'UPI पर टैक्स से अमेरिका को फायदा': राहुल गांधी का केंद्र पर निशाना, फैसला वापस लेने की मांग
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मुंबई, अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीतिगत बैठक के फैसले से पहले तेल की कीमतों में नरमी आने से बुधवार के सत्र में भारतीय शेयर बाजार पिछले दो दिनों की गिरावट से उबरकर बढ़त के साथ हरे निशान में बंद हुआ। इस बीच, एफएमसीजी, रियल्टी और पीएसयू बैंक के शेयरों के समर्थन से प्रमुख बेंचमार्क निफ्टी और सेंसेक्स में 0.45 प्रतिशत तक की तेजी देखने को मिली।
यूपीआई का फ्री युग खत्म, विपक्ष हमलावर पर पेमेंट ऐप्स खुश
व्यापारियों को किए जाने वाले 2000 रुपए से अधिक के यूपीआई लेन-देन पर फीस लगाई जाएगी. कांग्रेस ने इसे लूट करार दिया है.
मथुरा में सपा नेता राजन रिजवी पर महिला बैंककर्मी से अभद्रता और पीछा करने के आरोप में एफआईआर दर्ज
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सऊदी अरब के लिए खतरे की घंटी अब मक्का तक पहुंच गई है। इस्लाम के सबसे पवित्र शहर मक्का में पहली बार संभावित हवाई हमले को लेकर आपात चेतावनी जारी होने और सायरन बजने से पूरी दुनिया में चिंता पैदा हो गई है। मक्का में हर साल दुनिया के कोने-कोने से लाखों मुसलमान पहुंचते हैं, इसलिए यहां मंडराता कोई भी सुरक्षा खतरा सिर्फ सऊदी अरब की चिंता नहीं रह जाता। हम आपको बता दें कि लोगों को घरों के भीतर जाने और खिड़कियों-दरवाजों से दूर रहने को कहा गया। जेद्दा और ताइफ में भी ऐसी ही चेतावनी जारी हुई। कुछ ही मिनटों में अलर्ट हटा लिया गया, लेकिन इस घटना ने साफ कर दिया कि यमन के हूतियों से बढ़ता खतरा अब सऊदी अरब के बेहद संवेदनशील इलाकों तक पहुंच चुका है। मक्का का नाम इस पूरे संकट को असाधारण रूप से संवेदनशील बना देता है। यह केवल सऊदी अरब का शहर नहीं, बल्कि इस्लाम का सबसे पवित्र धार्मिक केंद्र है। इसलिए यहां हवाई खतरे की चेतावनी ने सैन्य संकट को सीधे धार्मिक और राजनीतिक संकट में बदल दिया है। इस्लामी सहयोग संगठन ने मक्का और मदीना क्षेत्र पर हमलों की कड़ी निंदा करते हुए कहा है कि पवित्र स्थलों, मस्जिदों और नागरिक ढांचे को निशाना बनाना अस्वीकार्य है और उसने सऊदी अरब की सुरक्षा तथा पवित्र स्थलों की रक्षा के उपायों का समर्थन किया है। इसे भी पढ़ें: Middle East Tension: मक्का के पास सऊदी एयर डिफेंस ने हूथी ड्रोन को किया ढेर, गठबंधन ने दी 'रेड लाइन' की सख्त चेतावनी लेकिन असली तस्वीर मक्का से कहीं बड़ी है। हम आपको बता दें कि 12 सितंबर को यमन से दागा गया प्रक्षेपास्त्र सऊदी अरब के जाजान क्षेत्र में गिरा, जिसमें दो लोग घायल हुए और एक मस्जिद सहित कई इमारतों तथा वाहनों को नुकसान पहुंचा। इसके अगले दिन सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने खमिस मुशैत, अबहा और ताइफ के नागरिक इलाकों पर बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन से हमलों की बात कही। इन हमलों में 13 नागरिक घायल हुए और आवासीय मकानों तथा वाहनों को नुकसान पहुंचा। रियाद ने अब साफ संकेत दिया है कि लगातार हमलों का जवाब दिया जाएगा। सबसे खतरनाक बात यह है कि हमला केवल शहरों पर नहीं हो रहा। सऊदी अरब की ऊर्जा व्यवस्था भी निशाने पर है। 11 सितंबर को इराक से हुए ड्रोन हमले के बाद करीब 1,200 किलोमीटर लंबी पूर्व-पश्चिम तेल पाइपलाइन को बंद करना पड़ा। यह पाइपलाइन प्रतिदिन लगभग 40 से 50 लाख बैरल तेल लाल सागर तक पहुंचाने में सक्षम है और होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी संकट के बीच सऊदी अरब के लिए बेहद महत्वपूर्ण वैकल्पिक रास्ता बन गई थी। यही वह बिंदु है जहां संकट का सामरिक अर्थ साफ दिखाई देता है। यदि होर्मुज बाधित है और लाल सागर के प्रवेश द्वार बाब-अल-मंदब पर भी हूतियों का दबदबा बढ़ता है, तो सऊदी अरब के सामने तेल निर्यात के सुरक्षित रास्ते लगातार सिकुड़ते जाएंगे। यानी निशाना केवल रियाद नहीं, बल्कि उसकी ऊर्जा-आधारित आर्थिक शक्ति और पूरी वैश्विक आपूर्ति शृंखला है। साथ ही हूतियों ने यमन के पश्चिमी तट पर मोखा बंदरगाह और रणनीतिक पेरिम द्वीप पर कब्जा कर अपनी स्थिति को और मजबूत किया है। इसके बाद हनीश द्वीपों पर भी उनकी पकड़ की खबरें सामने आईं। पेरिम द्वीप बाब-अल-मंदब के सबसे संकरे हिस्से में स्थित है और इस समुद्री मार्ग पर नियंत्रण का अर्थ लाल सागर में आने-जाने वाले जहाजों पर दबाव बनाने की क्षमता है। यह घटनाक्रम महज यमन के भूभाग की लड़ाई नहीं है। बाब-अल-मंदब लाल सागर को हिंद महासागर से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण समुद्री द्वार है। ऐसे में हूतियों की बढ़त सऊदी अरब के पश्चिमी तट, उसके तेल निर्यात और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार—तीनों पर एक साथ दबाव पैदा करती है। देखा जाये तो यहां सऊदी अरब की कूटनीतिक रणनीति पर भी सवाल उठते हैं। पाकिस्तान के साथ ‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौते’ के जरिए रियाद ने सामूहिक सुरक्षा का एक नया ढांचा खड़ा किया है, जिसमें एक सदस्य पर हमला सभी पर हमला माना गया है। लेकिन यदि सऊदी अरब ने भारत के साथ सुरक्षा और सामरिक सहयोग को और अधिक गहरा किया होता, तो मौजूदा संकट में उसके पास एक अतिरिक्त और महत्वपूर्ण साझेदार हो सकता था। भारत और सऊदी अरब के बीच पहले से ही रक्षा, नौसैनिक सहयोग, खुफिया साझेदारी और संयुक्त सैन्य अभ्यास मौजूद हैं। दूसरी ओर, भारत के ईरान और इजराइल के साथ भी ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंध हैं। ऐसे में भारत की दोनों पक्षों के साथ संवाद की क्षमता सऊदी अरब के लिए एक अतिरिक्त कूटनीतिक और सामरिक सहारा बन सकती थी। फिर भी मौजूदा संकट यह सवाल जरूर खड़ा करता है कि क्या रियाद ने अपनी सुरक्षा साझेदारियों का दायरा जरूरत से ज्यादा सीमित कर दिया है। इसमें कोई दो राय नहीं कि रियाद के सामने अब विकल्प कम हैं। सऊदी अरब के पास आधुनिक हथियार, विशाल आर्थिक संसाधन और मजबूत वायु रक्षा है, लेकिन हूतियों की रणनीति ने युद्ध को मुश्किल बना दिया है। छोटे ड्रोन, मिसाइल, समुद्री दबाव और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर हमले के जरिए अपेक्षाकृत कमजोर पक्ष भी भारी रणनीतिक लागत पैदा कर सकता है। वैसे रियाद अब तक संयम बरतता रहा है। लेकिन पाइपलाइन पर हमला, लगातार मिसाइल और ड्रोन हमले तथा बाब-अल-मंदब के आसपास हूतियों की बढ़त इस संयम की सीमा को चुनौती दे रहे हैं। अमेरिकी सहायता भी बढ़ी है। एक सौ से अधिक अमेरिकी सैन्य सलाहकार सऊदी अरब में खुफिया सूचना और लक्ष्य निर्धारण में सहायता कर रहे हैं, लेकिन अमेरिका सीधे युद्ध में उतरने से बच रहा है। यही सबसे बड़ा रणनीतिक पेच है। सऊदी अरब पीछे हटता है तो हूतियों का दबदबा बढ़ सकता है; वह व्यापक सैन्य कार्रवाई करता है तो संघर्ष लंबा और अधिक विनाशकारी हो सकता है। विशेषज्ञों ने भी चेताया है कि बड़े पैमाने पर सऊदी जवाबी कार्रवाई संघर्ष को फिर एक खुले और लंबे युद्ध में बदल सकती है। इसलिए मक्का की चेतावनी को केवल एक सुरक्षा अलर्ट समझना भारी भूल होगी। इसके पीछे एक बहुत बड़ा खेल दिखाई दे रहा है। जिसके तहत सऊदी शहरों पर दबाव बनाया जा रहा है, तेल की नस पर हमला हो रहा है और बाब-अल-मंदब जैसे समुद्री द्वार पर पकड़ हासिल की जा रही है। होर्मुज और बाब-अल-मंदब दोनों पर संकट गहराया तो इसका असर केवल सऊदी अरब या यमन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि तेल, समुद्री व्यापार और विश्व अर्थव्यवस्था तक पहुंचेगा। बहरहाल, मक्का तक पहुंचा खतरा इसलिए इस संघर्ष का नया मोड़ है। अब सवाल यह है कि सऊदी अरब कब तक अपनी सीमाओं, पवित्र स्थलों, तेल ढांचे और समुद्री हितों पर एक साथ पड़ते इस चौतरफा दबाव को सहन करेगा।
करोड़ो यूपीआई यूजर्स के मन में एक सवाल घूम रहा है। सवाल ये कि क्या 2000 रुपए से ऊपर की यूपीआई पेमेंट पर आपको पैसा देना होगा? मतलब आप ₹500 की यूपीआई करोगे तो मुफ्त और ₹5000 की करोगे तो क्या आपकी जेब से कुछ कटेगा? और अगर कटेगा तो फिर जिस डिजिटल इंडिया का नाम लेकर सरकार ने खुद कहा था कि यूपीआई फ्री रहेगा। उसी सरकार के अपने कागज में कल पहली बार 2000 को लेकर एक लकीर क्यों खींची? उसी कागज में एक तरफ लिखा था कि बैंक 2000 तक की पेमेंट पर ₹1 नहीं ले सकते। ना सीधे ना घुमाकर। लेकिन दूसरी तरफ 2000 के ऊपर कुछ कंडीशंस लगाई गई थी। वो कंडीशंस क्या पैसा लेने के लिए? सवाल यह भी उठता है कि जो लकीर आज तक कहीं थी नहीं उसे सरकार क्यों लगा रही है? क्या यूपीआई को लेकर जो नए नियम है वो सिर्फ कागजों के फेरबदल है या वाकई में 2000 के ऊपर चार्ज लगेगा और चार्ज लग रहा है तो किसकी जेब से कटेगा? आम आदमी की जेब से या वो जो इसे बिजनेस में इस्तेमाल करते हैं दुकानदार उनकी जेब से और अगर दुकानदार की जेब से भी जाता है तो क्या वो घूमकर आपके सामान में नहीं जुड़ेगा? यूपीआई से लोग आज शहर से गांव पैसा भेजते हैं। स्कूल की फीस जमा करते हैं। हर महीने घर का राशन ऑनलाइन मंगाते हैं। और जितने लोग यूपीआई से सारा काम करते हैं। अब तो भीख मांगने वाले भी लोग जो हैं वो यूपीआई दिखाते हैं। तो उन सबके मन में ये सवाल है कि भाई साहब 2000 के ऊपर अगर 3000 का बिल गया तो क्या पैसा लोगे? 4000 डॉक्टर की फीस मांगा तो क्या फीस के साथ यूपीआई का भी टैक्स देंगे? और घर का किराया तो 8000, 10000 20,000 हो तो क्या वहां जाएगा? इसे भी पढ़ें: डूबने वाला है ब्रिटेन का सूरज, होंगे 4 टुकड़े! UK अगर टूटता है तो इसका भारत पर क्या असर होगा? कैसे शुरू हुई चर्चा 15 सितंबर को अखबारों में खबर आ गई कि यूपीआई पर 2000 के यूपीआई ट्रांजैक्शन पर कोई पैसा नहीं लगेगा। सबको समझ में आ गया कि यार 2000 के ऊपर वाले पर तो लगेगा ही लगेगा। सरकार अगर यह कह रही है तो कोई बहुत दिन से ही चल रहा था कि यूपीआई ट्रांजैक्शन पर सरकार चार्ज लगाने वाली है। कई बार खंडन होता, कभी दबी आवाज में खंडन होता, कभी स्पष्टीकरण आता, कभी फ्रेमवर्क पे काम करने की बातें कही जाती। लेकिन 15 सितंबर की ही शाम को वित्त मंत्रालय ने निर्मला सीतारमण का जो मंत्रालय है उसने एक फ्रेमवर्क जारी किया है। फ्रेमवर्क शाम को करीब 7 बजे के आसपास सामने आया है। जिसमें यह साफ कहा गया है कि जी हां 2000 के ऊपर के यूपीआई ट्रांजैक्शन पे अब चार्ज लगेगा। लेकिन शर्तें हैं। सरकार ने बताया किनको नहीं देना है पैसा सोशल मीडिया बहस शुरू हो गई। यहीं से खबर आई कि भाई 2000 तक अगर आपने लिखा है तो क्या उसके आगे और यह अफवाह फैलनी तेज हो गई। रोज सुबह चाय वाले को, शाम को दूध वाले को, महीने के आखिर में घर के किराए वाले को आप यूपीआई से पैसा भेजते हैं। वहां पर एक्स्ट्रा पैसा नहीं जाता। क्या अब एक्स्ट्रा जाएगा? यह मैसेज वायरल हुआ कि 2000 के ऊपर की हर पेमेंट पर पैसा कटेगा और वो आपके खाते से कटेगा। कई लोगों ने अपने बैंक की ऐप चेक करनी शुरू कर दी कि पैसा कटा तो नहीं क्योंकि 2019 से यह फ्री था। पर अब क्या होगा? सरकार ने साफ किया है कि यूपीआई इस्तेमाल करने वाला आम ग्राहक के पैसे से रुपया नहीं कटेगा। चाहे पेमेंट कितनी बड़ी भी क्यों ना हो। जो चार्ज की बात है वह एमडीआर है। यानी दुकानदार अपनी बिक्री पर बैंक को जो थोड़ी सी फीस देता है। ठीक वैसे ही जैसे कार्ड से पेमेंट लेने पर देता है। और यह सिर्फ दुकान पर होने वाले पेमेंट की बात है। दोस्त या घर वाले को सीधे पैसे भेजने पर चाहे जितनी बड़ी रकम हो पैसा नहीं जाएगा। हां और अभी तक यह फीस लगाने का कोई अंतिम फैसला भी नहीं हुआ है कि दुकानदार पर कितनी लेगी यह एनपीसीआई की एक कमेटी तय करेगी। यानी वही सरकारी कंपनी जो यूपीआई को पीछे चलाती है और जिसका काम अभी शुरू हुआ है। इसे भी पढ़ें: दोस्त इजरायल को झटका! क्या भारत ने बदल लिया अपना रुख, ईरान के लिए नेतन्याहू को छोड़ा? UPI सेमहीनेमें100000 कमानेवालेव्यापारियोंकोनहींदेनाहोगाशुल्क सामान्य ग्राहक आम लोगों पर शुल्क लगेगा? नहीं, UPI भुगतान मुफ्त रहेगा। चाहे भुगतान Person-to-Person (P2P) हो या Person-to-Merchant (P2M), ग्राहक से शुल्क नहीं लिया जाएगा। UPI ऐप भी ग्राहक से कोई फीस नहीं लेंगे। QR स्कैन करने पर चार्ज लगेगा? नहीं। छोटे भुगतान पहले की तरह मुफ्त रहेंगे और व्यापारी यह शुल्क ग्राहक से नहीं वसूलेंगे। सरकार के मुताबिक, बैंक व्यापारियों के लेन-देन पर नजर रखेंगे। छोटे व्यापारी ₹2,000 से अधिक के भुगतान पर क्या होगा? ऐसे भुगतान पर 0.40% शुल्क लागू होगा। हालांकि, अगर व्यापारी की UPI से महीने की प्राप्ति ₹1 लाख तक है, तो MDR नहीं लगेगा। क्या नया QR कोड लेना होगा? नहीं। मौजूदा QR कोड से ही भुगतान जारी रहेगा। क्या जीएसटी रजिस्ट्रेशन जरूरी है? नहीं। शून्य MDR का लाभ लेने के लिए GST रजिस्ट्रेशन अनिवार्य नहीं है। सीमा कैसे तय होगी? बैंक व्यापारी के लेन-देन की निगरानी करेंगे। अगर लगातार 3 महीने तक UPI से प्राप्ति ₹1 लाख से अधिक रहती है, तभी व्यापारी को Person-to-Merchant श्रेणी में बदला जाएगा। बड़ेव्यापारी-ईकॉमर्स ₹2,000 से कम के भुगतान पर भी जीरो MDR लागू है। वहीं, ₹75,000 से अधिक के लेनदेन के लिए अधिकतम फीस ₹300 तय की गई है। क्रेडिट या डेबिट कार्ड के मुकाबले UPI कितना किफायती है? अभी क्रेडिट कार्ड पर 1.5% से 2.5% और डेबिट कार्ड पर 0.90% तक शुल्क लगता है। इसके मुकाबले UPI पर सिर्फ 0.40% या अधिकतम ₹300 का शुल्क रहेगा। क्या जीरो MDR का फायदा लेने के लिए छोटे दुकानदार को GST पंजीकरण कराना जरूरी है? नहीं। छोटे दुकानदारों को UPI भुगतान पर जीरो MDR का लाभ लेने के लिए सिर्फ इसी वजह से GST पंजीकरण कराने की जरूरत नहीं होगी। इसकी पात्रता तय करने में मासिक UPI कलेक्शन की सीमा और बैंक खाते की श्रेणी देखी जाएगी। जो छोटे कारोबारी कानून के तहत GST पंजीकरण की अनिवार्य सीमा से नीचे हैं, वे बिना GST दस्तावेज दिए भी डिजिटल भुगतान स्वीकार कर सकेंगे। यूपीआई तो इतने सालों तक फ्री था, अचानक इसकी जरूरत क्यों पड़ी सरकार ने यह कदम इसलिए उठाया ताकि UPI के सिस्टम को टिकाऊ बनाया जा सके। किसी भी व्यवस्था को चलाने की लागत होती है और UPI के मामले में यह हर साल औसतन 20 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा है। ट्रांजैक्शन की संख्या बढ़ने के साथ खर्च भी बढ़ रहा है और फिलहाल बैंक, सर्विस प्रोवाइडर कंपनियां और सरकार मिल-जुलकर इसका बोझ उठा रहे हैं। लेकिन, यह व्यवस्था शायद लंबे वक्त तक नहीं चल पाती। UPIकीताकत सरकार आम लोगों को सहूलियत देने और सिस्टम को टिकाऊ बनाने के बीच संतुलन रखना चाहती है। हालांकि, इन फैसलों से जुड़ी चिंताओं को समझते हुए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि MDR का बोझ आम लोगों पर न पड़े। देश में डिजिटल ट्रांजैक्शन की सबसे बड़ी ताकत इसकी सरलता और मुफ्त होना रही है। इसी वजह से UPI ने उन दूर-दराज के इलाकों तक भी पहुंच बनाई है, जहां इंटरनेट उपलब्ध है। ऐसे में इसकी सहजता और मुफ्त व्यवस्था बनी रहना जरूरी है। अगर आम उपभोक्ताओं पर थोड़ा भी अतिरिक्त बोझ पड़ा, तो UPI की स्वीकार्यता प्रभावित हो सकती है। डिजिटल इंडिया की दिशा में UPI एक बड़ी छलांग है और आज कई अन्य देश भी इसे अपना रहे हैं। इसने भुगतान प्रणाली को बेहद सरल बनाने के साथ-साथ व्यापार को बढ़ाने में भी मदद की है। ऐसे में UPI को सहज, सुलभ और आम लोगों के लिए किफायती बनाए रखना जरूरी होगा। जब-जब मर्चेंट फीस लगी, बोझ ग्राहकों पर ही पड़ा, 5 उदाहरण से समझें पेट्रोल पंप: कार्ड से भुगतान पर पेट्रोल पंप संचालक खुद शुल्क चुकाने के बजाय इसे 'फ्यूल सरचार्ज' के रूप में ग्राहक से वसूल रहे हैं। ज्वेलर्स: बैंक के 1.5% से 2% MDR की भरपाई के लिए ज्वेलर्स ग्राहक के बिल में 'कार्ड सरचार्ज' जोड़ रहे हैं। IRCTC, सिनेमा हॉल और ट्रैवल ऐप्स: भुगतान गेटवे के शुल्क को 'कन्विनियंस फीस' के नाम पर ग्राहक से वसूल रहे हैं। छोटे भुगतान: फिक्स्ड प्रोसेसिंग कॉस्ट से बचने के लिए कुछ व्यापारी ₹200 या ₹500 से कम के भुगतान पर कार्ड लेने से इनकार करते हैं और ग्राहक को अधिक खरीदारी के लिए मजबूर करते हैं। रेस्तरां और स्टोर्स: MDR को सीधे बिल में जोड़ना गैर-कानूनी होने के बावजूद कुछ रेस्तरां और स्टोर्स 5% तक का 'सर्विस चार्ज' लगाकर ग्राहक से अतिरिक्त शुल्क वसूलते हैं।
प्राइवेट स्कूल रिश्वत कांड में पूर्व मंत्री अनबिल महेश के ठिकानों पर क्राइम ब्रांच का छापा
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मुंबई, सोने और चांदी की कीमतों में बुधवार को तेजी देखने को मिली और दोनों कीमती धातुओं का दाम करीब 1.5 प्रतिशत तक बढ़ गया।
पीएम मोदी के जन्मदिन पर बंगाल में जलाया जाएगा 'आशीर्वाद का दीया', सीएम सुवेंदु ने लोगों से की अपील
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UPI पर अमेरिका का वार! क्या US कंपनियों के दबाव में Modi सरकार ने किया FREE UPI का अंत ?
यूपीआई मर्चेंट भुगतान पर शुल्क को कांग्रेस ने बताया- मोदी सरकार की 'द ग्रेट UPI लूट'
2000 रुपये से अधिक के यूपीआई मर्चेंट भुगतान पर 0.4% शुल्क लगाए जाने के सरकार के फैसले पर कांग्रेस ने मोदी सरकार को घेरा और इसे 'जेब काटो योजना' करार दिया। राहुल गांधी ने कहा कि दुकानदार पर लगने वाली फ़ीस क़ीमतों में जुड़कर ग्राहक की जेब से आएगी।
UPI से 2,000 रुपये से ऊपर लेनदेन पर शुल्क, 15 अक्टूबर से लागू
सरकार ने यूपीआई के जरिये 2,000 रुपये से अधिक के मर्चेंट ट्रांजेक्शन पर 0.4 प्रतिशत शुल्क तय किया है जो 15 अक्टूबर से लागू होगा। वित्त मंत्रालय ने मंगलवार शाम एक प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि व्यक्तिगत यूपीआई खातों से मर्चेंट खातों में भुगतान पर 2,000 रुपये से अधिक के लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लागू होगा
‘समान नागरिक संहिता कबूल नहीं है', मुस्लिम धर्मगुरुओं ने जताई आपत्ति
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भूपेंद्र यादव ने 'बदलने से पहले मरम्मत' पर जोर दिया, बोले- सर्कुलर इकोनॉमी सिर्फ रीसाइक्लिंग प्लांट में नहीं बन सकती
केपटाउन: दिल्ली के स्पीकर विजेंद्र गुप्ता कॉमनवेल्थ कॉन्फ्रेंस में 'समावेशी लोकतंत्र' पर रखेंगे विचार
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क्या दिखाता है 2027 यूपी चुनाव से पहले अखिलेश यादव का ‘नीला दांव’
समाजवादी पार्टी की छात्रसभा अब नीली टी-शर्ट और जींस में नजर आएगी. यूपी की राजनीति में नीला रंग अंबेडकरवादी और बहुजन राजनीति से जुड़ा रहा है. क्या अखिलेश यादव की कोशिश 2027 से पहले एक नई सामाजिक पहचान बनाने की है
आतंकी मसूद पर पाकिस्तान की नई नौटंकी
आतंकवाद के प्रश्न पर पाकिस्तान की भूमिका लंबे समय से विश्व समुदाय के लिए चिंता का विषय रही है। आतंकवाद के विरुद्ध कठोर कार्रवाई का दिखावा और आतंकी संगठनों के प्रति नरम रवैया, पाकिस्तान की विदेश एवं सुरक्षा नीति के इस विरोधाभासी चरित्र ने उसकी विश्वसनीयता को लगातार कठघरे में खड़ा किया है। आतंकी सरगना मसूद अजहर को लेकर पाकिस्तान की हालिया कार्रवाई भी इसी विरोधाभास की एक नई कड़ी के रूप में देखी जा रही है। उसे भगोड़ा घोषित करना और उसकी गिरफ्तारी पर इनाम की घोषणा करना पहली दृष्टि में कठोर कार्रवाई का संकेत देता है, लेकिन पाकिस्तान के पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए इसके पीछे की वास्तविक मंशा पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। मसूद अजहर कोई सामान्य अपराधी नहीं है। वह भारत में हुए अनेक आतंकी हमलों से जुड़े उन कुख्यात चेहरों में रहा है, जिनकी गतिविधियों ने न केवल भारत की सुरक्षा को चुनौती दी, बल्कि दक्षिण एशिया में आतंकवाद के नेटवर्क की भयावहता को भी उजागर किया। वर्ष 1999 में इंडियन एयरलाइंस के विमान के अपहरण के बाद यात्रियों की रिहाई के बदले भारत को जिन आतंकवादियों को छोड़ना पड़ा, उनमें मसूद अजहर भी शामिल था। इसके बाद उसने आतंकवादी गतिविधियों के जिस नेटवर्क को आगे बढ़ाया, उसने भारत की सुरक्षा व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी कीं। विडंबना यह है कि जिस व्यक्ति को भारत लंबे समय से आतंकवाद का प्रमुख चेहरा मानता रहा है, उसी मसूद अजहर को लेकर पाकिस्तान अब यह दावा कर रहा है कि वह उसकी पकड़ से बाहर है और संभवतः अफगानिस्तान में छिपा हुआ है। यदि यह दावा सही है तो सवाल यह उठता है कि पाकिस्तान की सुरक्षा और खुफिया एजेंसियां इतने कुख्यात आतंकी के संबंध में इतनी अनभिज्ञ कैसे हो सकती हैं? और यदि वह पाकिस्तान से बाहर है तो उसके संगठनात्मक नेटवर्क, आर्थिक संसाधनों और संपर्कों पर कार्रवाई क्यों दिखाई नहीं देती? यहीं से पाकिस्तान की कार्रवाई पर संदेह की परतें गहरी होने लगती हैं। पाकिस्तान की जांच एजेंसी एफआईए द्वारा मसूद अजहर को अपने अत्यंत खतरनाक आतंकवादियों की सूची में शामिल किया जाना अपने आप में महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। लेकिन केवल किसी आतंकी को सूचीबद्ध कर देना आतंकवाद के विरुद्ध निर्णायक कार्रवाई नहीं माना जा सकता। असली कसौटी गिरफ्तारी, न्यायिक प्रक्रिया, आतंकी नेटवर्क का विघटन और उसके वित्तीय स्रोतों पर प्रभावी प्रहार है। यदि कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित रह जाए, तो वह आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय दबाव को टालने की प्रशासनिक कवायद बनकर रह जाती है। भारत के सुरक्षा तंत्र से जुड़े इनपुट यदि यह संकेत देते हैं कि मसूद अजहर पाकिस्तान में ही छिपा हुआ है, तो पाकिस्तान के दावे की विश्वसनीयता और भी संदिग्ध हो जाती है। हालांकि ऐसे खुफिया दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक होती है, लेकिन पाकिस्तान का अतीत उसके वर्तमान दावों पर सहज विश्वास करने की अनुमति नहीं देता। पाकिस्तान का यह दोहरा चरित्र नया नहीं है। दुनिया पहले भी देख चुकी है कि आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई का दावा करने वाला पाकिस्तान अपनी ही धरती पर छिपे कुख्यात आतंकवादियों की मौजूदगी से लंबे समय तक इनकार करता रहा। ओसामा बिन लादेन का पाकिस्तान में पाया जाना इस संदर्भ में सबसे चर्चित उदाहरण है। अमेरिकी कार्रवाई में एबटाबाद में लादेन के मारे जाने के बाद पाकिस्तान के उन दावों की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न उठे थे, जिनमें वह अपनी धरती पर आतंकवादी सरगनाओं की मौजूदगी से अनभिज्ञता जताता रहा था। आतंकी मसूद अजहर पर पाकिस्तान सरकार की कार्यवाही को इसलिए भी संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है, क्योंकि पाकिस्तान में आतंकी सरगनाओं पर न तो सरकार का नियंत्रण है और न ही सेना की ही चलती है। आतंकियों का अपना एक तंत्र है। जिनमें कोई भी दखल नहीं दे सकता। पाकिस्तान में तीन शक्ति केंद्र माने जाते हैं, जिनमें सरकार, सेना और आतंकवादी हैं। कई बार यह भी देखने में आता है कि वहां की सरकार किसकी होगी, यह आतंकी और सेना तय करती है। इसलिए सरकार, आतंकियों पर कठोर कार्यवाही करने का सामर्थ्य नहीं जुटा पाती। और आतंकी फलीभूत होते रहते हैं। इस पृष्ठभूमि में मसूद अजहर पर घोषित इनाम को केवल कानून-व्यवस्था की कार्रवाई के रूप में देखना कठिन है। इसके पीछे पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि सुधारने की मंशा भी दिखाई देती है। विशेषकर आतंकवाद के वित्तपोषण और धनशोधन से जुड़े अंतरराष्ट्रीय मानकों के संदर्भ में पाकिस्तान पर लगातार दबाव रहा है। ऐसे समय में किसी कुख्यात आतंकी के विरुद्ध सार्वजनिक कार्रवाई का प्रदर्शन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को यह संदेश देने का प्रयास हो सकता है कि पाकिस्तान आतंकवाद के विरुद्ध सक्रिय है। लेकिन आज विश्व पहले की तुलना में कहीं अधिक सतर्क है। आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष में अब केवल घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय यह देखता है कि आतंकवादी संगठनों की वित्तीय धमनियां कितनी प्रभावी ढंग से रोकी गईं, उनके प्रशिक्षण शिविरों और नेटवर्क पर क्या कार्रवाई हुई, आतंकी सरगनाओं को न्याय के कठघरे में कब लाया गया और आतंकवाद को संरक्षण देने वाली संरचनाओं को कितना ध्वस्त किया गया। पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति भी उसके लिए एक बड़ी चुनौती है। विदेशी सहायता, ऋण और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से मिलने वाली आर्थिक सहायता उसके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसे में आतंकवाद के वित्तपोषण को लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव उसके आर्थिक हितों से सीधे जुड़ जाता है। यदि पाकिस्तान आतंकवाद पर प्रभावी कार्रवाई करने में विफल रहता है तो उस पर आर्थिक एवं वित्तीय प्रतिबंधों का दबाव बढ़ सकता है। इसलिए उसके द्वारा की जाने वाली प्रत्येक कार्रवाई को उसके आर्थिक और कूटनीतिक संदर्भ में भी परखना आवश्यक है। भारत के लिए यह समय पाकिस्तान के किसी भी दावे से प्रभावित होने के बजाय तथ्यों, प्रमाणों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के आधार पर अपनी आतंकवाद विरोधी नीति को और सुदृढ़ करने का है। आतंकवाद किसी एक देश की समस्या नहीं है। यह वैश्विक शांति, लोकतांत्रिक संस्थाओं और मानव सभ्यता के लिए चुनौती है। इसलिए आतंकवाद को संरक्षण देने वाली किसी भी व्यवस्था के प्रति अंतरराष्ट्रीय समुदाय को शून्य-सहनशीलता की नीति अपनानी होगी। मसूद अजहर पर इनाम की घोषणा यदि वास्तविक कार्रवाई की दिशा में पहला कदम है तो पाकिस्तान को उसे प्रमाणित करने में देर नहीं करनी चाहिए। उसे चाहिए कि वह मसूद अजहर की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करे, यदि वह पाकिस्तान में है तो उसे गिरफ्तार करे, उसके नेटवर्क को ध्वस्त करे और उसके विरुद्ध पारदर्शी न्यायिक कार्रवाई सुनिश्चित करे। अन्यथा यह कार्रवाई भी पाकिस्तान की उन अनेक घोषणाओं की सूची में जुड़ जाएगी, जिनमें शब्द बहुत थे, लेकिन परिणाम नगण्य। आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में अब दुनिया को दावों की नहीं, कार्रवाई की भाषा चाहिए। पाकिस्तान यदि वास्तव में अपनी छवि बदलना चाहता है तो उसे नौटंकी से आगे बढ़कर प्रमाण प्रस्तुत करने होंगे। क्योंकि आतंकवाद के सवाल पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की स्मृति अब इतनी कमजोर नहीं रही कि पुरानी चालें नए आवरण में आसानी से सफल हो जाएं। - सुरेश हिंदुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार
मेलोडी, ठेकुआ, मखाना-सत्तू— भारत की 'फूड डिप्लोमेसी' का नया दौर
रोम वाला वो क्लिप शायद आपकी फीड पर भी घूमा होगा। पीएम मोदी इटली की पीएम जॉर्जिया मेलोनी को एक छोटा-सा टॉफी पैकेट थमाते हैं, और मेलोनी मुस्कुराते हुए बोल पड़ती हैं— He gifted us a very, very good toffee। संयोग ऐसा कि टॉफी का नाम ही था मेलोडी! बस, इंटरनेट ने दोनों नामों को जोड़कर बना दिया 'Melodi', और वो मीठा पल रातोंरात एक मीम बन गया। एक साधारण-सी पार्ले टॉफी ने पूरे सोशल मीडिया पर राज कर लिया। लेकिन अगर आप इसे सिर्फ इत्तेफाक समझ रहे हैं, तो थोड़ा रुकिए। भारत की विदेश नीति में डिप्लोमेसी की अपनी अहमियत है ही, मगर पिछले कुछ बरसों में खाना भी उसमें एक चुपचाप मगर मजबूत किरदार निभाने लगा है। खाना अब सिर्फ पेट भरने की चीज़ नहीं रहा — यह एक सोची-समझी सॉफ्ट पावर की चाल बन चुका है। जैसे भाषा, संगीत या सिनेमा किसी देश की पहचान गढ़ते हैं, वैसे ही अब थाली भी एक तरह की चुप कूटनीतिक ज़बान बोलने लगी है। एक टॉफी, एक मिठाई, या किसी गाला डिनर का मेन्यू — ये सिर्फ मेहमाननवाज़ी नहीं, बल्कि बहुत सोच-समझकर गढ़ा गया एक संदेश होता है। दिल्ली में ब्रिक्स, थाली में इशारे टाइमिंग पर गौर करें तो मई 2026 में पीएम मोदी की पांच देशों की यात्रा का आख़िरी पड़ाव इटली ही था। मेलोनी को मेलोडी टॉफी सौंपना महज एक हल्का-फुल्का पल नहीं था, इसके पीछे की टाइमिंग सोच-समझकर तय की गई लगती है। वीडियो वायरल होते ही वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल का बयान आया कि पिछले 12 वर्षों में भारत का टॉफी निर्यात 166% बढ़ चुका है। यानी एक मामूली-सा गिफ्ट भी सरकार ने आसानी से एक आर्थिक नैरेटिव में बदल दिया — देखिए, भारत की मिठास अब दुनिया के बाज़ार में बिक रही है। यही डिप्लोमेसी की असली चाल है — जो चीज़ सोशल मीडिया पर वायरल हो जाए, उसे आंकड़ों के सहारे एक आर्थिक कहानी में ढाल दो। ठेकुआ जब स्लोवाकिया की संसद तक पहुंचा यह सिर्फ एक तोहफा नहीं था — यह बिहार की सीधी-सादी सांस्कृतिक पहचान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर मिली एक तरह की इज़्ज़त थी। जो मिठाई कभी सिर्फ त्योहारों तक सीमित मानी जाती थी, वह अब भारत की कूटनीतिक पहचान का हिस्सा बन चुकी है। बारीकी से देखें तो यह कोई अचानक शुरू हुआ चलन नहीं है। 2023 में जब भारत ने G20 की मेज़बानी की थी, तभी से इस रणनीति की झलक दिखनी शुरू हो गई थी। भारत मंडपम के उस गाला डिनर का पूरा मेन्यू वसुधैव कुटुंबकम यानी एक धरती, एक परिवार, एक भविष्य की थीम पर सजाया गया था। रागी डोसा, बाजरा खीर, कजू मटर मखाना से लेकर गोलगप्पे और समोसे तक — विदेशी मेहमानों को भारत के मिलेट्स और स्ट्रीट फूड, दोनों का ज़ायका एक साथ चखाया गया। यहीं से भारत ने खाने को महज़ मेहमाननवाज़ी नहीं, बल्कि एक कूटनीतिक हथियार की तरह बरतना शुरू किया। अब बारी मखाने और सत्तू की बिहार के सीएम सम्राट चौधरी ने इसे हर बिहारवासी के लिए गर्व का पल बताया, और बात भी सही है — जो मखाना और सत्तू कभी सिर्फ बिहार के गांव-देहात की रसोई तक सीमित थे, वे अब दुनिया के सबसे बड़े कूटनीतिक मंचों में से एक तक पहुंच चुके हैं। यह बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और परंपरा, दोनों के लिए एक बड़ी वैश्विक पहचान है। मेलोडी टॉफी से लेकर मखाने तक — भारत की गिफ्ट और मेन्यू डिप्लोमेसी में एक साफ पैटर्न नज़र आता है। हल्के-फुल्के निजी तोहफे (टॉफी, ठेकुआ) रिश्तों में अपनापन घोलने के लिए इस्तेमाल होते हैं, जबकि बड़े मंचों के मेन्यू और वेलकम किट (G20, BRICS) पूरे देश की सांस्कृतिक और कृषि विविधता दिखाने का ज़रिया बनते हैं। और इस पूरी कहानी में बिहार बार-बार लौटकर आता है — कभी ठेकुए के रूप में, तो कभी मखाना-सत्तू के रूप में। एक राज्य जिसे अक्सर सिर्फ राजनीतिक सुर्खियों के लिए जाना जाता रहा है, वह अब अपने स्वाद और परंपरा के दम पर दुनिया की सबसे बड़ी कूटनीतिक मेज़ों तक पहुंच चुका है। - संजीव कुमार मिश्र
तो अब शुभेंदु करेंगे गरबा मर्यादा की भी रक्षा?
जिस प्रकार शुद्ध हिंदू उत्सव गरबा में गैर हिंदुओं को शामिल करने की विकृत सेकुलर आवाजें उठने लगीं हैं उनको देखते हुए लगता है कि मुख्यतः गुजरात और महाराष्ट्र में होने वाले गरबा उत्सवों की मर्यादा रक्षा के लिए तेजस्वी हिंदू ध्वज वाहक एवं पश्चिम बंगाल के महानायक मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की सहायता मांगने का समय आ गया है . अब सब हैं कि सेक्युलर तालिबानी आवाजों के विरुद्ध हिंदुओं को चाहिए कि अपना अंगद समान पैर जमाया जाए। बंगाल से सीख ली जाए, जहाँ तेजस्वी वीर हिंदू नायक मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी दुर्गा पूजा को उसकी मूल गरिमा लौटाने का प्रयास कर रहे हैं। उनसे सीखकर गरबा को पतन से बचाया जाए। गरबा शक्ति की उपासना से जुड़ा पारंपरिक हिंदू पूजा-स्वरूप है। यह धनकुबेरों और हिंदू-भावना विहीन भीड़ के लिए मस्ती-मस्ती का कार्निवल नहीं है। इसे भी पढ़ें: Nandigram By-Election 50 हजार से ज्यादा वोटों से जीतेगी BJP, Suvendu Adhikari का बड़ा दावा गरबा कोई सेक्युलर मनोरंजन “मेला” नहीं है। यह माँ अम्बा की भक्ति का हिंदू प्रतीक है। जो माँ दुर्गा की पूजा नहीं करते, जो उनके सामने शीश नहीं झुकाते, उनको गरबा में शामिल होने का कोई अधिकार नहीं। इसका मूल रूप और अर्थ हिंदू ब्रह्मांड-दृष्टि, प्रतीकों और दिव्य स्त्री-शक्ति की साधना से आता है। “गरबा” शब्द संस्कृत शब्द “गर्भ” से निकला है। पारंपरिक रूप में नर्तक एक घेरे में गर्भ दीप—छेदों वाले मिट्टी के घड़े में जलते दीये —या देवी की मूर्ति के चारों ओर नृत्य अभ्यर्थना करते हैं। दीपक जीवन-शक्ति, शरीर के भीतर दिव्य उपस्थिति और देवी की सृजन-शक्ति का प्रतीक है। वृत्ताकार गति हिंदू चिंतन में काल के चक्र—सृष्टि, स्थिति और प्रलय—को दर्शाती है। गरबा शरद नवरात्रि में होता है, अर्थात् दुर्गा के नौ रूपों को समर्पित नौ रातों में। यह पर्व महिषासुर पर दुर्गा की विजय का स्मरण है, जैसा देवी माहात्म्य (मार्कंडेय पुराण) में वर्णित है। भक्त माँ की स्तुति के गीत (गर्बी) गाते हैं, ताली देते हैं और नृत्य को पूजा तथा कृतज्ञता का माध्यम बनाते हैं। पारंपरिक माहौल में स्थान पवित्र माना जाता है: प्रायः नंगे पाँव नाचते हैं, आरती होती है, और केंद्र में दीपक या मूर्ति ही मुख्य रहती है। नवरात्रि व्रत माँ भगवती की भक्ति का चिह्न है। गरबा और डांडिया रास (जहाँ डंडे देवी के आयुधों के प्रतीक हैं) गुजरात में इसी भक्ति की सामाजिक अभिव्यक्ति बने। लोक-नृत्य के रूप में यह शादियों और अन्य अवसरों पर भी होता रहा है, पर इसका सबसे विस्तृत और मुख्य संदर्भ दुर्गा-पूजा का नवरात्रि चक्र ही है। क्योंकि यह रूप देवी और उनके प्रतीकों के इर्द-गिर्द बुना गया है, पारंपरिक हिंदू साधक और संगठन इसे श्रद्धा का कर्म मानते हैं, सेक्युलर-गैरहिंदू मनोरंजन नहीं। जो दुर्गा को दिव्य माता नहीं मानते, मूर्ति-पूजा और धर्मिक विश्वास को अस्वीकार करते हैं, वे इस अनुष्ठान के उद्देश्य से बाहर हैं। गरबा को सिर्फ “फन मेला” कहना उसे उसके धर्मिक अर्थ से काट देता है और पूजा-भक्ति को तमाशा बना देता है। अन्य धर्मों के अनुष्ठानों से तुलना स्वाभाविक है। ईद की नमाज़ इस्लामी मज़हब के अनुसार निर्धारित है। गैर-मुसलमानों से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वे औपचारिक नमाज़ में मजहबी कर्तव्य के रूप में शामिल हों; वह स्थान और स्वरूप उन लोगों का है जो उस आस्था को स्वीकार करते हैं। अनेक परंपराओं में मूल उपासना-कर्म की सीमाएँ ऐसी ही हैं। नवरात्रि में गर्भ दीप या दुर्गा की मूर्ति के चारों ओर होने वाला गरबा उसी श्रेणी का आस्था-विशिष्ट कर्म है, राज्य द्वारा थोपा गया खुला सांस्कृतिक मेला नहीं। आज कई स्थानों पर गरबा अत्यधिक व्यावसायिक हो चुका है और हिंदू-भावना विहीन इवेंट मैनेजरों के हाथों विकृत हो रहा है। समय आ गया है कि अंगद समान हिंदू आस्था और मर्यादा का पैर जमाया जाए। बंगाल से सीख ली जाए, जहाँ तेजस्वी वीर हिंदू नायक मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी दुर्गा पूजा को उसकी मूल गरिमा लौटाने का प्रयास कर रहे हैं। उनसे सीखकर गरबा को पतन से बचाया जाए। यूनेस्को ने 2023 में गरबा को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया। उसमें इसके हिंदू सामाजिक स्वरूप और शक्ति/स्त्री-ऊर्जा के वृत्त को बनाए रखते हुए लोगों को जोड़ने की क्षमता का उल्लेख है। विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों का कहना सही है कि यह देवी-पूजा का रूप है, इसलिए प्रवेश उन्हीं का हो जो इस आस्था को साझा करते हैं। गरबा स्थलों पर प्रवेश नियंत्रण और पहचान जाँच की माँग इसीलिए है। मिश्रित आयोजनों में तनाव, हिंदू लड़कियों को निशाना बनाने, अपमान और उत्पीड़न की घटनाएँ सामने आई हैं। गैर-हिंदुओं द्वारा हिंदू देवताओं का मज़ाक उड़ाने और “गरबा के बहाने हिंदू लड़कियों को छेड़ने” की खबरें भी आती रही हैं। हिंदुओं को समावेशिता का पाठ पढ़ाने की ज़रूरत नहीं। भारत का संविधान हिंदू-बहुल समाज में बना। यह कानून के समक्ष समानता, धर्म की स्वतंत्रता और प्रत्येक समुदाय को अपने धार्मिक कार्यों के प्रबंधन का अधिकार देता है। भारतीय संविधान हिंदू समावेशिता की अभिव्यक्ति है। गरबा सनातन धर्म की मर्यादा से बँधा है। हिंदू अपनी संवेदनाओं के अनुरूप प्रवेश की शर्तें रख सकते हैं। मंदिर, मठ और पारंपरिक संप्रदाय पहले से कुछ अनुष्ठान-स्थानों पर मर्यादा के अनुसार प्रवेश नियंत्रित करते हैं। दुर्गा-पूजा पर आधारित सामुदायिक गरबा पर भी वही तर्क लागू होना चाहिए। अब साधु-संन्यासियों और पारंपरिक हिंदू स्वरों से अपील करनी चाहिए कि वे विशिष्ट हिंदू रूपों की मर्यादा स्पष्ट करें और उसकी रक्षा करें। ये माँगें धार्मिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अनुकूल हैं। शास्त्रीय नवरात्रि रूप में गरबा दुर्गा भगवती—माता और शक्ति के स्वरूप—के प्रति भक्ति का हिंदू अनुष्ठान है। गर्भ-दीप, वृत्ताकार गति, स्तुति-गीत तटस्थ मनोरंजन नहीं हैं। जो यह विश्वास नहीं रखते, वे इसके धार्मिक उद्देश्य से बाहर हैं, जैसे गैर-मुसलमान ईद की औपचारिक नमाज़ की संरचना से बाहर हैं। अनुष्ठान के पारंपरिक स्वरूप की रक्षा का अर्थ यह नहीं कि नृत्य की व्यापक लोकप्रियता से इनकार किया जाए। अर्थ यह है कि पूजा-केंद्रित कर्म अपने आप खुली सेक्युलर पार्टी नहीं बन जाता। जो आयोजक इसे उपासना मानते हैं, उन्हें भागीदारी का ढाँचा उसी के अनुसार रखने का अधिकार है। - तरुण विजय (लेखक पूर्व सांसद और वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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आखिर कृत्रिम बुद्धिमत्ता को लेकर जारी अमेरिकी-चीनी रस्साकसी के बीच क्या करे भारत? समझिए विस्तार से
वैश्विक पटल पर अमेरिका और चीन की प्रतिस्पर्धा देखते ही बनती है। इस बार मुद्दा कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई बनी है, वो भी ब्रिक्स 2026 बैठक के तुरंत बाद जिसका अपना महत्व है। चूंकि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ब्रिक्स देशों को एआई ओपन सोर्स उपलब्ध कराने की घोषणा की थी, इसलिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रतिक्रिया स्वरूप कहा कि एआई की दौड़ में अमेरिका चीन से आगे है? तो सवाल उठना लाज़मी है कि कितना आगे? और क्या चीन अगले कुछ वर्षों में इस दूरी को पाट सकता है? सबसे बड़ा सवाल यह कि इस वैश्विक प्रतिद्वंद्विता में भारत को क्या करना चाहिए? इस सभी बिंदुओं को हम आगे एक एक करके स्पष्ट करेंगे। देखा जाए तो एआई सेक्टर में न केवल अमेरिका और चीन के बीच, बल्कि यूरोप और अन्य देशों के बीच प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है। ऐसे में भारत के सामने चुनौती केवल एआई मॉडल बनाने की नहीं, बल्कि चिप, कंप्यूटिंग, डेटा, प्रतिभा, पूंजी और बाजार—पूरी एआई वैल्यू चैन में मजबूत होने की है। इसे भी पढ़ें: BRICS में Xi Jinping ने रखा 5-सूत्रीय सहयोग प्रस्ताव, Global South की मजबूती पर दिया जोर जहां तक भारत की “AI आत्मनिर्भरता” का सवाल है तो उसे विदेशी एआई यानी अमेरिका, चीन, यूरोप के एआई पटल को बंद करना नहीं चाहिए, बल्कि इन्हें इतना सक्षम बनना चाहिए कि भारत अपनी जरूरतों के लिए एआई बना सके और दुनिया को भी बेच सके। आपको पता होगा कि अमेरिका के नेतृत्व वाले एआई पैक्स सिलिका संगठन में 34 देश शामिल हैं, जिसमें भारत भी एक है। वहीं, चीनी नेतृत्व वाले वर्ल्ड एआई कोआपरेशन ऑर्गेनाइजेशन में 29 देश शामिल हैं। फिर भी ब्रिक्स देशों को चीन ने जो आकर्षक ऑफर दिया है उससे निकट भविष्य में पूरा खेल बदल सकता है। ऐसा इसलिए कि अमेरिकी एआई कंपनियों ने एआई की प्रगति को 'स्लोडाउन' करने का आह्वान किया है। चूंकि अब अमेरिका के भीतर ही एआई की प्रगति को लेकर विरोधाभास सामने आ रहा है और ट्रंप प्रशासन की तरफ से अमेरिकी कंपनियों को एआई प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल में अमेरिकी हितों को प्राथमिकता की बात हो रही है, इसलिए पैक्स सिलिका संगठन के अन्य 33 देशों का दिग्भ्रमित होना स्वाभाविक है। ऐसे में यदि चीन, भारत और यूरोप आपसी समझदारी विकसित करके अमेरिका को मात दे दें तो किसी के लिए भी हैरत की बात नहीं होगी। क्योंकि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ब्रिक्स के मंच से कहा है कि चीन ब्रिक्स के लिए ओपन सोर्स एआई समुदाय बनाने में अग्रणी भूमिका निभाएगा, बड़े भाषा मॉडल के विकास व उपयोग में सहयोग देगा, विशेष प्रशिक्षण आयोजित करेगा, और खुला एआई पारिस्थितिकी तंत्र खड़ा करेगा। खास बात यह कि यह प्रस्ताव उस पृष्ठभूमि में आया है जब चीनी कंपनियां ओपन सोर्स मॉडल पर जोर दे रही हैं, जबकि अमेरिकी दिग्गज कंपनियां अधिक बंद, फ्रंटियर मॉडल पर काम कर रहे हैं। चूंकि भारत इस प्रतिद्वंद्विता को पहचान रहा है, इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स बैठक में चेतावनी देते हुए साफ कहा था कि तकनीक और क्रिटिकल मिनरल्स का हथियार बनाना साझा प्रगति में बाधा बन सकता है। इससे भारत की नीति स्पष्ट है। देखा जाए तो दुनिया में एआई आधारित प्रौद्योगिकी को लेकर जो तगड़ी लामबंदी चल रही है, उसमें अमेरिका ने बेहद उच्च गुणवत्ता वाले चिप्स, सेमीकंडक्टर उपकरण, क्लाउड एक्सेस और कुछ फ्रंटियर मॉडल पर निर्यात नियंत्रण लागू करते हुए इन्हें सिर्फ 'भरोसेमंद साझेदारों' के साथ साझा करने की व्यवस्था करने का ऐलान किया है। कहने का तात्पर्य यह कि शेष देशों में एआई के मामले में अमेरिका या चीन में से किसी एक को ही चुनने का दबाव बनाया है और दोनों को चुनने का रास्ता अमेरिका ने लगभग बंद कर दिया है। चूंकि भारत भी पैक्स सिलिका का सदस्य है और ट्रंप ने खाड़ी देशों को भी चिप्स व निवेश के सौदे से जोड़ा है। उन्होंने अपने एआई स्टैक को निर्यात कूटनीति का हिस्सा बनाया है। इसलिए अमेरिका को रणनीतिक जवाब देते हुए चीन ने रेअर अर्थ मिनरल्स के निर्यात को नियंत्रित कर दुनिया को समझा दिया कि वह प्रौद्योगिकी की दुनिया में कितनी अफरातफरी मचा सकता है। आज चीनी गुट में रूस, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील और पाकिस्तान समेत 29 देश शामिल हैं। आपको याद दिला दें कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि जो एआई जीतेगा, वही जीतेगा इस क्षेत्र में जारी वैश्विक प्रतिद्वंद्विता को दर्शाता है। हालांकि, एआई अब एकतरफा अमेरिकी वर्चस्व की कहानी नहीं रही, बल्कि चीन जैसे दूसरे ध्रुव से मिल रही कड़ी तकनीकी प्रतिस्पर्धा की मिशाल बन चुकी है। यदि सितंबर 2026 की स्थिति को देखें, तो तकनीकी रूप से अमेरिका का पलड़ा अभी भी चीन से भारी है, लेकिन यह अंतर पहले की तुलना में काफी कम हुआ है और अगले कुछ वर्षों में चीन इस दूरी को पाटकर आगे भी निकल सकता है, बशर्ते कि भारत जैसे मजबूत पड़ोसी का साथ उसे मिल जाए। तकनीकी अध्ययन भी जाहिर करते हैं कि एआई अब एकतरफा अमेरिकी वर्चस्व की कहानी नहीं, बल्कि दो ध्रुवों की कड़ी तकनीकी प्रतिस्पर्धा बन चुकी है। इसलिए आइए जानते हैं कि किस क्षेत्र में कौन (अमेरिका या चीन) आगे? खासकर क्षेत्र, उसमें मिली बढ़त और अद्यतन स्थिति के नजरिए से:- एक, फ्रंटियर एआई मॉडल में अमेरिका बढ़त में है। उसका मॉडल अभी समग्र प्रदर्शन में आगे है। दो, एआई चिप्स/जीपीयू में अमेरिका को बढ़त है। Nvidia का बड़ा लाभ उसे मिला है। तीन, एआई कंप्यूट/आंकड़ा केंद्र में अमेरिका को बढ़त है। विशाल पूंजी, जीपीयू और हाइपरस्केल इंफ्रास्ट्रक्चर में वह आगे है। चार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता शोध पारिस्थितिकी तंत्र में अमेरिका को बढ़त है। वह विश्वविद्यालय, बड़ी तकनीक और उद्यम पूंजी का संयोजन करने में आगे बढ़ा है। पांच, वैश्विक कृत्रिम बुद्धिमत्ता पारिस्थितिकी तंत्र में अमेरिका को बढ़त प्राप्त है। उसे सहयोगी देशों, कंपनियों और क्लाउड पारिस्थितिकी तंत्र का लाभ मिला है। छह, सेमीकंडक्टर विनिर्माण या अर्धचालक निर्माण में चीन को कुछ क्षेत्रों में बढ़त प्राप्त है। उसने बड़े पैमाने का विनिर्माण और आपूर्ति श्रृंखला मजबूत किया है। सातवां, ओपन सोर्स/कम लागत वाले मॉडल में चीन मजबूत चुनौती बनकर उभरा है। उसके डीपसीक जैसे मॉडल ने लागत-प्रतिस्पर्धा बदली है। आठवां, एआई मॉडल की स्थापना/औद्योगिक उपयोग में चीन की बड़ी ताकत है। उसके पास विशाल विनिर्माण क्षमता और घरेलू बाजार है। यानी कि आठ क्षेत्रों में पांच में अमेरिका और तीन में चीन को बढ़त प्राप्त है। यदि आप ब्रुकिंग्स के अप्रैल 2026 के आकलन पर गौर करेंगे तो उसके अनुसार चीन के शीर्ष कृत्रिम बुद्धिमत्ता मॉडल अभी अमेरिकी फ्रंटियर मॉडल से कुछ महीने या अधिक पीछे हैं और अमेरिकी मॉडल तार्किक क्षमता, गणित, कुटलेखन (coding) तथा लंबे समय वाले स्वायत्त कार्य या दीर्घकालिक एजेंट-आधारित कार्य में समग्र बढ़त रखते हैं। लेकिन चीन को भी कम आंकना बड़ी गलती होगी। चीन की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह AI को पूरे औद्योगिक तंत्र से जोड़ रहा है—मोबाइल, ईवी, रोबोटिक्स, विनिर्माण, निगरानी या चौकसी, समान का प्रबंधन और सरकारी सेवाओं तक काफी मजबूत है। और चीन ने अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद अपने एआई चिप पारिस्थितिकी तंत्र को तेजी से विकसित किया है। हालांकि अभी अमेरिकी Huawei जैसे चीनी विकल्प या अमेरिकी Nvidia की बराबरी के पैमाने पर चीन नहीं हैं और अमेरिकी HBM जैसी महत्वपूर्ण तकनीकों की कमी चीन के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है। एक महत्वपूर्ण संकेत यह भी है कि अमेरिका और चीन मिलकर वैश्विक कंप्यूट, निवेश और एआई मॉडल के लगभग 90 प्रतिशत पर नियंत्रण रखते हैं। सवाल है कि असली अमेरिकी बढ़त कहाँ है? तो जवाब होगा कि अमेरिका के पास एक ऐसा एआई स्टैक (AI stack) है जिसे चीन के लिए पूरी तरह दोहराना कठिन है। उदाहरण स्वरूप Nvidia/एआई चिप्स, सेमीकंडक्टर डिजाइन, क्लाउड, हाइपरस्केल डेटा सेंटर्स, OpenAI/ Anthropic/Google आदि उद्यम पूंजी और ग्लोबल डेवलेपर्स के अमेरिकी विकल्प चीन के पास उस पैमाने पर उपलब्ध नहीं हैं। यही कारण है कि अमेरिका केवल अच्छे AI मॉडल नहीं बना रहा, बल्कि AI की पूरी वैश्विक आधारभूत संरचनात्मक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव रखता है। यह बात दीगर है कि आज अमेरिका स्पष्ट लेकिन घटती हुई बढ़त पर है और अगले 3–5 साल के दरम्यान ही अमेरिका व चीन का मुकाबला बेहद करीबी हो सकता है। जबकि दीर्घकाल में चीन की विशाल विनिर्माण क्षमता और राज्य-समर्थित निवेश के कारण अमेरिकी बढ़त को स्थायी मानना सुरक्षित नहीं है। इसलिए इसे “अमेरिका बनाम चीन” से ज्यादा अमेरिकी नवोन्मेष, चिप्स और पूंजी बनाम चीनी स्केल, विनिर्माण और राज्य लामबंदी की प्रतिस्पर्धा कहना अधिक सही होगा। जहां तक भारत की बात है तो उसको किसी एक AI ब्लॉक पर पूरी तरह निर्भर होने के बजाय अमेरिका, चीन, यूरोप, जापान, दक्षिण कोरिया और अन्य साझेदारों के साथ तकनीकी साझेदारी बढ़ानी चाहिए, साथ ही अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखनी चाहिए। वहीं, AI को रोजगार-विरोधी नहीं, उत्पादकता क्रांति की मिशाल के तौर पर विकसित करना चाहिए। यह ठीक है कि AI से कुछ नौकरियाँ खत्म होंगी, लेकिन नई नौकरियाँ भी बनेंगी। इसलिए स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय और कार्यबल समूह तक एआई साक्षरता और पुनः कौशल विकास या नया कौशल सीखना को बड़े स्तर पर लागू करना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह किन भारत को केवल “AI का उपभोक्ता” बनने के बजाय “AI का निर्माता और निर्यातक” बनना होगा। इसे एक रणनीतिक सूत्र में ऐसे समझिए: भारत चिप, कंप्यूट, डेटा, प्रतिभा, स्वदेशी मॉडल, स्टार्टअप, सुरक्षित रेगुलेशन और वैश्विक सहयोग को बढ़ाकर AI महाशक्ति बनने की दिशा में कदम बढ़ा सकता है। ऐसा इसलिए कि भारत की विशेष ताकत उसके पास विशाल डिजिटल बाजार, यूपीआई जैसी डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, युवा तकनीकी प्रतिभा और दुनिया का बड़ा बहुभाषी उपभोक्ता आधार है। यदि इन ताकतों को कंप्यूट और गहन तकनीकी अनुसंधान के साथ जोड़ा जाए, तो भारत अमेरिका-चीन की सीधी नकल किए बिना अपना अलग AI मॉडल खड़ा कर सकता है। इस प्रकार भारत तीसरा AI शक्ति-केंद्र बन सकता है बशर्ते कि वह केवल AI का बड़ा बाजार नहीं, बल्कि AI की पूरी वैल्यू चैन का महत्वपूर्ण निर्माता बन जाए। इसके लिए भारत को अमेरिका और चीन से अलग रास्ता अपनाना होगा, क्योंकि भारत की ताकत कम लागत, विशाल बहुभाषी बाजार, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और इंजीनियरिंग प्रतिभा है। जहां तक भारत की सबसे बड़ी संभावित ताकत की बात है तो अंतर्राष्ट्रीय तकनीकी विशेषज्ञ भी मानते हैं कि।अमेरिका के पास नवोन्मेष और पूंजी है, चीन के पास स्केल और विनिर्माण है, जानकी भारत अपनी प्रतिभा, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, बहुभाषी आंकड़ा, न्यूनतम लागत वाला नवोन्मेष और बृहत बाजार को जोड़कर अपना मॉडल बना सकता है। इसलिए भारत, अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक संतुलन साधते हुए खुद को किसी एक कैंप का तकनीकी उपग्रह नहीं बनना चाहिए, बल्कि अमेरिका से एडवांस चिप्स/अनुसंधान, जापान-कॉरिया से सेमी कंडक्टर सहयोग, यूरोप से जिम्मेदार एआई मानक और अन्य देशों से डेटासेट्स/मार्केट्स के मद्देनजर सबके साथ साझेदारी करनी चाहिए। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
चेन्नई, 15 सितंबर (आईएएनएस)। रजिस्टर्ड जन्मों में लगातार कमी और तेजी से बूढ़ी होती आबादी को देखते हुए, तमिलनाडु सरकार ने अपने परिवार कल्याण कार्यक्रम में बांझपन के इलाज को शामिल करने के लिए कदम उठाए हैं। ऐसा करने वाला वह देश का पहला राज्य बन गया है।
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नई दिल्ली, 15 सितंबर (आईएएनएस)। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला और केंद्रीय मंत्रियों ने राष्ट्रीय इंजीनियर्स (अभियंता) दिवस पर बधाई दी है। इसके साथ ही भारत रत्न डॉ. मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की जयंती पर उनको याद करते हुए नमन किया है।
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BRICS में भारत की शानदार कूटनीतिक सफलता ने 'Brand Modi' को और मजबूत कर दिया है
दिल्ली में हुई ब्रिक्स शिखर बैठक को अगर केवल एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन मानकर देखा जाएगा तो उसकी असली राजनीतिक अहमियत समझ में नहीं आएगी। देखा जाये तो यह बैठक ऐसे समय में हुई, जब दुनिया कई मोर्चों पर तनाव, युद्ध, अविश्वास और बदलते शक्ति-संतुलन से गुजर रही है। ऐसे माहौल में भारत ने जिस तरह अलग-अलग ध्रुवों के देशों को एक मंच पर बैठाया, संवाद के रास्ते खोले और मतभेदों के बावजूद सहयोग की जमीन तैयार की, वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति के लिए एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि के तौर पर सामने आई है। ब्रिक्स की इस बैठक की सबसे बड़ी सफलता यही रही कि भारत ने उन देशों के बीच भी संवाद की संभावना पैदा की, जिनके बीच गहरे मतभेद हैं। ईरान और खाड़ी के देशों के बीच बातचीत इसका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण है। पश्चिम एशिया लंबे समय से टकराव, अविश्वास और संघर्ष का मैदान बना हुआ है। ऐसे समय में दिल्ली का मंच बातचीत के लिए उपलब्ध होना अपने आप में भारत की बढ़ती स्वीकार्यता का संकेत है। प्रधानमंत्री मोदी ने यह दिखाया कि भारत किसी एक खेमे का हिस्सा बनकर नहीं, बल्कि अलग-अलग पक्षों से संवाद करते हुए अपने लिए स्वतंत्र कूटनीतिक स्थान बना सकता है। इसे भी पढ़ें: 'कमजोर' पटरी पर तेजी से दौड़ने का प्रयास कर रही भारत-चीन 'दोस्ती' की रेल कहीं डिरेल ना हो जाए! भारत और चीन के बीच हुई बातचीत भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। सीमा विवाद और लंबे समय से चले आ रहे तनाव के बावजूद दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व का आमने-सामने बैठना इस बात का प्रमाण है कि भारत अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं से समझौता किए बिना संवाद के दरवाजे बंद नहीं करता। यही वह बिंदु है जहां मोदी की कूटनीति की ताकत दिखाई देती है। अमेरिका से संबंध भी कायम हैं, रूस के साथ रिश्ते भी बने हुए हैं, चीन से संवाद भी हो रहा है और पश्चिम एशिया के अलग-अलग देशों के साथ भारत की स्वीकार्यता लगातार बढ़ रही है। यानी भारत किसी एक शक्ति के पीछे चलने के बजाय अपनी शर्तों पर संबंधों का संतुलन साध रहा है। यही सफलता उस राजनीतिक नैरेटिव को भी कमजोर करती है, जिसमें बार-बार यह सवाल उठाया जाता रहा कि अगर पड़ोसी देश पाकिस्तान ने मक्का समझौता कर लिया, दूसरे देशों के साथ अपने समीकरण बना लिए और क्षेत्रीय स्तर पर भारत के खिलाफ गतिविधियां बढ़ीं तो क्या भारत की विदेश नीति असफल हो गई? विदेश नीति को केवल पड़ोस की तत्काल घटनाओं से मापना वास्तविक तस्वीर को छोटा कर देना है। असली सवाल यह है कि दुनिया की बड़ी शक्तियां भारत को किस नजर से देख रही हैं और संकट के समय कितने देश भारत के साथ बातचीत के लिए तैयार हैं। दिल्ली की बैठक ने इस सवाल का जवाब काफी हद तक दे दिया है। यहां प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिगत कूटनीतिक छवि भी महत्वपूर्ण हो जाती है। नरेंद्र मोदी, व्लादिमीर पुतिन और शी चिनफिंग की तस्वीरें जिस तरह वैश्विक स्तर पर चर्चा में आई हैं, उनका राजनीतिक संदेश तस्वीर से कहीं बड़ा है। यह तस्वीर बताती है कि भारत का नेतृत्व एक साथ दुनिया की अलग-अलग शक्तियों के साथ संवाद करने की स्थिति में है। पश्चिमी देशों के लिए भी यह संदेश महत्वपूर्ण है कि भारत को नजरअंदाज करके वैश्विक राजनीति की कोई बड़ी रणनीति पूरी नहीं हो सकती। इसका घरेलू राजनीतिक असर भी कम नहीं होगा। भाजपा लंबे समय से प्रधानमंत्री मोदी की मजबूत वैश्विक छवि को अपनी राजनीतिक पूंजी के रूप में इस्तेमाल करती रही है। ब्रिक्स की दिल्ली बैठक उस पूंजी को और मजबूत करने का अवसर देती है। विपक्ष यदि यह कहता है कि सरकार की विदेश नीति कमजोर पड़ गई है, तो भाजपा के पास दिल्ली में जुटे वैश्विक नेताओं, भारत की मध्यस्थ भूमिका और अलग-अलग शक्ति केंद्रों के साथ संवाद को सामने रखने का मजबूत राजनीतिक आधार तैयार हो गया है। सबसे बड़ी बात यह है कि दिल्ली में मिली यह कूटनीतिक सफलता केवल एक शिखर सम्मेलन की सफलता बनकर नहीं रहने वाली। इसका सीधा और दीर्घकालिक लाभ भारत की सामरिक स्थिति को मिल सकता है। रूस, चीन, अमेरिका, यूरोप, ईरान और खाड़ी देशों जैसे अलग-अलग शक्ति केंद्रों के साथ एक साथ संवाद कायम रखने की मोदी की क्षमता ने यह संदेश दिया है कि भारत किसी दबाव या धड़े की राजनीति में बंधा हुआ नहीं है, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर दुनिया की बड़ी शक्तियों के साथ संबंध तय करने की स्थिति में है। इसका असर आने वाले समय में व्यापार, निवेश, ऊर्जा सुरक्षा, सामरिक सहयोग और भारत की वैश्विक हैसियत, हर मोर्चे पर दिखाई दे सकता है। साथ ही इस सफलता का एक घरेलू राजनीतिक पहलू भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आगामी पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा इस उपलब्धि को प्रधानमंत्री मोदी के मजबूत नेतृत्व और भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा के प्रमाण के रूप में जनता के सामने रख सकती है। विपक्ष यदि विदेश नीति को लेकर सरकार पर सवाल उठाता है, तो भाजपा के पास दिल्ली में एक साथ जुटे विश्व के बड़े नेताओं और मोदी की सक्रिय कूटनीतिक भूमिका को सामने रखने का अवसर होगा। यानी ब्रिक्स की सफलता सिर्फ दिल्ली की कूटनीतिक मेज पर मोदी की जीत नहीं है; यह आने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा के लिए एक बड़ा राजनीतिक हथियार और मोदी की नेतृत्व छवि को और मजबूत करने वाली उपलब्धि भी बन सकती है। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की सफलता ने घरेलू राजनीति में ब्रांड मोदी को और मजबूत कर दिया है। -नीरज कुमार दुबे
'कमजोर' पटरी पर तेजी से दौड़ने का प्रयास कर रही भारत-चीन 'दोस्ती' की रेल कहीं डिरेल ना हो जाए!
भारत और चीन के रिश्तों में दिल्ली में जो नई गर्माहट दिखाई दे रही है, उसे केवल कूटनीतिक शिष्टाचार या दो नेताओं की मुस्कान की तस्वीरों से समझना बड़ी भूल होगी। असली कहानी इससे कहीं ज्यादा कठोर है। सात साल बाद भारत आए शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात ने यह साफ कर दिया है कि गलवान के बाद दोनों देशों ने टकराव को खत्म नहीं किया है, लेकिन अब वे उसे नियंत्रित करने और अपने-अपने हितों के लिए रिश्ते को फिर से व्यवस्थित करने की दिशा में बढ़ रहे हैं। मोदी का भाषण रोक कर शी से पूछना— “Is it okay?”, एक मानवीय कूटनीतिक क्षण था, लेकिन उसके पीछे की रणनीति कहीं अधिक गंभीर है। दिल्ली में मोदी-शी बातचीत का सबसे महत्वपूर्ण वाक्य था— “Differences should not become disputes.” मोदी ने साफ किया कि सीमा पर शांति और स्थिरता ही संबंधों के आगे बढ़ने की बुनियादी शर्त है। दोनों देशों ने सीमा विवाद के न्यायसंगत और पारस्परिक रूप से स्वीकार्य समाधान की प्रतिबद्धता दोहराई, साथ ही पुराने समझौतों का पालन करने पर जोर दिया। व्यापार, निवेश, सप्लाई चेन, बाजार तक भरोसेमंद पहुंच और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने पर भी चर्चा हुई। यानी बातचीत अब केवल सीमा पर सैनिकों की दूरी घटाने तक सीमित नहीं है; दोनों देश रिश्तों का पूरा ढांचा दोबारा खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन यहां सबसे जरूरी सवाल है कि चीन अचानक भारत की तरफ क्यों देख रहा है? देखा जाये तो जवाब चीन की इच्छा से ज्यादा बदलती वैश्विक परिस्थितियों में छिपा है। अमेरिका की बढ़ती संरक्षणवादी व्यापार नीति, टैरिफ का दबाव, पश्चिम और चीन के बीच तकनीकी संघर्ष तथा वैश्विक सप्लाई चेन का पुनर्गठन बीजिंग के लिए गंभीर चुनौती हैं। ऐसे समय में भारत को लंबे समय तक केवल रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानकर चलना चीन के लिए महंगा पड़ सकता है। भारत दुनिया का विशाल बाजार है, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है और ग्लोबल साउथ में उसका राजनीतिक प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। यही वजह है कि चीन भारत के साथ संबंधों को “रणनीतिक और दीर्घकालिक” नजरिए से देखने की बात कर रहा है। चीनी पक्ष ने खुद कहा है कि दोनों देश एक-दूसरे की ताकतों से सीख सकते हैं और साझा विकास को आगे बढ़ा सकते हैं। चीन के लिए यह केवल भारत से कारोबार बढ़ाने का मामला नहीं है; यह उस बहुध्रुवीय विश्व-व्यवस्था में भारत को अपने साथ बनाए रखने की कोशिश भी है, जिसमें BRICS की भूमिका बढ़ रही है। यहां व्यापार सबसे बड़ा दबाव-बिंदु भी है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2026 में चीन से भारत का आयात करीब 131.62 अरब डॉलर, जबकि निर्यात केवल 19.47 अरब डॉलर रहा। यानी करीब 112 अरब डॉलर का भारी व्यापार घाटा। चीन भारत के कुल आयात का लगभग 19.2 प्रतिशत हिस्सा देता है। इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटो कंपोनेंट्स, सोलर उपकरण, बैटरियां, मशीनरी और दूसरे औद्योगिक सामान में भारत की चीनी निर्भरता बहुत बड़ी है। दूसरी ओर भारत चाहता है कि चीन अपने बाजार को भारतीय उत्पादों के लिए ज्यादा खोले। यही विरोधाभास रिश्तों की सबसे बड़ी चुनौती भी है और सबसे बड़ा अवसर भी। भारत चीन से व्यापार बंद नहीं कर सकता, लेकिन ऐसा व्यापार भी स्वीकार नहीं कर सकता जिसमें चीन लगातार बेचता रहे और भारत केवल खरीदता रहे। इसलिए अगला चरण trade expansion नहीं, trade rebalancing का होना चाहिए। भारतीय MSMEs को BRICS की सप्लाई चेन में जोड़ना, चीन से केवल finished goods लेने के बजाय उत्पादन और value chains में हिस्सेदारी बढ़ाना और निवेश को भारतीय manufacturing capacity से जोड़ना इस दिशा में निर्णायक हो सकता है। इसे भी पढ़ें: Modi की Delhi में छक्के लगा गये Putin, Global South में Russia का नया Power Network देखकर Trump हैरान लेकिन असली कांटा अभी भी सीमा है। 2020 के गलवान संघर्ष ने भरोसे को गहरी चोट पहुंचाई। इसके बाद सैनिक तनाव कम हुआ, लेकिन सीमा विवाद खत्म नहीं हुआ। अरुणाचल प्रदेश, LAC पर सैन्य तैनाती, चीन-पाकिस्तान समीकरण और संवेदनशील रणनीतिक क्षेत्रों में चीनी गतिविधियां अभी भी भारत की चिंताओं में हैं। इसलिए दिल्ली का संदेश बिल्कुल स्पष्ट है कि व्यापार और सहयोग आगे बढ़ सकते हैं, लेकिन सीमा पर शांति की कीमत पर नहीं। फिर आता है critical minerals का सवाल। मोदी ने शी की मौजूदगी में ही technology और critical minerals की “weaponisation” के खिलाफ चेतावनी दी। यह सीधा नाम लेकर हमला नहीं था, लेकिन संदेश साफ था। चीन rare-earth refining में 90 प्रतिशत से अधिक वैश्विक क्षमता नियंत्रित करता है। आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स, EV, AI और advanced manufacturing के दौर में यह आर्थिक ताकत ही नहीं, रणनीतिक leverage भी है। इसलिए भारत-चीन की नई गर्माहट को दोस्ती की वापसी कहना जल्दबाजी होगी। यह ज्यादा सही तरीके से managed competition है। जहां दोनों देश जानते हैं कि वे एक-दूसरे को हरा नहीं सकते, लेकिन एक-दूसरे को नजरअंदाज भी नहीं कर सकते। शी का दिल्ली आना, मोदी-शी की बातचीत, व्यापारिक संपर्कों का खुलना और BRICS में साथ काम करने की कोशिशें बताती हैं कि रिश्ते अब फिर से पटरी पर लाए जा रहे हैं। लेकिन पटरी अभी पूरी तरह मजबूत नहीं हुई है। एक गलत सीमा-संघर्ष, व्यापार पर एकतरफा दबाव या रणनीतिक अविश्वास इस पूरी प्रक्रिया को फिर पीछे धकेल सकता है। Xi का BRICS डिनर में शामिल न होना भी इसी सावधानी की याद दिलाता है। हालांकि उनकी अनुपस्थिति का आधिकारिक कारण नहीं बताया गया और इसे किसी राजनीतिक संकेत के रूप में स्थापित करना उचित नहीं होगा। बहरहाल, दिल्ली में इस बार मोदी ने संकेत दे दिया है कि सहयोग होगा, व्यापार होगा, BRICS में साझेदारी होगी, लेकिन सीमा, संप्रभुता, बाजार पहुंच और रणनीतिक स्वायत्तता पर भारत अपनी शर्तों से पीछे नहीं हटेगा। -नीरज कुमार दुबे
यही तो मोदी की खास बात है...अचानक किया हस्तक्षेप और BRICS को पश्चिम विरोधी मंच बनने से रोक दिया
महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति को किसी देश के दबाव का हथियार नहीं बनने देने से लेकर समुद्र में काम करने वाले नाविकों की सुरक्षा तक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़े दो बेहद अहम मुद्दे उठाए। उन्होंने साफ कहा कि दुनिया की आधुनिक अर्थव्यवस्था जिन महत्वपूर्ण खनिजों पर तेजी से निर्भर हो रही है, उनकी आपूर्ति सुरक्षित और भरोसेमंद रहनी चाहिए। साथ ही, उन्होंने संकट के समय नाविकों को मदद पहुंचाने के लिए आपात सहायता तंत्र बनाने का प्रस्ताव रखा। यानी नई दिल्ली में मोदी ने एक तरफ संसाधनों की सुरक्षा का सवाल उठाया, तो दूसरी तरफ वैश्विक व्यापार की उस मानवीय कड़ी पर ध्यान खींचा, जिस पर समुद्र के रास्ते होने वाला पूरा कारोबार टिका है। मोदी ने इसी क्रम में समुद्री व्यापार और नाविकों की सुरक्षा को भी प्रमुखता दी। उन्होंने कहा कि वैश्विक व्यापार तभी सुचारु रूप से आगे बढ़ सकता है, जब समुद्री मार्ग सुरक्षित रहें, आपूर्ति मार्ग खुले रहें और नाविक सुरक्षित रहें। पश्चिम एशिया तथा काला सागर क्षेत्र के संघर्षों का असर समुद्री व्यापार और भारतीय नाविकों की सुरक्षा पर पड़ा है। इससे पहले ईरान और रूस के राष्ट्राध्यक्षों के साथ अपनी अलग-अलग बैठकों में भी मोदी ने समुद्री आवाजाही की स्वतंत्रता, व्यापार की निर्बाध आवाजाही और नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा उठाया था। इसे भी पढ़ें: BRICS Summit 2026 की सफलता पर बोले S Jaishankar, बंटी दुनिया में भारत ने बनाई सहमति शिखर सम्मेलन के दौरान उन्होंने नाविकों के लिए आपात सहायता तंत्र बनाने का प्रस्ताव भी रखा। इसका उद्देश्य संकट के समय समुद्री अधिकारियों और संबंधित देशों के तंत्र को जोड़कर संकट संबंधी सूचनाएं पहुंचाना, चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराना, परिवारों तक सूचना पहुंचाना और जरूरत पड़ने पर बचाव तथा निकासी अभियान में मदद करना है। समुद्री व्यापार पर बढ़ते संघर्षों के असर के बीच यह प्रस्ताव सीधे तौर पर वैश्विक व्यापार की उस कमजोर कड़ी को सामने लाता है, जिस पर करोड़ों टन माल की आवाजाही टिकी हुई है। लेकिन नई दिल्ली शिखर सम्मेलन में मोदी की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक रेखा ब्रिक्स के स्वरूप को लेकर रही। उन्होंने इस धारणा को स्वीकार नहीं किया कि ब्रिक्स पश्चिम के खिलाफ खड़ा कोई राजनीतिक गठबंधन है। मोदी ने कहा कि ब्रिक्स किसी के विरुद्ध नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलने वाला समावेशी मंच है। पिछले दो दशकों में ब्रिक्स ने अपनी अलग पहचान बनाई है और अब उसके सामने चुनौती अपनी एकता तथा सहमति को ठोस परिणामों में बदलने की है। यही वजह रही कि मोदी ने ग्लोबल साउथ को केवल निर्णयों का पालन करने वाला पक्ष बनाए रखने की बजाय नियम बनाने में प्रभावी भूमिका देने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि दुनिया के अनेक देश वैश्विक संकटों की पहली कतार में खड़े हैं, लेकिन निर्णय लेने की व्यवस्था में पीछे हैं। इस असंतुलन को बदलने के लिए वैश्विक शासन व्यवस्था को आज की आर्थिक और राजनीतिक वास्तविकताओं के अनुरूप बनाना होगा। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अधिक प्रतिनिधित्व की मांग भी इसी संदर्भ में सामने आई। मोदी ने ब्रिक्स के भीतर युवाओं, राजनयिकों और नीति-निर्माताओं को बातचीत की कला, व्यावहारिक प्रशिक्षण और कानूनी विशेषज्ञता उपलब्ध कराने की बात भी रखी, ताकि ग्लोबल साउथ केवल बनाए गए नियमों का पालन करने वाला नहीं, बल्कि नियमों को आकार देने वाला समूह बने। उन्होंने ब्रिक्स के भीतर व्यापारिक अड़चनों को घटाने, निवेश बढ़ाने और कारोबारी संबंधों को मजबूत करने पर भी जोर दिया। भारत की अध्यक्षता में कृषि, स्वास्थ्य, कौशल और स्मार्ट बिजली तंत्र जैसे क्षेत्रों में सहयोग के नए ढांचे बनाए गए हैं। ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार बढ़ाने के लिए दस प्रमुख व्यापारिक बाधाओं को हटाने, हर वर्ष सौ नए उद्यमों को सदस्य देशों के बाजारों तक पहुंचाने और एक हजार नई कारोबारी साझेदारियां विकसित करने का लक्ष्य भी सामने रखा गया है। इस पूरे घटनाक्रम में मोदी की रणनीति साफ दिखाई दी। महत्वपूर्ण खनिजों से लेकर समुद्री सुरक्षा, व्यापार से लेकर वैश्विक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व तक, उन्होंने ब्रिक्स को किसी ध्रुव के खिलाफ खड़ा करने के बजाय वैश्विक व्यवस्था में अधिक हिस्सेदारी मांगने वाले मंच के रूप में पेश किया। संदेश यही रहा कि भविष्य साझा है तो उसे आकार देने का अधिकार भी साझा होना चाहिए। नई दिल्ली घोषणा के साथ ब्रिक्स ने इसी दिशा में आगे बढ़ने की साझा प्राथमिकताएं तय कीं। -नीरज कुमार दुबे
नई दिल्ली में संपन्न BRICS शिखर सम्मेलन के बीच भारत ने उस वक्त बड़ी कूटनीतिक कामयाबी हासिल की, जब पश्चिम एशिया के युद्ध को लेकर आमने-सामने खड़े ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) एक साझा BRICS घोषणा पर सहमत हो गए। करीब छह महीने से जारी युद्ध और लगातार बढ़ते क्षेत्रीय तनाव के बीच दोनों देशों के बीच सहमति बनना सिर्फ BRICS के लिए नहीं, बल्कि भारत की कूटनीतिक भूमिका के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है। दरअसल, BRICS के विदेश मंत्रियों की मई में हुई बैठक के दौरान ईरान और UAE के बीच मतभेद इतने गहरे थे कि संयुक्त बयान तक जारी नहीं हो पाया था। पश्चिम एशिया में युद्ध को लेकर दोनों देशों की प्राथमिकताएं और संघर्ष की व्याख्या अलग-अलग थी। ऐसे में दिल्ली शिखर सम्मेलन से पहले सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि ऐसी भाषा तैयार की जाए, जिस पर ईरान और UAE समेत BRICS के सभी सदस्य देश एक साथ खड़े हो सकें। इसे भी पढ़ें: UNSC में India की स्थायी सदस्यता का रास्ता साफ ! US, UK, France, Russia के बाद China भी आ गया साथ भारत की अध्यक्षता में हुई लंबी और बेहद कठिन बातचीत के बाद आखिरकार वह रास्ता निकाला गया। बातचीत आधी रात के बाद तक चलती रही और करीब चार बजे तक सहमति बनाने की कोशिशें जारी रहीं। अंतिम घोषणा में किसी एक देश को सीधे तौर पर युद्ध के लिए जिम्मेदार ठहराने के बजाय पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव पर सामूहिक चिंता जताई गई। सभी पक्षों से अधिकतम संयम बरतने और ऐसे कदमों से बचने की अपील की गई, जो स्थिति को और बिगाड़ सकते हैं। इस पूरी कवायद का सबसे बड़ा राजनीतिक संकेत उस समय सामने आया, जब ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और UAE के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के बीच BRICS सम्मेलन के इतर मुलाकात हुई। युद्ध शुरू होने के बाद दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच यह सबसे महत्वपूर्ण संपर्कों में से एक माना जा रहा है। खास बात यह है कि यह बैठक ऐसे समय हुई, जब क्षेत्रीय संघर्ष ने ईरान और खाड़ी देशों के रिश्तों को बेहद संवेदनशील बना दिया है। हम आपको बता दें कि BRICS की नई दिल्ली घोषणा में पश्चिम एशिया की स्थिति पर चिंता जताते हुए नागरिकों की सुरक्षा, संप्रभुता और क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर दिया गया है। इसके साथ ही वैश्विक व्यापार और समुद्री आवाजाही को सुरक्षित रखने की जरूरत भी रेखांकित की गई। घोषणा का मकसद किसी पक्ष की जीत या हार तय करना नहीं, बल्कि ऐसी न्यूनतम साझा जमीन तैयार करना था, जिस पर अलग-अलग रणनीतिक हित रखने वाले देश भी एक साथ खड़े हो सकें। यहीं भारत की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। BRICS के विस्तार के बाद संगठन के भीतर अब सिर्फ आर्थिक हितों का मेल नहीं है, बल्कि ईरान, UAE और अन्य देशों के बीच गंभीर भू-राजनीतिक मतभेद भी मौजूद हैं। ऐसे माहौल में सर्वसम्मति से घोषणा पारित कराना अपने आप में एक राजनीतिक उपलब्धि है। भारतीय कूटनीति ने पक्ष के साथ खड़े होने की बजाय ऐसी भाषा पर जोर दिया, जिसे विरोधी धड़े भी स्वीकार कर सकें। देखा जाये तो इसका असर BRICS की विश्वसनीयता पर भी पड़ेगा। अगर युद्ध जैसे बेहद संवेदनशील मुद्दे पर ईरान और UAE जैसे विरोधी हितों वाले देश एक ही घोषणा पर हस्ताक्षर कर सकते हैं, तो दिल्ली शिखर सम्मेलन ने यह संदेश जरूर दिया है कि BRICS सिर्फ आर्थिक सहयोग का मंच नहीं रह गया है। अब वह ऐसे भू-राजनीतिक संकटों में भी साझा रुख बनाने की कोशिश कर रहा है, जहां वैश्विक शक्तियों के बीच सीधा टकराव मौजूद है। -नीरज कुमार दुबे
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संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी को अब वह बड़ा रणनीतिक समर्थन मिलता दिखाई दे रहा है, जिस पर लंबे समय से पूरी दुनिया की नजर थी। नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान, संयुक्त राष्ट्र महासचिव अंतोनियो गुतारेस की मौजूदगी में चीन और रूस ने भारत को संयुक्त राष्ट्र, विशेषकर सुरक्षा परिषद में बड़ी भूमिका देने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराकर भारत के दावे को नई ताकत दे दी है। इससे पहले ब्रिटेन, फ्रांस और अमेरिका भी सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन कर चुके हैं, लेकिन हर बार यह मामला चीन की असहमति पर आकर अटक जाता था। अब पहली बार ऐसा संकेत मिल रहा है कि चीन का रुख भी बदल रहा है। रूस के साथ चीन का समर्थन मिलना केवल भारत की कूटनीतिक जीत नहीं, बल्कि सुरक्षा परिषद की दशकों पुरानी शक्ति-संरचना के सामने एक बेहद महत्वपूर्ण रणनीतिक संदेश भी है। इस घटनाक्रम को तमाम अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक भारत के लिए बड़ी जीत बता रहे हैं। अमेरिकी अर्थशास्त्री और कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जेफ्री सैक्स ने तो यहां तक कहा है कि भारत के अलावा कोई दूसरा देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के छठे स्थायी सदस्य बनने का इतना मजबूत दावा नहीं रखता। सैक्स ने भारत की करीब डेढ़ अरब की आबादी, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, वैश्विक प्रभाव और कूटनीतिक क्षमता को इसकी सबसे बड़ी ताकत बताया। उनका कहना है कि भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है, क्रय शक्ति के आधार पर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में लगातार अपनी प्रभावशाली भूमिका साबित कर रहा है। इसे भी पढ़ें: PM Modi और UAE क्राउन प्रिंस की मुलाकात, रणनीतिक और निवेश साझेदारी पर बनी सहमति हम आपको यह भी बता दें कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की नई दिल्ली घोषणा में चीन और रूस ने स्पष्ट रूप से भारत और ब्राजील की संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद में बड़ी भूमिका निभाने की आकांक्षा के प्रति अपना समर्थन दोहराया है। चीन का यह रुख खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह लंबे समय से भारत की स्थायी सदस्यता की मांग का खुलकर समर्थन करने से बचता रहा है। सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता रखने वाला चीन यदि भारत के दावे के समर्थन में खड़ा होता है, तो यह भारत के लिए बड़ी राहत की बात है। उल्लेखनीय है कि सुरक्षा परिषद में फिलहाल पांच स्थायी सदस्य हैं। चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका। इनके पास वीटो पावर है, जिसके जरिये इनमें से कोई भी देश किसी महत्वपूर्ण प्रस्ताव को रोक सकता है। इसके अलावा दस अस्थायी सदस्य होते हैं, जिनका कार्यकाल दो वर्ष का होता है। इसके अलावा, विडंबना देखिए कि 1945 में जिस वैश्विक शक्ति-संतुलन को ध्यान में रखकर यह व्यवस्था बनाई गई थी, वही ढांचा आज भी लगभग उसी रूप में कायम है। जबकि दुनिया की आबादी, अर्थव्यवस्था, शक्ति-संतुलन और राजनीतिक वास्तविकताएं बदल गईं, लेकिन सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का ढांचा नहीं बदला। यही वह बिंदु है जहां संयुक्त राष्ट्र सुधार की जरूरत सबसे ज्यादा दिखाई देती है। जिस संस्था का मूल उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा कायम करना है, वही संस्था जब दुनिया के बड़े हिस्से को निर्णय प्रक्रिया से पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दे पाती, तो उसकी वैधता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की विशाल आबादी और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का ढांचा बेहद असंतुलित है। देखा जाये तो दुनिया के संकटों का असर जिन देशों और समाजों पर सबसे ज्यादा पड़ता है, निर्णय लेने की मेज पर उनकी आवाज उतनी ही कमजोर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसी असमानता को रेखांकित करते हुए वैश्विक निर्णय व्यवस्था को विशेषाधिकारों की पिरामिड जैसी संरचना बताया है। उन्होंने कहा कि ऊपर बैठे शक्तिशाली देश निर्णय लेते हैं और नीचे मौजूद देशों को उन निर्णयों के परिणाम भुगतने पड़ते हैं। उन्होंने इस विशेषाधिकार की पिरामिड को साझेदारी के मंच में बदलने का आह्वान किया है। उनका यह संदेश केवल ब्रिक्स तक सीमित नहीं है, बल्कि मौजूदा वैश्विक व्यवस्था के सामने एक सीधी चुनौती है। प्रधानमंत्री मोदी और संयुक्त राष्ट्र महासचिव अंतोनियो गुतारेस की मुलाकात में भी बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और बहुपक्षीय संस्थाओं, विशेषकर सुरक्षा परिषद में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया गया। दोनों नेताओं ने संघर्षों, समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता, सतत विकास, मानव-केंद्रित कृत्रिम बुद्धिमत्ता, नवीकरणीय ऊर्जा और वैश्विक खाद्य सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा की। यह अपने आप में संकेत है कि आज की वैश्विक समस्याएं इतनी व्यापक हो चुकी हैं कि उन्हें पुराने शक्ति-संतुलन और सीमित प्रतिनिधित्व वाली संस्थाओं के सहारे नहीं संभाला जा सकता। देखा जाये तो भारत की स्थायी सदस्यता का सामरिक महत्व यहीं से सामने आता है। भारत केवल दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश नहीं है; वह एशिया की एक निर्णायक शक्ति, परमाणु शक्ति, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और ग्लोबल साउथ की प्रमुख आवाज है। भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी स्थान मिलने का अर्थ होगा एशिया और विकासशील दुनिया की निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक हिस्सेदारी बढ़ना। रणनीतिक स्तर पर चीन और रूस का समर्थन भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक पूंजी है। इससे यह धारणा कमजोर होती है कि भारत की स्थायी सदस्यता केवल पश्चिमी देशों की इच्छा पर निर्भर है। अब रूस और चीन जैसे स्थायी सदस्य भी इसके समर्थन में खुलकर खड़े दिखाई दे रहे हैं। यह भारत की उस कूटनीति की सफलता है जो एक साथ पश्चिम, रूस, चीन और ग्लोबल साउथ के साथ संवाद बनाए रखते हुए अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ा रही है। बहरहाल, मुद्दा सिर्फ भारत को स्थायी सदस्य बनाने का नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र को 21वीं सदी की वास्तविकताओं के अनुरूप बदलने का है। अगर दुनिया की सबसे बड़ी आबादी और प्रमुख उभरती शक्तियों को निर्णय की मेज पर पर्याप्त जगह नहीं मिलती, तो संयुक्त राष्ट्र वैश्विक समस्याओं का समाधान करने वाली संस्था कम और पुराने शक्ति-संतुलन की संरचना ज्यादा दिखाई देगा। दुनिया बदल चुकी है; अब संयुक्त राष्ट्र को भी बदलना ही होगा। और इस बदलाव की सबसे मजबूत दावेदारी आज भारत के पास है। -नीरज कुमार दुबे
Amit Shah's Big Move: Maharashtra से बड़ा संदेश, 2029 का एजेंडा या Fadnavis के साथ कोई नया खेल?
2029 से पहले 21 राज्यों में लागू होगा Uniform Civil Code, मुस्लिमों को फायदा होगा या नुकसान?
समान नागरिक संहिता पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बयान के बाद देश की राजनीति में जैसे भूचाल-सा आ गया है लेकिन हंगामा कर रहे लोगों को समझना चाहिए कि Uniform Civil Code का विचार आज की राजनीतिक बहस की उपज नहीं है। संविधान निर्माताओं ने ही इसकी कल्पना की थी और संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य को पूरे देश में समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करने का निर्देश दिया गया। संविधान सभा में डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने भी स्पष्ट किया था कि विवाह और उत्तराधिकार जैसे क्षेत्रों को समान नागरिक कानून के दायरे में लाने की संवैधानिक मंशा है। यानी UCC संविधान की मूल बहस का हिस्सा था, कोई अचानक सामने आया राजनीतिक एजेंडा नहीं। इसके बावजूद आजादी के बाद लंबे समय तक वोट बैंक की राजनीति और तुष्टिकरण की नीति के चलते कांग्रेस तथा उसके समर्थन वाली सरकारें विभिन्न समुदायों के निजी कानूनों को छूने से बचती रहीं। मगर नरेंद्र मोदी सरकार इस मुद्दे पर चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ रही है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का ताजा बयान इस संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। मुंबई में अमित शाह ने कहा कि 2029 से पहले भाजपा-एनडीए शासित सभी 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू कर दी जाएगी। उन्होंने कहा कि तीन तलाक खत्म कर मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार देने की दिशा में कदम उठाया गया है और कई राज्यों में UCC की प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी है। शाह का संदेश साफ है कि मोदी सरकार UCC को केवल चुनावी घोषणा बनाकर छोड़ने के मूड में नहीं है, बल्कि राज्य सरकारों के जरिए इसे विस्तार देने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। इसे भी पढ़ें: Maharashtra News: गरबा पंडालों में आधार कार्ड और तिलक जरूरी, Nitesh Rane ने Muslim एंट्री पर रोक का किया समर्थन उधर, अमित शाह के इस ऐलान के साथ ही विपक्ष ने इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने में देर नहीं की। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद ने कहा है कि किसी भी विचारधारा को संविधान से ऊपर नहीं रखा जा सकता। उन्होंने उत्तराखंड और दूसरे राज्यों में लागू या प्रस्तावित UCC को उच्च न्यायपालिका की कसौटी पर परखे जाने की बात कही और कहा कि मौलिक अधिकार तथा धार्मिक स्वतंत्रता जैसे सवालों पर अंतिम निर्णय अदालतों को करना होगा। कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने इससे भी आगे बढ़कर सवाल किया कि UCC से बेरोजगारी, महंगाई या पेट्रोल-डीजल की कीमतों जैसी आर्थिक समस्याएं कैसे दूर होंगी। उनका आरोप है कि सरकार इस मुद्दे के जरिए मुसलमानों को निशाना बनाने की राजनीति कर रही है। देखा जाये तो यहीं से UCC की असली राजनीतिक लड़ाई सामने आती है। एक पक्ष इसे समानता, लैंगिक न्याय और एक समान नागरिक अधिकारों की दिशा में संवैधानिक कदम बता रहा है, तो दूसरा पक्ष इसे धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों से जोड़कर देख रहा है। लेकिन राजनीतिक आरोपों से अलग इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि UCC का संवैधानिक आधार मौजूद है और व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े विषयों पर कानून बनाने का अधिकार राज्यों और केंद्र दोनों के पास है। विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और दत्तक ग्रहण जैसे विषय संविधान की सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची में आते हैं। इसलिए केवल संसद से केंद्रीय कानून की प्रतीक्षा करने की बजाय राज्य भी अपने-अपने स्तर पर कानून बना सकते हैं। सबसे अहम बात यह है कि अब UCC को लेकर बहस केवल राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं है। मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 के उन प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा था कि UCC का समय आ गया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने यह भी संकेत दिया था कि अगर मुस्लिम उत्तराधिकार कानून के किसी प्रावधान को रद्द कर दिया गया तो वैधानिक व्यवस्था में खालीपन पैदा हो सकता है। अदालत ने यह सवाल भी उठाया था कि ऐसे व्यापक बदलाव का रास्ता न्यायपालिका की बजाय विधायिका के माध्यम से क्यों न निकले। यानी सुप्रीम कोर्ट ने UCC की संवैधानिक बहस को नकारा नहीं, बल्कि व्यापक कानून बनाने की जिम्मेदारी विधायिका की ओर इंगित की। यही नहीं, विधि आयोग का रिकॉर्ड भी इस बहस को एकतरफा नहीं रहने देता। 21वें विधि आयोग ने 2018 में ‘Reforms of Family Law’ परामर्श पत्र जारी किया था। बाद में 22वें विधि आयोग ने जून 2023 में UCC पर नए सिरे से जनता, धार्मिक संगठनों और दूसरे हितधारकों से सुझाव मांगे। सरकार के अनुसार 21वें आयोग ने अंतिम रिपोर्ट नहीं दी और 22वां आयोग भी UCC पर अपनी रिपोर्ट पूरी नहीं कर सका। इस तरह यह मामला व्यापक परामर्श और विधायी विकल्पों की पड़ताल की प्रक्रिया में रहा है। अब सवाल यह है कि UCC वास्तव में जमीन पर कैसा दिखता है? उत्तराखंड इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। 27 जनवरी 2025 से वहां UCC लागू है और विवाह, तलाक, भरण-पोषण तथा उत्तराधिकार जैसे मामलों के लिए धर्म के आधार पर अलग-अलग व्यवस्था के स्थान पर एक समान ढांचा लागू किया गया है। राज्य का आधिकारिक UCC पोर्टल लगातार विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और अन्य सेवाओं के पंजीकरण के आंकड़े उपलब्ध करा रहा है। यानी यह केवल कागज पर बना कानून नहीं है, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था के स्तर पर काम कर रहा है। इसके बाद गुजरात ने मार्च 2026 में UCC विधेयक पारित किया। करीब आठ घंटे की बहस और विपक्ष के विरोध के बीच पारित इस कानून का उद्देश्य विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और live-in relationships से जुड़े मामलों के लिए समान कानूनी ढांचा तैयार करना है। इसके बाद मई 2026 में असम विधानसभा ने भी UCC विधेयक पारित कर दिया। असम का कानून बहुविवाह पर रोक, विवाह और लिव-इन-रिलेशनशिप के पंजीकरण तथा उत्तराधिकार में समानता जैसे प्रावधानों पर केंद्रित है। अनुसूचित जनजातियों को उनकी संवैधानिक और प्रथागत व्यवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए इसके दायरे से बाहर रखा गया है। गोवा का उदाहरण भी इस बहस में अक्सर निर्णायक रूप से सामने आता है। वहां ऐतिहासिक रूप से पुर्तगाली सिविल कोड से विकसित एक साझा नागरिक कानून व्यवस्था लंबे समय से मौजूद है। इसलिए भारत में यह दावा भी टिकता नहीं कि अलग-अलग समुदायों के लिए समान नागरिक कानून लागू करना अपने आप में असंभव या प्रशासनिक रूप से अव्यावहारिक है। या फिर यह किसी तरह का भेदभाव करता है। इसलिए अमित शाह के 2029 वाले ऐलान को सिर्फ एक चुनावी नारे के रूप में देखना ठीक नहीं होगा। उत्तराखंड में कानून लागू हो चुका है, गुजरात और असम विधायी रास्ते पर आगे बढ़ चुके हैं और गोवा का अपना ऐतिहासिक अनुभव मौजूद है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने UCC की आवश्यकता पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है और विधि आयोग ने भी इस विषय पर व्यापक परामर्श की प्रक्रिया चलाई है। अब देखना होगा कि मोदी सरकार इस मुद्दे पर कैसे आगे बढ़ती है। राज्यों से शुरुआत हो चुकी है इसलिए देखना होगा कि क्या केंद्रीय स्तर पर भी इस संबंध में कोई कानून आता है या नहीं? साथ ही विपक्ष की आपत्तियां यह भी दर्शा रही हैं कि यूसीसी को अदालतों में चुनौतियां दी जाएंगी, राज्यों में प्रावधानों को लेकर बहस होगी और धार्मिक स्वतंत्रता बनाम समान नागरिक अधिकारों का प्रश्न भी उठेगा। यहां विपक्ष को समझना होगा कि UCC कोई असंवैधानिक या अचानक थोपा गया विचार नहीं है। संविधान का अनुच्छेद 44, संविधान सभा की बहस, न्यायपालिका की टिप्पणियां और अब राज्यों में बन रही वास्तविक कानूनी व्यवस्था, इन सभी को साथ रखकर देखें तो साफ है कि UCC पर अब देश बहुत आगे निकल चुका है। -नीरज कुमार दुबे
दोस्त इजरायल को झटका! क्या भारत ने बदल लिया अपना रुख, ईरान के लिए नेतन्याहू को छोड़ा?
क्या ब्रिक्स डिक्लेरेशन भारत की विदेश नीति में किसी बड़े बदलाव की तरफ इशारा है? ब्रिक्स ब्रिक समिट का संयुक्त बयान जारी हो चुका है और इस बयान में पूरे फोरम ने कई मुद्दों पर काफी सख्त रुख अपनाया है। मसलन लेबनन के मुद्दे पर इजराइल का सीधा नाम लेते हुए आलोचना की गई है और लेबनान में सीजफायर का पालन करने पर जोर दिया गया है। लेकिन अमेरिका की एकतरफ़ा पाबंदियों की आलोचना करते समय ट्रंप या अमेरिका का कोई भी नाम का जिक्र नहीं किया गया है। इस संयुक्त बयान पर सभी देशों की सहमति बनवाना भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती थी क्योंकि इस साल ब्रिक्स की अध्यक्षता और सम्मेलन की मेजबानी दोनों भारत ही कर रहा है। अब देखना यह होगा कि इस बयान में इस्तेमाल किए गए शब्दों को बाकी देश किस तरह समझते हैं और भारत की तरफ से दिए गए संकेतों को किस तरह से लिया जाता है। पूरे बयान में बहुत सावधानी से शब्दों का चुनाव किया गया है। मिसाल के तौर पर देखें तो इसमें यूएन के दायरे से बाहर जाकर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों की आलोचना की गई है। लेकिन अमेरिका का नाम नहीं लिया गया है। इसी तरह परमाणु ठिकानों पर हमले की निंदा की गई है। लेकिन ईरान का जिक्र नहीं है। इजराइल यहां जरूर एक अपवाद के तौर पर सामने आया है। गाजा और लेबनान से जुड़े कई हिस्से इजराइल का नाम सीधे तौर पर साझा बयान में शामिल करते हैं। इस संयुक्त बयान को तैयार करना इसलिए भी मुश्किल था क्योंकि ईरान, यूएई और सऊदी अरब मिडिल ईस्ट में चल रही जंग को लेकर अलग-अलग तरह की भाषा चाहते थे। ऐसे में सभी की सहमति से बयान जारी हो जाना भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जा रही है। खासकर इसलिए क्योंकि पहले ऐसी अटकलें थी कि रूस और ईरान अमेरिका के खिलाफ काफी कड़ी भाषा इस्तेमाल करवाना चाहेंगे जिसका भारत और ब्रिक्स के दूसरे देश विरोध कर सकते हैं। लेकिन आखिर में सभी देशों में कंसेंसस बन गया और साझा बयान जारी हो गया। इजराइल को लेकर ब्रिक्स के बयान में गजा में मानवीय मदद पहुंचाने पर जोर दिया गया है। साथ ही फिलिस्तीनियों को जबरन उनके घरों और जमीन से हटाने का विरोध किया गया है। इसे भी पढ़ें: CPI ने BRICS घोषणापत्र का किया स्वागत, वैश्विक व्यवस्था में सुधार की वकालत की अमेरिका का नाम नहीं, लेकिन प्रतिबंधों की आलोचना घोषणापत्र की सबसे अहम बातों में से एक है एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों का मुद्दा। घोषणापत्र में कहा गया हम अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ एकतरफा दबाव वाले कदमों को लागू करने की निंदा करते हैं। हम फिर से कहते हैं कि ऐसे कदमों खासकर एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों और सेकेंडरी प्रतिबंधों के दूरगामी नकारात्मक असर होते हैं। इसमें यह भी कहा गया कि ऐसे कदमों का गरीबों पर बहुत बुरा असर पड़ता है। इसमें अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के खिलाफ एकतरफा दबाव वाले कदमों जिनमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से मंज़ूरी न लेने वाले प्रतिबंध भी शामिल हैं। दोनों ही बयानों में अमेरिका का नाम नहीं लिया गया है। लेकिन यह भाषा रूस और ईरान के लिए अहम है, जो ब्रिक्स के सदस्य हैं और जिन पर अमेरिका ने कई तरह की पाबंदियां लगा रखी हैं। ये दोनों देश लंबे समय से वॉशिंगटन की पाबंदी वाली नीतियों की आलोचना करते रहे हैं। इसलिए, इस भाषा में मॉस्को और तेहरान की एक अहम चिंता का ध्यान रखा गया है, लेकिन साथ ही घोषणापत्र को वॉशिंगटन पर सीधे हमले जैसा भी नहीं बनाया गया है। ब्रिक्स ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों के खिलाफ़ एकतरफ़ा टैरिफ और नॉन-टैरिफ़ उपायों को लेकर भी गहरी चिंता जताई है, और इसमें भी किसी देश का नाम नहीं लिया गया है। डोनाल्ड ट्रंप के व्हाइट हाउस में लौटने के बाद से यह मुद्दा और भी अहम हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने बार-बार ब्रिक्स को अमेरिका-विरोधी कहा है। उन्होंने इस समूह के साथ जुड़ने वाले देशों पर अतिरिक्त 10 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी दी है और डॉलर को कमज़ोर करने की कोशिशों पर 100 प्रतिशत ड्यूटी लगाने की चेतावनी भी दी है। ये तनाव सिर्फ़ ब्रिक्स समूह तक ही सीमित नहीं हैं। भारत को भी रूस से तेल खरीदने के कारण अमेरिकी टैरिफ़ का सामना करना पड़ा है। नई दिल्ली ने इस कदम को अनुचित, गैर-वाजिब और तर्कहीन बताया है और साथ ही अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए ज़रूरी कदम उठाने का संकल्प लिया है। इसे भी पढ़ें: जाते-जाते भारत में बड़ा धमाका कर गए जिनपिंग, पूरी दुनिया हैरान! बिना नाम लिए ईरान के पक्ष का समर्थन कैसे करता है यह घोषणापत्र पश्चिम एशिया के मुद्दे पर आम सहमति बनाना खास तौर पर मुश्किल था, क्योंकि ईरान और UAE इस टकराव को लेकर अलग-अलग राय रख रहे थे। ईरान ने इस बात के लिए भी BRICS की आलोचना की थी कि उसने अमेरिका और इज़राइल के हवाई हमलों के खिलाफ कोई बयान जारी नहीं किया, और वह इस समूह से समर्थन की उम्मीद कर रहा था। आखिरी घोषणापत्र में तेहरान के लिए ऐसी बातें कही गई हैं जिनका वह हवाला दे सकता है, लेकिन इसमें उसका नाम नहीं लिया गया है। BRICS ने नागरिक बुनियादी ढांचे और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की पूरी सुरक्षा-निगरानी वाली शांतिपूर्ण परमाणु सुविधाओं पर जानबूझकर किए गए हमलों पर गहरी चिंता जताई। इस हिस्से में ईरान, अमेरिका या इज़राइल का नाम नहीं लिया गया है। हालांकि, टकराव के संदर्भ में, यह तेहरान के उस तर्क का समर्थन करता हुआ दिखता है कि उसकी सुरक्षित परमाणु सुविधाओं पर हमले अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन थे। BRICS ने देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने का भी आह्वान किया और पश्चिम एशिया में अधिकतम संयम बरतने की अपील की। सबसे अहम बात यह है कि यह हिस्सा सदस्यों के अपने-अपने राष्ट्रीय रुख को याद दिलाता है, जिससे युद्ध के बारे में अलग-अलग राय रखने वाले देश अपनी व्यक्तिगत स्थिति छोड़े बिना एक ही टेक्स्ट पर सहमत हो पाते हैं। इसे भी पढ़ें: अगर तुमने...ब्रिक्स से लौटते ही जिनपिंग ने ट्रंप को क्या धमकी दे डाली? इजरायल पर BRICS का सीधा निशाना, लेबनान से सेना वापस बुलाने की मांग BRICS घोषणापत्र में इजरायल को लेकर स्पष्ट और सख्त रुख अपनाया गया है। गाजा में जारी हिंसा पर चिंता जताते हुए BRICS ने फिलिस्तीनियों के जबरन विस्थापन का विरोध किया है। साथ ही 1967 की सीमाओं के आधार पर पूर्वी यरुशलम को राजधानी बनाकर संप्रभु फिलिस्तीनी राष्ट्र के गठन के समर्थन को दोहराया गया है। घोषणापत्र में दक्षिण अफ्रीका की ओर से इजरायल के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) में चल रही कार्यवाही का भी उल्लेख किया गया। BRICS ने कहा कि गाजा में मानवीय सहायता की आपूर्ति सुनिश्चित करना इजरायल का कानूनी दायित्व है। लेबनान के मुद्दे पर BRICS ने युद्धविराम का स्वागत करते हुए सभी पक्षों से इसकी शर्तों का पालन करने और UNSC प्रस्ताव 1701 को पूरी तरह लागू करने की अपील की। साथ ही युद्धविराम के लगातार उल्लंघन और लेबनान की संप्रभुता एवं क्षेत्रीय अखंडता के उल्लंघन की निंदा की गई। घोषणापत्र में सीधे इजरायल से लेबनान के इलाकों से अपनी सेना वापस बुलाने को कहा गया। BRICS ने इजरायल से लेबनान सरकार के साथ हुए समझौते की शर्तों का सम्मान करने और उन सभी लेबनानी क्षेत्रों से अपनी सेनाएं हटाने का आह्वान किया, जहां वे अभी भी मौजूद हैं। UNSC Resolution 1701 को 2006 में इजरायल-हिजबुल्लाह युद्ध के बाद अपनाया गया था। इसमें इजरायली सेना की वापसी और दक्षिणी लेबनान में लेबनानी सेना तथा संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिकों की तैनाती की बात कही गई थी। BRICS के घोषणापत्र में अमेरिका का नाम लिए बिना एकतरफा प्रतिबंधों की आलोचना की गई है। वहीं परमाणु प्रतिष्ठानों से जुड़े हिस्से में ईरान का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया गया। लेकिन इजरायल का नाम स्पष्ट रूप से लिया गया और लेबनानी क्षेत्र से उसकी सेनाओं की वापसी की मांग की गई। तो, क्या भारत का रुख बदला है? सख्त भाषा के बावजूद, यह घोषणा अपने आप में भारत के रुख में कोई बुनियादी बदलाव नहीं दिखाती। ब्रिक्स (BRICS) घोषणा सभी 11 सदस्यों की सहमति वाला दस्तावेज़ है, न कि सिर्फ़ भारत का बयान। अध्यक्ष के तौर पर भारत का काम ऐसे तरीके खोजना था जिन्हें अलग-अलग हितों वाले देश स्वीकार कर सकें। भारत ने पश्चिम एशिया में बातचीत और कूटनीति की वकालत जारी रखी है, साथ ही फ़िलिस्तीन के लिए 'टू-स्टेट सॉल्यूशन' (दो-देश समाधान) का समर्थन किया है और इज़राइल के साथ करीबी रिश्ते भी बनाए रखे हैं। ब्रिक्स (BRICS) सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन की मुलाक़ात में, नई दिल्ली ने फिर से कहा कि विवादों को बातचीत और कूटनीति से सुलझाया जाना चाहिए। साथ ही, नेविगेशन, व्यापार और समुद्री यात्रियों की सुरक्षा के महत्व पर भी ज़ोर दिया गया। इसी तरह, भारत का व्यापक नज़रिया अलग-अलग गुटों के साथ संबंध बनाए रखने का रहा है। वह रूस और यूक्रेन, दोनों के साथ संपर्क बनाए हुए है, अमेरिका और इज़राइल के साथ भी उसके अहम संबंध हैं और ईरान के साथ भी बातचीत के रास्ते खुले रखे हैं। लेकिन जिस माहौल में भारत यह संतुलन बना रहा है, वह अब बदल गया है। ग्लोबल अनसर्टेनिटी का ही नतीजा है कि भारत चीन तमाम डिफरेंसेस को छोड़ के इस समय आगे बढ़ने के लिए तैयार है। तो मुझे नहीं लगता है भारत के लिए कोई डिप्लोमेटिक एक आप ये कहे कि कोई एम्बरेसमेंट होगा। भारत इससे और सशक्त होगा।
भारत में अगस्त माह में महंगाई 9.92 प्रतिशत रही: सरकार
नई दिल्ली, सरकार द्वारा सोमवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, देश में थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) आधारित महंगाई अगस्त 2026 के लिए 9.92 प्रतिशत रही, जो जुलाई में 9.78 प्रतिशत थी।
सरकार : भारत में अगस्त माह में महंगाई थोक मूल्य सूचकांक 9.92 प्रतिशत रही
नई दिल्ली, सरकार द्वारा सोमवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, देश में थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) आधारित महंगाई अगस्त 2026 के लिए 9.92 प्रतिशत रही, जो जुलाई में 9.78 प्रतिशत थी।
नई दिल्ली, पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है।
चुनाव में हार के लिए विजयन और एमवी गोविंदन पर उठे सवाल: केरल
कोझिकोड, सीपीआई (एम) के मजबूत गढ़ कन्नूर में ही पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की अप्रत्यक्ष रूप से आलोचना हो रही है।
ब्रिक्स की सफलतापूर्वक मेजबानी के लिए पीएम मोदी की सराहना: चंद्रबाबू नायडू
अमरावती, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की सफलतापूर्वक मेजबानी के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सराहना की है।
अलवर समेत कई शहरों में नतीजे जारी: राजस्थान निकाय चुनाव
जयपुर, राजस्थान के निकाय चुनाव 2026 की मतगणना के दौरान अलग-अलग नगर परिषद और नगर पालिकाओं से लगातार नतीजे सामने आ रहे हैं।
श्री गणेश चतुर्थी पर राहुल गांधी और खड़गे समेत विपक्ष के कई नेताओं ने दी शुभकामनाएं
श्री गणेश चतुर्थी पर राहुल गांधी और खड़गे समेत विपक्ष के कई नेताओं ने दी शुभकामनाएं
Hindi Diwas 2026: विश्व में हिन्दी का बढ़ता प्रभाव
वर्तमान में हिन्दी भारत की सीमाओं से बाहर निकलकर विश्व के कई देशों में अपना परचम स्थापित कर रही है। यह हिंदी के अंतर्राष्ट्रीय होने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। आज भारतीय मूल के व्यक्ति हिंदी के विस्तार में अभूतपूर्व योगदान दे रहे हैं। इतना ही नहीं अमेरिका, चीन सहित विश्व के लगभग 11 देशों में हिन्दी के समाचार पत्र प्रकाशित हो रहे हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि हिंदी भारतीय संस्कृति, संवेदना और आत्मीयता का वैश्विक स्वर बनती जा रही है। यह भाषा भारत की मिट्टी से जन्म लेकर आज विश्व के अनेक देशों में संवाद, साहित्य, शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक जुड़ाव का माध्यम बन रही है। हिन्दी की यह यात्रा केवल शब्दों के विस्तार की यात्रा नहीं है, यह भारत की उस सांस्कृतिक चेतना का विस्तार है, जिसने सदियों से सम्पूर्ण विश्व को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश दिया है। हिन्दी की शक्ति उसके विशाल शब्द भंडार और उसकी आत्मीयता में भी है। यह भाषा सहजता से लोगों को जोड़ती है। भारत से बाहर बसे भारतीय समुदायों ने हिन्दी को अपनी जड़ों से जोड़े रखने का महत्वपूर्ण माध्यम बनाया है। मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद और टोबैगो, गुयाना तथा दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में भारतीय मूल के लोगों ने हिन्दी के सांस्कृतिक प्रकाश को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया है। इसे भी पढ़ें: हिंदी का सम्मान ही भारतीय भाषाओं और संस्कृति की असली ताकत मॉरीशस हिन्दी की वैश्विक यात्रा का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। वहाँ हिन्दी का अध्ययन विद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में होता है। साहित्यिक गतिविधियों, सांस्कृतिक आयोजनों और भारतीय परंपराओं से जुड़े कार्यक्रमों में हिन्दी का विशेष स्थान दिखाई देता है। मॉरीशस में हिन्दी का विस्तार यह प्रमाणित करता है कि भाषा भौगोलिक सीमाओं से बाहर निकलकर भावनाओं और संस्कारों की जीवंत धारा है। फिजी में हिन्दी का एक विशिष्ट रूप ‘फिजियन हिन्दी’ के रूप में विकसित हुआ है। भारतीय मूल के लोगों के बीच यह संवाद और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण माध्यम बनी। यह हिन्दी की उस विशेष क्षमता को दर्शाती है, जिसमें वह अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों में पहुँचकर स्थानीय परिवेश के साथ संवाद करते हुए अपना नया स्वरूप ग्रहण कर सकती है। सूरीनाम, गुयाना तथा त्रिनिदाद और टोबैगो में भी भारतीय मूल के समुदायों ने हिन्दी को धार्मिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक परंपराओं के साथ जोड़े रखा। इन देशों में हिन्दी का महत्व भारतीय विरासत की स्मृति के रूप में भी है। भजन, रामायण-पाठ, सांस्कृतिक आयोजन और भारतीय पर्व हिन्दी को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आज के समय में हिन्दी का प्रभाव भारतीय मूल के समुदाय से बाहर निकल रहा है, की आबादी तक सीमित नहीं है। आज यह अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में हिन्दी सीखने और समझने वालों की संख्या लगातार बढ़ी है। भारतीय सिनेमा, टेलीविजन, डिजिटल माध्यम, संगीत और सोशल मीडिया ने हिन्दी को वैश्विक स्तर पर नई दृश्यता प्रदान की है। आज भारत से जुड़ने की इच्छा रखने वाला विश्व का युवा वर्ग हिन्दी के शब्दों और अभिव्यक्तियों से परिचित हो रहा है। विश्व के देशों में हिन्दी के प्रकाशन लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। जिनमें फिजी में शांतिदूत हिन्दी साप्ताहिक, मॉरीशस में आर्योदय, वसंत, इंद्रधनुष आदि, यहाँ हिन्दी पत्रकारिता का इतिहास 1909 से मिलता है। इसी प्रकार अमेरिका में हिन्दी जगत, कर्मभूमि, नवरंग टाइम्स, भारत समाचार, नमस्ते यूएसए, सेतु, विश्वा आदि हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं का उल्लेख मिलता है। कनाडा में सरस्वती पत्र सहित हिन्दी के साहित्यिक, सांस्कृतिक प्रकाशन हो रहे हैं। ब्रिटेन में पुरवाई, न्यूज़ीलैंड में भारत-दर्शन, ऑस्ट्रेलिया में ऑस्ट्रेलियांचल सहित हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन, संयुक्त अरब अमीरात में अभिव्यक्ति, अनुभूति आदि, नेपाल में तरंग को पहला हिन्दी साप्ताहिक और जय नेपाल को पहला हिन्दी दैनिक बताया गया है। आज के डिजिटल युग ने हिन्दी के विस्तार को अभूतपूर्व गति दी है। इंटरनेट और स्मार्टफोन ने भाषा की भौगोलिक सीमाओं को लगभग समाप्त कर दिया है। हिन्दी में समाचार, साहित्य, शिक्षा, मनोरंजन, ज्ञान-विज्ञान और सामाजिक संवाद की सामग्री बड़ी मात्रा में उपलब्ध है। सोशल मीडिया के माध्यम से हिन्दी लिखने और पढ़ने वालों का नया वर्ग सामने आया है। हिन्दी अब केवल मुद्रित पृष्ठों की भाषा न होकर मोबाइल स्क्रीन, डिजिटल मंच और वैश्विक संवाद का भी प्रभावशाली माध्यम बन चुकी है। हिन्दी के वैश्विक विस्तार में भारतीय साहित्य की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। कबीर, तुलसीदास, प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर और हरिवंश राय बच्चन जैसे रचनाकारों ने हिन्दी को ऐसी साहित्यिक ऊँचाई प्रदान की, जिसने भाषा को मानवीय संवेदना की अभिव्यक्ति बना दिया। हिन्दी साहित्य में जीवन, प्रकृति, परिवार, संघर्ष, आध्यात्मिकता और मानवता के विविध रंग मिलते हैं। यही व्यापकता हिन्दी को विश्व के पाठकों से जोड़ने की क्षमता प्रदान करती है। हिन्दी की वैश्विक प्रतिष्ठा में विश्व हिन्दी सम्मेलन जैसी संस्थागत पहल का भी विशेष योगदान है। ऐसे मंच हिन्दी के विद्वानों, साहित्यकारों, शिक्षाविदों और भाषा प्रेमियों को एक साथ लाते हैं। इससे हिन्दी के अध्ययन, अध्यापन, साहित्य और अंतरराष्ट्रीय विस्तार पर गंभीर विमर्श को गति मिलती है। आज आवश्यकता हिन्दी को केवल भावनाओं की भाषा मानने की नहीं, बल्कि ज्ञान, विज्ञान, तकनीक, व्यापार और वैश्विक संवाद की समर्थ भाषा के रूप में विकसित करने की है। नई तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अनुवाद प्रणाली और डिजिटल शिक्षा हिन्दी के लिए नए अवसर लेकर आए हैं। यदि इन क्षेत्रों में हिन्दी की शब्दावली, तकनीकी सामग्री और उच्च स्तरीय शिक्षण संसाधनों का निरंतर विस्तार किया जाए तो हिन्दी की वैश्विक उपयोगिता और बढ़ सकती है। हिन्दी का भविष्य उसके बोलने वालों की संख्या से अधिक उसकी उपयोगिता और गुणवत्ता पर निर्भर करेगा। दुनिया में अनेक भाषाएँ अपनी विशिष्ट पहचान के साथ आगे बढ़ रही हैं। हिन्दी भी अपनी वैज्ञानिक क्षमता, साहित्यिक समृद्धि और सांस्कृतिक शक्ति के आधार पर विश्व की प्रमुख भाषाओं में अपना स्थान और अधिक सुदृढ़ कर सकती है। भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका भी हिन्दी के लिए नए द्वार खोल रही है। आज विश्व भारत को केवल एक बड़े बाजार के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कृति, तकनीक, लोकतंत्र और शांति की महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में देख रहा है। ऐसे समय में हिन्दी भारत की आवाज को दुनिया तक पहुँचाने का सशक्त माध्यम बन सकती है। हिन्दी का वैश्विक विस्तार भाषायी सह अस्तित्व और सांस्कृतिक संवाद का विषय है। भारत की परंपरा सभी भाषाओं और संस्कृतियों का सम्मान करती है। हिन्दी इसी भावना के साथ विश्व की भाषाओं के बीच अपना स्थान बना सकती है। आज हिन्दी भारत की सीमाओं से बाहर निकलकर अनेक महाद्वीपों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है। आने वाला समय हिन्दी के लिए और अधिक संभावनाओं से भरा है। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम हिन्दी को गर्व के साथ अपनाएँ, उसे आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से जोड़ें और दुनिया के साथ संवाद की भाषा बनाएँ। हिन्दी भारत की आवाज है, भारतीय संस्कृति की संवेदना है और विश्व के साथ भारत के आत्मीय संवाद का एक सशक्त माध्यम है। जिस भाषा में करोड़ों लोगों के सपने, संवेदनाएँ और जीवन की धड़कनें व्यक्त होती हैं, उसका वैश्विक आकाश निश्चित रूप से और विस्तृत होगा। - डॉ. वन्दना सेन (लेखिका भारतीय भाषा मंच, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास की प्रान्त संयोजक हैं)
राहुल गांधी को इस्लामिक स्कॉलर का जवाब- 'भारत सनातन की भूमि, इसकी संस्कृति में मांसाहारी भोजन का स्थान नहीं'
हिंदी हमारी पहचान, हमारा स्वाभिमान: ओम बिड़ला और केंद्रीय मंत्रियों ने हिंदी दिवस पर देशवासियों को दी बधाई
कांग्रेस ने चीनी राष्ट्रपति के साथ बैठक को लेकर प्रधानमंत्री से पूछे सवाल
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बिहार : 'जदयू मतलब नीतीश कुमार’ से गरमाई बिहार की सियासत
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अगरतला, त्रिपुरा के स्टेट मेंटल हेल्थ अथॉरिटी की ओर से 19 अनधिकृत प्राइवेट रिहैबिलिटेशन सेंटरों को 'शो-कॉज नोटिस' जारी किए गए हैं।
आतंकवाद के खिलाफ भारत की बात को मिला वैश्विक समर्थन: मंत्री प्रफुल्ल पानसेरिया
सूरत, दिल्ली में आयोजित 'ब्रिक्स' शिखर सम्मेलन में पहलगाम आतंकी हमले समेत दुनिया के किसी भी हिस्से में होने वाली आतंकवादी घटनाओं और टेरर फंडिंग की निंदा को भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता माना जा रहा है।
तृणमूल के नाम और चुनाव चिह्न पर फैसले को लेकर अनिश्चितता: बंगाल उपचुनाव
कोलकाता, चुनाव आयोग की ओर से तृणमूल कांग्रेस के दो विरोधी गुटों के साथ अलग-अलग बैठकें की गईं और पार्टी के नाम व चुनाव चिह्न पर उनके दावों को सुना गया।
तृणमूल नेता शाहिदुल शेख चेन्नई से गिरफ्तार: पश्चिम बंगाल
कोलकाता, व्यवसायी पर हमले के आरोप में फरार पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के हिंगलगंज में बिशपुर पंचायत के उप प्रमुख और तृणमूल कांग्रेस नेता शाहिदुल शेख को चेन्नई से गिरफ्तार किया गया है।
ड्रैगन फ्रूट की खेती से खुली तरक्की की राह: बिहार
कटिहार, कभी खेती रीना देवी के परिवार के लिए सिर्फ पेट भरने का साधन थी। खेत में दिन-रात मेहनत करने के बाद भी हाथ में बचता कुछ नहीं था।
ए. राजा ने अपनी टिप्पणी ली वापस
चेन्नई, डीएमके सांसद ए. राजा ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के खिलाफ अपनी विवादित टिप्पणी वापस ले ली है।
केरल में बिजली संकट को लेकर सियासी जंग तेज, केएसईबी के पूर्व अध्यक्ष ने पिनाराई विजयन पर साधा निशाना
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राजस्थान निकाय चुनाव : जयपुर के वार्ड 62 में इस बूथ पर दोबारा मतदान का आदेश
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BRICS Declaration: Modi सरकार की बड़ी कामयाबी Pahalgam हमले की निंदा, Pakistan का नाम क्यों नहीं?
क्या अमेरिका, रूस और चीन के साथ मिलकर जी-3 बना सकता है? समझिए इसके पीछे की बदलती कूटनीति!
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रणनीतिक स्वायत्तता वाली कूटनीति से जहां अमेरिका, चीन, रूस तीनों बड़े देश घबराए हुए हैं, वहीं फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और ब्राजील जैसे देश इसमें ही अपना कूटनीतिक भविष्य देख रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिज्ञों का भी मानना है कि यदि भारत अपने मिशन में कामयाब हो जाता है तो इससे न केवल बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था को बल मिलेगा, बल्कि अमेरिका, रूस और चीन के हथियारों के सौदागरों के हाथ-पांव भी ठिठक जाएंगे। चूंकि समसामयिक वैश्विक परिदृश्य में अरब-खाड़ी देशों में अमेरिका-यूरोप की इज्जत दांव पर पड़ी हुई है, क्योंकि रूस-चीन का शह ईरान को हासिल है। इससे पहले यूक्रेन में रूस-चीन-उत्तर कोरिया की सैन्य साख दांव पर पड़ी हुई है, क्योंकि अमेरिका-यूरोप मिलकर यूक्रेन को भड़काए हुए हैं। वैसे तो चीन को ताइवान में और भारत को पीओके में उलझाने की साजिश पश्चिमी-पूर्वी देशों के इशारे पर रचाई गई, लेकिन भारत और चीन के सूझबूझ वाले नेतृत्व ने समय रहते ही स्थिति को संभाल लिया। इससे हथियारों के वैश्विक सौदागरों और ड्रग्स सप्लायर्स का भारत-चीन से खफा होना स्वाभाविक है। इससे होने वाले घाटे की भरपाई के लिए ही तो अमेरिका ने दोनों देशों के खिलाफ टैरिफ युद्ध छेड़ दिया। # मोदी डॉक्ट्रिन के चक्रव्यूह में हर ओर से घिरा महसूस करने लगा है अमेरिका और जब इसमें भी अमेरिका विफल हो गया और मोदी डॉक्ट्रिन के चक्रव्यूह में हर ओर से घिरा महसूस करने लगा तब उसने ग्रुप-तीन (G-3) का नया पैंतरा बदला। प्राप्त जानकारी के मुताबिक, अमेरिका के व्हाइट हाउस के जी तीन प्लान पर रूस के क्रेमलिन ने भी रजामंदी जताई है और बताया है कि पुतिन और जिनपिंग ने नवंबर में शेनजेन में होने वाले APEC सम्मेलन के दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप के साथ G3 बैठक करने पर चर्चा की है। अगर अमेरिका, रूस और चीन एक साथ बातचीत की मेज पर बैठ जाते हैं और किसी सहमति तक पहुंचते हैं, तो ये दूसरे विश्व युद्ध के बाद बने उस ‘याल्टा सिस्टम’ का अंत होगा, जिसने यूएन सुरक्षा परिषद को बनाया था। इसे भी पढ़ें: ईरान, सऊदी अरब और UAE के मतभेदों के बीच भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत, BRICS में साझा बयान पर बनी आम सहमति कहने का तात्पर्य यह कि अब अमेरिका, रूस और चीन परस्पर मिलकर दुनिया के अन्य मजबूत देशों भारत, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और ब्राजील आदि को अपने अंतर्राष्ट्रीय एजेंडे पर चलाएंगे और इनसे मुनाफा कमाएंगे। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग्लोबल साउथ की जो वैश्विक चाल चली है, उसमें भारत विरोधी महारथियों का उलझना और छटपटाना तय है। वहीं, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और ब्राजील जैसे देशों को ये त्रिपक्षीय पहल नागवार गुजरी तो फिर दुनियावी कश्मकश और दिलचस्प हो जाएगी। # वर्तमान भू-राजनीतिक तनावों और कूटनीतिक विरोध के हल की कुंजी है अमेरिका, रूस और चीन के ही पास यूं तो वर्तमान भू-राजनीतिक तनावों और कूटनीतिक विरोध के कारण अमेरिका, रूस और चीन का मिलकर 'जी-3' (G-3) बनाना वर्तमान परिदृश्य में अत्यधिक असंभावित चिंतन है। लेकिन जब मुख्य षड्यंत्रकारी राष्ट्र अमेरिका और उसके मनमौजी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंफ ही रूस-चीन युगलबंदी के समक्ष घुटने टेकते हुए ऐसा आकर्षक प्रस्ताव दे रहे हैं तो रूस-चीन दोनों के लिए भी यह आकर्षक डील होगी। चूंकि अमेरिका ने ही भारत-रूस की दोस्ती के मुकाबले चीन की तरक्की में योगदान दिया है तो चीन के लिए भी तो यह और अधिक फायदे का सौदा होगा। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि अमेरिका-रूस में तनावपूर्ण संबंध हैं, और अमेरिका ने रूस पर कई प्रतिबंध भी लगा रखे हैं। रूस-यूक्रेन संघर्ष और अन्य क्षेत्रीय मुद्दों के कारण अमेरिका और रूस के संबंध बहुत खराब हैं, ऐसे में बात कहां तक बढ़ेगी नवंबर 2006 तक इंतजार करना होगा। जहां तक अमेरिका और चीन की बात है तो दोनों देशों में रणनीतिक प्रतिस्पर्धा जारी है। अमेरिका और चीन आर्थिक और सैन्य मामलों में दुनिया के मुख्य प्रतिद्वंद्वी देश हैं। खास बात यह कि अमेरिका, रूस और चीन में विचारधारा का अंतर है। अमेरिका एक लोकतांत्रिक व्यवस्था का समर्थन करता है, जबकि रूस और चीन की शासन प्रणालियां उससे अलग हैं। ऐसे में जी-तीन की छतरी के नीचे आने के लिए तीनों देशों को भारी कीमत चुकानी होंगी और किसी सर्वमान्य निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले कई तरह के कूटनीतिक पापड़ बेलने पड़ेंगे। # दुनिया के लगभग सभी प्रगतिशील देश समझ चुके हैं अमेरिकी चतुराई देखा जाए तो पहले अमेरिका और सोवियत संघ की वैश्विक प्रतिस्पर्धा में, फिर अमेरिका और चीन की अंतर्राष्ट्रीय तनातनी में और रूस के साथ चीन के खड़े होने और भारत द्वारा भी रूस की इज्जत करने से अमेरिका बेचैन है। वहीं यूरोप भी अमेरिका की चतुराई समझ चुका है। इससे जी-7 (G-7) और नाटो जैसे उसके पुराने हथियार अब एशियाई- यूरोपीय मामलों में भोथरे साबित हो चुके है। फिर उसने जी-20 (G-20) की चाल चली लेकिन यहां भी भारत ने ग्लोबल साउथ की आवाज बुलंद कर अमेरिकी अरमानों पर पानी फेर दिया। इधर, भारत की रूसी सहभागिता, चीन की मौजूदगी, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, ईरान आदि की मौजूदगी वाले एससीओ (SCO) और ब्रिक्स (BRICS) में बढ़ती दिलचस्पी से अमेरिकी चौधराहट को एक नया खतरा उत्पन्न हो गया है। वैसे तो अमेरिकी डीप स्टेट ने भारत-चीन संबंधों को बिगाड़ने की पूरी चाल चली, लेकिन परिपक्व भारतीय कूटनीति के सामने अकसर वह लाचार दिखा। वहीं, भारत के पड़ोसी देशों को भड़काकर भी वह अपना उल्लू सीधा नहीं कर सका। यही वजह है कि भारत में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन की सफलता से पहले रूस-चीन के लिए उसने जी-तीन का नया चारा डाल दिया। # रूस के राष्ट्रपति पुतिन के पास भी अमेरिका से हाथ मिलाने की हैं कई बड़ी वजहें ऐसे में जहां रूस के राष्ट्रपति पुतिन के पास भी अमेरिका से हाथ मिलाने की अपनी बड़ी वजहें हैं। वास्तव में पुतिन की मजबूरी है कि करीब साढ़े चार साल से चल रहे यूक्रेन युद्ध में वो उलझे हुए हैं, जिसने रूस की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है और मोर्चे पर भी कोई साफ जीत नजर नहीं आ रही है। वहीं दूसरी तरफ, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग काफी मजबूत स्थिति में हैं। तभी तो वो बिश्केक, काहिरा और दिल्ली का दौरा खत्म करने के बाद सीधे व्हाइट हाउस, अमेरिका जाने की तैयारी कर रहे हैं। चूंकि शी जिनपिंग की स्थिति मजबूत है और वह हर मामले में सधी हुई चाल चलते हैं। इसलिए ट्रंप उनके मुरीद हैं। मुंह में राम, बगल में छुरी वाले अंदाज में। # भारत अपनी अर्थव्यवस्था और औद्योगिक विकास दर की रफ्तार बढ़ाकर G-3 के वैश्विक कुचक्रों का कर सकता है मुकाबला हालांकि, भारत अपनी अर्थव्यवस्था और औद्योगिक विकास दर की रफ्तार बढ़ाकर खुद को इतना मजबूत बना सकता है कि G-3 का कोई भी देश भारत को नजरअंदाज करने की स्थिति में न रहे। यानी भारत अपनी आर्थिक ताकत में इजाफा करके स्थिति को कभी भी अपने पक्ष में कर लेगा। वहीं, जिस तरह रूस और चीन ब्रिक्स का इस्तेमाल करते हुए भी अमेरिका से सीधा फायदा निकालते आए हैं, ठीक वैसे ही भारत भी सभी बड़े देशों से अपने हितों के हिसाब से सीधे रिश्ते साधकर वैश्विक मेज पर अपनी जगह मजबूत रखेगा। इसके दृष्टिगत भारत स्मार्ट और व्यवहारिक कूटनीतिक का सहारा लेगा। इसके अलावा, भारत फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और ब्राजील जैसे देशों के साथ मिलकर एक नया मजबूत मोर्चा खड़ा कर सकता है और इस प्रकार जो मिडिल पावर्स का नया फ्रंट बनेगा, उससे भारत लाभांवित होगा। दरअसल, ये वो देश हैं जो दुनिया की कमान सिर्फ तीन देशों के हाथों में सिमटे, ऐसा नहीं होने देना चाहते, इसलिए परस्पर एकजूट हैं। # अमेरिका, रूस और चीन का जी-3 (G-3) महज एक परिकल्पना, जमीनी हकीकत से दूर है यह त्रिकोणीय तालमेल यह बात दीगर है कि भू-राजनीतिक स्तर पर अमेरिका, रूस और चीन के बीच एक संभावित जी-3 (G-3) त्रिकोणीय तालमेल या महान शक्ति समझौते की जो चर्चाएँ सामने आ रही हैं, वह अभी कोई औपचारिक और स्थायी गठबंधन नहीं है। चूंकि तीनों देशों के शीर्ष नेताओं की सीधी बातचीत होगी, इसलिए अमेरिकी नेतृत्व बहुपक्षीय संगठनों के बजाय सीधे रूस और चीन के राष्ट्र प्रमुखों से व्यक्तिगत स्तर पर संपर्क साधने की नीति को प्राथमिकता पर रखता है। विश्लेषकों का भी मानना है कि दुनिया की ये तीन सबसे बड़ी महाशक्तियाँ आपस में मिलकर वैश्विक व्यवस्था के नियमों को तय करने के लिए एक त्रिकोणीय ढांचा बना सकती हैं, ताकि वैश्विक सत्ता का संतुलन बरकरार रहे। चूंकि इन तीनों देशों के पास विशाल सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक ताकत है, जिसके बल पर वे बड़े भू-राजनीतिक सौदे कर सकते हैं। यह एक प्रकार की रणनीतिक सौदेबाजी होगी, उससे ज्यादा कुछ नहीं। # रूस और चीन के पारस्परिक सहयोग से अमेरिका को टेकने पड़ेंगे घुटने चूंकि रूस और चीन अपने पारंपरिक सहयोग या ब्रिक्स (BRICS) जैसे मंचों को छोड़कर अमेरिका के पाले में पूरी तरह नहीं आ रहे हैं; बल्कि वे इन मंचों के साथ-साथ वाशिंगटन से भी सीधे संवाद की गुंजाइश तलाश रहे हैं। ताकि ब्रिक्स का अंत नहीं हो और अमेरिका से रणनीतिक लाभ भी मिलता रहे। गौर करने वाली बात यह है कि तीनों देशों के बीच बुनियादी मतभेद हैं। खासकर व्यापार, तकनीक, सुरक्षा और क्षेत्रीय आधिपत्य जैसे गंभीर मुद्दों पर तीनों देशों के हित एक-दूसरे के विपरीत हैं। इसलिए क्या जी-3 एक पक्का गठबंधन बनेगा, इसमें संदेह है। जब इसे लेकर कोई औपचारिक संधि होगी, या कोई लिखित समझौता होगा या फिर नाटो जैसा कोई नया सैन्य गुट बनेगा, तब यह समझा जाएगा कि अमेरिका, चीन और रूस अब एक दूसरे के करीब जा चुके हैं। चूंकि, यह नया राग अलापना अमेरिका की मजबूरी है, क्योंकि वह अरब-खाड़ी देशों में रूसी-चीनी चक्रव्यूह में घिर चुका है और निकलने का कोई रास्ता उसे नजर नहीं आ रहा है। वर्तमान में रूस और चीन बहुत अच्छे रणनीतिक और आर्थिक साझेदार हैं, जिन्हें अक्सर 'दोस्त' या 'जिगरी दोस्त' कहा जाता है। इस दोस्ती का मुख्य कारण भी अमेरिका विरोध है, क्योंकि दोनों देश अमेरिका और पश्चिमी देशों के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करना चाहते हैं। चीन रूस का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। रूस चीन को तेल और प्राकृतिक गैस बेचता है, जबकि चीन से उसे औद्योगिक वस्तुएं मिलती हैं। वहीं यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के दृष्टिगत रूस का चीन पर आर्थिक और राजनीतिक रूप से भरोसा और निर्भरता दोनों बढ़ी है। यद्यपि 1960 और 1970 के दशक में दोनों कम्युनिस्ट देशों के बीच वैचारिक मतभेद और सीमा विवाद भी रहे हैं, जिसे उन्होंने समझदारी पूर्वक दूर कर लिया है। इसे औपचारिक सैन्य गठबंधन नहीं कहा जाता है, बल्कि यह साझा हितों पर आधारित एक मजबूत रणनीतिक तालमेल यानी रणनीतिक साझेदारी है। # अमेरिका ने कस रखी है चीन की व्यापारिक नकेल वहीं, अमेरिका ने चीन पर विभिन्न व्यापारिक नीतियों और उत्पादों के तहत अलग-अलग दर से टैरिफ लगाए हैं, जिसमें अक्टूबर 2025 में घोषित 100% अतिरिक्त टैरिफ और पहले से चले आ रहे धारा 301 (Section 301) के शुल्क शामिल हैं। इसकी प्रमुख बातें निम्नलिखित हैं:- पहला, अतिरिक्त टैरिफ: अक्टूबर 2025 में अमेरिका ने चीन पर चीनी सामानों की डंपिंग और रेयर अर्थ मिनरल्स के विवाद के कारण 100% अतिरिक्त टैरिफ लगाने का आदेश दिया था। दूसरा, पुराने शुल्क: साल 2018 से चले आ रहे धारा 301 (Section 301) के तहत लगाए गए बुनियादी शुल्क अभी भी कई चीनी उत्पादों पर लागू हैं। तीसरा, विशेष उत्पाद: कुछ खास उत्पादों (जैसे बैटरी सामग्री) पर यह दरें 205% तक भी पहुंच चुकी हैं। चौथा, कानूनी फेरबदल: साल 2026 की शुरुआत में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने कुछ आपातकालीन टैरिफ को अमान्य भी करार दिया था, जिसके बाद दोनों देशों के बीच व्यापारिक बातचीत जारी है। # सैन्य और आर्थिक ताकत के मामले में संयुक्त राज्य अमेरिका रूस से है काफी आगे यह ठीक है कि सैन्य और आर्थिक ताकत के मामले में संयुक्त राज्य अमेरिका रूस से आगे और दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश है। जहां तक सैन्य रैंकिंग (Military Ranking) की बात है तो यह इस प्रकार है:- पहला, ग्लोबल फायरपावर रैंकिंग: रक्षा और सैन्य ताकत की सूची में अमेरिका पहले स्थान पर है और रूस दूसरे स्थान पर आता है। दूसरा, रक्षा बजट: अमेरिका का रक्षा बजट लगभग 850 बिलियन डॉलर है, जो रूस के बजट (लगभग 135 बिलियन डॉलर) से काफी अधिक है। तीसरा, अमेरिका की ताकत वायुसेना: अमेरिका के पास लगभग 13,000 विमान और 1,790 से ज्यादा फाइटर प्लेन हैं, जो इसे दुनिया की सबसे ताकतवर वायुसेना बनाते हैं। चौथा, वैश्विक पहुंच: अमेरिका के पास उन्नत तकनीक, विशाल नौसेना और दुनिया भर में फैले सैन्य ठिकाने हैं। जहां तक रूस की ताकत की बात है तो वह निम्नलिखित है:- पहला, परमाणु हथियार: परमाणु हथियारों के मामले में रूस सबसे आगे है। उसके पास करीब 6,000 परमाणु बम और खतरनाक मिसाइलें मौजूद हैं। दूसरा, जमीनी ताकत: रूस के पास जमीन पर मुकाबला करने के लिए 10,000 से अधिक टैंक और एस-400 व एस-500 जैसे उन्नत एयर डिफेंस सिस्टम हैं। निष्कर्ष यह है कि कुल मिलाकर अमेरिका अधिक शक्तिशाली और व्यापक रूप से सक्षम है, जबकि रूस के पास परमाणु और रणनीतिक रक्षा बल बहुत मजबूत हैं। इसलिए यदि तीनों देश एक साथ आएंगे तो वह मध्यम दर्जे वाले देशों के उभार में कितना बाधक बनेंगे यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। # आखिर ब्रिक्स की बैठक शुरू होने से पहले ही अमेरिका ने क्यों अलापा नया राग? राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि दिल्ली में ब्रिक्स सम्मेलन होने से ठीक पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और चीन के साथ मिलकर एक नया 'G-3' गुट बनाने की घोषणा करना, अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति की एक जबरदस्त बिसात समझी जा सकती है। क्योंकि अमेरिका अब यह मान चुका है कि बिना चीन और रूस की मदद के वह भारत पर लगाम नहीं लगा सकता है और ऐसा किए बिना वह अपना मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय अस्तित्व भी नहीं बचा पाएगा। इसलिए अब ट्रंप सीधे पुतिन और शी जिनपिंग से हाथ मिलाकर वैश्विक शक्ति प्रतिस्पर्धा को बदलना चाहते हैं। चूंकि भारत की राजधानी नई दिल्ली में आयोजित BRICS सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान जैसे वैश्विक नेता एक छत के नीचे होंगे और एग्रीकल्चर, हेल्थ सेक्टर और डिजिटल दुनिया में आपसी सहयोग बढ़ाएंगे, साथ ही बहुध्रुवीय दुनिया की वकालत करेंगे। ऐसे में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और चीन के साथ मिलकर G-3 गुट बनाने का जो ऐलान किया है, वह दुनिया के मध्यम दर्जे के उन देशों को खुली चुनौती है, जो इन तीनों देशों के अंतर्विरोध का फायदा उठाकर लाभ पीट रहे हैं। चूंकि वर्ष 2019 के बाद पहली बार चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत आ रहे हैं, इसलिए पूरी दुनिया की नजरें पीएम मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात पर टिकी हुई हैं। चूंकि दोनों देश पिछले कुछ सालों से बॉर्डर टेंशन और ट्रेड खींचतान से जूझ रहे हैं, ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि दिल्ली का ये मंच दोनों पड़ोसी देशों के बीच की कड़वाहट कम करेगा और व्यापारिक रिश्तों को फिर से पटरी पर लाएगा। इसके अलावा ईरान के नए राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान के आने से भी इस सम्मेलन की हलचल काफी बढ़ गई है। चूंकि ब्रिक्स हमेशा से खुद को अमेरिका और पश्चिमी देशों के दबदबे के खिलाफ एक बड़े विकल्प के तौर पर दिखाता आया है. लेकिन जैसे-जैसे इस संगठन का विस्तार हुआ है, इसके अंदरूनी मतभेद और गुटबाजी भी खुलकर सामने आने लगी है। इस वक्त ईरान और UAE के बीच तनातनी चल रही है। जहां ईरान चाहता है कि ब्रिक्स का ये मंच अमेरिका और इजरायल के सैन्य हमलों के खिलाफ खुलकर बोले और सख्त बयान दे, वहीं दूसरी तरफ यूएई इस विवाद में पड़ने के बजाय अपनी समुद्री सीमा और होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा को ज्यादा अहमियत दे रहा है। दोनों देशों की इसी खींचतान की वजह से मई में दिल्ली में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में कोई साझा बयान तक जारी नहीं हो सका था। चूंकि एक तरफ ब्रिक्स अपने अंदरूनी झगड़ों में उलझा हुआ है तो दूसरी तरफ वाशिंगटन, बीजिंग और मॉस्को के बीच एक नया समीकरण बन रहा है। वैसे भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हमेशा से ये मानते रहे हैं कि अगर वो पुतिन और शी जिनपिंग से सीधे बातचीत करें, तो दुनिया के बड़े-बड़े विवाद पलक झपकते ही सुलझ सकते हैं। लेकिन ट्रंप की इस पर्सनल कूटनीति से अमेरिका का अपना विदेश मंत्रालय, वहां की दूरदर्शी संसद और यूरोपीय सहयोगी देश काफी घबराए हुए हैं। वहीं, यूरोप को भय है कि ट्रंप यूक्रेन और यूरोप की सुरक्षा को दांव पर लगाकर रूस से हाथ मिला लेंगे। वहीं एशियाई देशों को चिंता है कि चीन के साथ कोई बड़ी डील करने के चक्कर में अमेरिका इस इलाके की सुरक्षा का अपना वादा कहीं तोड़ न दे। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
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BRICS Summit Delhi: Galwan पर China से सवाल पूछने की हिम्मत जुटा पाएंगे PM Modi?
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने केंद्रीय मंत्रियों से की मुलाकात
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पीएम मोदी ने भारत को गुलामी की मानसिकता से बाहर निकाला, दुनिया में नई पहचान दिलाई : सीएम योगी
पीएम मोदी ने भारत को गुलामी की मानसिकता से बाहर निकाला, दुनिया में नई पहचान दिलाई : सीएम योगी
पुस्तकें केवल ज्ञान का माध्यम नहीं, बल्कि समाज, देश और दुनिया को समझने का सशक्त जरिया: सीएम योगी
पुस्तकें केवल ज्ञान का माध्यम नहीं, बल्कि समाज, देश और दुनिया को समझने का सशक्त जरिया: सीएम योगी
पेजेश्कियान का अमेरिका-इजराइल को दो टूक संदेश, बोले- दबाव और दादागीरी के आगे नहीं झुकेगा ईरान
ईरानी राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कहा कि उनका देश अत्याचार के आगे नहीं झुकेगा। उन्होंने अमेरिका और इजराइल को निशाने पर लेते हुए कहा कि ईरान डराने-धमकाने की राजनीति स्वीकार नहीं करेगा।
'ब्रिक्स से भारत को क्या मिलेगा' चिदंबरम के इस सवाल का थरूर ने गिनाए भारत के फायदे
थरूर की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब पी. चिदंबरम ने BRICS को लेकर सवाल उठाए थे। पूर्व वित्त मंत्री ने हाल के BRICS सम्मेलनों से मिलने वाले ठोस लाभ पर सवाल करते हुए कहा था कि उन्हें पिछले दो-तीन सम्मेलनों से भारत के लिए कोई स्पष्ट फायदा नजर नहीं आया।
BRICS में Modi-Xi Jinping मुलाकात: क्या China पर भरोसा कर भारत कर रहा गलती? | India Foreign Policy

