ये लोग न पिएं हल्दी वाला दूध ! फायदे की जगह होगा नुकसान
आमतौर पर हल्दी वाला दूध हेल्दी माना जाता है। दर्द होने पर, सर्दी-खांसी होने पर घरों में लोग सबसे पहले हल्दी वाला दूध पीने की सलाह देते हैं,
Bhadrapada Amavasya 2026: भाद्रपद अमावस्या को स्नान- दान से होती है पुण्य की प्राप्ति
आज भाद्रपद अमावस्या है, हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि का खास महत्व है। भाद्रपद अमावस्या को कुशग्रहणी (कुशोत्पाटिनी) अमावस्या और पिठोरी अमावस्या भी कहा जाता है। यह अमावस्या पितरों के तर्पण और संतान की लंबी उम्र व सुख-समृद्धि के लिए समर्पित है तो आइए हम आपको भाद्रपद अमावस्या तिथि का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं। जानें भाद्रपद अमावस्या के बारे में हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि का विशेष धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व है। विशेष रूप से भाद्रपद माह की अमावस्या को पिठोरी अमावस्या के रूप में मनाया जाता है। यह दिन माताओं द्वारा अपने बच्चों की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और सुरक्षा के लिए व्रत रखने के लिए समर्पित होता है। पौराणिक शास्त्रों के अनुसार भाद्रपद अमावस्या के दिन कुशा इकट्ठी की जाती है। इसे पिठौरा, कुशोत्पाटनी, कुशग्रहणी अमावस्या इत्यादि नामों से भी जाना जाता है। इस दिन सुहागिन स्त्रियां व्रत रखकर भगवान भोलेनाथ एवं देवी दुर्गा की पूजा करती है। यह दिन पितरों की तृप्ति, पिंड दान, तर्पण और वंश वृद्धि के लिए अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। अमावस्या की शाम पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीया लगाने, पितरों का स्मरण, शिव जी और शनि देव की आराधना करने से जीवन में चारों तरफ लाभ मिलता है। इस वर्ष भाद्रपद अमावस्या की तिथि 11 सितंबर को है। भाद्रपद अमावस्या को स्नान और दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है एवं पाप मिटते हैं। इस दिन नाराज पितरों को खुश करने और पितृ दोष की शांति के उपाय किए जाते हैं। भाद्रपद अमावस्या में स्नान का शुभ मुहूर्त पंडितों के अनुसार 11 सितंबर को भाद्रपद अमावस्या के दिन आप ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर सकते हैं क्योंकि यह नहाने का सबसे उत्तम समय होता है। भाद्रपद अमावस्या पर ब्रह्म मुहूर्त 04:32 से 05:18 तक है। जो लोग ब्रह्म मुहूर्त में स्नान न कर पाएं, वे सूर्योदय के बाद भी स्नान कर सकते हैं। उसके बाद अपनी क्षमता के अुनसार दान करें। इसे भी पढ़ें: Pithori Amavasya 2026: संतान सुख और Pitra Dosh मुक्ति के लिए आज जरूर करें Shubh Muhurat में पूजा भाद्रपद अमावस्या पर ये चीजें करें दान, होगा लाभ भाद्रपद अमावस्या को स्नान करने के बाद आप किसी गरीब या जरूरतमंद व्यक्ति को कपड़े का दान कर सकते है। इसके अलावा चावल, गेहूं, दाल, हरी सब्जियां, फल, अनाज, गुड़, बर्तन, छाता आदि का दान कर सकते हैं। दान के साथ कुछ पैसे भी दे सकते हैं। भाद्रपद अमावस्या के दिन पितरों की नाराजगी दूर करने के उपाय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद अमावस्या पर सुबह स्नान के बाद पितरों का ध्यान करें और उनके निमित्त तर्पण करें। अन्न-वस्त्र का दान कर जरूरतमंद लोगों को भोजन कराएं। इसके अलावा गाय, कौआ, कुत्ता और अन्य जीवों को भी भोजन कराएं। पितृ दोष से मुक्ति पाने का दिन ज्योतिषीय दृष्टि से पितृ दोष होने पर व्यक्ति को करियर में बार-बार बाधा, आर्थिक अस्थिरता, पारिवारिक तनाव, संतान संबंधी चिंता या काम में अनावश्यक रुकावट जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। भाद्रपद अमावस्या के दिन भूलकर भी न करें ये गलती पंडितों के अनुसार भाद्रपद अमावस्या के दिन पितरों के नाम पर किए जाने वाले कर्म श्रद्धा और नियमपूर्वक करने चाहिए। दिखावे के लिए पूजा-पाठ करने के बजाय अपनी क्षमता के अनुसार तर्पण, दान और भोजन कराएं। इस दिन किसी का अपमान करना, झूठ बोलना, क्रोध करना या जानबूझकर किसी को कष्ट पहुंचाने की गलती न करें। पितृ दोष मुक्ति के उपाय अमावस्या के दिन स्नान के बाद पितरों का स्मरण कर जल, काले तिल और कुश से तर्पण करें। घर में पितरों का स्मरण करते हुए ॐ पितृभ्यः नमः मंत्र का जाप कर सकते हैं। परिवार की ओर से जाने-अनजाने हुई भूल के लिए पितरों से क्षमा प्रार्थना करें। इस दिन क्रोध, झूठ, अपमान और किसी जरूरतमंद को खाली हाथ लौटाने से बचें। पितरों का इसलिए भी होता है आशीर्वाद हिंदू परंपरा में पितरों को परिवार की वंश परंपरा का आधार माना गया है इसलिए अमावस्या जैसे अवसरों पर पूर्वजों का स्मरण केवल दोष दूर करने के लिए नहीं, बल्कि उनके प्रति आभार व्यक्त करने की परंपरा भी है। पूर्वजों का आशीर्वाद हो तो परिवारजन पर कष्ट नहीं आते। भाद्रपद अमावस्या से जुड़ी पौराणिक कथा भी है खास पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में एक गांव में सात भाई रहते थे। उनके साथ उनकी सात पत्नियां भी रहती थीं जो हर साल भाद्रपद अमावस्या पर पिठोरी व्रत करती थीं। सबसे बड़े भाई की पत्नी ने जब पहली बार यह व्रत किया, तो उसके नवजात शिशु की मृत्यु हो गई। इसके बाद क्रमानुसार दूसरे, तीसरे और इसी तरह छह भाइयों की पत्नियों ने जब-जब यह व्रत किया, तो उनके यहां भी संतानों की अकाल मृत्यु जैसी घटनाएं होने लगीं। केवल सबसे छोटे (सातवें) भाई की पत्नी ने जब व्रत किया, तो उसके बच्चे सुरक्षित रहे। दुखी होकर उन छह बहुओं ने अपनी छोटी देवरानी से इसका कारण पूछा। छोटी बहू ने बताया कि माता पार्वती और षष्ठी देवी की सच्चे मन से पूजा न करने और विधि में त्रुटि होने के कारण ऐसा हुआ है। तब सभी बहुओं ने अपनी भूल का पश्चाताप किया और माता पार्वती (पिठोरी माता) की विधि-विधान से आटे की मूर्तियां बनाकर क्षमा-प्रार्थना के साथ दोबारा व्रत और पूजन किया। माता की कृपा से सभी के मरे हुए बच्चे जीवित हो गए और उनके घरों में खुशहाली लौट आई। भाद्रपद अमावस्या दिन जरूर करें ये उपाय शास्त्रों के अनुसार पितृ दोष से मुक्ति पाने के लिए अमावस्या के दिन पूजा-अर्चना करने के बाद मंदिर में या जरूरतमंदों को पितरों का ध्यान करते हुए अन्न, वस्त्र, जूते-चप्पल और छाते का दान करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस उपाय को करने से पितृ दोष की समस्या दूर होती है और सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। इसके अलावा रोजाना पहली रोटी गाय के लिए और आखिरी रोटी कुत्ते के लिए निकालें। ऐसा माना जाता है कि इस उपाय को नियमित रूप से करने से जीवन में किसी चीज की कमी नहीं होती है। पितरों के तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध के दौरान पितृ मंत्रों और पितृ चालीसा का पाठ करें। इससे पूर्वज प्रसन्न होते हैं और परिवार के सदस्यों पर अपनी कृपा बरसाते हैं। - प्रज्ञा पाण्डेय
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अगर मुंह के छालों से कान में रहती है टीस तो यहां जानिए कारण और होम्योपैथिक उपचार
मुंह के पिछले हिस्से के छालों से जुड़ी नसों के कारण कान में होने वाले दर्द (रेफर्ड पेन) को होम्योपैथी आंतरिक असंतुलन का लक्षण मानती है। पेट की गड़बड़ी, तनाव और रोग प्रतिरोधक क्षमता की कमी से होने वाली इस तकलीफ में मर्क सॉल, नाइट्रिक एसिड और बोरेक्स जैसी दवाएं लक्षणों के आधार पर स्थायी राहत देती हैं।
शारीरिक कमजोरी, तनाव और पुनर्वास : स्वस्थ जीवन की ओर वापसी
शारीरिक निष्क्रियता के कारण मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं। पुनर्वास के दौरान लक्षित व्यायामों से मांसपेशियों की ताकत और सहनशक्ति (Stamina) वापस लौटती है।
Aja Ekadashi 2026: अजा एकादशी व्रत से होता है सभी पापों का नाश
आज अजा एकादशी है, हिन्दू धर्म में इस व्रत की खास मान्यता है। इस व्रत को रखने से व्यक्ति के द्वारा अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति मिलती है और जीवन में भी सुख शांति मिलती है तो आइए हम आपको अजा एकादशी व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं। जानें अजा एकादशी व्रत के बारे में धार्मिक मान्यताओं के अनुसार 'अजा' शब्द का संबंध सनातन धार्मिक परंपरा में आध्यात्मिक अर्थ से जोड़ा गया है। अजा एकादशी भगवान विष्णु की आराधना से जुड़ी एक महत्वपूर्ण एकादशी मानी जाती है। इस दिन व्रत करने के पीछे मुख्य भावना आत्मसंयम, भक्ति और अपने कर्मों को सात्त्विक दिशा देना है। पंडितों के अनुसार अजा एकादशी का व्रत व्यक्ति को अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखने, भोजन में संयम बरतने और आध्यात्मिक चिंतन में अधिक समय लगाने का अवसर देता है। सनातन परंपरा में अजा एकादशी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। जगत के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित यह पावन व्रत जीवन के संचित पापों, दरिद्रता और संकटों को समाप्त करने वाला माना गया है। धर्मग्रंथों के अनुसार जो व्यक्ति इस दिन श्रद्धा से उपवास करता है, उसे एक हजार अश्वमेध यज्ञों के बराबर पुण्य प्राप्त होता है। जानें अजा एकादशी का शुभ मुहूर्त हिन्दू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 6 सितंबर 2026 को शाम 7:30 बजे आरंभ होगी और अगले दिन 7 सितंबर को शाम 5:05 बजे समाप्त होगी। व्रत के लिए उदया तिथि को मान्यता दी जाती है। इसलिए अजा एकादशी का व्रत 7 सितंबर 2026, सोमवार को रखा जाएगा। इसे भी पढ़ें: Aja Ekadashi 2026: अजा एकादशी आज, जानिए Muhurat, पूजन विधि और व्रत का महत्व अजा एकादशी पर दान का है खास महत्व सनातन परंपरा में व्रत के साथ दान का विशेष महत्व है। अजा एकादशी के अवसर पर अपनी क्षमता के अनुसार जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता करना पुण्य और परोपकार की भावना को मजबूत करता है। जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या आवश्यक सामग्री भी दान की जाती है। अजा एकादशी व्रत का पारण भी होता है विशेष पंडितों के अनुसार अजा एकादशी व्रत का पारण 8 सितंबर 2026 को किया जाएगा। पंचांग के अनुसार, इस दिन सुबह 6:02 बजे से 8:33 बजे तक पारण का शुभ समय रहेगा। व्रती इस अवधि में स्नान, पूजा और भगवान विष्णु की आराधना करने के बाद व्रत खोल सकते हैं। अजा एकादशी व्रत पर ऐसे करें पूजा, होगा लाभ अजा एकादशी का दिन बहुत खास होता है इसलिए इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल की सफाई कर गंगाजल से शुद्धिकरण करें और व्रत का संकल्प लें। पीले या लाल कपड़े पर भगवान विष्णु की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें। भगवान को पीला चंदन, अक्षत, फूल, माला और वस्त्र अर्पित करें। पूजा में तुलसी दल अवश्य शामिल करें। खीर, मिठाई और मौसमी फलों का भोग लगाएं। घी का दीपक और धूप जलाकर भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें। इसके बाद विष्णु चालीसा और अजा एकादशी व्रत कथा का पाठ करें। अंत में भगवान विष्णु और एकादशी माता की आरती करें। अगले दिन द्वादशी तिथि में पूजा करने के बाद निर्धारित समय में व्रत का पारण करें। अजा एकादशी व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा भी है खास शास्त्रों के अनुसार युधिष्ठिर ने एक बार भगवान कृष्ण से भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकादशी के बारे में पूछा था। कृष्ण ने उन्हें सत्यवादी हरिश्चंद्र के बारे में बताकर उत्तर दिया - वह राजा जो अपनी जान बचाने के लिए भी झूठ नहीं बोलते थे। महर्षि विश्वामित्र द्वारा परखे जाने पर, हरिश्चंद्र ने एक वचन का सम्मान करने के लिए अपना पूरा राज्य त्याग दिया। उनके पास अपने वचन के अलावा कुछ नहीं बचा था, उन्हें अपनी रानी तारामती और अपने पुत्र रोहितश्व को दासता में बेचने के लिए मजबूर किया गया, और स्वयं को एक चांडाल को बेच दिया गया जो काशी के श्मशान घाटों की देखभाल करता था। अयोध्या के सम्राट अब अपने दिन चिताओं पर कर वसूलने में बिताते थे। फिर सबसे क्रूर प्रहार: उनके पुत्र रोहितश्व की सर्प दंश से मृत्यु हो गई। तारामती बच्चे के शव को दाह संस्कार के लिए श्मशान ले गई - और हरिश्चंद्र को, अपने कर्तव्य से बंधे हुए, अपनी शोकाकुल पत्नी से दाह संस्कार शुल्क मांगना पड़ा जो उन्हें पता था कि वह नहीं दे सकती थी। उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने झूठ नहीं बोला। यह सबसे निचले बिंदु पर था कि ऋषि गौतम ने उन्हें ढूंढ निकाला और उन्हें अजा एकादशी के बारे में बताया उन्हें इस तिथि पर पूर्ण विश्वास के साथ उपवास करने की सलाह दी। हरिश्चंद्र ने व्रत का पालन किया। और उस एक दिन के पुण्य ने सब कुछ बदल दिया: देवता अवतरित हुए, रोहितश्व को जीवनदान मिला, तारामती ने अपनी शाही गरिमा वापस पा ली, और हरिश्चंद्र को उनका राज्य और, समय के साथ, उच्च लोकों में एक स्थान वापस मिल गया। अजा एकादशी व्रत पर ये न करें, होगी हानि पंडितों के अनुसार अजा एकादशी के दिन चावल और सभी प्रकार के अनाजों से बचें। इसके अलावा प्याज, लहसुन और सभी मांसाहारी भोजन से दूर रहें। मसूर दाल, चना और अधिकांश दालें न खाएं। शहद, और कांस्य के बर्तन से भोजन न करें। क्रोध, गपशप, कटु वचन और झगड़े न करें, ये व्रत को भोजन की तरह ही तोड़ते हैं। इसके अलावा अजा एकादशी के दिन बाल या नाखून न काटें, साथ ही शेविंग भी न करें। अजा एकादशी पर ये करें, होंगे लाभ अजा एकादशी पर फल, दूध, दही, और सूखे मेवे खाएं, इससे ऊर्जा बनी रहेगी। साथ ही साबूदाना, सिंघाड़ा आटा, कुट्टू आटा, समा चावल खाएं। इसके अलावा जो निर्जला व्रत रखते हैं, उन्हें पारण समय खुलने तक इसे नहीं छूना चाहिए। इसके अलावा आलू, शकरकंद, कद्दू और सेंधा नमक खाएं। अजा एकादशी ये भी करें, मिलेगा पुण्य धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सूर्योदय से पहले स्नान करें, अपने पानी में कुछ बूंदें गंगाजल डालें। साफ पीले या सफेद वस्त्र पहनें। व्रत का औपचारिक संकल्प लें। एक साफ चौकी पर भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र रखें। उसके बगल में एक तांबे का कलश स्थापित करें, जिसमें पानी भरा हो और आम के पत्तों और एक नारियल से ढका हो। चंदन, रोली, अक्षत, फूल, धूप और एक शुद्ध देसी घी का दीपक अर्पित करें। कोई भी विष्णु पूजा तुलसी के पत्तों के बिना अधूरी है। उन्हें पिछली शाम को तोड़ लें - तुलसी को एकादशी पर कभी नहीं तोड़ना चाहिए। पंचमेवा, फल और खीर अर्पित करें। प्रत्येक प्रसाद में तुलसी शामिल होनी चाहिए। दिन भर ॐ नमो भगवते वासुदेवाय या विष्णु सहस्रनाम का जाप करें। अजा एकादशी व्रत कथा पढ़ें या सुनें, फिर एक आरती थाली और भीमसेनी कपूर के साथ आरती करें।जो सबसे सख्त रूप का पालन करते हैं, वे रात भर भजन और कीर्तन में जागते रहते हैं। - प्रज्ञा पाण्डेय
Dahi Handi 2026: Vajra Yoga में मनेगा दही हांडी का पर्व, जानें Shubh Muhurat और Puja Vidhi
आज यानी की 05 सितंबर 2026 को श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ा दही हांडी का पर्व मनाया जा रहा है। यह जन्माष्टमी के अगले दिन मनाया जाता है। इस दिन श्रीकृष्ण की माखन लीला को याद किया जाता है। दही हांडी पर्व पर जगह-जगह गोविंदा की टोलियां एक-दूसरे के कंधे पर चढ़कर मानव पिरामिड बनाती हैं और ऊंचाई पर रखी मटकी को फोड़ा जाता है। देश के कई हिस्सों में इस पर्व की रौनक देखने को मिलती है। तो आइए जानते हैं कि जन्माष्टमी के अगले दिन दही हांडी का पर्व क्यों मनाया जाता है और इसका शुभ मुहू्र्त क्या है और पूजा कैसे करें। तिथि और मुहूर्त आज यानी की 05 सितंबर 2026 को वज्र योग रहेगा। वहीं दोपहर 12:00 बजे से लेकर 12:50 तक अभिजीत मुहूर्त रहेगा। यह सबसे शुभ समय माना जाता है। इस दौरान पूजा-अर्चना और शुभ कार्य किए जा सकते हैं। वहीं दोपहर 01:16 मिनट से लेकर 02:45 मिनट तक अमृत काल रहेगा। इसे भी पढ़ें: Krishna Janmashtami 2026: Krishna Janmashtami पर बना दुर्लभ संयोग, नोट करें Shubh Muhurat और Puja Vidhi क्यों मनाया जाता है दही हांडी का पर्व जन्माष्टमी की रात में श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का मुख्य अनुष्ठान किया जाता है। फिर अगले दिन श्रीकृष्ण के बाल रूप और नटखटपन की लीलाओं का उत्सव मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक श्रीकृष्ण को माखन बहुत पसंद था। कान्हा अक्सर गोपियों का माखन चुराते थे। माखन चोरी से परेशान होकर गोपियों ने मटकी को जमीन से ऊंचाई पर टांगना शुरू कर दिया, जिससे कि बाल कृष्ण वहां तक न पहुंचे। लेकिन नटखट कृष्ण अपने सखाओं के साथ आते और एक-दूसरे पर चढ़कर मानव पिरामिड बनाते थे। वहीं सबसे ऊपर रहने वाला साथी मटकी को फोड़ देता था। जिसके बाद सब दही और माखन का आनंद लेते थे। कान्हा की इस लीला की याद में दही हांडी का पर्व मनाया जाता है। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद श्रीकृष्ण या फिर लड्डू गोपाल की पूजा करें। इसके बाद भगवान पंचामृत से स्नान कराएं और फिर बाद में साफ जल से स्नान कराने के बाद नए कपड़े पहनें। अब कान्हा को बांसुरी, मुकुट और चंदन का तिलक लगाएं और उनका सुंदर सा श्रृंगार करें। कान्हा को सजाने के बाद उनको झूले में बिठाएं और श्रद्धा व भक्ति के साथ उनको झूला झुलाएं। एक छोटी मटकी में मक्खन, दही, पोहा, सूखे मेवे और कुछ सिक्के डालकर पूजा घर में रखें। भगवान श्रीकृष्ण को पंचमेवा, मक्खन-मिश्री और गोपालकाला का भोग अर्पित करें। पूजा के अंत में घी का दीपक और कपूर जलाकर श्रीकृष्ण की आरती करें। पूजा पूरी होने के बाद सभी लोगों में प्रसाद वितरित करें।
रूखे-बेजान बालों में जान फूंकने के 5 आसान हेयर वॉश हैक्स बिना महंगे प्रोडक्ट्स के मिलेंगे रेशमी बाल
बालों की खूबसूरती केवल महंगे ब्रांडेड प्रोडक्ट्स या पार्लर के महंगे ट्रीटमेंट पर निर्भर नहीं करती। अक्सर हमारी रोज़मर्रा की छोटी-छोटी गलतियां बालों की कुदरती नमी छीन लेती हैं। यदि आपके बाल भी धोने के बाद उलझे रूखे और बेजान दिखने लगते हैं तो अपनी हेयर वॉश तकनीक में ये बदलाव करके देखें।
सनातन धर्म में भगवान श्रीकृष्ण को भगवान विष्णु का आठवाँ अवतार माना जाता है। उनका जीवन प्रेम, धर्म, नीति, करुणा, कर्म और भक्ति का अद्भुत संदेश देता है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में पूरे भारत और विश्व के अनेक देशों में श्रद्धा एवं उल्लास के साथ मनाई जाती है। हालांकि मथुरा, वृंदावन, द्वारका और देश के विभिन्न श्रीकृष्ण मंदिरों में इस पर्व की छटा अत्यंत मनोहर रूप लिये हुए होती है। भक्त इस दिन व्रत रखते हैं, भगवान श्रीकृष्ण का श्रृंगार करते हैं, झांकियां सजाते हैं और मध्यरात्रि में उनके जन्मोत्सव का आयोजन करते हैं। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 2026 की तिथि वर्ष 2026 में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी शुक्रवार, 4 सितंबर को मनाई जाएगी। यह पर्व भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को, विशेष रूप से रोहिणी नक्षत्र के संयोग में मनाया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मध्यरात्रि में हुआ था, इसलिए जन्माष्टमी की पूजा का विशेष आयोजन रात्रि में किया जाता है। तिथि और पूजा के समय में स्थान तथा स्थानीय पंचांग के अनुसार कुछ अंतर हो सकता है, अतः श्रद्धालुओं को अपने क्षेत्र के पंचांग के अनुसार पूजा मुहूर्त की पुष्टि करनी चाहिए। इसे भी पढ़ें: Krishna Janmashtami 2026: ऐश्वर्य एवं वैराग्य का अद्भुत संगम है श्रीकृष्ण श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का महत्व श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव नहीं है, बल्कि यह अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक भी है। पौराणिक मान्यता के अनुसार जब मथुरा के अत्याचारी राजा कंस के अत्याचार बढ़ गए और धर्म की स्थापना के लिए भगवान विष्णु के अवतार की आवश्यकता हुई, तब भगवान श्रीकृष्ण ने देवकी और वसुदेव के पुत्र के रूप में जन्म लिया। भगवान श्रीकृष्ण का जीवन अनेक प्रेरणाओं से भरा हुआ है। बाल्यकाल में उन्होंने पूतना, तृणावर्त और कालिय नाग जैसे दुष्टों का अंत किया तथा गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा की। आगे चलकर उन्होंने महाभारत के युद्ध में अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश दिया, जिसमें निष्काम कर्म, भक्ति और ज्ञान का संदेश दिया गया। जन्माष्टमी का पर्व भक्तों को यह प्रेरणा देता है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिन परिस्थितियां हों, सत्य, धर्म और कर्तव्य का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की पूजन विधि जन्माष्टमी के दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करते हुए व्रत और पूजा का संकल्प लें। पूजा स्थल को स्वच्छ करके भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल की प्रतिमा स्थापित करें। यदि प्रतिमा पहले से स्थापित है तो उसे स्नान कराकर नए वस्त्र और आभूषणों से सजाया जा सकता है। पूजा के लिए सामान्यतः निम्न सामग्री का उपयोग किया जाता है— लड्डू गोपाल अथवा भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा पंचामृत गंगाजल या स्वच्छ जल चंदन और रोली अक्षत पुष्प और माला तुलसी दल माखन और मिश्री फल और मिठाई धूप और दीप नए वस्त्र और श्रृंगार सामग्री संध्या अथवा रात्रि में पूजा स्थल को सुंदर ढंग से सजाएं और भगवान श्रीकृष्ण की झांकी तैयार करें। मध्यरात्रि में भगवान के जन्म का उत्सव मनाया जाता है। लड्डू गोपाल को पंचामृत और जल से स्नान कराएं। इसके बाद उन्हें स्वच्छ वस्त्र पहनाकर चंदन, पुष्प और तुलसी दल अर्पित करें। माखन-मिश्री, फल और अन्य सात्त्विक भोग लगाएं। धूप-दीप प्रज्ज्वलित कर भगवान श्रीकृष्ण की आरती करें और प्रसाद वितरित करें। पूजा के दौरान श्रद्धालु “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप कर सकते हैं। श्रीकृष्ण के नामों का स्मरण, भजन-कीर्तन और श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ भी इस दिन विशेष रूप से किया जाता है। जन्माष्टमी व्रत का महत्व जन्माष्टमी के दिन श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और शारीरिक क्षमता के अनुसार व्रत रखते हैं। कई लोग दिनभर फलाहार करते हैं और भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के बाद अथवा अगले दिन व्रत का पारण करते हैं। व्रत के दौरान मन, वचन और कर्म की पवित्रता बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। क्रोध, असत्य और नकारात्मक विचारों से दूर रहकर भगवान का स्मरण, भजन और सेवा करना इस पर्व का प्रमुख भाव है। परंपराओं के अनुसार व्रत की विधि और पारण का समय अलग-अलग हो सकता है, इसलिए अपने परिवार की धार्मिक परंपरा या स्थानीय पंचांग का पालन करना उचित है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की व्रत कथा पौराणिक कथा के अनुसार मथुरा के राजा उग्रसेन के पुत्र कंस ने अपनी बहन देवकी का विवाह वसुदेव के साथ किया। विवाह के समय आकाशवाणी हुई कि देवकी का आठवाँ पुत्र कंस के वध का कारण बनेगा। यह सुनकर कंस भयभीत और क्रोधित हो गया। उसने देवकी और वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया। देवकी की संतानों के जन्म लेते ही कंस उन्हें मार देता था। समय बीतता गया और देवकी के आठवें पुत्र के जन्म का समय आया। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की मध्यरात्रि में भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में देवकी की कोख से अवतार लिया। कहा जाता है कि भगवान के जन्म के समय कारागार के पहरेदार गहरी निद्रा में चले गए और कारागार के द्वार स्वयं खुल गए। वसुदेव भगवान श्रीकृष्ण को एक टोकरी में लेकर यमुना नदी पार कर गोकुल पहुंचे। गोकुल में नंद बाबा और माता यशोदा के घर उसी समय एक कन्या ने जन्म लिया था। वसुदेव श्रीकृष्ण को यशोदा के पास छोड़कर उस कन्या को लेकर वापस कारागार लौट आए। जब कंस को देवकी की आठवीं संतान के जन्म की सूचना मिली, तो वह उसे मारने के लिए पहुंचा। लेकिन जैसे ही उसने उस कन्या को पकड़कर भूमि पर पटकने का प्रयास किया, वह दिव्य रूप धारण कर आकाश में प्रकट हो गई। देवी ने कंस से कहा कि उसका वध करने वाला जन्म ले चुका है और वह सुरक्षित स्थान पर पहुंच गया है। यह सुनकर कंस और अधिक भयभीत हो गया। आगे चलकर भगवान श्रीकृष्ण ने अपने बाल्यकाल में अनेक दुष्ट शक्तियों का अंत किया और अंततः मथुरा पहुंचकर अत्याचारी कंस का वध किया। इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने धर्म की स्थापना और अधर्म का विनाश किया। इस प्रकार, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी आस्था, भक्ति और आनंद का महान पर्व है। भगवान श्रीकृष्ण का जीवन हमें प्रेम, करुणा, साहस, कर्तव्य और धर्म का संदेश देता है। उनकी शिक्षाएं आज भी मानव जीवन को सही दिशा प्रदान करती हैं। वर्ष 2026 में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 4 सितंबर, शुक्रवार को मनाई जाएगी। इस पावन अवसर पर श्रद्धालु व्रत, पूजा, भजन-कीर्तन और श्रीकृष्ण जन्म की कथा का श्रवण कर भगवान से सुख, शांति, समृद्धि और सद्बुद्धि की कामना कर सकते हैं। जय श्रीकृष्ण! - शुभा दुबे
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Most families arrive at this decision the same way. A parent retires, the employer coverage stops on the last working day, and nothing replaces it because nobody was ill that year.
Kajari Teej Vrat: अखंड सौभाग्य का पर्व Kajari Teej आज, जानें Puja Vidhi और चंद्रोदय का समय
हर साल भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को कजरी तीज का व्रत रखा जाता है। इस बार आज यानी की 31 अगस्त 2026 को कजरी तीज का व्रत किया जा रहा है। इस व्रत को महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अखंड सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए करती हैं। यह व्रत भगवान शिव और मां पार्वती को समर्पति होता है। इसलिए इस दिन भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा-अर्चना की जाती है। वहीं कुंवारी लड़कियां अच्छे वर की कामना से यह व्रत करती हैं। तो आइए जानते हैं कजरी तीज की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक 30 अगस्त की रात 09:39 मिनट से भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि की शुरुआत होगी। वहीं इस तिथि की समाप्ति आज यानी की 31 अगस्त की रात 08:53 मिनट पर होगी। ऐसे में उदयातिथि के आधार पर 31 अगस्त 2026 को कजरी तीज का व्रत किया जा रहा है। पूजा विधि इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करें। फिर पूजा का संकल्प लें और सूर्य देव को अर्घ्य दें। अब पूजा स्थल को साफ करें और भगवान शिव, मां पार्वती और नीमड़ी माता की प्रतिमा को स्थापित करें। इसके बाद भगवान शिव को दूध, गंगाजल, दही और बेलपत्र आदि अर्पित करें। वहीं मां पार्वती को सिंदूर, कुमकुम, चूड़ी, बिंदी और श्रृंगार सामग्री अर्पित कर विधिविधान से पूजा करें। पूजा के बाद भगवान शिव और मां पार्वती की आरती करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें। चंद्रमा को दे अर्घ्य कजरी तीज व्रत में भगवान शिव, मां पार्वती, नीमड़ी मां की पूजा करें। फिर चंद्र देव को अर्घ्य देने के बाद व्रत खोलें। चंद्रोदय होने पर एक लोटे में जल, दूध, अक्षत, रोली और फूल से अर्घ्य दें। वहीं इसके बाद एक ही जगह पर खड़े होकर चार बार परिक्रमा करें। महत्व विवाहित महिलाओं के लिए इस पर्व का विशेष महत्व होता है। इस दिन व्रत और पूजा करने से दांपत्य जीवन सुखमय होता है। इस दिन शादीशुदा महिलाएं सोलह श्रृंगार करके व्रत रखती हैं। यह व्रत सौभाग्य और समर्पण का प्रतीक है। कजरी तीज पर गीत-संगीत और लोक-नृत्य का विशेष महत्व होता है।
आज यानी की 28 अगस्त 2026 को वरलक्ष्मी व्रत रखा जा रहा है। यह मां लक्ष्मी के स्वरूप वरलक्ष्मी को समर्पित विशेष व्रत है। मुख्य रूप में विवाहित महिलाएं वरलक्ष्मी व्रत पति और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए करती हैं। हालांकि पहली बार यह व्रत करने वाली महिलाओं को पूजा विधि और नियमों के बारे में जानना बेहद जरूरी है। तो आइए जानते हैं वरलक्ष्मी व्रत की तिथि, मुहू्र्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक 28 अगस्त 2026 को सावन का आखिरी शुक्रवार है। इसलिए इस दिन वरलक्ष्मी का व्रत किया जाएगा। इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा स्थिर लग्न में की जाती है। आज मां लक्ष्मी की पूजा के लिए 4 शुभ मुहूर्त हैं। आज ब्रह्म मुहूर्त सुबह 04:28 मिनट से लेकर 05:12 मिनट तक है। वहीं अभिजीत मुहूर्त 11:56 से लेकर दोपहर 12:48 मिनट तक है। व्रत रखने के नियम इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करें और साफ कपड़े पहनें। पूजा स्थान को अच्छे से साफ करके वहां चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। फिर मां वरलक्ष्मी की प्रतिमा को स्थापित करें। वहीं कई जगह पर कलश स्थापना की परंपरा है। कलश में जल भरकर इसके ऊपर आम के पत्ते या नारियल रखें। फिर पूजा के समय मां को फल, फूल, मिठाई, कुमकुम, हल्दी और अन्य श्रृंगार सामग्री अर्पित करें। अब वरलक्ष्मी का ध्यान करें और परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की कामना करें। व्रत के दौरान मन, कर्म और वचनों में शुद्धता बनाए रखें। महत्व बता दें कि वरलक्ष्मी को महालक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि वर और लक्ष्मी के मेल से बना वरलक्ष्मी सभी मनोकामनाओं को पूरा करने वाली देवी का प्रतीक है। इस व्रत को करने से घर में सुख-शांति और समृद्धि आती है। धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत को करने से आर्थिक समस्याओं से निजात मिलती है और घर-परिवार का कल्याण होता है। वहीं कई महिलाएं संतान सुख और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से भी यह व्रत करती हैं।
Raksha Bandhan 2026: 28 अगस्त को भद्रा मुक्त शुभ मुहूर्त, जानें Rakhi बांधने का सटीक Time और Rituals
आज यानी की 28 अगस्त 2026 को भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और स्नेह का प्रतीक रक्षाबंधन का पर्व मनाया जा रहा है। इस त्योहार के प्रति बहनों और भाइयों में अधिक उत्सुकता देखने को मिलती है। इस बार सावन माह की पूर्णिमा 27 अगस्त 2026 की सुबह शुरू होकर 28 अगस्त 2026 की सुबह समाप्त होगी। ऐसे में 28 अगस्त को यह पर्व मनाया जा रहा है। तो आइए जानते हैं इस पर्व की तिथि, मुहूर्त और पूजन विधि के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक 28 अगस्त 2026 की सुबह 05:57 मिनट से 09:48 मिनट तक राखी बांधने का मुहूर्त है। इस दौरान करीब 3 घंटे 51 मिनट का समय मिलेगा। सुबह का यह मुहूर्त पूर्णिमा तिथि से जुड़ा होने की वजह से विशेष महत्व रखता है। सुबह 7:33 बजे से लेकर 9:10 बजे तक लाभ मुहूर्त रहेगा। वहीं इसके बाद 09:10 बजे से लेकर 9:48 बजे तक अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त रहेगा। धार्मिक मान्यता है कि इन मुहूर्त में राखी बांधना शुभ होता है। जानें भद्रा की स्थिति रक्षाबंधन के समय भद्रा की स्थिति को लेकर लोगों के बीच खासी सावधानी रहती है। धार्मिक परंपरा के मुताबिक भद्रा के समय राखी बांधने से बचा जाता है। लेकिन भद्राकाल 27 अगस्त 2026 को समाप्त हो जाएगा। इसलिए 28 अगस्त को रक्षाबंधन के पर्व पर भद्रा का साया नहीं रहेगा। भाई-बहन का पर्व आमतौर पर रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के रिश्ते से जोड़कर देखा जाता है। बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती हैं और उनके सुख-समृद्धि, सेहत और दीर्घायु होने की कामना करती हैं। वहीं भाई भी अपनी बहन की सुरक्षा और हर परिस्थिति में साथ देने का संकल्प लेता है। ऐसे बांधे राखी इस दिन राखी बांधने से पहले घर के मुख्य द्वार या दीवार पर गेरू और चावल के घोल से श्रवण कुमार का चित्र बनाएं। फिर इस चित्र की पूजा करें। वहीं इस दिन भगवान गणेश की पूजा का भी विशेष महत्व होता है। अब अपने भाई को को लकड़ी के पाट पर बैठाएं और इस दौरान उनका मुंह पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए। पूजा थाली में कुमकुम, रोली, हल्दी, अक्षत, दीपक, राखी और मिठाई रखें। फिर दीपक जलाएं और भाई के सिर पर रुमाल या साफ कपड़ा रखें। अब हल्दी, कुमकुम और अक्षत से भाई के माथे पर मंगल टीका लगाएं। तिलक लगाने के बाद आरती करें और भाई की दाहिनी कलाई पर राखी बांधें। धार्मिक मान्यता है कि राखी में तीन गांठें लगाना शुभ होता है। यह तीन गांठें, सुख-सुरक्षा और समृद्धि के लिए होती है।
रक्षाबंधन पर एथनिक फैशन गोल्स दे रही हैं शालिनी पांडे, देखें उनके 5 सबसे खूबसूरत लुक्स
अगर आप भी इस रक्षाबंधन अपने स्टाइल को खास बनाना चाहती हैं, तो शालिनी पांडे के ये खूबसूरत एथनिक लुक्स आपके लिए परफेक्ट इंस्पिरेशन साबित हो सकते हैं। साड़ियों से लेकर खूबसूरत ट्रेडिशनल आउटफिट्स तक, शालिनी ने कई बार साबित किया है कि एथनिक फैशन में उनका अंदाज़ सबसे अलग और बेहद आकर्षक है।
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Choosing the right health insurance cover in 2026 requires more than picking a large sum insured
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श्रावण माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को पुत्रदा एकादशी या पवित्रा एकादशी के नाम से जाना जाता है। हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन व्रत करने और भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करने से व्यक्ति को संतान सुख, परिवार की समृद्धि और संतान के उत्तम स्वास्थ्य की कामना पूरी होती है। इस बार आज यानी की 23 अगस्त 2026 को श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत किया जा रहा है। तो आइए जानते हैं श्रावण पुत्रदा एकादशी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक 23 अगस्त की रात 02:00 बजे से श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरूआत हुई है। जोकि अगले दिन यानी की 24 अगस्त 2026 की सुबह 04:18 मिनट तक रहेगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 23 अगस्त को श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत किया जा रहा है। इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 07:32 मिनट से लेकर दोपहर 12:24 मिनट तक है। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर व्रत का संकल्प करें और घर के पूजा स्थान की अच्छे से साफ-सफाई करें। फिर एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर उस पर भगवान विष्णु की प्रतिमा को स्थापित करें। अब श्रीविष्णु की प्रतिमा के सामने दीपक और धूप जलाएं। इसके बाद उनको फल-फूल, माला, रोली, कुमकुम और नैवेद्य आदि अर्पित करें। भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी दल जरूर शामिल करना चाहिए। इसके बाद पुत्रदा एकादशी व्रत का पाठ करें और भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें। पूजा के अंत में भगवान श्रीहरि विष्णु की आरती करें और परिवार की सुख-समृद्धि व संतान के कल्याण के लिए प्रार्थना करें। अंत में पूजा में होने वाली भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें। महत्व माना जाता है कि श्रावण पुत्रदा एकादशी को संतान सुख और परिवार की खुशहाली के लिए विशेष फलदायी होती है। वहीं इस एकादशी का व्रत करने से सुख-समृद्धि, संतान की उन्नति और अच्छे स्वास्थ्य की कामना भी पूरी होती है। एकादशी का व्रत करने और पूजा-अर्चना से भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।
Eid Milad-un-Nabi 2026: 25 या 26 अगस्त? जानें भारत में कब है Prophet Muhammad का जन्मदिन और महत्व
इस्लाम धर्म में ईद मिलाद-उन-नबी को पाक और अजतम (गौरवशाली) दिनों में शामिल किया गया है। खासतौर पर यह पाक मौका है, जब पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की विलादत-ए-मुबारक यानी 'जन्म की बधाई' को मनाते हैं। दुनियाभर के कई देशों में ईद मिलाद-उन-नबी, भारत में भी इसे अकीदत और एहतराम के साथ मनाया जाता है। भारत में भी इस दिन को मनाया जाता है। इसे नबी दिवस, मौलिद, मोहम्मद का जन्मदिन या पैगंबर मुहम्मद के जन्मदिन के रुप में जानते हैं। इस दिन सार्वजनिक अवकाश होता है। भारत में अधिकांश स्कूल और व्यवसाय इस दिन बंद होते हैं। भारत में कब ईद मिलाद-उन-नबी? इस्लाम धर्म में यह पवित्र त्योहार कब मनाया जाएगा, इसकी तारीख को लेकर काफी कन्यफूय्ज है। आइए आपको बताते हैं ईद मिलाद-उन-नबी का त्योहार 26 अगस्त 2026, बुधवार के दिन मनाया जाएगा। वैसे यह त्योहार इस्लामी तारीख चांद पर आधारित होती है, जिसके कारण अलग-अलग कैलेंडर और चांद देखने के तरीकों के कारण से ग्रेगोरियन तारीख में काफी अंतर देखने को मिलता है। वैसे कुछ इस्लामी कैलेंडरों में 12 रबी-उल-अव्वल 1448 हिजरी की तारीख 25 अगस्त है। वहीं, कुछ कैलेंडर और मुकामी रिवायतों में इसे 26 अगस्त को मनाया जाएगा। ईद मिलाद-उन-नबी के दिन लोग क्या करते हैं? इस दिन मुसलमान पैगंबर मुहम्मद के जन्म और उनकी शिक्षाओं को याद करते हैं, उन पर चर्चा करते हैं और जश्न मनाते हैं। कई सुन्नी मुसलमान इस अवसर को इस्लामी महीने रबी अल-अव्वल की 12 तारीख को मनाते हैं, बल्कि शिया समुदाय के लोग इसे रबी अल-अव्वल की 17 तारीख को मनाते हैं। इस दिन कई तरह की गतिविधियां की जाती हैं- - रात भर प्रार्थना सभाएं चलती हैं। - बड़ी भीड़ वाली पदयात्राएं और जुलूस निकलते हैं। - इतना ही नहीं, घरों, मस्जिदों और अन्य इमारतों को उत्सव के बैनर और झंडे से सजाया जाता है। - मस्जिदों से लेकर सामुदायिक भवनों में सामूहिक भोजन का आयोजन किया जाता है। - इसके अलावा, मुहम्मद के जीवन, कार्यों और उनकी शिक्षाओं के बारे में कहानियों और कविताओं के जरिए लोगों का मार्गदर्शन करते हैं।
Why Corporate Professionals Are Prioritizing Ergonomic Seating Designs
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Nag Panchami 2026: नाग पंचमी पर कैसे पाएं दोष से मुक्ति, जानें Nag Panchami 2026 की पूजा विधि
हिंदू धर्म में नागपंचमी पर्व का विशेष महत्व होता है। श्रावण माह की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को यह पर्व मनाया जाता है। इस दिन नाग देवता की पूजा-आराधना की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन नागों की पूजा-अर्चना करने से सर्प भय, कालसर्प दोष और सर्पदंश जैसी बाधाओं से मुक्ति मिलती है। वहीं आज लोग नाग देवता को दूध अर्पित करते हैं और उनको स्नान कराकर पूजा आदि करते हैं। साथ ही नाग देवता से सुरक्षा और समृद्धि की कामना करते हैं। तो आइए जानते हैं नाग पंचमी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक 16 अगस्त की शाम 04:51 मिनट से पंचमी तिथि की शुरूआत होगी। वहीं 17 अगस्त ती शाम 05:00 बजे इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से आज यानी की 17 अगस्त को नागपंचमी का पर्व मनाया जा रहा है। इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त 06:15 मिनट से लेकर 08:31 मिनट तक है। क्यों की जाती है नाग देवता की पूजा भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों से नागों का संबंध जुड़ा माना गया है। जहां भगवान शिव के गले में वासुकी नाग सुशोभित होते हैं। तो वहीं शेषनाग भगवान विष्णु की शैया हैं। श्रीकृष्ण के जन्म के बाद शेषनाग ने उनको और वासुदेव को यमुना पार कराने में मदद की थी। इसके अलावा समुद्र मंथन में भी वासुकी नाग की अहम भूमिका मानी जाती है। यह दिन नाग देवताओं के प्रति सम्मान प्रकट करने का पर्व है। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें और सूर्य देव को अर्घ्य दें। इसके बाद गाय के गोबर से नाग देवता का चित्र बनाएं और उनका आह्वान करें। अगर आपको व्रत करना हो, तो व्रत का संकल्प करें और फिर गुलाल, अबीर, मेहंदी, मेवा, फूल और दूध आदि अर्पित करें। इसके बाद मंत्रों का जाप करें और पूजा के बाद मनोकामना की पूर्ति के लिए प्रार्थना करें।
Hariyali Teej 2026: अखंड सौभाग्य के लिए किया जाता है हरियाली तीज का पर्व, जानिए पूजन विधि और महत्व
सावन का पवित्र महीना चल रहा है। हर साल सावन महीने के शुक्ल पत्र की तृतीया तिथि को हरियाली तीज का पर्व मनाया जाता है। इस बार आज यानी की 15 अगस्त 2026 को हरियाली तीज का पर्व मनाया जा रहा है। सुहागिन महिलाओं के लिए यह पर्व खास होता है। इस दिन भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा का विधान होता है। इस तिथि पर बारिश का मौसम रहता है और चारों ओर हरियाली रहती है। जिस कारण इसको हरियाली तीज का पर्व कहा जाता है। इस दिन व्रत और पूजन करने से वैवाहिक जीवन सुखमय होता है। तो आइए जानते हैं हरियाली तीज की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में... इसे भी पढ़ें: Hariyali Teej 2026: शिव-पार्वती के दिव्य मिलन का प्रतीक पर्व ‘हरियाली तीज’ तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक सावन माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि की शुरूआत 14 अगस्त की शाम 06:47 मिनट पर हुई है। वहीं इस तिथि की समाप्ति आज यानी 15 अगस्त की शाम 05:29 मिनट पर होगी। उदयातिथि के मुताबिक 15 अगस्त 2026 को हरियाली तीज का पर्व मनाया जा रहा है। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद सूर्य देव को अर्घ्य दें। इसके बाद बालू से भगवान शिव और मां पार्वती की प्रतिमा बनाएं। इसके बाद लकड़ी की चौकी पर कपड़ा बिछाकर उस पर भगवान शिव और मां पार्वती की प्रतिमा को स्थापित करें। इसके बाद मां पार्वती को सुहाग का सामान जैसे बिंदी, चूड़ियां, सिंदूर और कंघी आदि को थाली में सजाकर अर्पित करें। वहीं नैवेद्य में खीर, पूरी, हलुआ या मालपुए चढ़ाएं। इसके बाद हरियाली तीज की कथा सुनें। पूजा के अंत में आरती करें और सुखमय वैवाहिक जीवन की कामना करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें। महत्व सावन के महीने में आने वाली हरियाली तीज के पर्व का विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक मां पार्वती ने शिव को पति रूप में पाने के लिए वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। मां पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनको अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। तब से हर साल सावन माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरियाली तीज का पर्व मनाया जाता है।
भारतीय संस्कृति में प्रत्येक पर्व का अपना विशेष महत्व है। इन्हीं पावन पर्वों में हरियाली तीज का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पर्व श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। वर्षा ऋतु के आगमन से जब धरती हरियाली की चादर ओढ़ लेती है, तब प्रकृति का यह अनुपम सौंदर्य हरियाली तीज के उत्सव को और भी मनोहारी बना देता है। यह पर्व विशेष रूप से महिलाओं के लिए सौभाग्य, प्रेम, समृद्धि और आनंद का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया। इसी दिव्य मिलन की स्मृति में हरियाली तीज का पर्व मनाया जाता है। विवाहित महिलाएँ अपने पति की दीर्घायु एवं सुख-समृद्धि की कामना करती हैं, जबकि अविवाहित कन्याएँ योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए व्रत रखती हैं और माता पार्वती तथा भगवान शिव की पूजा करती हैं। इसे भी पढ़ें: Famous Shiv Temple: हिमाचल के इन Famous Shiva Temples के दर्शन से मिलेगी अपार शांति, देखें पूरी Travel Guide हरियाली तीज का उत्सव पूरे देश में उल्लास और उत्साह के साथ मनाया जाता है। महिलाएँ हरे रंग के वस्त्र धारण करती हैं, हाथों में मेहंदी रचाती हैं, चूड़ियाँ पहनती हैं और पारंपरिक आभूषणों से श्रृंगार करती हैं। बाग-बगीचों में झूले डाले जाते हैं, लोकगीत गाए जाते हैं और नृत्य के माध्यम से उत्सव की खुशी व्यक्त की जाती है। विशेष रूप से राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और बिहार जैसे राज्यों में इस पर्व की भव्यता देखने योग्य होती है। अनेक स्थानों पर भगवान शिव और माता पार्वती की शोभायात्राएँ भी निकाली जाती हैं। यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का ही नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान और पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश देता है। वर्षा ऋतु में चारों ओर फैली हरियाली हमें वृक्षों और वनस्पतियों के महत्व का स्मरण कराती है। हरियाली तीज हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने तथा पर्यावरण को सुरक्षित रखने की प्रेरणा देती है। आज के आधुनिक जीवन में भी हरियाली तीज की प्रासंगिकता बनी हुई है। यह पर्व परिवार में प्रेम, विश्वास और सौहार्द को मजबूत करता है तथा हमारी सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ने का अवसर प्रदान करता है। नई पीढ़ी को भी इस पर्व के सांस्कृतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक महत्व से परिचित कराना आवश्यक है। हरियाली तीज भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपराओं, प्रकृति-प्रेम और दांपत्य जीवन की पवित्रता का अनुपम उत्सव है। यह पर्व जीवन में उल्लास, प्रेम, आस्था और हरियाली का संदेश देता है। - शुभा दुबे
Sawan Shivratri 2026: सावन शिवरात्रि पर जानें जलाभिषेक का Muhurat और भद्रा काल का समय
हिंदू धर्म में सावन शिवरात्रि का विशेष महत्व होता है। सावन का महीना भगवान शिव को अतिप्रिय होता है। इसलिए सावन माह में भगवान शिव की पूजा-अर्चना का विशेष महत्व माना जाता है। इस दौरान भगवान शिव का पूजन, जप, जलाभिषेक और रुद्राभिषेक करने से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और बाधाओं का नाश होता है। सावन महीने की शिवरात्रि का विशेष महत्व होता है। सावन शिवरात्रि पर भगवान शिव की पूजा और आराधना शुभ और फलदायी मानी जाती है। तो आइए जानते हैं सावन शिवरात्रि की तिथि, मुहूर्त और पूजन विधि के बारे में... तिथि और मुहूर्त हर साल सावन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को सावन शिवरात्रि मनाई जाती है। पंचांग के मुताबिक इस साल चतुर्दशी तिथि की शुरूआत 11 अगस्त 2026 की सुबह 04:53 मिनट से हुई है। वहीं इस तिथि की समाप्ति अगले दिन यानी की 12 अगस्त को देर रात 01:51 मिनट पर होगी। उदयातिथि के मुताबिक 11 अगस्त को सावन शिवरात्रि मनाई जा रही है। शिवरात्रि पर रात्रि के चारों प्रहर में शिव और पार्वती की पूजा का विशेष महत्व होता है। भद्रा का साया इस बार सावन शिवरात्रि पर भद्राकाल का साया रहेगा। धार्मिक शास्त्रों में भद्राकाल को शुभ नहीं माना जाता है। आज सुबह से भद्रा लग जाएगी, जोकि दोपहर 03:22 मिनट तक रहेगी। लेकिन भगवान शिव की पूजा-अर्चना और जलाभिषेक में भद्रा दोष मान्य नहीं होगा। ऐसे में शिवभक्त बिना किसी डर के भद्राकाल में भगवान शिव की पूजा कर सकते हैं। पूजन विधि इस दिन सूर्योदय से पहले उठें और स्नान आदि करके साफ कपड़े पहनें। फिर घर के मंदिर की साफ-सफाई करें और पास में स्थित शिवालय में जाकर भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा करें। शिवलिंग पर जल, गंगाजल, दही, दूध, घी, शहद और शक्कर से अभिषेक करें। फिर शिवलिंग का दोबारा जल से अभिषेक करें। इसके बाद धतूरा, बेलपत्र, भांग, फूल और सफेद चंदन आदि अर्पित करें। अब भगवान शिव को फल और मिष्ठान आदि अर्पित कर नैवेद्य अर्पित करें। फिर 'ऊँ नम: शिवाय' मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र और शिव चालीसा का पाठ करें। अंत में भगवान शिव की आरती करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें।
Sawan Pradosh Vrat 2026: सोम प्रदोष व्रत पर शिवलिंग पूजा का महत्व, जानें Puja Timing और शुभ मुहूर्त
सावन के महीने में भगवान शिव की पूजा-आराधना का विशेष महत्व होता है। सावन माह में पड़ने वाले व्रत भी पुण्यदायी व्रतों में से एक माने जाते हैं। सावन में प्रदोष व्रत का विशेष महत्व होता है। वहीं प्रदोष व्रत सोमवार के दिन पड़ता है, इसको सोम प्रदोष व्रत भी कहा जाता है। प्रदोष में व्रत रखना और भगवान शिव की पूजा-आराधना करने से विशेष फलों की प्राप्ति होती है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक इस व्रत में प्रदोष काल में शिवलिंग का जलाभिषेक, रुद्राभिषेक, बेलपत्र और भांग-धतूरा आदि अर्पित किए जाते हैं। वहीं शिव मंत्रों के जाप से भगवान शिव और मां पार्वती की विशेष कृपा मिलती है। प्रदोष व्रत करने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति, संतान सुख और रोग आदि से छुटकारा मिलता है। इस बार 10 अगस्त को सोम प्रदोष व्रत किया जा रहा है। तो आइए जानते हैं सोम प्रदोष व्रत की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे मे... तिथि और मुहूर्त हिंदू पंचांग के अनुसार, सावन माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि की शुरुआत 10 अगस्त को सुबह 8 बजे से होगी और इस तिथि का समापन 11 अगस्त को 4 बजकर 55 मिनट पर होगा। सावन सोम प्रदोष व्रत पर पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 7 बजकर 05 मिनट से लेकर रात 09 बजकर 14 मिनट तक रहेगा। इस मुहूर्त में पूजा करना शुभ और फलदायी होता है। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करें और फिर भगवान शिव का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प करें। फिर भगवान शिव का दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से अभिषेक करें। इसके बाद 11 या 21 बेलपत्र, आक के फूल, धतूरा, फल, सुपारी, इलायची, लौंग, धूप, दीप, फूल, गंध, चावल और नैवेद्य अर्पित करें। पूजा के दौरान घी और शक्कर से बनी मिठाई का भोग लगाएं। इसके बाद शिव मंत्रों का जाप करें और शिव चालीसा का पाठ करें। प्रदोष व्रत कथा पढ़े और पूजा के अंत में घी के दीपक से भगवान शिव की आरती करें। पूरा दिन व्रत रखते हुए मन में भगवान शिव का स्मरण करें और शाम को फिर से स्नान आदि करके प्रदोष काल में भगवान शिव की फिर से विधि-विधान से पूजा-अर्चना करें। महत्व प्रदोष व्रत पर भगवान शिव की पूजा-अर्चना का महत्व होता है। वहीं सावन में प्रदोष व्रत का महत्व बढ़ जाता है। भगवान शिव की पूजा के लिए सबसे अच्छा मुहूर्त प्रदोष काल होता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक प्रदोष का समय होता है, जब भगवान शिव कैलाश पर तांडव करते हैं और सभी देवी-देवता उनकी आराधना करते हैं। प्रदोष व्रत रखने और प्रदोष काल में पूजा करने, दीपदान करने, शिव चालीसा और रुद्राष्टक का पाठ करने से सभी तरह के पापों का अंत हो जाता है।
हिंदू धर्म में कामिका एकादशी का विशेष महत्व होता है। हिंदू पंचांग के मुताबिक सावन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को कामिका एकादशी कहा जाता है। सावन महीने में पड़ने वाली इस एकादशी तिथि का विशेष महत्व होता है। क्योंकि सावन का महीना भगवान शिव को अतिप्रिय होता है। वहीं एकादशी तिथि पर भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना के लिए सबसे अच्छा माना जाता है। एकादशी का व्रत करने पर और भगवान विष्णु की पूजा करने से जातक के सभी तरह के पाप नष्ट हो जाते हैं और मृत्यु लोक के बाद व्यक्ति विष्णु लोक को प्राप्त होता है। कामिका एकादशी का व्रत करने से गंगा स्नान, काशी, गया, पुष्कर और कुरुक्षेत्र जैसे महान तीर्थों के बराबर पुण्यफल प्राप्त होता है। तो आइए जानते हैं कामिका एकादशी की तिथि, मुहूर्त और पूजन विधि के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक सावन माह के कृष्ण पक्ष एकादशी तिथि की शुरूआत 08 अगस्त 2026 की दोपहर 01:59 मिनट पर शुरू होगी। वहीं अगले दिन यानी की 09 अगस्त की सुबह 11:04 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। उदयातिथि के मुताबिक कामिका एकादशी का व्रत 09 अगस्त 2026 को रखा जाएगा। वहीं व्रत का पारण 10 अगस्त को सुबह 05:47 मिनट से लेकर 80:00 बजे तक होगा। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर भगवान विष्णु को पंचामृत, जल से स्नान कराने के बाद हल्दी और चंदन लगाएं। इसके बाद पीले फूल, तुलसी दल और भोग आदि अर्पित करें। फिर धूप-दीप जलाकर भगवान विष्णु से प्रार्थना करें। इसके बाद विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें और एकादशी व्रत कथा सुनें। इसके बाद अगले दिन व्रत का पारण करें। मंत्र ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात। ॐ श्रीं श्री लक्ष्मी-नारायणाभ्यां नमः। ॐ विष्णवे नमः।
Gajanan Sankranti 2026: सावन की गजानन चतुर्थी आज, इन Mantras के जाप से चमक सकती है आपकी Fortune
हिंदू धर्म में हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया जाता है। यह व्रत भगवान गणेश को समर्पित होता है। वहीं सावन महीने में पड़ने वाली संकष्टी चतुर्थी को गजानन संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन जो भी व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान गणेश की पूजा करते हैं, उनके जीवन की सभी परेशानियां दूर होती हैं। साथ ही सुख-समृद्धि आती है। इस बार आज यानी की 02 अगस्त को गजानन संक्रांति का व्रत किया जा रहा है। तो आइए जानते हैं इस दिन की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और मंत्र आदि के बारे में... तिथि और मुहूर्त वैदिक पंचांग के मुताबिक 01 अगस्त की रात 11:07 मिनट से सावन कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि की शुरूआत हुई है। वहीं आज यानी की 02 अगस्त की सुबह 11:15 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के मुताबिक 02 अगस्त संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया जाएगा। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर भगवान गणेश का ध्यान करें और व्रत का संकल्प लें। वहीं शाम को पूजा स्थान पर लकड़ी की चौकी लगाकर लाल कपड़ा बिछाएं। उस पर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें। फिर धूप-दीप जलाएं और भगवान गणेश को चंदन, रोली और फूल आदि अर्पित करें। भगवान गणेश को मोदक या लड्डू का भोग लगाएं और दूर्वा अर्पित करें। इसके बाद संकष्टी व्रत कथा का पाठ करें और आरती करें। वहीं चंद्रमा निकलने पर दूध, जल, फूल और अक्षत मिलाकर चंद्रदेव को अर्घ्य दें। इसके बाद प्रसाद ग्रहण करके व्रत का पारण करें। मंत्र वक्रतुंड महाकाय, सूर्यकोटि समप्रभ, निर्विघ्नम कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।। ॐ गण गणपतए नमः।। गजाननं भूतगणादि सेवितं, कपित्थ जंबू फल चारु भक्षणम, उमा शतम् शोक विनाश कार्यक्रम, नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम।।
Jaya Parvati Vrat 2026: जया पार्वती व्रत का समापन, जानिए Puja Vidhi और Udyapan का सही समय और नियम
सावन माह की शुरूआत को चुकी है। वहीं आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी से जया-विजया पार्वती व्रत शुरू हुआ था। जोकि सावन कृष्ण तृतीया यानी की 5 दिनों तक रखा जाता है। जया पार्वती व्रत भगवान शिव और मां पार्वती को समर्पित है। यह व्रत महिलाएं अखंड सुहाग और खुशहाल वैवाहिक जीवन के लिए रखती हैं और कुंवारी कन्याएं मनचाए वर की प्राप्ति के लिए रखती हैं। इस बार आज यानी की 01 अगस्त को जया पार्वती व्रत का समापन किया जाएगा। कैसे करें समापन जया पार्वती व्रत 5 दिनों तक चलने वाला विशेष व्रत है। इसको मुख्य रूप से सुहागिन महिलाएं और कुंवारी कन्याएं रखती हैं। वहीं व्रत के अंतिम दिन विधि-विधान से उद्यापन और समापन करना शुभ माना जाता है। पूजन विधि इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद भगवान शिव और मां पार्वती का पूजन करें। पूजा में भगवान शिव और मां पार्वती को अक्षत, फूल, फल, धूप-दीप और नैवेद्य आदि अर्पित करें। इसके बाद व्रत कथा का पाठ करें। क्योंकि माना जाता है कि बिना कथा सुने व्रत का पूजा पूरा फल मिलता है। मां पार्वती को सुहाग की सामग्री अर्पित करें और इसमें चूड़ियां, बिंदी, चुनरी, सिंदूर, मेहंदी और श्रृंगार की अन्य वस्तुएं शामिल करें। इसके बाद आरती करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए मां पार्वती और भगवान शिव से क्षमायाचना करें। वहीं अपनी श्रद्धा अनुसार ब्राह्मण, जरूरतमंद या किसी सुहागिन को फल, वस्त्र, दक्षिणा या अन्न का दान करें। प्रसाद वितरित करें और सात्विक भोजन ग्रहण कर व्रत का पारण करें। धार्मिक मान्यता धार्मिक मान्यता है कि जो भी महिला विधिपूर्वक यह व्रत करके समापन करती हैं, उनका वैवाहिक जीवन खुशहाल रहता है और अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है। वहीं अविवाहित कन्याओं को मनचाहे वर की प्राप्ति होती है।

