सिर्फ खाने के काम नहीं आती लौकी, स्किन की व्याधियों को दूर करता है इसका रस

क्याआप जानते हैं कि लौकीके रस को त्वचापर इस्तेमाल भी किया जासकता हैं जिससे स्किनपर गजब के फायदेदेखने को मिलते हैं।लौकी में भरपूर मात्रामें विटामिन सी, जिंक, एंटीऑक्सीडेंटऔर एंटी-एजिंग गुणमौजूद रहते हैं, जिसकेचलते स्किन केयर में लौकीके रस का इस्तेमालकिया जा सकता हैं।.....

खास खबर 30 Sep 2023 11:49 am

एक ही तरीके से बनाई घीया की सब्जी से हो गए बोर, अब बनाइए इसके कोफ़्ते

आज हमआपको बताने वाले हैं लौकीकी एक ऐसी हीस्वादिष्ट डिश जो आपकादिल जीत लेगी। येहै लौकी के कोफ्ते।ज्यादातर लोग तली हुई लौकी यालौकी चने की दालवाली सब्जी खाते हैं, लेकिनये रेसिपी उससे बिल्कुल अलगहै। यह काफी स्पाइसीहोती है, जो आपकेमुंह को पूरी तरहसे खोल देगी।.......

खास खबर 30 Sep 2023 11:21 am

Pitru Paksha 2023: पितृपक्ष में श्राद्ध पितरों को प्रदान करता है शांति

आज से पितृपक्ष शुरू हो गया है, इस समय लोग अपने पितरों को प्रसन्न करने के लिए प्रयास करते हैं, तो आइए हम आपको कुछ बातें बताते हैं जिनसे आपके पितृ प्रसन्न होकर आपको आर्शीवाद देंगे। जानें पितृ पक्ष के बारे में पितृ पक्ष को श्राद्ध पक्ष के नाम से भी जाना जाता है। इसकी शुरुआत 29 सितंबर, शुक्रवार से होने जा रही है और इसका समापन 14 अक्टूबर को होगा। इस दौरान किए गए तर्पण और श्राद्ध कर्म से पितृ प्रसन्न होते हैं। पितृपक्ष में अपने-अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि के अनुसार उनका श्राद्ध किया जाता है । पंडितों का मानना है कि जो लोग पितृपक्ष में पितरों का तर्पण नहीं करते उन्हें पितृदोष लगता है। श्राद्ध करने से उनकी आत्मा को तृप्ति और शांति मिलती है। वे आप पर प्रसन्न होकर पूरे परिवार को आशीर्वाद देते हैं। हर साल लोग अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए गया जाकर पिंडदान करते हैं। इसे भी पढ़ें: Pitru Paksha 2023: पितरों की आत्मा की शांति के लिए इन जगहों पर करें पिंडदान, जानिए इनका महत्व पितृपक्ष का महत्व हमारे हिन्दू धर्म में पितृपक्ष विशेष महत्व रखता है। हमारे यहां मृत्यु उपरांत व्यक्ति का श्राद्ध करना आवश्यक होता है। पंडितों का मानना है कि अगर किसी का श्राद्ध विधिपूर्वक नहीं हुआ तो उसकी आत्मा को शांति नहीं मिलती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृपक्ष के दौरान यमराज पितरों को उनके परिजनों से मिलने के लिए मुक्त कर देते हैं। ऐसे में अगर पितृपक्ष में पितरों का श्राद्ध न किया जाए तो उनकी आत्मा दुखी होती है। पितृपक्ष से जुड़ी पौराणिक कथा एक पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में जोगे और भोगे नामक के दो भाई रहते थे। जोगे बड़ा था और भोगे छोटा था। जोगे बहुत धनवान था लेकिन भोगे गरीब था। जोगे की पत्नी को अपना धनवान होने का बहुत अभिमान था लेकिन भोगे की पत्नी बहुत सरल थी। पितृपक्ष आने पर जोगे की पत्नी ने जोगे से पितरों का श्राद्ध करने को कहा लेकिन जोगे नहीं माना। लेकिन जोगे की पत्नी को लगा कि अगर श्राद्ध नहीं करेंगे तो समाज क्या कहेगा। इसलिए श्राद्ध करवाया और उसमें अपने मायके वालों को अपना धन दिखाने के लिए बुलाया। इस तरह जिस दिन श्राद्ध था उस दिन पितृ आए और उन्होंने देखा कि जोगे के घर उसके पत्नी के मायके वाले भोजन कर रहे हैं। यह देखकर पितृ बहुत दुखी हुए और भोगे के घर चले गए। भोगे के घर अगियारी निकली थी उसकी राख चाट कर पितृ चले गए। उसके बाद सभी पितृ जब नदी किनारे इकट्ठे हुए तो जोगे और भोगे के पितृ बहुत दुखी हुए। उन्होंने सोचा कि अगर भोगे के पास धन होता तो वह जरूर हमारा श्राद्ध अच्छे से करता । इसलिए सभी पितृ भोगे को धन मिले कहकर नाचने लगे। इधर भोगे के घर में भोजन नहीं होने के कारण उसके बच्चे भूखे थे। उन्होंने खाने का मांगा तो उनकी मां ने ऐसे ही कह दिया कि जाओ बर्तन में रखा है कुछ लेकर खा लो। जब बच्चों ने बर्तन खोला तो देखा कि उसमें सोने की मुहरे रखी हैं। उन्होंने यह बात मां को बतायी। इसके भोगे की पत्नी ने पितरों का अच्छे से श्राद्ध किया और जेठ-जठानी को बुलाकर आवभगत की। पितृपक्ष में नहीं किए जाते हैं ये काम 1. नए कपड़े और नया सामान न खरीदें। 2. दरवाजे पर आए भिखारी और अतिथि का अपमान न करें। 3. बासी खाना न खाएं। साथ ही शराब और मांस का भी सेवन न करें। 4. पितृपक्ष में होने वाली पूजा में लोहे के बर्तन के स्थान पर हमेशा पीतल और तांबे के बर्तन का इस्तेमाल करें। 5. तेल और सजावट का सामान इस्तेमाल नहीं करें। 6. इस दौरान मसूर की दाल, अलसी, धतूरा, कुलथी और मदार की दाल का सेवन न करें। पितृपक्ष में इन कामों से होते हैं पितृ प्रसन्न 1. ब्राह्मणों को सम्मान पूर्वक बुलाकर भोजन कराएं। यह ध्यान रहे कि भोजन हमेशा दोपहर में ही कराएं, सुबह और शाम को देवताओं को समय होता है। 2. ब्राह्मणों को भोजन कराकर उन्हें मीठा जरूर खिलाएं। मीठा खाने से ब्राह्मण प्रसन्न होंगे और उससे पितृ खुश होंगे। 3. इसके अलावा आप गाय, कुत्ते और कौवों को भोजन करा सकते हैं। इन्हें भोजन कराएं बिना श्राद्ध अधूरा माना जाता है। 4. पितृ पक्ष के दौरान पिंडदान, तर्पण या श्राद्ध कर्म करते हैं. इसके अलावा अगर संभव हो सके तो इस दौरान लहसुन और प्याज का सेवन भी नहीं करना चाहिए। कई चीजें शाकाहारी ऐसी हैं जिनको पितृ पक्ष के दौरान खाने की मनाही होती है. माना जाता है कि पितृ पक्ष के दौरान खीरा, जीरा और सरसों के साग का सेवन नहीं करना चाहिए. 5. पंडितों का मानना है कि इस दौरान पशु-पक्षियों को सताना नहीं चाहिए। क्योंकि ऐसा करने से पूर्वज नाराज हो जाते हैं। ऐसे में पितृ पक्ष के दौरान पशु-पक्षियों की सेवा करनी चाहिए। मांगलिक कार्य पितृ पक्ष में निषेध माने गए हैं। कोई भी शुभ काम इन 15 दिनों तक नहीं किया जाता है। जैसे ही नवरात्रि की शुरूआत होती है वैसे ही सारे मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं। 16 दिन के ही क्यों होते हैं श्राद्ध शास्त्रों के अनुसार, ऐसा माना जाता है कि किसी भी व्यक्ति की मृत्यु इन सोलह तिथियों के अलावा अन्य किसी भी तिथि पर नहीं होती है। यानी कि जब भी पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है तो उनकी मृत्यु तिथि के अनुसार ही करना चाहिए । इसलिए पितृ पक्ष सर्फ सोलह दिन के होते हैं। हालांकि जब तिथि क्षय होता है तब श्राद्ध के दिन 15 भी हो जाते हैं लेकिन बढ़ते कभी नहीं। पितृपक्ष में ऐसे करें श्राद्ध - श्राद्ध का काम हमेशा गया में या किसी पवित्र नदी के किनारे भी किया जा सकता है। - अगर इन दोनों में से किसी जगह पर आप नहीं कर पाते हैं तो किसी गौशाला में जाकर करना चाहिए। - इसके बाद साफ कपड़े पहनकर श्राद्ध और दान का संकल्प कीजिए। - जब तक श्राद्ध ना हो जाए तो कुछ भी ना खाएं। - वहीं, दिन के आठवें मुहूर्त में यानी कुतुप काल में श्राद्ध कीजिए जो कि 11 बजकर 36 मिनट से 12 बजकर 24 मिनट तक रहेगा। - घर पर श्राद्ध करने के लिए सुबह सूर्योदय से पहले नहा लीजिए। - इस दौरान पितरों को तृप्त करने के लिए पिंडदान और ब्राह्मण को भोजन कराया जाता है। - प्रज्ञा पाण्डेय

प्रभासाक्षी 29 Sep 2023 4:57 pm

ट्रक की केबिन में घुसा अजगर, ड्राइवर और क्लीनर ट्रक छोड़ भागे

ग्रेटर नोएडा, 29 सितंबर (आईएएनएस)। ग्रेटर नोएडा में बीती रात एक ट्रक में एक बड़ा अजगर केबिन में घुस गया। इसको देखकर परिचालक और चालक शोर मचाने लगे और ट्रक रोक कर ट्रक से कूद कर बाहर भाग खड़े हुए।

लाइफस्टाइल नामा 29 Sep 2023 1:37 pm

Pitra Paksha 2023: पितृदोष से मुक्ति के लिए पितृपक्ष में जरूर करें तर्पण, पितरों का मिलेगा आशीर्वाद

सनातन धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व होता है। हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि से पितृपक्ष शुरू होता है। वहीं श्राद्ध पक्ष का समापन आश्विन मास के अमावस्या तिथि पर हो जाता है। इस दौरान व्यक्ति द्वारा तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म आदि किए जाते हैं। बता दें कि पूर्वजों की मृत्यु की तिथि के अनुसार पितृ पक्ष में पिंडदान और श्राद्ध कर्म किया जाता है। क्योंकि अगर पितृरों का श्राद्ध नहीं करते हैं, तो उनकी आत्मा को शांति नहीं मिलती है। ऐसी स्थिति में घर में क्लेश बढ़ने लगता है और सुख-शांति चली जाती है। इसके साथ ही व्यक्ति पर पितृदोष भी लग सकता है। आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि साल 2023 में श्राद्ध की शुरूआत कब से हो रही है। इसे भी पढ़ें: Bhadrapada Purnima 2023: भाद्रपद पूर्णिमा पर स्नान-दान का होता है विशेष महत्व, घर में मां लक्ष्मी का होगा वास पितृ पक्ष तिथि 2023 प्रतिपदा तिथि की शुरूआत- सितंबर 29, 2023 को 03:26 मिनट से प्रतिपदा तिथि की समाप्ति- सितंबर 30, 2023 को 12:21 मिनट तक 29 सितंबर 2023- शुक्रवार- पूर्णिमा श्राद्ध 29 सितंबर 2023- शुक्रवार- प्रतिपदा श्राद्ध 30 सितंबर 2023- शनिवार- द्वितीया श्राद्ध 01 अक्टूबर 2023- रविवार- तृतीया श्राद्ध 02 अक्टूबर 2023- सोमवार- चतुर्थी श्राद्ध 03 अक्टूबर 2023- मंगलवार- पंचमी श्राद्ध 04 अक्टूबर 2023- बुधवार- षष्ठी श्राद्ध 05 अक्टूबर 2023- गुरुवार- सप्तमी श्राद्ध 06 अक्टूबर 2023- शुक्रवार- अष्टमी श्राद्ध 07 अक्टूबर 2023- शनिवार- नवमी श्राद्ध 08 अक्टूबर 2023- रविवार- दशमी श्राद्ध 09 अक्टूबर 2023- सोमवार- एकादशी श्राद्ध 11 अक्टूबर 2023- बुधवार- द्वादशी श्राद्ध 12 अक्टूबर 2023- गुरुवार- त्रयोदशी श्राद्ध 13 अक्टूबर 2023- शुक्रवार- चतुर्दशी श्राद्ध 14 अक्टूबर 2023- शनिवार- सर्व पितृ अमावस्या श्राद्ध के दिनों में साधक अपने पूर्वजों को याद करता है और उनका आभार प्रकट करता है। ऐसा माना जाता है कि यदि हमारे पितृ हमसे खुश रहते हैं, या तृप्त रहते हैं, तो वह परिवार को और आपको अपना आशीर्वाद देते हैं। इससे परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। हिंदू धर्म के अनुसार, अपने पूर्वजों का श्राद्ध संस्कार व पिंड दान जरुर करना चाहिए, इससे पितृरों की आत्मा को शांति मिलती है। ऐसे करें पितृरों को याद पितृपक्ष के दौरान अपने पितरों को नियमित रूप से जल दिया जाता है। बता दें कि पितरों को दक्षिण दिशा की तरफ मुंह करके जल दिया जाता है। जल में काला तिल और काथ में कुश लिया जाता है। जिस पूर्वज की मृत्यु जिस तिथि को होती है, उसे उसदिन अन्न और वस्त्र दान किया जाता है। साथ ही किसी निर्धन को भोजन कराया जाता है।

प्रभासाक्षी 29 Sep 2023 8:31 am

मुंबई में मराठी महिला को 'गुजराती' बहुल सोसायटी में दफ्तर खरीदने से रोके जाने पर राजनीतिक विवाद शुरू

मुंबई, 28 सितंबर (आईएएनएस)। मुंबई में एक बड़ा राजनीतिक विवाद तब शुरू हो गया, जब एक मराठी महिला ने आरोप लगाया कि उसे हाल ही में उपनगरीय मुलुंड में गुजराती बहुल बिल्डिंग सोसायटी में कार्यालय खरीदने से रोक दिया गया।

लाइफस्टाइल नामा 28 Sep 2023 9:16 pm

Ganesh Visarjan 2023: मंगल की कामना करते हुए गणपति बप्पा को करें विदा, जानिए विसर्जन का शुभ मुहूर्त

गणेश चतुर्थी से शुरू हुआ गणेश महोत्सव आज यानी की अनंत चतुर्दशी के मौके पर खत्म हो रहा है। बता दें कि इस साल 28 सितंबर को अनंत चतुर्दशी का पर्व मनाया जा रहा है। आज ही के दिन भगवान श्री गणेश का विसर्जन किया जाएगा। घरों व पंडालों में पिछले 10 दिनों से विघ्नहर्ता गणेश जी विराज रहे हैं। हालांकि कुछ लोग गणेश स्थापना के तीसरे, पांचवे और सातवें दिन गणपति विसर्जन कर देते हैं। तो कुछ लोग मंगल की कामना करते हुए 10 दिनों के बाद भगवान गणेश का विसर्जन करते हैं। आज इस आर्टिकल में हम आपको विसर्जन का शुभ मुहूर्त और गणेश विसर्जन के दौरान ध्यान रखने वाली कुछ जरूरी बातों के बारे में बताने जा रहे हैं। इसे भी पढ़ें: Anant Chaturdashi 2023: अनंत चतुर्दशी पर भगवान विष्णु के अनंत रूप की होती है पूजा, जानिए महत्व गणेश विजर्सन का शुभ मुहूर्त सुबह 06:12 से लेकर 07:42 बजे के बीच में सुबह 10:42 से लेकर दोपहर 03:11 के बीच में शाम 04:41 से लेकर 06:11 के बीच में शाम 06:11 से लेकर रात्रि 09:11 के बीच में गणेशजी की पूजा अर्चना करें गणेश विसर्जन से पहले गणेश भगवान की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करें। फिर गणेश चालीसा का पाठ करें। इसके बाद एक लकड़ी के पाटे को गंगाजल से साफ करें और उस पर स्वास्तिक बनाएं। फिर लकड़ी के पाटे पर लाल रंग का कपड़ा बिछा दें और चारों कोनों पर एक-एक पूजा की सुपारी रख दें। अब गणेश जी की मूर्ति को उस पाटे पर रख लें और गणेश जी का जयघोष करते हुए गणपति बप्पा को फूल, फल, मोदक रखकर नए वस्त्र रखें। अंत में भगवान श्री गणेश की आरती करें। मंगल कामना करते हुए घर से करें विदा गणपति के पास रखी सभी चीजों की पोटली बनाकर भगवान गणेश जी के पास रख दें। फिर गणपति बप्पा से 10 दिनों के दौरान पूजा-पाठ में अंजाने से हुए गलती के लिए क्षमा याचना करें। मंगल की कामना करते हुए और गणपति बप्पा मोरिया के जयकारे लगाते हुए बप्पा को पाटे सहित उठाकर अपने सिर या कंधे पर रख दें। इस तरह से उनको विसर्जन वाले स्थान पर ले जाएं। ऐसे करें गणपति विसर्जन जब गणपति को विसर्जन के स्थान पर लेकर जाएं तो वहां पर एक बार फिर कपूर जलाकर भगवान गणेश की आरती करें। साथ ही उनके पास रखी पोटली को फेंके नहीं, बल्कि बड़े सम्मान के साथ सभी को गणेश जी के साथ विसर्जित कर दें। एक बाऱ फिऱ बप्पा से विदा मांगते हुए अगले साल जल्दी आने की कामना करें।

प्रभासाक्षी 28 Sep 2023 8:08 am

Anant Chaturdashi 2023: अनंत चतुर्दशी पर भगवान विष्णु के अनंत रूप की होती है पूजा, जानिए महत्व

हर साल भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को अनंत चतुर्दशी का पर्व मनाया जाता है। बता दें कि इस साल आज यानी की 28 सितंबर को अनंत चतुर्दशी का पर्व मनाया जा रहा है। हिंदू पंचांग के मुताबिक शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि की शुरूआत 27 सितंबर को रात 10:18 मिनट से शुरू हुई है और यह 28 सितंबर को शाम 06:49 मिनट पर समाप्त होगी। उदयातिथि के मुताबिक 28 सितंबर को अनंत चतुर्दशी का पर्व मनाया जा रहा है। शुभ मुहूर्त भाद्रपद माह की चतुर्दशी तिथि की शुरूआत 27 सितंबर की रात 10:18 मिनट से शुरू होकर 28 सितंबर को शाम 06:49 मिनट तक है। वहीं अनंत चतुर्दशी की पूजा का शुभ मुहूर्त 28 सितंबर 2023 को सुबह 05:49 मिनट से शाम को 06:49 मिनट तक है। इसलिए जातक दिन में किसी भी समय भगवान श्रीहरि विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा कर सकते हैं। इसे भी पढ़ें: Shradh 2023: 29 सितंबर से 14 अक्टूबर तक चलेगा पितृपक्ष धार्मिक मान्यता धार्मिक मान्यता ते अनुसार, इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा करने से व्यक्ति को सभी तरह के सुख प्राप्त होते हैं। वहीं इस दिन रक्षा सूत्र बांधने से व्यक्ति के जीवन के सारे कष्ट व संताप दूर होते हैं। इसलिए अनंत चतुर्दशी के दिन व्यक्ति को भगवान श्राहरि की विधि-विधान व श्रद्धा से पूजा करनी चाहिए। पूजा विधि सुबह सूर्योदय से पहले स्नान आदि कर सूर्य भगवान को जल अर्पति करें। फिर कलश स्थापना करके लोटे में कुश रखें। अगर कुश आसानी से ना मिले तो आप दूब भी रख सकते हैं। फिर भगवान विष्णू की मूर्ति या प्रतिमा पर रोली, केसर और हल्दी के सूत रखें। भगवान श्रीहरि की गंगाजल,गंध,पुष्प,अक्षत,धूप-दीप आदि से पूजा करें और मिठाई का भोग लगाएं। इसके बाद भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप का ध्यान करते हुए सूत्र को धारण कर लें। बता दें कि यह सूत्र भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के साथ ही अनंत फल देता है। अनंत चतुर्दशी के मौके पर विष्णु सहस्त्रनाम स्त्रोत का पाठ करना शुभ माना जाता है। अनंत चतुर्दशी का महत्व आज यानी की अनंत चतुर्दशी का दिन भगवान श्रीहरि विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। इस दिन जातक व्रत करते हैं और पूजा के दौरान पवित्र धागा धारण करते हैं। इस धागे में 14 गांठें लगाकर भगवान विष्णु को अर्पित किया जाता है। फिर इस रक्षा सूत्र को अपनी कलाई में बांधने से स्वयं श्रीहरि अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। अनंत चतुर्दशी के दिन जो भी व्यक्ति पूजा-अर्चना और उपवास करता है, उसे बैकुंठ की प्राप्ति होती है।

प्रभासाक्षी 28 Sep 2023 8:05 am

Health insurance plans for family vs. Individual: Which is better?

Depending on your unique needs andcircumstances, you can choose between healthinsurance

खास खबर 27 Sep 2023 12:50 pm

बाराबंकी में वकील ने कुत्ते को मारी गोली, हुई मौत

बाराबंकी, 26 सितंबर (आईएएनएस)। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में कुत्ते को लेकर हुए विवाद में एक व्यक्ति ने लाइसेंसी बंदूक से फायर कर दिया। इसमें महिला बाल-बाल बच गई, जबकि गोली लगने से कुत्ते की मौत हो गई।

लाइफस्टाइल नामा 26 Sep 2023 1:34 pm

Vaman Jayanti 2023: वामन जयंती व्रत से घऱ में आती है समृद्धि

आज वामन द्वादशी है, वामन जयंती के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दू धर्म में वैष्णव लोग वामन जयंती श्रद्धापूर्वक मनाते हैं, तो आइए हम आपको वामन जयंती व्रत की पूजा विधि एवं महत्व के बारे में बताते हैं। जानें वामन जयंती के बारे में भादो महीने की शुक्ल पक्ष की द्वादशी को वामन द्वादशी मनायी जाती है। इस बार 26 सितंबर को वामन द्वादशी है। हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को भगवान वामन देव का अवतार हुआ था। वामन देव भगवान विष्णु के अवतार थे, इसलिए इस तिथि पर भगवान विष्णु के वामन स्वरूप की पूजा की जाती है। वामन देव भगवान विष्णु के पांचवे अवतार माने जाते हैं। वामन जयंती 2023 का शुभ मुहूर्त इस दिन श्रवण नक्षत्र का विशेष महत्व है, क्योंकि इसी नक्षत्र में वामन अवतार ने जन्म लिया था। श्रवण नक्षत्र 25 सितंबर को सुबह 11 बजकर 55 मिनट से 26 सितंबर को सुबह 09 बजकर 42 मिनट है। 26 सितंबर को पूजा का मुहूर्त सुबह 09 बजकर 12 मिनट से दोपहर 01 बजकर 43 मिनट है। इसे भी पढ़ें: Dream Astrology: सपने में दिखें ये चीजें तो समझिए चमकने वाली है किस्मत, मां लक्ष्मी कर देंगी मालामाल जानें भगवान विष्णु के वामन अवतार के बारे में शास्त्रों के अनुसार भगवान विष्णु ने ऋषि कश्यप और उनकी पत्नी अदिति के पुत्र के रूप में अवतार लिया और लोकप्रिय रूप से वामन के रूप में जाने गए। पंडितों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति भगवान वामन की पूजा करता है, तो वह व्यक्ति सभी प्रकार के कष्टों और पापों से मुक्त हो जाता है और मोक्ष को प्राप्त करता है। वामन जयंती व्रत मनाया जाता है धूमधाम से वामन जयंती व्रत भारत के विभिन्न हिस्सों में बहुत उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, जो श्रद्धालु इस व्रत का पालन करते हैं, उन्हें इस ब्रह्मांड के संरक्षक भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है, और उनके सभी पिछले पापों के लिए क्षमा प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है। वामन जयंती का महत्व हिन्दू धर्म में वामन जयंती का खास महत्व है। ऐसा माना जाता है कि इस व्रत के दिन अगर श्रावण नक्षत्र हो तो इसका महत्व बढ़ जाता है। इस दिन भक्त स्नान कर वामन भगवान की स्वर्ण प्रतिमा को की मंत्रोच्चार से पूजा करने पर सभी प्रकार के कष्ट दूर हो जाते हैं। पंडितों का मानना है कि वामन भगवान ने जैसे राजा बलि के कष्ट दूर किए थे वैसे ही वह भक्तों के कष्टों का भी निवारण करते हैं। वामन जयंती के दिन ऐसे करें पूजा वामन जयंती के दिन मंदिरों में विशेष रूप से पूजा की जाती है। विभिन्न स्थानों पर भागवत का पाठ कर वामन भगवान की लीला का गान किया जाता है। इसके अलावा वामन जयंती के दिन चावल तथा दही जैसे वस्तुओं का सेवन करना अच्छा माना जाता है। इस दिन व्रत कर भक्त शाम को वामन भगवान की आरती कर प्रसाद ग्रहण करते हैं। समस्त परिवार के साथ इस व्रत को करने से मनुष्य की सभी प्रकार की मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है। व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा भी है खास वामन अवतार को विष्णु भगवान का प्रमुख अवतार माना जाता है। श्रीमदभागवत पुराण में वामन अवतार का उल्लेख मिलता है। कथन के अनुसार एक बाद देवता तथा दानवों में युद्ध हुआ। इस युद्ध में देवता दानवों से पराजित होने लगे। दानव अमरावती पर आक्रमण करने लगे तभी इन्द्र विष्णु के पास जाकर सहायता के लिए याचना करने लगे। तब विष्णु भगवान ने सहायता का वचन दिया और कहा कि वह वामन रूप धारण कर माता अदिति के गर्भ से जन्म लेंगे। दानवों के राजा बलि द्वारा देवताओं की हार से कश्यप जी ने अदिति को पुत्र प्राप्ति के लिए पयोव्रत का अनुष्ठान करने को कहा जाता है। तब भादो महीने की शुक्ल पक्ष की द्वादशी को वामन भगवान अदिति के गर्भ से अवतार लेते हैं और ब्राह्मण का रूप लेते हैं। वामन अवतार और राजा बलि महर्षि कश्यप दूसरे कई ऋषियों के साथ मिलकर वामन भगवान का उपनयन संस्कार करते हैं। इस संस्कार में वामन बटुक को पुलह नामक के महर्षि ने यज्ञोपवीत संस्कार कराया। आंगिरस ने वस्त्र, अगस्त्य ने मृगचर्म, सूर्य ने छत्र, गुरु देव जनेऊ तथा कमण्डल, मरीचि ने पलाश दण्ड, भृगु ने खड़ाऊं, अदिति ने कोपीन, कुबेर ने भिक्षा पात्र तथा सरस्वती ने रुद्राक्ष माला दिए उसके बाद वामन भगवान पिता की आज्ञा लेकर राजा बलि के पास गए। उस समय राजा बली नर्मदा के उत्तर-तट पर अन्तिम अश्वमेध यज्ञ कर रहे होते थे। वामन भगवान ब्राह्मण का रूप धारण कर राजा बलि से भीख मांगने पहुंचें। उस समय वामन अवतार ने राजा बलि से केवल तीन पग भूमि मांगी। राजा बलि ने वामन के इस मांग पर सहमति व्यक्त की। इस पर वामन भगवान ने एक पैर से स्वर्ग था दूसरे पैर से पूरी पृथ्वी नाम ली। इसके बाद वह तीसरा पैर रखने के लिए राजा बलि से पूछे। इस पर राजा बलि भगवान का पैर रखने के लिए अपना सर दे देते हैं। राजा बलि के सिर पर पैर रखते हैं ही बलि परलोक चले जाते हैं। विष्णु भगवना प्रसन्न होकर राजा बलि को पाताल लोक का राजा बना देते हैं। इस तरह देवताओं को स्वर्ग वापस मिल जाता है और वह प्रसन्नता पूर्वक रहने लगते हैं। - प्रज्ञा पाण्डेय

प्रभासाक्षी 26 Sep 2023 12:59 pm

Daily Wear Diamond Earrings that Are Perfect for Workplace

In the realm of professional attire, accessories play a pivotal role.They are the silent communicators

खास खबर 26 Sep 2023 12:38 pm

Parivartini Ekadashi 2023: परिवर्तिनी एकादशी व्रत से होती है सौभाग्य की प्राप्ति

आज परिवर्तिनी एकादशी है, हिन्दू धर्म में व्रत का खास महत्व होता है, इसलिए इस दिन पूजा का विशेष विधान है तो आइए हम आपको परिवर्तिनी एकादशी व्रत की पूजा विधि तथा महत्व के बारे में बताते हैं। जानें परिवर्तिनी एकादशी के बारे में भाद्र महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस एकादशी का खास महत्व है क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु अपनी शयन मुद्रा में करवट बदलते हैं। करवट बदलने के कारण ही इसे परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार परिवर्तिनी एकादशी का व्रत करने से व्रती को वाजपेय यज्ञ के समान फल मिलता है। इस एकादशी के दिन विष्णु जी के वामन रूप की भी पूजा होती है। इसे भी पढ़ें: Shradh 2023: 29 सितंबर से 14 अक्टूबर तक चलेगा पितृपक्ष परिवर्तिनी एकादशी का महत्व इस दिन भगवान विष्णु के वामन रुप कि पूजा की जाती है। इस व्रत को करने से व्यक्ति के सुख, सौभाग्य में वृद्धि होती है। इस दिन माता यशोदा ने जलाशय पर जाकर श्री कृष्ण के वस्त्र धोए थे, इसी कारण इसे जलझूलनी एकादशी भी कहा जाता है। मंदिरों में इस दिन भगवान श्री विष्णु की प्रतिमा या शालिग्राम को पालकी में बिठाकर पूजा-अर्चना के बाद ढोल-नगाड़ों के साथ शोभा यात्रा निकाली जाती है जिसे देखने के लिए लोग उमड पड़ते हैं। धर्म ग्रंथों के अनुसार, परिवर्तिनी एकादशी पर व्रत करने से सभी पाप नष्ट होते हैं एवं वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। जो मनुष्य इस एकादशी को भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा करता है, वो तीनों लोक एवं त्रिदेवों की पूजा कर लेता है। परिवर्तिनी एकादशी से जुड़ी पौराणिक कथा परिवर्तिनी एकादशी से जुड़ी पौराणिक कथा भी है। इस कथा के अनुसार प्राचीन काल में त्रेतायुग में बलि नाम का एक दैत्य रहता था। वह दैत्य भगवान विष्णु का परम उपासक था। प्रतिदिन भगवान विष्णु की पूजा किया करता था। राजा बलि जितना विष्णु भगवान का भक्त था उतना ही शूरवीर था। एक बार उसने इंद्रलोक पर अधिकार जमाने की सोची इससे सभी देवता परेशान हो गए और विष्णु जी के पास पहुंचे। सभी देवता मिलकर विष्णु भगवान के पास जाकर स्तुति करने लगे। इस पर भगवान विष्णु ने कहा कि वह भक्तों की बात सुनेंगे और जरूर कोई समाधान निकालेंगे। विष्णु भगवान ने वामन स्वरूप धारण कर अपना पांचवां अवतार लिया और राजा बलि से सब कुछ दान में ले लिया। राजा बलि ने एक यज्ञ का आयोजन किया था उसमें विष्णु भगवान वामन रूप लेकर पहुंचें और दान में तीन पग भूमि मांगी। इस पर बलि ने हंसते हुए कहा कि इतने छोटे से हो तीन पग में क्या नाप लोगे। इस वामन भगवान ने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया और कहा कि मैं तीसरा पग कहां रखू। भगवान के इस रूप को राजा बलि पहचान गए और तीसरे पग के लिए अपना सिर दे दिया। इससे विष्णु भगवान प्रसन्न हुए और उन्होंने राजा बलि को पाताल लोक वापस दे दिया। साथ ही भगवान ने वचन दिया कि चार मास यानि चतुर्मास में मेरा एक रूप क्षीर सागर में शयन करेगा और दूसरा रूप पाताल लोक में राजा बलि की रक्षा के लिए रहेगा। परिवर्तिनी एकादशी शुभ मुहूर्त इस व्रत को करने के लिए, भगवान विष्णु की पूजा के लिए और अगले दिन व्रत का पारण करने के लिए शुभ मुहूर्त का ध्यान रखना जरूरी है। इस दिन के शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं। भगवान विष्णु के पूजन का शुभ समय- 25 सितंबर 2023 (सुबह 9:12 से सुबह 10:42 तक) राहुकाल- 25 सितंबर 2023 (सुबह 7:41 से सुबह 9:12 तक) व्रत पारण का शुभ समय काल- 26 सितंबर 2023 (दोपहर 1:25 से दोपहर 3:49 तक) वैष्णव समुदाय के लिए- 27 सितंबर 2023 (शाम 6:12 से शाम 8:36 तक) परिवर्तिनी एकादशी 2023 व्रत पारण समय पंडितों के अनुसार परिवर्तिनी एकादशी व्रत पारण द्वादश तिथि के दिन किया जाता है। पंचांग के अनुसार, पार्श्व परिवर्तिनी एकादशी व्रत का पारण 26 सितंबर दोपहर 01:25 से दोपहर 03:49 के बीच किया जाएगा। वहीं गौण पार्श्व एकादशी व्रत का पारण 27 सितंबर सुबह 06:11 से सुबह 08:30 के बीच किया जाएगा। परिवर्तिनी एकादशी के दिन करें ये काम एकाक्षी नारियल- परिवर्तिनी एकादशी के दिन घर में एकाक्षी नारियल लाना बेहद शुभ होता है, इससे मां लक्ष्मी आकर्षित होती है। घर में बरकत का वास होता है। एकाक्षी नारियल को विधि विधान से पूजा के बाद पूजा स्थल पर रखें। पीला चंदन- एकादशी पर भगवान विष्णु तथा लक्ष्मी की पूजा कर उन्हें पीले चंदन और केसर में गुलाब जल मिलाकर तिलक करें। इसी तिलक से स्वयं भी तिलक लगाएं और काम पर निकलें। ऐसा करने से कार्य अवश्य पूर्ण होता है। मंत्र देगा संतान सुख- निसंतान दंपत्ति एकादशी के दिन से गोपाल मंत्र ‘ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते देहि में तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः’ का जप आरंभ करें। इस मंत्र का प्रतिदिन एक माला जप करने से शीघ्र ही संतान होने का योग बनता है। परिवर्तिनी एकादशी में ऐसे करें पूजा पंडितों के अनुसार परिवर्तिनी एकादशी का दिन बहुत खास होता है, इसलिए इस दिन विशेष पूजा करें। इसके लिए आप सुबह जल्दी उठें तथा स्नान कर व्रत का संकल्प लें। उसके बाद पूजा की गतिविधियां शुरू करें। प्रारम्भ में भगवान विष्णु की मूर्ति को गंगा जल से स्नान कराएं। स्नान के पश्चात दीया जलाकर ईश्वर का स्मरण करें तथा स्तुति करें। इस बात का ध्यान रखें कि पूजा में तुलसी के पत्तों का इस्तेमाल जरूर करें और अंत में आरती गाएं। शाम को भी विष्णु जी आरती गाएं तथा विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। व्रत के बाद विधिपूर्वक पारण करें। ऐसे करें पारण एकादशी के व्रत समाप्ति को पारण कहते हैं। पारण एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद किया जाता है। एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि खत्म होने से पहले करना चाहिए। द्वादशी तिथि के भीतर पारण करने से पुण्य मिलता है। दूजी एकादशी और वैष्णव एकादशी एक ही दिन होती है। सन्यासियों, विधवाओं और मोक्ष प्राप्ति के इच्छुक श्रद्धालुओं को दूजी एकादशी के दिन व्रत करना चाहिए। - प्रज्ञा पाण्डेय

प्रभासाक्षी 25 Sep 2023 1:17 pm

Durva Ashtami 2023: आज मनाया जा रहा दूर्वा अष्टमी का पर्व, इस विधि से करेंगे पूजा तो बरसेगी गणपति की कृपा

हिंदू धर्म में गणपति को प्रथम पूज्य देवता माना जाता है। वहीं गणपति उत्सव की शुरूआत हो चुकी है। गणपति के भक्त उनके रंग में रंग चुके हैं। भगवान गणेश बहुत ही दयालु देवता हैं, वह अपने भक्तों से काफी जल्दी प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों की सारी मनोकामना पूरी करते हैं। गणपति बप्पा की पूजा विधि-विधान से की जाती है। ऐसे में अगर आप भी भगवान श्री गणेश को प्रसन्न करना चाहते हैं, तो दूर्वा अष्टमी के दिन उनकी विशेष पूजा जरूर करना चाहिए। बता दें कि सनातन धर्म में दूर्वा अष्टमी का अधिक महत्व माना जाता है। हर साल भाद्रपद माह की अष्टमी तिथि को दूर्वा अष्टमी का पर्व मनाया जाता है। दूर्वा अष्टमी के मौके पर गणपति को दूर्वा चढ़ाए जाने की परंपरा है। मान्यता के अनुसार, इस उपाय को करने से भगवान श्री गणेश की कृपा से सारी परेशानियों को अंत हो जाता है। इसे भी पढ़ें: Mahalaxmi Vrat 2023: महालक्ष्मी व्रत से दुख और दारिद्रता का होगा नाश, सुख-समृद्धि की होगी प्राप्ति आज मनाया जा रहा दूर्वा अष्टमी हर साल भाद्रपद माह की अष्टमी तिथि को दूर्वा अष्टमी तिथि मनाई जाती है। गणेश उत्सव के ठीक 4 दिन बाद दूर्वा अष्टमी का पर्व मनाया जाता है। इस साल 22 सितंबर 2023 दूर्वा अष्टमी तिथि की शुरूआत दोपहर 01:35 मिनट से शुरू हो रही है। वहीं 23 सितंबर 2023 को दोपहर 12:17 मिनट पर खत्म होगी। व्रत और पूजा विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि कर लें। फिर स्वच्छ वस्त्र धारण कर पूजा करने बैठें। फिर व्रत का संकल्प लें और घर के मंदिर में देवी-देवताओं को फल, फूल, चावल, माला, धूप और दीप अर्पित करें। इसके बाद भगवान श्री गणेश को दूर्वा अर्पित करें। गणपति बप्पा को तिल और मीठे आटे की रोटी का भोग लगाएं। आखिरी में भगवान शिव की पूजा-अर्चना करें। दूर्वा अष्टमी की पौराणिक कथा पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान गणेश का दैत्यों के साथ युद्ध हो रहा था। उस युद्ध में दैत्यों की मृत्यु नहीं हो रही थी, वह बार-बार जीवित हुए जा रहे थे। तब गणपति ने युद्ध को समाप्त करने के लिए राक्षसों को निगलना शुरू कर दिया। राक्षसों को निगलने से भगवान गणेश के शरीर में बहुत गर्मी उत्पन्न हो गई और गर्मी के कारण उनका पेट जलने लगा। तब सभी देवताओं ने भगवान गणेश को हरी दूर्वा चटाई और दूर्वा अर्पित किया। दूर्वा ने भगवान गणेश के शरीर के तापमान को कम कर दिया। इससे गणपति को अच्छा लगता है। इसी वजह से भगवान गणेश को दूर्वा अत्यंत प्रिय है। दूर्वा भगवान गणेश की पूजा अधूरी मानी जाती है। दूर्वा अष्टमी की पूजा का महाउपाय दूर्वा अष्टमी भगवान गणपति की विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए। साथ ही गणपति को दूब अर्पित करनी चाहिए। इसके बाद गणेश गायत्री मंत्र का 108 बार जाप करना चाहिए। फिर उनसे अपने जीवन के सभी कष्टों को हरने की विनती करें। इस उपाय को करने से गणपति शीघ्र सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। गणेश गायत्री मंत्र ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो बुदि्ध प्रचोदयात्।

प्रभासाक्षी 22 Sep 2023 9:48 am

Mahalaxmi Vrat 2023: महालक्ष्मी व्रत से दुख और दारिद्रता का होगा नाश, सुख-समृद्धि की होगी प्राप्ति

हर साल भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से महालक्ष्मी व्रत शुरू होता है। धन की देवी मां लक्ष्मी की पूजा के लिए समर्पित 16 दिन धन, वैभव, खुशहाली, उन्नति के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। बता दें कि महालक्ष्मी व्रत भाद्रपद माह की अष्टमी तिथि से आश्विन माह की अष्टमी तिथि तक होता है। माता लक्ष्मी की 16 दिनों तक विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। वहीं मां लक्ष्मी की कृपा से व्यक्ति की झोली खुशियों से भर जाती है और आर्थिक स्थिति में सुधार होता है। कब है महालक्ष्मी व्रत 2023 हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल भाद्रपद माह की अष्टमी तिथि की शुरूआत 22 सिंतबर को दोपहर 01:35 मिनट से हो रही है। वहीं यह तिथि 23 सितंबर 2023 को दोपहर 12:17 मिनट तक मान्य है। 22 सितंबर से महालक्ष्मी व्रत शुरू हो रहा है। वहीं 6 अक्टूबर को महालक्ष्मी व्रत का समापन होगा। इस साल महालक्ष्मी का व्रत 15 दिनों का है। इसे भी पढ़ें: Lalita Saptami 2023: ललिता सप्तमी का व्रत करने से दूर होंगे सारे दुख, भगवान कृष्ण की प्राप्त होगी कृपा महालक्ष्मी स्तोत्र पाठ के लाभ महालक्ष्मी व्रत के अलावा व्यक्ति को रोजाना महालक्ष्मी स्त्रोत का पाठ करना चाहिए। इससे व्यक्ति के जीवन में कभी निराशा और दरिद्रता आदि नहीं आती है। महालक्ष्मी स्त्रोत का पाठ करने से धन की देवी मां लक्ष्मी की कृपा बरसती है और व्यक्ति के जीवन में धन-धान्य व समृद्धि आती है। मान्यता के अनुसार, जो भी व्यक्ति दिन में एक बार महालक्ष्मी स्त्रोत का पाठ करता है, उसे सभी पापों से छुटकारा मिलता है। वहीं दिन में दो बार महालक्ष्मी स्त्रोत का पाठ करने से आर्थिक तंगी दूर होती है और राजयोग मिलता है। मां लक्ष्मी के मंत्र ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ॥ ॐ ऐं श्रीं महालक्ष्म्यै कमल धारिण्यै गरूड़ वाहिन्यै श्रीं ऐं नमः ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं त्रिभुवन महालक्ष्म्यै अस्मांक दारिद्र्य नाशय प्रचुर धन देहि देहि क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ । ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौं ॐ ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौं ऐं क्लीं ह्रीं श्री ॐ। महालक्ष्मी व्रत का महत्व महालक्ष्मी का व्रत धन-दौलत और समृद्धि की प्राप्ति के लिए किया जाता है। महालक्ष्मी व्रत के 15 दिनों में मां लक्ष्मी के प्रिय फूल व भोग अर्पित किया जाता है। जो भी व्यक्ति पूरी श्रद्धा से महालक्ष्मी का व्रत करता है, उसे धन, दौलत, मान, सम्मान आदि प्राप्त होता है। आर्थिक संकट, कंगाली और आर्थिक हानि से उबरने के लिए महालक्ष्मी व्रत करना चाहिए।

प्रभासाक्षी 22 Sep 2023 9:14 am

Lalita Saptami 2023: ललिता सप्तमी का व्रत करने से दूर होंगे सारे दुख, भगवान कृष्ण की प्राप्त होगी कृपा

हिंदू धर्म में हर साल ऐसे कई पर्व होते हैं, जो काफी ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं। बता दें कि हर साल भाद्रपद मास की सप्तमी तिथि को ललिता सप्तमी का व्रत किया जाता है। पूरे ब्रज मंडल में यह दिन काफी धूमधाम से मनाया जाता है। ललिता सप्तमी को संतान सप्तमी भी कहा जाता है। इस दिन लोग ललिता देवी की कृपा पाने के लिए उनकी विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं। मान्यता के अनुसार, ललिता देवी की पूजा करने से भगवान श्रीकृष्ण की कृपा भी प्राप्त होती है। यह दिन भगवान श्रीकृष्ण के लिए भी काफी खास है। आज मनाई जा रही ललिता सप्तमी बता दें कि हर साल की तरह इस साल 22 सितंबर को ललिता सप्तमी का पर्व मनाया जा रहा है। इस साल ललिता सप्तमी तिथि की शुरूआत 21 सितंबर 2023 को दोपहर 02:14 मिनट से हो रही है। वहीं 22 सितंबर 2023 को दोपहर 01:35 मिनट पर यह तिथि खत्म होगी। हालांकि उदयातिथि के मुताबिक ललिता सप्तमी का व्रत 22 सितंबर को किया जा रहा है। इसे भी पढ़ें: Rishi Panchami 2023: पापों से मुक्ति पाने के लिए रखा जाता है ऋषि पंचमी का व्रत, जानिए पौराणिक कथा शुभ मुहूर्त ललिता सप्तमी का शुभ मुहूर्त सुबह 04:35 मिनट से शुरू होगा और सुबह 05:22 मिनट पर समाप्त होगा। आज सुबह 11:49 मिनट पर अभिजीत मुहूर्त शुरू होगा और दोपहर 12:38 मिनट पर खत्म होगा। इसके अलावा गोधूलि मुहूर्त शाम को 06:18 मिनट पर शुरू होकर शाम को 06:42 मिनट पर खत्म होगा। अमृत काल सुबह 06:47 मिनट पर शुरू होकर सुबह 08:23 मिनट पर समाप्त होगा पूजा के नियम ललिता सप्तमी के दिन सुबह जल्दी स्नान आदि कर स्वच्छ वस्त्र पहनें। फिर पूजा स्थान की साफ-सफाई कर भगवान श्री गणेश का ध्यान करें। अब भगवान श्री गणेश, भगवान श्री कृष्ण, देवी ललिता, माता पार्वती, शालिग्राम भगवान की पूजा अर्चना करें। पूजा के दौरान उन्हें हल्दी, चंदन का पेस्ट, गुलाल, नारियल, चावल, फूल और दूध को प्रसाद के रूप में चढ़ाएं। इसके बाद तांबे के बर्तन से जल अर्पित करें। पूजा में मौली या लाल धागा चढ़ाएं और फिर उसे अपने दाहिने हाथ में बांधें। इस दिन सुबह सूर्योदय से लेकर अगले दिन सूर्योदय तक व्रत किया जाता है। पौराणिक कथा पौराणिक कथा के मुताबिक भगवान श्री कृष्ण की 8 प्रिय सखियां थीं। जिनमें श्रीराधा रानी, श्री ललिता सखी, श्री चित्रा, श्री इंदुलेखा, श्री विशाखा, श्री चंपकलता, श्री सुदेवी, श्रीचंपकलता और श्री तुंगविद्या थीं। भगवान श्री कृष्ण इन सारी सखियों में सबसे अधिक प्रेम श्री राधा और श्री ललिता सखी को करते थे। श्री कृष्ण की प्रिय सखी ललिता जी ललिता सप्तमी का व्रत समर्पित है। मान्यता के अनुसार, ललिता सप्तमी के दिन जो भी व्यक्ति भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी के साथ श्री ललिता देवी की पूजा-अर्चना करता है। वह भगवान श्रीकृष्ण का प्रिय हो जाता है। ललिता सप्तमी का व्रत करने से संतान प्राप्ति की इच्छा पूरी होती है।

प्रभासाक्षी 22 Sep 2023 8:56 am

बेंगलुरु में महिला तकनीकी विशेषज्ञ ने लगाया 'लव जिहाद' का आरोप, आरोपी को पकड़ने के लिए पुलिस जम्मू-कश्मीर रवाना

बेंगलुरु, 22 सितंबर (आईएएनएस)। पुलिस ने एक महिला सॉफ्टवेयर पेशेवर की शिकायत के बाद जम्मू-कश्मीर के एक युवक के खिलाफ मामला दर्ज किया है, जिसने दावा किया है कि जिस व्यक्ति के साथ वह रिश्ते में थी, उसने उसे इस्लाम अपनाने के लिए मजबूर किया। एक अधिकारी ने यहां गुरुवार को यह जानकारी दी।

लाइफस्टाइल नामा 22 Sep 2023 1:40 am

उज्जैन में एक ही परिवार के 4 सदस्यों के शव मिले

उज्जैन, 21 सितंबर (आईएएनएस)। मध्य प्रदेश के उज्जैन में एक परिवार के चार सदस्यों के शव मिले हैं। आत्महत्या की आशंका जताई जा रही है और पुलिस जांच में जुटी है।

लाइफस्टाइल नामा 21 Sep 2023 1:40 pm

धनबाद में मुस्लिम पंचायतों की कमेटी ने परिवार के सामाजिक बहिष्कार का किया ऐलान

धनबाद, 20 सितंबर (आईएएनएस)। धनबाद के पुटकी में मुस्लिम समाज की 16 पंचायतों की कमेटी ने एक परिवार के सामाजिक बहिष्कार का फरमान जारी किया है। इस फरमान को लेकर इलाके में बाकायदा लाउडस्पीकर के जरिए मुनादी भी की गई है। जिस परिवार के बहिष्कार की मुनादी की गई है, वह पुटकी के तीन नंबर इलाके में रहता है।

लाइफस्टाइल नामा 20 Sep 2023 5:48 pm

Rishi Panchami 2023: पापों से मुक्ति पाने के लिए रखा जाता है ऋषि पंचमी का व्रत, जानिए पौराणिक कथा

हिंदू धर्म में भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ऋषि पंचमी का व्रत किया जाता है। इस व्रत को करने से व्यक्ति के सारे पाप धुल जाते हैं साथ ही व्यक्ति का भाग्योदय होता है। खासकर महिलाएं इस व्रत को करती हैं। इस साल आज यानी की 20 सितंबर को ऋषि पंचमी का व्रत किया जा रहा है। आइए जानते हैं ऋषि पंचमी व्रत का शुभ मुहूर्त और इस व्रत को करने के पीछे की कहानी क्या है। व्रत की खासियत बता दें कि ऋषि पंचमी व्रत की यह खासियत है कि इस व्रत को सिर्फ महिलाएं कर सकती हैं। जो महिलाएं अंजाने में हुई गलतियों को सुधारना चाहती हैं, उन्हें ऋषि पंचमी का व्रत करना चाहिए। इस दिन सप्त ऋषियों की पूजा-अर्चना की जाती है। इसे भी पढ़ें: Paryushan 2023: आत्मशुद्धि एवं जीवन-उत्थान का पर्व है पर्युषण ऋषि पंचमी का शुभ मुहूर्त आज यानी की 20 सितंबर को ऋषि पंचमी का व्रत किया जा रहा है। इस दिन ऋषियों की पूजा का शुभ समय 11:02 मिनट से दोपहर 01:28 मिनट तक है। इस शुभ मुहूर्त में ऋषियों की पूजा का करने से पापों से मुक्ति मिलती है। पौराणिक कथा पौराणिक कथा के मुताबिक एक राज्य में एक ब्राह्मण पति-पत्नी की जोड़ी रहती थी। दंपति की दो संताने एक पुत्र और एक पुत्री थी। जब उनके बच्चे बड़े हो गए तो दंपति ने अपनी बेटी की शादी एक अच्छे लड़के से कर दी। कुछ समय बाद लड़की के पति की मृत्यु हो गई। इसके बाद उनकी बेटी वैधव्य व्रत का पालन करते हुए एक नदी के किनारे कुटिया में रहने लगी। कुछ समय बीतने के बाद अचानक से उस लड़की के शरीर में कीड़े पड़ने लगे। बेटी की हालत देख उसके माता-पिता परेशान रहने लगे। जब पत्नी ने अपने पति से बेटी की इस हालत का कारण पूछा, तो उसने ध्यान लगाकर बेटी के पूर्व जन्म के कर्मों को देखा। जिससे उन्हें पता चला कि पिछले जन्म में अपने मासिक के समय उसकी बेटी ने घर के बर्तनों को छुआ था। साथ ही लड़की ने पिछले जन्म में ऋषि पंचमी का व्रत नहीं किया था। जिसके कारण वर्तमान जीवन में उसे इतने कष्टों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में सारी बातें जान लेने के बाद उनकी बेटी ने विधि-विधान से ऋषि पंचमी का व्रत किया। जिससे उसके सारे कष्ट और पापों से मुक्ति मिल गई।

प्रभासाक्षी 20 Sep 2023 9:10 am

ग्रेटर नोएडा में सोसायटी के 24वीं मंजिल से गिरकर 12वीं के छात्र की मौत

ग्रेटर नोएडा, 19 सितंबर (आईएएनएस)। ग्रेटर नोएडा की हाई राइज सोसाइटी के 24वें फ्लोर से गिरकर एक 12वीं के छात्र की मौत हो गई। यह मामला हादसा है या सुसाइड इन दोनों एंगल पर फिलहाल पुलिस जांच कर रही है।

लाइफस्टाइल नामा 19 Sep 2023 1:31 pm

Ganesh Chaturthi 2023: आज मनाया जा रहा गणेश चतुर्थी का पर्व, जानिए शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

गणों के अधिपति भगवान श्री गणेश को प्रथम पूज्य देवता माना जाता है। भगवान गणेश की पूजा के बाद अन्य देवताओं की पूजा की जाती है। भगवान श्री गणेश को विघ्नहर्ता भी कहा जाता है। लोक मंगल भगवान गणेश का उद्देश्य होता है, लेकिन जहां भी अमंगल होता है, उसे दूर करने के लिए श्री गणेश अग्रणी होते हैं। भगवान गणेश ऋद्धि-सिद्धि के स्वामी हैं। इसलिए उनकी कृपा से व्यक्ति को कभी संपदा और समृद्धि का अभाव नहीं होता है। आज यानी की 19 सितंबर 2023 को गणेश चतुर्थी का पर्व मनाया जा रहा है। शुभ मुहूर्त हिंदू पंचांग के मुताबिक श्री गणेश जी की प्रतिमा को स्थापित करने का शुभ समय 19 सितंबर को सुबह 10:49 मिनट से दोपहर 01:16 मिनट तक रहेगा। इसे भी पढ़ें: Ganesh Chaturthi 2023: सामाजिक क्रान्ति का पर्व है गणेशोत्सव भगवान गणेश को चढ़ाएं ये चीजें बुद्धि के देवता कहे जाने वाले भगवान गणेश की कृपा से व्यक्ति का बौद्धिक विकास होता है। गणपति का आशीर्वाद पाने के लिए भक्त उनका सच्चे मन और पूर्ण श्रद्धा से आराधना करते हैं। हालांकि भगवान गणेश की पूजा के दौरान छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखना चाहिए। गणपति को मोदक, दूर्वा और घी जरूर चढ़ाना चाहिए। यह तीनों चीजें भगवान गणेश को अतिप्रिय हैं। निषेध है चंद्र दर्शन मान्यता के अनुसार, गणेश चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन नहीं करना चाहिए। कहा जाता है कि जो भी व्यक्ति गणेश चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन करता है, उस पर बिना वजह झूठा आरोप लगता है। बताया जाता है कि एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने गणेश चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन किया था। जिसके कारण उन पर मिथ्या आरोप लगे थे। इस कारण गणेश चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन निषेध माना जाता है। यदि किसी व्यक्ति को इस दिन चंद्र दर्शन हो जाएं, तो इसके निवारण के लिए 'सिंहःप्रसेनमवधीत् , सिंहो जाम्बवता हतः, सुकुमारक मा रोदीस्तव, ह्येष स्यमन्तकः।।' मंत्र का 28, 54 या 108 बार जाप करना चाहिए। गणेश चतुर्थी व्रत व पूजन विधि आज के दिन व्यक्ति को सुबह जल्दी स्नान आदि कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। फिर सोने, तांबे, मिट्टी की गणेश प्रतिमा लें। इसके बाद चौकी पर लाल आसन बिछाएं और उस पर भगवान गणेश जी को विराजमान करें। गणपति को सिंदूर व दूर्वा अर्पित करके 21 लडडुओं का भोग लगाएं। जिनमें से गणेश जी को 5 लड्डू अर्पित करें और बाकी लड्डू गरीबों में दान कर दें। अब गणपति की पूजा कर गणेश चतुर्थी की कथा, गणेश चालीसा और आरती करें। फिर अपनी दृष्टि को नीचे रखते हुए चंद्रदेव को अर्घ्य दें। गणेश चतुर्थी के दिन व्रत का भी विधान है।

प्रभासाक्षी 19 Sep 2023 9:41 am

वैवाहिक जीवन में यौन संबंध बनाने से जानबूझकर इनकार करना क्रूरता जैसा : दिल्ली हाईकोर्ट 

नई दिल्ली, 18 सितंबर (आईएएनएस)। दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक ऐसे जोड़े को दिए गए तलाक को बरकरार रखा है, जिनकी शादी पत्नी के यौन संबंध बनाने से इनकार के कारण सिर्फ 35 दिनों तक चली।

लाइफस्टाइल नामा 18 Sep 2023 9:46 pm

Hartalika Teej 2023: आज किया जा रहा हरतालिका तीज का व्रत, ऐसे करें भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा

हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरतालिका तीज व्रत किया जाता है। इस दिन भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती का व्रत किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक इस दिन भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती की पूजा-अर्चना करने से वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। वहीं संतान प्राप्ति के लिए भी यह व्रत बेहद प्रभावशाली माना जाता है। बता दें कि इस साल 18 सितंबर 2023 को हरतालिका तीज का व्रत किया जा रहा है। आइए जानते हैं हरतालिका तीज व्रत की शुभ मुहूर्त और पूजा विधि के बारे में... हरतालिका तीज 2023 पूजा मुहूर्त भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि की शुरूआत 17 सितंबर 2023 को सुबह 11:08 मिनट से हो रही है, वहीं 18 सिंतबर 2023 को दोपहर 12:39 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। उदयातिथि के मुताबिक 18 सितंबर 2023 को हरतालिका तीज का व्रत रखा जाएगा। काल हरतालिका तीज पूजा का शुभ मुहूर्त 06:07 मिनट से 08:34 मिनट तक रहेगा। इसे भी पढ़ें: Ganesh Chaturthi 2023: गणेश चतुर्थी पर इस तरह पूजन और भजन करने से पूरी होगी हर मनोकामना शुभ योग हिंदू पंचांग के मुताबिक हरतालिका तीज व्रत के दौरान 4 शुभ योगों का निर्माण हो रहा है। हरतालिका तीज के दिन इंद्र योग, रवि योग, चित्रा नक्षत्र और स्वाति नक्षत्र का निर्माण हो रहा है। इंद्रयोग समापन: 19 सितंबर सुबह 04:24 मिनट पर रवि योग: दोपहर 12:08 मिनट से 19 सितंबर सुबह 06:08 मिनट तक चित्रा नक्षत्र दोपहर 12:08 मिनट तक स्वाति नक्षत्र प्रारंभ दोपहर 12:08 मिनट से हरतालिका तीज 2023 पूजा विधि शास्त्रों के मुताबिक इस सुहागिन स्त्रियों को सुबह जल्दी स्नान आदि कर लेना चाहिए। इसके बाद नए वस्त्र धारण कर श्रृंगार करें। फिर शुभ मुहूर्त में दीपक जलकर व्रत का संकल्प करें और पूजा शुरू करें। इस दिन भगवान शिव, मां पार्वती और भगवान गणेश की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। हरतालिका तीज के दिन मिट्टी से भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा स्थापित करें। फिर उनकी विधि-विधान से पूजा करें। हरतालिका तीज व्रत कथा करें और आखिरी में आरती करें।

प्रभासाक्षी 18 Sep 2023 9:38 am

6ठी का छात्र खेलते खेलते अचानक हुआ बेहोश, डॉक्टरों ने किया मृत घोषित

हल्द्वानी, 17 सितंबर(आईएएनएस)। हल्द्वानी से एक चौकाने वाली घटना सामने आई है। यहाँ एक स्कूल में छात्र के बेहोश होने के बाद उसे अस्पताल में ले जाने पर चिकित्सकों ने मृत घोषित कर दिया। बरेली रोड स्थित महात्मा गांधी इंटर मृत कॉलेज में छठी कक्षा में पढ़ने वाला एक छात्र खेलते-खेलते अचानक बेहोश हो गया। शिक्षक उसे लेकर एसटीएच पहुंचे। जहां, डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

लाइफस्टाइल नामा 17 Sep 2023 5:41 pm

Vishwakarma Jayanti 2023: इस शुभ मुहूर्त में करें भगवान विश्वकर्मा की पूजा-अर्चना, जानिए इसका महत्व

सनातन धर्म में विश्वकर्मा भगवान का विशेष महत्व माना जाता है। हिंदू धर्म में हर साल 17 सितंबर को कन्या संक्रांति के दिन विश्वकर्मा जयंती मनाई जाती है। इस साल आज यानी की 17 सितंबर को विश्वकर्मा जयंती मनाई जा रही है। बता दें कि भगवान विश्वकर्मा सृष्टि के रचियता ब्रह्मा के पुत्र हैं। इनको दुनिया का पहला शिल्पकार माना जाता है। विश्वकर्मा जयंती के मौके पर यंत्र और औजारों की पूजा-अर्चना की जाती है। आइए जानते हैं विश्वकर्मा पूजा की तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि के बारे में... शुभ मुहूर्त बता दें कि आज यानी की 17 सितंबर दिन रविवार को विश्वकर्मा जयंती मनाई जा रही है। वैसे तो आज के पूरे दिन भगवान विश्वकर्मा की पूजा की जा सकती है। लेकिन पूजा के शुभ मुहूर्त की बात करें तो पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 07:50 मिनट से दोपहर 12:26 मिनट तक है। इसके अलावा पूजा का दूसरा मुहूर्त दोपहर 01:58 मिनट से 03:30 मिनट तक के लिए हैं। ऐसे में आप भी इन शुभ मुहूर्त पर पूजा-अर्चना कर सकते हैं। इसे भी पढ़ें: Ganesh Chaturthi 2023: गणेश चतुर्थी पर इस तरह पूजन और भजन करने से पूरी होगी हर मनोकामना विश्वकर्मा जयंती पूजा विधि विश्वकर्मा जयंती के दिन कामकाज में आने वाले यंत्रों व औजारों की साफ-सफाई करनी चाहिए। इसके बाद स्नान आदि कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। फिर भगवान विश्वकर्मा का चित्र स्थापित कर विधि-विधान से पूजा अर्चना करें। भगवान विश्वकर्मा को फल फूल, अक्षत, मिठाई, पंचमेवा और पंचामृत का भोग लगाना चाहिए। आखिरी में आरती कर लोगों में प्रसाद वितरित करें। विश्वकर्मा जयंती का महत्व मान्यता के अनुसार, विश्वकर्मा भगवान ने प्राचीन काल के सभी प्रसिद्ध नगरों का निर्माण किया है। उन्होंने स्वर्ग से लेकर सोने की लंका, द्वारका जैसे नगरों का निर्माण किया। इसके अलावा भगवान विश्वकर्मा ने भगवान शंकर के त्रिशूल, हनुमान जी की गदा, यमराज का कालदंड और कर्ण के कुंडल-कवच का निर्माण किया है। इसलिए यंत्रों और औजारों से अच्छी तरह से काम करने के लिए विश्वकर्मा भगवान के आशीर्वाद की आवश्यकता होती है। विश्वकर्मा जयंती के दिन विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने वालों पर भगवान विश्वकर्मा की पूरे साल कृपा बनी रहती है।

प्रभासाक्षी 17 Sep 2023 9:46 am

Ganesh Chaturthi 2023: गणेश चतुर्थी पर इस तरह पूजन और भजन करने से पूरी होगी हर मनोकामना

हिन्दुओं का प्रमुख त्योहार गणेश चतुर्थी इस साल 19 सितम्बर को मनाया जायेगा। माना जाता है कि इस दिन विघ्नहर्ता भगवान श्रीगणेश का जन्म हुआ था। दस दिवसीय इस त्योहार को देश भर में धूमधाम से मनाया जाता है। विशेषकर महाराष्ट्र में इस पर्व को लेकर उत्साह चरम पर होता है और दस दिनों तक पूरा राज्य गणेशमय हो जाता है। शिवपुराण में कहा गया है कि भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी मंगलमूर्ति गणेश की अवतरण तिथि है, जबकि गणेशपुराण के अनुसार गणेशावतार भाद्रपद शुक्ल की चतुर्थी को हुआ था। भगवान गणेश का स्वरूप अत्यन्त ही मनोहर एवं मंगलदायक है। वे अपने उपासकों पर शीघ्र प्रसन्न होकर उनकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। उनके अनन्त नामों में सुमुख, एकदन्त, कपिल, गजकर्णक, लम्बोदर, विकट, विघ्ननाशक, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचन्द्र तथा गजानन− ये बारह नाम अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। इन नामों का पाठ अथवा श्रवण करने से विद्यारम्भ, विवाह, गृह−नगरों में प्रवेश तथा गृह नगर से यात्रा में कोई विघ्न नहीं होता है। देवसमाज में गणेशजी को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। भगवान श्री गणेशजी की पूजा किसी भी शुभ कार्य के करने के पहले की जाती है। मोदक इनका सर्वप्रिय भोग है और चूहा इनका प्रिय वाहन है। इनकी शादी ऋद्धि तथा सिद्धि नामक के साथ हुई। इस पर्व से जुड़ी एक मान्यता यह भी है कि इस दिन के रात्रि में चंद्रमा का दर्शन करने से मिथ्या कलंक लग जाता है। इसे भी पढ़ें: Ganesh Chaturthi पर गणेश जी की पूजा में इन वर्जित सामग्री का उपयोग ना करें, पूजा नहीं होगी स्वीकार गणेश चतुर्थी के दिन प्रातःकाल स्नान आदि के बाद सोने, तांबे, मिट्टी आदि की गणेशजी की प्रतिमा स्थापित की जाती है और उनका आह्वान किया जाता है। उनका तिलक कर पान, सुपारी, नारियल, लड्डु तथा मेवे चढ़ाए जाते हैं। उन्हें कम से कम 21 लड्डुओं का भोग लगाने की परम्परा है। इनमें से पांच लड्डुओं को गणेशजी के पास ही रहने देना चाहिए बाकी लड्डुओं का प्रसाद बांट देना चाहिए। सुबह और शाम को गणेशजी की आरती की जानी चाहिए और पूजन के बाद नीची नजर से चंद्रमा को अर्घ्य देकर ब्राह्मणों को भोजन कराकर यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिए। गणेश चतुर्थी व्रत कथा एक बार भगवान शंकर माता पार्वती के साथ नर्मदा नदी के तट पर गये और वहां पार्वती जी के साथ चौपड़ खेलने की इच्छा जताई। हार जीत का निर्णय कौन करे इसके लिए पार्वती जी ने घास के तिनकों का एक पुतला बनाकर उसे कहा कि बेटा हार जीत का निर्णय तुम्हीं करना। संयोग से तीन बार लगातार पार्वती ही जीतीं लेकिन जब निर्णय सुनाने की बारी आई तो बालक ने भगवान शंकर को विजयी बताया। इससे क्रुद्ध होकर माता पार्वती ने उसे एक पैर से लंगड़ा होने और कीचड़ में रहने का शाप दे दिया। बालक ने जब अपनी अज्ञानता के लिए माफी मांगी तो माता पार्वती को उस पर दया आ गई और उन्होंने कहा कि ठीक है यहां नाग कन्याएं गणेश पूजन के लिए आएंगी तो उनके उपदेश से तुम गणेश व्रत करके मुझे प्राप्त करोगे। इसके बाद वह भगवान के साथ कैलाश पर्वत पर चली गईं। लगभग एक वर्ष बाद श्रावण माह में नाग कन्याएं गणेश पूजन के लिए वहां आईं। नाग कन्याओं ने गणेश व्रत करने की विधि उस बालक को भी बताई तो उसने भी 12 दिनों तक गणेशजी का व्रत किया। गणेशजी उस बालक के व्रत से प्रसन्न हुए और उसे मनवांछित फल मांगने के लिए कहा। बालक ने कहा कि भगवान मेरे पैरों में इतनी शक्ति दे दो कि मैं खुद से चल कर कैलाश पर्वत पर अपने माता−पिता के पास जा सकूं। भगवान गणेशजी ने बालक की इच्छा पूरी कर दी। जिससे बालक कैलाश पर्वत पर भगवान शंकर के पास जा पहुंचा। जब भगवान ने उससे पूछा कि वह यहां तक कैसे आया तो उसने गणेश व्रत की महिमा बता डाली। नर्मदा नदी के तट पर हुई घटना के बाद से माता पार्वती भी भगवान शंकर से अप्रसन्न चल रही थीं इसलिए भगवान शंकर ने भी गणेश व्रत किया तो माता पार्वती भागी−भागी उनके पास आईं और पूछा कि आपने ऐसा क्या किया कि मैं आपके पास भागी−भागी चली आई तो उन्होंने गणेश व्रत के बारे में बताया। इसके बाद माता पार्वती ने गणेश व्रत किया जिससे उनके पुत्र कार्तिकेय उनके पास आ गये। उन्होंने भी अपनी मां के मुख से इस व्रत के माहात्म्य के बारे में सुनकर यह व्रत किया और इस व्रत के बारे में विश्वामित्र जी को बताया। इस प्रकार इस व्रत के माध्यम से गणेशजी ने जैसे इन सभी की मनोकामना पूरी की उसी प्रकार वह इस व्रत को करने वाले हर श्रद्धालु की मनोकामना पूरी करते हैं। इस पर्व से जुड़ी एक और कथा एक बार भगवान शंकर स्नान करने के लिये भोगवती नामक स्थान पर गये। उनके चले जाने के पश्चात माता पार्वती ने अपने मैल से एक पुतला बनाया जिसका नाम उन्होंने गणेश रखा। माता ने गणेश को द्वार पर बैठा दिया और कहा कि जब तक मै स्नान करूं किसी भी पुरुष को अन्दर मत आने देना। कुछ समय बाद जब भगवान शंकर वापस आये तो गणेशजी ने उन्हें द्वार पर ही रोक दिया, जिससे क्रुद्ध होकर भगवान शंकर ने उनका सिर धड़ से अलग कर दिया और अन्दर चले गये। पार्वती जी ने समझा कि भोजन में विलम्ब होने से भगवान शंकरजी नाराज हैं, सो उन्होंने तत्काल दो थालियों में भोजन परोस कर शंकरजी को भोजन के लिये बुलाया। शंकरजी ने दो थालियों को देखकर पूछा कि यह दूसरा थाल किसके लिये है, तो पार्वतीजी ने उत्तर दिया कि यह दूसरा था पुत्र गणेश के लिये है जो बाहर पहरा दे रहा है। यह सुनकर भगवान शंकर बोले कि मैंने तो उसका सिर धड़ से अलग कर दिया है। यह सुनकर पार्वती जी को बहुत दुख हुआ और वह भगवान महादेव से अपने प्रिय पुत्र गणेश को जीवित करने की प्रार्थना करने लगीं। तब शंकरजी ने हाथी के बच्चे का सिर काटकर बालक के धड़ से जोड़ दिया जिससे बालक गणेश जीवित हो उठा और माता पार्वती बहुत हर्षित हुईं। उन्होंने पति और पुत्र को भोजन कराकर स्वयं भोजन किया। चूंकि यह घटना भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को हुयी थी इसलिये इस तिथि का नाम गणेश चतुर्थी रखा गया।

प्रभासाक्षी 16 Sep 2023 4:15 pm

इस तरह करें हरी मिर्च की देखभाल, दो सप्ताह तक नहीं होगी खराब

परेशानी तब आती हैजब यह लंबे समयतक टिक नहीं पातीऔर सूखने या लाल होनेलगती है। कुछ दिनोंके बाद उसके रंगऔर स्वाद दोनों पर असर पड़जाता है। ऐसे मेंआपको जरूरत होती है इसेसही तरह से स्टोरकरने की ताकि इसेलंबे समय तक काममें लिया जा सके।....

खास खबर 16 Sep 2023 3:51 pm

राजस्थान : सरकार से बातचीत के बाद पेट्रोल पंप संचालकों ने हड़ताल स्थगित की

जयपुर, 15 सितंबर (आईएएनएस)। राजस्थान में पेट्रोल पंप संचालकों ने सरकारी प्रतिनिधियों के साथ बातचीत के बाद शुक्रवार को अपनी हड़ताल को स्थगित कर दिया है। सरकारी प्रतिनिधियों ने उनसे उनकी मांगों पर विचार करने के लिए 10 दिन का समय देने को कहा है।

लाइफस्टाइल नामा 15 Sep 2023 9:46 pm

शैलजा सिंह का लेख : स्त्रियों की ‘ना’ का सम्मान जरूरी

सवाल यह उठता है कि सहमति या रज़ामंदी क्यों आवश्यक है? इसका जवाब एक सवाल से ही दिया जा सकता है। हमें सहमति की परवाह कब नहीं रहती है? जब हम किसी से ख़ुद को श्रेष्ठ मानते हैं, ताक़तवर मानते हैं, अपने पास अनेक तरह की सत्ता महसूस करते हैं, तब हमें लगता है कि हम जो कर रहे हैं, वह हमारा हक़ है। यही सहमति है। स्त्रियों को खुलकर ‘ना’ कहना सीखना होगा। पितृसत्तात्मक समाज में बेड़ियों को तोड़ना होगा, यह उनके स्वाभिमान का प्रश्न है। स्वाभिमान की रक्षा के लिए दृढ़ता से ‘ना’ कहना होगा। ऐसी भी नहीं है कि व्यवहार में सहमति एक बार ही काफ़ी है। स्त्री की तरफ़ से सहमति का हर बार पता चलना ज़रूरी है।

हरि भूमि 15 Sep 2023 2:00 pm

CG News: निजी कंपनी की मनमानी...लाखों की लागत से लगाए गए टाइल्स को निकाला, FIR की तैयारी में एनएच

राष्ट्रीय राजमार्ग 43 के निर्माण हेतु टीवीसीएल सड़क निर्माण कंपनी द्वारा सड़क बनाने के साथ नाली निर्माण सहित राहगीरों के चलने हेतु सड़क और नाली के बीच में टाइल्स भी लगाया गया था। पढ़िए पूरी खबर....

हरि भूमि 14 Sep 2023 2:00 pm

Kushagrahani Amavasya 2023: कुशाग्रहणी अमावस्या व्रत से सभी समस्याओं का होता है अंत

आज कुशाग्रहणी अमावस्या है, इसे पिठोरी अमावस्या भी कहा जाता है, इस अमावस्या पर दान का विशेष महत्व होता है तो आइए हम आपको कुशाग्रहणी अमावस्या व्रत की विधि एवं महत्व के बारे में बताते हैं। जानें कुशाग्रहणी अमावस्या के बारे में हिंदू धर्म में भाद्रपद अमावस्या का विशेष महत्व है। इस दिन दान-धर्म और पितरों का तर्पण किया जाता है। हिंदू धर्म में पूर्णिमा और अमावस्या का विशेष महत्व है। इस दिन को दान-धर्म करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। भाद्रपद महीने में पड़ने वाली इस अमावस्या को कुशोत्पाटिनी या कुशाग्रहणी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। शास्त्रों में इस अमावस्या का बहुत महत्व है। इस दिन वर्ष भर किए जाने वाले धार्मिक कार्यों, अनुष्ठानों और श्राद्ध आदि कार्यों के लिए कुश इकट्ठा किया जाता है। साथ ही इस दिन स्नान-दान, जप, तप और व्रत आदि का भी महत्व है। कुशाग्रहणी अमावस्या का शुभ मुहूर्त भाद्रपद अमावस्या तिथि का आरंभ- 14 सितंबर 2023 को सुबह 4 बजकर 48 मिनट से भाद्रपद अमावस्या तिथि का समापन- 15 सितंबर 2023 को सुबह 7 बजकर 9 मिनट पर इसे भी पढ़ें: Bhadrapada Amavasya: साध्य योग और पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में 14 सितंबर को मनाई जाएगी भाद्रपद अमावस्या हिंदू धर्म में कुश का महत्व हमारे शास्त्रों में सभी प्रकार के शुभ या धार्मिक कार्यों और अनुष्ठानों आदि में कुश का उपयोग किया जाता है। किसी को दान देते समय, सूर्यदेव को जल चढ़ाते समय और अन्य कई कार्यों में भी कुश का उपयोग किया जाता है। इसलिए कुशोत्पाटिनी अमावस्या के दिन कुश ग्रहण करने का या कुश को इकट्ठा करने का विधान है। भाद्रपद अमावस्या के दिन प्रत्येक व्यक्ति को जितनी मात्रा में हो सके कुश ग्रहण जरूर करना चाहिए। कुशाग्रहणी अमावस्या के दिन कुश से जुड़े इन बातों का रखें ध्यान भाद्रपद अमावस्या के दिन स्नान आदि के बाद उचित स्थान पर जाकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह करके दाहिने हाथ से कुश तोड़नी चाहिए। कुश तोड़ते समय इस मंत्र का जाप करना चाहिए। मंत्र इस प्रकार है- 'ऊँ हूं फट्- फट् स्वाहा।' कुश तोड़ते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कुश कटा-फटा नहीं होना चाहिए, वह पूर्ण रूप से हरा भरा होना चाहिए। कुशा ग्रहिणी अमावस्या पर पूजा पाठ में सुबह के समय दाएं हाथ से कुशा को जड़ से उखाड़ कर पूजा में इस्तेमाल किया जाता है। कुशाग्रहणी अमावस्या पर जरुर करें ये काम भाद्रपद अमावस्या पर पवित्र नदी में स्नान, दान के अलावा कुशा घास जरुर एकत्रित करें। कुश देवताओं और पितर देवों के पूजन कर्म के लिए श्रेष्ठ होती है। मान्यता है कि ये कुश सालभर में पूजा, पाठ पितरों के श्राद्ध कर्म में इस्तेमाल की जाए तो समस्त कार्य बिना विघ्न के पूरे हो जाते हैं। कुशा घास की अंगूठी पहनकर श्राद्ध कर्म करने से पूर्वजों की आत्मा को तृप्ति मिलती है। इसे बहुत पवित्र माना गया है और कुश के आसन पर बैठकर पूजा करने से देवी-देवता जल्द पूजा स्वीकार करते हैं। कुश निकालने के नियम कुश एक प्रकार की घास होती है। भाद्रपद की अमावस्या पर कुश घास इकट्ठा की जाती है। कुशोत्पाटिनी अमावस्या के दिन कुशा को निकालने के लिए कुछ नियम बताए गए हैं, जिनका पालन करना आवश्यक है। ध्यान रखें जो कुश इकट्ठा कर रहे हैं, उसमें पत्ती हो, आगे का भाग कटा न हो और हरा हो। ऐसी कुश देवताओं और पितर देवों के पूजन कर्म के लिए श्रेष्ठ होती है। कुश घास इकट्ठा करने के लिए सूर्योदय का समय शुभ माना जाता है। कुशा को किसी औजार से ना काटा जाए, इसे केवल हाथ से ही एकत्रित करना चाहिए और उसकी पत्तियां अखंडित होना चाहिए। यानी पत्तियों का अग्रभाग टूटा हुआ नहीं होना चाहिए। कुशा एकत्रित करने के लिए सूर्योदय का समय सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इसके लिए उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें और दाहिने हाथ से एक बार में ही कुशा को निकालें। कुशाग्रहणी अमावस्या पर करें ये शुभ काम इस तिथि पर देवी लक्ष्मी के साथ ही भगवान विष्णु की विशेष पूजा करें। पूजा में दक्षिणावर्ती शंख से अभिषेक करें। हनुमान मंदिर में सरसों के तेल का दीपक जलाएं और हनुमान चालीसा का पाठ करें। पीपल को जल चढ़ाकर सात परिक्रमा करें। शिवलिंग पर तांबे के लोटे से जल चढ़ाएं और ऊँ नम: शिवाय मंत्र का जाप करें। इस अमावस्या पर किसी गौशाला में धन और हरी घास का दान भी करना चाहिए। पितरों के लिए धूप-ध्यान करना चाहिए। इस दिन पितरों को तर्पण भी किया जाता है। इससे पितर बहुत प्रसन्न होते हैं और आशीर्वाद प्रदान करते हैं। कुशाग्रहणी अमावस्या का महत्व इस दिन पूजा-पाठ, जप-तप के साथ स्नान-दान का बहुत ज्यादा महत्व माना गया है। मान्यता है कि इस दिन व्रत और अन्य पूजन कार्य करने से पितरों की आत्मा को शान्ति प्राप्त होती है। शास्त्रों के अनुसार अमावस्या तिथि के स्वामी पितृदेव होते हैं, इसीलिए इस दिन पितरों की तृप्ति के लिए तर्पण और दान-पुण्य का बहुत महत्व होता है। धार्मिक दृष्टि से इस अमावस्या को कुश ग्रहण करने एवं पूजा में कुश के प्रयोग का विशेष महत्व है। इस दिन वर्ष भर पूजा,अनुष्ठान या श्राद्ध कराने के लिए नदी,मैदानों आदि जगहों से कुशा नामक घास उखाड़ कर घर लाते है।धार्मिक कार्यों में इस्तेमाल की जाने वाली यह घास यदि इस दिन एकत्रित की जाए तो वह वर्ष भर तक पुण्य फलदायी होती है। बिना कुशा घास के कोई भी धार्मिक पूजा निष्फल मानी जाती है। इसलिए कुशा घास का उपयोग हिन्दू पूजा पद्धति में प्रमुखता से किया जाता है। इस दिन तोड़ी गई कोई भी कुशा वर्ष भर तक पवित्र मानी जाती हैं।अत्यंत पवित्र होने के कारण इसका एक नाम पवित्री भी है। मत्स्य पुराण के एक प्रसंग के अनुसार जब भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर हिरण्याक्ष का वध करके पृथ्वी को पुनः स्थापित किया। उसके बाद उन्होंने अपने शरीर पर लगे पानी को झाड़ा तब उनके शरीर से बाल पृथ्वी पर गिरे और कुशा के रूप में बदल गए। - प्रज्ञा पाण्डेय

प्रभासाक्षी 14 Sep 2023 12:01 pm

कड़वे स्वाद के बावजूद स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है करेला, इन रोगों से मिलती है मुक्ति

करेला खानेमें कड़वा लगता है, इसका जूस पीने में जहरीला सा लगता है। लेकिन यह आपके स्वास्थ्य केलिए फायदेमंद है। विशेष रूप से करेला डायबिटीज का कालमाना जाता है।....

खास खबर 13 Sep 2023 8:09 am

Bhaum Pradosh Vrat 2023: भौम प्रदोष व्रत से असाध्य रोगों से मिलती है मुक्ति

आज भौम प्रदोष व्रत है, इस दिन शिव जी की उपासना होती है लेकिन मंगलवार के दिन प्रदोष होने का खास महत्व है तो आइए हम आपको भौम प्रदोष व्रत की विधि एवं महत्व के बारे में बताते हैं। जानें भौम प्रदोष व्रत के बारे में भाद्रपद माह का पहला प्रदोष व्रत बहुत खास माना जा रहा है, इस दिन शिव संग बजरंगबली की विशेष कृपा बरसेगी। मंगलवार के दिन पड़ने वाली त्रयोदशी तिथि के दिन भौम प्रदोष या मंगल प्रदोष व्रत मनाया जाता है। मंगल प्रदोष व्रत में प्रदोष काल के दौरान भगवान शिव की आराधना करने से असाध्य रोगों से छुटकारा मिलता है। जानें भौम प्रदोष व्रत का पौराणिक महत्व शास्त्रों का मानना है कि राम भक्त हनुमान भगवान शिव के रुद्रावतार हैं। प्रदोष व्रत को विधि विधान के साथ रखने से जातक के जीवन में आने वाले सभी संकट खत्म हो जाते हैं। इसके अलावा जिन लोगों को मांगलिक दोष होता है, तो वे यदि ये व्रत रखते हैं तो वैवाहिक जीवन में आने वाली परेशानियां दूर हो जाती है। वही व्यक्ति को शारीरिक पीड़ा से मुक्ति मिलती है। इसे भी पढ़ें: Astro Tips: बरगद के पेड़ के इन उपायों से पूरी होगी नौकरी की चाहत, आप भी आजमाकर देखें मंगल प्रदोष व्रत के दिन ऐसे करें पूजा मंगल प्रदोष व्रत भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। प्रदोष व्रत का दिन बहुत खास होता है। इसलिए इस दिन सबसे पहले जल्दी उठें और स्नान करें। नहाने के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनें। इसके बाद भगवान शिव को ध्यान करके हाथों में जल और पुष्प लेकर भौम प्रदोष या मंगल प्रदोष व्रत का संकल्प लें। साथ ही भगवान शिव की दैनिक पूजा करें। प्रदोष व्रत के दिन मन में बुरे ख्याल न लाएं। उस दिन दिन में फलाहार करते हुए भगवान शिव का भजन-कीर्तन करें। मंगल प्रदोष में शाम को पूजा करना अनिवार्य है इसके लिए प्रदोष काल की पूजा के लिए स्नान आदि से निवृत्त होकर साफ कपड़े पहनें। अब प्रदोष पूजा मुहूर्त में भगवान शिव की विधि पूर्वक पूजा करें। मंगल प्रदोष के दिन पूजा प्रारम्भ करने से पहले पूजा स्थान पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके आसन ग्रहण करें। फिर पूजा के लिए भगवान शिव की तस्वीर या प्रतिमा एक चौकी पर स्थापित कर दें। अब गंगा जल से भगवान शिव का अभिषेक करें। उनको भांग, धतूरा, सफेद चंदन, फल, फूल, अक्षत्, गाय का दूध, धूप आदि चढ़ाएं। साथ में यह याद रखें कि भूलकर भी सिंदूर और तुलसी का पत्ता शिवजी को अर्पित न करें। ऐसा करने से भगवान नाराज हो सकते हैं। पूजा के दौरान पूजा सामग्री उनको अर्पित करते समय ओम नम: शिवाय मंत्र का जाप करें। प्रदोष व्रत शुरू ऐसे करें अगर आप प्रदोष व्रत शुरू करना चाहते हैं तो किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी से शुरू किया जा सकता है। लेकिन श्रावण तथा कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि विशेष रूप से महत्वपूर्ण होती है। प्रदोष व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा पंडितों के अनुसार प्रदोष व्रत से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार एक गांव में गरीब ब्राह्मणी अपने बेटे के साथ रहती थी। वह रोज अपने बेटे के साथ भीख मांगने जाती थी। एक दिन उसे रास्ते में विदर्भ का राजकुमार मिला जो घायल अवस्था में था। उस राजकुमार को पड़ोसी राज्य ने आक्रमण कर उसका राज्य हड़प लिया और उसे बीमार बना दिया था। ब्राह्मणी उसे घर ले आई और उसकी सेवा करने लगी। सेवा से वह राजकुमार ठीक हो गया और उसकी शादी एक गंधर्व पुत्री से हो गयी। गंधर्व की सहायता से राजकुमार ने अपना राज्य मिल गया। इसके बाद राजकुमार ने ब्राह्मण के बेटे को अपना मंत्री बना लिया। इस तरह प्रदोष व्रत के फल से न केवल ब्राह्मणी के दिन सुधर गए बल्कि राजकुमार को भी उसका खोया राज्य वापस मिल गया। भौम प्रदोष व्रत के दिन बन रहे हैं ये शुभ योग हिंदू पंचांग के अनुसार, भौम प्रदोष व्रत के दिन शिव योग और सर्वार्थ सिद्धि योग का निर्माण हो रहा है। इस दिन शिव योग 13 सितंबर रात्रि 01 बजकर 12 मिनट तक रहेगा और सर्वार्थ सिद्धि योग सुबह 05 बजकर 27 मिनट से रात्रि 11 बजकर 01 मिनट तक रहेगा। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इन दोनों शुभ मुहूर्त में पूजा-पाठ करने से व्यक्ति को विशेष लाभ मिलता है। मंगल प्रदोष व्रत के दिन हनुमान चालीसा पढ़ना होगा फायदेमंद मंगल प्रदोष का प्रदोष व्रत में खास महत्व होता है। मंगल प्रदोष या भौम प्रदोष के दिन कोई व्यक्ति अगर हनुमान चालीसा पढ़ता है तो उसका विशेष फल प्राप्त होता है। मंगल प्रदोष पर शिवलिंग की करें आराधना पंडितों के अनुसार मंगल प्रदोष के दिन किसी मंदिर में जाकर शिवलिंग की विशेष पूजा-अर्चना करें। इस दिन शिवलिंग पर गन्ने का रस भी अर्पित करें। इससे सेहत सम्बंधी विकार दूर हो जाएंगे। ऐसा करने से शिवजी की विशेष कृपा होती है और दुर्भाग्य दूर हो जाता है। भौम प्रदोष व्रत का शुभ मुहूर्त हिंदू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 11 सितंबर रात्रि 11 बजकर 52 मिनट से शुरू होगी और 13 सितंबर रात्रि 02 बजकर 21 मिनट पर समाप्त हो जाएगी। उदया तिथि के अनुसार, भौम प्रदोष व्रत 12 सितंबर 2023, मंगलवार के दिन रखा जाएगा। इस विशेष दिन पर प्रदोष काल शाम 05 बजकर 49 मिनट से रात्रि 08 बजकर 08 मिनट तक रहेगा। - प्रज्ञा पाण्डेय

प्रभासाक्षी 12 Sep 2023 12:54 pm

Bribe for post mortem : मरने के बाद भी लूटे जा रहे आदिवासी, पोस्टमार्टम के लिए देनी पड़ रही रिश्वत

मरने के बाद भी एक आदिवासी को रिश्वत चुकानी पड़ गई। आदिवासी के परिजनों ने इसकी जानकारी कलेक्टर को भी दी थी। लेकिन फिर भी इनकी समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया गया।

हरि भूमि 10 Sep 2023 6:00 pm

Aja Ekadashi 2023: अजा एकादशी व्रत से प्राप्त होता है अक्षय पुण्य

आज अजा एकादशी व्रत है, यह हिन्दुओं का प्रमुख त्यौहार है, जिसे रखने से व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है। इस बार अजा एकादशी के दिन दो अत्यंत शुभ संयोग का निर्माण हो रहा है, जिसमें की गई पूजा-पाठ का विशेष लाभ साधकों को प्राप्त होगा तो आइए हम आपको अजा एकादशी व्रत के महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं। जानें अजा एकादशी व्रत के बारे में एकादशी व्रत हिंदू धर्म में काफी महत्व रखते हैं। पंडितों के अनुसार एकादशी व्रत भगवान विष्णु को अतिशय प्रिय होते हैं। जो भी श्रद्धालु एकादशी का व्रत धारण करते हैं, वह भगवान श्री विष्णु की विशेष कृपा के भागीदार होते हैं। अजा एकादशी व्रत जोकि भाद्रपद मास धारण किया जाता है। इस दिन श्रीहरि भगवान विष्णु तथा माता लक्ष्मी की पूजा अर्चना आदि की जाती है। इस साल अजा एकादशी व्रत 10 सितम्बर 2023 रविवार के दिन की जाएगी। एकादशी समस्त पापों का नाश करने वाली तथा अश्वमेध यज्ञ का फल देने वाली है। एकादशी के दिन व्रत-उपवास रखकर और रात्रि जागरण करके श्रीहरि विष्णुजी का पूजन-अर्चन तथा ध्यान किया जाता है। अजा एकादशी व्रत भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को रखा जाएगा इस व्रत को धारण करने वाले जातक सभी कष्टों से निवारण पाते हैं तथा भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। अजा एकादशी व्रत का शुभ मुहूर्त हिंदू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 09 सितंबर शाम 07 बजकर 17 मिनट से शुरू होगी और 10 सितंबर रात्रि 09 बजकर 28 मिनट पर समाप्त हो जाएगी। वहीं इस दिन पुनर्वसु और पुष्य नक्षत्र का निर्माण हो रहा है। बता दें कि पुनर्वसु नक्षत्र शाम 05 बजकर 06 मिनट तक रहेगा और इसके बाद पुष्य नक्षत्र शुरू हो जाएगा। वहीं इस दिन रवि पुष्य योग और सर्वार्थ सिद्धि योग का भी निर्माण हो रहा है। जो शाम 05 बजकर 06 मिनट से 11 सितंबर सुबह 05 बजकर 26 मिनट तक रहेगा। अजा एकादशी व्रत का महत्व और लाभ अजा एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है और इससे उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस व्रत को करने से भक्तों को भूत-प्रेतों के भय से मुक्ति मिलती है। शास्त्रों के अनुसार इस व्रत को करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है और कथा सुनने से अश्वमेघ यज्ञ के समान मिलने वाला लाभ प्राप्त होता है। हिंदू शास्त्रों के अनुसार हर व्रत का अपना महत्व और लाभ होता है। इस व्रत को रखने से भगवान का दिव्य आशीर्वाद मिलता है और भक्तों पर सुख और समृद्धि की वर्षा होती है। सभी व्रतों में एकादशी व्रत का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। हर वर्ष 24 एकादशियां होती हैं। भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी या 11वें दिन को अजा एकादशी मनाई जाती है। इस व्रत को करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है और सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। अजा एकादशी के दिन ऐसे करें पूजा पंडितों के अनुसार अजा एकादशी एक ऐसा त्योहार है जिसमें व्रत नियम और अनुष्ठान के साथ रखा जाता है। एकादशी के दिन सुबह सूर्योदय से पहले स्नान कर लें। पूजा स्थल को साफ करें और भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित करें। पूरी श्रद्धा से व्रत करने का संकल्प लें। कुछ पूजा सामग्री जैसे फूल, नारियल, सुपारी, फल, लौंग, अगरबत्ती, घी, पंचामृत भोग, तेल का दीपक तुलसी, दाल, चंदन आदि रखना जरूरी है। फिर भगवान विष्णु की पूजा करें और भोग लगाएं। सुबह-शाम आरती करें। अजा एकादशी अत्यंत फलदायी मानी गई है इसलिए इसकी व्रत कथा पढ़ें। कुछ भक्त पूरी रात जागते हैं और भगवान को समर्पित भक्ति गीत, भजन और कीर्तन गाते हैं। द्वादशी के दिन सुबह गरीबों और ब्राह्मणों को भोजन कराएं और दक्षिणा दें। इसके बाद फल कहकर व्रत का पारण करें। अजा एकादशी के दिन रखें इन बातों का ख्याल शास्त्रों के अनुसार जो लोग एकादशी व्रत का पालन करते हैं उन्हें मांस, मदिरा, लहसुन-प्याज, मसूर की दाल इत्यादि का सेवन नहीं करना चाहिए। इसके अलावा एकादशी तिथि के दिन किसी भी तरह के वृक्ष के पत्ते को तोड़ने से बचना चाहिए। लकड़ी के दातुन, नींबू जामुन या फिर आम का पत्ता चबाने से भी बचना चाहिए। एकादशी व्रत के दिन मन में हमेशा भक्ति भावना को जागृत करना चाहिए। किसी भी प्रकार के नकारात्मक विचार को मन में नहीं लाना चाहिए। एकादशी तिथि के दिन भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करना चाहिए। भजन करना चाहिए ऐसा करने से जीवन में सुख समृद्धि बनी रहती है। इसे भी पढ़ें: Bhadrapada Amavasya: साध्य योग और पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में 14 सितंबर को मनाई जाएगी भाद्रपद अमावस्या अजा एकादशी व्रत के दिन करें ये काम पंडितों के अनुसार एकादशी व्रत धारण करने वाले जातक सवेरे जल्दी उठकर शारीरिक स्वच्छ होकर मन में भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए नीचे दी गई प्रक्रिया को दुहराएं। भगवान विष्णु के सामने घी का दीपक जलाकर, फलों तथा फूलों से भक्तिपूर्वक पूजा करें। पूजा के बाद विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। दिन में निराहार एवं निर्जल व्रत का पालन करें। इस व्रत में रात्रि जागरण करें। द्वादशी तिथि के दिन प्रातः ब्राह्मण को भोजन कराएं व दान-दक्षिणा दें। उसके बाद सात्विक भोजन के साथ पारण करे। - प्रज्ञा पाण्डेय

प्रभासाक्षी 10 Sep 2023 12:43 pm

Bhadrapada Amavasya: साध्य योग और पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में 14 सितंबर को मनाई जाएगी भाद्रपद अमावस्या

हिंदू धर्म में भादो मास की अमावस्या का विशेष महत्व बताया गया है। पौराणिक मान्यता है कि पितृपक्ष से पहले पितरों को खुश करने के लिए भाद्रपद अमावस्या मनाई जाती है। इसे भादो अमावस्या भी कहा जाता है और इस दिन पवित्र नदी में स्नान किया जाता है और दान किया जाता है। पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डॉ अनीष व्यास ने बताया कि भाद्रपद अमावस्या साध्य योग और पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में 14 सितंबर को मनाई जाएगी। वैदिक पंचांग के मुताबिक भाद्रपद अमावस्या गुरुवार 14 सितंबर को सुबह 04.48 मिनट से शुरू हो जाएगी और शुक्रवार 15 सितंबर को सुबह 07.09 बजे संपन्न होगी। ऐसे में उदया तिथि के चलते भाद्रपद अमावस्या 14 सितंबर को मनाई जाएगी। भाद्रपद अमावस्या को पिथौरा अमावस्या भी कहा जाता है, इसलिए इस दिन देवी दुर्गा की पूजा की जाती है। इस संदर्भ में पौराणिक मान्यता है कि इस दिन माता पार्वती ने इंद्राणी को इस व्रत का महत्व बताया था। विवाहित स्त्रियों द्वारा संतान प्राप्ति एवं अपनी संतान के कुशल मंगल के लिये उपवास किया जाता है और देवी दुर्गा की पूजा की जाती है। इस अमावस्या को पिठोरी या कुशोत्पाटिनी अमवास्या भी कहते हैं। इसमें धार्मिक कार्यों के लिये उपयोग में आने वाले कुश को एकत्रित किया जाता है। जो सालों भर मान्य होता है। वहीं अन्य दिनों में एकत्रित किया जाने वाला कुश सिर्फ उसी दिन मान्य होता है। इस दिन शाम मे पीपल पेड़ के नीचे दीपक जलाये ओर अपने पितरों को स्मरण करे। इसके साथ ही पीपल की परिक्रमा लगाए इससे पितरों की आत्मा की शान्ति मिलती है। ज्योतिषाचार्य डॉ अनीष व्यास ने बताया कि हिन्दू धर्म में अमावस्या की तिथि पितरों की आत्म शांति, दान-पुण्य और काल-सर्प दोष निवारण के लिए विशेष रूप से महत्व रखती है। चूंकि भाद्रपद माह भगवान श्री कृष्ण की भक्ति का महीना होता है इसलिए भाद्रपद अमावस्या का महत्व और भी बढ़ जाता है। इस अमावस्या पर धार्मिक कार्यों के लिये कुशा एकत्रित की जाती है। कहा जाता है कि धार्मिक कार्यों, श्राद्ध कर्म आदि में इस्तेमाल की जाने वाली घास यदि इस दिन एकत्रित की जाये तो वह पुण्य फलदायी होती है। इस दिन प्रातःकाल उठकर किसी नदी, जलाशय या कुंड में स्नान करें और सूर्य देव को अर्घ्य देने के बाद बहते जल में तिल प्रवाहित करें। नदी के तट पर पितरों की आत्म शांति के लिए पिंडदान करें और किसी गरीब व्यक्ति या ब्राह्मण को दान-दक्षिणा दें। इस दिन कालसर्प दोष निवारण के लिए पूजा-अर्चना भी की जा सकती है। अमावस्या के दिन शाम को पीपल के पेड़ के नीचे सरसो के तेल का दीपक लगाएं और अपने पितरों को स्मरण करें। पीपल की सात परिक्रमा लगाएं। अमावस्या शनिदेव का दिन भी माना जाता है। इसलिए इस दिन उनकी पूजा करना जरूरी है। इसे भी पढ़ें: Shani Dosh: कुंडली में शनि दोष होने पर जीवन में लग जाता है परेशानियों का अंबार, जरूर करें ये उपाय ज्योतिषाचार्य डॉ अनीष व्यास ने बताया कि भाद्रपद महीना भगवान श्री कृष्णा की भक्ति का महीना माना जाता है। इसलिए भाद्रपद में पड़ने वाली अमावस्या का महत्व ज्यादा है। वहीं पितृ दोष से मुक्ति पाने के लिये या पितरों की आत्म शान्ति के लिए भी अमावस्या का खासा महत्व है। अमवास्या को स्नान, दान और तर्पण के लिए सबसे शुभ दिन माना गया है। मान्यता है कि इस दिन हाथों में कुश लेकर तर्पण करने से कई पीढ़ियों के पितर तृप्त हो जाते हैं। यदि कुंडली में पितृदोष या कालसर्प दोष हो तो इससे मुक्ति के लिये अमावस्या का दिन सबसे शुभ माना जाता है। अमावस्या के दिन स्नान, दान और पितृ तर्पण किया जाता है। भाद्रपद अमावस्या कुंडली विश्लेषक डॉ अनीष व्यास ने बताया कि वैदिक पंचांग के मुताबिक भाद्रपद अमावस्या गुरुवार 14 सितंबर को सुबह 04.48 मिनट से शुरू हो जाएगी और शुक्रवार 15 सितंबर को सुबह 07.09 बजे संपन्न होगी। ऐसे में उदया तिथि के चलते भाद्रपद अमावस्या 14 सितंबर को मनाई जाएगी। भाद्रपद अमावस्या को पिथौरा अमावस्या भी कहा जाता है, इसलिए इस दिन देवी दुर्गा की पूजा की जाती है। पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र और साध्य योग भविष्यवक्ता एवं कुंडली विश्लेषक डॉ अनीष व्यास ने बताया कि इस साल की भाद्रपद अमावस्या साध्य योग और पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में 14 सितंबर को मनाई जाएगी। उस दिन पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र सुबह से लेकर अगले दिन सुबह 04:54 तक है। वहीं साध्य योग प्रात:काल से लेकर अगले दिन सुबह 03:00 तक है । उसके बाद से शुभ योग प्रारंभ होगा। भाद्रपद अमावस्या को सूर्योदय सुबह 06:05 पर होगा। मुहूर्त भविष्यवक्ता डॉ अनीष व्यास ने बताया कि भाद्रपद अमावस्या पर ब्रह्म मुहूर्त के साथ ही स्नान और दान करना शुभ होगा। 14 सितंबर को ब्रह्म मुहूर्त सुबह 04:32 बजे से प्रात: 05:19 बजे तक है। इस बाद उत्तम मुहूर्त सुबह 06:05 बजे से सुबह 07:38 बजे के बीच है। इस दौरान स्नान और दान करना शुभ हो सकता है। करें दान कुंडली विश्लेषक डॉ अनीष व्यास ने बताया कि भाद्रपद अमावस्या के दिन अपने सामर्थ्य के अनुसार, कपड़े और अन्न का दान करना चाहिए। ऐसा करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। भाद्रपद में भगवान विष्णु की पूजा करते हैं और भाद्रपद अमावस्या पर पीपल के पेड़ की पूजा करना भी शुभ होता है। स्नान के बाद पीपल के पेड़ को जल अर्पित करना चाहिए। महत्व भविष्यवक्ता एवं कुंडली विश्लेषक डॉ अनीष व्यास ने बताया कि हर माह में आने वाली अमावस्या की तिथि का अपना विशेष महत्व होता है। भाद्रपद अमावस्या के दिन धार्मिक कार्यों के लिये कुशा एकत्रित की जाती है, इसलिए इसे कुशग्रहणी अमावस्या कहा जाता है। वहीं पौराणिक ग्रंथों में इसे कुशोत्पाटिनी अमावस्या भी कहा गया है। यदि भाद्रपद अमावस्या सोमवार के दिन हो तो इस कुशा का उपयोग 12 सालों तक किया जा सकता है। भाद्रपद माह में भगवान विष्णु की पूजा करते हैं और भाद्रपद अमावस्या पर आप पीपल के पेड़ की पूजा कर सकते हैं। उस दिन आप स्नान करने के बाद पीपल के पेड़ की जड़ में जल चढ़ाएं। पीपल में देवों का वास होता है। शाम के समय वहां पर पितरों के लिए सरसों के तेल वाला दीपक जलाना चाहिए। इससे पितर प्रसन्न होते हैं। - डॉ अनीष व्यास भविष्यवक्ता एवं कुंडली विश्लेषक

प्रभासाक्षी 9 Sep 2023 5:02 pm

एनर्जी का पावरहाउस है केला, खाने से शरीर को होते हैं लाभ

केले में प्रचुरमात्रा में विटामिन सी,डाइटेरी फाइबर और मैग्नीज़ भीहोता है। इसमें विटामिनबी6 भी होता है।केला फैट फ्री, कोलेस्ट्रॉलफ्री भी माना जाताहै। केले को उर्जाका पॉवर हाउस भीकहा जाता है।......

खास खबर 9 Sep 2023 12:47 pm

फोर्टिस एस्‍कॉर्ट्स जयपुर में मल्‍टीपल स्‍क्‍लेरॉसिस एवं ऑटोइम्‍यून डिज़ीज़ क्‍लीनिक का शुभारंभ

मल्‍टीपल स्‍क्‍लेरॉसिस (Multiple Sclerosis) मस्तिष्‍क तथा स्‍पाइनल कॉर्ड (केंद्रीय तंत्रिका तंत्र) से

खास खबर 7 Sep 2023 6:08 pm

Shri Krishna Janmashtami fast 2023: श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत से घर में आती है समृद्धि

आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी है, श्रीकृष्ण की पूजा करने से के व्यक्ति ऊर्जा, बुद्धि, शक्ति और आत्म विश्वास प्राप्त कर सकता है। इस तरह श्री कृष्ण की पूजा से सुख, शांति, आरोग्य एवं लाभ की प्राप्ति होती है तो आइए हम आपको कृष्णा जन्माष्टमी की पूजा विधि एवं महत्व के बारे में बताते हैं। जन्माष्टमी के दिन बांके बिहारी मंदिर में साल में एक बार होती है मंगला आरती बांके बिहारी मंदिर में भक्तों की भीड़ हमेशा देखी जाती है लेकिन जन्माष्टमी के दिन यहां श्रद्धालुओं का भीड़ के चलते पैर रखने की भी जगह नहीं मिलती है। इस दौरान भक्त यहां साल में एक बार होने वाली मंगला आरती में हिस्सा लेने को उत्सुक रहते हैं। श्री बांके बिहारी मंदिर में साल में केवल एक बार ही मंगला आरती होती है और देश-विदेश के भक्त इसमें शामिल होते हैं । इसे भी पढ़ें: Janmashtami 2023: श्रीकृष्ण भगवान का जीवन दर्शन और अलौकिक लीलाएं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत के दिन ऐसे करें पूजा पंडितों के अनुसार कृष्ण जन्माष्टमी के दिन श्री कृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा होती है। इस दिन सुबह स्नान करने के बाद सभी देवताओं को नमस्कार करके व्रत का संकल्प लें। फिर मध्यान्ह के समय काले तिलों को जल में छिड़क कर देवकी जी के लिए प्रसूति गृह बनाएं। अब इस सूतिका गृह में सुन्दर बिछौना बिछाकर उस पर शुभ कलश स्थापित करें। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के साथ माता देवकी जी की मूर्ति भी स्थापित करें। देवकी, वासुदेव, बलदेव, नन्द, यशोदा और लक्ष्मी जी इन सबका नाम लेते हुए विधिवत पूजन करें। यह व्रत रात में बारह बजे के बाद ही खोला जाता है। इस व्रत में अनाज का उपयोग नहीं किया जाता। फलहार के रूप में कुट्टू के आटे की पकौड़ी, मावे की बर्फी और सिंघाड़े के आटे का हलवे का सेवन कर सकते हैं। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर करें श्रीकृष्ण के इन मंत्रों का जाप शास्त्रों के अनुसार जन्माष्टमी के दिन जाप करना फलदायी होता है। इस दिन हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का जाप करें। श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारे, हे नाथ नारायण वासुदेवा, ॐ नमो भगवते तस्मै कृष्णाया कुण्ठमेधसे। सर्वव्याधि विनाशाय प्रभो माममृतं कृधि और ॐ नमो भगवते श्री गोविन्दाय के जाप करें। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर इन पूजन सामग्रियों को शामिल करें पंडितों के अनुसार श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर धूप बत्ती, अगरबत्ती, कपूर, केसर, चंदन, यज्ञोपवीत 5, कुमकुम, अक्षत, अबीर, गुलाल, अभ्रक, हल्दी, आभूषण, नाड़ा, रुई, रोली, सिंदूर, सुपारी, पान के पत्ते, पुष्पमाला, कमलगट्टे, तुलसीमाला, खड़ा धनिया, सप्तमृत्तिका, सप्तधान, कुशा व दूर्वा, पंच मेवा, गंगाजल, शहद, शक्कर, तुलसी दल, शुद्ध घी, दही, दूध, ऋतुफल, नैवेद्य या मिष्ठान्न, छोटी इलायची, लौंग मौली, इत्र की शीशी, सिंहासन, बाजोट या झूला (चौकी, आसन), पंच पल्लव, पंचामृत, केले के पत्ते, औषधि, श्रीकृष्ण की प्रतिमा या तस्वीर, गणेशजी की तस्वीर, अम्बिका जी की तस्वीर, भगवान के वस्त्र, गणेशजी को अर्पित करने के लिए वस्त्र, अम्बिका को अर्पित करने के लिए वस्त्र, जल कलश, सफेद कपड़ा, लाल कपड़ा, पंच रत्न, दीपक, बड़े दीपक के लिए तेल, बन्दनवार, ताम्बूल, नारियल, चावल, गेहूं, गुलाब और लाल कमल के फूल, दूर्वा, अर्घ्य पात्र आदि। कृष्ण जन्माष्टमी पर शुभ मुहूर्त पंडितों के अनुसार भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 6 सितंबर 2023 को दोपहर 03 बजकर 37 मिनट से शुरू हो रही है। वहीं इस तिथि का समापन अगले दिन 7 सितंबर 2023 शाम 04 बजकर 14 मिनट पर होगा। कृष्ण जन्माष्टमी की पूजा मध्य रात्रि की जाती है, इसलिए इस साल भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव 6 सितंबर 2023, बुधवार को मनाया जाएगा। कृष्ण जन्माष्टमी व्रत से होते हैं ये फायदे जन्माष्टमी के दिन श्रीकृष्ण की पूजा करने से न केवल घर में प्रेम और सौहार्द बना रहा रहता है बल्कि दाम्पत्य जीवन भी मधुर होता है। साथ ही वैवाहिक सम्बन्धों में मधुरता लाने के लिए उत्तर दिशा में नाचते हुए मयूर या राधा-कृष्ण की आलिंगनवद्ध पेंटिंग लगाना वास्तु की दृष्टि से अच्छा होता है। अगर आप संतान की इच्छा रखते हैं तो श्रीकृष्ण के बाल रूप की पूजा जरूर करें। संतान प्राप्ति हेतु इच्छुक दम्पत्ति अपने कमरे में श्री कृष्ण के बालरूप या गाय-बछड़े की फोटो लगाएं। अगर परिवार के सदस्यों में आपसी तालमेल और आत्मविश्वास की कमी है तो आप श्रीकृष्ण जी की अर्चना करें। इसके लिए आप अंगुली पर गोबर्धन पर्वत उठाए हुए भगवान श्री कृष्ण की तस्वीर घर में ऐसी जगह लगाएं ताकि आपकी नज़र अक्सर उस पर पढ़े। फोटो में बाल-गोपाल को जरूर शामिल करें। जन्माष्टमी व्रत से घर में कभी नहीं होगा अभाव घर में पूरब दिशा की ओर लड्डू गोपालजी की माखन खाते हुए की तस्वीर लगाना बहुत शुभ होगा। इससे आपके घर में कभी किसी चीज की कमी नहीं होगी। साथ ही इस बात का ध्यान रखें कि खाना बनाते समय भोजन को झूठा न करें। भगवान श्रीकृष्ण को तुलसी विशेष रूप से प्रिय होती है। इसलिए इस दिन तुलसी पूजन शुभ मानी जाती है। इसलिए शाम को तुलसी के सामने घी का दीपक जलाएं और 11 बार परिक्रमा करें। अगर आपके घर में तुलसी जी नहीं हैं तो किसी मंदिर में जाकर पूजा करें लेकिन कभी भी किसी और घर की तुलसी की पूजा न करें, ऐसा करने से पूजा का फल आपको नहीं मिलेगा। परिजात के फूलों से कृष्ण भगवान होते हैं प्रसन्न भगवान श्री हरि विष्णु और माता लक्ष्मी को परिजात के फूल बहुत पसंद हैं। कृष्ण भगवान विष्णु जी के अवतार हैं इसलिए उन्हें भी पूजा में परिजात के फूल अर्पित करें। कृष्ण जी को बांसुरी बहुत प्यारी है। इसलिए जन्माष्टमी के दिन चांदी की बांसुरी से कृष्ण भगवान की पूजा कर उसे अपने पर्स में रखें, इससे आपको लाभ होगा। - प्रज्ञा पाण्डेय

प्रभासाक्षी 7 Sep 2023 9:53 am

Janmashtami 2023: जन्माष्टमी के पर्व को लेकर दूर करें कंफ्यूजन, जानिए भगवान श्रीकृष्ण किस दिन लेगें जन्म

इस साल यानी की साल 2023 में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व 2 दिन मनाया जा रहा है। इस बार 6 सितंबर 2023 और 7 सितंबर 2023 को जन्माष्टमी का पर्व मनाया जा रहा है। बता दें कि ऐसा सिर्फ इस बार ही नहीं बल्कि हर साल होता है। ऐसे में लोगों के मन में कंफ्यूजन होता है कि आखिर वह किस दिन जन्माष्टमी का पर्व मनाएं। बता दें कि भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। ऐसे में जन्माष्टमी का पर्व मनाए जाने के पीछे दो तरह की परंपराएं और मान्यता है। पहले दिन जन्माष्टमी का पर्व स्मार्त और गृहस्थ लोग मनाते हैं। वहीं दूसरे दिन वैष्णव संप्रदाय के जुड़े लोग साधु-संत द्वारा मनाई जाती है। ऐसे में किस दिन गृहस्थ और वैष्णव के अलग-अलग दिनों में जन्माष्टमी मनाने का आखिर क्या कारण है। इसे भी पढ़ें: Krishna Janmashtami: जन्माष्टमी पर इस विधि से करें श्रीकृष्ण का पूजन, सचमुच प्रसन्न होंगे कान्हाजी जन्माष्टमी 2023? शुभ मुहूर्त भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरूआत- 6 सितंबर 2023 को दोपहर 03:27 मिनट से कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि समापन- 7 सितंबर 2023 को दोपहर 04:14 मिनट पर रोहिणी नक्षत्र- 6 सितंबर को सुबह 09:20 मिनट से 7 सितंबर सुबह 10:25 मिनट तक जन्माष्टमी तिथि- 6 और 7 सितंबर 2023 जन्माष्टमी है बेहद खास भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की मध्य रात्रि में श्री कृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र के दौरान हुआ था। इसलिए हर साल भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाती है। लेकिन अगर भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की रात में रोहिणी नक्षत्र हो, तो कृष्ण जयंती का पर्व मनाते हैं। ऐसे में 06 सितंबर को सुबह 09:21 मिनट से रोहिणी नक्षत्र लग जाएगा। वहीं 07 सितंबर को सुबह 10:25 मिनट तक रोहिणी नक्षत्र रहेगा। ऐसे में गृहस्थ लोग 06 सितंबर को जन्माष्टमी का पर्व मनाएंगे। वहीं वैष्णव यानी की संत लोग 07 सितंबर को जन्माष्टमी का पर्व मनाएंगे। मथुरा में जन्माष्टमी का पर्व हर साल जन्माष्टमी का पर्व 06 और 07 सितंबर को मनाया जाएगा। 06 सितंबर को गृहस्थ जीवन वाले और 07 सितंबर को वैष्णव संप्रदाय वाले जन्माष्टमी मनाते हैं। आपको बता दें कि मथुरा, गोकुल और भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े बड़े-बड़े स्थलों पर आज यानी की 07 सितंबर को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की पर्व मनाया जाएगा।

प्रभासाक्षी 7 Sep 2023 9:38 am

यौन शक्ति बढ़ाने के लिए इन खाद्य वस्तुओं को करें अपनी डाइट में शामिल, दूर होगी यौन कमजोरी

पुरुषों में यौनशक्ति कीकमी (Low Sex Drive) भी गलत खान– पान के कारण होतीहै। जिसकी वजह से शरीरमें पोषण तत्व कीकमी हो जाती हैऔर यह कई समस्याओंको जन्म देती हैऔर इसी के चलतेयौन शक्ति की कमी एकप्रमुख समस्या है।.....

खास खबर 6 Sep 2023 2:49 pm

Balram Jayanti 2023: आज मनाया जा रहा बलराम जयंती का पर्व, जानिए पूजा विधि और महत्व

हिंदू धर्म में बलराम जयंती यानी की हल षष्ठी के पर्व का विशेष महत्व होता है। पंचांग के अनुसार, हर साल भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को यह पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। बता दें कि यह त्योहार भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी के जन्मदिन के तौर पर मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं अपने बच्चे के उज्जवल भविष्य और सेहतमंद बने रहने के लिए व्रत करती हैं। ऐसे में आज यानी की 5 सितंबर 2023 को बलराम जयंती का पर्व मनाया जा रहा है। हल षष्ठी 2023 तिथि और शुभ मुहूर्त पंचांग के अनुसार, अनुसार, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि की शुरूआत 04 सितंबर को शाम 04:41 मिनट से शुरू होगी। वहीं 05 सितंबर को दोपहर 03:46 मिनट पर यह तिथि समाप्त होगी। ऐसे में 05 सितंबर 2023 को यह पर्व मनाया जा रहा है। इसे भी पढ़ें: Krishna Janmashtami: जन्माष्टमी पर इस विधि से करें श्रीकृष्ण का पूजन, सचमुच प्रसन्न होंगे कान्हाजी पूजा विधि हल षष्ठी के दिन सुबह सूर्योदय से पहले स्नान आदि कर साफ वस्त्र पहनें और सूर्य देव को जल अर्पित करें। फिर एक चौकी पर पीला या लाल वस्त्र बिछाएं। इस पर भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी की तस्वीर स्थापित करें। अब गणेश भगवान की पूजा अर्चना करें। फिर भगवना श्रीकृष्ण और बलराम की पूजा-अर्चना करें। बलराम जी को चंदन का तिलक करें और फिर पुष्प, गंध, दीप, धूप आदि दिखाएं। आखिरी में भगवान श्रीहरि विष्णु की पूजा कर आरती करें और बलराम जी के शस्त्र 'हल' की पूजा करें। हल षष्ठी 2023 पूजा महत्व बता दें कि हल षष्ठी को बलराम जयंती के नाम से भी जाना जाता है। भागवत पुराण के मुताबकि बलराम जी को जगत के पालनहार भगवान विष्णु का शेषावतार माना जाता है। हल षष्ठी के दिन भगवान बलभद्र की पूजा-अर्चना करने से व्यक्ति को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। वहीं संतान को लंबी आयु का आशीर्वाद मिलता है।

प्रभासाक्षी 5 Sep 2023 9:54 pm

Krishna Janmashtami: जन्माष्टमी पर इस विधि से करें श्रीकृष्ण का पूजन, सचमुच प्रसन्न होंगे कान्हाजी

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी बुधवार को रोहिणी नक्षत्र में अर्धरात्रि के समय वृष के चंद्रमा में हुआ था। यह भी माना जाता है कि अष्टमी के उपवास से पूजन और नवमी के पारण से व्रत की पूर्ति होती है। इस व्रत को करने वालों को चाहिए कि व्रत से एक दिन पूर्व अर्थात सप्तमी को हल्का तथा सात्विक भोजन करें। सभी ओर से मन और इंद्रियों को काबू में रखें। उपवास वाले दिन प्रातःकाल स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त होकर सूर्य, सोम, यम, काल, संधि, भूत, पवन, दिक्पति, भूमि, आकाश, खेचर, अमर और ब्रह्मादि को नमस्कार करके पूर्व या उत्तर मुख बैठें। हाथ में जल, फल, कुश, फूल और गंध लेकर संकल्प करके मध्याह्न के समय काले तिलों के जल से स्नान कर देवकी जी के लिए सूतिका गृह नियत करें। उसे स्वच्छ और सुशोभित करके उसमें सूतिका के उपयोगी सब सामग्री यथाक्रम रखें, तत्पश्चात चित्र या मूर्ति स्थापित करें। मूर्ति में प्रसूत श्रीकृष्ण को स्तनपान कराती हुई देवकी हों और लक्ष्मीजी उनके चरण स्पर्श किये हों, ऐसा भाव प्रकट हो। घर में भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति अथवा शालिग्राम का दूध, दही, शहद, यमुनाजल आदि से अभिषेक कर उसे अच्छे से सजाएं। इसके बाद श्रीविग्रह का षोडशोपचार विधि से पूजन करें। जन्माष्टमी के व्रत को करना अनिवार्य माना जाता है और विभिन्न धर्मग्रंथों में कहा गया है कि जब तक उत्सव सम्पन्न न हो जाए तब तक भोजन कदापि न करें। व्रत के दौरान फलाहार लेने में कोई मनाही नहीं है। रात को बारह बजे शंख तथा घंटों की आवाज से श्रीकृष्ण के जन्म की खबरों से जब चारों दिशाएं गूंज उठें तो भगवान श्रीकृष्ण की आरती उतार कर प्रसाद ग्रहण करें। इस प्रसाद को ग्रहण करके ही व्रत खोला जाता है। इसे भी पढ़ें: Krishna Janmashtami 2023: श्रीकृष्ण सच्चे अर्थों में सृष्टि के कुशल महाप्रबन्धक हैं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत पूजन विधि इस दिन व्रती को किसी नदी में तिल के साथ स्नान करके यह संकल्प करना चाहिए– 'मैं कृष्ण की पूजा उनके सहगामियों के साथ करूँगा।' व्रती को किसी धातु की कृष्ण प्रतिमा बनवानी चाहिए, प्रतिमा के गालों का स्पर्श करना चाहिए और मंत्रों के साथ उसकी प्राण प्रतिष्ठा करनी चाहिए। मंत्र के साथ देवकी व उनके शिशु श्री कृष्ण का ध्यान करना चाहिए तथा वसुदेव, देवकी, नन्द, यशोदा, बलदेव एवं चण्डिका की पूजा स्नान, धूप, गंध, नैवेद्य आदि के साथ एवं मंत्रों के साथ करनी चाहिए। इसके बाद प्रतीकात्मक ढंक से जातकर्म, नाभि छेदन, षष्ठीपूजा एवं नामकरण संस्कार आदि करने चाहिए। तब चन्द्रोदय (या अर्धरात्रि के थोड़ी देर उपरान्त) के समय किसी वेदिका पर अर्ध्य देना चाहिए, यह अर्ध्य रोहिणी युक्त चन्द्र को भी दिया जा सकता है, अर्ध्य में शंख से जल अर्पण होता है, जिसमें पुष्प, कुश, चन्दन लेप डाले हुए रहते हैं। इसके उपरान्त व्रती को चन्द्र का नमन करना चाहिए और वासुदेव के विभिन्न नामों वाले श्लोकों का पाठ करना चाहिए। व्रती को रात्रि भर कृष्ण की प्रशंसा के स्रोतों, पौराणिक कथाओं, गानों में संलग्न रहना चाहिए। दूसरे दिन प्रात: काल के कृत्यों के सम्पादन के उपरान्त, कृष्ण प्रतिमा का पूजन करना चाहिए, ब्राह्मणों को भोजन देना चाहिए, सोना, गौ, वस्त्रों का दान, 'मुझ पर कृष्ण प्रसन्न हों' शब्दों के साथ करना चाहिए। कृष्ण प्रतिमा किसी ब्राह्मण को दे देनी चाहिए और पारण करने के उपरान्त व्रत को समाप्त करना चाहिए। पर्व की छटा जन्माष्टमी पर्व के दौरान देश भर के मंदिरों की साज सज्जा की जाती है और जगह जगह रासलीला का आयोजन किया जाता है। वैसे इस पर्व की छटा कृष्ण जन्मभूमि, मथुरा में देखते ही बनती है जहां ब्रजभूमि महोत्सव अनूठा व आश्चर्यजनक होता है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर मथुरा नगरी भक्ति के रंगों से सराबोर हो उठती है। इस पावन अवसर पर भगवान कान्हा की मोहक छवि देखने के लिए दूर दूर से श्रद्धालु मथुरा पहुंचते हैं। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत कथा द्वापर युग में पृथ्वी पर राक्षसों के अत्याचार बढ़ने लगे। पृथ्वी गाय का रूप धारण कर अपनी कथा सुनाने के लिए तथा अपने उद्धार के लिए ब्रह्माजी के पास गई। ब्रह्माजी सब देवताओं को साथ लेकर पृथ्वी को भगवान विष्णु के पास क्षीरसागर ले गये। उस समय भगवान श्रीकृष्ण अनन्त शैया पर शयन कर रहे थे। स्तुति करने पर भगवान की निद्रा भंग हो गई। भगवान ने ब्रह्माजी एवं सब देवताओं को देखकर आने का कारण पूछा, तो पृथ्वी बोली− 'भगवान! मैं पाप के बोझ से दबी जा रही हूं। मेरा उद्धार कीजिए। यह सुनकर भगावान विष्णु बोले− मैं ब्रज मंडल में वासुदेव की पत्नी देवकी के गर्भ से जन्म लूंगा। तुम सब देवतागण ब्रज भूमि में जाकर यादव वंश में अपना शरीर धारण करो। इतना कहकर भगवान अंतर्ध्यान हो गए। इसके पश्चात देवता ब्रज मंडल में आकर यदुकुल में नन्द−यशोदा तथा गोप−गोपियों के रूप में पैदा हुए। द्वापर युग के अंत में मथुरा में उग्रसेन नाम के एक राजा राज्य करते थे। उग्रसेन के पुत्र का नाम कंस था। कंस ने उग्रसेन को बलपूर्वक सिंहासन से उतारकर जेल में डाल दिया और स्वयं राजा बन गया। कंस की बहन देवकी का विवाह यादव कुल में वासुदेव के साथ निश्चित हो गया था। जब कंस देवकी को विदा करने के लिए रथ के साथ जा रहा था, तो आकाशवाणी की बात सुनकर कंस क्रोध में भरकर देवकी को मारने को तैयार हो गया। उसने सोचा− न देवकी होगी, न उसका कोई पुत्र होगा। वासुदेवजी ने कंस को समझाया कि तुम्हें देवकी से तो कोई भय नहीं है। देवकी की आठवीं संतान से तुम्हें भय है। इसलिए मैं इसकी आठवीं संतान को तुम्हें सौंप दूंगा। तुम्हारी समझ में जो आये, उसके साथ वैसा ही व्यवहार करना। कंस ने वासुदेवजी की बात स्वीकार कर ली और वासुदेव−देवकी को कारागार में बंद कर लिया। तभी नारदजी वहां आ पहुंचे और कंस से बोले कि यह कैसे पता चलेगा कि आठवां गर्भ कौन-सा होगा। गिनती प्रथम से या अंतिम गर्भ से शुरू होगी। इस तरह कंस ने नारदजी से परामर्श कर देवकी के गर्भ से उत्पन्न होने वाले समस्त बालकों को मारने का निश्चय कर लिया। इस प्रकार एक−एक करके कंस ने देवकी की सातों संतानों को निर्दयतापूर्वक मार डाला। भाद्रपद के कृष्णपक्ष की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। उनके जन्म लेते ही जेल की कोठरी में प्रकाश फैल गया। वासुदेव-देवकी के सामने शंख, चक्र, गदा एवं पद्मधारी चतुर्भुज से अपना रूप प्रकट कर कहा− अब मैं बालक का रूप धारण करता हूं। तुम मुझे तत्काल गोकुल के नंद के यहां पहुंचा दो और उनकी अभी−अभी जन्मी कन्या को लाकर कंस को सौंप दो। तत्काल वासुदेवजी की हथकडि़यां खुल गईं। दरवाजे अपने आप खुल गये। पहरेदार सो गये। वासुदेव श्रीकृष्ण को सूप में रखकर गोकुल को चल दिये। रास्ते में यमुना श्रीकृष्ण के चरणों को स्पर्श करने के लिए आगे बढ़ने लगीं। भगवान ने अपने पैर लटका दिये। चरण छूने के बाद यमुना घट गईं। वासुदेव यमुना पार कर गोकुल में नंद के यहां गए। बालक कृष्ण को यशोदाजी की बगल में सुलाकर कन्या को लेकर वापस कंस के कारागार में आ गये। जेल के दरवाजे पूर्ववत बंद हो गये। वासुदेवजी के हाथों में हथकड़ियां पड़ गईं। पहरेदार भी जाग गये। कन्या के रोने पर कंस को खबर दी गई। कंस ने कारागार में आकर कन्या को लेकर पत्थर पर पटककर मारना चाहा, परंतु वह कंस के हाथों से छूटकर आकाश में उड़ गई और देवी का रूप धारण कर बोली कि हे कंस! मुझे मारने से क्या लाभ है? तेरा शत्रु तो गोकुल में पहुंच चुका है। यह दृश्य देखकर कंस हतप्रभ और व्याकुल हो गया। कंस ने श्रीकृष्ण को मारने के लिए अनेक दैत्य भेजे। श्रीकृष्ण ने अपनी अलौकिक माया से सारे दैत्यों को मार डाला। बड़े होने पर कंस को मारकर उग्रसेन को राजगद्दी पर बैठाया। श्रीकृष्ण की जन्मतिथि को तभी से सारे देश में बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाता है। - शुभा दुबे

प्रभासाक्षी 5 Sep 2023 4:15 pm

सेहत और त्वचा दोनों के लिए लाभकारी है हल्दी पानी, स्वस्थ व मजबूत रहता है शरीर, आता है निखार

हल्‍दी का पानी सेहत और त्‍वचा दोनों के लिए लाभकारी होता है। जिन लोगों को बार-बार सर्दी-जुकाम और संक्रमण हो जाता है उन्‍हें अपनी डाइट में हल्‍दी के पानी को जरूर शामिल करना चाहिए। गुणकारी हल्‍दी के अलग-अलग लाभ उठाने के लिए आपको किसी वैद्य या विशेषज्ञ की शरण में जाने की जरूरत नहीं है.......

खास खबर 5 Sep 2023 8:39 am

घर के कई मुश्किल कामों को आसान बनाता है प्याज, आजमा कर देखें

कोईभी फल ज्यादा देरतक कटा रखा रहनेपर उसमें ऑक्सीडेशन प्रोसेस शुरू हो जातीहै और वह भूराऔर खराब सा होनेलगता है। प्याज मेंमौजूद नेचुरल मॉइश्चर और सल्फर.....

खास खबर 4 Sep 2023 2:22 pm

Kajari Teej 2023: आज इस शुभ मुहूर्त में मनाया जा रहा कजरी तीज का पर्व, जानिए पूजा विधि और महत्व

हिंदू धर्म में हर दूसरे दिन कोई ना कोई व्रत-त्योहार आदि मनाया जाता है। बता दें कि इसी क्रम में आज यानी की 2 सितंबर 2023 को कजरी तीज का पर्व मनाया जा रहा है। हर साल भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को यह व्रत किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो भी महिला इस व्रत को करती हैं, उनके बच्चों का भविष्य उज्जवल होने के साथ परिवार में सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। कजरी तीज के पर्व पर भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती की पूजा-अर्चना की जाती है। आइए जानते हैं कजरी तीज की पूजा विधि, उसका महत्व और शुभ मुहूर्त के बारे में... कजरी तीज 2023 शुभ मुहूर्त इस साल भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि की शुरूआत 01 सितंबर को 11:50 मिनट से हो रहा है। वहीं 02 सितंबर को रात 10:49 मिनट पर यह तिथि समाप्त होगी। हिंदू पंचाग के अनुसार, कजरी तीज का पर्व आज यानी की 2 सितंबर को मनाया जा रहा है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक आज के दिन चंद्र देव की पूजा-उपासना की जाती है। बता दें कि आज चंद्रोदय का समय शाम 07:44 माना जा रहा है। इसके अलावा आज दोपहर 12:30 बजे से रेवती नक्षत्र शुरू हो रहा है। कजरी तीज का महत्व बता दें कि कजरी तीज को बड़ा तीज के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक देवी पार्वती ने सबसे पहले कजरी तीज का व्रत किया था। जिसके बाद इस व्रत को महिलाएं भी करने लगी। इस व्रत को करने से जीवन की परेशानियों का अंत होता है और परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है। यदि कोई कुंवाी कन्या इस व्रत को करती है, तो उसको मनपसंद जीवनसाथी प्राप्त होता है। कजरी तीज पर चंद्रमा की पूजा कर उन्हें अर्घ्य दिया जाता है। ऐसा करना लाभकारी होता है। कजरी तीज 2023 पूजा विधि कजरी तीज के दिन सुबह जल्दी स्नान आदि कर लें। इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। अब चौकी पर लाल रंग का कपड़ा बिछाकर भगवान शिव और माता पार्वती की मूर्ति स्थापित करें। फिर माता पार्वती और भोलेनाथ की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करें। मां पार्वती को महिलाएं सुहाग के 16 श्रृंगार अर्पित करें। वहीं भोलेनाथ को गाय का दूध, गंगा जल, बेल पत्र, धतूरा और भांग आदि अर्पित करें।

प्रभासाक्षी 2 Sep 2023 9:38 am

Parliament Special Session: विशेष सत्र के एजेंडे में कई 'महत्वपूर्ण आइटम', केंद्रीय मंत्री बोले...

केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा कि 18 से 22 सितंबर तक बुलाए गए संसद के विशेष सत्र के एजेंडे में 'महत्वपूर्ण आइटम' हैं और इसे 'बहुत जल्द' प्रसारित किया जाएगा।

हरि भूमि 1 Sep 2023 6:00 pm

जिन्दगी भर रहना है साथ तो इन बातों की बांध लें गांठ, टूटेगा नहीं रिश्ता

कई बार हमें ऐसा लगता है किहम अपने जीवन साथी के साथ बेहद खुशहाल जिन्दगी जी रहे हैं। इस खुशहाली में कुछ पल ऐसेभी आते हैं जब आपकी आपके साथी के साथ किसी बात पर नोकझोंक या वाद-विवाद हो जाताहै। उस समय आपको यह महसूस होता है कि नहीं हमारी.....

खास खबर 1 Sep 2023 11:46 am

Gayatri Jayanti 2023: आज मनाया जा रहा गायत्री जयंती का पर्व, जानिए वेदमाता से जुड़ा महामंत्र और महत्व

सनातन धर्म में वेद माता गायत्री की पूजा को सभी प्रकार की मनोकामनाओं की पूर्ति और कष्टों को दूर करने वाली मानी गई है। हिंदू मान्यता के मुताबिक सभी वेदों की माता गायत्री मानी गई हैं। हर साल श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि पर गायत्री जयंती मनाई जाती है। माना जाता है कि इसी दिन मां गायत्री का जन्म हुआ था। माता गायत्री हंस की सवारी करती हैं, उनके एक हाथ में चारों वेद और दूसरे हाथ में कमंडल सुशोभित रहता है। आइए जानते हैं गायत्री जयंती से पावन पर्व की पूजा विधि और धार्मिक महत्व के बारे में... गायत्री जयंती की तिथि हिंदू पंचाग के अनुसार, हर साल सावन माह की पूर्णिमा तिथि को गायत्री जयंती मनाई जाती है। इस साल आज यानी की 31 अगस्त 2023 को गायत्री जयंती मनाई जा रही है। हिंदू पंचांग के मुताबिक 30 अगस्त 2023 को सुबह 10:58 मिनट से श्रावण पूर्णिमा की शुरू हो गई थी और आज यानी यानी की 31 अगस्त को सुबह 07:05 मिनट तक रहेगी। इसे भी पढ़ें: Raksha Bandhan 2023: जानिये रक्षा बंधन पर्व का धार्मिक महत्व तथा पौराणिक और मध्यकालीन इतिहास मां गायत्री का स्वरूप बता दें कि मां गायत्री को ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों स्वरूप माना जाता है। मां गायत्री की उपासना त्रिमूर्ति को मानकर ही किया जाता है। मां गायत्री के पांच मुख और 10 हाथ हैं। वहीं उनके चारों मुख चार वेदों का प्रतीक हैं और पांचवा मुख सर्वशक्तिमान शक्ति होने का प्रतिनिधित्व करता है। मां गायत्री के दसों हाथ भगवान श्रीहरि विष्णु के प्रतीक हैं। मां गायत्री को त्रिदेवों का आराध्य भी कहा जाता है। इसके अलावा मां गायत्री को भगवान ब्रह्मा की दूसरी पत्नी भी कहा जाता है। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्माजी के मुख से सृष्टि के आरंभ में गायत्री मंत्र प्रकट हुआ। ब्रह्माजी ने मां गायत्री की कृपा से गायत्री मंत्र की व्याख्या अपने चारों मुखों से चार वेदों के तौर पर की थी। शुरूआत में सिर्फ देवताओं तक ही मां गायत्री की महिमा सीमित थी। लेकिन मां की महिमा अर्थात गायत्री मंत्र को महर्षि विश्वामित्र ने कठोर तपस्या कर जन-जन तक पहुंचाया। देवी गायत्री का विवाह एक बार ब्रह्माजी ने यज्ञ का आयोजन किया था। परंपरा के मुताबिक ब्रह्माजी को इस यज्ञ में पत्नी के साथ बैठना था। लेकिन किसी वजह से ब्रह्माजी की पत्नी सावित्री को आने में देर हो गई और यज्ञ का शुभ मुहूर्त निकला जा रहा था। इसलिए वहां मौजूद देवी गायत्री से ब्रह्मा जी ने विवाह कर लिया। इसके बाद ब्रह्मा जी ने उन्हें अपनी पत्नी का स्थान देकर यज्ञ शुरू कर दिया। मां गायत्री की उपासना भारतीय संस्कृति की चार आधार शिलाएं गायत्री, गीता, गंगा और गौ हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने इस बात का उल्लेख गीता में किया है कि व्यक्ति को अपने कल्याण के लिए गायत्री और ऊँ मंत्र का उच्चारण करना चाहिए। वेदों में मां गायत्री को प्राण, वायु, शक्ति, धन, कीर्ति और ब्रह्म तेज प्रदान करने वाली देवी बताया गया है। मां गायत्री की उपासना से व्यक्ति को सब आसानी से प्राप्त हो जाता है। गायत्री की महिमा का यशोगान करते हुए महाभारत के रचयिता वेद व्यासजी कहते हैं कि जैसे फूलों में शहद,दूध में घी होता है,वैसे ही समस्त वेदों का सार मां गायत्री हैं। यदि गायत्री को कोई व्यक्ति सिद्ध कर लेता है। तो यह सारी इच्छाओं को पूरा करने वाली कामधेनू गाय के समान हैं। गायत्री मंत्र के उच्चारण से आध्यात्मिक चेतना का विकास होता है। गायत्री मंत्र का श्रद्धा पूर्वक रोजाना जाप करने से व्यक्ति को सारे कष्टों से मुक्ति मिलती है। मां गायत्री उसके चारों तरफ रक्षा कवच के समान निर्माण करती हैं।

प्रभासाक्षी 31 Aug 2023 9:11 am

Raksha Bandhan 2023: रक्षाबंधन की डेट को लेकर हो रही कंफ्यूजन, तो यहां जानें कब है राखी बांधने का शुभ मुहूर्त

इस साल रक्षाबंधन की तारीख को लेकर लोगों में कंफ्यूजन बना हुआ है। दरअसल, इस बार भद्रा होने की वजह से रक्षाबंधन का पर्व 30 अगस्त और 31 अगस्त को मनाए जाने को लेकर मदभेद हैं। हर साल यह पर्व पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। इस दिन सभी बहनें अपने भाई को राखी बांधती है। लेकिन रक्षाबंधन के दिन यदि भद्रा लगता है तो बहनों को भाई की कलाई पर राखी नहीं बांधना चाहिए। क्योंकि भद्राकाल में राखी बांधना अशुभ माना जाता है। ऐसे में इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि रक्षाबंधन कब मनाया जा रहा है और इसका शुभ मुहूर्त क्या है। रक्षाबंधन का शुभ मुहूर्त बता दें कि इस साल 30 अगस्त को शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि सुबह 10:58 मिनट से शुरू हो रही है। वहीं पूर्णिमा तिथि की समाप्ति 31 अगस्त को सुबह 07:05 मिनट पर होगी। ऐसे में रक्षाबंधन का पर्व 30 अगस्त को मनाया जाएगा। लेकिन इस दिन भद्रा काल लगने के कारण राखी बांधने के शुभ मुहूर्त का विशेष ध्यान रखना होगा। उदया तिथि के मुताबिक 31 अगस्त को सुबह 07:05 मिनट से पहले रक्षाबंधन का पर्व मना लेना शुभ रहेगा। इसे भी पढ़ें: Raksha Bandhan 2023: भाई-बहिन के स्नेह का प्रतीक है रक्षाबंधन का पर्व राखी बांधने का शुभ मुहूर्त 30 अगस्त को रात 09:01 मिनट पर भद्रा काल समाप्त होगा। शास्त्रों के अनुसार, भद्रा काल की स्थिति में भद्रा मुख का त्याग करके जब भद्रा पूंछ हो, तो उस दौरान शुभ कार्य किए जा सकते हैं। ऐसे में इस बार भद्रा पूंछ शाम में 05:30 मिनट से 06:31 मिनट तक रहेगी। इस दौरान भी रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जा सकता है। इस दौरान राखी बांधने से भद्रा दोष नहीं लगेगा। लेकिन इस बात का खास ख्याल रखें कि आपका भद्रा काल में राखी नहीं बांधनी है। 30 अगस्त 2023 को भद्रा पूंछ का समय में 05:30 मिनट से 06:31 मिनट तक 30 अगस्त 2023 को भद्रा मुख का समय शाम में 06:31 मिनट से 08:11 मिनट तक। इस समय बांधे राखी 30 अगस्त को भद्र रात में 09:01 मिनट तक होने के कारण बहनें चौघड़िया मुहूर्त में भाई को राखी बांध सकती हैं। अमृत चौघड़िया मुहूर्त राखी बांधने के लिए सर्वोत्तम मुहूर्त सुबह 07:34 मिनट से 09:10 मिनट तक। शुभ चौघड़िया मुहूर्त सुबह 10:46 मिनट से 12:22 मिनट तक। अमृत सर्वोत्तम मुहूर्त रात में 09:34 मिनट से 10:58 मिनट तक।

प्रभासाक्षी 30 Aug 2023 8:48 am

Rakhi Festival 2023: मानवीय रिश्तों में नवीन ऊर्जा का संचार करता है राखी का पर्व

भारत धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं और त्योहारों का देश है, यहां के हर त्योहार का अपना एक मकसद और रंग होता है, जो विभिन्न धर्मों, समाजों एवं लोगों को करीब ले आता है। रक्षा-बंधन भी ऐसा ही अनूठा सांस्कृतिक पर्व है। राखी के धागें बहन के पवित्र प्रेम और रक्षा की डोरी भर नहीं है, बल्कि यह धार्मिक, सामाजिक और पारिवारिक एकबद्धता एवं एकसूत्रता का अमोघ साधन है। राखी का त्योहार महिलाओं को समानता एवं सुरक्षा प्रदान करने के लिये संकल्पित होने का अवसर प्रदान करता है। क्योंकि अगर नजर उठाकर देखें, तो कठिनाइयों और चुनौतियों से भरे क्षेत्रों में महिलाएं अब अपनी अद्भुत कार्यशैली से चमत्कृत बुलंदियां छू रही हैं। चाहे सेना हो या पहलवानी के अखाड़े, हर जगह समूची दुनिया उनका तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत करती है। बंधनों, उत्पीड़न एवं उपेक्षा से नारी को मुक्ति दिलाने की प्रेरणा राखी के धागों में गूंथी हुई है। रक्षाबंधन स्नेह का वह अमूल्य बंधन है, जिसका बदला धन तो क्या सर्वस्व देकर भी नहीं चुकाया जा सकता। यह त्यौहार भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक है, वही लगातार असुरक्षा एवं अस्मिता के लिये जूझती नारी को एक आश्वासन है उसकी रक्षा का। राखी के जरिये बहनें भाई की सलामती की दुआ मांगती हैं तो भाई ताउम्र बहन की हिफाजत का बीड़ा उठाते हैं, फिर चाहे रिश्ता खून का हो या सिर्फ कच्चे धागे का या फिर मानवीय संबंधों का। निश्चित ही नारी अस्मिता एवं अस्तित्व से जुड़ा राखी का त्योहार आदर्शों का हिमालय है और संकल्पों का सोपान है। रक्षाबंधन प्यार के धागों का एक ऐसा पर्व है जो घर-घर ही नहीं, समाज एवं राष्ट्र में मानवीय रिश्तों में नवीन ऊर्जा का संचार करता है। बहनों में उमंग और उत्साह को संचरित करता है, वे अपने प्यारे भाइयों के हाथ में राखी बांधने को आतुर होती हैं। बेहद शालीन और सात्विक यह पर्व सदियों पुराना है- तब से अब तक नारी सम्मान एवं सुरक्षा पर केन्द्रित यह विलक्षण पर्व है। सगे भाई बहन के अतिरिक्त अनेक भावनात्मक रिश्ते भी इस पर्व से बँधे होते हैं जो धर्म, जाति और देश की सीमाओं से परे हैं। यह पर्व आत्मीयता और स्नेह के बन्धन से रिश्तों को मजबूती प्रदान करने का पर्व है। रक्षा बंधन मानवीय भावों का बंधन है। यह प्रेम, त्याग और कर्तव्य का बन्धन है। इस बंधन में एक बार भी बंध जाने पर इसे तोड़ना बड़ा कठिन है। इन धागों में इतनी शक्ति है, जितनी लोहे की जंजीर में भी नहीं। इसे भी पढ़ें: Raksha Bandhan 2023: भाई-बहिन के स्नेह का प्रतीक है रक्षाबंधन का पर्व राखी के इस अभूतपूर्व पर्व को समझने के लिए इसके ऐतिहासिक प्रसंगों को समझना बेहद जरूरी है वरना इस पर्व की रंगत अधूरी रह जायेगी। भविष्य पुराण में वर्णन मिलता है कि देव और दानवों में जब युद्ध शुरू हुआ तब दानव हावी होते नजर आने लगे। भगवान इन्द्र घबरा कर बृहस्पति के पास गये। वहां बैठी इन्द्र की पत्नी इंद्राणी सब सुन रही थी। उन्होंने रेशम का धागा मन्त्रों की शक्ति से पवित्र करके अपने पति के हाथ पर बाँध दिया जिसके बाद इंद्र विजयी हुए। इस पर्व के अनेक ऐतिहासिक प्रसंग भी हैं। राजपूत जब लड़ाई पर जाते थे तब महिलाएँ उनको माथे पर कुमकुम तिलक लगाने के साथ-साथ हाथ में राखी भी बाँधती थी। मुगल काल के दौर में जब मुगल बादशाह हुमायूँ चितौड़ पर आक्रमण करने बढ़ा तो राणा सांगा की विधवा कर्मवती ने हुमायूँ को राखी भेजकर रक्षा वचन ले लिया। हुमायूँ ने इसे स्वीकार करके चितौड़ पर आक्रमण का ख्याल दिल से निकाल दिया और कालांतर में मुसलमान होते हुए भी राखी की लाज निभाने के लिए चितौड़ की रक्षा हेतु बहादुरशाह के विरूद्ध मेवाड़ की ओर से लड़ते हुए कर्मावती और मेवाड़ राज्य की रक्षा की। इसी तरह सिकंदर की पत्नी ने अपने पति के हिंदू शत्रु पुरू को राखी बांध कर अपना मुंहबोला भाई बनाया और युद्ध के समय सिकंदर को न मारने का वचन लिया। पुरू ने युद्ध के दौरान हाथ में बंधी राखी का और अपनी बहन को दिये हुए वचन का सम्मान करते हुए सिकंदर को जीवदान दिया। सिकंदर ने भी पोरस के रक्षा-सूत्र की लाज रखते हुए और एक योद्धा की तरह व्यवहार करते हुए उसका राज्य वापस लौटा दिया। राखी एक धागा प्रेम का है, जो इस पर्व को एक लौकिक महत्व प्रदान करता है, यह धागा भाई-बहन के रिश्तों को और मजबूत करता है। जो सिर्फ प्यार और अपनेपन का संदेश ही नहीं देता बल्कि कर्तव्यों का भी बोध कराता है। राखी के धागे को देखकर हर भाई को अपनी बहन के प्रति कर्तव्यों का आभास होता है। राखी का त्योहार सावन महीने के अंतिम दिन मनाया जाता है। महाभारत में भी इस बात का उल्लेख है कि जब ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि मैं सभी संकटों को कैसे पार कर सकता हूँ तब भगवान श्रीकृष्ण ने उनकी तथा उनकी सेना की रक्षा के लिये राखी का त्योहार मनाने की सलाह दी थी। उनका कहना था कि राखी के इस रेशमी धागे में वह शक्ति है जिससे आप हर आपत्ति से मुक्ति पा सकते हैं। महाभारत में ही रक्षाबन्धन से सम्बन्धित श्रीकृष्ण और द्रौपदी का एक और वृत्तान्त है। जब श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया तब उनकी तर्जनी में चोट आ गई। द्रौपदी ने उस समय अपनी साड़ी फाड़कर उनकी उँगली पर पट्टी बाँध दी। यह श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन था। श्रीकृष्ण ने इस उपकार का बदला बाद में चीरहरण के समय उनकी साड़ी को बढ़ाकर चुकाया। इस तरह राखी के दो धागों से भाई-बहन का ही नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवीय संवेदनाओं का गहरा नाता रहा है। राखी के त्योहार का ज्यादा महत्व पहले उत्तर भारत में था। आज यह पूरे भारत में बड़े उत्साह से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इसे नारली पूर्णिमा के नाम से मनाया जाता है। लोग समुद्र मंे वरुण राजा को नारियल दान करते हैं। नारियल के तीन आंखों को भगवान शिव की तीन आंखें मानते हैं। दक्षिण भारत में इसे अवनी अविट्टम के नाम से जाना जाता है। स्कन्ध पुराण, पद्मपुराण और श्रीमद्भागवत में वामनावतार नामक कथा में रक्षाबन्धन का प्रसंग मिलता है। कथा कुछ इस प्रकार है- दानवेन्द्र राजा बलि ने जब 100 यज्ञ पूर्ण कर स्वर्ग का राज्य छीनने का प्रयत्न किया तो इन्द्र आदि देवताओं में खलबली मच गयी और वे सभी भगवान विष्णु से प्रार्थना करने पहुंचे। तब भगवान वामन अवतार लेकर ब्राह्मण का वेष धारण कर राजा बलि से भिक्षा माँगने पहुँचे। गुरु के मना करने पर भी बलि ने तीन पग भूमि दान कर दी। भगवान ने तीन पग में सारा आकाश पाताल और धरती नापकर राजा बलि को रसातल में भेज दिया। इस प्रकार भगवान विष्णु द्वारा बलि राजा के अभिमान को चकनाचूर कर देने के कारण यह पर्व बलेव नाम से भी प्रसिद्ध है। राखी के बारे में प्रचलित ये कथाएं सोचने पर विवश कर देती हैं कि कितने महान उसूलों और मानवीय संवेदनाओं वाले थे वे लोग, जिनकी देखादेखी एक संपूर्ण परंपरा ने जन्म ले लिया और आज तक बदस्तूर जारी है। आज परंपरा भले ही चली आ रही है लेकिन उसमें भावना और प्यार की वह गहराई नहीं दिखायी देती। अब उसमें प्रदर्शन का घुन लग गया है। पर्व को सादगी से मनाने की बजाय बहनें अपनी सज-धज की चिंता और भाई से राखी के बहाने कुछ मिलने के लालच में ज्यादा लगी रहती हैं। भाई भी उसकी रक्षा और संकट हरने की प्रतिज्ञा लेने की बजाय जेब हल्की कर इतिश्री समझ लेता है। अब राखी में भाई-बहन के प्यार का वह ज्वार नहीं दिखायी देता जो शायद कभी रहा होगा। इसलिए राखी के इस परम पावन पर्व पर भाइयों को ईमानदारी से पुनः अपनी बहन ही नहीं बल्कि संपूर्ण नारी जगत की सुरक्षा और सम्मान करने की कसम लेने की अपेक्षा है। तभी राखी का यह पर्व सार्थक बन पड़ेगा और भाई-बहन का प्यार शाश्वत रह पायेगा। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

प्रभासाक्षी 29 Aug 2023 4:10 pm

Raksha Bandhan 2023: भाई-बहिन के स्नेह का प्रतीक है रक्षाबंधन का पर्व

रक्षाबन्धन का पर्व भाई-बहिन के स्नेह का प्रतीक देश का एक प्रमुख त्यौहार है। रक्षाबन्धन पर्व में रक्षासूत्र यानि राखी का सबसे अधिक महत्व है। इस पर्व के दिन बहनें अपने भाई को राखी बांधती हैं। श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाये जाने के कारण इसे श्रावणी पर्व भी कहते हैं। इस दिन ब्राह्मण, गुरु द्वारा भी राखी बांधी जाती है। हिन्दू धर्म के सभी धार्मिक अनुष्ठानों में रक्षासूत्र बांधते समय पण्डित संस्कृत में एक श्लोक का उच्चारण करते हैं। जिसमें रक्षाबन्धन का सम्बन्ध राजा बलि से स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। यह श्लोक रक्षाबन्धन का अभीष्ट मन्त्र है। येन बद्धो बलि राजा दानवेन्द्रो महाबलः तेन त्वाम प्रतिबद्धनामी रक्षे माचल माचलः इस श्लोक का अर्थ है जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बांधा गया था, उसी सूत्र से मैं तुझे बांधता हूं। तुम अपने संकल्प से कभी भी विचलित मत होना। रक्षाबंधन का त्योहार कब शुरू हुआ यह कोई नहीं जानता। लेकिन भविष्य पुराण में इस पर्व का वर्णन मिलता है। जब देवताओं और दानवों में युद्ध शुरू हुआ। तब देवताओं पर दानव हावी होने लगे। देवराज इन्द्र ने घबरा कर देवताओं के गुरू बृहस्पति से मदद की गुहार की। वहां बैठी इन्द्र की पत्नी इन्द्राणी सब सुन रही थी। उन्होंने रेशम का धागा मन्त्रों की शक्ति से पवित्र करके अपने पति के हाथ पर बांध दिया। संयोग से वह श्रावण पूर्णिमा का दिन था। लोगों का विश्वास है कि इन्द्र इस लड़ाई में इसी धागे की मन्त्र शक्ति से ही विजयी हुए थे। उसी दिन से श्रावण पूर्णिमा के दिन यह धागा बांधने की प्रथा चली आ रही है। यह धागा धन, शक्ति, हर्ष और विजय देने में पूरी तरह समर्थ माना जाता है। इसे भी पढ़ें: Raksha Bandhan 2023: रक्षाबंधन को लेकर लोगों के बीच है काफी भ्रम, जानिए कब मनाया जायेगा राखी का पर्व स्कन्ध पुराण, पद्मपुराण और श्रीमद्भागवत में वामनावतार नामक कथा में रक्षाबन्धन का प्रसंग मिलता है। दानवेन्द्र राजा बलि ने जब 100 यज्ञ पूर्ण कर स्वर्ग का राज्य छीनने का प्रयत्न किया तो इन्द्र आदि देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। तब भगवान विष्णु वामन अवतार लेकर ब्राह्मण का वेष धारण कर राजा बलि से भिक्षा मांगने पहुंचे। गुरु के मना करने पर भी राजा बलि ने तीन पग भूमि दान कर दी। भगवान ने तीन पग में सारा आकाश, पाताल और धरती नापकर राजा बलि को पाताल लोक में भेज दिया। कहते कि पाताल लोक में राजा बलि ने भक्ति के बल पर भगवान विष्णु से रात-दिन अपने सामने रहने का वचन ले लिया। भगवान के घर न लौटने से परेशान लक्ष्मी जी को नारद जी ने एक उपाय बताया। उस उपाय का पालन करते हुए लक्ष्मी जी ने राजा बलि के पास जाकर उसे रक्षाबन्धन बांधकर अपना भाई बनाया और अपने पति भगवान विष्णु को अपने साथ ले आयीं। उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी। महाभारत में भी इस बात का उल्लेख है कि जब युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से पूछा कि मैं सभी संकटों को कैसे पार कर सकता हूं। तब भगवान कृष्ण ने उनकी तथा उनकी सेना की रक्षा के लिये राखी का त्योहार मनाने की सलाह दी थी। उनका कहना था कि राखी के इस रेशमी धागे में वह शक्ति है जिससे आप हर विपत्ति से मुक्ति पा सकते हैं। इस समय द्रौपदी द्वारा कृष्ण को तथा कुन्ती द्वारा अभिमन्यु को राखी बांधने के कई उल्लेख मिलते हैं। महाराष्ट्र राज्य में यह त्योहार नारियल पूर्णिमा या श्रावणी के नाम से विख्यात है। इस दिन लोग नदी या समुद्र के तट पर जाकर अपने जनेऊ बदलते हैं और समुद्र की पूजा करते हैं। इस अवसर पर समुद्र के स्वामी वरुण देवता को प्रसन्न करने के लिये नारियल अर्पित करने की परम्परा भी है। राजस्थान में रामराखी और चूड़ाराखी या लूंबा बांधने का रिवाज है। रामराखी सामान्य राखी से भिन्न होती है। इसमें लाल डोरे पर एक पीले छींटों वाला फुंदना लगा होता है। यह केवल भगवान को ही बाँधी जाती है। चूड़ा राखी भाभियों की चूडियों में बांधी जाती है। विष्णु पुराण के एक प्रसंग में कहा गया है कि श्रावण की पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु ने हयग्रीव के रूप में अवतार लेकर वेदों को ब्रह्मा के लिये फिर से प्राप्त किया था। हयग्रीव को विद्या और बुद्धि का प्रतीक माना जाता है। महाभारत में ही रक्षाबन्धन से सम्बन्धित कृष्ण और द्रौपदी का एक और वृत्तान्त भी मिलता है। जब कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया तब उनकी तर्जनी में चोट आ गई। द्रौपदी ने उस समय अपनी साड़ी फाडकर उनकी उंगली पर पट्टी बांध दी। यह श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन था। कृष्ण ने इस उपकार का बदला बाद में चीरहरण के समय उनकी साड़ी को बढ़ाकर चुकाया। कहते हैं परस्पर एक दूसरे की रक्षा और सहयोग की भावना रक्षाबन्धन के पर्व में यहीं से प्रारम्भ हुई। राजपूत योद्धा जब शत्रु से युद्ध करने जाते थे तब महिलाएं उनको माथे पर कुमकुम का तिलक लगाने के साथ हाथ में रेशमी धागा भी बांधती थी। इस विश्वास के साथ कि यह धागा उन्हे विजयश्री के साथ वापस ले आयेगा। राखी के साथ एक और प्रसिद्ध कहानी जुड़ी हुई है। कहते हैं मेवाड़ की रानी कर्मावती को बादषाह बहादुरशाह द्वारा मेवाड़ पर हमला करने की पूर्व सूचना मिली। रानी लडने में असमर्थ थी अतः उसने मुगल बादशाह हुमायूं को राखी भेज कर रक्षा की याचना की। हुमायूं ने मुसलमान होते हुए भी राखी की लाज रखी और मेवाड़ पहुंच कर बहादुरशाह के विरूद्ध मेवाड़ की ओर से लड़ते हुए कर्मावती व उसके राज्य की रक्षा की। एक अन्य प्रसंगानुसार सिकन्दर की पत्नी ने अपने पति के हिन्दू शत्रु पुरू को राखी बांधकर अपना मुंहबोला भाई बनाया और युद्ध के समय सिकन्दर को न मारने का वचन लिया। पुरू ने युद्ध के दौरान हाथ में बंधी राखी और अपनी बहन को दिये हुए वचन का सम्मान करते हुए सिकन्दर को जीवन-दान दिया। उत्तरांचल में इसे श्रावणी कहते हैं। ब्राह्मण अपने यजमानों को यज्ञोपवीत तथा राखी देकर दक्षिणा लेते हैं। अमरनाथ की अतिविख्यात धार्मिक यात्रा गुरु पूर्णिमा से प्रारम्भ होकर रक्षाबन्धन के दिन सम्पूर्ण होती है। कहते हैं इसी दिन यहां का हिमानी शिवलिंग भी अपने पूर्ण आकार को प्राप्त होता है। इस उपलक्ष्य में इस दिन अमरनाथ गुफा में प्रत्येक वर्ष मेले का आयोजन भी होता है। नेपाल के पहाडी इलाकों में ब्राह्मण एवं क्षत्रीय समुदाय में रक्षा बन्धन गुरू के हाथ से बांधा जाता है। लेकिन दक्षिण सीमा में रहने वाले भारतीय मूल के नेपाली भारतीयों की तरह बहन से राखी बंधवाते हैं। रक्षाबन्धन पर्व सामाजिक और पारिवारिक एकबद्धता का सांस्कृतिक उपाय रहा है। विवाह के बाद बहन पराये घर में चली जाती है। इस बहाने प्रतिवर्ष अपने सगे ही नहीं अपितु दूरदराज के रिश्तों के भाइयों तक को उनके घर जाकर राखी बांध कर अपने रिश्तों का नवीनीकरण करती रहती है। समाज के विभिन्न वर्गों के बीच भी एक सूत्रता के रूप में इस पर्व का उपयोग किया जाता है। इस प्रकार जो कड़ी टूट गयी है उसे फिर से जागृत किया जा सकता है। रक्षा बंधन भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक है। भारतीय संस्कृति इतनी लचीली है कि इस में हर संस्कृति समाहित होती चली जाती है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक, सौराष्ट्र से असम तक देखें तो यहां के लोग प्रतिदिन कोई न कोई त्योहार मनाते मिलेंगे। इन त्योहारों के मूल में आपसी रिश्तों के बीच मधुरता घोलने एवं सरसता लाने की भावना रहती है। भाई-बहन के बीच प्यार, मनुहार व तकरार होना एक सामान्य सी बात है। लेकिन रक्षा बंधन के दिन बहन द्वारा भाई के हाथ में बांधे जाने वाले रक्षा सूत्र में भाई के प्रति बहन के असीम स्नेह और बहन के प्रति भाई के कर्तव्यबोध को पिरोया गया है। - रमेश सर्राफ धमोरा (लेखक राजस्थान सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार है। इनके लेख देश के कई समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहतें हैं।)

प्रभासाक्षी 29 Aug 2023 4:05 pm

56 दिन में 1,56,90,898 श्रद्धालुओं ने किए विश्वनाथ के दर्शन

वाराणसी, 29 अगस्त (आईएएनएस)। श्री काशी विश्वनाथ धाम नित नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। सावन माह के 56 दिन में श्री काशी विश्वनाथ धाम में 1 करोड़ 56 लाख 90 हज़ार आठ सौ 98 लोगो ने काशी पुराधिपति के चौखट पर हाजरी लगाई। मंगला आरती के बाद शुरू हुए बाबा के दर्शन की अटूट कतार स्वर्णमंडित गर्भगृह तक अनवरत चलती रही।

लाइफस्टाइल नामा 29 Aug 2023 9:34 am

Sawan Putrada Ekadashi 2023: संतान प्राप्ति की इच्छा से रखा जाता है सावन पुत्रदा एकादशी का व्रत

हर साल सावन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत किया जाता है। इसे पवित्रा एकादशी के नाम से भी जानते हैं। महिलाएं संतान प्राप्ति और अपने बच्चों की खुशहाली के हर साल यह व्रत करती हैं। बता दें कि साल में दो बार पुत्रदा एकादशी का व्रत किया जाता है। पुत्रदा एकादशी का पहला व्रत पौष माह में किया जाता है और दूसरा व्रत सावन माह में किया जाता है। सावन माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को श्रावण पुत्रदा एकादशी भी कहा जाता है। मान्यता के अनुसार, जो भी निसंतान दंपति इस व्रत को पूरे श्रद्धा और भक्ति से रहते हैं और भगवान श्रीहरि विष्णु की पूजा करते हैं। तो उन्हें जल्द ही संतान की प्राप्ति होती है। इस साल आज यानी की 27 अगस्त 2023 को श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत किया जा रहा है। आइए जानते हैं सावन पुत्रदा एकादशी व्रत का मुहूर्त, व्रत पारण समय और महत्व के बारे में... इसे भी पढ़ें: Pradosh Vrat 2023: पांच शुभ योग में रखा जायेगा सावन का अंतिम प्रदोष व्रत श्रावण पुत्रदा एकादशी तिथि इस साल सावन पुत्रदा एकादशी का व्रत 27 अगस्त 2023 को रखा जा रहा है। बता दें कि यह व्रत रक्षाबंधन के चार दिन पहले पड़ रहा है। जो भी दंपति पुत्र प्राप्ति की इच्छा रखते हैं, उनके लिए यह व्रत काफी ज्यादा महत्वपूर्ण है। सावन पुत्रदा एकादशी 2023 शुभ मुहूर्त हिंदू पंचांग के मुताबिक 27 अगस्त 2023 को सावन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरूआत सुबह 12:08 मिनट पर होगी। वहीं रात को 09:32 मिनट पर एकादशी तिथि की समाप्ति होगी। वहीं भगवान श्रीहरि विष्णु के पूजन का शुभ मुहूर्त सुबह 07:33 मिनट से सुबह 10:46 मिनट तक रहेगा। व्रत पारण समय सावन पुत्रदा एकादशी व्रत का पारण अगले दिन यानी की 28 अगस्त को सुबह 05:57 मिनट से सुबह 08:31 मिनट तक के बीच किया जाएगा। वहीं 28 अगस्त को शाम 06:22 मिनट पर द्वादशी तिथि समाप्त होगी। पुत्र प्राप्ति के लिए खास है यह व्रत धार्मिक मान्यता के अनुसार, एकादशी का व्रत करने वाले जातक की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है। इसके साथ ही व्यक्ति को श्रीहरि विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है। ऐसे में इन एकादशी में पुत्रदा एकादशी भी आती है। सावन के महीने में पुत्रदा एकादशी का व्रत करने वाले दंपति को संतान प्राप्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। बता दें कि पुत्रदा एकादशी साल में दो बार पड़ता है। पुत्रदा एकादशी का पहला व्रत पौष और दूसरा सावन माह में पड़ता है। सावन पुत्रदा एकादशी महत्व धार्मिक गंथों के मुताबिक संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपति को विधिपूर्वक श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करना चाहिए। इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति को लोक में समस्त भौतिक सुखों की प्राप्ति होने के साथ ही परलोक में स्वर्ग की प्राप्ति होती है। इस एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिलती है। साथ ही सभी तरह के ग्रह दोषों से भी मुक्ति मिलती है।

प्रभासाक्षी 27 Aug 2023 9:43 am

Raksha Bandhan 2023 Date: रक्षाबंधन पर राखी बांधते वक्त जरूर पढ़ें यह मंत्र, भाई को मिलेगी हर काम में विजय

रक्षाबंधन 30 अगस्त को या 31 अगस्त को महर्षि योगी आश्रम प्रयागराज के आचार्य प्रदीप पाण्डेय का कहना है कि सावन पूर्णिमा तिथि 30 अगस्त को सुबह 10.59 बजे से शुरू हो रही है, और यह तिथि 31 अगस्त सुबह 7.05 बजे संपन्न हो रही है। इधर, पूर्णिमा तिथि के साथ ही भद्रा काल भी शुरू हो जाएगा और भद्राकाल में श्रावणी पर्व मनाना निषिद्ध है। आचार्य पाण्डेय के अनुसार भद्राकाल 30 अगस्त को रात 9.02 बजे तक भद्राकाल है। इसलिए इस समय के बाद ही रक्षाबंधन मनाना ठीक रहेगा। वैसे रक्षाबंधन का पर्व दोपहर को मनाना ठीक रहता है। लेकिन शास्त्रों का कहना है कि दोपहर में भद्राकाल रहे तो प्रदोषकाल में रक्षाबंधन मनाना चाहिए। इसलिए इस समय के बाद राखी का पर्व मनाया जा सकता है। इसके अलावा पूर्णिमा 31 अगस्त को सुबह 7.05 बजे तक है, इसलिए 30 अगस्त रात और 31 अगस्त सुबह, दोनों दिन रक्षाबंधन का पर्व मनाया जा सकेगा। रक्षाबंधन का शुभ मुहूर्त आचार्य के अनुसार रक्षाबंधन 30 अगस्त को रात 9.02 बजे से शुरू होगा और यह अगले दिन 31 अगस्त सूर्योदय को 7.05 बजे तक मनाया जा सकेगा। ये भी पढ़ेंः Rakshabandhan 2023: श्रीकृष्ण ने कैसे निभाया भाई का फर्ज, पांच कहानियों से जानें रक्षाबंधन का महत्व और परंपरा ये भी पढ़ेंः ये हैं सावन में रुद्राक्ष धारण करने के नियम, शिवजी हो जाते हैं प्रसन्न, करोड़पति बनने की खुल जाती है राह ऐसे मनाएं रक्षाबंधन, ये पढ़ें मंत्र वैसे तो रक्षाबंधन हर घर में सदियों से मनाया जा रहा है, लेकिन आचार्य पाण्डेय का कहना है कि भाई को राखी बांधने से पहले भाई बहन को कुछ खाना नहीं चाहिए और रक्षाबंधन के लिए एक थाली में रोली, अक्षत, दीया, कुमकुम और मिठाई रखें। भाई का तिलक करें और फिर दायें हाथ में राखी बांधें। इसके बाद उसकी आरती उतारें। रक्षाबंधन के समय बहन को येन बद्धो बलि राजा, दानवेंद्रो महाबलः, तेन त्वाम् प्रतिबद्धनाम्, रक्षे माचल माचलः मंत्र का जाप भी करना चाहिए। साथ ही भाई से रक्षा का वचन लेना चाहिए।

पत्रिका 26 Aug 2023 12:39 pm

Varalaxmi Vratham 2023: वरलक्ष्मी व्रत करने से धन-धान्य में नहीं होगी कमी, इस खास मुहूर्त में करें पूजा

सावन के आखिरी शुक्रवार को वरलक्ष्मी व्रत रखा जाता है। इस साल यह व्रत आज यानी की 25 अगस्त 2023 को किया जा रहा है। वैसे तो हर शुक्रवार मां लक्ष्मी को समर्पित होता है। लेकिन सावन के शुक्रवार का अपना विशेष महत्व होता है। सावन के आखिरी शुक्रवार को वरलक्ष्मी का व्रत किया जाता है। बता दें कि सावन के आखिरी शुक्रवार को मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना जरूर करनी चाहिए। वहीं इस दिन व्रत रखने वाले व्यक्तियों पर मां लक्ष्मी की विशेष कृपा बरसती है। उनके जीवन में कभी भी धन-धान्य की कमी नहीं होती है। आइए जानते हैं वरलक्ष्मी व्रत का महत्व, पूजन विधि और शुभ मुहूर्त के बारे में... वरलक्ष्मी व्रत का महत्व वरलक्ष्‍मी व्रत सभी मनोकामनाओं को पूरा करने वाला माना गया है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, वरलक्ष्मी मां भगवान श्रीहरि विष्णु की पत्नी हैं। वरलक्ष्मी को महालक्ष्मी का अवतार माना जाता है। ऐसे में सावन के आखिरी शुक्रवार को मां वरलक्ष्मी की पूजा-अर्चना करने से घर में धन-धान्य की कमी नहीं होती है। यह व्रत विवाहित महिलाओं के लिए बहुत खास होता है। इस व्रत को करने से घर में सुख-समृद्धि का आगमन होता है और परिवार के सदस्यों में आपसी प्रेम बना रहता है। इस व्रत को करने से संतान का सुख भी प्राप्त होता है। इसे भी पढ़ें: Sawan Putrada Ekadashi 2023: 27 अगस्त को रखा जायेगा सावन पुत्रदा एकादशी का व्रत पूजा का शुभ मुहूर्त आज 25 अगस्‍त यानी कि सावन के आखिरी शुक्रवार को वरलक्ष्मी का व्रत किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश के अलावा आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और उड़ीसा के लोग भी इस व्रत को करते हैं। बता दें कि आज सिंह लग्‍न की पूजा सुबह 05:55 मिनट से सुबह 07:42 मिनट तक होगी। वहीं दोपहर 12:17 मिनट से 02:36 मिनट तक वृश्चिक लग्‍न की पूजा होगी। कुंभ लग्‍न की पूजा शाम को 06:22 मिनट से लेकर रात को 07:50 मिनट तक होगी। साथ ही रात को 10:50 मिनट से 12:45 मिनट तक वृषभ लग्‍न की पूजा की जाती है। वरलक्ष्मी व्रत का पूजा मंत्र वरलक्ष्मीर्महादेवि सर्वकाम-प्रदायिनी यन्मया च कृतं देवि परिपूर्णं कुरुष्व तत् वरलक्ष्‍मी व्रत की पूजा विधि इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि कर लें। इसके बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करे। घर की साफ-सफाई कर पूरे घर में गंगाजल छिड़कें। इसके बाद घर के बाहर आप रंगोली बनाएं। वहीं घर के मुख्य द्वार पर दोनों तरफ स्वास्तिक का चिन्ह बनाएं। इसके बाद मां लक्ष्मी और भगवान श्रीहरि विष्णु की मूर्ति या प्रतिमा स्थापित करें। फिर उन्हें पंचामृत से स्नान कराएं और फिर नए वस्त्र पहनाएं। इसके बाद उनका श्रृंगार करें। बता दें कि वरलक्ष्मी व्रत के दौरान मां लक्ष्मी की ठीक वैसे ही पूजा की जाती है, जैसे कि दीपावली में की जाती है। विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर भगवान श्रीगणेश की पूजा करें। भोग अर्पित कर आरती करें।

प्रभासाक्षी 25 Aug 2023 8:24 am

Sawan Putrada Ekadashi 2023: 27 अगस्त को रखा जायेगा सावन पुत्रदा एकादशी का व्रत

सावन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को श्रावण पुत्रदा एकादशी के नाम से जाना जाता है। इसे पवित्रा एकादशी भी कहते हैं। हर साल महिलाएं संतान प्राप्ति और अपने बच्चों की खुशहाली के लिए कई व्रत रखती हैं। इन्हीं में से एक पुत्रदा एकादशी होती है। साल में दो बार पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा जाता है। पहला व्रत पौष माह और दूसरा व्रत सावन के महीने में रखा जाता है। सावन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को श्रावण पुत्रदा एकादशी के नाम से जाना जाता है। इसे पवित्रा एकादशी भी कहते हैं। माना जाता है कि इस दिन निसंतान दंपत्ति व्रत रखकर, श्रीहरि की विधिपूर्वक पूजा करें, तो उन्हें जल्द ही संतान प्राप्ति होती है। है। पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डॉ अनीष व्यास ने बताया कि श्रावण पुत्रदा एकदाशी का व्रत दिनांक 27 अगस्त को रखा जाएगा और ये व्रत रक्षाबंधन से चार दिन पहले रखा जाता है। जिन दांपत्तियों को पुत्र नहीं होता है। उसके लिए पुत्रदा एकदाशी बेहद महत्वपूर्ण है। सनातन धर्म में कुल मिलाकर पूरे साल में 24 एकादशी पड़ती है और सभी एकादशी का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी के दिन व्रत रखने से व्यक्ति की सभी मनोकामना पूरी हो जाती है और भगवान विष्णु के आशीर्वाद की भी प्राप्ति होती है। अब ऐसे में इन सभी एकादशी में एक पुत्रदा एकादशी भी है। श्रावण मास में पुत्रदा एकदाशी के दिन व्रत रखने से संतान प्राप्ति के आशीर्वाद की प्राप्ति होती है। वहीं साल में दो पुत्रदा एकादशी पड़ती है। पहला पौष में और दूसरा सावन माह में । जिसे श्रावण पुत्रदा एकादशी के नाम से जाना जाता है। इसे पवित्रा एकादशी भी कहते हैं। सावन पुत्रदा एकादशी तिथि ज्योतिषाचार्य डॉ अनीष व्यास ने बताया कि सावन पुत्रदा एकादशी का व्रत 27 अगस्त 2023 को रखा जाने वाला है। ये व्रत रक्षाबंधन के चार दिन पहले पड़ रहा है। जो भी दंपत्ति पुत्र प्राप्ति की इच्छा रखते हों, उनके लिए पुत्रदा एकादशी काफी महत्वपूर्ण व्रत है। इसे भी पढ़ें: Sawan Shukrwar Ke Upay: बेहद खास हैं सावन के शुक्रवार, इन उपायों को करने से नहीं होगी धन की कमी सावन पुत्रदा एकादशी शुभ मुहूर्त भविष्यवक्ता एवं कुंडली विश्लेषक डॉ अनीष व्यास ने बताया कि हिंदू पंचांग के अनुसार सावन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 27 अगस्त 2023 को सुबह 12:08 मिनट पर होगी। इसी दिन रात्रि 09:32 मिनट पर एकादशी तिथि का समापन होगा। वहीं, विष्णु जी की पूजा के लिए शुभ मुहूर्त सुबह 07:33 मिनट से सुबह 10:46 मिनट तक रहेगा। व्रत पारण समय कुंडली विश्लेषक डॉ अनीष व्यास ने बताया कि सावन पुत्रदा एकादशी व्रत का पारण 28 अगस्त 2023 को सुबह 05:57 मिनट से सुबह 08:31 मिनट तक किया जाएगा। द्वादशी तिथि 28 अगस्त को शाम 06:22 मिनट पर समाप्त होगी। महत्व भविष्यवक्ता एवं कुंडली विश्लेषक डॉ अनीष व्यास ने बताया कि धर्म ग्रंथों के अनुसार पुत्र की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को विधि पूर्वक श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करना चाहिए। इस व्रत के प्रभाव से लोक में समस्त भौतिक सुख और परलोक में स्वर्ग की प्राप्ति होती है। सावन पुत्रदा एकादशी व्रत करने से व्यक्ति के पाप नष्ट हो जाते हैं, साथ ही ग्रह दोषों से भी मुक्ति मिलती है। सावन पुत्रदा एकादशी पर संतान सुख के लिए निर्जला व्रत कर रात्रि जागरण करें और फिर अगले दिन व्रत का पारण करें। - डॉ अनीष व्यास भविष्यवक्ता एवं कुंडली विश्लेषक

प्रभासाक्षी 24 Aug 2023 5:20 pm

Jind : हाईकोर्ट के आदेश पर 23 साल बाद जयपुर गांव में किसान को मिला जमीन पर कब्जा

गांव बुढ़ाखेड़ा के किसान ने खरीदी थी सवा दो एकड़ जमीन प्रशासन ने दलबल के साथ धान की फसल की जोताई करवाकर दिलाया कब्जा

हरि भूमि 22 Aug 2023 9:59 pm

Onam 2023: दक्षिण भारत में धूमधाम से मनाया जाता है ओणम पर्व, जानिए इसका शुभ मुहूर्त और महत्व

ओणम दक्षिण भारत का प्रमुख त्योहार है। केरल राज्य में विशेष रूप से यह त्योहार काफी धूमधाम और हर्षोल्लास से मनाया जाता है। बता दें कि ओणम का पर्व केरल में 10 दिनों तक चलता है। मलयालम कैलेंडर के मुताबिक चिंगम महीने में ओणम का पर्व मनाया जाता है। मलयालम कैलेंडर का पहला महीना चिंगम होता है। चिंगम का महीना अगस्त-सितंबर के बीच में आता है। मान्यता के अनुसार, राजा महाबली अपनी समस्त प्रजा से मिलने के लिए ओणम यानी थिरुओणम के दिन आते हैं। इसी खुशी में यह त्योहार मनाया जाता है। केरल राज्य में हर साल इसका अलग ही महत्व देखने को मिलता है। आइए जानते हैं कि ओणम त्योहार की शुरूआत कब से हो रही है और इस पर्व के महत्व और त्योहार की खास बातों के बारे में... इसे भी पढ़ें: Kalki Jayanti 2023: कल्कि जयंती व्रत से भक्तों को मिलता है मोक्ष ओणम 2023 पर्व की शुरुआत बता दें कि साल 2023 में इस पर्व की शुरूआत 20 अगस्त से हुई है। वहीं ओणम पर्व की समाप्ति 31 अगस्त को होगी। इस बीच 10 दिनों कर चलने वाले त्योहार में हर दिन खास होता है। वहीं 10वें दिन थिरुवोणम या ओणम पर्व का मनाया जाएगा। ओणम 2023 कैलेंडर पहला ओणम- 28 अगस्त 2023, सोमवार थिरुवोणम- 29 अगस्त 2023, मंगलवार तीसरा ओणम- 30 अगस्त 2023, बुधवार चौथा ओणम- 31 अगस्त 2023, गुरुवार दस दिनों तक चलता है पर्व बता दें कि यह पर्व 10 दिनों तक चलता है। इस त्योहार के पहले दिन और आखिरी दिन को थीरुओणम कहा जाता है। यह पर्व उल्लास, उमंग और परंपराओं से भरा हुआ है। इस दिन केरल में फेमस सर्प नौका दौड़ और कथकली नृत्य का आयोजन किया जाता है। ओणम 2023 महत्व इस पर्व के दौरान राजा बलि पाताल से प्रजा को आशीर्वाद देने आते हैं। भगवान श्रीहरि विष्णु ने इन्हीं दस दिनों के दौरान वामन अवतार लिया था। इस त्योहार में फूलों का अधिक महत्व होता है। जिसमें फूल सिर्फ पुरुषों द्वारा लाए जाते हैं। वहीं फूलों को महिलाओं द्वारा पुष्प कालीन से जोड़ा जाता है। इन फूलों से ही रंगोली बनाई जाती है। ओणम की पूजा से घर में सुख-समृद्धि आती है और वैवाहिक जीवन खुशियों से भर जाता है। मान्यता के अनुसार जो भी दंपति ओणम की पूजा साथ में करते हैं। उनके वैवाहिक जीवन में मधुरता बनी रहती है। ओणम पूजा करने से भगवान श्रीहरि विष्णु की असीम कृपा प्राप्त होती है। इस दस दिवसीय पर्व में केले और पापड़ का नाश्ता किया जाता है। भगवान विष्णु ने राजा बलि को वामन अवतार में दर्शन दिए थे और वह आज भी उनके साथ हैं। ओणम की पूजा करने से भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

प्रभासाक्षी 22 Aug 2023 12:29 pm

Kalki Jayanti 2023: कल्कि जयंती के दिन भगवान विष्णु का आखिरी अवतार लेगा जन्म, 64 कलाओं में होंगे परिपूर्ण

आज यानी की 22 अगस्त 2023 को कल्कि जयंति मनाई जा रही है। बता दें कि कल्कि भगवान श्रीहरि विष्णु के 10वें अवतार है। अभी तक धरती पर कल्कि ने अवतार नहीं लिया है। धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को भगवान कल्कि जन्म लेंगे। भगवान श्रीहरि विष्णु का यह अवतार कलयुग का अंत करेगा। आइए जानते हैं कल्कि जयंती के शुभ मुहूर्त, महत्व और पूजा विधि के बारे में... कल्कि जयंती 2023 शुभ मुहूर्त हिंदू पंचांग के मुताबिक श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि 22 अगस्त 2023 को देर रात 2 बजे से शुरू होगी। वहीं 23 अगस्त 2023 को देर रात 03:05 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। उदयातिथि की वजह से 22 अगस्त 2023 को कल्कि जयंती मनाई जाएगी। इस दिन किसी भी समय भगवान विष्णु के भक्त दिन में भगवान कल्कि की पूजा कर सकते हैं। इसे भी पढ़ें: Nag Panchami: भगवान शिव के साथ नागदेव की पूजा से मिलता है विशेष फल कल्कि जयंती का महत्व मान्यता के अनुसार, सावन माह की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को जगत के पालनहार भगवान विष्णु का 10वां अवतार कल्कि धरती पर जन्म लेंगे। भगवान विष्णु का यह अवतार 64 कलाओं में पारंगत होंगे। जिसके बाद यह अवतार कलयुग का अंत करेगा। बताया जाता है कि जब कलयुग में लोग बहुत ज्यादा अत्याचारी व दुराचारी हो जाएंगे। हर तरफ पाप बढ़ेगा और लोग एक-दूसरे के दुश्मन बन जाएंगे। धरती पर मनुष्य के दुष्कर्मों के कारण त्राहिमाम मच जाएगा। तब इस अत्याचार व पाप का अंत करने और धरती पर फिर से धर्म की स्थापना करने के लिए भगवान विष्णु कल्कि रूप में जन्म लेंगे। ऐसे करें पूजा श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि पर सूर्योदय से पहले उठ कर स्नान आदि करें और श्रीहरि विष्णु को प्रणाम कर अपने दिन की शुरुआत करें। इसके बाद पीले रंग के कपड़े पहनें और सूर्य देव को अर्घ्य दें। अब पूजा घर में लकड़ी की चौकी पर पीले रंग का कपड़ा बिछाकर इस पर भगवान श्रीहरि विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति व प्रतिमा स्थापित करें। फिर पंचोपचार कर भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करें। पूजा के दौरान श्रीहरि को फल, फूल, दूध, केसर मिला दूध, दही, घी, मक्खन, मिश्री आदि चढ़ाएं। अब विष्णु चालीसा का पाठ कर कल्कि मंत्र का जाप करें। आखिरी में सुख-समृद्धि और शांति के लिए भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी से कामना करें। पूरा दिन व्रत करें और शाम को आरती के बाद फलाहार करें। फिर अगले दिन पूजा-अर्चना कर व्रत का पारण करें।

प्रभासाक्षी 22 Aug 2023 9:41 am

Guar Ka Bhav : ग्वार कराएगा किसानों की बल्ले-बल्ले! यहां देखें कितनी चढ़े दाम

Guar Ka Bhav : ग्वार कराएगा किसानों की बल्ले-बल्ले! यहां देखें कितनी चढ़े दाम

हरयाणा क्रांति 19 Aug 2023 9:24 pm

Chandra Darshan 2023: अधिक मास की अमावस्या के बाद आज करें चंद्र दर्शन, ऐसे करेंगे पूजा तो पूरी होगी हर मनोकामना

सनातन धर्म में सूर्य और चंद्रमा को प्रत्यक्ष देवता माना गया है। इसलिए भगवान सूर्य देव और चंद्रमा की पूजा का विशेष महत्व होता है। चंद्र दर्शन व पूजन के लिए पूर्णिमा आदि तिथि बेहद शुभ होती हैं। हिंदू मान्यता के मुताबिक भगवान शिव ने जिस चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण कर रखा है, चंद्र दर्शन वाले दिन उनकी पूजा करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है। चंद्र दर्शन के दिन का आध्यात्मिक ही नहीं बल्कि ज्योतिषीय महत्व भी माना गया है। चंद्र दर्शन का शुभ मुहूर्त हिंदू पंचांग के अनुसार, सावन अधिक मास की अमावस्या के समाप्त होने के बाद अगले दिन यानी की 17 अगस्त 2023 को शाम को 06:59 से 07:44 के बीच चंद्र दर्शन कर सकेंगे। 01 घंटा 19 मिनट में किया जाने वाला चंद्र दर्शन और पूजा से शुभ फल प्राप्त होगा। इसे भी पढ़ें: Simha Sankranti 2023: सिंह संक्रांति पर सूर्य देव को अर्घ्य देने से बरसेगी कृपा, सूर्य के तेज सी रोशन होगी आपकी किस्मत कैसे करें चंद्र दर्शन बता दें कि हिंदू धर्म में चंद्र दर्शन को सुख और सौभाग्य का माध्यम माना गया है। इसके लिए व्यक्ति का न सिर्फ तन बल्कि मन से भी पवित्र होना बहुत जरूरी होता है। स्नान आदि कर सफेद वस्त्र धारण करें और फिर विधि-विधान से चंद्र देव पूजा-अर्चना करें। शुभ फल की प्राप्ति के लिए आज के दिन चंद्र देव को गंगाजल और दूध से अर्घ्य देना चाहिए। फिर धूप-दीप कर मोती व रूद्राक्ष की माला से 'ऊँ सोमाय नम:' मंत्र का जाप करें। चंद्र दर्शन वाले दिन चंद्र देव को खीर का भोग लगाने से जातक की हर मनोकामना पूरी होती है। जानिए चंद्र दर्शन के लाभ हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार, चंद्र दर्शन का बहुत ज्यादा पुण्यफल माना जाता है। यदि इस दिन कोई व्यक्ति फूरी श्रद्धा व भक्ति के साथ चंद्र देव की पूजा करता है, तो उसे कुंडली में चंद्र ग्रह के शुभ फलों की प्राप्ति होती है। वहीं ज्योतिष के मुताबिक चंद्र दर्शन करने वाले के मन को शांति और सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है। चंद्र दर्शन आपसी प्रेम व सामंजस्य बढ़ाने का काम करता है।

प्रभासाक्षी 17 Aug 2023 8:17 am

Simha Sankranti 2023: सिंह संक्रांति पर सूर्य देव को अर्घ्य देने से बरसेगी कृपा, सूर्य के तेज सी रोशन होगी आपकी किस्मत

ग्रहों के राजा सूर्य देव जब एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करते हैं, तो उसे संक्रांति कहते हैं। आज यानी की 17 अगस्त को सूर्य देव अपनी स्वराशि सिंह राशि में प्रवेश करने जा रहे हैं। इस संक्रांति को सिम्हा या सिंह संक्रांति कहा जाता है। ज्योतिष में इस संक्रांति की बेहद अहम महत्व बताया गया है। आज सूर्य देव कर्क राशि से निकलकर सिंह राशि में प्रवेश करेंगे। ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार, सिंह संक्रांति के दिन सूर्य देव की विशेष पूजा-अर्चना महत्व होता है। इसके अलावा भगवान विष्णु और नरसिंह देव की विधि-विधान से पूजा अर्चना की जाती है। बता दें कि ग्रहों के देवता सूर्य हर महीने राशि परिवर्तन करते हैं। आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको सिंह संक्रांति की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व के बारे में बताने जा रहे हैं। इसे भी पढ़ें: Adhikmaas Amavasya 2023: अधिकमास अमावस्या व्रत से मिलती है सुख-समृद्धि तिथि और शुभ मुहूर्त धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सूर्य देव को प्रत्यक्ष देवता माना जाता है। सूर्य देव की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने पर आरोग्यता का आशीर्वाद प्राप्त होता है। वहीं आज यानी की 17 अगस्त 2023 को सिंह संक्रांति है। आज यानी की 17 अगस्त की सुबह 06:44 मिनट से सिंह संक्रांति शुरू होगी। वहीं 18 अगस्त को दोपहर 01:44 मिनट पर इसकी समाप्ति होगी। आज सूर्य देव कर्क राशि से निकलकर सिंह राशि में गोचर करेंगे। सिंह संक्रांति के मौके पर सुबह स्नान आदि कर सूर्यदेव को अर्घ्य देने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। देश के उत्तरी और दक्षिणी हिस्से में इस दिन को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। पूजा विधि और मंत्र सिंह संक्रांति के दिन किसी पवित्र नदी में स्नान करना शुभ माना जाता है। अगर नदी में स्नान करना संभव नहीं हो, तो नहाने के पानी में थोड़ा से गंगाजल मिलाकर स्नान कर सकते हैं। सुबह स्नान आदि कर सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है। आज के दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर तांबे के लोटे में जल भरकर उसमें लाल फूल, रोली, अक्षत और कुमकुम मिलाकर उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दें। सूर्य देव को अर्घ्य देते समय ओम् आदित्याय विद्महे सहस्र किरणाय धीमहि तन्नो सूर्य: प्रचोदयात् मंत्र का जाप करना चाहिए। सूर्य भगवान को अर्घ्य देने के बाद अपने स्थान की तीन बार परिक्रमा करें। फिर सूर्य देव को प्रणाम कर अपने जीवन में आने वाले दुखों को दूर करने की प्रार्थना करें। मान्यता के अनुसार, ऐसा करने से तमाम दुखों का अंत हो जाता है। सूर्य नारायण की पूजा के बाद जगत के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु व नरसिंह भगवान की पूजा करें। सिंह संक्रांति के मौके पर श्रीहरि विष्णु को तुलसी दल अर्पित करना फलदाय़ी होता है।

प्रभासाक्षी 17 Aug 2023 8:03 am

Adhikmaas Amavasya 2023: अधिकमास अमावस्या व्रत से मिलती है सुख-समृद्धि

आज अधिकमास अमावस्या है, हिन्दू धर्म में अमावस्या का खास महत्व है, तो आइए हम आपको अधिकमास अमावस्या व्रत की विधि एवं महत्व के बारे में बताते हैं। जानें अधिकमास अमावस्या के बारे में हिंदू धर्म में अधिकमास महीने का खास महत्व माना गया है। अधिकमास की अमावस्या 3 साल बाद आती है। अधिकमास हर तीन साल में एक बार लगता है और इस 30 दिन की अवधि में पड़ने वाली अमावस्‍या, अधिकमास की अमावस्‍या कहलाती है। इस बार अधिकमास की अमावस्‍या 16 अगस्‍त को है। इस दिन किए जाने वाले कुछ काम बहुत पुण्यदायी माने जाते हैं। पंडितों का मानना है कि इस दिन कुछ दुर्लभ उपाय करने से आपके जीवन में बड़े बदलाव आ सकते हैं और आपका बुरा समय टल जाएगा। अधिकमास अमावस्या का महत्व पंडितों के अनुसार अमावस्या के दिन स्नान-दान और तर्पण इत्यादि कर्म करने से साधकों को सुख एवं समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। साथ ही जीवन में आ रही कई प्रकार की समस्याओं से भी छुटकारा मिलता है। वहीं, कालसर्प दोष निवारण की पूजा करने के लिए भी अमावस्या का दिन उपयुक्त होता है। इस विशेष दिन पर पीपल के पेड़ की उपासना करने से व्यक्ति को सुख, समृद्धि एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। इसे भी पढ़ें: Adhik Maas Amavasya 2023: अधिक मास की अमावस्या पर करें भगवान शिव की आराधना, जीवन में मिलेगी अपार सफलता अधिकमास अमावस्या के दिन करें ये उपाय, मिलेगा लाभ पंडितों के अनुसार अधिकमास अमावस्या की शाम को घर के ईशान कोण में गाय के घी का दीपक जलाएं। बत्ती के रूप में लाल रंग के धागे का उपयोग करें, इसमें थोड़ा केसर भी डालें। इस उपाय से घर में मां लक्ष्मी का आगमन होता है। अमावस्या के दिन भोले शंकर को शमी के पत्ते और बेलपत्र अर्पित करें। ऐसा करने पर आपको जीवन में आ रहे कष्टों से मुक्ति मिलती है। साथ ही इस दिन भगवान शिव पर कनेर का फूल चढ़ाने से व्यक्ति को कई प्रकार के शारीरिक कष्टों से भी छुटकारा मिलता है। अमावस्या के दिन पितृ दोष से मुक्ति के लिए करें ये उपाय इस विशेष दिन पर सुबह उठकर नदी में स्नान कर पिंडदान और श्राद्ध कर्म करें। ऐसा कनरे पर पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। अमावस्या के दिन शिवलिंग पर तिल चढ़ाने से पितृ शांत होते हैं। साथ ही पितृ दोष दूर होता है। अमावस्या पर करें ये, नकारात्मक ऊर्जा से मिलेगा छुटकारा अमावस्या के पानी में खड़ा नमक डालकर पौंछा लगाएं। ऐसा करने घर में मौजूद से नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है। जिससे घर-परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। जानें अधिकमास अमावस्या का शुभ मुहूर्त पंडितों के अनुसार हर 3 साल बाद पड़ने वाली अधिकमास की अमावस्या की तिथि 15 अगस्त 2023, मंगलवार को दोपहर 12 बजकर 42 मिनट शुरू होगी और इसका समापन 16 अगस्त को दोपहर 03 बजकर 07 मिनट हो जाएगा। इसी के साथ करीब एक महीने तक चलने वाला मलमास का महीना भी खत्म हो जाएगा और दोबारा से सावन का महीना शुरू जाएगा। अधिकमास अमावस्या व्रत से पितृदोष होता है दूर वैदिक ज्योतिष शास्त्र में पितृदोष का विशेष महत्व होता है। पितृदोष को शुभ नहीं माना जाता है। हिंदू धर्म के अनुसार जब भी किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो उसका अंतिम संस्कार विधि-विधान से करना जरूरी होता है। ऐसे में जिन लोगों की मृत्यु होती है और उनका अंतिम संस्कार सही तरीके से नहीं हो पाता है तो उनके परिजनों के ऊपर कई पीढ़ियों तक पितृदोष लगल जाता है। जिन जातकों के ऊपर यानी उनकी कुंडली में पितृदोष होता है वे संतान के सुख से वंचित रहते हैं। पितृदोष से पीड़ित व्यक्ति को नौकरी, व्यवसाय और घर-गृहस्थी पर बुरा प्रभाव पड़ता है। पितृदोष होने पर अक्सर बुरे-बुरे सपने आते हैं। अधिकमास अमावस्या व्रत से पितृदोष से ग्रसित लोगों को लाभ मिलता है। अधिकमास अमावस्या पर बन रहा है ये शुभ संयोग अभी अधिकमास चल रहा है, जो कि 16 अगस्त को खत्म हो जाएगा। यानी कि अमावस्या के दिन जहां अधिकमास खत्म होगा वहीं दूसरी तरफ सावन माह भी प्रारंभ हो जाएगा। दोनों खास दिन की तिथि एक साथ पड़ने से यह दिन और अधिक शुभ माना जा रहा है। अधिकमास अमावस्या के दिन विष्णु जी के उपासना के साथ भगवान भोलेनाथ की पूजा करना भी फलदायी साबित होगा। अधिकमास में भगवान नारायण की पूजा का विधान है, जबकि सावन शिवजी का अति प्रिय महीना है। अधिक मास को मलमास और पुरुषोत्तम मास के नाम से भी जाना जाता है। अधिकमास अमावस्या पर करें ये उपाय अधिकमास की अमावस्या तिथि का विशेष महत्व होता है। पंडितों के अनुसार अधिकमास अमावस्या पर भगवान शिव की पूजा करने का विशेष रूप से लाभ होता है। कुंडली से पितृदोष संबंधी ग्रह दोष को दूर करने के लिए इस दिन शिवलिंग पर जल, दूध, दही, शहद और काला तिल चढ़ाना चाहिए। इसके अलावा लंबी आयु और मृत्यु के भय को दूर करने के लिए शिवलिंग पर सफेद आक का फूल, बेलपत्र, भांग और धतूरा आदि चढ़ाएँ। अमावस्या तिथि पर पितरों को तर्पण करें और सूर्यदेव को तांबे के लोटे से जल अर्पित करें। अमावस्या तिथि पर मंत्रों का जाप करना बहुत ही लाभदायक माना जाता है। इस गंगास्नान करने के बाद पितृसूक्त, पितृ स्तोत्र और पितृ कवच का पाठ करना चाहिए। - प्रज्ञा पाण्डेय

प्रभासाक्षी 16 Aug 2023 12:20 pm

CWC List : कांग्रेस आज जारी कर सकती है सीडब्ल्यूसी सूची, सामने आ रहा इन नेताओं का नाम!

कांग्रेस की सर्वोच्च अधिकार प्राप्त समिति (CWC) की बुधवार को घोषणा हो सकती है। कहा जा रहा है कि इसमें छत्तीसगढ़ से प्रभारी शैलजा और सीएम होने के नाते भूपेश बघेल का नाम पक्का माना जा रहा है। अब देखना ये होगा कि किन नेताओं को सीडब्ल्यूसी की लिस्ट में शामिल किया जाएगा।

हरि भूमि 16 Aug 2023 10:00 am

Adhik Maas Amavasya 2023: अधिक मास की अमावस्या पर करें भगवान शिव की आराधना, जीवन में मिलेगी अपार सफलता

सावन मास के बीच 18 जुलाई से अधिक मास की शुरूआत हुई थी। जिसके बाद आज यानी की 16 अगस्त 2023 को अधिक मास का समापन हो रहा है। पूरे 19 साल बाद सावन में अधिक मास का संयोग बन रहा है। बता दें कि आज 16 अगस्त को अधिक मास की अमावस्या है। अमावस्या का दिन पूर्वजों की आत्मा की तृप्ति के लिए और श्राद्ध रस्मों को करने के लिए बेहद अच्छा माना जाता है। वहीं आज के दिन कुछ विशेष उपायों को करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है। अधिकमास की अमावस्या तिथि सावन माह की अमावस्या तिथि की शुरूआत 15 अगस्त को दोपहर 12:42 मिनट से होगी। वहीं 16 अगस्त को 03:07 मिनट पर इसका समापन होगा। ऐसे में 16 अगस्त 2023 को अधिक मास की अमावस्या मनाई जा रही है। सावन माह की इस अमावस्या पर गंगा स्नान का अधिक महत्व होता है। अगर आप गंगा स्नान कर पाने में असमर्थ हैं, तो नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्नान करें। इस तरह से स्नान करने से आपको गंगा स्नान के बराबर पुण्य प्राप्त होगा। इसे भी पढ़ें: Adhik Maas Shivratri 2023: अधिकमास शिवरात्रि व्रत से होती है भोलेनाथ की कृपा भगवान गणेश की पूजा अधिक मास की अमावस्या को बुधवार का दिन पड़ रहा है। वहीं बुधवार का दिन भगवान श्री गणेश को समर्पित होता है। इसलिए आज के दिन पूजा की शुरूआत गणेश भगवान से करें। इससे आपको विशेष फल की प्राप्ति होगी। सुबह जल्दी स्नान आदि कर गणेश जी को पंचामृत से स्नान कराएं और फिर शुद्ध जल से स्नान कराएं। इसके बाद गणेश जी की विधि-विधान से पूजा कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करें। पूजा के समय गणेश भगवान को जनेऊ, दूर्वा, चंदन आदि चीजें चढ़ानी चाहिए। इसके बाद उनका प्रिय भोग मोदक व लड्डू अर्पित करें। फिर धूप-दीप जलाकर आरती करें। पूजा के दौरान भगवान गणेश के मंत्र ' ऊं गं गणपतये नम:' का जाप करें। इससे जातक को गणेश जी का आशीर्वाद प्राप्त होता है। महादेव की करें पूजा अमावस्या के दिन भगवान शिव शंकर और देवी पार्वती का अभिषेक करें। शिवलिंग पर जल चढ़ाते हुए ऊँ नम: शिवाय मंत्र का जाप करें। जल से अभिषेक करने के बाद दूध चढ़ाएं औऱ फिर जल चढ़ाएं। अमावस्या के दिन भगवान शिव पर शमी के पत्ते और बेलपत्र चढ़ाने से व्यक्ति के जीवन में आने वाले संकटों का नाश होता है। पितृदोष से पाएं मुक्ति अधिक मास की अमावस्या पर सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि करें। फिर पिंडदान और श्राद्ध कर्म करें। ऐसा करने पर पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। वहीं शिवलिंग पर जलाभिषेक करने से पितृ शांत होते हैं। इसके अलावा आज के दिन कंडो पर घी-गुड़ अर्पित कर पितरों की पूजा-आराधना करनी चाहिए।

प्रभासाक्षी 16 Aug 2023 8:19 am

Adhik Maas Ravi Pradosh Vrat: अधिकमास रवि प्रदोष व्रत से होती है सभी मनोकामनाएं पूरी

13 अगस्त को अधिकमास रवि प्रदोष व्रत है। इस दिन श्रावन मास में भगवान शिव की उपासना का विशेष महत्व है। श्रावन मास में प्रदोष व्रत करने से महादेव का आशीर्वाद साधक पर बना रहता है, तो आइए हम आपको अधिकमास रवि प्रदोष व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं। अधिकमास रवि प्रदोष व्रत पर ऐसे करें पूजा सावन अधिक मास के प्रदोष व्रत वाले दिन प्रातः काल जल्दी उठें और स्नान आदि करके पूजा के लिए साफ वस्त्र पहन लें। पूजा घर में दीपक जलाएं और व्रत का संकल्प लें। फिर पूरे दिन व्रत रखते हुए प्रदोष काल में शिव जी की पूजा और उपासना करें। शाम के समय प्रदोष काल में पूजा के दौरान दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल मिलाकर पंचामृत से शिवलिंग का जलाभिषेक करें। भांग, धतूरा, बेलपत्र फूल और नैवेद्य शिवलिंग पर अर्पित करें। इसके बाद भगवान शिव की प्रतिमा के पास धूप-दीप जला कर प्रदोष व्रत की कथा पढ़ें या सुनें। अंत में शिवजी की आरती करके पूजा समाप्त करें। इसे भी पढ़ें: Budhwar Vrat Puja Vidhi: कब से शुरू करना चाहिए बुधवार का व्रत, जानिए व्रत में क्या खाएं और क्या नहीं अधिकमास सावन रवि प्रदोष व्रत का शुभ पंडितों के अनुसार श्रावण अधिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि का शुभारंभ 13 अगस्त सुबह 08 बजकर 19 मिनट से होगा और 14 अगस्त सुबह 10 बजकर 25 मिनट पर यह तिथि समाप्त हो जाएगी। प्रदोष काल में महादेव की पूजा के कारण यह व्रत 13 अगस्त 2023, रविवार के दिन रखा जाएगा। इस दिन प्रदोष काल संध्या 07 बजकर 03 मिनट से रात्रि 09 बजकर 12 मिनट तक रहेगा। इस शुभ अवसर पर दो अत्यंत शुभ योग का निर्माण हो रहा है, जिसमें की गई पूजा-पाठ से साधकों को विशेष लाभ मिलेगा। इस दिन सिद्धि योग रहेगा, जो शाम 04 बजे से शुरू होगा। साथ ही इस दिन पुनर्वसु नक्षत्र का निर्माण होगा जो सुबह 08 बजकर 26 मिनट से पूर्ण रात्रि तक रहेगा। अधिकमास सावन रवि प्रदोष का महत्व हिन्दू धर्म में प्रदोष व्रत को शुभ माना जाता है। सप्ताह के विभिन्न दिनों पर पड़ने वाले प्रदोष व्रत भांति-भांति के फल देते हैं। रविवार को पड़ने वाले प्रदोष को रवि प्रदोष की संज्ञा दी जाती है। मनुष्य के जीवन में रवि प्रदोष का खास महत्व है। रवि प्रदोष व्रत करने वाले व्यक्ति का स्वास्थ्य अच्छा रहता है और वह दीर्घायु तथा सुखी जीवन व्यतीत करता है। इसके अलावा उसे परिवार के लिए यह व्रत कल्याणकारी होता है। सोमवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष व्रत को करने से सभी इच्छाओं की पूर्ति होती है। मंगलवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष व्रत को करने से रोगों से छुटकारा मिलता है। बुधवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष व्रत को करने से सभी तरह की कामना की सिद्धि होती है। बृहस्पतिवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष व्रत को करने से शत्रु का नाश होता है। शुक्रवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष व्रत को करने से सौभाग्य की बढ़ोत्तरी होती है तथा शनिवार को प्रदोष व्रत करने से पुत्र की प्राप्ति होती है। अधिकमास सावन रवि प्रदोष से जुड़ी पौराणिक कथा भी है रोचक रवि प्रदोष से जुड़ी एक कथा प्रचलित है। उस कथा के अनुसार एक गांव में एक गरीब ब्राह्मण अपनी पत्नी और पुत्र के साथ रहता था। एक बार वह गंगा स्नान के लिए जा रहा था तभी लुटेरे उसे मिल गए उन्होंने उसे पकड़ लिया और पूछा कि तुम्हारे पिता ने गुप्त धन कहां छुपा रखा है। इससे बालक डरकर बोला कि वह बहुत गरीब है उसके पास कोई धन नहीं है । तब लुटेरों ने उसे छोड़ दिया। वह घर वापस आने लगा कि तभी थकने के कारण पेड़ के नीचे सो गया और राजा के सिपाहियों ने उसे लुटेरा समझ कर पकड़ लिया और जेल में डाल दिया। इधर गरीब ब्राह्मणी ने दूसरे दिन प्रदोष का व्रत किया और शिव जी से अपनी बालक की वापसी की प्रार्थना करते हुए पूजा की। शिव जी ब्राह्मणी की प्रार्थना से प्रसन्न होकर राजा को सपने में बताया कि वह बाल जिसे तुमने पकड़ा है वह निर्दोष है उसे छोड़ दो। दूसरे दिन राजा ने बालक के माता-पिता को बुलाकर न केवल बालक को छोड़ दिया बल्कि उनकी दरिद्रता दूर करने के लिए उन्हें पांच गांव भी दान में दे दिए। इस तरह प्रदोष व्रत के प्रभाव से न केवल ब्राह्मण का बेटा मिला बल्कि उनकी गरीबी भी दूर हो गयी। अधिकमास सावन रवि प्रदोष व्रत के उपाय रवि प्रदोष व्रत का संबंध सीधा सूर्य से होता है। इस व्रत को करने से चंद्रमा के साथ सूर्य भी आपके जीवन में सक्रिय रहता है। चंद्र और सूर्य की शुभता के कारण ग्रहों के दुष्प्रभाव में कमी आती है। अपयश को मिटाने के लिए इस दिन सुबह सूर्य देव को जल में लाल चंदन मिलाकर अर्घ्य दें। कुंडली में सूर्य को मजबूत करने से व्यक्ति को कार्यस्थल पर तरक्की और उच्च पद प्राप्त होता है। इसके लिए रवि प्रदोष व्रत के दिन शिवलिंग पर एक मुठ्‌ठी गेहूं अर्पित करें। इससे नौकरी में उन्नति मिलेगी। आर्थिक तंगी से गुजर रहे हैं तो इस दिन घर में मीठा पकवान बनाकर किसी नेत्रहीन व्यक्ति को खिलाएं। पूर्व दिशा की ओर मुख करके आदित्य ह्दय स्तोत्र का पाठ करें। इससे आरोग्य के साथ लंबी आयु का वरदान मिलेगा। - प्रज्ञा पाण्डेय

प्रभासाक्षी 12 Aug 2023 4:20 pm

Parama Ekadashi 2023: तीन साल में एक बार पड़ती है परमा एकादशी, जानिए शुभ मुहूर्त और पूजन विधि

आज यानी की 11 अगस्त को परमा या परम एकादशी मनाई जा रही है। इस एकादशी को श्रेष्ठ माना जाता है। बताया जाता है कि सभी एकादशी से यह एकादशी श्रेष्ठ होती है। इस साल 2023 में 11 अगस्त की सुबह 07:42 मिनट पर परमा एकादशी की शुरूआत होगी। हिंदू धर्म में एकादशी के व्रत का अधिक महत्व होता है। अधिकमास में पड़ने वाली एकादशी का विशेष महत्व होता है। क्योंकि अधिकमास की एकादशी 3 साल में 1 बार आती है। सावन माह की कृष्ण पक्ष की एकादशी को परमा एकादशी कहते हैं। आइए जानते हैं परमा एकादशी के शुभ मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में... क्या है इस पूजा का महत्व बता दें कि अधिक मास की परमा एकादशी पर भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। परमा एकादशी के दिन जो भी जातक व्रत करते हैं, शीघ्र ही उनकी मनोकामना पूरी होती है। इस दिन व्रत करने और भगवान विष्णु की पूजा से घर में सुख-शांति का वास होता है। मान्यता के अनुसार परमा एकादशी कठिन व्रतों में से एक है। इस दिन लोग निर्जला व्रत भी करते हैं। तो वहीं कुछ लोग सिर्फ चरणामृत ही लेते हैं। इसे भी पढ़ें: Parama Ekadashi 2023: परमा एकादशी व्रत से होती है शुभ फल की प्राप्ति पूजा और पारण परमा एकादशी के दिन यानी की 12 अगस्त को सुबह 07:28 मिनट से 09:07 मिनट तक पूजा का शुभ मुहूर्त है। वहीं व्रत का पारण अगले दिन 13 अगस्त को सुबह 05:49 मिनट से 08:19 मिनट कर किया जा सकता है। साल में 24 एकादशी प्राप्त जानकारी के अनुसार, अधिक मास मलमास में यह पुरुषोत्तम एकादशी होती है। इसका अपने आप में विशेष महत्व होता है। बता दें कि साल में कुल 24 एकादशी होती हैं। लेकिन मलमास के कारण साल में 26 एकादशी भी होती है। वहीं एकादशी के दिन अगर कोई भी व्यक्ति भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा सच्ची श्रद्धा और मन से करता है। तो निश्चय ही उसे जीवन में सुख, शांति मिलती है। ऐसे करें भगवान विष्णु को प्रसन्न इस व्रत में पांच दिनों कर पंचरात्रि व्रत का नियम होता है। इस दौरान भक्त पूरी श्रद्धा-भक्ति से भगवान श्री हरि विष्णु की पूजा करते हैं। इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है और उन्हें दान-दक्षिणा देकर विदा किया जाता है। इस दिन व्रत और पूजा करने से सभी कष्ट दूर होते हैं। इसके अलावा इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु के साथ भगवान भोलेनाथ की पूजा की जाती है।

प्रभासाक्षी 12 Aug 2023 8:53 am

Asia Cup 2023 पहली बार, पाकिस्तानी टैग वाली जर्सी में दिखेगा India

एशिया कप के दौरान यह पहली बार होगा, जब भारतीय टीम की जर्सी पर पाकिस्तान का नाम लिखा होगा। 30 अगस्त से शुरू होने वाले एशिया कप के कुछ मैच पाकिस्तान और बाकी श्रीलंका में खेले जाएंगे। पढ़ें पूरी खबर...

हरि भूमि 11 Aug 2023 9:58 am

पीसीसी की नई कार्यकारिणी और चुनाव घोषणापत्र समिति का ऐलान इसी सप्ताह, कमेटियों के नाम एआईसीसी को भेजे गए

छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज की नई कार्यकारिणी और कांग्रेस की चुनाव घोषणापत्र समिति सहित अन्य समितियों की घोषणा इस सप्ताह जारी किए जाने की तैयारी है। सभी विधानसभा क्षेत्रों में सचिव और महासचिवों की नियुक्ति भी जल्द की जाएगी।

हरि भूमि 7 Aug 2023 2:00 am

Vibhuvan Sankashti Chaturthi 2023: अधिकमास विभुवन संकष्टी चतुर्थी व्रत से होती हैं समस्याएं दूर

आज अधिकमास विभुवन संकष्टी चतुर्थी है, इस दिन भगवान गणेश की पूजा होती है, तो आइए हम आपको अधिकमास विभुवन संकष्टी चतुर्थी व्रत की विधि एवं महत्व के बारे में बताते हैं। जाने अधिकमास विभुवन संकष्टी चतुर्थी के बारे में हिंदू पंचांग के अनुसार श्रावण अधिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन विभुवन संकष्टी चतुर्थी व्रत रखा जाता है। इस विशेष दिन पर भगवान गणेश की विधिवत उपासना करने से कई प्रकार के रोग दोष और कष्टों से मुक्ति प्राप्त हो जाती। इस दिन पूजा-पाठ करने से पाप ग्रहों के अशुभ प्रभाव से मुक्ति प्राप्त हो जाती है। इस साल विभुवन संकष्टी चतुर्थी का यह व्रत 4 अगस्त को है। अधिक मास में पड़ने की वजह से यह व्रत हर तीन साल में एक बार आता है। विभुवन संकष्टी चतुर्थी व्रत के दिन भगवान गणेश की पूजा करने से जीवन में आ रही सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं। साथ ही इस दिन कुछ उपाय करने से विघ्न-बाधाओं का अंत होता है और जीवन में खुशियां आती हैं। अधिकमास विभुवन संकष्टी चतुर्थी व्रत से ये परेशानियां होती हैं दूर पंडितों के अनुसार यदि आप विवाह योग्य हैं, लेकिन विवाह में बार-बार बाधाएं आ रही हैं तो विभुवन संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश को गुड़ की 21 गोलियां और दूर्वा अर्पित करें। इससे शीघ्र विवाह के योग बनते हैं। व्यापार में तरक्की या नौकरी में प्रमोशन के लिए विभुवन संकष्टी चतुर्थी के दिन विध्नहर्ता गणेश की प्रतिमा को अपने घर ले आएं। फिर उनका पूजन करें और हल्दी की पांच गांठ गणेश जी को अर्पित करें। ऐसा करने से जल्द प्रमोशन के योग बनते हैं। विभुवन संकष्टी चतुर्थी के दिन घर में गणेश यंत्र की स्थापना करें। ऐसा इसलिए क्योंकि गणेश यंत्र को बहुत लाभकारी माना जाता है। गणेश यंत्र को घर में स्थापित करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यदि आप धन की समस्या से जूझ रहे हैं तो विभुवन संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा करें। गुड़ और घी का भोग लगाएं फिर उस भोग को गाय को खिलाएं। इससे धन लाभ मिलने के योग बनते हैं। इसे भी पढ़ें: Guruvar Vrat: पहली बार करने जा रहे गुरुवार का व्रत तो जान ले यें नियम, हर बाधा से मिलेगी मुक्ति अधिकमास विभुवन संकष्टी चतुर्थी 2023 मुहूर्त पंचांग के अनुसार, श्रावण अधिकमास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 4 अगस्त 2023को दोपहर 12 बजकर 45 मिनट पर शुरू होगी। इसका समापन 05 अगस्त 2023 को सुबह 09 बजकर 39 मिनट पर होगा. संकष्टी चतुर्थी के दिन चंद्रमा की पूजा का मुहूर्त 4 अगस्त को रहेगा। - गणपति पूजा सुबह का मुहूर्त - सुबह 07.25 - सुबह 09.05 - शाम का मुहूर्त - शाम 05.29 - रात 07.10 विभुवन संकष्टी चतुर्थी व्रत 3 साल में एक बार रखा जाता है। इस विशेष व्रत पर जप-तप और पूजा-पाठ से साधकों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है। अधिकमास विभुवन संकष्टी चतुर्थी पर गणेश पूजा का महत्व अधिकमास भगवान विष्णु को समर्पित हैं और इस साल अधिकमास सावन में आया है। पंडितों के अनुसार अधिकमास में गणपति की पूजा करने से घर में जल्द मांगलिक कार्य संपन्न होते हैं। गणपति की कृपा से विवाह, संतान प्राप्ति और आर्थिक तरक्की में आ रही बाधाएं हमेशा के लिए दूर हो जाती है। घर में बरकत के साथ घर पर सुख-समृद्धि बनी रहती है। अधिकमास विभुवन संकष्टी चतुर्थी के दिन करें पूजा पंडितों के अनुसार विभुवन संकष्टी चतुर्थी के दिन सबसे पहले सुबह उठें और स्नान करें। इस दिन लाल रंग के कपड़े पहनकर पूजा करें। पूजा करते समय अपना मुंह पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखें। स्वच्छ आसन या चौकी पर भगवान को विराजित करें। भगवान की प्रतिमा या चित्र के आगे धूप-दीप प्रज्वलित करें। ॐ गणेशाय नमः या ॐ गं गणपतये नमः का जाप करें। पूजा के बाद भगवान को लड्डू या तिल से बने मिष्ठान का भोग लगाएं। शाम को व्रत कथा पढ़कर चांद देखकर अपना व्रत खोलें। अपना व्रत पूरा करने के बाद दान करें। अधिकमास विभुवन संकष्टी चतुर्थी से जुड़ी पौराणिक कथा शास्त्रों के अनुसार संकष्टी चतुर्थी से सम्बन्धित कई कथाएं प्रचलित है। एक बार शिवजी और माता पार्वती एक दूसरे साथ समय व्यतीत कर रहे थे। तब मां पार्वती को चौपड़ खेलने की इच्छा हुई। लेकिन इस खेल में सवाल यह उठा कि दोनों के बीच हार-जीत का फैसला कौन करेगा। इस समस्या से निपटने के लिए भगवान शिव ने घास-फूंस का एक बालक बनाया और उसमें प्राण डाल दिए। इसके बाद पुतले से कहा कि अब हार-जीत का फैसला करना। चौपड़ खेलने के दौरान पार्वती तीन बार जीतीं। लेकिन बालक से पूछने पर उसने उत्तर दिया कि महादेव जीते। इस पर माता पार्वती बहुत क्रुद्ध हुईं और उन्होंने उसे कीचड़ में पड़ने रहने का अभिशाप दे दिया। इससे बालक दुखी हो गया उसने देवी से प्रार्थना की। तब देवी ने कहा कि आज से एक साल बाद यहां नागकन्याएं आएंगी उनके कहे अनुसार तुम गणेश जी की पूजा करना। ऐसा करने तुम्हारे सारे कष्ट दूर हो जाएंगे। उस बालक ने गणेश जी का व्रत किया। उपवास से देवता प्रसन्न हुए और उन्होने बालक से वर मांगने को कहा। बालक ने कहा कि मुझे अपने माता-पिता से मिलने कैलाश पर्वत जाना है। आप मुझे आर्शीवाद दें। इसके बाद वह बालक कैलाश पर्वत पर पहुंच गया। इसके बाद उसने माता पार्वती को प्रसन्न करने के लिए 21 दिन तक गणेश जी का व्रत करने से माता पार्वती प्रसन्न हो गयीं। अधिकमास विभुवन संकष्टी चतुर्थी व्रत का महत्व शास्त्रों में भगवान गणेश को विघ्नहर्ता के नाम से भी जाना जाता है। वे अपने भक्तों की सारी विपदाओं को दूर करते हैं और उनकी मनोकामनाएं को पूर्ण करते हैं। ऐसे में विभुवन संकष्टी चतुर्थी के दिन व्रत रखकर गणपति की पूजा-आराधना करने से समस्त प्रकार की बाधाएं दूर हो जाती हैं। - प्रज्ञा पाण्डेय

प्रभासाक्षी 4 Aug 2023 12:06 pm

Adhik Maas Purnima 2023: आज रखा जा रहा है श्रावण अधिक मास की पूर्णिमा का व्रत, बन रहे अद्भुत संयोग

सावन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को अधिक पूर्णिमा व्रत किया जाता है। इस यानी की 2023 में शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि आज यानी की 1 अगस्त को पड़ रही है। अधिक मास के कारण इस पूर्णिमा को अधिक पूर्णिमा कहा जाता है। आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको सनातन धर्म में पूर्णिमा तिथि का महत्व, पूजा विधि और शुभ मुहूर्त के बारे में बताने जा रहे हैं। अधिक मास पूर्णिमा तिथि हिंदू पंचांग के मुताबिक 01 अगस्त को सुबह 03:51 मिनट से श्रावण अधिक शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि शुरू होगी। वहीं 02 अगस्त को देर रात 12:00 बजे श्रावण अधिक शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि समाप्त हो जाएगी। ऐसे में 1 अगस्त 2023 को अधिक मास की पूर्णिमा का व्रत किया जाएगा। अधिक मास की पूर्णिमा का महत्व आपको बता दें कि हिंदू धर्म में सावन माह की पूर्णिमा का विशेष महत्व होता है। इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु की पूजा-अर्चना की जाती है। साथ ही सत्यनरायण व्रत करने से विष्णु भगवान की कृपा प्राप्त होती है। मान्यता के पूर्णिमा के विशेष दिन पर पूजा-पाठ और स्नान-दान का विशेष महत्व होता है। वहीं व्यक्ति को भगवान श्रीहरि का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है। शुभ योग इसके साथ ही 1 अगस्त 2023 को शाम 06:52 मिनट कर प्रीति योग रहेगा। वहीं शाम को 04:03 मिनट तक उत्तराषाढ़ा नक्षत्र रहेगा। बता दें कि इस दिन मंगला गौरी व्रत का भी संयोग बन रहा है। ऐसे में पूर्णिमा तिथि पर आप पूजा-अर्चना कर माता पार्वती और भगवान शंकर का भी आशीर्वाद पा सकते हैं। पूजा विधि अधिक मास की पूर्णिमा के दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि कर लें। इस दिन नदी में स्नान करान ज्यादा शुभ माना जाता है। इसके बाद सूर्यदेव को जल अर्पित करने के दौरान उनके बीज मंत्र 'ऊँ घृणि सूर्याय नम:' का जाप करें। फिर एक साफ चौका पर लाल कपड़ा बिछाकर भगवान श्रीहरि विष्णु की मूर्ति व प्रतिमा स्थापित करें। फिर उन्हें धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। इसके बाद भगवान विष्णु के समक्ष प्रार्थना करते हुए सत्यनारायण व्रत का संकल्प करें। वहीं शाम को पूजा के दौरान अपने सामने पानी का कलश रखें। भगवान विष्णु को पंचामृत, पत्ता, केला और पंजीरी अर्पित करें। फिर भगवान श्री हरि विष्णु के साथ माता लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करें। वहीं संध्याकाल के दौरान सत्यनारायण की कथा सुननी चाहिए। इसके बाद परिवार और अन्य लोगों को प्रसाद वितरित कर सामर्थ्य अनुसार दान-दक्षिणा देना चाहिए।

प्रभासाक्षी 1 Aug 2023 8:49 am

Padmini Ekadashi fast पर बन रहे हैं दो शुभ योग, 29 जुलाई को रखा जायेगा व्रत

पद्मिनी एकादशी शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि सावन के महीने में मनाई जाती है। इस बार पद्मिनी का व्रत अधिक मास में रखा जाएगा। कहा जाता है कि इस दिन व्रत रखने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है साथ ही पितरों को मोक्ष प्राप्त होता है। पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि पद्मिनी एकादशी तिथि का आरंभ 28 जुलाई को दोपहर 2:51 मिनट से आरंभ होगी और 29 जुलाई को दोपहर 1:06 मिनट तक रहेगी। ऐसे में पद्मिनी एकादशी का व्रत 29 जुलाई को रखा जाएगा। इस साल पद्मिनी एकादशी पर ब्रह्म और इंद्र योग जैसे दो शुभ योग भी बन रहे हैं। पद्मिनी एकादशी मलमास या अधिक मास में आती है। इसे कमला एकादशी भी कहा जाता है। अधिक मास की शुरुआत 18 जुलाई से हो चुकी है। इसका समापन 16 अगस्त को होगा। इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। अधिक मास में आने वाली एकादशी का महत्व बहुत ज्यादा होता है, क्योंकि इस माह के स्वामी श्रीहरि विष्णु हैं और एकादशी तिथि भी इन्हें ही समर्पित है। ऐसे में पद्मिनी एकादशी का व्रत रखकर पूजा करने से दोगुना फल की प्राप्ति होती है। इस व्रत से सालभर की एकादशियों का पुण्य मिल जाता है। ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि अधिक मास या फिर मल मास में शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी तिथि को कहा जाता है। इसे कमला या पुरुषोत्तमी एकादशी भी कहते हैं। हिन्दू पंचांग के अनुसार पद्मिनी एकादशी का व्रत जो महीना अधिक हो जाता है उस पर निर्भर करता है। अतः पद्मिनी एकादशी का उपवास करने के लिए कोई चन्द्र मास तय नहीं है। अधिक मास को लीप के महीने के नाम से भी जाना जाता है। अधिकमास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी तिथि को पुरुषोत्तमी एकादशी, कमला एकादशी या पद्मिनी एकादशी भी कहा जाता है। पुरुषोत्तमी/ पद्मिनी एकादशी भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि हर 3 साल में अधिकमास या मलमास आता है। इसलिए 3 सालों के बाद पुरुषोत्तमी एकादशी का व्रत रखा जाएगा। इस साल ये व्रत 29 जुलाई को रखा जाएगा। इस दिन विष्णु पूजा का मुहूर्त सुबह 07:22 बजे से सुबह 09:04 बजे तक है। इसके अलावा दोपहर में भी एकादशी पूजा का शुभ मुहूर्त है, जो दोपहर 12:27 बजे से शाम 05:33 बजे तक है। इस दिन व्रत रखकर विधिपूर्वक भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। माना जाता है कि इस व्रत को रखने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और मृत्यु के बाद वैकुंठ प्रदान करते हैं। इस साल पद्मिनी एकादशी पर ब्रह्म और इंद्र योग जैसे दो शुभ योग भी बन रहे हैं। इसे भी पढ़ें: Manglwar Upay: मंगलवार को भूलकर भी न खरीदें ये चीजें, वरना आपसे रूष्ट हो सकते हैं संकटमोचन ज्येष्ठा नक्षत्र और दो शुभ योग में पद्मिनी एकादशी कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि इस साल पद्मिनी एकादशी पर दो शुभ योग बने हैं । उस दिन ब्रह्म योग प्रात:काल से लेकर सुबह 09:34 मिनट तक है । उसके बाद से इंद्र योग प्रारंभ हो जाएगा । ये दोनों ही योग शुभ हैं । वहीं ज्येष्ठा नक्षत्र सुबह से लेकर रात 11 बजकर 35 मिनट तक है, उसके बाद से मूल नक्षत्र है । पद्मिनी एकादशी तिथि भविष्यवक्ता डा. अनीष व्यास ने बताया कि पंचांग के अनुसार श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 28 जुलाई 2023 को दोपहर 02:51 मिनट पर शुरू हो रही है। इसका समापन 29 जुलाई को दोपहर 01:06 मिनट पर होगा। उदया तिथि के अनुसार पद्मिनी एकादशी का व्रत 29 जुलाई को रखा जाएगा। पूजा मुहूर्त भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि 29 जुलाई को पूजा का मुहूर्त सुबह 07:22 मिनट से सुबह 09:04 मिनट तक है। इसके बाद दोपहर में शुभ समय 12:27 मिनट से शाम 05:33 मिनट तक है। करें पूजन कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि इस दिन सुबह स्नान कर भगवान विष्णु की विधि पूर्वक पूजा करें। निर्जल व्रत रखकर विष्णु पुराण सुनें या फिर इसका पाठ करें। इस दिन रात्रि में भजन- कीर्तन करते हुए जागरण करना शुभ होता है। रात में प्रति पहर विष्णु और शिवजी की पूजा करें। द्वादशी के दिन भी सुबह भगवान की पूजा करें। ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा दें और उसके बाद व्रत का पारण करें। पद्मिनी एकादशी भगवान विष्णु जी को अति प्रिय है। माना जाता है कि इस व्रत का विधि पूर्वक पालन करने वाला विष्णु लोक यानी वैकुंठ धाम को जाता है। पद्मिनी एकादशी व्रत कथा भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि त्रेता युग में एक पराक्रमी राजा कीतृवीर्य था। इस राजा की कई रानियां थी परंतु किसी भी रानी से राजा को पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई। संतानहीन होने के कारण राजा और उनकी रानियां तमाम सुख सुविधाओं के बावजूद दु:खी रहते थे। संतान प्राप्ति की कामना से तब राजा अपनी रानियों के साथ तपस्या करने चल पड़े। हज़ारों वर्ष तक तपस्या करते हुए राजा की सिर्फ हड्डियां ही शेष रह गयी परंतु उनकी तपस्या सफल न हो सकी। रानी ने तब देवी अनुसूया से उपाय पूछा। देवी ने उन्हें मल मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करने के लिए कहा। अनुसूया ने रानी को व्रत का विधान भी बताया। रानी ने तब देवी अनुसूया के बताये विधान के अनुसार पद्मिनी एकादशी का व्रत रखा। व्रत की समाप्ति पर भगवान प्रकट हुए और वरदान मांगने के लिए कहा। रानी ने भगवान से कहा प्रभु आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मेरे बदले मेरे पति को वरदान दीजिए। भगवान ने तब राजा से वरदान मांगने के लिए कहा। राजा ने भगवान से प्रार्थना की कि आप मुझे ऐसा पुत्र प्रदान करें जो सर्वगुण सम्पन्न हो जो तीनों लोकों में आदरणीय हो और आपके अतिरिक्त किसी से पराजित न हो। भगवान तथास्तु कह कर विदा हो गये। कुछ समय पश्चात रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया जो कार्तवीर्य अर्जुन के नाम से जाना गया। कालान्तर में यह बालक अत्यंत पराक्रमी राजा हुआ जिसने रावण को भी बंदी बना लिया था। ऐसा कहते हैं कि सर्वप्रथम भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को पुरुषोत्तमी एकादशी के व्रत की कथा सुनाकर इसके माहात्म्य से अवगत करवाया था - डा. अनीष व्यास भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक

प्रभासाक्षी 28 Jul 2023 4:51 pm

ED Director Sanjay Mishra: ED निदेशक का बढ़ेगा कार्यकाल! SC पहुंचा केंद्र...लगाई ये गुहार

ED Director Sanjay Mishra: केंद्र सरकार ने ईडी के निदेशक संजय मिश्रा (ED Director Sanjay Mishra) का कार्यकाल बढ़ाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) का रुख किया है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट कल यानी 27 जुलाई को सुनवाई करेगा।

हरि भूमि 26 Jul 2023 2:00 pm

कांग्रेस में बैठकों का दौर : कुमारी सैलजा बोलीं- BJP के 15 साल बनाम हमारे 5 साल.. यही जनता के बीच लेकर जाएंगे

वरिष्ठ नेताओं की बैठक को लेकर पीसीसी चीफ कुमारी सैलजा ने कहा कि, छत्तीसगढ़ की जनता को हम पर विश्वास है। भाजपा के 15 साल के कामों को हमने 5 साल में ही प्लान कर लिया और यही कार्य हम जनता के बीच लेकर जाएंगे।...पढ़े पूरी खबर

हरि भूमि 26 Jul 2023 1:59 pm

Budh Ashtami 2023: सावन माह में बुधाष्टमी व्रत करने से होते हैं सभी पाप नष्ट

आज बुधाष्टमी पर्व है, इस व्रत को बुधवार के दिन अष्टमी तिथि के पड़ने पर किया जाता है। श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया गया बुधाष्टमी व्रत जीवन में सुख को लाता है तो आइए हम आपको बुधाष्टमी व्रत के महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं। जानें बुधाष्टमी पर्व के बारे में हिंदू पंचांग के आधार पर सावन मास में अष्टमी तिथि व्रत का बहुत बड़ा महत्व है। अष्टमी व्रत के दिन काल भैरव की पूजा शिव के साथ किया जाता है। यदि बुधवार के दिन अष्टमी व्रत का संगम बनता है, तब बुध अष्टमी व्रत माना जाता है और यह विशेष लाभकारी हो जाता है। इस व्रत को करने से भूत प्रेत व नकारात्मक शक्तियां दूर रहती हैं और सभी तरह के पाप नष्ट हो जाते हैं। बुधाष्टमी का महत्व हमारे शास्त्रों में अष्टमी तिथि को बहुत ही महत्वपूर्ण बताया गया है। जिस बुधवार के दिन अष्टमी तिथि पड़ती है उसे बुध अष्टमी कहा जाता है। बुध अष्टमी के दिन सभी लोग विधिवत बुद्धदेव और सूर्य देव की पूजा अर्चना करते हैं। पंडितों के अनुसार जिन लोगों की कुंडली में बुध कमजोर होता है उनके लिए बुध अष्टमी का व्रत बहुत ही फलदाई होता है। बुधाष्टमी के दिन ऐसे करें पूजा बुध अष्टमी का व्रत करने के लिए व्यक्ति को प्रातः काल उठकर किसी पवित्र नदी में स्नान करने के पश्चात् पूजा का संकल्प लेना चाहिए। अगर आपके घर के आस पास कोई नदी नहीं है तो अपने नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्नान करें। ऐसा करने से आपको गंगा स्नान जितना ही पुण्य प्राप्त होगा। अब एक कलश में गंगाजल भर कर अपने घर के पूजा कक्ष स्थापित करें। बुधाष्टमी के दिन बुध देव की पूजा के साथ बुधाष्टमी की कथा भी अवश्य सुननी चाहिए। व्रत का संकल्प लेने के पश्चात् बुध ग्रह की विधिवत पूजा अर्चना करनी चाहिए। बुधाष्टमी के दिन भगवान् को भोग लगाने के लिए 8 प्रकार के पकवान बनाने चाहिए और इन्हे बांस के पत्तों में रखकर भगवान को भोग लगाना चाहिए। इस भोग को फल, फूल, धूप आदि के साथ बुध देव को चढ़ाना चाहिए। पूजा खत्म होने के पश्चात् भगवान पर चढ़ाये गए भोग को परिवार के सभी लोगों के साथ मिलकर ग्रहण करना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान गणेश की भी पूजा की जाती है। इसे भी पढ़ें: Iadana Mata Temple: राजस्थान के इस मंदिर में देवी मां करती हैं अग्निस्नान, विज्ञान भी नहीं सुलझा पाया यह रहस्य बुधाष्टमी व्रत के लाभ जो भी मनुष्य पूरे विधि विधान से बुधाष्टमी का व्रत करता है उसके सात जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। इस व्रत करने से धन-धान्य पुत्र और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। इस व्रत को करने से मनुष्य धरती पर सभी सुखों को भोग कर मृत्यु के पश्चात स्वर्ग को प्राप्त होता है। बुद्ध दोष दूर करने के लिए बुद्धाष्टमी के दिन करें ये उपाय अगर आपकी कुंडली में बुध दोष है और आप अपनी कुंडली से बुद्ध दोष को दूर करना चाहते हैं तो ,बुद्ध अष्टमी के दिन ये छोटे-छोटे उपाय करके इस दोष से छुटकारा पा सकते हैं। - भगवान गणेश को मोदक बहुत प्रिय है, अगर आप बुद्ध दोष से छुटकारा पाना चाहते हैं तो बुद्ध अष्टमी के दिन भगवान गणेश को मोदक का प्रसाद चढ़ाये। - अपनी कुंडली से बुध दोष के प्रभाव को दूर करने के लिए बुद्ध अष्टमी के दिन अपने हाथ की सबसे छोटी उंगली में पन्न रत्न धारण करें. पन्ना रत्न धारण करने से पहले किसी ज्योतिषी से सलाह जरूर लें. - बुधवार के दिन गाय को हरी घास खिलाने से भी भगवान् गणेश प्रसन्न होते हैं और बुध दोष का असर कम होता है। - कुंडली से बुद्ध दोष को दूर करने के लिए बुद्ध अष्टमी के दिन भगवान् गणेश को सिंदुर अर्पित करें। - बुद्ध अष्टमी के दिन स्नान करने के पश्चात् किसी मंदिर में जाकर गणेश जी को दूर्वा चढ़ाएं। अगर आप भगवान गणेश को दूर्वा की 11 या 21 गांठ चढ़ाते है तो इससे आपको बहुत जल्द फल प्राप्त होगा। बुधाष्टमी व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा भविष्यपुराण की एक कथा के अनुसार इल नाम के राजा रहा करते थे। एक बार वह हिरण का पीछा करते हुए, उस वन में जा पहुंचे जहां भगवान शिव और पार्वती जी भ्रमण कर रहे थे। उस समय शिव जी का आदेश था कि वन में पुरुष प्रवेश करते ही स्त्री में बदल जाए। इसलिए जैसे ही राजा इल ने वन में प्रवेश किया वह स्त्री बन गए। इल के उत्तम स्वरूप को देख बुध देव उन पर मोहित हो गए तथा उनसे विवाह कर लिया। जिस दिन इल और बुध का विवाह हुआ उस दिन अष्टमी तिथि थी, तभी से बुधाष्टमी का पर्व मनाया जाने लगा। बुधाष्टमी व्रत दिलाता है विजय बुधाष्टमी पर्व विजय की प्राप्ति के लिए बहुत ही उपयोगी होता है। यह व्रत उन कार्यों में सफलता दिलाने में बहुत सहायक बनता है जिनमें व्यक्ति को साहस और शौर्य की अधिक आवश्यकता होती है। धर्मराज, मां दुर्गा और भगवान शिव की शक्ति के लिए भी बुधाष्टमी व्रत बहुत महत्व होता है। इस व्रत की ऊर्जा का प्रवाह व्यक्ति को जीवन शक्ति और विपदाओं से आगे बढ़ने की क्षमता देता है। जिस पक्ष में बुधाष्टमी का अवसर हो उस दिन यह सिद्धि का योग बनाता है। बुध अष्टमी तिथि में किसी पर विजय प्राप्ति करना उत्तम माना गया है। यह विजय दिलाने वाली तिथि है, इस कारण जिन भी चीजों में व्यक्ति को सफलता चाहिए वह सभी काम इस तिथि में करे तो उसे सकारात्मक फल मिल सकते हैं। यह दिन बुरे कर्मों के बंधन को दूर करता है। इस दिन लेखन कार्य, घर इत्यादि वास्तु से संबंधित काम, शिल्प निर्माण से संबंधी काम, अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाले काम का आरम्भ भी सफलता देने वाला होता है। - प्रज्ञा पाण्डेय

प्रभासाक्षी 26 Jul 2023 12:44 pm

एयरपोर्ट पर दिखे Ananya Panday और Aditya Roy Kapur, यूरोप में मना रहे थे वेकेशन

अनन्या पांडे और आदित्य रॉय कपूर गुरुवार की सुबह एयरपोर्ट पर स्पॉट हुए हैं। यह Rumoured Couple कई दिनों से काफी सुर्खियां बटोर रहा है। जिसके चलते उनके फैंस उन्हें एकसाथ देख काफी खुश हैं।

हरि भूमि 20 Jul 2023 2:00 pm

प्रेमी जोड़े ने खाया जहर : रेलवे लाइन के करीब बेहोश मिले, प्रेमिका की मौत... प्रेमी की हालत गंभीर

स्टेशन मास्टर ने बताया कि, प्रेमी जोड़े को स्टेशन में बैठे हुए देखा गया था। इसके बाद दोनो स्टेशन से आगे चले गए थे। कुछ देर बाद दोनों बेहोशी की हालत स्टेशन में दिखे। इसके बाद राहगीरों की नजर उन पर पड़ी और घटनाक्रम की जानकारी हुई। पढ़िए पूरी खबर...

हरि भूमि 19 Jul 2023 2:00 pm

Adhik Chandra Darshan 2023: आज से शुरु हो रहा अधिकमास, जानिए चंद्र दर्शन का शुभ मुहूर्त और महत्व

किसी भी महीने की अमावस्या को चंद्रदेव के दर्शन करना काफी शुभ माना जाता है। धार्मिक दृष्टि से भी इसे काफी अहम माना जाता है। बता दें कि अमावस्या के दिन चंद्रमा के दर्शन कर लोग जीवन में सुख, समृद्धि और सौभाग्य की कामना करने के साथ ही विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल 19 जुलाई 2023 को चंद्र दर्शन किया जा सकता है। चंद्र दर्शन तिथि प्रतिपदा की तिथि का समय- 18 जुलाई दोपहर 12:01 मिनट - 19 जुलाई दोपहर 2:10 मिनट तक चंद्रोदय समय- 19 जुलाई, सुबह 6:57 मिनट पर चंद्रास्त समय- 19 जुलाई, शाम 8:38 मिनट पर इसे भी पढ़ें: Kark Sankranti 2023: कर्क संक्रांति पर पुण्यकाल में करें स्नान-दान, सूर्य सा चमक उठेगा आपका भाग्य चंद्रदर्शन की पूजा इस दिन भक्त पूरे विधि-विधान से चंद्रदेव के दर्शन कर उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। इस दिन चंद्रदेव को प्रसन्न करने के लिए कठोर व्रत भी किया जाता है। वहीं सूर्यास्त के फौरन बाद चंद्रमा को देखकर व्रत खोला जाता है। मान्यता के अनुसार, जो भी जातक चंद्र दर्शन के दिन चंद्र देव की अनुष्ठान पूजा करता है, उस व्यक्ति को सौभाग्य और समृद्धि प्राप्त होती है। इस दिन दान-पुण्य करना भी काफी शुभ माना जाता है। बता दें कि इस दिन ब्राह्मणों को कपड़े, चावल और चीनी आदि दान करने से शुभ फल प्राप्त होते हैं। चंद्र दर्शन का महत्व चंद्र देव को सबसे हिंदू पौराणिक कथाओं में प्रतिष्ठित देवताओं से एक माना गया है। वहीं चंद्रमा को अनुकूल ग्रह माना गया है। यह ज्ञान, पवित्रता अच्छे इरादों के साथ शांत मन से जुड़ा होता है। बताया जाता है कि जिस व्यक्ति की कुंडली के ग्रह में चंद्रमा की स्थिति अनुकूल होती है। वह अपने जीवन में सफलता और समृद्धि पाता है। हिंदू धर्म में चंद्रमा और भी अधिक प्रभावशाली माना जाता है। क्योंकि यह हिंदू धर्म में चंद्र कैलेंडर का पालन किया जाता है।

प्रभासाक्षी 19 Jul 2023 9:16 am

Hariyali Amavasya: आज मनाई जा रही हरियाली अमावस्या, महिलाएं पति की दीर्घायु के लिए रखती हैं व्रत

श्रावण मास की अमावस्‍या को हरियाली अमावस्या कहते हैं। इस साल 17 जुलाई 2023 को हरियाली अमावस्या मनाई जा रही है। सोमवार का दिन होने से इसे सोमवती अमावस्या भी कहा जाता है। जब अमावस्या की तिथि सोमवार को पड़ती है, तो इसे धार्मिक दृष्टि से बेहद शुभ माना जाता है। बता दें कि इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र के साथ पूजा और व्रत रखती हैं। शास्‍त्रों के मुताबिक इस दिन पौधे लगाने का खास महत्व बताया गया है। मान्यता के अनुसार, हर व्यक्ति को इस दिन कम से कम 5 पौधे जरूर लगाने चाहिए। इस उपाय को करने से कालसर्पदोष, पितृ दोष और शनि दोष के प्रभाव को कम करता है। आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको हरियाली अमावस्या के शुभ मुहूर्त, महत्व और उपायों के बारे में बताने जा रहे हैं। इसे भी पढ़ें: Sawan Shivratri 2023: सावन शिवरात्रि व्रत से होता है सभी पापों का नाश हरियाली अमावस्‍या का शुभ मुहूर्त हरियाली अमावस्‍या तिथि की शुरूआत: 16 जुलाई 2023 को हरियाली अमावस्‍या की शुरूआत रात 10:08 मिनट पर होगी। हरियाली अमावस्‍या तिथि की समाप्ति: 17 जुलाई को सुबह 12:01 मिनट पर होगी। उदया तिथि के हिसाब से हरियाली अमावस्‍या 17 जुलाई यानी की आज मनाई जा रही है। हरियाली अमावस्‍या का महत्‍व हरियाली अमावस्‍या के दिन पूजापाठ और दान-पुण्य का विशेष महत्व होता है। इस दिन गरीबों और जरूरतमंदों को दान पुण्य करने से पितर प्रसन्न होते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। वहीं महिलाएं पति की लंबी उम्र के लिए व्रत भी रखती हैं। हरियाली अमावस्या के दिन तुलसी और पीपल के पेड़ की पूजा करने से सुख-समृद्धि बढ़ती है। वहीं विधि-विधान से पूजा पाठ करने से आर्थिक संपन्नता बढ़ती है। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि कर साफ चौकी पर एक लाल कपड़ा बिछा लें। इसके बाद चौकी पर भगवान शंकर और मां पार्वती की मूर्ति या प्रतिमा स्थापित करें। फिर भोलेनाथ को भांग, धतूरा और बेलपत्र अर्पित करें और मां पार्वती को सुहाग का सामान अर्पित करें। वहीं व्रत के अगले दिन यह सारा सामान किसी जरूरतमंद महिला को दे दें। जरूर करें ये उपाय हरियाली अमावस्या के दिन पीपल के पेड़ की पूजा की जाती है। इस दिन पीपल पेड़ के नीचे तिल के तेल का दीपक जलाना चाहिए और दीपक में भी थोड़े से काले तिल डालें। इसके अलावा एक सफेद कपड़े में नारियल को बांधकर उसमें थोड़े से चावल और 11 रुपए रख दें। इसके बाद इसे अपने सिर से लेकर पैर तक सात बार उतार कर घर के किसी ऐसे कोने में रख दें। जहां पर बाहरी किसी व्यक्ति की नजर इस पर न पड़े। ऐसा करने से घर में कभी धन की कमी नहीं होगी। हरियाली अमावस्या के मौके पर गाय को खीर और रोटी खिलाएं। वहीं कुत्ते को तेल से चुपड़ी रोटी खिलाएं। ऐसा करने से हर संकंट से आप बचे रहेंगे और पितरों की कृपा आपके ऊपर बनी रहेगी। तांबे के लोटे में गुलाब का फूल और काले तिल डालकर पीपल के पेड़ पर अर्पित करें। इससे आर्थिक संकंट की स्थिति नहीं बनेगी।

प्रभासाक्षी 17 Jul 2023 9:16 am

नक्सलियों की कायराना हरकत : घर में सो रहे ग्रामीण का रेत दिया गला, मुखबीर बताकर ले ली जान

ग्रामीण शनिवार रात को अपने घर में सोया हुआ था। इसी दौरान कुछ नक्सली उसके घर पहुंचे और सो रहे सुंदर ओयाम का गला रेत कर हत्या कर दी। पढ़िए पूरी खबर ...

हरि भूमि 16 Jul 2023 1:59 pm

Kark Sankranti 2023: कर्क संक्रांति पर पुण्यकाल में करें स्नान-दान, सूर्य सा चमक उठेगा आपका भाग्य

आज यानी की 16 जुलाई 2023 को कर्क संक्रांति मनाई जा रही है। बता दें कि हिंदू धर्म में यह तिथि बेहद खास मानी जाती है। मान्यता के अनुसार, कर्क संक्रांति के दिन से भगवान सूर्य नारायण एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करते हैं। वहीं ज्योतिषियों की मानें तो ग्रहों के राजा भगवान सूर्य इस दिन से कर्क राशि में प्रवेश करने जा रहे हैं। आज से ही यानी की 16 जुलाई 2023 से सूर्य देव का दक्षिणायन शुरू हो जाएगा। आज की तिथि से करीब 6 महीने तक सूर्य देव दक्षिण दिशा की ओर गति करते रहेंगे। इस खास दिन पर सूर्य नारायण की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। जिससे आपकी आयु, आय और सौभाग्य में अपार वृद्धि होती है और शारीरिक दुर्बलता भी दूर होती है। इसके साथ ही व्यक्ति की मान-प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है। बता दें कि कर्क संक्रांति की तिथि पर गरीबों व जरूरतमंदों को दान-दक्षिणा देने से भगवान सूर्यदेव प्रसन्न होते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। अगर आप भी भगवान सूर्य देव की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं, तो इस दिन विधि-विधान से सूर्यदेव की पूजा करें। आइए जानते हैं पूजा का शुभ मुहूर्त, पुण्य काल और इसके प्रभाव के बारे में... इसे भी पढ़ें: Hariyali Amavasya 2023: 17 जुलाई को विशेष योगों में मनाई जाएगी हरियाली अमावस्या पूजा का शुभ मुहूर्त हिंदू पंचांग के अनुसार, कर्क संक्रांति 16 जुलाई 2023 को मनाई जा रही है। लेकिन इस साल 17 जुलाई 2023 को ब्रह्म मुहूर्त में सूर्य देव मिथुन राशि से निकलकर कर्क राशि में गोचर करेंगे। इस दिन यानी की 17 जुलाई को सूर्य देव सुबह 05:59 मिनट पर कर्क राशि में प्रवेश करेंगे। सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करना ही संक्रांति कहलाता है। पुण्य काल - दोपहर 12:27 - रात 07.21 महा पुण्य काल - शाम 05.03 - रात 07.21 स्नान-दान समय कर्क संक्रांति के दिन आप महापुण्य काल में स्नान और दान करना शुभ माना जाता है। स्नान के बाद सूर्य देव की विधि-विधान से पूजा करें और उनसे संबंधित वस्तुओं का दान करें। इससे पुण्य फल की प्राप्ति होती है। इससे आपको सूर्यदेव की कृपा प्राप्त होगी। कर्क संक्रांति का प्रभाव बता दें कि घोर नामक कर्क संक्रांति कष्टपूर्ण समय ला सकते है। इस दौरान आपको अपने वस्तुओं की रक्षा स्वयं करनी पड़ सकती है। क्योंकि इस दौरान चोर सक्रिय हो जाते हैं। वहीं सूर्य के राशि परिवर्तन के कारण लोगों को जुकाम, खांसी या ठंड से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं। इसके अलावा देशों के बीच संघर्ष की स्थिति पैदा हो सकती है। साथ ही वस्तुओं की लागत भी कम हो सकती है।

प्रभासाक्षी 16 Jul 2023 8:40 am

Hariyali Amavasya 2023: 17 जुलाई को विशेष योगों में मनाई जाएगी हरियाली अमावस्या

सावन महीने की अमावस्या तिथि को हरियाली अमावस्या या श्रावणी अमावस्या कहा जाता है। सावन का महीना भगवान भोलेनाथ को अत्यंत प्रिय है। ऐसे में श्रावण माह की अमावस्या को भी बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन पूर्वजों के निमित्त पिंडदान एवं दान-पुण्य के कार्य किए जाते हैं। हरियाली अमावस्या के दिन किसी पवित्र नदी में स्नान करके पितरों को पिंडदान, श्राद्ध कर्म करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। सावन माह की अमावस्या 17 जुलाई को हरियाली अमावस्या के रूप में मनाई जाएगी। पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि सावन का दूसरा सोमवार 17 जुलाई को हैं। सावन के दूसरे सोमवार को हरियाली अमावस्या भी है। अमावस्या होने की वजह से इस दिन सोमवती अमावस्या का संयोग बन रहा है और सोमवती अमावस्या के दिन शिव पूजा से पितृदोष, शनिदोष और कालसर्प दोष से मुक्ति मिलती है। इसी दिन सूर्य कर्क संक्रांति भी है। इस दिन सूर्य देव का कर्क राशि में प्रवेश होगा। सूर्य का गोचर कर्क राशि में होने से कर्क राशि में बुधादित्य नामक राजयोग बनने जा रहा है। इस राजयोग के प्रभाव से सूर्य देव की कृपा बरसेगी। शास्त्रों में इस अमावस्या पर पूजा-पाठ, स्नान-दान करना उत्तम माना गया है। साथ ही पर्यावरण की दृष्टि से भी हरियाली अमावस्या का बहुत महत्व है। वहीं हरियाली अमावस्या पर कुछ विशेष वृक्षों की पूजा करने से ग्रह दोष भी दूर होते हैं। सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि इसके अलावा हरियाली अमावस्या का पर्व जीवन में पर्यावरण के महत्व को भी बताता है। किसानों के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस दिन किसान अपने खेती में उपयोग होने वाले उपकरणों की पूजा करते हैं और ईश्वर से अच्छी फसल होने की कामना करते हैं। इस दिन पवित्र नदी में स्नान करके पितरों को पिंडदान, श्राद्ध कर्म करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। हरियाली अमावस्या ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि इस साल श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि 17 जुलाई 2023 को है। ऐसे में इसी दिन हरियाली अमावस्या मनाई जाएगी। उदया तिथि तिथि के आधार पर हरियाली अमावस्या 17 जुलाई को मनाई जाएगी। हरियाली अमावस्या का प्रारंभ- 16 जुलाई को रात 10:08 मिनट से अमावस्या का समापन- 18 जुलाई को रात 12:01 मिनट पर होगा। इसे भी पढ़ें: Shiva Temple: जटोली शिव मंदिर के पत्थरों को थपथपाने से आती है डमरू की आवाज, जानिए इसका रहस्य हरियाली अमावस्या का महत्व भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि सावन के महीने में कृष्ण पक्ष की शिवरात्रि के अगले दिन हरियाली अमावस्या होती है। इस दिन पेड़-पौधों की विशेष रूप से पूजा की जाती है। इस दिन पीपल और तुलसी के पौधे की पूजन का विशेष महत्व है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार पीपल के पेड़ में त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास माना जाता है। पितरों की शांति के लिए करें उपाय भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि हरियाली अमावस्या के दिन किसी योग्य ब्राह्मण को घर बुलाकर भोजन करवाएं। इस दिन किसी नदी किनारे श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करें। साथ ही गाय को चारा भी खिलाएं। हरियाली अमावस्या के दिन मछलियों के लिए नदी में आटे की गोलियां डालें। नदी में काले तिल प्रवाहित करें। पीपल और तुलसी पूजन का महत्व भविष्यवक्ता डा. अनीष व्यास ने बताया कि इस दिन वृक्ष पूजा की प्रथा अनुसार पीपल और तुलसी के पेड़ की पूजा की जाएगी। वृक्षों में देवताओं का वास माना जाता है। इस दिन पितृ तर्पण भी किया जाता है। इससे पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है। शांति और समृद्धि कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि सावन माह में पड़ने वाली इस हरियाली अमावस्या पर विशेष तरह का भोजन भी बनाया जाता है, जो कि ब्राम्हणों को खिलाया जाता है। खास बात यह है कि इस दिन भगवान शिव की पूजा भी की पूजा की जाती है। हरियाली अमावस के दिन भगवान शिव की विशेष रूप से पूजा की जाती है। मान्यता है कि श्रावण अमावस्या के दिन शिव भगवान की पूजा करने से घर में सुख और शांति के साथ समृद्धि भी आती है। 18 जुलाई से लग जायेगा मलमास भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि सावन के दूसरे सोमवार के बाद 18 जुलाई से 16 अगस्त तक मलमास रहेगा। पंचांग के अनुसार 3 साल में एक बार मलमास या अधिक मास पड़ता है। मलमास में शुभ कार्य वर्जित रहते है। मलमास में भगवान विष्णु की आराधना फलदायी होती है। आइए भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा.अनीष व्यास बता रहे हैं हरियाली अमावस्या पर राशि अनुसार करें पेड़ पौधों की पूजा मेष राशि: आंवले का पौधा वृषभ राशि: जामुन का पौधा मिथुन राशि: चंपा का पौधा कर्क राशि: पीपल का पौधा सिंह राशि: बरगद या अशोक का पौधा कन्या राशि: शिवजी का प्रिय बेल का पौधा, जूही का पौधा तुला राशि: अर्जुन या नागकेसर का पौधा वृश्चिक राशि: नीम का पौधा धनु राशि : कनेर का पौधा मकर राशि: शमी का पौधा कुंभ राशि: कदंब या आम का पौधा मीन राशि: बेर का पौधा आइए भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास बता रहे हैं हरियाली अमावस्या पर नवग्रह को प्रसन्न करने के लिए ग्रहों के अनुसार करें पेड़ पौधों की पूजा गुरु ग्रह के लिए: पीपल का पौधा शुक्र ग्रह के लिए: गूलर का पौधा शनि ग्रह के लिए: शमी का पौधा सूर्य ग्रह के लिए: सफेद मदार या आक का पौधा चंद्र ग्रह के लिए: पलाश का पौधा बुध ग्रह के लिए: अपामार्ग का पौधा मंगल ग्रह के लिए: खैर या शिशिर का पौधा राहु ग्रह के लिए: चंदन और दूर्वा का पौधा - डा. अनीष व्यास भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक

प्रभासाक्षी 15 Jul 2023 5:57 pm

Shravan Shivratri 2023: आज मनाई जा रही श्रावण शिवरात्रि, इन शुभ मुहूर्त में करें भोलेनाथ का जलाभिषेक

सावन माह में सोमवार व्रत, सावन प्रदोष व्रत और सावन शिवरात्रि की तिथियों का विशेष महत्व होता है। सावन माह में भगवान शिव की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। भगवान शिव की पूजा-अर्चना करने से व्यक्ति को सभी तरह के कष्टों से मुक्ति मिलती है और मनोकामना पूरी होती है। बता दें कि आज यानी की 15 जुलाई 2023 को सावन शिवरात्रि का पर्व मनाया जा रहा है। श्रावण शिवरात्रि का विशेष महत्व होता है। क्योंकि यह दिन भगवान भोलेनाथ को समर्पित होता है। श्रावण शिवरात्रि के मौके पर कांवड़िए शिवलिंग पर गंगाजल चढ़ाते हैं। श्रावण शिवरात्रि के पर्व को बेहद शुभ माना जाता है। बता दें कि देशभर में श्रावण शिवरात्रि काफी धूमधाम से मनाई जाती है। सावन शिवरात्रि में शिवलिंग का जलाभिषेक करने से और पूरे महीने भगवान शिव की पूजा का समान पुण्यफल प्राप्त होता है। यही कारण है श्रावण शिवरात्रि का दिन एक पर्व की तरह मनाया जाता है। आइए जानते हैं सावन शिवरात्रि का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व के बारे में... इसे भी पढ़ें: Sawan Pradosh Vrat 2023: सावन शुक्र प्रदोष व्रत से सौभाग्य में होती है वृद्धि सावन शिवरात्रि तिथि और समय चतुर्दशी तिथि की शुरूआति - 15 जुलाई 2023 से रात 08:32 मिनट तक चतुर्दशी तिथि की समाप्ति - 16 जुलाई 2023 से रात 10:08 मिनट तक निशिता काल मुहूर्त - 16 जुलाई 2023 सुबह 12.07 से 12.48 मिनट तक शिवरात्रि पारण समय - 16 जुलाई 2023- सुबह 05:34 बजे से दोपहर 03:51 मिनट तक चार प्रहर की पूजा का मुहूर्त रात को प्रथम प्रहर पूजा समय - 16 जुलाई 2023 को शाम 07:17 बजे से 09:51 मिनट तक रात्रि द्वितीय प्रहर पूजा समय - 16 जुलाई 2023 को रात 09:51 मिनट तक रात्रि तृतीय प्रहर पूजा समय - 16 जुलाई 2023 को 12:25 से दोपहर 03:00 बजे तक रात्रि चतुर्थ प्रहर पूजा समय - 16 जुलाई 2023 - दोपहर 03:00 बजे से शाम 05:34 मिनट तक शुभ योग वृद्धि योग - 14 जुलाई 2023, सुबह 08:28 - 15 जुलाई 2023, सुबह 08:22 मिनट तक ध्रुव योग - 15 जुलाई 2023, सुबह 08:22 - 16 जुलाई 2023, सुबह 8:33 मिनट तक ऐसे करें पूजा श्रावण शिवरात्रि पर सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदिकर स्वच्छ वस्त्र पहनें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद शिवलिंग का दूध, दही, शहद, घी, शक्कर, गन्ने के रस आदि से अभिषेक करें। फिर काले तिल को गंगाजल में मिलाकर 108 बार महामृत्युजंय मंत्र का जाप करें और उसे शिवलिंग पर अर्पित कर दें। अब महादेव की प्रिय वस्तुएं जैसे भांग, धतूरा, बेलपत्र, हरसिंगार के फूल और काला तिल आदि अर्पित करें। इसके बाद आटे के चौमुखी दीपक में घी का दीपक जलाएं और शिव मंत्र, शिव चालीसा व शिव तांडव स्त्रोत का पाठ करें।

प्रभासाक्षी 15 Jul 2023 9:06 am

Kurukshetra : नाबालिग से दुष्कर्म करने के आरोपी को 25 साल कठोर कारावास

अतिरिक्त जिला एवं सेशन न्यायाधीश की अदालत ने नाबालिग के साथ दुष्कर्म करने व जान से मारने की धमकी देने के दोषी विकास वासी जिला कुरुक्षेत्र को 25 साल कठोर कारावास व 55 हजार रुपए जुर्माने की सजा सुनाई।

हरि भूमि 14 Jul 2023 6:00 pm

Kamika Ekadashi 2023: भगवान विष्णु की कृपा पाने के लिए कामिका एकादशी पर ऐसे करें पूजा, जानिए शुभ मुहूर्त

हर महीने दो एकादशी के व्रत पड़ते हैं। वहीं सावन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को कामिका एकादशी कहा जाता है। इस साल कामिका एकादशी आज यानी की 13 जुलाई को है। बता दें कि सावन के महीने में पड़ने वाली एकदाशी की कई विशेषताएं होती हैं। इस दिन जगत के पालनहार भगवान विष्णु के साथ देवी तुलसी का विवाह विधि-विधान से किया जाता है। मान्यता के इस व्रत को करने से व्यक्ति की हर मनोकामना पूरी होती है। वहीं व्यक्ति द्वारा किए गए पाप कर्मों से भी मुक्ति मिलती है। आइए जानते हैं कामिका एकादशी का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व... कामिका एकादशी का शुभ मुहूर्त कामिका एकादशी 2023 तिथि की शुरूआत- 12 जुलाई को शाम 05:59 मिनट पर कामिका एकादशी 2023 तिथि की समाप्ति- 13 जुलाई को शाम 06:24 मिनट पर वहीं कामिका एकादशी 2023 का पहला पूजा मुहूर्त 13 जुलाई 2023 को सुबह 05:32 मिनट से सुबह 07:16 मिनट तक है। इसके बाद दूसरा पूजा मुहूर्त सुबह 10:43 मिनट से दोपहर 03:45 मिनट तक है। कामिका एकादशी का व्रत पारण 14 जुलाई को सुबह 05:33 मिनट से 08:18 मिनट तक किया जाएगा। पूजा विधि कामिका एकादशी के दिन सुबह सुर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि कर स्वच्छ कपड़े पहनें। फिर सूर्यदेव को अर्घ्य देते हुए व्रत का संकल्प करें। इसके बाद मंदिर की साफ सफाई कर एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं और उस पर भगवान विष्णु की प्रतिमा या मूर्ति स्थापित करें। अब भगवान की प्रतिमा के सामने दीपक जलाएं। फिर श्रीहरि विष्णु को फूल-फल, दूध, पंचामृत और तुलसी आदि अर्पित करें। पूजा के दौरान तुलसी चढ़ाना न भूलें। क्योंकि इसके बिना श्रीहरि की पूजा पूरी नहीं होती हैं। इसके बाद कामिका एकादशी व्रत कथा पढ़ आरती करें। आखिरी में भगवान श्रीहरि विष्णु से पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमा मांग लें। कामिका एकादशी व्रत का महत्व मान्यता के अनुसार, कामिका एकादशी का व्रत करने और विधि-विधान से भगवान श्रीहरि विष्णु की पूजा-अर्चना करने से न सिर्फ विष्णु भगवान बल्कि पितरों का भी आशीर्वाद प्राप्त होता है। इससे व्यक्ति के बिगड़े हुए काम बनने लगते हैं। इस व्रत को करने वाले व्यक्ति को किसी चीज का भय नहीं होता है। व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिलने के साथ ही मोक्ष की प्राप्ति होती है।

प्रभासाक्षी 13 Jul 2023 9:36 am

Kamika Ekadashi 2023: कामिका एकादशी व्रत से मिलता है शुभ फल

कामिका एकादशी है का हिन्दू धर्म में खास महत्व होता है। इसे पवित्रा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है तो आइए हम आपको कामिका एकादशी की पूजा विधि तथा महत्व के बारे में बताते हैं। जानें कामिका एकादशी के बारे में सावन मास के कृष्‍ण पक्ष की एकादशी को कामिका एकादशी कहते हैं। इस एकादशी पर भगवान विष्‍णु की पूजा का विशेष महत्‍व होता है। चातुर्मास में भगवान विष्‍णु की पूजा करने से लाभ होता है। कामिका एकादशी का व्रत करने से भक्‍तों को शुभ फल की प्राप्ति होती है। कामिका एकादशी का शुभ मुहूर्त कामिका एकादशी चातुर्मास में श्रावण कृष्‍ण पक्ष की एकादशी को कहा जाता है। इस बार कामिका एकादशी व्रत 13 जुलाई को है। चातुर्मास में भगवान विष्‍णु 4 महीने के लिए योग निद्रा में चले जाते है। ऐसे में कामिका एकादशी पर पूजा करके भगवान विष्‍णु को प्रसन्‍न करने के लिए भक्‍तजन यह व्रत करते हैं। पंडितों का मानना है कि जो भी भक्‍त कामिका एकादशी पर व्रत करते हें उन्‍हें बुरे कर्मों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसे भी पढ़ें: Saturday Upay: शनिवार को इन उपायों को करने से प्रसन्न होते हैं शनिदेव, रंक से बन जाएंगे राजा कामिका एकादशी व्रत का मुहूर्त कामिका एकादशी का आरंभ हो रही है- 12 जुलाई को शाम 5 बजकर 59 मिनट तक कामिका एकादशी का समापन हो रहा है- 13 जुलाई को शाम 6 बजकर 24 मिनट पर कामिका एकादशी व्रत के पारण का समय- 14 जुलाई को सुबह 5 बजकर 33 से 8 बजकर 18 मिनट तक। कामिका एकादशी के दिन चावल का सेवन नहीं करें पंडितों के अनुसार एकादशी के पवित्र दिन चावल नहीं खाएं। एकादशी के दिन चावल खाने से मनुष्य का जन्म रेंगने वाले जीव की योनि में होता है। अगर आप व्रत नहीं करते हैं तो इस दिन व्रत नहीं रखने वालों को भी चावल का सेवन नहीं करना चाहिए। अगर आप चावल खाने के शौकीन हैं तो द्वादशी के दिन खा सकते हैं। कामिका एकादशी के दिन ऐसे करें पूजा पंडितों के अनुसार सावन माह की एकादशी पर सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होने के बाद साफ वस्त्र पहनने चाहिए। इस दिन भगवान विष्णु पंचामृत और केसर मिश्रित जल से अभिषेक करना चाहिए। भगवान विष्णु का पूरे विधि विधान के साथ पूजन करें और कथा का श्रवण करें। व्रत में ब्रह्माण को भोजन कराएं और क्षमता के अनुसार दान अवश्य करें। ऐसा करने से भगवान विष्णु की कृपा से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। एकादशी के दिन सात्विक भोज ही करें कामिका एकादशी के पवित्र दिन सदैव सात्विक भोजन करें। कभी भी मांस-मंदिरा का सेवन नहीं करें। सात्विक तथा शाकाहारी भोजन कर विष्णु भगवान की पूजा करें इससे आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी। कामिका एकादशी के दिन कभी भी शाम को न सोएं कामिका एकादशी के दिन व्रत रखने वाले भक्त सदैव याद रखें कभी भी शाम को न सोएं। इस दिन सदैव प्रातः उठना चाहिए तथा भगवान का भजन करना चाहिए। इससे भगवान विष्णु प्रसन्न होकर भक्त की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। कामिका एकादशी के पवित्र अवसर पर सदैव संयम का पालन करें। कभी भी शारीरिक संबंध नहीं बनाएं। आपको संयम के साथ ब्रह्चर्य का पालन करना चाहिए। इस दिन भोग-विलास में लिप्त होने के बजाय पूजा-पाठ कर ईश्वर को प्रसन्न करें। कामिका एकादशी व्रत में नियमों का करें पालन पंडितों के अनुसार कामिका एकादशी व्रत केवल एक दिन का व्रत नहीं है बल्कि इस व्रत का प्रारम्भ दशमी से ही शुरू हो जाता है। दशमी के दिन दोपहर को भोजन करने के बाद रात में भोजन न करें। इस प्रकार एकादशी के दिन पूजा कर फलाहार ग्रहण करें। उसके बाद द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन करा कर दान दें उसके बाद पारण करें। कामिका एकादशी का महत्व कामिका एकदशी का विशेष महत्व है। महाभारत काल में स्वयं भगवान कृष्ण ने पांडवों को एकादशी के महामात्य के बारे में बताया था। कामिका एकादशी का व्रत रखने और पूजा करने से जीवन से हर प्रकार के कष्ट का नाश होता है। सुख समृद्धि मिलती है। जीवन में सफलता प्राप्त होती है और पितृ भी प्रसन्न होते हैं। कामिका एकादशी का व्रत रखने से पापों से भी मुक्ति मिलती है। एकादशी पूजा में तुलसी पत्र का प्रयोग होता है लाभकारी पंडितों के अनुसार तुलसी पत्र विष्णु भगवान को विशेष प्रिय होता है। इसलिए कामिका एकादशी के व्रत में तुलसी पत्र का बहुत महत्व होता है तथा तुलसी पत्र की पूजा करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं। इसलिए पूजा में तुलसी पत्र का प्रयोग अवश्य करें। कामिका एकादशी पर दान का है खास महत्व शास्त्रों के अनुसार अगर आप कामिका एकादशी के दिन भगवान विष्णु को प्रसन्न करना चाहते हैं तो सबसे पहले आपको गरीब असहाय और जरूरतमंदों को अन्न का दान करना चाहिए जिसमें चावल मक्का गेहूं इत्यादि शामिल हो। वहीं दूसरी तरफ कामिका एकादशी के दिन अगर आप गरीब असहाय व्यक्ति को पीले वस्त्र का दान करते हैं तो कुंडली में गुरु मजबूत होता है। सावन माह की कामिका एकादशी भी अपने आप पर महत्वपूर्ण है क्योंकि भगवान विष्णु इस समय क्षीर सागर में चले जाते हैं और इस दौरान विधि विधान पूर्वक पूजा आराधना करने से दान पुण्य करने से समस्त मनोकामना की सिद्धि होती है इस दिन गरीब असहाय जरूरतमंद लोगों को छाते का भी दान करना चाहिए। कामिका एकादशी व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा पौराणिक कथा के अनुसार, 'किसी गांव में एक ठाकुर नाम का आदमी रहता था, जो बहुत क्रोधी था। एक दिन उस ठाकुर का ब्राह्मण से झगड़ा हो गया और उसने गुस्से में आकर ब्राह्मण की हत्या कर दी। बाद में ठाकुर को अपनी गलती का पछतावा हुआ और उसने क्षमा मांगी। वहीं ब्राह्मण की हत्या की वजह से ठाकुर पर ब्रह्म हत्या का दोष लग गया. ठाकुर ने एक सिद्ध मुनि से इस दोष से मुक्ति पाने का उपाय पूछा। तब मुनि ने उसे श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत रखने के लिए कहा। ठाकुर ने पूरी श्रद्धा से एकादशी का व्रत रखा और भगवान विष्णु ने उसे दर्शन देकर पाप मुक्त कर दिया। तब से इस व्रत को कामिका एकादशी के नाम से जाना जाने लगा। तुलसी के बिना अधूरा है ये व्रत इस व्रत में भगवान विष्णु के साथ ही तुलसी पूजा करने का भी विधान है। कामिका एकादशी पर भगवान विष्णु को मंजरी सहित तुलसी पत्र चढ़ाना चाहिए। भगवान विष्णु को तुलसी बहुत प्रिय है। भगवान विष्णु हीरे-मोती, सोने-चांदी से इतने खुशी नहीं होते, जितनी खुशी उन्हें तुलसी पत्र से मिलती है। - प्रज्ञा पाण्डेय

प्रभासाक्षी 12 Jul 2023 5:10 pm

Mangla Gauri Vrat 2023: आज किया जा रहा सावन का दूसरा मंगला गौरी व्रत, जानिए पूजा विधि और महत्व

आज यानी की 11 जुलाई 2023 को सावन माह का दूसरा मंगलवार है। बता दें कि जिस तरह से सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित है, ठीक उसी तरह सावन के सभी मंगलवार मां पार्वती को समर्पित है। आज यानी की 11 जुलाई को दूसरा मंगला गौरी का व्रत किया जा रहा है। वहीं पहला मंगला गौरी का व्रत 4 जुलाई को किया गया था। मंगला गौरी व्रत के दिन मां पार्वती की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। मां मंगला गौरी आदि शक्ति माता पार्वती का मंगल स्वरूप हैं। वहीं मां दुर्गा के 8वें स्वरूप को महागौरी के नाम से जाना जाता है। इस व्रत को महिलाएं करती हैं। इस व्रत को करने से महिलाओं को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसलिए विवाहित महिलाएं सावन के मंगलवार को मंगला गौरी का व्रत करती हैं। मान्यता के अनुसार, विधि-विधान से मंगलागौरी व्रत करने से अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है। इसके साथ ही दांपत्य जीवन में प्रेम बना रहता है। आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको मंगला गौरी व्रत की पूजा और उसके महत्व के बारे में बताने जा रहे हैं। मंगला गौरी व्रत का शुभ योग आज यानी की 11 जुलाई को मंगला गौरी व्रत वाले दिन चार बेहद शुभ योग का निर्माण हो रहा है। आज सुकर्मा और धृति योग का निर्माण हो रहा है। इसके साथ हही आज के दिन सर्वाथ सिद्धि योग और अमृत सिद्धि योग का निर्माण हो रहा है। इन शुभ योग में पूजा करने का अधिक महत्व होता है। मंगला गौरी व्रत विधि दूसरे मंगला गौरी व्रत वाले दिन सबसे सूर्योदय से पहले स्नान आदि कर स्वच्छ कपड़े धारण करें। फिर लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछा लें। अब इस पर मां पार्वती की प्रतिमा को स्थापित करें। इसके बाद व्रत का संकल्प लेते हुए मां गौरी के सामने आंटे से बना हुआ दीपक जलाएं। फिर मां पार्वती को धूप-दीप, नैवेद्य आदि अर्पित करें। इसके बाद मां गौरी को श्रृंगार का सामान अर्पित करें। इस दौरान ध्यान रखें कि आप मां गौरी को जितनी भी चीजें अर्पित कर रहें हैं जैसे सुहाग का सामान, फल, फूल, माला, मिठाई आदि। इन सभी की संख्या 16 होना चाहिए। इसके बाद मां गौरी की विधि-विधान से पूजाकर आरती करें। मां पार्वती से अखंड सौभाग्य की प्रार्थना करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमा मांगे। मंगला गौरी व्रत का महत्व महिलाएं यह व्रत पति की लंबी आयु के लिए करती हैं। इस दिन मां पार्वती की विधि-विधान से पूजा करने से अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। वहीं दांपत्य जीवन में मधुरता आती है। वहीं जो महिलाएं संतान प्राप्ति की इच्छा से यह व्रत करती हैं, उन्हें शीघ्र ही संतान प्राप्ति होती है। वहीं दांपत्य जीवन में आने वाली समस्याओं का अंत होता है। इस व्रत को करने से दांपत्य जीवन का कलह-कष्ट व अन्य समस्याओं से निजात मिलती है।

प्रभासाक्षी 11 Jul 2023 9:13 am