अनुच्छेद-370 हटने के सात साल : जम्मू-कश्मीर में बुनियादी ढांचे, निवेश, पर्यटन के क्षेत्र में जबरदस्त बदलाव
बेरोजगारी की वजह से मंदिरों में चोर चोरी करने पहुंचे, नौकरी मिलेगी तो अपराध कम होगा : किशोरी पेडनेकर
बेरोजगारी की वजह से मंदिरों में चोर चोरी करने पहुंचे, नौकरी मिलेगी तो अपराध कम होगा : किशोरी पेडनेकर
तमिलनाडु: एआईएडीएमके नेता पलानीस्वामी ने टीवीके के पहले बजट को 'शून्य' अंक दिए
तमिलनाडु: एआईएडीएमके नेता पलानीस्वामी ने टीवीके के पहले बजट को 'शून्य' अंक दिए
'मुझे उन युवाओं पर गर्व है', प्रदर्शनकारियों से मिलकर बोले राहुल गांधी
'मुझे उन युवाओं पर गर्व है', प्रदर्शनकारियों से मिलकर बोले राहुल गांधी
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ने अग्निशमन विभाग मुख्यालय और पुलिस थानों का अचानक दौरा किया
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ने अग्निशमन विभाग मुख्यालय और पुलिस थानों का अचानक दौरा किया
जम्मू-कश्मीर में 370 हटने के बाद शांति और विकास का नया दौर: हिमाचल के गवर्नर कविंदर गुप्ता
जम्मू-कश्मीर में 370 हटने के बाद शांति और विकास का नया दौर: हिमाचल के गवर्नर कविंदर गुप्ता
अभिषेक बनर्जी के आमतला पार्टी कार्यालय पर कार्रवाई को लेकर रोक 21 अगस्त तक बढ़ी, 18 अगस्त को हाईकोर्ट में सुनवाई
आखिर बांकीपुर उपचुनाव भाजपा क्यों, कैसे और किसके चलते हारी? पूछता है बिहार!
बांकीपुर उपचुनाव 2026 में भाजपा की हार अब हर किसी को नहीं पच रही है। इसलिए लोग एक दूसरे से पूछ रहे हैं कि भाजपा क्यों हारी? कैसे पराजित हुई? और किसके चलते यह राजनीतिक दुर्दिन देखना पड़ा? बिहार वासी जानना चाहते हैं! क्योंकि 9 माह पहले ही तो उन्होंने जदयू नीत एनडीए गठबंधन को अभूतपूर्व बहुमत दिया था! अटकलें हैं कि क्या जदयू नेता और पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ हुई 'सियासी बदतमीजी' के बाद भाजपा अआखिर ब अकेले नहीं चल पाएगी, क्योंकि टीम नीतीश कुमार ने भारतीय जनता पार्टी के हवा-हवाई रणनीतिकारों को असली राजनीतिक जमीन पर तगड़ी पटकनी दिला डाली है! जानकारों की मानें तो चाहे चिराग पासवान हों, जीतनराम मांझी हों या उपेंद्र कुशवाहा हों, या मुंह फुलाए सवर्ण भाजपाई, सबकी खामोशी या राजनीतिक बकवास दोनों भाजपा पर भारी पड़ गई। वह हो गया, जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी! इसलिए ज्वलंत प्रश्न उठता है कि क्या भाजपा केवल अपने सहयोगियों और सहयोगी दलों दोनों के भितरघात की वजह से हारी है? क्योंकि ऐसे मतदान केंद्र जहां सहयोगी दल परंपरागत रूप से मजबूत रहे हैं, फिर भी वहां भाजपा को असामान्य रूप से कम वोट मिले हैं। खुद पार्टी और गठबंधन के नेताओं द्वारा दबी जुबान में ये बातें कहीं जा रही हैं, ताकि उनका महत्व बढ़े। इसे भी पढ़ें: बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में जन सुराज पार्टी के सुप्रीमो प्रशांत किशोर की जीत के सियासी मायने चौंकाने वाले लिहाजा, सुलगते सवाल उठने लगे कि आखिर बिहार में पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री (CM) बनने के बाद हुए पहले ही बांकीपुर उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी उम्मीदवार को जिस प्रकार की तगड़ी शिकस्त का सामना करना पड़ा, वह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आंतरिक युगलबंदी के खिलाफ किसी अंदरूनी राजनीतिक साजिश का द्योतक तो नहीं है! चर्चा तो यहां तक हो रही है कि आनन-फानन में जिस तरह से पार्टी उम्मीदवार बदला गया, उस साजिश के पीछे केंद्रीय मंत्री अमित शाह की टीम में उपजे अंतर्विरोधों और आरएसएस से जुड़े दिग्गजों की परोक्ष भूमिका तो कहीं नहीं है, जो कि राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की अव्यवहारिक पैराशूट नियुक्ति के बाद से ही अंदर ही अंदर खफा चल रहे थे और मौका मिलते ही उन्हें, उनकी ही जमीन पर असली जातीय और पार्टीगत दोनों राजनीतिक औकात दिखा दी! ऐसा इसलिए कि जो पार्टी दुर्लभ से दुर्लभतम चुनाव जीत जाती है, वह आखिर अपने ही राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन द्वारा छोड़ी हुई इकलौती सीट, जिस पर गत 30 वर्षों से 'पिता-पुत्र' का कब्जा रहा हो, वह अचानक हार जाए। खुद पटना के पीढ़ी दर पीढ़ी वाले भाजपा समर्थक संभ्रांत लोग भी अचंभित रह गए हैं कि ये क्या हो गया? क्या 'लालू की नीति' दबे पांव वेश बदलकर उनके पुत्र तेज प्रताप यादव के शह पर पटना में आ गई? क्या सहयोगी दलों के कार्यकर्ताओं को अपेक्षित स्तर पर सक्रिय नहीं किया गया? क्या स्थानीय स्तर पर असंतोष या गुटबाजी को शांत नहीं किया गया? क्या उम्मीदवार चयन को लेकर नाराज़गी नहीं भांपी जा सकी? क्या विपक्ष के प्रभावी ध्रुवीकरण का अंदाजा भाजपा रणनीतिकार नहीं लगा पाए? क्या स्थानीय मुद्दे और सत्ता-विरोधी भावना प्रबल रही और मतदान प्रबंधन यानी बूथ मैनेजमेंट में कमी बरती गई? उनका सीधा सवाल यह भी है कि आखिर पूर्व केंद्रीय मंत्री व भाजपा सांसद रविशंकर प्रसाद, जदयू सांसद और केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ सी पी ठाकुर (सांसद विवेक ठाकुर के पिता), राज्य सरकार के मंत्री रामकृपाल यादव और अशोक चौधरी के मोहल्लों से जुड़े मतदान केंद्रों पर भी भाजपा प्रत्याशी कैसे पिछड़े और प्रशांत किशोर वहां भी बढ़त बनाए रहे। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के बूथ की भी यही स्थिति रही। आखिर यह सब सियासी प्रपंच कैसे और क्यों संभव हुआ? क्या मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को बदलने के लिए इतना बड़ा आत्मघाती षड्यंत्र सवर्णों के नेताओं ने अपने ही खिलाफ रच दिया? क्या किसी ने इस हेतु नई दिल्ली और नागपुर से इशारा भी किया था? बात पचने वाली तो बिल्कुल भी नहीं है। सवाल है कि क्या आरएसएस और भाजपा के जमीनी तालमेल की कमी ही भाजपा के खराब प्रदर्शन का मुख्य कारण है। क्या भाजपा और उसके वैचारिक-संगठनात्मक नेटवर्क के बीच स्थानीय स्तर पर समन्वय में कमी रही? क्या उम्मीदवार चयन या स्थानीय असंतोष का प्रभाव पड़ा? क्या विपक्ष ने नए सामाजिक और राजनीतिक समीकरण बनाए? क्या कम मतदान का असर भाजपा के पारंपरिक मतदाता आधार पर पड़ा? सवाल यह भी है कि क्या जदयू के पूर्वमुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने द्वारा ही बनवाए हुए भाजपाई मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से सियासी बदला ले लिया गया है? या फिर पूर्वमुख्यमंत्री व कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा, और पूर्व कानून मंत्री व सांसद रविशंकर प्रसाद के अलावा ऋतुराज सिन्हा और संजय मयूख जैसे दिग्गज कायस्थ नेताओं ने निजी कारणों से भितरघात किया/कराया है? क्या लोजपा रामविलास के नेता व केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान का भी भाजपा को दिली सहयोग नहीं मिला? क्या उपेंद्र कुशवाहा की चुप्पी और जीतनराम मांझी और नागमणि जैसों के विषैले बोलों की कीमत भाजपा ने चुकाई है। वहीं, राजनीतिक पंडितों का मानना है कि यूजीसी बिल विवाद, ओबीसी/दलितों को ज्यादा कानूनी तरजीह दिए जाने, हिंदुत्व को गफलत में रखने और राम मंदिर चंदा चोरी प्रकरण के अलावा भरत तिवारी एनकाउंटर प्रकरण आदि ने सवर्णों के बीच भाजपा की राजनीतिक साख को गहरी चोट पहुंचाई है। आलम यह बताया गया है कि ओबीसी/दलित वोट बैंक भाजपा के साथ पूरी तरह से नहीं जुटा पाया है,जबकि सवर्णों का सजग तबका अपने बच्चों के भविष्य के खातिर भाजपा से दूर चला जा रहा है, या विकल्प ढूंढ रहा है। क्या जन सुराज पार्टी में वह विकल्प दिखाई दे चुकी है? क्या सवर्णों ने बीजेपी को धोखा दिया या ओबीसी और दलितों ने या फिर तीनों वर्गों के समृद्ध तबके ने? देखा जाए तो बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में जन सुराज पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने शोषित, दलित, पिछड़ों, अल्पसंख्यक समाज की राजनीति को धार देने की कोशिश तो की थी, पर कामयाबी नहीं मिली। लिहाजा, इस चुनाव में उन्होंने न केवल मुद्दे बदलते, बल्कि मोदी-शाह-सम्राट पर सीधे निशाना साधकर ही सफलता के इस मुकाम तक पहुंचे हैं। राजनीतिक पंडितों के मुताबिक, बिहार में भाजपा के लिए जन सुराज पार्टी अब एक वास्तविक चुनावी चुनौती बन चुकी है, जिसको राष्ट्रीय विस्तार पाते देर नहीं लगेगी। क्योंकि राष्ट्रीय राजनीतिक परिस्थिति यही चुगली कर रही है। बांकीपुर उपचुनाव को प्रशांत किशोर ने व्यक्तिगत अभियान में बदल दिया था। उनकी पार्टी जन सुराज ने इस चुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया और प्रशांत किशोर ने स्वयं मैदान में उतरकर इसे हाई-प्रोफाइल मुकाबला बना दिया। इससे विपक्षी वोटों का ध्रुवीकरण हुआ और भाजपा विरोधी मत नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के राजद प्रत्याशी की ओर न जाकर अपेक्षाकृत अधिक एक दिशा में गए जिससे जनसुराज को विजयश्री मिली और भाजपा को नुकसान हुआ। जहां तक एंटी-इनकंबेंसी की बात है तो बांकीपुर लंबे समय से भाजपा का गढ़ था, जहां लगातार एक ही दल के प्रतिनिधित्व से कुछ मतदाताओं में बदलाव की इच्छा पैदा हो गई प्रतीत होती है। इस चुनाव में स्थानीय मुद्दे भी हावी रहे। विपक्ष ने पूर्व घोषित उम्मीदवार के अकस्मात बदलाव, बूथ प्रबंधन, स्थानीय संगठन और मतदान प्रतिशत जैसे कारक को भी उछाला, जो निर्णायक भूमिका निभाए। जबकि शहरी मतदाता का बदलता रुझान भाजपा पर भारी पड़ गया। शिक्षित और युवा मतदाताओं ने परिवर्तन के पक्ष में मतदान किया, क्योंकि यूजीसी बिल का सर्वाधिक प्रभाव उन्हीं पर पड़ता। इसलिए इन बातों का प्रभाव परिणाम पर पड़ा है। पहले सीजेपी द्वारा केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे स्वीकार करवाना और अब जेएसपी के प्रशांत किशोर द्वारा भाजपा का मजबूत गढ़ तोड़ दिया जाना बहुत कुछ संकेत दे रहा है, जो यह साबित करता है कि उनकी पार्टी केवल वैचारिक मंच नहीं, बल्कि चुनाव जीतने की क्षमता भी रखती है। वहीं, अब बिहार और देश की राजनीति में त्रिकोणीय मुकाबले की संभावना बढ़ चुकी है, क्योंकि जन सुराज पार्टी अब एक स्थायी ताकत बन चुकी है। भविष्य के चुनावों में मुकाबला केवल एनडीए बनाम महागठबंधन तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि तीसरा गुट भी बनेगा। यही नहीं, भाजपा को अब अपने पारंपरिक शहरी और सवर्ण वोट बैंक की समीक्षा भी करनी पड़ेगी, क्योंकि उसके शहरी गढ़ में ही सेंध लगी है। लिहाजा पार्टी यह जानने का प्रयास अवश्य करेगी कि क्या पराजय का कारण उम्मीदवार बदलने से उपजा अंदरूनी रोष, संगठन की अंदरूनी खींचातानी, स्थानीय मुद्दे या मतदाताओं की प्राथमिकताओं में बदलाव तो नहीं था। क्या बिहार में संगठन बनाम चेहरे की बहस तेज होगी। यहां पर यह चर्चा भी होगी कि क्या मजबूत संगठन हमेशा निर्णायक है, या प्रभावशाली स्थानीय नेतृत्व और अभियान भी स्थापित दलों को चुनौती दे सकते हैं? क्या भाजपा 2030 के विधानसभा चुनाव की रणनीतियाँ बदल सकती है? क्या सभी प्रमुख दल उम्मीदवार चयन, सामाजिक समीकरण, शहरी मतदाताओं और युवा वोटरों को लेकर अपनी अपनी रणनीति की समीक्षा करेंगे? इसलिए, बांकीपुर का परिणाम केवल एक सीट का परिणाम नहीं माना जाएगा; बल्कि इसे बिहार की बदलती राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के संकेत के रूप में भी देखा जाएगा। भाजपा की हार के पीछे निम्नलिखित संभावित कारण हो सकते हैं, जैसे: एक, परंपरागत भाजपा मतदाताओं के एक हिस्से का जन सुराज की ओर जाना। दो, शहरी, युवा और बदलाव चाहने वाले मतदाताओं का रुझान बदलना। तीन, कम मतदान प्रतिशत का भाजपा के संगठनात्मक लाभ को कम कर देना। और चार, उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दे और चुनावी रणनीति का प्रभाव। चूंकि एग्जिट पोल और कुछ चुनाव-पूर्व विश्लेषणों में यह दावा किया गया था कि सवर्ण मतों का एक हिस्सा प्रशांत किशोर की ओर जाने के संकेत हैं, वह बात अब सच प्रतीत होती है। बताया जाता है राष्ट्रीय अध्यक्ष की सोच व समझ पर भी इस चुनाव का असर पड़ेगा, क्योंकि बांकीपुर जैसी लंबे समय से भाजपा की सीट के उनके हाथ से निकलते ही संगठन की चुनावी रणनीति, उम्मीदवार चयन और स्थानीय नेतृत्व पर सवाल उठ चुके हैं। लेकिन केवल एक उपचुनाव की हार से राष्ट्रीय अध्यक्ष की स्थिति पर बड़ा असर पड़ना तय नहीं माना जाता। पार्टी आमतौर पर कई चुनावों के समग्र प्रदर्शन के आधार पर ही संगठनात्मक निर्णय लेती है। जहाँ तक मुख्यमंत्री पर असर की बात है तो, चूँकि यह चुनाव राज्य सरकार के कार्यकाल के दौरान हुआ है, इसलिए विपक्ष इसे सरकार के कामकाज पर जनमत के रूप में पेश कर सकता है। चूंकि हार का अंतर बड़ा है और भाजपा के पारंपरिक क्षेत्रों में भी गिरावट दिखी है, इसलिए सरकार की रणनीति, संगठन और सामाजिक समीकरणों की समीक्षा हो सकती है। वहीं आगामी बिहार विधानसभा चुनाव पर भी इसका असर पड़ेगा, क्योंकि यह परिणाम व्यापक जनरुझान का संकेत प्रतीत होता है, जो भाजपा और एनडीए को उम्मीदवार चयन, सामाजिक गठबंधन, स्थानीय मुद्दों और चुनावी संदेश में बदलाव करने की जरूरत की चुगली कर रहा हैं। वहीं, यदि इसे केवल स्थानीय परिस्थितियों वाला परिणाम माना जाता है, तो इसका प्रभाव सीमित भी रह सकता है। इसलिए बांकीपुर के परिणाम ने राजनीतिक संदेश अवश्य दिया है, लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष या मुख्यमंत्री की स्थिति पर उसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि पार्टी नेतृत्व इस हार के कारणों का क्या आकलन करता है और आने वाले चुनावों में उसका प्रदर्शन कैसा रहता है। इतना तय है कि भाजपा की चुनावी हार आमतौर पर कई सामाजिक, राजनीतिक और संगठनात्मक कारणों के संयुक्त प्रभाव के चलते हुई है। चूंकि भाजपा का पारंपरिक वोट अपेक्षा से कम निकला है, इसलिए संगठनात्मक समन्वय, बूथ प्रबंधन और कार्यकर्ताओं की सक्रियता पर सवाल उठते हैं। भाजपा ने बूथ स्तर पर व्यापक संगठनात्मक तैयारी की थी और बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं को लगाया था। फिर भी इस चुनाव में कम मतदान, त्रिकोणीय मुकाबला, युवा मतदाताओं का रुझान, स्थानीय मुद्दे और विपक्ष की रणनीति जैसे कई अन्य कारकों के चलते उसे पराजय का सामना करना पड़ा। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
शिवसेना विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई गुरुवार दोपहर दो बजे होगी, कपिल सिब्बल ने रखी दलीलें
शिवसेना विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई गुरुवार दोपहर दो बजे होगी, कपिल सिब्बल ने रखी दलीलें
असम में सांप्रदायिक विभाजन को बढ़ावा दे रही भारतीय जनता पार्टी: बदरुद्दीन अजमल
असम में सांप्रदायिक विभाजन को बढ़ावा दे रही भारतीय जनता पार्टी: बदरुद्दीन अजमल
पंजाब विधानसभा में विपक्ष से दुर्व्यवहार, दबाई जा रही है आवाज: प्रताप सिंह बाजवा
पंजाब विधानसभा में विपक्ष से दुर्व्यवहार, दबाई जा रही है आवाज: प्रताप सिंह बाजवा
राष्ट्रमंडल खेल 2026: चुनौतियों के बीच चमका भारत
राष्ट्रमंडल खेल केवल पदकों की प्रतियोगिता नहीं बल्कि किसी देश की खेल संस्कृति, प्रतिभा विकास, खेल विज्ञान, प्रशिक्षण व्यवस्था और दीर्घकालिक खेल नीति का दर्पण भी होते हैं। ग्लासगो (स्कॉटलैंड) में 23 जुलाई से 2 अगस्त तक आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों का समापन भारत के लिए अनेक उपलब्धियों, कुछ अधूरी अपेक्षाओं और भविष्य की नई संभावनाओं के साथ हुआ। भारतीय दल ने 13 स्वर्ण, 17 रजत और 9 कांस्य सहित कुल 39 पदक जीतकर पदक तालिका में चौथा स्थान प्राप्त किया। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस बार प्रतियोगिता के कार्यक्रम में निशानेबाजी, कुश्ती, बैडमिंटन, हॉकी, टेबल टेनिस इत्यादि भारत के कई पारंपरिक मजबूत खेल शामिल ही नहीं थे। इन खेलों में भारत सामान्यतः बड़ी संख्या में पदक जीतता रहा है। ऐसे में सीमित अवसरों के बावजूद चौथा स्थान बनाए रखना भारतीय खिलाड़ियों की क्षमता और जुझारूपन का प्रमाण है। पदक तालिका में ऑस्ट्रेलिया ने 70 स्वर्ण सहित कुल 171 पदक जीतकर एक बार फिर अपना दबदबा कायम रखा। इंग्लैंड 110 पदकों के साथ दूसरे तथा कनाडा 62 पदकों के साथ तीसरे स्थान पर रहा। मेजबान स्कॉटलैंड भी 39 पदकों के साथ प्रभावशाली प्रदर्शन करते हुए पांचवें स्थान पर रहा। भारत और स्कॉटलैंड के कुल पदक समान रहे लेकिन स्वर्ण पदकों की संख्या के आधार पर भारत चौथे स्थान पर रहा। यदि पिछले राष्ट्रमंडल खेलों के प्रदर्शन की तुलना करें तो एक दिलचस्प तस्वीर सामने आती है। वर्ष 2018 में ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों में भारत ने 26 स्वर्ण, 20 रजत और 20 कांस्य सहित कुल 66 पदक जीतकर तीसरा स्थान हासिल किया था। उस प्रतियोगिता में निशानेबाजी ने अकेले 16 पदक दिलाकर भारत की सफलता में सबसे बड़ी भूमिका निभाई थी। इसके अलावा मुक्केबाजी, भारोत्तोलन और कुश्ती में भी भारतीय खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन किया था। 2022 में इंग्लैंड के बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेलों में भारत ने 22 स्वर्ण, 16 रजत और 23 कांस्य सहित कुल 61 पदक जीतकर चौथा स्थान प्राप्त किया था। तब कुश्ती में भारत के सभी 12 पहलवानों ने पदक जीतकर इतिहास रचा था जबकि भारोत्तोलन और टेबल टेनिस में भी भारतीय खिलाड़ियों ने उल्लेखनीय सफलता अर्जित की थी। इन दोनों आयोजनों की तुलना में 2026 के ग्लासगो खेलों में भारत के कुल पदकों की संख्या घटकर 39 रह गई। पहली दृष्टि में यह गिरावट चिंताजनक लग सकती है किंतु यदि प्रतियोगिता के कार्यक्रम का विश्लेषण किया जाए तो स्पष्ट होता है कि भारत के अनेक पदक संभावित खेल इस बार आयोजित ही नहीं किए गए। इसलिए केवल पदकों की संख्या के आधार पर प्रदर्शन का मूल्यांकन करना उचित नहीं होगा। वास्तव में भारत ने उपलब्ध अवसरों का काफी प्रभावी उपयोग किया और जिन खेलों में उसने भाग लिया, उनमें उल्लेखनीय सफलता अर्जित की। इसे भी पढ़ें: Gujarat CM भूपेंद्र पटेल को सौंपा गया Commonwealth Games ध्वज, 2030 की तैयारियां शुरू इस बार भारतीय मुक्केबाजों ने राष्ट्रमंडल खेलों के इतिहास का सर्वश्रेष्ठ अभियान चलाया। भारत ने मुक्केबाजी में सात स्वर्ण और तीन रजत सहित कुल दस पदक जीतकर नया इतिहास रच दिया। महिला मुक्केबाजों ने विशेष रूप से प्रभावित किया। जैस्मीन लम्बोरिया, प्रिया घनघस, साक्षी चौधरी और प्रीति पवार जैसी युवा खिलाड़ियों ने यह संकेत दिया कि भारतीय महिला मुक्केबाजी का भविष्य अत्यंत उज्ज्वल है। ओलंपिक पदक विजेता लवलीना बोरगोहेन स्वर्ण से भले चूक गई लेकिन उनका अनुभव और प्रदर्शन भारतीय मुक्केबाजी की मजबूती का प्रमाण बना रहा। पुरुष वर्ग में भी सचिन सिवाच और अंकुश सहित अन्य मुक्केबाजों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए भारत की पदक संख्या बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। यह सफलता दर्शाती है कि भारतीय मुक्केबाजी अब केवल कुछ खिलाड़ियों पर निर्भर नहीं रही बल्कि उसके पास प्रतिभाओं की व्यापक श्रृंखला तैयार हो चुकी है। भारोत्तोलन ने भी भारत की प्रतिष्ठा बनाए रखी। पिछले एक दशक में इस खेल में भारतीय खिलाड़ियों ने निरंतर प्रगति की है। ग्लासगो में भी उन्होंने अपने प्रदर्शन से यह साबित किया कि विश्व स्तर पर भारत अब एक मजबूत शक्ति बन चुका है। जूडो में भारतीय खिलाड़ियों ने अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन किया और कई महत्वपूर्ण पदक जीतकर यह संदेश दिया कि यह खेल भी भारत में तेजी से विकसित हो रहा है। हालांकि जूडो खिलाड़ी तूलिका मान का डोपिंग रोधी नियमों के अंतर्गत तीन बार ‘वेयरअबाउट्स’ संबंधी जानकारी देने में विफल रहने के कारण अस्थायी निलंबन और प्रतियोगिता से बाहर होना भारतीय दल के लिए एक बड़ा झटका था। यह घटना बताती है कि विश्वस्तरीय प्रतिस्पर्धा में केवल खेल कौशल ही नहीं, डोपिंग रोधी नियमों के प्रति पूर्ण जागरूकता और अनुशासन भी उतना ही आवश्यक है। एथलेटिक्स में भारत का प्रदर्शन इस बार विशेष चर्चा का विषय रहा। गुलवीर सिंह ने राष्ट्रमंडल खेलों के इतिहास में नया अध्याय जोड़ते हुए 10,000 मीटर दौड़ में रजत और 5,000 मीटर दौड़ में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया। वे एक ही राष्ट्रमंडल खेल में ट्रैक एवं फील्ड स्पर्धाओं में दो पदक जीतने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी बने। इससे पहले भारत को इन लंबी दूरी की स्पर्धाओं में कभी पदक नहीं मिला था। यह उपलब्धि भारतीय एथलेटिक्स के बदलते स्वरूप और वैज्ञानिक प्रशिक्षण प्रणाली की सफलता का संकेत देती है। पैरा खेलों में भी भारत ने 3 स्वर्ण, 2 रजत और 2 कांस्य सहित कुल सात पदक जीतकर नया इतिहास बनाया। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह राष्ट्रमंडल खेलों के पैरा वर्ग में भारत के अब तक के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के बराबर है। यदि भारतीय दल के प्रदर्शन का गहन विश्लेषण किया जाए तो स्पष्ट होता है कि इस बार महिलाओं ने शानदार योगदान दिया। महिला खिलाड़ियों ने 8 स्वर्ण सहित कुल 16 पदक जीतकर भारतीय खेलों में बढ़ती महिला भागीदारी और उत्कृष्टता का परिचय दिया। दूसरी ओर पुरुष खिलाड़ियों ने कुल 23 पदक जीतकर संतुलित प्रदर्शन किया। फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि 2026 का प्रदर्शन भारत के लिए संतोषजनक अवश्य है लेकिन ऐतिहासिक नहीं। वर्ष 2010 के नई दिल्ली राष्ट्रमंडल खेल आज भी भारत के स्वर्णिम अध्याय बने हुए हैं, जब भारत ने 38 स्वर्ण सहित कुल 101 पदक जीतकर ऑस्ट्रेलिया के बाद दूसरा स्थान प्राप्त किया था। घरेलू मैदान का लाभ अपनी जगह है लेकिन वह प्रदर्शन यह भी दर्शाता है कि यदि मजबूत खेल अवसंरचना, व्यापक खिलाड़ी आधार और सुव्यवस्थित तैयारी हो तो भारत शीर्ष देशों को कड़ी चुनौती देने की क्षमता रखता है। भारत की खेल यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष अब यह है कि देश अब कुछ चुनिंदा खेलों तक सीमित नहीं रह गया है। पहले भारत की अधिकांश सफलता निशानेबाजी, कुश्ती, बैडमिंटन और भारोत्तोलन तक सीमित रहती थी जबकि अब मुक्केबाजी, जूडो, एथलेटिक्स और पैरा खेलों में भी लगातार नए खिलाड़ी उभर रहे हैं। यह परिवर्तन भारत की खेल नीति, खेलो इंडिया जैसी योजनाओं, बेहतर प्रशिक्षण सुविधाओं, खेल विज्ञान, पोषण और खिलाड़ियों को मिलने वाले आर्थिक सहयोग का सकारात्मक परिणाम है। हालांकि अभी भी प्रतिभा पहचान, जमीनी स्तर पर कोचिंग, खेल चिकित्सा, मानसिक प्रशिक्षण और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के प्रतिस्पर्धी अनुभव को और मजबूत करने की आवश्यकता बनी हुई है। अब भारतीय खेल जगत की निगाहें वर्ष 2030 पर टिक गई हैं, जब राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी अहमदाबाद करेगा। यह केवल एक खेल आयोजन नहीं बल्कि भारत के लिए विश्व के सामने अपनी खेल क्षमता, आधुनिक अवसंरचना और संगठनात्मक दक्षता प्रदर्शित करने का सुनहरा अवसर होगा। ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों ने भारत को यह विश्वास अवश्य दिलाया है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों, भारतीय खिलाड़ी हर मंच पर देश का गौरव बढ़ाने का सामर्थ्य रखते हैं। अब आवश्यकता इस बात की है कि इन उपलब्धियों को अंतिम लक्ष्य न मानकर उन्हें ओलंपिक और वैश्विक खेल महाशक्ति बनने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखा जाए। जिन खेलों में भारत विश्वस्तरीय शक्ति बन चुका है, उन्हें और सशक्त किया जाए तथा एथलेटिक्स, तैराकी, जिम्नास्टिक और अन्य ओलंपिक खेलों में भी दीर्घकालिक निवेश बढ़ाया जाए। यदि भारत अपनी खेल नीतियों में निरंतरता बनाए रखता है, खिलाड़ियों को वैज्ञानिक प्रशिक्षण, विश्वस्तरीय सुविधाएं और दीर्घकालिक समर्थन उपलब्ध कराता है तो वह दिन दूर नहीं, जब राष्ट्रमंडल ही नहीं, ओलंपिक और अन्य वैश्विक प्रतियोगिताओं में भी भारत पदक तालिका के शीर्ष देशों में नियमित रूप से दिखाई देगा। - योगेश कुमार गोयल (लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)
हर कोई जेनजी से बात करना चाहता है, लेकिन वे तब कहां थे, जब उन पर लाठियां बरस रही थी : आदित्य ठाकरे
हर कोई जेनजी से बात करना चाहता है, लेकिन वे तब कहां थे, जब उन पर लाठियां बरस रही थी : आदित्य ठाकरे
जगन ने आंध्र सरकार टीडीपी पर तंबाकू किसानों के प्रति उदासीनता का आरोप लगाया
जगन ने आंध्र सरकार टीडीपी पर तंबाकू किसानों के प्रति उदासीनता का आरोप लगाया
अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले योगी बनाम अखिलेश की सियासत अब सीधे जातीय समीकरणों के अखाड़े में उतर चुकी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जहां समाजवादी पार्टी के PDA की नई-नई राजनीतिक व्याख्याएं गढ़ते हुए कभी इसे परिवार डेवलपमेंट अथॉरिटी तो कभी प्रोडक्शन हाउस ऑफ दंगाई एंड अपराधी बताते हैं, वहीं अब अखिलेश यादव ने उसी PDA का नया अर्थ निकालकर भाजपा को उसी के अंदाज में जवाब दिया है। अखिलेश ने तंज कसते हुए कहा कि PDA में PD का मतलब पंडित है। यानी जिस नारे को भाजपा लगातार निशाने पर ले रही थी, उसे सपा प्रमुख ने ब्राह्मण राजनीति के नए दरवाजे में बदलने की कोशिश कर दी। दरअसल, समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्र की जयंती पर लखनऊ में आयोजित प्रबुद्ध समाज सम्मेलन श्रद्धांजलि से ज्यादा राजनीतिक संदेश का मंच बन गया। अखिलेश यादव ने जनेश्वर मिश्र को समाजवादी आंदोलन का बड़ा चेहरा बताते हुए ब्राह्मण समाज को सम्मान देने का संदेश दिया और साफ संकेत दिया कि 2027 की लड़ाई में सपा सिर्फ पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यकों तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि ब्राह्मण मतदाताओं को भी अपने साथ जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है। इसे भी पढ़ें: विधानसभा में बवाल पर भड़के योगी, बोले- सपा को संविधान पर भरोसा नहीं, राम मंदिर विवाद पर कही बड़ी बात अखिलेश ने योगी सरकार पर कई मोर्चों से हमला बोला। उन्होंने बिना नाम लिए विकास दुबे एनकाउंटर का जिक्र करते हुए कहा कि जिस दिन गाड़ी पलटी थी, उस दिन गाड़ी नहीं, सरकार पलटने से बच गई थी। इतना ही नहीं, उन्होंने दावा किया कि समय आने पर सैटेलाइट इमेज सामने आएगी, जिससे पूरी कहानी साफ हो जाएगी। राम मंदिर में चढ़ावे के कथित गड़बड़ी के मुद्दे को उठाते हुए भी उन्होंने सरकार पर निशाना साधा और कहा कि हिंदू धर्म में दान की रसीद नहीं मांगी जाती, लेकिन अब रसीदों की राजनीति हो रही है। स्वास्थ्य व्यवस्था, प्रशासनिक कार्यशैली और सामाजिक असमानता जैसे मुद्दों को भी उन्होंने भाजपा सरकार के खिलाफ हथियार बनाया। हम आपको बता दें कि ब्राह्मणों को लेकर अखिलेश का यह नया दांव इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह वर्ग लंबे समय तक सत्ता की धुरी रहा है। आजादी के बाद शुरुआती दशकों में ब्राह्मण मतदाता मुख्य रूप से कांग्रेस के साथ रहे। मंडल-कमंडल की राजनीति के दौर में उनका बड़ा हिस्सा भाजपा की ओर चला गया और राम मंदिर आंदोलन ने इस रिश्ते को और मजबूत किया। हालांकि 2007 में मायावती ने ब्राह्मण-दलित सोशल इंजीनियरिंग के सहारे पूर्ण बहुमत की सरकार बनाकर यह साबित कर दिया था कि ब्राह्मण वोट पूरी तरह किसी एक दल की स्थायी जागीर नहीं हैं। लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में मोदी के उभार के बाद से ही यह वर्ग भाजपा के साथ रहा लेकिन तमाम कारणों के चलते ब्राह्मण भाजपा से नाराज बताये जा रहे हैं जिसके चलते अब एक बार फिर यही वर्ग सभी राजनीतिक दलों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है। यही वजह है कि बहुजन समाज पार्टी भी इस मुकाबले में पीछे नहीं है। मायावती पहले ही ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट देने और उन्हें सम्मानजनक भागीदारी देने की रणनीति का ऐलान कर चुकी हैं। उनका दावा है कि ब्राह्मणों सहित सवर्ण समाज के हित सबसे सुरक्षित बसपा में हैं और 2007 जैसा समीकरण दोबारा बन सकता है। ऐसे में साफ है कि 2027 के चुनाव में ब्राह्मण वोटों के लिए भाजपा, सपा और बसपा के बीच त्रिकोणीय राजनीतिक प्रतिस्पर्धा देखने को मिलेगी। उधर, उत्तर प्रदेश विधानसभा का मानसून सत्र भी इसी राजनीतिक तल्खी की भेंट चढ़ गया। विपक्ष के लगातार हंगामे के बीच सदन अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गया। सत्र समाप्त होने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समाजवादी पार्टी पर लोकतंत्र और विकास विरोधी राजनीति करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि विपक्ष ने अनुपूरक बजट, शिक्षामित्रों और अनुदेशकों के मानदेय बढ़ाने जैसे जनहित के मुद्दों पर चर्चा तक नहीं होने दी। योगी ने दावा किया कि उनकी सरकार ने शिक्षामित्रों और अनुदेशकों का मानदेय बढ़ाने के साथ पांच लाख रुपये तक की कैशलेस स्वास्थ्य सुविधा भी उपलब्ध कराई है, लेकिन विपक्ष का मकसद केवल व्यवधान पैदा करना था। बहरहाल, उत्तर प्रदेश की राजनीति में अब नारे भी हथियार हैं और उनकी परिभाषाएं भी। योगी हर मौके पर PDA की नई व्याख्या गढ़कर सपा पर हमला बोल रहे हैं, तो अखिलेश उसी PDA में पंडित जोड़कर भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं। मायावती भी ब्राह्मण कार्ड खेल चुकी हैं। ऐसे में यह साफ है कि अगले साल का विधानसभा चुनाव सिर्फ विकास और कानून-व्यवस्था पर नहीं, बल्कि नारों, जातीय समीकरणों और राजनीतिक प्रतीकों की जंग पर भी लड़ा जाएगा। -नीरज कुमार दुबे
शशि थरूर ने एलजीबीटीक्यूएआईए-प्लस पैनल के काम में देरी पर सवाल उठाए
शशि थरूर ने एलजीबीटीक्यूएआईए-प्लस पैनल के काम में देरी पर सवाल उठाए
पाकिस्तान में गृह मंत्री मोहसिन नकवी के बयान से सत्ता गठबंधन में हलचल, '70 साल पुरानी व्यवस्था विफल' बताने पर उठे सवाल
तिरंगा विवाद पर महबूबा के बचाव में उतरे उमर अब्दुल्ला, बोले- गलती से उल्टा पकड़ा होगा झंडा
तिरंगा विवाद पर महबूबा के बचाव में उतरे उमर अब्दुल्ला, बोले- गलती से उल्टा पकड़ा होगा झंडा
रेगिस्तान की इस आवाज ने दुनिया को बनाया अपना दीवाना, पढ़ें स्वरूप खान की सफलता की कहानी
रेगिस्तान की इस आवाज ने दुनिया को बनाया अपना दीवाना, पढ़ें स्वरूप खान की सफलता की कहानी
आतंकवाद पीड़ितों के परिजनों के लिए सरकारी नौकरियां, न्याय और पुनर्वास की दिशा में एक नया अध्याय : एलजी सिन्हा
अयोध्या राम मंदिर में वीआईपी पास की व्यवस्था समाप्त, संतों ने फैसले का किया स्वागत
अयोध्या राम मंदिर में वीआईपी पास की व्यवस्था समाप्त, संतों ने फैसले का किया स्वागत
पॉलिटिकल पार्टी नहीं बल्कि प्रेशर ग्रुप होगी कॉकरोच जनता पार्टी, अभिजीत दीपके ने बताया अपना आगे का प्लान
'पप्पू यादव की मानसिकता पाकिस्तान जैसी, संसद की सदस्यता निलंबित होनी चाहिए', साधु-संतों की मांग
'पप्पू यादव की मानसिकता पाकिस्तान जैसी, संसद की सदस्यता निलंबित होनी चाहिए', साधु-संतों की मांग
अदालती कार्यवाही की मीडिया रिपोर्टिंग पर कोई असर नहीं पड़ेगा : सुप्रीम कोर्ट
अदालती कार्यवाही की मीडिया रिपोर्टिंग पर कोई असर नहीं पड़ेगा : सुप्रीम कोर्ट
अनुच्छेद 370 हटाते समय किया गया एक भी वादा पूरा नहीं हुआ : इमरान मसूद
अनुच्छेद 370 हटाते समय किया गया एक भी वादा पूरा नहीं हुआ : इमरान मसूद
प्रबुद्धजन सम्मेलन में अखिलेश बोले, भाजपा ने राम मंदिर से लेकर जनता के भरोसे तक को नुकसान पहुंचाया
प्रबुद्धजन सम्मेलन में अखिलेश बोले, भाजपा ने राम मंदिर से लेकर जनता के भरोसे तक को नुकसान पहुंचाया
ईडी ने चिट फंड घोटाले के मामले में वाईएसआर कांग्रेस के नेता से जुड़ी जगहों पर ली तलाशी
ईडी ने चिट फंड घोटाले के मामले में वाईएसआर कांग्रेस के नेता से जुड़ी जगहों पर ली तलाशी
भाजपा सांसदों ने विपक्ष पर बिना वजह संसद की कार्यवाही बाधित करने और बहस से भागने का लगाया आरोप
भाजपा सांसदों ने विपक्ष पर बिना वजह संसद की कार्यवाही बाधित करने और बहस से भागने का लगाया आरोप
कोलकाता में स्वतंत्रता दिवस की झांकियों में केंद्र और पश्चिम बंगाल सरकार की कल्याणकारी योजनाओं को दिखाया जाएगा
असम बाढ़: जेपी नड्डा ने राहत शिविरों का किया दौरा, कहा- केंद्र से हर संभव मदद मिलेगी
असम बाढ़: जेपी नड्डा ने राहत शिविरों का किया दौरा, कहा- केंद्र से हर संभव मदद मिलेगी
मद्रास हाईकोर्ट ने पूर्व मंत्री सेंथिल बालाजी और उनके भाई की जमानत की शर्तों में ढील दी
मद्रास हाईकोर्ट ने पूर्व मंत्री सेंथिल बालाजी और उनके भाई की जमानत की शर्तों में ढील दी
जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटने से सुरक्षा में सुधार पर हालात पूरी तरह सामान्य नहीं : मोहम्मद हनीफा जान
केरल में बाढ़ से मरने वालों की संख्या बढ़कर 26 हुई, राज्य सरकार ने राहत पैकेज का किया ऐलान
केरल में बाढ़ से मरने वालों की संख्या बढ़कर 26 हुई, राज्य सरकार ने राहत पैकेज का किया ऐलान
मल्लिका शेरावत के साथ नजर आए तेज प्रताप यादव, सोशल मीडिया पर शेयर किया खास वीडियो
मल्लिका शेरावत के साथ नजर आए तेज प्रताप यादव, सोशल मीडिया पर शेयर किया खास वीडियो
झारखंड विधानसभा का मानसून सत्र गुरुवार से, छात्र आंदोलन का मुद्दा गूंजेगा, सर्वदलीय बैठक में वार्ता की मांग
कैश-फॉर-वोट मामला: कोर्ट ने तेलंगाना के मुख्यमंत्री को विदेश यात्रा की दी इजाजत
कैश-फॉर-वोट मामला: कोर्ट ने तेलंगाना के मुख्यमंत्री को विदेश यात्रा की दी इजाजत
जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा के कड़े इंतजाम, एनसी और पीडीपी के विरोध के बीच जनजीवन रहा सामान्य
जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा के कड़े इंतजाम, एनसी और पीडीपी के विरोध के बीच जनजीवन रहा सामान्य
विधानसभा का मानसून सत्र एक दिन पहले ही समाप्त, सीएम योगी बोले- विपक्ष ने विकास और सामाजिक न्याय के एजेंडे का किया विरोध
जुबान बिगड़ी हुई थी उदयनिधि की, पहली बार मिला सवा शेर, सत्ता में आते ही विजय ने धरा थलापति अवतार
1989 की 25 मार्च को तमिलनाडु विधानसभा में बजट पेश किया जा रहा था। जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके ने हाल के ही विधानसभा चुनाव में 27 सीटें जीती थीं और तमिलनाडु की विधानसभा को विपक्ष में एक महिला नेता मिली थी। उस वक्त डीएमके सरकार में थी और मुख्यमंत्री थे एम करुणानिधी। सदन में जैसे ही बजट भाषण पढ़ा जाना शुरू हुआ जयललिता और उनकी पार्टी के नेताओं ने विधानसभा में हंगामा शुरू कर दिया। हंगामा इतना बढ़ा कि एआईएडीएमके के किसी नेता ने करुणानिधी की तरफ फाइल फेंकी जिससे उनका चश्मा गिरकर टूट गया। जययलिता ने जब देखा कि हंगामा ज्यादा बढ़ रहा है तो वो सदन से बाहर जाने लगी। तभी मंत्री दुरई मुरगन आ गए और उन्होंने जयललिता को बाहर जाने से रोका और उनकी साड़ी खींची जिससे उनकी साड़ी फट गई और वो खुद भी जमीन पर गिर गईं। सत्ता पक्ष यानी डीएमके और विपक्ष यानी एआईएडीएमके के सदस्यों के बीच विधानसभा में हाथा-पाई हुई। अपनी फटी हुई साड़ी के साथ जयललिता विधानसभा से बाहर आ गईं। यही वो दिन था जब जयललिता ने सदन से निकलते हुए कहा था कि वो मुख्यमंत्री बनकर ही इस सदन में वापस आएंगी वरना कभी नहीं आएंगी।कई बार जिंदगी में हुई घटना बहुत कुछ बदलकर रख देती है। कई बार इतिहास की घटनाएं ऐसी होती हैं जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। अब एक बार फिर तमिलनाडु की राजनीति में एक महिला का नाम चर्चा में है। इस बार विवाद अभिनेत्री तृषा कृष्णन से जुड़ा है। बयान जो सीधे तौर पर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय के लिए था लेकिन इसमें नाम जुड़ा है एक्ट्रेस त्रिशा कृष्णन का भी। पूरा मामला समझ लेते हैं। इसे भी पढ़ें: सिर्फ एक बंदा काफ़ी है: PK से ओवैसी तक...कैसे अकेले दम पर राजनीति का रुख बदलने में लगे ये 'लोन वॉरियर्स' 3 अगस्त 2026 यानी बीते सोमवार की बात है। जब सुर्खियों में बांकीपुर और दतिया के उपचुनाव के परिणामों की चर्चा थी तब तमिलनाडु के थंजाऊर में किसानों का एक प्रदर्शन चल रहा था। कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी नदी के पानी को लेकर विवाद है। कावेरी नदी का पानी कर्नाटक से होकर तमिलनाडु पहुंचता है। तमिलनाडु का आरोप है कि कर्नाटक की सरकार पानी ही नहीं छोड़ती। जिसकी वजह से राज्य के किसानों को मुसीबत का सामना करना पड़ रहा है। सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिल पाता। यह है मुद्दा। इसे ही लेकर तमिलनाडु में किसान संगठन प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शन का नेतृत्व किसान नेता अय्या कन्नू कर रहे हैं। इस समय प्रदर्शन तेज इसलिए हुआ है क्योंकि तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा वाले इलाके में कुरवाई फसल बोई गई है। यह धान की ही फसल होती है जिसकी बुवाई जून जुलाई और सितंबर अक्टूबर में होती है। बुवाई के वक्त चाहिए होता है भरपूर पानी क्योंकि कर्नाटक ने तमिलनाडु के लिए कावेरी का पानी नहीं छोड़ा है। तो प्रदर्शन शुरू हो गया है। द प्रिंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक कन्नू ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय से सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा दायर करने और राज्य के किसानों के लिए ₹1 लाख करोड़ के मुआवजे की मांग करने की अपील की है। कन्नू का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक सरकार को हर महीने तमिलनाडु के लिए पानी छोड़ने का निर्देश दिया था। अब तक कर्नाटक के पास 80 टीएमसी यानी 1000 मिलियन क्यूबिक फीट से ज्यादा पानी है। कर्नाटक के सीएम डी के शिव कुमार ने तमिलनाडु के लिए 3500 क्यूसेक पानी छोड़ने से इंकार कर दिया। अगर वे पानी नहीं छोड़ते हैं तो वे कर्नाटक में नुकसान करेंगे और वे अपने लोगों और राज्य को बचाने के लिए 25,000 क्यूसेक पानी छोड़ रहे हैं। हमारे सीएम जोसेफ विजय को सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा दायर करके कर्नाटक से ₹1 लाख करोड़ की मुआवजे की मांग करनी चाहिए। प्रोटेस्ट के निशाने पर कर्नाटक सरकार के साथ-साथ तमिलनाडु की विजय सरकार भी है। तो विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और मुख्य विपक्षी पार्टी डीएमके के नेता उदयनिधि स्टालिन पहुंच गए थपुर जहां प्रोटेस्ट जारी था। प्रोटेस्ट के दौरान उदयनिधि स्पीच देना शुरू करते हैं। उदयनिधि ने क्या कह दिया, जो पुलिस उठा ले गई? लगातार सरकार और सीएम विजय पर निशाना साधते हैं। जब उदयनिधि बोल रहे थे तब मंच के सामने मौजूद लोग एक्ट्रेस त्रिशा कृष्णन का नाम चिल्लाने लगते हैं। उदयनिधि चुप हो जाते हैं। फिर पानी के ही रेफरेंस से एक आपत्तिजनक टिप्पणी करते हैं। मंच पर मौजूद और सामने खड़े लोग हंसने लगते हैं। फिर उदयनिधि एक पॉज लेते हुए कहते हैं, मैं कावेरी नदी के पानी की बात कर रहा हूं। जिसने इस बात पर मुहर ही लगा दी कि उदयनिधि के बयान को जिस तरह से समझा जा रहा है, वह असल में वही कहना भी चाह रहे थे। बयान आया तो विवाद शुरू हुआ। विजय की पार्टी टीवी ने उदयनिधि को निशाने पर ले लिया। पूर्व बीजेपी नेता के अन्नामलई ने भी इस बयान की आलोचना की। उन्होंने कहा जब मैं कल वैगई नदी की सफाई कर रहा था तो मैंने सोचा क्या इससे भी बुरा प्रदूषण कहीं हो सकता है। फिर मैंने उदयनिधि स्टालिन का भाषण सुना। उदयनिधि के बयान के खिलाफ तमिलनाडु पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया। द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक थवरुर ईस्ट पुलिस ने बीएएनएस की धारा 196, 192, 352, 79, 296 बी 61, 3512 और आईटी एक्ट की धारा 67 के तहत मुकदमा दर्ज किया है। मुकदमा दर्ज होने के बाद 4 अगस्त को तमिलनाडु पुलिस की एक टीम उदयनिधि के आवास पर पहुंच गई। पहले उनकी लीगल टीम और पुलिस के बीच बातचीत होती रही। कारवाई टालने की कोशिश हुई। लेकिन आखिरकार पुलिस ने उदयनिधि को हिरासत में ले लिया। इसे भी पढ़ें: स्पेन में जबरन क्यों घुसे हजारों मुस्लिम? डरा देगी इसके पीछे की कहानी, मेलोनी ने दी धमकी, मोदी हुए अलर्ट उदयनिधि को पहली बार सवा शेर मिला दरअसल जब तमिलनाडु में डीएमके की सरकार थी तो उदयनिधि स्टालिन कुछ भी बोलकर निकल जाते थे। कभी सनातन को डेंगू-मलेरिया कहा और इसका खात्मा करने की बात की, तो कभी हिन्दी भाषा को लेकर विवादित बयान दिया। अपनी सरकारी मशीनरी और कानूनी पेचिदगियों का इस्तेमाल कर वे हर बार निकल जाते थे। लेकिन इस बार मामला उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय के खिलाफ निजी टिप्पणी का था। विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन की जुबान एक बार फिर बिगड़ी और इस बार नतीजा पहले से कहीं ज्यादा कठोर निकला. चेन्नई स्थित उनके घर से पुलिस ने उन्हें उठा लिया। पूर्व सीएम के बेटे उदयनिधि को पहली बार 'सवा शेर' मिला। सीएम विजय ने इस पर तत्काल कार्रवाई की और 24 घंटे से कम समय में भी एक्शन लिया। उन्होंने साफ संदेश दे दिया कि बड़बोले बयानों का जवाब अब सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि पुलिस कार्रवाई भी हो सकती है। यह घटना सिर्फ कानूनी कार्रवाई नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश भी है। विजय की सरकार ने साफ दिखाया कि विपक्ष के नेता होने के बावजूद कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत टिप्पणियों और अभद्र बयानों से ऊपर नहीं है। CM विजय पर गुस्साए स्टालिन डीएम के नेता उदयनधि स्टालिन की गिरफ्तारी के बाद उनके पिता और डीएम के प्रमुख एमके स्टालिन ने सीएम विजय और उनकी सरकार पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा अहंकार हमेशा विनाश का रास्ता दिखाता है। एमके स्टालिन ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर लंबा चौड़ा पोस्ट लिखकर सरकार पर कई गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि जिस वक्त उदयनिधि को हिरासत में लिया गया वो तंजाबुर में कावेरी नदी के पानी के मुद्दे पर सरकार के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे। उनके मुताबिक उदयनिधि किसानों के हक की बात उठा रहे थे और सरकार की नाकामी को लोगों के सामने रख रहे थे। शालिनी ने कहा कि सीएम विजय कावेरी जल विवाद का कोई समाधान नहीं निकाल पाए हैं। इतना ही नहीं मेघदातू बांध के मुद्दे पर भी सरकार कोई ठोस कदम नहीं उठा सकी। इसका सबसे ज्यादा नुकसान किसानों को हो रहा है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा किसान पानी के लिए परेशान हैं। उनकी फसलें सूख रही है। लेकिन मंत्री सीएम की फिल्म देखकर भावुक हो रहे हैं। इस बयान के जरिए उन्होंने सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाया। एम के स्टालिन ने यह भी आरोप लगाया कि उदयनिधि की गिरफ्तारी का असली मकसद उन्हें विधानसभा के बजट सत्र से दूर रखना था। उनका कहना है कि 5 अगस्त को बजट सत्र शुरू होना है और सरकार नहीं चाहती कि उदयनिधि उसमें हिस्सा ले। उन्होंने पूछा कि अगर पुलिस को सिर्फ पूछताछ ही करनी थी तो चेन्नई में भी यह काम हो सकता था। फिर उदयनिधि को तंजाबुर क्यों ले जाया गया। स्टालिन का कहना है कि इससे साफ पता चलता है कि कारवाई राजनीतिक वजहों से की गई। एम के स्टालिन ने यह भी दावा किया कि मद्रास हाईकोर्ट ने कहा है कि उदयनिधि को उसी दिन रिहा किया जाए। उनके मुताबिक अदालत का यह आदेश सरकार के रवैया पर बड़ा झटका है और दिखाता है कि गिरफ्तारी को लेकर सवाल उठ रहे हैं। उन्होंने सीएम विजय पर हमला बोलते हुए कहा कि सत्ता में आने के बाद से उनकी सरकार विरोधियों को निशाना बनाने में ज्यादा व्यस्त है। स्टालिन का आरोप है कि सरकार लोकतांत्रिक तरीके से विरोध की आवाज सुनने की बजाय विपक्ष के नेताओं को गिरफ्तार कराने का रास्ता अपना रही है। उदयनिधि के बयान को लेकर भी एम के स्टालिन ने उनका बचाव किया। उन्होंने कहा कि उदयनिधि ने अपने भाषण में किसी का नाम नहीं लिया था और ना ही कोई अश्लील बात कही थी। उनका कहना है कि बयान को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है। स्टालिन ने यह भी कहा कि अगर कभी उदयनिधि से कोई गलती होती है तो वो बिना देर किए माफी मांग लेते हैं। इसीलिए इस पूरे मामले को बेवजह बड़ा बनाया जा रहा है। मद्रास कोर्ट में क्या-क्या हुआ? इसके बाद मामला मद्रास हाई कोर्ट पहुंचा जहां उनकी अग्रिम जमानत पर सुनवाई हुई। सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील विजय नारायण ने अदालत को बताया कि उदयनिधि स्टालिन को औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया गया है और उन्हें तंजावुर ले जाया जाएगा, लेकिन उन्हें हिरासत में रखने का कोई इरादा नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि पूछताछ पूरी होने के बाद उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया जाएगा। जमानत मिलने के बाद क्या बोले उदयनिधि? जमानत मिलने के बाद उदयनिधि स्टालिन ने पुलिस की कार्रवाई पर भी गंभीर आरोप लगाए। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा कि तमिलनाडु सरकार मद्रास कोर्ट में कह रही थी कि मुझे गिरफ्तार करने का कोई इरादा नहीं है, लेकिन पूछताछ के नाम पर करीब 3,000 पुलिसकर्मी तैनात कर दिए गए। मुझे चेन्नई से तंजावुर सड़क मार्ग से ऐसे ले जाया गया, जैसे मैं कोई आतंकवादी हूं। महिलाओं को लेकर पहले भी विवादों में रहे हैं उदयनिधि तृषा कृष्णन को लेकर हुआ यह विवाद कोई पहला मौका नहीं है जब उदयनिधि स्टालिन महिलाओं पर दिए गए बयानों से फंसे हों। इससे पहले भी वह कई बार ऐसे बयानों के कारण आलोचना झेल चुके हैं। कुछ समय पहले जब वह मुख्यमंत्री जोसेफ विजय पर हमला बोल रहे थे, तब उन्होंने विजय की पत्नी संगीता सोर्नालिंगम का नाम भी बीच में घसीट लिया था। उन्होंने उनके निजी जीवन से जुड़ी खबरों को अपने राजनीतिक भाषण का मुख्य हिस्सा बनाया था। उस समय भी विपक्ष ने उन पर यह गंभीर आरोप लगाया था कि वह अपनी राजनीतिक लड़ाई जीतने के लिए परिवार की महिलाओं को बीच में लेकर आते हैं। इससे पहले 2021 के विधानसभा चुनाव के दौरान भी ऐसा ही देखने को मिला था। परिस्थितियाँ भिन्न, मगर सोच वही पुरानी वर्ष 1989 में तमिलनाडु विधानसभा के भीतर जयललिता के साथ हुई बदसलूकी और हाल ही में तृषा कृष्णन पर हुई विवादित छींटाकशी—दिखने में ये दोनों घटनाएँ बिल्कुल अलग हैं। एक तरफ जहाँ लोकतांत्रिक सदन की मर्यादा तार-तार हुई थी और सीधा शारीरिक हमला हुआ था, वहीं दूसरी तरफ एक राजनीतिक मंच से सरेआम घटिया और अमर्यादित बयानबाज़ी की गई। इन दोनों घटनाओं के दौर, स्थान और तरीके भले बदल गए हों, लेकिन इनके पीछे की मानसिकता रत्ती भर नहीं बदली। ये दोनों मामले घूम-फिरकर एक ही कड़वे और गंभीर सवाल पर लाकर खड़ा करते हैं—आखिर तमिलनाडु के सियासी अखाड़े में बार-बार महिलाओं को ही सॉफ्ट टारगेट क्यों बनाया जाता है? अपनी राजनीतिक रंजिशों और गंदे शह-मात के खेल में आख़िर कब तक महिलाओं के सम्मान को ढाल बनाया जाता रहेगा?
उन्नत बचपन की पहली शर्त- स्वस्थ भोजन, स्वस्थ भविष्य
विकसित भारत का स्वप्न केवल आधुनिक इमारतों, तेज अर्थव्यवस्था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल तकनीक और विश्वस्तरीय आधारभूत संरचनाओं से पूरा नहीं होगा। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके बच्चे होते हैं। यदि बचपन स्वस्थ, संस्कारित, ऊर्जावान और मानसिक रूप से सुदृढ़ है, तो राष्ट्र का भविष्य स्वतः सुरक्षित हो जाता है। यदि बचपन ही अस्वस्थ, मोटापे, मधुमेह, कुपोषण और गलत खान-पान की आदतों से घिर जाए, तो विकास की पूरी अवधारणा खोखली सिद्ध होने लगती है। इसलिए बच्चों का स्वास्थ्य केवल स्वास्थ्य मंत्रालय का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास, शिक्षा, अर्थव्यवस्था और सामाजिक उत्तरदायित्व का भी सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है। महाराष्ट्र सरकार द्वारा राज्य के सभी स्कूलों और उनके आसपास जंक फूड की बिक्री, वितरण तथा प्रचार पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय इसी व्यापक दृष्टि का परिचायक है। यह केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के प्रति उत्तरदायित्व का गंभीर संदेश है। यह स्वीकार करने का साहसिक प्रयास है कि बच्चों की सेहत बाजार के मुनाफे से कहीं अधिक मूल्यवान है। यदि यह निर्णय प्रभावी ढंग से लागू होता है तो यह पूरे देश के लिए एक आदर्श मॉडल बन सकता है। आज सबसे बड़ी चिंता यह नहीं है कि बच्चे भोजन कम खा रहे हैं, बल्कि यह है कि वे पोषण कम और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ अधिक खा रहे हैं। रंग-बिरंगे पैकेट, आकर्षक विज्ञापन, कार्टून पात्रों की ब्रांडिंग, सोशल मीडिया का प्रभाव और हर गली-मोहल्ले में उपलब्ध फास्ट फूड ने बच्चों की स्वादेंद्रियों पर ऐसा कब्जा कर लिया है कि घर का पौष्टिक भोजन उन्हें फीका लगने लगा है। यह परिवर्तन केवल खान-पान की आदत का बदलाव नहीं है, बल्कि धीरे-धीरे उनके शरीर, मस्तिष्क और व्यवहार को भी प्रभावित कर रहा है। वैज्ञानिक शोध लगातार यह बताते रहे हैं कि अधिक वसा, अधिक नमक और अधिक चीनी वाले खाद्य पदार्थ बच्चों में मोटापा, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग, हार्मोन असंतुलन तथा मानसिक एकाग्रता में कमी जैसी अनेक समस्याओं का कारण बन रहे हैं। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि जो बीमारियां पहले चालीस-पचास वर्ष की आयु में दिखाई देती थीं, वे अब किशोरावस्था और बचपन में ही दस्तक देने लगी हैं। यह केवल स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि आने वाले समय में देश की उत्पादक क्षमता और मानव संसाधन पर भी गहरा प्रभाव डालने वाला संकट है। इसे भी पढ़ें: FSSAI का Dabur India पर बड़ा एक्शन! '100% शुद्ध' और 'ऑर्गेनिक' के गुमराह करने वाले दावों पर लगी रोक, 15 दिनों में मांगी रिपोर्ट बचपन की सबसे बड़ी आवश्यकता स्वाद नहीं, पोषण है। शरीर के विकास के साथ-साथ मस्तिष्क का तीव्र विकास भी बचपन में ही होता है। यदि इस अवस्था में बच्चों को संतुलित भोजन, ताजे फल, हरी सब्जियां, दूध, दालें, मोटे अनाज और प्राकृतिक खाद्य पदार्थ पर्याप्त मात्रा में मिलें, तो उनका शारीरिक और मानसिक विकास कहीं अधिक प्रभावी होता है। इसके विपरीत जंक फूड क्षणिक स्वाद तो देता है, लेकिन शरीर को आवश्यक पोषक तत्व नहीं देता। परिणामस्वरूप बच्चा बाहर से स्वस्थ दिखाई देता है, किंतु भीतर से अनेक पोषण संबंधी कमियों का शिकार बनने लगता है। दुर्भाग्य यह है कि जंक फूड आज केवल भोजन नहीं रहा, बल्कि एक आक्रामक व्यावसायिक संस्कृति बन चुका है। विज्ञापनों के माध्यम से बच्चों के मन में यह धारणा बैठा दी गई है कि आधुनिकता का अर्थ पैकेटबंद भोजन है। लोकप्रिय खिलाड़ी, फिल्मी कलाकार और डिजिटल प्रभावक अनजाने में बच्चों को ऐसे उत्पादों की ओर आकर्षित करते हैं, जिनका अत्यधिक सेवन उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। ऐसे में केवल परिवारों को दोष देना उचित नहीं होगा। सरकार, उद्योग, विद्यालय, अभिभावक और समाज-सभी को अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। विद्यालय केवल शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि जीवनशैली का निर्माण करने वाली प्रयोगशाला भी हैं। यदि स्कूल परिसर में बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराया जाए, पोषण शिक्षा को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए, विद्यालयों में रसोई बाग विकसित किए जाएं, बच्चों को स्वयं पौधे लगाने और प्राकृतिक भोजन के महत्व से जोड़ा जाए, तो यह परिवर्तन अधिक स्थायी होगा। केवल प्रतिबंध लगाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। स्वस्थ विकल्पों को स्वादिष्ट, आकर्षक और सुलभ बनाना भी उतना ही आवश्यक है। भारत की पारंपरिक भोजन संस्कृति विश्व की सबसे संतुलित और वैज्ञानिक भोजन प्रणालियों में मानी जाती है। बाजरा, ज्वार, रागी, दालें, छाछ, दही, अंकुरित अनाज, मौसमी फल, सब्जियां और घर का ताजा भोजन हमारे पूर्वजों की स्वस्थ जीवनशैली की पहचान रहे हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम आधुनिकता के नाम पर अपनी इस समृद्ध खाद्य संस्कृति को त्यागने के बजाय उसे नए स्वरूप में बच्चों तक पहुंचाएं। यदि विद्यालयों की कैंटीन में स्थानीय और पारंपरिक पौष्टिक व्यंजन उपलब्ध कराए जाएं, तो बच्चे धीरे-धीरे उसी स्वाद के अभ्यस्त हो सकते हैं। यह भी समझना होगा कि जंक फूड का प्रश्न केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। अस्वस्थ बचपन का अर्थ है भविष्य में स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ता खर्च, कार्यक्षमता में कमी, उत्पादकता का ह्रास और राष्ट्रीय आय पर प्रतिकूल प्रभाव। आज यदि बच्चों के पोषण पर निवेश किया जाता है तो वह आने वाले दशकों में स्वस्थ, सक्षम और नवाचारी नागरिकों के रूप में अनेक गुना लाभ देता है। इसलिए बच्चों के स्वास्थ्य पर खर्च को व्यय नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का सबसे लाभकारी निवेश माना जाना चाहिए। अभिभावकों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि घर में ही पैकेटबंद स्नैक्स, शीतल पेय और अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ नियमित रूप से उपलब्ध होंगे, तो बच्चे उनसे दूर नहीं रह पाएंगे। बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने आसपास देखते हैं। यदि परिवार स्वयं संतुलित भोजन करेगा, साथ बैठकर भोजन करने की परंपरा विकसित करेगा और बच्चों को रसोई से जोड़कर भोजन बनाने की प्रक्रिया में सहभागी बनाएगा, तो उनमें स्वस्थ भोजन के प्रति स्वाभाविक रुचि विकसित होगी। सरकारों को भी केवल स्कूलों तक सीमित न रहकर व्यापक नीति अपनानी होगी। बच्चों को लक्षित करने वाले भ्रामक खाद्य विज्ञापनों पर नियंत्रण, पैकेटबंद खाद्य पदार्थों पर स्पष्ट चेतावनी, अत्यधिक चीनी और नमक वाले उत्पादों की पहचान को सरल बनाना, खेल मैदानों की संख्या बढ़ाना, नियमित स्वास्थ्य परीक्षण, पोषण जागरूकता अभियान तथा स्थानीय स्तर पर सामुदायिक भागीदारी जैसे कदम समान रूप से आवश्यक हैं। यदि स्वास्थ्य और शिक्षा विभाग मिलकर साझा रणनीति बनाएं तो परिणाम कहीं अधिक प्रभावी होंगे। आज समय की मांग है कि जंक फूड के विरुद्ध संघर्ष को केवल प्रतिबंध तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे स्वस्थ जीवनशैली के राष्ट्रीय अभियान का स्वरूप दिया जाए। जिस प्रकार स्वच्छ भारत अभियान ने स्वच्छता को जन-आंदोलन बनाया, उसी प्रकार स्वस्थ भोजन और पोषण को भी राष्ट्रीय जन-जागरण का विषय बनाया जाना चाहिए। बच्चों को यह समझाना होगा कि वास्तविक ऊर्जा किसी पैकेट में नहीं, बल्कि प्रकृति के निकट रहने वाले भोजन में छिपी है। महाराष्ट्र सरकार का निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसने यह स्वीकार किया है कि बच्चों का स्वास्थ्य किसी भी राजनीतिक या आर्थिक हित से बड़ा है। अब आवश्यकता इस बात की है कि देश के सभी राज्य इस दिशा में समान साहस और दूरदर्शिता दिखाएं। विकसित भारत की आधारशिला स्मार्ट शहर नहीं, बल्कि स्वस्थ बच्चे हैं। यदि बचपन सुरक्षित रहेगा तो भविष्य सुरक्षित रहेगा। यदि बच्चों की थाली पौष्टिक होगी तो राष्ट्र की प्रगति भी संतुलित होगी। आने वाले भारत की पहचान केवल तकनीकी शक्ति से नहीं, बल्कि स्वस्थ, सशक्त, अनुशासित और जागरूक नई पीढ़ी से होगी। इसलिए आज का सबसे बड़ा राष्ट्रीय संकल्प यही होना चाहिए कि हर बच्चे को ऐसा वातावरण मिले, जहाँ स्वाद से पहले स्वास्थ्य, सुविधा से पहले पोषण और तात्कालिक आकर्षण से पहले दीर्घकालिक जीवन-सुरक्षा को महत्व दिया जाए। यही उन्नत बचपन का मार्ग है और यही विकसित भारत की सबसे मजबूत नींव। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
राज्यसभा में उठाया गया दवाओं पर मुनाफाखोरी और महंगी ब्रांडेड दवाओं का मुद्दा
राज्यसभा में उठाया गया दवाओं पर मुनाफाखोरी और महंगी ब्रांडेड दवाओं का मुद्दा
चीन और पाकिस्तान एक बार फिर भारत की सीमाओं पर सैन्य दबाव बढ़ाने की कोशिश में जुटे हैं लेकिन भारत ने दोनों को साफ और सरल भाषा में स्पष्ट कर दिया है कि हर नापाक हरकत का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए हम पूरी तरह तैयार हैं। हम आपको बता दें कि एक ओर चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के निकट अपने अत्याधुनिक J-20 स्टील्थ फाइटर जेट्स की सक्रियता बढ़ाई है, तो दूसरी ओर पाकिस्तान ने चीन निर्मित लगभग 250 SH-15 ट्रक-माउंटेड सेल्फ-प्रोपेल्ड हॉवित्जर तोपों को भारत से लगी पूरी पूर्वी सीमा पर तैनात कर अपनी आर्टिलरी क्षमता को मजबूत करने का प्रयास किया है। दोनों घटनाक्रम इस बात का संकेत हैं कि बीजिंग और इस्लामाबाद अब पहले से कहीं अधिक समन्वित सैन्य रणनीति पर काम कर रहे हैं। हालांकि भारत ने भी दोनों मोर्चों पर ऐसी बहुस्तरीय तैयारी कर रखी है, जो किसी भी दुस्साहस का तत्काल और करारा जवाब देने में सक्षम है। हम आपको बता दें कि पाकिस्तान द्वारा तैनात SH-15 हॉवित्जर चीन की सरकारी रक्षा कंपनी NORINCO द्वारा विकसित 155 मिमी की आधुनिक स्वचालित तोप है। यह 6x6 ट्रक प्लेटफॉर्म पर आधारित प्रणाली है, जो 30 से 40 किलोमीटर तक सामान्य गोला-बारूद और विशेष रॉकेट-असिस्टेड प्रोजेक्टाइल के साथ लगभग 50 किलोमीटर तक हमला कर सकती है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता शूट एंड स्कूट क्षमता है, जिसके तहत यह कुछ ही सेकंड में छह राउंड दागकर अपनी स्थिति बदल सकती है ताकि जवाबी हमले से बचा जा सके। पाकिस्तान का दावा है कि यह प्रणाली उसकी मारक क्षमता में बड़ा इजाफा करेगी, लेकिन भारत पहले से ही ऐसी तैनाती का जवाब देने की तैयारी कर चुका है। इसे भी पढ़ें: India Bhutan China Tri-Junction पर भारत की नई रणनीति ने किया हैरान, Doklam तक पहुँचेगी रेल, चीन के छूटे पसीने हम आपको बता दें कि पश्चिमी सीमा पर भारतीय सेना की सबसे बड़ी ताकत उसकी काउंटर-बैटरी फायर क्षमता है। भारतीय सेना के पास स्वदेशी पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर, K9-वज्र सेल्फ-प्रोपेल्ड हॉवित्जर, धनुष और ATAGS जैसी आधुनिक 155 मिमी तोपें मौजूद हैं। पिनाका कुछ ही सेकंड में दर्जनों रॉकेट दागकर दुश्मन के लॉन्चिंग क्षेत्र, गोला-बारूद डिपो और सैन्य जमावड़े को तबाह करने की क्षमता रखता है। वहीं K9-वज्र लंबी दूरी तक अत्यंत सटीक और तीव्र गोलाबारी करने में सक्षम है। यदि SH-15 जैसी प्रणालियां भारतीय चौकियों को निशाना बनाने की कोशिश करती हैं, तो भारतीय सेना की काउंटर-बैटरी प्रणाली उन्हें उनकी तैनाती वाले क्षेत्रों में ही जवाब देने की क्षमता रखती है। दूसरी ओर, उत्तरी मोर्चे पर चीन का J-20 स्टील्थ फाइटर एक अलग चुनौती पेश करता है। यह चीन का पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान है, जिसे कम रडार पहचान के साथ लंबी दूरी के अभियानों के लिए विकसित किया गया है। लेकिन स्टील्थ तकनीक का अर्थ यह नहीं कि विमान पूरी तरह अदृश्य हो जाता है। भारतीय वायुसेना ने लद्दाख और पूर्वोत्तर सेक्टर में बहुस्तरीय वायु रक्षा व्यवस्था स्थापित कर रखी है, जिसमें S-400 ट्रायम्फ, MR-SAM (बराक-8), आकाश और आकाश-एनजी जैसी प्रणालियां शामिल हैं। ये नेटवर्क विभिन्न ऊंचाइयों और दूरी पर आने वाले हवाई खतरों की पहचान और उन्हें निष्क्रिय करने के लिए एकीकृत तरीके से कार्य करते हैं। साथ ही भारतीय वायुसेना के अग्रिम एयरबेस भी पूरी तरह सक्रिय हैं। अंबाला और हासीमारा में तैनात राफेल लड़ाकू विमान Meteor बियॉन्ड विजुअल रेंज मिसाइल और SCALP क्रूज़ मिसाइल से लैस हैं। Su-30MKI बेड़ा ब्रह्मोस एयर-लॉन्च क्रूज़ मिसाइल और अस्त्र एयर-टू-एयर मिसाइलों के साथ भारतीय वायु शक्ति की रीढ़ बना हुआ है। इसके अलावा मिग-29UPG, मिराज-2000 और तेजस जैसे लड़ाकू विमान भी उत्तरी और पश्चिमी दोनों मोर्चों पर त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता बनाए हुए हैं। यही नहीं, जमीन से जमीन पर मार करने वाली मिसाइलों के मामले में भी भारत की स्थिति मजबूत है। लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल की तैनाती किसी भी उच्च पर्वतीय सैन्य ठिकाने या कमांड सेंटर पर बेहद कम समय में सटीक हमला करने की क्षमता देती है। वहीं हाल में शामिल की गई प्रलय क्वाज़ी-बैलिस्टिक मिसाइल विशेष रूप से चीन के रॉकेट बलों और सामरिक सैन्य ठिकानों को ध्यान में रखकर विकसित की गई है। इसके अतिरिक्त अग्नि-पी और अग्नि-5 जैसी सामरिक मिसाइलें भारत की दीर्घ दूरी की प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करती हैं। हम आपको यह भी बता दें कि हाल के वर्षों में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सड़क, पुल, सुरंग, एडवांस लैंडिंग ग्राउंड और रसद नेटवर्क के विस्तार ने भारतीय सेना की त्वरित तैनाती क्षमता को भी काफी बढ़ाया है। चिनूक और अपाचे हेलीकॉप्टरों के साथ M777 अल्ट्रा-लाइट हॉवित्जर को दुर्गम पहाड़ी इलाकों में तेजी से पहुंचाया जा सकता है। इससे चीन के सामने ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भारत की परिचालन क्षमता पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत हो चुकी है। देखा जाये तो चीन और पाकिस्तान का बढ़ता रक्षा सहयोग निश्चित रूप से क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है। पाकिस्तान का रक्षा बजट बढ़ाना, चीन से लगातार आधुनिक हथियार खरीदना और दोनों देशों के सैन्य नेतृत्व के बीच बढ़ता समन्वय यह संकेत देता है कि वे भारत पर दबाव बनाने की रणनीति पर आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन भारत ने भी पिछले कुछ वर्षों में अपनी सैन्य संरचना को केवल रक्षात्मक नहीं बल्कि त्वरित और निर्णायक जवाब देने वाली शक्ति के रूप में विकसित किया है। साथ ही सीमा पर हथियारों की संख्या जितनी भी बढ़ा ली जाए, युद्धक्षेत्र में निर्णायक बढ़त केवल उसी पक्ष को मिलती है जिसके पास बेहतर निगरानी, मजबूत लॉजिस्टिक्स, एकीकृत कमान, सटीक हथियार और तेज प्रतिक्रिया क्षमता हो। वर्तमान स्थिति में भारत ने दोनों मोर्चों पर यही बढ़त हासिल करने की दिशा में व्यापक तैयारी कर रखी है। यदि चीन LAC पर J-20 की मौजूदगी के सहारे मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश करता है या पाकिस्तान SH-15 की तैनाती के दम पर किसी सैन्य दुस्साहस का विचार करता है, तो उसे यह समझ लेना चाहिए कि भारतीय सेनाएं अब केवल जवाब नहीं देतीं, बल्कि हर चुनौती का समय, स्थान और परिस्थितियों के अनुरूप निर्णायक प्रतिकार करने की क्षमता भी रखती हैं। यही बात भारत ने एक बार फिर स्पष्ट कर दी है। इस संबंध में पूछे गये प्रश्न के उत्तर में भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए जो भी आवश्यक होगा, भारत वह करेगा। उन्होंने कहा, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हमने देखा कि किस तरह पाकिस्तान को करारा जवाब दिया गया। उन्होंने कहा कि अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए हम जो भी आवश्यक होगा, वह करेंगे। इसके लिए हमारी सेनाएं हमेशा पूरी सतर्कता के साथ तैनात रहती हैं। -नीरज कुमार दुबे
पीएम मोदी का वीडियो हटाने पर मेटा से नाराज संसदीय समिति ने मार्क जुकरबर्ग से 3 दिन के भीतर माफी मांगने को कहा
परिसीमन बिल से पहले राहुल गांधी से मिलने पहुंचेकिरेन रिजिजू, जानिए 50 मिनट तक चली मीटिंग में क्या हुई चर्चा
राम मंदिर दान चोरी मामले में सपा ने तीसरे दिन भी किया विरोध-प्रदर्शन, कहा-भाजपा सरकार में हुआ सनातन धर्म का अपमान
विपक्ष सांसदों का सरकार पर तंज, कहा-'पीएम और गृह मंत्री संसद में अनुपस्थित रहकर जिम्मेदारी से भाग रहे'
'ये मेरे लिए जेनरेशन होप है', सीएम हिमंता सरमा ने 'जेन-जी' को लेकर दिया बयान
'ये मेरे लिए जेनरेशन होप है', सीएम हिमंता सरमा ने 'जेन-जी' को लेकर दिया बयान
एनडीए के सांसदों ने राहुल गांधी पर अपने राजनीति फायदे के लिए देश में भ्रम फैलाने का लगाया आरोप
एनडीए के सांसदों ने राहुल गांधी पर अपने राजनीति फायदे के लिए देश में भ्रम फैलाने का लगाया आरोप
बंगाल भाजपा ने मंत्रियों से विधानसभा सत्र न होने पर भी विधायकों के साथ बैठक करने का निर्देश दिया
बंगाल भाजपा ने मंत्रियों से विधानसभा सत्र न होने पर भी विधायकों के साथ बैठक करने का निर्देश दिया
केरल: मंत्री सीपी जॉन ने महिलाओं पर अपनी टिप्पणी के लिए खेद जताया
केरल: मंत्री सीपी जॉन ने महिलाओं पर अपनी टिप्पणी के लिए खेद जताया
'एक प्रेशर ग्रुप के तौर पर काम करेगी सीजेपी', कॉकरोच जनता पार्टी के प्रमुख अभिजीत दीपके ने बताई रणनीति
ई20 विवाद : नितिन गडकरी को बॉम्बे हाईकोर्ट से राहत, सोशल मीडिया कंपनियों पर कर सकेंगे केस
ई20 विवाद : नितिन गडकरी को बॉम्बे हाईकोर्ट से राहत, सोशल मीडिया कंपनियों पर कर सकेंगे केस
पीएम मोदी के बाद लोकसभा स्पीकर से मिले नीतीश कुमार, राजनीतिक हलकों में चर्चाएं तेज
पीएम मोदी के बाद लोकसभा स्पीकर से मिले नीतीश कुमार, राजनीतिक हलकों में चर्चाएं तेज
चुनाव जीतने के बाद अपने वादे से किनारा कर रहे प्रशांत किशोर, देना होगा जवाब : रामकृपाल यादव
चुनाव जीतने के बाद अपने वादे से किनारा कर रहे प्रशांत किशोर, देना होगा जवाब : रामकृपाल यादव
जनेश्वर मिश्र से बड़ा नेता कोई नहीं, समतामूलक समाज का दिया था संदेश : सनातन पांडे
जनेश्वर मिश्र से बड़ा नेता कोई नहीं, समतामूलक समाज का दिया था संदेश : सनातन पांडे
अनुच्छेद 370 हटने से साकार हुआ श्यामा प्रसाद मुखर्जी का सपना, 7 साल में बदला जम्मू-कश्मीर और लद्दाख : पीएम मोदी
संसद में हंगामा, सभापति बोले- वेल में आने और प्लेकार्ड दिखाने पर होगी कार्रवाई
संसद में हंगामा, सभापति बोले- वेल में आने और प्लेकार्ड दिखाने पर होगी कार्रवाई
विपक्षी दलों के सांसदों की भारी नारेबाजी के बीच लोकसभा दोपहर 2 बजे तक स्थगित
विपक्षी दलों के सांसदों की भारी नारेबाजी के बीच लोकसभा दोपहर 2 बजे तक स्थगित
टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी को झटका, हाईकोर्ट ने खारिज की विदेश जाने की अनुमति से जुड़ी याचिका
टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी को झटका, हाईकोर्ट ने खारिज की विदेश जाने की अनुमति से जुड़ी याचिका
महाराष्ट्र में नकली पनीर पर एक साल का प्रतिबंध, एफडीए ने शुरू की सख्त कार्रवाई
महाराष्ट्र में नकली पनीर पर एक साल का प्रतिबंध, एफडीए ने शुरू की सख्त कार्रवाई
5 अगस्त: वह ऐतिहासिक तारीख जब कश्मीर को मिला नया सवेरा और अयोध्या में गूंजे राम नाम के जयकारे
5 अगस्त: वह ऐतिहासिक तारीख जब कश्मीर को मिला नया सवेरा और अयोध्या में गूंजे राम नाम के जयकारे
राहुल गांधी दूसरों को उपदेश देने के बजाय पहले अपनी पार्टी पर दें ध्यान : गिरिराज सिंह
राहुल गांधी दूसरों को उपदेश देने के बजाय पहले अपनी पार्टी पर दें ध्यान : गिरिराज सिंह
भारत-ब्रिटेन के बीच हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट देश के लिए बड़ी उपलब्धि : गजेंद्र सिंह शेखावत
भारत-ब्रिटेन के बीच हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट देश के लिए बड़ी उपलब्धि : गजेंद्र सिंह शेखावत
पीएम मोदी की 37 नए सांसदों से नाश्ते पर मुलाकात, बोले- 'मिलकर करें काम, सदन की कार्यवाही में बढ़-चढ़कर लें हिस्सा'
राम मंदिर चढ़ावे की हो निष्पक्ष जांच, ई-20 पेट्रोल को लेकर विपक्ष ने किया प्रदर्शन, अमित शाह से सदन में मांगा जवाब
विपक्षी सांसदों ने संसद में गांधी की प्रतिमा से मकर द्वार तक निकाला मार्च, गृह मंत्री से सदन में जवाब देने की मांग
Rahul Gandhi Leads Protest in Parliament, क्यों संसद से भाग रहे हैं गृहमंत्री Amit Shah?
सुनेत्रा पवार पर टिप्पणी को लेकर एनसीपी का कांग्रेस पर हमला, सार्वजनिक माफी की मांग
सुनेत्रा पवार पर टिप्पणी को लेकर एनसीपी का कांग्रेस पर हमला, सार्वजनिक माफी की मांग
UP Chunav 2027: चुनाव से पहले अखिलेश यादव का बड़ा दांव, अब घर-घर जाकर करेंगे ये काम
UP Chunav 2027: चुनाव से पहले अखिलेश यादव का बड़ा दांव, अब घर-घर जाकर करेंगे ये काम
बीएमसी के रेजिडेंट डॉक्टरों ने आज से ओपीडी सेवाएं बंद की
बीएमसी के रेजिडेंट डॉक्टरों ने आज से ओपीडी सेवाएं बंद की
कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने लोकसभा में दलबदल विरोधी कानून पर चर्चा की मांग की
कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने लोकसभा में दलबदल विरोधी कानून पर चर्चा की मांग की
खाद के लिए कतार में किसान, दोगुनी लाइन में लगकर भाजपा के खिलाफ वोट देंगे : अखिलेश यादव
खाद के लिए कतार में किसान, दोगुनी लाइन में लगकर भाजपा के खिलाफ वोट देंगे : अखिलेश यादव
तमिलनाडु : धर्मपुरी-कृष्णागिरी में बनेगा आम औद्योगिक कॉरिडोर, सरकार ने बनाया पांच प्रसंस्करण पार्क का प्रस्ताव
राजद का वर्तमान नेतृत्व राजनीतिक और सामाजिक रूप से पूरी तरह खत्म : पप्पू यादव
राजद का वर्तमान नेतृत्व राजनीतिक और सामाजिक रूप से पूरी तरह खत्म : पप्पू यादव
कोलकाता, 5 अगस्त (आईएएनएस)। कलकत्ता हाईकोर्ट की एकल पीठ के न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य बुधवार को तृणमूल कांग्रेस के महासचिव और लोकसभा सांसद अभिषेक बनर्जी की उस याचिका पर सुनवाई करेंगे, जिसमें उन्होंने आंखों के इलाज के लिए विदेश जाने की अनुमति मांगी है।
सदन की गरिमा बनाए रखना जरूरी, विपक्ष के सहयोग बिना नहीं चल सकती विधानसभा : स्पीकर सतीश महाना
सदन की गरिमा बनाए रखना जरूरी, विपक्ष के सहयोग बिना नहीं चल सकती विधानसभा : स्पीकर सतीश महाना
मणिकम टैगोर बी. ने दिया स्थगन प्रस्ताव का नोटिस, छात्रों के विरोध-प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई पर गृह मंत्री से मांगा जवाब
टीवीके सरकार पेश करेगी पहला बजट, नई योजनाओं और सुधारों पर रहेगा फोकस
टीवीके सरकार पेश करेगी पहला बजट, नई योजनाओं और सुधारों पर रहेगा फोकस
ईरानी प्रतिनिधिमंडल पहुंचा भारत, भुवनेश्वर के ब्रिक्स शिक्षा बैठक में लेगा हिस्सा
ईरानी प्रतिनिधिमंडल पहुंचा भारत, भुवनेश्वर के ब्रिक्स शिक्षा बैठक में लेगा हिस्सा
महाराष्ट्र दौरे पर टिकैत, किसानों की आत्महत्या पर चिंता
भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने महाराष्ट्र दौरे के दौरान एक बार फिर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को कानूनी गारंटी देने की मांग दोहराई
दिल्ली विधानसभा सत्र 7 अगस्त से शुरू
स्पीकर विजेंद्र गुप्ता ने बताया कि दिल्ली विधानसभा का छठा सत्र शुक्रवार से शुरू होगा और इसमें 7, 10 और 11 अगस्त को तीन बैठकें होंगी। स्पीकर गुप्ता ने मंगलवार को बताया कि दिल्ली के उपराज्यपाल टीएस संधू के आदेश के बाद, सत्र बुलाने का नोटिफिकेशन 31 जुलाई को जारी किया गया था।
इस वर्ष की पहली छमाही में, चीन की अर्थव्यवस्था ने अपनी स्थिर और सकारात्मक विकास प्रवृत्ति को जारी रखा। समुद्री अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिक पर्यावरण जैसे कई क्षेत्रों में मुख्य आंकड़ों का उत्कृष्ट प्रदर्शन चीन की अर्थव्यवस्था की मजबूत लचीलता और जीवंतता को दर्शाता है।
डीवाई पाटिल का निधन देश के लिए बड़ी क्षति, बांकीपुर के नतीजे बदलते जनमत का संकेत: भाई जगताप
डीवाई पाटिल का निधन देश के लिए बड़ी क्षति, बांकीपुर के नतीजे बदलते जनमत का संकेत: भाई जगताप
महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या पर चिंता, एमएसपी कानून सबसे बड़ी मांग: राकेश टिकैत
महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या पर चिंता, एमएसपी कानून सबसे बड़ी मांग: राकेश टिकैत
आर्टिकल 370 हटने की वर्षगांठ पर पाकिस्तानी शरणार्थियों में उत्साह, 5 अगस्त को उत्सव मनाने की तैयारी
आर्टिकल 370 हटने की वर्षगांठ पर पाकिस्तानी शरणार्थियों में उत्साह, 5 अगस्त को उत्सव मनाने की तैयारी
कर्नाटक कांग्रेस ने स्पीकर और चेयरमैन पद के लिए उम्मीदवारों के ऐलान का किया बचाव
कर्नाटक कांग्रेस ने स्पीकर और चेयरमैन पद के लिए उम्मीदवारों के ऐलान का किया बचाव
ईओ हत्याकांड: पप्पू यादव ने विमल कुमार के परिवार से की मुलाकात, मदद और सीबीआई जांच की मांग की
ईओ हत्याकांड: पप्पू यादव ने विमल कुमार के परिवार से की मुलाकात, मदद और सीबीआई जांच की मांग की
ओवैसी ने सतीश महाना के बयान पर जताई आपत्ति, बोले- विधानसभा की गरिमा से जुड़ा है सवाल
ओवैसी ने सतीश महाना के बयान पर जताई आपत्ति, बोले- विधानसभा की गरिमा से जुड़ा है सवाल
इमरान खान की रिहाई और अधिकार बहाली की मांग, एमनेस्टी संगठन ने पाकिस्तान सरकार से की अपील
इमरान खान की रिहाई और अधिकार बहाली की मांग, एमनेस्टी संगठन ने पाकिस्तान सरकार से की अपील

