तेलंगाना कांग्रेस नेता ने गृह मंत्री शाह पर सूखा राहत सहायता न देने का आरोप लगाया
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UGC Guidelines पर Supreme Court में घिरी Modi सरकार, Committee बनाने के फैसले से क्या बचेगी BJP?
गोल्ड ईटीएफ निवेशकों तीन साल में फोलियो 2.6 गुना बढ़े
मुंबई, सोने की कीमतों में लगातार आई तेजी के बीच निवेशकों का रुझान गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) की ओर तेजी से बढ़ा है। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, गोल्ड ईटीएफ में निवेश और फोलियो की संख्या में पिछले तीन वर्षों के दौरान इतनी तेज वृद्धि हुई है कि इसने लार्ज-कैप इक्विटी फंडों को भी पीछे छोड़ दिया है।
'योगी सरकार के प्रयासों ने दीपोत्सव को दिलाई वैश्विक पहचान', भावविभोर संतों ने जताया आभार
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के घर कब आओगे...मंगल-चांद पर कदम, त्योहारों पर घर पहुंचना किसी इम्तिहान से नहीं कम!
परदेस में पसीना बहाते हर इंसान के लिए साल के 365 दिन एक तरफ... और दीवाली-छठ के वो चार दिन एक तरफ। सीने में धड़कता हुआ बस एक ही सपना होता है, घर लौटना। दिल की ट्रेन पर घर जाने की तड़प हो और मां-बाप के फोन बज रहे हो कि बेटा घर कब आओगे। लेकिन इस मुल्क में एक आम परदेसी के लिए घर लौटने का रास्ता किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होता। रात के 9:15 की ट्रेन थी। गोदी में 8 महीने का मासूम बच्चा और साथ में पत्नी। घर से तो यही सोचकर निकले थे कि एक घंटा पहले नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुँच जाएंगे तो सुकून से बैठेंगे, लेकिन स्टेशन के बाहर का नज़ारा देखते ही जैसे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। स्टेशन के मुख्य गेट से लेकर बाहर सड़क तक फैलीं यात्रियों की अनगिनत, कभी न खत्म होने वाली कतारें। दिवाली और छठ का त्योहार सिर पर हो, तो परदेस में कमाने वाले हर बिहारी के दिल में बस एक ही धुन बजती है। घर पहुँचने की इसी बेताबी के बीच जब स्टेशन के बाहर इंसानों का समंदर देखा, तो दिल डूबने लगा। लगा कि महीनों की तपस्या, तत्काल टिकट की वो जद्दोजहद और माँ के हाथ के ठेकुए का स्वाद सब एक पल में बिखर जाएगा। ट्रेन छूटने का खौफ ऐसा था कि एक हाथ से बच्चे को सीने से कसकर भींचे हुए थे और दूसरे हाथ से बार-बार जेब में रखे बटुए को टटोल रहे थे। नज़रें घड़ी की सुइयों पर टिक कर रह गई थीं, जो बेरहमी से आगे भाग रही थीं। तभी उस आपाधापी और शोर के बीच लाल कुर्ते वाले एक कुली की आवाज़ कानों में पड़ी भईया, कितने बजे की गाड़ी है? 9:15 वाली? भूल जाइए, इस लाइन में खड़े रहे तो ट्रेन छूट जाएगी। 500 रुपये दीजिए, सीधे प्लेटफॉर्म पर उतार देंगे। हमारे पास कोई भारी अटैची या बोरिया-बिस्तर नहीं था जिसे उठाने के लिए कुली की दरकार होती। कंधे पर एक छोटा बैग था और सीने से लगा वो नन्हा सा बच्चा। लेकिन उस वक्त 500 रुपये सामान ढोने के नहीं, बल्कि उस बूढ़ी माँ की उम्मीदों को ज़िंदा रखने की कीमत थी जो दरवाज़े पर आँखें बिछाए बैठी थी। महीनों पहले कंफर्म कराए टिकट और साल भर के इंतज़ार के सामने वो 500 रुपये बहुत छोटे लगे। हमने हामी भर दी। वो कुली हमें भीड़ से काटकर, घुमावदार रास्तों और पिछले गेट से होते हुए सीधे प्लेटफॉर्म पर ले आया। ट्रेन सामने खड़ी देख आँखों में एक अजीब सी नमी तैर गई। इसे भी पढ़ें: Diwali पर पटाखों के धुएं और Screen से आंखों को बचाएं, अपनाएं ये जरूरी Eye Care Tips त्यौहार सबके लिए खुशी नहीं होती और ट्रेन का सफर सबके लिए आरामदायक नहीं होता। रेलवे स्टेशन पर उमड़ती भीड़, ट्रेन में चढ़ने की मारामारी और सीट पाने की कोशिश यात्रियों की मुश्किलें बढ़ा देती हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे ही कई वीडियो तेजी से वायरल हो रहे हैं, जिनमें रेलवे स्टेशन पर दिखाई दे रही भीड़ को देखकर कोई भी हैरान हो जाएगा। हर साल की तरह इस साल भी दिवाली के मौके पर यूपी बिहार की तरफ जाने वाली ट्रेनों जनरल डिब्बे में लोगों के लिए सफर करना मुश्किल साबित हो रहा है। जैसे जैसे दीवाली और छठ नजदीक आ रहा है, स्टेशन और ट्रेनों में भीड़ बढ़ती जा रही है। इंडियन रेलवे ने दिल्ली एनसीआर में आने वाले छह बड़े रेलवे स्टेशन पर प्लेटफॉर्म टिकट की बिक्री पर 14 नवंबर तक रोक लगा दी है,जिससे की भीड़ को कंट्रोल किया जा सके। वैसे तो भारत उन चुनिंदा विकसित देशों में से एक है जिसने चांद पर अपना यान पहुंचाया है। भारत ने चांद और मार्स पर पहुंचने का रास्ता तो खोज लिया है, लेकिन विडंबना देखिए भारत आज भी अपने रहवासियों को त्यौहार और तीज के मौके पर उन्हें घर पर सुरक्षित और आराम से पहुंचाने का रास्ता नहीं खोज पा रहा है। हाईटेक टेक्नोलॉजी के दौर में भारत ने अभी तक ऐसी कोई टेक्नोलॉजी विकसित नहीं की है, जिसके बदौलत देश के आम नागरिकों को एक कंफर्म टिकट मिल जाए या फिर एक डिग्निटी के साथ वो जनरल बागी में भी एक सीट पर बैठकर सफर कर सके। यह सवाल इसलिए उठता है क्योंकि हमारे देश में जब-जब कोई परदेसी दिवाली या छठ पर अपने घर जाने की सोचता है, तो उसे हर कदम पर लाचारी और शोषण का ही सामना करना पड़ता है। और यह कोई नई बात नहीं है। आपमें से भी शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने कभी घर जाने के लिए टिकट देखा हो और लंबी वेटिंग लिस्ट देखकर दिल न बैठा हो, या फिर फ्लाइट और बसों के आसमान छूते किराए देखकर जेब ने जवाब न दे दिया हो। इसे भी पढ़ें: श्रीगंगानगर में Railway Track पर धमाके के बाद 4 ट्रेनें रद्द, NIA और ATS ने संभाली जांच खासकर यूपी और बिहार की तरफ जाने वाले लोग तो बरसों से यही रोना रो रहे हैं कि भाई, ट्रेन में सीट मिलना तो दूर, खड़े होने की जगह नहीं मिलती और फ्लाइट का किराया ऐसा हो जाता है मानो विदेश का टिकट कटा रहे हों। जबकि सच यह है कि दिवाली और छठ की तारीखें पंचांग में साल भर पहले से छपी होती हैं। सबको पता होता है कि किस दिन त्योहार है। ट्रेनों के टिकट भी दो-चार महीने पहले खुल जाते हैं। तो फिर सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हमारे देश के रेलवे सिस्टम को यह अंदाजा नहीं होता कि इन रूटों पर कितने लाख लोग अपने घर लौटेंगे? अगर उन्हें पता होता है, तो फिर हर साल स्पेशल ट्रेनों के कागज़ी ऐलानों के बावजूद ट्रेनों में पैर रखने की जगह क्यों नहीं होती? खड़े होने की जगह की लड़ाई तो ट्रेन आने के बाद शुरू होती है, उससे पहले की असली जंग तो टिकट खिड़की पर लड़ी जाती है। आम इंसान सुबह 10 और 11 बजे तत्काल टिकट के लिए उंगलियां थामकर बैठता है, और दो मिनट के भीतर सारी सीटें गायब हो जाती हैं। दलाल और अवैध सॉफ्टवेयर वाले पूरे कोटे को मिनटों में हड़प जाते हैं। आखिर आम आदमी और इन दलालों के बीच यह जंग कब खत्म होगी? रेलवे का तंत्र इन अवैध सॉफ्टवेयरों और दलालों के सामने लाचार कब तक बना रहेगा? और कब तक एक सीधा-साधा नागरिक अपनी बेबसी पर आंसू बहाता रहेगा? अगर ट्रेन का टिकट न मिले, तो दूसरा रास्ता क्या बचता है? प्राइवेट बसें या फ्लाइट। लेकिन वहां तो खुली लूट मची होती है। सरकार ने आज तक फ्लाइट के डायनामिक फेयर और प्राइवेट बसों की मनमानी वसूली पर कोई लगाम क्यों नहीं लगाई? कोई कैप (अधिकतम सीमा) क्यों तय नहीं की जाती? त्योहार आते ही हर टिकट तीन गुना, चार गुना महंगा क्यों हो जाता है? क्या इस मनमाने मुनाफे और खुले शोषण को रोकने वाला कोई नहीं है? ज़रा उस इंसान के बारे में सोचिए जो बड़े शहरों में 15,000, 20,000 या 25,000 रुपये महीने की नौकरी करता है। क्या उसे साल भर की मेहनत के बाद सिर्फ एक बार अपने बूढ़े मां-बाप और बच्चों से मिलने के लिए अपनी पूरी एक महीने की कमाई सिर्फ आने-जाने के किराए में फूंक देनी चाहिए? देश इतनी तरक्की कर रहा है, डिजिटल इंडिया और हाई-स्पीड नेटवर्क की बातें करते हैं... लेकिन हकीकत यह है कि जब अपने ही देश में एक आम नागरिक को अपने घर जाने के लिए गिड़गिड़ाना पड़े, अपनी जेब कटवानी पड़े और जानवरों की तरह ठुंसकर सफर करना पड़े, तो फिर तरक्की के सारे दावे खोखले लगने लगते हैं। आखिर यह सिलसिला कब थमेगा? इसे भी पढ़ें: गंगानगर में Anupgarh के पास रेल पटरी पर धमाका, सूरतगढ़ रूट की ट्रेनें रद्द महापर्व पर अपनों से मिलने की बेताबी और बेबस पटरियां परदेस में साल भर पसीना बहाने वाले हर बिहारी और पूर्वांचली के लिए दीवाली-छठ सिर्फ त्योहार नहीं, घर लौटने का एक नाज़ुक अहसास है। यही वजह है कि त्योहारों का मौसम शुरू होते ही महानगरों के स्टेशनों पर सैलाब सा उमड़ पड़ता है। चार महीने पहले की बुकिंग हो या तत्काल की माथापच्ची, सीटें मिनटों में खत्म हो जाती हैं, लेकिन घर जाने की ज़िद कम नहीं होती। कन्फर्म सीट न मिलने पर भी लोग इस आस में स्टेशन पहुँच जाते हैं कि किसी तरह ट्रेन के पायदान पर भी जगह मिल जाए तो माँ के पास पहुँच जाएंगे। इसी मजबूरी के चलते आरक्षित बोगियों और जनरल कोचों का फर्क मिट जाता है और पूरी ट्रेन ठसाठस भीड़ का शिकार बन जाती है। तो सवाल यह उठता है कि यह समस्या हर साल ही क्यों पैदा होती है? छठ और दिवाली के मौकों पर स्पेशल ट्रेनों, किराए में रियायतों और तमाम बड़े-बड़े दावों की बातें होती हैं। हर बार यही दिलासा दिया जाता है कि अगली बार सब ठीक कर लेंगे, अगली बार बेहतर इंतज़ाम होंगे। अरे भाई, दिवाली का त्योहार तो घर लौटने का पर्व होना चाहिए, खुशियों और उल्लास का त्योहार होना चाहिए। फिर यह जद्दोजहद और जंग जैसी नौबत क्यों? एक ऐसी जंग, जिसमें जो जीतता है उसकी जेब खाली हो जाती है और जो हार जाता है वह मायूस चेहरा लेकर स्टेशन से लौटता है। यह परेशानी हर एक साल सामने आती है 10 नवंबर के आसपास दिल्ली से पटना का हवाई किराया लगभग 20,000 रुपये तक पहुँच चुका है। भारत में एक अकुशल मजदूर की महीने भर की कमाई करीब 10,000 रुपये होती है। तो क्या वह सिर्फ एक बार घर जाने के लिए अपनी पूरी एक महीने की मजदूरी फूंक दे? और हर कोई तो फ्लाइट का टिकट नहीं खरीद सकता। ऐसे में आम इंसान बसों की तरफ उम्मीद भरी नज़रों से देखता है। लेकिन जिन बसों का किराया 1,000 से 1,500 रुपये होता था, वो सीधे 4,000 से 5,000 रुपये तक पहुँच चुका है और यह किराया सिर्फ एक सवारी का है। अगर परिवार में तीन या चार लोग हों, तो आदमी वहीं बर्बाद हो जाए। इन सब हालात के बीच इंसान रेलवे की ओर रुख करता है। उसे लगता है कि ट्रेन तो सरकारी है, सस्ती है और आसानी से मिल जाएगी; लेकिन ट्रेन के टिकट का कहीं नामोनिशान नहीं मिलता। बुकिंग 60 दिन पहले खुलती है, फिर भी टिकट हाथ नहीं आता। यूपी और बिहार के रूटों पर तो कभी सीट मिलती ही नहीं। इंसान सोचता है कि चलो तत्काल में कोशिश कर लेते हैं, लेकिन वहां भी दाल नहीं गलती। फिर लाचार होकर उसी दलाल के पास जाना पड़ता है जिसके पास वह ऑटोमेटेड बॉट सॉफ्टवेयर होता है। वो चुटकियों में सारी सीटें झपट लेते हैं। इस मुद्दे पर हमने पहले भी चर्चा की है। खुद रेल मंत्री ने माना था कि IRCTC से 3 करोड़ से ज़्यादा फर्जी अकाउंट्स को हटाया गया। लेकिन उसके बाद भी दलालों का धंधा खत्म नहीं हुआ, बस उनके तौर-तरीके और पैंतरे बदल गए। सरकार कहती है कि वे रिकॉर्ड संख्या में स्पेशल ट्रेनें चला रहे हैं। लेकिन अगर इतनी ही स्पेशल ट्रेनें चल रही हैं, तो फिर स्टेशनों पर इंसानों का यह सैलाब क्यों है? हर साल का एक साफ डेटा पैटर्न तो सामने होता ही है कि कितने लाख लोगों ने टिकट बुक करने की कोशिश की और कितने वेटिंग में रह गए। तो क्या उपलब्ध सीटों से ज़्यादा यात्रियों की इस संख्या को ध्यान में रखकर पहले से ठोस योजना नहीं बनाई जा सकती थी? जब आम आदमी को तत्काल से भी राहत नहीं मिलती, तब रेलवे स्पेशल ट्रेनें चलाता है। यह बात भी ठीक है। पिछले साल भी हमने क्या देखा? सूरत, मुंबई, नई दिल्ली और आनंद विहार जैसे स्टेशनों पर बेकाबू भगदड़ मची। लोग पटरियों पर गिर रहे थे, बच्चे भीड़ में दब रहे थे और कई स्टेशनों से तो ऐसी तस्वीरें सामने आईं जिन्होंने इंसानियत को झकझोर कर रख दिया। क्या स्पेशल ट्रेनों का मतलब सिर्फ यह है कि आप एक आखिरी वक्त पर कागज़ पर ट्रेन का नंबर जारी कर दें, जो घंटों लेट चले और जिसमें बैठने की बुनियादी व्यवस्था तक न हो? जब सरकार के पास हर रूट का रियल-टाइम डेटा मौजूद है, जब IRCTC के सर्वर पर यह साफ दिखता है कि किस तारीख को दिल्ली-पटना, मुंबई-दरभंगा या सूरत-गोरखपुर रूट पर मांग 400% बढ़ जाती है, तो फिर यह 'क्राइसिस मैनेजमेंट' हर साल आखिरी हफ्ते में ही क्यों शुरू होता है? क्यों नहीं दो महीने पहले से रेगुलर ट्रेनों के फेरे बढ़ा दिए जाते? क्यों जनरल और स्लीपर कोचों की संख्या घटाकर केवल एसी कोचों को प्राथमिकता दी जा रही है, जबकि त्योहारों पर घर लौटने वाला सबसे बड़ा तबका वही मजदूर और मध्यम वर्ग है जिसकी जेब एसी के टिकट का बोझ नहीं उठा सकती? यह सिर्फ एक टिकट की मारामारी नहीं है, यह एक आम नागरिक की गरिमा का सवाल है। एक इंसान जो साल के 360 दिन परदेस में रहकर इस देश के विकास की रीढ़ बना हुआ है। सड़कें बना रहा है, फैक्ट्रियां चला रहा है, दफ्तरों में खट रहा है। क्या वह साल में सिर्फ एक बार अपने बूढ़े मां-बाप के चरण छूने और बच्चों के साथ दीया जलाने का हक भी खो चुका है?
योजनाओं के लाभ में वोटर ID की भूमिका पर विवाद, राहुल गांधी ने सरकार पर साधा निशाना
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार पहले मतदाता सूची से नाम हटाने और अब लोगों के कल्याणकारी योजनाओं के अधिकार सीमित करने की दिशा में बढ़ रही है। राहुल ने इस आशंका को “गहरी साजिश” बताया।
Chirag Paswan का UP Plan, 403 सीटों पर चुनाव लड़ने की चेतावनी से BJP या SP किसको होगा नुकसान?
दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास के आसपास की बेशकीमती सरकारी जमीनों को वापस लेने की मोदी सरकार की मुहिम अब भारतीय वायु सेना के स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स तक पहुंच गई है। नई दिल्ली के लोक कल्याण मार्ग स्थित एयरफोर्स स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स की 39.5 एकड़ जमीन अब केंद्र सरकार ने अपने कब्जे में ले ली है। खास बात यह है कि इस जमीन को वापस लेने के फैसले का विरोध खुद पूर्व वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने किया था। उन्होंने न केवल रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को पत्र लिखकर इस फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की थी, बल्कि व्यक्तिगत मुलाकात में भी अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी। इसके बावजूद सरकार का फैसला नहीं बदला और आखिरकार वायु सेना को यह जमीन आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय के भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) को सौंपनी पड़ी। देखा जाये तो यह घटनाक्रम कई मायनों में महत्वपूर्ण है। पहला सवाल यही है कि जब देश के वायु सेना प्रमुख रहे अधिकारी ने किसी जमीन के सामरिक और परिचालन महत्व का हवाला देते हुए उसे वायु सेना के पास ही रखने की मांग की, तब भी सरकार ने उनकी आपत्ति को तवज्जो क्यों नहीं दी? दरअसल, एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने 26 अक्टूबर को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को पत्र लिखा था। 29 अक्टूबर को मुलाकात के दौरान भी उन्होंने इस मामले को उठाया था। 31 अक्टूबर को उनका कार्यकाल समाप्त हो गया। एपी सिंह का तर्क था कि रेस कोर्स एयरफोर्स स्टेशन के भीतर स्थित स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स वहां की समग्र व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसे वायु सेना के नियंत्रण में ही रहना चाहिए। उन्होंने 2014 में तत्कालीन शहरी विकास मंत्रालय, रक्षा संपदा विभाग और वायु सेना के संयुक्त सर्वेक्षण का भी हवाला दिया था। वायु सेना की ओर से इस क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था और ड्रोन जैसे हवाई खतरों से निपटने में स्टेशन की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया गया था। इस परिसर में गोल्फ कोर्स, स्विमिंग पूल, बैडमिंटन कोर्ट और दूसरी खेल सुविधाएं थीं। लेकिन इन तमाम दलीलों का कोई असर नहीं हुआ। 28 अक्टूबर को परिसर बंद कर दिया गया और 5 नवंबर को 39.5 एकड़ जमीन औपचारिक रूप से केंद्र सरकार को सौंप दी गई। जमीन का हस्तांतरण 'जैसी है, जहां है' के आधार पर किया गया है। अब संबंधित विभाग संयुक्त सर्वेक्षण के जरिए जमीन का सटीक क्षेत्रफल निर्धारित करेंगे। देखा जाये तो इस पूरे घटनाक्रम को केवल एयरफोर्स के एक स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स की जमीन वापस लेने की कार्रवाई के रूप में देखना गलती होगी। दरअसल, केंद्र सरकार पिछले कुछ समय से प्रधानमंत्री आवास के आसपास की बेशकीमती जमीनों और संपत्तियों को अपने नियंत्रण में लेने की व्यापक मुहिम चला रही है। इससे पहले दिल्ली रेस क्लब की 53 एकड़ जमीन वापस ली जा चुकी है। जयपुर पोलो ग्राउंड भी सरकार के कब्जे में आ चुका है। दिल्ली जिमखाना क्लब की लगभग 27.3 एकड़ जमीन को लेकर भी कार्रवाई की गई है। अब एयरफोर्स स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स की जमीन भी इसी अभियान का हिस्सा बन गई है। यहां राजनीतिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार दिल्ली के उस इलाके में अपनी पकड़ मजबूत कर रही है, जहां दशकों से कई प्रतिष्ठित संस्थाएं और प्रभावशाली लोगों की गतिविधियां केंद्रित रही हैं। अंग्रेजों के दौर से चली आ रही क्लब संस्कृति, विशिष्ट संस्थानों और विशेषाधिकार प्राप्त व्यवस्थाओं पर सरकार की कार्रवाई को सत्ता के केंद्रीकरण और प्रशासनिक नियंत्रण के विस्तार के रूप में भी देखा जा सकता है। हम आपको यह भी बता दें कि इस मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि संबंधित 39.5 एकड़ जमीन को वायु सेना स्टेशन की मूल परिचालन भूमि के बजाय उसके साथ स्थित सरकारी जमीन बताया गया है। इस कार्रवाई के साथ एक तथ्य और उभर कर आया है कि मोदी सरकार ने यह संदेश दिया है कि किसी संस्थान का दशकों पुराना कब्जा सरकारी जमीन पर उसके अधिकार का स्थायी आधार नहीं हो सकता। बहरहाल, यह फैसला बताता है कि सरकार इस जमीन को लेकर अपनी योजना पर किसी तरह का समझौता करने के मूड में नहीं थी। एपी सिंह ने रक्षा मंत्री को पत्र लिखकर वायु सेना की सुरक्षा और भविष्य की जरूरतों का सवाल उठाया था, लेकिन उनकी दलीलें भी फैसले को नहीं बदल सकीं। अब इस जमीन का नियंत्रण आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय के पास होगा। इससे प्रधानमंत्री आवास के आसपास के विशाल भूखंडों पर सरकार की पकड़ और मजबूत होगी। देखा जाये तो असली राजनीतिक महत्व इस बात में है कि सरकार केवल जमीनों का स्वामित्व वापस नहीं ले रही, बल्कि राजधानी के सबसे प्रभावशाली इलाके में दशकों से चली आ रही संस्थागत व्यवस्थाओं और उनके विशेषाधिकारों को भी बदल रही है। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि सरकार इस जमीन का क्या इस्तेमाल करती है और क्या लोक कल्याण मार्ग के आसपास ऐसे दूसरे परिसरों को लेकर भी इसी तरह की कार्रवाई आगे बढ़ेगी। -नीरज कुमार दुबे
धनतेरस : गोल्ड-सिल्वर के दाम 4,500 रुपए तक की गिरावट
नई दिल्ली, धनतेरस के मौके पर सोना-चांदी खरीदने की योजना बना रहे ग्राहकों के लिए राहत भरी खबर है। आज के दिन घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों बाजारों में कीमती धातुओं की कीमतों में गिरावट देखने को मिली है। पिछले कुछ दिनों से सोने-चांदी में तेज उतार-चढ़ाव बना हुआ था, लेकिन हफ्ते के आखिरी कारोबारी दिन शुक्रवार को कीमतों में आई नरमी से खरीदारों को अपेक्षाकृत सस्ते भाव पर खरीदारी का मौका मिला है।
UGC नियमों पर सुप्रीम कोर्ट में मोदी सरकार के डांवाडोल रुख से बढ़ सकती है सवर्णों की चिंता!
यूजीसी के नए नियमों को लेकर शुरू हुआ विवाद अब शिक्षा संस्थानों की चारदीवारी से निकलकर सीधे सियासत के मैदान में पहुंच चुका है। यह मामला अब सिर्फ जातिगत भेदभाव रोकने के प्रावधानों का नहीं, बल्कि सवर्णों की नाराजगी, राजनीतिक दलों के जातीय समीकरण और वोट बैंक की लड़ाई का भी बन गया है। खासकर पांच राज्यों के आगामी विधानसभा चुनावों से पहले इस विवाद ने राजनीतिक दलों की चिंता बढ़ा दी है। इन नियमों के खिलाफ पहले भी सवर्ण समाज ने देशभर में जोरदार विरोध प्रदर्शन किया था और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था, जहां अदालत को इन पर रोक लगानी पड़ी थी। अब एक बार फिर नियमों की समीक्षा और उन्हें लेकर जारी राजनीतिक बहस ने चुनावी माहौल में नए सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यूजीसी विवाद के बहाने सवर्ण समाज की नाराजगी चुनावी मुद्दा बनेगी और इसका असर उन राज्यों के जातीय समीकरणों पर पड़ेगा, जहां बीजेपी की राजनीति काफी हद तक परंपरागत सामाजिक समर्थन पर टिकी रही है? यूजीसी विवाद की नई करवट और केंद्र का ताजा रुख हम आपको बता दें कि सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक हलचल यह है कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि वह यूजीसी के 2026 के इक्विटी रेगुलेशन की समीक्षा के लिए एक समिति बनाने पर विचार कर रही है। यानी सरकार ने न तो नियमों को पूरी तरह वापस लेने का फैसला किया है और न ही उन्हें उसी रूप में लागू करने का। सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार से कहा है कि नियमों पर दोबारा विचार किया जाए, ताकि किसी भी छात्र के साथ भेदभाव न हो और सभी के हित सुरक्षित रहें। हम आपको याद दिला दें कि 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित इन नियमों का मकसद उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकना था। इसके तहत विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में इक्विटी कमेटी और समान अवसर केंद्र बनाने का प्रावधान किया गया। लेकिन नियमों में जातिगत भेदभाव की परिभाषा को लेकर विवाद खड़ा हो गया। खासतौर पर नियम 3(1)(c) में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी के खिलाफ जाति आधारित भेदभाव को जिस तरह परिभाषित किया गया, उसे सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए असमान व्यवस्था बताया गया। सवर्ण संगठनों और सामान्य वर्ग के छात्रों ने आशंका जताई कि इन प्रावधानों का इस्तेमाल उनके खिलाफ शिकायतों और उत्पीड़न के हथियार के रूप में हो सकता है। देखते ही देखते विरोध प्रदर्शन कई राज्यों तक फैल गए थे। उत्तर प्रदेश में इस विरोध ने बीजेपी के भीतर भी बेचैनी पैदा कर दी। पार्टी के कुछ पदाधिकारियों ने इस्तीफे तक दिए। आखिरकार 29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों पर रोक लगा दी और 2012 के पुराने नियमों को जारी रखने का आदेश दिया। अदालत ने प्रावधानों की अस्पष्टता और उनके संभावित दुरुपयोग पर गंभीर सवाल उठाए थे। अब मोदी सरकार की ओर से समीक्षा समिति बनाने की बात सामने आने के बाद इस पूरे विवाद ने फिर राजनीतिक रंग पकड़ लिया है। पांच राज्यों के चुनाव में बीजेपी के सामने जातीय समीकरण की चुनौती इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक असर 2027 के विधानसभा चुनावों में दिखाई दे सकता है। उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में चुनाव होने हैं। इनमें उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड बीजेपी के लिए सत्ता की प्रतिष्ठा से जुड़े हैं, जबकि पंजाब में पार्टी अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में यूजीसी का मुद्दा पांचों राज्यों में अलग-अलग राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सबसे बड़ी परीक्षा होगी। यहां ब्राह्मण, ठाकुर और वैश्य मतदाता लंबे समय से बीजेपी के मजबूत समर्थक आधार का हिस्सा रहे हैं। राम मंदिर आंदोलन से लेकर हिंदुत्व के मुद्दे पर बीजेपी ने ब्राह्मण, ठाकुर और अन्य सवर्ण जातियों के बीच अपना मजबूत जनाधार तैयार किया है। लेकिन यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ सवर्ण समाज में जिस तरह नाराजगी सामने आई है, उससे बीजेपी के इस परंपरागत वोट बैंक में असंतोष बढ़ने और पार्टी के साथ उसके पुराने राजनीतिक रिश्ते कमजोर पड़ने की आशंका पैदा हो गई है। बीजेपी के लिए परेशानी यह है कि एक तरफ सामान्य वर्ग की नाराजगी है तो दूसरी तरफ ओबीसी और दलित मतदाताओं का बड़ा राजनीतिक आधार है। किसी एक पक्ष को नाराज करने का मतलब दूसरे पक्ष के बीच राजनीतिक संदेश जाना है। इस नाराजगी के संकेत उत्तर प्रदेश बीजेपी के संगठन में भी दिखाई दिए हैं। हाल के एमएलसी चुनावों में वाराणसी और लखनऊ जैसी सीटों पर पार्टी को मिली हार को भी सवर्ण असंतोष के संदर्भ में देखा जा रहा है। इसलिए बीजेपी के लिए यह महज एक शैक्षणिक नियम का विवाद नहीं, बल्कि अपने परंपरागत वोट बैंक को बचाने की लड़ाई बन गया है। उत्तराखंड में भी यह मुद्दा कम महत्वपूर्ण नहीं है। यहां सवर्ण मतदाताओं का राजनीतिक प्रभाव है और बीजेपी का परंपरागत समर्थन आधार भी इसी सामाजिक समीकरण से जुड़ा रहा है। यूजीसी विवाद को लेकर नाराजगी अगर चुनावी मुद्दा बनती है तो कांग्रेस को बीजेपी के खिलाफ सवर्ण असंतोष को भुनाने का अवसर मिल सकता है। हालांकि पंजाब में समीकरण कुछ अलग हैं। यहां दलित आबादी का अनुपात देश में सबसे अधिक है। ओबीसी और सामान्य वर्ग के मतदाताओं का भी महत्वपूर्ण प्रभाव है। बीजेपी के लिए चुनौती यह होगी कि वह सवर्ण मतदाताओं की नाराजगी दूर करने के साथ दलित और पिछड़े वर्गों के बीच अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता भी बनाए रखे। क्योंकि यूजीसी विवाद को विपक्ष सामाजिक न्याय और सामान्य वर्ग के अधिकारों के बीच टकराव के रूप में पेश कर सकता है। साथ ही गोवा और मणिपुर में इस मुद्दे का प्रभाव उत्तर प्रदेश जैसा व्यापक न भी हो, लेकिन उच्च शिक्षित युवाओं, विद्यार्थियों और सामान्य वर्ग के संगठित समूहों के बीच इसकी राजनीतिक गूंज दिखाई दे सकती है। सोशल मीडिया और छात्र संगठनों के माध्यम से यह मुद्दा स्थानीय चुनावी बहस का हिस्सा बन सकता है। बीजेपी के लिए दोहरी राजनीतिक मुश्किल सबसे दिलचस्प बात यह है कि बीजेपी के सामने इस विवाद में दोहरी चुनौती है। अगर सरकार नियमों को पूरी तरह वापस लेती है या उनमें बड़ा बदलाव करती है तो सामाजिक न्याय के मुद्दे पर विपक्ष को हमला करने का मौका मिलेगा। वहीं अगर नियमों को पुराने स्वरूप में लागू करने की कोशिश होती है तो सवर्ण समाज की नाराजगी दोबारा भड़क सकती है। साथ ही विपक्ष के लिए यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में बीजेपी को बड़ा राजनीतिक झटका लगा था। संविधान और आरक्षण को लेकर विपक्ष के अभियान ने पिछड़े और दलित मतदाताओं के बीच असर डाला था। अब यूजीसी विवाद के जरिए विपक्ष सवर्ण असंतोष को भी बीजेपी के खिलाफ जोड़ने की कोशिश कर सकता है। देखा जाये तो केंद्र सरकार का सुप्रीम कोर्ट में समीक्षा समिति बनाने का संकेत इसी राजनीतिक दबाव के बीच आया है। यह फैसला फिलहाल विवाद को ठंडा करने की कोशिश जरूर है, लेकिन असली सवाल नियमों के अंतिम स्वरूप का है। बहरहाल, यूजीसी विवाद बीजेपी के लिए ऐसी राजनीतिक पहेली बन गया है जिसमें एक तरफ सवर्ण वोट बैंक है और दूसरी तरफ दलित-पिछड़े वर्गों का समर्थन। पांच राज्यों के चुनाव से पहले सरकार को इसी पहेली का जवाब तलाशना है। अगर यह मुद्दा चुनाव तक गर्म रहा तो उत्तर प्रदेश में इसका असर सबसे ज्यादा दिखाई दे सकता है। यूजीसी के नियम भले ही विश्वविद्यालयों के लिए बनाए गए हों, लेकिन अब उनका भविष्य दिल्ली की सत्ता, राज्यों की राजनीति और बीजेपी के चुनावी गणित से जुड़ चुका है। -नीरज कुमार दुबे
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में छात्र संघ चुनाव के नतीजे घोषित, नोमान अशरफ अध्यक्ष चुने गए, नशरा नईम बनीं पहली महिला उपाध्यक्ष
रक्षा मंत्री राजनाथ और गृह मंत्री शाह सहित कई नेताओं ने दी धनतेरस की शुभकामनाएं
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यूपी की 403 सीटों पर लड़ेंगे चिरागः दलित राजनीति में नई दावेदारी या एनडीए में ज्यादा हिस्से का दबाव?
यूपी विधानसभा चुनाव 2027 में चिराग पासवान की एलजेपी (रामविलास) सभी 403 सीटों पर लड़ने की तैयारी में है। पासी-दलित वोट बैंक, भाजपा से गठबंधन और अखिलेश यादव की पीडीए राजनीति पर क्या होगा असर?
क्या हिंदुत्व सनातन से अलग हो सकता है, दिग्विजय सिंह स्पष्ट करें: वीएचपी प्रवक्ता विनोद बंसल
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पंजाब सरकार के कर्मचारियों ने डीए में बढ़ोतरी को किया खारिज; 13 नवंबर से शुरू होगा आंदोलन
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अग्निपथ योजना के विस्तार का पंजाब भाजपा ने किया स्वागत, पीसीएस परीक्षा में गड़बड़ी पर जांच की मांग
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आंध्र प्रदेश में चक्रवात मुरासु का असर कमजोर, बारिश से मिली राहत
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'संसद में सोते हैं, बाहर बहस की बात करते हैं', राहुल गांधी की चुनौती पर भाजपा का तीखा तंज
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धनतेरसः धन की पूजा नहीं, धन के शुद्ध संस्कारों का पर्व
पंच पर्वों से जुड़े दीपावली महापर्व का दूसरा महत्वपूर्ण पर्व है धनतेरस। धनतेरस के दिन भगवान धनवंतरी और मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है और इस दिन खरीदारी और दान-पुण्य करना भी शुभ माना जाता है। इस दिन को धन त्रयोदशी और धन्वंतरि जयंती के नाम से भी जाना जाता है। धनतेरस केवल दीपावली के आरंभ का पर्व नहीं, बल्कि धन के प्रति हमारी दृष्टि को परखने का अवसर है। यह वह दिन है जब भारतीय संस्कृति धन की पूजा के साथ मनुष्य को यह स्मरण कराती है कि धन साधन है, साध्य नहीं, समृद्धि जीवन का अलंकार है, जीवन का आधार नहीं। दुर्भाग्य यह है कि आधुनिक समय में धन की परिभाषा इतनी संकुचित हो गई है कि धन का अर्थ संवेदना, सदाचार और संतोष से नहीं, बल्कि संग्रह, सुविधा, प्रतिष्ठा और शक्ति से जोड़ा जाने लगा है। आज दुनिया में आर्थिक समृद्धि बढ़ी है, लेकिन क्या उसी अनुपात में मनुष्य समृद्ध हुआ है? चंद हाथों में सिमटती संपदा और बढ़ती आर्थिक विषमता ने समाज में एक विचित्र असुरक्षा पैदा की है। भौतिक सुविधाएं बढ़ी हैं, पर विश्वास घटा है। साधन बढ़े हैं, लेकिन साधना कमजोर हुई है। घर बड़े हुए, मगर हृदय छोटे होते गए। परिणामतः हिंसा, छल, भ्रष्टाचार, चोरी, शोषण, दुराचार और असीम संग्रह जैसी प्रवृत्तियां केवल समाज में नहीं, हमारे भीतर भी जगह बनाने लगी हैं। चेहरों की पहचान बची है, लेकिन चरित्र की पहचान धुंधली पड़ रही है। धनतेरस का वास्तविक संदेश इसी विसंगति को दूर करने में छिपा है। धन का विरोध भारतीय चिंतन कभी नहीं करता, वह धन के अंधे संग्रह और उसके अनुचित उपयोग का विरोध करता है। सनातन दृष्टि में लक्ष्मी तभी मंगलकारी है, जब वह धर्म और लोकमंगल से जुड़ी हो। भगवान महावीर का अपरिग्रह हमें बताते हैं कि आवश्यकता से अधिक संग्रह अंततः मनुष्य को वस्तुओं का स्वामी नहीं, वस्तुओं का दास बना देता है। जैन दर्शन का संयम और अल्पीकरण केवल साधु जीवन की साधना नहीं, बल्कि गृहस्थ जीवन के लिए भी एक महत्वपूर्ण जीवन-दृष्टि है। महात्मा गांधी ने धन के इसी प्रश्न को ट्रस्टीशिप के सिद्धांत से जोड़ा। उनके लिए संपत्ति का अधिकार केवल निजी उपभोग का अधिकार नहीं था, बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व भी था। धन हमारे पास हो सकता है, लेकिन उसका अंतिम अर्थ तभी है जब उससे किसी और के जीवन में आशा, सम्मान और अवसर पैदा हों। इसलिए प्रश्न यह नहीं कि हमारे पास कितना धन है, प्रश्न यह है कि हमारे धन का हमारे चरित्र पर कितना अधिकार है और हमारे धन से समाज को कितना अधिकार मिलता है। इसे भी पढ़ें: Dhanteras 2026: आरोग्य, धन और समृद्धि का पावन पर्व है धनतेरस धनतेरस धन की कामना का पर्व है। इस दृष्टि से यह अर्थव्यवस्था का पर्व है। अर्थ से अर्थ-व्यवस्था का सम्यक् एवं गुणात्मक संधान। इस दिन घर एवं बाजारों में आशा के दीप सजते हैं, मुद्रा का आदान-प्रदान होता है। मान्यता है कि इस दिन खरीदी गई चीजों में कई गुना वृद्धि हो जाती है। शास्त्रों में बताया गया है कि इस दिन कुछ उपाय करने से घर में धन-धान्य के भंडार भर जाते हैं और मां लक्ष्मी की कृपा सदैव बनी रहती है। तम मिटाती धनतेरस और प्रकाश बांटती लक्ष्मी यानी भारतीय पद्धति के अनुसार प्रत्येक आराधना, उपासना व अर्चना में आधिभौतिक, आध्यात्मिक और आधिदैविक इन तीनों रूपों का समन्वित व्यवहार होता है। इस तरह इस उत्सव में उपरोक्त तीनों प्रकार से लक्ष्मी की उपासना यानी धन एवं सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति के जनक धन्वंतरि देव समुद्र मंथन से प्रकट हुए थे और प्रकट होते समय उनके हाथ में अमृत से भरा कलश था। यही कारण है कि इस दिन बर्तन खरीदे जाते हैं। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, धन संपदा की देवी मां लक्ष्मी धनतेरस के दिन ही समुद्र मंथन के दौरान प्रकट हुईं थीं इसीलिए ऐसा माना जाता है कि इस दिन सोना-चांदी घर लाने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती है, घर में सुख-शांति, समृद्धि एवं खुशहाली आती है और अच्छा भाग्य भी घर लाते हैं। सोना खरीदने से बुरी शक्तियां और नकारात्मक ऊर्जा घर से दूर होती है। कई परिवार इस दिन सोना-चांदी खरीदकर अपनी सैकड़ों साल पुरानी परंपरा का पालन करते हुए इस दिन दिव्यता एवं धन की देवी लक्ष्मी देवी की पूजा करते हैं। लक्ष्मीजी का स्वरूप त्रिगुणात्मक है। उनका वास तन, मन और धन तीनों में है। पांच प्रकार के सुख कहे गये हैं- तन, मन, धन, पत्नी और संतान। देवी भगवती कमला यानी लक्ष्मीजी के आठ रूप कहे गये हैं। आद्य लक्ष्मी या महालक्ष्मी (कन्या), धन लक्ष्मी (धन, वैभव, निवेश, अर्थव्यवस्था), धान्य लक्ष्मी (अन्न), गजलक्ष्मी (पशु व प्राकृतिक धन), सनातना लक्ष्मी (सौभाग्य, स्वास्थ्य, आयु व समृद्धि), वीरा लक्ष्मी (वीरोचित लक्ष्मी अर्थात रक्षा, सुरक्षा), विजया लक्ष्मी (दिगदिगंत विजय), विद्या लक्ष्मी (विद्या, ज्ञान, कला विज्ञान), इन आठों स्वरूपों को मिलाकर महालक्ष्मी का पर्व बना दिवाली। दिवाली अर्थात दीप पर्व। जहां इन आठों स्वरूपों का प्रकाश हो, वहां दिवाली निश्चित रूप से होती है। प्रकाश, पुष्टि, प्रगति की प्रार्थना के साथ। दूसरे अर्थ में समझिए। लक्ष्मीजी का वास एक लघु इकाई में है। एक माटी के दीपक में है। उसके प्रकाश में है। एक फकीर की भी दिवाली है तो एक अमीर की भी। एक कुम्हार की भी दिवाली है, तो एक सर्राफ की भी। यही लक्ष्मी है। मन की लक्ष्मी। सबकी लक्ष्मी। इसका आशय यह है कि तन, मन, धन, परिवार और संतान की पुष्टि एक दीप की तरह प्रकाशवान रहें। धनवर्षा के साथ, अमृतवर्षा के साथ। आज आवश्यकता धन कमाने की नहीं, धन कमाने की शुद्ध पद्धति और उसके शुद्ध उपयोग की है। यदि साध्य समृद्धि है तो साधन भी शुद्ध होने चाहिए। बेईमानी, शोषण, छल और भ्रष्टाचार से अर्जित धन चाहे कितनी भी बड़ी संपत्ति क्यों न बना दे, वह जीवन में शांति और समाज में सम्मान नहीं ला सकता। इसके विपरीत परिश्रम, ईमानदारी और नैतिकता से अर्जित सीमित धन भी जीवन को गरिमा प्रदान करता है। धनतेरस हमें संग्रह के साथ विसर्जन की चेतना देता है। जिस धन का प्रवाह समाज तक नहीं पहुँचता, वह अंततः जड़ हो जाता है। दान, सेवा, शिक्षा, चिकित्सा, जरूरतमंदों की सहायता, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक उत्थान में धन का उपयोग उसकी सार्थकता बढ़ाता है। दीपक की तरह धन भी तभी प्रकाश देता है, जब वह स्वयं जलकर दूसरों के जीवन में उजाला फैलाए। इसलिए धनतेरस पर हमें केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि इस वर्ष हमारी संपत्ति कितनी बढ़ी, बल्कि यह भी पूछना चाहिए कि हमारा संतोष कितना बढ़ा, हमारा चरित्र कितना मजबूत हुआ, हमारी करुणा कितनी गहरी हुई और हमारे धन से कितने जीवनों में उजाला आया। हमारे पास कार न हो, कोठी न हो, ऊँची कुर्सी न हो-कोई बात नहीं, लेकिन हमारे पास ईमान, इंसानियत, आत्मसम्मान, संयम और चरित्र अवश्य होना चाहिए। यही वह संपदा है जिसे न बाजार खरीद सकता है, न समय छीन सकता है। धनतेरस का दीप तभी सच्चे अर्थों में जलेगा, जब हमारे भीतर धन के साथ धर्म, समृद्धि के साथ संवेदना, भोग के साथ संयम और अधिकार के साथ उत्तरदायित्व का प्रकाश भी जले। धन की समृद्धि जीवन को सुविधापूर्ण बना सकती है, लेकिन चरित्र की समृद्धि ही जीवन को महान बनाती है। यही धनतेरस का सनातन संदेश है और यही आधुनिक समाज की सबसे बड़ी आवश्यकता भी। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
साल 1967 भारत का मद्रास राज्य जो वर्तमान में तमिलनाडु के नाम से जाना जाता है। प्रदेश में सूखे के कारण अनाज की भारी कमी थी और कीमतें बहुत अधिक थीं। विधानसभा चुनाव अपने चरम पर थे। तभी इस संकट के बीच डीएमके के संस्थापक सी. एन अन्नादुरई ने एक चुनावी नारा दिया- मूंड्रू पडी लट्चियम, ओरू पडी निचयम। मतलब तीन पडी चावल हमारा लक्ष्य है, लेकिन एक पडी चावल निश्चित रूप से दिया जाएगा। एक रुपये में 3 माप (लगभग 4.5 किलोग्राम) के इस लोक-लुभावन वादे ने जनता को आकर्षित किया और डीएमके ने कांग्रेस को हराकर पहली बार भारी बहुमत से सत्ता हासिल की। ये और बात है कि भले ही अन्नादुरई अपने समय में इसे पूरी तरह लागू नहीं कर पाए, लेकिन उनके इस विचार ने तमिलनाडु की राजनीति में हमेशा के लिए सस्ते अनाज और राशन की नींव रख दी। लगभग छह दशक बाद और आधी दुनिया दूर, चुनावी लोकतंत्र का यह खेल आज भी नहीं बदला है। जब महंगाई और आर्थिक दबाव से जूझते अमेरिकी नागरिकों को रिझाने के लिए डोनाल्ड ट्रंप हर नागरिक के खाते में $5,000 भेजने जैसा लुभावना दांव चलते हैं, तो यह अन्नादुरई के उसी 1967 वाले प्रयोग की आधुनिक और हाई-टेक पुनरावृत्ति जैसा दिखता है। अमेरिका में जब कभी भी चुनाव होते हैं तो उसके रिजल्ट का असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। खासकर की जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हो और मिड टर्म के नतीजे इतने पाथ ब्रेकिंग हो। मतलब जो दशकों में नहीं देखा गया था। जो बाइडेन के जाने के बाद जब ट्रंप की वापसी हो गई तो लगता था कि अमेरिका अब कई दशक तक रेड वेब की ही चपेट में रहेगा। भारत, कनाडा, यूरोप जैसे जो ट्रंप पीड़ित थे, इस बात की भी तैयारी करने लगे थे कि ट्रंप का रिप्लेसमेंट अगर ट्रंप का ही मानस पुत्र या पुत्री निकला तो फिर कहां जाएंगे। लेकिन मिड टर्म में वो फटका पड़ा है कि आने वाले दो साल हिचकोले खाते हुए बीतने वाले हैं। ट्रंप की हरकतों के चलते रिपब्लिकन पार्टी ने सेनेट और हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव दोनों जगह अपना बहुमत खो दिया है। डेमोक्रेट्स के पास अब सीनेट में 54 सीटें और हाउस में 228 सीट है। जिन अब्दुल अल सईद को ट्रंप ने जिहादी कह दिया था। कहा था कि मेटल डिटेक्टर से निकलवाऊंगा, अब जेडी वेंस उन्हीं को शपथ दिलवाएंगे। हाउस को हफीम जेफरीज के रूप में पहला ब्लैक स्पीकर भी मिल गया है। गवर्नरशिप के मामले में भी डेमोक्रेट्स ने रिपब्लिककंस को पछाड़ा है। 28 सूबों में डेमोक्रेट्स के गवर्नर जीते हैं। 2009 के बाद पहली बार डेमोक्रेट्स ने ये रिकॉर्ड तोड़ा है। इसे भी पढ़ें: हारते ही भारत पर टूट पड़े ट्रंप, 9 कंपनियों को हिला डाला कम से कम 47 बार ट्रंप ने बयान दिया था कि अमेरिका को ऐसे वोट डालना चाहिए जैसे मैं ही चुनाव लड़ रहा हूं। उन्हें लगा कि इसका फायदा पार्टी को होगा, लेकिन इसका उल्टा ही हो गया। ट्रंप की पिछली दो साल की गलतियों का खामियाजा रिपब्लिकन पार्टी को भुगतना पड़ा। टेक्सस, साउथ कैरोलिना, ट्रांसिस, आयोवा और ओहायो जैसे कट्टर रिपब्लिकन स्टेट्स में ब्लू वेब आ गई है। नेतन्याहू के साथ मिलकर डोनाल्ड ट्रंप ने सोचा था कि ईरान में हम रिजीम चेंज कर लाएंगे और नोबेल प्राइज मिल जाएगा। पूरी दुनिया का नक्शा ही बदल देंगे। लेकिन रिजीम चेंज डोनाल्ड ट्रंप को मिल तो गया वो भी अपने ही देश में मिल गया। रिजीम चेंज से मतलब ऐसा बिल्कुल नहीं है कि डोनाल्ड ट्रंप अपना ऑफिस छोड़कर जा रहे हैं। लेकिन रिजीम चेंज से मतलब ये कि अमेरिकन टर्मनलॉजी में कहे तो एक लेम डक प्रेसिडेंट बनकर ही रहेंगे। डेमोक्रेट्स की आंधी ने ट्रंप के किले को हरा कर रख दिया है। लेकिन इसके बावजूद ट्रंप का अहंकार वो जस का तस है। वो डेमोक्रेट्स के हर नेहले पर दहला फेंकने की तैयारी कर रहे हैं। इसका दावा कर रहे हैं। कई हफ्तों तक ट्रंप अपने समर्थकों से अपील करते रहे कि वे ऐसे वोट करें जैसे राष्ट्रपति पद के लिए खुद ट्रंप खड़े हो। उन्हें उम्मीद थी कि इससे रिपब्लिकन उम्मीदवारों को फायदा होगा। लेकिन जब नतीजे खराब आए तो उन्होंने इस बात को मानने से ही इंकार कर दिया कि मिड टर्म चुनावों का नतीजा उनके खिलाफ जनमत का किसी तरह का कोई संकेत है। आमतौर पर ट्रंप के समर्थन वाले उम्मीदवारों को चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करते देखा गया है। लेकिन इस बार वो वोटरों को अपने पक्ष में करने में नाकाम रहे। टेक्सस के सेनेट चुनाव में पैक्स्टन को हार का सामना करना पड़ा। जबकि ट्रंप ने उनका समर्थन किया था। नॉर्थ कैरोलना के सेनेट चुनाव में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार रॉय कूपर को हराने के लिए ट्रंप ने माइकल वाटली को चुना था। लेकिन वाइटली यह मुकाबला हार गए। ओहायो में भी ट्रंप ने विवेक रामास्वामी के लिए रास्ता लगभग साफ कर दिया था। इसे भी पढ़ें: US Midterm Elections में Republican Party की हार पर Donald Trump ने झाड़ा पल्ला अमेरिका के कई हिस्सों से आए ऐसे ही चौंकाने वाले नतीजों के लिए ट्रंप ने ईरान युद्ध को भी जिम्मेदार मानने से इंकार किया है। जबकि इसी युद्ध के बाद से ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग में सबसे बड़ी गिरावट आई है। अमेरिकी अखबार है, नाम है वॉल स्ट्रीट जनरल। से बातचीत में डोनल्ड ट्रंप ने कहा कि नतीजे खराब आने की वजहों में युद्ध महज एक छोटा हिस्सा है। उन्होंने बढ़ती कीमतों के लिए जिम्मेदार अपनी टेरिफ नीति को भी मानने से इंकार किया। जब बल्कि नतीजों के बाद भी उन्होंने यही कहा कि उनकी सरकार का एजेंडा पहले की तरह ही आगे बढ़ता रहेगा। तो क्या ऐसे में यह मान लिया जाए कि मिड टर्म चुनाव में हार के बावजूद डॉनल्ड ट्रंप ने अभी कोई सबक नहीं सीखा है। इसे भी पढ़ें: US Midterm Elections में Republican Party की हार पर Donald Trump ने झाड़ा पल्ला भारत के लिए क्या है नतीजे के मायने? भारत के लिए सबसे बड़ा लाभ कम कच्चे तेल की कीमतों के रूप में सामने आ सकता है। इससे आयात बिल घटेगा, रुपये पर दबाव कम होगा और महंगाई को नियंत्रण में रखने में मदद मिलेगी। साथ ही कमजोर डॉलर और नरम ट्रेजरी यील्ड विदेशी निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता बढ़ा सकते है, जिससे भारतीय बाजारों में निवेश प्रवाह को समर्थन मिल सकता है। डेमोक्रेट्स कैसे कर कते है बेअसर? विधायी व्यवस्था के अनुसार, राष्ट्रपति का वीटो पूरी तरह से अंतिम नहीं होता। अगर अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनो हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट दोबारा दो-तिहाई बहुमत से उस विधेयक को पारित कर देते है तो राष्ट्रपति का वीटो बेअसर हो जाता है और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बिना भी विधेयक कानून बन जाता है। इसे भी पढ़ें: Republican सांसद Thomas Massie ने Pete Hegseth से मांगा इस्तीफा, Impeachment की दी चेतावनी पहले 100 घंटे US और दुनिया के लिए क्यो महत्वपूर्ण ? हकीम जेफ्रीज ने हाउस के शुरुआती 100 घंटों में आम लोगों के खर्च का बोझ कम करने के लिए बड़ा कानूनी कदम उठाने का वादा किया है। उनकी प्राथमिकताओं में एक्सपायर हो चुकी अफोर्डेबल केयर एक्ट की हेल्थ इंश्योरेंस सब्सिडी बहाल करना, ट्रंप के कार्यकाल में मेडिकेड में की गई करीब 1 ट्रिलियन डॉलर की कटौती वापस लेना और टैरिफ हटाना शामिल है। डेमोक्रेट्स ईरान में लड़ाई खत्म करने पर भी जोर देंगे, जिससे ईंधन की कीमतें बढ़ी है।दोनों सदनों में बहुमत के साथ वे अपने प्रस्तावों पर वोट करा सकते है हालांकि, बजट को लेकर टकराव से सरकारी शटडाउन का खतरा भी है।
गृह लक्ष्मियों के सशक्तीकरण पर भी ध्यान दें..
दीपावली की आहट सुनाई देने लगी है। घर-दुकान से लेकर कार्यालय आदि की साफ-सफाई का दौर चल रहा है। धन की देवी की बाट ताकती दुनिया को पता है कि भले ही उनकी सवारी उल्लू है, लेकिन उनकी कृपा उसी जगह होती है। जहां स्वच्छता होती है। लेकिन यह स्वच्छता आती कैसे है? बिना उद्यम और परिश्रम के क्या सफाई संभव है। मतलब साफ है कि बिना उद्यम के लक्ष्मी का आना संभव नहीं। हमारी परंपरा में घर-परिवार की महिलाओं-कन्याओं को भी देवी का ही रूप माना जाता है। बिनु घरनी घर भूत का डेरा, हमारे यहां यह माना जाता रहा है। यानी घर में जब घरनी या महिला होती है, तो वह सिर्फ महिला, पत्नी, बेटी, बहन या मां ही नहीं रह जाती, बल्कि घर की लक्ष्मी हो जाती है। घर की लक्ष्मी जब समर्थ होती है तो परिवार खुशहाल होता है। इन्हीं संदर्भो में याद आती है भारत सरकार की लखपति दीदी योजना। मोदी सरकार की कोशिशों से अब देश में तीन करोड़ महिलाएं लखपति दीदी बन चुकी हैं। अब भारत सरकार का लक्ष्य है कि इस संख्या को छह करोड़ तक पहुंचाया जाए। इस योजना की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अब कई दीदियां करोड़पति बन चुकी हैं या फिर उनका स्वयंसहायता समूह करोड़पति हो चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इतिहास में अपनी कई अनूठी पहलों के लिए याद किए जाएंगे। उनमें से ही एक अनूठी पहल है, लखपति दीदी योजना। इस योजना की शुरूआत उन्होंने स्वतंत्रता दिवस के दिन 15 अगस्त 2023 को किया था। इसके तहत अगले साल के केंद्रीय बजट में इसे औपचारिक रूप से देश भर में लागू करने का प्रावधान किया गया। इस योजना का नोडल केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय है। जिसके तहत चल रही दीनदयाल अंत्योदय योजना, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन को इस योजना को लागू करने की जिम्मेदारी दी गई है। इसके तहत ग्रामीण क्षेत्रों में स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को कौशल विकास की ट्रेनिंग देकर आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है, ताकि वे सालाना कम से कम ₹1 लाख की स्थायी आय अर्जित कर सकें। महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने वाली इस योजना के तहत उन्हें एलईडी बल्ब बनाने, प्लंबिंग, ड्रोन चलाने और रिपेयरिंग जैसे तकनीकी काम तो सिखाए ही जा रहे हैं, उन्हें स्थानीय स्तर पर काम करने और दस्तकारी आदि को बढ़ावा देने की भी कोशिश की जा रही है। शुरू में इस योजना के जरिए दो करोड़ महिलाओं को 'लखपति दीदी' बनाने का लक्ष्य रखा गयॉ था, जिसे फरवरी 2024 के अंतरिम बजट में बढ़ाकर तीन करोड़ कर दिया गया और यह लक्ष्य भी हासिल किया जा चुका है। इस योजना के तहत राज्य सरकारों की मदद से बैंकों से स्वयं सहायता समूहों को सस्ते दर पर कर्ज दिलाया जा रहा है। अच्छी बात यह है कि ज्यादातर दीदियां इस कर्ज से ना सिर्फ अपना काम बढ़ा रही हैं, बल्कि बैंकों को कर्ज की किश्तें भी नियमित रूप से चुका रही हैं। हाल ही में विजयवाड़ा में आयोजित दिल्ली के बाहर सरस मेले के दौरान केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस लक्ष्य को छह करोड़ करने का ऐलान किया और कहा कि अगले तीन साल में इस लक्ष्य को हासिल कर लिया जाएगा। इस दस्तकारों और स्वयंसहायता समूहों द्वारा निर्मित सामानों को बाजार उपलब्ध कराने की दृष्टि से केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय 1999 से ही दिल्ली में सरस मेले का आयोजन करता रहा है। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा शुरू किए गए इस बाजार को अब तक दिल्ली में ही लगाया जाता रहा है। लेकिन इस साल पहली बार विजयवाड़ा में 13 से 31 अक्टूबर तक विजयवाड़ा में यह आयोजन किया गया। इस आयोजन में विशेष रूप से सफल लखपति और करोड़पति दीदियों के काम को प्रदर्शित किया गया। इसी आयोजन में झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले लखपति दीदी मीनू रक्षित से मुलाकात हुई। ग्यारह महिला सदस्यों की सहायता से शुरू उनके ग्रुप का टर्न ओवर अब पचास लाख सालाना से ज्यादा हो गया है। इसका असर यह हुआ है कि कभी मजदूरी करके जीने वाला उनका परिवार अब आत्मनिर्भर हो गया है और ना सिर्फ उनके परिवार में खुशहाली आई है, बल्कि उनके समूह में शामिल महिलाओं की भी स्थिति सुधरी है। साबुन बनाने से शुरू हुआ उनका काम अब 35 तरह के घरेलू उत्पाद बना रहा है और देशभर से उनके माल की मांग बढ़ रही है। कुछ ऐसी ही कहानी रही राजस्थान के बीकानेर से इस मेले में शामिल होने आई राजीविका मिशन से जुड़ी ममता की भी कहानी है। बीकानेर अपने नमकीन के लिए मशहूर पहले से ही है। ममता भी अपने घर में अपने खाने-पीने के लिए नमकीन बनाती रहीं। लेकिन लखपति दीदी योजना से जुड़ने के बाद उनके समूह की ग्यारह महिलाओं का जैसे भाग्य ही बदल गया। महज तीन साल में ही इस समूह का सालाना टर्नओवर बारह लाख से ज्यादा हो गया है। इसका असर यह हुआ है कि इस समूह की महिलाएं अपने घर की आर्थिक मदद करने लगी हैं। अपने बच्चों के खर्च के लिए उन्हें किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ रहा। लखीमपुर से आई शमीमा की भी कुछ ऐसी ही कहानी रही। आज उनका समूह चमड़े के जूते-चप्पल बना रहा है। इस काम में उनके पति सहयोग करते हैं और उनके समूह का टर्नओवर साठ लाख को पार कर चुका है। इसे भी पढ़ें: Kerala High Court स्थापना दिवस पर बोले Arjun Ram Meghwal, केरल ने दिखाया महिला नीत विकास का रास्ता भारत में प्रबंधन की पढ़ाई के लिए मशहूर भारतीय प्रबंधन संस्थान यानी आईआईएम, अहमदाबाद ने हाल ही में लखपति दीदी योजना को लेकर एक शोध किया है। संस्थान ने अपने अध्ययन में देश के सत्रह राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के 6531 महिलाओं के काम को शामिल किया है। इस अध्ययन के मुताबिक लखपति दीदियों के परिवारों की आय में 61 फीसद तक का इजाफा देखा गया है। इसकी वजह से परिवारों की मासिक बचत में करीब 61.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। मार्च 2026 में खत्म हुए अध्ययन के अनुसार, करीब 48 प्रतिशत लखपति दीदियों के कारोबार में पिछले एक साल में विस्तार हुआ है। इसका असर यह हुआ है कि अब लखपति दीदियों के काम करने का दायरा भी बढ़ा है। अब वे एक साथ करीब-करीब दो-दो काम कर रही है। इस अध्ययन के मुताबिक एक लखपति दीदी की कामयाबी से दूसरी महिलाओं को भी प्रेरणा मिली और उन्होंने भी समूह बनाकर इस योजना का फायदा उठाया और अपनी आर्थिक स्थिति बेहतर की। घर की लक्ष्मी भले ही महिला को माना जाता रहा हो, लेकिन पारंपरिक परिवारों के अहम फैसलों में महिलाओं की राय की भूमिका कम रही है। लेकिन लखपति दीदियों की राय को पारिवारिक फैसलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आईआईएम के अध्ययन के अनुसार 36 प्रतिशत से ज्यादा लखपति दीदियों का कहना है कि पारिवारिक मामलों में उनकी राय का वजन बढ़ा है, साथ ही करबी 30.5 प्रतिशत दीदियों का मानना है कि उन्हें इस योजना के जरिए आर्थिक स्वायत्तता मिली है। आईआईएम अहमदाबाद की अध्ययन रिपोर्ट बताती है कि इस योजना से ग्रामीण समाज में भी बदलाव दिख रहा है। मराठी की एक कहावत है कि एक शिक्षित महिला के चलते सात पीढ़ियों तक शिक्षा का बदलाव दिखता है। कुछ इसी तर्ज पर कह सकते हैं कि लखपति दीदी योजना के चलते भारतीय समाज बदलाव के नए दौर में कदम रख चुका है। सोचिए अगर देश की छह करोड़ महिलाएं सालाना कम से कम एक लाख रूपए की आय वाली होंगी तो इसका क्या असर होगा। निश्चित तौर पर छह करोड़ परिवार गरीबी रेखा की सीमा को कुछ और फांद जाएंगे। लक्ष्मी पूजन के मौके पर लखपति दीदी योजना को इस रूप में भी देखा जाना चाहिए। उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं..
CEC Gyanesh Kumar पर उठे सवाल, Rahul Gandhi का दबाव, EC क्यों लेने लगा अपने फैसले वापस ?
गोकुल दूध उत्पादकों ने हराया तो बीजेपी ने चेयरमैन चुनाव के नियम बदल दिए, यह वोट चोरी है: राहुल
कोल्हापुर की गोकुल सहकारी डेयरी चुनाव में हार के बाद बीजेपी ने नियम बदलकर 4 सरकारी डायरेक्टर नामित करने का फ़ैसला ले लिया। अब चेयरमैन की नियुक्ति डायरेक्टर ही करेंगे। राहुल गांधी ने बीजेपी पर 'दूध उत्पादकों के वोट चुराने' का आरोप लगाया है।
भारतीय शेयर बाजार : सेंसेक्स 1,600 अंक से ज्यादा उछला, निफ्टी में 1.80 प्रतिशत की तेजी
मुंबई, अमेरिकी मध्यावधि (मिडटर्म) चुनावों के नतीजों और कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट से मिले सकारात्मक संकेतों के बीच भारतीय शेयर बाजार ने गुरुवार को जोरदार शुरुआत की। इस दौरान प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी करीब 2 प्रतिशत की बढ़त के साथ खुले और बाजार में सभी प्रमुख सेक्टरों में खरीदारी देखने को मिली।
भारत में जनसंख्या नियंत्रण कानून की मांग करने वालों के लिए सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी एक बड़ा झटका है। जिस देश में बढ़ती आबादी को सबसे बड़ी चुनौती बताकर दो बच्चों की नीति लागू करने की मांग जोर-शोर से उठाई जा रही थी, उसी देश में अब प्रजनन दर (Total Fertility Rate यानी TFR) इतनी नीचे पहुंच चुकी है कि सुप्रीम कोर्ट को दो बच्चों से अधिक संतान होने पर चुनाव लड़ने से रोकने वाले कानूनों की प्रासंगिकता पर ही सवाल उठाना पड़ा है। हम आपको बता दें कि 4 नवंबर को आए फैसले में अदालत ने साफ कहा है कि दो से अधिक बच्चे होने पर लोगों को दंडित करने वाले कानून अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं। यह टिप्पणी केवल किसी एक राज्य के पंचायत चुनाव या किसी एक महिला की चुनावी पात्रता तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के बदलते जनसांख्यिकीय भविष्य की तरफ एक बड़ा संकेत है। हम आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की अगुवाई में महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव इंगले के मामले की सुनवाई करते हुए 2003 के ऐतिहासिक जावेद बनाम हरियाणा राज्य फैसले पर पुनर्विचार के लिए मामला बड़ी पीठ को भेज दिया था। उस समय अदालत ने दो बच्चों से अधिक संतान होने पर पंचायत चुनाव लड़ने से रोकने वाले हरियाणा के कानून को वैध ठहराया था। लेकिन अब अदालत के सामने तस्वीर बदल चुकी है। वर्ष 2003 में भारत की कुल प्रजनन दर 3.02 थी, जो 2024 में घटकर 1.9 रह गई है। अदालत ने स्पष्ट किया कि 2.1 की प्रजनन दर को प्रतिस्थापन स्तर माना जाता है, यानी वह स्तर जिस पर एक पीढ़ी अपनी संख्या अगली पीढ़ी में बनाए रख सकती है। भारत इस सीमा से नीचे जा चुका है। जनसंख्या का आंकड़ा बड़ा, लेकिन परिवार छोटे हो रहे हैं देखा जाये तो इस पूरे मामले को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। भारत की कुल आबादी अभी भी बढ़ रही है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भारतीय परिवारों में बच्चों की संख्या भी बढ़ रही है। देश की आबादी में वृद्धि का एक बड़ा कारण Demographic Momentum है। यानी पहले के दशकों में पैदा हुई बड़ी आबादी अब युवा और प्रजनन योग्य आयु में है। इसलिए प्रति महिला बच्चों की औसत संख्या घटने के बावजूद कुल जन्म और आबादी में वृद्धि जारी रह सकती है। यही वह तथ्य है जिसे जनसंख्या नियंत्रण कानून की मांग करने वाली बहस अक्सर नजरअंदाज कर देती है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले में 1971 से 2024 के बीच प्रजनन दर में आई गिरावट का भी उल्लेख है। इस अवधि में TFR 5.2 से घटकर 1.9 हो गई। NFHS-5 के आंकड़ों में भी 2019-21 के दौरान यह दर 2.0 दर्ज की गई थी। अदालत ने 2024 के लिए NFHS-6 के आंकड़ों का हवाला देते हुए लगभग 2.0 का उल्लेख किया है। यानी भारत में छोटा परिवार अब केवल सरकारी नारा नहीं, बल्कि सामाजिक वास्तविकता बन चुका है। हालांकि इस राष्ट्रीय औसत के पीछे क्षेत्रीय असमानताएं भी हैं। बिहार में TFR 3.0, उत्तर प्रदेश में 2.4 और मेघालय में 2.9 दर्ज की गई थी, जबकि दिल्ली में 1.6, पश्चिम बंगाल में 1.6 और महाराष्ट्र में 1.7 थी। ये NFHS-5 के राज्यवार आंकड़े हैं। इसका मतलब है कि पूरे देश पर एक समान दो बच्चों का कानूनी प्रतिबंध थोपने का आधार और भी कमजोर पड़ता है। देश के अलग-अलग राज्यों की जनसांख्यिकीय परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। दो बच्चे की नीति से आगे बढ़ चुकी है भारत की तस्वीर देखा जाये तो सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में एक और बेहद महत्वपूर्ण पहलू उठाया है। दो से अधिक बच्चे होने पर चुनाव लड़ने से रोकने का कानून केवल जनसंख्या नियंत्रण का मामला नहीं है, बल्कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व और महिलाओं के अधिकारों से भी जुड़ा है। महाराष्ट्र की मंगला भीमराव इंगले को तीसरी संतान होने के कारण सरपंच पद के लिए अयोग्य ठहराया गया था। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति की सार्वजनिक पद संभालने की योग्यता का उसके बच्चों की संख्या से सीधा संबंध नहीं है। ऐसे प्रतिबंध महिलाओं को प्रजनन संबंधी फैसले और लोकतांत्रिक भागीदारी के बीच चुनाव करने के लिए मजबूर करते हैं। भारत के सामने अब बढ़ती आबादी नहीं, बूढ़ी होती आबादी की चुनौती साथ ही इस फैसले का सबसे गंभीर पहलू देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने जापान और चीन के उदाहरणों का उल्लेख करते हुए बताया कि कम प्रजनन दर के परिणाम कितने गंभीर हो सकते हैं। चीन ने पहले एक बच्चे की नीति अपनाई, लेकिन बाद में दो और फिर तीन बच्चों की अनुमति देनी पड़ी। इसके बावजूद वहां जन्म दर में अपेक्षित उछाल नहीं आया। भारत के लिए यह एक महत्वपूर्ण चेतावनी है। अदालत के मुताबिक देश में 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की हिस्सेदारी 2014 के 8.3 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में 9.7 प्रतिशत हो गई है और 2036 तक इसके करीब 15 प्रतिशत पहुंचने का अनुमान है। इससे कामकाजी आबादी का अनुपात घटने, पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा पर खर्च बढ़ने का खतरा है। यही वह बिंदु है जहां जनसंख्या नियंत्रण कानून की मांग और वास्तविक जनसांख्यिकीय आंकड़ों के बीच टकराव दिखाई देता है। भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी रही है। यही आबादी उद्योग, सेना, कृषि, सेवा क्षेत्र और उपभोग आधारित अर्थव्यवस्था को गति देती है। लेकिन यदि आने वाले दशकों में युवाओं का अनुपात तेजी से घटता है तो भारत के सामने श्रमशक्ति की कमी और बुजुर्गों की बढ़ती निर्भरता जैसी चुनौतियां खड़ी होंगी। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जनसंख्या संबंधी नीति का आधार अब बदलती वास्तविकताओं के अनुरूप होना चाहिए। अदालत ने यहां तक कहा कि पहले जिस अधिक आबादी को विकास में बाधा माना जाता था, आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं और स्वस्थ जनसंख्या वृद्धि की जरूरत पर भी ध्यान देना होगा। बहरहाल, अदालत का यह फैसला भारत की जनसंख्या बहस में एक निर्णायक मोड़ है। देश की आबादी का विशाल होना और देश की प्रजनन दर का कम होना दो अलग-अलग तथ्य हैं। इन्हें एक ही नजरिये से देखना भविष्य की बड़ी गलती साबित हो सकता है। दो बच्चों की अनिवार्यता और तीसरी संतान पर राजनीतिक अधिकार छीनने जैसी व्यवस्थाओं के औचित्य पर अब सुप्रीम कोर्ट ने ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर कानून बनाने की मांग करने वालों के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब देश प्रतिस्थापन प्रजनन दर से नीचे जा चुका है, तब और अधिक प्रतिबंधों की मांग आखिर किस जनसांख्यिकीय वास्तविकता पर आधारित है? -नीरज कुमार दुबे
समाजवादी पार्टी सत्ता में आई तो 24 घंटे में खत्म करेंगे अग्निवीर व्यवस्था : अवधेश प्रसाद
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अमेरिकी चुनाव नतीजों के बाद बाजार में तूफानी तेजी, सेंसेक्स 1,388 अंक उछला
कारोबार के शुरुआती दौर में करीब 2,099 शेयर बढ़त में थे, जबकि 397 शेयरों में गिरावट दर्ज की गई। 107 शेयरों के भाव में कोई बदलाव नहीं हुआ। रुपये में भी मजबूती दिखाई दी और शुरुआती कारोबार में वह डॉलर के मुकाबले 14 पैसे चढ़कर 94.32 पर पहुंच गया।
'प्रदर्शन का अधिकार दूसरे की आजीविका छीनने का लाइसेंस नहीं', कैट ने राहुल से पूछे सवाल, 'धिक्कार दिवस' मनाने का ऐलान
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने छात्रों से उच्च लक्ष्य रखने और नशे से दूर रहने का आग्रह किया
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अमेरिका में अब्दुल एल-सैयद की जीत का जिक्र कर ओवैसी बोले-यूपी में भी 'अब्दुल' बनेगा नेता
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आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने चक्रवात प्रभावित जिलों का किया हवाई सर्वेक्षण
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1984 सिख दंगों की पीड़िता निरप्रीत कौर की मांग, 1 नवंबर को मनाया जाए 'काला दिवस'
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गहलोत का भाजपा पर निशाना, बोले- लोकतांत्रिक इतिहास में पहली बार 'सत्ताधारी विपक्ष' का उदय
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'पहली बार सत्ता पक्ष विपक्ष के खिलाफ सड़कों पर उतरा', भाजपा की पदयात्रा पर बोलीं आराधना मिश्रा
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राजस्थान सरकार का फैसला, एनसीआर के छह जिलों में सिर्फ तीन घंटे फोड़ सकेंगे पटाखे, ग्रीन पटाखों पर क्यूआर कोड अनिवार्य
पश्चिम बंगाल की राजनीतिक लड़ाई में 'बेबी-ममता' की नजदीकियों से वामपंथियों के बीच बेचैनी बढ़ी
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पंजाब की सियासत में 'कमल' की दस्तक और आम आदमी पार्टी का अंतर्विरोध
पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 की तारीखें अभी आधिकारिक तौर पर घोषित नहीं हुई हैं, लेकिन राज्य की राजनीतिक बिसात पर शह और मात का खेल अपने चरम पर पहुंच चुका है। आम आदमी पार्टी द्वारा 31 अक्टूबर 2026 को अपने 40 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी किए जाने के ठीक बाद, पार्टी के भीतर सुलग रही असंतोष की चिंगारी एक बड़े विस्फोट में बदल गई है। अमृतसर नॉर्थ से विधायक और पूर्व आईपीएस अधिकारी कुंवर विजय प्रताप सिंह, समाना से विधायक व पूर्व स्वास्थ्य मंत्री चेतन सिंह जौड़ामाजरा, और सनौर से विधायक हरमीत सिंह पठानमाजरा का एक साथ पाला बदलकर भारतीय जनता पार्टी में शामिल होना केवल तीन विधायकों का इस्तीफा नहीं है, बल्कि यह भगवंत मान सरकार और आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के लिए एक गहरा राजनीतिक और नैतिक झटका है। नई दिल्ली में भाजपा के केंद्रीय कार्यालय में 2 नवंबर 2026 को जिस तरह इन नेताओं को पार्टी की सदस्यता दिलाई गई, उसने इस चर्चा को फिर से हवा दे दी है कि क्या पंजाब में भी भाजपा का बहुचर्चित 'ऑपरेशन लोटस' पूरी ताकत से सक्रिय हो चुका है। इस राजनीतिक उठापटक को समझने के लिए इसके कालक्रम और पृष्ठभूमि को देखना अनिवार्य है। विपक्षी खेमे और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, पंजाब में आम आदमी पार्टी को कमजोर करने या सत्ता परिवर्तन की इस पटकथा की शुरुआत हाल-फिलहाल में नहीं हुई, बल्कि इसकी जड़ें काफी गहरी हैं। मार्च 2024 और उसके बाद के महीनों में जब आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसदों का एक बड़ा धड़ा, जिसमें राघव चड्ढा और डॉ. संदीप पाठक जैसे प्रमुख चेहरे शामिल थे, धीरे-धीरे पार्टी लाइनों से दूर हुआ और बाद में 7 राज्यसभा सांसदों के एक गुट ने तकनीकी रूप से भाजपा के साथ विलय का रास्ता चुना, तभी से पंजाब की सत्ताधारी पार्टी के भीतर दरारें साफ दिखाई देने लगी थीं। उस समय भी मुख्यमंत्री भगवंत मान ने इसे 'गद्दारी' करार दिया था और केंद्रीय एजेंसियों के दबाव में किया गया दलबदल बताया था। इसके बाद जब भगवंत मान सरकार ने जालंधर में अपना शक्ति प्रदर्शन करने के लिए विधायकों की बैठक बुलाई, तो 94 विधायकों में से केवल 65 विधायक ही वहां पहुंचे। यह इस बात का स्पष्ट संकेत था कि पार्टी के लगभग 29 विधायक या तो नेतृत्व से नाराज थे या किसी अन्य राजनीतिक विकल्प की तलाश में थे। अब, नवंबर 2026 की शुरुआत में तीन सिटिंग विधायकों का इस्तीफा देना इसी सिलसिले की अगली और अधिक आक्रामक कड़ी है। इसे भी पढ़ें: Punjab में Congress कार्यकर्ताओं को Mallikarjun Kharge का संदेश, एकजुटता से ही मिलेगी पूरे देश में जीत संसदीय लोकतंत्र में जब भी किसी राज्य में सत्ताधारी दल के विधायक विपक्षी दल में शामिल होते हैं, तो सत्ता पक्ष द्वारा इसे 'ऑपरेशन लोटस' की संज्ञा दी जाती है। आम आदमी पार्टी का आरोप है कि भाजपा धनबल, बाहुबल और केंद्रीय जांच एजेंसियों जैसे प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई के डर का इस्तेमाल कर लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकारों को अस्थिर करने का प्रयास कर रही है। देश के राजनीतिक इतिहास में कर्नाटक, मध्य प्रदेश और गोवा जैसे राज्यों में सरकारों का गिरना या विधायकों का बड़े पैमाने पर दलबदल करना इस रणनीति का हिस्सा माना जाता रहा है। पंजाब के संदर्भ में भी, तीन विधायकों के भाजपा में जाने के बाद आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल और मुख्यमंत्री भगवंत मान ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उनका तर्क है कि पंजाब की जनता ने 2022 में आम आदमी पार्टी को 92 सीटों का प्रचंड बहुमत देकर बदलाव की जो जिम्मेदारी सौंपी थी, भाजपा उसे चोर दरवाजे से हथियाना चाहती है। हालांकि, इस सिक्के का दूसरा पहलू भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पार्टी छोड़ने वाले विधायकों ने जो आरोप लगाए हैं, वे केवल राजनीतिक अवसरवाद की कहानी नहीं कहते, बल्कि वे शासन और प्रशासन की गंभीर विफलताओं की ओर इशारा करते हैं। इस्तीफा देने वाले तीनों नेताओं—कुंवर विजय प्रताप, चेतन सिंह जौड़ामाजरा और हरमीत सिंह पठानमाजरा—ने मीडिया के सामने आकर अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा किया है। कुंवर विजय प्रताप सिंह, जिन्होंने 2015 के कोटकपूरा और बहबल कलां गुरु ग्रंथ साहिब बेअदबी मामले की जांच करने वाली एसआईटी का नेतृत्व किया था, लंबे समय से आम आदमी पार्टी की कार्यप्रणाली से असंतुष्ट चल रहे थे। उनका आरोप है कि जिस बेअदबी मामले को सुलझाने और दोषियों को सजा दिलाने के वादे पर आम आदमी पार्टी सत्ता में आई थी, उस पर मान सरकार ने जानबूझकर ढीली पैरवी की और राजनीति की। इसके अतिरिक्त, उन्होंने पंजाब के 'स्कूल्स ऑफ एमिनेंस' के दावों पर सवाल उठाए और राज्य में फैले माफिया राज की निंदा की। वहीं, पूर्व मंत्री चेतन सिंह जौड़ामाजरा और हरमीत सिंह पठानमाजरा ने सीधे तौर पर पंजाब में बढ़ते नशे (चिट्टा) के कारोबार, कानून-व्यवस्था के ध्वस्त होने, बेलगाम गैंगस्टर संस्कृति और राज्य पर बढ़ते ढाई लाख करोड़ रुपये के कर्ज को अपनी नाराजगी का कारण बताया। इन नेताओं का सबसे गंभीर आरोप यह है कि पंजाब की चुनी हुई सरकार को चंडीगढ़ से नहीं, बल्कि दिल्ली में बैठे कुछ खास लोगों और उनके सलाहकारों (जैसे विभव कुमार) द्वारा चलाया जा रहा है, जिससे स्थानीय विधायकों और मंत्रियों की गरिमा को ठेस पहुंची है। इस मोड़ पर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आने वाले दिनों में आम आदमी पार्टी के कितने और विधायक या नेता भाजपा का दामन थाम सकते हैं? राजनीतिक गलियारों और खुफिया रिपोर्टों में यह चर्चा आम है कि आम आदमी पार्टी के कम से कम 20 से 30 विधायक भाजपा और कांग्रेस के संपर्क में हैं। विशेष रूप से वे विधायक, जिन्हें डर है कि 2027 के चुनावों में उनका टिकट काटा जा सकता है, या जो भगवंत मान की कार्यशैली से लंबे समय से असंतुष्ट हैं, वे बहुत जल्द बड़ा कदम उठा सकते हैं। भाजपा के पंजाब प्रभारी सतीश पूनिया और राज्य इकाई के अध्यक्ष के अनुसार, यह केवल शुरुआत है और आने वाले दिनों में आम आदमी पार्टी के कई और बड़े चेहरे भाजपा में शामिल होंगे क्योंकि 'झाड़ू' का कुनबा पूरी तरह बिखर चुका है। पार्टी के भीतर असंतोष का मुख्य कारण टिकट वितरण की नीति और हाल ही में किए गए संगठनात्मक बदलाव हैं। उदाहरण के लिए, समाना निर्वाचन क्षेत्र में चेतन सिंह जौड़ामाजरा की अनदेखी कर शिरोमणि अकाली दल के पूर्व वरिष्ठ नेता सुरजीत सिंह रखड़ा को हलका इंचार्ज बना दिया गया, जिससे जौड़ामाजरा का टिकट कटना तय माना जा रहा था। इसी प्रकार, कई अन्य क्षेत्रों में भी पुराने वफादारों को दरकिनार कर पैराशूट नेताओं को तरजीह दी जा रही है, जो आने वाले समय में एक बड़ी भगदड़ का कारण बन सकता है। भाजपा के लिए पंजाब हमेशा से एक कठिन राजनीतिक मैदान रहा है, विशेष रूप से तीन कृषि कानूनों के विरोध में हुए किसान आंदोलनों के बाद से ग्रामीण क्षेत्रों में पार्टी को भारी विरोध का सामना करना पड़ा था। लेकिन अब, शिरोमणि अकाली दल के कमजोर होने और आम आदमी पार्टी के भीतर मचे इस घमासान के बीच, भाजपा पंजाब में अपने दम पर एक मजबूत विकल्प के रूप में उभरने की कोशिश कर रही है। आम आदमी पार्टी के कद्दावर हिंदू और सिख चेहरों को अपने पाले में लाकर भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि वह राज्य के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने के लिए तैयार है। पूर्व आईपीएस अधिकारी और सिख चेहरे के रूप में कुंवर विजय प्रताप की साफ-सुथरी छवि का उपयोग भाजपा माझा और मालवा क्षेत्रों में अपनी पैठ बढ़ाने के लिए करेगी। वहीं जौड़ामाजरा और पठानमाजरा जैसे जमीनी नेताओं के आने से पटियाला और उसके आसपास के जिलों में भाजपा का सांगठनिक ढांचा मजबूत होगा। भाजपा का यह रणनीतिक कदम स्पष्ट करता है कि वह पंजाब में केवल एक छोटी हिस्सेदार बनकर नहीं रहना चाहती, बल्कि 2027 में 'डबल इंजन' की सरकार बनाने के लक्ष्य के साथ आगे बढ़ रही है। दरअसल पंजाब की राजनीति इस समय एक बेहद संवेदनशील और अनिश्चित मोड़ पर खड़ी है। आम आदमी पार्टी जिसे अपनी सबसे सुरक्षित राजनीतिक जागीर समझ रही थी, वहां आंतरिक कलह और अंतर्विरोधों के कारण दरारें साफ दिखने लगी हैं। पहली लिस्ट आते ही जो बगावत शुरू हुई है, उसने यह साबित कर दिया है कि सत्ता का अति-केंद्रीकरण और विधायकों की आवाज को दबाना किसी भी राजनीतिक दल के लिए आत्मघाती हो सकता है। यह घटनाक्रम केवल विधायकों के दलबदल का मामला नहीं है, बल्कि यह पंजाब की जनता के उस जनादेश की परीक्षा है जो उसने पारंपरिक पार्टियों को नकार कर एक 'इंकलाब' के नाम पर दिया था। यदि भगवंत मान और अरविंद केजरीवाल समय रहते अपने विधायकों के असंतोष को दूर करने और शासन व्यवस्था में सुधार करने में विफल रहते हैं, तो पंजाब में कमल का खिलना केवल समय की बात रह जाएगी। आगामी महीनों में होने वाले दलबदल और गठबंधन के नए समीकरण ही यह तय करेंगे कि पंजाब की कमान किसके हाथ में होगी, लेकिन फिलहाल के लिए इतना जरूर कहा जा सकता है कि आम आदमी पार्टी का किला भीतर से दरक रहा है और इसकी गूंज दिल्ली से लेकर चंडीगढ़ तक साफ सुनी जा सकती है। - अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार
उमर अब्दुल्ला की सरकार पर खतरा, जम्मू कश्मीर में शांति बनाए रखना जरूरी
देश के कई अन्य राज्यों की तरह अब जम्मू कश्मीर में भी राजनीतिक उठापटक शुरू हो गई है। राज्य की उमर अब्दुल्ला की सरकार गहरे संकट में फंस गई है क्योंकि उनकी अपनी ही पार्टी के सांसद, विधायक और कई अन्य दिग्गज नेता उनके खिलाफ हो गए हैं। बडगाम से तीन बार विधायक रह चुके और 2024 के लोकसभा चुनाव में श्रीनगर से सांसद चुने गए नेशनल कॉन्फ्रेंस के आगा रूहुल्लाह मेहंदी ने सांसदी छोड़ने का ऐलान करते हुए पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। उमर अब्दुल्ला को लेकर उनकी अपनी ही पार्टी में नाराजगी इस हद तक बढ़ चुकी है कि रूहुल्लाह ने मंगलवार को बडगाम में अपने पिता की पुण्यतिथि पर आयोजित की गई जनसभा में ही पार्टी और सांसदी, दोनों छोड़ने का ऐलान कर दिया। इसे भी पढ़ें: श्रीनगर सांसद Aga Ruhullah Mehdi ने लोकसभा और National Conference दोनों छोड़ी अब्दुल्ला परिवार की पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस जम्मू कश्मीर की पार्टी है और खासतौर से इसका प्रभाव कश्मीर घाटी में ही ज्यादा माना जाता है। कश्मीरियों के लिए पूर्ण राज्य का दर्जा वापस हासिल करना एक भावनात्मक मुद्दा है। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला हो या वर्तमान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, दोनों ही राज्य को फिर से पूर्ण राज्य का दर्जा देने के साथ-साथ अनुच्छेद 370 को हटाए जाने का मुद्दा भी जोर-शोर से उठाते रहे हैं। ऐसे में आगा रूहुल्लाह मेहंदी के आरोपों ने पार्टी की बुनियाद को ही हिला दिया है। पार्टी छोड़ने का ऐलान करते समय उन्होंने आरोप लगाया कि उमर अब्दुल्ला बीजेपी के दबाव में 370 पर अपना रुख बदल चुके हैं। वैसे पार्टी में बगावत की शुरुआत विधायकों का एक गुट पहले ही कर चुका है। पार्टी के 25 विधायकों ने रविवार को ही फारूक और उमर अब्दुल्ला को 14 दिनों का अल्टीमेटम देते हुए चेतावनी दी थी कि अगर उनकी मांगें पूरी नहीं हुई तो वे सरकार से समर्थन वापस ले सकते हैं। आपको याद दिला दें कि, 5 अगस्त 2019 को जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद - 370 को हटाने के साथ ही इसे दो हिस्सों में बांट दिया गया था।जम्मू कश्मीर से लद्दाख को अलग कर, दोनों ही इलाके को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया था। इसके लगभग 5 वर्ष बाद सितंबर-अक्टूबर 2024 में केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर में विधानसभा चुनाव करवाए गए। नेशनल कॉन्फ्रेंस ने कांग्रेस के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा। गठबंधन में हुए समझौते के मुताबिक, एनसी के हिस्से में 51 और कांग्रेस के हिस्से में 32 सीटें आईं और 5 सीटों पर दोनों दलों के उम्मीदवारों के बीच दोस्ताना मुकाबला हुआ। विधानसभा चुनाव में एनसी-कांग्रेस और अन्य पार्टियों के गठबंधन को जीत हासिल हुई। उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में एनसी ने 42, बीजेपी ने 29 और कांग्रेस ने 6 सीटों पर जीत हासिल की। लेकिन मुख्यमंत्री की कमान संभालने के साथ ही उमर अब्दुल्ला के सामने कई मुश्किलें भी आने लगी। सबसे पहले झटका तो यही लगा कि कांग्रेस ने सरकार में शामिल होने से इनकार करते हुए बाहर से समर्थन देने का ऐलान कर दिया। इससे पहले नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेताओं को पूर्ण राज्य और अनुच्छेद 370 के जमाने की सरकार चलाने की आदत थी लेकिन इस सरकार में उन्हें कदम-कदम पर उपराज्यपाल मनोज सिन्हा का सामना करना पड़ रहा था और दिल्ली की तरह जम्मू कश्मीर की पुलिस भी उनके अधीन नहीं थी। रही-सही कसर पार्टी नेताओं में उभरे असंतोष ने पूरी कर दी। नाराज़ विधायकों का अपने ही मुख्यमंत्री के खिलाफ 4 सदस्यों का प्रतिनिधिमंडल बनाकर मांगों की लंबी-चौड़ी फेहरिस्त रख देना अपने आप में एक बड़ा इशारा करता है कि हालात हाथ से निकल चुके हैं। नाराज विधायक उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी, सलाहकार पद से नासिर सोगामी के साथ ही ऐसे मंत्रियों को भी हटाने की मांग कर रहे हैं जो 2 साल से उमर अब्दुल्ला की सरकार में मंत्री है। वैसे तो इसे एक केन्द्र शासित प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी के अंदर मचे घमासान की ख़बर कहकर टाला जा सकता है। लेकिन हमें यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि भारत के सिर के इस ताज जम्मू कश्मीर पर नापाक पाक की बुरी नज़र हमेशा लगी रहती है। पाकिस्तान में लगातार खराब होते राजनीतिक हालात, बिगड़ती अर्थव्यवस्था, बेलगाम होती जा रही महंगाई और पाकिस्तान अधिकृत जम्मू कश्मीर के हिस्से में लगातार हो रहे विरोध प्रदर्शन के बीच पाकिस्तान लंबे समय से राज्य के हालात को खराब करने का मंसूबा बना रहा है। ऐसे हालात में जम्मू कश्मीर में राजनीतिक स्थिरता बहुत जरूरी है और इसके लिए मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को तुरंत कुछ बड़े कदम उठाने होंगे। पाकिस्तान इस हालात का फायदा उठाकर कोई बड़ी हरकत करने में कामयाब ना हो जाए, इससे बचने के लिए उपराज्यपाल मनोज सिन्हा को भी फौरन सेना, सुरक्षा बलों, पुलिस और इंटेलिजेंस के साथ मिलकर बड़ी रणनीति तैयार करनी पड़ेगी। यह समय बहुत महत्वपूर्ण है और इसलिए राज्य में राजनीतिक स्थिरता और शांति कायम रखने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अब्दुल्ला सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे कांग्रेस के सर्वेसर्वा राहुल गांधी को भी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। - संतोष कुमार पाठक लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं
राहुल गांधी भारतीय लोकतंत्र को कमजोर करने के लिए सोरोस से फंड ले रहे हैं : बोम्मई
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'हम उनसे गुहार लगा रहे हैं कि लोकतंत्र को बचाइए', संजय राउत ने भाजपा पर साधा निशाना
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'दिमागी नक्सल' वाला फ्लॉप बयान दोहरा रहे पीएम मोदी, वोट चोरी पर उनके पास कोई जवाब नहीं: खरगे
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विपक्षी नेताओं ने कहा- राहुल गांधी की चुनौती को स्वीकार करते हुए प्रधानमंत्री को जवाब देना चाहिए
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'ईवीएम और बैलेट की चिंता छोड़ें, आत्मचिंतन शुरू करें', भोपाल में आयोजित पदयात्रा में जेपी नड्डा का विपक्ष पर निशाना
अमेरिका में ट्रंप की सबसे बड़ी हार। वो ट्रंप जो कि मोदी को हराने की उनके राजनीतिक करियर को खत्म करने की बात करते थे। कमला हैरिस ने तंज कसा। भारतीय मूल के नेताओं ने जमकर अमेरिकी चुनाव में धमाल मचाया है। सोचिए जिस नेता ने पूरी दुनिया को अपनी ताकत का एहसास कराने की बार-बार कोशिश की हो या धमकाया हो। जिस नेता ने चुनावी रैलियों में दावा किया कि अमेरिका की जनता उसके साथ खड़ी है। आज उसी नेता को अपनी ही पार्टी की चुनावी हार पर सफाई देनी पड़ रही है। अमेरिका से मिड टर्म चुनाव के जो शुरुआती नतीजे सामने आने लगे उन्होंने वाइट हाउस से लेकर अमेरिकी संसद तक हलचल मचा दी। ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी पिछड़ती दिखाई दे रही है और डेमोक्रेटिक पार्टी दोनों सदनों में बढ़त बनाती नजर आ रही या यह कह सकते हैं कि ट्रंप की हार हो चुकी है। लेकिन इस पूरी कहानी में सबसे दिलचस्प बात ट्रंप का वो बयान है जिसमें उन्होंने खुद कहा कि अगर मैं खुद चुनाव लड़ रहा होता तो हम भारी बहुमत से जीतते। यानी वह कह रहे हैं कि मैं खुद चुनाव नहीं लड़ रहा था। अब सवाल है कि अगर ट्रंप इतने ही लोकप्रिय हैं तो उनकी पार्टी के उम्मीदवार पीछे क्यों रह गए? क्या अमेरिकी जनता ने ट्रंप की नीतियों को नकारना शुरू कर दिया है? क्या महंगाई और अर्थव्यवस्था के मुद्दे ने राष्ट्रपति की मुश्किलें बढ़ा दी हैं? और क्या अब डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल पर महाभियोग का खतरा मडराने वाला है? अमेरिका के चुनावी नतीजों के पीछे की पूरी राजनैतिक कहानी क्या है और आने वाले दिनों में ट्रंप के सामने कौन-कौन सी बड़ी चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। आज का एमआरआई इसी पर करेंगे। इसे भी पढ़ें: ज्ञानेश कुमार साथ होते तो...ट्रंप की पार्टी को मिडटर्म इलेक्शन में मिली शिकस्त पर CJP ने लिए मजे चुनावी हार पर ट्रंप की सफाई ट्रंप की पार्टी को झटका लेकिन राष्ट्रपति की सफाई पहले से आ गई। अमेरिका में मंगलवार को मिड टर्म चुनाव संपन्न हुए। इन चुनाव में प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों और सीनेट की 35 सीटों पर मतदान हुआ। इसके अलावा 36 राज्यों में गवर्नर पद के लिए भी चुनाव कराए गए।सीनेट में भी डेमोक्रेट्स की स्थिति बहुत मजबूत दिखाई दी। यानी जिस अमेरिकी संसद में ट्रंप अपनी पार्टी के समर्थन के सहारे बड़े फैसले लेने की उम्मीद कर रहे थे, वहां अब विपक्ष की ताकत बढ़ती हुई नजर आई। और इसी बीच ट्रंप ने ऐसा बयान दिया जिसने इस चुनाव को और ज्यादा दिलचस्प बना दिया। ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म ट्रुथ सोशल पर लिखा कि वह खुद चुनाव में उम्मीदवार नहीं थे। अगर वह उम्मीदवार होते तो उनकी पार्टी बहुत बड़े अंतर से जीतती। अब जरा इस बयान के राजनीतिक मायने समझिए। चुनाव प्रचार के दौरान ट्रंप लगातार रिपब्लिकन उम्मीदवारों के लिए वोट मांग रहे थे। वह लोगों से कह रहे थे कि उम्मीदवारों को वोट देते समय उन्हें यानी ट्रंप को ध्यान में रखें। लेकिन जैसे ही नतीजों में पार्टी पिछड़ती दिखाई दी ट्रंप ने सफाई देना शुरू कर दिया कि वह खुद बैलेट पर मौजूद नहीं थे। दूसरी तरफ न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि वह चुनावी नतीजों को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं और डेमोक्रेट्स के साथ मिलकर काम करने की उम्मीद रखते हैं। यानी एक तरफ चुनावी हार की जिम्मेदारी से दूरी बनाने वाला बयान और दूसरी तरफ विपक्ष के साथ काम करने की बात। पांच बड़े राजनैतिक संकट महाभियोग की तलवार ट्रंप के सामने पहला और सबसे बड़ा राजनीतिक खतरा महाभियोग यानी इंपीचमेंट हो सकता है। अमेरिका के या अमेरिका में राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने की शक्ति प्रतिनिधि सभा के पास होती है। अगर डेमोक्रेटिक पार्टी प्रतिनिधि सभा में बहुमत हासिल कर लेती है तो उसके पास ट्रंप प्रशासन के फैसलों को और उसकी नीतियों की जांच करने को महाभियोग की प्रक्रिया आगे बढ़ाने को एक अवसर मिल सकता है। और यहां एक दिलचस्प बात है डॉनल्ड ट्रंप अपने पहले राष्ट्रपति कार्यकाल में भी दो बार महाभियोग का सामना कर चुके हैं। ऐसे में अगर दूसरे कार्यकाल में भी महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होती है तो यह उनके राजनैतिक भविष्य के लिए एक बड़ा झटका हो सकता है। हालांकि महाभियोग प्रस्ताव पास होने का मतलब राष्ट्रपति को तुरंत पद से हटाना नहीं होता। राष्ट्रपति को पद से हटाने के लिए सेनेट में दो तिहाई बहुमत की जरूरत होती है। लेकिन महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होना भी किसी राष्ट्रपति के लिए छोटी बात नहीं है। इसका मतलब होगा कि ट्रंप को अपने प्रशासन का बचाव करना पड़ेगा। विपक्ष के सवालों का जवाब देना पड़ेगा और राजनीतिक ऊर्जा का बड़ा हिस्सा इसी लड़ाई में खर्च करना पड़ सकता है। यानी जिस राष्ट्रपति का एजेंडा देश की नीतियों को बदलने का हो उसे अपने कार्यकाल की राजनीतिक बचाव में बिताना पड़ सकता है। इसे भी पढ़ें: VETO...अब ट्रंप क्या नया करने वाले हैं? मिडटर्म नतीजों के बाद अपने पोस्ट में बढ़ाई हलचल ट्रंप के कानून और वादे अटक सकते हैं अब बात करते हैं उस दूसरे खतरे की। मान लीजिए कि ट्रंप कोई बड़ा कानून बनाना चाहते हैं। टैक्स में कटौती करना है, आवरजन नियमों को सख्त करना है या अर्थव्यवस्था में कोई बड़ा बदलाव लाना है। लेकिन अगर संसद के एक या दोनों सदनों में डेमोक्रेटिक पार्टी का नियंत्रण हो गया तो क्या होगा? ऐसी स्थिति में ट्रंप के लिए अपने एजेंडे को लागू करना काफी मुश्किल होगा। अमेरिका की राजनीतिक व्यवस्था चेक एंड बैलेंस के सिद्धांत पर काम करती है। इसका मतलब है कि राष्ट्रपति के पास असीमित अधिकार नहीं होते। संसद की मंजूरी भी कई बड़े फैसलों के लिए जरूरी होती है। अगर विपक्षी पार्टी संसद में मजबूत हो जाती है तो वह ट्रंप के प्रस्तावित कानूनों को रोक सकती है। उनमें बदलाव की मांग कर सकती है या उन्हें मंजूरी देने में देरी कर सकती है। इसी स्थिति को राजनीतिक भाषा में ग्रिड ललॉक कहा जाता है। यानी सरकार और संसद के बीच ऐसा गतिरोध जिसमें बड़े फैसले आगे नहीं बढ़ पाते और इसका सीधा असर ट्रंप के राजनैतिक एजेंडे पर पड़ सकता है। नियुक्तियों में आ सकती हैं रुकावटें सीनेट वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों, राजदूतों और संघीय न्यायाधीशों (जिनमें सुप्रीम कोर्ट के लिए नामित लोग भी शामिल हैं) की नियुक्ति की पुष्टि करती है। डेमोक्रेट्स के नियंत्रण वाली सीनेट ट्रम्प द्वारा नामित लोगों की पुष्टि में देरी कर सकती है या उन्हें खारिज कर सकती है। इससे ट्रम्प के लिए अहम पदों को भरना और न्यायपालिका को अपनी पसंद के अनुसार ढालना मुश्किल हो जाएगा। ट्रम्प द्वारा पहले सुप्रीम कोर्ट के लिए नामित लोगों को रिपब्लिकन पार्टी (GOP) के नियंत्रण वाली सीनेट ने मंजूरी दी थी। असल में हाल के सभी सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों की पुष्टि उस सीनेट ने की है, जिस पर उसी पार्टी का नियंत्रण था जिससे राष्ट्रपति जुड़े थे। पिछली बार जब विपक्षी दल के नियंत्रण वाली सीनेट ने किसी उम्मीदवार को मंजूरी दी थी, तो वह 1991 की बात है। इसे भी पढ़ें: डेमोक्रेट्स की 5 ऐतिहासिक जीत: ट्रंप के 'MAGA' गढ़ में महा-उलटफेर, हिली अमेरिकी सियासत! बजट की लड़ाई अमेरिका में सरकारी खर्च पर कांग्रेस का नियंत्रण होता है। डेमोक्रेट्स, ट्रंप की प्राथमिकताओं के लिए फंडिंग को मंजूरी देने से इनकार कर सकते हैं। इससे बजट को लेकर लंबी बातचीत शुरू हो सकती है और नौबत सरकारी कामकाज ठप होने (गवर्नमेंट शटडाउन) तक भी आ सकती है। ऐसी स्थिति में जिस पार्टी के पास व्हाइट हाउस का नियंत्रण नहीं होता, वह अक्सर अपनी इस ताकत का इस्तेमाल करती है, जिसमें 'डेट-सीलिंग' (कर्ज की सीमा) बढ़ाने जैसी बातें शामिल हैं ताकि वह बहुमत वाली पार्टी से अपनी शर्तें मनवा सके। ट्रंप के पास अब भी कौन सी शक्तियां बची रहेंगी? संसद (कांग्रेस) के समर्थन के बिना भी अमेरिकी राष्ट्रपति के पास व्यापक शक्तियां मौजूद रहेंगी। वे कांग्रेस की विधायी मंजूरी के बिना भी कई बड़े नीतिगत फैसले कार्यकारी आदेशों (एग्जीक्यूटिव ऑर्डर्स) के जरिए ले सकते हैं। ट्रंप ने इन शक्तियों का इस्तेमाल ईरान पर सैन्य हमलों के आदेश देने, टैरिफ (आयात शुल्क) लगाने, बड़ी संख्या में संघीय कर्मचारियों को बर्खास्त करने और अमेरिका को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) व 2015 के पेरिस जलवायु समझौते से बाहर निकालने के लिए किया है। लिहाजा, कांग्रेस पर नियंत्रण खोने से ट्रंप की ये कार्यकारी शक्तियां खत्म नहीं होंगी। हालांकि, कांग्रेस पर डेमोक्रेट्स का नियंत्रण होने से ट्रंप के लिए अपनी शर्तों पर सरकार चलाना निश्चित रूप से पहले से कहीं अधिक कठिन हो जाएगा। ट्रंप के कार्यकाल के आधे पड़ाव पर अमेरिकी जनता ने अपना जनादेश दे दिया है। क्या ट्रंप इस संदेश को सुनेंगे?
मिशिगन से जीते अब्दुल-अल-सैयद, बोले 'सीनेट के लिए चुना जाना सम्मान और सौभाग्य की बात'
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पंजाब में बिगड़ी कानून व्यवस्था, 'आप' सरकार की नाकामी छिपा रहे मुख्यमंत्री: विजय इंदर सिंगला
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2027 में अखिलेश यादव को फिर मुख्यमंत्री बनाना चाहते हैं सपा कार्यकर्ता : आशुतोष वर्मा
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'मस्जिद से एलर्जी है', कदीमी मस्जिद मामले को लेकर असदुद्दीन ओवैसी ने साधा केंद्र सरकार पर निशाना
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ट्रंप 'राजनीतिक पंडित' बन हार-जीत पर देंगे राय, 'वीटो कैप' की पोस्ट
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प्रधानमंत्री मोदी के मार्गदर्शन में डबल इंजन सरकार ने अयोध्या की सांस्कृतिक पहचान को दिया नया गौरव: सीएम योगी
यूपी चुनाव 2027 : चित्रकूट की दो सीटों की अलग-अलग सियासत, एक पर सपा तो दूसरे पर अपना दल का कब्जा
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सीआरपीएफ ने रचा नया रिकॉर्ड, एकa वर्ष में शून्य ऑपरेशनल मौत पर पीएम मोदी ने जताई खुशी
केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) ने एक वर्ष तक किसी भी ऑपरेशनल मौत का मामला दर्ज नहीं होने का नया रिकॉर्ड दर्ज किया है। यह रिकॉर्ड 47 वर्षों बाद दोहराया गया है। प्रधानमंत्री ने सीआरपीएफ के इस रिकॉर्ड पर खुशी जाहिर की है।
राहुल गांधी की खुली चुनौती, PM मोदी से बोले- अब सामने आइए
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष तथा लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फिर खुली बहस की चुनौती देते हुए कहा कि 'अब 24 घंटे हो गए मोदी जी, मैंने आपको चैलेंज दिया है
राजस्थान पंचायत चुनाव: सीएम भजनलाल शर्मा के पिता ने पैतृक गांव में डाला वोट, नगला सिंघाड़ा ने किया मतदान का बहिष्कार
विपक्षी हुंकार शक्ति-प्रदर्शन नहीं, जनकल्याण का कारण बने
लोकतंत्र केवल सत्ता परिवर्तन की व्यवस्था नहीं, बल्कि जनआकांक्षाओं, नागरिक अधिकारों, जवाबदेही और सार्थक राजनीतिक संवाद की जीवंत प्रणाली है। इसकी मजबूती केवल सत्तारूढ़ दल की कार्यक्षमता से नहीं, बल्कि विपक्ष की जिम्मेदारी, उसकी वैचारिक परिपक्वता और जनहित के प्रति उसकी प्रतिबद्धता से भी निर्धारित होती है। लेकिन जब विपक्ष की राजनीति का केंद्र जनता के बुनियादी सवालों के बजाय सत्ता का विरोध, नेतृत्व पर व्यक्तिगत हमले और आरोपों की पुनरावृत्ति बन जाए, तब लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती को लेकर प्रश्न खड़े होना स्वाभाविक है। दिल्ली के रामलीला मैदान में कांग्रेस के नेतृत्व में लगभग बीस विपक्षी दलों का जुटना और वोट चोरी के मुद्दे पर हुंकार भरना इसी संदर्भ में राजनीतिक समीक्षा की अपेक्षा करता है। सवाल यह नहीं कि विपक्ष को रैली करने का अधिकार है या नहीं, बल्कि यह है कि ऐसी रैलियों से लोकतंत्र और आम जनता को आखिर क्या हासिल हो रहा है? रामलीला मैदान ऐतिहासिक रूप से जनआंदोलनों, राजनीतिक चेतना और लोकतांत्रिक प्रतिरोध का साक्षी रहा है। यहां उमड़ने वाली भीड़ को केवल राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि उससे जुड़े संदेश और उद्देश्य का मूल्यांकन भी आवश्यक है। कांग्रेस ने सहयोगी दलों को एक मंच पर लाकर अपनी राजनीतिक एकजुटता प्रदर्शित करने का प्रयास किया। दस लाख लोगों के जुटने का दावा किया गया था, लेकिन उपलब्ध विवरणों के अनुसार वास्तविक उपस्थिति इस दावे से काफी कम रही। फिर भी इस आयोजन का महत्त्व केवल भीड़ के आकार से नहीं, बल्कि उसके राजनीतिक संदेश से तय होना चाहिए। दुर्भाग्य यह है कि इस रैली में भी विपक्ष की ओर से वही पुराने आरोप, वही राजनीतिक भाषण और वही सत्ता विरोधी तेवर अधिक दिखाई दिए, जिनकी पुनरावृत्ति लंबे समय से होती रही है। इसे भी पढ़ें: कांग्रेस की रैली - ‘खाली खाली कुर्सियां, खाली खाली तम्बू हैं’ और भेजा...? वोट चोरी और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण अर्थात एसआईआर को लेकर विपक्ष ने गंभीर सवाल उठाए हैं। चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष का अधिकार ही नहीं, उसका दायित्व भी है। प्रत्येक वैध मतदाता का नाम मतदाता सूची में सुरक्षित रहना चाहिए और किसी भी पात्र नागरिक को मतदान के अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए आरोपों के साथ प्रमाण और तथ्यों की विश्वसनीयता भी आवश्यक है। जिन मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने का प्रश्न उठाया जा रहा है, उनमें मृतक, स्थायी रूप से अन्यत्र स्थानांतरित हो चुके और एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत मतदाता भी शामिल बताए गए हैं। निर्वाचन आयोग ने भी एसआईआर से जुड़े निर्णयों को तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिया गया बताया है। इस प्रक्रिया को लेकर न्यायालय में विचार और निर्देश भी सामने आए हैं। इसलिए इस पूरे विषय पर अंतिम निष्कर्ष तथ्यों, प्रमाणों और न्यायिक परीक्षण के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए। विपक्ष का दायित्व है कि वह चुनाव आयोग से पारदर्शिता की मांग करे, मतदाता सूची की त्रुटियों को उजागर करे और पात्र मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए ठोस प्रयास करे। लेकिन केवल वोट चोरी का नारा बुलंद करने से लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति विश्वास मजबूत नहीं होगा। यदि विपक्ष वास्तव में मतदाता अधिकारों को लेकर गंभीर है तो उसे प्रत्येक मतदान केंद्र पर अपने बूथ लेवल एजेंट नियुक्त करने, मतदाता सूची की जांच करने, वास्तविक विसंगतियों के प्रमाण जुटाने और प्रभावित नागरिकों को न्याय दिलाने की व्यवस्था मजबूत करनी चाहिए। लोकतंत्र की रक्षा नारों से कम और धरातल पर किए गए कार्यों से अधिक होती है। इस रैली का एक दूसरा पहलू भी है। कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की राजनीतिक एकजुटता का आधार क्या है? क्या यह एकजुटता किसी साझा आर्थिक दृष्टि, रोजगार नीति, कृषि सुधार, शिक्षा की गुणवत्ता, स्वास्थ्य सेवाओं, महंगाई, भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा, युवाओं के भविष्य और सामाजिक न्याय के व्यापक कार्यक्रम पर आधारित है? अथवा इसका मुख्य उद्देश्य नरेंद्र मोदी सरकार का विरोध करना और सत्ता के विरुद्ध राजनीतिक वातावरण तैयार करना है? यदि किसी गठबंधन की एकता का सबसे बड़ा आधार किसी एक नेता या सरकार का विरोध हो, तो उसकी वैचारिक स्थिरता और भविष्य की दिशा पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। सत्ता विरोध अपने आप में कोई राजनीतिक दर्शन नहीं हो सकता। लोकतंत्र में विपक्ष केवल आलोचक नहीं होता, वह वैकल्पिक नीतियों का निर्माता भी होता है। संसद में विधेयकों पर गंभीर चर्चा, सरकार की नीतियों का तथ्यात्मक परीक्षण, आर्थिक और सामाजिक समस्याओं पर वैकल्पिक सुझाव तथा जनता की आवाज को संस्थागत मंचों तक पहुंचाना उसकी बुनियादी जिम्मेदारी है। लेकिन जब राजनीतिक विमर्श आरोप-प्रत्यारोप, व्यक्तिगत कटाक्ष और विरोध प्रदर्शनों तक सीमित होने लगता है, तब जनता के वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। विपक्ष को यह समझना होगा कि प्रधानमंत्री की आलोचना करना और प्रधानमंत्री के विकल्प के रूप में अपनी योग्यता प्रमाणित करना दो अलग-अलग बातें हैं। पहली बात राजनीतिक विरोध है, जबकि दूसरी लोकतांत्रिक नेतृत्व की कसौटी है। आज भारत अनेक बुनियादी चुनौतियों के दौर से गुजर रहा है। युवाओं के लिए गुणवत्तापूर्ण रोजगार, किसानों की आय और कृषि की उत्पादकता, छोटे व्यापारियों की आर्थिक सुरक्षा, शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार, पर्यावरण संरक्षण, शहरी अव्यवस्था, बढ़ती आर्थिक विषमता और महिलाओं की सुरक्षा जैसे प्रश्न किसी एक दल के नहीं, पूरे राष्ट्र के प्रश्न हैं। क्या रामलीला मैदान की हुंकार इन विषयों पर कोई ठोस वैकल्पिक कार्यक्रम प्रस्तुत कर सकी? क्या विपक्ष ने यह बताया कि वह इन समस्याओं के समाधान के लिए कौन-सी नीतियां अपनाएगा? क्या उसने देश के सामने कोई साझा विकास दृष्टि रखी? इन सवालों का उत्तर ही इस रैली की राजनीतिक सार्थकता का वास्तविक मूल्यांकन करेगा। यह भी समझना आवश्यक है कि लोकतंत्र में भीड़ जुटाना और जनमत अर्जित करना अलग-अलग बातें हैं। भीड़ किसी क्षणिक राजनीतिक उत्तेजना, संगठनात्मक शक्ति अथवा विरोध की भावना से जुट सकती है, लेकिन स्थायी जनविश्वास विचारों, नीतियों, आचरण और परिणामों से अर्जित होता है। राजनीतिक दलों को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि विशाल मंच, बड़े भाषण और एकजुटता के प्रदर्शन से जनता का विश्वास स्वतः प्राप्त हो जाएगा। आज का मतदाता पहले की तुलना में अधिक जागरूक है। वह केवल यह नहीं सुनना चाहता कि सरकार ने क्या गलत किया, बल्कि यह भी जानना चाहता है कि विपक्ष उस स्थिति को सुधारने के लिए क्या करेगा। कांग्रेस के लिए यह आत्ममंथन का अवसर है। देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी होने के नाते उससे केवल विरोध की राजनीति नहीं, बल्कि वैचारिक नेतृत्व और रचनात्मक विपक्ष की अपेक्षा भी की जाती है। राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं को अपनी राजनीतिक ऊर्जा का उपयोग ऐसे मुद्दों पर करना चाहिए, जो समाज के व्यापक वर्गों को प्रभावित करते हैं। विपक्षी एकता तभी सार्थक होगी, जब वह साझा नकारात्मकता के बजाय साझा सकारात्मक एजेंडे पर आधारित होगी। विभिन्न दलों के बीच नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा और राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रहित के प्रश्नों पर सहमति बनाना आवश्यक है। वस्तुतः लोकतंत्र की प्राण-प्रतिष्ठा केवल चुनावों, रैलियों, नारों और राजनीतिक हुंकारों से नहीं होती। इसके लिए संस्थाओं की निष्पक्षता, नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा, राजनीतिक दलों की जवाबदेही, विचारों की स्वतंत्रता और जनहित के प्रति संवेदनशील शासन व्यवस्था आवश्यक है। सत्तापक्ष को भी आलोचना सुनने और अपनी कमियों को सुधारने का साहस दिखाना चाहिए, जबकि विपक्ष को प्रमाणों के साथ सवाल उठाने और समाधान प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए। लोकतंत्र किसी एक दल की बपौती नहीं, बल्कि समूचे राष्ट्र की साझी विरासत है। रामलीला मैदान की यह रैली विपक्ष के लिए केवल शक्ति प्रदर्शन का अवसर बनकर न रह जाए, बल्कि आत्ममंथन का कारण बने, यही समय की मांग है। सवाल यह नहीं कि विपक्ष मोदी सरकार के विरुद्ध कितनी बार एकजुट हो सकता है, बल्कि यह है कि वह देश के भविष्य के लिए कितनी बार एक सार्थक और विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत कर सकता है। लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए सत्ता का विरोध जरूरी हो सकता है, लेकिन उससे कहीं अधिक जरूरी है जनहित का समर्थन। लोकतंत्र को हुंकार से नहीं, विचार से; भीड़ से नहीं, विश्वास से और सत्ता की आलोचना से नहीं, जनकल्याण के ठोस संकल्प से मजबूती मिलती है। यही रामलीला मैदान की राजनीतिक गूंज से निकलने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण संदेश होना चाहिए। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
इन 55 हजार मौंतों की आशंका पर चर्चा तक नहीं
देश में सत्तारुढ़ राजनीतिक दलों के लिए मौसम परिवर्तन के दुष्प्रभाव चिंता का विषय नहीं है। ऐसे परिवर्तनों की चपेट में आने वाले गरीब होते हैं। इनकी आवाज सुनने वाली देश में कोई सरकार नहीं है। सिर्फ इनकी सुनवाई के दावे किए जाते हैं, जबकि पर्यावरण के प्रभावों से बचाने के इंतजामों पर चर्चा तक नहीं होती है। क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के जारी किया गए नक्शे आंकड़े काफी डराने वाले हैं। अलनीनो के प्रभाव से उत्पन्न गर्मी से भारत में जहां 55,200 लोगों की मौत होने की आशंका है। इसके बावजूद यह मुद्दा देश के सत्तारुढ़ दलों के चिंता का सबब नहीं है। अल नीनो हीट मॉर्टेलिटी ट्रैकर (अल नीनो के कारण गर्मी से होने वाली मौतों का ट्रैकर) नामक इस भयावह नक्शे के मुताबिक नक्शे के अनुसार जून 2026 में शुरू होने वाली इस घटना से मार्च 2027 तक गर्मी के कारण 857,400 अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं, जो वैज्ञानिकों द्वारा एक महीने पहले लगाए गए अनुमान से 350,000 ज्यादा है। इनमें से एक-तिहाई मौतें नाइजीरिया, भारत और ब्राजील में होने का अनुमान है। इसे भी पढ़ें: Bhutan की पहाड़ियों से उठी जलप्रलय की आहट, आपदा से निबटने के लिए India कितना तैयार है? शोधकर्ताओं का अनुमान है कि जून के बाद से 'अल नीनो' के कारण 484,500 अतिरिक्त मौतें हुई हैं। इसके कुछ असर इस तरह दिखे हैं। इंडोनेशिया में जंगलों में आग लगना, भारत में अहम मानसूनी बारिश का न होना और मध्य अमेरिका में सूखा पड़ना। अल नीनो की वजह से इन नौ महीनों की इस अवधि के अनुमान में लगाई गईं आधी से ज्यादा अतिरिक्त मौतें अगले छह महीनों के भीतर होने की आशंका है और भारत पर इसका भयावह रूप देखने को मिल सकता है। इतिहास के पन्नों में 1877-1878 के 'सुपर अल नीनो' को सबसे विनाशकारी मौसमी घटनाओं में गिना जाता है। उस दौरान इसके प्रभाव से भारत, चीन और ब्राजील जैसे देशों में भयंकर सूखा पड़ा था। लगातार बारिश न होने के कारण फसलें पूरी तरह से बर्बाद हो गई थीं। इतिहास में इसे 'ग्रेट फेमाइन' के रूप में जाना जाता है। इस अकाल के कारण भुखमरी और बीमारियों से दुनिया भर में करोड़ों लोगों की दर्दनाक मौत हुई थी। वैज्ञानिकों का मानना है कि समुद्र की सतह के तापमान में अत्यधिक वृद्धि उस सदी के सबसे बड़े जलवायु संकट का कारण बनी थी। क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के सह-संस्थापक और यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो में अर्थशास्त्र के मिल्टन फ्रीडमैन डिस्टिंग्विश्ड सर्विस प्रोफेसर, माइकल ग्रीनस्टोन ने कहा है कि सुपर अलनीनो पर हमारा शोध नई पूर्वानुमान क्षमताओं का इस्तेमाल करके हमारे सामने मौजूद सबसे जरूरी सवालों में से एक का जवाब देता है। अत्यधिक गर्मी के कारण कहां लोगों की जान जाने का खतरा है? अल नीनो एक मौसमी घटना है, जिसमें मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। यह अल नीनो-सदर्न ऑसिलेशन का गर्म चरण है। यह एक प्राकृतिक मौसमी पैटर्न है जो दुनिया भर में वायुमंडलीय परिसंचरण, हवाओं के तंत्र और बारिश के वितरण को प्रभावित करता है। इंडोनेशिया में धधकती भयानक जंगलों की आग से लेकर प्रशांत महासागर में तूफानों की असामान्य सक्रियता तक अल नीनो का असर दुनिया के लगभग हर कोने में देखने को मिल रहा है। इस असामान्य मौसमी गतिविधि के कारण आने वाले समय में दुनिया भर में अलग-अलग क्षेत्रों में अत्यधिक तापमान और अनिश्चित बारिश और अन्य प्राकृतिक आपदाओं का खतरा काफी बढ़ गया है। दिसंबर में अल नीनो अपने चरम पर पहुंच सकता है, जिसके प्रभाव से नवंबर से जनवरी के बीच भारत में सामान्य से कम सर्दी पड़ने की संभावना है। हालांकि उत्तरी हिस्से में ठंड की तीव्रता पश्चिमी विक्षोभ, पहाड़ों पर बर्फबारी और उत्तर-पश्चिमी हवाओं पर निर्भर करती है। इस दौरान दिल्ली समेत पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान एवं बिहार में कभी-कभी शीतलहर की आशंका को खारिज नहीं किया जा सकता। मैदानों में तापमान कुछ समय के लिए गिर सकता है। फिर भी मौसम विज्ञानियों का मानना है कि इस बार लंबे समय तक कड़ाके की ठंड पड़ने की आशंका काफी कमजोर है। डब्ल्यूएमओ के अनुसार नवंबर से जनवरी के दौरान प्रशांत महासागर में अलनीनो की स्थिति और मजबूत हो सकती है। कई जलवायु माडल संकेत दे रहे हैं कि दिसंबर में यह चरम पर पहुंच सकता है। समुद्र की सतह के तापमान में परिवर्तन का असर मौसम पर पड़ता है। हालांकि इसका असर देश के सभी हिस्सों में एक समान नहीं होगा। भारत में मानसून के दौरान 13 प्रतिशत कम बारिश होने के बाद, अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह मौसमी घटना सर्दियों में तापमान बढ़ाएगी, क्या ये बारिश के पैटर्न को बिगाड़ेगी और क्या कृषि पर दबाव बढ़ाएगी? भारत के मामले में अल नीनो पर कड़ी नजर रखी जाती है, क्योंकि आमतौर पर इसके कारण दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान सामान्य से कम बारिश होने का खतरा बढ़ जाता है। बीते मानसूनी सीजन में भारत के अलग-अलग हिस्सों में बारिश का असमान वितरण देखने को मिला। मध्य भारत में तो लगभग सामान्य बारिश हुई, लेकिन पूर्वी और पूर्वात्तर भारत में 26 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई जिसे असाधारण सूखा माना जा सकता है। वहीं दक्षिणी राज्यों में भी औसत से 24 प्रतिशत कम बारिश हुई। अल नीनो के और मजबूत होने से भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य से ज्यादा गर्मी हो सकती है, जिससे जल संसाधनों और कृषि पर दबाव बढ़ सकता है। आने वाले महीनों में अल नीनो का बढ़ता असर भारत के जल संसाधनों, कृषि पैदावार और खाद्य सुरक्षा के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित होने वाला है। सरकार और कृषि विभागों को किसानों के लिए समय पर एडवाइजरी जारी करने, कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देने और जलाशयों में पानी के सही प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करना होगा ताकि संभावित खाद्य संकट से बचा जा सके। सवाल यही है क्या देश के सत्तारुढ़ राजनीतिक दलों ने अलनीनो के प्रभाव से होने वाली मौतें और पेयजल तथा कृषि की चुनौतियों से निपटने के कोई इंतजाम किए हैं। दरअसल इसकी चर्चा तक किसी राजनीतिक दल ने नहीं की हैं। करीब 50 हजार लोगों की संभावित मौतों का यह मसला देश के नेताओं के लिए चिंता की बात नहीं है। ये मौतें अचानक नहीं होंगी। गर्मी के प्रभाव और पानी की कमी और दूषित पेयजल की मजबूरी से होने वाली मौतें धीमी मौत् होती है। यही वजह है कि नेताओं को इसकी चिंता नहीं है। इसका प्रमुख कारण है कि ऐसी मौतों का मसला वोट नहीं दिला सकता। इसी वजह से हर साल पर्यावरण परिवर्तन से होने वाली मौतें कभी भी राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा पत्र में शामिल नहीं की जाती हैं।
कांग्रेस की रैली - ‘खाली खाली कुर्सियां, खाली खाली तम्बू हैं’ और भेजा...?
फिल्म मेरा नाम जोकर के गीत ‘खाली-खाली कुर्सियां हैं खाली खाली तम्बू हैं’ के गीतकार गोपालदास ‘नीरज’ अगर 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई कांग्रेस की रैली को देखते तो वहां की खाली कुर्सियां व खाली तम्बू देख कर वैचारिक पक्ष से लिख रहे होते कि ‘खाली खाली भेजा है।’ रैली में किसी भी नेता द्वारा ऐसी कोई तथ्यात्मक बात नहीं कही गई जिससे यह साबित होता हो कि वोटों की चोरी हुई है और एसआईआर में गड़बड़ी है। जो जो बातें बोली गईं, चुनाव आयुक्त, प्रधानमंत्री व गृहमंत्री को लेकर जो जो अपशब्द बोले गए वो सब पिछले कई महीनों से गढ़े जा रहे झूठे नैरेटिव के प्रयासों से अतिरिक्त कुछ नहीं था। शायद यही कारण है कि न तो देशवासियों ने इस रैली से पहले विपक्ष को गंभीरता से लिया और न ही बाद में इन बातों पर ध्यान दे रहा है। कांग्रेस चाहे इस रैली को लेकर कितनी भी उत्साहित नजर आए परंतु यह तो सच्चाई है कि रैली में उमड़ी भीड़ दस लाख के दावे के मुकाबले कहीं अधिक कम रही। रही सही कसर केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजु ने यह दावा करके पूरी कर दी है कि कांग्रेस जिन तस्वीरों से रैली की भीड़ दिखा रही है वह कृत्रिम बुद्धिमता से तैयारी की गई है। इसे भी पढ़ें: रामलीला मैदान की इंडी गठबंधन की महारैली के सियासी निहितार्थ को समझिए रैली के दौरान व इससे पूर्व कथित जनसंसद में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने 2024 के लोकसभा चुनावों को जिस तरीके से अवैध बताया इससे तो उन्होंने अपने नेता पद को भी अवैधानिक घोषित कर दिया है। दुनिया के राजनीतिक इतिहास में शायद ही ऐसा कभी हुआ हो कि संवैधानिक पद पर विराजमान किसी नेता ने अपने ही पद को अवैध घोषित किया हो। अब प्रश्न है कि अगर उनका पद ही अवैध है तो वे इस पद से अभी तक चिपके हुए क्यों हैं? वैसे तो नेता प्रतिपक्ष कई महीनों से वोट चोरी का झूठ फैला रहे हैं परंतु कांग्रेस को वोट चोरी का अपना अभियान तेज करने का मौका कुछ दिन पहले की उस खबर से मिला, जिससे यह संदेश देने की कोशिश की गई थी कि एसआइआर के मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। हालांकि चुनाव आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय में शपथपत्र देकर स्पष्ट रूप से कहा कि एसआइआर पर सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से हुए। इसके बाद भी विपक्षी दल अपने इस हठ पर कायम हैं कि वोट चोरी हो रही है। वे इस तथ्य पर भी ध्यान देने के लिए तैयार नहीं कि जिन 13 करोड़ लोगों के नाम वोटर लिस्ट हटाए गए हैं, वे उनके हैं जो अन्यत्र जा बसे हैं या जिनकी मृत्यु हो गई है अथवा जिनके नाम दो-तीन जगह दर्ज थे। सच यह भी है कि 13 करोड़ लोगों का नाम हटाने का फैसला अंतिम नहीं है और वैध मतदाता अपना नाम वोटर लिस्ट में अभी भी शामिल करा सकते हैं। इतना होने के बावजूद उक्त रैली की कुर्सियां व तम्बू खाली होने के साथ-साथ वैचारिक रूप से भेजा खाली होना न कहा जाए तो क्या कहें? विडंबना यह भी है कि न्यायालय में एसआइआर के खिलाफ याचिका दायर करने वाले विपक्षी नेता कथित वोट चोरी के खिलाफ कोई प्रमाण अदालत के समक्ष पेश करने के बजाय दिखावटी संसद बुलाकर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ जन महाभियोग पारित करने जैसे स्वांग कर अपना ही उपहास ही उड़ा रहे हैं। रैली की वैचारिकता के साथ-साथ इसमें जुटी भीड़ को लेकर जिस तरह से झूठ का सहारा लेने के आरोप लग रहे हैं वह साफ दर्शाता है कि खुद विपक्ष इस रैली से निराश है और येन केन प्रकारेन रैली को अधिक से अधिक सफल होने के दावे कर रहा है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि विपक्षी दल ने रैली में भारी भीड़ दिखाने के लिए एआई से बनी फर्जी तस्वीरों का सहारा लिया है। किरेन रिजिजू ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर तेलंगाना से कांग्रेस सांसद वामसी गड्डम और अन्य नेताओं द्वारा साझा की गई एक तस्वीर को पोस्ट करते हुए कटाक्ष किया। रिजिजू ने लिखा कि रामलीला मैदान को खचाखच भरा दिखाने के लिए कांग्रेस पार्टी की फेक नैरेटिव टीम एआई से बनी नकली फोटो भी ठीक से नहीं बना पाई। सोशल मीडिया यूजर्स ने भी इस तस्वीर को तुरंत पकड़ लिया और दावा किया कि मंच पर दिख रहे राहुल गांधी और सोनिया गांधी के चेहरे और मूल रैली का मंच असली तस्वीरों से बिल्कुल अलग हैं। इससे पहले बीजेपी प्रवक्ता और सांसद संबित पात्रा कह चुके हैं कि रैली से पहले कांग्रेस ने 10 लाख लोगों के जुटने का दावा किया था, लेकिन हकीकत में 40 फीसदी मैदान खाली रहा। उन्होंने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि रैली में दिखाई गई भीड़ केवल ट्रिक फोटोग्राफी का नतीजा है, और ऐसी ट्रिक्स किसी को प्रधानमंत्री नहीं बना सकतीं। महात्मा गांधी मानते थे कि हिंसक और असत्य साधनों से कभी कोई संघर्ष नहीं जीता जा सकता। ईवीएम की तरह एसआईआर पर भी कांग्रेस लगातार झूठ पर झूठ बोल रही है और यही कारण है कि यह मुद्दा जनता के बीच कहीं ठहर नहीं पा रहा है। अगर सचमुच में चोरी हुई होती और इसके पक्ष में कांग्रेस के पास कोई प्रमाण है तो उसे संसद में पेश किया जाना चाहिए था और इस पर तथ्यात्मक बहस करनी चाहिए थी, वहां भी बात नहीं बनती तो अदालत का दरवाटा खटखटाना चाहिए था परंतु इसके विपरीत कांग्रेस ने नक्सलवादी हल्ला बोल शैली में जन संसद व रैली का आयोजन किया। अदालत का दरवाजा तो खटखटाया परंतु अभी तक उसमें अपने पक्ष में एक भी तथ्य प्रस्तुत नहीं कर पाई। कांग्रेस स्मरण रखे कि जब तक वैचारिक रूप से भेजा खाली रहेगा तब तक कुर्सियां व तम्बू भी समर्थकों को तरसते रहेंगे। - राकेश सैन
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तमिलनाडु : मुख्यमंत्री ने पुडुकोट्टई में 80 करोड़ रुपए की विकास परियोजनाओं का उद्घाटन किया
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कांग्रेस नेता बोले, आर्थिक व्यवस्था और सोशल मीडिया की भूमिका पर देश के सामने हो खुली चर्चा
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मुंबई, 2 नवंबर (आईएएनएस)। बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) की महापौर ऋतु तावड़े ने सोमवार को बॉलीवुड अभिनेत्री दीया मिर्जा के प्रदूषण-मुक्त दिवाली से जुड़े वीडियो की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि उनका विरोध लगातार हिंदुत्व और उससे जुड़े लोगों के खिलाफ रहा है।
पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में घिरे अनंत सिंह, बिहार विधानसभा सचिवालय ने भेजा नोटिस
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'स्वामित्व' योजना के तहत गुजरात के 14,866 गांवों की मैपिंग पूरी, ग्रामीणों को मालिकाना हक देने की तैयारी
रामलीला मैदान की इंडी गठबंधन की महारैली के सियासी निहितार्थ को समझिए
दिल्ली के रामलीला मैदान में 1 नवंबर 2026 को आयोजित इंडी (INDIA) गठबंधन की महारैली केवल एक राजनीतिक सभा नहीं थी, बल्कि यह विपक्ष की ओर से चुनाव आयोग, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर उठाए जा रहे सवालों को राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाने का एक और बृहत प्रयास था। 'वोट बचाओ, देश बचाओ' और 'चलो दिल्ली' के संदेश के साथ आयोजित इस रैली में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी शरद पवार, नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी, सीपीआई, सीपीआई एम, सीपीआई एमएल सहित लगभग 20 विपक्षी दलों के नेताओं ने हिस्सा लिया। अधिकांश नेताओं ने गर्मजोशी पूर्वक मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग भी उठाई और निज अनुभवजन्य आरोप लगाए। सबसे अंत में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने संतुलित भाषण देते हुए एक परिपक्व नेता प्रतिपक्ष का परिचय दिया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर निशाना साधते हुए खट्टा मीठा आरोप लगाए, जिसमें ताना और दुलार दोनों शामिल रहा। इसे भी पढ़ें: Jairam Ramesh का BJP पर वार, Rahul Gandhi की अपील पर Delhi के बाजारों में बढ़ा व्यापार इस घटनाक्रम को समझने के लिए अग्रांकित सात महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी है:- पहला, चुनाव आयोग और एसआईआर को विपक्ष ने बनाया मुख्य राजनीतिक मुद्दा: रैली का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि विपक्ष ने अपनी लड़ाई को केवल केंद्र सरकार के विरोध तक सीमित न रखकर चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जोड़ने की कोशिश की। विपक्ष के प्रमुख आरोप हैं कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने और प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी से मतदान के अधिकार पर असर पड़ सकता है।राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और अखिलेश यादव सहित कई नेताओं ने इस मुद्दे को उठाया। विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। इसका राजनीतिक निहितार्थ यह है कि विपक्ष चुनावी निष्पक्षता को अपनी साझा राजनीतिक लड़ाई का आधार बनाना चाहता है। वह मतदाता सूची के विवाद को लोकतंत्र, संविधान और नागरिक अधिकारों के व्यापक सवाल से जोड़ रहा है। हालांकि, विपक्ष के आरोपों और चुनाव आयोग की प्रक्रिया के बीच वास्तविक स्थिति का निर्धारण दस्तावेजों, संबंधित मतदाता आंकड़ों और कानूनी जांच के आधार पर ही होना चाहिए। चुनाव आयोग की ओर से एसआईआर (SIR) के आदेशों को वैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप बताया गया है। दूसरा, विपक्षी एकजुटता का सार्वजनिक प्रदर्शन, लेकिन नेतृत्व का सवाल बरकरार: इस महारैली में राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, तेजस्वी यादव, फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती जैसे महत्वपूर्ण विपक्षी नेताओं की मौजूदगी महत्वपूर्ण रही। इससे विपक्ष ने यह संदेश देने की कोशिश की कि अलग-अलग राज्यों में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा रखने वाले दल राष्ट्रीय मुद्दों पर एक मंच पर आ सकते हैं। लेकिन एक बड़ा सवाल अभी भी कायम है: एक, गठबंधन का वास्तविक नेतृत्व किसके हाथ में होगा? दो, क्या कांग्रेस और क्षेत्रीय दल एक-दूसरे के राजनीतिक हितों को पर्याप्त जगह देंगे? तीन, क्या विपक्ष साझा मुद्दों पर आंदोलन के साथ-साथ साझा नीतिगत कार्यक्रम भी बना पाएगा? चार, क्या चुनाव के समय सीटों के बंटवारे और उम्मीदवार चयन पर सहमति कायम रह सकेगी? इसका सियासी निहितार्थ यह है कि प्रमुख विपक्षी नेताओं द्वारा एक मंच पर नेताओं का खड़ा होना और एक साझा राजनीतिक संगठन की तरह काम करना दो अलग-अलग बातें हैं। महारैली ने पहले पहलू को प्रदर्शित किया, जबकि दूसरे की परीक्षा आगे होगी। तीसरा, कांग्रेस की राष्ट्रीय भूमिका और राहुल गांधी की राजनीतिक रणनीति: रैली के आयोजन में कांग्रेस की प्रमुख भूमिका रही। खड़गे और राहुल गांधी ने चुनाव आयोग तथा केंद्र सरकार के खिलाफ विपक्ष की आवाज को सामने रखा। राहुल गांधी ने नागरिकों के मताधिकार को धर्म और राजनीतिक पहचान से ऊपर रखने की बात कही। दूसरी ओर, अखिलेश यादव और ममता बनर्जी ने अपने-अपने राज्यों से जुड़े एसआईआर के सवालों को भी उठाया। इस घटनाक्रम के तीन राजनीतिक पहलू हैं: एक, कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गतिविधियों का साझा मंच उपलब्ध कराने की कोशिश कर रही है। दो, राहुल गांधी के लिए लोकतंत्र और चुनावी निष्पक्षता का मुद्दा उनकी राष्ट्रीय राजनीतिक संवाद शैली का महत्वपूर्ण हिस्सा बन रहा है। तीन, क्षेत्रीय दल इस मंच के माध्यम से अपने राज्य के राजनीतिक मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श में जगह दे रहे हैं। लेकिन कांग्रेस की राष्ट्रीय भूमिका और गठबंधन के भीतर अन्य दलों की स्वायत्तता के बीच संतुलन बनाना एक महत्वपूर्ण चुनौती बनी रहेगी। चौथा, ममता, अखिलेश और अन्य क्षेत्रीय नेताओं के अपने राजनीतिक संदेश: महारैली में सभी नेताओं का भाषण एक जैसा नहीं था। जहां अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश की मतदाता सूची और कथित नाम कटने के मुद्दे को उठाया। वहीं, ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में एसआईआर के प्रभाव का विरोध किया। उधर, तेजस्वी यादव ने अपने भाषण में महाभारत के शकुनि का संदर्भ दिया और पूछा कि आज के कौन है? इसके पीछे उनका गहरा दर्द यह है कि बिहार के दिग्गज समाजवादी नेता और पूर्व स्वास्थ्य मंत्री शकुनि चौधरी के पुत्र और बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने तेजस्वी यादव के मुख्यमंत्री बनने की संभावनाओं पर तुषारापात कर दिया। वहीं, फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती ने लोकतांत्रिक अधिकारों और नागरिक भागीदारी के सवाल उठाए। इससे स्पष्ट होता है कि गठबंधन का साझा मंच होने के बावजूद उसके प्रत्येक घटक दल की अपनी क्षेत्रीय प्राथमिकताएं हैं। इस तरह से उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, जम्मू-कश्मीर और अन्य राज्यों में मतदाता सूची, सामाजिक समीकरण और चुनावी प्रतिस्पर्धा के अलग-अलग संदर्भ हैं। इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर एक नारा सभी राज्यों में समान राजनीतिक अर्थ नहीं रखता। पांचवां, भाजपा और विपक्ष के बीच टकराव अब चुनावी संस्थाओं के सवाल तक पहुंचा: इस रैली के बाद राजनीतिक बहस का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी सामने आया कि भाजपा और विपक्ष चुनावी प्रक्रिया को लेकर एक-दूसरे के विरुद्ध अलग-अलग राजनीतिक दावे पेश कर रहे हैं। जहां भाजपा ने विपक्ष के आरोपों को राजनीतिक अभियान का हिस्सा बताया है। वहीं विपक्ष का कहना है कि मतदाता सूची की विश्वसनीयता और चुनाव आयोग की जवाबदेही पर सवाल उठाना उसका लोकतांत्रिक अधिकार है। दिलचस्प बात यह है कि 1 नवंबर को ही दिल्ली के हरिनगर में भाजपा नेता हरदीप सिंह पूरी और दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने 1984 के सिख-विरोधी दंगों के पीड़ितों के न्याय से जुड़ा अपना विरोध मार्च भी आयोजित किया। इससे रैली के साथ एक अलग राजनीतिक और ऐतिहासिक विवाद भी जुड़ गया। इसका अर्थ यह है कि राजनीतिक विमर्श केवल एसआईआर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें 1984 की त्रासदी, न्याय, राजनीतिक जवाबदेही और विपक्ष की तारीख के चयन जैसे सवाल भी शामिल हो गए। छठा, क्या महारैली विपक्ष को जनांदोलन में बदलने की क्षमता रखती है?: किसी राजनीतिक रैली की सफलता का आकलन केवल भीड़ के आकार से नहीं किया जा सकता। असली कसौटी यह है कि उसका संदेश कितनी दूर तक पहुंचता है और उसके बाद संगठनात्मक स्तर पर क्या कार्रवाई होती है। इस दृष्टि से विपक्ष के सामने कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं: एक, मतदाता सूची से जुड़े आरोपों को प्रमाणों के साथ जनता के सामने रखना, क्योंकि घुसपैठियों को निकालने, दो जगहों के वोटर लिस्ट में शामिल लोगों को हटाने के फैसले को कांग्रेस व उसके समर्थक दल नाजायज़ नहीं ठहरा सकते हैं। दो, जिन मतदाताओं के नाम छूटने की शिकायत है, उनके मामलों का तथ्यात्मक समाधान कराना होगा। तीन, चुनाव आयोग के समक्ष अपनी आपत्तियों को संवैधानिक और कानूनी तरीके से उठाना होगा। चार, साझा राजनीतिक मुद्दों के साथ रोजगार, महंगाई, किसानों, युवाओं और आर्थिक विकास जैसे विषयों पर भी स्पष्ट कार्यक्रम प्रस्तुत करना होगा। पांच, गठबंधन के भीतर नेतृत्व और सीटों के बंटवारे पर व्यावहारिक सहमति बनाना होगा। छह, यह भी ध्यान रखना होगा कि रैली में उपस्थिति के आंकड़ों को लेकर राजनीतिक दावे और प्रतिदावे सामने आए हैं। इसलिए भीड़ के आधार पर देशव्यापी जनसमर्थन का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। सातवां, इस महारैली से केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के सामने क्या सवाल खड़े हुए?: इस घटनाक्रम ने तीन संस्थागत प्रश्नों को चर्चा में ला दिया है: एक, एसआईआर में पारदर्शिता कितनी है? और प्रत्येक पात्र नागरिक का मताधिकार सुरक्षित रहे। दो, चुनाव आयोग की जवाबदेही कैसे सुनिश्चित हो? और चुनावी संस्था पर जनता का विश्वास बना रहे। तीन, राजनीतिक दलों की शिकायतों का समाधान कैसे हो? और विवादों का निष्पक्ष और कानूनी निपटारा हो। यहां पर एक और महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है कि चुनाव आयोग की आलोचना करना और उसकी संवैधानिक स्वतंत्रता को कमजोर करना एक ही बात नहीं है। इसी प्रकार आयोग की स्वतंत्रता का सम्मान करने का अर्थ यह भी नहीं कि उसकी प्रक्रियाओं पर सवाल नहीं उठाए जा सकते। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में दोनों पक्षों के लिए पारदर्शिता, जवाबदेही और कानून का पालन आवश्यक है। सच कहूँ तो रामलीला मैदान से निकले राजनीतिक संदेश की असली परीक्षा आगे होगी। 1 नवंबर की महारैली ने विपक्षी एकजुटता, चुनावी निष्पक्षता और मतदाता अधिकारों को राष्ट्रीय राजनीतिक बहस में प्रमुखता दी है। इसने यह भी दिखाया कि अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं और क्षेत्रीय हितों वाले दल कुछ साझा मुद्दों पर एक मंच पर आ सकते हैं। लेकिन इस आयोजन से अपने आप विपक्ष की राजनीतिक एकजुटता स्थायी हो गई है या मतदाताओं के बीच उसके आरोप स्वीकार कर लिए गए हैं, ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। विपक्ष के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपने आरोपों को प्रमाणों से पुष्ट करे और साझा राजनीतिक कार्यक्रम को जमीन पर उतारे। वहीं चुनाव आयोग के लिए भी यह महत्वपूर्ण है कि वह मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर उठ रही शंकाओं का पारदर्शी तरीके से समाधान करे। दरअसल, रामलीला मैदान की इस महारैली का सबसे बड़ा राजनीतिक निहितार्थ यह है कि भारतीय राजनीति में अब चुनाव जीतने की प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता भी एक प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनती जा रही है। आखिरकार लोकतंत्र की मजबूती किसी एक राजनीतिक दल की जीत या हार से नहीं, बल्कि निष्पक्ष चुनाव, स्वतंत्र संस्थाओं और नागरिकों के भरोसे से तय होती है। यही शाश्वत सत्य है और मतदाता सूची में घालमेल एक संस्थागत बीमारी है, जिसके लिए पहले जिला प्रशासन की जिम्मेदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए, उसके बाद चुनाव आयोग की। ऐसा इसलिए कि कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेंस, आप आदि शासित राज्यों में चुनाव आयोग चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
किताबों और खिलौनों की उम्र में हिंसा का पाठ क्यों पढ़ रहे हैं बच्चे?
बचपन को मासूमियत, निश्छलता, संवेदनशीलता और खिलखिलाती मुस्कान का पर्याय माना जाता है। बच्चों के हाथों में खिलौने अच्छे लगते हैं, पत्थर और ईंटें नहीं, उनकी आंखों में सपने अच्छे लगते हैं, किसी के प्रति नफरत और हिंसा नहीं। लेकिन जब 8-10 वर्ष की उम्र के बच्चे भी किसी दूसरे मासूम की जान लेने पर उतारू हो जाएं, तब सवाल केवल एक बच्चे के असामान्य व्यवहार का नहीं रह जाता बल्कि पूरे सामाजिक परिवेश, पारिवारिक संस्कारों, शिक्षा व्यवस्था और हमारी बदलती जीवनशैली का हो जाता है। हरियाणा के पंचकूला में छह साल की विशेष आवश्यकता वाली बच्ची पर तीसरी कक्षा के आठ वर्षीय छात्र द्वारा किया गया बर्बर हमला इसी भयावह वास्तविकता का आईना है। जब पंचकूला के सेक्टर-20 स्थित राजकीय संस्कृति मॉडल स्कूल में हुई इस हृदयविदारक घटना का वीडियो देखा तो मन बेहद विचलित हो उठा। आरोपी छात्र बच्ची को एक खाली कक्षा में ले गया, वहां उसके बाल पकड़कर घसीटा, बेंच पर सिर पटका, लातें मारी तथा ईंट, पत्थर और गमले से उसके सिर तथा चेहरे पर बार-बार प्रहार किए। करीब 96 सैकेंड तक चली इस हिंसा का दृश्य कक्षा में लगे सीसीटीवी कैमरे में दर्ज हुआ। सबसे विचलित करने वाली बात यह है कि हमला करने वाला कोई व्यस्क अपराधी नहीं बल्कि 8 वर्ष का बच्चा है। यह घटना जितनी पीड़ित बच्ची के लिए भयावह है, उतनी ही उस बच्चे के मानसिक और सामाजिक विकास को लेकर भी गंभीर चिंता पैदा करती है। आखिर इतनी छोटी उम्र में किसी बच्चे के भीतर इतनी आक्रामकता कहां से आती है? क्या उसने हिंसा को सामान्य व्यवहार मान लिया है? क्या वह किसी के दर्द और असहायता को महसूस करने की क्षमता खो रहा है? और सबसे बड़ा सवाल यह कि हमारे घरों, स्कूलों और समाज में ऐसा क्या बदल रहा है कि बचपन की भाषा में प्रेम और संवेदना की जगह हिंसा प्रवेश करती जा रही है? उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज में जिस तरह बच्ची के असहाय हो जाने के बाद भी हमला जारी रहने की बात सामने आई है, वह सामान्य बाल-सुलभ झगड़े से कहीं अधिक गंभीर है। इसे भी पढ़ें: नई पीढ़ी को बौद्धिक परतंत्रता और सांस्कृतिक अलगाव से बचाना जरुरी इस घटना ने एक ऐसा प्रश्न हमारे सामने खड़ा किया है, जिससे मुंह मोड़ना अब संभव नहीं है कि आखिर बच्चों के मन में हिंसा के बीज कौन बो रहा है? बच्चों और किशोरों में हिंसक व्यवहार का कोई एक कारण नहीं होता। परिवार में हिंसा देखना, कठोर अथवा असंगत अनुशासन, भावनात्मक उपेक्षा, कमजोर अभिभावकीय निगरानी, साथियों का दबाव, सामाजिक अलगाव और व्यवहार पर नियंत्रण की कठिनाइयां इसके जोखिम को बढ़ा सकती हैं। सबसे पहले सवाल परिवारों से है। आज अनेक घरों में बच्चों को महंगे खिलौने, स्मार्टफोन, टैबलेट और मनोरंजन के तमाम साधन तो उपलब्ध करा दिए जाते हैं लेकिन उनके साथ बैठकर बातचीत करने, उनकी भावनाएं समझने और उनके व्यवहार को दिशा देने का समय लगातार कम होता जा रहा है। माता-पिता अपनी व्यस्तताओं में उलझे हैं और कई बार बच्चे अपनी भावनात्मक उलझनों के साथ अकेले रह जाते हैं। घर में माता-पिता के झगड़े, गाली-गलौज, मारपीट, अपमानजनक भाषा और छोटी-छोटी बातों पर हिंसक प्रतिक्रिया देखने वाले बच्चों के मन पर इसका गहरा प्रभाव पड़ सकता है। बच्चा वही सीखता है, जो अपने आसपास बार-बार देखता है। यदि घर में समस्या का समाधान संवाद से नहीं बल्कि चीखने, धमकाने और हाथ उठाने से होता है तो उसके लिए हिंसा धीरे-धीरे व्यवहार का स्वीकार्य तरीका बन सकती है। दूसरा बड़ा सवाल डिजिटल दुनिया का है। मोबाइल फोन और इंटरनेट ने बच्चों के सामने ज्ञान और मनोरंजन के असंख्य अवसर खोले हैं लेकिन इसी दुनिया में हिंसक वीडियो, मारधाड़ वाले खेल, अपमानजनक सामग्री और आक्रामक व्यवहार को महिमामंडित करने वाले दृश्य भी मौजूद हैं। समस्या तब गंभीर हो जाती है, जब बच्चा बिना किसी निगरानी के घंटों ऐसी सामग्री देखता है और उसे यह समझाने वाला कोई नहीं होता कि पर्दे पर दिखाई जाने वाली हिंसा वास्तविक जीवन में किसी के शरीर, मन और अस्तित्व को कितनी गहरी चोट पहुंचाती है। तीसरी चिंता बच्चों में संवेदनशीलता और सहानुभूति के विकास की है। आज हम बच्चों को प्रतियोगिता में आगे निकलना, जीतना और दूसरों से बेहतर प्रदर्शन करना तो सिखा रहे हैं लेकिन हार स्वीकार करना, दूसरों की भावनाओं का सम्मान करना, कमजोर की मदद करना और क्रोध पर नियंत्रण रखना कितना सिखा रहे हैं? क्या स्कूलों में नैतिक शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तकों तक सिमट गई है? क्या बच्चों को यह समझाया जा रहा है कि किसी को चोट पहुंचाना बहादुरी नहीं, कमजोरी है? किसी दूसरे की पीड़ा देखकर मन में करुणा पैदा होना ही मानवीय संवेदना का आधार है। यदि यही संवेदना विकसित नहीं होगी तो शिक्षा की बड़ी-बड़ी डिग्रियां भी सभ्य समाज की गारंटी नहीं बन सकतीं। यहां स्कूलों की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। पंचकूला की घटना ने सीसीटीवी कैमरों की मौजूदगी और वास्तविक निगरानी के बीच के अंतर को उजागर किया है। कैमरे लगे होना सुरक्षा नहीं है, उनकी सतत निगरानी, समय पर हस्तक्षेप और जवाबदेही ही सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। सवाल है कि एक छह साल की बच्ची स्कूल परिसर में एक अन्य छात्र के साथ ऐसी स्थिति में कैसे पहुंच गई, जहां उस पर लगातार हमला होता रहा और किसी शिक्षक या कर्मचारी को समय रहते इसकी जानकारी नहीं मिली? यदि स्कूल में शिक्षकों की कमी थी, एक शिक्षक को कई कक्षाओं की जिम्मेदारी संभालनी पड़ रही थी अथवा ड्यूटी व्यवस्था में कोई खामी थी तो यह भी जांच का विषय है। यह पहली घटना नहीं है, जब स्कूलों में बच्चों के बीच हिंसा ने पूरे देश को झकझोरा हो। वर्ष 2017 में गुरुग्राम के रेयान इंटरनेशनल स्कूल में सात वर्षीय प्रद्युम्न ठाकुर की हत्या, 2018 में दिल्ली के एक सरकारी स्कूल में चाकूबाजी, 2019 में तमिलनाडु के कोडईकनाल में क्रिकेट विवाद के बाद छात्र की हत्या, 2021 में छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में छात्र की चाकू मारकर हत्या, 2025 में अहमदाबाद में छात्र की हत्या और 2026 में सूरत में स्कूल परिसर में चाकूबाजी जैसी घटनाएं अलग-अलग समय पर सामने आ चुकी हैं। इन सभी मामलों की परिस्थितियां अलग हैं लेकिन एक बात समान है कि स्कूल, जिन्हें बच्चों के लिए सबसे सुरक्षित स्थान होना चाहिए, वहां भी हिंसा की घटनाएं सामने आ रही हैं। अब समय आ गया है कि सरकार और शिक्षा विभाग स्कूलों की सुरक्षा को केवल औपचारिक निरीक्षण और कागजी दिशा-निर्देशों तक सीमित न रखें। प्रत्येक स्कूल में पर्याप्त शिक्षक, प्रशिक्षित काउंसलर, विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए प्रशिक्षित सहयोगी कर्मचारी, संवेदनशील स्थानों पर सतत निगरानी और शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई की व्यवस्था होनी चाहिए। प्रत्येक बच्चे की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्कूल प्रबंधन, शिक्षकों और प्रशासन की जवाबदेही तय होनी चाहिए। अभिभावकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। बच्चों के व्यवहार में अचानक आक्रामकता, दूसरों को चोट पहुंचाने की प्रवृत्ति, क्रोध पर नियंत्रण न रहना, पश्चाताप का अभाव, जानवरों अथवा कमजोर बच्चों के प्रति क्रूरता जैसे संकेतों को सामान्य शरारत समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। बच्चों को दंडित करने के बजाय उनकी भावनाओं को समझना, उन्हें अपनी बात कहने का अवसर देना और प्रेम के साथ स्पष्ट अनुशासन सिखाना जरूरी है। खेलकूद, रचनात्मक गतिविधियां, सामूहिक सहभागिता और सामाजिक सेवा जैसी गतिविधियां भी उनमें सहयोग, धैर्य और सहानुभूति विकसित कर सकती हैं। पंचकूला की घटना हमें एक कठोर सच्चाई से रूबरू कराती है कि बच्चों का भविष्य केवल अच्छे स्कूल, महंगी शिक्षा, आधुनिक तकनीक और बेहतर सुविधाओं से सुरक्षित नहीं हो सकता। उसके लिए अच्छे संस्कार, भावनात्मक सुरक्षा, मानवीय संवेदना और जिम्मेदार अभिभावक भी उतने ही आवश्यक हैं। जिस समाज में बच्चे दूसरों का दर्द महसूस करना भूलने लगें, वहां विकास के तमाम दावे खोखले साबित होने लगते हैं। आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि पंचकूला में एक 8 वर्षीय बच्चे ने 6 साल की बच्ची पर हमला क्यों किया बल्कि यह है कि हम ऐसी नौबत आने से पहले क्या कर रहे थे और भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने के लिए क्या करेंगे? जिस उम्र में बच्चों को अक्षर ज्ञान, दोस्ती, खेल और मानवीय रिश्तों का अर्थ समझना चाहिए, उस उम्र में यदि उनके हाथों में ईंट और पत्थर दिखाई देने लगें तो यह केवल एक परिवार या स्कूल की विफलता नहीं बल्कि हमारी सामूहिक सामाजिक चेतना की पराजय है। हमें तय करना होगा कि बच्चों को केवल प्रतियोगिता में जीतना सिखाना है या इंसानियत के साथ जीना भी क्योंकि बचपन यदि हिंसक हो गया तो भविष्य सभ्य कैसे होगा? और यदि स्कूलों में बच्चे सुरक्षित नहीं तो फिर उनके सुरक्षित भविष्य की गारंटी कौन देगा? - योगेश कुमार गोयल (लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में निरंतर सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार हैं)
Rahul की बड़ी चुनौती और Election Commission पर दबाव, क्या विपक्ष चलने वाला है बायकाट का बड़ा दांव?
इंडिया ब्लॉक की रैली फ्लॉप, 10 लाख की भीड़ जुटाने का दावा करने वाले हजारों में सिमट गए: संजय सेठ
इंडिया ब्लॉक की रैली फ्लॉप, 10 लाख की भीड़ जुटाने का दावा करने वाले हजारों में सिमट गए: संजय सेठ
ईरान को खत्म करने का प्लान! ट्रंप-नेतन्याहू की सीक्रेट बातचीत से हड़कंप
अमेरिकी मीडिया हस्ती और राजनीतिक टिप्पणीकार टकर कार्लसन ने दावा किया है कि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर ईरान के खिलाफ परमाणु हमला करने का दबाव डाल रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि वाशिंगटन कुछ ही दिनों के भीतर परमाणु हथियारों के इस्तेमाल को लेकर कोई फैसला ले सकता है। कार्लसन ने एक विस्तृत पोस्ट में लिखा है कि ये हथियार पहाड़ की ग्रेनाइट चट्टानों को भेदकर उन भूमिगत सुरंगों तक पहुंच सकते हैं, जहां कथित तौर पर परमाणु सामग्री को समृद्ध (एनरिच) करने का काम चल रहा है। कार्लसन ने लिखा इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के दबाव में ट्रंप प्रशासन कुछ ही दिनों में ईरान पर परमाणु हमला कर सकता है। उन्होंने आगे दावा किया कि नेतन्याहू इस तरह के अभियान के लिए जोर दे रहे हैं। उन्होंने एक अज्ञात सूत्र के हवाले से कहा बीबी (नेतन्याहू) इस बारे में ट्रंप को रोज फोन करते हैं। कार्लसन की पोस्ट में संभावित परमाणु हमले या नेतन्याहू द्वारा डाले जा रहे कथित दबाव के दावों के समर्थन में कोई ऐसा सबूत नहीं दिया गया, जिसकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि की जा सके। इसे भी पढ़ें: China हुआ सन्न, दुनिया हैरान, ट्रंप पर ऐसा भड़के जयशंकर, तगड़ा सुना दिया कार्लसन का दावा है कि नेतन्याहू युद्ध जारी रखना चाहते हैं। कार्लसन ने सैन्य कार्रवाई के कथित जोर को, पिछले हफ्ते इज़राइल में हुए चुनावों के बाद नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति से जोड़ा है। उन्होंने दावा किया कि ट्रम्प के सीधे हस्तक्षेप के बिना इज़रायली प्रधानमंत्री के लिए सरकार बनाना मुश्किल होगा, और अगर वे सत्ता से बाहर हो जाते हैं, तो उन्हें जांच का सामना करना पड़ सकता है और जेल भी जाना पड़ सकता है। कार्लसन ने लिखा कि नेतन्याहू को ट्रम्प के करीब रहना होगा। उन्हें इस युद्ध की ज़रूरत है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अमेरिका के कई वरिष्ठ अधिकारी नेतन्याहू के रुख का समर्थन कर रहे हैं और ईरान के साथ बातचीत के ज़रिए किसी समझौते के ख़िलाफ़ हैं। कार्लसन ने अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ और सेंटकॉम कमांडर ब्रैड कूपर का नाम लिया, और साथ ही दावा किया कि विदेश मंत्री मार्को रुबियो और CIA निदेशक जॉन रैटक्लिफ भी इज़रायली प्रधानमंत्री के इशारों पर चल रहे हैं। कार्लसन ने आगे दावा किया कि हाल ही में दोहा में हुई एक बैठक के दौरान, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ईरान के साथ शांति समझौते के मसौदे का विरोध किया था। उन्होंने इस दावे को साबित करने के लिए कोई विवरण या सबूत नहीं दिया। टिप्पणीकार ने यह भी कहा कि 27 सितंबर को नेतन्याहू चुपके से अबू धाबी गए थे, ताकि ईरान के ख़िलाफ़ अंतिम सैन्य अभियान के लिए संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का समर्थन हासिल कर सकें, लेकिन UAE ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। इसे भी पढ़ें: ट्रंप के रिजॉर्ट के पास मिसाइल की तरह नीचे आया विमान, फिर...9 की हुई मौत क्षेत्रीय और वैश्विक परिणामों को लेकर चेतावनी कार्लसन ने चेतावनी दी कि तनाव और बढ़ने से खाड़ी क्षेत्र और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं। उन्होंने होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल टैंकरों को हुए नुकसान और ऊर्जा तथा उर्वरक बाजारों में आई बाधाओं की ओर इशारा किया। उन्होंने दावा किया कि अक्टूबर में होर्मुज जलडमरूमध्य में, दुनिया भर में तेल ढोने वाले लगभग 850 सुपरटैंकरों में से 11 बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए थे। संभावित परमाणु हमले के परिणामों पर, कार्लसन ने आरोप लगाया कि 'पिकएक्स माउंटेन' पर ज़मीनी विस्फोट से फारस की खाड़ी प्रदूषित हो सकती है और 10 करोड़ लोगों की जलापूर्ति प्रभावित हो सकती है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि अमेरिका द्वारा परमाणु हथियारों का इस्तेमाल अन्य देशों के लिए एक मिसाल बन सकता है। कार्लसन ने दावा किया कि रूस ने कम से कम दो सरकारों से कहा है कि अगर अमेरिका ईरान पर परमाणु हमला करता है, तो उसे यूक्रेन के खिलाफ परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करने की छूट मिल जाएगी। उन्होंने उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया से जुड़े संभावित परमाणु तनाव का भी जिक्र किया। उन्होंने आगे आरोप लगाया कि अमेरिकी प्रशासन ने फरवरी से अपने परमाणु सिद्धांत में चुपचाप बदलाव किया है, ताकि तथाकथित युद्धक्षेत्र वाले परमाणु हथियारोंका इस्तेमाल करना आसान हो सके। इसे भी पढ़ें: ट्रंप के रिजॉर्ट के पास मिसाइल की तरह नीचे आया विमान, फिर...9 की हुई मौत ट्रंप कूटनीति के विकल्प पर कर रहे विचार टकर कार्लसन के ये दावे ऐसे समय में आए हैं जब वॉशिंगटन और तेहरान के बीच बातचीत दोबारा शुरू कराने के लिए कूटनीतिक कोशिशें जारी हैं, हालांकि नए सैन्य हमलों की संभावना पर भी चर्चा हो रही है। एक्सियोस (Axios) की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने शनिवार को फोन पर बात की। दोनों के बीच ईरान के साथ चल रही बातचीत की स्थिति और दोबारा सैन्य कार्रवाई शुरू करने की संभावना पर चर्चा हुई। रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू मंगलवार को होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के तुरंत बाद नए हमलों का दबाव बना रहे थे, जबकि राष्ट्रपति ट्रंप बातचीत को और मौका देना चाहते थे। एक इजरायली सूत्र ने इस बातचीत को कड़ा बताया, जबकि एक अमेरिकी सूत्र ने इसे सीधी और स्पष्ट बातचीत कहा। बाद में ट्रंप ने इसे बहुत अच्छी बातचीत बताया और पुष्टि की कि ईरान उन मुद्दों में शामिल था जिन पर बात हुई, हालांकि उन्होंने ज्यादा ब्योरा नहीं दिया। ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ बातचीत ठीक चल रही है और उन्हें कोई बहुत जल्दी नहीं है। हालांकि, उन्होंने यह संकेत भी दिया कि अमेरिका को अभी ईरान के एक-दो परमाणु ठिकानों पर ध्यान देने की जरूरत है, जिसमें उन्होंने खास तौर पर पिकेक्स माउंटेन का जिक्र किया। ट्रंप ने कहा हम यह 10 मिनट में कर सकते हैं। हमारे पास इसकी पूरी योजना है। आप पिकेक्स माउंटेन को देख सकते हैं। हमें उससे निपटना होगा और हम इसे बहुत तेजी से कर सकते हैं। इसी बीच, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने पिछले हफ्ते ईरान के राष्ट्रीय सुरक्षा प्रमुख मोहसिन रेज़ाई को एक पत्र भेजा, जिसमें बातचीत दोबारा शुरू करने की संभावना पर बात की गई थी। कतरी मध्यस्थों ने भी रविवार को लगातार तीसरे दिन ईरानी अधिकारियों के साथ चर्चा की, ताकि वॉशिंगटन और तेहरान के बीच सीधी बातचीत शुरू कराने के लिए सहमति बन सके। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि अभी तक कोई समझौता नहीं हुआ है और आगे की प्रगति इस बात पर निर्भर करती है कि अमेरिका, तेहरान के सवालों के जवाब कैसे देता है। अराघची ने कहा हम इस दिशा में हर संभव कोशिश कर रहे हैं और उम्मीद करते हैं कि दूसरा पक्ष इतनी समझदारी दिखाएगा कि अन्य रास्तों के बजाय कूटनीति को चुने। दूसरी तरफ, कार्लसन का दावा है कि ट्रंप इस समय वेंस और अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ की सलाह सुन रहे हैं, जिनका मानना है कि ईरान के साथ अब भी समझौता संभव है। कार्लसन ने अमेरिकी प्रशासन से परमाणु तनाव के खतरे की चेतावनी देते हुए कूटनीति का रास्ता अपनाने की अपील की।
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