अयोध्या दीपोत्सव की तैयारी तेज, योगी के नेतृत्व में इस बार और भव्य होगा आयोजन : वेदप्रकाश
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दिमासा भाषा के संरक्षण के लिए असम सरकार का बड़ा कदम, मंत्रियों का पैनल गठित
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भारत के कारोबारी जगत में एक बार फिर बड़ा उलटफेर हुआ है। एम3एम हुरुन इंडिया रिच लिस्ट 2026 ने गौतम अडानी और उनके परिवार को देश के सबसे अमीर परिवार के रूप में फिर से नंबर एक पर पहुंचा दिया है। अडानी परिवार की कुल संपत्ति अब 9.23 लाख करोड़ रुपये आंकी गई है, जबकि पिछले साल शीर्ष स्थान पर रहे मुकेश अंबानी और उनका परिवार 8.63 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति के साथ दूसरे स्थान पर है। यानी अडानी परिवार ने 59,400 करोड़ रुपये की बढ़त के साथ पहला स्थान हासिल किया है। यह वापसी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हाल के दिनों में अडानी समूह और स्वयं गौतम अडानी को लेकर कई विवाद खड़े किये गये थे। लेकिन विवादों से सफलतापूर्वक बाहर आते हुए अडानी की कारोबारी ताकत और उनके समूह से जुड़ी संपत्ति में फिर उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। एक साल में अडानी परिवार की संपत्ति 13 प्रतिशत बढ़ी, जबकि अंबानी परिवार की संपत्ति में 10 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इसे भी पढ़ें: BRICS Summit 2026: Gautam Adani से मिले Cyril Ramaphosa, भारत-दक्षिण अफ्रीका निवेश पर बड़ी चर्चा लेकिन इस कहानी की अहमियत सिर्फ इतनी नहीं है कि गौतम अडानी फिर से नंबर एक अमीर बन गए हैं। हुरुन की रिपोर्ट भारत में तेजी से बढ़ती संपत्ति की भी बड़ी तस्वीर दिखाती है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में अब 391 ऐसे अरबपति हैं जिनकी संपत्ति अमेरिकी डॉलर में एक अरब डॉलर या उससे ज्यादा है। पांच साल पहले ऐसे अरबपतियों की संख्या 237 थी। वहीं, कम से कम 1,000 करोड़ रुपये की संपत्ति रखने वाले भारतीयों की संख्या बढ़कर 1,810 हो गई है। इन सभी की कुल संपत्ति 187.5 लाख करोड़ रुपये है, जो भारत की अर्थव्यवस्था के आकार के करीब आधे के बराबर है। यानी भारत में सिर्फ अरबपतियों की संख्या ही नहीं बढ़ रही, बल्कि देश में बड़े पैमाने पर नई संपत्ति भी तैयार हो रही है। खास बात यह है कि यह संपत्ति वृद्धि ऐसे समय हुई जब शेयर बाजार में कमजोरी रही। इस अवधि में सूची में शामिल कुल संपत्ति 12.8 प्रतिशत बढ़ी, जबकि निफ्टी 50 में 3.9 प्रतिशत और सेंसेक्स में 5.8 प्रतिशत की गिरावट आई। इसका अर्थ यह है कि अमीरी की इस तस्वीर को केवल शेयर बाजार की तेजी से समझना गलत होगा। कारोबार में हिस्सेदारी, कंपनियों का मूल्यांकन, ऑर्डर बुक, उत्पादन क्षमता, बुनियादी ढांचे में निवेश और निर्यात मांग जैसे कारक इसमें बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। उधर, अडानी की वापसी इसी बदलते आर्थिक परिदृश्य से जुड़ी दिखाई देती है। हुरुन के मुताबिक एयरोस्पेस और रक्षा क्षेत्र की संपत्ति में 69 प्रतिशत की वृद्धि हुई। हरित ऊर्जा और औद्योगिक उत्पादों में 31-31 प्रतिशत, धातु एवं खनन में 30 प्रतिशत, औषधि क्षेत्र में 25 प्रतिशत और वित्तीय सेवाओं में 23 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। हुरुन के संस्थापक और मुख्य शोधकर्ता अनस रहमान जुनैद ने ऑर्डर बुक, बुनियादी ढांचे में निवेश, विनिर्माण क्षमता और निर्यात मांग को संपत्ति निर्माण के महत्वपूर्ण इंजन बताया है। बुनियादी ढांचा, ऊर्जा, औद्योगिक गतिविधियां, हरित ऊर्जा और अन्य बड़े पूंजीगत क्षेत्रों में निवेश उस व्यापक आर्थिक बदलाव से जुड़े हैं जिसे हुरुन ने इस सूची में दर्ज किया है। देखा जाये तो विकसित भारत के निर्माण की चर्चा में बुनियादी ढांचा, ऊर्जा सुरक्षा, विनिर्माण क्षमता, रक्षा उत्पादन और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्र केंद्रीय भूमिका रखते हैं। इस बीच भारत के सबसे अमीर परिवारों की तस्वीर भी बदल रही है। एलएन मित्तल परिवार 93 प्रतिशत की छलांग के साथ तीसरे स्थान पर पहुंच गया है और उसकी संपत्ति 3.39 लाख करोड़ रुपये हो गई है। अनिल अग्रवाल परिवार 87 प्रतिशत वृद्धि के साथ नौवें स्थान पर आया है, जबकि टॉरेंट फार्मास्यूटिकल्स से जुड़े समीर मेहता परिवार ने 52 प्रतिशत वृद्धि के बाद शीर्ष दस में जगह बनाई है। एक और बड़ा बदलाव यह है कि भारत की नई संपत्ति तेजी से तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रक्षा, सेमीकंडक्टर और हरित ऊर्जा से पैदा हो रही है। पहली बार कृत्रिम बुद्धिमत्ता को अलग संपत्ति-सृजन क्षेत्र के रूप में दर्ज किया गया है। इस क्षेत्र से जुड़े 19 लोग सूची में हैं, जिनकी संयुक्त संपत्ति 3.07 लाख करोड़ रुपये है। एआई, एयरोस्पेस एवं रक्षा और सेमीकंडक्टर क्षेत्र मिलकर 48 लोगों की 4.26 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। साथ ही भारत में औद्योगिक उत्पाद क्षेत्र सबसे बड़ा क्षेत्र बना हुआ है, जिसमें 166 नाम हैं। इसी क्षेत्र से 44 नए लोग सूची में आए। यह संकेत है कि भारत में संपत्ति निर्माण की कहानी केवल उपभोक्ता बाजार की नहीं, बल्कि कारखानों, उत्पादन, बुनियादी ढांचे, रक्षा, ऊर्जा और तकनीक की भी बन रही है। दूसरी तरफ उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं, खाद्य एवं पेय, उपभोक्ता वस्तुओं और खुदरा जैसे क्षेत्रों में संपत्ति में गिरावट दर्ज हुई। सबसे खास बात यह है कि भारत में नई संपत्ति का बड़ा हिस्सा अब लोग अपनी मेहनत और कारोबार के दम पर खड़ा कर रहे हैं। हुरुन की सूची में शामिल 1,266 उद्यमी यानी करीब 70 प्रतिशत लोग स्वनिर्मित हैं। पांच साल पहले यह आंकड़ा 55 प्रतिशत था। यानी अब पहले से कहीं ज्यादा भारतीय अपने दम पर कारोबार खड़ा कर रहे हैं और बड़ी संपत्ति बना रहे हैं। वहीं गौतम अडानी का फिर नंबर एक बनना इसी बड़ी आर्थिक कहानी का एक प्रमुख अध्याय है। 2022 में अडानी और अंबानी परिवारों की संयुक्त संपत्ति बाकी शीर्ष आठ परिवारों से 5.84 लाख करोड़ रुपये अधिक थी। 2026 में तस्वीर उलट गई है। दोनों की संयुक्त संपत्ति 17.86 लाख करोड़ रुपये है, जबकि बाकी आठ की कुल संपत्ति 21.15 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है। यानी भारत की संपत्ति अब धीरे-धीरे शीर्ष दो परिवारों से आगे भी फैल रही है। फिर भी अडानी की नंबर एक पर वापसी का संदेश साफ है। आलोचनाओं, बाजार के उतार-चढ़ाव और कारोबारी चुनौतियों के बीच उनकी संपत्ति में 13 प्रतिशत की वृद्धि हुई और वह फिर भारत के सबसे अमीर परिवार के शीर्ष स्थान पर पहुंच गए। बहरहाल, भारत की अर्थव्यवस्था जिस दिशा में बढ़ रही है, उसमें बुनियादी ढांचा, विनिर्माण, ऊर्जा, रक्षा, हरित ऊर्जा और नई तकनीक निर्णायक होते जा रहे हैं। अडानी की कारोबारी उपस्थिति इन क्षेत्रों के बड़े हिस्से में है। इसलिए उनकी वापसी सिर्फ अमीरी की सूची में नंबर बदलने की घटना नहीं, बल्कि भारत में पूंजी और संपत्ति निर्माण के बदलते केंद्रों की एक तस्वीर भी है। विकसित भारत की महत्वाकांक्षा को जमीन पर उतारने के लिए जिन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निवेश की जरूरत है, उनमें निजी क्षेत्र की भूमिका महत्वपूर्ण है और अडानी समूह की गतिविधियां इसी व्यापक निवेश चक्र का एक हिस्सा हैं। -नीरज कुमार दुबे
अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति थॉमस जैफर्सन ने बैंक्स और फाइनेंशियल स्टैब्लिशमेंट को देश की बॉर्डर पर तैनात आर्मी से भी ज्यादा खतरनाक बताया था। बात सही भी है। सरकारों को अपने प्रशासन, डिप्लोमेसी और युद्ध तक चलाने के लिए बैंक्स और कर्ज की जरूरत पड़ती ही हैं। जैफर्सन का इशारा इस बात पर था कि बैंक सिर्फ पैसे के लेन-देन की जगह नहीं हैं, बल्कि वे पूरे देश की नब्ज और सत्ता की रीढ़ हैं। जब यह रीढ़ कुछ दिनों के लिए भी काम करना बंद कर दे, तो पूरा देश ठहर जाता है। 28 सितंबर से यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (UFBU) की देशव्यापी हड़ताल इसी हकीकत की याद दिलाती है। फर्ज कीजिए महीने का आखिरी हफ्ता है। आपकी सैलरी आनी है। ईएमआई भी जानी होगी। किसी को चेक जमा करना है। किसी को बैंक से कैश निकालना है। और इसी बीच खबर आती है कि 28, 29 और 30 सितंबर को देश भर में बैंक स्ट्राइक होने वाली है। और कैलेंडर देखिए आप 26 सितंबर को फोर्थ सैटरडे है। बैंक की छुट्टी। 27 सितंबर संडे है बैंक की छुट्टी। और 28, 29 और 30 सितंबर को स्ट्राइक का कॉल है। यानी बैंक ब्रांच से काम करने वाले लोगों के लिए दिक्कत 3 दिन की नहीं लगातार 5 दिन तक खींच सकती है। फाइनेंस मिनिस्ट्री ने भी कहा है कि वीकेंड के साथ मिलकर यह स्ट्राइक बैंकिंग सर्विज पर 5 दिन जैसा असर डाल सकती है। तो सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बैंक कर्मचारी स्ट्राइक क्यों कर रहे हैं? आपके लिए सवाल है क्या 30 तारीख की सैलरी आएगी? यूपीआई चलेगा या नहीं चलेगा? एटीएम में पैसा मिलेगा या नहीं? चेक क्लियर होगा, ईएमआई कटेगी और आपका कोई जरूरी काम बैंक ब्रांच में अटका हुआ है तो क्या अभी निपटा लेना चाहिए? आखिर ऐसा क्या हो गया है कि लाखों बैंक कर्मचारी काम-काज चोड़कर सड़कों पर उतरने की तैयारी कर चुके हैं। सरकार इस मुद्दे पर क्या कर रही है? तमाम मामलों का एमआरआई स्कैन करेंगे। किसने बुलाई हड़ताल और क्यों बैंक कर्मचारियों के संगठन यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस UFBU ने इस हरताल को बुलाया है। बैंक कर्मचारियों का कहना है कि बैंक्स में हफ्ते में पांच दिन के काम की व्यवस्था होनी चाहिए और हर शनिवार छुट्टी होनी चाहिए। बैंक यूनियन की मुख्य मांग है कि हफ्ते में सिर्फ पांच दिन बैंक खोलने की व्यवस्ता लागू हो। अभी बैंक हर महीने के दूसरे और चौथे शनिवार को बंद रहते हैं लेकिन बाकी दो शनिवार काम होता है। यूनियंस चाहती हैं कि सभी शनिवार को छुट्टी हो और सोमवार से शुक्रवार तक बैंक काम करें। दूसरी बड़ी मांग पीएलआई यानि परफॉर्मेंश लिंक्ड इंसेंटिव की है। इस योजना को वापस लेने की मांग है। सरकार ने फिलहाल इस योजना को स्थगित कर दिया है। नए बैंक कर्मचारियों के लिए न्यू पेंशन स्कीम की जगह ओल्ड पेंशन स्कीम (ओपीएस) लागू करने की मांग की गई है। इसके अलावा पेंशन अपडेट करना, पेंशन पर युनिफॉर्म, डीए पेंशनर्स के लिए मेडिकल इंशोरेंस, प्रीमियम में राहत जैसी कई और मांगे भी है, जिन पर बैंक यूनियन सरकार से एक्शन की डिमांड कर रही है। इससे पहले 11 सितंबर को भी बैंक कर्मियों ने इनी मांगों को लेकर एक दिन की हड़ताल की थी। सरकार से बाचीत भी हुई थी, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकलने की वजह से अब वो तीन दिन की हड़ताल पर जा रहा है। म्युच्युअल फंड,इंशोरेंस प्रोडक्ट भी बेच रहे बैंक कर्मचारी बैंक कर्मचारियों की जितनी भी मांगे हैं उन में से सबसे बड़ी मांग जिस पर वो टस से मस नहीं होना चाहते वो 5-day वर्किंग है। बैंक कर्मियों के मुताबिक उन पर काम का बहुत जादा बोझ है, जिसके चलते वो ये डिमांड पिछले 10 साल से कर रहे है। बैंक कर्मियों के मुताबिक उनसे सामान्य बैंकिंग ऑपरेशन्स के अलावा भी कई काम कराए जाते सरकार की स्कीम्स लागू करना है। म्युचल फंड्स और इंशोरेंस जैसे प्रोडक्ट को बेचना है। ये भी काम बैंक वाले कर रहे हैं। कर्मचारियों के मुताबिक बैंकों की भर्ती प्रक्रिया बेहद ढीली है। जिसके चलते मैनपावर की कमी हमेशा बनी रहती है। इसी वज़ह से बैंकों में काम करने वाले लोग रोजाना 2-3 घंटे पहले ही ज्यादा काम करते है। बैंक कर्मचारियों के मताबिक एलआईसी जैसे कई फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन्स में 5-day working का नियम है यानी पांच दिन काम होता है तो बैंक में क्यों पांच दिन नहीं हो सकता। आप दस तरह के काम बैंक कर्मचारियों से करा रहे हैं, तो बैंक कर्मचारी कह रहे हैं कि हम भी तो इंसान हैं, हमारा भी परिवार है। क्या दिनभर सिर्फ नोट ही गिनते रहे। बैंक यूनियन्स के मुताबिक मार्च 2024 में इंडियन बैंक्स असोसियेशन आईवीए के साथ द्विपक्षीय समझोता हुआ और इसमें सहमती बनी थी। लेकिन इसे लागू करने के लिए अभी तक सरकार की आधिकारिक मंजूरी और अधिसूचना का इंतजार है। बैंक खुद किस तरह की दिक्कत की तैयारी कर रहे हैं एसबीआई ने कस्टमर्स के लिए एडवाइज़री जारी की है। बैंक ने कहा कि जो जरूरी बैंकिंग ट्रांजैक्शंस हैं उन्हें स्ट्राइक की तारीखों से पहले पूरा कर लें। कैश चाहिए तो एटीएम का इस्तेमाल करें। ADWM यानी ऐसी मशीन जहां से कई जगह कैश निकालने के साथ जमा भी किया जा सकता है। बैंक ने कस्टमर सर्विस पॉइंट्स इस्तेमाल करने के लिए भी कहा है और सबसे जरूरी इंटरनेट बैंकिंग, यo, मोबाइल बैंकिंग, यूपीआई और दूसरे डिजिटल चैनल्स को प्रेफर करने को कहा है। साथ में यह भी कि स्ट्राइक के दौरान जरूरी बैंकिंग सर्विज चालू रखने की पूरी कोशिश की जाएगी। ऐसे ही कुछ नोटिसेस बैंक ऑफ बौदा, Canरा बैंक, PNB सारे बैंक्स ने निकाले हैं। अगर आपका काम ब्रांच पर डिपेंड करता है बैंक की तो उसे आखिरी दिन के भरोसे मत छोड़िए। इस वक्त यूपीआई बिना किसी दिक्कत के चलेगा। यह स्ट्राइक बैंक कर्मचारियों की है। यूपीआई जैसे डिजिटल पेमेंट सिस्टम को बंद करने का कोई ऐलान नहीं है। इंटरनेट बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग और बैंक एप्स भी नॉर्मल रहेंगे। इसी तरह ऑनलाइन एनईएफटी और आरटीजीएस भी चलते रहने चाहिए। आरबीआई के मुताबिक एनईएफटी पूरे साल 24ों घंटे उपलब्ध है। आरटीजीएस भी 24 घंटे साल के चलता रहता है। हम 10 दिन का वेतन गंवा सकते हैं, क्या देश 10 दिन बैंक बंदी झेल सकता है? कर्मचारी यूनियनें हड़ताल के दौरान वेतन कटने के डर को अपनी सबसे बड़ी ताकत में तब्दील करने की अपील कर रही हैं। बैंककर्मियों का स्पष्ट तर्क है कि दो-तीन दिन या दस दिन का वेतन कटने से कर्मचारियों के घरों पर असर जरूर पड़ेगा, लेकिन वे झेल लेंगे। सवाल यह है कि क्या सरकार और देश की अर्थव्यवस्था बैंकों की राष्ट्रव्यापी पूर्ण बंदी को इतने दिन बर्दाश्त कर सकती है? कर्मचारियों का मानना है कि वेतन बचाने के लिए अगर वे आज पीछे हटे, तो उनकी बारगेनिंग पावर खत्म हो जाएगी, इसलिए वे अपनी सामूहिक ताकत दिखाने के मूड में हैं। संडे को भी खुलेंगे बैंक देशभर में सभी बैंक इस हफ्ते रविवार को भी खुले रहेंगे। वित्त मंत्रालय ने जानकारी दी है कि RBI ने 27 सितंबर को देश की सभी बैंक शाखाओं, दफ्तरों और एटीएम-लिंक ब्रांचों समेत सभी सर्विसेज को पूरी तरह चालू रखने की मंजूरी दी है। वित्त मंत्रालय ने कहा कि जनता की जरूरी बैंकिंग जरूरतों पर लंबे समय तक असर न पड़े, इसे सुनिश्चित करने के लिए सभी सरकारी बैंक और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक रविवार, 27 सितंबर को सामान्य रूप से काम करेंगे। रिजर्व बैंक ने सभी शाखाओं, कार्यालयों, एटीएम-लिंक ब्रांचों और करेंसी चेस्ट्स को इस दिन पूरी तरह चालू रखने की मंजूरी दी है। कर्मचारियों के भीतर सरकार और मैनेजमेंट के उस कदम को लेकर भी तीखा गुस्सा है, जिसके तहत रविवार (27 सितंबर) को शाखाएं या करेंसी चेस्ट खुलवाने की अनुमति ली गई थी। कर्मचारियों का कहना है कि एक रविवार को बैंक खोल देने से हड़ताल का असर कम नहीं होगा। अगर कर्मचारी सड़कों पर डटे रहे, तो हर गुजरते दिन के साथ ग्राहकों, कारोबारियों और पूरी अर्थव्यवस्था का दबाव सरकार पर बढ़ेगा। उनका संदेश साफ है कि जंग सिर्फ एक दिन की छुट्टी या काम की नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व और अधिकारों की पहचान कराने की है। सरकार का क्या कहना है? 21 सितंबर को सरकार ने कहा कि यूनियंस के साथ कई दौर की बातचीत और कंसिलिएशंस हुई हैं। बाकी मुद्दे बातचीत से हल किए जा सकते हैं और कर्मचारियों को स्ट्राइक से बचना चाहिए ताकि बैंकिंग सर्विज ना रुके। सरकार का दूसरा तर्क है कि शनिवार सिर्फ बैंक कर्मचारी के लिए वर्किंग डे नहीं है। कई कस्टमर्स, कई ग्राहक, आम लोग उसी दिन बैंक जाते हैं। 2015 में दूसरे और चौथे शनिवार को बैंक हॉलिडे मनाया गया था। लेकिन सरकार का कहना है कि बाकी शनिवार उन लोगों के लिए काम आते हैं जो सोमवार से शुक्रवार नौकरी या किसी दूसरे काम की वजह से ब्रांच नहीं जा पाते। तीसरा और इस बार सरकार का सबसे बड़ा कंसर्न है टाइमिंग। 30 सितंबर को हाफ ईयरली क्लोजिंग है। इस दिन बैंक सिर्फ सामान्य कस्टमर ट्रांजैक्शंस नहीं करते। बैंक अपने रिकॉर्ड्स भी मिलाते हैं। इसलिए फाइनेंस मिनिस्ट्री का कहना है कि इस वक्त स्ट्राइक का असर सिर्फ बैंक काउंटर तक नहीं रहेगा। बिजनेस, सरकारी ट्रांजैक्शन, इंटरनेशनल बैंकिंग तक असर पड़ सकता है। और सरकार सिर्फ अपील भी नहीं कर रही है, तैयारी भी कर रही है। डिपार्टमेंट ऑफ फाइनेंसियल सर्विज के 21 सितंबर के मेमो के मुताबिक 18 सितंबर को क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप की एक मीटिंग हुई। इसके बाद 21 सितंबर को पब्लिक सेक्टर बैंक्स, रीजनल रूरल बैंक्स और आईबीए के अधिकारियों के साथ स्ट्राइक की तैयारी पर चर्चा हुई। फिर होम मिनिस्ट्री से राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों को एडवाइज़री जारी करने में मदद मांगी गई। इसे भी पढ़ें: क्या सच में मनमर्जी करते हुए ज्ञानेश कुमार ने सरकार की शक्तियों को भी ठेंगा दिखा दिया? SIR के बीच चुनाव आयुक्तों में मतभेद की खबरों को ऑब्जर्वेशन और डिसेंट से समझें किस चीज की सुरक्षा के लिए? करेंसी चेस्ट यानी वो जगह जहां बैंकों के लिए बड़ी मात्रा में कैश रखा जाता है। चेक क्लियरिंग प्रोसेसिंग सेंटर्स, डाटा सेंटर्स, डाटा रिकवरी सेंटर्स, ट्रेजरी ऑपरेशन, आईटी सेंटर्स, साइबर सिक्योरिटी सेल, एटीएम साथ ही बैंक ब्रांच के आसपास लॉ एंड ऑर्डर बनाए रखने और जो कर्मचारी स्ट्राइक में शामिल नहीं है, उनकी सुरक्षा की बात भी कही गई है। राज्यों से स्ट्राइक से जुड़ी जानकारी और इंटेलिजेंस इनपुट भी मांगे गए हैं। तो सरकार की तैयारी सिर्फ इतनी नहीं है कि किसी तरह बैंक का शटर खुला रहे। कोशिश यह है कि बैंकिंग के पीछे चलने वाली पूरी मशीनरी, कैश, चेक, डाटा, आईटी, ट्रेजरी जितना हो सके वह चलता रहे। फाइनेंस मिनिस्ट्री ने बैंकों से यह भी कहा है कि एटीएम में इनफ कैश रखा जाए। जरूरी सर्विसेस के लिए बैकअप प्लान रहे और डिजिटल चैनल्स चलते रहें।
भारत और बांग्लादेश के कूटनीतिक संबंध पहले ही खराब दौर से गुजर रहे हैं। ऐसे में बांग्लादेश की तारिक रहमान सरकार ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृहराज्य गुजरात की हिलसा मछली का आयात रोक कर इस चिंगारी को और भड़का दिया है। हम आपको बता दें कि मंगलवार शाम बांग्लादेश ने भारत से हिलसा मंगाने वाले आयात परमिट रद्द कर दिए। पिछले करीब दो महीनों में बांग्लादेश लगभग 550 टन भारतीय हिलसा मंगा चुका था, लेकिन अब अचानक इस व्यापार पर रोक लगा दी गई है। मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यह फैसला ऐसे समय आया है जब बांग्लादेश खुद हिलसा की कमी और बढ़ती कीमतों से जूझ रहा है। यानी जिस भारतीय हिलसा की जरूरत बांग्लादेश के अपने बाजार को पड़ रही थी, उसी पर रोक लगाकर ढाका ने भारत के साथ पहले से तनावपूर्ण चल रहे रिश्तों में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। देखा जाये तो यह फैसला ऐसे समय आया है जब बांग्लादेश में हिलसा की स्थानीय पकड़ पिछले कुछ वर्षों के मुकाबले कमजोर हुई है और वहां कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। बांग्लादेशी मछुआरा महासंघ के अध्यक्ष रवींद्रनाथ बर्मन ने आरोप लगाया कि कुछ व्यापारियों ने भारत की गुजरात वाली हिलसा को बांग्लादेशी हिलसा बताकर बेचने की कोशिश की, जिससे उपभोक्ताओं के साथ धोखा हुआ। इसे भी पढ़ें: BRICS की सफलता और Mecca Pact की विफलता देख Bangladesh ने बदला रुख, नवंबर में India आने को आतुर हैं PM Tarique Rahman लेकिन असली कहानी इससे कहीं बड़ी है। हिलसा सिर्फ एक मछली नहीं है। बंगाली समाज में इसका स्वाद, परंपरा, धार्मिक रीति और सांस्कृतिक पहचान से गहरा संबंध है। बांग्लादेश इसे अपनी राष्ट्रीय मछली मानता है, जबकि पश्चिम बंगाल में भी पद्मा की हिलसा को विशेष प्रतिष्ठा हासिल है। हम आपको बता दें कि पद्मा गंगा की एक प्रमुख वितरिका है, जो आगे मेघना से मिलकर बंगाल की खाड़ी में जाती है। यही वजह है कि पद्मा और मेघना की हिलसा भारत में महंगी कीमत पर भी खरीदी जाती है। विडंबना देखिए कि बांग्लादेश लंबे समय से भारत को सीमित मात्रा में हिलसा भेजता रहा है, लेकिन दूसरी तरफ भारत से सैकड़ों टन हिलसा खरीद भी रहा है। पिछले दो महीनों में भारत से करीब 500 टन हिलसा बांग्लादेश पहुंची और अतिरिक्त 150 से 200 टन की प्रक्रिया भी चल रही थी। इनमें बड़ी मात्रा गुजरात के भरूच और नर्मदा क्षेत्र की हिलसा की बताई गई है। इसका कारण स्वाद से ज्यादा अर्थशास्त्र है। बांग्लादेश में पद्मा और मेघना की अच्छी हिलसा लगभग 2,200 से 2,800 टका प्रति किलो तक पहुंच सकती है, जबकि गुजरात की हिलसा वहां के थोक बाजार में लगभग 500 से 700 टका प्रति किलो की लागत पर पहुंचती है और खुदरा बाजार में करीब 1,500 से 1,800 टका प्रति किलो में बिक सकती है। यानी बांग्लादेश के लिए गुजरात की हिलसा स्थानीय कमी को पूरा करने का अपेक्षाकृत सस्ता माध्यम बन गई है। यही वह कारण है जहां बांग्लादेश का मौजूदा फैसला सवालों के घेरे में आता है। अगर भारतीय हिलसा वहां की आपूर्ति व्यवस्था, प्रसंस्करण उद्योग और कीमतों को संभालने में उपयोगी है, तो अचानक आयात परमिट रोकने से सबसे सीधा असर वहां के बाजार और उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है। दूसरी तरफ भारत में भी इसका असर होगा। पश्चिम बंगाल के व्यापारियों के अनुसार गुजरात में मौजूदा हिलसा की उपलब्धता भी सीमित हो चुकी है और कोलकाता के बाजार में म्यांमार की हिलसा ही एक प्रमुख विकल्प बच सकती है। भारत के लिए दूसरी बड़ी चुनौती घरेलू उत्पादन की है। पश्चिम बंगाल में हिलसा का उत्पादन वर्ष 2001 के करीब 80 हजार टन से घटकर 2013 में लगभग 15 हजार टन और 2020 में करीब 10 हजार टन रह गया था। इसके पीछे बंगाल की खाड़ी में अत्यधिक मछली पकड़ने को एक प्रमुख कारण बताया गया है। इसी कमी ने गुजरात की हिलसा के लिए बाजार तैयार किया। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनुसार गुजरात ने 2025-26 में करीब 14,588 टन हिलसा का उत्पादन किया। वहीं बांग्लादेश में भी हिलसा का उत्पादन गिरा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वार्षिक उत्पादन 2022 के 5,71,324 टन से घटकर 2025 में करीब 5 लाख टन रह गया। इसी दौरान कीमतों में भारी उछाल आया। ऐसे में भारत से आने वाली अपेक्षाकृत सस्ती हिलसा की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है। मगर सबसे बड़ा खतरा उपभोक्ता भरोसे का है। पश्चिम बंगाल और दिल्ली जैसे बाजारों में गुजरात और गंगा की हिलसा में अंतर करना कई खरीदारों के लिए आसान नहीं है। कुछ व्यापारियों ने खुद माना कि खरीदार को यह पता लगाना कठिन हो सकता है कि मछली वास्तव में कहां की है। ऐसे में गलत नाम से बिक्री का आरोप सिर्फ व्यापारिक विवाद नहीं, बल्कि खाद्य पारदर्शिता का मुद्दा भी बन जाता है। इस पूरे घटनाक्रम का व्यापक निहितार्थ साफ है। हिलसा अब सिर्फ स्वाद और परंपरा का विषय नहीं रही। यह सीमा-पार व्यापार, कीमत, स्थानीय उत्पादन, उपभोक्ता विश्वास और दोनों देशों के बाजारों की परस्पर निर्भरता का प्रतीक बन चुकी है। बांग्लादेश भारत से हिलसा खरीदकर अपनी कमी पूरी करता है, जबकि भारत में बंगाली उपभोक्ता बांग्लादेशी पद्मा हिलसा के लिए तरसते हैं। देखा जाये तो एक ही मछली है, लेकिन सीमा के दोनों ओर उसकी आर्थिक और सांस्कृतिक भूमिका अलग है। देखना होगा कि बांग्लादेश का यह परमिट-रोक फैसला अस्थायी प्रशासनिक कदम साबित होता है या हिलसा व्यापार में एक लंबी खींचतान की शुरुआत करता है। दुर्गापूजा से ठीक पहले लिया गया यह फैसला भारत के बाजार में पद्मा हिलसा की संभावित उपलब्धता पर भी असर डाल सकता है। उधर, बांग्लादेश के लिए भी चुनौती कम नहीं है क्योंकि जिस भारतीय आपूर्ति ने उसकी घरेलू और औद्योगिक जरूरतों में एक खाली जगह भरी है, उसे अचानक रोकने का असर अंततः वहां के बाजार पर ही दिखाई देगा। बहरहाल, हिलसा की यह कहानी अब सिर्फ स्वाद, परंपरा और बंगाली भावनाओं की कहानी नहीं रह गई है। यह भारत और बांग्लादेश के बीच बदलते व्यापारिक समीकरणों और एक-दूसरे पर निर्भर बाजारों की भी कहानी है। बांग्लादेश जिस भारतीय हिलसा को अपनी आपूर्ति की कमी पूरी करने के लिए खरीदता है, वही बांग्लादेशी पद्मा हिलसा भारत में दुर्लभता और प्रतिष्ठा के कारण सोने के भाव बिकती है। यानी एक ही मछली सीमा के इस पार भावनाओं की कीमत तय करती है और उस पार जरूरत की। ऐसे में अचानक व्यापार पर लगाई गई रोक सिर्फ मछली की आवाजाही रोकने का फैसला नहीं है। यह दोनों तरफ के बाजार, व्यापारियों और उपभोक्ताओं के लिए एक बड़ा सवाल छोड़ती है कि आखिर हिलसा के बहाने रिश्तों और व्यापार का यह खेल कब तक चलता रहेगा? -नीरज कुमार दुबे
वैश्विक संकेतों से लाल निशान में खुला भारतीय शेयर बाजार
मुंबई, कमजोर वैश्विक संकेतों से भारतीय शेयर बाजार गुरुवार को लाल निशान में खुला।
प्रधानमंत्री मोदी 24 सितंबर को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से 'सेवा यात्रा' के प्रतिभागियों से करेंगे संवाद
मतदाता सूची से लाखों नाम हटाना लोकतंत्र के लिए खतरा
चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया को लेकर जारी विवाद के बीच कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन 25 सितंबर को जयपुर पहुंचेंगे
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झारखंड भाजपा की सह-प्रभारी बनने पर निवेदिता सिंह ने जताई खुशी, बोलीं- 'संगठन को मजबूत करना प्राथमिकता'
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'जनता ने सिर्फ बयानबाजी और पोस्टरबाजी के लिए छोड़ा', सपा प्रमुख अखिलेश यादव पर बरसे संजय निषाद
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'वंदे मातरम' गैरकानूनी या राष्ट्रविरोधी नहीं, यह राष्ट्रभक्ति का प्रतीक : श्याम रजक
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नवनियुक्त प्रभारी-सह प्रभारी 'विकसित भारत' के सपने को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे : नितिन नवीन
पात्रा ने कहा कि 2014 के बाद से विपक्षी दलों को लगातार चुनावी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है और इसी कारण उनके मुताबिक अब चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
राजनीति में कुसंस्कार को बढ़ावा देती कांग्रेस
कांग्रेस पार्टी चुनावों में लगातार पराजय का सामना कर रही है जिसने पार्टी युवराज राहुल गांधी को हताश कर दिया है। उनको इस हताशा से उबारने के लिए कांग्रेस ने पेपर लीक तथा छात्रों की अन्य समस्याओं को आधार बनाकर “छात्रों की गूंज” नाम का अभियान अभियान आरंभ किया जिससे कांग्रेस तथा राहुल गाँधी को छात्रों व युवाओं के एकमात्र हितैषी के रूप में स्थापित किया जा सके। जेन ज़ी के जोर शोर और सोशल मीडिया पर तमाम हल्ले गुल्ले के साथ शुरू हुआ राहुल गांधी का छात्रों की गूंज कार्यक्रम पहले झूठे तथा गलत तथ्यों के कारण चर्चा में रहा और फिर अर्मादित, अनुशासनहीन व्यवहार के कारण। पहले चरण में मनुस्मृति के अपमान से आरम्भ हुआ ये कार्यक्रम अगले चरण में राहुल और संदीप दीक्षित ने द्वारा प्रधानमंत्री पर अशालीन कटाक्ष तक पहुंचा जिसमें एक विदेशी महिला राष्ट्राध्यक्ष पर अपमानजनक टिप्पणी की गयी, उसका विवाद अभी शांत भी नहीं हुआ था कि ये लोग इंदौर पहुँच गए। मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में 19 सितंबर 2026 को छात्रों की गूँज का आयोजन किया गया। यहाँ एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिमिक्री की गई उनकी विदेश नीति का मजाक बनाया गया। सोशल मीडिया इन्फ़्लुएन्सर पुलकित मणि ने उनकी मां का भी उपहास उड़ाया और राहुल गांधी ने उनका इस कुकृत्य में साथ दिया। इंदौर में जो कुछ हुआ उसकी निंदा केवल भारतीय जनता पार्टी ही नहीं अपितु कांग्रेस के सहयोगी समाजवादी पार्टी व शिवसेना का उद्धव गुट भी कर रहा है। मुंबई में शिवसेना नेता आनंद दुबे ने कहा कि मंच से किसी के परिवार के बारे में आपत्तिजनक बात करना उचित नहीं है। आने वाले समय में सभी राजनैतिक दलों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए। मर्यादा नहीं टूटनी चाहिए। भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस के इस कृत्य को सर्कस व राहुल गांधी को “असंस्कारी नाराज फूफा“ करार दिया है। इसे भी पढ़ें: छात्रों के कार्यक्रम में नकारात्मक राजनीति क्यों? कांग्रेस के मंच पर जिस प्रकार पुलकित मणि से मिमिक्री कराई गयी वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के निकृष्टतम उपयोग का उदाहरण है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राहुल गाँधी पर निशाना साधते हुए कहा कि मैं एक वीडियो देख रहा था जिसमें उन्होंने नारी शक्ति का अपमान किया है। लोगों में संस्कार नहीं है। हमारी परंपरा कहती है- पहले आप। रास्ते में बुजुर्ग, महिला, दिव्यांग को पहले जाने देना हमारा संस्कार है लेकिन जो भारत को अपमानित करने का लक्ष्य मान लेते हैं वे कुटुम्बकम भाव को नहीं समझ सकते। सत्य, असत्य और अर्धसत्य होता है और कुछ लोग अर्धसत्य कहकर ही भारत की छवि धूमिल करना चाहते हैं। राहुल के मंच से मोदी जी की मां का उपहास भारत माता का उपहास है, भारत की समस्त मातृशक्ति का उपहास है। मां के उपहास को भारत की मूल आत्मा कतई स्वीकार नहीं करेगी और न ही कभी माफ करने वाली है। यह सत्य है भारत की सनातन आस्था वाली आम जनता इस प्रकार से किए जाने वाले स्त्री अपमान को सहन नहीं करती और समय आने पर उत्तर देती है। बिहार विधान सभा चुनाव में कांग्रेस के मंच से पीएम मोदी की मां को गाली दी गई और बिहार में कांग्रेस का सफाया हो गया । इसी प्रकार राहुल गांधी अपने बयान, “लोग मंदिरों में लड़कियां छेड़ने के लिए जाते हैं” के बाद हुस अपना हश्र भी देख सकते हैं। राहुल गांधी पूरी तरह से भ्रम फ़ैलाने की राजनीति कर रहे हैं और विकृत मानसिकता से ग्रस्त हो चुके हैं। उनका एकमात्र लक्ष्य प्रधानमंत्री मोदी की छवि को धूमिल करना, सनातन संस्कृति को बदनाम करना तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर भरत की बदलती हुई तस्वीर की विकृत छवि प्रस्तुत करना है। किंतु हो इसका विपरीत रहा है राहुल गांधी अपने ही बुने जाल में फंसते जा रहे हैं। इससे उनका निकल पाना या सुधर जाना बहुत कठिन हो गया है । राहुल गांधी के असभ्य व्यवहार के कारण युवा वर्ग उनसे नहीं जुड़ पा रहा है। कांग्रेस का सबसे दुर्भाग्यूपर्ण पहलू यह है कि कोई भी वरिष्ठ नेता राहुल को समझाने के लिए आगे नहीं आता, उनको युवराज का दर्जा हासिल है इसके चाटुकार लोग इंदौर जैसी घटनाओं का समर्थन करने के लिए उतर पड़ते हैं। देश के युवाओं में आक्रोश है जिसके कारण कामेडियन पुलकित मणि के शो एक के बाद एक रद्द हो रहे हैं। राहुल गांधी के मंच से पर हुई मिमिक्री को हिंदुस्तान की हर मां और संपूर्ण मातृशक्ति का अपमान बताया जा रहा है लेकिन कांग्रेस के प्रवक्ता और आई टी सेल ण केवल इसके बचाव में लगे हैं वरन इसको मास्टर स्ट्रोक बता रहे हैं। उधर दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों ने छात्रसंघ के चुनाव परिणामों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को 3-1 से विजयी बनाकर बता दिया कि देश का युवा क्या पसंद करता है। - मृत्युंजय दीक्षित
छात्रों के कार्यक्रम में नकारात्मक राजनीति क्यों?
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति संवाद है। सरकार और विपक्ष के बीच वैचारिक विरोध होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन जब राजनीतिक संवाद का केंद्र नीतियों और जनसमस्याओं से हटकर व्यक्तियों पर टिप्पणियों, आरोपों, कटाक्षों और उपहास तक सीमित होने लगे तो लोकतांत्रिक विमर्श की गंभीरता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। वर्तमान में भारत की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यह है कि राजनीतिक दल रचनात्मक विरोध की जगह अनुचित आरोप प्रत्यारोप की परिधि में लगातार सक्रिय हैं। इस प्रकार की राजनीति देश के लोकतंत्र के उत्थान का मार्ग बिलकुल भी तैयार नहीं कर सकती। अभी कुछ पूर्व इंदौर में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम से जुड़ा मिमिक्री विवाद इसका ताजा उदाहरण है। कार्यक्रम का मूल विषय विद्यार्थियों की समस्याओं, शिक्षा, परीक्षाओं, रोजगार और छात्रावास जैसी चिंताओं से जुड़ा था। लेकिन ऐसा लगा कि कार्यक्रम अपने मूल उद्देश्य से भटक कर आरोपों और व्यक्तिगत खिल्ली उडाने पर ही केंद्रित होकर रह गया। आज चिंता इस बात की है कि छात्रों के सामने समस्या नहीं समाधान की चर्चा होना चाहिए। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने छात्रों के सामने इस अंदाज में अपनी बात रखने का प्रयास किया कि छात्र सरकार के विरोध में खड़े हो जाएं। जिन बातों का उल्लेख छात्रों के समक्ष होना चाहिए, वे मुद्दे भी कार्यक्रम में पूरी तरह गायब दिखाई दिए। ऐसे में सवाल उठता है कि हमारे राजनीतिक दल छात्रों को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं। इसे भी पढ़ें: प्रधानमंत्री की मां हो या गरीब की... Indore Mimicry Row पर Akhilesh Yadav का बड़ा बयान हालांकि कार्यक्रम में कुछ मुद्दों पर सरकार पर सवाल भी उठाए। लेकिन ऐसे सवाल छात्रों के बीच नहीं आना चाहिए। कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिमिक्री को लेकर शुरू हुआ विवाद देखते ही देखते राजनीतिक बहस का प्रमुख विषय बन गया। विपक्ष की ओर से इसे राजनीतिक व्यंग्य और अभिव्यक्ति के अधिकार के संदर्भ में देखा गया। क्या अभिव्यक्ति इस प्रकार की होना चाहिए, कदापि नहीं। यहां प्रश्न केवल मिमिक्री का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या राजनीतिक कार्यक्रमों में गंभीर मुद्दों को केंद्र में रखने के बजाय व्यक्तिगत कटाक्ष और उपहास को अधिक स्थान मिलना चाहिए? राजनीति में व्यंग्य कोई नई बात नहीं है। लोकतंत्र में व्यंग्य सत्ता से सवाल पूछने का माध्यम भी रहा है। नेता, सरकारें और नीतियां आलोचना के विषय बनती रही हैं। लेकिन व्यंग्य और व्यक्तिगत अवमानना के बीच एक महीन रेखा होती है। राजनीतिक विरोध कितना तीखा हो, यह राजनीतिक परिस्थितियां तय कर सकती हैं, लेकिन सार्वजनिक जीवन में भाषा और व्यवहार की मर्यादा का प्रश्न हमेशा बना रहता है। इंदौर की घटना में भी यही बहस सामने आई। इस पूरे प्रसंग से एक बड़ा सवाल जरूर निकलता है कि क्या विद्यार्थियों के मंच पर विद्यार्थियों के मूल प्रश्न पीछे छूट जाने चाहिए? यदि किसी छात्र को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल रही, यदि परीक्षा व्यवस्था को लेकर उसके मन में चिंता है, यदि रोजगार उसके भविष्य का सबसे बड़ा प्रश्न है या किसी छात्रा के सामने सुरक्षित और किफायती आवास की समस्या है, तो राजनीति का दायित्व है कि वह इन प्रश्नों को मजबूती से उठाए। इन सवालों के उत्तर भी उसी गंभीरता से मांगे जाने चाहिए। विपक्ष यदि सरकार की शिक्षा नीति से असहमत है तो उसे आंकड़ों के साथ अपना पक्ष रखना चाहिए। सरकार यदि विपक्ष के आरोपों को गलत मानती है तो उसे आंकड़ों और तथ्यों के साथ जवाब देना चाहिए। यही स्वस्थ लोकतांत्रिक बहस का रास्ता है। दुर्भाग्य यह है कि आज आरोप लगाना आसान हो गया है और आरोप का जवाब भी एक नए आरोप से देने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। एक नेता किसी नीति पर सवाल उठाता है तो जवाब में नीति की चर्चा करने के बजाय उसके पुराने बयान खोजे जाते हैं। किसी सरकार के निर्णय पर सवाल उठता है तो विपक्ष के पुराने कार्यकाल की कमियां गिनाई जाती हैं। किसी नेता की आलोचना होती है तो उसके जवाब में दूसरे नेता की आलोचना सामने आ जाती है। इस प्रकार राजनीतिक संवाद एक ऐसी प्रतिस्पर्धा में बदल जाता है जिसमें यह साबित करने की कोशिश होती है कि सामने वाला अधिक गलत है। लेकिन जनता का सवाल इससे अलग है कि आप क्या करेंगे? राजनीतिक दलों की ठोस योजनाएं क्या हैं। इन सवालों का उत्तर किसी आरोप से नहीं दिया जा सकता। राजनीति में व्यक्तिगत आक्षेप इसलिए भी चिंता का विषय हैं क्योंकि वे धीरे-धीरे राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा बन जाते हैं। नेता जिस भाषा का इस्तेमाल करते हैं, उसका प्रभाव समाज पर भी पड़ता है। समर्थक उसी भाषा को दोहराते हैं और फिर राजनीतिक मतभेद सामाजिक कटुता में बदलने लगते हैं। लोकतंत्र में विरोध होना चाहिए, लेकिन विरोध का अर्थ वैमनस्य नहीं है। आज विपक्ष की ओर से सरकार के प्रति पूरी तरह कटुता का व्यवहार किया जा रहा है। इंदौर के कार्यक्रम में भी कटुता का खेल खेला गया। क्या छात्र ऐसी कटुता को अपने उत्थान और विकास के लिए जरूरी मानते हैं। यह सवाल राजनीतिक दलों से पूछने का साहस भी छात्रों को करना चाहिए। यहां यह भी आवश्यक है कि इस प्रश्न को केवल एक दल या एक नेता तक सीमित न किया जाए। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, राजनीतिक मर्यादा की कसौटी सबके लिए समान होनी चाहिए। यदि विपक्ष किसी नेता की मिमिक्री करता है तो उसकी समीक्षा होनी चाहिए; यदि सत्ता पक्ष विपक्षी नेताओं पर व्यक्तिगत कटाक्ष करता है तो उस पर भी उतनी ही गंभीरता से सवाल उठना चाहिए। लोकतांत्रिक मर्यादा किसी एक दल की संपत्ति नहीं है। विपक्ष को भी लोकतान्त्रिक मर्यादा के तहत कार्यक्रम करना चाहिए। इंदौर का कार्यक्रम राजनीतिक सभा या रैली नहीं था, वह छात्रों का कार्यक्रम था, इसलिए इस कार्यक्रम में प्रथम दृष्टया राजनीतिक आरोप लगना ही नहीं चाहिए। राजनीतिक दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि वे अपने विरोधी को कितनी तीखी भाषा में जवाब दे सकते हैं। चुनौती यह है कि वे जनता के सामने अपनी नीतियों और योजनाओं को कितनी स्पष्टता से रख सकते हैं। आरोप-प्रत्यारोप से तालियां मिल सकती हैं, सोशल मीडिया पर चर्चा हो सकती है और समर्थकों का उत्साह भी बढ़ सकता है, लेकिन इससे समस्याओं का समाधान नहीं होता। बेरोजगार युवा को रोजगार चाहिए, उसे यह जानने में रुचि है कि सरकार और विपक्ष उसके लिए क्या करेंगे। विद्यार्थी को बेहतर शिक्षा चाहिए, उसे यह जानना है कि परीक्षा व्यवस्था कैसे विश्वसनीय बनेगी। परिवार को सुरक्षित भविष्य चाहिए, उसे राजनीतिक कटाक्षों से अधिक ठोस नीतियों की आवश्यकता है। इसलिए आज राजनीति को फिर से मुद्दों की ओर लौटने की जरूरत है। विरोध कीजिए, लेकिन नीतियों का विरोध कीजिए। सरकार से सवाल पूछिए, लेकिन तथ्यों के साथ पूछिए। विपक्ष के आरोपों का उत्तर दीजिए, लेकिन वैकल्पिक नीति के साथ दीजिए। व्यंग्य कीजिए, लेकिन ऐसी सीमा का ध्यान रखिए जहां राजनीतिक आलोचना व्यक्तिगत अपमान में न बदल जाए। लोकतंत्र में असहमति आवश्यक है, किंतु असहमति को संवाद में बदलना उससे भी अधिक आवश्यक है। राजनीति का उद्देश्य केवल यह सिद्ध करना नहीं होना चाहिए कि दूसरा पक्ष गलत है, राजनीति का बड़ा उद्देश्य यह बताना होना चाहिए कि जनता के लिए सही रास्ता क्या है और उस रास्ते पर चलने की योजना क्या है। आज जनता राजनीतिक दलों से यही अपेक्षा कर रही है कि वे आरोपों की राजनीति से आगे बढ़ें और समाधान की राजनीति को केंद्र में लाएं। यदि राजनीति लगातार व्यक्तियों के इर्द-गिर्द घूमती रही तो मुद्दे पीछे छूट जाएंगे। और जब मुद्दे पीछे छूटते हैं, तब लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष जनता की वास्तविक समस्याएं भी राजनीतिक विमर्श से बाहर होने लगती हैं। इसलिए समय की मांग स्पष्ट है कि कटाक्ष कम हों, संवाद बढ़े, आरोप कम हों, तथ्य बढ़ें और व्यक्तियों से अधिक मुद्दों पर राजनीति हो। यही लोकतंत्र की गरिमा भी है और जनता के प्रति राजनीति की वास्तविक जिम्मेदारी भी। - सुरेश हिंदुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार
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भाजपा के नए प्रदेश प्रभारी: नितिन नबीन ने बदली राज्यों की जिम्मेदारी, विनोद तावड़े को यूपी की कमान
भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन ने राज्यों के प्रभारियों की नई जिम्मेदारियां तय की हैं। विनोद तावड़े को यूपी और सतीश पूनिया को पंजाब का प्रभारी बनाया गया है।
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अगर अमेरिका ने सौ प्रतिशत का टैरिफ थोपा तो !
अमेरिकी संसद के दोनों सदनों से ‘सैंक्शनिंग रशा एंड ईरान एक्ट’ के पारित होने को लेकर देश में आशंकाओं के बादलों का उठना स्वाभाविक है। आज जिस आर्थिकी और विश्व व्यवस्था को तकरीबन पूरी दुनिया ने अपना रखा है, उसकी वजह से पूरी दुनिया को लगता है कि अमेरिका के सहयोग के बिना वह एक कदम आगे नहीं रख सकती। वैश्विक आर्थिकी में डालर के वर्चस्व के चलते ज्यादातर देशों को लगता है कि अगर अमेरिका की आंखें टेढ़ी हुईं तो उस पर महाविपत्ति आ जाएगी। इसी सोच का ही असर है कि इस अधिनियम के पारित होने के बाद भारत के प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस की नजर में भारतीय विदेश नीति नाकाम नजर आने लगी है। सैद्धांतिक रूप से भारतीय वामपंथी इकोसिस्टम अमेरिका का हर पल खुला विरोध करता है, लेकिन उसे भी अमेरिकी टैरिफ कानून भारतीय हित के खिलाफ नजर आ रहा है। इन सबके बीच भारत सरकार की प्रतिक्रिया संतुलित और सधी हुई है। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारत अपनी 140 करोड़ की आबादी की ऊर्जा सुरक्षा के लिए दृढ़ है। जाहिर है, भारत को झुकाने की सोच रखने वाले ट्रंप प्रशासन को ऐसी प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं रही होगी। ऐसे में अमेरिका के अगले कदम पर निगाह रखना ज्यादा जरूरी हो जाता है। रूस और ईरान से अगर भारत द्वारा तेल खरीदने का बुनियादी लक्ष्य रूस- यूक्रेन युद्ध को बढ़ावा देना या ईरान-इजरायल युद्ध में अमेरिका और इजरायल का विरोध नहीं है। दरअसल भारत मौजूदा माहौल में अपनी भारी-भरकम जनसंख्या के लिए किफायती ऊर्जा सुरक्षा को संरक्षित कर रहा है। इसलिए भारत का न झुकना देश के विपक्षी दलों और अमेरिकी सरकार के लिए हैरतअंगेज भले ही हो, भारतीय हितों के अनुकूल नहीं है। वैसे जब से ट्रंप ने अमेरिकी राष्ट्रपति का पद संभाला है, अपने ऊल-जलूल फैसलों के लिए ही वे जाने गए हैं। यह पहला मौका नहीं है कि उन्होंने इस कानून के जरिए भारत को दबाने की कोशिश की है। बीते साल एक अगस्त 2025 से उन्होंने भारतीय वस्तुओं पर 25 प्रतिशत का टैरिफ लगा दिया था। जिससे उनके ही बाजार में भारतीय वस्तुएं और सामान महंगे होने लगे थे। तब चालाकी दिखाते हुए ट्रंप प्रशासन ने फार्मास्युटिकल्स को इस टैरिफ से अलग रखा था। इसकी वजह यह है कि भारत से अमेरिका आने वाली दवाएं सस्ती पड़ती हैं। भारतीय रत्न और आभूषणों पर टैरिफ लगाने का बहुत असर नहीं पड़ा था। क्योंकि रत्न और आभूषण स्वभाव से ही महंगे होते हैं और उन्हें खरीदने वाले लोगों के लिए इनकी महंगाई मायने नहीं रखती। ठीक वैसे ही, जैसे भारत में महंगा होने के बावजूद सोने की खरीद-बिक्री पर असर नहीं पड़ा है। भारतीय सामान जब बढ़े टैरिफ के चलते अमेरिकी बाजार में महंगे होने लगे तो अमेरिका में भी ट्रंप प्रशासन के इस फैसले के खिलाफ सवाल उठने लगे। तब तक अमेरिकी प्रशासन को भी समझ आने लगा था कि उसने कैसा कदम उठाया है। इसका असर यह हुआ कि फरवरी 2026 में ट्रंप प्रशासन को टैरिफ में कटौती करनी पड़ी। इसे भी पढ़ें: इस बार भी मोदी नहीं जाएंगे UNGA, Jaishankar ही संभालेंगे मोर्चा, क्या Trump से आमना-सामना नहीं चाहते PM? पश्चिमी एशिया का हालिया संकट अमेरिका की ही देन है। जब से यह संकट बढ़ा है, भारत ने रूस से तेल की खरीददारी बढ़ा दी है। यह भारत की मजबूरी भी है। बीती जुलाई में भारत ने अपने कुल तेल आयात का 51.4 प्रतिशत तेल अकेले रूस से खरीदा था। रूस से तेल खरीद का भारतीय मकसद मौजूदा हालात में अपने लिए किफायती दरों पर तेल हासिल करना है। भारत का यह अधिकार है और मौजूदा हालात में अगर भारत झुकता है तो इसे भारतीय नागरिक शायद ही पसंद करेगा। भारत की तुलना में चीन ना सिर्फ रूस, बल्कि ईरान से भी भारी मात्रा में तेल खरीद रहा है। रूस से तेल खरीदना उसके लिए ज्यादा आसान और सस्ता है। चूंकि दोनों देशों की सीमाएं मिलती हैं और तेल की आपूर्ति पाइपलाइन के जरिए आसानी से होती है, इसलिए चीन भी टैरिफ युद्ध के निशाने पर होने के बावजूद तेल खरीद से पीछे नहीं हट रहा तो फिर हमें ही क्यों पीछे रहना चाहिए। इसमें दो राय नहीं कि अगर अमेरिकी राष्ट्रपति इस कानून के तहत भारत पर सौ प्रतिशत टैरिफ थोपते हैं तो भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात को बड़ा झटका लग सकता है। जानने की बात है कि भारत से अमेरिका भेजे जाने वाले सामानों में टेक्सटाइल्स, रत्न और आभूषण, आटोमोबाइल और इंजीनियरिंग उत्पाद ज्यादा है। टैरिफ अगर बढ़ेगा तो अमेरिकी बाजार में इनकी कीमतें महंगी होंगी, जिससे उनकी मांग घट सकतकी है। इससे भारतीय निर्यातकों को नुकसान हो सकता है। कुछ जानकारों को लगता है कि इससे रूस से जारी तेल खरीद से मिल रही अरबों रूपए की राहत खटाई में पड़ सकती है। यहां ध्यान देने की बात यह भी है कि भारत, अमेरिका से व्यापार समझौते को लेकर बातचीत जारी रखे हुए है। अगर सौ प्रतिशत टैरिफ लागू किया जाता है तो इस प्रस्तावित व्यापार समझौते में अड़चन आ सकती है। हो सकता है कि यह बातचीत ही खटाई में पड़ जाए। बेशक अमेरिका भारत का बड़ा कारोबारी साझीदार है। लेकिन मोदी के 2024 में सत्ता में आने के बाद से अब तक करीब चालीस देशों से मुक्त व्यापार समझौता किए जा चुके हैं। भारत ने हाल ही में यूरोपीय संघ से भी ऐसा समझौता किया है। भारत का मॉरीशस, संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रेलिया, यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ, ब्रिटेन, ओमान, न्यूजीलैंड आदि से मुक्त व्यापार समझौते या व्यापक आर्थिक साझेदारी का समझौता कर चुका है। भारत सरकार के ही आंकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अपने कारोबारी नेटवर्क का विस्तार करते हुए नौ बड़े मुक्त व्यापार समझौते भी किए हैं। यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ यानी ईएफटीए में आइसलैंड, लिकटेंस्टीन, नॉर्वे और स्विट्जरलैंड शामिल हैं। इसी तरह भारत ने आसियान देशों, जापान, दक्षिण कोरिया और साफ्टा के सदस्य देशों के साथ पारंपरिक कारोबारी समझौता कर चुका है। अगर अमेरिका भारत पर टैरिफ थोपता है तो देश को चाहिए कि इन देशों के जरिए कारोबार को बढ़ावा दे। वैसे भी टैरिफ थोपने की दशा में भारतीय कारोबारी दूसरे देशों के जरिए अमेरिका में अपना माल भेज सकते हैं। उम्मीद कर सकते हैं कि सरकार भी ऐसी राह तलाशने की कोशिश में जुटी होगी। फिर भारतीय अर्थव्यवस्था भी पहले जैसी नहीं रही, इसलिए हताश और चिंतित होने की जरूरत नहीं है, भारत को अमेरिकी बाजार में घुसने के लिए वैकल्पिक राहों की तलाश तेज करनी होगी। - उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं..
हैदराबाद, 23 सितंबर (आईएएनएस)। तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने बुधवार को अभिनेता नानी के उस अनुरोध का जवाब दिया, जिसमें उन्होंने हैदराबाद के आरटीसी एक्स रोड्स में अपनी फिल्म 'द पैराडाइज' के प्रीमियर शो में जाने की अनुमति मांगी थी।
बीमारी इंसान को केवल शारीरिक रूप से नहीं तोड़ती, बल्कि इलाज का खर्च कई परिवारों की आर्थिक कमर भी तोड़ देता है। ऐसे समय में जब कोई परिवार कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहा हो, तब जीवन बचाने वाली दवा की कीमत में दस गुना तक का अंतर सामने आए तो सवाल सिर्फ महंगी दवा का नहीं रह जाता, बल्कि पूरी व्यवस्था की जवाबदेही का बन जाता है। हम आपको बता दें कि सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को दवाओं की कीमतों में इसी भयावह अंतर पर गंभीर चिंता जताते हुए ऐसे सवाल उठाए हैं, जिनका जवाब सरकार, दवा कंपनियों, नियामक संस्थाओं और अस्पतालों, सभी को देना होगा। मामला उस समय बेहद गंभीर हो गया जब अदालत के सामने बताया गया कि कैंसर की एक आवश्यक दवा खुदरा विक्रेताओं को करीब 2,700 रुपये में उपलब्ध कराई जाती है, लेकिन उसी दवा पर 27,000 रुपये का अधिकतम खुदरा मूल्य अंकित है। यानी खुदरा मूल्य उस कीमत का लगभग दस गुना है जिस पर दवा खुदरा विक्रेता तक पहुंच रही है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने इस अंतर पर कड़ा सवाल उठाते हुए पूछा कि आखिर किसी मरीज से इतनी बड़ी रकम क्यों वसूली जानी चाहिए और जिन अधिकारियों को ऐसी व्यवस्था पर निगरानी रखनी चाहिए, वे चुप क्यों हैं। इसे भी पढ़ें: Facebook और X पर एंटी नेशनल कंटेंट हटाने की मांग खारिज, Supreme Court का दखल से इनकार देखा जाये तो यहां से सवालों की पूरी श्रृंखला शुरू होती है। अगर दवा की वास्तविक आपूर्ति कीमत और मरीज से वसूले जाने वाले मूल्य के बीच इतना बड़ा अंतर हो सकता है, तो मूल्य-निर्धारण की निगरानी कौन कर रहा है? अगर नियामक संस्थाएं मौजूद हैं, तो ऐसी कीमतें बाजार में पहुंचती कैसे हैं? और अगर नियम हैं, तो उनका पालन कराने की जिम्मेदारी किसकी है? सर्वोच्च न्यायालय ने इस अंतर को लेकर बेहद कठोर भाषा का इस्तेमाल किया और इसे मरीजों के साथ ‘दिनदहाड़े डकैती’ तथा ‘वसूली’ जैसे शब्दों से जोड़ा। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि जब जीवनरक्षक दवा की कीमत इतनी अधिक हो जाती है तो मजबूर मरीज क्या करे? अदालत के समक्ष यह बात भी रखी गई कि इलाज के लिए परिवारों को मकान और गहने तक बेचने पड़ते हैं। यही इस पूरे मामले का सबसे दर्दनाक पहलू है। देखा जाये तो एक स्वस्थ व्यक्ति किसी वस्तु की ऊंची कीमत देखकर उसे खरीदने से इंकार कर सकता है, लेकिन गंभीर बीमारी से जूझ रहा मरीज दवा को आसानी से मना नहीं कर सकता। कैंसर की दवा, हृदय की दवा या किसी दूसरी गंभीर बीमारी की आवश्यक औषधि उसके लिए विलासिता नहीं, जिंदगी की जरूरत है। ऐसे में मरीज और उसके परिवार की मजबूरी ही बाजार में उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है। सवाल यह भी है कि क्या किसी अस्पताल की अपनी दवा दुकान से ही दवा खरीदने के लिए मरीज को मजबूर किया जाना चाहिए? हम आपको बता दें कि याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि कुछ निजी अस्पताल मरीजों को बाहर से सस्ती दवा खरीदने की अनुमति नहीं देते और अस्पताल की ही दवा दुकान से महंगी दवा लेने के लिए मजबूर करते हैं। इन आरोपों की अंतिम कानूनी पुष्टि होना अभी बाकी है, लेकिन अदालत ने इन परिस्थितियों और कीमतों के अंतर को गंभीरता से लिया है। देखा जाये तो मामला तब और गंभीर हो जाता है जब सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का पैसा इसमें शामिल हो। सर्वोच्च न्यायालय ने चिंता जताई कि यदि किसी सरकारी स्वास्थ्य योजना के तहत अस्पताल महंगी कीमत पर दवा की प्रतिपूर्ति हासिल करता है, तो अंततः उस खर्च का भार करदाताओं पर पड़ सकता है। अदालत ने ऐसी स्थिति में सार्वजनिक धन के दुरुपयोग की आशंका पर भी सवाल उठाया। यहां सरकार और नियामक तंत्र से एक और बड़ा सवाल है। जब दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए व्यवस्था मौजूद है, तो क्या उसका दायरा पर्याप्त है? सुनवाई के दौरान यह मुद्दा सामने आया कि कई दवाएं मूल्य-सीमा के दायरे से बाहर हैं और गैर-अनुसूचित दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने को लेकर नियामकीय खालीपन मौजूद है। हालांकि इस पूरे मामले में यह भी जरूरी है कि हर ऊंची कीमत को अपने आप घोटाला या हर अस्पताल और दवा कंपनी को दोषी न माना जाए। अस्पतालों के एक प्रमुख संगठन ने हाल में कहा है कि दवाओं का अधिकतम खुदरा मूल्य अस्पताल तय नहीं करते और खरीद कीमत तथा मरीज से लिए गए मूल्य के अंतर को अलग-अलग परिस्थितियों में जांचना चाहिए। इसलिए असली जरूरत पारदर्शी जांच, कीमतों की स्पष्ट जानकारी और जिम्मेदारी तय करने की है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय की मौजूदा सुनवाई ने कम से कम एक महत्वपूर्ण दरवाजा खोल दिया है कि अब सवाल पूछा जा रहा है। और आम आदमी के लिए यही सबसे बड़ी उम्मीद है। अदालत ने केवल महंगी दवा की शिकायत सुनकर मामला आगे नहीं बढ़ाया, बल्कि यह पूछा कि कीमत तय करने की व्यवस्था क्या है, नियामक कहां है, मरीज पर इतना बोझ क्यों है और सार्वजनिक धन का इस्तेमाल किस तरह हो रहा है। हम आपको बता दें कि अगली सुनवाई 29 सितंबर 2026 को होनी है, जिसमें दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने और सस्ती जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता से जुड़े प्रस्तावों पर आगे विचार होना है। सर्वोच्च न्यायालय की यह सख्ती इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि स्वास्थ्य कोई ऐसा बाजार नहीं होना चाहिए जहां मरीज की मजबूरी मुनाफे का अवसर बन जाए। जरूरत अब सिर्फ तीखी टिप्पणियों की नहीं, बल्कि ऐसी ठोस व्यवस्था की है जिसमें दवा की वास्तविक लागत, निर्माता का मूल्य, खुदरा मूल्य और मरीज से वसूली जाने वाली रकम के बीच पारदर्शिता हो। क्योंकि बीमारी से लड़ रहा आम आदमी पहले ही जिंदगी की लड़ाई लड़ रहा है। उसे इलाज के नाम पर कीमतों की ऐसी भूलभुलैया में धकेलना, जहां वह अपनी जिंदगी बचाने के लिए घर-गहने बेचने को मजबूर हो जाए, तब इस व्यवस्था पर सवाल उठना बिल्कुल स्वाभाविक है। सर्वोच्च न्यायालय ने इन सवालों को अदालत की चौखट से बाहर समाज के सामने ला दिया है। अब निगाह इस बात पर है कि इन सवालों के बाद व्यवस्था बदलती है या फिर महंगी दवाओं का यह खेल उसी तरह चलता रहता है। -नीरज कुमार दुबे
‘आप बचेंगे नहीं’, चुनाव आयोग पर खुलासे को लेकर राहुल गांधी बोले- ये संविधान पर हमला
कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका को लेकर भी कई आरोप लगाए हैं। पार्टी का दावा है कि चुनाव आयोग के दो अन्य सदस्यों की ओर से पिछले कुछ महीनों में कई शिकायतें की गईं और महत्वपूर्ण फैसलों को लेकर उन्हें पर्याप्त जानकारी या परामर्श नहीं दिया गया।
क्या चुनाव आयोग के अंदर किसी की मनमर्जी चल रही है? आखिर क्या सच में दो चुनाव आयुक्तों ने नियम पालन न होने की शिकायत दर्ज कराई थी? क्या नए वोटरों को जोड़ने की प्रक्रिया में कोई अड़चने पैदा करने की कोशिश की गई। फॉर्म-6 की शक्तियों के मामले में सरकार की शक्तियों को भी ठेंगा दिखा दिया गया? चुनाव आयोग के जिन अधिकारियों को वोटर जोड़ने और हटाने का हक है, उनके हाथ क्या किसी ने बांध दिए? देशभर के वोटरों के डेटा को दिल्ली से कंट्रोल करने का चलन क्या शुरू किया गया? महीनों में 14 बार और एक ही दिन में कम से कम चार बार दो चुनाव आयुक्तिों को अपनी आपत्ति लिखित में दर्ज करानी पड़ी। इन आपत्तियों के बावजूद फैसले क्यों ले लिए गए। क्या सच में ऐसी परिस्थितियां बनी की चुनाव आयुक्तों को जाकर कैबिनेट सेक्रेटरी से शिकायत करनी पड़ गई। इसे भी पढ़ें: SIR पर अंदरूनी मतभेद की खबरों को चुनाव आयोग ने किया खारिज, कहा- 'सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए', विपक्ष का CEC ज्ञानेश कुमार पर तीखा हमला मीडिया रिपोर्ट में क्या कहा गया 10 महीनों में 14 बार बिना जानकारी लिए गए बड़े फैसले, दो चुनाव आयुक्तों ने दर्ज कराई लिखित आपत्ति भारतीय चुनाव आयोग (ECI) के भीतर कामकाज और पारदर्शिता को लेकर बड़ा अंदरूनी विवाद सामने आया है। द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट के मुताबिक, तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के दो चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में बिना उनकी जानकारी के लिए गए कई बड़े फैसलों और जारी किए गए आदेशों पर कड़ा ऐतराज जताया है। 10 महीनों में कम से कम 14 बार उठाई आपत्ति अखबार की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी द्वारा नवंबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच दर्ज की गई लिखित आपत्तियों की समीक्षा की गई है। इस दौरान दोनों आयुक्तों ने कम से कम 14 बार लिखित रूप से आपत्ति दर्ज कराते हुए सवाल किया कि आखिर उनकी सहमति और जानकारी के बिना ये आदेश और निर्णय कैसे जारी किए गए। रिपोर्ट के अनुसार, ये आपत्तियां मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को भी भेजी गई थीं। इसे भी पढ़ें: Election Commissioners की साख पर गहराया महा-संकट! निष्पक्षता पर उठी उंगली, क्या Supreme Court लेगा चुनाव आयोग में असहमति का स्वतः संज्ञान? किन अहम मुद्दों पर था दोनों आयुक्तों का ऐतराज? रिपोर्ट के मुताबिक, दो आयुक्तों द्वारा दर्ज की गई आपत्तियां मतदाता सूची और पंजीकरण प्रक्रिया से जुड़े अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण मामलों से संबंधित थीं। इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं: विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया: मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण से जुड़ी कार्यप्रणाली और उस पर लिए गए फैसले। फॉर्म-6 में बदलाव: नए मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़े फॉर्म-6 में किए गए संशोधन। मतदाताओं के नाम जोड़ना और हटाना: वोटर लिस्ट में नए नामों को शामिल करने और पुराने नामों को हटाने की प्रक्रिया। डेटा तक पहुंच: मतदाता सूची (Electoral Roll) के संवेदनशील डेटाबेस का रखरखाव और उसकी एक्सेस। अपील प्रक्रिया: मतदाता सूची से जुड़े निर्णयों के खिलाफ दायर होने वाली अपीलों की सुनवाई और निपटारे की व्यवस्था। चुनाव आयोग का जवाब चुनाव आयोग के सूत्रों ने उस मीडिया रिपोर्ट को खारिज कर दिया जिसमें दावा किया गया था कि स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) को लेकर चुनाव आयोग के अंदर मतभेद हैं। सूत्रों ने कहा कि SIR से जुड़े फैसलों समेत सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से सर्वसम्मति से लिए गए थे। सूत्रों ने कहा भारत के चुनाव आयोग के सभी फैसले, जिनमें SIR भी शामिल है, सर्वसम्मति से और दोनों चुनाव आयुक्तों तथा मुख्य चुनाव आयुक्त की मंजूरी से लिए गए हैं। ECI सूत्रों ने कहा कि हालांकि किसी भी मामले पर दोनों चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त की अपनी-अपनी राय हो सकती है, लेकिन भारत के चुनाव आयोग के सभी फैसले जिनमें SIR भी शामिल है। सर्वसम्मति से और दोनों चुनाव आयुक्तों तथा मुख्य चुनाव आयुक्त की मंजूरी से लिए गए हैं। भारतीय चुनाव आयोग (ECI) में फैसलों को लेकर सामने आई अंदरूनी आपत्तियों की खबरों के बीच अब आयोग से जुड़े सूत्रों का स्पष्टीकरण सामने आया है। सूत्रों के मुताबिक, विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े मसलों पर दोनों चुनाव आयुक्तों ने अपनी टिप्पणियां और सवाल जरूर रखे थे, जिन पर अंतिम फैसला लेने से पहले विचार भी किया गया था। हालांकि, किसी भी चुनाव आयुक्त ने अंतिम फैसले के खिलाफ कोई औपचारिक 'डिसेंट' (असहमति नोट) दर्ज नहीं कराया। आयोग का कहना है कि जिन फैसलों पर सवाल उठाए जा रहे हैं, उन सभी आदेशों पर तीनों सदस्यों के हस्ताक्षर मौजूद हैं। क्या होता है ऑब्जर्वेशन और डिसेंट में फर्क? चुनाव आयोग के सूत्रों का कहना है कि किसी भी नीतिगत मामले पर आंतरिक चर्चा के दौरान आयुक्तों द्वारा सवाल उठाना या टिप्पणियां (ऑब्जर्वेशन) करना एक सामान्य और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। ऑब्जर्वेशन (टिप्पणी/राय): चर्चा के दौरान किसी बिंदु पर स्पष्टीकरण मांगना या सुझाव देना। डिसेंट (औपचारिक असहमति): जब कोई आयुक्त बहुमत के अंतिम फैसले से पूरी तरह असहमत हो और आधिकारिक रिकॉर्ड पर अपनी असहमति दर्ज कराए। तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों की भूमिका व अधिकार बराबर होते हैं। यदि किसी मुद्दे पर मतभेद हो, तो निर्णय बहुमत के आधार पर लिया जाता है। यह स्पष्टीकरण उस मीडिया रिपोर्ट के बाद आया है जिसमें दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में SIR से जुड़े फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्ति जताई थी और कई कदम बिना उनकी जानकारी के उठाए जाने पर सवाल खड़े किए थे। पहले भी आयोग में दर्ज हो चुके हैं बड़े 'डिसेंट' चुनाव आयोग के कामकाज में आयुक्तों के बीच मतभेद या अलग राय दर्ज कराने का यह पहला मामला नहीं है। भारतीय चुनावी इतिहास में ऐसे कई अहम मौके आए हैं: 2019 का अशोक लवासा मामला: 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने आदर्श आचार संहिता से जुड़ी शिकायतों (जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण भी शामिल थे) के निपटारे पर अपने साथी आयुक्तों से अलग राय दर्ज कराई थी। 2009 का गोपालस्वामी विवाद: वर्ष 2009 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने सोनिया गांधी से जुड़े एक मामले में चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी और नवीन चावला के रुख से अलग औपचारिक राय रखी थी। एक सदस्यीय निकाय से तीन सदस्यीय आयोग तक का सफर वर्तमान में चुनाव आयोग तीन सदस्यीय निकाय के तौर पर काम करता है, लेकिन व्यवस्था हमेशा ऐसी नहीं थी। 1950 में जब निर्वाचन आयोग का गठन हुआ था, तब यह केवल मुख्य चुनाव आयुक्त वाला एक सदस्यीय निकाय था। 1950 से लेकर 1989 तक आयोग इसी एकल व्यवस्था के तहत संचालित होता रहा। बाद में इसे बहु-सदस्यीय बनाया गया, ताकि सभी महत्वपूर्ण चुनावी फैसलों में सामूहिक चर्चा और आम सहमति सुनिश्चित की जा सके। विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग की इस रिपोर्ट के बाद राजनीतिक प्रतिक्रिया हुई है; विपक्षी पार्टियों और नेताओं ने चुनाव आयोग के कामकाज पर सवाल उठाए हैं और CEC ज्ञानेश कुमार से जवाबदेही की मांग की है। मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कांग्रेस ने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार चुनाव आयोग को अपनी मर्ज़ी से चला रहे हैं। पार्टी ने कहा कि 'शिकायतों से साफ़ है कि तीन सदस्यों वाले चुनाव आयोग में सिर्फ़ ज्ञानेश कुमार की ही चलती है। कांग्रेस ने कुमार पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इशारे पर काम करने का आरोप लगाया और चुनाव आयोग में 'वोट चोरी' और राजनीतिक दखलंदाज़ी के अपने पुराने आरोपों को दोहराया। पार्टी ने कहा ज्ञानेश अपने बॉस मोदी की तरह ही तानाशाह की तरह काम कर रहे हैं और मोदी को खुश करने के लिए 'वोट चोरी' में लगे हैं। हमने पहले भी कहा है - मोदी ने चुनाव आयोग पर कब्ज़ा कर लिया है। ज्ञानेश कुमार मोदी की कठपुतली हैं। इंडियन एक्सप्रेस की यह रिपोर्ट इस बात को साबित करती है। मोदी और ज्ञानेश ने मिलकर देश के लोकतंत्र को भारी नुकसान पहुँचाया है। लेकिन याद रखें - जब समय आएगा, तो सभी को जवाबदेह ठहराया जाएगा, ज़िम्मेदारी तय की जाएगी। इस अपराध के लिए सज़ा ज़रूर मिलेगी। समाजवादी पार्टी (SP) के प्रमुख अखिलेश यादव ने इस रिपोर्ट को 'बेहद गंभीर' बताया और आरोप लगाया कि चुनाव आयुक्त अपनी सही ज़िम्मेदारियाँ नहीं निभा पा रहे हैं। उन्होंने तर्क दिया कि अगर किसी स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के सदस्य फ़ैसले लेने के लिए आज़ाद नहीं हैं या उनकी चिंताओं को नहीं सुना जाता है, तो इसके लोकतंत्र पर गंभीर असर पड़ेंगे। समाजवादी पार्टी के नेता ने कहा, इसका सीधा मतलब है कि सभी चुनाव आयुक्त अपनी सही ज़िम्मेदारियाँ नहीं निभा पा रहे हैं। अगर किसी स्वतंत्र संस्था के सदस्यों को सही काम करने की आज़ादी नहीं है या उनकी बात नहीं सुनी जाती है, तो ये लोकतंत्र के लिए बेहद घातक और खतरनाक हालात हैं। सत्ता में बैठे लोगों के हाथों की कठपुतली बनकर लोकतंत्र के साथ धोखा करना एक गंभीर संवैधानिक अपराध है। यह लोकतंत्र को खत्म करने की साज़िश से कम नहीं है। यादव ने सुप्रीम कोर्ट से भी इस मामले का स्वतः संज्ञान लेने की अपील की। TMC सांसद अभिषेक बनर्जी ने CEC को तुरंत हटाने और कोर्ट की निगरानी में जाँच के आदेश देने की माँग की। उन्होंने कहा, सिर्फ़ एक राजनीतिक पार्टी को फ़ायदा पहुँचाने के लिए लाखों वोटरों को वोट देने के अधिकार से वंचित करना हमारे लोकतंत्र की नींव पर प्रहार है। इसके लिए ज़िम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। पश्चिम बंगाल चुनावों के बाद, INDIA गठबंधन की सभी विपक्षी पार्टियों ने CJI और SC जजों को पत्र लिखकर गंभीर चिंताएँ जताई थीं। हालाँकि, उन आरोपों की न तो जाँच हुई और न ही उन पर ज़रूरी गौर किया गया। जब लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले गंभीर सवाल बार-बार उठाए जाते हैं और फिर भी उन पर कोई सुनवाई नहीं होती, तो इससे संस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठना लाज़मी है। सुप्रीम कोर्ट इससे मुँह नहीं मोड़ सकता। अंतिम ज़िम्मेदारी उसी की है। क्या CJI की अध्यक्षता वाली बेंच इस पर कोई कदम उठाएगी?
कच्चे तेल की कीमतों में नरमी से भारतीय शेयर में बाजार बढ़त
मुंबई, भारतीय शेयर बाजार मंगलवार के कारोबारी सत्र में तेजी के साथ खुला। सुबह 9:20 पर सेंसेक्स 260 अंक या 0.36 प्रतिशत की तेजी के साथ 74,782 और निफ्टी 83 अंक या 0.35 प्रतिशत की मजबूती के साथ 23,411 पर था।
Meta Share Surge: एक दिन में 2 लाख करोड़ रुपये बढ़ी मार्क जुकरबर्ग की दौलत, AI रणनीति से मिला बड़ा फायदा
रामपुर के मौलाना बोले- 'यूपी के अंदर कांग्रेस में अपने बलबूते सरकार बनाने का दम नहीं', इमरान मसूद को भी दिया जवाब
पंजाब: विधानसभा चुनाव से पहले ड्रग्स के पैसे को लेकर चिंताएं
पंजाब में विधानसभा चुनाव होने में कुछ ही महीने बचे हैं। नशीले पदार्थों की जब्ती और नार्को-टेररिज्म के नेटवर्क का भंडाफोड़ होने की लगातार खबरें आ रही हैं और इस पर सख्ती भी बरती जा रही है, फिर भी समाज के एक वर्ग का नशीले पदार्थों के गैर-कानूनी और अनैतिक धंधे में शामिल होना जारी है, जो चिंता का विषय बना हुआ है।
'आप' में शामिल होने पर कोई डील नहीं हुई, भगवंत मान के विजन से प्रभावित: रविंदर सिंह ब्रह्मपुरा
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तेलंगाना: एससी-एसटी समुदायों के यौन उत्पीड़न पीड़ितों को 'ग्रीन चैनल' से फंड जारी करने का निर्देश
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भाजपा की संगठनात्मक भूमिका जिम्मेदारी है, पद नहीं : हरियाणा सीएम सैनी
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चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग की तीन दिवसीय अमेरिका यात्रा के कूटनीतिक मायने
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निमंत्रण पर 23 से 25 सितंबर 2026 तक अमेरिका की राजकीय यात्रा पर रहेंगे। शी जिनपिंग 23 सितंबर को वाशिंगटन पहुंचेंगे। उनका यह दौरा 25 सितंबर को समाप्त होगा, जिसके बाद उनकी वापसी होगी। इस दौरान दोनों नेताओं के बीच शिखर वार्ता होगी, जिसमें व्यापार, टैरिफ, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और अन्य वैश्विक मुद्दों पर चर्चा की जाएगी। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की अमेरिका यात्रा वैश्विक भू-राजनीति (Geopolitics) और दोनों देशों के रिश्तों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा शी जिनपिंग का स्वागत करने और स्टेट डिनर देने के फैसले से साफ है कि दोनों महाशक्तियां तनाव को कम कर नए तालमेल की ओर बढ़ना चाहती हैं। लिहाजा इस यात्रा पर पूरी दुनिया के कूटनीतिज्ञों की नजर होगी। इस पर रूस और भारत की खास नजर बनी रहेगी, क्योंकि अमेरिका चाहेगा कि रूस और भारत से प्रगाढ़ हो रहे चीन के रिश्तों में कुछ खलल पैदा किया जाए। चूंकि अमेरिका ने सोवियत संघ और भारत के खिलाफ चीन को रणनीतिक मजबूती दी थी, लेकिन बाद में भी उसकी भूल साबित हुई। चीन को काबू में रखने के लिए अमेरिका ने भारत को शह दिया, लेकिन यहां भी उसका दांव उल्टा पड़ गया। इसलिए अमेरिका अब रूस और चीन से वन टू वन, और फिर जी-3 के माध्यम से बातचीत करने को उतावला है ताकि भारत, जापान, फ्रांस, दक्षिण कोरिया, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और ईरान जैसे महत्वाकांक्षी देशों को काबू में रखा जा सके। लेकिन यदि चीन व्यवहारिक कूटनीति को छोड़कर अमेरिकी मायाजाल में फंसता है तो फिर कहीं का नहीं रहेगा, क्योंकि भारत और रूस की समझदारी इतनी परिपक्व व मजबूत है कि उन्हें आंख दिखाने वाले उसी अंतर्राष्ट्रीय फजीहत को प्राप्त करेंगे, जैसा कि अभी अमेरिका भुगत रहा है। # इस यात्रा के प्रमुख कूटनीतिक मायने: एक, व्यापार युद्ध और टैरिफ में संतुलन: अमेरिका द्वारा चीनी सामानों पर अत्यधिक टैरिफ और निर्यात प्रतिबंध लगाने के बावजूद चीन ने रेयर अर्थ खनिजों और महत्वपूर्ण तकनीकों की सप्लाई रोककर कड़ा रुख अपनाया। इस यात्रा का प्राथमिक उद्देश्य नए व्यापारिक समझौते की रूपरेखा तैयार करना और दोनों देशों के बीच जारी आर्थिक/व्यापारिक तनाव को कम करना है। दो, रेयर अर्थ और AI की होड़: स्मार्टफोन, रक्षा सामग्री, इलेक्ट्रिक वाहनों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के लिए आवश्यक रेयर अर्थ खनिजों की वैश्विक आपूर्ति पर चीन का नियंत्रण है। अमेरिका अपनी सप्लाई चेन को सुरक्षित रखना चाहता है, जबकि चीन अमेरिका द्वारा सेमीकंडक्टर/चिप तकनीक पर लगाए गए प्रतिबंधों में ढील चाहता है। तीन, वैश्विक स्थिरता और मध्य-पूर्व संकट: दुनिया के दो बड़े नेताओं का मिलना वैश्विक बाजारों और अर्थव्यवस्था में स्थिरता का संदेश देता है। वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ते तनाव और रणनीतिक समुद्री रास्तों को सुचारू रखने जैसे मुद्दों पर दोनों देश कूटनीतिक सहयोग की गुंजाइश तलाश रहे हैं। चार, ताइवान और क्षेत्रीय सुरक्षा: चीन हमेशा से ताइवान पर अपने संप्रभु अधिकारों का दावा करता आया है। इस बैठक में अमेरिकी हथियारों की ताइवान को बिक्री पर चर्चा हो सकती है। बीजिंग इस मंच का इस्तेमाल अमेरिका को ताइवान के मामले में हस्तक्षेप कम करने का कूटनीतिक दबाव बनाने के लिए करेगा। # कूटनीतिक संदर्भ के क्षेत्र, अमेरिकी हित और चीनी हित व्यापार में अमेरिकी सोयाबीन व कृषि उत्पादों की बिक्री व बाजार पहुंच पर डील करेगा, जबकि चीन टैरिफ दरों में कमी और आर्थिक स्थिरता पर जोर देगा। - तकनीक में अमेरिका AI और सेमीकंडक्टर क्षेत्र में अपनी बढ़त बनाए रखना चाहेगा, जबकि चीन अमेरिकी टेक एक्सपोर्ट बैन और प्रतिबंधों से राहत चाहेगा। - सप्लाई चेन में अमेरिका रेयर अर्थ मिनरल्स की बिना बाधा आपूर्ति चाहेगा, जबकि चीन वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग में केंद्रीय भूमिका बनाए रखना चाहेगा। # अमेरिका और चीन की डील से भारत और रूस पर क्या- क्या असर पड़ सकते हैं? अमेरिका और चीन की यह द्विपक्षीय बातचीत और 'प्रबंधित प्रतिस्पर्धा' की दिशा में कदम भारत और रूस के रणनीतिक और आर्थिक हितों पर गहरा प्रभाव डालते हैं, क्योंकि अमेरिका और चीन पुराने अंतर्राष्ट्रीय सहयोगी रहे हैं? # अमेरिका और चीन की डील से भारत पर असर एक, सामरिक दबाव : भारत के लिए अमेरिका-चीन का संबंध एक दोधारी तलवार है। यदि अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक या रणनीतिक सहमति बनती है, तो भारत को डर रहता है कि अमेरिका इंडो-पैसिफिक रीजन में चीन के खिलाफ उतनी सख्ती नहीं दिखाएगा, जितनी भारत अपनी सुरक्षा (जैसे LAC विवाद) के लिए चाहता है। दो, क्वाड (QUAD) का भविष्य: यदि ट्रंप-शी वार्ता से दोनों देशों के बीच तनाव कम होता है, तो 'क्वाड' (अमेरिका, भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया) का जो सैन्य और रणनीतिक जोर चीन को घेरने पर था, वह थोड़ा सुस्त पड़ सकता है। तीन, सप्लाई चेन और व्यापार: चीन और अमेरिका के बीच व्यापारिक गतिरोध कम होने से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में जो विकल्प भारत (Make in India) के रूप में उभर रहा था, उस गति पर असर पड़ सकता है। हालांकि, अमेरिका-चीन की तकनीकी प्रतिस्पर्धा बनी रहने के कारण भारत को टेक/सेमीकंडक्टर निर्माण में फायदा मिलता रहेगा। चार, भारत को वैश्विक बाजार और तेल की कीमतों में स्थिरता का लाभ मिलता है जबकि चीन के खिलाफ अमेरिका का कड़ा समर्थन कम होने और ट्रेड में दबाव का जोखिम बना रहेगा। # अमेरिका और चीन की डील से रूस पर असर एक, चीन पर बढ़ती निर्भरता: रूस और चीन वर्तमान में असीमित साझेदारी में हैं। लेकिन यदि चीन और अमेरिका अपने आर्थिक रिश्तों को सुधार लेते हैं, तो रूस को डर रहेगा कि चीन अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव में आकर रूस को मिलने वाली आर्थिक और तकनीकी मदद को सीमित कर सकता है। दो, रूस-यूक्रेन युद्ध और कूटनीति: अमेरिका-चीन शिखर वार्ता में यदि रूस-यूक्रेन संघर्ष या वैश्विक प्रतिबंधों पर कोई गुप्त सहमति बनती है, तो मॉस्को के लिए पश्चिमी प्रतिबंधों से बचने के रास्ते (जैसे चीन के जरिए व्यापार) कठिन हो सकते हैं। तीन, मॉस्को की रणनीतिक स्थिति: रूस नहीं चाहता कि अमेरिका और चीन इतने करीब आ जाएं कि दुनिया में फिर से अमेरिका-चीन की G2 (दो महाशक्तियों का प्रभुत्व) वाली व्यवस्था स्थापित हो जाए, क्योंकि इससे रूस का वैश्विक वजन कम होता है। चार, रूस को चीन से आर्थिक व्यापार जारी रहने की उम्मीद रहेगी। जबकि चीन द्वारा अमेरिकी प्रतिबंधों के डर से रूस को दी जाने वाली मदद सीमित करने का जोखिम बना रहेगा। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
नशे के खिलाफ भाजपा के अभियान से 'आप' की भगवंत मान सरकार घबरा गई : अनिल विज
नशे के खिलाफ भाजपा के अभियान से 'आप' की भगवंत मान सरकार घबरा गई : अनिल विज
संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रासंगिकता पर उठते सवाल
अमेरिका-ईरान युद्ध हो या फिर रुस यूक्रेन युद्ध और इसी तरह दुनिया के देशों के सामने आ रही गंभीर समस्याओं के चलते संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रासंगिकता पर सवाल उठने लगे हैं। अमेरिका-ईरान युद्ध के चलते आज दुनिया के देश ईंधन की समस्या से दो चार हो रहे हैं। शक्तिशाली देशों के दादागिरी चरम पर पहुंचती जा रही है। आज हार्मुज का रास्ता बंद है तो अन्य वैकल्पिक रास्तों पर भी अवरोध आ रहे हैं। दुनिया के अन्य देशों की समस्याओं के प्रति कोई गंभीर नहीं है। पेट्रोल पदार्थों और एलपीजी की आवाजाही प्रभावित होने से ईंधन के भावों में बेतहासा बढ़ोतरी हो रही है। ऊर्जा संकट हो रहा है। आवागमन के साधनों का प्रमुख माध्यम पेट्रोल-डीजल आदि है और उनकी उपलब्धता पर पड़ रहे असर के कारण सभी देशों में सीधे आमजन प्रभावित हो रहे हैं। आखिर ऐसे समय में ही संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। पर जो तस्वीर सामने आ रही हैं वह साफ है कि युद्ध करने वाले देशों पर दबाव ड़ालने की स्थिति में ना तो कोई वैश्विक संस्था रह गई है और ना ही कोई सर्वमान्य वैश्विक नेता। आखिर यह कोई एक दिन का पराभव तो नहीं हैं बल्कि देखा जाएं तो संयुक्त राष्ट्र को तो योजनाबद्ध तरीके से शक्तिहीन किया गया है। अमेरिका जैसे देशों द्वारा बिना बजह फण्डिंग बाधित या कम की जाती है तो वीटो पॉवर स्वयं में नकारात्मक भूमिका में है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में नए सदस्यों के प्रवेश को टाला जा रहा है तो इसे पंगु बनाने में कोई कमी नहीं छोड़ी जा रही है। इसमें कोई दो राय नहीं कि कोविड के दौरान संयुक्त राष्ट्र संघ ने सकारात्मक भूमिका निभाई। देशों के बीच परस्पर सहयोग व समन्वय का परिणाम यह रहा कि दुनिया के देश कोविड वैश्विक संकट से मुकाबला करने में सफल रहे। खैर पर दुनिया के देशों के बीच युद्ध, युद्ध के हालात और तनाव की स्थिति को कम करने में संयुक्त राष्ट्र संघ पूरी तरह विफल रहा है। इस विफलता के कारणों का अलग से विश्लेषण किया जा सकता है। पर एक बात साफ है कि आज संयुक्त राष्ट्र संघ पर समग्र रुप से देखा जाएं तो भरोसा 57 प्रतिशत ही रह गया है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रति नकारात्मक विचार रखने वालों का प्रतिशत 37 प्रतिशत ही है। भरोसे के यह आंकड़ें अगस्त 26 के ही हैं और यह प्यू रिसर्च की हालिया रिपोर्ट में सामने आये हैं। दुनिया के देशों में संयुक्त राष्ट्र संघ पर सबसे कम भरोसा करने वाला देश इजरायल है। इजरायल के 79 प्रतिशत लोग संयुक्त राष्ट्र संघ पर भरोसा नहीं रखते। इजरायल ही क्या जापान, तुर्की, पाकिस्तान, ग्रीस, फिलिस्तीनी क्षेत्र के देश आदि ऐसे देष है जो यूएन पर भरोसे के मामले में लकारात्मक सोच रखते हैं। हांलाकि कनाड़ा, अमेरिका, नाइजीरिया, अधिकांश योरोपीय देश, घाना, केन्या व अधिकांश एशिया प्रशांत के देशों का भरोसा अधिक है। यह देश संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रति सोच सकारात्मक रखते हैं। नाइजीरिया, फ्रांस यहां तक कि अमेरिका आदि में संयुक्त राष्ट्र् के प्रति सकारात्मकता में अच्छी खासी गिरावट देखने को मिली है। दुनिया के देशों में एकमात्र श्रीलका ऐसा देश है जहां संयुक्त राष्ट्र् संघ के प्रति भरोसे में बढ़ोतरी देखी गई है। इसे भी पढ़ें: Imran Khan की पार्टी के कार्यकर्ताओं की हड्डी-पसली तोड़ने की तैयारी! Pakistan में बड़ी संख्या में लोगों के घायल होने की संभावना के चलते खाली कराये जा रहे अस्पताल सौ टके का सवाल यह है कि आज यूएन दुनिया के देशों के बीच संघर्ष या तनाव कम करने में निर्णायक भूमिका नहीं निभा पा रहा है। अमेरिका-ईरान या रुस-यूक्रेन युद्ध सबके सामने है। यह कोई दो देशों के बीच युद्ध नहीं है अपितु इन युद्धों की आंच दुनिया के अधिकांश देशों पर किसी ना किसी रुप में पहुंच रही है। आज वर्चस्व सिद्ध करने या दादागिरी ही एक मात्र ध्येय रह गया है। पर रुस और अमेरिका अभी भी यह नहीं समझ पा रहे कि युद्धारंभ से पहले चंद घंटों या चंद दिनों का युद्ध समझ कर जोश में आ गए थे आज हालात उनके लिए ना निगलते बन रही हैं और ना ही निगलते बन रही है। इन युद्धों ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि सामने वाला देश कितना भी छोटा क्यों ना हो पर युद्ध को लंबा किसनी की क्षमता उसमें हैं। अमेरिका इजरायल ने जब ईरान पर आक्रमण किया तब उन्होंने बहुत गाल बजाएं थे पर आज जो हालात है वह सबके सामने हैं। यही रुस यूक्रेन की बात है चंद दिनों का युद्ध कब सालों लंबा युद्ध होता जा रहा है यह सबके सामने हैं। आज संयुक्त राष्ट्र संघ प्रभावी या कारगर होता तो हालात इतने खराब नहीं होते। आज संयुक्त राष्ट्र संघ नख-दंत विहीन संस्था रह गया है। अमेरिका सहित विकसित देश फण्डिंग में कमी कर देते हैं या रोक देते हें तो यूएन अपने आप में इतना सक्षम नहीं है कि देशों पर दबाव बना सके। सुरक्षा परिषद का वीटो का अधिकार भी एक प्रमुख बाधा ही है। सुरक्षा परिषद में भारत के प्रवेश को लंबे समय से रोका जा रहा है। नए सदस्य किसी को स्वीकार ही नहीं हो रहे। एक बात साफ हो जानी चाहिए कि संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन एक सकारात्मक संदेश के साथ हुआ था। समय आ गया है जब दुनिया के देशों को संयुक्त राष्ट्र् संघ की भूमिका नए सीरे से तय करनी होगी। यूएन को दिखावटी संस्था के स्थान पर अधिकारपूर्ण और निर्णय क्षमता युक्त संस्था बनानी होगी। लोगों में विश्वास बनाना होगा कि यूएन केवल संस्था नहीं अपितु वह अपने दायित्वों को पूरा करने और दादागिरी करने वाले देशों पर लगाम लगाने की स्थिति में हो या ना हो पर एक ऐसा भ्रम तो पैदा करने की स्थिति में हो ताकि शक्तिशाली देशों की मोनोपोली को सीमित किया जा सके। - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
मध्य प्रदेश के कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने अपने बयान पर खेद जताया
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'आप' सरकार नशे को बढ़ावा देने वालों के साथ: तरुण चुघ
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न्यूयॉर्क में भारत ने पेश किया डिजिटल हेल्थ का मॉडल, स्वास्थ्य सचिव बोलीं-'एआई से बदलेगी तस्वीर'
नई दिल्ली, 22 सितंबर (आईएएनएस)। स्वास्थ्य सचिव पुण्या सलिला श्रीवास्तव ने न्यूयॉर्क में भारत के वाणिज्य दूतावास में आयोजित 'ग्राउंडिंग द फ्रंटियर: ए ग्लोबल साउथ एआई फ्रेमवर्क' विषय पर चर्चा के दौरान ग्लोबल साउथ के लिए एआई और डिजिटल हेल्थ इनोवेशन में भारत के अनुभव को साझा किया। उन्होंने कहा कि भारत यह दिखा रहा है कि कैसे मजबूत डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और संदर्भ-आधारित डेटा से चलने वाली एआई बड़े पैमाने पर हेल्थकेयर सर्विस को बदल सकती है।
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चीन पर चढ़ा Made In India का खुमार, 5 महीने में 9.36 अरब की शॉपिंग
जिस चीन के साथ भारत का व्यापार लंबे समय से एकतरफा नजर आता रहा है। अब भारतीय सामान की डिमांड तेजी से यहां बढ़ रही है। सिर्फ 5 महीने में चीन ने भारत से करीब ₹9.6 अरब डॉलर यानी लगभग ₹80,000 करोड़ का सामान खरीदा है। लेकिन इसको लेकर सबसे बड़ी बात यह है कि यह आंकड़ा पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले करीब 39% ज्यादा है। यानी दुनिया के सबसे बड़े मैन्युफैक्चरिंग देशों में शामिल चीन अब भारत से भी ज्यादा सामान मंगवाने लगा है। लेकिन आखिर ऐसा क्यों बदल रहा है? चीन के बाजार में मेड इन इंडिया की पकड़ बढ़ती कैसे दिखाई दे रही है? क्या यह भारत चीन की व्यापारिक किशस्तों में किसी बड़े बदलाव का संकेत है? ताजा कॉमर्स मिनिस्ट्री के आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल से अगस्त तक 2026 के दौरान भारत का चीन को निर्यात कुल 39% बढ़कर यहां पर 9.6 अरब डॉलर पहुंच गया है। ये आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस अवधि में भारत के पुराने ब्रिक्स सम साझेदार चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका को कुल भारतीय निर्यात 34% बढ़कर यहां पर 19.9 अरब डॉलर हो गया है। यानी इन चार देशों के बीच चीन भारत के निर्यात का सबसे बड़ा बाजार रहा। यह बढ़ोतरी ऐसे समय में हुई है जब भारत अपने मैन्युफैक्चरिंग बेस को बढ़ाना चाहता है और ग्लोबल सप्लाई चेन में बड़ी भूमिका निभाना चाहता है। इस कोशिश में इलेक्ट्रॉनिक्स एक अहम सेक्टर बनकर उभरा है। सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि अप्रैल-अगस्त की अवधि में चीन को इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट पिछले साल के मुकाबले 15 प्रतिशत से ज़्यादा बढ़ा। इससे पहले पिछले फाइनेंशियल ईयर के दौरान इलेक्ट्रॉनिक्स शिपमेंट में ज़बरदस्त बढ़ोतरी हुई थी। इसे भी पढ़ें: Iranian Airlines के Flight संचालन पर गहराएगा संकट, US प्रतिबंधों पर China से बातचीत जारी चीन भारत से खरीद क्यों रहा है? हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इलेक्ट्रॉनिक्स इस बढ़ोतरी के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में शामिल है। भारत से चीन जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक्स सामान जो हैं इसमें प्रिंटेड सर्किट बोर्ड्स हैं, स्मार्टफोनस हैं, डिस्प्ले मॉड्यूल्स और टेलीकॉम इक्विपमेंट जैसी तमाम चीजें शामिल हैं। ऐसे में वैश्विक स्तर पर एआई डाटा सेंटर्स और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की जो मांग है इससे बढ़ रही है जिससे इलेक्ट्रॉनिक सप्लाई चेन में भी ज्यादा बदलाव देखने को मिल रहा है और भारत इस बढ़ती मांग का एक हिस्सा पकड़ने की कोशिश कर रहा है। इसका मतलब यही है कि चीन ने भारतीय सामान के लिए अपना पूरा बाजार खोल दिया है। या फिर यह इसको आप ऐसे नहीं देख सकते कि भारत चीन का व्यापार संतुलित अभी धीरे-धीरे होता नजर आएगा। उदाहरण के लिए अगर आपको समझाएं तो अप्रैल और अगस्त 2026 27 के दौरान भारत ने चीन से करीब 65.49 अरब डॉलर का सामान आयत किया। यानी भारत का चीन से आयत अभी भी चीन को किए जाने वाले निर्यात से कई गुना ज्यादा है। इस 5 महीने की अवधि में चीन भारत का सबसे बड़ा इंपोर्ट सोर्स रहा है। इसलिए 9 6 अरब डॉलर का आंकड़ा एक सकारात्मक एक्सपोर्ट डेवलपमेंट जरूर है। लेकिन इसे भारत चीन के व्यापार घाटी के खत्म होने के तौर पर देखना सही नहीं होगा। इसे भी पढ़ें: Chinese Communist Party ने Zhang Youxia और Liu Zhenli को सेना व पार्टी से निकाला AI की मांग से इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट में बढ़ोतरी मार्च में खत्म हुए फाइनेंशियल ईयर में चीन को भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट तीन गुना बढ़कर $3.18 बिलियन हो गया, हालांकि यह बढ़ोतरी एक कम शुरुआती स्तर से हुई थी। इन शिपमेंट्स में प्रिंटेड सर्किट बोर्ड असेंबली, स्मार्टफोन, डिस्प्ले मॉड्यूल और टेलीकॉम इक्विपमेंट शामिल थे। इंडस्ट्री के अधिकारियों का कहना है कि AI और डेटा सेंटर्स के ग्लोबल विस्तार से भारतीय मैन्युफैक्चरर्स के इक्विपमेंट और कंपोनेंट्स की मांग बढ़ रही है। यह बढ़ोतरी भारत के मैन्युफैक्चरिंग लक्ष्यों के लिए अहम है क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक्स उन सेक्टर्स में से एक है जिसे नई दिल्ली बढ़ाना चाहती है, क्योंकि कंपनियां अपनी सप्लाई चेन में विविधता ला रही हैं। इसे भी पढ़ें: टैरिफ पर अमेरिकी सांसद ने दी धमकी तो भारत ने भी तगड़ा सुना दिया, ट्रैप हैरान! इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट में भी बढ़ोतरी चीन को होने वाले एक्सपोर्ट में बढ़ोतरी सिर्फ़ इलेक्ट्रॉनिक्स तक ही सीमित नहीं है। ब्लूमबर्ग न्यूज़ के अनुसार, अप्रैल-अगस्त की अवधि में इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट पिछले साल के मुकाबले लगभग 21 प्रतिशत बढ़ा। इस बढ़ोतरी में मशीनरी और उसके पार्ट्स, ऑटो कंपोनेंट्स और हैंड टूल्स शामिल थे। इस व्यापक बढ़ोतरी से पता चलता है कि भारतीय मैन्युफैक्चरर्स को चीनी बाज़ार में नए मौके मिल रहे हैं। लेकिन एक्सपोर्टर्स को इस रफ़्तार को बनाए रखना होगा और ज़्यादा तरह के प्रोडक्ट्स का एक्सपोर्ट करना होगा, ताकि इन फ़ायदों का दोनों देशों के बीच व्यापार पर कोई ठोस असर पड़ सके। भारतीय एक्सपोर्ट के लिए चीन अभी भी एक छोटा बाज़ार है हाल की बढ़ोतरी के बावजूद, भारतीय सामान के लिए चीन अभी भी एक छोटा बाज़ार बना हुआ है। मार्च में खत्म हुए फाइनेंशियल ईयर में भारत के कुल एक्सपोर्ट में चीन की हिस्सेदारी लगभग 4.4 प्रतिशत रही, जो एक साल पहले 3 प्रतिशत से थोड़ी ज़्यादा थी। अमेरिका, जो भारत का सबसे बड़ा एक्सपोर्ट बाज़ार है, भारत के कुल एक्सपोर्ट का लगभग पांचवां हिस्सा है। इससे भारतीय कंपनियों के लिए चीन में अपने कारोबार को बढ़ाने, खासकर मैन्युफैक्चर्ड सामान के मामले में, काफी गुंजाइश बनती है। लेकिन भारत जो सामान चीन को बेचता है और जो वहां से खरीदता है, उसके बीच भी काफी बड़ा अंतर है। ट्रेड डेफिसिट (व्यापार घाटा) एक बड़ी समस्या बनी हुई है ब्लूमबर्ग न्यूज़ की रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च में खत्म हुए साल में भारत ने 131.6 अरब डॉलर का चीनी सामान आयात किया। भारत के कुल आयात में चीनी सामान की हिस्सेदारी लगभग 17 प्रतिशत थी। इसलिए, चीन से भारत के इंपोर्ट की वैल्यू, चीन को भारत के एक्सपोर्ट की तुलना में कई गुना ज़्यादा थी। इस वजह से, हाल ही में एक्सपोर्ट बढ़ने के बावजूद दोनों देशों के बीच ट्रेड डेफिसिट (व्यापार घाटा) में कोई खास बदलाव नहीं आया। इस बढ़ोतरी के स्वरूप को लेकर भी कुछ अनिश्चितता है। चीन के कस्टम्स डेटा में भारत से प्रिंटेड सर्किट बोर्ड के इंपोर्ट में ऐसी कोई बढ़ोतरी नहीं दिखती है। इसके बजाय, ज़्यादातर बढ़ोतरी स्मार्टफ़ोन और दूसरे टेलीकॉम प्रोडक्ट्स के मामले में दिखती है। इंडस्ट्री के अधिकारियों का कहना है कि दोनों देशों के सामानों को क्लासिफ़ाई करने के तरीकों में अंतर की वजह से यह ठीक-ठीक पता लगाना मुश्किल है कि इस बढ़ोतरी की असल वजह क्या है। दिशा में बदलाव, लेकिन अभी पूरी तरह उलटाव नहीं हाल के वर्षों में रिश्ते काफी खराब होने के बाद, भारत और चीन अपने आर्थिक संबंधों को बेहतर बनाने की कोशिश कर रहे हैं, और इसी वजह से एक्सपोर्ट में बढ़ोतरी हुई है। ग्लोबल ट्रेड के तौर-तरीकों में बदलाव के साथ-साथ, दोनों पक्ष ट्रेड और सप्लाई-चेन से जुड़े मुद्दों पर भी ध्यान दे रहे हैं। भारत के लिए, चीन को एक्सपोर्ट बढ़ने से उसकी मैन्युफैक्चरिंग क्षमताएं बढ़ाने और ग्लोबल वैल्यू चेन में बड़ी भूमिका निभाने की कोशिशों को मदद मिल सकती है। लेकिन हाल के आंकड़े अभी कुल ट्रेड संबंधों में किसी बड़े बदलाव का संकेत नहीं देते हैं। भारत चीन को ज़्यादा इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग का सामान और दूसरे मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट बेच रहा है। साथ ही, भारत के ट्रेड में चीनी सामान का हिस्सा अभी भी बहुत बड़ा है। भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए तुरंत चुनौती यह है कि वे हाल की ग्रोथ को बनाए रखें और इसे कंपोनेंट्स, सब-असेंबली और तैयार प्रोडक्ट्स तक फैलाएं। बहरहाल, भारत और चीन के बीच पिछले कुछ सालों से सीमा और रणनीतिक मुद्दों को लेकर तनाव रहा है। इसके बावजूद दोनों देशों के बीच व्यापार जारी है। अब अगर राजनीतिक स्तर पर संबंध और आर्थिक संपर्क में सुधार आता है तो व्यापार के कुछ क्षेत्रों में इसका असर साफ दिखाई दे सकता है। लेकिन व्यापार के आंकड़ों से अभी यह निष्कर्ष निकाला नहीं जा सकता कि दोनों देशों के रिश्तों में व्यापक बदलाव हो चुका है।
अमेरिका अब किसी विदेशी नागरिक को अपने देश से बाहर निकालने के लिए उसके मूल देश के दरवाजे पर दस्तक देने और वहां से हरी झंडी मिलने का इंतजार नहीं करता। ट्रंप प्रशासन ने निर्वासन की पूरी परिभाषा ही बदल दी है। जिस व्यक्ति को अमेरिका से बाहर करना है, उसका देश उसे वापस लेगा या नहीं, इस बात पर अब अमेरिका माथापच्ची करने में समय नहीं गंवाता। अमेरिका अब खुद उसके लिए कोई तीसरा ठिकाना तलाश रहा है और उसे वहां पहुंचाने के लिए अपनी तिजोरी से धन खर्च कर रहा है। यानी जिस व्यक्ति को अमेरिका नहीं रखना चाहता, उसे उसके अपने देश में भेजने की बजाय किसी ऐसे देश में धकेला जा रहा है, जिससे उसका कोई नाता तक नहीं है। इस पूरी कवायद में अमेरिका उन देशों को पैसा भी दे रहा है, ताकि वे इन लोगों को अपने यहां रखने के लिए तैयार हो जाएं। यह केवल निर्वासन नहीं, बल्कि अमेरिकी धन, कूटनीतिक दबाव और वैश्विक प्रभाव के सहारे खड़ा किया जा रहा एक ऐसा तंत्र है, जिसमें अमेरिका तय कर रहा है कि उसके यहां से निकाला गया व्यक्ति आखिर दुनिया के किस कोने में पहुंचेगा। देखा जाये तो अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की आव्रजन नीति अब केवल सीमा बंद करने, गिरफ्तारी और निर्वासन तक सीमित नहीं रह गई है। अमेरिकी समाचार पत्र वॉशिंगटन पोस्ट ने अपनी एक पड़ताल में जो खुलासा किया है उससे पूरी दुनिया में हड़कंप मच गया है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिकी विदेश विभाग के जिस तंत्र का मूल काम दुनिया भर से उत्पीड़ित लोगों को शरण और पुनर्वास दिलाना था, उसी को अब दूसरे देशों में लोगों को धकेलने वाली एक विशाल निर्वासन व्यवस्था में बदल दिया गया है। इस पूरी कवायद के लिए कम से कम 410 करोड़ डॉलर की राशि स्वीकृत या प्रतिबद्ध की जा चुकी है और 31 देशों के साथ समझौते किए गए हैं। इसे भी पढ़ें: Prabhasakshi NewsRoom: Donald Trump की लोकप्रियता धड़ाम! 32% पर पहुंची Approval Rating, अमेरिकी जनता का भरोसा टूटा रिपोर्ट के मुताबिक इस पूरी व्यवस्था के केंद्र में विदेश विभाग के भीतर बनाया गया नया कार्यालय है। इसका नेतृत्व क्रिश्चियन एरहार्ट कर रहे हैं, जो पहले करीब दो दशक तक अमेरिकी दूतावासों की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े रहे थे। अब वही अधिकारी अफ्रीका और दूसरे क्षेत्रों में घूम-घूमकर सरकारों को ऐसे लोगों को स्वीकार करने के लिए तैयार कर रहे हैं, जिनका उन देशों से कोई संबंध तक नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक क्रिश्चियन एरहार्ट को कई विदेशी सरकारों के सामने सामान्य अधिकारी नहीं, बल्कि सीधे व्हाइट हाउस के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। उनके पीछे ट्रंप प्रशासन के प्रभावशाली अधिकारी स्टीफन मिलर की निर्णायक भूमिका बताई गई है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अमेरिका इन देशों को केवल कूटनीतिक दबाव से नहीं मना रहा, बल्कि भारी आर्थिक प्रोत्साहन भी दे रहा है। कम से कम 81 करोड़ डॉलर सीधे 13 विदेशी सरकारों को देने की प्रतिबद्धता सामने आई है। इसके अतिरिक्त अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन के लिए 179 करोड़ डॉलर और संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी संस्था के लिए 124 करोड़ डॉलर की राशि का प्रावधान किया गया है। इन संस्थाओं को इन समझौतों का प्रत्यक्ष पक्ष नहीं बताया गया है, लेकिन संबंधित देशों को निर्वासित लोगों को स्वीकार करने के लिए तैयार करने की प्रक्रिया में इन पैसों को प्रोत्साहन के रूप में इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई है। यानी तस्वीर बेहद साफ है। जिस व्यवस्था में कभी अमेरिका दूसरे देशों से भागकर आए लोगों को सुरक्षित जीवन देने के लिए धन लगाता था, अब उसी धन का इस्तेमाल ऐसे देशों को तैयार करने में हो रहा है जो अमेरिका से निकाले गए लोगों को अपने यहां रखने के लिए राजी हों। ट्रंप प्रशासन ने शरणार्थी पुनर्वास की पुरानी दिशा को पलटकर उसे निर्वासन केंद्रित बना दिया है। प्रशासन के अपने एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्वीकार किया है कि संबंधित विभाग की दिशा पूरी तरह बदल दी गई है। बताया जा रहा है कि कोस्टा रिका भेजी गई उड़ानों में चीन, रूस, ईरान और अफगानिस्तान के लोग थे। इस्वातिनी भेजे गए लोगों में वियतनाम, लाओस, क्यूबा और जमैका के नागरिक शामिल थे। युगांडा केवल अफ्रीकी नागरिकों को लेने पर सहमत हुआ, जबकि कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य ने अफ्रीकी नागरिकों को ही स्वीकार करने से इंकार कर दिया। कुछ देश गंभीर अपराधों के आरोपियों को भी लेने के लिए तैयार हैं, जबकि कुछ ने अपराध की प्रकृति के आधार पर सीमाएं तय की हैं। अब तक 25 हजार से अधिक लोगों को कम से कम 28 तीसरे देशों में भेजे जाने का अनुमान है। इनमें करीब 20 हजार लोग मेक्सिको भेजे गए। बाकी लोगों को मुख्यतः अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों में धकेला गया। अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि इनमें ऐसे लोग हैं जिनके खिलाफ अंतिम निर्वासन आदेश हैं, लेकिन उनके अपने देश उन्हें वापस लेने से इंकार करते हैं या उन्हें वहां भेजने पर उत्पीड़न का खतरा है। प्रशासन का दावा है कि तीसरे देश का रास्ता ऐसे कठिन मामलों को निपटाने का साधन है। लेकिन यहीं से इस नीति का सबसे गंभीर कानूनी पक्ष शुरू होता है। आलोचकों और आव्रजन वकीलों का आरोप है कि तीसरे देश में भेजकर वहां से संबंधित व्यक्ति को उसके मूल देश में जबरन भेजे जाने का रास्ता बनाया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय शरणार्थी कानून में ऐसे स्थान पर भेजना जहां व्यक्ति को उत्पीड़न या यातना का खतरा हो, गंभीर कानूनी सवाल खड़े करता है। गत शुक्रवार को एक संघीय अपीली अदालत ने इस नीति को गैरकानूनी ठहराते हुए कहा कि प्रभावित लोगों को तीसरे देश में भेजे जाने से पहले पर्याप्त सूचना और अपने भय या खतरे से जुड़े दावे रखने का अवसर नहीं दिया गया। हालांकि प्रशासन से इस फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देने की उम्मीद है। दूसरी ओर, पनामा का मामला इस पूरी व्यवस्था की असली तस्वीर दिखाता है। जनवरी 2025 में अमेरिका ने 299 लोगों को पनामा भेजा, जबकि उनका पनामा से कोई संबंध नहीं था। इनमें ईरानी नागरिक अरसलान सालेह फर्द भी थे। उन्हें न स्थायी निवास मिला, न काम करने का अधिकार और न ही अपने भविष्य की कोई स्पष्ट राह। भाषा की समस्या, आर्थिक तंगी और कानूनी अनिश्चितता ने उन्हें ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया जहां वह महीनों तक एक अस्थायी व्यवस्था में फंसे रहे। इस पूरी नीति का सामरिक महत्व केवल आव्रजन तक सीमित नहीं है। दरअसल, अमेरिका अब निर्वासन को विदेश नीति के एक औजार में बदलता दिखाई दे रहा है। अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कमजोर या आर्थिक रूप से निर्भर देशों को धन देकर लोगों को स्वीकार कराने से वॉशिंगटन को उन सरकारों पर नया प्रभाव हासिल करने का अवसर मिलता है। लेकिन इससे मानवाधिकारों पर अमेरिकी विश्वसनीयता भी कमजोर पड़ सकती है, क्योंकि जिन देशों में गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों की अमेरिकी रिपोर्टें स्वयं मौजूद हैं, उन्हीं देशों के साथ निर्वासन समझौते किए जा रहे हैं। साथ ही रणनीतिक स्तर पर ट्रंप प्रशासन एक और संदेश दे रहा है। अमेरिका में प्रवेश या वहां टिके रहना ही नहीं, बल्कि निर्वासन के बाद आपका अगला ठिकाना भी वॉशिंगटन तय कर सकता है। यह व्यवस्था संभावित प्रवासियों के बीच भय पैदा करने के लिए भी इस्तेमाल हो रही है। यानी निर्वासन अब वैश्विक स्तर पर बनाया गया निवारक दबाव तंत्र बनता जा रहा है। यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि अमेरिका ने शरणार्थियों के संरक्षण के लिए बने अपने पुराने ढांचे को इतनी तेजी से उलटकर निर्वासन की मशीनरी क्यों बना दिया? उससे भी बड़ा सवाल यह है कि जब इस व्यवस्था के लिए अरबों डॉलर की आर्थिक प्रतिबद्धताएं की जा रही हैं, दर्जनों देशों को धन के सहारे तैयार किया जा रहा है और हजारों लोगों को ऐसे देशों में भेजा जा रहा है जिनसे उनका कोई रिश्ता नहीं, तो क्या यह केवल सीमा नियंत्रण की नीति है या अमेरिकी विदेश नीति के चरित्र में एक बुनियादी बदलाव है? बहरहाल, वॉशिंगटन पोस्ट की पड़ताल का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है कि अमेरिका की शरणार्थी व्यवस्था का एक हिस्सा अब शरण देने की बजाय लोगों को अमेरिका से बाहर धकेलने के लिए इस्तेमाल हो रहा है। साथ ही इस पूरी मशीनरी के पीछे केवल सीमा नहीं, पैसा, कूटनीति, दबाव और वैश्विक शक्ति का इस्तेमाल दिखाई दे रहा है। -नीरज कुमार दुबे
ओम प्रकाश राजभर ने Modi का नाम लेकर कर दिया बड़ा दावा, क्या वाकई UP के चार टुकड़े होने वाले हैं?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनावी मौसम अभी पूरी तरह चढ़ा भी नहीं है, लेकिन सियासी चौपाल पर ऐसा मुद्दा उछल गया है, जिसकी गूंज लखनऊ से लेकर दिल्ली तक सुनाई दे रही है। उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के प्रमुख ओम प्रकाश राजभर ने दावा किया है कि आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश चार हिस्सों में बंटेगा और जातीय जनगणना के बाद इस दिशा में रास्ता साफ हो जाएगा। इतना ही नहीं, राजभर ने पूर्वांचल के अलग राज्य बनने पर उसके पहले मुख्यमंत्री के तौर पर अपने समाज के व्यक्ति का दावा भी ठोक दिया। देवरिया और अंबेडकरनगर में दिए गए अपने बयानों में ओम प्रकाश राजभर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कथित बातचीत का हवाला देते हुए कहा कि जातीय जनगणना के बाद राज्य के पुनर्गठन में कोई दिक्कत नहीं रहेगी। राजभर ने जिन चार हिस्सों की बात की, उनमें पूर्वांचल, मध्यांचल, बुंदेलखंड और हरित प्रदेश शामिल हैं। उन्होंने यह भी कहा कि पूर्वांचल में राजभर समाज का बड़ा वोट आधार है, इसलिए अलग राज्य बनने पर पहला मुख्यमंत्री राजभर समाज का बेटा होगा। उल्लेखनीय है कि यह बयान ऐसे समय आया है जब उत्तर प्रदेश 2027 के विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रहा है। इसे भी पढ़ें: 2027 का उत्तर प्रदेश दंगल: समाजवाद की नई राजनीतिक रंगोली या महज अवसरवाद का मुखौटा? देखा जाये तो राजभर ने सिर्फ राज्य के नक्शे पर लकीर खींचने की बात नहीं की है बल्कि उस लकीर के पार सत्ता की कुर्सी पर भी अपना सामाजिक दावा रख दिया है। यही वजह है कि यह मामला महज प्रशासनिक पुनर्गठन की बहस नहीं रह जाता, बल्कि उत्तर प्रदेश की जातीय और क्षेत्रीय राजनीति के बीच सीधा उतर जाता है। मायावती ने 2011 में चलाई थी बड़ी चाल वैसे राजभर ने कोई नया कुआं नहीं खोदा है। उत्तर प्रदेश को छोटे राज्यों में बांटने की मांग दो दशक से ज्यादा समय से अलग-अलग रूपों में उठती रही है। सबसे ठोस पहल नवंबर 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती की सरकार ने की थी। तत्कालीन विधानसभा ने उत्तर प्रदेश को पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध प्रदेश और पश्चिम प्रदेश में बांटने का प्रस्ताव पारित किया था। मायावती सरकार का तर्क था कि इतने विशाल राज्य में प्रशासन और विकास को प्रभावी ढंग से चलाना कठिन है और छोटे राज्य क्षेत्रीय जरूरतों पर ज्यादा फोकस कर सकते हैं। प्रस्ताव केंद्र को भेजा गया, लेकिन आगे मामला नहीं बढ़ा। 2014 में केंद्र सरकार ने संसद में बताया था कि 2011 का प्रस्ताव प्राप्त हुआ था, राज्य सरकार से अतिरिक्त जानकारी मांगी गई थी, लेकिन उस समय उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से वह जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई और केंद्र के पास उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं था। पश्चिम से पूर्वांचल तक अलग-अलग सुर यह भी उल्लेखनीय है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अलग राज्य या हरित प्रदेश की मांग भी पुरानी है। राष्ट्रीय लोक दल के संस्थापक अजित सिंह समेत कई नेताओं ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए अलग राज्य की वकालत की थी। गन्ना, खेती, कारोबार, उद्योग और दिल्ली की नजदीकी को इसके पक्ष में प्रमुख तर्कों के तौर पर रखा जाता रहा है। मगर पूर्वांचल की कहानी अलग है। यहां समर्थक कहते रहे हैं कि विशाल आबादी, आर्थिक पिछड़ापन, रोजगार के लिए पलायन और लखनऊ से दूरी के कारण क्षेत्र को अलग प्रशासनिक इकाई मिलनी चाहिए। बुंदेलखंड के लिए भी अलग राज्य की मांग लंबे समय से उठती रही है, लेकिन उसकी पेचीदगी यह है कि प्रस्तावित क्षेत्र उत्तर प्रदेश के साथ-साथ मध्य प्रदेश तक फैला हुआ है। देखा जाये तो मोटे तौर पर पुराने प्रस्तावों में पश्चिम प्रदेश में पश्चिमी और कुछ मध्य-पश्चिमी जिलों का बड़ा हिस्सा, अवध प्रदेश में मध्य क्षेत्र, बुंदेलखंड में झांसी, जालौन, ललितपुर, हमीरपुर, महोबा, बांदा और चित्रकूट जैसे जिले तथा पूर्वांचल में वाराणसी, गोरखपुर, आजमगढ़, बलिया, गाजीपुर, प्रयागराज, मिर्जापुर, सोनभद्र समेत पूर्वी उत्तर प्रदेश का बड़ा इलाका शामिल रहा है। इन सीमाओं को लेकर अलग-अलग प्रस्तावों में फर्क भी रहा है। सवाल सिर्फ नक्शे का नहीं, नीयत और व्यवस्था का भी है छोटे राज्यों के समर्थकों का तर्क है कि छोटा प्रशासन ज्यादा चुस्त होगा, क्षेत्रीय समस्याओं पर सरकार की पकड़ बढ़ेगी और विकास की प्राथमिकताएं स्थानीय जरूरतों के हिसाब से तय की जा सकेंगी। विरोध में यह सवाल भी उठता है कि क्या केवल राज्य छोटा कर देने से गरीबी, बेरोजगारी, पलायन और क्षेत्रीय असमानता खत्म हो जाएगी? नए राज्यों के गठन के साथ राजधानी, विधानसभा, उच्च न्यायालय, सरकारी कर्मचारियों, संपत्तियों, कर्ज, राजस्व और संस्थानों के बंटवारे जैसी बड़ी प्रशासनिक और वित्तीय चुनौतियां भी सामने आती हैं। आखिरी फैसला लखनऊ नहीं, संसद करेगी यहां यह भी उल्लेखनीय है कि संविधान का अनुच्छेद 3 साफ करता है कि नए राज्य का गठन, मौजूदा राज्य की सीमा या क्षेत्र में बदलाव का अधिकार संसद के पास है। ऐसा विधेयक राष्ट्रपति की सिफारिश के बिना संसद में पेश नहीं किया जा सकता। प्रभावित राज्य की विधानसभा से उसके विचार मांगे जाते हैं, लेकिन उसकी सहमति अनिवार्य नहीं है। यानी अगर कभी उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन की वास्तविक प्रक्रिया शुरू होती है तो मामला लंबी संवैधानिक और राजनीतिक प्रक्रिया से होकर गुजरेगा। बहरहाल, फिलहाल ओम प्रकाश राजभर ने उत्तर प्रदेश की सियासत में पुरानी चिंगारी पर फिर से फूंक मार दी है। अब देखना यह है कि यह सिर्फ चुनावी मौसम की गरमागरम हुंकार बनकर रह जाती है या सचमुच उत्तर प्रदेश के नक्शे पर नई लकीर खींचने की कवायद शुरू होती है। क्योंकि यूपी की राजनीति में एक बात बड़ी पुरानी है, यहां चुनाव आते ही मुद्दे सिर्फ उठते नहीं, कई बार पूरे भूगोल को ही हिला देने लगते हैं। राजभर के बयान पर प्रतिक्रियाएं आने भी लग गयी हैं। भाजपा के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने इसे चुनावी जुमला बताते हुए कहा है कि केंद्र या प्रदेश सरकार की ऐसी कोई मंशा नहीं है, जबकि भाजपा नेता संजीव बालियान ने यूपी को चार हिस्सों में बांटने के विचार का समर्थन किया है। वहीं विपक्ष ने कहा है कि सत्ता पक्ष की ओर से ध्यान भटकाने के प्रयास हो रहे हैं ताकि मूल मुद्दों की ओर जनता का ध्यान नहीं जाये। -नीरज कुमार दुबे
चांदी 2.40 लाख रुपये प्रति किलो नीचे
मुंबई, सोने और चांदी मंगलवार को सपाट खुले और शुरुआत कारोबार में दोनों कीमती धातु एक सीमित दायरे में बने हुए थे।
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असम में इसरो की एडवांस्ड रडार रिसर्च फैसिलिटी की आधारशिला रखी गई, अंतरिक्ष निगरानी क्षमता होगी मजबूत
गुवाहाटी, 21 सितंबर (आईएएनएस)। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने सोमवार को चंद्रपुर में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के इस्ट्रैक एडवांस्ड रडार रिसर्च फैसिलिटी का भूमि पूजन किया और आधारशिला रखी। इसे असम के वैज्ञानिक और तकनीकी बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
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Chai Par Sameeksha: UCC, UPI और Nandigram पर जमकर हो रही राजनीति, उलझ गया सभी दलों का गणित!
प्रभासाक्षी न्यूज़ नेटवर्क के खास साप्ताहिक कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में इस सप्ताह UCC, पश्चिम बंगाल विधानसभा उपचुनाव, UPI पेमेंट पर MDR आदि मुद्दों पर चर्चा हुई। प्रभासाक्षी संपादक नीरज कुमार दुबे ने सवालों के जवाब दिये। UCC पर उन्होंने कहा कि देश में इस समय समान नागरिक संहिता को लेकर जमकर बहस हो रही है। इसके पक्ष और विपक्ष में तमाम तरह के तर्क दिये जा रहे हैं। कोई इसे अपने धर्म के खिलाफ बता रहा है तो कोई कह रहा है कि इससे हमारी संस्कृति और पहचान को खतरा हो जायेगा। आश्चर्यजनक बात यह है कि अभी केंद्र सरकार ने समान नागरिक संहिता संबंधी कानून का मसौदा प्रस्ताव देश के समक्ष नहीं रखा है। यानि किसी को पता नहीं है कि समान नागरिक संहिता में क्या-क्या प्रावधान होंगे लेकिन फिर भी बिना कुछ जाने समझे लोग इससे भयभीत हो रहे हैं और दूसरों के बीच भी भ्रम फैला रहे हैं नीरज दुबे ने कहा कि केंद्रीय स्तर पर इसे लागू करना आसान नहीं होगा इसलिए इसे राज्यवर लागू करने की कोशिश भाजपा सरकार करेंगी। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में इसे लागू कर दिया गया है और वहां से कोई शिकायत नहीं मिल रही है। साथ ही उन्होंने कहा कि 370 हो या राम मंदिर बनना हो या समान नागरिक संहिता, यह भाजपा के कोर मुद्दे रहे हैं और भाजपा इनमें से दो को पहले पूरा कर चुकी है। यूनिफॉर्म सिविल कोड अभी बाकी है जिसे भाजपा शासित राज्यों में पहले लागू किया जा सकता है, जैसा कि अमित शाह के बयान से समझ में भी आता है। लेकिन इसको लेकर अभी से ही बिना मसौदा पढ़े भ्रम फैलाने की जो कोशिश हो रही है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। बिहार में जदयू की अपनी राजनीति है और वह उसे हिसाब से आगे बढ़ेगी। इसे भी पढ़ें: ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से भारत को क्या लाभ? बंगाल पर उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी का राजनीतिक सफर एक छात्र राजनीति की साहसी नायिका से लेकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनने और वर्तमान समय में घोर राजनीतिक व कानूनी संकटों से घिरने तक की एक बड़ी दास्तान है। जो ‘दीदी’ कभी सड़कों पर वामपंथ के 34 साल के किले को ढहाने के लिए जानी जाती थीं, वे आज अपनी राजनीतिक यात्रा के सबसे कठिन दौर से गुजर रही हैं। वर्तमान परिस्थितियों में ममता बनर्जी पर मुश्किलों के पहाड़ टूटने के मुख्य कारण इस प्रकार हैं- पहला, ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक झटका 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में लगा, जहाँ उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को हार का सामना करना पड़ा और राज्य में भाजपा की सरकार बनी। खुद ममता बनर्जी को भी अपनी पारंपरिक सीट भवानीपुर से शुभेंदु अधिकारी के हाथों करारी हार झेलनी पड़ी। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि ममता ने अपने शासन में जैसा किया है, वैसा ही उन्हें राजनीतिक तोर पर देखने को मिल रहा है। UPI पेमेंट को लेकर हो रहे बवाल पर उन्होंने कहा कि झूठ की गूंज एक्सप्रेस चलाने वाले कांग्रेस नेता राहुल गांधी के नेतृत्व वाला इंडी गठबंधन इस निर्णय के लिए सरकार पर अमेरिकी दबाव में झुकने, घुटने टेकने जैसे आरोप लगा रहा है। विपक्ष सोशल मीडिया पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर शुल्क को मोदी टैक्स बताकर इसे तत्काल वापस लेने की मांग कर रहा है। 2000 से ऊपर के कारोबारी भुगतान के इस 0.4 प्रतिशत शुल्क पर विपक्ष के झूठ की गूंज सोशल मीडिया से लेकर व्यापारियों तक पहुंच चुकी है। नीरज दुबे ने कहा कि कोई भी सेवा हमेशा के लिए फ्री में नहीं रखा जा सकता है। हालांकि, सरकार ने जो कदम उठाए है उससे आम आदमी को ज्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला है।
गुजरात सरकार का बड़ा फैसला: टॉप जिला-तालुका अधिकारियों को मिलेगा 'अटल सुशासन पुरस्कार'
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भारत की सेमीकंडक्टर छलांग ने अब उन ताकतों की बेचैनी भी उजागर कर दी है, जिन्हें भारत का तेजी से उभरना रास नहीं आ रहा। केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव की चेतावनी साफ संकेत देती है कि भारत की तरक्की को रोकने वाली चालें तेजी से चली जा रही हैं लेकिन देश को अब दुश्मनों के तौर-तरीके समझ में आ चुके हैं। माना जा रहा है कि जिस तरह भारत को मोबाइल फोन के क्षेत्र में वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनने से रोकने की कोशिशें हुईं, उसी तरह अब सेमीकंडक्टर क्षेत्र में भी साइबर हमलों, फर्जी खबरों और भौतिक व्यवधानों के जरिए भारत की रफ्तार थामने की कोशिश हो सकती है। लेकिन संदेश सीधा है। भारत अब पीछे हटने वाला नहीं है और उसकी रणनीतिक बढ़त को चुनौती देने वालों को इस बार भारत पहले से कहीं अधिक सतर्क और तैयार मिलेगा। हम आपको बता दें कि केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इस खतरे को समझाने के लिए Apple के भारत में iPhone निर्माण शुरू होने के शुरुआती दौर का उदाहरण दिया। टीवी समाचार चैनल NDTV से बातचीत में उन्होंने दावा किया कि उस समय उत्पादन को बाधित करने के लिए कई तरह के प्रयास किए गए। उनके अनुसार, कुछ स्थानों पर फूड पॉइजनिंग की घटनाएं हुईं, बिजली के तार काटे गए और फर्जी खबरें चलाई गईं। उन्होंने विशेष रूप से Reuters की उस रिपोर्ट का उल्लेख किया जिसमें कथित तौर पर कहा गया था कि विवाहित महिलाओं को उत्पादन इकाइयों में काम करने की अनुमति नहीं थी। वैष्णव ने इन घटनाओं को भारत को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में उभरने से रोकने की कोशिश के रूप में पेश किया। इसे भी पढ़ें: Narendra Modi ने भारत को सेमीकंडक्टर निर्माण केंद्र बनाने पर दिया जोर, अमेरिकी विधेयक पर भारत सतर्क यही Apple प्रकरण अब सेमीकंडक्टर उद्योग के लिए चेतावनी का आधार बनाया जा रहा है। वैष्णव का कहना है कि भारत के चिप क्षेत्र में प्रवेश को दुनिया ने नोटिस किया है और जैसे-जैसे भारत की क्षमता बढ़ेगी, समर्थन के साथ विरोध भी सामने आएगा। उन्होंने उद्योग को पहले से तैयार रहने को कहा है। उन्होंने कहा कि साइबर हमले, दुष्प्रचार और भौतिक हमले संभावित जोखिमों में शामिल हैं और भारत को इनसे निपटने के लिए लगातार सतर्क रहना होगा। देखा जाये तो इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्री की इस चेतावनी की पृष्ठभूमि में सेमीकंडक्टर उद्योग की रणनीतिक अहमियत समझना जरूरी है। कंप्यूटर, मोबाइल फोन और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से लेकर रक्षा प्रणालियों तक, लगभग पूरी आधुनिक अर्थव्यवस्था चिप्स पर निर्भर है। अमेरिका, ताइवान और दक्षिण कोरिया लंबे समय से इस क्षेत्र के प्रमुख केंद्र हैं, जबकि चीन तेजी से अपनी क्षमता बढ़ा रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विस्तार ने चिप्स की मांग और रणनीतिक महत्ता दोनों को और बढ़ा दिया है। ऐसे में अमेरिका और चीन सहित प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं सेमीकंडक्टर क्षमता को रणनीतिक आत्मनिर्भरता से जोड़ रही हैं। भारत ने इसी बदलते वैश्विक समीकरण में अपनी जगह बनाने के लिए पिछले कुछ वर्षों में बड़ा अभियान शुरू किया है। SEMICON India का आयोजन 2022 से किया जा रहा है। 17 से 19 सितंबर 2026 को आयोजित संस्करण में भी 52 देशों की लगभग 300 अंतरराष्ट्रीय कंपनियों ने हिस्सा लिया और 56 MoU, घोषणाएं तथा रणनीतिक पहलें सामने आईं। मोदी सरकार अब केवल चिप असेंबली और टेस्टिंग तक सीमित रहने की बजाय डिजाइन, उपकरण, सामग्री, फैब्रिकेशन, उन्नत पैकेजिंग, अनुसंधान और प्रतिभा विकास तक पूरी वैल्यू चेन खड़ी करने की कोशिश कर रही है। Semicon 2.0 के लिए जुलाई में ₹1,27,500 करोड़ के परिव्यय को मंजूरी दी गई। पहले चरण की योजना में 12 सेमीकंडक्टर परियोजनाओं को ₹1.64 लाख करोड़ से अधिक के निवेश के साथ मंजूरी दी जा चुकी है, जबकि Micron, Kaynes और CG Semi समेत पांच परियोजनाएं वाणिज्यिक उत्पादन में पहुंच चुकी हैं। यही नहीं, निवेश घोषणाओं का पैमाना भी इस बदलाव को रेखांकित करता है। Applied Materials ने 2035 तक भारत में 5 अरब डॉलर की योजना रखी है, Lam Research ने ₹10,000 करोड़ के प्रस्तावित निवेश की घोषणा की है, Tata Electronics ने धोलेरा में 363 एकड़ के vendor park की योजना सामने रखी है और Fujifilm ने ₹800 करोड़ के सेमीकंडक्टर materials plant की घोषणा की है। साथ ही मोदी सरकार ने Semicon 2.0 के तहत करीब ₹1 लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव मिलने की भी जानकारी दी है। यानी भारत के सामने अवसर बड़ा है, लेकिन जोखिम भी उतना ही वास्तविक है। Apple के अनुभव का हवाला देते हुए अश्विनी वैष्णव जिस खतरे की ओर इशारा कर रहे हैं, उसका व्यापक अर्थ यह है कि भारतीय कंपनियों और रणनीतिक तकनीकी परियोजनाओं को केवल उत्पादन क्षमता नहीं, बल्कि साइबर सुरक्षा, आपूर्ति-श्रृंखला सुरक्षा, सूचना-युद्ध और भौतिक सुरक्षा के मोर्चे पर भी तैयार रहना होगा। बहरहाल, भारत ने सेमीकंडक्टर क्षेत्र में प्रवेश का दरवाजा खोल दिया है। अब असली चुनौती यह है कि इस दरवाजे से आने वाली वैश्विक पूंजी, तकनीक और विनिर्माण क्षमता को कितनी मजबूती से सुरक्षित रखते हुए भारत एक टिकाऊ घरेलू चिप इकोसिस्टम में बदल पाता है। -नीरज कुमार दुबे
बिहार में परिसीमन प्रक्रिया के बाद कराया जाएगा अगला पंचायत चुनाव: सम्राट चौधरी
बिहार में परिसीमन प्रक्रिया के बाद कराया जाएगा अगला पंचायत चुनाव: सम्राट चौधरी
अक्सर विवादित बयान देकर सुर्खियों में रहने वाले पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के हालिया बयान ने भारतीय राजनीति में एक बार फिर राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता और कांग्रेस की वैचारिक दिशा को लेकर तीखी बहस छेड़ दी है। नई दिल्ली में एजी नूरानी की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में अंसारी ने नूरानी की 2019 में प्रकाशित पुस्तक The RSS: A Menace to India का हवाला देते हुए जवाहरलाल नेहरू की एक कथित टिप्पणी दोहराई थी। अंसारी के अनुसार, नेहरू ने कहा था कि भारत के लिए खतरा कम्युनिज्म नहीं, बल्कि “हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता” है। इसी संदर्भ में उन्होंने नागरिक राष्ट्रवाद की जगह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के उभार पर भी सवाल उठाए थे। यहां सियासी सवाल खड़ा होता है कि क्या आज के भारत को देखने का नजरिया अब भी दशकों पुराने वैचारिक चश्मे से तय किया जाएगा? सवाल उठता है कि क्या हिंदू दक्षिणपंथ को भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा बताना ही देश की वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक वास्तविकताओं की पर्याप्त व्याख्या है? उधर, बीजेपी ने अंसारी के बयान को हाथोंहाथ लिया और कांग्रेस की वैचारिक दिशा पर ही सवाल दाग दिया। बीजेपी सांसद और राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने तंज कसते हुए कहा कि अंसारी ने अनजाने में कांग्रेस की वर्तमान राजनीति को “पूरी तरह बेनकाब” कर दिया है। उन्होंने कहा कि जिस कांग्रेस ने कभी कम्युनिज्म को चुनौती माना था, वह आज “अल्ट्रा-लेफ्ट” की ओर चली गई है। डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने अंसारी द्वारा नेहरू के हवाले को राहुल गांधी की वर्तमान राजनीतिक भाषा से जोड़ते हुए पूछा कि क्या आज की कांग्रेस की वैचारिक जड़ें उसी सोच में हैं? उन्होंने कांग्रेस को “मुस्लिम लीग-माओवादी कांग्रेस” तक कह डाला। इसे भी पढ़ें: पूर्व उपराष्ट्रपति Hamid Ansari के बयान पर CM Yogi Adityanath का पलटवार, सनातन परंपरा के अपमान का लगाया आरोप लेकिन अंसारी के बयान का दूसरा और अधिक गंभीर राजनीतिक पहलू भी है। उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में ऐसे रुझान उभरे हैं जो नागरिक राष्ट्रवाद की स्थापित अवधारणा को चुनौती देकर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को आगे बढ़ाते हैं। उनके मुताबिक इसमें चुनावी बहुमत को धार्मिक बहुमत के रूप में प्रस्तुत करने और राजनीतिक सत्ता पर एकाधिकार की प्रवृत्ति दिखाई देती है। यह महज इतिहास का संदर्भ नहीं, बल्कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था पर सीधा वैचारिक आरोप है। इसी मुद्दे पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस पर और तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि संवैधानिक पद पर रह चुके व्यक्ति से पद की गरिमा बनाए रखने की अपेक्षा होती है। योगी ने अंसारी के बयान को भारतीय परंपराओं और सनातन संस्कृति के प्रति अपमानजनक बताया तथा आरोप लगाया कि इससे भारत की वैश्विक छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश होती है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बयान में हिंदू परंपरा को आतंकवाद से जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है। उधर, भाजपा नेता सैयद शाहनवाज हुसैन ने भी अंसारी से माफी की मांग की और दावा किया कि उनकी टिप्पणी से मुस्लिम समुदाय के भी अनेक लोग असहज हुए हैं। साथ ही भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने विभाजन के बाद भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप और विभिन्न धार्मिक समुदायों के साथ रहने की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि समाज में विभाजन पैदा करने की कोशिश सफल नहीं होगी। यही नहीं, कई अन्य मुस्लिम धार्मिक नेताओं द्वारा भी अंसारी की टिप्पणियों से दूरी बनाने और सामाजिक सौहार्द पर जोर देने की खबरें सामने आई हैं। बहरहाल, अब असली राजनीतिक बहस यही है कि क्या भारत को समझने के लिए हिंदू बनाम कम्युनिज्म की पुरानी वैचारिक तुलना पर्याप्त है? क्या हिंदू राष्ट्रवाद को स्वतः “खतरा” मानना उचित है? क्या नेहरू के दशकों पुराने कथन को आज की राजनीतिक परिस्थितियों का निर्णायक प्रमाण माना जा सकता है? देखा जाये तो इस विवाद ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि भारत की राजनीति में राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता, सनातन परंपरा और सांस्कृतिक पहचान की चर्चा अब केवल इतिहास की बहस नहीं रही, यह मौजूदा सत्ता-संघर्ष के केंद्र में है।
पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी से 'पद्म श्री' पुरस्कार वापस लेने की मांग, हिंदू सेना ने लिखा अमित शाह को पत्र
राशन इकट्ठा कर लो...यूरोप में क्या बड़ा होने वाला है! ब्रिटेन-फ्रांस अचानक क्यों करने लगे ये अपील?
क्या यूरोप एक बहुत बड़े महायुद्ध के मुहाने पर आकर खड़ा हो गया है? क्या तीसरे विश्वयुद्ध की आहट अब इतनी करीब आ चुकी है कि सरकारों ने अपने नागरिकों से सीधे तौर पर राशन और पानी जमा करने को कह दिया है? ये कोई अफवाह नहीं, बल्कि इस वक्त पूरे यूरोप की जमीनी हकीकत बन चुकी है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों खुले तौर पर कह रहे हैं कि यह वक्त बेहद मुश्किल है और सबको एक साथ खड़ा होना होगा। ब्रिटेन से लेकर फ्रांस तक, यूरोप के तमाम मुल्कों में जनता को बाकायदा हिदायत दी जा रही है कि घरों में राशन, सूखा खाना, पीने का पानी और ईंधन स्टॉक करना शुरू कर दें। यूरोप का शायद ही कोई ऐसा अखबार बचा हो जिसकी हेडलाइन में यह खौफ साफ न छलक रहा हो। दूसरी तरफ नजर डालेंगे तो अमेरिका लगभग ग्रीनलैंड की सुरक्षा का पूरा जिम्मा अपने हाथ में ले चुका है और साफ कह दिया है कि अब इस पूरे इलाके की रक्षा अमेरिकी बूट्स करेंगे। लेकिन इन सब के बीच सबसे बड़ा सवाल कि आखिर रूस की तरफ से यूरोप की खुफिया एजेंसियों को ऐसे कौन से इनपुट्स मिले हैं, जिसने पूरे महाद्वीप को हिलाकर रख दिया है? क्यों यूरोपीय राजधानियों में बंकरों की धूल झाड़ी जा रही है और सेनाओं को स्टैंडबाय पर रहने का फरमान जारी हो चुका है? क्या मॉस्को से कोई ऐसा बड़ा तूफान उठने वाला है जो पूरे यूरोप को अपनी जद में ले लेगा? आज इसी का एमआरआई स्कैन करते हैं। इसे भी पढ़ें: Congress का Election Commission पर हमला, SIR प्रक्रिया को बताया मतदाताओं के नाम हटाने की साजिश 1600 ड्रोंस से रूस पर अटैक यूक्रेन ने 20 सितंबर को यहां कई ड्रोन हमले किए हैं। आप इसका अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि रशिया ने दावा किया है कि यूक्रेन की तरफ से आने वाले 1600 ड्रोंस को उसने इंटरसेप्ट किया है और वीडियो से भी इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस हमले में दो लोगों की मौत हुई है। यूक्रेन ने रशिया की राजधानी मॉस्को की एक ऑयल रिफाइनरी और सेना के लॉजिस्टिक ठिकाने को टारगेट किया। कई इमारतों को इसमें नुकसान भी पहुंचा है। यह हमला ऐसे समय में हुआ जब रूस में संसदीय चुनाव के लिए वोटिंग चल रही थी। वोटिंग का अंतिम दिन था। लोअर हाउस जो संसद है रूस का उसके लोअर हाउस के लिए यह वोटिंग थी। यूक्रेनी राष्ट्रपति वडदमीर जेलस्की ने खुद हमले की जानकारी दी। उन्होंने सोशल मीडिया पर वीडियो पोस्ट कर लिखा, हमने रूस की ऑयल रिफाइनरी और सेना के लॉजिस्टिक ठिकाने को टारगेट किया। यह वही अरबों डॉलर का तंत्र है जहां रूस अपने डिफेंस का सामान तैयार करता है। जेलस्की ने यह भी बताया हमले में यूक्रेन ने क्या-क्या इस्तेमाल किया है। इसे भी पढ़ें: Shafali Verma के शतक से Asian Games सेमीफाइनल में India ने बनाए 195 रन चुनाव के अंतिम दिन क्यों हुआ हमला यूक्रेन ने हमले के लिए ठीक ऐसा वक्त चुना जब व्लादमीर पुतिन के 26 साल के एक छत्रराज को नई ताकत देने के लिए वोट डाले जा रहे थे। ठीक उसी वक्त जेलस्की के ड्रोन ब्रिगेड ने ऑपरेशन मॉस्को को अंजाम दे दिया। रूसी अधिकारियों के मुताबिक ड्रोन हमलों में तीन लोगों की जान चली गई जबकि 20 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। मतलब साफ है कि यह सिर्फ आसमान में उड़ते हुए यूक्रेन के ड्रोंस नहीं थे बल्कि रूस के दिल माने जाने वाले क्रिमिया पर यूक्रेन का लॉन्ग रेंज अटैक था। मॉस्को के आसमान में जिस तरह से एक के बाद एक धमाके हुए उससे रूस की एयर डिफेंस क्षमता पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं। क्योंकि यूक्रेन के हमलों का निशाना बना है मॉस्को का सबसे बड़ा ऑयल रिफाइनरी कॉम्प्लेक्स जो धमाकों के बाद पूरी तरह से स्वाहा हो गया है। यूक्रेन पिछले कई महीनों से रूस के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बना रहा है। क्योंकि तेल और गैस से होने वाली कमाई रूस की युद्ध मशीन के लिए बेहद अहम मानी जाती है। ऐसे में रूसी तेल रिफाइनिंग क्षमता पर यूक्रेनी हमलों से रूसी ईंधन की सप्लाई और कीमतों पर भी असर पड़ना तय है। उधर मॉस्को में 21 मंजिला एक रिहााइशी इमारत में ड्रोन टकराने से भीषण आग लग गई। इस बीच यूक्रेन के इस सबसे बड़े ड्रोन अटैक पर बड़ा सवाल यह उठने लगा है कि आखिर चुनाव के अंतिम दिन मॉस्को पर इतना बड़ा हमला क्यों किया गया? इसके जवाब में मॉस्को के मेयर सरगई सोबियानिन ने बताया कि यूक्रेन के हमले का सीधा मकसद रूसी संसदीय चुनाव में खलल डालना था। NATO के खिलाफ निर्णायक जंग छेड़ने की तैयारी में पुतिन रूसी भाषा में बोलते व्लादिमीर पुतिन का एक बयान सामने आया है। जिसमें वो कह रहे हैं कि नाटो हमारी तरफ एक्सपेंड करने की कोशिश कर रहा है। नए-नए इलाके में घुसने कोशिश कर रहा है। अब हमने फैसला किया है कि उनके खिलाफ अब निर्णायक जंग छेड़ दिया जाए। अब हुआ यह कि जैसे ही एक तो रूस के राष्ट्रपति ने कह दिया कि मारेंगे जरूर चाहे जो हो जाए और ऊपर से वहां राशन पानी इकट्ठा करने की बात हो ही गई। सारे यूरोप वाले कह रहे हैं कि हमारी रक्षा तो अमेरिका करता था। तो अमेरिका बचाएगा कि नहीं हमें? डोनाल्ड ट्रंप अलग ही मूड में नजर आ रहे हैं। उन्होंने अनाउंस किया कि हम यूक्रेन में अपने सैनिक तैनात है वापस ले रहे हैं। इतना ही नहीं उन्होंने कहा है कि गल्फ नेशन में जो अमेरिकन सैनिक हैं हम ईरान के हाथों मरने नहीं दे सकते। उसको भी वापस ले लेंगे। क्या नाटो की सीमा पर बड़ा धमाका होने वाला है यूरोपीय खुफिया एजेंसियों की तरफ से आई एक ताजा और बेहद सनसनीखेज रिपोर्ट ने पूरे पश्चिमी खेमे में खलबली मचा दी है। खुफिया अधिकारियों का दावा है कि रूस बहुत जल्द नाटो की ताकत और उसकी एकजुटता की परीक्षा ले सकता है, और यह संभावित हमला सालों में नहीं, बल्कि कुछ ही महीनों के भीतर देखने को मिल सकता है। पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने अपनी संसद में साफ लफ्जों में चेतावनी दी है कि मॉस्को आने वाले महीनों में ड्रोन या मिसाइलों के जरिए नाटो की जमीन को निशाना बना सकता है। टस्क के मुताबिक, पुतिन का सीधा मकसद यह साबित करना है कि नाटो का सबसे ताकतवर सुरक्षा कवच यानी आर्टिकल 5, जमीन पर सिर्फ एक किताबी थ्योरी है, हकीकत नहीं। इस चेतावनी की गंभीरता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने टस्क के इन दावों को बेहद सटीक और पुख्ता सबूतों पर आधारित बताया है। हालात इतने नाजुक हो चुके हैं कि मैक्रों ने पेरिस में तमाम राजनीतिक दलों के नेताओं और राष्ट्रपति पद के दावेदारों की एक आपातकालीन बैठक तलब कर ली, जहां रूस के इस बढ़ते खतरे पर बंद कमरों में रणनीति तैयार की जा रही है। यह चिंता तब बढ़ रही है जब इस हफ़्ते के आखिर में न्यूयॉर्क में UN जनरल असेंबली की बैठक होने वाली है और साथ ही रूस-यूक्रेन युद्ध में दोनों तरफ़ से हवाई हमले तेज़ हो गए हैं। रविवार तड़के कीव ने मॉस्को और रूस के दूसरे इलाकों पर सैकड़ों ड्रोन और मिसाइलें दागीं। यह इस युद्ध के दौरान किए गए सबसे बड़े हवाई हमलों में से एक था। द गार्जियन को दिए गए अलग-अलग साक्षात्कारों में पश्चिमी खुफिया प्रमुखों ने पुतिन के अगले खतरनाक कदम का जो खाका खींचा है, उसने नाटो मुख्यालय से लेकर तमाम यूरोपीय देशों की नींद उड़ा दी है। चेक गणराज्य की सुरक्षा सेवा 'बीआईएस' के प्रमुख माइकल कोउडेल्का ने प्राग स्थित अपने मुख्यालय में एक दुर्लभ इंटरव्यू के दौरान बेहद सनसनीखेज अंदेशा जताया है। कोउडेल्का के मुताबिक, केवल ड्रोन और मिसाइल स्ट्राइक ही नहीं, बल्कि रूस से सटी नाटो सीमा पर रूसी सेना की एक सीमित जमीनी घुसपैठ यानी 'स्मॉल-स्केल इनवेजन' भी क्रेमलिन के प्लान का सीधा हिस्सा हो सकता है। माइकल कोउडेल्का ने चेताते हुए साफ कहा यह पूरी तरह मुमकिन है। रूस की योजना में एक सीमित सैन्य घुसपैठ, फॉल्स-फ्लैग उकसावे वाली साजिशें और नाटो देशों के भीतर एक बड़े पैमाने का इनफ्लुएंस कैंपेन शामिल हो सकता है। और यह खतरा सालों दूर नहीं, बल्कि महज कुछ महीनों के भीतर हकीकत का रूप ले सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि पश्चिमी सुरक्षा एजेंसियां दिन-रात एक कर रही हैं ताकि हालात इस खौफनाक स्तर तक न पहुँचें। क्या अमेरिका की रणनीतिक चूक से बिगड़े हालात! यह लड़ाई अब तेजी से फैलती दिख रही है। अमेरिका को अपने नागरिकों के लिए अलर्ट जारी करना पड़ा है, डोनल्ड ट्रंप छुट्टी खत्म होने से पहले ही वापस लौट आए। वॉशिंगटन इन हालात से पूरी तरह पल्ला नहीं झाड़ सकता है। ईरान पर हमले से लेकर उसके साथ हुए अंतरिम समझौते को तोड़ने तक, कई मौकों पर गंभीर चूक हुई है। ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन यह आकलन करने में बुरी तरह नाकाम रहा कि संघर्ष किस हद तक जा सकता है। उसने पश्चिम एशिया में अपने सहयोगियों की चिंताओं को भी नजरअंदाज किया और हूतियों का बढ़ता खतरा उसी का नतीजा है।अमेरिकी राष्ट्रपति ने पिछले हफ्ते कहा था कि मास्को और कीव एक-दूसरे के ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमले रोकने के लिए सहमत हुए हैं। पिछले दिनों जब उनकी स्पेशल टीम ने दोनों देशों का दौरा किया था, तब उसे भी इस बात के रूप में प्रचारित किया गया कि अमेरिका अब वास्तविक बातचीत चाहता है । पर रूस पर अमेरिकी प्रतिबंधों वाले नए बिल और इन ताजा हमलों ने सारी कोशिशों को पीछे धकेल दिया है।
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों : केवाईसी कॉपी प्रमाणन की प्रक्रिया को किया आसान
नई दिल्ली, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के लिए अनुपालन प्रक्रिया को आसान कर दिया है। इसके तहत भारतीय बैंक अब विदेशों में अधिकृत अधिकारियों द्वारा प्रमाणित कुछ निर्दिष्ट केवाईसी दस्तावेजों की मूल प्रमाणित प्रतियां स्वीकार कर सकेंगे।
जम्मू-कश्मीर विधानसभा सत्र को लेकर नेताओं ने जताई उम्मीदें
जम्मू-कश्मीर विधानसभा सत्र को लेकर नेताओं ने जताई उम्मीदें
न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 21वें सत्र की शुरुआत के साथ ही भारत की कूटनीतिक सक्रियता तेज हो गई है। इस बार भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जगह विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे। जयशंकर 26 सितंबर को महासभा को संबोधित करेंगे और इस दौरान कई देशों के नेताओं तथा विदेश मंत्रियों के साथ महत्वपूर्ण द्विपक्षीय और बहुपक्षीय बैठकें भी करेंगे। ऐसे समय में जब दुनिया युद्ध, ऊर्जा संकट, व्यापारिक टकराव और बदलते शक्ति संतुलन से जूझ रही है तब इस सत्र से काफी उम्मीदें की जा रही हैं। हम आपको बता दें कि इस सत्र में संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष, शासनाध्यक्ष और वरिष्ठ प्रतिनिधि जुट रहे हैं। इस बार का केंद्रीय विषय है, विश्वास बहाल करना, बदलाव को संभालना और ऐसा संयुक्त राष्ट्र बनाना जो सभी के लिए परिणाम दे। महासचिव अंतोनियो गुतारेस ने वैश्विक नेताओं से शांति, गरिमा, न्याय और मानवता के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग मजबूत करने की अपील की है। यह उनके कार्यकाल का अंतिम महासभा सत्र भी है। ऐसे माहौल में भारत के सामने अपनी विदेश नीति की प्राथमिकताओं को बेहद स्पष्ट और मजबूती से रखने का अवसर है। इसे भी पढ़ें: BRICS की शानदार सफलता के बाद भारत ने पड़ोस में छेड़ा 'महा-अभियान', हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक तेजी से एक्टिव हुआ India देखा जाये तो जयशंकर की यात्रा का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि भारत-अमेरिका संबंध इस समय कई कठिन सवालों से गुजर रहे हैं। रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका द्वारा भारी शुल्क लगाने की व्यवस्था ने नई दिल्ली की ऊर्जा सुरक्षा और वाशिंगटन के साथ व्यापारिक संबंधों के बीच तनाव पैदा किया है। हम आपको बता दें कि अमेरिकी कानून राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से ऊर्जा खरीद जारी रखने वाले देशों पर सौ प्रतिशत तक शुल्क लगाने की शक्ति देता है। लेकिन भारत ने स्पष्ट किया है कि उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता अपने लगभग एक अरब चालीस करोड़ नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा है और वह अलग-अलग स्रोतों से ऊर्जा की आपूर्ति जारी रखेगा। यहीं से जयशंकर की न्यूयॉर्क यात्रा का असली सामरिक महत्व सामने आता है। भारत को एक साथ रूस के साथ अपने ऊर्जा और सामरिक संबंधों, अमेरिका के साथ व्यापार और सुरक्षा साझेदारी तथा ग्लोबल साउथ की चिंताओं को साधना है। संयुक्त राष्ट्र महासभा इस संतुलन को साधने के लिए सबसे बड़ा कूटनीतिक मंच उपलब्ध कराती है। जयशंकर की दर्जनों मुलाकातों में ऊर्जा, सुरक्षा, व्यापार, विकास और ग्लोबल साउथ के मुद्दे स्वाभाविक रूप से प्रमुख रहेंगे। इसके अलावा, भारत के लिए इस महासभा का एक अहम उद्देश्य 2028 से शुरू होने वाले दो वर्षीय कार्यकाल के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सदस्यता हासिल करने के समर्थन में विभिन्न देशों को साथ लाना भी है। इसके लिए जयशंकर अलग-अलग देशों के प्रतिनिधियों के सामने भारत का छह सूत्रीय घोषणापत्र रखेंगे और सुरक्षा परिषद में भारत की प्राथमिकताओं को स्पष्ट करेंगे। साथ ही, ग्लोबल साउथ के देशों के विकास में भारत की भूमिका, आर्थिक एवं मानवीय सहायता तथा संयुक्त राष्ट्र और अन्य बहुपक्षीय संस्थाओं के माध्यम से चलाए जा रहे कार्यक्रमों पर भी चर्चा होगी। पिछले वर्ष महासभा के दौरान जयशंकर ने 47 द्विपक्षीय और 10 बहुपक्षीय बैठकें की थीं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस बार भी भारत की कूटनीतिक गतिविधियां कितनी व्यापक रहने वाली हैं। उधर, कूटनीतिक हलकों में संयुक्त राष्ट्र महासभा के वार्षिक सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गैरमौजूदगी को लेकर सवाल उठ रहा है। उल्लेखनीय है कि 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के वार्षिक सत्र को चार बार यानि 2014, 2019, 2020 और 2021 में संबोधित किया। 2020 में महामारी के कारण उनका संबोधन पहले से रिकॉर्ड वीडियो के माध्यम से हुआ था। प्रधानमंत्री मोदी के तीसरे कार्यकाल को देखें तो स्थिति और भी स्पष्ट है। 2024 में मोदी न्यूयॉर्क गए और भविष्य के शिखर सम्मेलन को संबोधित किया, लेकिन महासभा की सामान्य बहस में भारत का राष्ट्रीय वक्तव्य विदेश मंत्री जयशंकर ने दिया। 2025 में भी सामान्य बहस में भारत का प्रतिनिधित्व जयशंकर ने किया और अब 2026 में भी भारत की कमान विदेश मंत्री के हाथ में है। इस तरह तीसरे कार्यकाल में अब तक मोदी ने महासभा की सामान्य उच्चस्तरीय बहस को अब तक संबोधित नहीं किया है। सवाल उठ रहा है कि क्या मोदी अमेरिका इसलिए नहीं जा रहे ताकि ट्रंप से मुलाकात से बच सकें? देखा जाये तो भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव जरूर है और रूसी तेल तथा अमेरिकी शुल्क का विवाद गंभीर है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी और ट्रंप की जून 2026 में फ्रांस में हुई मुलाकात में दोनों नेताओं ने व्यापार, ऊर्जा, रक्षा और प्रौद्योगिकी सहयोग आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई थी। इसलिए केवल संयुक्त राष्ट्र महासभा में मोदी की गैरमौजूदगी को ट्रंप से मुलाकात से बचने की रणनीति के रूप में देखा जाना गलत होगा। बहरहाल, न्यूयॉर्क में जयशंकर का संबोधन केवल संयुक्त राष्ट्र में भारत का भाषण नहीं होगा। यह संदेश देने का अवसर होगा कि भारत दबावों के बीच अपनी ऊर्जा सुरक्षा, सामरिक स्वायत्तता, ग्लोबल साउथ की आवाज और सुरक्षा परिषद में बड़ी भूमिका, इन चारों लक्ष्यों को एक साथ आगे बढ़ाना चाहता है। महासभा के मंच से भारत की कूटनीति की धार इसी संतुलन और दृढ़ता से दिखाई देगी। -नीरज कुमार दुबे
2027 का उत्तर प्रदेश दंगल: समाजवाद की नई राजनीतिक रंगोली या महज अवसरवाद का मुखौटा?
उत्तर प्रदेश की राजनीति को देश के सत्ता मार्ग का सबसे बड़ा प्रवेश द्वार माना जाता है। यहाँ का हर चुनावी समर राजनीतिक सिद्धांतों, सामाजिक इंजीनियरिंग और रणनीतिक पैंतरों की एक नई प्रयोगशाला बन जाता है। इस समय सूबे की सियासत 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट से पूरी तरह गर्म हो चुकी है। इस बार का विमर्श लोक-कल्याणकारी नीतियों या पारंपरिक विकास मॉडलों पर कम, बल्कि समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के बदलते वैचारिक और प्रतीकात्मक रंगों पर ज्यादा केंद्रित है। कभी लाल टोपी और हरे झंडे के पर्याय रहे अखिलेश यादव के इस नए राजनीतिक कलेवर ने उत्तर प्रदेश के पूरे राजनीतिक परिदृश्य को एक नई बहस में झोंक दिया है। उनके इस नए तेवर को जहां विपक्षी दल चुनावी अवसरवाद और गिरगिट की तरह रंग बदलने की संज्ञा दे रहे हैं, वहीं सपा के रणनीतिकार इसे बहुजन और वंचित समाज को एकजुट करने की एक व्यापक 'हाइब्रिड सोशल इंजीनियरिंग' के रूप में देख रहे हैं। ऐसे में यह सवाल मौजूं हो जाता है कि 2027 के महासमर से पहले अखिलेश यादव का यह नया रूप किसी गहरे वैचारिक परिवर्तन का संकेत है या सत्ता तक पहुँचने का महज एक तात्कालिक और व्यावहारिक शॉर्टकट? इस पूरे विवाद के केंद्र में सबसे पहला और चौंकाने वाला बदलाव समाजवादी पार्टी के आधिकारिक चुनाव प्रचार रथ पर देखने को मिला है। अखिलेश यादव ने 2027 की चुनावी यात्राओं के लिए जो नया रथ तैयार करवाया है, उसकी मुख्य रंग-योजना में इस बार 'भगवा' और पीत आभा को सबसे प्रमुखता से स्थान दिया गया है। 2022 के विधानसभा चुनाव में जहाँ सपा का रथ पूरी तरह लाल और हरे रंग के पारंपरिक समाजवादी रंग में रंगा था, वहीं इस बार भाजपा के सबसे मजबूत वैचारिक प्रतीक यानी 'भगवा रंग' का यह सीधा प्रवेश राजनीतिक विश्लेषकों को हैरान कर रहा है। इस रथ के माध्यम से सपा एक बेहद चतुर और बहुस्तरीय संदेश देने की कोशिश कर रही है। एक तरफ रथ पर भगवा पृष्ठभूमि के साथ बाबासाहेब आंबेडकर, डॉ. राम मनोहर लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव और चौधरी चरण सिंह जैसे महापुरुषों की तस्वीरें हैं, जो सामाजिक न्याय के समेकित एजेंडे को दर्शाती हैं। दूसरी तरफ, भगवा रंग का उपयोग कर अखिलेश यादव भाजपा के उस आख्यान को कुंद करना चाहते हैं जो सपा को बहुसंख्यक विरोधी या एक वर्ग विशेष की पार्टी के रूप में चित्रित करता रहा है। यह 'सॉफ्ट हिंदुत्व' और 'सोशल जस्टिस' का एक ऐसा अनूठा मिश्रण है, जिसके माध्यम से सपा सवर्णों (विशेषकर सत्तारूढ़ व्यवस्था से असंतुष्ट ब्राह्मणों और राजपूतों) तथा गैर-यादव पिछड़ों को यह विश्वास दिलाना चाहती है कि समाजवादी पार्टी अब किसी एक जाति या धर्म की बपौती नहीं है बल्कि वह बहुसंख्यक समाज की सांस्कृतिक भावनाओं का भी उतना ही सम्मान करती है। इसे भी पढ़ें: उत्तर प्रदेश 2027 का विधानसभा चुनाव: भाजपा का डेमेज कंट्रोल का प्रयास बात केवल रथ पर चढ़े भगवा रंग तक ही सीमित नहीं है, बल्कि समाजवादी कुनबे का यह वैचारिक विस्तार आगे बढ़कर 'नीले रंग' की ओर भी खिंचता हुआ दिखाई दे रहा है। पारंपरिक रूप से समाजवाद का प्रतिनिधित्व करने वाला 'लाल और हरा' रंग अब अपनी संपूर्ण एकाधिकारवादी पहचान खोता हुआ दिख रहा है। सपा की छात्र इकाई, 'समाजवादी छात्र सभा' ने हाल ही में अपने आधिकारिक परिधान (ड्रेस कोड) में नीली टी-शर्ट और जींस को शामिल कर लिया है, जिसके ऊपर लाल टोपी पहनी जा रही है। इसके अतिरिक्त, अखिलेश यादव स्वयं कई महत्वपूर्ण राजनीतिक बैठकों और जनसभाओं में नीले रंग का गमछा ओढ़े नजर आ रहे हैं। राजनीति में प्रतीकों का अपना एक अनूठा और गहरा महत्व होता है। नीला रंग दशकों से बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर की वैचारिक विरासत का मुख्य प्रतीक रहा है। सपा के इस 'नीले प्रेम' को सीधे तौर पर मायावती के कमजोर होते दलित जनाधार में सेंध लगाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। 2024 के लोकसभा चुनावों में सपा ने गैर-जाटव दलितों और अति-पिछड़ों के एक बड़े हिस्से का समर्थन हासिल कर शानदार सफलता दर्ज की थी। अब अखिलेश यादव उस क्षणिक सफलता को 2027 में एक स्थायी वोट बैंक में तब्दील करना चाहते हैं, जिसके लिए वे पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के नारे को केवल ज़ुबानी जमा-खर्च तक सीमित न रखकर पार्टी के दृश्य रूप (विजुअल अपीयरेंस) में भी ढाल रहे हैं। अखिलेश यादव की इस बदलती बहुरंगी रणनीति ने विपक्ष, विशेषकर बहुजन समाज पार्टी और भारतीय जनता पार्टी को हमला करने का एक बड़ा हथियार दे दिया है। बसपा सुप्रीमो मायावती ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए सपा के इस कदम को दलितों और पिछड़ों के साथ एक नया छल करार दिया है। उनका तर्क है कि जो समाजवादी पार्टी अपने शासनकाल में दलित महापुरुषों के नाम पर बने स्मारकों और जिलों के नाम बदलने में व्यस्त थी, वह आज केवल चुनाव जीतने के लिए नीले रंग का स्वांग रच रही है और उनका नया 'PDA रथ' उनके अपने लाल रंग से कम और आरएसएस-भाजपा के भगवा रंग में ज्यादा रंगा नजर आ रहा है। मायावती ने इसे गिरगिट की तरह रंग बदलना और वैचारिक दिवालियापन कहा है। दूसरी ओर, भाजपा और उसके सहयोगी दल जैसे सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर इसे सपा का 'चुनावी पाखंड' बता रहे हैं। सत्तापक्ष का आरोप है कि सपा अपनी पुरानी 'मुस्लिम-यादव' (एम-वाई) समीकरण वाली छवि से डरी हुई है और बहुसंख्यक समाज के गुस्से से बचने के लिए अब भगवा और नीले रंग की आड़ ले रही है। विरोधियों का कहना है कि सिर्फ पोशाक और रथ का रंग बदल लेने से कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर सपा का पुराना ट्रैक रिकॉर्ड और अतीत की गलतियाँ जनता के मानस पटल से गायब नहीं हो सकतीं। हालांकि, अगर इस पूरे घटनाक्रम का निष्पक्ष राजनीतिक विश्लेषण किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि अखिलेश यादव की यह कवायद महज तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं बल्कि एक सोची-सोची 'लॉन्ग-टर्म' रणनीति का हिस्सा है। मुलायम सिंह यादव के दौर की समाजवादी पार्टी मुख्य रूप से एक क्षेत्रीय और विशिष्ट सामाजिक समीकरण पर आधारित पार्टी थी। अखिलेश यादव भली-भांति जानते हैं कि आज के उत्तर प्रदेश में केवल 'यादव और मुस्लिम' मतों के सहारे भाजपा जैसी साधन-संपन्न और वैचारिक रूप से मजबूत चुनावी मशीनरी को मात देना असंभव है। 2017, 2019 और 2022 की लगातार हारों ने सपा को यह सिखाया है कि सत्ता की सीढ़ी चढ़ने के लिए उसे अपनी सर्वसमावेशी स्वीकार्यता बढ़ानी होगी। इसलिए, उन्होंने '75 जिले, 75 घोषणापत्र' जैसी माइक्रो-लेवल प्लानिंग की शुरुआत की है, जो यह दर्शाती है कि सपा अब केंद्रीकृत राजनीति के बजाय जमीनी और स्थानीय मुद्दों को तरजीह दे रही है। '27 में 27 हजार' का नारा भी इसी सूक्ष्म रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत बूथ स्तर पर भाजपा के पारंपरिक वोटों को काटने और अपने पाले में जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। इस पूरे 'कलर गेम' का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि अखिलेश यादव इस प्रक्रिया में अपने कोर वोट बैंक यानी अल्पसंख्यकों को खोने का जोखिम भी उठा रहे हैं या कम से कम ऐसा विपक्ष को लगता है। जब मायावती यह सवाल उठाती हैं कि क्या सपा का मुसलमानों से भरोसा उठ गया है?, तो वे वास्तव में मुस्लिम मतदाताओं के भीतर एक असुरक्षा की भावना पैदा करने का प्रयास कर रही होती हैं। लेकिन अखिलेश यादव की इस रणनीति के पीछे एक गहरा गणित है। उन्हें पता है कि उत्तर प्रदेश का अल्पसंख्यक मतदाता वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में भाजपा को हराने में सक्षम सबसे मजबूत विकल्प के साथ ही जाएगा, और वह विकल्प फिलहाल सपा ही है। इसलिए, मुस्लिम मतों के बिखरने का खतरा कम देखते हुए अखिलेश अपनी पूरी ऊर्जा उस बहुसंख्यक और दलित आबादी को जोड़ने में लगा रहे हैं जो अब तक उनसे दूर रही थी। यह एक बड़ा राजनीतिक जुआ है, जिसमें यदि वे सफल रहे तो भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय का एक नया अध्याय लिखा जाएगा, और यदि विफल रहे तो पार्टी अपने पारंपरिक आधार से भी हाथ धो सकती है। देखा जाय तो राजनीति में 'रंगों का बदलना' कोई नई बात नहीं है। विचारधाराएं समय के साथ अपनी प्रासंगिकता और व्यावहारिकता के अनुसार खुद को ढालती आई हैं। अखिलेश यादव का यह नया अवतार इस बात का प्रमाण है कि वे अब जूनियर यादव या एक विरासत संभालने वाले नेता की छवि से बाहर निकलकर खुद को उत्तर प्रदेश के एक सर्वमान्य और परिपक्व जननेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। उनका यह बहुरंगी दृष्टिकोण भारतीय लोकतंत्र के उस व्यावहारिक रूप को दिखाता है जहाँ चुनाव जीतने के लिए प्रतीकों का विलय और वैचारिक सीमाओं का लचीला होना अनिवार्य शर्त बन जाता है। क्या जनता उनके इस 'नीले-भगवा-लाल-हरे' इंद्रधनुषी गठबंधन को स्वीकार करेगी या इसे केवल एक चुनावी छलावा मानकर खारिज कर देगी, इसका फैसला 2027 के मतपेटियों से ही होगा। लेकिन एक बात तो तय है कि अखिलेश यादव के इन बदलते रंगों ने उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव को बेहद दिलचस्प, पेचीदा और अप्रत्याशित बना दिया है, जिसने विरोधियों को अपनी रणनीतियाँ नए सिरे से तैयार करने पर मजबूर कर दिया है। - अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार
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ओवैसी ने यूपी में विपक्षी गठबंधन पर कहा-'हम 2 अक्टूबर तक अपने गठबंधन का ऐलान करेंगे'
कम्युनिज्म की राह पर जा रहे राहुल गांधी, उनकी पार्टी बनी 'मुस्लिम लीग माओइस्ट कांग्रेस' : सुधांशु त्रिवेदी
पाकिस्तान ने एक बार फिर अफगानिस्तान की संप्रभुता का उल्लंघन करते हुए हवाई हमला किया है, लेकिन इस बार तालिबान ने भी इस्लामाबाद को कड़ा सबक सिखाने की ठानते हुए खुली और सख्त चेतावनी जारी कर दी है। हम आपको बता दें कि अफगानिस्तान के कुनार प्रांत में पाकिस्तानी एयर स्ट्राइक में कम से कम तीन लोगों की मौत और कई लोगों के घायल होने की खबर है। पाकिस्तानी कार्रवाई ऐसे समय हुई है, जब कुछ ही दिन पहले तालिबान प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने साफ कहा था कि अफगान जमीन पर किसी भी पाकिस्तानी सैन्य कार्रवाई का जवाब दिया जाएगा और इसे उन्होंने “क्रशिंग रिस्पॉन्स” यानी करारा जवाब बताया था। कुनार पर हमला, टकराव का खतरा बढ़ा रिपोर्टों के मुताबिक पाकिस्तान ने कुनार के अलावा पक्तिका प्रांत में भी हवाई कार्रवाई की। अफगान अधिकारियों ने जहां तीन लोगों के मारे जाने की जानकारी दी है, वहीं पाकिस्तान की ओर से तत्काल आधिकारिक प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं हुई। दूसरी ओर, पाकिस्तानी पक्ष का दावा है कि उसकी कार्रवाई संदिग्ध आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाकर की गई। यह कार्रवाई पाकिस्तान में हाल में हुए घातक आतंकी हमलों के बाद हुई है। हम आपको याद दिला दें कि पिछले सप्ताह कोहाट में पुलिस परिसर के पास हुए हमले में बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई थी और पाकिस्तानी सुरक्षा प्रतिष्ठान ने इसके पीछे अफगानिस्तान से संचालित आतंकवादी नेटवर्क की आशंका जताई है। इसे भी पढ़ें: Khyber Pakhtunkhwa में TTP आतंकियों के साथ मुठभेड़, 6 सुरक्षाकर्मियों समेत 14 की मौत इसी मुद्दे को लेकर अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच पुराना आरोप-प्रत्यारोप अब सीधे सैन्य टकराव में बदलता दिखाई दे रहा है। पाकिस्तान लगातार आरोप लगाता रहा है कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी TTP के लड़ाके अफगान जमीन का इस्तेमाल कर पाकिस्तान में हमले करते हैं। तालिबान इन आरोपों को लगातार खारिज करता है और कहता है कि वह अफगानिस्तान की धरती को दूसरे देशों के खिलाफ हमलों के लिए इस्तेमाल नहीं होने देता। तालिबान की दो टूक चेतावनी पाकिस्तान के सैन्य प्रवक्ता की ओर से अफगानिस्तान में आतंकवादी समूहों की भर्ती, प्रशिक्षण और हथियारबंदी के आरोपों के जवाब में तालिबान प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने कहा कि अगर पाकिस्तान आत्मरक्षा के नाम पर अफगान क्षेत्र में कार्रवाई करता है तो काबुल को अपनी संप्रभुता की रक्षा का अधिकार है। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान को अपनी आंतरिक सुरक्षा समस्याओं की समीक्षा करनी चाहिए, क्योंकि TTP और बलूच सशस्त्र समूहों से जुड़ी हिंसा तालिबान के 2021 में सत्ता में लौटने से पहले से मौजूद है। हालांकि तालिबान की भाषा में सैन्य चेतावनी जितनी कठोर है, उतना ही महत्वपूर्ण उसका दूसरा संदेश भी है। काबुल ने बातचीत का दरवाजा बंद नहीं किया है। मुजाहिद ने पाकिस्तान के साथ बेहतर खुफिया सहयोग और सीमा सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत बताई है तथा सऊदी अरब को दोनों देशों के बीच मध्यस्थता की संभावित भूमिका के लिए समर्थन दिया है। यानी काबुल एक तरफ सैन्य जवाब की चेतावनी दे रहा है, तो दूसरी तरफ राजनयिक रास्ता खुला रखने की कोशिश भी कर रहा है। पाकिस्तान के भीतर भी बढ़ता दबाव इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा और बेहद महत्वपूर्ण पहलू पाकिस्तान की घरेलू स्थिति है। इस्लामाबाद इस समय एक साथ सुरक्षा, राजनीति और अर्थव्यवस्था के दबाव से जूझ रहा है। देश में इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ यानी PTI ने 27 सितंबर को इस्लामाबाद मार्च का ऐलान किया है, जबकि जमात-ए-इस्लामी भी पेट्रोलियम लेवी के खिलाफ राजधानी की ओर मार्च कर रही है। सरकार ने प्रदर्शनकारियों को राजधानी में पहुंचने से रोकने की तैयारी शुरू कर दी है। पाकिस्तान के वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब ने चेतावनी दी है कि हड़ताल, धरना, लंबे मार्च और सड़कों की नाकेबंदी से अर्थव्यवस्था को रोजाना करीब 120 अरब पाकिस्तानी रुपये, यानी लगभग 400-434 मिलियन डॉलर का नुकसान हो सकता है। अनुमान के मुताबिक सेवाक्षेत्र को करीब 86 अरब रुपये, उद्योग को 25 अरब और कृषि को 9 अरब रुपये प्रतिदिन का नुकसान हो सकता है। सरकार ने यह भी चेताया है कि इंटरनेट बाधित होने की स्थिति में आईटी निर्यात पर गंभीर असर पड़ सकता है। देखा जाए तो इस्लामाबाद के सामने चुनौती केवल अफगान सीमा तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के भीतर भी राजनीतिक और सुरक्षा संकट गहराता जा रहा है। राजधानी में संभावित विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए सुरक्षा कड़ी कर दी गई है, प्रवेश मार्गों पर कंटेनर लगाए जा रहे हैं और प्रमुख अस्पतालों को हाई अलर्ट पर रखा गया है। इसी बीच पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के खैबर पख्तूनख्वा अध्यक्ष जुनैद अकबर के एक बयान ने सरकार की चिंता और बढ़ा दी है। 27 सितंबर के प्रस्तावित इस्लामाबाद मार्च से पहले एक कार्यकर्ता सम्मेलन को संबोधित करते हुए अकबर ने कहा कि PTI कार्यकर्ता मोटरवे, जीटी रोड और मार्गल्ला हिल्स समेत कई रास्तों से राजधानी में प्रवेश करेंगे और “हम इस्लामाबाद को सोमनाथ बना देंगे।” पाकिस्तान सरकार ने इसे सीधे तौर पर हिंसा की धमकी और राजधानी में अराजकता फैलाने की मंशा का संकेत बताया है। उधर, अफगानिस्तान पर पाकिस्तान के नये हमले के बाद सबसे बड़ा खतरा यह है कि एक सीमित एयर स्ट्राइक जवाबी गोलीबारी, सीमा संघर्ष और फिर व्यापक सैन्य टकराव में बदल सकती है। हम आपको याद दिला दें कि इस साल फरवरी में भी दोनों देशों के बीच वर्षों का सबसे गंभीर सैन्य टकराव हो चुका है और ताजा घटनाक्रम उसी चक्र की वापसी का संकेत देता है। बहरहाल, देखना होगा कि कुनार की यह बमबारी यहीं रुकती है या पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा एक बार फिर खुले सैन्य संघर्ष का नया मोर्चा बनती है। - नीरज कुमार दुबे
मुंबई, सोने और चांदी की कीमतों में सोमवार को गिरावट देखने को मिली और इससे दोनों की कीमती धातुओं का दाम करीब 0.70 प्रतिशत घट गया।
'हर देश को अपने हालात के हिसाब से कानून बनाने का हक,' इटली में बुर्का बैन पर बोले मुफ्ती कासमी
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अयोध्या: राम मंदिर के नए सीईओ जितेंद्र मिश्रा आज से शुरू करेंगे कामकाज
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UP Election 2027: Mayawati का बड़ा U-Turn, Congress-AIMIM गठबंधन पर फंसा पेंच !
ओडिशा विधानसभा सत्र से पहले सुरक्षा कड़ी, 22 सितंबर से 3 अक्टूबर तक चलेगा सदन
ओडिशा विधानसभा के 17वें कार्यकाल का सातवां सत्र 22 सितंबर से 3 अक्टूबर तक चलेगा। इसे देखते हुए कमिश्नरेट पुलिस ने भुवनेश्वर में सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए हैं।
अमरोहा में नई सियासी हलचल : मोहम्मद शमी की जयंत चौधरी से मुलाकात, चुनावी अटकलें तेज
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले क्रिकेटर मोहम्मद शमी और राष्ट्रीय लोक दल अध्यक्ष जयंत चौधरी की मुलाकात ने राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। अमरोहा से लेकर दिल्ली तक इस मुलाकात को लेकर सियासी हलचल बढ़ गई है
'आंध्र प्रदेश की गठबंधन सरकार विशाखापत्तनम के विकास को कर रही कमजोर', वाईएसआरसीपी का आरोप
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'जनता ने डबल इंजन पर जताया भरोसा', राजस्थान निकाय चुनाव में भाजपा के प्रदर्शन पर बोले भूपेंद्र यादव
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पंजाब की 'आप' सरकार नशे के समाधान में बुरी तरह विफल हुई: शिवराज सिंह चौहान
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पंजाब को नशामुक्त बनाकर विकसित राज्य बनाएगी भाजपा: अर्जुन राम मेघवाल
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गोवा में 'दिशा 2.0' कार्यशाला 21 सितंबर से, नागरिकों को कानूनी अधिकारों के प्रति किया जाएगा जागरूक
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उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन 22 सितंबर को पांच दिवसीय वैश्विक जल प्रबंधन कार्यक्रम का उद्घाटन करेंगे
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लालबाग हादसे पर सुरक्षा ऑडिट जरूरी, पीड़ित परिवारों को मिलेगा न्याय : शायना एनसी
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'छात्रों की गूंज' मिमिक्री विवाद पर भड़के केंद्रीय मंत्री रिजिजू, बोले-'कांग्रेस कॉमेडियन और जोकरों की पार्टी बन गई है'
24 सितंबर को रायबरेली जाएंगे अखिलेश यादव
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव 24 सितंबर को रायबरेली जाएंगे। अखिलेश यादव यहां पार्टी विधायक राहुल लोधी के घर पर चाय पिएंगे और सियासी चर्चा करेंगे
1 अक्टूबर से एलपीजी सब्सिडी के लिए आधार जरूरी
घरेलू एलपीजी उपभोक्ताओं को सरकारी सब्सिडी के साथ निर्धारित कीमत पर रसोई गैस सिलेंडर की बुकिंग जारी रखने के लिए 1 अक्टूबर 2026 से बायोमेट्रिक आधार प्रमाणीकरण पूरा करना अनिवार्य होगा।
'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम के बाद राहुल गांधी पर सीएम मोहन यादव का पलटवार, शिक्षा और रोजगार के आंकड़े रखे सामने
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव: 'जेनजी देश के साथ खड़ी है', एबीवीपी की जीत पर यश डबास का बयान
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'ड्रग्स के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ें', पंजाब के लोगों से केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान की अपील
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बंगाल उपचुनाव: चुनाव आयोग ने एजेयूपी और एआईएसएफ को दिए नए चुनाव चिह्न, नंदीग्राम-रेजीनगर में नए सिंबल पर लड़ेंगे उम्मीदवार
डूसू चुनाव 2026 : एनएसयूआई ने काटा टिकट, फिर दीपांशु शौकीन ने निर्दलीय चुनाव जीतकर दिखाया दम
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एबीवीपी की डूसू में जीत 'राष्ट्र प्रथम' की विचारधारा में युवाओं का भरोसा : अमित शाह
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उत्तर प्रदेश 2027 का विधानसभा चुनाव: भाजपा का डेमेज कंट्रोल का प्रयास
उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में साल 2024 का लोकसभा चुनाव एक ऐसे मोड़ के रूप में दर्ज हो चुका है, जिसने सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की अजेय मानी जाने वाली छवि को गहरा धक्का पहुँचाया। दिल्ली की सत्ता पर लगातार तीसरी बार काबिज होने के बावजूद, देश के सबसे बड़े और राजनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश में पार्टी की सीटों का आंकड़ा लगभग आधा रह जाना एक ऐसी चेतावनी थी, जिसे नजरअंदाज करना आत्मघाती साबित हो सकता था। इस चुनावी झटके ने जहाँ एक ओर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन को नई ऊर्जा दी, वहीं दूसरी ओर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को आत्ममंथन और अपनी रणनीतियों को नए सिरे से परिभाषित करने पर मजबूर कर दिया। अब जबकि राज्य साल 2027 के विधानसभा चुनाव के मुहाने पर खड़ा है, भाजपा का पूरा ध्यान केवल सत्ता बचाने पर नहीं, बल्कि अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन को वापस पाने और 'मिशन हैट्रिक' को सफल बनाने के लिए एक व्यापक, आक्रामक और बहुआयामी 'डैमेज कंट्रोल' (क्षति नियंत्रण) अभियान पर केंद्रित हो चुका है। यह संपादकीय विश्लेषण इसी बात की पड़ताल करता है कि कैसे भाजपा अपनी पिछली गलतियों से सीखकर 2027 के महासंग्राम के लिए एक अभेद्य चक्रव्यूह रचने का प्रयास कर रही है।यदि 2027 में लखनऊ की गद्दी पर दोबारा भगवा ध्वज लहराना है, तो संगठन की बुनियादी कमियों को दूर करना और सामाजिक व सांगठनिक समीकरणों को नए सिरे से साधना पहली और अनिवार्य शर्त बन चुकी है। सांगठनिक कसावट के साथ-साथ भाजपा का यह डैमेज कंट्रोल केवल पार्टी कैडर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सहयोगियों और प्रमुख चेहरों को जोड़े रखने के लिए एक आक्रामक राजनीतिक घेराबंदी में बदल चुका है। इसी कड़ी में हाल ही में दो बेहद महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम सामने आए हैं, जो भाजपा की इस गंभीर रणनीति को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। पहला घटनाक्रम रायबरेली सदर से भाजपा विधायक अदिति सिंह का है। पिछले कुछ समय से राजनीतिक गलियारों में अदिति सिंह की कांग्रेस में संभावित वापसी को लेकर तरह-तरह की अटकलें और कयास लगाए जा रही थे। इन अटकलों को पूरी तरह खारिज करते हुए और विपक्ष के मनोबल को तोड़ने के लिए अदिति सिंह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से एक उच्च स्तरीय मुलाकात की। इस बैठक ने न केवल सभी अफवाहों पर पूरी तरह विराम लगा दिया, बल्कि यह भी साफ कर दिया कि रायबरेली जैसे गांधी परिवार के पारंपरिक गढ़ में भाजपा अपने किले को अभेद्य रखने के लिए पूरी तरह मुस्तैद है। इसे भी पढ़ें: UP में अगले 6 महीने में 1 लाख युवाओं को मिलेगी सरकारी नौकरी, CM Yogi का ऐलान इसी रणनीति का दूसरा और अधिक महत्वपूर्ण हिस्सा अपने नाराज सहयोगियों को संभालना है, जिसमें भाजपा का शीर्ष नेतृत्व कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। लोकसभा चुनाव के बाद से ही अपनी उपेक्षा और अति-पिछड़ों के आरक्षण के मुद्दे को लेकर सार्वजनिक रूप से नाराजगी जाहिर कर रहे निषाद पार्टी के अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री संजय निषाद को मनाने के लिए भाजपा के प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े खुद उनके आवास पर पहुंचे। दोनों नेताओं के बीच हुई इस मैराथन बैठक का मुख्य उद्देश्य सहयोगी दलों के भीतर पनप रहे असंतोष को समय रहते दबाना और 2027 से पहले एनडीए के कुनबे को पूरी तरह एकजुट रखना है। भाजपा भली-भांति जानती है कि उत्तर प्रदेश जैसी जटिल राजनीतिक पिच पर अनुप्रिया पटेल की अपना दल (एस), ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा और संजय निषाद की निषाद पार्टी जैसे छोटे दल अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। विनोद तावड़े का खुद चलकर संजय निषाद के घर जाना यह दिखाता है कि भाजपा अब किसी भी बड़े या छोटे सहयोगी को खोने का जोखिम नहीं उठा सकती और वह गठबंधन के भीतर सत्ता और सम्मान का नया संतुलन बनाने के लिए तैयार है। इसके अतिरिक्त, युवाओं और रोजगार के मुद्दे पर विपक्ष के आक्रामक हमलों को कुंद करने के लिए सरकार ने अपनी प्रशासनिक मशीनरी को पूरी तरह से झोंक दिया है। पिछले कुछ समय में हुए पेपर लीक मामलों ने सरकार की साख पर जो बट्टा लगाया था, उसे धोने के लिए कड़े कानून बनाए गए हैं और पारदर्शी तरीके से भर्ती परीक्षाओं के आयोजन पर जोर दिया जा रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं युवाओं को नियुक्ति पत्र बांटने के कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं, ताकि यह संदेश दिया जा सके कि सरकार युवाओं के भविष्य के प्रति अत्यंत संवेदनशील है। इसके समानांतर, 'वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट' और राज्य में आ रहे भारी-भरकम औद्योगिक निवेश के जरिए स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर सृजित करने के दावों को सोशल मीडिया और जमीनी अभियानों के माध्यम से जनता के बीच ले जाया जा रहा है। विपक्ष द्वारा महंगाई और बेरोजगारी पर बनाए जा रहे माहौल का मुकाबला करने के लिए भाजपा अपनी 'डबल इंजन सरकार' के विकास कार्यों—जैसे एक्सप्रेसवे का जाल, हवाई अड्डों का विकास और बेहतर कानून-व्यवस्था—को मुख्य ढाल बना रही है। एक और महत्वपूर्ण मोर्चा जिस पर भाजपा बहुत बारीकी से काम कर रही है, वह है टिकट वितरण और एंटी-इन्कंबेंसी का प्रबंधन। पार्टी के आंतरिक सूत्रों और स्वतंत्र एजेंसियों के माध्यम से प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र का गहन और बहुस्तरीय जमीनी सर्वे कराया जा रहा है। इस सर्वे में न केवल विधायकों की लोकप्रियता और उनके कामकाज का आकलन किया जा रहा है, बल्कि जनता के बीच उनकी छवि और कार्यकर्ताओं के साथ उनके व्यवहार को भी मापा जा रहा है। इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि सत्ता विरोधी लहर को काटने और जनता के गुस्से को शांत करने के लिए भाजपा 2027 के चुनावों में 30 से 40 प्रतिशत मौजूदा विधायकों के टिकट काट सकती है या उनके क्षेत्र बदल सकती है। नए, युवा और स्थानीय स्तर पर स्वीकार्य चेहरों को मौका देकर पार्टी एक 'नया और ऊर्जावान' विकल्प पेश करने की तैयारी में है, जिससे बगावत के खतरों को कम से कम किया जा सके। आजमगढ़, अयोध्या, सहारनपुर और मुरादाबाद जैसे मंडलों की हारी हुई सीटों और विशेषकर उन 16 जिलों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है जहाँ पार्टी का प्रदर्शन सबसे खराब रहा था, और इन क्षेत्रों की कमान सीधे वरिष्ठ मंत्रियों और संगठन के शीर्ष पदाधिकारियों को सौंप दी गई है। अंततः, उत्तर प्रदेश 2027 का चुनाव केवल देश के सबसे बड़े राज्य की सत्ता का फैसला नहीं करेगा, बल्कि यह 2029 के अगले लोकसभा चुनाव की दशा और दिशा भी तय करेगा। भाजपा भली-भांति जानती है कि दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर ही गुजरता है और यूपी में किसी भी प्रकार की शिथिलता उसके राष्ट्रीय राजनीतिक प्रभुत्व को संकट में डाल सकती है। वर्तमान में भाजपा द्वारा किए जा रहे डैमेज कंट्रोल के प्रयास—चाहे वह अदिति सिंह की मुख्यमंत्री से मुलाकात हो या विनोद तावड़े का संजय निषाद के घर पहुंचना—यह दर्शाते हैं कि पार्टी अपनी पराजय को स्वीकार कर आत्मसंतुष्टि के जाल से बाहर निकल चुकी है और एक अनुशासित सेना की तरह अपनी कमियों को सुधारने में जुट गई है। विपक्ष के सामाजिक नैरेटिव को तोड़ना, कार्यकर्ताओं को दोबारा सक्रिय करना, सहयोगियों को संतुष्ट रखना और सुशासन के दावों पर जनता का विश्वास बहाल करना एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य है। लेकिन चुनावी राजनीति के माहिर खिलाड़ी के रूप में भाजपा ने जिस तरह से माइक्रो-मैनेजमेंट और सामाजिक समीकरणों को नए सिरे से गढ़ने का ब्लूप्रिंट तैयार किया है, उसने 2027 की लड़ाई को बेहद दिलचस्प और कड़ा बना दिया है। आगामी महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भाजपा की यह नई बिसात विपक्ष के बढ़ते हौसलों को पस्त करने में कितनी कारगर साबित होती है। - अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार
सत्ता से संघर्ष तकः ममता बनर्जी का राजनीतिक यथार्थ
ममता बनर्जी का राजनीतिक सफर एक छात्र राजनीति की साहसी नायिका से लेकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनने और वर्तमान समय में घोर राजनीतिक व कानूनी संकटों से घिरने तक की एक बड़ी दास्तान है। जो ‘दीदी’ कभी सड़कों पर वामपंथ के 34 साल के किले को ढहाने के लिए जानी जाती थीं, वे आज अपनी राजनीतिक यात्रा के सबसे कठिन दौर से गुजर रही हैं। वर्तमान परिस्थितियों में ममता बनर्जी पर मुश्किलों के पहाड़ टूटने के मुख्य कारण इस प्रकार हैं- पहला, ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक झटका 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में लगा, जहाँ उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को हार का सामना करना पड़ा और राज्य में भाजपा की सरकार बनी। खुद ममता बनर्जी को भी अपनी पारंपरिक सीट भवानीपुर से शुभेंदु अधिकारी के हाथों करारी हार झेलनी पड़ी। 15 साल तक राज्य पर राज करने के बाद सत्ता से बाहर होना उनके राजनीतिक पतन की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। दूसरा, ममता बनर्जी की राजनीतिक ताकत हमेशा उनकी पार्टी पर उनकी मजबूत पकड़ थी। लेकिन वर्तमान में टीएमसी के भीतर एक बड़ी बगावत छिड़ गई है। कई विधायकों और सांसदों ने अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव और पार्टी में तानाशाही रवैये को लेकर बगावती रुख अख्तियार कर लिया है, जिससे पार्टी दो फाड़ होने की कगार पर पहुंच गई है। तीसरा, ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा कानूनी और भावनात्मक झटका तब लगा जब चुनाव आयोग ने पार्टी में आंतरिक विवाद के कारण तृणमूल कांग्रेस के नाम और उनके प्रसिद्ध चुनाव चिह्न ‘जोड़ा फूल’ को फ्रीज (रोक लगा दी) कर दिया। आयोग ने दोनों गुटों को अस्थाई रूप से नए नाम और सिंबल दिए हैं। ममता बनर्जी ने इसे भारतीय लोकतंत्र का ‘काला दिन’ बताया है और इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। चौथा, सत्ता से हटते ही ममता बनर्जी के खिलाफ कानूनी शिकंजा लगातार कसता जा रहा है- चुनाव प्रचार के दौरान कथित तौर पर भड़काऊ और सांप्रदायिक बयान देने के आरोप में उनके खिलाफ कोलकाता और सिलीगुड़ी में एफआईआर दर्ज की गई हैं। इसे भी पढ़ें: TMC संकट Mamata Banerjee के अहंकार और भगवान राम के शाप का परिणाम: Suvendu Adhikari अगस्त 2026 में कोलकाता में छात्र संगठन (टीएमसीपी) की रैली के दौरान कलकत्ता हाई कोर्ट के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करने और कानून व्यवस्था बिगाड़ने के आरोप में भी पुलिस ने उन पर मामला दर्ज किया है। उनकी पिछली सरकार पर एक विज्ञापन एजेंसी को रु. 635 करोड़ से अधिक का टेंडर देने में गड़बड़ी जैसे भ्रष्टाचार के नए आरोप लग रहे हैं। पांचवां, ममता बनर्जी ने हमेशा खुद को जनता की लड़ाई लड़ने वाली और महिलाओं के अधिकारों की रक्षक के रूप में पेश किया था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में राज्य में हुए महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर उनके विवादित बयानों और भ्रष्टाचार के मामलों (जैसे शिक्षक भर्ती घोटाला आदि) ने उनकी छवि को गंभीर नुकसान पहुंचाया। जनता में पैदा हुए इसी आक्रोश और सत्ता-विरोधी लहर ने उन्हें बैकफुट पर धकेल दिया। संघर्ष की नायिका का वर्तमान रुख, इन सब मुश्किलों के बावजूद, 17 साल की उम्र में दूध के बूथ और स्टेनोग्राफर का काम करके अपने परिवार को संभालने वाली ममता बनर्जी ने हार मानने से साफ इनकार किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे राजनीतिक संन्यास नहीं लेंगी और वे इस ‘गंदे खेल’ के खिलाफ सड़कों पर उतरकर लड़ाई जारी रखेंगी। आगामी उपचुनावों के लिए उन्होंने रणनीति बदलते हुए कांग्रेस उम्मीदवारों को समर्थन देने की घोषणा भी की है। भारतीय राजनीति के इतिहास में ममता बनर्जी का नाम एक ऐसी जननेता के रूप में दर्ज रहा है, जिन्होंने शून्य से उठकर जन आंदोलनों के बल पर दशकों पुरानी राजनीतिक संरचनाओं को हिला दिया। छात्र राजनीति के समय से ही उनकी पहचान एक बेबाक और निर्भीक व्यक्तित्व के रूप में रही है। तीन दशकों से अधिक लंबे वामपंथी शासन को उखाड़ फेंकने वाली दीदी ने पूरे पंद्रह वर्षों तक पश्चिम बंगाल की सत्ता पर एकछत्र राज किया। परंतु समय का चक्र ऐसा घूमा है कि वही जुझारू नेत्री आज अपनी ही राजनीतिक यात्रा के सबसे कठिन दौर से गुजर रही हैं। हालिया विधानसभा चुनावों में मिली पराजय, दल के भीतर भड़की बगावत, चौतरफा वैधानिक कार्यवाहियों का शिकंजा और दल की मूल पहचान यानी नाम तथा चुनाव चिह्न का छिन जाना, इन सबने मिलकर उनके समक्ष अस्तित्व रक्षा की अभूतपूर्व चुनौती खड़ी कर दी है। हाल के विधानसभा चुनाव पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास में एक बड़े मोड़ के रूप में सामने आए। पंद्रह वर्षों के निरंतर शासन के बाद तृणमूल कांग्रेस को जन-असंतोष और प्रचंड विरोध का सामना करना पड़ा। चुनावी नतीजों में न केवल उनकी पार्टी को करारी हार झेलनी पड़ी, बल्कि ममता बनर्जी को स्वयं अपनी पारंपरिक सीट भवानीपुर से पराजय का स्वाद चखना पड़ा। इस परिणाम ने यह सिद्ध कर दिया कि राज्य में बदलाव की लहर अत्यधिक तीव्र थी। निरंतर शासन से उपजी असंतुष्टि, विभिन्न भर्ती घोटालों के आरोप तथा स्थानीय स्तर पर उपजे जन-रोष ने मिलकर उनकी दलगत जड़ों को कमजोर कर दिया, जिससे राज्य में एक नए राजनीतिक समीकरण का उदय हुआ। किसी भी क्षेत्रीय दल की वास्तविक शक्ति उसका सुदृढ़ संगठन, शालीन भाषा, लोकतांत्रिक मर्यादा और नेतृत्व के प्रति अटूट निष्ठा होती है। तृणमूल कांग्रेस में लगभग तीन दशकों तक ममता बनर्जी ही सर्वमान्य चेहरा और अंतिम निर्णयकर्ता रहीं। किंतु चुनावी असफलता के उपरांत पार्टी के भीतर दबा हुआ असंतोष अचानक बाहर आ गया। विधायकों और सांसदों के एक बड़े धड़े ने शीर्ष नेतृत्व की कार्यशैली पर प्रश्न चिह्न खड़े कर दिए। तृणमूल कांग्रेस में आंतरिक विभाजन के बाद दोनों गुटों द्वारा अधिकार जताए जाने के कारण आयोग को कड़ा कदम उठाना पड़ा। वर्षों पूर्व जिस पहचान को उन्होंने अपने कड़े परिश्रम और संघर्ष से सींचा था, उसी से वंचित हो जाना उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा संवैधानिक झटका माना जा रहा है। यद्यपि उन्होंने इस निर्णय को लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध बताते हुए शीर्ष अदालत का द्वार खटखटाया है, परंतु तत्काल रूप से इस स्थिति ने दल के कार्यकर्ताओं में भारी असमंजस पैदा कर दिया है। सत्ता से बाहर होते ही ममता बनर्जी बहुआयामी कानूनी चुनौतियों से भी घिर गई हैं। चुनावी अभियानों के दौरान दिए गए बयानों को लेकर उनके खिलाफ विभिन्न स्थानों पर प्राथमिक दर्ज कराई गई हैं। जनसभाओं और रैलियों के संचालन में उच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के उल्लंघन तथा व्यवस्था बिगाड़ने के आरोपों में भी दंडात्मक कार्यवाहियाँ शुरू की गई हैं। ये तमाम कानूनी उलझनें न केवल उनकी प्रशासनिक छवि पर प्रश्न खड़े करती हैं, बल्कि उन्हें राजनीतिक पुनर्निर्माण के स्थान पर कानूनी बचाव की मुद्रा में ला खड़ा करती हैं। ममता बनर्जी की वास्तविक पूंजी उनकी साख थी, जो एक साधारण, त्यागपूर्ण और आम जनता की रक्षक के रूप में बनी थी। जनाक्रोश और सत्ता-विरोधी लहर ने उन्हें बैकफुट पर धकेल दिया। इसके बावजूद विपरीत परिस्थितियों में पली-बढ़ी ममता बनर्जी ने आसानी से घुटने न टेकने का संकल्प दोहराया है। राजनीति से संन्यास लेने की बातों को खारिज करते हुए उन्होंने पुनः जन-सड़कों पर उतरकर संघर्ष करने का मार्ग चुना है। वर्तमान परिस्थितियों में उन्होंने अपनी रणनीति बदलते हुए अन्य विपक्षी दलों के साथ हाथ मिलाना शुरू किया है। नंदीग्राम उपचुनाव में अपने प्रत्याशी का नाम वापस लेकर कांग्रेस उम्मीदवार का समर्थन करना इसी रणनीति का भाग है। संक्षेप में कहा जाए तो ममता बनर्जी का वर्तमान समय उनके राजनीतिक जीवन की सबसे कसौटी पूर्ण परीक्षा का काल है। एक ओर दल में टूट, नाम व प्रतीक का स्थगन और मुकदमों का अंबार है, तो दूसरी ओर अपनी खोई साख को पुनः प्राप्त करने की विशाल चुनौती। इतिहास साक्षी है कि वे संकटों से उभरकर वापसी करने में माहिर रही हैं, किंतु इस बार चुनौती केवल राजनीतिक विरोधियों से नहीं, बल्कि अपनी ही बिखरी हुई विरासत को समेटने की है। अब यह देखना अत्यंत दिलचस्प होगा कि क्या वे अपने जनआंदोलन की पुरानी शैली के बल पर इस राजनीतिक चक्रव्यूह को भेद पाती हैं या नहीं। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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