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राय और ब्लॉग्स / पत्रिका

मानवता की फसल

आवश्यकता इस बात की है कि जो भारतीय दर्शन पढ़ाया जाता है, सरकारें भी उसी अनुरूप शासन चलाएं। सत्ता में अंग्रेजी के ग्लैमर ने ही देश की आज यह हालत बना दी है। बातें तो गांधीजी की करते हैं, सत्य न बोलने का प्रतिनिधि देश बनता जा रहा है। देश के लिए जीने का संकल्प तृष्णा के संघर्ष में खो गया। धन मिट्टी भी है, साथ भी नहीं जाता। हम मानवता क

21 Jan 2020 12:35 pm
मेरा कर्म, मेरा फल-II

मैं अच्छा सम्पादक बन गया। पैकेज ठीक मिल गया। जीवन का स्वरूप देखिए! घर पर कौन जा रहा है-सम्पादक। पत्नी से कौन मिला-सम्पादक (पति नहीं), बच्चों से कौन मिला-सम्पादक (पिता नहीं), मां-बाप से कौन मिला-सम्पादक (पुत्र नहीं)। सम्पादक रह गया, व्यक्ति (मैं) खो गया। चौबीस घंटे का जीवन मेरे आठ घंटे में लीन हो गया। शरीर रह गया, मैं खो गया।

20 Jan 2020 1:15 pm
मेरा कर्म, मेरा फल-1

जिन्दगी के सारे थपेड़े महिला को ही खाने पड़ते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि उसके जीवन का अन्तिम दौर अकेले ही निकले। भारत में तो परित्यक्ता को आसानी से पीहर में भी स्थान नहीं मिलता। बड़ी उम्र ने उसे जीवन-दर्शन से समझौता करने में कठिनाई पैदा की। तब तलाक होने में कोई भी आपत्ति नहीं है। प्रश्न इससे आगे निकल गया है। फिर एक-दूसरे की हत्य

19 Jan 2020 11:19 am
कौन सा स्कूल

आज सभी कन्याएं बिना दाम्पत्य ज्ञान, बिना प्रसव ज्ञान एवं शिशु चर्यानुभव के नए जीवन में प्रवेश करती हैं। मात्र शरीर के आधार पर, जिसका ज्ञान भी उन्हें नहीं होता। समाज संस्कार शून्य, आहार-निद्रा-भय-मैथुन पर आकर ठहर गया है। शायद कल्की अवतार की प्रतीक्षा कर रहा है।

17 Jan 2020 11:44 am