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नई दिल्ली, 17 सितंबर (आईएएनएस)। वित्त मंत्रालय विकसित भारत की यात्रा के वित्तपोषण विषय पर राज्यों और विधानमंडल वाले केंद्र शासित प्रदेशों के वित्त मंत्रियों तथा वित्त सचिवों का दो दिवसीय सम्मेलन आयोजित करेगा, जो शुक्रवार से शुरू होगा।
नई दिल्ली ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के तुरंत बाद जिस गति से पड़ोसी देशों के साथ उच्चस्तरीय संपर्क बढ़ाया है, उसने भारतीय विदेश नीति के अगले चरण की तस्वीर काफी हद तक साफ कर दी है। 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी के बाद भारत ने हिमालयी पड़ोस और हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी सक्रियता तेज कर दी है। भूटान में विदेश मंत्री एस. जयशंकर की यात्रा इसका सबसे ताजा उदाहरण है। 16 से 18 सितंबर तक की यात्रा में जयशंकर ने भूटान के प्रधानमंत्री के अलावा विदेश मंत्री डी.एन. ढुंगयेल के साथ विकास, ऊर्जा, व्यापार, संपर्क, संस्कृति और दोनों देशों के लोगों के बीच संबंधों पर व्यापक चर्चा की। इसके साथ ही भारत ने तीन महत्वपूर्ण परियोजनाओं को आगे बढ़ाकर यह संदेश दिया कि भूटान के साथ संबंध केवल पारंपरिक मित्रता तक सीमित नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाले विकास और रणनीतिक सहयोग पर आधारित हैं। जयशंकर ने भूटान के प्रधानमंत्री शेरिंग टोबगे को 54 ‘मेड इन इंडिया’ इलेक्ट्रिक वाहन सौंपते हुए कहा कि मुझे बेहद खुशी हुई। उन्होंने कहा कि भारत, भूटान की ई-मोबिलिटी और टिकाऊ परिवहन व्यवस्था की दिशा में हो रही प्रगति में सहयोग कर रहा है। इसे भी पढ़ें: EAM S Jaishankar पहुंचे Bhutan, पारो में विदेश मंत्री DN Dhungyel ने किया स्वागत साथ ही गासा में 500 किलोवाट की लुनाना जलविद्युत परियोजना की आधारशिला रखी गई। इसका उद्देश्य भूटान की उन बस्तियों तक बिजली पहुंचाना है, जो अब तक विद्युतीकरण से बाहर हैं। मोंगार में 65 बिस्तरों वाले ग्यालत्सुएन जेत्सुन पेमा मातृ एवं शिशु अस्पताल का उद्घाटन हुआ, जबकि समद्रुप जोंगखार में 80 मीटर लंबे जगनाथन पुल का लोकार्पण किया गया। ऊर्जा, स्वास्थ्य और सड़क संपर्क, तीनों क्षेत्रों में एक साथ आगे बढ़ाए गए ये काम भारत-भूटान साझेदारी की व्यापकता दिखाते हैं। इसके अलावा, भूटान के बूमथांग में जयशंकर की गतिविधियों का एक मानवीय पक्ष भी सामने आया। उन्होंने स्थानीय किसानों के लिए शुद्ध नस्ल की 43 जर्सी गायें सौंपीं। उनका कहना था कि इससे भूटान के डेयरी कार्यक्रम को मजबूती मिलेगी, दूध उत्पादन बढ़ेगा और किसानों की आय को लाभ होगा। उन्होंने वांगदुएछोलिंग महल और संग्रहालय का दौरा किया तथा कुर्जे ल्हाखांग में प्रार्थना भी की। इससे यह संकेत मिलता है कि भारत का भूटान संपर्क केवल सरकारी समझौतों तक सीमित नहीं, बल्कि कृषि, संस्कृति और जनसंपर्क तक फैला हुआ है। साथ ही जयशंकर की यात्रा को विदेश सचिव विक्रम मिसरी की हाल की भूटान यात्रा से अलग करके नहीं देखा जा सकता। 30-31 जुलाई को मिसरी ने भूटान के विदेश सचिव पेमा लेक्तुप दोर्जी के साथ 13वीं पंचवर्षीय योजना के लिए पांचवीं भारत-भूटान विकास सहयोग वार्ता की सह-अध्यक्षता की थी। दोनों देशों ने विकास साझेदारी, ऊर्जा, व्यापार, निवेश, संपर्क और क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा की थी। भूटान की 2024-29 की पंचवर्षीय योजना के लिए भारत के 10,000 करोड़ रुपये के समर्थन की प्रगति की भी समीक्षा हुई थी। अर्थात जुलाई में विदेश सचिव स्तर पर बनी रूपरेखा के बाद सितंबर में विदेश मंत्री स्तर पर उसके राजनीतिक और व्यावहारिक आयामों को आगे बढ़ाया जा रहा है। इसे भारत की भूटान नीति में निरंतरता और संस्थागत गहराई के संकेत के रूप में देखा जा सकता है। इस बीच नेपाल के वित्त मंत्री स्वर्णिम वाग्ले आज 17 सितंबर को नई दिल्ली पहुंचे हैं। उनकी यात्रा का मुख्य केंद्र हाल की विनाशकारी बाढ़ के बाद नेपाल के पुनर्निर्माण, आर्थिक सहयोग और ऊर्जा संबंधी जरूरतें हैं। वह भारतीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और विदेश मंत्री जयशंकर सहित अन्य अधिकारियों से मुलाकात करेंगे। भारत ने संकट की घड़ी में नेपाल को बिजली उपलब्ध कराने की दिशा में भी कदम उठाया है। भारत ने दिसंबर के अंत तक नेपाल को प्रतिदिन 18 घंटे के लिए 654 मेगावाट तक बिजली निर्यात की अनुमति दी है। उल्लेखनीय है कि बाढ़ से नेपाल की जलविद्युत परियोजनाओं और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान हुआ है। इसके अलावा, दक्षिण दिशा में भी भारत ने समानांतर संदेश दिया है। 8 से 10 सितंबर के बीच रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने श्रीलंका की यात्रा की, जो लगभग 38 वर्षों बाद किसी भारतीय रक्षा मंत्री की श्रीलंका यात्रा थी। दोनों देशों ने रक्षा, समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता पर सहयोग बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए। श्रीलंका के राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि श्रीलंकाई भूभाग का इस्तेमाल भारत की सुरक्षा के प्रतिकूल गतिविधियों के लिए नहीं होने दिया जाएगा। इन घटनाओं को एक साथ रखकर देखें तो भारत की रणनीति के तीन स्पष्ट आयाम सामने आते हैं। हिमालय में विकास और संपर्क, आपदा के समय आर्थिक तथा मानवीय सहयोग और हिंद महासागर में सुरक्षा साझेदारी। देखा जाये तो भूटान में जलविद्युत और पुल, नेपाल में पुनर्निर्माण और बिजली तथा श्रीलंका में रक्षा और समुद्री सुरक्षा, ये सब भले अलग-अलग पहल दिखती हैं, लेकिन इनके पीछे क्षेत्रीय स्थिरता और भारत-केंद्रित संपर्क तंत्र को मजबूत करने की साझा दिशा दिखाई देती है। सामरिक दृष्टि से भूटान का महत्व विशेष है। भारत-भूटान सीमा और हिमालयी क्षेत्र चीन के साथ भारत की व्यापक सुरक्षा गणना का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ऐसे में भूटान के साथ विश्वास, संपर्क, ऊर्जा और विकास सहयोग को मजबूत करना केवल आर्थिक साझेदारी नहीं, बल्कि दीर्घकालिक सामरिक स्थिरता से भी जुड़ा है। वहीं नेपाल भारत की उत्तरी सुरक्षा और संपर्क संरचना में महत्वपूर्ण है, जबकि श्रीलंका हिंद महासागर में समुद्री मार्गों और क्षेत्रीय सुरक्षा की दृष्टि से अहम है। इसलिए काठमांडू, थिम्पू और कोलंबो में एक साथ सक्रियता को भारत के पड़ोस को अलग-अलग द्विपक्षीय रिश्तों की बजाय एक जुड़े हुए क्षेत्रीय परिप्रेक्ष्य में देखने की कोशिश के रूप में समझा जा सकता है। बहरहाल, ब्रिक्स में ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने की बात करने के तुरंत बाद पड़ोस में विकास, पुनर्निर्माण, ऊर्जा, संपर्क और सुरक्षा पर जोर देकर भारत यह दिखा रहा है कि उसकी वैश्विक भूमिका का आधार केवल बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच नहीं, बल्कि उसके आसपास का स्थिर, जुड़ा और सहयोगी क्षेत्र भी है। यही इस पूरी कूटनीतिक सक्रियता का सबसे बड़ा रणनीतिक संकेत है। -नीरज कुमार दुबे
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जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के संवेदनशील भूभाग को लेकर चीन और पाकिस्तान ने एक बार फिर ऐसी कवायद शुरू की है, जिस पर भारत ने कड़ा ऐतराज जताया है। पाकिस्तान और चीन द्वारा बनाए गए तथाकथित सीमा संयुक्त आयोग की पहली बैठक के बाद भारत ने साफ शब्दों में कहा है कि इस आयोग का कोई कानूनी आधार नहीं है और भारतीय भूभाग को लेकर पाकिस्तान को चीन के साथ किसी भी तरह की व्यवस्था करने का कोई अधिकार नहीं है। भारत ने दो टूक कहा है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत के अभिन्न और अविभाज्य हिस्से हैं तथा कब्जे वाले भारतीय क्षेत्रों को लेकर चीन-पाकिस्तान की कोई भी गतिविधि भारत की संप्रभुता को प्रभावित नहीं कर सकती। हम आपको बता दें कि इस आयोग की पहली बैठक इस्लामाबाद में हुई। पाकिस्तान ने इसे द्विपक्षीय संबंधों की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए सीमा प्रबंधन, संयुक्त सीमा सर्वेक्षण, व्यापारिक प्रवाह और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने की बात कही। बैठक की सह-अध्यक्षता चीन के विदेश मंत्रालय के सीमा एवं महासागरीय मामलों से जुड़े अधिकारी ली या और पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय में चीन मामलों के महानिदेशक बिलाल महमूद चौधरी ने की। उधर, भारत ने इस पहल को महज दो देशों के बीच सामान्य सीमा सहयोग मानने से साफ इंकार कर दिया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि चीन और पाकिस्तान के बीच ऐसी कोई सीमा नहीं है, जिसे भारतीय भूभाग के संदर्भ में दोनों देश मिलकर वैध रूप दे सकें। भारत ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के पूरे केंद्रशासित क्षेत्रों को अपना अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा बताते हुए कहा कि पाकिस्तान को अपने अवैध और बलपूर्वक कब्जे वाले भारतीय क्षेत्रों के बारे में किसी व्यवस्था में प्रवेश करने का अधिकार नहीं है। देखा जाये तो इस पूरे घटनाक्रम की जड़ 1963 में हुए चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते तक जाती है। उस समझौते के तहत पाकिस्तान ने शक्सगाम घाटी के लगभग 5,180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को चीन के साथ सीमा निर्धारण की व्यवस्था में शामिल किया था। हालांकि भारत ने इसे कभी मान्यता नहीं दी। भारत सरकार ने संसद में भी स्पष्ट किया है कि वह इस तथाकथित समझौते को अवैध और अमान्य मानती है तथा शक्सगाम घाटी को भारतीय क्षेत्र मानती है। इसका इतिहास 1947-48 के भारत-पाकिस्तान युद्ध और तत्कालीन जम्मू-कश्मीर रियासत की स्थिति से जुड़ता है। भारत का आधिकारिक रुख है कि पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों पर कब्जा किया और बाद में उसी क्षेत्र से चीन के साथ समझौता किया। इसलिए पाकिस्तान द्वारा उस भूभाग के संबंध में चीन के साथ कोई भी समझौता अपने आप में अधिकारहीन है। हम आपको बता दें कि शक्सगाम घाटी और कराकोरम केवल मानचित्र पर दिखाई देने वाली दूरस्थ पहाड़ी जमीन नहीं हैं। यह इलाका चीन के शिनच्यांग क्षेत्र, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और लद्दाख के बीच स्थित अत्यंत संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्र है। इसी व्यापक भूभाग में चीन-पाकिस्तान संपर्क की महत्वपूर्ण आधारभूत संरचनाएं विकसित हुई हैं। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का एक हिस्सा भी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरता है, जिस पर भारत लगातार आपत्ति जताता रहा है। रणनीतिक दृष्टि से इसका महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि भारत एक साथ पश्चिमी और उत्तरी मोर्चों पर क्षेत्रीय दबाव का सामना करता है। भारत-चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पिछले वर्षों में सैन्य तनाव और तैनाती ने इस चुनौती को और गंभीर बनाया है। 2020 के गलवान संघर्ष के बाद दोनों देशों ने तनाव कम करने की दिशा में कुछ कदम उठाए, लेकिन सीमा विवाद का मूल प्रश्न अभी भी अनसुलझा है। ऐसे समय में कराकोरम क्षेत्र में चीन और पाकिस्तान द्वारा संयुक्त सीमा तंत्र को सक्रिय करना केवल प्रशासनिक सहयोग के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसका संभावित रणनीतिक अर्थ यह है कि दोनों देश उस भूभाग में अपने पारस्परिक समन्वय को संस्थागत रूप देना चाहते हैं, जोकि भारत का है। इससे भविष्य में सड़क, व्यापार, आवागमन, सर्वेक्षण और सीमा प्रबंधन जैसी गतिविधियों को अधिक संगठित आधार मिल सकता है। उधर, भारत का जवाब संप्रभुता की स्पष्ट रेखा खींचने वाला संदेश है। नई दिल्ली ने साफ कहा है कि चीन-पाकिस्तान की ऐसी कोई भी सीमा-संबंधी कवायद भारतीय संप्रभुता पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकती। भारत निरंतर यह कहता रहा है कि 1963 में पाकिस्तान द्वारा शक्सगाम घाटी जैसे कुछ इलाके चीन को सौंपना अवैध और अस्वीकार्य है। नयी दिल्ली ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) का भी विरोध किया है क्योंकि इसका एक हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) से होकर गुजरता है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने पाकिस्तान-चीन सीमा संयुक्त आयोग पर कहा, ‘‘इस मामले पर हमारा रुख स्पष्ट और पहले जैसा है। पाकिस्तान और चीन के बीच कोई सीमा नहीं है। हम तथाकथित संयुक्त आयोग को खारिज करते हैं, जिसका कोई कानूनी आधार नहीं है।’’ उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का समूचा केंद्र-शासित प्रदेश ‘‘भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा रहा है, (वर्तमान में भी) है और हमेशा रहेगा।’’ जायसवाल ने कहा, ‘‘हमने 1963 के तथाकथित चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते को कभी मान्यता नहीं दी है और लगातार यही कहा है कि यह अवैध और अमान्य है।’’ प्रवक्ता ने कहा, ‘‘हम इन कब्जे वाले इलाकों की स्थिति बदलने या अवैध कब्जे को वैध बनाने की किसी भी कोशिश का पुरजोर विरोध और खंडन करते हैं, क्योंकि इससे भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर आंच आती है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘भारतीय इलाकों को लेकर चीन और पाकिस्तान के बीच सीमा-सहयोग का कोई भी तथाकथित प्रयास पूरी तरह से अस्वीकार्य होगा और इन इलाकों पर भारत की संप्रभुता पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।’’ जायसवाल ने कहा, ‘‘इस तरह के दिखावे की बजाय, हम पाकिस्तान से मांग करते हैं कि वह अपने अवैध और जबरन कब्जे वाले इलाकों को तुरंत खाली करे।'' दूसरी ओर, पाकिस्तान के विदेश मंत्रालाय की ओर से जारी बयान के अनुसार, सीमा प्रबंधन प्रणाली पर 2013 के समझौते के आधार पर गठित आयोग की पहली बैठक बुधवार को इस्लामाबाद स्थित विदेश मंत्रालय में हुई। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के अनुसार, नया तंत्र सीमा पर सुरक्षा सुनिश्चित करने और वस्तुओं एवं सेवाओं की आवाजाही को सुगम बनाने के लिए नियमित समन्वय में मदद करेगा। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने बताया कि इससे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के तहत व्यापार व संपर्क को और बढ़ावा मिलेगा। इसके अलावा पाकिस्तान और चीन ने पुलिस प्रशिक्षण कार्यक्रमों के आदान-प्रदान तथा आधुनिक तकनीक एवं उपकरणों के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति जताई। पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने कहा कि चीन की कृत्रिम मेधा (एआई) आधारित तकनीक और आधुनिक उपकरण सुरक्षा चुनौतियों से निपटने में काफी मददगार साबित हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान देश की सुरक्षा के क्षेत्र में चीन के साथ सहयोग को और बढ़ाना चाहता है। बहरहाल, असल चुनौती अब जमीन पर बदलते सामरिक समीकरणों की है। कराकोरम में चीन और पाकिस्तान का बढ़ता सहयोग भारत के लिए गंभीर रणनीतिक चुनौती पैदा करता है। सड़क, व्यापार, सीमा प्रबंधन और संपर्क के नाम पर होने वाली गतिविधियां इस क्षेत्र में दोनों देशों की मौजूदगी को और मजबूत कर सकती हैं। ऐसे में शक्सगाम घाटी का मुद्दा केवल पुराने सीमा विवाद का हिस्सा नहीं रह जाता, बल्कि भारत की संप्रभुता, सुरक्षा और उत्तरी सीमाओं से जुड़ा महत्वपूर्ण सामरिक प्रश्न बन जाता है। -नीरज कुमार दुबे
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दिल्ली: मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने किया 'नमो श्रमिक सेवा केंद्र' और 'गिग वर्कर्स विश्राम स्थल' का उद्घाटन
यूपीआई में बदलाव को लेकर केंद्र सरकार और कांग्रेस में टकराव
कांग्रेस का आरोप, यूपीआई चार्ज से अमेरिकी कंपनियों का फायदा
भारत ने ब्रिक्स समिट करवाया। रूस के राष्ट्रपति पुतिन आए। चीन के राष्ट्रपति शी जिंनपिंग आए। तमाम दुनिया भर के जो सदस्य देश थे, जो इनवाइटेड कंट्रीज थे, पार्टनर कंट्रीज थे, वो पहुंचे। बहुत चर्चा हुई। ईरान पहुंचा। ईरान, यूएई की मीटिंग हो गई। दुनिया भर में इस बात पर बात हो रही है। अब अमेरिका जो है वैसे तो चीख चिल्ला नहीं रहा है ब्रिक्स पर लेकिन वो तिलमिला चुके हैं। क्यों खुन्नस खा चुका है यह हम आपको आगे बताएंगे। दरअसल ब्रिक्स की बैठक संपन्न हो गई। चर्चा चारों तरफ हुई कि भैया बैठक तो जो है बड़ा बढ़िया रहा। वेस्ट जलने लगा, अमेरिका जलने लगा और उसने जलन में सबसे पहले हमला किसकी तरफ करने का सोचा? भारत और रूस की दोस्ती पर। दरअसल अमेरिकी सांसदों ने रूस पर प्रतिबंध लगाने वाले बिल में जो है वो संशोधन के लिए पेश कर दिया है। बताया जा रहा है इसमें से एक ऐसा संशोधन भी है जिसको में भारत को टारगेट किया जा रहा है। क्यों किया जा रहा है? क्योंकि वो रशिया का दोस्त है और भावना तो यह रही होगी कि ये भारत ने कैसे इतना बढ़िया ब्रिक्स का समिट करा लिया। चीन के राष्ट्रपति आ गए। रूस के राष्ट्रपति आ गए। ईरान के राष्ट्रपति आ गए। चर्चा हो गई। ईरान यूएई की मीटिंग हो गई। बताओ इतना कुछ हो रहा है। तो ये जो भाव है कोई कह नहीं रहा है कि मुझे ब्रिक्स से दिक्कत है। अमेरिका में कोई हल्ला नहीं है इसको लेकर। सब उसको अंडरप्ले करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन यह खुन्नस है क्योंकि खुन्नस जो है वह यह संशोधन पे दिखाई देता है। जानकारी यह है कि जो संशोधन है उसमें भारत सहित रूस के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के नए कानून में शामिल करने की मांग की गई है। 100% टेरिफ वाला बिल पूरी तरह से पास हो गया। अमेरिका के इस कड़े फैसले से पूरी दुनिया के बाजारों में खलबली मच गई। लेकिन सवाल यह है कि अमेरिका ने सख्त फैसला लिया क्यों? दरअसल इसके पीछे एक नहीं बल्कि कई बड़े कारण हैं। एक तरफ जहां ब्रिक्स देशों में डीडोलराइजेशन की सिर्फ चर्चा मात्र से अमेरिका में डर का माहौल बन गया वहीं दूसरी तरफ अमेरिका का बढ़ता व्यापार घाटा यानी कि ट्रेड डेफिसिट और उसकी अमेरिका फर्स्ट नीति भी इसका बड़ा कारण है। इसे भी पढ़ें: अब्दुल्ला-मायावती-सिब्बल...एक-एक कर मोदी के समर्थन में अचानक क्यों उतरने लगे विरोधी,'चक्रव्यूह' में फंसे राहुल? अमेरिका के 100% वाले टेरिफ के पीछे असली कारण? पहला कारण है डीलराइजेशन की चर्चा और अमेरिका का डर। सच यह है कि ब्रिक्स देशों ने कोई नई करेंसी अभी तक नहीं बनाई है और ना ही डॉलर को पूरी तरह छोड़ा है। भारत जैसे देशों ने इस मामले में बेहद सतर्क और संतुलित रुख अपनाया हुआ है। लेकिन ब्रिक्स देशों में अपनी स्थानीय भाषाओं और मुद्राओं में व्यापार करने [संगीत] की जो बात शुरू हुई है, उसने अमेरिका को डरा दिया। अमेरिका को डर लगा कि अगर भविष्य में डॉलर का दबदबा कम हुआ तो उसकी आर्थिक ताकत कमजोर पड़ जाएगी। इसी डर के चलते अमेरिका ने पहले ही 100% टेरिफ की चेतावनी देकर सख्त कानून पास कर दिया। अमेरिका हर साल दूसरे देशों से बहुत ज्यादा सामान खरीदता है। लेकिन खुद कम सामान बेचता है। अमेरिका को अरबों डॉलर का नुकसान होता है। इस व्यापार घाटे को कम करने के लिए भारी टेरेफ लगाना अमेरिका के लिए बेहद जरूरी हो गया था। अब तीसरा कारण है अमेरिका फर्स्ट और घरेलू कंपनियों की सुरक्षा। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि विदेशी कंपनियां अपने देशों से सस्ता सामान भेजकर अमेरिकी कंपनियों को नुकसान पहुंचाती हैं। 100% टेरिफ लगाने से विदेशी सामान महंगा हो जाएगा। जिससे अमेरिका के लोग अपने ही देश में बना सामान खरीदेंगे और वहां नए रोजगार पैदा होंगे। इसे भी पढ़ें: US Sanctions Bill पर Congress का हमला, कहा- Modi Govt के तुष्टीकरण का कोई फायदा नहीं भारत के लिए क्या हैं इसके मायने? अमेरिकी संसद में पारित नया विधेयक भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूसी तेल या प्राकृतिक गैस का आयात करने वाले शीर्ष 5 देशों पर 100 प्रतिशत तक का आयात शुल्क (टैरिफ) लगाने का अधिकार देता है। वर्तमान में भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 88 फीसदी हिस्सा आयात करता है, जिसमें रूस एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता के रूप में उभरा है। वर्ष 2022 में यूक्रेन पर रूस के सैन्य हमले के बाद से रूसी कच्चा तेल भारत के आयात बास्केट का एक बड़ा हिस्सा बन गया। 'ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव' (GTRI) के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 में भारत ने रूस से 40.8 अरब डॉलर का कच्चा तेल खरीदा, जो उसके कुल कच्चे तेल आयात का लगभग एक-तिहाई है। वहीं, कमोडिटी डेटा ट्रैकर 'केपलर' (Kpler) के अनुसार, अगस्त में भारत ने रोजाना 20.8 लाख बैरल (bpd) रूसी तेल का आयात किया, जो उसके कुल तेल आयात का करीब 45 प्रतिशत था। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि इस विधेयक के पारित होने से भारत पर स्वतः 100 प्रतिशत शुल्क लागू नहीं हो जाता। यह कानून केवल राष्ट्रपति ट्रंप को यह तय करने का कानूनी अधिकार देता है कि शुल्क कब, किस दर पर और किस स्तर पर लगाया जाए। यदि अमेरिकी राष्ट्रपति वास्तव में 100 प्रतिशत शुल्क लगाने का फैसला करते हैं, तो यह आयात शुल्क का उच्चतम स्तर होगा। यह शुल्क उस मौजूदा 10 प्रतिशत टैरिफ के अतिरिक्त होगा, जो अमेरिका ने जबरन श्रम (फोर्स्ड लेबर) से बने सामानों के आयात को रोकने में नाकामी के दंड स्वरूप भारतीय उत्पादों पर लगाया हुआ है।आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के कड़े कदम से भारतीय अर्थव्यवस्था को गहरा झटका लग सकता है। रेटिंग एजेंसी इक्रा (ICRA Ltd) की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर ने 'फॉर्च्यून इंडिया' से बातचीत में कहा, अमेरिका द्वारा किसी भी प्रकार के उच्च शुल्क लगाए जाने और उससे पैदा होने वाली अनिश्चितता का सीधा नकारात्मक असर भारत के विकास परिदृश्य पर पड़ेगा।GTRI के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने भी इस विधेयक को भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया। 'टाइम्स ऑफ इंडिया' से बात करते हुए उन्होंने कहा, यह विधेयक भारत पर एकतरफा शर्तों पर द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) पर हस्ताक्षर कराने का एक सीधा और खतरनाक दबाव बनाने का प्रयास है। भारत युद्ध के लिए फंडिंग करने नहीं, बल्कि अपनी 1.4 अरब आबादी के लिए किफायती ऊर्जा सुरक्षित करने के लिए रूसी तेल खरीदता है; और इन खरीदों ने वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों को स्थिर रखने में अहम मदद की है। उन्होंने आगे आगाह किया कि यदि ट्रंप भारतीय सामानों पर 100 प्रतिशत शुल्क लागू करते हैं, तो इससे न केवल भारतीय निर्यातकों को भारी नुकसान होगा, बल्कि दोनों देशों के द्विपक्षीय व्यापार संबंधों पर भी गंभीर असर पड़ेगा। उन्होंने स्पष्ट किया, भारतीय निर्यात पर नए शुल्कों के वास्तविक असर का सही आकलन तभी किया जा सकेगा, जब अमेरिका औपचारिक रूप से शुल्क दरों की घोषणा करेगा। क्या भारत में पेट्रोल की कीमतें बढ़ेंगी? इसका जवाब अभी साफ़ नहीं है। हमें यह देखना होगा कि क्या भारत अमेरिका से टैरिफ़ के खतरे को टालने के लिए अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए रूसी कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता कम करता है। भारतीय रिफ़ाइनर दूसरे उत्पादकों से तेल ले सकते हैं, जिनमें पश्चिम एशिया, अफ्रीका और अमेरिका के देश शामिल हैं। असल में, अगस्त में वेनेज़ुएला से भारत का कच्चा तेल आयात 2020 के बाद से सबसे ऊँचे स्तर पर पहुँच गया, जो जुलाई के मुक़ाबले 64 प्रतिशत बढ़कर 358,000 बैरल प्रति दिन हो गया। Kpler के डेटा के अनुसार, जहाँ रूस कच्चे तेल का सबसे बड़ा सप्लायर बना रहा, वहीं अगस्त में उस देश से तेल आयात चार महीने के निचले स्तर 2.06 मिलियन बैरल प्रति दिन (bpd) पर आ गया, जो जुलाई से 27 प्रतिशत की भारी गिरावट है। इस बीच, UAE 542,000 bpd के साथ दूसरा सबसे बड़ा सप्लायर था, जो जुलाई के 470,000 bpd से 15 प्रतिशत ज़्यादा है। Kpler में तेल बाज़ारों के सीनियर मैनेजर सुमित रितोलिया ने पहले 'द प्रिंट' को बताया था कि भारतीय कच्चे तेल के आयात पर असर तुरंत नहीं पड़ेगा। अतीत में प्रतिबंधों के काम करने के तरीके के आधार पर, उन्हें 45-60 दिनों की 'विंड-डाउन' अवधि (धीरे-धीरे काम बंद करने की अवधि) की उम्मीद है, जिसके दौरान पहले से कॉन्ट्रैक्ट किए गए और रास्ते में मौजूद कार्गो की डिलीवरी हो सकती है। रितोलिया ने कहा कि शुरुआती असर नई बुकिंग पर पड़ेगा, न कि जल्द आने वाले कार्गो पर। इसका मतलब है कि भारत रूसी तेल सप्लाई की जगह दूसरे स्रोत से तेल ले सकता है, लेकिन सवाल यह है कि किस कीमत पर। इसे भी पढ़ें: भारत-रूस की दोस्ती तोड़ने के लिए Trump ने उठाया खतरनाक कदम, तुरंत मोदी सरकार ने कर दिया तगड़ा इलाज! भारत ने क्या जवाब दिया भारत नेकहा कि वह अपने आर्थिक हितों की रक्षा और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाएगा। भारत का यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट पारित किया है। यह विधेयक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले भारत और चीन जैसे देशों पर 100 प्रतिशत तक दंडात्मक शुल्क लगाने की अनुमति देता है। यह विधेयक ट्रंप को रूस पर प्रतिबंध लगाने और उसके प्रमुख व्यापारिक साझेदारों पर भारी शुल्क लगाने का अधिकार देता है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत अपने 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और अपने व्यापार तथा आर्थिक हितों की रक्षा के लिए सभी जरूरी कदम उठाएगा। विदेश मंत्रालय ने कहा कि अमेरिकी कांग्रेस में विधेयक पारित होने के बाद भारत इस मामले में आगे होने वाले घटनाक्रम पर नजर रख रहा है। पिछले कुछ वर्षों में भारत द्वारा रूस से कच्चे तेल की खरीद में काफी वृद्धि हुई है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि जैसा कि पहले भी कई मौकों पर कहा गया है, भारत अपने 1.4 अरब लोगों के लिए ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के वास्ते पूरी तरह प्रतिबद्ध है। मंत्रालय ने कहा कि भारत स्रोतों में विविधता लाने और बदलती बाजार परिस्थितियों के आधार पर अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करता रहेगा। विदेश मंत्रालय ने बताया कि इस मुद्दे पर पिछले कुछ महीनों में अमेरिका के विभिन्न अधिकारियों और प्रतिनिधियों के साथ उच्च स्तर पर चर्चा हुई है। उसने कहा कि भारत ने अमेरिका के सामने इस कदम के संभावित प्रभावों को स्पष्ट रूप से रखा है-न केवल भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों पर, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर भी। भारत ने अमेरिका को यह भी स्पष्ट किया है कि वह अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाने के लिए दृढ़ है। उसने कहा कि सरकार इन घटनाक्रम के प्रभावों से निपटने के लिए भारतीय व्यापार और उद्योग संगठनों के साथ मिलकर काम करेगी। यह प्रतिबंध विधेयक पिछले महीने अमेरिकी सीनेट से पारित हुआ था। बुधवार शाम अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने इसे 262-159 मतों से मंजूरी दी। ट्रंप के हस्ताक्षर के बाद यह कानून बन जाएगा। इसमें रूस के नेतृत्व और ऊर्जा क्षेत्र पर प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ रूस को तेल की आपूर्ति पर लगे प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले जहाजों के ‘छद्म बेड़ों’ पर भी प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव है। इसके अलावा, विधेयक ट्रंप को चीन, भारत और अन्य देशों पर कड़े शुल्क लगाने का अधिकार देता है, ताकि इन देशों की रूसी तेल और गैस पर निर्भरता कम की जा सके। विधेयक में ईरान पर अतिरिक्त प्रतिबंधों का भी प्रावधान है। क्या क्या हो सकता है महंगा अगर अमेरिका ने 100% टैरिफ लागू कर दिया, तो इसका बुरा असर सिर्फ कच्चे तेल पर ही नहीं, बल्कि भारत से अमेरिका जाने वाले निर्यात पर भी पड़ेगा। अमेरिका, भारत के कई सामानों पर टैक्स बढ़ा सकता है। इसका सबसे ज्यादा नुकसान हमारे इलेक्ट्रॉनिक्स (खासकर स्मार्टफोन), दवाइयों (फार्मास्यूटिकल्स), कपड़ा उद्योग, गहने (रत्न और आभूषण) और ऑटोमोबाइल पार्ट्स के निर्यात को झेलना पड़ सकता है।
जबरन छुट्टी और BJP का राष्ट्रीय उत्सव! Gen Z ने कैसे मनाया PM Modi का जन्मदिन?
'100% टैरिफ के साथ अमेरिकी सांसद की भारत को खुली धमकी'- कांग्रेस का आरोप, 'मोदी चुप'
100% टैरिफ़ वाला बिल अमेरिकी संसद में पास होने के बाद US सीनेटर ब्लूमेंथल ने कहा, 'बेहतर होगा कि चीन और भारत अपने बर्ताव सुधारें। अपना तेल और गैस कहीं और से खरीदें।' इसके बाद कांग्रेस ने इस धमकी के बावजूद पीएम मोदी पर चुप्पी साधने का आरोप लगाया है।
केंद्र सरकार का बड़ा फैसला, पेट्रोल, डीजल और ATF के निर्यात पर विंडफॉल टैक्स घटाया
केंद्र सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों पर शुल्क की समीक्षा के तहत पेट्रोल, डीजल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (एटीएफ) के निर्यात पर विंडफॉल टैक्स और निर्यात शुल्क में कटौती की है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक क्षेत्रीय नेता से वैश्विक पटल पर सबसे प्रभावशाली शीर्ष नेताओं में शामिल होना, उनकी सुदृढ़ रणनीतिक सोच, जनसंपर्क क्षमता और कूटनीतिक दूरदर्शिता का परिणाम है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारतीय राजनीति के सबसे प्रमुख और चर्चित चेहरों में से एक हैं। देश की जनता उन्हें अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखती है, और विपक्षी नेताओं के साथ उनके राजनीतिक समीकरणों के पीछे कई रणनीतिक कारण हैं। तो आइए सबसे पहले उनके प्रमुख गूढ़ राजनीतिक गुण निम्नलिखित हैं: एक, रणनीतिक कूटनीति और बहु-ध्रुवीय संतुलन: पीएम मोदी ने पारंपरिक गुटनिरपेक्षता की नीति को बदलते हुए 'मल्टी-अलाइनमेंट' की रणनीति अपनाई। भारत ने एक ही समय में अमेरिका, रूस, यूरोप और मध्य-पूर्व (खाड़ी देशों) के साथ मजबूत व्यापारिक और सुरक्षा संबंध बनाए रखे हैं। रूस-यूक्रेन संघर्ष के बीच वैश्विक दबावों के बावजूद भारत के राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखना और वैश्विक दक्षिण की आवाज बनना उनकी मजबूत कूटनीतिक क्षमता को दर्शाता है। इसे भी पढ़ें: नरेन्द्र मोदी: दृढ़ संकल्प, सशक्त नेतृत्व, दूरदृष्टा और सर्वांगीण विकास के प्रेरणादायक प्रतीक दो, दूरदर्शी जन-संचार और ब्रांडिंग: मोदी जी जन-संवाद के अद्वितीय विशेषज्ञ हैं। 'मन की बात', विशाल जनसभाओं और सोशल मीडिया के माध्यम से वे जनता से सीधे जुड़ते हैं। उन्होंने भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को वैश्विक मंचों (जैसे- योग दिवस, जी-20 की भारत की अध्यक्षता, ब्रिक्स की अध्यक्षता) पर प्रस्तुत कर देश की 'सॉफ्ट पावर' को अत्यधिक मजबूत किया है। तीन, साहसिक और निर्णायक निर्णय क्षमता: राजनीतिक जोखिम उठाने और बड़े फैसले लेने में वे झिझकते नहीं हैं। सर्जिकल स्ट्राइक, धारा 370 का निष्प्रभावीकरण, जीएसटी, और डिजिटल इंडिया जैसी योजनाओं से उन्होंने यह संदेश दिया कि वे दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित के लिए कड़े कदम उठाने में सक्षम हैं। चार, तकनीकी और कल्याणकारी सुशासन: डिजिटल इंडिया, आधार और यूपीआई के समावेश से सीधे बैंक खातों में जन-कल्याणकारी योजनाओं का पैसा पहुंचाकर उन्होंने भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया और प्रशासनिक पारदर्शिता बढ़ाई। इस मॉडल को वैश्विक स्तर पर एक सफल उदाहरण के रूप में देखा जाता है। पांच, कैडर संगठन और विशाल राजनीतिक तंत्र: जमीनी स्तर पर काम करने और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं भारतीय जनता पार्टी के कैडर संगठन का गहरा अनुभव उनकी सबसे बड़ी ताकत है। वे केवल नीतियों पर ध्यान केंद्रित नहीं करते, बल्कि उन नीतियों को धरातल पर उतारने के लिए पार्टी कैडर और नौकरशाही का कुशलता से उपयोग करते हैं। # प्रधानमंत्री मोदी की वैश्विक विदेश नीति और प्रमुख आंतरिक सुधारों का विवरण इस प्रकार हैं:- एक, वैश्विक विदेश नीति: 'भारत प्रथम' और बहु-ध्रुवीय कूटनीति: भारत की आधुनिक विदेश नीति को 'मोदी सिद्धांत' (Modi Doctrine) के रूप में भी देखा जाता है। इसके मुख्य स्तंभ हैं: - पड़ोस प्रथम नीति: दक्षिण एशिया में भारत की उपस्थिति और विश्वसनीयता को मजबूत करने के लिए बुनियादी ढांचे, बिजली और कनेक्टिविटी परियोजनाओं पर विशेष ध्यान देना। - एक्ट ईस्ट नीति: पूर्वी एशियाई और आसियान: देशों के साथ आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को गहरा करना। - ग्लोबल साउथ का नेतृत्व: विकासशील और गरीब देशों की प्राथमिकताओं (जैसे जलवायु न्याय, ऋण राहत और खाद्य सुरक्षा) को G20 जैसे मंचों पर उठाना। - रणनीतिक स्वायत्तता: किसी एक गुट में शामिल न होकर राष्ट्रहित के आधार पर अमेरिका, रूस, इजराइल और खाड़ी देशों के साथ स्वतंत्र संबंध बनाना। दो, प्रमुख आंतरिक सुधार: प्रशासनिक और आर्थिक कायाकल्प के क्षेत्र, प्रमुख पहल, उसके प्रभाव और परिणाम - डिजिटल क्रांति: डिजिटल इंडिया (UPI, Aadhaar, DigiLocker), भारत दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल भुगतान तंत्र बन गया; पारदर्शिता में वृद्धि करना। - कल्याणकारी तंत्र: डीबीटी (Direct Benefit Transfer) & जन धन योजना, बिचौलियों का खात्मा; करोड़ों रुपये की सीधे लाभार्थियों के खातों में डिलीवरी करना। - कर व आर्थिक सुधार: जीएसटी & आईबीसी, एक देश, एक कर व्यवस्था; व्यापार में सुगमता और डूबे हुए कर्जों (NPA) का समाधान करना। - संरचनात्मक विकास : पीएम गतिशक्ति & नेशनल इंफ्रा पाइपलाइन, राजमार्गों, रेलवे, बंदरगाहों और हवाई अड्डों का तेज गति से आधुनिकीकरण करना। - सुरक्षा और कानून : धारा 370 की समाप्ति & नया नागरिक न्याय कानून, जम्मू-कश्मीर का मुख्यधारा में एकीकरण; औपनिवेशिक कालीन आपराधिक कानूनों में सुधार करना। # आखिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भारतवासी किस किस रूप में देखते हैं? नेता उनसे क्यों चिढ़ते हैं? आइए जानते हैं, भारतवासी प्रधानसेवक नरेंद्र मोदी को किस-किस रूप में देखते हैं? एक, कड़े और मजबूत फैसले लेने वाले नेता (निर्णायक नेतृत्व): उनके समर्थक उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखते हैं जो राष्ट्रहित में बड़े और साहसिक फैसले लेने से पीछे नहीं हटते (जैसे- सर्जिकल स्ट्राइक, धारा 370 का हटना या बड़े आर्थिक सुधार)। दो, विकास पुरुष और आधुनिक भारत के निर्माता: कई लोग उन्हें डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, बुनियादी ढांचे (हाईवे, वंदे भारत एक्सप्रेस, एयरपोर्ट) के विस्तार और 'आत्मनिर्भर भारत' का विज़न देने वाले प्रशासक के रूप में देखते हैं। तीन, कल्याणकारी योजनाओं के प्रदाता: देश का एक बड़ा गरीब और मध्यम वर्ग उन्हें उज्ज्वला योजना, जनधन खाते, पीएम आवास योजना और मुफ्त राशन जैसी सीधी योजनाओं के माध्यम से उनके जीवन को आसान बनाने वाले संरक्षक के रूप में देखता है। चार, सांस्कृतिक पुनरुत्थान के प्रतीक: बहुसंख्यक समाज का एक वर्ग उन्हें हिंदू संस्कृति, परंपराओं और राष्ट्रीय गौरव को वैश्विक मंच पर पुनर्स्थापित करने वाले नेता के रूप में देखता है। पांच, कठोर और केंद्रित प्रशासक (आलोचकों की नज़र में): आलोचक या विरोधी उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखते हैं जो केंद्रीकृत निर्णय लेते हैं और विपक्ष या मीडिया के साथ संवाद के सीमित अवसर देते हैं। # राजनीतिक विरोधी और अन्य नेता उनसे क्यों असहज रहते हैं? विपक्षी नेताओं की चिढ़ या असहमति के पीछे मुख्य रूप से राजनीतिक, वैचारिक और रणनीतिक कारण हैं: एक, चुनावी मशीनरी और अपराजित छवि: मोदी का मजबूत संगठन (बीजेपी) और उनकी व्यक्तिगत जन-स्वीकार्यता विपक्षी दलों की पारंपरिक राजनीति और वोट बैंक को लगातार चुनौती देती है। दो, सीधा जन-संवाद: 'मन की बात' और सोशल मीडिया के माध्यम से मोदी जनता से बिना किसी बिचौलिए के सीधे जुड़ते हैं, जिससे पारंपरिक राजनीतिक बिचौलियों की भूमिका खत्म हो जाती है। तीन, कठोर राजनीतिक और संस्थागत टकराव: विपक्ष का आरोप रहता है कि मोदी सरकार में केंद्रीय जांच एजेंसियों और प्रशासनिक तंत्र का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों पर दबाव बनाने के लिए किया जाता है। चार, वैचारिक भिन्नता: कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दल देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे और समावेशी राजनीति के लिए उनकी हिंदुत्व आधारित विचारधारा को चुनौती मानते हैं। बावजूद इसके पीएम नरेंद्र मोदी किसी से नहीं दबते। उन्होंने बहुत सही कार्य किए, लेकिन हिंदुत्व और जातिवाद को लेकर उनके मंत्रियों ने जो जो वैधानिक कुकृत्य किए, कराए, इससे उनका वह जनाधार दांव पर है, जिसने उन्हें हर हर मोदी, घर घर मोदी के रूप से सर्वस्वीकार्य बनाया। यदि इसकी काट वो ढूंढ लेते हैं तो एनडीए अपराजेय रहेगा, अन्यथा यूसीसी के बहाने बिहार से भगदड़ के संकेत मिलने लगे हैं। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
नरेन्द्र मोदी: दृढ़ संकल्प, सशक्त नेतृत्व, दूरदृष्टा और सर्वांगीण विकास के प्रेरणादायक प्रतीक
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में आज विकास के पथ पर तेज़ी से अग्रसरित भारत, विकसित भारत बने के लिए सर्वांगीण विकास के कार्यों को धरातल पर मूर्त रूप देते हुए सफलता के नित-नए आयाम स्थापित कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत में तेज़ी से आर्थिक सुधार हो रहे हैं, मोदी ने देश में परिवर्तन लाने के लिए शहर, कस्बों से लेकर के गांव, दुर्गम दूरदराज के इलाकों तक में भी अब विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचे के अनवरत विकास का कार्य युद्ध स्तर पर चलवाने का कार्य कर रखा है। 21वीं सदी की आधुनिकता की दौड़ में एआई व डिजिटल क्रांति के क्षेत्र में भारत दुनिया भर में अपना लोहा मनवाने का कार्य कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विज़न के दम पर स्वदेशी को तेज़ी से बढ़ावा देकर के भारत तेज़ी से आत्मनिर्भर बनने का मुकाम हासिल कर रहा है। देश में विश्वस्तरीय आधुनिक सड़क, सागर व नभ मार्ग विकास के नित-नए मार्ग खोल रहे हैं। देश के पास विश्वस्तरीय अत्याधुनिक हथियारों के जखीरे व सुविधाओं से सुसज्जित ट्रैंड सेना का पूरा बड़ा लावा लश्कर मौजूद है, जो दुश्मन देशों से घिरे होने के बाद भी देश की सुरक्षा चिंताओं को दूर करने का कार्य बखूबी करता है। वैश्विक स्तर पर कूटनीति और देश की विभिन्न क्षेत्रों में मजबूत होती स्थिति के कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को आधुनिक भारत का शिल्पकार माना जाता है। भारत में लंबे समय तक लगातार केंद्र की सत्ता में रहने का कीर्तिमान बनाते हुए एक लोकप्रिय जननेता के रूप में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानने की कार्यशैली के दम पर आधुनिक, सशक्त, शक्तिशाली नए भारत के एक ऐसे सफल शिल्पकार बन चुके हैं, जिन्होंने आजादी के लगभग 7 दशकों का लंबा समय बीत जाने के बाद देश के दूरदराज, दुर्गम और सीमावर्ती इलाकों तक में भी विश्व स्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने का कार्य निरंतर शुरू कर रखा है, जो काबिले-तारीफ व अचंभित करने वाला है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में उनके कार्यकाल के दौरान देश में बड़े पैमाने पर धरातल पर नये भारत की परिकल्पना के साथ इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण का कार्य तेज़ी से हो रहा है। प्रधानमंत्री मोदी का यह प्रयास आत्मनिर्भर भारत की मजबूत नींव तैयार करने का कार्य बखूबी कर रहा है। देश में आधुनिक रेलवे स्टेशन, बंदरगाह, सड़क, रोपवे, एक्सप्रेस-वे, नेशनल हाईवे आदि जगह-जगह बन रहे हैं। पूरे देश में सड़क, हवाई, रेल व जल मार्ग से यात्रा व माल ढुलाई आदि की व्यवस्था को बहुत तेज़ी से विश्वस्तरीय बनाया जा रहा है। इसे भी पढ़ें: वडनगर से वैश्विक मंच तक नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा मोदी सरकार के कार्यकाल में देश की सीमाओं की रक्षा की बात करें तो आज देश के वीर योद्धाओं के हाथ दुश्मन पर कार्रवाई के लिए पूरी आजादी के साथ खुले हुए हैं, जिसकी बानगी देश व दुनिया के लोग नक्सल, आतंकियों, सर्जिकल स्ट्राइक व ऑपरेशन सिंदूर आदि में बखूबी देख चुके हैं, मां भारती के वीर सपूत अब बिना किसी दबाव के आतंकवादियों व नक्सलियों के जहरीले फन को निरंतर कुचल कर के सफाया करने का कार्य बखूबी कर रहे हैं। पिछले लगभग 4 या 5 दशक से आतंक की आग में झुलस रहे जम्मू-कश्मीर में अमन-चैन को कायम करने के लिए बड़े पैमाने पर कार्य किया जा रहा है, जिसके परिणामस्वरूप अब वहां पर शांति है। धारा 370 को हटाकर के जम्मू-कश्मीर के निवासियों को दशकों से वंचित किए गए उनके हक को वापस दिया गया। वहीं देशवासियों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बहुत सारी योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिसमें मुख्य रूप से देखा जाए तो जन धन योजना, कौशल भारत मिशन, मेक इन इंडिया, स्वच्छ भारत मिशन, सांसद आदर्श ग्राम योजना, श्रमेव जयते योजना, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, हृदय योजना, प्रधानमंत्री मुद्रा योजना, उजाला योजना, अटल पेंशन योजना, प्रधानमंत्री ज्योति ज्योति बीमा योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, स्मार्ट सिटी योजना, अमृत योजना, डिजिटल इंडिया मिशन, स्वर्ण मुद्रीकरण योजना, सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड योजना, उदय, स्टार्ट- अप इंडिया, सेतु भारतम योजना, स्टैंड अप इंडिया, ग्रामोदय से भारत उदय, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, नमामि गंगे योजना, पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना, आयुष्मान भारत योजना, आत्मनिर्भर भारत रोजगार योजना आदि जैसी योजनाएं चल रही हैं। यह योजनाएं हम भारतवासियों के जीवन स्तर में सुधार करते हुए उसे बेहतर बनाने कार्य कर रही हैं। अपनी दमदार कार्यशैली के दम पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जनता की अदालत में लोगों की आशा व उम्मीद का सकारात्मक प्रतीक बन चुकें हैं, लोग मान रहे हैं कि मोदी के नेतृत्व में भारत का बहुत तेज़ी से सर्वांगीण विकास हो रहा है। मोदी सनातन धर्म के गौरवशाली इतिहास को संरक्षित करते हुए देश व दुनिया को उससे बखूबी रूबरू करवा रहा है। आज का शक्तिशाली नया भारत आत्मनिर्भरता, विकास और वैश्विक सम्मान की एक नई ऊंचाइयों को छूने का कार्य कर रहा है। मोदी के नेतृत्व में विकासशील भारत अब विकसित भारत की दिशा में तेज़ी से आगे कदम बढ़ रहा है। जब पूरी दुनिया युद्ध व मंदी की मार से ग्रस्त हैं उस वक्त भी मोदी के प्रयासों से देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है और दुनिया के ताकतवर देशों को पीछे छोड़ने का कार्य कर रही है, जो एक बहुत अच्छा संकेत है। आज भारत दुनिया के निवेशकों की पसंदीदा जगह बनता जा रहा है, भारत में अब विदेशी कंपनियों के बड़े-बड़े कल-कारखाने खुलने लगें हैं। आर्थिक स्तर के मोर्चे के साथ-साथ सामरिक स्तर पर भी अब तो दुनिया भारत का लोहा मानने लगी है। आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ओजस्वी नेतृत्व में भारत विकास के नित-नए आयाम स्थापित करने का कार्य कर रहा है, लोग भी बढ़े ही आत्म विश्वास के साथ गर्व से कह रहे हैं कि मोदी है तो मुमकिन है। - दीपक कुमार त्यागी अधिवक्ता, स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक
जन्मदिन पर विशेष: मोदी होना आसान नहीं
कोई भी व्यक्ति जन्म से महान नहीं बनता, उसके द्वारा किए गए कर्म ही उसकी छवि बनाते हैं। भाग्य कुछ नहीं होता, कर्म से सब प्राप्त किया जा सकता है। गुजरात के निर्धन परिवार में जन्म लेने वाले नरेंद्र मोदी के व्यापक विस्तार की कहानी भी ऐसी ही है। मोदी ने अपने और अपने परिवार के बारे में कभी नहीं सोचा। उनके चिंतन के केंद्र में आम आदमी प्रमुखता से है। संभवतः वे पंडित दीनदयाल जी की उस उक्ति को धरती पर लाने का उपक्रम कर रहे हैं, जिसमें अंतिम छोर पर निवास करने वाले व्यक्ति का उत्थान छुपा हुआ है। तभी तो नरेंद्र मोदी कहते हैं कि 140 करोड़ देशवासी उनका परिवार है। इतना ही नहीं, वे अपने आपको प्रधान सेवक मानने में गौरव का अनुभव करते हैं। उन्होंने जनता के साथ जुड़ाव बनाने वाला यह कथन अपने जीवन में समाहित कर लिया है। ऐसा जीवन व्यतीत करने वाला व्यक्ति सामान्य नहीं हो सकता। इसलिए कहा जाता है कि नरेंद्र मोदी होना आसान नहीं है। किसी व्यक्ति के जीवन में प्राप्त होने वाला पद बड़ा हो सकता है, लेकिन पद से बड़ा होता है उसका व्यक्तित्व। कुर्सी शक्ति दे सकती है, किंतु उस शक्ति को धैर्य, संयम और संकल्प के साथ साधना हर किसी के लिए संभव नहीं होता। भारत की राजनीति में नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व इसी कारण अलग दिखाई देता है। उनके समर्थकों के लिए वे संघर्ष से निकली उस यात्रा के प्रतीक हैं, जिसमें अभावों से उठकर व्यक्ति देश के सर्वोच्च राजनीतिक नेतृत्व तक पहुंचता है। सच कहें तो मोदी होना आसान नहीं है। इसे भी पढ़ें: PM Narendra Modi के 76वें जन्मदिन पर Varanasi में गंगा तट पर 76 बटुकों ने किया विशेष दुग्ध अभिषेक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने वर्तमान राजनीतिक चुनौतियां नई नहीं हैं। सत्ता के गलियारों में जितनी प्रशंसा मिलती है, उतनी ही तीखी आलोचना भी उनका पीछा करती है। राजनीतिक प्रहारों की निरंतरता किसी भी व्यक्ति के धैर्य की परीक्षा ले सकती है। लेकिन मोदी की राजनीतिक शैली की एक प्रमुख विशेषता यह रही है कि वे अपने समर्थकों की अपेक्षाओं और विरोधियों के आक्रोश के बीच अपना संतुलन बनाए रखने का प्रयास करते दिखाई देते हैं। राजनीति में विरोध आवश्यक है। लोकतंत्र में सत्ता से प्रश्न पूछे जाने चाहिए। नीतियों की सकारात्मक आलोचना होनी चाहिए। लेकिन राजनीतिक असहमति जब व्यक्तिगत कटुता का रूप लेती है, तब लोकतंत्र की गरिमा प्रभावित होती है। ऐसे वातावरण में भी स्वयं को संयमित रखना किसी नेता के लिए सामान्य बात नहीं। आज की राजनीति केवल मोदी का समर्थन या विरोध पर ही केंद्रित हो गई है। इसे इस रूप में भी कहा जा सकता है कि मोदी का प्रचार विपक्षी दलों ने अधिक किया है। मोदी की राजनीतिक यात्रा का सबसे प्रेरक पक्ष उनका संघर्ष है। एक सामान्य परिवार से निकलकर देश के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने की कहानी भारतीय लोकतंत्र की उस शक्ति को रेखांकित करती है, जिसमें किसी व्यक्ति की सामाजिक पृष्ठभूमि उसकी अंतिम सीमा तय नहीं करती। अभावों में पला व्यक्ति भी अपने परिश्रम, अनुशासन और संकल्प के बल पर राष्ट्र के नेतृत्व तक पहुंच सकता है। यही मोदी की कहानी का सबसे बड़ा संदेश है। संघर्ष व्यक्ति को तोड़ता नहीं, यदि उसके भीतर संकल्प जीवित हो तो वही संघर्ष उसे गढ़ता है। मोदी के व्यक्तित्व की चर्चा करते समय उनके परिवार और व्यक्तिगत जीवन का पक्ष भी सामने आता है। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उनका परिवार सत्ता के केंद्र में दिखाई नहीं देता। सत्ता के शीर्ष पर रहते हुए पारिवारिक जीवन को राजनीतिक लाभ से दूर रखने की उनकी छवि उनके समर्थकों के लिए विशेष महत्व रखती है। भारतीय राजनीति में जहां परिवारवाद लंबे समय से बहस का विषय रहा है, वहां मोदी की व्यक्तिगत राजनीतिक यात्रा एक अलग उदाहरण प्रस्तुत करती है। मोदी की कहानी केवल भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं है। आज विश्व मंच पर भारत की उपस्थिति पहले से अधिक प्रभावशाली दिखाई देती है। अनेक देशों के साथ भारत के संबंधों का विस्तार हुआ है। वैश्विक मंचों पर भारत की शक्तिशाली भूमिका को लेकर चर्चा बढ़ी है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत की आवाज को गंभीरता से सुना जाना उस बदलते भारत का संकेत है, जो अपनी क्षमता, अपने हितों और अपनी सभ्यता की पहचान के साथ विश्व समुदाय के सामने खड़ा होना चाहते हैं। वे जब विदेश दौरा करते हैं, तब वे भारतीय मूल के नागरिकों से अवश्य मिलते हैं। इस दौरान भारतीय मूल के व्यक्तियों के चेहरे बहुत ही प्रफुल्लित दिखाई देते हैं। वे सभी मोदी को एक सफल नायक की श्रेणी में देखते हैं। अपनेपन का यह भाव मोदी के स्वभाव का ही परिणाम है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए विदेश यात्राओं या कूटनीतिक मुलाकातों का विषय नहीं है। यह उस आत्मविश्वास का विषय है, जिसके साथ भारत आज विश्व समुदाय से संवाद कर रहा है। एक समय था जब दुनिया के अनेक शक्तिशाली देश भारत को मुख्यतः एक विकासशील राष्ट्र के रूप में देखते थे। आज भारत की अर्थव्यवस्था, उसकी युवा शक्ति, उसकी तकनीकी क्षमता, उसका विशाल बाजार और उसकी सामरिक भूमिका विश्व की चर्चा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस परिवर्तन का पूरा श्रेय किसी एक व्यक्ति को देना उचित नहीं होगा, लेकिन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व ने भारत की इस वैश्विक प्रस्तुति को निश्चित रूप से एक विशिष्ट राजनीतिक दिशा दी है। और यही मोदी की विशेषता का एक महत्वपूर्ण आयाम है। वे भारत को केवल वर्तमान के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य की संभावना के रूप में प्रस्तुत करते हैं। नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व जितना मुखर है, उतना ही व्यक्तिगत जीवन में सादगी और अनुशासन की छवि से जुड़ा हुआ भी है। सार्वजनिक जीवन में निरंतर सक्रियता, दैनिक रूप से लंबे कार्य घंटे, देश-विदेश की यात्राएं और करोड़ों लोगों की अपेक्षाओं का भार, प्रधानमंत्री का जीवन किसी सामान्य नौकरी की तरह नहीं होता। प्रत्येक निर्णय के पीछे राजनीतिक, सामाजिक और राष्ट्रीय परिणाम जुड़े होते हैं। और इसीलिए प्रधानमंत्री होना केवल सत्ता प्राप्त करना नहीं है। यह हर दिन स्वयं को कटघरे में खड़ा करना भी है। एक ओर समर्थकों की अपेक्षाएं, दूसरी ओर विरोधियों के सवाल। एक ओर देश की आकांक्षाएं, दूसरी ओर विश्व की निगाहें। एक ओर वर्तमान की चुनौतियां, दूसरी ओर भविष्य के भारत की जिम्मेदारी। इन सबके बीच संतुलन बनाना ही नेतृत्व की वास्तविक परीक्षा है। नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर उनके जीवन को देखने का सबसे सार्थक तरीका यही है कि हम उनके संघर्ष, संकल्प और नेतृत्व की यात्रा को समझें। मतभेद लोकतंत्र की सुंदरता हैं। उनके भीतर एक ऐसा नेतृत्व दिखाई देता है जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपने लक्ष्य से विचलित नहीं होता। उनके आलोचक चाहे उनके निर्णयों से सहमत हों या नहीं, लेकिन यह भी एक तथ्य है कि नरेंद्र मोदी आज भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली और चर्चित चेहरों में से एक हैं। उनकी यात्रा हमें एक महत्वपूर्ण बात सिखाती है कि ऊंचाई पर पहुंचना कठिन है, लेकिन उस ऊंचाई पर टिके रहकर निरंतर आगे बढ़ते रहना उससे भी कठिन है। मोदी होना इसलिए आसान नहीं है। मोदी होने के निहितार्थ यही हैं संघर्ष को शक्ति में बदलना। आलोचना को सहने का धैर्य रखना। सफलता के बीच जमीन से जुड़े रहना। भारत की आकांक्षाओं को विश्व के सामने आत्मविश्वास से रखना। और सबसे बढ़कर, स्वयं से बड़ी किसी राष्ट्रीय आकांक्षा के लिए निरंतर काम करते रहना। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर उन्हें देखने का एक दृष्टिकोण यह भी है कि एक साधारण पृष्ठभूमि से निकला व्यक्ति किस प्रकार भारतीय लोकतंत्र की यात्रा में असाधारण राजनीतिक पहचान बना सकता है। राजनीति के निर्णयों का मूल्यांकन इतिहास करेगा। नीतियों की समीक्षा समय करेगा। उपलब्धियों और कमियों का आकलन आने वाली पीढ़ियां करेंगी। लेकिन संघर्ष की कहानी अपनी जगह रहती है। और नरेंद्र मोदी की कहानी का यही सबसे बड़ा भाव है, एक साधारण शुरुआत से असाधारण शिखर तक की यात्रा। इसलिए जन्मदिन के इस अवसर पर एक वाक्य सहज ही मन में उभरता है कि मोदी होना आसान नहीं। - सुरेश हिंदुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार 103 अग्रवाल अपार्टमेंट कैलाश टॉकीज के पास, नई सड़क लश्कर ग्वालियर (मध्यप्रदेश)
विश्वकर्मा पूजा: श्रम, कौशल और सृजन को नमन
भगवान विश्वकर्मा को ब्रह्माण्ड के दिव्य वास्तुकार और वास्तु शास्त्र के जनक माना जाता है। उन्हें सृष्टि के प्रथम अभियंता तथा वास्तु सृजन का देवता भी कहा जाता है। भगवान विश्वकर्मा के जन्म को लेकर पुराणों में एक कथा का उल्लेख मिलता है, जिसके अनुसार, सृष्टि की रचना की शुरूआत में भगवान विष्णु क्षीरसागर में प्रकट हुए और उनके नाभि-कमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई। ब्रह्मा जी के पुत्र का नाम धर्म रखा गया। धर्म का विवाह संस्कार वस्तु नामक स्त्री से हुआ। धर्म और वस्तु के सात पुत्र हुए और सातवें पुत्र का नाम वास्तु रखा गया। वास्तु शिल्प शास्त्र में अत्यंत निपुण थे। वास्तु के ही पुत्र का नाम विश्वकर्मा था, जो अपने माता-पिता की ही भांति महान शिल्पकार हुए और इस सृष्टि में अनेकों प्रकार के अद्भुत निर्माण विश्वकर्मा द्वारा ही किए गए। शास्त्रों के अनुसार, भगवान विश्वकर्मा का जन्म माघ शुक्ल त्रयोदशी को हुआ था, इसलिए इन्हें भगवान शिव का अवतार भी माना जाता है। वैसे तो हमारे देश में प्रायः घर की सुख-शांति के लिए ही प्रत्येक पर्व-त्यौहार, पूजा-पाठ इत्यादि का आयोजन किया जाता है किन्तु एक पूजा ऐसी भी है, जो केवल पारिवारिक सुख-शांति के लिए नहीं बल्कि व्यापार में उन्नति के लिए की जाती है। प्रतिवर्ष 17 सितम्बर को ‘विश्वकर्मा पूजा’ एकमात्र ऐसी ही पूजा है, जो काम में बरकत के लिए की जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विश्वकर्मा की पूजा करने से व्यापार में उन्नति होती है। विभिन्न धर्मग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि महर्षि अंगिरा के ज्येष्ठ पुत्र बृहस्पति की बहन भुवना ब्रह्मविद्या जानने वाली थी, जिनका विवाह अष्टम् वसु महर्षि प्रभास के साथ हुआ था, उन्हीं से सम्पूर्ण शिल्प विद्या के ज्ञाता प्रजापति विश्वकर्मा का जन्म हुआ। कुछ प्रचलित कथाओं के अनुसार भगवान विश्वकर्मा का जन्म देवताओं और राक्षसों के बीच हुए समुद्र मंथन से माना जाता है। वैसे हमारे धर्म शास्त्रों तथा ग्रंथों में विश्वकर्मा के पांच स्वरूपों व अवतारों का उल्लेख मिलता है। सृष्टि के रचयिता ‘विराट विश्वकर्मा’, महान शिल्प विज्ञान विधाता प्रभात पुत्र ‘धर्मवंशी विश्वकर्मा’, आदि विज्ञान विधाता वसु पुत्र ‘अंगिरावंशी विश्वकर्मा’, महान शिल्पाचार्य विज्ञान जन्मदाता ऋषि अथवी के पुत्र ‘सुधन्वा विश्वकर्मा’ तथा उत्कृष्ट शिल्प विज्ञानाचार्य शुक्राचार्य के पौत्र ‘भृंगुवंशी विश्वकर्मा’। धर्म शास्त्रों के अनुसार महर्षि दधीचि द्वारा दी गई उनकी हड्डियों से ही विश्वकर्मा ने वज्र का निर्माण किया था, जो देवताओं के राजा इन्द्र का प्रमुख हथियार माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि एक बार असुरों से परेशान देवताओं की गुहार पर विश्वकर्मा ने महर्षि दधीचि की हड्डियों से देवताओं के राजा इन्द्र के लिए वज्र बनाया था, जो इतना प्रभावशाली था कि उससे असुरों का सर्वनाश हो गया। इसे भी पढ़ें: Vishwakarma Jayanti 2026: सृष्टि के पहले इंजीनियर माने जाते है भगवान विश्वकर्मा देवताओं का स्वर्ग हो या रावण की सोने की लंका अथवा भगवान श्रीकृष्ण की द्वारिका या पाण्डवों की राजधानी हस्तिनापुर, इन सभी का निर्माण भगवान विश्वकर्मा द्वारा ही किया गया था, जो वास्तुकला की अद्भुत मिसाल हैं। वास्तुशास्त्र के जनक विश्वकर्मा ने अपने वास्तु ज्ञान से यमपुरी, वरूणपुरी, पाण्डवपुरी, सुदामापुरी, शिवमण्डलपुरी, पुष्पक विमान, भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र, भगवान शिव का त्रिशूल, यमराज का कालदंड, दानवीर कर्ण के कुंडल इत्यादि का भी निर्माण किया। देवताओं के लिए उन्होंने अनेक भव्य महलों, आलीशान भवनों, हथियारों तथा सिंहासनों का निर्माण किया। इसीलिए उन्हें ‘देवताओं के शिल्पी’ के रूप में भी विशिष्ट स्थान प्राप्त है। चार युगों में उन्होंने कई नगरों और भवनों का निर्माण किया। रावण के अंत के बाद जिस पुष्पक विमान में बैठकर राम, लक्ष्मण, सीता और अन्य साथी अयोध्या लौटे थे, वह भी विश्वकर्मा द्वारा ही निर्मित किया गया था। सबसे पहले सत्ययुग में उन्होंने स्वर्गलोक का निर्माण किया, त्रेता युग में लंका का, द्वापर युग में द्वारिका का और कलियुग के आरंभ के 50 वर्ष पूर्व हस्तिनापुर तथा इन्द्रप्रस्थ का निर्माण किया। उन्होंने ही जगन्नाथ पुरी के जगन्नाथ मन्दिर में स्थित कृष्ण, सुभद्रा और बलराम की विशाल मूर्तियों का निर्माण किया। प्रतिवर्ष 17 सितम्बर को ही विश्वकर्मा जयंती मनाए जाने का भी महत्व है। यह जयंती वर्षा ऋतु के अंत तथा शरद ऋतु के आरंभ में मनाए जाने की परम्परा रही है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जिस प्रकार मकर संक्रांति प्रतिवर्ष प्रायः 14 जनवरी को पड़ती है, उसी प्रकार कन्या संक्रांति 17 सितम्बर को पड़ती है। इसी दिन सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करते हैं और इसीलिए विश्वकर्मा जयंती 17 सितम्बर को ही मनाई जाती है। विश्वकर्मा जयंती और विश्वकर्मा पूजा की महत्ता को सिद्ध करने के लिए एक कथा भी प्रचलित है। कथानुसार, धार्मिक प्रवृत्ति का एक रथकार अपनी पत्नी सहित काशी में रहता है, जो अपने कार्य में बेहद निपुण था लेकिन स्थान-स्थान पर घूमने और कड़ा प्रयत्न करने के बाद भी उसे इतना ही धन प्राप्त हो जाता था कि बामुश्किल उसके परिवार के लिए भोजन का प्रबंध हो पाता था। उनकी कोई संतान नहीं थी, इसको लेकर भी पति-पत्नी चिंतित रहते थे और साधु-संतों की शरण में जाते रहते थे। एक दिन एक पड़ोसी ने उन्हें सलाह दी कि तुम भगवान विश्वकर्मा की शरण में जाओ, वही तुम्हारा बेड़ा पार करेंगे। उसके बाद पति-पत्नी ने भगवान विश्वकर्मा की सच्चे मन से पूजा-आराधना की, जिससे और उन्हें पुत्र-रत्न और धन-धान्य की प्राप्ति हुई और वे सुख से जीवन व्यतीत करने लगे। कहा जाता है कि उसी के बाद से विश्वकर्मा पूजा धूमघाम से की जाने लगी। विश्वकर्मा पूजा के दिन सभी प्रकार की मशीनों, जैसे औजार, गाड़ी, कम्प्यूटर अथवा प्रत्येक ऐसी वस्तु, जो आपके कार्य को पूरा करने में इस्तेमाल होती है, की पूजा की जाती है। तकनीकी जगत के भगवान विश्वकर्मा को सनातन धर्म में निर्माण एवं सृजन का देवता माना जाता है, जिन्हें दुनिया के पहले वास्तुकार और आधुनिक युग के इंजीनियर की उपाधि दी गई है। पुराणों में बताया गया है कि आदि देव ब्रह्मा इस सृष्टि के रचयिता हैं और उन्होंने विश्वकर्मा की सहायता से ही इस सृष्टि का निर्माण किया था। इसी वजह से विश्वकर्मा को दुनिया के पहले वास्तुकार एवं इंजीनियर की उपाधि दी गई। उन्हें औजारों का देवता और धातुओं का रचयिता भी कहा जाता है। वास्तु शास्त्र में महारत हासिल होने के कारण ही विश्वकर्मा को वास्तुशास्त्र का जनक कहा गया। यही कारण है कि वास्तुकार कई युगों से भगवान विश्वकर्मा को अपना गुरू मानते हुए उनकी पूजा करते आ रहे हैं। - योगेश कुमार गोयल (लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)
'भगवान विश्वकर्मा ज्ञान, निर्माण-कला और तकनीकी कौशल की परंपरा के प्रतीक', ओम बिरला समेत कई नेताओं ने दी शुभकामनाएं
उपराष्ट्रपति ने पीएम मोदी को दी जन्मदिन की शुभकामनाएं, कहा- 'दुनिया में एक चमकते हुए केंद्र के रूप में उभर रहा भारत'
टीएमसी के नाम और चुनाव चिन्ह पर घमासान, ईसीआई आज सुनेगा दोनों गुटों का दावा
भारत का चुनाव आयोग (ईसीआई) गुरुवार को नई दिल्ली में तृणमूल कांग्रेस के दोनों गुटों के प्रतिनिधिमंडलों से मुलाकात करेगा और बैठक के बाद चुनाव आयोग पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर कोई फैसला ले सकता है।
हमें पितृसत्ता की अधूरी कहानी क्यों सुनाई गई? Patriarchy? Think Again
भारत की शुरुआती वैदिक सभ्यता में महिलाओं का समाज में बहुत सम्मानजनक स्थान था, जहाँ उन्हें शिक्षा और धार्मिक अनुष्ठानों का पूरा अधिकार था। वैदिक साहित्य में गार्गी और मैत्रेयी जैसी महिलाओं के उदाहरण मिलते हैं, जो दार्शनिक चर्चाओं और बौद्धिक विमर्श में सक्रिय थीं।
शिवपाल का छलका 'भतीजा प्रेम', कहा- अखिलेश जैसी आधुनिक सोच किसी के पास नहीं
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यूपीआई चार्ज विवाद: कांग्रेस ने बताया 'डिजिटल यूटर्न', 'आप' ने गुजरात में विरोध करने की चेतावनी दी
गुजरात में विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार के उस फैसले की आलोचना की है, जिसके तहत 15 अक्टूबर से व्यापारियों को 2,000 रुपए से ज्यादा के कुछ खास यूपीआई पेमेंट पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) देना होगा।
गुलजार सिंह के परिवार से मिले तरुण चुघ, न्याय का भरोसा दिया
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संभल की डेमोग्राफी: हिंदू 13 हजार से हुए 47 हजार, मुस्लिम 23 हजार से हो गए 1 लाख 71 हजार
2011 की जनगणना के अनुसार संभल शहर की डेमोग्राफी 77.67% मुस्लिम आबादी जबकि हिंदू आबादी सिर्फ 22% वाली बताई गई है। वर्तमान में मुस्लिम 80% तक।
महाराष्ट्र में 584 आदिवासी छात्रों की मौत पर सियासत, सीजेपी ने शुरू किया 'आदिवासी स्कूल ठीक करो' अभियान
'आपके कर्मों का फल आपको मिलेगा', उद्धव ठाकरे की सफाई पर दिशा सालियान के पिता का पलटवार
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डिजिटल अर्थव्यवस्था पर कराधान के मुद्दे का शांत और गहन अध्ययन जरूरी है: निर्मला सीतारमण
बेंगलुरु, 16 सितंबर (आईएएनएस)। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बुधवार को कहा कि डिजिटल अर्थव्यवस्था पर कराधान से जुड़े फैसले लेते समय भारत, अन्य देशों और भविष्य में आने वाले निवेश पर पड़ने वाले प्रभावों का सावधानीपूर्वक अध्ययन किया जाना चाहिए।
8वें वेतन आयोग की चंडीगढ़ में शुरू हुईं बैठकें, वेतन और पेंशन पर होंगे विचार-विमर्श
8वें वेतन आयोग की चंडीगढ़ में शुरू हुईं बैठकें, वेतन और पेंशन पर होंगे विचार-विमर्श
फ्री यूपीआई के दावे के बीच ठगा रह गया आम आदमी
भारत की अर्थव्यवस्था को कैशलेस बनाने और 'डिजिटल इंडिया' के सुनहरे सपने दिखाने वाली सरकार ने आखिरकार 15 अक्टूबर से लागू होने वाले नए मर्चेंट डिस्काउंट रेट फ्रेमवर्क के जरिए देश की जनता के भरोसे पर करारा प्रहार किया है। लंबे समय से यह ढोल पीटा जा रहा था कि यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस पूरी तरह मुफ्त है, सुरक्षित है और यह देश के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की ताकत है। लेकिन सरकार और नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया का यह नया फैसला इस दावे की हवा निकालने के लिए काफी है। जनता आज ठगा हुआ महसूस कर रही है, क्योंकि जिस डिजिटल व्यवस्था की आदत उन्हें डालकर कैशलेस होने के फायदे गिनाए गए थे, अब उसी व्यवस्था के पीछे छिपे टैक्स और चार्जेस के कड़वे सच को सामने लाया जा रहा है। सरकार चाहे जितने भी दावे करे कि यह चार्ज आम ग्राहकों को नहीं बल्कि बड़े व्यापारियों को देना होगा, लेकिन आर्थिक मोर्चे की व्यावहारिक समझ रखने वाला कोई भी आम नागरिक यह बखूबी जानता है कि अंततः किसी भी टैक्स या फीस का बोझ घूम-फिरकर उपभोक्ता की जेब पर ही आकर गिरता है। यह नया ढांचा सीधे तौर पर देश के उस मध्यमवर्ग और नौकरीपेशा समाज के साथ विश्वासघात है, जिसने सरकार के कहने पर अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई को पूरी तरह डिजिटल माध्यमों के सुपुर्द कर दिया था। इस नए फ्रेमवर्क के तहत ₹2,000 से अधिक के ट्रांजैक्शन पर 0.4% का MDR लगाने का फैसला किया गया है। सरकारी नीति निर्माताओं ने बड़े ही शातिर तरीके से यह आंकड़ा तैयार किया है ताकि पहली नजर में यह जनता को प्रभावित न करे। यह दलील दी जा रही है कि देश के 96 फीसदी मर्चेंट ट्रांजैक्शंस ₹2,000 से कम के होते हैं, इसलिए आम जनता सुरक्षित है। लेकिन यह पूरी तरह से एक सांख्यिकीय भ्रम है जो जमीनी हकीकत से कोसों दूर है। आज के इस महंगाई के दौर में ₹2,000 की रकम क्या अहमियत रखती है? एक मध्यमवर्गीय परिवार जब महीने का राशन खरीदने किसी सुपरमार्केट या किराना दुकान पर जाता है, तो उसका बिल आसानी से ₹3,000 से ₹5,000 के पार चला जाता है। बच्चों की स्कूल की फीस, कोचिंग संस्थान के खर्च, बिजली और पानी के बड़े बिल, अस्पताल का खर्च, दवाइयां, इलेक्ट्रॉनिक्स सामान की खरीदारी, या किसी शादी-ब्याह के कपड़े खरीदना—ये सभी रोजमर्रा के ऐसे काम हैं जहां ट्रांजैक्शन की रकम ₹2,000 की इस कृत्रिम सीमा को पलक झपकते ही पार कर जाती है। ऐसे में यह कहना कि आम जनता इससे प्रभावित नहीं होगी, देश की बहुसंख्यक आबादी के जीवन स्तर और उनकी जरूरतों का क्रूर मजाक उड़ाने जैसा है। जनता के बीच इस कानून को लेकर जो सबसे बड़ा आक्रोश है, वह इस बात को लेकर है कि मर्चेंट्स पर लगाया गया यह चार्ज अंततः उन्हीं से वसूला जाएगा। कोई भी व्यापारी, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, अपनी जेब से 0.4% का घाटा नहीं सहेगा। बाजार का सीधा और शाश्वत नियम है कि जब भी किसी व्यवसाय की लागत बढ़ती है, तो वह उस लागत को अपने उत्पाद या सेवा की कीमत में जोड़ देता है। व्यापारी सीधे तौर पर भले ही यूपीआई पेमेंट करने पर आपसे अतिरिक्त पैसे न मांगें, लेकिन वे अपने सामानों के दाम में चुपके से 1 से 2 फीसदी की बढ़ोतरी कर देंगे ताकि उनका प्रॉफिट मार्जिन सुरक्षित रहे। इसका परिणाम यह होगा कि जो व्यक्ति नकद भुगतान करेगा, वह भी बिना वजह इस महंगाई की चपेट में आएगा और जो यूपीआई का इस्तेमाल करेगा, वह तो ठगा जाएगा ही। सरकार ने इस चालाकी से अपने राजस्व को बढ़ाने का रास्ता तो साफ कर लिया, लेकिन इसका सीधा खामियाजा उस जनता को भुगतना पड़ेगा जो पहले से ही बेकाबू महंगाई, बेरोजगारी और घटती क्रय शक्ति से जूझ रही है। इस कानून के पीछे छुपा एक और बड़ा खतरा देश की बैंकिंग और डिजिटल साक्षरता के लोकतांत्रिक ढांचे को नष्ट करना है। भारत जैसे विकासशील देश में लोगों को नकद छोड़कर डिजिटल ट्रांजैक्शन की ओर मोड़ना एक बहुत बड़ी सामाजिक और व्यावहारिक चुनौती थी। लोगों को बैंकों की लाइनों से बचाने और पारदर्शिता लाने के नाम पर सरकार ने खुद हर मंच से यूपीआई का प्रचार किया। रेहड़ी-पटरी वालों से लेकर बड़े-बड़े मॉल तक क्यूआर कोड चिपकाए गए। जनता ने भी सरकार पर भरोसा किया और अपनी सदियों पुरानी नकद लेन-देन की आदत को बदलकर जेब में बटुआ रखना बंद कर दिया। लेकिन अब, जब जनता पूरी तरह इस सिस्टम पर निर्भर हो चुकी है, तब सरकार ने अपनी असली नीयत दिखाते हुए इस पर शुल्क थोपना शुरू कर दिया है। यह नीति बिल्कुल वैसी ही है जैसी कोई निजी टेलीकॉम कंपनी पहले मुफ्त में सेवाएं देकर ग्राहकों को अपना आदी बनाती है और बाद में मनमाने दाम वसूलने लगती है। एक लोकतांत्रिक सरकार से जनहित की नीतियों की उम्मीद की जाती है, न कि किसी मुनाफाखोर कॉपोरेट घराने जैसी चालाकी की। इस फैसले के लागू होने से बाजार में एक बार फिर से 'कैश इकोनॉमी' यानी नकद लेन-देन का चलन तेजी से बढ़ेगा, जो देश की आर्थिक प्रगति के लिए एक प्रतिगामी कदम होगा। जनता के मन में यह डर बैठ गया है कि आज ₹2,000 पर 0.4% का चार्ज लगा है, तो कल को सरकार इसे बढ़ाकर 1% कर देगी और सीमा को घटाकर ₹500 कर देगी। इस अविश्वास के कारण लोग अब फिर से बैंकों से नकद निकालकर अपने पास रखने को मजबूर होंगे। जब व्यापारी देखेंगे कि ₹2,000 से ऊपर के पेमेंट पर उनका नुकसान हो रहा है, तो वे ग्राहकों को नकद भुगतान करने के लिए प्रोत्साहित करेंगे या फिर यूपीआई पेमेंट लेने से साफ इंकार कर देंगे। इससे वह काला धन और समानांतर अर्थव्यवस्था फिर से सिर उठाएगी, जिसे खत्म करने का दावा सरकार अक्सर करती रही है। डिजिटल लेन-देन में आने वाली इस गिरावट के लिए सीधे तौर पर सरकार की यह अदूरदर्शी और राजस्व-लोभी नीति जिम्मेदार होगी। देश का बुद्धिजीवी वर्ग और जागरूक नागरिक इस बात से भी बेहद खफा हैं कि सरकार एक तरफ तो कॉरपोरेट टैक्स में भारी छूट देती है, बड़े-बड़े उद्योगपतियों के लाखों करोड़ रुपये के कर्ज को बट्टा खाते में डाल देती है, लेकिन जब देश के आम नागरिकों की बात आती है, तो डिजिटल लेन-देन जैसी बुनियादी सुविधा पर भी टैक्स वसूलने के रास्ते तलाशने लगती है। ₹75,000 से ऊपर के ट्रांजैक्शन पर अधिकतम ₹300 की फीस तय करना इस बात का सबूत है कि सरकार को बड़े बिजनेसमैन की फिक्र है, लेकिन उस आम आदमी की कोई परवाह नहीं है जो अपनी गाढ़ी कमाई का छोटा-छोटा हिस्सा जोड़कर जीवन यापन कर रहा है। सरकार का यह कदम देश के नागरिकों के वित्तीय अधिकारों का हनन है। जब देश की जनता पहले से ही हर सामान पर भारी-भरकम जीएसटी दे रही है, अपनी आय पर इनकम टैक्स चुका रही है, तो फिर अपने ही पैसे को एक खाते से दूसरे खाते में ट्रांसफर करने या सामान खरीदने के डिजिटल माध्यम का उपयोग करने पर यह नया जुल्म क्यों ढाया जा रहा है? इस नए फ्रेमवर्क के खिलाफ देश के विभिन्न हिस्सों से विरोध की आवाजें उठने लगी हैं। सोशल मीडिया से लेकर चाय की दुकानों और बाजारों तक में लोग इस कानून की कड़े शब्दों में निंदा कर रहे हैं। जनता का स्पष्ट मानना है कि यह कानून उनकी आर्थिक स्वतंत्रता पर एक अदृश्य बेड़ी है। सरकार को यह समझना होगा कि डिजिटल इंडिया की सफलता इस बात पर निर्भर नहीं थी कि सरकार उससे कितना राजस्व कमा सकती है, बल्कि इस बात पर थी कि वह कितनी आसानी से और मुफ्त में देश के आम नागरिक को वित्तीय मुख्यधारा से जोड़ सकती है। 15 अक्टूबर से लागू होने जा रहा यह नया ढांचा यूपीआई की इस मूल भावना की हत्या है। जनता इस आर्थिक तानाशाही को चुपचाप स्वीकार नहीं करेगी। यदि सरकार वास्तव में जनहितैषी होने का दावा करती है, तो उसे तुरंत इस जनविरोधी कानून को वापस लेना चाहिए और यूपीआई को बिना किसी शर्त, बिना किसी सीमा के हमेशा के लिए पूरी तरह मुफ्त रखने की लिखित गारंटी देनी चाहिए। अन्यथा, डिजिटल क्रांति का यह रथ बीच रास्ते में ही थककर रुक जाएगा और जनता का तंत्र से भरोसा हमेशा के लिए उठ जाएगा। - अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार
जीडीपी से नहीं जमीन पर नजर आए बदलाव
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों से भारत की तरक्की का जश्न मनाने के लिए कहते हुए 7.8% की शानदार जीडीपी ग्रोथ के लिए बधाई दी। सवाल यह है कि क्या आम आदमी देश में जीडीपी ग्रोथ को समझता है। क्या जीडीपी बढ़ना देश की मौजूदा समस्याओं के समाधान का कोई पैमाना है। देश में जब प्रधानमंत्री जीडीपी बढ़ोतरी की घोषणा कर रहे थे, उसी दिन कमर्शियल एलपीजी के दाम में बढ़ोतरी हो गई है। दिल्ली में इसके दाम में 9.50 रुपये की बढ़ोतरी की गई है। दिल्ली में अब कमर्शियल सिलेंडर की कीमत 2747.50 रुपये, मुंबई में 2701 रुपये और चेन्नई में 2916.50 रुपये हो गई है। कमर्शियल सिलेंडर के महंगे होने से होटल, ढाबे आदि में खाना-पीना महंगा होना तय है। वहीं घर मिलने वाली चीजों के दाम में भी बढ़ोतरी हो सकती है। इसके अलावा 5 किलो वाले गैस सिलेंडर का भी दाम 2 रुपये बढ़कर 764 रुपये हो गया है। मुंबई और तमिलनाडु में दूध महंगा हो गया है। बॉम्बे मिल्क प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन ने थोक दूध की कीमतों में 9 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की है। इससे दूध की थोक दर 93 रुपये से बढ़कर 102 रुपये प्रति लीटर हो गई है। भारत में जुलाई-अगस्त 2026 के दौरान खाद्य महंगाई दर बढ़कर 5.52% हो गई है, जिसके कारण चीनी, प्याज, टमाटर, दाल और खाना पकाने के तेल जैसी जरूरी रसोई की चीजें महंगी हो गई हैं. चावल और दूध के दाम भी स्थिर से लेकर उच्च स्तर पर बने हुए हैं। इसे भी पढ़ें: भारत की सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग में बढ़ोतरी महंगाई बढ़ने के कारण प्याज (22.54%), लहसुन (35.36%) और अदरक (83.62%) की कीमतों में भारी तेजी आई है। ईंधन और परिवहन महंगाई बढ़कर 4.43% हो गई है, जिससे माल ढुलाई की लागत बढ़ी है। रेस्त्रां और आवास सेवाओं की महंगाई दर बढ़कर लगभग 7.72% हो गई है। देश के आम आदमी को हर दिन होने वाली कठिनाईयों से जूझना पड़ रहा है। देश का मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग को जीडीपी की ग्रोथ से अंतर तब पड़ता है, जब उनकी बुनियादी सुविधाओं कोई बेहतरी नजर आए। देश में पानी, बिजली, स्कूल, अस्पताल, सड़क, रोजगार, महंगाई जैसी बुनियादी समस्याओं की भरमार है। इनसे राहत मिलती भी है तो उूंट के मुंह में जीरे जितनी। इससे बदलाव नजर नहीं आता। भारत की आधी से अधिक आबादी यानी करीब 60 करोड़ लोग गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं। देश के भूजल का बड़ा हिस्सा आर्सेनिक, फ्लोराइड और अन्य भारी धातुओं (हैवी मेटल्स) की वजह से दूषित हो चुका है। बारिश का पर्याप्त पानी होने के बावजूद उचित हार्वेस्टिंग (संचयन) न होने के कारण पानी बेकार बह जाता है। नीति आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, साफ पीने का पानी न मिलने के कारण हर साल देश में करीब 2 लाख लोगों की मौत हो जाती है। वर्ष 2026 में भीषण गर्मी, रिकॉर्ड बिजली मांग (मई 2026 में 270 गीगावाट से अधिक) और स्थानीय रख-रखाव के कारण उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, ओडिशा और तेलंगाना जैसे कुछ राज्यों के इलाकों में आंशिक या अस्थायी कटौती की गई। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार भारत में बेघरता की दर प्रति 10,000 लोगों पर 13 है। अर्थात 17 प्रतिशत लोगों को पास अपना घर नहीं है। देश के ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 35 प्रतिशत गांवों में स्थानीय स्तर पर कोई भी बुनियादी चिकित्सा सुविधा या स्वास्थ्य केंद्र उपलब्ध नहीं है। ग्रामीण सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों और सर्जनों की भारी कमी है, जो लगभग 80 प्रतिशत तक खाली पड़े हैं। नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 10 वर्षों (2014-15 से 2024-25) में देश भर में करीब 94,000 सरकारी स्कूल बंद या आपस में मर्ज किए गए हैं। इसका मतलब है कि औसतन हर दिन 25 स्कूलों पर ताला लगा है। इसी दशक में सरकारी स्कूलों में कुल छात्रों का नामांकन 2.26 करोड़ कम हुआ है, जो 2014-15 के 26.95 करोड़ से घटकर 2024-25 में 24.69 करोड़ रह गया है। देश के एक लाख से अधिक स्कूलों में आज भी बिजली की उचित सुविधा नहीं है, और कई स्थानों पर पीने का साफ पानी उपलब्ध नहीं है। 71,959 स्कूलों में लड़कियों के लिए और 1.12 लाख स्कूलों में लड़कों के लिए काम करने वाले शौचालय मौजूद नहीं हैं। 1.39 लाख स्कूलों में लाइब्रेरी और 2.65 लाख स्कूलों में खेल का मैदान नहीं है। डिजिटल लाइब्रेरी का अभाव तो लगभग 13.62 लाख स्कूलों में है। भारत में 15 से 29 वर्ष के युवाओं की बेरोज़गारी दर जून 2026 में बढ़कर 16.2% हो गई है, 15–29 आयु वर्ग की महिलाओं में यह दर बढ़कर 20.7% हो गई। इसी आयु वर्ग के पुरुषों में यह दर 14.6% दर्ज की गई। जून 2026 में शहरी युवा बेरोज़गारी दर 18.2% और ग्रामीण युवा बेरोज़गारी दर 15.1% रही। नीति आयोग की बहुआयामी गरीबी सूचकांक रिपोर्ट के अनुसार, सबसे अधिक गरीबी वाले राज्य बिहार में 51.91% आबादी गरीब है। झारखंड मे 42.16% लोग गरीबी में जीवन बिता रहे हैं। उत्तर प्रदेश में 37.79% जनसंख्या गरीब है। मध्य प्रदेश में 36.65% लोग गरीब हैं। भारत में सबसे अमीर 10% लोगों के पास कुल संपत्ति का लगभग 65% हिस्सा है. सबसे ज़्यादा कमाई करने वाले 10% लोग राष्ट्रीय आय का 58% हिस्सा पाते हैं जबकि सबसे निचले 50% लोगों को सिर्फ़ 15% मिलता है। आर्थिक असमानता की यह खाई लगातार बढ़ती जा रही है। निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री का यह हक है कि जीडीपी की ग्रोथ पर खुशी मनाने का आह्वान करें पर जब तक इसका असर देश की मूल समस्याओं के निराकरण में नजर नहीं आएगा, देश के लोगों की उदासी दूर नहीं होगी। - योगेन्द्र योगी
कॉकरोच जनता पार्टी का 'आदिवासी स्कूल ठीक करो' अभियान, सुविधाओं की कमी पर उठाए सवाल
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पश्चिम बंगाल के हावड़ा में सीपीआई-एम के कई दफ्तरों में तोड़फोड़, भाजपा पर आरोप, पार्टी का इनकार
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प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन पर बिहार में 17 सितंबर को जलेगा 'आशीर्वाद का दीया’
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भारतीय और पाकिस्तानी नौसैनिक जहाजों के बीच हुई घटना से चिंता
15 सितंबर, 2026 को उत्तरी अरब सागर में भारतीय नौसेना का एक युद्धपोत और पाकिस्तान नौसेना का एक जहाज आपस में टकरा गए। विदेश मंत्रालय (MEA) ने बताया कि यह घटना अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में हुई और इससे कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ। घटना का विवरण भारतीय नौसेना का एक युद्धपोत नियमित निगरानी मिशन पर था, तभी खबर है कि पाकिस्तान नौसेना का एक जहाज तेज गति से उसकी ओर आया। भारतीय अधिकारियों के अनुसार, पाकिस्तानी जहाज ने गैर-पेशेवर और असुरक्षित तरीके से हरकत की, अपना रास्ता असुरक्षित ढंग से बदला और जहाजों के बीच भौतिक संपर्क (टक्कर) हुआ। इसे भी पढ़ें: EAM S Jaishankar पहुंचे Bhutan, पारो में विदेश मंत्री DN Dhungyel ने किया स्वागत नियमों का उल्लंघन भारत सरकार ने कहा कि पाकिस्तानी नौसैनिक इकाई का व्यवहार अप्रैल 1991 में भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य अभ्यास, युद्धाभ्यास और सैनिकों की आवाजाही की पूर्व सूचना देने के समझौते के अनुच्छेद 10 का सीधा उल्लंघन था। नियमों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में काम करते समय किसी भी दुर्घटना से बचने के लिए दूसरे देश के नौसैनिक जहाज और पनडुब्बियां एक-दूसरे से तीन नॉटिकल मील (लगभग 5 किलोमीटर) से अधिक करीब नहीं आएंगी। भारत ने उत्तरी अरब सागर में 15 सितंबर, 2026 को हुई टक्कर के संबंध में अपनी औपचारिक आपत्ति में विशेष रूप से इस नियम का हवाला दिया। भारत और पाकिस्तान ने 6 अप्रैल, 1991 को नई दिल्ली में सैन्य अभ्यास, युद्धाभ्यास और सैनिकों की आवाजाही की पूर्व सूचना देने के समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते में दोनों देशों का प्रतिनिधित्व तत्कालीन विदेश सचिवों मुचकुंद दुबे (भारत) और शहरयार एम. खान (पाकिस्तान) ने किया था। अनुसमर्थन दस्तावेजों के आदान-प्रदान के बाद यह समझौता 19 अगस्त, 1992 को लागू हुआ और यह दोनों देशों के बीच सैन्य विश्वास-निर्माण उपायों के व्यापक ढांचे का हिस्सा है। इस समझौते का उद्देश्य सैन्य इरादों की गलत व्याख्या से पैदा होने वाले संकटों को रोकना है। दोनों देशों ने विश्वास-निर्माण उपाय के रूप में अभ्यास, युद्धाभ्यास और सैनिकों की आवाजाही की पूर्व सूचना देने की आवश्यकता को स्वीकार किया। मुख्य नियमों के तहत दोनों देशों की थल, नौ और वायु सेनाओं के लिए एक-दूसरे के बहुत करीब बड़े सैन्य युद्धाभ्यास और अभ्यास करने से बचना जरूरी है। यदि निर्धारित दूरी के भीतर अभ्यास किए जाते हैं, तो मुख्य बल की रणनीतिक दिशा दूसरी तरफ नहीं होनी चाहिए और पास में कोई लॉजिस्टिकल तैयारी (जैसे रसद या सैन्य साजो-सामान का जमावड़ा) करने की अनुमति नहीं है। नौसेना के लिए, एक बड़े अभ्यास का मतलब है डिस्ट्रॉयर या फ्रिगेट के आकार या उससे बड़े छह या उससे ज़्यादा जहाज़ों का एक साथ काम करना और दूसरे देश के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक ज़ोन (EEZ) में प्रवेश करना। राजनयिक प्रतिक्रिया इस घटना के बाद, विदेश मंत्रालय (MEA) ने तुरंत राजनयिक कदम उठाए: (a) नई दिल्ली में पाकिस्तानी चार्ज डी'अफेयर्स (राजनयिक प्रतिनिधि) को बुलाकर अस्वीकार्य और गैर-पेशेवर व्यवहार के बारे में औपचारिक विरोध दर्ज कराया गया। (b) पाकिस्तानी अधिकारियों को सलाह दी गई कि वे सुनिश्चित करें कि उनकी सैन्य इकाइयाँ उचित सावधानी बरतें और भविष्य की घटनाओं को रोकने के लिए संबंधित द्विपक्षीय समझौतों का पालन करें। (c) इस्लामाबाद में भारतीय चार्ज डी'अफेयर्स को निर्देश दिया गया कि वे पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के समक्ष इसी तरह का औपचारिक विरोध दर्ज कराएं। निष्कर्ष उत्तरी अरब सागर के अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में नियमित निगरानी कर रहे भारतीय नौसेना के जहाज़ के साथ पाकिस्तानी नौसेना के जहाज़ की टक्कर से कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ, लेकिन भारत ने कहा कि पाकिस्तानी जहाज़ का तेज़ गति से पास आना सैन्य युद्धाभ्यास पर 1991 के भारत-पाकिस्तान समझौते के अनुच्छेद 10 का उल्लंघन था, जो सुरक्षित परिचालन दूरी बनाए रखने का आदेश देता है। विदेश मंत्रालय ने अस्वीकार्य और गैर-पेशेवर व्यवहार का विरोध किया और द्विपक्षीय सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन करने के महत्व पर ज़ोर दिया। अंतरराष्ट्रीय सीमाओं और नियंत्रण रेखा (LoC) पर शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए दोनों देशों द्वारा लगातार सावधानी बरतना ज़रूरी है। - प्रोफ़ेसर (डॉ.) डी.के. पांडेय विज़िटिंग सीनियर फ़ेलो, सेंटर फ़ॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज़, एडजंक्ट प्रोफ़ेसर, राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय, सलाहकार, एकेडमिक काउंसिल, फ़ॉरेन पॉलिसी स्कूल और GNOIT, पूर्व एसोसिएट डीन, SoB, गलगोटिया विश्वविद्यालय।
'UPI पर टैक्स से अमेरिका को फायदा': राहुल गांधी का केंद्र पर निशाना, फैसला वापस लेने की मांग
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यूपीआई का फ्री युग खत्म, विपक्ष हमलावर पर पेमेंट ऐप्स खुश
व्यापारियों को किए जाने वाले 2000 रुपए से अधिक के यूपीआई लेन-देन पर फीस लगाई जाएगी. कांग्रेस ने इसे लूट करार दिया है.
मथुरा में सपा नेता राजन रिजवी पर महिला बैंककर्मी से अभद्रता और पीछा करने के आरोप में एफआईआर दर्ज
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सऊदी अरब के लिए खतरे की घंटी अब मक्का तक पहुंच गई है। इस्लाम के सबसे पवित्र शहर मक्का में पहली बार संभावित हवाई हमले को लेकर आपात चेतावनी जारी होने और सायरन बजने से पूरी दुनिया में चिंता पैदा हो गई है। मक्का में हर साल दुनिया के कोने-कोने से लाखों मुसलमान पहुंचते हैं, इसलिए यहां मंडराता कोई भी सुरक्षा खतरा सिर्फ सऊदी अरब की चिंता नहीं रह जाता। हम आपको बता दें कि लोगों को घरों के भीतर जाने और खिड़कियों-दरवाजों से दूर रहने को कहा गया। जेद्दा और ताइफ में भी ऐसी ही चेतावनी जारी हुई। कुछ ही मिनटों में अलर्ट हटा लिया गया, लेकिन इस घटना ने साफ कर दिया कि यमन के हूतियों से बढ़ता खतरा अब सऊदी अरब के बेहद संवेदनशील इलाकों तक पहुंच चुका है। मक्का का नाम इस पूरे संकट को असाधारण रूप से संवेदनशील बना देता है। यह केवल सऊदी अरब का शहर नहीं, बल्कि इस्लाम का सबसे पवित्र धार्मिक केंद्र है। इसलिए यहां हवाई खतरे की चेतावनी ने सैन्य संकट को सीधे धार्मिक और राजनीतिक संकट में बदल दिया है। इस्लामी सहयोग संगठन ने मक्का और मदीना क्षेत्र पर हमलों की कड़ी निंदा करते हुए कहा है कि पवित्र स्थलों, मस्जिदों और नागरिक ढांचे को निशाना बनाना अस्वीकार्य है और उसने सऊदी अरब की सुरक्षा तथा पवित्र स्थलों की रक्षा के उपायों का समर्थन किया है। इसे भी पढ़ें: Middle East Tension: मक्का के पास सऊदी एयर डिफेंस ने हूथी ड्रोन को किया ढेर, गठबंधन ने दी 'रेड लाइन' की सख्त चेतावनी लेकिन असली तस्वीर मक्का से कहीं बड़ी है। हम आपको बता दें कि 12 सितंबर को यमन से दागा गया प्रक्षेपास्त्र सऊदी अरब के जाजान क्षेत्र में गिरा, जिसमें दो लोग घायल हुए और एक मस्जिद सहित कई इमारतों तथा वाहनों को नुकसान पहुंचा। इसके अगले दिन सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने खमिस मुशैत, अबहा और ताइफ के नागरिक इलाकों पर बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन से हमलों की बात कही। इन हमलों में 13 नागरिक घायल हुए और आवासीय मकानों तथा वाहनों को नुकसान पहुंचा। रियाद ने अब साफ संकेत दिया है कि लगातार हमलों का जवाब दिया जाएगा। सबसे खतरनाक बात यह है कि हमला केवल शहरों पर नहीं हो रहा। सऊदी अरब की ऊर्जा व्यवस्था भी निशाने पर है। 11 सितंबर को इराक से हुए ड्रोन हमले के बाद करीब 1,200 किलोमीटर लंबी पूर्व-पश्चिम तेल पाइपलाइन को बंद करना पड़ा। यह पाइपलाइन प्रतिदिन लगभग 40 से 50 लाख बैरल तेल लाल सागर तक पहुंचाने में सक्षम है और होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी संकट के बीच सऊदी अरब के लिए बेहद महत्वपूर्ण वैकल्पिक रास्ता बन गई थी। यही वह बिंदु है जहां संकट का सामरिक अर्थ साफ दिखाई देता है। यदि होर्मुज बाधित है और लाल सागर के प्रवेश द्वार बाब-अल-मंदब पर भी हूतियों का दबदबा बढ़ता है, तो सऊदी अरब के सामने तेल निर्यात के सुरक्षित रास्ते लगातार सिकुड़ते जाएंगे। यानी निशाना केवल रियाद नहीं, बल्कि उसकी ऊर्जा-आधारित आर्थिक शक्ति और पूरी वैश्विक आपूर्ति शृंखला है। साथ ही हूतियों ने यमन के पश्चिमी तट पर मोखा बंदरगाह और रणनीतिक पेरिम द्वीप पर कब्जा कर अपनी स्थिति को और मजबूत किया है। इसके बाद हनीश द्वीपों पर भी उनकी पकड़ की खबरें सामने आईं। पेरिम द्वीप बाब-अल-मंदब के सबसे संकरे हिस्से में स्थित है और इस समुद्री मार्ग पर नियंत्रण का अर्थ लाल सागर में आने-जाने वाले जहाजों पर दबाव बनाने की क्षमता है। यह घटनाक्रम महज यमन के भूभाग की लड़ाई नहीं है। बाब-अल-मंदब लाल सागर को हिंद महासागर से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण समुद्री द्वार है। ऐसे में हूतियों की बढ़त सऊदी अरब के पश्चिमी तट, उसके तेल निर्यात और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार—तीनों पर एक साथ दबाव पैदा करती है। देखा जाये तो यहां सऊदी अरब की कूटनीतिक रणनीति पर भी सवाल उठते हैं। पाकिस्तान के साथ ‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौते’ के जरिए रियाद ने सामूहिक सुरक्षा का एक नया ढांचा खड़ा किया है, जिसमें एक सदस्य पर हमला सभी पर हमला माना गया है। लेकिन यदि सऊदी अरब ने भारत के साथ सुरक्षा और सामरिक सहयोग को और अधिक गहरा किया होता, तो मौजूदा संकट में उसके पास एक अतिरिक्त और महत्वपूर्ण साझेदार हो सकता था। भारत और सऊदी अरब के बीच पहले से ही रक्षा, नौसैनिक सहयोग, खुफिया साझेदारी और संयुक्त सैन्य अभ्यास मौजूद हैं। दूसरी ओर, भारत के ईरान और इजराइल के साथ भी ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंध हैं। ऐसे में भारत की दोनों पक्षों के साथ संवाद की क्षमता सऊदी अरब के लिए एक अतिरिक्त कूटनीतिक और सामरिक सहारा बन सकती थी। फिर भी मौजूदा संकट यह सवाल जरूर खड़ा करता है कि क्या रियाद ने अपनी सुरक्षा साझेदारियों का दायरा जरूरत से ज्यादा सीमित कर दिया है। इसमें कोई दो राय नहीं कि रियाद के सामने अब विकल्प कम हैं। सऊदी अरब के पास आधुनिक हथियार, विशाल आर्थिक संसाधन और मजबूत वायु रक्षा है, लेकिन हूतियों की रणनीति ने युद्ध को मुश्किल बना दिया है। छोटे ड्रोन, मिसाइल, समुद्री दबाव और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर हमले के जरिए अपेक्षाकृत कमजोर पक्ष भी भारी रणनीतिक लागत पैदा कर सकता है। वैसे रियाद अब तक संयम बरतता रहा है। लेकिन पाइपलाइन पर हमला, लगातार मिसाइल और ड्रोन हमले तथा बाब-अल-मंदब के आसपास हूतियों की बढ़त इस संयम की सीमा को चुनौती दे रहे हैं। अमेरिकी सहायता भी बढ़ी है। एक सौ से अधिक अमेरिकी सैन्य सलाहकार सऊदी अरब में खुफिया सूचना और लक्ष्य निर्धारण में सहायता कर रहे हैं, लेकिन अमेरिका सीधे युद्ध में उतरने से बच रहा है। यही सबसे बड़ा रणनीतिक पेच है। सऊदी अरब पीछे हटता है तो हूतियों का दबदबा बढ़ सकता है; वह व्यापक सैन्य कार्रवाई करता है तो संघर्ष लंबा और अधिक विनाशकारी हो सकता है। विशेषज्ञों ने भी चेताया है कि बड़े पैमाने पर सऊदी जवाबी कार्रवाई संघर्ष को फिर एक खुले और लंबे युद्ध में बदल सकती है। इसलिए मक्का की चेतावनी को केवल एक सुरक्षा अलर्ट समझना भारी भूल होगी। इसके पीछे एक बहुत बड़ा खेल दिखाई दे रहा है। जिसके तहत सऊदी शहरों पर दबाव बनाया जा रहा है, तेल की नस पर हमला हो रहा है और बाब-अल-मंदब जैसे समुद्री द्वार पर पकड़ हासिल की जा रही है। होर्मुज और बाब-अल-मंदब दोनों पर संकट गहराया तो इसका असर केवल सऊदी अरब या यमन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि तेल, समुद्री व्यापार और विश्व अर्थव्यवस्था तक पहुंचेगा। बहरहाल, मक्का तक पहुंचा खतरा इसलिए इस संघर्ष का नया मोड़ है। अब सवाल यह है कि सऊदी अरब कब तक अपनी सीमाओं, पवित्र स्थलों, तेल ढांचे और समुद्री हितों पर एक साथ पड़ते इस चौतरफा दबाव को सहन करेगा।
करोड़ो यूपीआई यूजर्स के मन में एक सवाल घूम रहा है। सवाल ये कि क्या 2000 रुपए से ऊपर की यूपीआई पेमेंट पर आपको पैसा देना होगा? मतलब आप ₹500 की यूपीआई करोगे तो मुफ्त और ₹5000 की करोगे तो क्या आपकी जेब से कुछ कटेगा? और अगर कटेगा तो फिर जिस डिजिटल इंडिया का नाम लेकर सरकार ने खुद कहा था कि यूपीआई फ्री रहेगा। उसी सरकार के अपने कागज में कल पहली बार 2000 को लेकर एक लकीर क्यों खींची? उसी कागज में एक तरफ लिखा था कि बैंक 2000 तक की पेमेंट पर ₹1 नहीं ले सकते। ना सीधे ना घुमाकर। लेकिन दूसरी तरफ 2000 के ऊपर कुछ कंडीशंस लगाई गई थी। वो कंडीशंस क्या पैसा लेने के लिए? सवाल यह भी उठता है कि जो लकीर आज तक कहीं थी नहीं उसे सरकार क्यों लगा रही है? क्या यूपीआई को लेकर जो नए नियम है वो सिर्फ कागजों के फेरबदल है या वाकई में 2000 के ऊपर चार्ज लगेगा और चार्ज लग रहा है तो किसकी जेब से कटेगा? आम आदमी की जेब से या वो जो इसे बिजनेस में इस्तेमाल करते हैं दुकानदार उनकी जेब से और अगर दुकानदार की जेब से भी जाता है तो क्या वो घूमकर आपके सामान में नहीं जुड़ेगा? यूपीआई से लोग आज शहर से गांव पैसा भेजते हैं। स्कूल की फीस जमा करते हैं। हर महीने घर का राशन ऑनलाइन मंगाते हैं। और जितने लोग यूपीआई से सारा काम करते हैं। अब तो भीख मांगने वाले भी लोग जो हैं वो यूपीआई दिखाते हैं। तो उन सबके मन में ये सवाल है कि भाई साहब 2000 के ऊपर अगर 3000 का बिल गया तो क्या पैसा लोगे? 4000 डॉक्टर की फीस मांगा तो क्या फीस के साथ यूपीआई का भी टैक्स देंगे? और घर का किराया तो 8000, 10000 20,000 हो तो क्या वहां जाएगा? इसे भी पढ़ें: डूबने वाला है ब्रिटेन का सूरज, होंगे 4 टुकड़े! UK अगर टूटता है तो इसका भारत पर क्या असर होगा? कैसे शुरू हुई चर्चा 15 सितंबर को अखबारों में खबर आ गई कि यूपीआई पर 2000 के यूपीआई ट्रांजैक्शन पर कोई पैसा नहीं लगेगा। सबको समझ में आ गया कि यार 2000 के ऊपर वाले पर तो लगेगा ही लगेगा। सरकार अगर यह कह रही है तो कोई बहुत दिन से ही चल रहा था कि यूपीआई ट्रांजैक्शन पर सरकार चार्ज लगाने वाली है। कई बार खंडन होता, कभी दबी आवाज में खंडन होता, कभी स्पष्टीकरण आता, कभी फ्रेमवर्क पे काम करने की बातें कही जाती। लेकिन 15 सितंबर की ही शाम को वित्त मंत्रालय ने निर्मला सीतारमण का जो मंत्रालय है उसने एक फ्रेमवर्क जारी किया है। फ्रेमवर्क शाम को करीब 7 बजे के आसपास सामने आया है। जिसमें यह साफ कहा गया है कि जी हां 2000 के ऊपर के यूपीआई ट्रांजैक्शन पे अब चार्ज लगेगा। लेकिन शर्तें हैं। सरकार ने बताया किनको नहीं देना है पैसा सोशल मीडिया बहस शुरू हो गई। यहीं से खबर आई कि भाई 2000 तक अगर आपने लिखा है तो क्या उसके आगे और यह अफवाह फैलनी तेज हो गई। रोज सुबह चाय वाले को, शाम को दूध वाले को, महीने के आखिर में घर के किराए वाले को आप यूपीआई से पैसा भेजते हैं। वहां पर एक्स्ट्रा पैसा नहीं जाता। क्या अब एक्स्ट्रा जाएगा? यह मैसेज वायरल हुआ कि 2000 के ऊपर की हर पेमेंट पर पैसा कटेगा और वो आपके खाते से कटेगा। कई लोगों ने अपने बैंक की ऐप चेक करनी शुरू कर दी कि पैसा कटा तो नहीं क्योंकि 2019 से यह फ्री था। पर अब क्या होगा? सरकार ने साफ किया है कि यूपीआई इस्तेमाल करने वाला आम ग्राहक के पैसे से रुपया नहीं कटेगा। चाहे पेमेंट कितनी बड़ी भी क्यों ना हो। जो चार्ज की बात है वह एमडीआर है। यानी दुकानदार अपनी बिक्री पर बैंक को जो थोड़ी सी फीस देता है। ठीक वैसे ही जैसे कार्ड से पेमेंट लेने पर देता है। और यह सिर्फ दुकान पर होने वाले पेमेंट की बात है। दोस्त या घर वाले को सीधे पैसे भेजने पर चाहे जितनी बड़ी रकम हो पैसा नहीं जाएगा। हां और अभी तक यह फीस लगाने का कोई अंतिम फैसला भी नहीं हुआ है कि दुकानदार पर कितनी लेगी यह एनपीसीआई की एक कमेटी तय करेगी। यानी वही सरकारी कंपनी जो यूपीआई को पीछे चलाती है और जिसका काम अभी शुरू हुआ है। इसे भी पढ़ें: दोस्त इजरायल को झटका! क्या भारत ने बदल लिया अपना रुख, ईरान के लिए नेतन्याहू को छोड़ा? UPI सेमहीनेमें100000 कमानेवालेव्यापारियोंकोनहींदेनाहोगाशुल्क सामान्य ग्राहक आम लोगों पर शुल्क लगेगा? नहीं, UPI भुगतान मुफ्त रहेगा। चाहे भुगतान Person-to-Person (P2P) हो या Person-to-Merchant (P2M), ग्राहक से शुल्क नहीं लिया जाएगा। UPI ऐप भी ग्राहक से कोई फीस नहीं लेंगे। QR स्कैन करने पर चार्ज लगेगा? नहीं। छोटे भुगतान पहले की तरह मुफ्त रहेंगे और व्यापारी यह शुल्क ग्राहक से नहीं वसूलेंगे। सरकार के मुताबिक, बैंक व्यापारियों के लेन-देन पर नजर रखेंगे। छोटे व्यापारी ₹2,000 से अधिक के भुगतान पर क्या होगा? ऐसे भुगतान पर 0.40% शुल्क लागू होगा। हालांकि, अगर व्यापारी की UPI से महीने की प्राप्ति ₹1 लाख तक है, तो MDR नहीं लगेगा। क्या नया QR कोड लेना होगा? नहीं। मौजूदा QR कोड से ही भुगतान जारी रहेगा। क्या जीएसटी रजिस्ट्रेशन जरूरी है? नहीं। शून्य MDR का लाभ लेने के लिए GST रजिस्ट्रेशन अनिवार्य नहीं है। सीमा कैसे तय होगी? बैंक व्यापारी के लेन-देन की निगरानी करेंगे। अगर लगातार 3 महीने तक UPI से प्राप्ति ₹1 लाख से अधिक रहती है, तभी व्यापारी को Person-to-Merchant श्रेणी में बदला जाएगा। बड़ेव्यापारी-ईकॉमर्स ₹2,000 से कम के भुगतान पर भी जीरो MDR लागू है। वहीं, ₹75,000 से अधिक के लेनदेन के लिए अधिकतम फीस ₹300 तय की गई है। क्रेडिट या डेबिट कार्ड के मुकाबले UPI कितना किफायती है? अभी क्रेडिट कार्ड पर 1.5% से 2.5% और डेबिट कार्ड पर 0.90% तक शुल्क लगता है। इसके मुकाबले UPI पर सिर्फ 0.40% या अधिकतम ₹300 का शुल्क रहेगा। क्या जीरो MDR का फायदा लेने के लिए छोटे दुकानदार को GST पंजीकरण कराना जरूरी है? नहीं। छोटे दुकानदारों को UPI भुगतान पर जीरो MDR का लाभ लेने के लिए सिर्फ इसी वजह से GST पंजीकरण कराने की जरूरत नहीं होगी। इसकी पात्रता तय करने में मासिक UPI कलेक्शन की सीमा और बैंक खाते की श्रेणी देखी जाएगी। जो छोटे कारोबारी कानून के तहत GST पंजीकरण की अनिवार्य सीमा से नीचे हैं, वे बिना GST दस्तावेज दिए भी डिजिटल भुगतान स्वीकार कर सकेंगे। यूपीआई तो इतने सालों तक फ्री था, अचानक इसकी जरूरत क्यों पड़ी सरकार ने यह कदम इसलिए उठाया ताकि UPI के सिस्टम को टिकाऊ बनाया जा सके। किसी भी व्यवस्था को चलाने की लागत होती है और UPI के मामले में यह हर साल औसतन 20 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा है। ट्रांजैक्शन की संख्या बढ़ने के साथ खर्च भी बढ़ रहा है और फिलहाल बैंक, सर्विस प्रोवाइडर कंपनियां और सरकार मिल-जुलकर इसका बोझ उठा रहे हैं। लेकिन, यह व्यवस्था शायद लंबे वक्त तक नहीं चल पाती। UPIकीताकत सरकार आम लोगों को सहूलियत देने और सिस्टम को टिकाऊ बनाने के बीच संतुलन रखना चाहती है। हालांकि, इन फैसलों से जुड़ी चिंताओं को समझते हुए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि MDR का बोझ आम लोगों पर न पड़े। देश में डिजिटल ट्रांजैक्शन की सबसे बड़ी ताकत इसकी सरलता और मुफ्त होना रही है। इसी वजह से UPI ने उन दूर-दराज के इलाकों तक भी पहुंच बनाई है, जहां इंटरनेट उपलब्ध है। ऐसे में इसकी सहजता और मुफ्त व्यवस्था बनी रहना जरूरी है। अगर आम उपभोक्ताओं पर थोड़ा भी अतिरिक्त बोझ पड़ा, तो UPI की स्वीकार्यता प्रभावित हो सकती है। डिजिटल इंडिया की दिशा में UPI एक बड़ी छलांग है और आज कई अन्य देश भी इसे अपना रहे हैं। इसने भुगतान प्रणाली को बेहद सरल बनाने के साथ-साथ व्यापार को बढ़ाने में भी मदद की है। ऐसे में UPI को सहज, सुलभ और आम लोगों के लिए किफायती बनाए रखना जरूरी होगा। जब-जब मर्चेंट फीस लगी, बोझ ग्राहकों पर ही पड़ा, 5 उदाहरण से समझें पेट्रोल पंप: कार्ड से भुगतान पर पेट्रोल पंप संचालक खुद शुल्क चुकाने के बजाय इसे 'फ्यूल सरचार्ज' के रूप में ग्राहक से वसूल रहे हैं। ज्वेलर्स: बैंक के 1.5% से 2% MDR की भरपाई के लिए ज्वेलर्स ग्राहक के बिल में 'कार्ड सरचार्ज' जोड़ रहे हैं। IRCTC, सिनेमा हॉल और ट्रैवल ऐप्स: भुगतान गेटवे के शुल्क को 'कन्विनियंस फीस' के नाम पर ग्राहक से वसूल रहे हैं। छोटे भुगतान: फिक्स्ड प्रोसेसिंग कॉस्ट से बचने के लिए कुछ व्यापारी ₹200 या ₹500 से कम के भुगतान पर कार्ड लेने से इनकार करते हैं और ग्राहक को अधिक खरीदारी के लिए मजबूर करते हैं। रेस्तरां और स्टोर्स: MDR को सीधे बिल में जोड़ना गैर-कानूनी होने के बावजूद कुछ रेस्तरां और स्टोर्स 5% तक का 'सर्विस चार्ज' लगाकर ग्राहक से अतिरिक्त शुल्क वसूलते हैं।
Modi-Shah के लिए सबसे बड़ा संकट! Rajasthan के बाद क्या UP में Urban Voters छोड़ेगा BJP का साथ ?
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से भारत को क्या लाभ?
दिनांक 12 एवं 13 सितम्बर 2026 को ब्रिक्स का 18वां शिखर सम्मेलन दिल्ली के भारत मंडपम में सफलता पूर्वक सम्पन्न हो गया। ब्रिक्स का उद्देश्य सदस्य देशों के बीच आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक सहयोग बढ़ाना है। इस शिखर सम्मेलन में ब्रिक्स के 11 सदस्य देशों के साथ ही 10 अन्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष, प्रधानमंत्री एवं उच्च स्तर के अधिकारी शामिल हुए। वर्ष 2025-26 के लिए भारत को ब्रिक्स का अध्यक्ष बनाया गया था, अतः भारत ने इस वर्ष ब्रिक्स सम्मेलन की मेजबानी एवं अध्यक्षता की। ब्रिक्स के माध्यम से विश्व की 11 प्रमुख उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं एवं विकासशील देशों को एक मंच प्रदान किया जाता है। ब्रिक्स में शामिल देशों की कुल आबादी विश्व की कुल जनसंख्या का 49.5 प्रतिशत है और विश्व के कुल सकल घरेलू उत्पाद में 40 प्रतिशत की हिस्सेदारी है तथा वैश्विक व्यापार में 26 प्रतिशत की भागीदारी है। इससे वैश्विक स्तर पर ब्रिक्स का महत्व स्वयं ही स्पष्ट हो जाता है। ब्रिक्स के सदस्य देश आपस में आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय आर्थिक और वित्तीय स्थिति, दूरसंचार, कृषि, श्रम, रोजगार, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संरचना, व्यापार और विश्व व्यापार संगठन सहित वैश्विक मुद्दों पर विचार विमर्श करते है। इस वर्ष के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की थीम “लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण” रखी गई थी। शिखर सम्मेलन में 45 पन्नों एवं 140 बिंदुओं के “नई दिल्ली घोषणापत्र” को समस्त सदस्य देशों द्वारा सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया था। इस सम्मेलन की यह सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है, क्योंकि इस सम्मेलन में आपस में कुछ विरोधाभासी विचार रखने वाले देश (ईरान, साऊदी अरब एवं संयुक्त अरब अमीरात) भी शामिल थे। ईरान के राष्ट्रपति एवं यूएई के राष्ट्रपति के बीच शिखर सम्मेलन के बीच आपस में वार्ता सम्पन्न हुई थी, जबकि दोनों देशों के बीच अमेरिका-ईरान युद्ध के संदर्भ में तनाव की स्थिति कायम है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि ब्रिक्स की स्थापना अमेरिका में हुई है। वर्ष 2006 में न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) के मौके पर ब्रिक विदेश मंत्रियों की पहली बैठक में ब्रिक को औपचारिक रूप दिया गया था। ब्रिक का पहिला उद्घाटन शिखर सम्मेलन वर्ष 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में आयोजित किया गया था। वर्ष 2010 में न्यूयॉर्क में ब्रिक विदेश मंत्रियों की बैठक में दक्षिण अफ्रीका को शामिल करने के साथ ब्रिक को ब्रिक्स में विस्तारित करने पर सहमति हुई थी। तदनुसार, दक्षिण अफ्रीका ने 2011 में सान्या में तीसरे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लिया। मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जनवरी 2024 से और इंडोनेशिया जनवरी 2025 में ब्रिकस के पूर्ण सदस्य बने। इसके बाद बेलारूस, बोलीविया, कजाकिस्तान, क्यूबा, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम 2025 में भागीदार देशों के रूप में ब्रिक्स में शामिल हुए। इसे भी पढ़ें: आखिर कृत्रिम बुद्धिमत्ता को लेकर जारी अमेरिकी-चीनी रस्साकसी के बीच क्या करे भारत? समझिए विस्तार से भारत के प्रधानमंत्री ने अपने उदबोधन में उक्त ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में कई आवश्यक एवं महत्वपूर्ण विषयों की ओर समस्त सदस्यों का ध्यान आकर्षित किया है। अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने विभिन्न देशों से अमेरिका को होने वाले कई उत्पादों के निर्यात पर भारी भरकम टैरिफ लगाया था, इसी प्रकार चीन ने भी आवश्यक मिनरल के निर्यात पर कुछ प्रतिबंध लगाए थे, इस प्रकार की स्थित पुनः न बनें इस हेतु यह सुझाव दिया गया है कि तकनीकी एवं आवश्यक मिनेरल्स को विभिन्न देशों द्वारा हथियार की तरह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए इसका सीधा सीधा विपरीत प्रभाव विकासशील देशों के विकास पर पड़ता है। जब हम वैश्विक स्तर पर एक परिवार की बात करते हैं तो प्राकृतिक संसाधनों पर इस धरा पर निवासरत पूरी मानवजाति का समान अधिकार है। इसके उपयोग को कुछ देशों द्वारा रोका नहीं जाना चाहिए। भारतीय सनातन संस्कृति में तो प्रकृति को मां के समान माना जाता है, अतः प्रकृति का शोषण नहीं बल्कि आवश्यकता अनुसार दोहन होना चाहिए। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन भी आवश्यक है। विकास और पर्यावरण एक दूसरे के खिलाफ नहीं हैं केवल आवश्यता है कि दोनों के बीच संतुलन स्थापित किया जाय। हाल ही के समय में महामारी, जलवायु आपदाओं एवं सप्लाई चैन में रुकावटों ने दिखाया है कि विभिन्न देश एक दूसरे पर किस प्रकार निर्भर है। एक देश में आया संकट दूसरे देश को भी प्रभावित करता हुआ दिखाई दे रहा है। ब्रिक्स के सदस्य देशों को आपस में सहयोग बढ़ाने तथा सप्लाई चैन को मजबूती प्रदान करने की ओर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए। ब्रिक्स के सदस्य देशों के बीच आपस में छोटे कारोबारों को बढ़ावा दिए जाने के प्रयास किए जाने चाहिए और उन्हें नए बाजार और पर्याप्त वित्त की सुविधा उपलब्ध कराए जाने के प्रयास भी होने चाहिए ताकि रोजगार के नए अवसर निर्मित हों और अंतिम पंक्ति पर खड़े नागरिकों को गरीबी रेखा से ऊपर लाया जा सके। इसके लिए “ब्रिक्स कनेक्ट” के माध्यम से गरीब नागरिकों को काम के लिए आवश्यक कौशल सीखने, रोजगार के अवसर बढ़ाने एवं मातृशक्ति को अधिक काम के मौके देने का प्रयास किया जाना चाहिए। छोटे कारोबारियों को मदद पहुंचाने के उद्देश्य से BRICS MSME पोर्टल प्रारम्भ किया गया है। इससे छोटे कारोबारी नए बाजारों से जुड़ सकेंगें। ब्रिक्स देशों में कार्य कर रहे स्टार्टअप्स को आपस में जोड़ने के लिए ब्रिक्स इनक्युबेटर नेट्वर्क बनाया जा सकता है। इसी प्रकार, नए और बड़े स्तर के नवाचार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से ब्रिक्स स्टार्टअप इनोवेशन फंड भी बनाया जा सकता है। ब्रिक्स देश आपस में कारोबार को सरल बनाने के उद्देश्य से स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं और अमेरिकी डॉलर का इस्तेमाल कम करने का प्रयास कर रहे हैं। इसके साथ साथ, अलग अलग देशों के ऑनलाइन डिजिटल पेमेंट सिस्टम को आपस में जोड़ने का प्रयास भी किया जा रहा है। इससे एक देश के नागरिकों को दूसरे देश के नागरिकों को राशि भेजना बहुत आसान होगा और अमेरिकी डॉलर की आवश्यकता कम होगी। ब्रिक्स स्थापना से भारत को विशेष लाभ हुआ है। सामरिक दृष्टि से भारत का वैश्विक स्तर पर महत्व बढ़ा है। भारत आज न केवल ब्रिक्स बल्कि जी-20, जी-7, क्वाड, एससीओ जैसे वैश्विक संस्थानों में भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है। इससे वैश्विक स्तर पर भारत की साख बढ़ी है एवं अन्य देश आंज भारत की आवाज को गम्भीरता से सुन रहे हैं। विभिन्न देशों के नागरिक आज सनातन संस्कृति के संस्कारों को अपनाने हेतु लालायित हैं क्योंकि इस संदर्भ में भारत के व्यवहार से ये देश अत्यधिक प्रभावित हैं। साथ ही, भारत को कई प्रकार के आर्थिक लाभ भी होने जा रहे हैं और भारत में विदेशी निवेश बढ़ने की सम्भावना बनी है। ब्रिक्स के 21 सदस्य देशों के बीच आपसी समझदारी बढ़ी है और इससे इन देशों के बीच आर्थिक साझेदारी भी बढ़ेगी। आतंकवाद के खिलाफ मजबूत संदेश गया है कि भारत किसी भी कीमत पर आतंकवाद को पनपने नहीं देगा। नई दिल्ली घोषणापत्र में रूस एवं चीन सहित समस्त ब्रिक्स सदस्य देशों ने पहलगाम आतंकी हमले की निंदा भी की है। इसमें यह भी कहा गया है कि आतंकियों को पनाह देने वालों के खिलाफ मिलकर कार्यवाही करनी चाहिए। साथ ही, आतंकियों तक पहुंचने वाली फंडिंग को रोकने और उन्हें सुरक्षित ठिकाने देने वालों पर भी कार्यवाही की जानी चाहिए। भारत आज ग्लोबल साउथ की आवाज बन रहा है। इस क्षेत्र के देश भारत पर भरोसा करने लगे हैं। इससे भारतीय रुपए की वैश्विक स्तर पर साख बढ़ सकती है क्योंकि ब्रिक्स के सदस्य देश आपस में स्थानीय मुद्रा में व्यापार को बढ़ावा देने के प्रयास कर रहे हैं। यूपीआई एवं रूपे कार्ड की स्वीकार्यता कई देशों में अब बढ़ रही है। आपस में स्थानीय मुद्रा में व्यापार करने से भारतीय रुपए को मजबूती मिलेगी एवं इससे मंहगाई बढ़ने की गति कम होगी। ब्रिक्स ने वर्ष 2015 में डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी) की स्थापना की थी। इस बैंक ने भारत को 10,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक की राशि का ऋण प्रदान किया है। इस ऋणराशि का उपयोग मुंबई मेट्रो लाइन डालने के लिया किया जा रहा है। इंदौर में मेट्रो भी इसी ऋण से बनी है। दिल्ली-गाजियाबाद क्षेत्रीय रेल्वे लाइन इसी ऋण से बिछाई गई है। कुल मिलाकर भारत में आधारभूत संरचना खड़ी करने में ब्रिक्स द्वारा स्थापित उक्त बैंक का महत्वपूर्ण योगदान है। प्रहलाद सबनानी सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक, भारतीय स्टेट बैंक के-8, चेतकपुरी कालोनी, झांसी रोड, लश्कर, ग्वालियर - 474 009
प्राइवेट स्कूल रिश्वत कांड में पूर्व मंत्री अनबिल महेश के ठिकानों पर क्राइम ब्रांच का छापा
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मुंबई, सोने और चांदी की कीमतों में बुधवार को तेजी देखने को मिली और दोनों कीमती धातुओं का दाम करीब 1.5 प्रतिशत तक बढ़ गया।
UPI पर अमेरिका का वार! क्या US कंपनियों के दबाव में Modi सरकार ने किया FREE UPI का अंत ?
यूपीआई मर्चेंट भुगतान पर शुल्क को कांग्रेस ने बताया- मोदी सरकार की 'द ग्रेट UPI लूट'
2000 रुपये से अधिक के यूपीआई मर्चेंट भुगतान पर 0.4% शुल्क लगाए जाने के सरकार के फैसले पर कांग्रेस ने मोदी सरकार को घेरा और इसे 'जेब काटो योजना' करार दिया। राहुल गांधी ने कहा कि दुकानदार पर लगने वाली फ़ीस क़ीमतों में जुड़कर ग्राहक की जेब से आएगी।
UPI से 2,000 रुपये से ऊपर लेनदेन पर शुल्क, 15 अक्टूबर से लागू
सरकार ने यूपीआई के जरिये 2,000 रुपये से अधिक के मर्चेंट ट्रांजेक्शन पर 0.4 प्रतिशत शुल्क तय किया है जो 15 अक्टूबर से लागू होगा। वित्त मंत्रालय ने मंगलवार शाम एक प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि व्यक्तिगत यूपीआई खातों से मर्चेंट खातों में भुगतान पर 2,000 रुपये से अधिक के लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लागू होगा
‘समान नागरिक संहिता कबूल नहीं है', मुस्लिम धर्मगुरुओं ने जताई आपत्ति
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भूपेंद्र यादव ने 'बदलने से पहले मरम्मत' पर जोर दिया, बोले- सर्कुलर इकोनॉमी सिर्फ रीसाइक्लिंग प्लांट में नहीं बन सकती
एक्सप्लेनर: नए यूपीए फ्रेमवर्क में पी2पी लेनदेन पर नहीं लगेगा चार्ज, ग्राहकों को जारी रहेगी छूट
नए यूपीआई फ्रेमवर्क से किसी भी पर्सन-टू-पर्सन (पी2पी) लेनदेन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, क्योंकि इस तरह के लेनदेन को एमडीआर ढांचे से बाहर रखा गया है। यह जानकारी मंगलवार को वित्त मंत्रालय द्वारा जारी एक्सप्लेनर में दी गई।
केपटाउन: दिल्ली के स्पीकर विजेंद्र गुप्ता कॉमनवेल्थ कॉन्फ्रेंस में 'समावेशी लोकतंत्र' पर रखेंगे विचार
'भाजपा के गुलाम', डीएमके ने पार्टी नेताओं के खिलाफ मामलों को लेकर टीवीके की आलोचना की
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क्या दिखाता है 2027 यूपी चुनाव से पहले अखिलेश यादव का ‘नीला दांव’
समाजवादी पार्टी की छात्रसभा अब नीली टी-शर्ट और जींस में नजर आएगी. यूपी की राजनीति में नीला रंग अंबेडकरवादी और बहुजन राजनीति से जुड़ा रहा है. क्या अखिलेश यादव की कोशिश 2027 से पहले एक नई सामाजिक पहचान बनाने की है
आतंकी मसूद पर पाकिस्तान की नई नौटंकी
आतंकवाद के प्रश्न पर पाकिस्तान की भूमिका लंबे समय से विश्व समुदाय के लिए चिंता का विषय रही है। आतंकवाद के विरुद्ध कठोर कार्रवाई का दिखावा और आतंकी संगठनों के प्रति नरम रवैया, पाकिस्तान की विदेश एवं सुरक्षा नीति के इस विरोधाभासी चरित्र ने उसकी विश्वसनीयता को लगातार कठघरे में खड़ा किया है। आतंकी सरगना मसूद अजहर को लेकर पाकिस्तान की हालिया कार्रवाई भी इसी विरोधाभास की एक नई कड़ी के रूप में देखी जा रही है। उसे भगोड़ा घोषित करना और उसकी गिरफ्तारी पर इनाम की घोषणा करना पहली दृष्टि में कठोर कार्रवाई का संकेत देता है, लेकिन पाकिस्तान के पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए इसके पीछे की वास्तविक मंशा पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। मसूद अजहर कोई सामान्य अपराधी नहीं है। वह भारत में हुए अनेक आतंकी हमलों से जुड़े उन कुख्यात चेहरों में रहा है, जिनकी गतिविधियों ने न केवल भारत की सुरक्षा को चुनौती दी, बल्कि दक्षिण एशिया में आतंकवाद के नेटवर्क की भयावहता को भी उजागर किया। वर्ष 1999 में इंडियन एयरलाइंस के विमान के अपहरण के बाद यात्रियों की रिहाई के बदले भारत को जिन आतंकवादियों को छोड़ना पड़ा, उनमें मसूद अजहर भी शामिल था। इसके बाद उसने आतंकवादी गतिविधियों के जिस नेटवर्क को आगे बढ़ाया, उसने भारत की सुरक्षा व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी कीं। विडंबना यह है कि जिस व्यक्ति को भारत लंबे समय से आतंकवाद का प्रमुख चेहरा मानता रहा है, उसी मसूद अजहर को लेकर पाकिस्तान अब यह दावा कर रहा है कि वह उसकी पकड़ से बाहर है और संभवतः अफगानिस्तान में छिपा हुआ है। यदि यह दावा सही है तो सवाल यह उठता है कि पाकिस्तान की सुरक्षा और खुफिया एजेंसियां इतने कुख्यात आतंकी के संबंध में इतनी अनभिज्ञ कैसे हो सकती हैं? और यदि वह पाकिस्तान से बाहर है तो उसके संगठनात्मक नेटवर्क, आर्थिक संसाधनों और संपर्कों पर कार्रवाई क्यों दिखाई नहीं देती? यहीं से पाकिस्तान की कार्रवाई पर संदेह की परतें गहरी होने लगती हैं। पाकिस्तान की जांच एजेंसी एफआईए द्वारा मसूद अजहर को अपने अत्यंत खतरनाक आतंकवादियों की सूची में शामिल किया जाना अपने आप में महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। लेकिन केवल किसी आतंकी को सूचीबद्ध कर देना आतंकवाद के विरुद्ध निर्णायक कार्रवाई नहीं माना जा सकता। असली कसौटी गिरफ्तारी, न्यायिक प्रक्रिया, आतंकी नेटवर्क का विघटन और उसके वित्तीय स्रोतों पर प्रभावी प्रहार है। यदि कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित रह जाए, तो वह आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय दबाव को टालने की प्रशासनिक कवायद बनकर रह जाती है। भारत के सुरक्षा तंत्र से जुड़े इनपुट यदि यह संकेत देते हैं कि मसूद अजहर पाकिस्तान में ही छिपा हुआ है, तो पाकिस्तान के दावे की विश्वसनीयता और भी संदिग्ध हो जाती है। हालांकि ऐसे खुफिया दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक होती है, लेकिन पाकिस्तान का अतीत उसके वर्तमान दावों पर सहज विश्वास करने की अनुमति नहीं देता। पाकिस्तान का यह दोहरा चरित्र नया नहीं है। दुनिया पहले भी देख चुकी है कि आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई का दावा करने वाला पाकिस्तान अपनी ही धरती पर छिपे कुख्यात आतंकवादियों की मौजूदगी से लंबे समय तक इनकार करता रहा। ओसामा बिन लादेन का पाकिस्तान में पाया जाना इस संदर्भ में सबसे चर्चित उदाहरण है। अमेरिकी कार्रवाई में एबटाबाद में लादेन के मारे जाने के बाद पाकिस्तान के उन दावों की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न उठे थे, जिनमें वह अपनी धरती पर आतंकवादी सरगनाओं की मौजूदगी से अनभिज्ञता जताता रहा था। आतंकी मसूद अजहर पर पाकिस्तान सरकार की कार्यवाही को इसलिए भी संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है, क्योंकि पाकिस्तान में आतंकी सरगनाओं पर न तो सरकार का नियंत्रण है और न ही सेना की ही चलती है। आतंकियों का अपना एक तंत्र है। जिनमें कोई भी दखल नहीं दे सकता। पाकिस्तान में तीन शक्ति केंद्र माने जाते हैं, जिनमें सरकार, सेना और आतंकवादी हैं। कई बार यह भी देखने में आता है कि वहां की सरकार किसकी होगी, यह आतंकी और सेना तय करती है। इसलिए सरकार, आतंकियों पर कठोर कार्यवाही करने का सामर्थ्य नहीं जुटा पाती। और आतंकी फलीभूत होते रहते हैं। इस पृष्ठभूमि में मसूद अजहर पर घोषित इनाम को केवल कानून-व्यवस्था की कार्रवाई के रूप में देखना कठिन है। इसके पीछे पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि सुधारने की मंशा भी दिखाई देती है। विशेषकर आतंकवाद के वित्तपोषण और धनशोधन से जुड़े अंतरराष्ट्रीय मानकों के संदर्भ में पाकिस्तान पर लगातार दबाव रहा है। ऐसे समय में किसी कुख्यात आतंकी के विरुद्ध सार्वजनिक कार्रवाई का प्रदर्शन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को यह संदेश देने का प्रयास हो सकता है कि पाकिस्तान आतंकवाद के विरुद्ध सक्रिय है। लेकिन आज विश्व पहले की तुलना में कहीं अधिक सतर्क है। आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष में अब केवल घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय यह देखता है कि आतंकवादी संगठनों की वित्तीय धमनियां कितनी प्रभावी ढंग से रोकी गईं, उनके प्रशिक्षण शिविरों और नेटवर्क पर क्या कार्रवाई हुई, आतंकी सरगनाओं को न्याय के कठघरे में कब लाया गया और आतंकवाद को संरक्षण देने वाली संरचनाओं को कितना ध्वस्त किया गया। पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति भी उसके लिए एक बड़ी चुनौती है। विदेशी सहायता, ऋण और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से मिलने वाली आर्थिक सहायता उसके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसे में आतंकवाद के वित्तपोषण को लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव उसके आर्थिक हितों से सीधे जुड़ जाता है। यदि पाकिस्तान आतंकवाद पर प्रभावी कार्रवाई करने में विफल रहता है तो उस पर आर्थिक एवं वित्तीय प्रतिबंधों का दबाव बढ़ सकता है। इसलिए उसके द्वारा की जाने वाली प्रत्येक कार्रवाई को उसके आर्थिक और कूटनीतिक संदर्भ में भी परखना आवश्यक है। भारत के लिए यह समय पाकिस्तान के किसी भी दावे से प्रभावित होने के बजाय तथ्यों, प्रमाणों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के आधार पर अपनी आतंकवाद विरोधी नीति को और सुदृढ़ करने का है। आतंकवाद किसी एक देश की समस्या नहीं है। यह वैश्विक शांति, लोकतांत्रिक संस्थाओं और मानव सभ्यता के लिए चुनौती है। इसलिए आतंकवाद को संरक्षण देने वाली किसी भी व्यवस्था के प्रति अंतरराष्ट्रीय समुदाय को शून्य-सहनशीलता की नीति अपनानी होगी। मसूद अजहर पर इनाम की घोषणा यदि वास्तविक कार्रवाई की दिशा में पहला कदम है तो पाकिस्तान को उसे प्रमाणित करने में देर नहीं करनी चाहिए। उसे चाहिए कि वह मसूद अजहर की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करे, यदि वह पाकिस्तान में है तो उसे गिरफ्तार करे, उसके नेटवर्क को ध्वस्त करे और उसके विरुद्ध पारदर्शी न्यायिक कार्रवाई सुनिश्चित करे। अन्यथा यह कार्रवाई भी पाकिस्तान की उन अनेक घोषणाओं की सूची में जुड़ जाएगी, जिनमें शब्द बहुत थे, लेकिन परिणाम नगण्य। आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में अब दुनिया को दावों की नहीं, कार्रवाई की भाषा चाहिए। पाकिस्तान यदि वास्तव में अपनी छवि बदलना चाहता है तो उसे नौटंकी से आगे बढ़कर प्रमाण प्रस्तुत करने होंगे। क्योंकि आतंकवाद के सवाल पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की स्मृति अब इतनी कमजोर नहीं रही कि पुरानी चालें नए आवरण में आसानी से सफल हो जाएं। - सुरेश हिंदुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार
मेलोडी, ठेकुआ, मखाना-सत्तू— भारत की 'फूड डिप्लोमेसी' का नया दौर
रोम वाला वो क्लिप शायद आपकी फीड पर भी घूमा होगा। पीएम मोदी इटली की पीएम जॉर्जिया मेलोनी को एक छोटा-सा टॉफी पैकेट थमाते हैं, और मेलोनी मुस्कुराते हुए बोल पड़ती हैं— He gifted us a very, very good toffee। संयोग ऐसा कि टॉफी का नाम ही था मेलोडी! बस, इंटरनेट ने दोनों नामों को जोड़कर बना दिया 'Melodi', और वो मीठा पल रातोंरात एक मीम बन गया। एक साधारण-सी पार्ले टॉफी ने पूरे सोशल मीडिया पर राज कर लिया। लेकिन अगर आप इसे सिर्फ इत्तेफाक समझ रहे हैं, तो थोड़ा रुकिए। भारत की विदेश नीति में डिप्लोमेसी की अपनी अहमियत है ही, मगर पिछले कुछ बरसों में खाना भी उसमें एक चुपचाप मगर मजबूत किरदार निभाने लगा है। खाना अब सिर्फ पेट भरने की चीज़ नहीं रहा — यह एक सोची-समझी सॉफ्ट पावर की चाल बन चुका है। जैसे भाषा, संगीत या सिनेमा किसी देश की पहचान गढ़ते हैं, वैसे ही अब थाली भी एक तरह की चुप कूटनीतिक ज़बान बोलने लगी है। एक टॉफी, एक मिठाई, या किसी गाला डिनर का मेन्यू — ये सिर्फ मेहमाननवाज़ी नहीं, बल्कि बहुत सोच-समझकर गढ़ा गया एक संदेश होता है। दिल्ली में ब्रिक्स, थाली में इशारे टाइमिंग पर गौर करें तो मई 2026 में पीएम मोदी की पांच देशों की यात्रा का आख़िरी पड़ाव इटली ही था। मेलोनी को मेलोडी टॉफी सौंपना महज एक हल्का-फुल्का पल नहीं था, इसके पीछे की टाइमिंग सोच-समझकर तय की गई लगती है। वीडियो वायरल होते ही वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल का बयान आया कि पिछले 12 वर्षों में भारत का टॉफी निर्यात 166% बढ़ चुका है। यानी एक मामूली-सा गिफ्ट भी सरकार ने आसानी से एक आर्थिक नैरेटिव में बदल दिया — देखिए, भारत की मिठास अब दुनिया के बाज़ार में बिक रही है। यही डिप्लोमेसी की असली चाल है — जो चीज़ सोशल मीडिया पर वायरल हो जाए, उसे आंकड़ों के सहारे एक आर्थिक कहानी में ढाल दो। ठेकुआ जब स्लोवाकिया की संसद तक पहुंचा यह सिर्फ एक तोहफा नहीं था — यह बिहार की सीधी-सादी सांस्कृतिक पहचान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर मिली एक तरह की इज़्ज़त थी। जो मिठाई कभी सिर्फ त्योहारों तक सीमित मानी जाती थी, वह अब भारत की कूटनीतिक पहचान का हिस्सा बन चुकी है। बारीकी से देखें तो यह कोई अचानक शुरू हुआ चलन नहीं है। 2023 में जब भारत ने G20 की मेज़बानी की थी, तभी से इस रणनीति की झलक दिखनी शुरू हो गई थी। भारत मंडपम के उस गाला डिनर का पूरा मेन्यू वसुधैव कुटुंबकम यानी एक धरती, एक परिवार, एक भविष्य की थीम पर सजाया गया था। रागी डोसा, बाजरा खीर, कजू मटर मखाना से लेकर गोलगप्पे और समोसे तक — विदेशी मेहमानों को भारत के मिलेट्स और स्ट्रीट फूड, दोनों का ज़ायका एक साथ चखाया गया। यहीं से भारत ने खाने को महज़ मेहमाननवाज़ी नहीं, बल्कि एक कूटनीतिक हथियार की तरह बरतना शुरू किया। अब बारी मखाने और सत्तू की बिहार के सीएम सम्राट चौधरी ने इसे हर बिहारवासी के लिए गर्व का पल बताया, और बात भी सही है — जो मखाना और सत्तू कभी सिर्फ बिहार के गांव-देहात की रसोई तक सीमित थे, वे अब दुनिया के सबसे बड़े कूटनीतिक मंचों में से एक तक पहुंच चुके हैं। यह बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और परंपरा, दोनों के लिए एक बड़ी वैश्विक पहचान है। मेलोडी टॉफी से लेकर मखाने तक — भारत की गिफ्ट और मेन्यू डिप्लोमेसी में एक साफ पैटर्न नज़र आता है। हल्के-फुल्के निजी तोहफे (टॉफी, ठेकुआ) रिश्तों में अपनापन घोलने के लिए इस्तेमाल होते हैं, जबकि बड़े मंचों के मेन्यू और वेलकम किट (G20, BRICS) पूरे देश की सांस्कृतिक और कृषि विविधता दिखाने का ज़रिया बनते हैं। और इस पूरी कहानी में बिहार बार-बार लौटकर आता है — कभी ठेकुए के रूप में, तो कभी मखाना-सत्तू के रूप में। एक राज्य जिसे अक्सर सिर्फ राजनीतिक सुर्खियों के लिए जाना जाता रहा है, वह अब अपने स्वाद और परंपरा के दम पर दुनिया की सबसे बड़ी कूटनीतिक मेज़ों तक पहुंच चुका है। - संजीव कुमार मिश्र
तो अब शुभेंदु करेंगे गरबा मर्यादा की भी रक्षा?
जिस प्रकार शुद्ध हिंदू उत्सव गरबा में गैर हिंदुओं को शामिल करने की विकृत सेकुलर आवाजें उठने लगीं हैं उनको देखते हुए लगता है कि मुख्यतः गुजरात और महाराष्ट्र में होने वाले गरबा उत्सवों की मर्यादा रक्षा के लिए तेजस्वी हिंदू ध्वज वाहक एवं पश्चिम बंगाल के महानायक मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की सहायता मांगने का समय आ गया है . अब सब हैं कि सेक्युलर तालिबानी आवाजों के विरुद्ध हिंदुओं को चाहिए कि अपना अंगद समान पैर जमाया जाए। बंगाल से सीख ली जाए, जहाँ तेजस्वी वीर हिंदू नायक मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी दुर्गा पूजा को उसकी मूल गरिमा लौटाने का प्रयास कर रहे हैं। उनसे सीखकर गरबा को पतन से बचाया जाए। गरबा शक्ति की उपासना से जुड़ा पारंपरिक हिंदू पूजा-स्वरूप है। यह धनकुबेरों और हिंदू-भावना विहीन भीड़ के लिए मस्ती-मस्ती का कार्निवल नहीं है। इसे भी पढ़ें: Nandigram By-Election 50 हजार से ज्यादा वोटों से जीतेगी BJP, Suvendu Adhikari का बड़ा दावा गरबा कोई सेक्युलर मनोरंजन “मेला” नहीं है। यह माँ अम्बा की भक्ति का हिंदू प्रतीक है। जो माँ दुर्गा की पूजा नहीं करते, जो उनके सामने शीश नहीं झुकाते, उनको गरबा में शामिल होने का कोई अधिकार नहीं। इसका मूल रूप और अर्थ हिंदू ब्रह्मांड-दृष्टि, प्रतीकों और दिव्य स्त्री-शक्ति की साधना से आता है। “गरबा” शब्द संस्कृत शब्द “गर्भ” से निकला है। पारंपरिक रूप में नर्तक एक घेरे में गर्भ दीप—छेदों वाले मिट्टी के घड़े में जलते दीये —या देवी की मूर्ति के चारों ओर नृत्य अभ्यर्थना करते हैं। दीपक जीवन-शक्ति, शरीर के भीतर दिव्य उपस्थिति और देवी की सृजन-शक्ति का प्रतीक है। वृत्ताकार गति हिंदू चिंतन में काल के चक्र—सृष्टि, स्थिति और प्रलय—को दर्शाती है। गरबा शरद नवरात्रि में होता है, अर्थात् दुर्गा के नौ रूपों को समर्पित नौ रातों में। यह पर्व महिषासुर पर दुर्गा की विजय का स्मरण है, जैसा देवी माहात्म्य (मार्कंडेय पुराण) में वर्णित है। भक्त माँ की स्तुति के गीत (गर्बी) गाते हैं, ताली देते हैं और नृत्य को पूजा तथा कृतज्ञता का माध्यम बनाते हैं। पारंपरिक माहौल में स्थान पवित्र माना जाता है: प्रायः नंगे पाँव नाचते हैं, आरती होती है, और केंद्र में दीपक या मूर्ति ही मुख्य रहती है। नवरात्रि व्रत माँ भगवती की भक्ति का चिह्न है। गरबा और डांडिया रास (जहाँ डंडे देवी के आयुधों के प्रतीक हैं) गुजरात में इसी भक्ति की सामाजिक अभिव्यक्ति बने। लोक-नृत्य के रूप में यह शादियों और अन्य अवसरों पर भी होता रहा है, पर इसका सबसे विस्तृत और मुख्य संदर्भ दुर्गा-पूजा का नवरात्रि चक्र ही है। क्योंकि यह रूप देवी और उनके प्रतीकों के इर्द-गिर्द बुना गया है, पारंपरिक हिंदू साधक और संगठन इसे श्रद्धा का कर्म मानते हैं, सेक्युलर-गैरहिंदू मनोरंजन नहीं। जो दुर्गा को दिव्य माता नहीं मानते, मूर्ति-पूजा और धर्मिक विश्वास को अस्वीकार करते हैं, वे इस अनुष्ठान के उद्देश्य से बाहर हैं। गरबा को सिर्फ “फन मेला” कहना उसे उसके धर्मिक अर्थ से काट देता है और पूजा-भक्ति को तमाशा बना देता है। अन्य धर्मों के अनुष्ठानों से तुलना स्वाभाविक है। ईद की नमाज़ इस्लामी मज़हब के अनुसार निर्धारित है। गैर-मुसलमानों से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वे औपचारिक नमाज़ में मजहबी कर्तव्य के रूप में शामिल हों; वह स्थान और स्वरूप उन लोगों का है जो उस आस्था को स्वीकार करते हैं। अनेक परंपराओं में मूल उपासना-कर्म की सीमाएँ ऐसी ही हैं। नवरात्रि में गर्भ दीप या दुर्गा की मूर्ति के चारों ओर होने वाला गरबा उसी श्रेणी का आस्था-विशिष्ट कर्म है, राज्य द्वारा थोपा गया खुला सांस्कृतिक मेला नहीं। आज कई स्थानों पर गरबा अत्यधिक व्यावसायिक हो चुका है और हिंदू-भावना विहीन इवेंट मैनेजरों के हाथों विकृत हो रहा है। समय आ गया है कि अंगद समान हिंदू आस्था और मर्यादा का पैर जमाया जाए। बंगाल से सीख ली जाए, जहाँ तेजस्वी वीर हिंदू नायक मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी दुर्गा पूजा को उसकी मूल गरिमा लौटाने का प्रयास कर रहे हैं। उनसे सीखकर गरबा को पतन से बचाया जाए। यूनेस्को ने 2023 में गरबा को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया। उसमें इसके हिंदू सामाजिक स्वरूप और शक्ति/स्त्री-ऊर्जा के वृत्त को बनाए रखते हुए लोगों को जोड़ने की क्षमता का उल्लेख है। विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों का कहना सही है कि यह देवी-पूजा का रूप है, इसलिए प्रवेश उन्हीं का हो जो इस आस्था को साझा करते हैं। गरबा स्थलों पर प्रवेश नियंत्रण और पहचान जाँच की माँग इसीलिए है। मिश्रित आयोजनों में तनाव, हिंदू लड़कियों को निशाना बनाने, अपमान और उत्पीड़न की घटनाएँ सामने आई हैं। गैर-हिंदुओं द्वारा हिंदू देवताओं का मज़ाक उड़ाने और “गरबा के बहाने हिंदू लड़कियों को छेड़ने” की खबरें भी आती रही हैं। हिंदुओं को समावेशिता का पाठ पढ़ाने की ज़रूरत नहीं। भारत का संविधान हिंदू-बहुल समाज में बना। यह कानून के समक्ष समानता, धर्म की स्वतंत्रता और प्रत्येक समुदाय को अपने धार्मिक कार्यों के प्रबंधन का अधिकार देता है। भारतीय संविधान हिंदू समावेशिता की अभिव्यक्ति है। गरबा सनातन धर्म की मर्यादा से बँधा है। हिंदू अपनी संवेदनाओं के अनुरूप प्रवेश की शर्तें रख सकते हैं। मंदिर, मठ और पारंपरिक संप्रदाय पहले से कुछ अनुष्ठान-स्थानों पर मर्यादा के अनुसार प्रवेश नियंत्रित करते हैं। दुर्गा-पूजा पर आधारित सामुदायिक गरबा पर भी वही तर्क लागू होना चाहिए। अब साधु-संन्यासियों और पारंपरिक हिंदू स्वरों से अपील करनी चाहिए कि वे विशिष्ट हिंदू रूपों की मर्यादा स्पष्ट करें और उसकी रक्षा करें। ये माँगें धार्मिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अनुकूल हैं। शास्त्रीय नवरात्रि रूप में गरबा दुर्गा भगवती—माता और शक्ति के स्वरूप—के प्रति भक्ति का हिंदू अनुष्ठान है। गर्भ-दीप, वृत्ताकार गति, स्तुति-गीत तटस्थ मनोरंजन नहीं हैं। जो यह विश्वास नहीं रखते, वे इसके धार्मिक उद्देश्य से बाहर हैं, जैसे गैर-मुसलमान ईद की औपचारिक नमाज़ की संरचना से बाहर हैं। अनुष्ठान के पारंपरिक स्वरूप की रक्षा का अर्थ यह नहीं कि नृत्य की व्यापक लोकप्रियता से इनकार किया जाए। अर्थ यह है कि पूजा-केंद्रित कर्म अपने आप खुली सेक्युलर पार्टी नहीं बन जाता। जो आयोजक इसे उपासना मानते हैं, उन्हें भागीदारी का ढाँचा उसी के अनुसार रखने का अधिकार है। - तरुण विजय (लेखक पूर्व सांसद और वरिष्ठ पत्रकार हैं)
लखनऊ: 'अपनी जनता पार्टी' का प्रदर्शन, 'एक देश, एक शिक्षा' व्यवस्था लागू करने की मांग
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यूसीसी पर अमित शाह के बयान का सम्मान, यूपी में सबसे पहले करेंगे लागू : अनिल राजभर
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आखिर कृत्रिम बुद्धिमत्ता को लेकर जारी अमेरिकी-चीनी रस्साकसी के बीच क्या करे भारत? समझिए विस्तार से
वैश्विक पटल पर अमेरिका और चीन की प्रतिस्पर्धा देखते ही बनती है। इस बार मुद्दा कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई बनी है, वो भी ब्रिक्स 2026 बैठक के तुरंत बाद जिसका अपना महत्व है। चूंकि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ब्रिक्स देशों को एआई ओपन सोर्स उपलब्ध कराने की घोषणा की थी, इसलिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रतिक्रिया स्वरूप कहा कि एआई की दौड़ में अमेरिका चीन से आगे है? तो सवाल उठना लाज़मी है कि कितना आगे? और क्या चीन अगले कुछ वर्षों में इस दूरी को पाट सकता है? सबसे बड़ा सवाल यह कि इस वैश्विक प्रतिद्वंद्विता में भारत को क्या करना चाहिए? इस सभी बिंदुओं को हम आगे एक एक करके स्पष्ट करेंगे। देखा जाए तो एआई सेक्टर में न केवल अमेरिका और चीन के बीच, बल्कि यूरोप और अन्य देशों के बीच प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है। ऐसे में भारत के सामने चुनौती केवल एआई मॉडल बनाने की नहीं, बल्कि चिप, कंप्यूटिंग, डेटा, प्रतिभा, पूंजी और बाजार—पूरी एआई वैल्यू चैन में मजबूत होने की है। इसे भी पढ़ें: BRICS में Xi Jinping ने रखा 5-सूत्रीय सहयोग प्रस्ताव, Global South की मजबूती पर दिया जोर जहां तक भारत की “AI आत्मनिर्भरता” का सवाल है तो उसे विदेशी एआई यानी अमेरिका, चीन, यूरोप के एआई पटल को बंद करना नहीं चाहिए, बल्कि इन्हें इतना सक्षम बनना चाहिए कि भारत अपनी जरूरतों के लिए एआई बना सके और दुनिया को भी बेच सके। आपको पता होगा कि अमेरिका के नेतृत्व वाले एआई पैक्स सिलिका संगठन में 34 देश शामिल हैं, जिसमें भारत भी एक है। वहीं, चीनी नेतृत्व वाले वर्ल्ड एआई कोआपरेशन ऑर्गेनाइजेशन में 29 देश शामिल हैं। फिर भी ब्रिक्स देशों को चीन ने जो आकर्षक ऑफर दिया है उससे निकट भविष्य में पूरा खेल बदल सकता है। ऐसा इसलिए कि अमेरिकी एआई कंपनियों ने एआई की प्रगति को 'स्लोडाउन' करने का आह्वान किया है। चूंकि अब अमेरिका के भीतर ही एआई की प्रगति को लेकर विरोधाभास सामने आ रहा है और ट्रंप प्रशासन की तरफ से अमेरिकी कंपनियों को एआई प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल में अमेरिकी हितों को प्राथमिकता की बात हो रही है, इसलिए पैक्स सिलिका संगठन के अन्य 33 देशों का दिग्भ्रमित होना स्वाभाविक है। ऐसे में यदि चीन, भारत और यूरोप आपसी समझदारी विकसित करके अमेरिका को मात दे दें तो किसी के लिए भी हैरत की बात नहीं होगी। क्योंकि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ब्रिक्स के मंच से कहा है कि चीन ब्रिक्स के लिए ओपन सोर्स एआई समुदाय बनाने में अग्रणी भूमिका निभाएगा, बड़े भाषा मॉडल के विकास व उपयोग में सहयोग देगा, विशेष प्रशिक्षण आयोजित करेगा, और खुला एआई पारिस्थितिकी तंत्र खड़ा करेगा। खास बात यह कि यह प्रस्ताव उस पृष्ठभूमि में आया है जब चीनी कंपनियां ओपन सोर्स मॉडल पर जोर दे रही हैं, जबकि अमेरिकी दिग्गज कंपनियां अधिक बंद, फ्रंटियर मॉडल पर काम कर रहे हैं। चूंकि भारत इस प्रतिद्वंद्विता को पहचान रहा है, इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स बैठक में चेतावनी देते हुए साफ कहा था कि तकनीक और क्रिटिकल मिनरल्स का हथियार बनाना साझा प्रगति में बाधा बन सकता है। इससे भारत की नीति स्पष्ट है। देखा जाए तो दुनिया में एआई आधारित प्रौद्योगिकी को लेकर जो तगड़ी लामबंदी चल रही है, उसमें अमेरिका ने बेहद उच्च गुणवत्ता वाले चिप्स, सेमीकंडक्टर उपकरण, क्लाउड एक्सेस और कुछ फ्रंटियर मॉडल पर निर्यात नियंत्रण लागू करते हुए इन्हें सिर्फ 'भरोसेमंद साझेदारों' के साथ साझा करने की व्यवस्था करने का ऐलान किया है। कहने का तात्पर्य यह कि शेष देशों में एआई के मामले में अमेरिका या चीन में से किसी एक को ही चुनने का दबाव बनाया है और दोनों को चुनने का रास्ता अमेरिका ने लगभग बंद कर दिया है। चूंकि भारत भी पैक्स सिलिका का सदस्य है और ट्रंप ने खाड़ी देशों को भी चिप्स व निवेश के सौदे से जोड़ा है। उन्होंने अपने एआई स्टैक को निर्यात कूटनीति का हिस्सा बनाया है। इसलिए अमेरिका को रणनीतिक जवाब देते हुए चीन ने रेअर अर्थ मिनरल्स के निर्यात को नियंत्रित कर दुनिया को समझा दिया कि वह प्रौद्योगिकी की दुनिया में कितनी अफरातफरी मचा सकता है। आज चीनी गुट में रूस, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील और पाकिस्तान समेत 29 देश शामिल हैं। आपको याद दिला दें कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि जो एआई जीतेगा, वही जीतेगा इस क्षेत्र में जारी वैश्विक प्रतिद्वंद्विता को दर्शाता है। हालांकि, एआई अब एकतरफा अमेरिकी वर्चस्व की कहानी नहीं रही, बल्कि चीन जैसे दूसरे ध्रुव से मिल रही कड़ी तकनीकी प्रतिस्पर्धा की मिशाल बन चुकी है। यदि सितंबर 2026 की स्थिति को देखें, तो तकनीकी रूप से अमेरिका का पलड़ा अभी भी चीन से भारी है, लेकिन यह अंतर पहले की तुलना में काफी कम हुआ है और अगले कुछ वर्षों में चीन इस दूरी को पाटकर आगे भी निकल सकता है, बशर्ते कि भारत जैसे मजबूत पड़ोसी का साथ उसे मिल जाए। तकनीकी अध्ययन भी जाहिर करते हैं कि एआई अब एकतरफा अमेरिकी वर्चस्व की कहानी नहीं, बल्कि दो ध्रुवों की कड़ी तकनीकी प्रतिस्पर्धा बन चुकी है। इसलिए आइए जानते हैं कि किस क्षेत्र में कौन (अमेरिका या चीन) आगे? खासकर क्षेत्र, उसमें मिली बढ़त और अद्यतन स्थिति के नजरिए से:- एक, फ्रंटियर एआई मॉडल में अमेरिका बढ़त में है। उसका मॉडल अभी समग्र प्रदर्शन में आगे है। दो, एआई चिप्स/जीपीयू में अमेरिका को बढ़त है। Nvidia का बड़ा लाभ उसे मिला है। तीन, एआई कंप्यूट/आंकड़ा केंद्र में अमेरिका को बढ़त है। विशाल पूंजी, जीपीयू और हाइपरस्केल इंफ्रास्ट्रक्चर में वह आगे है। चार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता शोध पारिस्थितिकी तंत्र में अमेरिका को बढ़त है। वह विश्वविद्यालय, बड़ी तकनीक और उद्यम पूंजी का संयोजन करने में आगे बढ़ा है। पांच, वैश्विक कृत्रिम बुद्धिमत्ता पारिस्थितिकी तंत्र में अमेरिका को बढ़त प्राप्त है। उसे सहयोगी देशों, कंपनियों और क्लाउड पारिस्थितिकी तंत्र का लाभ मिला है। छह, सेमीकंडक्टर विनिर्माण या अर्धचालक निर्माण में चीन को कुछ क्षेत्रों में बढ़त प्राप्त है। उसने बड़े पैमाने का विनिर्माण और आपूर्ति श्रृंखला मजबूत किया है। सातवां, ओपन सोर्स/कम लागत वाले मॉडल में चीन मजबूत चुनौती बनकर उभरा है। उसके डीपसीक जैसे मॉडल ने लागत-प्रतिस्पर्धा बदली है। आठवां, एआई मॉडल की स्थापना/औद्योगिक उपयोग में चीन की बड़ी ताकत है। उसके पास विशाल विनिर्माण क्षमता और घरेलू बाजार है। यानी कि आठ क्षेत्रों में पांच में अमेरिका और तीन में चीन को बढ़त प्राप्त है। यदि आप ब्रुकिंग्स के अप्रैल 2026 के आकलन पर गौर करेंगे तो उसके अनुसार चीन के शीर्ष कृत्रिम बुद्धिमत्ता मॉडल अभी अमेरिकी फ्रंटियर मॉडल से कुछ महीने या अधिक पीछे हैं और अमेरिकी मॉडल तार्किक क्षमता, गणित, कुटलेखन (coding) तथा लंबे समय वाले स्वायत्त कार्य या दीर्घकालिक एजेंट-आधारित कार्य में समग्र बढ़त रखते हैं। लेकिन चीन को भी कम आंकना बड़ी गलती होगी। चीन की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह AI को पूरे औद्योगिक तंत्र से जोड़ रहा है—मोबाइल, ईवी, रोबोटिक्स, विनिर्माण, निगरानी या चौकसी, समान का प्रबंधन और सरकारी सेवाओं तक काफी मजबूत है। और चीन ने अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद अपने एआई चिप पारिस्थितिकी तंत्र को तेजी से विकसित किया है। हालांकि अभी अमेरिकी Huawei जैसे चीनी विकल्प या अमेरिकी Nvidia की बराबरी के पैमाने पर चीन नहीं हैं और अमेरिकी HBM जैसी महत्वपूर्ण तकनीकों की कमी चीन के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है। एक महत्वपूर्ण संकेत यह भी है कि अमेरिका और चीन मिलकर वैश्विक कंप्यूट, निवेश और एआई मॉडल के लगभग 90 प्रतिशत पर नियंत्रण रखते हैं। सवाल है कि असली अमेरिकी बढ़त कहाँ है? तो जवाब होगा कि अमेरिका के पास एक ऐसा एआई स्टैक (AI stack) है जिसे चीन के लिए पूरी तरह दोहराना कठिन है। उदाहरण स्वरूप Nvidia/एआई चिप्स, सेमीकंडक्टर डिजाइन, क्लाउड, हाइपरस्केल डेटा सेंटर्स, OpenAI/ Anthropic/Google आदि उद्यम पूंजी और ग्लोबल डेवलेपर्स के अमेरिकी विकल्प चीन के पास उस पैमाने पर उपलब्ध नहीं हैं। यही कारण है कि अमेरिका केवल अच्छे AI मॉडल नहीं बना रहा, बल्कि AI की पूरी वैश्विक आधारभूत संरचनात्मक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव रखता है। यह बात दीगर है कि आज अमेरिका स्पष्ट लेकिन घटती हुई बढ़त पर है और अगले 3–5 साल के दरम्यान ही अमेरिका व चीन का मुकाबला बेहद करीबी हो सकता है। जबकि दीर्घकाल में चीन की विशाल विनिर्माण क्षमता और राज्य-समर्थित निवेश के कारण अमेरिकी बढ़त को स्थायी मानना सुरक्षित नहीं है। इसलिए इसे “अमेरिका बनाम चीन” से ज्यादा अमेरिकी नवोन्मेष, चिप्स और पूंजी बनाम चीनी स्केल, विनिर्माण और राज्य लामबंदी की प्रतिस्पर्धा कहना अधिक सही होगा। जहां तक भारत की बात है तो उसको किसी एक AI ब्लॉक पर पूरी तरह निर्भर होने के बजाय अमेरिका, चीन, यूरोप, जापान, दक्षिण कोरिया और अन्य साझेदारों के साथ तकनीकी साझेदारी बढ़ानी चाहिए, साथ ही अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखनी चाहिए। वहीं, AI को रोजगार-विरोधी नहीं, उत्पादकता क्रांति की मिशाल के तौर पर विकसित करना चाहिए। यह ठीक है कि AI से कुछ नौकरियाँ खत्म होंगी, लेकिन नई नौकरियाँ भी बनेंगी। इसलिए स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय और कार्यबल समूह तक एआई साक्षरता और पुनः कौशल विकास या नया कौशल सीखना को बड़े स्तर पर लागू करना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह किन भारत को केवल “AI का उपभोक्ता” बनने के बजाय “AI का निर्माता और निर्यातक” बनना होगा। इसे एक रणनीतिक सूत्र में ऐसे समझिए: भारत चिप, कंप्यूट, डेटा, प्रतिभा, स्वदेशी मॉडल, स्टार्टअप, सुरक्षित रेगुलेशन और वैश्विक सहयोग को बढ़ाकर AI महाशक्ति बनने की दिशा में कदम बढ़ा सकता है। ऐसा इसलिए कि भारत की विशेष ताकत उसके पास विशाल डिजिटल बाजार, यूपीआई जैसी डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, युवा तकनीकी प्रतिभा और दुनिया का बड़ा बहुभाषी उपभोक्ता आधार है। यदि इन ताकतों को कंप्यूट और गहन तकनीकी अनुसंधान के साथ जोड़ा जाए, तो भारत अमेरिका-चीन की सीधी नकल किए बिना अपना अलग AI मॉडल खड़ा कर सकता है। इस प्रकार भारत तीसरा AI शक्ति-केंद्र बन सकता है बशर्ते कि वह केवल AI का बड़ा बाजार नहीं, बल्कि AI की पूरी वैल्यू चैन का महत्वपूर्ण निर्माता बन जाए। इसके लिए भारत को अमेरिका और चीन से अलग रास्ता अपनाना होगा, क्योंकि भारत की ताकत कम लागत, विशाल बहुभाषी बाजार, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और इंजीनियरिंग प्रतिभा है। जहां तक भारत की सबसे बड़ी संभावित ताकत की बात है तो अंतर्राष्ट्रीय तकनीकी विशेषज्ञ भी मानते हैं कि।अमेरिका के पास नवोन्मेष और पूंजी है, चीन के पास स्केल और विनिर्माण है, जानकी भारत अपनी प्रतिभा, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, बहुभाषी आंकड़ा, न्यूनतम लागत वाला नवोन्मेष और बृहत बाजार को जोड़कर अपना मॉडल बना सकता है। इसलिए भारत, अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक संतुलन साधते हुए खुद को किसी एक कैंप का तकनीकी उपग्रह नहीं बनना चाहिए, बल्कि अमेरिका से एडवांस चिप्स/अनुसंधान, जापान-कॉरिया से सेमी कंडक्टर सहयोग, यूरोप से जिम्मेदार एआई मानक और अन्य देशों से डेटासेट्स/मार्केट्स के मद्देनजर सबके साथ साझेदारी करनी चाहिए। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
डूबने वाला है ब्रिटेन का सूरज, होंगे 4 टुकड़े! UK अगर टूटता है तो इसका भारत पर क्या असर होगा?
क्या जिन अंग्रजों ने हम पर 200 साल राज किया उनका अपना देश अब टूट रहा है? ये सवाल इसलिए क्योंकि 14 सितंबर को वेल्स की राजधानी कैरेटिफ के एक होटल में यूनाइटेड किंगडम के चार देशों में से तीन के मुखिया एक मेज पर बैठते हैं और फिर ये तीनों एक कागज पर हस्ताक्षर करते हैं। जिसमें वो कहते हैं कि अपना भविष्य वो खुद तय करना चाहते हैं। ब्रिटेन कभी ये शब्द ही ताकत का दूसरा नाम हुआ करता था। वो साम्राज्य जिसके बारे में कहा जाता था कि इसका सूरज कभी नहीं डूबता। लेकिन आज ब्रिटेन महज एक दशक में सात प्रधानमंत्री को देख चुका है। लिज ट्रस सिर्फ 45 दिन टिकीं, बोरिस जॉनसन अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए, ऋषि सुनक दो साल से कम पद पर रहे और अबकी बार भी दो साल तक पूरे नहीं कर पाए। ऐसे अस्थिर दौर में देश की अर्थव्यवस्था डांवाडोल है। अमीर लोग देश छोड़ कर जा रहे हैं। सड़कों पर हिंसा आम हो चली है और लोग पूछ रहे हैं कि ये ब्रिटेन को क्या हो गया है? दरसअल, जिस इंग्लैंड को आप एक देश समझते हैं वो यूनाइटेड किंगडम के चार टुकड़ों (इंग्लैंड, वेल्स, स्कॉटलैंड, नॉर्दन आइलैंड) में से एक टुकड़ा है। ऐसे में सवाल ये है कि बाकी तीन टुकड़े यूके से क्यों अलग होना चाहते हैं? एक और दिलचस्प बात आपको बता दें कि दरअसल, आप अक्सर यूनाइटेड किंगडम के झंडे के प्रिंट वाला टी-शर्ट या बैग इस्तेमाल करते होंगे वो तीन झंडों को सिलकर बना है, लेकिन इसमें वेल्स है ही नहीं। फुटबॉल के मैदान पर चारों की टीम अलग-अलग खेलती है। लेकिन पासपोर्ट सभी का एक है। 2014 में स्कॉटलैंड ने अपनी जनता से वोट करवाया था, तब 100 में से 55% लोगों ने कहा कि हम यूनाइटेड किंगडम के साथ रहेंगे। 2022 में यूके की सबसे बड़ी अदालत ने कह दिया कि दोबारा वोट करवाना है तो बगैर लंदन की इजाजत के बगैर नहीं होगा। वेल्स के मुखिया ने भले ही आजादी के कागज पर दस्तगत किए। लेकिन उनके अपने लोगों में 100 में से सिर्फ 26% लोग अजादी चाहते हैं। यूके का सबसे बड़ा स्टील कारखाना खुद वेल्स में है। सवाल ये है कि ये चार देश एक कैसे हैं, एक हैं तो अलग कैसे होंगे। इनकी चाबी जब लंदन के पास है तो ये तीनों कागज लिखकर किसे दिखाना चाह रहे हैं। इसके साथ ही सबसे अहम और हमारे मतलब का सवाल कि यूनाइटेड किंगडम अगर टूटता है तो इसका भारत पर क्या असर होगा? इसे भी पढ़ें: ब्रिटेन जाने वालों की होश उड़ा देगी ये खबर! भारत भी चौंका ब्रिटेन के पतन की कहानी 19वीं सदी ब्रिटेन की सदी थी। उस वक्त दुनिया की 25 फीसदी जमीन उसके कब्जे में थी। दुनिया की 20 फीसदी आबादी उसके अधीन थी। ब्रिटिश पाउंड दुनिया की रिजर्व करेंसी था, वैसे ही जैसे आज अमेरिकी डॉलर है। उस ब्रिटेन ने दुनिया को बहुत कुछ दिया। इंडस्ट्रियल रेवोल्यूशन वहीं से शुरू हुआ। भाप के इंजन, रेलवे, वैश्विक व्यापार। ब्रिटेन ने दुनिया को आधुनिकता सिखाई, लेकिन यहां यह जिक्र भी जरूरी है कि यह साम्राज्य खून और शोषण पर खड़ा था। वह सूरज जो कभी नहीं डूबता था, भारत, अफ्रीका और कैरेबियन के लाखों लोगों के खून पसीने की कीमत पर चमकता था। पतन की कहानी समझने के लिए उदय की असलियत का पता होना चाहिए। वैसे तो दूसरे विश्वयुद्ध ने जाहिर कर दिया था कि ब्रिटेन अब कमजोर हो रहा है और अमेरिका नई ताकत बनकर उभर रहा था, लेकिन उसकी ताकत को पहला बड़ा झटका लगा। 1956 में मिस्र ने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया। ब्रिटेन और फ्रांस ने सैन्य कार्रवाई की, लेकिन अमेरिका ने कहा, रुको और ब्रिटेन रुक गया। जीसी पेन जैसे कई इतिहासकारों ने माना है कि स्वेज संकट ने ब्रिटेन के एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में पतन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पीएम का बयान और मच गया हंगामा 14 सितंबर 2026 को स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड के नेता कार्डिफ शहर में इकट्ठा हुए हैं। उन्होंने मिलकर एक एमओयू पर साइन भी किए हैं। जो इन तीनों यानी स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड की ब्रिटेन से आजादी का समर्थन करता है। एमओयू में लिखा गया है कि इन तीनों को आत्मनिर्णय का अधिकार है और जरूरत पड़ने पर वह अपने-अपने यहां जनमत संग्रह भी करवा सकते हैं। स्कॉटलैंड तो 2014 में एक रेफरेंडम करवा भी चुका है और उत्तरी आयरलैंड 1998 के गुड फ्राइडे एग्रीमेंट की वजह से ब्रिटेन के साथ बना हुआ है। वेल्स में भी 1990 के दशक में आजादी को लेकर प्रोटेस्ट हो चुके हैं। हालिया बवाल जो मचा है वह ब्रिटिश प्राइम मिनिस्टर एंडडी बर्नहम की एक टिप्पणी की वजह से शुरू हुआ था। 9 सितंबर को वह हाउस ऑफ कॉमंस में बोल रहे थे। एसएपी के क्रिस लॉ ने उनसे स्कॉटलैंड के जनमत संग्रह पर सवाल कर लिया। इसके जवाब में बर्नहम ने कहा कि स्कॉटलैंड के मामले में भी वही स्थिति लागू होती है, वही नियम लागू होते हैं जो नॉर्दन आइलैंड के मामले में होते हैं। यानी अगर जनता के बीच बहुत स्पष्ट बहुमत को लेकर समर्थन है तो जनमत संग्रह के सवाल पर विचार किया जा सकता है। प्रधानमंत्री की इस टिप्पणी के बाद स्कॉटलैंड के फर्स्ट मिनिस्टर जॉन शिवनी ने तो यह तक कह दिया कि एंडडी बर्नहम यूनाइटेड किंगडम के आखिरी प्रधानमंत्री होंगे। उनके बाद ब्रिटेन बट जाएगा। ट्रंप ने डाला आग में घी ट्रंप 12 सितंबर को डबलिन पहुंचे थे। वहां उन्होंने कह दिया कि वो एक यूनाइटेड आयरलैंड देखना पसंद करेंगे। नॉर्दर्न आयरलैंड का रिपब्लिक ऑफ आयरलैंड के साथ जुड़ना एक अच्छी बात होगी। फैंटास्टिक चीज होगी। उन्होंने ऐसा बोला। ब्रिटेन के खिलाफ ट्रंप अपने नए कार्यकाल की शुरुआत से ही एकदम लगे हुए हैं। पहले वह अपने दोस्त एलन मस्क के साथ मिलकर पूर्व प्रधानमंत्री की स्टारमर को ट्रोल किया करते थे और अब वो बर्नहम को ट्रोल कर रहे हैं। वैसे ट्रंप की यूनाइटेड आयरलैंड वाली टिप्पणी के पीछे एक पॉलिटिकल स्ट्रेटजी भी हो सकती है। नवंबर महीने में अमेरिका में मिड टर्म इलेक्शन है जिसमें ट्रंप हारते नजर आ रहे हैं। अमेरिका में 3 करोड़ से ज्यादा आयरिश मूल के लोग रहते हैं। हो सकता है कि इसी वोट बैंक को रिझाने के लिए ट्रंप ऐसी टिप्पणी कर रहे हो। 1998 में भी जब बिल क्लिंटन ने आयरलैंड और ब्रिटेन के बीच गुड फ्राइडे एग्रीमेंट करवाया था। तब भी आयरिश वोटर्स ने डेमोक्रेट्स को खूब वोट दिया था। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में उनकी पांच सीट ज्यादा आई थी उस साल। हो सकता है कि ट्रंप भी उसी तरह का कोई तीर मारने की कोशिश कर रहे हो। इसे भी पढ़ें: The Partition of Britain | दुनिया पर राज करने वाले ब्रिटेन का अंत करीब? बगावत की आग में झुलसा वेस्टमिंस्टर, तीन देशों ने दागा आजादी का पैगाम! 14 सितंबर को क्या हुआ 14 सितंबर 2026 को स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड के नेता कार्डिफ शहर में इकट्ठा हुए हैं। उन्होंने मिलकर एक एमओयू पर साइन भी किए हैं। जो इन तीनों यानी स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड की ब्रिटेन से आजादी का समर्थन करता है। एमओयू में लिखा गया है कि इन तीनों को आत्मनिर्णय का अधिकार है और जरूरत पड़ने पर वह अपने-अपने यहां जनमत संग्रह भी करवा सकते हैं। क्या है तीनों नेताओं का मकसद जॉनस्विनी (स्कॉटलैंड): स्कॉटलैंडकोआजाददेशबनानावईयूकीसदस्यतालेना इनका लक्ष्य है।इसके पीछे ये तर्क दिया जा रहा है कि अर्थव्यवस्था,टैक्स,ऊर्जावअन्यफैसलेदेशमेंहीहों।शिकायतःब्रिटेननेईयूछोड़ा,जबकि62%स्कॉटलैंडवासीसाथरहनाचाहतेथे। स्कॉटलैंडकेतेल,गैस,समुद्रीइलाकेकालाभब्रिटेनकोमिलरहा। रुनएपइओरवर्थ (वेल्स):स्वतंत्रवेल्सको बनान लक्ष्य है। तर्क है कि वेल्स कोब्रिटेनसेउचितफंडनहींमिलता।प्राकृतिकसंसाधनोंवनीतियोंपरनियंत्रणनहींहै।तपुलिस,न्यायव्यवस्थाऔरवित्तीयअधिकारवेल्सकोसौंपेजाएं।आजादीकोवेल्सकीसंवैधानिकयात्राकाअंतिमपड़ावबतारहेइओरवर्थ। मिशेल ओ'नील (नॉर्दन आयरलैंड) उत्तरी आयरलैंड व आयरलैंड गणराज्य को मिलाकर एक देश बनाना। द्वीप के लोगों को संवैधानिक भविष्य तय करने दिया जाए। 1998 की डील रेफरेंडम में एकीकरण की अनुमति। चारों हिस्सों की अपनी-अपनी पहचान यूके के नक्शे को देखेंगे तो आपको इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दन आयरलैंड दिख रहे होंगे। इन चारों से मिलकर बनता है यूनाइटेड किंगडम जिसका पूरा नाम है यूनाइटेड किंगडम ऑफ ग्रेट ब्रिटेन एंड नॉर्दन आयरलैंड। अब चारों हिस्सों की अपनी-अपनी पहचान भी है। इंग्लैंड की राजधानी लंदन है। स्कॉटलैंड की राजधानी है एडिन्रा। वेल्स की राजधानी है कार्टिफ जहां पे आज ये मीटिंग हुई है। और नॉर्दन आयरलैंड की राजधानी है बेलफास्ट। यह सब कहलाते तो ब्रिटेन का हिस्सा ही हैं। लेकिन विदेश नीति इन तीनों की,डिफेंस के जो मामले हैं वो यूनाइटेड किंगडम से चलाए जाते हैं। इसलिए इन तीनों इलाकों में जो प्रतिनिधि चुने जाते हैं, उन्हें कहा जाता है फर्स्ट मिनिस्टर। भारत की चीफ मिनिस्टर की तरह आप इन्हें समझ सकते हैं। लेकिन उनकी भूमिका एक स्टेट से बढ़कर होती है। अब स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दन आयरलैंड के पास अपनी-अपनी विधानसभा है और कुछ-कुछ अलग-अलग अधिकार हैं। इंग्लैंड में इस तरह की कोई अलग से संसद या विधानसभा नहीं है। इंग्लैंड से जो जुड़े मामले हैं वो यूनाइटेड किंगडम की संसद के कानून से ही बनाए जाते हैं। वहीं से मंजूर होते हैं। ये तीनों इलाके ब्रिटेन का हिस्सा कैसे बने हैं? वेल्स ब्रिटेन के पश्चिम में है। पहाड़ों वाला इलाका है। 10वीं शताब्दी में जब विलियम द कॉनकरर ने इंग्लैंड पर कब्जा किया। उसके बाद इंग्लैंड के शासकों की नजर थी। वो वेल्स पर बन गई थी। वेल्स में उस समय कई छोटे-छोटे राज्य और राजघराने थे। इंग्लैंड के राजा पूरे वेल्स पर एक साथ कब्जा नहीं कर पाए। लेकिन उन्होंने वेल्स की सीमा पर बहुत सारे किले बना लिए और किलों के जरिए वहां पर वो देखरेख करने लगे और धीरे-धीरे अपना प्रभाव बढ़ाने लगे। पर 1280 के दशक में इंग्लैंड के राजा एडवर्ड फर्स्ट ने वेल्स के खिलाफ मिलिट्री कैंपेन शुरू किया। उनकी सेना ने वेल्स के अहम इलाकों पर कब्जा किया और कई विशाल किले बनवाए। कैनफोन, कॉनवी और हारले जैसे किले जो बहुत फेमस किले हैं वह उसी दौर के बनाए गए थे। लेकिन 16वीं सदी में इंग्लैंड के राजा हेनरी ए्थ के समय दो ऐसे कानून पास हुए जिसकी वजह से आज ये पूरी स्थिति बनी। जिन्हें कहते हैं एक्ट्स ऑफ यूनियन। इन कानूनों का मकसद वेल्स और इंग्लैंड के बीच मौजूदा जो उस समय जो मौजूदा कानूनी दीवारें थी उसको हटाना था और उन्हीं के बदौलत वेल्स को इंग्लैंड की राजनीतिक व्यवस्था में शामिल किया गया। इसी कानून के बाद वेल्स ब्रिटेन का हिस्सा बना। इसे भी पढ़ें: Essar की EET Retail ब्रिटेन में SGN Retail का 40 करोड़ पाउंड में करेगी अधिग्रहण स्कॉटलैंड ब्रिटेन के उत्तरी हिस्से में पड़ता है। कई सदियों तक स्कॉटलैंड एक अलग देश हुआ करता था। उसका अपना राजा था। अलग कानूनी व्यवस्था थी। दक्षिण में इंग्लैंड था और दोनों देशों के बीच में सीमा को लेकर संघर्ष चलता चलता रहता था। इंग्लैंड ने स्कॉटलैंड को कब्जाने की पहली बड़ी कोशिश की थी। 1296 में। इंग्लैंड के राजा एडवर्ड फर्स्ट ने स्कॉटलैंड पर हमला किया और वहां के राजा जॉन बेलील को हटा दिया। अंग्रेजी सेना ने स्कॉटलैंड के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया। लेकिन यह नियंत्रण ज्यादा समय तक नहीं चल सका। स्कॉटलैंड में विद्रोह हुआ। विलियम वालेस और बाद में रॉबर्ट द ब्रूस ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ लड़ाई लड़ी। 1314 में बन कबर्न की लड़ाई में रॉबर्ट द ब्रूस ने अंग्रेजी सेना को हरा दिया। और 1328 में इंग्लैंड ने स्कॉटलैंड की आजादी को मान्यता दे दी। करीब 400 साल तक स्कॉटलैंड आजाद रहा। लेकिन 1707 में बड़ा बदलाव हुआ। उस समय स्कॉटलैंड आर्थिक मुश्किलों से गुजर रहा था और इंग्लैंड के साथ व्यापार और राजनीतिक संबंधों को लेकर भी वहां पे तनाव था दोनों के बीच। इंग्लैंड ने उस समय ऑफर दिया कि आप हमारे साथ आ जाइए। इंग्लैंड में अपना विलय कर लीजिए। अपना कानून अलग रखिएगा लेकिन देश एक होगा। इसी को लेकर 1706 में दोनों देशों के बीच एक संधि हो गई और स्कॉटलैंड इंग्लैंड की मातहत आ गया। स्कॉटलैंड की अलग संसद खत्म हो गई और उसके जो सांसद थे वो नई ब्रिटिश संसद में शामिल हो गए। 20वीं सदी में फिर से यह मांग उठी कि स्कॉटलैंड के घरेलू मामलों पर फैसले लेने के लिए उसके पास भी अधिकार होने चाहिए। इसका होता है कि 1997 में 1997 में एक जनमत संग्रह होता है। करीब 74 74% लोगों ने इसके पक्ष में वोट दिया। इसके बाद 1999 में स्कॉटलैंड पार्लियामेंट दोबारा अस्तित्व में आई। इसे डेवोल्यूशन कहा गया। नॉर्दन आयरलैंड 1801 से ही आयरलैंड ग्रेट ब्रिटेन का हिस्सा बन गया था। लेकिन वहां आजादी की मुहिम वेल्स और स्कॉटलैंड के मुकाबले काफी तेज थी। 1916 में डबलिन में ईस्टर राइजिंग हुआ। आरिश रिपब्लिकन आंदोलन के नेताओं ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह किया और आइलैंड को एक आजाद मुल्क घोषित करने की कोशिश की। विद्रोह कुछ ही दिनों में दबा दिया गया। लेकिन ब्रिटिश सरकार द्वारा इसके नेताओं को फांसी दी गई और उससे क्या हुआ कि आरिश जनता भड़क गई और एक नेशनलिस्ट मूवमेंट वहां पर तेज हो गया। इसके बाद सिंफेन पार्टी तेजी से उभरी। 1918 के चुनाव में उसने आयरलैंड में बड़ी जीत हासिल की। उसके सांसदों ने लंदन की ब्रिटिश सांसद में जाने के बजाय डबलिन में ही अपनी अलग संसद बनाने का फैसला किया जिसे डॉयल आयरन कहा गया और स्वतंत्र आई स्टेट की मांग को आगे बढ़ाया गया। इसके बाद 1919 से 1921 तक आयरलैंड की आजादी के लिए लड़ाई चलती रही। आयरलैंड के उत्तर में छह काउंटियां यूनाइटेड किंगडम में ही रही। यही इलाका बाद में नॉर्दर्न आयरलैंड कहलाया। वो इसलिए क्योंकि नॉर्दन आइलैंड में खासकर अलस्टर नाम के इलाके की कुछ हिस्सों में जो थी वो प्रोटेस्टेंट्स क्रिश्चियंस की आबादी वहां पे ज्यादा थी और वो ब्रिटेन के साथ रहना चाहते थे। दूसरी तरफ कैथोलिक राष्ट्रवादी समूह जो थे जिसके कई लोग पूरे आयरलैंड को एक देश के रूप में देखना चाहते थे। इसलिए जब आयरलैंड का विभाजन हुआ तो नॉर्दन आयरलैंड यूनाइटेड किंगडम में बना रहा। ब्रिटेन के बंटने का भारत पर असर ब्रिटेन UNSC का स्थायी सदस्य (P5) है। विभाजन के बाद ब्रिटेन की वैश्विक हैसियत और भू-राजनीतिक प्रभाव में भारी गिरावट आएगी। इससे UNSC में स्थायी सीट के लिए भारत की दावेदारी को नैतिक और रणनीतिक बल मिलेगा, क्योंकि सिकुड़ता हुआ ब्रिटेन अपनी पुरानी ताकत खो चुका होगा। भारत को सिर्फ लंदन (वेस्टमिंस्टर) से रिश्ते संभालने के बजाय एडिनबर्ग (स्कॉटलैंड), डबलिन (आयरलैंड) और कार्डिफ (वेल्स) के साथ अलग-अलग स्वतंत्र द्विपक्षीय रिश्ते और दूतावास स्थापित करने होंगे। भारत हमेशा से संप्रभु राष्ट्रों की क्षेत्रीय अखंडता का समर्थक रहा है। किसी स्थापित लोकतंत्र के टूटने से वैश्विक स्तर पर अलगाववादी ताकतों को शह मिल सकती है, जिसे लेकर नई दिल्ली बेहद सतर्क रहेगी। ब्रिटेन अपने आंतरिक विवादों और पुनर्गठन में इस कदर उलझ जाएगा कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसकी मौजूदगी सीमित हो जाएगी। भारत को सुरक्षा और रक्षा तकनीक (जेट इंजन, नौसैनिक उपकरण) के मामले में फ्रांस, अमेरिका या खुद की घरेलू क्षमताओं पर अधिक निर्भर रहना पड़ेगा। भारतीय छात्रों और कामगारों के लिए नियम बदल सकते हैं। यदि स्कॉटलैंड स्वतंत्र होकर ईयू की नीतियों की ओर बढ़ता है, तो वहां भारतीय छात्रों के लिए वर्क वीजा या आव्रजन के नियम लंदन के कड़े नियमों से ज्यादा उदार हो सकते हैं। यूके में रहने वाले लाखों भारतीय मूल के लोग मुख्य रूप से इंग्लैंड में केंद्रित हैं। विभाजन के बाद उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी और प्रभाव पर भी नया समीकरण बनेगा। कुल मिलाकर कहे तो ब्रिटेन के टूटने से लंदन की वैश्विक सौदेबाजी की ताकत कमजोर होगी। भारत के लिए यह स्थिति एक तरफ नए व्यापारिक और कूटनीतिक दरवाजे खोलेगी, वहीं दूसरी तरफ सुरक्षा परिषद में सुधार की भारतीय मांग को एक ठोस आधार प्रदान करेगी।
चेन्नई, 15 सितंबर (आईएएनएस)। रजिस्टर्ड जन्मों में लगातार कमी और तेजी से बूढ़ी होती आबादी को देखते हुए, तमिलनाडु सरकार ने अपने परिवार कल्याण कार्यक्रम में बांझपन के इलाज को शामिल करने के लिए कदम उठाए हैं। ऐसा करने वाला वह देश का पहला राज्य बन गया है।
विमल इलायची को दिल्ली हाईकोर्ट से बड़ा झटका: महाराष्ट्र एफडीए (FDA) के नोटिस के खिलाफ याचिका खारिज
दिल्ली उच्च न्यायालय ने विमल इलायची से जुड़ी कंपनी पीबी एग्रो द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें विमल पान मसाला के कथित छद्म विज्ञापन को लेकर महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) द्वारा बॉलीवुड अभिनेताओं शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को जारी किए गए कारण बताओ नोटिस को चुनौती दी गई थी।
“Naxal Era Was Better” | Balaghat Journalist’s Shocking Remark | ‘Conspiracy’ Evidence Against Dipke
Rajasthan Nikay Chunav 2026: चुनाव में BJP का फीका प्रदर्शन, Independents बने असली किंगमेकर!
नई दिल्ली, 15 सितंबर (आईएएनएस)। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला और केंद्रीय मंत्रियों ने राष्ट्रीय इंजीनियर्स (अभियंता) दिवस पर बधाई दी है। इसके साथ ही भारत रत्न डॉ. मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की जयंती पर उनको याद करते हुए नमन किया है।
आरएसएस के पांचवें सरसंघचालक के. एस. सुदर्शन की पुण्यतिथि पर नेताओं ने दी श्रद्धांजलि
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कांग्रेस में बड़े फेरबदल की तैयारी, 130 के इंटरव्यू, क्या राहुल इस बार अपनी टीम बना पायेंगे
कांग्रेस संगठन में बड़े बदलाव की तैयारी है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने करीब 130 नेताओं का इंटरव्यू लिया। AICC सचिवों की समीक्षा के बाद कई नेताओं की जिम्मेदारियां बदल सकती हैं। कहा जा रहा है राहुल गांधी को अब अपनी टीम बनाने का मौका मिल रहा है।
69वें राष्ट्रमंडल संसदीय सम्मेलन के लिए भारतीय प्रतिनिधिमंडल केप टाउन पहुंचा
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डीएससी घोटाले को लेकर जगन ने चंद्रबाबू पर एक और हमला बोला
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राजस्थान निकाय चुनाव के नतीजे भाजपा के विस्तार का संकेत: सुधांशु त्रिवेदी
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BRICS में भारत की शानदार कूटनीतिक सफलता ने 'Brand Modi' को और मजबूत कर दिया है
दिल्ली में हुई ब्रिक्स शिखर बैठक को अगर केवल एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन मानकर देखा जाएगा तो उसकी असली राजनीतिक अहमियत समझ में नहीं आएगी। देखा जाये तो यह बैठक ऐसे समय में हुई, जब दुनिया कई मोर्चों पर तनाव, युद्ध, अविश्वास और बदलते शक्ति-संतुलन से गुजर रही है। ऐसे माहौल में भारत ने जिस तरह अलग-अलग ध्रुवों के देशों को एक मंच पर बैठाया, संवाद के रास्ते खोले और मतभेदों के बावजूद सहयोग की जमीन तैयार की, वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति के लिए एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि के तौर पर सामने आई है। ब्रिक्स की इस बैठक की सबसे बड़ी सफलता यही रही कि भारत ने उन देशों के बीच भी संवाद की संभावना पैदा की, जिनके बीच गहरे मतभेद हैं। ईरान और खाड़ी के देशों के बीच बातचीत इसका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण है। पश्चिम एशिया लंबे समय से टकराव, अविश्वास और संघर्ष का मैदान बना हुआ है। ऐसे समय में दिल्ली का मंच बातचीत के लिए उपलब्ध होना अपने आप में भारत की बढ़ती स्वीकार्यता का संकेत है। प्रधानमंत्री मोदी ने यह दिखाया कि भारत किसी एक खेमे का हिस्सा बनकर नहीं, बल्कि अलग-अलग पक्षों से संवाद करते हुए अपने लिए स्वतंत्र कूटनीतिक स्थान बना सकता है। इसे भी पढ़ें: 'कमजोर' पटरी पर तेजी से दौड़ने का प्रयास कर रही भारत-चीन 'दोस्ती' की रेल कहीं डिरेल ना हो जाए! भारत और चीन के बीच हुई बातचीत भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। सीमा विवाद और लंबे समय से चले आ रहे तनाव के बावजूद दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व का आमने-सामने बैठना इस बात का प्रमाण है कि भारत अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं से समझौता किए बिना संवाद के दरवाजे बंद नहीं करता। यही वह बिंदु है जहां मोदी की कूटनीति की ताकत दिखाई देती है। अमेरिका से संबंध भी कायम हैं, रूस के साथ रिश्ते भी बने हुए हैं, चीन से संवाद भी हो रहा है और पश्चिम एशिया के अलग-अलग देशों के साथ भारत की स्वीकार्यता लगातार बढ़ रही है। यानी भारत किसी एक शक्ति के पीछे चलने के बजाय अपनी शर्तों पर संबंधों का संतुलन साध रहा है। यही सफलता उस राजनीतिक नैरेटिव को भी कमजोर करती है, जिसमें बार-बार यह सवाल उठाया जाता रहा कि अगर पड़ोसी देश पाकिस्तान ने मक्का समझौता कर लिया, दूसरे देशों के साथ अपने समीकरण बना लिए और क्षेत्रीय स्तर पर भारत के खिलाफ गतिविधियां बढ़ीं तो क्या भारत की विदेश नीति असफल हो गई? विदेश नीति को केवल पड़ोस की तत्काल घटनाओं से मापना वास्तविक तस्वीर को छोटा कर देना है। असली सवाल यह है कि दुनिया की बड़ी शक्तियां भारत को किस नजर से देख रही हैं और संकट के समय कितने देश भारत के साथ बातचीत के लिए तैयार हैं। दिल्ली की बैठक ने इस सवाल का जवाब काफी हद तक दे दिया है। यहां प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिगत कूटनीतिक छवि भी महत्वपूर्ण हो जाती है। नरेंद्र मोदी, व्लादिमीर पुतिन और शी चिनफिंग की तस्वीरें जिस तरह वैश्विक स्तर पर चर्चा में आई हैं, उनका राजनीतिक संदेश तस्वीर से कहीं बड़ा है। यह तस्वीर बताती है कि भारत का नेतृत्व एक साथ दुनिया की अलग-अलग शक्तियों के साथ संवाद करने की स्थिति में है। पश्चिमी देशों के लिए भी यह संदेश महत्वपूर्ण है कि भारत को नजरअंदाज करके वैश्विक राजनीति की कोई बड़ी रणनीति पूरी नहीं हो सकती। इसका घरेलू राजनीतिक असर भी कम नहीं होगा। भाजपा लंबे समय से प्रधानमंत्री मोदी की मजबूत वैश्विक छवि को अपनी राजनीतिक पूंजी के रूप में इस्तेमाल करती रही है। ब्रिक्स की दिल्ली बैठक उस पूंजी को और मजबूत करने का अवसर देती है। विपक्ष यदि यह कहता है कि सरकार की विदेश नीति कमजोर पड़ गई है, तो भाजपा के पास दिल्ली में जुटे वैश्विक नेताओं, भारत की मध्यस्थ भूमिका और अलग-अलग शक्ति केंद्रों के साथ संवाद को सामने रखने का मजबूत राजनीतिक आधार तैयार हो गया है। सबसे बड़ी बात यह है कि दिल्ली में मिली यह कूटनीतिक सफलता केवल एक शिखर सम्मेलन की सफलता बनकर नहीं रहने वाली। इसका सीधा और दीर्घकालिक लाभ भारत की सामरिक स्थिति को मिल सकता है। रूस, चीन, अमेरिका, यूरोप, ईरान और खाड़ी देशों जैसे अलग-अलग शक्ति केंद्रों के साथ एक साथ संवाद कायम रखने की मोदी की क्षमता ने यह संदेश दिया है कि भारत किसी दबाव या धड़े की राजनीति में बंधा हुआ नहीं है, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर दुनिया की बड़ी शक्तियों के साथ संबंध तय करने की स्थिति में है। इसका असर आने वाले समय में व्यापार, निवेश, ऊर्जा सुरक्षा, सामरिक सहयोग और भारत की वैश्विक हैसियत, हर मोर्चे पर दिखाई दे सकता है। साथ ही इस सफलता का एक घरेलू राजनीतिक पहलू भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आगामी पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा इस उपलब्धि को प्रधानमंत्री मोदी के मजबूत नेतृत्व और भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा के प्रमाण के रूप में जनता के सामने रख सकती है। विपक्ष यदि विदेश नीति को लेकर सरकार पर सवाल उठाता है, तो भाजपा के पास दिल्ली में एक साथ जुटे विश्व के बड़े नेताओं और मोदी की सक्रिय कूटनीतिक भूमिका को सामने रखने का अवसर होगा। यानी ब्रिक्स की सफलता सिर्फ दिल्ली की कूटनीतिक मेज पर मोदी की जीत नहीं है; यह आने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा के लिए एक बड़ा राजनीतिक हथियार और मोदी की नेतृत्व छवि को और मजबूत करने वाली उपलब्धि भी बन सकती है। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की सफलता ने घरेलू राजनीति में ब्रांड मोदी को और मजबूत कर दिया है। -नीरज कुमार दुबे
'कमजोर' पटरी पर तेजी से दौड़ने का प्रयास कर रही भारत-चीन 'दोस्ती' की रेल कहीं डिरेल ना हो जाए!
भारत और चीन के रिश्तों में दिल्ली में जो नई गर्माहट दिखाई दे रही है, उसे केवल कूटनीतिक शिष्टाचार या दो नेताओं की मुस्कान की तस्वीरों से समझना बड़ी भूल होगी। असली कहानी इससे कहीं ज्यादा कठोर है। सात साल बाद भारत आए शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात ने यह साफ कर दिया है कि गलवान के बाद दोनों देशों ने टकराव को खत्म नहीं किया है, लेकिन अब वे उसे नियंत्रित करने और अपने-अपने हितों के लिए रिश्ते को फिर से व्यवस्थित करने की दिशा में बढ़ रहे हैं। मोदी का भाषण रोक कर शी से पूछना— “Is it okay?”, एक मानवीय कूटनीतिक क्षण था, लेकिन उसके पीछे की रणनीति कहीं अधिक गंभीर है। दिल्ली में मोदी-शी बातचीत का सबसे महत्वपूर्ण वाक्य था— “Differences should not become disputes.” मोदी ने साफ किया कि सीमा पर शांति और स्थिरता ही संबंधों के आगे बढ़ने की बुनियादी शर्त है। दोनों देशों ने सीमा विवाद के न्यायसंगत और पारस्परिक रूप से स्वीकार्य समाधान की प्रतिबद्धता दोहराई, साथ ही पुराने समझौतों का पालन करने पर जोर दिया। व्यापार, निवेश, सप्लाई चेन, बाजार तक भरोसेमंद पहुंच और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने पर भी चर्चा हुई। यानी बातचीत अब केवल सीमा पर सैनिकों की दूरी घटाने तक सीमित नहीं है; दोनों देश रिश्तों का पूरा ढांचा दोबारा खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन यहां सबसे जरूरी सवाल है कि चीन अचानक भारत की तरफ क्यों देख रहा है? देखा जाये तो जवाब चीन की इच्छा से ज्यादा बदलती वैश्विक परिस्थितियों में छिपा है। अमेरिका की बढ़ती संरक्षणवादी व्यापार नीति, टैरिफ का दबाव, पश्चिम और चीन के बीच तकनीकी संघर्ष तथा वैश्विक सप्लाई चेन का पुनर्गठन बीजिंग के लिए गंभीर चुनौती हैं। ऐसे समय में भारत को लंबे समय तक केवल रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानकर चलना चीन के लिए महंगा पड़ सकता है। भारत दुनिया का विशाल बाजार है, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है और ग्लोबल साउथ में उसका राजनीतिक प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। यही वजह है कि चीन भारत के साथ संबंधों को “रणनीतिक और दीर्घकालिक” नजरिए से देखने की बात कर रहा है। चीनी पक्ष ने खुद कहा है कि दोनों देश एक-दूसरे की ताकतों से सीख सकते हैं और साझा विकास को आगे बढ़ा सकते हैं। चीन के लिए यह केवल भारत से कारोबार बढ़ाने का मामला नहीं है; यह उस बहुध्रुवीय विश्व-व्यवस्था में भारत को अपने साथ बनाए रखने की कोशिश भी है, जिसमें BRICS की भूमिका बढ़ रही है। यहां व्यापार सबसे बड़ा दबाव-बिंदु भी है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2026 में चीन से भारत का आयात करीब 131.62 अरब डॉलर, जबकि निर्यात केवल 19.47 अरब डॉलर रहा। यानी करीब 112 अरब डॉलर का भारी व्यापार घाटा। चीन भारत के कुल आयात का लगभग 19.2 प्रतिशत हिस्सा देता है। इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटो कंपोनेंट्स, सोलर उपकरण, बैटरियां, मशीनरी और दूसरे औद्योगिक सामान में भारत की चीनी निर्भरता बहुत बड़ी है। दूसरी ओर भारत चाहता है कि चीन अपने बाजार को भारतीय उत्पादों के लिए ज्यादा खोले। यही विरोधाभास रिश्तों की सबसे बड़ी चुनौती भी है और सबसे बड़ा अवसर भी। भारत चीन से व्यापार बंद नहीं कर सकता, लेकिन ऐसा व्यापार भी स्वीकार नहीं कर सकता जिसमें चीन लगातार बेचता रहे और भारत केवल खरीदता रहे। इसलिए अगला चरण trade expansion नहीं, trade rebalancing का होना चाहिए। भारतीय MSMEs को BRICS की सप्लाई चेन में जोड़ना, चीन से केवल finished goods लेने के बजाय उत्पादन और value chains में हिस्सेदारी बढ़ाना और निवेश को भारतीय manufacturing capacity से जोड़ना इस दिशा में निर्णायक हो सकता है। इसे भी पढ़ें: Modi की Delhi में छक्के लगा गये Putin, Global South में Russia का नया Power Network देखकर Trump हैरान लेकिन असली कांटा अभी भी सीमा है। 2020 के गलवान संघर्ष ने भरोसे को गहरी चोट पहुंचाई। इसके बाद सैनिक तनाव कम हुआ, लेकिन सीमा विवाद खत्म नहीं हुआ। अरुणाचल प्रदेश, LAC पर सैन्य तैनाती, चीन-पाकिस्तान समीकरण और संवेदनशील रणनीतिक क्षेत्रों में चीनी गतिविधियां अभी भी भारत की चिंताओं में हैं। इसलिए दिल्ली का संदेश बिल्कुल स्पष्ट है कि व्यापार और सहयोग आगे बढ़ सकते हैं, लेकिन सीमा पर शांति की कीमत पर नहीं। फिर आता है critical minerals का सवाल। मोदी ने शी की मौजूदगी में ही technology और critical minerals की “weaponisation” के खिलाफ चेतावनी दी। यह सीधा नाम लेकर हमला नहीं था, लेकिन संदेश साफ था। चीन rare-earth refining में 90 प्रतिशत से अधिक वैश्विक क्षमता नियंत्रित करता है। आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स, EV, AI और advanced manufacturing के दौर में यह आर्थिक ताकत ही नहीं, रणनीतिक leverage भी है। इसलिए भारत-चीन की नई गर्माहट को दोस्ती की वापसी कहना जल्दबाजी होगी। यह ज्यादा सही तरीके से managed competition है। जहां दोनों देश जानते हैं कि वे एक-दूसरे को हरा नहीं सकते, लेकिन एक-दूसरे को नजरअंदाज भी नहीं कर सकते। शी का दिल्ली आना, मोदी-शी की बातचीत, व्यापारिक संपर्कों का खुलना और BRICS में साथ काम करने की कोशिशें बताती हैं कि रिश्ते अब फिर से पटरी पर लाए जा रहे हैं। लेकिन पटरी अभी पूरी तरह मजबूत नहीं हुई है। एक गलत सीमा-संघर्ष, व्यापार पर एकतरफा दबाव या रणनीतिक अविश्वास इस पूरी प्रक्रिया को फिर पीछे धकेल सकता है। Xi का BRICS डिनर में शामिल न होना भी इसी सावधानी की याद दिलाता है। हालांकि उनकी अनुपस्थिति का आधिकारिक कारण नहीं बताया गया और इसे किसी राजनीतिक संकेत के रूप में स्थापित करना उचित नहीं होगा। बहरहाल, दिल्ली में इस बार मोदी ने संकेत दे दिया है कि सहयोग होगा, व्यापार होगा, BRICS में साझेदारी होगी, लेकिन सीमा, संप्रभुता, बाजार पहुंच और रणनीतिक स्वायत्तता पर भारत अपनी शर्तों से पीछे नहीं हटेगा। -नीरज कुमार दुबे
नई दिल्ली में BRICS का मंच इस बार सिर्फ दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्थाओं की बैठक नहीं बल्कि तेजी से बदलती विश्व व्यवस्था का एक जीवंत कूटनीतिक नक्शा नजर आया। इसका सबसे स्पष्ट संकेत रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन की दिल्ली यात्रा में दिखाई देता है। 11 और 12 सितंबर के दौरान पुतिन ने भारत, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, मलेशिया, इथियोपिया और संयुक्त अरब अमीरात के शीर्ष नेतृत्व के साथ अलग-अलग बातचीत की। यानी एक ही मंच पर एशिया, अफ्रीका, अरब जगत और Global South की अलग-अलग रणनीतिक धुरियों को साधने की कोशिश दिखाई दी है। सबसे महत्वपूर्ण बैठक स्वाभाविक रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ रही। यह सिर्फ भारत-रूस संबंधों की समीक्षा नहीं थी, बल्कि ऐसे समय में हुई है जब रूस पश्चिमी प्रतिबंधों के दबाव में है, भारत अपनी strategic autonomy को बनाए रखते हुए अमेरिका, यूरोप और रूस, तीनों के साथ संबंधों को संतुलित कर रहा है और दुनिया ऊर्जा तथा व्यापार के नए संकटों से गुजर रही है। मोदी और पुतिन ने रक्षा, ऊर्जा, व्यापार, अंतरिक्ष, राजनीतिक सहयोग, critical minerals और औद्योगिक साझेदारी जैसे क्षेत्रों की समीक्षा की। दोनों देशों ने व्यापार और औद्योगिक सहयोग को आगे बढ़ाने पर भी जोर दिया। इसे भी पढ़ें: यही तो मोदी की खास बात है...अचानक किया हस्तक्षेप और BRICS को पश्चिम विरोधी मंच बनने से रोक दिया इसके बाद पुतिन की दक्षिण अफ्रीकी राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा के साथ बातचीत हुई। यहां रूस का लक्ष्य साफ दिखाई देता है। अफ्रीका में अपने राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव को लगातार मजबूत करना। रामाफोसा ने रूस-दक्षिण अफ्रीका व्यापार बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया, जबकि पुतिन ने अफ्रीकी देशों के साथ संबंधों को विशेष महत्व देने की बात कही। मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी के साथ बैठक और भी रणनीतिक है। रूस और मिस्र के रिश्तों में ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा और परमाणु सहयोग पहले से महत्वपूर्ण हैं। बातचीत में रूसी अनाज की आपूर्ति और मिस्र में एल-दबाआ परमाणु परियोजना का मुद्दा सामने आया। यानी रूस मध्य पूर्व में सिर्फ राजनीतिक खिलाड़ी नहीं, बल्कि ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा का भी महत्वपूर्ण साझेदार बनकर मौजूद है। मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम के साथ बातचीत रूस की दक्षिण-पूर्व एशिया नीति की ओर इशारा करती है। यह संबंध BRICS से आगे ASEAN और Indo-Pacific की आर्थिक तथा रणनीतिक संभावनाओं तक जाता है। वहीं इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबी अहमद के साथ बातचीत रूस की अफ्रीका नीति का दूसरा महत्वपूर्ण सिरा है। यह एक ऐसा अफ्रीकी देश है जिसके साथ मॉस्को के राजनयिक संबंध 120 वर्ष से भी अधिक पुराने हैं। फिर आता है संयुक्त अरब अमीरात। अबू धाबी के क्राउन प्रिंस खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के साथ पुतिन की बैठक विशेष महत्व रखती है, क्योंकि UAE अरब दुनिया में रूस का एक प्रमुख आर्थिक साझेदार है। साथ ही ईरान और खाड़ी के बीच चल रहे तनाव के दौर में मॉस्को का अबू धाबी से संवाद उसकी मध्यस्थ और संतुलनकारी भूमिका को भी मजबूत करता है। इस पूरी श्रृंखला को एक साथ देखें तो तस्वीर बेहद स्पष्ट है। पुतिन दिल्ली में सिर्फ BRICS Summit में हिस्सा लेने नहीं आए थे, वह BRICS के भीतर रूस की strategic connectivity को मजबूत करने भी आये थे। देखा जाये तो भारत से लेकर दक्षिण अफ्रीका, मिस्र से UAE और मलेशिया से इथियोपिया तक, रूस उन देशों से संवाद बढ़ा रहा है जो अमेरिकी नेतृत्व वाली पश्चिमी व्यवस्था के विकल्प के रूप में किसी न किसी रूप में अधिक बहुध्रुवीय विश्व की वकालत करते हैं। यही दिल्ली BRICS की असली कहानी है। रूस पश्चिम से टकराव के बीच अकेला नहीं दिखना चाहता; वह एशिया, अफ्रीका और मध्य पूर्व में अपने लिए वैकल्पिक आर्थिक, ऊर्जा, व्यापारिक और राजनीतिक नेटवर्क तैयार कर रहा है। दूसरी ओर भारत इस पूरे समीकरण में सबसे महत्वपूर्ण संतुलनकारी शक्ति है। इस तरह BRICS का मंच अब केवल रूस-चीन की धुरी नहीं रह गया है। यह कई शक्तियों के बीच बातचीत का ऐसा मंच बन रहा है जहां मॉस्को को नई साझेदारियां, नई दिल्ली को strategic autonomy और Global South को अपनी सामूहिक bargaining power दिखाई दे रही है। यही वजह है कि दिल्ली में पुतिन की ये छह मुलाकातें उस विश्व व्यवस्था की झलक हैं जिसमें शक्ति का केंद्र धीरे-धीरे एक ध्रुव से निकलकर कई दिशाओं में फैल रहा है। यहां एक बात और काबिलेगौर है कि अमेरिका ने पुतिन को विश्व राजनीति में अलग थलग करने के लिए पूरा जोर लगाया लेकिन पुतिन की शक्ति बढ़ती जा रही है और उन्हें अपनी स्थिति मजबूत बनाये रखने में भारत और चीन भरपूर मदद भी दे रहे हैं। -नीरज कुमार दुबे
यही तो मोदी की खास बात है...अचानक किया हस्तक्षेप और BRICS को पश्चिम विरोधी मंच बनने से रोक दिया
महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति को किसी देश के दबाव का हथियार नहीं बनने देने से लेकर समुद्र में काम करने वाले नाविकों की सुरक्षा तक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़े दो बेहद अहम मुद्दे उठाए। उन्होंने साफ कहा कि दुनिया की आधुनिक अर्थव्यवस्था जिन महत्वपूर्ण खनिजों पर तेजी से निर्भर हो रही है, उनकी आपूर्ति सुरक्षित और भरोसेमंद रहनी चाहिए। साथ ही, उन्होंने संकट के समय नाविकों को मदद पहुंचाने के लिए आपात सहायता तंत्र बनाने का प्रस्ताव रखा। यानी नई दिल्ली में मोदी ने एक तरफ संसाधनों की सुरक्षा का सवाल उठाया, तो दूसरी तरफ वैश्विक व्यापार की उस मानवीय कड़ी पर ध्यान खींचा, जिस पर समुद्र के रास्ते होने वाला पूरा कारोबार टिका है। मोदी ने इसी क्रम में समुद्री व्यापार और नाविकों की सुरक्षा को भी प्रमुखता दी। उन्होंने कहा कि वैश्विक व्यापार तभी सुचारु रूप से आगे बढ़ सकता है, जब समुद्री मार्ग सुरक्षित रहें, आपूर्ति मार्ग खुले रहें और नाविक सुरक्षित रहें। पश्चिम एशिया तथा काला सागर क्षेत्र के संघर्षों का असर समुद्री व्यापार और भारतीय नाविकों की सुरक्षा पर पड़ा है। इससे पहले ईरान और रूस के राष्ट्राध्यक्षों के साथ अपनी अलग-अलग बैठकों में भी मोदी ने समुद्री आवाजाही की स्वतंत्रता, व्यापार की निर्बाध आवाजाही और नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा उठाया था। इसे भी पढ़ें: BRICS Summit 2026 की सफलता पर बोले S Jaishankar, बंटी दुनिया में भारत ने बनाई सहमति शिखर सम्मेलन के दौरान उन्होंने नाविकों के लिए आपात सहायता तंत्र बनाने का प्रस्ताव भी रखा। इसका उद्देश्य संकट के समय समुद्री अधिकारियों और संबंधित देशों के तंत्र को जोड़कर संकट संबंधी सूचनाएं पहुंचाना, चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराना, परिवारों तक सूचना पहुंचाना और जरूरत पड़ने पर बचाव तथा निकासी अभियान में मदद करना है। समुद्री व्यापार पर बढ़ते संघर्षों के असर के बीच यह प्रस्ताव सीधे तौर पर वैश्विक व्यापार की उस कमजोर कड़ी को सामने लाता है, जिस पर करोड़ों टन माल की आवाजाही टिकी हुई है। लेकिन नई दिल्ली शिखर सम्मेलन में मोदी की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक रेखा ब्रिक्स के स्वरूप को लेकर रही। उन्होंने इस धारणा को स्वीकार नहीं किया कि ब्रिक्स पश्चिम के खिलाफ खड़ा कोई राजनीतिक गठबंधन है। मोदी ने कहा कि ब्रिक्स किसी के विरुद्ध नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलने वाला समावेशी मंच है। पिछले दो दशकों में ब्रिक्स ने अपनी अलग पहचान बनाई है और अब उसके सामने चुनौती अपनी एकता तथा सहमति को ठोस परिणामों में बदलने की है। यही वजह रही कि मोदी ने ग्लोबल साउथ को केवल निर्णयों का पालन करने वाला पक्ष बनाए रखने की बजाय नियम बनाने में प्रभावी भूमिका देने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि दुनिया के अनेक देश वैश्विक संकटों की पहली कतार में खड़े हैं, लेकिन निर्णय लेने की व्यवस्था में पीछे हैं। इस असंतुलन को बदलने के लिए वैश्विक शासन व्यवस्था को आज की आर्थिक और राजनीतिक वास्तविकताओं के अनुरूप बनाना होगा। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अधिक प्रतिनिधित्व की मांग भी इसी संदर्भ में सामने आई। मोदी ने ब्रिक्स के भीतर युवाओं, राजनयिकों और नीति-निर्माताओं को बातचीत की कला, व्यावहारिक प्रशिक्षण और कानूनी विशेषज्ञता उपलब्ध कराने की बात भी रखी, ताकि ग्लोबल साउथ केवल बनाए गए नियमों का पालन करने वाला नहीं, बल्कि नियमों को आकार देने वाला समूह बने। उन्होंने ब्रिक्स के भीतर व्यापारिक अड़चनों को घटाने, निवेश बढ़ाने और कारोबारी संबंधों को मजबूत करने पर भी जोर दिया। भारत की अध्यक्षता में कृषि, स्वास्थ्य, कौशल और स्मार्ट बिजली तंत्र जैसे क्षेत्रों में सहयोग के नए ढांचे बनाए गए हैं। ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार बढ़ाने के लिए दस प्रमुख व्यापारिक बाधाओं को हटाने, हर वर्ष सौ नए उद्यमों को सदस्य देशों के बाजारों तक पहुंचाने और एक हजार नई कारोबारी साझेदारियां विकसित करने का लक्ष्य भी सामने रखा गया है। इस पूरे घटनाक्रम में मोदी की रणनीति साफ दिखाई दी। महत्वपूर्ण खनिजों से लेकर समुद्री सुरक्षा, व्यापार से लेकर वैश्विक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व तक, उन्होंने ब्रिक्स को किसी ध्रुव के खिलाफ खड़ा करने के बजाय वैश्विक व्यवस्था में अधिक हिस्सेदारी मांगने वाले मंच के रूप में पेश किया। संदेश यही रहा कि भविष्य साझा है तो उसे आकार देने का अधिकार भी साझा होना चाहिए। नई दिल्ली घोषणा के साथ ब्रिक्स ने इसी दिशा में आगे बढ़ने की साझा प्राथमिकताएं तय कीं। -नीरज कुमार दुबे
नई दिल्ली में संपन्न BRICS शिखर सम्मेलन के बीच भारत ने उस वक्त बड़ी कूटनीतिक कामयाबी हासिल की, जब पश्चिम एशिया के युद्ध को लेकर आमने-सामने खड़े ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) एक साझा BRICS घोषणा पर सहमत हो गए। करीब छह महीने से जारी युद्ध और लगातार बढ़ते क्षेत्रीय तनाव के बीच दोनों देशों के बीच सहमति बनना सिर्फ BRICS के लिए नहीं, बल्कि भारत की कूटनीतिक भूमिका के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है। दरअसल, BRICS के विदेश मंत्रियों की मई में हुई बैठक के दौरान ईरान और UAE के बीच मतभेद इतने गहरे थे कि संयुक्त बयान तक जारी नहीं हो पाया था। पश्चिम एशिया में युद्ध को लेकर दोनों देशों की प्राथमिकताएं और संघर्ष की व्याख्या अलग-अलग थी। ऐसे में दिल्ली शिखर सम्मेलन से पहले सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि ऐसी भाषा तैयार की जाए, जिस पर ईरान और UAE समेत BRICS के सभी सदस्य देश एक साथ खड़े हो सकें। इसे भी पढ़ें: UNSC में India की स्थायी सदस्यता का रास्ता साफ ! US, UK, France, Russia के बाद China भी आ गया साथ भारत की अध्यक्षता में हुई लंबी और बेहद कठिन बातचीत के बाद आखिरकार वह रास्ता निकाला गया। बातचीत आधी रात के बाद तक चलती रही और करीब चार बजे तक सहमति बनाने की कोशिशें जारी रहीं। अंतिम घोषणा में किसी एक देश को सीधे तौर पर युद्ध के लिए जिम्मेदार ठहराने के बजाय पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव पर सामूहिक चिंता जताई गई। सभी पक्षों से अधिकतम संयम बरतने और ऐसे कदमों से बचने की अपील की गई, जो स्थिति को और बिगाड़ सकते हैं। इस पूरी कवायद का सबसे बड़ा राजनीतिक संकेत उस समय सामने आया, जब ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और UAE के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के बीच BRICS सम्मेलन के इतर मुलाकात हुई। युद्ध शुरू होने के बाद दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच यह सबसे महत्वपूर्ण संपर्कों में से एक माना जा रहा है। खास बात यह है कि यह बैठक ऐसे समय हुई, जब क्षेत्रीय संघर्ष ने ईरान और खाड़ी देशों के रिश्तों को बेहद संवेदनशील बना दिया है। हम आपको बता दें कि BRICS की नई दिल्ली घोषणा में पश्चिम एशिया की स्थिति पर चिंता जताते हुए नागरिकों की सुरक्षा, संप्रभुता और क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर दिया गया है। इसके साथ ही वैश्विक व्यापार और समुद्री आवाजाही को सुरक्षित रखने की जरूरत भी रेखांकित की गई। घोषणा का मकसद किसी पक्ष की जीत या हार तय करना नहीं, बल्कि ऐसी न्यूनतम साझा जमीन तैयार करना था, जिस पर अलग-अलग रणनीतिक हित रखने वाले देश भी एक साथ खड़े हो सकें। यहीं भारत की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। BRICS के विस्तार के बाद संगठन के भीतर अब सिर्फ आर्थिक हितों का मेल नहीं है, बल्कि ईरान, UAE और अन्य देशों के बीच गंभीर भू-राजनीतिक मतभेद भी मौजूद हैं। ऐसे माहौल में सर्वसम्मति से घोषणा पारित कराना अपने आप में एक राजनीतिक उपलब्धि है। भारतीय कूटनीति ने पक्ष के साथ खड़े होने की बजाय ऐसी भाषा पर जोर दिया, जिसे विरोधी धड़े भी स्वीकार कर सकें। देखा जाये तो इसका असर BRICS की विश्वसनीयता पर भी पड़ेगा। अगर युद्ध जैसे बेहद संवेदनशील मुद्दे पर ईरान और UAE जैसे विरोधी हितों वाले देश एक ही घोषणा पर हस्ताक्षर कर सकते हैं, तो दिल्ली शिखर सम्मेलन ने यह संदेश जरूर दिया है कि BRICS सिर्फ आर्थिक सहयोग का मंच नहीं रह गया है। अब वह ऐसे भू-राजनीतिक संकटों में भी साझा रुख बनाने की कोशिश कर रहा है, जहां वैश्विक शक्तियों के बीच सीधा टकराव मौजूद है। -नीरज कुमार दुबे
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