यूरोप में यूपी के ‘योगी मॉडल’ पर अमल के अंतरराष्ट्रीय निहितार्थ
यूरोप में कानून-व्यवस्था, हिंसक प्रदर्शनों, संगठित अपराध और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने की घटनाओं के संदर्भ में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की शासन-शैली पर चर्चा एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक और नीतिगत विषय है। लेकिन इसका विश्लेषण करते समय एक बुनियादी सवाल समझना आवश्यक है कि क्या यूरोप को यूपी के 'योगी मॉडल' की सख्ती अपनाने की जरूरत है, या उसे उस मॉडल के कुछ चुनिंदा प्रशासनिक उपायों से सीख लेनी चाहिए? यहां पर यह बुनियादी सवाल इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि वर्ष 2017 के बाद अमेरिका-यूरोप ने योगी मॉडल की आलोचना की थी! लिहाजा, इस प्रश्न का उत्तर यूरोप की राजनीतिक व्यवस्था, मानवाधिकार संबंधी प्रतिबद्धताओं और उत्तर प्रदेश में अपनाई गई नीतियों के वास्तविक परिणामों को साथ रखकर ही दिया जा सकता है। लेकिन जब 'इस्लामिक अतिवादी' स्थानीय असंतुष्ट लोगों के साथ मिलकर यूरोप का इस्लामीकरण पर उतारू हों और ईरान का परोक्ष बरदहस्त उन्हें प्राप्त हो तो अमेरिका के बाद यूरोपीय विवशता समझी जा सकती है। इसे भी पढ़ें: Yogi Model ने Italy में मचाई धूम, दंगाइयों-उपद्रवियों से UP Style में निबटेंगी PM Giorgia Meloni सबसे पहला सवाल यह है की ‘योगी मॉडल’ से हमारा आपका क्या आशय है? तो माकूल जवाब यही होगा कि राजनीतिक विमर्श में ‘योगी मॉडल’ का प्रयोग मुख्यतः उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था को प्राथमिकता देने, अपराधियों के विरुद्ध पुलिस कार्रवाई, संगठित अपराध पर नियंत्रण, प्रशासनिक सख्ती और अवैध अतिक्रमण के विरुद्ध कार्रवाई जैसी नीतियों के लिए किया जाता है। हालाँकि, इन सभी उपायों को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं है। अपराध की जाँच, दोषसिद्धि, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना और संपत्ति संबंधी विवादों का निपटारा अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएँ हैं। चूंकि यूपी में बेलगाम अल्पसंख्यक अपराधियों, सत्ता संरक्षित बाहुबलियों, इनसे जुड़े मनबढ़ युवाओं और शातिर अपराधियों के इशारे पर अपराध कर रहे बहुसंख्यक अपराधियों को नियंत्रित करने में यूपी के योगी मॉडल ने आशातीत सफलता प्राप्त की है, इसलिए चारो तरफ से जल रहे फ्रांस, इटली जैसे यूरोपीय देशों के पास कोई दूसरा चारा भी नहीं है। सर्वप्रथम इटली की प्रमुख और मोदी की मित्र जॉर्जिया मेलोनी ने यूपी के योगी मॉडल पर अमल करने की घोषणा की, तत्पश्चात मोदी के दूसरे मित्र फ्रांस के प्रमुख मैक्रो ने जब यूपी के योगी मॉडल की अच्छी नीतियों पर अमल करना शुरू किया तो अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार 'गैंग' सक्रिय हो गया और यूरोपीय देशों को उस नकारा लोकतंत्र की दुहाई देने लगा, जहां के बेलगाम लोग 'जुल्मी पूंजीवादी अड्डों' को फूंकने के बजाय अपने देश के सार्वजनिक जगहों, नागरिक सुविधाओं और ठिकानों को ही फूंक रहे हैं! यूरोप में इस मॉडल की चर्चा के तीन संभावित कारण हैं:- एक, कानून का प्रभावी प्रवर्तन: हिंसा, लूटपाट और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वालों के विरुद्ध त्वरित एवं निष्पक्ष कार्रवाई करना। दो, प्रशासनिक जवाबदेही: पुलिस और स्थानीय प्रशासन की तैयारी, समन्वय तथा निर्णय लेने की क्षमता में सुधार करना। तीन, राज्य की विश्वसनीयता: नागरिकों को यह भरोसा दिलाना कि शांतिपूर्ण जीवन, सार्वजनिक परिवहन और व्यापारिक गतिविधियों की सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन किसी मॉडल का प्रभाव उसके नाम या राजनीतिक लोकप्रियता से नहीं, बल्कि उसके परिणामों और कानूनी प्रक्रियाओं के पालन से मापा जाना चाहिए। दूसरा प्रासंगिक सवाल यह है कि यूरोप के लिए इसके क्या अंतरराष्ट्रीय निहितार्थ हो सकते हैं? एक, कानून-व्यवस्था की बहस में बदलाव: यदि यूरोपीय देश उत्तर प्रदेश की तरह अपराधियों के विरुद्ध कार्रवाई की गति, पुलिस-प्रशासन के समन्वय और सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा पर अधिक ध्यान देते हैं, तो उनकी आंतरिक सुरक्षा नीतियों में बदलाव आ सकता है। इससे भारत के प्रशासनिक अनुभवों में अंतरराष्ट्रीय रुचि बढ़ सकती है। दो, भारत की सॉफ्ट पावर और नीतिगत प्रतिष्ठा: भारत के किसी राज्य की प्रशासनिक नीति पर यूरोप में गंभीर चर्चा होना भारतीय संघीय व्यवस्था के अनुभवों को आंतरिक सुरक्षा नीतियों में बदलाव आ सकता है। इससे भारत के प्रशासनिक अनुभवों में अंतरराष्ट्रीय रुचि बढ़ सकती है। तीन, मानवाधिकार और कानून के शासन पर बहस: यूरोप में पुलिस कार्रवाई के साथ नागरिक स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण प्रदर्शन और न्यायिक समीक्षा का विशेष महत्त्व है। यूरोप की परिषद ने 23 अक्टूबर 2026 के आसपास जारी अपने हालिया वक्तव्य में भी शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और हिंसा करने वाले व्यक्तियों के बीच अंतर करने तथा पुलिस बल के कानूनी और आनुपातिक इस्तेमाल पर जोर दिया है। चार, भारत-यूरोप संबंधों में नई चर्चा: यदि यूरोपीय सरकारें भारतीय राज्यों के पुलिस प्रशिक्षण, डिजिटल निगरानी के कानूनी ढाँचे या प्रशासनिक समन्वय जैसे क्षेत्रों में उपयोगी अनुभव पाती हैं, तो तकनीकी सहयोग और नीतिगत संवाद के अवसर बन सकते हैं। अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिज्ञ बताते हैं कि इसे अभी एक संभावित दिशा समझना चाहिए, न कि यूरोप द्वारा योगी मॉडल स्वीकार कर लेने का प्रमाण! तीसरा अहम सवाल है कि क्या यूरोप में ‘बुलडोजर नीति’ भी अपनाई जा सकती है? तो जवाब होगा कि यहीं पर इस बहस का सबसे संवेदनशील पक्ष सामने आता है। उत्तर प्रदेश में अवैध निर्माणों के विरुद्ध कार्रवाई को लेकर ‘बुलडोजर मॉडल’ राजनीतिक विमर्श का प्रमुख हिस्सा रहा है। लेकिन अवैध निर्माण हटाना और किसी आपराधिक मामले में आरोपी व्यक्ति को दंडित करने के लिए उसकी संपत्ति गिराना, दोनों अलग बातें हैं। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 13 नवंबर 2024 को स्पष्ट किया कि केवल किसी आपराधिक मामले में आरोपी होने के आधार पर, कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना, किसी की संपत्ति गिराना असंवैधानिक है। न्यायालय ने नोटिस, सुनवाई और न्यायिक समीक्षा से जुड़े निर्देश भी दिए। लिहाजा, यूरोप में भी ऐसी किसी नीति को लागू करने के लिए स्थानीय कानून, संपत्ति अधिकार, निष्पक्ष सुनवाई और आनुपातिक कार्रवाई के मानकों का पालन आवश्यक होगा। इसलिए यूरोप के लिए संभावित सीख यह नहीं कि वह बिना कानूनी प्रक्रिया के कठोर दंडात्मक कार्रवाई अपनाए, बल्कि यह कि अवैध गतिविधियों पर कार्रवाई प्रभावी, प्रमाण-आधारित और न्यायिक समीक्षा के अधीन हो। चौथा महत्वपूर्ण सवाल है कि योगी मॉडल बनाम यूरोपीय व्यवस्था की तुलनात्मक दृष्टि क्या है? इसे हमलोग विषय दर विषय, उससे संबंधित उत्तर प्रदेश के मॉडल से जुड़ी बहस और यूरोपीय व्यवस्था की प्रमुख कसौटी के आधार पर निम्नलिखित तरीके से समझ सकते हैं:- एक, अपराध नियंत्रण- पुलिस कार्रवाई और अपराधियों पर दबाव - प्रभावी जाँच, अभियोजन और निष्पक्ष सुनवाई। दो, हिंसक भीड़- सार्वजनिक व्यवस्था बहाल करना- हिंसक व्यक्तियों पर कार्रवाई, शांतिपूर्ण प्रदर्शन की सुरक्षा। तीन, संपत्ति संबंधी कार्रवाई- अवैध निर्माण और अतिक्रमण हटाना, कानून के अनुसार नोटिस, सुनवाई और अपील। चार, पुलिस की जवाबदेही- प्रशासनिक अनुशासन और कार्रवाई- आनुपातिक बल प्रयोग, स्वतंत्र जाँच और जवाबदेही। पांच, शासन की विश्वसनीयता- नागरिक सुरक्षा और कानून का प्रवर्तन- सुरक्षा के साथ मौलिक अधिकारों का संरक्षण। यूरोप की परिषद के मानवाधिकार मानकों में पुलिस कार्रवाई के लिए आवश्यकता, आनुपातिकता और जवाबदेही पर जोर दिया जाता है। ये मानक हिंसक घटनाओं से निपटने के साथ-साथ शांतिपूर्ण सभा के अधिकार की रक्षा भी करते हैं। जहां तक अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर इसके संभावित प्रभाव की बात है तो इससे भारत की प्रशासनिक छवि मज़बूत होगी। यदि उत्तर प्रदेश की किसी नीति से अपराध नियंत्रण या पुलिस-प्रशासन के समन्वय में मापने योग्य सुधार सिद्ध होता है, तो भारत अपने अनुभवों को अंतरराष्ट्रीय नीति-चर्चाओं में प्रस्तुत कर सकता है। इससे भारतीय राज्यों के प्रशासनिक प्रयोगों पर शोध और संवाद को बढ़ावा मिल सकता है। चूंकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा और सफल लोकतंत्र है, इसलिए भारत की बातों को अनसुनी करना अन्य देशों के लिए घातक भी हो सकता है। जहां तक यूरोप में राजनीतिक ध्रुवीकरण की बात है तो कठोर कानून-व्यवस्था की नीतियों को कुछ राजनीतिक समूह सार्वजनिक सुरक्षा के लिए आवश्यक मान सकते हैं, जबकि दूसरे समूह उनके दुरुपयोग और नागरिक स्वतंत्रताओं पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर सवाल उठा सकते हैं। इसका वास्तविक प्रभाव देश, सरकार और लागू नीति के अनुसार अलग होगा। जहां तक लोकतांत्रिक शासन की परीक्षा की बात है तो किसी सरकार की क्षमता केवल हिंसा रोकने से नहीं, बल्कि निर्दोष नागरिकों की सुरक्षा, निष्पक्ष न्याय और प्रशासनिक गलतियों को सुधारने की व्यवस्था से भी मापी जाती है। यह कसौटी भारत और यूरोप, दोनों पर लागू होती है। अब प्रासंगिक सवाल है कि आख़िर यूरोप को वास्तव में किन किन पहलुओं से सीखने पर विचार करना चाहिए? तो जवाब होगा कि यूरोपीय देशों के लिए उपयोगी नीति-चर्चा पाँच बिंदुओं पर केंद्रित हो सकती है:- एक, हिंसक घटनाओं के दौरान पुलिस, अभियोजन पक्ष और स्थानीय प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना। दो, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने तथा संगठित अपराध के मामलों में साक्ष्य-आधारित जाँच और समयबद्ध न्यायिक प्रक्रिया का अनुपालन करना। तीन, हिंसक व्यक्तियों और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के बीच स्पष्ट अंतर करना और हिंसक व्यक्तियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई करना। चार, पुलिस कार्रवाई की स्वतंत्र समीक्षा और गलत कार्रवाई के लिए अधिकारियों की जवाबदेही तय करना। पांच, अपराध की रोकथाम के साथ उन सामाजिक परिस्थितियों पर भी ध्यान देना जो बार-बार हिंसा को जन्म देती हैं। फ्रांस के न्याय मंत्रालय ने जून-जुलाई 2023 की शहरी हिंसा के बाद गिरफ्तार और दोषसिद्ध व्यक्तियों की पृष्ठभूमि तथा घटनाओं के कारणों का विश्लेषण कराया था। यह उदाहरण बताता है कि हिंसक घटनाओं से निपटने के लिए केवल तत्काल पुलिस कार्रवाई नहीं, बल्कि बाद का संस्थागत विश्लेषण भी महत्त्वपूर्ण है। कोरा सवाल है कि क्या योगी मॉडल यूरोप के लिए नया प्रशासनिक विकल्प बन सकता है? तो जवाब होगा कि इस प्रश्न पर गंभीर अंतरराष्ट्रीय चर्चा संभव है, क्योंकि यूरोप ने उत्तर प्रदेश के योगी मॉडल को अपना लिया है। मुख्य बात यह है कि कठोर शासन और प्रभावी शासन एक ही चीज नहीं हैं। प्रभावी शासन वह है जो हिंसा और अपराध पर नियंत्रण रखे, नागरिकों को सुरक्षित बनाए, कानून का निष्पक्ष पालन करे और प्रशासन को भी कानून के प्रति जवाबदेह रखे। यदि उत्तर प्रदेश की किसी विशिष्ट नीति के सकारात्मक परिणाम स्वतंत्र आँकड़ों से प्रमाणित होते हैं, तो यूरोपीय देश उसकी उपयोगिता पर विचार कर सकते हैं। लेकिन नीतियों को उनके नाम या राजनीतिक छवि के आधार पर नहीं, बल्कि प्रमाण, लागत, परिणाम और मानवाधिकारों पर उनके प्रभाव के आधार पर परखना चाहिए। यही वह दृष्टिकोण है जिसके तहत ‘योगी मॉडल’ पर बहस भारत की आंतरिक राजनीति से आगे बढ़कर कानून-व्यवस्था, लोकतंत्र और अंतरराष्ट्रीय प्रशासनिक सहयोग के व्यापक प्रश्नों तक पहुँच सकती है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
अरुणाचल प्रदेश की सियांग नदी पर प्रस्तावित 11,200 मेगावाट की सियांग अपर मल्टीपर्पज परियोजना (SUMP) के विरोध में उठे स्वरों का लगातार तेज होना केंद्र और राज्य सरकार के लिए मुश्किलों का सबब बन गया है। हालांकि यह बात भी सही है कि जब चीन तिब्बत में ब्रह्मपुत्र पर दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में से एक बना रहा है, तब भारत के लिए चुप बैठना आसान नहीं है। लेकिन इस परियोजना के खिलाफ सड़कों पर उतरे स्थानीय लोगों की नाराजगी भी नजरअंदाज नहीं की जा सकती। देखा जाये तो एक तरफ चीन की चुनौती है, तो दूसरी तरफ अपनी जमीन, जंगल और पहचान बचाने की लड़ाई है। सवाल यह है कि चीन की बढ़ती ताकत का मुकाबला करने के लिए भारत को क्या करना चाहिए और इस कोशिश में अपने ही सीमावर्ती नागरिकों का भरोसा कैसे बनाए रखना चाहिए? चीन की विशाल परियोजना और भारत की रणनीतिक चुनौती हम आपको बता दें कि तिब्बत में ब्रह्मपुत्र की ऊपरी धारा यारलुंग त्सांगपो पर चीन लगभग 60,000 मेगावाट क्षमता की विशाल जलविद्युत परियोजना बना रहा है। यह भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यही नदी अरुणाचल प्रदेश में सियांग और आगे असम में ब्रह्मपुत्र कहलाती है। नदी के ऊपरी हिस्से पर चीन की बढ़ती क्षमता भारत के सामने जल प्रवाह, बाढ़ प्रबंधन और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े सवाल खड़े करती है। वहीं भारत की प्रस्तावित सियांग परियोजना चीन की बढ़ती जलविद्युत ताकत का जवाब देने की दिशा में एक अहम कदम है। अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू के मुताबिक, इस परियोजना में करीब 9.2 अरब घन मीटर पानी जमा करने की क्षमता होगी, जबकि चीन की परियोजना की अनुमानित भंडारण क्षमता करीब 5.5 अरब घन मीटर है। यानी बिजली उत्पादन में चीन का बांध बड़ा हो सकता है, लेकिन पानी जमा करने के मामले में भारत की प्रस्तावित परियोजना अधिक सक्षम हो सकती है। यही इसकी सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत है। अगर चीन भविष्य में ब्रह्मपुत्र के पानी के प्रवाह में बदलाव करता है, तो सियांग परियोजना भारत को जल प्रबंधन और बाढ़ नियंत्रण के लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प दे सकती है। इसलिए यह परियोजना केवल बिजली बनाने तक सीमित नहीं, बल्कि भारत की जल सुरक्षा मजबूत करने और चीन के मुकाबले अपनी रणनीतिक स्थिति बेहतर बनाने का भी अवसर है। इसे भी पढ़ें: चीन के खिलाफ ढाल बनेगा सियांग डैम, तो फिर अरुणाचल के 'Gen Z' क्यों कर रहे हैं बगावत? समझिए पूरी Inside Story पासीघाट की हिंसा और आंदोलन के पीछे बढ़ता असंतोष जहां तक इस परियोजना के विरोध की बात है तो आपको बता दें कि 23 अक्टूबर की रात पासीघाट में परियोजना विरोधी प्रदर्शन हिंसक हो गए। NHPC कार्यालय और पुलिस थाने में आगजनी हुई तथा राजनीतिक प्रतिनिधियों के आवासों में तोड़फोड़ और लूटपाट की घटनाएं सामने आईं। पुलिसकर्मियों के घायल होने के बाद प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की और सार्वजनिक जमावड़े पर प्रतिबंध लगाए। इस घटनाक्रम ने सरकार और स्थानीय संगठनों के बीच पहले से मौजूद अविश्वास को और उजागर किया। रिपोर्टों के मुताबिक स्थानीय संगठनों ने यहां तक आरोप लगाया है कि केंद्र की परियोजना संबंधी पहल सियांग क्षेत्र को भारत-चीन रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का मैदान बना रही है। आदि बाने केबांग-यूनाइटेड नामक संगठन के प्रवक्ता दातिक रतन ने परियोजना के सर्वेक्षण, स्थानीय सहमति और पैतृक भूमि के अधिकारों को लेकर सवाल उठाए। संगठन ने दावा किया कि प्रभावित गांवों के लगभग 80 प्रतिशत परिवार परियोजना का विरोध कर रहे हैं। संगठन ने मुख्यमंत्री पेमा खांडू को सार्वजनिक बहस की चुनौती भी दी और कहा कि वह विकास के खिलाफ नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों की अनदेखी करके विकास थोपे जाने के खिलाफ है। देखा जाये तो इस विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू स्थानीय लोगों की पहचान, सम्मान और सुरक्षा की भावना है। साथ ही आदि और गालो समुदायों के लिए सियांग नदी सिर्फ पानी का स्रोत नहीं, बल्कि उनकी कृषि, सांस्कृतिक पहचान, पारंपरिक जीवन और पूर्वजों की भूमि का आधार है। विरोधी संगठनों का दावा है कि प्रस्तावित जलाशय से 27 गांव डूब सकते हैं और लगभग डेढ़ लाख लोग विस्थापित हो सकते हैं। इसके अलावा, सीमावर्ती समुदाय भारत की सुरक्षा और संप्रभुता के महत्वपूर्ण साझेदार हैं। यदि उन्हें लगता है कि उनकी जमीन, संस्कृति और भविष्य के बारे में निर्णय उनकी आवाज सुने बिना लिए जा रहे हैं, तो अविश्वास बढ़ सकता है। देखा जाये तो चीन के सामने भारत की स्थिति मजबूत करने के लिए स्थानीय नागरिकों के साथ विश्वास का रिश्ता कमजोर करना किसी भी रणनीति के लिए नुकसानदेह होगा। क्या आंदोलन के पीछे राजनीतिक स्वार्थ भी हैं? हम आपको यह भी बता दें कि इस परियोजना के विरोध पर सवाल भी उठ रहे हैं। सियांग परियोजना पर अरुणाचल की राजनीति में अलग-अलग रुख दिखाई दे रहे हैं। कुछ नेता और संगठन इसे चीन की चुनौती का जवाब मानते हैं, जबकि दूसरे समूह इसे स्थानीय अस्तित्व और पर्यावरण से जुड़ा खतरा बताते हैं। बांध बनने के फायदे और न बनने की संभावित कीमत की यदि बात करें तो परियोजना के संभावित लाभों में बड़े पैमाने पर बिजली उत्पादन, रोजगार, बुनियादी ढांचे का विकास और जल भंडारण की अतिरिक्त क्षमता शामिल हैं। चीन की विशाल परियोजना के संदर्भ में यह भारत को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक विकल्प दे सकती है। दूसरी ओर, हिमालयी क्षेत्र में भूकंप, भूस्खलन और अत्यधिक वर्षा जैसे जोखिम हैं। विस्थापन, उपजाऊ खेतों, जंगलों और ऐतिहासिक धरोहरों पर प्रभाव का निष्पक्ष मूल्यांकन भी जरूरी है। हम आपको यह भी बता दें कि सियांग परियोजना अभी पूर्व-व्यवहार्यता अध्ययन के चरण में है, लेकिन इसे केवल आज के फायदे-नुकसान के नजरिये से देखना पर्याप्त नहीं होगा। सवाल आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा का भी है। तिब्बत में ब्रह्मपुत्र की ऊपरी धारा पर चीन जिस विशाल जलविद्युत परियोजना का निर्माण कर रहा है, उसके मद्देनजर भारत को भी अपनी जल सुरक्षा मजबूत करने के लिए समय रहते तैयारी करनी होगी। रणनीतिक चुनौतियों का जवाब संकट सिर पर आने के बाद नहीं, बल्कि पहले से तैयारी करके दिया जाता है। सियांग परियोजना भारत को बिजली उत्पादन, जल भंडारण और बाढ़ प्रबंधन की अतिरिक्त क्षमता दे सकती है। इसलिए इसके हर पहलू का गंभीरता से अध्ययन करना और इसकी संभावनाओं को आगे बढ़ाना देश के दीर्घकालिक हित में महत्वपूर्ण है। यह सही है कि स्थानीय लोगों की जमीन, आजीविका, संस्कृति और पर्यावरण से जुड़ी चिंताएं अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इन चिंताओं को दूर करे, प्रभावित परिवारों के अधिकारों की रक्षा करे और किसी भी संभावित नुकसान के लिए उचित पुनर्वास तथा मुआवजे की व्यवस्था सुनिश्चित करे। लेकिन लोगों को भी यह समझना होगा कि किसी परियोजना से जुड़ी आशंकाओं और उसके वास्तविक परिणामों में अंतर हो सकता है। अधूरी जानकारी, अफवाहों या राजनीतिक दावों के आधार पर फैसला करने के बजाय उन्हें तथ्यों, वैज्ञानिक आकलन और व्यापक राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखना चाहिए। आज की तैयारी कल की सुरक्षा बन सकती है। यदि वैज्ञानिक अध्ययन यह साबित करते हैं कि सियांग परियोजना सुरक्षित और उपयोगी ढंग से बनाई जा सकती है, तो उसके रास्ते में आने वाली समस्याओं का समाधान खोजने के लिए सरकार और स्थानीय समुदायों को मिलकर काम करना चाहिए। देशहित में कभी-कभी कठिन फैसले लेने पड़ते हैं, लेकिन उन फैसलों का बोझ किसी एक समुदाय पर नहीं डाला जाना चाहिए। संभावित स्थानीय नुकसान को कम करना और प्रभावित लोगों को न्याय देना भी उतना ही जरूरी है जितना देश की सामरिक क्षमता बढ़ाना। बहरहाल, चीन की चुनौती का सामना करने के लिए भारत को मजबूत बुनियादी ढांचे, बेहतर जल प्रबंधन और दूरदर्शी रणनीति की जरूरत है। सियांग परियोजना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण विकल्प हो सकती है। इसलिए स्थानीय लोगों को विरोध और समर्थन के बीच किसी एक पक्ष को आंख मूंदकर चुनने के बजाय तथ्यों को समझना चाहिए, अपने अधिकारों के लिए आवाज उठानी चाहिए और साथ ही देश की सुरक्षा से जुड़े व्यापक सवालों पर भी विचार करना चाहिए। आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित जल संसाधन, मजबूत सीमाएं और विकास के अवसर देना आज की जिम्मेदारी है। राष्ट्रहित और स्थानीय हितों को आमने-सामने खड़ा करने के बजाय, दोनों की रक्षा करने वाला रास्ता निकालना ही सरकार की असली परीक्षा होगी। -नीरज कुमार दुबे
ज्ञानेश कुमार पर सवाल उठाने वालों को चुनाव आयोग ने 'मिलकर' दिया करारा जवाब! आरोपों की निकाल दी हवा
चुनाव आयोग पर सवाल उठाना विपक्ष का लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन सवालों की आड़ में संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर लगातार हमला करना और तथ्यों के सामने आने के बाद भी राजनीतिक आरोपों की धार बनाए रखना लोकतांत्रिक विमर्श की स्वस्थ परंपरा नहीं हो सकती। हम आपको बता दें कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में काम कर रहे भारतीय निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे के जरिए उन आरोपों का जवाब दिया है, जिनके माध्यम से आयोग की निर्णय प्रक्रिया और विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की निष्पक्षता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। आयोग का पक्ष सामने आने के बाद अब इस पूरे विवाद को केवल राजनीतिक आरोपों के चश्मे से देखना पर्याप्त नहीं होगा। दस्तावेज क्या कहते हैं, कानून क्या कहता है और अदालत के सामने कौन-सी दलीलें रखी गई हैं, यह देखना भी उतना ही जरूरी है। हम आपको यह भी बता दें कि आज इस मामले पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के हलफनामे पर जवाब दाखिल करने के लिए याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह को 10 दिन का समय दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले की सुनवाई दिवाली की छुट्टियों के बाद करने का फैसला किया है। अगली सुनवाई 17 नवंबर को होने की संभावना है। इसका अर्थ यह है कि अदालत ने अभी न तो आयोग के पक्ष को अंतिम रूप से स्वीकार किया है और न ही याचिकाकर्ताओं के आरोपों को सही ठहराया है। अदालत दोनों पक्षों की दलीलें सुनकर मामले को आगे बढ़ाएगी। इसे भी पढ़ें: Chai Par Sameeksha: Rahul Gandhi Vietnam Visit और भारत में चल रहे प्रदर्शनों का क्या कनेक्शन है? दूसरी ओर, आयोग के हलफनामे का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उसने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर एकतरफा फैसले लेने के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि एसआईआर से जुड़े तीन प्रमुख आदेश 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 को तीनों सदस्यों की सर्वसम्मति से जारी किए गए थे। आयोग के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों निर्वाचन आयुक्तों की सहमति से ही इन निर्णयों को अंतिम रूप दिया गया। हलफनामे को भी ज्ञानेश कुमार, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की सर्वसम्मति से मंजूरी दी गई। साथ ही यहां एक बुनियादी बात समझना जरूरी है। किसी फाइल पर किसी अधिकारी या निर्वाचन आयुक्त की टिप्पणी, सवाल अथवा सुझाव दर्ज होने का अर्थ अपने आप यह नहीं होता कि आयोग ने अंतिम निर्णय भी उसी टिप्पणी के आधार पर लिया। आयोग ने अपने हलफनामे में इसी अंतर को स्पष्ट किया है। उसका कहना है कि फाइलें निर्धारित प्रक्रिया के तहत एक निर्वाचन आयुक्त से दूसरे निर्वाचन आयुक्त और फिर मुख्य चुनाव आयुक्त के पास जाती हैं। जरूरी मामलों में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से मंजूरी भी ली जा सकती है, जिसे बाद में रिकॉर्ड पर दर्ज किया जाता है। आयोग का तर्क है कि आंतरिक विचार-विमर्श को अंतिम निर्णय के साथ मिलाकर देखना उचित नहीं है। यह दलील उन आरोपों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है, जिनमें दावा किया गया था कि एसआईआर से जुड़े 14 निर्णय दोनों निर्वाचन आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद आयोग के नाम पर लिए गए। लेकिन आयोग ने इन आरोपों के आधार को चुनौती देते हुए कहा है कि समाचार पत्रों में प्रकाशित रिपोर्ट अपने आप में आरोपों का निर्णायक कानूनी प्रमाण नहीं हो सकती। अब याचिकाकर्ता को अपना जवाब दाखिल करना है और अदालत को यह तय करना है कि उपलब्ध रिकॉर्ड से क्या निष्कर्ष निकलता है। दूसरा बड़ा मुद्दा फॉर्म-6 को लेकर है, जिसका इस्तेमाल मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए किया जाता है। आयोग ने कहा है कि वैधानिक फॉर्म-6 में संशोधन नहीं किया गया। उसके मुताबिक, एसआईआर के दौरान मांगा गया अतिरिक्त घोषणा-पत्र अलग दस्तावेज है, जिसे मूल आवेदन-पत्र में संशोधन नहीं माना जाना चाहिए। हालांकि आयोग ने यह स्वीकार किया कि ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया की प्रस्तुति से फॉर्म-6 में बदलाव होने का आभास पैदा हो सकता था। इसके बाद 21 अक्टूबर से ऑनलाइन प्रक्रिया को फॉर्म-6 और अलग एसआईआर घोषणा-पत्र में विभाजित करने की व्यवस्था किए जाने की बात भी कही गई। यही वह बिंदु है जहां आयोग के पक्ष को संतुलित दृष्टि से देखना चाहिए। किसी प्रक्रिया को स्पष्ट करने के लिए उसमें सुधार करना प्रशासनिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। यदि ऑनलाइन व्यवस्था से भ्रम पैदा हुआ था, तो उसे अलग करना उपयोगी कदम हो सकता है। लेकिन इससे यह निष्कर्ष अपने आप नहीं निकलता कि हर विवाद समाप्त हो गया। असली कसौटी यह है कि व्यवस्था कानून के अनुरूप है या नहीं और पात्र मतदाताओं को किसी प्रकार की परेशानी तो नहीं हो रही। साथ ही आयोग ने मतदाता सूची के पुनरीक्षण पर भी अपना पक्ष रखा है। उसका कहना है कि जिन मतदाताओं का रिकॉर्ड पुरानी मतदाता सूचियों से नहीं मिल पाता, उनके घर जाकर बूथ स्तर के अधिकारी दस्तावेज एकत्र कर सकते हैं। ऐसे मतदाताओं को सामान्यतः सुनवाई के लिए बुलाने की जरूरत नहीं होगी और असाधारण मामलों में सुनवाई की जा सकती है। आयोग ने यह भी कहा है कि ECINet प्रणाली पर किसी मतदाता का नाम जोड़ने या हटाने के लिए संबंधित निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी का आदेश आवश्यक है। इसके अतिरिक्त, तकनीकी व्यवस्था की जांच के लिए आईआईटी और भारतीय विज्ञान संस्थान के विशेषज्ञों को शामिल करने वाली समिति का उल्लेख किया गया है। इन दलीलों से आयोग यह बताना चाहता है कि मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए निर्धारित प्रक्रियाएं और प्रशासनिक सुरक्षा उपाय मौजूद हैं। मतदाता सूची में मृत, स्थानांतरित या दोहरी प्रविष्टियों की पहचान करना आवश्यक है, लेकिन किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटना भी उतना ही गंभीर विषय है। अब बात ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व की। किसी मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्यक्षमता का फैसला इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि विपक्ष उनके कामकाज से संतुष्ट है या नहीं। असली प्रश्न यह है कि क्या निर्णय कानून के अनुरूप लिए जा रहे हैं, क्या उनका रिकॉर्ड उपलब्ध है और क्या मतदाता के अधिकार सुरक्षित हैं। आयोग का हलफनामा इन सवालों का जवाब देने का एक औपचारिक प्रयास है। यदि उसके तर्क न्यायिक परीक्षण में सही साबित होते हैं, तो यह उसके संस्थागत पक्ष को मजबूती देगा। वहीं, यदि किसी निर्णय में कानूनी खामी पाई जाती है, तो उसे सुधारना भी उसी संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा है जिसकी रक्षा आयोग करता है। हम आपको यह भी बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही स्पष्ट किया था कि वह रिकॉर्ड की जांच करेगा और कानून के विपरीत पाए जाने वाले निर्णयों पर हस्तक्षेप कर सकता है। इसलिए इस मामले में न तो आयोग को अदालत से पहले क्लीन चिट दी जा सकती है और न ही केवल आरोपों के आधार पर उसे दोषी ठहराया जा सकता है। यही न्यायिक प्रक्रिया की खूबसूरती है। बहरहाल, चुनाव आयोग किसी राजनीतिक दल का प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है। उसकी आलोचना होनी चाहिए तो प्रमाणों के साथ और उसका बचाव होना चाहिए तो तथ्यों के आधार पर। ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखा है। अब याचिकाकर्ता का जवाब और अदालत की अगली सुनवाई इस विवाद की दिशा तय करेंगे। लोकतंत्र के हित में सबसे जरूरी यही है कि राजनीतिक शोर से ऊपर उठकर मतदाता के अधिकार, कानून की सर्वोच्चता और चुनाव आयोग की जवाबदेही को केंद्र में रखा जाए। -नीरज कुमार दुबे
‘समान नियम’ का मतलब ‘एक जैसे नियम’ नहीं, भारत की विधायी विविधता का सम्मान जरूरी: विजेंद्र गुप्ता
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इजरायल में 26वीं नेसेट के लिए मतदान, मतदाताओं ने शांति और लोकतंत्र पर जताया भरोसा
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मदन लाल खुराना की पुण्यतिथि पर भाजपा नेताओं ने दी श्रद्धांजलि, बताया 'दिल्ली का विकास पुरुष'
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स्तरहीनता एवं विरोध की भाषा में उलझती कांग्रेस
लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष एक-दूसरे के विरोधी अवश्य होते हैं, लेकिन उनकी भाषा शत्रुता की नहीं, वैचारिक प्रतिस्पर्धा की होनी चाहिए। राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र की शक्ति हैं, पर जब ये मतभेद व्यक्तिगत कटाक्ष, पारिवारिक टिप्पणियों और अपमानजनक शब्दों में बदलने लगते हैं, तब राजनीति का स्तर गिरता है और लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा प्रभावित होती है। भारतीय राजनीति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति कांग्रेस के अनेक नेताओं की आक्रामक टिप्पणियों और अब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के पटना में दिए गए विवादास्पद बयान ने एक बार फिर भाषाई मर्यादा पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। 25 अक्टूबर 2026 को पटना में बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह की 139वीं जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में खड़गे की एक टिप्पणी राजनीतिक विवाद का कारण बन गई। कार्यक्रम में उपस्थित एक व्यक्ति की टिप्पणी के जवाब में उन्होंने कहा, “मोदी का बाप भी जाएगा।” इस बयान की भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने तीखी आलोचना की। दूसरी ओर, कांग्रेस ने इस टिप्पणी को वैचारिक संदर्भ में समझाने का प्रयास किया। समाचारों के अनुसार संबंधित व्यक्ति ने भी बाद में कहा कि उसकी पूरी बात नहीं सुनी गई थी। इस घटनाक्रम के विभिन्न पक्ष अपनी-अपनी व्याख्या प्रस्तुत कर रहे हैं, लेकिन विवाद से अलग एक बुनियादी प्रश्न अपनी जगह कायम है-क्या देश के सर्वोच्च राजनीतिक पद पर आसीन व्यक्ति के प्रति विरोध जताने का यही तरीका होना चाहिए? खड़गे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं और लंबे राजनीतिक अनुभव के साथ पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। ऐसे व्यक्ति से सार्वजनिक मंच पर अधिक संयम और विवेक की अपेक्षा स्वाभाविक है। राजनीतिक सभा में कोई प्रतिकूल टिप्पणी हो जाए, तो उसका उत्तर तर्क, तथ्य और आत्मविश्वास से दिया जा सकता है। लेकिन जब जवाब व्यक्तिगत संबंधों और परिवार तक पहुंच जाए, तब मुद्दे की गंभीरता पीछे छूट जाती है और शब्दों का विवाद मुख्य समाचार बन जाता है। राजनीति में शब्द केवल वक्ता की तत्काल प्रतिक्रिया नहीं होते, वे उसकी सार्वजनिक जिम्मेदारी और लोकतांत्रिक संस्कारों की भी परीक्षा लेते हैं। कांग्रेस की राजनीति में नरेंद्र मोदी को लेकर तीखे और विवादास्पद वक्तव्यों का इतिहास भी इस बहस को व्यापक संदर्भ देता है। वर्ष 2007 में सोनिया गांधी ने गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान मोदी के लिए ‘मौत का सौदागर’ शब्द का प्रयोग किया था। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में मणिशंकर अय्यर की ‘चायवाला’ संबंधी टिप्पणी ने भी बड़ा राजनीतिक विवाद पैदा किया। बाद के वर्षों में राहुल गांधी के ‘चौकीदार चोर है’ नारे ने राजनीतिक बहस को व्यक्तिगत आरोपों की दिशा में मोड़ा। इन बयानों के पीछे अपने-अपने राजनीतिक संदर्भ और वक्ताओं की दलीलें रही हैं, लेकिन इनका सार्वजनिक प्रभाव इस प्रश्न को सामने लाता है कि क्या किसी नेता की आलोचना उसके कामकाज तक सीमित रखी जा सकती है, अथवा उसे व्यक्तिगत उपहास का विषय बनाना आवश्यक समझा जाने लगा है? इसे भी पढ़ें: आत्मघाती कड़वाहट: हताशा में मर्यादा की लक्ष्मण रेखा भूली कांग्रेस प्रियंका गांधी सहित कांग्रेस के अन्य नेताओं ने भी मोदी और उनकी सरकार के विरुद्ध कई अवसरों पर तीखे राजनीतिक हमले किए हैं। यह ध्यान रखना जरूरी है कि तीखी आलोचना अपने आप में अमर्यादित नहीं होती। सरकार की नीतियों, बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक सद्भाव, लोकतांत्रिक संस्थाओं और प्रशासनिक निर्णयों पर कठोर सवाल उठाना विपक्ष का संवैधानिक दायित्व है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब नीतिगत असहमति को व्यक्तिगत अपमान से जोड़ दिया जाता है और तर्क के स्थान पर कटाक्ष को राजनीतिक प्रभाव का माध्यम बनाया जाने लगता है। किसी नेता के प्रत्येक बयान को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं, लेकिन बार-बार होने वाले विवादों से राजनीतिक भाषा के स्तर पर विचार करने की आवश्यकता अवश्य पैदा होती है। यहां कांग्रेस के सामने एक बड़ी चुनौती है। विपक्ष के रूप में उसकी सार्थकता इस बात से तय होगी कि वह जनता के जीवन से जुड़े प्रश्नों पर कितना प्रभावी विमर्श खड़ा करती है। किसानों की समस्याएं, युवाओं के रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक असमानता और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर ठोस विकल्प प्रस्तुत करना उसकी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। यदि सार्वजनिक चर्चा बार-बार प्रधानमंत्री पर व्यक्तिगत टिप्पणियों तक सिमट जाती है, तो नीतिगत बहस पीछे छूटने का खतरा रहता है। इससे विपक्ष की आलोचना का वास्तविक आधार भी कमजोर पड़ सकता है। राजनीतिक विमर्श में मुद्दों की जगह व्यक्तियों को केंद्र में रख देने से लोकतंत्र को अपेक्षित लाभ नहीं मिलता। दूसरी ओर नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व और उनकी वैश्विक सक्रियता भारतीय राजनीति के महत्वपूर्ण पहलू हैं। प्रधानमंत्री के रूप में उनकी विदेश यात्राएं, विभिन्न देशों के नेतृत्व के साथ संवाद, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की भागीदारी और आर्थिक एवं रणनीतिक साझेदारियों को आगे बढ़ाने के प्रयास देश की वैश्विक भूमिका से जुड़े हैं। उनके समर्थक इन गतिविधियों को भारत की प्रतिष्ठा और प्रभाव में वृद्धि के रूप में देखते हैं। साथ ही, किसी भी प्रधानमंत्री के कार्यकाल का निष्पक्ष आकलन केवल अंतरराष्ट्रीय छवि से नहीं, बल्कि घरेलू नीतियों, आर्थिक परिणामों, सामाजिक समावेशन और शासन के रिकॉर्ड से भी किया जाना चाहिए। लोकतंत्र की सुंदरता इसी में है कि नेतृत्व की उपलब्धियों का सम्मान हो और उसके निर्णयों की आलोचनात्मक समीक्षा भी संभव बनी रहे। यह भी विचारणीय है कि किसी नेता के विरुद्ध जितनी अधिक व्यक्तिगत और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल होता है, उतना ही उसके समर्थकों में प्रतिक्रिया की भावना पैदा हो सकती है। नरेंद्र मोदी के संदर्भ में कांग्रेस की आलोचना का राजनीतिक असर हमेशा एक जैसा रहा हो, ऐसा निष्कर्ष निकालना तथ्यों से परे होगा। चुनावी परिणाम अनेक कारणों से प्रभावित होते हैं-नेतृत्व, संगठन, स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवार, गठबंधन और मतदाताओं की अपेक्षाएं। फिर भी, यह एक महत्वपूर्ण राजनीतिक जोखिम है कि यदि विपक्ष अपनी आलोचना को प्रमाण और नीतिगत विकल्पों के बजाय व्यक्तिगत टिप्पणियों पर आधारित करता है, तो वह अपनी बात जनता तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने का अवसर खो सकता है। इसके विपरीत भाजपा को भी केवल विरोधियों के विवादास्पद बयानों पर प्रतिक्रिया देने के बजाय अपने कामकाज और नीतियों के आधार पर जनता के सामने जवाबदेह रहना चाहिए। राजनीति की भाषा समाज के व्यवहार को प्रभावित करती है। जब शीर्ष नेता सार्वजनिक मंचों पर संयम खोते हैं, तब उनके समर्थकों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच भी कटुता बढ़ने की आशंका रहती है। सोशल मीडिया इस प्रवृत्ति को और तेज कर देता है, जहां किसी बयान का छोटा-सा अंश पूरे विमर्श पर हावी हो सकता है। इसलिए नेताओं को बोलने से पहले शब्दों के सामाजिक प्रभाव और पद की गरिमा पर विचार करना चाहिए। राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को अपमानित करना और उसके तर्क को पराजित करना दो अलग बातें हैं, लोकतंत्र में दूसरी बात अधिक महत्वपूर्ण है। अंततः कांग्रेस हो या भाजपा, किसी भी दल की वास्तविक राजनीतिक शक्ति उसकी भाषा की आक्रामकता से नहीं, बल्कि उसके विचारों, नीतियों, जनसेवा और जनता के विश्वास से निर्धारित होनी चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन आलोचना तथ्यों और तर्कों पर आधारित होनी चाहिए। इसी प्रकार कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे हों या सत्तापक्ष के अन्य नेता सभी से अपेक्षा है कि वे असहमति को अपमान में न बदलें। राजनीति में शब्दों की मर्यादा कोई औपचारिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है। सत्ता बदलेगी, नेता बदलेंगे और दलों की स्थितियां बदलेंगी, लेकिन सार्वजनिक जीवन में बोले गए शब्द लंबे समय तक समाज की स्मृति में रहते हैं। इसलिए राजनीति को कटुता की नहीं, संवाद की भाषा चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र में विचारों की विजय होनी चाहिए, व्यक्तिगत अपमान की नहीं। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
27 अक्टूबर 2026 यानी आज ही के दिन इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सबसे बड़ी परीक्षा है। 68 लाख इजरायली वोटर्स नई सरकार चुनने के लिए वोट डाल रहे हैं। गाजा और ईरान वॉर के बीच यह इजरायल का पहला चुनाव है। दोनों मोर्चों पर नेतन्याहू कहीं ना कहीं असफल रहे हैं। पहले वो हमास का हमला रोकने में नाकाम रहे। फिर ईरान की बारी आई। लेकिन वो ना तो तख्ता पलट करा आ पाए और ना ही न्यूक्लियर प्रोग्राम बंद हुआ। उल्टा ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ताला लगा दिया है। इसके अलावा नेतन्याहू पर घूसखोरी और पद के दुरुपयोग से जुड़े मुकदमे चल रहे हैं। उनके कई अफसर जांच के दायरे में हैं। कई पुराने अफसरों ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। नेतन्याहू की विरोधी पार्टियों ने आपस में हाथ मिल लिया है। जबकि सहयोगी पार्टियां उनसे किनारा करने लगी हैं। इलेक्शन पोल्स में नेतन्याहू की हार तय बताई जा रही है। चर्चा है कि इस बार उनका करियर खत्म हो सकता है। लेकिन इन दावों में कुछ भी नया नहीं है। नेतन्याहू पिछले 30 वर्षों में से 20 बरस प्रधानमंत्री रहे हैं। पहली बार 1996 से 1999 तक दूसरी बार 2009 से 2021 तक और उनका तीसरा कार्यकाल दिसंबर 2022 में शुरू हुआ था। जब-जब उनको कुर्सी छोड़नी पड़ी तब-तब कहा गया कि उनकी वापसी नहीं होगी। मगर नेतन्याहू हर बार फिनिक्स की तरह राख से उगाए हैं। इसी वजह से लोग उनको किंग बीबी भी कहते हैं। लेकिन नेतन्याहू इतने ताकतवर बने कैसे? इजरायल की पॉलिटिक्स को उन्होंने कैसे बदला? नेतन्याहू का पावर पैटर्न क्या कहता है? इस चुनाव में उनकी पोजीशन कमजोर क्यों है? और क्या यह चुनाव उनका करियर खत्म कर सकता है? तमाम सवालों का एमआरआई स्कैन करते हैं। इसे भी पढ़ें: इजरायल में धड़ाधड़ वोटिंग चालू, नेतन्याहू नहीं, आइजेनकोट बनेंगे PM? 2026 के इज़राइल चुनावों में मुख्य दावेदार कौन हैं? एक लोकतंत्र होने के नाते, जहाँ चुनाव 'आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली' से होते हैं, इज़राइल में कई पार्टियाँ और सूचियाँ (lists) मौजूद हैं। पार्टियों और सूचियों के बीच अंतर यह है कि एक पार्टी एक ऐसा संगठन है जो चुनाव के तय नियमों के दायरे में रहकर सत्ता हासिल करना चाहती है, जबकि एक 'सूची' का मतलब वही है जो इसके नाम से पता चलता है। यह किसी पार्टी या पार्टियों के समूह द्वारा चुनाव के लिए तैयार की गई उम्मीदवारों की एक सूची होती है। कोई भी पंजीकृत पार्टी या सूची चुनाव लड़ सकती है। 'बेसिक लॉ: द नेसेट' की धारा 7A के तहत, सेंट्रल इलेक्शंस कमिटी (CEC) या सुप्रीम कोर्ट किसी राजनीतिक पार्टी की सूची या किसी उम्मीदवार को अयोग्य घोषित कर सकते हैं, यदि उनके एजेंडे या कार्यों से यह झलकता हो कि वे इज़राइल राज्य के एक यहूदी और लोकतांत्रिक देश के रूप में अस्तित्व को नकारते हैं, नस्लवाद को बढ़ावा देते हैं, या इज़राइल के खिलाफ किसी शत्रु देश या आतंकवादी संगठन द्वारा किए जा रहे सशस्त्र संघर्ष का समर्थन करते हैं। जब रजिस्ट्रार यह तय कर लेता है कि किसी पार्टी का प्लेटफॉर्म और व्यवहार लोकतंत्र के अनुरूप है और वह अपने खातों का उचित रिकॉर्ड रखती है, तो उस पार्टी को चुनाव लड़ने की मंजूरी दे दी जाती है। सत्तारूढ़ गठबंधन और दक्षिणपंथी गुट लिकुड: प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाली पार्टी, जो गिदोन सार की 'न्यू होप' के साथ विलय कर एक संयुक्त राष्ट्रीय-रूढ़िवादी (national-conservative) सूची के तहत चुनाव लड़ रही है। ओत्ज़्मा येहुदित: इतामार बेन-ग्विर के नेतृत्व वाली एक धुर-दक्षिणपंथी पार्टी सूची। रिलिजियस ज़ायनिस्ट पार्टी – ज़ेहुत: बेज़लेल स्मोट्रिच (रिलिजियस ज़ायनिज्म) और मोशे फेग्लिन (ज़ेहुत) के नेतृत्व वाली एक संयुक्त सूची। शास : आर्य देहरी के नेतृत्व वाली अति-रूढ़िवादी (अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स) सेफार्डिक पार्टी सूची। यूनाइटेड टोरा जुडाइज्म : डेगेल हातोराह और अगुदत यिसराएल के बीच एक अति-रूढ़िवादी अश्केनाज़ी संयुक्त सूची, जिसका नेतृत्व याकोव अशर कर रहे हैं। अमचा यिसराएल: इज़राइल रक्षा बलों (IDF) के पूर्व जनरल ओफ़र विंटर और कार्यकर्ता यूसुफ हद्दाद द्वारा गठित एक नई दक्षिणपंथी सूची। नोआम: एवी माओज़ के नेतृत्व वाली एक धुर-दक्षिणपंथी और धार्मिक रूप से रूढ़िवादी सूची। विपक्ष और मध्य-वामपंथी गुट टुगेदर - बेयाचाद: नफ्ताली बेनेट के नए आंदोलन और यायर लापिड की 'येश अतिद' पार्टी को मिलाकर बनी एक मध्य-दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी संयुक्त सूची। याशर!: पूर्व आईडीएफ (IDF) चीफ ऑफ स्टाफ गादी ईसेनकोट और पूर्व शिन बेट प्रमुख योरम कोहेन के नेतृत्व वाली एक व्यापक मध्यमार्गी सूची। इसे भी पढ़ें: Israel Election: 120 सदस्यीय संसद के लिए मतदान, बेंजामिन नेतन्याहू के सामने सत्ता बचाने की चुनौती अरब समुदाय की पार्टियां द जॉइंट लिस्ट: यह एक संयुक्त चुनावी सूची है, जिसमें हदाश, ताअल और बलाद गुट शामिल हैं। इसका नेतृत्व यूसुफ जबरीन और अहमद तिबी करते हैं। यूनाइटेड अरब लिस्ट (राआम): यह मंसूर अब्बास के नेतृत्व वाली एक इस्लामी अरब-इजरायली पार्टी है। संसदीय व्यवस्था इजरायल एक संसदीय लोकतंत्र है, जिसमें सत्ता के तीन मुख्य अंग हैं: विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। देश में एक-सदनीय संसद है, जिसमें 120 सदस्य होते हैं। नेसेट (इजरायली संसद) के सदस्यों (MKs) को पूरे देश से चार साल के कार्यकाल के लिए चुना जाता है। कार्यकारी शक्तियां प्रधानमंत्री के पास होती हैं। सरकार सीधे तौर पर नेसेट के विश्वास पर टिकी होती है और शासन चलाने के लिए उसे बहुमत (कम से कम 61 सीटें) बनाए रखना जरूरी होता है। न्यायपालिका, जिसका नेतृत्व सुप्रीम कोर्ट करता है, स्वतंत्र रूप से काम करती है। यह बुनियादी कानूनों की व्याख्या करती है और कानूनों की समीक्षा करती है। इजरायल में राष्ट्रीय चुनावों का संचालन और देखरेख CEC (केंद्रीय चुनाव आयोग) द्वारा की जाती है। इसे भी पढ़ें: 1 घंटे में खाक कर देंगे, ईरान की नई धमकी, मार गिराया गया LUCAS ड्रोन! चुनावी थ्रेशोल्ड इज़राइल की 'पार्टी-लिस्ट आनुपातिक प्रतिनिधित्व' प्रणाली में 'चुनावी थ्रेशोल्ड' वह न्यूनतम प्रतिशत है जो किसी राजनीतिक दल को संसद में प्रवेश करने के लिए कुल राष्ट्रीय वोटों में से हासिल करना होता है। वर्तमान में यह सीमा 3.25% तय की गई है — यह मानक 2014 में नेसेट (इज़राइली संसद) के कानून द्वारा स्थापित किया गया था। इस सीमा को पार करने पर, किसी दल को नेसेट की कुल 120 सीटों में से कम से कम 4 सीटें मिल जाती हैं। यदि कोई दल 3.25% के इस आंकड़े तक नहीं पहुँच पाता है, तो उसे मिले सभी वोट रद्द कर दिए जाते हैं। इस तरह ये वोट 'बेकार' हो जाते हैं और इन्हें उन दलों के बीच फिर से बांट दिया जाता है जो सफल रहे हैं। इस थ्रेशोल्ड (सीमा) का मुख्य उद्देश्य संसद के अत्यधिक बिखराव को रोकना और बहुत छोटे दलों को बाहर रखकर, प्रतिनिधित्व और राजनीतिक स्थिरता के बीच संतुलन बनाना है। इज़रायली डेमोक्रेसी इंस्टीट्यूट के शोधकर्ता प्रो. ओफ़र केनिग बताते हैं कि 1951 में यह सीमा केवल 1% थी, जिसे धीरे-धीरे बढ़ाकर 1.5% (1992), 2% (2003) और अंततः 3.25% (2014) कर दिया गया। यह ऊँची सीमा छोटे वैचारिक समूहों या विशिष्ट दलों को चुनाव के दिन से पहले आपस में मिलकर एक साझा चुनावी सूची (इलेक्टोरल स्लेट) बनाने के लिए प्रेरित करती है, ताकि वे मिलकर इस थ्रेशोल्ड को पार कर सकें। वे आगे कहते हैं कि इस वजह से, 3.25% का यह नियम गठबंधन के समीकरण तय करने और यह निर्धारित करने में निर्णायक भूमिका निभाता है कि कौन-सा राजनीतिक गुट सरकार बना सकता है। इज़राइल में कैसे बनती है सरकार? समझिए पूरी प्रक्रिया इज़राइल के राजनीतिक इतिहास में आज तक किसी भी पार्टी को अपने दम पर 61 सीटों का स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। यही वजह है कि वहां हमेशा गठबंधन सरकार ही बनती आई है। ऐसे में पुराने और नए सहयोगियों को साधकर सरकार बनाने की प्रक्रिया में अक्सर काफी समय लगता है। मतदान के बाद केंद्रीय चुनाव समिति (CEC) अंतिम परिणाम और सीटों के वितरण को प्रमाणित करती है। इसके बाद राष्ट्रपति उन सभी दलों के प्रतिनिधियों से बातचीत करते हैं जिन्होंने चुनावी सीमा (इलेक्टोरल थ्रेशोल्ड) पार की है। इस चर्चा का मुख्य उद्देश्य प्रधानमंत्री पद के संभावित उम्मीदवारों पर राय लेना होता है। दलों से विचार-विमर्श के बाद राष्ट्रपति उस उम्मीदवार को सरकार बनाने का न्योता (जनादेश) सौंपते हैं, जिसके पास 61 सीटों का जादुई आंकड़ा जुटाने की सबसे अधिक संभावना होती है। नामित उम्मीदवार को गठबंधन तैयार करने के लिए शुरुआत में 28 दिनों का समय दिया जाता है। जरूरत पड़ने पर राष्ट्रपति इसे 14 दिनों के लिए और बढ़ा सकते हैं। यदि पहला उम्मीदवार तय समय में बहुमत जुटाने में असमर्थ रहता है, तो राष्ट्रपति यह जनादेश किसी दूसरे उम्मीदवार को सौंप सकते हैं, जिसे 28 दिनों का समय मिलता है। गठबंधन समझौता तय होने के बाद, नामित प्रधानमंत्री अपनी नई सरकार, नीतिगत दिशा-निर्देशों और कैबिनेट मंत्रियों की सूची को संसद (नेसेट) के सामने औपचारिक विश्वास मत के लिए पेश करते हैं। संसद में कम से कम 61 सदस्यों का समर्थन हासिल होते ही नई सरकार और उसके मंत्री पद की शपथ लेते हैं।
माओवादी आ-तंक समाप्त: मोदी सरकार में कितना बदला बस्तर?
अक्सर कुछ लोग कहते मिल जाते हैं कि भाजपा और मोदी सरकार में क्या ही बदला है? ये इतना सामान्यीकरण करने वाला प्रश्न है। जो किसी के गले नहीं उतरता है। कहीं और की बात न करें केवल छत्तीसगढ़ और बस्तर को ही देखें तो हमें पूरी तस्वीर ही अलग दिखाई देती है। भाजपा सरकार ने तय समय पर 31मार्च 2026 को छत्तीसगढ़ समेत देश को सशस्त्र माओवादी आ-तंक से मुक्त कर दिया। बस्तर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर गृहमंत्री अमित शाह और अब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का पहुंचना। ये कोई सामान्य बात नहीं है। ये इतिहास की वो लकीर है। जो राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षा और समृद्धि की संघर्षमय-प्रतिबद्धता की कहानी कहती है। 2024 में जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ये ऐलान किया था। उस समय लोग विश्वास नहीं कर रहे थे। 'विरोध के लिए विरोध करने वाले' धड़े, उपहास उड़ा रहे थे। किन्तु जब तय समय सीमा में देश से माओवादी आ-तंक ( नक्सलवाद) समाप्त हो गया तो विरोध करने वाले उपहास का पात्र बनकर रह गए। हालांकि 'अर्बन नक्सली' और उन्हीं के र-क्तबीज 'दिमागी नक्सली' आज भी बस्तर में आंखें गड़ाए बैठे हैं। किन्तु वो अब कभी भी सफल नहीं हो पाएंगे। क्योंकि पूरा समाज जाग चुका है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार 23 अक्टूबर 2026 को बस्तर में राष्ट्रपति का जाना हुआ है। सैकड़ों साल पुरानी 'मुरिया दरबार' परंपरा और वहां की कई परंपराओं से राष्ट्रपति का साक्षात्कार होना ।हमारी सांस्कृतिक अन्तश्चेतना का प्रतिबिम्ब है। ये कोई सामान्य बात नहीं है। यह उस संकल्प की परिणति है। जो संकल्प—बस्तर की ख़ुशहाली के लिए प्रतिबद्ध है। इसे भी पढ़ें: Bastar से Naxalism का खात्मा: Union Home Minister Amit Shah ने उजागर किया पांच दशकों के आतंक का सच बस्तर में यही लोकतन्त्र का उदय है। जहां अब लोग निर्भय होकर जीवन जी रहे हैं। राष्ट्रप्रमुख उनके बीच पहुंच रहे हैं। जबकि इसके पहले 'अर्बन नक्सलियों' की कमांड से संचालित होने वाले सशस्त्र माओवादी — वहां हिं-सा, रक्त'-पात का वीभत्स खेल, रचते थे। 'जनताना' सरकार के नाम पर भारत के लोकतन्त्र और संविधान को चुनौती देते थे। इन्हें किस विचार और पूर्ववर्ती सरकार का घोषित-अघोषित समर्थन प्राप्त था? क्या ये किसी से छिपा है? लेकिन अब नक्सली नेस्तनाबूद हो चुके हैं। जिन माओवादियों ने सरेंडर किया है। उनके पुनर्वास के कार्यक्रम चल रहे हैं। उनको कौशल सम्पन्न बनाया जा रहा है। मुख्य धारा से जोड़ा जा रहा है। ये केंद्र की मोदी और राज्य की साय सरकार ने ही कर दिखाया है। आप इनकी और मुद्दों पर आलोचना कर सकते हैं। लेकिन माओवादी आ-तंक को समाप्त करने का जो साहसिक कार्य भाजपा सरकार ने किया है। वो 'न भूतो न भविष्यति' जैसा ही है। अब बस्तर में - बस्तर पंडुम हो रहा है, बस्तर ओलंपिक हो रहा है। पर्यटन का विस्तार हो रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सड़कों का नया जाल बुना जा रहा है। भारत की राष्ट्रपति के तौर पर द्रौपदी मुर्मु का बस्तर पहुंचना भी कोई सामान्य बात नहीं है। उनका राष्ट्रपति बनना भी कोई साधारण बात नहीं थी। ये भी ध्यान रखना चाहिए कि- जनजातीय समाज से आने वाली बेटी 'द्रौपदी मुर्मु' को भाजपा ने सर्वोच्च पद राष्ट्रपति की आसंदी तक पहुंचाया है। जबकि कांग्रेस नेतृत्व वाले इंडी गठबंधन ने- जनजातीय समाज की इसी बेटी के ख़िलाफ़ अपना उम्मीदवार उतारा था। वो किसी भी स्थिति में जनजातीय समाज से आने वाली बेटी को राष्ट्रपति नहीं बनने देना चाहते थे। भला, कांग्रेस और इंडी गठबंधन को जनजातीय समाज के विरोध में आने से क्या हासिल हुआ? क्या ये कॉलोनियल माइंडसेट नहीं था, जो जनजातीय समाज को कभी भी स्वीकार नहीं करना चाहता है? वहीं गाहे-बगाहे कुछ लोग भारत के लोकतन्त्र को नसीहतें देते रहते हैं। उपनिवेश की मानसिकता के गुलाम आज भी कहते हैं कि —“15 अगस्त 1947 के बाद ही भारत में लोकतन्त्र आया।” ऐसे में उन्हें बस्तर के 'मुरिया दरबार' को जानना चाहिए। जहां सैकड़ों सालों से लोकतन्त्र और जन-संवाद का अद्भुत उदाहरण मिलता है। सैकड़ों गांवों के मांझी, चालकी और प्रतिनिधि 'मुरिया दरबार' में अपनी बातें रखते थे। क्षेत्र से जुड़े मुद्दों पर गहन, चिंतन और विमर्श करने की परंपरा निर्बाध रूप से जारी है। जहां पूरा समाज एक-दूसरे का पूरक है। भारत के कोने-कोने में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं। अंतर केवल इतना है कि भारत ने लोकतन्त्र शब्द का झुनझुना नहीं बजाया बल्कि लोकतन्त्र को जीवन में उतारा है। इसे शराब और ऐय्याशी में डूबे एसी कमरों में बैठने वाले तथाकथित अकादमिक जल्लाद और गल्पकार ( इतिहासकार) नहीं समझ सकते हैं। ये भी ध्यान में रखना चाहिए कि वो लोग जो हमारे जनजातीय बांधवों को अपने चश्मे से दिखाते हैं। बताते हैं कि 'आदिवासी हिन्दू नहीं हैं।' वो 75 दिनों तक चलने वाले बस्तर दशहरे को देखें। हमारा जनजातीय समाज ही बस्तर दशहरे का मुख्य कर्ताधर्ता है। पारंपरिक रीति-रिवाजों, मान्यताओं का जितना कड़ाई से जनजातीय समाज पालन करता है। उसका हम आप सहस्त्रांश नहीं कर पाते। यही हिन्दुत्व का विराट स्वरूप है। ये जो जात-पात, वाद आदि के ज़हर से समाज को तोड़ने की साज़िश करते रहते हैं। वो ज़रा! पूरे बस्तर दशहरा में एक कोई प्रकरण ढूंढ़ कर ला दें। जब पूरे बस्तर दशहरे के आयोजन के बीच कहीं कोई भेदभाव होता हो। यहां हर समाज के लोग बस आस्था और परंपरा के रंगों में डूबे मिलते हैं। प्रसन्नता के साथ धार्मिक अनुष्ठानों को पूरा करते मिलते हैं। कहने का आशय ये है कि —अब बस्तर में बारूद की गंध नहीं है। अब बस्तर में प्रकृति, संस्कृति, परिवर्तन और विकास की नई चेतना हिलोरें ले रही है। ये इसीलिए संभव हो पाया है क्योंकि देश की जनता ने प्रधानमंत्री के तौर पर नरेन्द्र मोदी को दिल्ली में चुनकर भेजा है। जो 'विकास और विरासत' को एक साथ लेकर चलने के लिए संकल्पबद्ध है। आप सोचिए कि —अगर केंद्र और राज्य में भाजपा सरकार नहीं होती तो क्या देश से माओवादी आ-तंक समाप्त हो पाता ? क्या धारा-370 ख़त्म हो पाती? बस्तर में हम जो दृश्य देख पा रहे हैं क्या वो कभी दिख पाते ? ज़रा ! इन सवालों के ज़वाब ख़ुद से एक बारगी ज़रूर पूछिएगा ! — कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल (साहित्यकार, स्तंभकार एवं पत्रकार)
'पंजाब में माइनिंग माफिया का 2000 करोड़ का कच्चा-चिट्ठा बेनकाब', मजीठिया नेता ने आम आदमी पार्टी पर लगाए आरोप
कमजोर वैश्विक संकेतों के चलते लाल निशान में खुला बाजार
मुंबई, हफ्ते के दूसरे कारोबारी दिन मंगलवार को भारतीय शेयर बाजार ने सुस्त शुरुआत की। यह लगातार छठा दिन है जब बाजार में गिरावट दर्ज की गई है, वहीं इस हफ्ते का गिरावट का यह लगातार दूसरा दिन है। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव के चलते बाजार में सतर्कता का माहौल बना हुआ है।
यूपी : विधान परिषद की 11 सीटों पर मतगणना शुरू, भाजपा-सपा के बीच सियासी मुकाबले पर नजर
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क्रांतिकारी जतींद्रनाथ दास की जयंती पर भजनलाल शर्मा और सम्राट चौधरी समेत कई नेताओं ने दी श्रद्धांजलि
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आगरा एमएलसी चुनाव में चूक पर कार्रवाई, चुनाव आयोग ने छह अधिकारियों के निलंबन के दिए आदेश
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आरजी कर केस: सोशल मीडिया अभियान पर पीड़िता की मां की सफाई, बोलीं- हम शामिल नहीं
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लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन निजी हमले स्वीकार्य नहीं : रोहन गुप्ता
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सऊदी में फंसे हज और उमरा यात्रियों को सरकार अपने खर्च पर वापस लाए : नसीम सिद्दीकी
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मल्लिकार्जुन खड़गे के बचाव में उतरे प्रियांक खड़गे, बोले- भाजपा चुनिंदा मुद्दों को लेकर राजनीति कर रही है
तमिलनाडु: कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर 31 अक्टूबर को प्रदर्शन करेगी डीएमके महिला विंग
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Chai Par Sameeksha: Rahul Gandhi Vietnam Visit और भारत में चल रहे प्रदर्शनों का क्या कनेक्शन है?
प्रभासक्षी के साप्ताहिक कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में इस सप्ताह हमने प्रदर्शनों को लेकर चर्चा की। हमेशा की तरह इस कार्यक्रम में मौजूद रहे प्रभासाक्षी के संपादक नीरज कुमार दुबे। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि 13 देशों में लगातार प्रदर्शनों का दौर है और इन सभी देशों में एक कुछ खास संगठन के लोग ही इन प्रदर्शनों को संचालित कर रहे हैं। नेपाल और बांग्लादेश में इन्हें सफलता मिली जिसके बाद से इनका हौसला बढ़ा हुआ है और यह लगातार उन देशों को टारगेट कर रहे हैं जो तेजी से तरक्की कर रहे हैं। नीरज दुबे ने साफ तौर पर कहा कि ज्यादातर देशों में हमने देखा कि विद्यार्थियों के प्रदर्शन से इस तरह की चीज शुरू होती है जो लगातार अलग-अलग मुद्दों पर बढ़ती जा रही है और फिर सत्ता परिवर्तन होता है। नीरज दुबे ने साफ तौर पर कहा कि जो तार सभी प्रदर्शनों से मिलते हुए नजर आ रहे हैं उस पर मंथन करने की जरूरत है। जिस तरह की कोर्ट में टिप्पणियां की जा रही है, उस पर भी गौर करने की जरूरत है। नीरज दुबे ने यह भी कहा कि इस देश में पहले शुरू हुआ, किस देश में बाद में शुरू हुआ यह चर्चा का विषय नहीं है। चर्चा इस बात पर होनी चाहिए कि यह आंदोलन शुरू कैसे हुए और जहां इस पर गौर करेंगे वही आपको पता चल जाएगा कि आखिर प्रदर्शनकारियों के मकसद क्या है। उन्होंने कहा कि हमारी दिल्ली पुलिस, हमारे सुरक्षा बलों ने धैर्य और संयम रखा जिसका नतीजा हम सब देख रहे हैं। विश्व के कई देशों में आगजनी जैसा माहौल है लेकिन भारत में जोर-जोर से दुर्गा पूजा मनाया गया और अब दिवाली की तैयारी चल रही है। इसे भी पढ़ें: PM Modi पर बयान के बाद देशभर में BJP का विरोध, Rahul Gandhi और Kharge से माफी की मांग की राहुल गांधी पर बोलते हुए नीरज दुबे ने साफ तौर पर कहा कि हाल के दिनों में वह चौथी बार वियतनाम गए हैं। उन्होंने कहा कि निजी जीवन सबका होता है लेकिन जब आप सार्वजनिक जीवन में है और आप नेता प्रतिपक्ष हैं तब आपको देश को बताना चाहिए कि आप कहां जा रहे हैं। आपका मकसद क्या है। उन्होंने कहा कि सरकार के पास बहुत सारी चीजें जानकारी में रहती हैं लेकिन आपकी जानकारी को सरकार सार्वजनिक नहीं कर सकती है। लेकिन आप एलओपी हैं, ऐसे में आपको अगर एक ही देश का दौरा बार-बार करना पड़ रहा है तो आप उसे देशवासियों को बता सकते हैं। नीरज दुबे ने कहा कि जब आपको देश में दुर्गा पूजा उत्सव और विजयदशमी में शामिल होना चाहिए था तब आप विदेश चले गए। इसके अलावा अब जब व्यापारियों के लिए बिजनेस का माहौल आ रहा है तब आप रामलीला मैदान में आंदोलन करने की तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में व्यापारी को नुकसान हो रहा है। इंडिया ब्लॉक के ऑनलाइन मीटिंग कैंसिल होने पर नीरज दुबे ने कहा कि आप दिल्ली में इतने बड़े रैली का कॉल दे चुके हैं लेकिन आप खुद विदेश चले गए। त्यौहार का मौसम है और आप जिन नेताओं पर लोगों को लाने के लिए कह रहे हैं उनके ऊपर भी प्रेशर है और ऐसे में वह लोग कहां से लाएं यह बड़ी चुनौती रहने वाली है। क्योंकि त्योहारों का मौसम है और रैली के लिए लोग इतनी दूर घर छोड़कर कैसे आएंगे। यह बड़ा सवाल है। यही कारण है कि इंडिया ब्लॉक को अपनी ऑनलाइन मीटिंग कैंसिल करनी पड़ी। उत्तर प्रदेश में सीट बंटवारे का पेंच भी फंसा हुआ है। इस पर नीरज दुबे ने साफ तौर पर कहा कि दोनों दल एक दूसरे के साथ लड़ना तो चाहते हैं। लेकिन एक दूसरे को किस तरीके से कमजोर किया जाए इसकी भी कोशिश जारी है।
कर्नाटक भाजपा ने पीएम मोदी के पिता पर खड़गे की टिप्पणी के विरोध में प्रदर्शन किया, माफी की मांग की
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पंजाब में कानून-व्यवस्था ध्वस्त, खुलेआम हो रही हत्याएं और लूटपाट: वीरेंद्र सचदेवा
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ब्रह्माकुमारीज संस्था के 'नशा-मुक्त भारत' अभियान को पूरा समर्थन देगी सरकारः नितिन नवीन
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मल्लिकार्जुन खड़गे को अपने बयान के लिए माफी मांगनी चाहिए : दानिश अंसारी
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फारूक अब्दुल्ला पर भाजपा नेता ने बोला हमला, कहा- 'पाकिस्तान से इतना प्रेम है तो वहीं चले जाएं'
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लैटिन अमेरिका के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश ब्राजील में जहां राष्ट्रपति चुनाव के बेहद कांटे के मुकाबले में मौजूदा राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा ने ऐतिहासिक जीत दर्ज कर ली है। लेकिन इस जीत के साथ ही ब्राजील में एक सियासी बवंडर भी शुरू हो गया है। पूर्व राष्ट्रपति जायर बोलसुनारो के बेटे और विपक्षी उम्मीदवार फ्लेवियो बोलसुनारो ने नतीजों को मानने से साफ इंकार कर दिया है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और चुनाव प्रक्रिया पर सीधे तौर पर धांधली और नियमों से छेड़छाड़ का गंभीर आरोप लगाते हुए चुनावों को रद्द करने की मांग कर दी है। पहले राउंड में पिछड़े फिर पलटीबाजी और अब ऐसी जीत की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की दक्षिणपंथी राजनीति के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया। ब्राजील में 80 साल के लुईस इनासियो लूला दा सिल्वा ने राष्ट्रपति चुनाव जीतकर इतिहास रच दिया। उन्होंने फ्लावियो बोलसनारो को हराकर चौथी बार राष्ट्रपति पद हासिल किया है। लेकिन इस जीत की सबसे बड़ी बात सिर्फ इतनी नहीं कि लूला फिर सत्ता में लौटे हैं। असली कहानी है उनकी चुनावी वापसी। ब्राजील की संप्रभुता और अमेरिका के साथ रिश्तों का भविष्य। क्योंकि लूला खुले तौर पर ट्रंप की कई नीतियों की आलोचना करते रहे हैं। वहीं उनके प्रतिद्वंदी फ्लावियो बालसुनारो दक्षिणपंथी नेता और पूर्व राष्ट्रपति जार बोलसुनारो के बेटे हैं। ऐसे में लूला की जीत को ट्रंप की राजनीति के लिए झटके के तौर पर देखा जा रहा है। लेकिन क्या यह वाकई ट्रंप की हार है? क्या ब्राजील ने अमेरिका को साफ संदेश दे दिया है? कि वो किसी के दबाव में नहीं आएगा और पहले दौर में पीछे रहने के बाद लूला ने आखिर में जो है बाजी कैसे पलट दी। इसने ट्रंप के घमंड और दादागिरी को कैसे चूरचूर कर डाला और लूला का चौथी बार ब्राजील का राष्ट्रपति बनना लैटिन अमेरिका की राजनीति पर कैसा संभावित असर डालने वाला है। कैसे लूला ने सेंकेड राउंड में पलट दी बाजी ब्राजील के राष्ट्रपति चुनाव का पहला दौर लूला के लिए चुनौती लेकर आया था। दक्षिणपंथी सेनेटर फ्लावियो बोलसनारो पहले दौर में आगे रहे जबकि लूला दूसरे स्थान पर थे। ऐसा लग रहा था कि ब्राजील में सत्ता का समीकरण बदल सकता है। लेकिन दूसरे दौर में तस्वीर पलट गई। ब्राजील के सुपीरियर इलेक्टोरल कोर्ट यानी टीएसई की तरफ से जारी आधिकारिक नतीजों के मुताबिक वोटों की गिनती पूरी हो चुकी है। अगर नतीजों के आंकड़ों पर नजर डालें तो सत्ताधारी वर्कर्स पार्टी के नेता लूला डसिलवा को 51.78% वैध वोट मिले हैं। वहीं लिबरल पार्टी के उम्मीदवार फ्लेवियो को 48.23% वोट हासिल हुए हैं। यानी कि जीत और हार का अंतर महज 3.5% का है। यह अंतर दिखाता है कि ब्राजील की जनता वैचारिक रूप से दो फाड़ हो चुकी है और मुकाबला आखिरी वोट तक कितना करीबी था। इस चुनाव की सबसे दिलचस्प बात यह रही कि पहले दौर में लूला दसिलवा पीछे चल रहे थे। 4 अक्टूबर को हुए पहले राउंड के मतदान में फ्लेवियो बोलसनारो 47.03% वोटों के साथ बढ़त बनाए हुए थे। जबकि लूला को 45% 16% वोट मिले थे। उस वक्त ऐसा लग रहा था कि दक्षिणपंथी लहर लूला की सत्ता को उखाड़ फेंकेगी। लेकिन इसके बाद लैटिन अमेरिका में तीन हफ्तों तक चला आक्रामक चुनाव प्रचार। लूला ने अपने मजदूर वर्ग के जनाधार पूर्वोत्तर के गढ़ और आम जनता के बीच जमीन नापी। दूसरे दौर यानी रन ऑफ में शानदार वापसी करते हुए लूला ने बाजी पलट दी। इसे भी पढ़ें: ट्रंप के मुखर आलोचक Lula Da Silva ब्राजील में फिर जीते; 44 लाख वोटों से Flavio Bolsonaro हारे, चुनाव नतीजे रद्द करने की मांग की नतीजों पर प्रतिद्वंद्वी बोलसनारो ने क्या कहा अब बात करते हैं उस विवाद की जिसने ब्राजील को एक बार फिर राजनीतिक अस्थिरता के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। हार के बाद ब्राज़लिया से फ्लेवियो बोलसनारो ने तीखा बयान जारी करते हुए कहा कि जिन परिस्थितियों में यह सब हुआ उसके बाद नतीजों को स्वीकार करना असंभव है। हम कानूनी कारवाई करेंगे और चुनाव को रद्द करने की मांग करेंगे। रविवार की दोपहर क्रिस्टियानो जानी ने मतदान केंद्रों को 2 घंटे अतिरिक्त खुला रखने का आदेश दे दिया। फ्लेवियो बल्सनारो का आरोप है कि जस्टिस जानिन को लूला ने ही सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किया था और वह पहले लूला के निजी वकील रह चुके हैं। एंड वक्त पर वोटिंग का समय बढ़ाकर सुप्रीम कोर्ट ने खेल के नियम बदल दिए जिससे लूला को फायदा पहुंचाया गया है। हालांकि इस पूरे विवाद पर एक पेच यह भी है कि खुद बालसुनारो के कैंप ने भी खराब मौसम के चलते कुछ राज्यों में समय बढ़ाने की मांग की थी। इलेक्ट्रोरल कोर्ट के चीफ कांसियो नून्स मारकेस ने दोनों उम्मीदवारों से बात की और लूला की जीत की औपचारिक पुष्टि कर दी। दिलचस्प बात यह भी है कि मार्केस को पूर्व राष्ट्रपति जायर व्सेसारो के कार्यकाल में नियुक्त किया गया था। मार्केस ने साफ किया कि आखिरी पलों में समय बढ़ाने के फैसले से काउंटिंग पर असर जरूर पड़ा है। लेकिन अंतिम नतीजों में कोई बाहरी दखल नहीं था और चुनाव निष्पक्ष रहा है। लेकिन दुनिया की चिंताएं इसलिए बढ़ गई है क्योंकि यह पूरा घटनाक्रम साल 2022 के चुनाव की याद दिलाता है। उस समय जाहिर बोलसुनारो ने भी लूला से मिली करीबी हार को स्वीकार नहीं किया था। जिसके बाद उनके समर्थकों ने संसद और सरकारी इमारतों पर धावा बोल दिया था। इसे भी पढ़ें: ''White House ऐसा लगता है जैसे Saddam Hussein ने Cheesecake Factory खोल ली हो'', Obama के तंज पर बुरी तरह भड़के Trump लूला की वापसी और वाशिंगटन के लिए संदेश यह जीत 80 वर्षीय लूला की एक और राजनीतिक वापसी है। उन्हें 2018 से 2019 के बीच भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल हुई थी, लेकिन बाद में ये आरोप खारिज कर दिए गए। 2022 में जायर बोल्सोनारो को हराकर वे फिर से सत्ता में लौटे। लूला की यह जीत ऐसे समय में हुई है, जब लैटिन अमेरिका के कुछ हिस्सों में दक्षिणपंथी सरकारों की ओर झुकाव बढ़ रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान, उन्होंने बोल्सोनारो के खेमे पर ब्राजील की संप्रभुता के लिए खतरा पैदा करने का आरोप लगाया। साथ ही, उन्होंने ऐसी नीतियों के खिलाफ चेतावनी दी जो सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों को कमजोर कर सकती हैं, और गरीबी कम करने तथा पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में हुई प्रगति को उलट सकती हैं। यह नतीजा ट्रम्प के लिए एक झटका है, जिनके प्रशासन ने बोल्सोनारो परिवार को फिर से सत्ता में लाने की कोशिशों का समर्थन किया था। लूला का लगातार नेतृत्व इस क्षेत्र में वाशिंगटन के प्रभाव को संतुलित करने का काम कर सकता है। लूला के कार्यकाल में विदेश मंत्री रहे सेल्सो अमोरिम ने रॉयटर्स को बताया कि लैटिन अमेरिका में संतुलन बनाए रखने में ब्राज़ील के राष्ट्रपति की भूमिका अहम होगी। इसे भी पढ़ें: Iran ने कहा America के साथ कूटनीति के रास्ते खुले, मध्यस्थों से भेजे जा रहे संदेश इस जीत ने कैसे ट्रंप को हरा दिया? लूला डसिलवा वही शख्सियत हैं जिन्होंने ना सिर्फ डोनाल्ड ट्रंप को उंगलियां दिखाई, तेवर दिखाया और यह भी जता दिया कि ब्राजील जो है अमेरिका का कोई गुलाम बनने वाला देश नहीं है। उसके प्रभाव से जो है मुक्त रहने वाला देश है। उसने साफ-साफ कह दिया था कि अगर हमारे ऊपर किसी भी तरह से व्यापारिक दबाव बढ़ाने की कोशिश की जाती है तो हमारे पास और भी बहुत सारे रास्ते खुले हुए हैं। डोनाल्ड ट्रंप को यह बातें जो है अपने ईगो से ज्यादा बड़ी दिखाई दी। उनका ईगो कहीं ना कहीं इससे हर्ट होता हुआ दिखाई दिया था। ऐसी अपेक्षाएं रही होंगी उनको कि लूरा डसिलवा जो है सत्ता से अब बेदखल हो जाए। लेकिन इस चुनाव ने कहीं ना कहीं उनकी उम्मीदों पर पानी फेर कर रख दिया है। कंजेर्वेटिव कांग्रेस लूला के लिए पेश कर रही है चुनौती अपनी जीत के बावजूद, लूला को अपने चौथे कार्यकाल के दौरान बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ब्राज़ील ने 1980 के दशक में लोकतंत्र की बहाली के बाद से अपनी सबसे रूढ़िवादी कांग्रेस चुनी है, जहाँ बोल्सोनारो की लिबरल पार्टी और उसके सहयोगियों का दोनों सदनों में गहरा प्रभाव रहने की उम्मीद है। यह राजनीतिक संतुलन लूला के लिए नए कानून पारित कराने और बजट संबंधी निर्णयों पर नियंत्रण बनाए रखने में मुश्किलें खड़ी कर सकता है। आर्थिक दबाव भी एक और बड़ी चिंता का विषय है। सरकार ने अगले वर्ष 2.3% की आर्थिक वृद्धि का अनुमान लगाया है, जबकि सार्वजनिक ऋण बढ़कर सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 82% से अधिक हो गया है। ऊँची ब्याज दरें, घरेलू कर्ज़ और सरकारी खर्च को नियंत्रित करने का दबाव प्रशासन पर भारी पड़ने के आसार हैं। इसलिए लूला को सामाजिक कार्यक्रमों और राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा के अपने वादे को पूरा करने के साथ-साथ एक रूढ़िवादी विधायिका के साथ तालमेल बिठाकर काम करना होगा। उनकी इस जीत ने एक और कार्यकाल तो सुरक्षित कर लिया है, लेकिन बोल्सोनारो खेमे द्वारा चुनावी नतीजों को स्वीकार करने से इनकार करने के कारण आने वाले हफ्तों में राजनीतिक तनाव और बढ़ सकता है।
प्रधानमंत्री मोदी को ऐसी टिप्पणियों से विचलित नहीं किया जा सकताः राजनाथ सिंह
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खड़गे के खिलाफ दिल्ली पुलिस में शिकायत, हिंदू सेना ने कहा- 'पीएम मोदी पर अपमानजनक टिप्पणी अस्वीकार्य'
आत्मघाती कड़वाहट: हताशा में मर्यादा की लक्ष्मण रेखा भूली कांग्रेस
भारतीय लोकतंत्र का इतिहास वैचारिक असहमतियों, तीखे तर्कों और धारदार बहसों से समृद्ध रहा है। संसद से लेकर सड़क तक, देश ने दक्षिणपंथ से लेकर वामपंथ और क्षेत्रीय अस्मिताओं के बीच बड़े-बड़े वैचारिक द्वंद्व देखे हैं। लेकिन, अतीत में इन सभी बहसों की एक अंतर्निहित मर्यादा होती थी। राजनीतिक विरोधी एक-दूसरे की नीतियों पर प्रहार करते थे, चरित्र और मर्यादाओं पर नहीं। दुर्भाग्य से, समकालीन राजनीति ने संवाद की उस समृद्ध परंपरा को हाशिए पर धकेल दिया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके दिवंगत पिता को लेकर की गई एक बेहद विवादित टिप्पणी (मोदी का बाप भी जाएगा) और उसके बाद आज पूरे देश में मचा सियासी बवाल इसी कड़वी हकीकत की तस्दीक करता है। पटना के एक कार्यक्रम में सामने आए इस बयान ने न केवल एक बड़ा राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है, बल्कि यह सवाल भी नए सिरे से उठा दिया है कि क्या देश का राजनीतिक नेतृत्व जन-सरोकारों से ध्यान भटकाने के लिए भाषा की मर्यादा की बलि चढ़ाने पर आमादा है? घटनाक्रम की पृष्ठभूमि को देखें तो यह पहली बार नहीं है जब देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल के सर्वोच्च पद पर बैठे नेता की जुबान फिसली हो। चुनावी रैलियों या राजनीतिक मंचों पर तात्कालिक तालियां बटोरने या कार्यकर्ताओं में जोश भरने के उत्साह में अक्सर नेता अपनी सीमाएं लांघ जाते हैं। पटना की सभा में जब भीड़ से किसी ने नारा लगाया या कुछ कहा, तो उसके जवाब में कांग्रेस अध्यक्ष का आपा खोना और प्रधानमंत्री के उस दिवंगत पिता तक पहुंच जाना, जो कभी राजनीति का हिस्सा ही नहीं रहे, किसी भी सभ्य समाज और स्वस्थ लोकतंत्र में स्वीकार्य नहीं माना जा सकता। आज इसी का नतीजा है कि भारतीय जनता पार्टी देश भर के सभी राज्य मुख्यालयों में इसके खिलाफ राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन कर रही है, पटना की अदालतों में शिकायतें दर्ज हो रही हैं और संसद से लेकर सड़कों तक का माहौल एक बार फिर वैचारिक विमर्श के बजाय व्यक्तिगत प्रतिशोध की आग में झुलस रहा है। इसे भी पढ़ें: Mallikarjun Kharge के ‘मोदी का बाप भी जाएगा’ बयान से भड़की BJP, NDA नेताओं ने साधा निशाना इस पूरे विवाद में दोनों पक्षों की अपनी-अपनी दलीलें और रणनीतियां हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और नितिन गडकरी जैसे भाजपा के शीर्ष नेताओं ने इसे लोकतंत्र की न्यूनतम मर्यादाओं को तार-तार करने वाला कृत्य करार दिया है। सत्ता पक्ष का तर्क है कि जब विपक्ष नीतियों के मोर्चे पर सरकार को घेरने में नाकाम रहता है, तो वह व्यक्तिगत कुंठा और हताशा में इस तरह के आक्षेपों पर उतर आता है। दूसरी तरफ, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस और उसके समर्थकों की ओर से सफाई पेश की जा रही है कि इस बयान को संदर्भ से काटकर देखा जा रहा है। उनका कहना है कि मल्लिकार्जुन खड़गे का इरादा किसी के स्वर्गीय पिता का व्यक्तिगत अपमान करना नहीं था, बल्कि वे एक वैचारिक संदर्भ (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या सरकार की नीतियां) में अपनी तीखी राजनीतिक प्रतिक्रिया दे रहे थे। लेकिन क्या राजनीति में 'संदर्भ' की आड़ लेकर व्यक्तिगत गरिमा पर चोट करने की छूट दी जा सकती है? यह एक ऐसा बुनियादी सवाल है, जिससे कोई भी दल बच नहीं सकता। इस मुद्दे का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू इसका भौगोलिक और राष्ट्रीय विस्तार है। मल्लिकार्जुन खड़गे स्वयं दक्षिण भारत (कर्नाटक) के एक बेहद वरिष्ठ और जमीनी नेता हैं, जिन्होंने दशकों तक संसदीय राजनीति को करीब से देखा है। वहीं, यह घटना उत्तर भारत के राजनीतिक रूप से सबसे जागरूक राज्य बिहार (पटना) में घटित हुई। ऐसे में यह केवल एक क्षेत्रीय विवाद नहीं रह जाता, बल्कि यह उत्तर से लेकर दक्षिण तक पूरे देश के जागरूक मतदाताओं को प्रभावित करता है। दक्षिण भारत की राजनीति आमतौर पर नीति-गत मुद्दों, कल्याणकारी योजनाओं और क्षेत्रीय गौरव पर केंद्रित मानी जाती रही है, जबकि उत्तर भारत की राजनीति में भाषा और प्रतीकों का बहुत बड़ा महत्व होता है। जब दक्षिण से आने वाला एक शीर्ष नेता उत्तर भारत की धरती पर खड़े होकर देश के प्रधानमंत्री के परिवार पर ऐसी टिप्पणी करता है, तो इसका राजनीतिक और सामाजिक असर बहुत व्यापक हो जाता है। यह पूरे देश के पाठकों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमारी राजनीति का भाषाई स्तर वाकई रसातल की ओर जा रहा है? भाषा की यह गिरावट किसी एक दल या एक नेता तक सीमित नहीं है। अगर हम निष्पक्ष होकर देखें तो पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति के शब्दकोश में 'राक्षस', 'दीमक', 'गद्दार', 'खून का दलाल' और न जाने कितने ही अमर्यादित शब्द शामिल हो चुके हैं। एक दल जब मर्यादा लांघता है, तो दूसरा दल उससे दो कदम आगे बढ़कर जवाब देता है। यह एक ऐसा दुष्चक्र बन चुका है, जिसमें जीत किसी की नहीं हो रही, बल्कि पराजय सिर्फ और सिर्फ भारतीय लोकतंत्र की हो रही है। जब देश के शीर्ष नेता सार्वजनिक मंचों से एक-दूसरे के प्रति इस कदर कड़वाहट और व्यक्तिगत द्वेष का प्रदर्शन करेंगे, तो जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक टकराव और घृणा को कैसे रोका जा सकता है? सोशल मीडिया के इस दौर में, जहाँ एक-एक शब्द सेकंडों में करोड़ों लोगों तक पहुँचता है, नेताओं की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है। एक जीवंत और परिपक्व लोकतंत्र की पहचान इस बात से होती है कि वहाँ की जनता के बुनियादी मुद्दों पर कितनी गंभीर चर्चा होती है। आज जब देश के सामने युवाओं की बेरोजगारी, बदलती अर्थव्यवस्था, महंगाई, आंतरिक सुरक्षा और वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीनी सेना की गश्ती जैसी गंभीर राष्ट्रीय चुनौतियाँ हैं, तब मुख्यधारा की राजनीति का कई दिनों तक केवल एक बयान पर अटक जाना देश के समय और संसाधनों की बर्बादी है। देश का युवा, चाहे वह उत्तर प्रदेश और बिहार की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा हो या बेंगलुरु और हैदराबाद के आईटी सेक्टर में अपनी नौकरियां बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा हो, वह अपने नेताओं से यह उम्मीद करता है कि वे संसद और मंचों से रोजगार सृजन, आर्थिक नीतियों और भविष्य के भारत का खाका पेश करें। इसके विपरीत, उन्हें देखने को मिलती है तो सिर्फ व्यक्तिगत कीचड़ उछालने की राजनीति। राजनीति में शुचिता और मर्यादा का संकट केवल चुनाव जीतने या हारने तक सीमित नहीं है। यह आने वाली पीढ़ी के राजनीतिक संस्कारों को भी तय करता है। यदि आज के युवा यह देखेंगे कि देश के सबसे शीर्ष पदों पर बैठे या विपक्ष का नेतृत्व करने वाले लोग एक-दूसरे के प्रति इतनी अमर्यादित भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, तो वे राजनीति को एक गंभीर और सेवाभावी क्षेत्र के रूप में देखना बंद कर देंगे। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि प्रधानमंत्री का पद किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि देश की लोकतांत्रिक संस्था का प्रतीक होता है। उस पद की एक गरिमा होती है, जिसका सम्मान सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को करना चाहिए। ठीक इसी तरह, विपक्ष के नेता का पद भी लोकतंत्र का एक अनिवार्य स्तंभ है, उसकी साख को भी बनाए रखना उतना ही जरूरी है। पटना की यह घटना और उसके बाद देश भर में मचा हंगामा भारतीय राजनीति के लिए एक 'वेक-अप कॉल' होना चाहिए। यह केवल शब्दों की एक तात्कालिक जंग नहीं है, बल्कि यह हमारे लोकतंत्र के गिरते स्तर का एक गंभीर लक्षण है। अब समय आ गया है कि देश के सभी राजनीतिक दल, चाहे वे सत्ता में हों या विपक्ष में, मिलकर संवाद की एक न्यूनतम आचार संहिता तय करें। राजनीति में कड़े से कड़े मतभेदों को भी शालीनता और तर्कों के साथ रखा जा सकता है। देश की जनता अब इस तरह की व्यक्तिगत बयानबाजी और उसके बाद होने वाले राजनीतिक तमाशों से थक चुकी है। उत्तर से लेकर दक्षिण तक, भारत का सजग मतदाता अब नेताओं को उनके काम, उनकी नीतियों और उनके व्यवहार की कसौटी पर कसने के लिए तैयार बैठा है। नेताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि जुबान भले ही फिसल जाए, लेकिन जनता की याददाश्त बहुत मजबूत होती है। - अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार
'महर्षि वाल्मीकि ने समाज को दिखाया सत्य, न्याय, करुणा और समरसता का मार्ग', जयंती पर खड़गे और राहुल ने दी शुभकामनाएं
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5 नवंबर को करनाल में अमित शाह की हुंकार, लोकतंत्र बचाओ पदयात्रा में होंगे शामिल
हरियाणा भाजपा अध्यक्ष अर्चना गुप्ता ने बताया कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 5 नवंबर को करनाल में आयोजित होने वाली 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ' पदयात्रा में शामिल होंगे
खड़गे के बयान पर गरमाई राजनीति, भाजपा का देशभर में हल्लाबोल
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिवंगत पिता के बारे में की गई टिप्पणियों को 'अपमानजनक, अभद्र और आपत्तिजनक' बताते हुए सोमवार को देशव्यापी प्रदर्शन की घोषणा की है।
पीएम मोदी के पिता पर टिप्पणी को लेकर खड़गे के खिलाफ पटना में शिकायत दर्ज
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फारूक अब्दुल्ला के बयान पर बोले हुसैन दलवई, कहा- पाकिस्तान के पक्ष में बयान देना गलत
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राजीव गांधी की दूरदृष्टि ने रखी आधुनिक भारत की मजबूत नींव : केशव महतो कमलेश
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'मोदी का बाप भी जाएगा': बिहार में टोका-टाकी करने वाले को खड़गे का जवाब; BJP बौखलाई
पटना में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के भाषण के दौरान किसी ने टिप्पणी की कि पीएम मोदी कहीं नहीं जाएँगे। इस पर खड़गे ने कहा, 'मोदी का बाप भी जाएगा।' इस पर बीजेपी बौखला गई। अमित शाह जैसे बीजेपी नेताओं ने उन पर सीमा लांघने का आरोप लगाया।
आंध्र प्रदेश की गठबंधन सरकार चुनावी प्रक्रिया का उड़ा रही मजाक: वाईएसआर कांग्रेस
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‘मन की बात’ से आत्मनिर्भर भारत, स्वदेशी उत्पादों और स्वस्थ जीवन का संदेश; भाजपा नेताओं ने की पीएम मोदी की सराहना
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भगवान वाल्मीकि: जिन्होंने श्रीराम के आदर्शों को शब्दों में ढाला
रामलीला का मंच सजने से पहले हर साल एक परंपरा निभाई जाती है। कई रामलीला समितियां पंजाब के अमृतसर में बने भगवान वाल्मीकि तीर्थ स्थल (राम तीर्थ) जाती हैं और वहां से पवित्र जल व अखंड ज्योति लेकर लौटती हैं। यह भगवान वाल्मीकि का आश्रम था, जहां माता सीता ने निवास किया और लव-कुश का जन्म हुआ। राम के चरित्र का मंचन उस भूमि के आशीर्वाद से शुरू होता है, जहां से राम कथा निकली। आश्विन पूर्णिमा को आने वाली वाल्मीकि जयंती इसी स्मरण का दिन है। ऋषिपुत्र, जिन्होंने साधना से पहचान बनाई भगवान वाल्मीकि ऋषि प्रचेता के पुत्र हैं। ऋषि के घर जन्म लेने भर से उनका मार्ग आसान नहीं हुआ। उन्होंने इतनी कठोर तपस्या की कि उनके शरीर पर दीमक की बांबी, यानी वल्मीक, बन गई। इसी से वे वाल्मीकि कहलाए। उनका जीवन बताता है कि साधना और संकल्प से मनुष्य अपनी पहली पहचान से आगे बढ़ सकता है। राम जी को संसार तक पहुंचाने वाली लेखनी आज घर-घर में भगवान श्रीराम का नाम है, तो इसकी नींव वाल्मीकि की रामायण ने रखी। उन्होंने केवल घटनाएं नहीं दर्ज कीं। उन्होंने श्रीराम के जीवन को आदर्शों के रूप में सामने रखा: •पिता के वचन के लिए राजपाट छोड़ देने का त्याग •वनवास के कष्टों में धैर्य •शबरी के जूठे बेर स्वीकार करने की विनम्रता •शत्रु के प्रति भी मर्यादा •प्रजा के विश्वास को अपने सुख से ऊपर रखने की भावना बाद में कई भाषाओं के कवियों ने राम को अपने ढंग से गाया, पर सबकी जड़ में वही आदिकाव्य है। इसीलिए भगवान वाल्मीकि को आदिकवि कहा जाता है। उन्होंने राम के जीवन आदर्शों को काव्य का रूप दिया। सीता के संबल और लव-कुश के गुरु वाल्मीकि केवल कथाकार नहीं थे। जब लोकापवाद के कारण माता सीता को वन जाना पड़ा, तब उन्हें आश्रय उनके आश्रम में मिला। जिस घड़ी में अपने भी दूर हो गए, उस घड़ी में एक ऋषि बिना किसी शर्त के सहारा बने। वहीं लव और कुश का जन्म हुआ। भगवान वाल्मीकि ने दोनों को शिक्षा, संस्कार और शस्त्र-विद्या दी। यही बालक आगे चलकर रामकथा का गान करते हुए अयोध्या पहुंचे। रचयिता का सिखाया गायन उन्हीं के शिष्यों के स्वर में लौटकर राम के दरबार तक पहुंचा। समरस जीवन और सबकी सहभागिता उनके आश्रम में ऊंच-नीच का कोई भेद नहीं था। राजपुत्र और वनवासी बालक एक ही गुरु से सीखते थे। आज वाल्मीकि जयंती पर निकलने वाली शोभायात्राओं, पूजन, भजन-कीर्तन और रामकथा के आयोजनों में सभी वर्गों के लोग साथ दिखते हैं। यह उसी समरसता की झलक है, जो उनके आश्रम की पहचान थी। आज हमारे लिए संदेश जयंती केवल जयकारे लगाने और झांकियां निकालने का दिन नहीं है। भगवान वाल्मीकि ने श्रीराम के आदर्श इसलिए लिखे कि समाज उन्हें अपनाए। इसलिए हमें अपने आसपास देखना चाहिए कि कोई उपेक्षित तो नहीं, किसी के साथ भेदभाव तो नहीं हो रहा, किसी को सहारे की आवश्यकता तो नहीं। जिस परंपरा ने सीता को आश्रय दिया, उसे मानने वाले को दूसरों के लिए आश्रय बनना आना चाहिए। भगवान वाल्मीकि को इससे बड़ी श्रद्धांजलि कोई नहीं हो सकती।
मन की बात : पीएम मोदी ने चेन्नई के युवाओं और वैज्ञानिक नरिंदर का किया जिक्र, कहा-देश में प्रतिभाओं की कभी कमी नहीं रही
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पूर्व पीएम पीवी नरसिम्हा राव के पोते सुभाष ने राहुल गांधी के कार्यों को बताया 'राष्ट्र-विरोधी'
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मन की बात में पीएम मोदी ने महर्षि वाल्मीकि और भाई परमानंद को किया याद, बोले- 'इनका जीवन आज भी देता है प्रेरणा'
देश को अराजकता और अलगाववाद की भट्टी में झोंकने का षड्यंत्र रच रहीं कुछ राजनीतिक ताकतें: सीएम योगी
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'रैली होकर रहेगी!' अलका लांबा का ऐलान, BJP पर लगाए बड़े आरोप
कांग्रेस नेता अलका लांबा ने व्यापारियों की ओर से इंडिया ब्लॉक की रैली को दीपवाली के बाद तक टालने की अपील पर कहा कि एक नवंबर को दिल्ली में रैली होकर रहेगी
ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ इंडिया गठबंधन की 1 नवंबर की रैली में 10 लाख लोग जुटेंगे: कांग्रेस का दावा
इंडिया गठबंधन ने 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर महारैली का ऐलान किया है। राहुल गांधी ने तंज में कहा कि इस कार्यक्रम का जोर शोर से प्रचार करने के लिए BJP और उनके लोगों का दिल से धन्यवाद।
हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री ने प्राकृतिक खेती से उगाए गए पांगी सेबों का शुभारंभ किया
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दिल्ली की सीएम रेखा गुप्ता ने छठ घाटों के विकास, सौंदर्यीकरण और निर्माण कार्यों का निरीक्षण किया
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पटियाला में युवक की हत्या का मामला: थाने में एफआईआर दर्ज, आरोपियों की तलाश में छापेमारी
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Bhagwat, Modi और Shah का 'वोट चोर, गद्दी छोड़' के खिलाफ पलटवार! विपक्ष का नैरेटिव बदलने में कामयाब ?
Trump ने मस्क-CIA को ही कर दिया एक्सपोज? राहुल की वियतनाम यात्रा की पोल भी खुल गई!
इस वक्त अमेरिका के अंदर एक अजीब सी जंग छिड़ी हुई है। एक तरफ दुनिया के सबसे ताकतवर राष्ट्र के राष्ट्रपति हैं डोनाल्ड ट्रंप तो दूसरी तरफ हैं दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति एलन मस्क। दोनों एक ही देश के हैं। दोनों मतलब एलन मस्क ट्रंप की पार्टी का समर्थन करते हैं और ट्रंप के समर्थक भी हैं एलन मस्क। 2024 के चुनाव में भी अच्छी खासी फंडिंग की थी और इस वाले चुनाव में भी हजारों करोड़ रुपए की फंडिंग की है और इन दोनों के बीच में फंसा हुआ है यूक्रेन। अमेरिका के भीतर महंगाई बढ़ रही है क्योंकि डीजल पेट्रोल नहीं मिल पा रहा है। स्टेट ऑफ होर्मुज बंद है। बाब अल मंदेब बंद है। जिसकी वजह से रूस के सामने गिड़गिड़ाना पड़ा और वहां से तेल मंगाना पड़ा। अब रूस की रिफाइनरीज के ऊपर यूक्रेन हमले कर रहा है। यूक्रेन हमले कर रहा है। जिन ड्रोन से उन ड्रोन पर स्टार्लिंग की डिवाइस लगी हुई है। उस डिवाइस की मदद से ही यूक्रेन के ड्रोन रशिया को छेद पा रहे हैं। उसकी रिफाइनरी पर हमला कर पा रहे हैं। ऐसे में आपने पिछले दिनों खबर सुनी कि किस तरीके से स्टार लिंक ने यूक्रेन की स्पीड कम कर दी। आप जो समझते हैं ना डाउनलोडिंग करने की स्पीड इंटरनेट की या फिर कुछ सर्च करने की स्पीड सिर्फ वही स्पीड इंटरनेट की नहीं होती है। हथियारों की एक अलग तरीके की स्पीड होती है। 100 किमी प्रति घंटा 150 किमी प्रति घंटा 200 किमी प्रति घंटा तक की स्पीड होती है। जितनी ज्यादा स्पीड होगी उतनी ही ज्यादा दिक्कत सामने वाले देश को उस ड्रोन को इंटरसेप्ट करने में आएंगी। यहां स्टार्लिंग की स्पीड बहुत ज्यादा थी। लगभग 200 कि.मी. प्रति घंटा के आसपास थी। तो रशिया के इंटरसेप्टर उन्हें पकड़ नहीं पाते थे और ये ड्रोंस जाकर रिफाइनरीज को हिट कर रहे थे। ट्रंप को रूस के साथडील करनी थी। ऐसे में अब उन्होंने आदेश दिया या नहीं दिया। ऐसे में अचानक से यूक्रेन की स्पीड इंटरनेट वाली कम हो गई। आरोप लगा कि मस्क ने यूक्रेन के मिलिट्री स्टार्लिंग की स्पीड को 100 मील प्रति घंटा पर कैप कर दिया। मतलब 100 मील प्रति घंटा का मान लीजिए कि 160 किमी प्रति घंटे के हिसाब से कैप कर दिया। कैप करने का मतलब है अगर वो ड्रोन 160 कि.मी. प्रति घंटा की स्पीड से ऊपर जाएगा तो वो उसकी जो वीडियो रिकॉर्डिंग है वो बंद हो जाएगी। उसका इंटरनेट कनेक्शन जो है वो टूट जाएगा। जाएगा। अब जब इंटरनेट कनेक्शन टूट जाएगा तो उसे पता नहीं चलेगा कि कहां हिट करना है, कहां हिट नहीं करना है। और जो उसे ऑपरेट कर रहे हैं लोग उनके पास तक वीडियो जब नहीं पहुंचेगा तब वो लोग भी एक तरीके से अंधे हो जाएंगे। तो ये पूरा गेम किया गया। इसे भी पढ़ें: SP MP Ramashankar Rajbhar का दावा, INDIA bloc में सीट बंटवारा तय, जल्द आएगा Manifesto सीआईए का क्या रोल है इससे यूक्रेन के हमलावर ड्रोन रूस के सामने फेल होने लगे और अब वॉल स्ट्रीट जनरल की ब्रेकिंग रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्रंप ने खुद मस्क को फोन करके कहा कि यह पाबंदी हटा लो। ट्रंप का कहना है कि मेरा इसमें कोई रोल नहीं है। एलन मस्क का कहना है कि मेरा भी उसमें कोई रोल नहीं है। रोल सामने आया सीआईए का। स्टार लिंक से डायरेक्ट इंटरनेट नहीं लेता है यूक्रेन। ये लेता है स्टार शील्ड से। स्टार शील्ड के ऊपर मतलब कौन नजर रखता है या फिर किसके हाथ में स्टार शील्ड है। स्टार शील्ड हाथ में है सीआईए के। अब पूरा गेम आपको समझ आया आ गया होगा कि किस तरीके से सिर्फ एक खबर बाहर आने से कि ट्रंप ने खुद मस्क को फोन करके कहा कि यह पाबंदी हटा लो। यहां सीआईए का भी जो पर्दाफाश हो गया और एलन मस्क भी एक्सपोज हो गए। वॉल स्ट्रीट जनरल के मुताबिक यह फोन बुधवार को किया गया। ट्रंप ने मस्क से कहा कि वो इस स्पीड लिमिट से नाराज हैं। यह लिमिट 14 अक्टूबर को स्पेस एक्स ने लगाई थी। इसे भी पढ़ें: देश और दुनिया के प्रमुख घटनाक्रम: 24 October के दोपहर तक के बड़े अपडेट्स मस्क और वाइट हाउस की कहानी अलग-अलग है यूक्रेन को शक है कि ट्रंप ने रूस की तरफ झुकाव का हिस्सा था। क्योंकि पिछले हफ्ते ही ट्रंप ने मॉस्को से तेल खरीदने और जेलस्की को हटाने की बात कही थी। कारनेगी एंडोमेंट के एक्सपर्ट माइकल कॉफमैन का कहना है कि अगर यह थ्रटल नहीं हटा तो रूस का फ्रंट लाइन पर आगे बढ़ना फिर तेज हो जाएगा। मतलब यूक्रेन की जंग का रिमोट कंट्रोल आज भी एक प्राइवेट कंपनी और दो लोगों के फोन कॉल पर टिका हुआ है। ट्रंप अब कतई नहीं चाहते कि जेलस्की यूक्रेन के राष्ट्रपति रहे और वो उन्हें हटाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। राहुल की वियतनाम यात्रा पर क्या झूठ पकड़ा गया? दो हफ्ते पहले तक राहुल गांधी देश में चुनाव चोरी, वोट चोरी, ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा इन सब की मांग कर रहे थे। संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जा करने के आरोप बीजेपी और सरकार पर वह लगा रहे थे। पूरा विपक्ष एक साथ आ गया था। सिर्फ आरोप नहीं लगाया जा रहा था। दिल्ली में आकाशवाणी से लेकर राजघाट तक, राष्ट्रपति भवन से लेकर जंतरमंतर तक जमकर प्रदर्शन हुए। सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकालकर सरकार और पूरे संवैधानिक सिस्टम पर सवाल खड़े करने की कोशिश हुई। वैसे तो आप ये कह सकते हैं कि सरकार को कटघरे में खड़ा करना हर विपक्षी का अधिकार है। सरकार ट्रैक पर रहे यह याद दिलाना विपक्ष का काम है। लेकिन संवैधानिक संस्थाओं को इस तरीके से डिसक्रेडिट कर देना कहां तक जायज है? राहुल गांधी ने देश में बड़ा नैरेटिव खड़ा कर दिया था। सरकार पर सवालों की झड़ी लगा दी। राहुल गांधी फ्रंट फुट पर खेल रहे थे। बीजेपी, सरकार और बाकी तमाम को आकर बकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस करके जवाब देना पड़ रहा था हर चीज पर। लेकिन जैसे ही इस पूरे सियासी गेम में पीएम मोदी की एंट्री हुई पूरा समीकरण 360 डिग्री चेंज हो गया। पूरा सिस्टम ऐसे पलटा कि अब बीजेपी के सवालों पर कांग्रेस को सफाई देनी पड़ रही है। यह सब बदला है। 18 अक्टूबर को राहुल गांधी के वियतनाम जाने की खबर सामने आने के बाद। राहुल गांधी जैसे ही विदेश पहुंचे, बीजेपी को उनकी विदेश यात्रा और विदेशों में मुलाकातों पर सवालों की झड़ी लगाने का मौका मिल गया। राहुल की विदेश यात्रा का सेम पैटर्न 2020 हो, 22 हो, 24 हो, 25 हो, 26 हो, हर बार एक बड़ा मुद्दा राहुल गांधी लेकर आते हैं। भारत यात्रा पर निकलते हैं। छात्रों की गूंज करते हैं। ज्ञानेश कुमार के खिलाफ पीएम मोदी के घर के बाहर चले जाते हैं। लेकिन जैसे ही चीज मोमेंटम पकड़ती है, वो चले जाते हैं। जनता को जुटाते हैं और फिर वर्क फ्रॉम विदेश पर निकल जाते हैं। अगर वोट चोरी गंभीर मुद्दा है तो राहुल गांधी खुद कितने गंभीर हैं? क्या 140 करोड़ की आबादी वाले देश में पार्ट टाइम पॉलिटिक्स की कोई जगह है?
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पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जिस तरह अजरबैजान ने तुर्की के साथ मिलकर पाकिस्तान का साथ दिया था उसे देखकर भारत हैरान था। लेकिन जल्द ही समय ने करवट ली। अब दक्षिण काकेशस की राजनीति में भारत ने पाकिस्तान को एक बड़ा कूटनीतिक झटका दे दिया है। हम आपको बता दें कि कभी पाकिस्तान के साथ खड़े नजर आने वाले अजरबैजान के साथ अब भारत के रिश्ते नई गर्माहट लेते दिख रहे हैं। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर की बाकू यात्रा और राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव व विदेश मंत्री जेहुन बायरामोव के साथ उनकी मुलाकात ने साफ कर दिया है कि भारत और अजरबैजान पुराने मतभेदों को पीछे छोड़कर सहयोग के नए रास्ते तलाश रहे हैं। आतंकवाद से मुकाबले, क्षेत्रीय सुरक्षा, व्यापार, ऊर्जा और संपर्क बढ़ाने जैसे मुद्दों पर हुई बातचीत भारत की कूटनीतिक सक्रियता का संकेत है। पाकिस्तान के लिए यह घटनाक्रम इसलिए अहम है, क्योंकि जिस अजरबैजान को वह अपना करीबी सहयोगी मानता रहा है, वही अब भारत के साथ रिश्ते मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, जयशंकर ने राष्ट्रपति अलीयेव से मुलाकात के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शुभकामनाएं पहुंचाईं। दोनों पक्षों ने द्विपक्षीय संबंधों की वर्तमान स्थिति और उन्हें आगे बढ़ाने की संभावनाओं पर चर्चा की। विदेश मंत्री बायरामोव के साथ वार्ता में व्यापार, निवेश और ऊर्जा सहयोग के विस्तार पर जोर दिया गया। हम आपको बता दें कि भारत और अजरबैजान अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) में भी रुचि रखते हैं और इसके तहत बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर सहमत हुए। हवाई संपर्क बढ़ाने तथा पर्यटन, कारोबार और लोगों के बीच आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करने पर भी चर्चा हुई। जयशंकर ने पश्चिम एशिया में संघर्ष के दौरान ईरान से भारतीय नागरिकों, विशेषकर विद्यार्थियों, को निकालने में अजरबैजान की सहायता के लिए आभार जताया। इसे भी पढ़ें: आखिर क्यों धधक रहा है फ्रांस और अन्य यूरोपीय देश? पुलिस प्रशासन के सामने क्या हैं चुनौतियाँ? इस यात्रा का सबसे संवेदनशील पहलू आतंकवाद और सुरक्षा से जुड़ा रहा। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट किया कि दोनों देशों के बीच सुरक्षा संबंधी मुद्दों, आतंकवाद और साझा खतरों पर चर्चा हुई। जयशंकर ने भी कहा कि आतंकवाद, संघर्ष और अस्थिरता दोनों देशों के साझा शत्रु हैं। देखा जाये तो भारत और अजरबैजान के बीच हुई बातचीत के आधिकारिक दायरे में आतंकवाद और साझा सुरक्षा चुनौतियों को स्थान मिलना क्षेत्रीय राजनीति में बड़ा घटनाक्रम है। यह घटनाक्रम इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत और अजरबैजान के संबंधों में तनाव आया था। अजरबैजान ने पाकिस्तान में आतंकवादी ढांचे के विरुद्ध भारत की सैन्य कार्रवाई की आलोचना की थी। दूसरी ओर, पाकिस्तान और तुर्किये के साथ बाकू के बढ़ते सामरिक संबंध भारत की चिंताओं का कारण रहे हैं। ऐसे में राष्ट्रपति अलीयेव से सीधी बातचीत और विदेश मंत्रियों की विस्तृत वार्ता यह दिखाती है कि दोनों देश मतभेदों को स्थायी बाधा नहीं बनने देना चाहते। वहीं अजरबैजान के मीडिया ने भी जयशंकर की यात्रा को प्रमुखता दी है। समाचार एजेंसी ट्रेंड ने राष्ट्रपति अलीयेव की जयशंकर से मुलाकात और विदेश मंत्री बायरामोव के उस बयान को प्रकाशित किया जिसमें उन्होंने स्वीकार किया कि पिछले वर्षों के मतभेदों ने द्विपक्षीय संबंधों तथा अंतरराष्ट्रीय संगठनों में सहयोग की संभावनाओं को प्रभावित किया था। बायरामोव ने कहा कि मुद्दों पर खुले और रचनात्मक ढंग से चर्चा हुई है और इससे संबंधों को अगले स्तर तक ले जाने का आधार तैयार होगा। एपीए और रिपोर्ट.az ने भी व्यापार, निवेश, सांस्कृतिक संबंधों तथा दोनों देशों की स्वतंत्र विदेश नीति पर जयशंकर की टिप्पणियों को प्रमुखता दी। इससे संकेत मिलता है कि बाकू इस संपर्क को केवल औपचारिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि संबंधों को नए सिरे से व्यवस्थित करने के अवसर के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। हम आपको यह भी बता दें कि इससे पहले अक्टूबर महीने में ही विदेश राज्य मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह ने बाकू में एशिया में बातचीत और विश्वास-निर्माण उपायों के सम्मेलन (CICA) के सातवें शिखर सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया था। उन्होंने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना, समावेशी सहयोग और आतंकवाद के विरुद्ध साझा कार्रवाई पर जोर दिया था। उन्होंने यह भी रेखांकित किया था कि क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाएं सभी देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करें। इस यात्रा ने उच्चस्तरीय राजनीतिक संवाद के लिए जमीन तैयार की, जिसे जयशंकर की यात्रा ने आगे बढ़ाया। साथ ही भारत और अजरबैजान के बीच बढ़ती नजदीकी की एक अहम वजह संकट के समय मिला सहयोग भी है। हाल ही में ईरान में संघर्ष के दौरान जब भारतीय नागरिकों, खासकर वहां पढ़ रहे विद्यार्थियों को सुरक्षित निकालने की चुनौती सामने आई, तब अजरबैजान ने भारत की मदद की। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अपनी बाकू यात्रा के दौरान इस सहयोग के लिए अजरबैजान का आभार जताया। यह घटनाक्रम बताता है कि दोनों देशों के रिश्ते अब केवल कूटनीतिक मुलाकातों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि जरूरत के समय एक-दूसरे की मदद करने की दिशा में भी आगे बढ़ रहे हैं। भारत के लिए यह सहयोग इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि क्षेत्रीय संकट के बीच अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में अजरबैजान जैसे देश का साथ मिलना उसकी कूटनीतिक पहुंच और आपसी विश्वास को मजबूत करता है। हम आपको यह भी बता दें कि अजरबैजान शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में भागीदारी चाहता है और इसके लिए भारत की सहमति जरूरी है। इसलिए भी दोनों देशों के बीच लगातार वार्ताएं होती दिख रही हैं। सितंबर में बिश्केक में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति अलीयेव की मुलाकात तथा उसके बाद जयशंकर की यात्रा ने राजनीतिक संपर्क को गति दी। लेकिन अजरबैजान को SCO की पूर्ण सदस्यता दी जानी चाहिए या नहीं, इस पर भारत ने अभी तक कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिया है। भारत को इस विषय पर आतंकवाद के विरुद्ध ठोस सहयोग, सदस्य देशों के बीच सहमति और क्षेत्रीय संतुलन जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखना है। रणनीतिक दृष्टि से देखा जाये तो भारत के लिए अजरबैजान ऊर्जा सुरक्षा, यूरोप और मध्य एशिया तक संपर्क, व्यापार तथा क्षेत्रीय संवाद का उपयोगी साझेदार बन सकता है। वहीं बाकू के लिए भारत एक बड़ा बाजार, निवेश का स्रोत और एशिया की प्रमुख शक्ति है। प्रधानमंत्री मोदी की पहल और जयशंकर की सक्रिय कूटनीति ने बातचीत का नया अवसर बनाया है। उधर, पाकिस्तान के लिए यह असहज संकेत है कि उससे निकट संबंध रखने वाला देश भारत के साथ भी अपने हितों के आधार पर सहयोग बढ़ा रहा है। बहरहाल, यदि आतंकवाद के विरुद्ध संवाद नियमित होता है, व्यापार और निवेश बढ़ते हैं तथा परिवहन गलियारों पर समन्वय मजबूत होता है, तो भारत-अजरबैजान संबंधों का यह नया अध्याय दक्षिण काकेशस में भारत की रणनीतिक पहुंच को विस्तार दे सकता है। -नीरज कुमार दुबे
आर्थिक मोर्चे पर विकास के सकारात्मक संकेत
विपरीत वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद दुनिया भर की रेटिंग संस्थाओं ने भारतीय अर्थव्यवस्था को गतिमान स्वीकार करते हुए वैश्विक औसत से लगभग दो गुणी विकास दर रहने की संभावना जताई है। यह इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है कि वैश्विक परिस्थितियों में कहीं और किसी तरह का सुधार नहीं दिखाई दे रहा है। ईरान-अमेरिका युद्ध हो या रूस-यूक्रेन युद्ध हो या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के तानाशाही पूर्ण तुगलकी निर्णय हो या कच्चे तेल के भावों में बेतहासा बढ़ोतरी और हार्मुज का संकट हालात समूचे विश्व में विकट से विकटतर बने हुए हैं। अब तो फ्रांस के हालात भी बिगड़ते जा रहे हैं तो उसका असर जहां योरोप में दिखाई देगा वहीं भारत में भी हालात को प्रभावित करने के कतिपय प्रयास जारी है। अच्छी बात यह है कि देश-दुनिया के गंभीर हालातों के बावजूद आर्थिक क्षेत्र की दुनिया की लगभग सभी रेटिंग संस्थाओं ने इंडियन इकोनोमी की ग्रोथ रेट को लेकर आशा से भी अधिक विश्वास जताया है। रेटिंग संस्थाओं की ही माने तो 2026 की वैश्विक औसत आर्थिक विकास दर 3 दशमलव 1 फीसदी रहने की संभावना व्यक्त की जा रही है वहीं दुनिया की रेटिंग संस्थाओं ने भारत के आर्थिक परिणामों को देखते हुए जुलाई की तुलना में अक्टूबर आते आते ग्रोथ को 6 दशमलव 9 से लेकर 7 दशमलव 1 रहने की उम्मीद जताई है। खास बात यह है कि विश्व रेटिंग संस्थाओं में से किसी भी संस्था ने जुलाई की रेटिंग की तुलना में नकारात्मक ग्रोथ नहीं दिखा कर ग्रोथ रेट में इजाफा ही जाहिर किया है। दरअसल देश में मांग और आपूर्ति से लेकर निर्यात तक में लगातार विकास देखा जा रहा है। देश में मांग और आपूर्ति की बेहतर हालात है तो निर्यात में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। यह भी तब जब वैश्विक मांग कमजोर देखी जा रही है। भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सबसे सकारात्मक बात यह है कि एमएसएमई सेक्टर में लगातार अच्छा काम हो रहा है तो दूसरी और सर्विस सेक्टर में तो एक तरह से लगातार उछाल ही आ रहा है। कच्चे तेल के भावों में तो जैसे आग ही लग रही है और उपलब्धता को लेकर भी लाख झंझट के बावजूद हकोनोमी को बूस्टअप रखने में खास बाधा नहीं आ रही है। देश में देसी-विदेशी निवेश में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। महंगाई के बावजूद बाजार मेंं मांग बरकरार है। बाजार में मांग से यह साफ है कि लोगों की क्रय शक्ति बनी हुई है। सर्विस सेक्टर में टूरिज्म, बैंकिंग, आईटी, और इसी तरह के अन्य क्षेत्र उल्लेखनीय परिणाम दे रहे हैं। नवंबर में दीपावली के त्यौहार के चलते बाजार और अधिक गतिशील हो जाएगा क्योंकि दीपावली पर बाजार में तेजी आती ही आती है। जानकारों की माने तो नवंबर माह में दीपावली पर 7 लाख करोड़ का कारोबार अनुमानित किया जा रहा है। इसे भी पढ़ें: अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने बढ़ाई भारत की विकास दर यह पिछली दीपावली की तुलना में 15 प्रतिशत से 18 प्रतिशत तक अधिक रहने की संभावना है। इसी तरह से सेवा क्षेत्र में भी अच्छी ग्रोथ जारी रहने का अनुमान है। इसके अलावा विपरीत हालातों के बावजूद निर्यात में लगातार बढ़ोतरी जारी है। देश की इकोनोमिक ग्रोथ के कारण देसी-विदेशी निवेश के बेहतर हालात दिखाई दे रहे हैं। यही कारण है कि चाहे आईएमएफ हो या मूडीज, ओईसीडी हो या वर्ल्ड बैंक, एशियन डब्लपमेंट बैंक हो या एसएण्डपी या फिच सभी ने भारत की इकोनोमी की ग्रोथ को लेकर सकारात्मक संकेत दिए हैं। भारत का आरबीआई का आंकलन तो पहले से ही सबके सामने हैं। एकमात्र फिच रेटिंग संस्था ऐसी है जिसने इंडियन इकोनोमी की ग्रोथ रेट 6.9 प्रतिशत आंकी है जोकि हांलाकि पूर्व की फिच की ही पूर्व की रेटिंग 6.5 प्रतिशत से ही अधिक है। मूडीज सहित कुछ रेटिंग संस्थाओं ने जहां अब 7 प्रतिशत विकास दर आंक रहे हैं तो वर्ल्ड बैंक, ओईसीडी आदि संस्थाओं को भरोसा है कि भारत की आर्थिक विकास दर 7 प्रतिशत से अधिक यानी की 7.1 प्रतिशत रहने की संभावना है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नित नए निर्णयों से दुनिया की अर्थ व्यवस्था पर पड़ रहे असर, युद्ध और तनाव के हालातों में सुधार नहीं होने, हार्मुज जैसी समस्या का समाधान नहीं होने, वैश्विक राजनीतिक अस्थिरता के दौर के बावजूद एक ही सधी हुई नीति का ही परिणाम है कि देश की अर्थ व्यवस्था विकास की गति को ना केवल बनाए हुए हैं अपितु उसकी विकास का ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा है। इसके लिए समग्र और समन्वित प्रयासों को श्रेय जाता है। जहां घरेलू मांग में कमी नहीं आई है वहीं निवेश का बेहतर माहौल बना हुआ है। एमएसएमई को उत्पादन लिंक प्रोत्साहन योजना का लाभ सीधे इकोनोमी का मिल रहा है वहीं रणनीतिक क्षेत्रों सेमीकण्डक्टर, डिफेंस, इलेक्ट्रोनिक्स, आईटी आदि आदि क्षेत्रों में योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ा जा रहा है। यही कारण है कि आज इंडियन इकोनोमी और उसकी ग्रोथ पर वैश्विक रेटिंग संस्थाएं अपना विश्वास व्यक्त कर रही है। - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
आखिर क्यों धधक रहा है फ्रांस और अन्य यूरोपीय देश? पुलिस प्रशासन के सामने क्या हैं चुनौतियाँ?
यूरोप में हिंसक विरोध-प्रदर्शनों, दंगों, आगजनी और पुलिस के साथ टकराव को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर नहीं समझा जा सकता। चूंकि इसके पीछे आर्थिक असंतोष, सामाजिक विभाजन, आव्रजन और एकीकरण की बहस, राजनीतिक ध्रुवीकरण, युवाओं में भविष्य को लेकर चिंता तथा पुलिस और नागरिकों के बीच विश्वास का संकट जैसे कई कारक हो सकते हैं। लेकिन एक बुनियादी अंतर समझना जरूरी है, वह यह कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतांत्रिक अधिकार है, जबकि आगजनी, लूटपाट, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान और लोगों पर हमले अपराध हैं। किसी प्रदर्शन में हिंसा होने का अर्थ यह नहीं कि उसमें शामिल हर व्यक्ति हिंसक है या पूरा समुदाय उसके लिए जिम्मेदार है। शायद इसी भ्रम में देश के देश जल रहे हैं और पुलिस तत्काल बहुत कुछ कर नहीं पाती। इससे आत्ताइयों के हौसले बुलंद हैं और लोकतांत्रिक सोच अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रही है। इसे भी पढ़ें: Vishwakhabram : France में Macron के खिलाफ विद्रोह जैसे हालात, पूरे यूरोप में फैल सकती है जनाक्रोश की आग! भले ही फ्रांस और अन्य यूरोपीय देशों की परिस्थितियाँ भी एक जैसी नहीं हैं। इसलिए यह देखना आवश्यक है कि अशांति किन कारणों से भड़कती है, पुलिस की कार्रवाई कहाँ कठिन हो जाती है और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करते हुए हिंसा रोकने के लिए कौन-से उपाय प्रभावी हो सकते हैं। # सवाल है कि अक्टूबर 2026 में फ्रांस में वास्तव में क्या हो रहा है? तो जवाब होगा कि फ्रांस में सितंबर के अंत से शुरू हुआ छात्र आंदोलन अक्टूबर में व्यापक अशांति में बदल गया। प्रारंभिक असंतोष स्कूलों की खराब सुविधाओं, शिक्षकों की कमी और शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी शिकायतों को लेकर था। बाद में महँगाई, जीवन-यापन की बढ़ती लागत और सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति जैसे मुद्दे भी आंदोलन से जुड़ गए। आखिर पेरिस सहित कई शहरों में लूटपाट, तोड़फोड़ और पुलिस से टकराव हुए। सरकार को बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी तैनात करने पड़े और कुछ क्षेत्रों में रात्रिकालीन कर्फ्यू प्रतिबंध लगाए गए। फ्रांसीसी अधिकारियों ने सुरक्षा व्यवस्था की तैयारियों और हिंसा के पूर्वानुमान में कमियों को भी स्वीकार किया। इसी समय इटली में भी जीवन-यापन की लागत, कम वेतन और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ी शिकायतों के बीच प्रदर्शन हिंसक हुए। स्पेन और पुर्तगाल में आवास की समस्या को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए हैं। हालांकि, इन सभी घटनाओं के कारण और उनका स्वरूप अलग-अलग हैं। # सवाल है कि आखिर यूरोप में असंतोष बार-बार क्यों भड़कता है? तो इसके कुछ कारण हैं जो निम्नलिखित हैं:- पहला, महँगाई, आवास और आर्थिक असुरक्षा: जब किराया, ऊर्जा, परिवहन और रोजमर्रा के खर्च बढ़ते हैं, लेकिन आय और रोजगार के अवसर उसी गति से नहीं बढ़ते, तो लोगों में व्यवस्था के प्रति नाराजगी बढ़ सकती है। युवाओं के लिए अच्छी शिक्षा, रोजगार और स्वतंत्र जीवन की संभावनाएँ सीमित महसूस होना इस असंतोष को और बढ़ा सकता है। दूसरा, सार्वजनिक सेवाओं पर दबाव: स्कूलों में शिक्षकों की कमी, जर्जर सुविधाएँ और स्थानीय सेवाओं की कमजोर स्थिति नागरिकों को यह महसूस करा सकती है कि उनकी समस्याओं को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं मिल रही। फ्रांस के हालिया आंदोलन में शिक्षा से जुड़ी शिकायतें शुरुआती मुद्दों में शामिल थीं। तीसरा, सामाजिक अलगाव और अवसरों में असमानता: कुछ शहरी और वंचित इलाकों में रोजगार, शिक्षा और सामाजिक उन्नति के अवसरों की कमी असंतोष को गहरा सकती है। यदि नागरिकों को लगता है कि संस्थाएँ उनकी बात नहीं सुनतीं या उनके साथ भेदभाव होता है, तो राज्य पर भरोसा कमजोर पड़ सकता है। लेकिन इसे हर उपद्रव का एकमात्र कारण मानना उचित नहीं होगा। चौथा, राजनीतिक ध्रुवीकरण और आंदोलन का हिंसक हो जाना: किसी जायज मांग के साथ बड़ी संख्या में लोग शांतिपूर्वक जुट सकते हैं, लेकिन कुछ समूह उसी भीड़ का इस्तेमाल तोड़फोड़, लूटपाट या पुलिस को उकसाने के लिए कर सकते हैं। सोशल मीडिया पर तेजी से फैलने वाली तस्वीरें और संदेश भी तनाव बढ़ा सकते हैं। आंदोलन की मांगों और हिंसा करने वाले व्यक्तियों की जिम्मेदारी को अलग-अलग समझना जरूरी है। पाँचवाँ, आव्रजन और राष्ट्रीय पहचान पर विवाद: यूरोप के अनेक देशों में आव्रजन, शरणार्थियों के एकीकरण, राष्ट्रीय पहचान और सार्वजनिक संसाधनों के वितरण पर राजनीतिक बहस चलती रही है। ये विवाद ध्रुवीकरण बढ़ा सकते हैं, लेकिन फ्रांस की अक्टूबर 2026 की हिंसा के लिए किसी विशेष धार्मिक या प्रवासी समुदाय को जिम्मेदार ठहराने के पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि आर्थिक असंतोष हिंसा की पृष्ठभूमि तैयार कर सकता है, लेकिन वह हिंसा को उचित नहीं ठहराता। इसी प्रकार, किसी अपराधी की पहचान या पृष्ठभूमि के आधार पर पूरे समुदाय को दोषी ठहराना भी तथ्यपरक समाधान नहीं है। # सवाल है कि उत्पाती और हिंसक भीड़ पर नियंत्रण में पुलिस क्यों पिछड़ जाती है? तो जवाब होगा कि यह इस पूरे संकट का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू है। अक्टूबर 2026 की फ्रांसीसी घटनाओं में पुलिस की विफलता के कुछ ठोस कारण सामने आए हैं। इन्हें केवल पुलिस की कमजोरी या इच्छाशक्ति की कमी कह देना अधूरा विश्लेषण होगा। एक, खुफिया आकलन और तैयारी में चूक: फ्रांस में 17 अक्टूबर के प्रदर्शनों के लिए भीड़ का अनुमान वास्तविक संख्या से काफी कम रहा। आंतरिक मंत्रालय के शुरुआती अनुमान लगभग 60,000–110,000 प्रदर्शनकारियों के थे, जबकि बाद में संशोधित अनुमान 200,000 तक पहुँचे और मंत्रालय ने वास्तविक उपस्थिति लगभग 550,000 बताई। यह सरकारी अनुमान है, स्वतंत्र रूप से सत्यापित अंतिम गणना नहीं। इतनी बड़ी भीड़ के बीच हिंसा करने वाले छोटे समूहों की पहचान और सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा कठिन हो जाती है। दो, पुलिस बल की तैनाती और संसाधनों का असंतुलन: यदि कई शहरों में एक साथ हिंसा फैलती है, तो पुलिस को लोगों की सुरक्षा, दुकानों की रक्षा, यातायात नियंत्रण और हिंसक घटनाओं पर कार्रवाई जैसे अनेक काम करने पड़ते हैं। फ्रांस की हालिया घटनाओं में पुलिसकर्मियों की संख्या और तैनाती के समय को लेकर भी सवाल उठे। तीन, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी और हिंसा करने वाले एक ही भीड़ में:पुलिस के सामने यह कठिन चुनौती रहती है कि हिंसा करने वालों पर कार्रवाई करते हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और आसपास के आम नागरिकों को नुकसान से कैसे बचाया जाए। जल्दबाजी में की गई कार्रवाई तनाव बढ़ा सकती है, जबकि देर करने पर तोड़फोड़ और लूटपाट का दायरा बढ़ सकता है। चार, पुलिस की कठोर कार्रवाई के कानूनी और सामाजिक परिणाम: फ्रांस में प्रदर्शन के दौरान बल प्रयोग की आवश्यकता, उसकी आनुपातिकता और कुछ पुलिसकर्मियों के आचरण को लेकर जाँच चलती रही है। अक्टूबर में छात्र प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में पुलिस के कथित अनुचित आचरण की 18 आंतरिक जाँचें शुरू होने की खबर आई। इसका अर्थ यह नहीं कि हर पुलिस कार्रवाई गलत थी। लेकिन बल का अनुचित प्रयोग नागरिकों का भरोसा घटा सकता है और तनाव बढ़ा सकता है। पांच, पुलिस थकान, समन्वय और बदलती परिस्थितियाँ: लगातार कई दिनों तक आंदोलन चलने पर पुलिसकर्मियों की उपलब्धता, स्थानीय इकाइयों और विशेष प्रशिक्षित बलों के बीच समन्वय तथा बदलती परिस्थितियों के अनुसार रणनीति बदलने की क्षमता महत्त्वपूर्ण हो जाती है। फ्रांस की घटनाओं में इन पहलुओं पर भी सवाल उठे हैं। # सवाल है कि क्या पुलिस को और अधिक कठोर बना देना ही समाधान है? तो जवाब होगा कि नहीं, सवाल केवल कठोरता का नहीं बल्कि समय पर कार्रवाई, निश्चित जवाबदेही, कानून का समान अनुपालन और सही रणनीति का है। यूरोप की परिषद की संसदीय सभा की 2025 की रिपोर्ट में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच संवाद, मध्यस्थता, विशेष प्रशिक्षण, नागरिकों के भरोसे और बल के सीमित व आनुपातिक उपयोग पर जोर दिया गया था। रिपोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि कुछ आंदोलनों में संगठित हिंसक समूह शांतिपूर्ण विरोध को बिगाड़ सकते हैं। पुलिस प्रशासन को तीन परिस्थितियों में अंतर करना चाहिए: एक, उपयुक्त प्रशासनिक दृष्टिकोण: शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा, संवाद और प्रदर्शन के अधिकार की रक्षा। दो, तनावपूर्ण भीड़, हिंसा का जोखिम: प्रशिक्षित बल, समन्वय, स्पष्ट चेतावनी और तनाव कम करने के उपाय। तीन, आगजनी, लूटपाट या लोगों पर हमला: त्वरित एवं लक्षित कानूनी कार्रवाई, साक्ष्य जुटाना और दोषियों की जवाबदेही। लिहाजा लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस को न तो हिंसा के सामने निष्क्रिय रहना चाहिए, न ही पूरी भीड़ को अपराधी मान लेना चाहिए। # आखिर हिंसक भीड़ से निपटने का ठोस और दीर्घकालिक इलाज क्या है? पहला, बेहतर पूर्वानुमान और खुफिया समन्वय: बड़े प्रदर्शनों के संभावित आकार, संवेदनशील स्थानों और हिंसा के जोखिम का समय रहते आकलन किया जाए। वैध प्रदर्शन और हिंसा की तैयारी में अंतर रखा जाए; केवल राजनीतिक विचारों के आधार पर लोगों को संदिग्ध न माना जाए। दूसरा, प्रशिक्षित पुलिस और स्पष्ट कमान: भीड़ प्रबंधन के लिए विशेष प्रशिक्षण, एकीकृत कमान, पर्याप्त संसाधन और नागरिकों को सुरक्षित रखने की स्पष्ट जिम्मेदारी हो। बल का प्रयोग कानून के अनुसार आवश्यक और आनुपातिक होना चाहिए। तीसरा, अपराधियों की पहचान और शीघ्र न्याय: जहाँ कानूनी रूप से अनुमत हो, वहाँ उपलब्ध वीडियो, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और अन्य विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय की जाए। गिरफ्तारी, अभियोजन और न्यायिक प्रक्रिया कानून के अनुरूप हो; निर्दोष लोगों को सामूहिक दंड न दिया जाए। चौथा, पुलिस की जवाबदेही भी सुनिश्चित हो: कार्रवाई की स्वतंत्र समीक्षा, शिकायतों की निष्पक्ष जाँच और गलत आचरण पर उचित दंड आवश्यक हैं। इससे पुलिस का अधिकार कमजोर नहीं, बल्कि उसकी वैधता और नागरिकों का विश्वास मजबूत होता है। पाँचवाँ, सामाजिक असंतोष के मूल कारणों पर काम: शिक्षा, रोजगार, आवास, सार्वजनिक सेवाओं और भेदभाव से जुड़ी शिकायतों को गंभीरता से सुना जाए। केवल पुलिस बल बढ़ाकर उन समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता जो लगातार नई अशांति को जन्म देती हैं। # आखिर भारत के लिए इसमें क्या सबक निहित है? फ्रांस का अनुभव भारत के लिए भी प्रासंगिक है, क्योंकि भारत में भी बड़े जनसमूह, राजनीतिक रैलियाँ, धार्मिक आयोजन, छात्र आंदोलन और स्थानीय विरोध-प्रदर्शन पुलिस प्रशासन के सामने अलग-अलग चुनौतियाँ पैदा कर सकते हैं। भारत के संदर्भ में पाँच सबक महत्त्वपूर्ण हैं: एक, कानून का समान पालन: राजनीतिक समर्थन, विरोध या सामाजिक पहचान के आधार पर कार्रवाई का मानक नहीं बदलना चाहिए। दो, भीड़ से पहले तैयारी: आयोजकों, स्थानीय प्रशासन, आपातकालीन सेवाओं और पुलिस के बीच समन्वय हो। तीन, हिंसा पर लक्षित कार्रवाई: शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और हिंसा करने वालों को अलग-अलग देखा जाए। चार, डिजिटल साक्ष्य और जवाबदेही: अफवाहों की जाँच हो, साक्ष्य सुरक्षित रखे जाएँ और गलत सूचना फैलाने वालों पर भी कानून के अनुसार कार्रवाई हो। पांच, नागरिक विश्वास: पुलिस की निष्पक्षता, पारदर्शिता और शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई को प्राथमिकता मिले। इन उपायों का उद्देश्य केवल भीड़ को तितर-बितर करना नहीं, बल्कि हिंसा को रोकना और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है। # वस्तुत: समस्या पुलिस की ताकत से बड़ी है: फ्रांस की अक्टूबर 2026 की घटनाएँ दिखाती हैं कि बड़े पैमाने की अशांति में खुफिया आकलन की चूक, अपर्याप्त या असंतुलित तैनाती, पुलिस थकान और आंदोलन के भीतर हिंसक समूहों की मौजूदगी मिलकर गंभीर संकट पैदा कर सकते हैं। दूसरी ओर, बल का अनुचित प्रयोग और सामाजिक शिकायतों की उपेक्षा भी संस्थाओं के प्रति अविश्वास बढ़ा सकती है। लोकतांत्रिक राज्य की असली परीक्षा यह है कि वह शांतिपूर्ण विरोध की रक्षा करे, हिंसक अपराधों को रोके और दोनों काम कानून की मर्यादा में रहते हुए करे। केवल दमन से असंतोष समाप्त नहीं होता और केवल संवाद से तत्काल हिंसा नहीं रुकती। प्रभावी व्यवस्था को दोनों की जरूरत है—अपराध पर निष्पक्ष कानूनी कार्रवाई और असंतोष के कारणों का गंभीर समाधान। यही दृष्टिकोण पुलिस प्रशासन को प्रभावी तथा लोकतंत्र को अधिक सुरक्षित बना सकता है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी इन दिनों चुनाव आयोग और मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर लगातार सवाल उठा रहे हैं। अब इस मुद्दे पर उनकी भिड़ंत पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल से हो गई है। कंवल सिब्बल ने कुरैशी के हमलावर रुख पर सवाल उठाते हुए इसे व्यक्तिगत रंजिश जैसा बताया है। वहीं इस टकराव ने कुरैशी को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल यह है कि जिस चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और मजबूती का कभी कुरैशी खुद बचाव करते थे, आज उसी संस्था पर उनके लगातार हमलों के पीछे आखिर वजह क्या है? हम आपको याद दिला दें कि जुलाई 2026 में एक साक्षात्कार के दौरान कुरैशी ने अपने कार्यकाल का हवाला देते हुए कहा था कि तत्कालीन यूपीए सरकार के दौरान चुनाव आयोग पर कोई दबाव नहीं था। उन्होंने आयोग की स्वतंत्रता और साख का जिक्र करते हुए कहा था कि उसकी स्थिति ऐसी थी कि कोई उस पर दबाव डालने की हिम्मत नहीं करता था और चुनाव की तारीखों की जानकारी भी सरकार को घोषणा के समय ही मिलती थी। लेकिन सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और मजबूती को केवल कुरैशी के कार्यकाल से जोड़कर देखा जाना चाहिए? आयोग आज भी एक संवैधानिक संस्था है और उसकी कार्यप्रणाली को लेकर उठाए जा रहे सवालों का जवाब तथ्यों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर दिया जाना चाहिए, न कि लगातार आरोप लगाकर उसकी साख पर संदेह पैदा करके। आखिर कुरैशी जिस संस्थागत स्वतंत्रता को कभी अपनी उपलब्धि बताते थे, आज उसी संस्था के प्रति उनका रवैया किस आधार पर बदल गया है? इसे भी पढ़ें: भारतीय मूल की Navi Pillay को Nobel Peace Prize मिलने पर India क्यों नहीं दे रहा बधाई? कारण जानकर चौंक जाएँगे! सुप्रीम कोर्ट में मामला, फिर भी सोशल मीडिया पर फैसला सुनाने की जल्दबाजी! कंवल सिब्बल ने इसी बिंदु पर कुरैशी को घेरा है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा है कि कुरैशी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ लगातार हमलावर हैं और उनका रवैया व्यक्तिगत हिसाब-किताब चुकाने जैसा लगता है। सिब्बल ने साफ कहा कि मामला जब सुप्रीम कोर्ट के सामने विचाराधीन है, तब अपनी तरफ से अंतिम निष्कर्ष निकालकर उसे प्रचारित करना उचित नहीं है। उन्होंने कुरैशी को आगाह किया कि ऐसा करके वह अपनी ही प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा रहे हैं। सिब्बल ने लिखा है कि उनका मकसद ट्रोलिंग नहीं, बल्कि भारतीय चुनाव व्यवस्था को बदनाम करने की कोशिश पर सवाल उठाना है। लेकिन कुरैशी ने जवाब में मुद्दे का सामना करने के बजाय ट्रोलिंग का कार्ड खेल दिया। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि वह वर्षों से दो रुपये वाले ट्रोल्स का सामना कर रहे हैं, तो क्या अब किसी पूर्व विदेश सचिव की ट्रोलिंग को विशेष सम्मान समझें? यहां सवाल यह है कि क्या किसी वरिष्ठ राजनयिक की आलोचना को ट्रोलिंग बताकर खारिज कर देना पर्याप्त जवाब है? देखा जाये तो कंवल सिब्बल ने उनके तर्कों पर सवाल उठाए थे, लेकिन कुरैशी ने बहस को व्यक्तिगत कटाक्ष की दिशा में मोड़ दिया। अपने कार्यकाल का हिसाब देने से क्यों बच रहे हैं कुरैशी? हम आपको यह भी बता दें कि सोशल मीडिया पर कुरैशी को घेरने वाले यूजर्स ने एक और असहज सवाल उठाया है। एक यूजर ने लिखा है कि जब वह खुद मुख्य चुनाव आयुक्त थे, तब मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर जैसी कवायद क्यों नहीं हुई? क्या मतदाता सूची को साफ-सुथरा रखना जरूरी नहीं था? क्या मृत, स्थानांतरित और अन्य अयोग्य श्रेणियों में आने वाले नामों की जांच नहीं होनी चाहिए? और क्या मतदाता सूची में केवल भारतीय नागरिकों को शामिल करने की कानूनी शर्त का पालन नहीं होना चाहिए? देखा जाये तो ये सवाल अपने आप में विचारणीय हैं। मतदाता सूची की शुद्धता और किसी पात्र नागरिक का वोट न छिनना, दोनों ही चुनावी व्यवस्था की बुनियादी जरूरतें हैं। इसलिए एसआईआर पर कुरैशी की मौजूदा आपत्तियों का मूल्यांकन करते समय उनके अपने कार्यकाल के रिकॉर्ड को सामने रखना भी जरूरी है। साथ ही यह विवाद इसलिए भी दिलचस्प है कि कुरैशी का पुराना रिकॉर्ड पूरी तरह सवालों से परे नहीं रहा। फरवरी 2020 में चुनाव आयोग ने उनके एक लेख पर जवाब देते हुए कहा था कि उनके कार्यकाल में आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के कुछ मामलों में जनप्रतिनिधित्व कानून और भारतीय दंड संहिता के संबंधित प्रावधानों के तहत कार्रवाई नहीं हुई थी। हम आपको यह भी बता दें कि सोशल मीडिया पर कुछ यूजर्स ने कुरैशी के दृष्टिकोण, वैचारिक झुकाव और पाकिस्तान के चुनावों को कथित रूप से निष्पक्ष बताने संबंधी उनके पुराने बयानों पर सवाल उठाए हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि किसी भी संवैधानिक संस्था की आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन आलोचना करने वाले की अपनी कसौटियां भी जांच के दायरे में आती हैं। यदि कुरैशी का मानना है कि एसआईआर गलत है, तो उन्हें ठोस आंकड़ों, कानूनी तर्कों और प्रमाणों के साथ अपनी बात रखनी चाहिए। केवल तीखे आरोपों और सार्वजनिक अभियानों से किसी संस्था की विश्वसनीयता पर सवाल तो उठाया जा सकता है लेकिन आरोपों को प्रमाणित करना भी जरूरी होता है। कंवल सिब्बल की आपत्ति का कारण भी यही है। कुरैशी कभी उस संस्था के मुखिया थे, जिसकी स्वतंत्रता और साख पर उन्हें गर्व था। आज वही संस्था उनके निशाने पर है। उनके रुख में यह बदलाव किन तथ्यों और अनुभवों के कारण आया, इसका जवाब उन्हें देना चाहिए। बहरहाल, सवाल उठता है कि क्या कुरैशी वास्तव में चुनावी सुधारों की लड़ाई लड़ रहे हैं, या मौजूदा आयोग के खिलाफ राजनीतिक अविश्वास की मुहिम में अपनी पूर्व संवैधानिक हैसियत का इस्तेमाल कर रहे हैं? उनकी मंशा पर अंतिम फैसला तथ्यों के आधार पर ही होगा, लेकिन उनके पुराने बयानों और मौजूदा आक्रामकता के बीच का अंतर इतना बड़ा है कि जवाब मांगना जरूरी हो गया है। -नीरज कुमार दुबे
बदलती दुनिया में अप्रासंगिक होता संयुक्त राष्ट्र
दुनिया के 50 देशों ने वर्ष 1945 में मिलकर संयुक्त राष्ट्र अधिकार पत्र पर हस्ताक्षर कर संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन किया था, जिसके बाद से प्रतिवर्ष 24 अक्तूबर को संयुक्त राष्ट्र दिवस मनाया जाता है। दरअसल द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को अधिक समतापूर्ण और न्यायोचित बनाने के लिए एक नए संगठन की स्थापना का विचार उभरा था, जो पांच राष्ट्रमंडल सदस्यों तथा आठ यूरोपीय निर्वासित सरकारों द्वारा 12 जून 1941 को लंदन में हस्ताक्षरित अंतर-मैत्री उद्घोषणा में पहली बार सार्वजनिक रूप से अभिव्यक्त हुआ था। उस उद्घोषणा के अंतर्गत एक स्वतंत्र विश्व के निर्माण हेतु कार्य करने का आव्हान किया गया था, जिसमें लोग शांति और सुरक्षा के साथ भयमुक्त वातावरण में रह सकें तथा निजीकरण एवं आर्थिक सहयोग के मार्ग की खोज कर सकें। उसके बाद 1944 में सोवियत संघ, अमेरिका, चीन तथा ब्रिटेन के प्रतिनिधियों द्वारा वाशिंगटन के डम्बर्टन ओक्स एस्टेट में कई बैठकों के आयोजन के बाद एक शांतिरक्षक वैश्विक संस्था बनाने की रूपरेखा तैयार की गई, जिसके आधार पर 50 देशों के प्रतिनिधियों के बीच 1945 में बातचीत हुई और 26 जून 1945 को सभी 50 देशों द्वारा चार्टर पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद यह चार्टर 24 अक्तूबर 1945 से प्रभावी हो गया। तभी से प्रतिवर्ष 24 अक्तूबर को ‘संयुक्त राष्ट्र दिवस’ मनाया जाने लगा। अंतर्राष्ट्रीय संघर्षों में हस्तक्षेप करने के उद्देश्य से स्थापित करते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ को इतनी शक्तियां प्रदान की गई कि वह अपने सदस्य देशों की सेनाओं को विश्व शांति के लिए कहीं भी तैनात कर सकता है। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के बाद से ही दुनिया के अनेक देश इसके साथ जुड़ते गए और 50 सदस्यों के साथ शुरू हुए इस वैश्विक संघ के सदस्य देशों की संख्या अब 193 हो चुकी है। संयुक्त राष्ट्र की संरचना में सुरक्षा परिषद वाले सबसे शक्तिशाली देश थे अमेरिका, फ्रांस, रूस तथा यूनाइटेड किंगडम, जिनकी द्वितीय विश्वयुद्ध में अहम भूमिका थी। संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्य उद्देश्यों में युद्ध रोकना, मानवाधिकारों की रक्षा करना, सभी देशों के बीच मित्रवत संबंध कायम करना, अंतर्राष्ट्रीय कानूनों को निभाने की प्रक्रिया जुटाना, सामाजिक एवं आर्थिक विकास, निर्धन तथा भूखे लोगों की सहायता करना, उनका जीवन स्तर सुधारना, बीमारियों से लड़ना इत्यादि शामिल हैं और इन उद्देश्यों को निभाने के लिए 1948 में मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा प्रमाणित की गई। हालांकि विड़म्बना है कि संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के इन 81 वर्षों में यह वैश्विक संस्था अब धीरे-धीरे अपनी प्रासंगिकता खोने लगी है। दरअसल बीते 81 वर्षों से अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, अर्थव्यवस्था, हथियार, मीडिया, समाज, मुद्रा तथा समाज से संबंधित तमाम नीतियां इसके पांच स्थायी सदस्य देशों ब्रिटेन, अमेरिका, चीन, रूस तथा फ्रांस के राष्ट्रीय हितों के अनुरूप ही निर्धारित की जाती रही हैं, जिस कारण ऐसी नीतियों का खामियाजा भारत के अलावा जापान, जर्मनी, आस्ट्रेलिया, इजरायल, दक्षिण कोरिया, ब्राजील, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात जैसे कई अन्य देशों को भुगतना पड़ा है, जो संयुक्त राष्ट्र महासभा की स्थायी सदस्यता के लिए तमाम मानदंडों को पूरा करने के बाद भी दशकों से सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य बनने के लिए प्रयासरत हैं। इसे भी पढ़ें: United Nations Day 2026: संयुक्त राष्ट्र की साख पर सवाल, सुधार से ही बचेगी प्रतिष्ठा संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के आठ दशकों में विश्व के सामरिक और आर्थिक समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं लेकिन इतना लंबा समय बीत जाने और तमाम वैश्विक समीकरण पूर्ण रूप से बदल जाने के बावजूद वीटो अधिकार वाले पांचों स्थायी सदस्यों में से कोई भी अपने वीटो अधिकार और स्थायी सीट को छोड़ने को तैयार नहीं है। हालांकि स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने पर संयुक्त राष्ट्र में आम सहमति है लेकिन चीन को खासकर एशिया से वीटो अधिकार वाले सदस्यों की संख्या बढ़ाना किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं है, जहां स्थायी सदस्यता के दोनों दावेदारों (भारत और जापान) पर वह विभिन्न कारणों से संदेह करता है। भारत ने जिस चीन को मान्यता देने में पहल की थी और सुरक्षा परिषद में उसकी स्थायी सीट को सिद्धांत के तौर पर लेने से मना कर दिया था, आज वही चीन भारत की स्थायी सदस्यता के मार्ग में रोड़े अटका रहा है। भारत चीन के वीटो पावर के कारण ही सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य नहीं बन पा रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा पारित किए जाने वाले प्रस्ताव बाध्यकारी प्रकृति के नहीं होते। आश्चर्य की बात है कि महासभा में 193 सदस्य देशों द्वारा पारित किए जाने वाले प्रस्ताव भी सुरक्षा परिषद के 5 स्थायी सदस्यों की सहमति पर ही निर्भर करते हैं। इसीलिए अनेक देशों द्वारा इसमें सुधार किए जाने की मांग बीते कई वर्षों से निरंतर की जा रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए भारत की दावेदारी की वकालत करते हुए कह चुके हैं कि नई ताकतों को केन्द्रीय भूमिका में लाए बिना दुनिया की यह सबसे बड़ी पंचायत स्वयं से की जाने वाली अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पाएगी। दुनिया के कई देश बार-बार कहते रहे हैं कि संयुक्त राष्ट्र का ढ़ांचा अब पुराना पड़ चुका है और इसकी स्थापना के समय जो परिस्थितियां थी, वे अब बहुत पुरानी हो चुकी हैं। इसलिए यदि यह वैश्विक संस्था अपने भीतर समयानुकूल सुधार नहीं लाती है तो कालांतर में यह महत्वहीन होती चली जाएगी। रूस-यूक्रेन युद्ध हो या इजरायल-फिलस्तीन अथवा अमेरिका-ईरान युद्ध, इन संघर्षों में दोनों ही पक्षों के हजारों बेगुनाह लोग मारे जा रहे हैं, हजारों परिवार उजड़ चुके हैं, लाखों की आबादी पलायन की त्रासदी से जूझ रही है, शहर के शहर मलबे में तब्दील हो रहे हैं लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ इन संघर्षों को रोकने के लिए कुछ नहीं कर सका है। इसीलिए दुनिया में जगह-जगह युद्ध टालने के लिए संयुक्त राष्ट्र की ओर से ठोस योजनाओं पर अमल किए जाने की जरूरत महसूस होती रही है क्योंकि इस वैश्विक संस्था का गठन ही दुनिया में अमन-चैन कायम रखने के उद्देश्य के साथ किया गया था लेकिन चिंता की बात है कि इन युद्धों में उसकी निष्क्रियता समूची मानव सभ्यता पर भारी पड़ रही है। भीषण होते इन युद्धों के कारण दुनिया अब दो धड़ों में बंटती जा रही है और संयुक्त राष्ट्र के अधिकांश सदस्य देश भी अब केवल बयान जारी करने से आगे नहीं बढ़ रहे। बहरहाल, यदि अभी भी संयुक्त राष्ट्र के पुनर्गठन की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती है तो यह संस्था आने वाले समय में अपना महत्व खो देगी। सही मायनों में दुनिया की इस सबसे बड़ी पंचायत को अब गंभीर आत्ममंथन की जरूरत के साथ पर्याप्त सुधारों की सख्त दरकार है। - योगेश कुमार गोयल (लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और हिन्दी अकादमी दिल्ली के सौजन्य से प्रकाशित ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ पुस्तक के लेखक हैं)
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पश्चिम बंगाल कांग्रेस ने शहरी निकाय चुनावों में सीट बंटवारे की संभावना से किया इनकार
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Jamia University: दीवारों पर ‘फ्री कश्मीर’ और ‘फ्री शरजील इमाम’ के नारे मिलने का दावा, परिसर के बाहर पुलिस तैनात
ओडिशा को 'इंडिया केम 2026' में 53,893 करोड़ रुपए के निवेश प्रस्ताव मिले
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जामिया यूनिवर्सिटी में बवाल के बीच इमरान मसूद हिरासत में, 'फ्री कश्मीर' नारों पर सियासत तेज
छात्रसंघ चुनाव की मांग को लेकर जारी आंदोलन के बीच विवादित नारों ने बढ़ाया तनाव, एबीवीपी ने FIR और जांच की मांग उठाई
उत्तर प्रदेश: युवती को गोली मारने के मामले में एनसीडब्ल्यू सख्त, डीजीपी से मांगी रिपोर्ट
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विरोध-प्रदर्शन लोकतांत्रिक अधिकार, रोकेंगे तो हर सड़क बनेगी जंतर-मंतर : कासिम रसूल इलियास
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यूपी चुनाव 2027: ओवैसी पर नसीम सिद्दीकी का निशाना, बोले- जनता को सावधान रहने की जरूरत
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महाराष्ट्र: मंत्री गिरीश महाजन ने राज्यपाल को दिया सिंहस्थ कुंभ मेला ध्वजारोहण समारोह का निमंत्रण, राष्ट्रपति भी रहेंगी मौजूद
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