फरीदाबाद के ऐतिहासिक सूरजकुंड परिसर में 31 जनवरी से 15 फरवरी तक 39वें अंतरराष्ट्रीय सूरजकुंड हस्तशिल्प मेले का आयोजन किया जाएगा। मेले का उद्घाटन देश के उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन करेंगे, जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी करेंगे। इस बार मेला वैश्विक सहभागिता और नई तकनीकी सुविधाओं के चलते खास रहने वाला है। मेले में 45 देशों के कलाकार अपनी पारंपरिक कला और संस्कृति का प्रदर्शन करेंगे। लगातार तीसरी बार मिस्र को कंट्री पार्टनर बनाया गया है, जबकि उत्तर प्रदेश को थीम स्टेट के रूप में चुना गया है। अब तक मिडिल ईस्ट, मिस्र समेत 25 देशों के कलाकारों की भागीदारी को लेकर सहमति मिल चुकी है। वहीं बांग्लादेश और ईरान से कलाकारों के आने को लेकर स्थिति अभी स्पष्ट नहीं हो पाई है। आयोजन में देश-विदेश के बुनकरों, कारीगरों और हस्तशिल्पियों को 1200 से अधिक स्टॉल आवंटित किए जा चुके हैं। इस बार टर्की की सजावटी फेंसिंग लाइटें और ट्यूनीशिया की ओलिव वुड से बनी कलाकृतियां पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण होंगी। उत्तर प्रदेश की शिल्प विरासत बनेगी केंद्र बिंदू थीम स्टेट उत्तर प्रदेश के पवेलियन में फिरोजाबाद की कांच की चूड़ियां, कन्नौज की इत्र परंपरा, आजमगढ़ की ब्लैक पॉटरी और वाराणसी, लखनऊ व भदोही की जरी-जरदोजी कला को प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाएगा। पर्यटन विभाग की ओर से लोक नृत्य, लोक संगीत, हस्तशिल्प और पारंपरिक व्यंजनों के माध्यम से प्रदेश की सांस्कृतिक झलक पेश की जाएगी। ओडीओपी योजना के तहत प्रदेश के 40 विशेष हस्तशिल्प स्टॉल लगाए जाएंगे, जिससे स्थानीय कारीगरों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी कला दिखाने का अवसर मिलेगा। दिनभर सांस्कृतिक रंग, फैशन शो भी होंगे शामिल मेले में रोजाना सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे तक सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। लोकनृत्य, लोकगीत और पारंपरिक प्रस्तुतियों के साथ तीन विशेष अवसरों पर फैशन शो भी होंगे, जिनमें पारंपरिक और आधुनिक परिधानों के साथ आभूषणों की झलक देखने को मिलेगी। क्यूआर कोड और फास्टैग से मिलेगी स्मार्ट सुविधा मेला परिसर के पाथवे पर विभिन्न जिलों की पहचान को दर्शाने वाले डिजाइन बनाए जाएंगे। हर शिल्प और जिले के लिए विशेष साइनेज और क्यूआर कोड लगाए जाएंगे, जिनके जरिए पर्यटक शिल्प निर्माण प्रक्रिया और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की जानकारी ले सकेंगे। पर्यटकों की सुविधा के लिए पार्किंग शुल्क का भुगतान फास्टैग के जरिए भी किया जा सकेगा। नकद और अन्य डिजिटल भुगतान विकल्प भी उपलब्ध रहेंगे। प्रशासन ने पांच स्थानों पर पार्किंग स्थल विकसित किए हैं, जहां एक साथ हजारों वाहन खड़े किए जा सकेंगे। पूर्वोत्तर भारत की संस्कृति की भी झलक इस बार सूरजकुंड मेले में पूर्वोत्तर भारत की संस्कृति भी खास तौर पर प्रदर्शित की जाएगी। अरुणाचल प्रदेश के तवांग मठ, असम के कामाख्या मंदिर और मेघालय की खासी हिल्स जैसे पर्यटन स्थलों की झलक के साथ-साथ आठों पूर्वोत्तर राज्यों की लोक कला, पारंपरिक वेशभूषा और खानपान पर्यटकों को आकर्षित करेगा। मेले के नोडल अधिकारी हरविंद्र सिंह यादव के अनुसार, इस बार करीब 1300 से अधिक स्टॉल लगाए जाएंगे और हर स्टॉल किसी न किसी राज्य या देश की सांस्कृतिक पहचान को दर्शाएगा। हर साल की तरह इस बार भी करीब 10 लाख से अधिक पर्यटकों के पहुंचने की उम्मीद है।
कोलकाता की शेल कंपनियों से 450 करोड़ की फर्जी बिलिंग
फर्जी इनपुट टैक्स क्रेडिट के एक बड़े नेटवर्क का भंडाफोड़ करते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), ईटानगर ने मंगलवार को पश्चिम बंगाल, मणिपुर और झारखंड में 10 ठिकानों पर एक साथ तलाशी अभियान चलाया। यह कार्रवाई 658 करोड़ रुपए की जाली बिलिंग और करीब 100 करोड़ रुपये के फर्जी इनपुट टैक्स क्रेडिट घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में की गई। ईडी ने यह कार्रवाई मेसर्स सिद्धि विनायक ट्रेड मर्चेंट, अरुणाचल प्रदेश के खिलाफ दर्ज एफआईआर के आधार पर शुरू की गई जांच के तहत की। जांच में सामने आया कि फर्म ने अक्टूबर 2023 से मार्च 2024 के बीच छह माह में 11 राज्यों की 58 कंपनियों को 15,258 फर्जी चालान जारी किए, जिनके जरिए वित्त वर्ष 2023-24 में करीब 99.31 करोड़ रुपये के फर्जी इनपुट टैक्स क्रेडिट का गलत लाभ उठाया गया। तलाशी के दौरान सामने आया कि दयाल कमर्शियल, एपी एंटरप्राइजेज, फीनिक्स हाइड्रोलिक्स, राम अवतार बंसल एंड कंपनी और भीमा शंकर इंडस्ट्रीज जैसी कोलकाता आधारित कंपनियां केवल बिल बनाने और इनपुट टैक्स क्रेडिट पास करने का काम कर रही थीं। इन संस्थाओं ने करीब 450 करोड़ रुपये के फर्जी बिल बनाए और वाहन खरीद-बिक्री के नकली रिकॉर्ड दिखाकर जीएसटी रिफंड का दावा किया।
राजस्थान में दंगा प्रभावित या तनावग्रस्त इलाकों में हिंदू-मुस्लिम बिना परमिशन के एक दूसरे को प्रॉपर्टी नहीं बेच पाएंगे। बेचने से पहले कलेक्टर से मंजूरी लेना जरूरी होगा। नियम तोड़ने पर कलेक्टर सौदा कैंसिल कर सकता है और प्रॉपर्टी भी सीज हो सकती है। प्रदेश में एक धर्म के लोगों का पलायन रोकने के लिए ‘डिस्टर्ब एरिया एक्ट’ को कैबिनेट की बैठक में मंजूरी मिल गई है। अब अगले सप्ताह विधानसभा में होने वाले बजट सत्र में बिल पेश किया जाएगा। इसके बाद इसे कानूनी रूप देने की तैयारी की जाएगी। गुजरात में यह कानून पहले से लागू है। वहीं, इसके कुछ प्रावधान नगालैंड, असम, मणिपुर व अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों में भी लागू हैं। इस कानून को लागू करने वालों में गुजरात के बाद राजस्थान का नाम शामिल करने की तैयारी है। अब इस एक्ट को लेकर कई सवाल भी उठ रहे हैं। जैसे- राजस्थान में इसकी जरूरत क्यों पड़ी? सेंसेटिव एरिया में रहने वाले अपनी प्रॉपर्टी कैसे बेच पाएंगे? एक्ट में किस तरह के प्रावधान होंगे? नहीं मानने पर कितने साल की सजा होगी? भास्कर ने लीगल और पॉलिटिकल एक्सपर्ट से ऐसे ही सवालों के जवाब जाने। सवाल : ‘डिस्टर्ब्ड एरिया एक्ट’ क्या है और इसके प्रावधान क्या हो सकते हैं?जवाब : कैबिनेट की मंजूरी के बाद अब राजस्थान विधानसभा में ‘डिस्टर्ब्ड एरिया बिल’ लाया जाएगा। यहां पारित होता है, तो राज्यपाल को मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। राज्यपाल की मंजूरी के बाद ये कानून का रूप ले लेगा। जब ये कानून का रूप ले लेगा, तब उसके प्रावधानों के तहत किसी क्षेत्र में दो समुदायों के बीच दंगा-फसाद होता रहता है या ऐसी कोई संभावना रहती है, कलेक्टर उसे डिस्टर्ब एरिया घोषित कर सकेंगे। उस क्षेत्र में कोई व्यक्ति किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति के साथ प्रॉपर्टी का सीधे सौदा नहीं कर पाएंगे। पहले उसे जिला कलेक्ट्रेट से मंजूरी लेनी होगी। सूत्रों के अनुसार इस बिल में कहीं भी हिंदू या मुस्लिम या किसी समुदाय का जिक्र नहीं होगा। लेकिन दोनों तरह की मेजोरिटी (हिंदू या मुस्लिम) को संबंधित डिस्टर्ब एरिया में घर बेचने से पहले कलेक्टर से परमिशन लेनी होगी। वहीं, किसी इलाके में चाहे मुस्लिम मेजोरिटी में हों या हिंदू मेजोरिटी में हों, तब भी यही प्रोसेस फॉलो करना होगा। सूत्रों के अनुसार इस बिल में ये मुख्य प्रावधान होंगे... सवाल : गुजरात के जैसे राजस्थान में भी इस कानून की जरूरत है क्या?जवाब : एक्सपट्र्स के अनुसार डिस्टर्ब्ड एरिया एक्ट का उद्देश्य दंगा प्रभावित क्षेत्रों से पलायन रोकने, जबरन या किसी डर से संपत्ति के होने वाले सौदों को रोकने आदि से है। एक्सपट्र्स के अनुसार जयपुर सहित अन्य जिलों में भी कहीं न कहीं दंगे भड़क जाते हैं। वहीं पलायन होने के मुद्दे भी बार-बार उठते रहे हैं। ऐसे में सरकार संबंधित क्षेत्रों की प्रॉपर्टी खरीद-फरोख्त के मामलों में अपनी निगरानी रखना चाह रही है। इससे उन लोगों को राहत मिलेगी, जो दबाव में या डर से अपनी प्रॉपर्टी बेचने पर मजबूर हो जाते हैं। गुजरात में भी संबंधित एक्ट के पीछे सरकार का मकसद दंगों की वजह से पलायन को रोकना था। इधर, सरकार का भी तर्क है कि इस एक्ट को केवल मुस्लिमों के नजरिये से नहीं देखना चाहिए। ये सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होगा। यदि कलेक्टर ने संबंधित क्षेत्र को डिस्टर्ब एरिया घोषित किया है, तो वहां हिंदू भी मुस्लिम से प्रॉपर्टी नहीं खरीद सकेगा। सवाल : कलेक्टर कैसे तय करेगा कि संबंधित क्षेत्र एक डिस्टर्ब्ड एरिया है?जवाब : सूत्रों के अनुसार एक्ट के प्रावधानों के तहत डिस्टर्ब्ड एरिया तय करने के लिए अमूमन उस इलाके में सांप्रदायिक दंगों का इतिहास देखा जाएगा। गुजरात में भी इसी तरह से स्थानीय प्रशासन (कलेक्टर) संबंधित एरिया को डिस्टर्ब्ड एरिया घोषित करता है। गुजरात में हर 5 साल में एक बार डिस्टर्ब्ड एरिया एक्ट में संशोधन किया जाता है। सवाल : यदि कानून बनने के बाद प्रॉपर्टी बेचने की इजाजत नहीं ली, तो क्या कार्रवाई हो सकती है?जवाब : बिना इजाजत के संपत्ति बेचने का सौदा किया, तो डिस्टर्ब्ड एरिया एक्ट के तहत दोनों पर केस दर्ज हो सकेगा। कानून का उल्लंघन करने पर 5 साल तक की जेल होने के प्रावधान इस कानून में लागू हो सकते हैं। साथ ही प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री रद्द कर दी जाएगी। हालांकि इस कानून को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। अगर कलेक्टर के आदेश पर डील रद्द हो गई है, तो प्रॉपर्टी का खरीदार हाईकोर्ट में अपील दायर कर सकता है। इसके बाद जज इस मामले पर फैसला सुना सकते हैं। गुजरात में ऐसे कई मामलों में वहां हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। सवाल : गुजरात में हिंदू महिला की प्रॉपर्टी क्या इसी एक्ट के तहत सीज हुई थी, मामला क्या था?जवाब : गुजरात में डिस्टर्ब्ड एरिया एक्ट, 1991 लागू है। साल 1986 में गुजरात विधानसभा में इसका विधेयक पेश किया गया और 1991 में यह कानून बना। सरकारी दस्तावेज में इस एक्ट का पूरा नाम ‘द गुजरात प्रॉहिबिटेशन ऑफ ट्रांसफर ऑफ इमूवेबल प्रॉपर्टी एंड प्रोविजन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ टेनेंट्स फ्रॉम इविक्शन फ्रॉम प्रिमिसिस इन डिस्टर्ब एरिया एक्ट' है। इस एक्ट के तहत सूरत कलेक्टर ने सलाबतपुरा एरिया को डिस्टर्ब एरिया घोषित किया हुआ था। मामले के तहत जून 2025 में सूरत में एक हिंदू महिला अपनी प्रॉपर्टी किसी मुस्लिम महिला को बेच रही थी। इसका एडवांस पैसा भी ले लिया था। सोसाइटी के लोगों को खरीदार से ही आपत्ति थी। वे नहीं चाहते थे कि कोई संबंधित धर्म का खरीदार सोसाइटी में आकर रहे। सौदे की शिकायत सोसाइटी के लोगों ने ही कलेक्टर तक पहुंचा दी। प्रॉपर्टी की मालिक अपने फैसले पर अड़ी रही। उसने सौदे का पूरा पैसा ले लिया। इसके बाद उसने प्रॉपर्टी बेचने के डॉक्यूमेंट्स तैयार करवाए। शिकायत के बाद सूरत कलेक्टर ने डिस्टर्ब्ड एरिया एक्ट यानी अशांत क्षेत्र अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर प्रॉपर्टी सील कर दी। साथ ही सौदे पर रोक लगा दी थी। एक्सपर्ट का मानना है कि यह मामला तो सोसाइटी के अन्य निवासियों की अपनी राय या इच्छा पर आधारित था। शायद वहां संबंधित हिंदू महिला के पलायन जैसी स्थिति नहीं थी। सवाल : क्या सरकार के इस कदम के पीछे कोई राजनीति छिपी हुई है?जवाब : एक्सपट्र्स के अनुसार बीजेपी को गुजरात में जिस तरह की सफलता मिली और उसके बाद देश में और यूपी सहित अन्य राज्यों में, उसके पीछे हिंदू-मुस्लिम मुद्दों का बड़ा योगदान है। बीजेपी की राजनीति को ऐसे मुद्दे सूट करते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि जयपुर की वॉल सिटी हो या अजमेर का दरगाह क्षेत्र, यहां हिंदुओं ने मकान खाली किए हैं और मुस्लिमों ने खरीदे हैं। पलायन एक बड़ा मुद्दा रहा है। यदि कानून वाकई पलायन को रोकता है, तो उद्देश्य पर कोई शंका नहीं रहेगी। लेकिन एक आशंका और है कि डिस्टर्ब एरिया में संपत्ति खरीद-फरोख्त के लिए सरकारी मशीनरी से मंजूरी लेने के मामले में कहीं नए भ्रष्टाचार को हवा न मिल जाए। मंजूरी के लिए 'दक्षिणा' का चलन कहीं भी किसी से छिपा हुआ नहीं है। गुजरात के डिस्टर्ब्ड एरिया एक्ट में धर्म का सीधा जिक्र नहीं है। इसमें दंगा, भीड़ की हिंसा जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है, लेकिन कई एक्टिविस्ट मानते हैं कि इस एक्ट के जरिए मुसलमानों को कुछ क्षेत्रों तक सीमित किया जा रहा है। ... यह खबर भी पढ़ें... एक धर्म के लोगों का पलायन रोकने कानून लाएगी राजस्थान-सरकार:अल्पसंख्यक इलाकों को अशांत क्षेत्र घोषित कर सकेगी, प्रॉपर्टी बेचने पर रहेगी रोक
पाली के डॉ वैभव भंडारी को राष्ट्रपति भवन से आमंत्रण पत्र मिला है। यह आमंत्रण कई मायनों में खास है। कार्ड न सिर्फ अपनी भव्यता के लिए चर्चा में है, बल्कि इसमें देश की सांस्कृतिक विविधता को बेहद अनोखे अंदाज में दर्शाया गया है। इस आमंत्रण कार्ड में लगे प्रत्येक फोटो की अपनी अलग कहानी है। देश के करीब 8 राज्यों की संस्कृति को तस्वीरों के माध्यम से इस कार्ड में खूबसूरती से उकेरा गया है, जो भारत की एकता और विविधता का संदेश देता है। कार्ड देखने में भी बेहद लाजवाब और कलात्मक है।आमंत्रण पत्र और बॉक्स में बांस आधारित हस्तशिल्प, त्रिपुरा की पारंपरिक बुनाई, हस्तनिर्मित काग़ज़, अष्टकोणीय बांस बुनाई से बनी वॉल हैंगिंग स्क्रोल, तथा सिक्किम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, असम, त्रिपुरा, नागालैंड, मिज़ोरम और मणिपुर की विशिष्ट हस्तकलाओं को दर्शाया गया है।आइए जानते है कि इस कार्ड में कौनसी तस्वीर क्या कहानी कहती है। पाली से डॉ वैभव भंडारी 26 जनवरी को दिल्ली में लेंगे हिस्साबता दे कि दिव्यांगों के हितों के लिए पिछले कई सालों से काम करने वाले पाली शहर के आदर्श नगर निवासी डॉ वैभव भंडारी को राष्ट्रपति भवन से आमंत्रण मिला है। वे 26 जनवरी को दिल्ली में राष्ट्रपति भवन में आयोजित होने वाले एट होम स्वागत समारोह में हिस्सा लेंगे। जिसमें देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी आएंगे। निमंत्रण कवर और बॉक्सनिमंत्रण बॉक्स में बॉस की बुनी हुई चटाई का उपयोग किया गया है, जो करघे पर तैयार की गई है। इसके ताने (वार्प) में रंगे हुए सूती धागे और बाने (वेफ़्ट) में बाँस की बारीक पट्टियां इस्तेमाल की गई हैं। यह तकनीक त्रिपुरा राज्य में प्रचलित है। बाहरी कवर पर हाथ से बने कागज के टैग पर आपका पता लिखा है जो बाँस से बनी एक कलाकृति के साथ लगाया गया है। यह कलाकृति बाँस को विशेष तरीके से धुएँ में तपाकर बनाई गई है। इस प्रक्रिया से इस कलाकृति का रंग गहरा भूरा हो जाता है। दीवार की सजावट हेतु स्क्रोलबॉस की अष्टकोणीय बुनाई पैटर्न वाली यह स्क्रोल, खुलने पर, भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के प्रत्येक राज्य की हस्तनिर्मित कृतियों का एक कलात्मक प्रदर्शन प्रस्तुत करती है। स्क्रोल की संरचना और तीन रंगों के धागे, कमर-करघे (लॉइन-लूम) के आकार का भी आभास कराते हैं। कमर-करघा बुनाई का एक उपकरण है, जिसका उपयोग भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में, विशेषकर महिलाओं द्वारा, विभिन्न प्रकार के कपड़े बुनने के लिए किया जाता है। बिच्छू बूटी से बुना कपड़ा और कढ़ाई, सिक्किमसिक्किम की विशिष्ट लेपचा बुनाई या 'थारा', परंपरागत रूप से बिच्छू घास (सिसनु) के रेशों से की जाती है। आधुनिक लेपचा बुनाई में बिच्छू घास के साथ सूती और ऊनी धागों का भी उपयोग होता है, जिन्हें कमर-करघे पर बुना जाता है। लेपचा लोक कथा के अनुसार, इस समुदाय का उद्भव कंचनजंघा पर्वत के निर्मल हिम से हुआ था। पर्वतों के साथ उनके पूर्वजों के इस विशेष संबंध, तथा भारत की पहली UNESCO 'मिक्स्ड हेरिटेज साइट', 'कंचनजंघा राष्ट्रीय उद्यान' के प्रति, इस कढ़ाई द्वारा सम्मान व्यक्त किया गया है। रित बॉस कला बुनाई, मेघालयमेघालय के ईस्ट खासी हिल्स क्षेत्र में स्थित मौसिनराम पृथ्वी पर सबसे अधिक वर्षा के लिए तो प्रसिद्ध है ही, यहां की बॉस की बुनाई की परंपरा भी अत्यंत विकसित है। इस क्षेत्र में पाए जाने वाले कच्चे बांस में प्राकृतिक रूप से जलरोधी रेशे होते हैं, जिनमें हल्की हरी चमक बनी रहती है जो अन्य बाँस प्रजातियों से अलग है। स्क्रोल पर हरे बॉस का कोस्टर, यहाँ सामान्य रूप से उपयोग होने वाली वर्षा-ढाल या 'नुप' से प्रेरित है। इसमें बारीक बाँस की दो परतों को षट्कोणीय बुनाई में पिरोया जाता है, जिनके बीच ताड़ के पत्तों की एक परत रखी जाती है। इस तरह, भारी वर्षा से सुरक्षा देने वाला हल्का और टिकाऊ आवरण तैयार होता है। मोन शुगु कागज, अरुणाचल प्रदेशअरुणाचल प्रदेश के पश्चिम कमेंग जिले में, मोनपा लोग जंगलों में शुगु शेंग झाड़ी की भीतरी छाल इकट्ठा करने जाते हैं। छाल को उबालकर गूंथा जाता है और पल्प में तब्दील किया जाता है, फिर इसे पतला किया जाता है। इस मिश्रण को फ्रेम में डाला जाता है, और सूखने के लिए रखा जाता है, जिससे कागज की परतें बनती हैं। यह कागज बहुत मजबूत होता है, और आसानी से फटता नहीं है। मोन शुगु हस्तनिर्मित कागज का उपयोग ग्रंथों के लेखन, और रोजमर्रा के कार्यों के लिए किया जाता है। स्क्रोल पर, इस बहु प्रयोगी कागज को अरुणाचल प्रदेश के राज्य-पशु 'मिथुन' के विशेष आकार में ढाला गया है। गोगना –बॉस से बना वाद्य यंत्र, असम असम में रोंगाली बिहू (नववर्ष) का स्वागत गोगना की मधुर धुनों के साथ किया जाता है, जिसके साथ ढोल और पेपा भी बजाय जाते हैं। बाँस से बनी यह जॉ-हार्प इन उत्सवों का अभिन्न अंग है। इस वाद्य यंत्र की बनावट वादक के अनुसार कुछ परिवर्तित होती है। पुरुषों की रामधन गोगना छोटी, चौड़ी और भारी होती है; जबकि महिलाओं की लाहोरी गोगना लंबी और पतली होती है, जिसे वे नृत्य के दौरान कभी-कभी बालों में हेयर पिन की तरह लगाती हैं। स्क्रोल में प्रदर्शित बच्चों की गोगना छोटी और हल्की होती है, तथा बजाने में सबसे सरल बॉस और बेंत का आभूषण, त्रिपुरात्रिपुरा में कुशल जनजातीय शिल्पकार बाँस और बेंत की बारीक पट्टियों से उत्कृष्ट आभूषण और सजावटी वस्तुएँ बनाते हैं। इन प्राकृतिक सामग्रियों को आकार देकर और बुनकर हल्के, टिकाऊ तथा आकर्षक रूपों में ढाला जाता है। ये सुंदर वस्तुएँ सरल उपकरणों और चिपकने वाले प्राकृतिक पदार्थों से बनाई जाती हैं। ये शिल्पकारों की कल्पना, दक्षता और कौशल को दर्शाती हैं। ऑरेंज वाइल्ड रिया और बिच्छू घास का कपड़े, नगालैंडनगालैंड की खियामनियुंगन नागा जनजाति द्वारा पहने जाने वाले इस वस्त्र के पीछे धीरे-धीरे विलुप्त होती परंपराओं के पुनर्निर्माण की एक गहरी कहानी है। स्थानीय महिलाएं ऑरेंज वाइल्ड रिया पौधे और बिच्छू घास (जिसे वहाँ 'एहलोन निउ' कहा जाता है) के तनों से प्राप्त रेशों से यह दुर्लभ वस्त्र बनाती हैं। रेशों को जंगलों से इकट्ठा किया जाता है, हाथ से बारीक धागों में अलग किया जाता है, सूत में काता जाता है और हाथ से बुना जाता है। चुनौतियों के बीच जन्मी यह कला, अब परंपराओं और गौरव का प्रतीक बन गई है। स्क्रॉल पर प्रदर्शित नमूना जॉब्स टीयर्स (गवेधुका या एडले मिलेट) पौधे के दानों से सजाया गया है, जिनका उपयोग इस क्षेत्र में आभूषण बनाने के लिए किया जाता है। हाथ से बुना पुआन चेई, मिज़ोरमपुआन चेई एक शॉल अथवा घेरदार स्कर्ट है, जो मिज़ोरम में लोकप्रिय है। 'पुआन' शब्द का प्रयोग, मिज़ो लोगों के परिधान या कपड़ों के लिए किया जाता है; 'पुआन' से जुड़े उपसर्ग या प्रत्यय से उसके उपयोग की जानकारी मिलती है। 'चेई' का अर्थ है 'सजाना'। इसलिए, 'पुआन चेई' उन सजीले परिधानों को कहा जाता है जिन्हें महिलाएं त्योहारों और शादियों जैसे महत्वपूर्ण अवसरों पर पहनती हैं। कपास के बने ये परिधान कमर-करघों पर बुने जाते हैं, और उनमें बारीक डिज़ाइन होती है। काली मिट्टी का लोंगपी शिल्प, मणिपुरबर्तन बनाने की इस प्राचीन तकनीक का उपयोग मणिपुर के तांगखुल नागा समुदाय द्वारा नवपाषाण काल से किया जा रहा है। लोंगपी पहाड़ियों के काले सर्पेन्टाइन पत्थरों के चूर्ण को स्थानीय मिट्टी के साथ मिलाकर बनाया जाना, इन बर्तनों की विशेषता है। इन्हें हाथ से आकार दिया जाता है, भट्टी में तपाया जाता है, और फिर पत्तियों से पॉलिश किया जाता है, जिससे इन्हें प्राकृतिक चमक प्राप्त होती है। स्क्रोल पर लगाई गई काली मिट्टी की कलाकृति, मणिपुर के राज्य-पुष्प 'शिरुई लिली' को दर्शाती है। जाने कौन हैं डॉक्टर वैभव भंडारीडॉ वैभव भंडारी पाली के आदर्श नगर में रहते है। पिछले कई सालों से दिव्यांगों के हितों को लेकर काम कर रहे है। पिता चंद्रभान भंडारी व्यवसायी है और माता शशि भंडारी गृहिणी है। उन्होंने PHD (कानून), MA (मनो विज्ञान), प्रोफेशनल डिप्लोमा इन क्लिनिकल साइकोलॉजी (RCI), MSW, LML, LLB, B.com त की पढ़ाई की है। उनका स्वावलंबन फाउंडेशन आज देश के 25 से अधिक राज्यों में सक्रिय रूप से कार्य कर रहा है।डॉ. भंडारी के प्रयासों से पाली में बौद्धिक दिव्यांग बच्चों के लिए विशेष केंद्र की स्थापना हुई। अब तक 47,534 से अधिक दिव्यांग जन एवं दुर्लभ रोगी एवं आमजन जागरूकता अभियान के जरिए लाभान्वित। जेनेटिक टेस्टिंग, सरकारी योजनाओं, कानूनी सहायता और पुनर्वास सेवाओं से जोड़ा।डॉ. वैभव भंडारी के प्रयासों से कई महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय लागू हुए, जिनमें प्रमुख हैं- प्रदेश के सभी कॉलेजों में अनिवार्य व्हीलचेयर सुविधा- राजस्थान में मोटर व्हीकल एक्ट में संशोधन कर दिव्यांग अनुकूल परिवहन- रोडवेज में बुकिंग काउंटर से सीधी सीट आवंटन व्यवस्था- सिलिकोसिस मरीजों के लिए प्रत्येक जिले में मासिक शिविर- “दिव्यांग ” शब्द के स्थान पर “दिव्यांग” शब्द का सरकारी प्रयोग सहकारिता विभाग से आदेश संस्थाओं हेतु ।- बौद्धिक दिव्यांगजनों को मतदान प्रक्रिया में शामिल करने हेतु विशेष निर्देश- ‘इंक्लूसिफिट’ कार्यक्रम के माध्यम से फैशन डिजाइन विद्यार्थियों के साथ मिलकर उन्होंने प्रगतिशील दिव्यांगता, व्हीलचेयर उपयोगकर्ताओं और अधिक सहारे की आवश्यकता वाले व्यक्तियों के लिए सुलभ, आरामदायक और गरिमापूर्ण कपड़े विकसित किए।- दिव्यांग बाल मेला को एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज।- मस्कुलर डिस्ट्रॉफी प्रभावित व्यक्तियों के लिए विशेष हल्की इलेक्ट्रिक व्हीलचेयर पर राष्ट्रीय स्तर का आदेश।- राजस्थान के पहले व्यक्ति जिन्होंने इच्छा मृत्यु पर Living Will बनाई। पुरस्कार और सम्मान- राष्ट्रीय पुरस्कार 2022 — राष्ट्रपति द्वारा ‘सर्वश्रेष्ठ दिव्यांगजन’- हेलेन केलर अवार्ड 2023 — NCPEDP- प्रो. यशवंतराव केलकर राष्ट्रीय युवा पुरस्कार 2023- Rare Star Award 2024 सहित अनेक राज्य व जिला स्तरीय सम्मान
राज्यपाल परनाइक का आह्वान– अरुणाचल के युवा NDA के लिए तैयार हों
अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल केटी परनाइक (सेवानिवृत्त) ने राज्य के छात्रों से राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) में शामिल होने के लिए खुद को तैयार करने का आग्रह किया।
अरुणाचल पर चीन का दावा भाजपा की गलती का नतीजा
चीन ने अपनी विस्तारवादी नीति और हड़पने वाली नीयत का परिचय देते हुए फिर से अरुणाचल प्रदेश को अपना हिस्सा बताया है

