त्योहारों की आहट के साथ जयपुर में आयोजित काजा के विशेष फेस्टिव प्रीव्यू पॉप-अप शो ने शहर के फैशन प्रेमियों, उद्यमियों और लाइफस्टाइल से जुड़े लोगों को एक ही मंच पर एकत्रित कर दिया। रंगों, रचनात्मकता और उत्सव की भावना से सराबोर इस आयोजन में पारंपरिक भारतीय शिल्प और आधुनिक डिजाइन का ऐसा खूबसूरत मेल देखने को मिला, जिसने सभी को आकर्षित किया। कार्यक्रम में देशभर के प्रतिभाशाली कारीगरों और डिजाइनर्स की ओर से तैयार किए गए हस्तनिर्मित फेस्टिव आउटफिट्स, होम फर्निशिंग्स, डेकोर आइटम्स, लाइफस्टाइल प्रोडक्ट्स और एक्सक्लूसिव कलेक्शन्स प्रदर्शित किए गए। प्रत्येक स्टॉल भारतीय हस्तकला की समृद्ध विरासत और आधुनिक फैशन की नई सोच का परिचय दे रहा था। त्योहारों के मौसम को ध्यान में रखते हुए तैयार किए गए इन विशेष कलेक्शन्स को खरीदने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। पूरे आयोजन स्थल को एफबीएस वीमन फोरम जयपुर की ओर से आकर्षक रंगों, कलात्मक सजावट, रोशनी और फेस्टिव थीम से सजाया गया था। जीवंत माहौल, मधुर लाइव म्यूजिक और शहर के लोगों की उत्साहपूर्ण मौजूदगी ने कार्यक्रम को किसी उत्सव से कम नहीं रहने दिया। इस दौरान शहर की कई जानी-मानी हस्तियां, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स, उद्यमी, फैशन डिजाइनर्स और लाइफस्टाइल जगत से जुड़े लोग एक-दूसरे से मिले और नए विचारों का आदान-प्रदान भी किया। खरीदारी के साथ-साथ मेहमानों के लिए विशेष रूप से तैयार की गई फ्यूजन ग्रेजिंग टेबल भी आकर्षण का केंद्र रही। यहां भारतीय और अंतरराष्ट्रीय व्यंजनों के अनूठे मेल ने सभी का स्वाद बढ़ाया। पारंपरिक फ्लेवर को आधुनिक अंदाज में प्रस्तुत किए गए व्यंजनों को मेहमानों ने खूब पसंद किया और पूरे आयोजन का आनंद लिया। आयोजन से जुड़े दिव्यांक वासवानी ने बताया कि यह फेस्टिव पॉप-अप केवल खरीदारी तक सीमित नहीं था, बल्कि स्थानीय कारीगरों, महिला उद्यमियों और रचनात्मक प्रतिभाओं को एक मंच देने का प्रयास भी था। उनका कहना था कि ऐसे आयोजनों के माध्यम से छोटे ब्रांड्स और हस्तशिल्प से जुड़े कलाकारों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने और नए ग्राहकों तक पहुंचने का अवसर मिलता है। वहीं एफबीएस की फाउंडर मेघा गुप्ता ने कहा कि इस आयोजन का उद्देश्य लोगों को केवल उत्पाद उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि उन्हें हस्तनिर्मित कला और स्थानीय शिल्पकारों की मेहनत से जोड़ना भी है। उन्होंने बताया कि पूरे कार्यक्रम के दौरान उत्साह, अपनापन और त्योहारों की खुशियां हर पल महसूस की गईं। शहर के लोगों ने भी इस पहल को भरपूर सराहा और स्थानीय उत्पादों के प्रति विशेष रुचि दिखाई। उन्होंने कहा कि हस्तनिर्मित उत्पाद केवल सजावटी वस्तुएं नहीं होते, बल्कि उनमें हमारे कारीगरों की मेहनत, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत की झलक दिखाई देती है। ऐसे आयोजनों से स्थानीय कलाकारों और महिला उद्यमियों को आर्थिक रूप से मजबूत होने का अवसर मिलता है और लोगों को गुणवत्ता, मौलिकता तथा भारतीय शिल्प से जुड़ने का नया अनुभव मिलता है।
हिंदी साहित्य में जब भी यथार्थवाद, सामाजिक चेतना और मानवीय संवेदनाओं की बात होती है, तो सबसे पहले जिस नाम का स्मरण होता है, वह है मुंशी प्रेमचंद। उनकी रचनाएं महज साहित्यिक कृतियां नहीं हैं, बल्कि भारतीय समाज का जीवंत दस्तावेज हैं। उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से गरीबी, शोषण, जातिगत भेदभाव, स्त्री-पीड़ा और ग्रामीण जीवन की वास्तविकताओं को जिस संवेदनशीलता और ईमानदारी से प्रस्तुत किया, वह आज भी पाठकों को गहराई से प्रभावित करता है, लेकिन प्रेमचंद बनने से पहले वे धनपत राय थे। एक ऐसा युवा जिसने जीवन के संघर्षों को बहुत निकट से देखा और उन्हीं अनुभवों को अपनी लेखनी की शक्ति बना लिया। 31 जुलाई 1880 को बनारस के निकट स्थित लमही गांव में आनंदी देवी और मुंशी अजायब राय के घर एक पुत्र का जन्म हुआ। उसका नाम धनपत राय रखा गया। पिता डाक विभाग में मुंशी थे और परिवार साधारण आर्थिक स्थिति वाला था। धनपत राय अपने माता-पिता की चौथी संतान थे। बचपन से ही उन्हें अनेक कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। जब वे सिर्फ 8 वर्ष के थे, तभी उनकी माता का निधन हो गया। मां के स्नेह से वंचित इस बालक के जीवन में गहरा खालीपन आ गया। कुछ समय तक उनकी दादी ने उनकी देखभाल की, किंतु उनका भी शीघ्र निधन हो गया। इसके बाद घर में सौतेली मां आईं, जिनसे उन्हें अपेक्षित प्रेम और अपनापन नहीं मिला। बाल्यकाल के ये अनुभव उनके मन पर गहरा प्रभाव छोड़ गए और आगे चलकर उनकी अनेक कहानियों के पात्रों तथा घटनाओं में दिखाई दिए। उनकी प्रसिद्ध कहानी बड़े घर की बेटी की आनंदी के चरित्र में भी उनकी मां की छवि देखी जाती है। अकेलेपन से घिरे धनपत राय को कहानियों में अपना संसार मिलने लगा। वे अक्सर एक तंबाकू की दुकान पर जाया करते थे, जहां उन्होंने फारसी की प्रसिद्ध कथा तिलिस्म-ए-होशरूबा सुनी। यही वह क्षण था, जिसने उनके भीतर साहित्य के प्रति गहरी रुचि उत्पन्न की। हालांकि, बाद में गोरखपुर के अंग्रेजी विद्यालय में अध्ययन करते हुए उन्होंने अंग्रेजी उपन्यासों का अध्ययन शुरू किया। विशेष रूप से जॉर्ज डब्ल्यू. एम. रेनॉल्ड्स की प्रसिद्ध कृति द मिस्ट्रीज ऑफ द कोर्ट ऑफ लंदन ने उनके साहित्यिक दृष्टिकोण को प्रभावित किया। किशोरावस्था में ही पहली कहानी लिखी किशोरावस्था में ही उन्होंने अपनी पहली कहानी लिखी। यह कहानी एक नवयुवक और निम्न जाति की महिला के प्रेम पर आधारित थी। यद्यपि यह कहानी कभी प्रकाशित नहीं हो सकी, फिर भी यहीं से एक महान कथाकार की यात्रा प्रारंभ हो चुकी थी। उनका पहला उर्दू उपन्यास असरार-ए-मआबिद था, जिसे देवस्थान रहस्य के नाम से भी जाना जाता है। यह उपन्यास मंदिरों में व्याप्त भ्रष्टाचार और गरीब महिलाओं के शोषण पर आधारित था तथा 1903 से 1905 के बीच एक उर्दू साप्ताहिक पत्र में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुआ। प्रेमचंद का निजी जीवन भी संघर्षों से भरा रहा। मात्र पंद्रह वर्ष की आयु में उनका विवाह कर दिया गया, किंतु यह वैवाहिक जीवन सुखद नहीं रहा। विचारों और स्वभाव के अंतर के कारण यह संबंध अधिक समय तक नहीं चल सका। बाद में 1906 में उन्होंने सामाजिक विरोध की परवाह किए बिना बाल-विधवा शिवरानी देवी से विवाह किया। उस समय यह एक अत्यंत साहसिक और प्रगतिशील निर्णय माना गया। शिवरानी देवी ने बाद में प्रेमचंद घर में नामक पुस्तक लिखी, जिसमें उन्होंने प्रेमचंद के व्यक्तित्व और जीवन के अनेक अनछुए पहलुओं को सामने रखा। परिवार में प्रेम से उन्हें नवाब कहकर पुकारा जाता था। इसी कारण उन्होंने अपनी प्रारंभिक रचनाएं नवाब राय नाम से लिखीं। वर्ष 1907 में उनका पहला कहानी-संग्रह सोज-ए-वतन प्रकाशित हुआ। इस संग्रह की कहानियां देशभक्ति और स्वतंत्रता की भावना से ओत-प्रोत थीं। अंग्रेज सरकार ने इन कहानियों को विद्रोह भड़काने वाला साहित्य माना और 1910 में इसकी प्रतियां जब्त कर जला दीं। साथ ही उन्हें चेतावनी दी गई कि यदि वे आगे भी ऐसा साहित्य लिखेंगे तो उन्हें जेल भेज दिया जाएगा। इसी समय उनके मित्र और जमाना पत्रिका के संपादक मुंशी दयानारायण निगम ने उन्हें नया नाम अपनाने की सलाह दी। इसके बाद धनपत राय प्रेमचंद बन गए। यही नाम आगे चलकर हिंदी और उर्दू साहित्य में अमर हो गया। 1914 के बाद प्रेमचंद ने हिंदी में लेखन प्रारंभ किया। उनकी पहली हिंदी कहानी सौत 1915 में प्रकाशित हुई और 1917 में उनका पहला हिंदी कहानी-संग्रह सप्त सरोज प्रकाशित हुआ। उनकी भाषा सरल, सहज और जनसामान्य की भाषा थी। वे आम लोगों के दुख-दर्द को अत्यंत मार्मिकता और संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करते थे। 1921 में सरकारी नौकरी छोड़ी महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रेरित होकर उन्होंने 1921 में अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी। इसके बाद उन्होंने साहित्य को ही अपना जीवन समर्पित कर दिया। 1923 में उन्होंने बनारस में ‘सरस्वती प्रेस’ की स्थापना की। इसी प्रेस से उनकी अनेक महत्वपूर्ण कृतियां प्रकाशित हुईं, जिनमें रंगभूमि, निर्मला, प्रतिज्ञा और गबन जैसी कालजयी रचनाएं शामिल हैं। इन उपन्यासों ने उन्हें भारतीय साहित्य का सबसे प्रभावशाली कथाकार बना दिया। साहित्य के साथ-साथ उन्होंने पत्रकारिता में भी योगदान दिया। 1930 में उन्होंने हंस नामक साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। बाद में जागरण पत्रिका का भी संपादन किया। यद्यपि इन प्रयासों से उन्हें आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, फिर भी उन्होंने अपने साहित्यिक और सामाजिक दायित्वों से कभी समझौता नहीं किया। साल 1934 में वे मुंबई पहुंचे और फिल्म मजदूर के लिए पटकथा लेखन का कार्य किया। यह फिल्म मजदूरों के जीवन और उनकी समस्याओं पर आधारित थी। हालांकि फिल्म उद्योग का वातावरण उन्हें रास नहीं आया और लगभग एक वर्ष बाद वे मुंबई छोड़कर वापस लौट आए। अपने जीवन के अंतिम वर्षों में उन्होंने अपनी सर्वश्रेष्ठ कृति गोदान की रचना की। किसान होरी के जीवन पर आधारित यह उपन्यास भारतीय ग्रामीण समाज का ऐसा यथार्थ चित्र प्रस्तुत करता है, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उसके प्रकाशन के समय था। गोदान को हिंदी साहित्य का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास माना जाता है। अंतिम प्रसिद्ध कहानी का नाम कफन था एक रोचक संयोग यह है कि मृत्यु से पूर्व प्रकाशित उनकी अंतिम प्रसिद्ध कहानी का नाम कफन था। उनका अंतिम उपन्यास मंगलसूत्र अधूरा रह गया, जिसे बाद में उनके पुत्र अमृत राय ने पूरा किया। 8 अक्टूबर 1936 को लंबी बीमारी के बाद इस महान साहित्यकार का निधन हो गया। किंतु उनका साहित्य आज भी जीवित है। उन्होंने अपने जीवनकाल में 15 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियां, अनेक नाटक, अनुवाद, बाल-साहित्य, लेख, संपादकीय और भाषणों की रचना की। उन्होंने साहित्य को महलों और अभिजात वर्ग से निकालकर खेतों, खलिहानों, झोपड़ियों और आम जनजीवन तक पहुंचाया। धनपत राय से प्रेमचंद बनने की यह यात्रा महज एक लेखक की सफलता की कहानी नहीं है, अपितु उस विचार और चेतना की कहानी है जिसने भारतीय साहित्य को नई दिशा दी। प्रेमचंद ने अपने लेखन से समाज को स्वयं का चेहरा दिखाया और यही कारण है कि आज भी उन्हें हिंदी साहित्य का उपन्यास सम्राट कहा जाता है। उनका साहित्य आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करता रहेगा। विचारक और स्तंभकार- नितिन जैन
जब भी हम किसी मंदिर में भगवान के दर्शन करने जाते हैं, तो एक खास बात अक्सर देखने को मिलती है। गर्भगृह में पूजा-अर्चना करने के बाद श्रद्धालु तुरंत पीछे मुड़कर नहीं चलते, बल्कि उल्टे कदमों से पीछे हटते हुए बाहर आते हैं। यानी जब तक वे मंदिर परिसर या गर्भगृह से बाहर न निकल जाएं, तब तक वे भगवान की तरफ पीठ नहीं करते हैं।यह केवल सदियों पुरानी कोई अंध परंपरा नहीं है, बल्कि इसके पीछे बेहद गहरे धार्मिक, आध्यात्मिक, मानसिक और व्यावहारिक कारण छिपे हैं। आइए आसान शब्दों में समझते हैं कि दर्शन के बाद उल्टे पैर पीछे हटने के पीछे क्या वजहें हैं:1. ईश्वर के प्रति सर्वोच्च सम्मान और आदर की भावनाहमारी भारतीय संस्कृति में बड़ों, माता-पिता और गुरुओं का आदर करना सबसे पहला धर्म माना गया है। जैसे हम किसी पूजनीय या बड़े व्यक्ति से बात करने के बाद तुरंत उनके सामने पीठ मोड़कर नहीं भागते, ठीक वैसे ही भगवान तो पूरी सृष्टि के स्वामी हैं। उनके सामने से अचानक पीठ फेरकर चले जाना अनादर का प्रतीक माना जाता है। जब तक हम मंदिर परिसर से बाहर नहीं आते, हमारा ध्यान और चेहरा ईश्वर की ओर ही रहता है, जो हमारी सच्ची श्रद्धा को दर्शाता है।2. सकारात्मक ऊर्जा (Positive Energy) को अपने अंदर समेटनाविज्ञान और अध्यात्म दोनों मानते हैं कि मंदिर का गर्भगृह और मूर्ति स्थल सकारात्मक ऊर्जा का बहुत बड़ा केंद्र होता है। जब हम हाथ जोड़कर ईश्वर के समक्ष खड़े होते हैं, तो वह पवित्र ऊर्जा हमारे शरीर और आभामंडल (Aura) में प्रवेश करती है। यदि हम दर्शन के तुरंत बाद सीधे मुड़ जाते हैं, तो उस ऊर्जा का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हो जाता है। उल्टे कदमों से बाहर आने का सांकेतिक अर्थ यही है कि हम उस दिव्य शांति, शक्ति और आशीर्वाद को अपने भीतर सहेजकर घर ले जा रहे हैं।3. अहंकार और घमंड का नाशसीधे पीठ मोड़कर चले जाना कभी-कभी इंसान के अनजाने अहंकार को दर्शाता है—मानो काम खत्म हुआ और हम चलते बने। इसके विपरीत, धीरे-धीरे पीछे की तरफ कदम बढ़ाना हमारी नम्रता और समर्पण भाव को प्रकट करता है। यह परंपरा इंसान को यह याद दिलाती है कि ईश्वर के सामने हमारा अस्तित्व बहुत छोटा है और जो कुछ भी हमारे पास है, वह सब उन्हीं की कृपा है।4. ध्यान और मन की एकाग्रता बनाए रखनाजैसे ही इंसान मंदिर से बाहर जाने के लिए पीठ मोड़ता है, उसका ध्यान तुरंत सांसारिक बातों—जैसे बाहर खड़े जूते-चप्पल, गाड़ियां या रोजमर्रा की चिंताओं में उलझ जाता है। लेकिन जब हम भगवान के श्रीविग्रह को देखते हुए पीछे हटते हैं, तो हमारा ध्यान अंतिम समय तक मूर्ति पर ही टिका रहता है। इससे मंदिर में मिली असीम मानसिक शांति लंबे समय तक मन में बनी रहती है।
मध्य प्रदेश में बने उत्पाद नई दिल्ली में बिकेंगे। अगले महीने होने वाले भारतीय व्यापार महोत्सव-2026 में एमपी के हस्तशिल्प, एमएसएमई, जनजातीय उत्पादों को भी मंच मिलेगा। यह आयोजन कैट यानी, कान्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स करेगा। इसे लेकर गुरुवार को एक प्रतिनिधिमंडल ने अपर मुख्य सचिव नीरज मंडलोई से भी मुलाकात की। प्रतिनिधिमंडल में प्रदेश अध्यक्ष सुनील अग्रवाल, सुनील जैन, संदीप गोधा, जिलाध्यक्ष धर्मेंद्र शर्मा मौजूद थे। इस दौरान बैठक भी हुई। इसमें जिलाध्यक्ष शर्मा ने बताया कि भारत सरकार के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय, इंडियन ट्रेड प्रमोशन ऑर्गेनाइजेशन (ITPO) और कैट के संयुक्त तत्वावधान में 12 से 15 अगस्त तक भारत मंडपम, नई दिल्ली में भारतीय व्यापार महोत्सव 2026 होगा। यह भारत का पहला एवं सबसे बड़ा स्वदेशी व्यापार महोत्सव होगा। जिसमें देशभर के उद्योग, व्यापार, एमएसएमईएस, स्टार्टअप, जीआई उत्पाद, हस्तशिल्प एवं निवेश के व्यापक अवसर उपलब्ध होंगे। एमपी को मिले बेहतर मंचअध्यक्ष शर्मा ने बताया कि इस महोत्सव में मध्य प्रदेश सरकार भी अपने चार से पांच स्टॉल लगाएगी। ताकि, प्रदेश के उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ा और सशक्त मंच प्राप्त हो सके। अपर मुख्य सचिव मंडलोई ने शासन की सहभागिता पर सकारात्मक आश्वासन दिया और राज्य के विभिन्न विभागों के माध्यम से महोत्सव में प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने पर सहमति व्यक्त की। आगामी चरण में महोत्सव की आयोजन समिति द्वारा विस्तृत प्रस्तुतीकरण दिए जाने पर भी सकारात्मक सहमति जताई गई।
बागोर की हवेली और लोक कला मंडल के टिकट अब ऑनलाइन, कतारों से मिली मुक्ति
झीलों की नगरी में आने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों के लिए अच्छी खबर है। अब उन्हें शहर के प्रमुख सांस्कृतिक कार्यक्रमों का लुत्फ उठाने के लिए टिकट की लंबी कतारों में नहीं लगना पड़ेगा। पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र की बागोर की हवेली और भारतीय लोक कला मंडल ने ऑनलाइन टिकटिंग की सुविधा शुरू कर दी है। इससे पर्यटक अब अपनी उदयपुर यात्रा की प्लानिंग पहले से और बेहतर तरीके से कर सकेंगे। नई व्यवस्था से वीकेंड और पर्यटन सीजन के दौरान सीट न मिलने की चिंता काफी हद तक खत्म हो जाएगी। पूर्व बुकिंग होने से पर्यटक निर्धारित समय पर सीधे प्रवेश कर सकेंगे।
किताबी पढ़ाई के साथ बच्चों को हुनरमंद और आत्मनिर्भर बनाने की पहल के तहत महिला अधिकार मंच ने मंगलवार को शिर्डी साईं हाई स्कूल में स्किल डेवलपमेंट कार्यशाला आयोजित की। कक्षा 6 से 10 तक के विद्यार्थियों को कैंडल और सोप मेकिंग, राखी बनाना और दीया सजाने जैसी गतिविधियों का प्रशिक्षण दिया गया। कार्यशाला का उद्देश्य बच्चों में रचनात्मक सोच विकसित करना और उन्हें छोटे-छोटे हुनर से आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित करना था। कार्यक्रम में विद्यार्थियों को बताया गया कि केवल पढ़ाई ही नहीं, बल्कि कोई भी व्यावहारिक कौशल भविष्य में रोजगार और अतिरिक्त आय का माध्यम भी बन सकता है। यदि बचपन से ही बच्चे अपने हुनर को पहचानकर उसे निखारें, तो वे आगे चलकर अपने पैरों पर खड़े हो सकते हैं। हुनर को रोजगार से जोड़ने पर जोर कार्यशाला में बच्चों को बताया गया कि आज के समय में स्किल डेवलपमेंट की अहमियत लगातार बढ़ रही है। छोटे-छोटे हुनर भी स्वरोजगार का माध्यम बन सकते हैं। विद्यार्थियों को अपने अंदर छिपी प्रतिभा पहचानने और उसे लगातार बेहतर बनाने के लिए प्रेरित किया गया। राखी, कैंडल, साबुन और दीया सजाना सीखा बच्चों को अलग-अलग समूहों में बांटकर कैंडल और सोप मेकिंग, आकर्षक राखियां बनाना तथा दीयों को सजाने का प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षकों ने बच्चों को इन चीजों को तैयार करने की पूरी प्रक्रिया समझाई। बच्चों ने भी उत्साह के साथ गतिविधियों में हिस्सा लिया और अपने हाथों से कई रचनात्मक वस्तुएं तैयार कीं। बच्चों ने लिया आत्मनिर्भर बनने का संकल्प कार्यशाला के दौरान विद्यार्थियों ने संकल्प लिया कि इस रक्षाबंधन पर वे बाजार से राखी खरीदने के बजाय अपने हाथों से बनाई राखियों का इस्तेमाल करेंगे। साथ ही दीपावली और अन्य त्योहारों पर भी अपने हाथों से सजाए गए दीयों का उपयोग करेंगे। उनका कहना था कि इससे न सिर्फ उनकी रचनात्मकता बढ़ेगी, बल्कि आत्मनिर्भर बनने की सोच भी मजबूत होगी। रचनात्मकता और आत्मविश्वास बढ़ाने की पहल आयोजकों ने बताया कि इस तरह की कार्यशालाओं का उद्देश्य बच्चों को किताबों के साथ-साथ व्यवहारिक ज्ञान देना है। इससे उनमें आत्मविश्वास बढ़ता है, नई चीजें सीखने की रुचि विकसित होती है और भविष्य में स्वरोजगार के प्रति सकारात्मक सोच बनती है। विद्यालय ने दिया सहयोग कार्यशाला के सफल आयोजन में विद्यालय प्रबंधन का सहयोग रहा। अंत में आयोजकों ने स्कूल प्रबंधन का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि आगे भी बच्चों के कौशल विकास के लिए इस तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। कार्यक्रम में महिला अधिकार मंच की राष्ट्रीय अध्यक्ष ज्योति सिंह, जिला अध्यक्ष पूजा मंगतानी, सचिव निशिका लालवानी, उप सचिव कोमल जैन, कोषाध्यक्ष मेघना सिंह, समन्वयक रंजना कालरा, विंग्स अकैडमी की संस्थापक निकिता खुबचंदानी, शिर्डी साईं हाई स्कूल की प्राचार्य प्रियंका शांडिल्य, विद्यालय के शिक्षक-शिक्षिकाएं तथा कक्षा 6 से 10 तक के बड़ी संख्या में विद्यार्थी मौजूद रहे।
August 2026 Festivals: अगस्त 2026 माह के व्रत एवं त्योहारों और जयंतियों की लिस्ट
August 2026 Hindu Festivals List. अगस्त 2026 में सावन सोमवार व्रत, कामिका एकादशी, हरियाली तीज, नाग पंचमी, सिंह संक्रांति, श्रावण पुत्रदा एकादशी, वरलक्ष्मी व्रत, रक्षाबंधन, श्रावणी पूर्णिमा, गायत्री जयंती, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और कजरी तीज जैसे अनेक ...
होली को छपरियों का त्योहार बताकर फंसीं फराह खान, दर्ज हुआ केस
फिल्ममेकर-कोरियोग्राफर फराह खान इन दिनों कुकिंग रियलिटी शो 'सेलिब्रिटी मास्टशेफ' को जज करती नजर आ रही हैं। हाल ही में शो के एक एपिसोड में फराह खान ने होली को 'छपरी लोगों का फेवरेट फेस्टिवल' बताया था। इसके बाद फराह मुश्किलों में घिर गई हैं। फराह खान ...

