...

चुनाव आयोग विवाद: किशन रेड्डी ने कांग्रेस पर 'दोहरे मापदंड' का आरोप लगाया

चुनाव आयोग विवाद: किशन रेड्डी ने कांग्रेस पर 'दोहरे मापदंड' का आरोप लगाया

समाचार नामा 27 Sep 2026 11:25 pm

चुनाव आयोग पर कांग्रेस का नया हमला, SIR और मतदाता सूची को लेकर उठाए गंभीर सवाल

चुनाव आयोग के हालिया प्रेस नोट को लेकर कांग्रेस और चुनाव आयोग के बीच विवाद लगातार गहराता जा रहा है

देशबन्धु 27 Sep 2026 10:32 pm

राहुल गांधी विकास पर नहीं करते बात, विदेश में करते हैं भारत को बदनाम: प्रफुल पानशेरिया

राहुल गांधी विकास पर नहीं करते बात, विदेश में करते हैं भारत को बदनाम: प्रफुल पानशेरिया

समाचार नामा 27 Sep 2026 8:33 pm

विपक्ष के पास कोई मुद्दा नहीं, इसलिए संवैधानिक संस्थाओं को निशाना बना रहा : नायब सैनी

विपक्ष के पास कोई मुद्दा नहीं, इसलिए संवैधानिक संस्थाओं को निशाना बना रहा : नायब सैनी

समाचार नामा 27 Sep 2026 6:15 pm

भारत का यूपीआई तेजी से आगे बढ़ रहा है

नई दिल्ली, नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) द्वारा संचालित यूपीआई भुगतान प्रणाली लेनदेन की मात्रा के लिहाज से दुनिया की सबसे बड़ी रिटेल फास्ट-पेमेंट सिस्टम है।

देशबन्धु 27 Sep 2026 5:56 pm

राष्ट्राध्यक्षों द्वारा हिंदी गाने गाकर सांस्कृतिक जुड़ाव की रणनीतिक

दिल्ली में हुए ब्रिक्स 2026 शिखर सम्मेलन के दौरान, मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने दो लोकप्रिय हिंदी फ़िल्मी गाने गाकर सबका ध्यान खींचा। उन्होंने ख्वाब हो तुम या कोई हकीकत और दोस्त, दोस्त न रहा, प्यार प्यार न रहा गाने गाए। इससे पहले, फरवरी 2026 में प्रधानमंत्री मोदी की मलेशिया यात्रा के दौरान, अनवर ने 'कभी खुशी कभी गम' फ़िल्म के गाने बोले चूड़ियाँ के साथ अपना आधिकारिक वीडियो एडिट करके उसमें बॉलीवुड का तड़का लगाया था। अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों में हिंदी गानों की भूमिका विदेशी नेता और अधिकारी लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों में हिंदी गाने गाते रहे हैं। जैसा कि कहा जाता है, संगीत की कोई भाषा नहीं होती। यह सीधे दिल से निकलता है। समय के साथ, कई गैर-भारतीय हस्तियों ने वैश्विक आयोजनों में हिंदी गाने गाकर दर्शकों का दिल जीता है। इसके कुछ उल्लेखनीय उदाहरण नीचे दिए गए हैं: (a)अगस्त 2023 में, भारत में तत्कालीन ब्रिटिश उच्चायुक्त सर अलेक्जेंडर एलिस ने किशोर कुमार की जयंती के अवसर पर 'ब्लैकमेल' (1973) फ़िल्म का गाना पल पल दिल के पास गाते हुए एक वीडियो पोस्ट किया। उन्होंने यह भी बताया कि उनकी पसंदीदा हिंदी फ़िल्में 'शोले' और 'चुपके-चुपके' हैं। यह सांस्कृतिक कूटनीति का एक बेहद व्यक्तिगत रूप था, क्योंकि ब्रिटिश राजनयिक ने खुद हिंदी गाना गाने में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया था। (b)27 से 28 अप्रैल 2018 तक चीनी विदेश मंत्रालय द्वारा आयोजित वुहान शिखर सम्मेलन के दौरान, हुबेई संग्रहालय में एक कार्यक्रम में चीनी संगीतकारों ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लिए हिंदी फ़िल्म 'ये वादा रहा' (1982) के गाने तू तू है वही दिल ने जिसे अपना कहा की धुन (इंस्ट्रूमेंटल) बजाई। प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट किया, विदेशी धरती पर भारतीय संगीत सुनकर बहुत अच्छा लगा... हमारे कलाकार दुनिया भर में लोकप्रिय हैं। दिवंगत ऋषि कपूर, जो मूल गाने में नज़र आए थे, ने भी ट्वीट किया, सम्मानित महसूस कर रहा हूँ। (c) मार्च 2021 में, भारतीय राजदूत तरनजीत सिंह संधू के लिए आयोजित एक डिनर में, जिसमें अमेरिकी नौसेना के चीफ ऑफ नेवल ऑपरेशन्स एडमिरल माइकल गिल्डे भी शामिल हुए थे, अमेरिकी नौसेना के आधिकारिक बैंड 'सी चैंटर्स' ने हिंदी फिल्म 'स्वदेश' (2004) का गाना ये जो देश है तेरा पेश किया। अमेरिकी नौसेना बैंड ने ट्वीट किया, नौसेना बैंड 1925 से ही नौसेना को सहयोगी देशों से जोड़ रहा है! होली की शुभकामनाएं। राजदूत संधू ने जवाब दिया, यह दोस्ती का ऐसा बंधन है जिसे तोड़ा नहीं जा सकता। (d) 2019 में, महात्मा गांधी की 150वीं जयंती मनाने के लिए 124 देशों के संगीतकारों ने भक्ति गीत वैष्णव जन तो तेने कहिए की एक मेडली (कई धुनों का मिश्रण) पेश की। भारत के विदेश मंत्रालय की अगुवाई वाली इस पहल में आर्मेनिया से अंगोला और आइसलैंड से इराक तक के देशों के कलाकार शामिल थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका संकलन वीडियो जारी किया। राजनीतिक वैज्ञानिक इस घटनाक्रम को सांस्कृतिक कूटनीति या बॉलीवुड कूटनीति कहते हैं। इसमें सॉफ्ट पावर के एक साधन के तौर पर हिंदी सिनेमा का इस्तेमाल किया जाता है और कूटनीतिक प्रोटोकॉल के साथ सांस्कृतिक जुड़ाव में संतुलन बनाया जाता है। प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने इस तरीके को अपनाने में काफी कुशलता दिखाई है। कूटनीति में तनाव कम करना और मनोवैज्ञानिक तालमेल जो विदेशी नेता या प्रतिनिधि हिंदी गाने गाते हैं या सीधे तौर पर भारतीय सांस्कृतिक चीजों से जुड़ते हैं, वे पब्लिक डिप्लोमेसी (जन-कूटनीति) के एक बहुत असरदार तरीके का इस्तेमाल करते हैं। आज के अंतरराष्ट्रीय संबंधों में, जहां प्रभाव राजनीतिक या सैन्य दबाव के बजाय आकर्षण पर टिका होता है, किसी देश की लोकप्रिय संस्कृति से सीधा जुड़ाव कूटनीतिक तनाव को कम करता है। इससे तुरंत सद्भावना बढ़ती है, हालांकि अगर यह दिखावा लगे तो बनावटी भी लग सकता है। पारंपरिक कूटनीतिक प्रोटोकॉल औपचारिक स्क्रिप्ट, राजकीय भोज और तयशुदा बयानों पर निर्भर करता है, जो अक्सर पक्षों के बीच दूरी बढ़ाते हैं। जब कोई विदेशी प्रतिनिधि कोई सांस्कृतिक काम करता है, जैसे कि कोई मशहूर हिंदी गाना गाना, तो आम प्रोटोकॉल से हटकर किया गया यह काम अपनापन, विनम्रता और कोशिश को दिखाता है; लेकिन अगर इसे अच्छी तरह से नहीं लिया गया, तो इसके अजीब लगने का खतरा भी रहता है। इस संरचनात्मक बदलाव से कई तरह से यह बदलता है कि राजनयिक बातचीत को कैसे देखा जाता है: सम्मान और तैयारी का संकेत: किसी विदेशी भाषा में गाने के बोल सीखना काफी मेहनत का काम है, जो यह दिखाता है कि आने वाला नेता मेज़बान देश की सांस्कृतिक पहचान को महत्व देता है। राजनीतिक हस्तियों को मानवीय रूप देना: यह तरीका किसी नेता के बारे में जनता की सोच को एक औपचारिक सरकारी प्रतिनिधि से बदलकर एक ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश करता है जिससे आसानी से जुड़ा जा सके। इससे अहम बातचीत के दौरान भावनात्मक दूरियां कम होती हैं, हालांकि अगर यह दिखावटी लगे तो इसका असर सीमित हो सकता है। साझा सांस्कृतिक और सिनेमाई मूल्यों से जुड़ाव हिंदी सिनेमा (बॉलीवुड) और संगीत ऐतिहासिक रूप से वैश्विक 'सॉफ्ट पावर' के बड़े माध्यम रहे हैं। दशकों से, भारतीय सिनेमा मध्य एशिया, मध्य पूर्व, अफ्रीका, पूर्वी यूरोप और दक्षिण-पूर्व एशिया में लोकप्रिय रहा है। जब गैर-भारतीय नेता शास्त्रीय या आधुनिक हिंदी गाने गाते हैं, तो वे लोगों की पुरानी सांस्कृतिक यादों को ताज़ा करते हैं: जैसे सोवियत-बाद के देशों और रूस में, सर पे लाल टोपी रूसी गाना, जिसे मेरा जूता है जापानी के नाम से भी जाना जाता है, 1955 की बॉलीवुड क्लासिक फ़िल्म 'श्री 420', जिसमें राज कपूर मुख्य भूमिका में थे, को बहुत ज़्यादा लोकप्रियता मिली। इस वापसी ने सोवियत-युग की यादें ताज़ा कर दीं और शीत युद्ध के बाद के रिश्तों को फिर से मज़बूत किया, जिससे राज कपूर एक सांस्कृतिक आइकन के तौर पर उभरे। दक्षिण-पूर्व एशिया में, रामायण और महाभारत जैसे साझा महाकाव्य और बॉलीवुड संगीत, गहरी सांस्कृतिक और भाषाई जड़ों वाले रिश्तों को और मज़बूत करते हैं। पश्चिमी देशों में, जिनमें अमेरिका और ब्रिटेन शामिल हैं, आज के दौर के ग्लोबल हिट गाने और क्रॉसओवर ट्रैक प्रभावशाली भारतीय समुदाय और वहाँ के मतदाताओं से जुड़ते हैं। भारतीय जनता और प्रवासी समुदायों से सीधा जुड़ाव: सरकार के मंत्रियों तक सीमित पारंपरिक विदेश नीति की पहलों के उलट, सांस्कृतिक जुड़ाव की कोशिशें ऊँचे राजनयिक चैनलों को छोड़कर सीधे आम जनता और दुनिया भर में बसे भारतीयों से जुड़ती हैं। इससे तुरंत सद्भावना बनाने वाली बात और पुख्ता होती है। भारत का प्रवासी समुदाय दुनिया में सबसे बड़ा है। फिर भी, इसका फ़ायदा इस बात पर निर्भर करता है कि यह पहल कितनी भरोसेमंद और लंबे समय तक चलने वाली लगती है। भारत की वैश्विक सांस्कृतिक पहचान के साथ तालमेल आज की भारतीय विदेश नीति में, 'सॉफ्ट पावर' की रणनीतियाँ - जैसे कि अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का दुनिया भर में विस्तार और अंतर्राष्ट्रीय शैक्षणिक आदान-प्रदान - देश की पहचान को 'विश्वमित्र' (एक वैश्विक दोस्त) और एक सांस्कृतिक शक्ति के तौर पर पेश करने में अहम भूमिका निभाती हैं। कड़े रुख में नरमी: उदाहरण के लिए, ब्रिक्स 2026 के दौरान माहौल काफी तनावपूर्ण था क्योंकि डी-डॉलराइजेशन (डॉलर का इस्तेमाल कम करना), अमेरिका की टैरिफ़ की धमकियाँ, रूस-यूक्रेन की स्थिति और भारत-चीन सीमा वार्ता जैसे कई मुद्दे एक साथ चल रहे थे। फिर भी, मलेशियाई प्रधानमंत्री के एक साधारण गाने ने तनाव को कम कर दिया। इसी तरह, रिश्तों को बेहतर बनाने के लिए, चीन ने 2018 में डोकलाम विवाद के ठीक बाद वुहान में तू तू है वही गाना बजाया। संगीत चुपचाप यह संदेश देता है: भले ही सीमा पर हमारे बीच टकराव हो, लेकिन हम एक धुन तो साझा कर ही सकते हैं। लोगों के बीच जुड़ाव की ताकत: जब 2023 में एलेक्स एलिस ने पल पल दिल के पास गाना गाया, तो UK हाई कमीशन के इंस्टाग्राम पर लोगों की भागीदारी (एंगेजमेंट) 300% बढ़ गई। अचानक, ब्रिटिश राजदूत हममें से ही एक लगने लगे। इसी तरह, जब US नेवी बैंड ने स्वदेश गाना बजाया, तो अमेरिका में रहने वाले भारतीयों ने तुरंत उसका वीडियो शेयर किया। इससे ऐसा अच्छा माहौल बना जो किसी भी सरकारी प्रेस रिलीज़ से नहीं बन सकता था। भू-राजनीतिक संतुलन: मलेशिया जैसे छोटे देश चीन या US के गुटों में बंधकर नहीं रहना चाहते। ब्रिक्स में हिंदी गाना गाकर, मलेशिया भारत को यह संकेत देता है: हम आपकी अपनी शर्तों पर कद्र करते हैं। यह वैसा ही है जैसे भारत व्लादिवोस्तोक फ़ोरम में कोई रूसी गाना गाए—यह तटस्थता दिखाने का एक सूक्ष्म और कम खर्चीला तरीका है जिसके बड़े फ़ायदे हो सकते हैं, हालांकि यह तरीका तब सबसे अच्छा काम करता है जब इसे सिर्फ़ दिखावा न समझा जाए। गाने से कड़े रुख नहीं बदलते। हिंदी गाना गाने से टैरिफ कम करने या UN में किसी मुद्दे पर भारत का समर्थन पाने जैसी समस्याएँ हल नहीं हो सकतीं। एलेक्स एलिस ने गाना गाया, लेकिन फिर भी UK ने आसानी से वीज़ा नहीं दिया; इससे पता चलता है कि सांस्कृतिक इशारे बातचीत के मुख्य रुख को बदले बिना माहौल को नरम बना सकते हैं। इसमें हमेशा दिखावे (tokenism) का जोखिम रहता है। सिर्फ़ गाना गाने से व्यापार घाटा या भुगतान की समस्याएँ ठीक नहीं होंगी। प्रतीकात्मक इशारों के साथ व्यावहारिक कदम भी उठाने ज़रूरी हैं। निष्कर्ष हिंदी गानों के इस्तेमाल ने पारंपरिक कूटनीतिक प्रोटोकॉल से आगे बढ़कर नेताओं के बीच व्यक्तिगत तालमेल को मज़बूत किया। जब विदेशी मेहमान हिंदी संगीत को अपनाते हैं, तो वे भारत के सांस्कृतिक कूटनीति मॉडल को मान्यता देते हैं। आपसी सांस्कृतिक सराहना एक बराबरी और सम्मान वाला आधार बनाती है जो आसान आर्थिक और भू-राजनीतिक बातचीत में मदद करता है, लेकिन यह व्यापक कूटनीतिक टूलकिट का सिर्फ़ एक हिस्सा है।

प्रभासाक्षी 27 Sep 2026 5:43 pm

तमिलनाडु सरकार का बड़ा फैसला, कानून-व्यवस्था विंग को आरटीआई के दायरे से किया बाहर

तमिलनाडु सरकार का बड़ा फैसला, कानून-व्यवस्था विंग को आरटीआई के दायरे से किया बाहर

समाचार नामा 27 Sep 2026 4:17 pm

अमेरिका-ईरान युद्ध- अगले हफ्ते तय होगी शेयर बाजार की चाल

मुंबई, भारतीय शेयर बाजार के लिए अगला हफ्ता काफी महत्वपूर्ण होने वाला है। इस दौरान कच्चा तेल, अमेरिका-ईरान युद्ध अपडेट और घरेलू आर्थिक आंकड़े जैसे ऑटो सेल्स, राजकोषीय घाटा, पीएमआई और इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन बाजार की चाल निर्धारित करेंगे।

देशबन्धु 27 Sep 2026 2:53 pm

केटी रामाराव ने पार्टी के अन्य नेताओं के साथ देखी एक्टर नानी की फिल्म ‘द पैराडाइज’

हैदराबाद, 27 सितंबर (आईएएनएस)। भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के कार्यकारी अध्यक्ष केटी रामा राव ने पार्टी के अन्य नेताओं के साथ हैदराबाद के एक थिएटर में एक्टर नानी की फिल्म ‘द पैराडाइज’ देखी और फिल्म की तारीफ की।

समाचार नामा 27 Sep 2026 2:33 pm

सरकारी बैंक कर्मचारियों की हड़ताल, रविवार को खुले बैंक

नई दिल्ली, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई), बैंक ऑफ बड़ौदा (बीओबी), पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) और कई अन्य सरकारी बैंक रविवार को खुले हैं। इससे आम जनता को 28 सितंबर से 30 सितंबर तक होने वाली प्रस्तावित तीन-दिनों की देशव्यापी बैंक हड़ताल से पहले अपने बैंकिंग काम पूरे करने का मौका मिल रहा है।

देशबन्धु 27 Sep 2026 1:52 pm

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर केरल के सीएम सतीशन का तीखा हमला, इस्तीफे की मांग की

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर केरल के सीएम सतीशन का तीखा हमला, इस्तीफे की मांग की

समाचार नामा 27 Sep 2026 12:21 pm

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाराष्ट्र कांग्रेस का हल्लाबोल, 28 सितंबर को राज्यभर में प्रदर्शन

महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी (एमपीसीसी) ने शनिवार को भारतीय चुनाव आयोग (ईसीआई) के साथ अपना टकराव बढ़ाते हुए 28 सितंबर को राज्यव्यापी आंदोलन की घोषणा की।

देशबन्धु 27 Sep 2026 7:40 am

देश की पहली LNG ट्रेन को आज हरी झंडी देंगे अमित शाह

केंद्रीय मंत्री अमित शाह को 27 सितंबर यानी रविवार को साबरमती स्टेशन से देश की पहली एलएनजी संचालित ट्रेन का शुभारंभ करेंगे। यह भारतीय रेल की किफायती रेल परिचालन की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

देशबन्धु 27 Sep 2026 7:30 am

भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन आज श्रीलंका के पांच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल की करेंगे मेजबानी

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीनभारत दौरे पर आ रहे श्रीलंका की सत्तारूढ़ जनता विमुक्ति पेरामुना (जेवीपी) के पांच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल की मेजबानी करेंगे।

देशबन्धु 27 Sep 2026 7:20 am

‘अफवाहों पर विश्वास न करें’, एंटी-सोशल एक्टिविटीज बिल पर सीएम सुवेंदु अधिकारी का बड़ा बयान

'द वेस्ट बंगाल पब्लिक सेफ्टी एंड कंट्रोल ऑफ एंटी-सोशल एक्टिविटीज बिल, 2026' को लेकर चल रही मीडिया रिपोर्ट्स पर पश्चिम बंगाल के सीएम सुवेंदु अधिकारी ने प्रतिक्रिया दी है

देशबन्धु 27 Sep 2026 7:10 am

SIR पर ममता ने BJP, ECI को चेताया- 'आपने बंगाल लिया, हम दिल्ली ले लेंगे'; विपक्षी एकता पर जोर

ममता बनर्जी ने SIR विवाद पर बीजेपी और चुनाव आयोग को चेतावनी देते हुए कहा कि चुनाव आयोग से जुड़े मुद्दों पर चर्चा और विपक्ष की आगे की रणनीति तय करने के लिए दिल्ली में INDIA गठबंधन की बैठक होगी। उन्होंने कहा है कि राहुल को उन्होंने संदेश भेजा है।

सत्य हिंदी 27 Sep 2026 5:13 am

यूपी ट्रेड शो : मिट्टी के गहनों में उतरी लखनऊ की चिकनकारी

विकास की रफ्तार के साथ जिंदगी भले ही आधुनिक होती जा रही हो, लेकिन इसी के बीच मिट्टी की खुशबू और हाथों की कारीगरी से जुड़ी पुरानी संस्कृति कहीं पीछे छूटती जा रही है

देशबन्धु 26 Sep 2026 11:04 pm

ज्ञानेश कुमार को पद्म भूषण देने की बात करना लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाना है: अधीर रंजन चौधरी

पश्चिम बंगाल के भाजपा प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य के मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को पद्म भूषण दिए जाने वाले बयान पर कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने एतराज जताया। उन्होंने कहा कि ज्ञानेश कुमार को पद्म भूषण देने की बात करना लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाना है।

देशबन्धु 26 Sep 2026 10:44 pm

नशे के मुद्दे को लेकर सीएम पुष्कर धामी का 'आप' सरकार पर निशाना, बोले- हम बनाएंगे ‘उभरता पंजाब’

नशे के मुद्दे को लेकर सीएम पुष्कर धामी का 'आप' सरकार पर निशाना, बोले- हम बनाएंगे ‘उभरता पंजाब’

समाचार नामा 26 Sep 2026 10:19 pm

राष्ट्रपति ने नहीं लौटाया पश्चिम बंगाल का 'एंटी-गुंडा बिल', पीआईबी ने मीडिया रिपोर्ट्स को बताया भ्रामक

राष्ट्रपति ने नहीं लौटाया पश्चिम बंगाल का 'एंटी-गुंडा बिल', पीआईबी ने मीडिया रिपोर्ट्स को बताया भ्रामक

समाचार नामा 26 Sep 2026 9:16 pm

पश्चिम बंगाल के शहरी चुनावों के लिए सुरक्षा तैनाती जिला स्तरीय कानून व्यवस्था आकलन पर करेगी निर्भर

पश्चिम बंगाल के शहरी चुनावों के लिए सुरक्षा तैनाती जिला स्तरीय कानून व्यवस्था आकलन पर करेगी निर्भर

समाचार नामा 26 Sep 2026 8:25 pm

भाजपा और वीएचपी ने तेलंगाना के सीएम पर 'गांधी परिवार' वाली टिप्पणी को लेकर हमला बोला

भाजपा और वीएचपी ने तेलंगाना के सीएम पर 'गांधी परिवार' वाली टिप्पणी को लेकर हमला बोला

समाचार नामा 26 Sep 2026 5:18 pm

Delhi में एकजुट दिखने वाले दल UP में आपस में लड़ रहे, INDIA Bloc की यह कैसी एकता है?

दिल्ली में विपक्षी गठबंधन INDIA के भीतर एक बार फिर एकजुटता की कवायद तेज हो गयी है। चुनाव आयोग से संबंधित मुद्दे पर साझा लड़ाई लड़ने की तैयारी हो रही है, नेताओं के बीच बातचीत बढ़ी है और दिल्ली में सभी विपक्षी दलों की बैठक भी बुला ली गई है। लेकिन सियासत का असली सवाल यह है कि क्या दिल्ली की एकजुटता उत्तर प्रदेश की जमीन तक पहुंच पाएगी? क्योंकि जिस गठबंधन को दिल्ली में एक मंच पर खड़ा करने की कोशिश हो रही है, उसी गठबंधन के सबसे बड़े चुनावी मैदान उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच खींचतान लगातार खुलकर सामने आ रही है। उल्लेखनीय है कि तृणमूल कांग्रेस नेता अभिषेक बनर्जी और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी चुनाव आयोग के मुद्दे पर विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने और उन दलों से संवाद बढ़ाने पर चर्चा कर रहे हैं, जो हाल के महीनों में कांग्रेस से दूरी बनाए हुए हैं। इसके साथ ही INDIA गठबंधन के घटक दलों की बैठक बुलाने, संयुक्त प्रेस वार्ता और देशव्यापी साझा आंदोलन की संभावना पर भी बातचीत चल रही है। यानी ऊपर से संदेश यही है कि विपक्ष को फिर एक साथ खड़ा किया जाए। इसे भी पढ़ें: Gyanesh Kumar से तीखे सवाल क्यों पूछने लगे Modi के 'हनुमान' Chirag Paswan? क्या NDA में भी बढ़ रहे हैं मतभेद? मगर हुजूर, राजनीति में असली परीक्षा मंच पर हाथ मिलाने की नहीं, मैदान में सीट बांटने की होती है। और यहीं से कहानी बदल जाती है। उत्तर प्रदेश में 403 विधानसभा सीटों का हिसाब किताब शुरू होते ही सपा और कांग्रेस के बीच पुरानी दोस्ती की परतें खुरचने लगी हैं। कांग्रेस ज्यादा सीटों की मांग कर रही है, जबकि समाजवादी पार्टी अपनी ताकत और पिछले चुनावी प्रदर्शन के आधार पर बड़ा हिस्सा अपने पास रखना चाहती है। दोनों दल अपने-अपने स्तर पर सीटों की ताकत-कमजोरी का आकलन कर रहे हैं और गंभीर सीट बंटवारे की बातचीत अक्टूबर में शुरू होने की संभावना बताई गई है। उधर, तनाव सिर्फ बंद कमरों की बातचीत तक सीमित नहीं है। कांग्रेस के इमरान मसूद ने जल्द गठबंधन तय करने की मांग की और कहा कि भ्रम की स्थिति में कांग्रेस चुनावी तैयारी नहीं कर सकती। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने तो यहां तक कहा कि मतभेद होने पर पार्टी सभी सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार है। दूसरी तरफ सपा की सांसद इकरा हसन ने साफ कहा कि उत्तर प्रदेश में भाजपा को चुनौती देने की क्षमता अखिलेश यादव के नेतृत्व में है। इस तरह यानी एक ही गठबंधन में दो सुर, दो दावे और दो नेतृत्व केंद्र दिखाई दे रहे हैं। अखिलेश यादव का रायबरेली से पीडीए यात्रा शुरू करना भी इसी रस्साकशी का हिस्सा माना जा रहा है। रायबरेली कांग्रेस का पारंपरिक गढ़ रहा है, लेकिन अखिलेश ने वहीं से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू कर यह संदेश दिया कि उत्तर प्रदेश में जमीन किसके पास है, इसका हिसाब अलग से होगा। इसे कई राजनीतिक विश्लेषक सीट बंटवारे से पहले सपा की राजनीतिक ताकत दिखाने की कवायद के तौर पर देख रहे हैं। और अब मैनपुरी-इटावा-सैफई की धरती से शिवपाल सिंह यादव का बयान इस खींचतान में नया तड़का लगा रहा है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने कहा था कि अखिलेश रायबरेली जा सकते हैं तो कांग्रेस भी इटावा, कन्नौज और मैनपुरी जाएगी। जवाब में शिवपाल ने कहा— जाइए, अभियान चलाइए, लेकिन वहां कांग्रेस को वोट नहीं मिलेगा। उन्होंने अपने जसवंतनगर क्षेत्र का हवाला देते हुए कांग्रेस को वहां वोट न मिलने की बात कही और सपा की जीत का दावा किया। अब शिवपाल के इस बयान का राजनीतिक मतलब समझिए। यह सिर्फ किसी एक रैली या दौरे पर प्रतिक्रिया नहीं है। यह दरअसल सपा के उस आत्मविश्वास का प्रदर्शन है जिसमें वह कांग्रेस को यह याद दिलाना चाहती है कि उत्तर प्रदेश में गठबंधन की जमीन सपा के संगठन और सामाजिक आधार से तैयार होती है। मैनपुरी, इटावा और सैफई जैसे इलाकों में कांग्रेस का चुनावी अभियान सपा के लिए सिर्फ सहयोगी दल की गतिविधि नहीं, बल्कि अपने प्रभाव क्षेत्र में दूसरे सहयोगी की राजनीतिक मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। यही INDIA गठबंधन की सबसे बड़ी पहेली है। दिल्ली में सवाल है कौन-कौन साथ आएगा? उत्तर प्रदेश में सवाल है किसके साथ कौन कितनी सीट पर लड़ेगा? दिल्ली में साझा मुद्दे खोजे जा रहे हैं, लखनऊ में सीटों का हिसाब किताब चल रहा है। दिल्ली में एकजुटता की तस्वीर खींची जा रही है और यूपी में दोनों दल अपने-अपने झंडे ऊंचे करने में जुटे हैं। हम आपको याद दिला दें कि 2024 में उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस ने मिलकर 43 लोकसभा सीटें जीती थीं। सपा 37 और कांग्रेस छह पर विजयी रही थी। यही प्रदर्शन अब दोनों दलों के आत्मविश्वास और दावेदारी का आधार बन रहा है। लेकिन 2027 की विधानसभा राजनीति का गणित अलग है। सपा अपने संगठन, सामाजिक समीकरण और विधानसभा में अपनी मौजूदा ताकत के आधार पर ज्यादा हिस्सेदारी चाहती है, जबकि कांग्रेस 2024 के प्रदर्शन और राहुल गांधी की सक्रियता को अपनी बढ़ती राजनीतिक हैसियत का आधार बना रही है। यानी मामला साफ है। INDIA गठबंधन को जोड़ने की कोशिश दिल्ली में हो रही है, लेकिन उसे बचाने की असली परीक्षा उत्तर प्रदेश में होनी है। क्योंकि गठबंधन सिर्फ नेताओं की मुलाकातों और साझा तस्वीरों से नहीं चलता। गठबंधन तब चलता है जब कार्यकर्ता एक-दूसरे के लिए जमीन छोड़ें, नेता एक-दूसरे की सीमा का सम्मान करें और सीटों के बंटवारे पर दोनों पक्ष अपनी महत्वाकांक्षा को किसी साझा फार्मूले में बांध सकें। वरना दिल्ली में जितनी बार हाथ मिलेंगे, मैनपुरी और रायबरेली में उतनी ही बार पैर एक-दूसरे की जमीन पर पड़ते दिखाई देंगे। उत्तर प्रदेश की राजनीति में यही पैर कब एक-दूसरे के रास्ते में आ जाएं, इसका फैसला अक्सर दिल्ली की बैठक नहीं, जमीन पर लड़ने वाला कार्यकर्ता करता है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 26 Sep 2026 4:59 pm

Global Mission पर निकलेंगे PM Modi, दिसम्बर में US, Canada, Europe यात्रा से नया इतिहास रचने की तैयारी

भारत की कूटनीतिक गतिविधियां दिसंबर महीने में एक बड़े रणनीतिक अभियान का रूप लेने जा रही हैं और अब पूरी दुनिया मोदी की कूटनीति का कमाल देखने वाली है। हम आपको बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संभावित बहु-देशीय यात्रा में अमेरिका, कनाडा और यूरोप के कम से कम दो देशों को शामिल किए जाने की तैयारी की खबर है। हालांकि विदेश मंत्रालय ने अभी यात्रा कार्यक्रम की आधिकारिक घोषणा नहीं की है, लेकिन साफ संकेत मिल रहे हैं कि भारत दिसंबर को केवल राजनयिक यात्राओं का महीना नहीं, बल्कि व्यापारिक समझौतों, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक शक्ति-संतुलन को साधने के अवसर के रूप में देख रहा है। मोदी के इस कूटनीतिक अभियान का सबसे बड़ा पड़ाव अमेरिका हो सकता है। प्रधानमंत्री मोदी के 14-15 दिसंबर को मियामी में होने वाले जी-20 शिखर सम्मेलन में शामिल होने की संभावना है। यदि यह यात्रा होती है तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ द्विपक्षीय मुलाकात का भी रास्ता खुल सकता है। इसी मंच पर चार देशों के समूह क्वॉड की संभावित बैठक भी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होगी। इसे भी पढ़ें: Global Energy संकट के बीच 41 देशों से ईंधन खरीदकर बनाई मजबूत सप्लाई चेन, मोदी को बॉस मानने वाले PM ने भारत को लेकर क्या कहा? देखा जाये तो भारत-अमेरिका संबंधों में इस समय व्यापार और रूस से जुड़े मुद्दे सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के मुताबिक भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर लगभग सहमति बन चुकी है, लेकिन इसे लागू करने से पहले भारत अपने निर्यातकों के हित और उनकी प्रतिस्पर्धी क्षमता को सुनिश्चित करना चाहता है। साफ है कि मोदी सरकार सिर्फ समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए जल्दबाजी में नहीं है, बल्कि वह ऐसा करार चाहती है जिसका सीधा और ठोस फायदा भारतीय उद्योग और निर्यातकों को मिले। यहीं से भारत की कूटनीति का दूसरा और अधिक कठिन पक्ष सामने आता है। अमेरिका ने रूस और ईरान से जुड़े नए प्रतिबंध कानून के जरिए रूस की ऊर्जा खरीद जारी रखने वाले देशों पर भारी शुल्क लगाने की संभावना का रास्ता खोला है। इसका सीधा असर भारत की ऊर्जा रणनीति पर पड़ सकता है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ बातचीत में भारत की आर्थिक और रणनीतिक चिंताओं को रखा। अमेरिका की ओर से भी यह संकेत दिया गया कि ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर साझेदार देशों की चिंताओं को ध्यान में रखा जाएगा। यहां भारत की नीति को समझना जरूरी है। नई दिल्ली न तो रूस से संबंध तोड़ रही है और न ही अमेरिका से दूरी बना रही है। सितंबर में मोदी और व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात में ऊर्जा, रक्षा, व्यापार और यूक्रेन युद्ध पर चर्चा हुई। मोदी ने रूस के सामने भी युद्ध को समाप्त करने और संवाद व कूटनीति के रास्ते आगे बढ़ने की बात रखी। इसी दौरान भारत के विदेश मंत्री की यूक्रेन यात्रा ने यह संदेश दिया कि भारत केवल एक पक्ष से बात करने वाली शक्ति नहीं, बल्कि अलग-अलग शक्ति केंद्रों से संवाद बनाए रखने वाला देश है। यही इस वर्ष की भारतीय कूटनीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। यूक्रेन युद्ध जारी है, पश्चिम एशिया में संघर्ष और ऊर्जा आपूर्ति पर संकट की आशंका बनी हुई है, अमेरिका-रूस तनाव गहरा रहा है और चीन के साथ वैश्विक प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। ऐसे वातावरण में भारत ने रूस के साथ ऊर्जा और रक्षा संबंध बनाए रखते हुए अमेरिका के साथ व्यापार तथा रणनीतिक सहयोग बढ़ाया, यूरोप के साथ आर्थिक और सुरक्षा साझेदारी मजबूत की और यूक्रेन के साथ शांति संबंधी संवाद जारी रखा। उधर, यूरोप के मोर्चे पर भारत को बड़ी उपलब्धि मिल चुकी है। भारत और यूरोपीय संघ ने 27 जनवरी 2026 को मुक्त व्यापार समझौते की वार्ता पूरी की। सितंबर में यूरोपीय आयोग ने समझौते को हस्ताक्षर और अनुमोदन के लिए परिषद के समक्ष पेश कर दिया। प्रस्तावित समझौते के तहत यूरोपीय संघ के भारत को होने वाले 96 प्रतिशत से अधिक माल निर्यात पर शुल्क घटाने या समाप्त करने की व्यवस्था है। इसलिए दिसंबर में ब्रसेल्स में औपचारिक हस्ताक्षर की संभावना केवल व्यापारिक घटना नहीं होगी; यह भारत-यूरोप संबंधों के व्यापक रणनीतिक विस्तार का प्रतीक भी बन सकती है। कनाडा भी इसी कड़ी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मार्च 2026 में मोदी और कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते को वर्ष के अंत तक पूरा करने का लक्ष्य तय किया था। दोनों देशों ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 70 अरब कनाडाई डॉलर तक ले जाने की महत्वाकांक्षा भी जताई है। कार्नी ने जून में मोदी के साथ मुलाकात के दौरान संबंधों में सकारात्मक गति और आपूर्ति शृंखलाओं, ऊर्जा तथा खाद्य सुरक्षा के महत्व को रेखांकित किया था। यदि दिसंबर में कनाडा और ब्रसेल्स के पड़ाव जुड़ते हैं तो भारत एक ही यात्रा में उत्तर अमेरिका और यूरोप के दो महत्वपूर्ण आर्थिक केंद्रों से संबंधों को नई दिशा दे सकता है। जर्मनी में अंतर-सरकारी परामर्श की संभावित बैठक इस कूटनीतिक अभियान को और व्यापक बना सकती है। देखा जाये तो इस पूरी रणनीति का सामरिक अर्थ केवल इतना नहीं है कि भारत नए बाजार खोल रहा है। असली लक्ष्य आपूर्ति शृंखलाओं का विविधीकरण, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी सहयोग, रक्षा साझेदारी और किसी एक शक्ति-केंद्र पर अत्यधिक निर्भरता से बचाव है। भारत-यूरोपीय संघ के बीच जनवरी में हुए समझौते के साथ सुरक्षा और रक्षा साझेदारी भी आगे बढ़ी है, जिसमें समुद्री सुरक्षा, रक्षा उद्योग, प्रौद्योगिकी, साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष और आतंकवाद-रोधी सहयोग शामिल हैं। इसलिए भारतीय कूटनीति को केवल यात्राओं और बैठकों की सूची के रूप में देखना अधूरा होगा। इसके केंद्र में एक ऐसी रणनीति दिखाई देती है जिसमें वॉशिंगटन से व्यापार, मॉस्को से ऊर्जा और रणनीतिक संबंध, यूरोप से बाजार और प्रौद्योगिकी, कनाडा से संसाधन व व्यापार और यूक्रेन से शांति संवाद—सभी को एक साथ साधने की कोशिश है। बहरहाल, भारत का संदेश स्पष्ट है। बदलती विश्व व्यवस्था में नई दिल्ली किसी एक खेमे की परिधि में नहीं, बल्कि अपने आर्थिक, ऊर्जा और सुरक्षा हितों के आधार पर अनेक शक्ति केंद्रों के साथ समानांतर संवाद बनाए रखना चाहती है। यही वह संतुलन है जिसने 2026 में तमाम संघर्षों और व्यापारिक तनावों के बीच भारत को वैश्विक कूटनीति के महत्वपूर्ण संवाद केंद्रों में बनाए रखा है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 26 Sep 2026 4:30 pm

पीएम मोदी से मिले सीएम योगी, यूपी चुनाव से पहले राज्यसभा और एमएलसी चुनाव पर मंथन

पीएम मोदी से सीएम योगी आदित्यनाथ की दिल्ली में मुलाकात हुई। यूपी विधानसभा चुनाव से पहले राज्यसभा और एमएलसी चुनाव की तैयारियों को लेकर भी चर्चा की खबर है।

देशबन्धु 26 Sep 2026 4:09 pm

शेयर बाजार फिर से फिसला

मुंबई, वैश्विक चिंताओं के चलते भारतीय शेयर बाजार लगातार सातवें सप्ताह गिरावट के साथ बंद हुआ। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की लगातार बिकवाली के कारण प्रमुख बेंचमार्क सेंसेक्स और निफ्टी में 0.88 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई।

देशबन्धु 26 Sep 2026 2:24 pm

'गृह लक्ष्मी' योजना के भुगतान में जानबूझकर देरी कर रही है कर्नाटक सरकार : आर. अशोक

'गृह लक्ष्मी' योजना के भुगतान में जानबूझकर देरी कर रही है कर्नाटक सरकार : आर. अशोक

समाचार नामा 26 Sep 2026 2:21 pm

UN में Pakistan की जबरदस्त फजीहत, Terrorism पर पूछा गया सवाल तो भाग खड़े हुए Shehbaz Sharif, Jaishankar ने पाकिस्तान को चारों खाने किया चित

न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के बाहर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से आतंकवाद को लेकर सीधे सवाल किए गए, लेकिन उन्होंने जवाब देने की बजाय वहां से भाग जाना ही बेहतर समझा। इसके एक दिन बाद संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में विदेश मंत्री एस. जयशंकर के सामने जब पाकिस्तानी पत्रकार ने भारत पर आतंकवाद प्रायोजित करने का आरोप लगाते हुए सवाल किया, तो जयशंकर ने पलटकर ऐसा करारा जवाब दिया कि सवाल पूछने वाला ही कठघरे में खड़ा हो गया। जयशंकर ने दो टूक कहा, “एक आतंकवादी देश मुझसे यह सवाल पूछ रहा है। चलिए भी।” उधर, जयशंकर के बयान से गर्म हुए माहौल के बीच ही भारत ने संयुक्त राष्ट्र के मंच से पाकिस्तान पर एक और करारा हमला कर डाला। हम आपको बता दें कि भारत ने पाकिस्तान को एक ‘‘कठपुतली शासन’’ करार देते हुए संयुक्त राष्ट्र में उसके ‘‘झूठ’’ और ‘‘छल’’ पर तीखा प्रहार किया तथा चेतावनी दी कि इस्लामाबाद की ओर से लगातार जारी आतंकवाद के गंभीर परिणाम होंगे। दरअसल, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच पर अपने संबोधन के दौरान एक बार फिर कश्मीर मामले को उठाया और 2025 में भारत के साथ हुए सैन्य संघर्ष को रोकने का श्रेय अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ‘‘समय पर हस्तक्षेप’’ को दिया। शहबाज शरीफ के संबोधन के बाद भारत ने शुक्रवार रात ‘जवाब के अपने अधिकार’ का इस्तेमाल किया। इसे भी पढ़ें: 'पाकिस्तान को आतंकवाद के नतीजे भुगतने होंगे', संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत ने शहबाज़ शरीफ़ को दिया करारा जवाब संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन की प्रथम सचिव पेटल गहलोत ने कहा, ‘‘हमने एक ऐसे शासन से लोकतांत्रिक अधिकारों और मानवीय मूल्यों पर कुछ पाखंडपूर्ण उपदेश सुने हैं, जिसकी राजधानी को अपने ही लोगों से बचाने के लिए इसी समय किलेबंद किया जा रहा है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘और ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि यह सेना का, सेना द्वारा और सेना के लिए शासन है। उसकी कठपुतलियां आती-जाती रह सकती हैं, लेकिन इस बात को लेकर कोई भ्रम नहीं होना चाहिए कि असल में फैसले कौन करता है। पाकिस्तान की वास्तविकता उसके 27वें संविधान संशोधन और उसके असली शासक को दी गई आजीवन कानूनी छूट से जाहिर होती है।’’ गहलोत ने पिछले साल नवंबर में शहबाज शरीफ सरकार द्वारा पारित उस 27वें संविधान संशोधन का उल्लेख करते हुए यह बात की जिसके तहत पाकिस्तान के ‘चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज’ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को किसी भी कानूनी मुकदमे से आजीवन छूट दी गई है। उन्होंने कहा, ‘‘हमें विश्वास है कि यह महासभा पाकिस्तान और उसकी नीतियों को उनके वास्तविक स्वरूप में देखेगी, न कि उस रूप में जैसे उसके प्रतिनिधि झूठे तरीके से पेश करते हैं। साल-दर-साल झूठ दोहराने से वह सच नहीं हो जाता। पाकिस्तान का आतंकवाद, छल और दोहरा रवैया न तो उसके लिए और न ही दुनिया के लिए फायदेमंद होगा।’’ हम आपको बता दें कि शहबाज शरीफ ने अपने संबोधन में ट्रंप को उनके ‘‘दृढ़तापूर्ण और दूरदर्शी नेतृत्व’’ के लिए धन्यवाद देते हुए कहा था कि अमेरिका के राष्ट्रपति के ‘‘समय पर हस्तक्षेप’’ ने दक्षिण एशिया में करोड़ों लोगों की जान बचाई। शहबाज शरीफ ने करीब 23 मिनट के अपने संबोधन में कश्मीर मुद्दा भी उठाते हुए कहा कि यह सुनिश्चित करने के लिए कश्मीर मुद्दे का न्यायसंगत और निष्पक्ष समाधान जरूरी है कि दक्षिण एशिया फिर कभी 2025 के संघर्ष जैसी स्थिति में न पहुंचे। उधर, भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा को याद दिलाया कि शहबाज शरीफ ने ये ‘‘विचित्र टिप्पणियां’’ ऐसे समय में की हैं जब महज दो सप्ताह पहले न्यूयॉर्क और दुनिया ने 11 सितंबर के भीषण आतंकवादी हमले की 25वीं बरसी मनाई थी। गहलोत ने कहा, ‘‘इस संदर्भ को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है क्योंकि उस हमले का मुख्य साजिशकर्ता ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान की सेना की प्रमुख अकादमी के बिल्कुल पास रह रहा था।’’ गहलोत ने शरीफ द्वारा कश्मीर मुद्दा उठाए जाने को लेकर उनकी आलोचना करते हुए कहा कि केंद्रशासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है। उन्होंने कहा, ‘‘और यह हमेशा ऐसा ही रहेगा। लेकिन अगर हमें कश्मीर की ही बात करनी है तो आइए, पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर पर ध्यान देते हैं। रावलाकोट के लोगों से बेमतलब की उन हत्याओं, बर्बर हिंसा और बुनियादी अधिकारों से वंचित किए जाने के बारे में पूछिए जिनका वे लंबे समय से सामना कर रहे हैं।’’ हम आपको बता दें कि पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 विवादित सीट को लेकर पिछले कई महीनों में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। इसे लेकर सुरक्षा बलों ने कार्रवाई भी की और हाल में तथाकथित विधानसभा के लिए हुए चुनावों में धांधली के आरोप भी लगे। गहलोत ने सीमा पार आतंकवाद की पाकिस्तान की ‘‘लंबे समय से बरकरार नीति’’ की आलोचना करते हुए कहा कि भारत ने पिछले साल दिखा दिया था कि ‘‘आतंकवादियों के पास न भागने की जगह होगी और न छिपने की।’’ गहलोत ने कहा, ‘‘हम आतंकवाद के खिलाफ आत्मरक्षा के अपने अधिकार का इस्तेमाल करेंगे। पाकिस्तान की ओर से आतंकवाद जारी रहने के परिणाम होंगे। इससे स्वाभाविक रूप से उन व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठेंगे, जिनकी बुनियाद मित्रता और सद्भावना पर रखी गई थी।’’ उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में शहबाज शरीफ द्वारा व्यक्त किए गए विचार ‘‘ऐसे लोगों की ओर से आए हैं जिनका कट्टरता और नफरत का लंबा इतिहास रहा है।’’ गहलोत ने कहा, ‘‘इस महासभा में धार्मिक असहिष्णुता पर उस शासन की ओर से टिप्पणियां की गईं, जिसकी व्यवस्था का एक प्रमुख आधार ईशनिंदा कानून हैं। दुनिया जानती है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है। कोई भी दिखावटी खोखली बात दुनिया को गुमराह नहीं कर सकती।’’ दूसरी ओर, जयशंकर के बयान की बात करें तो आपको बता दें कि मामला शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में उस समय गरमा गया, जब जयशंकर और लाइबेरिया की विदेश मंत्री सारा बेइसोलो न्यान्ती समुद्री परिवहन और नाविकों की सुरक्षा को लेकर बनाए गए ‘ग्रुप ऑफ फ्रेंड्स’ की जानकारी दे रहे थे। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद एक पाकिस्तानी पत्रकार ने जयशंकर से सवाल किया कि भारत पाकिस्तान में कथित आतंकवाद को प्रायोजित करना कब बंद करेगा? सवाल पूरा होते ही जयशंकर ने पलटवार किया, “एक आतंकवादी देश मुझसे यह सवाल पूछ रहा है। चलिए भी।” भारत के संयुक्त राष्ट्र में स्थायी प्रतिनिधि हरिश पर्वतनेनी ने भी साफ कर दिया कि जवाब सुना जा चुका है और वह बिल्कुल स्पष्ट है। उधर, संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने भाषण में बड़ी बड़ी बातें करने वाले शहबाज शरीफ से आतंकवाद के मुद्दे पर सवाल हुआ तो वह भाग खड़े हुए। हम आपको बता दें कि संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में प्रवेश करते समय पत्रकारों ने उनसे सीधे पूछा— “प्रधानमंत्री, आप आतंकवादियों को पनाह देना कब बंद करेंगे?” इस पर शहबाज शरीफ ने कोई जवाब नहीं दिया। बाद में बाहर निकलते समय उनसे लश्कर-ए-तैयबा के प्रमुख हाफिज सईद पर कार्रवाई को लेकर सवाल किया गया। इस सवाल पर भी उन्होंने चुप्पी साधी और भाग खड़े हुए। बहरहाल, संयुक्त राष्ट्र के मंच पर पाकिस्तान भारत पर आतंकवाद के आरोप लगाने पहुंचा, लेकिन सवाल जब उसके अपने दरवाजे पर पहुंचा तो जवाब गायब हो गया।

प्रभासाक्षी 26 Sep 2026 11:52 am

SIR विवाद पर विपक्ष में बढ़ी हलचल, ममता बनर्जी ने राहुल गांधी से की बात; INDIA ब्लॉक की बैठक की मांग

इस घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू पश्चिम बंगाल में लंबे समय से राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी रहे तृणमूल कांग्रेस (TMC) और सीपीआई (एम) के बीच संवाद है। जानकारी के मुताबिक, ममता बनर्जी ने सीपीआई (एम) के महासचिव एमए बेबी से भी बात की।

देशबन्धु 26 Sep 2026 10:58 am

Jan Suraaj Delhi Plan: बिहार के बाद दिल्ली में संगठन खड़ा करेगी JSP, MCD से विधानसभा तक चुनाव लड़ने की तैयारी

Jan Suraaj Delhi Plan: बिहार के बाद दिल्ली में संगठन खड़ा करेगी JSP, MCD से विधानसभा तक चुनाव लड़ने की तैयारी

समाचार नामा 26 Sep 2026 10:47 am

Vijay vs DMK: 'मेरी मोटी चमड़ी आलोचना से बचाती है', विजय ने DMK पर साधा निशाना

Vijay vs DMK: 'मेरी मोटी चमड़ी आलोचना से बचाती है', विजय ने DMK पर साधा निशाना

समाचार नामा 26 Sep 2026 10:40 am

SIR Row: ज्ञानेश कुमार को लेकर कांग्रेस का बड़ा ऐलान, देशभर में प्रदर्शन के बाद वेणुगोपाल ने कही ये बात

SIR Row: ज्ञानेश कुमार को लेकर कांग्रेस का बड़ा ऐलान, देशभर में प्रदर्शन के बाद वेणुगोपाल ने कही ये बात

समाचार नामा 26 Sep 2026 8:30 am

12 साल पहले मोदी ने ‘मेक इन इंडिया’ का संकल्प लिया, अब यूपी 1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य हासिल करेगा: अमित शाह

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने शुक्रवार को यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो के उद्घाटन समारोह में कहा कि आज का दिन मणिकांचन योग लेकर आया है

देशबन्धु 25 Sep 2026 10:25 pm

‘सोने की चिड़िया’ भारत में हुनरमंदों को नहीं मिला मंच, यूपी ने लोकल उत्पादों को ग्लोबल पहचान दी: योगी

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि भारत कभी दुनिया में ‘सोने की चिड़िया’ के रूप में जाना जाता था। लेकिन देश की शक्तियां विभाजित हुईं तो भारत गुलाम हुआ

देशबन्धु 25 Sep 2026 10:22 pm

सीईसी ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें वरना महाभियोग की कार्रवाई की जाए: राशिद अल्वी

सीईसी ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें वरना महाभियोग की कार्रवाई की जाए: राशिद अल्वी

समाचार नामा 25 Sep 2026 8:27 pm

'भगवा रंग की बसें कांग्रेस को पसंद नहीं आएंगी', मध्य प्रदेश के सीएम मोहन यादव

'भगवा रंग की बसें कांग्रेस को पसंद नहीं आएंगी', मध्य प्रदेश के सीएम मोहन यादव

समाचार नामा 25 Sep 2026 8:08 pm

Election Commission भेदभाव तो करता है! आम लोगों और VIP Voters के साथ आखिर अलग अलग सलूक क्यों होते हैं?

नई दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर चल रही कवायद के बीच एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने पूरी प्रक्रिया पर फिर से बहस तेज कर दी है। हम आपको बता दें कि जिन प्रमुख और चर्चित मतदाताओं के नाम पर एसआईआर के दौरान नोटिस जारी हुए थे, उनमें से अधिकांश के विवरण और दस्तावेजों का सत्यापन अब पूरा कर लिया गया है और उन्हें अंतिम मतदाता सूची में शामिल किए जाने के लिए हरी झंडी मिल गई है। इनमें पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, विदेश मंत्री एस जयशंकर, दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी जैसे चर्चित नाम शामिल हैं। इसके अलावा विदेश सचिव विक्रम मिस्री, पूर्व नीति आयोग के उपाध्यक्ष रहे अरविंद पनगढ़िया, भाजपा विधायक कैलाश गहलोत, पूर्व सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी, सीबीआई निदेशक प्रवीण सूद और दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग सहित कई अन्य प्रमुख लोगों को भी एसआईआर के दौरान नोटिस मिला था। चुनाव अधिकारियों के अनुसार इन मामलों की व्यक्तिगत रूप से जांच की गई और संबंधित मतदाताओं से आवश्यक जानकारी तथा दस्तावेज हासिल किए गए। सत्यापन पूरा होने के बाद इनके नाम अंतिम मतदाता सूची में शामिल किए जाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई है। इसे भी पढ़ें: Gyanesh Kumar से तीखे सवाल क्यों पूछने लगे Modi के 'हनुमान' Chirag Paswan? क्या NDA में भी बढ़ रहे हैं मतभेद? दरअसल, इन चर्चित नामों को नोटिस मिलने के बाद सवाल उठने लगे थे कि आखिर ऐसे लोगों के नाम भी एसआईआर की जांच के दायरे में कैसे आ गए? चुनाव अधिकारियों का कहना है कि मतदाता विवरण में कुछ तार्किक विसंगतियां मिली थीं या फिर मौजूदा विवरण पिछली गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया से जुड़े अभिलेखों से मेल नहीं खा रहा था। इसी आधार पर संबंधित मतदाताओं को नोटिस जारी किए गए। अधिकारियों के मुताबिक नोटिस मिलना अपने आप में मतदाता सूची से नाम काटे जाने का संकेत नहीं है, बल्कि यह संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने और जरूरी दस्तावेज उपलब्ध कराने का अवसर देता है। लेकिन असली सवाल यहीं से पैदा होता है। दिल्ली में एसआईआर के तहत करीब 33 लाख मतदाताओं को नोटिस जारी किए जाने की बात सामने आई है। यानी यह प्रक्रिया केवल कुछ चर्चित चेहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर लाखों आम मतदाताओं पर पड़ रहा है। नोटिस जारी होने के बाद आम मतदाता को निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपनी पात्रता और विवरण साबित करने के लिए दस्तावेज जुटाने पड़ रहे हैं। दूसरी तरफ चर्चित और प्रभावशाली लोगों के मामलों में अधिकारियों द्वारा संपर्क कर दस्तावेज जुटाने और सत्यापन पूरा करने की प्रक्रिया सामने आई है। यही अंतर अब एसआईआर की पूरी कवायद के केंद्र में आ गया है। कुछ रिपोर्टों में आरोप लगाया गया है कि दिल्ली के एसआईआर में अधिकारियों के स्तर पर वीआईपी मतदाताओं की पहचान कर उनके सत्यापन के लिए अलग तरह की सुविधा उपलब्ध कराई गई। इन रिपोर्टों के अनुसार सामान्य मतदाताओं को जहां नोटिस के बाद सुनवाई और दस्तावेजी प्रक्रिया से गुजरना पड़ रहा है, वहीं प्रभावशाली मतदाताओं के मामलों में प्रक्रिया अपेक्षाकृत आसान रही। यह आरोप चुनावी प्रक्रिया की समानता और पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। हालांकि चुनाव अधिकारियों का आधिकारिक पक्ष यह है कि नोटिस जारी करने का आधार मतदाता के पद या प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि एसआईआर के दौरान सामने आई विसंगतियां हैं और सभी मामलों में निर्धारित प्रक्रिया के तहत सत्यापन किया जा रहा है। हम आपको बता दें कि अंतिम मतदाता सूची चार नवंबर को प्रकाशित की जानी है, जबकि नोटिसों के निस्तारण की प्रक्रिया 29 अक्टूबर तक पूरी की जानी है। इस पूरे घटनाक्रम में फिलहाल सबसे अहम बात यही है कि जिन चर्चित मतदाताओं के नाम एसआईआर के दौरान सवालों के घेरे में आए, वे सत्यापन के बाद अंतिम सूची में जगह पाने की स्थिति में हैं। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि लाखों आम मतदाताओं के मामलों का निस्तारण किस गति और किस समान प्रक्रिया के तहत होता है और चार नवंबर को प्रकाशित होने वाली अंतिम सूची एसआईआर को लेकर उठे सवालों का कितना स्पष्ट जवाब देती है। बहरहाल, इतना तो दिख ही रहा है कि चुनाव आयोग की ओर से आम और खास में फर्क किया जा रहा है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 25 Sep 2026 4:36 pm

दिल्ली से देहरादून तक गरमाई सियासत: CEC के खिलाफ सड़कों पर उतरी कांग्रेस, पुलिस से धक्का-मुक्की के बीच दी उग्र आंदोलन की चेतावनी

दिल्ली से देहरादून तक गरमाई सियासत: CEC के खिलाफ सड़कों पर उतरी कांग्रेस, पुलिस से धक्का-मुक्की के बीच दी उग्र आंदोलन की चेतावनी

समाचार नामा 25 Sep 2026 4:35 pm

Gyanesh Kumar से तीखे सवाल क्यों पूछने लगे Modi के 'हनुमान' Chirag Paswan? क्या NDA में भी बढ़ रहे हैं मतभेद?

अब तक चुनाव आयोग पर सवाल उठाने वालों में विपक्ष सबसे आगे था, लेकिन अब सत्ता पक्ष के भीतर से भी चुनाव आयोग को लेकर आवाज उठने लगी है। यही इस पूरे विवाद का सबसे अहम पहलू है। केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के प्रमुख सहयोगी चिराग पासवान ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से साफ कहा है कि अगर चुनाव प्रक्रिया को लेकर लोगों के मन में सवाल उठ रहे हैं तो चुनाव आयोग को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। उनका कहना है कि आयोग को सफाई राहुल गांधी को नहीं, बल्कि देश की जनता को देनी चाहिए। हम आपको बता दें कि मामला इसलिए गरम है क्योंकि चुनाव आयोग के भीतर ही मतभेदों की खबर सामने आई है। द इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल के मुताबिक तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में कम से कम 14 मौकों पर मुख्य चुनाव आयुक्त के नेतृत्व में लिए जा रहे फैसलों और निर्देशों पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं। ये आपत्तियां मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े कामकाज, प्रपत्रों में बदलाव, आंकड़ों और मतदाता सूची से नाम हटाने जैसे मुद्दों को लेकर थीं। इसे भी पढ़ें: Chirag Paswan ने पटना में कहा, Paper Leak रोकने के लिए सख्त कदम जरूरी अब यहां से कहानी विपक्ष बनाम चुनाव आयोग की सीधी लड़ाई से आगे निकल जाती है। विपक्ष पहले से आरोप लगा रहा है कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल हैं। राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग तक कर दी है। कांग्रेस सहित विपक्षी दल संसद में भी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी में हैं। उधर, सत्ता पक्ष की तरफ से भाजपा ने इन आरोपों को खारिज किया है। भाजपा ने कहा है कि आयोग के भीतर अलग-अलग राय होना किसी संस्था के कामकाज का सामान्य हिस्सा है और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए। भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने भी इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कहा कि उसमें किसी चुनाव आयुक्त का प्रत्यक्ष या अनौपचारिक बयान नहीं है। दूसरी तरफ चुनाव आयोग का कहना है कि आंतरिक टिप्पणियां, तकनीकी सुझाव और आपत्तियां किसी बहुसदस्यीय संस्था की सामान्य निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हैं और विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं। लेकिन चिराग पासवान के बयान ने इस पूरे मामले का राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। चिराग ने विपक्ष के आरोपों को सही ठहराने के बजाय मुद्दे की जड़ पर हाथ रखा है, यानी उन्होंने जनता के भरोसे की बात कही है। उनका तर्क है कि विपक्ष राजनीति करेगा, यह उसका काम है, लेकिन अगर आम मतदाता ही चुनाव प्रक्रिया को लेकर संदेह करने लगे तो यह गंभीर बात है। इसलिए चुनाव आयोग को मजबूती से अपना पक्ष जनता के सामने रखना चाहिए। देखा जाये तो राजनीति में यही वह मोड़ होता है जहां बात आरोप-प्रत्यारोप से निकलकर भरोसे के सवाल पर आ जाती है। चुनाव जीतने-हारने का फैसला जनता करती है, लेकिन चुनाव कराने वाली संस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होने लगें तो उसका असर किसी एक दल की राजनीति तक सीमित नहीं रहता। खासकर तब, जब आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों की संख्या भी सामने आ चुकी हो और बाहर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा हो। ऊपर से चुनाव आयोग की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त के प्रस्तावित युवा मतदाता जागरूकता कार्यक्रमों के स्थगित होने की खबर भी आई है। आयोग ने इसे कार्यक्रमों की तारीखों में होने वाले सामान्य बदलाव से जोड़ा है, जबकि सूत्रों के मुताबिक ये कार्यक्रम अनिश्चितकाल के लिए टाल दिए गए हैं। यानी फिलहाल सियासत की गेंद चुनाव आयोग के पाले में है। विपक्ष सवालों की बौछार कर रहा है, भाजपा उसका बचाव कर रही है, लेकिन अब सहयोगी दल की तरफ से भी यही कहा जा रहा है कि सवाल उठ रहे हैं तो जवाब साफ-साफ दिया जाए। यही इस विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश है। मामला अब सिर्फ यह नहीं रह गया कि कौन किस पर आरोप लगा रहा है; असली सवाल यह है कि चुनावी व्यवस्था को लेकर जनता के मन में उठ रहे संदेहों का जवाब कौन और किस तरह देगा। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 25 Sep 2026 4:32 pm

एसआईआर को लेकर ईसीआई में असहमति के विवाद पर पप्पू यादव बोले-'ज्ञानेश कुमार ने संविधान का गला घोंटा'

एसआईआर को लेकर ईसीआई में असहमति के विवाद पर पप्पू यादव बोले-'ज्ञानेश कुमार ने संविधान का गला घोंटा'

समाचार नामा 25 Sep 2026 4:29 pm

29 नवंबर को दुनिया देखेगी RSS की ताकत, Centenary Year के तहत सालभर चले अभियान का Delhi में बड़े आयोजन के साथ होगा समापन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष का सालभर चला अभियान अब अपने अंतिम चरण में पहुंच रहा है। पिछले साल विजयादशमी से शुरू हुई गतिविधियों का समापन 29 नवंबर को नई दिल्ली में एक बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम के साथ प्रस्तावित है, जिसे संघ प्रमुख मोहन भागवत संबोधित करेंगे। संघ की योजना के मुताबिक इस आयोजन में करीब एक लाख स्वयंसेवक गणवेश में और लगभग 50 हजार आमंत्रित नागरिक शामिल हो सकते हैं। हम आपको बता दें कि संघ ने अपने सौवें वर्ष को केवल स्मरण और उत्सव तक सीमित रखने की बजाय देशव्यापी जनसंपर्क और सामाजिक संवाद के अभियान के रूप में आगे बढ़ाया। इसकी योजना में गांव-गांव और बस्ती-बस्ती संपर्क, सामाजिक समरसता बैठकें, हिंदू सम्मेलन, प्रबुद्ध नागरिकों के साथ संवाद तथा युवाओं के लिए विशेष कार्यक्रम शामिल किए गए। वर्ष की शुरुआत से ही संघ ने अपने संगठनात्मक ढांचे को व्यापक सामाजिक संपर्क से जोड़ने पर जोर दिया। इसे भी पढ़ें: Vanakkam Poorvottar: Meghalaya में BJP ने कर दिया बहुत बड़ा खेल, एक झटके में बदल डाला विधानसभा का पूरा गणित इस अभियान का एक महत्वपूर्ण पहलू सामाजिक समरसता रहा। संघ की घोषित योजना के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों के मंडलों और शहरी बस्तियों में सम्मेलन आयोजित किए गए, जबकि देश के विभिन्न हिस्सों में सामाजिक सद्भाव बैठकों के माध्यम से जाति, क्षेत्र और सामाजिक विभाजन से ऊपर उठकर संवाद का प्रयास किया गया। संघ की योजना में 11,360 खंडों और नगरों में सामाजिक सद्भाव बैठकों तथा 924 जिलों में प्रमुख नागरिकों के साथ संवाद का उल्लेख किया गया था। सालभर चले इस अभियान की पहुंच का अंदाजा संघ द्वारा जारी आंकड़ों से भी लगाया जा सकता है। संघ के अनुसार, देशभर में 62,555 विजयादशमी कार्यक्रमों में 32 लाख से अधिक स्वयंसेवकों ने गणवेश में भाग लिया। संघ ने यह भी बताया कि एक लाख से अधिक स्थानों पर उसकी गतिविधियां संचालित हो रही हैं। इन आंकड़ों को संघ अपने बढ़ते सामाजिक विस्तार और स्वयंसेवकों की भागीदारी के संकेत के रूप में प्रस्तुत करता है। इस शताब्दी वर्ष का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं रहा। अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में भी संघ से जुड़े संगठनों के माध्यम से संवाद और सामाजिक संपर्क के कार्यक्रम हुए। सितंबर 2026 में मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क, टोरंटो और लंदन में विभिन्न समुदायों, धार्मिक नेताओं, शिक्षाविदों और भारतीय मूल के लोगों के साथ संवाद किया। संघ के अनुसार इन कार्यक्रमों का केंद्र सामाजिक समरसता, सेवा, सांस्कृतिक संवाद और ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की अवधारणा रही। देश के भीतर भी इस पूरे वर्ष को संघ ने सेवा, सामाजिक संपर्क, परिवार, पर्यावरण, आत्मनिर्भरता और नागरिक दायित्व जैसे विषयों से जोड़ने का प्रयास किया। संघ के 2025-26 के वार्षिक विवरण के अनुसार देशभर में बड़ी संख्या में सेवा गतिविधियां शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक कल्याण और आत्मनिर्भरता जैसे क्षेत्रों में संचालित की गईं। साथ ही युवा पीढ़ी से संवाद भी इस शताब्दी वर्ष की एक महत्वपूर्ण कड़ी रहा है। खास तौर पर जेन-जी और जेनरेशन अल्फा के साथ संवाद के जरिए संघ ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि नई पीढ़ी को केवल निर्देश देने की बजाय उसकी बात सुनना और उसके सवालों का तार्किक उत्तर देना भी जरूरी है। मुंबई में युवाओं के साथ संवाद के दौरान मोहन भागवत ने लोकतंत्र में विरोध और असहमति को भी संवाद का हिस्सा बताया तथा युवाओं को देश की अगली पीढ़ी के रूप में देखने की बात कही। संघ के दृष्टिकोण से देखें तो राष्ट्र निर्माण में युवाओं की ऊर्जा, अनुशासन, सेवा और नागरिक जिम्मेदारी को जोड़ना उसकी दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है। इसी क्रम में समकालीन मुद्दों पर संघ प्रमुख का सार्वजनिक संवाद भी लगातार दिखाई देता रहा है, चाहे सामाजिक समरसता का प्रश्न हो, परिवार और पर्यावरण का विषय हो, आत्मनिर्भरता हो या नागरिक दायित्व। संघ स्वयं अपने शताब्दी वर्ष के प्रमुख लक्ष्यों में सामाजिक समरसता, पारिवारिक मूल्यों, पर्यावरण संरक्षण, आत्मनिर्भरता और नागरिक जिम्मेदारी को रखता है। यही वजह है कि संघ की सौ वर्षों की यात्रा केवल संगठन के विस्तार की कहानी नहीं, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ने और सेवा के माध्यम से राष्ट्र निर्माण में योगदान देने की यात्रा है। बहरहाल, आरएसएस का शताब्दी वर्ष केवल सौ वर्ष पूरे होने का समारोह नहीं, बल्कि संगठन के लिए अपने सामाजिक आधार, संपर्क अभियान और वैश्विक संवाद को प्रदर्शित करने का बड़ा अवसर रहा है। अब निगाहें 29 नवंबर के दिल्ली कार्यक्रम पर हैं, जहां सालभर की गतिविधियों को एक बड़े सार्वजनिक मंच पर समेटने की तैयारी है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 25 Sep 2026 4:29 pm

जब 'वंदे मातरम' गाने पर लगता था जुर्माना, फिर भी क्रांतिकारियों के होठों पर रहा आजादी का तराना

जब 'वंदे मातरम' गाने पर लगता था जुर्माना, फिर भी क्रांतिकारियों के होठों पर रहा आजादी का तराना

समाचार नामा 25 Sep 2026 2:21 pm

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाया जाए, एसआईआर पर रोक लगे: पिनाराई विजयन

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाया जाए, एसआईआर पर रोक लगे: पिनाराई विजयन

समाचार नामा 25 Sep 2026 2:20 pm

सीईसी के खिलाफ महाभियोग की तैयारी पर भड़की भाजपा, प्रवीण खंडेलवाल बोले- बेनकाब होगा विपक्ष का चेहरा

सीईसी के खिलाफ महाभियोग की तैयारी पर भड़की भाजपा, प्रवीण खंडेलवाल बोले- बेनकाब होगा विपक्ष का चेहरा

समाचार नामा 25 Sep 2026 2:13 pm

नेतन्याहू ने अपने भाषण से इस्लामिक वर्ल्ड में ही करा दी फूट? 77 देशों का वॉकआउट, 4 प्रमुख मुस्लिम बहुल मुल्क अपनी सीट पर जमे रहे, Abraham Accords है वजह?

संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) का मंच गुरुवार को उस वक्त वैश्विक कूटनीति के सबसे बड़े ड्रामे का गवाह बना, जब इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के पोडियम पर कदम रखते ही दर्जनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों ने एक साथ सदन छोड़ दिया। ईरान, गाज़ा और पश्चिम एशिया के सुलगते हालात पर दुनिया को संबोधित करने आए नेतन्याहू के सामने हॉल की कुर्सियां तेजी से खाली होने लगीं। मगर, पीछे हटने के बजाय नेतन्याहू ने तल्ख तेवर अपनाते हुए सदन में मौजूद लोगों से कहा शुरू करने से पहले एक छोटा सा ऐलान अगर इस हॉल में कोई और नैतिक कायर बचा है जिसने अभी तक सदन नहीं छोड़ा है, तो कृपया अब निकल जाए। लगभग 77 देशों के प्रतिनिधियों ने इस बड़े वॉकआउट का हिस्सा बनकर इज़रायल के खिलाफ अपनी नाराजगी दर्ज कराई। इनमें सऊदी अरब, कतर, मिस्र, जॉर्डन, तुर्की, ईरान, पाकिस्तान और इंडोनेशिया जैसे कई प्रमुख मुस्लिम और अरब मुल्क शामिल थे। लेकिन इस कूटनीतिक बवंडर के बीच सबसे चौंकाने वाला पहलू वो था जो हुआ ही नहीं। चार प्रमुख मुस्लिम-बहुल देश अपनी सीटों पर जमे रहे। संयुक्त अरब अमीरात (UAE), बहरीन, मोरक्को और अज़रबैजान ने इस सामूहिक बहिष्कार से खुद को पूरी तरह अलग रखा। अब सवाल यह उठता है कि जब अधिकांश इस्लामिक दुनिया नेतन्याहू को खुला संदेश दे रही थी, तब इन चार मुल्कों ने विरोध की इस लहर में शामिल न होने का फैसला क्यों किया? क्या यह अब्राहम अकॉर्ड्स (Abraham Accords) की रणनीतिक प्रतिबद्धता थी, ऊर्जा और रक्षा समझौतों का दबाव, या फिर बंद कमरों की वह कूटनीति जो सार्वजनिक नारों से ऊपर राष्ट्रीय हितों को तरजीह देती है? इसे भी पढ़ें: याद है ये...नेतन्याहू ने पेजर दिखा हिलाई पूरी दुनिया, UN रह गया हैरान, ईरान परेशान नेतान्याहू के UNGA भाषण के दौरान क्या हुआ? UN जनरल असेंबली के 81वें सेशन में नेतान्याहू का भाषण ऐसे समय में हुआ जब गाज़ा में संघर्ष जारी था और इज़राइल व ईरान के बीच बड़े पैमाने पर सैन्य तनाव बना हुआ था। जैसे ही वे पोडियम की ओर बढ़े, कई देशों के प्रतिनिधिमंडल हॉल से बाहर चले गए, जिससे इज़राइली प्रधानमंत्री के लिए श्रोताओं की संख्या काफी कम हो गई। खबरों के अनुसार, इन 77 देशों में मध्य पूर्व, एशिया, अफ्रीका, यूरोप, लैटिन अमेरिका और कैरिबियन क्षेत्र के देश शामिल थे। इस संख्या के बारे में एक ज़रूरी बात ध्यान देने वाली है। 77 देशों की इस गिनती का मतलब यह नहीं है कि उन सभी प्रतिनिधिमंडलों ने मिलकर वॉकआउट (विरोध में बाहर जाना) किया। खबरों के मुताबिक, कुछ प्रतिनिधिमंडल तब हॉल में मौजूद नहीं थे जब नेतान्याहू ने भाषण शुरू किया, जबकि कुछ अन्य उनके पोडियम पर आते ही बाहर चले गए। दरअसल, नेतन्याहू के सभागार में पहुंचने पर कुछ नेताओं ने उनका स्वागत किया तो कुछ ने विरोध जताया। कई प्रतिनिधि बाहर निकल गए और उनके भाषण के दौरान ज्यादातर सीट खाली दिखाई दीं। नेतन्याहू ने जोर देकर कहा कि ईरान पर हमला करना उनके लिए अब तक के सबसे आसान फैसलों में से एक था और उन्होंने सभागार से बाहर जाने वाले प्रतिनिधियों को नैतिक रूप से कायर करार दिया। उन्होंने कहा अगर नैतिक रूप से कोई और कायर अब भी सभागार में मौजूद है और बाहर नहीं गया है तो कृपया अभी चला जाए। फिलिस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास को संयुक्त राष्ट्र महासभा में शामिल होने के लिए अमेरिका द्वारा एक बार फिर वीजा नहीं दिए जाने के कारण उन्हें पहले से रिकॉर्ड किए गए वीडियो संदेश के जरिए महासभा को संबोधित करना पड़ा। अब्बास की उनके देश में लोकप्रियता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके प्रभाव में कमी आई है, लेकिन अपने संबोधन में उन्होंने स्पष्ट किया कि वह खुद को दरकिनार किए जाने को चुपचाप स्वीकार नहीं करेंगे। अब्बास ने कहा कि हम अपनी मातृभूमि नहीं छोड़ेंगे। हम विस्थापन स्वीकार नहीं करेंगे और हम किसी को भी अपनी ओर से हमारे भविष्य का फैसला नहीं करने देंगे। पूरे सप्ताह विश्व के कई नेताओं ने अपने भाषणों में फलस्तीनियों की स्थिति का उल्लेख किया और अब्बास ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इजराइल के खिलाफ अधिक ठोस कदम उठाने का आग्रह किया। इस बीच, हमास के एक प्रवक्ता ने कहा कि बोर्ड ऑफ पीस द्वारा गाजा के पुनर्निर्माण के लिए छह महीने की 2.45 अरब डॉलर की योजना पेश किए जाने के बाद संगठन शांति समझौते के अगले चरणों को आगे बढ़ाने के लिए तैयार है। हमास के प्रवक्ता हाजेम कासिम ने कहा कि उनका संगठन बोर्ड ऑफ पीस की रूपरेखा को लागू करने के लिए पूरी तरह तैयार है, हालांकि उन्होंने हथियार डालने की किसी योजना का उल्लेख नहीं किया। इजराइल ने कहा है कि जब तक हमास हथियार नहीं डालता, वह पुनर्निर्माण की अनुमति नहीं देगा। ईयू के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक और 27 सदस्यीय यूरोपीय संघ के अनुमान के अनुसार गाजा के पुनर्निर्माण के लिए 71 अरब यूरो (80.8 अरब डॉलर) की जरूरत है, लेकिन अब तक केवल एक अरब यूरो (1.1 अरब डॉलर) ही जुटाए जा सके हैं। इसे भी पढ़ें: कोई और कायर रह गया है? निकल जाओ...UN के मंच से नेतन्याहू ने ऐसा दहाड़ा, खाली हो गया पूरा हॉल कौन से प्रमुख मुस्लिम देश इसमें शामिल रहे? चार मुस्लिम-बहुल देश अलग दिखे क्योंकि वे उन 77 प्रतिनिधिमंडलों की सूची में शामिल नहीं थे जो अनुपस्थित थे या जिन्होंने चैंबर छोड़ दिया था – ये देश हैं संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, मोरक्को और अज़रबैजान। उनके फैसले खास तौर पर अहम हैं क्योंकि इन चारों ने इज़राइल के साथ अलग-अलग स्तर पर राजनयिक और रणनीतिक संबंध बनाए रखे हैं, जबकि गाज़ा युद्ध और इज़राइल के व्यापक सैन्य अभियानों को लेकर मुस्लिम दुनिया में तीखे मतभेद रहे हैं। UAE, बहरीन और मोरक्को ने 'अब्राहम समझौते'से जुड़े सामान्यीकरण समझौतों के ज़रिए इज़राइल के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित किए हैं। वहीं, अज़रबैजान ने कई दशकों में इज़राइल के साथ एक अलग रणनीतिक साझेदारी विकसित की है, खासकर रक्षा, ऊर्जा और क्षेत्रीय सुरक्षा के क्षेत्रों में। अब्राहम समझौता क्या हैं? अब्राहम समझौते, अमेरिका के समर्थन वाले उन समझौतों की एक श्रृंखला हैं, जिनसे इज़राइल और कई अरब व मुस्लिम-बहुल देशों के बीच संबंध सामान्य हुए। UAE और बहरीन ने सितंबर 2020 में इज़राइल के साथ औपचारिक रूप से समझौतों पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद दिसंबर 2020 में मोरक्को ने भी संबंधों को सामान्य करने के समझौते पर हस्ताक्षर किए। इन समझौतों से राजनयिक रास्ते खुले या बहाल हुए और व्यापार, पर्यटन, निवेश, तकनीक और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा मिला। UAE-इज़राइल समझौते ने दोनों देशों के बीच शांति, राजनयिक संबंधों और पूर्ण सामान्यीकरण की संधि स्थापित की। बहरीन ने भी इज़राइल के साथ शांति और सामान्यीकरण का समर्थन करने वाले एक घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए। बाद में मोरक्को और इज़राइल ने राजनयिक और कांसुलर संबंध स्थापित करने के लिए एक संयुक्त घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए। इन समझौतों का मतलब यह नहीं था कि इन देशों ने फ़िलिस्तीनी राष्ट्र का समर्थन करना बंद कर दिया या फ़िलिस्तीनी मुद्दे पर इज़राइल के साथ अपने मतभेदों को छोड़ दिया। इसके बजाय, इन्होंने ऐसे औपचारिक राजनयिक रास्ते बनाए जिनसे शामिल देश गंभीर क्षेत्रीय तनाव के समय भी बातचीत जारी रख सके। नेतान्याहू के भाषण के दौरान UAE क्यों मौजूद रहा? UAE उन शुरुआती अरब देशों में से एक था जिसने 'अब्राहम समझौते' (Abraham Accords) के तहत इज़राइल के साथ पूरे राजनयिक संबंध स्थापित किए। इस समझौते पर औपचारिक रूप से सितंबर 2020 में हस्ताक्षर किए गए थे, जिसके बाद राजनयिक मिशन स्थापित किए गए और आर्थिक संबंध बढ़ाए गए। गाज़ा युद्ध को लेकर बड़े मतभेदों के बावजूद UAE ने इज़राइल के साथ बातचीत जारी रखी है। उसका तरीका यह रहा है कि राजनयिक रास्ते खुले रखे जाएं और साथ ही फ़िलिस्तीनी मुद्दे और मानवीय चिंताओं पर अलग से अपना पक्ष रखा जाए। बहरीन क्यों मौजूद रहा? बहरीन 'अब्राहम समझौते' पर हस्ताक्षर करने वाला एक और प्रमुख अरब देश था। बहरीन और इज़राइल ने 2020 में औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित किए, जिससे सरकार-से-सरकार के बीच सीधे संपर्क के रास्ते बने, जो पहले मौजूद नहीं थे। बहरीन का फ़ैसला इसलिए भी खास था क्योंकि सऊदी अरब, कतर, कुवैत और ओमान समेत कई अन्य खाड़ी अरब देश उन देशों में शामिल थे जो नेतान्याहू के भाषण के दौरान या तो मौजूद नहीं थे या वहां से चले गए थे। इसे भी पढ़ें: UNGA में बोले Benjamin Netanyahu, New York के मेयर जोहरान ममदानी यहूदियों को खतरे में डाल रहे गाज़ा में तनाव के बावजूद मोरक्को क्यों बना रहा? मोरक्को का रुख़ थोड़ा अलग और पेचीदा है। उत्तरी अफ़्रीका का यह देश उन देशों के समूह का हिस्सा है जिनके इज़राइल के साथ संबंध सामान्य होने की चर्चा अक्सर 'अब्राहम एकॉर्ड्स' (Abraham Accords) के तहत होती है। हालाँकि, UAE और बहरीन के उलट, मोरक्को ने सितंबर 2020 में इज़राइल, UAE और बहरीन के साथ मिलकर 'अब्राहम एकॉर्ड्स' के मूल समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए थे। इसके बजाय, मोरक्को और इज़राइल ने दिसंबर 2020 में अपने संबंधों को सामान्य करने के समझौते की घोषणा की। बाद में अमेरिकी अधिकारियों ने मोरक्को के साथ संबंधों के सामान्य होने की प्रक्रिया को 'अब्राहम एकॉर्ड्स' की व्यापक प्रक्रिया का ही हिस्सा माना। तब से मोरक्को और इज़राइल के बीच राजनयिक और आर्थिक संबंध बने हुए हैं। अज़रबैजान ने नेतन्याहू के भाषण का बहिष्कार क्यों नहीं किया? अज़रबैजान का मामला उन तीन अरब देशों से अलग है, क्योंकि उसने 'अब्राहम एकॉर्ड्स' पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। वहाँ मौजूद रहने के उसके फ़ैसले को बाकू और तेल अवीव के बीच लंबे समय से चले आ रहे रणनीतिक संबंधों के ज़रिए बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। इज़राइल और अज़रबैजान ने रक्षा, सुरक्षा, ऊर्जा, व्यापार और तकनीक के क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर सहयोग विकसित किया है। जनवरी 2026 में दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में अज़रबैजान के विदेश मंत्रालय ने इस रिश्ते को 'रणनीतिक साझेदारी' बताया था। रक्षा और सैन्य सहयोग रक्षा सहयोग, अज़रबैजान और इज़राइल के संबंधों के सबसे अहम हिस्सों में से एक है। अज़रबैजान इज़राइली रक्षा उपकरणों का एक बड़ा ग्राहक रहा है, और दोनों देशों के बीच सुरक्षा के मामले में करीबी संपर्क बना हुआ है। यह रिश्ता कई सालों में विकसित हुआ है और अज़रबैजान की व्यापक सुरक्षा नीति का एक अहम हिस्सा बन गया है। इज़राइली सरकार से जुड़े विश्लेषणों में अज़रबैजान को इज़राइल के रक्षा उत्पादों के प्रमुख ग्राहकों में से एक बताया गया है। वॉकआउट करने वाले देश तुवालु, तुर्कमेनिस्तान, यमन, मिस्र, पनामा, सेनेगल, फिलिस्तीन, सूडान, ट्यूनीशिया, तुर्की, वेनेजुएला, एंटीगुआ और बारबुडा, बेलीज, कांगो, ओमान, कतर, सऊदी अरब, टोंगा, उज्बेकिस्तान, अंगोला, बारबाडोस, कोलंबिया, कोमोरोस, डोमिनिका, जिबूती, उत्तरी मैसेडोनिया, सैन मैरिनो, दक्षिण अफ्रीका, सोमालिया, अल्जीरिया, बांग्लादेश, ब्रुनेई दारुस्सलाम, ब्राजील, चिली, कांगो गणराज्य, लेबनान, लाइबेरिया, इरिट्रिया, चाड, मध्य अफ्रीकी गणराज्य, लीबिया, मॉरिटानिया, जॉर्डन, निकारागुआ, मेडागास्कर, नाइजर, पेरू, सेंट लूसिया, स्लोवेनिया, अफगानिस्तान, बहामास, बोस्निया और हर्जेगोविना, बोत्सवाना, उत्तर कोरिया, इस्वातिनी, सीरिया, युगांडा, पाकिस्तान, लेसोथो, बोलीविया, स्पेन, क्यूबा, ​​​​इक्वेटोरियल गिनी, ईरान, किर्गिस्तान, इराक, मोज़ाम्बिक, म्यांमार, मालदीव, इंडोनेशिया, कुवैत, नामीबिया, मलेशिया, गुयाना और केन्या।

प्रभासाक्षी 25 Sep 2026 12:42 pm

झारखंड : 110वीं जयंती पर याद किए गए पंडित दीनदयाल उपाध्याय, भाजपा नेताओं ने 'अंत्योदय' के संकल्प को दोहराया

झारखंड : 110वीं जयंती पर याद किए गए पंडित दीनदयाल उपाध्याय, भाजपा नेताओं ने 'अंत्योदय' के संकल्प को दोहराया

समाचार नामा 25 Sep 2026 12:09 pm

नोएल टाटा की आपत्ति खारिज, एन. चंद्रशेखरन ही बने रहेंगे टाटा संस के बॉस

अब टाटा संस के बोर्ड ने इन आपत्तियों को खारिज करते हुए कहा है कि चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति का फैसला कंपनी के नियमों के अनुरूप लिया गया है। कंपनी ने अपने जवाब में यह भी कहा है कि जिस प्रावधान का हवाला नोएल टाटा ने दिया है, वह मौजूदा चेयरमैन की पुनर्नियुक्ति पर लागू नहीं होता।

देशबन्धु 25 Sep 2026 11:56 am

अंत्योदय: विकसित भारत की मानवीय आधारशिला

भारत की विकास यात्रा आज ऐसे दौर में है, जब आर्थिक शक्ति, तकनीकी क्षमता, डिजिटल परिवर्तन और वैश्विक प्रभाव के नए अध्याय लिखे जा रहे हैं। 2026-27 की पहली तिमाही में भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.8 प्रतिशत दर्ज की गई है और देश को विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में तेजी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन किसी राष्ट्र की वास्तविक समृद्धि केवल उसके सकल घरेलू उत्पाद, ऊंची इमारतों, आधुनिक सड़कों या वैश्विक रैंकिंग से तय नहीं होती। उसकी सबसे बड़ी कसौटी यह है कि विकास की रोशनी उस व्यक्ति तक कितनी पहुंची है, जो विकास की कतार में सबसे पीछे खड़ा है। यहीं से अंत्योदय का विचार प्रासंगिक होता है। हर वर्ष 25 सितंबर को अंत्योदय दिवस मनाया जाता है। यह दिन पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती का दिन है और 25 सितंबर 2014 को भारत सरकार ने इसे अंत्योदय दिवस के रूप में घोषित किया था। इसी अवसर पर दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना को भी शुरू किया गया था, जिसका उद्देश्य ग्रामीण गरीब युवाओं को कौशल और रोजगार के अवसरों से जोड़ना था। इसलिए अंत्योदय दिवस केवल किसी महापुरुष की स्मृति का दिवस नहीं, बल्कि विकास की दिशा और उसकी प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करने का अवसर है। ‘अंत्योदय’ दो शब्दों से बना है-‘अंत्य’ अर्थात सबसे अंतिम और ‘उदय’ अर्थात उत्थान। लेकिन इसका अर्थ केवल किसी गरीब व्यक्ति को सहायता देना नहीं है। अंत्योदय का व्यापक अर्थ है-ऐसी व्यवस्था का निर्माण जिसमें कोई व्यक्ति अवसरों से वंचित न रहे, कोई परिवार बुनियादी सुविधाओं के अभाव में पीछे न छूटे और विकास की प्रक्रिया का लाभ समाज के अंतिम छोर तक पहुंचे। दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानववाद’ में मनुष्य केवल आर्थिक उत्पादन की इकाई नहीं है। उसके शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा-सभी का संतुलित विकास आवश्यक है। यही अंत्योदय को महज कल्याणकारी कार्यक्रम से आगे ले जाकर मानव-केंद्रित विकास-दर्शन बनाता है। आज प्रश्न यह नहीं है कि भारत विकास कर रहा है या नहीं। प्रश्न यह है कि भारत के विकास का लाभ किस गति से, किस गहराई से और किस अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रहा है। यही वह प्रश्न है जो अंत्योदय दिवस को 2026 में और अधिक महत्वपूर्ण बनाता है। भारत 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है। यह लक्ष्य केवल आर्थिक आकार बढ़ाने का लक्ष्य नहीं हो सकता। विकसित भारत का अर्थ विकसित गांव, सक्षम नागरिक, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य, सम्मानजनक रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, डिजिटल पहुंच, उद्यमिता और अवसरों की समान उपलब्धता भी है। 2026 में नीति-निर्माण में ‘समावेशी मानव विकास’ को विकसित भारत की चर्चा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है। यही कारण है कि आज अंत्योदय की आवश्यकता पहले से कम नहीं, बल्कि अधिक है। आर्थिक विकास जितना तेज होगा, उतनी ही जरूरी होगी यह सावधानी कि विकास की दौड़ में कोई पीछे न छूट जाए। तकनीक जितनी शक्तिशाली होगी, उतना ही जरूरी होगा कि डिजिटल विभाजन कम हो। नए रोजगार जितने पैदा होंगे, उतनी ही आवश्यकता होगी कि गरीब और ग्रामीण युवा उनके लिए आवश्यक कौशल प्राप्त कर सकें। भारत में अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़े करोड़ों श्रमिकों के संदर्भ में नीति आयोग ने भी यह रेखांकित किया है कि तकनीक अपने आप समावेशी परिवर्तन नहीं ला सकती, अवसरों और सामाजिक सुरक्षा तक पहुंच सुनिश्चित करना भी जरूरी है। इस दृष्टि से अंत्योदय का नया अर्थ ‘सहायता से सशक्तिकरण’ होना चाहिए। गरीब को केवल अनुदान नहीं, अवसर मिले। किसान को केवल राहत नहीं, बेहतर उत्पादकता और बाजार मिले। श्रमिक को केवल रोजगार नहीं, कौशल और सामाजिक सुरक्षा मिले। महिला को केवल कल्याणकारी योजना नहीं, शिक्षा, संपत्ति, उद्यमिता और निर्णय-क्षमता में भागीदारी मिले। ग्रामीण युवा को केवल नौकरी की तलाश में शहर की ओर जाने की मजबूरी न हो, बल्कि उसके गांव और कस्बे में ही कौशल, डिजिटल सुविधा और उद्यम का वातावरण बने। यही अंत्योदय का आधुनिक स्वरूप हो सकता है-व्यक्ति को लाभार्थी से भागीदार बनाना। 2014 में शुरू हुई दीनदयाल अंत्योदय योजना ने ग्रामीण और शहरी गरीबों के लिए आजीविका तथा कौशल-विकास को महत्व दिया था। सरकार ने उस समय ग्रामीण एवं शहरी गरीबों के उत्थान के लिए कौशल विकास और आजीविका के अवसरों को विस्तार देने की बात कही थी। आज आवश्यकता इस सोच को और व्यापक बनाने की है। अंत्योदय को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कौशल, आवास, पोषण, वित्तीय समावेशन, डिजिटल कनेक्टिविटी और सामाजिक सुरक्षा के बीच एक समन्वित दृष्टिकोण बनाना होगा। भारत की अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ यह जिम्मेदारी भी बढ़ती है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2025-26 में वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.7 प्रतिशत रही और 2026-27 की पहली तिमाही में यह 7.8 प्रतिशत रही। भारत को विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य भी सार्वजनिक नीति और आर्थिक विमर्श में प्रमुखता से व्यक्त किया गया है, 2026 के केंद्रीय बजट पर प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया में भी यह लक्ष्य दोहराया गया। लेकिन आर्थिक महाशक्ति बनने की यात्रा तभी व्यापक अर्थों में सफल होगी, जब आर्थिक शक्ति का सामाजिक आधार भी उतना ही मजबूत हो। विश्वगुरु बनने की आकांक्षा केवल विश्व को ज्ञान देने से पूरी नहीं होगी, अपने समाज के अंतिम व्यक्ति को गरिमापूर्ण जीवन देने से भी उसकी परीक्षा होगी। भारत की प्राचीन चेतना में ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ जैसे विचार रहे हैं। अंत्योदय इसी मानवीय परंपरा का आधुनिक सामाजिक-आर्थिक रूप माना जा सकता है। यह कहता है कि राष्ट्र की समृद्धि का अर्थ केवल कुछ लोगों की समृद्धि नहीं, बल्कि समूचे समाज की उन्नति है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय की स्मृति को जीवंत रखने का सबसे सार्थक तरीका केवल उनके चित्र पर माल्यार्पण करना नहीं, बल्कि उनके विचार के मानवीय पक्ष को व्यवहार में उतारना है। उनका जीवन सादगी, संगठन, राष्ट्रसेवा और वैचारिक प्रतिबद्धता से जुड़ा रहा। उनका अंत्योदय दर्शन आने वाली पीढ़ियों को यह प्रश्न पूछने की प्रेरणा देता है कि हमारे विकास का अंतिम लाभार्थी कौन है और क्या वह वास्तव में विकास की मुख्यधारा में आ पाया है? 2047 का विकसित भारत केवल सरकार के प्रयासों से नहीं बनेगा। इसके लिए शासन, समाज, उद्योग, स्वयंसेवी संस्थाओं, शिक्षण संस्थानों और नागरिकों-सभी की भागीदारी आवश्यक होगी। गांवों में स्थानीय उद्यमिता बढ़ानी होगी, युवाओं को कौशल देना होगा, शिक्षा की गुणवत्ता सुधारनी होगी, स्वास्थ्य सेवाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना होगा और सरकारी योजनाओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना होगा। डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और नई तकनीकें इस पहुंच को तेज कर सकती हैं, 2026 में नीति आयोग की डीपीआई-2047 रूपरेखा ने भी डिजिटल अवसंरचना को समावेशी और उत्पादकता-आधारित विकास से जोड़ा है। अंत्योदय का सबसे बड़ा संदेश यही है कि राष्ट्र की प्रगति को ऊपर से नीचे नहीं, नीचे से ऊपर भी देखना होगा। जब अंतिम गांव आगे बढ़ेगा, भारत आगे बढ़ेगा। जब अंतिम परिवार आत्मनिर्भर होगा, भारत मजबूत होगा। जब अंतिम बच्चा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पाएगा, भारत का भविष्य मजबूत होगा। जब अंतिम श्रमिक को सम्मान और सुरक्षा मिलेगी, भारत की विकास यात्रा अधिक मानवीय होगी। अंत्योदय दिवस इसलिए केवल 25 सितंबर का एक स्मृति-दिवस नहीं होना चाहिए। इसे राष्ट्र के विकास की नैतिक कसौटी बनाने की आवश्यकता है। दीनदयाल उपाध्याय की स्मृति को युगों तक जीवित रखने वाला सबसे प्रभावी स्मारक कोई भवन या प्रतिमा नहीं, बल्कि ऐसा भारत होगा जिसमें अंतिम व्यक्ति स्वयं को व्यवस्था से बाहर नहीं, बल्कि राष्ट्र की मुख्यधारा का सम्मानित भागीदार महसूस करे। विकसित भारत की ऊंचाई उसकी आर्थिक शक्ति से दिखाई देगी, लेकिन उसकी वास्तविक महानता इस बात से पहचानी जाएगी कि उसकी विकास-यात्रा कितनी दूर तक और कितने लोगों तक पहुंची है। अंत्योदय उसी यात्रा का मानवीय आधार है। 2047 का भारत यदि समृद्ध, सशक्त, आत्मनिर्भर और न्यायपूर्ण बनना चाहता है, तो विकास की हर मंजिल पर उसे एक बार पीछे मुड़कर उस अंतिम व्यक्ति को देखना होगा-क्योंकि जिस दिन अंतिम व्यक्ति का उदय होगा, उसी दिन भारत के उदय की पूर्णता होगी। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

प्रभासाक्षी 25 Sep 2026 10:21 am

Election Commission Row: SIR को लेकर घमासान, राहुल गांधी ने मांगा CEC ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा; आज कांग्रेस का मार्च

Election Commission Row: SIR को लेकर घमासान, राहुल गांधी ने मांगा CEC ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा; आज कांग्रेस का मार्च

समाचार नामा 25 Sep 2026 10:10 am

दीनदयाल उपाध्याय को उपराष्ट्रपति ने दी श्रद्धांजलि, कहा- 'राष्ट्र निर्माण की यात्रा को प्रेरित करते हैं उनके आदर्श'

दीनदयाल उपाध्याय को उपराष्ट्रपति ने दी श्रद्धांजलि, कहा- 'राष्ट्र निर्माण की यात्रा को प्रेरित करते हैं उनके आदर्श'

समाचार नामा 25 Sep 2026 10:09 am

SIR 'वोट चोरी' पर कांग्रेस का मोदी पर हमला: एक PM ने Gen Z को वोट का अधिकार दिया, दूसरा छीनने पर तुला है

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि राजीव गांधी ने 1988 में मतदान की उम्र 21 से घटाकर 18 कर Gen Z को सशक्त बनाया जबकि पीएम मोदी स्पेशल समरी रिवीजन रोककर Gen Z को मतदाता सूची से बाहर रखना चाहते हैं।

सत्य हिंदी 25 Sep 2026 10:04 am

प्रधानमंत्री मोदी ने 'सेवा यात्रा' में शामिल युवाओं से किया संवाद, कहा- 'ये अनुभव अमूल्य हैं'

प्रधानमंत्री मोदी ने 'सेवा यात्रा' में शामिल युवाओं से किया संवाद, कहा- 'ये अनुभव अमूल्य हैं'

समाचार नामा 25 Sep 2026 9:56 am

भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन जयपुर पहुंचे, युवाओं से संवाद और पदाधिकारियों के साथ करेंगे बैठक

भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन जयपुर पहुंचे, युवाओं से संवाद और पदाधिकारियों के साथ करेंगे बैठक

समाचार नामा 25 Sep 2026 7:50 am

मध्य प्रदेश: रिश्वत मांगने के आरोप में कृषि विभाग के दो और अधिकारी सस्पेंड, केंद्रीय मंत्री शिवराज का बड़ा एक्शन

मध्य प्रदेश: रिश्वत मांगने के आरोप में कृषि विभाग के दो और अधिकारी सस्पेंड, केंद्रीय मंत्री शिवराज का बड़ा एक्शन

समाचार नामा 24 Sep 2026 11:12 pm

राहुल गांधी का बड़ा हमला: वोट चोरी देशद्रोह, ज्ञानेश कुमार से तत्काल इस्तीफे की मांग

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष तथा लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने गुरुवार को कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने 'वोट चोरी' कराई है और उनको तत्काल इस्तीफा देकर सरकारी गवाह बन जाना चाहिए

देशबन्धु 24 Sep 2026 10:28 pm

नंदीग्राम उपचुनाव: कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को कलकत्ता हाई कोर्ट से बड़ी राहत

नंदीग्राम उपचुनाव: कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को कलकत्ता हाई कोर्ट से बड़ी राहत

समाचार नामा 24 Sep 2026 8:03 pm

Xi Jinping US Visit: अभी तो सिर्फ ट्रेलर सामने आया है, पूरी पिक्चर दिसम्बर में सामने आयेगी, तब दुनिया का हैरान होना तय है

वॉशिंगटन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के स्वागत के लिए जिस स्तर का राजकीय सम्मान दिखाया गया, उसे देखकर पूरी दुनिया हतप्रभ है। लेकिन सितम्बर में अमेरिका में दिखी यह कूटनीति सिर्फ ट्रेलर है क्योंकि पिक्चर अभी बाकी है जोकि दिसम्बर में दिखाई जायेगी। वैसे वॉशिंगटन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के स्वागत का दृश्य मई में बीजिंग में हुए ट्रंप-शी शिखर संवाद की याद दिला रहा है। जिस तरह चीन यात्रा के दौरान शी जिनपिंग ने ट्रंप का भव्य स्वागत किया था और बाद में झोंगनानहाई में स्वयं उनकी अगवानी की थी, उसी तरह अब अमेरिका पहुंचने पर ट्रंप ने प्रोटोकॉल से हटकर ज्वाइंट बेस एंड्रयूज पर स्वयं शी जिनपिंग का स्वागत किया। सैन्य बैंड, लाल कालीन, सम्मान गार्ड और लड़ाकू विमान के फ्लाईपास्ट के बीच हुआ यह स्वागत केवल राजकीय औपचारिकता नहीं, बल्कि अमेरिका-चीन संबंधों में चल रही कूटनीतिक गर्माहट का बड़ा संकेत माना जा रहा है। साथ ही करीब छह दशक में किसी विदेशी नेता के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति की ओर से बेस पर इस तरह की व्यक्तिगत अगवानी असाधारण मानी जा रही है। देखा जाये तो शी की यह यात्रा ऐसे समय हो रही है जब अमेरिका और चीन के रिश्ते प्रतिस्पर्धा और सहयोग के बीच एक नए संतुलन की तलाश में हैं। व्यापार शुल्क, दुर्लभ खनिज, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ताइवान और ईरान जैसे मुद्दे दोनों देशों के बीच गंभीर मतभेदों का कारण बने हुए हैं, लेकिन दोनों पक्ष अब टकराव को नियंत्रित रखने और बातचीत जारी रखने पर जोर दे रहे हैं। व्यापार युद्ध के बाद बनी अस्थायी व्यापार-समझ को आगे बढ़ाने की कोशिश भी इसी दिशा का संकेत है। इसे भी पढ़ें: अमेरिकी धरती पर खड़े होकर ट्रंप को घेरना आसान नहीं, मगर मैक्रों, पेजेशकियन, अहमद अल-शरा और सिल्वा ने ये कर दिखाया शी जिनपिंग ने भी साफ संकेत दिया है कि चीन और अमेरिका को प्रतिद्वंद्वी की बजाय साझेदार के रूप में संबंधों को आगे बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि दोनों देशों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा समाप्त हो गई है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अत्याधुनिक तकनीक में दोनों के बीच होड़ जारी है, ताइवान का प्रश्न बेहद संवेदनशील बना हुआ है और व्यापार तथा आपूर्ति श्रृंखला को लेकर भी मतभेद कायम हैं। इसलिए वॉशिंगटन में हो रही बातचीत को पूर्ण समझौते की बजाय तनाव कम करने और संबंधों को स्थिर रखने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन इस पूरी तस्वीर का एक और महत्वपूर्ण पहलू है भारत और रूस। दिसंबर में ट्रंप की मुलाकात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से होने की संभावनाएं भी सामने आ रही हैं। मोदी के दिसंबर में अमेरिका जाने की संभावना है, जहां चौदह और पंद्रह दिसंबर को फ्लोरिडा में होने वाली जी-20 बैठक के दौरान उनकी ट्रंप से द्विपक्षीय बातचीत हो सकती है। वहीं रूस ने अभी पुतिन-ट्रंप दिसंबर शिखर बैठक की पुष्टि नहीं की है। लेकिन अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के अनुसार पुतिन को दिसंबर में मियामी में होने वाली जी-20 बैठक के लिए आमंत्रित किया गया है और वहां ट्रंप के साथ मुलाकात की संभावना है। हालांकि क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा है कि अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है और बैठक के एजेंडे पर चर्चा करना भी जल्दबाजी होगी। देखा जाये तो इन संभावित मुलाकातों को हाल में नई दिल्ली में संपन्न हुए अठारहवें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के संदर्भ में देखना खासा महत्वपूर्ण है। भारत की मेजबानी में हुए इस सम्मेलन में नरेंद्र मोदी, शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन के बीच जिस स्तर का संवाद और सार्वजनिक गर्मजोशी दिखाई दी, उसने वैश्विक कूटनीति में खासा ध्यान खींचा। मोदी और शी ने द्विपक्षीय संबंधों, सीमा शांति, व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े मुद्दों पर बातचीत की, जबकि मोदी और पुतिन ने रक्षा, ऊर्जा, व्यापार, अंतरिक्ष और अन्य क्षेत्रों में सहयोग की समीक्षा की। ब्रिक्स सम्मेलन की तस्वीरें भी अपने आप में एक बड़ा कूटनीतिक संदेश थीं। एक ओर भारत और रूस के बीच मजबूत रणनीतिक संबंध, दूसरी ओर भारत और चीन के बीच लंबे तनाव के बाद संवाद की वापसी। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषण में मोदी, पुतिन और शी की साथ दिखाई देने वाली तस्वीरों को बदलती वैश्विक शक्ति समीकरणों के प्रतीक के रूप में देखा गया। यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें ट्रंप की रणनीति को समझा जा सकता है। अमेरिका के सामने अब ऐसी दुनिया है जहां चीन, रूस और भारत तीनों के साथ उसके अलग-अलग स्तर के हित, मतभेद और संभावित सहयोग मौजूद हैं। चीन के साथ व्यापार और तकनीक, रूस के साथ यूक्रेन युद्ध और ऊर्जा, जबकि भारत के साथ व्यापार, रक्षा, तकनीक और रणनीतिक सहयोग, तीनों रिश्ते एक-दूसरे से पूरी तरह अलग नहीं हैं। भारत के मामले में रूस से उसके ऊर्जा संबंध और अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता एक साथ चल रही हैं। रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिकी दबाव ने दोनों देशों के बीच आर्थिक बातचीत को जटिल बनाया है। ऐसे में मोदी-ट्रंप वार्ता में व्यापार, ऊर्जा और रणनीतिक संबंध महत्वपूर्ण विषय हो सकते हैं। इसलिए दिसंबर का संभावित कूटनीतिक दौर केवल अलग-अलग द्विपक्षीय मुलाकातों की श्रृंखला नहीं होगा। सितंबर के नई दिल्ली ब्रिक्स सम्मेलन में मोदी, पुतिन और शी की जुगलबंदी के बाद अब ट्रंप के सामने इन तीनों शक्तियों के साथ अपने संबंधों को अलग-अलग मोर्चों पर संभालने की चुनौती है। वॉशिंगटन में शी का भव्य स्वागत इसी व्यापक कूटनीतिक गणित की शुरुआत माना जा सकता है, जहां अमेरिका टकराव के साथ-साथ संवाद और समझौते के रास्ते भी खुले रखना चाहता है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 24 Sep 2026 6:54 pm

नकली व बेलगाम दवाओं के खिलाफ अब अदालत का ही आसरा

भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में जहां जन-कल्याण को शासन का मूलमंत्र माना जाता है, वहां स्वास्थ्य का क्षेत्र एक गंभीर संक्रमण काल से गुजर रहा है। बीमारियां जिस रफ्तार से बढ़ रही हैं, उससे कहीं अधिक तेजी से चिकित्सा के नाम पर इंसानी जिंदगियों से खिलवाड़ का एक भयावह और अनैतिक तंत्र विकसित हो चुका है। हाल ही में फार्मास्युटिकल क्षेत्र में मुनाफे की हवस और मरीजों के साथ हो रही धोखाधड़ी की गूंज देश की सबसे बड़ी अदालत में सुनाई दी है। न्याय के सर्वोच्च मंदिर ने दवा निर्माताओं, अस्पतालों और सरकारी नियामक संस्थाओं के रवैये पर जो तल्ख टिप्पणियां की हैं, उसने हमारे पूरे स्वास्थ्य तंत्र की रीढ़ को हिलाकर रख दिया है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ द्वारा एक मामले की सुनवाई के दौरान प्रयुक्त यह वाक्य—यह तो सीधे तौर पर दिन-दहाड़े डकैती है—महज एक टिप्पणी नहीं, बल्कि उस लाचार भारतीय नागरिक की सामूहिक चीख का प्रतिनिधित्व करता है, जो बीमारी से पहले इलाज के खर्च और उसमें होने वाली जालसाजी से मर जाता है। न्यायालय के समक्ष जो तथ्य उभरकर सामने आए हैं, वे किसी भी संवेदनशील समाज को स्तब्ध करने के लिए पर्याप्त हैं। खासकर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझ रहे मरीजों के घावों पर जिस तरह मुनाफाखोरी का नमक छिड़का जा रहा है, वह अमानवीयता की पराकाष्ठा है। अदालत के संज्ञान में लाया गया कि कैंसर की एक आवश्यक जीवन रक्षक दवा, जिसकी कीमत निर्माता कंपनी द्वारा रिटेलर के लिए महज ₹2,700 तय की जाती है, उस पर अधिकतम खुदरा मूल्य पूरे ₹27,000 छाप दिया जाता है। यानी कि लागत और थोक मूल्य से ठीक दस गुना अधिक दाम पर उस दवा को बेचे जाने की खुली छूट दे दी गई। एक पीड़ित परिवार और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा दायर की गई जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए माननीय न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने इस अकल्पनीय मूल्य अंतर पर गहरी नाराजगी जताई। अदालत ने सीधे शब्दों में सवाल पूछा कि मरीजों को इस तरह बेदर्दी से लूटने की इजाजत व्यवस्था कैसे दे सकती है? निर्माता कंपनियां और बड़ी-बड़ी कॉरपोरेट फार्मेसियां मिलकर मरीजों की जेब पर जो डाका डाल रही हैं, उस पर राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण और स्वास्थ्य मंत्रालय जैसी नियामक इकाइयां आंखें मूंदकर क्यों बैठी हैं? इसे भी पढ़ें: दवा कंपनियों की लूट पर Supreme Court ने की सख्त टिप्पणी, 'दिनदहाड़े डकैती और वसूली' पर प्रशासन चुप क्यों है? यह मामला सिर्फ निजी क्षेत्र की लूट तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के खजाने और टैक्सपेयर्स के पैसे में सेंधमारी का भी एक बड़ा घोटाला साबित हो रहा है। आज केंद्र सरकार 'आयुष्मान भारत', CGHS और DGHS जैसी लोक-कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से गरीब और मध्यम वर्ग के इलाज का खर्च उठाती है। निजी अस्पताल इन्हीं बढ़ी हुई और मनमानी एमआरपी पर दवाएं खरीदते हैं और बाद में सरकारी खजाने से उसका शत-प्रतिशत रीइम्बर्समेंट क्लेम करते हैं। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि चंद दवा माफियाओं और निजी अस्पतालों की तिजोरियां भरने के लिए आम जनता के खून-पसीने की गाढ़ी कमाई को पानी की तरह बहाया जा रहा है। करदाताओं का पैसा जो देश के बुनियादी ढांचे और लोक-कल्याण में लगना चाहिए था, वह दवा कंपनियों की साठगांठ की भेंट चढ़ रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस ओर ध्यान दिलाते हुए इसे 'स्पष्ट रूप से देश और जनता के साथ एक बड़ा फ्रॉड' करार दिया है। इस संदर्भ में एक अहम सुझाव यह भी आया कि क्यों न देश की सभी जीवन रक्षक दवाओं को एक एकीकृत मूल्य-नियंत्रण के दायरे में ला दिया जाए, जिससे जेनेरिक और ब्रांडेड दवाओं का यह पूरा कृत्रिम भ्रम ही समाप्त हो जाए और दवाएं समान दाम पर उपलब्ध हो सकें। एक तरफ जहां दवाओं के नाम पर यह संस्थागत और कानूनी लूट जारी है, वहीं दूसरी तरफ 'नकली दवाओं' का एक समानांतर और अंडरग्राउंड अंडरवर्ल्ड चल रहा है, जो सीधे मौत का व्यापार कर रहा है। हाल ही में बेंगलुरु में विशेष जांच दल और औषधि नियंत्रण विभाग द्वारा संयुक्त छापेमारी में एक बहुत बड़े अंतरराज्यीय नकली कैंसर दवा रैकेट का भंडाफोड़ हुआ है। जांच में जो तथ्य सामने आए, वे रोंगटे खड़े करने वाले हैं। वीरेश कुमार जैन नामक एक फार्मासिस्ट की मुख्य संलिप्तता वाले इस गिरोह ने करीब 90 से अधिक प्रतिष्ठित अस्पतालों और क्लीनिकों में पिछले पांच वर्षों से नकली तथा एक्सपायर्ड हो चुकी कैंसर और आईसीयू दवाओं की धड़ल्ले से आपूर्ति की। ये अपराधी एक्सपायर हो चुकी दवाओं को दोबारा प्रोसेस करते थे, उन्हें चमचमाते नए डिब्बों में पैक करते थे, नामचीन अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय फार्मा ब्रांडों के नकली होलोग्राम और लेबल लगाते थे और अस्पतालों के परचेजिंग डिपार्टमेंट को आकर्षित करने के लिए पचास प्रतिशत तक के भारी डिस्काउंट का लालच देते थे। पांच साल तक, यानी कि 1,800 से अधिक दिनों तक अस्पतालों के खरीद तंत्र ने बिना किसी लैब टेस्टिंग या प्रामाणिकता की जांच किए, सिर्फ मुनाफे के लालच में इन नकली दवाओं को खरीदा और उन लाचार मरीजों के जिस्म में कीमोथेरेपी के नाम पर जहर के रूप में उतार दिया जो अपनी जिंदगी की आखिरी उम्मीद लेकर वहां आए थे। इस घिनौने अपराध की जद सिर्फ बेंगलुरु तक सीमित नहीं है; इसके तार कर्नाटक से लेकर हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, तमिलनाडु और महाराष्ट्र तक फैले हुए हैं। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि नकली दवाओं का नेटवर्क देशव्यापी नेटवर्क बन चुका है। कुछ समय पूर्व नागपुर के सरकारी अस्पताल में भी एक ऐसा ही सनसनीखेज मामला सामने आया था, जहां मरीजों को दी जाने वाली गोलियों में मुख्य औषधीय साल्ट की जगह साधारण टेलकम पाउडर भरा हुआ था। जब किसी मरीज को एंटीबायोटिक या कैंसर रोधी दवाओं के नाम पर टेलकम पाउडर या चाक की गोलियां दी जाएंगी, तो उसका ठीक होना तो दूर, बीमारी और अधिक आक्रामक होकर उसकी जान ले लेगी। कानून के नजरिए से देखें तो यह धारा 302 यानी सीधे-सीधे हत्या का मामला बनता है, न कि केवल ट्रेडमार्क के उल्लंघन या मिलावट का। ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 में कहने को तो आजीवन कारावास और जब्त माल की कीमत का तीन गुना जुर्माने जैसे सख्त कानूनी प्रावधान शामिल किए गए हैं, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर अपराधियों को इसका कोई खौफ नजर नहीं आता। वजह साफ है—कमजोर लूपहोल्स का फायदा उठाकर अपराधी अक्सर जमानत पर बाहर आ जाते हैं और फिर से अपना वही खूनी कारोबार शुरू कर देते हैं। यही कारण है कि देश की जनता और न्यायविदों को अब इस भयावह संकट से उबरने के लिए न्यायपालिका की ओर देखना पड़ रहा है। अब जब पानी सिर से ऊपर जा चुका है, तो अदालती हस्तक्षेप ही एकमात्र उम्मीद बची है। अदालतों में दायर हालिया याचिकाओं में यह मांग बिल्कुल जायज है कि नकली और अत्यधिक महंगी दवाओं के मामलों की जांच के लिए तीन महीने की सख्त समय-सीमा तय हो और फास्ट ट्रैक कोर्ट के माध्यम से एक वर्ष के भीतर दोषियों को फांसी या उम्रकैद जैसी नजीर बनने वाली सजाएं दी जाएं। साथ ही, इस धंधे से अर्जित की गई अपराधियों और उनके परिवारों की पूरी चल-अचल संपत्ति को तुरंत कुर्क किया जाना चाहिए। दवा उद्योग को आत्ममंथन करना होगा कि जब आबकारी विभाग अपनी शराब की बोतलों पर क्यूआर कोड और ट्रैक-एंड-ट्रेस मैकेनिज्म लागू करके एक-एक बूंद का हिसाब रख सकता है, तो ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया देश की जीवन रक्षक दवाओं के लिए वैसा ही अचूक और फुलप्रूफ डिजिटल बारकोडिंग सिस्टम देशव्यापी स्तर पर अनिवार्य क्यों नहीं कर पा रहा है? शीर्ष 300 ब्रांडों पर क्यूआर कोड का नियम लागू करना एक स्वागत योग्य कदम है, लेकिन इसे देश की हर छोटी-बड़ी मेडिकल वाइल और टैबलेट स्ट्रिप पर अनिवार्य करना होगा। दवाइयों के इस दोतरफा संकट—एक तरफ कृत्रिम रूप से बढ़ाई गई बेलगाम कीमतें और दूसरी तरफ नकली दवाओं का जानलेवा जाल—ने चिकित्सा पेशे की विश्वसनीयता को भी दांव पर लगा दिया है। जब तक सरकारें राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखाएंगी और स्वास्थ्य को कॉर्पोरेट घरानों के मुनाफे का जरिया बनने से नहीं रोकेंगी, तब तक आम आदमी को न्याय नहीं मिल सकता। फार्मा लॉबी की ताकत के आगे सरकारी अमले की कथित और रहस्यमयी चुप्पी इस बात का संकेत है कि बिना अदालती हंटर के यह तंत्र सुधरने वाला नहीं है। 2,700 की दवा को 27,000 में बेचना अगर डकैती है, तो नकली दवाएं बेचना सीधे-सीधे नरसंहार है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले की अगली सुनवाई की तारीखें तय कर सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि अदालत का यह सख्त रुख देश की नीति-नियंताओं की कुंभकर्णी नींद को तोड़ेगा। देश को अब भाषणों और आश्वासनों की नहीं, बल्कि एक ऐसे कठोर कानून और पारदर्शी मूल्य निर्धारण व्यवस्था की जरूरत है, जहां किसी भी मां, बहन या पिता को पैसे के अभाव में या नकली दवा के जहर के कारण तड़प-तड़प कर दम न तोड़ना पड़े। स्वास्थ्य हर नागरिक का मौलिक अधिकार है, और इसे मुनाफाखोरों की मंडी बनने से बचाना ही आज के समय की सबसे बड़ी राष्ट्रीय चुनौती है। अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार

प्रभासाक्षी 24 Sep 2026 6:52 pm

ब्राह्मणों पर टिप्पणी करने वाले अब 'पी' का अर्थ पंडित बता रहे, जनता को गुमराह कर रहे: मनोज पांडे

ब्राह्मणों पर टिप्पणी करने वाले अब 'पी' का अर्थ पंडित बता रहे, जनता को गुमराह कर रहे: मनोज पांडे

समाचार नामा 24 Sep 2026 6:26 pm

अमेरिकी धरती पर खड़े होकर ट्रंप को घेरना आसान नहीं, मगर मैक्रों, पेजेशकियन, अहमद अल-शरा और सिल्वा ने ये कर दिखाया

संयुक्त राष्ट्र महासभा के वार्षिक अधिवेशन में इस बार एक अनोखी तस्वीर देखने को मिली। अमेरिकी धरती न्यूयॉर्क पर खड़े होकर कई देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने जिस तरह अमेरिका की नीतियों को ही आड़े हाथ लिया, उससे वैश्विक राजनीति में बढ़ती बेचैनी साफ दिखाई दी। ईरान ने सीधे अमेरिका को चुनौती दी, फ्रांस ने महाशक्तियों के तकनीकी और सामरिक वर्चस्व पर सवाल उठाए, सीरिया ने गोलान पहाड़ियों पर अमेरिकी नीति को खारिज किया, जबकि ब्राजील और तुर्किये जैसे देशों ने संप्रभुता, विदेशी हस्तक्षेप और मौजूदा वैश्विक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए। संदेश साफ है कि दुनिया की अनेक सरकारें मौजूदा अंतरराष्ट्रीय संकटों के लिए अमेरिकी नीतियों और व्यापक शक्ति आधारित राजनीति को जिम्मेदार ठहराते हुए अब ज्यादा मुखर दिखाई दे रही हैं। इस पूरे घटनाक्रम में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों का भाषण बेहद महत्वपूर्ण रहा। 22 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने संबोधन में मैक्रों ने चेतावनी दी कि दुनिया कहीं फिर से “जंगल के कानून” की ओर न लौट जाए। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था उस समय कमजोर होती है जब ताकतवर देश नियमों और संस्थाओं से ऊपर खुद को समझने लगते हैं। मैक्रों ने सबसे तीखा सवाल कृत्रिम बुद्धिमत्ता के भविष्य को लेकर उठाया। उनका कहना था कि दुनिया का भविष्य केवल अमेरिका, चीन या कुछ बड़ी निजी कंपनियों के हाथों में नहीं छोड़ा जा सकता। उन्होंने तकनीकी संप्रभुता, ओपन सोर्स अत्याधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियों और रक्षा, साइबर सुरक्षा तथा अंतरिक्ष क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय नियमों की आवश्यकता पर जोर दिया। यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में अमेरिकी कंपनियों का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। इसे भी पढ़ें: भारत को डराया नहीं जा सकता, यह नया भारत है गाजा के मुद्दे पर भी मैक्रों ने पश्चिमी देशों की नीतियों को कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने गाजा की मानवीय स्थिति को बेहद गंभीर बताते हुए मौजूदा शांति प्रयासों पर सवाल उठाया। पश्चिमी तट में बस्तियों से जुड़ी हिंसा की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि पड़ोसी देशों की संप्रभुता का उल्लंघन इजराइल के भविष्य को सुरक्षित नहीं कर सकता। यूक्रेन युद्ध को लेकर उन्होंने नागरिक और ऊर्जा ढांचे पर हमले रोकने तथा काला सागर से अनाज परिवहन की सुरक्षा के लिए दोहरी अस्थायी युद्धविराम व्यवस्था का प्रस्ताव भी रखा। लेकिन संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका को सबसे सीधी चुनौती ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन की ओर से मिली। 23 सितंबर को पेजेशकियन ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक दिन पहले दिए गए कड़े बयान का जवाब देते हुए कहा कि ईरान दबाव के आगे नहीं झुकेगा। उन्होंने अमेरिका और इजराइल पर ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई का आरोप लगाते हुए ईरान को आतंकवाद का दोषी नहीं, बल्कि आतंकवाद का पीड़ित बताया। पेजेशकियन ने ईरान के खिलाफ सैन्य और आर्थिक दबाव को लेकर कहा कि उनका देश “घुटने नहीं टेकेगा।” उन्होंने परमाणु हथियार हासिल करने की इच्छा से इंकार किया, लेकिन शांतिपूर्ण परमाणु तकनीक, विशेषकर चिकित्सा और कृषि के लिए, इन पर किसी तरह की पाबंदी स्वीकार करने से भी साफ इंकार कर दिया। होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी उन्होंने ईरान के नौवहन अधिकारों पर जोर दिया और अमेरिकी नाकेबंदी समाप्त करने की मांग रखी। हालांकि ईरानी राष्ट्रपति ने युद्ध के बीच कूटनीति का दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि बातचीत संभव है, लेकिन इसके लिए अमेरिका को धमकी, बल प्रयोग और प्रतिबंधों की भाषा छोड़नी होगी। इसी बीच ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची और अमेरिकी विशेष दूत स्टीव विटकॉफ के बीच कतर की मध्यस्थता से अप्रत्यक्ष बातचीत भी हुई, लेकिन तत्काल कोई बड़ी सफलता सामने नहीं आई। ईरानी पक्ष आर्थिक और समुद्री प्रतिबंध हटाने तथा फ्रीज हुए धन से जुड़े मुद्दों पर अपनी शर्तों पर कायम रहा। इस टकराव का सबसे नाटकीय दृश्य तब देखने को मिला जब पेजेशकियन के भाषण के दौरान अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल संयुक्त राष्ट्र महासभा कक्ष से बाहर चला गया। एक ओर मंच पर ईरान अमेरिका को चुनौती दे रहा था, दूसरी ओर पर्दे के पीछे दोनों पक्षों के बीच बातचीत भी चल रही थी। यानी युद्ध और कूटनीति एक साथ आगे बढ़ते दिखाई दिए। वहीं सीरिया के राष्ट्रपति अहमद अल-शरा ने भी अमेरिकी नीति पर खुला प्रहार किया। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में स्पष्ट कहा कि गोलान पहाड़ियां सीरिया की भूमि हैं और किसी भी बाहरी शक्ति को सीरियाई क्षेत्र किसी दूसरे देश को सौंपने का अधिकार नहीं है। उनका यह बयान अमेरिका द्वारा गोलान पहाड़ियों पर इजराइली संप्रभुता को मान्यता देने वाली नीति के सीधे विरोध में था। साथ ही अल-शरा ने इजराइली सैन्य कार्रवाइयों का उल्लेख करते हुए सैकड़ों हवाई हमलों, बड़ी संख्या में घुसपैठ और गिरफ्तारियों का आरोप लगाया तथा इजराइली सेना की वापसी और 1974 के अलगाव समझौते के पालन की मांग की। साथ ही उन्होंने युद्ध के बाद सीरिया के पुनर्निर्माण की तस्वीर भी पेश की। उन्होंने सरकारी संस्थाओं को स्थिर करने, हथियारों को केंद्रीय सरकार के नियंत्रण में लाने, संक्रमणकालीन न्याय लागू करने और मादक पदार्थों की तस्करी पर कार्रवाई की बात भी कही। उधर, ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा ने भी विदेशी हस्तक्षेप और राष्ट्रीय संप्रभुता के सवाल को प्रमुखता दी। उन्होंने कहा कि ब्राजील किसी बाहरी शक्ति का पिछलग्गू नहीं है और विदेशी हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं किया जाएगा। वहीं तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगान ने भी संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था और सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना पर सवाल उठाए तथा गाजा के मुद्दे पर इजराइल को मिल रहे समर्थन की आलोचना की। देखा जाये तो इस पूरे घटनाक्रम को केवल अमेरिका-विरोधी भाषणों की श्रृंखला नहीं माना जा सकता। असली मुद्दा तेजी से बदलती विश्व व्यवस्था का है। संयुक्त राष्ट्र के मंच पर अलग-अलग देशों की आवाजें यह सवाल उठा रही हैं कि क्या सैन्य ताकत, आर्थिक प्रतिबंध, तकनीकी वर्चस्व और कूटनीतिक दबाव के दम पर विश्व व्यवस्था चलाई जा सकती है। न्यूयॉर्क में इस बार अमेरिका के सामने सवाल केवल ईरान का नहीं था। सवाल यह था कि क्या दुनिया कुछ शक्तिशाली देशों और बड़ी तकनीकी कंपनियों के निर्णयों से चलेगी या फिर संप्रभुता, अंतरराष्ट्रीय कानून और बहुपक्षीय संस्थाओं की भूमिका दोबारा मजबूत होगी। संयुक्त राष्ट्र महासभा का यह अधिवेशन इसी टकराव को बेहद तीखे ढंग से दुनिया के सामने रख रहा है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 24 Sep 2026 6:18 pm

आईआईटी-बॉम्बे के छात्र की मौत के बाद मिड-सेमेस्टर परीक्षाएं स्थगित

आईआईटी-बॉम्बे के छात्र की मौत के बाद मिड-सेमेस्टर परीक्षाएं स्थगित

समाचार नामा 24 Sep 2026 3:48 pm

चुनाव आयोग पर उठे सवालों पर नकवी बोले-'असहमति लोकतंत्र में ही संभव, तानाशाही में नहीं'

चुनाव आयोग पर उठे सवालों पर नकवी बोले-'असहमति लोकतंत्र में ही संभव, तानाशाही में नहीं'

समाचार नामा 24 Sep 2026 3:25 pm

अयोध्या दीपोत्सव की तैयारी तेज, योगी के नेतृत्व में इस बार और भव्य होगा आयोजन : वेदप्रकाश

अयोध्या दीपोत्सव की तैयारी तेज, योगी के नेतृत्व में इस बार और भव्य होगा आयोजन : वेदप्रकाश

समाचार नामा 24 Sep 2026 2:32 pm

Gautam Adani ने की जबरदस्त वापसी! Mukesh Ambani को पछाड़ कर फिर बने नंबर-1, India में अमीरों की संख्या भी बढ़ी

भारत के कारोबारी जगत में एक बार फिर बड़ा उलटफेर हुआ है। एम3एम हुरुन इंडिया रिच लिस्ट 2026 ने गौतम अडानी और उनके परिवार को देश के सबसे अमीर परिवार के रूप में फिर से नंबर एक पर पहुंचा दिया है। अडानी परिवार की कुल संपत्ति अब 9.23 लाख करोड़ रुपये आंकी गई है, जबकि पिछले साल शीर्ष स्थान पर रहे मुकेश अंबानी और उनका परिवार 8.63 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति के साथ दूसरे स्थान पर है। यानी अडानी परिवार ने 59,400 करोड़ रुपये की बढ़त के साथ पहला स्थान हासिल किया है। यह वापसी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हाल के दिनों में अडानी समूह और स्वयं गौतम अडानी को लेकर कई विवाद खड़े किये गये थे। लेकिन विवादों से सफलतापूर्वक बाहर आते हुए अडानी की कारोबारी ताकत और उनके समूह से जुड़ी संपत्ति में फिर उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। एक साल में अडानी परिवार की संपत्ति 13 प्रतिशत बढ़ी, जबकि अंबानी परिवार की संपत्ति में 10 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इसे भी पढ़ें: BRICS Summit 2026: Gautam Adani से मिले Cyril Ramaphosa, भारत-दक्षिण अफ्रीका निवेश पर बड़ी चर्चा लेकिन इस कहानी की अहमियत सिर्फ इतनी नहीं है कि गौतम अडानी फिर से नंबर एक अमीर बन गए हैं। हुरुन की रिपोर्ट भारत में तेजी से बढ़ती संपत्ति की भी बड़ी तस्वीर दिखाती है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में अब 391 ऐसे अरबपति हैं जिनकी संपत्ति अमेरिकी डॉलर में एक अरब डॉलर या उससे ज्यादा है। पांच साल पहले ऐसे अरबपतियों की संख्या 237 थी। वहीं, कम से कम 1,000 करोड़ रुपये की संपत्ति रखने वाले भारतीयों की संख्या बढ़कर 1,810 हो गई है। इन सभी की कुल संपत्ति 187.5 लाख करोड़ रुपये है, जो भारत की अर्थव्यवस्था के आकार के करीब आधे के बराबर है। यानी भारत में सिर्फ अरबपतियों की संख्या ही नहीं बढ़ रही, बल्कि देश में बड़े पैमाने पर नई संपत्ति भी तैयार हो रही है। खास बात यह है कि यह संपत्ति वृद्धि ऐसे समय हुई जब शेयर बाजार में कमजोरी रही। इस अवधि में सूची में शामिल कुल संपत्ति 12.8 प्रतिशत बढ़ी, जबकि निफ्टी 50 में 3.9 प्रतिशत और सेंसेक्स में 5.8 प्रतिशत की गिरावट आई। इसका अर्थ यह है कि अमीरी की इस तस्वीर को केवल शेयर बाजार की तेजी से समझना गलत होगा। कारोबार में हिस्सेदारी, कंपनियों का मूल्यांकन, ऑर्डर बुक, उत्पादन क्षमता, बुनियादी ढांचे में निवेश और निर्यात मांग जैसे कारक इसमें बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। उधर, अडानी की वापसी इसी बदलते आर्थिक परिदृश्य से जुड़ी दिखाई देती है। हुरुन के मुताबिक एयरोस्पेस और रक्षा क्षेत्र की संपत्ति में 69 प्रतिशत की वृद्धि हुई। हरित ऊर्जा और औद्योगिक उत्पादों में 31-31 प्रतिशत, धातु एवं खनन में 30 प्रतिशत, औषधि क्षेत्र में 25 प्रतिशत और वित्तीय सेवाओं में 23 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। हुरुन के संस्थापक और मुख्य शोधकर्ता अनस रहमान जुनैद ने ऑर्डर बुक, बुनियादी ढांचे में निवेश, विनिर्माण क्षमता और निर्यात मांग को संपत्ति निर्माण के महत्वपूर्ण इंजन बताया है। बुनियादी ढांचा, ऊर्जा, औद्योगिक गतिविधियां, हरित ऊर्जा और अन्य बड़े पूंजीगत क्षेत्रों में निवेश उस व्यापक आर्थिक बदलाव से जुड़े हैं जिसे हुरुन ने इस सूची में दर्ज किया है। देखा जाये तो विकसित भारत के निर्माण की चर्चा में बुनियादी ढांचा, ऊर्जा सुरक्षा, विनिर्माण क्षमता, रक्षा उत्पादन और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्र केंद्रीय भूमिका रखते हैं। इस बीच भारत के सबसे अमीर परिवारों की तस्वीर भी बदल रही है। एलएन मित्तल परिवार 93 प्रतिशत की छलांग के साथ तीसरे स्थान पर पहुंच गया है और उसकी संपत्ति 3.39 लाख करोड़ रुपये हो गई है। अनिल अग्रवाल परिवार 87 प्रतिशत वृद्धि के साथ नौवें स्थान पर आया है, जबकि टॉरेंट फार्मास्यूटिकल्स से जुड़े समीर मेहता परिवार ने 52 प्रतिशत वृद्धि के बाद शीर्ष दस में जगह बनाई है। एक और बड़ा बदलाव यह है कि भारत की नई संपत्ति तेजी से तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रक्षा, सेमीकंडक्टर और हरित ऊर्जा से पैदा हो रही है। पहली बार कृत्रिम बुद्धिमत्ता को अलग संपत्ति-सृजन क्षेत्र के रूप में दर्ज किया गया है। इस क्षेत्र से जुड़े 19 लोग सूची में हैं, जिनकी संयुक्त संपत्ति 3.07 लाख करोड़ रुपये है। एआई, एयरोस्पेस एवं रक्षा और सेमीकंडक्टर क्षेत्र मिलकर 48 लोगों की 4.26 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। साथ ही भारत में औद्योगिक उत्पाद क्षेत्र सबसे बड़ा क्षेत्र बना हुआ है, जिसमें 166 नाम हैं। इसी क्षेत्र से 44 नए लोग सूची में आए। यह संकेत है कि भारत में संपत्ति निर्माण की कहानी केवल उपभोक्ता बाजार की नहीं, बल्कि कारखानों, उत्पादन, बुनियादी ढांचे, रक्षा, ऊर्जा और तकनीक की भी बन रही है। दूसरी तरफ उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं, खाद्य एवं पेय, उपभोक्ता वस्तुओं और खुदरा जैसे क्षेत्रों में संपत्ति में गिरावट दर्ज हुई। सबसे खास बात यह है कि भारत में नई संपत्ति का बड़ा हिस्सा अब लोग अपनी मेहनत और कारोबार के दम पर खड़ा कर रहे हैं। हुरुन की सूची में शामिल 1,266 उद्यमी यानी करीब 70 प्रतिशत लोग स्वनिर्मित हैं। पांच साल पहले यह आंकड़ा 55 प्रतिशत था। यानी अब पहले से कहीं ज्यादा भारतीय अपने दम पर कारोबार खड़ा कर रहे हैं और बड़ी संपत्ति बना रहे हैं। वहीं गौतम अडानी का फिर नंबर एक बनना इसी बड़ी आर्थिक कहानी का एक प्रमुख अध्याय है। 2022 में अडानी और अंबानी परिवारों की संयुक्त संपत्ति बाकी शीर्ष आठ परिवारों से 5.84 लाख करोड़ रुपये अधिक थी। 2026 में तस्वीर उलट गई है। दोनों की संयुक्त संपत्ति 17.86 लाख करोड़ रुपये है, जबकि बाकी आठ की कुल संपत्ति 21.15 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है। यानी भारत की संपत्ति अब धीरे-धीरे शीर्ष दो परिवारों से आगे भी फैल रही है। फिर भी अडानी की नंबर एक पर वापसी का संदेश साफ है। आलोचनाओं, बाजार के उतार-चढ़ाव और कारोबारी चुनौतियों के बीच उनकी संपत्ति में 13 प्रतिशत की वृद्धि हुई और वह फिर भारत के सबसे अमीर परिवार के शीर्ष स्थान पर पहुंच गए। बहरहाल, भारत की अर्थव्यवस्था जिस दिशा में बढ़ रही है, उसमें बुनियादी ढांचा, विनिर्माण, ऊर्जा, रक्षा, हरित ऊर्जा और नई तकनीक निर्णायक होते जा रहे हैं। अडानी की कारोबारी उपस्थिति इन क्षेत्रों के बड़े हिस्से में है। इसलिए उनकी वापसी सिर्फ अमीरी की सूची में नंबर बदलने की घटना नहीं, बल्कि भारत में पूंजी और संपत्ति निर्माण के बदलते केंद्रों की एक तस्वीर भी है। विकसित भारत की महत्वाकांक्षा को जमीन पर उतारने के लिए जिन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निवेश की जरूरत है, उनमें निजी क्षेत्र की भूमिका महत्वपूर्ण है और अडानी समूह की गतिविधियां इसी व्यापक निवेश चक्र का एक हिस्सा हैं। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 24 Sep 2026 1:54 pm

5 दिन बैंक बंद! कर्मचारियों के साथ ऐसा क्या हुआ? मेगा हड़ताल पर आ गए सभी, वजह जानकर आप भी चौंक जाएंगे

अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति थॉमस जैफर्सन ने बैंक्स और फाइनेंशियल स्टैब्लिशमेंट को देश की बॉर्डर पर तैनात आर्मी से भी ज्यादा खतरनाक बताया था। बात सही भी है। सरकारों को अपने प्रशासन, डिप्लोमेसी और युद्ध तक चलाने के लिए बैंक्स और कर्ज की जरूरत पड़ती ही हैं। जैफर्सन का इशारा इस बात पर था कि बैंक सिर्फ पैसे के लेन-देन की जगह नहीं हैं, बल्कि वे पूरे देश की नब्ज और सत्ता की रीढ़ हैं। जब यह रीढ़ कुछ दिनों के लिए भी काम करना बंद कर दे, तो पूरा देश ठहर जाता है। 28 सितंबर से यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (UFBU) की देशव्यापी हड़ताल इसी हकीकत की याद दिलाती है। फर्ज कीजिए महीने का आखिरी हफ्ता है। आपकी सैलरी आनी है। ईएमआई भी जानी होगी। किसी को चेक जमा करना है। किसी को बैंक से कैश निकालना है। और इसी बीच खबर आती है कि 28, 29 और 30 सितंबर को देश भर में बैंक स्ट्राइक होने वाली है। और कैलेंडर देखिए आप 26 सितंबर को फोर्थ सैटरडे है। बैंक की छुट्टी। 27 सितंबर संडे है बैंक की छुट्टी। और 28, 29 और 30 सितंबर को स्ट्राइक का कॉल है। यानी बैंक ब्रांच से काम करने वाले लोगों के लिए दिक्कत 3 दिन की नहीं लगातार 5 दिन तक खींच सकती है। फाइनेंस मिनिस्ट्री ने भी कहा है कि वीकेंड के साथ मिलकर यह स्ट्राइक बैंकिंग सर्विज पर 5 दिन जैसा असर डाल सकती है। तो सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बैंक कर्मचारी स्ट्राइक क्यों कर रहे हैं? आपके लिए सवाल है क्या 30 तारीख की सैलरी आएगी? यूपीआई चलेगा या नहीं चलेगा? एटीएम में पैसा मिलेगा या नहीं? चेक क्लियर होगा, ईएमआई कटेगी और आपका कोई जरूरी काम बैंक ब्रांच में अटका हुआ है तो क्या अभी निपटा लेना चाहिए? आखिर ऐसा क्या हो गया है कि लाखों बैंक कर्मचारी काम-काज चोड़कर सड़कों पर उतरने की तैयारी कर चुके हैं। सरकार इस मुद्दे पर क्या कर रही है? तमाम मामलों का एमआरआई स्कैन करेंगे। किसने बुलाई हड़ताल और क्यों बैंक कर्मचारियों के संगठन यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस UFBU ने इस हरताल को बुलाया है। बैंक कर्मचारियों का कहना है कि बैंक्स में हफ्ते में पांच दिन के काम की व्यवस्था होनी चाहिए और हर शनिवार छुट्टी होनी चाहिए। बैंक यूनियन की मुख्य मांग है कि हफ्ते में सिर्फ पांच दिन बैंक खोलने की व्यवस्ता लागू हो। अभी बैंक हर महीने के दूसरे और चौथे शनिवार को बंद रहते हैं लेकिन बाकी दो शनिवार काम होता है। यूनियंस चाहती हैं कि सभी शनिवार को छुट्टी हो और सोमवार से शुक्रवार तक बैंक काम करें। दूसरी बड़ी मांग पीएलआई यानि परफॉर्मेंश लिंक्ड इंसेंटिव की है। इस योजना को वापस लेने की मांग है। सरकार ने फिलहाल इस योजना को स्थगित कर दिया है। नए बैंक कर्मचारियों के लिए न्यू पेंशन स्कीम की जगह ओल्ड पेंशन स्कीम (ओपीएस) लागू करने की मांग की गई है। इसके अलावा पेंशन अपडेट करना, पेंशन पर युनिफॉर्म, डीए पेंशनर्स के लिए मेडिकल इंशोरेंस, प्रीमियम में राहत जैसी कई और मांगे भी है, जिन पर बैंक यूनियन सरकार से एक्शन की डिमांड कर रही है। इससे पहले 11 सितंबर को भी बैंक कर्मियों ने इनी मांगों को लेकर एक दिन की हड़ताल की थी। सरकार से बाचीत भी हुई थी, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकलने की वजह से अब वो तीन दिन की हड़ताल पर जा रहा है। म्युच्युअल फंड,इंशोरेंस प्रोडक्ट भी बेच रहे बैंक कर्मचारी बैंक कर्मचारियों की जितनी भी मांगे हैं उन में से सबसे बड़ी मांग जिस पर वो टस से मस नहीं होना चाहते वो 5-day वर्किंग है। बैंक कर्मियों के मुताबिक उन पर काम का बहुत जादा बोझ है, जिसके चलते वो ये डिमांड पिछले 10 साल से कर रहे है। बैंक कर्मियों के मुताबिक उनसे सामान्य बैंकिंग ऑपरेशन्स के अलावा भी कई काम कराए जाते सरकार की स्कीम्स लागू करना है। म्युचल फंड्स और इंशोरेंस जैसे प्रोडक्ट को बेचना है। ये भी काम बैंक वाले कर रहे हैं। कर्मचारियों के मुताबिक बैंकों की भर्ती प्रक्रिया बेहद ढीली है। जिसके चलते मैनपावर की कमी हमेशा बनी रहती है। इसी वज़ह से बैंकों में काम करने वाले लोग रोजाना 2-3 घंटे पहले ही ज्यादा काम करते है। बैंक कर्मचारियों के मताबिक एलआईसी जैसे कई फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन्स में 5-day working का नियम है यानी पांच दिन काम होता है तो बैंक में क्यों पांच दिन नहीं हो सकता। आप दस तरह के काम बैंक कर्मचारियों से करा रहे हैं, तो बैंक कर्मचारी कह रहे हैं कि हम भी तो इंसान हैं, हमारा भी परिवार है। क्या दिनभर सिर्फ नोट ही गिनते रहे। बैंक यूनियन्स के मुताबिक मार्च 2024 में इंडियन बैंक्स असोसियेशन आईवीए के साथ द्विपक्षीय समझोता हुआ और इसमें सहमती बनी थी। लेकिन इसे लागू करने के लिए अभी तक सरकार की आधिकारिक मंजूरी और अधिसूचना का इंतजार है। बैंक खुद किस तरह की दिक्कत की तैयारी कर रहे हैं एसबीआई ने कस्टमर्स के लिए एडवाइज़री जारी की है। बैंक ने कहा कि जो जरूरी बैंकिंग ट्रांजैक्शंस हैं उन्हें स्ट्राइक की तारीखों से पहले पूरा कर लें। कैश चाहिए तो एटीएम का इस्तेमाल करें। ADWM यानी ऐसी मशीन जहां से कई जगह कैश निकालने के साथ जमा भी किया जा सकता है। बैंक ने कस्टमर सर्विस पॉइंट्स इस्तेमाल करने के लिए भी कहा है और सबसे जरूरी इंटरनेट बैंकिंग, यo, मोबाइल बैंकिंग, यूपीआई और दूसरे डिजिटल चैनल्स को प्रेफर करने को कहा है। साथ में यह भी कि स्ट्राइक के दौरान जरूरी बैंकिंग सर्विज चालू रखने की पूरी कोशिश की जाएगी। ऐसे ही कुछ नोटिसेस बैंक ऑफ बौदा, Canरा बैंक, PNB सारे बैंक्स ने निकाले हैं। अगर आपका काम ब्रांच पर डिपेंड करता है बैंक की तो उसे आखिरी दिन के भरोसे मत छोड़िए। इस वक्त यूपीआई बिना किसी दिक्कत के चलेगा। यह स्ट्राइक बैंक कर्मचारियों की है। यूपीआई जैसे डिजिटल पेमेंट सिस्टम को बंद करने का कोई ऐलान नहीं है। इंटरनेट बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग और बैंक एप्स भी नॉर्मल रहेंगे। इसी तरह ऑनलाइन एनईएफटी और आरटीजीएस भी चलते रहने चाहिए। आरबीआई के मुताबिक एनईएफटी पूरे साल 24ों घंटे उपलब्ध है। आरटीजीएस भी 24 घंटे साल के चलता रहता है। हम 10 दिन का वेतन गंवा सकते हैं, क्या देश 10 दिन बैंक बंदी झेल सकता है? कर्मचारी यूनियनें हड़ताल के दौरान वेतन कटने के डर को अपनी सबसे बड़ी ताकत में तब्दील करने की अपील कर रही हैं। बैंककर्मियों का स्पष्ट तर्क है कि दो-तीन दिन या दस दिन का वेतन कटने से कर्मचारियों के घरों पर असर जरूर पड़ेगा, लेकिन वे झेल लेंगे। सवाल यह है कि क्या सरकार और देश की अर्थव्यवस्था बैंकों की राष्ट्रव्यापी पूर्ण बंदी को इतने दिन बर्दाश्त कर सकती है? कर्मचारियों का मानना है कि वेतन बचाने के लिए अगर वे आज पीछे हटे, तो उनकी बारगेनिंग पावर खत्म हो जाएगी, इसलिए वे अपनी सामूहिक ताकत दिखाने के मूड में हैं। संडे को भी खुलेंगे बैंक देशभर में सभी बैंक इस हफ्ते रविवार को भी खुले रहेंगे। वित्त मंत्रालय ने जानकारी दी है कि RBI ने 27 सितंबर को देश की सभी बैंक शाखाओं, दफ्तरों और एटीएम-लिंक ब्रांचों समेत सभी सर्विसेज को पूरी तरह चालू रखने की मंजूरी दी है। वित्त मंत्रालय ने कहा कि जनता की जरूरी बैंकिंग जरूरतों पर लंबे समय तक असर न पड़े, इसे सुनिश्चित करने के लिए सभी सरकारी बैंक और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक रविवार, 27 सितंबर को सामान्य रूप से काम करेंगे। रिजर्व बैंक ने सभी शाखाओं, कार्यालयों, एटीएम-लिंक ब्रांचों और करेंसी चेस्ट्स को इस दिन पूरी तरह चालू रखने की मंजूरी दी है। कर्मचारियों के भीतर सरकार और मैनेजमेंट के उस कदम को लेकर भी तीखा गुस्सा है, जिसके तहत रविवार (27 सितंबर) को शाखाएं या करेंसी चेस्ट खुलवाने की अनुमति ली गई थी। कर्मचारियों का कहना है कि एक रविवार को बैंक खोल देने से हड़ताल का असर कम नहीं होगा। अगर कर्मचारी सड़कों पर डटे रहे, तो हर गुजरते दिन के साथ ग्राहकों, कारोबारियों और पूरी अर्थव्यवस्था का दबाव सरकार पर बढ़ेगा। उनका संदेश साफ है कि जंग सिर्फ एक दिन की छुट्टी या काम की नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व और अधिकारों की पहचान कराने की है। सरकार का क्या कहना है? 21 सितंबर को सरकार ने कहा कि यूनियंस के साथ कई दौर की बातचीत और कंसिलिएशंस हुई हैं। बाकी मुद्दे बातचीत से हल किए जा सकते हैं और कर्मचारियों को स्ट्राइक से बचना चाहिए ताकि बैंकिंग सर्विज ना रुके। सरकार का दूसरा तर्क है कि शनिवार सिर्फ बैंक कर्मचारी के लिए वर्किंग डे नहीं है। कई कस्टमर्स, कई ग्राहक, आम लोग उसी दिन बैंक जाते हैं। 2015 में दूसरे और चौथे शनिवार को बैंक हॉलिडे मनाया गया था। लेकिन सरकार का कहना है कि बाकी शनिवार उन लोगों के लिए काम आते हैं जो सोमवार से शुक्रवार नौकरी या किसी दूसरे काम की वजह से ब्रांच नहीं जा पाते। तीसरा और इस बार सरकार का सबसे बड़ा कंसर्न है टाइमिंग। 30 सितंबर को हाफ ईयरली क्लोजिंग है। इस दिन बैंक सिर्फ सामान्य कस्टमर ट्रांजैक्शंस नहीं करते। बैंक अपने रिकॉर्ड्स भी मिलाते हैं। इसलिए फाइनेंस मिनिस्ट्री का कहना है कि इस वक्त स्ट्राइक का असर सिर्फ बैंक काउंटर तक नहीं रहेगा। बिजनेस, सरकारी ट्रांजैक्शन, इंटरनेशनल बैंकिंग तक असर पड़ सकता है। और सरकार सिर्फ अपील भी नहीं कर रही है, तैयारी भी कर रही है। डिपार्टमेंट ऑफ फाइनेंसियल सर्विज के 21 सितंबर के मेमो के मुताबिक 18 सितंबर को क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप की एक मीटिंग हुई। इसके बाद 21 सितंबर को पब्लिक सेक्टर बैंक्स, रीजनल रूरल बैंक्स और आईबीए के अधिकारियों के साथ स्ट्राइक की तैयारी पर चर्चा हुई। फिर होम मिनिस्ट्री से राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों को एडवाइज़री जारी करने में मदद मांगी गई। इसे भी पढ़ें: क्या सच में मनमर्जी करते हुए ज्ञानेश कुमार ने सरकार की शक्तियों को भी ठेंगा दिखा दिया? SIR के बीच चुनाव आयुक्तों में मतभेद की खबरों को ऑब्जर्वेशन और डिसेंट से समझें किस चीज की सुरक्षा के लिए? करेंसी चेस्ट यानी वो जगह जहां बैंकों के लिए बड़ी मात्रा में कैश रखा जाता है। चेक क्लियरिंग प्रोसेसिंग सेंटर्स, डाटा सेंटर्स, डाटा रिकवरी सेंटर्स, ट्रेजरी ऑपरेशन, आईटी सेंटर्स, साइबर सिक्योरिटी सेल, एटीएम साथ ही बैंक ब्रांच के आसपास लॉ एंड ऑर्डर बनाए रखने और जो कर्मचारी स्ट्राइक में शामिल नहीं है, उनकी सुरक्षा की बात भी कही गई है। राज्यों से स्ट्राइक से जुड़ी जानकारी और इंटेलिजेंस इनपुट भी मांगे गए हैं। तो सरकार की तैयारी सिर्फ इतनी नहीं है कि किसी तरह बैंक का शटर खुला रहे। कोशिश यह है कि बैंकिंग के पीछे चलने वाली पूरी मशीनरी, कैश, चेक, डाटा, आईटी, ट्रेजरी जितना हो सके वह चलता रहे। फाइनेंस मिनिस्ट्री ने बैंकों से यह भी कहा है कि एटीएम में इनफ कैश रखा जाए। जरूरी सर्विसेस के लिए बैकअप प्लान रहे और डिजिटल चैनल्स चलते रहें।

प्रभासाक्षी 24 Sep 2026 1:23 pm

Modi के Gujarat की Hilsa Fish के आयात पर Tarique Rahman ने लगा दी रोक, India-Bangladesh रिश्तों में आई नई टेंशन

भारत और बांग्लादेश के कूटनीतिक संबंध पहले ही खराब दौर से गुजर रहे हैं। ऐसे में बांग्लादेश की तारिक रहमान सरकार ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृहराज्य गुजरात की हिलसा मछली का आयात रोक कर इस चिंगारी को और भड़का दिया है। हम आपको बता दें कि मंगलवार शाम बांग्लादेश ने भारत से हिलसा मंगाने वाले आयात परमिट रद्द कर दिए। पिछले करीब दो महीनों में बांग्लादेश लगभग 550 टन भारतीय हिलसा मंगा चुका था, लेकिन अब अचानक इस व्यापार पर रोक लगा दी गई है। मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यह फैसला ऐसे समय आया है जब बांग्लादेश खुद हिलसा की कमी और बढ़ती कीमतों से जूझ रहा है। यानी जिस भारतीय हिलसा की जरूरत बांग्लादेश के अपने बाजार को पड़ रही थी, उसी पर रोक लगाकर ढाका ने भारत के साथ पहले से तनावपूर्ण चल रहे रिश्तों में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। देखा जाये तो यह फैसला ऐसे समय आया है जब बांग्लादेश में हिलसा की स्थानीय पकड़ पिछले कुछ वर्षों के मुकाबले कमजोर हुई है और वहां कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। बांग्लादेशी मछुआरा महासंघ के अध्यक्ष रवींद्रनाथ बर्मन ने आरोप लगाया कि कुछ व्यापारियों ने भारत की गुजरात वाली हिलसा को बांग्लादेशी हिलसा बताकर बेचने की कोशिश की, जिससे उपभोक्ताओं के साथ धोखा हुआ। इसे भी पढ़ें: BRICS की सफलता और Mecca Pact की विफलता देख Bangladesh ने बदला रुख, नवंबर में India आने को आतुर हैं PM Tarique Rahman लेकिन असली कहानी इससे कहीं बड़ी है। हिलसा सिर्फ एक मछली नहीं है। बंगाली समाज में इसका स्वाद, परंपरा, धार्मिक रीति और सांस्कृतिक पहचान से गहरा संबंध है। बांग्लादेश इसे अपनी राष्ट्रीय मछली मानता है, जबकि पश्चिम बंगाल में भी पद्मा की हिलसा को विशेष प्रतिष्ठा हासिल है। हम आपको बता दें कि पद्मा गंगा की एक प्रमुख वितरिका है, जो आगे मेघना से मिलकर बंगाल की खाड़ी में जाती है। यही वजह है कि पद्मा और मेघना की हिलसा भारत में महंगी कीमत पर भी खरीदी जाती है। विडंबना देखिए कि बांग्लादेश लंबे समय से भारत को सीमित मात्रा में हिलसा भेजता रहा है, लेकिन दूसरी तरफ भारत से सैकड़ों टन हिलसा खरीद भी रहा है। पिछले दो महीनों में भारत से करीब 500 टन हिलसा बांग्लादेश पहुंची और अतिरिक्त 150 से 200 टन की प्रक्रिया भी चल रही थी। इनमें बड़ी मात्रा गुजरात के भरूच और नर्मदा क्षेत्र की हिलसा की बताई गई है। इसका कारण स्वाद से ज्यादा अर्थशास्त्र है। बांग्लादेश में पद्मा और मेघना की अच्छी हिलसा लगभग 2,200 से 2,800 टका प्रति किलो तक पहुंच सकती है, जबकि गुजरात की हिलसा वहां के थोक बाजार में लगभग 500 से 700 टका प्रति किलो की लागत पर पहुंचती है और खुदरा बाजार में करीब 1,500 से 1,800 टका प्रति किलो में बिक सकती है। यानी बांग्लादेश के लिए गुजरात की हिलसा स्थानीय कमी को पूरा करने का अपेक्षाकृत सस्ता माध्यम बन गई है। यही वह कारण है जहां बांग्लादेश का मौजूदा फैसला सवालों के घेरे में आता है। अगर भारतीय हिलसा वहां की आपूर्ति व्यवस्था, प्रसंस्करण उद्योग और कीमतों को संभालने में उपयोगी है, तो अचानक आयात परमिट रोकने से सबसे सीधा असर वहां के बाजार और उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है। दूसरी तरफ भारत में भी इसका असर होगा। पश्चिम बंगाल के व्यापारियों के अनुसार गुजरात में मौजूदा हिलसा की उपलब्धता भी सीमित हो चुकी है और कोलकाता के बाजार में म्यांमार की हिलसा ही एक प्रमुख विकल्प बच सकती है। भारत के लिए दूसरी बड़ी चुनौती घरेलू उत्पादन की है। पश्चिम बंगाल में हिलसा का उत्पादन वर्ष 2001 के करीब 80 हजार टन से घटकर 2013 में लगभग 15 हजार टन और 2020 में करीब 10 हजार टन रह गया था। इसके पीछे बंगाल की खाड़ी में अत्यधिक मछली पकड़ने को एक प्रमुख कारण बताया गया है। इसी कमी ने गुजरात की हिलसा के लिए बाजार तैयार किया। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनुसार गुजरात ने 2025-26 में करीब 14,588 टन हिलसा का उत्पादन किया। वहीं बांग्लादेश में भी हिलसा का उत्पादन गिरा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वार्षिक उत्पादन 2022 के 5,71,324 टन से घटकर 2025 में करीब 5 लाख टन रह गया। इसी दौरान कीमतों में भारी उछाल आया। ऐसे में भारत से आने वाली अपेक्षाकृत सस्ती हिलसा की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है। मगर सबसे बड़ा खतरा उपभोक्ता भरोसे का है। पश्चिम बंगाल और दिल्ली जैसे बाजारों में गुजरात और गंगा की हिलसा में अंतर करना कई खरीदारों के लिए आसान नहीं है। कुछ व्यापारियों ने खुद माना कि खरीदार को यह पता लगाना कठिन हो सकता है कि मछली वास्तव में कहां की है। ऐसे में गलत नाम से बिक्री का आरोप सिर्फ व्यापारिक विवाद नहीं, बल्कि खाद्य पारदर्शिता का मुद्दा भी बन जाता है। इस पूरे घटनाक्रम का व्यापक निहितार्थ साफ है। हिलसा अब सिर्फ स्वाद और परंपरा का विषय नहीं रही। यह सीमा-पार व्यापार, कीमत, स्थानीय उत्पादन, उपभोक्ता विश्वास और दोनों देशों के बाजारों की परस्पर निर्भरता का प्रतीक बन चुकी है। बांग्लादेश भारत से हिलसा खरीदकर अपनी कमी पूरी करता है, जबकि भारत में बंगाली उपभोक्ता बांग्लादेशी पद्मा हिलसा के लिए तरसते हैं। देखा जाये तो एक ही मछली है, लेकिन सीमा के दोनों ओर उसकी आर्थिक और सांस्कृतिक भूमिका अलग है। देखना होगा कि बांग्लादेश का यह परमिट-रोक फैसला अस्थायी प्रशासनिक कदम साबित होता है या हिलसा व्यापार में एक लंबी खींचतान की शुरुआत करता है। दुर्गापूजा से ठीक पहले लिया गया यह फैसला भारत के बाजार में पद्मा हिलसा की संभावित उपलब्धता पर भी असर डाल सकता है। उधर, बांग्लादेश के लिए भी चुनौती कम नहीं है क्योंकि जिस भारतीय आपूर्ति ने उसकी घरेलू और औद्योगिक जरूरतों में एक खाली जगह भरी है, उसे अचानक रोकने का असर अंततः वहां के बाजार पर ही दिखाई देगा। बहरहाल, हिलसा की यह कहानी अब सिर्फ स्वाद, परंपरा और बंगाली भावनाओं की कहानी नहीं रह गई है। यह भारत और बांग्लादेश के बीच बदलते व्यापारिक समीकरणों और एक-दूसरे पर निर्भर बाजारों की भी कहानी है। बांग्लादेश जिस भारतीय हिलसा को अपनी आपूर्ति की कमी पूरी करने के लिए खरीदता है, वही बांग्लादेशी पद्मा हिलसा भारत में दुर्लभता और प्रतिष्ठा के कारण सोने के भाव बिकती है। यानी एक ही मछली सीमा के इस पार भावनाओं की कीमत तय करती है और उस पार जरूरत की। ऐसे में अचानक व्यापार पर लगाई गई रोक सिर्फ मछली की आवाजाही रोकने का फैसला नहीं है। यह दोनों तरफ के बाजार, व्यापारियों और उपभोक्ताओं के लिए एक बड़ा सवाल छोड़ती है कि आखिर हिलसा के बहाने रिश्तों और व्यापार का यह खेल कब तक चलता रहेगा? -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 24 Sep 2026 12:17 pm

वैश्विक संकेतों से लाल निशान में खुला भारतीय शेयर बाजार

मुंबई, कमजोर वैश्विक संकेतों से भारतीय शेयर बाजार गुरुवार को लाल निशान में खुला।

देशबन्धु 24 Sep 2026 11:33 am

अडाणी परिवार फिर बना देश का सबसे अमीर, अंबानी परिवार दूसरे स्थान पर; AI सेक्टर ने भी बनाई जगह

23 सितंबर को जारी रिपोर्ट के अनुसार, अडाणी परिवार की कुल संपत्ति सालाना आधार पर 13 फीसदी बढ़कर 9.23 लाख करोड़ रुपये हो गई। दूसरी ओर, मुकेश अंबानी और उनके परिवार की संपत्ति 10 फीसदी घटकर 8.63 लाख करोड़ रुपये रह गई। इसके साथ ही अंबानी परिवार सूची में दूसरे स्थान पर आ गया है।

देशबन्धु 24 Sep 2026 11:22 am

प्रधानमंत्री मोदी 24 सितंबर को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से 'सेवा यात्रा' के प्रतिभागियों से करेंगे संवाद

प्रधानमंत्री मोदी 24 सितंबर को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से 'सेवा यात्रा' के प्रतिभागियों से करेंगे संवाद

समाचार नामा 23 Sep 2026 11:17 pm

मतदाता सूची से लाखों नाम हटाना लोकतंत्र के लिए खतरा

चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया को लेकर जारी विवाद के बीच कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं

देशबन्धु 23 Sep 2026 10:33 pm

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन 25 सितंबर को जयपुर पहुंचेंगे

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन 25 सितंबर को जयपुर पहुंचेंगे

समाचार नामा 23 Sep 2026 10:20 pm

'नो फ्री लंच' बना केरल में नया सियासी मुद्दा, सीएम सतीशन पर भड़के बिनॉय विश्वम

'नो फ्री लंच' बना केरल में नया सियासी मुद्दा, सीएम सतीशन पर भड़के बिनॉय विश्वम

समाचार नामा 23 Sep 2026 10:06 pm

'जनता ने सिर्फ बयानबाजी और पोस्टरबाजी के लिए छोड़ा', सपा प्रमुख अखिलेश यादव पर बरसे संजय निषाद

'जनता ने सिर्फ बयानबाजी और पोस्टरबाजी के लिए छोड़ा', सपा प्रमुख अखिलेश यादव पर बरसे संजय निषाद

समाचार नामा 23 Sep 2026 8:07 pm

'वंदे मातरम' गैरकानूनी या राष्ट्रविरोधी नहीं, यह राष्ट्रभक्ति का प्रतीक : श्याम रजक

'वंदे मातरम' गैरकानूनी या राष्ट्रविरोधी नहीं, यह राष्ट्रभक्ति का प्रतीक : श्याम रजक

समाचार नामा 23 Sep 2026 7:55 pm

नवनियुक्त प्रभारी-सह प्रभारी 'विकसित भारत' के सपने को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे : नितिन नवीन

नवनियुक्त प्रभारी-सह प्रभारी 'विकसित भारत' के सपने को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे : नितिन नवीन

समाचार नामा 23 Sep 2026 7:26 pm

Kashmir राग अलापने वाले Erdogan पहले Greece और Cyprus के साथ Turkey के टकराव को बंद करने पर ध्यान दें

न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच से तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगन ने एक बार फिर कश्मीर का राग छेड़कर भारत के आंतरिक और द्विपक्षीय विषय में दखल देने की कोशिश की है। एर्दोगन ने कहा कि दक्षिण एशिया में कश्मीर सहित सभी विवादों का समाधान संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र और संबंधित प्रस्तावों के दायरे में बातचीत के जरिए होना चाहिए। यह बयान ऐसे समय आया है जब तुर्किये, पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच अगस्त में मक्का संयुक्त रक्षा समझौता हो चुका है। लेकिन सवाल यह है कि कश्मीर पर नसीहत देने वाले एर्दोगन क्या पहले अपने पड़ोस में शांति और सीमा विवादों का समाधान करेंगे? उल्लेखनीय है कि तुर्किये के अपने पड़ोसियों के साथ कई पुराने और गंभीर क्षेत्रीय विवाद हैं। यूनान के साथ एजियन सागर और पूर्वी भूमध्यसागर में समुद्री सीमाओं, महाद्वीपीय पट्टी और विशेष आर्थिक क्षेत्र को लेकर लंबे समय से टकराव चला आ रहा है। तुर्किये और साइप्रस के बीच विवाद तो 1974 के बाद से आज तक कायम है और संयुक्त राष्ट्र शांति व्यवस्था के बावजूद द्वीप विभाजित है। यही नहीं, पूर्वी भूमध्यसागर में ऊर्जा संसाधनों को लेकर भी अंकारा का यूनान और साइप्रस के साथ टकराव रहा है। साथ ही तुर्किये ने उन समुद्री क्षेत्रों में ऊर्जा खोज गतिविधियां की हैं, जिन पर यूनान और साइप्रस अधिकार का दावा करते हैं। इन गतिविधियों के कारण क्षेत्र में सैन्य तनाव तक पैदा हुआ है। इसे भी पढ़ें: Makkah Defence Pact आग नहीं, धुआं निकला, Modi की Diplomacy ने बिगाड़ दिया Pakistan का खेल साइप्रस का सवाल इससे भी ज्यादा संवेदनशील है। तुर्की सेना ने 1974 में साइप्रस के उत्तरी हिस्से पर कब्जा किया था और आज भी द्वीप का विभाजन कायम है। संयुक्त राष्ट्र के स्तर पर इस विवाद के समाधान की कोशिशें दशकों से चल रही हैं। ऐसे में एर्दोगन अगर दुनिया को सीमा विवादों और संवाद का पाठ पढ़ाते हैं, तो स्वाभाविक सवाल उठता है कि क्या वही सिद्धांत तुर्किये अपने पड़ोस में भी उतनी ही गंभीरता से लागू करेगा? यही वजह है कि एर्दोगन की कश्मीर पर टिप्पणी भारत के लिए केवल एक बयान नहीं, बल्कि कूटनीतिक दखल के रूप में देखी जा रही है। जबकि भारत का रुख बिल्कुल स्पष्ट है। जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा था, है और रहेगा। साथ ही भारत-पाकिस्तान से जुड़े विषयों पर किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की आवश्यकता नहीं है। पिछले वर्ष भी एर्दोगन की ऐसी टिप्पणी पर भारत ने स्पष्ट किया था कि कश्मीर पर उसका रुख नहीं बदला है और तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की कोई जरूरत नहीं है। इस बार भी नई दिल्ली ने एर्दोगन की टिप्पणी को स्वीकार नहीं किया है। भारत का संदेश साफ है कि कश्मीर पर बातचीत भारत और पाकिस्तान के बीच ही हो सकती है और आतंकवाद तथा हिंसा के माहौल में संवाद की शर्तें भी भारत पहले ही स्पष्ट कर चुका है। दूसरी ओर, एर्दोगन की यह सक्रियता तुर्किये और पाकिस्तान की बढ़ती रणनीतिक नजदीकी की पृष्ठभूमि में भी देखी जा रही है। अगस्त में तुर्किये, पाकिस्तान और सऊदी अरब ने मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसके साथ ही 2025 के भारत-पाकिस्तान सैन्य टकराव के दौरान अंकारा का पाकिस्तान के प्रति समर्थन भी भारत-तुर्किये संबंधों में तनाव का बड़ा कारण बना। भारत ने उस दौरान तुर्किये की ओर से पाकिस्तान को मिले समर्थन और सैन्य सहायता पर अपनी चिंता स्पष्ट रूप से दर्ज कराई थी। इसका असर सिर्फ कूटनीतिक रिश्तों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आर्थिक मोर्चे पर भी दिखाई दिया। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को तुर्किये की ओर से मिले समर्थन को देखते हुए भारत में तुर्किये के सामान के बहिष्कार की व्यापक मुहिम चली। दिल्ली की आजादपुर मंडी ने तुर्किये से सेब और अन्य फल-सब्जियों के आयात रोक दिये। साथ ही अन्य राज्यों के बाजारों में भी तुर्किये के सेब का बहिष्कार हुआ। महाराष्ट्र के पुणे में भी कारोबारियों ने तुर्किये के सेब खरीदना बंद कर दिया और स्थानीय तथा दूसरे देशों के विकल्पों की ओर रुख किया। उस समय रिपोर्टों में सिर्फ पुणे के बाजार में ही तुर्किये के सेब के कारोबार का मौसमी मूल्य लगभग 1,000 से 1,200 करोड़ रुपये तक बताया गया था। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि तुर्किये के मात्र सेब खरीदना बंद कर ही उसे कितना नुकसान पहुँचाया गया था। यही नहीं, व्यापक व्यापार के स्तर पर भी दोनों देशों के बीच कारोबार में काफी गिरावट दर्ज की गयी है। इस तरह अंकारा के पाकिस्तान-समर्थक रुख की भारत में केवल राजनीतिक आलोचना नहीं हुई, बल्कि उसका असर व्यापार, पर्यटन और तुर्किये के उत्पादों की भारतीय मांग पर भी पड़ा। उधर, भारत की ओर से तुर्किये की नापाक नीतियों का जवाब केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं दिखता। नई दिल्ली ने तुर्किये के क्षेत्रीय रुख को देखते हुए यूनान और साइप्रस के साथ अपने रणनीतिक तथा समुद्री सहयोग को भी महत्व दिया है। संदेश साफ है। अगर अंकारा पाकिस्तान के साथ खड़े होकर भारत के खिलाफ कूटनीतिक मोर्चा खोलता है, तो भारत भी अपने राष्ट्रीय हितों और क्षेत्रीय साझेदारियों के आधार पर जवाब देगा। बहरहाल, एर्दोगन को कश्मीर पर उपदेश देने से पहले अपने आसपास के विवादों की ओर देखना चाहिए। दुनिया के किसी भी देश को संवाद, संप्रभुता और शांतिपूर्ण समाधान की सीख देने का नैतिक आधार तभी मजबूत होता है, जब वही कसौटी अपने व्यवहार पर भी लागू की जाए। भारत ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है कि कश्मीर पर बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं होगा और तुर्किये की ऐसी हिमाकत का जवाब कूटनीतिक स्तर पर भी दिया जाएगा और रणनीतिक स्तर पर भी। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 23 Sep 2026 5:37 pm

चुनाव आयोग के बचाव में भाजपा: अपनी हार-जीत बताई, आयुक्तों को यूपीए सरकार में मिले पुरस्कारों की संख्या गिनाई

पात्रा ने कहा कि 2014 के बाद से विपक्षी दलों को लगातार चुनावी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है और इसी कारण उनके मुताबिक अब चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।

देशबन्धु 23 Sep 2026 5:04 pm

राजनीति में कुसंस्कार को बढ़ावा देती कांग्रेस

कांग्रेस पार्टी चुनावों में लगातार पराजय का सामना कर रही है जिसने पार्टी युवराज राहुल गांधी को हताश कर दिया है। उनको इस हताशा से उबारने के लिए कांग्रेस ने पेपर लीक तथा छात्रों की अन्य समस्याओं को आधार बनाकर “छात्रों की गूंज” नाम का अभियान अभियान आरंभ किया जिससे कांग्रेस तथा राहुल गाँधी को छात्रों व युवाओं के एकमात्र हितैषी के रूप में स्थापित किया जा सके। जेन ज़ी के जोर शोर और सोशल मीडिया पर तमाम हल्ले गुल्ले के साथ शुरू हुआ राहुल गांधी का छात्रों की गूंज कार्यक्रम पहले झूठे तथा गलत तथ्यों के कारण चर्चा में रहा और फिर अर्मादित, अनुशासनहीन व्यवहार के कारण। पहले चरण में मनुस्मृति के अपमान से आरम्भ हुआ ये कार्यक्रम अगले चरण में राहुल और संदीप दीक्षित ने द्वारा प्रधानमंत्री पर अशालीन कटाक्ष तक पहुंचा जिसमें एक विदेशी महिला राष्ट्राध्यक्ष पर अपमानजनक टिप्पणी की गयी, उसका विवाद अभी शांत भी नहीं हुआ था कि ये लोग इंदौर पहुँच गए। मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में 19 सितंबर 2026 को छात्रों की गूँज का आयोजन किया गया। यहाँ एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिमिक्री की गई उनकी विदेश नीति का मजाक बनाया गया। सोशल मीडिया इन्फ़्लुएन्सर पुलकित मणि ने उनकी मां का भी उपहास उड़ाया और राहुल गांधी ने उनका इस कुकृत्य में साथ दिया। इंदौर में जो कुछ हुआ उसकी निंदा केवल भारतीय जनता पार्टी ही नहीं अपितु कांग्रेस के सहयोगी समाजवादी पार्टी व शिवसेना का उद्धव गुट भी कर रहा है। मुंबई में शिवसेना नेता आनंद दुबे ने कहा कि मंच से किसी के परिवार के बारे में आपत्तिजनक बात करना उचित नहीं है। आने वाले समय में सभी राजनैतिक दलों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए। मर्यादा नहीं टूटनी चाहिए। भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस के इस कृत्य को सर्कस व राहुल गांधी को “असंस्कारी नाराज फूफा“ करार दिया है। इसे भी पढ़ें: छात्रों के कार्यक्रम में नकारात्मक राजनीति क्यों? कांग्रेस के मंच पर जिस प्रकार पुलकित मणि से मिमिक्री कराई गयी वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के निकृष्टतम उपयोग का उदाहरण है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राहुल गाँधी पर निशाना साधते हुए कहा कि मैं एक वीडियो देख रहा था जिसमें उन्होंने नारी शक्ति का अपमान किया है। लोगों में संस्कार नहीं है। हमारी परंपरा कहती है- पहले आप। रास्ते में बुजुर्ग, महिला, दिव्यांग को पहले जाने देना हमारा संस्कार है लेकिन जो भारत को अपमानित करने का लक्ष्य मान लेते हैं वे कुटुम्बकम भाव को नहीं समझ सकते। सत्य, असत्य और अर्धसत्य होता है और कुछ लोग अर्धसत्य कहकर ही भारत की छवि धूमिल करना चाहते हैं। राहुल के मंच से मोदी जी की मां का उपहास भारत माता का उपहास है, भारत की समस्त मातृशक्ति का उपहास है। मां के उपहास को भारत की मूल आत्मा कतई स्वीकार नहीं करेगी और न ही कभी माफ करने वाली है। यह सत्य है भारत की सनातन आस्था वाली आम जनता इस प्रकार से किए जाने वाले स्त्री अपमान को सहन नहीं करती और समय आने पर उत्तर देती है। बिहार विधान सभा चुनाव में कांग्रेस के मंच से पीएम मोदी की मां को गाली दी गई और बिहार में कांग्रेस का सफाया हो गया । इसी प्रकार राहुल गांधी अपने बयान, “लोग मंदिरों में लड़कियां छेड़ने के लिए जाते हैं” के बाद हुस अपना हश्र भी देख सकते हैं। राहुल गांधी पूरी तरह से भ्रम फ़ैलाने की राजनीति कर रहे हैं और विकृत मानसिकता से ग्रस्त हो चुके हैं। उनका एकमात्र लक्ष्य प्रधानमंत्री मोदी की छवि को धूमिल करना, सनातन संस्कृति को बदनाम करना तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर भरत की बदलती हुई तस्वीर की विकृत छवि प्रस्तुत करना है। किंतु हो इसका विपरीत रहा है राहुल गांधी अपने ही बुने जाल में फंसते जा रहे हैं। इससे उनका निकल पाना या सुधर जाना बहुत कठिन हो गया है । राहुल गांधी के असभ्य व्यवहार के कारण युवा वर्ग उनसे नहीं जुड़ पा रहा है। कांग्रेस का सबसे दुर्भाग्यूपर्ण पहलू यह है कि कोई भी वरिष्ठ नेता राहुल को समझाने के लिए आगे नहीं आता, उनको युवराज का दर्जा हासिल है इसके चाटुकार लोग इंदौर जैसी घटनाओं का समर्थन करने के लिए उतर पड़ते हैं। देश के युवाओं में आक्रोश है जिसके कारण कामेडियन पुलकित मणि के शो एक के बाद एक रद्द हो रहे हैं। राहुल गांधी के मंच से पर हुई मिमिक्री को हिंदुस्तान की हर मां और संपूर्ण मातृशक्ति का अपमान बताया जा रहा है लेकिन कांग्रेस के प्रवक्ता और आई टी सेल ण केवल इसके बचाव में लगे हैं वरन इसको मास्टर स्ट्रोक बता रहे हैं। उधर दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों ने छात्रसंघ के चुनाव परिणामों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को 3-1 से विजयी बनाकर बता दिया कि देश का युवा क्या पसंद करता है। - मृत्युंजय दीक्षित

प्रभासाक्षी 23 Sep 2026 4:43 pm

छात्रों के कार्यक्रम में नकारात्मक राजनीति क्यों?

लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति संवाद है। सरकार और विपक्ष के बीच वैचारिक विरोध होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन जब राजनीतिक संवाद का केंद्र नीतियों और जनसमस्याओं से हटकर व्यक्तियों पर टिप्पणियों, आरोपों, कटाक्षों और उपहास तक सीमित होने लगे तो लोकतांत्रिक विमर्श की गंभीरता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। वर्तमान में भारत की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यह है कि राजनीतिक दल रचनात्मक विरोध की जगह अनुचित आरोप प्रत्यारोप की परिधि में लगातार सक्रिय हैं। इस प्रकार की राजनीति देश के लोकतंत्र के उत्थान का मार्ग बिलकुल भी तैयार नहीं कर सकती। अभी कुछ पूर्व इंदौर में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम से जुड़ा मिमिक्री विवाद इसका ताजा उदाहरण है। कार्यक्रम का मूल विषय विद्यार्थियों की समस्याओं, शिक्षा, परीक्षाओं, रोजगार और छात्रावास जैसी चिंताओं से जुड़ा था। लेकिन ऐसा लगा कि कार्यक्रम अपने मूल उद्देश्य से भटक कर आरोपों और व्यक्तिगत खिल्ली उडाने पर ही केंद्रित होकर रह गया। आज चिंता इस बात की है कि छात्रों के सामने समस्या नहीं समाधान की चर्चा होना चाहिए। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने छात्रों के सामने इस अंदाज में अपनी बात रखने का प्रयास किया कि छात्र सरकार के विरोध में खड़े हो जाएं। जिन बातों का उल्लेख छात्रों के समक्ष होना चाहिए, वे मुद्दे भी कार्यक्रम में पूरी तरह गायब दिखाई दिए। ऐसे में सवाल उठता है कि हमारे राजनीतिक दल छात्रों को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं। इसे भी पढ़ें: प्रधानमंत्री की मां हो या गरीब की... Indore Mimicry Row पर Akhilesh Yadav का बड़ा बयान हालांकि कार्यक्रम में कुछ मुद्दों पर सरकार पर सवाल भी उठाए। लेकिन ऐसे सवाल छात्रों के बीच नहीं आना चाहिए। कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिमिक्री को लेकर शुरू हुआ विवाद देखते ही देखते राजनीतिक बहस का प्रमुख विषय बन गया। विपक्ष की ओर से इसे राजनीतिक व्यंग्य और अभिव्यक्ति के अधिकार के संदर्भ में देखा गया। क्या अभिव्यक्ति इस प्रकार की होना चाहिए, कदापि नहीं। यहां प्रश्न केवल मिमिक्री का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या राजनीतिक कार्यक्रमों में गंभीर मुद्दों को केंद्र में रखने के बजाय व्यक्तिगत कटाक्ष और उपहास को अधिक स्थान मिलना चाहिए? राजनीति में व्यंग्य कोई नई बात नहीं है। लोकतंत्र में व्यंग्य सत्ता से सवाल पूछने का माध्यम भी रहा है। नेता, सरकारें और नीतियां आलोचना के विषय बनती रही हैं। लेकिन व्यंग्य और व्यक्तिगत अवमानना के बीच एक महीन रेखा होती है। राजनीतिक विरोध कितना तीखा हो, यह राजनीतिक परिस्थितियां तय कर सकती हैं, लेकिन सार्वजनिक जीवन में भाषा और व्यवहार की मर्यादा का प्रश्न हमेशा बना रहता है। इंदौर की घटना में भी यही बहस सामने आई। इस पूरे प्रसंग से एक बड़ा सवाल जरूर निकलता है कि क्या विद्यार्थियों के मंच पर विद्यार्थियों के मूल प्रश्न पीछे छूट जाने चाहिए? यदि किसी छात्र को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल रही, यदि परीक्षा व्यवस्था को लेकर उसके मन में चिंता है, यदि रोजगार उसके भविष्य का सबसे बड़ा प्रश्न है या किसी छात्रा के सामने सुरक्षित और किफायती आवास की समस्या है, तो राजनीति का दायित्व है कि वह इन प्रश्नों को मजबूती से उठाए। इन सवालों के उत्तर भी उसी गंभीरता से मांगे जाने चाहिए। विपक्ष यदि सरकार की शिक्षा नीति से असहमत है तो उसे आंकड़ों के साथ अपना पक्ष रखना चाहिए। सरकार यदि विपक्ष के आरोपों को गलत मानती है तो उसे आंकड़ों और तथ्यों के साथ जवाब देना चाहिए। यही स्वस्थ लोकतांत्रिक बहस का रास्ता है। दुर्भाग्य यह है कि आज आरोप लगाना आसान हो गया है और आरोप का जवाब भी एक नए आरोप से देने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। एक नेता किसी नीति पर सवाल उठाता है तो जवाब में नीति की चर्चा करने के बजाय उसके पुराने बयान खोजे जाते हैं। किसी सरकार के निर्णय पर सवाल उठता है तो विपक्ष के पुराने कार्यकाल की कमियां गिनाई जाती हैं। किसी नेता की आलोचना होती है तो उसके जवाब में दूसरे नेता की आलोचना सामने आ जाती है। इस प्रकार राजनीतिक संवाद एक ऐसी प्रतिस्पर्धा में बदल जाता है जिसमें यह साबित करने की कोशिश होती है कि सामने वाला अधिक गलत है। लेकिन जनता का सवाल इससे अलग है कि आप क्या करेंगे? राजनीतिक दलों की ठोस योजनाएं क्या हैं। इन सवालों का उत्तर किसी आरोप से नहीं दिया जा सकता। राजनीति में व्यक्तिगत आक्षेप इसलिए भी चिंता का विषय हैं क्योंकि वे धीरे-धीरे राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा बन जाते हैं। नेता जिस भाषा का इस्तेमाल करते हैं, उसका प्रभाव समाज पर भी पड़ता है। समर्थक उसी भाषा को दोहराते हैं और फिर राजनीतिक मतभेद सामाजिक कटुता में बदलने लगते हैं। लोकतंत्र में विरोध होना चाहिए, लेकिन विरोध का अर्थ वैमनस्य नहीं है। आज विपक्ष की ओर से सरकार के प्रति पूरी तरह कटुता का व्यवहार किया जा रहा है। इंदौर के कार्यक्रम में भी कटुता का खेल खेला गया। क्या छात्र ऐसी कटुता को अपने उत्थान और विकास के लिए जरूरी मानते हैं। यह सवाल राजनीतिक दलों से पूछने का साहस भी छात्रों को करना चाहिए। यहां यह भी आवश्यक है कि इस प्रश्न को केवल एक दल या एक नेता तक सीमित न किया जाए। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, राजनीतिक मर्यादा की कसौटी सबके लिए समान होनी चाहिए। यदि विपक्ष किसी नेता की मिमिक्री करता है तो उसकी समीक्षा होनी चाहिए; यदि सत्ता पक्ष विपक्षी नेताओं पर व्यक्तिगत कटाक्ष करता है तो उस पर भी उतनी ही गंभीरता से सवाल उठना चाहिए। लोकतांत्रिक मर्यादा किसी एक दल की संपत्ति नहीं है। विपक्ष को भी लोकतान्त्रिक मर्यादा के तहत कार्यक्रम करना चाहिए। इंदौर का कार्यक्रम राजनीतिक सभा या रैली नहीं था, वह छात्रों का कार्यक्रम था, इसलिए इस कार्यक्रम में प्रथम दृष्टया राजनीतिक आरोप लगना ही नहीं चाहिए। राजनीतिक दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि वे अपने विरोधी को कितनी तीखी भाषा में जवाब दे सकते हैं। चुनौती यह है कि वे जनता के सामने अपनी नीतियों और योजनाओं को कितनी स्पष्टता से रख सकते हैं। आरोप-प्रत्यारोप से तालियां मिल सकती हैं, सोशल मीडिया पर चर्चा हो सकती है और समर्थकों का उत्साह भी बढ़ सकता है, लेकिन इससे समस्याओं का समाधान नहीं होता। बेरोजगार युवा को रोजगार चाहिए, उसे यह जानने में रुचि है कि सरकार और विपक्ष उसके लिए क्या करेंगे। विद्यार्थी को बेहतर शिक्षा चाहिए, उसे यह जानना है कि परीक्षा व्यवस्था कैसे विश्वसनीय बनेगी। परिवार को सुरक्षित भविष्य चाहिए, उसे राजनीतिक कटाक्षों से अधिक ठोस नीतियों की आवश्यकता है। इसलिए आज राजनीति को फिर से मुद्दों की ओर लौटने की जरूरत है। विरोध कीजिए, लेकिन नीतियों का विरोध कीजिए। सरकार से सवाल पूछिए, लेकिन तथ्यों के साथ पूछिए। विपक्ष के आरोपों का उत्तर दीजिए, लेकिन वैकल्पिक नीति के साथ दीजिए। व्यंग्य कीजिए, लेकिन ऐसी सीमा का ध्यान रखिए जहां राजनीतिक आलोचना व्यक्तिगत अपमान में न बदल जाए। लोकतंत्र में असहमति आवश्यक है, किंतु असहमति को संवाद में बदलना उससे भी अधिक आवश्यक है। राजनीति का उद्देश्य केवल यह सिद्ध करना नहीं होना चाहिए कि दूसरा पक्ष गलत है, राजनीति का बड़ा उद्देश्य यह बताना होना चाहिए कि जनता के लिए सही रास्ता क्या है और उस रास्ते पर चलने की योजना क्या है। आज जनता राजनीतिक दलों से यही अपेक्षा कर रही है कि वे आरोपों की राजनीति से आगे बढ़ें और समाधान की राजनीति को केंद्र में लाएं। यदि राजनीति लगातार व्यक्तियों के इर्द-गिर्द घूमती रही तो मुद्दे पीछे छूट जाएंगे। और जब मुद्दे पीछे छूटते हैं, तब लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष जनता की वास्तविक समस्याएं भी राजनीतिक विमर्श से बाहर होने लगती हैं। इसलिए समय की मांग स्पष्ट है कि कटाक्ष कम हों, संवाद बढ़े, आरोप कम हों, तथ्य बढ़ें और व्यक्तियों से अधिक मुद्दों पर राजनीति हो। यही लोकतंत्र की गरिमा भी है और जनता के प्रति राजनीति की वास्तविक जिम्मेदारी भी। - सुरेश हिंदुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार

प्रभासाक्षी 23 Sep 2026 4:39 pm

भाजपा के नए प्रदेश प्रभारी: नितिन नबीन ने बदली राज्यों की जिम्मेदारी, विनोद तावड़े को यूपी की कमान

भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन ने राज्यों के प्रभारियों की नई जिम्मेदारियां तय की हैं। विनोद तावड़े को यूपी और सतीश पूनिया को पंजाब का प्रभारी बनाया गया है।

देशबन्धु 23 Sep 2026 3:39 pm

शालीमार बाग में मस्जिद पर बुलडोजर कार्रवाई का मुस्लिम नेताओं ने किया विरोध, कहा- 'इबादत से रोकने की हो रही कोशिश'

शालीमार बाग में मस्जिद पर बुलडोजर कार्रवाई का मुस्लिम नेताओं ने किया विरोध, कहा- 'इबादत से रोकने की हो रही कोशिश'

समाचार नामा 23 Sep 2026 3:13 pm

अगर अमेरिका ने सौ प्रतिशत का टैरिफ थोपा तो !

अमेरिकी संसद के दोनों सदनों से ‘सैंक्शनिंग रशा एंड ईरान एक्ट’ के पारित होने को लेकर देश में आशंकाओं के बादलों का उठना स्वाभाविक है। आज जिस आर्थिकी और विश्व व्यवस्था को तकरीबन पूरी दुनिया ने अपना रखा है, उसकी वजह से पूरी दुनिया को लगता है कि अमेरिका के सहयोग के बिना वह एक कदम आगे नहीं रख सकती। वैश्विक आर्थिकी में डालर के वर्चस्व के चलते ज्यादातर देशों को लगता है कि अगर अमेरिका की आंखें टेढ़ी हुईं तो उस पर महाविपत्ति आ जाएगी। इसी सोच का ही असर है कि इस अधिनियम के पारित होने के बाद भारत के प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस की नजर में भारतीय विदेश नीति नाकाम नजर आने लगी है। सैद्धांतिक रूप से भारतीय वामपंथी इकोसिस्टम अमेरिका का हर पल खुला विरोध करता है, लेकिन उसे भी अमेरिकी टैरिफ कानून भारतीय हित के खिलाफ नजर आ रहा है। इन सबके बीच भारत सरकार की प्रतिक्रिया संतुलित और सधी हुई है। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारत अपनी 140 करोड़ की आबादी की ऊर्जा सुरक्षा के लिए दृढ़ है। जाहिर है, भारत को झुकाने की सोच रखने वाले ट्रंप प्रशासन को ऐसी प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं रही होगी। ऐसे में अमेरिका के अगले कदम पर निगाह रखना ज्यादा जरूरी हो जाता है। रूस और ईरान से अगर भारत द्वारा तेल खरीदने का बुनियादी लक्ष्य रूस- यूक्रेन युद्ध को बढ़ावा देना या ईरान-इजरायल युद्ध में अमेरिका और इजरायल का विरोध नहीं है। दरअसल भारत मौजूदा माहौल में अपनी भारी-भरकम जनसंख्या के लिए किफायती ऊर्जा सुरक्षा को संरक्षित कर रहा है। इसलिए भारत का न झुकना देश के विपक्षी दलों और अमेरिकी सरकार के लिए हैरतअंगेज भले ही हो, भारतीय हितों के अनुकूल नहीं है। वैसे जब से ट्रंप ने अमेरिकी राष्ट्रपति का पद संभाला है, अपने ऊल-जलूल फैसलों के लिए ही वे जाने गए हैं। यह पहला मौका नहीं है कि उन्होंने इस कानून के जरिए भारत को दबाने की कोशिश की है। बीते साल एक अगस्त 2025 से उन्होंने भारतीय वस्तुओं पर 25 प्रतिशत का टैरिफ लगा दिया था। जिससे उनके ही बाजार में भारतीय वस्तुएं और सामान महंगे होने लगे थे। तब चालाकी दिखाते हुए ट्रंप प्रशासन ने फार्मास्युटिकल्स को इस टैरिफ से अलग रखा था। इसकी वजह यह है कि भारत से अमेरिका आने वाली दवाएं सस्ती पड़ती हैं। भारतीय रत्न और आभूषणों पर टैरिफ लगाने का बहुत असर नहीं पड़ा था। क्योंकि रत्न और आभूषण स्वभाव से ही महंगे होते हैं और उन्हें खरीदने वाले लोगों के लिए इनकी महंगाई मायने नहीं रखती। ठीक वैसे ही, जैसे भारत में महंगा होने के बावजूद सोने की खरीद-बिक्री पर असर नहीं पड़ा है। भारतीय सामान जब बढ़े टैरिफ के चलते अमेरिकी बाजार में महंगे होने लगे तो अमेरिका में भी ट्रंप प्रशासन के इस फैसले के खिलाफ सवाल उठने लगे। तब तक अमेरिकी प्रशासन को भी समझ आने लगा था कि उसने कैसा कदम उठाया है। इसका असर यह हुआ कि फरवरी 2026 में ट्रंप प्रशासन को टैरिफ में कटौती करनी पड़ी। इसे भी पढ़ें: इस बार भी मोदी नहीं जाएंगे UNGA, Jaishankar ही संभालेंगे मोर्चा, क्या Trump से आमना-सामना नहीं चाहते PM? पश्चिमी एशिया का हालिया संकट अमेरिका की ही देन है। जब से यह संकट बढ़ा है, भारत ने रूस से तेल की खरीददारी बढ़ा दी है। यह भारत की मजबूरी भी है। बीती जुलाई में भारत ने अपने कुल तेल आयात का 51.4 प्रतिशत तेल अकेले रूस से खरीदा था। रूस से तेल खरीद का भारतीय मकसद मौजूदा हालात में अपने लिए किफायती दरों पर तेल हासिल करना है। भारत का यह अधिकार है और मौजूदा हालात में अगर भारत झुकता है तो इसे भारतीय नागरिक शायद ही पसंद करेगा। भारत की तुलना में चीन ना सिर्फ रूस, बल्कि ईरान से भी भारी मात्रा में तेल खरीद रहा है। रूस से तेल खरीदना उसके लिए ज्यादा आसान और सस्ता है। चूंकि दोनों देशों की सीमाएं मिलती हैं और तेल की आपूर्ति पाइपलाइन के जरिए आसानी से होती है, इसलिए चीन भी टैरिफ युद्ध के निशाने पर होने के बावजूद तेल खरीद से पीछे नहीं हट रहा तो फिर हमें ही क्यों पीछे रहना चाहिए। इसमें दो राय नहीं कि अगर अमेरिकी राष्ट्रपति इस कानून के तहत भारत पर सौ प्रतिशत टैरिफ थोपते हैं तो भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात को बड़ा झटका लग सकता है। जानने की बात है कि भारत से अमेरिका भेजे जाने वाले सामानों में टेक्सटाइल्स, रत्न और आभूषण, आटोमोबाइल और इंजीनियरिंग उत्पाद ज्यादा है। टैरिफ अगर बढ़ेगा तो अमेरिकी बाजार में इनकी कीमतें महंगी होंगी, जिससे उनकी मांग घट सकतकी है। इससे भारतीय निर्यातकों को नुकसान हो सकता है। कुछ जानकारों को लगता है कि इससे रूस से जारी तेल खरीद से मिल रही अरबों रूपए की राहत खटाई में पड़ सकती है। यहां ध्यान देने की बात यह भी है कि भारत, अमेरिका से व्यापार समझौते को लेकर बातचीत जारी रखे हुए है। अगर सौ प्रतिशत टैरिफ लागू किया जाता है तो इस प्रस्तावित व्यापार समझौते में अड़चन आ सकती है। हो सकता है कि यह बातचीत ही खटाई में पड़ जाए। बेशक अमेरिका भारत का बड़ा कारोबारी साझीदार है। लेकिन मोदी के 2024 में सत्ता में आने के बाद से अब तक करीब चालीस देशों से मुक्त व्यापार समझौता किए जा चुके हैं। भारत ने हाल ही में यूरोपीय संघ से भी ऐसा समझौता किया है। भारत का मॉरीशस, संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रेलिया, यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ, ब्रिटेन, ओमान, न्यूजीलैंड आदि से मुक्त व्यापार समझौते या व्यापक आर्थिक साझेदारी का समझौता कर चुका है। भारत सरकार के ही आंकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अपने कारोबारी नेटवर्क का विस्तार करते हुए नौ बड़े मुक्त व्यापार समझौते भी किए हैं। यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ यानी ईएफटीए में आइसलैंड, लिकटेंस्टीन, नॉर्वे और स्विट्जरलैंड शामिल हैं। इसी तरह भारत ने आसियान देशों, जापान, दक्षिण कोरिया और साफ्टा के सदस्य देशों के साथ पारंपरिक कारोबारी समझौता कर चुका है। अगर अमेरिका भारत पर टैरिफ थोपता है तो देश को चाहिए कि इन देशों के जरिए कारोबार को बढ़ावा दे। वैसे भी टैरिफ थोपने की दशा में भारतीय कारोबारी दूसरे देशों के जरिए अमेरिका में अपना माल भेज सकते हैं। उम्मीद कर सकते हैं कि सरकार भी ऐसी राह तलाशने की कोशिश में जुटी होगी। फिर भारतीय अर्थव्यवस्था भी पहले जैसी नहीं रही, इसलिए हताश और चिंतित होने की जरूरत नहीं है, भारत को अमेरिकी बाजार में घुसने के लिए वैकल्पिक राहों की तलाश तेज करनी होगी। - उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं..

प्रभासाक्षी 23 Sep 2026 3:06 pm