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जामिया में छात्र आंदोलन तेज, गेट बंद करने के फैसले पर फूटा गुस्सा

जामिया मिलिया इस्लामिया में छात्र संघ की मांग को लेकर पिछले 14-15 दिनों से चल रहा छात्रों का विरोध प्रदर्शन तेज हो गया है

देशबन्धु 25 Oct 2026 12:09 am

हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री ने प्राकृतिक खेती से उगाए गए पांगी सेबों का शुभारंभ किया

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समाचार नामा 24 Oct 2026 6:24 pm

दिल्ली की सीएम रेखा गुप्ता ने छठ घाटों के विकास, सौंदर्यीकरण और निर्माण कार्यों का निरीक्षण किया

दिल्ली की सीएम रेखा गुप्ता ने छठ घाटों के विकास, सौंदर्यीकरण और निर्माण कार्यों का निरीक्षण किया

समाचार नामा 24 Oct 2026 4:37 pm

पटियाला में युवक की हत्या का मामला: थाने में एफआईआर दर्ज, आरोपियों की तलाश में छापेमारी

पटियाला में युवक की हत्या का मामला: थाने में एफआईआर दर्ज, आरोपियों की तलाश में छापेमारी

समाचार नामा 24 Oct 2026 4:33 pm

Trump ने मस्क-CIA को ही कर दिया एक्सपोज? राहुल की वियतनाम यात्रा की पोल भी खुल गई!

इस वक्त अमेरिका के अंदर एक अजीब सी जंग छिड़ी हुई है। एक तरफ दुनिया के सबसे ताकतवर राष्ट्र के राष्ट्रपति हैं डोनाल्ड ट्रंप तो दूसरी तरफ हैं दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति एलन मस्क। दोनों एक ही देश के हैं। दोनों मतलब एलन मस्क ट्रंप की पार्टी का समर्थन करते हैं और ट्रंप के समर्थक भी हैं एलन मस्क। 2024 के चुनाव में भी अच्छी खासी फंडिंग की थी और इस वाले चुनाव में भी हजारों करोड़ रुपए की फंडिंग की है और इन दोनों के बीच में फंसा हुआ है यूक्रेन। अमेरिका के भीतर महंगाई बढ़ रही है क्योंकि डीजल पेट्रोल नहीं मिल पा रहा है। स्टेट ऑफ होर्मुज बंद है। बाब अल मंदेब बंद है। जिसकी वजह से रूस के सामने गिड़गिड़ाना पड़ा और वहां से तेल मंगाना पड़ा। अब रूस की रिफाइनरीज के ऊपर यूक्रेन हमले कर रहा है। यूक्रेन हमले कर रहा है। जिन ड्रोन से उन ड्रोन पर स्टार्लिंग की डिवाइस लगी हुई है। उस डिवाइस की मदद से ही यूक्रेन के ड्रोन रशिया को छेद पा रहे हैं। उसकी रिफाइनरी पर हमला कर पा रहे हैं। ऐसे में आपने पिछले दिनों खबर सुनी कि किस तरीके से स्टार लिंक ने यूक्रेन की स्पीड कम कर दी। आप जो समझते हैं ना डाउनलोडिंग करने की स्पीड इंटरनेट की या फिर कुछ सर्च करने की स्पीड सिर्फ वही स्पीड इंटरनेट की नहीं होती है। हथियारों की एक अलग तरीके की स्पीड होती है। 100 किमी प्रति घंटा 150 किमी प्रति घंटा 200 किमी प्रति घंटा तक की स्पीड होती है। जितनी ज्यादा स्पीड होगी उतनी ही ज्यादा दिक्कत सामने वाले देश को उस ड्रोन को इंटरसेप्ट करने में आएंगी। यहां स्टार्लिंग की स्पीड बहुत ज्यादा थी। लगभग 200 कि.मी. प्रति घंटा के आसपास थी। तो रशिया के इंटरसेप्टर उन्हें पकड़ नहीं पाते थे और ये ड्रोंस जाकर रिफाइनरीज को हिट कर रहे थे। ट्रंप को रूस के साथडील करनी थी। ऐसे में अब उन्होंने आदेश दिया या नहीं दिया। ऐसे में अचानक से यूक्रेन की स्पीड इंटरनेट वाली कम हो गई। आरोप लगा कि मस्क ने यूक्रेन के मिलिट्री स्टार्लिंग की स्पीड को 100 मील प्रति घंटा पर कैप कर दिया। मतलब 100 मील प्रति घंटा का मान लीजिए कि 160 किमी प्रति घंटे के हिसाब से कैप कर दिया। कैप करने का मतलब है अगर वो ड्रोन 160 कि.मी. प्रति घंटा की स्पीड से ऊपर जाएगा तो वो उसकी जो वीडियो रिकॉर्डिंग है वो बंद हो जाएगी। उसका इंटरनेट कनेक्शन जो है वो टूट जाएगा। जाएगा। अब जब इंटरनेट कनेक्शन टूट जाएगा तो उसे पता नहीं चलेगा कि कहां हिट करना है, कहां हिट नहीं करना है। और जो उसे ऑपरेट कर रहे हैं लोग उनके पास तक वीडियो जब नहीं पहुंचेगा तब वो लोग भी एक तरीके से अंधे हो जाएंगे। तो ये पूरा गेम किया गया। इसे भी पढ़ें: SP MP Ramashankar Rajbhar का दावा, INDIA bloc में सीट बंटवारा तय, जल्द आएगा Manifesto सीआईए का क्या रोल है इससे यूक्रेन के हमलावर ड्रोन रूस के सामने फेल होने लगे और अब वॉल स्ट्रीट जनरल की ब्रेकिंग रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्रंप ने खुद मस्क को फोन करके कहा कि यह पाबंदी हटा लो। ट्रंप का कहना है कि मेरा इसमें कोई रोल नहीं है। एलन मस्क का कहना है कि मेरा भी उसमें कोई रोल नहीं है। रोल सामने आया सीआईए का। स्टार लिंक से डायरेक्ट इंटरनेट नहीं लेता है यूक्रेन। ये लेता है स्टार शील्ड से। स्टार शील्ड के ऊपर मतलब कौन नजर रखता है या फिर किसके हाथ में स्टार शील्ड है। स्टार शील्ड हाथ में है सीआईए के। अब पूरा गेम आपको समझ आया आ गया होगा कि किस तरीके से सिर्फ एक खबर बाहर आने से कि ट्रंप ने खुद मस्क को फोन करके कहा कि यह पाबंदी हटा लो। यहां सीआईए का भी जो पर्दाफाश हो गया और एलन मस्क भी एक्सपोज हो गए। वॉल स्ट्रीट जनरल के मुताबिक यह फोन बुधवार को किया गया। ट्रंप ने मस्क से कहा कि वो इस स्पीड लिमिट से नाराज हैं। यह लिमिट 14 अक्टूबर को स्पेस एक्स ने लगाई थी। इसे भी पढ़ें: देश और दुनिया के प्रमुख घटनाक्रम: 24 October के दोपहर तक के बड़े अपडेट्स मस्क और वाइट हाउस की कहानी अलग-अलग है यूक्रेन को शक है कि ट्रंप ने रूस की तरफ झुकाव का हिस्सा था। क्योंकि पिछले हफ्ते ही ट्रंप ने मॉस्को से तेल खरीदने और जेलस्की को हटाने की बात कही थी। कारनेगी एंडोमेंट के एक्सपर्ट माइकल कॉफमैन का कहना है कि अगर यह थ्रटल नहीं हटा तो रूस का फ्रंट लाइन पर आगे बढ़ना फिर तेज हो जाएगा। मतलब यूक्रेन की जंग का रिमोट कंट्रोल आज भी एक प्राइवेट कंपनी और दो लोगों के फोन कॉल पर टिका हुआ है। ट्रंप अब कतई नहीं चाहते कि जेलस्की यूक्रेन के राष्ट्रपति रहे और वो उन्हें हटाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। राहुल की वियतनाम यात्रा पर क्या झूठ पकड़ा गया? दो हफ्ते पहले तक राहुल गांधी देश में चुनाव चोरी, वोट चोरी, ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा इन सब की मांग कर रहे थे। संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जा करने के आरोप बीजेपी और सरकार पर वह लगा रहे थे। पूरा विपक्ष एक साथ आ गया था। सिर्फ आरोप नहीं लगाया जा रहा था। दिल्ली में आकाशवाणी से लेकर राजघाट तक, राष्ट्रपति भवन से लेकर जंतरमंतर तक जमकर प्रदर्शन हुए। सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकालकर सरकार और पूरे संवैधानिक सिस्टम पर सवाल खड़े करने की कोशिश हुई। वैसे तो आप ये कह सकते हैं कि सरकार को कटघरे में खड़ा करना हर विपक्षी का अधिकार है। सरकार ट्रैक पर रहे यह याद दिलाना विपक्ष का काम है। लेकिन संवैधानिक संस्थाओं को इस तरीके से डिसक्रेडिट कर देना कहां तक जायज है? राहुल गांधी ने देश में बड़ा नैरेटिव खड़ा कर दिया था। सरकार पर सवालों की झड़ी लगा दी। राहुल गांधी फ्रंट फुट पर खेल रहे थे। बीजेपी, सरकार और बाकी तमाम को आकर बकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस करके जवाब देना पड़ रहा था हर चीज पर। लेकिन जैसे ही इस पूरे सियासी गेम में पीएम मोदी की एंट्री हुई पूरा समीकरण 360 डिग्री चेंज हो गया। पूरा सिस्टम ऐसे पलटा कि अब बीजेपी के सवालों पर कांग्रेस को सफाई देनी पड़ रही है। यह सब बदला है। 18 अक्टूबर को राहुल गांधी के वियतनाम जाने की खबर सामने आने के बाद। राहुल गांधी जैसे ही विदेश पहुंचे, बीजेपी को उनकी विदेश यात्रा और विदेशों में मुलाकातों पर सवालों की झड़ी लगाने का मौका मिल गया। राहुल की विदेश यात्रा का सेम पैटर्न 2020 हो, 22 हो, 24 हो, 25 हो, 26 हो, हर बार एक बड़ा मुद्दा राहुल गांधी लेकर आते हैं। भारत यात्रा पर निकलते हैं। छात्रों की गूंज करते हैं। ज्ञानेश कुमार के खिलाफ पीएम मोदी के घर के बाहर चले जाते हैं। लेकिन जैसे ही चीज मोमेंटम पकड़ती है, वो चले जाते हैं। जनता को जुटाते हैं और फिर वर्क फ्रॉम विदेश पर निकल जाते हैं। अगर वोट चोरी गंभीर मुद्दा है तो राहुल गांधी खुद कितने गंभीर हैं? क्या 140 करोड़ की आबादी वाले देश में पार्ट टाइम पॉलिटिक्स की कोई जगह है?

प्रभासाक्षी 24 Oct 2026 4:14 pm

अखिलेश यादव के 'घुसपैठिए' वाले बयान पर भड़के उत्तराखंड के सीएम, बताया देवभूमि का अपमान

अखिलेश यादव के 'घुसपैठिए' वाले बयान पर भड़के उत्तराखंड के सीएम, बताया देवभूमि का अपमान

समाचार नामा 24 Oct 2026 2:35 pm

कर्नाटक भाजपा का दावा, राहुल गांधी की 'मोहब्बत की दुकान' बनी 'स्टिंग ऑपरेशन की दुकान'

कर्नाटक भाजपा का दावा, राहुल गांधी की 'मोहब्बत की दुकान' बनी 'स्टिंग ऑपरेशन की दुकान'

समाचार नामा 24 Oct 2026 2:32 pm

कांग्रेस ने पांच राज्यों के लिए वॉर रूम चेयरपर्सन नियुक्त किए, विधानसभा चुनाव की तैयारी तेज

कांग्रेस ने पांच राज्यों के लिए वॉर रूम चेयरपर्सन नियुक्त किए, विधानसभा चुनाव की तैयारी तेज

समाचार नामा 24 Oct 2026 2:30 pm

Azerbaijan ने मारी गजब की पलटी, Operation Sindoor के दौरान Pakistan का साथ देने वाला देश India के साथ आ खड़ा हुआ

पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जिस तरह अजरबैजान ने तुर्की के साथ मिलकर पाकिस्तान का साथ दिया था उसे देखकर भारत हैरान था। लेकिन जल्द ही समय ने करवट ली। अब दक्षिण काकेशस की राजनीति में भारत ने पाकिस्तान को एक बड़ा कूटनीतिक झटका दे दिया है। हम आपको बता दें कि कभी पाकिस्तान के साथ खड़े नजर आने वाले अजरबैजान के साथ अब भारत के रिश्ते नई गर्माहट लेते दिख रहे हैं। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर की बाकू यात्रा और राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव व विदेश मंत्री जेहुन बायरामोव के साथ उनकी मुलाकात ने साफ कर दिया है कि भारत और अजरबैजान पुराने मतभेदों को पीछे छोड़कर सहयोग के नए रास्ते तलाश रहे हैं। आतंकवाद से मुकाबले, क्षेत्रीय सुरक्षा, व्यापार, ऊर्जा और संपर्क बढ़ाने जैसे मुद्दों पर हुई बातचीत भारत की कूटनीतिक सक्रियता का संकेत है। पाकिस्तान के लिए यह घटनाक्रम इसलिए अहम है, क्योंकि जिस अजरबैजान को वह अपना करीबी सहयोगी मानता रहा है, वही अब भारत के साथ रिश्ते मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, जयशंकर ने राष्ट्रपति अलीयेव से मुलाकात के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शुभकामनाएं पहुंचाईं। दोनों पक्षों ने द्विपक्षीय संबंधों की वर्तमान स्थिति और उन्हें आगे बढ़ाने की संभावनाओं पर चर्चा की। विदेश मंत्री बायरामोव के साथ वार्ता में व्यापार, निवेश और ऊर्जा सहयोग के विस्तार पर जोर दिया गया। हम आपको बता दें कि भारत और अजरबैजान अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) में भी रुचि रखते हैं और इसके तहत बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर सहमत हुए। हवाई संपर्क बढ़ाने तथा पर्यटन, कारोबार और लोगों के बीच आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करने पर भी चर्चा हुई। जयशंकर ने पश्चिम एशिया में संघर्ष के दौरान ईरान से भारतीय नागरिकों, विशेषकर विद्यार्थियों, को निकालने में अजरबैजान की सहायता के लिए आभार जताया। इसे भी पढ़ें: आखिर क्यों धधक रहा है फ्रांस और अन्य यूरोपीय देश? पुलिस प्रशासन के सामने क्या हैं चुनौतियाँ? इस यात्रा का सबसे संवेदनशील पहलू आतंकवाद और सुरक्षा से जुड़ा रहा। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट किया कि दोनों देशों के बीच सुरक्षा संबंधी मुद्दों, आतंकवाद और साझा खतरों पर चर्चा हुई। जयशंकर ने भी कहा कि आतंकवाद, संघर्ष और अस्थिरता दोनों देशों के साझा शत्रु हैं। देखा जाये तो भारत और अजरबैजान के बीच हुई बातचीत के आधिकारिक दायरे में आतंकवाद और साझा सुरक्षा चुनौतियों को स्थान मिलना क्षेत्रीय राजनीति में बड़ा घटनाक्रम है। यह घटनाक्रम इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत और अजरबैजान के संबंधों में तनाव आया था। अजरबैजान ने पाकिस्तान में आतंकवादी ढांचे के विरुद्ध भारत की सैन्य कार्रवाई की आलोचना की थी। दूसरी ओर, पाकिस्तान और तुर्किये के साथ बाकू के बढ़ते सामरिक संबंध भारत की चिंताओं का कारण रहे हैं। ऐसे में राष्ट्रपति अलीयेव से सीधी बातचीत और विदेश मंत्रियों की विस्तृत वार्ता यह दिखाती है कि दोनों देश मतभेदों को स्थायी बाधा नहीं बनने देना चाहते। वहीं अजरबैजान के मीडिया ने भी जयशंकर की यात्रा को प्रमुखता दी है। समाचार एजेंसी ट्रेंड ने राष्ट्रपति अलीयेव की जयशंकर से मुलाकात और विदेश मंत्री बायरामोव के उस बयान को प्रकाशित किया जिसमें उन्होंने स्वीकार किया कि पिछले वर्षों के मतभेदों ने द्विपक्षीय संबंधों तथा अंतरराष्ट्रीय संगठनों में सहयोग की संभावनाओं को प्रभावित किया था। बायरामोव ने कहा कि मुद्दों पर खुले और रचनात्मक ढंग से चर्चा हुई है और इससे संबंधों को अगले स्तर तक ले जाने का आधार तैयार होगा। एपीए और रिपोर्ट.az ने भी व्यापार, निवेश, सांस्कृतिक संबंधों तथा दोनों देशों की स्वतंत्र विदेश नीति पर जयशंकर की टिप्पणियों को प्रमुखता दी। इससे संकेत मिलता है कि बाकू इस संपर्क को केवल औपचारिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि संबंधों को नए सिरे से व्यवस्थित करने के अवसर के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। हम आपको यह भी बता दें कि इससे पहले अक्टूबर महीने में ही विदेश राज्य मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह ने बाकू में एशिया में बातचीत और विश्वास-निर्माण उपायों के सम्मेलन (CICA) के सातवें शिखर सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया था। उन्होंने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना, समावेशी सहयोग और आतंकवाद के विरुद्ध साझा कार्रवाई पर जोर दिया था। उन्होंने यह भी रेखांकित किया था कि क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाएं सभी देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करें। इस यात्रा ने उच्चस्तरीय राजनीतिक संवाद के लिए जमीन तैयार की, जिसे जयशंकर की यात्रा ने आगे बढ़ाया। साथ ही भारत और अजरबैजान के बीच बढ़ती नजदीकी की एक अहम वजह संकट के समय मिला सहयोग भी है। हाल ही में ईरान में संघर्ष के दौरान जब भारतीय नागरिकों, खासकर वहां पढ़ रहे विद्यार्थियों को सुरक्षित निकालने की चुनौती सामने आई, तब अजरबैजान ने भारत की मदद की। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अपनी बाकू यात्रा के दौरान इस सहयोग के लिए अजरबैजान का आभार जताया। यह घटनाक्रम बताता है कि दोनों देशों के रिश्ते अब केवल कूटनीतिक मुलाकातों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि जरूरत के समय एक-दूसरे की मदद करने की दिशा में भी आगे बढ़ रहे हैं। भारत के लिए यह सहयोग इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि क्षेत्रीय संकट के बीच अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में अजरबैजान जैसे देश का साथ मिलना उसकी कूटनीतिक पहुंच और आपसी विश्वास को मजबूत करता है। हम आपको यह भी बता दें कि अजरबैजान शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में भागीदारी चाहता है और इसके लिए भारत की सहमति जरूरी है। इसलिए भी दोनों देशों के बीच लगातार वार्ताएं होती दिख रही हैं। सितंबर में बिश्केक में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति अलीयेव की मुलाकात तथा उसके बाद जयशंकर की यात्रा ने राजनीतिक संपर्क को गति दी। लेकिन अजरबैजान को SCO की पूर्ण सदस्यता दी जानी चाहिए या नहीं, इस पर भारत ने अभी तक कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिया है। भारत को इस विषय पर आतंकवाद के विरुद्ध ठोस सहयोग, सदस्य देशों के बीच सहमति और क्षेत्रीय संतुलन जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखना है। रणनीतिक दृष्टि से देखा जाये तो भारत के लिए अजरबैजान ऊर्जा सुरक्षा, यूरोप और मध्य एशिया तक संपर्क, व्यापार तथा क्षेत्रीय संवाद का उपयोगी साझेदार बन सकता है। वहीं बाकू के लिए भारत एक बड़ा बाजार, निवेश का स्रोत और एशिया की प्रमुख शक्ति है। प्रधानमंत्री मोदी की पहल और जयशंकर की सक्रिय कूटनीति ने बातचीत का नया अवसर बनाया है। उधर, पाकिस्तान के लिए यह असहज संकेत है कि उससे निकट संबंध रखने वाला देश भारत के साथ भी अपने हितों के आधार पर सहयोग बढ़ा रहा है। बहरहाल, यदि आतंकवाद के विरुद्ध संवाद नियमित होता है, व्यापार और निवेश बढ़ते हैं तथा परिवहन गलियारों पर समन्वय मजबूत होता है, तो भारत-अजरबैजान संबंधों का यह नया अध्याय दक्षिण काकेशस में भारत की रणनीतिक पहुंच को विस्तार दे सकता है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 24 Oct 2026 1:30 pm

आर्थिक मोर्चे पर विकास के सकारात्मक संकेत

विपरीत वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद दुनिया भर की रेटिंग संस्थाओं ने भारतीय अर्थव्यवस्था को गतिमान स्वीकार करते हुए वैश्विक औसत से लगभग दो गुणी विकास दर रहने की संभावना जताई है। यह इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है कि वैश्विक परिस्थितियों में कहीं और किसी तरह का सुधार नहीं दिखाई दे रहा है। ईरान-अमेरिका युद्ध हो या रूस-यूक्रेन युद्ध हो या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के तानाशाही पूर्ण तुगलकी निर्णय हो या कच्चे तेल के भावों में बेतहासा बढ़ोतरी और हार्मुज का संकट हालात समूचे विश्व में विकट से विकटतर बने हुए हैं। अब तो फ्रांस के हालात भी बिगड़ते जा रहे हैं तो उसका असर जहां योरोप में दिखाई देगा वहीं भारत में भी हालात को प्रभावित करने के कतिपय प्रयास जारी है। अच्छी बात यह है कि देश-दुनिया के गंभीर हालातों के बावजूद आर्थिक क्षेत्र की दुनिया की लगभग सभी रेटिंग संस्थाओं ने इंडियन इकोनोमी की ग्रोथ रेट को लेकर आशा से भी अधिक विश्वास जताया है। रेटिंग संस्थाओं की ही माने तो 2026 की वैश्विक औसत आर्थिक विकास दर 3 दशमलव 1 फीसदी रहने की संभावना व्यक्त की जा रही है वहीं दुनिया की रेटिंग संस्थाओं ने भारत के आर्थिक परिणामों को देखते हुए जुलाई की तुलना में अक्टूबर आते आते ग्रोथ को 6 दशमलव 9 से लेकर 7 दशमलव 1 रहने की उम्मीद जताई है। खास बात यह है कि विश्व रेटिंग संस्थाओं में से किसी भी संस्था ने जुलाई की रेटिंग की तुलना में नकारात्मक ग्रोथ नहीं दिखा कर ग्रोथ रेट में इजाफा ही जाहिर किया है। दरअसल देश में मांग और आपूर्ति से लेकर निर्यात तक में लगातार विकास देखा जा रहा है। देश में मांग और आपूर्ति की बेहतर हालात है तो निर्यात में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। यह भी तब जब वैश्विक मांग कमजोर देखी जा रही है। भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सबसे सकारात्मक बात यह है कि एमएसएमई सेक्टर में लगातार अच्छा काम हो रहा है तो दूसरी और सर्विस सेक्टर में तो एक तरह से लगातार उछाल ही आ रहा है। कच्चे तेल के भावों में तो जैसे आग ही लग रही है और उपलब्धता को लेकर भी लाख झंझट के बावजूद हकोनोमी को बूस्टअप रखने में खास बाधा नहीं आ रही है। देश में देसी-विदेशी निवेश में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। महंगाई के बावजूद बाजार मेंं मांग बरकरार है। बाजार में मांग से यह साफ है कि लोगों की क्रय शक्ति बनी हुई है। सर्विस सेक्टर में टूरिज्म, बैंकिंग, आईटी, और इसी तरह के अन्य क्षेत्र उल्लेखनीय परिणाम दे रहे हैं। नवंबर में दीपावली के त्यौहार के चलते बाजार और अधिक गतिशील हो जाएगा क्योंकि दीपावली पर बाजार में तेजी आती ही आती है। जानकारों की माने तो नवंबर माह में दीपावली पर 7 लाख करोड़ का कारोबार अनुमानित किया जा रहा है। इसे भी पढ़ें: अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने बढ़ाई भारत की विकास दर यह पिछली दीपावली की तुलना में 15 प्रतिशत से 18 प्रतिशत तक अधिक रहने की संभावना है। इसी तरह से सेवा क्षेत्र में भी अच्छी ग्रोथ जारी रहने का अनुमान है। इसके अलावा विपरीत हालातों के बावजूद निर्यात में लगातार बढ़ोतरी जारी है। देश की इकोनोमिक ग्रोथ के कारण देसी-विदेशी निवेश के बेहतर हालात दिखाई दे रहे हैं। यही कारण है कि चाहे आईएमएफ हो या मूडीज, ओईसीडी हो या वर्ल्ड बैंक, एशियन डब्लपमेंट बैंक हो या एसएण्डपी या फिच सभी ने भारत की इकोनोमी की ग्रोथ को लेकर सकारात्मक संकेत दिए हैं। भारत का आरबीआई का आंकलन तो पहले से ही सबके सामने हैं। एकमात्र फिच रेटिंग संस्था ऐसी है जिसने इंडियन इकोनोमी की ग्रोथ रेट 6.9 प्रतिशत आंकी है जोकि हांलाकि पूर्व की फिच की ही पूर्व की रेटिंग 6.5 प्रतिशत से ही अधिक है। मूडीज सहित कुछ रेटिंग संस्थाओं ने जहां अब 7 प्रतिशत विकास दर आंक रहे हैं तो वर्ल्ड बैंक, ओईसीडी आदि संस्थाओं को भरोसा है कि भारत की आर्थिक विकास दर 7 प्रतिशत से अधिक यानी की 7.1 प्रतिशत रहने की संभावना है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नित नए निर्णयों से दुनिया की अर्थ व्यवस्था पर पड़ रहे असर, युद्ध और तनाव के हालातों में सुधार नहीं होने, हार्मुज जैसी समस्या का समाधान नहीं होने, वैश्विक राजनीतिक अस्थिरता के दौर के बावजूद एक ही सधी हुई नीति का ही परिणाम है कि देश की अर्थ व्यवस्था विकास की गति को ना केवल बनाए हुए हैं अपितु उसकी विकास का ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा है। इसके लिए समग्र और समन्वित प्रयासों को श्रेय जाता है। जहां घरेलू मांग में कमी नहीं आई है वहीं निवेश का बेहतर माहौल बना हुआ है। एमएसएमई को उत्पादन लिंक प्रोत्साहन योजना का लाभ सीधे इकोनोमी का मिल रहा है वहीं रणनीतिक क्षेत्रों सेमीकण्डक्टर, डिफेंस, इलेक्ट्रोनिक्स, आईटी आदि आदि क्षेत्रों में योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ा जा रहा है। यही कारण है कि आज इंडियन इकोनोमी और उसकी ग्रोथ पर वैश्विक रेटिंग संस्थाएं अपना विश्वास व्यक्त कर रही है। - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

प्रभासाक्षी 24 Oct 2026 1:22 pm

आखिर क्यों धधक रहा है फ्रांस और अन्य यूरोपीय देश? पुलिस प्रशासन के सामने क्या हैं चुनौतियाँ?

यूरोप में हिंसक विरोध-प्रदर्शनों, दंगों, आगजनी और पुलिस के साथ टकराव को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर नहीं समझा जा सकता। चूंकि इसके पीछे आर्थिक असंतोष, सामाजिक विभाजन, आव्रजन और एकीकरण की बहस, राजनीतिक ध्रुवीकरण, युवाओं में भविष्य को लेकर चिंता तथा पुलिस और नागरिकों के बीच विश्वास का संकट जैसे कई कारक हो सकते हैं। लेकिन एक बुनियादी अंतर समझना जरूरी है, वह यह कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतांत्रिक अधिकार है, जबकि आगजनी, लूटपाट, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान और लोगों पर हमले अपराध हैं। किसी प्रदर्शन में हिंसा होने का अर्थ यह नहीं कि उसमें शामिल हर व्यक्ति हिंसक है या पूरा समुदाय उसके लिए जिम्मेदार है। शायद इसी भ्रम में देश के देश जल रहे हैं और पुलिस तत्काल बहुत कुछ कर नहीं पाती। इससे आत्ताइयों के हौसले बुलंद हैं और लोकतांत्रिक सोच अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रही है। इसे भी पढ़ें: Vishwakhabram : France में Macron के खिलाफ विद्रोह जैसे हालात, पूरे यूरोप में फैल सकती है जनाक्रोश की आग! भले ही फ्रांस और अन्य यूरोपीय देशों की परिस्थितियाँ भी एक जैसी नहीं हैं। इसलिए यह देखना आवश्यक है कि अशांति किन कारणों से भड़कती है, पुलिस की कार्रवाई कहाँ कठिन हो जाती है और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करते हुए हिंसा रोकने के लिए कौन-से उपाय प्रभावी हो सकते हैं। # सवाल है कि अक्टूबर 2026 में फ्रांस में वास्तव में क्या हो रहा है? तो जवाब होगा कि फ्रांस में सितंबर के अंत से शुरू हुआ छात्र आंदोलन अक्टूबर में व्यापक अशांति में बदल गया। प्रारंभिक असंतोष स्कूलों की खराब सुविधाओं, शिक्षकों की कमी और शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी शिकायतों को लेकर था। बाद में महँगाई, जीवन-यापन की बढ़ती लागत और सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति जैसे मुद्दे भी आंदोलन से जुड़ गए। आखिर पेरिस सहित कई शहरों में लूटपाट, तोड़फोड़ और पुलिस से टकराव हुए। सरकार को बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी तैनात करने पड़े और कुछ क्षेत्रों में रात्रिकालीन कर्फ्यू प्रतिबंध लगाए गए। फ्रांसीसी अधिकारियों ने सुरक्षा व्यवस्था की तैयारियों और हिंसा के पूर्वानुमान में कमियों को भी स्वीकार किया। इसी समय इटली में भी जीवन-यापन की लागत, कम वेतन और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ी शिकायतों के बीच प्रदर्शन हिंसक हुए। स्पेन और पुर्तगाल में आवास की समस्या को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए हैं। हालांकि, इन सभी घटनाओं के कारण और उनका स्वरूप अलग-अलग हैं। # सवाल है कि आखिर यूरोप में असंतोष बार-बार क्यों भड़कता है? तो इसके कुछ कारण हैं जो निम्नलिखित हैं:- पहला, महँगाई, आवास और आर्थिक असुरक्षा: जब किराया, ऊर्जा, परिवहन और रोजमर्रा के खर्च बढ़ते हैं, लेकिन आय और रोजगार के अवसर उसी गति से नहीं बढ़ते, तो लोगों में व्यवस्था के प्रति नाराजगी बढ़ सकती है। युवाओं के लिए अच्छी शिक्षा, रोजगार और स्वतंत्र जीवन की संभावनाएँ सीमित महसूस होना इस असंतोष को और बढ़ा सकता है। दूसरा, सार्वजनिक सेवाओं पर दबाव: स्कूलों में शिक्षकों की कमी, जर्जर सुविधाएँ और स्थानीय सेवाओं की कमजोर स्थिति नागरिकों को यह महसूस करा सकती है कि उनकी समस्याओं को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं मिल रही। फ्रांस के हालिया आंदोलन में शिक्षा से जुड़ी शिकायतें शुरुआती मुद्दों में शामिल थीं। तीसरा, सामाजिक अलगाव और अवसरों में असमानता: कुछ शहरी और वंचित इलाकों में रोजगार, शिक्षा और सामाजिक उन्नति के अवसरों की कमी असंतोष को गहरा सकती है। यदि नागरिकों को लगता है कि संस्थाएँ उनकी बात नहीं सुनतीं या उनके साथ भेदभाव होता है, तो राज्य पर भरोसा कमजोर पड़ सकता है। लेकिन इसे हर उपद्रव का एकमात्र कारण मानना उचित नहीं होगा। चौथा, राजनीतिक ध्रुवीकरण और आंदोलन का हिंसक हो जाना: किसी जायज मांग के साथ बड़ी संख्या में लोग शांतिपूर्वक जुट सकते हैं, लेकिन कुछ समूह उसी भीड़ का इस्तेमाल तोड़फोड़, लूटपाट या पुलिस को उकसाने के लिए कर सकते हैं। सोशल मीडिया पर तेजी से फैलने वाली तस्वीरें और संदेश भी तनाव बढ़ा सकते हैं। आंदोलन की मांगों और हिंसा करने वाले व्यक्तियों की जिम्मेदारी को अलग-अलग समझना जरूरी है। पाँचवाँ, आव्रजन और राष्ट्रीय पहचान पर विवाद: यूरोप के अनेक देशों में आव्रजन, शरणार्थियों के एकीकरण, राष्ट्रीय पहचान और सार्वजनिक संसाधनों के वितरण पर राजनीतिक बहस चलती रही है। ये विवाद ध्रुवीकरण बढ़ा सकते हैं, लेकिन फ्रांस की अक्टूबर 2026 की हिंसा के लिए किसी विशेष धार्मिक या प्रवासी समुदाय को जिम्मेदार ठहराने के पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि आर्थिक असंतोष हिंसा की पृष्ठभूमि तैयार कर सकता है, लेकिन वह हिंसा को उचित नहीं ठहराता। इसी प्रकार, किसी अपराधी की पहचान या पृष्ठभूमि के आधार पर पूरे समुदाय को दोषी ठहराना भी तथ्यपरक समाधान नहीं है। # सवाल है कि उत्पाती और हिंसक भीड़ पर नियंत्रण में पुलिस क्यों पिछड़ जाती है? तो जवाब होगा कि यह इस पूरे संकट का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू है। अक्टूबर 2026 की फ्रांसीसी घटनाओं में पुलिस की विफलता के कुछ ठोस कारण सामने आए हैं। इन्हें केवल पुलिस की कमजोरी या इच्छाशक्ति की कमी कह देना अधूरा विश्लेषण होगा। एक, खुफिया आकलन और तैयारी में चूक: फ्रांस में 17 अक्टूबर के प्रदर्शनों के लिए भीड़ का अनुमान वास्तविक संख्या से काफी कम रहा। आंतरिक मंत्रालय के शुरुआती अनुमान लगभग 60,000–110,000 प्रदर्शनकारियों के थे, जबकि बाद में संशोधित अनुमान 200,000 तक पहुँचे और मंत्रालय ने वास्तविक उपस्थिति लगभग 550,000 बताई। यह सरकारी अनुमान है, स्वतंत्र रूप से सत्यापित अंतिम गणना नहीं। इतनी बड़ी भीड़ के बीच हिंसा करने वाले छोटे समूहों की पहचान और सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा कठिन हो जाती है। दो, पुलिस बल की तैनाती और संसाधनों का असंतुलन: यदि कई शहरों में एक साथ हिंसा फैलती है, तो पुलिस को लोगों की सुरक्षा, दुकानों की रक्षा, यातायात नियंत्रण और हिंसक घटनाओं पर कार्रवाई जैसे अनेक काम करने पड़ते हैं। फ्रांस की हालिया घटनाओं में पुलिसकर्मियों की संख्या और तैनाती के समय को लेकर भी सवाल उठे। तीन, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी और हिंसा करने वाले एक ही भीड़ में:पुलिस के सामने यह कठिन चुनौती रहती है कि हिंसा करने वालों पर कार्रवाई करते हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और आसपास के आम नागरिकों को नुकसान से कैसे बचाया जाए। जल्दबाजी में की गई कार्रवाई तनाव बढ़ा सकती है, जबकि देर करने पर तोड़फोड़ और लूटपाट का दायरा बढ़ सकता है। चार, पुलिस की कठोर कार्रवाई के कानूनी और सामाजिक परिणाम: फ्रांस में प्रदर्शन के दौरान बल प्रयोग की आवश्यकता, उसकी आनुपातिकता और कुछ पुलिसकर्मियों के आचरण को लेकर जाँच चलती रही है। अक्टूबर में छात्र प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में पुलिस के कथित अनुचित आचरण की 18 आंतरिक जाँचें शुरू होने की खबर आई। इसका अर्थ यह नहीं कि हर पुलिस कार्रवाई गलत थी। लेकिन बल का अनुचित प्रयोग नागरिकों का भरोसा घटा सकता है और तनाव बढ़ा सकता है। पांच, पुलिस थकान, समन्वय और बदलती परिस्थितियाँ: लगातार कई दिनों तक आंदोलन चलने पर पुलिसकर्मियों की उपलब्धता, स्थानीय इकाइयों और विशेष प्रशिक्षित बलों के बीच समन्वय तथा बदलती परिस्थितियों के अनुसार रणनीति बदलने की क्षमता महत्त्वपूर्ण हो जाती है। फ्रांस की घटनाओं में इन पहलुओं पर भी सवाल उठे हैं। # सवाल है कि क्या पुलिस को और अधिक कठोर बना देना ही समाधान है? तो जवाब होगा कि नहीं, सवाल केवल कठोरता का नहीं बल्कि समय पर कार्रवाई, निश्चित जवाबदेही, कानून का समान अनुपालन और सही रणनीति का है। यूरोप की परिषद की संसदीय सभा की 2025 की रिपोर्ट में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच संवाद, मध्यस्थता, विशेष प्रशिक्षण, नागरिकों के भरोसे और बल के सीमित व आनुपातिक उपयोग पर जोर दिया गया था। रिपोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि कुछ आंदोलनों में संगठित हिंसक समूह शांतिपूर्ण विरोध को बिगाड़ सकते हैं। पुलिस प्रशासन को तीन परिस्थितियों में अंतर करना चाहिए: एक, उपयुक्त प्रशासनिक दृष्टिकोण: शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा, संवाद और प्रदर्शन के अधिकार की रक्षा। दो, तनावपूर्ण भीड़, हिंसा का जोखिम: प्रशिक्षित बल, समन्वय, स्पष्ट चेतावनी और तनाव कम करने के उपाय। तीन, आगजनी, लूटपाट या लोगों पर हमला: त्वरित एवं लक्षित कानूनी कार्रवाई, साक्ष्य जुटाना और दोषियों की जवाबदेही। लिहाजा लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस को न तो हिंसा के सामने निष्क्रिय रहना चाहिए, न ही पूरी भीड़ को अपराधी मान लेना चाहिए। # आखिर हिंसक भीड़ से निपटने का ठोस और दीर्घकालिक इलाज क्या है? पहला, बेहतर पूर्वानुमान और खुफिया समन्वय: बड़े प्रदर्शनों के संभावित आकार, संवेदनशील स्थानों और हिंसा के जोखिम का समय रहते आकलन किया जाए। वैध प्रदर्शन और हिंसा की तैयारी में अंतर रखा जाए; केवल राजनीतिक विचारों के आधार पर लोगों को संदिग्ध न माना जाए। दूसरा, प्रशिक्षित पुलिस और स्पष्ट कमान: भीड़ प्रबंधन के लिए विशेष प्रशिक्षण, एकीकृत कमान, पर्याप्त संसाधन और नागरिकों को सुरक्षित रखने की स्पष्ट जिम्मेदारी हो। बल का प्रयोग कानून के अनुसार आवश्यक और आनुपातिक होना चाहिए। तीसरा, अपराधियों की पहचान और शीघ्र न्याय: जहाँ कानूनी रूप से अनुमत हो, वहाँ उपलब्ध वीडियो, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और अन्य विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय की जाए। गिरफ्तारी, अभियोजन और न्यायिक प्रक्रिया कानून के अनुरूप हो; निर्दोष लोगों को सामूहिक दंड न दिया जाए। चौथा, पुलिस की जवाबदेही भी सुनिश्चित हो: कार्रवाई की स्वतंत्र समीक्षा, शिकायतों की निष्पक्ष जाँच और गलत आचरण पर उचित दंड आवश्यक हैं। इससे पुलिस का अधिकार कमजोर नहीं, बल्कि उसकी वैधता और नागरिकों का विश्वास मजबूत होता है। पाँचवाँ, सामाजिक असंतोष के मूल कारणों पर काम: शिक्षा, रोजगार, आवास, सार्वजनिक सेवाओं और भेदभाव से जुड़ी शिकायतों को गंभीरता से सुना जाए। केवल पुलिस बल बढ़ाकर उन समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता जो लगातार नई अशांति को जन्म देती हैं। # आखिर भारत के लिए इसमें क्या सबक निहित है? फ्रांस का अनुभव भारत के लिए भी प्रासंगिक है, क्योंकि भारत में भी बड़े जनसमूह, राजनीतिक रैलियाँ, धार्मिक आयोजन, छात्र आंदोलन और स्थानीय विरोध-प्रदर्शन पुलिस प्रशासन के सामने अलग-अलग चुनौतियाँ पैदा कर सकते हैं। भारत के संदर्भ में पाँच सबक महत्त्वपूर्ण हैं: एक, कानून का समान पालन: राजनीतिक समर्थन, विरोध या सामाजिक पहचान के आधार पर कार्रवाई का मानक नहीं बदलना चाहिए। दो, भीड़ से पहले तैयारी: आयोजकों, स्थानीय प्रशासन, आपातकालीन सेवाओं और पुलिस के बीच समन्वय हो। तीन, हिंसा पर लक्षित कार्रवाई: शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और हिंसा करने वालों को अलग-अलग देखा जाए। चार, डिजिटल साक्ष्य और जवाबदेही: अफवाहों की जाँच हो, साक्ष्य सुरक्षित रखे जाएँ और गलत सूचना फैलाने वालों पर भी कानून के अनुसार कार्रवाई हो। पांच, नागरिक विश्वास: पुलिस की निष्पक्षता, पारदर्शिता और शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई को प्राथमिकता मिले। इन उपायों का उद्देश्य केवल भीड़ को तितर-बितर करना नहीं, बल्कि हिंसा को रोकना और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है। # वस्तुत: समस्या पुलिस की ताकत से बड़ी है: फ्रांस की अक्टूबर 2026 की घटनाएँ दिखाती हैं कि बड़े पैमाने की अशांति में खुफिया आकलन की चूक, अपर्याप्त या असंतुलित तैनाती, पुलिस थकान और आंदोलन के भीतर हिंसक समूहों की मौजूदगी मिलकर गंभीर संकट पैदा कर सकते हैं। दूसरी ओर, बल का अनुचित प्रयोग और सामाजिक शिकायतों की उपेक्षा भी संस्थाओं के प्रति अविश्वास बढ़ा सकती है। लोकतांत्रिक राज्य की असली परीक्षा यह है कि वह शांतिपूर्ण विरोध की रक्षा करे, हिंसक अपराधों को रोके और दोनों काम कानून की मर्यादा में रहते हुए करे। केवल दमन से असंतोष समाप्त नहीं होता और केवल संवाद से तत्काल हिंसा नहीं रुकती। प्रभावी व्यवस्था को दोनों की जरूरत है—अपराध पर निष्पक्ष कानूनी कार्रवाई और असंतोष के कारणों का गंभीर समाधान। यही दृष्टिकोण पुलिस प्रशासन को प्रभावी तथा लोकतंत्र को अधिक सुरक्षित बना सकता है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 24 Oct 2026 1:19 pm

Election Commission को घेरने चले थे SY Quraishi, Kanwal Sibal ने दिखा दिया आईना तो खेलने लगे Victim Card

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी इन दिनों चुनाव आयोग और मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर लगातार सवाल उठा रहे हैं। अब इस मुद्दे पर उनकी भिड़ंत पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल से हो गई है। कंवल सिब्बल ने कुरैशी के हमलावर रुख पर सवाल उठाते हुए इसे व्यक्तिगत रंजिश जैसा बताया है। वहीं इस टकराव ने कुरैशी को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल यह है कि जिस चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और मजबूती का कभी कुरैशी खुद बचाव करते थे, आज उसी संस्था पर उनके लगातार हमलों के पीछे आखिर वजह क्या है? हम आपको याद दिला दें कि जुलाई 2026 में एक साक्षात्कार के दौरान कुरैशी ने अपने कार्यकाल का हवाला देते हुए कहा था कि तत्कालीन यूपीए सरकार के दौरान चुनाव आयोग पर कोई दबाव नहीं था। उन्होंने आयोग की स्वतंत्रता और साख का जिक्र करते हुए कहा था कि उसकी स्थिति ऐसी थी कि कोई उस पर दबाव डालने की हिम्मत नहीं करता था और चुनाव की तारीखों की जानकारी भी सरकार को घोषणा के समय ही मिलती थी। लेकिन सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और मजबूती को केवल कुरैशी के कार्यकाल से जोड़कर देखा जाना चाहिए? आयोग आज भी एक संवैधानिक संस्था है और उसकी कार्यप्रणाली को लेकर उठाए जा रहे सवालों का जवाब तथ्यों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर दिया जाना चाहिए, न कि लगातार आरोप लगाकर उसकी साख पर संदेह पैदा करके। आखिर कुरैशी जिस संस्थागत स्वतंत्रता को कभी अपनी उपलब्धि बताते थे, आज उसी संस्था के प्रति उनका रवैया किस आधार पर बदल गया है? इसे भी पढ़ें: भारतीय मूल की Navi Pillay को Nobel Peace Prize मिलने पर India क्यों नहीं दे रहा बधाई? कारण जानकर चौंक जाएँगे! सुप्रीम कोर्ट में मामला, फिर भी सोशल मीडिया पर फैसला सुनाने की जल्दबाजी! कंवल सिब्बल ने इसी बिंदु पर कुरैशी को घेरा है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा है कि कुरैशी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ लगातार हमलावर हैं और उनका रवैया व्यक्तिगत हिसाब-किताब चुकाने जैसा लगता है। सिब्बल ने साफ कहा कि मामला जब सुप्रीम कोर्ट के सामने विचाराधीन है, तब अपनी तरफ से अंतिम निष्कर्ष निकालकर उसे प्रचारित करना उचित नहीं है। उन्होंने कुरैशी को आगाह किया कि ऐसा करके वह अपनी ही प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा रहे हैं। सिब्बल ने लिखा है कि उनका मकसद ट्रोलिंग नहीं, बल्कि भारतीय चुनाव व्यवस्था को बदनाम करने की कोशिश पर सवाल उठाना है। लेकिन कुरैशी ने जवाब में मुद्दे का सामना करने के बजाय ट्रोलिंग का कार्ड खेल दिया। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि वह वर्षों से दो रुपये वाले ट्रोल्स का सामना कर रहे हैं, तो क्या अब किसी पूर्व विदेश सचिव की ट्रोलिंग को विशेष सम्मान समझें? यहां सवाल यह है कि क्या किसी वरिष्ठ राजनयिक की आलोचना को ट्रोलिंग बताकर खारिज कर देना पर्याप्त जवाब है? देखा जाये तो कंवल सिब्बल ने उनके तर्कों पर सवाल उठाए थे, लेकिन कुरैशी ने बहस को व्यक्तिगत कटाक्ष की दिशा में मोड़ दिया। अपने कार्यकाल का हिसाब देने से क्यों बच रहे हैं कुरैशी? हम आपको यह भी बता दें कि सोशल मीडिया पर कुरैशी को घेरने वाले यूजर्स ने एक और असहज सवाल उठाया है। एक यूजर ने लिखा है कि जब वह खुद मुख्य चुनाव आयुक्त थे, तब मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर जैसी कवायद क्यों नहीं हुई? क्या मतदाता सूची को साफ-सुथरा रखना जरूरी नहीं था? क्या मृत, स्थानांतरित और अन्य अयोग्य श्रेणियों में आने वाले नामों की जांच नहीं होनी चाहिए? और क्या मतदाता सूची में केवल भारतीय नागरिकों को शामिल करने की कानूनी शर्त का पालन नहीं होना चाहिए? देखा जाये तो ये सवाल अपने आप में विचारणीय हैं। मतदाता सूची की शुद्धता और किसी पात्र नागरिक का वोट न छिनना, दोनों ही चुनावी व्यवस्था की बुनियादी जरूरतें हैं। इसलिए एसआईआर पर कुरैशी की मौजूदा आपत्तियों का मूल्यांकन करते समय उनके अपने कार्यकाल के रिकॉर्ड को सामने रखना भी जरूरी है। साथ ही यह विवाद इसलिए भी दिलचस्प है कि कुरैशी का पुराना रिकॉर्ड पूरी तरह सवालों से परे नहीं रहा। फरवरी 2020 में चुनाव आयोग ने उनके एक लेख पर जवाब देते हुए कहा था कि उनके कार्यकाल में आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के कुछ मामलों में जनप्रतिनिधित्व कानून और भारतीय दंड संहिता के संबंधित प्रावधानों के तहत कार्रवाई नहीं हुई थी। हम आपको यह भी बता दें कि सोशल मीडिया पर कुछ यूजर्स ने कुरैशी के दृष्टिकोण, वैचारिक झुकाव और पाकिस्तान के चुनावों को कथित रूप से निष्पक्ष बताने संबंधी उनके पुराने बयानों पर सवाल उठाए हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि किसी भी संवैधानिक संस्था की आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन आलोचना करने वाले की अपनी कसौटियां भी जांच के दायरे में आती हैं। यदि कुरैशी का मानना है कि एसआईआर गलत है, तो उन्हें ठोस आंकड़ों, कानूनी तर्कों और प्रमाणों के साथ अपनी बात रखनी चाहिए। केवल तीखे आरोपों और सार्वजनिक अभियानों से किसी संस्था की विश्वसनीयता पर सवाल तो उठाया जा सकता है लेकिन आरोपों को प्रमाणित करना भी जरूरी होता है। कंवल सिब्बल की आपत्ति का कारण भी यही है। कुरैशी कभी उस संस्था के मुखिया थे, जिसकी स्वतंत्रता और साख पर उन्हें गर्व था। आज वही संस्था उनके निशाने पर है। उनके रुख में यह बदलाव किन तथ्यों और अनुभवों के कारण आया, इसका जवाब उन्हें देना चाहिए। बहरहाल, सवाल उठता है कि क्या कुरैशी वास्तव में चुनावी सुधारों की लड़ाई लड़ रहे हैं, या मौजूदा आयोग के खिलाफ राजनीतिक अविश्वास की मुहिम में अपनी पूर्व संवैधानिक हैसियत का इस्तेमाल कर रहे हैं? उनकी मंशा पर अंतिम फैसला तथ्यों के आधार पर ही होगा, लेकिन उनके पुराने बयानों और मौजूदा आक्रामकता के बीच का अंतर इतना बड़ा है कि जवाब मांगना जरूरी हो गया है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 24 Oct 2026 1:14 pm

महाराष्ट्र: मनोज जरांगे से जुड़े वायरल ऑडियो पर शिवसेना का पलटवार, कहा- 'शिंदे की छवि खराब करना बर्दाश्त नहीं'

महाराष्ट्र: मनोज जरांगे से जुड़े वायरल ऑडियो पर शिवसेना का पलटवार, कहा- 'शिंदे की छवि खराब करना बर्दाश्त नहीं'

समाचार नामा 24 Oct 2026 12:24 pm

पश्चिम बंगाल कांग्रेस ने शहरी निकाय चुनावों में सीट बंटवारे की संभावना से किया इनकार

पश्चिम बंगाल कांग्रेस ने शहरी निकाय चुनावों में सीट बंटवारे की संभावना से किया इनकार

समाचार नामा 24 Oct 2026 12:19 pm

Jio IPO: जियो प्लेटफार्म्स के IPO ने बनाया विश्व रिकॉर्ड, 1.38 करोड़ से ज्यादा आवेदन; 22 गुना हुआ सब्सक्राइब

जियो प्लेटफार्म्स के आईपीओ में संस्थागत निवेशकों की ओर से भी जबरदस्त मांग देखने को मिली। योग्य संस्थागत खरीदारों (QIB) की कैटेगरी 70.55 गुना सब्सक्राइब हुई। वहीं, गैर-संस्थागत निवेशकों (NII) की कैटेगरी में करीब 14 गुना सब्सक्रिप्शन दर्ज किया गया।

देशबन्धु 24 Oct 2026 11:55 am

बिहार में एमएलसी चुनाव में एनडीए की सभी सीटों पर जीत तय : रामकृपाल यादव

बिहार में एमएलसी चुनाव में एनडीए की सभी सीटों पर जीत तय : रामकृपाल यादव

समाचार नामा 24 Oct 2026 10:42 am

हिमाचल प्रदेश को केंद्र सरकार की बड़ी सौगात, 320 नई पीजी मेडिकल सीटों को मंजूरी

हिमाचल प्रदेश को केंद्र सरकार की बड़ी सौगात, 320 नई पीजी मेडिकल सीटों को मंजूरी

समाचार नामा 24 Oct 2026 10:30 am

Jamia University: दीवारों पर ‘फ्री कश्मीर’ और ‘फ्री शरजील इमाम’ के नारे मिलने का दावा, परिसर के बाहर पुलिस तैनात

Jamia University: दीवारों पर ‘फ्री कश्मीर’ और ‘फ्री शरजील इमाम’ के नारे मिलने का दावा, परिसर के बाहर पुलिस तैनात

समाचार नामा 24 Oct 2026 8:41 am

ओडिशा को 'इंडिया केम 2026' में 53,893 करोड़ रुपए के निवेश प्रस्ताव मिले

ओडिशा को 'इंडिया केम 2026' में 53,893 करोड़ रुपए के निवेश प्रस्ताव मिले

समाचार नामा 23 Oct 2026 11:44 pm

केरल लोक भवन के शाकाहारी किचन विवाद पर यासर जिलानी ने कांग्रेस को घेरा, बताया तुष्टिकरण की राजनीति

केरल लोक भवन के शाकाहारी किचन विवाद पर यासर जिलानी ने कांग्रेस को घेरा, बताया तुष्टिकरण की राजनीति

समाचार नामा 23 Oct 2026 10:28 pm

उत्तर प्रदेश: युवती को गोली मारने के मामले में एनसीडब्ल्यू सख्त, डीजीपी से मांगी रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश: युवती को गोली मारने के मामले में एनसीडब्ल्यू सख्त, डीजीपी से मांगी रिपोर्ट

समाचार नामा 23 Oct 2026 8:31 pm

विरोध-प्रदर्शन लोकतांत्रिक अधिकार, रोकेंगे तो हर सड़क बनेगी जंतर-मंतर : कासिम रसूल इलियास

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समाचार नामा 23 Oct 2026 8:20 pm

अब समय आ गया है सत्ताधारी भाजपा लोगों की बढ़ती नाराजगी पर ध्यान दे : शशि थरूर

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समाचार नामा 23 Oct 2026 6:32 pm

यूपी चुनाव 2027: ओवैसी पर नसीम सिद्दीकी का निशाना, बोले- जनता को सावधान रहने की जरूरत

यूपी चुनाव 2027: ओवैसी पर नसीम सिद्दीकी का निशाना, बोले- जनता को सावधान रहने की जरूरत

समाचार नामा 23 Oct 2026 6:24 pm

पावर कट के बीच 'संकटमोचक' बनी हरियाणा पुलिस, हड़ताल के बीच बहाल कराई बिजली आपूर्ति

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समाचार नामा 23 Oct 2026 6:05 pm

महाराष्ट्र: मंत्री गिरीश महाजन ने राज्यपाल को दिया सिंहस्थ कुंभ मेला ध्वजारोहण समारोह का निमंत्रण, राष्ट्रपति भी रहेंगी मौजूद

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समाचार नामा 23 Oct 2026 5:33 pm

मांझे से मौत: कर्नाटक के डिप्टी सीएम की चेतावनी, लापरवाही से इस्तेमाल पर लग सकते हैं आपराधिक आरोप

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समाचार नामा 23 Oct 2026 4:37 pm

केरल : शपथ के एक घंटे बाद ही विवादों में घिरे राज्यपाल माथुर, कांग्रेस ने खाद्य निर्देशों का किया विरोध

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समाचार नामा 23 Oct 2026 4:33 pm

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समाचार नामा 23 Oct 2026 4:15 pm

'ये गांधी का देश है, उनके तरीकों से ही सब होगा', पीएम मोदी के बयान पर बोले मनोज झा

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समाचार नामा 23 Oct 2026 2:53 pm

महाराष्ट्र एमएलसी चुनाव : पांच सीटों के लिए मतदान, महायुति और एमवीए ने जीत का दावा किया

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समाचार नामा 23 Oct 2026 2:44 pm

इलाहाबाद-झांसी स्नातक एमएलसी चुनाव के लिए मतदान जारी, 152 बूथों पर कड़ी सुरक्षा

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समाचार नामा 23 Oct 2026 2:41 pm

'स्टिंग ऑपरेशन' को हल्के में ले रही कर्नाटक सरकार : एचडी कुमारस्वामी

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समाचार नामा 23 Oct 2026 2:37 pm

Delhi में बैठे बैठे मोदी ने Iraq में कर दिया खेल, India के पास अब तेल ही तेल

दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि भारत रूस से कितना तेल खरीद रहा है, वेनेजुएला से कितना तेल खरीदेगा और अमेरिकी दबाव के आगे भारत अपने फैसले बदलेगा या नहीं। लेकिन इस पूरे शोर-शराबे के बीच एक बड़ा सवाल जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है कि इराक से भारत कितनी बड़ी मात्रा में तेल खरीद रहा है और इस खरीद से अपने आर्थिक हितों को कैसे साध रहा है? देखा जाये तो रूस और वेनेजुएला के तेल पर दुनिया बहस करती रहे, लेकिन भारत की असली रणनीति समझनी है तो इराक के साथ उसके तेल कारोबार पर नजर डालनी होगी। यही वह मोर्चा है, जहां भारत अपनी जरूरत, बाजार और कीमत के हिसाब से फैसले लेकर दुनिया को यह संदेश दे रहा है कि उसकी ऊर्जा नीति किसी के दबाव से नहीं, बल्कि देश के हितों से तय होती है। इराक: भारत की ऊर्जा सुरक्षा का एक बड़ा स्तंभ देखा जाये तो भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक है। देश की अर्थव्यवस्था, परिवहन व्यवस्था, उद्योग और आम आदमी के जीवन में पेट्रोलियम की अहम भूमिका है। ऐसे में तेल की कीमतों में मामूली वृद्धि भी भारत के आयात बिल, महंगाई और रुपये पर दबाव डाल सकती है। भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में इराक ने भारत को 4.711 करोड़ मीट्रिक टन कच्चा तेल उपलब्ध कराया। यह भारत के कुल तेल आयात के मूल्य का लगभग 19.16 प्रतिशत था। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद इराक भारत का दूसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बना हुआ है। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि इराक भारत के लिए कोई मामूली या वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता नहीं है। वह भारत की ऊर्जा व्यवस्था का एक प्रमुख आधार है। भारतीय तेल कंपनियां इराक से नियमित रूप से तेल खरीदती हैं और इस व्यापार के माध्यम से दोनों देशों के आर्थिक संबंध भी मजबूत होते हैं। इसे भी पढ़ें: Prabhasakshi NewsRoom: Saudi Arabia में हालात बिगड़ते ही भारतीय जायरीनों को सुरक्षित निकालने के लिए एक्शन में आई मोदी सरकार, अब तक 13 हजार से ज्यादा लौटे अक्टूबर 2026 की खरीद: क्यों चर्चा में आया इराक का तेल? इराक से भारत की खरीद का महत्व हाल के घटनाक्रमों से और बढ़ गया है। 22 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर में भारत ने इराक से प्रतिदिन लगभग 8.30 लाख बैरल तेल आयात किया, जबकि अगस्त में यह मात्रा लगभग 1.71 लाख बैरल प्रतिदिन थी। इसी दौरान भारत का रूस से तेल आयात लगभग 14 प्रतिशत घटकर 18 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया। यह बदलाव बताता है कि भारत की तेल खरीद किसी एक राजनीतिक समीकरण से तय नहीं होती। जब मध्य-पूर्व का तेल प्रतिस्पर्धी कीमतों पर उपलब्ध होता है, तो भारतीय रिफाइनरियां उसकी ओर रुख कर सकती हैं। रूस का तेल भी भारतीय बाजार के लिए महत्वपूर्ण बना रहता है, लेकिन खरीद का फैसला कीमत, परिवहन खर्च, उपलब्धता और रिफाइनरी की जरूरतों के आधार पर होता है। इस रणनीति का एक और उल्लेखनीय उदाहरण सामने आया। इसी महीने की एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन ने इराक के बसरा टर्मिनल से लगभग 20 लाख बैरल बसरा मीडियम क्रूड की एक खेप खरीदने पर सहमति जताई थी। रिपोर्ट में इस खरीद के लिए दुबई के तेल मूल्य से 32 डॉलर प्रति बैरल कम कीमत का उल्लेख किया गया। यह उदाहरण उस मूल सिद्धांत को सामने लाता है जिस पर भारत की ऊर्जा रणनीति आधारित होनी चाहिए। यानि जहां बेहतर आर्थिक शर्तें मिलें, वहां से तेल खरीदने के विकल्प खुले रखे जाएं। वैश्विक बाजार पर क्या पड़ता है इसका असर? देखा जाये तो तेल बाजार में भारत जैसे बड़े खरीदार का निर्णय केवल उसकी घरेलू अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रहता। भारत प्रतिदिन लाखों बैरल कच्चे तेल का आयात करता है। इसलिए यदि भारतीय कंपनियां रूस के बजाय इराक या दूसरे मध्य-पूर्वी उत्पादकों से अधिक तेल खरीदती हैं, तो अलग-अलग तेल ग्रेड की मांग, व्यापारिक प्रवाह और क्षेत्रीय मूल्य प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है। सितंबर 2026 में मध्य-पूर्व से भारत का कुल तेल आयात बढ़कर लगभग 28 लाख बैरल प्रतिदिन पहुंच गया। यह भारत के कुल तेल आयात का लगभग 54 प्रतिशत था। बताया जा रहा है कि मध्य-पूर्वी तेल की बेहतर उपलब्धता और रूसी तेल पर घटते मूल्य-लाभ ने इस बदलाव में भूमिका निभाई। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि इराक से ज्यादा तेल खरीदते ही दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतें गिर जाएंगी। वैश्विक कीमतों पर ओपेक की उत्पादन नीति, युद्ध, समुद्री परिवहन, मांग और आपूर्ति जैसे कई कारक असर डालते हैं। लेकिन भारत का विविध स्रोतों से खरीदना आपूर्तिकर्ताओं के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ाने और अपने लिए बेहतर सौदे हासिल करने में मदद कर सकता है। यहां सवाल उठता है कि इस सबसे भारत को क्या फायदा हो सकता है? देखा जाये तो पहला फायदा है आयात लागत में बचत। अगर किसी खेप का वास्तविक पहुंच-मूल्य अन्य विकल्पों की तुलना में कम पड़ता है, तो भारतीय कंपनियों का खर्च घट सकता है। इसका लाभ रिफाइनरियों के मुनाफे और व्यापक अर्थव्यवस्था को मिल सकता है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कम कीमत का लाभ पेट्रोल-डीजल के खुदरा दामों में कितना पहुंचेगा, यह करों, रिफाइनिंग लागत और सरकारी मूल्य निर्धारण जैसे दूसरे कारकों पर भी निर्भर करता है। दूसरा फायदा है रणनीतिक स्वतंत्रता। भारत को रूस, इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका और जरूरत के अनुसार अन्य उत्पादकों से तेल खरीदने के विकल्प बनाए रखने चाहिए। इससे किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता कम होती है और प्रतिबंधों या आपूर्ति संकट की स्थिति में विकल्प उपलब्ध रहते हैं। तीसरा फायदा है भारत की सौदेबाजी की ताकत। जब भारतीय रिफाइनरियां कई बाजारों से खरीद सकती हैं, तो किसी एक आपूर्तिकर्ता की शर्तों को स्वीकार करना उनकी मजबूरी नहीं रह जाता। लेकिन इस लाभ को बनाए रखने के लिए समुद्री मार्गों की सुरक्षा, तेल की गुणवत्ता, परिवहन बीमा और भुगतान व्यवस्था का भी ध्यान रखना जरूरी है। इसके अलावा, इराक से प्रतिस्पर्धी शर्तों पर तेल खरीदना और अंतरराष्ट्रीय दबावों के बावजूद भारत के हितों को सर्वोपरि रखना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऊर्जा रणनीति का एक बड़ा मास्टरस्ट्रोक है। दुनिया भर की सरकारें तेल की बढ़ती कीमतों और उसके आर्थिक बोझ से जूझ रही हैं, वहीं भारत ने अंतरराष्ट्रीय उथल-पुथल के बीच पेट्रोल-डीजल की घरेलू कीमतों में लगभग स्थिरता बनाए रखकर आम जनता को बड़ी राहत देने की कोशिश की है। रूस हो, इराक हो या कोई दूसरा तेल उत्पादक देश, भारत का जोर इस बात पर रहा है कि तेल जहां से भी मिले, उसकी खरीद देश के आर्थिक हितों और ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखकर की जाए। यही मोदी सरकार की रणनीति की खासियत है कि वैश्विक संकट के बीच भारत के लिए बेहतर विकल्प तलाशना और अंतरराष्ट्रीय बाजार के दबाव को सीधे आम आदमी की जेब पर हावी न होने देना। जब दुनिया के कई देश महंगे तेल की चुनौती से जूझ रहे हैं, तब भारत में कीमतों को अपेक्षाकृत स्थिर बनाए रखना मोदी सरकार की ऊर्जा नीति की एक अहम उपलब्धि के रूप में पेश किया जा सकता है। हालांकि इराक से तेल खरीदने में जोखिम भी हैं। खाड़ी क्षेत्र में संघर्ष, होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षा और आपूर्ति में संभावित बाधाएं भारत के लिए गंभीर चुनौती बन सकती हैं। इसलिए सस्ता तेल तभी वास्तविक रणनीतिक लाभ है, जब उसकी आपूर्ति भरोसेमंद और आर्थिक रूप से व्यवहार्य भी हो। बहरहाल, दुनिया भारत की रूस से तेल खरीद पर नजर रखे या वेनेजुएला से संभावित खरीद पर बहस करे, भारत की ऊर्जा नीति का मूल्यांकन व्यापक तस्वीर के आधार पर होना चाहिए। इराक से 4.711 करोड़ टन वार्षिक तेल आपूर्ति और सितंबर 2026 में वहां से आयात में आई तेज बढ़ोतरी यह दिखाती है कि मध्य-पूर्व भारत की ऊर्जा सुरक्षा में कितनी अहम भूमिका निभाता है। यदि मोदी सरकार और भारतीय तेल कंपनियां प्रतिस्पर्धी कीमतों, सुरक्षित आपूर्ति और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को एक साथ साध पाती हैं, तो यह व्यावहारिक कूटनीति की बड़ी सफलता होगी। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 23 Oct 2026 1:45 pm

अक्टूबर में भारत की कारोबारी गतिविधियां 4 महीने के उच्च स्तर पर पहुंची: पीएमआई डेटा

नई दिल्ली, अक्टूबर में भारत के निजी क्षेत्र की कारोबारी गतिविधियों (बिजनेस एक्टिविटी) में जोरदार तेजी दर्ज की गई और यह चार महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई।

देशबन्धु 23 Oct 2026 1:33 pm

सपा की सियासत में आजम की ताकत और रामपुर जेल का सियासी फलसफा

उत्तर प्रदेश की राजनीति में रामपुर की जेल सिर्फ एक चारदीवारी नहीं, बल्कि वर्तमान में समाजवादी पार्टी के भविष्य और मुस्लिम सियासत के नए ध्रुवीकरण का केंद्र बन चुकी है। 22 अक्टूबर 2026 को सपा प्रमुख अखिलेश यादव और पार्टी के सबसे कद्दावर मुस्लिम चेहरे आजम खान के बीच रामपुर जिला जेल में हुई लगभग एक घंटे की मुलाकात केवल दो नेताओं की शिष्टाचार भेंट नहीं थी। यह उत्तर प्रदेश के आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात पर चली गई एक ऐसी चाल है, जिसके दूरगामी परिणाम न केवल समाजवादी पार्टी के भीतर, बल्कि पूरे राज्य के सामाजिक-राजनीतिक ताने-बाने पर दिखाई देंगे। कानूनी शिकंजे में फंसे और चुनावी राजनीति से तकनीकी रूप से दूर हो चुके आजम खान की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके एक इशारे पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की दर्जनों सीटों का गणित बदल सकता है। यही कारण है कि अखिलेश यादव को खुद रामपुर जेल पहुंचकर यह संदेश देना पड़ा कि समाजवादी पार्टी में आजम खान की हैसियत न तो कम हुई है और न ही उन्हें हाशिए पर धकेला जा सकता है। यह मुलाकात इस बात का जीवंत प्रमाण है कि सत्ता और कानूनी मुकदमों के उतार-चढ़ाव के बावजूद, सपा की सियासत में आजम की ताकत का सूरज पूरी तरह अस्त नहीं हुआ है, बल्कि रामपुर जेल की सलाखों के पीछे से वह एक नई ऊर्जा के साथ उभर रहा है। यह घटनाक्रम यह भी दर्शाता है कि जब-जब उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन या बड़े राजनैतिक उलटफेर की नींव रखी जाती है, तब-तब रामपुर का किला और वहां का नेतृत्व स्वतः ही मुख्यधारा की चर्चा के केंद्र में आ जाता है। इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए समाजवादी पार्टी के अंतर्विरोधों और उत्तर प्रदेश के बदलते मुस्लिम नेतृत्व के संकट को देखना जरूरी है। पिछले कुछ समय से यह चर्चा आम थी कि आजम खान के जेल जाने और उनके परिवार पर आए कानूनी संकट के दौरान समाजवादी पार्टी ने उस आक्रामकता के साथ उनका साथ नहीं दिया, जिसकी उम्मीद एक संस्थापक सदस्य को होती है। पार्टी के भीतर और बाहर इस बात को लेकर सुगबुगाहट थी कि अखिलेश यादव अपनी छवि को एक नए, आधुनिक और गैर-विवादास्पद रूप में ढालने के लिए 'माई' (मुस्लिम-यादव) समीकरण से थोड़ा इतर 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नारा दे रहे हैं। इस नए विमर्श में आजम खान जैसे पुराने समाजवादी दिग्गजों की कट्टर छवि फिट नहीं बैठ रही थी। इसी बीच, असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम और अन्य क्षेत्रीय दलों ने इस खालीपन को भरने की कोशिश शुरू कर दी। ओवैसी लगातार यह आरोप लगाते रहे कि सपा मुस्लिमों के वोट तो लेती है, लेकिन जब उनके बड़े नेताओं पर संकट आता है, तो नेतृत्व चुप्पी साध लेता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जो कभी आजम खान का अभेद्य किला माना जाता था, वहां मुस्लिम मतदाताओं के बीच उपजे इस असमंजस को अखिलेश यादव भांप चुके थे। रामपुर लोकसभा उपचुनाव और उसके बाद के घटनाक्रमों में जिस तरह से अंदरूनी गुटबाजी सामने आई, उसने पार्टी आलाकमान को सचेत कर दिया कि आजम खान को नजरअंदाज करने की कीमत २०२७ में बेहद भारी पड़ सकती है। इसलिए, अखिलेश यादव का रामपुर जेल जाना राजनीतिक मजबूरी भी था और एक सोची-समझी रणनीति भी, जिसके जरिए उन्होंने एक ही झटके में ओवैसी के नैरेटिव को ध्वस्त करने और अपने कोर वोटर को यह भरोसा दिलाने का प्रयास किया कि 'नेताजी' (मुलायम सिंह यादव) के दौर के स्तंभ आज भी उतने ही आदरणीय हैं। यह कदम यह भी स्पष्ट करता है कि सपा अपने पारंपरिक और वफादार वोट बैंक को किसी भी अन्य वैचारिक प्रयोग की वेदी पर होम करने के लिए तैयार नहीं है। इसे भी पढ़ें: SP सच में मुसलमानों की हितैषी है तो Muslim CM का चेहरा घोषित करे: अखिलेश को OP राजभर की सीधी चुनौती जेल की इस मुलाकात ने न केवल सपा के कार्यकर्ताओं में नया जोश भरा है, बल्कि पार्टी के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान पर भी एक तरह से विराम लगाने का काम किया है। हाल के दिनों में रामपुर के वर्तमान सांसद मोहिबुल्लाह नदवी और आजम खान के समर्थकों के बीच की दूरी जगजाहिर रही है। स्थानीय स्तर पर संगठन दो धड़ों में बंटा नजर आ रहा था। अखिलेश यादव ने जेल से बाहर आकर जिस तरह आजम थे, आजम हैं और आजम रहेंगे का हुंकार भरा, उससे उन्होंने यह साफ कर दिया कि रामपुर और पूरे रूहेलखंड क्षेत्र में समाजवादी पार्टी का चेहरा और कमान आज भी परोक्ष रूप से आजम खान के पास ही रहेगी। खबरों के मुताबिक, इस मुलाकात के दौरान आजम खान की पत्नी तंजीन फातिमा ने अखिलेश यादव को संभावित उम्मीदवारों और रणनीतिक बदलावों की एक सूची भी सौंपी। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि २०२७ के विधानसभा चुनावों में टिकटों के बंटवारे से लेकर गठबंधन के स्वरूप तक, आजम खान की राय को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी। भले ही आजम खान खुद चुनावी मैदान में न उतर सकें, लेकिन उनका 'रिमोट कंट्रोल' यूपी की सियासत में बेहद प्रभावी रहने वाला है। उनका यही प्रभाव अखिलेश यादव को उनके पास खींच लाया, क्योंकि वे जानते हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुस्लिम समाज में आजम खान की आवाज आज भी एक भावनात्मक अपील रखती है, जिसे कोई दूसरा नेता रिप्लेस नहीं कर पाया है। यह प्रभाव केवल रामपुर तक सीमित नहीं है, बल्कि मुरादाबाद, बिजनौर, बरेली और अमरोहा जैसे पूरे मुस्लिम बहुल बेल्ट में आजम खान की राजनीतिक छत्रछाया आज भी टिकटार्थियों के भाग्य का फैसला करने की क्षमता रखती है। दूसरी तरफ, इस मुलाकात ने विपक्षी खेमे, विशेषकर भारतीय जनता पार्टी को एक बार फिर सपा पर हमलावर होने का मौका दे दिया है। भाजपा ने इसे तुष्टिकरण की राजनीति का नया अध्याय और अपराधियों को संरक्षण देने की कोशिश करार दिया है। सत्ताधारी दल का तर्क है कि कानून सम्मत कार्रवाई के तहत जेल में बंद एक सजायाफ्ता नेता से राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री की यह मुलाकात यह दर्शाती है कि सपा आज भी अपने पुराने ढर्रे और तुष्टिकरण की नीति से बाहर नहीं निकल पाई है। भाजपा के रणनीतिकार इस मुलाकात को बहुसंख्यक मतदाताओं के बीच भुनाने की कोशिश करेंगे, ताकि सपा के खिलाफ एक बार फिर ध्रुवीकरण का माहौल बनाया जा सके। भाजपा के लिए यह मुलाकात एक ऐसा हथियार है जिसके जरिए वे यह साबित करने की कोशिश करेंगे कि अखिलेश यादव का 'पीडीए' सिर्फ एक मुखौटा है, और असलियत में वे उसी पुरानी राजनीति की ओर लौट रहे हैं जिसे जनता ने नकारा था। सुभासपा और अन्य छोटे दलों ने भी इसे केवल एक 'चुनावी नौटंकी' बताया है। विपक्ष का यह तीखा हमला दिखाता है कि वे भी अच्छी तरह जानते हैं कि आजम और अखिलेश का यह पुनर्मिलन अगर जमीन पर रंग लाया, तो विपक्षी दलों के लिए मुस्लिम वोटों में सेंध लगाना नामुमकिन हो जाएगा। भाजपा की ओर से आने वाले तीखे बयान इस बात का भी संकेत हैं कि वे आने वाले समय में कानून-व्यवस्था के मुद्दे को एक बार फिर चुनाव के केंद्र में लाएंगे और आजम खान का नाम लेकर सपा को घेरने की हरसंभव कोशिश करेंगे। इस पूरे परिदृश्य में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि क्या रामपुर जेल की यह मुलाकात समाजवादी पार्टी को 2027 की सत्ता के सिंहासन तक पहुंचा पाएगी? उत्तर प्रदेश की सियासत अब 2012 या 2017 जैसी नहीं रह गई है। मतदाता बेहद जागरूक हैं और केवल भावनात्मक अपीलों पर वोट नहीं करते। आजम खान की ताकत का एक पहलू अगर उनका भारी जनसमर्थन है, तो दूसरा पहलू उनकी छवि को लेकर होने वाला काउंटर-ध्रुवीकरण भी है। अखिलेश यादव के सामने चुनौती यह होगी कि वे आजम खान की ताकत का इस्तेमाल मुस्लिम वोटों को एकजुट करने में तो करें, लेकिन इसके साथ ही बहुसंख्यक और गैर-यादव ओबीसी मतदाताओं को छिटकने न दें। पीडीए का जो गुलदस्ता अखिलेश ने तैयार किया है, उसमें आजम खान की हिस्सेदारी को इस तरह पिरोना होगा कि वह समावेशी दिखे, न कि केवल एक वर्ग विशेष की राजनीति। पश्चिमी उत्तर प्रदेश का जो जाट-मुस्लिम-दलित गठबंधन सपा बनाने का प्रयास कर रही है, उसमें आजम खान की स्वीकार्यता को संतुलित रखना एक बेहद बारीक राजनीतिक कला होगी। यदि सपा इस संतुलन को साधने में सफल रही, तो रामपुर जेल से शुरू हुआ यह सफर २०२७ में लखनऊ के सचिवालय तक पहुंच सकता है, अन्यथा ध्रुवीकरण की तेज हवा इस पूरी रणनीति को बिखेर भी सकती है। बहरहाल, रामपुर जेल के बंद कमरों से निकला यह सियासी संदेश उत्तर प्रदेश की वादियों में गूंजने लगा है। इसने यह तय कर दिया है कि आने वाले दिनों में रामपुर की धरती एक बार फिर सूबे की राजनीति का कुरुक्षेत्र बनेगी। आजम खान जेल की सलाखों के पीछे रहकर भी सपा की सियासत के सबसे बड़े खिलाड़ियों में से एक बने हुए हैं, और अखिलेश यादव के इस कदम ने यह साबित कर दिया है कि उत्तर प्रदेश की सत्ता का रास्ता आज भी रामपुर के सियासी गलियारों से होकर ही गुजरता है। अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार

प्रभासाक्षी 23 Oct 2026 1:31 pm

आखिर कब थमेगा धार्मिक आयोजनों में मौत का सिलसिला?

धर्म, आस्था और विश्वास के केंद्रों पर इंसान सुकून, शांति और सुख-समृद्धि की कामना लेकर पहुंचता है लेकिन जब वही स्थान चीख-पुकार, दमघोंटू भीड़ और मौत के मंजर में तब्दील हो जाएं तो यह हमारी व्यवस्था की संवेदनहीनता और सुरक्षा संबंधी तैयारियों की विफलता का भयावह प्रमाण है। कोलकाता के चोरबागान दुर्गा पूजा पंडाल में 17 अक्तूबर की शाम भगदड़ जैसी स्थिति में 19 लोगों की मौत और दो दर्जन से अधिक लोगों के घायल होने की खबर ने एक बार फिर देश को झकझोर दिया। सप्तमी की शाम मां दुर्गा के दर्शन की लालसा लेकर निकले श्रद्धालुओं को क्या पता था कि घर लौटने के बजाय कई परिवारों को अपने प्रियजनों के शव मिलेंगे? जिस उत्सव में जीवन, शक्ति और विजय का संदेश गूंजना चाहिए था, वहां मातम पसरा था। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर हमारी आस्था के स्थलों पर इंसानी जिंदगी इतनी सस्ती क्यों हो जाती है? चोरबागान की घटना को केवल अचानक उमड़ी भीड़ या दुर्भाग्यपूर्ण हादसा बताकर जिम्मेदारी से बचना आसान है लेकिन ऐसा करना त्रासदी के वास्तविक कारणों से आंखें मूंदना होगा। बारिश के बीच पंडाल में प्रवेश और निकास के रास्तों पर भीड़ का दबाव बढ़ा और अफरा-तफरी की स्थिति पैदा हुई। घटनास्थल की संकरी गलियों, लोगों की आवाजाही तथा सुरक्षा प्रबंधों को लेकर भी सवाल उठे हैं। हालांकि, दुर्घटना के वास्तविक कारणों और जिम्मेदारी का निर्धारण निष्पक्ष जांच से ही होना चाहिए। फिर भी, यदि भारी भीड़ और खराब मौसम के बावजूद आवाजाही को सुरक्षित रखने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी तो यह गंभीर प्रशासनिक और आयोजन संबंधी विफलता का मामला है। जब किसी आयोजन में हजारों लोगों के जुटने की संभावना पहले से मालूम हो, तब संभावित खतरे का अनुमान लगाने के लिए दुर्घटना होने की प्रतीक्षा क्यों की जाती है? भारत में धार्मिक स्थलों और सार्वजनिक आयोजनों में भगदड़ कोई नई समस्या नहीं है। मंदिरों, तीर्थस्थलों, धार्मिक मेलों, जुलूसों और पर्व-समारोहों में भीड़ का बेकाबू होना बार-बार जानलेवा साबित होता रहा है। वर्ष 2005 में महाराष्ट्र के मांढरदेवी मंदिर में भगदड़ से 300 से अधिक लोगों की मौत हुई थी। 2011 में केरल के सबरीमाला में भगदड़ ने 100 से अधिक लोगों की जान ले ली थी। 2013 में मध्य प्रदेश के रतनगढ़ मंदिर में 100 से अधिक लोगों की मौत हुई। 2022 में जम्मू स्थित वैष्णो देवी मंदिर में भगदड़ से 12 श्रद्धालुओं की जान गई। 2024 में हाथरस में धार्मिक सत्संग के बाद मची भगदड़ में 121 लोगों की मौत ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। 2025 में प्रयागराज महाकुंभ और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भी भीड़ से जुड़ी जानलेवा घटनाओं ने सार्वजनिक सुरक्षा की तैयारियों पर गंभीर प्रश्न खड़े किए थे। हालांकि अलग-अलग घटनाओं के कारण और परिस्थितियां भिन्न थी लेकिन इनके बीच एक चिंताजनक समानता रही, भीड़ के दबाव में इंसानी जीवन की असुरक्षा। इसे भी पढ़ें: आस्था के सैलाब में कब तक गुम होती रहेगी जिंदगियां? हर त्रासदी के बाद शोक संदेश जारी होते हैं, मुआवजे की घोषणाएं होती हैं, जांच समितियां गठित की जाती हैं और इसके बाद व्यवस्था फिर पुराने ढ़र्रे पर लौट जाती है। यही हमारी सबसे बड़ी विफलता है। यदि पिछली दुर्घटनाओं से सबक लेकर प्रभावी सुरक्षा तंत्र विकसित किया गया होता तो बार-बार ऐसी मौतों का सामना नहीं करना पड़ता। जांच का उद्देश्य केवल दोषियों की पहचान करना नहीं, उन खामियों को दूर करना भी होना चाहिए, जिनके कारण एक ही प्रकार की त्रासदियां बार-बार सामने आती हैं। सवाल यह नहीं कि अगला हादसा कहां होगा बल्कि यह है कि उसे रोकने के लिए हमने अब तक क्या किया है? यह समझना जरूरी है कि भगदड़ केवल लोगों के अचानक दौड़ने से नहीं होती। जब किसी सीमित स्थान में भीड़ की संख्या उसकी क्षमता से अधिक हो जाती है, प्रवेश और निकास का प्रवाह बाधित होता है, लोग एक-दूसरे को धक्का देने लगते हैं या अफवाह के कारण एक साथ आगे बढ़ते हैं, तब स्थिति तेजी से जानलेवा बन सकती है। भीड़ के अत्यधिक दबाव में व्यक्ति के लिए सांस लेना और स्वयं को संभालना कठिन हो जाता है। गिरने वाला व्यक्ति दूसरों के लिए भी गंभीर खतरा पैदा कर सकता है। ऐसे हालात में कुछ क्षणों की अव्यवस्था भी अनेक जिंदगियां लील सकती है। इसलिए भीड़ प्रबंधन का अर्थ केवल पुलिसकर्मियों की तैनाती, बैरिकेडिंग या लाउडस्पीकर से घोषणाएं करना नहीं है। इसके लिए भीड़ की क्षमता का वैज्ञानिक आकलन, आवाजाही की सतत निगरानी, प्रशिक्षित कर्मियों और स्पष्ट आपातकालीन योजना की आवश्यकता होती है। धार्मिक आयोजनों में सुरक्षा को अक्सर आस्था के उत्साह और आयोजन की भव्यता के पीछे गौण कर दिया जाता है। ऊंचे-ऊंचे पंडाल, आकर्षक सजावट, रोशनी, प्रचार और प्रायोजकों की प्रतिस्पर्धा पर भरपूर ध्यान दिया जाता है लेकिन प्रवेश द्वार कितने हैं, निकास कितना चौड़ा है, आपातकालीन रास्ते खुले हैं या नहीं, पर्याप्त रोशनी है या नहीं और भीड़ बढ़ने पर क्या किया जाएगा, इन बुनियादी सवालों की अनदेखी कर दी जाती है। लोकप्रियता के नाम पर भीड़ को आमंत्रित करना और फिर उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी से बचना किसी भी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं हो सकता। आयोजकों को समझना होगा कि किसी पूजा पंडाल की सफलता श्रद्धालुओं की संख्या से नहीं बल्कि इस बात से तय होती है कि प्रत्येक श्रद्धालु सुरक्षित घर लौटे। सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी भी आयोजन स्थल पर पुलिस तैनात कर देने तक सीमित नहीं हो सकती। अनुमति देने से पहले स्थल की क्षमता, प्रवेश-निकास मार्गों, अग्नि सुरक्षा, संरचनात्मक मजबूती और आपातकालीन निकासी की व्यवस्था का वास्तविक निरीक्षण होना चाहिए। कोई भी तकनीक तभी कारगर होगी, जब उसके आधार पर समय रहते निर्णय लेने वाले जिम्मेदार लोग मौजूद हों। जवाबदेही तय करने में किसी प्रकार का पक्षपात नहीं होना चाहिए। यदि आयोजकों, अधिकारियों या अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों की लापरवाही प्रमाणित होती है तो कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। केवल कुछ गिरफ्तारियों या इस्तीफों को न्याय की पूर्णता नहीं माना जा सकता। साथ ही, जांच निष्पक्ष होनी चाहिए और दोष का निर्धारण राजनीतिक बयानबाजी के बजाय साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए। श्रद्धालुओं की भी अपनी जिम्मेदारी है। धक्का-मुक्की से बचना, अफवाहों पर विश्वास न करना, सुरक्षा निर्देशों का पालन करना और अत्यधिक भीड़ दिखाई देने पर प्रवेश करने की जिद न करना आवश्यक है। आयोजकों को भीड़ को आकर्षित करने के लिए सोशल मीडिया पर प्रचार करते समय सुरक्षा क्षमता का ध्यान रखना चाहिए। हालांकि, नागरिकों से सावधानी की अपेक्षा प्रशासनिक लापरवाही का विकल्प नहीं हो सकती। सुरक्षा की प्राथमिक जिम्मेदारी उन लोगों की है, जो आयोजन की योजना बनाते हैं, अनुमति देते हैं और व्यवस्था संचालित करते हैं। बहरहाल, चोरबागान की त्रासदी हमें चेतावनी दे रही है कि आस्था का सम्मान केवल पूजा-अर्चना, भव्य पंडालों और धार्मिक नारों से नहीं होता। उसका वास्तविक सम्मान मानव जीवन की रक्षा से होता है। मां दुर्गा की आराधना शक्ति, विवेक और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा देती है। यदि उनके दर्शन के लिए उमड़े श्रद्धालु अव्यवस्था के कारण अपनी जान गंवा दें तो हमें अपनी व्यवस्थाओं का कठोर आत्ममंथन करना ही होगा। अब वक्त शोक जताकर आगे बढ़ जाने का नहीं बल्कि व्यवस्था बदलने का है। हर धार्मिक स्थल, हर पूजा पंडाल और हर बड़े सार्वजनिक आयोजन में सुरक्षा को सर्वाेच्च प्राथमिकता देनी होगी। जब तक लापरवाही पर जवाबदेही तय नहीं होगी, सुरक्षा नियमों का कठोरता से पालन नहीं होगा और पिछली दुर्घटनाओं से मिले सबक जमीन पर नहीं उतरेंगे, तब तक श्रद्धालुओं की जान पर मंडराता खतरा समाप्त नहीं होगा। आस्था के नाम पर मौत को नियति मान लेना सबसे बड़ी भूल है। भगवान के दरबार में इंसान जिंदगी की दुआ मांगने जाता है, जान गंवाने नहीं। किसी भी सभ्य समाज और संवेदनशील शासन व्यवस्था की असली परीक्षा यही है कि श्रद्धालु विश्वास के साथ घर से निकलें और सुरक्षित अपने घर लौटें। - योगेश कुमार गोयल (लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और हिन्दी अकादमी दिल्ली के सौजन्य से प्रकाशित ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ पुस्तक के लेखक हैं)

प्रभासाक्षी 23 Oct 2026 12:51 pm

अगर भारत में हो रहे प्रदर्शनों के पीछे विदेशी शक्तियों का हाथ, तो अमित शाह क्या कर रहे हैं : उदित राज

अगर भारत में हो रहे प्रदर्शनों के पीछे विदेशी शक्तियों का हाथ, तो अमित शाह क्या कर रहे हैं : उदित राज

समाचार नामा 23 Oct 2026 12:24 pm

Driving Licence New Rules सामने आये, DL पर नागरिकता भी होगी दर्ज, जानिये अब क्या-क्या Documents देने पड़ेंगे?

देश में अब ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने के नियम बदलने की तैयारी है। नए नियम लागू हुए तो लाइसेंस पर न सिर्फ आपका ब्लड ग्रुप, मोबाइल नंबर और इमरजेंसी कॉन्टैक्ट दर्ज होगा, बल्कि आपकी नागरिकता की पहचान भी साफ होगी। भारतीय और विदेशी नागरिकों के ड्राइविंग लाइसेंस के रंग भी अलग-अलग हो सकते हैं। इतना ही नहीं, फर्जी पते और जन्मतिथि के सहारे लाइसेंस बनवाने वालों पर लगाम कसने के लिए उम्र और पते के प्रमाण के रूप में शपथपत्र और जीवन बीमा पॉलिसी की मान्यता खत्म करने का प्रस्ताव है। हम आपको बता दें कि सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने मोटर वाहन नियमों में इन बड़े बदलावों का मसौदा जारी किया है, जिसमें लाइसेंस बनवाने से लेकर उसमें संशोधन कराने तक की प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और आसान बनाने की तैयारी है। लाइसेंस पर दर्ज होंगे ब्लड ग्रुप और इमरजेंसी कॉन्टैक्ट प्रस्तावित बदलावों के अनुसार, ड्राइविंग लाइसेंस पर धारक का ब्लड ग्रुप, मोबाइल नंबर और आपातकालीन संपर्क विवरण दर्ज करना अनिवार्य किया जा सकता है। किसी दुर्घटना या आपात स्थिति में ये जानकारियां उपयोगी साबित हो सकती हैं और जरूरत पड़ने पर संबंधित व्यक्ति या उसके परिजनों से संपर्क करना आसान होगा। इसके अलावा, भारतीय और विदेशी नागरिकों की पहचान स्पष्ट करने के लिए दोनों श्रेणियों के लाइसेंस के रंग अलग-अलग रखने का प्रस्ताव भी किया गया है। लाइसेंस पर राष्ट्रीयता का उल्लेख होने से संबंधित अधिकारियों को धारक की नागरिकता की पहचान करने में भी सुविधा मिल सकती है। इसे भी पढ़ें: Prabhasakshi NewsRoom: Saudi Arabia में हालात बिगड़ते ही भारतीय जायरीनों को सुरक्षित निकालने के लिए एक्शन में आई मोदी सरकार, अब तक 13 हजार से ज्यादा लौटे फर्जी दस्तावेजों पर रोक लगाने की तैयारी हम आपको बता दें कि मौजूदा व्यवस्था में निर्धारित 12 दस्तावेजों में से कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने पर लाइसेंसिंग प्राधिकरण कार्यपालक मजिस्ट्रेट, न्यायिक मजिस्ट्रेट या नोटरी पब्लिक के समक्ष शपथपत्र को उम्र और पते के प्रमाण के रूप में स्वीकार कर सकता है। लेकिन इस सुविधा का दुरुपयोग कर गलत पता और जन्मतिथि दर्ज कराने की आशंकाएं सामने आती रही हैं। इसलिए शपथपत्र के जरिए गलत जानकारी देने की घटनाओं के मद्देनजर अब सत्यापन योग्य दस्तावेजों पर जोर दिया जा रहा है। मसौदे में उम्र, पता और पहचान प्रमाण के लिए अलग-अलग दस्तावेजों की सूची निर्धारित की गई है। पते के प्रमाण के तौर पर आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, ई-राशन कार्ड और पिछले तीन महीनों के बिजली या गैस बिल स्वीकार किए जा सकेंगे। विदेशी नागरिकों को भारत में वैध रूप से रहने से संबंधित प्रमाण देना होगा। उम्र के प्रमाण के लिए पासपोर्ट, स्कूल बोर्ड की अंकतालिका, जन्म प्रमाणपत्र और सरकारी विभागों द्वारा जारी पहचान पत्र शामिल किए गए हैं। वहीं, आधार कार्ड, पासपोर्ट, ई-राशन कार्ड और पैन कार्ड को पहचान प्रमाण के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। जीवन बीमा पॉलिसी को भी प्रमाण के तौर पर स्वीकार नहीं करने का प्रस्ताव है। ऑनलाइन ड्राइविंग टेस्ट होगा और सख्त मोदी सरकार ने सुरक्षित ड्राइविंग से जुड़े ऑनलाइन ट्यूटोरियल के आकलन की न्यूनतम उत्तीर्ण सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव रखा है। फिलहाल इस परीक्षा में 60 प्रतिशत अंक हासिल करना जरूरी है, जिसे बढ़ाकर 75 प्रतिशत किया जा सकता है। इसके अलावा, सुरक्षित ड्राइविंग ट्यूटोरियल की अवधि कम से कम 30 मिनट निर्धारित करने का प्रस्ताव है। इससे लाइसेंस आवेदकों के लिए सड़क सुरक्षा संबंधी जानकारी हासिल करना और उसका आकलन पास करना अधिक गंभीर प्रक्रिया बन सकता है। ऑनलाइन सेवाओं के लिए शुल्क में राहत साथ ही प्रस्तावित बदलावों में लाइसेंस से संबंधित सेवाओं को अधिक सुविधाजनक बनाने पर भी जोर दिया गया है। यदि आवेदक आधार प्रमाणीकरण के जरिए ऑनलाइन आवेदन करते हैं, तो पता, नाम और संपर्क नंबर में बदलाव जैसी निर्धारित सेवाओं के लिए शुल्क माफ करने का प्रस्ताव है। इससे लोगों को छोटे-छोटे संशोधनों के लिए बार-बार कार्यालय जाने की जरूरत कम हो सकती है और प्रक्रिया अधिक किफायती बन सकती है। 15 दिन में आवेदन पर फैसला, देरी पर भी प्रावधान हम आपको यह भी बता दें कि मसौदे के अनुसार, लाइसेंस में नाम, पता या अन्य विवरण बदलने के लिए ऑनलाइन किए गए आवेदन को संबंधित लाइसेंसिंग प्राधिकरण को 15 दिनों के भीतर मंजूर या खारिज करना होगा। आवेदन खारिज करने की स्थिति में कारण बताना भी अनिवार्य होगा। पते में बदलाव का आवेदन यदि 30 दिनों तक लंबित रहता है, तो उसे स्वतः स्वीकृत मानने का प्रस्ताव किया गया है। इससे आवेदकों को अनिश्चितकाल तक फैसले का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। इसके अलावा, ड्राइविंग लाइसेंस के नवीनीकरण, डुप्लीकेट लाइसेंस जारी करने, लाइसेंस में वाहन की नई श्रेणी जोड़ने और व्यक्तिगत विवरण बदलने जैसी सेवाओं के लिए एक संयुक्त आवेदन फॉर्म लाने की योजना है। जहां उपलब्ध होगा, वहां आवेदक का संबंधित विवरण सारथी पोर्टल से इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्राप्त किया जाएगा। बहरहाल, प्रस्तावित संशोधनों का उद्देश्य ड्राइविंग लाइसेंस व्यवस्था में फर्जीवाड़े पर अंकुश लगाना, सड़क सुरक्षा संबंधी आकलन को मजबूत करना और ऑनलाइन सेवाओं को अधिक तेज एवं पारदर्शी बनाना है। हालांकि, ये बदलाव फिलहाल मसौदा प्रस्ताव हैं। इनके अंतिम नियमों और लागू होने की तारीख की पुष्टि संबंधित अधिसूचना के अंतिम रूप के बाद ही होगी। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 23 Oct 2026 11:40 am

जर्मन कंपनियों के लिए भारत में बड़े अवसर: पीयूष गोयल

नई दिल्ली, केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने शुक्रवार को जर्मनी की राजधानी बर्लिन में कई प्रमुख उद्योगपतियों और कारोबारी नेताओं के साथ बैठकों के दौरान कहा कि भारत जर्मन कंपनियों के लिए निवेश, विनिर्माण और नवाचार के क्षेत्र में अपार अवसर प्रदान करता है।

देशबन्धु 23 Oct 2026 11:17 am

कित्तूर की वीरांगना रानी चेन्नम्मा की जयंती पर केंद्रीय मंत्री गडकरी समेत कई नेताओं ने किया नमन

कित्तूर की वीरांगना रानी चेन्नम्मा की जयंती पर केंद्रीय मंत्री गडकरी समेत कई नेताओं ने किया नमन

समाचार नामा 23 Oct 2026 8:25 am

कोटिया पर फिर गरमाई राजनीति! नवीन पटनायक ने भेजी BJD की बड़ी टीम

ओडिशा में बीजू जनता दल (बीजेडी) का एक प्रतिनिधिमंडल 23 अक्टूबर को कोटिया पंचायत का दौरा करेगा। यह दौरा ओडिशा के कोरापुट जिले के पोटांगी ब्लॉक में स्थित कोटिया के कुछ गांवों में आंध्र प्रदेश द्वारा कथित तौर पर चुनाव से जुड़ी गतिविधियां चलाए जाने के विरोध में किया जा रहा है।

देशबन्धु 23 Oct 2026 7:40 am

नाबालिगों के कथित नशे का वीडियो सामने आते ही मचा बवाल, बिट्टू ने सरकार को घेरा

पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता रवनीत सिंह बिट्टू ने एक कथित वीडियो साझा कर पंजाब में नशे की समस्या को लेकर राज्य की आम आदमी पार्टी (आप) सरकार पर तीखा हमला बोला है

देशबन्धु 23 Oct 2026 7:18 am

दिलजीत दोसांझ शो पर सियासी संग्राम! BJP-AAP आमने-सामने

दिल्ली भाजपा अध्यक्ष हर्ष मल्होत्रा ने गुरुवार को गायक दिलजीत दोसांझ के 30 अक्टूबर को प्रस्तावित दिल्ली शो को अनुमति नहीं दिए जाने के मुद्दे पर आम आदमी पार्टी (आप) की आलोचना की

देशबन्धु 23 Oct 2026 12:11 am

तमिलनाडु में बारिश का संकट गहराया, राहुल गांधी ने कांग्रेस को दिया 'राहत मिशन' का आदेश

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने तमिलनाडु, पुडुचेरी, कराईकल, केरल और लक्षद्वीप के लिए भारी से बहुत भारी बारिश का अलर्ट जारी किया है

देशबन्धु 22 Oct 2026 11:38 pm

उत्तरी असम के मरीजों को बड़ी सौगात, तेजपुर में बनेगा सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल

उत्तरी असम के मरीजों को बड़ी सौगात, तेजपुर में बनेगा सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल

समाचार नामा 22 Oct 2026 10:38 pm

मांड्या औद्योगिक परियोजनाओं में भूमि आवंटन में 10 महीने की देरी पर कुमारस्वामी नाराज, सीएम सिद्धारमैया को लिखा पत्र

मांड्या औद्योगिक परियोजनाओं में भूमि आवंटन में 10 महीने की देरी पर कुमारस्वामी नाराज, सीएम सिद्धारमैया को लिखा पत्र

समाचार नामा 22 Oct 2026 10:33 pm

नशा विरोधी कार्यकर्ताओं की मौत पर जवाब देने से बच रही पंजाब सरकार : अश्वनी शर्मा

नशा विरोधी कार्यकर्ताओं की मौत पर जवाब देने से बच रही पंजाब सरकार : अश्वनी शर्मा

समाचार नामा 22 Oct 2026 8:26 pm

सोनम वांगचुक ने केंद्र सरकार पर लगाया वादाखिलाफी का आरोप, पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग दोहराई

सोनम वांगचुक ने केंद्र सरकार पर लगाया वादाखिलाफी का आरोप, पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग दोहराई

समाचार नामा 22 Oct 2026 6:30 pm

मध्य प्रदेश: नगर निकाय की खरीद को लेकर एसीएस का वायरल वीडियो विवाद का कारण बना

मध्य प्रदेश: नगर निकाय की खरीद को लेकर एसीएस का वायरल वीडियो विवाद का कारण बना

समाचार नामा 22 Oct 2026 6:23 pm

केरल में नकदी फसलों के बढ़े दाम, किसान मोर्चा ने केंद्र सरकार को सराहा

केरल में नकदी फसलों के बढ़े दाम, किसान मोर्चा ने केंद्र सरकार को सराहा

समाचार नामा 22 Oct 2026 6:22 pm

संगठन कौशल, राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षा और दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ सार्वजनिक जीवन में विशिष्ट पहचान

कुछ व्यक्तित्व अपनी पहचान पद और प्रतिष्ठा से बनाते हैं, कुछ अपने विचारों से और कुछ अपने संकल्प को परिणाम में बदलने की कार्यशैली से। अमित शाह जी भारतीय राजनीति के ऐसे प्रमुख व्यक्तित्व हैं, जिनकी राजनीतिक यात्रा संगठन निर्माण, रणनीतिक दृष्टि, दृढ़ इच्छाशक्ति और महत्वपूर्ण राष्ट्रीय जिम्मेदारियों के निर्वहन के संदर्भ में विशेष महत्व रखती है। आज 22 अक्टूबर को उनके जन्मदिवस के अवसर पर उनके सार्वजनिक जीवन और कार्यशैली पर विचार करना एक ऐसे नेतृत्व को समझने का अवसर है, जिसने संगठनात्मक राजनीति से राष्ट्रीय नेतृत्व तक का लंबा सफर तय किया है। अमित शाह जी के व्यक्तित्व की एक विशिष्ट विशेषता यह है कि वे किसी लक्ष्य को निर्धारित करने के बाद उसे प्राप्त करने के लिए योजनाबद्ध ढंग से कार्य करने, संगठन को सक्रिय रखने और परिणामों की समीक्षा पर विशेष ध्यान देते हैं। उनके निकट रहकर कार्य करने का अवसर प्राप्त करने वाले व्यक्ति के रूप में मैंने उनकी कार्यपद्धति में लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता, समय के महत्व और दायित्वों के निर्वहन के प्रति गंभीरता को विशेष रूप से महत्वपूर्ण पाया है। उनका कार्य-दृष्टिकोण इस विचार को रेखांकित करता है कि केवल संकल्प व्यक्त करना पर्याप्त नहीं होता; संकल्प को सिद्धि तक पहुँचाने के लिए निरंतर परिश्रम, अनुशासन और प्रभावी क्रियान्वयन आवश्यक है। इसे भी पढ़ें: BJP विस्तार से Article 370 हटाने तक, गृह मंत्री Amit Shah का ऐसा रहा राजनीतिक सफर संगठन निर्माण से राष्ट्रीय नेतृत्व तक: 22 अक्टूबर 1964 को जन्मे अमित शाह जी ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़कर की। इसके बाद उन्होंने भारतीय जनता पार्टी में विभिन्न संगठनात्मक जिम्मेदारियाँ निभाईं और गुजरात की राजनीति में सक्रिय भूमिका के माध्यम से अपना राजनीतिक अनुभव विकसित किया। वर्ष 2013 में उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय महासचिव और उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया। वर्ष 2014 में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का दायित्व संभालने के बाद उनके नेतृत्व में संगठन विस्तार, बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं की सक्रियता और चुनावी प्रबंधन को विशेष महत्व मिला। उनकी राजनीतिक यात्रा इस बात का उदाहरण है कि किसी बड़े संगठन की सफलता के लिए स्पष्ट दिशा, समर्पित कार्यकर्ता, मजबूत संपर्क व्यवस्था और जिम्मेदारियों का प्रभावी निर्वहन कितना आवश्यक होता है। किसी भी संगठन की वास्तविक शक्ति केवल उसके शीर्ष नेतृत्व में नहीं, बल्कि उन हजारों कार्यकर्ताओं में भी होती है, जो स्थानीय स्तर पर जनता से जुड़कर संगठन के उद्देश्यों को आगे बढ़ाते हैं। अमित शाह जी की संगठनात्मक कार्यशैली में लक्ष्य निर्धारण, कार्यकर्ताओं की भूमिका, परिस्थितियों का आकलन और योजनाओं के क्रियान्वयन जैसे पहलुओं को महत्वपूर्ण स्थान मिला है। इसी कारण भारतीय राजनीतिक विमर्श में उन्हें अक्सर ‘राजनीति का चाणक्य’ कहा जाता है। यह उपाधि मुख्यतः उनकी चुनावी रणनीति, संगठनात्मक विस्तार और राजनीतिक परिस्थितियों के विश्लेषण की क्षमता के संदर्भ में प्रचलित हुई है। हालाँकि, किसी भी सार्वजनिक व्यक्तित्व का वास्तविक मूल्यांकन केवल लोकप्रिय उपाधियों से नहीं, बल्कि उसके कार्यों, निर्णयों और उनके परिणामों से किया जाना चाहिए। अमित शाह जी का सार्वजनिक जीवन भारतीय राजनीति में संगठन तथा रणनीति की भूमिका को समझने का एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है। नक्सलवाद के विरुद्ध अभियान: दृढ़ संकल्प और परिणामोन्मुख कार्यपद्धति: केंद्रीय गृह मंत्री के रूप में अमित शाह जी की भूमिका का एक महत्वपूर्ण अध्याय नक्सलवाद और वामपंथी उग्रवाद के विरुद्ध अभियान रहा है। दशकों तक नक्सली हिंसा ने देश के अनेक क्षेत्रों में नागरिकों, सुरक्षा बलों और विकास कार्यों के सामने गंभीर चुनौतियाँ खड़ी कीं। विशेष रूप से छत्तीसगढ़, झारखंड और मध्य भारत के कई क्षेत्रों में इस समस्या का प्रभाव लंबे समय तक बना रहा। अमित शाह जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में देश को नक्सलवाद से मुक्त कराने के लिए 31 मार्च 2026 की समय-सीमा निर्धारित करने और उस दिशा में व्यापक अभियान चलाने पर जोर दिया। केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय, सुरक्षा बलों की कार्रवाई, खुफिया तंत्र की मजबूती, नक्सली नेटवर्क पर प्रहार, आत्मसमर्पण की नीति तथा प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्यों को इस रणनीति में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया। गृह मंत्रालय ने जुलाई 2026 में देश को वामपंथी उग्रवाद से मुक्त होने की घोषणा की। यह घटनाक्रम भारत की आंतरिक सुरक्षा के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना गया। इस अभियान में सुरक्षा बलों के साहस, अधिकारियों के योगदान, राज्य सरकारों के सहयोग और कठिन परिस्थितियों में कर्तव्य निभाने वाले जवानों की भूमिका को विशेष सम्मान के साथ याद किया जाना चाहिए। मेरे विचार में इस अभियान की महत्वपूर्ण विशेषता लक्ष्य को स्पष्ट रूप से निर्धारित करना और उसे प्राप्त करने के लिए समन्वित प्रयास करना है। किसी गंभीर राष्ट्रीय समस्या का समाधान केवल घोषणाओं से संभव नहीं होता। उसके लिए मजबूत इच्छाशक्ति के साथ प्रभावी रणनीति, संसाधनों का समुचित उपयोग, प्रशासनिक समन्वय और निरंतर निगरानी आवश्यक होती है। इसके साथ ही स्थायी शांति के लिए प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, रोजगार और संचार सुविधाओं का विस्तार भी उतना ही महत्वपूर्ण है। स्थानीय समुदायों का विश्वास, आदिवासी नागरिकों के अधिकारों का सम्मान और विकास के अवसरों की उपलब्धता ही शांति को स्थायी आधार प्रदान कर सकती है। किसी भी राष्ट्रीय अभियान की व्यापक सफलता तब और अधिक सार्थक होती है, जब उसका सकारात्मक प्रभाव आम नागरिकों के जीवन में दिखाई देने लगे। राष्ट्रीय सुरक्षा और न्याय व्यवस्था में सुधार: केंद्रीय गृह मंत्री के रूप में अमित शाह जी के दायित्व केवल नक्सलवाद के विरुद्ध अभियान तक सीमित नहीं हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद से मुकाबला, सीमाओं की सुरक्षा, आंतरिक कानून-व्यवस्था के विषयों पर केंद्र-राज्य समन्वय और देश की आपराधिक न्याय व्यवस्था में सुधार जैसे महत्वपूर्ण विषय भी गृह मंत्रालय के कार्यक्षेत्र में आते हैं। भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम के माध्यम से आपराधिक न्याय व्यवस्था में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए। ये कानून 1 जुलाई 2024 से लागू हुए। इनका उद्देश्य न्यायिक प्रक्रियाओं को आधुनिक बनाना, तकनीक और फॉरेंसिक के उपयोग को बढ़ाना तथा जांच और अभियोजन व्यवस्था में बदलाव लाना है। ऐसे सुधारों की वास्तविक सफलता प्रभावी क्रियान्वयन, पुलिस और न्यायिक तंत्र के प्रशिक्षण, पर्याप्त संसाधनों, समयबद्ध न्याय और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा से निर्धारित होती है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रताओं के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। सहकारिता से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने की दिशा: अमित शाह जी की जिम्मेदारियों में सहकारिता मंत्रालय भी शामिल है। भारत में सहकारी संस्थाओं की भूमिका कृषि, दुग्ध उत्पादन, ग्रामीण ऋण, विपणन और स्थानीय आर्थिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण रही है। सहकारिता का मूल विचार सामूहिक प्रयास, साझा स्वामित्व और सदस्यों के हितों की रक्षा पर आधारित है। सहकारी संस्थाओं को आधुनिक तकनीक, पारदर्शी प्रबंधन, पेशेवर प्रशिक्षण और बाजार तक बेहतर पहुँच उपलब्ध कराकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है। इससे किसानों, छोटे उत्पादकों और ग्रामीण उद्यमियों के लिए नए अवसर विकसित होने की संभावना रहती है। इस क्षेत्र में संस्थाओं की वित्तीय स्थिति, लोकतांत्रिक संचालन, सदस्यों की भागीदारी और जवाबदेही पर ध्यान देना आवश्यक है। सहकारिता की सफलता तभी व्यापक होगी, जब उसका लाभ ग्रामीण परिवारों और स्थानीय समुदायों तक पहुँचे। सादगी, अध्ययनशीलता और कर्तव्यपरायणता: किसी व्यक्ति की पहचान केवल उसके पद से नहीं बनती। उसके व्यवहार, कार्य के प्रति दृष्टिकोण, अध्ययन की प्रवृत्ति, निर्णय लेने की क्षमता और जिम्मेदारियों के निर्वहन का तरीका भी उसके व्यक्तित्व को विशिष्ट बनाता है। अमित शाह जी के व्यक्तित्व में उनकी संगठनात्मक क्षमता, राजनीतिक रणनीति, अध्ययनशीलता और लक्ष्य के प्रति निरंतर सक्रियता को विशेष महत्व देते हैं। सार्वजनिक जीवन में अध्ययन और लेखन के प्रति रुचि किसी भी व्यक्ति को जटिल विषयों को समझने, तथ्यों का विश्लेषण करने और विभिन्न विकल्पों पर विचार करने में सहायता देती है। सादगी, सरलता, शुचिता, ईमानदारी और कर्तव्यपरायणता ऐसे मूल्य हैं, जिनका महत्व प्रत्येक सार्वजनिक सेवक के लिए है। इन मूल्यों की वास्तविक कसौटी सार्वजनिक आचरण, पारदर्शिता, जिम्मेदारी और कार्य के प्रति प्रतिबद्धता है। किसी भी पद पर आसीन व्यक्ति के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने दायित्वों को गंभीरता से निभाए और जनहित को अपने निर्णयों के केंद्र में रखे। अमित शाह जी की कार्यशैली से जुड़ा एक प्रमुख विचार यह है कि लक्ष्य निर्धारित करने के बाद उसके क्रियान्वयन पर निरंतर ध्यान दिया जाए। यह दृष्टिकोण केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। प्रशासन, शिक्षा, उद्योग और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में भी स्पष्ट लक्ष्य, अनुशासन, अध्ययन और निरंतर परिश्रम सफलता के महत्वपूर्ण आधार हैं। विकास, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्र निर्माण: भारत का विकास केवल आर्थिक प्रगति और आधुनिक बुनियादी ढाँचे तक सीमित नहीं है। देश की सांस्कृतिक विरासत, ऐतिहासिक स्मृतियाँ, परंपराएँ और सामाजिक विविधता भी उसकी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। आधुनिक विकास और सांस्कृतिक संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना भारत जैसे विशाल देश के लिए विशेष महत्व रखता है। राष्ट्रीय नेतृत्व के सामने रोजगार सृजन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य सेवाएँ, कृषि की चुनौतियाँ, पर्यावरण संरक्षण और तकनीकी आत्मनिर्भरता जैसे अनेक विषय हैं। इन क्षेत्रों में प्रगति के लिए केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग, प्रभावी नीतियाँ, पारदर्शी प्रशासन और नागरिकों की भागीदारी आवश्यक है। किसी भी नेतृत्व की कार्यक्षमता का व्यापक मूल्यांकन इसी आधार पर होना चाहिए कि उसके निर्णयों से आम नागरिकों के जीवन में कितना सकारात्मक परिवर्तन आया, संस्थाएँ कितनी मजबूत हुईं और विकास के अवसर समाज के विभिन्न वर्गों तक किस सीमा तक पहुँचे। संकल्प, कर्म और राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता: अमित शाह जी की राजनीतिक यात्रा संगठन निर्माण, रणनीति, राष्ट्रीय सुरक्षा और प्रशासनिक जिम्मेदारियों के अनेक पहलुओं को सामने लाती है। उनके समर्थकों के लिए उनकी विशेष पहचान दृढ़ संकल्प, संगठनात्मक कौशल और परिणामोन्मुख कार्यशैली में है। वहीं, लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी नेता के कार्यों और नीतियों का निष्पक्ष मूल्यांकन भी आवश्यक है, ताकि उपलब्धियों के साथ चुनौतियों और भविष्य की जरूरतों को समग्रता में समझा जा सके। मेरे विचार में सार्वजनिक जीवन की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी यह है कि व्यक्ति अपने दायित्वों को कितनी गंभीरता से निभाता है और उसके कार्यों से राष्ट्र तथा समाज को कितना लाभ मिलता है। नेतृत्व का महत्व केवल लक्ष्य निर्धारित करने में नहीं, बल्कि उन लक्ष्यों को जनजीवन में सकारात्मक परिवर्तन के रूप में साकार करने के प्रयासों में है। अमित शाह जी के जन्मदिवस पर उनके सार्वजनिक जीवन की चर्चा करते हुए यही कामना है कि देश की सुरक्षा, विकास, सामाजिक सद्भाव और नागरिकों के कल्याण के लिए किए जाने वाले प्रयास निरंतर आगे बढ़ें। भारत का भविष्य मजबूत संस्थाओं, जागरूक नागरिकों, जवाबदेह नेतृत्व और सामूहिक राष्ट्रीय प्रयासों से निर्मित होगा। संकल्प तभी सार्थक होता है, जब वह कर्म में दिखाई दे; और कर्म तभी स्थायी महत्व प्राप्त करता है, जब उससे राष्ट्र और समाज के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आए। - डॉ. राकेश मिश्र पूर्व कार्यकारी सचिव, अमित शाह

प्रभासाक्षी 22 Oct 2026 5:40 pm

Maldives President Mohamed Muizzu ने खेला डबल गेम, India से 3000 करोड़ की मदद लेने के बाद Pakistan जाकर कर लिया Defence Agreement

एक ओर मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू भारत से 3,000 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता का लाभ ले रहे हैं, तो दूसरी ओर पाकिस्तान पहुंचकर रक्षा और समुद्री सहयोग सहित 20 समझौतों पर हस्ताक्षर कर रहे हैं। जिस भारत ने आर्थिक संकट के समय मालदीव को सहारा दिया, उसकी उदारता का लाभ उठाकर इस द्वीपीय देश के राष्ट्रपति अब पाकिस्तान के साथ सामरिक रिश्ते मजबूत करने में जुटे हैं। यह महज कूटनीतिक सक्रियता नहीं, बल्कि भारत के लिए एक गंभीर रणनीतिक सवाल है कि क्या उसका पड़ोसी उसकी आर्थिक सहायता को अपना अधिकार और उसके सामरिक हितों की अनदेखी को अपनी विदेश नीति की स्वतंत्रता समझने लगा है? देखा जाये तो मुइज्जू की पाकिस्तान यात्रा ने भारत की इसी चिंता को हवा दी है। एक दशक से अधिक समय बाद मालदीव का कोई राष्ट्रपति पाकिस्तान गया है। तीन दिवसीय इस यात्रा के दौरान पाकिस्तान के सेना प्रमुख और चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के साथ उनकी मुलाकात और रक्षा सहयोग बढ़ाने पर सहमति विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। दोनों देशों ने रक्षा, समुद्री सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अन्य क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए 20 समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए हैं। सवाल यह है कि इन समझौतों का वास्तविक स्वरूप क्या होगा, इनके क्रियान्वयन की दिशा क्या होगी और हिंद महासागर में इनका इस्तेमाल किस तरह किया जाएगा? इन सवालों के जवाब सामने आना अभी बाकी है, लेकिन भारत के लिए सतर्क होने की वजहें स्पष्ट हैं। इसे भी पढ़ें: Prabhasakshi NewsRoom: France से लेकर India तक हुए प्रदर्शनों के पीछे काम कर रहा था 13 देशों के 101 संगठनों का Network, Fox News ने किया बड़ा खुलासा! देखा जाये तो मालदीव कोई साधारण भौगोलिक इकाई नहीं है। हिंद महासागर में उसकी स्थिति उसे समुद्री व्यापार मार्गों, नौवहन की सुरक्षा और क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती है। भारत की समुद्री सुरक्षा का सीधा संबंध इस क्षेत्र में स्थिरता से है। मालदीव के साथ भारत के संबंध इसलिए भी अहम हैं, क्योंकि दोनों देशों के बीच समुद्री निगरानी, रक्षा प्रशिक्षण, आपदा प्रबंधन और सुरक्षा सहयोग का लंबा इतिहास रहा है। ऐसे में यदि पाकिस्तान इस रिश्ते में रक्षा और समुद्री सहयोग के माध्यम से अपनी जगह बनाने की कोशिश करता है, तो भारत को केवल द्विपक्षीय समझौतों की सूची नहीं, बल्कि उनके दीर्घकालीन सामरिक परिणामों पर भी नजर रखनी होगी। दूसरी ओर, पाकिस्तान की अपनी सीमाएं हैं। आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों से जूझ रहा पाकिस्तान मालदीव को भारत जैसी व्यापक आर्थिक सहायता देने की स्थिति में नहीं दिखता। फिर भी इस्लामाबाद के लिए माले के साथ बढ़ती नजदीकी का महत्व आर्थिक लाभ से कहीं अधिक कूटनीतिक और रणनीतिक हो सकता है। भारत के निकटवर्ती समुद्री क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने, दक्षिण एशिया में भारत की भूमिका को चुनौती देने और क्षेत्रीय मंचों पर अपने लिए समर्थन जुटाने की उसकी कोशिशों को इसी संदर्भ में देखना चाहिए। साथ ही मुइज्जू का पाकिस्तान में दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के शिखर सम्मेलन को जल्द बुलाने का आह्वान भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। उन्होंने कहा कि मालदीव सदस्य देशों से परामर्श कर सार्क की गतिविधियां दोबारा शुरू कराने के लिए तैयार है। सुनने में यह क्षेत्रीय सहयोग की सकारात्मक पहल लग सकती है, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वर्ष 2016 में इस्लामाबाद में प्रस्तावित सार्क शिखर सम्मेलन जम्मू-कश्मीर के उरी में हुए आतंकी हमले के बाद रद्द हो गया था। भारत का स्पष्ट रुख रहा है कि आतंकवाद और क्षेत्रीय सहयोग साथ-साथ नहीं चल सकते। पाकिस्तान को पहले ऐसा वातावरण बनाना होगा जिसमें आतंकवाद से मुक्त होकर सार्थक सहयोग संभव हो। ऐसे में मुइज्जू का पाकिस्तान की धरती से सार्क सम्मेलन बहाल करने की पैरवी करना भारत के लिए असहज करने वाला है। इससे पहले भी वह भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत आगे बढ़ाने के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभाने की पेशकश कर चुके हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या दक्षिण एशिया की समस्याओं का समाधान आतंकवाद पर पाकिस्तान की जवाबदेही तय किए बिना हो सकता है? क्या क्षेत्रीय सहयोग के नाम पर उस बुनियादी समस्या को किनारे रखा जा सकता है, जिसने सार्क को वर्षों से निष्क्रिय बना रखा है? भारत के लिए यह स्वीकार करना कठिन होगा कि आतंकवाद पर ठोस कार्रवाई के बिना पाकिस्तान को क्षेत्रीय कूटनीति के केंद्र में वापस लाने की कोशिश की जाए। हैरानी की बात यह भी है कि इसी दौरान भारत ने मालदीव की आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए 30 अरब रुपये की मुद्रा अदला-बदली सुविधा को आगे बढ़ाने की मंजूरी दी है। अप्रैल में दी गई इस राशि की सुविधा के तहत भारतीय रुपये तक पहुंच मालदीव को तरलता संबंधी दबाव से निपटने में मदद करती है। भारत 2012 से अब तक मालदीव को 1.1 अरब डॉलर से अधिक की मुद्रा अदला-बदली सहायता भी दे चुका है। इसके अलावा भारतीय निवेश से मालदीव के सरकारी ऋण-पत्रों को समर्थन मिला है। मालदीव की विदेश मंत्री ने इस फैसले के लिए भारत के प्रति आभार जताया और इसे दोनों देशों की पुरानी मित्रता का प्रमाण बताया है। देखा जाये तो भारत की सहायता को कमजोरी समझना मुइज्जू की सबसे बड़ी भूल होगी। भारत का सहयोग किसी राजनीतिक दल या राष्ट्रपति पर एहसान नहीं, बल्कि पड़ोस में स्थिरता, समृद्धि और साझा सुरक्षा सुनिश्चित करने की दीर्घकालीन नीति का हिस्सा है। लेकिन मित्रता का अर्थ सामरिक हितों के प्रति उदासीनता भी नहीं होता। आर्थिक सहायता और रक्षा सहयोग दो अलग-अलग विषय हैं, फिर भी जब कोई देश एक ओर भारत से वित्तीय सहारा ले और दूसरी ओर पाकिस्तान के साथ संवेदनशील क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाए, तो नई दिल्ली को अपने हितों की रक्षा के लिए स्पष्ट कूटनीतिक संदेश देना चाहिए। समय की मांग यही है कि भारत को मालदीव के साथ संवाद बनाए रखते हुए इन 20 समझौतों के वास्तविक क्रियान्वयन, रक्षा प्रशिक्षण, समुद्री सूचनाओं के आदान-प्रदान और संभावित सुरक्षा प्रभावों पर करीबी नजर रखनी चाहिए। साथ ही मालदीव को यह समझाना होगा कि हिंद महासागर में स्थिरता किसी तीसरे देश के विरुद्ध खेमेबंदी से नहीं, बल्कि पारदर्शी और भरोसेमंद सहयोग से मजबूत होती है। मुइज्जू को तय करना होगा कि उनकी विदेश नीति का आधार दीर्घकालीन राष्ट्रीय हित हैं या भारत-विरोधी संतुलन साधने की राजनीतिक कवायद। मालदीव की भौगोलिक स्थिति उसे रणनीतिक महत्व देती है, लेकिन यही स्थिति उसे बड़ी शक्तियों की प्रतिस्पर्धा का मैदान भी बना सकती है। पाकिस्तान के साथ समझौते करना मालदीव का संप्रभु निर्णय है; मगर उन समझौतों के वास्तविक परिणामों को लेकर भारत की चिंता भी उतनी ही जायज है। बहरहाल, हिंद महासागर में भारत अपनी सुरक्षा को लेकर कोई जोखिम नहीं उठा सकता। मित्रता का हाथ बढ़ाना उसकी ताकत है, लेकिन उस ताकत का अर्थ यह नहीं कि उसके सामरिक हितों की अनदेखी की जाए और वह चुपचाप तमाशा देखता रहे। मुइज्जू की पाकिस्तान यात्रा ने नई दिल्ली के सामने एक स्पष्ट चुनौती रख दी है। यह चुनौती है पड़ोसियों की आर्थिक मदद जारी रखते हुए यह सुनिश्चित करना कि भारत की उदारता उसके अपने सामरिक हितों के विरुद्ध इस्तेमाल न होने पाए। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 22 Oct 2026 4:50 pm

मक्का-मदीना में फंसे भारतीय उमरा यात्रियों की सुरक्षित वापसी की मांग, ओवैसी ने केंद्र सरकार से लगाई गुहार

मक्का-मदीना में फंसे भारतीय उमरा यात्रियों की सुरक्षित वापसी की मांग, ओवैसी ने केंद्र सरकार से लगाई गुहार

समाचार नामा 22 Oct 2026 4:28 pm

शिक्षा क्षेत्र में सुधार के लिए मेघालय सरकार प्रतिबद्ध, 2,000 से अधिक स्कूलों को किया गया अपग्रेड

शिक्षा क्षेत्र में सुधार के लिए मेघालय सरकार प्रतिबद्ध, 2,000 से अधिक स्कूलों को किया गया अपग्रेड

समाचार नामा 22 Oct 2026 4:27 pm

ई-मुद्रा मामले : सरकार ने जांच के दिए निर्देश

मुंबई, डिजिटल सिग्नेचर और आम जनता तक पहुंच के लिए वेबसाइट्स को सिक्योरिटी सर्टिफिकेट जारी करने वाली ई-मुद्रा को लेकर सरकार की ओर से सुरक्षा जांच के निर्देश के बाद, कंपनी के शेयरों में भारी गिरावट दर्ज की गई है।

देशबन्धु 22 Oct 2026 3:07 pm

मोदी मॉडल पर चुनाव लड़ने चले थे ट्रंप, 9 सर्वे में जनता ने किया रिजेक्ट, अब 2 साल कठपुतली बनकर रहेंगे!

कोई भी हारने वाले को पसंद नहीं करता। कोई भी धमकाया जाना पसंद नहीं करता। फिर भी हम खड़े हैं, हम धरती पर सबसे बड़ी महाशक्ति हैं और हर कोई हमारे हिस्से का खा रहा है। यह ठीक नहीं है। अगर मैं अपना धंधा ऐसे चलाता तो खुद को बाहर कर देता। अमेरिका को फिर से जीतना शुरु करना होगा। आओ हम सब मिलकर अमेरिका को मजबूत बनाएं और उसे फिर से महान बनाएं। इन शब्दों के साथ अकड़ते और हवा में मुट्टियां लहराते हुए डोनाल्ड जॉन ट्रंप ने जून 2015 में दुनिया की सबसे ताकतवर कुर्सी को हासिल करने के लिए अपने शुरु किए चुनाव प्रचार को जीत के साथ समाप्त किया था। कट टू 2024 हम अपने देश को ठीक करने में मदद करने जा रहे हैं। हमारे पास एक ऐसा देश है जिसे मदद की ज़रूरत है और उसे मदद की सख्त ज़रूरत है। हम अपनी सीमाएं फिक्स करने जा रहे हैं। हम सब कुछ फिक्स करने जा रहे हैं। इन लाइनों के साथ अपनी चुनावी जीत के बाद ट्रंप ने ये दर्शाया था कि आने वाले दिनों में कुर्सी संभालने के बाद उनके तेवर कैसे रहने वाले हैं। जनवरी 2024 में दोबारा से शपथ लेने के तुरंत बाद इन्होंने कहा कि अवैध अप्रवासियों को बर्थ राइट सिटीजनशिप नहीं मिलेगी। फिर कहा ड्राइवर गाड़ी निकालो हमें डब्लूएचओ से बाहर जाना है। फिर कहा क्लाइमेट चेंज बकवास है। अमेरिका पेरिस समझौते जैसी फालतू चीज में शामिल नहीं होगा। दुनिया मतलब राष्ट्रपति बने थे अमेरिका के लेकिन दुनिया को ये दिखा रहे थे कि नहीं मैं पूरी दुनिया का राष्ट्रपति बन गया हूं। जिसे चाह रहे थे उसे धमका रहे जिसे जैसे चाह रहे थे उसके साथ वैसा बर्ताव कर रहे थे। किसी की बेइज्जती वाइट हाउस में बिठाकर कर रहे थे। तो किसी की बेइज्जती अपने बयान में बयानों में कर रहे थे। न क्या आप यकीन करेंगे कि वही ट्रंप जो दुनिया को धमका रहे थे अब से पहले तक वो ट्रंप आज गिड़गिड़ा रहे हैं। अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मुश्किलें बढ़ती दिखाई दे रही है। एक तरफ देश में महंगाई और बढ़ती कीमतों से आम जनता परेशान है तो दूसरी तरफ ट्रंप की लोकप्रियता में भी लगातार गिरावट देखने को मिल रही है और अब इन सबका असर नवंबर में होने वाले मध्यावधि यानी कि मिड टर्म चुनाव पर दिखाई दे सकता है। अमेरिका में 3 नवंबर को मिड टर्म चुनाव होने हैं और इन चुनाव से यह तय होगा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी अमेरिकी संसद यानी कि कांग्रेस के दोनों सदनों में आप अपना बहुमत बचा पाती है या फिर नहीं। लेकिन चुनाव से ठीक पहले सामने आए कई सर्वेक्षणों यानी कि सर्वे में रिपब्लिकन पार्टी की चिंता बढ़ गई है। इन सर्वेक्षणों में डेमोक्रेटिक पार्टी को बढ़त मिलती दिखाई दे रही है और सबसे बड़ी बात यह है कि अमेरिकी मतदाता अब अर्थव्यवस्था, महंगाई और सरकार की नीतियों को लेकर सवाल उठा रहे हैं। कई लोगों का मानना है ट्रंप की नीतियों की वजह से उनकी रोजमर्रा की जिंदगी और ज्यादा महंगी हो गई है यानी महंगाई बढ़ी है। ऐसे में सवाल है क्या अमेरिका की जनता ट्रंप सरकार के कामकाज से नाराज है? क्या यह नाराजगी चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी को भारी पड़ सकती है? और अगर डेमोक्रेटिक पार्टी जीत जाती है तो ट्रंप के लिए आगे की राह कितनी मुश्किल हो जाएगी? आइए इस पूरी राजनीतिक तस्वीर का एमआरआई स्कैन करते हैं। इसे भी पढ़ें: Mukesh Ambani के कारोबारी सामर्थ्य का अचानक मुरीद क्यों हुआ अमेरिका? Marco Rubio ने Jamnagar Refinery में क्या क्या देखा? दुनिया को धमकाने वाले ट्रंप गिड़गिड़ाने क्यों लगे आपने देखा होगा किस तरीके से अमेरिका ने रशिया से डीजल खरीदने की डील की वो कोई आम डील नहीं थी। वो डीजल जरूर आम हो सकता है। 3 लाख टन डीजल जरूर आम सी बात हो सकती है। जरूर किसी और देश से ज्यादा पैसे में अमेरिका खरीद सकता था उस डीजल को लेकिन रशिया के सामने ही क्यों इसके लिए गिड़गिड़ाया? क्यों यूक्रेन को अकेला छोड़ दिया? जिस यूक्रेन को बिलियंस ऑफ डॉलर दिए कि रूस के साथ लड़ाई करो। मतलब दुनिया में बहुत सारी चीजें ऐसे जापान का साथ छोड़ दिया। साउथ कोरिया को मना कर दिया। यूक्रेन का नेट बंद करवा दिया। आइलॉन मस्क के यूरोप का नेट की स्पीड घटवा दी। डेनमार्क को धमका दिया कि हमें ग्रीनलैंड चाहिए ही चाहिए। वो ट्रंप आज दुनिया के सामने गिड़गिड़ा रहे हैं। दुनिया में भी पहले रूस के सामने गिड़गिड़ाए और अब भारत में उनका संदेश लेकर मार्को रूबियो फिलहाल भारत में मौजूद है। मार्को रूबियो जामनगर रिफाइनरी में गए। जामनगर की रिफाइनरी वो रिफाइनरी है जो रोजाना 14 लाख बैरल तेल रिफाइन करती है । वेनेजुएला के तेल पर कब्जा तो अमेरिका ने कर लिया लेकिन उसे रिफाइन नहीं कर सकता। उसके लिए भारत की जरूरत होगी। आज अमेरिका को डीजल की जरूरत है। पेट्रोल की जरूरत है और इसी वजह से जो अप्रूवल रेटिंग है ट्रंप की वो लगातार घटती जा रही है क्योंकि अमेरिका में महंगाई लगातार बढ़ रही है। अमेरिका में रहना मुश्किल हो गया है। अमेरिका में रहना महंगा हो गया है। खाना महंगा हो गया है। ऊर्जा महंगी हो गई है। तो अब विटर्म में जाने वाले हैं ट्रंप रिपब्लिकन पार्टी डेमोक्रेटिक पार्टी है। दोनों पार्टियां चुनाव में जाने वाली हैं। 3 नवंबर को यह चुनाव है। ट्रंप चाहते हैं कि 3 नवंबर से पहले लगभग 10-12 दिन जो हैं उससे पहले पहले वो सब कुछ ठीक कर लें। जो महंगाई आउट ऑफ कंट्रोल जा चुकी है उसे वो कंट्रोल कर रहे हैं। कई रिपोर्ट्स दावा करती है कि अमेरिका में रहने वाले चार लोगों में से तीन लोग ट्रंप से नफरत करते हैं। ट्रंप की नीतियों का समर्थन नहीं करते। मतलब 25% लेकिन कुछ रिपोर्ट्स फिर भी थोड़ा सा दावा करती हैं कि नहीं थोड़ी सी इज्जत बची हुई है और अभी लगभग 31% तक ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग है। इसे भी पढ़ें: रूस पर चौंकाया...भारत पहुंचते ही अमेरिका के विदेश मंत्री ने किया बड़ा धमाका, सब हैरान! 34% अमेरिकी ट्रंप के कामकाज से संतुष्ट आपको बता दें कि अप्रूवल रेटिंग जो होती है वो डोनाल्ड ट्रंप की गिरती जा रही है। अब अप्रूवल रेटिंग का मतलब यह होता है कितने लोग राष्ट्रपति के कामकाज से संतुष्ट हैं और कितने लोग उनसे असहमत हैं। एनबीसी न्यूज़ के एक रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ 34% अमेरिकी ट्रंप के कामकाज से संतुष्ट हैं। जबकि 66% लोगों ने उनके प्रदर्शन पर असहमति जताई है। इस सर्वेक्षण में 51% लोगों ने तो ट्रंप के कामकाज से बहुत ज्यादा असहमति जताई है और यह उनके दूसरे कार्यकाल के दौरान इस सर्वे में दर्ज किया जा किया गया सबसे ऊंचा आंकड़ा बताया जा रहा है। वहीं वाशिंगटन पोस्ट एबीसी न्यूज़ और जो एप्सोस में सर्वे हुए हैं उसमें ट्रंप के अप्रूवल रेटिंग सिर्फ 33% सामने आई है। जबकि 66% लोगों ने उनके कामकाज को लेकर असहमति जताई है। यह आंकड़ा भी इस सर्वेक्षण के इतिहास में ट्रंप का सबसे कमजोर प्रदर्शन बताया गया। यानी कि सर्वे के आंकड़े साफ संकेत दे रहे हैं कि ट्रंप को लेकर अमेरिकी मतदाताओं के बीच असंतोष बढ़ा है। महंगाई बनी ट्रंप की सरकार की सबसे पर बड़ी परेशानी ये लोगों का कहना है क्योंकि ये सबसे बड़ा मुद्दा है किसी भी देश के लिए सरकार का चुनावी भविष्य तय करने के लिए ये बड़ी भूमिका भी निभाता है और यह मुद्दा है अर्थव्यवस्था का। इसे भी पढ़ें: US Presidential Election 2028 | राष्ट्रपति चुनाव के लिए जेडी वेंस को समर्थन देने पर डोनाल्ड ट्रंप का टालमटोल, कहा- 'अभी बहुत जल्दी है' क्या चुनाव जीत पाएंगे ट्रंप? हालांकि इसका मकसद ट्रंप के समर्थकों की भागीदारी बढ़ाना था। लेकिन इस कदम से डेमोक्रेट और निर्दलीय मतदाता भी उनकी मतलब जैसे उन्होंने कहा कि हर सीट पर आप ट्रंप को ही मानकर चलिए कि ट्रंप चुनाव लड़ रहे हैं। चाह तो थे चाहते थे कि रिपब्लिकन की जो वोट है वो बढ़े लेकिन यहां पर मामला उल्टा पड़ गया। उल्टा यहां पर अगर डेमोक्रेट्स की बात करें तो उनका कहना है कि ट्रंप ने खर्च कम करने और युद्ध खत्म करने के अपने चुनावी वादों को पूरा नहीं किया। उन्होंने वादा किया कि अगर मतदाता उन्हें किसी भी सदन में बहुमत देते हैं तो वो अमेरिकियों के जीवन यापन का खर्च कम करने के लिए काम करेंगे और कथित भ्रष्टाचार के लिए प्रशासन को जवाबदेह ठहराएंगे। यहां पर अगर आपको बात करें तो ऊर्जा जो है वो 34% तक महंगी हो चुकी है। खाना पीना ढाई से तीन गुना तक ढाई से 3% तक महंगा हो चुका है। यहां पर ये अमेरिका के हाल हैं। अमेरिका की अगर बात करें तो ट्रिपल ए के अनुसार पेट्रोल की राष्ट्रीय औसत कीमत $4.28 है जो 1 साल पहले की तुलना में $1.2 ज्यादा है। मतलब $5 प्रति गैलन तक यहां पर कीमत बढ़ चुकी है। डीजल की कीमतें लगभग 3 गैलन $3 प्रति गैलन तक यहां पर बढ़ चुकी हैं। और अगर बाकी बात करें तो गृह सुरक्षा विभाग के आंकड़ों से पता चलता है कि जो बाइडन के प्रशासन की तुलना में दक्षिणी पश्चिमी सीमा में पकड़े गए जो प्रवासी आते हैं उनमें कमी आई है। 95% तक उनका आना कम हुआ है। लेकिन बाकी जो चीजें हैं वो यहां पर महंगी हुई हैं। अमेरिका में रहना महंगा हो चुका है। मतलब एक रिपोर्ट यह दावा करती है कि अगर किसी परिवार का खर्च महीने का अमेरिका में रहने का अब तक $3000 था तो वो अब यहां मतलब अगर मौजूदा वक्त की बात करें तो वो $311 तक पहुंच चुका है। मतलब $11 की बढ़ोतरी पिछले कुछ महीनों में हुई है। जिस तरीके से ईरान ने स्टेट ऑफ़ होर्मुज चौक की हुई है और बाबल मंदिर पर कब्जा किसका है? हूतियों का कब्जा है। हूतियों को हथियार कौन दे रहा है? चीन और रूस दे रहे हैं। ईरान को हथियार कौन दे रहा है? चीन और रूस दे रहे हैं। ईरान का तेल कौन खरीद रहा है? चीन खरीद रहा है। मतलब एक तरीके से अमेरिका को पूरी तरीके से रशिया और चाइना ने काउंटर कर लिया है। घेर कर मार दिया है। अब यहां जीत तो बहुत दूर की बात है। हार भी बहुत बुरी ना ट्रंप की हो जाए। ये कहा जा रहा है अमेरिका में। जो डेमोक्रेट्स हैं उनकी जो रेटिंग है या फिर जो उनका आंकड़ा है जिस तरीके से भी अमेरिका में ये गिनती होती होगी वो 92% 52% के पार पहुंच चुका है। वहीं ट्रंप की पार्टी की बात करें तो 42 फ़ीसदी पर अटकी हुई है। और अगर ये अप्रूवल रेटिंग नहीं बढ़ी तो फिर रिपब्लिकनंस चुनाव हार जाएंगे और राष्ट्रपति तो रहेंगे। ट्रंप 4 साल तक आने वाले 2 साल भी राष्ट्रपति तो रहेंगे। लेकिन काम क्या कुछ कर पाएंगे या नहीं कर पाएंगे वह वक्त बताएगा। रिपब्लिकन के सामने क्या चुनौती रिपब्लिकन पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह मतदाताओं को कैसे भरोसा दिलाएं कि उनकी नीतियां अर्थव्यवस्था को बेहतर बना सकती है। डेमोक्रेटिक पार्टी को सर्वेक्षणों में बढ़त मिलती दिखाई दी है। देखिए चुनावी मुकाबले की बात करें तो सर्वे में डेमोक्रेटिक पार्टी रिपब्लिकन पार्टी से आगे दिख रही है। एबीसी न्यूज़, वाशिंगटन पोस्ट और कई ऐसे अमेरिकी जो चैनल्स हैं उसके सर्वे में प्रतिनिधि सभा के चुनाव के लिए डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों को 52% और रिपब्लिकन उम्मीदवारों को 44% समर्थन मिला। यानी डेमोक्रेट्स को 8% अंकों की बढ़त दिखाई दी। वहीं रटर्स और अह इप्सोस के सर्वेक्षण में डेमोक्रेटिक पार्टी को बढ़त मिली। इस सर्वेक्षण में डेमोक्रेट्स को 47 और रिपब्लिकन पार्टी को 35% समर्थन मिला। यानी कि यहां भी अंतर 12% अंकों का है। इन आंकड़ों से पता चलता है चुनाव से पहले डेमोक्रेटिक पार्टी का प्रदर्शन बेहतर दिखाई दे रहा है। हालांकि यह याद रखना जरूरी है कि राष्ट्रीय सर्वेक्षणों के आधार पर सीधे चुनाव के नतीजों का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है।

प्रभासाक्षी 22 Oct 2026 2:16 pm

Mecca Mosque में हुआ 'अशोभनीय कृत्य' क्या था? Saudi Arabia ने दो बांग्लादेशियों को फाँसी पर क्यों लटकाया? Muslim World क्यों हैरान रह गया?

इस्लाम के सबसे पवित्र शहर मक्का की एक मस्जिद में अशोभनीय कृत्य के मामले में सऊदी अरब ने दो बांग्लादेशी नागरिकों को मृत्युदंड दे दिया है। 14 अक्टूबर को हुई इन फाँसियों ने न केवल धार्मिक स्थलों की मर्यादा और सऊदी अरब के कठोर दंड कानूनों पर बहस छेड़ दी है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर न्यायिक पारदर्शिता और विदेशों में काम करने वाले प्रवासी नागरिकों के अधिकारों को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि बांग्लादेश सरकार के अनुसार, उसे इन मृत्युदंडों के क्रियान्वयन से पहले आधिकारिक सूचना नहीं दी गई थी। ढाका अब रियाद से पूरे मामले का ब्योरा माँग रहा है। पवित्र स्थल में कथित कृत्य, फिर मृत्युदंड सऊदी अरब के गृह मंत्रालय के अनुसार, मृत्युदंड पाने वाले बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान नज़रुल इस्लाम अब्दुल बशीर और सिटी अख्तर के रूप में की गई है। अधिकारियों का कहना है कि दोनों को मक्का की एक मस्जिद में अनैतिक कृत्य करने के मामले में गिरफ्तार किया गया था। जाँच के बाद मामला अदालत में पहुँचा, जहाँ आरोप सिद्ध होने पर दोनों को मृत्युदंड सुनाया गया। संबंधित न्यायिक प्राधिकरण से फैसले की पुष्टि और शाही आदेश के बाद 14 अक्टूबर को सजा लागू कर दी गई। इसे भी पढ़ें: Saudi Aramco Attack | सऊदी अरामको पर दहलाने वाला ड्रोन हमला! दो की मौत और घायल लोगों में एक भारतीय भी शामिल, अमेरिका ने जारी किया देश छोड़ने का फरमान सऊदी अधिकारियों ने अपने बयान में धार्मिक स्थल की पवित्रता, अपराध की गंभीरता और समय-स्थान की मर्यादा के उल्लंघन को सजा का आधार बताया। हालाँकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि कथित कृत्य वास्तव में क्या था, घटना किस मस्जिद में हुई थी और आरोपियों के खिलाफ कौन-कौन से साक्ष्य प्रस्तुत किए गए थे। हालांकि सोशल मीडिया पर दावे किये जा रहे हैं कि दोनों को केवल चुंबन लेने या किसी खास प्रकार की शारीरिक निकटता के कारण मृत्युदंड दिया गया। हालांकि ये सोशल मीडिया के दावे हैं इसके बारे में कोई प्रमाण नहीं हैं। बांग्लादेश सरकार ने उठाए सवाल देखा जाये तो इस मामले का सबसे गंभीर पहलू केवल मृत्युदंड नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया को लेकर पैदा हुआ विवाद है। बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय और जेद्दा स्थित उसके वाणिज्य दूतावास ने कहा है कि उन्हें फाँसी से पहले इसकी सूचना नहीं मिली थी। ढाका ने सऊदी अधिकारियों को राजनयिक पत्र भेजकर आरोपों का पूरा विवरण, अदालत के फैसलों की प्रतियाँ और मृत्युदंड की प्रक्रिया से संबंधित जानकारी माँगी है। बांग्लादेश सरकार ने यह भी जानना चाहा है कि उसके नागरिकों को मुकदमे के दौरान किस प्रकार की कानूनी सहायता उपलब्ध कराई गई और राजनयिक मिशन को समय रहते जानकारी क्यों नहीं दी गई? देखा जाये तो किसी विदेशी नागरिक को मृत्युदंड देने से पहले उसके देश को हर परिस्थिति में सूचना देना और हिरासत में लिए गए व्यक्ति के कांसुलर अधिकारों की रक्षा करना सभी सरकारों का दायित्व होता है। इस्लामी कानून में ताज़ीर का क्या अर्थ है? उधर, सऊदी अरब ने इस मामले में ‘ताज़ीर’ के अंतर्गत मृत्युदंड दिए जाने की बात कही है। इस्लामी न्यायशास्त्र में ताज़ीर उन अपराधों के लिए विवेकाधीन दंड की श्रेणी है, जिनकी सजा निर्धारित करने में न्यायाधीश को लागू कानूनी व्यवस्था के अंतर्गत भूमिका मिलती है। यह ऐसा प्रावधान नहीं है जिसके अंतर्गत प्रत्येक अनुचित व्यवहार के लिए स्वतः मृत्युदंड निर्धारित हो जाता हो। यही इस मामले का सबसे संवेदनशील प्रश्न है: यदि अपराध की प्रकृति और उसके प्रमाण सार्वजनिक नहीं हैं, तो आम लोग यह कैसे समझें कि इतनी कठोर सजा किन परिस्थितियों में उचित मानी गई? देखा जाये तो न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता केवल सजा देने से नहीं, बल्कि स्पष्ट आरोप, विश्वसनीय साक्ष्य, निष्पक्ष सुनवाई और जवाबदेह प्रक्रिया से भी स्थापित होती है। यह भी ध्यान रखना होगा कि इस्लामी कानून की व्याख्या और उसका क्रियान्वयन हर मुस्लिम देश में एक समान नहीं है। सऊदी अरब की कानूनी व्यवस्था को सीधे बांग्लादेश या दुनिया के सभी मुसलमानों की धार्मिक समझ का प्रतिनिधि मानना उचित नहीं होगा। धार्मिक स्तर पर क्या होंगे प्रभाव? उल्लेखनीय है कि मक्का और मदीना दुनिया भर के मुसलमानों के लिए अत्यंत पवित्र स्थान हैं। मक्का में मस्जिद अल-हरम और काबा का विशेष धार्मिक महत्त्व है। ऐसे स्थान पर मर्यादा के उल्लंघन का आरोप स्वाभाविक रूप से धार्मिक भावनाओं को प्रभावित करता है। सऊदी सरकार की दृष्टि में कठोर कार्रवाई पवित्र स्थलों की प्रतिष्ठा और अनुशासन बनाए रखने का संदेश हो सकती है। लेकिन इस घटना का दूसरा पहलू भी है। धार्मिक आस्था और न्यायिक प्रक्रिया को एक-दूसरे का विरोधी नहीं होना चाहिए। यदि किसी अपराध के लिए कठोरतम दंड दिया जाता है, तो उसके आधार और प्रक्रिया की स्पष्टता भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण हो जाती है। धार्मिक स्थलों के सम्मान की रक्षा के नाम पर न्यायिक पारदर्शिता के प्रश्नों को अनदेखा नहीं किया जा सकता। बांग्लादेश में सामाजिक और राजनीतिक असर दूसरी ओर, बांग्लादेश में इस मामले का प्रभाव तीन स्तरों पर पड़ सकता है। एक तो विदेशों में काम करने वाले नागरिकों की सुरक्षा और उनके कानूनी अधिकारों को लेकर सरकार पर दबाव बढ़ सकता है। दूसरा, सऊदी अरब में काम कर रहे लाखों बांग्लादेशी श्रमिकों के परिवारों के बीच चिंता पैदा हो सकती है। साथ ही धार्मिक आस्था और मृत्युदंड की कठोरता को लेकर सार्वजनिक बहस तेज हो सकती है। रिपोर्टों के अनुसार, सऊदी अरब में लगभग 35 लाख बांग्लादेशी कामगार रहते हैं और वहाँ से भेजी जाने वाली रकम बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था तथा अनेक परिवारों की आजीविका के लिए महत्त्वपूर्ण है। ऐसे में यह मामला केवल दो व्यक्तियों तक सीमित नहीं रह जाता; यह प्रवासी श्रमिकों की कानूनी सुरक्षा और दोनों देशों के राजनयिक संबंधों से भी जुड़ जाता है। बहरहाल, मक्का की मस्जिद से जुड़ा यह मामला एक बुनियादी सवाल सामने रखता है कि क्या किसी पवित्र स्थल की मर्यादा की रक्षा और न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता साथ-साथ सुनिश्चित नहीं की जानी चाहिए? सऊदी अरब ने धार्मिक स्थल की पवित्रता के उल्लंघन को मृत्युदंड का आधार बताया है, जबकि बांग्लादेश अब आरोपों, अदालती फैसलों और राजनयिक सूचना की पूरी जानकारी माँग रहा है। सजा के पक्ष में कोई भी तर्क दिया जाये लेकिन किसी भी न्याय व्यवस्था की वास्तविक कसौटी केवल उसकी कठोरता नहीं, बल्कि उसका न्यायपूर्ण, पारदर्शी और जवाबदेह होना भी है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 22 Oct 2026 1:33 pm

Mukesh Ambani के कारोबारी सामर्थ्य का अचानक मुरीद क्यों हुआ अमेरिका? Marco Rubio ने Jamnagar Refinery में क्या क्या देखा?

गुजरात स्थित जामनगर में बुधवार को एक ऐसी मुलाकात हुई, जिसके मायने किसी औद्योगिक दौरे से कहीं ज्यादा बड़े हैं। अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो दुनिया की सबसे बड़ी सिंगल-साइट ऑयल रिफाइनरी देखने पहुंचे, जहां रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर मुकेश अंबानी तथा एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अनंत अंबानी ने उनका स्वागत किया। उनके साथ भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर भी मौजूद रहे। सवाल यह है कि अमेरिका के शीर्ष राजनयिक ने दिल्ली के बजाय जामनगर को इतना महत्व क्यों दिया? जवाब है तेल, ऊर्जा सुरक्षा, वेनेजुएला का भारी कच्चा तेल और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर बढ़ता दबाव। हम आपको बता दें कि जामनगर में रुबियो को केवल रिफाइनरी की विशाल मशीनें और अत्याधुनिक तकनीक नहीं दिखाई गई, बल्कि रिलायंस के उस औद्योगिक सामर्थ्य से भी परिचित कराया गया, जिसकी जरूरत आज अमेरिका को भी महसूस हो रही है। कंपनी के मुताबिक, अंबानी ने उन्हें रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स के अलावा निर्माणाधीन डेटा सेंटरों और चरणबद्ध तरीके से शुरू हो रही न्यू एनर्जी गीगा-फैक्ट्रियों की जानकारी दी। बातचीत में पारंपरिक ऊर्जा, नई ऊर्जा, तकनीकी सहयोग, मजबूत सप्लाई चेन और डेटा सेंटरों के लिए भरोसेमंद बिजली की जरूरत जैसे मुद्दे शामिल रहे। यानी चर्चा सिर्फ तेल खरीदने-बेचने की नहीं, बल्कि ऊर्जा और डिजिटल अर्थव्यवस्था के भविष्य की भी थी। इसे भी पढ़ें: मार्को रूबियो की भारत यात्रा के पीछे की रणनीतिक साझेदारी या दबाव की कूटनीति को बारीकी से समझिए आखिर जामनगर में ऐसा क्या है? हम आपको बता दें कि जामनगर रिफाइनरी कॉम्प्लेक्स की संयुक्त कच्चा तेल प्रसंस्करण क्षमता प्रतिदिन 14 लाख बैरल है। इसमें 1999 में शुरू हुई पहली रिफाइनरी और 2008 में चालू हुई निर्यात-केंद्रित दूसरी रिफाइनरी शामिल हैं। रिलायंस के मुताबिक, यह कॉम्प्लेक्स 216 से अधिक प्रकार के कच्चे तेल का प्रसंस्करण कर चुका है। इसकी सबसे बड़ी ताकत भारी और अधिक सल्फर वाले कच्चे तेल को भी उपयोगी पेट्रोलियम उत्पादों में बदलने की क्षमता है। यही क्षमता इसे अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से अहम बनाती है। वेनेजुएला का भारी कच्चा तेल दुनिया की हर रिफाइनरी आसानी से संसाधित नहीं कर सकती। लेकिन रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी इस मामले में विशिष्ट क्षमता रखती है। अमेरिका की वेनेजुएला-केंद्रित तेल रणनीति और वहां से कच्चे तेल की आपूर्ति बढ़ाने की कोशिशों के बीच रिलायंस एक महत्वपूर्ण संभावित साझेदार बनकर उभरी है। रुबियो ने साफ कहा कि रिलायंस के पास वेनेजुएला समेत पश्चिमी देशों में निकलने वाले भारी कच्चे तेल को रिफाइन करने की खास क्षमता है। यही वजह है कि अमेरिका रिलायंस के साथ मिलकर काम करने के नए रास्ते तलाश रहा है। अनुमानों के मुताबिक, अक्टूबर में रिलायंस हर दिन वेनेजुएला से करीब 3.5 लाख से 3.7 लाख बैरल कच्चा तेल मंगा सकती है। इससे साफ है कि वेनेजुएला के तेल को इस्तेमाल करने की अमेरिकी रणनीति में जामनगर रिफाइनरी की भूमिका बेहद अहम हो सकती है। अमेरिका की परेशानी और रिलायंस की अहमियत इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा पहलू अमेरिकी घरेलू अर्थव्यवस्था है। अमेरिका में डीजल की कीमतों में उछाल और ईंधन आपूर्ति को लेकर चिंताओं के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन पर भारी दबाव है। नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले महंगे ईंधन का मुद्दा राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील है। रिलायंस इस तस्वीर में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जामनगर से डीजल, पेट्रोल और विमानन ईंधन सहित बड़ी मात्रा में रिफाइंड उत्पाद दुनिया भर में भेजे जाते हैं। रिपोर्टों के मुताबिक 2025 की पहली छमाही में जामनगर से 2.166 करोड़ टन रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात हुआ। इसमें 98.1 लाख टन डीजल, 61.4 लाख टन पेट्रोल और 20.6 लाख टन जेट ईंधन शामिल था। यूरोप इन उत्पादों का सबसे बड़ा क्षेत्रीय बाजार रहा। साथ ही अमेरिका के लिए रिलायंस की अहमियत सिर्फ उसकी रिफाइनरी तक सीमित नहीं है। भारत में अमेरिकी गैस की बढ़ती मांग भी इसकी बड़ी वजह है। भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर के मुताबिक, पिछले एक साल में भारत के कुल एलपीजी आयात में अमेरिकी गैस की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से बढ़कर 67 प्रतिशत हो गई है। यानी अब भारत को एलपीजी सप्लाई करने वाला अमेरिका सबसे बड़ा देश बन गया है। अमेरिका में अंबानी का निवेश भी चर्चा के केंद्र में इसके अलावा, रुबियो के दौरे के पीछे एक और बड़ा आर्थिक पहलू है। ट्रंप प्रशासन अमेरिका में औद्योगिक उत्पादन और रोजगार वापस लाने की नीति को अपनी प्रमुख उपलब्धियों के रूप में पेश करता रहा है। इसी सिलसिले में टेक्सास के पोर्ट ऑफ ब्राउन्सविल में प्रस्तावित नई तेल रिफाइनरी में रिलायंस की भागीदारी को खास महत्व दिया जा रहा है। अमेरिका में करीब पांच दशकों बाद लगने जा रही इस प्रमुख नई रिफाइनरी पर लगभग 3 से 4 अरब डॉलर खर्च होने का अनुमान है। इसकी सालाना प्रसंस्करण क्षमता करीब 6 करोड़ बैरल अमेरिकी कच्चे तेल की होगी। रिलायंस ने इसके उत्पादन का बड़ा हिस्सा खरीदने के लिए 20 साल का समझौता किया है और इसके 2029 के आसपास परिचालन शुरू करने की उम्मीद है। रूस का तेल, यूक्रेन युद्ध और भारत पर अमेरिकी दबाव रिलायंस की अहमियत का तीसरा पहलू रूस-यूक्रेन युद्ध है। 2022 में युद्ध शुरू होने के बाद भारत रूसी तेल का बड़ा खरीदार बनकर उभरा और रिलायंस ने भी रूसी कच्चे तेल का आयात बढ़ाया। कंपनी के तेल स्रोतों में रूस की हिस्सेदारी 2022 से पहले लगभग 3 प्रतिशत थी, जो 2025 में बढ़कर करीब 50 प्रतिशत तक पहुंच गई। रूसी तेल खरीदने के मुद्दे पर ट्रंप प्रशासन ने भारत पर अतिरिक्त टैरिफ का दबाव बनाया। इसके बाद रिलायंस ने रूसी कच्चे तेल का आयात घटाया। रुबियो ने स्वीकार किया कि भारत अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता ला रहा है, लेकिन रूस से बड़ी मात्रा में तेल खरीदना तुरंत बंद करना आसान नहीं है। उन्होंने भारत को अमेरिका का महत्वपूर्ण साझेदार भी बताया। अमेरिकी मीडिया की नजर में यह दौरा क्यों खास है? उधर, अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय मीडिया इस दौरे को सिर्फ एक कारोबारी मुलाकात के तौर पर नहीं देख रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि रिलायंस अमेरिका के कई अहम हितों से जुड़ी हुई है। अमेरिका चाहता है कि भारत रूसी तेल पर अपनी निर्भरता कम करे, वेनेजुएला के तेल का ज्यादा इस्तेमाल हो, ईंधन की कीमतों पर काबू पाया जा सके और अमेरिकी कंपनियों में निवेश बढ़े। इन सभी मुद्दों पर रिलायंस की भूमिका अहम हो सकती है। अंबानी बनाम मस्क: अमेरिकी हितों की एक और पेचीदगी दिलचस्प बात यह है कि जहां ट्रंप प्रशासन रिलायंस के साथ ऊर्जा सहयोग बढ़ाने की संभावनाएं तलाश रहा है, वहीं ट्रंप के करीबी एलन मस्क का रिलायंस से टकराव भी सामने आया है। मस्क की कंपनी स्टारलिंक भारत में परिचालन लाइसेंस हासिल करने की कोशिश कर रही है। मस्क ने आरोप लगाया कि भारत में जियो को फायदा पहुंचाने के लिए स्टारलिंक के प्रवेश में बाधाएं डाली जा रही हैं। रिलायंस ने जवाब दिया कि उसे प्रतिस्पर्धा से कभी डर नहीं लगा और वह घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय निवेश एवं नवाचार का स्वागत करने वाले भारत में विकसित हुई है। देखा जाये तो यही विरोधाभास इस पूरे घटनाक्रम को और दिलचस्प बनाता है। अमेरिका के कारोबारी और राजनीतिक हित हर मुद्दे पर एक जैसे नहीं हैं, लेकिन ऊर्जा के मोर्चे पर रिलायंस की क्षमता वॉशिंगटन को उसके साथ बातचीत के लिए प्रेरित कर रही है। कुल मिलाकर देखें तो जामनगर में मार्को रुबियो का दौरा भारत की औद्योगिक ताकत और मुकेश अंबानी के कारोबारी सामर्थ्य का भी बड़ा संकेत है। दुनिया के सबसे ताकतवर देशों में शामिल अमेरिका के विदेश मंत्री का भारत आकर किसी उद्योगपति के साथ ऊर्जा और निवेश जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा करना अपने आप में खास है। इससे पता चलता है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में रिलायंस की क्षमता और जामनगर रिफाइनरी की अहमियत को अमेरिका भी गंभीरता से लेता है। रिलायंस ने भी अपने बयान में कहा है कि इस दौरे के दौरान पारंपरिक और नई ऊर्जा के क्षेत्र में कारोबारी साझेदारी की संभावनाओं, सस्ती और भरोसेमंद ऊर्जा आपूर्ति, आधुनिक तकनीक और मजबूत सप्लाई चेन पर चर्चा हुई। कंपनी ने अमेरिकी कंपनियों के साथ तकनीक, इंजीनियरिंग और आधुनिक विनिर्माण के क्षेत्र में सहयोग की संभावनाओं पर भी अपने विचार रखे। बहरहाल, जामनगर से निकला संदेश साफ है कि भारत की औद्योगिक ताकत और मुकेश अंबानी की कारोबारी क्षमता को अमेरिका भी नजरअंदाज नहीं कर सकता। अमेरिकी विदेश मंत्री का किसी भारतीय उद्योगपति से मिलने के लिए उसके औद्योगिक परिसर तक पहुंचना इस बात को रेखांकित करता है कि वैश्विक ऊर्जा की राजनीति में रिलायंस की भूमिका कितनी अहम हो गई है। यह सिर्फ अंबानी की कारोबारी सफलता की कहानी नहीं, बल्कि भारत की उस बढ़ती ताकत का भी संकेत है, जिसके साथ अमेरिका अपने ऊर्जा और आर्थिक हितों को जोड़कर देख रहा है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 22 Oct 2026 1:28 pm

विजयादशमी पर सनातन विजय व राष्ट्र को नशामुक्त करने का संकल्प

असत्य पर सत्य की विजय का महापर्व विजयादशमी रावण के पुतलों के दहन के साथ धूमधाम से संपन्न हो चुका है। इस अवसर पर देशभर में भव्य कार्यक्रमों का आयोजन हुआ। इसी दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपना स्थापना दिवस मनाया। यह अवसर संकल्पों का अवसर भी रहा इनमें सबसे महत्वपूर्ण संकल्प गृहमंत्री अमित शाह ने पंजाब में लिया। गृहमंत्री ने दिसंबर 2029 तक पंजाब को नशे से मुक्ति दिलाने का संकल्प लिया। यह एक देशव्यापी संकल्प है क्योंकि आज केवल पंजाब में ही नहीं अपितु अन्य प्रान्तों के युवाओं को भी नशे की लत में झोंका जा रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विजयादशमी कार्यक्रम को सर संघचालक डा. मोहन भागवत ने संबोधित किया। उन्होंने यूरोप के देशों मे हो रहे विरोध प्रदर्शनों, जेन-जी और एआई पर अपने विचार व्यक्त करते हुए नई पीढ़ी को एकजुटता का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि भारत की प्रगति के लिए एकजुटता बहुत जरूरी है। भारत विकास की राह पर अग्रसर है, अभी विकास पूरा नही हुआ है तो समस्याएं तो रहेंगी ही, समस्या के चलते आंदोलन होते ही हैं और लोकतंत्र मे आंदोलन होंगे ही किंतु आंदोलन समाधान के लिए होना चाहिए समस्या के लिए नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि हमें पश्चिम में चली आंधी से बचना ही होगा हमारी किसी भी कृति से समाज में अनबन, द्वेष या विभाजन पैदा नहीं होना चाहिए। डॉ. भागवत ने चेताया कि आंदोलन किसी दूसरे लक्ष्य से चले तो वह राजनीतिक साधन बन जाता है। इसका लाभ भारत को दबाने वाली शक्तियां लेती हैं। वे भारत को बांटकर दूसरा वर्ग बनाती हैं असंतोष और अराजकता भड़काती हैं। उन्होंने कहा कि पश्चिम से आंधी चली है जो हर तरह की व्यवस्था, भद्रता, मांगल्य और सांस्कृतिक मानवीय संस्कार से विरोध रखती है। फ्रांस, अल्बानिया, बांग्लादेश और नेपाल में क्या हुआ ये सब किया कराया उनका ही है उन लोगों का कहना है कि रिजीम चेंज करने से परिस्थिति बनती है लेकिन ऐसा कभी हुआ नहीं है पहले नहीं हुआ है और आज भी नहीं हुआ है। इसे भी पढ़ें: सरसंघचालक मोहन भागवत का संदेश: सत्ता परिवर्तन का भ्रम और राष्ट्र की आंतरिक स्थिरता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दशहरा उत्सव में भाग लेते हुए देश के दुश्मनों को स्पष्ट चेतावनी दी कि हम 2047 तक भारत को विकसित भारत बनाकर ही रहेंगे। प्रधानमंत्री ने वस्तुतः अपने नये नारे “हम करके रहेंगे“ को ही दोहराया और बता दिया है कि अंत में विजय हमारी ही होगी। प्रधानमंत्री ने देश के सामने आ रही वर्तमान चुनौतियों से मिलकर लड़ने का संदेश दिया और देश के सभी राजनैतिक दलों व समस्त संवैधानिक संस्थाओं से राष्ट्रहित में एकजुट हो जाने का आह्वान किया। प्रधानमंत्री ने देश के तीन दुश्मनों का उल्लेख करते हुए कहा कि देश के मान सम्मान को नुकसान पहुंचाने वाली ताकतें, समाज में फूट डालने वाले लोग और भारतीय समाज से नफरत करने वाली सोच ऐसी चुनौतिया हैं जिनका सामना देश को मिलकर करना होगा। उन्होंने देश की एकता व संस्कृति को मजबूत बनाए रखने पर बल दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भगवान राम के आदर्शों को याद करते हुए कहा कि रामराज्य में शासन का उद्देश्य जनकल्याण होता है। वहां भेदभाव की जगह न्याय और सभी को समान अवसर देना होता है। साथ ही गरीबों, वंचितों की सेवा करना भी है, सरकार और समाज दोनों का ध्यान इन लोगों की सहायता पर होना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन से आगामी समय में सरकार द्वारा लिए जाने वाले संभावित साहसिक निर्णयों व संकल्पों का संदेश भी निकल रहा है। संभव है सरकार संसद के माध्यम से अपने कुछ ऐतिहासिक संकल्पों को पूर्ण करने के लिए आगे बढ़े और इसी कारण से प्रधानमंत्री ने देशहित में सभी राजनीतिक दलों से एकजुटता का आह्वान किया है। सरकार परिसीमन बिल, महिला आरक्षण बिल तथा एक देश एक चुनाव व्यवस्था पर आगे बढ़ना चाहती है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि वर्तमान समस्याओं का अंत रामराज्य के माध्यम से ही संभव है। प्रधानमंत्री मोदी ने अयोध्या में दिए गए अपने संबोधन को स्मरण किया और प्रभु श्रीराम के गुणों व विशेषताओं का वर्णन करते हुए राम राज्य की स्थापना व उस समय लिए गए सभी संकल्पों को पूर्ण करने का भी स्मरण किया और कहा कि “अंत में विजय हमारी ही होगी।“ उन्होंने कहा कि आज देश का जन-मन अधर्म पर धर्म की जीत का उद्घोष कर रहा है भगवान राम ने रावण का अंत किया और मानवता को ऐसे आदर्श दिए जो इतिहास में अतुलनीय हैं। भगवान राम ने कठिनाईयों के बाद भी सत्य और नीति का मार्ग नहीं छोड़ने की सीख दी। उधर उत्तर प्रदेश में सभी की दृष्टि गोरखपुर में आयोजित विजयादशमी उत्सव के अवसर पर उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के संबोधन पर भी टिकी हुई थी। योगी जी ने अपनी चिर-परिचित शैली में सनातन की बात की। उन्होंने अयोध्या की रामलीला, दीपोत्सव और राम मंदिर निर्माण का उल्लेख करते हुए कहा कि जिन लोगों ने अयोध्या की रामलीला तक नहीं देखी वे भी वहां को लेकर दुष्प्रचार कर रहे हैं। योगी ने कहा कि राम मंदिर का निर्माण तय समय से पहले हो गया है। जो लोग कभी अयोध्या गए ही नहीं उन लोगों को भगवान श्रीराम के मंदिर का निर्माण कैसे बर्दाश्त होगा। उन्होंने समाज को जाति, क्षेत्र और भाषा के नाम पर बांटने वालों की तुलना रावण से की और कहा कि देश को कमजोर करने का प्रयास करने वाले लोगों में रावण की आत्मा आ गई है। उन्होंने कहा कि कालनेमि भी राम-राम कहता था उन्होंने लोगों से बजरंग बली की तरह सही और गलत की पहचान करने की अपील की। महाराष्ट्र से देवेन्द्र फड़नवीस, उत्तराखंड से पुष्कर सिंह धामी, असम से हिमंता बिस्वा सरमा और पश्चिम बंगाल से शुभेंदु अधिकारी के सन्देश और संकल्प भी चर्चा में रहे। - मृत्युंजय दीक्षित

प्रभासाक्षी 22 Oct 2026 12:48 pm

मार्को रूबियो की भारत यात्रा के पीछे की रणनीतिक साझेदारी या दबाव की कूटनीति को बारीकी से समझिए

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की भारत यात्रा का महत्त्व केवल भारत-अमेरिका संबंधों को मजबूत करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके केंद्र में व्यापार समझौता, रूस से भारत की तेल खरीद, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा सहयोग, अत्याधुनिक तकनीक और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति-संतुलन जैसे मुद्दे भी अहम हैं। साथ ही, यह यात्रा एक बुनियादी प्रश्न भी उठाती है, वह यह कि क्या भारत अमेरिका के साथ सहयोग करते हुए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर सकता है? क्योंकि अमेरिका की दुश्मनी से ज्यादा दोस्ती खतरनाक होती है! अमेरिकी नेताओं ने भारत और भारतीय पेशेवरों के लिए जिन निकृष्टम शब्दों का उपयोग किया, तरह तरह की प्रतिबंधक चालें चलीं, उसको भूलना बिल्कुल कठिन है। आखिर भारत के खिलाफ कभी पाकिस्तान, कभी बांग्लादेश और कभी नेपाल को भड़काने वाला अमेरिका भारत से कितनी दोस्ती निभा पाएगा, वह गुजश्ता वक्त ही बताएगा! यूं तो 20 अक्टूबर को विजयदशमी जैसे अहम दिनों में मुंबई में रूबियो और विदेश मंत्री एस. जयशंकर की वार्ता हुई। जहां अमेरिकी पक्ष ने व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की दिशा में प्रगति की बात कही। वहीं, दोनों देशों ने ऊर्जा, रक्षा और प्रौद्योगिकी सहयोग पर भी चर्चा की। हालांकि, बातचीत में प्रगति को किसी अंतिम समझौते के संपन्न होने के बराबर नहीं माना जाना चाहिए। इसे भी पढ़ें: Prabhasakshi NewsRoom: कभी Pakistan पर सख्त कार्रवाई चाहते थे Marco Rubio, अब उसी की पैरवी कर रहे हैं! सीनेटर से विदेश मंत्री बनते ही क्यों बदल गये सुर? अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की भारत यात्रा के कुछ प्रमुख कूटनीतिक निहितार्थ इस प्रकार हैं:- पहला, व्यापार समझौता एक अवसर भी और एक दबाव भी: अमेरिका भारत के लिए एक बड़ा निर्यात बाजार है। दूसरी ओर, अमेरिकी टैरिफ नीति भारतीय उद्योगों, निर्यातकों और रोजगार को प्रभावित कर सकती है। अगस्त 2025 में व्यापार वार्ता टूटने के बाद अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर कुछ मामलों में 50% तक टैरिफ लगाया था। लेकिन फरवरी 2026 में घोषित रूपरेखा के तहत यह दर घटाकर 18% की गई, लेकिन व्यापक व्यापार समझौते पर वार्ता अटकी रही। ऐसी परिस्थितियों में रूबियो ने 20 अक्टूबर को कहा कि समझौता लगभग अंतिम चरण में है, हालांकि अभी कुछ मुद्दे सुलझने बाकी हैं। ऐसे में भारत के लिए असली सवाल क्या है? क्या समझौते से भारतीय निर्यात, विनिर्माण और रोजगार को दीर्घकालीन लाभ मिलेगा, या भारत को अपने कृषि, डेयरी, डिजिटल कारोबार और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में असमान रियायतें देनी पड़ेंगी? दूसरा, रूसी तेल से जुड़ी भारत की ऊर्जा नीति पर अमेरिकी प्रभाव: भारत की रूस से रियायती कच्चा तेल खरीदने की नीति ऊर्जा लागत और आपूर्ति के विविधीकरण से जुड़ी है। अमेरिका चाहता है कि भारत अमेरिकी ऊर्जा की खरीद बढ़ाए और अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाए। अलबत्ता यहाँ दो अलग हित आमने-सामने हैं। जहां अमेरिका का हित अपने ऊर्जा निर्यात को बढ़ाना और रूस पर आर्थिक दबाव की नीति को आगे बढ़ाना है। वहीं, भारत का हित सस्ती तथा विश्वसनीय ऊर्जा उपलब्ध रखना, महँगाई नियंत्रित करना और अपनी विदेश नीति के विकल्प सुरक्षित रखना है। ऐसे में रूबियो ने अमेरिकी ऊर्जा व्यापार को भारत की आपूर्ति शृंखला विविधता से जोड़कर प्रस्तुत किया। वहीं, रूसी तेल पर संभावित प्रतिबंधों और शुल्क का प्रश्न दोनों देशों के संबंधों में तनाव का सबसे बड़ा कारण बना हुआ है, क्योंकि रूस भारत का भरोसेमंद साझीदार देश रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ में उसने भारत के पक्ष में कई बार वीटो का प्रयोग किया है। दरअसल, भारत के लिए चुनौती अमेरिकी तेल खरीदने या रूसी तेल खरीदने में से किसी एक को राजनीतिक निष्ठा का प्रमाण बनाने की नहीं, बल्कि लागत, उपलब्धता, राष्ट्रीय सुरक्षा और कूटनीतिक परिणामों के आधार पर निर्णय लेने की है। तीसरा, रक्षा सहयोग से तकनीक मिलेगी, लेकिन निर्भरता का जोखिम भी रहेगा: अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग से भारत को उन्नत तकनीक, खुफिया सहयोग, सैन्य उपकरणों और संयुक्त अनुसंधान के अवसर मिल सकते हैं। लेकिन अत्याधुनिक अमेरिकी प्रणालियों पर बहुत अधिक निर्भरता होने पर स्पेयर पार्ट्स, रखरखाव, सॉफ्टवेयर, निर्यात नियंत्रण और राजनीतिक शर्तों का प्रश्न उठ सकता है? लिहाजा भारत को तीन बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए: एक, रक्षा खरीद के साथ तकनीक हस्तांतरण और भारत में उत्पादन की ठोस व्यवस्था हो। दो, किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता के बजाय स्वदेशी क्षमता तथा विविध स्रोत विकसित हों। तीन, समझौते भारत की स्वतंत्र निर्णय क्षमता को सीमित न करें। इस दौरान रूबियो ने रक्षा और असैन्य परमाणु सहयोग में प्रगति का उल्लेख किया और अमेरिकी तकनीक तथा प्रणालियों की अधिक खरीद की वकालत की। यह सहयोग का अवसर है, लेकिन भारत को हर प्रस्ताव का मूल्यांकन उसकी लागत, तकनीकी शर्तों और दीर्घकालीन निर्भरता के आधार पर करना होगा। चौथा, हिंद-प्रशांत और चीन के दृष्टिगत अमेरिका व भारत का साझा हित, लेकिन समान प्राथमिकताएँ जरूरी नहीं: भारत और अमेरिका दोनों के लिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता, समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन महत्त्वपूर्ण हैं। चीन की बढ़ती सामरिक भूमिका भी दोनों के बीच सहयोग का एक प्रमुख कारण है। फिर भी दोनों देशों की प्राथमिकताएँ हमेशा एक जैसी नहीं होतीं। जहां अमेरिका अपनी वैश्विक रणनीति, गठबंधनों और घरेलू राजनीतिक हितों के अनुसार नीतियाँ बदल सकता है। वहीं, भारत को चीन के साथ सीमा विवाद, पड़ोसी देशों के साथ संबंध और अपनी आर्थिक जरूरतों को स्वतंत्र रूप से देखना होता है। इसलिए भारत रूस सहित अन्य देशों के साथ भी संबंध बनाए रखना चाहता है। इसलिए भारत-अमेरिका सहयोग को किसी तीसरे देश के विरुद्ध स्थायी प्रतिबद्धता में बदलने के बजाय, साझा हितों पर आधारित रखना भारत की कूटनीतिक स्वायत्तता के अनुकूल होगा। पांचवां, मुंबई और जामनगर की पूंजीवादी आर्थिक कूटनीति का संकेत: रूबियो की यात्रा में मुंबई में सरकारी तथा कारोबारी वार्ताएँ और गुजरात के जामनगर में ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ा कार्यक्रम शामिल था। इससे स्पष्ट है कि यात्रा का आर्थिक पक्ष भी प्रमुख है। एक मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका भारत की रिलायंस इंडस्ट्रीज को वेनेजुएला के कच्चे तेल के अधिक प्रसंस्करण और संभावित उत्पादन संबंधी अवसरों से जोड़ने में रुचि रखता है। भारत के लिए इसका अर्थ केवल ऊर्जा आयात का स्रोत बदलना नहीं है, बल्कि उसे देखना होगा कि ऐसे सहयोग से भारतीय कंपनियों को क्या लाभ होगा, ऊर्जा आपूर्ति कितनी सुरक्षित होगी और किसी बाहरी नीति-परिवर्तन से निवेश या कारोबार पर क्या असर पड़ सकता है। सुलगता सवाल है कि क्या अमेरिका के अतीत के ट्रैक रिकॉर्ड के कारण उस पर भरोसा करना जोखिमपूर्ण है? इस प्रश्न का उत्तर अमेरिकी विदेश नीति के कुछ महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक उदाहरणों को देखकर अधिक स्पष्ट होता है। अमेरिका को न तो हर परिस्थिति में अविश्वसनीय मानना उचित है, न ही उसकी घोषणाओं को स्थायी प्रतिबद्धता समझना। कुछ प्रमुख उदाहरण पर गौर फरमाना उचित होगा। एक, 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिकी प्रतिबंध: भारत के पोखरण-II परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिका ने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए। इससे स्पष्ट हुआ कि परमाणु अप्रसार जैसे मुद्दों पर वाशिंगटन अपने नीतिगत उद्देश्यों के लिए भारत पर आर्थिक दबाव डाल सकता है। बाद के वर्षों में संबंधों में सुधार हुआ और असैन्य परमाणु सहयोग का रास्ता भी खुला। दो, पाकिस्तान के साथ अमेरिकी संबंध भारत के लिए चिंता की बात: शीतयुद्ध और अफगानिस्तान संघर्ष के अलग-अलग चरणों में अमेरिका ने पाकिस्तान के साथ सुरक्षा सहयोग किया। यह भारत की सुरक्षा संबंधी चिंताओं का विषय रहा है। हालांकि, अमेरिकी-पाकिस्तानी संबंधों में भी उतार-चढ़ाव आए हैं। इससे पता चलता है कि अमेरिकी नीतियाँ अक्सर अपने सामरिक उद्देश्यों के अनुसार बदलती रही हैं। तीन, भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौता: 2005–2008 के दौरान दोनों देशों ने असैन्य परमाणु सहयोग की दिशा में ऐतिहासिक प्रगति की। यह इस बात का उदाहरण है कि अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं और हितों के बावजूद, ठोस बातचीत तथा संस्थागत समझौतों से दीर्घकालीन सहयोग संभव है। चार, हाल के वर्षों में टैरिफ और रूसी तेल का विवाद: 2025–2026 में अमेरिकी टैरिफ और रूस से भारत की तेल खरीद को लेकर तनाव सामने आया। बाद में टैरिफ में कमी और रूसी तेल से संबंधित प्रतिबंधों पर अस्थायी राहत की दिशा में कदम भी दिखे। यह उदाहरण बताता है कि आर्थिक दबाव की नीति और व्यावहारिक समझौते एक ही संबंध में साथ-साथ चल सकते हैं। इन उदाहरणों से एक उपयोगी निष्कर्ष निकलता है, वह यह कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में भरोसा किसी देश की सद्भावना की धारणा से अधिक, उसके व्यवहार, समझौतों की शर्तों और हितों के मेल पर आधारित होना चाहिए। अमेरिका का ऐतिहासिक रिकॉर्ड सहयोग और दबाव—दोनों का रहा है। भारत को इस रिकॉर्ड को ध्यान में रखकर समझौते करने चाहिए, लेकिन अतीत के हर विवाद को भविष्य के हर सहयोग की विफलता का प्रमाण भी नहीं मानना चाहिए। सवाल है कि अमेरिका पर भरोसा करने के बजाय भारत को कौन-सी रणनीति अपनानी चाहिए? तो जवाब होगा कि भारत के सामने विकल्प केवल अमेरिका पर भरोसा करने या उससे दूरी बनाने के नहीं हैं। वह सहयोग भी कर सकता है और अपने जोखिमों को सीमित भी रख सकता है। क्षेत्रवार भारत के लिए व्यावहारिक दृष्टिकोण इस प्रकार है। व्यापार क्षेत्र में पारस्परिक लाभ, स्पष्ट शर्तें और विवाद समाधान की व्यवस्था होनी चाहिए। ऊर्जा क्षेत्र में अमेरिका, रूस तथा अन्य आपूर्तिकर्ताओं के बीच विविधता का उदाहरण बन सकता है। रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी उत्पादन, तकनीक हस्तांतरण और बहु-स्रोत खरीद महत्वपूर्ण नीति है। विदेश नीति के क्षेत्र में अमेरिका, रूस, यूरोप और अन्य साझेदारों के साथ स्वतंत्र संबंध विकसित कर सकता है। प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में घरेलू अनुसंधान, डेटा सुरक्षा और महत्त्वपूर्ण तकनीकों में आत्मनिर्भरता जरूरी है। कूटनीति के क्षेत्र में लिखित समझौते, नियमित समीक्षा और उल्लंघन की स्थिति में सुरक्षा उपाय नितांत जरूरी है। इन उपायों का उद्देश्य अमेरिका से दूरी बनाना नहीं, बल्कि किसी एक बाहरी शक्ति के नीतिगत बदलाव से भारत की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को कम करना है। सवाल है कि रूबियो की यात्रा के बाद भारत को किन संकेतों पर नजर रखनी चाहिए? तो जवाब होगा कि किसी राजनयिक यात्रा की सफलता का आकलन स्वागत, भाषणों या संयुक्त तस्वीरों से नहीं, बल्कि उसके बाद सामने आने वाले परिणामों से होना चाहिए। एक, व्यापार समझौता: क्या अंतिम समझौता वास्तव में संपन्न होता है? क्या भारतीय निर्यातकों को प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले उचित अवसर मिलते हैं? दो, रूसी तेल: क्या भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के अनुसार निर्णय ले सकता है, या उस पर खरीद घटाने के लिए अतिरिक्त दबाव आता है? तीन, रक्षा और तकनीक: क्या भारत को वास्तविक तकनीक, घरेलू उत्पादन और अनुसंधान के अवसर मिलते हैं? चार, पाकिस्तान और क्षेत्रीय सुरक्षा: क्या अमेरिका भारत की सुरक्षा संबंधी चिंताओं को समझते हुए संतुलित और स्पष्ट नीति अपनाता है? पांच, समझौतों का पालन: क्या अमेरिका की नीतियों में बदलाव होने पर भी पहले से तय प्रतिबद्धताएँ सुरक्षित रहती हैं? वस्तुत:, भारत का अमेरिका पर भरोसा हो, लेकिन राष्ट्रीय हितों की कीमत पर कतई नहीं। मार्को रूबियो की भारत यात्रा को एक साथ दो दृष्टियों से देखना चाहिए। पहली, भारत-अमेरिका सहयोग से व्यापार, ऊर्जा, रक्षा और प्रौद्योगिकी में वास्तविक लाभ हासिल किए जा सकते हैं। दूसरी, अमेरिकी सरकारों की नीतियाँ बदल सकती हैं और वाशिंगटन अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है—जैसा कि अन्य बड़ी शक्तियाँ भी करती हैं। इसलिए भारत की नीति का आधार न तो अमेरिका-विरोध होना चाहिए, न अमेरिका पर असीमित निर्भरता। उसे मुद्दा-आधारित सहयोग, रणनीतिक स्वायत्तता, विविध साझेदारियों और अपने राष्ट्रीय हितों की स्पष्ट रक्षा पर आधारित होना चाहिए। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिका से संबंध अच्छे हों, फिर भी भारत के पास स्वतंत्र निर्णय लेने के विकल्प बने रहें। किसी भी समझौते में भारत को यह देखना चाहिए कि लाभ और जोखिम क्या हैं, प्रतिबद्धताएँ कितनी स्पष्ट हैं और भविष्य में परिस्थितियाँ बदलने पर उसके पास कितनी गुंजाइश बचती है। यही कसौटी रूबियो की इस यात्रा और भविष्य के भारत-अमेरिका संबंधों के मूल्यांकन में उपयोगी होगी। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 22 Oct 2026 12:41 pm

सौरव दास और आशुतोष रांका की जमानत पर शायना एनसी का तंज, कहा-'जमानत कोई जीत नहीं, कोर्ट की सख्त शर्त है'

सौरव दास और आशुतोष रांका की जमानत पर शायना एनसी का तंज, कहा-'जमानत कोई जीत नहीं, कोर्ट की सख्त शर्त है'

समाचार नामा 22 Oct 2026 12:27 pm

चुनौतियों के बावजूद बढ़ती हिंदी

बांग्ला संस्कृति का मूल स्वर सहिष्णुता, उदारता और समन्वय का रहा है। उन्नीसवीं सदी में बंगाल की धरती ने नवजागरण का स्वागत किया, जिसके मूल में ईश्वरचंद्र विद्यासागर और स्वामी विवेकानंद के विचार रहे। इस समन्वय की संस्कृति का ही असर रहा कि बंगाल की ही धरती से ना सिर्फ हिंदी पत्रकारिता का उद्भव हुआ, बल्कि उसकी जड़ें मजबूत भी हुईं। लेकिन वही बंगाल बदल गया है। बांग्ला संस्कृति समन्वय के सूत्रों को कहीं पीछे छोड़ती नजर आने लगी है। अगर ऐसा नहीं होता तो कोलकाता नगर निगम के उस पोस्टर पर विवाद नहीं होता, जिसमें बांग्ला और हिंदी भाषा के शब्दों का अनूठा और कलात्मक संगम था। बांग्ला संस्कृति के प्रतीक पर्व दुर्गा पूजा के दौर में भाषायी सौंदर्य और कला के अनूठे मेल पर राजनीति ने जब सवाल उठाया तो कोलकाता नगर निगम ने अपना पोस्टर ही वापस ले लिया। शायद निगम ने सोचा होगा कि उत्साह और उल्लास का स्वाद राजनीतिक कंकड़ से खराब ना हो। जिस पोस्टर पर विवाद हुआ, उसके बारे में जानना जरूरी है। यह भी जानना जरूरी है कि आखिर उसमें क्या रहा, जिससे पश्चिम बंगाल का विपक्षी दल तृणमूल कांग्रेस परेशान हो गया। दरअसल दुर्गा पूजा के दौरान दस से 21 अक्टूबर तक कोलकाता नगर निगम ने देश की पूर्व राजधानी वाले शहर में चलाए जा रहे सफाई अभियान के लिए एक विशेष पोस्टर जारी किया था। जिसमें लिखा था, 'मायेर कोरबो स्वच्छता से स्वागत' यानी मां दुर्गा का स्वागत स्वच्छता से करेंगे। जैसा कि शब्दों से पता चलता है, पोस्टर के अकेले वाक्य में बांग्ला और हिंदी शब्दों का अनूठा मेल पेश किया गया। विज्ञापन के भाषा की जिन्हें समझ है, उन्हें पता है कि बांग्ला और हिंदी के इस अनूठे मेल के जरिए जो संदेश दिया गया, वह कितना प्रभावी रहा। लेकिन तृणमूल कांग्रेस को इस वाक्य के तीन शब्द ‘स्वच्छता से स्वागत’ बंगाल में हिंदी थोपने का षडयंत्र नजर आने लगा। वैसे भी राज्य में अब भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। भाजपा की पहचान हिंदुत्व और हिंदी को लेकर रही है। इसलिए तृणमूल के लिए यह आरोप लगाना और उसे भाजपा के हिंदी वर्चस्ववाद के छद्म नैरेटिव से जोड़ना आसान रहा। लेकिन कोलकाता नगर निगम ने राजनीति से किनारा करना उचित समझा और इसे बदलने में उसने देर नहीं लगाई। पोस्टर के वाक्य को पूरी तरह बांग्ला कर दिया, 'स्वच्छतार साथे, मां के स्वागत जनाई' कर दिया। बांग्ला के इस वाक्य का भाव वही है, जो पहले वाक्य का रहा। अफसोस यह कि राजनीति की वजह से भाषाई मेल का अनूठापन गायब हो गया। इसे भी पढ़ें: आस्था के सैलाब में कब तक गुम होती रहेगी जिंदगियां? संविधान सभा में हिंदी को जितनी चुनौतियों का सामना नहीं करना पड़ा, उससे ज्यादा हिंदी इन दिनों वह चुनौतियों से जूझ रही है। वैसे तो तमिल जैसी क्षेत्रीय राजनीतिक अस्मिताएं हिंदी की राह में रोड़े डालती रही हैं। इसका साथ कभी कर्नाटक तो कभी महाराष्ट्र देता रहा है। यहां गौर करने की बात यह है कि भारतीय राष्ट्रीयता के अंतर्गत कई उपराष्ट्रीयताएं भी हैं, जिसे हम क्षेत्रीय अस्मिताओं के नाम से भी जानते हैं। भारतीय राष्ट्रीयता का मूल स्वर हिंदी के जरिए उद्घाटित होता है। जिसे हम हिंदी हार्टलैंड या हृदय प्रदेश कहते हैं, वहां राष्ट्रीयता पर अपवादस्वरूप ही सवाल उठते हैं। लेकिन उपराष्ट्रीयताएं अक्सर हिंदी पर हमले के बहाने राष्ट्रीयता को प्रकारांतर से चुनौती देती रहती हैं। तब उनका एक मात्र तर्क यही होता है कि हिंदी थोपी जा रही है। दिलचस्प यह है कि जिस भाषा ने करीब दो सौ साल तक देश को गुलाम बनाए रखा, उसे अपनाने में उपराष्ट्रीयताएं गर्व समझती हैं। संविधान सभा की आखिरी बैठक के दिन सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने खुलेतौर पर स्वीकार किया था कि भाषा की समस्या का ठोस हल सभा नहीं निकाल पायी है। फिर भी उन्हें उम्मीद थी कि आने वाले दिनों में भाषा के मुद्दे पर देश गांधी की तरह सोचेगा। हालांकि महावीर प्रसाद त्यागी को ऐसी उम्मीद नहीं थी। इसीलिए उन्होंने अपने आखिरी भाषण में कहा था कि वे संविधान के पृष्ठों पर गांधीजी को खोज रहे हैं, लेकिन उन्हें गांधी नजर नहीं आए। पता नहीं, तृणमूल कांग्रेस को यह पता है या नहीं, लेकिन उसे जानना चाहिए कि आर्य समाज के प्रमुख ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश को हिंदी में लिखने के लिए बांग्ला माटी के सपूत केशवचंद्र सेन ने स्वामी दयानंद सरस्वती को प्रेरित किया था। भावी भारत की संपर्क या राष्ट्रभाषा बनने की क्षमता हिंदी में देखने वाले प्राथमिक लोगों में केशवचंद्र सेन भी रहे। कांग्रेस का अध्यक्ष बनने के बाद बंगाल की माटी के क्रांतिकारी सपूत सुभाष चंद्र बोस ने ना सिर्फ हिंदी सीखने के लिए शिक्षक रखा था, बल्कि उन्होंने कोलकाता नगर निगम के अध्यक्ष के नाते पिछली सदी के तीस के दशक में हिंदी को लेकर अर्थपूर्ण भाषण भी दिया था। हिंदी पर सवाल कभी-कभी कर्नाटक में भी उठता है और किंचित महाराष्ट्र में भी। लेकिन हिंदी को स्वाधीनता से पहले से ही सबसे बड़ी चुनौती तमिलनाडु में मिलती रही है। हाल ही में तमिलनाडु के करूर और कोयंबटूर के सरकारी अस्पतालों में मरीजों को दी जाने वाली दवाओं के पर्चे के कवर पर तमिल और अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी में भी निर्देश छापे गए थे। जिसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर जारी करते हुए विपक्षी द्रमुक पार्टी के नेता टी.आर.बी. राजा ने सवाल उठाया कि क्या तमिलनाडु में चुपचाप 'तीन-भाषा नीति' लागू की जा चुकी है। हिंदी की ग्रंथि से प्रभावित तमिलनाडु राजनीति सवाल उठाए तो विवाद होना ही था। जब विवाद बढ़ा तो दोनों सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों ने मरीजों को दिए जाने वाले त्रिभाषी कवर का वितरण तत्काल रोक दिया और उसकी जगह तमिल और अंग्रेजी लिखी पर्चियां जारी कर दीं। तमिलनाडु में हाल ही में राजमार्ग के साइनबोर्ड पर हिंदी लिखे जाने को लेकर भी विवाद खड़ा किया गया। राज्य के तूतीकोरिन जिले के सत्तानकुलम-नाजरेथ राज्य राजमार्ग 93 पर हिंदी में जगहों का नाम लिखा जाना यहां की विपक्षी राजनीति को रास नहीं आया। जब विवाद बढ़ा तो दो सहायक इंजीनियरों भूमिनाथन और मुथु लक्ष्मी को निलंबित कर दिया गया। इतना ही नहीं, साइनबोर्ड से तत्काल हिंदी नामों को मिटा दिया गया। दरअसल, हाईवे पर लगे नए साइनबोर्ड में तमिल और अंग्रेजी के साथ कस्बों के नाम हिंदी में भी लिखे गए थे। हिंदी उस राज्य के लिए कितनी खतरनाक हो सकती है, जिसकी एक मंत्री एस कीर्तना ने मई में शपथ लेते ही हिंदी बोलकर लोगों का दिल जीत लिया था। तब उनका तर्क था कि हिंदी के जरिए वे अपने नेता यानी जोसेफ विजयन की नीतियों को व्यापक समुदाय तक पहुंचाना चाहती हैं। राजनीति के चलते भले ही कोलकाता नगर निगम और तमिलनाडु सरकार झुक गए हों, लेकिन देश की सहज संपर्क भाषा को चुनौती समझने वाले इन राज्यों की राजनीति को समझना होगा कि उनके विरोध के बावजूद हिंदी खुद बढ़ रही है। कोलकाता में पोस्टर तैयार करने वाले दिमाग और हाथों को हिंदी के प्रयोग के जरिए भाषायी चमत्कार करना कलात्मक लगता है तो यह हिंदी की ही जीत है। तमिलनाडु के वे इंजीनियर भी बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने लीक पर चलने की बजाय राजमार्ग के पास के शहरों और कस्बों के नामों को देवनागरी में लिखना उचित समझा। चाहे पोस्टर तैयार करने वाला दिमाग हो या फिर कस्बों का नाम हिंदी में उकेरने वाले विचार, उनकी नजर में हिंदी कोई चुनौती नहीं, बल्कि भारतीय अभिव्यक्ति का विस्तार है। इसलिए उन हाथों और दिमागों का स्वागत किया जाना चाहिए। - उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

प्रभासाक्षी 22 Oct 2026 11:43 am

बिहार MLC चुनाव आज, 8 सीटों पर 150 उम्मीदवारों की किस्मत दांव पर

बिहार विधान परिषद (एमएलसी) की आठ सीटों के लिए प्रचार बुधवार शाम 5 बजे समाप्त हो गया। मतदान 23 अक्टूबर को सुबह 8 बजे से शाम 4 बजे तक होगा।

देशबन्धु 22 Oct 2026 7:40 am

अदालतों के जरिए चुनाव रोकने की कोशिश कर रही है वाईएसआaरसीपी : चंद्रबाबू नायडू

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने वाईएसआर कांग्रेस पार्टी पर आरोप लगाया कि वह अदालतों का दरवाजा खटखटाकर चुनाव और विकास कार्यों को रोकने की कोशिश कर रही है।

देशबन्धु 21 Oct 2026 11:45 pm

आंध्र प्रदेश के साथ नए तनाव के बीच, ओडिशा के मंत्री ने कोटिया सीमा विवाद पर कार्रवाई का आश्वासन दिया

आंध्र प्रदेश के साथ नए तनाव के बीच, ओडिशा के मंत्री ने कोटिया सीमा विवाद पर कार्रवाई का आश्वासन दिया

समाचार नामा 21 Oct 2026 10:36 pm

अदालतों के जरिए चुनाव रोकने की कोशिश कर रही है वाईएसआरसीपी : चंद्रबाबू नायडू

अदालतों के जरिए चुनाव रोकने की कोशिश कर रही है वाईएसआरसीपी : चंद्रबाबू नायडू

समाचार नामा 21 Oct 2026 10:36 pm

'सरकारी मदरसों में भी लागू हो एक जैसी नीति', सीएम धामी के फैसले पर वीएचपी प्रवक्ता विनोद बंसल

'सरकारी मदरसों में भी लागू हो एक जैसी नीति', सीएम धामी के फैसले पर वीएचपी प्रवक्ता विनोद बंसल

समाचार नामा 21 Oct 2026 10:18 pm

नशे के खिलाफ मान सरकार ने नहीं की गंभीरता से कार्रवाई, केंद्र करेगा सख्त कार्रवाई : विजय सांपला

नशे के खिलाफ मान सरकार ने नहीं की गंभीरता से कार्रवाई, केंद्र करेगा सख्त कार्रवाई : विजय सांपला

समाचार नामा 21 Oct 2026 8:22 pm

जम्मू-कश्मीर में मेडिकल इंटर्न्स को बड़ी राहत, मासिक वजीफा बढ़कर 25,000 रुपए हुआ

जम्मू-कश्मीर में मेडिकल इंटर्न्स को बड़ी राहत, मासिक वजीफा बढ़कर 25,000 रुपए हुआ

समाचार नामा 21 Oct 2026 8:19 pm

नक्सलवाद से मुक्त होकर विकास का नया अध्याय लिख रहा है छत्तीसगढ़ : विष्णुदेव साय

नक्सलवाद से मुक्त होकर विकास का नया अध्याय लिख रहा है छत्तीसगढ़ : विष्णुदेव साय

समाचार नामा 21 Oct 2026 4:35 pm

सपा घोषणापत्र जारी करने से पहले जनता के सामने अपना रिपोर्ट कार्ड पेश करे : भाजपा

सपा घोषणापत्र जारी करने से पहले जनता के सामने अपना रिपोर्ट कार्ड पेश करे : भाजपा

समाचार नामा 21 Oct 2026 4:27 pm

बर्नस्टीन : निफ्टी का टारगेट घटाकर 25,000 हुआ

मुंबई, ब्रोकरेज फर्म बर्नस्टीन ने निफ्टी के लिए इस साल के अंत तक का टारगेट प्राइस घटाकर 25,000 कर दिया है, जो कि पहले 26,000 था। इसकी वजह अमेरिका से ट्रेड डील पर अनिश्चितता और भारतीय इक्विटी की आय में सुधार को लेकर चिंताएं बने रहना है।

देशबन्धु 21 Oct 2026 3:56 pm

शेयर बाजार में तेजी के बाद बड़ा उलटफेर, सेंसेक्स 1,400 अंक फिसला; निवेशकों को ₹8.78 लाख करोड़ का झटका

दोपहर करीब 1 बजकर 45 मिनट तक बाजार की तस्वीर पूरी तरह बदल गई थी। दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, सेंसेक्स अपने दिन के उच्चतम स्तर से 1,400.41 अंक फिसलकर 73,281.78 अंक पर आ गया। दूसरी ओर, निफ्टी भी अपने दिन के शिखर से 448.65 अंक नीचे आकर 22,672.25 अंक पर कारोबार करता दिखाई दिया।

देशबन्धु 21 Oct 2026 3:33 pm

दशहरा रैली में उद्धव और शिंदे की ताजा भिड़ंत ने बालासाहेब की विरासत की जंग को और भड़का दिया है

महाराष्ट्र की राजनीति में दशहरा पर्व सियासी शक्ति प्रदर्शन और एक-दूसरे पर हमले का बड़ा मौका भी है। मुंबई में इस बार भी यही नजारा दिखा। दादर के शिवाजी पार्क में उद्धव ठाकरे की हुंकार थी, तो गोरेगांव के नेस्को सेंटर में एकनाथ शिंदे का पलटवार था। दोनों नेता एक-दूसरे पर निशाना साध रहे थे, लेकिन उनकी असली नजर महाराष्ट्र की जनता पर थी, जिसे तय करना है कि बालासाहेब ठाकरे की राजनीतिक विरासत का असली वारिस कौन है। इस बार दोनों रैलियों में ‘रिजीम चेंज’ यानी सत्ता परिवर्तन का मुद्दा भी खास रहा। उद्धव ठाकरे ने केंद्र की भाजपा सरकार को हटाने और सत्ता बदलने की खुली हुंकार भरी। उन्होंने युवाओं के विरोध प्रदर्शनों और वोटर लिस्ट में कथित गड़बड़ियों का हवाला देते हुए सवाल उठाया कि जब लोगों को न्याय नहीं मिलेगा, तो वे सत्ता परिवर्तन की मांग क्यों न करें? जवाब में एकनाथ शिंदे ने तंज कसते हुए कहा कि सत्ता में कौन रहेगा, इसका फैसला जनता करती है। उन्होंने उद्धव को याद दिलाया कि उनकी अपनी पार्टी में भी सत्ता और नेतृत्व का बदलाव हो चुका है। दोनों के इन बयानों का सियासी मतलब यह है कि जहां उद्धव महाराष्ट्र की लड़ाई को केंद्र की भाजपा सरकार के खिलाफ व्यापक विपक्षी अभियान से जोड़ना चाहते हैं, वहीं शिंदे सत्ता परिवर्तन की मांग को जनता के फैसले के खिलाफ विपक्ष की बेचैनी बताकर खारिज करना चाहते हैं। साथ ही उद्धव और शिंदे की दशहरा रैली से जो तस्वीर उभरती है वह साफ बताती है कि यह मुकाबला अब महज दो नेताओं की निजी अदावत नहीं रह गया है। इसके केंद्र में हिंदुत्व की परिभाषा, मराठी अस्मिता, किसानों की बदहाली, चुनावी जनादेश और सत्ता की वैधता जैसे सवाल हैं। दोनों खेमे अपनी-अपनी कहानी सुना रहे हैं, लेकिन असली परीक्षा जनता की अदालत में होनी है। इसे भी पढ़ें: एकनाथ शिंदे का उद्धव ठाकरे पर तीखा हमला: 2019 का गठबंधन ‘जनादेश की डकैती’, ‘इंडिया’ गठबंधन को बताया रावण उद्धव ठाकरे का हमला देखा जाये तो शिवाजी पार्क उद्धव ठाकरे के लिए सिर्फ रैली का मैदान नहीं, राजनीतिक विरासत का प्रतीक है। यही वह जमीन है, जहां बालासाहेब ठाकरे ने शिवसेना की आक्रामक राजनीति को आवाज दी थी। उद्धव इसी विरासत के सहारे अपनी लड़ाई को आगे बढ़ा रहे हैं। उनका संदेश था कि शिवसेना की पहचान किसी चुनाव आयोग के फैसले, किसी सरकारी मुहर या सत्ता के गणित से तय नहीं होगी। उद्धव ने भाजपा के साथ अपने पुराने गठबंधन को बड़ी राजनीतिक भूल बताते हुए कहा कि उसके साथ 25 साल गंवा दिए। उन्होंने कहा कि भाजपा ने बालासाहेब के हिंदुत्व का इस्तेमाल किया और बाद में शिवसेना को ही किनारे कर दिया। यह हमला केवल भाजपा पर नहीं था; इसके जरिए उद्धव ने शिंदे खेमे पर भी सवाल उठाया कि सत्ता की मलाई के लिए शिवसेना की मूल राजनीतिक पहचान से समझौता किसने किया। उद्धव ने मतदाता सूची से कथित रूप से नाम हटाए जाने, संवैधानिक संस्थाओं और केंद्र सरकार की कार्यशैली को लेकर भी सवाल उठाए। युवा प्रदर्शनकारियों को उन्होंने अराजक तत्व नहीं, बल्कि बदलाव की मांग करने वाले क्रांतिकारी बताया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व पर निशाना साधते हुए उन्होंने सत्ता परिवर्तन की जरूरत का संदेश दिया। यानी उद्धव की रणनीति साफ है। शिंदे के पास सरकार हो सकती है, पार्टी का आधिकारिक नाम हो सकता है, विधानसभा में ज्यादा विधायक हो सकते हैं; लेकिन ठाकरे खेमे के पास वह राजनीतिक भावनात्मक पूंजी है, जिसे वह बालासाहेब की विरासत और मराठी अस्मिता के नाम पर भुनाना चाहता है। एकनाथ शिंदे का पलटवार उधर नेस्को सेंटर में एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे को उनके ही पुराने फैसलों के कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की। उनका तर्क था कि 2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ चुनाव लड़कर बाद में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ सरकार बनाना मतदाताओं के जनादेश के साथ विश्वासघात था। शिंदे ने इसे ही सबसे बड़ी ‘वोट चोरी’ करार दिया। देखा जाये तो यह एकनाथ शिंदे की सियासत का केंद्रीय तर्क है। वह उद्धव को याद दिलाना चाहते हैं कि सत्ता की राजनीति में नैतिकता का सवाल उठाने से पहले अपने पुराने फैसलों का हिसाब भी देना पड़ता है। उनके लिए 2022 में शिवसेना से बगावत करना पार्टी को बचाने की लड़ाई है, जबकि उद्धव के लिए वही घटना पार्टी तोड़ने और जनादेश की अवमानना का उदाहरण है। यानि एक ही घटना, परन्तु दो बिल्कुल उलटी व्याख्याएं! उद्धव कहते हैं कि शिवसेना को तोड़ा गया, शिंदे कहते हैं कि उन्होंने शिवसेना को उसकी मूल विचारधारा की ओर लौटाया। उद्धव के लिए शिंदे सत्ता के सहारे विरासत हथियाने वाले नेता हैं, तो शिंदे के लिए उद्धव कांग्रेस के साथ जाकर बालासाहेब की राजनीति से दूर चले गए नेता हैं। देखा जाये तो यही महाराष्ट्र की इस लड़ाई का सबसे दिलचस्प पहलू है। दोनों बालासाहेब का नाम लेते हैं, दोनों भगवे पर अपना दावा जताते हैं और दोनों अपने प्रतिद्वंद्वी को शिवसेना की मूल आत्मा से भटका हुआ बताते हैं। सवाल यह है कि बालासाहेब की विरासत का फैसला नारों से होगा, संगठन से, चुनावी नतीजों से या जनता के वोटों से? हम आपको यह भी बता दें कि इस बार की दशहरा रैलियों में किसानों का मुद्दा भी खूब उछला। महाराष्ट्र के सूखे और संकटग्रस्त किसानों की दुर्दशा ने दोनों नेताओं को एक-दूसरे पर हमला करने का मौका दिया। शिंदे ने किसानों के बीच जाकर मदद पहुंचाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि यह वक्त आरोप-प्रत्यारोप का नहीं, संकट में फंसे किसानों के साथ खड़े होने का है। उनकी ओर से किसानों के लिए राहत सामग्री पहुंचाने और जरूरतमंद परिवारों की मदद करने की बात भी सामने रखी गयी। उन्होंने उद्धव पर सवाल उठाया कि जब किसान परेशान हैं, तब केवल राजनीतिक प्रदर्शन करने से क्या हासिल होगा? वहीं उद्धव ने सरकार की राहत राशि और किसानों की वास्तविक जरूरतों को लेकर सवाल उठाए। उनके हमले का आशय यह था कि सरकार की घोषणाओं और किसानों के हाथ में पहुंचने वाली मदद के बीच बड़ा अंतर है। उन्होंने शिंदे खेमे पर भी निशाना साधा और राजनीतिक बगावत के लिए कथित तौर पर दिए गए पैसों की तुलना किसानों को मिलने वाली छोटी राहत से की। देखा जाये तो महाराष्ट्र की राजनीति में किसान का सवाल कभी सिर्फ खेत और फसल तक सीमित नहीं रहता। वह सत्ता की साख, ग्रामीण नाराजगी और चुनावी समीकरणों से जुड़ जाता है। इसलिए दोनों नेताओं के लिए किसानों का जिक्र जरूरी था। लेकिन किसानों के लिए असली सवाल यह नहीं है कि किस मंच से ज्यादा जोरदार भाषण हुआ; सवाल यह है कि सूखती फसल, कर्ज और घरेलू खर्च के बीच उन्हें ठोस राहत कितनी मिली। इसमें कोई दो राय नहीं कि संगठन और सत्ता के गणित में शिंदे का पलड़ा भारी है। 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में उनकी शिवसेना ने 57 सीटें जीती थीं, जबकि उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) को 20 सीटें मिली थीं। चुनाव आयोग की मान्यता और सरकार में उनकी भागीदारी भी शिंदे को संस्थागत बढ़त देती है। इसके बावजूद शिवाजी पार्क का ऐतिहासिक मंच उद्धव के पास बना रहना बताता है कि राजनीतिक विरासत और चुनावी ताकत हमेशा एक ही तराजू में नहीं तौली जातीं। महाराष्ट्र की इस लड़ाई में दोनों नेताओं की कमजोरियां भी साफ हैं। जहां उद्धव को साबित करना है कि भावनात्मक समर्थन को चुनावी ताकत में बदला जा सकता है। वहीं शिंदे को साबित करना है कि पार्टी का नाम, विधायक और सत्ता होने के अलावा बालासाहेब की विरासत भी उन्हीं के साथ है। बहरहाल, दशहरा रैली में तीर खूब चले, लेकिन सियासी रावण अभी पूरी तरह गिरा नहीं है। महाराष्ट्र की राजनीति में अगला अध्याय इस बात से तय होगा कि जनता किसकी कहानी पर भरोसा करती है उद्धव की, जिन्होंने पार्टी तोड़े जाने का दर्द अपनी राजनीति का आधार बनाया है, या शिंदे की, जो इसे शिवसेना को उसकी मूल दिशा में लौटाने की लड़ाई बताते हैं। फिलहाल महाराष्ट्र में भगवा एक है, लेकिन उसके दावेदार दो हैं। एक कहता है, शिवसेना हमारी विरासत है; दूसरा कहता है, शिवसेना हमारी असली पहचान है। इसी खींचतान में महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल गूंज रहा है कि बालासाहेब के नाम पर तालियां कौन बटोरेगा और जनता के वोट कौन जीतेगा? -नीरज कुमार दुबे

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