...

छत्तीसगढ़ में अफ्रीकन स्वाइन फीवर की पुष्टि:300 से ज्यादा सूअरों की मौत, रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद 150 सूअरों को इंजेक्शन देकर मारकर दफनाया

छत्तीसगढ़ में जानलेवा अफ्रीकन स्वाइन फीवर (ASF) की पुष्टि हुई है। दुर्ग जिले के नारधा-मुडपार गांव स्थित सूअर फार्म में इस वायरस के कारण 300 से अधिक सूअरों की तड़प-तड़प कर मौत हो गई। संक्रमण के फैलाव को रोकने के लिए पशुपालन विभाग ने बची हुई करीब 150 सूअरों को भी जहरीला इंजेक्शन देकर मार दिया और सभी को प्रोटोकॉल के तहत दफनाया गया। इस वायरस से फार्म मालिक को करीब 1 करोड़ 20 लाख रुपए का नुकसान हुआ है। दरअसल सोमवार को पशुपालन विभाग की टीम बड़ी संख्या में मुडपार गांव पहुंची थी। अधिकारी और डॉक्टर पीपीई किट पहनकर फार्म के अंदर गए और बचे हुए सूअरों को इंजेक्शन देकर मार दिया। इसके बाद फार्म के पीछे सभी मृत सूअरों को गड्ढा खोदकर दफनाया गया। फिलहाल पूरे फार्म को सील करने की तैयारी की जा रही है। बता दें कि मुडपार गांव सूअर पालन का एक प्रमुख केंद्र है। यहां लंबे समय से बड़े पैमाने पर सूअर पालन किया जा रहा था। इस फार्म से न केवल दुर्ग-भिलाई, बल्कि प्रदेश के कई अन्य हिस्सों और पड़ोसी राज्यों में भी पोर्क (Pork) की सप्लाई की जाती थी। देखिए पहले ये तस्वीरें- रिपोर्ट के आने तक हो चुकी थी 300 सूअरों की मौत फार्म मालिक पीओ जॉय ने बताया कि उनके फार्म में कुल 300 से 400 सूअर थे। 29 मार्च को पहली बार सैंपल लिया गया था, जबकि 1 अप्रैल से सूअरों की मौत शुरू हो गई। 6 अप्रैल तक करीब 300 सूअरों की मौत हो चुकी थी और बाकी को विभाग ने मार दिया। उन्होंने बताया कि एक सूअर की कीमत लगभग 30 हजार रुपए थी, जिससे उन्हें भारी नुकसान हुआ है। फार्म में 133 गर्भवती सूअर और करीब 400 बच्चे भी थे। सोमवार को सभी को जहर का इंजेक्शन देकर मारा गया और फार्म के पीछे जेसीबी से गड्ढा खोदकर दफना दिया गया। फॉर्म के मालिक ने दी थी विभाग को सूचना पीओ जॉय ने बताया कि उन्होंने खुद ही विभाग को सूचना देकर बुलाया था, ताकि बीमारी और अधिक न फैल सके। उन्होंने कहा कि अफ्रीकन स्वाइन फीवर एक पुरानी और बेहद खतरनाक बीमारी है, जिसका अभी तक दुनिया में कोई वैक्सीन या इलाज उपलब्ध नहीं है। यह बीमारी लगने के बाद लगभग सभी सूअरों की मौत हो जाती है। हालांकि यह केवल सूअरों में ही फैलती है और इंसानों या अन्य जानवरों को प्रभावित नहीं करती। प्रदेश में सूअर के मांस की सबसे ज्यादा खपत फार्म मालिक का कहना है कि छत्तीसगढ़ में सूअर के मांस की खपत काफी अधिक है। हर दिन महाराष्ट्र और नागपुर की ओर से बड़ी मात्रा में सूअर यहां लाए जाते हैं। उनका आरोप है कि कई जगहों पर बीमार जानवरों को भी काटा जा रहा है, जिससे संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ जाता है। उन्होंने बताया कि यह वायरस नोट और दैनिक उपयोग की वस्तुओं पर भी कुछ दिनों तक जीवित रह सकता है, इसलिए सावधानी बरतना जरूरी है। हालांकि इस बीमारी का असर इंसानों पर नहीं होता, लेकिन संक्रमित सूअर का मांस खाने से बचना चाहिए। उनका कहना है कि वायरस गर्मी में नष्ट हो जाता है, फिर भी प्रशासन ने एहतियात के तौर पर मांस के सेवन पर रोक लगाने की सलाह दी है। 24 घंटे के भीतर होनी चाहिए कार्रवाई फार्म मालिक ने कहा किऐसी गंभीर बीमारी की सूचना मिलने के बाद प्रशासन को 24 घंटे के भीतर कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि संक्रमण को अन्य फार्म तक फैलने से रोका जा सके। यदि समय रहते कदम उठाए जाते, तो नुकसान कम हो सकता था। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें अपने नुकसान से ज्यादा चिंता इस बात की है कि यह बीमारी अन्य फार्म तक न फैले। रिपोर्ट पॉजिटिव आते ही शुरू हुई कार्रवाई पशुपालन विभाग के डिप्टी डायरेक्टर वसीम शम्स ने बताया कि 2 अप्रैल को सूचना मिलने के बाद तुरंत सैंपल भोपाल स्थित हाई सिक्योरिटी एनिमल डिजीज लैब भेजा गया था। सोमवार सुबह करीब 10 बजे रिपोर्ट पॉजिटिव आई। इसके बाद विभाग की टीम तुरंत मौके पर पहुंची और कार्रवाई शुरू कर दी गई। फिलहाल पूरे इलाके पर नजर रखी जा रही है और संक्रमण को आगे फैलने से रोकने के लिए फार्म को सील करने की कार्रवाई की जा रही है। जानिए क्या है यह वायरस और कितना खतरनाक है? अफ्रीकन स्वाइन फीवर (ASF) एक बेहद खतरनाक वायरल बीमारी है। इसकी गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें मृत्यु दर 100% तक होती है। यानी यदि कोई सूअर इस वायरस से संक्रमित हो जाता है, तो उसका बच पाना लगभग असंभव होता है। हालांकि राहत की बात यह है कि यह वायरस इंसानों को संक्रमित नहीं करता, लेकिन यह सूअर पालन उद्योग के लिए बेहद विनाशकारी साबित होता है और पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। इस वायरस की उत्पत्ति अफ्रीका से हुई थी, लेकिन साल 2018 के बाद इसने चीन, वियतनाम और यूरोप के कई देशों में भारी तबाही मचाई। चीन में इस बीमारी के चलते करोड़ों सूअरों को मारना पड़ा, जिससे वहां की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ा। साल 2026 में भी पोलैंड और इटली जैसे देशों में इसके नए स्ट्रेन सामने आ रहे हैं। भारत में इस वायरस की पहली पुष्टि वर्ष 2020 में असम और अरुणाचल प्रदेश में हुई थी, जहां हजारों सूअरों की मौत हुई। इसके बाद धीरे-धीरे यह वायरस पंजाब, केरल और अब छत्तीसगढ़ तक फैल चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि छत्तीसगढ़ में यह संक्रमण बाहरी राज्यों से लाए गए संक्रमित सूअरों या दूषित मांस उत्पादों के जरिए पहुंचा हो सकता है। दुर्ग के अलावा बलौदा बाजार और महासमुंद के जंगली इलाकों में भी सूअरों की संदिग्ध मौतों के मामले सामने आए हैं, जिससे प्रशासन और पशुपालन विभाग सतर्क हो गया है। ………………… इससे जुड़ी यह खबर भी पढ़िए… बिलासपुर में बर्ड फ्लू, 47 हजार पक्षी-अंडे नष्ट किए: संक्रमण के बाद हुई पूरे संभाग में सप्लाई, कानन पेंडारी 7 दिन तक बंद छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में कोनी स्थित पोल्ट्री फार्म में बर्ड-फ्लू वायरस मिला है। यहां 5 हजार मुर्गियां की मौत के बाद 10 किलोमीटर के दायरे में आने वाली 22 हजार से ज्यादा पक्षी और 25 हजार अंडे नष्ट किए गए। पढ़ें पूरी खबर…

दैनिक भास्कर 7 Apr 2026 9:39 am

सब-जूनियर मेंस नेशनल हॉकी: डिवीजन ए में यूपी, एमपी, झारखंड की जीत, डिवीजन बी में दिल्ली समेत इन टीमों ने बाजी मारी

16वीं हॉकी इंडिया सब जूनियर मेंस नेशनल चैंपियनशिप 2026 के छठे दिन, डिवीजन 'ए' में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और झारखंड की टीमों ने जीत हासिल की, जबकि डिवीजन 'बी' में दिल्ली, तेलंगाना, कर्नाटक और अरुणाचल प्रदेश ने अपने-अपने मुकाबले जीते

देशबन्धु 7 Apr 2026 5:40 am

ऑक्टेव फेस्टिवल की मेजबानी की दौड़ में उदयपुर, वेस्ट जोन ने शुरू की 2026-27 के कैलेंडर की तैयारी

देश की लोक कला, संस्कृति और शिल्प परंपराओं को बढ़ावा देने के लिए शहर के पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र (वेस्ट जोन) ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के सांस्कृतिक कैलेंडर की तैयारी शुरू कर दी है। इसके तहत राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा और केंद्र शासित प्रदेश दमन-दीव व दादरा-नगर हवेली में वर्षभर विभिन्न महोत्सव आयोजित किए जाएंगे। केंद्र के अधिकारियों के अनुसार सभी कार्यक्रमों का प्रस्ताव राजभवन भेजा जाएगा, जहां इसमें आवश्यक बदलाव या नए आयोजन जोड़े जा सकते हैं। उदयपुर में हर साल की तरह 21 से 30 दिसंबर तक 10 दिवसीय शिल्पग्राम महोत्सव होगा, जिसमें देशभर के लोक कलाकार और शिल्पकार भाग लेंगे। इसके अलावा शिल्पदर्शन, रंगशाला, मल्हार और ऋतु बसंत जैसे कार्यक्रम भी वर्षभर होंगे। अन्य राज्यों में भी बड़े आयोजनों की योजना है। गोवा में ‘लोकोत्सव’ और गांधीनगर में ‘बसंत उत्सव’ आयोजित कर स्थानीय और राष्ट्रीय लोक कलाओं को मंच दिया जाएगा। शिल्पग्राम के बाद बड़ा आयोजन ऑक्टेव फेस्टिवल शिल्पग्राम महोत्सव के बाद केंद्र का दूसरा बड़ा आयोजन ‘ऑक्टेव फेस्टिवल’ है। पांच दिवसीय इस उत्सव में पूर्वोत्तर राज्यों-अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम की संस्कृति और लोक प्रस्तुतियां शामिल होती हैं। पिछले वर्ष इसका आयोजन महाराष्ट्र में हुआ था। केंद्र के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार इस बार ऑक्टेव फेस्टिवल के उदयपुर में आयोजित होने की प्रबल संभावना है। यदि ऐसा होता है, तो शहरवासियों को पूर्वोत्तर भारत की विविध सांस्कृतिक झलक एक ही मंच पर देखने का अवसर मिलेगा। शिल्पग्राम महोत्सव सहित कई आयोजन प्रस्तावित, 4 राज्यों में सालभर होंगे कार्यक्रम

दैनिक भास्कर 7 Apr 2026 5:30 am

पिता की लाश का सिर काटकर दफन करता है बेटा:शादी से पहले 3 महीने प्रेग्नेट होना जरूरी; शिकारी जनजाति वांचों की कहानी

एक पहाड़ी पर सुबह 8 बजे का वक्त। एक बूढ़े की लाश पड़ी है। वह पूरी तरह काली पड़ चुकी है। लाश के बगल में 24-25 साल का लड़का घुटने के बल बैठा है। फूट-फूटकर रो रहा है। तभी कुछ महिलाएं आईं और लाश के पास बैठ गईं। एक खास तरह के पेड़ के पत्तों से लाश का चेहरा साफ करने लगीं। उनमें से एक महिला ने दूर खड़े बुजुर्ग को कुछ इशारा किया। बुजुर्ग ने उस लड़के की तरफ एक धारदार छोटी तलवार बढ़ाई। लड़के ने कांपते हाथों से तलवार थामी और धीरे-धीरे लाश का गला रेतने लगा। कुछ ही देर में लाश का सिर धड़ से अलग हो गया। ये लाश लड़के के पिता की है, जो डेढ़ महीने से इस पहाड़ी पर पड़ी थी। दरअसल, ये बेटा अपने पिता का अंतिम संस्कार कर रहा है। दैनिक भास्कर की सीरीज ‘हम लोग’ में मैं मनीषा भल्ला इस बार लाई हूं वांचो जनजाति की कहानी। अरुणाचल प्रदेश की लोंगडिंग इलाके में बसी इस जनजाति की आबादी सिर्फ 40 हजार है… लौटते हैं अंतिम संस्कार की प्रथा पर। बूढ़े की लाश का गला कटते ही दो शख्स मटकेनुमा मिट्टी का बर्तन लेकर आए। उन्होंने कटे हुए सिर को हाथ में उठाया और गौर से देखने लगे, जैसे नाप रहे हों। फिर मिट्टी के बर्तन को औंधा करके उसे करीने से पत्थर से तोड़ने लगे, ताकि सिर उसमें समा जाए। फिर उसी बर्तन में सिर डालकर लड़के को थमा दिया। धड़ जस का तस यहीं पड़ा रहा। सभी लोग सिर को लेकर पहाड़ी के दूसरे हिस्से की तरफ चल दिए। वहां जगह-जगह पर छोटे-छोटे मिट्टी के चबूतरे जैसे बने हैं। सभी पर वैसे ही मटके रखे हैं जैसे मटके में सिर है। लड़का एक खाली चबूतरे की तरफ बढ़ा और मटका रख दिया। फिर मटके के ऊपर पत्थर रख दिया। भीड़ से एक शख्स शराब की बोतल और खाना लेकर आया और लड़के की ओर बढ़ दिया। लड़के ने कुछ बुदबुदाते हुए शराब और खाना इसी चबूतरे पर चढ़ा दिया। उधर, बिना सिर की लाश वहीं पड़ी रही। धीरे-धीरे सभी लोग अपने गांव लौट गए। वांचो लोगों में प्राकृतिक मौत होने पर लाश को इसी तरह डेढ़ महीने के लिए पहाड़ी पर छोड़ देते हैं। कोई जानवर लाश को न खा जाए इसलिए बारी-बारी से लोग रखवाली करते हैं। फिर सिर काटकर अंतिम संस्कार किया जाता है। दिलचस्प बात ये है कि इस तरह से अंतिम संस्कार सिर्फ प्राकृतिक मौत होने पर ही करते हैं। दुर्घटना या हत्या होने पर ये लोग लाश को पहाड़ी पर ही फेंक देते हैं। जिसे जानवर नोच-नोचकर खा जाते हैं। दरअसल, इनका मानना है कि आत्मा सिर में बसती है। इसलिए सिर को सुरक्षित रखा जाता है, ताकि पूर्वजों के दर्शन होते रहें। जब कोई शख्स अप्राकृतिक मौत मरता है तो उसकी आत्मा उसी वक्त निकल जाती है। वांचो लोग जिस तलवार से लाश का गला रेतते हैं, उसे चंग कहते हैं। जहां लाश का धड़ पड़ा रहता है, उसे जुकथो कहते हैं। जिस जगह पर मिट्टी का प्लेटफॉर्म बनाकर सिर रखा जाता है वो जालो है। वांचो लोग अरुणाचल प्रदेश की पटकाई की पहाड़ियों में बसते हैं। ये जगह लोंगडिंग जिले में आती है जो गुवाहाटी से 350 किलोमीटर दूर है। इनको जानने मैं पहुंची हूं पटकाई की पहाड़ियों पर। मेरे साथ हैं इस समुदाय को जानने वाले एंथ्रोपोलोजिस्ट नोट्‌टोई वांगसाहम। जो लोंगडिंग से ही साथ आए हैं। दोपहर के 12 बजे थे। हम पहाड़ी से पैदल ही गांव की तरफ बढ़ने लगे। रास्ते में नोट्‌टोई ने बताया कि- ‘वांचो लोगों में आज भी राजा का शासन है। इनसे मिलने के लिए राजा की इजाजत जरूरी है। इसलिए हमें सबसे पहले राजा के सामने जाकर हाजिरी लगानी होगी। तभी बस्ती में घुस पाएंगी।’ ‘कौन है यहां के राजा?’ मैंने पूछा ‘पहले तो जितवंग वाहम यहां के राजा थे लेकिन, चार साल पहले उनकी मौत हो गई। अब रानी का राज है।’ ‘तो राजा की जगह रानी से इजाजत लेनी पड़ती है?’ ‘हां, अभी तो रानी ही सब देखती हैं लेकिन, उनके बेटे को अब लोग राजा कहने लगे हैं।’ अब तक हम 5 किलोमीटर चल चुके थे। कुछ ही दूर बांस से बने घर नजर आने लगे। किसी की टीन की छत चमक रही थी तो किसी की छत यहां के स्थानीय पेड़ टोको लीफ से बनी थी। यहां सिर्फ एक घर ऐसा दिखा जो आधा सीमेंट और आधा बांस से बना है। ये घर काफी बड़ा है। नोट्‌टोई ने बताया कि ‘यही रानी का घर है।’ जैसे ही रानी के घर के सामने पहुंचे, एक महिला हमें अंदर ले गई। नजरें घुमाकर देखा तो दीवारों पर जानवरों की खाल और खोपड़ियां टंगी हैं। मैंने नोट्‌टोई से इशारे में पूछा तो कहने लगे- ‘पहले के समय में वांचो जंगली जानवरों का शिकार करते थे। ये ऐसे ही शिकार किए हुए जानवरों की खाल हैं। नोट्‌टोई बताते हैं कि ‘वांचो लोग कबीले की शान बढ़ाने के लिए दुश्मनों के सिर, बाजू और टांग काटकर ले आते थे। हर वांचो बस्ती में म्यूजियम की तरह एक जगह होती थी, जिसे ‘साउतुंग’ कहते थे। यहीं दुश्मन के कटे हुए सिर सजाए जाते थे। साल में एक बार उन्हें शराब और खाना चढ़ाकर पूजा भी की जाती थी। अब यहां लोग क्रिश्चियैनिटी को मानने लगे हैं। इसलिए धीरे-धीरे ये सब बंद हो गया और साउतुंग भी खत्म हो गए। अब सिर्फ जानवरों के सिर और खाल बची हैं।’ हम लोग ड्राइंग रूम के सोफे पर बैठकर रानी सेंगम वांग्चा वांचो का इंतजार करने लगे। दीवार पर चीते की खाल टंगी है। पास ही बंदूकें और जंगली सुअर के सिर भी। तभी एक महिला कमरे में आती हैं, सफेद रंग की शॉर्ट कुर्ती और नीले रंग की शॉलनुमा लॉन्ग स्कर्ट लपेटे। गले में चांदी के सिक्कों की माला और माथे पर रंग-बिरंगे मोतियों से बनी पट्टी पहने। पहनावा देखकर पता चल रहा है कि यही रानी हैं। मैंने रानी से सबसे पहले उनके कपड़ों के बारे में पूछा, वो बताने लगीं कि- ‘ये शॉलनुमा स्कर्ट हमारी पारंपरिक पोषाक है। इसे नीथो कहते हैं।’ मैंने दीवार पर टंगे जंगली सुअर के सिर को देखकर पूछा, ‘इसका शिकार राजा ने किया था?’ रानी बताती हैं कि- ‘बस्ती में जब भी कोई जंगली सुअर का शिकार करता है, तो उसका सिर और रीढ़ की हड्डी के पास का मांस हमारे घर भेजते हैं। बाकि जानवरों का केवल सिर ही राजा के घर भेजते हैं। उसके बाद ही वो खुद खा सकते हैं। अगर कोई ऐसा नहीं करता तो उसे बस्ती से निकाल दिया जाता है।’ ‘रीढ़ की हड्डी का मांस?’ ‘हां, इसे हम घरों में लटकाकर सुखाते हैं और जब मन हो पका लेते हैं।’ ये कहते हुए रानी मुझे रसोई में ले गईं। यहां एक लकड़ी से सहारे छत से मांस के लंबे और चपटे टुकड़े लटक रहे हैं। कुछ तो एकदम ताजे हैं लेकिन कुछ सूख हुए। यहीं नोट्‌टोई बताते हैं कि ‘वांचो की हर बस्ती का एक राजा होता है। बस्तियों के राजा मिलकर एक चीफ चुनते हैं, जो वांचो लोगों से जुड़े सभी अहम फैसले लेता है।’ आखिर में रानी से बस्ती में जाने की इजाजत लेते हुए हम यहां से निकल पड़े। टीन की छत वाले घर के बाहर एक शख्स बैठा है। उसने गले में मोतियों की माला और किसी जानवर की खोपड़ी जैसा कुछ पहना है। नोट्‌टोई उनसे मिलवाने ले गए। शख्स का नाम है एल जेवंग वांगसु। मैंने सबसे पहले उनके पहनावे के बारे में पूछा, वो बोले- ‘ये बंदर का सिर है। इसका कपाल लकड़ी से बना है, लेकिन इसपर चढ़ी चमड़ी असली बंदर की है। इसके अलावा माला में जानवरों के नाखून और दांत भी पिरोए हुए हैं। सिर पर जो पहना है वो भालू के बाल से बना है। इसे खोहम कहते हैं।’ जेवंग की पत्नी मंगखाऊ वांगसु अंदर आने के लिए कहती हैं। घुसते ही मछली पकने की महक आने लगी। नजरें घुमाकर देखा तो फर्श से लेकर दीवारें तक सब बांस का बना है। छत से मांस के लंबे, चपटे टुकड़े लटक रहे हैं। कमरे के एक कोने में साड़ी का झूला बंधा है। महिलाओं के शरीर पर गुदे टैटू से पता चलती है उम्र मंगखाऊ के पैर के निचले हिस्से में बना टैटू देखकर मैंने उसका मतलब पूछा। वो कहने लगीं- ‘टैटू हम वांचो महिलाओं की पहचान है। इससे महिलाओं की उम्र का पता लगता है। जब लड़की किशोरावस्था में कदम रखती है तो नाभि के पास टैटू बनाया जाता है। पैर के निचले हिस्से पर टैटू का मतलब वो जवान हो गई यानी रजस्वला हो चुकी है। जांघ पर बने टैटू का मतलब है कि अब लड़की जीवनसाथी चुन सकती है। महिलाओं के छाती पर बने टैटू का मतलब है कि वे शादीशुदा हैं।’ ‘लड़कियां अपना जीवनसाथी कैसे चुनती हैं?’ मैंने पूछा वो बताने लगीं- ‘ज्यादातर प्रेम विवाह होते हैं। लड़की को जब कोई लड़का पसंद आता है तो उसे एक झुमका देती है। जिसे माएपो कहते हैं। यही विवाह का प्रस्ताव माना जाता है। इसके बाद लड़के वाले, लड़की के घर जाते हैं। उन्हें- पान, तंबाकू और स्थानीय पेड़ की छाल पेनखोन और केकखोन देते हैं। इससे होंठ लाल हो जाते हैं। फिर लड़का-लड़की एकदूसरे को माला पहनाते हैं। यह रस्म ‘हिंगहो एलाई’ कही जाती है।’ लड़की की मां को घर बुलाकर शराब परोसते हैं लड़के वाले जेवांग बताते हैं कि ‘कुछ दिन बाद लड़के वाले लड़की की मां को घर बुलाते हैं। मेहमाननवाजी करते हैं। वहां हमारी खास शराब यानी ‘जू’ के साथ मछली और तरह-तरह के जानवरों का मांस परोसा जाता हैं। लड़की की मां वापस घर जाकर बेटी की शादी तय होने का ऐलान करती है। फिर लड़के की मां को बुलाकर यही रस्म लड़की वाले निभाते हैं।’ बीच में ही जेवांग की पत्नी मंगखाऊ, चाय ले आईं। ये लाल रंग की है। बिना दूध वाली। ये जड़ी-बूटी से बनी है, इसे खलप कहते हैं। स्वाद थोड़ा कड़वा सा है, ब्लैक टी जैसा। रिश्ता तय होने के बाद लड़का-लड़की बना सकते हैं संबंध जेवांग शादी की परंपरा के बारे में बताते हैं- ‘जब दोनों तरफ से रिश्ता तय होने का ऐलान होता है, तब ‘टोईकट’ परंपरा होती है। इसमें लड़के वाले लड़की और उसकी सहेलियों को घर बुलाते हैं। लड़का सबको अपने खेत दिखाने ले जाता है। वहां नाच-गाना भी होता है। फिर लड़का सभी लड़कियों को कपड़े और गहने तोहफे में देता है। इसके बाद से लड़का-लड़की जब चाहें मिल सकते हैं। एक-दूसरे के घर जा सकते हैं। अगर घर पर न मिलना हो, तो बस्ती के कम्युनिटी हॉल में भी जा सकते हैं। जिसे ‘जिप्सम नाइलो’ कहते हैं। यहां कपल्स जब चाहें आ सकते हैं और संबंध भी बना सकते हैं। प्रेग्नेंट होने के बाद मिलता है बहू का दर्जा जब लड़की प्रेग्नेंट हो जाती है तो तीसरे महीने लड़के के घर जाती है। तब खोकम की रस्म होती है, यानी लड़की के छाती के बीचों-बीच ‘खाहू’ नाम का टैटू बनाया जाता है। फिर पूजा होती है, जिसमें अंडा, अदरक और शराब चढ़ाई जाती है। इस रस्म के बाद पुजारी ऐलान करता है कि ‘ये लड़की आज से लड़के के परिवार का हिस्सा है।’ इसके बाद भैंसा या बड़ा सुअर काटा जाता है। जानवर की खाल के छोटे-छोटे टुकड़े साफ कर के लड़की के घर भेज देते हैं। जिसे पूरे गांव में बांटा जाता है, जैसे-शादी के बाद मिठाई बांटी जाती है। खोकम के बाद रिश्ते को तोड़ना आसान नहीं होता। अगर पति या पत्नी में से कोई अलग होना चाहे, तो उसे कीमत चुकानी पड़ती है- कभी सूअर देकर तो कभी जमीन देकर।’ लकड़ी की तलवार से काटी जाती है बच्चे की नाल मेरे साथी नोट्टोई बच्चे के जन्म से जुड़ी परंपरा के बारे में बताते हैं कि- बच्चे के जन्म के समय एक बुजुर्ग महिला को बुलाया जाता है। वो बांस से बनी चाकू से नाल काटती है, फिर उसे ओनोक नाम के पेड़ से बांध देती है। बड़ी बेटी को गहने और बड़े बेटे को मिलती है जमीन जायदाद वांचो लोगों में घर की बागडोर महिलाओं के हाथ में होती है। मां के गहने सबसे बड़ी बेटी को मिलते हैं। जमीन-जायदाद सबसे बड़े बेटे के हिस्से जाती है। बाकी बच्चों को कुछ भी नहीं दिया जाता है। हां, अगर परिवार थोड़ा संपन्न हो, तो उन्हें भी थोड़ा-बहुत हिस्सा दे दिया जाता है। यहां आज भी शिकार की परंपरा है। लोग कभी समूह में, तो कभी अकेले शिकार पर निकलते हैं। शिकार के बाद जानवर की पूजा होती है। फिर उसका सिर राजा को दिया जाता है और बाकी मांस पूरी बस्ती में बांट दिया जाता है। यहां से निकलकर हम दूसरी वांचो बस्ती की ओर गए। यहां एक खास तरह की पोषाक में कुछ मर्द खड़े हैं। सभी के सिर पर बांस की टोपी है। यह हॉर्नबिल पक्षी के पंखों से सजी है। इसमें भालू, बंदर, बकरी के बाल लगे हैं। गले में मोतियों की माला है, जिसमें जंगली सूअर के दांत, भालू के नाखून, शेर के दांत या बंदर की चमड़ी से बनी चीजें लगी हैं। शरीर के निचले हिस्से में लंगोट की तरह कुछ पहना हुआ है, जिससे केवल प्राइवेट पार्ट ढका है। परेशानी दूर करने के लिए पुजारी चढ़ाता है बलि वांचो लोग आत्माओं में विश्वास करते हैं। अगर किसी के साथ कुछ बुरा होता है तो पुजारी को बताते हैं। फिर वो सपना देखकर समस्या का कारण बताता है। कई बार पुजारी को घर भी बुलाया जाता है। रास्ते में उसको शराब पिलाई जाती है। परेशानी दूर करने के लिए कुत्ता, बकरी या मुर्गा-मुर्गी की बलि दी जाती है। वांचो लोगों के पास खेती ही कमाई का कोई साधन नहीं है। ये लोग धान के अलावा कई तरह के मिलेट की खेती करते हैं। जैसे- मीखा, कामई, पोलोम, कच्चू, मनसा, जोक, विक्वप, विकुअत, बाह और शिनेई। बच्चों के लिए प्राइमरी स्कूल तो गांव में ही लेकिन आगे की पढ़ाई के लिए लोंगडिंग जाना पड़ता है। इनके ज्यादातर बच्चे सरकारी नौकरी में हैं। कई घरों के बच्चे आर्मी में भी हैं। इस सीरीज में अगले हफ्ते पढ़िए ऐसे ही अनोखे मैतेई लोगों की कहानी…. ---------------------------------------------------- 1- 100 किलो का पत्थर उठाया, लड़की बोली- तुमसे करूंगी शादी:औरतें 5 पति भी रख सकती हैं, 1800 अनोखे ‘टोडा’ लोगों की कहानी सुबह की हल्की धुंध अभी पहाड़ियों से हटी नहीं है। घास पर जमी ओस चमक रही है। मैदान के किनारे जंगल में एक पुराने पेड़ के नीचे लोग जमा हुए हैं। इसी पेड़ के नीचे एक बड़ा इम्तिहान होने वाला है। पूरी कहानी यहां पढ़ें 2- शरीर के ऊपरी हिस्से पर कपड़े नहीं पहनतीं बोंडा महिलाएं:शादी ठुकराने पर लड़कीवालों का घर तोड़ देते हैं, मृत्युभोज में खाते हैं गाय का मांस सुबह करीब 10 बजे का वक्त। मिट्टी से लिपा-पुता एक कच्चा घर। बाहर सिर मुंडाए दो महिलाएं बैठी हैं। उम्र करीब 38-40 साल। ऊपरी बदन लगभग नंगा। बाकी शरीर पर नाम मात्र के कपड़े। छाती छिपाने के लिए मोतियों और कौड़ियों से बनी मालाएं। पूरी कहानी यहां पढ़ें

दैनिक भास्कर 7 Apr 2026 5:11 am

Arunachal Singam Peak Result हुए घोषित; 26.03 लाख का प्रथम पुरस्कार जाहीर

अरुणाचल प्रदेश सिंघम पीक लॉटरी के 6 अप्रैल 2026 सुबह 10:55 बजे के परिणाम घोषित। टिकट संख्या 62J 27451 ने जीता 26.03 लाख का प्रथम पुरस्कार। पूरी सूची यहाँ देखें।

प्रातःकाल 6 Apr 2026 7:02 pm

अरुणाचल प्रदेश के सीएम पेमा खांडू को सुप्रीम कोर्ट से झटका, सरकारी ठेकों के मामले में CBI को जांच के आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने अरुणाचल प्रदेश के सीएम पेमा खांडू के परिवार को सरकारी ठेके देने के मामले में CBI से प्रारंभिक जांच कराने का आदेश दिया है। मामला 1270 करोड़ रुपये के ठेकों में कथित अनियमितताओं से जुड़ा है, जिसमें खांडू परिवार की 4 कंपनियां शामिल हैं।

देशबन्धु 6 Apr 2026 11:54 am

संडे जज्बात-कश्मीरी मुसलमान से शादी की, विदेश ले जाकर छोड़ा:सौतेले पापा ने मुझे घर से निकाला था, मम्मी ने भी बंद किया दरवाजा

8 साल से हिंदी फिल्में नहीं देखी। कैसे देखूं? जिस फिल्म में 7-8 साल का कोई बच्चा दिखता है, मेरा अपना बेटा ‘माही’ उसमें दिखने लगता है। रास्ते में चलते-फिरते भी यदि कोई गोरा-चिट्ठा बच्चा दिख जाए, तो जी करता है- दौड़ गले लगा लूं। मेरी ऐसी कोई रात नहीं बीतती, जब आंसुओं से तकिया गीली न होता हो। पिछले चार साल कहीं भी जाती हूं तो अक्सर मुझसे पूछा जाता है- रश्मि, आपके कितने बच्चे हैं? दो बच्चे… कहना चाहती हूं, लेकिन यह बात जुबान पर आते-आते ठहर जाती है। फिर बोलती हूं- एक बेटी है। सोचती हूं- दो बच्चे बताऊंगी तो लोग सवाल पूछेंगे कि- दूसरा बच्चा कहां है? पति क्या करते हैं और कहां रहते हैं? लेकिन सच यह है कि मेरी कोख ने दो बच्चे को जन्म दिया। दूसरे बच्चे की मां होने का सुख पति ने छीन लिया। मैं रश्मि सहगल, दिल्ली की रहने वाली हूं। पैदा तो एक बड़े खानदान में हुई, लेकिन 15 साल की उम्र के बाद अनाथालय में पली। चौथी क्लास में थी, तभी पापा की मौत हो गई थी। कैसे हुई थी, पता नहीं। कुछ लोगों ने तो यहां तक कहा- आपकी मां ने पैसे के लिए आपके पापा को मार दिया। जबकि मां बताती हैं कि पापा को कैंसर था। खैर… पापा की मौत के बाद मां ने एक अमीर आदमी से दूसरी शादी कर ली। उनके साथ सौतेले पापा के यहां रहने लगी थी। 5वीं से 10वीं की पढ़ाई वहीं की। वहां मुझे हर रोज एहसास कराया जाता कि सौतेले पापा के पास रह रही हूं। हर बात पर टोका जाता। कहीं जाने-आने पर मनाही थी। कई बार तो कोई चीज अनजाने में टूट जाती, तो खूब पिटाई की जाती। बच्ची थी, कम समझती थी इसलिए सोचती कि मां-बाप तो बच्चे को मारते ही हैं। बड़ी हुई, तो पता चला कि सौतेले पापा मुझे जान-बूझकर मारते थे। अक्सर मुझे गंदे तरीके से छूते भी थे। एक दिन उन्होंने मेरी खूब पिटाई की। बेल्ट से मारा। एक हाथ की चमड़ी उधड़ गई। मारते हुए मां से कहा- इसे अभी घर से निकालो, वर्ना तुम्हें भी घर में नहीं रहने देंगे। उस समय रात के 10 बज रहे थे। मां ने मेरे खून से सने हाथ को पकड़ा और घर से बाहर कर दिया। फौरन अंदर से दरवाजा बंद कर लिया। पूरी रात घर के बाहर बैठी रही कि शायद मम्मी का कलेजा पसीजेगा और वह मुझे भीतर बुला लेंगी। सुबह के लगभग 4 बज गए, लेकिन दरवाजा नहीं खुला। मेरे हाथ से खून अब भी निकल रहा था। मैंने दुपट्टा फाड़ा और हाथ में लपेट लिया। घर से कुछ किलोमीटर की ही दूरी पर हमारी मेड का घर था। सुबह होते ही मैं उनके यहां चली गई। मुझे देखकर मेड डर गईं। कहने लगीं- क्या हुआ रश्मि? तुम यहां क्या कर रही हो? मेरे मुंह से आवाज ही नहीं निकल रही थी। हकलाते हुए बोली, मम्मी-पापा ने घर से निकाल दिया। कुछ दिन आप अपने यहां मुझे रहने देंगी? कुछ देर बाद मेड बोली- नहीं, नहीं। तुम जवान हो। इस तरह किसी के घर कैसे रह सकती हो? जाओ अपने घर जाओ। यह कहते हुए उन्होंने भी दरवाजा बंद कर लिया। उसके बाद घर के पास एक अनाथालय था, वहां पहुंची। अनाथालय में मुझे रहने को जगह मिली। फिर वहीं रही और 12वीं तक पढ़ाई की। एक कंपनी में रिसेप्शनिस्ट की जॉब लग गई। यहीं पर एक कश्मीरी लड़के से मुलाकात हुई। वह बहुत हैंडसम लड़का था। उस ऑफिस की सारी लड़कियां उस पर फिदा थीं। 2014 की बात है। धीरे-धीरे हम दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं। एक-दूसरे से मिलने लगे। बचपन में पिता की मौत, फिर मां के होते हुए भी मैंने अनाथ की जिंदगी जिया था। मुझे लगा कि- अब हर खुशी मिलने वाली है- पत्नी का सुख। मां बनने का सपना और अपना घर-परिवार, लेकिन किसे पता था कि यह खुशी ज्यादा दिन नहीं रहने वाली। उस लड़के ने कहा- अगर तुम्हें मेरे साथ शादी करनी है, तो इस्लाम को मानना होगा। मेरे पास कोई दूसरा चारा नहीं था- मैंने हां कह दिया। उसके बाद बुरका, पांच वक्त की नमाज… सब करने लगी। फिर हम दोनों कश्मीर चले गए। वहां मुस्लिम रीति-रिवाज से हमारी शादी हुई। कुछ ही महीने वहां रही, फिर पति के साथ दुबई चली गई। वहां पहुंचते ही पति का रवैया बदलने लगा। हर रोज गाली-गलौज, मार-पिटाई करने लगे। घर से निकल जाने को कहते। मन-ही-मन सोचती- हे भगवान! जिंदगी कितनी परीक्षा लेगी! पहले सौतेला बाप ने मार-पीटकर भगाया और अब पति भगाना चाहता है। किसी तरह रिश्ता निभाती रही। 2015 आते-आते गर्भवती हुई। पति को पता चला तो वह कहने लगे- अभी बच्चा नहीं पैदा करना है। इसे गिरा दो। सुनकर घबरा गई कि- एक बाप कोख में पल रहे अपने बच्चे को गिराने के लिए कह रहा है! लेकिन मैं अड़ गई, बोली- बच्चे पैदा करूंगी। 6-7 महीने की गर्भवती थी तब पति मेरे साथ संबंध बनाने की जिद करते थे। कहते - शौहर हूं, जब चाहूं संबंध बना सकता हूं। मैं मना नहीं कर पाती थी। जिद करके मेरे साथ संबंध बनाता। उससे मेरी प्रेग्नेंसी में दिक्कत आ गई। बच्चे के पैदा होने की तारीख नजदीक आई और जब तेज दर्द हुआ तो हॉस्पिटल लेकर गए। डॉक्टर ने फौरन कहा- सर्जरी करके बच्चा निकालना होगा। उस वक्त भी मेरे पति बार-बार कह रहे थे- डॉक्टर नॉर्मल डिलीवरी होने दीजिए। डॉक्टर ने समझाया नॉर्मल डिलीवरी का इंतजार करोगे, तो जच्चा-बच्चा दोनों की जान जा सकती है। तब मेरे पति माने। डॉक्टर ने सर्जरी की। बेटी पैदा हुई, सुनते ही पति के होश उड़ गए। कहने लगा- क्या ही पैदा किया तुमने। बेटी जनमी हो। मेरे सास-ससुर भी कश्मीर से दुबई आ गए। सर्जरी के दूसरे दिन ही अस्पताल से घर आ गई। बच्ची को दूध पिलाने से लेकर डायपर लाने तक सब काम करना पड़ता। पेट में टांके कच्चे थे, घाव खुल गया और उसमें पस भर गई। उस दौरान भी सास-ससुर कोई मदद नहीं कर रहे थे। एक दिन तो अपने पति से डायपर लाने को बोली तो उन्होंने गुस्से में आकर मेरे मुंह पर थूक दिया और कहा- जानती हो कि तुम्हारी औकात क्या है? न तुम्हारे बाप का पता है, न घर का। सड़क से उठकर महल में आ गई हो। उस दिन समझ गई कि अब भी मैं अकेली हूं। पति का बेटी से कोई लगाव नहीं था। वह कुछ तय रकम दे देते। उसी में बच्चे और खुद की देखभाल करती। दो साल बाद, 2017 में बेटे माही का जन्म हुआ। तब लगा कि अब शायद सब ठीक हो जाएगा। देखभाल के लिए फिर से मेरी सास दुबई आ गईं। वह अक्सर कहतीं- तुम्हारे बच्चे मेरे हाथ से कुछ नहीं खाते, तुम ही इन्हें संभालो। दोनों बच्चों की जिम्मेदारी मुझ पर ही थी। आज भी वह हिजाब मेरे पास है, जिसमें गांठ बांधकर मैं अपने बेटे को पेट से बांधकर रखती थी। पेट पर बांधे हुए उसे दूध पिलाती और बेटी को खाना खिलाती। एक बार भी सास नहीं कहती कि लाओ मैं संभाल दूं। बस मुझे इतना भरोसा था कि बेटा अब बड़ा हो रहा है, शायद सब ठीक हो जाएगा। 2022 की बात है। उस वक्त हम पति-पत्नी सिंगापुर चले गए। वहां रोज दोनों बच्चों को स्कूल छोड़ने जाना पड़ता। सुबह पति को जगाती तो झगड़ पड़ते। एक दिन मैंने पति से कहा- मुझे ड्राइविंग सिखा दो, ताकि बच्चों को स्कूल छोड़ सकूं। उसके बाद मैंने ड्राइविंग लाइसेंस के लिए अप्लाई किया। जिस दिन ड्राइविंग टेस्ट था, मेरे पति ने मुझे कार देने से इनकार कर दिया। मैं कार के सामने खड़ी गिड़गिड़ाती रही। चाबी देने को कहती रही, लेकिन उसने एक नहीं सुनी। जाते वक्त मेरे पैर पर कार चढ़ाते हुए ऑफिस निकल गए। सोचा जिस इंसान को मेरी बिल्कुल कद्र नहीं, उसके साथ रहना बेकार है। 2021 आते-आते हालात और बिगड़ गए। पुलिस के पास भी नहीं जा सकती थी। जाती, तो वापस उसी घर में आना होता और फिर से वही मार-पिटाई होती। बेटा हर वक्त पति के साथ ही रहता था। एक रात पति ने मुझे और मेरी बेटी को घर से धक्का मारकर निकाल दिया। उसे लगा कि हर बार की तरह रोऊंगी और वापस लौट जाऊंगी, लेकिन उस दिन मैंने ऐसा नहीं किया। रात में ही दोस्तों को फोन करके उधार पैसे मांगे। फ्लाइट का टिकट कराया और बेटी के साथ दिल्ली लौट आई। कुछ दिनों तक अपने एक जानने वाले के यहां रही, फिर नौकरी करने लगी। कोई रेंट पर मकान देने को तैयार नहीं था। पूछते थे- पति क्या करते हैं? कहां रहते हैं? बताती- हम मां और बेटी हैं। पति नहीं हैं। मकान मालिक कमरा देने से इंकार कर देता। बड़ी मुश्किल से एक फ्लैट मिला। जो बेटी सिंगापुर में पढ़ रही थी, उसे दिल्ली में कोई स्कूल एडमिशन देने को तैयार नहीं था। सभी स्कूल बच्चे के पिता की डिटेल्स मांग रहे थे। बड़ी मुश्किल से एक स्कूल में एडमिशन मिला। वहां महीने की फीस 15 हजार थी और मेरी सैलरी 30 हजार। करीब एक साल तक वहां पढ़ाया, फिर स्कूल ने फीस न जमा करने से बेटी को निकाल दिया। उसके बाद बेटी बीमार पड़ने लगी। जो भी पैसा मेरे पास था और ज्वैलरी थी, बेचकर उसका इलाज करवाने लगी। हर रात बेटी के साथ बेटे माही की याद आती है। कई बार मैंने उससे बात करने की कोशिश की, लेकिन पति बात नहीं कराता। धमकी देते हुए कहता- दिल्ली में हो, चैन से रहो, नहीं तो इतने टुकड़े काटूंगा कि गिनती भी नहीं हो पाएगी। उसी दौरान मेरी भी तबीयत बहुत खराब हो गई। अस्पताल में भर्ती होने की नौबत आ गई। मैं बेटी को कुछ दिनों के लिए अपनी मां के पास छोड़ने के लिए लाजपत नगर गई, लेकिन मां ने दरवाजा बंद कर लिया और सीधे मना कर दिया- यहां मत आना। बीमार होने की वजह से मेरी नौकरी छूट गई। उस वक्त लोग सलाह देने लगे- दूसरी शादी कर लो। बच्ची के चक्कर में जिंदगी क्यों खराब कर रही हो, जिसका बच्चा है, उसे दे दो, लेकिन उन्हें क्या पता, मैं अपनी बेटी के लिए ही जी रही हूं। उस वक्त बेटी कुछ मांगती, तो कोई बहाना बना लेती। उससे सच बताने की हिम्मत नहीं होती। जब नौकरी के लिए इंटरव्यू देने जाती तो बेटी फोन करके पूछती- मां, नौकरी लगी? मैं हंसकर कहती- नहीं बेटा। मन-ही-मन सोचती- आज फिर उसे पिज्जा खिलाने और फिल्म दिखाने का वादा पूरा नहीं कर पाऊंगी। ऐसे ही चार महीने गुजर गए। तब जाकर फिर से एक नौकरी लगी। अब सिर्फ बेटी के लिए जी रही हूं। सिंगल मदर हूं। कई बार तो सोचकर ही कांप जाती हूं- अगर मुझे कुछ हो गया, तो मेरी 10 साल की बेटी का क्या होगा? बेटी का नाम लॉरिन है। मेरा बस एक ही सपना है कि उसे पढ़ा-लिखा दूं, उसके लिए एक घर बना दूं, जिसके गेट के बोर्ड पर लिखा हो- ‘लॉरिन हाउस’, ताकि कभी कोई उसे ताना दे, घर से निकाले तो वह कह सके- मेरा अपना भी घर है। बेटे की शक्ल देखे हुए सालों हो गए हैं। मुझे नहीं पता कि वह कहां है? किस देश में है? पति दूसरी शादी कर चुका है। शायद अब ऑस्ट्रेलिया में रह रहा है। मैंने कई बार कश्मीर जाकर बेटे को तलाशने की कोशिश की। बहुत पहले वह एक बार मिला भी था। कश्मीर मानवाधिकार आयोग की मदद से। तब मैंने उससे गले लगकर कहा था- मैं तुम्हारी नजर में अपराधी हो सकती हूं। जब कभी लौटने का मन हो तो लौट आना। मुझे जितना मारने का मन करे, मार लेना। हूं तो तुम्हारी मां। जहां रहो खुश रहो। मेरे पास उसकी एक भी तस्वीर नहीं है। 5 साल हो गए हैं, उसकी शक्ल नहीं देखी है। हर दिन यही सोचती हूं कि आज भी बेटे की कोई खबर नहीं है। पति ने घर से निकालते वक्त धमकी दी थी कि बेटी से ही संतोष करना, वर्ना उसे भी छीन लूंगा। (रश्मि सहगल ने अपने ये जज्बात भास्कर रिपोर्टर नीरज झा से साझा किए) --------------------------------------- 1- संडे जज्बात-उन्होंने हेलिकॉप्टर से लाश भेजी, हम ट्रेनें भर देंगे:दिल्ली वालों ने पीट-पीटकर मार डाला मेरा बेटा, क्योंकि हमारी शक्ल अलग है मैं अरुणाचल प्रदेश के ईटानगर की रहने वाली मरीना नीडो हूं- नीडो तानिया की मां, जिसे दिल्ली में भीड़ ने पीट-पीटकर मार दिया। अगर ऐसी नफरत बढ़ती रही, तो किसी दिन हालात खतरनाक हो सकते हैं। हम बस इतना चाहते हैं कि- आप हमें समझिए। हम अलग दिखते हैं, लेकिन अलग नहीं हैं। हम भी इसी देश के हैं। मेरे बेटे को सिर्फ इसलिए मार दिया गया, क्योंकि उसका चेहरा आपसे अलग था। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- संडे जज्बात-पुलिस ने मेरे प्राइवेट पार्ट पर ईंट बांधी:सिर कुर्सी में बांधकर उल्टा टांगा, मैं वकील बनकर केस खुद लड़ा- 12 साल बाद जीता 18 साल की उम्र में पुलिस ने मुझे हत्या के मामले में आरोपी बना दिया। मैंने अपने केस की खुद पैरवी की और 12 साल बाद बाइज्जत बरी हुआ। अपना केस लड़ने के लिए लॉ किया और अब मैं एडवोकेट अमित चौधरी हूं। मेरठ बार एसोसिएशन का सदस्य भी हूं। मेरी जिंदगी पर जल्द ही एक फिल्म बन रही है, जो नेटफ्लिक्स पर रिलीज होगी। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें

दैनिक भास्कर 5 Apr 2026 5:42 am

खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स:गोल्ड जीतने पर 2 लाख और टीम इवेंट्स में एक लाख रु. मिलेंगे; 19 मेडल के साथ छत्तीसगढ़ 9वें स्थान पर

रायपुर में 10 दिनों तक चले पहले खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026 का समापन शुक्रवार को हुआ। इसमें कर्नाटक की टीम 23 गोल्ड मेडल के साथ ओवरऑल चैंपियन रही। वहीं, ओडिशा (21 गोल्ड) और झारखंड (16 गोल्ड) क्रमशः दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे। मेजबान छत्तीसगढ़ ने भी शानदार प्रदर्शन करते हुए 3 गोल्ड, 10 सिल्वर और 6 ब्रॉन्ज समेत कुल 19 मेडल जीतकर 9वें स्थान पर रहा। मुख्य अतिथि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने राज्य के सभी पदक विजेताओं के लिए नकद पुरस्कारों की घोषणा की। सीएम ने कहा कि व्यक्तिगत स्पर्धाओं में गोल्ड जीतने वाले खिलाड़ियों को 2 लाख रुपए, सिल्वर के लिए 1.5 लाख और ब्रॉन्ज के लिए 1 लाख रुपए दिए जाएंगे। वहीं, टीम इवेंट्स में गोल्ड, सिल्वर और ब्रॉन्ज विजेताओं को क्रमशः 1 लाख, 75 हजार और 50 हजार रुपए मिलेंगे। फुटबॉल में पुरुष टीम ने जीता सिल्वरअंतिम दिन पुरुष फुटबॉल के फाइनल मुकाबले में छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल की टीम आमने-सामने थी। दोनों टीमों के बीच रोमांचक मुकाबला देखने को मिला। 45वें मिनट में बंगाल के चाको ने गोल कर टीम को 1-0 की बढ़त दिला दी। जबकि प्रदेश के खिलाड़ी फुल टाइम तक गोल करने में असफल रहे। इसके साथ ही टीम को सिल्वर मेडल से संतोष करना पड़ा, जबकि ब्रॉन्ज अरुणाचल प्रदेश और गोवा को मिला। वहीं, इसके पहले गुरुवार को छत्तीसगढ़ की महिला टीम ने झारखंड को हराकर गोल्ड जीता। मल्लखंभ में भी हम अव्वल:ट्राइबल गेम्स में मल्लखंभ को डेमोस्ट्रेशन गेम के रूप में शामिल किया गया। अंबिकापुर के गांधी स्टेडियम में हुए मल्लखंभ प्रतियोगिता में छत्तीसगढ़ ने 124.35 अंक के साथ पहला स्थान हासिल किया। महाराष्ट्र 118.35 अंक के साथ दूसरे और झारखंड 86.95 अंक के साथ तीसरे स्थान पर रहा। रोप, पोल और हैंगिंग मल्लखंभ में खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन किया। प्रदेश को व्यक्तिगत खेल में 16 पदकछत्तीसगढ़ के खिलाड़ियों ने व्यक्तिगत खेलों में 16 मेडल जीते। इंटरनेशनल स्वीमिंग पूल में हुए इवेंट में हमारी टीम ने चार सिल्वर, 3 ब्रॉन्ज मेडल जीते। इसमें अनुष्का भगत ने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए चारों सिल्वर मेडल हासिल किए। वहीं, वेटलिफ्टिंग में एकमात्र गोल्ड 77 किग्रा में निकिता ने जीता। इसके अलावा जगदलपुर में हुए एथलेटिक्स में मेंस शॉटपुट में सिद्धार्थ नागेश ने गोल्ड हासिल किया। इस तरह छत्तीसगढ़ के खिलाड़ियों ने व्यक्तिगत खेलों में कुल 2 गोल्ड, 9 सिल्वर और 5 ब्रॉन्ज जीते। इंजरी के बाद गोल्ड जीतने वाली बॉक्सर मैरी कॉम से खास बातचीत मैरी कॉम ने जताई इच्छा- छत्तीसगढ़ सरकार एकेडमी का सेटअप देगी तो युवाओं को बॉक्सिंग की ट्रेनिंग और कोर्स कराने को तैयार सुमय कर की रिपोर्ट खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में शिरकत करने पहुंची 6 बार की वर्ल्ड चैम्पियन मुक्केबाज मैरी कॉम ने अपने जीवन के सबसे कठिन संघर्षों, ओलिंपिक के दबाव और अपनी एकेडमी को लेकर खास बातचीत की। उन्होंने बताया कि 2022 में उन्हें एक गंभीर चोट लगी थी। दर्द और डर के कारण मैं 6 महीने तक रोती रही। उन्होंने इच्छा जताई कि मैं छत्तीसगढ़ में बॉक्सिंग की ट्रेनिंग देना चाहती हूं। पेश है मैरी कॉम के साथ भास्कर से खास बातचीत... आपकी एकेडमी का रूटीन क्या है, क्या छत्तीसगढ़ में कोचिंग देना चाहेंगी?मणिपुर में मेरी एकेडमी में 100 से ज्यादा बच्चे हैं, जो अरुणाचल, असम, झारखंड के हैं। अगर छत्तीसगढ़ सरकार एकेडमी सेटअप करके देती है, तो मैं बॉक्सिंग कोर्स और ट्रेनिंग देने को तैयार हूं। आपकी फिल्म में बच्चे की बीमारी का एक इमोशनल सीन है, असलियत क्या थी?-फिल्म में दिखाया गया है कि मुझे विदेश में फोन पर सूचना मिली, लेकिन असलियत अलग थी। मुझे चीन जाने से पहले ही पता चल गया था कि मेरे बच्चे के दिल में छेद है। मेरा मन ट्रेनिंग में नहीं लग रहा था। तब आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, मैं सब-इन्स्पेक्टर थी और सैलरी मात्र 20-30 हजार थी। मैंने हिम्मत जुटाई और देश के लिए खेलने गई। वहां गोल्ड जीता और टूर्नामेंट की ‘बेस्ट बॉक्सर’ भी चुनी गई। आज की खेल सुविधाओं में क्या बदलाव ?-हमारे समय में सुविधाएं बहुत कम थीं। हम कच्चे मैदानों पर खेलते थे। आज सरकार साईं, टॉप्स स्कीम और स्कॉलरशिप से खिलाड़ियों को सब कुछ दे रही है। यहां तक कि अब साइकोलॉजिस्ट भी उपलब्ध है। ओलंपिक जैसे बड़े मंचों पर मेडल के करीब आकर खिलाड़ी क्यों चूक जाते हैं? - इसका सबसे बड़ा कारण ‘प्रेशर’ है। खिलाड़ियों पर देश, माता-पिता और दोस्तों की उम्मीदों का बहुत बोझ होता है। हर कोई इस मानसिक दबाव को हैंडल नहीं कर पाता, जिससे परफॉर्मेंस ऊपर-नीचे हो जाती है। मैं युवाओं को यही कहती हूं कि इस दबाव को साइड में रखकर सिर्फ अपने बेस्ट प्रदर्शन पर ध्यान दें।

दैनिक भास्कर 4 Apr 2026 5:30 am

'राघव चड्‌ढा भाजपा के खिलाफ बोलते, मगर वक्ता अच्छे':झांसी में दिनेश शर्मा बोले- विपक्ष को मोदी की आरती उतारनी चाहिए, अमेरिका-चीन की नहीं

झांसी में पूर्व डिप्टी सीएम एवं राज्यसभा सांसद दिनेश शर्मा ने राज्यसभा में उपनेता पद से हटाए गए आम आदमी पार्टी (AAP) के सांसद राघव चड्‌ढा की तारीफ की। उन्होंने कहा- राघव चड्‌ढा एक अच्छे वक्ता हैं। उन्होंने कुछ पब्लिक इश्यू उठाए हैं, जो आम आदमी पार्टी को अच्छे नहीं लगे। रही बात भाजपा के प्रति झुकाव की तो सभी स्पीच में वे भाजपा के खिलाफ ही बोलते हैं। सांसद के तौर पर उनकी परफॉरमेंस अच्छी रही है। अब वो आम आदमी पार्टी नहीं रही, वो खास आदमी पार्टी हो गई है। पार्टी में बहुत सारे उद्योगपति सदस्य बन गए। इसलिए वहां कार्यकर्ता और नेता का कोई महत्व नहीं है। राज्यसभा सांसद दिनेश शर्मा शुक्रवार को झांसी में सखी हनुमान मंदिर में आयोजित धार्मिक कार्यक्रम में शामिल हुए। यहां से भाजपा नेता रामजी परिहार और सदर विधायक रवि शर्मा के घर पहुंचे, जहां उन्होंने मीडिया से बातचीत की। लोग अफवाह फैला रहे हैं दिनेश शर्मा ने कहा- दूसरे दलों के लोग गैस और पेट्रोल को लेकर अफवाह फैला रहे हैं। मगर ये बात सही है कि विश्व में संकट है, लेकिन हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 10 रुपए लीटर पेट्रोल और डीजल पर टैक्स में छूट कर दी। प्रोडक्ट और खाद पर कस्टम ड्यूटी हटा दी। जीएसटी का सरलीकरण कर दिया। क्राइसिस का मैनेजमेंट किया जा रहा है। देश के विपक्ष को उनकी आरती उतारनी चाहिए, मगर वो आरती अमेरिका से लेकर चीन तक की उतार रहे हैं। उस पाकिस्तान के बारे में बोलते हैं, जहां बुखमरी मची है। किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा दिनेश शर्मा ने यूजीसी पर कहा- थोड़े दिन प्रतीक्षा कर लीजिए। धर्मेंद्र प्रधान का 1 मार्च को बयान आ चुका है। उन्होंने कहा- अगड़ा, पिछड़ा, दलित समेत किसी के साथ कोई भेदभाव न हो। ये सरकार की प्राथमिकता पहले भी थी और आज भी है। अभी सुप्रीम कोर्ट में मामला है। अखिलेश के भारत के विश्वगुरु खोने का मौका गंवाने वाले बयान पर कहा- विश्व गुरु कौन बनता है, जो नेतृत्व करता है। अभी G20 हुआ तो जापान, जर्मनी, फांस, अमेरिका के लोग सामने की रो में बैठे थे और मोदी अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठे थे। अब गुरु तो हो ही गए न। गुरू का मतलब, नेतृत्वकर्ता और मोदी आज विश्व में है। 102 जिले हिंदू अल्पसंख्यक, उन्हें सुविधा मिले उन्होंने कहा- 2 की जगह अब हम एक बच्चे के सिद्धांत पर बढ़ रहे हैं। ये रिश्तों को समाप्त कर रहा है। संस्कृति को खत्म कर रहा है। डेमोग्राफी का परिवर्तन कर रहा है। अमेरिका रिसर्च कहती है कि जिनके यहां एक बच्चा होता है तो वे अवसादग्रस्त हो जाते हैं। सरसंघचालक ने 3 बच्चों के लिए कहा है। इस पर अमल होना चाहिए। सब लोगों को मिलकर एक राष्ट्रीय नीति तैयार करनी होगी। जनसंख्या के स्थाईकरण के संदर्भ में कानून बने। कश्मीर, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश समेत 10 राज्यों में हिंदू अल्पसंख्यक हो गए हैं। हिंदू अल्पसंख्यक है, लेकिन उसको बहूसंख्यक का दर्जा मिलता है। 102 जिलों में हिंदू अल्पसंख्यक है, उसको अल्पसंख्यक के अधिकार मिलने चाहिए। इसमें मुस्लिम, सिख या किश्चियन का विरोध नहीं है, बल्कि देश के संरक्षण के लिए सामूहिक प्रत्यन की बात है। भारत बुजुर्ग भारत देश न कहलाए, इसलिए ये प्रयास करना चाहिए। मैंने खतरा बताया है, अब मानना और न मानना समाज के ऊपर है। इस दौरान मंत्री मनोहर लाल मन्नू कोरी, सांसद अनुराग शर्मा, सदर विधायक रवि शर्मा, विधायक डॉ. रश्मि आर्य, जिलाध्यक्ष सुधीर सिंह आदि मौजूद थे। --------------------------- यह खबर भी पढ़ें… अयोध्या में बुर्का पहनकर लूटने वाली महिला हिंदू निकली:4 महीने की गर्भवती, खिलौना पिस्टल दिखाकर ज्वेलरी लूटी; बॉयफ्रेंड के साथ गिरफ्तार अयोध्या में ज्वेलरी शॉप में बुर्का पहनकर लूट करने वाली महिला हिंदू निकली। बॉयफ्रेंड के साथ मिलकर उसने वारदात की थी। पुलिस ने गुरुवार देर रात दोनों को गिरफ्तार कर लिया है। महिला का नाम पायल (25) और लड़के का नाम राहुल (27) है। पढ़ें पूरी खबर….

दैनिक भास्कर 3 Apr 2026 8:17 pm

छत्तीसगढ़ की पहली महिला फुटबॉल स्टार बनी किरण पिस्दा:हर पोजिशन में खेलने में एक्सपर्ट, सेमीफाइनल मैच में गोलकीपिंग कर चर्चा में आईं

खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में देशभर के आदिवासी खिलाड़ियों का दम देखने को मिल रहा है। इसी मंच पर छत्तीसगढ़ की महिला फुटबॉलर किरण पिस्दा ने अपने खेल और आत्मविश्वास से सबका ध्यान खींचा। सेमीफाइनल मैच में अरुणाचल प्रदेश के खिलाफ पेनल्टी शूटआउट के दौरान उन्होंने गोलकीपर बनकर टीम को संभाला—यहीं से उनकी चर्चा और तेज हो गई। किरण भारतीय टीम के लिए खेल चुकी हैं। इसके अलावा यूरोप की क्रोएशियन विमेंस लीग में डाइनेमो जागरेब वुमन के लिए खेल चुकी हैं। सबसे बड़ी खासियत: हर पोजीशन पर खेलने की क्षमता 24 साल की किरण इस समय अपने करियर के बेहतरीन दौर में हैं और बड़े इंटरनेशनल टूर्नामेंट में जगह बनाने के लिए लगातार मेहनत कर रही हैं। किरण का सफर आसान नहीं रहा। स्कूल से ही उन्हें खेलने का मौका मिला, जहां से उनका आत्मविश्वास बढ़ा। उनके भाई गिरीश पिस्दा, जो खुद नेशनल लेवल खिलाड़ी हैं, उनके सबसे बड़े प्रेरणा बने। बाद में वह पढ़ाई के लिए रायपुर आईं और यहीं से उनका करियर नई दिशा में बढ़ा। पहला झटका: जब नेशनल टीम में जगह नहीं मिली नेशनल कैंप तक पहुंचने के बाद भी उनका चयन नेशनल टीम में नहीं हुआ। ये उनके लिए बड़ा झटका था।किरण मानती हैं—उस समय फिटनेस और मानसिक तैयारी उतनी मजबूत नहीं थी। वो कहती हैं कि सलेक्शन नहीं हुआ तोसमझ आया कि सिर्फ टैलेंट नहीं, खुद को हर स्तर पर बेहतर बनाना जरूरी है। खुद को बदला: मेहनत, फिटनेस और पॉजिटिव सोच इस असफलता के बाद किरण ने हार नहीं मानी। फिटनेस पर जमकर काम किया मैच को समझना शुरू किया। हर स्थिति में खेलने की तैयारी की। वो कहती हैं कि सबसे बड़ा बदलाव उनके सोच में आया। उन्होंने तय किया कि कभी निगेटिव नहीं सोचूंगी, क्योंकि इसका सीधा असर खेल पर पड़ता है। कोच का साथ बना टर्निंग पॉइंट उनके कोच योगेश ने मुश्किल समय में उन्हें संभाला। जब भी आत्मविश्वास गिरता, कोच उन्हें पॉजिटिव रहने की सलाह देते। किरण की सबसे बड़ी ताकत उनकी वर्सेटिलिटी (हर पोजीशन पर खेलना) है। इंटरनेशनल सफर और चुनौतियां किरण भारत के लिए कई बार खेल चुकी हैं। 2022 SAFF चैंपियनशिप टीम का हिस्सा रहीं और यूरोप में भी खेल चुकी हैं। लेकिन यहां भी चुनौतियां खत्म नहीं हुईं। हाल ही में AFC विमेंस एशियन कप के लिए चयन नहीं होने का दर्द उन्हें झेलना पड़ा। किरण कहती हैं कि उनका फोकस साफ है। घरेलू लीग में लगातार अच्छा प्रदर्शन, भारतीय टीम में जगह पक्की करना और बड़े इंटरनेशनल टूर्नामेंट खेलना। सेलेक्शन नहीं हुआ तो इसका मतलब ये नहीं कि आप अच्छे खिलाड़ी नहीं हैं… इसका मतलब है कि आपको और मेहनत करनी है।

दैनिक भास्कर 2 Apr 2026 7:12 pm

मिडिल ईस्ट में वॉर का असर टूरिज्म सेक्टर पर:फॉरेन ट्रिप कैंसिल करा रहे लोग, एजेंट्स ने कहा- व्यापार पर बुरा असर पड़ रहा

मिडिल ईस्ट में चल रहे वॉर की वजह से टूरिज्म सेक्टर पर बुरा असर पड़ा है। जिससे गोरखपुर के टूरिज्म व्यापारियों का बिजनेस ठप पड़ गया है। समर वेकेशन में फॉरेन ट्रिप जाने वाले लोगों ने भारी मात्रा में अपने टिकट कैंसल करा दिया है। ट्रैवल एजेंट्स का कहना है कि मिडिल ईस्ट देशों की सभी बुकिंग्स कैंसल हो गई हैं। दूसरी तरफ फ्लाइट की टिकट भी महंगी हो गई है। इसका असर डोमेस्टिक ट्रिप पर भी देखने को मिल रहा है। वॉर की वजह से लोग देश के अंदर भी ट्रैवेल करने से कतरा रहे हैं। वहीं जो लोग बुकिंग्स करवा रहे भी रहे हैं। वे भी अपना डेस्टिनेशन साउथ एशियाई देशों को चुन रहे हैं। इन देशों में ज्यादातर बुकिंग्स वियनाम की हुई है। इसके अलावा, सिंगापुर, मालदीव, थाईलैंड जाना भी लोग पसंद कर रहे हैं। वहीं देश के अंदर नैनीताल, शिमला और अरुणाचल प्रदेश की बुकिंग्स हैं। 35 से अधिक बुकिंग्स कैंसिल होप फन ट्रैवल एजेंसी के ओनर शिव मिश्रा ने बताया कि महीने भर में दुबई, साउदी अरब, अबू धाबी, कतर समेत अन्य मिडिल ईस्ट देशों कि करीब 30-35 बुकिंग कैंसिल हुई हैं। जिनमें लगभग 150 पैसेंजर शामिल हैं। इंटरनेशनल उड़ानों की रेट भी 10-20 परसेंट तक बढ़ गई है। जिसकी वजह से बूकिंग्स नहीं हो रही है। इसके अलावा समर वोकेशन के लिए जो भी बूकिंग्स हो रही हैं, उनमें ज्यादातर लोगों की पहली पसंद वियतनाम है। वियतनाम पहली पसंद बनी साथ ही सिंगापुर, मलेशिया, मारिशस, दार्जिलिंग इंडोनेशिया, कंबोडिया की बुकिंग आ रही हैं। इस समय वार और फ्लाईट की टिकट महंगी होने की वजह से लोग इंडिया हो या फॉरेन कहीं भी ट्रैवल करने से कतरा रहे हैं। लोगों को लग रहा है कि इस क्राइसिस के बीच क्या पता कब कहा फंस जाएं। उन्होंने बताया कि मार्च-अप्रैल का पीक सीजन होता है। मेरे पास जहां पहले 150- 200 तक बूकिंग्स होती थी। वह घट कर महज 15 से 20 तक रह गई हैं। जिन्होंने पहले से कराई थी वे भी कैंसिल हो गई हैं। डोमेस्टिक टूरिज्म को दे रहे बढ़ावा वहीं रॉयल टूर एंड ट्रेवल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के ओनर अहमद माआज ने बताया कि वॉर की वजह से इंटरनेशनल टूरिज्म को नुकसान पहुंचा है, लेकिन इससे गोरखपुर के लोगों में देश के अंदर ही घूमने का रुझान बढ गया है। क्योंकि ट्रैवल एजेंट्स भी डोमेस्टिक टूरिज्म को ही बढ़ावा दे रहे है। डोमेस्टिक ट्रिप के लिए लोग राजस्थान, आंध्र प्रदेश, गुजरात, तमिलनाडु, बनारस, नैनीताल, अरुणाचल प्रदेश जैसे जगहों को पसंद कर रहे हैं। वहीं वे लोग एशियाई देशों के पैकेज ऑफर कर रहे हैं, ताकि लोग कम से कम कुछ छुट्टियां मना सकें। इनमें मालदिव, थाईलैंड, श्रीलंका, सिंगापुर सस्ते और कम जोखिम वाले ऑप्शन हैं, क्योंकि इन रूट्स पर मध्य पूर्व का हवाई क्षेत्र शामिल नहीं होता। लगातार फ्लाइट्स कैंसिल हो रही त्रिदेव टूर एंड ट्रेवल के ओनर ध्रुव गौर ने बताया कि वॉर ने टूरिज्म को बहुत ही प्रभावित किया है। लोग लगातार फ्लाइट कैंसिल करवा रहे है। पहले की बुकिंग्स तो कैंसल हो रही है। फॉरेन ट्रिप के लिए नई बुकिंग्स भी नहीं मिल रही। जिसकी वजह से हमने डोमेस्टिक टूरिज्म का ऑप्शन लोगों के सामने रखना शुरू कर दिया है। ऐसा अगर लंबे समय तक चला तो दिक्कत होगी। जिसमें लोग फिर ऐसे ऑप्शन की तलाश करेगें जो आस पास के ही हो।

दैनिक भास्कर 1 Apr 2026 6:47 am

Bigg Boss 18 : चुम दरांग को मिला अरुणाचल प्रदेश के सीएम का सपोर्ट

सलमान खान का पॉपुलर रियलिटी शो 'बिग बॉस 18' अपने अंतिम दौर में पहुंच गया है। हर कोई इस सीजन का विनर बनने के लिए पूरा जोर लगा रहा है। इन दिनों शो में 'टिकट टू फिनाले' टास्क चल रहा है। इस टास्क में विवियन डीसेना और चुम दरंग आमने-सामने खड़े हैं। वहीं ...

वेब दुनिया 10 Jan 2025 2:40 pm