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दो साल लगें या दस, आंदोलन नहीं रुकेगा: राहुल गांधी

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने और विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया रोकने की मांग को लेकर उनका आंदोलन जारी रहेगा और इसमें चाहे एक दिन लगे या दो साल, वह पीछे नहीं हटेंगे

देशबन्धु 13 Oct 2026 10:31 pm

कांग्रेस मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन के दौरान भाजपा महिला कार्यकर्ताओं के साथ बदसलूकी: बांसुरी स्वराज

कांग्रेस मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन के दौरान भाजपा महिला कार्यकर्ताओं के साथ बदसलूकी: बांसुरी स्वराज

समाचार नामा 13 Oct 2026 10:26 pm

बंगाल में तृणमूल के पूर्व विधायक को बड़ी राहत, जबरन वसूली मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने दी सशर्त अंतरिम जमानत

बंगाल में तृणमूल के पूर्व विधायक को बड़ी राहत, जबरन वसूली मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने दी सशर्त अंतरिम जमानत

समाचार नामा 13 Oct 2026 10:19 pm

एलडीएफ और यूडीएफ ने सुगाथन के खिलाफ मिला लिया हाथ: केरल भाजपा

एलडीएफ और यूडीएफ ने सुगाथन के खिलाफ मिला लिया हाथ: केरल भाजपा

समाचार नामा 13 Oct 2026 10:18 pm

दिल्ली के एलजी टीएस संधू ने विश्वविद्यालयों को दिया सुझाव, बेहतर नतीजों के लिए पीपीपी मॉडल अपनाएं

दिल्ली के एलजी टीएस संधू ने विश्वविद्यालयों को दिया सुझाव, बेहतर नतीजों के लिए पीपीपी मॉडल अपनाएं

समाचार नामा 13 Oct 2026 8:40 pm

गांधीनगर नगर निगम चुनाव: बीजेपी का दबदबा कायम, कांग्रेस का प्रदर्शन सुधरा, 'आप' का नहीं खुला खाता

गांधीनगर नगर निगम चुनाव: बीजेपी का दबदबा कायम, कांग्रेस का प्रदर्शन सुधरा, 'आप' का नहीं खुला खाता

समाचार नामा 13 Oct 2026 6:23 pm

चुनाव आयोग के अधिकारियों को नहीं, मतदाता सूची की नीति बदलिए

किसी भी लोकतंत्र की मजबूती के लिए पारदर्शी, विश्वसनीय और समावेशी मतदाता सूची जरूरी है। लेकिन भारत के नेताओं और नौकरशाहों के गठजोड़ ने इसे एक हास्यास्पद विषय बना दिया है। यदि प्रत्येक व्यक्ति के जन्मभूमि पर ही मतदाता पहचान पत्र बना दिया जाए, और उसके पलायन के बावजूद उसका स्थाई नंबर नहीं बदलने दिया जाए, तो इससे बहुत सारे गड़बड़ झाले को रोका जा सकता है। इसे आधार कार्ड से लिंक करने पर व्यक्ति की वास्तविक पहचान भी सुनिश्चित होती है। लेकिन हमारी नौकरशाही ऐसा कभी नहीं होने देगी। भारत में राजनीतिक कारणों से जितने पाकिस्तानियों और बांग्लादेशियों के मतदाता पहचान पत्र बनाए गए, उसके लिए तत्कालीन बीएलओ, एसडीएम और डीएम के अलावा राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि जिम्मेदार नहीं हैं, तो कौन है? क्या कभी इस लापरवाही की जिम्मेदारी सुनिश्चित करने की कोशिश की गई? इनकी जमीनी लापरवाहियों या राजनीतिक पक्षपात के लिए इन्हें कड़ी सजा मिलनी चाहिए, न कि राज्य के मुख्य चुनाव आयुक्त और केंद्रीय मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ अनर्गल आरोप लगाए जाने चाहिए। इसे भी पढ़ें: सुप्रीम कटघरे में अब CEC को मुकदमों से बचाने वाला 'अभयदान', क्या है धारा-16 का 'कवच' जिस पर SC करेगा सुनवाई? एडॉल्फ हिटलर ने कहा था कि यदि तुम एक झूठ को सौ बार दोहराओगे तो वह लोगों को सच लगने लगेगा। जिन नेताओं ने अल्पसंख्यकों की आड़ में, झुग्गी-झोपड़ियों की आड़ में गलत मतदाता पहचान पत्र बनवा लिए, जब एसआईआर में ये पकड़ में आने लगे तो विपक्ष का बेचैन होना स्वाभाविक है। चाहे कांग्रेस हो भाजपा हो या क्षेत्रीय दल, अब इस खेल में सभी पारंगत दिख रहे हैं। यदि नौकरशाही तभी इस खेल को पकड़ लेती तो आज चुनाव आयोग को इतनी कड़ी मशक्कत नहीं करनी पड़ती। इस पूरे खेल में ग्राम पंचायत, नगर पंचायत, नगरपालिका, नगर निगम, विधानसभा और लोकसभा की मतदाता सूची में जो गड़बड़झाला है, उसे भी यदि समय रहते नहीं रोका गया, तो मतदाताओं को न्याय मिल पाएगा, इस बात की कोई गारंटी नहीं है। क्योंकि हर चुनाव में मतदाता सूची बदल जाना राजनीतिक व प्रशासनिक खेल नहीं तो क्या है? हर चुनाव के वक्त कुछ ऐसे वास्तविक लोग मिल जाएंगे, जिनके नाम ही मतदाता सूची से गायब मिलेंगे। आखिर इस लापरवाही के लिए सरकारी अधिकारियों की जिम्मेदारी कौन सुनिश्चित करेगा। इस बात में कोई दो राय नहीं कि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति मतदाता के मताधिकार में निहित है। यह अधिकार तभी सार्थक है, जब प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में दर्ज हो और कोई अपात्र व्यक्ति गलत तरीके से उसमें शामिल न रहे। इसलिए मतदाता सूची तैयार करने, उसमें संशोधन करने और उसकी शुद्धता सुनिश्चित करने की प्रक्रिया लोकतांत्रिक व्यवस्था का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि कोई अधिकारी इसमें लापरवाही बरतता पाया जाता है तो उसके लिए भी सख्त सजा का प्रावधान हो। जब भी मतदाता सूची में गड़बड़ियों, नाम कटने, दोहरी प्रविष्टियों अथवा पात्र मतदाताओं के छूट जाने की शिकायतें सामने आती हैं, तो चुनाव आयोग के अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका पर सवाल उठने लगते हैं। लेकिन क्या हर समस्या के लिए मैदानी स्तर पर काम करने वाले अधिकारियों व राजनीतिक कार्यकर्ताओं को जिम्मेदार ठहराना उचित है? या हमें उन नीतियों, नियमों और प्रक्रियाओं की समीक्षा करनी चाहिए, जिनके तहत मतदाता सूची तैयार की जाती है? नए मतदाताओं के नाम जोड़ना और मृतकों के नाम डिलीट करना चुनाव आयोग की वार्षिक जिम्मेदारी है। इस हेतु हर वर्ष अभियान चलाया जाता है। सवाल है कि अधिकारियों की जवाबदेही के साथ नीतिगत सुधार भी जरूरी है। इसके लिए संसद को भी सचेष्ट होना पड़ेगा। मतदाता सूची तैयार करने का काम व्यापक और संवेदनशील है। इसमें करोड़ों नागरिकों के विवरण का सत्यापन, नए मतदाताओं का पंजीकरण, मृत व्यक्तियों के नाम हटाना, स्थानांतरित नागरिकों के विवरण का अद्यतन और दोहरी प्रविष्टियों की पहचान जैसे अनेक कार्य शामिल होते हैं। यदि इन प्रक्रियाओं में त्रुटियां होती हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। जानबूझकर लापरवाही, पक्षपात या नियमों के उल्लंघन के प्रमाण मिलने पर संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए। लेकिन प्रत्येक प्रशासनिक त्रुटि को केवल कर्मचारियों की विफलता मान लेना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। यह भी देखना होगा कि निर्धारित समयसीमा व्यावहारिक है या नहीं, उपलब्ध संसाधन पर्याप्त हैं या नहीं, सत्यापन की प्रक्रिया कितनी सरल है और नागरिकों को अपनी शिकायतों के समाधान के लिए कितनी आसानी से अवसर मिलता है। सवाल है कि मतदाता सूची की नीति में किन बदलावों की जरूरत है? पहला, प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम जोड़ने की प्राथमिकता। मतदाता सूची की शुद्धता का अर्थ केवल गलत नाम हटाना नहीं, बल्कि प्रत्येक पात्र नागरिक को सूची में शामिल करना भी है। किसी पात्र मतदाता का नाम हटने या दर्ज न होने से उसके मताधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए नाम हटाने की प्रक्रिया में उचित सूचना, सत्यापन और अपना पक्ष रखने का अवसर सुनिश्चित किया जाना चाहिए। दूसरा, नाम काटने की प्रक्रिया पारदर्शी हो। किसी मतदाता का नाम सूची से हटाने के लिए स्पष्ट नियम, सत्यापन योग्य आधार और निर्धारित प्रक्रिया होनी चाहिए। नागरिक को, जहां नियमों के तहत आवश्यक हो, प्रस्तावित कार्रवाई की सूचना और आपत्ति दर्ज कराने का अवसर मिलना चाहिए। केवल तकनीकी रिकॉर्ड या अपूर्ण जानकारी के आधार पर किसी पात्र मतदाता का अधिकार प्रभावित नहीं होना चाहिए। तीसरा, मृत और स्थानांतरित मतदाताओं के मामलों में सावधानी जरूरी है। मृत व्यक्तियों के नाम हटाना और स्थायी रूप से स्थानांतरित मतदाताओं के रिकॉर्ड को अद्यतन करना आवश्यक है। लेकिन एक ही नाम, समान आयु या मिलते-जुलते पते के आधार पर किसी व्यक्ति को गलत तरीके से सूची से बाहर नहीं किया जाना चाहिए। पहचान और निवास के सत्यापन के लिए विश्वसनीय प्रक्रिया जरूरी है। चौथा, तकनीक का उपयोग हो, लेकिन मानवीय सत्यापन के साथ जरूरी है। डिजिटल डेटाबेस, ऑनलाइन आवेदन और स्वचालित प्रणाली मतदाता सूची को बेहतर बनाने में सहायक हो सकते हैं। हालांकि, तकनीकी गड़बड़ी, डेटा में विसंगति या गलत मिलान की स्थिति में मानवीय समीक्षा और सुधार का अवसर उपलब्ध होना चाहिए। तकनीक नागरिकों की सुविधा बढ़ाए, उनके अधिकारों में बाधा न बने। पांचवां, शिकायत निवारण की प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित हो। नाम जुड़वाने, संशोधन कराने या गलत तरीके से नाम हटाए जाने की शिकायतों के लिए सरल और समयबद्ध व्यवस्था होनी चाहिए। नागरिकों को आवेदन की स्थिति जानने, निर्णय का कारण समझने और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अपील करने की सुविधा मिलनी चाहिए। छठा, अधिकारियों को पर्याप्त संसाधन और प्रशिक्षण मिलना चाहिए। मतदाता सूची तैयार करने वाले कर्मचारियों पर यदि सीमित समय में अत्यधिक काम का दबाव है, तो त्रुटियों की आशंका बढ़ सकती है। इसलिए पर्याप्त कर्मचारी, व्यावहारिक समयसीमा, स्पष्ट दिशा-निर्देश और उचित प्रशिक्षण भी नीतिगत सुधार का हिस्सा होने चाहिए। सबसे बड़ी बात यह कि राजनीतिक विवाद से ऊपर उठकर समीक्षा हो। मतदाता सूची का मुद्दा अक्सर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय बन जाता है। एक पक्ष नामों को हटाए जाने पर सवाल उठाता है, तो दूसरा पक्ष सूची की शुद्धता और दोहरी प्रविष्टियों को समाप्त करने की आवश्यकता पर जोर देता है। इन दोनों चिंताओं की निष्पक्ष जांच जरूरी है। न तो हर नाम हटाए जाने को गलत मानना उचित है और न ही प्रत्येक कार्रवाई को स्वतः सही मान लेना। महत्वपूर्ण यह है कि हर निर्णय के पीछे स्पष्ट आधार हो, नियम सभी पर समान रूप से लागू हों और शिकायतों का समाधान प्रमाणों के आधार पर किया जाए। मतदाता सूची की विश्वसनीयता केवल चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं है। यह नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों और चुनावी प्रक्रिया पर जनता के भरोसे से जुड़ा विषय है। सवाल है कि अब आगे का रास्ता क्या है? तो जवाब यही होगा कि मतदाता सूची की नीति की नियमित समीक्षा की जानी चाहिए। इसमें राजनीतिक दलों, नागरिक समाज, चुनाव संबंधी विशेषज्ञों और आम मतदाताओं से सुझाव लिए जा सकते हैं। नाम जोड़ने और हटाने के आंकड़े, शिकायतों की स्थिति तथा उनके निस्तारण की जानकारी उचित गोपनीयता और कानूनी सीमाओं के भीतर सार्वजनिक की जानी चाहिए। साथ ही, मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए कि कोई पात्र नागरिक अनावश्यक प्रशासनिक बाधाओं के कारण अपने मताधिकार से वंचित न हो और सूची की शुद्धता भी बनी रहे। यदि किसी के पास वैध मतदाता पहचान पत्र है, लेकिन मतदाता सूची से उनका नाम नदारत है तो ऐसे व्यक्तियों को वोट डालने का अधिकार मिलना चाहिए। वस्तुतः चुनाव आयोग के अधिकारियों की जवाबदेही जरूरी है, लेकिन जवाबदेही का अर्थ केवल दोष तय करना नहीं, बल्कि व्यवस्था की कमियों को दूर करना भी है। यदि नियम जटिल हैं, प्रक्रियाएं अस्पष्ट हैं या संसाधन अपर्याप्त हैं, तो केवल अधिकारियों को बदलने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए ऐसी मतदाता सूची चाहिए, जिसमें प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम हो, प्रत्येक गलत प्रविष्टि को निष्पक्ष प्रक्रिया से सुधारा जाए और किसी का मताधिकार मनमाने ढंग से प्रभावित न हो। इसलिए मूल प्रश्न यही है—क्या हम हर विवाद के बाद अधिकारियों पर कार्रवाई तक सीमित रहेंगे, या ऐसी पारदर्शी, जवाबदेह और नागरिक-अनुकूल नीति बनाएंगे, जिससे गलतियों की संभावना ही कम हो जाए? मतदाता सूची की नीति में सुधार लोकतंत्र के प्रति जनता का विश्वास मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 13 Oct 2026 4:33 pm

जंतर-मंतर से दूर होते प्रतिरोध के ठिकाने

लोकतंत्र की जीवंतता केवल इस बात से तय नहीं होती कि संसद के भीतर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच कितनी सार्थक बहस होती है, बल्कि इसकी असली कसौटी यह है कि संसद के बाहर सड़कों पर आम नागरिक की आवाज को कितनी गंभीरता और सहजता से सुना जाता है। देश की राजधानी नई दिल्ली के हृदय स्थल में स्थित जंतर मंतर पिछले 33 वर्षों से इसी लोकतांत्रिक चेतना, जन आक्रोश और नागरिक उम्मीदों का सबसे बड़ा केंद्र रहा है। किंतु अब केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा गठित एक उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशों के आधार पर दिल्ली पुलिस ने एक ऐतिहासिक बदलाव करते हुए जंतर मंतर को अधिकृत प्रदर्शन स्थलों की सूची से बाहर कर दिया है। 28 अप्रैल 2022 के पुराने स्थायी आदेश में संशोधन करते हुए अब राजधानी में धरना और प्रदर्शन के लिए तीन नए स्थान निर्धारित किए गए हैं, जिनमें मध्य दिल्ली का रामलीला मैदान, उत्तरी दिल्ली का बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के कड़कड़डूमा स्थित व्यावसायिक केंद्र मैदान शामिल हैं। प्रशासन के इस एक निर्णय ने तीन दशकों से चली आ रही प्रतिरोध की एक पूरी परंपरा को विराम दे दिया है और साथ ही लोकतांत्रिक अधिकारों तथा प्रशासनिक व्यवस्था के बीच के द्वंद्व पर एक नई बहस छेड़ दी है। जंतर मंतर का यह परिसर केवल 18वीं सदी के खगोलीय यंत्रों का स्मारक मात्र नहीं था, बल्कि यह आधुनिक भारत के सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों की सबसे बड़ी प्रयोगशाला बन चुका था। वर्ष 1993 से लेकर 2026 तक के अपने 33 वर्षों के सफर में इस छोटे से मार्ग ने अनगिनत ऐतिहासिक बदलावों की नींव रखी। चाहे वर्ष 2011 का भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल आंदोलन हो, वर्ष 2012 में निर्भया कांड के बाद उमड़ा युवाओं का स्वतःस्फूर्त जनसैलाब हो, वर्ष 2015 में पूर्व सैनिकों का वन रैंक वन पेंशन आंदोलन हो या फिर वर्ष 2023 में महिला पहलवानों का लंबा संघर्ष, जंतर मंतर ने हर वर्ग की पीड़ा को राष्ट्रीय पटल पर रखने का मंच प्रदान किया। देश के सुदूर कोनों से आने वाले किसानों, मजदूरों, छात्रों, शिक्षकों और वंचित वर्गों के लिए यह स्थान एक ऐसी उम्मीद की तरह था, जहाँ खड़े होकर वे सीधे सत्ता के शीर्ष से संवाद करने का अहसास पाते थे। संसद भवन से मात्र 1 से 1.5 किलोमीटर की दूरी पर होने के कारण यहाँ उठने वाली हर आवाज की गूंज नीति निर्माताओं के कानों तक आसानी से पहुँच जाती थी। इसे भी पढ़ें: Jantar Mantar हो गया छू मंतर, प्रदर्शन करना है तो Ramlila Maidan, Burari Ground या CBD Ground जाना पड़ेगा इस ऐतिहासिक स्थल से प्रदर्शनों को हटाने के पीछे प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों के अपने ठोस तर्क हैं। तात्कालिक कारणों पर नजर डालें तो वर्ष 2026 के जून और जुलाई माह में प्रतियोगी परीक्षाओं की शुचिता और शिक्षा सुधारों की मांग को लेकर लगभग 36 दिनों तक चला विशाल छात्र आंदोलन इस फैसले का मुख्य आधार बना। उस आंदोलन के दौरान जंतर मंतर की सीमित क्षमता के विपरीत 1 लाख से अधिक प्रदर्शनकारी जुट गए थे। जब इस भारी भीड़ ने संसद भवन की ओर कूच करने का प्रयास किया, तो सुरक्षा व्यवस्था चरमरा गई और पुलिस तथा छात्रों के बीच हुई झड़पों में 118 पुलिसकर्मियों सहित दर्जनों छात्र घायल हुए। इसके अतिरिक्त, हाल ही में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन के मुद्दे पर राजनीतिक दलों और युवा संगठनों द्वारा फिर से जंतर मंतर पर बड़े घेराव की तैयारी की जा रही थी। नए संसद भवन और कर्तव्य पथ के आसपास अति विशिष्ट व्यक्तियों के निरंतर आवागमन और संवेदनशील मंत्रालयों की सुरक्षा को देखते हुए पुलिस का मानना है कि इतनी कम दूरी पर अनियंत्रित भीड़ का जुटना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा जोखिम है। सुरक्षा के अलावा स्थानीय व्यापारियों और आम नागरिकों की दैनिक परेशानियां भी इस बदलाव का एक बड़ा कारण बनी हैं। जंतर मंतर राजधानी के सबसे बड़े व्यावसायिक केंद्र कनॉट प्लेस और जनपथ के ठीक बगल में स्थित है। जब भी यहाँ कोई बड़ा प्रदर्शन होता था, तो एहतियात के तौर पर आसपास की मुख्य सड़कें और रेल के भूमिगत स्टेशन बंद कर दिए जाते थे। इससे न केवल घंटों लंबा यातायात जाम लगता था, बल्कि नई दिल्ली रेलवे स्टेशन और हवाई अड्डे की ओर जाने वाले हजारों यात्रियों की गाड़ियां छूट जाती थीं। स्थानीय व्यापार मंडलों ने लंबे समय से यह शिकायत की थी कि लगातार होने वाले धरनों और नाकेबंदी के कारण कनॉट प्लेस के व्यापार को करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी पूर्व में यह सुझाव दिया था कि प्रदर्शनों के लिए ऐसी खुली और बड़ी जगह तलाशी जानी चाहिए जहाँ आम जनजीवन प्रभावित न हो तथा प्रदर्शनकारियों के लिए पेयजल, शौचालय और चिकित्सा जैसी बुनियादी सुविधाएं आसानी से उपलब्ध कराई जा सकें। किंतु इस प्रशासनिक सुविधा के दूसरे पहलू पर नजर डालें तो नागरिक अधिकार संगठनों और संविधानविदों की चिंताएं अत्यंत गंभीर और विचारणीय हैं। राजधानी में सत्ता के केंद्र से जन आंदोलनों को दूर धकेलने की यह प्रवृत्ति नई नहीं है, बल्कि पिछले चार दशकों में विरोध का पता तीन बार बदला जा चुका है। वर्ष 1988 तक इंडिया गेट के पास स्थित बोट क्लब देश के सबसे बड़े प्रदर्शनों का केंद्र हुआ करता था, जहाँ से संसद और राष्ट्रपति भवन सीधे दिखाई देते थे। अक्टूबर 1988 में चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में जब 5 लाख किसानों ने एक सप्ताह तक बोट क्लब पर डेरा डाला, तो सरकार ने सुरक्षा और व्यवस्था का हवाला देकर वहां प्रदर्शनों पर स्थायी रोक लगा दी और वर्ष 1993 में जंतर मंतर को नया विकल्प बनाया गया। वर्ष 2017 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने पर्यावरण और ध्वनि प्रदूषण के नियमों का हवाला देकर जंतर मंतर पर भी आंशिक पाबंदियां लगाईं, और अब वर्ष 2026 में इसे पूरी तरह से सूची से हटा दिया गया है। बोट क्लब से जंतर मंतर और अब जंतर मंतर से बुराड़ी तथा कड़कड़डूमा के मैदानों तक का यह सफर वास्तव में सत्ता के गलियारों से आम जनता की भौतिक और मनोवैज्ञानिक दूरी बढ़ने की कहानी है। लोकतंत्र में किसी भी शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का मूल उद्देश्य सरकार का ध्यान आकर्षित करना और राष्ट्रीय समाचार माध्यमों के जरिए अपनी बात देश के सामने रखना होता है। जंतर मंतर की भौगोलिक स्थिति उसे यह विशेष महत्व देती थी कि वहां बैठा सौ लोगों का एक छोटा समूह भी राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन जाता था। इसके विपरीत, उत्तरी दिल्ली का बुराड़ी मैदान या पूर्वी दिल्ली का कड़कड़डूमा क्षेत्र मुख्य प्रशासनिक केंद्र से 15 से 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। बाहरी इलाकों में प्रदर्शनों को स्थानांतरित करने से प्रशासन को भीड़ प्रबंधन में तो आसानी होगी, लेकिन इससे जन आंदोलनों की दृश्यता और प्रभावशीलता कम होने का पूरा अंदेशा है। जब विरोध की आवाज सत्ता के केंद्र से बहुत दूर किसी कोने में सिमट जाती है, तो उसकी अनदेखी करना तंत्र के लिए बहुत आसान हो जाता है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क) और 19(1)(ख) देश के प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा शांतिपूर्ण और निशस्त्र सम्मेलन करने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी वर्ष 2018 के मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ मामले में स्पष्ट रूप से कहा था कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर नागरिकों के विरोध करने के अधिकार को पूरी तरह से निष्प्रभावी या अर्थहीन नहीं बनाया जा सकता। शासन का यह दायित्व है कि वह सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच एक स्वस्थ संतुलन कायम करे। यदि सुरक्षा चुनौतियों और शहरी यातायात के दबाव के कारण जंतर मंतर से प्रदर्शनों को हटाना अपरिहार्य ही था, तो सरकार और प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि रामलीला मैदान, बुराड़ी और कड़कड़डूमा के नए स्थलों पर आने वाले नागरिकों की आवाज अनसुनी न रहे। लोकतंत्र की गरिमा इसी में है कि प्रदर्शन का मैदान भले ही बदल जाए, लेकिन जनता की पीड़ा को सुनने की सत्ता की संवेदनशीलता कभी कम न हो। - महेन्द्र तिवारी

प्रभासाक्षी 13 Oct 2026 4:29 pm

राहुल के सुरक्षाकर्मियों ने सीएम शिवकुमार को मारा धक्का, भाजपा बोली-'वरिष्ठों का कोई सम्मान नहीं'

राहुल के सुरक्षाकर्मियों ने सीएम शिवकुमार को मारा धक्का, भाजपा बोली-'वरिष्ठों का कोई सम्मान नहीं'

समाचार नामा 13 Oct 2026 4:26 pm

कर्नाटक स्टिंग ऑपरेशन विवाद: सिद्दारमैया ने खटखटाया कोर्ट का दरवाजा, भाजपा का कांग्रेस पर धोखा देने का आरोप

कर्नाटक स्टिंग ऑपरेशन विवाद: सिद्दारमैया ने खटखटाया कोर्ट का दरवाजा, भाजपा का कांग्रेस पर धोखा देने का आरोप

समाचार नामा 13 Oct 2026 4:03 pm

UP Congress में कुर्सी की लड़ाई जूते-चप्पल तक आई, Ajay Rai ने BJP में वापसी की टिकट कटाई!

उत्तर प्रदेश की राजनीति में कब कौन किस पाले में चला जाए, इसकी गारंटी न दिल्ली दे सकती है, न लखनऊ का कोई सियासी पंडित। अब कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अजय राय को लेकर भी यही सवाल उठने लगा है कि क्या वह एक बार फिर भाजपा का दामन थाम सकते हैं? सवाल उठ रहा है कि जिस नेता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वाराणसी में बार-बार चुनौती दी, क्या वही नेता अब कांग्रेस में अपनी सियासी जमीन खिसकती देख पुराने घर की ओर लौटने का रास्ता तलाश रहे हैं? फिलहाल यह अटकल है। लेकिन प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी छिनने, नए नेतृत्व से तनातनी और लखनऊ कांग्रेस दफ्तर में जूते-चप्पल चलने के बाद इन चर्चाओं को हवा जरूर मिल गई है। वैसे कहावत है कि घर का भेदी लंका ढाए, लेकिन यूपी कांग्रेस का हाल देखिए, यहां लंका ढहाने के लिए विपक्ष को मशक्कत करने की जरूरत ही क्या है, जब अपने ही लोग एक-दूसरे से दो-दो हाथ करने को तैयार बैठे हों! हम आपको बता दें कि अजय राय को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाकर आराधना मिश्रा 'मोना' को जिम्मेदारी सौंप दी गई। नई व्यवस्था में इमरान मसूद को भी कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली। मगर संगठन में बदलाव का यह फैसला पुराने नेतृत्व और उसके समर्थकों के बीच सहज रूप से स्वीकार नहीं हुआ। अजय राय की नाराजगी की एक वजह यह भी बताई जा रही है कि उन्हें हटाने के तरीके से वह असहज थे। उन्हें लगता है कि उनकी भूमिका और राजनीतिक हैसियत को नजरअंदाज किया गया। इसे भी पढ़ें: 'यादवों की गुलामी छोड़ो', Asaduddin Owaisi ने Akhilesh Yadav पर सीधा हमला बोलते हुए UP के Muslims से कर दिया बड़ा आह्वान देखा जाये तो यूपी की राजनीति में पद केवल नाम के आगे लगने वाला तमगा नहीं होता। उसके साथ समर्थकों की फौज, टिकट की दावेदारी, संगठन पर पकड़ और भविष्य की सियासी संभावनाएं भी जुड़ी होती हैं। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी से उतरना किसी नेता के लिए महज जिम्मेदारी बदलना नहीं, अपने प्रभाव का हिसाब-किताब भी होता है। यही वजह है कि अब चर्चा चल रही है कि कांग्रेस उन्हें गुजरात जैसे किसी दूसरे राज्य में संगठनात्मक जिम्मेदारी देकर मनाने की कोशिश कर सकती है। दूसरी तरफ भाजपा में वापसी की संभावना भी सियासी गलियारों में तैर रही है। उल्लेखनीय है कि अजय राय 1996 से 2009 तक भाजपा में रहे और उसके टिकट पर तीन बार विधायक चुने गए थे। दूसरी ओर, लखनऊ के कांग्रेस मुख्यालय में जो हुआ, वह महज दो नेताओं के समर्थकों की कहासुनी मानकर टाल देने वाला मामला नहीं है। आराधना मिश्रा के पदभार ग्रहण समारोह के दौरान अजय राय और ममता चौधरी से जुड़े गुट आमने-सामने आ गए। विवाद रास्ता देने और अध्यक्ष को लेकर हुई टिप्पणी से शुरू हुआ बताया गया, लेकिन देखते ही देखते मामला धक्का-मुक्की और जूते-चप्पल तक पहुंच गया था। देखा जाये तो इस घटना ने यूपी कांग्रेस की एक पुरानी बीमारी को फिर उजागर कर दिया है। पार्टी में कार्यकर्ताओं से ज्यादा नेताओं की फौज दिखाई देती है। हर नेता को अपना खेमा चाहिए, हर खेमे को अपनी हैसियत चाहिए और हर हैसियत को संगठन में अपनी हिस्सेदारी चाहिए। सवाल यह है कि जब पार्टी कार्यालय में ही नेतृत्व की इज्जत और अनुशासन की हिफाजत नहीं हो पा रही, तो गांव-कस्बों में संगठन खड़ा करने की जिम्मेदारी कौन निभाएगा? एक ओर चुनाव सामने हैं दूसरी ओर ऐसे वक्त पर अगर पदभार ग्रहण समारोह में जूते चल रहे हैं, तो टिकट बंटवारे, जिला अध्यक्षों की नियुक्ति और चुनावी गठबंधन के वक्त यह खींचतान किस मुकाम पर पहुंचेगी इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है। यह आशंका निराधार नहीं है कि जैसे-जैसे 2027 का विधानसभा चुनाव नजदीक आएगा, कांग्रेस की गुटबाजी और जूतम-पैजार बढ़ सकती है। आने वाले दिनों में टिकट के दावेदार बढ़ेंगे, पदों की खींचतान तेज होगी और हर नेता अपने समर्थकों के साथ ताकत दिखाने की कोशिश करेगा। अगर कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने अभी से अनुशासन की स्पष्ट लक्ष्मण रेखा नहीं खींची, तो चुनावी तैयारी से ज्यादा ऊर्जा आपसी हिसाब चुकता करने में खर्च हो सकती है। साथ ही इस पूरे विवाद को केवल अजय राय बनाम नए नेतृत्व की लड़ाई बताकर खत्म नहीं किया जा सकता। ममता चौधरी ने आरोप लगाया है कि उनके साथ अभद्रता हुई और उन्हें धमकाया गया। उन्होंने अजय राय पर दलित विरोधी व्यवहार का आरोप भी लगाया है। दूसरी ओर, अजय राय ने भी ममता चौधरी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने पांच सदस्यीय जांच समिति बनाई है। इसकी कमान पूर्व प्रदेश अध्यक्ष बृजलाल खाबरी को दी गई है। समिति में अभिषेक दत्त, अब्दुल हन्नान, रवि वर्मा और शमीना शफीक भी शामिल हैं। देखा जाये तो यहां कांग्रेस नेतृत्व के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ पार्टी को नेताओं के बीच अनुशासन कायम करना है, दूसरी तरफ महिला और दलित कार्यकर्ताओं की शिकायतों को निष्पक्षता से सुनना है। यदि किसी नेता के प्रभाव के कारण शिकायत दबती है, तो संगठन के भीतर बराबरी और सम्मान के दावों पर सवाल उठेंगे। और यदि जांच से पहले ही किसी को दोषी ठहरा दिया जाता है, तो निष्पक्ष प्रक्रिया पर सवाल खड़े होंगे। साथ ही अजय राय की नाराजगी का एक पहलू समाजवादी पार्टी के साथ कांग्रेस के रिश्तों से भी जुड़ा बताया जा रहा है। पार्टी के भीतर ऐसी चर्चा है कि अखिलेश यादव के साथ बेहतर तालमेल बैठाने की कवायद में प्रदेश नेतृत्व बदलने का फैसला लिया गया। अजय राय के समाजवादी पार्टी के साथ रिश्ते सहज नहीं रहे, जबकि प्रमोद तिवारी और आराधना मिश्रा को गठबंधन के लिहाज से अपेक्षाकृत सुविधाजनक माना जाता है। इसके अलावा, सोमवार को दिल्ली में राहुल गांधी के आह्वान पर निकले कांग्रेस के विरोध मार्च में अजय राय की गैरमौजूदगी ने भी अटकलों को हवा दी। जब प्रदेश में संगठनात्मक बदलाव के बाद नाराजगी खुलकर सामने आ रही हो और पूर्व अध्यक्ष राष्ट्रीय कार्यक्रम से दूर रहें, तो सवाल उठना लाजिमी है कि मामला सिर्फ पद का है या राजनीतिक भविष्य का भी। हालांकि अजय राय के सामने पिंडरा विधानसभा सीट का अपना सियासी हिसाब भी है। वह वहां से अपनी दावेदारी को लेकर सक्रिय रहना चाहते हैं। ऐसे में गुजरात की जिम्मेदारी स्वीकार करना, यूपी में अपनी जमीन पर ध्यान देना या किसी दूसरे राजनीतिक विकल्प पर विचार करना, इन संभावनाओं के बीच उनकी अगली चाल पर सबकी नजर रहेगी। साथ ही यूपी कांग्रेस के सामने संकट केवल अजय राय की नाराजगी का नहीं है। संकट उस संगठनात्मक संस्कृति का है, जिसमें पद बदलते ही पुराने और नए नेतृत्व के बीच अविश्वास सिर उठाने लगता है। यदि हर बदलाव को प्रतिष्ठा की लड़ाई बना दिया जाएगा, तो संगठन का विस्तार कैसे होगा? और यदि हर असहमति समर्थकों की भिड़ंत में बदल जाएगी, तो आम कार्यकर्ता अपनी जगह कहां तलाशेगा? उत्तर प्रदेश में चुनावी राजनीति केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस, बयानबाजी और बड़े नेताओं की तस्वीरों से नहीं चलती। बूथ पर कार्यकर्ता चाहिए, गांव में भरोसा चाहिए और टिकट न मिलने पर भी संगठन के साथ खड़े रहने की राजनीतिक संस्कृति चाहिए। पार्टी कार्यालय में जूते-चप्पल चलना इसी कसौटी पर कांग्रेस के सामने असहज सवाल खड़ा करता है। बहरहाल, अजय राय भाजपा में लौटेंगे या कांग्रेस उन्हें कोई नई जिम्मेदारी देकर रोक लेगी, इसका जवाब आने वाला वक्त देगा। लेकिन कांग्रेस नेतृत्व के लिए इससे भी बड़ा सवाल है कि क्या वह नेताओं की महत्वाकांक्षाओं के बीच संगठन को बचा पाएगा? क्योंकि यूपी की सियासत में चुनाव से पहले नाराजगी कोई नई बात नहीं। नई बात तब होगी, जब कोई पार्टी अपने नेताओं को यह समझा सके कि संगठन की कुर्सी निजी जागीर नहीं और पार्टी कार्यालय अखाड़ा नहीं होता। कांग्रेस ने अगर अनुशासन को कायम करने के लिए तत्काल कदम नहीं उठाये तो 2027 की चुनावी बिसात बिछने तक कांग्रेस में विरोधियों से मुकाबले की तैयारी कम और अपनों से हिसाब बराबर करने की कवायद ज्यादा दिखाई दे सकती है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 13 Oct 2026 4:03 pm

राहुल गांधी के आरोपों पर बोले पीयूष गोयल, कांग्रेस ने तो CEC को मंत्री-राज्यपाल बनाया था

गोयल ने कहा कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने से पहले कांग्रेस को अपने शासनकाल के रिकॉर्ड पर नजर डालनी चाहिए। उनके मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने चुनाव आयोग को स्वतंत्र और स्वायत्त तरीके से काम करने का अवसर दिया है।

देशबन्धु 13 Oct 2026 3:48 pm

सुप्रीम कटघरे में अब CEC को मुकदमों से बचाने वाला 'अभयदान', क्या है धारा-16 का 'कवच' जिस पर SC करेगा सुनवाई?

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और भारत के चुनाव आयोग (ECI) को नोटिस जारी किया है। यह नोटिस एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की उस याचिका पर जारी किया गया है जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के पालन के दौरान किए गए कार्यों के लिए दी गई कानूनी छूट (सिविल और आपराधिक कार्यवाही से सुरक्षा) को चुनौती दी गई है। इस मामले को कोर्ट में पहले से लंबित याचिकाओं के साथ जोड़ दिया गया है और 29 अक्टूबर को उन याचिकाओं के साथ ही इस पर भी सुनवाई होनी है। इस चुनौती का मुख्य आधार 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' की धारा 16 है। इस प्रावधान के अनुसार, अदालतें किसी मौजूदा या पूर्व CEC या चुनाव आयुक्त के खिलाफ़ उनके आधिकारिक कर्तव्यों के पालन (या पालन करने के दावे) के दौरान किए गए किसी काम या कही गई किसी बात के लिए दीवानी या आपराधिक कार्यवाही शुरू या जारी नहीं रख सकतीं। इस चुनौती से देश के शीर्ष चुनाव अधिकारियों को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा के दायरे पर सवाल उठते हैं और यह भी कि क्या ऐसी छूट जवाबदेही और कानून के शासन के संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप है। विरोध से संशोधन तक: कैसे बनी धारा 16? जब सरकार ने 10 अगस्त 2023 को राज्यसभा में 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) विधेयक, 2023' पेश किया, तो इस कानून की चारों ओर आलोचना हुई। इस विधेयक से नियुक्तियों के मामले में सरकार को जो बेहिसाब दबदबा मिलने वाला था, उसके अलावा एक बात पर ज़ोरदार बहस हुई: यह विधेयक CEC और ECs को वेतन, भत्ते और सेवा की अन्य शर्तों के मामले में कैबिनेट सेक्रेटरी के बराबर लाने की कोशिश कर रहा था; जबकि पहले वे सुप्रीम कोर्ट के जजों के बराबर के स्तर पर थे। विपक्षी दलों ने उस बराबरी के दर्जे का मुद्दा उठाया जो CEC और ECs को सुप्रीम कोर्ट के जजों के बराबर मिला हुआ था, और जिसे प्रस्तावित कानून खत्म करना चाहता था। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों ने 16 सितंबर 2023 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक संयुक्त पत्र लिखकर चिंता जताई कि इस कदम से EC की प्रतिष्ठा और अधिकार कम होंगे और यह संकेत जाएगा कि CEC और ECs सिर्फ़ नौकरशाहों के बराबर हैं, उनसे बेहतर नहीं, जिससे नौकरशाही से उनके स्वतंत्र होने की धारणा पर बुरा असर पड़ेगा। आलोचना के बाद, सरकार ने बिल को कुछ समय के लिए रोक दिया और 2023 के शीतकालीन सत्र में कुछ अहम बदलावों के साथ इसे चर्चा और पास कराने के लिए पेश किया। 12 दिसंबर 2023 को, केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने राज्यसभा में बिल पर बहस शुरू करते हुए कहा कि सरकार बिल की धारा 15 में एक संशोधन ला रही है। इसका मकसद CEC और ECs को सैलरी और सर्विस की शर्तों के मामले में सुप्रीम कोर्ट के जजों के बराबर लाना है। उन्होंने सदन को बिल में एक और संशोधन के बारे में भी बताया, जो धारा 15A को जोड़ना था। इससे उन्हें बिना किसी रुकावट और आज़ादी से अपने काम करने में मदद मिलेगी। यह बिल 12 दिसंबर 2023 को राज्यसभा से और 21 दिसंबर 2023 को लोकसभा से पास हुआ। इसे 28 दिसंबर 2023 को राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिली। धारा 15A, 2023 के कानून में धारा 16 के तौर पर शामिल हुई। यह धारा अभी चर्चा में है, खासकर उस बड़े विवाद की वजह से जो CEC ज्ञानेश कुमार के कथित तौर पर एकतरफा फैसलों को लेकर खड़ा हुआ है। ये फैसले चुनावी रोल के बहुत विवादित 'स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न' (SIR) को कराने से जुड़े थे। 1. CEC एक्ट की धारा 16 ज्ञानेश कुमार को क्या सुरक्षा देती है? धारा 16 मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक काम करते समय किए गए, या कथित तौर पर किए गए कामों के लिए सिविल और आपराधिक कार्यवाही से सुरक्षा देती है। यह सुरक्षा उनके पद छोड़ने के बाद भी बनी रहती है। 2. क्या CEC के तौर पर लिए गए फैसलों के लिए ज्ञानेश कुमार पर मुकदमा चलाया जा सकता है? धारा 16 अदालतों को किसी सरकारी काम से जुड़ी सिविल या आपराधिक कार्यवाही पर विचार करने या उसे जारी रखने से रोकती है। सुप्रीम कोर्ट इस सुरक्षा के दायरे पर विचार कर रहा था; इस लेख में इस बात पर कोई अंतिम फैसला नहीं बताया गया है कि क्या कुमार पर मुकदमा चलाया जा सकता है। 3. विपक्षी पार्टियां ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई क्यों चाहती हैं? विपक्षी पार्टियों का आरोप है कि उन्होंने मतदाता सूची के 'स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न' (विशेष गहन संशोधन) के संबंध में एकतरफा फैसले लिए। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अन्य चुनाव आयुक्तों ने उन फैसलों और आदेशों पर आपत्ति जताई थी, जिनके बारे में उन्हें जानकारी नहीं थी। 4. क्या CEC एक्ट चुनाव आयुक्तों को जजों की तुलना में ज़्यादा सुरक्षा देता है? सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि धारा 16 के तहत जजों को मिलने वाली सुरक्षा से ज़्यादा कानूनी सुरक्षा मिल सकती है। लेख में बताया गया है कि जजेज़ (प्रोटेक्शन) एक्ट के तहत सरकार या कोर्ट के पास जजों के खिलाफ़ कुछ कार्रवाई करने का अधिकार सुरक्षित रहता है, जबकि CEC एक्ट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। 5. क्या सुप्रीम कोर्ट ने धारा 16 की वैधता पर कोई फ़ैसला सुनाया है? कोर्ट ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, CEC और दूसरे चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी किया है। इसमें धारा 16 पर किसी अंतिम फ़ैसले की बात नहीं कही गई है। इससे पहले 5 अक्तूबर 2026 को सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने 2023 के कानून के तहत चुनाव आयुक्तों की मिली कानूनी सुरक्षा को लेकर कहा कि यह तो संवैधानिक कोर्ट के जजों को भी प्राप्त नहीं है। सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर)को लेकर कथित मनमाने फैसले को लेकर डाली गई याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच की तरफ से ये गंभीर मौखिक टिप्पणी की गई थी। न्यायाधीश (संरक्षण) अधिनियम, 1985 (The Judges (Protection) Act, 1985) क्या है? केंद्र सरकार, राज्य सरकार, भारत के सर्वोच्च न्यायालय, किसी उच्च न्यायालय या किसी अन्य सक्षम प्राधिकारी को उस समय लागू किसी भी कानून के तहत किसी व्यक्ति (जो न्यायाधीश रहा हो या वर्तमान में न्यायाधीश हो) के खिलाफ उचित कार्रवाई (चाहे वह दीवानी, आपराधिक, विभागीय कार्यवाही या किसी अन्य रूप में हो) करने का अधिकार बना रहेगा। यह प्रावधान (कार्रवाई की छूट देने वाली यह धारा) CEC अधिनियम (मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम) में मौजूद नहीं है। इसे भी पढ़ें: 'फ़ोन ज़ब्त, वकील से मिलने की इजाज़त नहीं': दास और रांका को हिरासत में लिए जाने के बाद दिल्ली पुलिस पर CJP के आरोप CEC और ECs की नियुक्ति कैसे होती है? संविधान का अनुच्छेद 324 चुनावों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण की ज़िम्मेदारी भारत के चुनाव आयोग (ECI) को सौंपता है। अनुच्छेद 324(2) के अनुसार, संसद द्वारा बनाए गए किसी भी कानून के अधीन रहते हुए, राष्ट्रपति CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करते हैं। कई दशकों तक, संसद ने इन नियुक्तियों की प्रक्रिया तय करने वाला कोई कानून नहीं बनाया था। इसके कारण सुप्रीम कोर्ट के सामने यह सवाल उठा कि जब ECI के सदस्यों की नियुक्ति कार्यपालिका (सरकार) करती है, तो ECI की आज़ादी को कैसे बचाया जा सकता है। मार्च 2023 में, सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की संविधान पीठ ने 'अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ' मामले में अपना फ़ैसला सुनाया। अनूप बरनवाल मामला क्या था? जनवरी 2015 में अनूप बरनवाल ने एक जनहित याचिका (PIL) दायर की। उनका तर्क था कि ECI के सदस्यों की नियुक्ति की व्यवस्था असंवैधानिक है। उस समय, नियुक्तियाँ करने का अधिकार कार्यपालिका के पास था। PIL में कहा गया था कि समय के साथ ECI की आज़ादी कम हुई है। इसमें कोर्ट से अपील की गई कि वह ECI में नियुक्तियों के लिए एक स्वतंत्र, कॉलेजियम जैसी व्यवस्था बनाने का निर्देश दे। संविधान पीठ ने कहा कि जब तक संसद अनुच्छेद 324(2) के तहत कोई कानून नहीं बनाती, तब तक चुनाव आयोग में नियुक्तियां तीन सदस्यों वाली एक समिति की सिफारिश पर की जाएंगी। इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल होंगे। अदालत ने कहा कि यह व्यवस्था तब तक लागू रहेगी जब तक संसद इस विषय पर कोई कानून नहीं बना लेती। CEC को कैसे हटाया जा सकता है? संविधान CEC को पद से हटाने के मामले में काफी सुरक्षा देता है। अनुच्छेद 324(5) के अनुसार, CEC को पद से उसी तरह और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है। इसका मतलब है कि CEC को केवल साबित हो चुके दुर्व्यवहार या अक्षमता के आधार पर और सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने के लिए तय संसदीय प्रक्रिया के ज़रिए ही हटाया जा सकता है। संसद के दोनों सदनों में ज़रूरी विशेष बहुमत से पास होना चाहिए। संसद द्वारा प्रस्ताव पास किए जाने के बाद ही राष्ट्रपति CEC को हटाने का आदेश जारी कर सकते हैं। इसकी प्रक्रिया 'जजेज़ (इन्क्वायरी) एक्ट, 1968' में बताई गई है। दूसरे चुनाव आयुक्तों को मिलने वाली सुरक्षा अलग है। आर्टिकल 324(5) के तहत, किसी चुनाव आयुक्त या क्षेत्रीय आयुक्त को CEC की सिफ़ारिश के बिना उनके पद से नहीं हटाया जा सकता। इसे भी पढ़ें: Piyush Goyal ने Rahul Gandhi से पूछे 10 सवाल, वोट चोरी पर सबूत देने की दी चुनौती क्या CEC को गिरफ़्तार किया जा सकता है? इससे संबंधित प्रावधान 2023 के अधिनियम की धारा 16 है। यह धारा किसी भी ऐसे व्यक्ति को अदालत में दीवानी या आपराधिक कार्यवाहियों से सुरक्षा प्रदान करती है, जो CEC या चुनाव आयुक्त रहा हो या वर्तमान में हो। बशर्ते वह कृत्य, बात या शब्द उसने अपने आधिकारिक कर्तव्य या कार्य के निर्वहन के दौरान किया या कहा हो। यह प्रावधान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सुरक्षा उन व्यक्तियों तक भी बढ़ाता है जो CEC या चुनाव आयुक्त हैं या कभी रहे थे। हालांकि, धारा 16 स्पष्ट रूप से यह नहीं कहती कि CEC को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। यह केवल यह कहती है कि अदालतें इस धारा के दायरे में आने वाले आचरण के संबंध में कोई दीवानी या आपराधिक कार्यवाही स्वीकार या जारी नहीं रखेंगी। इस धारा में गिरफ्तारी (Arrest), जांच (Investigation) या पुलिस हिरासत (Police Custody) जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया गया है। इसलिए, इसे गिरफ्तारी से सीधी या पूर्ण छूट नहीं कहा जा सकता। इसके अलावा, यह सुरक्षा केवल उन्हीं कृत्यों से जुड़ी है जो आधिकारिक कर्तव्यों या कार्यों के निर्वहन के दौरान किए गए हों। 2023 से पहले क्या व्यवस्था थी? पुराना कानून (1991 का एक्ट): 2023 से पहले चुनाव आयोग Act, 1991 से संचालित होता था। इस 1991 के कानून में आयुक्तों के खिलाफ कोर्ट केस या आपराधिक कार्रवाई पर रोक लगाने वाली ऐसी कोई 'धारा 16' या कोई इम्युनिटी क्लॉज नहीं था। सामान्य लोक सेवकों वाला नियम (CrPC धारा 197): पहले चुनाव आयुक्तों को अन्य सरकारी अफसरों की तरह ही माना जाता था।उन पर आधिकारिक ड्यूटी से जुड़े मामले में केस चलाने के लिए CrPC की धारा 197 के तहत सरकार की पूर्व अनुमति की जरूरत होती थी। यानी कोर्ट जाने पर पूरी तरह कानूनी रोक नहीं थी, सिर्फ सरकार की मंजूरी की शर्त थी। संविधान (अनुच्छेद 324):सविधान ने CEC को केवल पद से हटाने की सुरक्षा दी थी कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह महाभियोग जैसी प्रक्रिया से ही हटाया जा सकता है। लेकिन संविधान के तहत उन्हें राष्ट्रपति या राज्यपाल (अनुच्छेद 361) की तरह मुकदमों से कानूनी छूट नहीं दी गई थी। 2023 के कानून ने क्या बदल दिया? 2023 के नए एक्ट की धारा 16 में साफ लिख दिया गया कि CEC या ECs द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्य के दौरान किए गए किसी भी काम या फैसले के खिलाफ अदालत कोई भी सिविल या क्रिमिनल केस स्वीकार ही नहीं करेगी।

प्रभासाक्षी 13 Oct 2026 3:40 pm

छत्तीसगढ़ दौरे के दौरान बस्तर के दशहरा उत्सव में शामिल होंगी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु

छत्तीसगढ़ दौरे के दौरान बस्तर के दशहरा उत्सव में शामिल होंगी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु

समाचार नामा 13 Oct 2026 3:14 pm

'यादवों की गुलामी छोड़ो', Asaduddin Owaisi ने Akhilesh Yadav पर सीधा हमला बोलते हुए UP के Muslims से कर दिया बड़ा आह्वान

उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 का चुनाव अभी कुछ समय दूर है, लेकिन शह-मात का खेल अभी से गरमाने लगा है। समाजवादी पार्टी के दरवाजे पर गठबंधन की उम्मीद लेकर पहुंचे असदुद्दीन ओवैसी को जब अखिलेश यादव ने भाव नहीं दिया, तो AIMIM प्रमुख ने आजमगढ़ की धरती से ऐसा सियासी तीर छोड़ा, जिसका निशाना सीधे लाल टोपी और मुलायम-अखिलेश की मुस्लिम राजनीति पर जा लगा। ओवैसी ने मुसलमानों से यादव परिवार की ‘गुलामी’ छोड़कर अपनी सियासी रहनुमाई खुद करने का आह्वान कर दिया। यानी गठबंधन की मेज पर जगह नहीं मिली, तो अब सियासी मैदान में हिस्सेदारी का हिसाब मांगा जाएगा! देखा जाये तो ओवैसी का हमला महज जुबानी जंग नहीं, बल्कि उस मुस्लिम वोट बैंक पर दावेदारी की खुली घोषणा है, जिसे समाजवादी पार्टी लंबे समय से अपनी सियासी ताकत का अहम हिस्सा मानती रही है। ओवैसी का आरोप है कि मुलायम सिंह यादव से लेकर अखिलेश यादव तक, मुस्लिम समाज ने पीढ़ियों तक सपा का साथ दिया, लेकिन बदले में उसे अपने दम पर नेतृत्व खड़ा करने का पर्याप्त मौका नहीं मिला। ओवैसी का सवाल साफ है कि अगर वोट मुसलमानों का, मेहनत मुसलमानों की और सत्ता की सीढ़ी मुसलमानों के समर्थन से तैयार होती है, तो फिर नेतृत्व के दरवाजे पर ताला क्यों? इसे भी पढ़ें: बुआ मायावती ने भतीजे आकाश आनंद को वापस बुलाया या राजनीतिक जाल में फंसा दिया? यही वह सवाल है, जो अखिलेश यादव के लिए सियासी सिरदर्द बन सकता है। क्योंकि यूपी की राजनीति में वोट का गणित सिर्फ जातियों की गिनती से नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी से भी तय होता है। ओवैसी इसी हिस्सेदारी के मुद्दे को हथियार बनाकर सपा के उस मजबूत सामाजिक समीकरण में सेंध लगाने की तैयारी में हैं, जिसके सहारे अखिलेश 2027 में बीजेपी को चुनौती देने का सपना देख रहे हैं। साथ ही आजमगढ़ को लेकर ओवैसी ने अखिलेश को घेरने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। शिब्ली नेशनल कॉलेज को विश्वविद्यालय का दर्जा न मिलने, शिब्ली अकादमी को कथित तौर पर महज पांच लाख रुपये देने, खराब सड़कों, बंद पड़े हवाई अड्डे और महंगी शिक्षा का सवाल उठाकर उन्होंने सपा के विकास के दावों पर चोट की। साथ ही उन्होंने यह भी तंज कसा कि जब आजमगढ़ में सपा के दो सांसद, दस विधायक और जिला पंचायत अध्यक्ष तक पार्टी के हैं, तो जमीन पर विकास की तस्वीर इतनी बदहाल क्यों है? देखा जाये तो सवाल स्थानीय है, लेकिन निशाना सीधे अखिलेश की सियासी साख पर है। उधर, योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव के अयोध्या से चुनाव लड़ने की चुनौती पर ओवैसी ने दोनों को क्रमशः संभल और गोरखपुर से उतरने की नसीहत देकर राजनीतिक अखाड़े में नया दांव चल दिया। साथ ही मोदी और योगी सरकार पर मुठभेड़ों, बुलडोजर कार्रवाई और मुसलमानों के घरों-दुकानों पर कार्रवाई को लेकर हमला बोलते हुए उन्होंने खुद को मुस्लिम अधिकारों की मुखर आवाज के रूप में पेश किया। लेकिन इस पूरी लड़ाई का असली सवाल यही है कि क्या ओवैसी मुस्लिम समाज के भीतर स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व खड़ा कर पाएंगे, या उनका वोट काटने वाला चेहरा होने का आरोप ही उनके रास्ते की सबसे बड़ी बाधा बनेगा? इसमें कोई दो राय नहीं कि सपा के साथ गठबंधन की कोशिश नाकाम होने के बाद ओवैसी के सामने अपनी ताकत साबित करने की चुनौती है। वहीं अखिलेश के सामने यह भरोसा कायम रखने की परीक्षा है कि उनका सामाजिक गठबंधन सिर्फ चुनाव जीतने का समीकरण नहीं, बल्कि सत्ता में भागीदारी का भी रास्ता है। देखा जाये तो यूपी में 2027 की जंग अभी शुरू नहीं हुई है, मगर मुस्लिम वोटों की चौसर बिछ चुकी है। ओवैसी ने चाल चल दी है, अखिलेश को जवाब देना है और बीजेपी इस खींचतान का सियासी फायदा उठाने की ताक में रहेगी। आखिरकार, चुनाव में न नारा अकेले जीतता है, न आरोप, जीतता वही है, जिसके साथ जनता का भरोसा, संगठन की ताकत और वोटों का ठोस गणित होता है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 13 Oct 2026 2:21 pm

एआई बूम ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को बांटा: आईएमएफ

वॉशिंगटन, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने मंगलवार को कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) में तेजी से बढ़ रहे निवेश और मध्य पूर्व में जारी युद्ध के कारण दुनिया की अर्थव्यवस्था दो हिस्सों में बंटती नजर आ रही है।

देशबन्धु 13 Oct 2026 2:20 pm

'संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाना राहुल गांधी की आदत', इंडिया ब्लॉक के प्रदर्शन पर एनडीए नेताओं का पलटवार

'संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाना राहुल गांधी की आदत', इंडिया ब्लॉक के प्रदर्शन पर एनडीए नेताओं का पलटवार

समाचार नामा 13 Oct 2026 2:16 pm

'बिमोल अकोइजम संसद में रहने लायक नहीं', जेएनयू कांड को लेकर राष्ट्रपति से मिलेंगी भाजपा की महिला सांसद

'बिमोल अकोइजम संसद में रहने लायक नहीं', जेएनयू कांड को लेकर राष्ट्रपति से मिलेंगी भाजपा की महिला सांसद

समाचार नामा 13 Oct 2026 2:04 pm

राहुल गांधी को महादेव के बारे में कुछ नहीं पता, इसी कारण राजनीतिक तमाशे को 'शिव तांडव' से जोड़ा : राम कदम

राहुल गांधी को महादेव के बारे में कुछ नहीं पता, इसी कारण राजनीतिक तमाशे को 'शिव तांडव' से जोड़ा : राम कदम

समाचार नामा 13 Oct 2026 2:00 pm

चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्ष की याचिका पर कांग्रेस नेता बोले-'लोकतंत्र की रक्षा के लिए जारी रहेगा संघर्ष'

चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्ष की याचिका पर कांग्रेस नेता बोले-'लोकतंत्र की रक्षा के लिए जारी रहेगा संघर्ष'

समाचार नामा 13 Oct 2026 1:53 pm

IMF का अनुमान: भारत की GDP ग्रोथ 7% रहेगी, दुनिया की आर्थिक रफ्तार से दोगुने से ज्यादा

IMF ने भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान वित्त वर्ष 2026-27 के लिए बढ़ाकर 7% किया। जानिए वैश्विक विकास दर, AI निवेश और अर्थव्यवस्था के सामने मौजूद चुनौतियां।

देशबन्धु 13 Oct 2026 10:30 am

संजय सिंह की कोर्ट में बढ़ी टेंशन! गवाही पूरी, अब 17 अक्टूबर को होगी आर-पार की बहस

उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर जिले में आदर्श आचार संहिता उल्लंघन के मामले में आम आदमी पार्टी (आप) सांसद संजय सिंह समेत 12 आरोपियों के खिलाफ विचाराधीन केस में गवाही पूरी हो गई है

देशबन्धु 13 Oct 2026 7:40 am

अमित शाह टिप्पणी मामला: राहुल गांधी की मुश्किलें बढ़ेंगी या मिलेगी राहत? आज कोर्ट में सुनवाई

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और रायबरेली सांसद राहुल गांधी के खिलाफ चल रहे मानहानि मामले में आज 13 अक्टूबर को सुनवाई होगी

देशबन्धु 13 Oct 2026 7:37 am

दुर्गा पूजा से पहले पश्चिम बंगाल में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल, 4 आईएएस अधिकारियों का तबादला

दुर्गा पूजा से पहले पश्चिम बंगाल में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल, 4 आईएएस अधिकारियों का तबादला

समाचार नामा 13 Oct 2026 12:00 am

'EVM खराब है तो सरकार भी छोड़ो'... राहुल गांधी पर हिमंता बिस्वा सरमा का बड़ा हमला

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को चुनौती दी कि अगर उन्हें वाकई लगता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव सुनिश्चित नहीं कर सकते, तो वे विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों की सरकारों से इस्तीफा मांगें और चुनाव बहिष्कार की घोषणा करें।

देशबन्धु 12 Oct 2026 11:13 pm

SIR पर महासंग्राम! राहुल गांधी विपक्षी फौज के साथ Supreme Court पहुंचे, चुनाव आयोग पर बड़ा हमला

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है

देशबन्धु 12 Oct 2026 11:01 pm

'सीजेआई के पास इंडिया गठबंधन से मिलने का समय नहीं', सपा प्रवक्ता अमीक जामेई का दावा

'सीजेआई के पास इंडिया गठबंधन से मिलने का समय नहीं', सपा प्रवक्ता अमीक जामेई का दावा

समाचार नामा 12 Oct 2026 10:24 pm

'देश में अराजकता फैलाना विपक्ष का लक्ष्य', राहुल गांधी के मार्च पर भाजपा नेता का आरोप

'देश में अराजकता फैलाना विपक्ष का लक्ष्य', राहुल गांधी के मार्च पर भाजपा नेता का आरोप

समाचार नामा 12 Oct 2026 9:58 pm

ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर गांधी मैदान से राजभवन तक मार्च: संदीप सौरव

ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर गांधी मैदान से राजभवन तक मार्च: संदीप सौरव

समाचार नामा 12 Oct 2026 6:27 pm

मध्य प्रदेश: मुख्यमंत्री मोहन यादव का स्कूली बच्चों से संवाद

मध्य प्रदेश: मुख्यमंत्री मोहन यादव का स्कूली बच्चों से संवाद

समाचार नामा 12 Oct 2026 6:12 pm

पेयजल के बिना कैसे पूरा होगा विकसित भारत का सपना

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने सार्वजनिक जीवन के 25 साल पूरे होने पर आयोजित कार्यक्रम को एक घंटे तक संबोधित करते हुए कहा कि जब तक भारत विकसित नहीं होता, तब तक न थकूंगा, न रुकूंगा। इस नारे का 19 बार जिक्र किया। उन्होंने कहा कि भारत को 2047 तक हर हालत में विकसित देश बनाना है। निश्चित तौर पर भारत को विकसित देश बनना ही चाहिए। सवाल यह है कि क्या तब तक भारत के करोड़ों लोग प्यासे रहेंगे। उन्हें पर्याप्त और शुद्ध पानी के लिए क्या भारत के विकसित होने तक इंतजार करना पड़ेगा। क्या देश के लोगों की प्यास और दूषित पेयजल से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं को तब तक के लिए रोका जा सकता है। विकसित भारत का सपना देखने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन इससे पहले केंद्र और राज्यों की सरकारों का यह खुलासा करना चाहिए कि देश के लोगों को गुणवत्तायुक्त पर्याप्त पीने का पानी कब तक उपलब्ध हो जाएगा। इसके लिए देश की राष्ट्रीय नीति क्या है। इस मुद्दे पर कोई बोलने को तैयार नहीं है। इस बारे में चर्चा करते ही देश के विकास और विकसित भारत के सपने पर सवालिया निशान लग जाते हैं। देश के सत्तारुढ़ दलों और विपक्षी दलों के नेता ऐसे जमीनी जरूरतों के मुद्दों से मुंह चुराते हैं। पेयजल जैसी समस्याओं से निपटने के लिए सरकारों के पास दूरदृष्टि और योजनाएं नहीं हैं। यदि लगातार एक या दो बार देश में मानसून मेहरबान न हो तो देश में पीने के पानी का हाहाकार मचने लगता है। इसे भी पढ़ें: Maharashtra Drought: सूखा प्रभावित क्षेत्रों के लिए 8 महीने की योजना बनाएगी सरकार, केंद्र से मांगेगी राहत देश में पेयजल संकट अभी से गहराने लगा, जबकि अभी मानसून की विदाई हुई है। महाराष्ट्र में राज्य सरकार ने 16 अक्टूबर से सभी शहरी और ग्रामीण स्थानीय निकायों में कम से कम 10 प्रतिशत जल कटौती लागू करने का निर्णय लिया है। राज्य के जालना जिले में बांध में केवल 2 प्रतिशत पानी बचा है। नौबत यहां तक आ गई है कि प्रशासन को पानी की चोरी रोकने के लिए पुलिस और राजस्व विभाग की टीमों के साथ रात में भी निगरानी और गश्त करनी पड़ रही है। इस बार मानसून में बारिश की करीब 12—13 प्रतिशत की कमी के कारण देश के दूसरे राज्यों की हालत भी महाराष्ट्र जैसी होने से इंकार नहीं किया जा सकता। देश के कई राज्यों में कम बारिश का असर अब जलाशयों पर दिख रहा है। 1 अक्टूबर तक देश के प्रमुख जलाशयों में 71.84% पानी था। पिछले साल इसी समय यह 90.31% था, जबकि सामान्य स्तर 81.79% है। अर्थात इस बार जलाशयों में पानी पिछले साल के मुकाबले काफी कम है। देशभर में इस बार का मानसून 13वां सबसे सूखा सीजन रहा। पिछले 11 सालों में यह सबसे कम बारिश वाला मानसून रहा है। हालांकि, सीजन खत्म होने से पहले हुई तेज बारिश के कारण बारिश की कमी में 2.5% का सुधार हुआ। मानसून-2026 सीजन सामान्य से 12.6% कम बारिश के साथ खत्म हुआ। देश के 43% जिलों में 20 से 72% तक कम बारिश हुई। सबसे ज्यादा पंजाब में 41% कम बारिश हुई। राजस्थान में करीब 22% कमी दर्ज की गई। इनके अलावा 9 राज्यों में भी औसत से कम बारिश हुई। पूर्वी भारत में ओडिशा में सामान्य से 30% ज्यादा बारिश हुई, जबकि बारिश के लिए प्रसिद्ध पूर्वोत्तर राज्यों में इस साल 1901 के बाद सबसे कम बारिश दर्ज की गई। पानी की कमी का असर महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, राजस्थान और तमिलनाडु में ज्यादा दिख रहा है। कई इलाकों में खेती के लिए पानी कम पड़ रहा है और फसलों को भी नुकसान हो रहा है। आजादी के साठ वर्षो के बाद भी देश की एक तिहाई जनता को पीने के लिए स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है। शायद यही कारण है कि प्रतिवर्ष जल जनित बीमारियों के चलते 15 लाख बच्चे काल के गाल में समा जाते है और काम के अनगिनत घंटों का नुकसान होता है। समस्या यह है कि केंद्र एवं राज्य सरकारें पेयजल संकट को दूर करने के लिए गंभीर नहीं, जबकि वे इससे परिचित है कि आने वाले समय में पानी के लिए युद्ध छिड़ सकते है। भारत में पेयजल संकट बढ़ती आबादी और कृषि की जरूरतों के कारण भी गंभीर होता जा रहा है। करीब 65-70 प्रतिशत जल कृषि कार्यो में खप जाता है। इसके अतिरिक्त उद्योगों के संचालन में भी जल का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। विडंबना यह है कि न तो उद्योग एवं कृषि क्षेत्र को अपनी आवश्यकता भर पानी उपलब्ध हो पा रहा है और न ही आम आदमी को। हमारे देश में जल संकट जब-तब गंभीर रूप ले लेता है। बात चाहे कावेरी जल विवाद के कारण तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच की तनातनी की हो अथवा यमुना जल के बंटवारे को लेकर दिल्ली एवं हरियाणा के बीच की, ऐसे विवाद लगातार बढ़ते जा रहे है। अब तो जल बंटवारे को लेकर राजनीति भी होने लगी है और एक प्रांत के लोगों को दूसरे प्रांत के लोगों के समक्ष खड़ा करने में संकोच नहीं किया जा रहा है। इन दिनों होगेंक्काल पेयजल परियोजना को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच यही हो रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार देश के 60 करोड़ लोग पानी की किल्लत से जूझ रहे हैं जबकि 16 करोड़ लोग गंदा पानी पी रहे हैं। शुद्ध पानी के लिए सरकार करोड़ों-अरबों रुपये खर्च कर रही है, लेकिन हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। देश के करीब 9 राज्यों में पानी की गुणवत्ता खराब है। नीति आयोग की कंपोजिट वॉटर मैनेजमेंट इंडेक्स रिपोर्ट में बताया गया कि भारत में पानी की वजह से हर साल दो लाख लोगों की मौत हो रही है। साल 2030 तक ये स्‍थ‍िति‍ और विकराल हो जाएगी जब देश की लगभग 40 फीसदी आबादी के सामने पानी का संकट होगा। विकसित भारत के 2047 के लक्ष्य तक देश में पेयजल की हालत का तो आकलन ही नहीं किया गया है। यूनाइटेड स्टेट्स जियोलॉजिकल सर्वे के वैश्विक स्तर पर कुल पानी की सालाना निकासी या खपत के मामले में भारत पहले पायदान नंबर-1 पर है। अत्यधिक आबादी और कृषि (सिंचाई) के कारण सबसे आगे है। वैश्विक जल गुणवत्ता सूचकांक में भारत 122 देशों में से 120वें स्थान पर है। सुरक्षित पेयजल और जल गुणवत्ता के मामले में भारत की गिनती दुनिया के सबसे निचले स्तर के देशों में होती है। पेयजल से लेकर जल संरक्षण की योजनाओं पर अत्यंत शिथिलता बरती जा रही है। दो वर्ष पूर्व आम बजट में ऐसी योजनाओं के लिए तमाम प्रावधान किए गए थे, लेकिन इस बजट में वे सिरे से गायब है। देश को विकसित राष्ट्र बनाने में जल संसाधन का उतना ही महत्व है जितना ऊर्जा और अन्य साधनों का। जब तक ऐसी बुनियादी सुविधाओं का समाधान नहीं होगा, तब तक विकसित राष्ट्र का सपना एक छलावा ही साबित होगा। - योगेन्द्र योगी

प्रभासाक्षी 12 Oct 2026 5:45 pm

भाजपा सांसद ने खुले पत्र के जरिए सपा प्रमुख से पूछे सवाल, समाजवादी आंदोलन के कार्यकर्ताओं को हिस्सेदारी देने पर मांगा जवाब

भाजपा सांसद ने खुले पत्र के जरिए सपा प्रमुख से पूछे सवाल, समाजवादी आंदोलन के कार्यकर्ताओं को हिस्सेदारी देने पर मांगा जवाब

समाचार नामा 12 Oct 2026 5:24 pm

भारत में सितंबर में खुदरा महंगाई 5.54 प्रतिशत रही

नई दिल्ली, भारत में सितंबर 2026 में खुदरा महंगाई सालाना आधार पर बढ़कर 5.54 प्रतिशत (प्रोविजनल) हो गई है।

देशबन्धु 12 Oct 2026 4:45 pm

'ये लोग अब संवैधानिक संस्थाओं से लड़ रहे हैं', भाजपा नेता ने कांग्रेस पर साधा निशाना

'ये लोग अब संवैधानिक संस्थाओं से लड़ रहे हैं', भाजपा नेता ने कांग्रेस पर साधा निशाना

समाचार नामा 12 Oct 2026 4:27 pm

वैश्विक अस्थिरता बढ़ने से भारतीय शेयर बाजार लाल निशान में बंद

मुंबई, भारतीय शेयर बाजार सोमवार के कारोबारी सत्र में लाल निशान में बंद हुआ।

देशबन्धु 12 Oct 2026 4:26 pm

सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इंडिया ब्लॉक का सुप्रीम कोर्ट मार्च, राहुल-खड़गे समेत कई नेता शामिल

सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इंडिया ब्लॉक का सुप्रीम कोर्ट मार्च, राहुल-खड़गे समेत कई नेता शामिल

समाचार नामा 12 Oct 2026 4:02 pm

वित्तीय सेवा क्षेत्र में 2026 की तीसरी तिमाही में दोगुने से अधिक बढ़कर 7.3 अरब डॉलर रहा

नई दिल्ली, भारत के वित्तीय सेवा क्षेत्र में 2026 की तीसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर) में 7.3 अरब डॉलर के 67 सौदे दर्ज किए गए।

देशबन्धु 12 Oct 2026 3:48 pm

गोल्ड ईटीएफ में निवेश 71 प्रतिशत से अधिक बढ़कर 4,451 करोड़ रुपए हुआ

नई दिल्ली, एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया (एम्फी) की ओर से सोमवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, सितंबर में गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) में शुद्ध निवेश अगस्त के 2,597 करोड़ रुपए से महीने-दर-महीने आधार पर 71.4 प्रतिशत बढ़कर सितंबर में 4,451 करोड़ रुपए हो गया है। यह दिखाता है कि सोने की ओर लोगों का रुझान बढ़ रहा है।

देशबन्धु 12 Oct 2026 3:24 pm

जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन पर रोक को लेकर सौरव दास और आशुतोष रांका बोले-'यह अस्वीकार्य, पीछे नहीं हटेंगे'

जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन पर रोक को लेकर सौरव दास और आशुतोष रांका बोले-'यह अस्वीकार्य, पीछे नहीं हटेंगे'

समाचार नामा 12 Oct 2026 3:15 pm

कांग्रेस के सुप्रीम कोर्ट तक मार्च पर भाजपा नेता बोले-'इनके खिलाफ अवमानना का केस चलना चाहिए'

कांग्रेस के सुप्रीम कोर्ट तक मार्च पर भाजपा नेता बोले-'इनके खिलाफ अवमानना का केस चलना चाहिए'

समाचार नामा 12 Oct 2026 3:11 pm

Jio IPO को नुकसान पहुँचाने के लिए Elon Musk ने चला बड़ा दाँव, Mukesh Ambani का पलटवार Starlink को पड़ सकता है भारी

स्टारलिंक के मालिक एलन मस्क का दुस्साहस बढ़ता ही चला जा रहा है। भारतीय उद्योगपति और रिलायंस इंडस्ट्रीज के मालिक मुकेश अंबानी पर सोशल मीडिया के जरिये निशाना साधने के बाद अब जियो के प्रस्तावित आईपीओ से ठीक पहले एलन मस्क ने तीखे बयान दिये हैं। जिन्हें भारतीय बाजार में अपनी एंट्री के लिए दबाव बनाने और रिलायंस के खिलाफ माहौल तैयार करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। गौरतलब है कि एलन मस्क ने आरोप लगाया है कि भारत में कुछ प्रभावशाली कारोबारी हित उनकी कंपनी स्टारलिंक का रास्ता रोक रहे हैं। साथ ही, उन्होंने भारत में सस्ती सैटेलाइट इंटरनेट सेवा देने का वादा किया है। हालांकि, सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि जियो और भारती समर्थित वनवेब भी जरूरी मंजूरियों के लिए लंबे समय से इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मस्क के आरोप तथ्यों पर आधारित हैं या जियो के आईपीओ से पहले प्रतिस्पर्धा को लेकर एकतरफा नैरेटिव बनाने की कोशिश की जा रही है? उल्लेखनीय है कि मस्क ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर दावा किया कि भारत में कुछ प्रभावशाली कारोबारी हित स्टारलिंक की एंट्री रोककर अपने एकाधिकार को बचाना चाहते हैं। उन्होंने अंबानी पर भी निशाना साधते हुए प्रतिस्पर्धा की अनुमति देने की बात कही। साथ ही वादा किया कि भारत में स्टारलिंक की सेवा सस्ती रखी जाएगी, क्योंकि महंगी सेवा होने पर ग्राहक उसे नहीं अपनाएंगे। मस्क का तर्क है कि प्रतिस्पर्धा से भारतीय उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प मिलेंगे, भले ही इससे अंबानी के मुनाफे पर दबाव पड़े। इसे भी पढ़ें: एलन मस्क प्रकरण, विदेशी मुख के शंख न बनें राहुल गांधी लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत में स्टारलिंक की व्यावसायिक शुरुआत में देरी के लिए वास्तव में जियो या अंबानी जिम्मेदार हैं? दूरसंचार विभाग (DoT) के रिकॉर्ड पर आधारित रिपोर्ट इस दावे की दूसरी तस्वीर पेश करती है। रिपोर्ट के मुताबिक, जियो सैटेलाइट कम्युनिकेशंस और भारती समर्थित वनवेब ने स्टारलिंक से पहले अपनी सुरक्षा और तकनीकी अनुपालन संबंधी प्रक्रियाएं पूरी कर ली थीं। जियो ने 20 मार्च 2025 को अपना सुरक्षा एवं तकनीकी प्रदर्शन पूरा किया, जबकि वनवेब ने 2025 की दूसरी छमाही में यह प्रक्रिया पूरी की। स्टारलिंक का प्रदर्शन 2026 की शुरुआत में हुआ। ऐसे में यह कहना कि केवल भारतीय प्रतिस्पर्धियों के प्रभाव के कारण स्टारलिंक को रोका जा रहा है, यह सरासर गलत है। देखा जाये तो लाइसेंस और मंजूरी की समयरेखा भी इस बहस को समझने में मदद करती है। वनवेब को अगस्त 2021 में दूरसंचार विभाग से आशय-पत्र मिला और अप्रैल 2022 में उसे जीएमपीसीएस लाइसेंस मिला। जियो ने नवंबर 2021 में लाइसेंस के लिए आवेदन किया और अक्टूबर 2022 में प्राधिकरण हासिल किया। इसके विपरीत, स्टारलिंक को जीएमपीसीएस लाइसेंस 6 जून 2025 को मिला। यानी भारतीय कंपनियां इस प्रक्रिया में पहले से मौजूद थीं, फिर भी उनकी सेवाएं व्यावसायिक रूप से शुरू नहीं हो सकी हैं। तीनों कंपनियों को अंतिम सुरक्षा मंजूरी और स्पेक्ट्रम आवंटन की प्रतीक्षा है। यदि जियो और वनवेब को बाजार में स्टारलिंक को रोकने के लिए विशेष सुविधा मिल रही होती, तो सवाल उठाए जा सकते थे। इसके अलावा, सैटेलाइट इंटरनेट का मामला सामान्य दूरसंचार सेवा से अलग है। इसके नेटवर्क की पहुंच सीमाओं से परे हो सकती है, इसलिए नेटवर्क की निगरानी, वैध अवरोधन और भारतीय कानूनों के अनुपालन जैसे विषय महत्वपूर्ण हैं। सुरक्षा संबंधी शर्तें पूरी होने के बाद ही स्पेक्ट्रम आवंटन और व्यावसायिक परिचालन का रास्ता साफ हो सकता है। हम आपको यह भी बता दें कि केंद्र सरकार ने मस्क के भेदभाव के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि नियामकीय ढांचा निष्पक्ष और गैर-भेदभावपूर्ण है। दूरसंचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी स्पष्ट किया है कि कंपनियां जरूरी सुरक्षा और नियामकीय शर्तें पूरी करने के बाद ही सेवाएं शुरू कर सकती हैं। देखा जाये तो भारत के लिए इस मामले में प्राथमिकता किसी कारोबारी घराने के हितों की रक्षा करना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा का वातावरण तैयार करना होना चाहिए। स्टारलिंक को भी अन्य कंपनियों की तरह समान नियमों का पालन करना होगा। केवल वैश्विक प्रतिष्ठा, तकनीकी क्षमता या बाजार में निवेश की इच्छा के आधार पर सुरक्षा संबंधी शर्तों में छूट नहीं दी जा सकती। अब सवाल उठता है कि जियो के आईपीओ पर कितना असर पड़ेगा? हम आपको बता दें कि जियो प्लेटफॉर्म्स 106 अरब डॉलर के मूल्यांकन को लक्ष्य बनाकर अपना आईपीओ लाने की तैयारी में है। ऐसे समय में मस्क का अंबानी पर सार्वजनिक हमला और सस्ती स्टारलिंक सेवा का वादा बाजार में चर्चा पैदा कर रहा है। लेकिन निवेशकों के लिए एलन मस्क के बयान की बजाय जियो कंपनी की वित्तीय स्थिति, विकास की संभावनाएं, प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति और नियामकीय जोखिम जैसे कई कारक महत्वपूर्ण होंगे। इसी तरह, स्टारलिंक की भारतीय बाजार में वास्तविक चुनौती उसकी कीमत, कवरेज, सेवा की गुणवत्ता और आवश्यक मंजूरियां मिलने पर निर्भर करेगी। बहरहाल, भारत में कारोबार करने की इच्छा रखने वाली किसी भी विदेशी कंपनी का स्वागत प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ता हितों के आधार पर होना चाहिए, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा की शर्तों के साथ। मस्क की बयानबाजी से मंजूरी की प्रक्रिया तेज हो या न हो, उसका फैसला नियमों और तथ्यों के आधार पर ही होना चाहिए। जियो और वनवेब के इंतजार का रिकॉर्ड यह भी बताता है कि मामला केवल स्टारलिंक बनाम अंबानी का नहीं, बल्कि भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के लिए सुरक्षा, नियमन और समान अवसर सुनिश्चित करने का है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 12 Oct 2026 2:31 pm

संतोष मूरत की 'साहब, मैं ज़िंदा हूँ' वाली तख्ती से गृह मंत्रालय के ताले तक, जंतर-मंतर की अनकही कहानी

कागज़ पर मरा हुआ एक इंसान जब खुद के ज़िंदा होने की सनद मांगने देश की चौखट पर आया, तो उसने जंतर मंतर के फुटपाथ को अपना ठिकाना बनाया। हाथों में मैं जिंदा हूं साहब वाली तख्ती और कड़कड़ाती ठंड में सीने से चिपका हुआ एक लावारिस भूरा कुत्ता। मानो मुंशी प्रेमचंद की पूस की रात का हल्कू और जबरा, दिल्ली के दिल में सालों तक इंसाफ की पहरेदारी करते रहे। नाम संतोष मूरत सिंह। यह वही सड़क है, जहाँ सिर्फ संतोष नहीं, बल्कि मुल्क के हर उस कोने की आवाज़ पहुँची, जिसे अपनी ही ज़मीन पर बेगाना कर दिया गया था। सवाई जयसिंह ने सदियों पहले पत्थरों के इस अजूबे को ग्रहों और तारों की चाल नापने के लिए तराशा था। इन्हें भला इस बात का क्या इल्म होगा कि आदाज हिंदुस्तान में ये खगोलीय वेधशाला एक दिन मुल्क के दर्द का थर्मामीटर बन जाएगा। दशक दर दशक बदलते रहे। लेकिन लाल-बलुआ पत्थर और ईंटों से बना जंतर-मंतर महज स्माक नहीं अपितु 140 करोड़ हिंदुस्तानियों की असहमति की सबसे बड़ी पनाहगाह बन गया। एक ऐसा ठिकाना जहां लोकतंत्र के हाशिए पर खड़ा सबसे कमजोर इंसान भी तख्त पर बैठे हुक्मरानों की आंखों में आंखे डालकर सवाल कर सके। लेकिन अब पत्थरों की यह सड़क खामोश हो जाएगी। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक बड़ा फैसला लेते हुए जंतर मंतर को आधिकारिक प्रोटेस्ट साइट्स की सूची से डिनोटिफाई कर दिया है। यानी लोकतंत्र का वह मशहूर कोना, जहाँ तख्तियों की इबारतें हुकूमतों की नींद उड़ा दिया करती थीं, अब हमेशा के लिए खाली करा लिया गया है। वाल सिर्फ एक जगह के बंद होने का नहीं है। सवाल यह है कि जब असहमति की सबसे पहचानी जाने वाली चौखट ही मिटा दी जाए, तो वो संतोष मूरत सिंह, वो किसान, वो छात्र और वो मजदूर ब अपनी फरियाद लेकर किस देहरी पर दस्तक देंगे? इसे भी पढ़ें: Jantar Mantar नहीं रहा अब 'प्रोटेस्ट साइट', गृह मंत्रालय का बड़ा फैसला, तय किए ये 3 नए स्थान क्या है नया फैसला दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन के लिए तय जगह की सूची से हटा दिया है और ऐसी सभाओं के लिए तीन दूसरी जगहों के नाम बताए हैं। यह कदम 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के साथ शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन की इजाज़त को लेकर चल रहे विवाद और 'इंडिया ब्लॉक' के सुप्रीम कोर्ट तक प्रस्तावित मार्च से पहले राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी किए जाने के बीच उठाया गया है। 1 अक्टूबर, 2026 के एक आदेश के मुताबिक, नई तय की गई तीन जगहें हैं। पुरानी दिल्ली में रामलीला मैदान, पूर्वी दिल्ली में CBD ग्राउंड और उत्तरी दिल्ली में बुराड़ी ग्राउंड। गौरतलब है कि ये तीनों जगहें मध्य दिल्ली में स्थित जंतर-मंतर से क्रमशः 3 किमी, 13.5 किमी और 44 किमी दूर हैं। दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार के हस्ताक्षर वाले इस आदेश में 28 अप्रैल, 2022 के उस पुराने आदेश में कुछ बदलाव किए गए हैं, जिसके तहत जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन की जगह के तौर पर तय किया गया था। पुलिस ने कहा कि तीन नई जगहों पर विरोध-प्रदर्शन और रैलियों के आयोजन से जुड़े विस्तृत और संशोधित स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) अलग से जारी किए जाएंगे। इसे भी पढ़ें: Jantar Mantar बंद होने के खिलाफ याचिका, 13 अक्टूबर को सुनवाई करने को तैयार दिल्ली HC हाई कोर्ट जंतर-मंतर बंद करने के मामले में याचिका पर सुनवाई करेगा दिल्ली हाई कोर्ट 13 अक्टूबर को उस याचिका पर सुनवाई करेगा जिसमें शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के लिए जंतर-मंतर को बंद करने के फैसले को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया था कि प्रदर्शनों के लिए कोई वैकल्पिक जगह तय नहीं की गई है। कोर्ट ने 10 और 11 अक्टूबर को दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी एक अलग याचिका को भी मंगलवार के लिए सूचीबद्ध किया, लेकिन तत्काल सुनवाई करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले से ही इस मामले को देख रहा है और उसने केंद्र सरकार से हलफनामा मांगा है। इसे भी पढ़ें: Delhi Police को अल्टीमेटम: Jantar Mantar पर Peaceful Protest के लिए CJP ने दी 24 घंटे की डेडलाइन महाराजा जय सिंह द्वितीय की सोच महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय न केवल एक शासक थे, बल्कि गणित और खगोल विज्ञान में गहरी रुचि रखने वाले विद्वान भी थे। 18वीं सदी की शुरुआत में, उन्होंने खगोलीय घटनाओं के बारे में ज़्यादा सटीक जानकारी की ज़रूरत को समझा और पूरे भारत में कई वेधशालाएँ बनवाईं। दिल्ली का जंतर-मंतर उनके द्वारा बनाई गई पाँच वेधशालाओं में से एक था; बाकी वेधशालाएँ जयपुर, उज्जैन, वाराणसी और मथुरा में स्थित थीं। इन वेधशालाओं को खगोलीय तालिकाओं को बेहतर बनाने और आकाशीय गतिविधियों की ज़्यादा सटीक माप करने के लिए डिज़ाइन किया गया था। जय सिंह द्वितीय के प्रयासों से वैज्ञानिक आदान-प्रदान के एक दौर की झलक मिलती है, जिसमें भारतीय खगोलीय परंपराओं का फ़ारसी, इस्लामी और यूरोपीय स्रोतों के ज्ञान से मेल हुआ। उनकी वेधशालाएँ अवलोकन और गणना के केंद्र बन गईं, जहाँ वैज्ञानिक तरीकों और वास्तुकला के नए प्रयोगों का संगम हुआ। जहाँ वास्तुकला और खगोल विज्ञान का मिलन होता है रहने या पूजा-पाठ के लिए बनाई जाने वाली पारंपरिक इमारतों से अलग, जंतर-मंतर को एक विशाल वैज्ञानिक उपकरण के तौर पर बनाया गया था। हर संरचना का एक खास मकसद था। आकाशीय पिंडों की गति को देखने के लिए इनके कोण और माप बहुत सावधानी से तय किए गए थे। दिल्ली वेधशाला की सबसे खास संरचना 'सम्राट यंत्र' है। यह एक विशाल धूप-घड़ी है, जिसका इस्तेमाल सूरज की परछाई की गति को ट्रैक करके स्थानीय समय का पता लगाने के लिए किया जाता था। इसके विशाल आकार की वजह से खगोलविद ज़्यादा सटीकता के साथ अवलोकन कर पाते थे। एक और ज़रूरी यंत्र 'जय प्रकाश यंत्र' है, जिसमें कटोरे के आकार के दो हिस्से होते हैं। इनकी मदद से खगोलशास्त्री आकाशीय पिंडों की स्थिति का पता लगाते थे। बेलनाकार आकृतियों से बने 'राम यंत्र' का इस्तेमाल तारों और दूसरे खगोलीय पिंडों की ऊंचाई और दिशा मापने के लिए किया जाता था। ये सभी यंत्र मिलकर यह दिखाते हैं कि किस तरह वैज्ञानिक जानकारी को ऐसी भौतिक संरचनाओं में बदला गया, जिनका अध्ययन और इस्तेमाल किया जा सकता था। 18वीं सदी में आसमान को समझना आधुनिक टेलीस्कोप और डिजिटल टेक्नोलॉजी के आने से पहले के दौर में जंतर-मंतर जैसी वेधशालाओं ने ब्रह्मांड को समझने में अहम भूमिका निभाई। खगोलशास्त्री आकाशीय गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए गणितीय गणनाओं और सावधानी से बनाए गए उपकरणों पर निर्भर रहते थे। ऐसी जगहों पर की गई खोजों और अवलोकनों से ज़्यादा सटीक कैलेंडर बनाने और ग्रहों की चाल के बारे में जानकारी बेहतर करने में मदद मिली। खगोल विज्ञान को रोज़मर्रा की ज़िंदगी से अलग नहीं माना जाता था; इसने खेती, त्योहारों, समुद्री यात्रा और समय बताने के तरीकों को प्रभावित किया।स जंतर-मंतर वैज्ञानिक अवलोकन और समाज के बीच इसी संबंध को दिखाता है और बताता है कि कैसे आसमान के अध्ययन ने इंसानी समझ को आकार दिया। जैसे-जैसे दिल्ली देश का राजनीतिक और प्रशासनिक केंद्र बनी, जंतर-मंतर धीरे-धीरे लोगों की आवाज़ उठाने की जगह के तौर पर पहचाना जाने लगा। इसकी खुली बनावट की वजह से लोग यहाँ व्यवस्थित ढंग से इकट्ठा हो सकते थे, और इसके ऐतिहासिक माहौल ने इस जगह को एक खास पहचान दी। जंतर-मंतर में आया यह बदलाव दिखाता है कि कैसे ऐतिहासिक जगहों का मतलब पीढ़ियों के साथ बदलता रहता है। मूल रूप से खगोलीय पिंडों की गति के अध्ययन के लिए बनाया गया यह स्मारक नागरिक भागीदारी से जुड़ गया, जिससे इसके सांस्कृतिक महत्व में एक और आयाम जुड़ गया। 33 साल से धरने देख रहा था जंतर-मंतर 1988 में किसान आंदोलन के बाद बोट क्लब पर प्रदर्शन रोक दिए गए थे। इसके बाद 1993 में जंतर-मंतर पर पहला प्रदर्शन हुआ था। जंतर-मंतर को धरना स्थल बनाने संबंधी किसी आदेश का रिकॉर्ड नहीं है। यह पुलिस की प्रशासनिक व्यवस्था के रूप में विकसित हुआ। स्थानीय लोगों की शोर, प्रदूषण जैसी शिकायतों पर एनजीटी ने 2017 में यहां प्रदर्शन रोक दिए। धरने-प्रदर्शन रामलीला मैदान में करने को कहा। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा- शांतिपूर्ण प्रदर्शन संवैधानिक अधिकार है। कोर्ट ने प्रतिबंध हटाकर नियंत्रित प्रदर्शन की व्यवस्था बनाने को कहा। अब सुप्रीम कोर्ट में फिर वैकल्पिक प्रदर्शन स्थल की मांग लंबित है।

प्रभासाक्षी 12 Oct 2026 2:29 pm

Rahul Gandhi को दोटूक जवाब देकर CJI Surya Kant ने न्यायिक मर्यादा की लाज रख ली

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी और INDIA गठबंधन के नेताओं को मिलने का समय देने से इनकार कर दिया है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), कथित ‘वोट चोरी’ और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्ष सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को ज्ञापन सौंपना चाहता था। लेकिन CJI ने साफ कर दिया कि जिन विषयों पर विपक्ष हस्तक्षेप चाहता है, वे न्यायालय में पहले से विचाराधीन हैं। ऐसे मामलों में प्रशासनिक स्तर पर निर्देश देने के बजाय विपक्ष को न्यायिक प्रक्रिया के तहत याचिका दायर करनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि मौलिक अधिकारों के संरक्षण के लिए सर्वोच्च न्यायालय के दरवाजे सभी नागरिकों के लिए चौबीसों घंटे खुले हैं। मुख्य न्यायाधीश का यह रुख ऐसे समय सामने आया है, जब राहुल गांधी और INDIA गठबंधन चुनावी प्रक्रिया से जुड़े आरोपों को लेकर सरकार तथा चुनाव आयोग पर दबाव बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। विपक्ष की मांग थी कि SIR की प्रक्रिया रोकी जाए, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें और कथित चुनावी अनियमितताओं की जांच हो। राहुल गांधी ने 12 अक्टूबर को सर्वोच्च न्यायालय तक मार्च करने का आह्वान करते हुए इसे लोकतंत्र और संविधान की रक्षा की लड़ाई बताया। विपक्ष का कहना है कि मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों से पात्र नागरिकों के मतदान के अधिकार पर असर पड़ रहा है। इसे भी पढ़ें: जब जब देश के साथ खड़े होने की बात आती है, तब तब Rahul Gandhi की राह अलग क्यों हो जाती है? देखा जाये तो इस घटनाक्रम को समझने के लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से विपक्ष की हालिया मुलाकात भी महत्वपूर्ण है। विपक्षी नेताओं ने राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं पर चिंता जताई थी। मुलाकात के बाद राहुल गांधी ने कहा कि राष्ट्रपति ने उनसे आरोपों के समर्थन में सबूत मांगे हैं और विपक्ष प्रमाण प्रस्तुत करने को तैयार है। राहुल गांधी ने संकेत दिया था कि राष्ट्रपति ने वोट चोरी के आरोप को एक तरह से सही माना है। हालांकि बाद में सूत्रों के हवाले से आई खबर के अनुसार राष्ट्रपति कार्यालय ने राहुल गांधी के बयान और दावे पर अप्रसन्नता जताई। दूसरी ओर, राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद मुख्य न्यायाधीश से मिलने की कोशिश और फिर उनका इनकार विपक्ष की रणनीति के लिए एक अहम घटनाक्रम है। राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे चाहते थे कि वे अपनी चिंताओं को सीधे CJI के सामने रखें। लेकिन न्यायपालिका का काम राजनीतिक प्रतिनिधिमंडलों के ज्ञापन पर प्रशासनिक निर्देश देना नहीं, बल्कि विधिसम्मत याचिकाओं पर सुनवाई करना और कानून के अनुसार फैसला देना है। CJI के रुख का यही संस्थागत अर्थ है। लेकिन फिर भी राहुल गांधी का सर्वोच्च अदालत तक मार्च निकालने का फैसला सीधे सीधे अराजकता फैलाने का प्रयास है। राहुल गांधी बार बार संविधान का हवाला देते हैं लेकिन संविधान की संरक्षक राष्ट्रपति के बारे में झूठ बोलते हैं, संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण स्थल सर्वोच्च न्यायालय की बात नहीं मानते, ऐसे में सवाल उठेगा ही कि उनकी असल मंशा क्या है? यही नहीं, ईवीएम पर बार बार सवाल उठाने वाले कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों को हाल में असम और हिमाचल प्रदेश में बैलट पेपर से कराए गए नगर निगम चुनाव में भी करारा झटका लगा है। इसलिए राहुल गांधी समेत अन्य विपक्षी नेताओं को समझना होगा कि गड़बड़ चुनावी व्यवस्था में नहीं विपक्षी पार्टियों की नीतियों और नीयत पर है, उनकी विश्वसनीयता पर है। देखा जाये तो SIR का विवाद केवल राजनीतिक दलों के बीच टकराव नहीं है। मतदाता सूची की शुद्धता चुनाव की विश्वसनीयता के लिए जरूरी है। चुनाव आयोग का पक्ष है कि पुनरीक्षण का उद्देश्य सूची को दुरुस्त करना है। विपक्ष इस प्रक्रिया की पारदर्शिता और संभावित प्रभाव पर सवाल उठा रहा है। विपक्ष चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता को राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का केंद्र बनाने की कोशिश कर रहा है, जबकि मोदी सरकार आर्थिक विकास और अपने नीतिगत प्रदर्शन को सामने रख कर विकसित भारत के संकल्प को सिद्ध करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। बहरहाल, CJI का इनकार इस पूरे विवाद में एक महत्वपूर्ण संस्थागत घटनाक्रम है। विपक्ष को समझना होगा कि अंतिम फैसला राजनीतिक नारों या मुलाकातों से नहीं, बल्कि अदालत के सामने प्रस्तुत तथ्यों और प्रमाणों से तय होगा। साथ ही मुख्य न्यायाधीश का विपक्षी नेताओं को मुलाकात का समय देने से इनकार करना संस्थागत मर्यादा बनाए रखने के लिहाज से उचित कदम माना जा सकता है। यदि राजनीतिक दल अपनी मांगों और आरोपों के आधार पर सीधे CJI से मुलाकात कर न्यायिक हस्तक्षेप की अपेक्षा करने लगें, तो भविष्य में दूसरे दल भी इसी परंपरा का सहारा ले सकते हैं। इससे न्यायपालिका पर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिशों को बढ़ावा मिलने और निष्पक्षता को लेकर अनावश्यक सवाल उठने की आशंका रहेगी। न्यायपालिका की स्वतंत्रता केवल उसके फैसलों में ही नहीं, बल्कि उसकी प्रक्रियाओं और राजनीतिक दलों से समान दूरी बनाए रखने में भी निहित है। इसलिए किसी भी पक्ष को विशेष राजनीतिक हैसियत के आधार पर अलग सुविधा देने के बजाय सभी के लिए निर्धारित न्यायिक प्रक्रिया का पालन करना अधिक उचित है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 12 Oct 2026 1:58 pm

एलन मस्क प्रकरण, विदेशी मुख के शंख न बनें राहुल गांधी

शंख का यह दुर्भाग्य है कि ईश्वर ने उसे मजबूत खोल तो दिया है पर कोमल मस्तिष्क नहीं, तो बेचारा पराई फूक से बजने को मजबूर है। शंख की इसी मजबूरी के खतरे भी अनेक है, चाहते न चाहते हुए भी वह दूसरों की हावर्ड को आवाज दे देता है और वो भी कई गुना बढ़ा कर। आजकल देश के प्रतिपक्षी नेता राहुल गांधी हर विदेशी मुंह का शंख बनने के प्रयास में दिख रहे हैं। दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति और स्टारलिंक के मालिक एलन मस्क का भारत सरकार पर किया गया हमला अनेक तरह के खतरनाक संकेत समेटे हुए हैं और इस हमले में किसी विदेशी शक्ति को देश के किसी संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति का एक स्वर होना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। राहुल गांधी को विदेशी फूक से बजने वाला शंख बनने से गुरेज करना चाहिए। जैसा कि सभी जानते हैं कि, सूचना प्रौद्योगिकी जिस तेजी से विकसित हो रही है उसी तेजी से इसके खतरे भी बढ़ रहे हैं। यह तकनीक जहां बड़ी आबादी को लाभ पहुंचा रही है, वहीं इसे नियंत्रित करने वाली चंद कंपनियों को बेशुमार ताकत भी सौंप रही है। इतनी कि ये कंपनियां राजनीतिक शक्तियों को भी बौना समझने लगी हैं। जहां बात नहीं बनती, वहां वे राष्ट्रीय नेतृत्व की साख बिगाडऩे में लग जाती हैं। कुछ देशों में सरकारें बनाने-गिराने के खेल में सक्रिय रहकर स्वार्थ साधना तो उनका पुराना नुस्खा है। दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति और स्टारलिंक के मालिक एलन मस्क का भारत सरकार पर किया गया अपनी तरह का 'पहला हमला' इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। इसे भी पढ़ें: जब जब देश के साथ खड़े होने की बात आती है, तब तब Rahul Gandhi की राह अलग क्यों हो जाती है? अपने सोशल मीडिया मंच 'एक्स' पर मस्क ने कहा कि स्टारलिंक को 165 से ज्यादा देशों में लाइसेंस मिल चुका है और उसने पांच वर्षों तक भारत के हर कानून का पालन किया, फिर भी लाइसेंस क्यों नहीं मिला? क्या अंबानी ही भारत के असली बॉस हैं? यह बात पूरी तरह सच नहीं है। सरकार ने साफ किया कि स्टारलिंक को मई 2025 में ही लाइसेंस मिल चुका है। सिर्फ स्पेक्ट्रम आवंटन अटका है, क्योंकि विदेशी निवेश की मंजूरी और सुरक्षा शर्तों का परीक्षण बाकी है। स्टारलिंक ने जमीनी ढांचा विकसित करने के लिए जियो और भारती एयरटेल से साझेदारी भी की है और जियो के मालिक मुकेश अंबानी ही हैं। तो अंबानी पर कटाक्ष का अर्थ क्या है? सीधा अर्थ है कि मस्क सुरक्षा शर्तों में ढील चाहते हैं और यह भी कि सैटेलाइट फोन के क्षेत्र में कोई भारतीय कंपनी उनके मुकाबले आगे न बढ़े, क्योंकि अंबानी भी यह महत्वाकांक्षा रखते हैं। ऐसे समय, जब केंद्र सरकार नीट और एसआइआर पर घरेलू राजनीति में घिरी है, मस्क की टिप्पणी मौके का फायदा उठाने की चाल है। ऐसा लगता है कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस सोची-समझी चाल पर बिना सोचे प्रतिक्रिया दे दी- 'भारत में स्वागत है एलन, जब तक दूसरा शख्स न मिले इंतजार करें।' जबकि, स्टारलिंक के जियो और एयरटेल से समझौते पर तब कांग्रेस ने राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर चिंता जताई थी। घरेलू मोर्चे पर सरकार को घेरना एक बात है और अंतरराष्ट्रीय दांव-पेचों में शामिल होना दूसरी। क्या सुरक्षा की चिंता किए बिना किसी सैटेलाइट कंपनी को इसलिए मंजूरी दे देनी चाहिए कि उसके मालिक अंबानी-अदाणी नहीं, मस्क हैं? दूसरी बात यह है कि विदेशी कंपनी के आगे भारतीय कंपनी को तरजीह क्यों नहीं मिलनी चाहिए, भले ही वह अंबानी या अदाणी की ही क्यों न हो, जिनकी मोनोपॉली विपक्ष के लिए घरेलू मुद्दा है? मस्क जैसे लोग नई तकनीकों से मानवता की भलाई के लिए भले ही ढेरों काम कर रहे हों, पर इससे शायद ही कोई इनकार करे कि आर्थिक और राष्ट्रीय हितों के टकराव में उनका व्यवहार पराया ही रहेगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के युग में ऐसे तकनीकी महारथियों से सावधान रहना होगा, न सिर्फ सत्ता पक्ष को बल्कि विपक्ष को भी। माना कि शंख मस्तिष्क विहीन होते हैं पर शंख से जुड़े किसी न किसी को तो यह जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी कि कोई विदेशी फूक शंख के माध्यम से देश का वातावरण बिगाड़ न पाए। - राकेश सैन 32, खंडाला फार्म कॉलोनी जालंधर।

प्रभासाक्षी 12 Oct 2026 1:53 pm

एसआईपी निवेश रिकॉर्ड में 32,490 करोड़ रुपए की हुई बढ़ोतरी

मुंबई, म्यूचुअल फंड में सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (एसआईपी) के जरिए निवेश सितंबर में नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।

देशबन्धु 12 Oct 2026 12:59 pm

सीईसी के खिलाफ इंडिया गठबंधन का सुप्रीम कोर्ट तक मार्च, कांग्रेस बोली-देश बचाने के लिए जरूरी

सीईसी के खिलाफ इंडिया गठबंधन का सुप्रीम कोर्ट तक मार्च, कांग्रेस बोली-देश बचाने के लिए जरूरी

समाचार नामा 12 Oct 2026 12:26 pm

Goa Politics: रेवंत रेड्डी ने भाजपा को बताया ‘रावण’ और कांग्रेस को ‘राम’, 2027 चुनाव से पहले वोटर्स से की अपील

Goa Politics: रेवंत रेड्डी ने भाजपा को बताया ‘रावण’ और कांग्रेस को ‘राम’, 2027 चुनाव से पहले वोटर्स से की अपील

समाचार नामा 12 Oct 2026 10:40 am

'राजमाता विजयाराजे सिंधिया का राष्ट्रसेवा के प्रति त्याग और समर्पण प्रेरणास्रोत', पीएम मोदी समेत नेताओं ने किया नमन

'राजमाता विजयाराजे सिंधिया का राष्ट्रसेवा के प्रति त्याग और समर्पण प्रेरणास्रोत', पीएम मोदी समेत नेताओं ने किया नमन

समाचार नामा 12 Oct 2026 10:39 am

दिल्ली में हाई अलर्ट! विपक्ष के सुप्रीम कोर्ट मार्च से पहले 6 मेट्रो स्टेशनों पर एंट्री-एग्जिट बंद

राजधानी दिल्ली में सोमवार को प्रस्तावित विपक्षी मार्च को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था सख्त कर दी गई है

देशबन्धु 12 Oct 2026 7:16 am

सड़क से सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई, राहुल गांधी ने भरी हुंकार

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने ऐलान किया कि विपक्षी दल, युवा, सिविल सोसाइटी और लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले लोग सोमवार, 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट तक मार्च करेंगे

देशबन्धु 11 Oct 2026 10:45 pm

इंफोसिस: पीईआरएम निलंबन से कारोबार पर नहीं पड़ेगा बड़ा असर

नई दिल्ली, आईटी क्षेत्र की प्रमुख कंपनी इंफोसिस ने कहा है कि अमेरिकी सरकार द्वारा परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन (पीईआरएम) कार्यक्रम के तहत कुछ नई और लंबित आवेदन प्रक्रियाओं पर लगाए गए निलंबन का उसके कारोबार पर कोई महत्वपूर्ण असर पड़ने की उम्मीद नहीं है।

देशबन्धु 11 Oct 2026 2:01 pm

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में मेट्रो, रेल और इंटरनेट सेवाएं सामान्य रखने के दिए निर्देश, शांतिपूर्ण विरोध को बताया मौलिक अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में मेट्रो, रेल और इंटरनेट सेवाएं सामान्य रखने के दिए निर्देश, शांतिपूर्ण विरोध को बताया मौलिक अधिकार

समाचार नामा 11 Oct 2026 1:57 pm

'पितृसत्ता का अंत' सिर्फ एक राजनीतिक हथकंडा है? बांसुरी स्वराज ने जेएनयू प्रोफेसर पर लगे आरोपों पर राहुल गांधी से पूछा सवाल

'पितृसत्ता का अंत' सिर्फ एक राजनीतिक हथकंडा है? बांसुरी स्वराज ने जेएनयू प्रोफेसर पर लगे आरोपों पर राहुल गांधी से पूछा सवाल

समाचार नामा 11 Oct 2026 1:06 pm

एनडीए नेताओं का सीजेपी पर तंज, कहा-'मां दुर्गा सीजेपी और विपक्ष को दें सद्बुद्धि'

एनडीए नेताओं का सीजेपी पर तंज, कहा-'मां दुर्गा सीजेपी और विपक्ष को दें सद्बुद्धि'

समाचार नामा 11 Oct 2026 12:15 pm

शेयर बाजार : महंगाई डेटा, कच्चा तेल और बॉल्ड यील्ड से बाजार की चाल बदली

मुंबई, भारतीय शेयर बाजार के लिए अगला हफ्ता काफी अहम होने वाला है। कच्चे तेल की कीमत, बॉन्ड यील्ड और महंगाई डेटा के साथ अन्य अंतरराष्ट्रीय और घरेलू आर्थिक आंकड़े बाजार की चाल निर्धारित करेंगे।

देशबन्धु 11 Oct 2026 11:28 am

'उनके महान विचार सदैव प्रेरणापुंज बने रहेंगे', जयंती पर महाराजा अग्रसेन को प्रधानमंत्री मोदी ने किया नमन

'उनके महान विचार सदैव प्रेरणापुंज बने रहेंगे', जयंती पर महाराजा अग्रसेन को प्रधानमंत्री मोदी ने किया नमन

समाचार नामा 11 Oct 2026 10:23 am

पीएम मोदी ने लोकनायक जयप्रकाश नारायण को किया नमन, बोले- 'हम उनके आदर्शों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध'

पीएम मोदी ने लोकनायक जयप्रकाश नारायण को किया नमन, बोले- 'हम उनके आदर्शों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध'

समाचार नामा 11 Oct 2026 8:28 am

'सदैव मां का आशीर्वाद बना रहे', नवरात्र के पावन अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी ने दी देशवासियों को शुभकामनाएं

'सदैव मां का आशीर्वाद बना रहे', नवरात्र के पावन अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी ने दी देशवासियों को शुभकामनाएं

समाचार नामा 11 Oct 2026 8:21 am

सीईसी विवाद पर आज फिर सड़कों पर उतरेगी CJP,दिल्ली में सुरक्षा कड़ी

मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने अपना आंदोलन जारी रखने का ऐलान किया है

देशबन्धु 11 Oct 2026 7:30 am

सीजेपी के प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई से भड़के अरविंद सावंत, बोले- ये अघोषित इमरजेंसी है

सीजेपी के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान नेताओं को डिटेन किए जाने पर शिवसेना (यूबीटी) सांसद अरविंद सावंत ने केंद्र सरकार और पुलिस पर तीखा हमला बोला। सावंत ने कहा कि शांतिपूर्ण आंदोलन संविधान का अधिकार है। हवाई जहाज से लोगों को पकड़कर डिटेन करना आतंकवादियों जैसा व्यवहार है और यह अघोषित इमरजेंसी है। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया।

देशबन्धु 11 Oct 2026 7:21 am

पुलिस हिरासत में केजरीवाल का देश से अपील, ‘‘सब लोग दिल्ली चलो’’

देश की राजधानी में शनिवार को हर तरफ पीएम मोदी की दिल्ली पुलिस का तांडव देखने को मिला

देशबन्धु 11 Oct 2026 2:16 am

दिल्ली प्रदर्शन पर सियासी संग्राम: BJP ने साधा निशाना, कांग्रेस ने सरकार को घेरा

दिल्ली में सीजेपी के विरोध-प्रदर्शन और अभिजीत दिपके की गिरफ्तारी को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। पश्चिम बंगाल के नदिया में भाजपा सांसद जगन्नाथ सरकार ने प्रदर्शनकारियों पर देश को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करने का आरोप लगाया। वहीं, मुंबई में कांग्रेस नेता भाई जगताप और विधायक असलम शेख ने केंद्र सरकार की आलोचना करते हुए विरोध-प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार और लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़े सवाल उठाए।

देशबन्धु 10 Oct 2026 11:28 pm

CJP प्रदर्शन के बाद हालात सामान्य होने लगे, अधिकांश लोग रिहा, मेट्रो सेवाएं बहाल

राजधानी दिल्ली में CJP के प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर लागू की गई सख्त सुरक्षा व्यवस्था के बीच अब हालात धीरे-धीरे सामान्य होने लगे हैं

देशबन्धु 10 Oct 2026 11:19 pm

दिल्ली में सीजेपी के प्रदर्शन को लेकर घमासान, भाजपा और कांग्रेस नेताओं ने दी प्रतिक्रिया

दिल्ली में सीजेपी के प्रदर्शन को लेकर घमासान, भाजपा और कांग्रेस नेताओं ने दी प्रतिक्रिया

समाचार नामा 10 Oct 2026 8:10 pm

सीएमआरएल-एक्सालॉजिक मामले में सोमवार को दर्ज होगी एफआईआर: केरल के गृह मंत्री

सीएमआरएल-एक्सालॉजिक मामले में सोमवार को दर्ज होगी एफआईआर: केरल के गृह मंत्री

समाचार नामा 10 Oct 2026 6:22 pm

शक्ति की आराधना: मंत्रों से अधिक भावना का महत्व

भारतवर्ष पर्वों और उत्सवों की पावन भूमि है। यहाँ मनाए जाने वाले सभी त्योहारों का अपना एक विशेष आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। इन सभी पर्वों में शारदीय नवरात्र का स्थान अत्यंत विशिष्ट और पवित्र माना गया है। नव का अर्थ है 9 और रात्रि का अर्थ है रातों का समूह। यह 9 रातों और 10 दिनों का एक ऐसा पावन समय है जब संपूर्ण ब्रह्मांड में आदि शक्ति माँ भगवती की विशेष कृपा बरसती है। नवरात्र केवल एक साधारण व्रत या उत्सव मात्र नहीं है, बल्कि यह मानव मन और आत्मा की शुद्धि तथा दैवीय शक्ति के संचय का एक अत्यंत दुर्लभ अवसर है। यह समय हमें हमारी आंतरिक ऊर्जा को जागृत करने और जीवन में व्याप्त अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त करता है। शारदीय नवरात्र का आगमन वर्षा ऋतु के समापन और शीत ऋतु के आरंभ के समय होता है। प्रकृति भी इस समय एक नए रूप में सजती है और संपूर्ण वातावरण में एक नई ताजगी तथा पवित्रता का वास होता है। इन 9 रातों में माँ दुर्गा के 9 अलग अलग स्वरूपों की उपासना की जाती है। प्रत्येक स्वरूप का अपना एक विशेष संदेश और महत्व है। माता के यह रूप हमें जीवन के विभिन्न चरणों और संघर्षों में साहस, धैर्य, करुणा और विजय की प्रेरणा देते हैं। शक्ति की उपासना का यह पर्व हमें यह सिखाता है कि सत्य और धर्म की रक्षा के लिए शक्ति का होना अत्यंत आवश्यक है। बिना शक्ति के शांति और प्रगति की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। यह शक्ति केवल शारीरिक नहीं है, बल्कि मानसिक और आत्मिक भी है। इसे भी पढ़ें: Shardiya Navratri 2026: 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि की शुरुआत, घटस्थापना और पूजा सामग्री की पूरी लिस्ट अखबार हिन्दी मिलाप में प्रकाशित आराम से नामक स्तंभ में दी गई पूजन विधि के अनुसार, नवरात्र की उपासना अत्यंत सरल, क्रमबद्ध और भावपूर्ण है। किसी भी शुभ और मांगलिक कार्य का आरंभ सदैव विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश के पूजन से ही होता है। नवरात्र की उपासना में भी सबसे पहले भगवान गजानन का स्मरण और पूजन करना अनिवार्य माना गया है। साधक अपने हाथ में पवित्र जल, अक्षत अर्थात बिना टूटे हुए चावल, और पुष्प लेकर संकल्प करता है। संकल्प एक प्रकार की दृढ़ प्रतिज्ञा है। साधक माता से प्रार्थना करता है कि हे जगदम्बे, मैं इस पवित्र पूजन और व्रत के माध्यम से अपने संकल्प को पूर्ण करने के लिए आपका हृदय से आह्वान करता हूँ। संकल्प के पश्चात जल, अक्षत और कुमकुम से विधि विधान के साथ पूजन की शुरुआत होती है। पूजन के मुख्य क्रम में सबसे पहला चरण माता का आह्वान और ध्यान है। साधक अपनी आँखें बंद करके माँ भगवती के उस दिव्य और भव्य स्वरूप का ध्यान करता है, जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में लीन थे और माता ने प्रकट होकर सृष्टि की रक्षा के लिए मधु और कैटभ नामक भयंकर राक्षसों का वध किया था। ध्यान का यह चरण मन को सांसारिक चिंताओं से मुक्त करके पूरी तरह से माता के चरणों में केंद्रित करने का एक माध्यम है। जब मन पूरी तरह से एकाग्र हो जाता है, तब माता की उपस्थिति का अनुभव हृदय में होने लगता है। ध्यान के उपरांत माता को स्नान कराने की प्रक्रिया होती है। सर्वप्रथम शुद्ध और पवित्र जल से माता की प्रतिमा या यंत्र को स्नान कराया जाता है। इसके पश्चात पंचामृत से स्नान कराया जाता है। पंचामृत 5 अत्यंत पवित्र वस्तुओं का मिश्रण होता है जिसमें गाय का दूध, दही, घी, शहद और शर्करा मिलाई जाती है। स्नान कराते समय साधक यह भाव रखता है कि हे महादेवी, दूध, दही, घी, शहद और शर्करा के मिश्रण से तैयार यह उत्तम पंचामृत आपकी सेवा में प्रस्तुत है, कृपया इसे स्वीकार करें। पंचामृत स्नान के पश्चात एक बार फिर से शुद्ध जल से स्नान कराया जाता है ताकि माता का श्री विग्रह पूरी तरह से स्वच्छ हो जाए। स्नान के बाद माता के श्रृंगार का चरण आता है। माँ भगवती को अत्यंत सुंदर और पवित्र वस्त्र अर्पित किए जाते हैं। मुख्य वस्त्र के साथ साथ उपवस्त्र भी चढ़ाया जाता है। इसके बाद मस्तक पर चंदन और सिंदूर का तिलक लगाया जाता है जो सौभाग्य और सुहाग का प्रतीक है। माता को ताजे और सुगंधित पुष्पों की माला पहनाई जाती है। वस्त्र अर्पित करते समय साधक कहता है कि हे देवी, नाना प्रकार के सुंदर बेल बूटों और जरी गोटों से सुसज्जित यह अत्यंत उत्तम और मनमोहक वस्त्र मैं आपको समर्पित कर रहा हूँ। श्रृंगार का यह भाव हमें यह सिखाता है कि हम अपने जीवन में भी सुंदरता, पवित्रता और सदगुणों को धारण करें। श्रृंगार के पश्चात माता को भोग अर्पित किया जाता है और दीप दर्शन कराया जाता है। माता के समक्ष अत्यंत श्रद्धा के साथ विविध प्रकार के उत्तम नैवेद्य, ऋतु फल, और स्वादिष्ट मिष्ठान्न रखे जाते हैं। इसके बाद सुगंधित धूप और दीप जलाकर माता को दिखाया जाता है। दीप का प्रकाश ज्ञान का प्रतीक है और धूप की सुगंध हमारी प्रार्थनाओं की पवित्रता को दर्शाती है। यह प्रकाश अज्ञानता और बुराई के अंधकार को समाप्त करने का संदेश देता है। पूजन के अंतिम चरण में माता की आरती, प्रदक्षिणा और क्षमा प्रार्थना की जाती है। आरती के लिए विशेष रूप से कर्पूर का उपयोग किया जाता है। कर्पूर के साथ भीगे हुए ईंधन को जलाकर उसमें 1, 3, 5, 7 या इससे अधिक संख्या में बत्तियां बनाकर माता की मंगल आरती उतारी जाती है। कर्पूर जलकर पूरी तरह से समाप्त हो जाता है और कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो यह दर्शाता है कि हमारा अहंकार भी माता के समक्ष पूरी तरह से भस्म हो जाना चाहिए। आरती के बाद साधक अपने स्थान पर गोल घूमकर प्रदक्षिणा करता है। अंत में सबसे महत्वपूर्ण भाग होता है क्षमा प्रार्थना। साधक हाथ जोड़कर कहता है कि हे माता, न तो मुझे आपकी भक्ति का कोई गहरा ज्ञान है और न ही मैं पूजा के कठिन मंत्रों को जानता हूँ। मैंने अपनी अल्प बुद्धि और क्षमता के अनुसार जो भी पूजन किया है, आप अपनी उदारता से उसे परिपूर्ण मानकर स्वीकार करें और मेरी सभी भूलों को क्षमा करें। नवरात्र पूजन का सबसे मूल और महत्वपूर्ण भाव यही है कि यदि पूजा के दौरान कोई मंत्र भूल भी जाए, या कोई सामग्री छूट भी जाए, तो साधक की भावना और श्रद्धा में कोई कमी नहीं आनी चाहिए। अज्ञानवश या अधिकता में किए गए पूजन से जगदम्बा सर्वकल्याणी महादेवी संतुष्ट ही होती हैं, क्योंकि वे केवल अपने भक्तों का सच्चा भाव देखती हैं। कर्मकांड से अधिक महत्व हृदय की पवित्रता का है। यह पावन पर्व हमें एक बहुत ही गहरा सामाजिक और आध्यात्मिक संदेश भी देता है। यह हमें सिखाता है कि संसार की हर एक स्त्री में देवी का ही वास है। स्त्री का सम्मान करना, उसकी गरिमा की रक्षा करना और उसे समाज में उचित स्थान देना ही देवी की सच्ची आराधना है। जब तक समाज में नारी का सम्मान नहीं होगा, तब तक कोई भी पूजा या व्रत सफल नहीं हो सकता। शक्ति की इस आराधना से ही हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में फैला हुआ अज्ञानता और बुराइयों का अंधकार दूर होता है। यही कारण है कि दीपावली के महापर्व से ठीक पहले आने वाली यह शारदीय नवरात्र, केवल एक उत्सव नहीं है, बल्कि यह दीपावली के प्रकाश पर्व की तैयारी का एक अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक आरंभ है। नवरात्र में हम अपने भीतर शक्ति और पवित्रता का संचय करते हैं, ताकि दीपावली के दिन हम अपने अंतर्मन के दीयों को सत्य और ज्ञान के प्रकाश से पूरी तरह से प्रज्वलित कर सकें। यह संपूर्ण कालखंड हमें अंधकार से प्रकाश की ओर, असत्य से सत्य की ओर और मृत्यु से अमरता की ओर ले जाने का एक दिव्य मार्ग प्रशस्त करता है। माता की यह आराधना हमारे जीवन को सुख, शांति, समृद्धि और अपार सफलता से भर दे, यही इस पर्व की सच्ची सार्थकता है। - महेन्द्र तिवारी 216 बी, द्वितीय तल, राधिका ज्वेलर्स के पास, गली नंबर-10, साध नगर, पालम कॉलोनी, नई दिल्ली - 110045

प्रभासाक्षी 10 Oct 2026 6:22 pm

जब जब देश के साथ खड़े होने की बात आती है, तब तब Rahul Gandhi की राह अलग क्यों हो जाती है?

स्टारलिंक की भारत में एंट्री का रास्ता साफ होता नहीं दिख रहा, तो एलन मस्क ने मुकेश अंबानी पर हमला करने का नया तरीका खोज लिया है। पहले अंबानी को भारत का ‘असली बॉस’ बताया और अब उन्हें ‘प्राइम मिनिस्टर अंबानी’ कहकर तंज कस दिया। लेकिन मस्क साहब, जरा ठहरिए! यह सिर्फ मुकेश अंबानी पर कटाक्ष नहीं है, बल्कि भारत के प्रधानमंत्री पद को भी एक कारोबारी विवाद में घसीटने की कोशिश है। प्रधानमंत्री का पद किसी उद्योगपति की जागीर नहीं, बल्कि देश के लोकतंत्र और संवैधानिक व्यवस्था का प्रतीक है। ऐसे में अपनी कंपनी के हितों के लिए इस पद पर तंज कसना आखिर किस तरह की कारोबारी शालीनता है? सवाल यह भी है कि भारत में अपनी शर्तें मनवाने के लिए मस्क इतने उतावले क्यों हैं कि उन्हें अब देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था की गरिमा का भी ख्याल नहीं रहा? हम आपको बता दें कि एलन मस्क का आरोप है कि मुकेश अंबानी का प्रभाव स्टारलिंक की भारत में एंट्री में बाधा बन रहा है। जबकि भारत सरकार का रुख स्पष्ट है कि स्टारलिंक, जियो सैटकॉम और वनवेब जैसी कंपनियों को सुरक्षा मंजूरी और स्पेक्ट्रम से जुड़े नियमों का पालन करना होगा। केंद्रीय दूरसंचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया भी मस्क के भेदभाव के आरोपों को खारिज कर चुके हैं। ऐसे में सवाल यह है कि जब नियमों के तहत मंजूरी मिलनी है, तो मस्क बार-बार अंबानी को निशाना बनाकर आखिर साबित क्या करना चाहते हैं? इसे भी पढ़ें: CJP के Jantar Mantar प्रदर्शन पर भड़की BJP, Sambit Patra बोले- राजधानी को बंधक बनाने की साजिश हुई फ्लॉप देखा जाये तो मस्क जिस स्टारलिंक को भारत में जल्द शुरू करने की मांग कर रहे हैं, वह कोई सामान्य इंटरनेट सेवा नहीं है। यह हजारों उपग्रहों के नेटवर्क के जरिए इंटरनेट उपलब्ध कराती है। दूरदराज के गांवों, सीमावर्ती इलाकों और आपदा प्रभावित क्षेत्रों के लिए यह तकनीक उपयोगी हो सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सुरक्षा संबंधी सवालों को नजरअंदाज कर दिया जाए। रूस और चीन समेत दुनिया के तमाम देशों ने स्टारलिंक को अनुमति नहीं दी है। वहीं भारत के लिए महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या विदेशी कंपनी के नियंत्रण वाले नेटवर्क पर निर्भरता राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से जोखिम पैदा कर सकती है? भारत सरकार की चिंताओं में डेटा की सीमा पार आवाजाही, संचार पर नियंत्रण और सुरक्षा एजेंसियों की कानूनी निगरानी जैसे मुद्दे शामिल हैं। यह चिंता काल्पनिक भी नहीं है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने मार्च 2025 में ही स्टारलिंक पर सवाल उठाए थे। उन्होंने पूछा था कि राष्ट्रीय सुरक्षा की जरूरत पड़ने पर संचार बंद करने का अधिकार स्टारलिंक के पास होगा या उसके भारतीय साझेदारों के पास? उन्होंने यह भी पूछा था कि क्या इन समझौतों के पीछे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को खुश करने की कोशिश थी? विडंबना देखिए कि जिस मुद्दे पर कांग्रेस पहले सुरक्षा संबंधी सवाल उठा रही थी, उसी मुद्दे पर आज राहुल गांधी मस्क के आरोपों को राजनीतिक समर्थन देते दिखाई दे रहे हैं। साथ ही एलन मस्क ने रिलायंस पर भाजपा को चुनावी चंदा देने का आरोप लगाया है। लेकिन अगर चुनावी फंडिंग और कारोबारियों के राजनीतिक प्रभाव का प्रश्न उठाया जा रहा है, तो यही कसौटी मस्क पर भी लागू होनी चाहिए। अमेरिकी चुनाव आयोग में दाखिल दस्तावेजों से पता चला था कि मस्क ने 2024 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप का समर्थन करने वाले राजनीतिक समूहों को 25.9 करोड़ डॉलर से अधिक दिए थे। इसमें लगभग 23.9 करोड़ डॉलर अमेरिका पीएसी को दिए गए थे। इसलिए सवाल उठता है कि अगर किसी उद्योगपति की चुनावी फंडिंग राजनीतिक प्रभाव का प्रमाण मानी जा सकती है, तो ट्रंप की जीत के लिए करोड़ों डॉलर खर्च करने वाले मस्क से यह सवाल क्यों नहीं पूछा जाना चाहिए? क्या अमेरिका में किसी पसंदीदा उम्मीदवार की मदद करना लोकतंत्र है, लेकिन भारत में किसी कंपनी की राजनीतिक फंडिंग अपने आप संदेह का विषय बन जाती है? वास्तविकता यह है कि कॉरपोरेट राजनीतिक चंदा अनेक लोकतंत्रों में चुनावी राजनीति का हिस्सा है। साथ ही भारत में इंटरनेट की कीमतों की तुलना भी इस बहस को एक नया आयाम देती है। रिलायंस जियो ने सस्ते मोबाइल डेटा के जरिए करोड़ों भारतीयों को इंटरनेट से जोड़ा है और यह कंपनी पूरी दुनिया में सबसे सस्ता डेटा देने के लिए जानी जाती है जबकि एलन मस्क की ब्रॉडबैंड सेवाएं और उनके उपकरण बेहद महंगे हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि स्टारलिंक बेकार है। दूरदराज के क्षेत्रों में उसकी उपयोगिता वास्तविक हो सकती है। लेकिन मस्क यदि भारतीयों के हितों की बात करते हैं, तो उन्हें यह भी बताना होगा कि उनकी सेवा कितने भारतीयों की पहुंच में होगी। प्रतिस्पर्धा का स्वागत होना चाहिए, मगर राष्ट्रीय सुरक्षा और आम उपभोक्ता की आर्थिक क्षमता की कीमत पर नहीं। इसके अलावा, राहुल गांधी ने मस्क के ‘असली बॉस’ वाले सवाल के जवाब में लिखा, ‘वेलकम टू इंडिया, एलन। दूसरे शख्स से मिलोगे तो हैरान रह जाओगे।’ यह टिप्पणी परोक्ष रूप से गौतम अडानी की ओर संकेत करती दिखाई दी। मस्क ने इसके जवाब में राहुल को धन्यवाद दिया। देखा जाये तो राहुल का उद्योगपतियों और सरकार के संबंधों पर सवाल उठाना गलत नहीं है। लेकिन क्या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे पर किसी विदेशी कारोबारी के साथ सोशल मीडिया पर राजनीतिक तंज कसना पर्याप्त है? विपक्ष का दायित्व सिर्फ सरकार पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि देश की रणनीतिक और डिजिटल सुरक्षा पर कोई समझौता न हो। साथ ही इस बात पर भी सवाल उठ रहे हैं कि जब जब राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल आता है तब तब राहुल गांधी अलग राह क्यों पकड़ लेते हैं? यह सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि कई वरिष्ठ कांग्रेस नेता राहुल गांधी के ट्वीट से नाराज हैं। पूर्व की सरकारों में लंबे समय तक केंद्रीय मंत्री रहे कांग्रेस नेताओं का कहना है कि निवेश और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुडें मुद्दों पर राय सोशल मीडिया पर नहीं रखी जाती। उनका कहना है कि पार्टी स्तर पर देशहित में जो राय बनती है उसके आधार पर ही सबको बोलना चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि जयराम रमेश इस मुद्दे पर पहले ही पार्टी का पक्ष रख चुके थे और स्टारलिंक के संभावित सुरक्षा जोखिमों पर गंभीर सवाल उठाए थे। कांग्रेस नेताओं ने पूछा है कि राहुल गांधी को स्पष्ट करना चाहिए कि क्या वे जयराम रमेश की ओर से उठाये गये सवालों से सहमत हैं या मस्क के समर्थन में उनकी प्राथमिकताएं बदल गई हैं? बहरहाल, एलन मस्क को प्रतिस्पर्धा करने का पूरा अधिकार है, लेकिन भारत को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए शर्तें तय करने और भारतीय जनता को पारदर्शी व्यवस्था की मांग करने का उतना ही अधिकार है। प्रधानमंत्री पद पर तंज कसकर मस्क अगर अपनी कंपनी के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं, तो उन्हें यह भी समझना होगा कि भारत में कारोबार सिर्फ दबाव या सार्वजनिक बयानबाजी के दम पर नहीं, बल्कि नियमों के तहत होता है। उनकी इस टिप्पणी ने उलटे भारत में उनके रवैये पर सवाल खड़े कर दिए हैं और सोशल मीडिया पर कई भारतीयों ने नाराजगी जताई है। राहुल गांधी को भी यह समझना चाहिए कि सरकार का विरोध करना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और देश के हितों को किसी विदेशी कारोबारी और उसकी कंपनी के साथ चल रहे विवाद का हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 10 Oct 2026 2:57 pm

शिमला में विंटर सीजन से कारोबारियों को बड़ी उम्मीदें

शिमला, राजधानी शिमला में वीकेंड के दौरान पर्यटकों की आवाजाही बढ़ने से पर्यटन कारोबार को रफ्तार मिली है।

देशबन्धु 10 Oct 2026 1:54 pm

दुनियाभर में दोहरेपन और खोखलेपन की सबसे बड़ी मिसाल हैं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से डीजल खरीदने का फैसला कर लिंडसे ग्राहम को मानो श्रद्धांजलि दे दी है! यह कटाक्ष इसलिए है, क्योंकि भारत रूस से तेल खरीदे तो उस पर सौ फीसदी टैरिफ लगा दिया जाता है, लेकिन अमेरिका वही काम करे तो उसे शानदार फैसला बताया जाता है। यही नहीं, नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिला, तो ट्रंप ने अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय पर ही प्रतिबंध लगा दिए। आखिर यह कैसी नीति है? दूसरों को नियमों का पाठ पढ़ाने वाले ट्रंप जब अपने देश के हितों की बात आती है, तो उन्हीं नियमों को भूल जाते हैं। भारत पर रूस से तेल नहीं खरीदने का दबाव बनाने वाले ट्रंप अब खुद रूस से डीजल खरीद रहे हैं, इस फैसले ने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है इसलिए सवाल उठ रहा है कि रूस से तेल खरीदना गलत है, या गलत सिर्फ तब है जब भारत खरीदे? यही है ट्रंप की नीति का दोहरापन और खोखलापन! देखा जाये तो रूसी ऊर्जा खरीद को लेकर भारत पर दबाव बनाने वाले ट्रंप का ताजा फैसला उनकी कथनी और करनी के बीच की खाई को उजागर करता है। उल्लेखनीय है कि ट्रंप ने रूस से तत्काल तीन लाख टन से अधिक डीजल की आपूर्ति के साथ नवंबर में पांच लाख टन, उसके बाद दस लाख टन और फिर कुछ ही समय में तीस लाख टन अतिरिक्त डीजल की आपूर्ति की घोषणा की है। अमेरिकी प्रशासन ने रूसी डीजल की आपूर्ति को सुगम बनाने के लिए अस्थायी सामान्य अनुमति भी जारी की है, जिसके अंतर्गत निर्धारित शर्तों को पूरा करने वाले कुछ माल पर अप्रैल 2027 तक प्रतिबंधों में छूट का प्रावधान किया गया है। इसे भी पढ़ें: Donald Trump ने नोबेल शांति पुरस्कार न मिलने पर Norway पर साधा निशाना, 8 युद्ध रुकवाने का किया दावा गौरतलब है कि यह वही प्रशासन है जिसने रूस की युद्ध अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाने के उद्देश्य से प्रतिबंधों को सख्त करने की नीति अपनाई थी। लेकिन जब अमेरिका में ईंधन की कीमतें बढ़ीं और किसानों, ट्रक चालकों तथा कारोबारियों पर दबाव बढ़ा, तो रूस से ऊर्जा खरीद अचानक स्वीकार्य हो गई। दरअसल अमेरिका में नवंबर की शुरुआत में मध्यावधि चुनाव होने हैं और ट्रंप की नीतियों के चलते वहां महंगाई अप्रत्याशित रूप से बढ़ गयी है जिसके चलते जनता नाराज है। रिपोर्टों के मुताबिक, सितंबर में अमेरिकी डीजल की कीमत 6.52 डॉलर प्रति गैलन के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गयी थी और शुक्रवार को लगभग 6.28 डॉलर प्रति गैलन रही। तीन नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले महंगाई का सवाल ट्रंप के लिए बड़ा सिरदर्द बन चुका है। सर्वेक्षणों के मुताबिक, 78 प्रतिशत अमेरिकी नागरिकों ने बढ़ती जीवन-यापन लागत के लिए ट्रंप की नीतियों को जिम्मेदार माना है। इसलिए जब अमेरिकी मतदाताओं की जेब का सवाल आया, तो रूस से डीजल खरीदना ट्रंप के लिए राष्ट्रीय हित बन गया। लेकिन भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों और आर्थिक हितों के अनुसार रूसी तेल खरीदे, तो उसे टैरिफ का सामना करना पड़ता है। इसलिए सवाल उठता है कि यह कैसी निष्पक्षता है? यह कैसी नियम-आधारित व्यवस्था है, जिसमें नियम दूसरों के लिए हैं और छूट अपने लिए? दूसरी ओर, ट्रंप के इस फैसले ने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की की नाराजगी भी बढ़ा दी है। उन्होंने इसे अनुचित और बेईमानी भरा कदम बताते हुए कहा कि इससे पुतिन को जन्मदिन का उपहार मिलने जैसा संदेश जाता है। जेलेंस्की की आपत्ति इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि यह घोषणा ऐसे समय हुई, जब ट्रंप के प्रतिनिधि यूक्रेनी और यूरोपीय अधिकारियों के साथ युद्ध समाप्त करने के प्रस्तावों पर बातचीत कर रहे थे। जेलेंस्की ने यह भी संकेत दिया कि यदि ऊर्जा प्रतिबंधों में ढील दोनों देशों की ओर से सर्दियों में ऊर्जा ढांचे पर हमले रोकने जैसे पारस्परिक समझौते का हिस्सा होती, तो उसका समर्थन किया जा सकता था। लेकिन बिना ऐसी शर्तों के रियायत देना रूस की युद्ध क्षमता को आर्थिक सहारा देने जैसा दिखाई देता है। वहीं अमेरिकी रिपब्लिकन नेता डॉन बेकन ने भी इस फैसले की आलोचना की। उनका तर्क था कि अमेरिकी किसानों और उपभोक्ताओं के लिए डीजल सस्ता करना जरूरी है, लेकिन इसके लिए रूस से ईंधन खरीदना गलत रास्ता है। उन्होंने पूछा कि जब अमेरिकी संसद ने रूस पर दबाव बढ़ाने के लिए कानून पारित किया और ट्रंप ने स्वयं उस पर हस्ताक्षर किए, तो अब उसी दबाव को कमजोर करने का औचित्य क्या है? इसके अलावा, ट्रंप की राजनीति का दूसरा चिंताजनक पहलू अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के प्रति उनका रवैया है। अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश नवी पिल्लै को नोबेल शांति पुरस्कार मिलने के कुछ ही घंटों बाद ट्रंप प्रशासन ने न्यायालय के विरुद्ध प्रतिबंधों की घोषणा कर दी। नवी पिल्लै को सम्मान ऐसे समय मिला, जब अंतरराष्ट्रीय न्यायिक संस्थाओं पर राजनीतिक दबाव बढ़ने को लेकर चिंताएं व्यक्त की जा रही थीं। नोबेल समिति ने युद्ध अपराधियों को जवाबदेह ठहराने और पीड़ितों को न्याय दिलाने वाली अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था को शांतिपूर्ण विश्व की अनिवार्य शर्त बताया। नवी पिल्लै को नोबेल शांति पुरस्कार मिलते ही ट्रंप जैसे बौखला गये और कुछ घंटों बाद अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि ट्रंप अमेरिकी नागरिकों पर अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय का अभियोजन स्वीकार नहीं करेंगे। अमेरिकी प्रशासन ने न्यायालय के साथ लेन-देन पर रोक लगाने और उसके संसाधनों को बाधित करने की मंशा जाहिर की। वहीं अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय ने इसे कानून के शासन और अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था की बुनियाद पर हमला बताया। देखा जाये तो यहां भी वही पुराना सवाल सामने आता है कि क्या अंतरराष्ट्रीय कानून केवल कमजोर देशों और विरोधियों पर लागू होना चाहिए? क्या अमेरिका को अपने नागरिकों और अधिकारियों को किसी भी अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही से ऊपर रखने का अधिकार मिल जाना चाहिए? ऐसा लगता है कि वाशिंगटन अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही की सीमाएं अपने हिसाब से तय करना चाहता है। ट्रंप की राजनीति में सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि वे राष्ट्रीय हित का इस्तेमाल कभी प्रतिबंधों को उचित ठहराने के लिए करते हैं, तो कभी उन्हीं प्रतिबंधों को कमजोर करने के लिए। भारत के लिए रूसी तेल आर्थिक और ऊर्जा संबंधी जरूरतों का प्रश्न है, लेकिन अमेरिका के लिए वही रूसी ऊर्जा घरेलू महंगाई घटाने और चुनावी नुकसान रोकने का साधन बन जाती है। इसी तरह, अंतरराष्ट्रीय न्याय की बात तब तक स्वीकार्य दिखाई देती है, जब तक वह अमेरिकी सत्ता और उसके सहयोगियों के हितों से न टकराए। जैसे ही जवाबदेही का सवाल उठता है, स्वतंत्र न्यायिक संस्था को ही निशाना बनाया जाने लगता है। यह केवल नीतिगत असंगति नहीं, बल्कि उस नैतिक दावे की कमजोरी है जिसके आधार पर अमेरिका दुनिया को नियमों, लोकतंत्र और न्याय का उपदेश देता रहा है। ट्रंप ने अपने फैसलों से यह धारणा मजबूत की है कि उनके लिए सिद्धांत स्थायी नहीं, बल्कि परिस्थितियों और राजनीतिक लाभ के अनुसार बदलने वाली चीज हैं। बहरहाल, ट्रंप चाहे अपने कदमों को अमेरिकी हितों की रक्षा बताएं, लेकिन जब वही कदम दूसरों पर थोपे गए नैतिक मानदंडों को ध्वस्त करते हैं, तो उनकी राजनीति का खोखलापन उजागर होता है। अमेरिका को रूसी डीजल और भारत पर सौ फीसदी टैरिफ, इससे बड़ा दोहरा मापदंड क्या होगा? साथ ही अंतरराष्ट्रीय न्यायालय पर प्रतिबंध लगाकर यदि कोई देश खुद को कानून से ऊपर समझने लगे, तो दुनिया उसे न्याय का संरक्षक नहीं, बल्कि अपने स्वार्थ का प्रहरी ही मानेगी। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 10 Oct 2026 12:42 pm

'सरकार ने अच्छा नहीं किया', अभिजीत दीपके को हिरासत में लिए जाने पर भड़के माता-पिता

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दिल्ली में सीजेपी के विरोध प्रदर्शन पर बिहार के नेताओं की तीखी प्रतिक्रिया, कहा- 'अराजकता फैलाने की कोशिश'

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'पिछली कमलनाथ सरकार की अधूरी तैयारी का खामियाजा भुगत रहा ओबीसी वर्ग', आरक्षण के मुद्दे पर मप्र भाजपा का निशाना

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समाचार नामा 10 Oct 2026 10:23 am

सीजेपी प्रोटेस्ट में शामिल होने से पहले गुरुग्राम में यूट्यूबर ध्रुव राठी को पुलिस ने हिरासत में लिया

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समाचार नामा 10 Oct 2026 10:20 am

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समाचार नामा 10 Oct 2026 8:28 am

CEC विवाद पर जंतर-मंतर में प्रदर्शन आज, दिल्ली में हाई अलर्ट

मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर शनिवार को राजधानी दिल्ली में विरोध प्रदर्शन की तैयारी तेज हो गई है

देशबन्धु 10 Oct 2026 6:47 am

सीजेपी प्रदर्शन: दिल्ली पुलिस 10 अक्टूबर को सुबह 6 बजे से करेगी ट्रैफिक डायवर्जन, लोगों को अतिरिक्त समय लेकर यात्रा करने की सलाह

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समाचार नामा 9 Oct 2026 11:55 pm

राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद गरजा विपक्ष, ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे तक जारी रहेगा आंदोलन

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्ष के 10 सांसदों ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से मुलाकात की। इसके बाद लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी ने मीडिया से बातचीत में दावा किया कि उन्होंने संबंधित मुद्दे को उठाया। इस पर उन्होंने हमसे कहा कि हम उनके सामने सबूत पेश करें।

देशबन्धु 9 Oct 2026 11:28 pm

शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना संवैधानिक अधिकार, लेकिन सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने से बचें: इफ्राहिम हुसैन

शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना संवैधानिक अधिकार, लेकिन सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने से बचें: इफ्राहिम हुसैन

समाचार नामा 9 Oct 2026 11:27 pm

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने हमारी बातों को गलत नहीं बताया, सबूत मांगा: सपा सांसद राजीव राय

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने हमारी बातों को गलत नहीं बताया, सबूत मांगा: सपा सांसद राजीव राय

समाचार नामा 9 Oct 2026 11:26 pm

राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद राहुल का बड़ा दावा, वोट चोरी के सबूत मांगे गए

मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्षी नेताओं ने विजय चौक पर जोरदार प्रदर्शन किया। इसके बाद एक प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से भी मुलाकात की

देशबन्धु 9 Oct 2026 11:20 pm

'युवाओं को कोई नहीं रोक सकता', सीजेपी के प्रदर्शन के लिए ट्रेनें रद्द होने पर बोले चिराग पासवान

'युवाओं को कोई नहीं रोक सकता', सीजेपी के प्रदर्शन के लिए ट्रेनें रद्द होने पर बोले चिराग पासवान

समाचार नामा 9 Oct 2026 8:50 pm

सुप्रीम कोर्ट का निर्देश- वाहन, सारथी, ई-डीएआर और बीमा डेटाबेस चार हफ्ते में करें लिंक, मोटर दुर्घटना क्लेम होगा आसान

सुप्रीम कोर्ट का निर्देश- वाहन, सारथी, ई-डीएआर और बीमा डेटाबेस चार हफ्ते में करें लिंक, मोटर दुर्घटना क्लेम होगा आसान

समाचार नामा 9 Oct 2026 8:00 pm

सिनेमा और समाज सेवा का अनूठा संगम थे नाना पाटेकर

भारतीय कला जगत ने 8 अक्टूबर 2026 को अपना एक ऐसा अनमोल रत्न खो दिया जिसकी भरपाई करना शायद आने वाले कई दशकों तक संभव नहीं होगा। प्रख्यात अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की आयु में अचानक हृदय गति रुकने से निधन हो गया। यह दुखद समाचार दावानल की तरह पूरे देश में फैल गया और हर कोई स्तब्ध रह गया। नाना केवल एक साधारण अभिनेता नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसी बुलंद आवाज थे जो पर्दे पर आम इंसान की पीड़ा, उसके क्रोध और उसकी लाचारी को बेहद जीवंत रूप में प्रस्तुत करते थे। उनका जाना केवल कला जगत की ही क्षति नहीं है, बल्कि समाज के उस शोषित और वंचित वर्ग की भी बहुत बड़ी क्षति है, जिसके लिए वे हमेशा एक मसीहा बनकर खड़े रहे। उनके निधन से कला, संस्कृति और समाज सेवा के क्षेत्र में जो गहरा सन्नाटा पसरा है, उसे शब्दों में बांधना बेहद कठिन है। नाना पाटेकर का जन्म महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड जंजीरा में हुआ था। उनका बचपन बेहद संघर्षपूर्ण और अभावों में बीता था। उन्होंने अपने जीवन के शुरुआती दिनों में ही जीवन की कठोर वास्तविकताओं का सामना किया। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण उन्होंने छोटी उम्र में ही काम करना शुरू कर दिया था। एक समय ऐसा भी था जब वे सड़कों पर पैदल यात्रियों के सड़क पार करने के लिए सफेद पट्टियां रंगने का काम करते थे और उसी से अपनी आजीविका चलाते थे। यह उनके जीवट और अथक परिश्रम का ही परिणाम था कि उन्होंने कभी परिस्थितियों के सामने घुटने नहीं टेके। इस कठोर संघर्ष ने उन्हें जीवन की उन गहराइयों से परिचित कराया, जो बाद में उनके अभिनय में स्पष्ट रूप से दिखाई देती थीं। उनके भीतर का कलाकार इसी भट्टी में तपकर कुंदन बना था। नाटकों और रंगमंच के प्रति उनका आकर्षण उन्हें धीरे-धीरे अभिनय की दुनिया की ओर ले गया, जहां उन्होंने अपनी एक अलग और अमिट पहचान बनाई। इसे भी पढ़ें: नाना पाटेकर के निधन पर अमिताभ बच्चन ने व्यक्त किया गहरा शोक! कहा- अद्वितीय कलाकार और सच्चे समाजसेवी को नमन रंगमंच से अपने अभिनय की शुरुआत करने वाले नाना पाटेकर ने जब रूपहले पर्दे पर कदम रखा, तो उन्होंने नायक की उस पारंपरिक छवि को पूरी तरह से तोड़ दिया जो उस समय तक सिनेमा में स्थापित थी। उनकी आंखें बोलती थीं और उनकी आवाज में वह कशिश थी जो दर्शकों को अंत तक बांधे रखती थी। उनका संवाद अदायगी का तरीका इतना स्वाभाविक और तेज होता था कि सामने बैठा दर्शक खुद को उस दृश्य का हिस्सा समझने लगता था। उन्होंने क्रांतिवीर, परिंदा, तिरंगा, खामोशी, प्रहार और नटसम्राट जैसी तमाम बेहतरीन रचनाओं में अपने अभिनय का जो उत्कृष्ट प्रदर्शन किया, वह अभिनय की पाठशाला में हमेशा एक मानक के रूप में पढ़ाया जाएगा। चाहे वह एक भ्रष्ट व्यवस्था से लड़ने वाला आम नागरिक हो, एक सख्त सैन्य अधिकारी हो या फिर एक गूंगे बहरे दंपति का संवेदनशील पिता, हर भूमिका में उन्होंने अपने प्राण फूंक दिए। उनके द्वारा बोले गए संवाद आज भी लोगों की जुबान पर हैं और वे मात्र संवाद न होकर समाज की कुरीतियों पर एक गहरा कटाक्ष प्रतीत होते हैं। नाना पाटेकर की एक और बहुत बड़ी विशेषता यह थी कि वे अपनी मातृभाषा मराठी और हिंदी, दोनों ही भाषाओं पर समान अधिकार रखते थे। उन्होंने जितनी सफलता हिंदी सिनेमा में प्राप्त की, उतनी ही ऊंचाई उन्होंने मराठी सिनेमा और रंगमंच में भी हासिल की। उनकी वाणी में एक विशेष प्रकार का ओज था। जब वे अपने संवाद बोलते थे, तो शब्दों के आरोह और अवरोह पर उनका नियंत्रण अद्भुत होता था। उन्होंने कभी भी किसी विदेशी भाषा या पाश्चात्य संस्कृति को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। वे अपनी जड़ों से जुड़े रहे और अपनी भारतीय संस्कृति पर हमेशा गर्व करते रहे। उनकी वेशभूषा, उनके विचार और उनका रहन सहन सब कुछ पूरी तरह से भारतीय था। चकाचौंध के इस दौर में भी उन्होंने अपनी भारतीयता को कभी नहीं छोड़ा। अभिनय की दुनिया में सर्वोच्च शिखर पर पहुंचने के बावजूद नाना पाटेकर ने कभी दिखावे की दुनिया को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। उन्होंने हमेशा एक बेहद सादा और संयमित जीवन व्यतीत किया। जब अन्य कलाकार विलासिता पूर्ण जीवन जी रहे थे, तब नाना अपने गांव में खेती कर रहे थे और एक साधारण इंसान की तरह जीवन बिता रहे थे। उनका यही गुण उन्हें अन्य सभी कलाकारों से अलग और श्रेष्ठ बनाता था। वे हमेशा अपनी जड़ों से जुड़े रहे और उन्होंने कभी अपने अतीत को नहीं भुलाया। यह उनकी महानता ही थी कि उन्होंने अपनी कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा समाज की भलाई के लिए दान कर दिया। विशेषकर महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त क्षेत्रों में किसानों की आत्महत्या की घटनाओं ने उनके हृदय को गहरे तक झकझोर दिया था। किसानों की पीड़ा को उन्होंने अपना दर्द समझा और उनकी सहायता के लिए एक संस्था का निर्माण किया। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने हजारों अनाथ बच्चों, विधवाओं और कर्ज में डूबे किसानों के परिवारों को आर्थिक और मानसिक संबल प्रदान किया। उन्होंने गांव गांव जाकर लोगों की समस्याएं सुनीं और उनके समाधान के लिए जमीनी स्तर पर कार्य किया। उनके इस निस्वार्थ सेवा भाव ने उन्हें जनता के बीच एक भगवान के समान दर्जा दिला दिया था। लोग उन्हें केवल एक कलाकार के रूप में नहीं बल्कि अपने परिवार के एक बड़े बुजुर्ग के रूप में देखते थे जो संकट के समय हमेशा उनके साथ खड़ा रहता था। वर्तमान समय में जहां युवा पीढ़ी बहुत जल्दी मानसिक तनाव का शिकार हो जाती है, नाना पाटेकर का जीवन उनके लिए एक खुला मार्गदर्शन है। उनका जीवन सिखाता है कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि मनुष्य के भीतर इच्छाशक्ति और दृढ़ संकल्प है, तो वह किसी भी बाधा को पार कर सकता है। उन्होंने बिना किसी बाहरी सहारे के अपने दम पर वह मुकाम हासिल किया, जो लाखों लोगों के लिए केवल एक सपना होता है। उनकी यात्रा शून्य से शिखर तक की एक बेहद प्रेरणादायक कहानी है। 8 अक्टूबर 2026 की वह मनहूस सुबह भारतीय कला जगत के लिए एक काला अध्याय लेकर आई। वे गोवा के डोना पाउला स्थित अपने आवास पर थे, जब सुबह के समय उन्हें अचानक गंभीर हृदयघात हुआ। परिजनों द्वारा उन्हें तुरंत समीप के एक बड़े अस्पताल ले जाया गया। वहां मौजूद चिकित्सकों ने करीब 45 मिनट तक उनके हृदय को पुनः सक्रिय करने का हर संभव प्रयास किया, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। सुबह 5 बजकर 20 मिनट पर चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। यह समाचार जैसे ही बाहर आया, पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। जो आंखें उनकी कला को देखकर चमक उठती थीं, वे आंसुओं से नम थीं। चिकित्सकीय और कानूनी प्रक्रियाओं के बाद उनके पार्थिव शरीर को विशेष विमान और वाहन के माध्यम से महाराष्ट्र के पुणे लाया गया। उनका अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव डोंजे में पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ संपन्न हुआ। इस अवसर पर जनसैलाब उमड़ पड़ा था। हर कोई अपने चहेते नायक के अंतिम दर्शन करना चाहता था। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने स्वयं वहां पहुंचकर उनके पार्थिव शरीर को कंधा दिया, जो इस बात का प्रतीक था कि उनका कद राजनीति और कला की सीमाओं से कहीं बहुत ऊपर था। उनके अंतिम सफर में उनके पुराने मित्र, सहकर्मी और हजारों की संख्या में आम लोग शामिल हुए। हर आंख नम थी और हर दिल भारी था। नाना पाटेकर का जाना एक युग का अंत है। उन्होंने अपने अभिनय और अपने कर्मों से जो लकीर खींची है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा स्रोत बनी रहेगी। उनका भौतिक शरीर आज हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनकी कला, उनके विचार और मानवता के लिए किए गए उनके निस्वार्थ कार्य उन्हें हमेशा हमारे दिलों में जीवित रखेंगे। रूपहले पर्दे का वह शेर आज हमेशा के लिए शांत हो गया है, लेकिन उसकी दहाड़ भारतीय सिनेमा और समाज की चेतना में हमेशा गूंजती रहेगी। - महेन्द्र तिवारी

प्रभासाक्षी 9 Oct 2026 7:35 pm

हिमालय की प्रदूषण-मुक्ति भी हो पहाड़ी तीर्थयात्रा का उद्देश्य

हिमालय केवल पर्वतों की एक शृंखला नहीं है, वह भारत की सांस्कृतिक चेतना, आध्यात्मिक आस्था और प्राकृतिक जीवन का आधार है। उसकी चोटियों में तप की स्मृतियां हैं, उसकी नदियों में करोड़ों लोगों की जीवनधारा बहती है और उसकी घाटियों में असंख्य धार्मिक स्थल सदियों से श्रद्धालुओं को आकर्षित करते रहे हैं। हिमाचल प्रदेश सहित पूरे हिमालयी क्षेत्र में हिंदू धर्म के अनेक प्रमुख तीर्थस्थल हैं। इन स्थानों पर पहुंचना श्रद्धालुओं के लिए आस्था का विषय है, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि पिछले कुछ वर्षों में तीर्थयात्रा और पर्यटन के बीच की सीमा धुंधली होती जा रही है। दर्शन और आध्यात्मिक अनुभूति के साथ मनोरंजन, मौज-मस्ती और उपभोक्तावादी जीवनशैली का प्रवेश पहाड़ों की संवेदनशीलता पर भारी पड़ रहा है। हिमालय की सबसे बड़ी विशेषता ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी है। यहां का पर्यावरण अत्यंत नाजुक है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मिट्टी की परत पतली है, वनस्पतियों की पुनरुत्पादन क्षमता सीमित है और कचरे के प्राकृतिक रूप से नष्ट होने की प्रक्रिया मैदानी क्षेत्रों की तुलना में बहुत धीमी है। इसके बावजूद हम हजारों-लाखों लोगों को एक साथ इन क्षेत्रों में पहुंचा रहे हैं। वाहनों की लंबी कतारें, पार्किंग का दबाव, होटल और ढाबों का अनियोजित विस्तार, प्लास्टिक की बोतलें, खाद्य पदार्थों के रैपर, पॉलीथिन और डिस्पोजेबल सामग्री पहाड़ों की प्राकृतिक सुंदरता और पर्यावरण को लगातार चोट पहुंचा रहे हैं। चारधाम यात्रा के दौरान इस वर्ष सितंबर के मध्य तक 800 टन से अधिक कचरा एकत्र होने की सूचना इस संकट की गंभीरता को सामने रखती है। केदारनाथ जैसे अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र में अप्रैल से अगस्त के बीच 50.30 टन कचरा जमा होना विशेष चिंता का विषय है। यह तथ्य इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में फेंकी गई एक प्लास्टिक बोतल केवल एक बोतल नहीं रहती, वह लंबे समय तक पर्यावरण में मौजूद रहकर मिट्टी, जलस्रोतों और वन्यजीवन के लिए खतरा बन सकती है। विडंबना देखिए-जिस स्थान पर मनुष्य आत्मशुद्धि, संयम और त्याग की भावना लेकर जाता है, वहीं वह अपने पीछे कचरे का निशान छोड़ आता है। क्या ऐसी यात्रा को वास्तव में तीर्थयात्रा कहा जा सकता है? तीर्थ का अर्थ केवल किसी मंदिर तक पहुंच जाना नहीं है। तीर्थ मनुष्य के भीतर परिवर्तन की यात्रा है। यदि मंदिर में माथा टेकने के बाद हम उसी पर्वत की गोद में प्लास्टिक फेंक दें, जिसकी पवित्रता के नाम पर वहां पहुंचे हैं, तो हमारी आस्था अधूरी रह जाती है। इसे भी पढ़ें: Delhi Pollution रोकने के लिए Construction Ban, Parking Charges डबल करने और Work From Home की नीति का ऐलान इस संदर्भ में ‘कैरी मी बैक’ अभियान उम्मीद की एक महत्वपूर्ण किरण है। लगभग पांच हजार तीर्थयात्रियों द्वारा करीब 18 किलोमीटर के रास्ते से 12 टन से अधिक कंप्रेस्ड प्लास्टिक वापस नीचे लाना बताता है कि श्रद्धालुओं को सहभागी बनाया जाए तो वे पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यह केवल कचरा उठाने का अभियान नहीं, बल्कि तीर्थयात्रा की मानसिकता बदलने का प्रयास है। ऐसे अभियानों को व्यापक स्वरूप देकर हिमाचल, उत्तराखंड और अन्य हिमालयी तीर्थ क्षेत्रों में लागू किया जाना चाहिए। अमरनाथ यात्रा से मिला अनुभव भी सकारात्मक दिशा दिखाता है। पुनः उपयोग किए जाने वाले बर्तनों और पानी भरने की सुविधाओं के विस्तार के कारण यात्रियों की संख्या में 17 प्रतिशत वृद्धि के बावजूद प्रति यात्री कचरे में 15 प्रतिशत कमी आना इस बात का प्रमाण है कि सुविधाजनक और वैज्ञानिक व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए तो पर्यावरणीय दबाव कम किया जा सकता है। इसलिए केवल श्रद्धालुओं से अपील करना पर्याप्त नहीं है, प्रशासन को ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें पर्यावरण-अनुकूल व्यवहार सबसे सहज विकल्प बने। हिमाचल प्रदेश के धार्मिक एवं पर्यटन स्थलों पर भीड़ का अनियंत्रित बढ़ना इसी व्यापक संकट का हिस्सा है। शिमला, मनाली, धर्मशाला, चामुंडा, ज्वालाजी, चिंतपूर्णी, नैना देवी और अन्य धार्मिक-पर्यटन स्थलों पर मौसम विशेष में बढ़ने वाला दबाव यातायात, जलापूर्ति, सीवेज, ठोस कचरा और स्थानीय संसाधनों पर असर डालता है। पहाड़ों की वहन क्षमता मैदानी शहरों जैसी नहीं है। इसलिए किसी भी तीर्थ या पर्यटन स्थल की लोकप्रियता को केवल अधिकाधिक लोगों को वहां पहुंचाने की सफलता के रूप में नहीं देखा जा सकता। अब समय आ गया है कि ‘जितने अधिक पर्यटक, उतना अधिक विकास’ की सोच को ‘जितना संवेदनशील पर्यावरण, उतना जिम्मेदार पर्यटन’ में बदला जाए। तीर्थस्थलों की वहन क्षमता का वैज्ञानिक अध्ययन हो और उसके आधार पर प्रतिदिन या मौसम के अनुसार आगंतुकों की संख्या निर्धारित की जाए। सिंगल-यूज प्लास्टिक पर प्रभावी नियंत्रण हो, पानी के रिफिल स्टेशन बढ़ाए जाएं, बोतलों और पैकेजिंग के लिए डिपॉजिट-रिटर्न व्यवस्था लागू की जाए तथा कचरे को स्रोत पर ही अलग करने की व्यवस्था हो। दुकानदारों, होटल संचालकों और वेंडरों को उनके द्वारा उत्पन्न कचरे के प्रति जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण है तीर्थयात्री की मानसिकता में परिवर्तन। पहाड़ हमारे मनोरंजन के मैदान नहीं हैं। वे हमारी आने वाली पीढ़ियों की प्राकृतिक विरासत हैं। जिस नदी के किनारे हम पूजा करते हैं, वही नदी नीचे बसे करोड़ों लोगों का जीवन है। जिस जंगल को हम कैमरे में कैद करते हैं, वही जंगल पहाड़ी पारिस्थितिकी को संतुलित करता है। जिस पर्वत को हम देवभूमि कहकर नमन करते हैं, उसकी ढलानों पर प्लास्टिक फेंकना हमारी अपनी श्रद्धा का अपमान है। नेपाल और हिमालयी क्षेत्र में समय-समय पर अत्यधिक वर्षा, बाढ़, भूस्खलन और हिमस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं ने यह चेतावनी दी है कि पर्वतीय पारिस्थितिकी के साथ छेड़छाड़ के परिणाम गंभीर हो सकते हैं। हर आपदा को सीधे पर्यटन या प्रदूषण का परिणाम मानना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा, लेकिन इतना निश्चित है कि अनियोजित निर्माण, अत्यधिक मानवीय दबाव, वन क्षरण और कचरा प्रबंधन की कमजोरी पर्वतीय क्षेत्रों की संवेदनशीलता को बढ़ा सकती है। हिमालय आज चिन्ताओं का हिमालय बन गया है। कुछ दशकों में खासकर हिमालयी क्षेत्र के राज्यों में विकास के नाम पर जहां प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन हुआ है, वहीं धार्मिक पर्यटन के नाम पर व्यापक स्तर पर प्रदूषण फैला है। इतना ही नहीं, प्रकृति से खिलवाड़ कर नियमों के खिलाफ ऐसा निर्माण खड़ा किया जा रहा है, जो बाढ़ और भूस्खलन के साथ बर्बादी लेकर आता रहा है। सवाल यह भी है कि पहाड़ी राज्यों में विकास का क्या पैमाना होना चाहिए? अगर विकास के नाम पर कहीं निर्माण गतिविधियां आवश्यक हों तो वह नियोजन के साथ ही आपदाओं को झेलने में सक्षम होनी चाहिए। आम तौर पर देखा गया है कि इन राज्यों में पर्यटन एवं धार्मिक यात्राओं को बढ़ावा देेने के नाम पर ऐसी बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी हो गईं जो न सिर्फ बाढ़ और भूस्खलन झेलने में अक्षम साबित हुईं, बल्कि पर्यावरण के हिसाब से भी नुकसानदेह रही हैं। ऐसे निर्माण में सरकारी स्तर पर सतर्कता की जो उम्मीद की जाती है, उसे नजरअंदाज किया गया। हिमालय हमें बहुत कुछ देता है-जल, वन, जैव विविधता, जलवायु संतुलन, संस्कृति और आध्यात्मिक ऊर्जा। बदले में हमारी जिम्मेदारी केवल वहां जाकर पूजा करना नहीं, बल्कि उस प्रकृति की रक्षा करना भी है। तीर्थयात्री यदि एक बोतल पानी लेकर पहाड़ पर जा सकता है तो खाली बोतल वापस भी ला सकता है। यह छोटा-सा संकल्प बड़े परिवर्तन का आधार बन सकता है। आस्था और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। धार्मिक यात्रा का वास्तविक संस्कार तभी पूर्ण होगा जब तीर्थयात्री मंदिर से लौटते समय अपने साथ प्रसाद ही नहीं, प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी भी लेकर लौटे। सरकारें व्यवस्था करें, स्थानीय समुदाय भागीदारी निभाएं और श्रद्धालु अपना कचरा वापस लाने का संकल्प लें-तभी हिमालय की पवित्रता सुरक्षित रह सकेगी। हिमालय को केवल देवभूमि कहने से उसकी रक्षा नहीं होगी, उसे देवभूमि की तरह व्यवहार देकर ही उसकी पवित्रता बचाई जा सकती है। यही सच्ची तीर्थयात्रा है, यही प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और यही आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारा नैतिक दायित्व है। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

प्रभासाक्षी 9 Oct 2026 7:30 pm

पीएम मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष पूरे, असम कैबिनेट ने पारित किए 75 प्रस्ताव

पीएम मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष पूरे, असम कैबिनेट ने पारित किए 75 प्रस्ताव

समाचार नामा 9 Oct 2026 5:55 pm