हिमाचल ने दुर्लभ रिकॉर्ड के 17 लाख आर्काइव पेजों को डिजिटाइज किया
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1.3 लाख करोड़ की फ्रेट कॉरिडोर परियोजना राष्ट्र को समर्पित, महाराष्ट्र को मिलेगा बड़ा फायदा
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आखिर युवाओं के बीच क्यों नहीं चमक पा रहे हैं भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन?
भाजपा के राजनीतिक गलियारों में एक सवाल सबको बेचैन किए हुए है कि आखिर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन युवाओं के बीच क्यों नहीं चमक पा रहे हैं? क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, सपा मुखिया अखिलेश यादव, राजद सुप्रीमो तेजस्वी यादव, आप नेता अरविंद केजरीवाल, जनसुराज नेता प्रशांत किशोर आदि जैसे राजनीतिक क्षत्रपों को सियासी रूप से निपटाने के लिए नितिन नवीन के रूप में जो राजनीतिक तुरूप का पत्ता चला है, वह अब मनहूसियत की ओर अग्रसर है! कहीं विपक्ष के इशारे पर थिरक रहा जेन-जी भारी पड़ रहा है तो कहीं सवर्ण संगठनों का जनप्रदर्शन भाजपा नेतृत्व की रीति-नीति पर सवालों के गोले बरसा रहा है। वहीं कांग्रेस व उसके समर्थक दल जिस तरह से अपने अपने मुद्दों पर भाजपा को घेर रहे हैं, उससे पार्टी के कट्टर समर्थकों में भी ऊहापोह मची हुई है! पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन उनकी उपलब्धि जरूर है, लेकिन सवाल तो यहां तक उठ रहे हैं कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह पार्टी की कीमत पर उन्हें एक सीमा के बाद युवाओं के बीच चमकने नहीं देना चाहते और पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा की तरह सिर्फ अपना-अपना अनुगामी बनाए रखना चाहते हैं? चूंकि नितिन नवीन के ऊपर पीएम मोदी का ठप्पा लगा हुआ है, इसलिए उनपर एक सीमा के बाद बड़े नेता विश्वास भी नहीं कर पा रहे हैं और अफवाह उड़वा रहे हैं कि नितिन नवीन में नैसर्गिक नेतृत्व क्षमता की कमी है? इससे मोदी-भागवत दोनों परेशान हैं। राजनीतिक विश्लेषक की मानें तो यह सवाल असल में नितिन नवीन की व्यक्तिगत क्षमता से ज्यादा भाजपा के सत्ता-संगठन मॉडल का सवाल है? अभी उपलब्ध घटनाक्रम को देखकर सीधे यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या गृहमंत्री अमित शाह उन्हें “चमकने नहीं देना चाहते”। लेकिन यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या भाजपा में किसी राष्ट्रीय अध्यक्ष को अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाने की पर्याप्त जगह मिलती है? इसे भी पढ़ें: पुरानी 'साइकिल' में सपा ने लगाये नए 'राजनीतिक पुर्जे', अखिलेश की ‘शार्प’ और डिंपल की ‘सॉफ्ट’ राजनीति क्या गुल खिलाएगी? देखा जाए तो अगस्त 2026 में नितिन नवीन ने स्वयं Gen Z outreach की रणनीति पर बड़ी बैठक की, जिसमें करीब 45 नेताओं ने हिस्सा लिया। इस बैठक में पार्टी ने युवाओं के मुद्दों और उनसे संवाद की रणनीति पर जोर दिया है, हालांकि सर जमीन पर ऐसा कुछ होता हुआ दिखाई नहीं पड़ रहा है, क्योंकि इसमें युवा कम दिलचस्पी लेते दिखाई दे रहे हैं। लिहाजा, मेरे आकलन में तीन संभावनाएँ हैं:- पहली, यह “नियंत्रित नेतृत्व” की रणनीति हो सकती है: भाजपा में प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह की राजनीतिक ब्रांड-शक्ति इतनी बड़ी है कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का स्वतंत्र जन-नेता के रूप में उभरना आसान नहीं है। पार्टी अध्यक्ष का प्राथमिक काम संगठन, चुनाव और रणनीति का संचालन रहता है; लेकिन प्रधानमंत्री की लोकप्रियता का समानांतर राष्ट्रीय चेहरा बनना उसका घोषित उद्देश्य नहीं होता। इसलिए नितिन नवीन की दृश्यता कम होना अपने-आप में यह साबित नहीं करता कि उन्हें जानबूझकर रोका जा रहा है। दूसरी, नितिन नवीन अभी “राष्ट्रीय नेता” बनने की प्रक्रिया में हैं: वे भाजपा के सबसे युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और उनकी नई राष्ट्रीय टीम में अनुभव तथा युवा ऊर्जा को मिलाने की कोशिश दिखाई देती है। लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना और राष्ट्रीय जननेता बनना दो अलग चीजें हैं। ऐसा इसलिए कि राष्ट्रीय जननेता बनने के लिए चाहिए: अपनी विशिष्ट राजनीतिक भाषा, युवाओं के बीच स्वतः आकर्षण, लगातार देशव्यापी उपस्थिति, कठिन मुद्दों पर स्वतंत्र विचार, संगठन से बाहर भी व्यक्तिगत जनाधार, मीडिया और सोशल मीडिया में अपनी पहचान, लेकिन इनमें से अधिकांश का मूल्यांकन अभी करना जल्दी होगा। तीसरी, सबसे दिलचस्प संभावना: नितिन नवीन की क्षमता है, लेकिन उनकी “राजनीतिक ब्रांडिंग” अभी विकसित नहीं हुई है: यही वह जगह है जहाँ मैं आपकी पिछली बात से सहमत हूँ कि युवाओं को जोड़ना केवल कार्यक्रमों से नहीं होगा। पार्टी अभी bike yatras, hackathons, marathons, campus activities और social-media outreach जैसी योजनाओं पर विचार कर रही है। लेकिन युवा किसी नेता से केवल यह नहीं सुनना चाहता कि “मोदी सरकार ने यह किया”, बल्कि अब वह पूछता है: “आप स्वयं मेरे लिए क्या सोचते हैं?” यहीं नितिन नवीन को अपनी अलग पहचान बनानी होगी। असली परीक्षा यही है! ऐसे में अगर नितिन नवीन हर भाषण में मोदी सरकार की उपलब्धियों के प्रवक्ता बने रहेंगे, तो वे संगठन के सफल अध्यक्ष हो सकते हैं, लेकिन युवा जननेता बनने में कठिनाई होगी। लेकिन यदि वे कहें—“मोदी जी ने भारत को 2047 का लक्ष्य दिया है; अब मेरी पीढ़ी तय करेगी कि उस भारत की शिक्षा, रोजगार, AI, उद्यमिता और राजनीति कैसी होगी।” तो एक अलग राजनीतिक आवाज पैदा होगी। # सवाल है कि क्या स्वाभाविक उभार से मोदी-शाह उन्हें रोकेंगे? मेरे पास ऐसा कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं है कि मोदी या शाह नितिन नवीन को युवाओं के बीच उभरने से रोक रहे हैं। उलटे, उपलब्ध रिपोर्टों में मोदी और शाह की ओर से युवाओं को केंद्र में रखने की बात तथा नितिन नवीन के नेतृत्व में Gen Z outreach को आगे बढ़ाने की तस्वीर मिलती है। लेकिन भाजपा की राजनीतिक संस्कृति में एक संस्थागत सीमा जरूर है, वह यह कि - मोदी = सर्वोच्च राष्ट्रीय राजनीतिक ब्रांड। शाह = संगठन/रणनीति का शक्तिशाली केंद्र। राष्ट्रीय अध्यक्ष = संगठन का चेहरा और समन्वयक। नितिन नवीन को इस ढाँचे के भीतर रहते हुए “अपनी जगह” बनानी होगी। और अगर प्राकृतिक नेतृत्व क्षमता की बात करें? तो अभी फैसला देना जल्दबाजी होगा, बल्कि मैं नितिन नवीन के लिए अगले 12–18 महीने को नेतृत्व की अग्निपरीक्षा मानूंगा। तब देखना होगा कि क्या वे युवाओं के बीच बिना प्रधानमंत्री के नाम के भी भीड़ आकर्षित कर सकते हैं? बेरोजगारी, परीक्षा, शिक्षा और AI जैसे असुविधाजनक सवालों पर अपनी भाषा विकसित करते हैं? भाजपा के पुराने कार्यकर्ताओं के साथ-साथ नए युवाओं को भी नेतृत्व में ऊपर लाते हैं? सोशल मीडिया पर केवल पार्टी का संदेश दोहराने के बजाय अपना राजनीतिक विचार रखते हैं? किसी संकट में स्वयं आगे आकर समाधान प्रस्तुत करते हैं? राज्यों में जाकर “नितिन नवीन मॉडल” जैसी कोई संगठनात्मक पहचान बनाते हैं? अगर इन छह सवालों का जवाब अगले डेढ़ साल में हाँ होता है, तो यह कहना मुश्किल होगा कि उनमें प्राकृतिक नेतृत्व क्षमता नहीं है। वहीं, नितिन नवीन के सामने सबसे बड़ा खतरा मोदी-शाह से कम और “सिर्फ अध्यक्ष रह जाने” का ज्यादा है। राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में वे सफल हो सकते हैं—बैठकें करें, संगठन विस्तार करें, चुनाव जिताएँ, पदाधिकारी नियुक्त करें। उनकी नई राष्ट्रीय टीम में अनुभवी और युवा नेताओं का मिश्रण भी इसी संगठनात्मक भूमिका की ओर संकेत करता है। लेकिन इतिहास में कुछ अध्यक्ष संगठन के पदाधिकारी बनकर रह जाते हैं और कुछ अपने दौर के राजनीतिक चेहरे बन जाते हैं। लिहाजा, नितिन नवीन को दूसरा रास्ता चुनना होगा। और इसके लिए शायद उन्हें मोदी-शाह से टकराने की जरूरत नहीं है; यह उनका स्वभाव भी नहीं है। इसलिए उन्हें मोदी-शाह की छाया के भीतर अपनी राजनीतिक धूप पैदा करनी होगी। यही उनकी वास्तविक नेतृत्व-परीक्षा है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
'विकसित भारत' संवाद के लिए दौड़ में एक करोड़ युवाओं के शामिल होने की उम्मीद
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उद्योग जगत का मजबूत समर्थन कोयला गैसीकरण योजना को मिला
नई दिल्ली, केंद्र सरकार की 37,500 करोड़ रुपए की महत्वाकांक्षी कोयला एवं लिग्नाइट गैसीकरण प्रोत्साहन योजना को उद्योग जगत से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है।
ब्रिक्स 2026: भारत की कूटनीतिक क्षमताओं को चुनौती देता
2026 में ग्लोबल जियो पॉलिटिक्स के मौजूदा माहौल के आधार पर, ब्रिक्स एक इकोनॉमिक इन्वेस्टमेंट के शॉर्ट फॉर्म से बढ़कर एक बड़ी इंस्टीट्यूशनल ताकत बन गया है जो उभरते हुए मल्टीपोलर वर्ल्ड ऑर्डर को आकार दे रहा है। इसके महत्व, उपलब्धियों, चुनौतियों और ब्रिक्स विरोधी बातों को सुलझाने के प्रयासों को समझना आवश्यक है। मल्टीपोलर दुनिया में ब्रिक्स का महत्व ब्रिक्स ग्लोबल साउथ के हितों को बताने और एक ज़्यादा संतुलित बहुध्रुवीय विश्व बनाने के लिए एक बुनियादी प्लेटफ़ॉर्म बन गया है। 2025 तक, ब्रिक्स के सदस्य देश दुनिया की लगभग 48% आबादी और परचेसिंग पावर पैरिटी (पी पी पी) के आधार पर ग्लोबल जीडीपी का 39% हिस्सा थे। भारत की 2026 ब्रिक्स प्रेसीडेंसी के तहत, इस की गाइडिंग थीम बिल्डिंग फॉर रेजिलिएंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन और सस्टेनेबिलिटी है। कमज़ोर ग्लोबल गवर्नेंस, प्रोटेक्शनिस्ट पॉलिसी और बढ़ती जियोपॉलिटिकल अनिश्चितता के दौर में, ब्रिक्स साउथ-साउथ सहयोग के लिए एक सही विकल्प देता है जो पारंपरिक दबदबे और हुक्म से रहित है। यह उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं को अपनी पार्टनरशिप में विविधता लाने और ग्लोबल गवर्नेंस में अपनी आवाज़ बुलंद करने की इजाज़त देता है, बिना कोल्ड वॉर-स्टाइल के बाइनरी अलाइनमेंट में मजबूर हुए। ब्रिक्स की खास उपलब्धियां ब्रिक्स ने कई उपलब्धियां हासिल की हैं। इसका सफ़र आसान नहीं था। कई चुनौतियों के बावजूद यह अपने अनेक लक्ष्यों को हासिल कर सका। कुछ मुख्य उपलब्धियां हैं: स्ट्रेटेजिक विस्तार: ब्रिक्स ने सफलतापूर्वक अपनी पहुंच बढ़ाई है। 2026 तक, इस ब्लॉक में ऑफिशियली 11 सदस्य देश शामिल हैं: ओरिजिनल पांच (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) प्लस मिस्र, इथियोपिया, ईरान, इंडोनेशिया, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब (हालांकि सऊदी अरब अपने फॉर्मल स्टेटस को लेकर कुछ डिप्लोमैटिक अस्पष्टता बनाए हुए है)। पार्टनर देशों का संस्थागतकरण: मुख्य फैसले लेने की क्षमता को कम किए बिना अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए, ब्रिक्स ने एक फॉर्मल पार्टनर देश कैटेगरी शुरू की। 2025 में, दस देश—बेलारूस, बोलीविया, क्यूबा, कज़ाकिस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज़्बेकिस्तान और वियतनाम—ऑफिशियल पार्टनर के तौर पर शामिल हुए, जिससे एंगेजमेंट के लिए एक फ्लेक्सिबल फ्रेमवर्क बना। न्यू डेवलपमेंट बैंक (एन डी बी) की उपलब्धियाँ: एन डी बी ने हाल ही में अपनी 10वीं वर्षगाँठ मनाई, जिसमें क्लीन एनर्जी, ट्रांसपोर्ट और सस्टेनेबल डेवलपमेंट में 120 से ज़्यादा बड़े प्रोजेक्ट्स को फाइनेंस किया गया। इसने ग्लोबल साउथ को पार्टनरशिप, सॉवरेनिटी और शेयर्ड प्रायोरिटीज़ पर बना एक मल्टीलेटरल डेवलपमेंट बैंक सफलतापूर्वक दिया है, न कि वेस्टर्न-लेड फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन्स से जुड़ी कंडीशनैलिटीज़ पर। इंट्रा-ब्रिक्स ट्रेड ग्रोथ: मेंबर्स के बीच दो दशकों के ट्रेड एक्सपेंशन ने डेवलप हो रहे इकोनॉमिक संबंधों को सामने लाया है, जिससे साउथ-साउथ ट्रेड के नए, रेसिलिएंट पैटर्न बने हैं जो बाहरी झटकों से कम वल्नरेबल हैं। कॉमर्स सेक्रेटरी राजेश अग्रवाल ने 5 सितंबर, 2026 को कहा कि इंट्रा-ब्रिक्स मर्चेंडाइज़ ट्रेड अब कई गुना बढ़ गया है, जो मेंबर देशों के बीच गहरे ट्रेड इंटीग्रेशन और मज़बूत इकोनॉमिक कोऑपरेशन के लिए बहुत ज़्यादा अनटैप्ड पोटेंशियल को हाईलाइट करता है। 2003 में $84 बिलियन से 2024 में $1.17 ट्रिलियन तक इंट्रा-ब्रिक्स मर्चेंडाइज़ ट्रेड 13 गुना बढ़ गया, जो 13.3 परसेंट की सालाना एवरेज रेट से बढ़ रहा है, जो इसी समय के दौरान 5.7 परसेंट की ग्लोबल ट्रेड ग्रोथ से काफी ज़्यादा है। भविष्य की चुनौतियाँ भारत के लिए अलग-अलग चुनौतियों के बीच ब्रिक्स को आगे ले जाना आसान नहीं होगा। उनमें से कुछ ये हैं: ब्रिक्स कनेक्ट्स को लागू करना: भारत की 2026 की ब्रिक्स अध्यक्षता की पहल ब्रिक्स कनेक्ट्स का उद्देश्य सदस्य देशों के नागरिकों को लाभ पहुँचाने को प्राथमिकता देना है। इसके मुख्य फ़ोकस एरिया में डिजिटल पेमेंट और फ़ाइनेंशियल इनक्लूज़न (वित्तीय समावेश) को बढ़ाना, एजुकेशनल डिग्री को आपसी मान्यता देना, सस्ता इंटरनेट और इंसानों पर केंद्रित ए आई, एक नया ब्रिक्स स्टार्टअप नॉलेज हब, और बेहतर ट्रेड कॉरिडोर शामिल हैं, जिनसे लॉजिस्टिक्स की लागत कम हो सकती है और सामान सस्ता हो सकता है। अंदरूनी सोच में विभिन्नता: यह ग्रुप एक जैसा ग्रुप नहीं है, जिससे आम सहमति बनाना मुश्किल हो जाता है। इसमें बहुत अलग-अलग जियोपॉलिटिकल सोच वाले देश हैं, जिनमें वे देश शामिल हैं जो पश्चिम का सक्रिय रूप से सामना कर रहे हैं (जैसे, रूस, ईरान) से लेकर वे देश भी शामिल हैं जो पश्चिमी देशों (जैसे, भारत, ब्राज़ील) के साथ मज़बूत स्ट्रेटेजिक और इकोनॉमिक संबंध बनाए हुए हैं। इंस्टीट्यूशनल एकता बनाम विस्तार: ब्रिक्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वह खुद को ज़्यादा बढ़ाए बिना अपनी बढ़ती जियोपॉलिटिकल अहमियत को ठोस इंस्टीट्यूशनल असर में बदले। तेज़ी से विस्तार से इस ग्रुप के बेकाबू होने और निर्णायक रूप से काम करने की इसकी क्षमता कम होने का खतरा है। अलग-अलग इकोनॉमिक प्राथमिकताएँ: फाइनेंशियल इंटीग्रेशन पर सदस्यों के अलग-अलग विचार हैं। जहां कुछ लोग वेस्ट से तेज़ी से फाइनेंशियल डीकपलिंग पर ज़ोर देते हैं, वहीं दूसरे प्रैक्टिकल इकोनॉमिक डेवलपमेंट को प्राथमिकता देते हैं और बड़े फाइनेंशियल बदलावों के नतीजों से डरते हैं। ब्रिक्स विरोधी कोशिशों और बातों पर ध्यान देना ब्रिक्स उस पश्चिमी नैरेटिव को बेअसर करने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहा है जिसके तहत इसे पश्चिम-विरोधी क्लब या एक विघटनकारी ताकत के तौर पर देखा जाता है। इन कोशिशों से निपटने के लिए यह कई रणनीतियाँ अपनाता है: इसे भी पढ़ें: सहयोग, समावेश और समाधान...BRICS में क्या खेला करने भारत आ रहे रूस, चीन और ईरान नैरेटिव को नए सिरे से पेश करना: 2026 में भारत की अध्यक्षता में नेतृत्व ने टकराव वाली छवि को स्पष्ट रूप से खारिज किया है। आधिकारिक राजनयिक रुख इस बात पर ज़ोर देता है कि ब्रिक्स पश्चिम-विरोधी नहीं है; यह संतुलन का पक्षधर है और ब्रिक्स देशों को G7-विरोधी नहीं बनना चाहिए, और G7 को ब्रिक्स -विरोधी नहीं बनना चाहिए। यह समूह खुद को स्वाभाविक रूप से विरोधी के बजाय गैर-पश्चिमी और सुधारवादी के तौर पर पेश करता है। डी-डॉलरलाइज़ेशन पर व्यावहारिक और क्रमिक दृष्टिकोण: गंभीर आर्थिक जवाबी कार्रवाई (जैसे टैरिफ की धमकियाँ) से बचने के लिए, ब्रिक्स ने डी-डॉलरलाइज़ेशन से जुड़ी अपनी बयानबाज़ी को नरम किया है। अमेरिकी डॉलर या ब्रिक्स की साझा मुद्रा को अचानक और पूरी तरह से बदलने के बजाय—जिसका भारत जैसे सदस्यों ने स्पष्ट रूप से विरोध किया है—यह समूह व्यावहारिक और क्रमिक बदलाव पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। इसमें स्थानीय मुद्रा में लेन-देन को बढ़ावा देना, द्विपक्षीय स्वैप समझौते और व्यापार के लिए डिजिटल मुद्रा के ढांचे की संभावनाओं को तलाशना शामिल है। समावेशी बहुपक्षवाद पर ध्यान: ब्रिक्स लगातार व्यापक UN सुधार, बहुपक्षीय व्यापार सुधार और समावेशी वैश्विक शासन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराता है। मौजूदा संस्थानों को पूरी तरह खत्म करने के बजाय उनमें सुधार की वकालत करके, ब्रिक्स कई उदारवादी देशों का समर्थन हासिल करता है। एक्सक्लूसिव ब्लॉक (सीमित समूह) की धारणा को कम करना: पार्टनर कंट्री मॉडल की शुरुआत रणनीतिक रूप से उन देशों को शामिल करती है जो अमेरिका के सहयोगी या साझेदार भी हैं (जैसे थाईलैंड, मलेशिया और कज़ाकिस्तान)। इससे पता चलता है कि ब्रिक्स के साथ जुड़ना पश्चिमी देशों के साथ संबंधों के खिलाफ़ नहीं है, जिससे इस समूह को राजनयिक रूप से अलग-थलग करने की कोशिशें कमज़ोर पड़ती हैं। निष्कर्ष 2026 में ब्रिक्स एक जटिल बदलाव के दौर से गुज़र रहा है। इसकी अहमियत 'ग्लोबल साउथ' को एक व्यवस्थित और संस्थागत आवाज़ देने की क्षमता में निहित है। भारत, जो 2012, 2016 और 2021 के बाद चौथी बार ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है, ने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय और व्यापारिक बुनियादी ढाँचे को मज़बूत करने के अपने प्रयासों को भी प्रदर्शित किया। लेकिन ब्रिक्स की दीर्घकालिक सफलता आंतरिक मतभेदों को सुलझाने, एन डी बी जैसे तंत्रों के माध्यम से ठोस आर्थिक लाभ पहुँचाने और एक व्यावहारिक व सुधार-उन्मुख रुख बनाए रखने पर निर्भर करेगी, जो ब्रिक्स को रोकने की कोशिशों को बेअसर कर सके। - प्रोफ़ेसर (डॉ.) डी.के. पांडेय विज़िटिंग सीनियर फ़ेलो, सेंटर फ़ॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज़, एडजंक्ट प्रोफ़ेसर, राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय, सलाहकार, एकेडमिक काउंसिल, फ़ॉरेन पॉलिसी स्कूल और GNOIT, पूर्व एसोसिएट डीन, SoB, गलगोटिया विश्वविद्यालय।
'आपको न्याय मिलेगा', गौरव गोगोई ने मणिपुर के म्यूजिशियन की हत्या पर जाहिर किया दुख
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वडोदरा में पीएम मोदी का जेन-जी को संदेश, बोले- देश का हर नौजवान 'सच की हुंकार' के साथ
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निवेश और निर्यात के दम पर वित्त वर्ष 2027 में 7 प्रतिशत का विकास
नई दिल्ली, एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय अर्थव्यवस्था वित्त वर्ष 2026-27 में भी मजबूती बनाए रख सकती है और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर 7 प्रतिशत से ऊपर रह सकती है, क्योंकि निवेश और निर्यात में तेजी अर्थव्यवस्था की प्रमुख विकास शक्ति बनकर उभर रहे हैं, जो खपत में संभावित नरमी और घरेलू नीतिगत प्रोत्साहन के घटते प्रभाव की भरपाई कर सकते हैं।
सहयोग, समावेश और समाधान...BRICS में क्या खेला करने भारत आ रहे रूस, चीन और ईरान
ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत के पास है। बहुत बड़ी बैठक इसी महीने नई दिल्ली में आयोजित होने वाली है। दुनिया की नजरें ब्रिक्स की बैठक पर है। 2026 में भारत ब्रिक्स की अध्यक्षता में बैठक कर रहा है, वो कहां करने वाला है? ये नई दिल्ली में भारत मंडपम में 12 13 सितंबर को ब्रिक्स देशों की बैठक होगी और इसके लिए पहले भी साल भर वर्किंग ग्रुप्स हैं, मंत्रियों स्तर की बैठक है, सीजीआई स्तर की बैठक है, बैंकिंग स्तर की बैठक है, एनएसए लेवल की बैठक है। ये सब कुछ पहले ही भारत में हो चुका है। और अब राष्ट्रीय अध्यक्षों के बीच यह बैठक 12 13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित होने वाली है। इसे भी पढ़ें: BRICS Summit 2026: अपनी Currency और Global Governance में सुधार का एजेंडा, New Delhi से PM Modi देंगे नया मंत्र ब्रिक्स क्या है? ब्रिक्स उभरते हुए बाजारों और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं वाले 11 प्रमुख देशों का एक ग्रुप है जिसमें ब्राजील, चीन, मिस्र, इथोपिया, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त अरब अमीरात है। ये जो ब्रिक्स है इसमें जो सबसे बड़ी बात है वो ये कि ये जो ग्लोबल और क्षेत्रीय मुद्दों के साथ ही अंतरराष्ट्रीय, राजनीतिक और आर्थिक गवर्नेंस से जुड़े मामलों पर लगातार बातचीत करता है। और सहयोग के लिए एक अहम मंच है और यही वजह है कि ब्रिक्स का जब भी नाम आता है तो अमेरिका की धड़कनें बढ़ जाती हैं। क्योंकि अमेरिका को लगता है कि ब्रिक्स के जरिए डॉलर को धराशाई करने का प्लान है और डॉलर को ठेंगा दिखा के अगर ब्रिक्स देश आपस में ही कोई अपनी करेंसी बना ले कोई अपना ट्रांजैक्शन सिस्टम बना ले तो अमेरिका को एक बड़ा झटका लग सकता है। इसे भी पढ़ें: BRICS Economic Partnership Strategy 2030: नई दिल्ली शिखर सम्मेलन से तय होगी भविष्य की ग्लोबल ट्रेड नीति, मजबूती और इनोवेशन' पर टिकी दुनिया की नजर ब्रिक्स की थीम क्या है? इसके लोगो में भारत के राष्ट्रीय फूल कमल है। इसके बीच में नमस्ते की मुद्रा है। इसे एक पब्लिक डिजाइन प्रतियोगिता के जरिए चुना गया। इसमें पंखुड़ियों में ब्रिक्स के सभी सदस्य देशों का रंग है जो इसकी आधिकारिक थीम से जुड़े हुए हैं। मजबूत इनोवेशन, सहयोग और सेंसबिलिटी का निर्माण। कौन-कौन संभावित रूप से इस बैठक में हिस्सा लेने के लिए आ सकता है इसमें जो सबसे पहला नाम है वो रूस के राष्ट्रपति व्लादमीर पुतिन का है जिनका आना लगभग तय माना जा रहा है। चीन के राष्ट्रपति शी जिजिंगपिंग के भी दौरे की जानकारी है कि वो भी इस दौरे पर आ सकते हैं। इसके अलावा ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजिशियान भी भारत में अपनी मौजूदगी दर्ज करा सकते हैं। यानी कि तीन अहम राष्ट्रपति भारत जो हैं वैश्विक नेता जो हैं वह भारत में ब्रिक्स की बैठक में हिस्सा लेने के लिए इस बार नई दिल्ली की यात्रा कर सकते हैं। यह बहुत महत्वपूर्ण शिखर सम्मेलन है। यह सम्मेलन ऐसे वक्त में हो रहा है जब मध्य पूर्व और यूरोप में जो है वो युद्ध के कारण भू राजनीतिक तनाव जो है वो अपने चरम पर है और अमेरिका को लेकर भी बहुत उथल-पुथल है। इसके अलावा माना जा रहा है कि अब जो है समूह का विस्तार जो है वो एशिया, अफ्रीका, मध्यपूर्व और लैटिन अमेरिका तक हो गया है। उम्मीद है कि इस पूरे ब्लॉक के नेता और वरिष्ठ प्रतिनिधि भी आपको एक साथ नजर आएंगे। सम्मेलन के लिए बताया जा रहा है कि नई दिल्ली आने वाले राष्ट्रीय अध्यक्षों में जो है दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा भी शामिल हो सकते हैं। मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल फतेह अलसीसी भी शामिल हो सकते हैं। बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर लुकाशेंको भी आ सकते हैं। कजाकिस्तान के राष्ट्रपति कासिम जोरमाट टोकयो भी और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रोबो सुबानतो भी शामिल हो सकते हैं। मान जानकारी यह भी है कि मलेशिया, थाईलैंड, इथोपिया के भी पीएम जो हैं वह इस शिखर सम्मेलन में शामिल हो सकते हैं। जबकि क्यूबा, नाइजीरिया, उज्बेकिस्तान का प्रतिनिधि जो है उनके राष्ट्रपतियों के द्वारा जो है वो किया जा सकता है। इसके अलावा माना जा रहा है कि कई अहम देशों के मंत्री जो हैं अह वो घरेलू व्यवस्थाओं में जो है लूला डिसिलवा शामिल नहीं हो पाएंगे।इसके अलावा युगांडा का प्रतिनिधित्व मंडल आएगा। वहीं वियतनाम के पीएम भी आ सकते हैं। और संयुक्त अरब अमीरात के प्रतिनिधि जो हैं वो अबू धाबी के क्राउंस प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन ज़द अल नहायन कर सकते हैं।
पीएम मोदी ने आलोचकों को फिर बताया 'नाराज फूफा जी', राहुल पर निशाना- 'झूठ की गूंज' को नकारें
पीएम मोदी ने वडोदरा में युवाओं से कहा कि वे कांग्रेस समेत विपक्षी दलों के 'झूठे दावों' के बहकावे में न आएं। राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि लोग 'झूठ की गूंज' के ज़रिए आपको गुमराह करने की कोशिश करेंगे, लेकिन युवा सच्चाई के साथ खड़े रहेंगे।
बांग्लादेश को दुश्मन खेमे में जाने से रोकने के लिए भारत तेजी से सक्रिय हो गया है। ढाका के संभावित रूप से सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान से जुड़े ‘मक्का ज्वाइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ जैसे सामूहिक सुरक्षा ढांचे में शामिल होने की खबरों ने नई दिल्ली की रणनीतिक चिंताएं बढ़ा दी हैं। भारत ने इस मुद्दे पर तीव्र बैकचैनल कूटनीति शुरू कर दी है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि आखिर बांग्लादेश की असली मंशा क्या है। इसी बीच भारत और बांग्लादेश के बीच वर्षों से बंद पड़ी यात्री रेल सेवाओं को फिर शुरू करने की कवायद भी तेज हो गई है। रिपोर्टों के मुताबिक, बांग्लादेश मक्का ज्वाइंट डिफेंस एग्रीमेंट में शामिल होने की संभावनाओं पर विचार कर रहा है। यह एक ऐसा पारस्परिक रक्षा ढांचा बताया जा रहा है, जिसमें सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान शामिल हैं। शेख हसीना सरकार के पतन के बाद बदले राजनीतिक माहौल में ढाका अपनी विदेश नीति को अधिक विविध बनाने की कोशिश कर रहा है। बांग्लादेशी रणनीतिक हलकों में संभावित सदस्यता को तुर्किये की सैन्य तकनीक, सऊदी अरब की आर्थिक सहायता और पाकिस्तान के साथ सुरक्षा सहयोग हासिल करने के अवसर के रूप में देखा जा रहा है। इसे व्यापक रूप से ‘मुस्लिम फैमिली’ के ढांचे में कूटनीतिक सहयोग बढ़ाने की कोशिश के तौर पर पेश किया जा रहा है। इसे भी पढ़ें: Makkah Defence Pact आग नहीं, धुआं निकला, Modi की Diplomacy ने बिगाड़ दिया Pakistan का खेल लेकिन नई दिल्ली की नजर से तस्वीर कहीं अधिक गंभीर है। भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि पाकिस्तान से जुड़े किसी सामूहिक रक्षा ढांचे का विस्तार सीधे उसके पूर्वी मोर्चे तक हो सकता है। यदि बांग्लादेश औपचारिक रूप से ऐसे किसी सैन्य समझौते में शामिल होता है, तो भारत के आसपास एक नए सामरिक समीकरण का निर्माण हो सकता है। बंगाल की खाड़ी तक फैला सामूहिक सुरक्षा ढांचा भारत की रणनीतिक गणनाओं को बदल सकता है। हम आपको बता दें कि भारत और बांग्लादेश के बीच करीब 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा है। ऐसे में पूर्वी सीमा पर किसी नए सुरक्षा गठबंधन की मौजूदगी नई दिल्ली के लिए साधारण कूटनीतिक घटनाक्रम नहीं होगी। भारत को अपने पड़ोस को केवल द्विपक्षीय रिश्तों के नजरिये से नहीं, बल्कि एक संभावित मल्टी-फ्रंट सिक्योरिटी थिएटर के रूप में देखना पड़ सकता है। यही वजह है कि भारतीय बैकचैनल यह टटोलने में जुटे हैं कि ढाका वास्तव में कोई बाध्यकारी सैन्य प्रतिबद्धता चाहता है या फिर इस तरह की संभावनाओं का इस्तेमाल भारत समेत अन्य शक्तियों से कूटनीतिक लाभ लेने के लिए कर रहा है। इसी रणनीतिक तनाव के बीच भारत-बांग्लादेश संबंधों में एक सकारात्मक संकेत भी उभर रहा है। दोनों देश बंद पड़ी यात्री ट्रेन सेवाओं को फिर शुरू करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। ढाका में आज से दोनों देशों के रेलवे अधिकारियों की बैठक शुरू हुई है, जिसमें मैत्री, बंधन और मिताली एक्सप्रेस को दोबारा पटरी पर लाने पर चर्चा हो रही है। बांग्लादेश रेलवे के अतिरिक्त महानिदेशक (ऑपरेशंस) मोहम्मद नजमुल इस्लाम के अनुसार, दोनों देशों के बीच यात्री रेल संपर्क अगस्त 2024 के बाद से बंद है, जबकि मालगाड़ियां बिना किसी बाधा के लगातार चलती रही हैं। मैत्री एक्सप्रेस ढाका कैंटोनमेंट और कोलकाता के बीच चलती थी, बंधन एक्सप्रेस खुलना और कोलकाता को जोड़ती थी, जबकि मिताली एक्सप्रेस ढाका कैंटोनमेंट से न्यू जलपाईगुड़ी तक संचालित होती थी। इन सेवाओं को जुलाई 2024 में आधिकारिक रूप से निलंबित किया गया था। इसके बाद देशव्यापी अशांति, शेख हसीना सरकार के पतन और 5 अगस्त 2024 को उनके भारत जाने के बाद दोनों देशों के रिश्तों में तनाव बढ़ गया। नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम व्यवस्था के दौरान शेख हसीना की भारत में मौजूदगी और उनके प्रत्यर्पण की मांग जैसे मुद्दों ने संबंधों में खटास पैदा की। हालांकि, बांग्लादेश में 22 फरवरी 2026 को हुए आम चुनाव के बाद एक नया राजनीतिक अध्याय शुरू हुआ। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की जीत के बाद तारिक रहमान के नेतृत्व में नई सरकार बनी और अब दोनों देशों के बीच सामान्य रिश्तों की बहाली की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा महसूस की जा रही है। वर्तमान अंतर-सरकारी रेलवे बैठक यानी IGRM में केवल ट्रेनों को शुरू करने पर ही नहीं, बल्कि वित्तीय हिसाब-किताब, सीमा पार ट्रेन परिचालन, वार्षिक लेखा संतुलन, परिचालन क्षमता, रोलिंग स्टॉक और रेलवे ढांचे के विकास जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हो रही है। बांग्लादेश की योजना राजशाही से कोलकाता के लिए एक नई ट्रेन शुरू करने की भी है। साथ ही, मैत्री एक्सप्रेस को जमुना ब्रिज के बजाय पद्मा ब्रिज के रास्ते चलाने का प्रस्ताव भी सामने आ सकता है। भारत द्वारा 27 जून से बांग्लादेशी नागरिकों के लिए पर्यटक वीजा फिर शुरू किए जाने के बाद आम लोगों के बीच भी रेल सेवाओं की बहाली की मांग तेज हुई है। भारतीय उच्चायुक्त ने भी दोनों देशों के बीच ‘पीपुल-टू-पीपुल रिलेशन’ को बेहद अहम बताया है। दरअसल, यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है। एक तरफ भारत बांग्लादेश के संभावित नए सैन्य समीकरणों को लेकर सतर्क है, दूसरी तरफ वह रेल, वीजा, व्यापार और जनसंपर्क के जरिए रिश्तों को सामान्य बनाने की कोशिश कर रहा है। नई दिल्ली समझती है कि अगर ढाका रणनीतिक रूप से दूर गया, तो भारत की पूर्वी सुरक्षा चुनौती स्थायी रूप से बदल सकती है। इसलिए कूटनीति अब सिर्फ दोस्ती बचाने की नहीं, बल्कि बांग्लादेश को किसी संभावित दुश्मन खेमे की ओर झुकने से रोकने की रणनीतिक लड़ाई बन चुकी है। -नीरज कुमार दुबे
Makkah Defence Pact आग नहीं, धुआं निकला, Modi की Diplomacy ने बिगाड़ दिया Pakistan का खेल
तुर्किये, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए मक्का ज्वाइंट डिफेंस एग्रीमेंट की चर्चा पूरी दुनिया में हुई। मक्का पैक्ट पर हस्ताक्षर करने वाले तीनों देशों ने इसको लेकर ऐसी ऐसी बातें कहीं जिससे रक्षा रणनीति के क्षेत्र में इस समझौते की खबर आग की तरह फैल गयी। लेकिन जैसे जैसे समझौते के बिंदु सामने आने लगे वैसे वैसे दुनिया को समझ आ गया कि यहां आग से ज्यादा धुआं है। हम आपको बता दें कि बड़े-बड़े दावों और सामूहिक सुरक्षा के संदेश के बावजूद इस समझौते की सैन्य क्षमता और वास्तविक प्रभाव को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं। इसी बीच इस पैक्ट के पैकेट की हवा पूरी तरह निकालने के लिए मोदी सरकार की कूटनीति भी तेज हो गई है। भारत साफ तौर पर यह सुनिश्चित करने में जुटा है कि पाकिस्तान इस समझौते का इस्तेमाल भारत के खिलाफ कोई रणनीतिक दबाव बनाने के लिए नहीं कर सके। देखा जाये तो शुरुआत में ऐसा लगा था कि मक्का पैक्ट एक ऐसा भू-राजनीतिक प्रयोग बनकर उभर रहा है, जिसके तार पश्चिम एशिया से लेकर दक्षिण एशिया और संभवतः बंगाल की खाड़ी तक फैल सकते हैं। समझौते का मूल संदेश यह था कि तीनों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला, तीनों पर हमला माना जाएगा। लेकिन इस घोषणा के पीछे जितनी बड़ी सामरिक महत्वाकांक्षा है, उतनी ही गहरी अस्पष्टता भी है। इसी अस्पष्टता में पाकिस्तान की सबसे बड़ी उम्मीद छिपी है और भारत के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक सवाल भी है। सवाल यह है कि क्या यह वास्तव में एक नया “इस्लामिक नाटो” बनने जा रहा है, या फिर यह राजनीतिक संदेश, सामरिक दबाव और प्रतिरोधक क्षमता का एक बड़ा लेकिन सीमित प्रयोग भर है? इसे भी पढ़ें: Mecca Defence Alliance की पहली बैठक में हुए बड़े फैसले, Pakistan को मिली अहम जिम्मेदारी, भारत पर इसका क्या होगा असर? देखा जाये तो मक्का समझौते की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी भौगोलिक और सामरिक असंगति है। पाकिस्तान न तो पश्चिम एशिया का हिस्सा है और न ही खाड़ी क्षेत्र का। तुर्किये की सुरक्षा चिंताएं सीरिया, इराक, कुर्द उग्रवाद, शरणार्थियों और अपनी दक्षिणी सीमाओं से जुड़ी हैं। सऊदी अरब के सामने ईरान, यमन के हूती और क्षेत्रीय अस्थिरता की चुनौतियां हैं। पाकिस्तान की प्राथमिक चुनौती बिल्कुल अलग है। ऐसे में सवाल उठता है कि तीनों देशों की साझा “दुश्मन की परिभाषा” आखिर क्या है? यही कारण है कि इस समझौते को एक मजबूत सैन्य गठबंधन की बजाय फिलहाल स्ट्रैटेजिक सिग्नलिंग और डिटरेंस का प्रयोग कहना अधिक उचित होगा। यहां इतिहास भी कई सवाल खड़े करता है। 2015 में हूती हमलों के दौरान पाकिस्तान ने सऊदी अरब की रक्षा के लिए सीधे सैन्य हस्तक्षेप से दूरी बनाई थी। 2019 में अबकैक और खुरैस के ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमले के समय भी कोई स्वचालित पाकिस्तानी सैन्य प्रतिक्रिया नहीं हुई। दूसरी तरफ, जब पाकिस्तान और तालिबान के बीच सीमा तनाव हुआ, तब सऊदी अरब ने पाकिस्तान को सैन्य सहायता नहीं दी। ऐसे में स्वाभाविक सवाल है कि जब पुराने द्विपक्षीय समझौते संकट के समय सीधे सैन्य कार्रवाई में नहीं बदले, तो नया त्रिपक्षीय समझौता वास्तव में कितना असरदार साबित होगा? लेकिन भारत के लिए खतरे का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि तुर्किये या सऊदी अरब वास्तव में पाकिस्तान के लिए युद्ध लड़ेंगे या नहीं? सामरिक गारंटी युद्ध शुरू होने से पहले ही राजनीतिक व्यवहार बदल देती है। पाकिस्तान को यह संदेश मिल सकता है कि उसके पीछे अब एक व्यापक सुरक्षा ढांचा खड़ा है। खासकर तब, जब तुर्किये लगातार पाकिस्तान का राजनीतिक और सैन्य समर्थन करता रहा है, जिसमें ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी उसका रुख भारत के खिलाफ स्पष्ट था। यही नहीं, 31 अगस्त को इस्तांबुल में हुई बैठक में इस समझौते को और मजबूत बनाने पर भी चर्चा हुई। इसमें एक स्थायी सचिवालय बनाने, सैन्य सहयोग बढ़ाने, रक्षा उद्योग में साझेदारी करने और मिलकर रक्षा उपकरण तैयार करने की बात हुई। रियाद में सचिवालय बनाने और शुरुआती वर्षों में पाकिस्तानी महासचिव नियुक्त करने की योजना से साफ है कि इस समझौते को एक स्थायी और संगठित ढांचा देने की कोशिश की जा रही है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार की सऊदी अरब, तुर्किये और मिस्र के विदेश मंत्रियों से हालिया बातचीत भी बताती है कि इस दिशा में कूटनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। अब सबसे संवेदनशील मोर्चा है बांग्लादेश। यदि ढाका इस समझौते में शामिल होता है, तो मामला भारत के लिए पश्चिमी सीमा तक सीमित नहीं रहेगा। पाकिस्तान से जुड़ा एक सामूहिक रक्षा ढांचा भारत की पूर्वी सीमा और बंगाल की खाड़ी तक पहुंच सकता है। भारत की 4096 किलोमीटर लंबी पूर्वी सीमा के संदर्भ में यह रणनीतिक समीकरण बदल सकता है। यही कारण है कि नई दिल्ली कथित रूप से बैकचैनल कूटनीति के जरिए ढाका की वास्तविक मंशा टटोल रही है कि क्या बांग्लादेश वास्तव में सैन्य प्रतिबद्धता चाहता है या इस मंच का उपयोग केवल कूटनीतिक और आर्थिक लाभ के लिए कर रहा है? यहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की असली ताकत सामने आती है। भारत किसी एक खेमे में बंद देश नहीं है। वह SCO में चीन और पाकिस्तान के साथ बैठता है, अमेरिका, फ्रांस और इजरायल के साथ गहरे सुरक्षा संबंध रखता है और अमेरिका, जापान तथा ऑस्ट्रेलिया के साथ क्वॉड का सदस्य है। भारत की नीति साफ है। हर मंच पर मौजूद रहो, लेकिन किसी की रणनीतिक कैद में मत जाओ। इसके अलावा, तुर्किये के SCO में पूर्ण सदस्य बनने की महत्वाकांक्षा के बीच भारत के पास 'सहमति' नामक एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक हथियार है। दरअसल, SCO में किसी नए देश को सदस्य बनाने के लिए मौजूदा सदस्य देशों की सहमति जरूरी होती है। ऐसे में भारत का रुख साफ है। अगर तुर्किये NATO, मक्का समझौते और SCO, तीनों का हिस्सा बनना चाहता है, तो उसे यह भरोसा देना होगा कि पाकिस्तान के साथ उसका रक्षा समझौता SCO के भीतर भारत के खिलाफ किसी दबाव या रणनीतिक फायदा उठाने का माध्यम नहीं बनेगा। माना जा रहा है कि भारत को तुर्किये से तीन स्पष्ट आश्वासन चाहिए। एक तो पाकिस्तान को तुर्किये के जरिए SCO में अप्रत्यक्ष प्रभाव नहीं मिलेगा। साथ ही SCO की सदस्यता किसी बाहरी रक्षा प्रतिबद्धता का विस्तार नहीं बनेगी और भारत-पाकिस्तान संकट में तुर्किये की संस्थागत स्थिति मक्का समझौते का हथियार नहीं बनेगी। इसके अलावा, सऊदी अरब के मामले में भी भारत को भावनाओं नहीं बल्कि हितों के आधार पर चलना होगा। ऊर्जा, निवेश और IMEC जैसे संबंध महत्वपूर्ण हैं, लेकिन यदि रियाद पाकिस्तान के साथ नई सुरक्षा प्रतिबद्धता जोड़ता है तो भारत को अपनी ऊर्जा आपूर्ति, निवेश और रणनीतिक साझेदारियों में विविधता बढ़ानी होगी। देखा जाए तो मक्का पैक्ट को लेकर भारत को डरने की नहीं, बल्कि सतर्क और तैयार रहने की जरूरत है। पाकिस्तान को किसी दूसरे देश का समर्थन मिलने से उसे भारत के खिलाफ खुली छूट नहीं मिल जाएगी। भारत की जवाबी कार्रवाई की नीति अब स्पष्ट है और सीमा पार आतंकवाद का जवाब देने की उसकी क्षमता किसी नए रक्षा समझौते से कम नहीं होगी। मक्का समझौते की सबसे बड़ी ताकत उसका राजनीतिक प्रतीकवाद है और सबसे बड़ी कमजोरी उसकी अस्पष्टता है। लेकिन भारत की ताकत यह है कि नई दिल्ली केवल युद्धक्षेत्र में नहीं, कूटनीतिक गलियारों में भी लड़ना जानती है। बहरहाल, अंकारा अपने गठबंधन चुन सकता है, रियाद अपनी प्राथमिकताएं तय कर सकता है और पाकिस्तान नई ढाल तलाश सकता है, लेकिन भारत अपनी संप्रभुता और रणनीतिक हितों से कोई समझौता नहीं करेगा। मोदी की कूटनीति का स्पष्ट संदेश है कि भारत किसी भी गठबंधन से न डरता है, न दबाव में आता है; लेकिन जो भी गठबंधन भारत के हितों को चुनौती देगा, उसे कूटनीति से लेकर रणनीतिक मोर्चे तक भारत के मजबूत जवाब का सामना करना होगा। -नीरज कुमार दुबे
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समझिए, आखिर कैसे संभव हुई इसरो की सफलता-दर-सफलता वाली उपलब्धि?
जन्माष्टमी की शुभ घड़ी यानी 4 सितंबर 2026 की रात जब श्रीहरिकोटा से GSLV-F17 ने उड़ान भरी और EOS-05 को निर्धारित कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया, तब यह केवल एक और रॉकेट लॉन्च नहीं था, बल्कि यह भारत की चार दशक से अधिक पुरानी अंतरिक्ष-यात्रा में तकनीकी परिपक्वता, संस्थागत अनुशासन और असफलताओं से सीखने की वैज्ञानिक संस्कृति का एक महत्वपूर्ण प्रमाण था। इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (ISRO) के आधिकारिक रिकॉर्ड में GSLV-F17/EOS-05 को 4 सितंबर 2026 के सफल मिशन के रूप में दर्ज किया गया है। हालांकि, इस सफलता का मूल्यांकन केवल राष्ट्रवादी उत्साह से करना वैज्ञानिक दृष्टि से अधूरा होगा। असली सवाल यह है— आखिर ISRO बार-बार कठिन अंतरिक्ष अभियानों को सफल बनाने की क्षमता कैसे विकसित कर पाया? इसका सटीक उत्तर किसी एक प्रतिभाशाली वैज्ञानिक, किसी एक सरकार या किसी एक तकनीक में नहीं है। वास्तव में इसका शानदार उत्तर है— सतत संस्थागत learning system, जिसको इस प्रकार समझा जा सकता है:- इसे भी पढ़ें: ISRO को कमजोर करने की साजिश हो रही या भारत को Space Superpower बनने की रणनीति पर काम चल रहा? पहला, ISRO की पहली ताकत— असफलता को अपराध नहीं, Data मानना: अंतरिक्ष विज्ञान में असफलता असामान्य नहीं है। दुनिया की सबसे बड़ी अंतरिक्ष एजेंसियां भी मिशन खोती रही हैं। ISRO भी इससे अछूता नहीं रहा। PSLV-C61/EOS-09 मिशन मई 2025 में पूरा नहीं हो सका। GSLV-F15/NVS-02 मिशन में भी उपग्रह को निर्धारित operational orbit तक पहुंचाने में समस्या आई। बावजूद इसके, ISRO के आधिकारिक launch record में इन घटनाओं को दर्ज किया गया है। महत्वपूर्ण यह है कि ISRO असफलता के बाद उसे छिपाने के बजाय failure analysis करता है। उदाहरण के लिए 2021 के GSLV-F10 मिशन की विफलता के बाद क्रायोजेनिक upper stage की anomaly की जांच के लिए विशेषज्ञों की Failure Analysis Committee गठित की गई थी। यही वैज्ञानिक संस्कृति किसी भी aerospace organisation की असली पूंजी होती है। Failure, फिर Analysis, फिर Modification, फिर Testing, फिर Reflight- यह चक्र जितनी तेजी और ईमानदारी से चलता है, उतनी ही तेजी से reliability बढ़ती है। दूसरा, GSLV-F17 की सफलता इसलिए महत्वपूर्ण है कि GSLV साधारण rocket नहीं है: ISRO के अनुसार GSLV तीन-stage vehicle है जिसमें solid, liquid और cryogenic upper stage शामिल हैं और इसे लगभग 2,000 किलोग्राम वर्ग के spacecraft को Geosynchronous Transfer Orbit में पहुंचाने के लिए डिजाइन किया गया है। क्रायोजेनिक तकनीक किसी भी अंतरिक्ष कार्यक्रम की अत्यंत कठिन तकनीकी क्षमताओं में से एक है। Liquid hydrogen और liquid oxygen को अत्यंत निम्न तापमान पर संभालना, turbopumps को नियंत्रित करना, combustion stability बनाए रखना और सही समय पर thrust उपलब्ध कराना—ये सभी अत्यधिक जटिल engineering challenges हैं। इसलिए GSLV की सफलता को केवल “rocket चला और satellite पहुंच गया” के स्तर पर देखना तकनीकी उपलब्धि को छोटा करना होगा। तीसरा, असली सफलता—Precision: अंतरिक्ष में “पास-पास” भी असफलता हो सकती है। रॉकेट को satellite को केवल अंतरिक्ष में नहीं पहुंचाना होता। उसे निर्धारित velocity, direction और orbital parameters के साथ पहुंचाना होता है। इसमें Guidance, Navigation and Control प्रणाली की भूमिका निर्णायक होती है। Inertial sensors, gyroscopes, accelerometers, onboard computers, telemetry और ground tracking systems लगातार vehicle की स्थिति और गति का अनुमान लगाते हैं। फिर flight-control system trajectory को नियंत्रित करता है। यानी रॉकेट का हर सेकंड गणित है। एक छोटी velocity error भविष्य में satellite के fuel budget को प्रभावित कर सकती है। यही कारण है कि GSLV-F17 जैसी सफलता वास्तव में हजारों calculations और लाखों engineering decisions की अंतिम अभिव्यक्ति होती है। चौथा, ISRO की सबसे बड़ी ताकत—System Engineering: ISRO की उपलब्धि को केवल rocket technology के रूप में देखना गलत होगा। एक अंतरिक्ष मिशन वास्तव में कई प्रणालियों का एक साथ काम करना है— Propulsion और Avionics और Software और Navigation और Telemetry और Communication और Satellite और Ground Station और Mission Control. इनमें से कोई एक critical subsystem विफल हुआ तो पूरा मिशन खतरे में पड़ सकता है। ISRO ने दशकों में इन प्रणालियों को अलग-अलग विकसित करने के बजाय एक integrated engineering ecosystem में विकसित किया है। यही उसकी institutional strength है। पांचवां, NASA से तुलना- संसाधन बनाम engineering culture: NASA के पास ISRO की तुलना में कहीं अधिक वित्तीय संसाधन, विशाल industrial ecosystem और private-sector partnerships हैं। NASA का मॉडल high-end science, deep-space exploration और अत्यंत जटिल वैज्ञानिक missions पर केंद्रित है। लेकिन ISRO की ताकत अलग है। भारत ने सीमित संसाधनों के भीतर high reliability और mission utility को प्राथमिकता दी। NASA जहां अत्यंत महंगे और technologically ambitious missions कर सकता है, ISRO ने comparatively frugal architecture के माध्यम से ऐसे missions विकसित किए जिनका प्रत्यक्ष उपयोग मौसम, संचार, navigation, agriculture, disaster management और Earth observation में होता है। यह तुलना “कौन बेहतर है?” की नहीं होनी चाहिए। यह दो अलग engineering philosophies की तुलना है। छठा, SpaceX से तुलना: यहां ISRO को सीखना भी होगा: SpaceX ने launch economics को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। Reusable rockets, rapid launch cadence, vertically integrated manufacturing और aggressive testing ने space-launch industry की पारंपरिक सोच को चुनौती दी है। ISRO की ताकत reliability और cost efficiency में रही है, लेकिन आने वाले दशक में उसके सामने बड़ा प्रश्न होगा— क्या वह केवल सफल launches करेगा या launches को mass-scale commercial service में बदल पाएगा? SpaceX की असली चुनौती यही है। भविष्य में भारत को केवल “कम लागत में satellite launch करने वाला देश” नहीं रहना चाहिए। उसे— Reusable Launch Vehicle और Rapid Turnaround और Private Space Industry और High Launch Frequency की दिशा में तेजी से बढ़ना होगा। सातवां, चीन से तुलना- भारत की अगली चुनौती: China ने अंतरिक्ष कार्यक्रम को राष्ट्रीय शक्ति के एक व्यापक instrument में बदल दिया है। उसका space programme launch vehicles, navigation, lunar exploration, space station, Earth observation और military space capabilities तक फैला हुआ है। भारत के लिए चीन की चुनौती केवल rocket technology नहीं है। चुनौती है—Scale। भारत को अब यह सोचना होगा कि क्या उसका space ecosystem अगले 10–20 वर्षों में चीन जैसी industrial scale हासिल कर सकता है? ISRO अकेले इसका उत्तर नहीं दे सकता। इसके लिए private companies, universities, semiconductor industry, materials science, propulsion companies और venture capital ecosystem को साथ आना होगा। आठवां, EOS-05 का महत्व—Space से Earth तक: EOS-05 की सफलता का एक बड़ा संदेश यह है कि space technology का अंतिम लक्ष्य केवल अंतरिक्ष में पहुंचना नहीं है। Earth observation का मतलब है- कृषि निगरानी, आपदा प्रबंधन, शहरी नियोजन, infrastructure monitoring, मौसम और पर्यावरण अध्ययन तथा रणनीतिक applications, यानी satellite की सफलता तभी पूर्ण मानी जाएगी जब उसका data जमीन पर decision-making को बेहतर बनाए। इसीलिए अंतरिक्ष कार्यक्रम को केवल launch statistics से मापना गलत होगा। असली सवाल है— एक सफल launch से भारत की जमीन पर कितनी नई क्षमता पैदा हुई? नौवां, ISRO का सबसे बड़ा competitive advantage—Frugal Engineering: ISRO की “कम लागत” वाली छवि अक्सर गलत तरीके से प्रस्तुत होती है। Frugal engineering का अर्थ घटिया engineering नहीं है। इसका अर्थ है—कम संसाधनों में अधिकतम engineering value। Proven technology का इस्तेमाल, indigenous components, modular architecture, extensive testing और mission objectives की स्पष्ट प्राथमिकता—इन सबने भारतीय space programme को टिकाऊ बनाया। लेकिन अब भारत को frugal engineering के अगले चरण में जाना होगा: Frugal Engineering से Scalable Engineering की ओर, यानी कम लागत के साथ बड़ी संख्या में उत्पादन और launches की क्षमता की ओर। दसवां,. सबसे महत्वपूर्ण पूंजी—Institutional Memory: ISRO की सफलता का शायद सबसे कम चर्चित कारण है institutional memory। एक वैज्ञानिक retire हो जाता है। लेकिन उसका अनुभव organisation में बना रहता है। एक mission समाप्त होता है। लेकिन उसका telemetry data अगली generation के engineers के काम आता है। एक failure होता है। लेकिन उसकी failure report अगली design review का हिस्सा बनती है। यही कारण है कि चार दशक पुरानी engineering knowledge आज के missions में दिखाई देती है। यह किसी भी देश के वैज्ञानिक संस्थान की सबसे मूल्यवान संपत्ति है। ग्यारहवां, ISRO को अब अपनी अगली परीक्षा के लिए तैयार होना होगा: GSLV-F17 की सफलता पर गर्व स्वाभाविक है। लेकिन अंतरिक्ष दौड़ अब बदल चुकी है। अगले दशक में केवल successful launches पर्याप्त नहीं होंगे। भारत को पांच मोर्चों पर आगे बढ़ना होगा— पहला—Reusable Launch Vehicles: Launch cost घटाने के लिए reusability निर्णायक होगी। दूसरा—Private Space Industry: ISRO को हर काम खुद करने वाली संस्था के बजाय technology enabler और national space architect बनना होगा। तीसरा—Semiconductor और advanced materials: Space technology की आत्मनिर्भरता केवल rocket engine से नहीं होगी। चौथा—Human Spaceflight: Gaganyaan भारत की engineering ecosystem की अगली बड़ी परीक्षा है। पांचवां—Deep Space Exploration: चंद्रमा, मंगल और आगे के missions भारत की scientific ambition का वास्तविक पैमाना तय करेंगे। वस्तुतः, ISRO की असली उपलब्धि rocket नहीं, scientific culture है। GSLV-F17/EOS-05 की सफलता को देखकर भारत को केवल यह नहीं कहना चाहिए कि— “हमने एक और rocket सफलतापूर्वक launch कर दिया।” सही निष्कर्ष इससे बड़ा है। भारत ने एक ऐसा scientific institution बनाया है जो—असफल होता है, असफलता का विश्लेषण करता है, अपनी तकनीक सुधारता है, फिर उड़ान भरता है और अगली बार अधिक परिपक्व होकर लौटता है। यही वैज्ञानिक सभ्यता की पहचान है। गौर कीजिए, जहां NASA की ताकत उसका विशाल scientific ecosystem है। वहीं SpaceX की ताकत उसकी disruptive commercial engineering है। जहां चीन की ताकत उसका scale और state-backed industrial mobilisation है। और ISRO की ऐतिहासिक ताकत रही है—सीमित संसाधनों में विश्वसनीय, स्वदेशी और उपयोगी अंतरिक्ष तकनीक विकसित करने की क्षमता। लेकिन 21वीं सदी के दूसरे चरण में भारत के सामने सवाल बदल चुका है। अब सवाल यह नहीं है कि— “क्या भारत अंतरिक्ष में पहुंच सकता है?” वह साबित हो चुका है। अब सवाल है— क्या भारत अंतरिक्ष में ऐसी स्थायी वैज्ञानिक-औद्योगिक शक्ति बन सकता है जो NASA जैसी research depth, SpaceX जैसी commercial speed और चीन जैसा scale—तीनों से सीखकर अपनी स्वतंत्र भारतीय space architecture तैयार कर सके? सच कहूं तो GSLV-F17/EOS-05 की सफलता उस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, मंजिल नहीं। और शायद यही इस उपलब्धि का सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक मूल्यांकन है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
बच्चों की मौत का जिम्मेदार कौन?
मानवीय हिमाकतों के चलते दिल्ली में और एक बड़ी दर्दनाक घटना घट गई। सत्य निकेतन के मोतीनगर स्थिति एक सालों पुरानी जर्जर हालत की बिल्डिंग मौत बनकर रिमझिम बारिश में भरभराकर गिर पड़ी। घटना की सूचना पाकर पहुंचे बच्चों के परिजनों की चीखें कलेजा फाड़ रही हैं। परिजन बिलख रहे हैं,मांए बदहवास और बेसुध हैं। स्थानीय पुलिस और हुकुमती अधिकारियों का घटनास्थल पर जमघट लगा है। राहत-बचाव कार्य जारी है। घायल बच्चे एम्स के ट्रामा सेंटर भिजवाए जा रहे हैं। लेकिन वहां से कुछ बच्चों के ना रहने की सूचनाएं हर किसी को झकझोर रही हैं। बिल्डिंग में रहने वाले बच्चे तकरीबन बाहरी प्रदेशों के थे। वह अपना उज्जवल भविष्य बनाने की चाह लेकर शिक्षा ग्रहण करने पहुंचे थे। पर, उन्हें क्या पता हादसों का रूप ले चुकी दिल्ली उनकी जान लील लेगी। पढ़ने वाले बच्चों के साथ दिल्ली में आए दिन कोई न कोई हादसा होता ही रहता है। राजेंद्र नगर स्थिति कोचिंग सेंटर की बेसमेंट में पानी भरने से हुई बच्चों की मौत को शायद ही कोई भूल पाया हो। मुखर्जी नगर की कोचिंग सेंटर में आग लगने की घटना को याद करके भी रोंगटे खड़े होते हैं। इस तरह की प्रत्येक घटनाओं पर जिम्मेदार अधिकारियों और नेताओं का हमेशा से एक ही बयान होता है। दोषी बख्शे नहीं जाएंगे, सख्त कार्रवाई होगी? इसके अलावा मृतकों के परिजनों को मुआवजा और घायलों की इलाज कराकर मामला रफा-दफा कर दिया जाता है और जब तक मीडिया में घटना की चर्चाएं होंगी, कार्रवाई के नाम पर सरकारी डंडा पीटा जाता रहेगा। शोर जैसे ही शांत होगा। जांच-पड़ताल ठंडे बस्ते में चली जाएंगी। जमीदोज हुई बिल्डिंग में ज्यादातर विश्वविधायल में पढ़ने वाले और सिविल सर्विसेज की तैयारी करने वाले मात्र 20-22 आयु के बच्चे रहते थे। मालिक ने बिल्डिंग को करीब 30 सालों से पीजी के लिए किसी अन्य को किराए पर दिया हुआ था। बिल्डिंग मानकों के एकदम विरुद्ध निर्मित हुई थी। क्षेत्रफल मात्र 55 गज का था जिसमें 30 कमरे बना रखे थे। बिल्डिंग 40 से 45 साल पुरानी बताई जाती है। जबकि, देखने में इससे भी कहीं पुरानी लगती थी। मालिक पर मुकदमा हुआ है। एकाध महीने बाद उसे जमानत मिल जाएगी। उसी जगह पर फिर से दूसरी बिल्डिंग तान दी जाएगी। इसे भी पढ़ें: दिल्ली में किस बात से बेबस 'ट्रिपल इंजन' सरकार? Satya Niketan हादसे पर Rahul Gandhi का BJP पर वार दिल्ली विश्वविद्यालय क्षेत्र में बने पीजी को लेकर ‘इंडियन जियोटेक्निकल काॅन्फ्रेस’ ने कुछ वर्ष पहले एक रिसर्च किया था जिसमें पाया था कि 85 फीसदी पीजी बच्चों के रहने के लायक नहीं हैं। इस तरह की रिसर्च रिपोर्ट को भी हुकूमतों ने दरकिनार किया। हादसे का शिकार हुई बिल्डिंग के निर्माण में घोर मानवीय हिमाकत का तांडव किया गया था। दिल्ली नगर निगम से लेकर, पुलिस, फायर ब्रिगेड और सरकार के अधिकारियों ने घूस खाया। घटनास्थल साउथ दिल्ली का सत्य निकेतन क्षेत्र है जिसे डूब या निचला-धरातल क्षेत्र भी कहते हैं। वहां बिल्डिंग बनाने की मात्र ढाई मंजिला इजाजत होती है। पर, अधिकारियों ने घूस खाकर पांच मंजिला तक बनवा दिया। दिल दहला देने वाले हादसे को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि बिल्डिंग में अवैध निर्माण होता रहा और जिम्मेदार लोग आंख मूंदकर तमाशबीन बने रहे। इतना ही नहीं, करीब 40 साल पुरानी इस बिल्डिंग में बारिश के दौरान हर साल बेसमेंट जलमग्न हो जाता था, जिससे इसकी नींव कमजोर होती गई और इस साल बजन नहीं सहन कर पाई जिससे भराभरकर ढह गई। हादसे की जिम्मेदारी शायद ही कोई ले? क्योंकि ऐसे हादसे दिल्ली में समय-समय पर होते रहे हैं। कुछ महीनों पहले ही एक अवैध होटल में आग लगने से विदेशी सहित कई लोग जलकर खाक हुए थे। बिल्डिंगों का गिरना तो दिल्ली में आम हो चुका है। दिल्ली में अवैध कॉलोनियों की भरमार है। कहने को तो अवैध हैं लेकिन अधिकारी घूस लेकर उसे चंद मिनटों में वैध कर देते हैं। दिल्ली में इस समय करीब 1731 अवैध काॅलोनियां और 650 से लेकर 675 झुग्गी झोपड़ियां हैं जिनमें ज्यादातर किराएदार ही रहते हैं। दिल्ली ऐसा शहर है जहां देश के सभी प्रांतों के लोग रोजी रोटी कमाने आते हैं। शिक्षा का हब भी दिल्ली है। जहां सिविल सेवा की तैयारियां करने बच्चे दूर-दराज से पहुंचते हैं। 5 लाख बच्चे सालाना सिविल सर्विसेज परीक्षा की तैयारी करने दिल्ली के मुखर्जी नगर आते हैं, रहने के लिए उन्हें पीजी चाहिए होता है। ऐसे में बच्चे सस्ता पीजी खोजते हैं, लेकिन उन्हें क्या पता सस्ता घर उनकी जान ले लेगा? वहीं, करीब 15 लाख बच्चे अन्य प्रदेशों के दिल्ली के विभिन्न कॉलेजों में अध्ययनरत हैं। जहां हादसा हुआ, उस इलाके में तकरीबन घर पीजी में तब्दील हैं। पीजी के नाम पर बड़ा नेक्सस उस इलाके में चलता है जिसका मकान होता है वह खुद पीजी संचालित नहीं करता, बल्कि वह किसी अन्य को ठेके पर दे देता है। ठेकेदार बच्चों को कमरों में भूसे की तरह ठूस देते हैं। जहां ना कोई सुविधा, न मानकों का इस्तेमाल, सिर्फ उन्हें कमाने से मतलब होता है। हादसे वाली बिल्डिंग गिरने का संकेत कुछ वर्षों से दे रही थी? लेकिन ना मालिक ने गौर किया और ना ही अधिकारियों ने? पिछले साल तीसरे माले की सीढ़ियों की छत का उपरी हिस्सा गिरा था जिसे रिपेयर करवाकर संभावित हादसे पर पर्दा डाल दिया गया। बिल्डिंग में 50 के आसपास बच्चे रहते थे। सभी यूपी-बिहार राज्यों से वास्ता रखते हैं। हादसा रविवार को होता है जिस दिन ज्यादातर बच्चे अपने कमरों में थे क्योंकि उस दिन क्लासें और ट्यूशन की छुट्टी थी। शनिवार रात को बच्चे बेखौफ होकर सोए थे, उन्हें नहीं पता था कि अगले दिन उनके साथ क्या होने वाला है। कुछ बच्चों की जाने चली गई है? कई गंभीर रूप से घायल हैं। घटना निसंदेह दुखदायक है। हादसे की जिम्मेदारी अधिकारियों को लेना चाहिए और सीख लेकर भविष्य में इस तरह की बिल्डिंग को पहले ही जमींदोज करने का संकल्प भी लेना चाहिए। डॉ. रमेश ठाकुर सदस्य, राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान (NIPCCD), भारत सरकार!
'आप' विधायक को गुजरात हाई कोर्ट से राहत, विधानसभा सत्र में हिस्सा लेने के लिए 7 दिन की मिली अंतरिम जमानत
राजस्थान नगर निकाय चुनाव में 125 सीट जीतेगी भाजपा: विधायक बालमुकुंद आचार्य
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पश्चिम बंगाल: मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी की काफू से मुलाकात, दिग्गज फुटबॉलर ने भेंट की 'खास जर्सी'
कोलकाता, 7 सितंबर (आईएएनएस)। ब्राजील के दिग्गज फुटबॉलर और वर्ल्ड कप विजेता काफू ने सोमवार को नबन्ना में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी से मुलाकात की। इस दौरान उनके साथ शताद्रु दत्ता भी मौजूद थे।
उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने गुवाहाटी यूनिवर्सिटी में 110 करोड़ रुपए के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की आधारशिला रखी
मुख्यमंत्री अधिकारी ने बंगाल में 'एबी पीएम-जेएवाई' की उपलब्धियों पर प्रकाश डाला
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हिंद महासागर में भारत की सामरिक क्षमता को नई धार देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल शुरू हुई है। हम आपको बता दें कि भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) के वैज्ञानिक अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह में स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) स्थापित करने की संभावनाओं का आकलन कर रहे हैं। यह कवायद द्वीपों की बढ़ती बिजली जरूरतों को पूरा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे भारत की एक व्यापक रणनीतिक सोच भी दिखाई देती है, जिसके केंद्र में ग्रेट निकोबार, पूर्वी हिंद महासागर और दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में शामिल मलक्का जलडमरूमध्य है। हम आपको बता दें कि परमाणु ऊर्जा विभाग की एक टीम 4 से 8 सितंबर तक अंडमान-निकोबार के दौरे पर है और द्वीपसमूह के तीनों जिलों में संभावित स्थानों का अध्ययन कर रही है। यह सर्वे ऐसे समय हो रहा है, जब यहां बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा परियोजनाएं आकार ले रही हैं और आने वाले वर्षों में बिजली की मांग तेजी से बढ़ने की संभावना है। BARC की टीम ने अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह के उपराज्यपाल एडमिरल डीके जोशी को प्रस्तावित SMR योजना, संभावित स्थलों और इसकी प्रमुख विशेषताओं की जानकारी भी दी है। इससे संकेत मिलता है कि यह योजना केवल तकनीकी विचार-विमर्श तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे द्वीपसमूह के भविष्य के विकास और भारत के सामरिक ढांचे के साथ जोड़कर देखा जा रहा है। इसे भी पढ़ें: ISRO को कमजोर करने की साजिश हो रही या भारत को Space Superpower बनने की रणनीति पर काम चल रहा? बढ़ती बिजली जरूरतों के बीच SMR का विकल्प दरअसल, अंडमान-निकोबार में प्रस्तावित विशाल परियोजनाओं के कारण ऊर्जा की जरूरत आने वाले समय में कई गुना बढ़ सकती है। विशेष रूप से ग्रेट निकोबार में अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, गहरे पानी वाला बहुउद्देशीय बंदरगाह, टाउनशिप और अन्य बिजली एवं बुनियादी ढांचा परियोजनाएं प्रस्तावित हैं। इसी पृष्ठभूमि में स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टरों का विकल्प महत्वपूर्ण बनकर उभरा है। हम आपको बता दें कि SMR अपेक्षाकृत छोटे आकार के परमाणु रिएक्टर होते हैं, जिन्हें स्थानीय और क्षेत्रीय ऊर्जा जरूरतों के अनुरूप विकसित किया जा सकता है। अंडमान-निकोबार जैसे दूरस्थ द्वीपीय क्षेत्रों में स्थिर और दीर्घकालिक बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिहाज से इनकी उपयोगिता महत्वपूर्ण मानी जा रही है। लेकिन इस पूरी कहानी का एक दूसरा और अधिक व्यापक पहलू भी है। परमाणु ऊर्जा के विस्तार के साथ-साथ भविष्य में परमाणु ईंधन की उपलब्धता भी एक महत्वपूर्ण रणनीतिक प्रश्न बनती जा रही है। चीन की समुद्र से यूरेनियम निकालने की नई तकनीक इसी बीच चीन से आई एक नई वैज्ञानिक उपलब्धि ने वैश्विक परमाणु ऊर्जा की बहस को एक नया आयाम दिया है। चीनी शोधकर्ताओं ने एक ऐसी नई सामग्री विकसित करने का दावा किया है, जो समुद्री जल से यूरेनियम निकालने में अमेरिकी ऊर्जा विभाग द्वारा पहले निर्धारित लक्ष्य से आठ गुना अधिक क्षमता दिखाती है। चीन के क़िंगदाओ स्थित चीनी विज्ञान अकादमी से जुड़े शोधकर्ताओं ने प्राकृतिक समुद्री जल के नमूनों से इस सामग्री के प्रति ग्राम से 50.4 मिलीग्राम तक यूरेनियम प्राप्त करने का दावा किया है। इसकी तुलना में अमेरिकी मानक लगभग 6 मिलीग्राम प्रति ग्राम था। इस नई सामग्री को PhosCage नाम दिया गया है। यह स्पंज जैसी आणविक संरचना है, जिसमें फॉस्फेट समूह मौजूद हैं। ये रासायनिक रूप से यूरेनियम को बांधने की क्षमता रखते हैं। शोधकर्ताओं ने बाद में इस सामग्री को मिलीमीटर आकार के छोटे मोतियों या बीड्स में बदल दिया, ताकि इसे प्रयोगशाला के बाहर भी अधिक आसानी से इस्तेमाल और वापस प्राप्त किया जा सके। इन बीड्स ने प्रति ग्राम सामग्री से 22.55 मिलीग्राम तक यूरेनियम निकाला और सात बार दोबारा इस्तेमाल किए जाने के बाद भी प्रभावी बने रहे। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह तकनीक समुद्री जल से यूरेनियम निकालने के लिए एक नया रास्ता खोल सकती है और भविष्य में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाले अधिक प्रभावी अवशोषक पदार्थों के विकास की नींव रख सकती है। समुद्र का यूरेनियम क्यों है इतना महत्वपूर्ण? परमाणु ऊर्जा का विस्तार करने वाले देशों के लिए यूरेनियम की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती है। चीन के मामले में यह चुनौती विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसका परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम घरेलू यूरेनियम उत्पादन की तुलना में कहीं तेजी से बढ़ रहा है। विश्व परमाणु संघ के आंकड़ों के अनुसार, चीन ने 2024 में घरेलू खदानों से लगभग 1,600 टन यूरेनियम का उत्पादन किया, जबकि उसके परमाणु रिएक्टरों की जरूरत लगभग 13,000 टन थी। इस बड़े अंतर के कारण चीन को यूरेनियम के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। यहीं समुद्र एक संभावित वैकल्पिक संसाधन के रूप में सामने आता है। हम आपको बता दें कि दुनिया में जमीन पर ज्ञात यूरेनियम संसाधन लगभग 7.9 मिलियन टन माने जाते हैं, जबकि महासागरों में अनुमानित रूप से करीब 4.5 अरब टन यूरेनियम मौजूद है। भूवैज्ञानिक समय के दौरान चट्टानों से बारिश के पानी द्वारा यूरेनियम बहकर नदियों के माध्यम से समुद्रों तक पहुंचता रहा है, जिसके कारण समुद्री जल में इसकी विशाल मात्रा जमा हो गई। समस्या यह है कि समुद्र में यूरेनियम की सांद्रता बेहद कम है। एक टन समुद्री जल में केवल लगभग 3.3 मिलीग्राम यूरेनियम पाया जाता है। इसका अर्थ है कि व्यावसायिक स्तर पर बड़ी मात्रा में यूरेनियम निकालने के लिए अत्यधिक मात्रा में समुद्री जल को संसाधित करना होगा। इसके अलावा समुद्री जल में यूरेनियम के साथ कई अन्य घुले हुए तत्व भी मौजूद रहते हैं, जिससे इसे अलग करना तकनीकी रूप से मुश्किल हो जाता है। वैनाडियम की चुनौती और चीन की नई सफलता इसके अलावा, समुद्री जल से यूरेनियम निकालने में वैनाडियम एक बड़ी चुनौती माना जाता रहा है। इसका कारण यह है कि वैनाडियम भी उन्हीं रासायनिक स्थानों से जुड़ सकता है, जिनका उपयोग यूरेनियम को पकड़ने के लिए किया जाता है। अमेरिका में इस चुनौती से निपटने के लिए वर्षों तक शोध किया गया। ओक रिज नेशनल लेबोरेटरी ने विशेष प्रकार के फाइबर विकसित किए, जबकि पैसिफिक नॉर्थवेस्ट नेशनल लेबोरेटरी ने प्राकृतिक रूप से बहने वाले समुद्री जल में इन तकनीकों का परीक्षण किया। 2016 तक अमेरिका की सबसे प्रभावी अवशोषक सामग्री समुद्री जल के लंबे संपर्क के बाद प्रति ग्राम लगभग 6 मिलीग्राम यूरेनियम निकालने में सक्षम थी। हालांकि यह तकनीक पारंपरिक यूरेनियम खनन की तुलना में काफी महंगी बनी रही और अमेरिकी ऊर्जा विभाग ने 2018 में कार्यक्रम समाप्त होने के बाद इस दिशा में अपनी सक्रियता काफी हद तक कम कर दी। उधर, चीन के क़िंगदाओ स्थित शोधकर्ताओं का दावा है कि उनकी नई सामग्री ने इस चुनौती के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है। दो अलग-अलग वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया कि बीड्स आधारित यह सामग्री कई धातुओं की मौजूदगी के बावजूद यूरेनियम को प्राथमिकता के साथ पकड़ने में सक्षम रही। विशेष रूप से यह वैनाडियम की तुलना में यूरेनियम को अधिक प्रभावी ढंग से अलग करने में सक्षम बताई गई है। हालांकि इस तकनीक की सीमाएं भी हैं। अभी यह प्रयोगशाला स्तर पर ही है। शोधकर्ताओं ने क़िंगदाओ के तट से समुद्री जल लेकर लगभग 25 लीटर पानी को प्रयोगशाला आधारित फ्लो सिस्टम से गुजारा था। इसका परीक्षण खुले समुद्र में नहीं किया गया है, जहां लहरें, समुद्री धाराएं, जैविक गतिविधियां और बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियां पूरी प्रक्रिया को अधिक जटिल बना सकती हैं। इसके अलावा, अभी तक यह भी स्पष्ट नहीं है कि समुद्र से प्राप्त यूरेनियम की उत्पादन लागत कितनी होगी। शोधकर्ताओं का अगला लक्ष्य इस तकनीक को बड़े स्तर पर विकसित करना और समुद्री जल से यूरेनियम निकालने की कुल लागत कम करना है। ग्रेट निकोबार: विकास परियोजना से कहीं अधिक उधर, भारत के संदर्भ में अंडमान-निकोबार में SMR की संभावनाओं का अध्ययन ऐसे समय हो रहा है, जब ग्रेट निकोबार एक विशाल विकास और रणनीतिक परियोजना के केंद्र के रूप में उभर रहा है। ग्रेट निकोबार परियोजना के तहत गलाथिया बे में एक इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, एक ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, टाउनशिप और उससे जुड़ा ऊर्जा एवं अन्य बुनियादी ढांचा विकसित करने की योजना है। सरकार इस परियोजना को रणनीतिक, रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण बता चुकी है। इसका उद्देश्य केवल व्यापार और कनेक्टिविटी बढ़ाना नहीं है। इसके जरिए भारत अंडमान सागर और दक्षिण-पूर्व एशिया में अपनी उपस्थिति मजबूत करना चाहता है और अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों के निकट एक बड़े समुद्री केंद्र का विकास करना चाहता है। देखा जाये तो ग्रेट निकोबार की भौगोलिक स्थिति इसे एक सामान्य विकास परियोजना से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बना देती है। भारत यहां अपनी आर्थिक पहुंच बढ़ाने के साथ-साथ समुद्री गतिविधियों की निगरानी और पूर्वी हिंद महासागर में अपनी सामरिक क्षमता को भी मजबूत करना चाहता है। यहीं से यह कहानी हिंद महासागर में बदलते शक्ति-संतुलन तक पहुंचती है। दरअसल, पूर्वी हिंद महासागर में चीन की बढ़ती सक्रियता के बीच ग्रेट निकोबार भारत की रणनीतिक तैयारियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनता जा रहा है। एक मजबूत और स्थायी रक्षा उपस्थिति भारत को समुद्री मार्गों की निगरानी और सुरक्षा में मदद कर सकती है तथा हिंद महासागर में विदेशी शक्तियों की बढ़ती मौजूदगी का मुकाबला करने की क्षमता भी बढ़ा सकती है। इस पूरी रणनीति के केंद्र में है मलक्का जलडमरूमध्य। हम आपको बता दें कि दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री चोकपॉइंट्स में शामिल मलक्का जलडमरूमध्य हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के बीच वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति का प्रमुख मार्ग है। भारी मात्रा में अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाज और ऊर्जा संसाधन इसी रास्ते से गुजरते हैं। ग्रेट निकोबार की भौगोलिक स्थिति भारत को मलक्का जलडमरूमध्य के पश्चिमी प्रवेश क्षेत्र के करीब एक महत्वपूर्ण रणनीतिक लाभ प्रदान करती है। ऐसे में यहां विकसित होने वाला बंदरगाह, हवाई अड्डा, ऊर्जा ढांचा और रक्षा उपस्थिति मिलकर भारत की समुद्री क्षमता को नई ताकत दे सकते हैं। INS Baaz और त्रि-सेवा कमान की अहमियत कैंपबेल बे स्थित INS Baaz की सामरिक भूमिका भी इसी संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण है। यह नौसैनिक एयर स्टेशन मलक्का जलडमरूमध्य और सिक्स डिग्री चैनल के महत्वपूर्ण समुद्री क्षेत्रों पर नजर रखने की दृष्टि से अहम माना जाता है। पूरे अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह की सामरिक अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां भारत की एकमात्र एकीकृत त्रि-सेवा कमान यानि अंडमान और निकोबार कमान स्थापित है। थलसेना, नौसेना और वायुसेना की संयुक्त कमान का गठन इस द्वीपसमूह की उस विशेष भौगोलिक स्थिति को देखते हुए किया गया था, जो अंतरराष्ट्रीय समुद्री संपर्क मार्गों के बेहद करीब स्थित है। द्वीपों की भौगोलिक स्थिति भारत को अपने समुद्री हितों की रक्षा करने और संभावित खतरों पर नजर रखने की क्षमता प्रदान करती है। यही कारण है कि अंडमान-निकोबार कमान भारत की व्यापक ‘एक्ट ईस्ट’ रणनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ऊर्जा, यूरेनियम और समुद्री शक्ति का नया समीकरण BARC का SMR सर्वे इस पूरी रणनीतिक तस्वीर में एक नया आयाम जोड़ता है। यदि अंडमान-निकोबार में छोटे मॉड्यूलर परमाणु रिएक्टर स्थापित होते हैं, तो वे तेजी से विकसित हो रहे नागरिक और रणनीतिक ढांचे को एक विश्वसनीय ऊर्जा आधार प्रदान कर सकते हैं। बंदरगाह, हवाई अड्डे, टाउनशिप और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए स्थिर बिजली उपलब्ध कराने के साथ SMR द्वीपों की ऊर्जा आत्मनिर्भरता और लचीलापन भी बढ़ा सकते हैं। वहीं चीन का समुद्री जल से यूरेनियम निकालने का नया प्रयोग यह संकेत देता है कि भविष्य में महासागर केवल व्यापार और सामरिक प्रतिस्पर्धा के केंद्र नहीं रहेंगे, बल्कि परमाणु ऊर्जा के लिए ईंधन संसाधनों की नई होड़ का भी मैदान बन सकते हैं। समुद्रों में अनुमानित 4.5 अरब टन यूरेनियम मौजूद होने का अनुमान परमाणु ऊर्जा के भविष्य के लिए एक बेहद आकर्षक संभावना प्रस्तुत करता है। हालांकि इसे व्यावसायिक रूप से निकालना अभी भी एक कठिन और महंगी तकनीकी चुनौती है। यदि भविष्य में ऐसी तकनीकें आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनती हैं, तो परमाणु ऊर्जा के लिए ईंधन आपूर्ति का वैश्विक समीकरण बदल सकता है। चीन जैसे देशों के लिए इससे आयातित यूरेनियम पर निर्भरता कम करने का रास्ता खुल सकता है। भारत के लिए क्या मायने? भारत के लिए अंडमान-निकोबार में परमाणु ऊर्जा की संभावनाएं और हिंद महासागर की सामरिक स्थिति एक-दूसरे से अलग मुद्दे नहीं हैं। एक तरफ SMR जैसी तकनीकें दूरस्थ द्वीपों को विश्वसनीय ऊर्जा उपलब्ध करा सकती हैं। दूसरी तरफ यही ऊर्जा तेजी से विकसित हो रहे बंदरगाहों, हवाई अड्डों और अन्य महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को मजबूत आधार दे सकती है। ग्रेट निकोबार में बनने वाला समुद्री और हवाई ढांचा भारत की आर्थिक और सामरिक उपस्थिति को मजबूत कर सकता है। मलक्का जलडमरूमध्य के निकट भारत की भौगोलिक स्थिति उसे वैश्विक समुद्री गतिविधियों पर बेहतर निगरानी का अवसर देती है। बहरहाल, अंडमान-निकोबार में SMR की संभावनाओं का यह सर्वे केवल एक परमाणु ऊर्जा परियोजना की शुरुआती कवायद नहीं दिखाई देता। यह उस बड़े भारतीय रणनीतिक नक्शे का हिस्सा है, जिसमें विकास, ऊर्जा, समुद्री व्यापार, राष्ट्रीय सुरक्षा और हिंद महासागर में बदलता शक्ति-संतुलन एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। साथ ही चीन का समुद्री जल से यूरेनियम निकालने का नया शोध यह भी दिखाता है कि परमाणु ऊर्जा की भविष्य की प्रतिस्पर्धा केवल जमीन पर मौजूद खदानों तक सीमित नहीं रह सकती। महासागर भी भविष्य में परमाणु ईंधन के एक संभावित विशाल स्रोत के रूप में उभर सकते हैं। और इस पूरे भू-रणनीतिक नक्शे पर भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बिंदुओं में से एक है ग्रेट निकोबार। यह एक ऐसा द्वीप है, जहां भारत की नजर केवल विकास परियोजनाओं पर नहीं है, बल्कि समुद्र के उस विशाल रास्ते पर भी है, जिससे होकर दुनिया के व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। -नीरज कुमार दुबे
राजस्थान में एक समय बगावत का रायता फैलाने वाले सचिन पायलट आखिर पंजाब कांग्रेस को एकजुट कैसे रख पाएंगे? यह सवाल इसलिए अहम है क्योंकि राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट की खुली जंग का खामियाजा कांग्रेस को विधानसभा चुनावों में उठाना पड़ा था। विडंबना देखिए, उस समय पंजाब के वरिष्ठ नेता सुखजिंदर सिंह रंधावा राजस्थान कांग्रेस के प्रभारी थे। अब भूमिकाएं बदल चुकी हैं। सचिन पायलट पंजाब कांग्रेस के प्रभारी बन गए हैं और रंधावा पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वारिंग के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं तथा चन्नी गुट के साथ खड़े हैं। ऐसे में पायलट के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि जो नेता अपने गृह प्रदेश में गुटबाजी की आग को नहीं बुझा पाया, वह पंजाब में बिखरी कांग्रेस को कैसे एकजुट करेगा? हम आपको बता दें कि कांग्रेस हाईकमान ने एआईसीसी महासचिव सचिन पायलट को भूपेश बघेल की जगह पंजाब का प्रभारी बनाकर भेजा है। भूपेश बघेल को असम की जिम्मेदारी दी गई है। पंजाब में 2027 की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं और कांग्रेस के पास अंदरूनी कलह सुलझाने के लिए बहुत अधिक समय नहीं है। ऐसे में 49 वर्षीय सचिन पायलट की नियुक्ति को कांग्रेस की ओर से एक बड़े राजनीतिक प्रयोग के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन सवाल उठता है कि राजस्थान का कभी का ‘बागी’ क्या अब पंजाब में ‘शांतिदूत’ की भूमिका निभा पाएगा? इसे भी पढ़ें: Uttar Pradesh समेत 5 States Assembly Elections की तारीखों को लेकर सामने आया बड़ा अपडेट देखा जाये तो सचिन पायलट का अपना राजनीतिक इतिहास इस जिम्मेदारी को और दिलचस्प बनाता है। 2014 में राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने संगठन को खड़ा किया और 2018 में पार्टी को सत्ता तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन सत्ता मिलते ही अशोक गहलोत और पायलट के बीच नेतृत्व, संगठन और राजनीतिक भविष्य को लेकर संघर्ष शुरू हो गया। जुलाई 2020 में यह संघर्ष खुली बगावत में बदल गया। पायलट अपने समर्थक विधायकों के साथ अलग हो गए, राज्य सरकार संकट में आई और उन्हें उपमुख्यमंत्री तथा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटा दिया गया। सचिन पायलट ने तब भाजपा में जाने से साफ इंकार किया था और कहा था कि उनकी लड़ाई कांग्रेस से नहीं, बल्कि गहलोत से है। वह कांग्रेस में रहे, लेकिन गहलोत-पायलट की प्रतिद्वंद्विता वर्षों तक पार्टी के लिए सिरदर्द बनी रही। बाद में सार्वजनिक तौर पर रिश्तों में नरमी दिखाई गई। 2025 में गहलोत ने यहां तक कहा कि “हम कब अलग थे?” लेकिन राजनीतिक इतिहास इतनी आसानी से मिटता नहीं। पायलट और गहलोत के बीच मतभेद खत्म होने के दावे के बावजूद समय-समय पर दोनों खेमों की दूरियां सामने आती रही हैं। यही नहीं, 2028 में होने वाले राजस्थान विधानसभा चुनावों से पहले गहलोत-पायलट की प्रतिस्पर्धा फिर तेज हो सकती है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि जिस नेता ने अपने ही प्रदेश में मजबूत राजनीतिक गुट खड़ा किया और गुटबाजी को हवा दी, वह दूसरे प्रदेश में गुटबाजी खत्म करने का कौन-सा सफल फार्मूला अपनाएगा? हालांकि पंजाब में पायलट के अनुभव का दूसरा पहलू भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने स्वयं देखा है कि अनसुलझी नेतृत्व की लड़ाई किसी राज्य इकाई को कितना नुकसान पहुंचा सकती है। शायद इसी अनुभव के कारण हाईकमान उन्हें एक ‘ऑर्गेनाइजेशनल फिक्सर’ के तौर पर आजमा रहा है। उधर, पंजाब कांग्रेस में संकट गंभीर है। पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के नेतृत्व वाला एक गुट राजा वारिंग को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने की मांग करता रहा है। हाईकमान ने जुलाई में वारिंग को पद पर बनाए रखा और चन्नी को चुनाव अभियान समिति की कमान दी, लेकिन इससे असंतोष खत्म नहीं हुआ। विपक्ष के नेता प्रताप सिंह बाजवा भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं बताए जाते। सुखजिंदर सिंह रंधावा और विजय इंदर सिंगला जैसे नेता भी वारिंग विरोधी खेमे में रहे हैं। भूपेश बघेल इस खींचतान को खत्म नहीं कर पाए। उन पर वारिंग के ज्यादा करीब होने और निष्पक्षता बनाए रखने में विफल रहने के आरोप लगे। उनके खिलाफ पंजाब के कुछ इलाकों में पोस्टर तक लगाए गए। अब पायलट की नियुक्ति को वारिंग विरोधी नेताओं को संतुष्ट करने की कोशिश माना जा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि वारिंग, चन्नी और रंधावा, सभी ने पायलट की नियुक्ति का स्वागत किया है। लेकिन असली परीक्षा स्वागत संदेशों से नहीं होगी। सवाल यह है कि क्या चन्नी वारिंग को हटाने की मांग छोड़ेंगे? क्या बाजवा, रंधावा और अन्य वरिष्ठ नेता एक मंच पर वास्तविक रूप से साथ आएंगे? इसके साथ ही राहुल गांधी का प्रस्तावित पंजाब बस दौरा, सचिन पायलट की पहली बड़ी परीक्षा हो सकता है। पायलट को केवल नेताओं की बैठकें नहीं करानी होंगी। उन्हें गुटों के बीच भरोसा पैदा करना होगा, टिकट वितरण को नए संघर्ष का कारण बनने से रोकना होगा और महत्वाकांक्षी नेताओं को समझाना होगा कि एक-दूसरे को कमजोर करने से अधिक नुकसान कांग्रेस का होगा। 2027 में कांग्रेस का मुकाबला भगवंत मान के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी सरकार से है। भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के संभावित गठजोड़ से मुकाबला और जटिल हो सकता है। क्षेत्रीय राजनीतिक ताकतें भी समीकरण बदल सकती हैं। इसलिए पंजाब सचिन पायलट के लिए महज एक नई जिम्मेदारी नहीं है। यह उनकी राजनीतिक परिपक्वता की सबसे कठिन परीक्षा है। राजस्थान में वह कभी कांग्रेस के भीतर बगावत का चेहरा बने थे, पंजाब में उन्हें समझौते और एकजुटता का चेहरा बनना है। देखना होगा कि क्या पायलट अपने अतीत से सबक लेकर पंजाब कांग्रेस को जोड़ पाएंगे, या पंजाब की गुटबाजी साबित करेगी कि कांग्रेस के भीतर कुछ दरारें इतनी गहरी हैं जिन्हें कोई भी प्रभारी भर नहीं सकता? -नीरज कुमार दुबे
अन्ना हजारे की तबीयत पहले से काफी बेहतर, बॉम्बे हॉस्पिटल के डॉक्टर गौतम भंसाली ने दिया अपडेट
मुंबई, 7 सितंबर (आईएएनएस)। बॉम्बे हॉस्पिटल के डॉक्टर डॉ. गौतम भंसाली ने हॉस्पिटल में भर्ती सोशल एक्टिविस्ट अन्ना हजारे के हेल्थ को लेकर अपडेट दिया है। उन्होंने सोमवार को समाचार एजेंसी आईएएनएस से बात करते हुए कहा कि अन्ना हजारे की तबीयत में पहले से सुधार हो रहा है। उनको बॉम्बे हॉस्पिटल में भर्ती किए लगभग 6 दिन हो गए हैं। ट्रीटमेंट को वह अच्छा रेस्पॉन्स कर रहे हैं।
फारूक अब्दुल्ला के बयान पर भड़के विवेक बाली, बोले- यह हिंदू अधिकारियों को भी घाटी से निकालने की साजिश
दिल्ली में जुटे Congress के एससी-एसटी सांसद, 3 प्रमुख नेताओं के शामिल न होने से गरमाई राजनीति
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जेएसएससी-सीजीएल मामले में पूर्व डीजीपी की भूमिका संदिग्ध, कार्रवाई से हिचक रही हेमंत सरकार : बाबूलाल मरांडी
ISRO को कमजोर करने की साजिश हो रही या भारत को Space Superpower बनने की रणनीति पर काम चल रहा?
क्या भारत की अंतरिक्ष एजेंसी इसरो को धीरे-धीरे निजी हाथों के हवाले किया जा रहा है, या फिर देश एक ऐसी नई अंतरिक्ष रणनीति की ओर बढ़ रहा है जिसमें इसरो शोध और सामरिक अभियानों का कमांड सेंटर बनेगा और उद्योग उत्पादन की ताकत? यही सवाल पिछले कुछ दिनों से भारतीय अंतरिक्ष जगत के भीतर और बाहर तेज बहस का विषय बना हुआ है। अब इसरो ने स्वयं सामने आकर स्पष्ट किया है कि न तो इसरो का निजीकरण होगा और न ही उसकी भूमिका या महत्व कम किया जाएगा। यह स्पष्टीकरण ऐसे समय आया है जब इसरो के नौ कर्मचारी संगठनों ने 4 सितंबर को इसरो अध्यक्ष वी. नारायणन को पत्र लिखकर अंतरिक्ष क्षेत्र में चल रहे सुधारों, उत्पादन गतिविधियों के निजी कंपनियों और सार्वजनिक उपक्रमों को हस्तांतरण तथा कर्मचारियों के भविष्य पर गंभीर सवाल उठाए थे। उनकी चिंता का केंद्र 21 अगस्त को IN-SPACe के अध्यक्ष पवन गोयनका की वह टिप्पणी थी, जिसमें कहा गया था कि भविष्य में इसरो प्रक्षेपण यानों का निर्माण बंद कर सकता है और उनका उत्पादन उद्योग या पीएसयू संभाल सकते हैं। इसे भी पढ़ें: राष्ट्रीय आत्मविश्वास को मजबूत करता जीएसएलवी-एफ17 का प्रक्षेपण इसरो का जवाब स्पष्ट है कि भूमिका बदल रही है, महत्व नहीं। एजेंसी अब उस दिशा में अपने वैज्ञानिक संसाधन केंद्रित करना चाहती है जहां उसकी विशेषज्ञता सबसे निर्णायक है। यानि फ्रंटियर रिसर्च, उन्नत प्रौद्योगिकी, मानव अंतरिक्ष उड़ान, अगली पीढ़ी के प्रक्षेपण यान, गहरे अंतरिक्ष और ग्रहों के मिशन तथा राष्ट्रीय और सामरिक क्षमताएं। हम आपको बता दें कि संचार, नेविगेशन और पृथ्वी अवलोकन के उन्नत पेलोड, सेंसर, प्रणोदन प्रणालियां और अन्य महत्वपूर्ण तकनीकें इसरो के मूल फोकस में बनी रहेंगी। दूसरी ओर, जिन तकनीकों ने परिपक्वता हासिल कर ली है और जिनका बड़े पैमाने पर नियमित उत्पादन संभव है, उन्हें उद्योग और पीएसयू प्रतिस्पर्धी प्रक्रियाओं के माध्यम से बढ़ा सकते हैं। इसमें परिपक्व लॉन्च व्हीकल, नियमित उपग्रह और स्थापित अंतरिक्ष प्रणालियां शामिल हो सकती हैं। इसरो का तर्क है कि इससे उसके वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों का समय उत्पादन में नहीं, बल्कि भविष्य की जटिल तकनीकों और महत्वाकांक्षी अभियानों में लगेगा। यही इस बदलाव का सबसे बड़ा रणनीतिक अर्थ है। अंतरिक्ष शक्ति बनने के लिए इसरो को “फैक्ट्री” से आगे बढ़कर “टेक्नोलॉजी फ्रंटियर” पर खड़ा होना होगा। भारत ने 2030 तक सालाना 50 प्रक्षेपणों का लक्ष्य रखा है। पवन गोयनका का कहना है कि इतने बड़े पैमाने का लक्ष्य कोई एक संगठन अकेले हासिल नहीं कर सकता। इसके लिए निजी पूंजी, औद्योगिक उत्पादन क्षमता, उद्यमिता और वैश्विक बाजार तक पहुंच जरूरी है। यह पूरी व्यवस्था भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 और एफडीआई नीति के क्रमिक उदारीकरण से जुड़ी है। इसरो इसे निजीकरण नहीं, बल्कि “इकोसिस्टम विस्तार और क्षमता गुणन” बता रहा है। उद्योग, स्टार्ट-अप और अकादमिक संस्थानों को अंतरिक्ष मूल्य श्रृंखला में शामिल कर इसरो की क्षमताओं को प्रतिस्थापित नहीं, बल्कि कई गुना करने की योजना है। नई संरचना में विभागीय भूमिकाएं भी स्पष्ट की गई हैं। डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस नीति दिशा देगा, इसरो उन्नत अनुसंधान, प्रौद्योगिकी विकास और राष्ट्रीय मिशनों का मुख्य केंद्र रहेगा, IN-SPACe गैर-सरकारी संस्थाओं की भागीदारी को सक्षम और अधिकृत करेगा, जबकि NSIL परिपक्व क्षमताओं के व्यावसायीकरण और उद्योग-आधारित उपयोग को आगे बढ़ाएगा। लेकिन इस परिवर्तन पर सवाल खत्म नहीं हुए हैं। कर्मचारी संगठनों ने पूछा है कि नीति का कानूनी और प्रशासनिक आधार क्या है, इसका क्रियान्वयन कब होगा और मौजूदा कर्मचारियों तथा भविष्य की भर्ती पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। उनका सबसे महत्वपूर्ण तर्क है कि दशकों में विकसित इसरो की तकनीक राष्ट्रीय संपत्ति है, इसलिए उसका हस्तांतरण पारदर्शी, जवाबदेह और सामरिक तथा सुरक्षा हितों के अनुरूप होना चाहिए। विपक्ष ने भी इस मुद्दे को राजनीतिक मोर्चे पर उठा लिया है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि स्टार्ट-अप को बढ़ावा देने के नाम पर इसरो की भूमिका सीमित की जा रही है और उसकी दशकों पुरानी क्षमताएं निजी कंपनियों को सौंपी जा सकती हैं। पार्टी नेता जयराम रमेश ने इसे इसरो के “साराभाई-धवन ढांचे” को कमजोर करने की प्रक्रिया बताया। यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाएं अब असाधारण स्तर पर पहुंच चुकी हैं। 2035 तक भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन, 2040 तक भारतीय मानवयुक्त चंद्र मिशन, पुन: प्रयोज्य और अगली पीढ़ी के लॉन्च सिस्टम तथा सतत चंद्र और ग्रह अन्वेषण, ये लक्ष्य साधारण व्यावसायिक विस्तार से हासिल नहीं होंगे। इसरो का कहना है कि ऐसी क्षमताओं को केवल बाजार की ताकतों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। हम आपको बता दें कि भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था फिलहाल लगभग 8.4 अरब डॉलर आंकी गई है और लक्ष्य 2033 तक इसे 44 अरब डॉलर तक पहुंचाने का है। इसलिए असली चुनौती निजी क्षेत्र बनाम इसरो नहीं, बल्कि इसरो-नेतृत्व वाले राष्ट्रीय अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र की सफलता है। रणनीतिक दृष्टि से यह भारत के लिए निर्णायक मोड़ है। अब सवाल यह है कि क्या भारत उत्पादन का विस्तार करते हुए अपनी संवेदनशील तकनीक, सामरिक स्वायत्तता और वैज्ञानिक नेतृत्व को सुरक्षित रख पाएगा। यदि संतुलन सही बैठा, तो निजी उद्योग इसरो की ताकत बढ़ाएगा; यदि पारदर्शिता और संस्थागत नियंत्रण कमजोर पड़े, तो राष्ट्रीय क्षमताओं के हस्तांतरण पर उठ रहे सवाल और गंभीर होंगे। इसरो ने फिलहाल अपना संदेश साफ कर दिया है कि वह पीछे नहीं हट रहा, बल्कि उत्पादन की जिम्मेदारियों से मुक्त होकर अंतरिक्ष की अगली सीमा पर छलांग लगाने की तैयारी कर रहा है। -नीरज कुमार दुबे
उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनाव सिर्फ वोटों की गिनती से नहीं जीते जाते। यहां जाति, जज्बात, चेहरा और संदेश, इन चारों का सही तालमेल सत्ता तक पहुंचने का रास्ता बनाता है। 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर जरूर है, लेकिन सियासी बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव भी अपनी पुरानी साइकिल में नए राजनीतिक पुर्जे लगाने में जुटे हैं। मकसद सपा को उसकी पुरानी छवि से बाहर निकालना है, जिसे विरोधी लंबे समय से एक खास सामाजिक दायरे और सत्ता में कथित तौर पर आक्रामक राजनीति से जोड़ते रहे हैं। अखिलेश की नई रणनीति में जातीय समीकरण भी है, हिंदू प्रतीक भी हैं, पीडीए का विस्तार भी है और सबसे दिलचस्प बात यह है कि डिंपल यादव के रूप में एक नया और अपेक्षाकृत शांत चेहरा भी है। डिंपल की बढ़ती भूमिका और ‘सॉफ्ट पॉलिटिक्स’ देखा जाये तो अब तक डिंपल यादव की राजनीति अपेक्षाकृत संयमित और सीमित सार्वजनिक दायरे में दिखाई देती रही है। लेकिन हाल के समय में उनकी सक्रियता बढ़ी है। संसद से लेकर राजनीतिक मुद्दों तक उनकी मौजूदगी ज्यादा मुखर हुई है। यही बदलाव महज सामान्य राजनीतिक सक्रियता नहीं, बल्कि सपा की व्यापक रणनीति का एक अहम हिस्सा भी माना जा सकता है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में अक्सर आवाज जितनी ऊंची होती है, राजनीति उतनी ही असरदार दिखाई जाती है। आरोप-प्रत्यारोप, तीखे बयान और मंचीय हमले यहां आम बात हैं। ऐसे माहौल में डिंपल की शैली अलग दिखाई देती है। यानि कम शोर, संयमित भाषा, सहज व्यवहार और टकराव की बजाय संवाद का अंदाज। यही वजह है कि सपा के लिए उनका चेहरा राजनीतिक रूप से उपयोगी हो सकता है। कह सकते हैं कि अखिलेश यादव की राजनीति में धार वही है, लेकिन उसके साथ डिंपल की राजनीति का एक ‘सॉफ्ट टच’ जोड़ा जा रहा है। इसे भी पढ़ें: ‘पराये धन’ को अपना बनाना भाजपा से बेहतर कोई नहीं जानता... ‘पीडीए’ तंज पर अखिलेश यादव का तीखा पलटवार क्या डिंपल यादव हो सकती हैं मुख्यमंत्री पद का चेहरा? यहीं से एक बड़ा सियासी सवाल निकलता है कि क्या 2027 के विधानसभा चुनाव में डिंपल यादव समाजवादी पार्टी की मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार हो सकती हैं? फिलहाल सपा की राजनीति का केंद्रीय चेहरा अब भी अखिलेश यादव ही हैं। लेकिन राजनीति में हर बात की शुरुआत घोषणा से नहीं होती। कई बार किसी नेता की बढ़ती सक्रियता, बदलती भूमिका और सार्वजनिक स्वीकार्यता ही भविष्य के संकेत देने लगती है। डिंपल की कार्यशैली अखिलेश से अलग है। अखिलेश जहां सीधे राजनीतिक हमले करने और भाजपा के खिलाफ आक्रामक विपक्षी राजनीति का चेहरा हैं, वहीं डिंपल अपेक्षाकृत शांत और संतुलित दिखाई देती हैं। उनकी यही अलग पहचान भविष्य में सपा के लिए एक अतिरिक्त राजनीतिक पूंजी बन सकती है। इसके अलावा, उत्तर प्रदेश में अब कोई भी पार्टी महिलाओं को नजरअंदाज करने का जोखिम नहीं लेना चाहती। भाजपा अपनी महिला-केंद्रित योजनाओं और लाभार्थी राजनीति के जरिए महिला वोटरों पर लगातार पकड़ मजबूत करने की कोशिश करती रही है। दूसरी तरफ विपक्ष भी समझ चुका है कि सिर्फ जातीय समीकरणों से चुनावी लड़ाई पूरी नहीं होती। ‘आधी आबादी’ अब सिर्फ नारा नहीं, चुनावी समीकरण का बड़ा हिस्सा है। ऐसे में डिंपल यादव सपा के लिए एक प्रभावी महिला चेहरा बन सकती हैं। उनकी शांत और सहज छवि उन महिला मतदाताओं तक पहुंच बनाने में मदद कर सकती है, जो सपा को अब तक मुख्य रूप से पुरुष नेतृत्व वाली पार्टी के रूप में देखती रही हैं। अगर पार्टी महिलाओं के लिए ठोस राजनीतिक कार्यक्रम और भरोसेमंद संदेश के साथ मैदान में उतरती है, तो डिंपल उस अभियान का स्वाभाविक चेहरा बन सकती हैं। वैसे यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि वह मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार बनेंगी, लेकिन इतना जरूर है कि अगर सपा को 2027 में महिला मतदाताओं के बीच अपनी नई जमीन तैयार करनी है, तो डिंपल की भूमिका केवल एक सांसद या स्टार प्रचारक तक सीमित नहीं रह सकती। यूपी की राजनीति में जो नेता धीरे-धीरे अपनी जगह बनाता है, वह कई बार अचानक बड़े समीकरण का केंद्र बन जाता है। डिंपल के मामले में भी यही संभावना राजनीतिक चर्चा को दिलचस्प बनाती है। 2027 और सपा की नई सोशल इंजीनियरिंग अखिलेश यादव अच्छी तरह जानते हैं कि 2024 में बने राजनीतिक माहौल को 2027 की सत्ता तक पहुंचाने के लिए सिर्फ पुराने समीकरण काफी नहीं होंगे। दलित राजनीति की जमीन में बदलाव आया है, पिछड़ों के भीतर भी कई परतें हैं और सवर्ण मतदाताओं को लेकर नई राजनीतिक संभावनाएं तलाशनी पड़ रही हैं। यहीं से सामने आता है पीडीए का विस्तार। पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए सपा की नई राजनीतिक रणनीति का केंद्र रहा है। लेकिन अब अखिलेश ने इस राजनीतिक फार्मूले में एक नया मोड़ दिया है। ‘पी’ की व्याख्या में पंडितों यानी ब्राह्मणों को भी जोड़ने की कोशिश की गई है। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी भले बहुत बड़ी न हो, लेकिन उनका राजनीतिक प्रभाव हमेशा संख्या से ज्यादा रहा है। गांव की चौपाल हो या शहर की राजनीतिक बैठक, कई इलाकों में ब्राह्मण मतदाता चुनावी माहौल और समीकरण दोनों पर असर डालता है। बसपा ने 2007 में दलित-ब्राह्मण सामाजिक समीकरण को मजबूत करके सत्ता का रास्ता बनाया था। बाद में भाजपा के उभार और नरेंद्र मोदी की राजनीति के साथ बड़ी संख्या में ब्राह्मण मतदाता भाजपा के साथ मजबूती से जुड़ गए। अब अखिलेश उसी राजनीतिक जमीन में संभावनाएं तलाश रहे हैं। त्रिशूल, शिव और समाजवाद का नया प्रयोग अखिलेश यादव की राजनीति का एक और महत्वपूर्ण बदलाव हिंदू प्रतीकों को लेकर दिखाई देता है। वह अब केवल पुराने समाजवादी ढांचे में सिमटकर राजनीति नहीं करना चाहते। उन्हें मालूम है कि 2027 का उत्तर प्रदेश 1990 के दशक का उत्तर प्रदेश नहीं है। इसलिए सपा प्रमुख हिंदू धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों से दूरी बनाने की बजाय उन्हें अपनी राजनीतिक भाषा का हिस्सा बना रहे हैं। सनातन धर्म की चर्चा, हनुमान चालीसा का पाठ, ब्राह्मणों तक पहुंच और धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों में सक्रिय भागीदारी, यह सब एक व्यापक राजनीतिक संदेश का हिस्सा है। जनेश्वर मिश्र की जयंती के मौके पर त्रिशूल और शिव स्तुति के बीच ब्राह्मणों तक पहुंचने का संदेश इसी नई राजनीति की तस्वीर है। इटावा में केदारेश्वर महादेव मंदिर के निर्माण को भी इसी बड़े राजनीतिक संदर्भ में देखा जा सकता है। संदेश साफ है कि सपा सामाजिक न्याय की बात भी करेगी और हिंदू समाज के साथ संवाद भी बनाएगी। वैसे यह भाजपा के हिंदुत्व की सीधी नकल नहीं, बल्कि अपने लिए अलग राजनीतिक जगह बनाने की कोशिश है। लेकिन असली पेंच भी यही है। उत्तर प्रदेश में समीकरण बनाना आसान है मगर उन्हें मतदान केंद्र तक पहुंचाना मुश्किल है। अखिलेश यादव की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि ब्राह्मणों को जोड़ने की कोशिश में पीडीए का मूल आधार कमजोर नहीं हो। दूसरी चुनौती सपा की पुरानी राजनीतिक छवि है। भाजपा लगातार सपा के पिछले शासनकाल को कानून-व्यवस्था और कथित दबंग राजनीति के मुद्दे पर घेरती रही है। ऐसे में डिंपल यादव की बढ़ती भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। उनका संयमित और सहज व्यक्तित्व सपा की छवि को नया आयाम दे सकता है। लेकिन यूपी की राजनीति में सिर्फ मुस्कुराहट से चुनाव नहीं जीते जाते। सवाल यह भी है कि क्या ब्राह्मण मतदाता वास्तव में भाजपा से दूर होंगे? क्या दलितों का बड़ा हिस्सा सपा की तरफ आएगा? क्या पिछड़ों के बीच पीडीए की पकड़ और मजबूत होगी? और क्या महिला मतदाता सपा को एक नए नजरिए से देखेंगे? सवाल यह भी है कि क्या समाजवादी पार्टी अपनी पुरानी पहचान से बाहर निकलकर सचमुच एक व्यापक सामाजिक गठबंधन तैयार कर पाएगी? देखा जाये तो अखिलेश के सामने एक और चुनौती विपक्षी राजनीति के भीतर भी है। अगर सपा एक तरफ सवर्णों को जोड़ने की कोशिश करे और दूसरी तरफ उसके राजनीतिक सहयोगियों की भाषा उसी वर्ग को असहज करे, तो समीकरण बनने से पहले ही बिगड़ सकते हैं। यूपी में राजनीति का यही असली गणित है कि एक जाति को जोड़ो तो दूसरी की नाराजगी का डर, एक वर्ग को साधो तो दूसरे को संदेश देने की चुनौती। फिलहाल इतना साफ है कि अखिलेश यादव 2027 के लिए सिर्फ चुनाव नहीं लड़ रहे, बल्कि समाजवादी पार्टी का नया संस्करण तैयार कर रहे हैं। उसमें पुराना समाजवाद है, नया पीडीए है, ब्राह्मणों के लिए जगह है, हिंदू प्रतीकों की स्वीकार्यता है और महिला मतदाताओं तक पहुंचने के लिए डिंपल यादव जैसा एक अलग चेहरा भी है। यहां सवाल उठता है कि क्या ‘शार्प’ अखिलेश और ‘सॉफ्ट’ डिंपल का यह राजनीतिक संतुलन 2027 में सपा के लिए नई ताकत बनेगा? या फिर उत्तर प्रदेश की जातीय राजनीति के पुराने गड्ढे इस नई साइकिल की रफ्तार रोक देंगे? जवाब 2027 देगा, लेकिन इतना तय है कि इस बार साइकिल सिर्फ चलने नहीं, अपना नया रास्ता बनाने की कोशिश में है। -नीरज कुमार दुबे
Delhi Building Collapse: हादसे पर हादसे, Modi-Shah की बेरुखी ने बढ़ाए भ्रष्टाचारियों के हौसले?
'रीतम सिंह जैसे व्यक्ति को प्रवक्ता कैसे बना दिया', पूर्व सैनिकों ने कांग्रेस नेता की टिप्पणियों पर पलटवार किया
पीएम मोदी गुजरात को देंगे 35 हजार करोड़ रुपए की सौगात, मंगलवार को मुंबई में करेंगे ग्लोबल फिनटेक फेस्ट का उद्घाटन
कर्नाटक में सूखाग्रस्त तालुकों की घोषणा में भेदभाव, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ने राज्य सरकार पर लगाया भेदभाव का आरोप
सागर जहरीली शराब कांड: अस्पताल में 84 बीमार लोगों का इलाज जारी, 30 आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज
सागर जहरीली शराब कांड: अस्पताल में 84 बीमार लोगों का इलाज जारी, 30 आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज
जयपुर में गरजे ओवैसी, मस्जिदों पर कार्रवाई से लेकर बुनियादी मुद्दों तक BJP को घेरा; हनुमान बेनीवाल के साथ दिखी नई जुगलबंदी
दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में इमारत गिरने की घटना पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने शोक संतप्त परिवारों के प्रति संवेदना जताई और घायलों के जल्द स्वस्थ होने की कामना की।
शिवसेना प्रवक्ता राजू वाघमारे ने पीएम मोदी के 'नाराज फूफा' वाले बयान का समर्थन करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री की होमियोपैथी वाली टिप्पणी जेन-जी के लिए नहीं, बल्कि विपक्ष के लिए थी। उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी का काम दूसरों के कंधे पर बंदूक रखकर सरकार पर निशाना साधना है और उनकी स्थिति 'मेरी सूरत ही ऐसी है' वाली कहावत जैसी है।
बचपन का सपना हुआ साकार, इंजीनियर आर्यन मलिक बने लेफ्टिनेंट
भारतीय सेना में अधिकारी बनकर आर्यन ने बढ़ाया परिवार, गांव और क्षेत्र का गौरव; बधाई देने के लिए घर पहुंच रहे ग्रामीण
'जिम्मेदार व्यक्तियों को बख्शा नहीं जाएगा', दिल्ली बिल्डिंग हादसे पर बोलीं सीएम रेखा गुप्ता
'जिम्मेदार व्यक्तियों को बख्शा नहीं जाएगा', दिल्ली बिल्डिंग हादसे पर बोलीं सीएम रेखा गुप्ता
प्रधानमंत्री मोदी करीब 13 साल बाद SRCC पहुंचे। उन्होंने कार्यक्रम स्थल तक पहुंचने के लिए मेट्रो की यात्रा भी की। वर्ष 2013 में वह गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में इसी कॉलेज में आए थे। अपने संबोधन में उन्होंने उस पुराने दौरे को याद करते हुए तब और अब के भारत की आर्थिक स्थिति की तुलना की।
सोना चार हजार रुपए और चांदी आठ हजार रुपए सस्ती हुई
नई दिल्ली, सोने और चांदी में इस हफ्ते बड़ी गिरावट देखने को मिली, जिससे दोनों कीमती धातुओं का दाम क्रमश: 4,000 रुपए और 8,000 रुपए से अधिक घट गया।
सागर जहरीली शराब कांड: सीएम मोहन यादव ने दिए कार्रवाई के निर्देश, बोले- 'सरकार बर्दाश्त नहीं करेगी ऐसी घटनाएं'
'मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के लिए संकटमोचक थे सुदिव्य सोनू', मंत्री के निधन पर कांग्रेस और झामुमो नेताओं ने जताया दुख
उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन आज से दो दिवसीय असम दौरे पर
उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन रविवार को दो दिवसीय असम दौरे पर जाएंगे, जहां वह एक शैक्षणिक संस्थान के स्वर्ण जयंती समारोह, एक विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह और एक नागरिक अभिनंदन कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे।
हाईकोर्ट में बड़े बदलाव : केंद्र ने 8 राज्यों में नए चीफ जस्टिस नियुक्त किए
केंद्र सरकार ने देश के आठ हाईकोर्ट में नए मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति की है
गुजरात भर के 40 शिक्षकों को 'राज्य के सर्वश्रेष्ठ शिक्षक' पुरस्कार से सम्मानित किया गया
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यूपी: सहारनपुर में मस्जिद गिराए जाने पर विपक्ष का हमला, बोले- कानून सभी के लिए समान होना चाहिए
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उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन 6 सितंबर से दो दिवसीय असम दौरे पर, कई कार्यक्रमों में लेंगे हिस्सा
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'दिमागी नक्सल वो होम्योपैथिक गोली जिसने सबको बाहर निकाल दिया, पीएम मोदी का विपक्ष पर तंज
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‘कानून और संविधान का उल्लंघन,' सहारनपुर में मस्जिद गिराए जाने पर विपक्षी दलों ने जताया एतराज
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संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया के नए नक्शे को दी मंजूरी
संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) ने एक ऐसे नए नक्शे को अपनाने के पक्ष में वोट किया है, जो धरती के महाद्वीपों का बिल्कुल सही आकार दिखाता है. इस प्रस्ताव के खिलाफ सिर्फ अमेरिका ने वोट किया
तमिलनाडु : मुख्यमंत्री विजय ने छात्रों के निर्माण और सामाजिक प्रगति में शिक्षकों की भूमिका की सराहना की
उत्तर प्रदेश 2027: चुनावी बिसात और बदलते समीकरण
उत्तर प्रदेश की राजनीति को भारतीय लोकतंत्र का हृदयस्थल माना जाता है। दिल्ली की गद्दी का रास्ता लखनऊ के गलियारों से होकर गुजरता है, यही कारण है कि देश के इस सबसे बड़े सूबे में होने वाली हर छोटी-बड़ी राजनीतिक हलचल का असर राष्ट्रीय फलक पर साफ दिखाई देता है। वर्ष 2026 की समाप्ति के करीब आते ही और 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट के साथ उत्तर प्रदेश में राजनीतिक दलों के बीच शह-मात का खेल पूरी तरह से शुरू हो चुका है। लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजों ने सूबे की राजनीतिक जमीन को जो नई शक्ल दी थी, उसके बाद हर दल अपनी रणनीतियों को धार देने में जुटा है। एक तरफ जहां भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) लगातार तीसरी बार उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज होकर इतिहास रचने की कवायद में जुटी है, वहीं दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी अपने 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के सहारे दस साल के सत्ता के वनवास को खत्म करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। इस बार का चुनाव केवल पारंपरिक नारों या वादों पर आधारित नहीं रहने वाला, बल्कि यह जमीन पर रची जा रही नई सामाजिक और गठबंधन राजनीति की प्रयोगशाला बनने जा रहा है। इस राजनीतिक उठापटक और नए समीकरणों के निर्माण के बीच हाल ही में लखनऊ से एक बेहद महत्वपूर्ण और रणनीतिक खबर सामने आई, जिसने राज्य के सियासी हलकों में नई बहस छेड़ दी है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तथा कॉकरोच जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता आशुतोष रांका के बीच लखनऊ में लगभग 90 मिनट यानी डेढ़ घंटे तक चली बंद कमरे की मैराथन मुलाकात ने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है। इस मुलाकात के मायने केवल एक शिष्टाचार भेंट तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह 2027 के महासमर से पहले उत्तर प्रदेश की युवा और छात्र राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है। आशुतोष रांका और अखिलेश यादव के बीच हुई इस चर्चा के केंद्र में मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के नौजवानों के मुद्दे, लगातार होती परीक्षाओं के पेपर लीक, बेरोजगारी, छात्रों की समस्याएं और उच्च शिक्षा में आ रही गिरावट जैसे विषय शामिल रहे। इसे भी पढ़ें: Uttar Pradesh BJP Regional Team 2027 | यूपी बीजेपी ने सभी छह क्षेत्रों की नई टीमों का किया ऐलान, सामाजिक समीकरण साधने पर जोर | Full List पार्टी के भीतर और बाहर इस मुलाकात को 'प्लान 2027' के एक अहम हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। दरअसल, उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया और बेहद जागरूक मतदाता वर्ग तैयार हो चुका है, जिसे राजनीतिक विश्लेषक 'जेन-जी' या पहली बार मतदान करने वाले युवा कहते हैं। यह युवा वर्ग पारंपरिक जातिगत राजनीति से ऊपर उठकर रोजगार, निष्पक्ष परीक्षाओं और आधुनिक अवसरों की मांग कर रहा है। अखिलेश यादव बखूबी जानते हैं कि केवल पारंपरिक मुस्लिम-यादव समीकरण या केवल सामान्य गठबंधनों के बूते भाजपा जैसी विशाल और साधन-संपन्न चुनावी मशीनरी को मात देना असंभव है। यही वजह है कि लोकसभा चुनाव में मिली सफलता के बाद सपा अब छोटे-छोटे वैचारिक समूहों, छात्र संगठनों और युवाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले चेहरों को अपने पाले में लाकर भाजपा के उस युवा वोट बैंक में सेंध लगाना चाहती है, जो कभी भगवा दल की सबसे बड़ी ताकत हुआ करता था। रांका और अखिलेश यादव की यह मुलाकात इस बात की तस्दीक करती है कि विपक्ष इस बार युवाओं के आक्रोश को एक ठोस राजनीतिक वोट बैंक में बदलने की मुकम्मल तैयारी कर चुका है। हालांकि, इस मुलाकात पर भाजपा ने भी फौरन तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। भाजपा प्रवक्ताओं का कहना है कि विपक्ष के पास कोई ठोस नीति या विकास का एजेंडा नहीं है, इसलिए वह केवल भ्रम फैलाने और छोटे-छोटे संगठनों के सहारे अपनी डूबती नैया बचाने का प्रयास कर रहा है। लेकिन राजनीति के जानकार इसे अलग नजरिए से देखते हैं। उनका मानना है कि उत्तर प्रदेश में जब भी कोई बड़ा सत्ता परिवर्तन हुआ है, उसके मूल में युवाओं और छात्रों का आंदोलन या उनका असंतोष ही रहा है। ऐसे में सीजेपी जैसी युवा केंद्रित ताकतों और सपा का करीब आना भविष्य के एक नए और बड़े सामाजिक-राजनैतिक मोर्चे की बुनियाद रख सकता है। यदि हम उत्तर प्रदेश की समूची राजनैतिक बिसात पर नजर डालें, तो इस समय सबसे बड़ा टकराव नैरेटिव यानी विमर्श गढ़ने को लेकर चल रहा है। समाजवादी पार्टी ने इस बार 'आरक्षण' और 'संविधान' को अपनी राजनीति के केंद्र में रख दिया है। 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष को 'संविधान बचाओ' के नारे से जो अप्रत्याशित लाभ मिला था, अखिलेश यादव उसे 2027 तक कायम रखना चाहते हैं। हालिया महीनों में उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरियों में आरक्षण की स्थिति, 69000 शिक्षक भर्ती का विवाद और पिछड़े-दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व को लेकर सपा ने एक आक्रामक रुख अख्तियार किया है। अखिलेश यादव लगातार जनसभाओं और सोशल मीडिया के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं कि वर्तमान सत्ताधारी दल दलितों और पिछड़ों के संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करने की साजिश रच रहा है। इस नैरेटिव के जरिए सपा सीधे तौर पर भाजपा के गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित वोट बैंक पर निशाना साध रही है, जिसने पिछले एक दशक से भाजपा की जीत में रीढ़ की हड्डी का काम किया है। सपा की इस रणनीति के जवाब में भारतीय जनता पार्टी भी खामोश नहीं बैठी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा ने अपनी संगठन मशीनरी को पूरी तरह से चुनावी मोड में डाल दिया है। भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका पन्ना प्रमुख और बूथ स्तर का ढांचा माना जाता है। पार्टी ने इस बार कागजी दावों को खारिज करते हुए हर एक बूथ कमेटी का भौतिक सत्यापन शुरू किया है। खासकर उन बूथों पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है, जहां पिछले चुनाव में विपक्ष को बढ़त मिली थी। इसके साथ ही, भाजपा सरकार अपनी कानून-व्यवस्था की सख्त छवि, बुनियादी ढांचे का विकास (जैसे एक्सप्रेसवे और औद्योगिक गलियारे) और केंद्र व राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों के एक बड़े नेटवर्क के भरोसे मैदान में उतर रही है। भाजपा का मानना है कि विकास और सुशासन का उनका यह 'डबल इंजन' मॉडल विपक्ष के जातिगत ध्रुवीकरण के प्रयासों को विफल कर देगा। लेकिन इस बार एनडीए गठबंधन के भीतर की आंतरिक खींचतान भी पूरी तरह सतह पर आ चुकी है। गठबंधन में शामिल छोटे दल जैसे निषाद पार्टी के डॉ. संजय निषाद, अपना दल (सोनेलाल) की अनुप्रिया पटेल और सुभासपा के ओम प्रकाश राजभर अपनी राजनीतिक जमीन बचाने और सीटों के सम्मानजनक बंटवारे के लिए भाजपा पर लगातार दबाव बना रहे हैं। हाल ही में एक सार्वजनिक मंच पर निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद के भावुक होने और आंसुओं के छलकने की घटना ने उत्तर प्रदेश की सियासत में भारी उबाल ला दिया था। जहां संजय निषाद ने इसे अपने समाज को हक न मिल पाने की पीड़ा बताया, वहीं अखिलेश यादव ने तुरंत इस पर तंज कसते हुए इसे भाजपा के साथ जाने का 'पश्चाताप और प्रायश्चित' करार दे दिया। यह घटना दर्शाती है कि निषाद और अन्य अति-पिछड़ी जातियों के वोट बैंक को लेकर दोनों पक्षों में कितनी जबर्दस्त रस्साकशी चल रही है। अखिलेश यादव ने साफ कर दिया है कि निषाद समाज भी उनके 'PDA' का एक अभिन्न हिस्सा है और यदि उनकी सरकार आती है, तो वे जातीय जनगणना कराकर हर समाज को उसका वास्तविक हक देंगे। दूसरी तरफ, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच का 'इंडिया' गठबंधन भी एक नाजुक मोड़ पर खड़ा है। यद्यपि अखिलेश यादव और कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने बार-बार यह दोहराया है कि 2027 का विधानसभा चुनाव दोनों दल मिलकर लड़ेंगे, लेकिन जमीनी स्तर पर सीटों के बंटवारे और प्रादेशिक नेतृत्व को लेकर दोनों दलों के स्थानीय नेताओं के बीच महत्वाकांक्षाओं का टकराव साफ दिखाई देता है। कांग्रेस जहां लोकसभा चुनाव के उत्साह के बाद उत्तर प्रदेश में अपने पुराने गौरव को हासिल करने के लिए अधिक सीटों की मांग कर रही है, वहीं समाजवादी पार्टी खुद को बड़े भाई की भूमिका में रखते हुए कांग्रेस को सीमित सीटों पर समेटने की रणनीति बना रही है। इसके अतिरिक्त, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती की खामोशी और उनकी अंदरूनी बैठकें भी इस त्रिकोणीय मुकाबले को और दिलचस्प बना रही हैं। मायावती अपने खिसकते दलित वोट बैंक को सहेजने के लिए नए सिरे से कैडर कैंप आयोजित कर रही हैं। यदि बसपा अपने पारंपरिक वोट को बचाने में सफल रहती है, तो इसका सीधा नुकसान सपा-कांग्रेस गठबंधन को उठाना पड़ सकता है, जिससे अंततः भाजपा को लाभ होने की संभावना बढ़ जाएगी। सियासत के इस खेल में शह और मात के मोहरे बिछ चुके हैं। जनता शांत है, लेकिन वह हर दल की चालों को बहुत बारीकी से देख रही है। रोजगार की तलाश में भटकता युवा, महंगाई से जूझता आम नागरिक और अपने अधिकारों के प्रति सजग होता जातियों का समूह ही अंततः यह तय करेगा कि 2027 में लखनऊ के सिंहासन पर किसका राजतिलक होगा। फिलहाल, राजनैतिक दलों की यह सरगर्मी और रणनीतिक मुलाकातों का दौर यह बताने के लिए काफी है कि उत्तर प्रदेश का आगामी चुनावी संग्राम बेहद रोमांचक, अप्रत्याशित और भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होने जा रहा है। - अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार
कॅरियर की अंधी दौड़ में हांफती युवा पीढ़ी!
भारत युवाओं का देश है। जाहिर है ऐसे देश की चिंताएं बहुत अलग होती हैं। उसकी ज्यादातर आबादी को शिक्षा, रोजगार और सुंदर जीवन की कामना होती है। उनकी महत्वाकाक्षाएं, अवसरों की होड़ और दौड़। पाने की खुशी और न मिलने का आक्रोश सब साझा होते हैं। करियर में सफल होने, जल्दी और ज्यादा पाने की कामनाएं इस दौर का मूल्य हैं। ऐसे में शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों को गहरी चुनौती है। संकट के बादल गहरे हैं। समाधान के सूत्र न्यूनतम। बदलती कार्य संस्कृति सरकारों में नौकरियों के दरवाजे सिकुड़ रहे हैं। ज्यादातर नौकरियां निजी क्षेत्रों में ही हैं। नौ से पांच बजे की पक्की नौकरियां अब स्वप्न ही हैं। उनकी जगह गिग इकोनामी (फ्री लांस, कांट्रैक्ट वर्क) ने ले ली है। आर्थिक स्वतंत्रता की तो छोड़िए यह माडल भविष्य की अनिश्चितता और वित्तीय अस्थिरता भी ला रहा है, जिसके नाते बढ़ता मानसिक तनाव और अवसाद संकट को गहरा कर रहा है। हिंदुस्तान अलग तरह से चलता रहा है। परिवार इसकी प्राणवायु रहे हैं। परिवार का कोई एक आदमी नौकरी पर रहता था, शेष अपने घर-इलाके-गांव में बैठकर स्थानीय स्तर पर जो कर सकते थे करते थे। परिवार की छाया में सुरक्षा थी, संरक्षण था, बच्चों को संस्कारित करने के पारिवारिक उपक्रम थे। नई व्यवस्था ने एक परिवार में कई परिवार खड़े कर दिए हैं। इससे एक की जगह अब चार परिवार, चार चूल्हे और चार व्यवस्थाएं खड़ी करनी पड़ रही है। आप कितना भी कमा रहे हैं वह कम ही है। इसने नई पीढ़ी को ईएमआई के दुष्चक्र में फंसा कर नई व्यवस्थाओं का गुलाम बना दिया है। परिवार व्यवस्था भारत की संस्कृति का आधार रही है। वह संस्कारशाला भी है। इसे भी पढ़ें: तेजी से बदल रही है भारत की तस्वीर कार्य और जीवन का संतुलन कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने हमारे सामने नई चुनौतियां पेश की हैं। वे बेहतर सहायक से ज्यादा तनाव के वाहक हैं। युवाओं में एआई के कारण नौकरियां जाने और खुद के अप्रासंगिक हो जाने का भय बैठ गया है। वे इस पूरे दृश्य को बहुत चिंता से देख रहे हैं। री-स्किलिंग का दबाव उन्हें गहरे भय में डाल रहा है। इससे मानसिक थकान होना स्वाभाविक ही है। इस समय सबसे बड़ी चिंता कार्य और जीवन संतुलन की है। वर्क फ्राम होम और डिजिटल कनेक्टिविटी ने सारा कुछ बदलकर रख दिया है। काम के घंटे अब प्रायः 24 घंटे ही हैं। देर रात तक ई-मेल, रिर्पोट्स और मैसेज का जवाब देते हुए युवा ‘आलवेज आन’ मोड में रहते हैं। जिससे पारिवारिक जीवन, व्यक्तिगत समय और नींद सब प्रभावित हो रही है। बर्नआउट की बढ़ती दर, काम के अनिश्चित घंटे, स्पर्धा का वातावरण और टारगेट पूरे करने का दबाव साथ चलता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन(डब्लूएचओ) ने बर्नआउट को प्रोफेशनल बीमारी मान लिया है। यह अब भारतीय कारपोरेट जगत में एक अनिवार्य समस्या बन गयी है। सोशल मीडिया से बनती छवियां सोशल मीडिया ने समाज में अलग तरह की स्पर्धा की छवियां प्रस्तुत की हैं। अपने सुखद, आनंद के क्षणों को वायरल करने की बीमारी दूसरे की पीड़ा का कारण बन जाती है। किसी की बड़ी पदस्थापना, उसकी पार्टियां, रील्स, पर्यटन की तस्वीरें, महंगी जीवनशैली का विज्ञापन करना, सफलताओं के हाईलाइट्स देखकर तुलना और स्पर्धा की बातें तेज होती हैं। इससे हीनभावना और तनाव का जन्म भी होता है। परिजन और बच्चे भी अपने पालकों से ऐसी ही जीवन शैली की अपेक्षा करते हैं। ऐसे समय में युवाओं के लिए तनाव प्रबंधन की विधियां समझने और उन्हें जीवन की ठोस सच्चाइयों से जोड़ने की जरूरत है। योग, ध्यान के अनेक अभ्यास जीवन में शांति ला सकते हैं। जिंदगी के हमारे दृष्टिकोण में परिवर्तन ला सकते हैं। रील्स की तुरंतवादी जीवनशैली और जीवन के सतत संघर्ष को समझने की जरुरत है।सोशल मीडिया से प्रक्षेपित हो रही छवियों से प्रभावित होने के बजाए, लोगों के संघर्ष और उससे उपजी सफलताओं के पाठ भी पढ़े जाने चाहिए। उद्यमिता और उसके जोखिम नए समय ने युवाओं को उद्यमिता के गुर दिए हैं। यह पीढ़ी जोखिम उठाने और सफलताओं के नए शिखर छूने वाली पीढ़ी है। इसके मंत्र अलग हैं। वे जल्दी से सफलताओं के नए क्षितिज को छूना चाहते हैं। छू भी रहे हैं। कम आयु में उनकी सफलताएं विस्मित करने वाली हैं। उनके स्टार्टअप धूम मचा रहे हैं। सफलता की बड़ी कहानियां लिख रहे हैं। प्रेरित कर रहे हैं। इसके दूसरे पक्ष का विचार भी जरूरी है। हमें पता है कि 90 प्रतिशत से अधिक स्टार्टअप शुरुआती सालों में ही अन्यान्य कारणों से विफल हो जाते हैं। विफलता का डर, निवेशकों का दबाव, फंडिंग का संकट संस्थापकों और शुरुआती कर्मचारियों में मानसिक तनाव पैदा कर ही देता है। इतने बड़े देश में हर साल लाखों युवा हाथ काम मांगने के लिए खड़े हो जाते हैं। उनके पास डिग्रियां भी होती हैं। किंतु वे कौशल युक्त नहीं होते। वे डिग्रीधारी हैं किंतु किसी काम के नहीं हैं। बाजार की जरूरतें अलग हैं, उनके कौशल अलग हैं। ऐसे में बहुत योग्य लोगों को भी अपेक्षित नौकरी नहीं मिल पाती, अच्छे वेतन की तो जाने ही दीजिए। युवाओं के ज्यादातर संकट वास्तविक हैं। वे जानकारी से भरपूर हैं, उनके पास अवसरों का जनतंत्र है। आकांक्षाओं की बाढ़ है। वे सूचनाओं से लदे-फंदे हैं। यह ज्यादा सूचनाएं भी दुख और भ्रम का कारण बन रही हैं। आकांक्षाओं का बड़ा आकाश उतनी ही गहरी निराशा लेकर लाता है। यह साधारण नहीं है कि आईआईटी के विद्यार्थी आत्महत्या कर रहे हैं। ऐसे प्रतिभाशाली विद्यार्थियों का अवसान उनके परिवार,देश और समाज के लिए भी बड़ी क्षति है । परीक्षाओं में मिलती असफलताएं, लीक होते प्रश्नपत्र, परीक्षाओं की नष्ट होती शुचिता, सरकारी- प्रशासनिक तंत्र की कदाचार रोकने की विफलताओं ने युवाओं को गहरी चिंताएं दी हैं। शिक्षा के निजीकरण और उससे उपजे बाजारीकरण ने हालात बहुत बदल दिए हैं। महंगी शिक्षा के लिए परिवार कर्ज में डूब रहे हैं। प्रतिभा पलायन का संकट तो है ही। समाज में यह बात बहुत गहरे पैठ रही है इस देश में प्रतिभाशाली युवाओं की जगह नहीं बची है। यह तथ्य नहीं किंतु गहराई से फैलती धारणा है। आप बिना जुगाड़ के इस व्यवस्था में सफल नहीं हो सकते। किसी राष्ट्र जीवन में ऐसी धारणाएं ठीक नहीं हैं। हमें समझना होगा कि राष्ट्र से हम सबकी सामूहिक आकांक्षाएं,साझे प्रयासों से ही फलीभूत होंगी। भारत की आजादी के आठ दशक अभूतपूर्व प्रगति, एकत्व और जीवंत लोकतंत्र के प्रमाण हैं। हर राष्ट्र जीवन में चुनौतियां होती हैं, उससे जूझकर हम अपने संकटों का हल खोजते हैं। देश की युवा पीढ़ी भी अपने संकटों के बीच इस राष्ट्र जीवन के समक्ष उपस्थित प्रश्नों के ठोस और वाजिब हल जरुर तलाशेगी। युवा शक्ति की तेजस्विता, नवाचारों और आत्मविश्वास को देखकर यह विश्वास सहज ही होता है। - प्रो. संजय द्विवेदी (लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)
शिक्षकों संग पीएम मोदी की खास बातचीत, पब्लिक स्पीकिंग पर मांगे टिप्स, बच्चों की 'रिपोर्टिंग स्किल्स' पर भी ली चुटकी
China के सैन्य मॉडल की राह पर Pakistan! 50 साल बाद किए बड़े बदलाव, India के लिए क्या हैं मायने?
अब पाकिस्तान भी चीन के सैन्य मॉडल की राह पर चल पड़ा है। करीब पांच दशकों बाद पाकिस्तान ने अपने सैन्य कमांड ढांचे में बड़ा बदलाव करते हुए सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच समन्वित कमान को नई दिशा देने की कोशिश की है। इस पुनर्गठन का सबसे बड़ा फायदा फील्ड मार्शल असीम मुनीर को मिलता दिखाई दे रहा है, जिनके हाथों में पाकिस्तान की सैन्य व्यवस्था की ताकत पहले से कहीं अधिक केंद्रित हो सकती है। यह बदलाव केवल प्रशासनिक फेरबदल नहीं, बल्कि पाकिस्तान की सैन्य शक्ति, रणनीतिक हथियारों और युद्धकालीन फैसलों को अधिक केंद्रीकृत करने की व्यापक कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। हम आपको बता दें कि नए कानूनों और संवैधानिक बदलावों के बाद पाकिस्तान में चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज (CDF) की व्यवस्था को मजबूत किया गया है। असीम मुनीर पहले से सेना प्रमुख हैं और अब तीनों सेनाओं यानि थल सेना, नौसेना और वायुसेना, के बीच समन्वित कमान के केंद्र में भी हैं। पुरानी व्यवस्था में ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी का पद तीनों सेनाओं के बीच समन्वय की भूमिका निभाता था, लेकिन नई व्यवस्था में कमान का केंद्र और अधिक स्पष्ट रूप से एक व्यक्ति के आसपास सिमट गया है। इसे भी पढ़ें: SCO के मंच से चीन और पाकिस्तान को एक साथ धोकर मोदी ने दुनिया की वाहवाही लूट ली यही इस बदलाव का सबसे बड़ा संदेश है कि पाकिस्तान की सत्ता व्यवस्था में सेना अब केवल सबसे ताकतवर संस्था नहीं रहना चाहती, बल्कि अपनी ताकत को कानून और संस्थागत ढांचे के जरिए स्थायी रूप देना चाहती है। रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान ने अपने रणनीतिक सैन्य ढांचे को भी नए सिरे से संगठित करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। नेशनल स्ट्रैटेजिक कमांड जैसी व्यवस्था के जरिए परमाणु हथियारों, मिसाइल क्षमताओं और अन्य रणनीतिक संसाधनों की कमान को अधिक केंद्रीकृत करने की कोशिश की जा रही है। इससे पाकिस्तान के सामरिक निर्णयों में सेना की भूमिका और मजबूत होती दिखाई देती है। हम आपको बता दें कि पाकिस्तान का यह नया मॉडल चीन की सैन्य संरचना से भी प्रभावित माना जा रहा है। सेना, नौसेना, वायुसेना, मिसाइल और रणनीतिक क्षमताओं को एकीकृत कमान के तहत लाने की सोच का उद्देश्य युद्ध या संकट की स्थिति में तेज फैसले और संयुक्त सैन्य कार्रवाई बताया जा रहा है। पाकिस्तान लंबे समय से अपनी सैन्य क्षमताओं के आधुनिकीकरण में चीन के साथ सहयोग बढ़ाता रहा है और नया कमांड मॉडल भी उसी व्यापक रणनीतिक दिशा का हिस्सा माना जा रहा है। लेकिन भारत के लिए सवाल यह है कि क्या असीम मुनीर के हाथों में अधिक शक्ति आने से खतरा बढ़ जाएगा? देखा जाए तो इसका जवाब केवल हां या नहीं में नहीं दिया जा सकता। पाकिस्तान की सैन्य संरचना में केंद्रीकरण निश्चित रूप से भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक घटनाक्रम है। एकीकृत कमान से पाकिस्तान सीमित युद्ध, मिसाइल संचालन और बहु-क्षेत्रीय सैन्य अभियानों में बेहतर समन्वय की कोशिश कर सकता है। खासतौर पर भारत की पश्चिमी सीमा के संदर्भ में पाकिस्तान अपनी सैन्य तैयारी को अधिक संगठित करने का प्रयास करेगा। लेकिन पाकिस्तान को यह भ्रम पालने की जरूरत नहीं है कि कमांड स्ट्रक्चर बदलने से जमीन पर उसकी सामरिक वास्तविकता भी बदल जाएगी। भारत के सामने पाकिस्तान की चुनौती केवल हथियारों या पदों की नहीं है। भारत के पास कहीं अधिक व्यापक सैन्य, आर्थिक और तकनीकी क्षमता है। आधुनिक युद्ध केवल सैनिकों और मिसाइलों की संख्या से तय नहीं होते। अर्थव्यवस्था, रक्षा उत्पादन, तकनीक, खुफिया क्षमता, साइबर शक्ति, अंतरिक्ष क्षमता और राजनीतिक स्थिरता, ये सभी युद्ध शक्ति के महत्वपूर्ण आधार हैं। यहीं पाकिस्तान की सबसे बड़ी कमजोरी सामने आती है। एक तरफ पाकिस्तान सैन्य कमान को मजबूत और केंद्रीकृत कर रहा है, दूसरी तरफ उसकी अर्थव्यवस्था लगातार दबाव में है। देश राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक संकट और आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों से जूझता रहा है। बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा जैसे क्षेत्रों में सुरक्षा समस्याएं अलग हैं। ऐसे में केवल सेना प्रमुख के हाथों में अधिक अधिकार देने से पाकिस्तान की मूल समस्याएं समाप्त नहीं हो जाएंगी। यहां एक सवाल यह भी है कि क्या सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण पाकिस्तान की संस्थाओं को और कमजोर करेगा? देखा जाए तो पाकिस्तान का इतिहास बताता है कि वहां सेना और निर्वाचित सरकार के बीच शक्ति संतुलन हमेशा विवाद का विषय रहा है। अब यदि सैन्य कमान, रणनीतिक हथियारों और तीनों सेनाओं के समन्वय की शक्ति एक ही शीर्ष सैन्य नेतृत्व के इर्द-गिर्द केंद्रित होती है, तो नागरिक नियंत्रण को लेकर सवाल और गहरे होंगे। उधर, भारत को इस घटनाक्रम पर नजर जरूर रखनी होगी, हालांकि चिंता की कोई वजह नहीं है। क्योंकि नई कमान व्यवस्था से पाकिस्तान की सैन्य योजनाओं में तेजी और समन्वय आ सकता है, लेकिन भारत की रणनीतिक तैयारी भी अब पुरानी नहीं रही। नई दिल्ली के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पाकिस्तान की किसी भी सैन्य पुनर्संरचना का जवाब बयानबाजी से नहीं, बल्कि बेहतर तैयारी, मजबूत खुफिया तंत्र, आधुनिक तकनीक और निर्णायक सैन्य क्षमता से दिया जाए। असीम मुनीर के हाथों में ज्यादा ताकत आना पाकिस्तान के लिए शक्ति प्रदर्शन हो सकता है, लेकिन भारत के लिए यह एक स्पष्ट संकेत है कि पड़ोसी देश अपनी सैन्य संरचना को नए सिरे से ढाल रहा है। साथ ही पाकिस्तान को भी यह समझ लेना चाहिए कि पदों की ताकत और वास्तविक राष्ट्रीय शक्ति में बड़ा अंतर होता है। सेना प्रमुख को अधिक अधिकार देने से न अर्थव्यवस्था मजबूत होती है, न राजनीतिक संकट खत्म होता है और न ही सैन्य दुस्साहस की कीमत कम हो जाती है। बहरहाल, नई कमान, नया ढांचा और नए पद पाकिस्तान की सैन्य व्यवस्था को बदल सकते हैं, लेकिन दक्षिण एशिया की सामरिक सच्चाई नहीं बदल सकते। भारत तैयार है, सतर्क है और अपनी सुरक्षा के खिलाफ किसी भी चुनौती का जवाब देने की क्षमता रखता है। नीरज कुमार दुबे
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सैक्सनी-अनहाल्ट में 6 सितंबर को मतदान होना है. चुनाव से पहले के रुझानों में धुर-दक्षिणपंथी पार्टी ‘एएफडी’ को 40 फीसदी से ज्यादा समर्थन मिलता दिख रहा है
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मुंबई, भारतीय शेयर बाजार गुरुवार के कारोबारी सत्र में गिरावट के साथ बंद हुआ।
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नई दिल्ली, भारत के सर्विसेज सेक्टर में अगस्त में जोरदार वृद्धि देखने को मिली है और एचएसबीसी इंडिया सर्विसेज पीएमआई बढ़कर 54.1 पर पहुंच गया है।
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मामले ने उस समय और राजनीतिक रंग ले लिया, जब पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर राघव चड्ढा को लेकर तंज कसा। उन्होंने SIR प्रक्रिया के तहत बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने का भी उल्लेख किया।
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'देश में कानून का राज, अब न्याय मिलेगा,' दिशा सालियान केस पर भाजपा विधायक का बयान
पालघर, 3 सितंबर (आईएएनएस)। महाराष्ट्र की सियासत में दिशा सालियान केस की सीबीआई जांच को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। इस मामले को लेकर वसई-विरार की भाजपा विधायक स्नेहा दुबे पंडित ने कहा कि न्याय व्यवस्था पर उन्हें पूरा भरोसा है और यह फैसला दिशा सालियान को न्याय दिलाने की दिशा में बड़ा कदम है।
संवैधानिक अधिकारियों के इस्तीफे पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र से मांगा जवाब
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सीएम फडणवीस ने राष्ट्रीय राजनीति में जाने की संभावना को किया खारिज, कहा - 2029 तक महाराष्ट्र में ही रहूंगा
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही: केवल सिंह ढिल्लों
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कश्मीरी पंडितों को धमकी पर शिवसेना सख्त, कहा- सुरक्षा सुनिश्चित करे उमर सरकार
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हीरे से लेकर हथियारों तक, Belgium के साथ मिलकर Modi ने Europe के लिए बनाया बड़ा गेम प्लान
भारत और बेल्जियम के रिश्तों की सबसे चमकदार पहचान हीरे रहे हैं। एंटवर्प से मुंबई और सूरत तक फैला कारोबार दोनों देशों को जोड़ता रहा है। लेकिन अब यह रिश्ता सिर्फ चमकते हीरों तक सीमित नहीं रहने वाला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डी वेवर की नई दिल्ली में हुई मुलाकात ने भारत-बेल्जियम संबंधों को रक्षा, सेमीकंडक्टर, हरित ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, समुद्री सुरक्षा, अंतरिक्ष, साइबर सुरक्षा और निवेश जैसे रणनीतिक क्षेत्रों तक विस्तार देने का स्पष्ट रोडमैप तैयार कर दिया है। बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डी वेवर की 2 से 4 सितंबर की भारत यात्रा और दोनों देशों के बीच हुए समझौते इस बात का संकेत हैं कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत यूरोप के साथ अपने संबंधों को नई सामरिक गहराई दे रहा है। प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि भारत अब द्विपक्षीय संबंधों को अलग-अलग घटनाओं के रूप में नहीं, बल्कि व्यापार, सुरक्षा, प्रौद्योगिकी और वैश्विक राजनीति को जोड़कर एक व्यापक रणनीतिक ढांचे में आगे बढ़ा रहा है। इतिहास की साझी विरासत, भविष्य की रणनीतिक साझेदारी हम आपको बता दें कि भारत-बेल्जियम संबंधों की जड़ें गहरी हैं। प्रथम विश्व युद्ध में फ्लैंडर्स के युद्धक्षेत्रों में 9,000 से अधिक भारतीय सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया था। बेल्जियम स्वतंत्र भारत के साथ 1947 में राजनयिक संबंध स्थापित करने वाले शुरुआती यूरोपीय देशों में शामिल था। अब 2027 में दोनों देश अपने राजनयिक संबंधों की 80वीं वर्षगांठ मनाएंगे। प्रधानमंत्री डी वेवर ने भारत यात्रा की शुरुआत राजघाट पर महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि देकर की। यह प्रतीकात्मक घटना उस रिश्ते की ओर इशारा करती है जिसकी बुनियाद लोकतंत्र, कानून के शासन, बहुलवाद और आपसी विश्वास पर टिकी है। इसे भी पढ़ें: SCO के मंच से चीन और पाकिस्तान को एक साथ धोकर मोदी ने दुनिया की वाहवाही लूट ली लेकिन इस बार इतिहास से अधिक महत्वपूर्ण भविष्य है। 15 जुलाई 2026 को ब्रुसेल्स में शुरू हुआ पहला भारत-बेल्जियम रणनीतिक संवाद अब दोनों देशों के संबंधों को नियमित और व्यापक संस्थागत आधार देगा। इसके तहत व्यापार और निवेश से लेकर हरित परिवर्तन, प्रौद्योगिकी, संपर्क, रक्षा और सुरक्षा तक सहयोग के लिए एक स्थायी मंच तैयार किया गया है। भारत-ईयू समीकरण में बेल्जियम की बढ़ती अहमियत इस यात्रा का सबसे बड़ा वैश्विक महत्व भारत-यूरोपीय संघ संबंधों से जुड़ा है। जनवरी 2026 में भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौते की वार्ता का सफल निष्कर्ष एक ऐतिहासिक घटनाक्रम माना जा रहा है। मोदी और डी वेवर ने इसके शीघ्र क्रियान्वयन पर जोर दिया है। भारत और यूरोपीय संघ दुनिया की दो बड़ी लोकतांत्रिक और आर्थिक शक्तियां हैं। ऐसे समय में जब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं भू-राजनीतिक तनाव, युद्ध और आर्थिक प्रतिस्पर्धा से प्रभावित हैं, भारत-ईयू आर्थिक साझेदारी का विस्तार केवल व्यापारिक मामला नहीं है। यह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को चीन-केंद्रित निर्भरता से बाहर निकालने और अधिक विविध तथा सुरक्षित व्यवस्था बनाने की रणनीति भी है। बेल्जियम इस समीकरण में विशेष भूमिका निभा सकता है। एंटवर्प यूरोप के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक और बंदरगाह केंद्रों में है। दूसरी ओर भारत हिंद महासागर क्षेत्र में एक विशाल बाजार और तेजी से उभरती आर्थिक शक्ति है। दोनों देशों का सहयोग यूरोप और भारत के बीच एक नए आर्थिक एवं लॉजिस्टिक गलियारे की नींव बन सकता है। पांच साल में व्यापार दोगुना करने का लक्ष्य दोनों प्रधानमंत्रियों ने अगले पांच वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए इंडिया-बेल्जियम इन्वेस्टमेंट फास्ट-ट्रैक मैकेनिज्म शुरू किया गया है, जो निवेश संबंधी बाधाओं को दूर करने और कंपनियों को सहायता देने का काम करेगा। बेल्जियम की संप्रभु निवेश संस्था एसएफपीआईएम और भारत के नेशनल इन्वेस्टमेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर फंड यानि एनआईआईएफ के बीच सहयोग से एक संभावित भारत-बेल्जियम आर्थिक और निवेश गलियारे की दिशा में भी काम होगा। सहयोग के नए क्षेत्रों की सूची बेहद महत्वपूर्ण है। इसमें सेमीकंडक्टर, फार्मास्यूटिकल्स, जैव प्रौद्योगिकी, रसायन, रक्षा विनिर्माण, महत्वपूर्ण खनिजों की रिफाइनिंग और रिसाइक्लिंग, परमाणु ऊर्जा और उन्नत विनिर्माण शामिल हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने साफ कहा कि बेल्जियम की सेमीकंडक्टर विशेषज्ञता और भारत का विशाल औद्योगिक पैमाना एक-दूसरे के पूरक हैं। बेल्जियम के विश्वस्तरीय आईमेक संस्थान को भारत के सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम से जोड़ने की पहल भविष्य में तकनीकी आत्मनिर्भरता के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। रक्षा सहयोग: रिश्तों का सबसे बड़ा रणनीतिक बदलाव इसके अलावा, भारत-बेल्जियम संबंधों में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव रक्षा और सुरक्षा के क्षेत्र में दिखाई देता है। दोनों देशों के रक्षा मंत्रालयों के बीच हस्ताक्षरित लेटर ऑफ इंटेंट नियमित सैन्य संवाद, स्टाफ वार्ता, प्रशिक्षण, अनुसंधान और रक्षा औद्योगिक साझेदारी का ढांचा तैयार करेगा। दोनों देश रक्षा सह-विकास और सह-उत्पादन की संभावनाएं तलाशेंगे। प्रधानमंत्री मोदी ने उन्नत रक्षा उपकरणों, विशेष रूप से जोरावर टैंक जैसे क्षेत्रों में सहयोग का उल्लेख किया। साथ ही बेल्जियम का नई दिल्ली में रक्षा अताशे नियुक्त करना और भारत का ब्रुसेल्स में स्थायी रक्षा अताशे नियुक्त करने का फैसला रिश्तों की बदलती प्राथमिकताओं का स्पष्ट संकेत है। बेल्जियम का युद्धपोत एलईओपोल्ड 1 नवंबर 2026 को भारत आएगा। यह मात्र नौसैनिक दौरा नहीं, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ते सहयोग का संकेत है। इसके अलावा, भारत और बेल्जियम ने आतंकवाद के खिलाफ भी मजबूत साझा रुख अपनाया है। बेल्जियम ने पहलगाम में 2025 के आतंकी हमले की निंदा दोहराई और सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ भारत के साथ एकजुटता दिखाई। दोनों देशों ने आतंकवाद, उसके सुरक्षित ठिकानों और वित्तपोषण के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया। वहीं, सीबीआई और बेल्जियम की संघीय पुलिस के बीच समझौता संगठित अपराध और साइबर अपराध के खिलाफ सहयोग को नई ताकत देगा। सूचना साझा करने, भगोड़ों का पता लगाने और क्षमता निर्माण में यह समझौता महत्वपूर्ण होगा। ग्रीन हाइड्रोजन से समुद्री शक्ति तक साथ ही हरित ऊर्जा सहयोग भी इस यात्रा की बड़ी उपलब्धि है। नवीकरणीय ऊर्जा पर नए एमओयू के तहत ग्रीन हाइड्रोजन, सौर ऊर्जा, ऊर्जा भंडारण, अपतटीय पवन ऊर्जा, बायो-एनर्जी और पंप्ड स्टोरेज में सहयोग बढ़ेगा। ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन से लेकर परिवहन, भंडारण और अंतिम उपयोग तक पूरी वैल्यू चेन में साझेदारी की योजना बनाई गई है। प्रधानमंत्री मोदी ने आंध्र प्रदेश के काकीनाडा में विकसित हो रहे विशाल ग्रीन अमोनिया प्रोजेक्ट का भी उल्लेख किया। समुद्री और बंदरगाह सहयोग भी सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। एंटवर्प और फ्लैंडर्स की बंदरगाह विशेषज्ञता, भारत के तेजी से विकसित होते बंदरगाह नेटवर्क और हिंद महासागर में भारत की भूमिका मिलकर नई संभावनाएं पैदा कर सकती हैं। लॉजिस्टिक्स, ड्रेजिंग, बंदरगाह विकास और अपतटीय पवन ऊर्जा में बेल्जियम की विशेषज्ञता भारत के लिए उपयोगी हो सकती है। वैश्विक राजनीति में साझा संदेश इसके अलावा, दोनों नेताओं ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की जरूरत पर जोर दिया। बेल्जियम ने एक बार फिर विस्तारित और सुधारित सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन किया। दोनों देशों ने एक-दूसरे की अस्थायी सदस्यता की उम्मीदवारी का भी समर्थन किया। यूक्रेन और पश्चिम एशिया पर दोनों देशों ने संवाद और कूटनीति के जरिए न्यायपूर्ण और स्थायी शांति की आवश्यकता पर जोर दिया। यह भारत की उस विदेश नीति के अनुरूप है जो किसी सैन्य गुट का हिस्सा बनने के बजाय संवाद, बहुपक्षवाद और रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता देती है। मोदी की कूटनीति का बड़ा संदेश देखा जाये तो भारत-बेल्जियम संबंधों का नया अध्याय प्रधानमंत्री मोदी की व्यापक कूटनीतिक सोच को दर्शाता है। मोदी ने पुराने हीरा व्यापार को आधुनिक रणनीतिक साझेदारी में बदलने का प्रयास किया है। अब एंटवर्प-मुंबई-सूरत का संबंध सेमीकंडक्टर, ग्रीन हाइड्रोजन, रक्षा उत्पादन, समुद्री संपर्क और निवेश से जुड़ रहा है। यही इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि भारत ने यूरोप के साथ अपने संबंधों को केवल बाजार तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें सुरक्षा, तकनीक और भू-राजनीति से जोड़ दिया है। प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीति की सफलता इस बात में है कि भारत आज एक साथ अमेरिका, यूरोप, रूस और ग्लोबल साउथ के साथ अपने हितों के आधार पर संबंधों को आगे बढ़ा रहा है। बेल्जियम के साथ यह नई साझेदारी भी उसी संतुलित और बहुआयामी कूटनीति का उदाहरण है। बहरहाल, हीरों की चमक से शुरू हुआ भारत-बेल्जियम संबंध अब हाई-टेक, हरित ऊर्जा और रक्षा सहयोग की नई रोशनी में प्रवेश कर रहा है। यदि तय समझौते जमीन पर उतरे, तो यह साझेदारी केवल दो देशों के रिश्तों को नहीं, बल्कि भारत-यूरोप के पूरे रणनीतिक समीकरण को नई दिशा दे सकती है। -नीरज कुमार दुबे
'मैं इन युवाओं के साथ खड़ा हूं', बिहार छात्र आंदोलन के घायलों से मिले राहुल गांधी
'मैं इन युवाओं के साथ खड़ा हूं', बिहार छात्र आंदोलन के घायलों से मिले राहुल गांधी
राम मंदिर ट्रस्ट के सीईओ के तौर पर जितेंद्र मिश्रा की नियुक्ति पर एनडीए नेता बोले-'ऑपरेशन सिंदूर संभाला था, पारदर्शिता लाएंगे'
उत्तरप्रदेश की आध्यात्मिक राजधानी अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण भारतीय राजनीति के सबसे लंबे और निर्णायक अध्यायों में से एक रहा है। इस मंदिर आंदोलन ने भारतीय राजनीति की दिशा बदली, भाजपा को राष्ट्रीय सत्ता के केंद्र तक पहुंचाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई और अंततः 22 जनवरी 2024 को रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा के साथ आंदोलन का सबसे बड़ा प्रतीकात्मक लक्ष्य पूरा हुआ। लेकिन इतिहास का दिलचस्प मोड़ यह है कि मंदिर बनने के बाद असली प्रशासनिक चुनौती शुरू हुई है, जिसके दृष्टिगत 2 सितंबर 2026 को श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने सेवानिवृत्त एयर मार्शल जितेंद्र कुमार मिश्र को अपना पहला पूर्णकालिक CEO नियुक्त किया। इसलिए मिश्र की नियुक्ति के पीछे छिपे महत्वपूर्ण प्रशासनिक व सियासी संदेश को समझना होगा। इसे भी पढ़ें: Operation Sindoor से अयोध्या तक: कौन है राम मंदिर ट्रस्ट के नए CEO एयर मार्शल जीतेंद्र मिश्रा, क्या होगी जिम्मेदारी मसलन, लगभग 5,585 आवेदनों में से बहुस्तरीय चयन प्रक्रिया के बाद तीन नामों के पैनल में से उनका चयन हुआ। मिश्र अप्रैल 2026 में भारतीय वायुसेना के पश्चिमी वायु कमान के प्रमुख पद से सेवानिवृत्त हुए थे और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उनकी भूमिका के कारण राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित रहे। सवाल इसलिए बड़ा है कि राम मंदिर जैसे धार्मिक-सांस्कृतिक संस्थान का CEO एक पूर्व शीर्ष सैन्य कमांडर ही क्यों? और उससे भी बड़ा सवाल यह कि क्या यह सिर्फ प्रशासनिक नियुक्ति है या अयोध्या के लिए तैयार किए जा रहे किसी बड़े संस्थागत मॉडल का संकेत? मेरे अनुभवजन्य आकलन में इसके कम-से-कम सात बड़े प्रशासनिक व सियासी संदेश हैं, जो इसप्रकार हैं:- पहला, राम मंदिर अब ‘आंदोलन’ नहीं, ‘सुव्यवस्थित संस्थान’ है: राम मंदिर आंदोलन के समय सबसे बड़ी आवश्यकता राजनीतिक-सामाजिक लामबंदी की थी, जबकि मंदिर निर्माण के बाद आवश्यकता बदल गई है। अब करोड़ों श्रद्धालुओं की व्यवस्था, दर्शन प्रणाली, सुरक्षा, दान, वित्त, कर्मचारियों, तकनीक, निर्माण, यातायात और अंतरराष्ट्रीय धार्मिक पर्यटन का प्रबंधन करना है। इसलिए CEO की नियुक्ति मूलतः इस बात की घोषणा है कि राम मंदिर अब केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि एक विशाल संस्थागत व्यवस्था है। खासकर यह परिवर्तन भाजपा और संघ परिवार के लिए भी महत्वपूर्ण है। जिस राम मंदिर ने राजनीतिक आंदोलन को ऊर्जा दी, वही मंदिर अब शासन और प्रशासन की क्षमता की परीक्षा का केंद्र बनने जा रहा है। दूसरा, ‘संत-आधारित प्रबंधन’ से ‘प्रोफेशनल मैनेजमेंट’ की ओर अग्रसर है: राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की मूल प्रकृति धार्मिक-सामाजिक है। लेकिन मंदिर के बढ़ते आकार और महत्व के साथ केवल पारंपरिक न्यास व्यवस्था पर्याप्त नहीं रह सकती। शायद CEO का पद बनाना इसी बदलाव का संकेत है। और CEO के लिए पूर्व एयर मार्शल का चयन और भी स्पष्ट संदेश देता है कि- संस्था को अब कॉरपोरेट-जैसी प्रशासनिक दक्षता, सैन्य-जैसी अनुशासनात्मक क्षमता और आधुनिक प्रबंधन की आवश्यकता महसूस हो रही है। मिश्र के चयन की प्रक्रिया भी असाधारण थी—5,585 आवेदन, 1,580 योग्य/उपयुक्त उम्मीदवार, 108 ऑनलाइन इंटरैक्शन, 16 आमने-सामने के उम्मीदवार और अंततः तीन नामों का पैनल। चयन समिति ने नेतृत्व, प्रबंधन अनुभव, ईमानदारी और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय महत्व की संस्था को संचालित करने की दृष्टि जैसे पहलुओं का मूल्यांकन किया। अर्थात संदेश साफ है कि अब राम मंदिर के प्रशासन में ‘कौन है?’ से ज्यादा महत्वपूर्ण ‘क्या कर सकता है?’ होने जा रहा है। तीसरा, ऑपरेशन सिंदूर से अयोध्या तक ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ से ‘राष्ट्रीय संस्कृति’ का सेतु है यह निर्णय: जितेंद्र मिश्र की नियुक्ति का सबसे प्रतीकात्मक पक्ष यही है कि जिस अधिकारी ने पश्चिमी वायु कमान का नेतृत्व किया और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सैन्य अभियानों की कमान से जुड़े रहे, वही अब राम मंदिर के प्रशासन का नेतृत्व करेंगे। उन्हें सर्वोत्तम युद्ध सेवा पदक से भी सम्मानित किया गया है। इसका अर्थ निकालने में सावधानी जरूरी है। यह कहना जल्दबाजी होगी कि सरकार या ट्रस्ट ने जानबूझकर ‘राष्ट्रीय सुरक्षा मॉडल’ को मंदिर प्रशासन में उतारने का निर्णय लिया है। लेकिन प्रतीकात्मक अर्थ को नकारना भी मुश्किल है। सीमा की रक्षा करने वाले सैन्य कमांडर से लेकर देश की सांस्कृतिक अस्मिता के सबसे बड़े प्रतीक के प्रबंधन तक की यात्रा— अपने आप में एक शक्तिशाली राजनीतिक प्रतीक है। यह संदेश भी पढ़ा जा सकता है कि अयोध्या को अब केवल धार्मिक नगर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय महत्व के सांस्कृतिक-सुरक्षा परिसर के रूप में विकसित करने की तैयारी है। चौथा, चढ़ावा विवाद के बाद ‘विश्वास’ की पुनर्स्थापना होगी: इस नियुक्ति के समय को सबसे अधिक गंभीरता से देखना होगा। राम मंदिर के चढ़ावे से जुड़े कथित वित्तीय अनियमितता मामले में गिरफ्तारियां हुईं और ट्रस्ट के प्रशासन पर सवाल उठे। हालिया ट्रस्ट बैठक में चढ़ावे की गिनती में मानवीय हस्तक्षेप घटाने के लिए तकनीक आधारित प्रणाली पर भी विचार किया गया। IIT और बैंकों से प्रस्ताव लिए जाने की खबर है। ऐसे समय में एक अत्यंत वरिष्ठ, गैर-राजनीतिक और अनुशासनप्रिय सैन्य अधिकारी को CEO बनाना एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि अब मंदिर प्रशासन में विश्वास केवल धार्मिक प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि संस्थागत पारदर्शिता से भी अर्जित करना होगा। लेकिन यहां राजनीतिक ईमानदारी जरूरी है। मिश्र की नियुक्ति को सीधे चढ़ावा विवाद का परिणाम कहना उपलब्ध तथ्यों से सिद्ध नहीं है। CEO चयन की प्रक्रिया जुलाई में शुरू हो चुकी थी और लगभग दो महीने चली। फिर भी दोनों घटनाओं का समय एक साथ आने से यह स्पष्ट है कि ट्रस्ट अपने प्रशासनिक ढांचे को अधिक मजबूत और जवाबदेह बनाने की दिशा में बढ़ रहा है। पांचवां, क्या RSS-BJP-VHP की पारंपरिक भूमिका बदल रही है?: यही वह सवाल है जिस पर सबसे ज्यादा राजनीतिक बहस होगी। राम मंदिर आंदोलन की राजनीतिक-सामाजिक धुरी में भाजपा के साथ RSS और विश्व हिंदू परिषद की भूमिका ऐतिहासिक रही है। अब जब मंदिर का संचालन एक पूर्व एयर मार्शल को सौंपा जा रहा है, तो क्या इसका अर्थ है कि पुराने राजनीतिक-सामाजिक नेटवर्क पर भरोसा कम हो रहा है? कांग्रेस नेता भूपेश बघेल ने इसी दिशा में राजनीतिक आरोप लगाया है कि भाजपा-RSS से जुड़े लोगों पर भरोसा कम होने के कारण सेना के अधिकारी को जिम्मेदारी दी गई। लेकिन इस आरोप को तथ्य नहीं, राजनीतिक व्याख्या के रूप में देखना चाहिए। दूसरी व्याख्या ज्यादा व्यावहारिक हो सकती है। वह यह कि RSS और VHP आंदोलन चला सकते हैं, वैचारिक-सामाजिक आधार दे सकते हैं, लेकिन प्रतिदिन लाखों श्रद्धालुओं, हजारों कर्मचारियों, वित्तीय प्रणालियों, तकनीकी ढांचे और सुरक्षा-समन्वय को चलाने के लिए अलग तरह की विशेषज्ञता चाहिए। इसलिए संभव है कि यह RSS/BJP से दूरी नहीं, बल्कि कार्य-विभाजन का नया चरण हो। छठा, मोदी मॉडल के बाद अब ‘अयोध्या मॉडल’ की परीक्षा का वक्त: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक विमर्श में राम मंदिर केवल धार्मिक मुद्दा नहीं रहा; वह सांस्कृतिक पुनर्जागरण, विरासत और विकास की राजनीति से भी जुड़ा रहा है। अब अयोध्या को विश्वस्तरीय धार्मिक-सांस्कृतिक शहर बनाने की चुनौती सामने है। यही वह जगह है जहां ‘अयोध्या मॉडल’ की परीक्षा होगी। क्या अयोध्या विश्वस्तरीय तीर्थ व्यवस्था बना पाएगी? वह करोड़ों श्रद्धालुओं को सुरक्षित दर्शन करा पाएगी? वह दान और वित्तीय व्यवस्था में पारदर्शिता स्थापित करेगी? वह स्थानीय नागरिकों के हितों की रक्षा करेगी? वह धार्मिक पर्यटन से रोजगार पैदा करेगी? वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की सांस्कृतिक छवि मजबूत करेगी? अगर इन सवालों का उत्तर सकारात्मक मिलता है तो राम मंदिर भाजपा के लिए केवल राजनीतिक प्रतीक नहीं रहेगा। वह प्रशासनिक सफलता का मॉडल भी बन सकता है। सातवां, 2027 की उत्तर प्रदेश राजनीति में अयोध्या का नया अर्थ कैसे समझाया जाएगा: यह सबसे बड़ा संदेश है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव सामने है। ऐसे समय में अयोध्या का राजनीतिक महत्व कम नहीं हुआ है, बल्कि उसकी प्रकृति बदल गई है। 2017 और 2022 की राजनीति में राम मंदिर मुख्यतः निर्माण और आस्था के सवाल से जुड़ा था। हालांकि, अब सवाल बदल गया है—वह यह कि राम मंदिर बनने के बाद अयोध्या कैसी बनी? यही प्रश्न 2027 के राजनीतिक विमर्श में महत्वपूर्ण हो सकता है। अगर अयोध्या में विश्वस्तरीय सुविधाएं, रोजगार, पर्यटन, बेहतर परिवहन और सुरक्षित तीर्थ व्यवस्था दिखाई देती है तो भाजपा इसे अपने विकास और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के संयुक्त मॉडल के रूप में प्रस्तुत कर सकती है। लेकिन यदि स्थानीय विस्थापन, महंगाई, यातायात, भीड़, पर्यावरण, प्रशासनिक भ्रष्टाचार या वित्तीय विवाद जैसे मुद्दे उभरते हैं तो विपक्ष को नया राजनीतिक हथियार मिल सकता है। इसलिए CEO की नियुक्ति का अप्रत्यक्ष चुनावी अर्थ भी है। अब राम मंदिर केवल भाजपा की वैचारिक पूंजी नहीं, बल्कि उसका प्रशासनिक प्रदर्शन भी राजनीतिक पूंजी बन सकता है। आठवां, ट्रस्ट का सामूहिक पुनर्गठन: गत 2 सितंबर की बैठक में केवल CEO नियुक्त नहीं किया गया, बल्कि तीन नए ट्रस्टियों—महेश भगचंदका, मदन मोहन पांडेय और निर्मला यादव—की नियुक्ति भी हुई। सबकी प्रमुख जिम्मेदारियों में फेरबदल हुआ और वित्तीय मामलों तथा दान प्रबंधन को लेकर भी महत्वपूर्ण फैसले किए गए। इसलिए इसे किसी एक पद की नियुक्ति कहना उचित नहीं होगा। यह राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के दूसरे चरण के पुनर्गठन जैसा दिखाई देता है। पहला चरण था—मंदिर निर्माण, और दूसरा चरण है—मंदिर संचालन। और तीसरा चरण संभवतः होगा—अयोध्या को वैश्विक धार्मिक-सांस्कृतिक केंद्र बनाना। और जितेंद्र मिश्र इसी दूसरे चरण के प्रमुख प्रशासक बनने जा रहे हैं। नौवां, मोदी, RSS और योगी के लिए इन नियुक्तियों के अलग-अलग अर्थ: देखा जाए तो इन महत्वपूर्ण नियुक्तियों के मोदी, RSS और योगी—तीनों के लिए अलग-अलग अर्थ हैं, जिसके दृष्टिगत इस नियुक्ति को तीन राजनीतिक स्तरों पर पढ़ा जा सकता है। जहां मोदी के लिए यह प्रशासनिक दक्षता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को जोड़ने का अवसर है। वहीं, RSS के लिए यह आंदोलन की वैचारिक सफलता के बाद संस्था को टिकाऊ और पेशेवर बनाने की चुनौती है। वहीं, उत्तर प्रदेश सरकार के लिए यह अयोध्या को केवल धार्मिक नगर नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े पर्यटन और सांस्कृतिक-आर्थिक केंद्रों में बदलने की परीक्षा है। और यहीं पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। दसवां, ट्रस्ट स्वतंत्र धार्मिक न्यास है, उसका CEO सीधे राज्य सरकार का अधिकारी नहीं है: अब भले ही ट्रस्ट स्वतंत्र धार्मिक न्यास है और उसका CEO सीधे राज्य सरकार का अधिकारी नहीं है। इसलिए दोनों के बीच अधिकार-क्षेत्र अलग हैं। लेकिन अयोध्या की सड़क, परिवहन, पुलिस, कानून-व्यवस्था, नगर विकास, पर्यटन और नागरिक सुविधाएं राज्य सरकार से जुड़ी हैं। इसलिए CEO और उत्तर प्रदेश प्रशासन के बीच समन्वय अयोध्या मॉडल की सफलता की निर्णायक शर्त होगा। ग्यारहवां, राम मंदिर आंदोलन व मंदिर निर्माण मुहिम की असली परीक्षा अब हुई शुरू : कहना न होगा कि जिस राम मंदिर आंदोलन ने भारतीय राजनीति को बदल दिया और मंदिर निर्माण ने आंदोलन को ऐतिहासिक उपलब्धि में बदला, उसकी असली परीक्षा अब शुरू हुई है। क्योंकि प्रशासन इस उपलब्धि को संस्थागत स्थायित्व में बदलने की कोशिश कर रहा है। एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र की नियुक्ति इसी परिवर्तन का सबसे बड़ा संकेत है। लेकिन उनकी सैन्य वर्दी की चमक से ज्यादा महत्वपूर्ण होगा उनका प्रशासनिक परिणाम। वह यह कि वे कितनी पारदर्शिता ला पाते हैं? दान व्यवस्था कितनी विश्वसनीय बनती है?श्रद्धालुओं को कितनी बेहतर सुविधाएं मिलती हैं? स्थानीय लोगों को अयोध्या के विकास में कितना हिस्सा मिलता है? ट्रस्ट कितना स्वायत्त और जवाबदेह रहता है? अंततोगत्वा, महत्वपूर्ण संदेश यह कि क्या राम मंदिर की भव्यता के साथ उसकी प्रशासनिक विश्वसनीयता भी उतनी ही भव्य बन पाएगी? यही वह प्रश्न है जो आने वाले वर्षों में राम मंदिर की राजनीतिक विरासत तय करेगा। क्योंकि अब राम मंदिर का सवाल केवल यह नहीं है कि “रामलला का मंदिर कितना भव्य है?” बल्कि मौलिक सवाल यह है कि “रामलला के मंदिर की व्यवस्था कितनी आदर्श है?” और शायद यही कारण है कि एक पूर्व एयर मार्शल को मंदिर का पहला CEO बनाया गया है। राम मंदिर आंदोलन ने सत्ता को बदलने का काम किया था; अब राम मंदिर का प्रशासन यह तय करेगा कि वह भारतीय संस्थागत संस्कृति को कितना बदल पाता है। यहीं से अयोध्या की राजनीति का अगला अध्याय शुरू होता है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
राष्ट्रीय आत्मविश्वास को मजबूत करता जीएसएलवी-एफ17 का प्रक्षेपण
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) जल्द ही जीएसएलवी-एफ 17 लॉन्च करके एक बड़ी उपलब्धि हासिल करने वाला है। यह मिशन अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट ईओएस-05 (जिसे पहले जीआई सैट-1ए कहा जाता था) को अंतरिक्ष में ले जाएगा। ईओएस-05 एक अत्याधुनिक इमेजिंग सैटेलाइट है जिसे आपदाओं के समय तेज़ी से तस्वीरें लेने के लिए बनाया गया है। इसरो ने ही इस स्पेसक्राफ्ट को विकसित किया है और इसका लॉन्च के समय वज़न 2,367 किलोग्राम होगा। ईओएस-05/जीआई सैट-1ए उस कमी को पूरा करेगा जो 2021 में ईओएस-03/जीआई सैट-1 के लॉन्च में आई रुकावट के कारण पैदा हुई थी। जीएसएलवी-एफ 10 मिशन इसके क्रायोजेनिक अपर स्टेज में तकनीकी खराबी के कारण विफल हो गया था। हालांकि लिफ्ट-ऑफ के बाद पहला और दूसरा स्टेज सामान्य रूप से काम कर रहे थे, लेकिन तीसरे स्टेज का क्रायोजेनिक इंजन चालू नहीं हो पाया, जिससे ईओएस-03 सैटेलाइट का नुकसान हो गया। इसरो का नया आत्मविश्वास इसरो के चेयरमैन डॉ. वी. नारायणन के अनुसार, ईओएस-05 सैटेलाइट पृथ्वी से लगभग 36,000 किलोमीटर ऊपर स्थित होकर पूरे देश की लगातार निगरानी करेगा। पीएसएलवी रॉकेट की लगातार दो विफलताओं के बाद, इसरो अपने अगले लॉन्च के लिए तैयार है। यह सैटेलाइट ठीक वैसे ही काम करेगा जैसे कोई पर्यवेक्षक ऊँची जगह से पूरे गाँव पर नज़र रखता है। डॉ. नारायणन ने बताया कि इसरो की योजना मार्च 2027 तक सात रॉकेट लॉन्च करने की है, जिसमें गगनयान मिशन (जीआई मिशन) की पहली बिना क्रू वाली उड़ान भी शामिल है। मौजूदा वित्तीय वर्ष के लिए, इसरो का लक्ष्य 12 सैटेलाइट बनाना और आठ रॉकेट लॉन्च करना है। ये मिशन संचार, नेविगेशन, पृथ्वी की निगरानी और वैज्ञानिक अनुसंधान को बेहतर बनाएंगे, साथ ही भविष्य में मानव अंतरिक्ष उड़ान और खोज के लिए आधार भी तैयार करेंगे। लॉन्च की तैयारियां इसरो, जीएसएलवी-एफ 17 लॉन्च के लिए अंतिम तैयारियां पूरी कर रहा है। यह लॉन्च 4 सितंबर 2026 को सुबह 2:55 बजे सतीश धवन स्पेस सेंटर, श्रीहरिकोटा के दूसरे लॉन्च पैड से निर्धारित है। जीएसएलवी-एफ 17 को 29 अगस्त 2026 को रात लगभग 8 बजे दूसरे लॉन्च पैड (एसएलपी) पर ले जाया गया। यह मिशन एक अहम चरण में पहुँच गया है, क्योंकि रॉकेट को टेक-ऑफ से पहले व्हीकल इंटीग्रेशन सेंटर (वीआईसी) से लॉन्च पैड पर ले जाया गया है। इसे भी पढ़ें: ISRO का धमाका, स्पेस में तैनात होगी भारत की तीसरी आंख EOS-05, कांपे चीन-पाकिस्तान यह मिशन ईओएस-05 GEO इमेजिंग सैटेलाइट (जीआई सैट-1ए) को सब-जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में भेजेगा। इस ऑर्बिट का पेरिगी (पृथ्वी के सबसे करीब का बिंदु) 170 किमी और एपोजी (सबसे दूर का बिंदु) 28,934 किमी होगा। 2025 और 2026 की शुरुआत में लगातार दो पीएसएलवी मिशन फेल होने के बाद, इस मिशन पर बारीकी से नज़र रखी जाएगी और इसके हर पहलू की विस्तार से जांच की जाएगी। इसरो पिछले आठ महीनों में कोई सफल रॉकेट लॉन्च नहीं कर पाया है, लेकिन अब एजेंसी एक बड़ी वापसी के लिए तैयार है। इसरो ने गड़बड़ी के कारणों की जांच के लिए लॉन्च रोक दिए थे, जिससे जीएसएलवी-एफ 17/ईओएस-05 मिशन उसके लॉन्च प्रोग्राम में भरोसा बहाल करने का एक अहम मौका बन गया है। उम्मीद है कि यह सैटेलाइट भारत की पृथ्वी की निगरानी, इमेजिंग और डेटा-आधारित गतिविधियों को बेहतर बनाएगा। यह मिशन भारत की अंतरिक्ष-आधारित पृथ्वी अवलोकन क्षमताओं में एक बड़ी प्रगति है और इससे और भी एडवांस्ड सैटेलाइट सिस्टम के विकास में मदद मिलेगी। ईओएस-05 के उद्देश्य ईओएस-05 एक पृथ्वी अवलोकन सैटेलाइट है जिसे जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से भारतीय उपमहाद्वीप और आसपास के क्षेत्रों की लगभग रियल-टाइम, हाई-टेम्पोरल-रिज़ॉल्यूशन वाली इमेजिंग करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। ईओएस-05 के मुख्य उद्देश्य साफ मौसम (बिना बादलों के) में बार-बार और बड़े इलाके की निगरानी करने पर केंद्रित हैं। सैटेलाइट की मुख्य क्षमताओं और लक्ष्यों में ये शामिल हैं: ईओएस-05 विज़िबल/नियर-इन्फ्रारेड और शॉर्ट-वेव इन्फ्रारेड बैंड में मल्टीस्पेक्ट्रल और हाइपरस्पेक्ट्रल इमेज लेता है। यह लगभग हर पाँच मिनट में चुनिंदा क्षेत्रों और हर तीस मिनट में पूरे भारतीय भू-भाग की इमेज लेता है, और मल्टीस्पेक्ट्रल मोड में लगभग 42 मीटर का स्थानिक रिज़ॉल्यूशन (स्पेशियल रिज़ॉल्यूशन) हासिल करता है। यह सैटेलाइट पृथ्वी के घूमने के साथ एक निश्चित स्थिति बनाए रखते हुए, लगभग 36,000 किमी की जियोसिंक्रोनस ऊंचाई से लगातार निगरानी करने में सक्षम बनाता है। यह कॉन्फ़िगरेशन एक ही बड़े इलाके को लगातार या लगभग लगातार कवर करता है, जबकि लो-अर्थ-ऑर्बिट इमेजिंग सैटेलाइट्स कुछ खास जगहों के ऊपर से केवल कभी-कभी ही गुज़रते हैं। इन क्षमताओं से जो मुख्य काम किए जा सकते हैं, उनमें ये शामिल हैं: (i) प्राकृतिक आपदाओं और अचानक होने वाली घटनाओं, जैसे चक्रवात, बाढ़, जंगल की आग, बादल फटने और आंधी-तूफान के लिए तेज़ी से निगरानी और समय रहते चेतावनी देना। (ii) मौसम पर नज़र रखना और पर्यावरण की निगरानी करना। (iii) खेती, वानिकी और प्राकृतिक संसाधनों का आकलन, जिसमें फसल की स्थिति, पेड़-पौधों की सेहत और जल निकायों की निगरानी शामिल है। (iv) रणनीतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए निगरानी, जिसमें राष्ट्रीय सीमाओं जैसे महत्वपूर्ण इलाकों पर लगातार नज़र रखना शामिल है। जीएसएलवी की जानकारी जीएसएलवी-एफ 17 मिशन इसरो का कुल मिलाकर 103वां और 2026 का दूसरा मिशन है। यह जीएसएलवी मार्क I और II के लिए 19वां और साल का पहला मिशन है। जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल एक एक्सपेंडेबल लॉन्च सिस्टम है, जो जीएसएलवी मार्क III से अलग है। जीएसएलवी मार्क-I में रूसी क्रायोजेनिक स्टेज का इस्तेमाल किया गया है, जबकि मार्क-II में भारत में बना अपर स्टेज इस्तेमाल होता है; तीसरे स्टेज को छोड़कर दोनों वर्शन का कॉन्फ़िगरेशन एक जैसा है। यह व्हीकल पीएसएलवी के भरोसेमंद पार्ट्स जैसे S125/S139 सॉलिड रॉकेट बूस्टर और विकास इंजन का इस्तेमाल करता है। 18 लॉन्च में से जीएसएलवी को 12 बार सफलता मिली है, जबकि चार बार पूरी तरह और दो बार आंशिक रूप से असफलता का सामना करना पड़ा है, जिससे इसकी सफलता दर 72.2% रही है। 2010 से ऑपरेशनल जीएसएलवी मार्क-II की लागत $47 मिलियन है। इसकी ऊंचाई 51.7 मीटर है, जो मार्क-I की 49.13 मीटर की ऊंचाई से ज़्यादा है। यह रॉकेट लो अर्थ ऑर्बिट में 5,000 किलोग्राम तक और जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में 2,500 किलोग्राम तक पेलोड ले जाने में सक्षम है, जो इसके पिछले वर्शन की तुलना में लगभग 1,000 किलोग्राम ज़्यादा है। यह 7,887 किलोन्यूटन का थ्रस्ट देता है और तीन स्टेज में काम करता है। निष्कर्ष पीएसएलवी रॉकेट की लगातार दो असफलताओं के बाद, इसरो अपने अगले लॉन्च के लिए तैयार है। तकनीकी उद्देश्यों के अलावा, एक सफल मिशन इसरो टीम का आत्मविश्वास काफी बढ़ाएगा और जनता का भरोसा भी मजबूत करेगा। उम्मीद है कि यह सैटेलाइट कई तरह के कामों में मदद करेगा, जैसे मौसम की जानकारी, आपदा की निगरानी (खासकर बाढ़, चक्रवात और जंगल की आग), खेती, वानिकी, और रणनीतिक व राष्ट्रीय सुरक्षा की निगरानी। - प्रोफ़ेसर (डॉ.) डी.के. पांडे विज़िटिंग सीनियर फ़ेलो, सेंटर फ़ॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज़, एडजंक्ट प्रोफ़ेसर, राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय, सलाहकार, एकेडमिक काउंसिल, फ़ॉरेन पॉलिसी स्कूल और GNOIT, पूर्व एसोसिएट डीन, SoB, गलगोटिया विश्वविद्यालय।
आम आदमी पार्टी के गठन का प्रमुख उद्देश्य भ्रष्टाचार से राजनीति को मुक्त करके उसमें शुचिता लाना था। लेकिन क्या आम आदमी पार्टी इस उद्देश्य में सफल रही। पंजाब सरकार पर काबिज आम आदमी पार्टी के रवैये से तो ऐसा नहीं दिख रहा। बल्कि वह पिछली कांग्रेसी सरकार के भ्रष्टाचार की धारा को ही आगे बढ़ाती दिख रही है। यह कहना है कि राज्य के अनाज आपूर्ति घोटाले के व्हिसल ब्लोअर गुरप्रीत सिंह का। गुरप्रीत सिंह का आरोप है कि इन घोटालों से राज्य को हजारों करोड़ का चूना लगा है। इससे हुई कमाई की बंदरबाट राज्य के मंत्रियों और ताकतवर अफसरों के बीच हुई है। बीते अप्रैल में राज्य के बीजेपी प्रमुख सुनील जाखड़ ने भी पंजाब सरकार पर आरोप लगाया था कि अनाज रखने वाली बोरियों की खरीद में भारी घोटाला किया गया है। उन्होंने आरोप लगाया था कि राज्य में 22 रूपए की दर से बोरी मिल रही थी, लेकिन आम आदमी पार्टी सरकार ने उसे तकरीबन दोगुने यानी 43 रूपए 89 पैसे की दर से खरीदा। इस घोटाले की उन्होंने जांच की मांग की थी। हालांकि बीजेपी अभी चुप है, लेकिन आने वाले दिनों में उसकी चुप्पी टूट सकती है। इसे भी पढ़ें: CJP प्रोटेस्ट क्यों हुआ कैंसिल, CJI ने ऐसा क्या कह दिया, PM मोदी से इसका क्या है कनेक्शन? दिल्ली के शराब घोटाले की तर्ज पर उसकी पंजाब सरकार पर अनाज खरीद घोटाले के आरोप लग रहे हैं। वैसे आरोप पुरानी कांग्रेस सरकार पर लगे थे। राज्य में नई सरकार आने के बाद आम आदमी पार्टी की जिम्मेदारी थी कि इसे रोके और उचित कानूनी उपाय करे। लेकिन जिस तरह से इस मामले की अनदेखी राज्य की मौजूदा सरकार कर रही है, उससे लगता नहीं कि वह इस मामले में ईमानदार है। ह्विसल ब्लोअर गुरप्रीत सिंह का कहना है कि इस सिलसिले में वे अधिकारियों और मंत्रियों से कई बार मिले, लेकिन बात कहीं से आगे बढ़ती नहीं दिख रही। राज्य में विधानसभा के चुनाव की उलटी गिनती शुरू होने में देर है। लेकिन जिस तरह अनाज घोटाले को लेकर पंजाब की सरकार को घेरने की कोशिश हो रही है, उसके संकेत साफ हैं। आने वाले विधानसभा चुनावों में पंजाब की भगवंत मान सरकार के लिए इसका जवाब देना आसान नहीं होगा। फिलहाल इस मुद्दे को राज्य के विपक्षी दल तूल देते हुए नजर नहीं आ रहे हैं। लेकिन इसकी गारंटी नहीं है कि आने वाले दिनों में, जब राज्य के विधानसभा चुनाव सिर पर होंगे, विपक्षी दल इस मामले में चुप बैठेंगे। पांच नदियों के प्रदेश पंजाब की ख्याति खेती-किसानी के लिए रही है। यहां की करीब तीन चौथाई आबादी सीधे या फिर परोक्ष रूप से खेती-किसानी से जुड़ी हुई है। जाहिर है कि यहां के लोगों के लिए खेती-किसानी ना सिर्फ जीवन रेखा है, बल्कि भावनात्मक मुद्दा भी है। इसलिए आने वाले दिनों में अगर अनाज घोटाले की तासीर बढ़ने लगे तो हैरत नहीं होनी चाहिए। पंजाब के कृषि उपज घोटाले के तार पिछली कांग्रेस सरकार से जुड़ते हैं। कांग्रेस की सरकार रहते राज्य के खाद्य और आपूर्ति विभाग से जुड़ी निविदाओं में जमकर धांधली हुई थी। इस मामले के तूल पकड़ने के बाद राज्य के विजिलेंस विभाग ने साल 2022 में लुधियाना में एफआईआर दर्ज की थी। इसकी जांच के दौरान कांग्रेसी सरकार के मंत्री रहे भारत भूषण आशु, ठेकेदार तेलू राम समेत खाद्य और आपूर्ति विभाग के कई अधिकारियों की गिरफ्तारी हुई थी। इसी मामले के एक आरोपी जूनियर अधिकारी राकेश सिंगला भगोड़ा घोषित हो चुका है और उसके लिए सीबीआई ने रेड कार्नर नोटिस जारी कर रखा है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि पंजाब की भगवंत मान सरकार पर अनाज घोटाले का आरोप कैसे चस्पा हो रहा है। राज्य को भ्रष्टाचार और नशा मुक्त करने के नारे के साथ सत्ता में आई पंजाब की भगवंत मान सरकार ने दरअसल इस भगोड़े अधिकारी के खिलाफ अब तक कोई ठोस कार्रवाई करती नजर नहीं आ रही है। अव्वल तो होना चाहिए कि टेंडर घोटाले की जांच करके दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होती, लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है। बल्कि इसकी कड़ी आगे जुड़ती जा रही है। लुधियाना में दर्ज मामले के व्हिसल ब्लोर गुरप्रीत सिंह हैं। उनका आरोप है कि नई सरकार के आने के बाद कहां तक घोटाला रूकता, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। दरअसल पंजाब में कृषि उपज की खरीद भारत सरकार के खाद्य निगम के लिए पंजाब सरकार करती है। इसके लिए उसे प्रति क्विंटल कमीशन मिलता है। असल गड़बड़ी यहीं हैं। गुरप्रीत सिंह का कहना है कि दरअसल असल खरीद कुछ और हो रही है और कागजों पर कुछ और दिखाया जा रहा है। चूंकि हर साल केंद्र सरकार खरीद के लिए निश्चित रकम राज्य को देती है, लिहाजा उसका हर साल वह हिसाब-किताब भी मांगती है। लेकिन दिलचस्प यह है कि साल 2017 में कांग्रेस के सत्ता में आने से लेकर 2022 में आई मान सरकार ने इस बारे में केंद्र को ठीक से हिसाब नहीं दिया है। इसकी वजह से केंद्र सरकार द्वारा इन वर्षों में राज्य को मिले 31 हजार करोड़ रूपए को केंद्र सरकार ने राज्य को कर्ज घोषित कर दिया है। इस कर्ज के एवज में पंजाब सरकार को इसकी दोगुनी रकम चुकानी पड़ेगी। गुरप्रीत सिंह का आरोप है कि कोविड महामारी के बहाने पड़ोसी राज्यों हरियाणा और उत्तर प्रदेश से अनाज की खरीद की गई। इसके लिए करीब साढ़े छह हजार करोड़ की बोगस बिलिंग की गई। फर्जी खरीद बाद में भी हुई। पंजाब में साल 2025 में भारी बाढ़ आई। इस दौरान राज्य में जितने अनाज की पैदावार नहीं हुई, उसकी तुलना में ज्यादा अनाज की राज्य में खरीद की गई। गुरप्रीत सिंह के मुताबिक, इस बार भी पिछले साल यानी 2024 जितने अनाज की खरीद दिखाई गई। दिलचस्प है कि साल 2022 में आपूर्ति घोटाले का मामला दर्ज होने के बाद इस बारे में राज्य सरकार ने खरीददारी की नई नीतियां बनाईं। राज्य ने लेबर कार्टेज एंड ट्रांसपोर्ट पालिसी बनाई। नई नीति की वजह से इस साल राज्य को करीब दो सौ करोड़ का फायदा हुआ। लेकिन अधिकारियों को यह रास नहीं आया, क्योंकि इसमें उनकी कमाई नहीं रही। फिर उन्होंने मिलीभगत करके इस नीति को साल 2024 में बदलकर तकरीबन पुरानी जैसी ही कर दिया। इसकी वजह से राज्य को अनाज खरीद में सालाना सौ करोड़ की चपत लग रही है। पंजाब की मान सरकार पर आरोप लगा है कि साल 2024 में उसने खरीद के लिए टेंडरों में भी हेरफेर किया। गुरप्रीत का आरोप है कि इसके जरिए कुछ चहेते ठेकेदारों को फायदा पहुंचाया गया और उनसे मिली रकम का दिल्ली के 2025 विधानसभा चुनाव में इस्तेमाल किया गया। गुरप्रीत सिंह ने इन सब घोटालों को लेकर सीबीआई की चंडीगढ़ यूनिट से शिकायत करके जांच की मांग की है। हालांकि सीबीआई के हाथ इस सिलसिले में बंधे हैं। क्योंकि इंडी गठबंधन में शामिल सरकारों ने अपने राज्यों में सीबीआई को जांच करने के अधिकार को वापस ले लिया था। दिलचस्प यह है कि टेंडर घोटाला और आपूर्ति घोटाला सामने आने और उसकी जांच होने के बाद प्रवर्तन निदेशालय ने आरोपी और भगोड़े अधिकारी राकेश सिंगला के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उसकी करीब साढ़े बाइस करोड़ की संपत्तियां सील कर रखी हैं। लेकिन राज्य की ओर से जांच आगे नहीं बढ़ रही है। जब केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों ने आंदोलन किया था, उसमें पंजाब के किसान और उनके संगठन बढ़चढ़कर हिस्सा ले रहे थे। देखना यह होगा कि विधानसभा चुनावों के वक्त ये संगठन सामने आते हैं या नहीं। राज्य के अगले विधानसभा चुनाव को लेकर शिरोमणि अकाली दल और बीजेपी में एक बार फिर गलबहियां होने की संभावना बढ़ गई है। यदि ऐसा होता है तो तय मानिए, विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी के लिए अनाज घोटाला वैसा ही सिरदर्द होगा, जैसा दिल्ली विधानसभा चुनाव में शीश महल और शराब घोटाला बना था। उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं..

