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सीनेट पर कब्जा बरकरार रखने के लिए ट्रंप ने झोंकी ताकत, बोले- 'हमें जीतना ही होगा'

सीनेट पर कब्जा बरकरार रखने के लिए ट्रंप ने झोंकी ताकत, बोले- 'हमें जीतना ही होगा'

समाचार नामा 2 Nov 2026 7:20 am

वोटर लिस्ट में गड़बड़ी पर चुनाव आयोग सख्त, अब निलंबन के साथ दर्ज होगा आपराधिक मामला

मतदाता सूची तैयार करने में लापरवाही या जानबूझकर गड़बड़ी करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ चुनाव आयोग ने कड़ा रुख अपनाया है

देशबन्धु 1 Nov 2026 11:48 pm

पाटन को मिला नया कैंसर अस्पताल, आयुष्मान लाभार्थियों के लिए मुफ्त पीईटी स्कैन

पाटन, 1 नवंबर (आईएएनएस)। रविवार को पाटन में नए कैंसर अस्पताल के उद्घाटन के साथ, उत्तर गुजरात के निवासियों को अब कई विशेष कैंसर निदान और उपचार सेवाओं के लिए अहमदाबाद जाने की आवश्यकता नहीं होगी।

समाचार नामा 1 Nov 2026 11:40 pm

मणिपुर के मुख्यमंत्री ने सभी समुदायों के बीच एकता, शांति और सद्भाव का आह्वान किया

मणिपुर के मुख्यमंत्री ने सभी समुदायों के बीच एकता, शांति और सद्भाव का आह्वान किया

समाचार नामा 1 Nov 2026 11:33 pm

बिहार और बंगाल में 2 नवंबर को भाजपा की 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ' पदयात्रा, नितिन नवीन करेंगे नेतृत्व

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समाचार नामा 1 Nov 2026 11:31 pm

लोकतंत्र के इतिहास में एक काला अध्याय: आंध्र प्रदेश नगर निगम चुनाव पर जगन का बयान

लोकतंत्र के इतिहास में एक काला अध्याय: आंध्र प्रदेश नगर निगम चुनाव पर जगन का बयान

समाचार नामा 1 Nov 2026 11:29 pm

सपा विधायक रविदास मेहरोत्रा का भाजपा पर निशाना, 'देश में बदलाव की लहर, रामलीला रैली ऐतिहासिक रही'

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समाचार नामा 1 Nov 2026 10:39 pm

पीडीए और इंडी गठबंधन के बूते यूपी नहीं जीत पाएंगे अखिलेश यादव : ओपी राजभर

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समाचार नामा 1 Nov 2026 10:35 pm

ओडिशा के जेल महानिदेशक के खिलाफ पूर्व महिला जेलर ने यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई

ओडिशा के जेल महानिदेशक के खिलाफ पूर्व महिला जेलर ने यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई

समाचार नामा 1 Nov 2026 9:38 pm

'वोट चोरी के खिलाफ जनता सड़कों पर है', रामलीला रैली को विपक्ष ने बताया ऐतिहासिक

'वोट चोरी के खिलाफ जनता सड़कों पर है', रामलीला रैली को विपक्ष ने बताया ऐतिहासिक

समाचार नामा 1 Nov 2026 9:35 pm

दुर्गा पूजा भगदड़ के सबक, काली और जगधात्री पूजा के लिए जारी हुए नए सुरक्षा निर्देश

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समाचार नामा 1 Nov 2026 9:26 pm

'व्यापारियों को रैली की भीड़ नहीं, ग्राहकों की जरूरत है', राहुल गांधी पर भाजपा सांसद का तंज

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समाचार नामा 1 Nov 2026 7:31 pm

पंजाब को लूटा गया, 1984 के दंगों पर आज तक नहीं मांगी माफी : हरसिमरत कौर बादल

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समाचार नामा 1 Nov 2026 7:21 pm

राहुल गांधी की चेतावनी, 'वोट चोरी' के मामले में जेल जाएंगे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार

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समाचार नामा 1 Nov 2026 5:39 pm

नकारात्मक सोच इंडी गठबंधन की राजनीति का हिस्सा बन चुकी है : आलोक सिंह

नकारात्मक सोच इंडी गठबंधन की राजनीति का हिस्सा बन चुकी है : आलोक सिंह

समाचार नामा 1 Nov 2026 3:31 pm

नितिन नवीन का राहुल गांधी पर निशाना, कहा-'जनता के मत से बनी सरकार का कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता'

नितिन नवीन का राहुल गांधी पर निशाना, कहा-'जनता के मत से बनी सरकार का कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता'

समाचार नामा 1 Nov 2026 1:38 pm

रामलीला मैदान में इंडी गठबंधन की शक्ति प्रदर्शन रैली, रामलीला मैदान से लोकतंत्र बचाने का संदेश

रामलीला मैदान में इंडी गठबंधन की शक्ति प्रदर्शन रैली, रामलीला मैदान से लोकतंत्र बचाने का संदेश

समाचार नामा 1 Nov 2026 1:31 pm

'चलो दिल्ली' मार्च कांग्रेस के राजनीतिक पतन के ताबूत में आखिरी कील साबित होगा: जेपी नड्डा

'चलो दिल्ली' मार्च कांग्रेस के राजनीतिक पतन के ताबूत में आखिरी कील साबित होगा: जेपी नड्डा

समाचार नामा 1 Nov 2026 1:20 pm

सोना हजार रुपए और चांदी 13 हजार रुपए से अधिक सस्ती हुई

नई दिल्ली, सोने और चांदी में इस हफ्ते बड़ी गिरावट देखने को मिली, जिससे दोनों कीमती धातुओं का दाम क्रमश: 1,500 रुपए और 13,000 रुपए से अधिक घट गया।

देशबन्धु 1 Nov 2026 11:17 am

'आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में भूमिका निभा रहा मध्य प्रदेश', राज्य स्थापना दिवस पर पीएम मोदी ने दी शुभकामनाएं

'आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में भूमिका निभा रहा मध्य प्रदेश', राज्य स्थापना दिवस पर पीएम मोदी ने दी शुभकामनाएं

समाचार नामा 1 Nov 2026 8:19 am

रामलीला मैदान रैली के लिए दिल्ली में हाई अलर्ट, 4 हजार पुलिसकर्मी और 200 से ज्यादा CCTV तैनात

राजधानी दिल्ली के रामलीला मैदान में रविवार को होने वाली INDIA गठबंधन की प्रस्तावित रैली को लेकर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है

देशबन्धु 1 Nov 2026 7:20 am

राहुल गांधी ने दिया ज्ञानेश कुमार पर बड़े खुलासे का संकेत, बोले- वह CEC पद पर टिक नहीं पाएँगे

राहुल गांधी ने INDIA गठबंधन के मॉक संसद सत्र में कहा, 'ज्ञानेश कुमार CEC के पद पर नहीं टिक पाएंगे। खुलासे के बाद भी अगर बीजेपी उन्हें अड़ी रहती है तो हमें समझ आ जाएगा कि उनका खेल क्या है।' वहीं बीजेपी ने राहुल गांधी को 'मॉक पीएम' कहा।

सत्य हिंदी 1 Nov 2026 4:38 am

जेल से रिहाई के बाद आजम खान को ईडी ने हिरासत में लिया, वकीलों ने गिरफ्तारी पर उठाए सवाल

जेल से रिहाई के बाद आजम खान को ईडी ने हिरासत में लिया, वकीलों ने गिरफ्तारी पर उठाए सवाल

समाचार नामा 31 Oct 2026 10:35 pm

कर्नाटक: मांड्या में एआरएआई को भूमि आवंटन पर कुमारस्वामी-शिवकुमार में तीखी नोकझोंक

कर्नाटक: मांड्या में एआरएआई को भूमि आवंटन पर कुमारस्वामी-शिवकुमार में तीखी नोकझोंक

समाचार नामा 31 Oct 2026 10:32 pm

'वोट चोरी' विरोध मार्च को लेकर केटीआर का राहुल गांधी और रेवंत रेड्डी पर तंज

'वोट चोरी' विरोध मार्च को लेकर केटीआर का राहुल गांधी और रेवंत रेड्डी पर तंज

समाचार नामा 31 Oct 2026 10:06 pm

ऐतिहासिक होगी रामलीला मैदान की रैली, इन तीन मांगों को लेकर भरेंगे हुंकार: भूपेश बघेल

ऐतिहासिक होगी रामलीला मैदान की रैली, इन तीन मांगों को लेकर भरेंगे हुंकार: भूपेश बघेल

समाचार नामा 31 Oct 2026 8:31 pm

राष्ट्रीय एकता दिवस समारोह में शामिल हुए पीएम मोदी, सरदार पटेल की 151वीं जयंती पर आयोजित हुई भव्य परेड

राष्ट्रीय एकता दिवस समारोह में शामिल हुए पीएम मोदी, सरदार पटेल की 151वीं जयंती पर आयोजित हुई भव्य परेड

समाचार नामा 31 Oct 2026 6:37 pm

'रन फॉर यूनिटी': जोशी ने सरदार पटेल की विरासत को लेकर कांग्रेस पर निशाना साधा

'रन फॉर यूनिटी': जोशी ने सरदार पटेल की विरासत को लेकर कांग्रेस पर निशाना साधा

समाचार नामा 31 Oct 2026 6:27 pm

'मॉक पार्लियामेंट' को संजय निरुपम ने बताया नौटंकी, इंडिया ब्लॉक बोला-लोकतंत्र बचाने की लड़ाई

'मॉक पार्लियामेंट' को संजय निरुपम ने बताया नौटंकी, इंडिया ब्लॉक बोला-लोकतंत्र बचाने की लड़ाई

समाचार नामा 31 Oct 2026 6:23 pm

Bhutan की पहाड़ियों से उठी जलप्रलय की आहट, आपदा से निबटने के लिए India कितना तैयार है?

हिमालय की बर्फीली चोटियों से उठी एक प्राकृतिक हलचल ने भारत के पूर्वोत्तर और उत्तर बंगाल की चिंता बढ़ा दी है। भूटान की शिंताफू ग्लेशियर झील के फटने से निकला पानी नदियों के रास्ते भारत की ओर बढ़ा। प्रशासन ने अलर्ट जारी किया, गांव खाली कराए गए और बचाव एजेंसियों को मोर्चे पर लगाया गया। फिलहाल पानी का स्तर घटने के संकेत हैं, लेकिन एक नई अस्थायी झील बनने से खतरे का एक और पहलू सामने आ गया है। दरअसल, हिमालय की ऊंची चोटियों पर जमा बर्फ जब टूटती है, तो उसका असर केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रहता। कई बार हजारों फीट नीचे बसे गांवों, कस्बों और शहरों की जिंदगी भी इसकी चपेट में आ जाती है। भूटान में 29 अक्टूबर 2026 को हुई ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) की घटना ने एक बार फिर इसी खतरे की गंभीरता को सामने ला दिया है। इसे भी पढ़ें: Bhutan में हिमनद झील टूटने के बाद Alipurduar में 12 हजार लोग सुरक्षित निकाले गए हम आपको बता दें कि भूटान के गासा जिले के लेमथांग क्षेत्र में स्थित शिंताफू झील के बांधनुमा प्राकृतिक अवरोध के टूटने से भारी मात्रा में पानी बाहर निकला। इस घटना के बाद पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार, कूचबिहार और असम के धुबरी तथा कोकराझार जिलों में बाढ़ की आशंका को देखते हुए प्रशासन को सतर्क कर दिया गया। केंद्रीय जल आयोग (CWC) ने भी संभावित जलस्तर वृद्धि को लेकर विशेष बाढ़ परामर्श जारी किया। 6 से 7 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी का खतरा अंतरराष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र (ICIMOD) के अनुसार, घटना से पहले शिंताफू झील में लगभग 60 से 70 लाख घन मीटर पानी मौजूद था। यह करीब 2,400 से 2,800 ओलंपिक आकार के स्विमिंग पूल के बराबर है। हालांकि, वास्तव में कितना पानी बाहर निकला, इसका आकलन अभी किया जा रहा है। इस पानी का प्रवाह भूटान की मो छू नदी और आगे पुनात्सांगछू नदी तंत्र से होते हुए भारत में संकोश नदी की ओर बढ़ा। भारत में संकोश नदी पश्चिम बंगाल और असम के सीमावर्ती इलाकों के लिए महत्वपूर्ण है। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार, पानी को सीमा तक पहुंचने में लगभग छह से आठ घंटे लगने की आशंका जताई गई थी। यही वजह रही कि प्रशासन ने संभावित खतरे को गंभीरता से लेते हुए पहले ही सतर्कता बढ़ा दी। हजारों लोगों का पलायन, NDRF-SDRF तैनात उधर, पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार जिले में प्रशासन ने एहतियात के तौर पर लगभग 6,000 से 7,000 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया। इनमें नदी किनारे और संवेदनशील इलाकों में रहने वाले परिवार शामिल थे। राहत शिविरों में चार हजार से अधिक लोगों के लिए भोजन, राशन, बच्चों के लिए जरूरी खाद्य सामग्री और दूसरी सुविधाओं की व्यवस्था की गई। जलपाईगुड़ी और कूचबिहार में भी निगरानी बढ़ाई गई। प्रशासन ने लाउडस्पीकर के माध्यम से लोगों को नदी किनारों और निचले इलाकों से दूर रहने की चेतावनी दी। NDRF, SDRF और नागरिक सुरक्षा की टीमें तैनात की गईं। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने धुबरी और कोकराझार के संवेदनशील राजस्व क्षेत्रों में स्थिति पर नजर रखने के निर्देश दिए। उन्होंने संबंधित अधिकारियों और NDRF के साथ लगातार संपर्क बनाए रखने तथा लोगों से सरकारी निर्देशों का पालन करने की अपील की। खतरा टला या अभी बाकी है बड़ा जोखिम? ताजा रिपोर्टों के मुताबिक संकोश नदी का जलस्तर घटने लगा है। कोकराझार के जिला प्रशासन ने भी तत्काल बड़े पैमाने पर जलभराव की आशंका कम होने की बात कही है। पश्चिम बंगाल में फिलहाल बड़े नुकसान या जनहानि की सूचना नहीं है। लेकिन इस पूरी घटना में सबसे चिंताजनक तथ्य एक नई अस्थायी झील का निर्माण है। भूटान के राष्ट्रीय जल विज्ञान एवं मौसम विज्ञान केंद्र (NCHM) के अनुसार, पानी और मलबे के बहाव से टाक्त्सेमाखांग में एक नई झील बन गई है। यह सिंताफू छू और लुंगू छू नदियों के संगम के पास स्थित है। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी अस्थायी झीलें दोबारा बाढ़ का कारण बन सकती हैं। तेज बहाव अपने साथ चट्टानें और मलबा लाता है, जिससे नदी का रास्ता अवरुद्ध हो सकता है। यदि पानी का दबाव बढ़कर इस प्राकृतिक अवरोध को तोड़ता है, तो दूसरी बाढ़ पैदा हो सकती है। इसलिए भूटान में मो छू और पुनात्सांगछू नदी घाटियों के आसपास रहने वाले लोगों को भी सतर्क रहने की सलाह दी गई है। यहां सवाल उठता है कि आखिर क्यों फट रही हैं हिमालय की ग्लेशियर झीलें? देखा जाये तो इसका सबसे बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन और तेजी से पिघलते ग्लेशियरों को माना जाता है। ग्लेशियरों के पीछे हटने से उनके आसपास बड़ी-बड़ी झीलें बनती हैं। इनमें पानी अक्सर बर्फ, चट्टानों और हिमनदों से निकले मलबे के प्राकृतिक बांधों के पीछे जमा होता है। भारी बारिश, हिमस्खलन, चट्टानों का झील में गिरना, भूकंप और प्राकृतिक बांधों का कमजोर होना अचानक पानी के बाहर निकलने का कारण बन सकते हैं। इसी घटना को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF कहते हैं। यह सामान्य बाढ़ से अधिक खतरनाक हो सकती है, क्योंकि इसमें पानी के साथ भारी मात्रा में पत्थर, मिट्टी और मलबा भी तेजी से नीचे आता है। भारत की तैयारी पर उठते बड़े सवाल देखा जाये तो भूटान की यह घटना भारत के लिए केवल एक स्थानीय बाढ़ का मामला नहीं है। यह हिमालयी राज्यों की आपदा प्रबंधन व्यवस्था की भी परीक्षा है। भारत सरकार ने सितंबर 2026 में हिमालयी राज्यों की GLOF और हिमस्खलन संबंधी तैयारियों की समीक्षा की थी। इसमें शुरुआती चेतावनी प्रणाली, संवेदनशील झीलों की निगरानी, जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान और समय पर लोगों को सुरक्षित निकालने पर जोर दिया गया था। लेकिन अब कुछ सवालों के जवाब तलाशना जरूरी है। सवाल उठता है कि क्या भूटान और भारत के बीच ग्लेशियर झीलों के जलस्तर की वास्तविक समय में जानकारी साझा करने की व्यवस्था पर्याप्त है? क्या असम, अरुणाचल प्रदेश और उत्तर बंगाल के सभी संवेदनशील नदी तटीय गांवों तक समय रहते चेतावनी पहुंचाने का तंत्र मौजूद है? क्या नदियों पर बने बांधों और जलविद्युत परियोजनाओं की GLOF जैसी अचानक आने वाली बाढ़ से निपटने की क्षमता का नियमित परीक्षण हो रहा है? क्या प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षित आश्रय स्थल, निकासी मार्ग और प्रशिक्षित बचाव दल पर्याप्त संख्या में उपलब्ध हैं? क्या नई अस्थायी झील की लगातार निगरानी और उसके संभावित टूटने की स्थिति में दूसरी चेतावनी जारी करने की व्यवस्था तैयार है? बहरहाल, सबसे बड़ी जरूरत सीमा पार समन्वय, वैज्ञानिक निगरानी और जमीनी स्तर पर तैयारी की है। भूटान में हुई घटना ने स्पष्ट कर दिया है कि हिमालय की चोटियों पर पैदा होने वाला खतरा किसी अंतरराष्ट्रीय सीमा को नहीं पहचानता। आज पानी का स्तर घट रहा है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के दौर में ऐसी घटनाएं भविष्य में और गंभीर हो सकती हैं। इसलिए प्रशासन के लिए असली चुनौती बाढ़ आने के बाद राहत पहुंचाना नहीं, बल्कि बाढ़ आने से पहले हर संभावित खतरे को पहचानकर लोगों की जिंदगी बचाना है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 31 Oct 2026 5:57 pm

भोपाल में सरदार पटेल की जयंती पर कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने किया रक्तदान

भोपाल में सरदार पटेल की जयंती पर कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने किया रक्तदान

समाचार नामा 31 Oct 2026 4:30 pm

नितिन नवीन जाएंगे हरियाणा, रोहतक में 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ' पदयात्रा में होंगे शामिल

नितिन नवीन जाएंगे हरियाणा, रोहतक में 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ' पदयात्रा में होंगे शामिल

समाचार नामा 31 Oct 2026 2:26 pm

अरुणाचल प्रदेश: भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेष तवांग पहुंचे, केंद्रीय मंत्री शेखावत बोले-पवित्र अवशेष के दर्शन का मिला सौभाग्य

अरुणाचल प्रदेश: भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेष तवांग पहुंचे, केंद्रीय मंत्री शेखावत बोले-पवित्र अवशेष के दर्शन का मिला सौभाग्य

समाचार नामा 31 Oct 2026 2:15 pm

धनतेरस : सोना या चांदी? छोटे निवेशकों के लिए क्या है बेहतर विकल्प

नई दिल्ली, रोशनी का पर्व 'दीपावली' बस आने वाला ही है। इसकी शुरुआत धनतेरस से होती है, जो 6 नवंबर को पड़ रहा है। इस दिन लोग सोना और चांदी समेत कई कीमती धातुएं खरीदते हैं।

देशबन्धु 31 Oct 2026 12:54 pm

भाजपा के रणनीतिकारों के सामने कई सवाल छोड़ गया एमएलसी चुनाव!

देश के चार राज्यों (उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक) की 28 विधान परिषद (एमएलसी) सीटों पर चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं, सभी राजनीतिक दल व विश्लेषक परिणामों का अध्ययन करके उसके अपने-अपने लाभ-हानि के हिसाब से मायने निकाल रहे हैं। लेकिन इस बार का यह चुनाव कई ऐसे सवाल छोड़ गया है जिनका जवाब राजनीतिक दलों के रणनीतिकारों के साथ विशेषकर उत्तर प्रदेश के संदर्भ में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को जल्द से जल्द तलाश ना होगा। क्योंकि भाजपा को अन्य दलों से अलग मानते हुए किसी व्यक्ति या परिवार की जागीर की जगह संगठन को सर्वोपरि मानने वाला राजनीतिक दल माना जाता है और वैसे भी अंदरूनी गुटबाजी से दूर अनुशासन वाली पार्टी मानने का दावा भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के द्वारा हमेशा सार्वजनिक रूप भी किया जाता है। लेकिन एमएलसी के चुनावों के परिणामों पर गौर करें तो उत्तर प्रदेश की हॉट सीट वाराणसी, लखनऊ व महाराष्ट्र में नागपुर जैसी हाईप्रोफाइल सीट पर हारने के पीछे भाजपा के कुछ राजनेताओं की अति महत्वाकांक्षा व अनुशासन का तार-तार होना बहुत बड़ी वज़ह माना जा रहा है। पहले पार्टी के अधिकांश राजनेता व कार्यकर्ता निस्वार्थ भाव से कार्य करते हुए धरातल पर नज़र आते थे, लेकिन लंबे समय से सत्ता का सुख लगातार भोगने के कारण अब पार्टी के कुछ राजनेताओं का अहंकार अपने चरम पर है और वह सत्ता के मद में चूर होकर के जनता को ठेंगा दिखाकर चिढ़ाते हुए पार्टी के केंद्रीय व प्रदेश नेतृत्व तक के भी दिशा-निर्देशों की आये दिन अनदेखी करने का कार्य कर रहे हैं। जबकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व गृहमंत्री अमित शाह के दौर की भारतीय जनता पार्टी की पहचान एक ऐसे राजनीतिक दल के रूप में होती है, जिसके कार्यकर्ता व नेता किसी भी स्तर के चुनाव को हल्के में नहीं लेते हैं। लेकिन जिस तरह से उत्तर प्रदेश के एमएलसी चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन रहा है, उसने तो पार्टी के रणनीतिकारों को जीती हुई व हारी हुई सभी ही सीटों के परिणाम पर विस्तार से विश्लेषण करने के लिए सोचने पर मजबूर कर ही दिया है। क्योंकि उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 में विधानसभा चुनाव हैं, पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को योगी सरकार के कार्यों के दम पर चुनावों में जीत की हैट्रिक लगाने की पूरी उम्मीद है। जिस वक्त में यूपी के विधानसभा चुनाव सर पर हैं उस वक्त में पार्टी के शीर्ष रणनीतिकार एमएलसी चुनावों में हर सीट पर भाजपा प्रत्याशी की जीत का अंतर बढ़ाकर के विपक्षी दलों के जनता की अदालत से पैर उखाड़कर के भाजपा के पक्ष में माहौल बनाना चाहते थे। लेकिन सूत्रों के अनुसार लगातार मीटिंग व ईटिंग के बाद भी कुछ भाजपा नेताओं की ही चीटिंग के चलते भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का यह दांव जन अदालत में उल्टा हो गया है, जिसका खामियाजा भारतीय जनता पार्टी को एमएलसी चुनावों की रणभूमि में कुछ सीटों पर हार के रूप में उठाना पड़ा है। इसे भी पढ़ें: विधान परिषद- छोटा चुनाव बड़े सबक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सीट वाराणसी, रक्षामंत्री राजनाथ सिंह की सीट लखनऊ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गढ़ नागपुर के एमएलसी सीटों के इन चुनाव परिणामों के बाद अब पार्टी में ही संगठन की रणनीति और प्रत्याशी चयन पर सवाल उठाने की गुपचुप सुगबुगाहट शुरू हो गई है। वहीं कुछ राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो हाईप्रोफाइल सीटों के साथ-साथ बाकी सीटों पर भी जीत का अंतर भाजपा के कुछ अपने ही लोगों का भीतरघात, दावेदारों व अन्य जिम्मेदार लोगों के द्वारा सही ढंग से वोट नहीं बनवाने, प्रत्याशी चयन पर सवाल, संगठन के द्वारा बनाई गई जीत की रणनीति और कुछ अपनों के ही द्वारा चुनाव में की गयी चीटिंग की चीख-चीखकर के स्वयं ही पोल खोलने का कार्य रही है। ऐसी स्थिति में विचारणीय तथ्य यह है कि उत्तर प्रदेश में आगामी वर्ष 2027 में विधानसभा के चुनाव हैं, भाजपा के केंद्रीय व प्रदेश नेतृत्व आये दिन चुनावी रणभूमि के लिए सटीक कारगर रणनीति बनाने के लिए छोटी व बड़ी मीटिंग करते रहते हैं और इन मीटिंग में केंद्रीय व प्रदेश स्तर के नेताओं से लेकर के भाजपा के मंडल स्तर के नेताओं व कार्यकर्ताओं तक की भी मौजूदगी समय-समय पर रहती है, मीटिंग में पार्टी के नेताओं के द्वारा चुनावी रणभूमि के लिए एक चाक-चौबंद रणनीति बनायी जाती है। लेकिन सूत्रों के अनुसार पार्टी में अब एक ऐसा लंबा-चौड़ा धड़ा तैयार हो गया है जो मीटिंग के बाद में ईटिंग कर निकलने के बाद से ही गुटबाजी व अपनी महत्वाकांक्षाओं के चलते संगठन सर्वोपरि के भाव का त्याग करके चीटिंग करने में लग जाता है। इसका ताजा उदाहरण हाल ही में सम्पन्न हुए उत्तर प्रदेश के 11 एमएलसी सीटों के चुनाव भी हैं, इन 11 सीटों में भाजपा 6 सीटें और समाजवादी पार्टी 5 सीटें जीती है। लेकिन सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि हार के साथ-साथ कुछ सीटों पर तो जैसे-तैसे ही भारतीय जनता पार्टी को जीत मिली है। हालांकि चुनाव परिणामों में दस सीटों पर सिटिंग एमएलसी ही दोबारा चुन लिए गए हैं। केवल लखनऊ स्नातक सीट पर ही बड़ा उलटफेर हुआ है, यहां भाजपा के मौजूदा एमएलसी अवनीश कुमार सिंह को सपा की कांति सिंह ने हरा दिया है। वैसे देखें तो वर्ष 2020 में इन सभी 11 सीटों के चुनाव में भाजपा ने छह, समाजवादी पार्टी ने तीन और निर्दलीय उम्मीदवारों ने दो सीटों पर जीत हासिल की थी, वहीं इस बार भाजपा की सीटें तो छह ही रह गई, लेकिन सपा की सीट तीन से बढ़कर के पांच सीट हो गई हैं। चुनावों के यह परिणाम उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा में अंदरुनी गुटबाजी और भविष्य में चुनावी रणभूमि में कांटे की टक्कर होने का संकेत दे रहे हैं। जो स्थिति उत्तर प्रदेश में हैट्रिक लगाने का सपना देख रही भाजपा हाईकमान के लिए एक गहन आत्ममंथन का विषय है। हालांकि उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के चुनावी तरकश में हैट्रिक लगाने के लिए जन अदालत में बताने के लिए कानून व्यवस्था में लेकर के बहुत सारे सरकार के शानदार कार्य हैं, लेकिन इन कार्यों पर पार्टी के कुछ शीर्ष राजनेताओं की अंदरूनी खींचतान, जबरदस्त आपसी गुटबाजी व महत्वकांक्षाएं भारी ना पड़े, इसके लिए समय रहते ही भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को ठोस व प्रभावी उपाय धरातल पर करने होंगे। - दीपक कुमार त्यागी अधिवक्ता, स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 31 Oct 2026 12:30 pm

इंदिरा गांधी की 42वीं पुण्यतिथि पर कांग्रेस नेताओं ने दी श्रद्धांजलि, देश की 'आयरन लेडी' बताया

इंदिरा गांधी की 42वीं पुण्यतिथि पर कांग्रेस नेताओं ने दी श्रद्धांजलि, देश की 'आयरन लेडी' बताया

समाचार नामा 31 Oct 2026 12:26 pm

China को लगे 40 साल, Modi ने 12 साल में कर दिखाया! बचपन में गरीबी को झेलने वाले PM ने 49.6 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर उठाया

बचपन में घोर गरीबी को बेहद करीब से देखने वाले और जीवनयापन के लिए रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने वाले नरेंद्र मोदी ने जब देश के प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी संभाली, तो उनके सामने भारत की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक थी गरीबी। करोड़ों लोगों के पास न पक्का मकान था, न बैंक खाता, न शौचालय, न रसोई गैस और न ही बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी ने गरीबों को सरकारी योजनाओं के केंद्र में रखते हुए गरीबी के अभिशाप से देश को बाहर निकालने का अभियान शुरू किया। अब इस अभियान के सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं जिसे अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी मान रही हैं। उल्लेखनीय है कि विश्व बैंक की अक्टूबर 2026 की ताजा रिपोर्ट भारत की इसी परिवर्तनकारी यात्रा पर वैश्विक मुहर लगा रही है। विश्व बैंक की रिपोर्ट: 49.6 करोड़ लोगों की जिंदगी में बदलाव विश्व बैंक की Poverty and Equity Brief, October 2026 के मुताबिक, भारत ने 2011 से 2023 के बीच अनुमानित 49.6 करोड़ लोगों को 4.20 डॉलर प्रतिदिन वाली निम्न-मध्यम आय वर्ग की गरीबी रेखा से ऊपर उठाया। इस अवधि में इस श्रेणी में आने वाली आबादी का अनुपात 57.7 प्रतिशत से घटकर 16.1 प्रतिशत रह गया। इससे भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अत्यंत गरीबी में रहने वाली आबादी का अनुपात 2011 के 27.1 प्रतिशत से घटकर 2023 में महज 2.6 प्रतिशत रह गया। विश्व बैंक ने भारत की इस प्रगति को दुनिया में गरीबी घटने की सबसे तेज प्रक्रियाओं में से एक बताया है। रिपोर्ट के अनुसार, मजबूत घरेलू उपभोग, रोजगार में वृद्धि, विशेषकर महिलाओं की बढ़ती रोजगार भागीदारी और खाद्य सब्सिडी सहित सामाजिक सुरक्षा योजनाओं ने इस बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसे भी पढ़ें: World Bank Report 2026 | भारत में अत्यधिक गरीबी घटकर 2.6% पर आई! विश्व बैंक की रिपोर्ट में ऐतिहासिक गिरावट और आय असमानता की चुनौती गरीबी के खिलाफ मोदी सरकार की रणनीति देखा जाये तो प्रधानमंत्री मोदी की आर्थिक नीतियों का एक महत्वपूर्ण आधार रहा है कि गरीबों को केवल आर्थिक सहायता देने के बजाय उन्हें बुनियादी सुविधाओं और वित्तीय व्यवस्था से जोड़ा जाए। जनधन योजना के जरिए करोड़ों बैंक खाते खुले। आधार और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर ने सरकारी सहायता सीधे लाभार्थियों तक पहुंचाने का रास्ता मजबूत किया। उज्ज्वला योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, आयुष्मान भारत, स्वच्छ भारत मिशन और जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं ने गरीब परिवारों के जीवन स्तर को प्रभावित किया। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के माध्यम से करोड़ों परिवारों को खाद्य सुरक्षा मिली। इसके साथ ही मुद्रा योजना, स्टार्टअप इंडिया, मेक इन इंडिया और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाओं के जरिए रोजगार, उद्यमिता और विनिर्माण क्षेत्र को प्रोत्साहित करने का प्रयास हुआ। वैश्विक संकट में भी भारत की आर्थिक मजबूती साथ ही कोरोना महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध, ऊर्जा संकट, महंगाई और वैश्विक व्यापारिक तनाव के बीच भारत ने अपनी आर्थिक विकास गति बनाए रखने की कोशिश की है। बुनियादी ढांचे पर सरकारी निवेश, डिजिटल अर्थव्यवस्था, घरेलू उपभोग और मजबूत बैंकिंग व्यवस्था ने अर्थव्यवस्था को सहारा दिया। भारत की डिजिटल भुगतान व्यवस्था और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण की क्षमता ने सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के क्रियान्वयन को भी अधिक प्रभावी बनाया है। क्या दुनिया में किसी नेता ने इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल की है? यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या दुनिया के किसी दूसरे नेता ने नरेंद्र मोदी जैसी आर्थिक उपलब्धि इतने कम समय में हासिल की है? तुलनात्मक रूप से देखें तो चीन ने 1978 के बाद लगभग चार दशकों में करीब 77 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकालने का ऐतिहासिक दावा किया था। वहीं भारत ने विश्व बैंक के अक्टूबर 2026 के आंकड़ों के अनुसार, 2011 से 2023 के बीच महज 12 वर्षों में 49.6 करोड़ लोगों को 4.20 डॉलर प्रतिदिन वाली निम्न-मध्यम आय वर्ग की गरीबी रेखा से ऊपर पहुंचाया। अत्यंत गरीबी का अनुपात भी इसी अवधि में 27.1 प्रतिशत से घटकर 2.6 प्रतिशत रह गया। चीन की चार दशक लंबी यात्रा के मुकाबले भारत की 12 वर्षों की यह उपलब्धि अपने आप में असाधारण है। इस उपलब्धि का राजनीतिक और नीतिगत महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि इस अवधि के अधिकांश वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीते हैं। 2014 में सत्ता संभालने के बाद मोदी सरकार ने गरीबों के बैंक खाते खोलने, सीधे आर्थिक सहायता पहुंचाने, मुफ्त राशन, आवास, रसोई गैस, स्वास्थ्य बीमा, स्वच्छता और ग्रामीण बुनियादी सुविधाओं के विस्तार को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया। जनधन-आधार-डीबीटी की व्यवस्था से लेकर गरीब कल्याण योजनाओं तक, इन नीतिगत पहलों ने गरीबी के खिलाफ अभियान को व्यापक आधार दिया। इसलिए 2014 के बाद लागू और विस्तारित इन नीतियों को इस ऐतिहासिक बदलाव का एक महत्वपूर्ण नीतिगत श्रेय निश्चित रूप से दिया जाना चाहिए। अभी बाकी है आर्थिक लड़ाई साथ ही विश्व बैंक ने रोजगार की गुणवत्ता, युवाओं की बेरोजगारी और क्षेत्रीय असमानता को लेकर भी चिंता जताई है। देश की लगभग 57 प्रतिशत गरीब आबादी उत्तर प्रदेश से पश्चिम बंगाल तक फैले राज्यों के एक क्षेत्र में केंद्रित है। 2017 से 2023 के बीच रोजगार में लगभग 13.4 करोड़ की वृद्धि हुई, जिसमें ग्रामीण महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का महत्वपूर्ण योगदान रहा। लेकिन युवाओं के लिए बेहतर और उत्पादक रोजगार उपलब्ध कराना अभी बड़ी चुनौती है। विश्व बैंक के अनुमान के मुताबिक, 4.20 डॉलर वाली गरीबी रेखा पर गरीबी की दर 2026 के 14.2 प्रतिशत से घटकर 2028 तक 12.1 प्रतिशत हो सकती है। बहरहाल, भारत की यह यात्रा केवल आंकड़ों की कहानी नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों के जीवन में आए बदलाव की कहानी है। रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने से लेकर देश के प्रधानमंत्री बनने तक का सफर तय करने वाले नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में गरीबी के खिलाफ चलाए गए अभियान ने महत्वपूर्ण परिणाम दिए हैं। अब चुनौती इस उपलब्धि को स्थायी आर्थिक समृद्धि में बदलने की है, ताकि गरीबी से बाहर आए परिवार दोबारा अभाव के अंधेरे में न लौटें और भारत विकसित राष्ट्र बनने के अपने लक्ष्य की ओर मजबूती से बढ़ सके। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 31 Oct 2026 12:22 pm

BREAKING: सरकारी नौकरियों में भर्ती की उम्र सीमा 5 साल बढ़ी, 30 अक्टूबर से लागू होगा नया नियम

BREAKING: सरकारी नौकरियों में भर्ती की उम्र सीमा 5 साल बढ़ी, 30 अक्टूबर से लागू होगा नया नियम

समाचार नामा 31 Oct 2026 8:29 am

प्रधानमंत्री मोदी ने नए नेविगेशन उपग्रह एनवीएस-03 की सफल लॉन्चिंग पर इसरो के वैज्ञानिकों को दी बधाई

नई दिल्ली, 31 अक्टूबर (आईएएनएस)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नए नेविगेशन उपग्रह एनवीएस-03 की सफल लॉन्चिंग पर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को बधाई दी है। उन्होंने कहा कि यह मिशन भारत की स्वदेशी सैटेलाइट नेविगेशन प्रणाली 'नाविक' को और मजबूत बनाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम है।

समाचार नामा 31 Oct 2026 7:43 am

1 नवंबर की कांग्रेस रैली पर विवाद, भाजपा बोली- सिख समुदाय की भावनाओं को पहुंची ठेस

1 नवंबर की कांग्रेस रैली पर विवाद, भाजपा बोली- सिख समुदाय की भावनाओं को पहुंची ठेस

समाचार नामा 30 Oct 2026 10:29 pm

विधान परिषद- छोटा चुनाव बड़े सबक

उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक की 28 विधान परिषद सीटों के चुनाव संपन्न हो चुके हैं। सर्वाधिक 11 सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश का चुनाव परिणाम आ चुका है जो भाजपा तथा सपा के बीच 6-5 के परिणाम से समाप्त हुआ। यह था तो छोटा चुनाव किंतु इस पर सभी राजनैतिक विश्लेषकों की दृष्टि थी कि 2027 विधानसभा चुनाव के पहले कौन क्लीन स्वीप करता है किंतु शिक्षकों व स्नातकों ने स्पष्ट संदेश दे दिया है कि आगामी चुनाव किसी भी दल या गठबंधन के लिए बहुत आसान नहीं होंगे। मुकाबला कांटे का होगा। जिस दल के प्रत्याशी व कार्यकर्ता धरातल पर उतर कर अपने मतदाताओं के साथ गहन संपर्क व संवाद में रहेंगे उन्हीं को लाभ होगा। विधान परिषद चुनावों में भाजपा मात्र छह सीटों पर पर अपनी साख बचाने में सफल रही जबकि समाजवादी पार्टी अपने पीडीए के बल पर पांच सीटें जीतने में सफल रही और यही नहीं उसने वाराणसी, आगरा व लखनऊ में बीजेपी के गढ़ों में परचम फहराकर भाजपा के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दीं। अब सपा में उत्साह का वातावरण है। उसके नेता व प्रवक्ता कह रहे हैं कि वर्ष 2024 में अयोध्या में भगवान राम का आशीर्वाद उन्हें प्राप्त हुआ और अब 2026 में काशी की नगरी में महादेव और लखनऊ में प्रभु श्रीराम के अनुज लक्ष्मणजी का भी आशीर्वाद मिल चुका है। सफलता से उत्साहित समाजवादी पार्टी अब इसी नैरेटिव को आगे बढ़ाएगी। इसे भी पढ़ें: चार राज्यों के विधान परिषद चुनावों के मिले-जुले परिणामों के महत्वपूर्ण सियासी संदेश भारतीय जनता पार्टी के लिए अत्यंत सतर्क हो जाने का समय आ गया है। यदि वर्ष 2024 में लोकसभा चुनाव के दौरान प्रदेश के मतदाताओं ने जो रवैया दिखाया था और सपा -कांग्रेस गठबंधन ने प्रदेश में लोकसभा की सर्वाधिक सीटें जीत ली थीं अगर वही रुख अभी भी बरकार है तब यह परिस्थितियों को और भी कठिन बना सकता है। भारतीय जनता पार्टी को सबसे बड़ा झटका रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के संसदीय क्षेत्र लखनऊ की स्नातक सीट पर लगा है। यहाँ पार्टी के प्रत्याशी इंजीनियर अवनीश सिंह को सपा प्रत्याशी कांति सिंह ने बहुत आसानी से पराजित कर दिया। यह स्पष्ट संकेत है कि अगर भाजपा ने अपना चुनावी प्रबंधन और कार्यकर्ताओं व मतदाताओं के मध्य अपना संवाद, संपर्क, व्यवहार नहीं सुधारा तो फिरऔर भी नुकसान उठाना पड़ सकता है। वाराणसी का परिणम भी स्थिति को गंभीर बना रहा है। प्रदेश के संगठन पर सवालिया निशान भी उठ रहे हैं। वाराणसी का जनमानस प्रश्न कर रहा है कि जो उम्मीदवार पिछले चुनावों में पराजित हो चुका था, जनता के मध्य कभी नहीं रहता, केवल चुनावो के छह महीने पूर्व गणेश परिक्रमा करके पार्टी का टिकट कैसे लेकर आ जाता है? ऐसी परिस्थितियों में उन कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरता है जो धरातल पर उतरकर पार्टी के लिए कड़ी मेहनत कर रहे होते हैं। वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में जितना विकास हुआ है उतनी किसी ने कल्पना भी नहीं करी थी फिर भी वहां भाजपा के वोट प्रतिशत में लगातार गिरावट और विधान परिषद की दोनों सीटों पर हार भाजपा के लिए चिंता का विषय है। काशी विश्वनाथ मंदिर का भव्य कारिडोर बना, जिससे पर्यटकों की संख्या में भारी वृद्धि हुई, रोप-वे बन रहा है, वाराणसी को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम मिलने जा रहा है, रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर क्रियाशील है, काशी को सांस्कृतिक-आध्यात्मिक गतिविधियों पूरे भारत से से जोड़ा जा रहा है, निवेशक आ रहे हैं, काशी -तमिल संगमम का आयोजन किया जा रहा है। इस सबके बाद भी वाराणसी में एमएलसी चुनावों में दोनों सीटों पर पराजय स्थानीय नेतृत्व पर सवाल खड़े कर रही है। वाराणसी की पराजय से यह बात भी उठ रही है कि वाराणसी नगर भाजपा में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। भाजपा के लिए अच्छी बात ये है कि विधानसभा चुनावों के पूर्व एक लिटमस टेस्ट हो गया। अभी भी भाजपा के पास कार्यकर्ताओं में उत्साह जागरण तथा अपनी रणनीति नए सिरे से गढ़ने के लिए पर्याप्त समय है। प्रदेश भाजपा की नवगठित कर्यकारिणी की बैठक होने जा रही है जिसमें हर बिंदु पर चर्चा होगी। यहाँ अमित शाह जी की अध्यक्षता में कडे़ कदम भी उठाए जा सकते हैं। दीपावली के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियां तथा भाजपा का चुनाव अभियान प्रारंभ होगा। भाजपा के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि जनमानस तो योगी-योगी कर रहा है किंतु कार्यकर्ताओं में उत्साह नहीं है। भाजपा के लिए अपने कार्यकर्ताओं में उत्साह जगाने का समय है क्योंकि विभिन्न कारणों से उणमें धरातल पर उत्साह नहीं दिखाई दे रहा है। अगर बीजेपी का कार्यकर्ता उत्साहित हो गया और घरों से निकल पड़ा तो फिर भाजपा आसानी से तीन सौ पार जा सकती है। भाजपा अपने कार्यकर्ताओं की नाराजगी जितनी जल्दी जितना कम कर लेगी, टिकट वितरण सही होगा, योगी आदित्यनाथ सरकार चुनावों से पूर्व एक लाख नौकरी देने का वादा सफलतापूर्वक पूरा कर लेगी और साथ ही अगर 69,000 शिक्षकों की भर्ती का मामला सुप्रीम कोर्ट से सुलझ जाएगा तो विधानसभा चुनाव भाजपा के नियंत्रण में आ जाएगा। - मृत्युंजय दीक्षित

प्रभासाक्षी 30 Oct 2026 6:51 pm

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: क्या अब सुधरेंगे फ्रॉड पीड़ितों के हालात?

भारत में डिजिटल क्रांति ने जहाँ आम नागरिक के जीवन को सुगम बनाया है, वहीं इसने एक ऐसे अदृश्य और खौफनाक अपराध तंत्र को भी जन्म दे दिया है जिसने देश की पूरी बैंकिंग और सुरक्षा व्यवस्था के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। आज के दौर में साइबर फ्रॉड और विशेष रूप से 'डिजिटल अरेस्ट' जैसी त्रासदियाँ किसी महामारी की तरह फैल चुकी हैं, जहाँ पलक झपकते ही किसी व्यक्ति की जीवनभर की गाढ़ी कमाई अपराधियों के खातों में चली जाती है। ऐसे माहौल में देश की सर्वोच्च अदालत, सुप्रीम कोर्ट का हालिया रुख न केवल डिजिटल और साइबर फ्रॉड के पीड़ितों के हक में एक ऐतिहासिक कदम है, बल्कि यह देश की बैंकिंग प्रणाली के लिए एक बेहद सख्त चेतावनी भी है। अदालत ने बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि बैंकों की लापरवाही या उनकी उचित सावधानी (ड्यू डिलिजेंस) में कमी के कारण कोई नागरिक ठगी का शिकार होता है, तो संबंधित बैंक को उस नुकसान की पूरी भरपाई करनी होगी। मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ का यह निर्देश इस मायने में क्रांतिकारी है क्योंकि यह पहली बार उपभोक्ताओं के नुकसान की सीधी जवाबदेही उन वित्तीय संस्थानों पर डालता है, जो सुरक्षा का दावा तो करते हैं लेकिन अपनी कमियों को छिपाने में लगे रहते हैं। अदालत द्वारा रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया को आगामी संशोधित 'केवाईसी गाइडलाइंस' में पीड़ितों को मुआवजा देने का प्रावधान अनिवार्य रूप से शामिल करने का आदेश देना एक ऐसा नीतिगत बदलाव है, जिसकी प्रतीक्षा लंबे समय से की जा रही थी। इस आदेश के तहत आरबीआई को तीस नवंबर दो हजार छब्बीस तक नए नियम अधिसूचित करने हैं, जो इकतीस दिसंबर दो हजार छब्बीस से देश भर में प्रभावी हो जाएंगे। अदालत का यह समयबद्ध दृष्टिकोण दर्शाता है कि न्यायपालिका इस संकट की गंभीरता को कितनी गहराई से महसूस कर रही है। इस पूरे संकट का सबसे स्याह पहलू यह है कि अब तक साइबर अपराध के मामलों में पूरी व्यवस्था का दृष्टिकोण केवल पीड़ित को उपदेश देने या उसे जागरूक करने तक ही सीमित रहा है। सरकारें, पुलिस और बैंक अक्सर विज्ञापनों के माध्यम से यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं कि किसी को अपना ओटीपी या पासवर्ड न बताएं। परंतु, आज का साइबर अपराध केवल ओटीपी चोरी करने तक सीमित नहीं रह गया है। 'डिजिटल अरेस्ट' जैसी नई और परिष्कृत तकनीकों में अपराधियों द्वारा कानून प्रवर्तन एजेंसियों का फर्जी रूप धरकर, पीड़ितों को मानसिक रूप से बंधक बना लिया जाता है और अत्यधिक मनोवैज्ञानिक दबाव में उनसे पैसे ऐंठे जाते हैं। ऐसे में साधारण नागरिक, चाहे वह कितना भी पढ़ा-लिखा क्यों न हो, भय और भ्रम के जाल में फंस जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस कड़वी सच्चाई को स्वीकार किया है कि इस साल देश में डिजिटल अरेस्ट और साइबर फ्रॉड के कारण जनता ने लगभग आठ सौ करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि गंवाई है। यह आंकड़ा केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि यह उन हजारों परिवारों की मानसिक प्रताड़ना, आर्थिक तबाही और टूटे हुए सपनों की दास्तां है, जिन्होंने अपनी जमा-पूंजी को सुरक्षित मानकर बैंकों के हवाले किया था। जब कोई अपराधी किसी खाते से करोड़ों रुपये ट्रांसफर करने में सफल हो जाता है, तो यह केवल पीड़ित की सादगी नहीं, बल्कि उस बैंक के सुरक्षा चक्र की पूर्ण विफलता होती है। अदालत ने इसी बिंदु पर प्रहार करते हुए बैंकों को निर्देश दिया है कि यदि किसी खाताधारक के सामान्य व्यवहार या पुराने पैटर्न से अलग कोई 'असामान्य ट्रांजैक्शन' या संदिग्ध लेनदेन होता है, तो बैंक को उस पर तुरंत अस्थाई रोक लगानी होगी। यह एक ऐसा सुरक्षात्मक कदम है जो अगर पहले से मुस्तैदी से लागू होता, तो आज आठ सौ करोड़ रुपये का यह राष्ट्रीय नुकसान रोका जा सकता था। इसे भी पढ़ें: डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) कानून क्या है? इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती क्यों दी गई है? इस पूरे संगठित अपराध की रीढ़ की हड्डी 'म्यूल अकाउंट्स' यानी वे फर्जी बैंक खाते हैं, जिनका उपयोग साइबर ठग अपनी पहचान छिपाने और पैसे को अलग-अलग खातों में घुमाने के लिए करते हैं। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि बिना बैंकों के भीतर बैठे कुछ भ्रष्ट तत्वों की मिलीभगत या फिर बैंकों के ढीले रवैये के, हजारों की संख्या में फर्जी दस्तावेजों पर खाते खोलना और उनमें करोड़ों का लेन-देन होना संभव नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इन फर्जी खातों के जाल पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए साफ किया है कि बैंकों को अपने ग्राहक को जानो की प्रक्रिया को केवल एक कागजी औपचारिकता नहीं, बल्कि एक अभेद्य सुरक्षा कवच बनाना होगा। अब तक बैंक इन फर्जी खातों के जरिए होने वाले अपराधों से खुद को अलग कर लेते थे और सारा दोष पुलिस या पीड़ित पर मढ़ दिया करते थे। लेकिन इस नए आदेश के बाद जब लापरवाही साबित होने पर मुआवजा देना बैंकों के लिए कानूनी रूप से अनिवार्य हो जाएगा, तब वित्तीय संस्थानों को अपनी तकनीकी सुरक्षा और आंतरिक निगरानी तंत्र को दुरुस्त करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। जब बैंकों को यह समझ आएगा कि सुरक्षा में चूक की कीमत उनके अपने मुनाफे से कटेगी, तब वे संदिग्ध खातों पर नजर रखने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और उन्नत सुरक्षा प्रणालियों में निवेश करने को तत्पर होंगे। इसके साथ ही, बैंकों को यह भी निर्देश दिया गया है कि वे किसी भी संदिग्ध डिजिटल अरेस्ट या वित्तीय धोखाधड़ी की गतिविधि की भनक लगते ही तुरंत नजदीकी पुलिस स्टेशन को सूचित करें, जिससे वित्तीय सुरक्षा और कानून व्यवस्था के बीच एक मजबूत और त्वरित तालमेल स्थापित हो सके। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक आदेश जितना स्वागत योग्य है, इसे जमीन पर उतारने की राह में उतनी ही जटिल चुनौतियां भी खड़ी हैं। सबसे बड़ा कानूनी और व्यावहारिक संकट यह उठेगा कि 'बैंक की लापरवाही' और 'ग्राहक की गलती' के बीच की महीन रेखा को कौन और कैसे तय करेगा। बैंक निश्चित रूप से हर मामले में अपनी कानूनी टीमों के सहारे यह साबित करने की पुरजोर कोशिश करेंगे कि उपभोक्ता ने स्वयं अपनी संवेदनशील वित्तीय जानकारियां या क्रेडेंशियल्स साझा किए थे, और इसलिए बैंक मुआवजे के लिए कतई उत्तरदायी नहीं है। इसके अलावा, बैंकिंग लॉबी की ओर से इस बात को लेकर भी कानूनी प्रतिरोध देखने को मिल सकता है कि तकनीकी रूप से सुरक्षित प्रणालियों के बावजूद यदि कोई उपभोक्ता 'सोशल इंजीनियरिंग' या मनोवैज्ञानिक दबाव (जैसे डिजिटल अरेस्ट) का शिकार होता है, तो उसकी पूरी वित्तीय देनदारी बैंक पर कैसे थोपी जा सकती है। इसके लिए आरबीआई को अपने संशोधित नियमों में बहुत स्पष्ट, निष्पक्ष और पारदर्शी मापदंड तय करने होंगे ताकि पीड़ितों को न्याय पाने के लिए बैंकों के चक्कर न काटने पड़ें और न ही उन्हें उपभोक्ता अदालतों के अंतहीन मुकदमों में उलझना पड़े। एक और चिंताजनक पहलू इस कानून के लागू होने की समयसीमा है। दिसंबर दो हजार छब्बीस तक का समय अपराधियों को नए रास्ते खोजने का मौका दे सकता है, इसलिए इस संक्रमण काल के दौरान भी बैंकों को अपनी स्वेच्छा से सुरक्षा मानकों को कड़ा करना चाहिए। निष्कर्षतः, सुप्रीम कोर्ट का यह कड़ा रुख देश के करोड़ों डिजिटल उपभोक्ताओं के लिए एक नई उम्मीद की किरण लेकर आया है। डिजिटल इंडिया का सपना तभी पूरी तरह साकार और सफल हो सकता है, जब देश का हर नागरिक डिजिटल रूप से खुद को सुरक्षित महसूस करे। अदालत ने अपना काम बखूबी कर दिया है और अब गेंद पूरी तरह से रिजर्व बैंक और देश के तमाम वाणिज्यिक बैंकों के पाले में है। उन्हें यह समझना होगा कि वित्तीय सुरक्षा में सेंध केवल एक व्यक्ति का नुकसान नहीं, बल्कि पूरी बैंकिंग व्यवस्था से जनता के भरोसे का उठ जाना है, और इस भरोसे को बनाए रखना अब उनकी कानूनी मजबूरी भी है। - अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार

प्रभासाक्षी 30 Oct 2026 6:46 pm

भारत में तेजी से घट रही गरीबी: वर्ल्ड बैंक

नई दिल्ली, भारत ने गरीबी में बीते एक दशक में दुनिया की सबसे तेज गिरावट में से एक दर्ज की है और देश में 2011 से 2023 के बीच करीब 49.6 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकले हैं।

देशबन्धु 30 Oct 2026 5:31 pm

भारत को 1.5 अरब स्क्वायर फीट प्राइवेट एजुकेशन इन्फ्रा की होगी आवश्यकता

नई दिल्ली, भारत को वित्त वर्ष 35 तक करीब 1.5 अरब स्क्वायर फीट अतिरिक्त प्राइवेट एजुकेशन इन्फ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता होगी।

देशबन्धु 30 Oct 2026 4:23 pm

भाजपा की 'लोकतंत्र बचाओ' रैली पर उदित राज का हमला, बोले- दबाव में है सरकार

भाजपा की 'लोकतंत्र बचाओ' रैली पर उदित राज का हमला, बोले- दबाव में है सरकार

समाचार नामा 30 Oct 2026 4:21 pm

Mock Parliament या Public Impeachment को लेकर क्या कहता है भारत का संविधान?

संसद में हंगामा और संसद के बाहर ड्रामा। यह लाइन आज के विपक्ष पर खूब फिट बैठती है। एक ओर संसद की कार्यवाही को लगातार बाधित किया जाता है दूसरी ओर किसी नेता के घर पर संसद की कार्यवाही का मंचन कर सुर्खियां हासिल करने की कोशिश की जाती है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अभियान को 'जन महाभियोग' का नाम दे रहे विपक्षी दलों ने जिस मॉक पार्लियामेंट का आयोजन किया है उस पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। यहां सवाल यह भी उठता है कि बात-बात पर संविधान की पुस्तक दिखाने वाले राहुल गांधी ने क्या संविधान को पढ़ा ही नहीं है? दरअसल भारतीय संविधान में किसी राजनीतिक दल, विपक्षी गठबंधन या संगठन को संसद अथवा विधानसभा का मॉक सत्र आयोजित कर उसे संवैधानिक कार्यवाही का स्वरूप देने या अपनी ओर से जन महाभियोग चलाने का कोई अधिकार नहीं दिया गया है। संविधान ने संसद और विधानसभाओं के गठन, सत्र संचालन तथा महाभियोग जैसी प्रक्रियाओं के लिए स्पष्ट प्रावधान निर्धारित किए हैं। इसलिए इन संवैधानिक व्यवस्थाओं के समानांतर राजनीतिक मंच खड़ा करना और उसे संसदीय या महाभियोग की कार्यवाही के रूप में प्रस्तुत करना संवैधानिक मर्यादाओं और निर्धारित संस्थागत प्रक्रियाओं पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। संविधान में समानांतर संसद की कोई व्यवस्था नहीं हम आपको बता दें कि संविधान का अनुच्छेद 85 स्पष्ट करता है कि संसद के सत्र बुलाने का अधिकार राष्ट्रपति के पास है। वहीं अनुच्छेद 174 के तहत राज्य विधानमंडल का सत्र बुलाने का अधिकार राज्यपाल को दिया गया है। अनुच्छेद 118 संसद के दोनों सदनों को अपनी कार्यवाही संचालित करने के लिए नियम बनाने का अधिकार देता है। इसका मतलब बिल्कुल स्पष्ट है कि संसद की बैठक, कार्यवाही, अध्यक्षता और विधायी निर्णय किसी राजनीतिक संगठन की मनमर्जी से नहीं चल सकते। इसे भी पढ़ें: Ministry of Corporate Affairs ने NCLT और NCLAT को पूरी तरह Hijack कर लिया है, CJI Surya Kant ने Modi सरकार पर की बेहद कड़ी टिप्पणी साथ ही अनुच्छेद 105 के तहत संसद के सदस्यों को प्राप्त विशेषाधिकार भी इसी संवैधानिक संस्था और उसकी कार्यवाही से संबंधित हैं। किसी निजी आयोजन में शामिल होने वाले राजनीतिक नेताओं को इन विशेषाधिकारों का लाभ नहीं मिलता। इसलिए किसी आयोजन को संसद की कार्यवाही के रूप में प्रस्तुत करना संवैधानिक अधिकारों और वास्तविक राजनीतिक गतिविधि के बीच की सीमा को धुंधला करता है। 2010 का मॉक पार्लियामेंट विवाद इसका प्रमाण है उल्लेखनीय है कि 20 अगस्त 2010 को लोकसभा में हंगामे के बाद लगभग 70 सांसदों ने सदन के भीतर ही मॉक पार्लियामेंट आयोजित कर दी थी। इस घटना पर तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने नाराजगी जताई थी। 25 अगस्त 2010 को हुई सर्वदलीय बैठक में राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों ने इस घटना पर खेद जताया था। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि संसद जैसी संवैधानिक संस्था की कार्यवाही का राजनीतिक प्रदर्शन स्वयं संसदीय व्यवस्था के भीतर भी गंभीर आपत्ति का विषय बना था। साथ ही जन महाभियोग संविधान की निर्धारित प्रक्रिया का विकल्प नहीं है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ जन महाभियोग आयोजित करने का विचार इससे भी अधिक गंभीर संवैधानिक प्रश्न खड़ा करता है। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन आधारों पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है। इसके लिए अनुच्छेद 124(4) में निर्धारित प्रक्रिया लागू होती है। हम आपको बता दें कि न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत लोकसभा में कम से कम 100 या राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर से प्रस्ताव प्रस्तुत किया जा सकता है। प्रस्ताव स्वीकार होने पर जांच समिति गठित होती है। आरोपों की जांच के बाद दोनों सदनों में निर्धारित विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना आवश्यक है। उसके बाद राष्ट्रपति द्वारा हटाने का आदेश जारी किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में जनता की किसी प्रतीकात्मक संसद, राजनीतिक गठबंधन या पूर्व लोकसभा अध्यक्ष की अध्यक्षता वाली निजी सभा के लिए कोई स्थान निर्धारित नहीं है। इसलिए किसी राजनीतिक आयोजन में मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ आरोपों की सुनवाई करना, प्रतीकात्मक प्रस्ताव पारित करना या जन महाभियोग की घोषणा करना वास्तविक संवैधानिक महाभियोग नहीं हो सकता। ऐसे आयोजन से किसी संवैधानिक पदाधिकारी की स्थिति पर कोई कानूनी प्रभाव नहीं पड़ता। नाम बदलने से संवैधानिक प्रश्न समाप्त नहीं होता साथ ही यदि मॉक पार्लियामेंट का नाम बदलकर जन संसद अथवा जन महाभियोग कर दिया जाए तो इससे उसकी संवैधानिक स्थिति नहीं बदल जाती। किसी आयोजन की वैधता उसके नाम से नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक गतिविधियों से निर्धारित होती है। कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों को समझना चाहिए कि संविधान शांतिपूर्ण विरोध और राजनीतिक अभिव्यक्ति का अधिकार देता है। लेकिन इन अधिकारों के आधार पर किसी को संसद की वैधानिक शक्तियां अथवा महाभियोग की संवैधानिक प्रक्रिया अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं मिलता। इसलिए मॉक पार्लियामेंट को वास्तविक संसदीय सत्र और जन महाभियोग को वास्तविक संवैधानिक महाभियोग के रूप में पेश करना कानूनी रूप से निराधार है। ऐसी कार्यवाहियां किसी संवैधानिक निर्णय को जन्म नहीं दे सकतीं और न ही संसद द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का स्थान ले सकती हैं। बहरहाल, संविधान ने संसद बनाई है, राजनीतिक दलों को अपनी संसद बनाने का अधिकार नहीं दिया। संविधान ने महाभियोग की प्रक्रिया निर्धारित की है, राजनीतिक मंचों को महाभियोग का फैसला सुनाने का अधिकार नहीं दिया। यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक तथ्य है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 30 Oct 2026 3:54 pm

अरबों से बगावत, यहूदियों से 'रक्त-संधि': जब Muslim-Jews ने मिलकर बनाया इजरायल, 1948 के युद्ध की अनस

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्। अर्थात हे भारत, जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म में वृद्धि होती है, तब-तब मैं धर्म की स्थापना के लिए स्वयं को प्रकट करता हूँ। विश्व इतिहास में महाभारत के युद्ध को धर्मयुद्ध कहा गया। लेकिन महाभारत के लिए जो युद्ध लड़ा गया था वो किसी धर्म या संप्रदाय के लिए नहीं बल्कि सत्य और न्याय की समाज में स्थापना के लिए लड़ा गया था। इसका उद्देश्य किसी नए धर्म की स्थापना करके दूसरे धर्मों का क्रूर दमन करना नहीं था और न ही उनके धार्मिक स्थलों को नष्ट करना था। दुनिया के सभी धर्मों को दो हिस्सों में अब्राहिम रिलीजन और इंडियन रिलीजन में बांटा गया है। अब्राहिम रिलीजन में ईसाई, यहूदी और मुसलमान आते हैं तो वहीं इंडियन रिलीजन में बुद्धिस्ट, हिंदू और सिख जैसे बहुत सारे धर्म शामिल हैं, जिनकी जड़े हमारे भारत देश से मिलती हैं। यानी इनकी स्थापना और शुरुआत भारत देश से ही कि गई थी। ईसाई धर्म जब अपनी ठीक ठाक जगह यूरोप में बना चुका था। उस वक्त ईसाई जब अपने धर्म का विस्तार कर रहे थे, तो उनका नारा सिर्फ और सिर्फ समाज में मोहब्बत बांटने का था। जीसस क्राइस्ट शोअर्ड अस, हाऊ टू लव अदर्स यानी जीसस ने हमें बताया है कि लोगों से कैसे मोहब्बत की जाए। लेकिन सवाल ये था कि जिनकी जुबान पर जीसस के नाम पर मोहब्बत बांटने वाले गीत थे, उन्होंने क्रूसेड का रास्ता क्यों चुना? लोगों को नफरत छोड़कर प्यार बांटने के गीत गाने वालों ने पूरे यूरोप में तबाही क्यों मचाई और वो भी दूसरे धर्म वालों का नरसंहार करके। इसी को द क्रूसिड के नाम से जाना जाता है। इसे भी पढ़ें: नेतन्याहू जिसे शर्म कहते थे, अब इजरायल में वही मुस्लिम शासन? मिट जाएगा इतिहास! इज़राइल बनाने के लिए यहूदी-मुस्लिम मिलकर लड़े थे साथ बाइबल में कहा गया है कि यह भूमि यहूदियों के लिए है, और पवित्र धर्मग्रंथों से असहमति नहीं जताई जानी चाहिए। मैं और मेरे लोग यहूदी राज्य के वफादार नागरिकों के रूप में शांति से रहना चाहते हैं,—यह बात गैलिली (उत्तरी इज़राइल) के मुस्लिम बदू अल-हैब जनजाति के प्रमुख शेख हुसैन इस्माइल अबू यूसुफ ने 1948 की शुरुआत में यिगल एलोन से कही थी। एलोन ब्रिटिश-शासित फ़िलिस्तीन में यहूदियों के विशिष्ट सैन्य बल 'पलमाच' (Palmach) के कमांडर थे। मई 1948 में इज़राइल द्वारा स्वतंत्रता की घोषणा करने से कुछ महीने पहले, अबू यूसुफ ने यहूदी बलों के साथ गठबंधन की मांग की थी। इसके बाद उनकी जनजाति के लगभग 70 युवकों को यहूदी सेना के साथ मिलकर लड़ने के लिए प्रशिक्षित किया गया। एक ऐसे समय में जब यहूदी सेनाएँ फ़िलिस्तीनी अरब समूहों से लड़ रही थीं और इज़राइल का अस्तित्व में आना बाकी था, एक मुस्लिम अरब प्रमुख की ओर से यह एक असाधारण घोषणा थी। जब अबू यूसुफ ने यह निर्णय लिया, तब फ़िलिस्तीन पर ब्रिटिश शासन अपने अंत के करीब था, और यहूदी व फ़िलिस्तीनी अरब सेनाएँ उस क्षेत्र के भविष्य को लेकर आपस में लड़ रही थीं। जहाँ अधिकांश अरब दुनिया एक यहूदी राष्ट्र के निर्माण का विरोध कर रही थी, वहीं इस क्षेत्र में कुछ ऐसे मुस्लिम बदू कबीले भी थे जिन्होंने यहूदियों का समर्थन करने का फैसला किया। यूसुफ के नेतृत्व वाली अल-हैब जनजाति भी उन्हीं में से एक थी। इस कबीले के सदस्यों ने खुफिया जानकारी दी, यहूदी लड़ाकों की मदद की और एक ऐसी सैन्य इकाई में शामिल हुए जिसने उस युद्ध में हिस्सा लिया, जिसके परिणामस्वरूप इज़राइल की स्थापना हुई। हालाँकि यह कहानी मध्य पूर्व में यहूदी-अरब प्रतिद्वंद्विता के बारे में आज की धारणा को चुनौती देती है, लेकिन यह यह भी दिखाती है कि किस तरह संघर्ष और विजय ने यहूदियों और अरबों को, और यहाँ तक कि अरब समुदायों को भी आपस में बाँट दिया। इज़राइल के गठन के लगभग आठ दशक बाद, यहूदियों और अरबों के बीच के संबंध वहां की राजनीति के केंद्र में आ गए हैं। 27 अक्टूबर के चुनाव के नतीजों के अनुमान के मुताबिक, इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के गुट को 53 सीटें और उनके प्रतिद्वंद्वी गादी आइसेनकोट के गुट को 48 सीटें मिल सकती हैं। 120 सदस्यों वाली 'नेसेट' (इज़राइली संसद) में बहुमत के लिए 61 सीटों की जरूरत होती है, जो दोनों गुटों के पास नहीं हैं। अरब पार्टियों ने रिकॉर्ड 19 सीटें जीतने का अनुमान लगाया है और वे 'किंगमेकर' की भूमिका में आ सकती हैं। यह स्थिति तब है जब यहूदी नेतृत्व वाले कई विपक्षी दल, इज़राइल की दो अरब पार्टियों के समर्थन पर निर्भर रहने से कतराते रहे हैं। इस गतिरोध और इज़राइली अरब मतदाताओं की संख्या बढ़ाने के लिए विदेशी फंडिंग मिलने के आरोपों ने, इज़राइल में यहूदी-अरब संबंधों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। ऐसे में, मुस्लिम बेदुइन लोगों की कहानी आज और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, जिसे याद करना प्रासंगिक है। इज़रायल के बनने से पहले ही एक युद्ध शुरू हो चुका था 20वीं सदी की शुरुआत में फिलिस्तीन में यहूदियों के लिए एक अलग देश की मांग जोर पकड़ने लगी थी। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 'होलोकॉस्ट' (यहूदियों के नरसंहार) के बाद यह मांग और भी प्रबल हो गई। इस नरसंहार में एडोल्फ हिटलर के नाज़ी जर्मनी और उसके सहयोगियों ने लगभग 60 लाख यहूदियों की हत्या कर दी थी। इस नरसंहार और बचे हुए यहूदियों की दयनीय स्थिति ने एक यहूदी राष्ट्र की स्थापना के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन को और बढ़ा दिया। 29 नवंबर 1947 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें ब्रिटिश शासन वाले फिलिस्तीन को बांटकर एक यहूदी और एक अरब देश बनाने का सुझाव दिया गया था। दिलचस्प बात यह है कि भारत उन 13 देशों में शामिल था, जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र की इस विभाजन योजना के खिलाफ वोट दिया था। यहूदी नेतृत्व ने विभाजन योजना को स्वीकार कर लिया, लेकिन फ़िलिस्तीनी अरब नेताओं और पड़ोसी अरब देशों ने इसे अस्वीकार कर दिया। उस समय फ़िलिस्तीन ब्रिटिश शासन के अधीन था, और आप्रवासन, भूमि और क्षेत्र पर प्रतिस्पर्धी दावों को लेकर यहूदी और अरब समुदायों के बीच तनाव बढ़ रहा था। यहूदी समूह एक राष्ट्रीय मातृभूमि स्थापित करना चाहते थे, जबकि फ़िलिस्तीनी अरब यहूदी मांगों का विरोध कर रहे थे और अपनी भूमि पर नियंत्रण खोने से भयभीत थे। संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के बाद, हगानाह सहित यहूदी सैन्य संगठनों और स्थानीय मिलिशिया और लड़ाकों सहित फ़िलिस्तीनी अरब सशस्त्र समूहों के बीच लड़ाई छिड़ गई। मुख्य यहूदी सैन्य संगठन हगानाह और उसकी विशिष्ट लड़ाकू टुकड़ी, पल्माच ने यहूदी बस्तियों की रक्षा और सैन्य अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जैसे ही ब्रिटेन ने फ़िलिस्तीन से हटने की तैयारी की, संघर्ष और तीव्र हो गया। इसने इज़राइल की स्वतंत्रता की घोषणा का मार्ग प्रशस्त किया। यहूदियों के मुख्य सैन्य संगठन 'हगाना' और उसके विशिष्ट लड़ाकू बल 'पाल्माच' ने यहूदी बस्तियों की रक्षा करने और सैन्य अभियान चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जैसे-जैसे ब्रिटेन ने फिलिस्तीन से हटने की तैयारी की, संघर्ष और तेज हो गया। इसी पृष्ठभूमि में मई 1948 में इज़राइल ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की, जिसके बाद पड़ोसी अरब देशों के साथ युद्ध छिड़ गया। 14 मई 1948 को डेविड बेन-गुरियन ने इज़राइल की स्वतंत्रता की घोषणा की। अगले दिन, मिस्र, ट्रांसजॉर्डन (अब जॉर्डन), सीरिया और इराक की सेनाएँ युद्ध में शामिल हो गईं। लेबनान ने भी इसमें हिस्सा लिया। यह युद्ध 1949 तक चलता रहा। इज़राइल न केवल बचा रहा, बल्कि उसने संयुक्त राष्ट्र की विभाजन योजना में यहूदी राज्य के लिए प्रस्तावित क्षेत्र से भी कहीं अधिक ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया। फिलिस्तीनियों के लिए, यह युद्ध 'नक्बा' यानी एक बड़ी तबाही बन गया, जिसके दौरान लगभग 7 लाख लोगों को अपने घर छोड़कर भागना पड़ा या उन्हें वहाँ से निकाल दिया गया। लेकिन, यह लड़ाई कोई ऐसी सीधी-सादी स्थिति नहीं थी जहाँ सभी अरब एक तरफ होकर सभी यहूदियों के खिलाफ लड़ रहे हों। कुछ अरब समुदायों ने यहूदी सेनाओं का समर्थन किया, कुछ ने उनके खिलाफ लड़ाई लड़ी, और कुछ तटस्थ रहने की कोशिश करते रहे। यहूदियों का पक्ष चुनने वालों में 'अल-हैब' कबीले के मुस्लिम बेदौइन (खानाबदोश) लोग भी शामिल थे। वे गैलिली क्षेत्र में 'तूबा' गाँव के आसपास रहते थे। यह इलाका उस समय ब्रिटिश शासन वाले फिलिस्तीन का हिस्सा था, और आज उत्तरी इज़राइल में 'तूबा-ज़ंगारिये' नामक कस्बे के रूप में जाना जाता है। इसे भी पढ़ें: Israel के घरेलू विवाद में घसीटे जाने पर Doha चुप नहीं रहेगा, Qatar की चेतावनी मुस्लिम कबीले ने यहूदियों का पक्ष क्यों चुना? 1948 में यहूदी सेनाओं का समर्थन करने का 'अल-हैब' कबीले का फैसला, बरसों की दोस्ती, कबीलाई प्रतिद्वंद्विता और राजनीतिक हिसाब-किताब का नतीजा था। 'पालमाच' (यहूदियों की एक विशेष लड़ाकू टुकड़ी, जो बाद में इज़रायली सेना का हिस्सा बन गई) के अभिलेखों के अनुसार, मुस्लिम बेदौइन 'अल-हैब' कबीले के पड़ोसी यहूदी बस्तियों के साथ बरसों से दोस्ताना संबंध थे। यहाँ तक कि 1936 से 1939 के 'अरब विद्रोह' के दौरान भी—जब फिलिस्तीनी अरबों ने ब्रिटिश शासन और यहूदियों के बढ़ते प्रवास के खिलाफ बगावत की थी—इस कबीले ने यहूदी समुदायों पर होने वाले हमलों में शामिल होने से इनकार कर दिया था। इसके प्रमुख, हुसैन इस्माइल अबू यूसुफ ने 'ज्यूइश नेशनल फंड' को 500 डुनम (लगभग 70 मानक फुटबॉल मैदानों के बराबर) ज़मीन बेची थी। बाद में यह ज़मीन 'किबुत्ज़ कफार हनासी' का हिस्सा बन गई, जो जॉर्डन नदी के पास (उत्तरी इज़राइल में) ऊपरी गैलिली क्षेत्र में स्थित एक यहूदी बस्ती है। यह कबीला काफी छोटा था, जिसमें 1948 के समय महिलाओं और बच्चों सहित लगभग 400 सदस्य थे। हालाँकि, इसके हथियारबंद लोगों को गैलिली के पहाड़ी इलाकों की अच्छी जानकारी थी, जिससे वे एक बहुत ही उपयोगी सहयोगी साबित हो सकते थे। 'अल-हैब' कबीले के 'अरब हायर कमिटी' के साथ भी लंबे समय से मतभेद चल रहे थे; यह कमिटी फिलिस्तीनी अरब राष्ट्रीय आंदोलन का प्रतिनिधित्व करने वाली मुख्य राजनीतिक संस्था थी। 'पाल्माच' अभिलेखागार के अनुसार, अबू यूसुफ का मानना ​​था कि आने वाले युद्ध में यहूदी सेनाओं की जीत होगी। उनके इस फैसले पर सीरिया के दबाव का भी असर था। कहा जाता है कि सीरिया के प्रतिनिधियों ने उन्हें यह प्रस्ताव दिया था कि अगर वे अपने कबीले को गोलान हाइट्स (जो उस समय सीरिया के नियंत्रण में था) ले जाएँ, तो पुरानी दुश्मनी भुला दी जाएगी। लेकिन अबू यूसुफ ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। इसके बजाय, उन्होंने यहूदी सेनाओं से संपर्क किया और एक ऐसा गठबंधन करना चाहा जिससे उनके कबीले का भविष्य सुरक्षित हो सके। इसे भी पढ़ें: Israel Election: विदेशी दखल की जांच हो पर Arab आबादी को न करें बदनाम, बोले Isaac Herzog यहूदी कमांडरों ने शेख की परीक्षा कैसे ली प्रस्तावित रक्त समझौते के कारण मुस्लिम कबीले के मुखिया और यहूदी सैन्य नेतृत्व के बीच मुलाकात का रास्ता साफ हो गया। 1948 की शुरुआत में, रोश पिना की यहूदी बस्ती के दो लोगों - अमीहुद श्वार्ट्ज और मानो फ्रीडमैन - ने अबू यूसुफ और पाल्माच कमांडर यिगाल एलोन के बीच एक बैठक आयोजित करने में मदद की। इसमें यरुहम कोहेन ने भी सहायता की, जो गैलिली के अरब समुदायों से अच्छी तरह परिचित थे। अबू यूसुफ ने एलोन से कहा कि वह चाहता है कि उसके लोग प्रस्तावित यहूदी राज्य में शांति से रहें। लेकिन यहूदी कमांडरों ने बिना जांच-पड़ताल किए उसके आश्वासनों पर भरोसा नहीं किया। पाल्माच के अभिलेखों (archives) के अनुसार, उन्होंने शेख से 'बनोट याकोव ब्रिज' के पार सीरियाई सेना की स्थिति के बारे में बताने को कहा; यह पुल सीरियाई सीमा के पास एक महत्वपूर्ण रास्ता था। कमांडर ने इस जानकारी का मिलान अन्य स्रोतों से मिली खुफिया जानकारी से किया। दोनों जानकारियां मेल खा गईं। इससे यहूदी नेताओं को यकीन हो गया कि शेख पर भरोसा किया जा सकता है। इस बैठक में एक समझौता हुआ, जिसके तहत कबीले के नौजवानों को मिलाकर एक सैन्य इकाई बनाई जानी थी। यह इकाई पाल्माच की 'यिफताह ब्रिगेड' के अधीन काम करने वाली थी। इस गठबंधन ने अबू यूसुफ के कबीले को उस पक्ष के साथ जगह दी, जिसके जीतने की उम्मीद थी। इस गठबंधन की बदौलत यहूदी सेना को ऐसे लोग मिल गए जो उस इलाके को अच्छी तरह जानते थे, स्थानीय अरब समुदायों को समझते थे, और ऐसी खुफिया जानकारी जुटा सकते थे जिसे हासिल करने में यहूदी लड़ाकों को काफी मुश्किल होती। 70 मुस्लिम बेदौइन जिन्होंने यहूदी 'पालमाच' (Palmach) में हिस्सा लिया इस गठबंधन के परिणामस्वरूप 'पाल-हेइब प्लाटून' का गठन हुआ। यह एक ऐसी सैन्य इकाई थी जिसमें मुस्लिम बेदौइन लड़ाके शामिल थे, जो यहूदी सेनाओं के साथ मिलकर काम करते थे। इस इकाई का कमांडर इसाक हैंकिन को बनाया गया, जो महमूद अल-उबैद के साथ मिलकर काम करते थे। महमूद अल-उबैद एक बेदौइन लड़ाके थे, जो बाद में इज़राइल रक्षा बलों (Israel Defense Forces) की 'अल्पसंख्यक इकाई' (Minorities Unit) में भी शामिल हुए। हैंकिन ने 'अल-हेइब' कबीले के युवाओं को प्रशिक्षण देना शुरू किया। उनकी शुरुआती जिम्मेदारियों में गांव की सुरक्षा को मजबूत करना शामिल था—जैसे खाइयां खोदना, आश्रय स्थल बनाना और संभावित हमलों से निपटने के लिए मोर्चे तैयार करना। बाद में, कबीले के लगभग 70 चुने हुए लोगों को सैन्य प्रशिक्षण दिया गया। उन्होंने युद्ध की तकनीकें सीखीं, हथियारों को चलाना सीखा और यह भी सीखा कि छोटे समूहों में रहकर कैसे काम किया जाता है। इस इकाई ने 'ऑपरेशन माताते' से पहले खुफिया अभियान चलाए। यह ऑपरेशन 3 मई 1948 को शुरू हुआ था। इज़राइल की स्वतंत्रता की घोषणा से ठीक 11 दिन पहले। यह ऑपरेशन एक बड़े यहूदी सैन्य अभियान का हिस्सा था, जिसका मकसद पड़ोसी अरब सेनाओं के संभावित हस्तक्षेप से पहले रणनीतिक रास्तों और ठिकानों को सुरक्षित करना था। अल-हैब लड़ाकों ने इस क्षेत्र और यहाँ के लोगों के बारे में अपनी जानकारी का इस्तेमाल करके, अरबों की स्थिति और उनकी गतिविधियों के बारे में जानकारी जुटाने में मदद की। लेकिन यहूदी सेनाओं के साथ जुड़ने के उनके फैसले में काफी जोखिम था, क्योंकि इससे वे अरबों के दुश्मन बन गए। 14 मई को डेविड बेन-गुरियन द्वारा इज़राइल की स्थापना की घोषणा के एक दिन बाद, मिस्र, ट्रांसजॉर्डन (अब जॉर्डन), सीरिया, लेबनान और इराक की सेनाओं ने पहला अरब-इज़राइली युद्ध छेड़ दिया। यह लड़ाई कई महीनों तक चली। इज़राइली सेनाओं ने कई मोर्चों पर अरब सेनाओं का मुकाबला किया। अल-हैब कबीले ने गैलिली में खुफिया जानकारी और सैन्य सहायता उपलब्ध कराई।

प्रभासाक्षी 30 Oct 2026 2:14 pm

उत्तर प्रदेश: लखनऊ में पार्टी की राज्य कार्यसमिति की बैठक करेंगे अमित शाह, सीएम योगी सहित कई नेता होंगे शामिल

उत्तर प्रदेश: लखनऊ में पार्टी की राज्य कार्यसमिति की बैठक करेंगे अमित शाह, सीएम योगी सहित कई नेता होंगे शामिल

समाचार नामा 30 Oct 2026 8:35 am

पीएम किसान सम्मान निधि की 24वीं किस्त आज, यूपी के 2.24 करोड़ किसानों को मिलेगा लाभ

मोदी-योगी सरकार अन्नदाता किसान की समृद्धि के लिए निरंतर कदम बढ़ा रही है। डबल इंजन सरकार खेत से लेकर किसानों के सम्मान तक कार्य कर रही है। इसी क्रम में शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात के बनासकांठा से किसानों के खाते में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि की 24वीं किस्त भेजेंगे।

देशबन्धु 30 Oct 2026 7:30 am

20 साल के सुशासन का जश्न, 24 नवंबर को जेडीयू मनाएगी बड़ा उत्सव

जनता दल (यूनाइटेड) 24 नवंबर को ‘सुशासन दिवस’ के रूप में मनाएगी। यह दिन 2005 में नीतीश कुमार के बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभालने की 20वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में मनाया जाएगा।

देशबन्धु 30 Oct 2026 7:20 am

एमपीएससी परीक्षा लीक जांच: आयोग ने जवाब दाखिल करने की अंतिम तिथि 16 नवंबर निर्धारित की

एमपीएससी परीक्षा लीक जांच: आयोग ने जवाब दाखिल करने की अंतिम तिथि 16 नवंबर निर्धारित की

समाचार नामा 29 Oct 2026 10:39 pm

'शांति समझौता बातचीत के पक्षधर गुट पर लागू होता है': असम सीएम ने मंत्री की 'उल्फा' संबंधी टिप्पणी पर स्पष्टीकरण दिया

'शांति समझौता बातचीत के पक्षधर गुट पर लागू होता है': असम सीएम ने मंत्री की 'उल्फा' संबंधी टिप्पणी पर स्पष्टीकरण दिया

समाचार नामा 29 Oct 2026 8:34 pm

MLC चुनाव में बीजेपी को अपने ही गढ़ों में झटका, पटना से काशी और लखनऊ से नागपुर तक हार की चर्चा

चार राज्यों की विधान परिषद की 28 सीटों पर हुए चुनाव के नतीजों ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। बीजेपी ने 12 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि उसके सहयोगी दलों को तीन सीटें मिलीं। इस तरह एनडीए के खाते में कुल 15 सीटें आईं।

देशबन्धु 29 Oct 2026 8:17 pm

तिरुपति नगर निगम चुनाव: वाईएसआरसीपी ने बूथ धांधली और हिंसा की जताई आशंका, चुनाव आयोग से कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की मांग

तिरुपति नगर निगम चुनाव: वाईएसआरसीपी ने बूथ धांधली और हिंसा की जताई आशंका, चुनाव आयोग से कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की मांग

समाचार नामा 29 Oct 2026 8:06 pm

चार राज्यों के विधान परिषद चुनावों के मिले-जुले परिणामों के महत्वपूर्ण सियासी संदेश

चार राज्यों के विधान परिषद चुनावों के मिले-जुले परिणामों में भले ही भाजपा-राजग को बढ़त मिली हो, लेकिन उत्तरप्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भाजपा -राजग को विपक्षी दलों द्वारा कड़ी टक्कर मिली है, जबकि कर्नाटक की चारो सीट जीतकर भाजपा राजग ने वहां की सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी को जबर्दस्त सियासी पटखनी दी है। वहीं, कांग्रेस के सामने संगठनात्मक चुनौती खड़ी हुई है। उसे एक मात्र नागपुर स्नातक सीट मिली है। लेकिन आरएसएस मुख्यालय होने और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के क्षेत्र में मिली कांग्रेस को यह जीत इस बात का संकेत है कि सवर्ण वोटर अब भाजपा की अतिवादी दलित-ओबीसी नीतियों से ऊब चुके हैं और कांग्रेस के अच्छे उम्मीदवार को जितवाने से भी उन्हें गुरेज नहीं है। इसे भी पढ़ें: RSS के किले Nagpur और Modi के गढ़ Varanasi में BJP की करार हार से सत्ता पक्ष की नींद उड़ी यदि राजनीतिक नजरिए से देखा जाए तो उत्तर प्रदेश में सपा की मजबूती और बिहार में जन सुराज का आगाज—बीजेपी-एनडीए को सवर्ण वोटरों की उदासीनता के दृष्टिगत सावधान कर रहे हैं। भले ही चार राज्यों की 28 विधान परिषद सीटों के नतीजे 28 अक्टूबर 2026 को सामने आए, लेकिन इन मिले जुले परिणामों ने उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक और महाराष्ट्र में भारतीय राजनीति की एक दिलचस्प तस्वीर पेश की है। जहां भाजपा और उसके राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के सहयोगियों ने कुल 28 सीटों में से 16 सीट पर जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस को एक मात्र सीट मिली है। दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने पांच सीटें जीतकर अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराई, तो बिहार में जन सुराज को पहली सफलता मिली। महाराष्ट्र में भी मुकाबला पूरी तरह एकतरफा नहीं रहा और भाजपा नीत महायुति गठबंधन को कांग्रेस नीत महा विकास अघाड़ी की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी शरद पवार से कड़ी टक्कर मिली है। इन नतीजों का महत्व केवल जीत और हार की संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि ये राजनीतिक दलों की संगठनात्मक क्षमता, स्थानीय नेतृत्व, शिक्षक एवं स्नातक मतदाताओं से जुड़ाव और विपक्षी गठबंधनों के भीतर प्रतिस्पर्धा के बारे में भी संकेत देते हैं। जहां तक चारों राज्यों के चुनावी गणित का सवाल है तो यह जान लीजिए कि गत 23 अक्टूबर 2026 को उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक और महाराष्ट्र की विधान परिषद की कुल 28 सीटों के लिए मतदान हुआ, जिसकी मतगणना 28 अक्टूबर को हुई। उत्तर प्रदेश की 11, बिहार की 8, कर्नाटक की 4 और महाराष्ट्र की 5 यानी कुल 28 सीटों के नतीजे आए। उत्तर प्रदेश की कुल 11 सीटें में से भाजपा को 6 और समाजवादी पार्टी (सपा) को 5 सीटों पर जीत मिली, यानी मुकाबला कांटे का रहा। वहीं, बिहार की कुल 8 सीटों में भाजपा को 3 और जनता दल (यूनाइटेड) को 1 सीट मिली। यानी भाजपा नीत राजग 8 सीटों में से 4 सीटें जितने में कामयाब रहा। जबकि मुख्य विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) को 1, जन सुराज पार्टी को 1 और निर्दलीय को 2 सीटें मिली हैं। इस प्रकार बिहार में भाजपा सबसे अधिक तीन सीटें जीतने वाली पार्टी रही। निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी दो सीटें हासिल कीं। इनकी भी पृष्ठभूमि भाजपाई ही रही है। वहीं, कर्नाटक की कुल 4 सीटों में भाजपा को 3 सीटें और जनता दल (सेक्युलर) को 1 सीट मिली। यहां की सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस 0 पर आऊट हो गई। कर्नाटक में भाजपा-जद(एस) गठबंधन ने चारों सीटें जीत लीं। वहीं, महाराष्ट्र की कुल 5 सीटों में भाजपा को 1, शिवसेना (महायुति) को 1, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) को 2 और कांग्रेस को 1 सीट मिली। वहीं, महाराष्ट्र विधान परिषद की नागपुर स्नातक निर्वाचन सीट के चुनाव आयोग और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कांग्रेस उम्मीदवार अभिजीत वंजारी ने इस सीट पर जीत दर्ज की है। उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार सुधाकर कोहले को शिकस्त दी है। # भाजपा और राजग के लिए क्या संदेश? चार राज्यों में 16 सीटें जीतना भाजपा और उसके सहयोगियों के लिए संगठनात्मक सफलता का संकेत है। विशेष रूप से कर्नाटक में चारों सीटों पर जीत ने विपक्षी गठबंधन के समन्वय और कांग्रेस की स्थानीय चुनावी रणनीति पर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, इन परिणामों को सीधे विधानसभा चुनावों के जनादेश के बराबर मानना उचित नहीं होगा। भाजपा के सामने अब इस सफलता को व्यापक जनसंपर्क, स्थानीय समस्याओं के समाधान और आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारी से जोड़ने की चुनौती है। # कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस द्वारा चारों राज्यों में मात्र एक सीट जीत पाना उसके लिए गंभीर राजनीतिक सवाल पैदा करता है। खासकर कर्नाटक में उसकी अपनी सरकार है, फिर भी पार्टी किसी सीट पर जीत हासिल नहीं कर सकी। इसके तीन संभावित सबक हैं: एक, स्थानीय स्तर पर संगठन और उम्मीदवार चयन की समीक्षा आवश्यक है। दो, शिक्षक एवं स्नातक जैसे विशिष्ट मतदाता वर्गों से निरंतर संवाद जरूरी है। तीन, गठबंधन की राजनीति के साथ-साथ अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान को भी मजबूत करना होगा। हालांकि, विधान परिषद चुनावों के मतदाता सीमित और विशिष्ट वर्गों से आते हैं। इसलिए इन नतीजों के आधार पर कांग्रेस के समूचे जनाधार के बारे में अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। # उत्तर प्रदेश में सपा ने भाजपा को क्या चुनौती दी? उत्तर प्रदेश के नतीजे खास महत्व रखते हैं, क्योंकि राज्य में 2027 की शुरुआत में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। भाजपा ने कई सीटों पर अपना प्रभाव बनाए रखा, लेकिन सपा ने पांच सीटें जीतकर यह दिखाया कि वह विधान परिषद के चुनावों में भी प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता रखती है। सपा को वाराणसी की दो सीटों पर सफलता मिलना भी उल्लेखनीय रहा। इसका सियासी अर्थ यह है कि दोनों दलों को अपने संगठन, स्थानीय नेतृत्व और मतदाता संपर्क पर ध्यान देना होगा। फिर भी, विधान परिषद के सीमित मतदाता वर्ग और विधानसभा के व्यापक मतदाता वर्ग में अंतर है। इसलिए इन नतीजों को आगामी विधानसभा चुनाव का निश्चित संकेत नहीं माना जा सकता। # बिहार में जन सुराज की जीत क्यों महत्वपूर्ण है? बिहार के दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में जन सुराज के सुरेश प्रसाद राय ने कांग्रेस के निवर्तमान विधान परिषद सदस्य मदन मोहन झा को 324 मतों से हराया। इससे जन सुराज को विधान परिषद में पहली चुनावी सफलता मिली। पटना शिक्षक सीट पर राजद ने भाजपा के नवल किशोर यादव को हराया, जबकि सारण में निर्दलीय उम्मीदवार राहुल राज ने जीत दर्ज की। इन परिणामों से तीन बातें सामने आती हैं: एक, नए राजनीतिक विकल्प की गुंजाइश: जन सुराज ने सीमित लेकिन महत्वपूर्ण चुनावी सफलता हासिल की। दो, स्थानीय असंतोष का महत्व: पुराने और स्थापित उम्मीदवारों को भी मतदाताओं की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है। तीन, निर्दलीय उम्मीदवारों की प्रासंगिकता: स्थानीय पहचान और मतदाताओं से सीधा संपर्क दलगत समर्थन के अतिरिक्त भी भूमिका निभा सकता है। जन सुराज के लिए असली चुनौती इस सफलता को दूसरे क्षेत्रों में भी संगठनात्मक विस्तार में बदलना होगी। # महाराष्ट्र का संदेश- मुकाबला बहुकोणीय है: महाराष्ट्र में महायुति और विपक्षी गठबंधन के बीच मुकाबला मिश्रित रहा। शरद पवार के नेतृत्व वाली राकांपा (एसपी) ने पुणे स्नातक और छत्रपति संभाजीनगर स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में जीत हासिल की। वहीं भाजपा और महायुति के अन्य सहयोगियों को भी सफलता मिली। जबकि नागपुर स्नातक सीट पर कांग्रेस ने बाजी मारी। यह परिणाम बताता है कि राज्य की राजनीति को केवल एक दल बनाम दूसरे दल के रूप में समझना पर्याप्त नहीं है। गठबंधन, स्थानीय उम्मीदवार, क्षेत्रीय नेतृत्व और मतदाता समूहों की प्राथमिकताएं भी परिणामों को प्रभावित करती हैं। # क्या इन चुनावों से राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय होगी? विधान परिषद चुनावों में केवल निर्धारित शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के पात्र मतदाता मतदान करते हैं। इन चुनावों में मतपत्रों का इस्तेमाल होता है, ईवीएम का नहीं। इसलिए इन परिणामों से संगठनात्मक ताकत, स्थानीय असंतोष और उम्मीदवारों की स्वीकार्यता के संकेत तो मिलते हैं, लेकिन पूरे राज्य या देश की जनता की राजनीतिक पसंद का सीधा अनुमान नहीं लगाया जा सकता। इसके बावजूद, परिणाम तीन व्यापक प्रश्न जरूर खड़े करते हैं: एक, क्या सत्तारूढ़ दल अपनी स्थानीय उपलब्धियों और संगठन को प्रभावी चुनावी समर्थन में बदल पा रहे हैं? दो, क्या विपक्षी दल स्थानीय स्तर पर मजबूत उम्मीदवार और साझा रणनीति तैयार कर पा रहे हैं? तीन, क्या नए राजनीतिक दल और निर्दलीय उम्मीदवार स्थापित दलों के लिए कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में चुनौती बन सकते हैं? वस्तुत: चार राज्यों के विधान परिषद चुनावों का सबसे बड़ा सियासी संदेश यह है कि भाजपा-राजग को समग्र बढ़त मिली है, लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा कायम है। उत्तर प्रदेश में सपा की सफलता, बिहार में जन सुराज का प्रवेश, कर्नाटक में कांग्रेस की हार और महाराष्ट्र में मिला-जुला परिणाम—ये सभी अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों को दर्शाते हैं। किसी एक राज्य की सफलता को दूसरे राज्य में दोहराया हुआ जनादेश मानना उचित नहीं होगा। अंततः राजनीतिक दलों के लिए इन चुनावों की उपयोगिता इसी में है कि वे मतदाताओं के संदेश को समझें, संगठनात्मक कमियों की पहचान करें और जनता के मुद्दों पर अपनी जवाबदेही बढ़ाएं। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 29 Oct 2026 6:43 pm

Pakistan के खिलाफ Rajnath Singh के तेवर देख बगलें झांकने लगा America, India की Defence Diplomacy ने पूरी दुनिया में छोड़ा प्रभाव

राजनाथ सिंह की रक्षा कूटनीति ने अमेरिका के सामने भारत की सुरक्षा चिंताओं को जिस दृढ़ता और दोटूक अंदाज में रखा है, उसने पाकिस्तान को सैन्य सहायता देने के मुद्दे पर वाशिंगटन को भी असहज स्थिति में ला खड़ा किया। एफ-16 लड़ाकू विमानों के लिए अमेरिकी सहायता पैकेज पर भारत की कड़ी आपत्ति और पाकिस्तान को दी जाने वाली संवेदनशील तकनीक के तीसरे देश तक पहुंचने की आशंका उठाकर राजनाथ सिंह ने स्पष्ट कर दिया कि भारत अब अपनी सुरक्षा के सवाल पर किसी भी तरह की ढिलाई बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। आतंकवाद पर दोहरे मापदंडों के खिलाफ रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का सख्त संदेश इस बात का संकेत है कि भारत-अमेरिका की रणनीतिक साझेदारी अपनी जगह है, लेकिन पाकिस्तान के मामले में भारत अपने हितों से समझौता नहीं करेगा। देखा जाये तो रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक बार फिर साबित किया है कि बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन में भारत की रक्षा कूटनीति केवल बैठकों और औपचारिक बयानों तक सीमित नहीं है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों की स्पष्ट पैरवी करने, मित्र देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी मजबूत करने और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भारत की शर्तों को प्रभावी ढंग से सामने रखने का माध्यम भी है। इसे भी पढ़ें: Philippines ने भी लिया BrahMos, Rajnath Singh ने वैश्विक मंच पर दिखाई भारत की ताकत हम आपको बता दें कि फिलीपींस के सेबू में आसियान रक्षा मंत्रियों की बैठक के दौरान राजनाथ सिंह ने अमेरिका के सामने पाकिस्तान को एफ-16 लड़ाकू विमानों के लिए सहायता पैकेज देने का मुद्दा उठाया। इसके साथ ही जापान और ऑस्ट्रेलिया के रक्षा मंत्रियों के साथ उनकी मुलाकातों ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की बढ़ती रणनीतिक सक्रियता का एक महत्वपूर्ण संदेश दिया। राजनाथ सिंह ने भारत का पक्ष इतनी स्पष्टता से रखा कि वाशिंगटन के लिए पाकिस्तान को दी जाने वाली सैन्य सहायता के दुष्परिणामों पर जवाब देना और इस्लामाबाद का बचाव करना मुश्किल हो गया। अमेरिका के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के साथ बातचीत में राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान के एफ-16 कार्यक्रम से जुड़े सहायता पैकेज पर भारत की गंभीर चिंता व्यक्त की। हम आपको बता दें कि अमेरिका का 64.9 करोड़ डॉलर का यह पैकेज पाकिस्तान के लड़ाकू विमानों की परिचालन क्षमता और रखरखाव को मजबूत करने से जुड़ा है। इसमें एवियोनिक्स सुधार, तकनीकी उपकरण, स्पेयर पार्ट्स, प्रशिक्षण, सिमुलेटर और लॉजिस्टिक सहायता जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। भारत की आपत्ति का मूल प्रश्न यही है कि पाकिस्तान को मिलने वाली ऐसी सैन्य सहायता का वास्तविक इस्तेमाल किस उद्देश्य से होगा और इसका दक्षिण एशिया की सुरक्षा पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। भारत लंबे समय से सीमा पार आतंकवाद का मुद्दा उठाता रहा है। ऐसे में पाकिस्तान की सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने वाले किसी भी कदम को नई दिल्ली क्षेत्रीय सुरक्षा के व्यापक संदर्भ में देखती है। राजनाथ सिंह ने अमेरिकी पक्ष को इस बात के लिए भी आगाह किया कि पाकिस्तान को दी जाने वाली संवेदनशील सैन्य तकनीक किसी तीसरे देश तक पहुंच सकती है। देखा जाये तो यह चिंता केवल भारत-पाकिस्तान संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि तकनीकी सुरक्षा, हथियारों के प्रसार और व्यापक क्षेत्रीय सामरिक संतुलन से भी जुड़ी है। राजनाथ सिंह की कूटनीतिक पहल का महत्व इस बात में है कि भारत ने अपनी सुरक्षा संबंधी चिंताओं को सीधे अमेरिकी नेतृत्व के सामने स्पष्टता और दृढ़ता के साथ रखा है। भारत ने यह संदेश दिया है कि रणनीतिक साझेदारी अपनी जगह है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर वह चुप्पी नहीं साधेगा। आतंकवाद पर दोहरा मापदंड नहीं चलेगा राजनाथ सिंह ने अपने अमेरिकी समकक्ष के साथ बातचीत के दौरान आतंकवाद के खिलाफ शून्य-सहिष्णुता की नीति पर जोर दिया। उनका संदेश स्पष्ट था कि आतंकवादी संगठनों को समर्थन, प्रशिक्षण या वित्तीय सहायता देने वाले देशों के प्रति अंतरराष्ट्रीय समुदाय का रवैया सुसंगत और कठोर होना चाहिए। अमेरिकी रक्षा मंत्री ने भी सीमा पार आतंकवाद से मुकाबले में भारत के प्रति समर्थन दोहराया। यह भारत के लिए महत्वपूर्ण कूटनीतिक आधार है, क्योंकि आतंकवाद के विरुद्ध सहयोग तभी प्रभावी हो सकता है जब सुरक्षा संबंधी चिंताओं को केवल बयानों में नहीं, बल्कि व्यावहारिक नीतियों में भी जगह मिले। इसके अलावा, भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी के दस वर्षीय ढांचे की समीक्षा, सैन्य आदान-प्रदान, समुद्री सुरक्षा और रक्षा आपूर्ति शृंखलाओं पर चर्चा से यह भी स्पष्ट होता है कि दोनों देश अपने सहयोग को व्यापक रणनीतिक दिशा देना चाहते हैं। भारत का प्रयास है कि अमेरिका के साथ साझेदारी मजबूत बनी रहे, लेकिन उसके साथ ही पाकिस्तान को सैन्य सहायता देने जैसे मुद्दों पर भारतीय चिंताओं को नजरअंदाज न किया जाए। जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ ‘JAI’: हिंद-प्रशांत में रणनीतिक संदेश साथ ही राजनाथ सिंह की कूटनीति का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ उनकी बातचीत है। जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइज़ुमी के साथ चर्चा में समुद्री सुरक्षा, नौसैनिक जहाज निर्माण, डिजाइन और माइन काउंटरमेजर्स क्षमताओं में सहयोग जैसे मुद्दे शामिल रहे। जापान की तकनीकी विशेषज्ञता और भारत की विनिर्माण क्षमता को जोड़ने की संभावनाएं रक्षा औद्योगिक सहयोग को नई दिशा दे सकती हैं। जापान के साथ वायुसेना सहयोग बढ़ाने और रक्षा उद्योग से जुड़ी कंपनियों के बीच संपर्क मजबूत करने पर भी जोर दिया गया। यह सहयोग केवल सैन्य अभ्यासों तक सीमित नहीं है; इसका उद्देश्य दीर्घकाल में रक्षा क्षमताओं, तकनीकी सहयोग और औद्योगिक साझेदारी को मजबूत करना भी है। ऑस्ट्रेलिया के उपप्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री रिचर्ड मार्ल्स के साथ बैठक में दोनों देशों ने रक्षा सहयोग की समीक्षा की और आपसी समन्वय बढ़ाने पर चर्चा की। राजनाथ सिंह ने उन्हें फरवरी 2027 में बेंगलुरु में प्रस्तावित एयरो इंडिया में शामिल होने का निमंत्रण भी दिया। इसी बीच राजनाथ सिंह की जापानी और ऑस्ट्रेलियाई समकक्षों के साथ तस्वीर तथा उनका संदेश, ‘JAI: Japan, Australia, India’, विशेष राजनीतिक और रणनीतिक महत्व रखता है। यह तीनों देशों के बीच सहयोग, विश्वास और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में साझा हितों का प्रतीक है। एक स्वतंत्र, खुला और सुरक्षित हिंद-प्रशांत भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया की साझेदारी का प्रमुख आधार बना हुआ है। राजनाथ सिंह के नेतृत्व में रक्षा कूटनीति का व्यापक दृष्टिकोण इन बैठकों को एक साथ देखने पर राजनाथ सिंह की रक्षा कूटनीति के दो महत्वपूर्ण आयाम सामने आते हैं। एक तो अमेरिका जैसे प्रमुख रणनीतिक साझेदार के सामने पाकिस्तान को सैन्य सहायता देने के दुष्परिणामों पर स्पष्ट आपत्ति दर्ज कराना। दूसरा, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे विश्वसनीय साझेदारों के साथ रक्षा, तकनीक, समुद्री सुरक्षा और औद्योगिक सहयोग को आगे बढ़ाना। यही सक्रिय रक्षा कूटनीति की विशेषता है। भारत किसी एक देश के साथ संबंधों पर निर्भर रहने के बजाय कई स्तरों पर साझेदारियां मजबूत कर रहा है। वह अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए क्षेत्रीय सहयोग का दायरा भी बढ़ाना चाहता है। बहरहाल, पाकिस्तान को एफ-16 सहायता पर अमेरिकी मंत्री के सामने दोटूक आपत्ति और जापान-ऑस्ट्रेलिया के साथ ‘JAI’ का संदेश, ये दोनों घटनाक्रम मिलकर भारत की उस रक्षा नीति को रेखांकित करते हैं, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा पर दृढ़ता और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी का विस्तार साथ-साथ चलते हैं। राजनाथ सिंह के नेतृत्व में भारत की रक्षा कूटनीति का यही व्यापक दृष्टिकोण उसे बदलते वैश्विक परिदृश्य में अधिक सक्रिय और प्रभावशाली भूमिका निभाने का अवसर देता है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 29 Oct 2026 5:50 pm

महाराष्ट्र: नागपुर में अपनी जीत पर सीएम फडणवीस पर बरसी कांग्रेस, डिलीट पोस्ट को बनाया मुद्दा

महाराष्ट्र: नागपुर में अपनी जीत पर सीएम फडणवीस पर बरसी कांग्रेस, डिलीट पोस्ट को बनाया मुद्दा

समाचार नामा 29 Oct 2026 4:34 pm

'असहमति की आवाज को दबाने कोशिश,' शिक्षकों पर सीएम सुवेंदु के बयान पर सौगत रॉय का पलटवार

'असहमति की आवाज को दबाने कोशिश,' शिक्षकों पर सीएम सुवेंदु के बयान पर सौगत रॉय का पलटवार

समाचार नामा 29 Oct 2026 4:28 pm

नई पीढ़ी को बौद्धिक परतंत्रता और सांस्कृतिक अलगाव से बचाना जरुरी

संकटग्रस्त और बिखरती पारिवारिक व्यवस्था, ध्वस्त होते जीवन-मूल्य, अपनी जड़ों से उखड़ती पीढ़ी वर्तमान की सबसे बड़ी चुनौतियां हैं। इनके बीच उपनिवेशवादी मानसिकता से प्रभावित शिक्षा व्यवस्था हमें अभी भी जकड़े हुए है। अंग्रेजों के जाने के आठ दशक बाद भी अपनी शिक्षा व्यवस्था को हम उन संकटों से मुक्त नहीं करा पाए हैं, जो हमें हमारी लंबी दासता ने दिये थे। इस शिक्षा व्यवस्था के नाते 'इंडिया' से 'भारत' की ओर हमारा प्रवास संभव नहीं हो पा रहा है। धर्मपाल जी की किताब 'द ब्यूटीफुल ट्री' हमें जिस भारत के दर्शन कराती है, वहां प्रत्येक गांव में एक या अधिक स्कूल थे। ये हर तरह का ज्ञान और कौशल दे रहे थे। अंग्रेजों ने इस समूची भारतीय शिक्षा व्यवस्था का 'कैसे' ध्वंस किया? 'क्यों किया' यह जानना अनिवार्य है। महात्मा गांधी के आरंभिक लेखन में इस क्षत-विक्षत हो रहे भारत का दर्द दिखता है। अंग्रेजी शिक्षा ने हमें 'कमजोर और कम भारतीय' बनाया। साथ ही अपनी जमीन और उसके मूल्यों के प्रति हिकारत और हीनता बोध पैदा किया। यह आत्मदैन्य या 'एहसास-ए-कमतरी' आज भी हमें जकड़े हुए है। इसे भी पढ़ें: Education और Innovation को बढ़ावा देने के लिए 15 October को मनाते हैं World Students Day किताबों तक सिमटी शिक्षाः अंग्रेजी शिक्षा ने 'घर' और 'स्कूल' के बीच दूरी बनाई। इस पढ़ाई ने हमें यह सिखाया कि स्कूल कोई ऊंची जगह है और घर ठीक नहीं है। इस हीनता में फंसकर हमने अपनी संस्कारशाला 'परिवार' और उसके द्वारा दिए जा रहे मूल्यों को कमतर मान लिया। बच्चों में नैतिक मूल्य, आदर और सामाजिक जिम्मेदारियां परिवार और समाज द्वारा सिखाई जाती थीं। यह जिम्मेदारी भी पूरी तरह स्कूलों पर डाल दी गई। इससे परिवारों की भूमिका गौण होती चली गई । शिक्षा मुख्य रूप से किताबों और चार दीवारों तक सीमित हो गई। फलतः बच्चे घर के पारंपरिक कामकाज, खेती, दस्तकारी और व्यावहारिक जीवन के अनुभवों से दूर होते गए। ये सभी काम पहले घर के माध्यम से स्वतः सीखते थे। अंग्रेजों की नकल सिर्फ भाषा तक नहीं रही बल्कि वह हमारे जीवन में भी प्रवेश कर गई। खानपान, परिधान, दिनचर्या , कैलेण्डर सब बदल गये। स्कूल जब बदलते हैं तो वह पूरा सांस्कृतिक परिवेश बदलने की क्षमता रखते हैं। यह हमने हिंदुस्तान में होते हुए देखा। इसीलिए उस जमाने में भारत के गवर्नर जनरल रहे लॉर्ड विलियम बेंटिक ने कहा था, पढ़ने के बाद वे हमारी नकल करने लगे हैं। क्या से क्या हो गए देखते-देखतेः ऐसा देश जहां सब 'स्वधर्म' पर चलते हुए अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं। अगर उस समाज में घरों ताले नहीं हैं, चोरियां नहीं होती,लोग झूठ नहीं बोलते, ऊंच-नीच नहीं है तो सोचिए कि वह समाज और उसकी शिक्षा कैसी रही होगी? अनेक विदेशी यात्रियों ने भारत के बारे में अपने जो अनुभव दर्ज किए हैं। वे हैरान करने वाले हैं। अंग्रेजों ने अपनी शिक्षा व्यवस्था से भारतीय समाज का मानस बदल दिया। नतीजतन समाज बदला, उसके मूल्यों में व्यापक बदलाव हुए। सरकार, पुलिस, कोर्ट-कचहरी, प्रशासन तंत्र का महत्व बना। हमारी स्वायत्तता और समाज केंद्रित व्यवस्थाएं नष्ट हुईं। हम सरकार के सामने याचक की तरह खड़े हो गए। गांव उजड़ने लगे। स्थानीय उद्यम नष्ट हुए। कुटीर उद्योग तबाह हो गए। पारिवारिक कौशल नष्ट हुए। गैर-बराबरी बढ़ती गई। अपनी चीजों से ही नफ़रत करने वाला समाज विकसित हुआ। अंग्रेजी शिक्षा ने भारत में गहरे विभाजन पैदा किए। अलीट और नान अलीट का बंटवारा, 'भारत' और 'इंडिया' की पृथक पहचान बन गया। हम यह समझ ही नहीं पाए कि पांव छूने, नमस्कार करने और हाथ मिलाने में अंतर क्या है और श्रेष्ठ क्या है? हर जानकारी नहीं है ज्ञानः हर जानकारी ज्ञान नहीं है। इस शिक्षा व्यवस्था ने ज्ञान के नाम पर ढेरों जानकारियां परोस दीं। इनका जीवन संघर्षों में कोई उपयोग नहीं । हम 'मानने' को 'जानना' समझने लगे हैं। 'क्यों' का विचार मन में आता ही नहीं। अपनी जिस शिक्षा व्यवस्था से हमने 1750 में दुनिया का 33 प्रतिशत उत्पादन और व्यापार सुनिश्चित किया था । अंग्रेजी राज और उसकी शिक्षा ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा। अपनी स्वायत्तता से अग्रणी समाज कैसे सरकारी प्रशासनिक तंत्र से चौपट हो जाता, भारत इसकी ही कहानी है। नई अंग्रेजी शिक्षा मुक्त नहीं करती थी। बांधती थी। सेवक बनाने पर जोर था। जबकि गुरुकुल पद्धति, स्थानीय हस्तकलाएं, कृषि ज्ञान और स्वदेशी विज्ञान हाशिए पर चले गए। आधुनिक शिक्षा ने पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को नष्ट कर दिया। ये प्रणालियां स्थानीय समाज की जरूरतों के अनुकूल थीं। 'लोक' की उपेक्षा से ऐसा समाज खड़ा हुआ जो अपनी जड़ों से उखड़ा हुआ है। स्कूल आधुनिक और पश्चिमी मूल्यों को बढ़ावा देते रहे हैं, जबकि अधिकांश भारतीय घर पारंपरिक और सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़े होते हैं। इस वैचारिक अंतर के कारण घर और विद्यालय के परिवेश में टकराव की स्थिति उत्पन्न हो रही है। इस शिक्षा प्रणाली ने अंग्रेजों की नीतियों को सही ठहराने वाला एक ऐसा वर्ग तैयार किया जो मानसिक रूप से उपनिवेशवादी सोच का समर्थन करने लगा। इसने देश की आर्थिकी और बौद्धिक संपदा को परतंत्र बनाए रखा। जब तक हम अपनी माटी के ज्ञान और भाषा का सम्मान करना नहीं सीखेंगे, तब तक औपनिवेशिक छांव से पूरी तरह मुक्त होना असंभव है। अंग्रेजी की लंबी छायाः भारत ने स्थानीय भाषाओं में अपना सब कुछ विकसित किया था। अब अंग्रेजी थोप दी गई। वह सिर्फ भाषा की तरह नहीं “कौशल' की तरह आई। इसे न जानने वाले कमतर माने जाने लगे। शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होने के कारण आम जनता के लिए उच्च शिक्षा और विज्ञान के दरवाजे बंद हो गए। रटने वाली शिक्षा को बढ़ावा मिला, जिससे मौलिक सोच, अनुसंधान और स्वतंत्र चिंतन पर विपरीत प्रभाव पड़ा। अंग्रेजी जानने वाले शिक्षित वर्ग और पारंपरिक शिक्षा पाने वाले या अशिक्षित आम जनमानस के बीच एक गहरी खाई बन गई। ऐसे में 'कोलोनिजियम' को 'डिकोड' करने के जैसे सचेतन प्रयास किए जाने थे, हमने कहां किए? आज भी इसकी छाया आपको सरकारी कामकाज में दिखेगी। शिक्षा मंत्रालय को मानव संसाधन मंत्रालय बनाया गया। फिर उसे शिक्षा मंत्रालय बनाया गया है। जबकि संस्कृति मंत्रालय को शिक्षा से अलग रखा गया है। क्या संस्कृति और शिक्षा एक-दूसरे के पूरक नहीं हैं? गुलामी के लंबे कालखंड में आक्रांताओं ने हमारे विश्वविद्यालयों को बार-बार लूटा, नष्ट किया। अंग्रेजों ने जड़ों पर चोट की। मानसिकता बदली। हीन भावना भरी और हमारे अपने लोगों को हमारे विचार के विरुद्ध खड़ा कर दिया। इस संकट से आज भी हिंदुस्तान जूझ रहा है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम बौद्धिक गुलामी की बेड़ियों को तोड़ें, जो हमें अपनी ही माटी में पराया बनाती है। जब तक हमारी शिक्षा हमारी अपनी संस्कृति, भाषा और मौलिक चिंतन से नहीं जुड़ेगी, तब तक हम वास्तविक अर्थों में स्वतंत्र नहीं हो सकते। उपनिवेशवाद के छोड़े अंधेरों को मिटाकर ही हम एक आत्मविश्वासी, स्वदेशी और सशक्त भारतीय समाज का निर्माण कर सकते हैं। प्रो. संजय द्विवेदी (लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। भारतीय जन संचार संस्थान-आईआईएमसी के महानिदेशक रहे हैं।)

प्रभासाक्षी 29 Oct 2026 4:28 pm

आईआरसीटीसी मनी लॉन्ड्रिंग मामले में लालू यादव को दिल्ली हाईकोर्ट से राहत, ईडी को नोटिस

आईआरसीटीसी मनी लॉन्ड्रिंग मामले में लालू यादव को दिल्ली हाईकोर्ट से राहत, ईडी को नोटिस

समाचार नामा 29 Oct 2026 4:11 pm

एक नवंबर से डिफॉल्ट होगा डायरेक्ट प्लान: म्यूचुअल फंड्स

मुंबई, एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (एएमसी) के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर म्यूचुअल फंड स्कीमों में एक नवंबर से डायेक्ट प्लान डिफॉल्ट होंगे।

देशबन्धु 29 Oct 2026 2:31 pm

RSS के किले Nagpur और Modi के गढ़ Varanasi में BJP की करार हार से सत्ता पक्ष की नींद उड़ी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जैसे ही सोशल मीडिया पर कांग्रेस की सीटों की संख्या को लेकर तंज कसते हुए पूछा कि आखिर कांग्रेस को कितनी सीटें मिलीं, उसके कुछ ही समय बाद महाराष्ट्र के नागपुर में कांग्रेस ने जीत दर्ज कर अपना खाता खोल दिया। इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में भी भाजपा को दोनों विधान परिषद सीटों पर हार का सामना करना पड़ा और विपक्षी समाजवादी पार्टी ने जीत हासिल की। इस तरह कांग्रेस पर कटाक्ष करने की कोशिश में भाजपा खुद ही राजनीतिक कटाक्ष का निशाना बन गई। RSS के मुख्यालय नागपुर में कांग्रेस की जीत और मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में विपक्ष की सफलता ने इन MLC चुनावों के नतीजों को एक नया राजनीतिक मोड़ दे दिया। देखा जाये तो चार राज्यों के विधान परिषद चुनावों के नतीजों ने राष्ट्रीय राजनीति में एक दिलचस्प तस्वीर पेश की है। भाजपा के नेतृत्व वाले NDA ने कुल 28 सीटों में 16 पर जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस को केवल महाराष्ट्र की नागपुर स्नातक सीट पर सफलता मिली। लेकिन इन परिणामों का राजनीतिक महत्व केवल सीटों के कुल आंकड़े तक सीमित नहीं है। महाराष्ट्र में नागपुर और उत्तर प्रदेश में वाराणसी की हार ने भाजपा के लिए प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उसके संगठनात्मक प्रभाव पर चर्चा शुरू कर दी है। इसे भी पढ़ें: डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) कानून क्या है? इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती क्यों दी गई है? हम आपको बता दें कि महाराष्ट्र की नागपुर स्नातक निर्वाचन सीट पर कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने भाजपा के सुधाकर कोहले को 3,271 मतों से हराकर सीट बरकरार रखी। वंजारी को 67,231 और कोहले को 63,960 वोट मिले। लगभग दो दिन चली मतगणना में दूसरे वरीयता के मत निर्णायक साबित हुए। इस निर्वाचन क्षेत्र का महत्व इसलिए भी है कि नागपुर RSS का मुख्यालय होने के साथ-साथ मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का गृहक्षेत्र भी है। यह परिणाम भाजपा के लिए स्थानीय स्तर पर संगठन और मतदाता संपर्क की समीक्षा का अवसर है। गडकरी लंबे समय तक इसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं और भाजपा ने इस बार भी सीट वापस पाने के लिए अभियान चलाया था। इसके बावजूद कांग्रेस की लगातार दूसरी जीत बताती है कि मजबूत वैचारिक और संगठनात्मक आधार वाले क्षेत्र में भी चुनावी परिणाम स्वतः सुनिश्चित नहीं होते। दूसरी ओर, कांग्रेस ने इस जीत को भाजपा के शुरुआती दावों के जवाब के रूप में पेश किया। महाराष्ट्र कांग्रेस ने मुख्यमंत्री फडणवीस की उस सोशल मीडिया पोस्ट पर तंज कसा, जिसमें उन्होंने कांग्रेस के शून्य सीटों पर रहने की बात कही थी। नागपुर का परिणाम आने के बाद पार्टी ने उनकी पोस्ट हटाए जाने को लेकर भी कटाक्ष किया। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने इसे भाजपा के राजनीतिक दावों के लिए झटका बताया। वहीं उत्तर प्रदेश के चुनावों में वाराणसी का परिणाम और भी महत्वपूर्ण रहा। समाजवादी पार्टी ने वाराणसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में लाल बिहारी यादव के माध्यम से अपनी सीट बरकरार रखी। इसके साथ ही सपा के आशुतोष सिन्हा ने वाराणसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में भी जीत हासिल की। इस तरह प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र से जुड़ी दोनों विधान परिषद सीटें भाजपा के हाथ से निकल गईं। पूरे उत्तर प्रदेश में भाजपा ने 11 में से छह और सपा ने पांच सीटें जीतीं। वैसे इन नतीजों का अर्थ यह नहीं है कि वाराणसी के सभी मतदाताओं ने भाजपा के खिलाफ मतदान किया है। विधान परिषद के शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों का मतदाता वर्ग सीमित और विशिष्ट है। फिर भी, 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले वाराणसी में दोनों सीटों पर हार सपा के लिए राजनीतिक उत्साह बढ़ाने वाली और भाजपा के लिए स्थानीय संगठन की समीक्षा करने वाली घटना है। हम आपको यह भी बता दें कि प्रधानमंत्री मोदी ने MLC चुनावों में कांग्रेस के शुरुआती कमजोर प्रदर्शन पर तंज कसा था। इसके जवाब में कांग्रेस नेताओं ने नागपुर और वाराणसी के परिणामों को सामने रखकर भाजपा पर पलटवार किया। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि प्रधानमंत्री को कांग्रेस की सीटों की संख्या पर टिप्पणी करने के साथ यह भी आत्ममंथन करना चाहिए कि वाराणसी में भाजपा दोनों सीटें क्यों हार गई और RSS के गढ़ नागपुर में कांग्रेस ने जीत कैसे हासिल की? उन्होंने बेरोजगारी, महंगाई और निजी निवेश से जुड़े मुद्दों का उल्लेख करते हुए दावा किया कि मतदाताओं ने केंद्र सरकार की नीतियों के प्रति असंतोष जताया है। वहीं कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने भी प्रधानमंत्री की बैलेट पेपर वाली टिप्पणी पर पलटवार करते हुए नागपुर और वाराणसी के परिणामों का उल्लेख किया। उनका तर्क था कि यदि भाजपा बैलेट पेपर से हुए चुनावों के नतीजों को कांग्रेस की कमजोरी का प्रमाण बता रही है, तो उसे अपने उन क्षेत्रों में हार पर भी जवाब देना चाहिए जहां भाजपा की मजबूत राजनीतिक मौजूदगी मानी जाती है। दूसरी ओर, समग्र तस्वीर में NDA की 16 सीटों की जीत महत्वपूर्ण है। कर्नाटक में भाजपा-जेडीएस गठबंधन ने चारों सीटें जीतीं, उत्तर प्रदेश में भाजपा छह सीटों पर विजयी रही और बिहार में भाजपा-जदयू ने मिलकर चार सीटें हासिल कीं। दूसरी ओर, महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी ने पांच में से तीन सीटें जीतीं और उत्तर प्रदेश में सपा ने पांच सीटों पर सफलता हासिल की। इन परिणामों से तीन राजनीतिक संदेश निकलते हैं। एक तो NDA का कुल प्रदर्शन उसे मनोवैज्ञानिक बढ़त देता है। दूसरा, नागपुर और वाराणसी जैसे प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में हार भाजपा के लिए स्थानीय चुनावी समीकरणों और संगठनात्मक रणनीति की समीक्षा का विषय है। तीसरा, कांग्रेस और INDIA गठबंधन के लिए क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ समन्वय और चुनावी प्रदर्शन को मजबूत करना जरूरी है। बहरहाल, नागपुर और वाराणसी में भाजपा की हार को महज स्थानीय चुनावी घटनाक्रम बताकर खारिज नहीं किया जा सकता। एक ओर NDA ने कुल सीटों के आंकड़े में बढ़त बनाकर अपनी चुनावी ताकत का प्रदर्शन किया, तो दूसरी ओर विपक्ष ने उन क्षेत्रों में भाजपा को शिकस्त दी, जिनकी पहचान उसके मजबूत राजनीतिक प्रभाव से जुड़ी है। RSS के मुख्यालय नागपुर में कांग्रेस की जीत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में समाजवादी पार्टी की सफलता ने भाजपा के राजनीतिक दावों के बीच असहज सवाल खड़े कर दिए हैं। अब निगाहें आगामी विधानसभा चुनावों पर हैं, देखना होगा कि क्या विपक्ष इन प्रतीकात्मक जीतों को व्यापक जनसमर्थन में बदलकर भाजपा के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर पाएगा, या भाजपा इन झटकों से सबक लेकर अपने गढ़ों में फिर पकड़ मजबूत करेगी? -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 29 Oct 2026 2:30 pm

रबी फसलों की खरीद बढ़ी में बढ़ोतरी

नई दिल्ली, छह रबी फसलों की खरीद बढ़कर 2025-26 में 3,921 लाख मीट्रिक टन हो गई है, जो कि वित्त वर्ष 2004-05 में 2,302 लाख मीट्रिक टन थी।

देशबन्धु 29 Oct 2026 1:43 pm

चुनावों में मिली हार और पार्टी के भीतर बगावत के बीच एआईएडीएमके जिला सचिवों की बैठक 1 नवंबर को

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समाचार नामा 29 Oct 2026 12:28 pm

'लोकतंत्र के लिए खतरनाक', नसीरुद्दीन शाह की 'दिमागी नक्सल' टिप्पणी पर किरेन रिजिजू ने साधा निशाना

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समाचार नामा 29 Oct 2026 12:24 pm

मोदी के तंज से गरमाई सियासत, कांग्रेस का पलटवार; वाराणसी और नागपुर में BJP की हार पर उठाए सवाल

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री की टिप्पणी पर पलटवार करते हुए उन्हें 'प्रवचनमंत्री' कहकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को दूसरों को उपदेश देने के बजाय आत्मविश्लेषण करना चाहिए।

देशबन्धु 29 Oct 2026 11:29 am

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ओहियो रैली में की भारतीय मूल के रामास्वामी को जिताने की अपील

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समाचार नामा 29 Oct 2026 8:55 am

MLC चुनाव 2026: क्या बदल रही है राजनीति की हवा? आशुतोष का विश्लेषण

विधान परिषद चुनाव 2026 के नतीजों ने बीजेपी, कांग्रेस और विपक्ष की रणनीति पर सवाल खड़े किए। कर्नाटक, बिहार, यूपी और महाराष्ट्र में चुनावी नतीजों का क्या संकेत है? वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष का खास विश्लेषणः

सत्य हिंदी 29 Oct 2026 8:33 am

MLC Election Results: 4 राज्यों की 28 सीटों पर नतीजे घोषित, बीजेपी सबसे आगे; देखें विजेताओं की पूरी लिस्ट

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समाचार नामा 29 Oct 2026 8:30 am

क्या 1 नवंबर की रैली से डरी सरकार? कांग्रेस ने लगाया बड़ा आरोप

एआईसीसी महासचिव केसी वेणुगोपाल ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार घबरा गई है और 1 नवंबर को होने वाले 'दिल्ली चलो' मार्च और मेगा रैली के लिए देश भर से लोगों को दिल्ली पहुंचने से रोकने की कोशिश कर रही है।

देशबन्धु 29 Oct 2026 7:30 am

2027 की जंग की तैयारी शुरू! अमित शाह 30 अक्टूबर को लखनऊ से देंगे बड़ा संदेश

उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) 30 अक्टूबर को लखनऊ में प्रदेश कार्यसमिति की बैठक के जरिए संगठन की रणनीति और चुनावी तैयारियों को धार देगी

देशबन्धु 29 Oct 2026 7:20 am

व्यापारियों की गुहार सुनने के लिए राहुल गांधी के पास 20 मिनट भी नहीं है: तुहिन सिन्हा

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समाचार नामा 28 Oct 2026 10:34 pm

एमएलसी चुनाव नतीजों पर अमित शाह का तंज, पूछा- कांग्रेस ने 28 में से कितनी सीटें जीतीं?

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समाचार नामा 28 Oct 2026 10:27 pm

टाटा विवाद पर राहुल और निर्मला आमने-सामने, आरोपों से गरमाई सियासत

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के बीच टाटा समूह को लेकर बुधवार को वाकयुद्ध छिड़ गया

देशबन्धु 28 Oct 2026 10:23 pm

स्थानीय निकाय चुनावों में जीत पार्टी कार्यकर्ताओं की कड़ी मेहनत को दिखाती है: सीएम भजनलाल शर्मा

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समाचार नामा 28 Oct 2026 10:20 pm

योग्यता आधारित भर्ती से असम के युवाओं को समान अवसर मिल रहे हैं: मुख्यमंत्री सरमा

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समाचार नामा 28 Oct 2026 6:26 pm