बागी विधायकों पर अखिलेश का तंज, बोले सदस्यता की पर्ची से ज्यादा कुछ नहीं मिला
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) के तीन बागी विधायकों के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने के बाद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने उन पर तीखा तंज कसा
जेएनयू यौन उत्पीड़न मामला: एनसीडब्ल्यू प्रमुख से मिला भाजपा का प्रतिनिधिमंडल, सांसद के खिलाफ कार्रवाई की मांग
उत्तर प्रदेश में नामांकन की चुनौतियां, 'अयोध्या चैलेंज' और राजनैतिक भविष्य का शंखनाद
भारतीय राजनीति का यह एक सर्वमान्य और समय-सिद्ध सिद्धांत है कि दिल्ली का रास्ता लखनऊ के गलियारों से होकर ही गुजरता है। उत्तर प्रदेश न केवल देश का सबसे बड़ा राज्य है, बल्कि यह वह राजनैतिक कुरुक्षेत्र भी है जहां राष्ट्रीय स्तर के बड़े-बड़े सियासी सूरमाओं का भाग्य तय होता है। वर्ष 2026 के इस उत्तरार्ध में कदम रखते ही प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर सरगर्मियां अपने चरम पर पहुंच चुकी हैं और संपूर्ण राज्य एक बार फिर एक बड़े लोकतांत्रिक उत्सव और उसकी जटिलताओं के मुहाने पर खड़ा है। किसी भी चुनाव प्रक्रिया का सबसे पहला, महत्वपूर्ण और प्रशासनिक रूप से संवेदनशील पड़ाव नामांकन होता है, जो केवल एक कानूनी या प्रशासनिक औपचारिकता मात्र नहीं है, बल्कि यह किसी भी राजनैतिक दल की सांगठनिक शक्ति, आंतरिक अनुशासन और जमीनी रणनीति का लिटमस टेस्ट है। इस प्रक्रिया में आने वाली चुनौतियां न केवल चुनाव आयोग और प्रशासन के धैर्य की परीक्षा लेती हैं, बल्कि यह विभिन्न राजनैतिक दलों के अस्तित्व और उनकी साख से भी जुड़ी होती हैं। इस बार, यह नामांकन प्रक्रिया सिर्फ कागजी कार्यवाहियों तक सीमित नहीं है, बल्कि सूबे के दो सबसे बड़े दिग्गजों—मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव—के बीच सीधे 'नामांकन चैलेंज' के रूप में तब्दील हो चुकी है, जिसने उत्तर प्रदेश की सियासत में एक अभूतपूर्व भूचाल ला दिया है। इस राजनैतिक रस्साकशी की शुरुआत तब हुई जब समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अयोध्या का दौरा किया और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी पर तीखा तंज कसते हुए दावा किया कि सपा द्वारा उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद भाजपा सर्वे पर सर्वे करा रही है और उसे अयोध्या में खड़ा करने के लिए कोई उपयुक्त प्रत्याशी ही नहीं मिल रहा है। अखिलेश ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सीधे चुनौती दे डाली कि अगर उन्हें अपनी लोकप्रियता और विकास कार्यों पर इतना ही भरोसा है, तो वे खुद आगामी विधानसभा चुनाव में अयोध्या सीट से मैदान में उतरकर दिखाएं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस चुनौती को न सिर्फ स्वीकार किया, बल्कि इसे एक कदम आगे बढ़ाते हुए अखिलेश यादव को ही कटघरे में खड़ा कर दिया और एक सार्वजनिक कार्यक्रम में साफ शब्दों में कहा कि अगर दम है तो अखिलेश भी अयोध्या से चुनाव लड़ें और वे भी लड़ेंगे, दोनों आमने-सामने नामांकन दाखिल कर एक बार अपनी किस्मत आजमा लें ताकि मामला हमेशा के लिए तय हो जाए। योगी के इस सीधे प्रहार पर अखिलेश यादव ने भी तुरंत प्रतिक्रिया दी और इस सीधे मुकाबले को यह कहते हुए टालने की कोशिश की कि भाजपा को हराने के लिए उनका एक युवा 'पीडीए' प्रहरी ही काफी है। इस जुबानी जंग ने यह साफ कर दिया है कि आगामी चुनावों में नामांकन का दौर कितना हाई-वोल्टेज होने वाला है और दोनों खेमों द्वारा एक-दूसरे की घेराबंदी का यह सबसे आक्रामक रूप है। इसे भी पढ़ें: UP Congress में कुर्सी की लड़ाई जूते-चप्पल तक आई, Ajay Rai ने BJP में वापसी की टिकट कटाई! किसी भी राजनैतिक दल के लिए चुनाव की घोषणा के बाद नामांकन का चरण सबसे अधिक तनावपूर्ण और आंतरिक संघर्षों से भरा होता है क्योंकि टिकटों की घोषणा से लेकर नामांकन पत्र दाखिल करने के अंतिम मिनट तक दलों के भीतर जो उथल-पुथल मचती है, वह सांगठनिक ढांचे को हिलाकर रख देती है। टिकट न मिलने से नाराज कार्यकर्ताओं और नेताओं का विद्रोह उत्तर प्रदेश की राजनीति का एक कड़वा और अपरिवर्तनीय सच है, जहां नामांकन के ठीक पहले पाला बदलना, रातों-रात प्रतिद्वंद्वी पार्टी की सदस्यता ले लेना, निर्दलीय पर्चा दाखिल कर देना या अपनी ही पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार का खेल बिगाड़ने के लिए किसी डमी प्रत्याशी को खड़ा कर देना सबसे बड़ा सांगठनिक चैलेंज बन जाता है। भारतीय जनता पार्टी जैसी कैडर-आधारित पार्टी हो या समाजवादी पार्टी जैसी मजबूत क्षेत्रीय ताकत, आंतरिक असंतोष को दबाना और रूठे हुए नेताओं को मनाना इस समय दोनों ही खेमों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है, और जब बड़े नेता एक-दूसरे को सीधे नामांकन की चुनौती दे रहे हों, तो जमीनी कार्यकर्ताओं को अनुशासित रखना और अधिक मुश्किल हो जाता है। इसके साथ ही, चुनाव आयोग ने हाल के वर्षों में नामांकन पत्रों की स्क्रूटनी और हलफनामों की समीक्षा को अत्यधिक कड़ा कर दिया है, जिसके तहत शपथ पत्र में अपनी संपत्ति, आपराधिक इतिहास, शैक्षणिक योग्यता और वित्तीय देनदारियों का रत्ती भर भी गलत विवरण देना पूरे नामांकन को निरस्त करा सकता है, जैसा कि हाल ही में संपन्न हुए राज्यसभा और विधान परिषद द्विवार्षिक चुनावों के दौरान कुछ निर्दलीय व छोटे दलों के उम्मीदवारों के पर्चे खारिज होने से साबित भी हो चुका है। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल, सघन आबादी और राजनैतिक रूप से संवेदनशील राज्य में नामांकन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखना जिला प्रशासनों और police महकमे के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होता क्योंकि कलेक्ट्रेट और कमिश्नरी कार्यालयों के बाहर का दृश्य अक्सर राजनैतिक शक्ति प्रदर्शन का अखाड़ा बन जाता है। नामांकन दाखिल करने जाते समय उम्मीदवारों द्वारा भारी भीड़ जुटाना, अपनी ताकत का अहसास कराना और गाड़ियों के लंबे काफिले ले जाना एक आम चलन बन चुका है, जिसके कारण चुनाव आयोग के कड़े नियमों के बावजूद कलेक्ट्रेट परिसर के बाहर समर्थकों का हुजूम नियंत्रित करना पुलिस के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द साबित होता है और इस दौरान आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के मामले सबसे ज्यादा दर्ज होते हैं। उत्तर प्रदेश के कई जिले राजनैतिक और सामाजिक रूप से अत्यधिक संवेदनशील माने जाते हैं, जहां नामांकन के दौरान प्रतिद्वंद्वी गुटों के बीच झड़प, नारेबाजी और कभी-कभी हिंसक टकराव की आशंका बनी रहती है, जिससे निपटने के लिए प्रशासन को चप्पे-चप्पे पर सीसीटीवी कैमरों, ड्रोन कैमरों और भारी संख्या में प्रांतीय सशस्त्र कांस्टेबुलरी तथा अर्धसैनिक बलों की तैनाती करनी पड़ती है ताकि पूरी नामांकन प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो सके। इस चुनावी माहौल में डिजिटल तकनीक जहां एक वरदान है, वहीं यह प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती भी बनकर उभरी है क्योंकि हाल के हफ्तों में सोशल मीडिया पर उत्तर प्रदेश में पंचायत और स्थानीय निकायों के चुनावों के नामांकन और तारीखों को लेकर कई फर्जी और भ्रामक खबरें प्रसारित की गईं, जिनका खंडन करना और जनता के बीच सही सूचना पहुंचाना राज्य निर्वाचन आयोग के लिए एक अतिरिक्त प्रशासनिक चुनौती बन गया है। वास्तव में, योगी और अखिलेश के बीच छिड़ा यह नामांकन युद्ध आगामी महासमर की नींव रख रहा है और वर्तमान में जो भी सांगठनिक फेरबदल या राजनैतिक बयानबाजी हो रही है, वह मुख्य चुनाव के मद्देनजर ही की जा रही है, जिसमें सभी प्रमुख दलों के सामने अपनी-अपनी विशिष्ट चुनौतियां हैं। लगातार दो बार राज्य की सत्ता पर काबिज रहने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा के सामने सत्ता विरोधी लहर को कम करने और नए चेहरों को मौका देने की चुनौती होगी, और जब विधानसभा चुनाव के वास्तविक नामांकन शुरू होंगे, तब मौजूदा विधायकों के टिकट काटने या बदलने पर जो आंतरिक असंतोष पैदा होगा, उसे संभालना पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और योगी आदित्यनाथ के लिए सबसे बड़ा इम्तिहान होगा। दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी पिछले कुछ समय से अपने 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के साथ खुद को री-ब्रांड कर रही है, और अखिलेश यादव के लिए चुनौती यह होगी कि वे टिकट वितरण और नामांकन के समय इस सामाजिक समीकरण को जमीन पर कैसे उतारते हैं तथा अयोध्या जैसी प्रतीकात्मक और हाई-प्रोफाइल सीट पर योगी आदित्यनाथ की सीधी चुनौती का सामना करने के लिए वे अपने मौजूदा घोषित प्रत्याशी पर भरोसा बनाए रखते हैं या खुद मैदान में उतरकर इस राजनैतिक जुए को खेलने का साहस दिखाते हैं। नामांकन की प्रक्रिया लोकतंत्र के भव्य भवन की वह पहली ईंट है, जिस पर पूरे चुनाव की शुचिता, विश्वसनीयता और पारदर्शिता टिकी होती है और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में, जहां की राजनीति जाति, धर्म, क्षेत्रीयता, बाहुबल और धनबल के अत्यधिक जटिल ताने-बाने से बुनी गई है, वहां नामांकन को निर्विघ्न और निष्पक्ष बनाना एक युगांतकारी कार्य है। योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव के बीच का 'अयोध्या नामांकन चैलेंज' यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि उत्तर प्रदेश का आगामी चुनाव किसी भी सामान्य चुनाव से अलग, एक वैचारिक और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की लड़ाई बनने जा रहा है। चुनौतियां चाहे राजनैतिक दलों के भीतर टिकटों को लेकर मचे घमासान की हों, कलेक्ट्रेट के बाहर कानून-व्यवस्था की हों, या फिर दोनों शीर्ष नेताओं के बीच आमने-सामने के मुकाबले की हों—इन सबका समाधान केवल और केवल सख्त प्रशासनिक इच्छाशक्ति, चुनाव आयोग की निष्पक्षता और राजनैतिक दलों की लोकतांत्रिक परिपक्वता में ही निहित है। उत्तर प्रदेश की जागरूक जनता नामांकन के इस शोर-शराबे, रैलियों के शक्ति प्रदर्शन और शीर्ष नेताओं की इस राजनैतिक जंग के बीच हर उम्मीदवार के हलफनामे, उसके आचरण और उसकी पार्टी की नीति का बहुत सूक्ष्मता से मूल्यांकन कर रही है और आने वाले महीनों में यह देखना अत्यंत दिलचस्प होगा कि देश का यह सबसे बड़ा राजनैतिक सूबा इन चुनौतियों से पार पाकर किस तरह एक नए राजनैतिक भविष्य की इबारत लिखता है और क्या 'अयोध्या' वास्तव में इस महामुकाबले का मुख्य केंद्र बिंदु बनती है। - अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने बढ़ाई भारत की विकास दर
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए भारत के सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर के अनुमान को 6.4 प्रतिशत से बढ़ाकर 7 प्रतिशत करना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक अत्यंत उत्साहवर्धक और सकारात्मक संकेत है। वैश्विक पटल पर जब कई बड़ी और विकसित अर्थव्यवस्थाएं मंदी, महंगाई और अस्थिरता के दौर से गुजर रही हैं, तब भारत की विकास दर में इस तरह का सकारात्मक संशोधन देश की आर्थिक नीतियों और मजबूत आधारभूत संरचना की सफलता को प्रमाणित करता है। यह केवल एक संख्यात्मक वृद्धि नहीं है, बल्कि यह विश्व समुदाय के उस अटूट भरोसे का प्रतीक है जो उसने भारत की आर्थिक संभावनाओं पर जताया है। सात प्रतिशत की यह जादुई विकास दर भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की सूची में सबसे ऊपर रखती है और यह स्पष्ट करती है कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद देश का आर्थिक पहिया तेज गति से घूम रहा है। इस शानदार आर्थिक वृद्धि के पीछे सबसे बड़ा कारण देश की अपनी मजबूत घरेलू मांग है। पश्चिमी देशों की तरह भारतीय अर्थव्यवस्था पूरी तरह से केवल निर्यात पर निर्भर नहीं है, बल्कि यहां का विशाल मध्यवर्ग और उसकी उपभोग क्षमता अर्थव्यवस्था को एक मजबूत ढाल प्रदान करती है। जब वैश्विक बाजारों में मांग कम होती है, तब देश के भीतर की खपत उत्पादन को गिरने नहीं देती। पिछले कुछ वर्षों में लोगों की क्रय शक्ति में जो सुधार आया है, उसने बाजार में उत्पादों और सेवाओं की मांग को निरंतर बनाए रखा है। यह घरेलू मांग ही है जिसके कारण छोटे से लेकर बड़े उद्योगों तक का चक्र सुचारू रूप से चल रहा है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में खपत बढ़ने से विनिर्माण और खुदरा व्यापार को भारी लाभ मिल रहा है, जो अंततः सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़ों में परिलक्षित हो रहा है। इसे भी पढ़ें: ढ़ाई दशक के सख्त फैसलों ने बनाया मोदी को मोदी घरेलू मांग के साथ ही सेवा क्षेत्र इस विकास यात्रा का एक बहुत महत्वपूर्ण स्तंभ बनकर उभरा है। भारत का सेवा क्षेत्र, विशेष रूप से सूचना प्रौद्योगिकी, वित्तीय सेवाएं, स्वास्थ्य और शिक्षा, न केवल देश के भीतर बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी धाक जमा रहा है। तकनीक के निरंतर विस्तार और नवाचार ने भारतीय उद्यमों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने योग्य बनाया है। वित्तीय सेवाओं के आधुनिकीकरण और लेनदेन की नई तकनीकी प्रणालियों ने भी व्यापार को आसान और पारदर्शी बनाया है। सेवा क्षेत्र का लगातार विस्तार न केवल विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ा रहा है, बल्कि यह लाखों युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा कर रहा है। ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था में भारत की बढ़ती पैठ उसे भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार कर रही है। सरकार द्वारा बुनियादी ढांचे के विकास पर किया जा रहा भारी पूंजीगत व्यय भी इस सात प्रतिशत की वृद्धि का एक प्रमुख वाहक है। नई सड़कों, राजमार्गों, रेलवे मार्गों, हवाई अड्डों और बंदरगाहों के निर्माण से न केवल देश के विभिन्न हिस्से आपस में बेहतर तरीके से जुड़ रहे हैं, बल्कि इससे माल ढुलाई और व्यापार की लागत में भी भारी कमी आ रही है। बुनियादी ढांचे पर खर्च किया गया धन अर्थव्यवस्था में कई गुना अधिक प्रभाव डालता है। इससे निर्माण सामग्री उद्योगों को सीधा लाभ मिलता है और दिहाड़ी मजदूरों से लेकर तकनीकी विशेषज्ञों तक हर स्तर पर रोजगार का सृजन होता है। सरकार की यह दूरदर्शी सोच अर्थव्यवस्था को दीर्घकालिक मजबूती प्रदान कर रही है, जिससे भविष्य में विकास की रफ्तार को और भी तेज किया जा सकेगा। इसके अतिरिक्त विनिर्माण क्षेत्र में जान फूंकने के लिए लागू की गई उत्पादन आधारित प्रोत्साहन जैसी योजनाओं का भी सकारात्मक असर दिखने लगा है। देश को वैश्विक विनिर्माण का केंद्र बनाने की दिशा में यह एक बड़ा कदम है। अब संचार उपकरणों से लेकर रक्षा सामग्री और बिजली से चलने वाले उपकरणों तक का निर्माण बड़े पैमाने पर देश के भीतर ही हो रहा है। इससे आयात पर निर्भरता कम हो रही है और व्यापार घाटा भी सुधर रहा है। जब देश में नई औद्योगिक इकाइयां लगती हैं, तो वे अपने साथ कुशल और अकुशल दोनों तरह के कामगारों के लिए आजीविका लेकर आती हैं। युवाओं को रोजगार मिलने से उनकी आमदनी बढ़ती है, जिससे वे बाजार में अधिक पैसा खर्च करते हैं, और यह चक्र पूरी अर्थव्यवस्था को लगातार गति प्रदान करता है। भारत जैसे विशाल देश में असली आर्थिक विकास तब तक संभव नहीं है जब तक कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था मुख्यधारा के साथ पूरी तरह से कदम मिलाकर न चले। कृषि और उससे जुड़े उद्योगों का देश के सकल घरेलू उत्पाद में बहुत बड़ा योगदान है। अच्छी उपज और बेहतर समर्थन मूल्य के कारण ग्रामीण आय में जो वृद्धि दर्ज की गई है, उसने कृषि उपकरणों और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की मांग को तेज किया है। ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ता उपभोग इस बात का संकेत है कि विकास का लाभ केवल शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह समाज के निचले पायदान तक भी पहुंच रहा है। आर्थिक समावेशन की यह प्रक्रिया विकास को अधिक टिकाऊ और संतुलित बनाती है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के इस नए अनुमान का सीधा असर विदेशी निवेशकों की मानसिकता पर भी पड़ेगा। दुनिया भर के निवेशक हमेशा ऐसे बाजारों की तलाश में रहते हैं जहां उन्हें स्थिरता, सुरक्षा और उच्च लाभ की गारंटी मिल सके। जब एक शीर्ष वैश्विक संस्था भारत की विकास दर को बढ़ाती है, तो यह निवेशकों के लिए एक स्पष्ट संकेत होता है कि भारत निवेश के लिए सबसे सुरक्षित और लाभदायक स्थान है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के बढ़ने से देश में नई तकनीक आती है, उत्पादन क्षमता का विस्तार होता है और वैश्विक बाजारों तक हमारी पहुंच आसान हो जाती है। इसके साथ ही, देश के प्रतिभूति बाजारों में भी सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे आम निवेशकों की संपत्ति में भी इजाफा होता है। हालांकि, इस उच्च विकास दर के साथ कुछ चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं, जिन पर निरंतर ध्यान देने की आवश्यकता है। मुद्रास्फीति यानी महंगाई दर को नियंत्रित रखना सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक है। यदि वस्तुओं और सेवाओं के दाम तेजी से बढ़ते हैं, तो वह आम आदमी की क्रय शक्ति को कम कर देता है, जिससे अंततः घरेलू मांग प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा, वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, जैसे युद्ध और आपूर्ति श्रृंखला में आने वाली बाधाएं, कच्चे तेल और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को अस्थिर कर सकते हैं। कृषि क्षेत्र पर जलवायु परिवर्तन और अनियमित मौसम का प्रभाव भी एक बड़ी चिंता का विषय बना रहता है। इसलिए विकास के इस आंकड़े को बनाए रखने के लिए जोखिम प्रबंधन पर विशेष जोर देना होगा। निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि 6.4 प्रतिशत से 7 प्रतिशत तक का यह सफर केवल एक मामूली सा गणितीय बदलाव नहीं है, बल्कि यह एक सशक्त और आत्मनिर्भर राष्ट्र की मजबूत बुनियाद का परिचायक है। सरकार की नीतियां, उद्यमियों का साहस और आम नागरिक की मेहनत मिलकर इस आर्थिक महाकाव्य को लिख रहे हैं। यदि आर्थिक सुधारों की यह प्रक्रिया इसी तरह बिना रुके चलती रही और सामने आने वाली चुनौतियों का कुशलतापूर्वक प्रबंधन किया गया, तो भारत को एक विकसित और समृद्ध अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य को प्राप्त करने से कोई नहीं रोक सकता। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का यह अनुमान इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि भारत सही दिशा में आगे बढ़ रहा है और आने वाले दशक पूरी तरह से भारतीय अर्थव्यवस्था के स्वर्णिम काल होने वाले हैं।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर तिरंगा लहराने, छात्रों की गिरफ्तारी और विरोध-प्रदर्शन के अधिकार को लेकर छिड़ा विवाद अब महज कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रह गया है। इसके मंच पर देश की सियासत का एक नया नाटक भी आकार लेने लगा है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं की गिरफ्तारी पर जिस अंदाज में आवाज बुलंद की है, उससे साफ है कि विपक्ष अब इस आंदोलन को अपने बड़े राजनीतिक अभियान से जोड़ने की कोशिश में है। सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी को अचानक CJP के आंदोलन में लोकतंत्र की नई उम्मीद दिखाई देने लगी है, या फिर इसके पीछे चुनाव आयोग, मतदाता सूची और भाजपा के खिलाफ विपक्षी मोर्चे को मजबूत करने की रणनीति काम कर रही है? हम आपको बता दें कि राहुल गांधी ने सोशल मीडिया मंच X पर कहा कि जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान तिरंगा लहराना कोई अपराध नहीं है और ऐसा करने पर युवाओं को जेल में डालना कायरता है। उन्होंने छात्रों, युवाओं, पत्रकारों और INDIA गठबंधन का जिक्र करते हुए दावा किया कि अलग-अलग बैनर के बावजूद सबकी लड़ाई संवैधानिक अधिकारों की मांग करना ही है। उनका संदेश था कि जंतर-मंतर जनता का है और उसे वापस हासिल किया जाएगा। इसे भी पढ़ें: अनियंत्रित भीड़ को 'शिव बारात' की उपमा देकर राहुल गांधी ने हिंदू भावनाओं को पहुँचाई ठेस! देखा जाये तो बात सुनने में दमदार है। आखिर लोकतंत्र में विरोध की आवाज को जगह मिलनी ही चाहिए। लेकिन राजनीति में केवल भाषण नहीं, उसके पीछे की टाइमिंग भी बहुत कुछ कहती है। राहुल गांधी का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि CJP के आंदोलन को लेकर कांग्रेस का रुख अब तक इतना खुला और स्पष्ट नहीं था। सवाल उठता है कि पहले दूरी, अब दोस्ती क्यों? हम आपको याद दिला दें कि परीक्षाओं में गड़बड़ी और पेपर लीक के खिलाफ जुलाई में CJP ने जंतर-मंतर पर 17 दिनों तक प्रदर्शन किया था। सोशल मीडिया पर इस संगठन की चर्चा बढ़ी, लेकिन कांग्रेस के बड़े नेताओं ने शुरुआत में उससे दूरी बनाए रखी। पार्टी का जोर अपने अभियानों ‘छात्रों की गूंज’ और ‘वोट चोरी' पर रहा। संदेश साफ था कि पेपर लीक और मतदाता सूची की कथित अनियमितताओं जैसे मुद्दों पर कांग्रेस पहले से लड़ाई लड़ रही है। यानी आंदोलन का मुद्दा वही था, लेकिन मंच अलग-अलग थे। कांग्रेस अपनी राजनीतिक जमीन पर किसी दूसरे संगठन को ज्यादा जगह देने के मूड में नहीं दिख रही थी। देखा जाये तो विपक्ष की राजनीति में मुद्दों से ज्यादा महत्वपूर्ण कई बार यह हो जाता है कि मुद्दे का श्रेय किसे मिलेगा। इसके बाद, 10 अक्टूबर को CJP ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े मुद्दों पर प्रदर्शन का आह्वान किया, लेकिन कांग्रेस उससे दूर रही। 12 अक्टूबर को जब विपक्षी दलों ने अपना मार्च निकाला, तब CJP भी उस कार्यक्रम से अलग रही। एक ही मुद्दे पर अलग-अलग प्रदर्शन विपक्ष की एकजुटता के दावों पर सवाल खड़े कर रहे थे। अब राहुल गांधी का कहना है कि कोई समानांतर प्रदर्शन नहीं है, बल्कि लड़ाई एक ही है। यही वह राजनीतिक मोड़ है, जहां कांग्रेस ने CJP के आंदोलन को अपने व्यापक विपक्षी अभियान से जोड़ने का संकेत दिया है। CJP के नेताओं सौरव दास और अभिषेक रांका को जंतर-मंतर में अनधिकृत प्रवेश के आरोप में गिरफ्तार किए जाने और पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के बाद विपक्ष ने सरकार पर हमला तेज कर दिया है। पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के सांसद अभिषेक बनर्जी ने तिरंगा लहराने पर भारतीयों की गिरफ्तारी को लेकर भाजपा पर निशाना साधा और भारत को ‘पाकिस्तानाइज्ड’ करने का आरोप लगाया। वहीं, CPI(ML) के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने जंतर-मंतर को जनता का प्रदर्शन स्थल बताते हुए गिरफ्तारी और हिरासत को अनुचित करार दिया। विपक्ष का तर्क है कि जब नागरिक अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन करना चाहते हैं, तो उन्हें पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। दूसरी तरफ, किसी भी प्रदर्शन के मामले में प्रशासन को प्रवेश, सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़े नियमों का हवाला देने का अधिकार होता है। साथ ही इस विवाद का एक और अहम पहलू है। सरकार के जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल के रूप में समाप्त करने के फैसले के बाद विपक्ष इसे जनता के विरोध के अधिकार से जोड़ रहा है। ऐसे में जंतर-मंतर अब राजनीतिक प्रतीक बनता जा रहा है। इसके अलावा, राहुल गांधी की राजनीति में एक बड़ी चुनौती लंबे समय से यही रही है कि अलग-अलग मुद्दों पर उठने वाली आवाजों को एक साझा राजनीतिक अभियान में कैसे बदला जाए? CJP के साथ खड़े होने का उनका फैसला इसी दिशा में एक कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है। छात्रों का असंतोष, पेपर लीक का मुद्दा, मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों के आरोप और प्रदर्शन के अधिकार का सवाल, इन सबको एक सूत्र में पिरोकर कांग्रेस भाजपा के खिलाफ व्यापक मोर्चा तैयार करना चाहती है। लेकिन यहां एक पेचीदा सवाल भी है। यदि कांग्रेस पहले से इन मुद्दों पर आंदोलन कर रही थी, तो CJP के साथ खड़े होने में इतनी देर क्यों हुई? और अगर लड़ाई वास्तव में एक ही है, तो 10 और 12 अक्टूबर को अलग-अलग प्रदर्शन क्यों हुए? इन सवालों का जवाब केवल बयानबाजी से नहीं मिलेगा। विपक्ष को यह साबित करना होगा कि उसकी एकजुटता केवल राजनीतिक सुविधा का गठजोड़ नहीं, बल्कि मुद्दों पर आधारित साझा प्रतिबद्धता है। दूसरी ओर, सरकार को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रदर्शन स्थलों और प्रशासनिक नियमों के नाम पर नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकार अनावश्यक रूप से बाधित न हों। इस पूरे सियासी घटनाक्रम में एक दिलचस्प पहलू आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल का भी है। CJP को अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक उपज माना जाता रहा है और आम आदमी पार्टी का उसके आंदोलनों के प्रति समर्थन भी इस चर्चा को हवा देता है। ऐसे में राहुल गांधी का अचानक CJP के साथ खुलकर खड़ा होना कई सियासी सवाल पैदा करता है। क्या यह महज लोकतांत्रिक अधिकारों के समर्थन का मामला है, या इसके पीछे विपक्षी राजनीति की कोई बड़ी बिसात बिछाई जा रही है? क्या CJP के बहाने कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच जमी सियासी बर्फ पिघलाने की कोशिश हो रही है? और क्या इसे अरविंद केजरीवाल की INDIA गठबंधन में संभावित वापसी के संकेत के तौर पर भी देखा जाना चाहिए? सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि पंजाब में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी एक-दूसरे के प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं। ऐसे में अगर दिल्ली के राजनीतिक मंच पर दोनों के बीच नजदीकी बढ़ती है, तो पंजाब की सियासत में इसका क्या असर पड़ेगा? क्या दोनों दल एक तरफ राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ साझा रणनीति बनाने और दूसरी तरफ पंजाब में एक-दूसरे को चुनौती देने का दोहरा खेल खेलेंगे? देखा जाये तो भारतीय राजनीति में अक्सर सार्वजनिक मंचों पर दिखने वाली एकजुटता भविष्य के राजनीतिक समीकरणों की जमीन भी तैयार करती है। ऐसे में राहुल गांधी का CJP के समर्थन में उतरना केवल एक आंदोलन के पक्ष में दिया गया बयान है या कांग्रेस और केजरीवाल के बीच नए सियासी संवाद की शुरुआत, इस पर निगाहें बनी रहेंगी। बहरहाल, राहुल गांधी का CJP के समर्थन में उतरना कांग्रेस की रणनीति में बदलाव का संकेत है। यह कदम विपक्ष को एक साझा मंच देने की कोशिश भी हो सकता है और भाजपा के खिलाफ राजनीतिक बढ़त हासिल करने का अवसर भी क्योंकि भारतीय राजनीति में दोनों संभावनाएं एक साथ मौजूद रहती हैं। साथ ही तिरंगा किसी एक पार्टी की जागीर नहीं, संविधान किसी एक गठबंधन की संपत्ति नहीं और जंतर-मंतर किसी एक संगठन की निजी जमीन नहीं है। यदि विपक्ष सचमुच जनता के अधिकारों की लड़ाई लड़ना चाहता है, तो उसे विश्वसनीय संघर्ष करना होगा। -नीरज कुमार दुबे
चिप उद्योग के भविष्य पर भारत में होगी वैश्विक चर्चा: आईएसआईजी समिट
नई दिल्ली, इंटरनेशनल सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री ग्रुप (आईएसआईजी) 3-4 नवंबर को राष्ट्रीय राजधानी में 'आईएसआईजी एग्जीक्यूटिव समिट इंडिया 2026' का आयोजन करेगा।
पॉलीकैब इंडिया में शेयर 5 प्रतिशत तक लुढ़के
नई दिल्ली, पॉलीकैब इंडिया के शेयरों में बुधवार को गिरावट देखने को मिली और यह 5 प्रतिशत तक फिसल गया।
भारत अब चीन पाकिस्तान की नकेल कस रहा है। इस बार सिर्फ सीमा पर नहीं बल्कि समुद्र मिसाइल और वैश्विक व्यापार तीनों मोर्चों पर एक ऐसा खेल शुरू हो चुका है जिसकी गूंज बीजिंग से लेकर इस्लामाबाद तक साफ सुनाई दे रही है। भारतीय सीमाओं पर अगले तीन साल में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के लिए बड़े स्तर पर तैयारियां की जा रही हैं। वहीं, चीन और पाकिस्तान से लगी सीमाओं पर अब जमीन के नीचे सैन्य अड्डे बनाने की तैयारी है। भारतीय सेना चीन (लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल) और पाकिस्तान (लाइन ऑफ़ कंट्रोल) के साथ अपनी संवेदनशील सीमाओं पर ज़मीन के नीचे बने शेल्टर, गहरी सुरंगों और मज़बूत स्टोरेज साइट्स का एक बड़ा नेटवर्क बना रही है। इसका मुख्य मकसद फ्रंटलाइन पर तैनात सैनिकों, भारी गोला-बारूद, ईंधन के भंडार और अहम हथियारों जैसे आर्टिलरी गन, एयर डिफेंस सिस्टम और मिसाइल बैटरी को दुश्मन की सटीक मिसाइलों, लोइटरिंग म्यूनिशन (कामिकेज़ ड्रोन) और भारी हवाई हमलों से सुरक्षित रखना है। सेना इस रणनीति को फ़ोर्स-प्रिज़र्वेशन (सेना को सुरक्षित रखने) की मुख्य योजना मानती है। ऑपरेशन सिंदूर, यूक्रेन-रूस और अमेरिका-ईरान युद्ध में मिसाइलों, ड्रोन और बंकर बस्टर बमों के इस्तेमाल को देखते हुए यह फैसला किया गया है। आधुनिक, टेक्नोलॉजी पर आधारित युद्ध में आगे की चौकियों को दुश्मन के शुरुआती ज़बरदस्त हमले के लिए खुला छोड़ने के बजाय, यह तरीका यह पक्का करता है कि लड़ाई के लिए ज़रूरी अहम साधन सुरक्षित रहें। इस युद्ध-क्षमता को सुरक्षित रखने से ज़मीनी टुकड़ियों को दुश्मन के भारी हमलों की शुरुआती लहर से बचने, उस झटके को सहने और तुरंत निर्णायक जवाबी हमला करने की क्षमता बनाए रखने में मदद मिलती है। इसे भी पढ़ें: Nepal Flood: गोरखा में सेना ने 200 से अधिक लोगों को सुरक्षित निकाला उत्तर में 19 प्रोजेक्ट सेना की नॉर्दर्न कमांड, जो जम्मू-कश्मीर और लद्दाख की देखरेख करती है, ने अपने इलाके में सुरक्षित अंडरग्राउंड (ज़मीन के नीचे) सुविधाएं बनाने के लिए 19 अलग-अलग प्रोजेक्ट शुरू किए हैं। हर साइट को वहां की ज़मीन की स्थिति और उसके काम के हिसाब से डिज़ाइन किया जाएगा। इसे भी पढ़ें: Delhi CAPF Deployment | दिल्ली में बड़े बवाल की आशंका! दिल्ली पुलिस ने की 20 अक्टूबर तक CAPF की तैनाती बढ़ाने की मांग, छावनी में तब्दील होगी राजधानी इन सुविधाओं का इस्तेमाल इन कामों के लिए किया जाएगा मिलिट्री इक्विपमेंट स्टोर करना: ज़रूरी हथियारों और सामान को दुश्मन की गोलीबारी से सुरक्षित रखना। गोला-बारूद स्टोर करना: गोला-बारूद के स्टॉक को मिसाइल और ड्रोन हमलों से बचाना। ट्रेनिंग की ज़रूरतें: सुरक्षित माहौल में ट्रेनिंग गतिविधियों में मदद करना। कमांड ने अगस्त में इन प्रोजेक्ट्स के लिए टेंडर जारी किए थे। जो कंपनियां इस काम में दिलचस्पी रखती हैं, वे 7 नवंबर तक अपनी बोलियां (बिड) भेज सकती हैं। इसे भी पढ़ें: एक से बढ़कर एक हथियार से भारत को लैस कर रहा रूस, SU-57 के बाद अब T-72 टैंक की बारी आर्मी कमांडर ने क्या कहा नॉर्दर्न कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ, लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा ने 9 अक्टूबर को सोसाइटी ऑफ़ इंडियन डिफेंस मैन्युफैक्चरर्स (SIDM) के सालाना सेशन में इस प्लान के बारे में बात की। उन्होंने कहा कि इन प्रोजेक्ट्स के लिए खरीद की प्रक्रिया पारदर्शी और सभी के लिए निष्पक्ष होगी। उन्होंने यह भी कहा कि सेना चाहती है कि ज़्यादा से ज़्यादा कंपनियाँ इसमें हिस्सा लें, जिनमें माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइज़ेज़ (MSMEs) भी शामिल हों। सेना ज़मीन के नीचे क्यों जा रही है? आधुनिक युद्ध तेज़ी से बदल रहे हैं। लंबी दूरी की मिसाइलें और सटीक निशाना लगाने वाले हथियार अब ज़मीन पर मौजूद लक्ष्यों को बहुत सटीकता से निशाना बना सकते हैं। इससे खुले बेस, गोला-बारूद के भंडार और खड़े किए गए उपकरण आसानी से निशाने पर आ सकते हैं। ज़मीन के नीचे बनी जगहें कहीं बेहतर सुरक्षा देती हैं। ये सेना को तब भी काम करते रहने में मदद कर सकती हैं जब दुश्मन लंबे समय तक और ज़ोरदार हमले करे। भारतीय सेना की ज़मीन के नीचे बनी नई सुविधाओं को मिसाइल हमलों, मोर्टार की गोलाबारी और हवाई हमलों से सुरक्षित रहने के लिए बनाया गया है। सेना ने पश्चिम एशिया में हाल के युद्धों और 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान अपने अनुभव से सबक सीखा है। यह मई 2025 में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर में आतंकी ठिकानों के ख़िलाफ़ भारत की सैन्य कार्रवाई थी। योजना बनाने वालों ने ईरान के ज़मीन के नीचे बनी सुरंगों और मिसाइल शहरों के बड़े नेटवर्क का भी अध्ययन किया है, जिसने लंबे हवाई हमलों के दौरान उसे अपने हथियारों को सुरक्षित रखने में मदद की थी। सबसे ज़बरदस्त हमलों का सामना करने के लिए तैयारी आर्मी ने एक्सपर्ट्स से बातचीत करने और आज के दौर के युद्धक्षेत्र की ज़रूरतों को समझने के बाद इन शेल्टर (सुरक्षित ठिकानों) के लिए अलग-अलग डिज़ाइन तैयार किए हैं। इन विकल्पों में शामिल हैं: प्री-फ़ैब्रिकेटेड स्ट्रक्चर: पहले से तैयार यूनिट जिन्हें तेज़ी से लगाया जा सकता है। ज़मीन के नीचे बनी सुविधाएँ: सामान रखने और सुरक्षा के लिए ज़मीन के नीचे बनाए गए शेल्टर। बहुत गहरी गुफ़ाएँ: चट्टानों को काटकर बनाई गई बहुत गहरी जगहें जो सबसे ज़बरदस्त हमलों को भी झेल सकती हैं। ये स्ट्रक्चर भारी बमबारी, तोपखाने की गोलाबारी और यहाँ तक कि बंकर-बस्टर हथियारों का भी सामना करने के लिए बनाए गए हैं। बंकर-बस्टर को इस तरह डिज़ाइन किया गया है कि फटने से पहले यह ज़मीन में गहराई तक जा सके। पूर्व में भी काम चल रहा है सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा के लिए पूर्व में भी इसी तरह की कोशिशें चल रही हैं। पश्चिम बंगाल में ज़मीन की इस संकरी पट्टी को अक्सर चिकन नेक कहा जाता है; यह अपनी सबसे संकरी जगह पर सिर्फ़ 20 से 22 किलोमीटर चौड़ी है। यह भारत के बाकी हिस्सों और पूर्वोत्तर राज्यों के बीच ज़मीन का मुख्य संपर्क मार्ग है, जो इसे देश के सबसे संवेदनशील इलाकों में से एक बनाता है। यहाँ बनाई जा रही ज़मीन के नीचे की सुविधाओं का इस्तेमाल कमांड और कंट्रोल, लॉजिस्टिक्स और सुरक्षित स्टोरेज के लिए किया जा सकता है। इससे सेना को इस इलाके में अहम ऑपरेशन जारी रखने में मदद मिलेगी, भले ही उस पर हमला हो जाए। BRO ड्रोन बंकर बना रहा है बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइज़ेशन (BRO) कुछ अग्रिम ठिकानों पर ज़मीन के नीचे बंकर भी बना रहा है। ये बंकर कॉम्बैट ड्रोन और दूसरे कीमती उपकरणों की सुरक्षा करेंगे। सुरक्षा कारणों से इन जगहों की जानकारी साझा नहीं की गई है। युद्ध लड़ने के तरीके में बदलाव यह कदम सैन्य सोच में एक बड़े बदलाव को दिखाता है। आज सेनाएँ न सिर्फ़ हमले पर, बल्कि बचाव और सुरक्षा पर भी ध्यान देती हैं। ज़मीन के नीचे अच्छी तरह से बनाए गए ठिकाने दुश्मन की गोलाबारी से जोखिम कम कर सकते हैं, लड़ने की क्षमता को सुरक्षित रख सकते हैं और सैनिकों को लंबे समय तक डटे रहने में मदद कर सकते हैं। भारत की सीमाएँ उत्तर और पूर्व दोनों तरफ़ लंबी और मुश्किल हैं। ज़मीन के नीचे बने शेल्टर का यह नया नेटवर्क भविष्य के किसी भी संघर्ष में सेना को सुरक्षित और तैयार रखने में अहम भूमिका निभा सकता है। जम्मू-कश्मीर में तीन साल में बनेंगे 5,000 अतिरिक्त बंकर जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती इलाकों में पिछले आठ वर्षों के दौरान नागरिकों की सुरक्षा के लिए करीब 10,000 बंकर बनाए गए हैं। अब सरकार ने अगले तीन वर्षों में 5,000 और बंकर बनाने की योजना तैयार की है। इसकी प्रक्रिया शुरू हो गई है। लंबी लड़ाई में सेना को दुश्मन पर मिलेगी बढ़त आधुनिक युद्ध में सैन्य ठिकानों को बचाए रखना दुश्मन पर हमला करने जितना ही जरूरी है। अग्रिम मोचों के पास सुरक्षित रसद भंडार होने से लंबी लड़ाई में सेना की आपूर्ति और जवाबी कार्रवाई की क्षमता भी बनी रहेगी। इससे दुश्मन के लिए एक ही हमले में भारत की सैन्य क्षमता को नुकसान पहुंचाना मुश्किल होगा। हालांकि, हिमालय में निर्माण की ऊंची लागत, भौगोलिक चुनौतियां और भारी उपकरणों की ढुलाई बड़ी मुश्किलें हैं। चीन के इलाके में पठारी जमीन अपेक्षाकृत समतल होने से उसे निर्माण में बढ़त मिलती है। भारत को प्रीफैब्रिकेटेड स्टील बंकर जैसी आधुनिक तकनीकों पर ध्यान देना होगा, ताकि दुर्गम इलाकों में भी कम समय में मजबूत और सुरक्षित ठिकाने तैयार किए जा सकें।
'प्रधानमंत्री से लेकर सिपाही तक को दिलाएंगे सजा', प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोले राहुल गांधी
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पीएम मोदी के जनसेवा के 25 साल पूरे होने पर अभिनंदन प्रस्ताव, महाराष्ट्र कैबिनेट ने किसानों के लिए भी बड़ी घोषणा
108 मुफ्त एम्बुलेंस कर्मचारियों की हड़ताल की चेतावनी प्रशासनिक विफलता : भाजपा
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अनियंत्रित भीड़ को 'शिव बारात' की उपमा देकर राहुल गांधी ने हिंदू भावनाओं को पहुँचाई ठेस!
भले ही राहुल गांधी ने 12 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में अपने राजनीतिक मार्च को ‘शिव बारात’ कहकर केवल एक उपमा दी हो, लेकिन सवाल यह है कि क्या भगवान शिव की बारात जैसे पवित्र धार्मिक प्रसंग को राजनीतिक विरोध-प्रदर्शन के लिए इस्तेमाल करना उचित था? जिस बारात का संबंध देवाधिदेव महादेव और माता पार्वती के दिव्य विवाह से है, उसे एक राजनीतिक आंदोलन का नाम देते समय क्या उसकी धार्मिक गरिमा और करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं का ध्यान नहीं रखा जाना चाहिए था? हम आपको याद दिला दें कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने निर्वाचन आयोग और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े मुद्दों पर विपक्ष के मार्च के दौरान कहा था कि यह शिव की बारात है, इसमें कोई भी शामिल हो सकता है। उन्होंने आंदोलन की तुलना भगवान शिव के तांडव से भी की थी। उनका आशय आंदोलन को स्वतःस्फूर्त और सबके लिए खुला बताना था। लेकिन इसी बयान ने धार्मिक प्रतीकों के राजनीतिक इस्तेमाल पर विवाद खड़ा कर दिया है। विश्व हिंदू परिषद ने उनकी टिप्पणी की आलोचना करते हुए सार्वजनिक माफी की माँग की है। इसे भी पढ़ें: UP Congress में कुर्सी की लड़ाई जूते-चप्पल तक आई, Ajay Rai ने BJP में वापसी की टिकट कटाई! देखा जाये तो यहाँ सवाल केवल एक उपमा का नहीं, बल्कि उस धार्मिक प्रतीक के अर्थ का है जिसे भारतीय समाज में विशेष श्रद्धा के साथ देखा जाता है। राहुल गांधी को शायद पता नहीं कि शिव बारात कोई सामान्य जुलूस नहीं है। शिवपुराण की रुद्रसंहिता के पार्वतीखंड में भगवान शिव की विवाह-यात्रा का विस्तृत वर्णन मिलता है। अध्याय 40 में शिव की बारात का प्रसंग है। इसके बाद विवाह की तैयारियों, शिव के हिमालय पहुँचने और विवाह-संस्कार का वर्णन आगे के अध्यायों में आता है। अध्याय 48 में पुरोहितों द्वारा तिथि आदि बताए जाने और शुभ समय आने के बाद विवाह-संस्कार प्रारंभ होने का उल्लेख है। शिव बारात का धार्मिक महत्त्व इसी दिव्य विवाह से जुड़ा है। इसमें शिवगणों, नंदी, देवताओं और ऋषियों की सहभागिता का वर्णन मिलता है। लोकपरंपरा में भूत-प्रेत और विचित्र रूप वाले गणों के चित्रण ने इस बारात को एक विशिष्ट पहचान दी है। यह शिव के उस स्वरूप की याद दिलाता है जो बाहरी रूप, वैभव और सामाजिक प्रतिष्ठा की सीमाओं से परे है। इसीलिए शिव बारात को केवल लोगों की भीड़, नारेबाजी या किसी राजनीतिक आंदोलन के लिए सुविधाजनक उपमा मान लेना श्रद्धालुओं को असहज कर सकता है। धार्मिक प्रतीक की अपनी गरिमा होती है और उसका इस्तेमाल किस संदर्भ में किया जा रहा है, यह महत्त्वपूर्ण है। साथ ही यहां यह सवाल भी उठता है कि क्या शिव बारात किसी भी दिन निकल सकती है? देखा जाये तो हिंदू धर्म में धार्मिक पर्व, विवाह-संस्कार और शोभायात्रा के अपने अलग-अलग नियम और परंपराएँ हैं। महाशिवरात्रि भगवान शिव की आराधना का सबसे प्रमुख पर्व है। इस अवसर पर देशभर में शिव बारात निकाली जाती है और शिव-पार्वती विवाह की झाँकियाँ सजाई जाती हैं। वहीं, शास्त्रोक्त विवाह-संस्कार में तिथि, पंचांग और शुभ मुहूर्त का विशेष महत्त्व होता है। शिवपुराण में भी शिव-पार्वती विवाह के प्रसंग में तिथि और शुभ समय का उल्लेख मिलता है। साथ ही परम्परागत रूप से शिव बारात महाशिवरात्रि के दिन ही निकाली जाती है और देश में शायद ही किसी अन्य दिवसों पर शिव बारात का आयोजन होता हो। सामान्य धार्मिक शोभायात्रा किसी स्थानीय उत्सव या मंदिर की परंपरा के अनुसार अन्य अवसरों पर भी निकाली जा सकती है। इसके विपरीत, यदि आयोजन को विधिवत शिव-विवाह या किसी विशिष्ट पर्व का शास्त्रोक्त अनुष्ठान बताया जा रहा है, तो संबंधित तिथि, पूजा-विधान, मुहूर्त और परंपरा का पालन अपेक्षित है। साथ ही राहुल गांधी को यह भी समझना चाहिए कि भगवान शिव की बारात में धक्के मारने या कोहनी से दूसरों को मारने या किसी को कॉलर पकड़ कर पीछे धकेलने की कोई परम्परा नहीं है। शिव बारात में भक्ति, श्रद्धा और उत्सव का भाव होता है, न कि किसी को धक्का देने या कोहनी मारकर आगे बढ़ने का। भले ही राहुल गांधी की उपमा का उद्देश्य अपने राजनीतिक मार्च को सबके लिए खुला बताना रहा हो, लेकिन सवाल यह है कि इसके लिए भगवान शिव की बारात जैसे पवित्र प्रसंग को ही क्यों चुना गया? क्या एक राजनीतिक आंदोलन में शामिल भीड़ की तुलना शिव बारात से करना उचित था? और क्या ऐसी तुलना शिव बारात की धार्मिक छवि को एक अनियंत्रित भीड़ के रूप में प्रस्तुत नहीं करती? बहरहाल, राहुल गांधी के इस बयान ने धार्मिक प्रतीकों के राजनीतिक इस्तेमाल और सनातन परंपराओं के प्रति संवेदनशीलता को लेकर एक गंभीर बहस छेड़ दी है। देखा जाये तो लोकतंत्र में राजनीतिक विरोध का अधिकार सभी को है, लेकिन उस विरोध को व्यक्त करने के लिए करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़े प्रतीकों का इस्तेमाल करते समय उनकी गरिमा का ध्यान रखना भी उतना ही आवश्यक है। -नीरज कुमार दुबे
Narendra Modi की सियासत के 25 साल: Indian Politics में कैसे स्थापित हुआ 'मोदी मार्ग'?
सात अक्टूबर 2001 को नरेंद्र मोदी ने जब गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, तब कोई नहीं सोच रहा था कि मोदी एक साल का भी कार्यकाल पूरा कर पाएंगे। राजनीतिक जानकारों और गुजरात के लोगों की इस सोच के पीछे कुछ खास वजहें भी थीं। मोदी के गुजरात का सरदार बनने से पहले के पांच वर्षों में राज्य में एक-एक करके चार मुख्यमंत्री आए और चले गए थे। मोदी राज्य के किसी ताकतवर जाति समुदाय से भी नहीं हैं और सबसे बड़ी बात कि मुख्यमंत्री बनने से पहले उन्होंने कोई चुनाव भी नहीं लड़ा था। हां, पर्दे के पीछे की राजनीति के मंजे हुए खिलाड़ी के तौर पर वे स्थापित थे। इतना ही नहीं, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर राज्यों के बीजेपी प्रभारी के रूप में भी अपनी सियासी समझ का भी वे लोहा मनवा चुके थे। लेकिन वक्त के साथ, मोदी ने सभी आशंकाओं को ना सिर्फ खारिज कर दिया है, बल्कि चौथाई सदी तक लगातार सत्ता का केंद्र बिंदु रहने वाले वाली शख्सियत भी बन चुके हैं। इसके पहले मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता ज्योति बसु के नाम देश में सबसे लंबे समय यानी करीब 23 साल सत्ता संभालने का रिकॉर्ड था। मोदी उस रिकॉर्ड से भी काफी आगे बढ़ चुके हैं। हाल के दिनों में एक वरिष्ठ हिंदी पत्रकार मोदी मार्ग की अवधारणा देकर आलोचनाओं के केंद्र में हैं। मोदी मार्ग की चर्चा हो तो वामपंथी तो सांड़ की तरह भड़केंगे ही, वे समाजवादी भी वरिष्ठ पत्रकार के आलोचक हो गए हैं, जो कभी उनके सहयोगी रहे या वे उनके साथी रहे। बेशक मोदी मार्ग की इन दिनों आलोचना हो रही है, लेकिन आने वाले दिनों में जब नरेंद्र मोदी का अपना और उनके दौर के भारत का इतिहास लिखा जाएगा, निश्चित तौर पर मोदी मार्ग या मोदीत्व की अवधारणा को भी स्वीकार किया जाएगा। किसी शख्सियत के जरिए शुरू पंथ या वैचारिक धारा को उसके जीवन काल में सर्व मान्यता और स्वीकार्यता कम ही मिल पाती है। लेकिन जब वही शख्सियत इतिहास की धारा में विलीन हो जाती है, तो उसकी दिखाई राहों को पंथ का दर्जा मिलने लगता है। गांधी बेशक अपनी जिंदगी में ही महात्मा के रूप में स्थापित हो चुके थे, लेकिन उनके कई प्रयोगों की उसी तरह आलोचनाएं होती रहीं, जैसे आज मोदी के वैचारिक विरोधी उनके तमाम कदमों की कटु आलोचनामें लीन रहते हैं। वैसे भी लोकतांत्रिकक दौर के भारतीय समाज की एक धारा रही है। शुरू में वह पदधारकों का शुरू में स्वागत करता है, बाद में उसका विरोधी हो जाता है। लेकिन वही शख्सियत जब इतिहास में समाहित हो जाती है, कुछ अपवादों को छोड़ समाज उसका घोर प्रशंसक हो जाता है। बीजेपी की ही राजनीति का उदाहरण इस संदर्भ में ले सकते हैं। एक दौर में बीजेपी विरोधियों की नजर में अटल उदार थे, जबकि आडवाणी कट्टर। लिहाजा आडवाणी लगातार विरोधियों के निशाने पर रहे। लेकिन जैसे ही अटल युग की समाप्ति हुई और मोदी युग की ओर बीजेपी बढ़ चली, आडवाणी उन्हीं विरोधियों की नजर में आदर के पात्र होते गए और मोदी के कटु आलोचकों की संख्या बढ़ती गई। कुछ इसी अंदाज में कह सकते हैं कि आने वाले दिनों में भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में कोई अन्य नेता उभरा तो हो सकता है कि मोदी बीजेपी विरोधियों की नजर में ही प्रशंसा का पात्र बन जाएं और बीजेपी का भावी नेता आडवाणी और मोदी की तरह आलोचनाओं के केंद्र में आ जाए। सत्ता की राजनीति में मोदी की यात्रा पर निगाह डालते हैं तो उनकी सबसे बड़ी चुनौती खुद की स्वीकार्यता बढ़ाना रही। जिस तरह चौथाई सदी से वे सत्ता के केंद्र में हैं, उसे देख कह सकते हैं कि इसमें वे कामयाब रहे हैं। इतना ही नहीं, वे सबसे ज्यादा समय तक सत्ता को खुद के इर्द-गिर्द केंद्रीकृत करने में भी सफल रहे हैं। आज भारत की केंद्रीय सत्ता ही नहीं, भारतीय जनता पार्टी का संगठन भी उन्हीं के इर्द-गिर्द केंद्रित है और उन्हीं से शक्ति ग्रहण करता है। इसे भी पढ़ें: ढ़ाई दशक के सख्त फैसलों ने बनाया मोदी को मोदी यह मोदी का दुर्भाग्य रहा कि उनके गुजरात की सत्ता संभालने के महज छह महीने बाद ही राज्य को गोधरा कांड के चलते भयानक सांप्रदायिक दंगों का सामना करना पड़ा। गुजरात सरकार की रिपोर्ट के अनुसार इन दंगों में 1044 लोगों के मारे गए , जबकि 2548 लोग घायल हुए थे। इसके अलावा 223 लोग लापता बताए गए। दंगों के सात साल बीतने के बाद सरकार के ही अनुसार, लापता लोगों की संख्या कुछ बढ़ गई। इन दंगों के बाद नरेंद्र मोदी विशेषकर कांग्रेस और वामपंथी दलों के निशाने पर आ गए। देश के वामपंथी सोच से प्रभावित स्वयंसेवी संगठनों ने उनके खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर मोर्चा खोल दिया। एक तरह से मोदी को राजनीतिक घृणा का पात्र बनाने की कोशिश की गई। उनके चरित्र हनन तक की कोशिशें हुईं। गुजरात दंगों के साथ ही इशरत जहां मुठभेड़ कांड को लेकर उनके खिलाफ सीबीआई जांच हुई। सीबीआई के समक्ष बतौर मुख्यमंत्री पूछताछ के लिए उन्हें कई बार घंटों तक उपस्थिति जतानी पड़ी और बतौर मुख्यमंत्री उन्हें घंटों तक सीबीआई के अच्छे-बुरे सवालों का सामना करना पड़ा। गुजरात दंगों के दाग के चलते एक दौर में उन्हें अमेरिका ने वीजा देने से इनकार कर दिया। इस बिंदु पर देखें तो मोदी का जीवट व्यक्तित्व उभरता है। कह सकते हैं कि तिरस्कार और आलोचनाओं से वे ताकत ग्रहण करते हैं, कुछ-कुछ मिथकीय पात्र बालि की तरह। जिस तरह बालि के सामने आए उसके विरोधियों की आधी ताकत बालि में ही समाहित हो जाती थी, मोदी कुछ उसी तरह विरोधियों की आलोचनाओं से ताकत ग्रहण करते हैं और अपनी राह बनाते रहते हैं। तीखे और अपमानजनक विरोध से जीवट से जीवट वाली शख्सियतें टूट जाती हैं, मोदी की ना सिर्फ कटु आलोचना हुई या हो रही है, उन्हें सार्वजनिक मंचों से घटिया, अश्लील और फूहड़ गालियां दी जा रही हैं। अतीत में उन्हें चरित्र हनन की सीमा तक बदनाम करने की कोशिशें हुईं। लेकिन मोदी रूके नहीं। कभी पर्दे के पीछे से राजनीति करने वाले मोदी लगातार आगे बढ़ते रहे। गुजरात में जब चीजें पटरी पर आनी शुरू हुईं तो उन्होंने राज्य के विकास को लेकर अपना मॉडल पेश किया। जिसे कालांतर में देश ने उसे ‘गुजरात मॉडल’ के नाम से जाना। ‘गुजरात मॉडल’ के विकास और इस विकास की गति को बनाए रखने के लिए प्रवासियों और निवेशकर्ताओं को लुभाने के लिए उन्होंने ‘वायव्रेंट गुजरात’ नाम से आयोजन शुरू किए। जिसे देखते ही देखते राज्य की जनता ने तो अपनाया ही, प्रवासियों ने भी हाथोंहाथ लिया। इसी का असर रहा कि जिस राज्य में महज पांच साल में चार मुख्यमंत्री आए और गए, उसी राज्य में मोदी ने साढ़े बारह साल से अधिक वक्त तक सत्ता संभालने का रिकॉर्ड बनाया। 2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान उनकी ख्याति राज्य से बाहर की सीमाओं तक पैठ बना चुकी थी या बना रही थी। इसका ही नतीजा रहा कि 2012 के गुजरात विधानसभा चुनावों के वक्त राष्ट्रीय मीडिया के एक हिस्से ने मोदी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार कर लिया। तब कहा जा रहा था कि गुजरात इस बार सिर्फ अपने मुख्यमंत्री का ही नहीं, बल्कि देश के भावी प्रधानमंत्री का भी चुनाव कर रहा है। मोदी की राजनीतिक यात्रा जातिवादी राजनीति का जवाब भी है। कांग्रेस के प्रथम परिवार, नीतीश कुमार और ममता बनर्जी को छोड़ दें तो आज के ज्यादातर बड़े राजनेता कहीं न कहीं सिर्फ अपनी जातियों के नेता हैं या उनकी राजनीतिक बुनियाद का आधार उनकी जाति है। लेकिन मोदी की लोकप्रियता में उनकी जाति का कोई आधार नहीं है। मोदी ने अपने लंबे शासन काल में ढरों उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन मोटे तौर पर देखें तो उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि भारत की वैश्विक मंच पर बदली छवि। उनके शासनकाल में भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि में सुधार हुआ है। मोदी ने आर्थिक मोर्चे पर देश को बहुत गति दी है। मोदी कहते हैं कि उनकी नजर में सिर्फ चार जातियां हैं, महिला, युवा, गरीब और किसान। मोदी के लंबे शासन काल में इन चारों ही वर्गों का ध्यान ठीक से रखने की कोशिशें बढ़ी हैं। भारत दुनिया की चौथी बड़ी आर्थिक महाशक्ति अगर बन चुका है, तो इसके पीछे उनका नजरिया भी है। कृषि में साढ़े चार प्रतिशत सालाना की विकास दर हासिल की जा चुकी है, बीजेपी के एजेंडे के तहत अयोध्या में राममंदिर बन चुका है, कश्मीर को अलग-थलग करने वाले संविधान के विशेष अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाया जा चुका है। मोदी के शासनकाल की उपलब्धियों को गिनाने बैठें तो पूरी रात गुजर जाएगी। बस मोटे तौर पर कह सकते हैं कि मोदी राज में देश ने अपना खोया गौरव हासिल करने की दिशा में एक मजबूत कदम जरूर बढ़ाया है। उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक हैं..
एसआईआर को लेकर विपक्ष पर शायना एनसी का तंज, कहा-2029 की हार का बहाना अभी से तलाश रहे राहुल गांधी
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CJP Members Arrested: दिल्ली पुलिस ने कॉकरोच जनता पार्टी के 3 सदस्यों को किया गिरफ्तार, जंतर-मंतर प्रदर्शन से जुड़ा मामला
जागरण मंच और किसान संघ के संस्थापक दत्तोपंत ठेंगड़ी की पुण्यतिथि पर गडकरी समेत कई बड़े नेताओं ने दी श्रद्धांजलि
तिरंगा लहराने पर हिरासत? CJP ने दिल्ली पुलिस पर लगाए गंभीर आरोप
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट के जरिए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं
भारत-कनाडा रिश्तों को नई उड़ान, एयर इंडिया और कनाडा के बीच बड़ी चर्चा
भारतीय मूल के कनाडाई अंतरराष्ट्रीय व्यापार मंत्री मनिंदर सिद्धू ने दिल्ली में एयर इंडिया के चीफ कमर्शियल ऑफिसर (सीसीओ) निपुण अग्रवाल से मुलाकात की
मध्य प्रदेश: सीएम मोहन यादव कल लाडली बहना योजना की 41वीं किस्त हस्तांतरित करेंगे
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दो साल लगें या दस, आंदोलन नहीं रुकेगा: राहुल गांधी
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने और विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया रोकने की मांग को लेकर उनका आंदोलन जारी रहेगा और इसमें चाहे एक दिन लगे या दो साल, वह पीछे नहीं हटेंगे
कांग्रेस मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन के दौरान भाजपा महिला कार्यकर्ताओं के साथ बदसलूकी: बांसुरी स्वराज
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बंगाल में तृणमूल के पूर्व विधायक को बड़ी राहत, जबरन वसूली मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने दी सशर्त अंतरिम जमानत
दिल्ली के एलजी टीएस संधू ने विश्वविद्यालयों को दिया सुझाव, बेहतर नतीजों के लिए पीपीपी मॉडल अपनाएं
दिल्ली के एलजी टीएस संधू ने विश्वविद्यालयों को दिया सुझाव, बेहतर नतीजों के लिए पीपीपी मॉडल अपनाएं
गांधीनगर नगर निगम चुनाव: बीजेपी का दबदबा कायम, कांग्रेस का प्रदर्शन सुधरा, 'आप' का नहीं खुला खाता
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'दंगे और डर फैलाना ही एकमात्र उपलब्धि', पार्टी की योजनाओं का श्रेय लेने पर भाजपा ने सपा को घेरा
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Rahul Gandhi के March से घबराई BJP? Piyush Goyal और Amit Shah क्यों उतरे मैदान में?
चुनाव आयोग के अधिकारियों को नहीं, मतदाता सूची की नीति बदलिए
किसी भी लोकतंत्र की मजबूती के लिए पारदर्शी, विश्वसनीय और समावेशी मतदाता सूची जरूरी है। लेकिन भारत के नेताओं और नौकरशाहों के गठजोड़ ने इसे एक हास्यास्पद विषय बना दिया है। यदि प्रत्येक व्यक्ति के जन्मभूमि पर ही मतदाता पहचान पत्र बना दिया जाए, और उसके पलायन के बावजूद उसका स्थाई नंबर नहीं बदलने दिया जाए, तो इससे बहुत सारे गड़बड़ झाले को रोका जा सकता है। इसे आधार कार्ड से लिंक करने पर व्यक्ति की वास्तविक पहचान भी सुनिश्चित होती है। लेकिन हमारी नौकरशाही ऐसा कभी नहीं होने देगी। भारत में राजनीतिक कारणों से जितने पाकिस्तानियों और बांग्लादेशियों के मतदाता पहचान पत्र बनाए गए, उसके लिए तत्कालीन बीएलओ, एसडीएम और डीएम के अलावा राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि जिम्मेदार नहीं हैं, तो कौन है? क्या कभी इस लापरवाही की जिम्मेदारी सुनिश्चित करने की कोशिश की गई? इनकी जमीनी लापरवाहियों या राजनीतिक पक्षपात के लिए इन्हें कड़ी सजा मिलनी चाहिए, न कि राज्य के मुख्य चुनाव आयुक्त और केंद्रीय मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ अनर्गल आरोप लगाए जाने चाहिए। इसे भी पढ़ें: सुप्रीम कटघरे में अब CEC को मुकदमों से बचाने वाला 'अभयदान', क्या है धारा-16 का 'कवच' जिस पर SC करेगा सुनवाई? एडॉल्फ हिटलर ने कहा था कि यदि तुम एक झूठ को सौ बार दोहराओगे तो वह लोगों को सच लगने लगेगा। जिन नेताओं ने अल्पसंख्यकों की आड़ में, झुग्गी-झोपड़ियों की आड़ में गलत मतदाता पहचान पत्र बनवा लिए, जब एसआईआर में ये पकड़ में आने लगे तो विपक्ष का बेचैन होना स्वाभाविक है। चाहे कांग्रेस हो भाजपा हो या क्षेत्रीय दल, अब इस खेल में सभी पारंगत दिख रहे हैं। यदि नौकरशाही तभी इस खेल को पकड़ लेती तो आज चुनाव आयोग को इतनी कड़ी मशक्कत नहीं करनी पड़ती। इस पूरे खेल में ग्राम पंचायत, नगर पंचायत, नगरपालिका, नगर निगम, विधानसभा और लोकसभा की मतदाता सूची में जो गड़बड़झाला है, उसे भी यदि समय रहते नहीं रोका गया, तो मतदाताओं को न्याय मिल पाएगा, इस बात की कोई गारंटी नहीं है। क्योंकि हर चुनाव में मतदाता सूची बदल जाना राजनीतिक व प्रशासनिक खेल नहीं तो क्या है? हर चुनाव के वक्त कुछ ऐसे वास्तविक लोग मिल जाएंगे, जिनके नाम ही मतदाता सूची से गायब मिलेंगे। आखिर इस लापरवाही के लिए सरकारी अधिकारियों की जिम्मेदारी कौन सुनिश्चित करेगा। इस बात में कोई दो राय नहीं कि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति मतदाता के मताधिकार में निहित है। यह अधिकार तभी सार्थक है, जब प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में दर्ज हो और कोई अपात्र व्यक्ति गलत तरीके से उसमें शामिल न रहे। इसलिए मतदाता सूची तैयार करने, उसमें संशोधन करने और उसकी शुद्धता सुनिश्चित करने की प्रक्रिया लोकतांत्रिक व्यवस्था का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि कोई अधिकारी इसमें लापरवाही बरतता पाया जाता है तो उसके लिए भी सख्त सजा का प्रावधान हो। जब भी मतदाता सूची में गड़बड़ियों, नाम कटने, दोहरी प्रविष्टियों अथवा पात्र मतदाताओं के छूट जाने की शिकायतें सामने आती हैं, तो चुनाव आयोग के अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका पर सवाल उठने लगते हैं। लेकिन क्या हर समस्या के लिए मैदानी स्तर पर काम करने वाले अधिकारियों व राजनीतिक कार्यकर्ताओं को जिम्मेदार ठहराना उचित है? या हमें उन नीतियों, नियमों और प्रक्रियाओं की समीक्षा करनी चाहिए, जिनके तहत मतदाता सूची तैयार की जाती है? नए मतदाताओं के नाम जोड़ना और मृतकों के नाम डिलीट करना चुनाव आयोग की वार्षिक जिम्मेदारी है। इस हेतु हर वर्ष अभियान चलाया जाता है। सवाल है कि अधिकारियों की जवाबदेही के साथ नीतिगत सुधार भी जरूरी है। इसके लिए संसद को भी सचेष्ट होना पड़ेगा। मतदाता सूची तैयार करने का काम व्यापक और संवेदनशील है। इसमें करोड़ों नागरिकों के विवरण का सत्यापन, नए मतदाताओं का पंजीकरण, मृत व्यक्तियों के नाम हटाना, स्थानांतरित नागरिकों के विवरण का अद्यतन और दोहरी प्रविष्टियों की पहचान जैसे अनेक कार्य शामिल होते हैं। यदि इन प्रक्रियाओं में त्रुटियां होती हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। जानबूझकर लापरवाही, पक्षपात या नियमों के उल्लंघन के प्रमाण मिलने पर संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए। लेकिन प्रत्येक प्रशासनिक त्रुटि को केवल कर्मचारियों की विफलता मान लेना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। यह भी देखना होगा कि निर्धारित समयसीमा व्यावहारिक है या नहीं, उपलब्ध संसाधन पर्याप्त हैं या नहीं, सत्यापन की प्रक्रिया कितनी सरल है और नागरिकों को अपनी शिकायतों के समाधान के लिए कितनी आसानी से अवसर मिलता है। सवाल है कि मतदाता सूची की नीति में किन बदलावों की जरूरत है? पहला, प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम जोड़ने की प्राथमिकता। मतदाता सूची की शुद्धता का अर्थ केवल गलत नाम हटाना नहीं, बल्कि प्रत्येक पात्र नागरिक को सूची में शामिल करना भी है। किसी पात्र मतदाता का नाम हटने या दर्ज न होने से उसके मताधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए नाम हटाने की प्रक्रिया में उचित सूचना, सत्यापन और अपना पक्ष रखने का अवसर सुनिश्चित किया जाना चाहिए। दूसरा, नाम काटने की प्रक्रिया पारदर्शी हो। किसी मतदाता का नाम सूची से हटाने के लिए स्पष्ट नियम, सत्यापन योग्य आधार और निर्धारित प्रक्रिया होनी चाहिए। नागरिक को, जहां नियमों के तहत आवश्यक हो, प्रस्तावित कार्रवाई की सूचना और आपत्ति दर्ज कराने का अवसर मिलना चाहिए। केवल तकनीकी रिकॉर्ड या अपूर्ण जानकारी के आधार पर किसी पात्र मतदाता का अधिकार प्रभावित नहीं होना चाहिए। तीसरा, मृत और स्थानांतरित मतदाताओं के मामलों में सावधानी जरूरी है। मृत व्यक्तियों के नाम हटाना और स्थायी रूप से स्थानांतरित मतदाताओं के रिकॉर्ड को अद्यतन करना आवश्यक है। लेकिन एक ही नाम, समान आयु या मिलते-जुलते पते के आधार पर किसी व्यक्ति को गलत तरीके से सूची से बाहर नहीं किया जाना चाहिए। पहचान और निवास के सत्यापन के लिए विश्वसनीय प्रक्रिया जरूरी है। चौथा, तकनीक का उपयोग हो, लेकिन मानवीय सत्यापन के साथ जरूरी है। डिजिटल डेटाबेस, ऑनलाइन आवेदन और स्वचालित प्रणाली मतदाता सूची को बेहतर बनाने में सहायक हो सकते हैं। हालांकि, तकनीकी गड़बड़ी, डेटा में विसंगति या गलत मिलान की स्थिति में मानवीय समीक्षा और सुधार का अवसर उपलब्ध होना चाहिए। तकनीक नागरिकों की सुविधा बढ़ाए, उनके अधिकारों में बाधा न बने। पांचवां, शिकायत निवारण की प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित हो। नाम जुड़वाने, संशोधन कराने या गलत तरीके से नाम हटाए जाने की शिकायतों के लिए सरल और समयबद्ध व्यवस्था होनी चाहिए। नागरिकों को आवेदन की स्थिति जानने, निर्णय का कारण समझने और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अपील करने की सुविधा मिलनी चाहिए। छठा, अधिकारियों को पर्याप्त संसाधन और प्रशिक्षण मिलना चाहिए। मतदाता सूची तैयार करने वाले कर्मचारियों पर यदि सीमित समय में अत्यधिक काम का दबाव है, तो त्रुटियों की आशंका बढ़ सकती है। इसलिए पर्याप्त कर्मचारी, व्यावहारिक समयसीमा, स्पष्ट दिशा-निर्देश और उचित प्रशिक्षण भी नीतिगत सुधार का हिस्सा होने चाहिए। सबसे बड़ी बात यह कि राजनीतिक विवाद से ऊपर उठकर समीक्षा हो। मतदाता सूची का मुद्दा अक्सर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय बन जाता है। एक पक्ष नामों को हटाए जाने पर सवाल उठाता है, तो दूसरा पक्ष सूची की शुद्धता और दोहरी प्रविष्टियों को समाप्त करने की आवश्यकता पर जोर देता है। इन दोनों चिंताओं की निष्पक्ष जांच जरूरी है। न तो हर नाम हटाए जाने को गलत मानना उचित है और न ही प्रत्येक कार्रवाई को स्वतः सही मान लेना। महत्वपूर्ण यह है कि हर निर्णय के पीछे स्पष्ट आधार हो, नियम सभी पर समान रूप से लागू हों और शिकायतों का समाधान प्रमाणों के आधार पर किया जाए। मतदाता सूची की विश्वसनीयता केवल चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं है। यह नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों और चुनावी प्रक्रिया पर जनता के भरोसे से जुड़ा विषय है। सवाल है कि अब आगे का रास्ता क्या है? तो जवाब यही होगा कि मतदाता सूची की नीति की नियमित समीक्षा की जानी चाहिए। इसमें राजनीतिक दलों, नागरिक समाज, चुनाव संबंधी विशेषज्ञों और आम मतदाताओं से सुझाव लिए जा सकते हैं। नाम जोड़ने और हटाने के आंकड़े, शिकायतों की स्थिति तथा उनके निस्तारण की जानकारी उचित गोपनीयता और कानूनी सीमाओं के भीतर सार्वजनिक की जानी चाहिए। साथ ही, मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए कि कोई पात्र नागरिक अनावश्यक प्रशासनिक बाधाओं के कारण अपने मताधिकार से वंचित न हो और सूची की शुद्धता भी बनी रहे। यदि किसी के पास वैध मतदाता पहचान पत्र है, लेकिन मतदाता सूची से उनका नाम नदारत है तो ऐसे व्यक्तियों को वोट डालने का अधिकार मिलना चाहिए। वस्तुतः चुनाव आयोग के अधिकारियों की जवाबदेही जरूरी है, लेकिन जवाबदेही का अर्थ केवल दोष तय करना नहीं, बल्कि व्यवस्था की कमियों को दूर करना भी है। यदि नियम जटिल हैं, प्रक्रियाएं अस्पष्ट हैं या संसाधन अपर्याप्त हैं, तो केवल अधिकारियों को बदलने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए ऐसी मतदाता सूची चाहिए, जिसमें प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम हो, प्रत्येक गलत प्रविष्टि को निष्पक्ष प्रक्रिया से सुधारा जाए और किसी का मताधिकार मनमाने ढंग से प्रभावित न हो। इसलिए मूल प्रश्न यही है—क्या हम हर विवाद के बाद अधिकारियों पर कार्रवाई तक सीमित रहेंगे, या ऐसी पारदर्शी, जवाबदेह और नागरिक-अनुकूल नीति बनाएंगे, जिससे गलतियों की संभावना ही कम हो जाए? मतदाता सूची की नीति में सुधार लोकतंत्र के प्रति जनता का विश्वास मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
जंतर-मंतर से दूर होते प्रतिरोध के ठिकाने
लोकतंत्र की जीवंतता केवल इस बात से तय नहीं होती कि संसद के भीतर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच कितनी सार्थक बहस होती है, बल्कि इसकी असली कसौटी यह है कि संसद के बाहर सड़कों पर आम नागरिक की आवाज को कितनी गंभीरता और सहजता से सुना जाता है। देश की राजधानी नई दिल्ली के हृदय स्थल में स्थित जंतर मंतर पिछले 33 वर्षों से इसी लोकतांत्रिक चेतना, जन आक्रोश और नागरिक उम्मीदों का सबसे बड़ा केंद्र रहा है। किंतु अब केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा गठित एक उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशों के आधार पर दिल्ली पुलिस ने एक ऐतिहासिक बदलाव करते हुए जंतर मंतर को अधिकृत प्रदर्शन स्थलों की सूची से बाहर कर दिया है। 28 अप्रैल 2022 के पुराने स्थायी आदेश में संशोधन करते हुए अब राजधानी में धरना और प्रदर्शन के लिए तीन नए स्थान निर्धारित किए गए हैं, जिनमें मध्य दिल्ली का रामलीला मैदान, उत्तरी दिल्ली का बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के कड़कड़डूमा स्थित व्यावसायिक केंद्र मैदान शामिल हैं। प्रशासन के इस एक निर्णय ने तीन दशकों से चली आ रही प्रतिरोध की एक पूरी परंपरा को विराम दे दिया है और साथ ही लोकतांत्रिक अधिकारों तथा प्रशासनिक व्यवस्था के बीच के द्वंद्व पर एक नई बहस छेड़ दी है। जंतर मंतर का यह परिसर केवल 18वीं सदी के खगोलीय यंत्रों का स्मारक मात्र नहीं था, बल्कि यह आधुनिक भारत के सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों की सबसे बड़ी प्रयोगशाला बन चुका था। वर्ष 1993 से लेकर 2026 तक के अपने 33 वर्षों के सफर में इस छोटे से मार्ग ने अनगिनत ऐतिहासिक बदलावों की नींव रखी। चाहे वर्ष 2011 का भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल आंदोलन हो, वर्ष 2012 में निर्भया कांड के बाद उमड़ा युवाओं का स्वतःस्फूर्त जनसैलाब हो, वर्ष 2015 में पूर्व सैनिकों का वन रैंक वन पेंशन आंदोलन हो या फिर वर्ष 2023 में महिला पहलवानों का लंबा संघर्ष, जंतर मंतर ने हर वर्ग की पीड़ा को राष्ट्रीय पटल पर रखने का मंच प्रदान किया। देश के सुदूर कोनों से आने वाले किसानों, मजदूरों, छात्रों, शिक्षकों और वंचित वर्गों के लिए यह स्थान एक ऐसी उम्मीद की तरह था, जहाँ खड़े होकर वे सीधे सत्ता के शीर्ष से संवाद करने का अहसास पाते थे। संसद भवन से मात्र 1 से 1.5 किलोमीटर की दूरी पर होने के कारण यहाँ उठने वाली हर आवाज की गूंज नीति निर्माताओं के कानों तक आसानी से पहुँच जाती थी। इसे भी पढ़ें: Jantar Mantar हो गया छू मंतर, प्रदर्शन करना है तो Ramlila Maidan, Burari Ground या CBD Ground जाना पड़ेगा इस ऐतिहासिक स्थल से प्रदर्शनों को हटाने के पीछे प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों के अपने ठोस तर्क हैं। तात्कालिक कारणों पर नजर डालें तो वर्ष 2026 के जून और जुलाई माह में प्रतियोगी परीक्षाओं की शुचिता और शिक्षा सुधारों की मांग को लेकर लगभग 36 दिनों तक चला विशाल छात्र आंदोलन इस फैसले का मुख्य आधार बना। उस आंदोलन के दौरान जंतर मंतर की सीमित क्षमता के विपरीत 1 लाख से अधिक प्रदर्शनकारी जुट गए थे। जब इस भारी भीड़ ने संसद भवन की ओर कूच करने का प्रयास किया, तो सुरक्षा व्यवस्था चरमरा गई और पुलिस तथा छात्रों के बीच हुई झड़पों में 118 पुलिसकर्मियों सहित दर्जनों छात्र घायल हुए। इसके अतिरिक्त, हाल ही में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन के मुद्दे पर राजनीतिक दलों और युवा संगठनों द्वारा फिर से जंतर मंतर पर बड़े घेराव की तैयारी की जा रही थी। नए संसद भवन और कर्तव्य पथ के आसपास अति विशिष्ट व्यक्तियों के निरंतर आवागमन और संवेदनशील मंत्रालयों की सुरक्षा को देखते हुए पुलिस का मानना है कि इतनी कम दूरी पर अनियंत्रित भीड़ का जुटना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा जोखिम है। सुरक्षा के अलावा स्थानीय व्यापारियों और आम नागरिकों की दैनिक परेशानियां भी इस बदलाव का एक बड़ा कारण बनी हैं। जंतर मंतर राजधानी के सबसे बड़े व्यावसायिक केंद्र कनॉट प्लेस और जनपथ के ठीक बगल में स्थित है। जब भी यहाँ कोई बड़ा प्रदर्शन होता था, तो एहतियात के तौर पर आसपास की मुख्य सड़कें और रेल के भूमिगत स्टेशन बंद कर दिए जाते थे। इससे न केवल घंटों लंबा यातायात जाम लगता था, बल्कि नई दिल्ली रेलवे स्टेशन और हवाई अड्डे की ओर जाने वाले हजारों यात्रियों की गाड़ियां छूट जाती थीं। स्थानीय व्यापार मंडलों ने लंबे समय से यह शिकायत की थी कि लगातार होने वाले धरनों और नाकेबंदी के कारण कनॉट प्लेस के व्यापार को करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी पूर्व में यह सुझाव दिया था कि प्रदर्शनों के लिए ऐसी खुली और बड़ी जगह तलाशी जानी चाहिए जहाँ आम जनजीवन प्रभावित न हो तथा प्रदर्शनकारियों के लिए पेयजल, शौचालय और चिकित्सा जैसी बुनियादी सुविधाएं आसानी से उपलब्ध कराई जा सकें। किंतु इस प्रशासनिक सुविधा के दूसरे पहलू पर नजर डालें तो नागरिक अधिकार संगठनों और संविधानविदों की चिंताएं अत्यंत गंभीर और विचारणीय हैं। राजधानी में सत्ता के केंद्र से जन आंदोलनों को दूर धकेलने की यह प्रवृत्ति नई नहीं है, बल्कि पिछले चार दशकों में विरोध का पता तीन बार बदला जा चुका है। वर्ष 1988 तक इंडिया गेट के पास स्थित बोट क्लब देश के सबसे बड़े प्रदर्शनों का केंद्र हुआ करता था, जहाँ से संसद और राष्ट्रपति भवन सीधे दिखाई देते थे। अक्टूबर 1988 में चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में जब 5 लाख किसानों ने एक सप्ताह तक बोट क्लब पर डेरा डाला, तो सरकार ने सुरक्षा और व्यवस्था का हवाला देकर वहां प्रदर्शनों पर स्थायी रोक लगा दी और वर्ष 1993 में जंतर मंतर को नया विकल्प बनाया गया। वर्ष 2017 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने पर्यावरण और ध्वनि प्रदूषण के नियमों का हवाला देकर जंतर मंतर पर भी आंशिक पाबंदियां लगाईं, और अब वर्ष 2026 में इसे पूरी तरह से सूची से हटा दिया गया है। बोट क्लब से जंतर मंतर और अब जंतर मंतर से बुराड़ी तथा कड़कड़डूमा के मैदानों तक का यह सफर वास्तव में सत्ता के गलियारों से आम जनता की भौतिक और मनोवैज्ञानिक दूरी बढ़ने की कहानी है। लोकतंत्र में किसी भी शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का मूल उद्देश्य सरकार का ध्यान आकर्षित करना और राष्ट्रीय समाचार माध्यमों के जरिए अपनी बात देश के सामने रखना होता है। जंतर मंतर की भौगोलिक स्थिति उसे यह विशेष महत्व देती थी कि वहां बैठा सौ लोगों का एक छोटा समूह भी राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन जाता था। इसके विपरीत, उत्तरी दिल्ली का बुराड़ी मैदान या पूर्वी दिल्ली का कड़कड़डूमा क्षेत्र मुख्य प्रशासनिक केंद्र से 15 से 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। बाहरी इलाकों में प्रदर्शनों को स्थानांतरित करने से प्रशासन को भीड़ प्रबंधन में तो आसानी होगी, लेकिन इससे जन आंदोलनों की दृश्यता और प्रभावशीलता कम होने का पूरा अंदेशा है। जब विरोध की आवाज सत्ता के केंद्र से बहुत दूर किसी कोने में सिमट जाती है, तो उसकी अनदेखी करना तंत्र के लिए बहुत आसान हो जाता है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क) और 19(1)(ख) देश के प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा शांतिपूर्ण और निशस्त्र सम्मेलन करने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी वर्ष 2018 के मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ मामले में स्पष्ट रूप से कहा था कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर नागरिकों के विरोध करने के अधिकार को पूरी तरह से निष्प्रभावी या अर्थहीन नहीं बनाया जा सकता। शासन का यह दायित्व है कि वह सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच एक स्वस्थ संतुलन कायम करे। यदि सुरक्षा चुनौतियों और शहरी यातायात के दबाव के कारण जंतर मंतर से प्रदर्शनों को हटाना अपरिहार्य ही था, तो सरकार और प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि रामलीला मैदान, बुराड़ी और कड़कड़डूमा के नए स्थलों पर आने वाले नागरिकों की आवाज अनसुनी न रहे। लोकतंत्र की गरिमा इसी में है कि प्रदर्शन का मैदान भले ही बदल जाए, लेकिन जनता की पीड़ा को सुनने की सत्ता की संवेदनशीलता कभी कम न हो। - महेन्द्र तिवारी
राहुल के सुरक्षाकर्मियों ने सीएम शिवकुमार को मारा धक्का, भाजपा बोली-'वरिष्ठों का कोई सम्मान नहीं'
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कर्नाटक स्टिंग ऑपरेशन विवाद: सिद्दारमैया ने खटखटाया कोर्ट का दरवाजा, भाजपा का कांग्रेस पर धोखा देने का आरोप
राहुल गांधी के आरोपों पर बोले पीयूष गोयल, कांग्रेस ने तो CEC को मंत्री-राज्यपाल बनाया था
गोयल ने कहा कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने से पहले कांग्रेस को अपने शासनकाल के रिकॉर्ड पर नजर डालनी चाहिए। उनके मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने चुनाव आयोग को स्वतंत्र और स्वायत्त तरीके से काम करने का अवसर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और भारत के चुनाव आयोग (ECI) को नोटिस जारी किया है। यह नोटिस एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की उस याचिका पर जारी किया गया है जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के पालन के दौरान किए गए कार्यों के लिए दी गई कानूनी छूट (सिविल और आपराधिक कार्यवाही से सुरक्षा) को चुनौती दी गई है। इस मामले को कोर्ट में पहले से लंबित याचिकाओं के साथ जोड़ दिया गया है और 29 अक्टूबर को उन याचिकाओं के साथ ही इस पर भी सुनवाई होनी है। इस चुनौती का मुख्य आधार 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' की धारा 16 है। इस प्रावधान के अनुसार, अदालतें किसी मौजूदा या पूर्व CEC या चुनाव आयुक्त के खिलाफ़ उनके आधिकारिक कर्तव्यों के पालन (या पालन करने के दावे) के दौरान किए गए किसी काम या कही गई किसी बात के लिए दीवानी या आपराधिक कार्यवाही शुरू या जारी नहीं रख सकतीं। इस चुनौती से देश के शीर्ष चुनाव अधिकारियों को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा के दायरे पर सवाल उठते हैं और यह भी कि क्या ऐसी छूट जवाबदेही और कानून के शासन के संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप है। विरोध से संशोधन तक: कैसे बनी धारा 16? जब सरकार ने 10 अगस्त 2023 को राज्यसभा में 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) विधेयक, 2023' पेश किया, तो इस कानून की चारों ओर आलोचना हुई। इस विधेयक से नियुक्तियों के मामले में सरकार को जो बेहिसाब दबदबा मिलने वाला था, उसके अलावा एक बात पर ज़ोरदार बहस हुई: यह विधेयक CEC और ECs को वेतन, भत्ते और सेवा की अन्य शर्तों के मामले में कैबिनेट सेक्रेटरी के बराबर लाने की कोशिश कर रहा था; जबकि पहले वे सुप्रीम कोर्ट के जजों के बराबर के स्तर पर थे। विपक्षी दलों ने उस बराबरी के दर्जे का मुद्दा उठाया जो CEC और ECs को सुप्रीम कोर्ट के जजों के बराबर मिला हुआ था, और जिसे प्रस्तावित कानून खत्म करना चाहता था। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों ने 16 सितंबर 2023 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक संयुक्त पत्र लिखकर चिंता जताई कि इस कदम से EC की प्रतिष्ठा और अधिकार कम होंगे और यह संकेत जाएगा कि CEC और ECs सिर्फ़ नौकरशाहों के बराबर हैं, उनसे बेहतर नहीं, जिससे नौकरशाही से उनके स्वतंत्र होने की धारणा पर बुरा असर पड़ेगा। आलोचना के बाद, सरकार ने बिल को कुछ समय के लिए रोक दिया और 2023 के शीतकालीन सत्र में कुछ अहम बदलावों के साथ इसे चर्चा और पास कराने के लिए पेश किया। 12 दिसंबर 2023 को, केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने राज्यसभा में बिल पर बहस शुरू करते हुए कहा कि सरकार बिल की धारा 15 में एक संशोधन ला रही है। इसका मकसद CEC और ECs को सैलरी और सर्विस की शर्तों के मामले में सुप्रीम कोर्ट के जजों के बराबर लाना है। उन्होंने सदन को बिल में एक और संशोधन के बारे में भी बताया, जो धारा 15A को जोड़ना था। इससे उन्हें बिना किसी रुकावट और आज़ादी से अपने काम करने में मदद मिलेगी। यह बिल 12 दिसंबर 2023 को राज्यसभा से और 21 दिसंबर 2023 को लोकसभा से पास हुआ। इसे 28 दिसंबर 2023 को राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिली। धारा 15A, 2023 के कानून में धारा 16 के तौर पर शामिल हुई। यह धारा अभी चर्चा में है, खासकर उस बड़े विवाद की वजह से जो CEC ज्ञानेश कुमार के कथित तौर पर एकतरफा फैसलों को लेकर खड़ा हुआ है। ये फैसले चुनावी रोल के बहुत विवादित 'स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न' (SIR) को कराने से जुड़े थे। 1. CEC एक्ट की धारा 16 ज्ञानेश कुमार को क्या सुरक्षा देती है? धारा 16 मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक काम करते समय किए गए, या कथित तौर पर किए गए कामों के लिए सिविल और आपराधिक कार्यवाही से सुरक्षा देती है। यह सुरक्षा उनके पद छोड़ने के बाद भी बनी रहती है। 2. क्या CEC के तौर पर लिए गए फैसलों के लिए ज्ञानेश कुमार पर मुकदमा चलाया जा सकता है? धारा 16 अदालतों को किसी सरकारी काम से जुड़ी सिविल या आपराधिक कार्यवाही पर विचार करने या उसे जारी रखने से रोकती है। सुप्रीम कोर्ट इस सुरक्षा के दायरे पर विचार कर रहा था; इस लेख में इस बात पर कोई अंतिम फैसला नहीं बताया गया है कि क्या कुमार पर मुकदमा चलाया जा सकता है। 3. विपक्षी पार्टियां ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई क्यों चाहती हैं? विपक्षी पार्टियों का आरोप है कि उन्होंने मतदाता सूची के 'स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न' (विशेष गहन संशोधन) के संबंध में एकतरफा फैसले लिए। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अन्य चुनाव आयुक्तों ने उन फैसलों और आदेशों पर आपत्ति जताई थी, जिनके बारे में उन्हें जानकारी नहीं थी। 4. क्या CEC एक्ट चुनाव आयुक्तों को जजों की तुलना में ज़्यादा सुरक्षा देता है? सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि धारा 16 के तहत जजों को मिलने वाली सुरक्षा से ज़्यादा कानूनी सुरक्षा मिल सकती है। लेख में बताया गया है कि जजेज़ (प्रोटेक्शन) एक्ट के तहत सरकार या कोर्ट के पास जजों के खिलाफ़ कुछ कार्रवाई करने का अधिकार सुरक्षित रहता है, जबकि CEC एक्ट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। 5. क्या सुप्रीम कोर्ट ने धारा 16 की वैधता पर कोई फ़ैसला सुनाया है? कोर्ट ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, CEC और दूसरे चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी किया है। इसमें धारा 16 पर किसी अंतिम फ़ैसले की बात नहीं कही गई है। इससे पहले 5 अक्तूबर 2026 को सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने 2023 के कानून के तहत चुनाव आयुक्तों की मिली कानूनी सुरक्षा को लेकर कहा कि यह तो संवैधानिक कोर्ट के जजों को भी प्राप्त नहीं है। सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर)को लेकर कथित मनमाने फैसले को लेकर डाली गई याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच की तरफ से ये गंभीर मौखिक टिप्पणी की गई थी। न्यायाधीश (संरक्षण) अधिनियम, 1985 (The Judges (Protection) Act, 1985) क्या है? केंद्र सरकार, राज्य सरकार, भारत के सर्वोच्च न्यायालय, किसी उच्च न्यायालय या किसी अन्य सक्षम प्राधिकारी को उस समय लागू किसी भी कानून के तहत किसी व्यक्ति (जो न्यायाधीश रहा हो या वर्तमान में न्यायाधीश हो) के खिलाफ उचित कार्रवाई (चाहे वह दीवानी, आपराधिक, विभागीय कार्यवाही या किसी अन्य रूप में हो) करने का अधिकार बना रहेगा। यह प्रावधान (कार्रवाई की छूट देने वाली यह धारा) CEC अधिनियम (मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम) में मौजूद नहीं है। इसे भी पढ़ें: 'फ़ोन ज़ब्त, वकील से मिलने की इजाज़त नहीं': दास और रांका को हिरासत में लिए जाने के बाद दिल्ली पुलिस पर CJP के आरोप CEC और ECs की नियुक्ति कैसे होती है? संविधान का अनुच्छेद 324 चुनावों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण की ज़िम्मेदारी भारत के चुनाव आयोग (ECI) को सौंपता है। अनुच्छेद 324(2) के अनुसार, संसद द्वारा बनाए गए किसी भी कानून के अधीन रहते हुए, राष्ट्रपति CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करते हैं। कई दशकों तक, संसद ने इन नियुक्तियों की प्रक्रिया तय करने वाला कोई कानून नहीं बनाया था। इसके कारण सुप्रीम कोर्ट के सामने यह सवाल उठा कि जब ECI के सदस्यों की नियुक्ति कार्यपालिका (सरकार) करती है, तो ECI की आज़ादी को कैसे बचाया जा सकता है। मार्च 2023 में, सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की संविधान पीठ ने 'अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ' मामले में अपना फ़ैसला सुनाया। अनूप बरनवाल मामला क्या था? जनवरी 2015 में अनूप बरनवाल ने एक जनहित याचिका (PIL) दायर की। उनका तर्क था कि ECI के सदस्यों की नियुक्ति की व्यवस्था असंवैधानिक है। उस समय, नियुक्तियाँ करने का अधिकार कार्यपालिका के पास था। PIL में कहा गया था कि समय के साथ ECI की आज़ादी कम हुई है। इसमें कोर्ट से अपील की गई कि वह ECI में नियुक्तियों के लिए एक स्वतंत्र, कॉलेजियम जैसी व्यवस्था बनाने का निर्देश दे। संविधान पीठ ने कहा कि जब तक संसद अनुच्छेद 324(2) के तहत कोई कानून नहीं बनाती, तब तक चुनाव आयोग में नियुक्तियां तीन सदस्यों वाली एक समिति की सिफारिश पर की जाएंगी। इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल होंगे। अदालत ने कहा कि यह व्यवस्था तब तक लागू रहेगी जब तक संसद इस विषय पर कोई कानून नहीं बना लेती। CEC को कैसे हटाया जा सकता है? संविधान CEC को पद से हटाने के मामले में काफी सुरक्षा देता है। अनुच्छेद 324(5) के अनुसार, CEC को पद से उसी तरह और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है। इसका मतलब है कि CEC को केवल साबित हो चुके दुर्व्यवहार या अक्षमता के आधार पर और सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने के लिए तय संसदीय प्रक्रिया के ज़रिए ही हटाया जा सकता है। संसद के दोनों सदनों में ज़रूरी विशेष बहुमत से पास होना चाहिए। संसद द्वारा प्रस्ताव पास किए जाने के बाद ही राष्ट्रपति CEC को हटाने का आदेश जारी कर सकते हैं। इसकी प्रक्रिया 'जजेज़ (इन्क्वायरी) एक्ट, 1968' में बताई गई है। दूसरे चुनाव आयुक्तों को मिलने वाली सुरक्षा अलग है। आर्टिकल 324(5) के तहत, किसी चुनाव आयुक्त या क्षेत्रीय आयुक्त को CEC की सिफ़ारिश के बिना उनके पद से नहीं हटाया जा सकता। इसे भी पढ़ें: Piyush Goyal ने Rahul Gandhi से पूछे 10 सवाल, वोट चोरी पर सबूत देने की दी चुनौती क्या CEC को गिरफ़्तार किया जा सकता है? इससे संबंधित प्रावधान 2023 के अधिनियम की धारा 16 है। यह धारा किसी भी ऐसे व्यक्ति को अदालत में दीवानी या आपराधिक कार्यवाहियों से सुरक्षा प्रदान करती है, जो CEC या चुनाव आयुक्त रहा हो या वर्तमान में हो। बशर्ते वह कृत्य, बात या शब्द उसने अपने आधिकारिक कर्तव्य या कार्य के निर्वहन के दौरान किया या कहा हो। यह प्रावधान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सुरक्षा उन व्यक्तियों तक भी बढ़ाता है जो CEC या चुनाव आयुक्त हैं या कभी रहे थे। हालांकि, धारा 16 स्पष्ट रूप से यह नहीं कहती कि CEC को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। यह केवल यह कहती है कि अदालतें इस धारा के दायरे में आने वाले आचरण के संबंध में कोई दीवानी या आपराधिक कार्यवाही स्वीकार या जारी नहीं रखेंगी। इस धारा में गिरफ्तारी (Arrest), जांच (Investigation) या पुलिस हिरासत (Police Custody) जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया गया है। इसलिए, इसे गिरफ्तारी से सीधी या पूर्ण छूट नहीं कहा जा सकता। इसके अलावा, यह सुरक्षा केवल उन्हीं कृत्यों से जुड़ी है जो आधिकारिक कर्तव्यों या कार्यों के निर्वहन के दौरान किए गए हों। 2023 से पहले क्या व्यवस्था थी? पुराना कानून (1991 का एक्ट): 2023 से पहले चुनाव आयोग Act, 1991 से संचालित होता था। इस 1991 के कानून में आयुक्तों के खिलाफ कोर्ट केस या आपराधिक कार्रवाई पर रोक लगाने वाली ऐसी कोई 'धारा 16' या कोई इम्युनिटी क्लॉज नहीं था। सामान्य लोक सेवकों वाला नियम (CrPC धारा 197): पहले चुनाव आयुक्तों को अन्य सरकारी अफसरों की तरह ही माना जाता था।उन पर आधिकारिक ड्यूटी से जुड़े मामले में केस चलाने के लिए CrPC की धारा 197 के तहत सरकार की पूर्व अनुमति की जरूरत होती थी। यानी कोर्ट जाने पर पूरी तरह कानूनी रोक नहीं थी, सिर्फ सरकार की मंजूरी की शर्त थी। संविधान (अनुच्छेद 324):सविधान ने CEC को केवल पद से हटाने की सुरक्षा दी थी कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह महाभियोग जैसी प्रक्रिया से ही हटाया जा सकता है। लेकिन संविधान के तहत उन्हें राष्ट्रपति या राज्यपाल (अनुच्छेद 361) की तरह मुकदमों से कानूनी छूट नहीं दी गई थी। 2023 के कानून ने क्या बदल दिया? 2023 के नए एक्ट की धारा 16 में साफ लिख दिया गया कि CEC या ECs द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्य के दौरान किए गए किसी भी काम या फैसले के खिलाफ अदालत कोई भी सिविल या क्रिमिनल केस स्वीकार ही नहीं करेगी।
Modi vs Rahul: लोकप्रियता में कितना बड़ा ख़तरा बने राहुल गांधी? RSS की अब नई रणनीति क्या होगी?
छत्तीसगढ़ दौरे के दौरान बस्तर के दशहरा उत्सव में शामिल होंगी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु
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Rahul Gandhi's Opposition Chai Meeting और AISA का राजभवन मार्च! Modi Govt के खिलाफ निर्णायक संघर्ष ?
उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 का चुनाव अभी कुछ समय दूर है, लेकिन शह-मात का खेल अभी से गरमाने लगा है। समाजवादी पार्टी के दरवाजे पर गठबंधन की उम्मीद लेकर पहुंचे असदुद्दीन ओवैसी को जब अखिलेश यादव ने भाव नहीं दिया, तो AIMIM प्रमुख ने आजमगढ़ की धरती से ऐसा सियासी तीर छोड़ा, जिसका निशाना सीधे लाल टोपी और मुलायम-अखिलेश की मुस्लिम राजनीति पर जा लगा। ओवैसी ने मुसलमानों से यादव परिवार की ‘गुलामी’ छोड़कर अपनी सियासी रहनुमाई खुद करने का आह्वान कर दिया। यानी गठबंधन की मेज पर जगह नहीं मिली, तो अब सियासी मैदान में हिस्सेदारी का हिसाब मांगा जाएगा! देखा जाये तो ओवैसी का हमला महज जुबानी जंग नहीं, बल्कि उस मुस्लिम वोट बैंक पर दावेदारी की खुली घोषणा है, जिसे समाजवादी पार्टी लंबे समय से अपनी सियासी ताकत का अहम हिस्सा मानती रही है। ओवैसी का आरोप है कि मुलायम सिंह यादव से लेकर अखिलेश यादव तक, मुस्लिम समाज ने पीढ़ियों तक सपा का साथ दिया, लेकिन बदले में उसे अपने दम पर नेतृत्व खड़ा करने का पर्याप्त मौका नहीं मिला। ओवैसी का सवाल साफ है कि अगर वोट मुसलमानों का, मेहनत मुसलमानों की और सत्ता की सीढ़ी मुसलमानों के समर्थन से तैयार होती है, तो फिर नेतृत्व के दरवाजे पर ताला क्यों? इसे भी पढ़ें: बुआ मायावती ने भतीजे आकाश आनंद को वापस बुलाया या राजनीतिक जाल में फंसा दिया? यही वह सवाल है, जो अखिलेश यादव के लिए सियासी सिरदर्द बन सकता है। क्योंकि यूपी की राजनीति में वोट का गणित सिर्फ जातियों की गिनती से नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी से भी तय होता है। ओवैसी इसी हिस्सेदारी के मुद्दे को हथियार बनाकर सपा के उस मजबूत सामाजिक समीकरण में सेंध लगाने की तैयारी में हैं, जिसके सहारे अखिलेश 2027 में बीजेपी को चुनौती देने का सपना देख रहे हैं। साथ ही आजमगढ़ को लेकर ओवैसी ने अखिलेश को घेरने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। शिब्ली नेशनल कॉलेज को विश्वविद्यालय का दर्जा न मिलने, शिब्ली अकादमी को कथित तौर पर महज पांच लाख रुपये देने, खराब सड़कों, बंद पड़े हवाई अड्डे और महंगी शिक्षा का सवाल उठाकर उन्होंने सपा के विकास के दावों पर चोट की। साथ ही उन्होंने यह भी तंज कसा कि जब आजमगढ़ में सपा के दो सांसद, दस विधायक और जिला पंचायत अध्यक्ष तक पार्टी के हैं, तो जमीन पर विकास की तस्वीर इतनी बदहाल क्यों है? देखा जाये तो सवाल स्थानीय है, लेकिन निशाना सीधे अखिलेश की सियासी साख पर है। उधर, योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव के अयोध्या से चुनाव लड़ने की चुनौती पर ओवैसी ने दोनों को क्रमशः संभल और गोरखपुर से उतरने की नसीहत देकर राजनीतिक अखाड़े में नया दांव चल दिया। साथ ही मोदी और योगी सरकार पर मुठभेड़ों, बुलडोजर कार्रवाई और मुसलमानों के घरों-दुकानों पर कार्रवाई को लेकर हमला बोलते हुए उन्होंने खुद को मुस्लिम अधिकारों की मुखर आवाज के रूप में पेश किया। लेकिन इस पूरी लड़ाई का असली सवाल यही है कि क्या ओवैसी मुस्लिम समाज के भीतर स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व खड़ा कर पाएंगे, या उनका वोट काटने वाला चेहरा होने का आरोप ही उनके रास्ते की सबसे बड़ी बाधा बनेगा? इसमें कोई दो राय नहीं कि सपा के साथ गठबंधन की कोशिश नाकाम होने के बाद ओवैसी के सामने अपनी ताकत साबित करने की चुनौती है। वहीं अखिलेश के सामने यह भरोसा कायम रखने की परीक्षा है कि उनका सामाजिक गठबंधन सिर्फ चुनाव जीतने का समीकरण नहीं, बल्कि सत्ता में भागीदारी का भी रास्ता है। देखा जाये तो यूपी में 2027 की जंग अभी शुरू नहीं हुई है, मगर मुस्लिम वोटों की चौसर बिछ चुकी है। ओवैसी ने चाल चल दी है, अखिलेश को जवाब देना है और बीजेपी इस खींचतान का सियासी फायदा उठाने की ताक में रहेगी। आखिरकार, चुनाव में न नारा अकेले जीतता है, न आरोप, जीतता वही है, जिसके साथ जनता का भरोसा, संगठन की ताकत और वोटों का ठोस गणित होता है। -नीरज कुमार दुबे
एआई बूम ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को बांटा: आईएमएफ
वॉशिंगटन, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने मंगलवार को कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) में तेजी से बढ़ रहे निवेश और मध्य पूर्व में जारी युद्ध के कारण दुनिया की अर्थव्यवस्था दो हिस्सों में बंटती नजर आ रही है।
'संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाना राहुल गांधी की आदत', इंडिया ब्लॉक के प्रदर्शन पर एनडीए नेताओं का पलटवार
राहुल गांधी को महादेव के बारे में कुछ नहीं पता, इसी कारण राजनीतिक तमाशे को 'शिव तांडव' से जोड़ा : राम कदम
चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्ष की याचिका पर कांग्रेस नेता बोले-'लोकतंत्र की रक्षा के लिए जारी रहेगा संघर्ष'
आन्दोलन वही, जो सार्थक मुद्दा, दिशा एवं भरोसे से जुड़ा हो
लोकतंत्र में असहमति उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी जीवंतता का प्रमाण है। सरकार से सवाल पूछना, नीतियों का विरोध करना और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाना नागरिक स्वतंत्रता का अनिवार्य हिस्सा है। लेकिन लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा केवल इस बात से नहीं होती कि विरोध करने की कितनी स्वतंत्रता है, बल्कि इससे भी होती है कि उस स्वतंत्रता का उपयोग किस उद्देश्य, किस भाषा और किस पद्धति से किया जा रहा है। किसी आंदोलन का मुद्दा कितना ही महत्त्वपूर्ण क्यों न हो, यदि उसका नेतृत्व दिशाहीन हो जाए, भाषा उत्तेजक बन जाए और पद्धति हिंसा अथवा अराजकता की ओर बढ़ने लगे, तो उसका नैतिक आधार कमजोर पड़ने लगता है। इसलिए आज देश के सामने प्रश्न केवल आंदोलनों का नहीं, बल्कि उनके चरित्र, विश्वसनीयता और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व का भी है। दिल्ली में हाल के विरोध प्रदर्शनों और उन पर प्रशासन की सख्ती के बाद सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप ने एक बार फिर लोकतंत्र की सीमाओं और संभावनाओं पर बहस छेड़ दी है। एक ओर शांतिपूर्ण विरोध नागरिकों का अधिकार है, तो दूसरी ओर सार्वजनिक व्यवस्था, नागरिक सुरक्षा और कानून का पालन सुनिश्चित करना शासन का दायित्व है। इन दोनों के बीच संतुलन ही संवैधानिक लोकतंत्र की पहचान है। न तो सरकार को कानून-व्यवस्था के नाम पर नागरिक स्वतंत्रताओं के अनावश्यक दमन की छूट दी जा सकती है और न ही आंदोलनकारियों को लोकतांत्रिक अधिकारों की आड़ में सार्वजनिक जीवन को बाधित करने का असीमित अधिकार प्राप्त है। संविधान अधिकार देता है, लेकिन उन अधिकारों के साथ उत्तरदायित्व भी जोड़ता है। आज सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि जनांदोलनों की दिशा कौन तय कर रहा है? क्या आंदोलन वास्तव में जनसमस्याओं के समाधान के लिए खड़े हो रहे हैं, अथवा जनता के असंतोष को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का साधन बनाया जा रहा है? यह प्रश्न किसी एक दल या संगठन तक सीमित नहीं है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, सामाजिक संगठन हों या जनसमूह, सभी को अपने आचरण की कसौटी संविधान, नैतिकता और जनहित को बनाना चाहिए। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। वह सरकार की नीतियों पर सवाल उठाता है, कमियों को सामने लाता है और जनहित के मुद्दों को राजनीतिक विमर्श में स्थान देता है। लेकिन विपक्ष का दायित्व केवल विरोध करना नहीं, बल्कि वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत करना भी है। यदि हर असहमति को सत्ता के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष में बदलने का प्रयास किया जाए, हर प्रशासनिक निर्णय को राजनीतिक षड्यंत्र बताया जाए और प्रत्येक जनसमस्या को व्यापक अव्यवस्था का प्रतीक बना दिया जाए, तो वास्तविक मुद्दे शोर में खोने लगते हैं। इसी तरह सरकार भी यदि आलोचना को शत्रुता समझने लगे, तो लोकतांत्रिक संवाद की संभावनाएं संकुचित हो जाती हैं। इसे भी पढ़ें: प्रदर्शन भी होगा, आवाजाही भी चलेगी! Delhi Protest Case में Supreme Court के अहम निर्देश आंदोलन की साख उसके मूल उद्देश्य एवं भरोसे से बनती है। जिस मुद्दे को लेकर लोग एकत्र होते हैं, उसकी स्पष्टता, तथ्यात्मक प्रामाणिकता और समाधान की दिशा आंदोलन की विश्वसनीयता निर्धारित करती है। जब मूल प्रश्न पीछे छूट जाता है और राजनीतिक दलों की प्रतिस्पर्धा, व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाएं अथवा वैचारिक टकराव केंद्र में आ जाते हैं, तब आंदोलन की ऊर्जा बिखरने लगती है। जनसमर्थन जुटाना और जनविश्वास अर्जित करना दो अलग-अलग बातें हैं। भीड़ किसी क्षणिक आक्रोश का परिणाम हो सकती है, लेकिन जनविश्वास निरंतर नैतिक आचरण और रचनात्मक कार्यों से अर्जित होता है। भारत का लोकतांत्रिक इतिहास इस संदर्भ में अनेक महत्त्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है। वर्ष 1974 का छात्र आंदोलन और लोकनायक जयप्रकाश नारायण का नेतृत्व बताता है कि जनाक्रोश को रचनात्मक परिवर्तन की शक्ति में कैसे बदला जा सकता है। बिहार के छात्रों ने भ्रष्टाचार, महंगाई और शासन संबंधी समस्याओं के विरुद्ध आवाज उठाई थी। जयप्रकाश नारायण ने इस असंतोष को व्यापक सामाजिक और राजनीतिक सुधारों की दिशा देने का प्रयास किया। आज के आंदोलनों को इस ऐतिहासिक अनुभव से सीखना चाहिए। किसी भी आंदोलन की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितनी सड़कें बंद हुईं, कितने लोग एकत्र हुए या कितने दिनों तक विरोध चला। उसकी सफलता का वास्तविक पैमाना यह होना चाहिए कि उसने किस समस्या का समाधान प्रस्तुत किया, जनजीवन में क्या सकारात्मक परिवर्तन लाया और समाज में संवैधानिक चेतना को कितना मजबूत किया। वर्तमान समय में इंटरनेट मीडिया ने जनमत निर्माण की प्रक्रिया को पूरी तरह बदल दिया है। अब कोई घटना कुछ ही मिनटों में व्यापक बहस का विषय बन सकती है। यह लोकतंत्र के लिए एक महत्त्वपूर्ण अवसर है, क्योंकि इससे आम नागरिकों को अपनी बात रखने और प्रशासन से जवाब मांगने का मंच मिला है। लेकिन यही माध्यम भ्रामक सूचनाओं, अधूरे तथ्यों, भावनात्मक अभियानों और अपुष्ट आरोपों को भी तेजी से प्रसारित कर सकता है। हैशटैग, वायरल वीडियो और ऑनलाइन समर्थन अपने आप में किसी आंदोलन की नैतिक प्रामाणिकता का प्रमाण नहीं हैं। किसी आरोप की गंभीरता का निर्धारण उसके प्रमाणों से होना चाहिए, उसकी लोकप्रियता से नहीं। यदि आंदोलनकारी तथ्यों की पुष्टि किए बिना आरोप लगाते हैं, तो वे अपने ही उद्देश्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसी प्रकार प्रशासन का दायित्व है कि वह आलोचनात्मक आवाजों को केवल इसलिए संदिग्ध न माने कि वे सरकार के विरुद्ध हैं। पारदर्शिता, तथ्यपरक संवाद और निष्पक्ष जांच ही अविश्वास को दूर करने के प्रभावी उपाय हैं। आज युवाओं के पास डिजिटल तकनीक, नवाचार, उद्यमिता और सामाजिक सहभागिता के अनेक अवसर हैं। उनकी ऊर्जा केवल विरोध तक सीमित न रहे, बल्कि समाधान निर्माण में भी लगे। भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन हो तो पारदर्शिता के व्यावहारिक उपाय सामने आएं, चुनावी सुधारों की मांग हो तो प्रमाण आधारित सुझाव प्रस्तुत किए जाएं, प्रशासनिक अन्याय का प्रश्न हो तो कानूनी और संस्थागत रास्तों को मजबूत किया जाए। विरोध की सार्थकता तब बढ़ती है, जब वह किसी बेहतर व्यवस्था की कल्पना और निर्माण का आधार बनता है। जनांदोलनों के संदर्भ में विदेशी शक्तियों की भूमिका पर भी चर्चा होती रही है। यह स्वाभाविक है कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में राष्ट्रीय हितों, बाहरी प्रभावों और सूचना के प्रवाह को लेकर सतर्कता बरती जाए। लेकिन इस विषय पर भी भावनाओं अथवा आशंकाओं के बजाय प्रमाणों के आधार पर बात होनी चाहिए। किसी आंदोलन में सरकार की आलोचना होने मात्र से उसे विदेशी षड्यंत्र का हिस्सा नहीं कहा जा सकता। उसी प्रकार यदि किसी गतिविधि में विदेशी वित्तपोषण, भ्रामक प्रचार अथवा अनुचित हस्तक्षेप के विश्वसनीय प्रमाण मिलते हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। राष्ट्रीय एकता और अखंडता की रक्षा केवल कठोर प्रशासनिक कार्रवाई से नहीं होती। वह नागरिकों के विश्वास, संस्थाओं की निष्पक्षता, न्याय की उपलब्धता और शासन की पारदर्शिता से मजबूत होती है। देश की आलोचना और देश के प्रति शत्रुता में अंतर समझना आवश्यक है। सरकार की किसी नीति का विरोध करना राष्ट्रविरोध नहीं है, जैसे राष्ट्रीय हित की चिंता करना किसी नागरिक की लोकतांत्रिक स्वतंत्रता को सीमित करने का औचित्य नहीं बन सकता। अंततः लोकतंत्र की शक्ति न तो केवल सत्ता में निहित है और न ही केवल सड़क पर उतरने वाली भीड़ में। उसकी वास्तविक शक्ति नागरिक विवेक, संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और समाज की संवाद करने की क्षमता में है। किसी भी आंदोलन को स्वयं से तीन प्रश्न अवश्य पूछने चाहिए-क्या हमारा मुद्दा तथ्यपरक और जनहितकारी है? क्या हमारी पद्धति लोकतांत्रिक और अहिंसक है? क्या हमारे प्रयास से समस्या का समाधान निकलेगा या समाज में विभाजन और अविश्वास बढ़ेगा? केवल मुद्दा सही होना पर्याप्त नहीं है, उसके लिए सही नेतृत्व, सही भाषा, सही पद्धति और सही लक्ष्य भी आवश्यक हैं। आंदोलन का उद्देश्य केवल किसी व्यवस्था को चुनौती देना नहीं, बल्कि उससे बेहतर व्यवस्था के निर्माण में योगदान करना होना चाहिए। जो आंदोलन समाज को विवेक, अनुशासन, न्याय और रचनात्मकता की दिशा देता है, वही इतिहास में स्थायी स्थान प्राप्त करता है। भारत का भविष्य ऐसे ही लोकतांत्रिक चिंतन में सुरक्षित है, जहां असहमति को सम्मान मिले, सत्ता जवाबदेह रहे, विपक्ष रचनात्मक बने और राष्ट्रहित का अर्थ नागरिक स्वतंत्रता तथा संवैधानिक मर्यादा के समन्वय में खोजा जाए। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
IMF का अनुमान: भारत की GDP ग्रोथ 7% रहेगी, दुनिया की आर्थिक रफ्तार से दोगुने से ज्यादा
IMF ने भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान वित्त वर्ष 2026-27 के लिए बढ़ाकर 7% किया। जानिए वैश्विक विकास दर, AI निवेश और अर्थव्यवस्था के सामने मौजूद चुनौतियां।
संजय सिंह की कोर्ट में बढ़ी टेंशन! गवाही पूरी, अब 17 अक्टूबर को होगी आर-पार की बहस
उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर जिले में आदर्श आचार संहिता उल्लंघन के मामले में आम आदमी पार्टी (आप) सांसद संजय सिंह समेत 12 आरोपियों के खिलाफ विचाराधीन केस में गवाही पूरी हो गई है
अमित शाह टिप्पणी मामला: राहुल गांधी की मुश्किलें बढ़ेंगी या मिलेगी राहत? आज कोर्ट में सुनवाई
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और रायबरेली सांसद राहुल गांधी के खिलाफ चल रहे मानहानि मामले में आज 13 अक्टूबर को सुनवाई होगी
दुर्गा पूजा से पहले पश्चिम बंगाल में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल, 4 आईएएस अधिकारियों का तबादला
दुर्गा पूजा से पहले पश्चिम बंगाल में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल, 4 आईएएस अधिकारियों का तबादला
'EVM खराब है तो सरकार भी छोड़ो'... राहुल गांधी पर हिमंता बिस्वा सरमा का बड़ा हमला
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को चुनौती दी कि अगर उन्हें वाकई लगता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव सुनिश्चित नहीं कर सकते, तो वे विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों की सरकारों से इस्तीफा मांगें और चुनाव बहिष्कार की घोषणा करें।
'सीजेआई के पास इंडिया गठबंधन से मिलने का समय नहीं', सपा प्रवक्ता अमीक जामेई का दावा
'सीजेआई के पास इंडिया गठबंधन से मिलने का समय नहीं', सपा प्रवक्ता अमीक जामेई का दावा
'देश में अराजकता फैलाना विपक्ष का लक्ष्य', राहुल गांधी के मार्च पर भाजपा नेता का आरोप
'देश में अराजकता फैलाना विपक्ष का लक्ष्य', राहुल गांधी के मार्च पर भाजपा नेता का आरोप
'देश को टकराव नहीं, विवेक और समाधान चाहिए', सीजेपी के प्रदर्शन पर स्वामी चिदानंद सरस्वती
'देश को टकराव नहीं, विवेक और समाधान चाहिए', सीजेपी के प्रदर्शन पर स्वामी चिदानंद सरस्वती
ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर गांधी मैदान से राजभवन तक मार्च: संदीप सौरव
ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर गांधी मैदान से राजभवन तक मार्च: संदीप सौरव
मध्य प्रदेश: मुख्यमंत्री मोहन यादव का स्कूली बच्चों से संवाद
मध्य प्रदेश: मुख्यमंत्री मोहन यादव का स्कूली बच्चों से संवाद
पेयजल के बिना कैसे पूरा होगा विकसित भारत का सपना
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने सार्वजनिक जीवन के 25 साल पूरे होने पर आयोजित कार्यक्रम को एक घंटे तक संबोधित करते हुए कहा कि जब तक भारत विकसित नहीं होता, तब तक न थकूंगा, न रुकूंगा। इस नारे का 19 बार जिक्र किया। उन्होंने कहा कि भारत को 2047 तक हर हालत में विकसित देश बनाना है। निश्चित तौर पर भारत को विकसित देश बनना ही चाहिए। सवाल यह है कि क्या तब तक भारत के करोड़ों लोग प्यासे रहेंगे। उन्हें पर्याप्त और शुद्ध पानी के लिए क्या भारत के विकसित होने तक इंतजार करना पड़ेगा। क्या देश के लोगों की प्यास और दूषित पेयजल से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं को तब तक के लिए रोका जा सकता है। विकसित भारत का सपना देखने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन इससे पहले केंद्र और राज्यों की सरकारों का यह खुलासा करना चाहिए कि देश के लोगों को गुणवत्तायुक्त पर्याप्त पीने का पानी कब तक उपलब्ध हो जाएगा। इसके लिए देश की राष्ट्रीय नीति क्या है। इस मुद्दे पर कोई बोलने को तैयार नहीं है। इस बारे में चर्चा करते ही देश के विकास और विकसित भारत के सपने पर सवालिया निशान लग जाते हैं। देश के सत्तारुढ़ दलों और विपक्षी दलों के नेता ऐसे जमीनी जरूरतों के मुद्दों से मुंह चुराते हैं। पेयजल जैसी समस्याओं से निपटने के लिए सरकारों के पास दूरदृष्टि और योजनाएं नहीं हैं। यदि लगातार एक या दो बार देश में मानसून मेहरबान न हो तो देश में पीने के पानी का हाहाकार मचने लगता है। इसे भी पढ़ें: Maharashtra Drought: सूखा प्रभावित क्षेत्रों के लिए 8 महीने की योजना बनाएगी सरकार, केंद्र से मांगेगी राहत देश में पेयजल संकट अभी से गहराने लगा, जबकि अभी मानसून की विदाई हुई है। महाराष्ट्र में राज्य सरकार ने 16 अक्टूबर से सभी शहरी और ग्रामीण स्थानीय निकायों में कम से कम 10 प्रतिशत जल कटौती लागू करने का निर्णय लिया है। राज्य के जालना जिले में बांध में केवल 2 प्रतिशत पानी बचा है। नौबत यहां तक आ गई है कि प्रशासन को पानी की चोरी रोकने के लिए पुलिस और राजस्व विभाग की टीमों के साथ रात में भी निगरानी और गश्त करनी पड़ रही है। इस बार मानसून में बारिश की करीब 12—13 प्रतिशत की कमी के कारण देश के दूसरे राज्यों की हालत भी महाराष्ट्र जैसी होने से इंकार नहीं किया जा सकता। देश के कई राज्यों में कम बारिश का असर अब जलाशयों पर दिख रहा है। 1 अक्टूबर तक देश के प्रमुख जलाशयों में 71.84% पानी था। पिछले साल इसी समय यह 90.31% था, जबकि सामान्य स्तर 81.79% है। अर्थात इस बार जलाशयों में पानी पिछले साल के मुकाबले काफी कम है। देशभर में इस बार का मानसून 13वां सबसे सूखा सीजन रहा। पिछले 11 सालों में यह सबसे कम बारिश वाला मानसून रहा है। हालांकि, सीजन खत्म होने से पहले हुई तेज बारिश के कारण बारिश की कमी में 2.5% का सुधार हुआ। मानसून-2026 सीजन सामान्य से 12.6% कम बारिश के साथ खत्म हुआ। देश के 43% जिलों में 20 से 72% तक कम बारिश हुई। सबसे ज्यादा पंजाब में 41% कम बारिश हुई। राजस्थान में करीब 22% कमी दर्ज की गई। इनके अलावा 9 राज्यों में भी औसत से कम बारिश हुई। पूर्वी भारत में ओडिशा में सामान्य से 30% ज्यादा बारिश हुई, जबकि बारिश के लिए प्रसिद्ध पूर्वोत्तर राज्यों में इस साल 1901 के बाद सबसे कम बारिश दर्ज की गई। पानी की कमी का असर महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, राजस्थान और तमिलनाडु में ज्यादा दिख रहा है। कई इलाकों में खेती के लिए पानी कम पड़ रहा है और फसलों को भी नुकसान हो रहा है। आजादी के साठ वर्षो के बाद भी देश की एक तिहाई जनता को पीने के लिए स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है। शायद यही कारण है कि प्रतिवर्ष जल जनित बीमारियों के चलते 15 लाख बच्चे काल के गाल में समा जाते है और काम के अनगिनत घंटों का नुकसान होता है। समस्या यह है कि केंद्र एवं राज्य सरकारें पेयजल संकट को दूर करने के लिए गंभीर नहीं, जबकि वे इससे परिचित है कि आने वाले समय में पानी के लिए युद्ध छिड़ सकते है। भारत में पेयजल संकट बढ़ती आबादी और कृषि की जरूरतों के कारण भी गंभीर होता जा रहा है। करीब 65-70 प्रतिशत जल कृषि कार्यो में खप जाता है। इसके अतिरिक्त उद्योगों के संचालन में भी जल का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। विडंबना यह है कि न तो उद्योग एवं कृषि क्षेत्र को अपनी आवश्यकता भर पानी उपलब्ध हो पा रहा है और न ही आम आदमी को। हमारे देश में जल संकट जब-तब गंभीर रूप ले लेता है। बात चाहे कावेरी जल विवाद के कारण तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच की तनातनी की हो अथवा यमुना जल के बंटवारे को लेकर दिल्ली एवं हरियाणा के बीच की, ऐसे विवाद लगातार बढ़ते जा रहे है। अब तो जल बंटवारे को लेकर राजनीति भी होने लगी है और एक प्रांत के लोगों को दूसरे प्रांत के लोगों के समक्ष खड़ा करने में संकोच नहीं किया जा रहा है। इन दिनों होगेंक्काल पेयजल परियोजना को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच यही हो रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार देश के 60 करोड़ लोग पानी की किल्लत से जूझ रहे हैं जबकि 16 करोड़ लोग गंदा पानी पी रहे हैं। शुद्ध पानी के लिए सरकार करोड़ों-अरबों रुपये खर्च कर रही है, लेकिन हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। देश के करीब 9 राज्यों में पानी की गुणवत्ता खराब है। नीति आयोग की कंपोजिट वॉटर मैनेजमेंट इंडेक्स रिपोर्ट में बताया गया कि भारत में पानी की वजह से हर साल दो लाख लोगों की मौत हो रही है। साल 2030 तक ये स्थिति और विकराल हो जाएगी जब देश की लगभग 40 फीसदी आबादी के सामने पानी का संकट होगा। विकसित भारत के 2047 के लक्ष्य तक देश में पेयजल की हालत का तो आकलन ही नहीं किया गया है। यूनाइटेड स्टेट्स जियोलॉजिकल सर्वे के वैश्विक स्तर पर कुल पानी की सालाना निकासी या खपत के मामले में भारत पहले पायदान नंबर-1 पर है। अत्यधिक आबादी और कृषि (सिंचाई) के कारण सबसे आगे है। वैश्विक जल गुणवत्ता सूचकांक में भारत 122 देशों में से 120वें स्थान पर है। सुरक्षित पेयजल और जल गुणवत्ता के मामले में भारत की गिनती दुनिया के सबसे निचले स्तर के देशों में होती है। पेयजल से लेकर जल संरक्षण की योजनाओं पर अत्यंत शिथिलता बरती जा रही है। दो वर्ष पूर्व आम बजट में ऐसी योजनाओं के लिए तमाम प्रावधान किए गए थे, लेकिन इस बजट में वे सिरे से गायब है। देश को विकसित राष्ट्र बनाने में जल संसाधन का उतना ही महत्व है जितना ऊर्जा और अन्य साधनों का। जब तक ऐसी बुनियादी सुविधाओं का समाधान नहीं होगा, तब तक विकसित राष्ट्र का सपना एक छलावा ही साबित होगा। - योगेन्द्र योगी
भाजपा सांसद ने खुले पत्र के जरिए सपा प्रमुख से पूछे सवाल, समाजवादी आंदोलन के कार्यकर्ताओं को हिस्सेदारी देने पर मांगा जवाब
भारत में सितंबर में खुदरा महंगाई 5.54 प्रतिशत रही
नई दिल्ली, भारत में सितंबर 2026 में खुदरा महंगाई सालाना आधार पर बढ़कर 5.54 प्रतिशत (प्रोविजनल) हो गई है।
'ये लोग अब संवैधानिक संस्थाओं से लड़ रहे हैं', भाजपा नेता ने कांग्रेस पर साधा निशाना
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वैश्विक अस्थिरता बढ़ने से भारतीय शेयर बाजार लाल निशान में बंद
मुंबई, भारतीय शेयर बाजार सोमवार के कारोबारी सत्र में लाल निशान में बंद हुआ।
विपक्षी नेता किसी सरकार पर हमला बोलें तो समझ आता है, लेकिन मध्य प्रदेश में तो राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपनी ही पार्टी की सरकार के मुख्यमंत्री मोहन यादव को घेरकर पूरी भाजपा को सकते में डाल दिया है। हम आपको बता दें कि आदिवासियों के घरों पर बुलडोजर चलाए जाने के मुद्दे पर शिवराज की नाराजगी ने मध्य प्रदेश की सियासत में एक नई बहस छेड़ दी है। सवाल सिर्फ आदिवासी परिवारों के घरों को तोड़े जाने का नहीं है, बल्कि यह भी है कि क्या भारतीय जनता पार्टी के भीतर सत्ता और नेतृत्व को लेकर कोई ऐसी खींचतान चल रही है, जिसकी झलक अब सार्वजनिक रूप से दिखाई देने लगी है? मुख्यमंत्री मोहन यादव और शिवराज सिंह चौहान के बीच कथित मतभेदों की चर्चाओं के बीच इस घटनाक्रम के राजनीतिक मायने तलाशे जा रहे हैं। हम आपको बता दें कि मामला सीहोर जिले के कोसमी गांव का है, जहां 11 अक्टूबर को वन विभाग और वन विकास निगम की कार्रवाई में बारेला आदिवासी समुदाय के 12 परिवारों के घर तोड़े जाने की खबर सामने आई। आरोप है कि इस कार्रवाई में खेतों में खड़ी मक्का और अरहर की फसलें भी नष्ट हुईं और पानी के लिए इस्तेमाल होने वाले कुएं को मिट्टी से भर दिया गया। अधिकारियों की दलील वन भूमि पर कथित अतिक्रमण हटाने की है, लेकिन कार्रवाई के तरीके ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इसे भी पढ़ें: Rahul Gandhi के आरोपों पर Shivraj का पलटवार, अराजकता से सत्ता पाना चाहती है Congress शिवराज सिंह चौहान को इसकी जानकारी मिली तो वह सीधे गांव पहुंच गए। पीड़ित परिवारों से मुलाकात की, उनके साथ धरने पर बैठे और मौके से ही मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल तथा भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल से बात की। शिवराज ने प्रभावित परिवारों को नए मकान बनवाने और तब तक रहने-खाने की व्यवस्था कराने का भरोसा दिया। उन्होंने अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि गरीब आदिवासियों के साथ हुआ अन्याय बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। लेकिन शिवराज के बयान का सबसे अहम हिस्सा वह था, जिसमें उन्होंने सवाल उठाया कि जिन लोगों के वोट से भाजपा को जीत मिलती है, उन्हीं के घर क्यों उजाड़े जा रहे हैं? उन्होंने यह आशंका भी जताई कि कुछ अधिकारी मुख्यमंत्री मोहन यादव की छवि खराब करने की साजिश कर रहे हो सकते हैं। यानी शिवराज ने एक तरफ मुख्यमंत्री के प्रति अपनी चिंता जताई, तो दूसरी तरफ उनके अधीन काम करने वाले प्रशासनिक तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया। सवाल उठता है कि क्या यह शिवराज बनाम मोहन यादव की लड़ाई है? देखा जाये तो राजनीतिक गलियारों में इस घटनाक्रम को सिर्फ प्रशासनिक कार्रवाई के विरोध तक सीमित करके नहीं देखा जा रहा है। दिसंबर 2023 में शिवराज सिंह चौहान की जगह मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद से ही दोनों नेताओं की राजनीतिक भूमिका और उनके बीच संबंधों को लेकर समय-समय पर चर्चाएं होती रही हैं। शिवराज लंबे समय तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं और बुधनी उनकी पुरानी राजनीतिक कर्मभूमि रही है। ऐसे क्षेत्र में आदिवासी परिवारों के घर उजड़ना और फिर उनका खुद मौके पर पहुंचकर प्रशासन के खिलाफ खड़ा होना, उनकी स्थानीय राजनीतिक पकड़ और जननेता की छवि से भी जुड़ा है। ऐसे में उनकी प्रतिक्रिया को जनहित की चिंता और अपने राजनीतिक प्रभाव को बनाए रखने, दोनों संभावित संदर्भों में भी देखा जा सकता है। उधर, कांग्रेस ने इस प्रकरण को भाजपा के अंदरूनी मतभेदों से जोड़ते हुए मुख्यमंत्री पर निशाना साधा है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने आरोप लगाया कि भाजपा की अंदरूनी खींचतान का खामियाजा आदिवासी परिवारों को भुगतना पड़ रहा है। हालांकि, भाजपा के लिए असली चुनौती विपक्ष के आरोपों से ज्यादा इस सवाल का जवाब देना है कि कथित अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई में प्रभावित परिवारों के पुनर्वास, आजीविका और बुनियादी जरूरतों का ध्यान रखा गया या नहीं। अगर केंद्रीय मंत्री को अपनी ही राज्य सरकार के अधिकारियों के खिलाफ सार्वजनिक रूप से हस्तक्षेप करना पड़ रहा है, तो प्रशासनिक समन्वय और जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है। वैसे यह पहली बार नहीं है जब शिवराज ने मध्य प्रदेश सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हों। उन्होंने पहले भी आदिवासियों से जुड़े मामलों और मूंग की खरीद के मुद्दे पर हस्तक्षेप किया था। अब निगाहें मुख्यमंत्री मोहन यादव की प्रतिक्रिया और प्रभावित परिवारों को मिलने वाली राहत पर हैं। शिवराज का कहना है कि वह मुख्यमंत्री के सामने पूरा मामला उठाएंगे। यदि दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई होती है और परिवारों का पुनर्वास सुनिश्चित किया जाता है, तो विवाद का प्रशासनिक समाधान निकल सकता है। लेकिन यदि मामला लंबा खिंचता है, तो भाजपा के भीतर समन्वय और नेतृत्व की कार्यशैली पर बहस और तेज हो सकती है। बहरहाल, कोसमी की घटना को शिवराज और मोहन यादव के बीच टकराव कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना स्पष्ट है कि केंद्रीय मंत्री का सार्वजनिक विरोध राज्य सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा करता है। -नीरज कुमार दुबे
सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इंडिया ब्लॉक का सुप्रीम कोर्ट मार्च, राहुल-खड़गे समेत कई नेता शामिल
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वित्तीय सेवा क्षेत्र में 2026 की तीसरी तिमाही में दोगुने से अधिक बढ़कर 7.3 अरब डॉलर रहा
नई दिल्ली, भारत के वित्तीय सेवा क्षेत्र में 2026 की तीसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर) में 7.3 अरब डॉलर के 67 सौदे दर्ज किए गए।
CEC के खिलाफ INDIA Alliance पहुंचा Supreme Court! 200 Bureaucrats राहुल के साथ, Modi के खिलाफ बगावत?
गोल्ड ईटीएफ में निवेश 71 प्रतिशत से अधिक बढ़कर 4,451 करोड़ रुपए हुआ
नई दिल्ली, एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया (एम्फी) की ओर से सोमवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, सितंबर में गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) में शुद्ध निवेश अगस्त के 2,597 करोड़ रुपए से महीने-दर-महीने आधार पर 71.4 प्रतिशत बढ़कर सितंबर में 4,451 करोड़ रुपए हो गया है। यह दिखाता है कि सोने की ओर लोगों का रुझान बढ़ रहा है।
जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन पर रोक को लेकर सौरव दास और आशुतोष रांका बोले-'यह अस्वीकार्य, पीछे नहीं हटेंगे'
स्टारलिंक के मालिक एलन मस्क का दुस्साहस बढ़ता ही चला जा रहा है। भारतीय उद्योगपति और रिलायंस इंडस्ट्रीज के मालिक मुकेश अंबानी पर सोशल मीडिया के जरिये निशाना साधने के बाद अब जियो के प्रस्तावित आईपीओ से ठीक पहले एलन मस्क ने तीखे बयान दिये हैं। जिन्हें भारतीय बाजार में अपनी एंट्री के लिए दबाव बनाने और रिलायंस के खिलाफ माहौल तैयार करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। गौरतलब है कि एलन मस्क ने आरोप लगाया है कि भारत में कुछ प्रभावशाली कारोबारी हित उनकी कंपनी स्टारलिंक का रास्ता रोक रहे हैं। साथ ही, उन्होंने भारत में सस्ती सैटेलाइट इंटरनेट सेवा देने का वादा किया है। हालांकि, सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि जियो और भारती समर्थित वनवेब भी जरूरी मंजूरियों के लिए लंबे समय से इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मस्क के आरोप तथ्यों पर आधारित हैं या जियो के आईपीओ से पहले प्रतिस्पर्धा को लेकर एकतरफा नैरेटिव बनाने की कोशिश की जा रही है? उल्लेखनीय है कि मस्क ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर दावा किया कि भारत में कुछ प्रभावशाली कारोबारी हित स्टारलिंक की एंट्री रोककर अपने एकाधिकार को बचाना चाहते हैं। उन्होंने अंबानी पर भी निशाना साधते हुए प्रतिस्पर्धा की अनुमति देने की बात कही। साथ ही वादा किया कि भारत में स्टारलिंक की सेवा सस्ती रखी जाएगी, क्योंकि महंगी सेवा होने पर ग्राहक उसे नहीं अपनाएंगे। मस्क का तर्क है कि प्रतिस्पर्धा से भारतीय उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प मिलेंगे, भले ही इससे अंबानी के मुनाफे पर दबाव पड़े। इसे भी पढ़ें: एलन मस्क प्रकरण, विदेशी मुख के शंख न बनें राहुल गांधी लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत में स्टारलिंक की व्यावसायिक शुरुआत में देरी के लिए वास्तव में जियो या अंबानी जिम्मेदार हैं? दूरसंचार विभाग (DoT) के रिकॉर्ड पर आधारित रिपोर्ट इस दावे की दूसरी तस्वीर पेश करती है। रिपोर्ट के मुताबिक, जियो सैटेलाइट कम्युनिकेशंस और भारती समर्थित वनवेब ने स्टारलिंक से पहले अपनी सुरक्षा और तकनीकी अनुपालन संबंधी प्रक्रियाएं पूरी कर ली थीं। जियो ने 20 मार्च 2025 को अपना सुरक्षा एवं तकनीकी प्रदर्शन पूरा किया, जबकि वनवेब ने 2025 की दूसरी छमाही में यह प्रक्रिया पूरी की। स्टारलिंक का प्रदर्शन 2026 की शुरुआत में हुआ। ऐसे में यह कहना कि केवल भारतीय प्रतिस्पर्धियों के प्रभाव के कारण स्टारलिंक को रोका जा रहा है, यह सरासर गलत है। देखा जाये तो लाइसेंस और मंजूरी की समयरेखा भी इस बहस को समझने में मदद करती है। वनवेब को अगस्त 2021 में दूरसंचार विभाग से आशय-पत्र मिला और अप्रैल 2022 में उसे जीएमपीसीएस लाइसेंस मिला। जियो ने नवंबर 2021 में लाइसेंस के लिए आवेदन किया और अक्टूबर 2022 में प्राधिकरण हासिल किया। इसके विपरीत, स्टारलिंक को जीएमपीसीएस लाइसेंस 6 जून 2025 को मिला। यानी भारतीय कंपनियां इस प्रक्रिया में पहले से मौजूद थीं, फिर भी उनकी सेवाएं व्यावसायिक रूप से शुरू नहीं हो सकी हैं। तीनों कंपनियों को अंतिम सुरक्षा मंजूरी और स्पेक्ट्रम आवंटन की प्रतीक्षा है। यदि जियो और वनवेब को बाजार में स्टारलिंक को रोकने के लिए विशेष सुविधा मिल रही होती, तो सवाल उठाए जा सकते थे। इसके अलावा, सैटेलाइट इंटरनेट का मामला सामान्य दूरसंचार सेवा से अलग है। इसके नेटवर्क की पहुंच सीमाओं से परे हो सकती है, इसलिए नेटवर्क की निगरानी, वैध अवरोधन और भारतीय कानूनों के अनुपालन जैसे विषय महत्वपूर्ण हैं। सुरक्षा संबंधी शर्तें पूरी होने के बाद ही स्पेक्ट्रम आवंटन और व्यावसायिक परिचालन का रास्ता साफ हो सकता है। हम आपको यह भी बता दें कि केंद्र सरकार ने मस्क के भेदभाव के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि नियामकीय ढांचा निष्पक्ष और गैर-भेदभावपूर्ण है। दूरसंचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी स्पष्ट किया है कि कंपनियां जरूरी सुरक्षा और नियामकीय शर्तें पूरी करने के बाद ही सेवाएं शुरू कर सकती हैं। देखा जाये तो भारत के लिए इस मामले में प्राथमिकता किसी कारोबारी घराने के हितों की रक्षा करना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा का वातावरण तैयार करना होना चाहिए। स्टारलिंक को भी अन्य कंपनियों की तरह समान नियमों का पालन करना होगा। केवल वैश्विक प्रतिष्ठा, तकनीकी क्षमता या बाजार में निवेश की इच्छा के आधार पर सुरक्षा संबंधी शर्तों में छूट नहीं दी जा सकती। अब सवाल उठता है कि जियो के आईपीओ पर कितना असर पड़ेगा? हम आपको बता दें कि जियो प्लेटफॉर्म्स 106 अरब डॉलर के मूल्यांकन को लक्ष्य बनाकर अपना आईपीओ लाने की तैयारी में है। ऐसे समय में मस्क का अंबानी पर सार्वजनिक हमला और सस्ती स्टारलिंक सेवा का वादा बाजार में चर्चा पैदा कर रहा है। लेकिन निवेशकों के लिए एलन मस्क के बयान की बजाय जियो कंपनी की वित्तीय स्थिति, विकास की संभावनाएं, प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति और नियामकीय जोखिम जैसे कई कारक महत्वपूर्ण होंगे। इसी तरह, स्टारलिंक की भारतीय बाजार में वास्तविक चुनौती उसकी कीमत, कवरेज, सेवा की गुणवत्ता और आवश्यक मंजूरियां मिलने पर निर्भर करेगी। बहरहाल, भारत में कारोबार करने की इच्छा रखने वाली किसी भी विदेशी कंपनी का स्वागत प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ता हितों के आधार पर होना चाहिए, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा की शर्तों के साथ। मस्क की बयानबाजी से मंजूरी की प्रक्रिया तेज हो या न हो, उसका फैसला नियमों और तथ्यों के आधार पर ही होना चाहिए। जियो और वनवेब के इंतजार का रिकॉर्ड यह भी बताता है कि मामला केवल स्टारलिंक बनाम अंबानी का नहीं, बल्कि भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के लिए सुरक्षा, नियमन और समान अवसर सुनिश्चित करने का है। -नीरज कुमार दुबे
संतोष मूरत की 'साहब, मैं ज़िंदा हूँ' वाली तख्ती से गृह मंत्रालय के ताले तक, जंतर-मंतर की अनकही कहानी
कागज़ पर मरा हुआ एक इंसान जब खुद के ज़िंदा होने की सनद मांगने देश की चौखट पर आया, तो उसने जंतर मंतर के फुटपाथ को अपना ठिकाना बनाया। हाथों में मैं जिंदा हूं साहब वाली तख्ती और कड़कड़ाती ठंड में सीने से चिपका हुआ एक लावारिस भूरा कुत्ता। मानो मुंशी प्रेमचंद की पूस की रात का हल्कू और जबरा, दिल्ली के दिल में सालों तक इंसाफ की पहरेदारी करते रहे। नाम संतोष मूरत सिंह। यह वही सड़क है, जहाँ सिर्फ संतोष नहीं, बल्कि मुल्क के हर उस कोने की आवाज़ पहुँची, जिसे अपनी ही ज़मीन पर बेगाना कर दिया गया था। सवाई जयसिंह ने सदियों पहले पत्थरों के इस अजूबे को ग्रहों और तारों की चाल नापने के लिए तराशा था। इन्हें भला इस बात का क्या इल्म होगा कि आदाज हिंदुस्तान में ये खगोलीय वेधशाला एक दिन मुल्क के दर्द का थर्मामीटर बन जाएगा। दशक दर दशक बदलते रहे। लेकिन लाल-बलुआ पत्थर और ईंटों से बना जंतर-मंतर महज स्माक नहीं अपितु 140 करोड़ हिंदुस्तानियों की असहमति की सबसे बड़ी पनाहगाह बन गया। एक ऐसा ठिकाना जहां लोकतंत्र के हाशिए पर खड़ा सबसे कमजोर इंसान भी तख्त पर बैठे हुक्मरानों की आंखों में आंखे डालकर सवाल कर सके। लेकिन अब पत्थरों की यह सड़क खामोश हो जाएगी। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक बड़ा फैसला लेते हुए जंतर मंतर को आधिकारिक प्रोटेस्ट साइट्स की सूची से डिनोटिफाई कर दिया है। यानी लोकतंत्र का वह मशहूर कोना, जहाँ तख्तियों की इबारतें हुकूमतों की नींद उड़ा दिया करती थीं, अब हमेशा के लिए खाली करा लिया गया है। वाल सिर्फ एक जगह के बंद होने का नहीं है। सवाल यह है कि जब असहमति की सबसे पहचानी जाने वाली चौखट ही मिटा दी जाए, तो वो संतोष मूरत सिंह, वो किसान, वो छात्र और वो मजदूर ब अपनी फरियाद लेकर किस देहरी पर दस्तक देंगे? इसे भी पढ़ें: Jantar Mantar नहीं रहा अब 'प्रोटेस्ट साइट', गृह मंत्रालय का बड़ा फैसला, तय किए ये 3 नए स्थान क्या है नया फैसला दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन के लिए तय जगह की सूची से हटा दिया है और ऐसी सभाओं के लिए तीन दूसरी जगहों के नाम बताए हैं। यह कदम 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के साथ शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन की इजाज़त को लेकर चल रहे विवाद और 'इंडिया ब्लॉक' के सुप्रीम कोर्ट तक प्रस्तावित मार्च से पहले राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी किए जाने के बीच उठाया गया है। 1 अक्टूबर, 2026 के एक आदेश के मुताबिक, नई तय की गई तीन जगहें हैं। पुरानी दिल्ली में रामलीला मैदान, पूर्वी दिल्ली में CBD ग्राउंड और उत्तरी दिल्ली में बुराड़ी ग्राउंड। गौरतलब है कि ये तीनों जगहें मध्य दिल्ली में स्थित जंतर-मंतर से क्रमशः 3 किमी, 13.5 किमी और 44 किमी दूर हैं। दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार के हस्ताक्षर वाले इस आदेश में 28 अप्रैल, 2022 के उस पुराने आदेश में कुछ बदलाव किए गए हैं, जिसके तहत जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन की जगह के तौर पर तय किया गया था। पुलिस ने कहा कि तीन नई जगहों पर विरोध-प्रदर्शन और रैलियों के आयोजन से जुड़े विस्तृत और संशोधित स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) अलग से जारी किए जाएंगे। इसे भी पढ़ें: Jantar Mantar बंद होने के खिलाफ याचिका, 13 अक्टूबर को सुनवाई करने को तैयार दिल्ली HC हाई कोर्ट जंतर-मंतर बंद करने के मामले में याचिका पर सुनवाई करेगा दिल्ली हाई कोर्ट 13 अक्टूबर को उस याचिका पर सुनवाई करेगा जिसमें शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के लिए जंतर-मंतर को बंद करने के फैसले को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया था कि प्रदर्शनों के लिए कोई वैकल्पिक जगह तय नहीं की गई है। कोर्ट ने 10 और 11 अक्टूबर को दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी एक अलग याचिका को भी मंगलवार के लिए सूचीबद्ध किया, लेकिन तत्काल सुनवाई करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले से ही इस मामले को देख रहा है और उसने केंद्र सरकार से हलफनामा मांगा है। इसे भी पढ़ें: Delhi Police को अल्टीमेटम: Jantar Mantar पर Peaceful Protest के लिए CJP ने दी 24 घंटे की डेडलाइन महाराजा जय सिंह द्वितीय की सोच महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय न केवल एक शासक थे, बल्कि गणित और खगोल विज्ञान में गहरी रुचि रखने वाले विद्वान भी थे। 18वीं सदी की शुरुआत में, उन्होंने खगोलीय घटनाओं के बारे में ज़्यादा सटीक जानकारी की ज़रूरत को समझा और पूरे भारत में कई वेधशालाएँ बनवाईं। दिल्ली का जंतर-मंतर उनके द्वारा बनाई गई पाँच वेधशालाओं में से एक था; बाकी वेधशालाएँ जयपुर, उज्जैन, वाराणसी और मथुरा में स्थित थीं। इन वेधशालाओं को खगोलीय तालिकाओं को बेहतर बनाने और आकाशीय गतिविधियों की ज़्यादा सटीक माप करने के लिए डिज़ाइन किया गया था। जय सिंह द्वितीय के प्रयासों से वैज्ञानिक आदान-प्रदान के एक दौर की झलक मिलती है, जिसमें भारतीय खगोलीय परंपराओं का फ़ारसी, इस्लामी और यूरोपीय स्रोतों के ज्ञान से मेल हुआ। उनकी वेधशालाएँ अवलोकन और गणना के केंद्र बन गईं, जहाँ वैज्ञानिक तरीकों और वास्तुकला के नए प्रयोगों का संगम हुआ। जहाँ वास्तुकला और खगोल विज्ञान का मिलन होता है रहने या पूजा-पाठ के लिए बनाई जाने वाली पारंपरिक इमारतों से अलग, जंतर-मंतर को एक विशाल वैज्ञानिक उपकरण के तौर पर बनाया गया था। हर संरचना का एक खास मकसद था। आकाशीय पिंडों की गति को देखने के लिए इनके कोण और माप बहुत सावधानी से तय किए गए थे। दिल्ली वेधशाला की सबसे खास संरचना 'सम्राट यंत्र' है। यह एक विशाल धूप-घड़ी है, जिसका इस्तेमाल सूरज की परछाई की गति को ट्रैक करके स्थानीय समय का पता लगाने के लिए किया जाता था। इसके विशाल आकार की वजह से खगोलविद ज़्यादा सटीकता के साथ अवलोकन कर पाते थे। एक और ज़रूरी यंत्र 'जय प्रकाश यंत्र' है, जिसमें कटोरे के आकार के दो हिस्से होते हैं। इनकी मदद से खगोलशास्त्री आकाशीय पिंडों की स्थिति का पता लगाते थे। बेलनाकार आकृतियों से बने 'राम यंत्र' का इस्तेमाल तारों और दूसरे खगोलीय पिंडों की ऊंचाई और दिशा मापने के लिए किया जाता था। ये सभी यंत्र मिलकर यह दिखाते हैं कि किस तरह वैज्ञानिक जानकारी को ऐसी भौतिक संरचनाओं में बदला गया, जिनका अध्ययन और इस्तेमाल किया जा सकता था। 18वीं सदी में आसमान को समझना आधुनिक टेलीस्कोप और डिजिटल टेक्नोलॉजी के आने से पहले के दौर में जंतर-मंतर जैसी वेधशालाओं ने ब्रह्मांड को समझने में अहम भूमिका निभाई। खगोलशास्त्री आकाशीय गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए गणितीय गणनाओं और सावधानी से बनाए गए उपकरणों पर निर्भर रहते थे। ऐसी जगहों पर की गई खोजों और अवलोकनों से ज़्यादा सटीक कैलेंडर बनाने और ग्रहों की चाल के बारे में जानकारी बेहतर करने में मदद मिली। खगोल विज्ञान को रोज़मर्रा की ज़िंदगी से अलग नहीं माना जाता था; इसने खेती, त्योहारों, समुद्री यात्रा और समय बताने के तरीकों को प्रभावित किया।स जंतर-मंतर वैज्ञानिक अवलोकन और समाज के बीच इसी संबंध को दिखाता है और बताता है कि कैसे आसमान के अध्ययन ने इंसानी समझ को आकार दिया। जैसे-जैसे दिल्ली देश का राजनीतिक और प्रशासनिक केंद्र बनी, जंतर-मंतर धीरे-धीरे लोगों की आवाज़ उठाने की जगह के तौर पर पहचाना जाने लगा। इसकी खुली बनावट की वजह से लोग यहाँ व्यवस्थित ढंग से इकट्ठा हो सकते थे, और इसके ऐतिहासिक माहौल ने इस जगह को एक खास पहचान दी। जंतर-मंतर में आया यह बदलाव दिखाता है कि कैसे ऐतिहासिक जगहों का मतलब पीढ़ियों के साथ बदलता रहता है। मूल रूप से खगोलीय पिंडों की गति के अध्ययन के लिए बनाया गया यह स्मारक नागरिक भागीदारी से जुड़ गया, जिससे इसके सांस्कृतिक महत्व में एक और आयाम जुड़ गया। 33 साल से धरने देख रहा था जंतर-मंतर 1988 में किसान आंदोलन के बाद बोट क्लब पर प्रदर्शन रोक दिए गए थे। इसके बाद 1993 में जंतर-मंतर पर पहला प्रदर्शन हुआ था। जंतर-मंतर को धरना स्थल बनाने संबंधी किसी आदेश का रिकॉर्ड नहीं है। यह पुलिस की प्रशासनिक व्यवस्था के रूप में विकसित हुआ। स्थानीय लोगों की शोर, प्रदूषण जैसी शिकायतों पर एनजीटी ने 2017 में यहां प्रदर्शन रोक दिए। धरने-प्रदर्शन रामलीला मैदान में करने को कहा। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा- शांतिपूर्ण प्रदर्शन संवैधानिक अधिकार है। कोर्ट ने प्रतिबंध हटाकर नियंत्रित प्रदर्शन की व्यवस्था बनाने को कहा। अब सुप्रीम कोर्ट में फिर वैकल्पिक प्रदर्शन स्थल की मांग लंबित है।
उच्च शिक्षा का दशक और गुणवत्ता की परीक्षा
समावेशी विकास के हिमायती अर्थशास्त्री मानव पूंजी सिद्धांत के तहत शिक्षा को महज सामाजिक कल्याण या व्यक्तिगत उन्नति का माध्यम नहीं, बल्कि उत्पादकता, नवाचार और दीर्घकालिक आर्थिक विकास की बुनियादी पूंजी के रूप में देखते हैं। इस लिहाज से कह सकते हैं कि किसी देश की युवा आबादी अपने आप में विकास की गारंटी नहीं होती। उसकी वास्तविक आर्थिक और सामाजिक क्षमता इस बात से निर्धारित होती है कि उसे उपलब्ध शिक्षा ज्ञान, कौशल और निर्णय क्षमता में कितना रूपांतरित कर पाती है। भारत आज इसी द्वंद्व के बीच खड़ा है। एक ओर विशाल युवा आबादी जनसांख्यिकीय लाभांश की संभावना प्रस्तुत करती है, दूसरी ओर कृत्रिम बुद्धिमत्ता, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और वैश्विक श्रम बाजार में आते बदलाव मानव पूंजी निर्माण की पारंपरिक धारणाओं को चुनौती दे रहे हैं। ह्यूमनिटीज एंड सोशल साइंसेज कम्युनिकेशंस में 2025 में प्रकाशित एक अध्ययन ने भी रेखांकित किया कि भारत में जनसांख्यिकीय बदलाव का आर्थिक लाभ अनुकूल नीतिगत वातावरण, बेहतर स्वास्थ्य, सम्मानजनक रोजगार और लैंगिक सशक्तीकरण पर निर्भर करता है। इसलिए पिछले एक दशक में उच्च शिक्षा के विस्तार और सुधारों का मूल्यांकन केवल संस्थानों तथा नामांकन की बढ़ती संख्या से नहीं, बल्कि इस कसौटी पर किया जाना चाहिए कि भारत अपनी युवा आबादी को ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की सक्षम मानवीय शक्ति में कितना बदल पाया है। इसे भी पढ़ें: Gen Z Revolt: मोदी के दोस्त के देश में भी वही हो रहा,जो भारत में हुआ था? भयंकर साज़िश का पर्दाफ़ाश! इस दशक में भारतीय उच्च शिक्षा का सामाजिक आधार उल्लेखनीय रूप से विस्तृत हुआ है। अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण के अनुसार, कुल नामांकन 2014 से 15 के लगभग 3.42 करोड़ से बढ़कर 2023 से 24 में करीब 4.50 करोड़ हो गया। महिलाओं के साथ अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के विद्यार्थियों की भागीदारी भी बढ़ी है, जो उच्च शिक्षा के व्यापक सामाजिक विस्तार का संकेत है। हालांकि, नामांकन वृद्धि अपने आप में पर्याप्त नहीं है। वास्तविक लोकतंत्रीकरण के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, पर्याप्त संसाधन और रोजगारपरक अवसरों तक समान पहुंच जरूरी है। महानगरों और छोटे शहरों के संस्थानों के बीच गुणवत्ता का अंतर अब प्रमुख चुनौती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने उच्च शिक्षा सुधार के लिए व्यापक वैचारिक ढांचा प्रस्तुत किया। बहुविषयक अध्ययन, लचीली पाठ्यचर्या, शोध उन्मुख शिक्षा, कौशल विकास और अकादमिक क्रेडिट की हस्तांतरणीयता इसके प्रमुख प्रावधान हैं। अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट विद्यार्थियों को शैक्षणिक यात्रा में अधिक लचीलापन देता है, जबकि समर्थ जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म प्रवेश, परीक्षा और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को व्यवस्थित करने की क्षमता रखते हैं। इन पहलों का महत्व संस्थागत विस्तार से आगे बढ़कर सीखने की गुणवत्ता, शैक्षणिक गतिशीलता और प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने में है। फिर भी नीतिगत महत्वाकांक्षा और संस्थागत वास्तविकता के बीच की दूरी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बहुविषयक शिक्षा के लिए विभिन्न विषयों के सक्षम विभाग, प्रशिक्षित शिक्षक और पर्याप्त अकादमिक संसाधन चाहिए। शोध आधारित शिक्षा के लिए प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, शोध अनुदान और मार्गदर्शन की व्यवस्था आवश्यक है। डिजिटल प्लेटफॉर्म प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल बना सकते हैं, लेकिन वे कमजोर शिक्षण व्यवस्था की भरपाई नहीं कर सकते। इसलिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति का वास्तविक मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि उसके प्रावधानों ने कक्षाओं में शिक्षण, विद्यार्थियों के सीखने के स्तर और विश्वविद्यालयों की अकादमिक संस्कृति में कितना बदलाव पैदा किया है। उच्च शिक्षा सुधार की केंद्रीय कसौटी शिक्षक व्यवस्था और शोध क्षमता है। शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा करने वाले कर्मचारी नहीं, बल्कि ज्ञान सृजन, आलोचनात्मक विवेक और बौद्धिक स्वतंत्रता के वाहक हैं। अनेक संस्थानों में रिक्त पदों, संविदा नियुक्तियों और गैर शैक्षणिक दायित्वों का दबाव शिक्षण, शोध निर्देशन और विद्यार्थियों से संवाद को प्रभावित करता है। इसलिए पारदर्शी नियुक्ति, अकादमिक स्वतंत्रता और निरंतर प्रशिक्षण को दीर्घकालिक निवेश के रूप में देखना आवश्यक है। गौरतलब है कि विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता शोध और नवाचार में उनके योगदान से भी निर्धारित होती है। भारत ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन व्यापक विश्वविद्यालय व्यवस्था में शोध संस्कृति को और मजबूत करने की आवश्यकता है। कृषि, जलवायु परिवर्तन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, शहरीकरण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे क्षेत्र भारतीय संदर्भ में महत्वपूर्ण शोध अवसर प्रस्तुत करते हैं। इसके लिए शोध वित्तपोषण बढ़ाने, उद्योग और अकादमिक संस्थानों के सहयोग तथा युवा शोधकर्ताओं को स्वतंत्र अवसर देने की जरूरत है। विश्वविद्यालयों को ज्ञान के उपभोक्ता नहीं, बल्कि उसके उत्पादक केंद्र बनाना होगा। इसी तरह रोजगार और उच्च शिक्षा के संबंध को भी अधिक सूक्ष्मता से समझने की जरूरत है। डिग्री और रोजगार के बीच बढ़ती दूरी पाठ्यक्रमों की प्रासंगिकता, व्यावहारिक प्रशिक्षण और उद्योग की बदलती मांगों पर प्रश्न उठाती है। तकनीकी दक्षता, डिजिटल साक्षरता, संचार क्षमता और समस्या समाधान जैसे कौशल अब अनेक क्षेत्रों में आवश्यक हो गए हैं। फिर भी, रोजगारोन्मुखी शिक्षा का अर्थ विश्वविद्यालयों को उद्योग की तात्कालिक जरूरतों के अधीन कर देना नहीं है। मानविकी और सामाजिक विज्ञान विषय विद्यार्थियों में ऐतिहासिक चेतना, नैतिक विवेक, लोकतांत्रिक समझ और समाज के जटिल प्रश्नों का विश्लेषण करने की क्षमता विकसित करते हैं। एक सक्षम उच्च शिक्षा व्यवस्था को आर्थिक उपयोगिता और बौद्धिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन कायम करना होगा। उसका उद्देश्य केवल रोजगार पाने योग्य व्यक्ति तैयार करना नहीं, बल्कि ज्ञानवान, विवेकशील और उत्तरदायी नागरिक बनाना भी है। हाल में बिहार में 211 नए सरकारी डिग्री कॉलेजों की शुरुआत, 2,451 संविदा सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति तथा विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक और डिजिटल सुधारों की पहल इसी राष्ट्रीय चुनौती का एक प्रासंगिक उदाहरण है। इन प्रयासों से उच्च शिक्षा की भौगोलिक पहुंच और संस्थागत क्षमता बढ़ाने की संभावना बनती है। लेकिन इनकी दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कॉलेजों में नियमित शिक्षण, पर्याप्त संसाधन, अकादमिक नेतृत्व और गुणवत्तापूर्ण अध्ययन का वातावरण कितना विकसित होता है। बिहार का अनुभव इस व्यापक तथ्य को रेखांकित करता है कि संस्थानों की संख्या बढ़ाना सुधार का प्रारंभिक चरण है, उसकी परिणति गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में ही हो सकती है। ये पूरा दशक भारतीय उच्च शिक्षा में विस्तार और संस्थागत परिवर्तन का दौर रहा है, लेकिन अगली चुनौती कहीं अधिक जटिल है। बढ़ता नामांकन, महिलाओं और वंचित समूहों की भागीदारी तथा डिजिटल प्रशासन सकारात्मक आधार तैयार करते हैं, पर गुणवत्ता, शिक्षक उपलब्धता, शोध क्षमता और रोजगारपरकता की चुनौतियां अभी बनी हुई हैं। इसलिए उच्च शिक्षा नीति का केंद्र अब मात्र विस्तार नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण और समान अवसरों का निर्माण होना चाहिए। भारत की युवा आबादी तभी वास्तविक जनसांख्यिकीय लाभांश में बदल सकती है, जब शिक्षा उसे ज्ञान, कौशल और नवाचार की क्षमता प्रदान करे। आने वाले दशक की अग्निपरीक्षा इसी रूपांतरण में निहित है। - संजीव कुमार मिश्र
Rahul Gandhi को दोटूक जवाब देकर CJI Surya Kant ने न्यायिक मर्यादा की लाज रख ली
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी और INDIA गठबंधन के नेताओं को मिलने का समय देने से इनकार कर दिया है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), कथित ‘वोट चोरी’ और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्ष सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को ज्ञापन सौंपना चाहता था। लेकिन CJI ने साफ कर दिया कि जिन विषयों पर विपक्ष हस्तक्षेप चाहता है, वे न्यायालय में पहले से विचाराधीन हैं। ऐसे मामलों में प्रशासनिक स्तर पर निर्देश देने के बजाय विपक्ष को न्यायिक प्रक्रिया के तहत याचिका दायर करनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि मौलिक अधिकारों के संरक्षण के लिए सर्वोच्च न्यायालय के दरवाजे सभी नागरिकों के लिए चौबीसों घंटे खुले हैं। मुख्य न्यायाधीश का यह रुख ऐसे समय सामने आया है, जब राहुल गांधी और INDIA गठबंधन चुनावी प्रक्रिया से जुड़े आरोपों को लेकर सरकार तथा चुनाव आयोग पर दबाव बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। विपक्ष की मांग थी कि SIR की प्रक्रिया रोकी जाए, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें और कथित चुनावी अनियमितताओं की जांच हो। राहुल गांधी ने 12 अक्टूबर को सर्वोच्च न्यायालय तक मार्च करने का आह्वान करते हुए इसे लोकतंत्र और संविधान की रक्षा की लड़ाई बताया। विपक्ष का कहना है कि मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों से पात्र नागरिकों के मतदान के अधिकार पर असर पड़ रहा है। इसे भी पढ़ें: जब जब देश के साथ खड़े होने की बात आती है, तब तब Rahul Gandhi की राह अलग क्यों हो जाती है? देखा जाये तो इस घटनाक्रम को समझने के लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से विपक्ष की हालिया मुलाकात भी महत्वपूर्ण है। विपक्षी नेताओं ने राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं पर चिंता जताई थी। मुलाकात के बाद राहुल गांधी ने कहा कि राष्ट्रपति ने उनसे आरोपों के समर्थन में सबूत मांगे हैं और विपक्ष प्रमाण प्रस्तुत करने को तैयार है। राहुल गांधी ने संकेत दिया था कि राष्ट्रपति ने वोट चोरी के आरोप को एक तरह से सही माना है। हालांकि बाद में सूत्रों के हवाले से आई खबर के अनुसार राष्ट्रपति कार्यालय ने राहुल गांधी के बयान और दावे पर अप्रसन्नता जताई। दूसरी ओर, राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद मुख्य न्यायाधीश से मिलने की कोशिश और फिर उनका इनकार विपक्ष की रणनीति के लिए एक अहम घटनाक्रम है। राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे चाहते थे कि वे अपनी चिंताओं को सीधे CJI के सामने रखें। लेकिन न्यायपालिका का काम राजनीतिक प्रतिनिधिमंडलों के ज्ञापन पर प्रशासनिक निर्देश देना नहीं, बल्कि विधिसम्मत याचिकाओं पर सुनवाई करना और कानून के अनुसार फैसला देना है। CJI के रुख का यही संस्थागत अर्थ है। लेकिन फिर भी राहुल गांधी का सर्वोच्च अदालत तक मार्च निकालने का फैसला सीधे सीधे अराजकता फैलाने का प्रयास है। राहुल गांधी बार बार संविधान का हवाला देते हैं लेकिन संविधान की संरक्षक राष्ट्रपति के बारे में झूठ बोलते हैं, संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण स्थल सर्वोच्च न्यायालय की बात नहीं मानते, ऐसे में सवाल उठेगा ही कि उनकी असल मंशा क्या है? यही नहीं, ईवीएम पर बार बार सवाल उठाने वाले कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों को हाल में असम और हिमाचल प्रदेश में बैलट पेपर से कराए गए नगर निगम चुनाव में भी करारा झटका लगा है। इसलिए राहुल गांधी समेत अन्य विपक्षी नेताओं को समझना होगा कि गड़बड़ चुनावी व्यवस्था में नहीं विपक्षी पार्टियों की नीतियों और नीयत पर है, उनकी विश्वसनीयता पर है। देखा जाये तो SIR का विवाद केवल राजनीतिक दलों के बीच टकराव नहीं है। मतदाता सूची की शुद्धता चुनाव की विश्वसनीयता के लिए जरूरी है। चुनाव आयोग का पक्ष है कि पुनरीक्षण का उद्देश्य सूची को दुरुस्त करना है। विपक्ष इस प्रक्रिया की पारदर्शिता और संभावित प्रभाव पर सवाल उठा रहा है। विपक्ष चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता को राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का केंद्र बनाने की कोशिश कर रहा है, जबकि मोदी सरकार आर्थिक विकास और अपने नीतिगत प्रदर्शन को सामने रख कर विकसित भारत के संकल्प को सिद्ध करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। बहरहाल, CJI का इनकार इस पूरे विवाद में एक महत्वपूर्ण संस्थागत घटनाक्रम है। विपक्ष को समझना होगा कि अंतिम फैसला राजनीतिक नारों या मुलाकातों से नहीं, बल्कि अदालत के सामने प्रस्तुत तथ्यों और प्रमाणों से तय होगा। साथ ही मुख्य न्यायाधीश का विपक्षी नेताओं को मुलाकात का समय देने से इनकार करना संस्थागत मर्यादा बनाए रखने के लिहाज से उचित कदम माना जा सकता है। यदि राजनीतिक दल अपनी मांगों और आरोपों के आधार पर सीधे CJI से मुलाकात कर न्यायिक हस्तक्षेप की अपेक्षा करने लगें, तो भविष्य में दूसरे दल भी इसी परंपरा का सहारा ले सकते हैं। इससे न्यायपालिका पर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिशों को बढ़ावा मिलने और निष्पक्षता को लेकर अनावश्यक सवाल उठने की आशंका रहेगी। न्यायपालिका की स्वतंत्रता केवल उसके फैसलों में ही नहीं, बल्कि उसकी प्रक्रियाओं और राजनीतिक दलों से समान दूरी बनाए रखने में भी निहित है। इसलिए किसी भी पक्ष को विशेष राजनीतिक हैसियत के आधार पर अलग सुविधा देने के बजाय सभी के लिए निर्धारित न्यायिक प्रक्रिया का पालन करना अधिक उचित है। -नीरज कुमार दुबे
एलन मस्क प्रकरण, विदेशी मुख के शंख न बनें राहुल गांधी
शंख का यह दुर्भाग्य है कि ईश्वर ने उसे मजबूत खोल तो दिया है पर कोमल मस्तिष्क नहीं, तो बेचारा पराई फूक से बजने को मजबूर है। शंख की इसी मजबूरी के खतरे भी अनेक है, चाहते न चाहते हुए भी वह दूसरों की हावर्ड को आवाज दे देता है और वो भी कई गुना बढ़ा कर। आजकल देश के प्रतिपक्षी नेता राहुल गांधी हर विदेशी मुंह का शंख बनने के प्रयास में दिख रहे हैं। दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति और स्टारलिंक के मालिक एलन मस्क का भारत सरकार पर किया गया हमला अनेक तरह के खतरनाक संकेत समेटे हुए हैं और इस हमले में किसी विदेशी शक्ति को देश के किसी संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति का एक स्वर होना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। राहुल गांधी को विदेशी फूक से बजने वाला शंख बनने से गुरेज करना चाहिए। जैसा कि सभी जानते हैं कि, सूचना प्रौद्योगिकी जिस तेजी से विकसित हो रही है उसी तेजी से इसके खतरे भी बढ़ रहे हैं। यह तकनीक जहां बड़ी आबादी को लाभ पहुंचा रही है, वहीं इसे नियंत्रित करने वाली चंद कंपनियों को बेशुमार ताकत भी सौंप रही है। इतनी कि ये कंपनियां राजनीतिक शक्तियों को भी बौना समझने लगी हैं। जहां बात नहीं बनती, वहां वे राष्ट्रीय नेतृत्व की साख बिगाडऩे में लग जाती हैं। कुछ देशों में सरकारें बनाने-गिराने के खेल में सक्रिय रहकर स्वार्थ साधना तो उनका पुराना नुस्खा है। दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति और स्टारलिंक के मालिक एलन मस्क का भारत सरकार पर किया गया अपनी तरह का 'पहला हमला' इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। इसे भी पढ़ें: जब जब देश के साथ खड़े होने की बात आती है, तब तब Rahul Gandhi की राह अलग क्यों हो जाती है? अपने सोशल मीडिया मंच 'एक्स' पर मस्क ने कहा कि स्टारलिंक को 165 से ज्यादा देशों में लाइसेंस मिल चुका है और उसने पांच वर्षों तक भारत के हर कानून का पालन किया, फिर भी लाइसेंस क्यों नहीं मिला? क्या अंबानी ही भारत के असली बॉस हैं? यह बात पूरी तरह सच नहीं है। सरकार ने साफ किया कि स्टारलिंक को मई 2025 में ही लाइसेंस मिल चुका है। सिर्फ स्पेक्ट्रम आवंटन अटका है, क्योंकि विदेशी निवेश की मंजूरी और सुरक्षा शर्तों का परीक्षण बाकी है। स्टारलिंक ने जमीनी ढांचा विकसित करने के लिए जियो और भारती एयरटेल से साझेदारी भी की है और जियो के मालिक मुकेश अंबानी ही हैं। तो अंबानी पर कटाक्ष का अर्थ क्या है? सीधा अर्थ है कि मस्क सुरक्षा शर्तों में ढील चाहते हैं और यह भी कि सैटेलाइट फोन के क्षेत्र में कोई भारतीय कंपनी उनके मुकाबले आगे न बढ़े, क्योंकि अंबानी भी यह महत्वाकांक्षा रखते हैं। ऐसे समय, जब केंद्र सरकार नीट और एसआइआर पर घरेलू राजनीति में घिरी है, मस्क की टिप्पणी मौके का फायदा उठाने की चाल है। ऐसा लगता है कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस सोची-समझी चाल पर बिना सोचे प्रतिक्रिया दे दी- 'भारत में स्वागत है एलन, जब तक दूसरा शख्स न मिले इंतजार करें।' जबकि, स्टारलिंक के जियो और एयरटेल से समझौते पर तब कांग्रेस ने राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर चिंता जताई थी। घरेलू मोर्चे पर सरकार को घेरना एक बात है और अंतरराष्ट्रीय दांव-पेचों में शामिल होना दूसरी। क्या सुरक्षा की चिंता किए बिना किसी सैटेलाइट कंपनी को इसलिए मंजूरी दे देनी चाहिए कि उसके मालिक अंबानी-अदाणी नहीं, मस्क हैं? दूसरी बात यह है कि विदेशी कंपनी के आगे भारतीय कंपनी को तरजीह क्यों नहीं मिलनी चाहिए, भले ही वह अंबानी या अदाणी की ही क्यों न हो, जिनकी मोनोपॉली विपक्ष के लिए घरेलू मुद्दा है? मस्क जैसे लोग नई तकनीकों से मानवता की भलाई के लिए भले ही ढेरों काम कर रहे हों, पर इससे शायद ही कोई इनकार करे कि आर्थिक और राष्ट्रीय हितों के टकराव में उनका व्यवहार पराया ही रहेगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के युग में ऐसे तकनीकी महारथियों से सावधान रहना होगा, न सिर्फ सत्ता पक्ष को बल्कि विपक्ष को भी। माना कि शंख मस्तिष्क विहीन होते हैं पर शंख से जुड़े किसी न किसी को तो यह जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी कि कोई विदेशी फूक शंख के माध्यम से देश का वातावरण बिगाड़ न पाए। - राकेश सैन 32, खंडाला फार्म कॉलोनी जालंधर।
एसआईपी निवेश रिकॉर्ड में 32,490 करोड़ रुपए की हुई बढ़ोतरी
मुंबई, म्यूचुअल फंड में सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (एसआईपी) के जरिए निवेश सितंबर में नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।
सीईसी के खिलाफ इंडिया गठबंधन का सुप्रीम कोर्ट तक मार्च, कांग्रेस बोली-देश बचाने के लिए जरूरी
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Goa Politics: रेवंत रेड्डी ने भाजपा को बताया ‘रावण’ और कांग्रेस को ‘राम’, 2027 चुनाव से पहले वोटर्स से की अपील
दिल्ली में हाई अलर्ट! विपक्ष के सुप्रीम कोर्ट मार्च से पहले 6 मेट्रो स्टेशनों पर एंट्री-एग्जिट बंद
राजधानी दिल्ली में सोमवार को प्रस्तावित विपक्षी मार्च को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था सख्त कर दी गई है
सड़क से सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई, राहुल गांधी ने भरी हुंकार
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने ऐलान किया कि विपक्षी दल, युवा, सिविल सोसाइटी और लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले लोग सोमवार, 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट तक मार्च करेंगे
दिल्ली की सीएम रेखा पर सुप्रिया श्रीनेत के निशाना साधने पर सिरसा बोले-'कांग्रेस का यही असली चेहरा'
दिल्ली की सीएम रेखा पर सुप्रिया श्रीनेत के निशाना साधने पर सिरसा बोले-'कांग्रेस का यही असली चेहरा'
इंफोसिस: पीईआरएम निलंबन से कारोबार पर नहीं पड़ेगा बड़ा असर
नई दिल्ली, आईटी क्षेत्र की प्रमुख कंपनी इंफोसिस ने कहा है कि अमेरिकी सरकार द्वारा परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन (पीईआरएम) कार्यक्रम के तहत कुछ नई और लंबित आवेदन प्रक्रियाओं पर लगाए गए निलंबन का उसके कारोबार पर कोई महत्वपूर्ण असर पड़ने की उम्मीद नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में मेट्रो, रेल और इंटरनेट सेवाएं सामान्य रखने के दिए निर्देश, शांतिपूर्ण विरोध को बताया मौलिक अधिकार
'पितृसत्ता का अंत' सिर्फ एक राजनीतिक हथकंडा है? बांसुरी स्वराज ने जेएनयू प्रोफेसर पर लगे आरोपों पर राहुल गांधी से पूछा सवाल
एनडीए नेताओं का सीजेपी पर तंज, कहा-'मां दुर्गा सीजेपी और विपक्ष को दें सद्बुद्धि'
एनडीए नेताओं का सीजेपी पर तंज, कहा-'मां दुर्गा सीजेपी और विपक्ष को दें सद्बुद्धि'
शेयर बाजार : महंगाई डेटा, कच्चा तेल और बॉल्ड यील्ड से बाजार की चाल बदली
मुंबई, भारतीय शेयर बाजार के लिए अगला हफ्ता काफी अहम होने वाला है। कच्चे तेल की कीमत, बॉन्ड यील्ड और महंगाई डेटा के साथ अन्य अंतरराष्ट्रीय और घरेलू आर्थिक आंकड़े बाजार की चाल निर्धारित करेंगे।
पीएम मोदी ने लोकनायक जयप्रकाश नारायण को किया नमन, बोले- 'हम उनके आदर्शों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध'
'सदैव मां का आशीर्वाद बना रहे', नवरात्र के पावन अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी ने दी देशवासियों को शुभकामनाएं
महाराजा अग्रसेन की जयंती पर केंद्रीय मंत्री गडकरी और सीएम योगी समेत कई नेताओं ने दी शुभकामनाएं
महाराजा अग्रसेन की जयंती पर केंद्रीय मंत्री गडकरी और सीएम योगी समेत कई नेताओं ने दी शुभकामनाएं
सीईसी विवाद पर आज फिर सड़कों पर उतरेगी CJP,दिल्ली में सुरक्षा कड़ी
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने अपना आंदोलन जारी रखने का ऐलान किया है
सीजेपी के प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई से भड़के अरविंद सावंत, बोले- ये अघोषित इमरजेंसी है
सीजेपी के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान नेताओं को डिटेन किए जाने पर शिवसेना (यूबीटी) सांसद अरविंद सावंत ने केंद्र सरकार और पुलिस पर तीखा हमला बोला। सावंत ने कहा कि शांतिपूर्ण आंदोलन संविधान का अधिकार है। हवाई जहाज से लोगों को पकड़कर डिटेन करना आतंकवादियों जैसा व्यवहार है और यह अघोषित इमरजेंसी है। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया।
पुलिस हिरासत में केजरीवाल का देश से अपील, ‘‘सब लोग दिल्ली चलो’’
देश की राजधानी में शनिवार को हर तरफ पीएम मोदी की दिल्ली पुलिस का तांडव देखने को मिला
दिल्ली प्रदर्शन पर सियासी संग्राम: BJP ने साधा निशाना, कांग्रेस ने सरकार को घेरा
दिल्ली में सीजेपी के विरोध-प्रदर्शन और अभिजीत दिपके की गिरफ्तारी को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। पश्चिम बंगाल के नदिया में भाजपा सांसद जगन्नाथ सरकार ने प्रदर्शनकारियों पर देश को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करने का आरोप लगाया। वहीं, मुंबई में कांग्रेस नेता भाई जगताप और विधायक असलम शेख ने केंद्र सरकार की आलोचना करते हुए विरोध-प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार और लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़े सवाल उठाए।
CJP प्रदर्शन के बाद हालात सामान्य होने लगे, अधिकांश लोग रिहा, मेट्रो सेवाएं बहाल
राजधानी दिल्ली में CJP के प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर लागू की गई सख्त सुरक्षा व्यवस्था के बीच अब हालात धीरे-धीरे सामान्य होने लगे हैं
दिल्ली में सीजेपी के प्रदर्शन को लेकर घमासान, भाजपा और कांग्रेस नेताओं ने दी प्रतिक्रिया
दिल्ली में सीजेपी के प्रदर्शन को लेकर घमासान, भाजपा और कांग्रेस नेताओं ने दी प्रतिक्रिया
सीएमआरएल-एक्सालॉजिक मामले में सोमवार को दर्ज होगी एफआईआर: केरल के गृह मंत्री
सीएमआरएल-एक्सालॉजिक मामले में सोमवार को दर्ज होगी एफआईआर: केरल के गृह मंत्री
शक्ति की आराधना: मंत्रों से अधिक भावना का महत्व
भारतवर्ष पर्वों और उत्सवों की पावन भूमि है। यहाँ मनाए जाने वाले सभी त्योहारों का अपना एक विशेष आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। इन सभी पर्वों में शारदीय नवरात्र का स्थान अत्यंत विशिष्ट और पवित्र माना गया है। नव का अर्थ है 9 और रात्रि का अर्थ है रातों का समूह। यह 9 रातों और 10 दिनों का एक ऐसा पावन समय है जब संपूर्ण ब्रह्मांड में आदि शक्ति माँ भगवती की विशेष कृपा बरसती है। नवरात्र केवल एक साधारण व्रत या उत्सव मात्र नहीं है, बल्कि यह मानव मन और आत्मा की शुद्धि तथा दैवीय शक्ति के संचय का एक अत्यंत दुर्लभ अवसर है। यह समय हमें हमारी आंतरिक ऊर्जा को जागृत करने और जीवन में व्याप्त अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त करता है। शारदीय नवरात्र का आगमन वर्षा ऋतु के समापन और शीत ऋतु के आरंभ के समय होता है। प्रकृति भी इस समय एक नए रूप में सजती है और संपूर्ण वातावरण में एक नई ताजगी तथा पवित्रता का वास होता है। इन 9 रातों में माँ दुर्गा के 9 अलग अलग स्वरूपों की उपासना की जाती है। प्रत्येक स्वरूप का अपना एक विशेष संदेश और महत्व है। माता के यह रूप हमें जीवन के विभिन्न चरणों और संघर्षों में साहस, धैर्य, करुणा और विजय की प्रेरणा देते हैं। शक्ति की उपासना का यह पर्व हमें यह सिखाता है कि सत्य और धर्म की रक्षा के लिए शक्ति का होना अत्यंत आवश्यक है। बिना शक्ति के शांति और प्रगति की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। यह शक्ति केवल शारीरिक नहीं है, बल्कि मानसिक और आत्मिक भी है। इसे भी पढ़ें: Shardiya Navratri 2026: 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि की शुरुआत, घटस्थापना और पूजा सामग्री की पूरी लिस्ट अखबार हिन्दी मिलाप में प्रकाशित आराम से नामक स्तंभ में दी गई पूजन विधि के अनुसार, नवरात्र की उपासना अत्यंत सरल, क्रमबद्ध और भावपूर्ण है। किसी भी शुभ और मांगलिक कार्य का आरंभ सदैव विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश के पूजन से ही होता है। नवरात्र की उपासना में भी सबसे पहले भगवान गजानन का स्मरण और पूजन करना अनिवार्य माना गया है। साधक अपने हाथ में पवित्र जल, अक्षत अर्थात बिना टूटे हुए चावल, और पुष्प लेकर संकल्प करता है। संकल्प एक प्रकार की दृढ़ प्रतिज्ञा है। साधक माता से प्रार्थना करता है कि हे जगदम्बे, मैं इस पवित्र पूजन और व्रत के माध्यम से अपने संकल्प को पूर्ण करने के लिए आपका हृदय से आह्वान करता हूँ। संकल्प के पश्चात जल, अक्षत और कुमकुम से विधि विधान के साथ पूजन की शुरुआत होती है। पूजन के मुख्य क्रम में सबसे पहला चरण माता का आह्वान और ध्यान है। साधक अपनी आँखें बंद करके माँ भगवती के उस दिव्य और भव्य स्वरूप का ध्यान करता है, जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में लीन थे और माता ने प्रकट होकर सृष्टि की रक्षा के लिए मधु और कैटभ नामक भयंकर राक्षसों का वध किया था। ध्यान का यह चरण मन को सांसारिक चिंताओं से मुक्त करके पूरी तरह से माता के चरणों में केंद्रित करने का एक माध्यम है। जब मन पूरी तरह से एकाग्र हो जाता है, तब माता की उपस्थिति का अनुभव हृदय में होने लगता है। ध्यान के उपरांत माता को स्नान कराने की प्रक्रिया होती है। सर्वप्रथम शुद्ध और पवित्र जल से माता की प्रतिमा या यंत्र को स्नान कराया जाता है। इसके पश्चात पंचामृत से स्नान कराया जाता है। पंचामृत 5 अत्यंत पवित्र वस्तुओं का मिश्रण होता है जिसमें गाय का दूध, दही, घी, शहद और शर्करा मिलाई जाती है। स्नान कराते समय साधक यह भाव रखता है कि हे महादेवी, दूध, दही, घी, शहद और शर्करा के मिश्रण से तैयार यह उत्तम पंचामृत आपकी सेवा में प्रस्तुत है, कृपया इसे स्वीकार करें। पंचामृत स्नान के पश्चात एक बार फिर से शुद्ध जल से स्नान कराया जाता है ताकि माता का श्री विग्रह पूरी तरह से स्वच्छ हो जाए। स्नान के बाद माता के श्रृंगार का चरण आता है। माँ भगवती को अत्यंत सुंदर और पवित्र वस्त्र अर्पित किए जाते हैं। मुख्य वस्त्र के साथ साथ उपवस्त्र भी चढ़ाया जाता है। इसके बाद मस्तक पर चंदन और सिंदूर का तिलक लगाया जाता है जो सौभाग्य और सुहाग का प्रतीक है। माता को ताजे और सुगंधित पुष्पों की माला पहनाई जाती है। वस्त्र अर्पित करते समय साधक कहता है कि हे देवी, नाना प्रकार के सुंदर बेल बूटों और जरी गोटों से सुसज्जित यह अत्यंत उत्तम और मनमोहक वस्त्र मैं आपको समर्पित कर रहा हूँ। श्रृंगार का यह भाव हमें यह सिखाता है कि हम अपने जीवन में भी सुंदरता, पवित्रता और सदगुणों को धारण करें। श्रृंगार के पश्चात माता को भोग अर्पित किया जाता है और दीप दर्शन कराया जाता है। माता के समक्ष अत्यंत श्रद्धा के साथ विविध प्रकार के उत्तम नैवेद्य, ऋतु फल, और स्वादिष्ट मिष्ठान्न रखे जाते हैं। इसके बाद सुगंधित धूप और दीप जलाकर माता को दिखाया जाता है। दीप का प्रकाश ज्ञान का प्रतीक है और धूप की सुगंध हमारी प्रार्थनाओं की पवित्रता को दर्शाती है। यह प्रकाश अज्ञानता और बुराई के अंधकार को समाप्त करने का संदेश देता है। पूजन के अंतिम चरण में माता की आरती, प्रदक्षिणा और क्षमा प्रार्थना की जाती है। आरती के लिए विशेष रूप से कर्पूर का उपयोग किया जाता है। कर्पूर के साथ भीगे हुए ईंधन को जलाकर उसमें 1, 3, 5, 7 या इससे अधिक संख्या में बत्तियां बनाकर माता की मंगल आरती उतारी जाती है। कर्पूर जलकर पूरी तरह से समाप्त हो जाता है और कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो यह दर्शाता है कि हमारा अहंकार भी माता के समक्ष पूरी तरह से भस्म हो जाना चाहिए। आरती के बाद साधक अपने स्थान पर गोल घूमकर प्रदक्षिणा करता है। अंत में सबसे महत्वपूर्ण भाग होता है क्षमा प्रार्थना। साधक हाथ जोड़कर कहता है कि हे माता, न तो मुझे आपकी भक्ति का कोई गहरा ज्ञान है और न ही मैं पूजा के कठिन मंत्रों को जानता हूँ। मैंने अपनी अल्प बुद्धि और क्षमता के अनुसार जो भी पूजन किया है, आप अपनी उदारता से उसे परिपूर्ण मानकर स्वीकार करें और मेरी सभी भूलों को क्षमा करें। नवरात्र पूजन का सबसे मूल और महत्वपूर्ण भाव यही है कि यदि पूजा के दौरान कोई मंत्र भूल भी जाए, या कोई सामग्री छूट भी जाए, तो साधक की भावना और श्रद्धा में कोई कमी नहीं आनी चाहिए। अज्ञानवश या अधिकता में किए गए पूजन से जगदम्बा सर्वकल्याणी महादेवी संतुष्ट ही होती हैं, क्योंकि वे केवल अपने भक्तों का सच्चा भाव देखती हैं। कर्मकांड से अधिक महत्व हृदय की पवित्रता का है। यह पावन पर्व हमें एक बहुत ही गहरा सामाजिक और आध्यात्मिक संदेश भी देता है। यह हमें सिखाता है कि संसार की हर एक स्त्री में देवी का ही वास है। स्त्री का सम्मान करना, उसकी गरिमा की रक्षा करना और उसे समाज में उचित स्थान देना ही देवी की सच्ची आराधना है। जब तक समाज में नारी का सम्मान नहीं होगा, तब तक कोई भी पूजा या व्रत सफल नहीं हो सकता। शक्ति की इस आराधना से ही हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में फैला हुआ अज्ञानता और बुराइयों का अंधकार दूर होता है। यही कारण है कि दीपावली के महापर्व से ठीक पहले आने वाली यह शारदीय नवरात्र, केवल एक उत्सव नहीं है, बल्कि यह दीपावली के प्रकाश पर्व की तैयारी का एक अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक आरंभ है। नवरात्र में हम अपने भीतर शक्ति और पवित्रता का संचय करते हैं, ताकि दीपावली के दिन हम अपने अंतर्मन के दीयों को सत्य और ज्ञान के प्रकाश से पूरी तरह से प्रज्वलित कर सकें। यह संपूर्ण कालखंड हमें अंधकार से प्रकाश की ओर, असत्य से सत्य की ओर और मृत्यु से अमरता की ओर ले जाने का एक दिव्य मार्ग प्रशस्त करता है। माता की यह आराधना हमारे जीवन को सुख, शांति, समृद्धि और अपार सफलता से भर दे, यही इस पर्व की सच्ची सार्थकता है। - महेन्द्र तिवारी 216 बी, द्वितीय तल, राधिका ज्वेलर्स के पास, गली नंबर-10, साध नगर, पालम कॉलोनी, नई दिल्ली - 110045
ढ़ाई दशक के सख्त फैसलों ने बनाया मोदी को मोदी
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ढ़ाई दशक की अनवरत राजनीतिक नेतृत्व यात्रा के दौरान लिए गए एक से एक चौंकाने वाले फैसलों ने मोदी को मोदी बनाया है। आज मोदी विश्व के सर्वाधिक भरोसेमंद नेताओं में से एक है। सामने वाले को भी यह भय सताये रहता है कि पता नहीं मोदी क्या स्टेंड लेकर क्या का क्या कर ड़ालेंगे। यही कारण है कि चाहे डोनाल्ड ट्रम्प हो, पुतिन हो या फिर शी जिंनपिंग हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को हल्के में नहीं ले पाते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की 100 प्रतिशत टैरिफ की धमकी के आगे भारत नहीं झुका है तो रुस से कच्चे तेल का आयात जारी है। मालदीव का उदाहरण सामने है जब नरेन्द्र मोदी ने भारत के द्वीप पर केवल कुर्सी लगाकर बैठकर ही मालदीव का हिला कर रख दिया। देश में भी गुजरात के मुख्यमंत्री के रुप में करीब 13 साल और देश के प्रधानमंत्री के रुप में 12 साल से कुछ अधिक के समय में लिए गए निर्णयों से समूचे विप़क्ष को धीरे से पर जोर का झटका देते रहे हैं। हो यह रहा है कि नरेन्द्र मोदी पर जो भी वार किया जाता है वही वार नरेन्द्र मोदी की ताकत बन जाता है। चाहे शुरुआत गुजरात मुख्यमंत्री रहते गोदारा कांड की हो या फिर चौकीदार चोर से लेकर वोट चोरी तक की हो, प्रतिपक्ष का हर वार ना केवल खाली गया है अपितु प्रतिपक्ष के लिए सेल्फ गोल बन कर ही रह गया है। देष आज आंतरिक और बाहरी दोनों ही क्षेत्रों में सर्वोपरि होकर उभरा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुजरात मुख्यमंत्री काल में ही अपने दूरगामी निर्णयों से विशिष्ट पहचान बना ली थी। चाहे वह गोदारा कांड हो या फिर गुजरात भूकंप और उसके बाद विनाशकारी भूकंप प्रभावित क्षेत्र में पुनर्निमार्ण के कार्य, नर्मदा के अतिरिक्त पानी को पाइपलाइन के माध्यम से उत्तरी गुजरात और सौराष्ट्र के सूखाग्रस्त क्षेत्रों में पेयजल की व्यवस्था, स्वच्छ भारत का सपना भी गुजरात के रास्ते ही आया है तो कृषि और घरेलू जरुरत की बिजली की व्यवस्था को अलग अलग कर 24 घंटे बिजली उपलब्ध कराना अपने आप में बड़ी बात है। वाईब्रेंट गुजरात समिट को देशी विदेशी निवेश को सिंगल विण्डों सिस्टम के माध्यम से साकार करना किसी दूरगामी सोच का ही परिणाम है। आज देष के अनेक राज्यों में निवेश सम्मेलन होने लगे हैं और ईज ऑफ डूइंग के बावजूद गुजरात समिट को मॉडल समिट माना ही जाता है। आज का मेक इन इंडिया इसी का विस्तार है। इसे भी पढ़ें: जब जब देश के साथ खड़े होने की बात आती है, तब तब Rahul Gandhi की राह अलग क्यों हो जाती है? जहां तक प्रधानमंत्री बनने के बाद के निर्णयों का सवाल है तो कूटनीति और विदेश नीति के मौर्चें पर आज भारत की तूंती बोलती है। सर्जिकल स्ट्राइक, बालाघाट एयर स्ट्राइक और ऑपरेशन सिन्दुर ने समूची दुनिया के सामने भारत के रण कौशल की धाक जमा दी और इसका परिणाम यह रहा कि पाकिस्तान के पक्ष में आवाज उठाने की हिम्मत लगभग अन्य देशों में नहीं ही रही। कहने को तुर्किया पाकिस्तान के पक्ष में गाहे-बेगाहे बोलता रहता है पर उसका असर नगण्य ही है। ब्रिक्स के माध्यम से आज भारत दुनिया के देशों का नेतृत्व कर रहा है तो अमेरिकी डॉलर को चुनौती देने की शुरुआत भारत के नेतृत्व में दुनिया के देश करने लगे हैं। देर सबेर यह हालात होंगे ही। समान नागरिकता कानून और कष्मीर में धारा 370 हटाकर कश्मीर को देश की मुख्य धारा से जोड़ना लगभग असंभव काम हो सका है। आर्थिक क्षेत्र में आज भारत दुनिया की प्रमुख ताकत बनकर उभरा है। एक राष्ट्र एक कर जीएसटी विपक्ष के लाख विरोध के बावजूद आज इकोनोमी का प्रमुख हिस्सा बन चुकी है। नोटबंदी का लाख विरोध हुआ और जनधन, आधार और मोबाइल यानी की जाम का असर साफ दिखाई दे रहा है। आज मोबाइल उत्पादन के क्षेत्र में भारत अग्रणी देष हो गया है। मेक इन इंडिया और वोकल फॉर लोकल ने असर दिखाया है तो सुधार प्रयासों का ही परिणाम है हमारे देश से आज सामरिक महत्व के उत्पादों का निर्यात होने लगा है। उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना ने एमएसएमई को नई ताकत दी है। न्यायिक क्षेत्र के सुधार सामने हैं। पुराने अनावश्यक कानूनों को हटाया गया है तो आज के संदर्भ में नई भारतीय न्याय संहिता लागू की है। चार श्रम कानूनों के माध्यम से श्रमिकों के भविष्य को संवारने का काम किया गया है। विपक्ष के दो प्रमुख हथियार, राममंदिर और धारा 370 हटाने का बीजेपी का सगूफा केवल राजनीतिक लाभ के लिए है पर नरेन्द्र मोदी सरकार ने राममंदिर का निर्माण कराकर स्पष्ट संदेश दे दिया कि बीजेपी के नारे या वादे खयाली पुलाव नहीं होते। बिना किसी विवाद के राममंदिर विवाद का निपटारा बहुत बड़ी उपलब्धी मानी जानी चाहिए। तीन तलाक का बिल पारित कराना अपने आप में मुश्किल भरा काम था। नारी शक्ति बंदन अधिनियम के माध्यम से महिलाओं को राजनीतिक नेत्त्व में 33 प्रतिशत आरक्षण महिला सषक्तिकरण का बड़ा निर्णय माना जाना चाहिए। कोविड 2019 के दौरान भारत द्वारा किये गये प्रबंधन को वैश्विक सहयोग को समूचे देशों द्वारा सराहा गया। आयुष्मान भारत, कृषि और कृषक सम्मान के निर्णय, पीएम गरीब कल्याण योजना या इसी तरह के कार्यक्रमों और निर्णयों की लंबी फेहरिस्त हो जाती है। सवाल यह नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी न 25 साल के अपने राजनीतिक नेतृत्व के दौरान क्या किया और ना ही यह कोई गुणगान का सवाल है। सवाल सीधा सा यह है कि आज भारत दुनिया के देशों का पिछलग्गू ना होकर दुनिया के देष भारत की और देखने लगे हैं। भारत अपने स्तर पर अपनी आवश्यकताओं और संप्रभुता को बनाये रखते हुए निर्णय लेता है और इसके खिलाफ किसी की बोलने की हिम्मत नहीं होती है। नरेन्द्र मोदी द्वारा मुख्यमंत्री व प्रधानमंत्री रहते जो कठोर निर्णय लिए गए हैं उनमें से अधिकांश दुधारी निर्णय रहे हैं और सबसे मजे की बात यह है कि चुनावों में जनता द्वारा उन पर मोहर लगाई जा रही है। इसलिए विपक्ष लाख आलोचना करें पर इसमेंं कोई दो राय नहीं कि 25 साल की यात्रा और विपक्ष के तीखे हमलों के बावजूद नरेन्द्र मोदी जनता के भरोसे पर खरे उतर रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह कि निर्णय करना और खासतौर से कठोर निर्णय जोखिम भरा होता है पर प्रत्येक कठोर निर्णय के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अधिक निखर के आये हैं। - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

