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Navjot Singh Sidhu ने पोती का Home Coming Video किया पोस्ट, खुशी से झूमा पूरा परिवार। Amritsar

नवजोत सिंह सिद्धू दादा बन गए हैं। उनके बेटे करण सिद्धू और बहू इनायत के घर 1 अक्टूबर को बेटी का जन्म हुआ, जिसका नाम सिद्धू ने आर्या रखा है। पोती की होमकमिंग पर सिद्धू परिवार ने खास जश्न मनाया। फूलों और लाइट्स से घर सजाया गया और सिद्धू पोती के नन्हे पैरों को छूकर भावुक नजर आए।

लाइव हिन्दुस्तान 7 Oct 2026 12:23 pm

न्यू अमृतसर में लगेंगे स्टॉल, 8 से शुरू होगी प्रक्रिया, सेवा केंद्रों में

भास्कर न्यूज | अमृतसर दिवाली और गुरुपर्व के त्योहार पर पटाखों के कारोबार के लिए जिला प्रशासन ने अस्थायी लाइसेंस जारी करने की कवायद शुरू कर दी है। न्यू अमृतसर क्षेत्र में पटाखों के महज 10 खोखे (स्टॉल) लगाने की ही मंजूरी दी जाएगी। इन 10 लाइसेंसों को पाने के लिए शहर में कितना भारी क्रेज रहता है। पिछले वर्ष 2025 में जिला प्रशासन के पास कुल 722 आवेदन पहुंचे थे। यानी मात्र 10 दुकानों के लिए सैकड़ों लोगों ने अपनी किस्मत आजमाई थी। इस बार भी 10 लाइसेंसों के लिए आवेदकों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा देखने को मिलेगी। आवेदन करने के लिए हर आवेदक को 100 रुपये की निर्धारित फीस देनी होगी। डिप्टी कमिश्नर दलविंदरजीत सिंह ने बताया कि इच्छुक व्यक्ति 8 से 10 अक्टूबर 2026 की शाम 5:00 बजे तक जिले के किसी भी सेवा केंद्र में जाकर 100 रुपये शुल्क के साथ अपना आवेदन फॉर्म जमा करवा सकते हैं। 8 से 10 अक्टूबर (शाम 5:00 बजे तक) जिले के सभी सेवा केंद्रों में आवेदन किए जा सकेंगे। इसके बाद आए हुए आवेदनों का 13 अक्टूबर 2026 को दोपहर 2:00 बजे ड्रॉ निकाला जाएगा। सुरक्षा नियमों का पालन अनिवार्य, बिना लाइसेंस बेचे तो कार्रवाई डिप्टी कमिश्नर ने स्पष्ट किया है कि पटाखा बिक्री और लाइसेंस आवंटन से जुड़ी तमाम शर्तों एवं सुरक्षा मानकों का पालन करवाया जाएगा। बिना लाइसेंस पटाखा बेचने या तय जगह (न्यू अमृतसर) के अलावा कहीं और स्टॉल लगाने वालों पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। विस्तृत जानकारी जिला प्रशासन की वेबसाइट amritsar.nic.in पर उपलब्ध है।

दैनिक भास्कर 7 Oct 2026 5:54 am

Amritsar News: रानी पेंशन के लिए 10 अक्तूबर को संगरूर में महारैली

Mega rally for Rani Pension in Sangrur on October 10

अमर उजाला 7 Oct 2026 1:43 am

Amritsar News: जगदीश झींडा ने ऑल इंडिया गुरुद्वारा एक्ट बनाने की मांग की

Jagdish Jhinda demanded the enactment of an All India Gurdwara Act

अमर उजाला 4 Oct 2026 1:43 am

Neem Karoli Baba Death Anniversary: जानिए Lakshman Narayan Sharma के Neem Karoli Baba बनने का सफर

नीम करौली बाबा का नाम सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी बड़ी श्रद्धा के साथ लिया जाता है। आज ही के दिन यानी की 11 सितंबर को नीम करौली बाबा का निधन हो गया था। बाबा को एक दिव्य पुरुष, महान योगीराज और हनुमान जी का भक्त माना जाता है। वहीं नीम करौली बाबा के अनुयायी मानते हैं कि वह स्वयं हनुमान जी के अवतार थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर बाबा नीम करौली के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में... जन्म और परिवार उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के अकबरपुर गांव में करीब 1900 के आसपास नीम करौली बाबा का जन्म हुआ था। इनका असली नाम लक्ष्मी नारायण शर्मा था। महज 11 साल की उम्र में लक्ष्मी नारायण शर्मा की शादी राम बेटी से हो गई थी। लेकिन इसके बाद भी उनका मन सांसारिक जीवन में नहीं लगा और आगे जाकर उन्होंने आध्यात्मिक मार्ग अपना लिया। इसे भी पढ़ें: Guru Ramdas Death Anniversary: 30 रागों में रचे 638 शब्द, सिखों के चौथे गुरु ने कैसे रखा Amritsar का आधार कब प्राप्त हुआ ज्ञान मान्यता है कि नीम करौली बाबा को महज 17 साल की उम्र में ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। उन्होंने साधु जीवन अपनाने के लिए घर छोड़ दिया था। लेकिन पिता और परिवार के आग्रह पर वह वापस वैवाहिक जीवन में लौट आए थे। गांव के निर्विरोध प्रधान रहे बाबा बताया जाता है कि वह अपने गांव में करीब 40 सालों तक निर्विरोध ग्राम प्रधान रहे थे। साधारण जीवन जीने के बाद वह आध्यात्मिक गुरु के रूप में प्रसिद्ध होते चले गए। धीरे-धीरे देश के अलग-अलग हिस्सों में उनकी लोकप्रियता फैलती चली गई और उनके अनुयायियों की संख्या बढ़ती चली गई। ऐसे पड़ा 'नीम करौली' नाम लक्ष्मी नारायण शर्मा के नाम से जुड़ी सबसे चर्चित कहानियों में एक नीब करौरी गांव की घटना है। माना जाता है कि एक बार बाबा ट्रेन में सवार होकर जा रहे थे, लेकिन उन्होंने टिकट नहीं लिया था, जिस कारण उनको ट्रेन से उतार दिया गया था। जिसके बाद ट्रेन आगे नहीं बढ़ी। जब बाबा को वापस ट्रेन में बैठाया गया, तो ट्रेन चल पड़ी। इसी घटना के बाद उनका नाम नीब करौरी बाबा के रूप में जाना जाने लगा। कैंची धाम बाबा नीम करौली का सबसे प्रसिद्ध आश्रम कैंची धाम है। साल 1964 में नैनीताल जिले के भवाली के पास क्षिप्रा नदी के किनारे नीम करौली बाबा ने कैंची धाम की स्थापना की थी। देश-विदेश में कैंची धाम बाबा के भक्तों के लिए प्रमुख आस्था का केंद्र बन चुका है। हर साल 15 जून को कैंची धाम स्थापना दिवस मनाया जाता है। बाबा के दरबार पहुंची जानी-मानी हस्तियां कैंची धाम की प्रसिद्धि सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं है। बल्कि देश दुनिया की कई जानी मानी हस्तियां भी उनसे प्रभावित रहीं। मेटा के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग, एप्पल के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स, और भारतीय क्रिकेटर विराट कोहली का नाम बाबा नीम करौली और कैंची धाम से जुड़ी चर्चाओं में आता है। मृत्यु वहीं 11 सितंबर 1973 को नीम करौली बाबा वृंदावन में ब्रह्मलीन हुए थे। आज भारत समेत कई देशों में बाबा नीम करौली के आश्रम और मंदिर हैं।

प्रभासाक्षी 11 Sep 2026 1:04 pm

Vinoba Bhave Birth Anniversary: काशी से Wardha तक, जानिए कैसे विनायक भावे बने भूदान आंदोलन के Saint Vinoba

आज ही के दिन यानी की 11 सितंबर को विनोबा भावे का जन्म हुआ था। विनोबा भावे महात्मा गांधी की विरासत को आगे ले जाने का काम करते दिखाई दिए। वह एक स्वतंत्रता सेनानी होने के अलावा प्रसिद्ध गांधीवादी समाज सुधारक नेता भी थे। विनोबा भावे को भूदान आंदोलन से पूरी दुनिया में बड़ी पहचान मिली थी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर विनोबा भावे के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में... जन्म और परिवार महाराष्ट्र के कोंकण इलाके के गागोदा गांव में 11 सितंबर 1895 को विनोबा भावे का जन्म हुआ था। इनका असली नाम विनायक नरहरि भावे था। यह ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखते थे। इनकी मां रुकमणी बाई एक विदूषी महिला थीं। वहीं विनोबा भावे पर अपनी मां का गहरा प्रभाव था। विनोबा को अपनी मां से ही ईश्वर के प्रति आस्था और आध्यात्म के प्रति झुकाव मिला था। वहीं पिता से विज्ञान, गणित और अलग विलक्षण सोच और तार्किता मिली थी। आध्यात्मिक यात्रा विनोबा भावे परीक्षा देने के लिए मुंबई जाने वाली रेलगाड़ी में तो बैठे, लेकिन उनका मन वैराग्य में रमा हुआ था। ऐसे में वह बीच में ही दूसरी गाड़ी में बैठकर आध्यात्मिक यात्रा पर हिमालय की ओर निकल पड़े। वह ज्ञान की तलाश में बहुत भटके। वह काशी में भी लंबे समय तक रहे। वहीं समाचार पत्रों में महात्मा गांधी के बारे में पढ़कर उनको ऐसा लगा कि गांधीजी उनके लिए मार्गदर्शक हो सकते हैं। उस दौरान महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से लौटे थे। उन्होंने महात्मा गांधी को पत्र लिखा और जवाब में आमंत्रण मिलने पर वह फौरन अहमदाबाद रवाना हो लिए। इसे भी पढ़ें: Guru Ramdas Death Anniversary: 30 रागों में रचे 638 शब्द, सिखों के चौथे गुरु ने कैसे रखा Amritsar का आधार गांधीजी से मुलाकात महात्मा गांधी और विनोबा भावे की पहली मुलाकात 07 जून 1916 में हुई थी। दोनों ही पहली मुलाकात के बाद एक-दूसरे के मुरीद हो गए। इसके बाद विनोबा भावे ने खुद को महात्मा गांधी के आश्रम के लिए समर्पित कर दिया। जब गांधीजी को लगा कि वह अहमदाबाद या कहीं और कितना भी बड़ा आश्रम बना लें। देशभर में अहिंसक सैनिक तैयार नहीं हो सकेंगे। ऐसे में उन्होंने विनोबा भावे को वर्धा भेजा, जहां पर महाराष्ट्र धर्म नाम से मराठी में प्रकाशित होने वाली उनकी पत्रिका काफी लोकप्रिय हुई थी। संत और आचार्य के रूप में जाने गए विनोबा भावे देश की आजादी तक विनोबा भावे संत और आचार्य के रूप में पहचान मिली थी। महात्मा गांधी के निधन के बाद उन्होंने गांधीजी की विरासत को कायम रखा। लेकिन वह अपने स्वभाव के मुताबिक इसको आध्यात्मिक रूप से ही आगे बढ़ाते रहे। साल 1951 में महाराष्ट्र में भूदान आंदोलन ने विनोबा भावे को दुनियाभर में मशहूर कर दिया था। यह एक स्वैच्छिक सुधार आंदोलन था, जिसमें रचनात्मक कार्यों और विचारों के प्रयोग से सामाजिक स्तर पर बदलाव की कोशिश की गई। उन्होंने सर्वोदय समाज की स्थापना की और आजादी के बाद अपना जीवन वर्धा के ब्रह्म विद्या मंदिर आश्रम में गुजारा। मृत्यु वहीं 15 नवंबर 1982 को अन्न जल त्याग कर विनोबा भाने ने समाधि मरण को अपना लिया।

प्रभासाक्षी 11 Sep 2026 12:48 pm