राहुल गांधी का बड़ा संदेश, संविधान बचाने की लड़ाई अब नहीं रुकेगी
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने देश में लोकतंत्र, संविधान और जनता की आवाज की रक्षा को लेकर एक बार फिर केंद्र सरकार पर निशाना साधा है
केंद्रीय मंत्री गडकरी ने मणिपुर के मुख्यमंत्री को एनएच प्रोजेक्ट और अन्य मुद्दों पर केंद्र के समर्थन का भरोसा दिलाया
'एनएच-66 का काम होगा तेज, तीन महीने में एनएच-966 को मिलेगी मंजूरी', नितिन गडकरी ने केरल सीएम को दिया भरोसा
यूपी में कांग्रेस को मिली मजबूती, 'आप' महिला विंग की प्रमुख और बीएसपी नेता समेत कई दिग्गज हुए शामिल
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पोरबंदर में बनेगा 100 करोड़ रुपए का मरीन बायोटेक कॉरिडोर, गुजरात सरकार की बड़ी योजना
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पिता की पुण्यतिथि पर भावुक हुए चिराग पासवान, बोले- 6 साल बाद भी मिल रहा सम्मान
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एमपीएससी छात्रों के आंदोलन की आड़ में विपक्ष अपना करियर चमका रहा है : मनीषा कायंदे
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति और भारत की कनेक्टिविटी रणनीति का असर अब साफ दिखाई देने लगा है। भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा यानी IMEC को लेकर दुनिया के कई देश भारत के साथ जुड़ने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। मिस्र, लेबनान और ओमान ने IMEC के साथ काम करने की इच्छा जताई है, जबकि ग्रीस और साइप्रस इसके पूर्ण सदस्य बनने के इच्छुक हैं। यानी 2023 में भारत की पहल से शुरू हुआ यह गलियारा अब धीरे-धीरे अपना दायरा बढ़ा रहा है और बदलते वैश्विक हालात में भारत की रणनीतिक ताकत का बड़ा केंद्र बनता जा रहा है। फ्रांस के राष्ट्रपति के IMEC विशेष दूत जेरार्ड मेस्त्राले ने नई दिल्ली में साफ कहा है कि IMEC के विस्तार पर फैसला मौजूदा आठ हस्ताक्षरकर्ता सरकारें ही करेंगी। उल्लेखनीय है कि भारत, अमेरिका, सऊदी अरब, यूएई, फ्रांस, जर्मनी, इटली और यूरोपीय संघ इसके मौजूदा हस्ताक्षरकर्ता हैं। वर्ष 2023 में G20 शिखर सम्मेलन के दौरान सामने आया यह प्रोजेक्ट भारत को अरब प्रायद्वीप के रास्ते यूरोप से जोड़ने के लिए समुद्री मार्ग, रेल नेटवर्क, ऊर्जा ढांचे और डिजिटल कनेक्टिविटी को एक साथ जोड़ने की परिकल्पना करता है। सबसे अहम बात यह है कि इस साल के अंत तक IMEC की पहली मंत्रीस्तरीय बैठक होने की उम्मीद है। अब तक इसकी गतिविधियां मुख्यतः स्टीयरिंग कमेटी के स्तर तक सीमित रही हैं। मंत्रीस्तरीय बैठक न केवल परियोजना को राजनीतिक गति दे सकती है, बल्कि इसके भौगोलिक दायरे और सदस्यता विस्तार पर भी बड़ा फैसला संभव है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि जॉर्डन और इजरायल मूल समझौते में उल्लिखित थे, हालांकि वे आठ हस्ताक्षरकर्ताओं में शामिल नहीं हैं। युद्ध ने बदली IMEC की तस्वीर देखा जाये तो पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और तनाव ने IMEC के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है, लेकिन साथ ही इसकी जरूरत भी पहले से कहीं ज्यादा बढ़ा दी है। होर्मुज और बाब-अल-मंदेब जैसे अहम समुद्री रास्तों पर बढ़ते खतरे ने यह साफ कर दिया है कि IMEC को किसी एक संवेदनशील मार्ग पर निर्भर नहीं रहना होगा। सवाल यही है कि जिस कॉरिडोर का मकसद सुरक्षित और वैकल्पिक व्यापार मार्ग देना है, अगर वही कुछ जोखिम भरे रास्तों पर निर्भर रहा तो वह कितना भरोसेमंद साबित होगा? यही कारण है कि 2026 का IMEC, 2023 के IMEC से बिल्कुल अलग दिखाई दे रहा है। अब इसे एक सीधी लाइन वाले कॉरिडोर के बजाय 'नेटवर्क ऑफ कॉरिडोर्स' के रूप में देखने की जरूरत महसूस की जा रही है। अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहयोग और विकास संगठन की मैरी-एस्टेल रे के अनुसार बदलते हालात ने मूल कॉरिडोर की संरचना बदल दी है और अब व्यापारियों के लिए कई वैकल्पिक मार्गों और विकल्पों की जरूरत है। साथ ही इस बदलाव में ओमान की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई है। ओमान अरब प्रायद्वीप के लिए एक वैकल्पिक प्रवेश द्वार बन सकता है और उसके बंदरगाह होर्मुज तथा बाब-अल-मंदेब के जोखिम से बचने वाली व्यवस्था में अहम भूमिका निभा सकते हैं। सोहर और यूएई के फुजैराह के बीच प्रस्तावित रेल संपर्क इसी नई रणनीतिक सोच की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। 'लाइन' नहीं, ऐसा नेटवर्क जिसे दुश्मन तोड़ न सके विशेषज्ञों का मानना है कि एक ही मार्ग पर निर्भर रहने वाला कॉरिडोर युद्ध या भू-राजनीतिक संकट में आसानी से बाधित हो सकता है। इसके विपरीत कई बंदरगाहों, रेल मार्गों और समुद्री विकल्पों वाला नेटवर्क संकट के दौरान अपना रास्ता बदल सकता है। यही IMEC की नई रणनीतिक दिशा बन सकती है। फुजैराह जैसे होर्मुज के बाहर स्थित बंदरगाहों को मजबूत करना, ओमान के सोहर और सलालाह जैसे विकल्पों को जोड़ना तथा मिस्र और अन्य संभावित मार्गों को नेटवर्क में शामिल करना इस परियोजना को ज्यादा प्रभावी बना सकता है। देखा जाये तो इसका अर्थ केवल IMEC की सीमा बढ़ाना नहीं, बल्कि उसकी पूरी भौगोलिक संरचना को फिर से डिजाइन करना है। भारत के हाथ में डिजिटल कमान भी साथ ही भारत केवल भौतिक कनेक्टिविटी पर निर्भर नहीं है। पूर्व बंदरगाह सचिव राजेश कुमार सिन्हा के मुताबिक IMEC की लॉजिस्टिक प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल बनाना आवश्यक है। भारत ने यूएई के साथ मिलकर MAITRI (Master Application for International Trade and Regulatory Interface) विकसित किया है, जो मई में लाइव हुआ। यह डिजिटल ढांचा आगे IMEC के दूसरे हिस्सों में भी दोहराया जा सकता है। IMEC का लक्ष्य सिर्फ सामान पहुंचाना नहीं, बल्कि तेज, सस्ता और सुरक्षित व्यापार तंत्र तैयार करना है। मूल परिकल्पना के अनुसार इससे ट्रांजिट समय में 40 प्रतिशत तक और लॉजिस्टिक लागत में करीब 30 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है। इसके साथ ग्रीन हाइड्रोजन, स्वच्छ ऊर्जा और सुरक्षित डिजिटल कनेक्टिविटी भी इस परियोजना के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। चीन के सामने भारत का रणनीतिक दांव इसके अलावा, IMEC का महत्व केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। यह चीन की Belt and Road Initiative के सामने एक वैकल्पिक वैश्विक कनेक्टिविटी मॉडल भी प्रस्तुत करता है। साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया समर्थन ने इस परियोजना को फिर राजनीतिक ऊर्जा दी है। हालांकि अमेरिकी समर्थन का वित्तीय समर्थन में बदलना अभी निश्चित नहीं माना जा रहा। साथ ही भारत के लिए इसका सामरिक अर्थ और भी बड़ा है। यदि IMEC बहु-मार्गीय नेटवर्क में बदलता है, तो भारत पश्चिम एशिया और यूरोप के बीच व्यापार, ऊर्जा, डिजिटल कनेक्टिविटी और लॉजिस्टिक्स का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है। इसके अलावा, यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को भी मजबूत करेगा। यानी भारत किसी एक शक्ति या किसी एक व्यापारिक मार्ग पर निर्भर हुए बिना कई देशों और कई कॉरिडोरों के साथ समानांतर साझेदारी आगे बढ़ा सकेगा। भारत पहले ही IMEC के साथ-साथ International North-South Transport Corridor और Eastern Maritime Corridor जैसे अन्य संपर्क मार्गों पर काम कर रहा है। यही व्यापक रणनीति भारत को केवल IMEC का हिस्सा नहीं, बल्कि भविष्य के वैश्विक कनेक्टिविटी नेटवर्क का केंद्रीय खिलाड़ी बना सकती है। असली चुनौती: कॉरिडोर को जमीन पर उतारना हालांकि तस्वीर पूरी तरह आसान नहीं है। कई रेल लिंक, बंदरगाह और कनेक्टिविटी परियोजनाएं अभी विकास के दौर में हैं। युद्ध जोखिम, बीमा लागत, पूंजी की लागत और क्षेत्रीय अस्थिरता IMEC को व्यावसायिक रूप से चुनौतीपूर्ण बनाती है। भारत के सामने निर्यात के लिए पर्याप्त कार्गो उपलब्ध कराने की चुनौती भी है। इसके लिए मजबूत प्रशासनिक ढांचे की जरूरत होगी। जैसे कि एक साझा कानूनी या संस्थागत व्यवस्था, बेहतर डिजिटल एकीकरण, देशों के बीच समन्वय और व्यापारियों तथा निजी क्षेत्र की सक्रिय भागीदारी। बहरहाल, पश्चिम एशिया के संकट ने IMEC की जरूरत को कम नहीं किया, बल्कि इसे और बढ़ा दिया है। अब कोशिश इसे एक ही रास्ते तक सीमित रखने की नहीं, बल्कि ऐसे मजबूत नेटवर्क में बदलने की है, जिसमें किसी एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग के बंद होने पर भी व्यापार जारी रह सके। इस पूरी रणनीति में भारत की भूमिका बेहद अहम है। भारत अब केवल दूसरे देशों तक पहुंचने वाले रास्ते का हिस्सा नहीं बनना चाहता, बल्कि ऐसे नए रास्ते तैयार करने में प्रमुख भूमिका निभा रहा है, जो आने वाले समय में वैश्विक व्यापार की दिशा तय कर सकते हैं। -नीरज कुमार दुबे
'मतदान का अधिकार छीनने नहीं देंगे', सीईसी के इस्तीफे तक आंदोलन जारी रहेगा: कर्मवीर बौद्ध
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10 अक्टूबर को Gyanesh Kumar पर आर-पार की जंग! INDIA Bloc vs Modi-RSS, क्या टकराव चाहती है सरकार?
एक फैसला, एक प्रेस कॉन्फ्रेंस और करोड़ों भारतीयों की ईएमआई का गणित रातों-रात बिगड़ गया! अगर आपने घर, कार या पर्सनल लोन ले रखा है, तो आपकी बैंक किश्त अब और महंगी होने वाली है। रिजर्व बैंक यानी RBI का एक फैसला। RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी ने रेपो रेट 0.25% बढ़ाकर 5.50% कर दिया है। अब आप कहेंगे कि ये रेपो रेट और एमपीसी क्या बला है, हमारा इससे क्या लेना-देना? लेना-देना सीधा आपकी गाढ़ी कमाई से है। और लोग कहते हैं महंगाई सरकार बढ़ाती है। अक्सर हम और आप महंगाई का ठीकरा सरकारों पर फोड़ते हैं, लेकिन पर्दे के पीछे ब्याज दरों का रिमोट कंट्रोल किसके हाथ में होता है? एमपीसी क्या है और इसका सीधा असर आपके बैंक बैलेंस पर कैसे पड़ता है? चलिए, इस भारी-भरकम इकॉनमी का आज एमआरआई स्कैन करते हैं। इसे भी पढ़ें: मोदी के समर्थन में नारेबाजी पर भड़के कांग्रेस कार्यकर्ता, कश्मीरी युवक की कर दी पिटाई, बीजेपी आग बबूला रेपो रेट क्या बला है? इसे भी समझ लीजिए। यह वो रेट यानी दर होती है जिस पर रिजर्व बैंक दूसरे बैंकों को कर्ज देता है। मतलब यह हुआ कि जैसे ही आरबीआई दूसरे बैंकों को महंगे इंटरेस्ट रेट पर कर्ज देती है। दूसरे बैंक भी कस्टमर को मिलने वाले लोन पर ब्याज बढ़ा देते हैं। अगर रेपो रेट आरबीआई कम कर दे तो बैंक से मिलने वाला लोन सस्ता हो जाता है। इंटरेस्ट रेट कम हो जाता है। किस तरह के लोन होंगे इनमें? होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन। इसे ऐसे समझिए कि एक बड़ा साहूकार है जिससे छोटे-छोटे साहूकार पैसा उठाते हैं और लोगों को कर्ज देते हैं। इसे भी पढ़ें: Election Commission पर हार का ठीकरा फोड़कर अराजकता फैला रहे Rahul Gandhi, बोले CM Mohan Yadav बदले में उनसे क्या लेते हैं? ब्याज। तो अगर बड़ा साहूकार छोटे साहूकारों से ब्याज ज्यादा लेता है तो छोटा साहूकार भी लोगों से ब्याज ज्यादा लेने लगेगा क्योंकि उसको भी तो अपना घर चलाना है। वो क्यों नुकसान सा है भला? तो अब इसी रेपो रेट को बड़े साहूकार यानी आरबीआई ने बढ़ा दिया है। 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की गई है। तो रेपो रेट 5.50% हो गया। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कह दिया कि यह फैसला महंगाई के बदलते हालात को देखते हुए लिया गया। मल्होत्रा ने कहा कि महंगाई और उसके हालात अब उतने सामान्य नहीं है जितने पिछले साल थे। रेपो रेट बढ़ा है इसलिए आपके लोन की ईएमआई की राशि भी बढ़ जाएगी। अगर ईएमआई बढ़ाना नहीं चाहते हैं तो टेन्योर बढ़ जाएगा। यानी जो लोन 2 साल में खत्म होने वाला था वह अब 2 साल से ज्यादा वक्त में खत्म होगा। आम आदमी की जेब अब और भी खाली ज्यादा होने वाली है। इस बुरी खबर के बीच एक छोटी सी अच्छी खबर भी है। वो यह कि बैंक डिपॉजिट और फिक्स्ड डिपॉजिट यानी एफडी पर मिलने वाले ब्याज में भी बढ़ोतरी होगी। यानी अगर आपने एफडी किया है या करने वाले हैं तो उस पर मिलने वाला इंटरेस्ट अब पहले के मुकाबले ज्यादा होगा। मतलब यह हुआ कि आपका फायदा होने वाला है। लेकिन इसमें किंतु परंतु वाली स्थिति भी है। इसे भी पढ़ें: Elon Musk के आरोपों पर बोले Sunil Mittal, Eutelsat OneWeb भी भारत में मंजूरियों का कर रही इंतजार लिक्विडिटी की स्थिति क्या है? डिपॉजिट के लिए कंपटीशन कितना है मार्केट में? और आने वाले वक्त में इंटरेस्ट रेट कैसा हो सकता है यानी बढ़ेगा या घटेगा इसकी उम्मीद कितनी है? हालांकि अगर बैंक धीरे-धीरे डिपॉजिट रेट बढ़ाते हैं तो एफडी करने वालों को फायदा हो सकता है। इसे एक उदाहरण से समझ लीजिए। अगर कोई बैंक एक साल की एफडी की दर 6% देता है तो कस्टमर को हर साल ₹600 ब्याज मिलेगा। अब इस 6% को बढ़ाकर 6.25% कर दिया जाता है तो कस्टमर को 62500 का ब्याज मिलेगा। यानी हर साल ₹2500 ज्यादा। असली फायदा इस बात पर निर्भर करता है कि क्या बैंक 25 बीपीएस की पूरी बढ़ोतरी का फायदा डिपॉजिटर को देते हैं और क्या डिपॉजिटर नई एफडी में निवेश कर रहा है या मौजूदा में। पहला लोन किसने लिया? साल 1950 न्यूयॉर्क का एक बेहद आलीशान रेस्टोरेंट था। अमेरिका के एक जानेमाने बिजनेसमैन फ्रैंक मैकनारा अपने दोस्तों के साथ डिनर खत्म कर चुके थे। हंसीज़ाक का माहौल था। बातें चल रही थी। तभी वेटर आता है और टेबल पर बिल रख जाता है। फ्रैंक बहुत शान से अपनी सूट की जेब में हाथ डालते हैं। लेकिन अगले ही पल उनके चेहरे की हवाइयां उड़ जाती हैं। जेब खाली था। वॉलेट घर पर ही छूट गया था और पास में $1 का भी कैश नहीं था। अब सोचिए न्यूयॉर्क के इतने बड़े बिजनेसमैन के पास वेटर के सामने बिल चुकाने के पैसे नहीं है। कोई रास्ता ना देखकर मजबूरन उन्हें अपनी पत्नी को फोन करना पड़ा। उनकी पत्नी घर से पैसे लेकर रेस्टोरेंट पहुंची। फिर बिल चुकाया गया। तब जाकर फ्रैंक की जान में जान आया। उस रात फ्रैंक मैकन मारा को इतनी भयंकर शर्मिंदगीगी महसूस हुई कि उन्होंने कसम खाई कि दोबारा कभी ऐसी स्थिति में नहीं फसूंगा। तभी उनके मन में ख्याल भी आया। क्या कोई ऐसा तरीका नहीं हो सकता कि मैं बिना कैश लिए रेस्टोरेंट जाऊं। एक कार्ड दिखाऊं, खाना खाऊं और महीने के अंत में एक साथ सारा भुगतान कर दूं। और यह सारी कहानी मैंने आपको क्यों बताई? क्योंकि इसी एक शर्मिंदा करने वाली घटना से जन्म हुआ था डायनर्स क्लब का दुनिया के पहले आधुनिक क्रेडिट कार्ड का। इसे भी पढ़ें: 13 करोड़ वोटर लिस्ट में जुड़ने तक जारी रहेगी ECI के खिलाफ लड़ाई, Congress MP Imran Masood का दावा इंसान ने कर्ज का आविष्कार क्यों किया सोमेरियन सभ्यता जो आज के इराक वाले इलाके के आसपास पड़ती है। उस दौर में पैसा या करेंसी नाम की कोई चीज ही नहीं थी। तो सोचिए जब पैसा ही नहीं था तो लोन किस चीज का दिया जाता? लोन दिया जाता था अनाज का, बीज का और मवेशियों का। मान लीजिए एक सुमेरियन किसान है। बुवाई का मौसम आ गया लेकिन उसके पास बोने के लिए बीज ही नहीं है। फसल कटने में अभी 6 महीने बाकी हैं। और इस बीज परिवार का पेट भी पालना है। वो जाता था शहर के मुख्य मंदिर के पास या फिर राजा के महल के पास। वहां वो पुजारी या फिर अधिकारी से 10 बोरी जौ उधार मांगता। वो दे भी देते। लेकिन उनकी एक शर्त होती थी कि जब 6 महीने बाद फसल कटेगी तो किसान को 10 बोरी के बदले 13 बोरी जौ वापस लौटानी होगी। और यही जो तीन अतिरिक्त बोरियां थी यहीं जन्म हुआ इंटरेस्ट यानी ब्याज का। सुमेरियन भाषा में ब्याज को कहा जाता था मैश जिसका शाब्दिक अर्थ होता है छोटा बच्चा। यानी जैसे एक गाय एक बछड़े को जन्म देती है वैसे ही अनाज के लोन से ब्याज रूपी बच्चा पैदा होता है। अब सबसे दिलचस्प बात इस लेनदेन का हिसाब भी रखा जाता था। तब कागज तो था नहीं इसलिए वे क्ले टेबलेट्स यानी गीली मिट्टी की पट्टिकाएं लेते थे। उस पर यूनिफार्म लिपि में लिखा जाता था। चाणक्य का अर्थशास्त्र अगर हम भारत की बात करें तो भारत में भी कर्ज की व्यवस्था उतनी ही पुरानी और विकसित थी और ईसा पूर्व चौथी सदी में जब आचार्य चाणक्य ने अर्थशास्त्र लिखा तो उन्होंने भारत के वित्तीय नियमों को इतनी विस्तार से लिखा कि आज का आरबीआई भी हैरान रह जाए। चाणक्य ने अर्थशास्त्र में लिखा था कि आम व्यापारिक कर्ज पर ब्याज 15% प्रतिवर्ष होगी। लेकिन जो व्यापारी समुद्री रास्तों या खतरनाक जंगलों से होकर व्यापार करने जाते थे जोखिम ज्यादा होने के कारण उनसे 60% तक ब्याज लिया जा सकता था। भारत में डेप्ट एंड डिपॉजिट यानी ऋण और दान के पूरे कानून मौजूद थे। जहां ये तक तय था कि किस स्थिति में कर्ड चुकाना होगा और किस स्थित में नहीं।
तमिलनाडु में प्रमोशन के लिए संपत्ति की जानकारी देना अनिवार्य, 31 अक्टूबर तक अपलोड करना होगा ब्योरा
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CEC Gyanesh Kumar के खिलाफ देशव्यापी उबाल! UP, Bihar से Karnataka तक प्रदर्शन, Jantar Mantar पर नजर
अचूक, अभेद्य और सटीक भारतीय वायु सेना: गर्व के साथ सफलता की ऊंचाइयों को छूते हुए
भारतीय वायु सेना (आई. ए. एफ.) आज (8 अक्टूबर, 2026) अपनी 94वीं वर्षगांठ मना रही है। यह दिन हवाई सुरक्षा, रणनीतिक प्रतिरोध और मानवीय सेवा के लगभग एक सदी के सफल सफर को दर्शाता है। इसे भी पढ़ें: IAF प्रमुख Amar Preet Singh ने 'ऑपरेशन सिंदूर' को किया याद! कहा- दुनिया ने देखी भारत की 'विध्वंसक ताकत', वायु सेना हर चुनौती के लिए पूरी तरह तैयार भारतीय वायु सेना दिवस क्यों मनाया जाता है भारतीय वायु सेना दिवस हर साल 8 अक्टूबर को मनाया जाता है, जो 1932 में हमारी वायु सेना की आधिकारिक स्थापना की याद दिलाता है। ब्रिटिश शासन के दौरान 'रॉयल इंडियन एयर फ़ोर्स' के रूप में स्थापित, वायु सेना ने 1950 में अपने नाम से रॉयल शब्द हटा दिया। यह दिन उन वायु योद्धाओं (सेवानिवृत्त एवं सेवारत) के साहस, पेशेवर रवैये और बलिदान का सम्मान करता है, जो शांति और संघर्ष के समय भारत के हवाई क्षेत्र, सीमाओं और नागरिकों की रक्षा करते हैं। भारतीय वायु सेना दिवस समारोह की खास बातें भारतीय वायु सेना दिवस समारोह भव्यता, सटीकता और टेक्नोलॉजी के प्रदर्शन के लिए जाने जाते हैं। सालाना एयर डिस्प्ले और फ्लाईपास्ट में फाइटर जेट, ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और हेलीकॉप्टर के तालमेल वाले हवाई करतब शामिल होते हैं। एयर-वॉरियर परेड में पुरुष और महिला दोनों तरह के कर्मियों का सटीक तालमेल वाला मार्च होता है, जो अनुशासन और मिलिट्री अंदाज़ को दिखाता है। फ्लाई-पास्ट कार्यक्रम को आम जनता तक पहुँचाने के लिए हर साल जगहें बदली जाती हैं, जैसे हिंडन एयर फ़ोर्स बेस, चंडीगढ़ और प्रयागराज। इस साल वाराणसी में 22, 23 और 25 अक्टूबर को फ्लाई-पास्ट डिस्प्ले होगा। थीम-बेस्ड कैंपेन में प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) और रक्षा मंत्रालय की तरफ़ से ऑफिशियल प्रमोशनल रिलीज़ शामिल हैं, जिनमें डायनामिक वीडियो कंटेंट होता है, जैसे 2026 का कैंपेन जिसकी थीम है, इंडियन एयर फ़ोर्स: अचूक, अभेद्य और सटीक। भारतीय वायु सेना की मुख्य बातें 2022 से लगातार पांचवें साल, भारतीय वायु सेना दुनिया भर में अमेरिका और रूस के बाद तीसरे स्थान पर है। यह युद्ध में खुद को साबित कर चुकी और अनुभवी सेना है। साथ ही, यह इस क्षेत्र की एकमात्र ऐसी वायु सेना है जो लगातार युद्ध अभियानों में शामिल रही है। 2019 में बालाकोट, 2020 से 2025 तक लद्दाख एल ए सी गतिरोध और मई 2025 में 'ऑपरेशन सिंदूर' जैसे अभियानों ने भारतीय वायु सेना की लंबी दूरी तक हमला करने और हवाई सुरक्षा की क्षमताओं को दिखाया है। ऑपरेशन का अनुभव इसकी एक बड़ी ताकत है। भारतीय वायु सेना 250 से ज़्यादा एसयू-30एम के आई एयर-डोमिनेंस फाइटर जेट्स का संचालन करती है। इन्हें एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे रडार और अस्त्र मार्क2 मिसाइलों के साथ 'सुपर सुखोई' मानकों के अनुसार अपग्रेड किया जा रहा है। राफेल 4.5-जेनरेशन फाइटर जेट्स, जो मीटियोर और स्कैल्प मिसाइलों और एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट से लैस हैं, 'ऑपरेशन सिंदूर' में बहुत असरदार साबित हुए। जल्द ही राफेल का एक नया वेरिएंट आने की उम्मीद है। तेजस मार्क-1, अपग्रेडेड मिग-29यूपीजी, मिराज-2000 और जगुआर फाइटर जेट्स जैसे अन्य प्लेटफॉर्म भी अलग-अलग तरह की ऑपरेशनल क्षमताएं प्रदान करते हैं। लेह (10,700 फीट की ऊंचाई) से लेकर कार निकोबार जैसी जगहों से काम करने की भारतीय वायु सेना की क्षमता इसे क्षेत्र की एकमात्र ऐसी वायु सेना बनाती है जो लगातार ऊंचाई वाले इलाकों में ऑपरेशन करने में सक्षम है। भारतीय वायु सेना एस-400 और आकाश सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम के साथ आईएसीसीएस और एएफनेट का इस्तेमाल करके असरदार इंटीग्रेटेड नेट-सेंट्रिक ऑपरेशन करती है। ये प्लेटफ़ॉर्म एक यूनिफाइड नेटवर्क के तौर पर काम करते हैं। एयर वॉरियर्स ने टेक्नोलॉजी-बेस्ड ऑपरेशन के तरीके को सफलतापूर्वक अपना लिया है। भारतीय वायु सेना का ट्रेनिंग का तरीका सबसे अच्छे तरीकों में से एक है और भारतीय वायु सेना के पायलटों ने कई इंटरनेशनल एक्सरसाइज़ जीती हैं। 'आत्मनिर्भर भारत' पहल और देश में ही मॉडर्नाइज़ेशन पर ध्यान देने के अच्छे नतीजे मिल रहे हैं। भारतीय वायु सेना ने 180 तेजस मार्क -1ए एयरक्राफ्ट का ऑर्डर दिया है और आमका (ए एम सी ए), फिफ्थ-जेनरेशन फाइटर, कैटस् टीमिंग ड्रोन और स्वदेशी अस्त्र बी वी आर मिसाइल को मंज़ूरी दी है। ये कदम आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देते हैं, साथ ही बदलाव के दौर में क्षमता की कमियों को दूर करने के लिए लगातार कोशिशें ज़रूरी हैं। इंडियन एयर फ़ोर्स की उपलब्धियाँ कई दशकों के इतिहास में, भारतीय वायु सेना बाइप्लेन के एक छोटे से बेड़े से बढ़कर दुनिया की टॉप पाँच सबसे ताकतवर एयर फ़ोर्स में से एक बन गई है। इसकी मुख्य उपलब्धियों में शामिल हैं: युद्ध के समय बहादुरी: बड़े मिलिट्री ऑपरेशन्स में अहम भूमिका, जिसमें दूसरा विश्व युद्ध; 1948, 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान संघर्ष; 1999 का कारगिल युद्ध शामिल हैं। और 2019 के बालाकोट ऑपरेशन जैसे सटीक क्रॉस-बॉर्डर हमले। सेना का आधुनिकीकरण और स्वदेशी इनोवेशन: पुराने आयातित विमानों से हटकर राफेल और एसयू-30एम के आई जैसे एडवांस्ड मल्टी-रोल फाइटर जेट, तेजस जैसे स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान, सी-17 ग्लोबमास्टर और सी-295 जैसे आधुनिक भारी-भरकम सामान ढोने वाले विमान, और स्वार्म ड्रोन व ड्रोनाथॉन जैसी नई तकनीकों को अपनाना। मानवीय सहायता और आपदा राहत (एच ए डी आर): राष्ट्रीय आपातकाल, बाढ़ और भूकंप के दौरान ज़रूरी बचाव अभियान चलाना, और विदेशों में संघर्ष वाले इलाकों में फँसे नागरिकों और मेडिकल सप्लाई को एयरलिफ्ट करना। आज भारतीय वायु सेना के सामने चुनौतियाँ शानदार क्षमताओं के बावजूद, भारतीय वायु सेना को ऑपरेशन, स्ट्रक्चर और प्लानिंग से जुड़ी अहम चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमानों की संख्या में काफी कमी आ रही है। हालाँकि 42 फाइटर स्क्वाड्रन की मंज़ूरी है, लेकिन अभी संख्या इससे कम है। 2030 के दशक में इनके और कम होने की उम्मीद है क्योंकि मिग-21, मिग-29, जगुआर और मिराज-2000 जैसे पुराने बेड़े तेज़ी से रिटायर हो रहे हैं और उनकी जगह नए विमान उतनी तेज़ी से नहीं आ रहे हैं। यह बढ़ता अंतर भविष्य की तैयारी के लिए सेना के आधुनिकीकरण को बहुत ज़रूरी बनाता है। एयर चीफ मार्शल एयर मार्शल ए.पी. सिंह ने 3 अक्टूबर 2026 को कहा, हमारी संख्या कम है, लेकिन हम कमज़ोर नहीं हैं, जो भारतीय वायु सेना की मौजूदा स्थिति को दर्शाता है। 2021 में ऑर्डर किए गए स्वदेशी तेजस मार्क-1ए का एक स्क्वाड्रन साल के आखिर तक शामिल कर लिया जाएगा। तेजस मार्क-2 की पहली उड़ान सितंबर 2027 तक होने की संभावना है, जबकि आमका (ए एम सी ए) की पहली उड़ान सितंबर 2028 तक होने की उम्मीद है। भारतीय वायु सेना उत्तरी सीमा पर लंबे समय से चल रहे और बहुत अहम सैन्य गतिरोध को संभाल रही है, साथ ही परमाणु हथियार वाले पश्चिमी पड़ोसी के खिलाफ रणनीतिक तैयारी भी बनाए हुए है। इसे भी पढ़ें: Indian Air Force का 94वां स्थापना दिवस, Hindan Air Force Station पर भव्य परेड चीन का सैन्य बुनियादी ढांचे, एयरफील्ड और क्वांटम कंप्यूटिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और स्टील्थ क्षमताओं जैसी अगली पीढ़ी की तकनीकों का तेज़ी से आधुनिकीकरण क्षेत्रीय निर्माण क्षमताओं से कहीं आगे निकल रहा है। इससे प्रभावी 'फोर्स मल्टीप्लायर' (सैन्य क्षमता बढ़ाने वाले साधनों) और लगातार आधुनिकीकरण के ज़रिए सीमित संसाधनों का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल करने की ज़रूरत बढ़ जाती है। इन-फ्लाइट रिफ्यूलर (आई एल-78), एयरबोर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम (अवाक्स), लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल बैटरी और मज़बूत अनमैन्ड एरियल कॉम्बैट सिस्टम (यू ए एस) जैसे अहम 'फोर्स मल्टीप्लायर' की कुल संख्या में अभी भी कमी है, जिससे इन क्षमताओं को बड़े पैमाने पर तैनात करने में सीमाएँ आती हैं। भारतीय वायु सेना की लगातार प्रभावशीलता बनाए रखने के रोडमैप के लिए इन कमियों को दूर करना ज़रूरी है। --- प्रोफेसर (डॉ.) डी. के. पांडेय
नई दिल्ली, 8 अक्टूबर (आईएएनएस)। दवाओं की बिक्री को बढ़ावा देने के लिए फार्मा कंपनियों द्वारा डॉक्टरों को महंगे तोहफे और सुविधाएं देने की प्रथा पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक विशेष कमेटी का गठन करने और उसकी रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने का आदेश दिया है।
भारत में एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स की उपग्रह आधारित इंटरनेट सेवा स्टारलिंक की शुरुआत को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। एलन मस्क ने भारत में अपनी कंपनी की राह में “कुछ प्रभावशाली उद्योगपतियों” के रोड़े अटकाने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि ये कारोबारी भारतीय जनता पर अपना एकाधिकार और नियंत्रण बनाए रखने के लिए स्टारलिंक को भारत में प्रवेश नहीं करने दे रहे हैं। मस्क ने यहां तक कह दिया कि यह “भारत की जनता के खिलाफ अपराध” है। लेकिन मस्क के इस बयान के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत जैसे संप्रभु देश की सुरक्षा और दूरसंचार नीति अब किसी अरबपति के सोशल मीडिया बयान से तय होगी? उधर, भारत सरकार ने मस्क के आरोप को सीधे खारिज कर दिया है। सरकार का कहना है कि भारत में उपग्रह आधारित संचार सेवाओं के लिए बनाए गए नियम निष्पक्ष और किसी भी कंपनी के साथ भेदभाव से मुक्त हैं। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि इन नियमों को किसी कंपनी के खिलाफ भेदभावपूर्ण बताना पूरी तरह बेबुनियाद और गलत समझ पर आधारित है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत सरकार ने साफ किया है कि स्टारलिंक अकेली कंपनी नहीं है जो मंजूरी की प्रक्रिया में है। सुनील भारती मित्तल समर्थित वनवेब, मुकेश अंबानी की रिलायंस जियो और एलन मस्क की स्टारलिंक, तीनों कंपनियों के मामले में सुरक्षा संबंधी जांच चल रही है। सरकार के मुताबिक तीनों कंपनियां फिलहाल लगभग एक ही नियामकीय चरण में हैं। तो फिर मस्क से पहला सवाल यही पूछा जाना चाहिए कि अगर भारत सरकार तीनों कंपनियों की सुरक्षा जांच कर रही है, तो केवल स्टारलिंक को रोकने का आरोप भारत पर क्यों लगाया जा रहा है? इस विवाद का दूसरा और बेहद अहम पहलू इसके समय से जुड़ा है। एलन मस्क का बयान ऐसे समय आया जब भारत दुनिया के सामने अपनी संचार और डिजिटल जगत की तकनीकी क्षमता का प्रदर्शन करने के लिए तैयार था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंडिया मोबाइल कांग्रेस के दसवें संस्करण का उद्घाटन किया। दुनिया के सौ से अधिक देशों की भागीदारी वाले इस आयोजन में भारत की 5जी तकनीक, डिजिटल संपर्क व्यवस्था, दूरसंचार क्षेत्र की उपलब्धियों और भविष्य की संचार तकनीक को दुनिया के सामने रखा जा रहा है। जब पूरी दुनिया भारत की संचार क्रांति और तकनीकी प्रगति को देखने के लिए जुटी थी, उसी समय स्टारलिंक को लेकर मस्क का तीखा बयान सामने आया। इसलिए सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह महज एक कारोबारी असहमति थी या फिर इस बयान के समय ने भारत की तकनीकी उपलब्धियों से दुनिया का ध्यान हटाकर स्टारलिंक विवाद की तरफ मोड़ दिया? यह सवाल उठेगा ही कि भारत के सबसे बड़े दूरसंचार आयोजनों में से एक के दौरान ही इस तरह का सार्वजनिक आरोप लगाने की जरूरत आखिर एलन मस्क को क्यों पड़ी? अब बात उस मुद्दे की, जिस पर भारत सरकार कोई समझौता नहीं करना चाहती है। वह मुद्दा है राष्ट्रीय सुरक्षा। भारत ने स्टारलिंक को देश में आने से पूरी तरह मना नहीं किया है। कंपनी को भारत में उपग्रह आधारित संचार सेवाएं देने का आवश्यक लाइसेंस मिल चुका है। लेकिन लाइसेंस मिलना सेवा शुरू करने की अंतिम अनुमति नहीं है। इसके बाद सुरक्षा मंजूरी, रेडियो तरंगों के आवंटन और अन्य आवश्यक नियमों का पालन करना पड़ता है। यहीं पर मस्क के आरोप की असली परीक्षा होती है। देखा जाये तो उपग्रह आधारित इंटरनेट सामान्य इंटरनेट सेवा से अलग है। यहां केवल तेज इंटरनेट पहुंचाने का सवाल नहीं है। इसके साथ भारतीय नागरिकों के आंकड़ों की सुरक्षा, आंकड़ों को देश के भीतर रखने, संचार की वैध निगरानी, आपातकालीन परिस्थितियों में सरकारी पहुंच और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर प्रश्न जुड़े हैं। भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि भारतीय उपयोगकर्ताओं का आंकड़ा कहां रखा जाएगा, संचार व्यवस्था पर किसका नियंत्रण होगा और राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों को कानून के तहत आवश्यकता पड़ने पर आवश्यक जानकारी और पहुंच किस प्रकार उपलब्ध होगी? वहीं स्टारलिंक ने भारत की सुरक्षा संबंधी चिंताओं को दूर करने की कोशिश करते हुए दावा किया है कि उसने भारत में लगभग 20 जमीन आधारित केंद्र तैयार किए हैं और भारतीय उपयोगकर्ताओं के आंकड़ों को देश के भीतर रखने के लिए विशेष सुरक्षा व्यवस्था विकसित की है। कंपनी की वरिष्ठ अधिकारी लॉरेन ड्रेयर ने इंडिया मोबाइल कांग्रेस में कहा कि भारत से सभी आवश्यक मंजूरियां मिलने के बाद कंपनी सेवा शुरू करने के लिए तैयार है। लेकिन भारत का रुख बिल्कुल स्पष्ट है, पहले सुरक्षा, उसके बाद सेवा। साथ ही भारत के निष्पक्ष रवैये का एक बड़ा उदाहरण खुद एलन मस्क की दूसरी कंपनी टेस्ला है। भारत ने टेस्ला को देश में कारोबार करने से नहीं रोका। टेस्ला ने मुंबई में अपना पहला शोरूम खोला और भारत में अपनी इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री शुरू की। अगर भारत सरकार वास्तव में मस्क की कंपनियों के खिलाफ होती, तो टेस्ला को भारतीय बाजार में प्रवेश की अनुमति क्यों दी जाती? लेकिन क्या कार बेचने और देश की संचार व्यवस्था का हिस्सा बनने को एक ही तराजू में तौला जा सकता है? बिल्कुल नहीं। कार एक उपभोक्ता वस्तु है, जबकि देश की संचार व्यवस्था सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा, आंकड़ों और रणनीतिक संचार से जुड़ी होती है। इसलिए दोनों क्षेत्रों में सुरक्षा के अलग-अलग मानक होना स्वाभाविक है। यही बात मस्क के आरोपों पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा करती है। अगर भारत स्टारलिंक के साथ भेदभाव कर रहा है, तो वनवेब और रिलायंस जियो भी सुरक्षा जांच की प्रक्रिया से क्यों गुजर रहे हैं? और अगर भारत किसी एक कारोबारी समूह को फायदा पहुंचाना चाहता है, तो फिर मस्क की टेस्ला को भारत में कारोबार करने की अनुमति क्यों दी गई? इसमें कोई दो राय नहीं कि एलन मस्क को भारत के फैसले पर सवाल उठाने का अधिकार है। लेकिन किसी संप्रभु देश की नियामकीय प्रक्रिया पर सवाल उठाने के साथ आरोपों के समर्थन में ठोस प्रमाण देना भी जरूरी है। केवल सोशल मीडिया पर “प्रभावशाली उद्योगपतियों” वाला आरोप लगा देना इस बात का प्रमाण नहीं बन जाता कि भारत की व्यवस्था पक्षपातपूर्ण है। भारत को विदेशी निवेश चाहिए, नई तकनीक चाहिए और दुनिया की बड़ी कंपनियों का स्वागत भी है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि किसी विदेशी कंपनी को राष्ट्रीय सुरक्षा से ऊपर रखा जाए। भारत किसी अरबपति की निजी संपत्ति नहीं है और न ही किसी कारोबारी की सोशल मीडिया टिप्पणी भारत की नीतियां तय कर सकती है। भारत अपने फैसले अपनी संप्रभुता, अपने कानून, अपनी सुरक्षा और अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर करेगा। यही किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र का अधिकार है और यही उसकी जिम्मेदारी भी है। एलन मस्क को यह भी समझना होगा कि भारत की सुरक्षा चिंता को केवल आशंका मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। दुनिया के दूसरे देशों में भी Starlink को लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा और नियंत्रण से जुड़े गंभीर सवाल उठे हैं। ऑस्ट्रेलिया के सरकारी सुरक्षा अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि निजी उपग्रह इंटरनेट कंपनियों पर किसी देश का नियंत्रण सीमित हो सकता है। ऐसे में इन कंपनियों पर जरूरत के मुताबिक निगरानी और नियंत्रण न होने से देश की सुरक्षा और संप्रभुता के लिए खतरा पैदा हो सकता है। यूक्रेन में तो Starlink की भूमिका सीधे युद्ध और सुरक्षा से जुड़ चुकी है। अमेरिकी सरकारी जांच में पाया गया कि Starlink दोहरे उपयोग वाली तकनीक है, जिसका इस्तेमाल नागरिक संचार के साथ-साथ युद्धक्षेत्र में ड्रोन संचालन, तोपों के निशाने और सैन्य संचार के लिए भी हुआ। जांच में यह भी सामने आया कि बड़ी संख्या में Starlink उपकरण ऐसे क्षेत्रों में पहुंच गए थे जहां उनके दुरुपयोग या चोरी का जोखिम था। यही नहीं, 2026 में यूक्रेन ने रूसी ड्रोन के लिए Starlink के अवैध इस्तेमाल को रोकने के उद्देश्य से केवल अधिकृत उपकरणों को सेवा देने की व्यवस्था लागू की। म्यांमार में भी Starlink पर गंभीर आरोप लगे हैं। अंतरराष्ट्रीय जांचों में सामने आया कि मानव तस्करी और साइबर ठगी के लिए चलाए जा रहे कुख्यात ठिकानों में Starlink का इस्तेमाल हो रहा था; एक कार्रवाई में ऐसे ही एक परिसर से 30 Starlink उपकरण जब्त किए गए थे। यहां तक कि अमेरिकी सांसदों ने भी दक्षिण-पूर्व एशिया के इन ठगी केंद्रों में Starlink के इस्तेमाल को लेकर कंपनी से जवाब मांगा है। वैसे इन घटनाओं का अर्थ यह नहीं है कि Starlink स्वयं इन अपराधों में शामिल है, लेकिन ये घटनाएं यह जरूर दिखाती हैं कि इतनी शक्तिशाली और सीमापार काम करने वाली उपग्रह इंटरनेट व्यवस्था के इस्तेमाल पर किसी देश की सरकारें नियंत्रण, निगरानी और राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर इतनी सतर्क क्यों हैं? ऐसे में भारत अगर अपने यहां Starlink को पूरी सुरक्षा जांच और स्पष्ट शर्तों के बाद ही अनुमति देना चाहता है, तो इसमें गलत क्या है? बहरहाल, भारत में कारोबार करने के लिए दुनिया की कंपनियों का स्वागत है, लेकिन भारत की जमीन पर कारोबार करने वाली हर कंपनी को भारत के कानून, भारत के नियम और भारत की सुरक्षा शर्तों का पालन करना ही होगा। भारत तकनीक का स्वागत करेगा, निवेश का स्वागत करेगा और प्रतिस्पर्धा का भी स्वागत करेगा, लेकिन अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा की कीमत पर नहीं। -नीरज कुमार दुबे
ममता के दिल्ली दौरे पर दिलीप घोष का तंज, बोले-याचिकाओं से बंगाल पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा
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नई दिल्ली, 8 अक्टूबर (आईएएनएस)। दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का गुरुवार सुबह गोवा स्थित उनके आवास पर निधन हो गया। 75 वर्षीय अभिनेता के निधन पर कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों और नेताओं ने शोक व्यक्त किया है। सभी ने ईश्वर से प्रार्थना की कि दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान और शोकाकुल परिजनों व प्रशंसकों को यह दुख सहने की शक्ति प्रदान करें।
Bihar Politics: SIR के खिलाफ महागठबंधन का बड़ा प्रदर्शन, पटना में राजभवन मार्च आज
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राहुल-प्रियंका के साथ कथित पुलिस कार्रवाई के खिलाफ आज कांग्रेस का विरोध प्रदर्शन
मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने बुधवार को पार्टी कार्यकर्ताओं से 8 अक्टूबर को राज्यभर में प्रदर्शन करने की अपील की। उन्होंने कहा कि नई दिल्ली में विरोध मार्च के दौरान लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अन्य इंडिया गठबंधन सांसदों के साथ हुई कथित पुलिस कार्रवाई के विरोध में ये प्रदर्शन किए जाएंगे।
राहुल की हुंकार, लोकतांत्रिक आवाज दबेगी नहीं
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर कांग्रेस और INDIA गठबंधन का विरोध प्रदर्शन लगातार दूसरे दिन भी जारी रहा
गुजरात बोर्ड ने कक्षा 10 और 12 की मार्कशीट के लिए 'पारख सेल' और डिजीलॉकर सुविधा शुरू की
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आंध्र प्रदेश के राज्यपाल एस. अब्दुल नजीर ने लोक भवन में 77वें टीबी सील बिक्री अभियान की शुरुआत की
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महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने गृह मंत्री अमित शाह को सूखे की स्थिति से अवगत कराया, केंद्र से सहायता मांगी
'विशाखापत्तनम मेट्रो और बीच कॉरिडोर प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दे केंद्र', सीएम नायडू का पीएम मोदी से आग्रह
वैश्विक खाद्य संकट के काले बादलों के बावजूद भारत की स्थिति दुनिया के अन्य देशों की तुलना में काफी मजबूत और सुरक्षित है।
एसआईआर पर हंगामा, हकीकत से ज्यादा फसाना
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर सियासी पारा लगातार चढ़ा हुआ है। विशेषकर विपक्षी दल जिस तरह से इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं, उससे माहौल में एक भ्रम फैल रहा है। विपक्षी हंगामे और सवालों के चलते ऐसे लोगों की संख्या बढ़ी है, जो मानने लगे हैं कि मतदाता सूची की जांच एक तरह से नागरिकता की जांच हो गई है। लोग एक बारगी वोटर न होने को बर्दाश्त कर भी लें, लेकिन कोई नहीं चाहेगा कि उसकी जन्मजात नागरिकता पर सवाल उठे या वह खतरे में पड़े। कहना न होगा कि विशेषकर पश्चिम बंगाल में हुए एसआईआर के बहाने विपक्ष यह भ्रम और डर-दोनों फैलाने में किंचित सफल रहा है। हालांकि यह भी सच है कि ऐसा भ्रम और डर सिर्फ पश्चिम बंगाल और बिहार के ही कुछ इलाकों में ही दिख रहा है। एसआईआर उत्तर प्रदेश में भी हुआ है और दिल्ली में भी जारी है। एसआईआर तमिलनाडु में भी हुआ है। लेकिन यहां के मतदाताओं के बीच ऐसा भ्रम और डर न के बराबर दिखा है। इसे भी पढ़ें: Voter List विवाद पर पूर्व जज SN Dhingra का बयान, ECI की SIR प्रक्रिया को बताया जरूरी ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर बिहार और पश्चिम बंगाल में ऐसा डर क्यों दिख रहा है? इसकी वजह है, वहां पिछले कुछ दशकों में बांग्लादेश से बढ़ी घुसपैठ। पश्चिम बंगाल में जब सत्ता में वाममोर्चा था, तब यही ममता बनर्जी वहां घुसपैठ के मुद्दे को उछालती रहती थीं और वाममोर्चे पर आरोप लगाती रहती थीं कि वह इसे बढ़ावा दे रहा है। ममता बनर्जी इस बहाने परोक्ष रूप से वाममोर्चा पर आरोप लगाती थीं कि मतदाता बने घुसपैठियों के ही सहारे वह पश्चिम बंगाल की सत्ता में काबिज है। बाद के दिनों में ये मतदाता ममता के समर्थक हो गए और ममता की सत्ता के आधार बनने लगे तो उन्हें भी यह मामला फिजूल का लगने लगा। बिहार का सीमांचल इलाका भी बांग्लादेशी घुसपैठ से प्रभावित रहा है। इसलिए वहां भी ऐसे सवाल और भ्रम उठ रहे हैं। चूंकि एसआईआर में ऐसे अवैध मतदाता ज्यादा सवालों के घेरे में हैं या फिर उनके नाम कट रहे हैं, इस वजह से इन्हीं राज्यों में यह मुद्दा कुछ ज्यादा तुर्श दिख रहा है। मतदाता सूची में सुधार और उसमें चुनाव आयोग एवं मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर भी बड़े सवाल उठे हैं। सवाल यह भी है कि क्या एसआईआर को लेकर उठाए जा रहे सवाल असल में प्रक्रियात्मक और कानूनी हैं या इनके जरिए सिर्फ राजनीति हो रही है? पहले ही कहा जा चुका है कि एसआईआर को लेकर विपक्षी दलों की सबसे ज्यादा आपत्तियां बिहार और पश्चिम बंगाल से जुड़ी बताई जा रही हैं। कुछ राजनेताओं और दलों ने एसआईआर के आधार पर इन राज्यों के चुनावी परिणामों और मतदाता सूची की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। यहां ध्यान रखने की बात है कि एसआईआर केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी हुआ, लेकिन वहां बिहार या पश्चिम बंगाल की तरह इस पर सियासी विवाद नहीं हुआ। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि यदि कुछ राज्यों में एसआईआर को लेकर गंभीर आपत्ति नहीं है तो फिर एक या दो राज्यों में गंभीर आपत्तियां क्या राजनीतिक एजेंडे की वजह से तो नहीं उठाई जा रहीं? एसआईआर को देखने और समझने की एक ही कसौटी हर राज्य में क्यों नहीं लागू की जा रही है? इससे तो यही संकेत जाता है कि इसका सियासी विरोध सेलेक्टिव है और दोहरे मापदंड से भरा हुआ है। क्या है एसआईआर की मानक प्रक्रिया? एसआईआर को लेकर जारी बहस में बड़े पैमाने पर नाम हटाने, तकनीकी प्रणाली के इस्तेमाल और पारदर्शिता जैसे सवाल उठाए गए हैं। मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया निर्धारित कानूनी और प्रशासनिक चरणों के तहत होती है। नाम हटाने से पहले मतदाता को नोटिस जारी करने और उसकी आपत्तियों और तर्कों की सुनवाई की जाती है। इसके बाद आखिरी निर्णय संबंधित निर्वाचन अधिकारी के स्तर पर होता है। इसलिए ड्राफ्ट मतदाता सूची में किसी मतदाता का नाम नहीं होना और अंतिम मतदाता सूची से नाम हट जाना, एक ही बात नहीं है। इसलिए जरूरी है कि दावे, ड्राफ्ट आंकड़े, आपत्तियों और अंतिम निर्णय, इन सभी चरणों को अलग-अलग समझा जाए। हर स्तर पर चूंकि आयोग ने पारदर्शी व्यवस्था अपना रखी है, इसे समझना हो तो अभी दिल्ली के किसी बीएलओ केंद्र का दौरा किया जा सकता है। दिल्ली में खूब नोटिस जारी किए गए हैं, उनके जवाब में लोग बीएलओ यानी बूथ स्तर के अधिकारी के पास पहुंच रहे हैं। लेकिन अफरातफरी, घबराहट या दहशत नहीं दिख रही। बीएलओ लोगों से जरूरी फॉर्म और प्रमाण ले रहे हैं। ज्यादातर नोटिस की वजह पूरा नाम ना होना, नाम की वर्तनी गलत होना, पिता या पति के नाम का पूरा न होना या फिर उनके नाम की वर्तनी में गड़बड़ी या कमी होना है। अधिकारियों का कहना है कि ईसीआईनेट का सॉफ्टवेयर मतदाता सूची के पहले से जारी नाम और आवेदन में कुछ ही गड़बड़ी पाता है तो वह नोटिस जेनरेट कर देता है। उदाहरण के लिए, पहले से किसी का नाम मतदाता सूची में सिर्फ रमेश दर्ज है, जबकि उसका पूरा नाम रमेश शर्मा है, या इसी तरह उसके पिता का पूरा नाम दर्ज नहीं है। लेकिन पहचान के दूसरे दस्तावेजों में उसका पूरा नाम दर्ज है। जब आयोग के अधिकारी ईसीआईनेट पर इसे लोड करते हैं तो सॉफ्टवेयर इस गड़बड़ी या बेमेल तथ्य को पकड़ता है। इसी तरह किसी का पता बदल गया है, जो पहले से दर्ज रिकॉर्ड से अलग है तो उसे भी नोटिस जा रही है। बस इन्हें प्रमाणित करना भर है। लेकिन राजनीतिक दल इसे या तो समझ नहीं रहे या फिर जानबूझकर नासमझी दिखा रहे हैं। वैसे भी इन प्रमाणों को घुसपैठिए या अवैध मतदाता साबित नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए उनके नाम कट रहे हैं या काटे जाने की संभावना बन रही है। एसआईआर को लेकर जारी मौजूदा बहस में नागरिकों के लिए कुछ प्रश्न बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं, क्या पुनरीक्षण निर्धारित संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया के तहत हुआ? क्या किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया? यदि ऐसा हुआ, तो क्या दावा और आपत्ति की प्रक्रिया के जरिए उसे सुधारा गया? क्या अलग-अलग राज्यों में समान प्रक्रियाओं को समान कसौटी पर देखा जा रहा है? इसे भी पढ़ें: आकाशवाणी भवन में जबरन घुसने का आरोप! Rahul Gandhi और Priyanka Gandhi के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने दर्ज की FIR संस्थाओं पर बहस हो, लेकिन तथ्यों के आधार पर एसआईआर, निर्वाचन आयोग और न्यायपालिका पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक तो है, लेकिन आरोप और प्रमाण, ड्राफ्ट सूची और अंतिम सूची, याचिका और न्यायिक आदेश तथा राजनीतिक मांग और कानूनी कार्रवाई, के बीच समझदारी से अंतर बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है। अव्वल तो मतदाता सूची की शुद्धता और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर बहस तथ्यों, कानून और निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर होनी चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। चुनाव आयोग बार-बार यह भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहा है कि एसआईआर मतदाताओं को बेहतर सुविधा देने की व्यवस्था है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य है, कोई भी वैध और योग्य मतदाता छूटे नहीं। मोटे तौर पर एसआईआर का एक ही मकसद है, हर योग्य और वैध मतदाता को सूची में जोड़ना, दिए गए पते पर न रहे मतदाताओं और मृतकों का नाम सूची से हटाना। इसके साथ ही विदेशी और घुसपैठियों को मतदाता सूची से बाहर करना है। एक आरोप यह लग रहा है कि मतदाता सूची तैयार करने में ईसीआईनेट सॉफ्टवेयर की भूमिका बीएलओ और ईआरओ की तुलना में बढ़ गई है, जिसकी वजह से मतदाता सूची को फाइनल करने के ईआरओ के अधिकार दरकिनार हो गए हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। ईसीआईनेट सिर्फ तकनीकी मंच है, जिसकी बुनियाद अधिकारियों द्वारा घर-घर से जुटाए आंकड़े हैं। नहीं भूलना चाहिए कि मतदाता सूची में किसी नाम को जोड़ने या उससे हटाने का निर्णय सिर्फ ईआरओ ही ले सकता है और वह भी जनप्रतिनिधित्व कानून 1950 और मतदाता सूची पंजीयन नियम 1960 के तहत, नोटिस और सुनवाई के बाद ही ऐसा कर सकता है। कहना न होगा कि ऐसा ही हो रहा है। लेकिन राजनीति इसे देखने की बजाय अपने हिसाब से घटनाओं और कार्यों की व्याख्या कर रही है। उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
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Jantar Mantar Protest: Rahul-Priyanka फिर Detain! Gyanesh Kumar को क्यों बचा रही Modi सरकार?
ममता की 2021 की 'खेला होबे' वाली तस्वीर बंगाल की राजनीति में फिर से चर्चा का विषय बनी
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भारतीय चुनावी राजनीति में इन दिनों EVM बनाम बैलेट पेपर की बहस फिर तेज है। विपक्षी दलों का एक वर्ग लगातार मांग कर रहा है कि देश में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की जगह पुराने बैलेट पेपर से चुनाव कराए जाएं। हाल में INDIA ब्लॉक ने भी बैलेट पेपर की वापसी की मांग दोहराई है और चुनाव आयोग के खिलाफ राजनीतिक अभियान तेज किया है। लेकिन इस बहस के बीच एक असहज सवाल विपक्ष से भी पूछा जाना चाहिए कि अगर बैलेट पेपर ही चुनावी निष्पक्षता की गारंटी है, तो हाल में बैलेट पेपर से हुए चुनावों के नतीजों की व्याख्या विपक्ष किस तरह करेगा? हम आपको बता दें कि असम के सिलचर में 3 अक्टूबर को नगर निगम के पहले चुनाव में बैलेट पेपर से मतदान हुआ। परिणाम में भाजपा ने 42 में से 32 सीटें जीतीं और उसकी सहयोगी असम गण परिषद ने दो सीटें हासिल कीं। कांग्रेस को केवल दो सीटें मिलीं, जबकि छह सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवार विजयी रहे। यानी बैलेट पेपर वाले चुनाव में भी भाजपा-नीत NDA ने दो-तिहाई से अधिक सीटें जीत लीं। यह परिणाम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि EVM पर सवाल उठाने वाली राजनीति में अक्सर यह धारणा बनाई जाती है कि यदि चुनाव बैलेट पेपर से हो तो परिणाम अलग होगा। सिलचर का परिणाम कम-से-कम इतना जरूर बताता है कि बैलेट पेपर अपने आप किसी पार्टी के पक्ष या विपक्ष में परिणाम नहीं बदल देता। मतदाता जिस राजनीतिक दल को समर्थन देना चाहता है, वह अपना समर्थन मतदान की किसी भी व्यवस्था में व्यक्त कर सकता है। इसी संदर्भ में इस साल हुए पांच विधानसभा चुनावों यानि असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के पोस्टल बैलेट आंकड़ों की भी चर्चा होनी जरूरी है। निर्वाचन आयोग के चुनाव नतीजों वाले पोर्टल पर प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में EVM वोटों के साथ पोस्टल वोटों का भी अलग विवरण दर्ज है। आप इनका विश्लेषण करेंगे तो पाएंगे कि भाजपा और एनडीए को अच्छी खासी संख्या में पोस्टल बैलेट के जरिये भी मत मिला था। असम में तो कई निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा उम्मीदवारों को पोस्टल बैलेट में मजबूत समर्थन मिला था। पश्चिम बंगाल में भी कई ऐसे निर्वाचन क्षेत्र रहे जहां भाजपा उम्मीदवारों को सैकड़ों पोस्टल वोट मिले और वे परिणाम तय करने में महत्वपूर्ण साबित हुए। हम आपको बता दें कि पोस्टल बैलेट मुख्यतः चुनाव ड्यूटी पर तैनात कर्मचारियों और कानून के तहत पात्र अन्य श्रेणियों के मतदाताओं से जुड़े होते हैं। इसलिए इनके आधार पर पूरे राज्य की जनता की राजनीतिक पसंद का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। लेकिन ये आंकड़े एक महत्वपूर्ण राजनीतिक सवाल जरूर खड़ा करते हैं। सवाल उठता है कि यदि किसी दल का तर्क है कि मतदान की मशीन यानि ईवीएम ही उसकी हार का कारण है, तो उसे उन चुनावों और निर्वाचन क्षेत्रों को भी देखना चाहिए जहां कागज पर वोट पड़े और फिर भी परिणाम उसके पक्ष में नहीं आया। देखा जाये तो विपक्ष के सामने वास्तविक राजनीतिक चुनौती केवल EVM पर सवाल उठाना नहीं, बल्कि यह समझना भी है कि मतदाता लगातार किन मुद्दों, नेतृत्व और संगठनात्मक विकल्पों को प्राथमिकता दे रहा है। चुनाव आयोग या किसी संवैधानिक संस्था की आलोचना करने का लोकतांत्रिक अधिकार विपक्ष के पास है। यदि कहीं चुनावी प्रक्रिया में ठोस अनियमितता का प्रमाण है, तो उसकी जांच और सुधार की मांग भी पूरी तरह जायज है। लेकिन हार के हर परिणाम को पहले से ही संस्थागत साजिश मान लेना और संगठन, उम्मीदवार, जनसंपर्क, स्थानीय मुद्दों तथा राजनीतिक रणनीति की समीक्षा से बचना लोकतांत्रिक राजनीति के लिए स्वस्थ रास्ता नहीं है। ईवीएम और चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहे दलों को समझना होगा कि भारत का लोकतंत्र किसी एक मशीन से बड़ा है। जनता का फैसला EVM, बैलेट पेपर और पोस्टल बैलेट, हर माध्यम से सामने आता है। इसलिए राजनीतिक दलों के लिए सबसे कठिन, लेकिन सबसे जरूरी सवाल यही है कि क्या वे चुनावी व्यवस्था बदलने की मांग से पहले अपने मतदाताओं के बदलते मिजाज को समझने की कोशिश कर रहे हैं?
CJP, छात्र और विपक्ष की 10 अक्टूबर को दिल्ली में घेराबंदी! क्या झुकेंगे Modi, हटेंगे Gyanesh Kumar?
पीएम मोदी 'विकसित भारत' के लक्ष्य के साथ देश को आगे बढ़ाने के लिए लगातार कर रहे काम: रेखा गुप्ता
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मल्लिकार्जुन खड़गे ने बुलाई इंडिया गठबंधन के नेताओं की लंच बैठक, धरना प्रदर्शन के बाद अगली रणनीति पर चर्चा
मध्य प्रदेश में कांग्रेस की जमीनी लड़ाई की तैयारी, रीवा संभाग की बैठक में हुआ मंथन
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2 महीने, 3 सरप्राइज एलीमेंट: बीजेपी हैरान, पुलिस परेशान, क्या है राहुल गांधी की 'धप्पा' पॉलिटिक्स!
संसद से चुनाव आयोग तक का रास्ता छावनी में तब्दील था, चप्पे-चप्पे पर भारी बैरिकेडिंग और अलर्ट मोड में खड़ी पुलिस… लेकिन राहुल गांधी ने एक बार फिर सबको 'धप्पा' दे दिया! मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कांग्रेस का मोर्चा खोलते हुए, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने अचानक आकाशवाणी भवन की ओर रुख किया और सीधे 8 घंटे की नाकाबंदी कर डाली। प्रशासन देखता ही रह गया और राहुल का यह सरप्राइज अटैक पूरी तरह कामयाब रहा। पिछले दो महीनों में यह तीसरी बार है जब राहुल गांधी के इस फ्लैश प्रोटेस्ट ने दिल्ली पुलिस ही नहीं, खुद अपनी पार्टी के नेताओं तक के होश उड़ा दिए हैं। पिछले दो महीनों में यह तीसरी बार है जब राहुल ने अचानक धरना देकर पुलिस और कुछ हद तक कांग्रेस नेताओं को भी चौंका दिया है। जुलाई में, कांग्रेस सांसद ने प्रधानमंत्री आवास के बाहर अचानक विरोध प्रदर्शन किया। पिछले महीने, उनकी नई रणनीति का दूसरा चरण तब देखने को मिला जब वह अचानक संसद मार्ग पुलिस स्टेशन में एक छात्र प्रदर्शनकारी के साथ घुस गए; इस छात्र को 20 जुलाई की हिंसा के दौरान पैलेट गन से चोट लगी थी और राहुल ने FIR दर्ज करने की मांग की। राहुल का यह नया सियासी 'प्लेबुक' अब विरोधियों के लिए बिल्कुल अप्रत्याशित सिरदर्द बन चुका है! इसे भी पढ़ें: Rahul Gandhi और Priyanka Gandhi हिरासत में, CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कर रहे थे प्रदर्शन CEC के विरोध-प्रदर्शन के दौरान राहुल का नया दांव सड़कों पर अचानक होने वाले ऐसे विरोध-प्रदर्शन राहुल के राजनीतिक हथियारों में एक नया हथियार बन गए हैं। मंगलवार को इसका तीसरा चरण देखने को मिला। ऐसा लग रहा था कि दिल्ली पुलिस को विपक्ष के निर्वाचन सदन तक मार्च करने की हर चाल का पहले से अंदाज़ा था। जब विपक्ष का मार्च ECI हेडक्वार्टर से कुछ सौ मीटर दूर नीति आयोग के दफ़्तर के पास पहुँचा, तो प्रदर्शनकारियों का सामना पुलिस से हुआ। इस गहमागहमी के बीच, राहुल ने कैमरों को तस्वीर लेने का मौका दिया। जब कांग्रेस नेता आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे थे, तब वह पुलिस बैरिकेड के ऊपर चढ़ गए और तिरंगा लहराया। हालांकि, पुलिस का सब्र जवाब दे गया। इसके बाद वही जाना-पहचाना नज़ारा देखने को मिला; पुलिस ने नेताओं को हिरासत में लेना और उन्हें बसों में भरना शुरू कर दिया। प्रियंका गांधी एक बस में सवार हुईं, जो आकाशवाणी भवन के पास खड़ी थी। राहुल भी बस में चढ़ने ही वाले थे। तभी हालात बदल गए। TOI और इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, जैसे ही राहुल बस में चढ़ने वाले थे, उन्होंने प्रियंका को कोई इशारा किया। जल्द ही, वायनाड के सांसद नीचे उतरे और गांधी भाई-बहन तेज़ी से आकाशवाणी भवन की ओर दौड़ पड़े। इस अचानक उठाए गए कदम से न सिर्फ़ पुलिस, बल्कि कांग्रेस नेता भी हैरान रह गए। आकाशवाणी भवन के गेट के पास कोई पुलिसकर्मी नहीं था। सुरक्षा गार्डों ने गांधी भाई-बहन को रोकने की कोशिश की, जिससे तनावपूर्ण स्थिति पैदा हो गई, लेकिन आखिरकार दोनों परिसर में दाखिल हो गए। पुलिस को उम्मीद थी कि लोगों को हिरासत में लेने से विरोध प्रदर्शन खत्म हो जाएगा, लेकिन अचानक बदले हालात ने एक नया धरना शुरू कर दिया। इस अफरातफरी के बीच राहुल ने पत्रकारों से कहा कि देश के साथ जो किया गया है, वह देशद्रोह है। इसे भी पढ़ें: CEC नियुक्ति में PM, LoP के साथ CJI भी हों शामिल, Owaisi ने मौजूदा चयन प्रक्रिया पर उठाए सवाल एक पेड़ के नीचे बैठ गए राहुल चाहे पीएम मोदी हों, अमित शाह हों या ज्ञानेश कुमार, किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा। यह पता नहीं चल पाया है कि गांधी भाई-बहन ने अचानक आकाशवाणी भवन में घुसने का फ़ैसला क्यों किया। हो सकता है कि राहुल निर्वाचन सदन जाने के लिए शॉर्टकट के तौर पर इस जगह का इस्तेमाल करना चाहते हों, क्योंकि निर्वाचन सदन आकाशवाणी भवन के पिछले गेट के पास ही है। हालाँकि, पुलिस ने तुरंत पिछला गेट बंद कर दिया, जिसके बाद कांग्रेस सांसदों को आकाशवाणी भवन के परिसर में ही घंटों तक धरना देना पड़ा। राहुल और प्रियंका ब्रॉडकास्टिंग हाउस के अंदर एक पेड़ के नीचे बैठ गए। केसी वेणुगोपाल, पवन खेड़ा और इमरान प्रतापगढ़ी समेत कांग्रेस के दूसरे नेता भी आकाशवाणी के गेट से अंदर घुसने में कामयाब रहे, जबकि पुलिस बल को तैनात करने की कोशिश कर रही थी। बाकी लोगों को बाउंड्री वॉल पर चढ़ते और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग करते हुए नारे लगाते देखा गया। कांग्रेस ने इस मौके का फ़ायदा उठाने में ज़रा भी देर नहीं की। पार्टी ने एक्स पर राहुल के अचानक रास्ते से हटकर कहीं और जाने का एक वीडियो शेयर किया, जिसके साथ मज़ाकिया अंदाज़ में धप्पा कैप्शन लिखा था। यह ड्रामा सूरज डूबने के काफी देर बाद तक चलता रहा। जब कांग्रेस नेताओं ने चुनाव आयुक्तों से मिले बिना वहां से हटने से इनकार कर दिया, तो उनके लिए रोल और एनर्जी ड्रिंक्स मंगवाए गए। इससे एक और विवाद खड़ा हो गया। आप इसके बारे में यहां पढ़ सकते हैं। रात करीब 8 बजे, पुलिस ने आखिरकार आकाशवाणी भवन परिसर को खाली कराना शुरू किया। तस्वीरों में राहुल को परिसर से खींचकर बस की ओर ले जाते हुए देखा गया। नेताओं को किंग्सवे कैंप पुलिस स्टेशन ले जाया गया और हिरासत में रखा गया, जिसके बाद रात 10 बजे उन्हें रिहा कर दिया गया। राहुल का सरप्राइज एलीमेंट वाला प्लेबुक यह पहली बार नहीं था जब राहुल गांधी ने प्रशासन को चकमा दिया हो। 21 जुलाई को संसद की ओर मार्च कर रहे प्रदर्शनकारी छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के ठीक एक दिन बाद, राहुल गांधी और कांग्रेस सांसदों का एक दल अचानक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास के पास पहुंच गया और बिना किसी पूर्व सूचना के धरने पर बैठ गया।इस अचानक हुए प्रदर्शन से पहले खुद कांग्रेस सांसदों को भी अंधेरे में रखा गया था। उन्हें शुरुआत में केवल यह कहकर बुलाया गया था कि वे कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर उनका जन्मदिन मनाने के लिए इकट्ठा हों। जैसे ही सभी नेता एकत्र हुए, उन्हें असल योजना की जानकारी दी गई और उन्होंने 7, लोक कल्याण मार्ग की ओर मार्च करना शुरू कर दिया, जो वहां से महज 2 किलोमीटर दूर है। इस अप्रत्याशित कदम ने पुलिस को पूरी तरह चौंका दिया। यह धरना तब जाकर समाप्त हुआ जब पुलिस ने राहुल गांधी को वहां से हटाया, और इस छीना-झपटी के दौरान उनकी नाक पर चोट भी लग गई थी। अगला घटनाक्रम एक महीने बाद, 21 अगस्त को हुआ। इसे भी पढ़ें: CEC विरोध पर CM Devendra Fadnavis बोले, संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने की है साजिश पैलेट गन पीड़ित को लेकर थाने के बाहर धरने पर बैठे राहुल पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में सब कुछ सामान्य चल रहा था, तभी राहुल वहाँ साहिल लोचब के साथ पहुँचे। साहिल 19 साल का छात्र है, जिसे कथित तौर पर 20 जुलाई के विरोध प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन से चोट लगी थी। राहुल ने मांग की कि इस मामले में तुरंत FIR दर्ज की जाए। जब पुलिस ने टाल-मटोल की, तो राहुल अपनी बात पर अड़े रहे और पुलिस स्टेशन के बाहर धरने पर बैठ गए। जल्द ही, प्रियंका गांधी, कांग्रेस के अन्य नेता और विपक्ष के बड़े नेता भी उनके साथ शामिल हो गए। पुलिस स्टेशन के बाहर सुरक्षा बढ़ा दी गई और वही जाना-पहचाना ड्रामा देखने को मिला। राहुल ने साफ कर दिया कि जब तक FIR दर्ज नहीं हो जाती, वे वहाँ से नहीं हटेंगे, चाहे इसमें कितने भी घंटे क्यों न लगें। सात घंटे बाद यह गतिरोध खत्म हुआ, जब दिल्ली पुलिस ने आखिरकार पैलेट फायरिंग के मामले में FIR दर्ज कर ली। ये घटनाक्रम सरकार के खिलाफ अहम मुद्दों से निपटने के राहुल के तौर-तरीकों में आए बड़े बदलाव का संकेत देते हैं। अब वे किसी मुद्दे पर सिर्फ़ सोशल मीडिया पर बात नहीं करते, बल्कि ऐसे अचानक किए गए विरोध प्रदर्शनों के ज़रिए ज़मीन पर भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं। Dhappa https://t.co/IMP0mIK2NV — Congress (@INCIndia) October 6, 2026
दिल्ली की सड़कों पर इन दिनों जो कुछ दिखाई दे रहा है, उसमें केवल प्रदर्शनकारी और पुलिस आमने-सामने नहीं हैं। उनके बीच अब मोबाइल कैमरा भी खड़ा है, सोशल मीडिया भी खड़ा है और कुछ सेकंड में किसी घटना को देशभर में पहुंचा देने वाली तकनीक भी खड़ी है। शायद इसीलिए दिल्ली पुलिस के लिए आज किसी प्रदर्शन को नियंत्रित करना केवल बैरिकेड लगाने, भीड़ को रोकने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने का मामला नहीं रह गया है। पुलिस को कानून लागू भी करना है, स्वयं को उकसावे से बचाना भी है और साथ-साथ यह सुनिश्चित भी करना है कि अगले कुछ सेकंड में उसकी कोई प्रतिक्रिया काट-छांटकर वायरल वीडियो न बन जाए। दो अक्टूबर से नई दिल्ली क्षेत्र में शुरू हुए प्रदर्शनों ने कुछ ही दिनों में पुलिस के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। अलग-अलग राजनीतिक दलों, छात्र संगठनों, कार्यकर्ताओं और दूसरे समूहों के प्रदर्शन तथा प्रतिबंधित क्षेत्रों की तरफ बढ़ने की कोशिशों के कारण पुलिस को लगातार अपनी रणनीति बदलनी पड़ रही है। केवल एक स्थान पर खड़ी भीड़ के बजाय अलग-अलग दिशाओं में आगे बढ़ते समूहों को संभालना पुलिस के लिए नई चुनौती बन गया है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक असहज सवाल भी उठता है। सवाल यह है कि क्या जुलाई में जंतर-मंतर के प्रदर्शन से जुड़े मामलों में प्राथमिकी निरस्त किए जाने के चलते ही प्रदर्शनकारियों के बीच यह संदेश गया कि पुलिस के साथ टकराव का कानूनी परिणाम गंभीर नहीं होगा? क्या इसी कारण प्रदर्शनकारियों के मन में पुलिस का डर कम हो गया है? क्या इसी कारण कुछ लोग अब पुलिसकर्मियों से आक्रामक भाषा में बात करने, उन्हें चुनौती देने, धक्का-मुक्की करने या जानबूझकर उकसाने का जोखिम अधिक आसानी से उठा रहे हैं? हम आपको याद दिला दें कि जुलाई में हुए प्रदर्शनों के बाद दिल्ली पुलिस ने कई मामले दर्ज किए थे। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने प्राथमिकियों को निरस्त कर दिया था। साथ ही अदालती आदेश में यह भी कहा गया था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन में केवल भागीदारी अपने आप में अपराध नहीं मानी जा सकती। ऐसे में जब महिला पुलिसकर्मियों के साथ बदसलूकी और शारीरिक खींचतान के मामले सामने आ रहे हैं और पुरुष पुलिसकर्मियों पर दुर्व्यवहार के झूठे आरोप तक लगाये जा रहे हैं तब यह सवाल प्रमुखता से उठता है कि क्या एफआईआर निरस्त कर प्रदर्शनकारियों को सुधरने का जो मौका दिया गया था उसका उन्होंने गलत फायदा उठाया? दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस भी आरोप प्रत्यारोप के इस दौर में तकनीक के सहारे अपना बचाव कर रही है। नई दिल्ली क्षेत्र में तैनात पुलिसकर्मियों की वर्दी पर बॉडी-वॉर्न कैमरे लगाए गए हैं। संसद मार्ग पर प्रदर्शन से निपटने के लिए तैयार पुलिसकर्मियों की वर्दी पर ये छोटे कैमरे साफ दिखाई दे रहे हैं। पुलिस की रणनीति में सार्वजनिक उद्घोषणा के लिए लाउडस्पीकर का इस्तेमाल बढ़ाया गया है और कई पुलिसकर्मी डंडों के बिना तैनात दिखाई दिए। देखा जाये तो बॉडीकैम का अर्थ केवल पुलिस को आरोपों से बचाना नहीं है। यदि कोई पुलिसकर्मी सीमा पार करता है तो वही कैमरा उसके खिलाफ भी प्रमाण बन सकता है। यदि कोई प्रदर्शनकारी पुलिस को जानबूझकर उकसाता है, बैरिकेड तोड़ता है, हमला करता है या बाद में घटनाक्रम का अधूरा वीडियो प्रस्तुत करता है तो पुलिस के पास पूरी घटना का अपना दृश्य रिकॉर्ड मौजूद रहेगा। इसके अलावा, सुरक्षा व्यवस्था में दूसरा बड़ा परिवर्तन बहुस्तरीय बैरिकेडिंग है। प्रदर्शनकारियों को प्रतिबंधित क्षेत्रों की ओर बढ़ने से रोकने के लिए कई स्तरों पर अवरोध लगाए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि जुलाई की घटनाओं के बाद दिल्ली पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों ने अपनी तैयारियों की व्यापक समीक्षा की। ताजा प्रदर्शनों से पहले उन स्थानों तक की पहचान की गई जहाँ टूटा हुआ फुटपाथ, पत्थर अथवा दीवार का हिस्सा तनाव बढ़ने पर हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। जुलाई के अनुभवों के बाद सुरक्षा व्यवस्था की इस तरह समीक्षा बताती है कि अब भीड़ प्रबंधन में केवल पुलिस बल की संख्या नहीं, बल्कि प्रदर्शन-स्थल के भौतिक वातावरण को भी सुरक्षा का हिस्सा माना जा रहा है। एक और समस्या सोशल मीडिया की है। पुलिसकर्मी के चेहरे के बिल्कुल सामने कैमरा रख देना, लगातार सवाल करना, नारे लगाना अथवा ऐसी परिस्थिति बनाना जिसमें उससे कोई तीखी प्रतिक्रिया निकल जाए, ऐसे माहौल में पुलिसकर्मी के कुछ सेकंड के नियंत्रण खोने का परिणाम लाखों लोगों तक पहुंचने वाला वीडियो हो सकता है। इसीलिए नई पुलिस रणनीति में आत्मसंयम स्वयं एक सुरक्षा उपकरण बन गया है। इस चुनौती की गंभीरता तब और बढ़ जाती है जब तकनीक के जरिये फर्जी दृश्य भी बनाए जाने लगें। दिल्ली पुलिस ने हाल में एक ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार किया है जिसने एआई की मदद से ऐसा वीडियो बनाया जिसमें एक पुलिसकर्मी को महिला के साथ दुर्व्यवहार करते दिखाया गया था। बहरहाल, इसमें कोई दो राय नहीं कि दिल्ली पुलिस के सामने इस समय बेहद कठिन चुनौती है। उसे प्रदर्शन के लोकतांत्रिक अधिकार की रक्षा करनी है। उसे प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा करनी है। अपने जवानों विशेषकर महिला पुलिसकर्मियों की सुरक्षा करनी है। उसे आरोप लगने पर जवाबदेह भी होना है। साथ ही बैरिकेड टूटने, प्रतिबंधित क्षेत्र में भीड़ घुसने अथवा हिंसा होने की स्थिति में कानून भी लागू करना है। शायद इसीलिए राजधानी की पुलिसिंग तेजी से बदल रही है। वर्दी पर बॉडीकैम, बहुस्तरीय बैरिकेड, लाउडस्पीकर से लगातार चेतावनी और सूचना, अतिरिक्त पुलिस तथा अर्धसैनिक बल, संवेदनशील रास्तों की पहले से पहचान, मोबाइल वीडियो के समानांतर पुलिस की अपनी रिकॉर्डिंग और सोशल मीडिया पर फैलने वाली संदिग्ध सामग्री की डिजिटल जांच। लेकिन तकनीक चाहे जितनी बढ़ जाए, अंततः सबसे बड़ी परीक्षा सड़क पर खड़े पुलिसकर्मी के धैर्य की ही है। जनता भी पुलिस की दिक्कतों को समझ रही है और उसका हौसला बढ़ाने के लिए सड़कों पर उतर रही है। -नीरज कुमार दुबे
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा रेपो रेट में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी के बाद फ्लोटिंग ब्याज दर पर होम लोन लेने वाले ग्राहकों की कर्ज लागत बढ़ सकती है। केंद्रीय बैंक ने बुधवार को रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत कर दिया है।
पीएम मोदी के नेतृत्व के 25 साल पूरे, भाजपा नेताओं ने कहा- हर क्षेत्र में व्यापक बदलाव और विकास हुआ
पीएम मोदी के नेतृत्व के 25 साल पूरे, भाजपा नेताओं ने कहा- हर क्षेत्र में व्यापक बदलाव और विकास हुआ
'7 अक्टूबर भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में स्वर्णिम दिन', पीएम मोदी के जनसेवा के 25 वर्ष पर अमित शाह ने की प्रशंसा
गुजरात से आई 'सेवा संकल्प बाइक यात्रा' के प्रतिभागियों का काशी में हुआ भव्य स्वागत
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क्या देश में मोदी विरोधी लहर शुरू हो चुकी है? अगर आज चुनाव हुए तो क्या परिणाम हो सकते हैं?
आज जब नरेंद्र मोदी सरकार के मुखिया के रूप में लगातार पच्चीस साल पूरे कर रहे हैं, तब भारतीय राजनीति की एक बेहद दिलचस्प और महत्वपूर्ण तस्वीर सामने आ रही है। सात अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में सरकार की कमान संभालने वाले नरेंद्र मोदी ने पहले गुजरात और फिर देश की सत्ता का नेतृत्व करते हुए बिना किसी लंबे अंतराल के पच्चीस वर्ष पूरे कर लिए हैं। यह अपने आप में भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की असाधारण राजनीतिक यात्रा है। इस अवसर पर सत्ता पक्ष इसे नेतृत्व, सेवा, विकास और निरंतर जनविश्वास की उपलब्धि के रूप में देख रहा है, तो दूसरी ओर विपक्ष ठीक इसी समय चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता, मतदाता सूची और लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर सरकार और चुनाव आयोग को घेर रहा है। यानी नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा के पच्चीसवें वर्ष का यह पड़ाव उस समय आया है जब सत्ता के सामने सबसे बड़ा सवाल शायद विपक्ष की ताकत का नहीं, बल्कि संस्थाओं और जनविश्वास का है। देखा जाये तो सरकार और भारतीय जनता पार्टी के लिए आज का दिन स्वाभाविक रूप से उपलब्धियों को गिनाने का दिन है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने नरेंद्र मोदी के पच्चीस वर्ष के शासन को ऐतिहासिक उपलब्धि बताते हुए उनके गुजरात के मुख्यमंत्रित्व और केंद्र की तीन लगातार सरकारों को सार्वजनिक विश्वास का प्रमाण बताया है। सरकार की ओर से कल्याणकारी योजनाओं, बुनियादी ढांचे, डिजिटल व्यवस्था, आर्थिक सुधार, राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और तकनीकी उपलब्धियों को इस लंबे सफर की प्रमुख उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। प्रधानमंत्री ने भी इस अवसर को सेवा और राष्ट्रहित के भाव से जोड़ा है। लेकिन राजनीति सिर्फ उपलब्धियों की सूची से नहीं चलती। देश की राजनीति का दूसरा चेहरा भी उतनी ही ताकत से दिखाई दे रहा है। छह अक्टूबर को राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के विरोध में प्रदर्शन किया। संसद से चुनाव आयोग की ओर बढ़ते विपक्षी सांसदों को पुलिस ने रोका, जिसके बाद धरना, हिरासत और राजनीतिक टकराव की तस्वीरें सामने आईं। राहुल गांधी का बैरिकेड पर चढ़ना और “ज्ञानेश, इट्स डन ब्रो” जैसी युवा शैली की भाषा सोशल मीडिया पर तेजी से फैली। इस पूरे घटनाक्रम ने चुनाव आयोग और मतदाता सूची के विवाद को अचानक देश की राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया। विपक्ष इस पूरे विवाद को केवल मतदाता सूची की तकनीकी प्रक्रिया नहीं मान रहा। उसके लिए यह लोकतंत्र, मताधिकार और चुनावी निष्पक्षता का सवाल है। कांग्रेस और उसके सहयोगी आरोप लगा रहे हैं कि मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने से नागरिकों के मतदान अधिकार पर असर पड़ सकता है। विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग कर रहा है और इस पूरे मामले को व्यापक राजनीतिक आंदोलन में बदलने की कोशिश कर रहा है। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि कांग्रेस लगातार चुनाव हारने के बाद चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ा कर रही है और उसे अपनी राजनीतिक कमजोरी का जिम्मेदार संस्थाओं को बनाने के बजाय जनता का विश्वास जीतने की कोशिश करनी चाहिए। भाजपा का यह भी सवाल है कि जिस चुनावी व्यवस्था के माध्यम से विपक्ष कई राज्यों में जीत हासिल करता रहा, उसी व्यवस्था को अपनी हार के बाद अविश्वसनीय कैसे कहा जा सकता है। यहीं से इस समय की राजनीति का सबसे बड़ा द्वंद्व सामने आता है। विपक्ष का सवाल है कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर प्रश्न उठे तो लोकतंत्र कैसे सुरक्षित रहेगा? सत्ता पक्ष का सवाल है कि बिना निर्णायक प्रमाण के चुनावी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करने से क्या लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा ही कमजोर नहीं होगा? दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क रख रहे हैं, लेकिन एक तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर बहस अब महज विपक्षी भाषण नहीं रह गई है। हालांकि इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि विपक्ष के सारे आरोप सिद्ध हो चुके हैं। चुनाव आयोग पर गंभीर सवाल उठना एक बात है और “चुनाव चोरी सिद्ध हो जाना” दूसरी बात है। शायद यही वह बिंदु है जहां से आम जनता और राजनीतिक विमर्श के बीच अंतर दिखाई देता है। राजनीति की दुनिया में इस समय SIR, चुनाव आयोग और ज्ञानेश कुमार सबसे बड़ा मुद्दा दिखाई दे रहे हैं। समाचार चैनलों और सोशल मीडिया पर भी यही सबसे अधिक दिखाई दे रहा है। लेकिन जब हम व्यापक जनमत संकेतकों को देखते हैं तो तस्वीर कुछ अलग है। सितंबर 2026 के ताजा इप्सॉस सर्वेक्षण में सात में से लगभग सात भारतीयों ने माना कि देश सही दिशा में जा रहा है और करीब आठ में से आठ ने वर्तमान आर्थिक स्थिति को सकारात्मक माना है। लेकिन उसी सर्वेक्षण में बेरोजगारी भारत की सबसे बड़ी चिंता बनी हुई है। यानी देश के भविष्य को लेकर आशावाद मौजूद है, मगर नौकरी और अवसर को लेकर बेचैनी भी उतनी ही वास्तविक है। यही भारतीय जनमत की वर्तमान जटिलता है। जनता का एक बड़ा हिस्सा यह मान सकता है कि देश आगे बढ़ रहा है, अर्थव्यवस्था टिकाऊ है, बुनियादी ढांचे में बदलाव आया है और भारत की वैश्विक स्थिति मजबूत हुई है, लेकिन उसी व्यक्ति के घर में नौकरी, आमदनी, महंगाई और भविष्य की सुरक्षा की चिंता भी हो सकती है। सितंबर में शहरी उपभोक्ता विश्वास में भी सुधार आया और भारत का उपभोक्ता विश्वास सूचकांक बढ़ा। इसका मतलब यह हुआ कि आर्थिक तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है; फिर भी रोजगार सबसे बड़ा चिंता का विषय बना हुआ है। इससे नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के सामने असली राजनीतिक प्रश्न भी स्पष्ट होता है। चुनौती केवल यह नहीं है कि विपक्ष कितना आक्रामक है। चुनौती यह है कि सरकार आर्थिक उपलब्धियों और बड़े राष्ट्रीय लक्ष्यों की कथा को आम नागरिक की रोजमर्रा की जिंदगी से कितना जोड़ पाती है। जब विकास का अर्थ सड़क, रेल, डिजिटल भुगतान और वैश्विक प्रतिष्ठा से आगे बढ़कर नौकरी, स्थिर आय और युवा के भविष्य में दिखाई देने लगेगा, तभी सरकारी उपलब्धियों का राजनीतिक असर और गहरा होगा। साथ ही नरेंद्र मोदी के व्यक्तिगत नेतृत्व को लेकर तस्वीर अभी भी पूरी तरह बदलती हुई नहीं दिखती। अगस्त 2026 के इंडिया टुडे-सी वोटर सर्वेक्षण में 48.7 प्रतिशत लोगों ने मोदी को अगले प्रधानमंत्री के लिए सबसे पसंदीदा विकल्प माना। हालांकि जनवरी के मुकाबले उनके समर्थन में कुछ कमी आई है। इस गिरावट को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन इसे सीधे मोदी विरोधी लहर भी नहीं कहा जा सकता। दूसरी ओर, राहुल गांधी अभी तक उस राजनीतिक बढ़त को हासिल नहीं कर पाए हैं, जो मोदी के समर्थन में कमी आने पर उन्हें स्वाभाविक रूप से मिल सकती थी। यानी मोदी की राजनीतिक ताकत अभी भी बनी हुई है, लेकिन उसमें एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई दे रहा है। पहले मोदी को लेकर बहस अक्सर इस बात पर केंद्रित रहती थी कि उनके मुकाबले कौन है? अब बहस का एक हिस्सा इस बात पर भी केंद्रित होने लगा है कि सरकार और संवैधानिक संस्थाएं जनता का विश्वास कितना कायम रख पा रही हैं? यही बदलाव आगे चलकर महत्वपूर्ण हो सकता है। सोशल मीडिया पर भी इस समय राजनीति का यही दोहरा चेहरा दिखाई दे रहा है। राहुल गांधी के प्रदर्शन के वीडियो और उनके अंदाज को उनके समर्थक पसंद कर रहे हैं, जबकि विरोधी इसे राजनीतिक दिखावा बता रहे हैं। भाजपा भी सोशल मीडिया के जरिए इसका जवाब दे रही है। यानी सोशल मीडिया ने राजनीतिक बहस को जरूर ज्यादा तेज और आक्रामक बना दिया है, लेकिन वहां दिखाई देने वाली प्रतिक्रियाओं को पूरे देश की राय मान लेना ठीक नहीं होगा। सोशल मीडिया पर वही आवाज ज्यादा सुनाई देती है, जिसके पीछे बड़ी संख्या में सक्रिय और भावनात्मक समर्थक हों। इसलिए सोशल मीडिया का शोर यह तो बताता है कि किसी मुद्दे पर बहस कितनी तेज है, लेकिन यह नहीं बताता कि जनता का बड़ा हिस्सा वास्तव में क्या सोच रहा है। इस पूरे परिदृश्य में युवाओं की बेचैनी को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कॉकरोच जनता पार्टी जैसे युवा केंद्रित आंदोलनों और उनसे जुड़ी डिजिटल राजनीति ने यह दिखाया है कि एक नया राजनीतिक असंतोष उभर रहा है जो जरूरी नहीं कि सीधे कांग्रेस या भाजपा की पारंपरिक राजनीति में समा जाए। रोजगार, परीक्षा व्यवस्था, अवसर और संस्थागत निष्पक्षता जैसे मुद्दे इस नई पीढ़ी को प्रभावित कर रहे हैं। यह नाराज़गी अभी किसी एक पार्टी के पक्ष में संगठित नहीं हुई है, लेकिन इसे हल्के में लेना भी उचित नहीं होगा। इसलिए आज की भारतीय राजनीति को अगर एक वाक्य में समझना हो तो तस्वीर यह है कि नरेंद्र मोदी का जनाधार टूटा नहीं है, मगर उनके नेतृत्व के इर्द-गिर्द सवालों की प्रकृति बदल रही है। व्यक्तिगत लोकप्रियता अभी मजबूत है, सरकार की उपलब्धियों का नैरेटिव अभी जीवित और प्रभावी है, देश की आर्थिक दिशा को लेकर आशावाद भी मौजूद है; लेकिन रोजगार की चिंता, युवा असंतोष और चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता पर उठते सवाल एक नया दबाव पैदा कर रहे हैं। मोदी के लिए असली चुनौती विपक्ष की किसी एक रैली से नहीं, बल्कि इन अलग-अलग चिंताओं के एक साथ जुड़ जाने से पैदा हो सकती है। फिलहाल स्थिति को “मोदी विरोधी लहर” कहना अतिशयोक्ति होगी। लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि जनता के भीतर कोई बेचैनी नहीं है। बेचैनी है, सवाल हैं, संस्थाओं को लेकर आशंका है और युवाओं में अवसर को लेकर अधीरता है। साथ ही देश के बड़े हिस्से में स्थिरता, आर्थिक दिशा और प्रधानमंत्री के नेतृत्व को लेकर भरोसा भी कायम है। दूसरे शब्दों में कहें तो भारतीय मतदाता इस समय न तो पूरी तरह नाराज़ होकर सत्ता से विमुख दिखाई दे रहा है और न ही आंखें बंद करके संतुष्ट है। यही नरेंद्र मोदी के पच्चीसवें वर्ष की सबसे बड़ी राजनीतिक सच्चाई है। यहां यह भी सवाल उठता है कि देश में आज चुनाव हों तो क्या होगा? उपलब्ध ताजा राष्ट्रीय जनमत संकेतक सरकार के लिए चेतावनी जरूर देते हैं लेकिन उसके लिए खतरे का संकेत नहीं दे रहे। अगस्त 2026 के इंडिया टुडे-सी वोटर सर्वेक्षण के मुताबिक आज लोकसभा चुनाव होने पर भाजपा को 261 और एनडीए को 326 सीटें मिल सकती हैं, जबकि इंडिया गठबंधन 185 सीटों तक पहुंच सकता है। यानी भाजपा अपने दम पर बहुमत से नीचे रहेगी, लेकिन एनडीए फिर भी आराम से सरकार बनाने की स्थिति में रहेगा। बहरहाल, मोदी की सबसे बड़ी ताकत आज भी उनका व्यक्तिगत नेतृत्व और जनता के एक बड़े हिस्से से बना सीधा राजनीतिक जुड़ाव है। लेकिन आने वाले वर्षों में उनकी सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि विकास, लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता, रोजगार और युवाओं के भविष्य को लेकर उठ रहे सवालों का सरकार कितना ठोस और भरोसेमंद जवाब दे पाती है। सरकार के मुखिया के रूप में 25 वर्ष पूरे होने पर नरेंद्र मोदी ने 2047 तक आत्मनिर्भर भारत बनाने का संकल्प दोहराते हुए कहा है, “वी विल डू इट।” यह नारा आने वाले भारत के लिए उनके बड़े लक्ष्य और राजनीतिक आत्मविश्वास को दर्शाता है। लेकिन इस लक्ष्य को जमीन पर उतारने के लिए सिर्फ संकल्प नहीं, बल्कि जनता के भरोसे को लगातार मजबूत करना भी जरूरी होगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि 25 वर्षों तक सरकार के मुखिया के रूप में बने रहना इतिहास है, लेकिन इतिहास की असली पहचान इस बात से होती है कि वह भविष्य को किस दिशा में ले जाता है। अब मोदी के सामने चुनौती इसी भविष्य को उपलब्धियों के साथ-साथ जनता के भरोसे का भविष्य बनाने की है। -नीरज कुमार दुबे
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नितिन नवीन दो दिवसीय वाराणसी दौरे पर, 'सेवा यात्रियों' की जनसभा को करेंगे संबोधित
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अध्यक्ष नितिन नवीन सात और आठ अक्टूबर को उत्तर प्रदेश के दो दिवसीय दौरे पर वाराणसी में रहेंगे
साइबर फ्रॉड पर PM मोदी का बड़ा जोर, टेक्नोलॉजी से मजबूत समाधान विकसित करने की अपील
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दिल्ली में आज विपक्ष का बड़ा मार्च, कांग्रेस-AAP और लेफ्ट 1 बजे CEO कार्यालय तक जाएंगे
कांग्रेस, आम आदमी पार्टी (आप) और वामपंथी दल दोपहर 1 बजे दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) के कार्यालय तक विरोध मार्च निकालेंगे।
भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने मंगलवार को विपक्षी सांसदों के मार्च और मुलाकात को लेकर स्थिति स्पष्ट करते हुए प्रेस नोट जारी किया है
राहुल-प्रियंका हिरासत से रिहा, चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन पर गरमाई सियासत
लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी समेत कांग्रेस नेताओं को किंग्सवे कैंप से रिहा कर दिया गया है। इसके बाद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा किंग्सवे कैंप स्थित न्यू पुलिस लाइन से रवाना हो गए हैं।
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चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट पर हमला बंद करे कांग्रेस, 2014 से चल रहा है यही नाटक: रिजिजू
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मुंबई के विकास में जनभागीदारी बढ़ाने के लिए ‘पार्टिसिपेट मुंबई’ लॉन्च, सीएम फडणवीस बोले-परियोजनाओं को मिलेगा बढ़ावा
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सीईसी ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें, नहीं तो पूरा देश बनेगा जंतर-मंतर: अभिजीत दिपके
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Rahul Gandhi की हुंकार, सरकार पर सबसे बड़ा हमला! Gyanesh Kumar संकट में फंस गए PM Modi?
पहाड़ की राजनीति में वैसे तो मौसम कब करवट ले ले, कहा नहीं जा सकता, लेकिन इस बार कांग्रेस के भीतर का मौसम कुछ ज्यादा ही बिगड़ा हुआ नजर आ रहा है। एक तरफ भाजपा लगातार संगठन को चुनावी मोड में ले जा रही है, दूसरी तरफ कांग्रेस अपने ही घर की उठापटक से बाहर निकलने का रास्ता तलाश रही है। इस पूरी कहानी के केंद्र में एक बार फिर वही पुराने चेहरे हरीश रावत हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार सवाल यह है कि लगातार चुनावी पराजयों के बाद भी कांग्रेस आखिर बार-बार उन्हीं पर दांव क्यों लगाये? और क्या अब भी उनके पास उत्तराखंड की राजनीति को निर्णायक रूप से प्रभावित करने की उतनी ही ताकत बची है? हम आपको बता दें कि कांग्रेस हाईकमान ने हरीश रावत की ‘धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा’ को लेकर साफ संदेश दिया है कि चुनावी राज्य में किसी एक नेता का समानांतर अभियान नहीं चल सकता और पार्टी को सामूहिक रूप से चुनाव लड़ना होगा। लेकिन हरीश रावत पीछे हटने की बजाय अपनी यात्रा पर आगे बढ़े। उनका कहना है कि वे कांग्रेस को सत्ता में वापस लाने के लिए जनता के बीच जा रहे हैं। सुनने में यह बात बिल्कुल कांग्रेस के हित में लगती है, लेकिन राजनीति में सिर्फ इरादा नहीं, नतीजे भी देखे जाते हैं और यहीं से हरीश रावत की मौजूदा राजनीतिक हैसियत पर सवाल उठने शुरू होते हैं। हरीश रावत उत्तराखंड के बड़े नेताओं में रहे हैं, इसमें कोई दो राय नहीं। उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली, केंद्र की राजनीति में लंबी पारी खेली और उत्तराखंड कांग्रेस को कई मुश्किल दौर में संभाला। लेकिन राजनीति में किसी नेता का कद सिर्फ उसके पुराने पदों से नहीं मापा जाता। चुनावी राजनीति में जनता का फैसला सबसे बड़ा पैमाना होता है और अगर इसी पैमाने पर हरीश रावत के पिछले कुछ चुनावों को देखा जाए तो तस्वीर बहुत चमकदार नहीं दिखाई देती। 2017 का विधानसभा चुनाव शायद इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। मुख्यमंत्री रहते हुए हरीश रावत ने दो विधानसभा सीटों से चुनाव लड़ने का फैसला किया। हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा, दोनों सीटों पर वह मैदान में उतरे, लेकिन दोनों जगह हार गए। हरिद्वार ग्रामीण में भाजपा के यतीश्वरानंद ने उन्हें 12 हजार से ज्यादा वोटों से हराया, जबकि किच्छा में भाजपा के राजेश शुक्ला ने उन्हें शिकस्त दी। यानी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा उत्तराखंड का सबसे बड़ा कांग्रेसी चेहरा विधानसभा तक नहीं पहुंच सका। उस चुनाव में कांग्रेस की हालत इतनी खराब हुई कि पार्टी 70 में से सिर्फ 11 सीटों पर सिमट गई और भाजपा ने 57 सीटें जीतकर सत्ता पर कब्जा कर लिया। वैसे राजनीति में हार के बाद वापसी संभव होती है और हरीश रावत ने भी कोशिश जारी रखी। 2019 में वे नैनीताल-ऊधमसिंह नगर लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में उतरे, लेकिन भाजपा के अजय भट्ट के सामने टिक नहीं सके। अजय भट्ट को 7.72 लाख से ज्यादा वोट मिले और हरीश रावत करीब 4.33 लाख वोट पर रुक गए। हार का अंतर तीन लाख से ज्यादा रहा। इसके बाद 2022 में विधानसभा चुनाव आया तो रावत ने लालकुआं को अपना रणक्षेत्र बनाया। इस बार भी भाजपा के मोहन सिंह बिष्ट ने उन्हें 17,527 वोटों के अंतर से हरा दिया। यानी 2017 में दो विधानसभा सीटों पर हार, 2019 में लोकसभा की हार और 2022 में विधानसभा की हार, लगातार चुनावी पराजय का यह सिलसिला किसी भी नेता के राजनीतिक भविष्य पर सवाल खड़ा करने के लिए काफी है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। 2024 के लोकसभा चुनाव में हरिद्वार से कांग्रेस ने हरीश रावत के बेटे वीरेंद्र रावत को मैदान में उतारा। मुकाबला भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत से था। नतीजा फिर कांग्रेस के खिलाफ गया। त्रिवेंद्र सिंह रावत ने वीरेंद्र रावत को करीब 1.64 लाख वोटों से हरा दिया। यानी जिस परिवार को कांग्रेस लंबे समय से उत्तराखंड की राजनीति में एक मजबूत आधार मानती रही है, उसके सामने भी चुनावी जमीन उतनी मजबूत दिखाई नहीं दी, जितनी पार्टी शायद मानती रही है। यहीं से सवाल पैदा होता है कि बार-बार हरीश रावत पर ही दांव क्यों लगाया जाये? क्या कांग्रेस के पास उत्तराखंड में कोई नया चेहरा नहीं है? क्या पार्टी ने नई पीढ़ी का नेतृत्व तैयार नहीं किया? क्या संगठन के भीतर ऐसा कोई नेता नहीं है जो हरीश रावत के बिना कांग्रेस को चुनावी मुकाबले में खड़ा कर सके? या फिर कांग्रेस हाईकमान को अब भी लगता है कि चुनाव जीतने की क्षमता भले कम हुई हो, लेकिन हरीश रावत के पास वह राजनीतिक अनुभव, जनसंपर्क और संगठनात्मक पकड़ है जिसे नजरअंदाज करना पार्टी के लिए नुकसानदेह होगा? देखा जाये तो हरीश रावत की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वे उत्तराखंड की राजनीति को बेहद करीब से जानते हैं। वे पहाड़ की भाषा समझते हैं, मैदान की राजनीति को समझते हैं और कांग्रेस के पुराने कार्यकर्ताओं के बीच उनकी पकड़ भी है। वे राजनीतिक मुद्दों को जनता की भाषा में बदलने की कला जानते हैं। लेकिन उनकी सबसे बड़ी कमजोरी भी अब सामने है। उनकी व्यक्तिगत चुनावी विश्वसनीयता पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। जब कोई नेता खुद लगातार चुनाव हार रहा हो तो उसके समर्थकों के लिए यह कहना आसान नहीं होता कि वही नेता पार्टी को सत्ता तक पहुंचा देगा। यही वजह है कि कांग्रेस के भीतर हरीश रावत की भूमिका को लेकर असमंजस दिखाई देता है। पार्टी उन्हें पूरी तरह किनारे नहीं कर सकती, क्योंकि उनका अनुभव और जनाधार अब भी उपयोगी है। लेकिन पार्टी उन्हें पूरी तरह आगे भी नहीं कर सकती, क्योंकि तब बाकी नेताओं और गुटों के बीच असंतोष बढ़ने का खतरा है। अगर हरीश रावत अपनी अलग राजनीतिक गतिविधियां जारी रखते हैं तो हाईकमान को डर है कि चुनाव से पहले ही कांग्रेस का मंच अलग-अलग हिस्सों में बंट जाएगा। देखा जाये तो उत्तराखंड कांग्रेस की असली समस्या यही है। उसके पास नेता बहुत हैं, लेकिन नेतृत्व का सर्वमान्य चेहरा नहीं है। हर नेता अपने समर्थकों के साथ खड़ा है, हर गुट अपनी राजनीतिक जगह चाहता है और दिल्ली चाहती है कि चुनाव आते-आते सभी एक मंच पर दिखाई दें। लेकिन पहाड़ की राजनीति में जितनी ऊंचाई होती है, उतने ही मोड़ भी होते हैं। कांग्रेस के सामने इस समय सबसे बड़ा मोड़ नेतृत्व का ही है। उधर भाजपा की कहानी बिल्कुल अलग दिखाई दे रही है। 2017 में भाजपा ने 70 में से 57 सीटें जीतकर कांग्रेस को सत्ता से बाहर किया था। 2022 में भाजपा का आंकड़ा घटकर 47 जरूर हुआ, लेकिन सत्ता उसके हाथ से नहीं निकली। कांग्रेस 19 सीटों तक पहुंची, लेकिन सरकार बनाने से काफी दूर रही। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उत्तराखंड की पांचों सीटें जीतकर कांग्रेस का खाता तक नहीं खुलने दिया। यानी विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के पास लगातार चुनावी जीत की मनोवैज्ञानिक बढ़त भी है और मजबूत संगठन की ताकत भी। भाजपा की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह पिछली जीत के भरोसे बैठी दिखाई नहीं देती। वह उन सीटों पर भी संगठन मजबूत करने में जुटी है जहां उसे विधानसभा चुनाव में हार मिली थी। पार्टी की तैयारी बूथ स्तर तक दिखाई देती है और उसके सामने चुनाव सिर्फ सरकार बचाने का नहीं, बल्कि उत्तराखंड में अपने राजनीतिक वर्चस्व को और मजबूत करने का है। इसके उलट कांग्रेस के पास सरकार के खिलाफ मुद्दों की कोई कमी नहीं है। बेरोजगारी है, भर्ती परीक्षाओं के सवाल हैं, पलायन है, पहाड़ के गांवों का खाली होना है, जमीन और जंगल के सवाल हैं, युवाओं की नाराजगी है और स्थानीय अस्मिता से जुड़े मुद्दे हैं। लेकिन इन मुद्दों को एक बड़े राजनीतिक अभियान में बदलने से पहले कांग्रेस को अपने भीतर की लड़ाई खत्म करनी होगी। यही वह जगह है जहां भाजपा को सबसे बड़ा फायदा मिल रहा है। हालांकि कांग्रेस के लिए उम्मीद पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। 2024 में बद्रीनाथ और मंगलौर विधानसभा उपचुनाव जीतना यह दिखाता है कि भाजपा अजेय नहीं है। लेकिन केदारनाथ उपचुनाव में भाजपा की जीत ने यह भी साफ कर दिया कि कांग्रेस के सामने चुनौती छोटी नहीं है। उसे सिर्फ भाजपा के खिलाफ माहौल बनाने से काम नहीं चलेगा, उसे अपना संगठन, अपना नेतृत्व और अपना चुनावी संदेश तीनों मजबूत करने होंगे। इसी मोड़ पर हरीश रावत का सवाल सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है। अगर रावत पार्टी को मजबूत करने के लिए जनता के बीच जाना चाहते हैं तो कांग्रेस को उनके अनुभव का इस्तेमाल जरूर करना चाहिए। लेकिन अगर उनकी सक्रियता कांग्रेस के भीतर एक और ध्रुवीकरण पैदा करती है तो वही सक्रियता पार्टी के लिए बोझ बन सकती है। कांग्रेस को यह तय करना होगा कि हरीश रावत उसके लिए एक वरिष्ठ मार्गदर्शक और स्टार प्रचारक हैं या फिर एक बार फिर पूरा चुनाव उन्हीं के इर्द-गिर्द लड़ा जाएगा। क्योंकि इन दोनों रास्तों में जमीन-आसमान का फर्क है। देखा जाये तो उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत का अध्याय अभी खत्म नहीं हुआ है, लेकिन यह भी सच है कि उनका सबसे मजबूत दौर पीछे छूट चुका है। उनकी राजनीतिक प्रासंगिकता अब सिर्फ इस बात से तय नहीं होगी कि वे कितनी बड़ी रैलियां करते हैं या कितने जिलों में यात्रा निकालते हैं। असली सवाल यह होगा कि क्या वे कांग्रेस के भीतर बिखरे हुए नेताओं और कार्यकर्ताओं को एक मंच पर ला सकते हैं और क्या उनकी मौजूदगी पार्टी के वोट में बदल सकती है? वहीं कांग्रेस को भी यह समझना होगा कि उत्तराखंड की जनता सिर्फ पुराने चेहरों की यादों पर वोट नहीं करती। पहाड़ की जनता अपने नेताओं से हिसाब मांगती है। वह पूछती है कि पांच साल में क्या हुआ, रोजगार कहां है, गांव क्यों खाली हो रहे हैं, सड़क और स्वास्थ्य की हालत क्या है और आने वाली पीढ़ी के लिए राज्य में क्या बचा है। इसलिए 2027 का चुनाव अगर कांग्रेस सिर्फ हरीश रावत बनाम भाजपा बनाकर लड़ती है तो यह उसकी रणनीतिक भूल होगी। उसे हरीश रावत के अनुभव को इस्तेमाल करते हुए एक नई राजनीतिक टीम और नया नेतृत्व सामने लाना होगा। वरना खतरा यह है कि कांग्रेस हर बार पुराने चेहरे को देखकर पहाड़ की चढ़ाई शुरू तो कर दे, लेकिन चुनाव की चोटी तक पहुंचने से पहले ही फिर किसी पुराने मोड़ पर लौट आए। क्योंकि सवाल अब सिर्फ हरीश रावत के सियासी वजूद का नहीं है। सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड कांग्रेस अपने पुराने सियासी चेहरे से आगे निकलकर नया नेतृत्व पैदा कर पाएगी, या फिर 2027 में भी पहाड़ वही पुराना सवाल पूछेगा कि कांग्रेस के पास आखिर नया क्या है? -नीरज कुमार दुबे
यूपी राज्यसभा चुनाव : भाजपा ने जमीनी कार्यकर्ताओं पर जताया भरोसा, सपा बोली- छवि सुधारने की कोशिश
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बुआ मायावती ने भतीजे आकाश आनंद को वापस बुलाया या राजनीतिक जाल में फंसा दिया?
लखनऊ की राजनीति बड़ी अजीब चीज है। यहां सामने कुछ दिखाई देता है मगर असली खेल पर्दे के पीछे चल रहा होता है। बसपा सुप्रीमो मायावती और उनके भतीजे आकाश आनंद के मामले में भी कुछ ऐसा ही दिखाई दे रहा है। जिस आकाश आनंद को कुछ समय पहले मायावती ने पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था, आज वही आकाश आनंद फिर बसपा में लौट आए हैं और उन्हें दोबारा पार्टी का राष्ट्रीय संयोजक बना दिया गया है। ऊपर से कहानी इतनी-सी है कि भतीजे ने माफी मांगी, बुआ ने माफ कर दिया और परिवार फिर एकजुट हो गया। लेकिन यूपी की राजनीति में कहानी इतनी सीधी होती तो फिर राजनीति किस बात की? असल सवाल यह है कि मायावती ने आकाश आनंद को वापस क्यों बुलाया और वापस बुलाकर उन्हें राष्ट्रीय संयोजक की जिम्मेदारी ही क्यों दी? क्या यह आकाश पर भरोसा है, या फिर उस राजनीतिक संभावना को रोकने की कोशिश है जो उनके बाहर जाने के बाद पैदा हो रही थी? याद कीजिए, जब मायावती ने आकाश आनंद को पार्टी से बाहर किया था तो वह राजनीति में अकेले नहीं रह गए थे। उनके लिए दूसरे दलों के दरवाजे खुलने लगे थे। चंद्रशेखर आजाद ने उनके लिए जगह होने की बात कही। अखिलेश यादव से जब आकाश को समाजवादी पार्टी में लेने की संभावना पर सवाल हुआ तो उन्होंने भी दरवाजा बंद नहीं किया। निषाद पार्टी की तरफ से न्योता आया। यानी जिस भतीजे को मायावती ने बसपा से बाहर कर दिया था, उसे दूसरे राजनीतिक दल अपने यहां जगह देने के लिए तैयार दिख रहे थे। यहीं से मायावती के लिए असली खतरा पैदा होता था। क्योंकि बात सिर्फ यह नहीं थी कि आकाश आनंद किसी दूसरी पार्टी में चले जाते। असली खतरा यह था कि अगर वह किसी दूसरे दल में जाकर अपनी राजनीतिक जमीन तैयार कर लेते, युवा दलितों के बीच अपनी पहचान बना लेते और धीरे-धीरे मायावती से अलग अपना एक स्वतंत्र राजनीतिक वजूद खड़ा कर लेते, तो फिर भविष्य में वह सिर्फ “मायावती के भतीजे” नहीं रहते। वह अपने आप में एक राजनीतिक ब्रांड बन सकते थे। यही वह चीज है जो शायद मायावती को सबसे ज्यादा खटकती। देखा जाये तो बसपा पहले ही उत्तर प्रदेश की राजनीति में लगातार कमजोर हुई है। कभी जिस पार्टी के बिना यूपी की सत्ता का गणित पूरा नहीं होता था, वह आज विधानसभा और लोकसभा चुनावों में एक सीट जीतने की जद्दोजहद करती दिखाई देती है। 2019 में बसपा को उत्तर प्रदेश में करीब 19 प्रतिशत वोट मिले थे, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में उसका वोट शेयर 10 प्रतिशत से भी नीचे चला गया। इस बीच दलित राजनीति के मैदान में चंद्रशेखर आजाद जैसा नया चेहरा भी उभरा है। यानी बसपा के सामने चुनौती सिर्फ भाजपा या सपा-कांग्रेस गठबंधन की नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक जगह की भी है जिसे कभी बसपा अपना स्थायी इलाका मानती थी। ऐसे माहौल में अगर मायावती का भतीजा पार्टी से निकलकर किसी दूसरे दल में चला जाता और वहां अपनी अलग पहचान बनाने लगता, तो बसपा के लिए मामला और मुश्किल हो सकता था। क्योंकि मायावती के पास अपना मजबूत कोर वोट बैंक भले अभी भी मौजूद हो, लेकिन चुनावी राजनीति में सिर्फ कोर वोट बैंक होना और चुनाव जीतने की स्थिति में होना दो अलग-अलग बातें हैं। मुमकिन है कि मायावती ने इसी खतरे को भांप लिया हो। उन्हें लगा हो कि अगर आकाश दूसरे दल में चले गए और वहां युवा दलित राजनीति का नया चेहरा बन गए तो बसपा के सामने सिर्फ एक नेता के जाने का संकट नहीं होगा, बल्कि नेतृत्व की अगली पीढ़ी का विकल्प भी पार्टी के बाहर तैयार हो जाएगा। बसपा अगर अभी शून्य पर खड़ी दिखाई दे रही है तो आकाश का किसी दूसरे राजनीतिक मंच पर जाकर मजबूत होना इस शून्य को डबल शून्य में बदल सकता है। इसलिए भतीजे को वापस बुलाना जरूरी समझा गया। लेकिन यहां कहानी में एक और पेंच है। आकाश को सिर्फ वापस नहीं बुलाया गया, उन्हें राष्ट्रीय संयोजक बना दिया गया। सुनने में यह बड़ा सम्मान है, लेकिन राजनीति में हर सम्मान के साथ जिम्मेदारी भी आती है। आकाश को अब जो जिम्मेदारी मिली है, वह आसान नहीं है। खासकर तब, जब सामने 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव खड़ा है। अब अगर बसपा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करती है तो मायावती की रणनीति सफल कही जाएगी और आकाश आनंद को इसका फायदा भी मिलेगा। लेकिन अगर बसपा का प्रदर्शन फिर कमजोर रहा तो सवाल सिर्फ मायावती से नहीं होगा। सवाल आकाश से भी होगा। आखिर राष्ट्रीय संयोजक किसलिए बनाए गए थे? संगठन को मजबूत करने के लिए या सिर्फ पद की शोभा बढ़ाने के लिए? युवा वोटरों को बसपा से जोड़ने की जिम्मेदारी किसकी थी? चुनावी रणनीति को जमीन पर उतारने का काम कौन कर रहा था? यानी मायावती ने आकाश को वापस लाकर उन्हें एक ऐसी जिम्मेदारी दे दी है जिसमें सफलता का श्रेय तो मिलेगा ही, लेकिन असफलता का ठीकरा भी सिर पर फूट सकता है। यही वह जगह है जहां सवाल उठता है कि कहीं यह आकाश आनंद की राजनीतिक ब्रांड वैल्यू को मजबूत करने की बजाय धीरे-धीरे खत्म करने की रणनीति तो नहीं? क्योंकि मान लीजिए 2027 में बसपा फिर चुनावी तौर पर कोई खास कमाल नहीं कर पाती। तब आकाश आनंद के पास क्या बचेगा? वह किसी दूसरी पार्टी में जाकर यह भी नहीं कह सकते कि उन्हें बसपा में मौका नहीं मिला था। मौका मिला, राष्ट्रीय संयोजक बनाया गया, संगठन की जिम्मेदारी दी गई और फिर भी पार्टी चुनाव नहीं जीत सकी। ऐसे में दूसरे दलों के लिए आकाश को अपने साथ लेना उतना आकर्षक नहीं रह जाएगा। यानी जिस समय वह बसपा से बाहर थे, उस समय दूसरे दल उन्हें अपने यहां लाने की संभावनाएं तलाश रहे थे। लेकिन अब वह बसपा के राष्ट्रीय संयोजक हैं। अगर बसपा फिर कमजोर प्रदर्शन करती है तो वही दूसरे दल शायद यह सोचें कि जिस नेता को अपनी पार्टी संभालने का मौका मिला और वह उसे नहीं उठा पाया, उसे अपने यहां लाकर क्या हासिल होगा? देखा जाये तो राजनीति में इसे बहुत बारीक तरीके से समझना होगा। मायावती ने आकाश को बाहर जाने से तो रोक लिया, लेकिन साथ ही उन्हें बसपा की किस्मत से बांध भी दिया। अब आकाश की राजनीतिक कामयाबी और बसपा की राजनीतिक कामयाबी एक-दूसरे से अलग नहीं रह सकतीं। इसके अलावा, यहां एक सवाल मायावती से भी पूछा जाना चाहिए। मायावती की राजनीति की सबसे बड़ी पहचान ही परिवारवाद के खिलाफ लड़ाई रही है। कांशीराम ने परिवार की राजनीति नहीं की। उन्होंने मायावती जैसे कार्यकर्ता को आगे बढ़ाया। मायावती ने भी लंबे समय तक यही संदेश दिया कि बसपा किसी एक परिवार की पार्टी नहीं, बल्कि बहुजन समाज की पार्टी है। लेकिन अब पिछले कुछ समय से बसपा के भीतर परिवार के सदस्यों की भूमिका लगातार चर्चा में है। आकाश आनंद को पहले आगे किया गया। फिर हटाया गया। ईशान आनंद को जिम्मेदारी मिली। फिर आकाश को वापस लाया गया। दीपिका आनंद के नाम की चर्चा भी सामने आई। कभी कहा गया कि परिवार के किसी सदस्य को राजनीतिक पद नहीं दिया जाएगा और फिर घटनाक्रम कुछ ही समय में दूसरी दिशा में जाता दिखाई दिया। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर बसपा में परिवार के बाहर नेतृत्व का विकल्प क्यों नहीं दिखाई देता? मायावती दूसरी पार्टियों में परिवारवाद पर सवाल उठाती रही हैं। समाजवादी पार्टी पर परिवारवाद का आरोप लगाने में वह कभी पीछे नहीं रहतीं। लेकिन जनता यह भी देखती है कि अपनी पार्टी के भीतर नेतृत्व की अगली कतार में कौन खड़ा है? यहां मामला सिर्फ आकाश आनंद का नहीं है। सवाल यह है कि क्या बसपा में मायावती के बाद कोई ऐसा गैर-पारिवारिक चेहरा नहीं है, जिसे राष्ट्रीय स्तर की जिम्मेदारी दी जा सके? क्या पार्टी में दशकों से काम कर रहे किसी दलित, पिछड़े, गरीब या वंचित कार्यकर्ता में नेतृत्व की संभावना नहीं बची? अगर है, तो फिर बार-बार परिवार के सदस्यों की तरफ ही क्यों देखा जा रहा है? देखा जाये तो यूपी की राजनीति में जनता बहुत कुछ भूल सकती है, लेकिन विरोधाभास जल्दी नहीं भूलती। अगर दूसरी पार्टियों के परिवारवाद को मायावती राजनीतिक अपराध मानती हैं तो फिर बसपा में परिवार के सदस्यों की बढ़ती भूमिका पर भी सवाल उठेंगे। सवाल सिर्फ विरोधियों की तरफ से नहीं उठेंगे, बसपा के भीतर भी उठेंगे। उधर, आकाश आनंद के लिए भी अब मामला आसान नहीं है। उन्हें राष्ट्रीय संयोजक की कुर्सी जरूर मिल गई है, लेकिन यह कुर्सी फूलों की नहीं, कांटों की है। अब उन्हें यह साबित करना होगा कि वह सिर्फ मायावती के भतीजे नहीं हैं। उन्हें यह दिखाना होगा कि वह संगठन खड़ा कर सकते हैं, युवा दलित मतदाताओं को जोड़ सकते हैं और बसपा को उस राजनीतिक जमीन पर वापस ला सकते हैं, जहां से पार्टी लगातार खिसकती चली गई है। बहरहाल, बुआ ने भतीजे को घर तो वापस बुला लिया, लेकिन अब उसके हाथ में पूरे घर का हिसाब-किताब पकड़ा दिया है। घर बचा तो भतीजे का कद बढ़ेगा और घर डूबा तो सवाल भी उसी से होगा। मगर सबसे बड़ा सवाल फिर भी वही रहेगा कि परिवारवाद के खिलाफ राजनीति की पहचान बनाने वाली मायावती को अब अपनी पार्टी का भविष्य परिवार के बाहर क्यों दिखाई नहीं देता? क्योंकि अगर बसपा सचमुच बहुजन की पार्टी है तो उसका भविष्य किसी एक परिवार की अगली पीढ़ी में नहीं, बल्कि उन लाखों कार्यकर्ताओं में दिखाई देना चाहिए जो दशकों से पार्टी का झंडा उठाए घूम रहे हैं। वरना राष्ट्रीय संयोजक की कुर्सी चाहे जितनी बड़ी हो, जनता पूछेगी जरूर कि यह आकाश आनंद की उड़ान है या मायावती की राजनीतिक छतरी के नीचे सुरक्षित किया गया एक और नाम? -नीरज कुमार दुबे
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प्रभासाक्षी की साप्ताहिक कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में इस सप्ताह हमने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर हो रही राजनीति पर चर्चा की। साथ-साथ उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने जो बदलाव किए हैं उससे भी संबंधित सवाल पूछे। हमेशा की तरह इस कार्यक्रम में मौजूद रहे प्रभासाक्षी के संपादक नीरज दुबे। नीरज दुबे ने साफ तौर पर कहा कि राजनीति के लिए फिलहाल संवैधानिक संस्थाओं को भी विपक्ष की ओर से नहीं छोड़ा जा रहा है। उन्होंने कहा कि मामला सुप्रीम कोर्ट में है और ऐसे में सुप्रीम कोर्ट पर हर किसी को भरोसा रखना चाहिए। नीरज दुबे ने कहा कि चुनाव आयोग ने कई सुधार हाल के दिनों में किए हैं। यह अच्छी बात है कि विपक्ष ने इसको लेकर दबाव बनाया और चुनाव आयोग ने वह सुधार किए हैं। उन्होंने कहा कि सुधार की गुंजाइश हमेशा रहती है और चुनाव आयोग भी वही कर रहा है। उन्होंने कहा कि जब से जंतर मंतर का आंदोलन हुआ है तब से विपक्ष को भी लगने लगा है कि यह सरकार झुक सकती है और हमें लगातार इसको लेकर झुकाने की तैयारी करनी चाहिए। हालांकि नीरज कुमार दुबे ने साफ तौर पर कहा कि डूसू चुनाव या पंजाब विश्वविद्यालय के चुनाव को हम देखें तो वहां भाजपा समर्थित संगठन को जीत मिली। विपक्ष के जो विद्यार्थी संगठन है, उसे हार का सामना करना पड़ा जिसका मतलब साफ है कि अभी भी देश के युवा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ खड़े हैं। ऐसे में विपक्ष को युवाओं के बीच भ्रम फैलाने से बचना चाहिए। इसे भी पढ़ें: Seat Sharing पर Congress सीधे SP चीफ Akhilesh Yadav से करे बात, Dharmendra Yadav ने दी नसीहत नीरज कुमार दुबे ने कहा कि देश तरक्की कर रहा है। लेकिन विपक्ष लगातार भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहा है। जो राजक तत्व है, जो आंदोलनजीवी हैं, वह हमेशा इसी तरीके की बातें करते रहेंगे ताकि देश के लोगों में भ्रम रहे। उन्होंने कहा कि कॉकरोच जनता पार्टी को एक सफलता मिली जिसके बाद उसका आत्मविश्वास बढ़ा हुआ है। लेकिन ऐसा नहीं है कि हर बार उसे सफलता मिल जाए। कांग्रेस को भी यही लगता है कि जब सीजेपी को समर्थन मिल गया तो हम क्यों पीछे रहे? इसलिए कांग्रेस भी इस तरह की चीज कर रही है। फिलहाल सीजेपी और कांग्रेस के बीच ही लड़ाई साफ तौर पर देखने को मिल रही है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के भीतर हुए बदलाव पर हमने नीरज कुमार दुबे से सवाल पूछा। नीरज दुबे ने कहा कि कांग्रेस घूम फिर कर एक परिवार पर ही आ जाती है और उत्तर प्रदेश में भी हमने देखा कि वह एक परिवार के ही व्यक्ति को पार्टी की कमान सौंप दी है। जिस व्यक्ति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी उनके क्षेत्र में मजबूत चुनौती दी थी, उसे चुनाव से 4 महीने पहले हटाने का क्या मतलब है? आप किसी दूसरे पार्टी से नेता को लेकर आते हैं और उसे प्रभारी बनाते हैं। प्रभारी के जरिए आप रिपोर्ट लेते हैं और तब फैसला आप लेते हैं। ऐसे में आप खुद अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के भरोसे पर खड़े नहीं उतर रहे हैं। इमरान मसूद के बयान की वजह से आपके गठबंधन के सहयोगी अखिलेश यादव आपसे नाराज है। बावजूद इसके आप इमरान मसूद को आगे बढ़ाने की कोशिश में लगे हैं।
भरोसे पर भी खरे उतरे सेलिब्रिटिज
विज्ञापनों के प्रति सेलिब्रिटिज की जवाबदेही को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की हालिया टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है कि अपने उत्पादों को बेचने के लिए सेलिब्रिटिज का उपयोग सबसे अधिक किया जाता रहा है। विज्ञापनदाता जानते हैं कि लक्षित उपभोक्ता तक पहुंचने में सेलिब्रिटिज की भागीदारी महत्वपूर्ण हो जाती हैं। लोग सेलिब्रिटिज पर विष्वास करते हैं और विज्ञापनदाता कंपनियां इसी का लाभ अपने उत्पादों को बाजार दिलाने में करते आये हैं। इसीलिए राष्ट्र्पति द्रौपदी मुर्मु की टिप्पणी कि सच्चा सितारा रोशनी फैलाता है, अंधेरापन नहीं, आज के संदर्भ में महत्वपूर्ण होने के साथ ही सितारों और सेलिब्रिटिज को समाज के प्रति जवाबदेही समझने का संकेत भी है। दर असल हो रहा है कि पैसे की चकाचोंध में सेलिब्रिटिज समाज के प्रति जवाबदेही से मुहं मोड़ते दिखाई देते हैं। जब आम जन का सेलेब्रिटिज का भरोसा है तो सेलिब्रिटिज की भी इस भरोसे को बनाए रखने की नैतिक जिम्मेदारी हो जाती है। दरअसल सेलिब्रिटिज को उत्पाद के साथ देखकर आमआदमी आंख मींच कर भरोसे के सहारे खरीदारी करता है। वह उस उत्पाद और सेलिब्रिटिज द्वारा किये जा रहे वादे को सत्य समझता है। ऐसे में सेलिब्रिटी का समाज या लक्षित वर्ग के प्रति और अधिक जिम्मेदारी बन जाती है। विकेता या निर्माता अपने उत्पाद को बेचने पर ध्यान देता है। इसलिए वह अपने उत्पाद के गुणगान अधिक ही करने लगता है तो सेलिब्रिटी के विज्ञापन के सहारे अतिशयोक्तिपूर्ण दावें करने लग जाते हैं। यहां तक कि कई विज्ञापन के दावें तो सत्य के आसपास भी नहीं होते जैसा कि अक्षय कुमार का डॉबर च्यवनप्राश को लेकर विज्ञापन। यह तो एक उदाहरण मात्र है। आज तो सेरोगेट विज्ञापनों का दौर भी चल निकला है। शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्राप का इलायची का विज्ञापन सबके सामने है जिसके माध्यम से छद्म रुप से प्रतिबंधित पान मसाला का विज्ञापन किया जा रहा था। इसी तरह के अनेक विज्ञापन हमारे सामने हैं। हांलाकि इसमें कोई दो राय नहीं कि निर्माता अपने उत्पाद का विज्ञापन करने के लिए सेलिब्रिटिज को बहुत अधिक पेमेंट किया जाता है और इस पेमेंट के चक्कर में सेलिब्रिटिज समाज के प्रति अपने दायित्व और कानूनी प्रावधानों को भी दरकिनार कर देते हैं। यही कारण है कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने दुखती रग पर हाथ रखते हुए 72 वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में पिछले माह सितंबर में आयोजित समारोह में आमआदमी का दर्द सामने रखा। विवादित विज्ञापनों का दौर लंबे समय से चला आता रहा है। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि अपने उत्पाद को बेचने के लिए सेलिब्रिटिज, महिलाओं और बच्चों को केन्द्र में रखा जाता है। दरअसल लक्ष्यित वर्ग को सम्मोहित करना इन विज्ञापनों का खास उद्देश्य हो जाता है। विज्ञापन करते समय कई बार तो सांप्रदायिकता तक सामने आ जाती है। 2020 का तनिष्क का विज्ञापन इसका उदाहरण है तो 2026 का कृति सेनन का गीवा ज्वेलरी का विज्ञापन सामने हैं। विमल इलायची का फिल्म कलाकर त्रय का विज्ञापन सर्वविदित है जिसमें इलायची के नाम पर छद्म रुप से पान मसाला तंबाकू का ही विज्ञापन था। इस तरह के सेरेगेट विज्ञापन आम होते जा रहे हैं। लेविस 501 जिंस का अक्षय कुमार का विज्ञापन, 2021 का आलिया भट्ट का कन्यादान के बहाने कन्यामान विज्ञापन यह फिर 1995 में अजगर से जिस्म को लपेटे मिलिंद सोयन और मधु सप्रे का टफ जूते का विज्ञापन का विवाद आज तक चर्चा में है। 2026 का विक्की कौशल-रश्मिका संधाना का माचो अंडरवियर का विज्ञापन भी विवादों में रहा है। इसे भी पढ़ें: Switzerland के साथ रिश्तों को नई ऊंचाई देकर Modi ने Europe में चली बड़ी कूटनीतिक चाल विज्ञापनों को लेकर सरकार भी गंभीर रही है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 द्वारा जवाबदेही तय की गई है। 10 लाख से 50 लाख तक के जुर्माने के प्रावधान के साथ ही ऐसे विज्ञापनकर्ताओं पर एक साल से तीन साल तक प्रतिबंध के प्रावधान भी है। भ्रामक विज्ञापनों को लेकर माननीय सर्वोच्च न्यायालय भी गंभीर रहा है और समय समय पर टिप्पणियां की गई है। इस दायरें में चार लाख से अधिक कमाई वाले व 5 लाख फालोवर्स वाले सेलिब्रिटिज को रखा गया है। हालात की गंभीरता को इसी से समझना होगा कि फिल्म कलाकारों के समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को इस तरह का संदेश देना पड़ा। वैसे भी जिस पर भरोसा होता है या किया जाता है तो भरोसे वाले व्यक्ति पर भी भरोसे को बनाये रखने का दायित्व हो जाता है। विज्ञापननिर्माताओं को भी समाज के प्रति दायित्व को समझना होगा तभी सभी अपने भरोसे पर खरे उतर सकते हैं। - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
Switzerland के साथ रिश्तों को नई ऊंचाई देकर Modi ने Europe में चली बड़ी कूटनीतिक चाल
दुनिया के बदलते सामरिक और आर्थिक समीकरणों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति लगातार भारत की वैश्विक पहुंच को नए आयाम दे रही है। इसी व्यापक कूटनीतिक रणनीति की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में स्विट्जरलैंड के साथ संबंधों को नई ऊंचाई तक ले जाने की दिशा में आज एक अहम कदम सामने आया। स्विस राष्ट्रपति गाइ पार्मेलिन की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने प्रवास एवं गतिशीलता, युवा पेशेवरों, परिवहन प्रौद्योगिकी, वैज्ञानिक अनुसंधान तथा नवाचार और स्टार्टअप सहयोग से जुड़े पांच महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए। व्यापार और निवेश से आगे बढ़कर रक्षा उत्पादन, परमाणु ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, विज्ञान, उन्नत प्रौद्योगिकी और वैश्विक कूटनीति तक साझेदारी का विस्तार यह संकेत देता है कि भारत–स्विट्जरलैंड संबंध अब एक नए रणनीतिक चरण में प्रवेश कर रहे हैं और मोदी की सक्रिय कूटनीति ने यूरोप के इस महत्वपूर्ण देश के साथ भारत की साझेदारी को जिस तेजी से व्यापक बनाया है, उसने अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों का ध्यान खींचा है। प्रधानमंत्री मोदी और गाइ पार्मेलिन की मुलाकात का सबसे बड़ा संदेश यह है कि भारत और स्विट्जरलैंड अब अपने रिश्ते को बहु-आयामी रणनीतिक साझेदारी में बदलने की कोशिश कर रहे हैं। हैदराबाद हाउस में मोदी और पारमेलिन ने व्यापार एवं निवेश, एआई, नवाचार, रक्षा उत्पादन और सैन्य आदान-प्रदान, परमाणु ऊर्जा, विज्ञान-प्रौद्योगिकी तथा लोगों के बीच संपर्क सहित पूरे संबंधों की समीक्षा की। देखा जाये तो आर्थिक मोर्चे पर भारत–ईएफटीए व्यापार एवं आर्थिक साझेदारी समझौता इस रिश्ते की रीढ़ बनकर उभरा है। यह समझौता अक्टूबर 2025 में लागू हुआ था और स्विट्जरलैंड इसे भारतीय बाजार में स्विस कंपनियों की पहुंच और निवेश के लिए अधिक निश्चितता देने वाला करार मानता है। स्विट्जरलैंड के अनुसार भारत एशिया में उसका दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और देश में 330 से अधिक स्विस कंपनियां सक्रिय हैं। इसे भी पढ़ें: Swiss President से मुलाकात के बाद बोले PM Modi, वैश्विक शांति और संस्थाओं में सुधार जरूरी द्विपक्षीय वार्ता के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि इस समझौते के जरिए अगले 15 वर्षों में भारत में 100 अरब डॉलर के निवेश और 10 लाख प्रत्यक्ष रोजगार का लक्ष्य रखा गया है। भारतीय कृषि उत्पादों, औषधियों, वस्त्रों और इंजीनियरिंग उत्पादों के लिए स्विस बाजार में अवसर बढ़ाने के साथ भारत जैव-प्रौद्योगिकी, जीवन विज्ञान, बैंकिंग, बीमा, खाद्य प्रसंस्करण और सतत विकास जैसे क्षेत्रों में स्विस निवेश आकर्षित करना चाहता है। लेकिन इस साझेदारी का असली रणनीतिक विस्तार रक्षा और उन्नत प्रौद्योगिकी में दिखाई देता है। दोनों पक्षों ने सैन्य आदान-प्रदान और रक्षा उत्पादन में नए अवसर तलाशने तथा परमाणु ऊर्जा सहयोग को और गहरा करने पर सहमति जताई है। यह संकेत इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि स्विट्जरलैंड की उच्च तकनीकी औद्योगिक क्षमता और भारत की बढ़ती रक्षा विनिर्माण महत्वाकांक्षा मिलकर नए तकनीकी और औद्योगिक सहयोग के रास्ते खोल सकती हैं। साथ ही दोनों देशों के बीच बुनियादी ढांचे में भी सहयोग अब जमीन पर दिखाई दे रहा है। वाराणसी रोपवे, नोएडा के जेवर हवाई अड्डे और पर्वतीय क्षेत्रों में रेलवे तथा सुरंग परियोजनाओं का उल्लेख करते हुए मोदी ने परिवहन, गतिशीलता और आधारभूत ढांचे पर नए समझौते को आगे की साझेदारी का आधार बताया। समझौते में विद्युत वाहन, रोपवे, परिपत्र अर्थव्यवस्था, सुरंग और टिकाऊ परिवहन प्रणालियों पर सहयोग शामिल है। साथ ही विज्ञान और नवाचार इस रिश्ते की दूसरी बड़ी धुरी बन रहे हैं। भारतीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग और स्विस राष्ट्रीय विज्ञान प्रतिष्ठान के बीच समझौता दीर्घकालिक संयुक्त अनुसंधान का ढांचा तैयार करेगा। स्वास्थ्य, स्वच्छ ऊर्जा और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में नए संयुक्त शोध की शुरुआत भी प्रस्तावित है। ज्यूरिख विश्वविद्यालय के अनुप्रयुक्त विज्ञान संस्थान के साथ समझौते के जरिए शुरुआती चरण के भारतीय स्टार्टअप को प्रशिक्षण, तकनीकी हस्तांतरण, कार्यशालाओं और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्किंग का अवसर मिलेगा। मानव संसाधन के मोर्चे पर भी बड़ा बदलाव हुआ है। प्रवास एवं गतिशीलता साझेदारी के तहत पांच वर्ष तक वैध बहु-प्रवेश वीजा और प्रत्येक यात्रा में छह महीने तक ठहरने की सुविधा का प्रावधान है। छात्रों के लिए नवीकरणीय एक-वर्षीय अनुमति भी शामिल है। वहीं युवा पेशेवरों के आदान-प्रदान समझौते के तहत हर वर्ष दोनों देशों से 300-300 युवा पेशेवर भेजे जा सकेंगे, जिसे बढ़ाकर 500 तक किया जा सकता है। इसका उद्देश्य युवाओं को काम के साथ पेशेवर और भाषाई कौशल विकसित करने का अवसर देना है। यह समझौता प्रतिभा, तकनीक और पूंजी, तीनों को एक ही गलियारे में जोड़ता है। भारत को वैश्विक प्रतिभा और नवाचार नेटवर्क में प्रवेश मिलता है, जबकि स्विट्जरलैंड को भारत के विशाल प्रतिभा और बाजार आधार से जुड़ने का अवसर मिलता है। इसके अलावा, दोनों देशों ने आगामी भारत–स्विस अनुसंधान प्रमुख कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र की भी घोषणा की है। साथ ही वैश्विक शांति, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार की जरूरत पर दोनों पक्षों ने सहमति जताई है। यूक्रेन और पश्चिम एशिया जैसे संकटों पर भारत ने हर सार्थक शांति प्रयास के समर्थन की अपनी नीति दोहराई। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी इस रिश्ते का अगला मोर्चा है। भारत में 2026 के एआई इम्पैक्ट शिखर सम्मेलन के बाद स्विट्जरलैंड अगले चरण में जिनेवा एआई शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। दोनों देशों की कोशिश जिम्मेदार, समावेशी और मानव-केंद्रित कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए सहयोग बढ़ाने की है। साफ है कि यह यात्रा केवल पांच समझौतों की कहानी नहीं है। इसके पीछे भारत की रणनीति यूरोप में व्यापार, निवेश, उन्नत तकनीक और विश्वसनीय आपूर्ति शृंखलाओं के नए केंद्रों से संबंध मजबूत करने की है, जबकि स्विट्जरलैंड भारत को अपने एशियाई आर्थिक और तकनीकी विस्तार के महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में देख रहा है। 7 अक्टूबर का भारत–ईएफटीए ‘प्रॉस्पेरिटी समिट’ इस पूरी कवायद को निवेश और कारोबारी परियोजनाओं में बदलने की अगली परीक्षा होगा। बहरहाल, रणनीतिक तस्वीर बिल्कुल स्पष्ट है। भारत–स्विट्जरलैंड संबंध अब घड़ियों, पर्यटन और बैंकिंग की पारंपरिक छवि से बाहर निकलकर रक्षा उत्पादन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष, स्वच्छ ऊर्जा, अत्याधुनिक बुनियादी ढांचे, स्टार्टअप और वैश्विक कूटनीति के नए मैदान में प्रवेश कर चुके हैं। -नीरज कुमार दुबे
बैंक ऑफ बड़ौदा में ह्यूमन रिसोर्स पदों पर आवेदन की अंतिम तिथि 16 अक्तूबर तक बढ़ी
नई दिल्ली, बैंक ऑफ बड़ौदा (बीओबी) में नौकरी करने की इच्छा रखने वालों के लिए एक सुनहरा मौका सामने आया है।
भारतीय शेयर बाजार ने लगातार 4 दिन की गिरावट का तोड़ा सिलसिला
मुंबई, अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में तेजी से बढ़ोतरी की आशंकाओं में कमी आने के कारण वैश्विक शेयर बाजारों में तेजी आने से भारतीय शेयर बाजार ने लगातार चार दिनों की गिरावट का सिलसिला तोड़ते हुए हरे निशान में बंद हुआ।
मुंबई में इस साल के पहले नौ महीने में बिके 72,804 घर: रिपोर्ट
मुंबई, मुंबई के आवासीय बाजार में जनवरी-सितंबर के दौरान 2018 के बाद सबसे अधिक बिक्री दर्ज की गई है।
महाराष्ट्र एमएलसी चुनाव पर सभी पांचों सीटों पर जीत दर्ज करेगी महायुति: मुरलीधर मोहोल
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ब्राजील: राष्ट्रपति चुनाव के पहले दौर में लूला पर बढ़त बनाने वाले बोल्सोनारो कौन?
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Gen Z Revolt: मोदी के दोस्त के देश में भी वही हो रहा,जो भारत में हुआ था? भयंकर साज़िश का पर्दाफ़ाश!
पहले विश्व युद्ध के पहले फ्रांस को एक सुपर पावर कह ले या फिर एक प्रमुख ताकत दुनिया की कहा जाता था। आज भी फ्रांस को दुनिया भर में शिक्षा, लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों के लिए, मानव अधिकारों के लिए जाना जाता है। लेकिन आज उसी फ्रांस के स्कूलों के बाहर आग लगी है। बल्कि पेरिस जैसे शहर पूरी तरीके से छात्रों की चपेट में है। स्कूलों के गेट बंद हैं। सड़कों पर आगजनी है। पुलिस और छात्रों के बीच सीधा टकराव है । शुरुआत स्कूल की समस्याओं से हुई थी। लेकिन अब आंदोलन का दायरा बढ़ चुका है। शिक्षक नहीं क्लासरूम में भीड़ है। स्कूलों की इमारतें जर्जर होने का दावा है। लंबे स्कूल के घंटे और युवाओं को लग रहा है कि उनके भविष्य के साथ समझौता किया जा रहा है। 2 अक्टूबर तक करीब 400 हाई स्कूल बंद थे और 1000 से ज़्यादा संस्थानों में किसी ना किसी रूप में प्रोटेस्ट या डिस्ट्रप्शन दर्ज हुआ और फिर आई सबसे चौंकाने वाली तस्वीर सामने कि करीब 2000 गिरफ्तारियां। पुलिस के साथ झड़प, आगजनी, स्कूलों के बाहर बैरिकेड्स और सरकार अब कह रही कि आंदोलन के एक हिस्से पर हिंसक तत्वों का कब्जा हो गया है। लेकिन कहानी सिर्फ इतनी नहीं क्योंकि इन बच्चों के हाथ में सिर्फ पत्थर नहीं इनके हाथ में एक शिकायत भी है कि हमारा भविष्य कहां है। स्कूल के गेट से शुरू हुआ विस्फोट। फ्रांस में मौजूदा आंदोलन की शुरुआत पेरिस रीजन के हाई स्कूलों से हुई। पहले छात्रों ने स्कूल के गेट ब्लॉक किए। फिर दूसरे शहर जुड़े और फिर प्रोटेस्ट फैलता चला गया और कुछ ही दिनों में मामला नेशनल अनरेस्ट में बदलने लगा। 1 अक्टूबर तक फ्रांस के 1000 से ज्यादा हाई स्कूल प्रोटेस्ट या डिस्क्रिप्शन से प्रभावित बताए गए। एजुकेशन मिनिस्ट्री के आंकड़ों के अनुसार 222 स्कूल्स में ब्लॉकेड्स दर्ज हुए हैं। 2 अक्टूबर को करीब 400 स्कूल बंद रखने पड़े। हालात अभी भी वैसे ही हैं। यानी जिस समस्या की शुरुआत एक स्कूल के गेट से हुई थी, अब पूरे फ्रांस की एजुकेशन सिस्टम की वह परीक्षा बन गई है। बच्चों की शिकायत आखिर क्या है जिस पर बात नहीं बन पा रही। अब इस आंदोलन के पीछे की जमीन समझिए। इसे भी पढ़ें: France में छात्रों के उग्र प्रदर्शन से 400 High School बंद, पुलिस पर पथराव और आगजनी छात्रों की सबसे बड़ी शिकायत है टीचर्स की कमी कई जगह क्लासेस में स्टूडेंट्स की संख्या बहुत ज्यादा है। कुछ छात्रों का कहना है कि एक क्लास रूम में 30 से ज्यादा बच्चे हैं। कई स्कूलों में टीचर्स की अनुपस्थिति के कारण क्लासेस कैंसिल हो रही हैं। फ्रांस के एजुकेशन मिनिस्ट्री के आंकड़े कहते हैं कि 2024-25 स्कूल ईयर में पब्लिक सेकेंडरी स्कूल्स में करीब 10% टीचिंग आवर्स पढ़ाए ही नहीं गए। इनमें लगभग 7.5 मिस्ड आवर्स सब्स्टट्यूट टीचर्स ना मिलने के कारण थे। यानी छात्रों की शिकायत सिर्फ सोशल मीडिया का गुस्सा नहीं। इसके पीछे एजुकेशन सिस्टम में वास्तविक स्टाफिंग प्रॉब्लम भी है। स्कूलों के हालत ने गुस्सा और बढ़ाया है। अब दूसरी बड़ी शिकायत है इंफ्रास्ट्रक्चर। कई स्कूलों की इमारतें पुरानी होने का दावा है। क्लासरूम ओवर क्राउडेड है। हीट वेव के दौरान कई क्लासरूम्स में तापमान बेहद ज्यादा रहा। स्टूडेंट्स का कहना है कि अगर उन्हें घंटों ऐसे कमरों में बैठना पड़ता है जहां बेसिक कंफर्ट तक पर्याप्त नहीं है। कई जगह स्टाफ शॉर्टेज के कारण एडमिनिस्ट्रेटिव और टीचिंग वर्क लोड भी बढ़ा हुआ है। यानी छात्र कह रहे हैं कि हमें सिर्फ परीक्षा पास करने के लिए नहीं कहा जा सकता। हमें पढ़ने के लिए सही स्कूल भी चाहिए। इसे भी पढ़ें: G20 Meet: Piyush Goyal ने फ्रांस, कनाडा, सऊदी अरब और दक्षिण कोरिया संग Trade पर की चर्चा स्कूल की दीवारों से बाहर निकला जेन जी का गुस्सा जेनजी का गुस्सा स्कूल की दीवारों से बाहर निकल चुका है और यही इस आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बनता है। प्रदर्शनकारी सिर्फ क्लासरूम कंडीशंस की बात नहीं कर रहे। उनकी चिंता है आगे की जिंदगी, यूनिवर्सिटी एडमिशन, एंप्लॉयमेंट, इकोनॉमिक सिक्योरिटी, स्टूडेंट सपोर्ट और एक ऐसा फ्यूचर जहां उन्हें लग रहा कि कंपटीशन बढ़ रहा है लेकिन अपॉर्चुनिटीज उसी अनुपात में नहीं बढ़ रही। कई छात्रों के लिए स्कूल सिर्फ स्कूल नहीं वो उनके सोशल मोबिलिटी का रास्ता है। अगर पब्लिक एजुकेशन कमजोर होती है तो गरीब और मिडिल क्लास परिवार के बच्चों के लिए आगे बढ़ने के अवसर भी प्रभावित हो सकते हैं। इसीलिए आंदोलन में एजुकेशन फंडिंग के साथ-साथ बॉर्डर इकोनॉमिक कंसर्न्स भी दिखाई दे रहे हैं। फिर आंदोलन हिंसक क्यों हो गया और कैसे हो गया? शांतिपूर्ण प्रोटेस्ट लोकतंत्र का हिस्सा हो सकता है। लेकिन फ्रांस में कई जगह प्रोटेस्ट ने वायलेंट टर्म ले लिया। 2 अक्टूबर तक करीब 400 हाई स्कूल बंद थे और 1000 से ज़्यादा संस्थानों में किसी ना किसी रूप में प्रोटेस्ट या डिस्ट्रप्शन दर्ज हुआ और फिर आई सबसे चौंकाने वाली तस्वीर सामने कि करीब 2000 गिरफ्तारियां। पुलिस के साथ झड़प, आगजनी, स्कूलों के बाहर बैरिकेड्स और सरकार अब कह रही कि आंदोलन के एक हिस्से पर हिंसक तत्वों का कब्जा हो गया है। लेकिन कहानी सिर्फ इतनी नहीं क्योंकि इन बच्चों के हाथ में सिर्फ पत्थर नहीं इनके हाथ में एक शिकायत भी है कि हमारा भविष्य कहां है। स्कूल के गेट से शुरू हुआ विस्फोट। फ्रांस में मौजूदा आंदोलन की शुरुआत पेरिस रीजन के हाई स्कूलों से हुई। पहले छात्रों ने स्कूल के गेट ब्लॉक किए। 3 अक्टूबर तक इस आंदोलन में करीब 5000 से ज्यादा लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। इनमें बड़ी संख्या 15, 16, 14, 12 साल के बच्चों की बताई गई है। 600 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हो चुके हैं और सरकारी संपत्ति को नुकसान लगातार हो रहा है। करोड़ों यूरो में उसकी कीमत पहुंच चुकी है। पुलिस के साथ-साथ शिक्षकों और आम लोगों पर हमले की घटनाएं भी सामने आई है। यहां का जो स्टॉक एक्सचेंज है उसमें भी भीड़ घुस गई है। उसे भी अपने कब्जे में ले लिया है। 3 अक्टूबर की अह राइटर्स की यह रिपोर्ट बताती है कि 1200 से ज़्यादा स्कूल इस आंदोलन से प्रभावित हो चुके थे। यानी जो विरोध कुछ दिन पहले पेरिस के आसपास के इलाकों से शुरू हुआ था वो अब देशव्यापी आंदोलन का रूप ले चुका है। कई शहरों में आग लगाई गई। पुलिस पर पत्थर फेंके गए, बोतलें फेंकी गई। पुलिस वालों को धक्का दिया गया। पुलिसवालों के साथ मारपीट की गई। एक महिला पुलिस वाली को महिला पुलिसकर्मी को लातों से पीटा गया। एक शिक्षक पर पेट्रोल फेंकने की घटना सामने आई। नातेश में एक स्कूल में आगजनी के बाद इमारत को लंबे समय तक बंद रखना पड़ा। कई जगहों पर पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए आंसू गैस के गोले भी छोड़े। इसे भी पढ़ें: भारत को Veto पॉवर दिलाने के लिए रूस ने UN में किया बड़ा धमाका, हिले अमेरिका, चीन समेत दुनिया के बड़े-बड़े देश 1968 में भी एक बड़े छात्र आंदोलन से रूबरू हुआ फ्रांस अब मामला सिर्फ स्कूलों की हालत सुधारों की मांग तक सीमित नहीं रह गया है। यही वजह है कि फ्रांस की सरकार अब इसे सिर्फ छात्र आंदोलन के तौर पर नहीं देख रही है। ऐसा नहीं है कि फ्रांस में छात्रों का आंदोलन ये कोई पहली बार हुआ है। 1968 में भी एक बहुत बड़ा आंदोलन छात्रों का फ्रांस में हुआ था। उसके बाद भी छात्रों के लगातार आंदोलन प्रदर्शन फ्रांस में होते रहे हैं। लेकिन इतना हिंसक कोई भी प्रदर्शन आज तक नहीं हुआ। फ्रांस के प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लिकार्नू ने संकट की के लिए इसमें बैठक बुलाई और मंत्रियों के जितने भी कार्यक्रम थे वह रद्द कर दिए। सरकार का कहना है कि छात्रों की समस्याओं पर बातचीत हो सकती है। हो सकती है। ऐसा नहीं है कि मतलब तुरंत छात्रों की मांगों को मान लिया जाए। लेकिन हिंसा और आगजनी को किसी भी हालत में स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह होना भी नहीं चाहिए। क्योंकि अगले साल फ्रांस में राष्ट्रपति के चुनाव भी होने वाले हैं और पूर्व राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रो दोबारा चुनाव लड़ सकते हैं। ऐसे समय में युवाओं का गुस्सा राजनीतिक पार्टियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। सरकार ने आरोप लगाया कि कट्टर वामपंथी पार्टी एलएफआई छात्रों के गुस्से को राजनीतिक आंदोलन में बदलने की कोशिश कर रही है। और यहां कल एक आपके सामने ही एक्स फॉरेन एक्सपर्ट से मैं बात कर रहा था। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ फ्रांस के छात्रों ने किया हो ऐसा मुमकिन नहीं है। यहां हो सकता है कि कुछ जो इस्लामिक लोग हैं फ्रांस में लगभग 10% मुस्लिम आबादी फ्रांस में है वो लोग भी इसमें शामिल हैं। अबाया पहनने की वो मांग कर रहे हैं। बांग्लादेश-नेपाल या भारत जैसा पैटर्न? बांग्लादेश और नेपाल में हाल ही के यूथ लेड प्रोटेस्ट ने पॉलिटिकल सिस्टम को बड़ा झटका दिया। भारत में भी एजुकेशन मिनिस्टर को इस्तीफा देना पड़ा। अब फ्रांस में भी जेनजी सड़क पर है। लेकिन दोनों परिस्थितियों को एक जैसा बताना अभी जल्दबाजी होगी। फ्रांस एक एस्टैब्लिश यूरोपियन डेमोक्रेसी है। यहां इंस्टिट्यूशनल स्ट्रक्चर मजबूत है और मौजूदा फ्रेंच प्रोटेस्ट का डॉक्यूमेंटेड इमीडिएटेड ट्रिगर एजुकेशन कंडीशंस है। इसलिए फ्रांस में प्रोटेस्ट जरूर है। जेनजी मोबिलाइजेशन भी है। वायलेंस भी बढ़ी है। लेकिन इसे अभी बांग्लादेश या नेपाल जैसी सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया कहना उपलब्ध एविडेंस नहीं है। फिर एक कॉमन फैक्टर जरूर यहां पर दिखाई देता है। नई पीढ़ी का पॉलिटिकल एस्टैब्लिशमेंट और पब्लिक इंस्टिट्यूशन से बढ़ता फ्रस्ट्रेशन। जेनजी की सबसे बड़ी ताकत सोशल मीडिया है। आज के युवाओं का आंदोलन सिर्फ सड़क पर नहीं चलता। वो स्मार्टफोन पर भी चलता है। एक स्कूल में पुलिस क्लैश, दूसरे शहर में बर्निंग, बैरिकेड और तीसरे शहर में स्टूडेंट्स की स्पीच और कुछ ही घंटों में पूरा देश उसे देख सुन सकता है। यही सोशल मीडिया मोबिलाइजेशन को बेहद तेज बनाता है। एक लोकल ग्रिवेंस कुछ घंटों में नेशनल मूवमेंट बन जाता है। और यही चीज सरकारों के लिए आजकल सबसे बड़ी चुनौती है। क्योंकि ट्रेडिशनल पॉलिटिकल ऑर्गेनाइजेशंस की तरह जजी मोबिलाइजेशन को हमेशा एक सिंगल लीडरशिप स्ट्रक्चर की जरूरत नहीं होती। फ्रांस की कहानी में सबसे बड़ा वार्निंग सिग्नल क्या है? इस पूरे घटनाक्रम को सिर्फ बच्चे हिंसा कर रहे हैं कहकर खत्म कर देना आसान नहीं है। उससे अंडरलाइन प्रॉब्लम खत्म ही होगी। दूसरी तरफ सरकार गलत है इसलिए हिंसा जायज है। कहना भी उतना ही खतरनाक होगा। क्योंकि स्कूल, बिल्डिंग्स जलाने, टीचर्स और पुलिस पर हमला करने, पब्लिक प्रॉपर्टी को नष्ट करने से स्टूडेंट्स की लेजिटमेट डिमांड्स कमजोर पड़ सकती हैं। यानी एक आंदोलन को दो अलग तस्वीरों में देखिए। एक तस्वीर बेहतर एजुकेशन की डिमांड करती है जिंजी। दूसरी तस्वीर आगजनी और पुलिस क्लैशेस की है। सरकार को पहली तस्वीर का जवाब पॉलिसी से देना है और दूसरी तस्वीर का जवाब लॉ इनफोर्समेंट से। तो फ्रांस की सड़कों पर इस वक्त सिर्फ छात्र नहीं है। वहां एक पूरी जनरेशन अपनी स्थिति दर्ज करा रही है। उनका मैसेज साफ है। टीचर चाहिए, बेहतर क्लासरूम चाहिए, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए, फ्यूचर चाहिए। किसी भयंकर साजिश की ओर इशारा तो नहीं दिलचस्प बात यह है कि सरकार ने छात्रों की कुछ मांगों पर कदम उठाने की कोशिश भी की। शिक्षा मंत्री ने बातचीत का रास्ता खोलने की बात कही हो और शिक्षा के क्षेत्र में सरकार के बजट को लेकर भी बदलावों की चर्चा हुई है। यह बवाल इसलिए भी फ्रांस में ज्यादा हुआ क्योंकि इस बार जो बजट पेश हुआ उसमें शिक्षा का जो बजट था वो केवल 1.7% ही बढ़ाया गया था। बाकी जमीन पर तनाव कम नहीं हुआ है। छात्र संगठनों ने आने वाले मंगलवार को एक बड़े प्रदर्शन का आह्वान किया है। इसका मतलब साफ है कि फ्रांस की सरकार के सामने अब सिर्फ स्कूलों को खोलने की चुनौती चुनौती नहीं है। उसे तय करना है कि जायज छात्र मांगों को कैसे सुना जाए। उन्हें कैसे पूरा किया जाए और कैसे फ्रांस को जलने से रोका जाए। हिंसा को कैसे रोका जाए और इस पूरे आंदोलन को चुनावी राजनीतिक हथियार बनने से भी रोकना जरूरी है क्योंकि इतिहास बताता है कि फ्रांस में छात्र आंदोलनों की ताकत को कम करके आंकना भारी पड़ सकता है। 1968 का छात्र आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जिसने फ्रांसीसी राजनीति और समाज को हिला कर रख दिया था। आज 2026 में हालात अलग हैं। लेकिन सवाल फिर वही है। क्या यह सिर्फ बेहतर शिक्षा के लिए छात्रों की आवाज है? या फिर छात्रों के गुस्से के पीछे अब राजनीति और हिंसक तत्व भी पूरी तरीके से घुस चुके हैं। शायद 2 साल पहली बात है वो आपको याद होगा किस तरीके से इस्लामिक कट्टरपंथियों ने फ्रांस को जलाया था। हफ्ते भर तक फ्रांस वहां जलता रहा था और आज भी तस्वीर कुछ वैसी ही है।
भारत में आर्थिक विकास की गति तेज रहने के बावजूद क्यों गिर रहा है शेयर बाजार
हाल ही के समय में भारत के शेयर बाजार में लगातार तेज गिरावट दर्ज हुई है, इससे देश में इस तरह का माहौल बनाने का प्रयास किया जा रहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर भारी संकट आने वाला है और भारतीय नागरिकों पर इसका अत्यधिक कष्टकारी असर पड़ने वाला है। यह आंकलन किसी भी प्रकार से उचित नहीं कहा जा सकता है क्योंकि शेयर बाजार में गिरावट विदेशी संस्थागत निवेशकों के मन में बैठ रहे डर के आधार पर देखी जा रही है, जबकि भारतीय संस्थागत निवेशक तो लगातार अपना निवेश भारतीय शेयर बाजार में बढ़ा रहे हैं एवं म्यूचुअल फंडस द्वारा प्रति माह 30,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि का लगातार निवेश शेयर बाजार हो रहा है। यह सही है कि भारतीय शेयर बाजार का सेन्सेक्स 1 अक्टूबर 2025 के 80,983 बिंदुओं के स्तर से 1 अक्टोबर 2026 को 71,910 बिंदुओं के स्तर पर नीचे आ गया है। इसी प्रकार, निफ्टी इंडेक्स भी 1 अक्टूबर 2025 के 24,836 बंदुओं के स्तर से नीचे गिरकर 1 अक्टूबर 2026 को 22,422 बिंदुओं के स्तर पर आ गया है। पिछले एक वर्ष की अवधि में 10 से 11 प्रतिशत के बीच की गिरावट दर्ज हुई है। जबकि, इस बीच भारत में अर्थ के विभिन्न क्षेत्रों में आर्थिक विकास दर लगातार उच्च स्तर की बनी हुई है। फिर, ऐसे क्या कारण हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था का चमकता चेहरा होने के बावजूद, भारतीय शेयर बाजार लगातार गिरावट दर्ज कर रहा है। दरअसल किसी भी देश का शेयर बाजार, स्टॉक एक्सचेंज पर दर्ज कम्पनियों की आगे आने वाले वर्षों में होने वाली अनुमानित आय के आधार पर, घटता अथवा बढ़ता रहता है। दूसरे, आजकल जब समस्त देश एक तरह से आपस में जुड़ से गए हैं और हम एक वैश्विक गांव में निवास कर रहे हैं तब एक देश में होने वाली घटनाओं का प्रभाव दूसरे देश के शेयर बाजार पर भी पड़ता हुआ दिखाई देता है। जैसे, रूस-यूक्रेन युद्ध, इजराईल-हम्मास युद्ध, अमेरिका-ईरान युद्ध, सऊदी अरब-हूथी युद्ध एवं खाड़ी के देशों का आपसी युद्द, आदि कुछ ऐसे उदाहरण हैं, जिनके चलते भारतीय शेयर बाजार भी सहमा हुआ दिखाई दे रहा है, हालांकि भारत किसी भी प्रकार से, अप्रत्यक्ष अथवा प्रत्यक्ष रूप से, इन युद्धों से नहीं जुड़ा है । तीसरे, विदेशी निवेशक भारी मात्रा में कुछ देशों के शेयर बाजार में अपनी पूंजी का निवेश करते हैं, क्योंकि उन्हें इन देशों में किए गए निवेश से अच्छे रिटर्न की सम्भावना दिखाई देती है। परंतु, जब इन विदेशी निवेशकों द्वारा अपना निवेश शेयर बाजार से निकाला जाता है तब उस देश का शेयर बाजार तेजी से गिरने लगता है। इसे भी पढ़ें: प्रधानमंत्री लगातार कर रहे हैं विदेशी मुद्रा बचाने की अपील उक्त वर्णित युद्धों के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं और यह 100 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गए हैं, एक वर्ष पूर्व यह 65 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर थे, अर्थात इस एक वर्ष के दौरान कच्चे तेल की कीमतों में 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज हुई है। भारत कच्चे तेल की कुल खपत का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात करता है, अतः भारत के उक्त युद्धों से किसी भी प्रकार से नहीं जुड़े होने के बावजूद, भारतीय अर्थव्यवस्था पर कुछ विपरीत प्रभाव पड़ सकता है, ऐसा माहौल बनाए जाने के चलते विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयर बाजार से अपना निवेश भारी मात्रा में निकाल रहे हैं। हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि के बावजूद भारत में मुद्रा स्फीति की दर को नियंत्रण में बनाए रखने के प्रयास अभी तक तो सफल ही रहे हैं। फिर भी, केलेंडर वर्ष 2026 में अभी तक विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से 2.8 लाख करोड़ रुपए की भारी भरकम राशि निकाल ली है। सितम्बर 2024 तक के 24 माह में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में 38,600 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निवेश किया था जबकि सितम्बर 2026 तक के 24 माह में 56,300 करोड़ अमेरिकी डॉलर की निकासी की गई हैं। विदेशी संस्थागत निवेशक इतनी भारी मात्रा में अपना निवेश भारत से निकालकर अमेरिकी बांडस, अमेरिका के शेयर बाजार, वियतनाम एवं दक्षिणी कोरिया के शेयर बाजार एवं चीन के शेयर बाजार में कर रहे हैं। क्योंकि, अमेरिका में ब्याज दरों (यूएस फेड दर) में वृद्धि के चलते, बांडस की यील्ड पिछले लगभग 24-25 वर्षों के उच्चत्तम स्तर 5.60 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गई है। साथ ही, अमेरिकी शेयर बाजार में अभी भी तेजी बनी हुई है क्योंकि वहां की कम्पनियों द्वारा उच्च तकनीकी के नवाचार करने के चलते उनकी उत्पादकता एवं लाभप्रदता में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। इसी प्रकार, वियतनाम एवं दक्षिणी कोरिया में आरटीफिशीयल इंटेलीजेंस के क्षेत्र की कम्पनियों में उच्च स्तर की लाभप्रदता दर्ज होने की सम्भावनाएं दिखाई दे रही है, इसलिए विदेशी निवेशक अमेरिका, वियतनाम एवं दक्षिणी कोरिया जैसे देशों की ओर आकर्षित हो रहे है एवं अपना निवेश इन देशों में बढ़ा रहे हैं। चीन का शेयर बाजार बहुत ही तेजी से नीचे गिरा था जिसके कारण वहां पर कम्पनियों के शेयरों का (Price to Earning - PE Ratio) कीमत/आय रेशो भारतीय कंपनियों के कीमत/आय रेशो की तुलना में अत्यधिक आकर्षक हो गया है। चीन में औसतन यह रेशो 12 प्रतिशत के नीचे है जबकि भारत में यह रेशो औसतन 20 प्रतिशत से अधिक है। अतः विदेशी संस्थागत निवेशकों को भारतीय कम्पनियों के शेयर, चीनी कम्पनियों के शेयर की तुलना में महंगे दिखाई दे रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिकी डॉलर के लगातार मजबूत होने चलते भारतीय रुपया लगातार कमजोर हो रहा है, इस कारण से भी विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयर बाजार से अपना निवेश निकाल रहे है। आज भारतीय रुपए की कीमत 96 रुपए प्रति अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच गई है। साथ ही, डॉलर इंडेक्स जो 1 अक्टोबर 2025 को 97.71 के स्तर पर था वह 1 अक्टोबर 2026 को बढ़कर 101.80 के स्तर पर आ गया है। स्वर्ण की कीमतें भी 3,871 अमेरिकी डॉलर प्रति ओंस से बढ़कर 4,170 अमेरिकी डॉलर प्रति ओंस पर पहुंच गई है। भारत स्वर्ण का भारी मात्रा में (कुल खपत का 90 प्रतिशत से अधिक) आयात करता है, स्वर्ण के आयात का भुगतान अमेरिकी डॉलर में ही करना होता है, अतः भारतीय रुपए पर इससे अतिरिक्त दबाव बनता हुआ दिखाई दे रहा है। उक्त संदर्भों को यदि भारतीय अर्थव्यवस्था से जोड़कर देखा जाय तो स्थिति कुछ अलग ही दिखाई देती है। भारत में सकल घरेलू उत्पाद में वित्तीय वर्ष 2026-27 की प्रथम तिमाही में 7.8 प्रतिशत की आकर्षक वृद्धि दर्ज हुई है, जबकि वैश्विक स्तर पर यह वृद्धि केवल 3 प्रतिशत एवं तेजी से आर्थिक विकास कर रही अर्थव्यवस्थाओं में यह 3.8 प्रतिशत रहने की सम्भावना व्यक्त की गई है। जब भारत में आर्थिक विकास दर तुलनात्मक रूप से अधिक तेज गति से आगे बढ़ेगी तो भारतीय कम्पनियों की आय एवं लाभप्रदता में भी तेज गति से वृद्धि सम्भव होगी। इसी प्रकार, अगस्त 2026 माह में भारत की औद्योगिक विकास दर भी 8 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई है जो कि अगस्त 2025 में 4.7 प्रतिशत के स्तर पर थी। विभिन्न उत्पादों के भारत से निर्यात अगस्त 2026 में 4,380 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार कर गए हैं जो अगस्त 2025 में 3,480 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर थे। 15 सितम्बर 2026 को समाप्त पखवाड़े में समस्त बैंकों के ऋणों में 18.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह वृद्धि दर 10.4 प्रतिशत की रही थी। इसी प्रकार, बैंकों की जमाराशि में वृद्धि दर भी पिछले वर्ष की 9.5 प्रतिशत की तुलना में इस वर्ष 17.3 प्रतिशत की रही है। बैंकों का ऋण:जमा अनुपात लगभग 81 प्रतिशत के पास पहुंच गया है। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत में अर्थ के विभिन्न क्षेत्रों में अतुलनीय वृद्धि दर आंकी जा रही है। बैंकों की सकल गैर निष्पादनकारी आस्तियों में भी कमी दर्ज हुई है और यह जुलाई 2025 के 2.2 प्रतिशत की तुलना में जुलाई 2026 में घटकर 1.68 प्रतिशत के स्तर पर नीचे आ गई है। शुद्ध गैर निष्पादनकारी आस्तियां तो पिछले वर्ष के 0.5 प्रतिशत की तुलना में 0.4 प्रतिशत ही रही है। अर्थात, बैंकों द्वारा प्रदत्त किए जा रहे ऋणों की अदायगी समय पर हो रही है। भारतीय बैंकों का पूंजी पर्याप्तता अनुपात तो आज विकसित देशों की बैंकों से भी अधिक हो गया है, जो जुलाई 2025 के 17.5 प्रतिशत से बढ़कर जुलाई 2026 में 17.8 प्रतिशत के स्तर को पार कर गया है। इससे भारतीय बैंकों की मजबूत स्थिति झलकती है। उद्योगों द्वारा अपनी उत्पादन क्षमता का 75 प्रतिशत से अधिक उपयोग किया जा रहा है, यह ऐसी स्थिति है जब सम्बंधित उद्योग को अपनी उत्पादन क्षमता में वृद्धि करने के बारे में विचार प्रारम्भ करना होता है। उक्त जानकारी की सत्यता की गवाही वस्तु एवं सेवा कर के संग्रहण में हो रही लगातार वृद्धि से भी ध्यान में आती है। सितम्बर 2026 माह में 14.5 प्रतिशत की वृद्धि के साथ वस्तु एवं सेवा कर का संग्रहण 2.04 लाख करोड़ से अधिक की राशि का रहा है और यह लगातार तीसरा महीना है जब यह संग्रहण 2 लाख करोड़ रुपए से अधिक का रहा है। भारत में सितम्बर 2026 माह के दौरान Unified Payments Interface (एकीकृत भुगतान अन्तरापृष्ठ) सिस्टम के अंतर्गत प्रतिदिन औसतन 80 करोड़ से अधिक के व्यवहार दर्ज हो रहे हैं, जो पूरे विश्व में किसी भी देश में सबसे अधिक व्यवहार हैं। अगस्त 2026 माह के दौरान उक्त व्यवहार 79 करोड़ के रहे थे और सितम्बर 2025 में 65 करोड़ से अधिक व्यवहार प्रतिदिन के रहे थे। कुल मिलाकर भारत में अर्थ के विभिन्न क्षेत्रों में दर्ज हो रही विकास दर की कहानी स्पष्ट तौर पर कह रही है कि भारत का भविष्य बहुत सुरक्षित है। और, यह झूठा विमर्श खड़ा किया जाना कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर भारी संकट आने वाला है और भारतीय नागरिकों पर इसका कष्टकारी प्रभाव पड़ने वाला है, पूर्णत: असत्य है। घबराहट में विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा शेयर बाजार से निकाले जा रहे निवेश को आधार बनाकर उक्त झूठे विमर्श को खड़ा करने का प्रयास हो रहा है। - प्रहलाद सबनानी सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक, भारतीय स्टेट बैंक के-8, चेतकपुरी कालोनी, झांसी रोड, लश्कर, ग्वालियर - 474 009
सोना 0.5 प्रतिशत गिरा, चांदी 2.27 लाख रुपए प्रति किलो के पार
मुंबई, सोने और चांदी की कीमतों में सोमवार को मिलाजुला कारोबार देखा गया। शुरुआत सत्र में सोने में 0.48 प्रतिशत की गिरावट और चांदी में 0.53 प्रतिशत की तेजी देखी गई।
'उद्धव ठाकरे और दिमाग का कोई संबंध नहीं', चुनाव आयोग पर सवाल उठाने पर भड़के नितेश राणे
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सेवा संकल्प अभियान: सीएम धामी ने स्वच्छता कार्यक्रम में लिया हिस्सा, गुरुद्वारा श्री नानकमत्ता साहिब में टेका माथा

