपेक्षित सैन्य समर्थन नहीं मिला तो सऊदी अरब ने अप्रत्याशित कदम उठाया। अमेरिकी मध्य कमान के माध्यम से सऊदी अरब और इजराइल के बीच संपर्क स्थापित हुआ। इजराइल से मुख्य रूप से हूतियों की सैन्य तैनाती, संभावित हमलों और महत्वपूर्ण ठिकानों से संबंधित खुफिया सहायता पर चर्चा हुई। इजराइली पक्ष से सऊदी बुनियादी ढांचे और रणनीतिक ठिकानों की रक्षा के लिए खुफिया तथा वायु रक्षा क्षमताओं से संबंधित सहायता की संभावना भी सामने आई है। लेकिन यह सहायता प्रत्यक्ष इजराइली सैन्य हस्तक्षेप में नहीं बदली। यानी रियाद को यहां भी वह सैन्य समाधान नहीं मिला जिसकी उसे हूतियों की तेजी से बढ़ती पकड़ के सामने जरूरत थी। यहीं चीन की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। हूतियों ने लाल सागर के तट और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के आसपास तेजी से बढ़त बनाई है। यह सऊदी तेल निर्यात और समुद्री परिवहन के लिए गंभीर खतरा है। इसी पृष्ठभूमि में सऊदी अरब ने चीन से हस्तक्षेप की अपील की। चीन ने सार्वजनिक रूप से संयम, बातचीत और सुरक्षित नौवहन की बहाली की मांग की, लेकिन पर्दे के पीछे उसका संदेश कहीं ज्यादा सीधा था। चीन ने तेहरान से कहा है कि वह हूतियों पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करे और उन्हें नियंत्रित करे, ताकि संघर्ष लाल सागर तथा ऊर्जा मार्गों में और न फैले। चीन ने हूतियों को रोकने के लिए अपनी सबसे बड़ी ताकत यानि आर्थिक और कूटनीतिक पकड़ का इस्तेमाल किया है। हम आपको बता दें कि चीन एक दशक से अधिक समय से ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और ईरानी तेल का सबसे महत्वपूर्ण खरीदार भी है। 2025 में ईरान के समुद्री रास्ते से होने वाले तेल निर्यात का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा चीन ने खरीदा था। यही आर्थिक रिश्ता बीजिंग को तेहरान पर प्रभाव डालने की क्षमता देता है। इसके अलावा 2023 में चीन ने सऊदी अरब और ईरान के बीच संबंध बहाल कराने में मध्यस्थ की भूमिका भी निभाई थी। इसलिए बीजिंग के पास दोनों पक्षों से संवाद का वह चैनल मौजूद है जो अमेरिका के पास नहीं है। देखा जाये तो इस पूरे संकट का सबसे बड़ा सामरिक पहलू केवल सऊदी अरब की सुरक्षा नहीं है। मामला दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार की सुरक्षा तक पहुंच चुका है। एक तरफ होरमुज जलडमरूमध्य पर तनाव है और दूसरी तरफ हूतियों की बढ़ती पकड़ बाब-अल-मंदेब पर दबाव बना रही है। यदि दोनों प्रमुख समुद्री मार्ग लंबे समय तक बाधित होते हैं तो तेल, गैस और वैश्विक समुद्री व्यापार पर एक साथ दबाव पड़ सकता है। यही चीन की सबसे बड़ी चिंता है। चीन की अर्थव्यवस्था ऊर्जा आयात पर निर्भर है और खाड़ी क्षेत्र उसके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसलिए बीजिंग के लिए हूती संकट अब केवल सऊदी अरब या यमन का मामला नहीं रहा। बहरहाल, सऊदी अरब के सामने अब केवल हूतियों की चुनौती नहीं है, बल्कि उसके पारंपरिक सुरक्षा साझेदारों की सीमाएं भी उजागर हो गई हैं। पाकिस्तान समझौते की भाषा तक सीमित है, अमेरिका प्रत्यक्ष युद्ध से पीछे है, इजराइल की मदद फिलहाल खुफिया और रक्षा सहयोग तक सीमित है और चीन पहली बार इस संकट में निर्णायक मध्यस्थ की भूमिका आजमा रहा है। अगर बीजिंग ईरान के जरिए हूतियों पर वास्तविक दबाव डालने में सफल होता है, तो पश्चिम एशिया में शक्ति के खेल का एक नया अध्याय खुल सकता है। अगर वह भी असफल होता है, तो लाल सागर और बाब-अल-मंदेब का संकट केवल सऊदी अरब का संकट नहीं रहेगा, यह वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन सकता है। -नीरज कुमार दुबे
मुंबई, सोने और चांदी में शुक्रवार को तेजी देखी गई और शुरुआती कारोबार में दोनों कीमती धातुओं का दाम करीब आधा प्रतिशत तक बढ़ गया।
शंकर शाह और रघुनाथ शाह के बलिदान दिवस पर शिवराज चौहान और सीएम मोहन यादव समेत कई नेताओं ने दी श्रद्धांजलि
उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन आज मुंबई दौरे पर, लालबागचा राजा के करेंगे दर्शन
उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन शुक्रवार को महाराष्ट्र में मुंबई, लोनावला और पुणे का दौरा करेंगे और धार्मिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक कार्यक्रमों में शामिल होंगे। इस दौरान उपराष्ट्रपति शुक्रवार सुबह मुंबई में लालबागचा राजा के दर्शन करेंगे।
चुनाव आयोग ने टीएमसी का नाम और प्रतीक फ्रीज किया
निर्वाचन आयोग ने ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के आंतरिक विवाद पर व्यवस्था देते हुए उसके दोनों गुटों के पार्टी के मूल नाम और आधिकारिक चुनाव चिह्न 'फूल और घास' के इस्तेमाल पर गुरुवार को तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी
TMC name symbol freeze- टीएमसी के चुनाव चिह्न और नाम फ्रीज़ होने के बाद कांग्रेस ने खुलकर ममता बनर्जी का समर्थन किया है। कांग्रेस ने सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त पर हमला किया, वहीं नेता विपक्ष राहुल गांधी ने कहा कि यह लोकतंत्र का पतन है।
'आधुनिक भारत के वास्तुकार': सीएम धामी ने 'आशीर्वाद का दीया' कार्यक्रम में पीएम मोदी की सराहना की
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के मौके पर आयोजित 'आशीर्वाद का दीया' कार्यक्रम में उन्हें 'आधुनिक भारत का निर्माता' बताया।

