Chai Par Sameeksha: Misra-Masood क्या बचा पाएंगे UP Congress का वजूद? CJP Protest का क्या असर होगा?
प्रभासाक्षी की साप्ताहिक कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में इस सप्ताह हमने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर हो रही राजनीति पर चर्चा की। साथ-साथ उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने जो बदलाव किए हैं उससे भी संबंधित सवाल पूछे। हमेशा की तरह इस कार्यक्रम में मौजूद रहे प्रभासाक्षी के संपादक नीरज दुबे। नीरज दुबे ने साफ तौर पर कहा कि राजनीति के लिए फिलहाल संवैधानिक संस्थाओं को भी विपक्ष की ओर से नहीं छोड़ा जा रहा है। उन्होंने कहा कि मामला सुप्रीम कोर्ट में है और ऐसे में सुप्रीम कोर्ट पर हर किसी को भरोसा रखना चाहिए। नीरज दुबे ने कहा कि चुनाव आयोग ने कई सुधार हाल के दिनों में किए हैं। यह अच्छी बात है कि विपक्ष ने इसको लेकर दबाव बनाया और चुनाव आयोग ने वह सुधार किए हैं। उन्होंने कहा कि सुधार की गुंजाइश हमेशा रहती है और चुनाव आयोग भी वही कर रहा है। उन्होंने कहा कि जब से जंतर मंतर का आंदोलन हुआ है तब से विपक्ष को भी लगने लगा है कि यह सरकार झुक सकती है और हमें लगातार इसको लेकर झुकाने की तैयारी करनी चाहिए। हालांकि नीरज कुमार दुबे ने साफ तौर पर कहा कि डूसू चुनाव या पंजाब विश्वविद्यालय के चुनाव को हम देखें तो वहां भाजपा समर्थित संगठन को जीत मिली। विपक्ष के जो विद्यार्थी संगठन है, उसे हार का सामना करना पड़ा जिसका मतलब साफ है कि अभी भी देश के युवा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ खड़े हैं। ऐसे में विपक्ष को युवाओं के बीच भ्रम फैलाने से बचना चाहिए। इसे भी पढ़ें: Seat Sharing पर Congress सीधे SP चीफ Akhilesh Yadav से करे बात, Dharmendra Yadav ने दी नसीहत नीरज कुमार दुबे ने कहा कि देश तरक्की कर रहा है। लेकिन विपक्ष लगातार भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहा है। जो राजक तत्व है, जो आंदोलनजीवी हैं, वह हमेशा इसी तरीके की बातें करते रहेंगे ताकि देश के लोगों में भ्रम रहे। उन्होंने कहा कि कॉकरोच जनता पार्टी को एक सफलता मिली जिसके बाद उसका आत्मविश्वास बढ़ा हुआ है। लेकिन ऐसा नहीं है कि हर बार उसे सफलता मिल जाए। कांग्रेस को भी यही लगता है कि जब सीजेपी को समर्थन मिल गया तो हम क्यों पीछे रहे? इसलिए कांग्रेस भी इस तरह की चीज कर रही है। फिलहाल सीजेपी और कांग्रेस के बीच ही लड़ाई साफ तौर पर देखने को मिल रही है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के भीतर हुए बदलाव पर हमने नीरज कुमार दुबे से सवाल पूछा। नीरज दुबे ने कहा कि कांग्रेस घूम फिर कर एक परिवार पर ही आ जाती है और उत्तर प्रदेश में भी हमने देखा कि वह एक परिवार के ही व्यक्ति को पार्टी की कमान सौंप दी है। जिस व्यक्ति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी उनके क्षेत्र में मजबूत चुनौती दी थी, उसे चुनाव से 4 महीने पहले हटाने का क्या मतलब है? आप किसी दूसरे पार्टी से नेता को लेकर आते हैं और उसे प्रभारी बनाते हैं। प्रभारी के जरिए आप रिपोर्ट लेते हैं और तब फैसला आप लेते हैं। ऐसे में आप खुद अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के भरोसे पर खड़े नहीं उतर रहे हैं। इमरान मसूद के बयान की वजह से आपके गठबंधन के सहयोगी अखिलेश यादव आपसे नाराज है। बावजूद इसके आप इमरान मसूद को आगे बढ़ाने की कोशिश में लगे हैं।
चीन-पाकिस्तान रक्षा गठजोड़ और भारत की रणनीतिक विवशता
दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक परिदृश्य में शक्ति संतुलन तेजी से करवट बदल रहा है। पिछले कुछ समय में चीन और पाकिस्तान के बीच रक्षा और सामरिक सहयोग जिस आक्रामकता के साथ आगे बढ़ा है, उसने नई दिल्ली के सुरक्षा गलियारों में खतरे की घंटी बजा दी है। हाल ही में चीन द्वारा पाकिस्तान को पांचवीं पीढ़ी के अत्याधुनिक स्टेल्थ लड़ाकू विमान, विशेष रूप से जे-35 और जे-31 की आपूर्ति करने की खबरें और पाकिस्तानी पायलटों की चीनी वायुसेना के साथ बढ़ती संयुक्त ट्रेनिंग महज एक द्विपक्षीय सैन्य सौदा नहीं है। यह भारत की संप्रभुता, हवाई श्रेष्ठता और दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए एक सीधी और गंभीर चुनौती है। भारतीय वायुसेना के नेतृत्व ने भी इस उभरते खतरे को खुले तौर पर स्वीकार किया है। आज भारत के सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि वह एक तरफ घटती हुई लड़ाकू विमानों की स्क्वाड्रन क्षमता और दूसरी तरफ टू-फ्रंट वॉर (दो मोर्चों पर युद्ध) की वास्तविक होती आशंका के बीच अपनी सैन्य संप्रभुता को कैसे अक्षुण्ण बनाए रखे। यह संपादकीय इस रक्षा सौदे के गहरे रणनीतिक निहितार्थों, भारत की वर्तमान वायुसैनिक कमजोरियों और इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने के व्यावहारिक रास्तों का एक विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है। ऐतिहासिक रूप से, भारत ने पारंपरिक सैन्य मोर्चे पर हमेशा पाकिस्तान के खिलाफ एक गुणात्मक और संख्यात्मक बढ़त बनाए रखी है। १९६५, १९७१ और १९९९ के युद्धों में भारतीय वायुसेना की तकनीकी और रणनीतिक श्रेष्ठता ने निर्णयकारी भूमिका निभाई थी। यहाँ तक कि हाल के वर्षों में फ्रांस से मिले ४.५ पीढ़ी के राफेल विमानों ने पाकिस्तान की वायुसेना के अमेरिकी एफ-16 विमानों पर भारत को एक स्पष्ट मनोवैज्ञानिक और तकनीकी बढ़त दे दी थी। लेकिन चीन द्वारा पाकिस्तान को पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट सौंपने की यह नई डील इस स्थापित संतुलन को पूरी तरह से बिगाड़ने की क्षमता रखती है। इसे भी पढ़ें: Prabhasakshi NewsRoom: Jaishankar की बात एकदम सही निकली, Pakistan के साथ नई Defence Deal कर America ने India के लिए बढ़ाया खतरा! पांचवीं पीढ़ी के विमानों की सबसे बड़ी खासियत उनका 'स्टेल्थ' होना होता है, यानी वे दुश्मन के रडार की नजरों से बचकर बेहद करीब तक हमला करने में सक्षम होते हैं। यदि पाकिस्तान इन विमानों को अपनी वायुसेना में सफलतापूर्वक शामिल और संचालित कर लेता है, तो भारत की मौजूदा हवाई रक्षा प्रणालियों और राफेल जैसे ४.५ पीढ़ी के विमानों की प्रभावशीलता पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न लग जाएगा। चीन इस सौदे के जरिए न केवल भारत को अपने पड़ोस में उलझाए रखना चाहता है, बल्कि वह भारतीय उपमहाद्वीप में अमेरिकी प्रभाव और भारत की बढ़ती वैश्विक महत्वाकांक्षाओं को भी सीमित करना चाहता है। यह सौदा साफ तौर पर दर्शाता है कि पाकिस्तान अब चीनी सेना के एक 'प्रॉक्सी' के रूप में काम कर रहा है, जिसका एकमात्र उद्देश्य भारत की सैन्य ऊर्जा को निरंतर सोखना है। इस बाहरी खतरे के बीच, भारत की सबसे बड़ी चिंता उसकी आंतरिक रक्षा तैयारियों की धीमी रफ्तार है। भारतीय वायुसेना को किसी भी दोहरे मोर्चे (चीन और पाकिस्तान) की चुनौती से निपटने के लिए कम से कम ४२ लड़ाकू विमानों की स्क्वाड्रन की आवश्यकता स्वीकृत है। इसके विपरीत, वर्तमान में यह संख्या खतरनाक रूप से घटकर महज २९ स्क्वाड्रन पर आ गई है। मिग-२१ जैसे पुराने सोवियत कालीन विमानों के चरणबद्ध तरीके से बाहर होने और नए विमानों के शामिल होने की बेहद धीमी दर ने इस खाई को और चौड़ा कर दिया है। इस संकट को और गहरा करने में हमारे स्वदेशी रक्षा उत्पादन की कछुआ चाल ने बड़ी भूमिका निभाई है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड द्वारा विकसित किए जा रहे तेजस मार्क-१ए लड़ाकू विमानों की डिलीवरी में लगातार हो रही देरी ने वायुसेना के आधुनिकीकरण के पहियों को जाम कर दिया है। स्वदेशीकरण और 'आत्मनिर्भर भारत' का नारा अपनी जगह बेहद सराहनीय और आवश्यक है, लेकिन जब वास्तविक युद्ध की रणनीतियों की बात आती है, तो नारों से ज्यादा जमीन पर विमानों की उपलब्धता मायने रखती है। भारत अपने लड़ाकू विमानों की संख्या को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है, जबकि उसके दोनों पड़ोसी देश अपनी फ्लीट को न केवल आधुनिक बना रहे हैं, बल्कि उनकी संख्या में भी भारी इजाफा कर रहे हैं। वायुसेना प्रमुख के अनुसार, यदि भारत को अपनी खोई हुई हवाई श्रेष्ठता वापस पानी है, तो उसे हर साल अपनी फ्लीट में कम से कम ३६ से ४० नए फाइटर जेट शामिल करने होंगे, जो कि वर्तमान उत्पादन क्षमता को देखते हुए एक बेहद कठिन लक्ष्य प्रतीत होता है। हालांकि स्थिति चिंताजनक है, लेकिन सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को तुरंत किसी घबराहट या पैनिक में आने की आवश्यकता नहीं है। किसी भी लड़ाकू विमान की क्षमता महज उसकी कागजी विशिष्टताओं या उसकी पीढ़ी से तय नहीं होती। युद्ध में सबसे महत्वपूर्ण होता है 'सिस्टम इंटीग्रेशन' । पाकिस्तान को चीन से विमान तो मिल सकते हैं, लेकिन उन्हें अपने मौजूदा पश्चिमी और चीनी रडार नेटवर्क, मिसाइल प्रणालियों और कमांड-एंड-कंट्रोल इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ पूरी तरह से एकीकृत करने में वर्षों का समय लगेगा। चीनी तकनीक की विश्वसनीयता और वास्तविक युद्ध स्थितियों में उसका प्रदर्शन हमेशा से संदेह के घेरे में रहा है। इसके अतिरिक्त, वायु रक्षा केवल लड़ाकू विमानों के भरोसे नहीं लड़ी जाती। भारत ने हाल के वर्षों में अपनी जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणालियों को बेहद मजबूत किया है। रूस से मिली एस-४०० ट्रिम्फ वायु रक्षा प्रणाली और भारत के अपने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन तथा भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड ( द्वारा विकसित किए जा रहे आधुनिक एंटी-स्टेल्थ रडार नेटवर्क इस खतरे को काफी हद तक कम कर सकते हैं। एंटी-स्टेल्थ रडार कम तरंग दैर्ध्य का उपयोग करके स्टेल्थ विमानों की अदृश्यता को बेअसर करने की क्षमता रखते हैं। इसलिए, चीनी विमानों का पाकिस्तान की फ्लीट में आना भारत के लिए चुनौती जरूर है, लेकिन यह कोई ऐसी अभेद्य दीवार नहीं है जिसे तोड़ा न जा सके। इस सामरिक गतिरोध को तोड़ने के लिए भारत को एक बहुआयामी और त्वरित रणनीति पर काम करना होगा। पहली प्राथमिकता तात्कालिक आवश्यकताओं को पूरा करने की होनी चाहिए। भारत पिछले कई वर्षों से ११४ मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट की खरीद प्रक्रिया को अटकाए हुए है। नौकरशाही की लालफीताशाही और बजटीय सीमाओं के कारण इस सौदे पर अंतिम निर्णय नहीं हो पाया है। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए, भारत सरकार को इसी वित्तीय वर्ष के भीतर फ्रांस के साथ राफेल या किसी अन्य समकक्ष विमान के लिए MRFA डील को अंतिम रूप देना होगा। यह वायुसेना के घटते स्क्वाड्रन को तुरंत ऑक्सीजन देने जैसा होगा। दूसरी रणनीति दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता की होनी चाहिए। भारत का अपना पांचवीं पीढ़ी का विमान कार्यक्रम, जिसे 'एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट' कहा जाता है, अभी भी डिजाइन और शुरुआती विकास के चरणों में है। सरकार को इस परियोजना को 'मिशन मोड' में डालना होगा और निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देकर इसकी समयसीमा को आधा करना होगा। लेकिन यदि AMCA के निर्माण में उम्मीद से ज्यादा देरी होती है, तो भारत को व्यावहारिक रुख अपनाते हुए विदेशी विकल्पों को खुला रखना होगा। रूस द्वारा पेश किए गए सुखोई-५७ स्टेल्थ फाइटर के प्रस्ताव या अमेरिका के अत्याधुनिक विमानों की तकनीक हस्तांतरण की संभावनाओं पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में रणनीतिक जिद से ज्यादा व्यावहारिक निर्णय मायने रखते हैं। चीन-पाकिस्तान रक्षा सौदा भारतीय रक्षा योजनाकारों के लिए एक स्पष्ट और कड़ा 'वेक-अप कॉल' है। अब वह समय बीत चुका है जब भारत अपने दुश्मनों पर केवल अपनी संख्या बल या पुराने युद्धों के अनुभवों के आधार पर बढ़त बनाए रख सकता था। आज का युद्ध तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्टेल्थ और इलेक्ट्रॉनिक विंग्स का है। यदि भारत को उपमहाद्वीप में एक शुद्ध सुरक्षा प्रदाता और एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में अपनी स्थिति बनाए रखनी है, तो उसे अपनी रक्षा खरीद प्रक्रियाओं में क्रांतिकारी बदलाव करने होंगे।घटती हुई स्क्वाड्रन संख्या और पड़ोसियों की बढ़ती ताकत के बीच का यह अंतर भारत को रक्षा खर्च बढ़ाने और त्वरित निर्णय लेने के लिए विवश करता है। हमें यह समझना होगा कि शांति की रक्षा केवल तभी की जा सकती है जब आप युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार हों। चीन और पाकिस्तान की इस जुगलबंदी का जवाब देने के लिए भारत को आर्थिक, कूटनीतिक और सैन्य मोर्चे पर एक नए विज़न की आवश्यकता है। समय तेजी से निकल रहा है, और आसमान में अपनी संप्रभुता को बनाए रखने के लिए नई दिल्ली को अब कड़े, त्वरित और दूरगामी फैसले लेने ही होंगे। - अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार
भरोसे पर भी खरे उतरे सेलिब्रिटिज
विज्ञापनों के प्रति सेलिब्रिटिज की जवाबदेही को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की हालिया टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है कि अपने उत्पादों को बेचने के लिए सेलिब्रिटिज का उपयोग सबसे अधिक किया जाता रहा है। विज्ञापनदाता जानते हैं कि लक्षित उपभोक्ता तक पहुंचने में सेलिब्रिटिज की भागीदारी महत्वपूर्ण हो जाती हैं। लोग सेलिब्रिटिज पर विष्वास करते हैं और विज्ञापनदाता कंपनियां इसी का लाभ अपने उत्पादों को बाजार दिलाने में करते आये हैं। इसीलिए राष्ट्र्पति द्रौपदी मुर्मु की टिप्पणी कि सच्चा सितारा रोशनी फैलाता है, अंधेरापन नहीं, आज के संदर्भ में महत्वपूर्ण होने के साथ ही सितारों और सेलिब्रिटिज को समाज के प्रति जवाबदेही समझने का संकेत भी है। दर असल हो रहा है कि पैसे की चकाचोंध में सेलिब्रिटिज समाज के प्रति जवाबदेही से मुहं मोड़ते दिखाई देते हैं। जब आम जन का सेलेब्रिटिज का भरोसा है तो सेलिब्रिटिज की भी इस भरोसे को बनाए रखने की नैतिक जिम्मेदारी हो जाती है। दरअसल सेलिब्रिटिज को उत्पाद के साथ देखकर आमआदमी आंख मींच कर भरोसे के सहारे खरीदारी करता है। वह उस उत्पाद और सेलिब्रिटिज द्वारा किये जा रहे वादे को सत्य समझता है। ऐसे में सेलिब्रिटी का समाज या लक्षित वर्ग के प्रति और अधिक जिम्मेदारी बन जाती है। विकेता या निर्माता अपने उत्पाद को बेचने पर ध्यान देता है। इसलिए वह अपने उत्पाद के गुणगान अधिक ही करने लगता है तो सेलिब्रिटी के विज्ञापन के सहारे अतिशयोक्तिपूर्ण दावें करने लग जाते हैं। यहां तक कि कई विज्ञापन के दावें तो सत्य के आसपास भी नहीं होते जैसा कि अक्षय कुमार का डॉबर च्यवनप्राश को लेकर विज्ञापन। यह तो एक उदाहरण मात्र है। आज तो सेरोगेट विज्ञापनों का दौर भी चल निकला है। शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्राप का इलायची का विज्ञापन सबके सामने है जिसके माध्यम से छद्म रुप से प्रतिबंधित पान मसाला का विज्ञापन किया जा रहा था। इसी तरह के अनेक विज्ञापन हमारे सामने हैं। हांलाकि इसमें कोई दो राय नहीं कि निर्माता अपने उत्पाद का विज्ञापन करने के लिए सेलिब्रिटिज को बहुत अधिक पेमेंट किया जाता है और इस पेमेंट के चक्कर में सेलिब्रिटिज समाज के प्रति अपने दायित्व और कानूनी प्रावधानों को भी दरकिनार कर देते हैं। यही कारण है कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने दुखती रग पर हाथ रखते हुए 72 वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में पिछले माह सितंबर में आयोजित समारोह में आमआदमी का दर्द सामने रखा। विवादित विज्ञापनों का दौर लंबे समय से चला आता रहा है। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि अपने उत्पाद को बेचने के लिए सेलिब्रिटिज, महिलाओं और बच्चों को केन्द्र में रखा जाता है। दरअसल लक्ष्यित वर्ग को सम्मोहित करना इन विज्ञापनों का खास उद्देश्य हो जाता है। विज्ञापन करते समय कई बार तो सांप्रदायिकता तक सामने आ जाती है। 2020 का तनिष्क का विज्ञापन इसका उदाहरण है तो 2026 का कृति सेनन का गीवा ज्वेलरी का विज्ञापन सामने हैं। विमल इलायची का फिल्म कलाकर त्रय का विज्ञापन सर्वविदित है जिसमें इलायची के नाम पर छद्म रुप से पान मसाला तंबाकू का ही विज्ञापन था। इस तरह के सेरेगेट विज्ञापन आम होते जा रहे हैं। लेविस 501 जिंस का अक्षय कुमार का विज्ञापन, 2021 का आलिया भट्ट का कन्यादान के बहाने कन्यामान विज्ञापन यह फिर 1995 में अजगर से जिस्म को लपेटे मिलिंद सोयन और मधु सप्रे का टफ जूते का विज्ञापन का विवाद आज तक चर्चा में है। 2026 का विक्की कौशल-रश्मिका संधाना का माचो अंडरवियर का विज्ञापन भी विवादों में रहा है। इसे भी पढ़ें: Switzerland के साथ रिश्तों को नई ऊंचाई देकर Modi ने Europe में चली बड़ी कूटनीतिक चाल विज्ञापनों को लेकर सरकार भी गंभीर रही है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 द्वारा जवाबदेही तय की गई है। 10 लाख से 50 लाख तक के जुर्माने के प्रावधान के साथ ही ऐसे विज्ञापनकर्ताओं पर एक साल से तीन साल तक प्रतिबंध के प्रावधान भी है। भ्रामक विज्ञापनों को लेकर माननीय सर्वोच्च न्यायालय भी गंभीर रहा है और समय समय पर टिप्पणियां की गई है। इस दायरें में चार लाख से अधिक कमाई वाले व 5 लाख फालोवर्स वाले सेलिब्रिटिज को रखा गया है। हालात की गंभीरता को इसी से समझना होगा कि फिल्म कलाकारों के समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को इस तरह का संदेश देना पड़ा। वैसे भी जिस पर भरोसा होता है या किया जाता है तो भरोसे वाले व्यक्ति पर भी भरोसे को बनाये रखने का दायित्व हो जाता है। विज्ञापननिर्माताओं को भी समाज के प्रति दायित्व को समझना होगा तभी सभी अपने भरोसे पर खरे उतर सकते हैं। - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
Switzerland के साथ रिश्तों को नई ऊंचाई देकर Modi ने Europe में चली बड़ी कूटनीतिक चाल
दुनिया के बदलते सामरिक और आर्थिक समीकरणों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति लगातार भारत की वैश्विक पहुंच को नए आयाम दे रही है। इसी व्यापक कूटनीतिक रणनीति की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में स्विट्जरलैंड के साथ संबंधों को नई ऊंचाई तक ले जाने की दिशा में आज एक अहम कदम सामने आया। स्विस राष्ट्रपति गाइ पार्मेलिन की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने प्रवास एवं गतिशीलता, युवा पेशेवरों, परिवहन प्रौद्योगिकी, वैज्ञानिक अनुसंधान तथा नवाचार और स्टार्टअप सहयोग से जुड़े पांच महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए। व्यापार और निवेश से आगे बढ़कर रक्षा उत्पादन, परमाणु ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, विज्ञान, उन्नत प्रौद्योगिकी और वैश्विक कूटनीति तक साझेदारी का विस्तार यह संकेत देता है कि भारत–स्विट्जरलैंड संबंध अब एक नए रणनीतिक चरण में प्रवेश कर रहे हैं और मोदी की सक्रिय कूटनीति ने यूरोप के इस महत्वपूर्ण देश के साथ भारत की साझेदारी को जिस तेजी से व्यापक बनाया है, उसने अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों का ध्यान खींचा है। प्रधानमंत्री मोदी और गाइ पार्मेलिन की मुलाकात का सबसे बड़ा संदेश यह है कि भारत और स्विट्जरलैंड अब अपने रिश्ते को बहु-आयामी रणनीतिक साझेदारी में बदलने की कोशिश कर रहे हैं। हैदराबाद हाउस में मोदी और पारमेलिन ने व्यापार एवं निवेश, एआई, नवाचार, रक्षा उत्पादन और सैन्य आदान-प्रदान, परमाणु ऊर्जा, विज्ञान-प्रौद्योगिकी तथा लोगों के बीच संपर्क सहित पूरे संबंधों की समीक्षा की। देखा जाये तो आर्थिक मोर्चे पर भारत–ईएफटीए व्यापार एवं आर्थिक साझेदारी समझौता इस रिश्ते की रीढ़ बनकर उभरा है। यह समझौता अक्टूबर 2025 में लागू हुआ था और स्विट्जरलैंड इसे भारतीय बाजार में स्विस कंपनियों की पहुंच और निवेश के लिए अधिक निश्चितता देने वाला करार मानता है। स्विट्जरलैंड के अनुसार भारत एशिया में उसका दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और देश में 330 से अधिक स्विस कंपनियां सक्रिय हैं। इसे भी पढ़ें: Swiss President से मुलाकात के बाद बोले PM Modi, वैश्विक शांति और संस्थाओं में सुधार जरूरी द्विपक्षीय वार्ता के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि इस समझौते के जरिए अगले 15 वर्षों में भारत में 100 अरब डॉलर के निवेश और 10 लाख प्रत्यक्ष रोजगार का लक्ष्य रखा गया है। भारतीय कृषि उत्पादों, औषधियों, वस्त्रों और इंजीनियरिंग उत्पादों के लिए स्विस बाजार में अवसर बढ़ाने के साथ भारत जैव-प्रौद्योगिकी, जीवन विज्ञान, बैंकिंग, बीमा, खाद्य प्रसंस्करण और सतत विकास जैसे क्षेत्रों में स्विस निवेश आकर्षित करना चाहता है। लेकिन इस साझेदारी का असली रणनीतिक विस्तार रक्षा और उन्नत प्रौद्योगिकी में दिखाई देता है। दोनों पक्षों ने सैन्य आदान-प्रदान और रक्षा उत्पादन में नए अवसर तलाशने तथा परमाणु ऊर्जा सहयोग को और गहरा करने पर सहमति जताई है। यह संकेत इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि स्विट्जरलैंड की उच्च तकनीकी औद्योगिक क्षमता और भारत की बढ़ती रक्षा विनिर्माण महत्वाकांक्षा मिलकर नए तकनीकी और औद्योगिक सहयोग के रास्ते खोल सकती हैं। साथ ही दोनों देशों के बीच बुनियादी ढांचे में भी सहयोग अब जमीन पर दिखाई दे रहा है। वाराणसी रोपवे, नोएडा के जेवर हवाई अड्डे और पर्वतीय क्षेत्रों में रेलवे तथा सुरंग परियोजनाओं का उल्लेख करते हुए मोदी ने परिवहन, गतिशीलता और आधारभूत ढांचे पर नए समझौते को आगे की साझेदारी का आधार बताया। समझौते में विद्युत वाहन, रोपवे, परिपत्र अर्थव्यवस्था, सुरंग और टिकाऊ परिवहन प्रणालियों पर सहयोग शामिल है। साथ ही विज्ञान और नवाचार इस रिश्ते की दूसरी बड़ी धुरी बन रहे हैं। भारतीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग और स्विस राष्ट्रीय विज्ञान प्रतिष्ठान के बीच समझौता दीर्घकालिक संयुक्त अनुसंधान का ढांचा तैयार करेगा। स्वास्थ्य, स्वच्छ ऊर्जा और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में नए संयुक्त शोध की शुरुआत भी प्रस्तावित है। ज्यूरिख विश्वविद्यालय के अनुप्रयुक्त विज्ञान संस्थान के साथ समझौते के जरिए शुरुआती चरण के भारतीय स्टार्टअप को प्रशिक्षण, तकनीकी हस्तांतरण, कार्यशालाओं और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्किंग का अवसर मिलेगा। मानव संसाधन के मोर्चे पर भी बड़ा बदलाव हुआ है। प्रवास एवं गतिशीलता साझेदारी के तहत पांच वर्ष तक वैध बहु-प्रवेश वीजा और प्रत्येक यात्रा में छह महीने तक ठहरने की सुविधा का प्रावधान है। छात्रों के लिए नवीकरणीय एक-वर्षीय अनुमति भी शामिल है। वहीं युवा पेशेवरों के आदान-प्रदान समझौते के तहत हर वर्ष दोनों देशों से 300-300 युवा पेशेवर भेजे जा सकेंगे, जिसे बढ़ाकर 500 तक किया जा सकता है। इसका उद्देश्य युवाओं को काम के साथ पेशेवर और भाषाई कौशल विकसित करने का अवसर देना है। यह समझौता प्रतिभा, तकनीक और पूंजी, तीनों को एक ही गलियारे में जोड़ता है। भारत को वैश्विक प्रतिभा और नवाचार नेटवर्क में प्रवेश मिलता है, जबकि स्विट्जरलैंड को भारत के विशाल प्रतिभा और बाजार आधार से जुड़ने का अवसर मिलता है। इसके अलावा, दोनों देशों ने आगामी भारत–स्विस अनुसंधान प्रमुख कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र की भी घोषणा की है। साथ ही वैश्विक शांति, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार की जरूरत पर दोनों पक्षों ने सहमति जताई है। यूक्रेन और पश्चिम एशिया जैसे संकटों पर भारत ने हर सार्थक शांति प्रयास के समर्थन की अपनी नीति दोहराई। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी इस रिश्ते का अगला मोर्चा है। भारत में 2026 के एआई इम्पैक्ट शिखर सम्मेलन के बाद स्विट्जरलैंड अगले चरण में जिनेवा एआई शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। दोनों देशों की कोशिश जिम्मेदार, समावेशी और मानव-केंद्रित कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए सहयोग बढ़ाने की है। साफ है कि यह यात्रा केवल पांच समझौतों की कहानी नहीं है। इसके पीछे भारत की रणनीति यूरोप में व्यापार, निवेश, उन्नत तकनीक और विश्वसनीय आपूर्ति शृंखलाओं के नए केंद्रों से संबंध मजबूत करने की है, जबकि स्विट्जरलैंड भारत को अपने एशियाई आर्थिक और तकनीकी विस्तार के महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में देख रहा है। 7 अक्टूबर का भारत–ईएफटीए ‘प्रॉस्पेरिटी समिट’ इस पूरी कवायद को निवेश और कारोबारी परियोजनाओं में बदलने की अगली परीक्षा होगा। बहरहाल, रणनीतिक तस्वीर बिल्कुल स्पष्ट है। भारत–स्विट्जरलैंड संबंध अब घड़ियों, पर्यटन और बैंकिंग की पारंपरिक छवि से बाहर निकलकर रक्षा उत्पादन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष, स्वच्छ ऊर्जा, अत्याधुनिक बुनियादी ढांचे, स्टार्टअप और वैश्विक कूटनीति के नए मैदान में प्रवेश कर चुके हैं। -नीरज कुमार दुबे
बैंक ऑफ बड़ौदा में ह्यूमन रिसोर्स पदों पर आवेदन की अंतिम तिथि 16 अक्तूबर तक बढ़ी
नई दिल्ली, बैंक ऑफ बड़ौदा (बीओबी) में नौकरी करने की इच्छा रखने वालों के लिए एक सुनहरा मौका सामने आया है।
भारतीय शेयर बाजार ने लगातार 4 दिन की गिरावट का तोड़ा सिलसिला
मुंबई, अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में तेजी से बढ़ोतरी की आशंकाओं में कमी आने के कारण वैश्विक शेयर बाजारों में तेजी आने से भारतीय शेयर बाजार ने लगातार चार दिनों की गिरावट का सिलसिला तोड़ते हुए हरे निशान में बंद हुआ।
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Gen Z Revolt: मोदी के दोस्त के देश में भी वही हो रहा,जो भारत में हुआ था? भयंकर साज़िश का पर्दाफ़ाश!
पहले विश्व युद्ध के पहले फ्रांस को एक सुपर पावर कह ले या फिर एक प्रमुख ताकत दुनिया की कहा जाता था। आज भी फ्रांस को दुनिया भर में शिक्षा, लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों के लिए, मानव अधिकारों के लिए जाना जाता है। लेकिन आज उसी फ्रांस के स्कूलों के बाहर आग लगी है। बल्कि पेरिस जैसे शहर पूरी तरीके से छात्रों की चपेट में है। स्कूलों के गेट बंद हैं। सड़कों पर आगजनी है। पुलिस और छात्रों के बीच सीधा टकराव है । शुरुआत स्कूल की समस्याओं से हुई थी। लेकिन अब आंदोलन का दायरा बढ़ चुका है। शिक्षक नहीं क्लासरूम में भीड़ है। स्कूलों की इमारतें जर्जर होने का दावा है। लंबे स्कूल के घंटे और युवाओं को लग रहा है कि उनके भविष्य के साथ समझौता किया जा रहा है। 2 अक्टूबर तक करीब 400 हाई स्कूल बंद थे और 1000 से ज़्यादा संस्थानों में किसी ना किसी रूप में प्रोटेस्ट या डिस्ट्रप्शन दर्ज हुआ और फिर आई सबसे चौंकाने वाली तस्वीर सामने कि करीब 2000 गिरफ्तारियां। पुलिस के साथ झड़प, आगजनी, स्कूलों के बाहर बैरिकेड्स और सरकार अब कह रही कि आंदोलन के एक हिस्से पर हिंसक तत्वों का कब्जा हो गया है। लेकिन कहानी सिर्फ इतनी नहीं क्योंकि इन बच्चों के हाथ में सिर्फ पत्थर नहीं इनके हाथ में एक शिकायत भी है कि हमारा भविष्य कहां है। स्कूल के गेट से शुरू हुआ विस्फोट। फ्रांस में मौजूदा आंदोलन की शुरुआत पेरिस रीजन के हाई स्कूलों से हुई। पहले छात्रों ने स्कूल के गेट ब्लॉक किए। फिर दूसरे शहर जुड़े और फिर प्रोटेस्ट फैलता चला गया और कुछ ही दिनों में मामला नेशनल अनरेस्ट में बदलने लगा। 1 अक्टूबर तक फ्रांस के 1000 से ज्यादा हाई स्कूल प्रोटेस्ट या डिस्क्रिप्शन से प्रभावित बताए गए। एजुकेशन मिनिस्ट्री के आंकड़ों के अनुसार 222 स्कूल्स में ब्लॉकेड्स दर्ज हुए हैं। 2 अक्टूबर को करीब 400 स्कूल बंद रखने पड़े। हालात अभी भी वैसे ही हैं। यानी जिस समस्या की शुरुआत एक स्कूल के गेट से हुई थी, अब पूरे फ्रांस की एजुकेशन सिस्टम की वह परीक्षा बन गई है। बच्चों की शिकायत आखिर क्या है जिस पर बात नहीं बन पा रही। अब इस आंदोलन के पीछे की जमीन समझिए। इसे भी पढ़ें: France में छात्रों के उग्र प्रदर्शन से 400 High School बंद, पुलिस पर पथराव और आगजनी छात्रों की सबसे बड़ी शिकायत है टीचर्स की कमी कई जगह क्लासेस में स्टूडेंट्स की संख्या बहुत ज्यादा है। कुछ छात्रों का कहना है कि एक क्लास रूम में 30 से ज्यादा बच्चे हैं। कई स्कूलों में टीचर्स की अनुपस्थिति के कारण क्लासेस कैंसिल हो रही हैं। फ्रांस के एजुकेशन मिनिस्ट्री के आंकड़े कहते हैं कि 2024-25 स्कूल ईयर में पब्लिक सेकेंडरी स्कूल्स में करीब 10% टीचिंग आवर्स पढ़ाए ही नहीं गए। इनमें लगभग 7.5 मिस्ड आवर्स सब्स्टट्यूट टीचर्स ना मिलने के कारण थे। यानी छात्रों की शिकायत सिर्फ सोशल मीडिया का गुस्सा नहीं। इसके पीछे एजुकेशन सिस्टम में वास्तविक स्टाफिंग प्रॉब्लम भी है। स्कूलों के हालत ने गुस्सा और बढ़ाया है। अब दूसरी बड़ी शिकायत है इंफ्रास्ट्रक्चर। कई स्कूलों की इमारतें पुरानी होने का दावा है। क्लासरूम ओवर क्राउडेड है। हीट वेव के दौरान कई क्लासरूम्स में तापमान बेहद ज्यादा रहा। स्टूडेंट्स का कहना है कि अगर उन्हें घंटों ऐसे कमरों में बैठना पड़ता है जहां बेसिक कंफर्ट तक पर्याप्त नहीं है। कई जगह स्टाफ शॉर्टेज के कारण एडमिनिस्ट्रेटिव और टीचिंग वर्क लोड भी बढ़ा हुआ है। यानी छात्र कह रहे हैं कि हमें सिर्फ परीक्षा पास करने के लिए नहीं कहा जा सकता। हमें पढ़ने के लिए सही स्कूल भी चाहिए। इसे भी पढ़ें: G20 Meet: Piyush Goyal ने फ्रांस, कनाडा, सऊदी अरब और दक्षिण कोरिया संग Trade पर की चर्चा स्कूल की दीवारों से बाहर निकला जेन जी का गुस्सा जेनजी का गुस्सा स्कूल की दीवारों से बाहर निकल चुका है और यही इस आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बनता है। प्रदर्शनकारी सिर्फ क्लासरूम कंडीशंस की बात नहीं कर रहे। उनकी चिंता है आगे की जिंदगी, यूनिवर्सिटी एडमिशन, एंप्लॉयमेंट, इकोनॉमिक सिक्योरिटी, स्टूडेंट सपोर्ट और एक ऐसा फ्यूचर जहां उन्हें लग रहा कि कंपटीशन बढ़ रहा है लेकिन अपॉर्चुनिटीज उसी अनुपात में नहीं बढ़ रही। कई छात्रों के लिए स्कूल सिर्फ स्कूल नहीं वो उनके सोशल मोबिलिटी का रास्ता है। अगर पब्लिक एजुकेशन कमजोर होती है तो गरीब और मिडिल क्लास परिवार के बच्चों के लिए आगे बढ़ने के अवसर भी प्रभावित हो सकते हैं। इसीलिए आंदोलन में एजुकेशन फंडिंग के साथ-साथ बॉर्डर इकोनॉमिक कंसर्न्स भी दिखाई दे रहे हैं। फिर आंदोलन हिंसक क्यों हो गया और कैसे हो गया? शांतिपूर्ण प्रोटेस्ट लोकतंत्र का हिस्सा हो सकता है। लेकिन फ्रांस में कई जगह प्रोटेस्ट ने वायलेंट टर्म ले लिया। 2 अक्टूबर तक करीब 400 हाई स्कूल बंद थे और 1000 से ज़्यादा संस्थानों में किसी ना किसी रूप में प्रोटेस्ट या डिस्ट्रप्शन दर्ज हुआ और फिर आई सबसे चौंकाने वाली तस्वीर सामने कि करीब 2000 गिरफ्तारियां। पुलिस के साथ झड़प, आगजनी, स्कूलों के बाहर बैरिकेड्स और सरकार अब कह रही कि आंदोलन के एक हिस्से पर हिंसक तत्वों का कब्जा हो गया है। लेकिन कहानी सिर्फ इतनी नहीं क्योंकि इन बच्चों के हाथ में सिर्फ पत्थर नहीं इनके हाथ में एक शिकायत भी है कि हमारा भविष्य कहां है। स्कूल के गेट से शुरू हुआ विस्फोट। फ्रांस में मौजूदा आंदोलन की शुरुआत पेरिस रीजन के हाई स्कूलों से हुई। पहले छात्रों ने स्कूल के गेट ब्लॉक किए। 3 अक्टूबर तक इस आंदोलन में करीब 5000 से ज्यादा लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। इनमें बड़ी संख्या 15, 16, 14, 12 साल के बच्चों की बताई गई है। 600 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हो चुके हैं और सरकारी संपत्ति को नुकसान लगातार हो रहा है। करोड़ों यूरो में उसकी कीमत पहुंच चुकी है। पुलिस के साथ-साथ शिक्षकों और आम लोगों पर हमले की घटनाएं भी सामने आई है। यहां का जो स्टॉक एक्सचेंज है उसमें भी भीड़ घुस गई है। उसे भी अपने कब्जे में ले लिया है। 3 अक्टूबर की अह राइटर्स की यह रिपोर्ट बताती है कि 1200 से ज़्यादा स्कूल इस आंदोलन से प्रभावित हो चुके थे। यानी जो विरोध कुछ दिन पहले पेरिस के आसपास के इलाकों से शुरू हुआ था वो अब देशव्यापी आंदोलन का रूप ले चुका है। कई शहरों में आग लगाई गई। पुलिस पर पत्थर फेंके गए, बोतलें फेंकी गई। पुलिस वालों को धक्का दिया गया। पुलिसवालों के साथ मारपीट की गई। एक महिला पुलिस वाली को महिला पुलिसकर्मी को लातों से पीटा गया। एक शिक्षक पर पेट्रोल फेंकने की घटना सामने आई। नातेश में एक स्कूल में आगजनी के बाद इमारत को लंबे समय तक बंद रखना पड़ा। कई जगहों पर पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए आंसू गैस के गोले भी छोड़े। इसे भी पढ़ें: भारत को Veto पॉवर दिलाने के लिए रूस ने UN में किया बड़ा धमाका, हिले अमेरिका, चीन समेत दुनिया के बड़े-बड़े देश 1968 में भी एक बड़े छात्र आंदोलन से रूबरू हुआ फ्रांस अब मामला सिर्फ स्कूलों की हालत सुधारों की मांग तक सीमित नहीं रह गया है। यही वजह है कि फ्रांस की सरकार अब इसे सिर्फ छात्र आंदोलन के तौर पर नहीं देख रही है। ऐसा नहीं है कि फ्रांस में छात्रों का आंदोलन ये कोई पहली बार हुआ है। 1968 में भी एक बहुत बड़ा आंदोलन छात्रों का फ्रांस में हुआ था। उसके बाद भी छात्रों के लगातार आंदोलन प्रदर्शन फ्रांस में होते रहे हैं। लेकिन इतना हिंसक कोई भी प्रदर्शन आज तक नहीं हुआ। फ्रांस के प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लिकार्नू ने संकट की के लिए इसमें बैठक बुलाई और मंत्रियों के जितने भी कार्यक्रम थे वह रद्द कर दिए। सरकार का कहना है कि छात्रों की समस्याओं पर बातचीत हो सकती है। हो सकती है। ऐसा नहीं है कि मतलब तुरंत छात्रों की मांगों को मान लिया जाए। लेकिन हिंसा और आगजनी को किसी भी हालत में स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह होना भी नहीं चाहिए। क्योंकि अगले साल फ्रांस में राष्ट्रपति के चुनाव भी होने वाले हैं और पूर्व राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रो दोबारा चुनाव लड़ सकते हैं। ऐसे समय में युवाओं का गुस्सा राजनीतिक पार्टियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। सरकार ने आरोप लगाया कि कट्टर वामपंथी पार्टी एलएफआई छात्रों के गुस्से को राजनीतिक आंदोलन में बदलने की कोशिश कर रही है। और यहां कल एक आपके सामने ही एक्स फॉरेन एक्सपर्ट से मैं बात कर रहा था। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ फ्रांस के छात्रों ने किया हो ऐसा मुमकिन नहीं है। यहां हो सकता है कि कुछ जो इस्लामिक लोग हैं फ्रांस में लगभग 10% मुस्लिम आबादी फ्रांस में है वो लोग भी इसमें शामिल हैं। अबाया पहनने की वो मांग कर रहे हैं। बांग्लादेश-नेपाल या भारत जैसा पैटर्न? बांग्लादेश और नेपाल में हाल ही के यूथ लेड प्रोटेस्ट ने पॉलिटिकल सिस्टम को बड़ा झटका दिया। भारत में भी एजुकेशन मिनिस्टर को इस्तीफा देना पड़ा। अब फ्रांस में भी जेनजी सड़क पर है। लेकिन दोनों परिस्थितियों को एक जैसा बताना अभी जल्दबाजी होगी। फ्रांस एक एस्टैब्लिश यूरोपियन डेमोक्रेसी है। यहां इंस्टिट्यूशनल स्ट्रक्चर मजबूत है और मौजूदा फ्रेंच प्रोटेस्ट का डॉक्यूमेंटेड इमीडिएटेड ट्रिगर एजुकेशन कंडीशंस है। इसलिए फ्रांस में प्रोटेस्ट जरूर है। जेनजी मोबिलाइजेशन भी है। वायलेंस भी बढ़ी है। लेकिन इसे अभी बांग्लादेश या नेपाल जैसी सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया कहना उपलब्ध एविडेंस नहीं है। फिर एक कॉमन फैक्टर जरूर यहां पर दिखाई देता है। नई पीढ़ी का पॉलिटिकल एस्टैब्लिशमेंट और पब्लिक इंस्टिट्यूशन से बढ़ता फ्रस्ट्रेशन। जेनजी की सबसे बड़ी ताकत सोशल मीडिया है। आज के युवाओं का आंदोलन सिर्फ सड़क पर नहीं चलता। वो स्मार्टफोन पर भी चलता है। एक स्कूल में पुलिस क्लैश, दूसरे शहर में बर्निंग, बैरिकेड और तीसरे शहर में स्टूडेंट्स की स्पीच और कुछ ही घंटों में पूरा देश उसे देख सुन सकता है। यही सोशल मीडिया मोबिलाइजेशन को बेहद तेज बनाता है। एक लोकल ग्रिवेंस कुछ घंटों में नेशनल मूवमेंट बन जाता है। और यही चीज सरकारों के लिए आजकल सबसे बड़ी चुनौती है। क्योंकि ट्रेडिशनल पॉलिटिकल ऑर्गेनाइजेशंस की तरह जजी मोबिलाइजेशन को हमेशा एक सिंगल लीडरशिप स्ट्रक्चर की जरूरत नहीं होती। फ्रांस की कहानी में सबसे बड़ा वार्निंग सिग्नल क्या है? इस पूरे घटनाक्रम को सिर्फ बच्चे हिंसा कर रहे हैं कहकर खत्म कर देना आसान नहीं है। उससे अंडरलाइन प्रॉब्लम खत्म ही होगी। दूसरी तरफ सरकार गलत है इसलिए हिंसा जायज है। कहना भी उतना ही खतरनाक होगा। क्योंकि स्कूल, बिल्डिंग्स जलाने, टीचर्स और पुलिस पर हमला करने, पब्लिक प्रॉपर्टी को नष्ट करने से स्टूडेंट्स की लेजिटमेट डिमांड्स कमजोर पड़ सकती हैं। यानी एक आंदोलन को दो अलग तस्वीरों में देखिए। एक तस्वीर बेहतर एजुकेशन की डिमांड करती है जिंजी। दूसरी तस्वीर आगजनी और पुलिस क्लैशेस की है। सरकार को पहली तस्वीर का जवाब पॉलिसी से देना है और दूसरी तस्वीर का जवाब लॉ इनफोर्समेंट से। तो फ्रांस की सड़कों पर इस वक्त सिर्फ छात्र नहीं है। वहां एक पूरी जनरेशन अपनी स्थिति दर्ज करा रही है। उनका मैसेज साफ है। टीचर चाहिए, बेहतर क्लासरूम चाहिए, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए, फ्यूचर चाहिए। किसी भयंकर साजिश की ओर इशारा तो नहीं दिलचस्प बात यह है कि सरकार ने छात्रों की कुछ मांगों पर कदम उठाने की कोशिश भी की। शिक्षा मंत्री ने बातचीत का रास्ता खोलने की बात कही हो और शिक्षा के क्षेत्र में सरकार के बजट को लेकर भी बदलावों की चर्चा हुई है। यह बवाल इसलिए भी फ्रांस में ज्यादा हुआ क्योंकि इस बार जो बजट पेश हुआ उसमें शिक्षा का जो बजट था वो केवल 1.7% ही बढ़ाया गया था। बाकी जमीन पर तनाव कम नहीं हुआ है। छात्र संगठनों ने आने वाले मंगलवार को एक बड़े प्रदर्शन का आह्वान किया है। इसका मतलब साफ है कि फ्रांस की सरकार के सामने अब सिर्फ स्कूलों को खोलने की चुनौती चुनौती नहीं है। उसे तय करना है कि जायज छात्र मांगों को कैसे सुना जाए। उन्हें कैसे पूरा किया जाए और कैसे फ्रांस को जलने से रोका जाए। हिंसा को कैसे रोका जाए और इस पूरे आंदोलन को चुनावी राजनीतिक हथियार बनने से भी रोकना जरूरी है क्योंकि इतिहास बताता है कि फ्रांस में छात्र आंदोलनों की ताकत को कम करके आंकना भारी पड़ सकता है। 1968 का छात्र आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जिसने फ्रांसीसी राजनीति और समाज को हिला कर रख दिया था। आज 2026 में हालात अलग हैं। लेकिन सवाल फिर वही है। क्या यह सिर्फ बेहतर शिक्षा के लिए छात्रों की आवाज है? या फिर छात्रों के गुस्से के पीछे अब राजनीति और हिंसक तत्व भी पूरी तरीके से घुस चुके हैं। शायद 2 साल पहली बात है वो आपको याद होगा किस तरीके से इस्लामिक कट्टरपंथियों ने फ्रांस को जलाया था। हफ्ते भर तक फ्रांस वहां जलता रहा था और आज भी तस्वीर कुछ वैसी ही है।
भारत में आर्थिक विकास की गति तेज रहने के बावजूद क्यों गिर रहा है शेयर बाजार
हाल ही के समय में भारत के शेयर बाजार में लगातार तेज गिरावट दर्ज हुई है, इससे देश में इस तरह का माहौल बनाने का प्रयास किया जा रहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर भारी संकट आने वाला है और भारतीय नागरिकों पर इसका अत्यधिक कष्टकारी असर पड़ने वाला है। यह आंकलन किसी भी प्रकार से उचित नहीं कहा जा सकता है क्योंकि शेयर बाजार में गिरावट विदेशी संस्थागत निवेशकों के मन में बैठ रहे डर के आधार पर देखी जा रही है, जबकि भारतीय संस्थागत निवेशक तो लगातार अपना निवेश भारतीय शेयर बाजार में बढ़ा रहे हैं एवं म्यूचुअल फंडस द्वारा प्रति माह 30,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि का लगातार निवेश शेयर बाजार हो रहा है। यह सही है कि भारतीय शेयर बाजार का सेन्सेक्स 1 अक्टूबर 2025 के 80,983 बिंदुओं के स्तर से 1 अक्टोबर 2026 को 71,910 बिंदुओं के स्तर पर नीचे आ गया है। इसी प्रकार, निफ्टी इंडेक्स भी 1 अक्टूबर 2025 के 24,836 बंदुओं के स्तर से नीचे गिरकर 1 अक्टूबर 2026 को 22,422 बिंदुओं के स्तर पर आ गया है। पिछले एक वर्ष की अवधि में 10 से 11 प्रतिशत के बीच की गिरावट दर्ज हुई है। जबकि, इस बीच भारत में अर्थ के विभिन्न क्षेत्रों में आर्थिक विकास दर लगातार उच्च स्तर की बनी हुई है। फिर, ऐसे क्या कारण हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था का चमकता चेहरा होने के बावजूद, भारतीय शेयर बाजार लगातार गिरावट दर्ज कर रहा है। दरअसल किसी भी देश का शेयर बाजार, स्टॉक एक्सचेंज पर दर्ज कम्पनियों की आगे आने वाले वर्षों में होने वाली अनुमानित आय के आधार पर, घटता अथवा बढ़ता रहता है। दूसरे, आजकल जब समस्त देश एक तरह से आपस में जुड़ से गए हैं और हम एक वैश्विक गांव में निवास कर रहे हैं तब एक देश में होने वाली घटनाओं का प्रभाव दूसरे देश के शेयर बाजार पर भी पड़ता हुआ दिखाई देता है। जैसे, रूस-यूक्रेन युद्ध, इजराईल-हम्मास युद्ध, अमेरिका-ईरान युद्ध, सऊदी अरब-हूथी युद्ध एवं खाड़ी के देशों का आपसी युद्द, आदि कुछ ऐसे उदाहरण हैं, जिनके चलते भारतीय शेयर बाजार भी सहमा हुआ दिखाई दे रहा है, हालांकि भारत किसी भी प्रकार से, अप्रत्यक्ष अथवा प्रत्यक्ष रूप से, इन युद्धों से नहीं जुड़ा है । तीसरे, विदेशी निवेशक भारी मात्रा में कुछ देशों के शेयर बाजार में अपनी पूंजी का निवेश करते हैं, क्योंकि उन्हें इन देशों में किए गए निवेश से अच्छे रिटर्न की सम्भावना दिखाई देती है। परंतु, जब इन विदेशी निवेशकों द्वारा अपना निवेश शेयर बाजार से निकाला जाता है तब उस देश का शेयर बाजार तेजी से गिरने लगता है। इसे भी पढ़ें: प्रधानमंत्री लगातार कर रहे हैं विदेशी मुद्रा बचाने की अपील उक्त वर्णित युद्धों के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं और यह 100 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गए हैं, एक वर्ष पूर्व यह 65 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर थे, अर्थात इस एक वर्ष के दौरान कच्चे तेल की कीमतों में 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज हुई है। भारत कच्चे तेल की कुल खपत का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात करता है, अतः भारत के उक्त युद्धों से किसी भी प्रकार से नहीं जुड़े होने के बावजूद, भारतीय अर्थव्यवस्था पर कुछ विपरीत प्रभाव पड़ सकता है, ऐसा माहौल बनाए जाने के चलते विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयर बाजार से अपना निवेश भारी मात्रा में निकाल रहे हैं। हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि के बावजूद भारत में मुद्रा स्फीति की दर को नियंत्रण में बनाए रखने के प्रयास अभी तक तो सफल ही रहे हैं। फिर भी, केलेंडर वर्ष 2026 में अभी तक विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से 2.8 लाख करोड़ रुपए की भारी भरकम राशि निकाल ली है। सितम्बर 2024 तक के 24 माह में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में 38,600 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निवेश किया था जबकि सितम्बर 2026 तक के 24 माह में 56,300 करोड़ अमेरिकी डॉलर की निकासी की गई हैं। विदेशी संस्थागत निवेशक इतनी भारी मात्रा में अपना निवेश भारत से निकालकर अमेरिकी बांडस, अमेरिका के शेयर बाजार, वियतनाम एवं दक्षिणी कोरिया के शेयर बाजार एवं चीन के शेयर बाजार में कर रहे हैं। क्योंकि, अमेरिका में ब्याज दरों (यूएस फेड दर) में वृद्धि के चलते, बांडस की यील्ड पिछले लगभग 24-25 वर्षों के उच्चत्तम स्तर 5.60 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गई है। साथ ही, अमेरिकी शेयर बाजार में अभी भी तेजी बनी हुई है क्योंकि वहां की कम्पनियों द्वारा उच्च तकनीकी के नवाचार करने के चलते उनकी उत्पादकता एवं लाभप्रदता में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। इसी प्रकार, वियतनाम एवं दक्षिणी कोरिया में आरटीफिशीयल इंटेलीजेंस के क्षेत्र की कम्पनियों में उच्च स्तर की लाभप्रदता दर्ज होने की सम्भावनाएं दिखाई दे रही है, इसलिए विदेशी निवेशक अमेरिका, वियतनाम एवं दक्षिणी कोरिया जैसे देशों की ओर आकर्षित हो रहे है एवं अपना निवेश इन देशों में बढ़ा रहे हैं। चीन का शेयर बाजार बहुत ही तेजी से नीचे गिरा था जिसके कारण वहां पर कम्पनियों के शेयरों का (Price to Earning - PE Ratio) कीमत/आय रेशो भारतीय कंपनियों के कीमत/आय रेशो की तुलना में अत्यधिक आकर्षक हो गया है। चीन में औसतन यह रेशो 12 प्रतिशत के नीचे है जबकि भारत में यह रेशो औसतन 20 प्रतिशत से अधिक है। अतः विदेशी संस्थागत निवेशकों को भारतीय कम्पनियों के शेयर, चीनी कम्पनियों के शेयर की तुलना में महंगे दिखाई दे रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिकी डॉलर के लगातार मजबूत होने चलते भारतीय रुपया लगातार कमजोर हो रहा है, इस कारण से भी विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयर बाजार से अपना निवेश निकाल रहे है। आज भारतीय रुपए की कीमत 96 रुपए प्रति अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच गई है। साथ ही, डॉलर इंडेक्स जो 1 अक्टोबर 2025 को 97.71 के स्तर पर था वह 1 अक्टोबर 2026 को बढ़कर 101.80 के स्तर पर आ गया है। स्वर्ण की कीमतें भी 3,871 अमेरिकी डॉलर प्रति ओंस से बढ़कर 4,170 अमेरिकी डॉलर प्रति ओंस पर पहुंच गई है। भारत स्वर्ण का भारी मात्रा में (कुल खपत का 90 प्रतिशत से अधिक) आयात करता है, स्वर्ण के आयात का भुगतान अमेरिकी डॉलर में ही करना होता है, अतः भारतीय रुपए पर इससे अतिरिक्त दबाव बनता हुआ दिखाई दे रहा है। उक्त संदर्भों को यदि भारतीय अर्थव्यवस्था से जोड़कर देखा जाय तो स्थिति कुछ अलग ही दिखाई देती है। भारत में सकल घरेलू उत्पाद में वित्तीय वर्ष 2026-27 की प्रथम तिमाही में 7.8 प्रतिशत की आकर्षक वृद्धि दर्ज हुई है, जबकि वैश्विक स्तर पर यह वृद्धि केवल 3 प्रतिशत एवं तेजी से आर्थिक विकास कर रही अर्थव्यवस्थाओं में यह 3.8 प्रतिशत रहने की सम्भावना व्यक्त की गई है। जब भारत में आर्थिक विकास दर तुलनात्मक रूप से अधिक तेज गति से आगे बढ़ेगी तो भारतीय कम्पनियों की आय एवं लाभप्रदता में भी तेज गति से वृद्धि सम्भव होगी। इसी प्रकार, अगस्त 2026 माह में भारत की औद्योगिक विकास दर भी 8 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई है जो कि अगस्त 2025 में 4.7 प्रतिशत के स्तर पर थी। विभिन्न उत्पादों के भारत से निर्यात अगस्त 2026 में 4,380 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार कर गए हैं जो अगस्त 2025 में 3,480 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर थे। 15 सितम्बर 2026 को समाप्त पखवाड़े में समस्त बैंकों के ऋणों में 18.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह वृद्धि दर 10.4 प्रतिशत की रही थी। इसी प्रकार, बैंकों की जमाराशि में वृद्धि दर भी पिछले वर्ष की 9.5 प्रतिशत की तुलना में इस वर्ष 17.3 प्रतिशत की रही है। बैंकों का ऋण:जमा अनुपात लगभग 81 प्रतिशत के पास पहुंच गया है। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत में अर्थ के विभिन्न क्षेत्रों में अतुलनीय वृद्धि दर आंकी जा रही है। बैंकों की सकल गैर निष्पादनकारी आस्तियों में भी कमी दर्ज हुई है और यह जुलाई 2025 के 2.2 प्रतिशत की तुलना में जुलाई 2026 में घटकर 1.68 प्रतिशत के स्तर पर नीचे आ गई है। शुद्ध गैर निष्पादनकारी आस्तियां तो पिछले वर्ष के 0.5 प्रतिशत की तुलना में 0.4 प्रतिशत ही रही है। अर्थात, बैंकों द्वारा प्रदत्त किए जा रहे ऋणों की अदायगी समय पर हो रही है। भारतीय बैंकों का पूंजी पर्याप्तता अनुपात तो आज विकसित देशों की बैंकों से भी अधिक हो गया है, जो जुलाई 2025 के 17.5 प्रतिशत से बढ़कर जुलाई 2026 में 17.8 प्रतिशत के स्तर को पार कर गया है। इससे भारतीय बैंकों की मजबूत स्थिति झलकती है। उद्योगों द्वारा अपनी उत्पादन क्षमता का 75 प्रतिशत से अधिक उपयोग किया जा रहा है, यह ऐसी स्थिति है जब सम्बंधित उद्योग को अपनी उत्पादन क्षमता में वृद्धि करने के बारे में विचार प्रारम्भ करना होता है। उक्त जानकारी की सत्यता की गवाही वस्तु एवं सेवा कर के संग्रहण में हो रही लगातार वृद्धि से भी ध्यान में आती है। सितम्बर 2026 माह में 14.5 प्रतिशत की वृद्धि के साथ वस्तु एवं सेवा कर का संग्रहण 2.04 लाख करोड़ से अधिक की राशि का रहा है और यह लगातार तीसरा महीना है जब यह संग्रहण 2 लाख करोड़ रुपए से अधिक का रहा है। भारत में सितम्बर 2026 माह के दौरान Unified Payments Interface (एकीकृत भुगतान अन्तरापृष्ठ) सिस्टम के अंतर्गत प्रतिदिन औसतन 80 करोड़ से अधिक के व्यवहार दर्ज हो रहे हैं, जो पूरे विश्व में किसी भी देश में सबसे अधिक व्यवहार हैं। अगस्त 2026 माह के दौरान उक्त व्यवहार 79 करोड़ के रहे थे और सितम्बर 2025 में 65 करोड़ से अधिक व्यवहार प्रतिदिन के रहे थे। कुल मिलाकर भारत में अर्थ के विभिन्न क्षेत्रों में दर्ज हो रही विकास दर की कहानी स्पष्ट तौर पर कह रही है कि भारत का भविष्य बहुत सुरक्षित है। और, यह झूठा विमर्श खड़ा किया जाना कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर भारी संकट आने वाला है और भारतीय नागरिकों पर इसका कष्टकारी प्रभाव पड़ने वाला है, पूर्णत: असत्य है। घबराहट में विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा शेयर बाजार से निकाले जा रहे निवेश को आधार बनाकर उक्त झूठे विमर्श को खड़ा करने का प्रयास हो रहा है। - प्रहलाद सबनानी सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक, भारतीय स्टेट बैंक के-8, चेतकपुरी कालोनी, झांसी रोड, लश्कर, ग्वालियर - 474 009
सोना 0.5 प्रतिशत गिरा, चांदी 2.27 लाख रुपए प्रति किलो के पार
मुंबई, सोने और चांदी की कीमतों में सोमवार को मिलाजुला कारोबार देखा गया। शुरुआत सत्र में सोने में 0.48 प्रतिशत की गिरावट और चांदी में 0.53 प्रतिशत की तेजी देखी गई।
'उद्धव ठाकरे और दिमाग का कोई संबंध नहीं', चुनाव आयोग पर सवाल उठाने पर भड़के नितेश राणे
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सेवा संकल्प अभियान: सीएम धामी ने स्वच्छता कार्यक्रम में लिया हिस्सा, गुरुद्वारा श्री नानकमत्ता साहिब में टेका माथा
पाकिस्तानियों से ज्यादा जीते हैं भारतीय, मगर भारतीयों से भी ज्यादा जीते हैं बांग्लादेशी। विश्व स्वास्थ्य संगठन के ताजा आंकड़े भारत की जीवन-प्रत्याशा की एक दिलचस्प तस्वीर सामने रखते हैं। वर्ष 2023 में एक भारतीय की औसत जीवन-प्रत्याशा 71 वर्ष रही, जबकि पाकिस्तान में यह 68.2 वर्ष थी। लेकिन बांग्लादेश 72.7 वर्ष के साथ भारत से आगे निकल गया। अमेरिका और कनाडा तो इससे भी काफी आगे हैं। यानी भारत ने पाकिस्तान को पीछे जरूर छोड़ा है, लेकिन लंबी जिंदगी के मामले में अभी बांग्लादेश से भी पिछड़ रहा है। कहानी यहीं खत्म नहीं होती। भारतीयों की बढ़ती उम्र के साथ सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस जिंदगी में स्वस्थ रहने के कितने साल शामिल हैं। हम आपको बता दें कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के ताजा वैश्विक स्वास्थ्य आकलन ने भारत की सेहत की ऐसी तस्वीर सामने रखी है, जिसमें एक तरफ महामारी के बाद जीवन-प्रत्याशा तेजी से संभली है, तो दूसरी तरफ हृदय रोग, मधुमेह, पक्षाघात और फेफड़ों की पुरानी बीमारियां मौत की सबसे बड़ी वजह बनती जा रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में स्वस्थ जीवन-प्रत्याशा वर्ष 2023 में केवल 60.6 वर्ष रही। यानी औसतन जीवन के अंतिम करीब दस वर्ष किसी न किसी बीमारी, अक्षमता या स्वास्थ्य संबंधी परेशानी के साथ गुजरने की आशंका बनी रहती है। वर्ष 2019 में यही आंकड़ा 60.5 वर्ष था। महामारी के दौरान यह 2021 में घटकर 58.4 वर्ष रह गया और फिर 2022 में 60.2 तथा 2023 में 60.6 वर्ष तक पहुंचा। इसे भी पढ़ें: Prabhasakshi NewsRoom: Jaishankar की बात एकदम सही निकली, Pakistan के साथ नई Defence Deal कर America ने India के लिए बढ़ाया खतरा! रिपोर्ट के मुताबिक, महामारी के बाद भारत ने जीवन-प्रत्याशा में उल्लेखनीय वापसी की है। वर्ष 2019 में यह 70.5 वर्ष थी, जो 2021 में गिरकर 68.1 वर्ष हो गई। इसके बाद 2022 में यह फिर 70.5 वर्ष और 2023 में 71 वर्ष पहुंच गई। यानी महज दो वर्षों में भारत ने अनुमानित जीवन के 2.9 वर्ष वापस हासिल कर लिए। लेकिन स्वस्थ जीवन-प्रत्याशा की वापसी केवल 2.2 वर्ष रही। यही अंतर भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने सबसे गंभीर चुनौती को उजागर करता है। बुजुर्गों के मामले में भी तस्वीर कुछ बेहतर हुई है। वर्ष 2023 में 60 वर्ष की उम्र तक पहुंच चुके व्यक्ति के औसतन 18.8 वर्ष और जीने की उम्मीद थी, जबकि 2019 में यह 18.4 वर्ष थी। लेकिन इनमें पूरी तरह स्वस्थ रहने वाले वर्षों की संख्या 13.7 वर्ष ही थी। साफ है कि उम्र बढ़ रही है, मगर स्वस्थ उम्र उतनी तेजी से नहीं बढ़ रही। इसके अलावा, भारत की बीमारियों की तस्वीर भी पिछले दो दशकों में पूरी तरह बदल गई है। वर्ष 2000 में देश में मौत के दस प्रमुख कारणों में संक्रामक बीमारियों की हिस्सेदारी करीब 62 प्रतिशत थी, जबकि गैर-संचारी बीमारियों की हिस्सेदारी 34 प्रतिशत थी। वर्ष 2023 तक तस्वीर उलट गई। गैर-संचारी बीमारियां करीब 75 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ मौत की सबसे बड़ी वजह बन गईं, जबकि संक्रामक बीमारियों की हिस्सेदारी घटकर करीब 16 प्रतिशत रह गई। बाकी हिस्सेदारी चोट और दुर्घटनाओं जैसी वजहों की रही। बीमारियों की बदलती तस्वीर को मौत के आंकड़ों से आसानी से समझा जा सकता है। वर्ष 2000 में भारत में क्षय रोग और दस्त जैसी संक्रामक बीमारियां मौत की बड़ी वजह थीं। तब प्रति एक लाख आबादी पर क्षय रोग से 92.4 और दस्त से 87.8 मौतें होती थीं। लेकिन वर्ष 2023 तक तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी थी। अब हृदय रोग सबसे बड़ा जानलेवा कारण बन गया, जिससे प्रति एक लाख आबादी पर 138.5 मौतें दर्ज हुईं। इसके बाद फेफड़ों की पुरानी बीमारी से 83.19, पक्षाघात से 74.8 और मधुमेह से 49.01 मौतें प्रति एक लाख आबादी पर हुईं। यानी भारत अब केवल संक्रमण से नहीं, बल्कि दिल, फेफड़ों, मधुमेह और पक्षाघात जैसी लंबी बीमारियों से भी बड़ी जंग लड़ रहा है। फिर भी संक्रामक बीमारियों को समाप्त मान लेना बड़ी भूल होगी। दस्त, क्षय रोग और निचले श्वसन तंत्र के संक्रमण अब भी भारत में मौत के दस प्रमुख कारणों में शामिल हैं। यानी भारत को एक साथ पुरानी बीमारियों और नई जीवनशैली वाली बीमारियों, दोनों मोर्चों पर लड़ना पड़ रहा है। दूसरी ओर, दुनिया की तस्वीर भी भारत से बहुत अलग नहीं है। वर्ष 2023 में वैश्विक जीवन-प्रत्याशा 73.3 वर्ष पहुंच गई, जो 2019 के 73.4 वर्ष के लगभग बराबर है। लेकिन वैश्विक स्वस्थ जीवन-प्रत्याशा 62.8 वर्ष ही रही, जो 2019 से अब भी 0.4 वर्ष कम है। दुनिया में होने वाली कुल मौतों में गैर-संचारी बीमारियों की हिस्सेदारी 2000 के 58 प्रतिशत से बढ़कर 2023 में 74 प्रतिशत हो गई। दुनिया की दस प्रमुख जानलेवा वजहों में आठ अब गैर-संचारी बीमारियां हैं। बहरहाल, विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक महामारी से स्वास्थ्य संकेतकों को लगा झटका अब काफी हद तक संभल चुका है, लेकिन असली अगली चुनौती लंबी जिंदगी नहीं, स्वस्थ जिंदगी सुनिश्चित करना है। इस तरह भारत के लिए संदेश बिल्कुल साफ है कि सिर्फ लोगों की औसत उम्र बढ़ना स्वास्थ्य क्षेत्र की सफलता का अंतिम पैमाना नहीं हो सकता। अगर बढ़ती उम्र के साथ हृदय रोग, मधुमेह, पक्षाघात और फेफड़ों की बीमारियां भी बढ़ती रहीं, तो देश लंबी जिंदगी तो पाएगा, लेकिन स्वस्थ जिंदगी नहीं। यही वह मोर्चा है, जहां आने वाले वर्षों में भारत की स्वास्थ्य नीतियों की असली परीक्षा होगी।
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दो हफ़्तों में पवित्र शहरों पर दूसरा हमला: धार्मिक स्थलों पर हमलों को रोकने की तत्काल ज़रूरत
पवित्र धार्मिक शहरों पर दूसरा हमला, 2017 के बाद से सबसे गंभीर हमला, मंगलवार, 29 सितंबर 2026 को स्थानीय समयानुसार सुबह 5:11 बजे हुआ। हूतियों ने मदीना में तैबा पावर डिस्ट्रिब्यूशन स्टेशन को निशाना बनाया, जो इस्लाम के दूसरे सबसे पवित्र स्थल 'अल-मस्जिद अन-नबवी' को बिजली सप्लाई करने वाली एक नागरिक सुविधा है। एक वन-वे अटैक ड्रोन ने एक ट्रांसफ़ॉर्मर को बेकार कर दिया। सऊदी गठबंधन ने बताया कि बड़े ग्रिड पर कोई असर नहीं पड़ा और मस्जिद में बिजली गुल नहीं हुई। गठबंधन के प्रवक्ता मेजर जनरल तुर्की अल-माल्की ने पुष्टि की कि मलबे को बरामद कर लिया गया है और ऑपरेशनल रिव्यू से हूतियों की संलिप्तता की पुष्टि हुई है। मक्का पर हमला दो हफ़्ते पहले, मंगलवार, 15 सितंबर 2026 को स्थानीय समयानुसार शाम 6:50 बजे, सऊदी अरब ने मक्का के दक्षिण में एक हूती ड्रोन को ग्रैंड मस्जिद के ऊपर प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र में घुसने से पहले ही रोककर नष्ट कर दिया। 2017 के बाद मक्का पर यह पहली कोशिश थी। सऊदी अधिकारियों ने इस हमले के लिए यमन के हूती विद्रोहियों को ज़िम्मेदार ठहराया; बढ़ते तनाव के बीच इस्लाम के सबसे पवित्र शहर पर यह अपनी तरह की पहली घटना थी। सऊदी एयर डिफेंस ने जेद्दा से लगभग 70 किलोमीटर अंदर ड्रोन को रोक दिया, जिससे वह अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाया। सऊदी-नेतृत्व वाले गठबंधन के प्रवक्ता कर्नल तुर्की अल-मलिकी ने बताया कि मक्का के प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र में घुसने से पहले ही ड्रोन को रोक दिया गया था। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि दो पवित्र मस्जिदों और तीर्थयात्रियों की सुरक्षा एक 'रेड लाइन' (अति-संवेदनशील सीमा) है। उन्होंने इस हमले की निंदा करते हुए इसे 'शर्मनाक हरकत' बताया, जिसका मकसद इबादत करने वालों में डर पैदा करना और आम नागरिकों को नुकसान पहुँचाना था। सऊदी विदेश मंत्रालय ने इसे 'कायरतापूर्ण आतंकवादी हमला' करार दिया। हूथी आंदोलन (अंसार अल्लाह) ने तुरंत और स्पष्ट रूप से इसकी ज़िम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया। 57 मुस्लिम-बहुल देशों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन 'ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन' (ओ आई सी) ने मक्का पर हुए हमले की कड़ी निंदा करते हुए इसे 'घिनौना' बताया। ओ आई सी ने यमन के हूथी आंदोलन को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराया और पवित्र स्थलों की सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय एकजुटता का आह्वान किया। साथ ही, संगठन ने वैश्विक समुदाय से ऐसी हिंसा को रोकने के लिए कदम उठाने का आग्रह किया, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता और धार्मिक सद्भाव को खतरा हो सकता है। सऊदी अरब और जी सी सी ने कहा कि इन हमलों ने 'सभी रेड लाइन्स पार कर ली हैं' और यह 'हालात को गंभीर रूप से बिगाड़ने' (ग्रेव एस्केलेशन) जैसा है। मक्का और मदीना को निशाना बनाकर दुनिया भर के लाखों मुसलमानों को जान-बूझकर उकसाया गया है। यू ए ई, बहरीन, कुवैत, जॉर्डन और तुर्की ने भी एकजुटता दिखाते हुए बयान जारी किए। हूथियों ने ज़िम्मेदारी से इनकार करते हुए कहा कि उन्होंने किसी भी पवित्र स्थल को निशाना नहीं बनाया। उन्होंने सऊदी अरब पर आरोप लगाया कि वह मक्का के बारे में पहले किए गए दावे को साबित न कर पाने की अपनी नाकामी को छिपाने की कोशिश कर रहा है। अब मदीना क्यों? हूथियों ने जुलाई 2026 में सऊदी अरब की समुद्री नाकेबंदी की घोषणा की थी और 2022 में संयुक्त राष्ट्र संघ की युद्धविराम संधि के टूटने के बाद सीमा-पार हमले फिर से शुरू कर दिए थे। सना और लाल सागर के तट पर उनके नियंत्रण की वजह से वे 900 किलोमीटर से ज़्यादा दूरी तक ड्रोन भेजकर मदीना तक पहुँच सकते हैं। पवित्र मस्जिद के पास बिजलीघर पर हमला करने का मकसद धार्मिक आक्रोश को भड़काना, सऊदी अरब पर दबाव बढ़ाना और ईरान-समर्थित क्षमताओं का प्रदर्शन करना है, ताकि यह दिखाया जा सके कि वे ईरान-अमेरिका-इज़राइल के बीच चल रहे संघर्ष के दौरान भी सऊदी अरब के अंदरूनी इलाकों तक हमला कर सकते हैं। इसमें किसी के हताहत होने की खबर नहीं है, लेकिन इसका प्रतीकात्मक असर बहुत बड़ा है। इस्लामी दुनिया में, पैगंबर की मस्जिद (मस्जिद-ए-नबवी) को सेवा देने वाले बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने को पवित्रता पर ही हमला माना जाता है। धार्मिक स्थलों पर हमलों को रोकने वाले अंतरराष्ट्रीय नियम टकराव के दौरान धार्मिक स्थलों को निशाना बनाना युद्ध का एक पुराना और दुखद पहलू रहा है। अंतरराष्ट्रीय कानून में इस मुद्दे पर स्पष्ट नियम हैं, जो सीधे तौर पर ऊपर बताए गए हमलों जैसे मामलों को संबोधित करते हैं। नीचे इन स्थलों के लिए ऐतिहासिक उदाहरण और मुख्य कानूनी सुरक्षा उपाय दिए गए हैं। अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून (आई एच एल) सशस्त्र संघर्षों के दौरान कई तरह से धार्मिक स्थलों की सुरक्षा करता है। इसका मुख्य सिद्धांत यह है कि ये स्थल नागरिकों की संपत्ति हैं और इन पर तब तक हमला नहीं किया जाना चाहिए जब तक कि ये सैन्य लक्ष्य न बन जाएं। 1907 के हेग नियमों का अनुच्छेद 27 कहता है कि घेराबंदी और बमबारी के दौरान, 'धर्म, कला, विज्ञान या धर्मार्थ कार्यों के लिए समर्पित इमारतों, ऐतिहासिक स्मारकों, अस्पतालों... को यथासंभव बचाने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए', बशर्ते कि उनका उपयोग सैन्य उद्देश्यों के लिए न किया जा रहा हो। अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आई सी सी) के रोम स्टैच्यूट के आर्टिकल 8(2)(बी)(ix) और 8(2)(ई)(iv) के तहत, 'धर्म, शिक्षा, कला, विज्ञान या चैरिटी के कामों के लिए बनी इमारतों, ऐतिहासिक स्मारकों या अस्पतालों पर जान-बूझकर हमला करना' इंटरनेशनल और नॉन-इंटरनेशनल आर्म्ड कॉन्फ्लिक्ट (सशस्त्र संघर्ष) में वॉर क्राइम माना जाता है, बशर्ते वे मिलिट्री टारगेट न हों। कस्टमरी इंटरनेशनल लॉ (प्रचलित अंतरराष्ट्रीय कानून) सभी देशों के लिए अनिवार्य नियम के तौर पर धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों की सुरक्षा करता है, चाहे किसी संधि को मंज़ूरी दी गई हो या नहीं। आई सी आर सी और दूसरे संगठन लगातार इस बात पर ज़ोर देते हैं कि इन स्थलों की सुरक्षा करना 'इंटरनेशनल ह्यूमैनिटेरियन लॉ (अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून) के तहत एक अनिवार्य दायित्व और एक बहुत बड़ी नैतिक ज़िम्मेदारी है।' हालांकि धार्मिक स्थलों पर हमलों को रोकने वाला कानूनी ढांचा मज़बूत है, लेकिन जवाबदेही हमेशा सुनिश्चित नहीं हो पाती। मुख्य चुनौती कड़े कानूनी नियमों और कमज़ोर लागूकरण के बीच संतुलन बनाने की है। न्यायिक कार्रवाई अक्सर अंतरराष्ट्रीय अदालतों के अधिकार क्षेत्र या मामलों को आगे बढ़ाने की देशों की इच्छा पर निर्भर करती है। प्रतिबंध जैसे राजनीतिक उपाय असरदार हो सकते हैं, लेकिन भू-राजनीतिक कारणों से अक्सर उन्हें चुनिंदा तौर पर लागू किया जाता है। निष्कर्ष धार्मिक स्थलों पर कई ऐतिहासिक हमलों के बावजूद, अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने ऐसे कामों को स्पष्ट रूप से रोकने के लिए एक मज़बूत कानूनी ढांचा बनाया है। चुनौती नियमों की कमी में नहीं, बल्कि लागूकरण, अधिकार क्षेत्र और राजनीतिक बाधाओं के बीच संतुलन बनाने में है। यही संतुलन तय करता है कि क्या ऊपर बताए गए हमलों के मामलों में इन सुरक्षा उपायों को असरदार ढंग से लागू किया जा सकता है या नहीं।
सीपीआई(एम) ने बंगाल के कूचबिहार में पार्टी कार्यालय में तोड़फोड़ का भाजपा पर लगाया आरोप
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राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और अखिलेश यादव कर रहे वोट बैंक की राजनीति: गिरिराज सिंह
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'वोट की चोरी हो रही है', तेजस्वी ने चुनाव आयोग से लेकर केंद्र सरकार को घेरा
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'तानाशाही और चुनाव चोरी के खिलाफ 1857 जैसा विद्रोह', सीईसी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन पर बोले संजय राउत
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पश्चिम एशिया : तनाव मार्केट आउटलुक अगले हफ्ते आरबीआई पॉलिसी
मुंबई, छुट्टियों के कारण छोटे रहे कारोबारी सप्ताह में भारतीय शेयर बाजार पर वैश्विक दबाव हावी रहा और प्रमुख सूचकांक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक स्तरों से नीचे फिसल गए। अब अगले सप्ताह निवेशकों की निगाहें आरबीआई की मौद्रिक नीति समीक्षा, दूसरी तिमाही (क्यू2) के कॉरपोरेट नतीजों और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव पर रहेंगी, जो बाजार की अगली दिशा तय कर सकते हैं।
सोनिया गांधी की आंखों में बाटला हाउस एनकाउंटर के आरोपियों के लिए थे आंसू, कैप्टन स्मित के लिए करुणा का भाव नहीं : सुधांशु त्रिवेदी
कर्नाटक : बेलगावी में वोटर लिस्ट से 198 मुस्लिम वोटर्स के नाम हटाने का आरोप, भाजपा नेता को सशर्त जमानत
पीएम मोदी ने क्रांतिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा को दी श्रद्धांजलि, बोले- 'उनके पराक्रम को कभी नहीं भूलेगा देश'
हिन्दी साहित्य के युगद्रष्टा आचार्य रामचंद्र शुक्ल की जयंती पर नेताओं ने किया नमन
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'मोदी अवैध पीएम': SIR गड़बड़ी पर खड़गे बोले- 'अवैध सरकारें भंग कर बैलेट पेपर से चुनाव कराए जाएँ'
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कलबुर्ग में पत्रकारों से कहा कि मोदी और शाह SIR से लोकतंत्र को खत्म करने में लगे हैं। उन्होंने कहा, 'देश में illegal चुनाव हो रहे हैं, मोदी अवैध प्रधानमंत्री हैं, शाह अवैध गृह मंत्री हैं और जितने सीएम अब बने हैं वे अवैध हैं।'
मिशन 2027 में जुटी भाजपा, यूपी मीडिया टीम में बड़ा फेरबदल
उत्तर प्रदेश में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी ने संगठन को मजबूत करने की दिशा में तैयारियां तेज कर दी हैं
एसआईआर पर भड़के सलीम इंजीनियर, बोले- 13 करोड़ वोटर्स के नाम काटना गंभीर अपराध
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कांग्रेस ने फिर अपनाई बांटो और राज करो की नीति
वर्तमान समय में कांग्रेस पार्टी जहां एक ओर अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए चुनाव आयोग व देश की अन्य संवैधानिक संस्थाओं पर हमलावर है वहीं दूसरी ओर उसके तेलंगाना राज्य के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने हिंदू देवी देवताओें का विभाजन करके कांग्रेस की बांटो और राज करो की नीति को आगे बढ़ाकर राजनैतिक माहौल को गर्म कर दिया है। दक्षिण का राज्य तेलंगाना कांग्रेस के शासन में आर्थिक तंगी व भ्रष्टाचार से गुजर रहा है। अपनी प्रशासनिक नाकामियों तथा चुनावी वादों को पूरा करने में नाकाम रहने व मुस्लिम तुष्टिकरण को छुपाने के लिए रेवंत रेड्डी ने प्रभु श्रीराम को उत्तर और भगवान शिव को दक्षिण का देवता बताकर एक नयी विभाजक रेखा खींचने का असफल प्रयास किया है। उत्तर भारत में अपने अस्तित्व का संघर्ष करती कांग्रेस अब विभाजनकारी मानसिकता के सबसे निचले पायदान पर पहुँच गयी लगती है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी इससे पूर्व भी कई विवादित बयान दे चुके हैं। एक बार उन्होंने कहा था कि मुस्लिम ही कांग्रेस है और कांग्रेस ही मुस्लिम है। रेवंत रेड्डी का कहना है कि भगवान राम अमीरों के देवता हैं और भगवान शिव गरीबों के देवता हैं। वे स्वयं को भगवान शिव का भक्त बताते हुए कहते हैं कि भाजपा ने भगवान राम को चोरी कर लिया है। रेवंत रेड्डी का कहना है भाजपा के लोग “हर हर महादेव“ तक नहीं बोलते। वह एक बार हिंदुओं के 33 करोड़ देवताओं पर भी विकृत बयानबाजी कर चुके हैं। दिमागी नक्सली नेताओं का यही लक्ष्य रहता है किसी न किसी प्रकर हिंदू देवी देवताओं का अपमान किया जाए। विगत सितम्बर में हुए गणेशोत्सव आयोजन के दौरान तेलंगाना में कई जगह से गणेशेत्सवों के आयोजन पर बाधाओं के समाचार आ रहे थे। इसे भी पढ़ें: राम और शिव के बारे में रेवंत रेड्डी की टिप्पणियां हिंदू धर्म के प्रति उनकी घोर अज्ञानता को प्रदर्शित कर रही हैं कांग्रेस पार्टी ने अयोध्या में श्री राम मंदिर के निर्माण में और वाराणसी में काशी विश्वनाथ कारिडोर का विरोध किया। ज्ञानवापी में मिले शिवलिंग को फव्वारा बताने में सबसे पहले कांग्रेस ही मैदान में उतर पड़ी थी। रेवंत रेड्डी संभवतः यह बात भूल गए कि भगवान शिव को नीलकंठ भी कहा जाता है क्योंकि उन्होंने समाज की रक्षा के लिए विष को भी अपने गले में ही धारण कर लिया था। तेलंगाना के मुख्यमंत्री को भगवान श्रीराम का चरित्र पढ़ना चहिए। मुख्यमंत्री को यह नहीं पता कि भगवान श्रीराम मर्यादा पुरषोत्तम थे। अंग्रेजों की बनाई हुई पार्टी कांग्रेस ने अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की रणनीति के तहत ही विगत 76 वर्षों में हिंदू समाज को जाति, पंथ, संप्रदाय, भाषा और क्षेत्र के आधार पर बांटने की पूरी कोशिश की है और वह लगातार जारी है। मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने अपने बयान के माध्यम से आर्य बनाम द्रविड का विभाजन करते हुए यह भी कहाकि हम द्रविड़ हैं और हम भगवान शिव की आराधना करते हैं जबकि आर्य प्रभु श्रीराम को मानते हैं। रेवंत रेड्डी का कहना है कि बीजेपी के मंचों से जयश्रीराम का नारा सुनाई देता है जबकि “हर हर महादेव“ का उद्घोष नहीं किया जाता । रेड्डी ने कहा कि “मोदीजी हर हर महादेव क्यों नहीं कहते?“ रेवंत रेड्डी का बयान झूठ का पुलिंदा भर है। रेवंत रेड्डी को यह नहीं पता कि उत्तर भारत में केदारनाथ, विश्वनाथ और महाकाल जैसे ज्योतिर्लिंग हैं, उत्तर भारत में ही काँवड़ यात्रा होती है और श्रावण माह महादेव को ही समर्पित रहता है। कांग्रेस को तो भगवान शिव के मंदिरों के विकास से भी चिढ़ रही है। गुजरात के पवित्र सेामनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार रोकने और तत्कालीन राष्ट्रपति स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद को सोमनाथ मंदिर न जाने देने का भरसक प्रयास स्वयं नेहरु जी ने किया था। सोमनाथ मंदिर के 1000 वर्ष पूर्ण होने पर आयोजित कर्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रतिभाग पर भी कांग्रेस ने नफरत भरा बयान दिया था। मध्य प्रदेश के उज्जैन में बने भव्य महाकाल कॉरिडोर का विरोध भी कांग्रेस नेताओं ने ही किया था। आज दक्षिण भारत के जो कांग्रेसी नेता अपने आपको शिवभक्त बता रहे हैं वह ज्ञानवापी में मिले शिवलिंग के उद्धार के लिए आगे क्यों नही आ रहे हैं? कांग्रेस के शासनकाल में भगवान शिव के मंदिरों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी को एक बार काशी विश्वनाथ धाम और सोमनाथ मंदिर में जाकर दर्शन करना चाहिए तब उन्हें स्पष्ट रूप से पता चल जाएगा कि आर्य प्रभु श्रीराम के भी भक्त हैं और भगवान शिव के भी भक्त हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रामेश्वरम में भी भगवान की पूजा करते हैं और काशी विश्वनाथ धाम में भी। वह अपनी हर जनसभा में हर-हर महादेव के नारे लगाते हैं। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवत रेड्डी ने निहित राजनीतिक स्वार्थ व गांधी परिवार की चाटुकारिता के लिए एक निंदनीय बयान दिया है। यह बयान भारत को उत्तर और दक्षिण में बांटने की कांग्रेस की राजनीति का हिस्सा है। भाषा के आधार पर भी कांग्रेस उत्तर और दक्षिण को लड़ाती रही है। इस बयानबाजी का एक पक्ष मुस्लिम समाज को खुश रखने के लिए हिन्दुओं की आस्था पर प्रहार करना भी है। यहां पर एक बड़ा सवाल यह भी है कि कांग्रेस के नेता कभी अन्य धर्मों के प्रति इस प्रकार के बयान क्यों नहीं देते? यह बात पूरी तरह से स्पष्ट हो चुकी है गांधी परिवार व विपक्ष को अयोध्या का भव्य राम मंदिर व काशी विश्वनाथ धाम सहित अन्य मंदिरों का विकास अच्छा नहीं लग रहा है इसलिए अब उसने यह नया नैरेटिव गढ़ना शुरू कर दिया है कि प्रधानमंत्री मोदी व बीजेपी के लोग “हर- हर महादेव“ नहीं बोलते। वास्तविकता ये है देश की जनता कांग्रेस की इस फूट डालो-राज करो की नीति अच्छी तरह से समझ चुकी है यही कारण है कि कांग्रेस लगातार सिमट रही है लेकिन वह अपने में सुधार के बजाए चुनाव आयोग व संवैधानिक संस्थाओं पर हमलावर होकर सत्ता में वापसी का प्रयास कर रही है। - मृत्युंजय दीक्षित
कैप्टन स्मित मच्छार की बहादुरी ने टाली बड़ी हवाई त्रासदी
आसमान में उड़ता हुआ विमान सामान्यतः यात्रियों के लिए सुरक्षित यात्रा और मंजिल तक पहुंचने का भरोसा लेकर चलता है। विमान के भीतर बैठे लोग यह कल्पना भी नहीं करते कि कुछ ही क्षणों में वही यात्रा जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष में बदल सकती है। 30 सितंबर 2026 को दुबई से तेल अवीव जा रहे एक विमान में कुछ ऐसा ही हुआ। उड़ान के दौरान ऐसी भयावह स्थिति पैदा हुई, जिसमें विमान में सवार लोगों की जान पर गंभीर खतरा मंडराने लगा। उस समय भारतीय विमान चालक कैप्टन स्मित मच्छार ने जिस साहस, धैर्य और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय दिया, उसकी चर्चा भारत ही नहीं, दुनिया के अनेक हिस्सों में हो रही है। दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की उड़ान संख्या एफजेड1073 में लगभग 174 यात्री सवार थे। विमान बोइंग 737 मैक्स 8 था। उड़ान के दौरान विमान में कार्यरत सह-पायलट ने कथित तौर पर कैप्टन स्मित मच्छार पर चाकू से हमला किया। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, हमले के बाद विमान की स्थिति अचानक गंभीर हो गई और वह कुछ ही क्षणों में लगभग 14000 फुट नीचे चला गया। इस घटना ने विमान में मौजूद यात्रियों और चालक दल के सदस्यों को भारी संकट में डाल दिया। सबसे कठिन स्थिति यह थी कि जिस व्यक्ति के हाथ में विमान की सुरक्षित उड़ान की जिम्मेदारी थी, उसी पर हमला कर दिया गया था। कैप्टन मच्छार गंभीर रूप से घायल हो गए, लेकिन उन्होंने अपना धैर्य नहीं खोया। उपलब्ध विवरण के अनुसार, उन्होंने घायल अवस्था में भी विमान के नियंत्रण और यात्रियों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी। उन्होंने कक्ष का दरवाजा खोलने में सफलता प्राप्त की, जिसके बाद यात्रियों और चालक दल के सदस्यों ने मिलकर हमलावर को काबू करने में मदद की। विमान में मौजूद दो अन्य विमान चालकों ने भी स्थिति संभालने में सहायता की। अंततः विमान को सऊदी अरब के तबूक हवाई अड्डे पर आपात स्थिति में उतारा गया। इसे भी पढ़ें: नीरजा भनोट से स्मित मच्छार तक, हिन्दुओं की शूरवीरता की कायल दुनिया इस पूरी घटना का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि संकट के उस क्षण में कैप्टन मच्छार ने केवल अपने जीवन की चिंता नहीं की। उनके सामने विमान में बैठे सैकड़ों लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी थी। एक विमान चालक के लिए सामान्य परिस्थितियों में भी निर्णय लेना अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, लेकिन जब स्वयं चालक घायल हो, विमान असामान्य स्थिति में हो और कुछ ही क्षणों में बड़ा हादसा हो सकता हो, तब निर्णय लेने की क्षमता की वास्तविक परीक्षा होती है। कैप्टन मच्छार ने इसी परीक्षा में असाधारण धैर्य दिखाया। घटना के बाद कैप्टन मच्छार को तबूक के अस्पताल में भर्ती कराया गया। भारतीय अधिकारियों के अनुसार वह गंभीर रूप से घायल हुए थे, लेकिन उनका उपचार किया जा रहा था और उनकी स्थिति सुरक्षित बताई गई। उनकी बहादुरी की प्रशंसा भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने भी की। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी कैप्टन मच्छार के साहस की सराहना करते हुए उन्हें सच्चा नायक बताया। कैप्टन स्मित मच्छार का विमानन क्षेत्र में लंबा अनुभव भी इस घटना के संदर्भ में उल्लेखनीय है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार वह मुंबई के घाटकोपर क्षेत्र से हैं और इससे पहले स्पाइसजेट में कार्य कर चुके हैं। जून 2022 में वह फ्लाईदुबई से जुड़े थे। उनके पास बोइंग 737 विमानों को उड़ाने का लगभग 9750 घंटे का अनुभव बताया गया है। इतने लंबे अनुभव ने निश्चित रूप से उन्हें कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने की व्यावसायिक क्षमता प्रदान की होगी, लेकिन केवल अनुभव से उस क्षण का साहस नहीं समझाया जा सकता। घायल होने के बावजूद यात्रियों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देना उनके कर्तव्यबोध को भी सामने लाता है। इस घटना की एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि यात्रियों ने भी संकट के समय असाधारण सहयोग किया। विमान के भीतर उत्पन्न खतरे को केवल चालक दल ने ही नहीं संभाला, बल्कि यात्रियों ने भी हमलावर को काबू करने में मदद की। इससे पता चलता है कि आपात स्थिति में सामूहिक सहयोग कितना महत्वपूर्ण हो सकता है। एक व्यक्ति की बहादुरी ने रास्ता बनाया, लेकिन उसके बाद कई लोगों के सहयोग ने स्थिति को नियंत्रण में लाने में भूमिका निभाई। इस घटना को केवल एक व्यक्ति की कहानी मानना पूरी तस्वीर को छोटा कर देना होगा। यह साहस, प्रशिक्षण, जिम्मेदारी और सामूहिक सहयोग की कहानी भी है। घटना के बाद विमान सुरक्षित रूप से तबूक पहुंचा और यात्रियों को आगे उनकी मंजिल तक पहुंचाने की व्यवस्था की गई। उपलब्ध समाचारों के अनुसार सभी यात्री सुरक्षित रहे। जिस स्थिति में विमान हजारों फुट नीचे आ गया था, उसमें सुरक्षित अवतरण अपने आप में महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। विमान की आपात स्थिति और उसके बाद हुई घटनाओं की जांच संबंधित अधिकारियों द्वारा की जा रही है। इसलिए सह-पायलट की वास्तविक मंशा, हमले का कारण और घटना के पीछे की पूरी परिस्थितियों के बारे में अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा। कैप्टन मच्छार की बहादुरी को लेकर भारत में भी भावनात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिली। उत्तर प्रदेश के कुंडा क्षेत्र से विधायक रघुराज प्रताप सिंह, जिन्हें राजा भैया के नाम से भी जाना जाता है, ने उनकी बहादुरी की प्रशंसा करते हुए एक महत्वपूर्ण सुझाव रखा। उन्होंने कहा कि यदि ऐसे बहादुर विमान चालक को सम्मानपूर्वक भारतीय सेना में विमान चालक के पद पर नियुक्त किया जाए तो यह गर्व की बात होगी। उन्होंने केंद्रीय नेतृत्व से इस विषय पर विचार करने का आग्रह किया। यह फिलहाल एक राजनीतिक नेता द्वारा किया गया सुझाव है, कोई सरकारी नियुक्ति या निर्णय नहीं। राजा भैया की इस मांग ने एक अलग बहस को भी जन्म दिया है। भारतीय सेना में नियुक्तियां निर्धारित नियमों, पात्रताओं और प्रक्रियाओं के अनुसार होती हैं। किसी व्यक्ति की असाधारण बहादुरी निश्चित रूप से सम्मान का विषय हो सकती है, लेकिन किसी विशिष्ट पद पर नियुक्ति का निर्णय संबंधित नियमों और संस्थागत प्रक्रियाओं के अनुसार ही किया जा सकता है। इसलिए राजा भैया की मांग को एक सम्मानजनक सुझाव के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि किसी घोषित सरकारी फैसले के रूप में। कैप्टन मच्छार की कहानी हमें यह भी याद दिलाती है कि किसी पेशे की असली परीक्षा तब होती है, जब सामान्य परिस्थितियां अचानक असामान्य हो जाएं। विमान चालक के लिए यात्रियों की सुरक्षा केवल नौकरी की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक नैतिक दायित्व भी है। कैप्टन मच्छार ने जिस परिस्थिति में अपना संयम बनाए रखा, उसमें उनके सामने अपने जीवन का खतरा भी था और विमान में सवार लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी। ऐसे समय में भय स्वाभाविक है, लेकिन भय के बावजूद जिम्मेदारी निभाना ही साहस का वास्तविक अर्थ है। इस घटना के संदर्भ में कैप्टन मच्छार के कुछ पुराने विचार भी उल्लेखनीय हैं। विमानन क्षेत्र से जुड़ी एक रिपोर्ट में उनके पूर्व कथनों का उल्लेख किया गया है, जिनमें उन्होंने यात्रियों के सुरक्षित विमान से बाहर निकलने को अपनी प्राथमिकता बताया था। उन्होंने यह भी कहा था कि कठिन परिस्थितियों में यात्रियों से संवाद बनाए रखना महत्वपूर्ण होता है। आज जब उनकी अपनी उड़ान में असाधारण संकट आया, तब उनके व्यवहार में भी यात्रियों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने की वही भावना दिखाई दी। आकाश में घटित यह घटना कई सवाल भी छोड़ गई है। विमान में चालक दल की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए? यदि चालक दल के किसी सदस्य से ही अचानक खतरा उत्पन्न हो जाए तो ऐसी परिस्थिति से निपटने के लिए क्या अतिरिक्त व्यवस्थाएं होनी चाहिए? आपातकालीन प्रशिक्षण में ऐसी घटनाओं को किस तरह शामिल किया जाना चाहिए? इन प्रश्नों का उत्तर संबंधित विमानन संस्थाओं और जांच एजेंसियों को देना होगा। घटना की जांच से सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर विमानन सुरक्षा व्यवस्था में आवश्यक सुधार किए जा सकते हैं। फिलहाल सबसे बड़ी बात यह है कि एक बेहद कठिन परिस्थिति में विमान सुरक्षित रूप से जमीन पर पहुंचा और उसमें सवार यात्रियों की जान बच गई। कैप्टन स्मित मच्छार स्वयं घायल हुए, लेकिन उन्होंने अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटने के बजाय संकट का सामना किया। यही कारण है कि उनकी बहादुरी की चर्चा सीमाओं से परे हो रही है। भारत के प्रधानमंत्री से लेकर इजरायल के प्रधानमंत्री तक ने उनके साहस की सार्वजनिक रूप से सराहना की है। कैप्टन स्मित मच्छार की कहानी केवल एक विमान दुर्घटना को टालने की कहानी नहीं है। यह उस मानवीय साहस की कहानी है, जिसमें व्यक्ति अपने सामने उपस्थित खतरे के बावजूद दूसरों की सुरक्षा को प्राथमिकता देता है। यह कहानी विमान चालकों, सुरक्षा कर्मियों, चिकित्सकों, सैनिकों और उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा का विषय बन सकती है, जिनके काम में दूसरों के जीवन की जिम्मेदारी जुड़ी होती है। किसी भी बहादुरी का सबसे बड़ा पुरस्कार लोगों का सुरक्षित घर लौटना होता है। कैप्टन मच्छार के लिए भी शायद यही सबसे महत्वपूर्ण बात होगी कि जिस विमान की जिम्मेदारी उनके हाथों में थी, उसके यात्री सुरक्षित अपनी मंजिल तक पहुंचे। सम्मान, प्रशंसा और पुरस्कार बाद की बातें हैं। संकट की घड़ी में कर्तव्य से पीछे न हटना ही उनकी कहानी का सबसे मजबूत पक्ष है। घायल शरीर के बावजूद जिम्मेदारी निभाने वाले इस विमान चालक ने यह दिखाया कि साहस केवल युद्धभूमि में ही नहीं, बल्कि जीवन के किसी भी मोर्चे पर सामने आ सकता है। आकाश में कुछ क्षणों तक चली इस असाधारण घटना ने एक बात स्पष्ट कर दी कि संकट कितना भी बड़ा क्यों न हो, धैर्य, प्रशिक्षण, कर्तव्यबोध और सामूहिक सहयोग मिलकर बड़ी से बड़ी त्रासदी को टालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
नीरजा भनोट से स्मित मच्छार तक, हिन्दुओं की शूरवीरता की कायल दुनिया
कैप्टन स्मित मच्छार की बहादुरी को जहां आज पूरी दुनिया सलाम कर रही है वहीं इस घटना ने आज से लगभग चालीस साल पहले हुई इसी तरह की घटना की याद दिलवा दी है जब एक अन्य हिंदू विरांगना नीरजा भनोट ने अपनी जान दे कर जहाज में सवार कई दर्जन यात्रियों की जान बचाई थी। आज पूरी दुनिया हिन्दुओं की इसी बहादुरी व कर्तव्यपरायणता को सलाम कर रही है। 30 सितम्बर को दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की उड़ान एफजेड-1073 में उस समय अफरा-तफरी मच गई, जब कॉकपिट के अंदर दोनों पायलटों के बीच हिंसक झड़प हो गई। घटना के दौरान भारतीय कैप्टन स्मित मच्छार गंभीर रूप से घायल हो गए। इसके बाद विमान अचानक तेजी से नीचे जाने लगा। विमान ने बेहद कम समय में हजारों फीट की ऊंचाई खो दी। स्थिति बिगड़ती देख यात्रियों और चालक दल के सदस्यों ने कॉकपिट तक पहुंचने की कोशिश की। घायल होने के बावजूद कैप्टन मच्छार ने कॉकपिट का दरवाजा खोलने में मदद की, जिससे अंदर मौजूद हमलावर को काबू करने का रास्ता बना। इसे भी पढ़ें: flydubai पायलट Smit Machhar ने घायल हालत में खोला Cockpit, PM Modi ने की जमकर तारीफ इसके बाद इजारायली यात्री यानिव हयून कॉकपिट के अंदर पहुंचे, हयून ने हमलावर को पीछे से पकडक़र नियंत्रण से दूर किया और पायलट की सीट पर पहुंचकर विमान को संभालने में मदद की। इस तरह स्मित मच्छार ने जहाज में सवार 174 लोगों की जान बचाई, जिनमें अधिकतर इस्राइली नागरिक थे। विमान को क्रैश करने की कोशिश करने वाला को-पायलट ओमान का निवासी था। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप समेत दुनिया भर के बड़े नेताओं ने इस हिन्दू सपूत की बहादुरी की प्रशंसा की है। नेतन्याहू ने कैप्टन स्मित मच्छार के साहस को ‘अविस्वसनीय’ बताया। उन्होंने कहा कि घायल होने के बावजूद भारतीय पायलट ने जिस तरह स्थिति का सामना किया, उसने यात्रियों और चालक दल को हस्तक्षेप का मौका दिया। पीएम मोदी ने उन्हें ‘हीरो’ बताते हुए कहा कि उनके साहस ने सैकड़ों लोगों की जान बचाने और एक बड़ी त्रासदी को टालने में मदद की। डोनाल्ड ट्रंप ने भी घटना को लेकर कैप्टन मच्छार और यात्री यानिव हयून की तारीफ की। ट्रंप ने कहा कि गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद पायलट ने दरवाजा खोलकर अहम भूमिका निभाई। वैसे इस घटना का आधिकारिक कारण सामने नहीं आया है परंतु समझा जा रहा है कि अगर दुर्घटना हो जाती तो यह अमेरिका के ट्विन टावरों पर हुए आतंकी घटना का ही दूसरा रूप होती, संभव है इसके बाद इस्राईल की भी सैनिक प्रक्रिया होती और दुनिया में शांति व्यवस्था को नया खतरा पैदा हो जाता, जो पहले ही इरान-अमेरिका और रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते संकट में चली आ रही है। स्मित मच्छार की बहादुरी ने न केवल पौने दो सौ लोगों का जीवन बचाया बल्कि दुनिया को भी एक बड़े संकट से बचा लिया। 30 सितम्बर को हुई इस घटना ने एक और हिन्दू विरांगना नीरजा भनोट का पुण्य स्मरण करवा दिया है जो इसी तरह की घटना में शहीद हुई थीं परंतु जीवन के अंतिम क्षण तक अपहृत जहाज के यात्रियों की सुरक्षा के लिए आतंकियों से लड़ती रहीं। उनकी बहादुरी को देख कर पाकिस्तान ने भी उन्हें तमगा-ए-इंसानियत पुरस्कार से सम्मानित किया। 5 सितंबर 1986 की सुबह कराची का जिन्ना अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पैन अमेरिकन वल्र्ड की फ्लाइट 73 मुंबई से न्यूयॉर्क के सफर पर थी और कराची उसका एक पड़ाव था। विमान में करीब 360 यात्री और 19 क्रू सदस्य मौजूद थे। लेकिन अचानक विमान में चार हथियारबंद आतंकी घुस आए और उन्होंने फ्लाइट को हाईजैक कर लिया। उस समय विमान की सीनियर फ्लाइट पर्सर थीं 22 साल की नीरजा भनोट। हालात बेहद खतरनाक थे, लेकिन नीरजा ने घबराने के बजाय तुरंत समझ लिया कि यात्रियों को बचाने के लिए क्या करना जरूरी है। उन्होंने कॉकपिट तक हाईजैक का संकेत पहुंचाया। इसकी वजह से पायलट और दूसरे कॉकपिट क्रू सदस्य विमान से बाहर निकलने में कामयाब रहे जिससे विमान के उड़ान भरने की संभावना खत्म हो गई और आतंकवादी अंदर फंस गए यात्रियों पर नियंत्रण बनाए रखने की कोशिश करने लगे। आतंकवादियों की नजर अमेरिकी यात्रियों पर थी। नीरजा ने अमेरिकी यात्रियों के पासपोर्ट छिपाने शुरू कर दिए। पासपोर्ट कूड़ेदान में डाल दिए गए, ताकि आतंकवादियों को यह पता न चल सके कि विमान में कौन-कौन से अमेरिकी नागरिक मौजूद हैं। करीब 17 घंटे तक विमान जमीन पर खड़ा रहा। जब विमान की बिजली चली गई, तो स्थिति अचानक और ज्यादा खतरनाक हो गई। अंधेरे का फायदा उठाकर आतंकवादियों ने गोलीबारी शुरू कर दी। अफरा-तफरी के बीच नीरजा ने इमरजेंसी गेट खोल दिया। उनके सामने मौका था कि वह खुद सबसे पहले विमान से बाहर निकल जाएं, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने यात्रियों को बाहर निकलने में मदद करना शुरू किया। नीरजा ने बच्चों समेत कई यात्रियों को सुरक्षित बाहर निकलने में मदद की। इसी दौरान वह आतंकवादियों की गोली का निशाना बन गईं। तीन बच्चों को बचाने की कोशिश करते हुए उन्हें गोली मार दी गई। गंभीर रूप से घायल नीरजा को अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उनकी जान नहीं बच सकी। इस घटना में 20 लोगों की मौत हुई. हालांकि, नीरजा की सूझबूझ और साहस के कारण सैकड़ों यात्री सुरक्षित बच पाए। नीरजा भनोट की बहादुरी को भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में सम्मान मिला. भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया। पाकिस्तान ने भी उनकी बहादुरी को मान्यता देते हुए उन्हें ‘तमगा-ए-इंसानियत’ से सम्मानित किया। अमेरिका में भी उनकी बहादुरी के लिए उन्हें कई सम्मान मिले। बाद के वर्षों में उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया गया और मुंबई में एक चौक का नाम भी उनके नाम पर रखा गया। आज स्मित मच्छार ने नीरजा भनोट की उसी बहादुरी की पुन: स्मृति करवा दी है और दुनिया हिन्दुओं की शूरवीरता व कर्तव्यपरायणता को सलाम कर रही है। - राकेश सैन
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मच्छर, हाथी, घोड़ा और बिच्छू… Gujarat के इन अजीब Surnames से जुड़ी कहानी सुनकर चौंक जाएंगे!
फ्लाईदुबई की एक उड़ान में संकट टालने वाले कप्तान स्मित मच्छर का नाम सामने आया तो उनकी बहादुरी के साथ उनके अनोखे उपनाम ने भी लोगों का ध्यान खींचा। ‘मच्छर’ नाम सुनकर भले ही पहले उड़ने वाले कीट की तस्वीर सामने आए, लेकिन यहां बात एक ऐसे पायलट की है, जिसने 9/11 जैसे आतंकी हमले को घटित होने से रोका और सभी विमान यात्रियों की जान बचाई। स्मित मच्छर नाम ने गुजरात के उन अनोखे उपनामों की कहानी भी सामने ला दी, जिनमें पशु-पक्षियों और कीट-पतंगों के नाम पीढ़ियों से लोगों की पहचान बने हुए हैं। हम आपको बता दें कि गुजराती समाज में विशेषकर कुछ नागर ब्राह्मण, ब्रह्मक्षत्रिय और लोहाना समुदायों में पशु-पक्षियों और कीट-पतंगों से जुड़े कई उपनाम मिलते हैं। इनमें घोड़ा, मांकड़ यानी खटमल, मांकड़ी यानी बड़ी चींटी, पोपट यानी तोता, विंछी यानी बिच्छू, शियाल यानी सियार, तीतर और हाथी जैसे उपनाम शामिल हैं। यानी एक ही सामाजिक संसार में कहीं मच्छर भनभना रहा है, कहीं बिच्छू डंक मार रहा है, कहीं घोड़ा दौड़ रहा है और कहीं हाथी चिंघाड़ रहा है! इसे भी पढ़ें: राजनयिक संबंध नहीं रखने वाले देश का पायलट इजराइली उड़ानें संचालित नहीं कर सकता, फिर Omani Co-Pilot कैसे Flydubai Flight में आ गया? इस कहानी में कैप्टन मनोज हाथी का किस्सा भी बेहद दिलचस्प है। एयर इंडिया में संचालन विभाग के पूर्व निदेशक रहे कैप्टन हाथी का उपनाम सचमुच ‘हाथी’ है। जब उन्होंने बोइंग 747 जैसे विशाल जंबो विमान को उड़ाने के लिए प्रशिक्षण लिया, तो उनके साथियों को मजाक करने का एक और मौका मिल गया। कैप्टन हाथी ने मीडिया को बताया कि एयर इंडिया में उनके समय कप्तान वाघ और पारसी इनफ्लाइट पर्यवेक्षक होमी घोड़ा भी थे। यानी विमानन जगत में उनके आसपास ही पूरा ‘जंगल’ बसा हुआ था। विदेश में भी कैप्टन हाथी के नाम ने खूब ध्यान खींचा, लेकिन वहां इसे याद रखना लोगों के लिए आसान था। ब्रिटेन में कई लोग उनके नाम को ‘द जंगल बुक’ के मशहूर किरदार कर्नल हाथी से जोड़ लेते थे। भारत में लोग अक्सर उनसे मजाक में पूछते थे कि जब उपनाम हाथी है तो इतने दुबले क्यों हैं? अब वजन थोड़ा बढ़ा तो मजाक भी बदल गया। लोग कहने लगे कि अब कैप्टन हाथी अपने नाम के साथ पूरी तरह न्याय कर रहे हैं। इसके अलावा, गुजरात के जूनागढ़ के नागर समुदाय से जुड़े फिल्मकार अभिलाष घोड़ा भी अपने उपनाम को गर्व से धारण करते हैं। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, उनका कहना है कि गुजरात से बाहर यह नाम अक्सर लोगों का ध्यान खींचता है, लेकिन उनके परिवार ने इसे पीढ़ियों से सम्मान और आत्मविश्वास के साथ अपनाया है। हालांकि परिवार के कई लोगों को भी यह निश्चित रूप से पता नहीं कि इस उपनाम की मूल उत्पत्ति क्या रही होगी। वहीं ‘मच्छर’ उपनाम का संबंध गुजरात के ब्रह्मक्षत्रिय समुदाय से बताया जाता है। वाधवान स्थित समुदाय संस्था के सचिव राजू दुबल के अनुसार, सुरेंद्रनगर सहित गुजरात के कुछ इलाकों में यह उपनाम विशेष रूप से देखने को मिलता है। अहमदाबाद की भारती विंछी भी ब्रह्मक्षत्रिय समुदाय से आती हैं। उन्होंने बताया कि ऐसे उपनाम समुदाय में संख्या की दृष्टि से कम हैं। परिवार में बुजुर्गों से मिली जानकारी के अनुसार उनके पूर्वज कीटों के काटने, खासकर बिच्छू के डंक का उपचार करने में दक्ष माने जाते थे। इसी कारण बिच्छू से जुड़ा नाम समुदाय की पहचान का हिस्सा बन गया। इस परंपरा में केवल पशु-पक्षी और कीट ही नहीं, बल्कि भूत और जोगी जैसे उपनाम भी मिलते हैं। इस पूरे मामले पर समाजशास्त्री गौरांग जानी का कहना है कि गुजराती उपनामों के इतिहास पर विनोदिनी नीलकंठ की 1942 में प्रकाशित पुस्तक ‘गुजराती अटकाओं नो इतिहास’ अब भी महत्वपूर्ण विद्वतापूर्ण स्रोत मानी जाती है। उनके अनुसार, ऐसे उपनामों को संभावित रूप से ‘टोटेम’ परंपराओं से जोड़ा जा सकता है। अर्थात किसी समूह का किसी विशेष पशु के प्रति सम्मान, उससे जुड़ाव या उसके सकारात्मक गुणों को अपनाने की सामाजिक परंपरा रही थी। गौरांग जानी के मुताबिक सौराष्ट्र में ऐसे उपनामों की अधिकता का कारण बड़े जातीय ढांचे से ज्यादा वहां के करीबी और आपस में जुड़े समुदायों की मजबूत सामाजिक संरचना हो सकती है। बहरहाल, अगली बार जब किसी खबर में कैप्टन मच्छर, कैप्टन हाथी या कोई घोड़ा दिखाई दे, तो नाम पर मुस्कुराने से पहले कहानी जरूर समझिए। क्योंकि गुजरात के इन उपनामों के पीछे केवल मजेदार शब्द नहीं, बल्कि समुदाय, परंपरा, पेशे, लोकविश्वास और सदियों पुरानी सामाजिक स्मृतियों की पूरी कहानी छिपी हो सकती है। और हां, मच्छर का विमान उड़ाना जितना असामान्य सुनाई देता है, हाथी का जंबो जेट उड़ाना उससे कहीं ज्यादा शानदार संयोग है! -नीरज कुमार दुबे
केरल भाजपा ने उठाई सबरीमाला हवाई अड्डे की मांग, तीन हजार एकड़ जमीन के अध्ययन के लिए मांगी केंद्र की मंजूरी
कर्नाटक में केंद्रीय टीमों ने सूखे का आकलन शुरू किया, फसल का नुकसान 60,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है: डिप्टी सीएम
बिहार: अनंत-नीरज विवाद पर बोले जदयू नेता श्रवण कुमार, 'बातचीत से जल्द निकलेगा समाधान'
बिहार: अनंत-नीरज विवाद पर बोले जदयू नेता श्रवण कुमार, 'बातचीत से जल्द निकलेगा समाधान'
आप की राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ ने आप पर हमला किया और कहा कि जिन्होंने बूथ लेवल पर भी काम नहीं किया उन्हें राजस्थान से उठाकर पंजाब में बंगला और गाड़ी सब दिया जा रहा है। पूर्व विधायक श्याम सुंदर शर्मा, रजत राकेश टंडन भी कांग्रेस में शामिल हुए।
4 साल में पहली बार एक सुर में बोले रूस और यूक्रेन, दोनों को पसंद आया मोदी का प्रस्ताव
चार साल से ज्यादा समय से जंग लड़ रहे रूस और यूक्रेन के मोर्चे भले आज भी आमने-सामने हों, लेकिन शांति के सवाल पर दोनों तरफ से निकली आवाज पहली बार एक ही दिशा में जाती दिखाई दी है। और यह दिशा दी है भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने। यूक्रेन के विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा ने भारत के प्रस्ताव को युद्ध समाप्त करने के लिए सामने आए चार प्रस्तावों में सबसे व्यापक बताया है। दूसरी तरफ रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी खुलकर कहा कि प्रधानमंत्री मोदी लगातार इस संघर्ष को खत्म करने का सवाल उठाते रहे हैं और उनके पास दोनों पक्षों को स्वीकार्य समाधान के लिए “बहुत अच्छे विचार” हैं। देखा जाये तो युद्ध के मैदान में एक-दूसरे पर हमला कर रहे मॉस्को और कीव की तरफ से आई इन टिप्पणियों ने भारत की उस कूटनीतिक पहल को अचानक केंद्र में ला दिया है, जो अब तक बंद कमरों की बातचीत से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर दिखाई देने लगी है। यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पहली बार यूक्रेन की ओर से भारत की पहल को सार्वजनिक रूप से इतनी स्पष्ट मान्यता मिली है। सिबिहा के अनुसार भारत ने पहली बार इस प्रक्रिया में भूमिका निभाने की इच्छा का संकेत दिया है। यूक्रेन ऊर्जा क्षेत्र और काला सागर में युद्धविराम पर विचार करने को तैयार है, बशर्ते ऊर्जा तथा बंदरगाह ढांचे पर हमले भी रुकें। साथ ही कीव ने संपर्क रेखा पर बिना शर्त युद्धविराम के विकल्प को भी खुला बताया है। इसे भी पढ़ें: सब पर दादागिरी झाड़ते रहे ट्रंप, मगर कोई झुक नहीं रहा था! अब तो खुद US President ने ही अपनी 'सीमित शक्तियों' का खुलासा कर दिया उधर, भारत की पहल की व्यापकता का सबसे बड़ा संकेत यही है कि यह केवल गोलाबारी रोकने तक सीमित नहीं दिखती। इसमें ऊर्जा सुरक्षा, बंदरगाहों, काला सागर में व्यापार और कृषि आपूर्ति जैसे उन क्षेत्रों को जोड़ने की कोशिश है, जिनका सीधा संबंध युद्ध से बाहर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा से है। वहीं तुर्किये और मिस्र की पहल मुख्यतः काला सागर तथा अनाज निर्यात से जुड़ी बताई गई है, जबकि अमेरिका की पहल ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमले रोकने पर केंद्रित है। यहीं पुतिन का बयान बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। उन्होंने कहा कि मोदी रूस के साथ अच्छे और मित्रतापूर्ण संबंध होने के बावजूद लगातार युद्ध समाप्त करने का प्रश्न उठाते हैं और दोनों पक्षों के लिए स्वीकार्य समाधान खोजने में उनकी गहरी रुचि है। पुतिन ने मोदी के शांतिपूर्ण तरीके से और जल्द से जल्द संघर्ष समाप्त करने के प्रयासों के लिए आभार भी जताया। देखा जाये तो मोदी की यह भूमिका अचानक पैदा नहीं हुई। वर्ष 2022 में ही उन्होंने कहा था कि “यह युद्ध का युग नहीं है।” जुलाई 2024 में रूस की यात्रा के दौरान उन्होंने साफ कहा था कि बम, बंदूक और गोलियों के बीच शांति वार्ता सफल नहीं हो सकती और समाधान युद्धभूमि पर नहीं निकलेगा। 31 अगस्त 2026 को बिश्केक में पुतिन से मुलाकात के दौरान भी उन्होंने “अनंत युद्ध” से “युद्ध की समाप्ति” की दिशा में बढ़ने की बात कही थी। यहीं इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सामरिक संदेश छिपा है। रूस से भारत के गहरे संबंध हैं, जबकि यूक्रेन के साथ भी भारत ने संवाद के रास्ते खुले रखे हैं। ऐसे समय में यदि भारत रूस तक अपनी बात पहुंचा सकता है और यूक्रेन भी उसकी पहल को व्यापक प्रस्ताव मानता है, तो नई दिल्ली के पास संवाद के लिए एक ऐसा कूटनीतिक स्थान बनता है जो कई पश्चिमी शक्तियों के लिए उपलब्ध नहीं है। दूसरी ओर, इसी कूटनीतिक हलचल के बीच रूस ने अपनी सैन्य शक्ति का भी जबरदस्त प्रदर्शन किया है। दो अक्टूबर को पुतिन ने यूराल क्षेत्र में चल रहे सेंटर-2026 सैन्य अभ्यास के अंतिम चरण का निरीक्षण किया। रूस के अनुसार इस अभ्यास में लगभग 47 हजार सैनिक, 11 प्रशिक्षण क्षेत्र और कैस्पियन सागर शामिल रहे। अंतिम चरण में करीब छह हजार सैनिक उतरे। चीन, बेलारूस, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, मंगोलिया और पाकिस्तान सहित कई देशों की सेनाएं इसमें शामिल रहीं तथा 55 देशों के प्रतिनिधियों ने अभ्यास देखा। इस अभ्यास में रूस ने करीब 700 सैन्य उपकरणों, 600 से अधिक मानवरहित विमानों और 60 से अधिक रोबोटिक प्रणालियों का इस्तेमाल दिखाया। पुतिन ने नए जेट-चालित जेरान मानवरहित विमानों का भी निरीक्षण किया, जिनका इस्तेमाल रूस यूक्रेन युद्ध में कर चुका है। इसका अर्थ साफ है कि मास्को युद्ध से मिले अनुभव को अगली पीढ़ी की युद्धक क्षमता में बदल रहा है। इसलिए तस्वीर बेहद दिलचस्प है। एक तरफ रूस युद्ध के मैदान में अपनी सैन्य क्षमता, मानवरहित युद्ध प्रणाली और दूर तक मार करने वाली तकनीक का प्रदर्शन कर रहा है; दूसरी तरफ उसी रूस के राष्ट्रपति भारत के प्रधानमंत्री के युद्ध समाप्त करने वाले विचारों की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा कर रहे हैं। यही भारत की कूटनीति की असली परीक्षा और संभावित ताकत दोनों है। लेकिन रास्ता आसान नहीं है। यूक्रेन में रूसी हमले जारी हैं, ऊर्जा ढांचा लगातार निशाने पर है और काला सागर में सुरक्षा तथा अनाज आपूर्ति का संकट बना हुआ है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार रूस और यूक्रेन दोनों एक-दूसरे के ऊर्जा तथा ईंधन ढांचे पर हमले कर रहे हैं। ऐसे माहौल में भारत की चुनौती केवल प्रस्ताव देने की नहीं, बल्कि प्रस्ताव को युद्धभूमि से वार्ताकक्ष तक पहुंचाने की है। यदि नई दिल्ली रूस और यूक्रेन दोनों से संवाद कायम रखते हुए ऊर्जा, कृषि, काला सागर और अंततः व्यापक युद्धविराम को एक ही ढांचे में जोड़ पाती है, तो यह केवल एक युद्ध को रोकने की कोशिश नहीं होगी, यह बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की बढ़ती कूटनीतिक भूमिका का बड़ा प्रमाण बन सकता है। फिलहाल इतना जरूर स्पष्ट है कि मोदी की शांति पहल को अब केवल भारतीय दावा नहीं कहा जा सकता; यूक्रेन ने उसे व्यापक प्रस्ताव बताया है और पुतिन ने स्वयं उसके पीछे मोदी की लगातार कोशिशों को स्वीकार किया है। -नीरज कुमार दुबे
अब तक विरोधियों से ताकत पाते रहे प्रधानमंत्री मोदी क्या चक्रव्यूह तोड़ पाएंगें?
“मोदी है तो मुमकिन है” यह सिर्फ नारा नहीं है, भरोसा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने 25 सालों के सत्ताकाल में इसे अर्जित किया है। चुनावों में इस भावना को ‘मोदी की गारंटी’ कहा गया। यही विचार था जो मोदी को संगठन और विचार से बड़ा बना देता है। आज मोदी एक विचार बन चुके हैं। वह विचार है सबको साथ लेकर इस देश को विकसित भारत बनाने का सपना। इस मायने में वे सपनों के सौदागर भी हैं। “अच्छे दिन आने वाले हैं” से लेकर “सबका साथ, सबका विकास, सबका प्रयास, सबका विश्वास” तक यह सातत्य दिखता है। यह बिल्कुल नई राजनीतिक संस्कृति है और उसका सतत विकास है। सुशासन, विकास और संवाद है मंत्र- ऐसा लगता है कि सुशासन, विकास और संवाद तीन स्तरों से सत्ता ने सब कुछ साध लिया है। आलोचना हर सरकार की होती है, होनी भी चाहिए। कहीं कुछ भी पूर्ण नहीं है। किंतु दिल्ली में 2014 के बाद आई सरकार ने न सिर्फ अपनी धमक बनाई वरन बदलता हुए हिंदुस्तान भी दिखा। यह अलग ही हिंदुस्तान था। जो आकांक्षाओं से भरा-पूरा था। अवसाद की चादर को फेंक कर कुछ करना चाहता था। आगे बढ़ना चाहता था। मोदी ऐसे हैं जिन्होंने राजनीतिक तंत्र और नेताओं की इज्जत थोड़ी बढ़ाई ही है। इसके पूर्व का समय याद करें तो वह ‘नीतिगत जड़ता’ का समय था, घोटालों की खबरें से हलाकान देश भ्रष्टाचार के विरुद्ध सड़कों पर था। दिल्ली में एक नई बनी पार्टी (आप) सत्ता में चुकी थी। तभी मोदी उम्मीदों का चेहरा बनकर उभरे और लोगों ने उनमें राष्ट्रनायक की छवि देखी। उनका साधारण अतीत भरोसा दे रहा था कि उन्हें लोगों के दर्द पता हैं और वे संकटों के ठोस और वाजिब हल निकालेगें। इस भरोसे ने तीन बार उन्हें केंद्र की सत्ता पर न सिर्फ बिठाया बल्कि तमाम राज्यों में भी भाजपा और राजग की सरकारें बनीं, जिन्हें डबल इंजन की सरकार कहकर संबोधित किया गया। इसे भी पढ़ें: प्रधानमंत्री लगातार कर रहे हैं विदेशी मुद्रा बचाने की अपील अति आत्मविश्वास से बचने की जरुरत- गुजरात और दिल्ली के ‘सत्ता साकेत’ में लगभग ढाई दशक पूरे कर चुके नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को लेकर इस समय विपक्ष और समाज के कुछ हिस्से हमलावर हैं। कुछ मुद्दे तो खुद उनकी सरकार ने दिए तो कुछ विपक्ष प्रायोजित विवाद भी हैं। जिसमें पेपरलीक, एनटीए की नाकामी, इथेनाल और चुनाव आयोग जैसे मुद्दे हैं। नरेटिव की जंग में मोदी का मुकाबला नहीं, किंतु हर बार ऐसा नहीं होता। कई बार अतिआत्मविश्वास भी नुकसानदायक होता है। जनता सब कुछ कर सकती है, किंतु अहंकार स्वीकार नहीं करती। सच तो यह है कि विपक्ष के बिखराव और आपसी खींचतान के बाद भी सरकार न तो सदन चला पाई न सामने से उठ रहे सवालों के उत्तर दे पाई। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या मोदी थक गए हैं या वे घिर गए हैं? सच्चाई तो यह है कि मोदी और उनकी पार्टी के संगठन का मुकाबला करने की स्थिति में इस समय कोई दल या राजनीतिक समूह नहीं है। भाजपा अब पुरानी पार्टी नहीं रही। इस दौर में उनका जो भौगोलिक और सामाजिक विस्तार हुआ है, वह अभूतपूर्व है। इसके भरोसे ही वह तीन बार केंद्रीय सत्ता में आ सकी, जिसमें दो बार उसे पूर्ण बहुमत मिला तो तीसरी बार भी उसने आत्मविश्वास से भरकर सहयोगियों के साथ सरकार बना ली। सत्ता विरोधी रुझान के बाद भी भाजपा का मुख्य प्रतिद्वंदी दल कांग्रेस 100 सीटों का आंकड़ा पार नहीं कर सका। बावजूद इसके इस चुनाव परिणाम से विपक्ष में यह भरोसा तो बना कि भाजपा के अश्वमेघ के रथ को रोका जा सकता है। बंगाल की जीत ने दिया भरोसा- अल्पमत की सरकार होने के बाद भी केंद्र की सरकार भरोसे से भरी है। बड़े फैसले हो रहे हैं। बंगाल के चुनावों की असंभव सी दिख रही जीत ने भाजपा के काडर में आत्मविश्वास भरा है। इस भरोसे में असम की जीत तो संयुक्त है ही। अब पंजाब और उत्तर प्रदेश के मैदान में डटी भाजपा को यह साबित करना है कि अभी वह चुकी और थकी नहीं है। पंजाब में बहुत कमजोर खिलाड़ी होकर भी वह मैदान को जीतने के लिए जिस तरह उतरी है, वह बात साबित करती है कि उसका यह भरोसा अकारण तो बिल्कुल नहीं है। नई नवेली आम आदमी पार्टी की सरकार वहां (पंजाब में) दूसरे संघर्ष में बन सकती है तो कोई कारण नहीं भाजपा भी ऐसे स्वप्न देखे। वहीं उत्तर प्रदेश में तो उसके पास योगी आदित्यनाथ जैसा फायर ब्रांड लीडर है, जिसके पास 10 सालों का सुनहरा अतीत है। सरकार के नेता पर कोई दाग नहीं है, गुंडों पर लगाम है, सरप्लस एकोनामी है। यानी उत्तर प्रदेश में बहुत कुछ बदल गया है। सामाजिक समरसता पर संकट- फिर क्या कारण हैं कि नरेंद्र मोदी को लेकर तरह-तरह की बातें हो रही हैं। कई जातीय समूह उन पर हमलावर हैं। जबकि इन समूहों द्वारा उठाए जा रहे आरक्षण जैसे विषयों पर राजनीतिक दलों की आम सहमति है। कोई दल इस विषय को छू नहीं सकता। ‘समीक्षा’ जैसे शब्द पर भी राजनीतिक दल कांप उठते हैं। इस विषय पर मोदी निशाने पर हैं। हालांकि यह ज्यादातर जंग आनलाईन माध्यमों पर ही लड़ी जा रही है किंतु समाज में इसका जहर नहीं फैल रहा है, यह कहना गलत होगा। इस बीच यूजीसी गाइडलाइंस ने अलग कबाड़ा किया। इससे मोदी विरोधियों को आग उगलने का मौका मिला। यह तो भला हो सुप्रीम कोर्ट का कि उसने इन प्रावधानों को रोककर सरकार की लाज बचा ली। सामाजिक समरसता के लिए यह सारे विवाद घातक हैं, किंतु राजनीति का लक्ष्य संधान अगर समाज को बांटकर ही होता हो तो क्या किया जा सकता है? इसके साथ ही शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को लंबे समय तक झेलते रहना भी सरकार के विरुद्ध गया, अंततः प्रधान तिलचट्टों की अनावश्यक सस्ती राजनीति के शिकार होकर विदा हो गए। इससे गुमनाम और जनाधारहीन नई नवेली ‘काक्रोच जनता पार्टी’ अनावश्यक चर्चा में आ गयी। इस सबके बाद भी मोदी और भाजपा की शक्ति को कम आंकना गलत होगा। योगी आदित्यनाथ, हेमंत विश्वशर्मा, शुभेंदु अधिकारी, मोहन यादव, विष्णुदेव साय, नायब सिंह सैनी, मोहन मांझी, देवेंद्र फड़नवीस, सम्राट चौधरी जैसी मुख्यमंत्रियों की टीम को कम आंकना नासमझी होगी। नरेंद्र मोदी ने देश के हर क्षेत्र में सभी सामाजिक समूह के नेताओं की पूरी मलिका खड़ी कर दी है। भाजपा के इस सामाजिक विस्तार को समझे बिना आप मोदी की ताकत को नहीं भांप सकते। इसी तरह भाजपा का भौगोलिक विस्तार अप्रतिम है। उत्तर प्रदेश में होगा देश का फैसला- भाजपा ‘मोदी समय’ में जम्मू से लेकर कन्याकुमारी तक की लोकसभा सीटें जीत चुकी है। भुवनेश्वर से लेकर मुंबई तक भाजपा की तूती बोल रही है। कांग्रेस और विपक्षी दलों के भरसक प्रयासों के बाद भी मोदी देश की जनता की पहली पसंद बने हुए हैं। सरकार के विरुद्ध असंतोष को वे कैसे समाप्त करते हैं, इसकी पहली बड़ी परीक्षा उत्तर प्रदेश के चुनाव मैदान में होनी है। वहां के परिणाम देश की राजनीति को प्रभावित करेंगे। कई विश्वेषक और ज्योतिष गुरु नरेंद्र मोदी को राष्ट्रपति भवन भेजने और किसी अन्य को प्रधानमंत्री बनाने में लगे हैं, किंतु ऐसा लगता है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा स्वयं को ज्यादा आश्वस्त पाती है। प्रधानमंत्री की सक्रियता और दिनचर्या को देखते हुए यह कहना कठिन है कि वे अभी आसानी से हथियार डाल देगें। संगठन और सरकार पर उनकी पकड़ मजबूत है। आज तक विपक्षियों के द्वारा हुए व्यापक विरोध से ही वे शक्ति अर्जित करते रहे हैं। नए समय में हो रहा विरोध क्या उन्हें फिर से शक्तिमान बनाएगा, इसके लिए उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों के परिणामों का इंतजार करना पड़ेगा। उत्तर प्रदेश का राजनीतिक संदेश देश की भावी दिशा तय करेगा, इसमें दो राय नहीं है। - प्रो. संजय द्विवेदी (लेखक राजनीतिक विश्वेषक हैं।)
UP Congress Update: आराधना मिश्रा ‘मोना’ बनीं प्रदेश अध्यक्ष, जानिए ब्लॉक प्रमुख से यूपी कांग्रेस की कमान तक का सफर
'भ्रामक प्रचार फैलाकर पूरे देश को अस्थिर करना चाहती कांग्रेस', सीईसी के खिलाफ प्रदर्शन पर बोले भाजपा नेता
गृह मंत्री अमित शाह भोपाल में गोपालक सम्मेलन समेत कई कार्यक्रमों में लेंगे हिस्सा
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'अस्तित्व बचाने के लिए यमदूत से भी समझौता कर लेंगी ममता बनर्जी', एआईटीएमसी के सीजेपी को समर्थन पर भाजपा का तंज
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मुंबई के शिवाजी पार्क में सीजेपी के प्रदर्शन के दौरान लगे 'जय श्री राम' के नारे, पुलिस ने संभाली स्थिति
राजस्थान में 3 से 16 अक्टूबर तक चलेगा ‘सही खान-पान, स्वस्थ राजस्थान’ अभियान
जयपुर, 2 अक्टूबर (आईएएनएस)। राजस्थान में लोगों को सुरक्षित, पौष्टिक और स्वस्थ खान-पान की आदतों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए 3 से 16 अक्टूबर तक 'सही खान-पान, स्वस्थ राजस्थान' अभियान आयोजित किया जाएगा।
स्थानीय राजनीति से रखेंगे दूरी, रेजीनगर के विकास के लिए सीधे केंद्र से बात करूंगा: हुमायूं कबीर
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छत्तीसगढ़: भ्रष्टाचार मामले में कांग्रेस विधायक देवेंद्र यादव को एसीबी का नोटिस
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चुनाव प्रचार में जेल नहीं, जनता से जुड़े मुद्दों पर बात होनी चाहिए, हिमंता बिस्वा सरमा का गौरव गोगोई पर तंज
कर्नाटक में भाजपा ने निकाली 'सेवा संकल्प यात्रा' और 'विजय संकल्प यात्रा', कांग्रेस सरकार पर साधा निशाना
विपक्ष हताश और निराश, केवल पीएम मोदी का विरोध उनका एजेंडा: भाजपा सांसद नरेश बंसल
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घुट-घुटकर मरने से सम्मान के साथ मरना बेहतर, विश्वेंद्र सिंह ने दिए कांग्रेस छोड़ने के संकेत
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आज कोई लाल बहादुर शास्त्री जैसा नहीं जो नैतिक आधार पर इस्तीफा दे, ज्ञानेश कुमार पर बोले अनिल शास्त्री
दिल्ली: ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर विपक्ष का हल्ला बोल, यूथ कांग्रेस बोली- जारी रहेगा संघर्ष
'सेवा मेरा योगदान' के तहत स्वच्छता अभियान में शामिल हुईं सीएम रेखा गुप्ता, स्वच्छ दिल्ली के लिए की अपील
चुनाव आयोग के सामने ही धरने पर बैठ गए मुख्यमंत्री! क्या है कर्नाटक का SIR विवाद, जिस पर मच गया बवाल?
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केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह देंगे मध्य प्रदेश को कई सौगातें : मोहन यादव
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आंध्र प्रदेश के राज्यपाल, मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री ने महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री को दी श्रद्धांजलि
एमएमडीआर संशोधन विधेयक पर सियासत तेज, संजय सेठ बोले-देश संविधान से चलता है, जिद से नहीं
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खादी के वस्त्रों पर 30 जनवरी तक 25 फीसदी छूट : मुख्यमंत्री योगी
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सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन पर एनडीए नेता बोले-'विपक्ष के पास गाली देने अलावा कोई काम नहीं'
पीयूष गोयल ने व्यापार मंत्रियों से की मुलाकात
मिल्वौकी, केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भारत के आर्थिक संबंधों को मजबूत करने के लिए कनाडा के अंतराष्ट्रीय व्यापार के मंत्री मनिंदर सिद्धू , यूके के बिजनेस, इनोवेशन, साइंस और ट्रेड सेक्रेटरी ऑफ स्टेट जोनाथन रेनॉल्ड्स और ऑस्ट्रेलिया के व्यापार और पर्यटन मंत्री सीनेटर डॉन फैरेल से मुलाकात की।
भारत के बारे हमारे देश के महापुरुषों की स्पष्ट कल्पना थी। वे भारत की जड़ों से बहुत गहरे तक जुड़े हुए थे। लेकिन आज भारत का जो स्वरूप हमारी आंखों के सामने है, वह भारत के महापुरूषों की मान्यताओं के अनरूप नहीं कहा जा सकता। आज जो बुराई दिखाई देती है, वह अंग्रेजी मानसिकता को अपनाने वाले कुछ लोगों की देन है। जबकि गांधी जी स्वदेशी के पक्षधर थे। ऐसे में सवाल यह भी आता है कि इन लोगों को भारतीय जीवन मूल्यों के बारे में या तो पता नहीं था या फिर जानते हुए भी उसे पुनर्स्थापित नहीं करना चाहते थे। भारत को स्वतंत्रता मिलने के पश्चात इस बात पर गहन चिंतन किया गया कि अब कैसा भारत बनाना चाहिए। महात्मा गांधी की इस बारे में स्पष्ट कल्पना थी। वे कहते थे कि मैं एक ऐसे भारत का निर्माण करना चाहता हूँ जिसमें शराब जैसी बुराई का नामोनिशान न हो, जहां समाज में भेदभाव न हो, गौहत्या पाप हो और रामराज्य स्थापित हो। गांधी जी की दृष्टि में भविष्य के भारत की बुनियाद में पुरातन और सांस्कृतिक मानबिन्दुओं का समावेश था। वे जानते थे कि इसके बिना भारत नहीं, क्योंकि भारत का आधार ही राम है। इसे भी पढ़ें: गांधी का पुनर्जन्म ही नहीं, गांधी-दृष्टि का पुनर्जागरण हो भारत महात्मा गांधी के इन विचारों को हमारे राजनीतिक दल आत्मसात करने में संकोच कर रहे हैं। कहीं न कहीं इन बातों को एक सांप्रदायिक बताने का खेल भी चल रहा है, लेकिन ऐसा करने में वे भूल जाते हैं कि भारत में रामराज्य की संकल्पना स्वतंत्रता मिलने के बाद की नहीं है और न ही यह केवल महात्मा गांधी का ही विचार है, बल्कि महात्मा गांधी ने उसी बात को आगे बढ़ाने का प्रयास किया, जो भारत में सनातन काल से चल रहा है। भारत के मनीषियों ने जो सांस्कृतिक मूल्य स्थापित किए थे, गांधी जी ने उनका हृदय से अनुगमन किया और आत्मसात किया। इसीलिए वे भारत में इसके स्थापन का प्रयास करते दिखाई दिए। महात्मा गांधी ने अप्रत्यक्ष रूप से अंग्रेजों की उस नीति का भी विरोध किया, जो समाज में विभाजन की रेखा खींचती थी। इसलिए वे समाज में भाईचारे के भाव का विस्तार चाहते थे। महात्मा गांधी जैसा चाहते थे, उन्हें वैसा दृश्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रमों में दिखाई दिया। इसलिए वे अपने जीवन के अंतिम दिनों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नजदीक आते जा रहे थे। उन्होंने संघ के वर्धा शिविर में भाग लिया। वहां उन्होंने भेदभाव रहित समाज का दर्शन किया, जो उस समय उनकी कल्पना में अपेक्षित था। गांधी जी जानते थे कि सामाजिक एकता इस देश के लिए कितनी आवश्यक है। वर्तमान में समाज की फूट के चलते अनेक विसंगतियों का जन्म हो रहा है। व्यभिचार बढ़ रहे हैं। जो गांधी जी के विचार के प्रतिकूल है। गांधी जी भगवान राम को सभी धर्म और संप्रदाय से ऊपर मानते थे। आज भगवान राम को जिस प्रकार से केवल हिन्दू समाज से जोड़कर देखा जाता है, वह दृष्टि महात्मा गांधी की नहीं थी। श्रीराम जी का जीवन एक ऐसा आदर्श है जो सबके लिए उत्थानकारी है। गांधी जी ने राम को भारतीय दृष्टि से देखा। आज के समाज से भी यही अपेक्षा की जाती है कि वह राम जी को संकुचित दायरे से न देखकर भारतीयता की दृष्टि से देखें। ऐसा करेंगे तो उन्हें राम अपने दिखाई देंगे, भारत के दिखाई देंगे। महात्मा गांधी का पूरा चिंतन भारत के विकास पर भी केंद्रित रहा। उन्होंने देश में स्वदेशी भावना को जगाने के लिए स्वयं के जीवन से कई उदाहरण दिए। आज बाजार में जिस प्रकार से विदेशी वस्तुओं का आक्रमण हुआ है, उसके कारण हमारे देश का पैसा विदेशी संस्थाओं को आर्थिक रूप से मजबूत कर रहा है। अपने देश का पैसा अपने देश में ही रहे, इसलिए गांधी जी ने स्वदेशी का विचार अपने जीवन में अपनाया और समाज को प्रेरित किया। आज इस भाव को इसलिए भी अपनाने की आवश्यकता है, क्योंकि आज भारत को आत्मनिर्भर बनाने की आवश्यकता है, जो केवल स्वदेशी विचार से ही संभव है। इतना ही नहीं गांधी जी भारत में लघु एवं कुटीर उद्योगों की स्थापना को भी देश के विकास का मजबूत आधार मानते थे। हालांकि अब भारत का समाज स्वदेशी की ओर जाग्रत भाव के साथ अग्रसर हुआ है। महात्मा गांधी गौहत्या पर पूरी तरह से प्रतिबंध चाहते थे। हम जानते हैं गौ हमारे देश का अर्थशास्त्र है। गाय देश की आर्थिक उन्नति से जुड़ी है। देश में जब गौ आधारित खेती होती थी, तब देश धन धान्य से संपन्न था। धरती के सोना उगलने का समय भी यही था। वास्तव में गांधी जी का चिंतन अद्भुत था। उनका हर शब्द भारत की आत्मा ही था। हमें भारत की आत्मा को बचाना है तो गांधी जी विचारों को आत्मसात करना होगा। इसी से भारत की समृद्धि का मार्ग निर्मित होगा और हम आत्मनिर्भर भारत की दिशा में मजबूती के साथ आगे बढ़ेंगे। - सुरेश हिंदुस्थानी, वरिष्ठ पत्रकार
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बचपन में कहते थे कि जमीन को खोदो तो दूसरी तरफ अमेरिका में निकलोगे। दुनिया तो गोल है लेकिन मैप को जूम करके देखें तो अमेरिका एकदम पश्चिम में नजर आता है। आज बात उसी अमेरिका के लोकतांत्रिक पहलू और वहां के चुनाव की करेंगे। अमेरिका में होने वाला मध्यावधि चुनाव भारत के मध्यावधि चुनाव से बिल्कुल अलग होता है और भारत में कोई सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाती तो मध्य अवधि चुनाव होता है लेकिन अमेरिका में मध्यावधि चुनाव की वजह ऐसी नहीं है। सबसे बड़ी बात ये है की चुनाव में मौजूद राष्ट्रपति ट्रंप की पार्टी हार भी जाती है और संसद में अल्पमत में भी जाती है तो भी जो राष्ट्रपति बने रहेंगे और अमेरिका के इस मध्यावधि चुनाव से जुड़ी ऐसी कई दिलचस्प जानकारी है जो आज आपको बताएंगे और इस चुनाव का विश्लेषण भी करेंगे क्योंकि इस चुनाव का असर ना केवल अमेरिका पर बल्कि पुरी दुनिया पर भी हो सकता है। चूंकि इस बार चा चुनाव राष्ट्रपति के कार्यकाल के बीच में आया है। इसी वजह से इसे मिड टर्म इलेक्शन के नाम से जाना जाता है। आज हम अमेरिका के मिड टर्म इलेक्शन की पूरी कहानी को समझेंगे। संसद के चुनाव से राष्ट्रपति की कुर्सी पर क्या असर पड़ता है? इसे भी पढ़ें: जान दांव पर लगा भारतीय पायलट ने छुड़ाया हाईजैक विमान! एक लाईन से नेतन्याहू-ट्रंप सब ने ठोका सलाम भारतीय संसद से कितना अलग? हिंदुस्तान में कानून बनाने वाले सबसे बड़े संस्था संसद है जिसे विधायक का भी कहते हैं। संसद के हिस्से हैं। पहला लोकसभा जिसे निचला सदन कहते हैं और दूसरा राज्यसभा जिसे ऊपरी सदन कहते हैं। लोकसभा के सदस्य का कार्यकाल 5 साल का होता है। वही राज्यसभा कभी भंग नहीं होती और इसके सदस्य का कार्यकाल छह वर्ष का होता है। इसी तरह अमेरिका में संसद को अमेरिकी कांग्रेस कहा जाता है और अमेरिकी कांग्रेस भी दो हसन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट में बंटा होता है। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में 435 मेंबर होते हैं। हर मेंबर का कार्यकाल सिर्फ दो साल का होता है। सीटों का निर्धारण जनसंख्या के आधार पर होता है। दूसरे सदन को सीनेट बोलते हैं। इसके सदस्यों की संख्या 100 है। कार्यकाल 6 बरस का होता है। हर दो बरस में एक तिहाई सदस्यों का कार्यकाल पूरा होता है और फिर चुनाव होता है। अमेरिका में कुल 50 राज्य हर राज्य से दो सेनेटर चुने जाते हैं। सीटों के बंटवारे में जनसंख्या की भूमिका यहां नहीं होती। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के ठीक मध्य में होने वाले ये चुनाव प्रशासन के एजेंडे पर एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय जनमत संग्रह (रेफरेंडम) के रूप में काम करेंगे। सभी 50 राज्यों में करोड़ों अमेरिकी मतदाता वाशिंगटन में सत्ता के संतुलन को तय करने के लिए मतदान करेंगे, जिससे अमेरिकी प्रतिनिधि सभा और अमेरिकी सीनेट दोनों के नियंत्रण का फैसला होगा। कैपिटल हिल के गलियारों से परे 2026 के मध्यावधि चुनाव राज्यों में कार्यकारी शक्ति को भी नया रूप देंगे। इस दौरान 36 राज्यों के गवर्नर पदों, दर्जनों राज्य अटॉर्नी जनरल, सेक्रेटरी पदों और राज्य विधानमंडलों के सदनों का भविष्य भी दांव पर होगा। अमेरिका में मध्यावधि चुनाव (मिडटर्म इलेक्शन) क्या होते हैं? संसदीय व्यवस्थाओं के विपरीत, जहाँ प्रधानमंत्री अपनी सुविधानुसार चुनाव करवा सकते हैं या संसद भंग कर सकते हैं, अमेरिकी संविधान के अनुच्छेद I और II के तहत राष्ट्रीय चुनावों का एक निश्चित और अटल कार्यक्रम तय है। मध्यावधि चुनाव वे आम चुनाव हैं जो अमेरिका में हर चार साल में होते हैं और ये राष्ट्रपति के चार साल के कार्यकाल के ठीक आधे समय पर आयोजित किए जाते हैं। हालांकि मध्यावधि चुनाव वाले साल में राष्ट्रपति पद के लिए मतदान नहीं होता है, लेकिन संघीय और राज्य स्तर की सत्ता के लगभग सभी अन्य महत्वपूर्ण पदों के लिए चुनाव होते हैं: प्रतिनिधि सभा: प्रतिनिधि सभा की सभी 435 वोटिंग सीटों पर हर दो साल में चुनाव होते हैं। प्रतिनिधियों का कार्यकाल दो साल का होता है, जिसका अर्थ है कि सभी 50 राज्यों के हर एक निर्वाचन क्षेत्र (डिस्ट्रिक्ट) को संसद में अपनी विधायी आवाज़ चुननी होगी। अमेरिकी सीनेट: सीनेटरों का कार्यकाल छह साल का होता है, जिन्हें तीन चुनावी वर्गों (Classes) में विभाजित किया गया है। सीनेट के लगभग एक-तिहाई हिस्से पर हर दो साल में चुनाव होते हैं। 2026 में, मतदाता क्लास 2 से संबंधित 33 नियमित सीटों के साथ-साथ अधूरे कार्यकाल को भरने के लिए होने वाले विशेष चुनावों पर भी फैसला करेंगे। गवर्नर पद के चुनाव: 36 राज्यों और तीन अमेरिकी क्षेत्रों (टेरिटरीज़) के कार्यकारी प्रमुख (गवर्नर) चुनाव का सामना करेंगे। गवर्नरों का राज्य के बजट, न्यायिक नियुक्तियों, कानून व्यवस्था, शिक्षा और राज्य स्तरीय स्वास्थ्य नीतियों पर व्यापक प्रभाव होता है। राज्य विधानमंडल और स्थानीय प्रशासनिक पद: राज्य सीनेट और राज्य प्रतिनिधि सभा की हज़ारों सीटों पर चुनाव होंगे। इसके साथ ही सेक्रेटरी ऑफ स्टेट (अधिकांश राज्यों में मुख्य चुनाव अधिकारी) और अटॉर्नी जनरल (मुख्य कानून प्रवर्तन अधिकारी) जैसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक पद भी दांव पर होंगे। बैलेट: दर्जनों राज्यों के नागरिक संवैधानिक संशोधनों, वैधानिक बदलावों, कर प्रस्तावों, प्रजनन अधिकारों से जुड़े उपायों और मतदान अधिकारों से जुड़े कानूनों पर सीधे मतदान करेंगे। इसे भी पढ़ें: भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर Piyush Goyal और Jamieson Greer की बातचीत सीनेट की 'स्टैगर्ड' चुनाव व्यवस्था क्या है और यह कैसे काम करती है? अमेरिकी संविधान बनाने वालों ने सीनेट को एक स्थिर और लगातार काम करने वाली संस्था के तौर पर बनाया था। एक ही चुनाव में सभी सदस्यों के बदलने से रोकने के लिए, उन्होंने सीनेट को तीन अलग-अलग क्लास में बांटा: क्लास 1: 2024, 2030 और उसके बाद चुनाव के लिए। क्लास 2: 2026, 2032 और उसके बाद चुनाव के लिए। क्लास 3: 2022, 2028 और उसके बाद चुनाव के लिए। 2026 में, क्लास 2 की उन सीनेट सीटों पर चुनाव होगा जो मूल रूप से 2020 में चुनी गई थीं। क्योंकि क्लास 2 में ऐतिहासिक रूप से कड़े मुकाबले वाले 'स्विंग स्टेट्स' की ज़्यादा सीटें शामिल रही हैं, इसलिए 2026 का सीनेट मैप दोनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के लिए एक बहुत ही अनिश्चित और कड़े मुकाबले वाला मैदान है। ऐतिहासिक रूप से मिडटर्म चुनाव (मध्य-अवधि चुनाव) व्हाइट हाउस में काबिज़ राजनीतिक पार्टी के लिए एक बड़ी संरचनात्मक चुनौती पेश करते हैं। राष्ट्रपति की पार्टी क्यों हारती है मध्यावधि चुनाव? जानिए क्या है 'मिडटर्म कर्स' अमेरिकी गृह युद्ध के बाद से मौजूदा राष्ट्रपति की पार्टी ने 90 प्रतिशत से ज़्यादा मिडटर्म चुनावों में हाउस की सीटें और ज़्यादातर चुनावों में सीनेट की सीटें गंवाई हैं। जानकार इस घटना को, जिसे अक्सर मिडटर्म कर्स या मिडटर्म पेनल्टी कहा जाता है, कई मुख्य वजहों से जोड़कर देखते हैं। विपक्षी पार्टी के वोटर आम तौर पर ज़्यादा राजनीतिक रूप से प्रेरित, नाराज़ और वोट देने के लिए ज़्यादा सक्रिय होते हैं, जबकि मौजूदा राष्ट्रपति का समर्थन करने वाले वोटर शायद निश्चिंत महसूस करते हों या कार्यकाल के दौरान किए गए समझौतों से असंतुष्ट हों। मिडटर्म चुनाव अनिवार्य रूप से देश के आर्थिक प्रदर्शन, लोगों की सोच (कंज्यूमर सेंटीमेंट), जीवन-यापन की लागत और प्रशासन के शुरुआती दो सालों में लिए गए फैसलों पर एक तरह का जनमत-संग्रह बन जाते हैं। राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतने वाले उम्मीदवार द्वारा बनाया गया गठबंधन अक्सर सरकार चलाने के दौरान नीतिगत मतभेदों का सामना करता है, जिससे अलग-अलग वोटिंग समूहों के बीच वोटिंग की संख्या को ऊंचे स्तर पर बनाए रखना मुश्किल हो जाता है। अमेरिका में मिडटर्म चुनाव कैसे जीता जाता है? मिडटर्म चुनाव जीतने के लिए राष्ट्रपति चुनाव अभियान की तुलना में बहुत अलग राजनीतिक रणनीतियों की ज़रूरत होती है। राष्ट्रपति चुनाव वाले वर्षों में वोटिंग आमतौर पर योग्य मतदाताओं के 60% से 66% के बीच होती है। इसके विपरीत, मिडटर्म चुनाव में वोटिंग ऐतिहासिक रूप से काफी कम हो जाती है, जो आमतौर पर 40% से 50% के बीच रहती है। वोटिंग कम होने के कारण, मतदाताओं का स्वरूप बदल जाता है। ज़्यादा उम्र के अमेरिकी, जो चुनाव के साल की परवाह किए बिना लगातार बड़ी संख्या में वोट करते हैं, मिडटर्म चुनाव में मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा बन जाते हैं। कम उम्र के मतदाता, कम आय वाले परिवारों के लोग और नागरिकता पाने वाले लोग मिडटर्म चुनाव में कम संख्या में वोट करते हैं, जब तक कि उन्हें बहुत अच्छी तरह से संगठित ज़मीनी अभियानों या ज़रूरी मुद्दों के ज़रिए प्रेरित न किया जाए। जो भी पार्टी अपने निष्क्रिय समर्थकों को सक्रिय मिडटर्म मतदाताओं में बदलने में सफल होती है, उसे चुनाव के दिन एक बड़ा संरचनात्मक फ़ायदा मिलता है। अमेरिकी राजनीतिक गठबंधनों में भी बड़े बदलाव होते रहते हैं। कॉलेज-शिक्षित मतदाता खासकर उपनगरीय इलाकों में तेज़ी से डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों के साथ जुड़ रहे हैं, जबकि ग्रामीण और औद्योगिक क्षेत्रों में बिना कॉलेज-शिक्षा वाले मज़दूर वर्ग के मतदाता रिपब्लिकन की ओर तेज़ी से झुके हैं। इस बीच, मज़दूर वर्ग के हिस्पैनिक, अफ़्रीकी-अमेरिकी और एशियाई-अमेरिकी पुरुषों ने अलग-अलग क्षेत्रों में वोटिंग के बदलते रुझान दिखाए हैं, जिससे राजनीतिक अभियान योजनाकारों के लिए पारंपरिक जनसांख्यिकीय अनुमान कम भरोसेमंद हो गए हैं। बिना किसी पार्टी से जुड़े स्वतंत्र मतदाता, जो कई राज्यों में सबसे तेज़ी से बढ़ने वाला राजनीतिक समूह हैं, उपनगरीय हाउस और सीनेट क्षेत्रों में कड़े मुक़ाबले वाले चुनावों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। हाल के सालों में राज्यों की विधानसभाओं ने वोटिंग से जुड़े कानूनों में अहम बदलाव किए हैं, जिससे अमेरिकियों के वोट डालने का तरीका बदल गया है: अर्ली वोटिंग (समय से पहले वोटिंग) का समय: ज़्यादातर राज्य 3 नवंबर को होने वाले आधिकारिक चुनाव दिवस से पहले कई दिनों या हफ़्तों तक व्यक्तिगत रूप से अर्ली वोटिंग की सुविधा देते हैं। मेल-इन और एब्सेंटी बैलेट (डाक से वोटिंग): बिना किसी खास कारण के मेल-इन वोटिंग, हस्ताक्षर की जांच, ड्रॉप-बॉक्स की सुविधा और बैलेट मिलने की समय-सीमा से जुड़े नियम हर राज्य में अलग-अलग होते हैं। वोटों की गिनती और नतीजों की घोषणा का समय: क्योंकि राज्य मेल-इन और अर्ली बैलेट की प्रक्रिया अलग-अलग समय-सीमाओं के तहत पूरी करते हैं, इसलिए कड़े मुकाबले वाले चुनावों में खासकर कैलिफ़ोर्निया, एरिज़ोना और नेवादा जैसे राज्यों में अंतिम नतीजों की पूरी गिनती में कई दिन लग सकते हैं। इसे भी पढ़ें: भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर Piyush Goyal और Jamieson Greer की बातचीत अमेरिकी मध्यावधि चुनाव 2026: क्या उम्मीद की जा सकती है? 2026 के मध्यावधि चुनावों के नतीजे तय करेंगे कि 2028 तक अमेरिका की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी और इससे 120वीं अमेरिकी कांग्रेस के लिए सत्ता का बुनियादी ढांचा भी तय होगा। अगर रिपब्लिकन दोनों सदनों पर अपना नियंत्रण बनाए रखते हैं, तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के पास बजट पैकेज पास करने, टैक्स कानूनों में बदलाव करने और जजों की नियुक्ति को मंज़ूरी दिलाने के लिए कानून बनाने का साफ़ रास्ता होगा। इसके विपरीत, यदि डेमोक्रेट कांग्रेस के किसी भी सदन पर कब्जा कर लेते हैं, तो वाशिंगटन में विभाजित सरकार का युग शुरू हो जाएगा: हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में बहुमत होने पर: डेमोक्रेट हाउस की सभी समितियों पर नियंत्रण कर लेंगे, जिससे उन्हें सम्मन जारी करने, कार्यकारी शाखा के निर्णयों की निगरानी करने, प्रतिस्पर्धी संघीय बजट विधेयक तैयार करने और एकतरफा विधायी पहलों को रोकने का पूर्ण अधिकार प्राप्त हो जाएगा। सीनेट में बहुमत होने पर: डेमोक्रेट न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया को नियंत्रित करेंगे, जिससे उन्हें संघीय जिला न्यायालयों, अपीलीय न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में न्यायिक उम्मीदवारों को रोकने या विलंबित करने की शक्ति प्राप्त होगी, साथ ही कार्यकारी शाखा की नियुक्तियों की भी गहन जांच करने का अधिकार होगा। आखिर में सबसे बड़ी बात... 2026 के ये मध्यावधि चुनाव सिर्फ संसद के नियंत्रण की जंग नहीं हैं, बल्कि यह 2028 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव का आधिकारिक लॉन्चिंग पैड भी साबित होंगे। अहम स्विंग और बैटलग्राउंड राज्यों में एकतरफा जीत दर्ज करने वाले गवर्नर रातों-रात 2028 की राष्ट्रपति रेस के सबसे बड़े दावेदार बनकर उभरेंगे। वहीं, जो सीनेटर या राष्ट्रीय नेता उपनगरीय और कामकाजी वर्ग के वोटरों में अपनी मजबूत पकड़ साबित करेंगे, 2028 के प्राइमरी घमासान से पहले उनका पलड़ा सबसे भारी हो जाएगा। यानी 3 नवंबर की यह रात सिर्फ आज का फैसला नहीं करेगी, बल्कि तय करेगी कि अगले चार साल बाद व्हाइट हाउस की चाबी किसके हाथ में होगी!
Rahul Gandhi के सवाल से हिली Modi सरकार! Gyanesh Kumar-TCS कनेक्शन का सच क्या?
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Delhi से Mumbai तक CEC के खिलाफ महा-प्रदर्शन का बिगुल! क्या दबाव में झुकेंगे Gyanesh Kumar?
सरकारी तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) ने अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क कीमतों में मजबूती के अनुरूप गुरुवार से 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमत में 62.50 रुपए की बढ़ोतरी की है।
हाईटेक होते वृद्धाश्रम और बेदखल होता बुढ़ापा
पुणे के समीप संचालित एक आधुनिक वृद्धाश्रम में जब एक बेसहारा बुजुर्ग के दाखिले के लिए संपर्क किया गया, तो वहां का मासिक शुल्क पचास हजार रुपये बताया गया। यह केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह हमारे समकालीन समाज के बदलते चरित्र, नैतिक पतन और बुजुर्गों के प्रति संवेदनहीनता का एक भयावह दस्तावेज़ है। भारत जैसे विकासशील देश में, जहां एक आम कामकाजी नागरिक या सेवानिवृत्त व्यक्ति की पूरी मासिक आय भी अक्सर इस आंकड़े तक नहीं पहुंच पाती, वहां बुढ़ापे की शरणस्थली का इतना खर्चीला होना एक गंभीर सामाजिक संकट की ओर इशारा करता है। यह इस कड़वी हकीकत को उजागर करता है कि जो वृद्धाश्रम कभी करुणा, सेवा और निस्वार्थ आश्रय के पवित्र केंद्र हुआ करते थे, वे अब कॉर्पोरेट शैली के आलीशान रिसॉर्ट्स और फाइव स्टार होटलों में तब्दील हो चुके हैं। जब जीवन के अंतिम पड़ाव पर मिलने वाली सुरक्षा और गरिमा भी पूरी तरह से बाजारवाद की वस्तु बन जाए, तो समाज के गरीब, निम्न-मध्यमवर्गीय और सर्वहारा बुजुर्गों के जीवित रहने की उम्मीदें ही दम तोड़ने लगती हैं। यह स्थिति इस बुनियादी लोकतांत्रिक और मानवीय सवाल को जन्म देती है कि क्या सम्मान से जीने और शांति से मरने का अधिकार केवल समाज के धनाढ्य वर्ग तक ही सीमित रह गया है? इस संकट की जड़ें हमारे सामाजिक और पारिवारिक ढांचे में आए गहरे बिखराव से जुड़ी हुई हैं। भारत की पहचान सदियों से संयुक्त परिवार की उस व्यवस्था से रही है, जहां बुजुर्गों को घर का 'बरगद' माना जाता था, जिनकी छत्रछाया में पूरी गोत्र और पीढ़ियां खुद को सुरक्षित महसूस करती थीं। लेकिन वैश्वीकरण, तीव्र शहरीकरण और आधुनिक जीवनशैली की अंधी दौड़ ने इस पारंपरिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया है। आज की युवा पीढ़ी रोजगार, करियर और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की तलाश में महानगरों या सुदूर विदेशों की ओर पलायन कर रही है, जहां उनके जीवन में माता-पिता के लिए स्थान संकुचित होता जा रहा है। कई मामलों में तो युवा दंपति बुजुर्गों को अपने साथ रखना एक अनुत्पादक बोझ समझने लगते हैं। इसी पारिवारिक अलगाव और सामाजिक लाचारी को आज कॉर्पोरेट जगत ने एक बहुत बड़े व्यावसायिक अवसर के रूप में पहचान लिया है। अब इन संस्थानों को 'वृद्धाश्रम' जैसे पारंपरिक और संवेदनशील नामों के बजाय 'सीनियर लिविंग सोसाइटीज', 'सिल्वर होम्स' या 'रिटायरमेंट रिसॉर्ट्स' जैसे आकर्षक और भ्रामक नामों से प्रचारित किया जा रहा है, ताकि समाज में बुजुर्गों को छोड़ने के अपराध बोध को एक स्टेटस सिंबल में बदला जा सके। इसे भी पढ़ें: International Day for Older Persons: वृद्ध व्यक्ति परिवार पर बोझ नहीं, बल्कि परिवार और समाज की जीवित पूंजी हैं! महीने के पचास हजार रुपये या उससे अधिक की भारी-भरकम राशि वसूलने वाले ये हाईटेक आश्रम अपने विज्ञापनों में वातानुकूलित कमरों, आलीशान आंतरिक सज्जा, चौबीस घंटे वाई-फाई, आधुनिक जिम, स्विमिंग पूल, क्लब हाउस और कस्टमाइज्ड डाइट प्लान जैसी सुख-सुविधाओं का बढ़-चढ़कर दावा करते हैं। यह पूरा परिदृश्य बाहर से देखने पर अत्यंत आकर्षक और किसी पर्यटन स्थल जैसा प्रतीत हो सकता है, परंतु गहराई से विचार करने पर इसकी खोखली और वीरान प्रकृति साफ दिखाई देती है। जीवन के सांध्यकाल में पहुंचे, अपनों से उपेक्षित और अकेलेपन से जूझ रहे किसी बुजुर्ग को बुढ़ापे में इन कृत्रिम और यांत्रिक सुख-सुविधाओं की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि उन्हें दो पल के सच्चे प्यार, अपनों के साथ संवाद और मानसिक संबल की दरकार होती है। इन कॉर्पोरेट संस्थानों ने सुख और विलासिता के साधन तो ऊंचे दामों पर बेच दिए, लेकिन वे उस मानवीय अपनत्व और मानसिक शांति को नहीं बेच पाए जो केवल एक परिवार के भीतर ही संभव है। यह एक ऐसी विडंबना है जहां बुजुर्गों के पास सोने के लिए मखमली बिस्तर तो मौजूद है, लेकिन उस पर चैन की नींद सोने के लिए जरूरी पारिवारिक स्नेह और मानसिक संतोष पूरी तरह नदारद है। इस पूरे परिदृश्य का सबसे मार्मिक और चिंताजनक पहलू यह है कि इस नई व्यवस्था ने देश के गरीब और मध्यम वर्ग के बुजुर्गों को पूरी तरह से हाशिए पर धकेल दिया है। भारत की एक बहुत बड़ी आबादी आज भी असंगठित क्षेत्रों में दिहाड़ी मजदूरी या छोटे-मोटे काम करके अपना जीवन यापन करती है, जिनके पास न तो भविष्य के लिए कोई बड़ी जमापूंजी होती है और न ही बुढ़ापे को सुरक्षित करने के लिए कोई सरकारी पेंशन। यदि ऐसे परिवारों में संतानों द्वारा माता-पिता का परित्याग कर दिया जाए, तो वे इन महंगे आश्रमों की चौखट तक लांघने की कल्पना भी नहीं कर सकते। परिणामस्वरूप, ऐसे बेसहारा वृद्ध सड़कों पर, रेलवे स्टेशनों पर या धार्मिक स्थलों के बाहर अत्यंत दयनीय परिस्थितियों में भीख मांगने या लावारिस मौत मरने को मजबूर हो जाते हैं। दूसरी ओर, देश की विशाल जनसंख्या के अनुपात में सरकारी वृद्धाश्रमों की संख्या नगण्य है, और जो गिने-चुने मुफ्त या चैरिटेबल आश्रम संचालित भी हो रहे हैं, उनमें से अधिकांश की स्थिति इतनी जर्जर और अमानवीय है कि वहां बुनियादी स्वच्छता, शुद्ध पेयजल और न्यूनतम चिकित्सा सुविधाओं का भी घोर अभाव रहता है। ऐसे में देश के निर्धन बुजुर्गों के लिए बुढ़ापा एक अभिशाप और अंतहीन यातना का पर्याय बन चुका है। यद्यपि भारत सरकार ने बुजुर्गों के अधिकारों और उनके भरण-पोषण की रक्षा के लिए 'माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007' जैसा कड़ा कानून बनाया है, जिसके तहत संतानों के लिए अपने वृद्ध माता-पिता की देखभाल करना कानूनी रूप से अनिवार्य है। लेकिन व्यावहारिक धरातल पर इस कानून की सीमाएं और विफलताएं साफ नजर आती हैं। कोई भी भारतीय माता-पिता, चाहे उन पर दुखों का कितना भी पहाड़ क्यों न टूट पड़े, अपने ही बच्चों के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराने या उन्हें जेल भिजवाने के लिए कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। वे सामाजिक लोक-लाज, समाज के उपहास और अपनी अगाध ममता के वशीभूत होकर चुपचाप अपमान और प्रताड़ना को सहना ही अपनी नियति मान लेते हैं। इसी कानूनी लाचारी और सामाजिक संकोच का अनुचित लाभ उठाकर कई असंवेदनशील संतानें बुजुर्गों को उनकी अपनी ही गाढ़ी कमाई से बनाए गए घरों से बेदखल कर देती हैं और व्यवस्था मूकदर्शक बनी रहती है। जब जीवन की बुनियादी आवश्यकताएं जैसे कि शिक्षा, स्वास्थ्य और अब बुढ़ापे का आश्रय भी पूरी तरह से बेलगाम बाजारवाद और पूंजीपतियों के हवाले कर दिए जाते हैं, तो समाज में सामाजिक और आर्थिक असमानता की खाई और अधिक चौड़ी तथा हिंसक हो जाती है। इसलिए, निजी वृद्धाश्रमों के इस अनियंत्रित और संवेदनहीन व्यावसायीकरण पर तुरंत रोक लगाना अनिवार्य हो गया है। सरकार को इन निजी संस्थानों की मनमानी फीसों और कार्यप्रणाली को नियंत्रित करने के लिए एक सख्त नियामक संस्था या वैधानिक निकाय का गठन करना चाहिए, जो यह सुनिश्चित करे कि कोई भी व्यावसायिक घराना किसी बुजुर्ग की मजबूरी और लाचारी का सौदा न कर सके। इसके साथ ही, सरकार को देश के प्रत्येक जिले में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल के आधार पर ऐसे किफायती, स्वच्छ और सुरक्षित वृद्धाश्रमों का निर्माण करना चाहिए, जहां मध्यम और गरीब वर्ग के बुजुर्ग बिना किसी आर्थिक मानसिक तनाव के गरिमापूर्ण जीवन व्यतीत कर सकें। साथ ही, कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) के नियमों में संशोधन करके बड़ी कंपनियों के मुनाफे का एक निश्चित हिस्सा गरीब बुजुर्गों के मुफ्त आश्रय, भोजन और चिकित्सा के लिए अनिवार्य रूप से आरक्षित किया जाना चाहिए। अंततः, केवल कड़े कानून बनाने, अदालती आदेशों या सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन मात्र से इस अत्यंत संवेदनशील समस्या का पूर्ण और स्थाई समाधान संभव नहीं है। यह एक गंभीर सामाजिक, मानसिक और नैतिक व्याधि है, जिसका उपचार हमें अपने परिवारों और व्यक्तिगत चेतना से प्रारंभ करना होगा। हमें अपनी शिक्षा प्रणाली और पारिवारिक संस्कारों में ऐसे नैतिक मूल्यों को पुनर्जीवित करना होगा जो नई पीढ़ी को यह समझा सकें कि माता-पिता कोई उपयोग के बाद फेंक दी जाने वाली वस्तु या वित्तीय दायित्व नहीं हैं, बल्कि वे हमारे जीवन की सबसे अमूल्य धरोहर और सांस्कृतिक पूंजी हैं। जिस समाज या राष्ट्र में उसके बुजुर्गों की आंखों में अकेलेपन का आंसू, तिरस्कार का दर्द और असुरक्षा का भाव व्याप्त हो, वह समाज विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में कितनी भी प्रगति क्यों न कर ले, आत्मिक और नैतिक रूप से सदैव दरिद्र ही रहेगा। पुणे के आश्रम का यह पचास हजार रुपये का मासिक शुल्क हम सभी के लिए एक गंभीर चेतावनी है, जिसे यदि आज हमने अनदेखा कर दिया, तो आने वाले समय में बुढ़ापा केवल धनवानों का एक विशेषाधिकार बनकर रह जाएगा और देश की एक बहुत बड़ी गरीब आबादी के हिस्से में केवल लाचारी, सड़कों की धूल और घोर उपेक्षा ही आएगी। समय रहते इस बाजारवाद के विरुद्ध खड़े होना और अपनी सामाजिक आत्मा को जगाना आज के समय की सबसे बड़ी पुकार है। - अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार

