फ्लाईदुबई घटना भले ही हमारे देश में नहीं हुई लेकिन करेंगे गहन जांच: UAE
दुबई से तेल अवीव जा रहे विमान में बड़ा हादसा होते-होते टला। विमान ने दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट से उड़ान भरी थी लेकिन फिर क्रैश कराने की कोशिश के बीच रास्ता बदला गया और आखिरकार इसे सऊदी के तबूक में ही लैंड कराया गया।
पिता का स्वाभिमान और बेटी का भरोसा: जीवन के वो 8 अनमोल सबक
पिता अपनी सीमित आमदनी, महीने के आखिरी दिनों की तंगी और मन में उठते सैकड़ों सवालों के बावजूद, बेटी की एक आवाज पर वे अपनी हर मजबूरी को किनारे रख देते हैं।...
Vighnaraj Sankashti Chaturthi पर बना Angarki योग, गणेश पूजन का शुभ मुहूर्त और विधि
आज यानी की 29 सितंबर 2026 को विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी मनाई जा रही है। यह पर्व भगवान गणेश को समर्पित है। मंगलवार को यह पर्व पड़ने से इसको अंगारकी संकष्टी चतुर्थी भी कहा जाएगा। इस दिन भगवान गणेश की पूजा का विधान है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन जो भी जातक श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान गणेश की पूजा-अर्चना करता है, उसके जीवन में आने वाले सभी संकट और कष्ट दूर होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। तो आइए जानते हैं विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक 29 सितंबर की शाम 05:09 मिनट से आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि की शुरूआत होगी। वहीं अगले दिन यानी की 30 सितंबर की दोपहर 02:55 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 29 सितंबर 2026 को विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया जा रहा है। पूजन विधि इस दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें और फिर सूर्य देव को अर्घ्य दें। अब व्रत का संकल्प लें और फिर पूजा स्थल की साफ-सफाई करें। इसके बाद एक लकड़ी की चौकी पर पीला या लाल कपड़ा बिछाएं और उस पर गणपति की प्रतिमा को स्थापित करें। अब बप्पा को जल, दूर्वा, फूल, रोली, अक्षत और फल आदि अर्पित करें। इसके बाद मोदक और उनका प्रिय भोग चढ़ाएं। फिर गणेश मंत्र का जाप करें और गणेश चालीसा या गणेश स्त्रोत का पाठ करें। फिर शाम को विधिविधान से भगवान गणेश की पूजा करें। इसके बाद चंद्र दर्शन करें और चंद्र देव को अर्घ्य दें और फिर व्रत खोलें। महत्व भगवान गणेश को विघ्नहर्ता कहा जाता है। यही कारण है कि इस व्रत का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन बप्पा की पूजा-अर्चना करने से बाधाएं दूर होती हैं। संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा करने से संकटों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख-समृ्द्धि और सौभाग्य का आगमन होता है।
विश्व हृदय दिवस 2026: दिल की सेहत का रखें ख्याल, जानें इस वर्ष की थीम और इतिहास
हृदय या दिल मानव शरीर का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है, जो पूरे शरीर में रक्त को पंप करता है।
विश्व रेबीज दिवस: हर नौ मिनट में एक व्यक्ति की मौत, 'प्राणघातक' वायरस से ऐसे करें बचाव
हर वर्ष 28 सितंबर को विश्व रेबीज दिवस मनाया जाता है। यह दुनिया का पहला रेबीज टीका विकसित करने वाले फ्रांसीसी वैज्ञानिक लुई पाश्चर की पुण्यतिथि अवसर पर मनाया जाता है।
आज यानी की 27 सितंबर 2026 से पितृपक्ष की शुरूआत हो रही है। इस दौरान पितरों को तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक पितृपक्ष के दौरान पूर्वज पृथ्वी पर आते हैं और अपने वंशजों से तर्पण ग्रहण कर उनपर कृपा बरसाते हैं। पितरों की आत्मशांति और उनका आशीर्वाद पाने के लिए विधिविधान से श्राद्ध कर्म किया जाता है। इस दौरान पूरे 15 दिनों तक कई नियमों का पालन भी किया जाता है। माना जाता है कि यह समय अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का होता है। पितृपक्ष 2026 26 सितंबर - पूर्णिमा श्राद्ध 27 सितंबर - प्रतिपदा श्राद्ध 28 सितंबर - द्वितीया श्राद्ध 29 सितंबर - तृतीया श्राद्ध 30 सितंबर - चतुर्थी और पंचमी श्राद्ध 01 अक्तूबर - षष्ठी श्राद्ध 02 अक्तूबर - सप्तमी श्राद्ध 03 अक्तूबर - अष्टमी श्राद्ध 04 अक्तूबर - नवमी श्राद्ध 05 अक्तूबर - दशमी श्राद्ध 06 अक्तूबर - एकादशी श्राद्ध 07 अक्तूबर - द्वादशी श्राद्ध 08 अक्तूबर - त्रयोदशी श्राद्ध 09 अक्तूबर - चतुर्दशी श्राद्ध 10 अक्तूबर - सर्वपितृ श्राद्ध श्राद्ध करने का समय और जगह श्राद्ध या तर्पण हमेशा दोपहर के समय करना चाहिए। कभी भी सूर्यास्त के बाद यह कर्म नहीं करना चाहिए। पूजा के समय अपना मुंह हमेशा दक्षिण दिशा की ओर रखना चाहिए। इससे पितरों की दिशा माना जाता है। वहीं ध्यान रहे कि हमेशा श्रद्धा जमीन, किसी मंदिर या पवित्र नदी के किनारे ही करना चाहिए। वहीं किसी दूसरे के घर पर श्राद्ध कर्म नहीं करना चाहिए। तर्पण के दौरान कुशा और काले तिल का इस्तेमाल जरूरी माना जाता है। ब्राह्मण भोज और पंचबली का महत्व श्राद्ध वाले दिन कम से कम 3 ब्राह्मणों को घर पर बुलाकर पूरे सम्मान के साथ सात्विक भोजन कराना चाहिए। उनको दान-दक्षिणा देकर विदा करना चाहिए। क्योंकि बिना दान के श्राद्ध अधूरा माना जाता है। इसके साथ ही भोजन का एक हिस्सा गाय, देवताओं, कौवे, कुत्ते और चींटियों के लिए जरूर निकालें। इसको पंचबली कहा जाता है, जोकि पितरों तक खाना पहुंचाने का जरिया माना जाता है।
आयुर्वेद दिवस विशेष : रसोई में सेहत का खजाना, इनका सेवन स्वास्थ्य और शरीर के लिए वरदान
प्रत्येक वर्ष 23 सितंबर को आयुर्वेद दिवस मनाया जाता है। इसी क्रम में बुधवार को पूरे देश और दुनिया में 11वां आयुर्वेद दिवस मनाया जा रहा है। इस वर्ष आयुर्वेद दिवस की थीम 'स्वस्थ भविष्य के लिए आयुर्वेद' है। इसका मकसद वैज्ञानिक रिसर्च के जरिए आयुर्वेद को आधुनिक हेल्थकेयर का अहम हिस्सा बनाना है।
The Standards Zeelab Pharmacy Follows When Choosing Medicine Manufacturers
The quality of a medicine does not only depend on its formulation but also on the quality standards followed throughout the product's lifecycle.
बेहतर कल के लिए आयुर्वेद एक नारा नहीं हकीकत है - डॉ .मनजीत कौर
आज ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियर फूट रहें हैं,बादल फट रहे हैं,जंगलों में आग धधक रही है,
The Anatomy of a Lab-Grown Diamond Engagement Ring: Understanding Every Design Element
An engagement ring can look deceptively simple at first glance, yet it is actually the result of several distinct components working together.
Vamana Jayanti: Vaman Dwadashi पर पंचामृत अभिषेक और तुलसी दल से करें पूजन, जीवन में आएगी सुख-समृद्धि
हिंदू धर्म में भगवान विष्णु को जगत का पालनहार माना जाता है और श्रीहरि के विभिन्न अवतारों के विशेष महत्व के बारे में भी बताया गया है। भगवान विष्णु के इन्हीं अवतारों में एक अवतार भगवान वामन का अवतार है। हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को वामन जयंती का पर्व मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान वामन की पूजा करने से जीवन में सुख-शांति और समृद्धि की कामना की जाती है। तिथि और मुहूर्त द्रिक पंचांग के मुताबिक 22 सितंबर की रात 09:43 बजे से भाद्रपद शुक्ल द्वादशी तिथि की शुरुआत हुई है। वहीं आज यानी की 23 सितंबर की रात 10:50 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 23 सितंबर 2026 को वामन जयंती मनाई जा रही है। इसको वामन द्वादशी के नाम से भी जानते हैं। कौन सा अवतार हैं वामन पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक भगवान विष्णु के दशावतारों में पांचवें अवतार भगवान वामन हैं। मत्स्य, कूर्म, वराह और नरसिंह अवतार के बाद श्रीहरि ने वामन रूप धारण किया था। धार्मिक मान्यता है कि वामन भगवान का जन्म भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को हुआ था। इनके माता अदिति और पिता ऋषि कश्यप माने जाते हैं। भगवान वामन ने अपने इस अवतार से राजा बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी थी। पूजन विधि इस दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि करें और साफ कपड़े पहनें। फिर भगवान वामन का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें और सूर्य देव को जल अर्पित करें। फिर एक चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं और उस पर भगवान विष्णु या भगवान वामन की प्रतिमा को स्थापित करें। फिर 'ॐ नमो भगवते वामनाय नमः' मंत्र का जाप करते हुए भगवान विष्णु का पहले पंचामृत और बाद में साफ पानी से अभिषेक करें। भगवान विष्णु को पीले पुष्प, अक्षत, चंदन, पीले वस्त्र और तुलसी दल आदि अर्पित करें। फिर धूप-दीप जलाकर भगवान को तुलसी दल के साथ सात्विक भोग और फल अर्पित करें। इसके बाद वामन अवतार से जुड़ी कथा का पाठ करें और आरती करें। वहीं पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें और सुख-समृद्धि की कामना करें। महत्व इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा-आराधना की जाती है। इस दिन जो भी जातक भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना और उनके वामन स्वरूप की पूजा करता है। व्रत, पूजा, कथा और दान-पुण्य जैसे कार्य करता है। उसके जीवन में सुख-शांति और सौभाग्य आता है।
हाई ब्लड प्रेशर की जड़ पर प्रहार : होम्योपैथी और संतुलित जीवनशैली से संभव है स्वाभाविक नियंत्रण
बिना स्पष्ट लक्षणों के दिल और किडनी को नुकसान पहुंचाने वाले 'साइलेंट किलर' हाई ब्लड प्रेशर के नियंत्रण में होम्योपैथी और जीवनशैली सुधार एक प्रभावी विकल्प बनकर उभरे हैं। होम्योपैथी शारीरिक व मानसिक कारणों को समझकर समस्या की जड़ पर काम करती है।
Parivartini Ekadashi 2026: परिवर्तिनी एकादशी व्रत से मिलती है सभी पापों से मुक्ति
आज परिवर्तिनी एकादशी है, परिवर्तिनी एकादशी तिथि को भगवान विष्णु की आराधना के लिए विशेष माना गया है। परिवर्तिनी एकादशी को जलझूलनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दू धर्म में परिवर्तिनी एकादशी विशेष है क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में सोते हुए अपनी करवट बदलते हैं। इस एकादशी पर कुछ विशेष उपाय करने से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है तो आइए हम आपको परिवर्तिनी एकादशी व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं। जानें परिवर्तिनी एकादशी के बारे में पंडितों के अनुसार वर्ष में 24 एकादशी आती हैं और हर महीने शुक्ल व कृष्ण पक्ष में एक-एक एकादशी पड़ती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन श्रीहरि विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने से जीवन में सुख, समृद्धि और सौभाग्य का मार्ग प्रशस्त होता है। भाद्रपद मास की परिवर्तिनी एकादशी को जलझूलनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। 22 सितंबर दिन मंगलवार को परिवर्तनी एकादशी तिथि का व्रत किया जाएगा, हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष एकादशी तिथि को परिवर्तनी एकादशी का व्रत किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन व्रत रखकर विधि विधान से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा अर्चना करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है, जीवन में सुख-शांति एवं समृद्धि आती है। पुराणों में बताया गया है कि परिवर्तनी एकादशी का व्रत करने से 100 यज्ञ के बराबर पुण्य फल की प्राप्ति होती है और व्यक्ति जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। शास्त्रों के अनुसार चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु क्षीर सागर में योगनिद्रा में विश्राम करते हैं। परिवर्तिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु अपनी करवट बदलते हैं, इसलिए इस एकादशी का विशेष महत्व बताया गया है। इसे भी पढ़ें: Rajasthan के Kalki Temple में संगमरमर के घोड़े का भर रहा घाव, जुड़ी है रहस्यमयी मान्यता जानें परिवर्तिनी एकादशी का शुभ मुहूर्त हिन्दू पंचांग के अनुसार, परिवर्तिनी एकादशी 22 सितंबर 2026 को मनाई जाएगी। एकादशी तिथि 21 सितंबर की रात करीब 8 बजे आरंभ होगी और 22 सितंबर की रात लगभग 9:43 बजे समाप्त होगी। परिवर्तिनी एकादशी व्रत में करें इन नियमों का पालन पंडितों के अनुसार परिवर्तिनी एकादशी व्रत का पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद ही करें। एकादशी पूजा में तुलसी का प्रयोग जरूर करें। बिना तुलसी के विष्णु जी की पूजा अधूरी मानी जाती है। एकादशी के दिन पीले रंग के वस्त्र पहनें। व्रत के दिन क्रोध न करें और न ही किसी के लिए अपने मन में बुरे विचार लेकर आएं। एकादशी के दिन तुलसी तोड़ना वर्जित होता है। तो इस दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें और न ही जल चढ़ाएं। एकादशी के दिन तामसिक चीजों का सेवन न करें। (लहसुन-प्याज,मांसाहार, शराब) एकादशी के दिन बाल, दाढ़ी और नाखून काटने की मनाही होती है। परिवर्तिनी एकादशी व्रत के पारण का समय - एकादशी तिथि प्रारम्भ - सितंबर 21, 2026 को 08:00 पी एम बजे - एकादशी तिथि समाप्त - सितंबर 22, 2026 को 09:43 पी एम बजे - परिवर्तिनी एकादशी पारण तिथि- 23 सितंबर 2026 - पारण (व्रत खोलने का)समय - 06:27 ए एम से 08:53 ए एम - पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय - 10:50 पी एम परिवर्तिनी एकादशी के दिन विष्णु जी को लगाएं इन चीजों का भोग पंडितों के अनुसार जगत के पालनहार भगवान विष्णु को पंचामृत अत्यंत प्रिय है इसलिए इसका भोग जरूर लगाएं। दूध, दही, चीनी, शहर और घी को मिलाकर पंचामृत तैयार किया जाता है। एकादशी के दिन विष्णु जी को पंचमेवा भी जरूर चढ़ाएं। पंचमेवा में बादाम, काजू, छुआरा, किशमिश और मखाना आता है। श्री हरि विष्णु को पीला रंग बेहद पसंद है तो एकादशी के दिन बेसन के लड्डू, बूंदी के लड्डू, पीला पेड़ा या केसरिया रंग की खीर भी अर्पित करें। एकादशी के दिन चावल बनाना वर्जित है तो आप खीर साबूदाना की बना सकते हैं।परिवर्तिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु को मौसमी फल जैसे- केला, सेब, अनार आदि फलों का भी भोग लगाएं। परिवर्तिनी एकादशी व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा भी है रोचक शास्त्रों में परिवर्तिनी एकादशी के विषय में राजा मांधाता और अनावृष्टि की कथा प्रचलित है। इस कथा के अनुसार त्रेतायुग में मांधाता नाम के एक प्रतापी राजा थे। उनके राज्य में लगातार तीन वर्षों तक बारिश नहीं हुई, जिससे भयंकर सूखा पड़ गया और प्रजा त्रस्त हो गई। कारण जानने के लिए राजा जब वन गए, तो ऋषियों ने बताया कि राज्य में एक शूद्र द्वारा तपस्या करने के कारण यह दोष उत्पन्न हुआ है। राजा मांधाता ने निर्दोष और तपस्यारत व्यक्ति को दंड देने से मना कर दिया और इसका धार्मिक उपाय पूछा। तब ऋषियों ने उन्हें परिवार सहित भाद्रपद शुक्ल एकादशी (परिवर्तिनी एकादशी) का व्रत करने की सलाह दी। राजा ने विधि-विधान से यह व्रत किया, जिससे राज्य में मूसलाधार बारिश हुई, खेत हरे-भरा हो गए और प्रजा फिर से सुखी हो गई। परिवर्तिनी एकादशी में दशमी से पहलें रखें ये सावधानी शास्त्रों के अनुसार नारद पुराण में एकादशी व्रत के नियम अनुसार तिथि की शुरुआत होने के बाद इनमें मसूर आदि दालें, दूसरे के घर भोजन, और रात्रि भोजन से बचने की बात कही गई है। इसलिए अगर आप शास्त्रीय नियमों के अनुसार व्रत करना चाहते हैं तो 21 सितंबर को दिन में ही सात्त्विक और हल्का भोजन कर लेना बेहतर माना जाता है। परिवर्तिनी एकादशी व्रत में ये खाएं, रहेंगे सेहतमंद पंडितों के अनुसार एकादशी व्रत को लेकर जलाहार, फलाहार, क्षीरभोजी और नक्तभोजी जैसी अलग-अलग व्रत पद्धतियां बताई गई है। आप अपनी क्षमता अनुसार ये व्रत कर सकते हैं। साबूदाना, सिंघाड़ा, शकरकंद, आलू और मूंगफली जैसी चीजें एकादशी व्रत में खा सकते हैं। एकादशी व्रत में सिर्फ अन्न का त्याग ही नहीं बल्कि झूठ, छल-कपट, क्रोध और कठोर वाणी से बचने की सलाह भी दी जाती है। व्रत के दौरान संयम रखें, इंद्रियों पर काबू रखना भी जरुरी है। परिवर्तिनी एकादशी का महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, परिवर्तिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा, व्रत, मंत्र जाप और दान-पुण्य करने से भक्तों को श्रीहरि की कृपा प्राप्त होती है। भक्त भगवान विष्णु को पीले फूल, तुलसी, फल और पंचामृत अर्पित कर पूजा करते हैं। एकादशी का व्रत मन और इंद्रियों पर संयम रखने तथा भगवान के प्रति भक्ति बढ़ाने का अवसर माना जाता है। परिवर्तिनी एकादशी को भगवान विष्णु के वामन स्वरूप और राजा बलि से जुड़ी कथा के कारण भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य के अनुसार व्रत रखते हैं और भगवान विष्णु का स्मरण करते हैं। - प्रज्ञा पाण्डेय
Parivartini Ekadashi व्रत से मिलेगा वाजपेय यज्ञ जैसा पुण्य, योगनिद्रा में करवट बदलेंगे श्रीहरि
हर साल भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को पार्श्व एकादशी का व्रत किया जाता है। इस बार 22 सितंबर 2026 को पार्श्व एकादशी का व्रत किया जा रहा है। इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना की जाती है। पार्श्व एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी भी कहा जाता है। पार्श्व एकादशी का व्रत करने से जातक के सभी पाप नष्ट होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। तो आइए जानते हैं पार्श्व एकादशी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और धार्मिक महत्व के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक 21 सितंबर को रात 08:00 बजे से एकादशी तिथि की शुरूआत हुई है। वहीं आज यानी की 22 सितंबर 2026 की रात 09:43 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। इसलिए उदयातिथि के आधार पर 22 सितंबर 2026 को पार्श्व एकादशी का व्रत किया जा रहा है। पूजन विधि इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठने के बाद साफ कपड़े पहनें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद पूजा स्थल की साफ-सफाई करें और एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं। इसके बाद भगवान विष्णु या वामन देव की मूर्ति को स्थापित करें। फिर पानी से भरा तांबे का कलश रखें और इसके ऊपर आम के पत्ते रखें और फिर एक नारियल रखें। अब भगवान विष्णु की मूर्ति को गंगाजल और पंचामृत से साफ करें और फिर साफ पानी से धोकर पोछें। श्रीहरि को चंदन का तिलक करें और रोली, अक्षत, पीले फूल, धूप-दीप और शुद्ध देसी घी का दीपक जलाएं। भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी का इस्तेमाल जरूर करें। तुलसी दल को एकादशी के एक दिन पहले तोड़ कर रख लेना चाहिए। भगवान विष्णु को फल, पंचमेवा और खीर का भोग अर्पित करें। वहीं हर भोग में तुलसी दल का इस्तेमाल जरूर करें। फिर विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें और परिवर्तनी एकादशी व्रत कथा जरूर पढ़ें। पूजा के अंत में आरती करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें। महत्व पार्श्व एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी भी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन स्वरूप की पूजा-अर्चना की जाती है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के मुताबिक एकादशी के दिन भगवान विष्णु क्षीर सागर में योगनिद्रा के दौरान बाएं से दाएं करवट बदलते हैं। माना जाता है कि पार्श्व एकादशी का व्रत करने से जातक को वाजपेय यज्ञ के बराबर पुण्यफल की प्राप्ति होती है। वहीं इस व्रत के प्रभाव से पापों का नाश होता है।
Radha Ashtami पर देवी राधा और श्रीकृष्ण की पूजा से मिलेगा सुख-सौभाग्य, जानिए पूजन विधि और महत्व
आज यानी की 19 सितंबर 2026 को राधा अष्टमी का पर्व मनाया जा रहा है। यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण की प्रिय राधारानी के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को राधा अष्टमी का व्रत और पूजन किया जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी की विधि-विधान से पूजा और व्रत किया जाता है। इस दिन पूजा और व्रत करने से जीवन में सुख-सौभाग्य और समृद्धि का आगमन होता है। तो आइए जानते हैं राधा अष्टमी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरूआत 18 सिंतबर 2026 की दोपहर 01:00 बजे शुरू होगी। वहीं अगले दिन यानी की 19 सितंबर 2026 की दोपहर 03:26 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के मुताबिक 19 सितंबर 2026 को राधा अष्टमी का पर्व मनाया जा रहा है। पूजन विधि इस दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठें और स्नान आदि करके साफ कपड़े पहनें। फिर सूर्य देव को अर्घ्य दें और पूजा स्थल की साफ-सफाई करें। अब एक चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर उस पर भगवान श्रीकृष्ण और देवी राधा की प्रतिमा को स्थापित करें। फिर देवी राधा का मन में ध्यान करते हुए उनको जल, पंचामृत, पुष्प, रोली, धूप, अक्षत और दीप आदि अर्पित करें। राधा रानी को श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें। इस दौरान देवी राधा के मंत्र का जाप करें। फिर आरती करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें। धार्मिक महत्व देवी राधा को कृष्ण भक्ति और प्रेम भक्ति का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व राधा-कृष्ण की आराधना, भक्ति और आध्यात्मिक साधना का विशेष अवसर है। इस दिन मंदिरों को सजाया जाता है और भगवान श्रीकृष्ण-देवी राधा का विशेष श्रृंगार किया जाता है। इसके साथ ही भजन-कीर्तन और पूजा का आयोजन किया जाता है।
शरीर और मन को संतुलित रखने के लिए करें ताड़ासन, जानिए इसके लाभ
आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में घंटों एक ही जगह बैठकर काम करने से हमारा शारीरिक पोस्चर बिगड़ जाता है।
Vishwakarma Puja 2026: Shubh Muhurat के साथ जानिए Puja Vidhi का धार्मिक और औद्योगिक महत्व
सनातन धर्म में भगवान विश्वकर्मा को सृष्टि का दिव्य शिल्पकार, वास्तुकार और निर्माण कला का अधिष्ठाता देव माना जाता है। मशीनों, औजारों, उद्योगों, कारखानों, कार्यशालाओं और निर्माण कार्यों से जुड़े लोगों के लिए विश्वकर्मा पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन श्रद्धालु भगवान विश्वकर्मा की पूजा कर अपने कार्य में उन्नति, सफलता, सुरक्षा और समृद्धि की कामना करते हैं। विश्वकर्मा पूजा को विशेष रूप से शिल्पकारों, इंजीनियरों, वास्तुकारों, तकनीकी कर्मियों, कारीगरों, वाहन चालकों तथा उद्योग और निर्माण क्षेत्र से जुड़े लोगों का प्रमुख पर्व माना जाता है। कई स्थानों पर इस अवसर पर औजारों, मशीनों और कार्यस्थल की भी विशेष पूजा की जाती है। विश्वकर्मा पूजा 2026 की तिथि वर्ष 2026 में विश्वकर्मा पूजा गुरुवार, 17 सितंबर को मनाई जाएगी। यह पर्व सामान्यतः कन्या संक्रांति के अवसर पर मनाया जाता है, जब सूर्य देव कन्या राशि में प्रवेश करते हैं। विश्वकर्मा पूजा की तिथि सौर गणना और संक्रांति पर आधारित होने के कारण इसे कई क्षेत्रों में प्रतिवर्ष लगभग 17 सितंबर के आसपास मनाया जाता है। पूजा का सटीक समय स्थानीय पंचांग और सूर्य संक्रांति के समय के अनुसार निर्धारित किया जा सकता है। इसे भी पढ़ें: विश्वकर्मा पूजा: श्रम, कौशल और सृजन को नमन भगवान विश्वकर्मा का महत्व पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विश्वकर्मा को देवताओं का दिव्य वास्तुकार और शिल्पकार माना गया है। उन्होंने अपनी अद्भुत निर्माण कला और शिल्प कौशल से अनेक दिव्य नगरों, भवनों और अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण किया। प्रचलित पौराणिक मान्यताओं में भगवान विश्वकर्मा द्वारा किए गए प्रमुख निर्माण कार्यों में देवताओं के लिए दिव्य भवन और महल, भगवान विष्णु के लिए सुदर्शन चक्र, भगवान शिव के लिए त्रिशूल, इंद्र के लिए वज्र, श्रीकृष्ण के लिए द्वारका नगरी और रावण के लिए स्वर्णमयी लंका जैसे निर्माण कार्यों का उल्लेख मिलता है। भगवान विश्वकर्मा केवल निर्माण और शिल्प के देवता ही नहीं, बल्कि रचनात्मकता, तकनीकी ज्ञान, परिश्रम और कौशल के भी प्रतीक हैं। विश्वकर्मा पूजा हमें अपने कार्य और कार्य में प्रयुक्त साधनों के प्रति सम्मान व्यक्त करने की प्रेरणा देती है। विश्वकर्मा पूजा की पूजन विधि विश्वकर्मा पूजा के दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर, दुकान, कारखाने, कार्यालय या कार्यस्थल की अच्छी तरह सफाई करें। इसके बाद भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा या चित्र को पूजा स्थल पर स्थापित करें। पूजन सामग्री पूजा में सामान्यतः निम्न सामग्री का उपयोग किया जाता है— भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा या चित्र कलश रोली और चंदन अक्षत पुष्प और माला धूप और दीप फल और मिठाई पंचामृत और स्वच्छ जल नारियल पान और सुपारी कार्य में उपयोग होने वाले औजार और उपकरण पूजा की विधि सबसे पहले भगवान गणेश का स्मरण कर पूजा का संकल्प लें। इसके बाद भगवान विश्वकर्मा का ध्यान करते हुए उन्हें चंदन, अक्षत, पुष्प और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करें। पूजा स्थल पर रखे औजारों, मशीनों और कार्य उपकरणों को साफ करके उन पर रोली, चंदन और पुष्प अर्पित करें। कई स्थानों पर वाहनों और मशीनों की भी पूजा की जाती है। धूप-दीप प्रज्ज्वलित कर भगवान विश्वकर्मा की आरती करें और कार्य में सफलता, सुरक्षा तथा उन्नति की प्रार्थना करें। पूजा के बाद प्रसाद का वितरण किया जाता है। इस दिन कार्यस्थल की स्वच्छता और उपकरणों की देखभाल को भी विशेष महत्व दिया जाता है। आधुनिक संदर्भ में इसे कार्य के प्रति सम्मान और सुरक्षित कार्य संस्कृति के संदेश के रूप में भी देखा जा सकता है। विश्वकर्मा पूजा का व्रत और नियम विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर कुछ श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत भी रखते हैं। हालांकि, इस पर्व में पूजा और कार्य के साधनों के सम्मान को अधिक प्रमुखता दी जाती है। श्रद्धालु इस दिन सात्त्विक भोजन ग्रहण करते हैं और अपनी श्रद्धा के अनुसार दान-पुण्य भी करते हैं। कुछ उद्योगों और कार्यस्थलों पर पूजा के बाद कर्मचारियों तथा श्रमिकों के लिए सामूहिक प्रसाद या भोजन का आयोजन किया जाता है। विश्वकर्मा पूजा की पौराणिक कथा पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान विश्वकर्मा ब्रह्मांड के प्रथम शिल्पकार और दिव्य वास्तुकार हैं। देवताओं को जब भी किसी विशेष भवन, नगर, अस्त्र या दिव्य उपकरण की आवश्यकता होती थी, तब भगवान विश्वकर्मा अपनी अद्भुत कला और ज्ञान से उसका निर्माण करते थे। एक प्रचलित कथा के अनुसार भगवान विश्वकर्मा ने देवताओं के लिए स्वर्ग के भव्य भवनों और दिव्य सभाओं का निर्माण किया। उन्होंने अपने कौशल से अनेक अद्भुत नगरों और महलों की रचना की। मान्यता है कि भगवान विश्वकर्मा ने भगवान विष्णु के लिए सुदर्शन चक्र और भगवान शिव के लिए त्रिशूल जैसे दिव्य अस्त्रों का निर्माण किया। इंद्र के वज्र को भी उनकी दिव्य शिल्पकला से जोड़ा जाता है। श्रीराम से संबंधित परंपराओं में स्वर्णमयी लंका के निर्माण का संबंध भी भगवान विश्वकर्मा से माना जाता है। कहा जाता है कि यह भव्य नगरी मूल रूप से कुबेर के लिए निर्मित की गई थी और बाद में रावण ने उस पर अधिकार कर लिया। इसी प्रकार श्रीकृष्ण की द्वारका नगरी के निर्माण से भी भगवान विश्वकर्मा का संबंध बताया जाता है। समुद्र तट पर स्थित इस दिव्य नगरी को अपनी अद्भुत वास्तुकला और सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध माना गया। इन कथाओं के माध्यम से भगवान विश्वकर्मा की सृजनात्मक शक्ति, तकनीकी दक्षता और निर्माण कौशल का महत्व सामने आता है। यही कारण है कि शिल्प, वास्तुकला और तकनीकी कार्यों से जुड़े लोग भगवान विश्वकर्मा को अपना आराध्य मानते हैं। विश्वकर्मा पूजा का संदेश विश्वकर्मा पूजा केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं है, बल्कि यह परिश्रम, कौशल और सृजनशीलता के सम्मान का भी अवसर है। यह पर्व हमें सिखाता है कि किसी भी निर्माण, उद्योग या तकनीकी उपलब्धि के पीछे मानव की मेहनत, ज्ञान और कौशल का महत्वपूर्ण योगदान होता है। यह दिन हमें अपने औजारों, मशीनों और कार्यस्थल के प्रति जिम्मेदार बनने की प्रेरणा भी देता है। कार्यस्थल की स्वच्छता, उपकरणों की उचित देखभाल और सुरक्षित ढंग से कार्य करना इस पर्व के संदेश को आधुनिक जीवन से जोड़ता है। इस प्रकार, विश्वकर्मा पूजा सृजन, तकनीकी ज्ञान, श्रम और कौशल के सम्मान का पावन पर्व है। भगवान विश्वकर्मा को दिव्य वास्तुकार और शिल्पकार के रूप में स्मरण करते हुए श्रद्धालु अपने कार्य और कार्य में उपयोग होने वाले उपकरणों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। वर्ष 2026 में विश्वकर्मा पूजा 17 सितंबर, गुरुवार को मनाई जाएगी। इस अवसर पर घरों, दुकानों, कारखानों, कार्यालयों और कार्यशालाओं में भगवान विश्वकर्मा की पूजा कर सुख, समृद्धि, कार्य में सफलता और उन्नति की कामना की जाएगी। - शुभा दुबे
Vishwakarma Jayanti पर अष्टदल रंगोली और सात अनाजों से करें मशीनों व औजारों की पूजा
हिंदू धर्म में भगवान विश्वकर्मा को वास्तुकला, निर्माण, शिल्प और तकनीकी कौशल से जुड़ा देवता माना जाता है। इस पर्व का विशेष महत्व होता है। खासतौर पर यह पर्व इंजीनियरों, कारीगरों, फैक्ट्री कर्मचारियों, मेकैनिक, व्यापारियों, बिल्डरों और मशीनों व उपकरणों के साथ काम करने वाले लोगों के लिए अहम होता है। इस बार आज यानी की 17 सितंबर को विश्वकर्मा जयंती मनाई जा रही है। इस दिन लोग मशीनों और औजारों की पूजा करते हैं और भगवान विश्वक्रमा से काम में सफलता, तरक्की और सुरक्षा आदि की कामना करते हैं। तो आइए जानते हैं विश्वकर्मा जयंती की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे में... तिथि और मुहूर्त इस बार 17 सितंबर 2026 को विश्वकर्मा पूजा मनाई जाएगी। यह पर्व कन्या संक्रांति के दिन मनाया जाता है, जब सूर्य देव सिंह राशि से निकलकर कन्या राशि में गोचर करेंगे। इस बार कन्या संक्रांति का समय सुबह करीब 07:58 मिनट माना गया है। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। इसके बाद ऑफिस, कार्यस्थल, कारखाने, मशीने और औजारों को अच्छे से साफ कर लें। फिर चारों ओर गंगाजल से छिड़काव करे। अब अष्टदल रंगोली बनाएं और उस पर सात तरह के अनाजों को रखें। फिर भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा को स्थापित करें और मशीनों व उपकरणों पर फूल, तिलक और कलावा आदि अर्पित करें। अब धूप-दीप जलाकर पूजा करें और अंत में भगवान विश्वकर्मा की आरती करें। महत्व धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक भगवान विश्वकर्मा को देवताओं के दिव्य निर्माणकर्ता के रूप में जाना जाता है। भगवान विश्वकर्मा ने देवताओं के लिए कई भव्य और दिव्य भवनों और नगरों का निर्माण किया है। इस कारण भगवान विश्वकर्मा को निर्माण, सृजन और शिल्पकला का देवता माना जाता है। मंत्र ॐ विश्वकर्मणे नमः
Ganesh Chaturthi Puja: कलश स्थापना, पंचामृत स्नान और मोदक भोग के साथ करें बप्पा की आराधना
हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश चतुर्थी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन से गणेश उत्सव शुरू होता है। इस बार आज यानी की 14 सितंबर 2026 को गणेश चतुर्थी का पर्व मनाया जा रहा है। इस दौरान बप्पा की स्थापना की जाती है और उनकी पूजा होती है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक बप्पा की पूजा करने से जीवन में आने वाले संकट दूर होते हैं। क्योंकि गणेश भगवान का एक नाम विघ्नहर्ता भी है। तो आइए जानते हैं गणेश चतुर्थी कीतिथि, पूजा विधि और शुभ मुहूर्त आदि के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के इस बार 14 सितंबर को 07:06 मिनट पर भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि की शुरुआत हो रही है। वहीं इस तिथि की समाप्ति अगले दिन यानी की 15 सितंबर 2026 की सुबह 07:44 मिनट पर होगी। मान्यताओं के मुताबिक बप्पा का जन्म मध्याह्न काल के दौरान हुआ था। ऐसे में गणेश चतुर्थी का पर्व 14 सितंबर 2026 को मनाया जा रहा है। गणपति स्थापना और पूजा मुहूर्त गणेश चतुर्थी पर पूजा का मुहूर्त सुबह 11:02 मिनट से लेकर दोपहर 01:31 मिनट तक रहेगा। इस दौरान आप गणपति बप्पा की विधि-विधान से स्थापना और पूजा कर सकते हैं। अगर इस दौरान पूजा नहीं कर पाते हैं, तो आप अभिजीत मुहूर्त में भी बप्पा की पूजा-अर्चना कर सकते हैं। पूजन विधि पूजा शुरू करने से पहले भगवान गणेश का स्मरण करें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद कलश की स्थापना करें और कलश में चावल, जल, सुपानी और एक सिक्का डालें। अब भगवान गणेश की प्रतिमा का पंचामृत से स्नान कराएं। फिर बप्पा को हल्दी, कुमकुम और चंदन का तिलक करें। गणपति को दूर्वा जरूर अर्पित करें। वहीं भोग में लड्डू, मोदक और अन्य प्रसाद अर्पित करें। पूजा के अंत में आरती करें और 'ऊँ गणेशाय नम:' मंत्र का जाप करते रहें। पूजा खत्म होने के बाद सभी को प्रसाद बांटें। मंत्र वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
Varaha Jayanti पर पंचामृत से करें श्रीहरि का अभिषेक, 13 सितंबर को बन रहा पूजा का शुभ संयोग
भगवान विष्णु की पूजा सृष्टि के पालनहार के रूप में की जाती है। जब-जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है और सृष्टि का संतुलन बिगड़ता है, तब-तब भगवान विष्णु अलग-अलग रूपों में अवतार लेकर धर्म की रक्षा करते हैं और अधर्म का नाश करते हैं। भगवान विष्णु के इन्हीं अवतारों में वराह अवतार है। भगवान विष्णु ने समुद्र में डूबी पृथ्वी को बाहर निकालने के लिए और असुर हिरण्याक्ष का वध करने के लिए वराह अवतार लिया था। इस बार 13 सितंबर 2026 को वराह जयंती मनाई जा रही है। भगवान श्रीहरि के इस स्वरूप में साहस, शक्ति और संरक्षण का संगम देखने को मिलता है। तो आइए जानते हैं वराह जंयती की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और पौराणिक कथा के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि की शुरूआत 13 सितंबर 2026 की सुबह 07:08 मिनट पर हो रहा है। वहीं अगले दिन यानी की 14 सितंबर 2026 की सुबह 07:08 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। वहीं उदयातिथि के आधार पर 13 सितंबर 2026 को वराह जयंती मनाई जा रही है। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें और फिर व्रत और पूजा का संकल्प लें। अब सू्र्य देव को अर्घ्य दें और भगवान विष्णु के वराह स्वरूप की प्रतिमा को पूजा स्थान पर स्थापित करें। इसके बाद जल से भरा कलश रखें और भगवान श्रीहरि के वराह स्वरूप का पंचामृत से अभिषेक करें। भगवान वराह को पीले फूल, फल और पीले वस्त्र आदि अर्पित करें। फिर धूप-दीप जलाकर श्रीहरि की आरती करें। पूजा के दौरान 'ॐ वाराहाय नमः' मंत्र का जाप करें। पूजा के अंत में श्रीहरि विष्णु से परिवार की सुख-शांति व समृद्धि के लिए कामना करें। पौराणिक कथा धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक हिरण्याक्ष नामक एक शक्तिशाली असुर तीनों लोकों में आतंक मचाने लगा। उसके अत्याचार से देवता, ऋषि-मुनि और अन्य प्राणी परेशान थे। वहीं हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को समुद्र के गहरे जल में ले जाकर छिपा दिया। पृथ्वी के जल में समा जाने से सृष्टि का संतुलन बिगड़ने लगा और चारों तरफ संकट पैदा होने लगा। तब पृथ्वी की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने वराह अवतार लिया और वह गहरे समुद्र में उतरे। भगवान वराह ने अपने दांतों पर पृथ्वी को उठाया और जल से बाहर ले आए। फिर हिरण्याक्ष के लिए भगवान विष्णु का भयंकर युद्ध हुआ। अंत में भगवान वराह ने हिरण्याक्ष का वध कर पृथ्वी को उसके आतंक से मुक्त कराया। इस कारण से भगवान विष्णु के वराह अवतार को उन रूपों में गिना जाता है, जिन्होंने सृष्टि की रक्षा और अधर्म का विनाश किया। धार्मिक महत्व वराह जयंती श्रीहरि विष्णु की शक्ति और उनके रक्षक स्वरूप की याद दिलाने वाला पर्व है। जो भी व्यक्ति इस दिन श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान वराह की पूजा-अर्चना करता है, उसके जीवन में आने वाले सभी दोष और परेशानियां दूर होती हैं और व्यक्ति को भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।
Hartalika Teej 2026: तिथि, महत्व, पूजन विधि और व्रत कथा
सनातन धर्म में हरतालिका तीज का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। यह पर्व मुख्य रूप से भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना को समर्पित है। विवाहित महिलाएं पति की दीर्घायु, सुखी दांपत्य जीवन और परिवार के मंगल की कामना से यह व्रत रखती हैं, जबकि अविवाहित कन्याएं मनोवांछित एवं योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा करती हैं। हरतालिका तीज को श्रद्धा, तप, प्रेम और अटूट संकल्प का पर्व माना जाता है। इस दिन माता पार्वती के कठोर तप और भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने की कथा का स्मरण किया जाता है। हरतालिका तीज 2026 की तिथि वर्ष 2026 में हरतालिका तीज का व्रत मुख्य रूप से सोमवार, 14 सितंबर 2026 को मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि 13 सितंबर को प्रातः लगभग 7:08 बजे प्रारंभ होकर 14 सितंबर को प्रातः लगभग 7:06 बजे समाप्त हो रही है। उदयातिथि के आधार पर अधिकांश पंचांग 14 सितंबर को हरतालिका तीज मानते हैं। हालांकि, कुछ क्षेत्रों और पारिवारिक परंपराओं में प्रदोषकाल या स्थानीय मान्यता के अनुसार 13 सितंबर को भी व्रत रखा जा सकता है। इसलिए श्रद्धालुओं को अपने परिवार की परंपरा और स्थानीय पंचांग का पालन करना चाहिए। इसे भी पढ़ें: Unique Temple: संतान सुख और नौकरी के लिए इन प्रसिद्ध Temple में चढ़ाते हैं Resume व लौकी हरतालिका तीज का महत्व हरतालिका तीज माता पार्वती के भगवान शिव के प्रति अटूट प्रेम और तपस्या का प्रतीक है। पौराणिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तप किया था। उनकी दृढ़ भक्ति और संकल्प से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इस व्रत के माध्यम से श्रद्धालु विशेष रूप से निम्न कामनाएं करते हैं— सुखी और समृद्ध दांपत्य जीवन पति की दीर्घायु और उत्तम स्वास्थ्य परिवार में सुख-शांति मनोवांछित एवं योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद हरतालिका तीज का नाम भी इसकी पौराणिक कथा से जुड़ा है। प्रचलित व्याख्या के अनुसार ‘हरत’ या ‘हरण’ का संबंध किसी को दूर ले जाने से और ‘आलिका’ का अर्थ सखी से माना जाता है। कथा के अनुसार माता पार्वती की सखी उन्हें वन में ले गई थीं, ताकि वे अपनी इच्छा के विरुद्ध होने वाले विवाह से बच सकें और भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए तपस्या कर सकें। हरतालिका तीज की पूजन विधि हरतालिका तीज के दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और भगवान शिव तथा माता पार्वती का स्मरण करते हुए व्रत का संकल्प लें। पूजा स्थल को स्वच्छ करके चौकी स्थापित करें। परंपरा के अनुसार भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा स्थापित की जाती है। कई स्थानों पर मिट्टी, रेत या अन्य पारंपरिक सामग्री से शिव-पार्वती की प्रतीकात्मक प्रतिमाएं भी बनाई जाती हैं। पूजन सामग्री पूजा में सामान्यतः निम्न सामग्री का उपयोग किया जाता है— भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा या चित्र गणेश जी की प्रतिमा या चित्र बेलपत्र धतूरा, आक आदि, स्थानीय परंपरा के अनुसार पुष्प और माला रोली, चंदन और अक्षत धूप और दीप फल एवं नैवेद्य सुहाग की सामग्री, जैसे चूड़ियां, सिंदूर और बिंदी वस्त्र या चुनरी पंचामृत और स्वच्छ जल पूजा की विधि सबसे पहले भगवान गणेश का स्मरण करें। इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान कर उन्हें जल, चंदन, अक्षत, पुष्प और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करें। माता पार्वती को सुहाग की सामग्री और श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित की जाती हैं। भगवान शिव को बेलपत्र और अन्य प्रिय सामग्री श्रद्धापूर्वक चढ़ाई जाती है। इसके बाद हरतालिका तीज की व्रत कथा सुनी या पढ़ी जाती है। अंत में भगवान शिव और माता पार्वती की आरती कर सुखी वैवाहिक जीवन और परिवार के मंगल की प्रार्थना की जाती है। प्रातःकाल पूजा को विशेष रूप से शुभ माना जाता है। यदि किसी कारण से प्रातःकाल पूजा संभव न हो, तो कई परंपराओं में प्रदोषकाल में भी शिव-पार्वती की पूजा की जाती है। हरतालिका तीज के व्रत का महत्व हरतालिका तीज का व्रत अनेक परिवारों में निर्जला व्रत के रूप में रखा जाता है। हालांकि, व्रत के नियम क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। व्रत का वास्तविक उद्देश्य केवल भोजन और जल का त्याग नहीं, बल्कि श्रद्धा, संयम, आत्मनियंत्रण और भगवान के प्रति समर्पण भी है। इसलिए श्रद्धालुओं को अपनी शारीरिक क्षमता और पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत का पालन करना चाहिए। हरतालिका तीज की व्रत कथा पौराणिक कथा के अनुसार पर्वतराज हिमवान की पुत्री माता पार्वती बचपन से ही भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त करना चाहती थीं। उन्होंने मन ही मन भगवान शिव को अपना सर्वस्व मान लिया था। माता पार्वती की इच्छा से अनजान उनके पिता हिमवान ने उनका विवाह भगवान विष्णु से करने का विचार किया। जब माता पार्वती को इस बात का पता चला, तो वे अत्यंत दुखी हुईं। उनकी एक प्रिय सखी ने उन्हें सलाह दी कि यदि वे भगवान शिव को ही पति रूप में प्राप्त करना चाहती हैं, तो उन्हें एकांत स्थान पर जाकर कठोर तपस्या करनी चाहिए। कथा के अनुसार माता पार्वती की सखी उन्हें घर से दूर घने वन में ले गईं। वहां माता पार्वती ने भगवान शिव की आराधना करते हुए कठोर तप किया और अन्न-जल का त्याग कर अपनी भक्ति में लीन रहीं। उनकी कठिन तपस्या और अटूट श्रद्धा से भगवान शिव प्रसन्न हुए और उनके समक्ष प्रकट हुए। भगवान शिव ने माता पार्वती से उनकी इच्छा पूछी। माता पार्वती ने विनम्रतापूर्वक भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की। भगवान शिव ने उनकी तपस्या और दृढ़ संकल्प से प्रसन्न होकर उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया। बाद में पर्वतराज हिमवान ने भी भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के लिए सहमति दे दी। इस प्रकार माता पार्वती की अटूट भक्ति, तपस्या और दृढ़ निश्चय सफल हुआ। तभी से भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा प्राप्त करने के लिए हरतालिका तीज का व्रत और पूजन करने की परंपरा प्रचलित मानी जाती है। इस प्रकार, हरतालिका तीज केवल एक धार्मिक व्रत नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, तपस्या और दृढ़ संकल्प का संदेश देने वाला पर्व है। माता पार्वती का जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि सच्ची श्रद्धा और अटल संकल्प के साथ किए गए प्रयास जीवन में सकारात्मक दिशा प्रदान कर सकते हैं। वर्ष 2026 में हरतालिका तीज मुख्य रूप से 14 सितंबर, सोमवार को मनाई जाएगी। तिथि को लेकर क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपराओं में अंतर संभव है, इसलिए स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा-व्रत का निर्णय करना उचित रहेगा। इस पावन अवसर पर श्रद्धालु भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना कर सुख, शांति, सौभाग्य और मंगलमय जीवन की कामना कर सकते हैं। - शुभा दुबे
ये लोग न पिएं हल्दी वाला दूध ! फायदे की जगह होगा नुकसान
आमतौर पर हल्दी वाला दूध हेल्दी माना जाता है। दर्द होने पर, सर्दी-खांसी होने पर घरों में लोग सबसे पहले हल्दी वाला दूध पीने की सलाह देते हैं,
आयुर्वेद में घरेलू औषधीय पानी का महत्व - 6 प्रभावी नुस्खे, यहां देखें
आयुर्वेद में शरीर को स्वस्थ रखने के लिए प्राकृतिक चीजों और संतुलित जीवनशैली को महत्व दिया जाता है
अगर मुंह के छालों से कान में रहती है टीस तो यहां जानिए कारण और होम्योपैथिक उपचार
मुंह के पिछले हिस्से के छालों से जुड़ी नसों के कारण कान में होने वाले दर्द (रेफर्ड पेन) को होम्योपैथी आंतरिक असंतुलन का लक्षण मानती है। पेट की गड़बड़ी, तनाव और रोग प्रतिरोधक क्षमता की कमी से होने वाली इस तकलीफ में मर्क सॉल, नाइट्रिक एसिड और बोरेक्स जैसी दवाएं लक्षणों के आधार पर स्थायी राहत देती हैं।
शारीरिक कमजोरी, तनाव और पुनर्वास : स्वस्थ जीवन की ओर वापसी
शारीरिक निष्क्रियता के कारण मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं। पुनर्वास के दौरान लक्षित व्यायामों से मांसपेशियों की ताकत और सहनशक्ति (Stamina) वापस लौटती है।
Aja Ekadashi 2026: अजा एकादशी व्रत से होता है सभी पापों का नाश
आज अजा एकादशी है, हिन्दू धर्म में इस व्रत की खास मान्यता है। इस व्रत को रखने से व्यक्ति के द्वारा अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति मिलती है और जीवन में भी सुख शांति मिलती है तो आइए हम आपको अजा एकादशी व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं। जानें अजा एकादशी व्रत के बारे में धार्मिक मान्यताओं के अनुसार 'अजा' शब्द का संबंध सनातन धार्मिक परंपरा में आध्यात्मिक अर्थ से जोड़ा गया है। अजा एकादशी भगवान विष्णु की आराधना से जुड़ी एक महत्वपूर्ण एकादशी मानी जाती है। इस दिन व्रत करने के पीछे मुख्य भावना आत्मसंयम, भक्ति और अपने कर्मों को सात्त्विक दिशा देना है। पंडितों के अनुसार अजा एकादशी का व्रत व्यक्ति को अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखने, भोजन में संयम बरतने और आध्यात्मिक चिंतन में अधिक समय लगाने का अवसर देता है। सनातन परंपरा में अजा एकादशी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। जगत के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित यह पावन व्रत जीवन के संचित पापों, दरिद्रता और संकटों को समाप्त करने वाला माना गया है। धर्मग्रंथों के अनुसार जो व्यक्ति इस दिन श्रद्धा से उपवास करता है, उसे एक हजार अश्वमेध यज्ञों के बराबर पुण्य प्राप्त होता है। जानें अजा एकादशी का शुभ मुहूर्त हिन्दू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 6 सितंबर 2026 को शाम 7:30 बजे आरंभ होगी और अगले दिन 7 सितंबर को शाम 5:05 बजे समाप्त होगी। व्रत के लिए उदया तिथि को मान्यता दी जाती है। इसलिए अजा एकादशी का व्रत 7 सितंबर 2026, सोमवार को रखा जाएगा। इसे भी पढ़ें: Aja Ekadashi 2026: अजा एकादशी आज, जानिए Muhurat, पूजन विधि और व्रत का महत्व अजा एकादशी पर दान का है खास महत्व सनातन परंपरा में व्रत के साथ दान का विशेष महत्व है। अजा एकादशी के अवसर पर अपनी क्षमता के अनुसार जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता करना पुण्य और परोपकार की भावना को मजबूत करता है। जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या आवश्यक सामग्री भी दान की जाती है। अजा एकादशी व्रत का पारण भी होता है विशेष पंडितों के अनुसार अजा एकादशी व्रत का पारण 8 सितंबर 2026 को किया जाएगा। पंचांग के अनुसार, इस दिन सुबह 6:02 बजे से 8:33 बजे तक पारण का शुभ समय रहेगा। व्रती इस अवधि में स्नान, पूजा और भगवान विष्णु की आराधना करने के बाद व्रत खोल सकते हैं। अजा एकादशी व्रत पर ऐसे करें पूजा, होगा लाभ अजा एकादशी का दिन बहुत खास होता है इसलिए इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल की सफाई कर गंगाजल से शुद्धिकरण करें और व्रत का संकल्प लें। पीले या लाल कपड़े पर भगवान विष्णु की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें। भगवान को पीला चंदन, अक्षत, फूल, माला और वस्त्र अर्पित करें। पूजा में तुलसी दल अवश्य शामिल करें। खीर, मिठाई और मौसमी फलों का भोग लगाएं। घी का दीपक और धूप जलाकर भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें। इसके बाद विष्णु चालीसा और अजा एकादशी व्रत कथा का पाठ करें। अंत में भगवान विष्णु और एकादशी माता की आरती करें। अगले दिन द्वादशी तिथि में पूजा करने के बाद निर्धारित समय में व्रत का पारण करें। अजा एकादशी व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा भी है खास शास्त्रों के अनुसार युधिष्ठिर ने एक बार भगवान कृष्ण से भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकादशी के बारे में पूछा था। कृष्ण ने उन्हें सत्यवादी हरिश्चंद्र के बारे में बताकर उत्तर दिया - वह राजा जो अपनी जान बचाने के लिए भी झूठ नहीं बोलते थे। महर्षि विश्वामित्र द्वारा परखे जाने पर, हरिश्चंद्र ने एक वचन का सम्मान करने के लिए अपना पूरा राज्य त्याग दिया। उनके पास अपने वचन के अलावा कुछ नहीं बचा था, उन्हें अपनी रानी तारामती और अपने पुत्र रोहितश्व को दासता में बेचने के लिए मजबूर किया गया, और स्वयं को एक चांडाल को बेच दिया गया जो काशी के श्मशान घाटों की देखभाल करता था। अयोध्या के सम्राट अब अपने दिन चिताओं पर कर वसूलने में बिताते थे। फिर सबसे क्रूर प्रहार: उनके पुत्र रोहितश्व की सर्प दंश से मृत्यु हो गई। तारामती बच्चे के शव को दाह संस्कार के लिए श्मशान ले गई - और हरिश्चंद्र को, अपने कर्तव्य से बंधे हुए, अपनी शोकाकुल पत्नी से दाह संस्कार शुल्क मांगना पड़ा जो उन्हें पता था कि वह नहीं दे सकती थी। उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने झूठ नहीं बोला। यह सबसे निचले बिंदु पर था कि ऋषि गौतम ने उन्हें ढूंढ निकाला और उन्हें अजा एकादशी के बारे में बताया उन्हें इस तिथि पर पूर्ण विश्वास के साथ उपवास करने की सलाह दी। हरिश्चंद्र ने व्रत का पालन किया। और उस एक दिन के पुण्य ने सब कुछ बदल दिया: देवता अवतरित हुए, रोहितश्व को जीवनदान मिला, तारामती ने अपनी शाही गरिमा वापस पा ली, और हरिश्चंद्र को उनका राज्य और, समय के साथ, उच्च लोकों में एक स्थान वापस मिल गया। अजा एकादशी व्रत पर ये न करें, होगी हानि पंडितों के अनुसार अजा एकादशी के दिन चावल और सभी प्रकार के अनाजों से बचें। इसके अलावा प्याज, लहसुन और सभी मांसाहारी भोजन से दूर रहें। मसूर दाल, चना और अधिकांश दालें न खाएं। शहद, और कांस्य के बर्तन से भोजन न करें। क्रोध, गपशप, कटु वचन और झगड़े न करें, ये व्रत को भोजन की तरह ही तोड़ते हैं। इसके अलावा अजा एकादशी के दिन बाल या नाखून न काटें, साथ ही शेविंग भी न करें। अजा एकादशी पर ये करें, होंगे लाभ अजा एकादशी पर फल, दूध, दही, और सूखे मेवे खाएं, इससे ऊर्जा बनी रहेगी। साथ ही साबूदाना, सिंघाड़ा आटा, कुट्टू आटा, समा चावल खाएं। इसके अलावा जो निर्जला व्रत रखते हैं, उन्हें पारण समय खुलने तक इसे नहीं छूना चाहिए। इसके अलावा आलू, शकरकंद, कद्दू और सेंधा नमक खाएं। अजा एकादशी ये भी करें, मिलेगा पुण्य धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सूर्योदय से पहले स्नान करें, अपने पानी में कुछ बूंदें गंगाजल डालें। साफ पीले या सफेद वस्त्र पहनें। व्रत का औपचारिक संकल्प लें। एक साफ चौकी पर भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र रखें। उसके बगल में एक तांबे का कलश स्थापित करें, जिसमें पानी भरा हो और आम के पत्तों और एक नारियल से ढका हो। चंदन, रोली, अक्षत, फूल, धूप और एक शुद्ध देसी घी का दीपक अर्पित करें। कोई भी विष्णु पूजा तुलसी के पत्तों के बिना अधूरी है। उन्हें पिछली शाम को तोड़ लें - तुलसी को एकादशी पर कभी नहीं तोड़ना चाहिए। पंचमेवा, फल और खीर अर्पित करें। प्रत्येक प्रसाद में तुलसी शामिल होनी चाहिए। दिन भर ॐ नमो भगवते वासुदेवाय या विष्णु सहस्रनाम का जाप करें। अजा एकादशी व्रत कथा पढ़ें या सुनें, फिर एक आरती थाली और भीमसेनी कपूर के साथ आरती करें।जो सबसे सख्त रूप का पालन करते हैं, वे रात भर भजन और कीर्तन में जागते रहते हैं। - प्रज्ञा पाण्डेय
Aja Ekadashi 2026: अजा एकादशी आज, जानिए Muhurat, पूजन विधि और व्रत का महत्व
हर साल भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को अजा एकादशी का व्रत किया जाता है। इस बार आज यानी की 07 सितंबर 2026 को यह व्रत किया जा रहा है। अन्य एकादशी तिथियों की तरह अजा एकादशी का व्रत जगत के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन व्रत करने और श्रद्धा व भक्तिभाव के साथ भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करने से समस्त पापों का नाश होता है। साथ ही जीवन से दुख-दरिद्रता दूर होती है। अजा एकादशी का व्रत करने से जातक को अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य की प्राप्ति होती है। तो आइए जानते हैं अजा एकादशी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे में... तिथि व शुभ मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक 06 सितंबर 2026 की शात 07:29 मिनट से अजा एकादशी तिथि की शुरूआत हो रही हैं। वहीं आज यानी की 07 सितंबर 2026 की शाम 05:03 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 07 सितंबर 2026 को अजा एकादशी का व्रत किया जा रहा है। वहीं द्वादशी तिथि के भीतर एकादशी व्रत का पारण सही समय पर करना शुभ माना जाता है। इसलिए 08 सितंबर को सुबह 06:02 बजे से सुबह 08:33 बजे तक पारण कर सकते हैं। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। अगर संभव हो तो इस दिन पीले कपड़े पहनें। फिर भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें और सूर्य देव को अर्घ्य दें। अब पूजा स्थल की सफाई करें और एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर उस पर श्रीहरि विष्णु की मूर्ति स्थापित करें। अब भगवा विष्णु के सामने घी का दीपक जलाएं और धूप जलाएं। फिर श्रीहरि को पीले फूल, रोली, मौली, अक्षत और फल आदि अर्पित करें। भगवान विष्णु को फल और मिठाई आदि का भोग अर्पित करें। वहीं भोग में तुलसी दल को शामिल करना न भूलें। इसके बाद अजा एकादशी व्रत कथा का पाठ करें। वहीं पूजा के दौरान भगवान विष्णु के मंत्र 'ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नम:' मंत्र का 108 बार जाप करें। अंत में पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें। धार्मिक मान्यताएं धार्मिक मान्यता के मुताबिक अजा एकादशी का व्रत करने से जातक को पापों से मुक्ति मिलती है। इस दिन जो भी भक्त भगवान विष्णु की सच्चे मन से पूजा-अर्चना करता है और व्रत करता है, उसको श्रीहरि की विशेष कृपा प्राप्त होती है। भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
Dahi Handi 2026: Vajra Yoga में मनेगा दही हांडी का पर्व, जानें Shubh Muhurat और Puja Vidhi
आज यानी की 05 सितंबर 2026 को श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ा दही हांडी का पर्व मनाया जा रहा है। यह जन्माष्टमी के अगले दिन मनाया जाता है। इस दिन श्रीकृष्ण की माखन लीला को याद किया जाता है। दही हांडी पर्व पर जगह-जगह गोविंदा की टोलियां एक-दूसरे के कंधे पर चढ़कर मानव पिरामिड बनाती हैं और ऊंचाई पर रखी मटकी को फोड़ा जाता है। देश के कई हिस्सों में इस पर्व की रौनक देखने को मिलती है। तो आइए जानते हैं कि जन्माष्टमी के अगले दिन दही हांडी का पर्व क्यों मनाया जाता है और इसका शुभ मुहू्र्त क्या है और पूजा कैसे करें। तिथि और मुहूर्त आज यानी की 05 सितंबर 2026 को वज्र योग रहेगा। वहीं दोपहर 12:00 बजे से लेकर 12:50 तक अभिजीत मुहूर्त रहेगा। यह सबसे शुभ समय माना जाता है। इस दौरान पूजा-अर्चना और शुभ कार्य किए जा सकते हैं। वहीं दोपहर 01:16 मिनट से लेकर 02:45 मिनट तक अमृत काल रहेगा। इसे भी पढ़ें: Krishna Janmashtami 2026: Krishna Janmashtami पर बना दुर्लभ संयोग, नोट करें Shubh Muhurat और Puja Vidhi क्यों मनाया जाता है दही हांडी का पर्व जन्माष्टमी की रात में श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का मुख्य अनुष्ठान किया जाता है। फिर अगले दिन श्रीकृष्ण के बाल रूप और नटखटपन की लीलाओं का उत्सव मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक श्रीकृष्ण को माखन बहुत पसंद था। कान्हा अक्सर गोपियों का माखन चुराते थे। माखन चोरी से परेशान होकर गोपियों ने मटकी को जमीन से ऊंचाई पर टांगना शुरू कर दिया, जिससे कि बाल कृष्ण वहां तक न पहुंचे। लेकिन नटखट कृष्ण अपने सखाओं के साथ आते और एक-दूसरे पर चढ़कर मानव पिरामिड बनाते थे। वहीं सबसे ऊपर रहने वाला साथी मटकी को फोड़ देता था। जिसके बाद सब दही और माखन का आनंद लेते थे। कान्हा की इस लीला की याद में दही हांडी का पर्व मनाया जाता है। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद श्रीकृष्ण या फिर लड्डू गोपाल की पूजा करें। इसके बाद भगवान पंचामृत से स्नान कराएं और फिर बाद में साफ जल से स्नान कराने के बाद नए कपड़े पहनें। अब कान्हा को बांसुरी, मुकुट और चंदन का तिलक लगाएं और उनका सुंदर सा श्रृंगार करें। कान्हा को सजाने के बाद उनको झूले में बिठाएं और श्रद्धा व भक्ति के साथ उनको झूला झुलाएं। एक छोटी मटकी में मक्खन, दही, पोहा, सूखे मेवे और कुछ सिक्के डालकर पूजा घर में रखें। भगवान श्रीकृष्ण को पंचमेवा, मक्खन-मिश्री और गोपालकाला का भोग अर्पित करें। पूजा के अंत में घी का दीपक और कपूर जलाकर श्रीकृष्ण की आरती करें। पूजा पूरी होने के बाद सभी लोगों में प्रसाद वितरित करें।
रूखे-बेजान बालों में जान फूंकने के 5 आसान हेयर वॉश हैक्स बिना महंगे प्रोडक्ट्स के मिलेंगे रेशमी बाल
बालों की खूबसूरती केवल महंगे ब्रांडेड प्रोडक्ट्स या पार्लर के महंगे ट्रीटमेंट पर निर्भर नहीं करती। अक्सर हमारी रोज़मर्रा की छोटी-छोटी गलतियां बालों की कुदरती नमी छीन लेती हैं। यदि आपके बाल भी धोने के बाद उलझे रूखे और बेजान दिखने लगते हैं तो अपनी हेयर वॉश तकनीक में ये बदलाव करके देखें।
सनातन धर्म में भगवान श्रीकृष्ण को भगवान विष्णु का आठवाँ अवतार माना जाता है। उनका जीवन प्रेम, धर्म, नीति, करुणा, कर्म और भक्ति का अद्भुत संदेश देता है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में पूरे भारत और विश्व के अनेक देशों में श्रद्धा एवं उल्लास के साथ मनाई जाती है। हालांकि मथुरा, वृंदावन, द्वारका और देश के विभिन्न श्रीकृष्ण मंदिरों में इस पर्व की छटा अत्यंत मनोहर रूप लिये हुए होती है। भक्त इस दिन व्रत रखते हैं, भगवान श्रीकृष्ण का श्रृंगार करते हैं, झांकियां सजाते हैं और मध्यरात्रि में उनके जन्मोत्सव का आयोजन करते हैं। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 2026 की तिथि वर्ष 2026 में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी शुक्रवार, 4 सितंबर को मनाई जाएगी। यह पर्व भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को, विशेष रूप से रोहिणी नक्षत्र के संयोग में मनाया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मध्यरात्रि में हुआ था, इसलिए जन्माष्टमी की पूजा का विशेष आयोजन रात्रि में किया जाता है। तिथि और पूजा के समय में स्थान तथा स्थानीय पंचांग के अनुसार कुछ अंतर हो सकता है, अतः श्रद्धालुओं को अपने क्षेत्र के पंचांग के अनुसार पूजा मुहूर्त की पुष्टि करनी चाहिए। इसे भी पढ़ें: Krishna Janmashtami 2026: ऐश्वर्य एवं वैराग्य का अद्भुत संगम है श्रीकृष्ण श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का महत्व श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव नहीं है, बल्कि यह अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक भी है। पौराणिक मान्यता के अनुसार जब मथुरा के अत्याचारी राजा कंस के अत्याचार बढ़ गए और धर्म की स्थापना के लिए भगवान विष्णु के अवतार की आवश्यकता हुई, तब भगवान श्रीकृष्ण ने देवकी और वसुदेव के पुत्र के रूप में जन्म लिया। भगवान श्रीकृष्ण का जीवन अनेक प्रेरणाओं से भरा हुआ है। बाल्यकाल में उन्होंने पूतना, तृणावर्त और कालिय नाग जैसे दुष्टों का अंत किया तथा गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा की। आगे चलकर उन्होंने महाभारत के युद्ध में अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश दिया, जिसमें निष्काम कर्म, भक्ति और ज्ञान का संदेश दिया गया। जन्माष्टमी का पर्व भक्तों को यह प्रेरणा देता है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिन परिस्थितियां हों, सत्य, धर्म और कर्तव्य का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की पूजन विधि जन्माष्टमी के दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करते हुए व्रत और पूजा का संकल्प लें। पूजा स्थल को स्वच्छ करके भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल की प्रतिमा स्थापित करें। यदि प्रतिमा पहले से स्थापित है तो उसे स्नान कराकर नए वस्त्र और आभूषणों से सजाया जा सकता है। पूजा के लिए सामान्यतः निम्न सामग्री का उपयोग किया जाता है— लड्डू गोपाल अथवा भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा पंचामृत गंगाजल या स्वच्छ जल चंदन और रोली अक्षत पुष्प और माला तुलसी दल माखन और मिश्री फल और मिठाई धूप और दीप नए वस्त्र और श्रृंगार सामग्री संध्या अथवा रात्रि में पूजा स्थल को सुंदर ढंग से सजाएं और भगवान श्रीकृष्ण की झांकी तैयार करें। मध्यरात्रि में भगवान के जन्म का उत्सव मनाया जाता है। लड्डू गोपाल को पंचामृत और जल से स्नान कराएं। इसके बाद उन्हें स्वच्छ वस्त्र पहनाकर चंदन, पुष्प और तुलसी दल अर्पित करें। माखन-मिश्री, फल और अन्य सात्त्विक भोग लगाएं। धूप-दीप प्रज्ज्वलित कर भगवान श्रीकृष्ण की आरती करें और प्रसाद वितरित करें। पूजा के दौरान श्रद्धालु “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप कर सकते हैं। श्रीकृष्ण के नामों का स्मरण, भजन-कीर्तन और श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ भी इस दिन विशेष रूप से किया जाता है। जन्माष्टमी व्रत का महत्व जन्माष्टमी के दिन श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और शारीरिक क्षमता के अनुसार व्रत रखते हैं। कई लोग दिनभर फलाहार करते हैं और भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के बाद अथवा अगले दिन व्रत का पारण करते हैं। व्रत के दौरान मन, वचन और कर्म की पवित्रता बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। क्रोध, असत्य और नकारात्मक विचारों से दूर रहकर भगवान का स्मरण, भजन और सेवा करना इस पर्व का प्रमुख भाव है। परंपराओं के अनुसार व्रत की विधि और पारण का समय अलग-अलग हो सकता है, इसलिए अपने परिवार की धार्मिक परंपरा या स्थानीय पंचांग का पालन करना उचित है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की व्रत कथा पौराणिक कथा के अनुसार मथुरा के राजा उग्रसेन के पुत्र कंस ने अपनी बहन देवकी का विवाह वसुदेव के साथ किया। विवाह के समय आकाशवाणी हुई कि देवकी का आठवाँ पुत्र कंस के वध का कारण बनेगा। यह सुनकर कंस भयभीत और क्रोधित हो गया। उसने देवकी और वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया। देवकी की संतानों के जन्म लेते ही कंस उन्हें मार देता था। समय बीतता गया और देवकी के आठवें पुत्र के जन्म का समय आया। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की मध्यरात्रि में भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में देवकी की कोख से अवतार लिया। कहा जाता है कि भगवान के जन्म के समय कारागार के पहरेदार गहरी निद्रा में चले गए और कारागार के द्वार स्वयं खुल गए। वसुदेव भगवान श्रीकृष्ण को एक टोकरी में लेकर यमुना नदी पार कर गोकुल पहुंचे। गोकुल में नंद बाबा और माता यशोदा के घर उसी समय एक कन्या ने जन्म लिया था। वसुदेव श्रीकृष्ण को यशोदा के पास छोड़कर उस कन्या को लेकर वापस कारागार लौट आए। जब कंस को देवकी की आठवीं संतान के जन्म की सूचना मिली, तो वह उसे मारने के लिए पहुंचा। लेकिन जैसे ही उसने उस कन्या को पकड़कर भूमि पर पटकने का प्रयास किया, वह दिव्य रूप धारण कर आकाश में प्रकट हो गई। देवी ने कंस से कहा कि उसका वध करने वाला जन्म ले चुका है और वह सुरक्षित स्थान पर पहुंच गया है। यह सुनकर कंस और अधिक भयभीत हो गया। आगे चलकर भगवान श्रीकृष्ण ने अपने बाल्यकाल में अनेक दुष्ट शक्तियों का अंत किया और अंततः मथुरा पहुंचकर अत्याचारी कंस का वध किया। इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने धर्म की स्थापना और अधर्म का विनाश किया। इस प्रकार, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी आस्था, भक्ति और आनंद का महान पर्व है। भगवान श्रीकृष्ण का जीवन हमें प्रेम, करुणा, साहस, कर्तव्य और धर्म का संदेश देता है। उनकी शिक्षाएं आज भी मानव जीवन को सही दिशा प्रदान करती हैं। वर्ष 2026 में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 4 सितंबर, शुक्रवार को मनाई जाएगी। इस पावन अवसर पर श्रद्धालु व्रत, पूजा, भजन-कीर्तन और श्रीकृष्ण जन्म की कथा का श्रवण कर भगवान से सुख, शांति, समृद्धि और सद्बुद्धि की कामना कर सकते हैं। जय श्रीकृष्ण! - शुभा दुबे
Kajari Teej Vrat: अखंड सौभाग्य का पर्व Kajari Teej आज, जानें Puja Vidhi और चंद्रोदय का समय
हर साल भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को कजरी तीज का व्रत रखा जाता है। इस बार आज यानी की 31 अगस्त 2026 को कजरी तीज का व्रत किया जा रहा है। इस व्रत को महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अखंड सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए करती हैं। यह व्रत भगवान शिव और मां पार्वती को समर्पति होता है। इसलिए इस दिन भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा-अर्चना की जाती है। वहीं कुंवारी लड़कियां अच्छे वर की कामना से यह व्रत करती हैं। तो आइए जानते हैं कजरी तीज की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक 30 अगस्त की रात 09:39 मिनट से भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि की शुरुआत होगी। वहीं इस तिथि की समाप्ति आज यानी की 31 अगस्त की रात 08:53 मिनट पर होगी। ऐसे में उदयातिथि के आधार पर 31 अगस्त 2026 को कजरी तीज का व्रत किया जा रहा है। पूजा विधि इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करें। फिर पूजा का संकल्प लें और सूर्य देव को अर्घ्य दें। अब पूजा स्थल को साफ करें और भगवान शिव, मां पार्वती और नीमड़ी माता की प्रतिमा को स्थापित करें। इसके बाद भगवान शिव को दूध, गंगाजल, दही और बेलपत्र आदि अर्पित करें। वहीं मां पार्वती को सिंदूर, कुमकुम, चूड़ी, बिंदी और श्रृंगार सामग्री अर्पित कर विधिविधान से पूजा करें। पूजा के बाद भगवान शिव और मां पार्वती की आरती करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें। चंद्रमा को दे अर्घ्य कजरी तीज व्रत में भगवान शिव, मां पार्वती, नीमड़ी मां की पूजा करें। फिर चंद्र देव को अर्घ्य देने के बाद व्रत खोलें। चंद्रोदय होने पर एक लोटे में जल, दूध, अक्षत, रोली और फूल से अर्घ्य दें। वहीं इसके बाद एक ही जगह पर खड़े होकर चार बार परिक्रमा करें। महत्व विवाहित महिलाओं के लिए इस पर्व का विशेष महत्व होता है। इस दिन व्रत और पूजा करने से दांपत्य जीवन सुखमय होता है। इस दिन शादीशुदा महिलाएं सोलह श्रृंगार करके व्रत रखती हैं। यह व्रत सौभाग्य और समर्पण का प्रतीक है। कजरी तीज पर गीत-संगीत और लोक-नृत्य का विशेष महत्व होता है।
आज यानी की 28 अगस्त 2026 को वरलक्ष्मी व्रत रखा जा रहा है। यह मां लक्ष्मी के स्वरूप वरलक्ष्मी को समर्पित विशेष व्रत है। मुख्य रूप में विवाहित महिलाएं वरलक्ष्मी व्रत पति और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए करती हैं। हालांकि पहली बार यह व्रत करने वाली महिलाओं को पूजा विधि और नियमों के बारे में जानना बेहद जरूरी है। तो आइए जानते हैं वरलक्ष्मी व्रत की तिथि, मुहू्र्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक 28 अगस्त 2026 को सावन का आखिरी शुक्रवार है। इसलिए इस दिन वरलक्ष्मी का व्रत किया जाएगा। इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा स्थिर लग्न में की जाती है। आज मां लक्ष्मी की पूजा के लिए 4 शुभ मुहूर्त हैं। आज ब्रह्म मुहूर्त सुबह 04:28 मिनट से लेकर 05:12 मिनट तक है। वहीं अभिजीत मुहूर्त 11:56 से लेकर दोपहर 12:48 मिनट तक है। व्रत रखने के नियम इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करें और साफ कपड़े पहनें। पूजा स्थान को अच्छे से साफ करके वहां चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। फिर मां वरलक्ष्मी की प्रतिमा को स्थापित करें। वहीं कई जगह पर कलश स्थापना की परंपरा है। कलश में जल भरकर इसके ऊपर आम के पत्ते या नारियल रखें। फिर पूजा के समय मां को फल, फूल, मिठाई, कुमकुम, हल्दी और अन्य श्रृंगार सामग्री अर्पित करें। अब वरलक्ष्मी का ध्यान करें और परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की कामना करें। व्रत के दौरान मन, कर्म और वचनों में शुद्धता बनाए रखें। महत्व बता दें कि वरलक्ष्मी को महालक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि वर और लक्ष्मी के मेल से बना वरलक्ष्मी सभी मनोकामनाओं को पूरा करने वाली देवी का प्रतीक है। इस व्रत को करने से घर में सुख-शांति और समृद्धि आती है। धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत को करने से आर्थिक समस्याओं से निजात मिलती है और घर-परिवार का कल्याण होता है। वहीं कई महिलाएं संतान सुख और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से भी यह व्रत करती हैं।
Raksha Bandhan 2026: 28 अगस्त को भद्रा मुक्त शुभ मुहूर्त, जानें Rakhi बांधने का सटीक Time और Rituals
आज यानी की 28 अगस्त 2026 को भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और स्नेह का प्रतीक रक्षाबंधन का पर्व मनाया जा रहा है। इस त्योहार के प्रति बहनों और भाइयों में अधिक उत्सुकता देखने को मिलती है। इस बार सावन माह की पूर्णिमा 27 अगस्त 2026 की सुबह शुरू होकर 28 अगस्त 2026 की सुबह समाप्त होगी। ऐसे में 28 अगस्त को यह पर्व मनाया जा रहा है। तो आइए जानते हैं इस पर्व की तिथि, मुहूर्त और पूजन विधि के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक 28 अगस्त 2026 की सुबह 05:57 मिनट से 09:48 मिनट तक राखी बांधने का मुहूर्त है। इस दौरान करीब 3 घंटे 51 मिनट का समय मिलेगा। सुबह का यह मुहूर्त पूर्णिमा तिथि से जुड़ा होने की वजह से विशेष महत्व रखता है। सुबह 7:33 बजे से लेकर 9:10 बजे तक लाभ मुहूर्त रहेगा। वहीं इसके बाद 09:10 बजे से लेकर 9:48 बजे तक अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त रहेगा। धार्मिक मान्यता है कि इन मुहूर्त में राखी बांधना शुभ होता है। जानें भद्रा की स्थिति रक्षाबंधन के समय भद्रा की स्थिति को लेकर लोगों के बीच खासी सावधानी रहती है। धार्मिक परंपरा के मुताबिक भद्रा के समय राखी बांधने से बचा जाता है। लेकिन भद्राकाल 27 अगस्त 2026 को समाप्त हो जाएगा। इसलिए 28 अगस्त को रक्षाबंधन के पर्व पर भद्रा का साया नहीं रहेगा। भाई-बहन का पर्व आमतौर पर रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के रिश्ते से जोड़कर देखा जाता है। बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती हैं और उनके सुख-समृद्धि, सेहत और दीर्घायु होने की कामना करती हैं। वहीं भाई भी अपनी बहन की सुरक्षा और हर परिस्थिति में साथ देने का संकल्प लेता है। ऐसे बांधे राखी इस दिन राखी बांधने से पहले घर के मुख्य द्वार या दीवार पर गेरू और चावल के घोल से श्रवण कुमार का चित्र बनाएं। फिर इस चित्र की पूजा करें। वहीं इस दिन भगवान गणेश की पूजा का भी विशेष महत्व होता है। अब अपने भाई को को लकड़ी के पाट पर बैठाएं और इस दौरान उनका मुंह पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए। पूजा थाली में कुमकुम, रोली, हल्दी, अक्षत, दीपक, राखी और मिठाई रखें। फिर दीपक जलाएं और भाई के सिर पर रुमाल या साफ कपड़ा रखें। अब हल्दी, कुमकुम और अक्षत से भाई के माथे पर मंगल टीका लगाएं। तिलक लगाने के बाद आरती करें और भाई की दाहिनी कलाई पर राखी बांधें। धार्मिक मान्यता है कि राखी में तीन गांठें लगाना शुभ होता है। यह तीन गांठें, सुख-सुरक्षा और समृद्धि के लिए होती है।
सुकर्मा योग में पूरे दिन बहनें बांध सकेंगी राखी, इस बार रक्षाबंधन पर नहीं है भद्रा का साया
रक्षाबंधन का त्योहार बहन-भाई के बीच प्रेम का प्रतीक है। इसमें बहन भाई को तिलक लगाकर उसके दीर्घायु की कामना करती है। भाई भी जीवन भर बहन के सुख-दुख में साथ निभाने का वादा करता है और स्नेह स्वरूप बहन को उपहार भी देता है। इस त्योहार को प्राचीन काल से मनाने की परंपरा चली आ रही है। इस पर्व को हिंदी पंचांग के श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। पूर्णिमा के दिन मनाएं जाने कि वजह से कई जगह इसे राखी पूर्णिमा भी कहते हैं। इस वर्ष रक्षाबंधन 28 अगस्त 2026 को है। पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि इस बार रक्षाबंधन का पर्व बेहद खास रहने वाला है। 28 अगस्त 2026 को पूरे दिन राखी बांधने के लिए शुभ समय रहेगा, क्योंकि भद्राकाल का साया नहीं रहेगा। पूर्णिमा पर आमतौर पर भद्रा रहती है और भद्राकाल में कोई भी शुभ कार्य करना वर्जित माना जाता है। इस बार रक्षाबंधन पर भद्रा का कोई व्यवधान नहीं रहेगा। पंचांग की गणना के अनुसार 27 अगस्त को सुबह 9:09 मिनट से भद्रा शुरू होगी, जो रात 9:25 मिनट तक रहेगी। जिससे 28 अगस्त को रक्षाबंधन का पूरा दिन शुभ रहेगा। खास बात यह है कि इस बार रक्षाबंधन पर भद्राकाल का साया नहीं रहेगा, यानी बहनें सुबह से लेकर शाम तक कभी भी अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांध सकेंगी। श्रावणी पूर्णिमा पर 28 अगस्त को शतभिषा नक्षत्र, सुकर्मा योग, बव उपरांत कौलव करण तथा मीन राशि के चंद्रमा की साक्षी में मनाया जाएगा। धर्मशास्त्रीय मान्यता के अनुसार बहनें भाई की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और मंगलकामना के लिए उसकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधेंगी। शुक्रवार के दिन सुकर्मा योग होने से भी यह दिन विशेष शुभ फलदायी माना जा रहा है। ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि रक्षाबंधन का त्योहार बहन-भाई के बीच प्रेम का प्रतीक है। इसमें बहन भाई को तिलक लगाकर उसके दीर्घायु की कामना करती है। भाई भी जीवन भर बहन के सुख-दुख में साथ निभाने का वादा करता है और स्नेह स्वरूप बहन को उपहार भी देता है। इस त्योहार को प्राचीन काल से मनाने की परंपरा चली आ रही है। रक्षाबंधन पर अबकी बार भद्रा का साया नहीं है। रक्षाबंधन पर अक्सर ऐसा होता है कि भद्रा का अशुभ साया भाई-बहन के इस पवित्र त्योहार में खलल डाल देता है और त्योहार का मजा किरकिरा हो जाता है। खुशी की बात यह है कि इस बार भद्रा नहीं है और भाई-बहन पूरे आनंद और प्रेम सौहार्द के साथ इस त्योहार को मनाएंगे। रक्षाबंधन श्रावण मास की पूर्णिमा को होता है। इस दिन बहनें राखी के रूप में अपने भाई की कलाई पर रक्षासूत्र बांधती हैं और भाई इसके बदले में बहनों को उनकी रक्षा करने का वचन देते हैं। इसे भी पढ़ें: Famous Temple: मां बगलामुखी मंदिर क्यों है खास, Celebs और VIPs की आस्था का केंद्र बना Himachal Pradesh का यह सिद्ध धाम नहीं रहेगा भद्रा का साया ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि इस बार रक्षाबंधन पर भद्रा का कोई व्यवधान नहीं रहेगा। पंचांग की गणना के अनुसार 27 अगस्त को सुबह 9:09 मिनट से भद्रा शुरू होगी, जो रात 9:25 मिनट तक रहेगी। जिससे 28 अगस्त को रक्षाबंधन का पूरा दिन शुभ रहेगा। रक्षाबंधन तिथि भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि रक्षाबंधन 28 अगस्त को मनाया जाएगा। सावन के महीने के आखिरी दिन यानी के श्रावण पूर्णिमा को रक्षाबंधन मनाया जाता है। श्रवण शुक्ल पूर्णिमा, 28 अगस्त 2026 (शुक्रवार) को रक्षाबन्धन है। इस दिन पूर्णिमा तिथि प्रातः 9:48 तक है। रक्षाबंधन पर्व पर भद्रा का साया नहीं होगा। पूर्णिमायां भद्रारहितायां त्रिमुहूर्त्ताधिकोदय व्यापिन्यामपराह्न प्रदोषे वा कार्यम् - धर्मसिन्धु । रक्षा बंधन : - 28 अगस्त 2026 पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: - 27 अगस्त को सुबह 09:08 मिनट से शुरू पूर्णिमा तिथि समापन: - 28 अगस्त को सुबह 09:48 मिनट तक रक्षा बंधन का शुभ मुहूर्त चर-लाभ-अमृत का चौघड़िया प्रातः 06:08 से प्रातः 10:53 तक शुभ का चौघड़िया दोपहर 12:28 से दोपहर 02-03 तक अपराह्न दोपहर 01:44 से सायं 04:16 तक चर का चौघड़िया सायं 05-13 से सायं 05 06.48 तक अभिजित दोपहर 12:04 से दोपहर 12:53 तक है। राखी बांधने का सही तरीका भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि राखी बंधवाते समय भाई का मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। बहनों को पूजा की थाली में चावल, रौली, राखी, दीपक आदि रखना चाहिए। इसके बाद बहन को भाई के अनामिका अंगुली से तिलक करना चाहिए। तिलक के बाद भाई के माथे पर अक्षत लगाएं। अक्षत अखंड शुभता को दर्शाते हैं। उसके बाद भाई की आरती उतारनी चाहिए और उसके जीवन की मंगल कामना करनी चाहिए। कुछ जगहों पर भाई की सिक्के से नजर उतारने की भी परंपरा है। भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास से जानते हैं राशि अनुसार बहनें अपने भाई के हाथ पर कोनसे कलर की राखी बांधें। मेष :- राशि के भाई को मालपुए खिलाएं एवं लाल डोरी से निर्मित राखी बांधे। वृषभ :- राशि के भाई को दूध से निर्मित मिठाई खिलाएं एवं सफेद रेशमी डोरी वाली राखी बांधे। मिथुन :- राशि के भाई को बेसन से निर्मित मिठाई खिलाएं एवं हरी डोरी वाली राखी बांधे। कर्क :- राशि के भाई को रबड़ी खिलाएं एवं पीली रेशम वाली राखी बांधे। सिंह :- राशि के भाई को रस वाली मिठाई खिलाएं एवं पंचरंगी डोरे वाली राखी बांधे। कन्या :- राशि के भाई को मोतीचूर के लड्डू खिलाएं एवं गणेशजी के प्रतीक वाली राखी बांधे। तुला :-राशि के भाई को हलवा या घर में निर्मित मिठाई खिलाएं एवं रेशमी हल्के पीले डोरे वाली राखी बांधे। वृश्चिक :- राशि के भाई को गुड़ से बनी मिठाई खिलाएं एवं गुलाबी डोरे वाली राखी बांधे। धनु :- राशि के भाई को रसगुल्ले खिलाएं एवं पीली व सफेद डोरी से बनी राखी बांधे। मकर :- राशि के भाई को मिठाई खिलाएं एवं मिलेजुले धागे वाली राखी बांधे। कुंभ :- राशि के भाई को ग्रीन मिठाई खिलाएं एवं नीले रंग से सजी राखी बांधे। मीन :- राशि के भाई को मिल्क केक खिलाएं एवं पीले-नीले जरी की राखी बांधे। - डा. अनीष व्यास भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक
श्रावण माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को पुत्रदा एकादशी या पवित्रा एकादशी के नाम से जाना जाता है। हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन व्रत करने और भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करने से व्यक्ति को संतान सुख, परिवार की समृद्धि और संतान के उत्तम स्वास्थ्य की कामना पूरी होती है। इस बार आज यानी की 23 अगस्त 2026 को श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत किया जा रहा है। तो आइए जानते हैं श्रावण पुत्रदा एकादशी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक 23 अगस्त की रात 02:00 बजे से श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरूआत हुई है। जोकि अगले दिन यानी की 24 अगस्त 2026 की सुबह 04:18 मिनट तक रहेगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 23 अगस्त को श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत किया जा रहा है। इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 07:32 मिनट से लेकर दोपहर 12:24 मिनट तक है। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर व्रत का संकल्प करें और घर के पूजा स्थान की अच्छे से साफ-सफाई करें। फिर एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर उस पर भगवान विष्णु की प्रतिमा को स्थापित करें। अब श्रीविष्णु की प्रतिमा के सामने दीपक और धूप जलाएं। इसके बाद उनको फल-फूल, माला, रोली, कुमकुम और नैवेद्य आदि अर्पित करें। भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी दल जरूर शामिल करना चाहिए। इसके बाद पुत्रदा एकादशी व्रत का पाठ करें और भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें। पूजा के अंत में भगवान श्रीहरि विष्णु की आरती करें और परिवार की सुख-समृद्धि व संतान के कल्याण के लिए प्रार्थना करें। अंत में पूजा में होने वाली भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें। महत्व माना जाता है कि श्रावण पुत्रदा एकादशी को संतान सुख और परिवार की खुशहाली के लिए विशेष फलदायी होती है। वहीं इस एकादशी का व्रत करने से सुख-समृद्धि, संतान की उन्नति और अच्छे स्वास्थ्य की कामना भी पूरी होती है। एकादशी का व्रत करने और पूजा-अर्चना से भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।
Eid Milad-un-Nabi 2026: 25 या 26 अगस्त? जानें भारत में कब है Prophet Muhammad का जन्मदिन और महत्व
इस्लाम धर्म में ईद मिलाद-उन-नबी को पाक और अजतम (गौरवशाली) दिनों में शामिल किया गया है। खासतौर पर यह पाक मौका है, जब पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की विलादत-ए-मुबारक यानी 'जन्म की बधाई' को मनाते हैं। दुनियाभर के कई देशों में ईद मिलाद-उन-नबी, भारत में भी इसे अकीदत और एहतराम के साथ मनाया जाता है। भारत में भी इस दिन को मनाया जाता है। इसे नबी दिवस, मौलिद, मोहम्मद का जन्मदिन या पैगंबर मुहम्मद के जन्मदिन के रुप में जानते हैं। इस दिन सार्वजनिक अवकाश होता है। भारत में अधिकांश स्कूल और व्यवसाय इस दिन बंद होते हैं। भारत में कब ईद मिलाद-उन-नबी? इस्लाम धर्म में यह पवित्र त्योहार कब मनाया जाएगा, इसकी तारीख को लेकर काफी कन्यफूय्ज है। आइए आपको बताते हैं ईद मिलाद-उन-नबी का त्योहार 26 अगस्त 2026, बुधवार के दिन मनाया जाएगा। वैसे यह त्योहार इस्लामी तारीख चांद पर आधारित होती है, जिसके कारण अलग-अलग कैलेंडर और चांद देखने के तरीकों के कारण से ग्रेगोरियन तारीख में काफी अंतर देखने को मिलता है। वैसे कुछ इस्लामी कैलेंडरों में 12 रबी-उल-अव्वल 1448 हिजरी की तारीख 25 अगस्त है। वहीं, कुछ कैलेंडर और मुकामी रिवायतों में इसे 26 अगस्त को मनाया जाएगा। ईद मिलाद-उन-नबी के दिन लोग क्या करते हैं? इस दिन मुसलमान पैगंबर मुहम्मद के जन्म और उनकी शिक्षाओं को याद करते हैं, उन पर चर्चा करते हैं और जश्न मनाते हैं। कई सुन्नी मुसलमान इस अवसर को इस्लामी महीने रबी अल-अव्वल की 12 तारीख को मनाते हैं, बल्कि शिया समुदाय के लोग इसे रबी अल-अव्वल की 17 तारीख को मनाते हैं। इस दिन कई तरह की गतिविधियां की जाती हैं- - रात भर प्रार्थना सभाएं चलती हैं। - बड़ी भीड़ वाली पदयात्राएं और जुलूस निकलते हैं। - इतना ही नहीं, घरों, मस्जिदों और अन्य इमारतों को उत्सव के बैनर और झंडे से सजाया जाता है। - मस्जिदों से लेकर सामुदायिक भवनों में सामूहिक भोजन का आयोजन किया जाता है। - इसके अलावा, मुहम्मद के जीवन, कार्यों और उनकी शिक्षाओं के बारे में कहानियों और कविताओं के जरिए लोगों का मार्गदर्शन करते हैं।
Nag Panchami 2026: नाग पंचमी पर कैसे पाएं दोष से मुक्ति, जानें Nag Panchami 2026 की पूजा विधि
हिंदू धर्म में नागपंचमी पर्व का विशेष महत्व होता है। श्रावण माह की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को यह पर्व मनाया जाता है। इस दिन नाग देवता की पूजा-आराधना की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन नागों की पूजा-अर्चना करने से सर्प भय, कालसर्प दोष और सर्पदंश जैसी बाधाओं से मुक्ति मिलती है। वहीं आज लोग नाग देवता को दूध अर्पित करते हैं और उनको स्नान कराकर पूजा आदि करते हैं। साथ ही नाग देवता से सुरक्षा और समृद्धि की कामना करते हैं। तो आइए जानते हैं नाग पंचमी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक 16 अगस्त की शाम 04:51 मिनट से पंचमी तिथि की शुरूआत होगी। वहीं 17 अगस्त ती शाम 05:00 बजे इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से आज यानी की 17 अगस्त को नागपंचमी का पर्व मनाया जा रहा है। इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त 06:15 मिनट से लेकर 08:31 मिनट तक है। क्यों की जाती है नाग देवता की पूजा भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों से नागों का संबंध जुड़ा माना गया है। जहां भगवान शिव के गले में वासुकी नाग सुशोभित होते हैं। तो वहीं शेषनाग भगवान विष्णु की शैया हैं। श्रीकृष्ण के जन्म के बाद शेषनाग ने उनको और वासुदेव को यमुना पार कराने में मदद की थी। इसके अलावा समुद्र मंथन में भी वासुकी नाग की अहम भूमिका मानी जाती है। यह दिन नाग देवताओं के प्रति सम्मान प्रकट करने का पर्व है। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें और सूर्य देव को अर्घ्य दें। इसके बाद गाय के गोबर से नाग देवता का चित्र बनाएं और उनका आह्वान करें। अगर आपको व्रत करना हो, तो व्रत का संकल्प करें और फिर गुलाल, अबीर, मेहंदी, मेवा, फूल और दूध आदि अर्पित करें। इसके बाद मंत्रों का जाप करें और पूजा के बाद मनोकामना की पूर्ति के लिए प्रार्थना करें।
Hariyali Teej 2026: अखंड सौभाग्य के लिए किया जाता है हरियाली तीज का पर्व, जानिए पूजन विधि और महत्व
सावन का पवित्र महीना चल रहा है। हर साल सावन महीने के शुक्ल पत्र की तृतीया तिथि को हरियाली तीज का पर्व मनाया जाता है। इस बार आज यानी की 15 अगस्त 2026 को हरियाली तीज का पर्व मनाया जा रहा है। सुहागिन महिलाओं के लिए यह पर्व खास होता है। इस दिन भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा का विधान होता है। इस तिथि पर बारिश का मौसम रहता है और चारों ओर हरियाली रहती है। जिस कारण इसको हरियाली तीज का पर्व कहा जाता है। इस दिन व्रत और पूजन करने से वैवाहिक जीवन सुखमय होता है। तो आइए जानते हैं हरियाली तीज की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में... इसे भी पढ़ें: Hariyali Teej 2026: शिव-पार्वती के दिव्य मिलन का प्रतीक पर्व ‘हरियाली तीज’ तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक सावन माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि की शुरूआत 14 अगस्त की शाम 06:47 मिनट पर हुई है। वहीं इस तिथि की समाप्ति आज यानी 15 अगस्त की शाम 05:29 मिनट पर होगी। उदयातिथि के मुताबिक 15 अगस्त 2026 को हरियाली तीज का पर्व मनाया जा रहा है। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद सूर्य देव को अर्घ्य दें। इसके बाद बालू से भगवान शिव और मां पार्वती की प्रतिमा बनाएं। इसके बाद लकड़ी की चौकी पर कपड़ा बिछाकर उस पर भगवान शिव और मां पार्वती की प्रतिमा को स्थापित करें। इसके बाद मां पार्वती को सुहाग का सामान जैसे बिंदी, चूड़ियां, सिंदूर और कंघी आदि को थाली में सजाकर अर्पित करें। वहीं नैवेद्य में खीर, पूरी, हलुआ या मालपुए चढ़ाएं। इसके बाद हरियाली तीज की कथा सुनें। पूजा के अंत में आरती करें और सुखमय वैवाहिक जीवन की कामना करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें। महत्व सावन के महीने में आने वाली हरियाली तीज के पर्व का विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक मां पार्वती ने शिव को पति रूप में पाने के लिए वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। मां पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनको अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। तब से हर साल सावन माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरियाली तीज का पर्व मनाया जाता है।
Hariyali Amavasya 2026: सावन की अमावस्या पर बन रहे विशेष संयोग, जानें Puja Vidhi और दान का महत्व
आज यानी की 12 अगस्त 2026 को हरियाली अमावस्या मनाई जा रही है। सावन शिवरात्रि के ठीक अगले दिन और हरियाली तीज से 3 दिन पहले यह अमावस्या आती है। सावन के महीने में पड़ने की वजह से इसको हरियाली अमावस्या कहा जाता है। हरियाली अमावस्या के दिन पूजा-पाठ, दान, पितरों का स्मरण करना बेहद फलदायी माना जाता है। ऐसे में आइए जानते हैं हरियाली अमावस्या की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक श्रावण माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि की शुरूआत 12 अगस्त की सुबह 01:53 मिनट पर हो रही है। वहीं इस तिथि की समाप्ति रात 11:07 मिनट पर होगी। ऐसे में हरियाली अमावस्या 12 अगस्त 2026 को मनाई जा रही है। स्नान-दान मुहूर्त सावन माह के दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान-दान करना शुभ माना जाता है। 12 अगस्त को सुबह 04:23 मिनट से लेकर 05:06 मिनट तक ब्रह्म मुहूर्त रहेगा। वहीं पूजा के लिए अभिजित मुहूर्त दोपहर 11:59 मिनट से लेकर 12:52 मिनट तक रहेगा। पूजन विधि हरियाली अमावस्या को पितरों के तर्पण के लिए सुबह जल्दी उठकर गंगाजल से स्नान आदि करें। इसके बाद अपने ईष्ट का ध्यान करें और भगवान शिव की पूजा-अर्चना करें। भगवान शिव को मदार और आक के फूल चढ़ाएं और पीपल के पेड़ की पूजा करें। इससे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा आती है। महत्व हरियाली अमावस्या को चितलगी अमावस्या, गटारी अमावस्या और चुक्कला अमावस्या के नाम से भी जानते हैं। इस दिन भगवान शिव की पूजा का विधान है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक जो भी जातक इस दिन विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और कष्टों से मुक्ति मिलती है।
Sawan Shivratri 2026: सावन शिवरात्रि पर जानें जलाभिषेक का Muhurat और भद्रा काल का समय
हिंदू धर्म में सावन शिवरात्रि का विशेष महत्व होता है। सावन का महीना भगवान शिव को अतिप्रिय होता है। इसलिए सावन माह में भगवान शिव की पूजा-अर्चना का विशेष महत्व माना जाता है। इस दौरान भगवान शिव का पूजन, जप, जलाभिषेक और रुद्राभिषेक करने से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और बाधाओं का नाश होता है। सावन महीने की शिवरात्रि का विशेष महत्व होता है। सावन शिवरात्रि पर भगवान शिव की पूजा और आराधना शुभ और फलदायी मानी जाती है। तो आइए जानते हैं सावन शिवरात्रि की तिथि, मुहूर्त और पूजन विधि के बारे में... तिथि और मुहूर्त हर साल सावन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को सावन शिवरात्रि मनाई जाती है। पंचांग के मुताबिक इस साल चतुर्दशी तिथि की शुरूआत 11 अगस्त 2026 की सुबह 04:53 मिनट से हुई है। वहीं इस तिथि की समाप्ति अगले दिन यानी की 12 अगस्त को देर रात 01:51 मिनट पर होगी। उदयातिथि के मुताबिक 11 अगस्त को सावन शिवरात्रि मनाई जा रही है। शिवरात्रि पर रात्रि के चारों प्रहर में शिव और पार्वती की पूजा का विशेष महत्व होता है। भद्रा का साया इस बार सावन शिवरात्रि पर भद्राकाल का साया रहेगा। धार्मिक शास्त्रों में भद्राकाल को शुभ नहीं माना जाता है। आज सुबह से भद्रा लग जाएगी, जोकि दोपहर 03:22 मिनट तक रहेगी। लेकिन भगवान शिव की पूजा-अर्चना और जलाभिषेक में भद्रा दोष मान्य नहीं होगा। ऐसे में शिवभक्त बिना किसी डर के भद्राकाल में भगवान शिव की पूजा कर सकते हैं। पूजन विधि इस दिन सूर्योदय से पहले उठें और स्नान आदि करके साफ कपड़े पहनें। फिर घर के मंदिर की साफ-सफाई करें और पास में स्थित शिवालय में जाकर भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा करें। शिवलिंग पर जल, गंगाजल, दही, दूध, घी, शहद और शक्कर से अभिषेक करें। फिर शिवलिंग का दोबारा जल से अभिषेक करें। इसके बाद धतूरा, बेलपत्र, भांग, फूल और सफेद चंदन आदि अर्पित करें। अब भगवान शिव को फल और मिष्ठान आदि अर्पित कर नैवेद्य अर्पित करें। फिर 'ऊँ नम: शिवाय' मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र और शिव चालीसा का पाठ करें। अंत में भगवान शिव की आरती करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें।
Sawan Pradosh Vrat 2026: सोम प्रदोष व्रत पर शिवलिंग पूजा का महत्व, जानें Puja Timing और शुभ मुहूर्त
सावन के महीने में भगवान शिव की पूजा-आराधना का विशेष महत्व होता है। सावन माह में पड़ने वाले व्रत भी पुण्यदायी व्रतों में से एक माने जाते हैं। सावन में प्रदोष व्रत का विशेष महत्व होता है। वहीं प्रदोष व्रत सोमवार के दिन पड़ता है, इसको सोम प्रदोष व्रत भी कहा जाता है। प्रदोष में व्रत रखना और भगवान शिव की पूजा-आराधना करने से विशेष फलों की प्राप्ति होती है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक इस व्रत में प्रदोष काल में शिवलिंग का जलाभिषेक, रुद्राभिषेक, बेलपत्र और भांग-धतूरा आदि अर्पित किए जाते हैं। वहीं शिव मंत्रों के जाप से भगवान शिव और मां पार्वती की विशेष कृपा मिलती है। प्रदोष व्रत करने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति, संतान सुख और रोग आदि से छुटकारा मिलता है। इस बार 10 अगस्त को सोम प्रदोष व्रत किया जा रहा है। तो आइए जानते हैं सोम प्रदोष व्रत की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे मे... तिथि और मुहूर्त हिंदू पंचांग के अनुसार, सावन माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि की शुरुआत 10 अगस्त को सुबह 8 बजे से होगी और इस तिथि का समापन 11 अगस्त को 4 बजकर 55 मिनट पर होगा। सावन सोम प्रदोष व्रत पर पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 7 बजकर 05 मिनट से लेकर रात 09 बजकर 14 मिनट तक रहेगा। इस मुहूर्त में पूजा करना शुभ और फलदायी होता है। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करें और फिर भगवान शिव का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प करें। फिर भगवान शिव का दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से अभिषेक करें। इसके बाद 11 या 21 बेलपत्र, आक के फूल, धतूरा, फल, सुपारी, इलायची, लौंग, धूप, दीप, फूल, गंध, चावल और नैवेद्य अर्पित करें। पूजा के दौरान घी और शक्कर से बनी मिठाई का भोग लगाएं। इसके बाद शिव मंत्रों का जाप करें और शिव चालीसा का पाठ करें। प्रदोष व्रत कथा पढ़े और पूजा के अंत में घी के दीपक से भगवान शिव की आरती करें। पूरा दिन व्रत रखते हुए मन में भगवान शिव का स्मरण करें और शाम को फिर से स्नान आदि करके प्रदोष काल में भगवान शिव की फिर से विधि-विधान से पूजा-अर्चना करें। महत्व प्रदोष व्रत पर भगवान शिव की पूजा-अर्चना का महत्व होता है। वहीं सावन में प्रदोष व्रत का महत्व बढ़ जाता है। भगवान शिव की पूजा के लिए सबसे अच्छा मुहूर्त प्रदोष काल होता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक प्रदोष का समय होता है, जब भगवान शिव कैलाश पर तांडव करते हैं और सभी देवी-देवता उनकी आराधना करते हैं। प्रदोष व्रत रखने और प्रदोष काल में पूजा करने, दीपदान करने, शिव चालीसा और रुद्राष्टक का पाठ करने से सभी तरह के पापों का अंत हो जाता है।
हिंदू धर्म में कामिका एकादशी का विशेष महत्व होता है। हिंदू पंचांग के मुताबिक सावन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को कामिका एकादशी कहा जाता है। सावन महीने में पड़ने वाली इस एकादशी तिथि का विशेष महत्व होता है। क्योंकि सावन का महीना भगवान शिव को अतिप्रिय होता है। वहीं एकादशी तिथि पर भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना के लिए सबसे अच्छा माना जाता है। एकादशी का व्रत करने पर और भगवान विष्णु की पूजा करने से जातक के सभी तरह के पाप नष्ट हो जाते हैं और मृत्यु लोक के बाद व्यक्ति विष्णु लोक को प्राप्त होता है। कामिका एकादशी का व्रत करने से गंगा स्नान, काशी, गया, पुष्कर और कुरुक्षेत्र जैसे महान तीर्थों के बराबर पुण्यफल प्राप्त होता है। तो आइए जानते हैं कामिका एकादशी की तिथि, मुहूर्त और पूजन विधि के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक सावन माह के कृष्ण पक्ष एकादशी तिथि की शुरूआत 08 अगस्त 2026 की दोपहर 01:59 मिनट पर शुरू होगी। वहीं अगले दिन यानी की 09 अगस्त की सुबह 11:04 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। उदयातिथि के मुताबिक कामिका एकादशी का व्रत 09 अगस्त 2026 को रखा जाएगा। वहीं व्रत का पारण 10 अगस्त को सुबह 05:47 मिनट से लेकर 80:00 बजे तक होगा। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर भगवान विष्णु को पंचामृत, जल से स्नान कराने के बाद हल्दी और चंदन लगाएं। इसके बाद पीले फूल, तुलसी दल और भोग आदि अर्पित करें। फिर धूप-दीप जलाकर भगवान विष्णु से प्रार्थना करें। इसके बाद विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें और एकादशी व्रत कथा सुनें। इसके बाद अगले दिन व्रत का पारण करें। मंत्र ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात। ॐ श्रीं श्री लक्ष्मी-नारायणाभ्यां नमः। ॐ विष्णवे नमः।
Gajanan Sankranti 2026: सावन की गजानन चतुर्थी आज, इन Mantras के जाप से चमक सकती है आपकी Fortune
हिंदू धर्म में हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया जाता है। यह व्रत भगवान गणेश को समर्पित होता है। वहीं सावन महीने में पड़ने वाली संकष्टी चतुर्थी को गजानन संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन जो भी व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान गणेश की पूजा करते हैं, उनके जीवन की सभी परेशानियां दूर होती हैं। साथ ही सुख-समृद्धि आती है। इस बार आज यानी की 02 अगस्त को गजानन संक्रांति का व्रत किया जा रहा है। तो आइए जानते हैं इस दिन की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और मंत्र आदि के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक 01 अगस्त की रात 11:07 मिनट से सावन कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि की शुरूआत हुई है। वहीं आज यानी की 02 अगस्त की सुबह 11:15 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के मुताबिक 02 अगस्त संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया जाएगा। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर भगवान गणेश का ध्यान करें और व्रत का संकल्प लें। वहीं शाम को पूजा स्थान पर लकड़ी की चौकी लगाकर लाल कपड़ा बिछाएं। उस पर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें। फिर धूप-दीप जलाएं और भगवान गणेश को चंदन, रोली और फूल आदि अर्पित करें। भगवान गणेश को मोदक या लड्डू का भोग लगाएं और दूर्वा अर्पित करें। इसके बाद संकष्टी व्रत कथा का पाठ करें और आरती करें। वहीं चंद्रमा निकलने पर दूध, जल, फूल और अक्षत मिलाकर चंद्रदेव को अर्घ्य दें। इसके बाद प्रसाद ग्रहण करके व्रत का पारण करें। मंत्र वक्रतुंड महाकाय, सूर्यकोटि समप्रभ, निर्विघ्नम कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।। ॐ गण गणपतए नमः।। गजाननं भूतगणादि सेवितं, कपित्थ जंबू फल चारु भक्षणम, उमा शतम् शोक विनाश कार्यक्रम, नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम।।
Jaya Parvati Vrat 2026: जया पार्वती व्रत का समापन, जानिए Puja Vidhi और Udyapan का सही समय और नियम
सावन माह की शुरूआत को चुकी है। वहीं आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी से जया-विजया पार्वती व्रत शुरू हुआ था। जोकि सावन कृष्ण तृतीया यानी की 5 दिनों तक रखा जाता है। जया पार्वती व्रत भगवान शिव और मां पार्वती को समर्पित है। यह व्रत महिलाएं अखंड सुहाग और खुशहाल वैवाहिक जीवन के लिए रखती हैं और कुंवारी कन्याएं मनचाए वर की प्राप्ति के लिए रखती हैं। इस बार आज यानी की 01 अगस्त को जया पार्वती व्रत का समापन किया जाएगा। कैसे करें समापन जया पार्वती व्रत 5 दिनों तक चलने वाला विशेष व्रत है। इसको मुख्य रूप से सुहागिन महिलाएं और कुंवारी कन्याएं रखती हैं। वहीं व्रत के अंतिम दिन विधि-विधान से उद्यापन और समापन करना शुभ माना जाता है। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद भगवान शिव और मां पार्वती का पूजन करें। पूजा में भगवान शिव और मां पार्वती को अक्षत, फूल, फल, धूप-दीप और नैवेद्य आदि अर्पित करें। इसके बाद व्रत कथा का पाठ करें। क्योंकि माना जाता है कि बिना कथा सुने व्रत का पूजा पूरा फल मिलता है। मां पार्वती को सुहाग की सामग्री अर्पित करें और इसमें चूड़ियां, बिंदी, चुनरी, सिंदूर, मेहंदी और श्रृंगार की अन्य वस्तुएं शामिल करें। इसके बाद आरती करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए मां पार्वती और भगवान शिव से क्षमायाचना करें। वहीं अपनी श्रद्धा अनुसार ब्राह्मण, जरूरतमंद या किसी सुहागिन को फल, वस्त्र, दक्षिणा या अन्न का दान करें। प्रसाद वितरित करें और सात्विक भोजन ग्रहण कर व्रत का पारण करें। धार्मिक मान्यता धार्मिक मान्यता है कि जो भी महिला विधिपूर्वक यह व्रत करके समापन करती हैं, उनका वैवाहिक जीवन खुशहाल रहता है और अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है। वहीं अविवाहित कन्याओं को मनचाहे वर की प्राप्ति होती है।

