भारत पहुंचे पुतिन, PM मोदी के साथ शुरू हुई अहम बैठक; रक्षा-ऊर्जा और व्यापार पर होगी चर्चा
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लगातार बदलते हुए वैश्विक हालातों में जहां पल-पल अनिश्चितता और अराजकता के बादल मंडरा रहे हैं। ऐसे में हाल ही में जहां किर्गिस्तान की राजधानी बिकेक पे एससीओ का समिट खत्म हुआ। जहां दुनिया की तीन बड़ी महाशक्तियों जिनमें चीन, रूस और भारत शामिल है जो कि तीनों एशिया में हैं। उनके बड़े नेता वहां पर मौजूद रहे। चाहे चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग हो, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन हो या भारत के प्रधानमंत्री मोदी हो। ऐसे में अब बारी है एक और समिट की जो कि दिल्ली में चल रही है। 18वां ब्रिक्स सम्मेलन जिसमें शामिल होने के लिए रूस के राष्ट्रपति शी जिनपिंग दिल्ली पहुंच चुके हैं। वहीं चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भी भारत आने की तैयारियां जोर शोर से चल रही है। बैक चैनल से भी, डिप्लोमेटिक चैनल से भी। अगर ऐसा होता है तो फिर यह ऐतिहासिक होगा। क्योंकि अगर जिनपिंग भी भारत आते हैं तो यह करीब 7 साल के बाद उनकी भारत की पहली यात्रा होगी। इसे भी पढ़ें: Strait of Hormuz का नाम बदलकर Trump Strait रखने की तैयारी, Iran पर US का कड़ा रुख दुनिया में टेंशन का माहौल इस साल यानी कि 2026 में ब्रिक्स का जो कमान है, जो अध्यक्षता है वो भारत के पास है। ब्रिक्स दुनिया की बड़ी अभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं का समूह है। इसमें भारत के अलावा रूस, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका कोर मेंबर्स तो है ही। इनके साथ ही मिस्र यानी कि इजिप्ट, ईरान, इथियोपिया, यूएई यानी कि संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया भी शामिल है। ध्यान रखिए कि इसमें ईरान और यूएई दोनों शामिल है। जिनके बीच इस समय जंग के कारण ठनी हुई है। भारत की अध्यक्षता में पूरे साल अलग-अलग शहरों में बैठकें, मंत्री स्तरीय सम्मेलन और कई स्तर की चर्चाएं हो रही हैं। भारत का भी मुख्य फोकस ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत करने, आर्थिक सहयोग को बढ़ाने, ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करने, डिजिटल तकनीक को शेयर करने और उसका इजाद करने, आतंकवाद से निपटने और सप्लाई चेन को मजबूत करने पर है। यानी कि ब्रिक्स को सिर्फ राजनीतिक मंच नहीं बल्कि व्यापार, निवेश और विकास के बड़े मंच के तौर पर आगे बढ़ाने की तमाम देशों की कोशिश है। क्या है ब्रिक्स ब्रिक्स दुनिया की प्रमुख उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं और विकासशील देशों का एक प्रभावशाली अंतर सरकारी संगठन है। इसके सदस्य शुरुआत में तो ब्राजील, रूस, भारत और चीन रहे यानी कि ब्रिक। लेकिन बाद में एक साल के बाद ही 2010 में दक्षिण अफ्रीका भी शामिल हुआ और इसे ब्रिक्स कहा जाने लगा। इसके बाद हाल ही के वर्षों में कई अन्य देश भी इसके साथ जुड़े। जिसमें इसकी कुल संख्या 10 प्रमुख देशों की हो चुकी है। नए सदस्य देशों में मिस्र, इथियोपिया, ईरान और यूएई शामिल है। इसका मकसद वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद यानी कि जीडीपी और व्यापार में अपनी हिस्सेदारी को मजबूत करना है। न्यू डेवलपमेंट बैंक यानी कि एनडीबी के माध्यम से बुनियादी ढांचा और विकास परियोजनाओं को बढ़ावा देना है। और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों जैसे कि विश्व बैंक यानी कि वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ जैसे तमाम जो संगठन है संस्थान हैं वहां पर विकासशील देशों की बेहतर आवाज और सुधार सुनिश्चित करना है। इसे भी पढ़ें: ईरान ने Marco Rubio के 'Proxy' दावे को किया खारिज, Houthis को बताया स्वतंत्र यमनी गुट क्या ब्रिक्स से बढ़ेगा भारत का कद? अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का स्थान लगातार बढ़ रहा है। वजह साफ है। जब भी दुनिया पर संकट आया हमेशा भारत ने मदद का हाथ बढ़ाया। खास बात यह भी है कि भारत सिर्फ अपने लिए आवाज नहीं उठाता बल्कि भारत तो विकासशील देशों यानी कि ग्लोबल साउथ की मजबूत आवाज भी बन गया है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे देश भारत को अपने हितों के पैरोकार के तौर पर देखते हैं क्योंकि भारत एक ही समय में अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ यानी कि जैसे क्वाड जैसे संगठन है जिसमें जापान, ऑस्ट्रेलिया भी शामिल है या फिर G7 में भी आमंत्रित देशों के तौर पर सही। लेकिन लगभग हर बार शामिल होता आ रहा है। वहां पर यूरोप के देश भी मौजूद रहते हैं। फ्रांस, जर्मनी, इटली जबकि ब्रिक्स और एससीओ जैसे मंचों पर रूस और चीन के साथ संबंध निभा रहा है भारत। यह संतुलित कूटनीति ही साबित करती है कि भारत स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करता है। साथ ही भारत वैश्विक व्यापार और वित्तीय सुधारों में भी अपनी डिजिटल ताकत का लोहा मनवा रहा है। भारत का यूपीआई डिजिटल भुगतान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लेनदेन को आसान बनाने में बड़ी अहम भूमिका निभा रहा है। क्या चीन से सुलझेगा सीमा विवाद? भारत और चीन दोनों के बीच सीमा विवाद आज का नहीं है बल्कि दशकों पुराना है। दोनों के बीच एक बार जंग भी हो चुकी है 1962 में और दोनों के सैनिकों के बीच कई बार झड़पें भी हुई। डोकलाम गलवान इसका ताजा उदाहरण है। फिर भी चीन के साथ हमारा व्यापार बढ़ता जा रहा है। लेकिन इसमें ज्यादा फायदा चीन को है। भारत को नुकसान है। ऐसे में अगर राष्ट्रपति शनिपिंग भारत आते हैं तो उसमें एलएसी पर शांति और सीमा विवाद सबसे मुख्य मुद्दा हो सकता है। दोनों देश सीमा पर ऐसी व्यवस्था बनाने पर बात कर रहे हैं जिससे किसी सैन्य घटना या तनाव का असर द्विपक्षीय रिश्तों पर ना पड़े। जिनपिंग की संभावित यात्रा से पहले एनएसए अजीत डोभाल सीमा मुद्दे पर 25वें दौर की विशेष प्रतिनिधि वार्ता के लिए बीजिंग जा चुके हैं। वहां पर उनकी चीन के विदेश मंत्री वांग ही से मुलाकात भी हुई और चीन के उपराष्ट्रपति से भी मुलाकात हुई। दोनों देश वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी कि एलएसी पर चीन निर्धारण की प्रक्रिया में जो सीमा का निर्धारण है उसमें तेजी लाने और ठोस नतीजे पाने के लिए सहमत हुए हैं। साथ ही सीमा पर किसी भी तनाव को बढ़ने से रोकने के लिए नए सैन्य संपर्क चैनल और हॉट लाइन स्थापित करने का भी फैसला लिया गया है। हालांकि वर्ष 2020 की गलवान घाटी की घटनाओं के बाद से रिश्तों में खटास आई है। अविश्वास पैदा हुआ है। उसे पूरी तरीके से खत्म करने में भी समय लगेगा। ब्रिक्स (BRICS) के एजेंडे में अहम मिनरल्स (critical minerals) इतने अहम क्यों हो गए हैं? ब्रिक (BRIC) की शुरुआत 2009 में ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन के एक अनौपचारिक समूह के तौर पर हुई थी। यह समूह वित्तीय व्यवस्था में सुधार के मकसद से बना था, जिसे ज़्यादातर लोग पश्चिमी देशों के पक्ष में झुका हुआ मानते थे। 2010 में दक्षिण अफ़्रीका इस समूह में शामिल हुआ, जिसके बाद इसका नाम बदलकर ब्रिक्स (BRICS) कर दिया गया। शुरुआती सालों में, यह समूह मुख्य रूप से मैक्रो-इकोनॉमिक और डेवलपमेंट फ़ाइनेंस से जुड़े मुद्दों पर तालमेल बिठाने वाले मंच के तौर पर काम करता था। इस दिशा में इसकी सबसे ठोस उपलब्धि 2014 में 'न्यू डेवलपमेंट बैंक' की स्थापना थी। 2024 में, ब्रिक्स ने चार नए पूर्ण सदस्य देशों — मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) — को शामिल किया और 2025 में इंडोनेशिया इसका पूर्ण सदस्य बना। ब्रिक्स के सहयोगी देशों में बेलारूस, बोलीविया, क्यूबा, कजाकिस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम शामिल हैं। सऊदी अरब को इस समूह का पूर्ण सदस्य माना जाता है; हालाँकि, देश ने अभी तक इसमें शामिल होने के अपने इरादे की औपचारिक घोषणा नहीं की है, जिससे उसकी स्थिति स्पष्ट नहीं है। अफ्रीका, दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया, पश्चिम एशिया, मध्य एशिया और लैटिन अमेरिका तक फैले इस समूह में दुनिया की 49.5 प्रतिशत आबादी रहती है, और यह वैश्विक जीडीपी का 40 प्रतिशत तथा वैश्विक व्यापार का 26 प्रतिशत हिस्सा है। अगले कुछ सालों में, जैसे-जैसे ब्रिक्स का विस्तार हुआ, इसका एजेंडा भी बढ़ा। इसमें आतंकवाद-रोधी सहयोग, टेलीकम्युनिकेशन, कृषि, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, श्रम, और बहुपक्षीय संगठनों व वित्तीय प्रणालियों में सुधार जैसे मुद्दे शामिल किए गए। रूस की अध्यक्षता में हुए 2024 कज़ान शिखर सम्मेलन में 'क्रिटिकल मिनरल्स' (महत्वपूर्ण खनिज) औपचारिक रूप से ब्रिक्स के एजेंडे का हिस्सा बने। कज़ान शिखर सम्मेलन में जियोलॉजिकल प्लेटफॉर्म बनाने को भी मंज़ूरी दी गई, हालाँकि इसे अभी तक पूरी तरह से लागू नहीं किया गया है। ब्रिक्स सदस्य देशों की 'क्रिटिकल मिनरल वैल्यू चेन' में क्या भूमिका है? ब्रिक्स सदस्य देशों के पास 'क्रिटिकल मिनरल वैल्यू चेन' में खास खूबियां हैं। इनमें एनर्जी ट्रांज़िशन, डिफेंस अपग्रेडेशन, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और डिजिटलाइज़ेशन के लिए ज़रूरी अनछुए भंडार से लेकर मिडस्ट्रीम प्रोसेसिंग, कैपिटल एक्सपेंडिचर और बड़े कंज्यूमर मार्केट तक शामिल हैं। अगर इन खूबियों को एक साथ लाया जाए, तो यह ब्लॉक वैल्यू चेन को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। अभी यह चेन बिखरी हुई है; जिन देशों के पास अनछुए भंडार हैं, उनके पास प्रोसेसिंग की क्षमता नहीं है, जबकि जिन देशों में कंज्यूमर डिमांड और कैपिटल है, उनके पास रिसोर्स की कमी है। ब्रिक्स सदस्य देशों के पास रेयर अर्थ एलिमेंट्स (REE) के बड़े भंडार हैं। इनमें चीन के पास सबसे बड़ा और ब्राज़ील के पास दूसरा सबसे बड़ा भंडार है। साथ ही, इनके पास ग्रेफाइट के भी बड़े भंडार हैं। ब्राज़ील के पास लिथियम और कॉपर के भी काफी भंडार हैं। अकेले इंडोनेशिया दुनिया के निकेल उत्पादन का आधे से ज़्यादा हिस्सा पैदा करता है और कोबाल्ट का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। भारत में REE और ग्रेफाइट का काफ़ी भंडार है। रूस और दक्षिण अफ़्रीका प्लेटिनम ग्रुप की धातुओं के मुख्य उत्पादक हैं। रूस के पास निकेल और तांबे का भी बड़ा भंडार है। ब्रिक्स (BRICS) के सहयोगी देशों के पास भी खनिजों का बड़ा भंडार है। बोलीविया 'लिथियम ट्राएंगल' का हिस्सा है, जिसके पास दुनिया का आधे से ज़्यादा लिथियम भंडार है। साथ ही, कजाकिस्तान में यूरेनियम का सबसे बड़ा भंडार है और वह यूरेनियम का प्रमुख उत्पादक है; इसके अलावा, वह तांबे का भी एक महत्वपूर्ण उत्पादक है। वियतनाम में भी REE और ग्रेफाइट का काफ़ी भंडार है। भारत ज़रूरी मिनरल सप्लाई चेन में कमियों को कैसे दूर कर सकता है? एक भरोसेमंद पार्टनर के तौर पर भारत की पहचान कोई नई बात नहीं है। गुटनिरपेक्ष रहने की परंपरा, 'ग्लोबल साउथ' की आवाज़ बनने का लंबा इतिहास और चीन के उलट, छोटे या गरीब देशों के खिलाफ़ संसाधनों पर निर्भरता का इस्तेमाल कूटनीतिक हथियार के तौर पर न करने का रिकॉर्ड — इन सब वजहों से नई दिल्ली को सिर्फ़ संसाधन निकालने वाली ताकत के बजाय एक डेवलपमेंट पार्टनर के तौर पर देखा जाता है।भारत विकासशील और विकसित दुनिया के बीच एक ईमानदार बातचीत करने वाले देश के तौर पर उभरा है, और यह भूमिका भरोसे पर टिकी है। भारत ने अपनी इस स्थिति का इस्तेमाल जयपुर में ब्रिक्स 2026 ट्रेड मिनिस्टर्स की मीटिंग और नई दिल्ली में ब्रिक्स एनवायरनमेंट मिनिस्टर्स की 12वीं मीटिंग में ज़रूरी मिनरल्स को सहयोग का ज़रिया बनाने के लिए किया है। मंत्रियों की मीटिंग से आगे बढ़कर, भारत लंबे समय से ज़रूरी मिनरल्स को सहयोग का ज़रिया बनाने की वकालत करता रहा है। उसने जियोलॉजिकल प्लेटफ़ॉर्म को पूरी तरह से चालू करने की भी पैरवी की है, जिसके ज़रिए ब्रिक्स देशों के बीच डेटा-शेयरिंग, निकालने की टेक्नोलॉजी और जियोलॉजिकल रिसर्च में सहयोग हो सके।
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BRICS Summit में Modi का शक्ति प्रदर्शन देखकर Pakistan में मची है जबरदस्त खलबली
नई दिल्ली में आयोजित हो रहे 18वें ब्रक्स शिखर सम्मेलन की गूंज वैसे तो पूरी दुनिया में सुनाई दे रही है लेकिन पाकिस्तान के सत्ता और रक्षा प्रतिष्ठान में इसे लेकर जबरदस्त सन्नाटा छाया हुआ है। सन्नाटा इसलिए है क्योंकि शहबाज शरीफ से लेकर असीम मुनीर तक, आसिफ अली जरदारी से लेकर ख्वाजा आसिफ तक और इशाक डार से लेकर पाकिस्तान के अन्य बड़बोले नेताओं तक की नजरें टीवी चैनलों पर लगी हुई हैं और जैसे जैसे वैश्विक नेता एक एक कर दिल्ली की धरती पर उतर रहे हैं वैसे वैसे पाकिस्तान हुक्मरानों का गला सूखता जा रहा है। हम आपको बता दें कि इस्लामाबाद के लिए दिल्ली का यह सम्मेलन इसलिए असहज करने वाला है क्योंकि यहां चीन, ईरान और सऊदी अरब जैसे उसके अपने रणनीतिक साझेदार भी मौजूद हैं। पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्टें दर्शा रही हैं कि इस्लामाबाद की कुटिल नजर भारत-चीन संबंधों के संभावित सुधार पर टिकी हुई हैं। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय से भी बाकायदा चीन-भारत बढ़ती नजदीकी पर सवाल पूछा गया, जिस पर उसने कहा कि चीन के साथ उसकी “all-weather” साझेदारी किसी तीसरे देश के साथ चीन के संबंधों से प्रभावित नहीं होगी। लेकिन यही स्पष्टीकरण बताता है कि सवाल कितना महत्वपूर्ण हो चुका है। इसे भी पढ़ें: ब्रिक्स@20: सपने बड़े, चुनौतियां उससे बड़ी, ब्रिक्स की ‘ब्रिक’ कितनी मजबूत? पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा झटका मोदी-शी जिनपिंग की मुलाकात होने वाली है। सात साल बाद शी जिनपिंग का भारत आना अपने आप में बड़ा संकेत है। सीमा विवाद के बाद दोनों देशों ने धीरे-धीरे संवाद बहाल किया है और अब व्यापार, निवेश, सीमा प्रबंधन तथा रणनीतिक संवाद पर आगे बढ़ने की कोशिश हो रही है। पाकिस्तान के लिए समस्या यह है कि उसकी सुरक्षा रणनीति लंबे समय से इस धारणा पर टिकी रही है कि भारत को दो मोर्चों पर एक साथ दबाव में रखा जा सकता है। लेकिन अगर बीजिंग और नई दिल्ली टकराव से प्रतिस्पर्धी सह-अस्तित्व की ओर बढ़ते हैं, तो इस्लामाबाद का वह रणनीतिक गणित कमजोर पड़ सकता है। साथ ही पाकिस्तान इसलिए भी परेशान है कि यदि भारत और चीन के संबंध सुधरे तो भविष्य के भारत-पाक संघर्ष में बिना बीजिंग के सहयोग के इस्लामाबाद के लिए मैदान में कुछ घंटे टिक पाना भी मुश्किल हो जायेगा। दूसरा मोर्चा मोदी-पुतिन समीकरण है। दोनों नेताओं की बैठक में S-400 की अंतिम यूनिट की डिलीवरी और अगली पीढ़ी के BrahMos पर चर्चा हो रही है। भारत को चार S-400 रेजिमेंट मिल चुकी हैं और पांचवीं की डिलीवरी पर रूस ने अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। पाकिस्तान के लिए यह इसलिए चिंता का विषय है क्योंकि भारत की वायु-रक्षा और लंबी दूरी की मारक क्षमता में रूसी सहयोग उसकी सैन्य गणना को और कठिन बनाता है। आने वाले समय में BrahMos के उन्नत संस्करण और संयुक्त उत्पादन पर बातचीत इस तस्वीर को और गंभीर बना सकती है। हम आपको याद दिला दें कि पिछले साल हुए भारत-पाक सैन्य संघर्ष के दौरान रूस की एस-400 ने पाकिस्तान के लगभग सभी हमलों को निष्क्रिय कर दिया था। उस समय पाकिस्तान ने चीन और तुर्की से रक्षा उपकरण लेकर भारत पर निशाने साधे थे लेकिन एस-400 के आगे कोई नहीं टिक पाया था। ऐसे में पाकिस्तान की नजरें इस बात पर बनी हुई हैं कि भारत और रूस के बीच क्या नये रक्षा समझौते होने जा रहे हैं। पाकिस्तान की तीसरी चिंता सऊदी अरब और चौथी ईरान को लेकर है। BRICS की मेज पर सऊदी अरब और ईरान दोनों हैं, जबकि पश्चिम एशिया अब भी संघर्ष की आग में झुलस रहा है। पाकिस्तान के लिए यह बेहद असहज परिस्थिति है क्योंकि एक तरफ वह सऊदी अरब के साथ अपने सुरक्षा संबंधों को महत्वपूर्ण मानता है, दूसरी तरफ भारत के खाड़ी देशों के साथ रिश्ते लगातार गहरे हो रहे हैं। इसी बीच ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन भारत पहुंचे हैं और मोदी के साथ उनकी द्विपक्षीय वार्ता भी हो रही है। पाकिस्तान की चिंता यहां यह है कि सऊदी अरब के साथ वह हाल ही में मक्का पैक्ट में शामिल हुआ है। ऐसे में यदि भारत और सऊदी अरब के संबंध और मजबूत होते हैं तो मक्का पैक्ट के पैकेट की हवा पूरी तरह निकल जायेगी। साथ ही ईरानी राष्ट्रपति से मोदी की बातचीत के बाद यदि पश्चिम एशिया के हालात में सुधार होता है तो पाकिस्तान की उस पूरी कूटनीतिक कवायद पर पानी फिर जायेगा जिसके तहत कभी अमेरिका और ईरान को इस्लामाबाद बुलाकर वार्ता कराई गयी तो कभी शहबाज शरीफ और असीम मुनीर भागे भागे तेहरान और वाशिंगटन के चक्कर लगाते रहे। साथ ही पाकिस्तान को एक और कारण से बेचैनी हो रही है। दरअसल जिस BRICS में पाकिस्तान सदस्यता चाहता है, उसी मंच की मेजबानी भारत कर रहा है और विस्तार के लिए सर्वसम्मति जरूरी होने के कारण पाकिस्तान की सदस्यता की राह में भारत की आपत्ति निर्णायक बाधा है। हम आपको यह भी बता दें कि इस समय पाकिस्तान के टीवी चैनलों और सोशल मीडिया मंचों पर चल रही डिबेटस में मोदी की सफल कूटनीति का विश्लेषण करने के साथ-साथ शहबाज और मुनीर की जोड़ी की कूटनीतिक विफलताओं पर भी खुलकर चर्चा की जा रही है। बहरहाल, कुल मिलाकर देखें तो दिल्ली का BRICS सम्मेलन इस्लामाबाद को इसलिए भी बहुत ज्यादा असहज कर रहा है क्योंकि यह बदलते दक्षिण एशियाई शक्ति-संतुलन का आईना बनकर उभर रहा है। -नीरज कुमार दुबे
'आकाश आनंद ढूंढ रहे राजनीतिक ठिकाना तो समाजवादी पार्टी में उनका स्वागत', बसपा से निष्कासन पर बोले सपा नेता
दिल्ली इस समय दुनिया की कूटनीति का नया केंद्र बन गई है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए एक के बाद एक दुनिया के प्रमुख नेता भारत पहुंच रहे हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी द्विपक्षीय मुलाकातों का लंबा सिलसिला यह बताने के लिए काफी है कि भारत की वैश्विक भूमिका अब कितनी तेजी से बढ़ रही है। रूस से लेकर चीन, ईरान से लेकर खाड़ी देशों और अफ्रीका से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक, इन मुलाकातों के जरिए भारत एक साथ कई मोर्चों पर अपने रिश्तों को मजबूत कर रहा है। यह केवल नेताओं की मुलाकात नहीं, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की बढ़ती ताकत, उसकी स्वतंत्र विदेश नीति और अपनी शर्तों पर सभी प्रमुख शक्तियों के साथ संबंध बनाए रखने की रणनीति का स्पष्ट संकेत है। इन मुलाकातों की शुरुआत 11 सितंबर यानि आज रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ होगी। रूस भारत का पुराना और भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार है। ऐसे समय में जब रूस और पश्चिम के बीच तनाव बना हुआ है, पुतिन के साथ मोदी की बातचीत का महत्व और बढ़ जाता है। रक्षा सहयोग, ऊर्जा, परमाणु क्षेत्र, अंतरिक्ष और यूरेशियाई भू-राजनीति जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के रिश्ते भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का महत्वपूर्ण आधार हैं। इसे भी पढ़ें: रूस-भारत संबंध नई ऊंचाइयों पर इसके बाद ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस से मुलाकातें होंगी। ईरान के साथ संवाद पश्चिम एशिया में भारत के हितों, ऊर्जा सुरक्षा और चाबहार बंदरगाह जैसे संपर्क-साधनों के लिहाज से अहम है। वहीं गुटेरेस के साथ बातचीत यह संकेत देती है कि भारत वैश्विक संस्थाओं में सुधार और विकासशील देशों की आवाज को मजबूत करने के सवाल पर अपनी भूमिका को और मुखर करना चाहता है। 12 सितंबर का कार्यक्रम भारत की ‘एक साथ कई मोर्चों पर साझेदारी’ वाली रणनीति को स्पष्ट करता है। इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबीय अहमद अली, मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम, अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान और वियतनाम के प्रधानमंत्री ले मिन्ह हंग के साथ बैठकें भारत के लिए अफ्रीका, आसियान, खाड़ी और हिंद-प्रशांत, चारों दिशाओं में अपनी पहुंच मजबूत करने का अवसर हैं। खासकर वियतनाम और मलेशिया के साथ संबंध हिंद-प्रशांत में भारत की सक्रियता तथा समुद्री सुरक्षा के संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं। इसी दिन राष्ट्रपति पेजेशकियन की राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति से मुलाकात भी भारत-ईरान संबंधों की व्यापकता को रेखांकित करती है। लेकिन सबसे अधिक निगाहें शाम को होने वाली प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बैठक पर रहेंगी। भारत-चीन संबंधों में सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच शीर्ष स्तर की बातचीत यह संदेश देती है कि भारत प्रतिस्पर्धा के बावजूद संवाद के रास्ते बंद नहीं करना चाहता। यह ‘प्रतिस्पर्धा के साथ सह-अस्तित्व और संवाद’ वाली व्यावहारिक कूटनीति का संकेत है। 13 सितंबर को कजाखस्तान, फिलीपींस, मिस्र और दक्षिण अफ्रीका के नेताओं के साथ बातचीत इस रणनीति को और व्यापक बनाती है। कजाखस्तान भारत के लिए मध्य एशिया तक पहुंच का महत्वपूर्ण द्वार है, फिलीपींस हिंद-प्रशांत में समुद्री साझेदारी की दृष्टि से अहम है, जबकि मिस्र स्वेज नहर और पश्चिम एशिया-अफ्रीका के बीच भारत की कनेक्टिविटी के लिए महत्वपूर्ण है। दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा के साथ संवाद भारत-अफ्रीका साझेदारी और ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने के लिहाज से विशेष महत्व रखता है। बुरुंडी, नाइजीरिया और युगांडा के शीर्ष नेतृत्व के साथ मुलाकातें भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। ये बैठकें बताती हैं कि भारत अफ्रीका को केवल व्यापारिक बाजार के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य की वैश्विक राजनीति में एक महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में देख रहा है। देखा जाये तो इन द्विपक्षीय बैठकों का सबसे बड़ा संदेश यही है कि भारत किसी एक शक्ति-गुट के साथ खड़े होने के बजाय सभी प्रमुख शक्ति केंद्रों के साथ अपने हितों के आधार पर संबंधों को संतुलित करने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है। रूस से रक्षा और ऊर्जा, ईरान से कनेक्टिविटी, खाड़ी से निवेश और ऊर्जा, चीन से संवाद, आसियान से हिंद-प्रशांत सहयोग और अफ्रीका से ग्लोबल साउथ की साझेदारी, इन सभी को एक साथ साधने की कोशिश दिखाई देती है। यही भारत की सामरिक स्वायत्तता का नया रूप है। दिल्ली में होने वाली ये मुलाकातें दुनिया को यह संदेश देंगी कि भारत अब केवल वैश्विक व्यवस्था का सहभागी नहीं, बल्कि उसके स्वरूप और दिशा को प्रभावित करने वाली एक निर्णायक शक्ति बनने की ओर बढ़ रहा है। -नीरज कुमार दुबे
कांग्रेस फैला रही 'ब्रिक्स' को लेकर नकारात्मकता: संबित पात्रा
नई दिल्ली, भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और लोकसभा सांसद संबित पात्रा ने ब्रिक्स समिट को लेकर कांग्रेस समेत विपक्षी दलों पर निशाना साधा है।
नीला रंग अपनाने से नहीं बदलेगी जातिवादी सोच: मायावती
लखनऊ, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती ने समाजवादी पार्टी (सपा), कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों पर तीखा हमला बोलते हुए उनके नीले रंग अपनाने को लेकर सवाल उठाए हैं।
'पंजाब में भाजपा और अकाली दल साथ आए तो सत्ता तक पहुंचना मुश्किल नहीं', रामदास आठवले बोले- गठबंधन पर चल रही बातचीत
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ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए दिल्ली में 15,000 पुलिसकर्मी तैनात
राजधानी दिल्ली में आगामी 12 और 13 सितंबर को आयोजित होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को ध्यान में रखते हुए सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं
'एसआईआर के तहत तैयार ड्राफ्ट वोटर लिस्ट अंतिम नहीं,' महाराष्ट्र के सीईओ ने मतदाताओं को दिया भरोसा
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उत्तर प्रदेश विधायकों की पेंशन और भत्तों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, याचिका पर जारी किया नोटिस
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कर्नाटक में सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति उजागर, सीजेपी ने शिक्षकों की कमी पर उठाए सवाल
कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रतिनिधिमंडल ने बेंगलुरु के चार सरकारी स्कूलों का दौरा कर शिक्षकों की कमी, स्कूलों की जर्जर आधारभूत संरचना और स्वच्छता व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंता जताई
'इन दो सवालों का जवाब दें', कांग्रेस विधायक ने सीएमआरएल-एक्सलॉजिक मामले में रियास को चुनौती दी
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ब्रिक्स 2026 समिट पूर्व रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भारत आगामी दौरे से काफी उम्मीदें हैं, और इस पर तेज़ी से काम चल रहा है। भारत अपनी 2026 की अध्यक्षता के तहत 18वें ब्रिक्स समिट की मेज़बानी कर रहा है। यह समिट 12-13 सितंबर, 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में होना तय है। राष्ट्रपति पुतिन के मुख्य समिट से एक दिन पहले, 11 सितंबर को नई दिल्ली पहुँचने की उम्मीद है। उनके दौरे में हैदराबाद हाउस में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक खास द्विपक्षीय बैठक होगी, जिसमें कई रणनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर चर्चा की जाएगी। यह एक साल से भी कम समय में पुतिन का दूसरा दौरा होगा- पिछला दौरा दिसंबर 2025 में 23वें भारत-रूस वार्षिक समिट के लिए हुआ था। भारत ‘अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय’ (आईसीसी) का सदस्य नहीं है; इसलिए गिरफ्तारी वारंट का मुद्दा, जैसा कि 2023 में दक्षिण अफ्रीका में हुआ था, यहाँ लागू नहीं होता। द्विपक्षीय एजेंडा में कई अहम क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किए जाने की उम्मीद है: रक्षा और परमाणु ऊर्जा: क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने पुष्टि की: भारत को एडवांस्ड सू-57 फाइटर जेट्स की बिक्री एजेंडा में सबसे ऊपर होगी। पेस्कोव ने मंगलवार को नई दिल्ली में ब्रिक्स नेताओं के समिट से पहले भारतीय पत्रकारों के साथ एक वर्चुअल बातचीत में यह बात कही। अमका में देरी के बाद भारतीय वायु सेना दो स्क्वाड्रन पर विचार कर रहा है। चर्चा में भारत को 5वीं पीढ़ी के सू-57 फाइटर एयरक्राफ्ट के अलावा एस-500 सिस्टम की संभावित बिक्री भी शामिल होने की उम्मीद है। इसके अलावा, रूस नए परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने पर भारत के साथ बातचीत का इंतज़ार कर रहा है। इसे भी पढ़ें: हालिया टकराव के बाद Iran और खाड़ी देशों का BRICS में होगा आमना-सामना, अब मोदी की कूटनीति देखेगी दुनिया व्यापार और वित्तीय सहयोग: दोनों देशों के पश्चिमी प्रतिबंधों के असर को कम करने के लिए राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने पर ज़ोर देने की उम्मीद है। रूसी अधिकारियों ने बताया है कि ब्रिक्स देशों के साथ उनके 90 प्रतिशत तक लेन-देन अब राष्ट्रीय मुद्राओं में किए जाते हैं, जो वित्तीय मज़बूती की दिशा में एक कदम है। द्विपक्षीय व्यापार का लक्ष्य $100 बिलियन है। रेयर अर्थ (दुर्लभ खनिजों) की खोज में सहयोग भी एजेंडा में शामिल है। भारत को सेमीकंडक्टर के लिए इनकी ज़रूरत है। रूस के पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा भंडार है, जबकि भारत के पास वैश्विक भंडार का लगभग सात प्रतिशत हिस्सा है। रूस रेयर अर्थ खनिजों की खोज में भारत की मदद कर सकता है। टेक्नोलॉजी और मैन्युफैक्चरिंग: पेमेंट की दिक्कतों के कारण भारत-रूस व्यापार $65 बिलियन पर अटका हुआ है, क्योंकि रूस को डॉलर इम्पोर्ट करने की इजाज़त नहीं है। रूस और ब्रिक्स के बीच अब लगभग 90% लेन-देन नेशनल करेंसी में हो रहा है, और रुपये के सरप्लस (अतिरिक्त) का मुद्दा धीरे-धीरे सुलझाया जा रहा है। रुपये का वह ढेर - रूस के पास भारतीय बैंकों में लगभग $8 बिलियन अतिरिक्त रुपये पड़े हैं जिनका वह इस्तेमाल नहीं कर सकता - मुख्य मुद्दों में से एक होगा। समिट से पहले, भारतीय इंडस्ट्रियल एजेंसियां मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में गहरे संबंधों के लिए माहौल तैयार कर रही हैं। समिट के दौरान, भारत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग, क्वांटम टेक्नोलॉजी और सेमीकंडक्टर रिसर्च में सरकार और रिसर्च के स्तर पर करीबी सहयोग को बढ़ावा देने की उम्मीद कर रहा है। भू-राजनीतिक पहलू भू-राजनीतिक नज़रिए से, यह दौरा भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के प्रति प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है। नई दिल्ली रूस पर अपनी पारंपरिक रक्षा और ऊर्जा निर्भरता को संतुलित करते हुए अमेरिका के साथ सहयोग को गहरा कर रही है और व्यापक क्षेत्रीय स्थितियों को भी संभाल रही है। इसके अलावा, राष्ट्रपति पुतिन मोदी को यूक्रेन युद्ध की मौजूदा स्थिति के बारे में जानकारी देंगे - भारत को फिर से एक संभावित मध्यस्थ के रूप में देखा जा रहा है। मॉस्को ने यूक्रेन संघर्ष का शांतिपूर्ण समाधान खोजने के प्रयासों में योगदान देने की भारत की इच्छा का सार्वजनिक रूप से स्वागत किया है, जिससे राजनयिक बातचीत में एक सकारात्मक माहौल बना है। ट्रंप प्रशासन ने भारत को रूसी तेल खरीदने (50% टैरिफ की धमकी) के बारे में चेतावनी दी है, लेकिन भारत की ऊर्जा ज़रूरतें ज़्यादा अहम हैं। अमेरिका इस समिट पर बारीकी से नज़र रखेगा क्योंकि इसमें डी-डॉलराइज़ेशन पर चर्चा हो सकती है - पेस्कोव पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं: रूस डी-डॉलराइज़ेशन नहीं चाहता; अमेरिका ने खुद डॉलर को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया है। भारत की 2026 ब्रिक्स अध्यक्षता की थीम, मज़बूती, इनोवेशन, सहयोग और सस्टेनेबिलिटी के लिए निर्माण के तहत, समिट 11-सदस्यीय समूह में व्यावहारिक सहयोग को बढ़ाने पर भी ध्यान केंद्रित करेगा। इसमें डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को आगे बढ़ाना, क्लाइमेट एक्शन और प्रस्तावित ग्लोबल रिसर्च एडवांस्ड इंफ्रास्ट्रक्चर नेटवर्क (GRAIN) जैसी मल्टीलेटरल पहल शामिल हैं, जो सदस्य देशों के बीच हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग संसाधनों को साझा करेंगी। निष्कर्ष राष्ट्रपति पुतिन का आगामी दौरा रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, जिसका उद्देश्य रक्षा, ऊर्जा और उभरती टेक्नोलॉजी के क्षेत्रों में भारत-रूस साझेदारी को मज़बूत करना है, और यह सब मज़बूत और विस्तारित होते ब्रिक्स गठबंधन के व्यापक ढांचे के भीतर हो रहा है। यह सिर्फ ब्रिक्स का एक औपचारिक दौरा नहीं है; यह ब्रिक्स के भीतर एक छोटा भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन है। 11 तारीख को ही बड़ी घोषणाओं की उम्मीद की जा सकती है। - प्रोफ़ेसर (डॉ.) डी.के. पांडेय विज़िटिंग सीनियर फ़ेलो, सेंटर फ़ॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज़, एडजंक्ट प्रोफ़ेसर, राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय, सलाहकार, एकेडमिक काउंसिल, फ़ॉरेन पॉलिसी स्कूल और GNOIT, पूर्व एसोसिएट डीन, SoB, गलगोटिया विश्वविद्यालय।
787 करोड़ रुपए का पेप्सिको प्लांट खुला, 5000 किसानों के लिए रोजगार और पक्का बाजार बनेगा: सीएम सरमा
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मौत का इंतजार करती इमारतें और गहरी नींद सोता प्रशासन
दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के सत्य निकेतन में जो हृदयविदारक घटना घटित हुई है, वह केवल एक पांच मंजिला इमारत के भरभराकर गिरने की घटना नहीं बल्कि राजधानी की उस व्यवस्था का ढ़हना है, जिसकी नींव नागरिकों की सुरक्षा, कानून के शासन और प्रशासनिक जवाबदेही पर टिकी होनी चाहिए थी। जिस इमारत में कुछ घंटे पहले तक देश के अलग-अलग हिस्सों से आए युवा अपने भविष्य के सपने बुन रहे थे, देखते ही देखते वह ईंट, सीमेंट और लोहे के मलबे में बदल गई। धूल का गुबार तो छंट जाएगा, मलबा भी हट जाएगा, सड़कें फिर सामान्य हो जाएंगी लेकिन उन परिवारों के जीवन में जो शून्य पैदा हुआ है, वह कभी नहीं भर सकेगा। ‘हॉस्टल डेज’ नामक लड़कों के लिए बने पीजी की इस पांच मंजिला इमारत में हादसे के वक्त कई छात्र अपने कमरों में थे, जिनके मलबे में दबे होने की आशंका है। बताया जा रहा है कि इमारत लगभग 40-50 वर्ष पुरानी थी और हादसे के समय बेसमेंट में मरम्मत तथा खुदाई का काम चल रहा था। यही तथ्य इस त्रासदी को और भयावह बना देता है। सवाल केवल यह नहीं है कि इमारत क्यों गिरी बल्कि असली सवाल यह है कि इतनी पुरानी और संवेदनशील इमारत में बेसमेंट की खुदाई और निर्माण संबंधी गतिविधियां आखिर चल कैसे रही थी? हर बड़े भवन हादसे के बाद एक ही कहानी दोहराई जाती है। प्रशासन कहता है कि जांच होगी, कुछ छोटे अधिकारियों पर कार्रवाई होती है और कुछ दिनों बाद पूरा मामला फाइलों के नीचे दब जाता है। फिर किसी दूसरे इलाके में कोई और इमारत गिरती है, कहीं आग लगती है, कोई बेसमेंट मौत का कुआं बन जाता है और हम फिर वही प्रश्न पूछते रह जाते हैं कि आखिर जिम्मेदार कौन है? सच तो यह है कि भारत के शहरों में कोई बहुमंजिला अवैध निर्माण रातों-रात खड़ा नहीं होता। जमीन का उपयोग बदलता है, नक्शा बनता है, निर्माण शुरू होता है, मंजिलें बढ़ती हैं, बिजली-पानी के कनेक्शन मिलते हैं और अंततः उस इमारत में व्यावसायिक गतिविधियां शुरू हो जाती हैं। इस पूरी प्रक्रिया में अनेक विभागों और अधिकारियों की भूमिका होती है। ऐसे में यह कहना कि प्रशासन को कुछ पता ही नहीं था, जिम्मेदारी से बचने का सबसे आसान बहाना है। इसे भी पढ़ें: सत्य निकेतन हादसा: जिम्मेदार अधिकारियों पर हो ठोस कार्रवाई यदि कोई इमारत नियमों के विरुद्ध बन रही थी तो निर्माण के दौरान संबंधित नगर निगम अधिकारी कहां थे? यदि वहां व्यावसायिक गतिविधियां चल रही थी तो फायर विभाग ने सुरक्षा का आकलन क्यों नहीं किया? बिजली और पानी के कनेक्शन किस आधार पर मिले? पुलिस और स्थानीय प्रशासन की नजर उस भवन पर क्यों नहीं पड़ी? और यदि सब कुछ नियमों के अनुसार था तो फिर हादसा हुआ कैसे? यही वे प्रश्न हैं, जिनका जवाब केवल ठेकेदार या किसी छोटे कर्मचारी को दोषी ठहराकर नहीं दिया जा सकता। सत्य निकेतन की त्रासदी इसलिए भी गंभीर है क्योंकि दिल्ली में पीजी संस्कृति तेजी से बढ़ी है। देशभर से राजधानी में पढ़ने, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने और रोजगार तलाशने आने वाले हजारों युवा ऐसी इमारतों में रहते हैं, जहां कमरे छोटे हैं, गलियां संकरी हैं, सीढ़ियां संकरी हैं और सुरक्षा मानकों की स्थिति अक्सर संदिग्ध रहती है। मकान मालिक के लिए कमरों की संख्या बढ़ाना कारोबार है लेकिन उस कमरे में रहने वाला छात्र अपने सपने लेकर वहां आता है। जब छह कमरों की अनुमति वाली इमारत में 25 से अधिक कमरे बना दिए जाते हैं, जब बेसमेंट को पार्किंग के बजाय व्यावसायिक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जब एक ही निकास मार्ग पर सैंकड़ों लोगों की सुरक्षा निर्भर कर दी जाती है, तब यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं रहता, यह मानव जीवन के साथ खिलवाड़ बन जाता है। दिल्ली में अतीत की त्रासदियां भी हमें बार-बार चेताती रही हैं। 1997 का उपहार सिनेमा अग्निकांड हो या हाल के वर्षों में सामने आए बेसमेंट, कोचिंग सेंटर और व्यावसायिक इमारतों से जुड़े हादसे, हर घटना के बाद सुरक्षा मानकों पर सवाल उठे। बंद दरवाजे, अवरुद्ध निकास, अवैध निर्माण, अग्निशमन उपकरणों की अनुपलब्धता और प्रशासनिक उदासीनता बार-बार त्रासदियों की पृष्ठभूमि में दिखाई देती रही है। फिर भी व्यवस्था की स्मृति इतनी कमजोर है कि कुछ दिनों बाद सब कुछ फिर पुराने ढ़र्रे पर लौट आता है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि सस्पेंशन हमेशा छोटे कर्मचारी का ही क्यों होता है? यदि किसी इलाके में वर्षों तक अवैध निर्माण चलता रहा, यदि नियमों के विपरीत इमारतें खड़ी होती रही और उनमें पीजी, कोचिंग सेंटर, दुकानें या अन्य व्यावसायिक गतिविधियां चलती रही तो उस पूरे प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही तय होनी चाहिए, जिसने इसे होने दिया। तत्कालीन अवैध निर्माण प्रभारी, संबंधित वरिष्ठ अधिकारी, जोनल स्तर के जिम्मेदार अधिकारी और संबंधित विभागों की भूमिका की निष्पक्ष जांच क्यों न हो? यदि मिलीभगत प्रमाणित होती है तो कार्रवाई भी उसी अनुपात में कठोर क्यों न हो? समस्या किसी एक इमारत की नहीं है। दिल्ली और देश के तमाम शहरों में हजारों ऐसी इमारतें हैं, जो बाहर से सामान्य दिखाई देती हैं लेकिन भीतर से मौत के जाल में बदल चुकी हैं। कहीं बेसमेंट में अवैध निर्माण है, कहीं बिना वेंटिलेशन के कोचिंग सेंटर, कहीं संकरी सीढ़ियां, कहीं बंद खिड़कियां, कहीं लोहे की ग्रिलें और कहीं एक ही प्रवेश-निकास द्वार। अग्निशमन उपकरण कई जगह केवल निरीक्षण के समय दिखाने के लिए रखे जाते हैं और आपातकालीन निकास कागजों पर मौजूद रहते हैं, वास्तविकता में नहीं। ऐसी स्थिति में हादसा होने पर दमकल की गाड़ियां भी संकरी गलियों में फंस जाती हैं। बचाव दल के पास पहुंचने का रास्ता नहीं होता और अंदर फंसे लोगों के पास बाहर निकलने का रास्ता नहीं होता। फिर कुछ ही मिनटों में एक इमारत कब्रिस्तान में बदल जाती है। अब जरूरत केवल दोषी खोजने की नहीं, व्यवस्था बदलने की है। दिल्ली की सभी पुरानी बहुमंजिला और व्यावसायिक इमारतों का व्यापक सुरक्षा ऑडिट होना चाहिए। पीजी, हॉस्टल, कोचिंग सेंटर और बेसमेंट में संचालित व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की अनिवार्य जांच होनी चाहिए। फायर एनओसी की प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल, पारदर्शी और समयबद्ध हो। अवैध निर्माण पर केवल जुर्माना लगाकर उसे वैध बनाने की प्रवृत्ति समाप्त होनी चाहिए। गंभीर उल्लंघन वाली इमारतों को तत्काल सील और आवश्यकतानुसार ध्वस्त किया जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण यह कि जिम्मेदारी ऊपर तक जानी चाहिए। किसी दुर्घटना के बाद दो-चार छोटे कर्मचारियों को निलंबित कर देना प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, अक्सर जिम्मेदारी से बचने का तरीका बन जाता है। यदि किसी अधिकारी की लापरवाही, मिलीभगत या भ्रष्ट आचरण के कारण लोगों की जान जोखिम में पड़ी है तो उसके विरुद्ध कठोर आपराधिक कार्रवाई होनी चाहिए। पद जितना बड़ा हो, जवाबदेही भी उतनी ही बड़ी होनी चाहिए। सत्य निकेतन का मलबा केवल ईंट-पत्थरों का ढ़ेर नहीं है। उसके नीचे प्रशासनिक दावों की विश्वसनीयता, भवन सुरक्षा के नियमों और नागरिकों के भरोसे की भी परीक्षा हो रही है। इस त्रासदी को ‘हादसा’ कहकर आगे बढ़ जाना सबसे बड़ा अपराध होगा। हादसा वह होता है, जिसे रोका न जा सके लेकिन जिस दुर्घटना की जमीन अवैध निर्माण, नियमों की अनदेखी, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही से तैयार होती है, उसे केवल हादसा कहना सच्चाई को छोटा करना है। यदि इस बार भी जांच के नाम पर खानापूर्ति हुई, छोटे कर्मचारियों पर गाज गिराकर बड़े जिम्मेदार बच निकले और कुछ लाख रुपये के मुआवजे को न्याय का विकल्प बना दिया गया तो अगली त्रासदी केवल समय की प्रतीक्षा करेगी। तब फिर कोई इमारत गिरेगी, कोई परिवार उजड़ेगा, कोई बच्चा मलबे में दबेगा और हम फिर पूछेंगे कि आखिर असली गुनहगार कौन है? जबकि सच हम सभी जानते होंगे। गुनहगार केवल वह व्यक्ति नहीं होगा, जिसने अवैध निर्माण किया बल्कि गुनहगार वह पूरा तंत्र होगा, जिसने उसे बनने दिया, चलने दिया और तब तक आंखें बंद रखी, जब तक मलबे ने चीखना शुरू नहीं कर दिया। अब समय चीख सुनने का नहीं, व्यवस्था को जवाबदेह बनाने का है। - योगेश कुमार गोयल (लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)
जानबूझकर विपक्ष खराब कर रहा देश की छवि
पश्चिमी एशिया और रूस-यूक्रेन की लड़ाई के चलते दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाएं हिचकोले खा रहीं हैं। ऐसे में जब यह आंकड़ा आए कि देश की जीडीपी की विकासदर 7.8 प्रतिशत रही है तो अव्वल तो खुशी का माहौल होना चाहिए था। लेकिन इसे लेकर विवाद खड़ा हो गया है। विवाद की बुनियाद बना है पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग का दावा। उनका कहना है कि जीडीपी आधार को 86 लाख करोड़ से घटाकर 80 लाख करोड़ कर दिया है। इस लिहाज से यह दर शून्य से लेकर 2.6 प्रतिशत तक ही बैठती है। सरकार के आंकड़ों की कोई पूर्व रसूखदार अधिकारी खिल्ली उड़ाए और उसे विपक्ष न ले उड़ता तो हैरत ही होती। लेकिन ऐसा हो रहा है। इसकी वजह यह है कि मौजूदा राजनीतिक माहौल में सरकार और विपक्ष के बीच बढ़ी वैचारिक खाई निजी खुन्नस और दुश्मनी तक पहुंच गई है। इस वजह से दोनों ही पक्षों में एक-दूसरे को लेकर भरोसे का रिश्ता नहीं रह गया है। यही वजह है कि देश को जोड़ने और आगे बढ़ाने वाले जब भी कोई मुद्दा या आंकड़ा सामने आता है, विपक्ष उसकी विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़े करने लगता है। ऐसा नहीं कि अतीत में विपक्ष सरकार को नहीं घेरता रहा है। लेकिन तब भी यह ध्यान रखा जाता था कि राष्ट्रीय हितों और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को लेकर ऐसे कदम न उठाए जाएं या ऐसे बयान न दिए जाएं, जिससे देश की छवि पर आंच पहुंचे। अगर ऐसा नहीं होता तो मानवाधिकार के मामले पर नेता प्रतिपक्ष पाकिस्तान की मुखालफत करने के लिए जेनेवा जाने वाले सरकारी दल की अगुआई नहीं करता। पीवी नरसिंह राव की सरकार ने तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष अटल बिहारी वाजपेयी को ना सिर्फ भारतीय प्रतिनिधिमंडल दल का नेता बनाकर भेजा था, बल्कि पाकिस्तान के इरादे को नेस्तनाबूद करके लौटे प्रतिनिधिमंडल का प्रोटोकाल तोड़कर दिल्ली के हवाई अड्डे पर स्वागत भी किया था। भारत ने जब-जब परमाणु परीक्षण किया, तत्कालीन विपक्ष उसके साथ रहा। वाजपेयी के पोखरण परीक्षण के बाद तो अमेरिका ने भारत पर कई प्रतिबंध लगा दिए थे, लेकिन कांग्रेस ने तब भी वाजपेयी सरकार पर सवालिया निशान नहीं लगाए थे। लेकिन आज के दौर में अगर मोदी सरकार ऐसा कोई परीक्षण करती है तो उससे आज का विपक्ष सबूत मांगेगा। यह भी हो सकता है कि विदेशी धरती पर जाकर राहुल गांधी इसका प्रत्यक्ष सबूत और परीक्षण की पूरी प्रक्रिया की जानकारी मांग दें। इसे भी पढ़ें: BJP President Nitin Nabin ने वंदे मातरम् पर Congress के रुख को भारत विरोधी बताया ठीक इसी तरह जीडीपी के आंकड़ों को लेकर भी मोदी सरकार को झूठा ठहराने की कोशिश हो रही है। चीन गलवान कांड के दौरान भारतीय सीमावर्ती कमांड के चीफ रहे जनरल को बर्खास्त कर देता है, फिर भी राहुल गांधी की अगुआई में विपक्ष अब भी प्रचारित करने से परहेज नहीं कर रहा है कि गलवान घाटी में भारतीय सेना को चीन ने हराया और चीन भारत की जमीन पर कब्जा कर लिया है। ऐसी बयानबाजी अगर एक-दो बार होती तो उसे अनदेखा भी किया जा सकता था। लेकिन विपक्ष, विशेषकर राहुल गांधी की ओर से बार-बार ऐसे बयान दिए जाते हैं, जिसका संकेत तो यही लगता है कि वे भारत की छवि को खराब कर रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी विपक्ष की इस प्रवृत्ति को राष्ट्रीयता बनाम राजनीति के बहस के दायरे में लाकर राहुल गांधी पर सवालों की बौछार करती रहती है। यह बात और है कि ऐसे ही बयान देने या उनका समर्थन करने वाले अखिलेश यादव और चंद्रशेखर रावण जैसे नेताओं के बयानों को नोटिस तक नहीं लेती। वैसे विदेशों में भारतीय व्यवस्था पर बार-बार सवाल उठाया गया है। मसलन राहुल गांधी ने बोस्टन में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए थे। तब उन्होंने कहा था कि चुनाव आयोग 'कंप्रोमाइज्ड' है और इसके सिस्टम में 'बहुत गलत' है। हालांकि चुनाव आयोग ऐसे आरोपों का जवाब देता रहा, लेकिन विपक्ष की जुबान नहीं रूकी। इसी तरह बीते लोकसभा चुनाव के बाद अमेरिका के नेशनल प्रेस क्लब में राहुल ने कहा था, 'भारत में लोकतंत्र पिछले 10 सालों से टूटा हुआ है, अब यह लड़ रहा है। ‘ इसी तरह सितंबर 2023 में राहुल ने यूरोपीय यूनियन को संबोधित करते हुए ब्रसेल्स में कहा था कि भारत में भेदभाव और हिंसा बढ़ रही है। इस तरह के बयानों से राहुल जहां भारत के आंतरिक मामलों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जाते रहे हैं, वहीं इसके जरिए वे भारतीय संस्थाओं को खुद ही बदनाम करते हैं। इसी तरह मई 2022 में लंदन में 'आइडियाज फॉर इंडिया' सम्मेलन में राहुल ने कहा था कि भारतीय संस्थाएं 'परजीवी' बन गई हैं। तब उन्होंने भारतीय संस्थाओं मसलन सीबीआई और ईडी को 'डीप स्टेट' कह दिया था। इतना ही नहीं, उन्होंने भारत की तुलना पाकिस्तान से भी कर दी। राहुल ने 2018 में सिंगापुर के ली कुआन यू स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी में कहा था कि भारत में 'डर और नफरत' का माहौल है और बहुलता की विचारधारा खतरे में है। इसी तरह जनवरी 2018 में बहरीन में प्रवासी भारतीयों के सम्मेलन में राहुल ने कहा था कि सरकार बेरोजगारी से निपटने में नाकाम रही है। जिसका असर गुस्से और नफरत के रूप में दिख रहा है। इसी तरह 2017 में उन्होंने अमेरिका में कहा था कि भारत अब वह नहीं रहा, जहां हर कोई कुछ भी कह सकता है। ऐसे बयानों से अक्सर वे भारत को ही सवालों के घेरे में रखते हैं और इस तरह देश की छवि को नुकसान पहुंचाते हैं। उनके ऐसे बयानों को बाद में समूचा विपक्ष और ले उड़ता है और जगह-जगह भारतीय छवि को नुकसान पहुंचाता है। कुछ ऐसा ही इस बार जीडीपी को लेकर हो रहा है। 1991 के बाद के दौर इस वक्त याद आना लाजमी है। राजीव गांधी की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति के बावजूद कांग्रेस को आम चुनाव में बहुमत नहीं मिला। तब नरसिंह राव की अगुआई में कांग्रेस की अल्पमत की सरकार चलती रही। उस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को 120 सीटें मिलीं थीं। इतनी ताकत के बावजूद बीजेपी ने आर्थिक सुधार के मोर्चे पर कांग्रेस की सरकार को बहुत सहयोग किया। सहयोग करने के लिए बीजेपी ने संसद की कार्यवाही से बहिर्गमन करने का रास्ता चुना था। मुद्दों पर वह सरकार को सदन में घेरती थी, लेकिन जब भी मतदान की नौबत आती, बीजेपी बाहर निकल जाती थी। इस तरह बीजेपी विरोध भी करती थी और सरकार का परोक्ष साथ भी देती थी। लेकिन आज की स्थिति देखिए। सत्ता पक्ष और विपक्ष में भरोसे का रिश्ता ही नहीं रहा। विपक्ष सिर्फ तीर साधे रहता है और उसकी अगुआई अक्सर राहुल गांधी करते हैं। बाकी विपक्ष उनके साथ कोरस गान में शामिल हो जाता है। वाजपेयी की अगुआई वाली सरकार ने जब परमाणु परीक्षण किया था, तब कांग्रेस ने भी कमोबेश साथ दिया था। जबकि आज की तुलना में अमेरिका ने भारत विरोध में कहीं ज्यादा कड़े कदम उठाए थे। कई तरह की आर्थिक पाबंदियां भी लगाई थीं। तब चाहती तो कांग्रेस वाजपेयी सरकार को रोज कठघरे में खड़ा करती। तब कह सकते हैं कि कांग्रेस के नेतृत्व में ऐसे लोगों का वर्चस्व जरूर था, जो राष्ट्रीय हितों और तकाजों को समझते थे। सवाल यह है कि क्या ऐसी सोच आज की राजनीति विकसित नहीं कर सकती ? विपक्ष को भूलना नहीं चाहिए कि ऐसे सवाल उठाकर वह भारतीय सरकार को नहीं, भारत की छवि को खराब कर रहा है। उसे देखना होगा कि भारत के आंकड़ों को विश्व बैंक ने भी मान्यता दे दी है। ऐसे में सवाल विपक्षी सोच पर भी उठता है। उसे भी सोचना होगा कि राष्ट्रीय विकास और हित में उसकी भी अपनी सकारात्मक भूमिका है और उसे निभाना होगा। - उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं..
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Mayawati ने आकाश को क्यों दिखाई 'जमीन' ? BSP के इस फैसले का UP Elections पर क्या होगा असर?
बहुजन समाज पार्टी की सियासत में एक बार फिर ऐसा उलटफेर हुआ है, जिसने पार्टी के साथ-साथ उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में भी हलचल तेज कर दी है। जिस कवायद को आकाश आनंद के सियासी भविष्य की राह साफ करने की कोशिश माना जा रहा था, वही कुछ घंटों में उनके बहुजन समाज पार्टी से पूरी तरह बाहर होने की पटकथा बन गई। हम आपको बता दें कि बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को पार्टी से ‘पूरी तरह आजाद’ कर दिया है। खास बात यह है कि मायावती ने यह फैसला आकाश के ससुर और पूर्व राज्यसभा सांसद अशोक सिद्धार्थ के राजनीति से संन्यास की घोषणा के तत्काल बाद लिया। यानी जिस शर्त को आकाश की वापसी और राजनीतिक सक्रियता के रास्ते की आखिरी बाधा माना जा रहा था, वह शर्त पूरी हुई, लेकिन नतीजा उम्मीद के ठीक उलट निकला। अशोक सिद्धार्थ ने गुरुवार सुबह भावुक संदेश के जरिए राजनीति से संन्यास का ऐलान किया। उन्होंने साफ कहा कि मायावती का आदेश उनके लिए पारिवारिक और राजनीतिक रिश्तों से ऊपर है। उन्होंने यह भी कहा कि आकाश ने करीब दो दशक मायावती की देखरेख और मार्गदर्शन में बिताए हैं और उनके भीतर मायावती का ‘खून’ बहता है। सिद्धार्थ ने खुद पर आकाश को प्रभावित या गुमराह करने के आरोपों को भी खारिज किया और कहा कि उनके जैसे सामान्य कार्यकर्ता की इतनी हैसियत ही कहां कि वह आकाश को गुमराह कर सके। इसे भी पढ़ें: Mayawati ने भतीजे Akash Anand को BSP की सभी जिम्मेदारियों से किया पूरी तरह आजाद लेकिन बसपा सुप्रीमो के तेवर इससे नरम नहीं हुए। मायावती ने अपने दस सूत्रीय संदेश में साफ कर दिया कि मामला केवल संगठनात्मक जिम्मेदारी का नहीं है, बल्कि निष्ठा, परिवार और राजनीतिक प्राथमिकताओं का है। उन्होंने आरोप लगाया कि आकाश आनंद और अशोक सिद्धार्थ पार्टी और बहुजन आंदोलन के हित से ज्यादा पारिवारिक रिश्तों और निजी हितों को महत्व दे रहे हैं। मायावती का सबसे तीखा सवाल आकाश की सोशल मीडिया गतिविधियों को लेकर था। उनका कहना था कि आकाश पहले उनके पोस्ट को लगातार रीपोस्ट करके अपनी राजनीतिक निष्ठा जताते रहे हैं, लेकिन सिद्धार्थ से जुड़े हालिया पोस्ट को उन्होंने रीपोस्ट नहीं किया, जबकि मायावती के मुताबिक वह पोस्ट खुद आकाश के राजनीतिक हित में था। यहीं से बसपा सुप्रीमो ने आकाश की ‘दोहरी मानसिकता’ पर सवाल खड़ा कर दिया। उनका तर्क था कि अगर आकाश के लिए पार्टी और बहुजन आंदोलन से ज्यादा अहम पारिवारिक रिश्ते हैं तो फिर वह पार्टी के लिए प्रभावी ढंग से काम कैसे कर सकते हैं? मायावती ने अशोक सिद्धार्थ के राजनीति छोड़ने के फैसले को सही कदम बताया, लेकिन साथ ही यह भी कह दिया कि फैसला देर से लिया गया। उनका आरोप था कि अगर सिद्धार्थ को अपने दामाद के उज्ज्वल राजनीतिक भविष्य की सचमुच चिंता होती तो वह उसी वक्त राजनीति छोड़ने की घोषणा कर देते। देरी को मायावती ने सिद्धार्थ की महत्वाकांक्षा और नीयत पर सवाल उठाने का आधार बनाया। दरअसल, आकाश आनंद पिछले कुछ वर्षों में बसपा की अगली पीढ़ी के चेहरे के तौर पर तेजी से उभरे थे। मायावती ने उन्हें राष्ट्रीय समन्वयक जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी थी। लेकिन आकाश की राजनीतिक भूमिका बार-बार बदलती रही। तीन सितंबर को उन्हें राष्ट्रीय समन्वयक पद से हटाया गया और अब पार्टी से ही ‘आजाद’ कर दिया गया है। यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है जब उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों की आहट तेज हो चुकी है। बसपा के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि मायावती के बाद पार्टी का चेहरा कौन होगा और संगठन को नई पीढ़ी तक कैसे पहुंचाया जाएगा। आकाश आनंद को इसी संक्रमण का संभावित चेहरा माना जा रहा था। अब उनके बाहर होने से बसपा की उत्तराधिकार की पूरी रणनीति फिर सवालों के घेरे में है। इस बीच मायावती के छोटे भाई के बेटे ईशान आनंद की हाल के महीनों में उनके साथ बढ़ती मौजूदगी भी सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है। इससे बसपा में अगली पीढ़ी की कमान को लेकर अटकलें और तेज हो सकती हैं। देखा जाये तो उत्तर प्रदेश की राजनीति में मायावती का यह फैसला महज एक पारिवारिक विवाद नहीं माना जाएगा। 2027 में मुकाबला बहुकोणीय होने की स्थिति में बसपा का हर फैसला उसके वोट बैंक, संगठन और सोशल इंजीनियरिंग पर असर डालेगा। आकाश जैसे युवा चेहरे की विदाई से पार्टी को जहां नई पीढ़ी से जुड़ने में चुनौती मिल सकती है, वहीं मायावती के सामने अब यह साबित करने की चुनौती होगी कि बसपा किसी एक उत्तराधिकारी के भरोसे नहीं, बल्कि उनके अपने राजनीतिक नियंत्रण और संगठनात्मक ढांचे पर खड़ी है। फिलहाल संदेश साफ है कि ससुर ने राजनीति छोड़ी, लेकिन दामाद की कुर्सी नहीं बची। और मायावती की बसपा में रिश्ते नहीं, राजनीतिक निष्ठा अंतिम कसौटी है। 2027 के रण में इस फैसले की असली कीमत और असर तब सामने आएगा, जब हाथी मैदान में उतरेगा।
Modi in Vadodara: PM Modi का नैरेटिव हुआ फेल, क्यों करनी पड़ी Rahul Gandhi की नकल?
गुजरात सरकार का बड़ा फैसला, गुरु रविदास जयंती पर 231 करोड़ रुपये की विकास परियोजनाओं को मंजूरी
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BJP's Desperation: Nitin Nabin के विवादित बोल, Rahul Gandhi को 'मियां' बताकर फंसी बीजेपी?
दिग्विजय सिंह की ‘सनातन स्वाभिमान यात्रा’ पर भाजपा का हमला, राम कदम बोले- कैसी नौटंकी है
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हरीश द्विवेदी को युवा मोर्चे की जिम्मेदारी दिए जाने को पार्टी के संगठनात्मक विस्तार की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बस्ती से लोकसभा सांसद द्विवेदी लंबे समय से भाजपा संगठन से जुड़े रहे हैं। युवा मोर्चा के जरिए पार्टी युवाओं के बीच अपनी राजनीतिक और संगठनात्मक पहुंच को मजबूत करने पर जोर देती रही है।
Marital Rape मामले पर Supreme Court में जबरदस्त घमासान, Parliament के पाले में आई गेंद!
वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने की मांग पर चल रही बहस अब सुप्रीम कोर्ट के सामने उस बुनियादी सवाल तक पहुंच गई है, जहां अदालत को यह तय करना है कि क्या वह मौजूदा आपराधिक कानून की स्पष्ट सीमा को बदलकर एक नया अपराध लागू कर सकती है। बुधवार को सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इसी सवाल पर गंभीर टिप्पणी की और केंद्र सरकार की इस दलील से सहमति जताई कि इस अत्यंत संवेदनशील और जटिल मुद्दे पर अंतिम फैसला संसद को करना चाहिए। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 20(1) का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि जब मौजूदा कानून किसी कृत्य को अपराध के रूप में परिभाषित ही नहीं करता, तो उसके लिए किसी व्यक्ति को आपराधिक रूप से दंडित कैसे किया जा सकता है। हम आपको बता दें कि अनुच्छेद 20(1) स्पष्ट करता है कि किसी व्यक्ति को उस समय लागू कानून के उल्लंघन के अलावा किसी अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसे भी पढ़ें: Karnataka Case: 'सेक्स स्लेव' फैसले को चुनौती, Supreme Court में Personal Liberty पर बहस मौजूदा कानून में यही सबसे महत्वपूर्ण पेच है। भारतीय दंड संहिता की धारा 375 में Exception 2 के तहत पत्नी के साथ पति द्वारा यौन संबंध को बलात्कार की परिभाषा से बाहर रखा गया था। पत्नी की उम्र को लेकर सुप्रीम कोर्ट के 2017 के फैसले के बाद यह सीमा 18 वर्ष से संबंधित हो गई। अब भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 63(2) में भी इसी प्रकार का अपवाद मौजूद है। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान बेहद अहम सवाल उठाया कि जब कानून ने किसी आचरण को अपराध की श्रेणी में रखा ही नहीं है, तो अदालत उसे अपराध मानकर अभियोजन की अनुमति कैसे दे सकती है? पिछली सुनवाई में भी पीठ ने पूछा था कि क्या संवैधानिक अदालतें खुद आपराधिक कानून को दोबारा लिखकर नया अपराध बना सकती हैं। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मामला सामाजिक, कानूनी और संवैधानिक दृष्टि से अत्यंत जटिल है और इसका समाधान संसद के स्तर पर होना चाहिए। अदालत ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि यदि सरकार को लगता है कि मौजूदा कानून में समस्या है, तो उसे संसद की मंजूरी के साथ कानून को दोबारा तैयार करना चाहिए। यानी सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सीमा रेखा खींच दी है कि कानून की व्याख्या अदालत कर सकती है, लेकिन संसद द्वारा स्पष्ट रूप से बनाए गए आपराधिक प्रावधान को बदलकर नया अपराध बनाना अलग प्रश्न है। हालांकि अदालत ने महिलाओं की पीड़ा को किसी भी तरह कमतर नहीं आंका। पीठ ने साफ कहा कि पति द्वारा उसकी इच्छा के विरुद्ध यौन संबंध के लिए मजबूर की गई महिला “निश्चित रूप से पीड़िता” है। असली सवाल यह है कि ऐसी स्थिति में पति पर बलात्कार का मुकदमा चलाने का कानूनी आधार क्या होगा, जब वर्तमान कानून स्वयं वैवाहिक संबंध के लिए अपवाद प्रदान करता है। हम आपको बता दें कि कर्नाटक से जुड़े एक मामले ने इस बहस को और पेचीदा बना दिया है। वहां हाई कोर्ट ने ऐसे पति के खिलाफ अभियोजन की अनुमति दी थी जिस पर पत्नी के साथ लगभग “सेक्स स्लेव” जैसा व्यवहार करने का आरोप था। सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले को पहले सुनने पर विचार कर रहा है, ताकि यह देखा जा सके कि मौजूदा कानून की व्याख्या के जरिए अभियोजन संभव है या नहीं। दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि विवाह किसी महिला की शारीरिक स्वायत्तता और सहमति के अधिकार को समाप्त नहीं कर सकता। वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नुंडी ने कहा कि अदालत को नया अपराध बनाने की जरूरत नहीं है; बलात्कार पहले से परिभाषित अपराध है और सवाल केवल इतना है कि क्या पतियों को उससे संवैधानिक संरक्षण देना उचित है। उधर, केंद्र सरकार इसके विपरीत विवाह की भारतीय सामाजिक संरचना, आपराधिक कानून के संभावित दुरुपयोग और सबूत जुटाने की कठिनाइयों को प्रमुख आधार मान रही है। सरकार का तर्क है कि पति-पत्नी के बीच बंद दरवाजों के भीतर सहमति या असहमति साबित करना सामान्य यौन अपराधों की तुलना में अधिक जटिल होगा। वैवाहिक विवादों में गंभीर आपराधिक धाराओं के इस्तेमाल की आशंका भी सरकार की चिंता का हिस्सा है। केंद्र सरकार का यह भी कहना है कि पश्चिमी देशों के कानूनी मॉडल को भारत की सामाजिक और पारिवारिक परिस्थितियों पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता। भारत में विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं, बल्कि व्यापक पारिवारिक और सामाजिक ढांचे से जुड़ी संस्था है। इसी आधार पर सरकार “पश्चिमी मॉडल की अंधी नकल” से बचने की बात करती है। वहीं बहस का एक वैचारिक पक्ष भी है। दरअसल वैवाहिक बलात्कार की पश्चिमी अवधारणा को भारतीय पारिवारिक व्यवस्था पर उसी रूप में लागू करने की कोशिश भारतीय विवाह संस्था को कमजोर कर सकती है। देखा जाये तो ऐसी अवधारणाएं भारतीय सामाजिक व्यवस्था को व्यक्तिगत अधिकारों की अत्यधिक कानूनी व्याख्या के जरिए छिन्न-भिन्न कर सकती हैं। दूसरी ओर, वैवाहिक बलात्कार को अपराध मानने की मांग के पीछे भारतीय महिलाओं के अधिकार और शारीरिक स्वायत्तता से जुड़े तर्क भी हैं। फिलहाल केंद्र का रुख स्पष्ट है कि घरेलू हिंसा, क्रूरता और शारीरिक हमले जैसी मौजूदा कानूनी धाराओं के तहत पीड़ित पत्नी को संरक्षण उपलब्ध है; बलात्कार की कानूनी परिभाषा में बदलाव करना हो तो वह व्यापक सामाजिक विमर्श, विशेषज्ञों से परामर्श और संसद में बहस के बाद होना चाहिए। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई तीन सप्ताह बाद अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध की है। इसलिए अब असली लड़ाई केवल “वैवाहिक बलात्कार अपराध है या नहीं” की नहीं, बल्कि इस बड़े संवैधानिक प्रश्न की है कि भारत में आपराधिक कानून की नई सीमा कौन तय करेगा, न्यायपालिका या संसद? -नीरज कुमार दुबे
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लंबे समय से दुनिया को यह संदेश देते रहे हैं कि “यह युद्ध का युग नहीं है।” अब यही संदेश उनकी विदेश नीति की सबसे बड़ी कसौटी बन गया है। एक तरफ रूस-यूक्रेन युद्ध अपने पांचवें वर्ष में प्रवेश कर चुका है, दूसरी ओर पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच टकराव ने खाड़ी देशों को भी सीधे संकट में डाल दिया है। ऐसे समय में दिल्ली में होने वाला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन केवल आर्थिक सहयोग का मंच नहीं, बल्कि भारत की कूटनीतिक क्षमता का बड़ा प्रदर्शन भी बनने जा रहा है। ब्रिक्स में रूस, चीन, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे परस्पर विरोधी हितों वाले देश एक साथ मौजूद होंगे। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भारत आने से एक बार फिर पूरी दुनिया की नजर मोदी-पुतिन मुलाकात पर है। हाल ही में एससीओ सम्मेलन से इतर द्विपक्षीय मुलाकात के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने पुतिन से साफ कहा था कि अब युद्ध को आगे बढ़ाने की बजाय उसे खत्म करने का रास्ता तलाशना चाहिए। भारत और रूस के दशकों पुराने मजबूत रिश्तों के बीच मोदी का यह संदेश काफी महत्वपूर्ण है। अब ब्रिक्स सम्मेलन में मोदी के पास एक और मौका होगा कि वह रूस के साथ अपनी दोस्ती कायम रखते हुए पुतिन को बातचीत और शांति की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें। इसे भी पढ़ें: Prabhasakshi NewsRoom: BRICS Summit का पूरा Schedule जारी, जानिए कब और किन वैश्विक नेताओं से मिलेंगे PM Modi हम आपको यह भी बता दें कि इस दिशा में भारत केवल रूस से बात नहीं कर रहा। विदेश मंत्री एस. जयशंकर हाल में कीव गए और यूक्रेनी नेतृत्व के साथ बातचीत की थी। उन्होंने स्पष्ट किया था कि भारत रूस और यूक्रेन दोनों के संपर्क में है और युद्ध को समाप्त करने में उपयोगी विचारों पर काम करने के लिए तैयार है। यानी मोदी सरकार की रणनीति किसी एक पक्ष को चुनने की नहीं, बल्कि दोनों पक्षों से संवाद बनाए रखकर शांति की गुंजाइश बचाए रखने की है। वहीं पश्चिम एशिया में यही नीति और भी कठिन है। हालिया संघर्ष के दौरान ईरान ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने के क्रम में बहरीन, कुवैत, कतर, ओमान, जॉर्डन और दूसरे देशों को भी अपनी सैन्य कार्रवाई के दायरे में ला दिया। ईरान का तर्क था कि वह अमेरिकी ठिकानों को निशाना बना रहा है, लेकिन मिसाइल और ड्रोन उन देशों की संप्रभु सीमाओं के भीतर पहुंचे जहां ये ठिकाने मौजूद हैं। जुलाई में भी ईरान ने खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने की कार्रवाई जारी रखी। यहीं मोदी की कूटनीति की असली परीक्षा सामने आती है। युद्ध के बीच उन्होंने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान से बातचीत की थी और साफ कहा था कि भारत सभी मुद्दों का समाधान संवाद और कूटनीति से चाहता है। साथ ही उन्होंने ऊर्जा और व्यापार के निर्बाध आवागमन तथा भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को भारत की प्राथमिकता बताया। दूसरी ओर उन्होंने यूएई, बहरीन, सऊदी अरब और कतर के नेताओं से अलग-अलग बातचीत कर उनके खिलाफ हुए हमलों की निंदा भी की थी। बहरीन के मामले में प्रधानमंत्री ने सीधे कहा था कि भारत हमलों की निंदा करता है और वहां के लोगों के साथ खड़ा है; सऊदी अरब और यूएई के संदर्भ में भी उन्होंने संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के उल्लंघन को गंभीरता से लिया था। यही संतुलन मोदी की विदेश नीति की ताकत है। ईरान से संबंध भी चाहिए और खाड़ी अरब देशों का भरोसा भी; रूस से रणनीतिक साझेदारी भी बचानी है और पश्चिम से आर्थिक-तकनीकी रिश्ते भी मजबूत करने हैं। भारत के लिए यह केवल प्रतिष्ठा का सवाल नहीं है। पश्चिम एशिया में करोड़ों भारतीयों के हित, ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा सीधे इससे जुड़ी है। मोदी ने ईरान से बातचीत में भी इसी व्यावहारिक प्राथमिकता को सामने रखा है। साथ ही इस पूरे समीकरण में चीन को अलग करके देखना भी संभव नहीं है। शी जिनपिंग की भारत यात्रा सात वर्ष बाद हो रही है और दोनों देशों के बीच रिश्तों में सावधानी के साथ सुधार की कोशिश दिखाई दे रही है। सीमा पर तनाव कम करना, आर्थिक रिश्तों को नियंत्रित तरीके से आगे बढ़ाना और प्रतिस्पर्धा के बावजूद संवाद बनाए रखना भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के लिए जरूरी है। इसलिए दिल्ली का ब्रिक्स सम्मेलन मोदी के लिए केवल शिखर सम्मेलन नहीं, बल्कि कूटनीतिक संतुलन का मंच है। एक ही मेज पर पुतिन, शी, पेजेश्कियान, सऊदी और यूएई नेतृत्व के बीच भारत यह दिखा सकता है कि रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ किसी खेमे से दूरी नहीं, बल्कि सभी से अपने हितों के आधार पर संवाद करने की क्षमता है। देखा जाये तो दुनिया आज अलग-अलग खेमों में बंटी हुई है। ऐसे समय में मोदी की कूटनीति की सबसे बड़ी ताकत यही है कि भारत किसी एक पक्ष के साथ खड़ा होने की बजाय सभी से संवाद बनाए रखता है। रूस से युद्ध खत्म करने की अपील हो, यूक्रेन से बातचीत, ईरान से संपर्क, खाड़ी देशों के साथ मजबूत रिश्ते, पश्चिम के साथ साझेदारी या चीन से संवाद, भारत हर मोर्चे पर अपने हितों को साधते हुए रिश्ते आगे बढ़ा रहा है। यही संतुलित कूटनीति भारत को इस उथल-पुथल भरी दुनिया में अपनी स्वतंत्र और मजबूत जगह बनाने में मदद कर रही है।
चेन्नई में 19 सितंबर को ऑटो चालकों का प्रदर्शन, किराया बढ़ाने की मांग तेज
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100 दिन तो सिर्फ शुरुआत है, कर्नाटक के विकास की यात्रा अभी शुरू हुई : सीएम शिवकुमार
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बीएसपी में परिवार की कलह बढ़ीः मायावती ने भतीजे आकाश आनंद को पार्टी से निकाला
Mayawati expels Akash Anand from BSP- बीएसपी का संकट बढ़ता जा रहा है। मायावती ने 9 सितंबर को कहा था कि आकाश आनंद के ससुर अशोक सिद्धार्थ राजनीति से संन्यास की घोषणा करें। लेकिन अशोक ने आज राजनीति से संन्यास लिया। मायावती ने कहा- बहुत देर हो गई है।
राजस्थान को 'लव जिहाद' से मुक्त कराया : सीएम भजनलाल शर्मा
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सीएम पटेल ने गुजरात विधानसभा में 'भीष्म क्यूब-आर300' के प्रदर्शन का उद्घाटन किया
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अमरावती अस्पताल अग्निकांड: तीन नवजातों की मौत पर पांच वरिष्ठ स्वास्थ्य अधिकारी निलंबित
मुंबई, 9 सितंबर (आईएएनएस)। महाराष्ट्र सरकार ने अमरावती जिला महिला अस्पताल की विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाई (एसएनसीयू) में 24 अगस्त को लगी आग में तीन नवजात शिशुओं की मौत के मामले में स्वास्थ्य विभाग के पांच वरिष्ठ अधिकारियों और कर्मचारियों को निलंबित करने का आदेश दिया है।
'समर्पित सेवा के 25 साल': भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन ने पीएम मोदी के बदलाव लाने वाले नेतृत्व को सलाम किया
भाजपा लोकतंत्र की दुश्मन, भ्रष्टाचार और नफरत को सफलता का पैमाना बनाया : अखिलेश यादव
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भाजपा पर निशाना साधते हुए उसे लोकतंत्र का दुश्मन करार दिया
चिराग दिल्ली में जर्जर हॉस्टल बिल्डिंग में दरार, सरकार ने छात्रों को सुरक्षित निकाला, मंत्री आशीष सूद ने 'आप' पर साधा निशाना
'हनुमान जी को हटाकर लोग अपना खुद ही विनाश करेंगे', संत ने जताया आक्रोश
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'जारकीहोली पर ईडी की छापेमारी को बेवजह राजनीतिक रंग दिया जा रहा', कर्नाटक भाजपा का कांग्रेस पर हमला
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दिल्ली हाईकोर्ट ने एनआईए से पूछा, 'क्या कड़ी शर्तों के साथ इंजीनियर राशिद को जमानत दी जा सकती है?'
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Western Dedicated Freight Corridor क्या है? Modi के Infra Model की बड़ी तस्वीर हर कोई हैरान है
भारत के बुनियादी ढांचे में बड़े बदलाव अक्सर दिखाई देने वाली सड़कों और पुलों से नहीं, बल्कि उन नेटवर्कों से मापे जाते हैं जो देश की अर्थव्यवस्था की धड़कन को तेज करते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मंगलवार को वडोदरा में पश्चिमी Dedicated Freight Corridor (WDFC) के अंतिम तीन खंडों का उद्घाटन इसी श्रेणी की परियोजना है। गुजरात और महाराष्ट्र के बीच बने 326 किलोमीटर के इन तीन खंडों पर 20,700 करोड़ रुपये से अधिक खर्च हुए हैं। इनके साथ 1,506 किलोमीटर लंबा Western DFC पूरा हो गया है और Eastern DFC के साथ देश में समर्पित माल ढुलाई गलियारों का नेटवर्क अब 2,843 किलोमीटर तक पहुंच गया है। हम आपको बता दें कि इन अंतिम खंडों में New Sanand (N)-New Makarpura, New Umbergaon-New Saphale और New Saphale-JNPT शामिल हैं। खास महत्व महाराष्ट्र के Vaitarna (Saphale)-JNPT हिस्से का है, क्योंकि अब पश्चिमी गलियारे को जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट से सीधा संपर्क मिल गया है। इससे बंदरगाह से माल की आवाजाही और तेज होने तथा freight loading बढ़ने की उम्मीद है। हम आपको बता दें कि Western DFC मुख्य रूप से गुजरात और महाराष्ट्र के बंदरगाहों से उत्तर भारत की ओर जाने वाले ISO containers को ढोता है। JNPT, Mumbai Port, Pipavav, Mundra और Kandla जैसे बंदरगाहों से निकलने वाला माल Tughlakabad, Dadri, Dhandari Kalan और Khatuwas जैसे Inland Container Depots तक पहुंचता है। आगे चलकर fertiliser, foodgrain, salt, coal, iron, steel और cement जैसे भारी माल की ढुलाई भी इस नेटवर्क की बड़ी भूमिका होगी। दूसरी ओर 1,337 किलोमीटर लंबा Eastern DFC Ludhiana से Sonnagar तक फैला है और मुख्यतः पूर्वी भारत के coal तथा mineral traffic को संभालता है। इसका 936 किलोमीटर हिस्सा Sonnagar-Dadri के बीच electrified double line है, जबकि Sahnewal-Khurja का 401 किलोमीटर हिस्सा electrified single line है। यह गलियारा कई घनी आबादी वाले शहरों से होकर गुजरने के बजाय उन्हें बाईपास करता है, जिससे passenger routes पर दबाव भी कम होता है। इस पूरी परियोजना की असली ताकत केवल इसकी लंबाई नहीं, बल्कि इसकी रफ्तार और क्षमता है। दोनों Dedicated Freight Corridors पर अब लगभग 426 freight trains प्रतिदिन चल रही हैं। DFC पर मालगाड़ियों की औसत गति 50 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक रही है, जो गैर-DFC नेटवर्क की औसत freight speed की तुलना में लगभग दोगुनी है। अप्रैल-मई में EDFC की औसत गति 44.9 और 44.7 kmph, जबकि WDFC की 53.6 और 52.3 kmph दर्ज की गई। यानी अलग freight network ने transit time और लागत घटाने की दिशा में ठोस आधार तैयार किया है। हम आपको बता दें कि इस बदलाव की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि Howrah-Delhi और Mumbai-Delhi जैसे पुराने trunk routes अपनी क्षमता से कहीं अधिक दबाव झेल रहे थे। इन मार्गों पर line utilisation 115 से 150 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। परिणामस्वरूप मालगाड़ियों की आवाजाही प्रभावित हुई और सड़क परिवहन पर निर्भरता बढ़ी। दिलचस्प तथ्य यह है कि इन DFC corridors के समानांतर National Highways देश के कुल road network का केवल लगभग 0.5 प्रतिशत हैं, लेकिन करीब 40 प्रतिशत road freight संभालते हैं। देखा जाये तो यह परियोजना केवल रेलवे की कहानी नहीं है; यह भारत की आर्थिक रणनीति से जुड़ी है। रेलवे की कुल कमाई में freight revenue की हिस्सेदारी 65 प्रतिशत से अधिक है और यही आय passenger services को सब्सिडी देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। राष्ट्रीय रेल योजना का लक्ष्य rail freight share को मौजूदा लगभग 27 प्रतिशत से बढ़ाकर 2030 तक 45 प्रतिशत, यानी करीब 3,000 million tonnes तक ले जाना है। 2025-26 में रेलवे ने रिकॉर्ड 1,670 million tonnes loading दर्ज की। हम आपको बता दें कि इस महत्वाकांक्षी नेटवर्क की नींव हालांकि आज से नहीं, बल्कि अप्रैल 2005 की Japan-India बैठक में पड़ी थी। 2007 में feasibility study हुई और Dedicated Freight Corridor Corporation of India Limited (DFCCIL) को निर्माण, संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी मिली। परियोजना के लिए World Bank से 14,900 करोड़ रुपये और Japan International Cooperation Agency से 38,722 करोड़ रुपये की debt funding मिली, जबकि शेष राशि budgetary support से आई। अब मोदी सरकार की नजर अगले चरण पर है। इस वर्ष के बजट में Dankuni से Surat तक तीसरे Dedicated Freight Corridor की घोषणा की गई है और उसका Detailed Project Report तैयार किया जा रहा है। यह बताता है कि freight infrastructure को एक पूर्ण राष्ट्रीय नेटवर्क के रूप में देखने की सोच आगे बढ़ रही है। देखा जाये तो मोदी सरकार के दौर में जिस execution-oriented infrastructure approach पर जोर दिया गया है, Dedicated Freight Corridor उसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आता है। वर्षों पहले परिकल्पित परियोजना को चरणबद्ध तरीके से पूरा करके बंदरगाह, औद्योगिक केंद्र, माल गलियारे और उत्तर भारतीय बाजारों को एक तेज नेटवर्क से जोड़ना भारत की logistics क्षमता को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम है। आखिरकार, आधुनिक अर्थव्यवस्था में दूरी केवल किलोमीटर से नहीं मापी जाती, समय, लागत और भरोसेमंद कनेक्टिविटी ही वास्तविक दूरी तय करते हैं। 2,843 किलोमीटर का यह freight network उसी दूरी को छोटा करने की कोशिश है। अब चुनौती यह होगी कि इन तेज रेल लाइनों को पर्याप्त terminals, first-mile और last-mile connectivity तथा प्रतिस्पर्धी logistics व्यवस्था से जोड़ा जाए, ताकि रेल की बढ़ी क्षमता सीधे उद्योग, व्यापार और उपभोक्ता तक दिखाई दे। बहरहाल, Dedicated Freight Corridor जैसी परियोजनाएं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस इंफ्रास्ट्रक्चर विजन को रेखांकित करती हैं, जिसमें केवल परियोजनाओं की घोषणा नहीं, बल्कि उनके समयबद्ध क्रियान्वयन और अंतिम चरण तक निगरानी पर जोर दिखाई देता है। एक ही नेतृत्व द्वारा बड़ी परियोजनाओं का शिलान्यास करना और वर्षों बाद उनके तैयार हिस्सों का उद्घाटन करना इस बात का संकेत है कि सरकार बुनियादी ढांचे को महज घोषणाओं का विषय नहीं, बल्कि आर्थिक विकास की रीढ़ मानकर आगे बढ़ रही है। सड़क, रेलवे, बंदरगाह, माल ढुलाई गलियारे और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क, इन सभी क्षेत्रों में क्षमता बढ़ाने का यह प्रयास भारत की आर्थिक गति को मजबूत करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। खास तौर पर DFC जैसे प्रोजेक्ट में समय और परिवहन लागत घटने का सीधा लाभ उद्योग, व्यापार और निर्यात को मिल सकता है। यही वजह है कि आज भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार की चर्चा केवल नई परियोजनाओं की संख्या को लेकर नहीं, बल्कि उनके आकार, आपसी कनेक्टिविटी और जमीन पर उतरने की रफ्तार को लेकर भी हो रही है। -नीरज कुमार दुबे
38 साल बाद Sri Lanka की यात्रा पर गये भारतीय रक्षा मंत्री, पहुँचते ही China का सारा खेल पलट दिया
करीब 38 साल बाद किसी भारतीय रक्षा मंत्री का श्रीलंका पहुंचना हिंद महासागर की बदलती भू-राजनीति में भारत की उस रणनीतिक वापसी का संकेत है, जिसमें सुरक्षा, समुद्री शक्ति, आर्थिक साझेदारी और जनविश्वास, चारों मोर्चों को एक साथ साधा जा रहा है। इससे पहले 1988 में तत्कालीन रक्षा मंत्री केसी पंत श्रीलंका गए थे और अब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह कोलंबो की तीन दिवसीय यात्रा पर हैं। राजनाथ सिंह ने कोलंबो में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए जिस बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया, उसका रणनीतिक संदेश बेहद स्पष्ट था, “पड़ोसी बदले नहीं जा सकते।” उन्होंने कहा कि भारत श्रीलंका को अपना बेहद करीबी मित्र मानता है और संकट की किसी भी घड़ी में उसके साथ मजबूती से खड़ा रहेगा। यह केवल भावनात्मक बयान नहीं, बल्कि 2022 के आर्थिक संकट और 2025 में चक्रवात दित्वाह के बाद भारत की त्वरित सहायता से जुड़ी उस विश्वसनीयता का राजनीतिक विस्तार है, जिसे श्रीलंका में चीन के मुकाबले भारत की सबसे बड़ी ताकत माना जा सकता है। चीन के मुकाबले भारत की बढ़त क्यों अहम? श्रीलंका हिंद महासागर के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों के बीच स्थित है। कोलंबो, हंबनटोटा और अन्य बंदरगाहों की भौगोलिक स्थिति इसे भारत की समुद्री सुरक्षा के लिए असाधारण महत्व देती है। पिछले वर्षों में चीन की आर्थिक और बंदरगाह परियोजनाओं ने श्रीलंका को बीजिंग के रणनीतिक प्रभाव के केंद्र में ला दिया था। लेकिन मौजूदा घटनाक्रम संकेत देता है कि कोलंबो अब एकतरफा चीनी निर्भरता की बजाय संतुलित साझेदारी को प्राथमिकता दे रहा है। खुद श्रीलंका के Sunday Times ने राजनाथ सिंह के दौरे से पहले लिखा कि भारत चाहता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पिछली यात्रा के दौरान हुए समझौतों को तेजी से लागू किया जाए। अखबार ने यह भी रेखांकित किया कि सिंह की यात्रा ऐसे समय हो रही है जब श्रीलंका को अपने अंतरराष्ट्रीय संबंधों को अधिक सक्रियता से संचालित करना होगा। इसी अखबार के संपादकीय ने इससे भी बड़ा संकेत दिया। उसने हिंद महासागर में बढ़ती सैन्य गतिविधियों, समुद्री मार्गों और बंदरगाहों की भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच श्रीलंका को फिर से “geopolitical vortex” में बताया और चीन के संदर्भ में पहले सामने आए संदिग्ध शोध-पोतों के मुद्दे को याद किया। यानी श्रीलंका की अपनी मीडिया बहस भी यह स्वीकार कर रही है कि द्वीप की सुरक्षा और संप्रभुता अब सीधे हिंद महासागर की महाशक्ति प्रतिस्पर्धा से जुड़ी है। रक्षा सहयोग अब कागज से जमीन पर इस यात्रा का सबसे ठोस परिणाम तीन महत्वपूर्ण रक्षा समझौतों के रूप में सामने आ रहा है। इनमें दोनों देशों के National Cadet Corps के बीच सहयोग, भारत और श्रीलंका के National Defence Colleges के बीच साझेदारी तथा श्रीलंकाई वायुसेना के भारतीय मूल के L70 एंटी-एयरक्राफ्ट हथियारों के रखरखाव में भारत की सहायता शामिल है। भारत पहले ही 24 ऐसे हथियार श्रीलंका को दे चुका है और अब शेष छह की भी मुफ्त में मेंटेनेंस सहायता करेगा। यहां असली महत्व हथियारों से ज्यादा दीर्घकालिक सैन्य इंटरऑपरेबिलिटी और संस्थागत संबंधों का है। प्रशिक्षण, रक्षा शिक्षा और उपकरणों का रखरखाव किसी देश को केवल हथियार बेचने से कहीं ज्यादा गहरे सुरक्षा रिश्ते में बांधता है। इसके साथ ही कोलंबो बंदरगाह पर भारतीय नौसेना के INS Udaygiri की मौजूदगी ने यात्रा को स्पष्ट समुद्री आयाम भी दे दिया है। दिल जीतने की कूटनीति राजनाथ सिंह ने केवल रक्षा की भाषा नहीं बोली। उन्होंने भारत की आर्थिक क्षमता, तेजी से बदलती अर्थव्यवस्था और वैश्विक भूमिका को भी सामने रखा। उन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था के करीब 4 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने, 7.8 प्रतिशत तिमाही वृद्धि और वैश्विक विकास में 16 प्रतिशत से अधिक योगदान का उल्लेख किया। यह संदेश श्रीलंका के लिए महत्वपूर्ण है कि भारत अब केवल सुरक्षा प्रदाता नहीं, बल्कि आर्थिक अवसरों का स्रोत भी है। उधर, श्रीलंका के राजनीतिक और सामाजिक हलकों में भी इस रिश्ते की सकारात्मक स्वीकार्यता दिखाई दे रही है। पूर्व ईस्टर्न प्रोविंस गवर्नर और सीलोन वर्कर्स कांग्रेस नेता सेंथिल थोंडामन ने राजनाथ सिंह की यात्रा को दोनों देशों की रक्षा साझेदारी मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण कदम बताया और कहा कि श्रीलंका ने सरकारें बदलने के बावजूद भारत के साथ रक्षा क्षेत्र में सहयोग बनाए रखा है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को श्रीलंका के लोगों द्वारा “बड़े भाई” की तरह स्वीकार किए जाने की बात भी कही। रणनीतिक निष्कर्ष: भारत ने बाजी कैसे पलटी? देखा जाये तो यह स्पष्ट है कि भारत ने श्रीलंका को चीन की एकाधिकारवादी रणनीतिक निर्भरता की ओर जाने से रोकने के लिए एक मजबूत वैकल्पिक सुरक्षा और आर्थिक ढांचा खड़ा कर दिया है। यही इस यात्रा की सबसे बड़ी रणनीतिक जीत है। भारत ने सैन्य शक्ति के साथ विश्वसनीयता, संकट में मदद, सांस्कृतिक निकटता, आर्थिक अवसर और जनसंपर्क को एक पैकेज में बदल दिया है। श्रीलंका को यह संदेश मिल रहा है कि भारत उसके सामने कोई दूर की महाशक्ति नहीं, बल्कि वह पड़ोसी है जो संकट में सबसे पहले पहुंच सकता है। हिंद महासागर के इस निर्णायक भूगोल में यही भारत की सबसे बड़ी बढ़त है। चीन बंदरगाहों और परियोजनाओं के जरिए प्रभाव बनाता है, जबकि भारत अब सुरक्षा, साझेदारी और भरोसे के जरिए अपना प्रभाव गहरा कर रहा है। राजनाथ सिंह की कोलंबो यात्रा केवल रक्षा कूटनीति नहीं; यह हिंद महासागर में भारत की रणनीतिक वापसी और श्रीलंका के दिल-दिमाग दोनों में अपनी जगह मजबूत करने की कवायद है। -नीरज कुमार दुबे
'तुष्टीकरण के आगे कांग्रेस ने किया आत्मसमर्पण', वंदे मातरम विवाद पर ओपी चौधरी
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'वंदे मातरम' के पूर्ण गायन के दौरान एनसी नेताओं के खड़े होने पर भाजपा ने की सराहना, कांग्रेस पर कसा तंज
Modi Vadodara Event: नौजवानों का मोहभंग और Rahul की नकल! क्या Modi का दांव उलटा पड़ गया?
पूर्वी प्रांत ने कैसे लिया राइट टर्न, Germany के सबसे खतरनाक आदमी को मिलने वाली है सत्ता?
किस तरह एक विधानसभा चुनाव ने जर्मनी के भीतर भौगोलिक और वैचारिक दरार को इतना पुख्ता कर दिया है कि इसे देश के आधुनिक दौर का सबसे खतरनाक पल माना जा रहा है और क्यों जर्मनी के एक असेंबली रिजल्ट से पुतिन बहुत खुश होंगे। इस बरस 3 अक्टूबर को जर्मनी अपना 36वां टाक डे डचिन आइनहाइट मनाएगा यानी एकीकरण दिवस। 3 अक्टूबर 1990 को दो हिस्सों में बटे जर्मनी के एक होने की सालगिरह। उसी दिन जर्मन डेमोक्रेटिक रिपब्लिक जीडीआर आधिकारिक रूप से खत्म हो गया। लेकिन जमीन पर जर्मनी के दो हिस्सों का बंटवारा कायम रहा और यह विभाजन लगातार गहराता गया और इसी की एक परिणति हुई इस 6 सितंबर को बैलेट पेपर के जरिए। जर्मनी के 16 राज्यों में से एक आकार में बम मुश्किल भारत के मणिपुर या मिजोरम जितना बड़ा करीब सवा 5 लाख की आबादी। एएफडी यानी अल्टरनेटिव फॉर डचैंड। 2026 में 39 सीट जीतकर सबसे बड़ी पार्टी 2021 के चुनाव में इसे 23 सीटें मिली थी। सीडीयू यानी क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन। जर्मनी में अभी केंद्र में जो सरकार है उसका नेतृत्व इसी के पास है और सेक्सनी अनहल्ट में राज्य सरकार को भी यही इसी यही पार्टी लीड कर रही थी। ताजा चुनाव में उसे मिली 15 सीटें। पिछले चुनाव में मिली थी 40 सीटें। डी लिंकर यानी लेफ्ट पार्टी को अभी मिली आठ, 2021 में 12 सीट, एसपीडी यानी सोशल डेमोक्रेट्स को 2026 में आठ सीट, 2021 में नौ सीट, ग्रीस को अभी आठ, 2021 में छह सीट, बीएसडब्ल्यू यानी ज़ारा वागन क्लिष्ट पार्टी को पांच सीट। इसे भी पढ़ें: दिल्ली की मतदाता सूची में राघव चड्ढा का नाम शामिल, AAP ने उठाए प्रक्रिया पर सवाल 35 साल के उलरिष जीत के हीरो 35 साल के उलरिष जिगमुंड 2016 से सैक्सनी अनहाल्ट की विधानसभा के सदस्य है। सोशल मीडिया पर अच्छी पकड़ है। माना जाता है कि उनकी जीत में Gen Z के समर्थन का बड़ा हाथ है। वह अपनी पार्टी के कट्टरपंथी नेताओ के मुकाबले ज्यादा नरम माने जाते है। जिगमुंड ने कहा कि लोगों ने साफ कर दिया है कि वे राजनीतिक बदलाव चाहते हैं। प्रवासियों पर कड़े AfD का जोर अवैध प्रवास रोकने, प्रवासियों को मिलने वाली सुविधाओं में कटौती और बड़ी संख्या में लोगों को वापस भेजने की नीति पर है। चुनाव में यह बहस का मुद्दा बना। इसे भी पढ़ें: Satya Niketan हादसे में AAP नेता Saurabh Bhardwaj का गंभीर आरोप, बचाव कार्य में Mobile Jammers का हुआ इस्तेमाल चांसलर को झटका जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ल्स और उनकी पार्टी क्रिश्चियन डेमोक्रेट्स (सीडीयू) के लिए बड़ा झटका है, जिसे महज 17.2% वोट मिले है। CDU 24 साल से इस प्रांत में सत्ता में थी। AfD की जीत से जुड़े सवाल पूर्वी जर्मनी के एक छोटे राज्य में धुर-दक्षिणपंथी पार्टी AfD की जीत से पूरे यूरोप में खलबली मची है। जर्मनी में जिन वजहों से पार्टी को जीत मिली, वैसे मुद्दे ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, स्पेन में भी उठाए जाते रहे है। अगले साल फ्रांस, इटली, स्पेन में चुनाव है, जहां धुर-दक्षिणपंथी नेता मजबूत हो रहे है। ये AfD के तरीकों का इस्तेमाल कर चुनाव जीतने की कोशिश कर सकते है। पर इन नेताओं का सत्ता में आना उदारवादी लोकतंत्र के लिए बुरी खबर है। रूस ने इस जीत को ऐतिहासिक बताया है। फ्रांस ने इसे पूरे यूरोप के लिए गंभीर समय बताया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया पर नतीजे की तस्वीर साझा की। इनकी छवि कैसी है? एक प्रतिष्ठित जर्मन पत्रिका है डे एश पीगल। 14-15 अगस्त को आई मैगज़ीन की कवर स्टोरी पर उलश की तस्वीर थी। शीर्षक था जर्मनी में सबसे खतरनाक इंसान ना उलरिश और ना उनके समर्थकों को इस विशेषण से कोई फर्क पड़ा बल्कि वो इसे कॉम्प्लीमेंट की तरह सराते दिखे। इलेक्शन कैंपेन से यह तस्वीरें आई कि किस तरह सपोर्टर टीशर्ट पर शपीगल कवर स्टोरी की फोटो छपवाकर घूम रहे थे। यहां तक कि शपीगल के उस एडिशन पर उलश से दस्तखत की फरमाइश भी हो रही थी। क्या है परिचय उलश का?
सोने में तेजी, चांदी 2.40 लाख के पार
मुंबई, वैश्विक स्तर पर अस्थिरता से सुरक्षित निवेश की मांग बढ़ने से सोना और चांदी में बुधवार को तेजी देखी गई।
तेलंगाना विधानसभा से बीआरएस के 21 विधायक मानसून सत्र की बाकी अवधि के लिए निलंबित
तेलंगाना विधानसभा से बीआरएस के 21 विधायक मानसून सत्र की बाकी अवधि के लिए निलंबित
दिल्ली में मणिपुर के संगीतकार पर 4-5 युवकों ने किया था लात-घूसों से हमला, बेटे ने दर्ज कराई एफआईआर
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समाजवादी छात्रसभा का ड्रेस कोड बदलने पर सपा सांसद बोले- 'यह समतामूलक समाज बनाने का संदेश'
समाजवादी छात्रसभा का ड्रेस कोड बदलने पर सपा सांसद बोले- 'यह समतामूलक समाज बनाने का संदेश'
पहली ही परीक्षा में फेल हो गया Makkah Pact, Saudi पर Houthi Attack होते ही छिप गयी Munir की सेना
मक्का पैक्ट को बने अभी ज्यादा वक्त नहीं बीता, लेकिन उसकी पहली बड़ी परीक्षा ने ही इस रक्षा समझौते की असली ताकत पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सऊदी अरब पर हूती मिसाइलों और ड्रोन की बारिश हुई, दक्षिणी शहरों में नागरिक और आर्थिक प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया, ऊर्जा प्रतिष्ठानों में आग लगी और 73 लोग घायल हुए, लेकिन मैदान में दिखाई दी तो सिर्फ निंदा। पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ “पूरी एकजुटता” जताई, उसकी संप्रभुता की रक्षा के अधिकार का समर्थन किया और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हमलों की कड़ी निंदा की। मगर सवाल यह है कि जिस समझौते की बुनियाद ही इस सिद्धांत पर रखी गई है कि एक सदस्य पर हमला तीनों पर हमला माना जाएगा और मिलकर उसका जवाब दिया जाएगा, उसकी पहली अग्निपरीक्षा में बाकी दो साझेदारों की सामूहिक ताकत आखिर नजर क्यों नहीं आ रही? दुनिया देख रही है कि एक मंच पर बैठे तीन देशों में से एक पर संकट आया तो असीम मुनीर की सेना दुबक गयी। दुनिया देख रही है कि बड़े बड़े बिल्ले सीने पर टांग कर घूमने वाले मुनीर निंदा वाला बयान देने के लिए भी सामने नहीं आये और इस काम के लिए शहबाज शरीफ को आगे कर दिया। उल्लेखनीय है कि मक्का में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने जिस संयुक्त रक्षा समझौते को औपचारिक रूप दिया था, उसका मूल सिद्धांत यही बताया गया था कि किसी एक सदस्य के खिलाफ आक्रामकता को तीनों की सुरक्षा के लिए खतरे के तौर पर देखा जाएगा। समझौते में सैन्य समन्वय, खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान, रणनीतिक परामर्श और रक्षा योजना जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की बात है। लेकिन अब असली सवाल कागज पर लिखे सिद्धांतों का नहीं, उनके अमल का है। सऊदी अरब के अबहा, खमिस मुशैत, जाजान और नजरान में हूतियों के हमलों ने इस सवाल को और तीखा कर दिया है। सऊदी अधिकारियों के अनुसार हमलों में 73 लोग घायल हुए और महिलाओं तथा बच्चों के भी घायल होने की बात सामने आई। कई ऊर्जा प्रतिष्ठानों में आग लगी और कुछ जगहों पर संचालन अस्थायी रूप से रोकना पड़ा। हूतियों ने हमलों की जिम्मेदारी लेते हुए दावा किया कि उन्होंने अबहा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे, किंग खालिद एयर बेस और अरामको से जुड़े प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया। रियाद ने इसे खतरनाक और गैर-जिम्मेदाराना उकसावे वाली कार्रवाई बताते हुए जवाब देने की चेतावनी दी है। सऊदी नेतृत्व का कहना है कि देश की संप्रभुता, नागरिकों और राष्ट्रीय संपत्तियों की रक्षा के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जाएंगे। दूसरी ओर हूती इन हमलों को यमन में सऊदी समर्थित बलों की कार्रवाई का जवाब बता रहे हैं। उनका दावा है कि पिछले दिनों यमन के कई इलाकों में 120 से ज्यादा हवाई हमले हुए और एक जेल पर हमले में 11 लोगों की मौत हुई। यानी यह सिर्फ एकतरफा हमला नहीं, बल्कि तेजी से बढ़ता प्रतिशोध का चक्र है। यहीं पाकिस्तान पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। इस्लामाबाद ने कहा कि वह सऊदी अरब की संप्रभुता और सुरक्षा के साथ खड़ा है। लेकिन क्या “निंदा” और “समर्थन” ही उस रक्षा समझौते की पूरी सीमा है, जिसके बारे में सामूहिक सुरक्षा और सामूहिक प्रतिरोध की बातें की गई थीं? अगर नहीं, तो पाकिस्तान की वास्तविक भूमिका क्या होगी? क्या वह सैन्य सहयोग करेगा, खुफिया सहायता देगा, हवाई सुरक्षा में मदद करेगा या केवल बयान जारी करता रहेगा? साथ ही सवाल सिर्फ पाकिस्तान का नहीं है। तुर्किये कहां है? जिस त्रिपक्षीय ढांचे को क्षेत्रीय स्थिरता और सामूहिक सुरक्षा का माध्यम बताया गया था, उसकी विश्वसनीयता तभी साबित होगी जब संकट के समय उसके सदस्य अपनी प्रतिबद्धताओं को व्यवहार में बदलें। सवाल उठता है कि अगर संकट के वक्त भी सैन्य गठबंधन केवल बयानबाजी तक सीमित रहे, तो उसकी विश्वसनीयता कितनी है? देखा जाये तो खतरा इसलिए भी बड़ा है क्योंकि हूती-सऊदी टकराव अकेला मोर्चा नहीं है। हूती लाल सागर और बाब-अल-मंदेब के आसपास समुद्री यातायात को निशाना बनाने की क्षमता पहले ही दिखा चुके हैं। जुलाई में उन्होंने सऊदी तेल टैंकरों पर हमले और रियाद के खिलाफ समुद्री नाकाबंदी की घोषणा की थी। दूसरी तरफ सऊदी समर्थित यमनी बल हूतियों के खिलाफ जवाबी अभियान चला रहे हैं। दक्षिण-पश्चिमी यमन में लड़ाई तेज होने से सैकड़ों लोगों के मारे जाने और हजारों के विस्थापित होने की खबरें हैं। सबसे खतरनाक बात यह है कि यह संघर्ष उस समय भड़क रहा है जब अमेरिका और ईरान के बीच रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर तनाव अलग मोर्चे पर चल रहा है। एक तरफ फारस की खाड़ी और होर्मुज, दूसरी तरफ लाल सागर और बाब-अल-मंदेब, दोनों समुद्री गलियारों पर संकट एक साथ गहराया तो इसका असर सिर्फ मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा। सऊदी ऊर्जा ढांचे पर लगातार हमले वैश्विक तेल बाजार के लिए बड़ा झटका बन सकते हैं। शुरुआती हमलों के बाद ही कच्चे तेल की कीमतों में उछाल दर्ज किया गया है। यदि रिफाइनरी, पाइपलाइन, प्रसंस्करण केंद्र या निर्यात ढांचा लगातार निशाने पर आया तो बाजार में वास्तविक सप्लाई पर असर हो सकता है। इसका असर पेट्रोल-डीजल से लेकर परिवहन, विनिर्माण और महंगाई तक पहुंच सकता है। भारत के लिए खतरा और सीधा है। खाड़ी से ऊर्जा आयात और लाल सागर से जुड़ा समुद्री व्यापार दोनों क्षेत्रीय स्थिरता पर निर्भर हैं। होर्मुज और लाल सागर दोनों बाधित हुए तो तेल आयात महंगा होगा, जहाजों को लंबा रास्ता अपनाना पड़ सकता है, बीमा और माल ढुलाई की लागत बढ़ सकती है और इसका असर भारतीय अर्थव्यवस्था तथा आम उपभोक्ता तक पहुंच सकता है। यहां एक सवाल और उठता है कि क्या यह एक और मध्य-पूर्वी युद्ध की शुरुआत हो सकती है? देखा जाये तो एक संभावना यह है कि सऊदी अरब सीमित जवाबी कार्रवाई करे और कूटनीति के जरिए स्थिति को नियंत्रित किया जाए। दूसरी संभावना है कि यमन का युद्ध फिर अपने पुराने खूनी दौर में लौट जाए। लेकिन सबसे भयावह स्थिति तब होगी जब ये अलग-अलग संघर्ष एक-दूसरे में मिल जाएं। अगर हूती सऊदी अरब पर हमले बढ़ाते हैं, रियाद बड़े सैन्य अभियान की ओर जाता है, अमेरिका-ईरान टकराव तेज होता है और लाल सागर में जहाजों पर हमले बढ़ते हैं, तो यमन, सऊदी अरब, ईरान और अमेरिका के अलग-अलग मोर्चे एक ही युद्धक्षेत्र में बदल सकते हैं। तब मक्का पैक्ट की असली परीक्षा भी होगी और उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी सामने आएगी। देखा जाये तो रक्षा समझौते की विश्वसनीयता केवल इस बात से तय नहीं होती कि संकट के बाद किसने कितनी कड़ी भाषा में बयान दिया। वह इस बात से तय होती है कि संकट आने पर कौन कितना आगे खड़ा हुआ। फिलहाल सऊदी अरब पर हमले जारी हैं, हूती जवाबी कार्रवाई की धमकी दे रहे हैं और रियाद भी पीछे हटने के संकेत नहीं दे रहा। ऐसे में पाकिस्तान के सामने भी साफ सवाल है। क्या वह सिर्फ सऊदी अरब के लिए “हम आपके साथ हैं” कहेगा, या मक्का में किए गए सामूहिक सुरक्षा के वादे को किसी ठोस रणनीतिक कार्रवाई में बदलेगा? अगर जवाब सिर्फ निंदा है, तो फिर सवाल उठना स्वाभाविक है कि मक्का पैक्ट आखिर रक्षा समझौता है या निंदा का नया मंच? -नीरज कुमार दुबे
गृहमंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष सहित कई नेताओं ने भारतेंदु हरिश्चंद्र को जयंती पर किया नमन
गृहमंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष सहित कई नेताओं ने भारतेंदु हरिश्चंद्र को जयंती पर किया नमन
कर्नाटक के लोक निर्माण मंत्री सतीश जारकीहोली के 15 ठिकानों पर ईडी का छापा
कर्नाटक के लोक निर्माण मंत्री सतीश जारकीहोली के 15 ठिकानों पर ईडी का छापा
कांग्रेस ने बंगाल में जिंदा होने का सबूत देने के लिए दर्ज कराई धीरेंद्र शास्त्री पर एफआईआर : दिलीप घोष
ओडिशा में भाजपा खनन नीति के खिलाफ इंडिया गठबंधन का आंदोलन
ओडिशा में इंडिया गठबंधन ने राज्य की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार की खनन नीति के खिलाफ मंगलवार को राज्यव्यापी प्रतिरोध आंदोलन का एलान किया
समाजवादी पार्टी की छात्र इकाई के ड्रेस का रंग नीला किए जाने को लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में बयानबाजी तेज हो गई है
दिल्ली के मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने उद्योगों को बढ़ावा देने वाली योजनाओं की समीक्षा की
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भारतीय पत्थर कला की वैश्विक यात्रा
भारत में पत्थर तराशने की परंपरा दुनिया की सबसे समृद्ध परंपराओं में से एक है। सातवीं शताब्दी ईसा पूर्व से यहां राजमिस्त्रियों और शिल्पियों के गिल्ड मौजूद रहे हैं, और यह हुनर पीढ़ी-दर-पीढ़ी सौंपा जाता रहा
हिमाचल ने दुर्लभ रिकॉर्ड के 17 लाख आर्काइव पेजों को डिजिटाइज किया
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1.3 लाख करोड़ की फ्रेट कॉरिडोर परियोजना राष्ट्र को समर्पित, महाराष्ट्र को मिलेगा बड़ा फायदा
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आखिर युवाओं के बीच क्यों नहीं चमक पा रहे हैं भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन?
भाजपा के राजनीतिक गलियारों में एक सवाल सबको बेचैन किए हुए है कि आखिर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन युवाओं के बीच क्यों नहीं चमक पा रहे हैं? क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, सपा मुखिया अखिलेश यादव, राजद सुप्रीमो तेजस्वी यादव, आप नेता अरविंद केजरीवाल, जनसुराज नेता प्रशांत किशोर आदि जैसे राजनीतिक क्षत्रपों को सियासी रूप से निपटाने के लिए नितिन नवीन के रूप में जो राजनीतिक तुरूप का पत्ता चला है, वह अब मनहूसियत की ओर अग्रसर है! कहीं विपक्ष के इशारे पर थिरक रहा जेन-जी भारी पड़ रहा है तो कहीं सवर्ण संगठनों का जनप्रदर्शन भाजपा नेतृत्व की रीति-नीति पर सवालों के गोले बरसा रहा है। वहीं कांग्रेस व उसके समर्थक दल जिस तरह से अपने अपने मुद्दों पर भाजपा को घेर रहे हैं, उससे पार्टी के कट्टर समर्थकों में भी ऊहापोह मची हुई है! पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन उनकी उपलब्धि जरूर है, लेकिन सवाल तो यहां तक उठ रहे हैं कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह पार्टी की कीमत पर उन्हें एक सीमा के बाद युवाओं के बीच चमकने नहीं देना चाहते और पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा की तरह सिर्फ अपना-अपना अनुगामी बनाए रखना चाहते हैं? चूंकि नितिन नवीन के ऊपर पीएम मोदी का ठप्पा लगा हुआ है, इसलिए उनपर एक सीमा के बाद बड़े नेता विश्वास भी नहीं कर पा रहे हैं और अफवाह उड़वा रहे हैं कि नितिन नवीन में नैसर्गिक नेतृत्व क्षमता की कमी है? इससे मोदी-भागवत दोनों परेशान हैं। राजनीतिक विश्लेषक की मानें तो यह सवाल असल में नितिन नवीन की व्यक्तिगत क्षमता से ज्यादा भाजपा के सत्ता-संगठन मॉडल का सवाल है? अभी उपलब्ध घटनाक्रम को देखकर सीधे यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या गृहमंत्री अमित शाह उन्हें “चमकने नहीं देना चाहते”। लेकिन यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या भाजपा में किसी राष्ट्रीय अध्यक्ष को अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाने की पर्याप्त जगह मिलती है? इसे भी पढ़ें: पुरानी 'साइकिल' में सपा ने लगाये नए 'राजनीतिक पुर्जे', अखिलेश की ‘शार्प’ और डिंपल की ‘सॉफ्ट’ राजनीति क्या गुल खिलाएगी? देखा जाए तो अगस्त 2026 में नितिन नवीन ने स्वयं Gen Z outreach की रणनीति पर बड़ी बैठक की, जिसमें करीब 45 नेताओं ने हिस्सा लिया। इस बैठक में पार्टी ने युवाओं के मुद्दों और उनसे संवाद की रणनीति पर जोर दिया है, हालांकि सर जमीन पर ऐसा कुछ होता हुआ दिखाई नहीं पड़ रहा है, क्योंकि इसमें युवा कम दिलचस्पी लेते दिखाई दे रहे हैं। लिहाजा, मेरे आकलन में तीन संभावनाएँ हैं:- पहली, यह “नियंत्रित नेतृत्व” की रणनीति हो सकती है: भाजपा में प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह की राजनीतिक ब्रांड-शक्ति इतनी बड़ी है कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का स्वतंत्र जन-नेता के रूप में उभरना आसान नहीं है। पार्टी अध्यक्ष का प्राथमिक काम संगठन, चुनाव और रणनीति का संचालन रहता है; लेकिन प्रधानमंत्री की लोकप्रियता का समानांतर राष्ट्रीय चेहरा बनना उसका घोषित उद्देश्य नहीं होता। इसलिए नितिन नवीन की दृश्यता कम होना अपने-आप में यह साबित नहीं करता कि उन्हें जानबूझकर रोका जा रहा है। दूसरी, नितिन नवीन अभी “राष्ट्रीय नेता” बनने की प्रक्रिया में हैं: वे भाजपा के सबसे युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और उनकी नई राष्ट्रीय टीम में अनुभव तथा युवा ऊर्जा को मिलाने की कोशिश दिखाई देती है। लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना और राष्ट्रीय जननेता बनना दो अलग चीजें हैं। ऐसा इसलिए कि राष्ट्रीय जननेता बनने के लिए चाहिए: अपनी विशिष्ट राजनीतिक भाषा, युवाओं के बीच स्वतः आकर्षण, लगातार देशव्यापी उपस्थिति, कठिन मुद्दों पर स्वतंत्र विचार, संगठन से बाहर भी व्यक्तिगत जनाधार, मीडिया और सोशल मीडिया में अपनी पहचान, लेकिन इनमें से अधिकांश का मूल्यांकन अभी करना जल्दी होगा। तीसरी, सबसे दिलचस्प संभावना: नितिन नवीन की क्षमता है, लेकिन उनकी “राजनीतिक ब्रांडिंग” अभी विकसित नहीं हुई है: यही वह जगह है जहाँ मैं आपकी पिछली बात से सहमत हूँ कि युवाओं को जोड़ना केवल कार्यक्रमों से नहीं होगा। पार्टी अभी bike yatras, hackathons, marathons, campus activities और social-media outreach जैसी योजनाओं पर विचार कर रही है। लेकिन युवा किसी नेता से केवल यह नहीं सुनना चाहता कि “मोदी सरकार ने यह किया”, बल्कि अब वह पूछता है: “आप स्वयं मेरे लिए क्या सोचते हैं?” यहीं नितिन नवीन को अपनी अलग पहचान बनानी होगी। असली परीक्षा यही है! ऐसे में अगर नितिन नवीन हर भाषण में मोदी सरकार की उपलब्धियों के प्रवक्ता बने रहेंगे, तो वे संगठन के सफल अध्यक्ष हो सकते हैं, लेकिन युवा जननेता बनने में कठिनाई होगी। लेकिन यदि वे कहें—“मोदी जी ने भारत को 2047 का लक्ष्य दिया है; अब मेरी पीढ़ी तय करेगी कि उस भारत की शिक्षा, रोजगार, AI, उद्यमिता और राजनीति कैसी होगी।” तो एक अलग राजनीतिक आवाज पैदा होगी। # सवाल है कि क्या स्वाभाविक उभार से मोदी-शाह उन्हें रोकेंगे? मेरे पास ऐसा कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं है कि मोदी या शाह नितिन नवीन को युवाओं के बीच उभरने से रोक रहे हैं। उलटे, उपलब्ध रिपोर्टों में मोदी और शाह की ओर से युवाओं को केंद्र में रखने की बात तथा नितिन नवीन के नेतृत्व में Gen Z outreach को आगे बढ़ाने की तस्वीर मिलती है। लेकिन भाजपा की राजनीतिक संस्कृति में एक संस्थागत सीमा जरूर है, वह यह कि - मोदी = सर्वोच्च राष्ट्रीय राजनीतिक ब्रांड। शाह = संगठन/रणनीति का शक्तिशाली केंद्र। राष्ट्रीय अध्यक्ष = संगठन का चेहरा और समन्वयक। नितिन नवीन को इस ढाँचे के भीतर रहते हुए “अपनी जगह” बनानी होगी। और अगर प्राकृतिक नेतृत्व क्षमता की बात करें? तो अभी फैसला देना जल्दबाजी होगा, बल्कि मैं नितिन नवीन के लिए अगले 12–18 महीने को नेतृत्व की अग्निपरीक्षा मानूंगा। तब देखना होगा कि क्या वे युवाओं के बीच बिना प्रधानमंत्री के नाम के भी भीड़ आकर्षित कर सकते हैं? बेरोजगारी, परीक्षा, शिक्षा और AI जैसे असुविधाजनक सवालों पर अपनी भाषा विकसित करते हैं? भाजपा के पुराने कार्यकर्ताओं के साथ-साथ नए युवाओं को भी नेतृत्व में ऊपर लाते हैं? सोशल मीडिया पर केवल पार्टी का संदेश दोहराने के बजाय अपना राजनीतिक विचार रखते हैं? किसी संकट में स्वयं आगे आकर समाधान प्रस्तुत करते हैं? राज्यों में जाकर “नितिन नवीन मॉडल” जैसी कोई संगठनात्मक पहचान बनाते हैं? अगर इन छह सवालों का जवाब अगले डेढ़ साल में हाँ होता है, तो यह कहना मुश्किल होगा कि उनमें प्राकृतिक नेतृत्व क्षमता नहीं है। वहीं, नितिन नवीन के सामने सबसे बड़ा खतरा मोदी-शाह से कम और “सिर्फ अध्यक्ष रह जाने” का ज्यादा है। राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में वे सफल हो सकते हैं—बैठकें करें, संगठन विस्तार करें, चुनाव जिताएँ, पदाधिकारी नियुक्त करें। उनकी नई राष्ट्रीय टीम में अनुभवी और युवा नेताओं का मिश्रण भी इसी संगठनात्मक भूमिका की ओर संकेत करता है। लेकिन इतिहास में कुछ अध्यक्ष संगठन के पदाधिकारी बनकर रह जाते हैं और कुछ अपने दौर के राजनीतिक चेहरे बन जाते हैं। लिहाजा, नितिन नवीन को दूसरा रास्ता चुनना होगा। और इसके लिए शायद उन्हें मोदी-शाह से टकराने की जरूरत नहीं है; यह उनका स्वभाव भी नहीं है। इसलिए उन्हें मोदी-शाह की छाया के भीतर अपनी राजनीतिक धूप पैदा करनी होगी। यही उनकी वास्तविक नेतृत्व-परीक्षा है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
'विकसित भारत' संवाद के लिए दौड़ में एक करोड़ युवाओं के शामिल होने की उम्मीद
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ब्रिक्स 2026: भारत की कूटनीतिक क्षमताओं को चुनौती देता
2026 में ग्लोबल जियो पॉलिटिक्स के मौजूदा माहौल के आधार पर, ब्रिक्स एक इकोनॉमिक इन्वेस्टमेंट के शॉर्ट फॉर्म से बढ़कर एक बड़ी इंस्टीट्यूशनल ताकत बन गया है जो उभरते हुए मल्टीपोलर वर्ल्ड ऑर्डर को आकार दे रहा है। इसके महत्व, उपलब्धियों, चुनौतियों और ब्रिक्स विरोधी बातों को सुलझाने के प्रयासों को समझना आवश्यक है। मल्टीपोलर दुनिया में ब्रिक्स का महत्व ब्रिक्स ग्लोबल साउथ के हितों को बताने और एक ज़्यादा संतुलित बहुध्रुवीय विश्व बनाने के लिए एक बुनियादी प्लेटफ़ॉर्म बन गया है। 2025 तक, ब्रिक्स के सदस्य देश दुनिया की लगभग 48% आबादी और परचेसिंग पावर पैरिटी (पी पी पी) के आधार पर ग्लोबल जीडीपी का 39% हिस्सा थे। भारत की 2026 ब्रिक्स प्रेसीडेंसी के तहत, इस की गाइडिंग थीम बिल्डिंग फॉर रेजिलिएंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन और सस्टेनेबिलिटी है। कमज़ोर ग्लोबल गवर्नेंस, प्रोटेक्शनिस्ट पॉलिसी और बढ़ती जियोपॉलिटिकल अनिश्चितता के दौर में, ब्रिक्स साउथ-साउथ सहयोग के लिए एक सही विकल्प देता है जो पारंपरिक दबदबे और हुक्म से रहित है। यह उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं को अपनी पार्टनरशिप में विविधता लाने और ग्लोबल गवर्नेंस में अपनी आवाज़ बुलंद करने की इजाज़त देता है, बिना कोल्ड वॉर-स्टाइल के बाइनरी अलाइनमेंट में मजबूर हुए। ब्रिक्स की खास उपलब्धियां ब्रिक्स ने कई उपलब्धियां हासिल की हैं। इसका सफ़र आसान नहीं था। कई चुनौतियों के बावजूद यह अपने अनेक लक्ष्यों को हासिल कर सका। कुछ मुख्य उपलब्धियां हैं: स्ट्रेटेजिक विस्तार: ब्रिक्स ने सफलतापूर्वक अपनी पहुंच बढ़ाई है। 2026 तक, इस ब्लॉक में ऑफिशियली 11 सदस्य देश शामिल हैं: ओरिजिनल पांच (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) प्लस मिस्र, इथियोपिया, ईरान, इंडोनेशिया, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब (हालांकि सऊदी अरब अपने फॉर्मल स्टेटस को लेकर कुछ डिप्लोमैटिक अस्पष्टता बनाए हुए है)। पार्टनर देशों का संस्थागतकरण: मुख्य फैसले लेने की क्षमता को कम किए बिना अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए, ब्रिक्स ने एक फॉर्मल पार्टनर देश कैटेगरी शुरू की। 2025 में, दस देश—बेलारूस, बोलीविया, क्यूबा, कज़ाकिस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज़्बेकिस्तान और वियतनाम—ऑफिशियल पार्टनर के तौर पर शामिल हुए, जिससे एंगेजमेंट के लिए एक फ्लेक्सिबल फ्रेमवर्क बना। न्यू डेवलपमेंट बैंक (एन डी बी) की उपलब्धियाँ: एन डी बी ने हाल ही में अपनी 10वीं वर्षगाँठ मनाई, जिसमें क्लीन एनर्जी, ट्रांसपोर्ट और सस्टेनेबल डेवलपमेंट में 120 से ज़्यादा बड़े प्रोजेक्ट्स को फाइनेंस किया गया। इसने ग्लोबल साउथ को पार्टनरशिप, सॉवरेनिटी और शेयर्ड प्रायोरिटीज़ पर बना एक मल्टीलेटरल डेवलपमेंट बैंक सफलतापूर्वक दिया है, न कि वेस्टर्न-लेड फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन्स से जुड़ी कंडीशनैलिटीज़ पर। इंट्रा-ब्रिक्स ट्रेड ग्रोथ: मेंबर्स के बीच दो दशकों के ट्रेड एक्सपेंशन ने डेवलप हो रहे इकोनॉमिक संबंधों को सामने लाया है, जिससे साउथ-साउथ ट्रेड के नए, रेसिलिएंट पैटर्न बने हैं जो बाहरी झटकों से कम वल्नरेबल हैं। कॉमर्स सेक्रेटरी राजेश अग्रवाल ने 5 सितंबर, 2026 को कहा कि इंट्रा-ब्रिक्स मर्चेंडाइज़ ट्रेड अब कई गुना बढ़ गया है, जो मेंबर देशों के बीच गहरे ट्रेड इंटीग्रेशन और मज़बूत इकोनॉमिक कोऑपरेशन के लिए बहुत ज़्यादा अनटैप्ड पोटेंशियल को हाईलाइट करता है। 2003 में $84 बिलियन से 2024 में $1.17 ट्रिलियन तक इंट्रा-ब्रिक्स मर्चेंडाइज़ ट्रेड 13 गुना बढ़ गया, जो 13.3 परसेंट की सालाना एवरेज रेट से बढ़ रहा है, जो इसी समय के दौरान 5.7 परसेंट की ग्लोबल ट्रेड ग्रोथ से काफी ज़्यादा है। भविष्य की चुनौतियाँ भारत के लिए अलग-अलग चुनौतियों के बीच ब्रिक्स को आगे ले जाना आसान नहीं होगा। उनमें से कुछ ये हैं: ब्रिक्स कनेक्ट्स को लागू करना: भारत की 2026 की ब्रिक्स अध्यक्षता की पहल ब्रिक्स कनेक्ट्स का उद्देश्य सदस्य देशों के नागरिकों को लाभ पहुँचाने को प्राथमिकता देना है। इसके मुख्य फ़ोकस एरिया में डिजिटल पेमेंट और फ़ाइनेंशियल इनक्लूज़न (वित्तीय समावेश) को बढ़ाना, एजुकेशनल डिग्री को आपसी मान्यता देना, सस्ता इंटरनेट और इंसानों पर केंद्रित ए आई, एक नया ब्रिक्स स्टार्टअप नॉलेज हब, और बेहतर ट्रेड कॉरिडोर शामिल हैं, जिनसे लॉजिस्टिक्स की लागत कम हो सकती है और सामान सस्ता हो सकता है। अंदरूनी सोच में विभिन्नता: यह ग्रुप एक जैसा ग्रुप नहीं है, जिससे आम सहमति बनाना मुश्किल हो जाता है। इसमें बहुत अलग-अलग जियोपॉलिटिकल सोच वाले देश हैं, जिनमें वे देश शामिल हैं जो पश्चिम का सक्रिय रूप से सामना कर रहे हैं (जैसे, रूस, ईरान) से लेकर वे देश भी शामिल हैं जो पश्चिमी देशों (जैसे, भारत, ब्राज़ील) के साथ मज़बूत स्ट्रेटेजिक और इकोनॉमिक संबंध बनाए हुए हैं। इंस्टीट्यूशनल एकता बनाम विस्तार: ब्रिक्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वह खुद को ज़्यादा बढ़ाए बिना अपनी बढ़ती जियोपॉलिटिकल अहमियत को ठोस इंस्टीट्यूशनल असर में बदले। तेज़ी से विस्तार से इस ग्रुप के बेकाबू होने और निर्णायक रूप से काम करने की इसकी क्षमता कम होने का खतरा है। अलग-अलग इकोनॉमिक प्राथमिकताएँ: फाइनेंशियल इंटीग्रेशन पर सदस्यों के अलग-अलग विचार हैं। जहां कुछ लोग वेस्ट से तेज़ी से फाइनेंशियल डीकपलिंग पर ज़ोर देते हैं, वहीं दूसरे प्रैक्टिकल इकोनॉमिक डेवलपमेंट को प्राथमिकता देते हैं और बड़े फाइनेंशियल बदलावों के नतीजों से डरते हैं। ब्रिक्स विरोधी कोशिशों और बातों पर ध्यान देना ब्रिक्स उस पश्चिमी नैरेटिव को बेअसर करने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहा है जिसके तहत इसे पश्चिम-विरोधी क्लब या एक विघटनकारी ताकत के तौर पर देखा जाता है। इन कोशिशों से निपटने के लिए यह कई रणनीतियाँ अपनाता है: इसे भी पढ़ें: सहयोग, समावेश और समाधान...BRICS में क्या खेला करने भारत आ रहे रूस, चीन और ईरान नैरेटिव को नए सिरे से पेश करना: 2026 में भारत की अध्यक्षता में नेतृत्व ने टकराव वाली छवि को स्पष्ट रूप से खारिज किया है। आधिकारिक राजनयिक रुख इस बात पर ज़ोर देता है कि ब्रिक्स पश्चिम-विरोधी नहीं है; यह संतुलन का पक्षधर है और ब्रिक्स देशों को G7-विरोधी नहीं बनना चाहिए, और G7 को ब्रिक्स -विरोधी नहीं बनना चाहिए। यह समूह खुद को स्वाभाविक रूप से विरोधी के बजाय गैर-पश्चिमी और सुधारवादी के तौर पर पेश करता है। डी-डॉलरलाइज़ेशन पर व्यावहारिक और क्रमिक दृष्टिकोण: गंभीर आर्थिक जवाबी कार्रवाई (जैसे टैरिफ की धमकियाँ) से बचने के लिए, ब्रिक्स ने डी-डॉलरलाइज़ेशन से जुड़ी अपनी बयानबाज़ी को नरम किया है। अमेरिकी डॉलर या ब्रिक्स की साझा मुद्रा को अचानक और पूरी तरह से बदलने के बजाय—जिसका भारत जैसे सदस्यों ने स्पष्ट रूप से विरोध किया है—यह समूह व्यावहारिक और क्रमिक बदलाव पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। इसमें स्थानीय मुद्रा में लेन-देन को बढ़ावा देना, द्विपक्षीय स्वैप समझौते और व्यापार के लिए डिजिटल मुद्रा के ढांचे की संभावनाओं को तलाशना शामिल है। समावेशी बहुपक्षवाद पर ध्यान: ब्रिक्स लगातार व्यापक UN सुधार, बहुपक्षीय व्यापार सुधार और समावेशी वैश्विक शासन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराता है। मौजूदा संस्थानों को पूरी तरह खत्म करने के बजाय उनमें सुधार की वकालत करके, ब्रिक्स कई उदारवादी देशों का समर्थन हासिल करता है। एक्सक्लूसिव ब्लॉक (सीमित समूह) की धारणा को कम करना: पार्टनर कंट्री मॉडल की शुरुआत रणनीतिक रूप से उन देशों को शामिल करती है जो अमेरिका के सहयोगी या साझेदार भी हैं (जैसे थाईलैंड, मलेशिया और कज़ाकिस्तान)। इससे पता चलता है कि ब्रिक्स के साथ जुड़ना पश्चिमी देशों के साथ संबंधों के खिलाफ़ नहीं है, जिससे इस समूह को राजनयिक रूप से अलग-थलग करने की कोशिशें कमज़ोर पड़ती हैं। निष्कर्ष 2026 में ब्रिक्स एक जटिल बदलाव के दौर से गुज़र रहा है। इसकी अहमियत 'ग्लोबल साउथ' को एक व्यवस्थित और संस्थागत आवाज़ देने की क्षमता में निहित है। भारत, जो 2012, 2016 और 2021 के बाद चौथी बार ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है, ने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय और व्यापारिक बुनियादी ढाँचे को मज़बूत करने के अपने प्रयासों को भी प्रदर्शित किया। लेकिन ब्रिक्स की दीर्घकालिक सफलता आंतरिक मतभेदों को सुलझाने, एन डी बी जैसे तंत्रों के माध्यम से ठोस आर्थिक लाभ पहुँचाने और एक व्यावहारिक व सुधार-उन्मुख रुख बनाए रखने पर निर्भर करेगी, जो ब्रिक्स को रोकने की कोशिशों को बेअसर कर सके। - प्रोफ़ेसर (डॉ.) डी.के. पांडेय विज़िटिंग सीनियर फ़ेलो, सेंटर फ़ॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज़, एडजंक्ट प्रोफ़ेसर, राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय, सलाहकार, एकेडमिक काउंसिल, फ़ॉरेन पॉलिसी स्कूल और GNOIT, पूर्व एसोसिएट डीन, SoB, गलगोटिया विश्वविद्यालय।
सत्य निकेतन हादसा: जिम्मेदार अधिकारियों पर हो ठोस कार्रवाई
दिल्ली के सत्य निकेतन में रविवार को पांच मंजिला छात्र-पीजी भवन का भरभराकर गिर जाना केवल एक दर्दनाक हादसा नहीं है। यह उस व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न है, जो भवन बनने देती है, उसमें अनधिकृत निर्माण होने देती है, उसमें विद्यार्थियों को रहने देती है, उसकी कमजोरियों को वर्षों तक नजरअंदाज करती है और फिर उसके ढह जाने के बाद जागती है। इस हादसे में अब तक छह लोगों की मौत की सूचना है और कई लोग घायल हुए हैं। प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार भवन में बेसमेंट और कई ऊपरी मंजिलों में मरम्मत या निर्माण संबंधी काम चल रहा था। प्रशासन ने मजिस्ट्रेट जांच और भवन मालिक के खिलाफ एफआईआर के आदेश दिए हैं। लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि हादसे के बाद किसके खिलाफ एफआईआर होगी? असली सवाल यह है कि हादसे से पहले जिम्मेदार अधिकारी कहां थे? यदि निर्माण नियमों का उल्लंघन था, यदि भवन का स्वीकृत नक्शा नहीं था, यदि अतिरिक्त मंजिलें बनाई गई थीं, यदि बेसमेंट में निर्माण चल रहा था, यदि भवन छात्रों के रहने के लिए इस्तेमाल हो रहा था और यदि वह संरचनात्मक रूप से जोखिमपूर्ण था, तो इन सबका पता प्रशासन को तब क्यों नहीं चला जब वहां निर्माण हो रहा था? सत्य निकेतन दिल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिणी परिसर के आसपास विद्यार्थियों का प्रमुख इलाका है। देश के विभिन्न राज्यों से हजारों युवा यहां अपने भविष्य के सपने लेकर आते हैं। वे छोटे-छोटे कमरों, पीजी और किराये के मकानों में रहकर पढ़ते हैं। उनके माता-पिता अपनी जीवनभर की कमाई का बड़ा हिस्सा बच्चों की शिक्षा पर लगाते हैं और यह विश्वास करते हैं कि राजधानी में उनका बच्चा सुरक्षित रहेगा। लेकिन जब शिक्षा की तलाश में निकला युवा एक ऐसी इमारत में पहुंचता है, जिसकी नींव ही नियमों और सुरक्षा के साथ समझौते पर टिकी हो, तो विकास की हमारी पूरी अवधारणा कटघरे में खड़ी हो जाती है और यह कोई पहली चेतावनी नहीं है। 2022 में भी सत्य निकेतन में निर्माणाधीन चार मंजिला इमारत ढहने से दो मजदूरों की मौत हुई थी और चार लोग घायल हुए थे। उस समय भी निर्माण कार्य, सुरक्षा और भवन की निगरानी पर सवाल उठे थे। लगभग चार साल बाद उसी इलाके में फिर एक बड़ी इमारत ढह गई। इसका अर्थ है कि हमने घटना से सबक लेने के बजाय घटना को एक समाचार की तरह देखा और आगे बढ़ गए। इसे भी पढ़ें: बच्चों की मौत का जिम्मेदार कौन? यहां भ्रष्टाचार की बात करते समय एक सावधानी भी जरूरी है। किसी अधिकारी या व्यवसायी को बिना जांच दोषी ठहराना उचित नहीं। लेकिन यदि जांच में यह सिद्ध होता है कि नियमों के विरुद्ध निर्माण को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया, निरीक्षण में लापरवाही हुई या किसी प्रकार की मिलीभगत रही, तो जिम्मेदारी केवल भवन मालिक तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। जिसने नियम तोड़े और जिसने नियम तोड़ने दिए-दोनों को जवाबदेह बनाना होगा। सत्य निकेतन की त्रासदी को जुलाई 2024 के पुराने राजेंद्र नगर हादसे से अलग करके नहीं देखा जा सकता। वहां राव आईएएस स्टडी सर्किल के बेसमेंट में पानी भर जाने से तीन सिविल सेवा अभ्यर्थियों-तनीया सोनी, श्रेया यादव और नवीन डालविन की मृत्यु हुई थी। सबसे भयावह तथ्य यह था कि बेसमेंट का उपयोग लाइब्रेरी के रूप में हो रहा था, जबकि उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार उसे पार्किंग और स्टोरेज के लिए इस्तेमाल किया जाना था। इससे भी अधिक चिंताजनक बात सामने आई-हादसे से लगभग एक महीने पहले एक विद्यार्थी ने एमसीडी में शिकायत की थी। भारत में भवन निर्माण के लिए नियमों की कमी नहीं है। नक्शा स्वीकृति, भवन उपविधियां, अग्नि सुरक्षा, संरचनात्मक सुरक्षा, अधिभोग प्रमाणपत्र, पार्किंग, बेसमेंट के उपयोग-हर क्षेत्र के लिए नियम हैं। लेकिन समस्या नियमों की संख्या नहीं, उनके पालन की ईमानदारी है। जब किसी भवन में एक मंजिल की अनुमति हो और चार-पांच मंजिलें खड़ी हो जाएं, जब बेसमेंट स्टोरेज के लिए स्वीकृत हो और वहां लाइब्रेरी या व्यावसायिक गतिविधि चलने लगे, जब सड़क की जलनिकासी बाधित हो और फिर भी निर्माण चलता रहे-तो सवाल केवल नागरिक की मनमानी का नहीं है। सवाल उस पूरी निगरानी व्यवस्था का है, जो आंखों के सामने होने वाले बदलाव को देखने के बावजूद समय पर कार्रवाई नहीं करती। भ्रष्टाचार केवल रिश्वत लेने का नाम नहीं है। भ्रष्टाचार वह भी है जब कोई जिम्मेदार व्यक्ति अपने कर्तव्य को जानबूझकर न निभाए। किसी अवैध निर्माण को देखकर आंखें बंद कर लेना भी व्यवस्था के प्रति अपराध है। किसी भवन को जोखिमपूर्ण जानते हुए कार्रवाई न करना भी भ्रष्ट प्रशासनिक संस्कृति का हिस्सा है। सरकारी भवन भी सुरक्षित नहीं तो आम आदमी किस पर भरोसा करे? मई 2024 में दिल्ली के आईटीओ स्थित सेंट्रल रेवेन्यू बिल्डिंग में आग लगी थी। 46 वर्षीय ऑफिस सुपरिंटेंडेंट की धुएं में दम घुटने से मृत्यु हुई थी। रिपोर्टों के अनुसार भवन पुराना था और उसमें आधुनिक फायर-स्प्रिंकलर व्यवस्था भी नहीं थी। यह घटना एक और सवाल सामने रखती है-जब सरकारी भवनों में भी सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त नहीं है, तो निजी और अनधिकृत भवनों की निगरानी की स्थिति क्या होगी? मुंबई, दिल्ली, चेन्नई, बेंगलुरु और देश के अन्य महानगरों में अनियोजित शहरी विस्तार लगातार बढ़ रहा है। जमीन सीमित है, जनसंख्या बढ़ रही है, किराये की मांग बढ़ रही है और व्यावसायिक हित अधिकतम जगह का अधिकतम उपयोग चाहते हैं। ऐसे में यदि शासन मजबूत नियमन और वैज्ञानिक शहरी नियोजन नहीं करेगा तो शहर ऊपर की ओर बढ़ेंगे, लेकिन उनकी सुरक्षा नीचे गिरती जाएगी। दुर्घटना के बाद वही परिचित दृश्य सामने आता है-मंत्री घटनास्थल पर पहुंचते हैं, अधिकारी बैठक करते हैं, मुआवजे की घोषणा होती है, जांच समिति बनती है, कुछ भवन सील होते हैं, कुछ गिरफ्तारियां होती हैं और कुछ दिनों तक प्रशासन सक्रिय दिखाई देता है। फिर धीरे-धीरे सब सामान्य हो जाता है। लेकिन किसी मृत विद्यार्थी के माता-पिता के लिए कुछ भी सामान्य नहीं होता। उनके लिए वह एक जांच समिति नहीं, जीवनभर का खालीपन है। उनके लिए मुआवजे की राशि उनके बेटे या बेटी का विकल्प नहीं है। वे यह जानना चाहते हैं कि उनका बच्चा सुरक्षित क्यों नहीं था? किसने सुरक्षा की गारंटी दी थी? किसने निगरानी की थी? किसने खतरे को नजरअंदाज किया था? इसलिए जांच का उद्देश्य केवल दोषी व्यक्ति ढूंढना नहीं होना चाहिए। जांच को यह भी पता लगाना चाहिए कि किस स्तर पर सिस्टम विफल हुआ। फाइल कहां रुकी? निरीक्षण किसने किया? शिकायत किसने दबाई? नक्शा किस आधार पर स्वीकार हुआ? अवैध निर्माण वर्षों तक कैसे चलता रहा? भवन में रहने वालों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी? और सबसे महत्वपूर्ण-क्या उन अधिकारियों की भी जवाबदेही तय होगी जिनकी जिम्मेदारी ही ऐसे हादसों को रोकना थी? सत्य निकेतन के मलबे से आज देश को केवल छह मौतों का आंकड़ा नहीं देखना चाहिए। वहां दबे हुए सपनों को देखना चाहिए। उन माता-पिताओं की आंखों को देखना चाहिए जिन्होंने अपने बच्चों को दिल्ली भेजते समय यह सोचा होगा कि वे पढ़ेंगे, आगे बढ़ेंगे और परिवार का नाम रोशन करेंगे। उन सपनों की मौत केवल एक इमारत के गिरने से नहीं हुई है, वे उस मानसिकता के नीचे दबे हैं जिसमें नियमों से अधिक प्रभावशाली पैसा, सुविधा और ‘सब चलता है’ की संस्कृति बन जाती है। अब समय है कि सरकारें हादसों के बाद जागने की आदत छोड़ें। भवन गिरने से पहले निरीक्षण हो, पानी भरने से पहले जलनिकासी सुधरे, शिकायत मिलने के बाद कार्रवाई हो और भ्रष्टाचार होने से पहले ही उसकी गुंजाइश बंद हो। क्योंकि देश को केवल नया भारत नहीं बनाना है-उसे सुरक्षित, जिम्मेदार, ईमानदार और संवेदनशील भारत भी बनाना है। सत्य निकेतन का मलबा हमसे यही पूछ रहा है-अगली इमारत गिरने का इंतजार करेंगे या अब व्यवस्था को सचमुच जगाएंगे? - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
'आपको न्याय मिलेगा', गौरव गोगोई ने मणिपुर के म्यूजिशियन की हत्या पर जाहिर किया दुख
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वडोदरा में पीएम मोदी का जेन-जी को संदेश, बोले- देश का हर नौजवान 'सच की हुंकार' के साथ
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निवेश और निर्यात के दम पर वित्त वर्ष 2027 में 7 प्रतिशत का विकास
नई दिल्ली, एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय अर्थव्यवस्था वित्त वर्ष 2026-27 में भी मजबूती बनाए रख सकती है और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर 7 प्रतिशत से ऊपर रह सकती है, क्योंकि निवेश और निर्यात में तेजी अर्थव्यवस्था की प्रमुख विकास शक्ति बनकर उभर रहे हैं, जो खपत में संभावित नरमी और घरेलू नीतिगत प्रोत्साहन के घटते प्रभाव की भरपाई कर सकते हैं।
सहयोग, समावेश और समाधान...BRICS में क्या खेला करने भारत आ रहे रूस, चीन और ईरान
ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत के पास है। बहुत बड़ी बैठक इसी महीने नई दिल्ली में आयोजित होने वाली है। दुनिया की नजरें ब्रिक्स की बैठक पर है। 2026 में भारत ब्रिक्स की अध्यक्षता में बैठक कर रहा है, वो कहां करने वाला है? ये नई दिल्ली में भारत मंडपम में 12 13 सितंबर को ब्रिक्स देशों की बैठक होगी और इसके लिए पहले भी साल भर वर्किंग ग्रुप्स हैं, मंत्रियों स्तर की बैठक है, सीजीआई स्तर की बैठक है, बैंकिंग स्तर की बैठक है, एनएसए लेवल की बैठक है। ये सब कुछ पहले ही भारत में हो चुका है। और अब राष्ट्रीय अध्यक्षों के बीच यह बैठक 12 13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित होने वाली है। इसे भी पढ़ें: BRICS Summit 2026: अपनी Currency और Global Governance में सुधार का एजेंडा, New Delhi से PM Modi देंगे नया मंत्र ब्रिक्स क्या है? ब्रिक्स उभरते हुए बाजारों और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं वाले 11 प्रमुख देशों का एक ग्रुप है जिसमें ब्राजील, चीन, मिस्र, इथोपिया, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त अरब अमीरात है। ये जो ब्रिक्स है इसमें जो सबसे बड़ी बात है वो ये कि ये जो ग्लोबल और क्षेत्रीय मुद्दों के साथ ही अंतरराष्ट्रीय, राजनीतिक और आर्थिक गवर्नेंस से जुड़े मामलों पर लगातार बातचीत करता है। और सहयोग के लिए एक अहम मंच है और यही वजह है कि ब्रिक्स का जब भी नाम आता है तो अमेरिका की धड़कनें बढ़ जाती हैं। क्योंकि अमेरिका को लगता है कि ब्रिक्स के जरिए डॉलर को धराशाई करने का प्लान है और डॉलर को ठेंगा दिखा के अगर ब्रिक्स देश आपस में ही कोई अपनी करेंसी बना ले कोई अपना ट्रांजैक्शन सिस्टम बना ले तो अमेरिका को एक बड़ा झटका लग सकता है। इसे भी पढ़ें: BRICS Economic Partnership Strategy 2030: नई दिल्ली शिखर सम्मेलन से तय होगी भविष्य की ग्लोबल ट्रेड नीति, मजबूती और इनोवेशन' पर टिकी दुनिया की नजर ब्रिक्स की थीम क्या है? इसके लोगो में भारत के राष्ट्रीय फूल कमल है। इसके बीच में नमस्ते की मुद्रा है। इसे एक पब्लिक डिजाइन प्रतियोगिता के जरिए चुना गया। इसमें पंखुड़ियों में ब्रिक्स के सभी सदस्य देशों का रंग है जो इसकी आधिकारिक थीम से जुड़े हुए हैं। मजबूत इनोवेशन, सहयोग और सेंसबिलिटी का निर्माण। कौन-कौन संभावित रूप से इस बैठक में हिस्सा लेने के लिए आ सकता है इसमें जो सबसे पहला नाम है वो रूस के राष्ट्रपति व्लादमीर पुतिन का है जिनका आना लगभग तय माना जा रहा है। चीन के राष्ट्रपति शी जिजिंगपिंग के भी दौरे की जानकारी है कि वो भी इस दौरे पर आ सकते हैं। इसके अलावा ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजिशियान भी भारत में अपनी मौजूदगी दर्ज करा सकते हैं। यानी कि तीन अहम राष्ट्रपति भारत जो हैं वैश्विक नेता जो हैं वह भारत में ब्रिक्स की बैठक में हिस्सा लेने के लिए इस बार नई दिल्ली की यात्रा कर सकते हैं। यह बहुत महत्वपूर्ण शिखर सम्मेलन है। यह सम्मेलन ऐसे वक्त में हो रहा है जब मध्य पूर्व और यूरोप में जो है वो युद्ध के कारण भू राजनीतिक तनाव जो है वो अपने चरम पर है और अमेरिका को लेकर भी बहुत उथल-पुथल है। इसके अलावा माना जा रहा है कि अब जो है समूह का विस्तार जो है वो एशिया, अफ्रीका, मध्यपूर्व और लैटिन अमेरिका तक हो गया है। उम्मीद है कि इस पूरे ब्लॉक के नेता और वरिष्ठ प्रतिनिधि भी आपको एक साथ नजर आएंगे। सम्मेलन के लिए बताया जा रहा है कि नई दिल्ली आने वाले राष्ट्रीय अध्यक्षों में जो है दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा भी शामिल हो सकते हैं। मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल फतेह अलसीसी भी शामिल हो सकते हैं। बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर लुकाशेंको भी आ सकते हैं। कजाकिस्तान के राष्ट्रपति कासिम जोरमाट टोकयो भी और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रोबो सुबानतो भी शामिल हो सकते हैं। मान जानकारी यह भी है कि मलेशिया, थाईलैंड, इथोपिया के भी पीएम जो हैं वह इस शिखर सम्मेलन में शामिल हो सकते हैं। जबकि क्यूबा, नाइजीरिया, उज्बेकिस्तान का प्रतिनिधि जो है उनके राष्ट्रपतियों के द्वारा जो है वो किया जा सकता है। इसके अलावा माना जा रहा है कि कई अहम देशों के मंत्री जो हैं अह वो घरेलू व्यवस्थाओं में जो है लूला डिसिलवा शामिल नहीं हो पाएंगे।इसके अलावा युगांडा का प्रतिनिधित्व मंडल आएगा। वहीं वियतनाम के पीएम भी आ सकते हैं। और संयुक्त अरब अमीरात के प्रतिनिधि जो हैं वो अबू धाबी के क्राउंस प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन ज़द अल नहायन कर सकते हैं।
पीएम मोदी ने आलोचकों को फिर बताया 'नाराज फूफा जी', राहुल पर निशाना- 'झूठ की गूंज' को नकारें
पीएम मोदी ने वडोदरा में युवाओं से कहा कि वे कांग्रेस समेत विपक्षी दलों के 'झूठे दावों' के बहकावे में न आएं। राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि लोग 'झूठ की गूंज' के ज़रिए आपको गुमराह करने की कोशिश करेंगे, लेकिन युवा सच्चाई के साथ खड़े रहेंगे।
बांग्लादेश को दुश्मन खेमे में जाने से रोकने के लिए भारत तेजी से सक्रिय हो गया है। ढाका के संभावित रूप से सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान से जुड़े ‘मक्का ज्वाइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ जैसे सामूहिक सुरक्षा ढांचे में शामिल होने की खबरों ने नई दिल्ली की रणनीतिक चिंताएं बढ़ा दी हैं। भारत ने इस मुद्दे पर तीव्र बैकचैनल कूटनीति शुरू कर दी है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि आखिर बांग्लादेश की असली मंशा क्या है। इसी बीच भारत और बांग्लादेश के बीच वर्षों से बंद पड़ी यात्री रेल सेवाओं को फिर शुरू करने की कवायद भी तेज हो गई है। रिपोर्टों के मुताबिक, बांग्लादेश मक्का ज्वाइंट डिफेंस एग्रीमेंट में शामिल होने की संभावनाओं पर विचार कर रहा है। यह एक ऐसा पारस्परिक रक्षा ढांचा बताया जा रहा है, जिसमें सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान शामिल हैं। शेख हसीना सरकार के पतन के बाद बदले राजनीतिक माहौल में ढाका अपनी विदेश नीति को अधिक विविध बनाने की कोशिश कर रहा है। बांग्लादेशी रणनीतिक हलकों में संभावित सदस्यता को तुर्किये की सैन्य तकनीक, सऊदी अरब की आर्थिक सहायता और पाकिस्तान के साथ सुरक्षा सहयोग हासिल करने के अवसर के रूप में देखा जा रहा है। इसे व्यापक रूप से ‘मुस्लिम फैमिली’ के ढांचे में कूटनीतिक सहयोग बढ़ाने की कोशिश के तौर पर पेश किया जा रहा है। इसे भी पढ़ें: Makkah Defence Pact आग नहीं, धुआं निकला, Modi की Diplomacy ने बिगाड़ दिया Pakistan का खेल लेकिन नई दिल्ली की नजर से तस्वीर कहीं अधिक गंभीर है। भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि पाकिस्तान से जुड़े किसी सामूहिक रक्षा ढांचे का विस्तार सीधे उसके पूर्वी मोर्चे तक हो सकता है। यदि बांग्लादेश औपचारिक रूप से ऐसे किसी सैन्य समझौते में शामिल होता है, तो भारत के आसपास एक नए सामरिक समीकरण का निर्माण हो सकता है। बंगाल की खाड़ी तक फैला सामूहिक सुरक्षा ढांचा भारत की रणनीतिक गणनाओं को बदल सकता है। हम आपको बता दें कि भारत और बांग्लादेश के बीच करीब 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा है। ऐसे में पूर्वी सीमा पर किसी नए सुरक्षा गठबंधन की मौजूदगी नई दिल्ली के लिए साधारण कूटनीतिक घटनाक्रम नहीं होगी। भारत को अपने पड़ोस को केवल द्विपक्षीय रिश्तों के नजरिये से नहीं, बल्कि एक संभावित मल्टी-फ्रंट सिक्योरिटी थिएटर के रूप में देखना पड़ सकता है। यही वजह है कि भारतीय बैकचैनल यह टटोलने में जुटे हैं कि ढाका वास्तव में कोई बाध्यकारी सैन्य प्रतिबद्धता चाहता है या फिर इस तरह की संभावनाओं का इस्तेमाल भारत समेत अन्य शक्तियों से कूटनीतिक लाभ लेने के लिए कर रहा है। इसी रणनीतिक तनाव के बीच भारत-बांग्लादेश संबंधों में एक सकारात्मक संकेत भी उभर रहा है। दोनों देश बंद पड़ी यात्री ट्रेन सेवाओं को फिर शुरू करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। ढाका में आज से दोनों देशों के रेलवे अधिकारियों की बैठक शुरू हुई है, जिसमें मैत्री, बंधन और मिताली एक्सप्रेस को दोबारा पटरी पर लाने पर चर्चा हो रही है। बांग्लादेश रेलवे के अतिरिक्त महानिदेशक (ऑपरेशंस) मोहम्मद नजमुल इस्लाम के अनुसार, दोनों देशों के बीच यात्री रेल संपर्क अगस्त 2024 के बाद से बंद है, जबकि मालगाड़ियां बिना किसी बाधा के लगातार चलती रही हैं। मैत्री एक्सप्रेस ढाका कैंटोनमेंट और कोलकाता के बीच चलती थी, बंधन एक्सप्रेस खुलना और कोलकाता को जोड़ती थी, जबकि मिताली एक्सप्रेस ढाका कैंटोनमेंट से न्यू जलपाईगुड़ी तक संचालित होती थी। इन सेवाओं को जुलाई 2024 में आधिकारिक रूप से निलंबित किया गया था। इसके बाद देशव्यापी अशांति, शेख हसीना सरकार के पतन और 5 अगस्त 2024 को उनके भारत जाने के बाद दोनों देशों के रिश्तों में तनाव बढ़ गया। नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम व्यवस्था के दौरान शेख हसीना की भारत में मौजूदगी और उनके प्रत्यर्पण की मांग जैसे मुद्दों ने संबंधों में खटास पैदा की। हालांकि, बांग्लादेश में 22 फरवरी 2026 को हुए आम चुनाव के बाद एक नया राजनीतिक अध्याय शुरू हुआ। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की जीत के बाद तारिक रहमान के नेतृत्व में नई सरकार बनी और अब दोनों देशों के बीच सामान्य रिश्तों की बहाली की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा महसूस की जा रही है। वर्तमान अंतर-सरकारी रेलवे बैठक यानी IGRM में केवल ट्रेनों को शुरू करने पर ही नहीं, बल्कि वित्तीय हिसाब-किताब, सीमा पार ट्रेन परिचालन, वार्षिक लेखा संतुलन, परिचालन क्षमता, रोलिंग स्टॉक और रेलवे ढांचे के विकास जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हो रही है। बांग्लादेश की योजना राजशाही से कोलकाता के लिए एक नई ट्रेन शुरू करने की भी है। साथ ही, मैत्री एक्सप्रेस को जमुना ब्रिज के बजाय पद्मा ब्रिज के रास्ते चलाने का प्रस्ताव भी सामने आ सकता है। भारत द्वारा 27 जून से बांग्लादेशी नागरिकों के लिए पर्यटक वीजा फिर शुरू किए जाने के बाद आम लोगों के बीच भी रेल सेवाओं की बहाली की मांग तेज हुई है। भारतीय उच्चायुक्त ने भी दोनों देशों के बीच ‘पीपुल-टू-पीपुल रिलेशन’ को बेहद अहम बताया है। दरअसल, यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है। एक तरफ भारत बांग्लादेश के संभावित नए सैन्य समीकरणों को लेकर सतर्क है, दूसरी तरफ वह रेल, वीजा, व्यापार और जनसंपर्क के जरिए रिश्तों को सामान्य बनाने की कोशिश कर रहा है। नई दिल्ली समझती है कि अगर ढाका रणनीतिक रूप से दूर गया, तो भारत की पूर्वी सुरक्षा चुनौती स्थायी रूप से बदल सकती है। इसलिए कूटनीति अब सिर्फ दोस्ती बचाने की नहीं, बल्कि बांग्लादेश को किसी संभावित दुश्मन खेमे की ओर झुकने से रोकने की रणनीतिक लड़ाई बन चुकी है। -नीरज कुमार दुबे
सांप के काटने से मौत के मामलों पर एनएचआरसी सख्त, हर राज्य में एंटी-स्नेक वेनम उपलब्ध कराने के निर्देश
पीएम मोदी के दौरे को लेकर जेन-जी में जबरदस्त उत्साह, कहा-उनका आना सौभाग्य की बात
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पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम उपचुनाव में भाजपा की जीत तय : दिलीप घोष
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'विकसित महाराष्ट्र 2047' के लिए एनबीएफसी बनाने की दिशा में बड़ा कदम, सरकार ने बनाई टेंडर समिति
महाराष्ट्र सरकार ने अपने दीर्घकालिक विकास लक्ष्यों को गति देने के लिए सोमवार को एक विशेष टेंडर समिति का गठन किया है। यह समिति राज्य के लिए एक समर्पित वित्तीय संस्था के गठन और उसके संचालन की प्रक्रिया की निगरानी करेगी।
दिल्ली में सभी PG का होगा सेफ्टी टेस्ट, सत्य निकेतन हादसे के बाद LG ने तय की डेडलाइन
राजधानी दिल्ली में छात्रों के लिए चल रहे पेइंग गेस्ट (PG) आवासों की सुरक्षा को लेकर उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू ने सख्त निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा है कि सभी प्रमुख PG हब में इमारतों का स्ट्रक्चरल ऑडिट एक सप्ताह के भीतर पूरा किया जाए
बिल्डिंग हादसे पर सियासी वार: दिल्ली सरकार ने कहा- 'आप-कांग्रेस कर रही हैं राजनीति'
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सीएम सरमा ने असम दौरे के लिए उपराष्ट्रपति को कहा धन्यवाद, तमिलनाडु के साथ संबंधों को मजबूत करने के प्रयासों को सराहा
मणिपुर में 2023 के बाद हुई जातीय हिंसा की होगी जांच, सीएम ने कहा- गैरकानूनी गतिविधियों से जुड़े मामलों की हो रही समीक्षा
समझिए, आखिर कैसे संभव हुई इसरो की सफलता-दर-सफलता वाली उपलब्धि?
जन्माष्टमी की शुभ घड़ी यानी 4 सितंबर 2026 की रात जब श्रीहरिकोटा से GSLV-F17 ने उड़ान भरी और EOS-05 को निर्धारित कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया, तब यह केवल एक और रॉकेट लॉन्च नहीं था, बल्कि यह भारत की चार दशक से अधिक पुरानी अंतरिक्ष-यात्रा में तकनीकी परिपक्वता, संस्थागत अनुशासन और असफलताओं से सीखने की वैज्ञानिक संस्कृति का एक महत्वपूर्ण प्रमाण था। इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (ISRO) के आधिकारिक रिकॉर्ड में GSLV-F17/EOS-05 को 4 सितंबर 2026 के सफल मिशन के रूप में दर्ज किया गया है। हालांकि, इस सफलता का मूल्यांकन केवल राष्ट्रवादी उत्साह से करना वैज्ञानिक दृष्टि से अधूरा होगा। असली सवाल यह है— आखिर ISRO बार-बार कठिन अंतरिक्ष अभियानों को सफल बनाने की क्षमता कैसे विकसित कर पाया? इसका सटीक उत्तर किसी एक प्रतिभाशाली वैज्ञानिक, किसी एक सरकार या किसी एक तकनीक में नहीं है। वास्तव में इसका शानदार उत्तर है— सतत संस्थागत learning system, जिसको इस प्रकार समझा जा सकता है:- इसे भी पढ़ें: ISRO को कमजोर करने की साजिश हो रही या भारत को Space Superpower बनने की रणनीति पर काम चल रहा? पहला, ISRO की पहली ताकत— असफलता को अपराध नहीं, Data मानना: अंतरिक्ष विज्ञान में असफलता असामान्य नहीं है। दुनिया की सबसे बड़ी अंतरिक्ष एजेंसियां भी मिशन खोती रही हैं। ISRO भी इससे अछूता नहीं रहा। PSLV-C61/EOS-09 मिशन मई 2025 में पूरा नहीं हो सका। GSLV-F15/NVS-02 मिशन में भी उपग्रह को निर्धारित operational orbit तक पहुंचाने में समस्या आई। बावजूद इसके, ISRO के आधिकारिक launch record में इन घटनाओं को दर्ज किया गया है। महत्वपूर्ण यह है कि ISRO असफलता के बाद उसे छिपाने के बजाय failure analysis करता है। उदाहरण के लिए 2021 के GSLV-F10 मिशन की विफलता के बाद क्रायोजेनिक upper stage की anomaly की जांच के लिए विशेषज्ञों की Failure Analysis Committee गठित की गई थी। यही वैज्ञानिक संस्कृति किसी भी aerospace organisation की असली पूंजी होती है। Failure, फिर Analysis, फिर Modification, फिर Testing, फिर Reflight- यह चक्र जितनी तेजी और ईमानदारी से चलता है, उतनी ही तेजी से reliability बढ़ती है। दूसरा, GSLV-F17 की सफलता इसलिए महत्वपूर्ण है कि GSLV साधारण rocket नहीं है: ISRO के अनुसार GSLV तीन-stage vehicle है जिसमें solid, liquid और cryogenic upper stage शामिल हैं और इसे लगभग 2,000 किलोग्राम वर्ग के spacecraft को Geosynchronous Transfer Orbit में पहुंचाने के लिए डिजाइन किया गया है। क्रायोजेनिक तकनीक किसी भी अंतरिक्ष कार्यक्रम की अत्यंत कठिन तकनीकी क्षमताओं में से एक है। Liquid hydrogen और liquid oxygen को अत्यंत निम्न तापमान पर संभालना, turbopumps को नियंत्रित करना, combustion stability बनाए रखना और सही समय पर thrust उपलब्ध कराना—ये सभी अत्यधिक जटिल engineering challenges हैं। इसलिए GSLV की सफलता को केवल “rocket चला और satellite पहुंच गया” के स्तर पर देखना तकनीकी उपलब्धि को छोटा करना होगा। तीसरा, असली सफलता—Precision: अंतरिक्ष में “पास-पास” भी असफलता हो सकती है। रॉकेट को satellite को केवल अंतरिक्ष में नहीं पहुंचाना होता। उसे निर्धारित velocity, direction और orbital parameters के साथ पहुंचाना होता है। इसमें Guidance, Navigation and Control प्रणाली की भूमिका निर्णायक होती है। Inertial sensors, gyroscopes, accelerometers, onboard computers, telemetry और ground tracking systems लगातार vehicle की स्थिति और गति का अनुमान लगाते हैं। फिर flight-control system trajectory को नियंत्रित करता है। यानी रॉकेट का हर सेकंड गणित है। एक छोटी velocity error भविष्य में satellite के fuel budget को प्रभावित कर सकती है। यही कारण है कि GSLV-F17 जैसी सफलता वास्तव में हजारों calculations और लाखों engineering decisions की अंतिम अभिव्यक्ति होती है। चौथा, ISRO की सबसे बड़ी ताकत—System Engineering: ISRO की उपलब्धि को केवल rocket technology के रूप में देखना गलत होगा। एक अंतरिक्ष मिशन वास्तव में कई प्रणालियों का एक साथ काम करना है— Propulsion और Avionics और Software और Navigation और Telemetry और Communication और Satellite और Ground Station और Mission Control. इनमें से कोई एक critical subsystem विफल हुआ तो पूरा मिशन खतरे में पड़ सकता है। ISRO ने दशकों में इन प्रणालियों को अलग-अलग विकसित करने के बजाय एक integrated engineering ecosystem में विकसित किया है। यही उसकी institutional strength है। पांचवां, NASA से तुलना- संसाधन बनाम engineering culture: NASA के पास ISRO की तुलना में कहीं अधिक वित्तीय संसाधन, विशाल industrial ecosystem और private-sector partnerships हैं। NASA का मॉडल high-end science, deep-space exploration और अत्यंत जटिल वैज्ञानिक missions पर केंद्रित है। लेकिन ISRO की ताकत अलग है। भारत ने सीमित संसाधनों के भीतर high reliability और mission utility को प्राथमिकता दी। NASA जहां अत्यंत महंगे और technologically ambitious missions कर सकता है, ISRO ने comparatively frugal architecture के माध्यम से ऐसे missions विकसित किए जिनका प्रत्यक्ष उपयोग मौसम, संचार, navigation, agriculture, disaster management और Earth observation में होता है। यह तुलना “कौन बेहतर है?” की नहीं होनी चाहिए। यह दो अलग engineering philosophies की तुलना है। छठा, SpaceX से तुलना: यहां ISRO को सीखना भी होगा: SpaceX ने launch economics को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। Reusable rockets, rapid launch cadence, vertically integrated manufacturing और aggressive testing ने space-launch industry की पारंपरिक सोच को चुनौती दी है। ISRO की ताकत reliability और cost efficiency में रही है, लेकिन आने वाले दशक में उसके सामने बड़ा प्रश्न होगा— क्या वह केवल सफल launches करेगा या launches को mass-scale commercial service में बदल पाएगा? SpaceX की असली चुनौती यही है। भविष्य में भारत को केवल “कम लागत में satellite launch करने वाला देश” नहीं रहना चाहिए। उसे— Reusable Launch Vehicle और Rapid Turnaround और Private Space Industry और High Launch Frequency की दिशा में तेजी से बढ़ना होगा। सातवां, चीन से तुलना- भारत की अगली चुनौती: China ने अंतरिक्ष कार्यक्रम को राष्ट्रीय शक्ति के एक व्यापक instrument में बदल दिया है। उसका space programme launch vehicles, navigation, lunar exploration, space station, Earth observation और military space capabilities तक फैला हुआ है। भारत के लिए चीन की चुनौती केवल rocket technology नहीं है। चुनौती है—Scale। भारत को अब यह सोचना होगा कि क्या उसका space ecosystem अगले 10–20 वर्षों में चीन जैसी industrial scale हासिल कर सकता है? ISRO अकेले इसका उत्तर नहीं दे सकता। इसके लिए private companies, universities, semiconductor industry, materials science, propulsion companies और venture capital ecosystem को साथ आना होगा। आठवां, EOS-05 का महत्व—Space से Earth तक: EOS-05 की सफलता का एक बड़ा संदेश यह है कि space technology का अंतिम लक्ष्य केवल अंतरिक्ष में पहुंचना नहीं है। Earth observation का मतलब है- कृषि निगरानी, आपदा प्रबंधन, शहरी नियोजन, infrastructure monitoring, मौसम और पर्यावरण अध्ययन तथा रणनीतिक applications, यानी satellite की सफलता तभी पूर्ण मानी जाएगी जब उसका data जमीन पर decision-making को बेहतर बनाए। इसीलिए अंतरिक्ष कार्यक्रम को केवल launch statistics से मापना गलत होगा। असली सवाल है— एक सफल launch से भारत की जमीन पर कितनी नई क्षमता पैदा हुई? नौवां, ISRO का सबसे बड़ा competitive advantage—Frugal Engineering: ISRO की “कम लागत” वाली छवि अक्सर गलत तरीके से प्रस्तुत होती है। Frugal engineering का अर्थ घटिया engineering नहीं है। इसका अर्थ है—कम संसाधनों में अधिकतम engineering value। Proven technology का इस्तेमाल, indigenous components, modular architecture, extensive testing और mission objectives की स्पष्ट प्राथमिकता—इन सबने भारतीय space programme को टिकाऊ बनाया। लेकिन अब भारत को frugal engineering के अगले चरण में जाना होगा: Frugal Engineering से Scalable Engineering की ओर, यानी कम लागत के साथ बड़ी संख्या में उत्पादन और launches की क्षमता की ओर। दसवां,. सबसे महत्वपूर्ण पूंजी—Institutional Memory: ISRO की सफलता का शायद सबसे कम चर्चित कारण है institutional memory। एक वैज्ञानिक retire हो जाता है। लेकिन उसका अनुभव organisation में बना रहता है। एक mission समाप्त होता है। लेकिन उसका telemetry data अगली generation के engineers के काम आता है। एक failure होता है। लेकिन उसकी failure report अगली design review का हिस्सा बनती है। यही कारण है कि चार दशक पुरानी engineering knowledge आज के missions में दिखाई देती है। यह किसी भी देश के वैज्ञानिक संस्थान की सबसे मूल्यवान संपत्ति है। ग्यारहवां, ISRO को अब अपनी अगली परीक्षा के लिए तैयार होना होगा: GSLV-F17 की सफलता पर गर्व स्वाभाविक है। लेकिन अंतरिक्ष दौड़ अब बदल चुकी है। अगले दशक में केवल successful launches पर्याप्त नहीं होंगे। भारत को पांच मोर्चों पर आगे बढ़ना होगा— पहला—Reusable Launch Vehicles: Launch cost घटाने के लिए reusability निर्णायक होगी। दूसरा—Private Space Industry: ISRO को हर काम खुद करने वाली संस्था के बजाय technology enabler और national space architect बनना होगा। तीसरा—Semiconductor और advanced materials: Space technology की आत्मनिर्भरता केवल rocket engine से नहीं होगी। चौथा—Human Spaceflight: Gaganyaan भारत की engineering ecosystem की अगली बड़ी परीक्षा है। पांचवां—Deep Space Exploration: चंद्रमा, मंगल और आगे के missions भारत की scientific ambition का वास्तविक पैमाना तय करेंगे। वस्तुतः, ISRO की असली उपलब्धि rocket नहीं, scientific culture है। GSLV-F17/EOS-05 की सफलता को देखकर भारत को केवल यह नहीं कहना चाहिए कि— “हमने एक और rocket सफलतापूर्वक launch कर दिया।” सही निष्कर्ष इससे बड़ा है। भारत ने एक ऐसा scientific institution बनाया है जो—असफल होता है, असफलता का विश्लेषण करता है, अपनी तकनीक सुधारता है, फिर उड़ान भरता है और अगली बार अधिक परिपक्व होकर लौटता है। यही वैज्ञानिक सभ्यता की पहचान है। गौर कीजिए, जहां NASA की ताकत उसका विशाल scientific ecosystem है। वहीं SpaceX की ताकत उसकी disruptive commercial engineering है। जहां चीन की ताकत उसका scale और state-backed industrial mobilisation है। और ISRO की ऐतिहासिक ताकत रही है—सीमित संसाधनों में विश्वसनीय, स्वदेशी और उपयोगी अंतरिक्ष तकनीक विकसित करने की क्षमता। लेकिन 21वीं सदी के दूसरे चरण में भारत के सामने सवाल बदल चुका है। अब सवाल यह नहीं है कि— “क्या भारत अंतरिक्ष में पहुंच सकता है?” वह साबित हो चुका है। अब सवाल है— क्या भारत अंतरिक्ष में ऐसी स्थायी वैज्ञानिक-औद्योगिक शक्ति बन सकता है जो NASA जैसी research depth, SpaceX जैसी commercial speed और चीन जैसा scale—तीनों से सीखकर अपनी स्वतंत्र भारतीय space architecture तैयार कर सके? सच कहूं तो GSLV-F17/EOS-05 की सफलता उस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, मंजिल नहीं। और शायद यही इस उपलब्धि का सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक मूल्यांकन है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
बच्चों की मौत का जिम्मेदार कौन?
मानवीय हिमाकतों के चलते दिल्ली में और एक बड़ी दर्दनाक घटना घट गई। सत्य निकेतन के मोतीनगर स्थिति एक सालों पुरानी जर्जर हालत की बिल्डिंग मौत बनकर रिमझिम बारिश में भरभराकर गिर पड़ी। घटना की सूचना पाकर पहुंचे बच्चों के परिजनों की चीखें कलेजा फाड़ रही हैं। परिजन बिलख रहे हैं,मांए बदहवास और बेसुध हैं। स्थानीय पुलिस और हुकुमती अधिकारियों का घटनास्थल पर जमघट लगा है। राहत-बचाव कार्य जारी है। घायल बच्चे एम्स के ट्रामा सेंटर भिजवाए जा रहे हैं। लेकिन वहां से कुछ बच्चों के ना रहने की सूचनाएं हर किसी को झकझोर रही हैं। बिल्डिंग में रहने वाले बच्चे तकरीबन बाहरी प्रदेशों के थे। वह अपना उज्जवल भविष्य बनाने की चाह लेकर शिक्षा ग्रहण करने पहुंचे थे। पर, उन्हें क्या पता हादसों का रूप ले चुकी दिल्ली उनकी जान लील लेगी। पढ़ने वाले बच्चों के साथ दिल्ली में आए दिन कोई न कोई हादसा होता ही रहता है। राजेंद्र नगर स्थिति कोचिंग सेंटर की बेसमेंट में पानी भरने से हुई बच्चों की मौत को शायद ही कोई भूल पाया हो। मुखर्जी नगर की कोचिंग सेंटर में आग लगने की घटना को याद करके भी रोंगटे खड़े होते हैं। इस तरह की प्रत्येक घटनाओं पर जिम्मेदार अधिकारियों और नेताओं का हमेशा से एक ही बयान होता है। दोषी बख्शे नहीं जाएंगे, सख्त कार्रवाई होगी? इसके अलावा मृतकों के परिजनों को मुआवजा और घायलों की इलाज कराकर मामला रफा-दफा कर दिया जाता है और जब तक मीडिया में घटना की चर्चाएं होंगी, कार्रवाई के नाम पर सरकारी डंडा पीटा जाता रहेगा। शोर जैसे ही शांत होगा। जांच-पड़ताल ठंडे बस्ते में चली जाएंगी। जमीदोज हुई बिल्डिंग में ज्यादातर विश्वविधायल में पढ़ने वाले और सिविल सर्विसेज की तैयारी करने वाले मात्र 20-22 आयु के बच्चे रहते थे। मालिक ने बिल्डिंग को करीब 30 सालों से पीजी के लिए किसी अन्य को किराए पर दिया हुआ था। बिल्डिंग मानकों के एकदम विरुद्ध निर्मित हुई थी। क्षेत्रफल मात्र 55 गज का था जिसमें 30 कमरे बना रखे थे। बिल्डिंग 40 से 45 साल पुरानी बताई जाती है। जबकि, देखने में इससे भी कहीं पुरानी लगती थी। मालिक पर मुकदमा हुआ है। एकाध महीने बाद उसे जमानत मिल जाएगी। उसी जगह पर फिर से दूसरी बिल्डिंग तान दी जाएगी। इसे भी पढ़ें: दिल्ली में किस बात से बेबस 'ट्रिपल इंजन' सरकार? Satya Niketan हादसे पर Rahul Gandhi का BJP पर वार दिल्ली विश्वविद्यालय क्षेत्र में बने पीजी को लेकर ‘इंडियन जियोटेक्निकल काॅन्फ्रेस’ ने कुछ वर्ष पहले एक रिसर्च किया था जिसमें पाया था कि 85 फीसदी पीजी बच्चों के रहने के लायक नहीं हैं। इस तरह की रिसर्च रिपोर्ट को भी हुकूमतों ने दरकिनार किया। हादसे का शिकार हुई बिल्डिंग के निर्माण में घोर मानवीय हिमाकत का तांडव किया गया था। दिल्ली नगर निगम से लेकर, पुलिस, फायर ब्रिगेड और सरकार के अधिकारियों ने घूस खाया। घटनास्थल साउथ दिल्ली का सत्य निकेतन क्षेत्र है जिसे डूब या निचला-धरातल क्षेत्र भी कहते हैं। वहां बिल्डिंग बनाने की मात्र ढाई मंजिला इजाजत होती है। पर, अधिकारियों ने घूस खाकर पांच मंजिला तक बनवा दिया। दिल दहला देने वाले हादसे को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि बिल्डिंग में अवैध निर्माण होता रहा और जिम्मेदार लोग आंख मूंदकर तमाशबीन बने रहे। इतना ही नहीं, करीब 40 साल पुरानी इस बिल्डिंग में बारिश के दौरान हर साल बेसमेंट जलमग्न हो जाता था, जिससे इसकी नींव कमजोर होती गई और इस साल बजन नहीं सहन कर पाई जिससे भराभरकर ढह गई। हादसे की जिम्मेदारी शायद ही कोई ले? क्योंकि ऐसे हादसे दिल्ली में समय-समय पर होते रहे हैं। कुछ महीनों पहले ही एक अवैध होटल में आग लगने से विदेशी सहित कई लोग जलकर खाक हुए थे। बिल्डिंगों का गिरना तो दिल्ली में आम हो चुका है। दिल्ली में अवैध कॉलोनियों की भरमार है। कहने को तो अवैध हैं लेकिन अधिकारी घूस लेकर उसे चंद मिनटों में वैध कर देते हैं। दिल्ली में इस समय करीब 1731 अवैध काॅलोनियां और 650 से लेकर 675 झुग्गी झोपड़ियां हैं जिनमें ज्यादातर किराएदार ही रहते हैं। दिल्ली ऐसा शहर है जहां देश के सभी प्रांतों के लोग रोजी रोटी कमाने आते हैं। शिक्षा का हब भी दिल्ली है। जहां सिविल सेवा की तैयारियां करने बच्चे दूर-दराज से पहुंचते हैं। 5 लाख बच्चे सालाना सिविल सर्विसेज परीक्षा की तैयारी करने दिल्ली के मुखर्जी नगर आते हैं, रहने के लिए उन्हें पीजी चाहिए होता है। ऐसे में बच्चे सस्ता पीजी खोजते हैं, लेकिन उन्हें क्या पता सस्ता घर उनकी जान ले लेगा? वहीं, करीब 15 लाख बच्चे अन्य प्रदेशों के दिल्ली के विभिन्न कॉलेजों में अध्ययनरत हैं। जहां हादसा हुआ, उस इलाके में तकरीबन घर पीजी में तब्दील हैं। पीजी के नाम पर बड़ा नेक्सस उस इलाके में चलता है जिसका मकान होता है वह खुद पीजी संचालित नहीं करता, बल्कि वह किसी अन्य को ठेके पर दे देता है। ठेकेदार बच्चों को कमरों में भूसे की तरह ठूस देते हैं। जहां ना कोई सुविधा, न मानकों का इस्तेमाल, सिर्फ उन्हें कमाने से मतलब होता है। हादसे वाली बिल्डिंग गिरने का संकेत कुछ वर्षों से दे रही थी? लेकिन ना मालिक ने गौर किया और ना ही अधिकारियों ने? पिछले साल तीसरे माले की सीढ़ियों की छत का उपरी हिस्सा गिरा था जिसे रिपेयर करवाकर संभावित हादसे पर पर्दा डाल दिया गया। बिल्डिंग में 50 के आसपास बच्चे रहते थे। सभी यूपी-बिहार राज्यों से वास्ता रखते हैं। हादसा रविवार को होता है जिस दिन ज्यादातर बच्चे अपने कमरों में थे क्योंकि उस दिन क्लासें और ट्यूशन की छुट्टी थी। शनिवार रात को बच्चे बेखौफ होकर सोए थे, उन्हें नहीं पता था कि अगले दिन उनके साथ क्या होने वाला है। कुछ बच्चों की जाने चली गई है? कई गंभीर रूप से घायल हैं। घटना निसंदेह दुखदायक है। हादसे की जिम्मेदारी अधिकारियों को लेना चाहिए और सीख लेकर भविष्य में इस तरह की बिल्डिंग को पहले ही जमींदोज करने का संकल्प भी लेना चाहिए। डॉ. रमेश ठाकुर सदस्य, राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान (NIPCCD), भारत सरकार!
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