अरुणाचल प्रदेश में सेना और आईटीबीपी ने किया संयुक्त युद्ध अभ्यास
भारतीय सेना और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) ने अरुणाचल प्रदेश में छह दिवसीय संयुक्त प्रशिक्षण अभ्यास 'अग्नि परीक्षा' का प्रथम चरण आयोजित किया, जिसका उद्देश्य अंतर-बल समन्वय और युद्ध की तैयारी को बढ़ाना था। अधिकारियों ने यह जानकारी दी।
गलवान घाटी में चीन के साथ हुई हिंसक झड़प में हमारे 20 जवान शहीद हुए। इसमें 5 बिहार के थे। शहीदों की शहादत को 6 साल होने वाले है। गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प पर सलमान खान ‘बैटल ऑफ गलवान’ फिल्म भी बना रहे हैं। सलमान की इस फिल्म में बिहार के 5 जवानों की कहानी भी दिखाई देगी। वो कैसे लड़े और शहीद हुए। 14 अप्रैल को सलमान की मूवी रिलीज होगी। इस बीच 26 जनवरी के मौके पर दैनिक भास्कर के रिपोर्टर्स ने उन शहीदों के परिजन से मुलाकात की। शहीदों के परिवार आज किस हाल में हैं? उनकी शहादत कैसे हुई थी, सरकार की तरफ से उन्हें क्या मदद मिली? पढ़िए स्पेशल रिपोर्ट… सबसे पहले, सलमान खान गलवान जंग में जिस संतोष बाबू का कैरेक्टर प्ले कर रहे हैं, उस शहीद की कहानी गलवान में चीनी सैनिकों से झड़प में बिहार रेजिमेंट के 11 जवान शहीद थे। बिहार बटालियन का नेतृत्व कमांडिंग अफसर कर्नल संतोष बाबू कर रहे थे। शहीद संतोष बाबू तेलंगाना के सूर्यापेट के रहने वाले थे। शहीद संतोष ने हैदराबाद के सैनिक स्कूल में पढ़ाई की, फिर वे एनडीए के लिए चुने गए थे। शहीद कर्नल बी. संतोष बाबू की पत्नी संतोषी ने भास्कर से बातचीत में कहा, 'बेटा तो बहुत छोटा है, लेकिन बेटी को अपने पापा की बहुत याद आती है। अक्सर पूछती है कि, पापा कहां हैं? कब घर आएंगे? वो क्या कर रहे हैं?' बेटी के इन सवालों के जवाब में, संतोषी उन्हें पापा के पुराने फोटो दिखाती हैं। वो वीडियो दिखाती हैं, जो कभी साथ में शूट किए थे। पिकनिक की फोटो दिखाती हैं। संतोषी कहती हैं, 'बेटा, पापा अभी लद्दाख में हैं। देश के दुश्मनों से लड़ रहे हैं। बहुत अच्छा काम कर रहे हैं, इसलिए सरकार उन्हें पुरस्कार दे रही है।' शहीद संतोष के परिवार में माता-पिता और पत्नी के अलावा बेटी अभिगना (10) और बेटा अनिरुद्ध (5) हैं। संतोषी कहती हैं कि अगर मेरा बेटा भी सेना में जाना चाहेगा तो सपोर्ट करूंगी। पति को यूनिफॉर्म में देखकर बहुत गर्व होता था। यादें तो इसके अलावा भी बहुत सारी हैं। अब उन्हीं यादों के सहारे पूरी जिंदगी बितानी है। 2- पटना बिहटा के शहीद सुनील कुमार सुनील कुमार पटना के बिहटा ब्लॉक के सिकरिया पंचायत के तारापुर के रहने वाले थे। अब उनका पूरा परिवार सगुना मोड़ में रहता है। सुनील कुमार की शहादत को लगभग छह साल हो चुके हैं। उनकी शहादत के छह साल बाद गांव में स्मारक और सड़क बनाने की मांग अब तक अधूरी है। इस बीच एक साल पहले शहीद सुनील कुमार के पिता का निधन हो गया। सुनील 2002 में सेना में भर्ती हुए थे। गलवान में हुई झड़प के करीब एक साल पहले उनकी तैनाती पूर्वी लद्दाख के दुर्गम इलाके में हुई थी। गलवान युद्ध के समय उनकी उम्र 38 साल थी। पैतृक गांव के घर में केवल सुनील कुमार और उनके पिता की तस्वीरें हैं। ग्रामीणों ने बताया कि शहादत के दिन कई मंत्री, विधायक और सांसद हमारे गांव पहुंचे थे। शहीद के परिवार और ग्रामीणों ने मांग की थी कि गांव में शहीद सुनील कुमार का स्मारक बनाया जाए और उनके नाम पर गांव की सड़क का नामकरण हो। परिवार के सदस्य अजय कुमार गुप्ता ने बताया कि, शहादत के बाद बिहार सरकार के मंत्री, विधायक और सांसद सभी लोग पहुंचे थे और कई वादे किए थे, जो आज भी अधूरे हैं। उन्होंने दोहराया कि उनकी मुख्य मांग है कि गांव की सड़क का नाम शहीद हवलदार सुनील कुमार के नाम पर रखा जाए और सिकरिया चौक के पास उनका स्मारक बने। स्थानीय सांसद-विधायक से ग्रामीण नाराज स्थानीय पंचायत प्रतिनिधी विवेक कुमार ने बताया कि, सरकार शहीद परिवार के लिए क्या अपनी छवि रखती है, वह दिख रहा है। स्थानीय सांसद-विधायक सभी लोग अब चुप बैठे हैं। कई बार हम लोगों ने उनसे बात की, लेकिन वह बात को महत्व नहीं दे रहे। शहीद के पिता इसी दुख में गुजर गए। उनकी मां की भी तबीयत खराब है। पूरा परिवार अब दानापुर में रह रहा है। पत्नी रीति देवी को पटना में क्लर्क की सरकारी नौकरी मिल चुकी है। उनकी तैनाती फिलहाल मनेर ब्लॉक में है। सबसे बड़ी बेटी सोनाली 16 साल की है। दो बेटे भी हैं, जिसमें 15 साल का आयुष और 10 साल का विराट है। शहीद सुनील कुमार की पत्नी रीति देवी ने बताया, 'वह दिसंबर 2019 में घर आए थे। तब एक महीने रुके थे। नवंबर में शादी की सालगिरह थी। जब सुनील घर आए थे तो उन्होंने अपनी सालगिरह भी मनाई थी। उनका हैदराबाद पोस्टिंग के लिए लेटर आ चुका था। उनकी यही प्लानिंग थी कि वापस आकर हैदराबाद शिफ्ट होंगे। उनके वापस जाने से पहले आने का टिकट भी हो चुका था। वे 15 अप्रैल को घर आने वाले थे, लेकिन लॉकडाउन के चलते घर नहीं आ पाए।' शहादत की खबर सुनकर आंखों के सामने छा गया था अंधेरा 15 जून 2020 को खबर आई कि चीनी सैनिकों के साथ झड़प हुई है। जब हमने फोन लगाया तो बताया गया कि बिहार रेजिमेंट में ही एक और सुनील कुमार हैं। आपके पति ठीक हैं। मगर सुबह 8 बजे उनके शहीद होने की सूचना दी गई। इसके बाद टीवी पर भी न्यूज चलने लगा।' 3- वैशाली के शहीद जयकिशोर सिंह वैशाली के जंदाहा थाना क्षेत्र के चकफतेह गांव के रहने वाले राज कपूर सिंह के बेटे जय किशोर सिंह 2018 में सेना में भर्ती हुए थे। तब उनकी उम्र 22 साल थी। उनकी गलवान में पहली पोस्टिंग थी। ये चार भाइयों में दूसरे नंबर पर थे। उनके बड़े भाई नंद किशोर भी सेना के जवान हैं। उनके पिता राज कपूर सिंह किसान हैं। जय किशोर सिंह की शादी नहीं हुई थी। गांव के स्कूल की जमीन पर शहीद जय किशोर सिंह की मूर्ति लगी है। पिता राज कपूर सिंह कहते हैं कि गांव के ही हरिनाथ राम को पता नहीं क्या दिक्कत थी कि इसका निर्माण बीच में ही रोक दिया था, लेकिन जब मैंने इसकी शिकायत थाना अध्यक्ष से की, तो उन्होंने भी हरिनाथ का ही पक्ष लिया। फिलहाल, मूर्ति के पास न तो बाउंड्री है और न ही उसे सही तरीके से बनाया गया है। एक बेटा शहीद हुआ है, एक और भेजेंगे लेकिन डरेंगे नहीं जब जयकिशोर सिंह शहीद हुए थे, तब उनके बड़े भाई नंद किशोर सिक्किम में पोस्टेड थे। पिता राज कपूर सिंह बताते हैं कि जय किशोर की शहादत की खबर नंद किशोर को सबसे पहले मिली थी। वे बताते हैं कि मेरा बेटा सेना में भर्ती हुआ था, तब काफी खुश था। जब भी बात होती थी तो कहता था कि कोई दिक्कत नहीं है और मन लग रहा है। राज कपूर सिंह कहते हैं कि एक और छोटा बेटा है, उसे भी हम सेना में भेजेंगे। एक के शहीद होने से हम डरने वाले नहीं हैं। उलड़ाई लगा है तो पीछे हटने का कोई सवाल ही नहीं है। हमेशा कदम अगाड़ी रहता है। तुम एक मारोगे हम इधर से एक और भेजेंगे। गांव के लोग नहीं बनने दे रहे हैं स्मारक शहीद के पिता राज कपूर सिंह बताते हैं कि बिहार सरकार की तरफ से छोटे बेटे को नौकरी मिली है, लेकिन दुख इस बात का है कि अभी तक मेरे भाई का स्मारक नहीं बना है। जब भी प्रशासन के पास जाता हूं तो आज आना कल आना करके टाल देते हैं। हम जमीन देने के लिए भी तैयार हैं, लेकिन गांव के लोग अड़चन लगा रहे हैं। 4- समस्तीपुर के शहीद अमन कुमार सिंह मेरा बेटा 16 जून 2020 में देश के लिए शहीद हो गया। 20 जून को उसके पार्थिव शरीर के सामने बिहार सरकार से तत्कालीन मंत्री महेश्वर हजारी ने गांव में शहीद के नाम पर सड़क बनाने की घोषणा की थी। उनके साथ तत्कालीन डिप्टी सीएम सुशील मोदी भी थे, लेकिन 6 साल होने को हैं, लेकिन सड़क नहीं बना, बेटे का स्मारक भी नहीं बना। सड़क बनाना तो मेरे वश की बात नहीं है, लेकिन बेटे का स्मारक अब खुद के पैसे से ही बनाऊंगा। सरकार का अब इंतजार नहीं कर सकता हूं। ये कहते हुए बेटे की याद में शहीद अमन कुमार सिंह के पिता सुधीर कुमार सिंह की आंखें नम हो जाती हैं। जिला मुख्यालय से करीब 65 किलोमीटर दूर मोहिउद्दीननगर के सुल्तानपुर गंगा दियारा के छोटे गांव में शहीद अमन सिंह का मकान है। देश के लिए शहीद होने से एक साल पहले ही अमन सिंह की शादी हुई थी। सुधीर सिंह बताते हैं कि जब अमन आखिरी बार घर से निकले थे तो कहा था कि लौटूंगा तो आपका और मम्मी का इलाज सेना के हॉस्पिटल में कराऊंगा। सुधीर कुमार सिंह बताते हैं कि आज 77वां गणतंत्र दिवस है, लेकिन हमारे गांव में आने-जाने के लिए पक्की सड़क नहीं है। बरसात के दिनों में लोगों को पानी में घुसकर गांव आना-जाना पड़ता है। वे बताते हैं कि सरकार की ओर से उनकी बहू को सरकारी नौकरी मिली है। वो अंचल कार्यालय में पोस्टेड है। 15 महीने पहले हुई थी शादी सुधीर सिंह बताते हैं कि शहादत से मात्र 15 महीने पहले ही अमन की शादी हुई थी। 24 साल के अमन 2014 में आर्मी में भर्ती हुए थे। पिछले दो साल से वे गलवान में तैनात थे। साल 2020 में उनकी पोस्टिंग हैदराबाद के लिए हुई थी, लेकिन कोरोना के चलते वे नहीं जा सके। सुधीर सिंह कहते हैं कि अमन आखिरी बार फरवरी में घर आया था और जुलाई में आने की बात कही थी। उनसे फोन पर भी नेटवर्क के चलते रोज बात नहीं होती थी। हफ्ते में एक दो बार ही फोन आता था। आखिरी बार शायद 11 तारीख को मेरी बात हुई थी। तब तक सब कुछ ठीक था। उन्होंने चीन या किसी तरह के तनाव की बात नहीं बताई थी। 16 जून की रात उसके यूनिट से शहादत की खबर मिली थी। 5- सहरसा के शहीद कुंदन कुमार सहरसा के सत्तरकटैया प्रखंड के आरण गांव के रहने वाले निमेंद्र यादव के दो बेटे में कुंदन सबसे छोटे थे। कुंदन 2012 में बिहार रेजीमेंट 16वीं बटालियन में बतौर सिपाही भर्ती हुए थे। उनकी पहली पोस्टिंग अरुणाचल प्रदेश फिर जम्मू कश्मीर उसके बाद लद्दाख में की गई थी। कुंदन कुमार यादव के परिवार को सरकारी वादों का अब भी इंतजार है। उनका परिवार आज भी जिला मुख्यालय से लेकर राजधानी पटना तक चक्कर काटने को मजबूर हैं। पिता ने बताया कि शहादत के बाद बिहार सरकार ने 5 कट्टा जमीन देने का वादा किया था, लेकिन 6 साल बाद भी जमीन का वादा पूरा नहीं किया जा सका है। कुंदन के पिता ने बताया कि केंद्र सरकार और राज्य सरकार की ओर से स्मारक का वादा पूरा किया जा चुका है और शहीद बेटे की पत्नी को सरकारी नौकरी के साथ-साथ मुआवजे की रकम भी मिल चुकी है। राज्य सरकार ने कुंदन की पत्नी बेबी कुमारी को सहरसा के डीसीएलआर ऑफिस में क्लर्क की नौकरी दी है। कुंदन को दो बेटे 9 साल का रोशन और 6 साल का राणा है। 'बेटा शहीद हुआ तो क्या, अब दोनों पोतों को भी फौज में भेजेंगे' जब कुंदन शहीद हुए थे, तब उनके पिता निमेंद्र यादव ने कहा था कि मेरा बेटा शहीद हो गया, दुख तो बहुत है। उसी पर घर-परिवार का सारा अरमान था। हम खेती-किसानी करते हैं। इकलौता वही कमाने वाला था। कहकर गया था कि अबकी बार छुट्टी लेकर आएंगे तो मकान बनवाएंगे। उन्होंने कहा कि जिस दिन मुझे उसकी शहादत की खबर मिली उसी दिन मन में ठान लिया कि अपने दोनों पोतों को भी फौज में भेजूंगा। आखिरी बार 11 जून को उनकी बात कुंदन से हुई थी। पहाड़ों पर नेटवर्क नहीं होने के चलते हफ्ते में एक बार बात होती थी। जल्द ही छुट्टी लेकर घर आने की बात उन्होंने पत्नी से कही थी। कुंदन साल 2012 में सेना में शामिल हुए थे। 2013 में उनकी शादी मधेपुरा जिले के घैलाढ़ थाना क्षेत्र के इनरबा गांव की बेबी कुमारी से हुई थी। अब जानिए, 15-16 जून की रात को गलवान में क्या हुआ था, झड़प की कहानी क्या है? गलवान घाटी में चीन और भारत के सैनिकों में झड़प की वजह पड़ोसी देश की एक ऑब्जर्वेशनल पोस्ट थी। चीन ने ठीक एलएसी पर एक ऑब्जर्वेशन पोस्ट बना ली थी। भारतीय सेना को इस स्ट्रक्चर पर आपत्ति थी। 16 बिहार इन्फैन्ट्री रेजिमेंट के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल संतोष बाबू इसे लेकर कई बार चीनी कमांडर को आपत्ति दर्ज करवा चुके थे। एक बार उनके कहने पर चीन ने इस कैम्प को हटा भी दिया, लेकिन 14 जून को अचानक फिर से ये कैम्प खड़ा कर दिया गया। कर्नल संतोष के जवान उस कैम्प को खुद उखाड़ फेंकना चाहते थे, लेकिन तभी उन्होंने खुद कैम्प तक जाकर चीन के सैनिकों से बात करने का फैसला किया। शाम 4 बजे के आसपास वो अपने 40 जवानों के जवानों को लेकर पैदल उस कैम्प तक चले गए। जैसे ही कर्नल संतोष ने सवाल किया एक चीनी सैनिक ने आकर उन्हें धक्का दिया और गालियां देने लगा। ऐसा देखते ही 16 बिहार इंफैन्ट्री रेजिमेंट के सैनिकों को गुस्सा आ गया और उन्होंने चीन के सैनिकों को पीटना शुरू कर दिया। मुक्केबाजी में दोनों ओर के सैनिक घायल हो गए। गुस्साए भारतीय सैनिकों चीन के ऑब्जर्वेशन पोस्ट को तहस-नहस कर दिया। इसी बीच कर्नल संतोष ने घायल सैनिकों को वापस पोस्ट पर भेज दिया और वहां से और सैनिकों को बुलवाया। 15 जून की शाम को शुरू हुई लड़ाई आधी रात तक चलती रही धीरे-धीरे अंधेरा होने लगा था और वहां भारतीय और चीन सैनिक जमावड़ा बढ़ता जा रहा था। तभी अचानक एक बड़ा पत्थर कर्नल संतोष के सिर पर आकर गिरा। फिर दोनों ओर से पथराव होने लगा और एक घंटे तक ये गुत्थम-गुत्था झगड़ा चलता रहा। कुछ ही देर में ये खूनखराबे में बदल गया। चीन के लगभग 300 सैनिक थे और इनका सामना करने के लिए भारतीय जवानों की संख्या 45 से 50 थी। भारतीय सैनिकों के पास हथियार तो थे, लेकिन वो उनका इस्तेमाल नहीं कर रहे थे। वहीं चीन के सैनिकों ने इस झगड़े की प्री-प्लानिंग के लिए कंटीले तार बंधे डंडे, लोहे की रॉड और बड़े बोल्डर पत्थर जमाकर रखे थे। मानों वो भारतीय सैनिकों के इंतजार में बैठे हों। उस रात इंडियन आर्मी ने कर्नल समेत 20 जवानों को खोया चीन के सैनिक जब इन सब सामान का इस्तेमाल कर भारतीय जवानों पर हमला कर रहे थे। तब तक हर इन्फेंट्री बटालियन में तैनात भारतीय सेना की घातक प्लाटून वहां पहुंच गई। उन सैनिकों ने चीन के सोल्जर्स पर जमकर हमला किया, जिसमें चीन के सैनिकों की गर्दन और रीढ़ की हड्डी तक टूट गई। झगड़ा गलवान घाटी के किनारे खड़ी खाई के ठीक पास चल रहा था। यही वजह थी कि जब चीन और भारतीय सैनिक के बीच खूनखराबा हुआ तो कुछ सैनिक जाकर नीचे गलवान नाले में गिर गए। इनमें भारतीय भी थे और चीन के सैनिक भी। उस रात भारतीय सेना ने कर्नल संतोष समेत 20 जवानों को खोया, जबकि चीन के 16-20 सैनिकों की मौके पर ही मौत हो गई थी जबकि 17 गंभीर घायल जवानों ने बाद में इलाज के दौरान दम तोड़ दिया।
फरीदाबाद के ऐतिहासिक सूरजकुंड परिसर में 31 जनवरी से 15 फरवरी तक 39वें अंतरराष्ट्रीय सूरजकुंड हस्तशिल्प मेले का आयोजन किया जाएगा। मेले का उद्घाटन देश के उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन करेंगे, जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी करेंगे। इस बार मेला वैश्विक सहभागिता और नई तकनीकी सुविधाओं के चलते खास रहने वाला है। मेले में 45 देशों के कलाकार अपनी पारंपरिक कला और संस्कृति का प्रदर्शन करेंगे। लगातार तीसरी बार मिस्र को कंट्री पार्टनर बनाया गया है, जबकि उत्तर प्रदेश को थीम स्टेट के रूप में चुना गया है। अब तक मिडिल ईस्ट, मिस्र समेत 25 देशों के कलाकारों की भागीदारी को लेकर सहमति मिल चुकी है। वहीं बांग्लादेश और ईरान से कलाकारों के आने को लेकर स्थिति अभी स्पष्ट नहीं हो पाई है। आयोजन में देश-विदेश के बुनकरों, कारीगरों और हस्तशिल्पियों को 1200 से अधिक स्टॉल आवंटित किए जा चुके हैं। इस बार टर्की की सजावटी फेंसिंग लाइटें और ट्यूनीशिया की ओलिव वुड से बनी कलाकृतियां पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण होंगी। उत्तर प्रदेश की शिल्प विरासत बनेगी केंद्र बिंदू थीम स्टेट उत्तर प्रदेश के पवेलियन में फिरोजाबाद की कांच की चूड़ियां, कन्नौज की इत्र परंपरा, आजमगढ़ की ब्लैक पॉटरी और वाराणसी, लखनऊ व भदोही की जरी-जरदोजी कला को प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाएगा। पर्यटन विभाग की ओर से लोक नृत्य, लोक संगीत, हस्तशिल्प और पारंपरिक व्यंजनों के माध्यम से प्रदेश की सांस्कृतिक झलक पेश की जाएगी। ओडीओपी योजना के तहत प्रदेश के 40 विशेष हस्तशिल्प स्टॉल लगाए जाएंगे, जिससे स्थानीय कारीगरों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी कला दिखाने का अवसर मिलेगा। दिनभर सांस्कृतिक रंग, फैशन शो भी होंगे शामिल मेले में रोजाना सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे तक सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। लोकनृत्य, लोकगीत और पारंपरिक प्रस्तुतियों के साथ तीन विशेष अवसरों पर फैशन शो भी होंगे, जिनमें पारंपरिक और आधुनिक परिधानों के साथ आभूषणों की झलक देखने को मिलेगी। क्यूआर कोड और फास्टैग से मिलेगी स्मार्ट सुविधा मेला परिसर के पाथवे पर विभिन्न जिलों की पहचान को दर्शाने वाले डिजाइन बनाए जाएंगे। हर शिल्प और जिले के लिए विशेष साइनेज और क्यूआर कोड लगाए जाएंगे, जिनके जरिए पर्यटक शिल्प निर्माण प्रक्रिया और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की जानकारी ले सकेंगे। पर्यटकों की सुविधा के लिए पार्किंग शुल्क का भुगतान फास्टैग के जरिए भी किया जा सकेगा। नकद और अन्य डिजिटल भुगतान विकल्प भी उपलब्ध रहेंगे। प्रशासन ने पांच स्थानों पर पार्किंग स्थल विकसित किए हैं, जहां एक साथ हजारों वाहन खड़े किए जा सकेंगे। पूर्वोत्तर भारत की संस्कृति की भी झलक इस बार सूरजकुंड मेले में पूर्वोत्तर भारत की संस्कृति भी खास तौर पर प्रदर्शित की जाएगी। अरुणाचल प्रदेश के तवांग मठ, असम के कामाख्या मंदिर और मेघालय की खासी हिल्स जैसे पर्यटन स्थलों की झलक के साथ-साथ आठों पूर्वोत्तर राज्यों की लोक कला, पारंपरिक वेशभूषा और खानपान पर्यटकों को आकर्षित करेगा। मेले के नोडल अधिकारी हरविंद्र सिंह यादव के अनुसार, इस बार करीब 1300 से अधिक स्टॉल लगाए जाएंगे और हर स्टॉल किसी न किसी राज्य या देश की सांस्कृतिक पहचान को दर्शाएगा। हर साल की तरह इस बार भी करीब 10 लाख से अधिक पर्यटकों के पहुंचने की उम्मीद है।
कोलकाता की शेल कंपनियों से 450 करोड़ की फर्जी बिलिंग
फर्जी इनपुट टैक्स क्रेडिट के एक बड़े नेटवर्क का भंडाफोड़ करते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), ईटानगर ने मंगलवार को पश्चिम बंगाल, मणिपुर और झारखंड में 10 ठिकानों पर एक साथ तलाशी अभियान चलाया। यह कार्रवाई 658 करोड़ रुपए की जाली बिलिंग और करीब 100 करोड़ रुपये के फर्जी इनपुट टैक्स क्रेडिट घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में की गई। ईडी ने यह कार्रवाई मेसर्स सिद्धि विनायक ट्रेड मर्चेंट, अरुणाचल प्रदेश के खिलाफ दर्ज एफआईआर के आधार पर शुरू की गई जांच के तहत की। जांच में सामने आया कि फर्म ने अक्टूबर 2023 से मार्च 2024 के बीच छह माह में 11 राज्यों की 58 कंपनियों को 15,258 फर्जी चालान जारी किए, जिनके जरिए वित्त वर्ष 2023-24 में करीब 99.31 करोड़ रुपये के फर्जी इनपुट टैक्स क्रेडिट का गलत लाभ उठाया गया। तलाशी के दौरान सामने आया कि दयाल कमर्शियल, एपी एंटरप्राइजेज, फीनिक्स हाइड्रोलिक्स, राम अवतार बंसल एंड कंपनी और भीमा शंकर इंडस्ट्रीज जैसी कोलकाता आधारित कंपनियां केवल बिल बनाने और इनपुट टैक्स क्रेडिट पास करने का काम कर रही थीं। इन संस्थाओं ने करीब 450 करोड़ रुपये के फर्जी बिल बनाए और वाहन खरीद-बिक्री के नकली रिकॉर्ड दिखाकर जीएसटी रिफंड का दावा किया।
राजस्थान में दंगा प्रभावित या तनावग्रस्त इलाकों में हिंदू-मुस्लिम बिना परमिशन के एक दूसरे को प्रॉपर्टी नहीं बेच पाएंगे। बेचने से पहले कलेक्टर से मंजूरी लेना जरूरी होगा। नियम तोड़ने पर कलेक्टर सौदा कैंसिल कर सकता है और प्रॉपर्टी भी सीज हो सकती है। प्रदेश में एक धर्म के लोगों का पलायन रोकने के लिए ‘डिस्टर्ब एरिया एक्ट’ को कैबिनेट की बैठक में मंजूरी मिल गई है। अब अगले सप्ताह विधानसभा में होने वाले बजट सत्र में बिल पेश किया जाएगा। इसके बाद इसे कानूनी रूप देने की तैयारी की जाएगी। गुजरात में यह कानून पहले से लागू है। वहीं, इसके कुछ प्रावधान नगालैंड, असम, मणिपुर व अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों में भी लागू हैं। इस कानून को लागू करने वालों में गुजरात के बाद राजस्थान का नाम शामिल करने की तैयारी है। अब इस एक्ट को लेकर कई सवाल भी उठ रहे हैं। जैसे- राजस्थान में इसकी जरूरत क्यों पड़ी? सेंसेटिव एरिया में रहने वाले अपनी प्रॉपर्टी कैसे बेच पाएंगे? एक्ट में किस तरह के प्रावधान होंगे? नहीं मानने पर कितने साल की सजा होगी? भास्कर ने लीगल और पॉलिटिकल एक्सपर्ट से ऐसे ही सवालों के जवाब जाने। सवाल : ‘डिस्टर्ब्ड एरिया एक्ट’ क्या है और इसके प्रावधान क्या हो सकते हैं?जवाब : कैबिनेट की मंजूरी के बाद अब राजस्थान विधानसभा में ‘डिस्टर्ब्ड एरिया बिल’ लाया जाएगा। यहां पारित होता है, तो राज्यपाल को मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। राज्यपाल की मंजूरी के बाद ये कानून का रूप ले लेगा। जब ये कानून का रूप ले लेगा, तब उसके प्रावधानों के तहत किसी क्षेत्र में दो समुदायों के बीच दंगा-फसाद होता रहता है या ऐसी कोई संभावना रहती है, कलेक्टर उसे डिस्टर्ब एरिया घोषित कर सकेंगे। उस क्षेत्र में कोई व्यक्ति किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति के साथ प्रॉपर्टी का सीधे सौदा नहीं कर पाएंगे। पहले उसे जिला कलेक्ट्रेट से मंजूरी लेनी होगी। सूत्रों के अनुसार इस बिल में कहीं भी हिंदू या मुस्लिम या किसी समुदाय का जिक्र नहीं होगा। लेकिन दोनों तरह की मेजोरिटी (हिंदू या मुस्लिम) को संबंधित डिस्टर्ब एरिया में घर बेचने से पहले कलेक्टर से परमिशन लेनी होगी। वहीं, किसी इलाके में चाहे मुस्लिम मेजोरिटी में हों या हिंदू मेजोरिटी में हों, तब भी यही प्रोसेस फॉलो करना होगा। सूत्रों के अनुसार इस बिल में ये मुख्य प्रावधान होंगे... सवाल : गुजरात के जैसे राजस्थान में भी इस कानून की जरूरत है क्या?जवाब : एक्सपट्र्स के अनुसार डिस्टर्ब्ड एरिया एक्ट का उद्देश्य दंगा प्रभावित क्षेत्रों से पलायन रोकने, जबरन या किसी डर से संपत्ति के होने वाले सौदों को रोकने आदि से है। एक्सपट्र्स के अनुसार जयपुर सहित अन्य जिलों में भी कहीं न कहीं दंगे भड़क जाते हैं। वहीं पलायन होने के मुद्दे भी बार-बार उठते रहे हैं। ऐसे में सरकार संबंधित क्षेत्रों की प्रॉपर्टी खरीद-फरोख्त के मामलों में अपनी निगरानी रखना चाह रही है। इससे उन लोगों को राहत मिलेगी, जो दबाव में या डर से अपनी प्रॉपर्टी बेचने पर मजबूर हो जाते हैं। गुजरात में भी संबंधित एक्ट के पीछे सरकार का मकसद दंगों की वजह से पलायन को रोकना था। इधर, सरकार का भी तर्क है कि इस एक्ट को केवल मुस्लिमों के नजरिये से नहीं देखना चाहिए। ये सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होगा। यदि कलेक्टर ने संबंधित क्षेत्र को डिस्टर्ब एरिया घोषित किया है, तो वहां हिंदू भी मुस्लिम से प्रॉपर्टी नहीं खरीद सकेगा। सवाल : कलेक्टर कैसे तय करेगा कि संबंधित क्षेत्र एक डिस्टर्ब्ड एरिया है?जवाब : सूत्रों के अनुसार एक्ट के प्रावधानों के तहत डिस्टर्ब्ड एरिया तय करने के लिए अमूमन उस इलाके में सांप्रदायिक दंगों का इतिहास देखा जाएगा। गुजरात में भी इसी तरह से स्थानीय प्रशासन (कलेक्टर) संबंधित एरिया को डिस्टर्ब्ड एरिया घोषित करता है। गुजरात में हर 5 साल में एक बार डिस्टर्ब्ड एरिया एक्ट में संशोधन किया जाता है। सवाल : यदि कानून बनने के बाद प्रॉपर्टी बेचने की इजाजत नहीं ली, तो क्या कार्रवाई हो सकती है?जवाब : बिना इजाजत के संपत्ति बेचने का सौदा किया, तो डिस्टर्ब्ड एरिया एक्ट के तहत दोनों पर केस दर्ज हो सकेगा। कानून का उल्लंघन करने पर 5 साल तक की जेल होने के प्रावधान इस कानून में लागू हो सकते हैं। साथ ही प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री रद्द कर दी जाएगी। हालांकि इस कानून को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। अगर कलेक्टर के आदेश पर डील रद्द हो गई है, तो प्रॉपर्टी का खरीदार हाईकोर्ट में अपील दायर कर सकता है। इसके बाद जज इस मामले पर फैसला सुना सकते हैं। गुजरात में ऐसे कई मामलों में वहां हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। सवाल : गुजरात में हिंदू महिला की प्रॉपर्टी क्या इसी एक्ट के तहत सीज हुई थी, मामला क्या था?जवाब : गुजरात में डिस्टर्ब्ड एरिया एक्ट, 1991 लागू है। साल 1986 में गुजरात विधानसभा में इसका विधेयक पेश किया गया और 1991 में यह कानून बना। सरकारी दस्तावेज में इस एक्ट का पूरा नाम ‘द गुजरात प्रॉहिबिटेशन ऑफ ट्रांसफर ऑफ इमूवेबल प्रॉपर्टी एंड प्रोविजन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ टेनेंट्स फ्रॉम इविक्शन फ्रॉम प्रिमिसिस इन डिस्टर्ब एरिया एक्ट' है। इस एक्ट के तहत सूरत कलेक्टर ने सलाबतपुरा एरिया को डिस्टर्ब एरिया घोषित किया हुआ था। मामले के तहत जून 2025 में सूरत में एक हिंदू महिला अपनी प्रॉपर्टी किसी मुस्लिम महिला को बेच रही थी। इसका एडवांस पैसा भी ले लिया था। सोसाइटी के लोगों को खरीदार से ही आपत्ति थी। वे नहीं चाहते थे कि कोई संबंधित धर्म का खरीदार सोसाइटी में आकर रहे। सौदे की शिकायत सोसाइटी के लोगों ने ही कलेक्टर तक पहुंचा दी। प्रॉपर्टी की मालिक अपने फैसले पर अड़ी रही। उसने सौदे का पूरा पैसा ले लिया। इसके बाद उसने प्रॉपर्टी बेचने के डॉक्यूमेंट्स तैयार करवाए। शिकायत के बाद सूरत कलेक्टर ने डिस्टर्ब्ड एरिया एक्ट यानी अशांत क्षेत्र अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर प्रॉपर्टी सील कर दी। साथ ही सौदे पर रोक लगा दी थी। एक्सपर्ट का मानना है कि यह मामला तो सोसाइटी के अन्य निवासियों की अपनी राय या इच्छा पर आधारित था। शायद वहां संबंधित हिंदू महिला के पलायन जैसी स्थिति नहीं थी। सवाल : क्या सरकार के इस कदम के पीछे कोई राजनीति छिपी हुई है?जवाब : एक्सपट्र्स के अनुसार बीजेपी को गुजरात में जिस तरह की सफलता मिली और उसके बाद देश में और यूपी सहित अन्य राज्यों में, उसके पीछे हिंदू-मुस्लिम मुद्दों का बड़ा योगदान है। बीजेपी की राजनीति को ऐसे मुद्दे सूट करते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि जयपुर की वॉल सिटी हो या अजमेर का दरगाह क्षेत्र, यहां हिंदुओं ने मकान खाली किए हैं और मुस्लिमों ने खरीदे हैं। पलायन एक बड़ा मुद्दा रहा है। यदि कानून वाकई पलायन को रोकता है, तो उद्देश्य पर कोई शंका नहीं रहेगी। लेकिन एक आशंका और है कि डिस्टर्ब एरिया में संपत्ति खरीद-फरोख्त के लिए सरकारी मशीनरी से मंजूरी लेने के मामले में कहीं नए भ्रष्टाचार को हवा न मिल जाए। मंजूरी के लिए 'दक्षिणा' का चलन कहीं भी किसी से छिपा हुआ नहीं है। गुजरात के डिस्टर्ब्ड एरिया एक्ट में धर्म का सीधा जिक्र नहीं है। इसमें दंगा, भीड़ की हिंसा जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है, लेकिन कई एक्टिविस्ट मानते हैं कि इस एक्ट के जरिए मुसलमानों को कुछ क्षेत्रों तक सीमित किया जा रहा है। ... यह खबर भी पढ़ें... एक धर्म के लोगों का पलायन रोकने कानून लाएगी राजस्थान-सरकार:अल्पसंख्यक इलाकों को अशांत क्षेत्र घोषित कर सकेगी, प्रॉपर्टी बेचने पर रहेगी रोक
अरुणाचल पर चीन का दावा भाजपा की गलती का नतीजा
चीन ने अपनी विस्तारवादी नीति और हड़पने वाली नीयत का परिचय देते हुए फिर से अरुणाचल प्रदेश को अपना हिस्सा बताया है

