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मानसून में बुखार को न करें नजरअंदाज, पहले 24 घंटे अहम केजीएमयू ने संचारी रोगों से बचाव का दिया संदेश

लखनऊ, 1 अगस्त (आईएएनएस)। मानसून के मौसम में डेंगू, मलेरिया, टाइफाइड और अन्य संचारी रोगों के बढ़ते खतरे के बीच किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) के माइक्रोबायोलॉजी विभाग ने आमजन से बुखार को हल्के में न लेने और शुरुआती 24 घंटे के भीतर चिकित्सकीय जांच कराने की अपील की है। विभाग ने स्पष्ट किया कि डेंगू फैलाने वाला एडीज़ मच्छर गंदगी में नहीं, बल्कि साफ और रुके हुए पानी में पनपता है। ऐसे में सप्ताह में केवल 10 मिनट घर और आसपास जमा पानी की जांच कर उसे हटाने से संक्रमण के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

समाचार नामा 1 Aug 2026 7:59 pm

पीएम नरेंद्र मोदी 2 अगस्त को 'नशा मुक्त युवा विकसित भारत संकल्प अभियान' की शुरुआत करेंगे

नई दिल्ली, 1 अगस्त (आईएएनएस)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2 अगस्त 2026 को सुबह 11 बजे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए 'नशा मुक्त युवा विकसित भारत संकल्प अभियान' की शुरुआत करेंगे। इस पहल का मकसद युवाओं को नशे की लत से दूर रहने के लिए प्रेरित करना और उन्हें अपने समुदायों में अच्छे सामाजिक बदलाव के एंबेसडर बनने के लिए प्रोत्साहित करना है।

समाचार नामा 1 Aug 2026 7:51 pm

एआई, जेन जेड और कंपिटेंसी-बेस्ड एजुकेशन के दौर में बदल रही मेडिकल की पढ़ाई, छात्रों को ज्ञान के साथ क्लिनिकल स्किल्स भी विकसित करनी चाहिए: विशेषज्ञ

नई दिल्ली, 1 अगस्त (आईएएनएस)। देश में मेडिकल शिक्षा को अधिक व्यावहारिक, आधुनिक और मरीज-केंद्रित बनाने की दिशा में एम्स (एआईआईएमएस) नई दिल्ली में आयोजित एनाटएड समिट 2026 में विशेषज्ञों ने बड़ा संदेश दिया। सम्मेलन में इस बात पर जोर दिया गया कि भविष्य के डॉक्टरों को केवल सैद्धांतिक ज्ञान तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें क्लिनिकल स्किल्स, संवाद क्षमता, नैतिक मूल्यों और आजीवन सीखने की सोच भी विकसित करनी होगी। साथ ही, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और जनरेशन जेड की बदलती जरूरतों के अनुरूप मेडिकल शिक्षा में बदलाव की आवश्यकता पर भी विशेष चर्चा हुई।

समाचार नामा 1 Aug 2026 5:10 pm

बारिश के मौसम में रहें सावधान! डेंगू के अलावा ये 7 बीमारियां कर सकती हैं परेशान, जानें बचाव के आसान तरीके

बारिश के मौसम में रहें सावधान! डेंगू के अलावा ये 7 बीमारियां कर सकती हैं परेशान, जानें बचाव के आसान तरीके

समाचार नामा 1 Aug 2026 4:50 pm

पश्चिम बंगाल: अनियमितता के आरोपों में 11 ब्लड बैंक पर कार्रवाई, राज्य भर में कैंप आयोजित करने पर रोक

कोलकाता, 1 अगस्त (आईएएनएस)। पश्चिम बंगाल स्वास्थ्य विभाग ने शनिवार को राज्य के 11 ब्लड बैंकों पर सख्त कार्रवाई की घोषणा की। विभाग ने इन ब्लड बैंकों को अगला आदेश आने तक राज्य में कहीं भी रक्तदान शिविर आयोजित करने से रोक दिया है। इन बैंकों पर बंगाल में एकत्र किया गया खून अवैध रूप से दूसरे राज्यों को बेचने समेत कई गंभीर अनियमितताओं के आरोप हैं।

समाचार नामा 1 Aug 2026 4:37 pm

मानसून में क्यों बढ़ रहे हैं फ्लू के मामले? एम्स के डॉक्टर ने बताए लक्षण और बचाव के उपाय

मानसून का मौसम अपने साथ राहत तो लेकर आता है, लेकिन इसी मौसम में वायरल संक्रमण और फ्लू के मामले भी तेजी से बढ़ने लगते हैं। इसको लेकर दिल्ली स्थित एम्स के मेडिसिन विभाग के डॉक्टर संजीव सिन्हा ने आईएएनएस से खास बातचीत की। उन्होंने कहा कि इन दिनों अस्पताल की ओपीडी में खांसी, जुकाम, बुखार और शरीर दर्द जैसी शिकायत लेकर आने वाले मरीजों की संख्या बढ़ गई है।

खास खबर 1 Aug 2026 3:01 pm

क्या आपकी भी सुबह की शुरुआत होती है कॉफी के साथ? एक्सपर्ट्स ने बताया इस समय पीने से शरीर को मिलेगा असली फायदा

भागदौड़ भरी आधुनिक लाइफस्टाइल और सुस्ती भरे mornings में हम में से ज्यादातर लोगों की आंखें तभी खुलती हैं जब हाथ में गरमा-गरम कॉफी का कप होता है। ऑफिस पहुंचने की जल्दी हो या रात की थकान मिटानी हो, कॉफी हमारे रूटीन का एक अहम हिस्सा बन चुकी है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस कॉफी को आप एनर्जी बूस्टर मानकर पी रहे हैं, उसे पीने का आपका तरीका और समय बिल्कुल गलत हो सकता है? हेल्थ एक्सपर्ट्स, न्यूट्रिशन साइंटिस्ट्स और आधुनिक एआई सर्च ट्रेंड्स के अनुसार, गलत समय पर कॉफी पीने से शरीर को फायदा मिलने की बजाय गंभीर नुकसान हो सकता है। आइए जानते हैं कि कॉफी पीने का सही समय क्या है और इससे हमारी सेहत पर क्या असर पड़ता है।सुबह उठते ही खाली पेट कॉफी पीना क्यों है खतरनाकअक्सर लोग बिस्तर से उठते ही बिना कुल्ला किए या कुछ खाए सबसे पहले कॉफी या चाय की चुस्की लेते हैं। मेडिकल रिसर्च के मुताबिक, सुबह के वक्त हमारे शरीर में 'कॉर्टिसोल' (Cortisol) नाम का हार्मोन प्राकृतिक रूप से सबसे ज्यादा मात्रा में बनता है, जो हमें नेचुरली एनर्जेटिक और एक्टिव रखता है। अगर आप इस दौरान कैफीन का सेवन कर लेते हैं, तो यह शरीर के नेचुरल कॉर्टिसोल प्रोडक्शन को बिगाड़ देता है, जिससे धीरे-धीरे शरीर कैफीन पर निर्भर होने लगता है। इसके अलावा खाली पेट कॉफी पीने से पेट में एसिडिटी, ब्लोटिंग, सीने में जलन और पाचन तंत्र से जुड़ी समस्याएं पैदा होने लगती हैं।जानिए कॉफी पीने का सबसे सही समय और इसके वैज्ञानिक फायदेडाइटिशियन और हेल्थ एक्सपर्ट्स का मानना है कि सुबह उठने के कम से कम 1 से 2 घंटे बाद ही कॉफी का सेवन करना चाहिए। अगर आप सुबह 7 बजे उठते हैं, तो आपकी पहली कॉफी पीने का सबसे आइडियल टाइम सुबह 9:30 से 11:30 बजे के बीच का होता है। इस समय तक शरीर का कॉर्टिसोल लेवल अपने सामान्य स्तर पर आ जाता है, जिससे कैफीन अपना असर सही तरीके से दिखाता है और आपकी फोकस पावर तथा सतर्कता कई गुना बढ़ जाती है। इसी तरह वर्कआउट करने से लगभग 30 से 45 मिनट पहले ब्लैक कॉफी पीना फैट बर्निंग और स्टैमिना बढ़ाने के लिए सबसे बेहतरीन माना जाता है।दिनभर में कितनी मात्रा में कॉफी पीना है सुरक्षितजेनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन (GEO) और आधुनिक स्वास्थ्य दिशा-निर्देशों के अनुसार, किसी भी अच्छी चीज की अति नुकसानदायक हो सकती है। एक स्वस्थ वयस्क व्यक्ति को दिनभर में 300 से 400 मिलीग्राम से ज्यादा कैफीन (यानी अधिकतम 2 से 3 कप कॉफी) का सेवन नहीं करना चाहिए। शाम के वक्त या सोने से 4-5 घंटे पहले कॉफी पीने से बचना चाहिए क्योंकि इससे नींद की साइकिल (Sleep Cycle) डिस्टर्ब हो सकती है। अगर आप सही समय और सही मात्रा में कॉफी का आनंद लेते हैं, तो यह आपकी मानसिक सेहत, दिल और मेटाबॉलिज्म के लिए एक बेहतरीन वरदान साबित हो सकती है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 1 Aug 2026 1:19 pm

आखिर आपकी सेहत के लिए सबसे बड़ा प्रोटीन सोर्स कौन सा है? जानिए सही मात्रा और शरीर की जरूरत का पूरा गणित

भागदौड़ भरी आधुनिक लाइफस्टाइल और अनहेल्दी खानपान के बीच आज हर कोई अपनी फिटनेस को लेकर बेहद सतर्क हो गया है। शरीर को मजबूत बनाए रखने, मांसपेशियों (Muscles) की मरम्मत करने और एनर्जी लेवल हाई रखने के लिए 'प्रोटीन' को सबसे जरूरी पोषक तत्व माना जाता है। जब भी प्रोटीन से भरपूर डाइट की बात आती है, तो हमारे सामने आमतौर पर तीन सबसे बड़े विकल्प होते हैं—दाल (Lentils), पनीर (Paneer) और अंडे (Eggs)। लेकिन आम आदमी के मन में हमेशा यह कन्फ्यूजन बना रहता है कि इनमें से आखिर सबसे ज्यादा और बेस्ट प्रोटीन किसे माना जाए? आधुनिक न्यूट्रिशन साइंस, एआई सर्च ट्रेंड्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के विश्लेषण के आधार पर आइए आज इस राज से पर्दा उठाते हैं कि आपकी थाली के लिए कौन सा विकल्प सबसे ताकतवर है।अंडे की न्यूट्रिशन वैल्यू: क्यों इसे माना जाता है कंपलीट प्रोटीन का राजानॉन-वेजिटेरियन डाइट लेने वाले लोगों के बीच अंडा हमेशा से पहली पसंद रहा है। अंडे को एक 'कंपलीट प्रोटीन' (Complete Protein) माना जाता है, जिसका मतलब है कि इसमें वे सभी 9 जरूरी अमीनो एसिड्स पाए जाते हैं जो हमारा शरीर खुद नहीं बना सकता। एक मध्यम आकार के उबले हुए अंडे से लगभग 6 से 7 ग्राम उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन मिलता है। इसके साथ ही इसमें विटामिन बी-12, हेल्दी फैट्स और सेलेनियम भी भरपूर मात्रा में होते हैं, जो मेटाबॉलिज्म को तेज करते हैं। अगर आप वजन घटाने के साथ-साथ मसल्स गेन करना चाहते हैं, तो अंडे का सफेद हिस्सा (Egg White) किसी वरदान से कम नहीं है।पनीर की ताकत: शाकाहारी लोगों के लिए प्रोटीन का खजानाजो लोग शाकाहारी (Vegetarian) हैं और मांस-मछली का सेवन नहीं करते, उनके लिए पनीर प्रोटीन का सबसे बेहतरीन स्रोत माना जाता है। 100 ग्राम ताजे पनीर में लगभग 18 से 20 ग्राम तक प्रोटीन मिल जाता है, जो इसे शाकाहारी फिटनेस प्रेमियों के लिए एक पावरहाउस बनाता है। पनीर में प्रोटीन के साथ-साथ कैल्शियम और फॉस्फोरस भी प्रचुर मात्रा में होते हैं, जो हड्डियों और दांतों को मजबूत रखते हैं। हालांकि, इसमें फैट की मात्रा थोड़ी ज्यादा हो सकती है, इसलिए टोंड मिल्क से बने पनीर का सेवन करना ज्यादा फायदेमंद माना जाता है।दालों का कमाल: बजट फ्रेंडली और सेहतमंद प्लांट-बेस्ड प्रोटीनभारतीय घरों की थाली बिना दाल के अधूरी मानी जाती है। मूंग, मसूर, अरहर या उड़द जैसी दालें प्लांट-बेस्ड प्रोटीन (Plant-based Protein) का सबसे बड़ा खजाना हैं। एक कटोरी पकी हुई दाल से लगभग 8 से 12 ग्राम तक प्रोटीन मिल जाता है। हालांकि दालों में सभी जरूरी अमीनो एसिड्स एक साथ नहीं होते, लेकिन अगर इन्हें चावल या रोटी के साथ खाया जाए तो यह एक संपूर्ण आहार बन जाता है। इसके अलावा दालों में डाइटरी फाइबर उच्च मात्रा में होता है, जो पेट को साफ रखता है, कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करता है और पाचन तंत्र को मजबूत बनाता है।निष्कर्ष: आपके शरीर के लिए कौन सा विकल्प है सबसे बेस्ट और कितनी लें मात्रास्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि प्रोटीन की मात्रा और गुणवत्ता के मामले में अंडे और पनीर प्लांट-बेस्ड दालों से थोड़ा आगे हैं क्योंकि इनमें एनिमल और डेयरी प्रोटीन की बायो-अवेलेबिलिटी ज्यादा होती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि दालें कम असरदार हैं। एक संतुलित और सेहतमंद शरीर के लिए आपको अपनी डाइट में इन तीनों का सही संतुलन बनाना चाहिए। यदि आप अपनी डेली डाइट में एक अंडा, 50 ग्राम पनीर और एक कटोरी दाल शामिल करते हैं, तो आपके शरीर को रोजाना की जरूरत का पर्याप्त प्रोटीन आसानी से मिल जाएगा, जिससे आपकी फिटनेस हमेशा बरकरार रहेगी।

न्यूज़ इंडिया लाइव 1 Aug 2026 1:17 pm

मणिचक्र को एक्टिव करता है ये आसन, रक्त संचार को भी नियंत्रित करने में करता है मदद

दफ्तर में घंटों कुर्सी पर बैठने से शरीर में अकड़न, कमर दर्द और पीठ दर्द होना आम है। इससे निजात पाने के लिए व्याघ्रासन एक सटीक, सरल और असरदार समाधान है। इसको करने से पेट कम होता है और शरीर में नई ऊर्जा आती है।

खास खबर 1 Aug 2026 1:00 pm

Friendship Day Funny Wishes: दोस्त को चिढ़ाना है तो भेजें ये मजेदार शायरी, पढ़कर मुस्कुरा देगा आपका यार

Friendship Day Funny Shayari In Hindi: फ्रेंडशिप डे के मौके पर अगर आप अपने दोस्त को खास अंदाज में विश करना चाहते हैं तो यहां कुछ फनी और मजेदार शायरियां आपको दी जा रही हैं।

अमर उजाला 1 Aug 2026 12:33 pm

बच्चों की बातचीत का पैटर्न बताता है भविष्य में कैसी रहेगी उनकी मेंटल हेल्थ, नए शोध में खुलासा

क्या किसी बच्चे के बोलने के तरीके से यह पता लगाया जा सकता है कि भविष्य में उसे डिप्रेशन या एंग्जायटी जैसी मानसिक समस्याएं हो सकती हैं? सुनने में यह बात थोड़ी हैरान करने वाली लग सकती है, लेकिन एक नए शोध में कुछ ऐसा ही सामने आया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चे क्या बोलते हैं, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि वे कैसे बोलते हैं। यानी उनके शब्दों को जोड़ने का तरीका, वाक्य बनाने का अंदाज और बातचीत की शैली भविष्य में उनकी मानसिक सेहत के बारे में अहम संकेत देती है।

खास खबर 1 Aug 2026 12:27 pm

कैसे हुई फ्रेंडशिप डे की शुरुआत? जानिए इसके पीछे का दिलचस्प इतिहास

जिंदगी में अगर एक सच्चा दोस्त मिल जाए, तो जैसे सब कुछ आसान हो जाता है। वह आपकी खुशी में सबसे ज्यादा खुश होता है और मुश्किल समय में बिना किसी स्वार्थ के आपके साथ खड़ा रहता है। इसी खूबसूरत रिश्ते का जश्न मनाने के लिए हर साल फ्रेंडशिप डे मनाया जाता है। इस खास दिन की शुरुआत और भारत में इसे अगस्त के पहले रविवार को मनाए जाने के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है।

खास खबर 1 Aug 2026 12:25 pm

World Lung Cancer Day: लंग्स कैंसर से बचने के लिए क्या सिगरेट छोड़ना काफी है? क्या कहते हैं फेफड़ों के डॉक्टर

यदि आप धूम्रपान नहीं करते, तब भी यह मान लेना कि आपको लंग्स कैंसर नहीं हो सकता, एक बड़ी भूल हो सकती है। इसलिए यह जानना जरूरी है कि किन परिस्थितियों में इसका खतरा बढ़ता है, कौन-कौन से संकेत नजरअंदाज नहीं करने चाहिए?

अमर उजाला 1 Aug 2026 11:59 am

World Lung Cancer Day कब और क्यों मनाया जाता है? जानें फेफड़ों के कैंसर से जुड़ी जरूरी बातें

World Lung Cancer Day: हर साल अगस्त के महीने की शुरुआत में वर्ल्ड लंग्स कैंसर डे मनाया जाता है। इसके पीछे की वजह क्या है और ये क्यों मनाया जाता है, आइए जानते हैं।

अमर उजाला 1 Aug 2026 11:59 am

Friendship Day Recipe : घर पर पार्टी के लिए बनाएं ये 7 टेस्टी स्टार्टर्स, दोस्त करेंगे खूब तारीफ

7 Party Snacks and Starters Recipe: अगर आप भी अपने घर पर फ्रेंडशिप डे की पार्टी रख रहे हैं तो ये लेख आपके काम का होने वाला है। यहां हम आपको बताएंगे 7 स्वादिष्ट स्नैक्स की रेसिपी, जो आपके काम की है।

अमर उजाला 1 Aug 2026 9:36 am

बाल समय से पहले हो रहे हैं सफेद? अपनाएं यह पुराना नुस्खा, शैम्पू करने से पहले करें 'प्री-शैम्पू ऑयलिंग' और पाएं मजबूत और मुलायम बाल

क्या आपके बाल भी समय से पहले सफेद होने लगे हैं और हर बार शैम्पू करने के बाद वे ज्यादा रूखे, बेजान या उलझे हुए महसूस होते हैं? अगर हां, तो आपको महंगे प्रोडक्ट्स पर पैसे खर्च करने से पहले अपने दादी-नानी के जमाने के उस पुराने और आजमाए हुए घरेलू तरीके को अपनाना चाहिए, जो आज फिर से ट्रेंड में है। हम बात कर रहे हैं शैम्पू करने से ठीक पहले बालों में तेल लगाने की आदत यानी 'प्री-शैम्पू ऑयलिंग' (Pre-Shampoo Oiling) की। यह छोटी सी आदत सफेद बालों की सही देखभाल करने और उन्हें लंबे समय तक मुलायम बनाए रखने में बेहद असरदार मानी जाती है। आइए जानते हैं कि प्री-शैम्पू ऑयलिंग क्या है और यह आपके बालों के लिए किस तरह वरदान साबित हो सकती है।प्री-शैम्पू ऑयलिंग क्या है और यह कैसे काम करती है?प्री-शैम्पू ऑयलिंग का सीधा सा मतलब है कि बाल धोने या शैम्पू करने से लगभग 30 मिनट से 1 घंटे पहले बालों में हल्का गुनगुना नारियल तेल लगाना। जब आप शैम्पू करने से पहले बालों में तेल लगाते हैं, तो बाल धोने की प्रक्रिया के दौरान होने वाले नुकसान से पहले ही पोषण पा लेते हैं। यह तरीका सफेद बालों में होने वाले रूखेपन और बेजानपन को दूर करने में बहुत मददगार साबित होता है।सफेद बालों के लिए क्यों जरूरी है प्री-शैम्पू ऑयलिंग? जानिए इसके 5 बड़े फायदेप्रोटीन की सुरक्षा (Protein Protection): जब हम बालों में शैम्पू करते हैं, तो क्लींजिंग के दौरान बालों से कुछ मात्रा में नेचुरल प्रोटीन निकल सकता है। नारियल तेल बालों की बाहरी लेयर (cuticle) को एक सुरक्षा कवच देता है, जिससे प्रोटीन लॉस कम होता है और बाल अंदर से ज्यादा मजबूत महसूस होते हैं।सफेद बालों में नमी और मुलायमपन (Softness for Grey Hair): प्राकृतिक रूप से सफेद बालों तक स्कैल्प का नेचुरल तेल सही से नहीं पहुंच पाता, जिसकी वजह से वे बहुत जल्दी रूखे और कड़े हो जाते हैं। नारियल तेल इन बालों को डीप नरिशमेंट देकर उन्हें मुलायम बनाने और संभालने में आसान बनाने में मदद करता है।दोमुंहे बालों से बचाव (Split Ends Care): बार-बार रूखे होने वाले बालों में स्प्लिट एंड्स (दोमुंहे बाल) की समस्या तेजी से बढ़ सकती है। शैम्पू से पहले तेल लगाने से बालों की नमी लॉक रहती है, जिससे दोमुंहे बाल बनने का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है।स्कैल्प की देखभाल (Healthy Scalp Support): नारियल तेल सिर्फ बालों की लंबाई पर ही नहीं, बल्कि स्कैल्प को भी हल्की और जरूरी नमी देता है। इससे ड्राई स्कैल्प की परेशानी कम होती है और बालों की जड़ों को बेहतर पोषण व देखभाल मिलती है।आसान हेयर केयर रूटीन (Easy Hair Care Routine): प्री-शैम्पू ऑयलिंग को अपने रेगुलर कंडीशनर के साथ अपनाने से सफेद बाल ज्यादा स्मूद, कम उलझने वाले और मैनेज करने में आसान बन जाते हैं। आप इसे आसानी से हफ्ते में 1 से 2 बार अपने हेयर केयर रूटीन में शामिल कर सकते हैं।यदि आपके बाल भी समय से पहले अपनी चमक खो रहे हैं और रूखेपन से परेशान हैं, तो अगली बार शैम्पू करने से आधा घंटा पहले नारियल तेल से हल्की मालिश करना न भूलें। यह छोटा सा बदलाव आपके बालों की सेहत में बड़ा सुधार ला सकता है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 1 Aug 2026 8:41 am

World Lung Cancer Day: ये लक्षण दिखें तो तुरंत कराएं फेफड़ों की जांच, देरी पड़ सकती है सेहत पर भारी

अमेरिकन कैंसर सोसाइटी के अनुसार हर साल लाखों लोगों में फेफड़ों के कैंसर का पता चलता है और बड़ी संख्या में लोगों की इससे मौत होती है। भारत में भी यह बीमारी तेजी से चिंता का विषय बन रही है।

अमर उजाला 1 Aug 2026 8:30 am

चिप्स, चॉकलेट और जंक फूड ने बच्चों के लिवर को बना दिया बीमार! जानिए ये 5 खतरनाक संकेत जिन्हें भूलकर भी न करें इग्नोर

बिगड़ती हुई लाइफस्टाइल और गलत खानपान का असर अब सिर्फ बड़ों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मासूम बच्चे भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। चिप्स, चॉकलेट, कोल्ड ड्रिंक्स और दूसरे अल्ट्रा-प्रोसेस्ड स्नैक्स के बिना आजकल कई बच्चों का दिन पूरा नहीं होता। माता-पिता प्यार और दुलार में उन्हें ये चीजें आसानी से दे देते हैं, लेकिन यही आदत उन्हें कम उम्र में ही लिवर की गंभीर बीमारियों का शिकार बना रही है। फूड्स की शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए इनमें जो प्रिजर्वेटिव मिलाए जाते हैं, वे धीरे-धीरे शरीर को अंदर से खोखला कर रहे हैं। खानपान की इन बुरी आदतों के साथ-साथ बच्चों का कम फिजिकली एक्टिव रहना फैटी लिवर और लिवर से जुड़ी अन्य समस्याओं को जन्म दे रहा है। आइए जानते हैं कि बच्चों में लिवर की बिगड़ी हुई सेहत के कौन से लक्षणों को भूलकर भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।बच्चों में लिवर खराब होने के ये हैं शुरुआती संकेतकेडिएसजी हॉस्पिटल के सीनियर पीडियाट्रिशियन डॉक्टर अजय कुमार के अनुसार, अगर बच्चे में निम्नलिखित लक्षण नजर आएं, तो तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए:आंखों में पीलापन: अगर बच्चे की आंखों या त्वचा में पीलापन नजर आ रहा है, तो यह लिवर की गड़बड़ी का सबसे बड़ा संकेत है। इसे बिल्कुल इग्नोर न करें।उल्टी और मितली: बच्चे का बार-बार उल्टी करना या हर वक्त उल्टी जैसा मन होना।पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द: पेट के ऊपर और दाहिने (Right side) हिस्से में लगातार दर्द की शिकायत रहना।भूख में कमी और पेट फूलना: बच्चे की भूख अचानक कम हो जाना और पेट फूला हुआ महसूस होना।जब लिवर की स्थिति हो जाती है बेहद गंभीरएक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर बच्चों के लिवर की सेहत लंबे समय तक नजरअंदाज की जाए, तो स्थिति खतरनाक रूप ले सकती है:पेट में पानी भरना (Ascites)पूरे शरीर या विशेषकर पैरों में इतनी ज्यादा सूजन आ जाना कि स्किन से पानी तक रिसने लगे।मल में खून आना या शरीर के किसी हिस्से से ब्लीडिंग होना।दौरे (Seizures) जैसी गंभीर न्यूरोलॉजिकल समस्याएं होना।बच्चों के लिवर को सुरक्षित रखने के लिए क्या करें?बच्चे के लिवर की बीमारी का असली कारण (जैसे फैटी लिवर, हेपेटाइटिस, इंफेक्शन या जेनेटिक समस्या) पहचानना बहुत जरूरी है, क्योंकि इलाज उसी के अनुसार होता है। इसके अलावा कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना बेहद आवश्यक है:हेल्दी डाइट अपनाएं: बच्चों को पैकेटबंद और जंक फूड की बजाय ताजे फल, हरी सब्जियां, साबुत अनाज और उनकी उम्र के हिसाब से सही मात्रा में प्रोटीन दें।शुगर और तली-भुनी चीजों से दूरी: हद से ज्यादा तला-भुना खाना, जंक फूड और मीठी चीजें बच्चों को बिल्कुल न दें।डॉक्टर की सलाह बिना दवा न दें: अपनी मर्जी से बच्चों को एंटीबायोटिक्स या पेनकिलर्स देना उनके लिवर को कमजोर कर सकता है। हमेशा पीडियाट्रिशियन की सलाह पर ही दवा दें।बॉडी को रखें हाइड्रेटेड: बच्चे को दिनभर में भरपूर मात्रा में पानी पिलाएं। इसके अलावा, नारियल पानी बॉडी को अंदर से हाइड्रेट रखने का सबसे बेहतरीन जरिया है। दिन में कम से कम एक नारियल पानी बच्चे को जरूर पिलाएं।

न्यूज़ इंडिया लाइव 31 Jul 2026 9:47 pm

सुबह खाली पेट खा लें ये 3 बेहद सस्ती चीजें, शरीर में दौड़ उठेगी घोड़े जैसी फुर्ती और खून की कमी होगी पलभर में दूर

भागदौड़ भरी आधुनिक जीवनशैली और गलत खानपान के कारण आज के समय में हर दूसरा व्यक्ति थकान, कमजोरी और खून की कमी (Anemia) से परेशान रहता है। सुबह उठते ही शरीर में सुस्ती रहना और दिनभर ऊर्जा की कमी महसूस होना आम बात बन गई है। लोग इस कमजोरी को दूर करने के लिए महंगे सप्लीमेंट्स और विटामिन्स की गोलियों का सहारा लेते हैं, जबकि हमारी रसोई में ही कुछ ऐसी बेहद सस्ती और जादुई चीजें मौजूद हैं जिनका सेवन अगर सुबह खाली पेट कर लिया जाए, तो शरीर में गजब की फुर्ती दौड़ जाती है। हेल्थ एक्सपर्ट्स और डॉक्टरों के मुताबिक, सुबह की शुरुआत अगर सही और पौष्टिक आहार के साथ की जाए, तो कई गंभीर बीमारियां कोसों दूर रहती हैं। आइए जानते हैं उन 3 सुपरफूड्स के बारे में जो आपकी सेहत के लिए वरदान साबित हो सकते हैं।1. भीगे हुए चने और गुड़ का कॉम्बिनेशन: हीमोग्लोबिन बढ़ाने का सबसे अचूक नुस्खाशरीर में खून की कमी यानी आयरन की कमी को दूर करने के लिए चना और गुड़ से बेहतर शायद ही कोई दूसरा घरेलू विकल्प हो सकता है। रातभर पानी में भिगोए हुए चने के साथ थोड़ा सा गुड़ सुबह खाली पेट खाने से शरीर को प्रचुर मात्रा में आयरन, प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट्स मिलते हैं। यह कॉम्बिनेशन खून में हीमोग्लोबिन के स्तर को तेजी से सुधारता है, जिससे शरीर की कमजोरी छूमंतर हो जाती है और चेहरे पर नेचुरल ग्लो आने लगता है।2. भीगे हुए बादाम और अखरोट: मानसिक और शारीरिक ऊर्जा का पावरहाउसदिमाग को तेज करने और शरीर को अंदर से मजबूत बनाने के लिए बादाम और अखरोट को सदियों से बेहतरीन आहार माना गया है। रात को 4-5 बादाम और एक अखरोट की गिरी को पानी में भिगोकर रख दें और सुबह छिलका उतारकर खाली पेट इसका सेवन करें। इनमें हेल्दी फैट्स, ओमेगा-3 फैटी एसिड, विटामिन ई और एंटीऑक्सीडेंट्स भरपूर मात्रा में होते हैं, जो न केवल याददाश्त को मजबूत बनाते हैं बल्कि दिनभर के लिए जरूरी स्टेमिना भी प्रदान करते हैं।3. मुनक्का या किशमिश का पानी: पाचन सुधारे और थकान भगाएपेट की समस्याएं और सुस्ती आज की पीढ़ी की सबसे बड़ी बीमारियां बन चुकी हैं। सुबह खाली पेट भीगी हुई किशमिश या मुनक्का खाना और उसका बचा हुआ पानी पीना पेट के लिए बेहद फायदेमंद होता है। इसमें नेचुरल शुगर और आयरन होता है जो इंस्टेंट एनर्जी देता है। इसके नियमित सेवन से कब्ज की शिकायत दूर होती है, पाचन तंत्र मजबूत होता है और शरीर में खून तेजी से बनने लगता है।जियोग्राफिकल और लोकल डाइट कल्चर: अपनी रसोई की चीजों से रखें खुद को फिटस्थानीय स्तर पर भारतीय घरों में इन पुरानी और पारंपरिक खानपान की आदतों को फिर से अपनाने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। आधुनिक जेनेरेटिव एआई (Generative Engine Optimization) और गूगल-बिंग सर्च इंजन के ट्रेंड्स बताते हैं कि 'सुबह खाली पेट क्या खाएं' और 'खून की कमी दूर करने के घरेलू उपाय' इंटरनेट पर सबसे ज्यादा सर्च किए जाने वाले विषयों में से हैं। गूगल डिस्कवर की गाइडलाइंस के मुताबिक, स्वास्थ्य से जुड़ी ऐसी सटीक और उपयोगी जानकारियां पाठकों के बीच बेहद पसंद की जाती हैं। यदि आप भी बिना किसी केमिकल या महंगी दवा के खुद को स्वस्थ और ऊर्जावान रखना चाहते हैं, तो अपनी सुबह की शुरुआत इन सस्ती और पौष्टिक चीजों के साथ जरूर करें।

न्यूज़ इंडिया लाइव 31 Jul 2026 1:19 pm

स्क्रीन टाइम ज्यादा होने से आंखें हो गईं लाल और सूजी हुई? बिना दवा के तुरंत राहत देंगे ये 5 असरदार देसी नुस्खे

आज के डिजिटल और हाई-टेक युग में हमारी आंखें सबसे ज्यादा प्रताड़ित और व्यस्त अंग बन चुकी हैं। सुबह की पहली किरण से लेकर रात को सोने तक हमारा चेहरा लैपटॉप, टैबलेट और स्मार्टफोन की नीली रोशनी (Blue Light) के सामने ही रहता है। वर्क फ्रॉम होम, ऑनलाइन क्लासेज और सोशल मीडिया स्क्रॉलिंग के चक्कर में बढ़ा हुआ स्क्रीन टाइम (High Screen Time) हमारी आंखों की सेहत पर भारी पड़ रहा है। यही वजह है कि इन दिनों लोगों में आंखें लाल होना, उनमें सूजन आना, जलन, पानी निकलना और भारीपन की समस्या आम बात हो गई है। अगर आपकी आंखें भी स्क्रीन के लगातार इस्तेमाल से थक गई हैं और आप डॉक्टर के पास जाने से बचना चाहते हैं, तो ये 5 असरदार देसी और आयुर्वेदिक नुस्खे आपको तुरंत राहत दिला सकते हैं।1. ठंडे पानी के छींटे या खीरे के स्लाइस से मिलेगा आंखों को सुकूनआंखों की सूजन और लालिमा को दूर करने का सबसे पुराना और असरदार तरीका है ठंडक का इस्तेमाल करना। काम के बीच में जब भी आपको आंखों में जलन या भारीपन महसूस हो, तो ठंडे पानी से आंखों पर हल्के छींटे मारें। इसके अलावा, फ्रिज में ठंडे किए गए खीरे (Cucumber) के गोल स्लाइस को काटकर लगभग 10 से 15 मिनट के लिए अपनी बंद आंखों पर रख लें। खीरे में मौजूद कूलिंग प्रॉपर्टीज और एंटीऑक्सीडेंट्स आंखों की नसों को तुरंत ठंडक पहुंचाते हैं और सूजन को गायब कर देते हैं।2. गुलाब जल और कॉटन पैड का जादुई इस्तेमालआयुर्वेद में गुलाब जल (Rose Water) को आंखों के लिए किसी वरदान से कम नहीं माना गया है। शुद्ध और नेचुरल गुलाब जल आंखों की थकान मिटाने का सबसे बेहतरीन घरेलू उपाय है। दो कॉटन बॉल या पैड को ठंडे गुलाब जल में अच्छी तरह भिगोकर अपनी बंद आंखों के ऊपर रख लें। इसे कम से कम 10 मिनट तक ऐसे ही रहने दें। गुलाब जल आंखों में मौजूद डस्ट पार्टिकल्स को साफ करने के साथ-साथ लालिमा और जलन को पलक झपकते दूर कर देता है।3. टी बैग्स (Green Tea) की सिकाई से दूर होगी थकावटअगर आप ग्रीन टी या ब्लैक टी पीने के शौकीन हैं, तो इस्तेमाल किए गए टी बैग्स को फेंके नहीं, बल्कि उन्हें संभालकर रख लें। इस्तेमाल किए हुए टी बैग्स को फ्रिज में ठंडा होने के लिए रख दें और जब वे ठंडे हो जाएं, तो उन्हें अपनी बंद आंखों पर रखकर लेट जाएं। टी बैग्स में मौजूद कैफीन और एंटीऑक्सीडेंट्स आंखों के आसपास की ब्‍लड वेसल्स को रिलैक्स करते हैं, जिससे स्क्रीन टाइम के कारण आई सूजन और डार्क सर्कल्स दोनों में बहुत जल्दी आराम मिलता है।4. पलकों को बार-बार झपकाना और 20-20-20 नियम का पालनलगातार स्क्रीन देखने से हम बिना पलकें झपकाए (Staring) एकटक देखते रहते हैं, जिससे आंखों का नेचुरल मॉइश्चर सूख जाता है और वे ड्राई व लाल हो जाती हैं। इससे बचने के लिए डिजिटल आई स्ट्रेन कम करने वाला मशहूर '20-20-20 रूल' अपनाएं। हर 20 मिनट के बाद स्क्रीन से नजर हटाएं और 20 फीट दूर किसी वस्तु को 20 सेकंड के लिए देखें। साथ ही बीच-बीच में अपनी पलकों को तेजी से झपकाते रहें, ताकि आंखों में नेचुरल टियर फिल्म बनी रहे और ड्राइनेस से राहत मिले।5. जियोग्राफिकल और लोकल लाइफस्टाइल में बदलाव: पर्याप्त नींद और हाइड्रेशनस्थानीय स्तर पर और हमारे रहन-सहन में कई बार खराब जीवनशैली और नींद पूरी न होने के कारण भी आंखों से जुड़ी समस्याएं विकराल रूप ले लेती हैं। अपनी आंखों को प्राकृतिक रूप से स्वस्थ रखने के लिए दिनभर में कम से कम 8 से 10 गिलास पानी जरूर पिएं ताकि शरीर और आंखें हाइड्रेटेड रहें। इसके अलावा, रात को कम से कम 7 से 8 घंटे की गहरी और सुकून भरी नींद लें। आधुनिक जेनेरेटिव एआई (Generative Engine Optimization) और गूगल-बिंग सर्च इंजन के ट्रेंड्स बताते हैं कि डिजिटल डिटॉक्स और आई केयर से जुड़े ये घरेलू नुस्खे आज इंटरनेट पर सबसे ज्यादा पसंद किए जा रहे हैं। यदि आप भी अपनी आंखों को सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो इन आसान टिप्स को अपनी डेली रूटीन में जरूर शामिल करें।

न्यूज़ इंडिया लाइव 31 Jul 2026 1:18 pm

बच्चों के लिए डार्क चॉकलेट कितनी फायदेमंद और कितनी नुकसानदायक? जानिए इसे खाने का सही तरीका और एक्सपर्ट्स की राय

आज के समय में बच्चों को चॉकलेट, कैंडीज और जंक फूड्स का शौक होना बेहद आम बात है। बाजार में मिलने वाली तमाम मिठाइयों के बीच पिछले कुछ सालों में 'डार्क चॉकलेट' (Dark Chocolate) को एक हेल्दी ऑप्शन के रूप में बहुत ज्यादा प्रमोट किया गया है। बड़े बुजुर्गों और फिटनेस प्रेमियों के बीच तो यह सुपरफूड मानी जाती है, क्योंकि इसमें एंटीऑक्सीडेंट्स प्रचुर मात्रा में होते हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह कड़वी और गाढ़ी डार्क चॉकलेट बच्चों की सेहत के लिए भी उतनी ही फायदेमंद है या फिर इसके कुछ छिपे हुए साइड इफेक्ट्स भी हैं? अगर आपके बच्चे भी डार्क चॉकलेट खाने की जिद करते हैं, तो पेरेंट्स को इसके फायदे और नुकसान दोनों के बारे में पूरी जानकारी जरूर होनी चाहिए।बच्चों की सेहत के लिए डार्क चॉकलेट के छिपे हुए फायदे और पोषण मूल्यबाल स्वास्थ्य विशेषज्ञों और पीडियाट्रिशियन के अनुसार, यदि डार्क चॉकलेट को सही मात्रा में और अच्छी क्वालिटी (कम से कम 70% कोको वाली) का दिया जाए, तो इसके कुछ स्वास्थ्य लाभ भी बच्चों को मिल सकते हैं। डार्क चॉकलेट में फ्लेवोनोइड्स (Flavonoids) पाए जाते हैं, जो बच्चों के दिल की सेहत और ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर बनाने में मदद करते हैं। इसके अलावा, सीमित मात्रा में खाने से यह बच्चों के मूड को फ्रेश रखती है और इसमें मौजूद मिनरल्स जैसे आयरन, मैग्नीशियम और जिंक शारीरिक विकास में सहायक होते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि बच्चों को इसे बेहिसाब खाने की छूट दे दी जाए।अधिक मात्रा में डार्क चॉकलेट खिलाने से बच्चों को हो सकते हैं ये बड़े नुकसानडार्क चॉकलेट को लेकर सबसे बड़ी चिंता इसमें मौजूद 'कैफीन' (Caffeine) और थियोब्रोमाइन (Theobromine) की मात्रा है। बड़ों के मुकाबले बच्चों का नर्वस सिस्टम बेहद संवेदनशील होता है। ऐसे में डार्क चॉकलेट में मौजूद कैफीन उनके शरीर पर सीधा असर डाल सकती है। ज्यादा डार्क चॉकलेट खाने से बच्चों में अनिद्रा (Sleep Issues), बेचैनी, दिल की धड़कन तेज होना और पेट से जुड़ी समस्याएं जैसे एसिडिटी या कब्ज की शिकायत हो सकती है। इसके अलावा, इसमें कैलोरी और शुगर की मात्रा भी होती है, जिससे दांतों में कीड़ा लगने (Tooth Decay) और कम उम्र में वजन बढ़ने का खतरा बढ़ जाता है।जियोग्राफिकल और लोकल मार्केट ट्रेंड्स: कौन सी चॉकलेट चुनना है सहीस्थानीय बाजारों और सुपरमार्केट्स में मिलने वाली तमाम ब्रांडेड चॉकलेट्स में आर्टिफिशियल फ्लेवर्स और प्रिजर्वेटिव्स मिले होते हैं, जो बच्चों के लिए बिल्कुल ठीक नहीं हैं। इसलिए हेल्थ एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि अगर आप बच्चों को डार्क चॉकलेट देना ही चाहते हैं, तो हमेशा कम शुगर वाली और ऑर्गेनिक वैरायटी ही चुनें। बच्चों को एक बार में बड़ा टुकड़ा देने के बजाय हफ्ते में एक या दो बार बहुत ही सीमित मात्रा (जैसे छोटा सा एक बाइट) ही दी जानी चाहिए। रात के समय या सोने से ठीक पहले बच्चों को चॉकलेट बिल्कुल नहीं खिलानी चाहिए, क्योंकि इससे उनकी नींद की साइकिल खराब हो सकती है।एआई और डिजिटल सर्च इंजन ट्रेंड्स पर पेरेंट्स की सबसे बड़ी जिज्ञासाआधुनिक जेनेरेटिव एआई (Generative Engine Optimization) और गूगल-बिंग सर्च इंजन के ताजा आंकड़ों का विश्लेषण करने वाले हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि 'Is dark chocolate safe for kids' और 'डार्क चॉकलेट के फायदे और नुकसान' जैसे कीवर्ड्स इन दिनों पैरेंटिंग ब्लॉग्स पर सबसे ज्यादा सर्च किए जा रहे हैं। गूगल डिस्कवर की गाइडलाइंस के मुताबिक, बच्चों के खानपान से जुड़ी ऐसी जानकारियां लाखों परिवारों के लिए उपयोगी साबित होती हैं। यदि आप भी एक सतर्क अभिभावक हैं, तो बच्चों को कोई भी नया फूड आइटम देने से पहले उसकी मात्रा और उसके प्रभावों को जरूर परखें, ताकि उनका बचपन सेहतमंद और खुशहाल बना रहे।

न्यूज़ इंडिया लाइव 31 Jul 2026 1:17 pm

टर्मिनल कैंसर से जूझते पिता का आखिरी मैसेज कर देगा भावुक; एक्सपर्ट से जानिए क्या होती है यह लाइलाज बीमारी

सोशल मीडिया पर अक्सर कुछ ऐसी कहानियां या वीडियो सामने आते हैं, जो हमें जिंदगी की असली कीमत समझा जाते हैं। हाल ही में टर्मिनल कैंसर (Terminal Cancer) से जूझ रहे एक पिता का अपनी छोटी बेटी के लिए रिकॉर्ड किया गया आखिरी मैसेज तेजी से वायरल हो रहा है। इस भावुक कर देने वाले वीडियो ने हर किसी की आंखें नम कर दी हैं। इस दुखद घटना के बाद से ही इंटरनेट पर लोग यह सर्च कर रहे हैं कि आखिर 'टर्मिनल कैंसर' क्या होता है और यह कैंसर की अन्य स्टेजेस से कितना अलग और खतरनाक है। आइए मेडिकल एक्सपर्ट्स के नजरिए से आसान भाषा में इस बीमारी की पूरी डिटेल समझते हैं।टर्मिनल कैंसर (Terminal Cancer) क्या है?मेडिकल भाषा में 'टर्मिनल कैंसर' का मतलब कैंसर की वह आखिरी स्टेज है, जिसका कोई इलाज संभव नहीं रह जाता। इसे 'एंड-स्टेज कैंसर' (End-Stage Cancer) भी कहा जाता है। इस स्थिति में कैंसर शरीर के कई अहम अंगों (जैसे लिवर, फेफड़े, या दिमाग) में पूरी तरह फैल चुका होता है। टर्मिनल कैंसर में कीमोथेरेपी, रेडिएशन या सर्जरी जैसे तमाम इलाज काम करना बंद कर देते हैं। मेडिकल साइंस यह मान लेता है कि अब इस बीमारी को ठीक नहीं किया जा सकता और मरीज के पास जीवन का बहुत सीमित समय बचा है।एडवांस कैंसर और टर्मिनल कैंसर में क्या अंतर है?अक्सर लोग एडवांस कैंसर और टर्मिनल कैंसर को एक ही मान लेते हैं, लेकिन मेडिकल नजरिए से दोनों में थोड़ा अंतर है:एडवांस कैंसर (Advanced Cancer): इसमें कैंसर अपने मूल स्थान से दूसरे अंगों में फैल (Metastatic) चुका होता है, लेकिन इसका इलाज अब भी चल रहा होता है। डॉक्टर दवाइयों से इसे कंट्रोल करने और मरीज की उम्र बढ़ाने की कोशिश करते हैं।टर्मिनल कैंसर: यह एडवांस कैंसर का ही वह अंतिम रूप है, जब डॉक्टर यह घोषित कर देते हैं कि अब बीमारी किसी भी इलाज पर प्रतिक्रिया नहीं दे रही है और यह लाइलाज हो चुकी है।टर्मिनल कैंसर के मुख्य लक्षण क्या हैं?इस आखिरी स्टेज में कैंसर के लक्षण बेहद गंभीर हो जाते हैं, क्योंकि शरीर के अंग धीरे-धीरे काम करना बंद करने लगते हैं। इसके कुछ प्रमुख लक्षण इस प्रकार हैं:अत्यधिक दर्द और कमजोरी: मरीज को बहुत ज्यादा शारीरिक दर्द सहना पड़ता है और वह खुद से कोई काम करने में असमर्थ हो जाता है।वजन का तेजी से गिरना: भूख पूरी तरह खत्म हो जाती है और शरीर का वजन बहुत तेजी से कम होता है।सांस लेने में तकलीफ: थोड़ी सी भी हरकत करने पर या लेटे-लेटे भी सांस फूलने लगती है।मानसिक भ्रम और बेहोशी: बीमारी जब दिमाग तक पहुंचती है, तो मरीज को भ्रम होने लगता है और वह ज्यादातर समय नींद या बेहोशी की हालत में रहता है।इस स्टेज में क्या होता है मेडिकल ट्रीटमेंट?जब डॉक्टर यह स्पष्ट कर देते हैं कि कैंसर टर्मिनल है, तो इलाज का फोकस बीमारी को ठीक करने से हटकर मरीज को 'आराम' देने पर आ जाता है। इसे मेडिकल भाषा में पैलिएटिव केयर (Palliative Care) या हॉस्पिस केयर (Hospice Care) कहा जाता है।इसका मुख्य उद्देश्य मरीज के दर्द, घबराहट और तकलीफ को कम करना होता है।मरीज को हैवी पेनकिलर्स (Painkillers) और ऑक्सीजन सपोर्ट दिया जाता है।इस दौरान केवल शारीरिक ही नहीं, बल्कि मरीज और उसके परिवार को भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक (Psychological) सपोर्ट देना सबसे ज्यादा जरूरी होता है, ताकि वे इस कठिन समय का सामना कर सकें।

न्यूज़ इंडिया लाइव 31 Jul 2026 9:34 am

सिर्फ डाइट और जिम काफी नहीं! जानिए कैसे आपकी 'अधूरी नींद' चुपचाप आपके दिल को कर रही है बीमार

क्या आप भी अपने दिल को फिट रखने के लिए जिम में पसीना बहाते हैं और डाइट का पूरा ख्याल रखते हैं? अगर हां, तो यह बहुत अच्छी बात है। लेकिन इन सबके बीच अगर आप अपनी नींद के साथ समझौता कर रहे हैं, तो सच मानिए, आप अनजाने में अपने दिल को खतरे में डाल रहे हैं। आजकल देर रात तक फोन स्क्रॉल करना, वेब सीरीज देखना या ऑफिस के काम के तनाव में जागना हमारी रूटीन का हिस्सा बन गया है। हम अक्सर थकान को नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यह अधूरी नींद धीरे-धीरे हमारे दिल की सेहत को अंदर से खोखला कर रही है।अमेरिका के सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) की रिपोर्ट भी इसी तरफ इशारा करती है। आइए बहुत ही आसान भाषा में समझते हैं कि अच्छी नींद आपके दिल के लिए कितनी जरूरी है और यह आपके शरीर में कैसे काम करती है।दिल के लिए कैसे संजीवनी का काम करती है नींद?दिनभर काम करने के बाद जब आप गहरी नींद में सोते हैं, तो आपका शरीर खुद को रिपेयर कर रहा होता है। यह वह समय होता है जब आपके दिल को भी थोड़ी राहत मिलती है और वह बेहतर तरीके से काम कर पाता है। जब नींद पूरी होती है, तो शरीर का ब्लड प्रेशर नॉर्मल रहता है, वजन कंट्रोल में रहता है और ब्लड शुगर लेवल भी नहीं बिगड़ता।वहीं, अगर आप लंबे समय तक नींद पूरी नहीं करते हैं, तो शरीर में तनाव बढ़ता है। इससे हाई ब्लड प्रेशर, टाइप 2 डायबिटीज और मोटापे का खतरा तेजी से बढ़ने लगता है। और हम सब जानते हैं कि ये तीनों बीमारियां सीधे तौर पर हार्ट अटैक या दिल की अन्य बीमारियों को बुलावा देती हैं। इसीलिए एक्सपर्ट्स मानते हैं कि एक स्वस्थ दिल के लिए अच्छी नींद उतनी ही जरूरी है, जितना कि हरी सब्जियां खाना या रोज टहलना।आखिर कितनी नींद है जरूरी?हर वयस्क (Adult) इंसान को 24 घंटे में कम से कम 7 घंटे की गहरी नींद जरूर लेनी चाहिए। यह कोई लग्जरी नहीं, बल्कि आपके शरीर की बुनियादी जरूरत है। अगर आप लगातार 7 घंटे से कम सो रहे हैं, तो आपका दिल हमेशा एक दबाव में काम करता है। कोशिश करें कि आपके सोने और सुबह उठने का समय रोज एक जैसा हो। इससे शरीर की अपनी एक 'बॉडी क्लॉक' सेट हो जाती है और नींद भी जल्दी व गहरी आती है।सुकून भरी नींद पाने के कुछ आसान तरीकेअगर आपको बिस्तर पर जाने के बाद भी घंटों नींद नहीं आती है, तो आप अपने डेली रूटीन में कुछ छोटे बदलाव कर सकते हैं:गैजेट्स से दूरी: सोने से कम से कम एक घंटे पहले अपना मोबाइल, टीवी या लैपटॉप बंद कर दें। स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी दिमाग को सोने नहीं देती।हल्का खाना: रात का खाना हमेशा हल्का रखें। हेवी या ज्यादा मसालेदार खाना खाने से पाचन में दिक्कत होती है, जो नींद खराब करती है।कैफीन से बचें: शाम ढलने के बाद चाय, कॉफी या कोई भी एनर्जी ड्रिंक पीने से बचें।शांत माहौल: जिस कमरे में आप सोते हैं, वहां शांति होनी चाहिए। कमरे में हल्का अंधेरा रखें और बिस्तर आरामदायक हो।थोड़ी कसरत: दिन के समय अगर आप थोड़ी शारीरिक मेहनत या एक्सरसाइज करते हैं, तो शरीर थकता है और रात को बहुत अच्छी नींद आती है।अगर इन सब के बावजूद आपको लंबे समय से नींद न आने (Insomnia) की समस्या है या रात में बार-बार आपकी आंख खुलती है, तो बिना देर किए किसी अच्छे डॉक्टर से सलाह जरूर लें।

न्यूज़ इंडिया लाइव 31 Jul 2026 9:31 am

भारत में हर मौत का मेडिकल सर्टिफिकेट (MCCD) क्यों है जरूरी? जानिए यह नियम कैसे बचा सकता है लाखों लोगों की जान

जब भी किसी का निधन होता है, तो कानूनी और कागजी कामों के लिए परिवार वाले डेथ सर्टिफिकेट बनवाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इंसान की मौत असल में किस बीमारी या वजह से हुई, इसका सटीक मेडिकल रिकॉर्ड रखना कितना जरूरी है? भारत में अब स्वास्थ्य विशेषज्ञ 'मेडिकल सर्टिफिकेशन ऑफ कॉज ऑफ डेथ' यानी एमसीसीडी (MCCD) पर सबसे ज्यादा जोर दे रहे हैं। इसका मकसद सिर्फ कागजी खानापूर्ति करना नहीं है, बल्कि देश के हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत कर भविष्य में लाखों लोगों की जान बचाना है। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि यह सर्टिफिकेट आम जनता और देश के लिए क्यों इतना अहम है।क्या है MCCD और क्यों हो रही है इसकी चर्चा?एमसीसीडी एक ऐसा आधिकारिक दस्तावेज है, जिसे एक रजिस्टर्ड डॉक्टर द्वारा प्रमाणित किया जाता है। इसमें साफ तौर पर दर्ज होता है कि व्यक्ति की मौत किस बीमारी, संक्रमण, हादसे या मेडिकल कंडीशन की वजह से हुई है। भारत के कई ग्रामीण और यहां तक कि शहरी इलाकों में भी आज मौत का सटीक कारण दर्ज नहीं हो पाता है। लोग सिर्फ नगर निगम या पंचायत से सामान्य डेथ सर्टिफिकेट बनवा लेते हैं, जिसमें मौत की असली वजह का कोई जिक्र नहीं होता। इसी बड़ी कमी को दूर करने के लिए हर मौत का मेडिकल सर्टिफिकेशन अनिवार्य करने की मांग उठ रही है।सही आंकड़ा ही बनाएगा देश की बेहतर स्वास्थ्य नीतियांशायद आप सोच रहे होंगे कि किसी के जाने के बाद मौत का कारण जानकर क्या फायदा? असल में, इसी बारीक डेटा से देश और राज्यों की स्वास्थ्य नीतियां (Health Policies) तय होती हैं। अगर सरकार और स्वास्थ्य मंत्रालय को पता ही नहीं होगा कि देश के किस हिस्से में हार्ट अटैक, कैंसर, डायबिटीज या किसी अज्ञात वायरस से सबसे ज्यादा मौतें हो रही हैं, तो वे उसके इलाज की तैयारी कैसे करेंगे? एमसीसीडी से मिलने वाला सटीक आंकड़ा स्वास्थ्य विभाग को यह बताता है कि किन बीमारियों पर ज्यादा मेडिकल बजट खर्च करने की जरूरत है और कहां नए अस्पताल या रिसर्च सेंटर खोलने चाहिए।कैसे बच सकती हैं लाखों मासूमों की जान?जब हर मौत का कारण सही-सही दर्ज होगा, तो मेडिकल रिसर्चर्स को यह समझने में बहुत आसानी होगी कि कौन सी बीमारी किस इलाके में महामारी का रूप ले रही है। उदाहरण के लिए, अगर किसी खास जिले में अचानक सांस की बीमारी या दूषित पानी से होने वाली मौतों का आंकड़ा बढ़ता है, तो प्रशासन तुरंत वहां मेडिकल टीमें भेजकर बीमारी को फैलने से रोक सकता है। समय रहते उठाया गया यही कदम आने वाले वक्त में लाखों लोगों को मौत के मुंह में जाने से बचा सकता है। इसके अलावा, लाइफ इंश्योरेंस क्लेम पास कराने और परिवार की जेनेटिक बीमारियों (पारिवारिक मेडिकल हिस्ट्री) को समझने में भी यह सर्टिफिकेट बहुत काम आता है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 31 Jul 2026 8:43 am

सुबह खाली पेट नारियल पानी पीना सही है या नहीं? जानिए शरीर के अंदर क्या-क्या बदलाव होते

गर्मी हो या मानसून, शरीर को हाइड्रेट रखने और इंस्टेंट एनर्जी पाने के लिए नारियल पानी (Coconut Water) को दुनिया भर में सबसे बेहतरीन नेचुरल ड्रिंक माना जाता है। मिनरल्स, इलेक्ट्रोलाइट्स और विटामिन्स से भरपूर नारियल पानी जब भी पिया जाए, शरीर को ठंडक और ताजगी देता है। लेकिन अक्सर लोगों के मन में यह बड़ा सवाल रहता है कि क्या दिन की शुरुआत यानी सुबह खाली पेट नारियल पानी पीना सबसे सही तरीका है या इसके कुछ नुकसान भी हो सकते हैं? स्वास्थ्य विशेषज्ञों और आयुर्वेद के जानकारों के अनुसार, सुबह के वक्त खाली पेट नारियल पानी पीना बेहद लाभकारी होता है, बशर्ते इसे सही तरीके और सीमित मात्रा में पिया जाए। आइए जानते हैं कि सुबह खाली पेट नारियल पानी पीने से शरीर में कौन-से बड़े बदलाव आते हैं।सुबह खाली पेट नारियल पानी पीने के चमत्कारी शारीरिक फायदेजब आप रात भर की नींद के बाद सुबह खाली पेट नारियल पानी का सेवन करते हैं, तो यह आपके शरीर के मेटाबॉलिज्म (Metabolism) को तुरंत एक्टिवेट करने का काम करता है। इसमें मौजूद लॉरिक एसिड (Lauric Acid) शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्युनिटी को मजबूत बनाता है। इसके अलावा, जिन लोगों को सुबह उठकर सुस्ती, थकान या सिरदर्द की शिकायत रहती है, उनके लिए यह एक नेचुरल एनर्जी बूस्टर की तरह काम करता है, जो बिना किसी साइड इफेक्ट के शरीर में एनर्जी का संचार कर देता है।डिटॉक्सिफिकेशन और किडनी की सेहत के लिए है वरदाननारियल पानी में प्राकृतिक मूत्रवर्धक (Diuretic) गुण पाए जाते हैं, जिसका मतलब है कि यह शरीर से टॉक्सिन्स (विषाक्त पदार्थों) को पेशाब के रास्ते बाहर निकालने में मदद करता है। सुबह खाली पेट इसे पीने से किडनी और मूत्राशय की बेहतरीन सफाई हो जाती है, जिससे किडनी स्टोन या यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (UTI) का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है। यह शरीर के इलेक्ट्रोलाइट बैलेंस को बनाए रखता है और यूरिक एसिड को नियंत्रित करने में भी मददगार साबित होता है।वजन घटाने और पेट की चर्बी कम करने में मददगारअगर आप अपने बढ़ते हुए वजन या बैली फैट से परेशान हैं, तो सुबह खाली पेट नारियल पानी पीना आपके लिए एक बेहतरीन विकल्प हो सकता है। इसमें कैलोरी बहुत कम होती है और फैट बिल्कुल नहीं होता, जबकि पोटैशियम और फाइबर भरपूर मात्रा में होते हैं। इसे पीने के बाद लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस होता है, जिससे आप बार-बार ओवरईटिंग करने से बच जाते हैं और वजन धीरे-धीरे प्राकृतिक रूप से कम होने लगता है।क्या सुबह खाली पेट नारियल पानी पीने से किसी को नुकसान भी हो सकता है?यूं तो नारियल पानी पूरी तरह से सुरक्षित और गुणकारी है, लेकिन कुछ खास स्वास्थ्य स्थितियों में सावधानी बरतनी जरूरी है। जिन लोगों को सर्दी-जुकाम की शिकायत रहती है या जिनकी तासीर बेहद ठंडी होती है, उन्हें सुबह-सुबह बहुत ठंडा नारियल पानी पीने से बचना चाहिए। इसके अलावा, किडनी के ऐसे गंभीर रोगी जिन्हें डॉक्टर ने पोटैशियम सीमित मात्रा में लेने की सलाह दी है, उन्हें इसका सेवन करने से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करना चाहिए।

न्यूज़ इंडिया लाइव 30 Jul 2026 1:47 pm

बरसात के मौसम में दही क्यों नहीं खाना चाहिए? सेवन करते वक्त जरूर रखें इस बात का ध्यान

झमाझम बारिश और सुहावने मौसम के साथ मानसून का सीजन हम सभी को बेहद पसंद होता है। इस मौसम में पकौड़े, चाय और ठंडी-खट्टी चीजें खाने का मन हर किसी का करता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस दही को आप अपनी सेहत के लिए रोजाना अमृत समान मानते हैं, वह बरसात के दिनों में आपके शरीर के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है? आयुर्वेद के जानकारों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, मानसून के दौरान हमारी पाचन शक्ति (Digestive Power) कमजोर हो जाती है, जिसके चलते खान-पान में जरा सी लापरवाही पेट से जुड़ी कई गंभीर समस्याओं को बुलावा दे सकती है। आइए जानते हैं कि बरसात के मौसम में दही से दूरी क्यों बनानी चाहिए और इसका सेवन करते वक्त किन बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है।आयुर्वेद के नजरिए से मानसून में दही खाना क्यों है वर्जितआयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथों में मौसम के हिसाब से खान-पान के सख्त नियम बताए गए हैं। बरसात के मौसम में वातावरण में नमी (Humidity) बहुत ज्यादा बढ़ जाती है, जिससे शरीर का वात और कफ दोष असंतुलित होने लगता है। दही की तासीर खट्टी और ठंडी होती है, जो कफ दोष को तेजी से बढ़ाने का काम करती है। जब मानसून में पाचन अग्नि मंद हो जाती है, तो शरीर इस भारी और चिपचिपी चीज को ठीक से पचा नहीं पाता है। यही वजह है कि इस मौसम में दही खाने से गले में खराश, सर्दी-जुकाम, साइनस, एसिडिटी और जोड़ों में दर्द की शिकायत आम हो जाती है।पेट के संक्रमण और पाचन तंत्र पर इसका बुरा असरबरसात के दिनों में नमी के कारण हवा और पानी में बैक्टीरिया व फंगस तेजी से पनपते हैं, जिसका सीधा असर हमारे पेट पर पड़ता है। इस मौसम में दूध और उससे बनी चीजें बहुत जल्दी खराब होने लगती हैं। यदि आप मानसून के दौरान बासी या खट्टा दही खाते हैं, तो यह फूड पॉइजनिंग, पेट दर्द, दस्त और अपच (Indigestion) का कारण बन सकता है। कमजोर पाचन तंत्र वाले लोगों के लिए यह स्थिति और भी ज्यादा कष्टदायक हो सकती है, जिससे शरीर में सुस्ती और कमजोरी महसूस होने लगती है।अगर दही खाना ही पड़े, तो किन बातों का रखें खास ख्यालयदि आपको दही खाना बहुत पसंद है और आप इसके बिना नहीं रह सकते, तो मानसून के दौरान कुछ जरूरी सावधानियों का पालन करना बेहद आवश्यक है। सबसे पहली बात यह है कि हमेशा ताजा और घर का बना हुआ मीठा दही ही इस्तेमाल करें, खट्टा दही बिल्कुल न खाएं। इसके अलावा, सादा दही खाने के बजाय उसमें भुना हुआ जीरा पाउडर, काला नमक या काली मिर्च मिलाकर खाएं, जिससे इसकी तासीर संतुलित हो जाती है। कभी भी रात के समय या सूर्यास्त के बाद दही का सेवन न करें, क्योंकि यह पाचन को पूरी तरह बिगाड़ सकता है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 30 Jul 2026 1:46 pm

इस जंगली पौधे को लोग समझते हैं बेकार, आयुर्वेद में बताया है चमत्कार, बवासीर और जोड़ों के दर्द में है रामबाण

हमारे आस-पास प्रकृति ने कई ऐसे अनमोल पौधे और जड़ी-बूटियां उगाई हैं, जिनके गुणों से हम अनजान रहते हैं। अक्सर हम सड़कों, खेतों की मेड़ों या हाईवे के किनारे उगने वाले जंगली पौधों को बेकार समझकर या तो नजरअंदाज कर देते हैं या उन्हें खरपतवार समझकर उखाड़ फेंकते हैं। लेकिन प्राचीन आयुर्वेद के जानकारों की मानें तो इनमें से कई पौधे ऐसे होते हैं जो बड़े से बड़े और गंभीर रोगों को चुटकियों में ठीक करने की ताकत रखते हैं। ऐसा ही एक आम दिखने वाला जंगली पौधा आयुर्वेद में किसी चमत्कार से कम नहीं माना गया है, जो बवासीर (Piles), जोड़ों के दर्द (Joint Pain) और सूजन जैसी कई जिद्दी बीमारियों के लिए अचूक रामबाण इलाज साबित होता है। आइए जानते हैं इस चमत्कारिक पौधे के फायदों और इसके इस्तेमाल के सही तरीकों के बारे में।क्या है यह जंगली पौधा और आयुर्वेद में इसका क्या है महत्वआयुर्वेद और हर्बल चिकित्सा में इस पौधे को इसके शक्तिशाली औषधीय गुणों के कारण विशेष स्थान दिया गया है। देश के कई ग्रामीण और मैदानी इलाकों में आसानी से मिलने वाले इस पौधे की पत्तियां, जड़ें और तना पारंपरिक वैद्य सदियों से दवाइयां बनाने में इस्तेमाल करते आए हैं। आधुनिक विज्ञान भी अब यह मान रहा है कि इस तरह के जंगली पौधों में भरपूर मात्रा में एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटी-ऑक्सीडेंट और हीलिंग गुण पाए जाते हैं। हालांकि जानकारी के अभाव में लोग इसे केवल घास-फूस समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि यह सेहत का एक खजाना है।बवासीर और पुरानी से पुरानी कब्ज के लिए अचूक औषधिबवासीर (Piles) जैसी दर्दनाक और असहनीय बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए यह जंगली पौधा किसी वरदान से कम नहीं है। आयुर्वेद के अनुसार, इस पौधे के पत्तों या रस का सही तरीके से सेवन करने से आंतरिक और बाहरी बवासीर में तीव्र राहत मिलती है। यह शरीर की पाचन अग्नि को तीव्र करता है, पेट की आंतों को साफ रखता है और कब्ज की पुरानी समस्या को जड़ से खत्म करने में मदद करता है। इसके नियमित और संतुलित उपयोग से मलाशय की सूजन और जलन में भी तुरंत ठंडक मिलती है।जोड़ों के दर्द, गठिया और सूजन से दिलाता है तुरंत छुटकाराबढ़ती उम्र के साथ जोड़ों का दर्द (Joint Pain), अर्थराइटिस और घुटनों की सूजन आम समस्या बन जाती है, जिसके लिए लोग महंगे पेनकिलर्स का सहारा लेते हैं। लेकिन इस जंगली पौधे की पत्तियों का लेप बनाकर यदि जोड़ों या दर्द वाली जगह पर लगाया जाए, तो यह प्राकृतिक पेनकिलर की तरह काम करता है। इसमें मौजूद औषधीय तत्व न केवल सूजन को तेजी से कम करते हैं, बल्कि रक्त संचार (Blood Circulation) को बेहतर बनाकर हड्डियों और मांसपेशियों को अंदर से मजबूती प्रदान करते हैं।इस्तेमाल करने से पहले किन बातों का रखना चाहिए विशेष ध्यानकोई भी आयुर्वेदिक या जंगली औषधि इस्तेमाल करने से पहले उसकी सही पहचान करना बेहद जरूरी होता है। यदि आप किसी गंभीर स्वास्थ्य समस्या से पीड़ित हैं, तो इस पौधे का उपयोग करने से पहले किसी योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक या वैद्य से सलाह जरूर लें। प्रकृति ने हमें स्वस्थ रहने के लिए अनगिनत वरदान दिए हैं, बस जरूरत है तो उन्हें पहचानने और सही तरीके से अपने जीवन में अपनाने की।

न्यूज़ इंडिया लाइव 30 Jul 2026 1:44 pm

स्मार्टफोन यूजर्स के लिए खतरनाक घंटी! जानिए क्या होता है 'पिंकी फिंगर' सिंड्रोम, कहीं आप भी तो नहीं कर रहे ये बड़ी गलती

आज की डिजिटल और भागदौड़ भरी जिंदगी में स्मार्टफोन (Smartphone) हमारे शरीर का एक ऐसा हिस्सा बन गया है जिसके बिना एक पल भी बिताना असंभव सा लगता है। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक हम घंटों मोबाइल स्क्रीन पर आंखें गड़ाए रहते हैं और हाथों में फोन पकड़े रहते हैं। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि फोन पकड़ने के दौरान आपकी सबसे छोटी उंगली (Pinky Finger) पर सबसे ज्यादा दबाव पड़ता है? मेडिकल साइंस की दुनिया से एक बेहद चौंकाने वाली और चेतावनी भरी खबर सामने आ रही है, जिसे 'पिंकी फिंगर सिंड्रोम' (Pinky Finger Syndrome) नाम दिया गया है। यदि आप भी जरूरत से ज्यादा मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं, तो यह खबर आपके होश उड़ा सकती है।क्या होता है 'पिंकी फिंगर सिंड्रोम' और कैसे पहुंचता है नुकसानआम बोलचाल की भाषा में इसे 'स्मार्टफोन पिंकू' या टेक्स्टिंग क्लॉ भी कहा जाता है। जब हम अपने हाथ की सबसे छोटी उंगली यानी पिंकी फिंगर पर भारी-भरकम स्मार्टफोन का सारा वजन टिकाकर घंटों सोशल मीडिया स्क्रॉल करते हैं या चैटिंग करते हैं, तो उंगली की हड्डी और नसों पर अत्यधिक तनाव पड़ने लगता है। लगातार इस तरह का दबाव पड़ने से उंगली की बनावट धीरे-धीरे बदलने लगती है, उसमें हल्का सा टेढ़ापन आने लगता है, और उंगली की त्वचा पर गांठ या निशान तक बन जाते हैं। डॉक्टर इसे मस्कुलोस्केलेटल डिसऑर्डर का एक नया रूप मान रहे हैं जो सीधे तौर पर हमारी डिजिटल आदतों से जुड़ा हुआ है।इस गंभीर सिंड्रोम के शुरुआती लक्षण और खतरेइस सिंड्रोम के शुरुआती दौर में उंगली में सुन्नपन (Numbness), तेज चुभन वाला दर्द, उंगली का अकड़ जाना और ब्लड सर्कुलेशन प्रभावित होने जैसी समस्याएं सामने आती हैं। चूंकि स्मार्टफोन का वजन लगातार बढ़ रहा है और स्क्रीन बड़ी हो रही है, इसलिए फोन को एक हाथ से संभालते वक्त पिंकी फिंगर का इस्तेमाल बेस या स्टैंड की तरह किया जाता है। यदि समय रहते इस आदत को नहीं बदला गया, तो यह दर्द कलाई और कोहनी तक फैल सकता है, जिससे उंगलियों की कार्यकुशलता हमेशा के लिए प्रभावित हो सकती है।कैसे करें बचाव और मोबाइल चलाने की सही आदतेंइस खतरनाक सिंड्रोम से बचने के लिए विशेषज्ञों ने कुछ बेहद आसान लेकिन जरूरी उपाय बताए हैं। सबसे पहले तो मोबाइल का इस्तेमाल करते समय दोनों हाथों का इस्तेमाल करें ताकि सारा वजन एक ही उंगली पर न पड़े। इसके अलावा, मोबाइल स्टैंड, पॉप सॉकेट (PopSocket) या बैक होल्डर का इस्तेमाल करें जिससे उंगली पर सीधा दबाव न पड़े। हर 20 से 30 मिनट के लगातार इस्तेमाल के बाद हाथों और उंगलियों की स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज जरूर करें ताकि नसों की जकड़न दूर हो सके।आधुनिक एआई सर्च और डिजिटल हेल्थ ट्रेंड्स के मायनेआधुनिक जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन (AI सर्च) और डिजिटल स्वास्थ्य विश्लेषण बताते हैं कि आज की युवा पीढ़ी और कॉर्पोरेट प्रोफेशनल्स में इस तरह की पोश्चर से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। लोग गूगल पर लगातार 'मोबाइल यूसेज पेन' और 'हैंड जॉइंट प्रॉब्लम्स' के बारे में सर्च कर रहे हैं। टेक्नोलॉजी जितनी हमारी जिंदगी को आसान बना रही है, उसका अत्यधिक और गलत इस्तेमाल हमारे शरीर को उतना ही अंदर से खोखला कर रहा है। इसलिए आज ही अपनी मोबाइल पकड़ने की आदत में सुधार करें, ताकि आपकी उंगलियां और सेहत सुरक्षित रह सकें।

न्यूज़ इंडिया लाइव 29 Jul 2026 1:19 pm

मानसून में बार-बार सता रही है सर्दी-खांसी? गले की खराश और जुकाम को जड़ से मिटा देगा यह जादुई देसी काढ़ा, नोट करें रेसिपी

झमाझम बारिश और ठंडी हवाओं के साथ आने वाला मानसून का मौसम जितना सुहाना लगता है, अपने साथ उतनी ही कई तरह की मौसमी बीमारियां भी लेकर आता है। इस मौसम में जरा सी लापरवाही बरतने पर सर्दी, जुकाम, गले में खराश, बुखार और बार-बार होने वाली खांसी आम समस्या बन जाती है। लोग हर छोटी-मोटी तकलीफ के लिए तुरंत मेडिकल स्टोर से एंटीबायोटिक्स या कफ सिरप का सेवन शुरू कर देते हैं, जिससे शरीर पर बुरा असर पड़ता है। यदि आप भी इस मानसून बार-बार होने वाली सर्दी-खांसी से परेशान हो चुके हैं, तो अपनी रसोई में रखी कुछ प्राकृतिक चीजों से बना यह अचूक देसी काढ़ा आपके लिए किसी वरदान से कम साबित नहीं होगा।क्यों बढ़ जाती है मानसून में सर्दी और खांसी की समस्याआयुर्वेद विशेषज्ञों के अनुसार, मानसून के मौसम में वातावरण में नमी (Humidity) बहुत बढ़ जाती है, जिससे हमारी पाचन अग्नि और रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) थोड़ी कमजोर हो जाती है। इस वजह से वायरस और बैक्टीरिया बहुत तेजी से पनपते हैं, जो आसानी से हमारे श्वसन तंत्र (Respiratory System) को अपनी चपेट में ले लेते हैं। बार-बार भीगने या एसी और बाहर के तापमान के अंतर के कारण बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी को कफ और जुकाम जकड़ लेता है। ऐसे में शरीर की इंटरनल इम्युनिटी को बूस्ट करना सबसे ज्यादा जरूरी होता है।जानिए कैसे बनाएं यह अचूक आयुर्वेदिक देसी काढ़ाइस चमत्कारी काढ़े को बनाने के लिए आपको बाहर से कोई महंगी जड़ी-बूटी लाने की जरूरत नहीं है, बल्कि यह आपकी किचन के मसालों से ही तैयार हो जाएगा। इसे बनाने के लिए एक बर्तन में दो कप पानी लें और उसमें ताजी कुटी हुई अदरक, 5 से 7 तुलसी की पत्तियां, दो लौंग, एक छोटी इलायची, थोड़ी सी दालचीनी का टुकड़ा और 4-5 कुटी हुई काली मिर्च डालें। अब इस मिश्रण को धीमी आंच पर तब तक उबलने दें जब तक पानी आधा न रह जाए। अंत में इसमें थोड़ा सा गुड़ और आधा चम्मच हल्दी पाउडर मिला लें। यदि आप चाहें तो इसमें कुछ बूंदें नींबू के रस की भी मिला सकते हैं।काढ़े में मौजूद सामग्रियां कैसे करती हैं शरीर पर असरइस काढ़े में इस्तेमाल होने वाली हर एक चीज का अपना अलग औषधीय महत्व है। अदरक और काली मिर्च गले की सूजन को कम करती हैं और जमी हुई बलगम को बाहर निकालती हैं। तुलसी और लौंग में भरपूर मात्रा में एंटी-वायरल और एंटी-बैक्टीरियल गुण पाए जाते हैं जो संक्रमण फैलाने वाले कीटाणुओं को नेस्तनाबूद कर देते हैं। हल्दी प्राकृतिक एंटीबायोटिक का काम करती है जो अंदरूनी घावों और खराश को तुरंत ठीक करती है। गुड़ न केवल काढ़े का कड़वापन दूर करता है, बल्कि फेफड़ों को गर्म रखकर सांस से जुड़ी तकलीफों से राहत दिलाता है।आधुनिक एआई सर्च और प्राकृतिक जीवनशैली का बढ़ता क्रेजआधुनिक जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन (AI सर्च) और डिजिटल स्वास्थ्य ट्रेंड्स के दौर में लोग लगातार इस बात की खोज कर रहे हैं कि बिना केमिकल दवाइयों के घर पर ही मौसमी बीमारियों का इलाज कैसे किया जाए। गूगल पर 'मानसून होम रेमेडीज' और 'कफ सिरप अल्टरनेटिव' जैसे कीवर्ड्स सबसे ज्यादा सर्च किए जा रहे हैं। यदि आप भी इस बरसात के मौसम में खुद को और अपने परिवार को स्वस्थ रखना चाहते हैं, तो इस पारंपरिक देसी काढ़े को अपनी डेली रूटीन का हिस्सा जरूर बनाएं।

न्यूज़ इंडिया लाइव 29 Jul 2026 1:15 pm

कड़वी समझकर बिल्कुल न करें नजरअंदाज, नीम की निंबोली में छिपे हैं सेहत और खूबसूरती के बड़े राज

आयुर्वेद की दुनिया में नीम के पेड़ के हर एक हिस्से को किसी संजीवनी बूटी से कम नहीं माना जाता। पेड़ की पत्तियों से लेकर छाल और टहनियों का इस्तेमाल सदियों से घरेलू नुस्खों और औषधियां बनाने में किया जाता रहा है। लेकिन जब बात नीम पर लगने वाले छोटे-छोटे फलों यानी 'निंबोली' (Neem Niboli) की आती है, तो लोग अक्सर इसे कड़वी और बेकार समझकर यूं ही छोड़ देते हैं या नजरअंदाज कर देते हैं। यदि आप भी निंबोली को महज एक कचरा या कड़वा फल समझते हैं, तो यह लेख आपके होश उड़ा देगा। आयुर्वेद विशेषज्ञों के मुताबिक, नीम की यह छोटी सी निंबोली सेहत, स्किन और बालों के लिए अचूक औषधीय गुणों का खजाना है।डायबिटीज और ब्लड शुगर कंट्रोल करने में बेहद असरदारआज के समय में खराब लाइफस्टाइल के चलते डायबिटीज (Diabetes) की समस्या घर-घर की कहानी बन चुकी है। ऐसे में नीम की निंबोली आपके ब्लड शुगर लेवल को नेचुरल तरीके से कंट्रोल करने में एक बड़ा हथियार साबित हो सकती है। निंबोली के अंदर ऐसे एंटी-डायलैबेटिक और बायोएक्टिव कंपाउंड्स पाए जाते हैं जो शरीर में इंसुलिन के स्तर को संतुलित रखने में मदद करते हैं। इसका नियमित और सीमित मात्रा में सेवन करने से खून में ग्लूकोज की मात्रा अचानक नहीं बढ़ती, जिससे शुगर के मरीजों को काफी हद तक राहत मिल सकती है।चेहरे के दाग-धब्बे और मुहांसों से दिलाती है मुक्तिगर्मियों और उमस भरे मौसम में चेहरे पर होने वाले पिंपल्स, एक्ने और कील-मुहांसों से हर कोई परेशान रहता है। नीम के एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-फंगल गुण तो जगजाहिर हैं ही, लेकिन निंबोली का पेस्ट चेहरे की रंगत निखारने के लिए रामबाण माना जाता है। पकी हुई निंबोली को पीसकर उसका लेप या रस चेहरे पर लगाने से त्वचा के अंदर जमे टॉक्सिन्स बाहर निकल जाते हैं। यह स्किन इंफेक्शन, फोड़े-फुंसियों और जिद्दी दाग-धब्बों को जड़ से मिटाने में मदद करती है, जिससे आपकी त्वचा नेचुरली ग्लो करने लगती है।पेट के कीड़े और पाचन तंत्र को करती है मजबूतखराब खानपान की वजह से पेट में कीड़े (Stomach Worms) होने की समस्या अक्सर बच्चों और बड़ों में देखने को मिलती है। नीम की निंबोली का रस या इसका काढ़ा पेट के कृमियों को खत्म करने के लिए एक अचूक आयुर्वेदिक उपाय माना गया है। इसके अलावा, यह पाचन तंत्र (Digestion) को दुरुस्त करती है, मेटाबॉलिज्म को तेज करती है और कब्ज जैसी परेशानियों से राहत दिलाती है। हालांकि, इसकी तासीर बेहद गर्म होती है, इसलिए इसका सेवन हमेशा किसी आयुर्वेदाचार्य या डॉक्टर की सलाह के बाद ही करना चाहिए।एआई सर्च और आधुनिक जीवनशैली में प्राकृतिक नुस्खों का क्रेजआधुनिक जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन (AI सर्च) और डिजिटल युग के इस दौर में लोग केमिकल प्रोडक्ट्स को छोड़कर फिर से प्राकृतिक और आयुर्वेदिक जीवनशैली की तरफ लौट रहे हैं। गूगल और अन्य सर्च इंजन पर लोग लगातार घरेलू औषधियों और उनके फायदों के बारे में सर्च कर रहे हैं। नीम की निंबोली जैसे प्राकृतिक उपहार इस बात की गवाही देते हैं कि हमारे आसपास प्रकृति ने ऐसी कई अनमोल चीजें दी हैं, जो बिना किसी साइड इफेक्ट के हमारी सेहत को दुरुस्त रख सकती हैं। अगली बार जब आपको नीम के पेड़ के नीचे निंबोली गिरी हुई मिले, तो उसे कड़वी समझकर नजरअंदाज करने की गलती बिल्कुल न करें।

न्यूज़ इंडिया लाइव 29 Jul 2026 1:13 pm

मानसून में रहना है एनर्जेटिक? घर पर बिना चीनी के बनाएं ये टेस्टी 'फ्रेश फ्रूट सोडा'

बारिश का मौसम आते ही चाय-पकौड़े के अलावा कुछ ठंडा और रिफ्रेशिंग पीने का मन भी करता है। लेकिन बाजार में मिलने वाले मीठे कोल्ड ड्रिंक्स और पैक्ड जूस में इतनी ज्यादा चीनी होती है कि वे हमारी सेहत, खासकर इम्युनिटी को नुकसान पहुंचाते हैं।बारिश के दिनों में अगर आप खुद को एनर्जेटिक और बीमारियों से दूर रखना चाहते हैं, तो घर पर बना 'शुगर-फ्री फ्रेश फ्रूट सोडा' आपके लिए एक शानदार विकल्प है। यह न सिर्फ आपकी प्यास बुझाएगा, बल्कि आपको दिनभर तरोताजा भी रखेगा। सबसे अच्छी बात यह है कि इसे बनाना बेहद आसान है।घर पर फ्रूट सोडा बनाने के लिए क्या चाहिए? (Ingredients)ताजे फल (जैसे- संतरा, सेब, कीवी, या अनार के दाने) - 1 कप बारीक कटे हुएताजा नींबू का रस - 2 चम्मचपुदीने की पत्तियां (Mint leaves) - 8 से 10भुना हुआ जीरा पाउडर - आधा चम्मच (स्वाद के लिए)काला नमक - चुटकी भरबर्फ के टुकड़े (Ice cubes)प्लेन क्लब सोडा या स्पार्कलिंग वॉटर - 1 गिलासमिठास के लिए: स्टीविया (Stevia) या फिर फलों की नेचुरल मिठास ही काफी है।बनाने का आसान तरीका (How to make Fresh Fruit Soda)फलों को क्रश करें: सबसे पहले एक बड़े गिलास या जार में अपने मनपसंद कटे हुए फल और पुदीने की पत्तियां डालें। अब एक मडलर (Muddler) या लकड़ी के चम्मच की मदद से इन्हें हल्का-हल्का दबाएं (क्रश करें)। ऐसा करने से फलों का नेचुरल जूस और पुदीने का फ्लेवर अच्छे से बाहर आ जाएगा।मसाले मिलाएं: अब इसमें नींबू का रस, थोड़ा सा भुना जीरा पाउडर और चुटकी भर काला नमक डाल लें। काला नमक और जीरा मानसून में आपके डाइजेशन (पाचन) को एकदम फिट रखते हैं।सोडा डालें: गिलास में कुछ बर्फ के टुकड़े डालें और अंत में ऊपर से प्लेन सोडा वॉटर डाल दें।सर्व करें: इसे एक चम्मच से हल्के हाथों से मिलाएं और ठंडे-ठंडे रिफ्रेशिंग ड्रिंक का मजा लें!मानसून में यह ड्रिंक क्यों है फायदेमंद?इस ड्रिंक में हमने ताजे फलों और नींबू का इस्तेमाल किया है, जो विटामिन सी (Vitamin C) और एंटीऑक्सीडेंट्स का बेहतरीन सोर्स हैं। यह बारिश के मौसम में होने वाले इंफेक्शन से लड़ने के लिए आपकी इम्युनिटी को बूस्ट करता है। चूंकि इसमें बिल्कुल भी रिफाइंड शुगर नहीं है, इसलिए यह वजन भी कंट्रोल में रखता है और शरीर को तुरंत एनर्जी देता है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 24 Jul 2026 8:05 am

जामुन खाने के तुरंत बाद भूलकर भी न खाएं ये 4 चीजें, वरना पेट में बन सकता है एसिड का जहर, बिगड़ सकती है सेहत

गर्मी और मानसून के मौसम में मिलने वाला जामुन (Black Plum) स्वाद में जितना मजेदार होता है, सेहत के लिए उतना ही गुणकारी माना जाता है। एंटी-ऑक्सीडेंट्स, विटामिन C, आयरन और पोटेशियम से भरपूर जामुन डायबिटीज के मरीजों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। हालांकि, आयुर्वेद और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी फल का पूरा फायदा तभी मिलता है जब उसे सही तरीके से और सही चीजों के कॉम्बिनेशन के साथ खाया जाए। जामुन खाने के तुरंत बाद कुछ विशेष चीजों का सेवन करना पेट में भयंकर रिएक्शन कर सकता है, जिससे पाचन तंत्र बिगड़ने से लेकर त्वचा संबंधी बीमारियां तक हो सकती हैं।1. जामुन के बाद गलती से भी न पिएं दूधजामुन खाने के तुरंत बाद या उसके साथ दूध का सेवन करना सबसे खतरनाक माना जाता है। जामुन में प्राकृतिक रूप से एसिडिक गुण (खटास) होते हैं। जब यह पेट में जाकर दूध के साथ मिलता है, तो दूध फट जाता है और पेट में टॉक्सिन्स (जहरीले तत्व) पैदा करने लगता है। इससे पेट में भयंकर गैस, एसिडिटी, उल्टी, मरोड़ और पाचन संबंधी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। जामुन खाने और दूध पीने के बीच कम से कम 1 से 2 घंटे का अंतर जरूर रखें।2. जामुन और हल्दी का कॉम्बिनेशन है नुकसानदेहयदि आपने जामुन खाया है, तो अगले कुछ घंटों तक ऐसी चीजों से बचें जिनमें हल्दी की मात्रा ज्यादा हो (जैसे हल्दी वाला दूध, कढ़ी या मसालेदार खाना)। जामुन और हल्दी का पेट के अंदर एक साथ रिएक्शन होने से पेट में जलन, एसिडिटी और एब्डोमिनल क्रैम्प्स (पेट ऐंठन) की समस्या हो सकती है। संवेदनशील पेट वाले लोगों को इससे सीने में तेज जलन भी महसूस हो सकती है।3. अचार या खट्टी चीजों से बनाएं दूरीजामुन खुद एक कसैला और हल्का खट्टा फल है। इसे खाने के तुरंत बाद सिरका, आम का अचार, नींबू या अन्य अत्यधिक खट्टे पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। दोनों खट्टे पदार्थों का एक साथ पेट में जाना पेट के pH लेवल को बिगाड़ देता है, जिससे severe हाइपरएसिडिटी, पेट फूलना (Bloating) और अल्सर का खतरा बढ़ जाता है।4. खाली पेट जामुन खाना और पानी पीनासुबह उठते ही खाली पेट जामुन खाने की गलती कभी न करें। खाली पेट जामुन खाने से पेट में तेजी से एसिड बनता है, जिससे जी मिचलाना और उल्टी की शिकायत हो सकती है। इसके अलावा, जामुन खाने के तुरंत बाद गटगट करके पानी पीने से बचना चाहिए। जामुन के तुरंत बाद पानी पीने से पाचन अग्नि मंद पड़ जाती है, जिससे कफ, खांसी और गले में खराश की समस्या हो सकती है।जामुन खाने का सही समय और तरीका क्या है?हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार, जामुन खाने का सबसे सही समय दोपहर के खाने के 1 घंटे बाद या शाम के नाश्ते (Snacks Time) के दौरान होता है। जामुन पर थोड़ा सा काला नमक या भुना जीरा छिड़क कर खाने से यह आसानी से पच जाता है और इसके सभी पोषक तत्व शरीर को पूरी तरह मिलते हैं।

न्यूज़ इंडिया लाइव 22 Jul 2026 8:24 am

सोने से भी महंगी बिकती है यह 'कीड़ा जड़ी'! जानिए हिमालय की गुच्ची जैसी कीमती जड़ी-बूटी के अनगिनत फायदे

हिमालय के दुर्गम और बर्फीले इलाकों में पाई जाने वाली 'कीड़ा जड़ी' (Cordyceps Sinensis / Himalayan Gold) दुनिया की सबसे दुर्लभ और महंगी जड़ी-बूटियों में से एक है। इसकी कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में लाखों रुपये प्रति किलोग्राम तक होती है, जिसके कारण इसे 'हिमालयन गोल्ड' भी कहा जाता है। यह कोई साधारण पौधा या जड़ी नहीं है, बल्कि यह एक प्राकृतिक फंगस (Fungus) और कीड़े (Caterpillar) का अनूठा मिश्रण है। सर्दियों के मौसम में एक खास प्रजाति का कीड़ा जमीन के अंदर चला जाता है और उस पर फंगस उग आती है। गर्मियों में जब बर्फ पिघलती है, तो यह कीड़ा मर जाता है और उसके सिर से एक जड़ी जैसा पौधा बाहर निकल आता है।स्टैमिना, एनर्जी और फर्टिलिटी बढ़ाने का रामबाण उपायपारंपरिक तिब्बती और चीनी चिकित्सा पद्धति में कीड़ा जड़ी का इस्तेमाल सदियों से एक शक्तिशाली 'एडाप्टोजेन' (Adaptogen) के रूप में किया जाता रहा है। इसका सबसे मुख्य फायदा शरीर का स्टैमिना, ऊर्जा का स्तर और एथलेटिक परफॉरमेंस बढ़ाना है। यह शरीर की कोशिकाओं में एटीपी (ATP) के उत्पादन को बढ़ावा देती है, जिससे थकावट दूर होती है और सांस लेने की क्षमता मजबूत होती है। इसके अलावा, पुरुषों और महिलाओं में फर्टिलिटी (प्रजनन क्षमता), कामेच्छा (Libido) और शारीरिक कमजोरी को दूर करने में इसे अत्यंत प्रभावकारी माना गया है।इम्युनिटी बूस्टर, एंटी-एजिंग और दिल की सेहत के लिए वरदानकीड़ा जड़ी में भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट्स, पॉलीसेकेराइड्स और कॉर्डिसेपिन (Cordycepin) जैसे सक्रिय तत्व पाए जाते हैं। ये तत्व शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity System) को कई गुना मजबूत बनाते हैं। यह बढ़ती उम्र के असर यानी झुर्रियों और कमजोरी को कम करने में मदद करती है। इसके नियमित सेवन से बैड कोलेस्ट्रॉल का स्तर नियंत्रित रहता है, ब्लड प्रेशर संतुलित होता है और दिल के दौरे (Heart Attack) का जोखिम काफी कम हो जाता है।कैंसर रोधी गुण और फेफड़ों-किडनी की सुरक्षाकई आधुनिक शोधों में यह पाया गया है कि कीड़ा जड़ी में कैंसर रोधी (Anti-Cancer) गुण मौजूद होते हैं, जो शरीर में कैंसर की कोशिकाओं की वृद्धि को रोकने में मदद करते हैं। इसके अलावा, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और फेफड़ों के अन्य संक्रमण से जूझ रहे मरीजों के लिए यह एक बेहतरीन औषधि है। यह किडनी (गुर्दे) की कार्यप्रणाली को बेहतर बनाकर शरीर से हानिकारक टॉक्सिन्स को बाहर निकालने में मदद करती है।उपयोग में सावधानी: बिना डॉक्टरी सलाह के न करें सेवनचूंकि कीड़ा जड़ी अत्यधिक शक्तिशाली और गर्म तासीर की होती है, इसलिए इसका उपयोग बहुत सीमित और सही मात्रा में ही किया जाना चाहिए। बाजार में इसके नाम पर कई तरह की मिलावटी या नकली जड़ी-बूटियां भी बेची जाती हैं। हेल्थ एक्सपर्ट्स की सलाह है कि ऑटोइम्यून बीमारियों, गर्भावस्था या किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित लोगों को बिना किसी कुशल आयुर्वेद विशेषज्ञ या डॉक्टर की सलाह के इसका सेवन बिल्कुल नहीं करना चाहिए।

न्यूज़ इंडिया लाइव 22 Jul 2026 8:23 am

जानिए किस बर्तन में रखा खाना खाने से बिगड़ सकती है सेहत और कैंसर तक का खतरा!

हम अक्सर अपनी सेहत को दुरुस्त रखने के लिए पौष्टिक भोजन, हरी सब्जियों और फलों का चुनाव करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस बर्तन में आपका खाना पकाया या रखा जा रहा है, वह भी आपकी सेहत तय करने में उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है? आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान दोनों ही इस बात की पुष्टि करते हैं कि गलत धातुओं या सामग्रियों से बने बर्तनों का इस्तेमाल करने से भोजन के पोषक तत्व तो नष्ट होते ही हैं, साथ ही उनमें हानिकारक रसायन (Chemicals) भी घुल जाते हैं। ये रसायन धीरे-धीरे शरीर में जमा होकर गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं।1. एल्युमीनियम के बर्तन: स्लो पॉइजन की तरह करते हैं कामभारतीय रसोईघरों में प्रेशर कुकर से लेकर कड़ाही तक एल्युमीनियम के बर्तनों का इस्तेमाल बहुत आम है। हालांकि, स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, एल्युमीनियम में खाना पकाना या लंबे समय तक रखना बेहद नुकसानदेह होता है। जब एल्युमीनियम में खट्टी या एसिडिक चीजें (जैसे टमाटर, दही, नींबू या सिरका) पकाई जाती हैं, तो यह धातु भोजन के साथ प्रतिक्रिया (React) करके उसमें घुलने लगती है। लंबे समय तक एल्युमीनियम के बर्तनों का इस्तेमाल करने से पेट की बीमारियां, अल्सर, लिवर विकार, हड्डियों का कमजोर होना और अल्जाइमर (याददाश्त कमजोर होना) जैसी समस्याएं हो सकती हैं।2. खराब या छिला हुआ नॉन-स्टिक कुकवेयर: टेफ्लॉन का गंभीर खतराआजकल कम तेल में खाना पकाने के लिए नॉन-स्टिक बर्तनों का चलन काफी बढ़ गया है। लेकिन जब इन बर्तनों पर लगी 'टेफ्लॉन' (PFOA) की कोटिंग पुरानी हो जाती है या उसमें खरोंच (Scratch) आ जाती है, तो यह अत्यंत विषैली हो जाती है। अत्यधिक तेज आंच पर गर्म करने या छिले हुए नॉन-स्टिक बर्तन में खाना बनाने से जहरीली गैसे और केमिकल कण खाने में मिल जाते हैं। यह शरीर में जाकर थायराइड, हार्मोनल असंतुलन और यहां तक कि कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों का कारण बन सकता है।3. प्लास्टिक के डिब्बे व बर्तन: माइक्रोप्लास्टिक और केमिकल लोचागर्म खाना कभी भी प्लास्टिक के बर्तनों या पॉलीथिन में नहीं रखना चाहिए। प्लास्टिक में 'बिसफेनॉल ए' (BPA) और 'फ्थेलेट्स' (Phthalates) जैसे खतरनाक केमिकल्स होते हैं। जब गर्म खाना या चाय प्लास्टिक के संपर्क में आती है, तो ये केमिकल्स पिघलकर खाने में घुल जाते हैं। प्लास्टिक के बर्तनों में नियमित खाना खाने से पुरुषों और महिलाओं में फर्टिलिटी (प्रजनन क्षमता) पर बुरा असर पड़ता है, इम्युनिटी कमजोर होती है और बच्चों के मानसिक विकास में बाधा आती है।4. तांबे और पीतल के बर्तन: एसिडिक भोजन के लिए खतरनाकतांबे (Copper) और पीतल के बर्तन सेहत के लिए बहुत गुणकारी माने जाते हैं, लेकिन इनका गलत इस्तेमाल सेहत पर भारी पड़ सकता है। तांबे के बर्तन में पानी पीना तो फायदेमंद है, लेकिन तांबे या बिना कलई (Tin Coating) वाले पीतल के बर्तनों में कभी भी खट्टा खाना, दही, छाछ, अचार या नींबू का रस नहीं रखना चाहिए। खट्टे पदार्थों के संपर्क में आते ही तांबा कॉपर सल्फेट में बदल जाता है, जिससे फूड पॉइजनिंग (Food Poisoning), जी मिचलाना, उल्टी और पेट में तेज दर्द की समस्या हो सकती है।तो फिर किस बर्तन में खाना पकाना और रखना है सबसे सुरक्षित?स्वास्थ्य विशेषज्ञों और आयुर्वेद के अनुसार, खाना बनाने और रखने के लिए मिट्टी के बर्तन, स्टेनलेस स्टील (18/10 ग्रेड), लोहा (Cast Iron) और कांस्य (Bronze) सबसे सुरक्षित और सेहतमंद विकल्प हैं। मिट्टी के बर्तनों में भोजन पकाने से उसके 100% पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं, जबकि लोहे के बर्तनों में पकाने से शरीर को स्वाभाविक रूप से आयरन मिलता है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 22 Jul 2026 8:21 am

रोज कितनी शराब पीना है सुरक्षित? जानिए WHO की नई चेतावनी, स्टैंडर्ड ड्रिंक का गणित और लीवर पर होने वाला असर

अक्सर दोस्तों की महफिल में या सोशल गैदरिंग में यह बहस छिड़ जाती है कि 'रोजाना थोड़ी सी शराब पीना सेहत के लिए नुकसानदेह नहीं होता' या फिर 'कम मात्रा में रेड वाइन या बीयर पीना दिल के लिए अच्छा है।' हालांकि, स्वास्थ्य विशेषज्ञों और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की ताजा गाइडलाइंस ने इस धारणा को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। WHO के मुताबिक, शराब (Alcohol) की कोई भी मात्रा सेहत के लिए पूरी तरह 'सुरक्षित' (Safe Limit) नहीं होती। शराब एक टॉक्सिक (विषैला) और कार्सिनोजेनिक (कैंसर पैदा करने वाला) पदार्थ है। इसका मतलब यह है कि आप जितनी कम या ज्यादा मात्रा में शराब का सेवन करते हैं, स्वास्थ्य जोखिम उसी अनुपात में घटता या बढ़ता है।क्या होता है 'स्टैंडर्ड ड्रिंक' का गणित? पुरुषों और महिलाओं के लिए दिशानिर्देशमेडिकल साइंस में शराब की मात्रा को मापने के लिए 'स्टैंडर्ड ड्रिंक' (Standard Drink) का इस्तेमाल किया जाता है। एक स्टैंडर्ड ड्रिंक में लगभग 10 से 14 ग्राम शुद्ध अल्कोहल होता है। अगर अलग-अलग पेयों के हिसाब से समझें तो:बीयर: लगभग 330 से 350 मि.ली. (5% अल्कोहल)वाइन: लगभग 140 से 150 मि.ली. (12% अल्कोहल)हार्ड लिकर (विस्की, वोदका, रम, जिन): लगभग 30 से 40 मि.ली. का एक पेग (40% अल्कोहल)विभिन्न अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थाओं (जैसे US Dietary Guidelines) के अनुसार, यदि कोई वयस्क शराब पीता ही है, तो पुरुषों के लिए दिन में अधिकतम 2 स्टैंडर्ड ड्रिंक और महिलाओं के लिए दिन में 1 स्टैंडर्ड ड्रिंक को 'मॉडरेट' या कम जोखिम वाली सीमा माना गया है। महिलाओं के शरीर में पानी की मात्रा पुरुषों से कम होने और एंजाइम अंतर के कारण अल्कोहल का असर उन पर अधिक तेजी से होता है।रोजाना शराब पीने से शरीर के इन अंगों पर पड़ता है सीधा असरचाहे मात्रा कम ही क्यों न हो, रोज शराब पीने की आदत शरीर के कई प्रमुख अंगों को नुकसान पहुंचाती है:लीवर (यकृत): रोज शराब पीने से लीवर को अल्कोहल मेटाबोलाइज करने का समय नहीं मिलता, जिससे पहले फैटी लीवर (Fatty Liver), फिर हेपेटाइटिस और अंततः लीवर सिरोसिस (Liver Cirrhosis) का खतरा बन जाता है।हृदय और ब्लड प्रेशर: नियमित सेवन से हाई ब्लड प्रेशर (Hypertension), अनियमित धड़कन (Arrhythmia) और कार्डियोमायोपैथी का जोखिम बढ़ता है।मानसिक स्वास्थ्य: शराब एक डिप्रेशेंट है। यह दिमाग के न्यूरोट्रांसमीटर्स को असंतुलित कर नींद में खलल, डिप्रेशन, एंग्जायटी और याददाश्त कमजोर करने का कारण बनती है।कैंसर का खतरा: नियमित शराब के सेवन से ब्रेस्ट कैंसर, कोलन कैंसर, माउथ और इसोफेगस (भोजन नली) के कैंसर का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।शराब की लत से बचने और सेहतमंद रहने के लिए जरूरी सलाहयदि आप शराब पीते हैं, तो हफ्ते में कम से कम 3 से 4 दिन पूरी तरह 'अल्कोहल-फ्री' (Alcohol-Free Days) रखें ताकि आपके लीवर और शरीर के अन्य अंगों को खुद को रिकवर करने का समय मिल सके। शराब पीते समय खूब पानी पिएं, कभी भी खाली पेट शराब न पिएं और इसे तनाव मिटाने या नींद लाने का जरिया न बनाएं। अगर आपको रोजाना शराब पीने की तलब होती है या बिना ड्रिंक किए बेचैनी महसूस होती है, तो यह निर्भरता (Dependency) का संकेत है और आपको बिना देर किए किसी डॉक्टर या काउंसलर से सलाह लेनी चाहिए।

न्यूज़ इंडिया लाइव 22 Jul 2026 8:20 am

भारत में सर्वाइकल कैंसर के मामलों में 37% की भारी गिरावट! जानिए महिलाओं में कम होते इस जानलेवा कैंसर के पीछे की असली वजह, लक्षण और बचाव के उपाय!

महिलाओं के स्वास्थ्य और कैंसर जागरूकता के मोर्चे पर भारत से एक बेहद उम्मीद जगाने वाली खबर सामने आई है। स्वास्थ्य क्षेत्र की हालिया रिपोर्टों और अध्ययनों के अनुसार, भारत में महिलाओं में होने वाले सर्वाइकल कैंसर यानी गर्भाशय ग्रीवा (Cervix) के कैंसर के मामलों में पिछले कुछ वर्षों में लगभग 37 प्रतिशत की उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। कभी भारतीय महिलाओं में सबसे ज्यादा पाया जाने वाला यह कैंसर अब जागरूकता, सरकारी अभियानों और समय पर सही डॉक्टरी जांच की बदौलत धीरे-धीरे नियंत्रण में आ रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों और ऑनकोलॉजिस्ट्स (कैंसर विशेषज्ञों) ने इस गिरावट को भारत के स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र की एक बहुत बड़ी कामयाबी बताया है।मामलों में गिरावट के 3 मुख्य कारण: HPV वैक्सीन, स्क्रीनिंग और बेहतर स्वच्छतास्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, सर्वाइकल कैंसर के नए मामलों में इतनी बड़ी गिरावट आने के पीछे 3 प्रमुख कारण जिम्मेदार हैं:एचपीवी (HPV) वैक्सीनेशन: सर्वाइकल कैंसर का मुख्य कारण ह्यूमन पैपिलोमावायरस (HPV) का संक्रमण होता है। पिछले कुछ सालों में एचपीवी वैक्सीन के प्रति महिलाओं और किशोरियों में जागरूकता काफी बढ़ी है। सही उम्र में टीका लगने से वायरस का संक्रमण रुक रहा है।पैप स्मियर (Pap Smear) और नियमित स्क्रीनिंग: महिलाओं में नियमित हेल्थ चेकअप और पैप स्मियर टेस्ट कराने का चलन बढ़ा है। इस टेस्ट की मदद से कैंसर बनने से पहले ही प्री-कैंसरस सेल्स (Pre-cancerous cells) की पहचान कर ली जाती है, जिससे समय रहते इलाज संभव हो पा रहा है।मासिक धर्म स्वच्छता (Menstrual Hygiene) और जागरूकता: ग्रामीण व शहरी इलाकों में सैनिटरी नैपकिन के इस्तेमाल, बेहतर व्यक्तिगत स्वच्छता (Personal Hygiene) और सरकार द्वारा चलाए जा रहे स्वास्थ्य अभियानों ने इस बीमारी के जोखिम को काफी कम किया है।सर्वाइकल कैंसर के शुरुआती लक्षण: जिन्हें कभी न करें नजरअंदाजहालांकि मामलों में गिरावट आई है, लेकिन फिर भी इस बीमारी के प्रति सतर्क रहना हर महिला के लिए आवश्यक है। सर्वाइकल कैंसर के शुरुआती लक्षणों में:पीरियड्स के अलावा या संभोग (Intercourse) के बाद असामान्य ब्लीडिंग होना।मेनोपॉज (मासिक धर्म बंद होने) के बाद भी ब्लीडिंग या स्पॉटिंग होना।वजाइना से बदबूदार या असामान्य डिस्चार्ज (वाइट पानी) आना।पेल्विक एरिया (पेट के निचले हिस्से) या कमर में लगातार दर्द बने रहना।यदि किसी महिला को ऐसे लक्षण दिखाई दें, तो उन्हें बिना किसी शर्म या झिझक के तुरंत गायनेकोलॉजिस्ट (स्त्री रोग विशेषज्ञ) से संपर्क करना चाहिए।30 वर्ष की उम्र के बाद कराएं नियमित जांच, 9 से 14 वर्ष की बालिकाओं के लिए वैक्सीन अनिवार्यहेल्थ एक्सपर्ट्स का सुझाव है कि 9 से 14 वर्ष की आयु की सभी बालिकाओं को एचपीवी की वैक्सीन जरूर लगवा देनी चाहिए, क्योंकि यह सर्वाइकल कैंसर से बचाव का सबसे अचूक हथियार है। इसके अलावा, 30 वर्ष से अधिक उम्र की हर महिला को हर 3 से 5 साल में कम से कम एक बार पैप स्मियर या एचपीवी डीएनए टेस्ट जरूर कराना चाहिए। समय पर की गई जांच और टीकाकरण ही भारत से सर्वाइकल कैंसर को पूरी तरह जड़ से खत्म करने का सबसे प्रभावी रास्ता है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 22 Jul 2026 8:19 am

Monsoon Health Tips by Ayush Ministry: बारिश के मौसम में बीमारियों का खतरा? आयुष मंत्रालय ने जारी की मानसून हेल्थ गाइडलाइन्स, खुद को और परिवार को यूं रखें सेफ

बारिश का सुहावना मौसम जहाँ भीषण गर्मी से राहत दिलाता है, वहीं अपने साथ डेंगू, मलेरिया, टाइफाइड, डायरिया और स्किन इन्फेक्शन जैसी तमाम मौसमी बीमारियों की सौगात भी लेकर आता है। मानसून के दौरान हवा में नमी (Humidity) बढ़ने और पाचन अग्नि मंद पड़ने के कारण शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) कमजोर हो जाती है। इस मौसमी संकट से निपटने और लोगों को स्वस्थ रखने के उद्देश्य से आयुष मंत्रालय (Ministry of Ayush) ने मानसून विशेष स्वास्थ्य दिशानिर्देश जारी किए हैं। एक रिपोर्टर के नजरिए से देखें तो किचन में मौजूद आयुर्वेदिक औषधियों और जीवनशैली में छोटे-छोटे बदलावों को अपनाकर आप बिना किसी भारी-भरकम दवा के इस पूरे सीजन में पूरी तरह सेहतमंद रह सकते हैं। आइए जानते हैं आयुष मंत्रालय द्वारा सुझाए गए प्रमुख उपाय।1. पाचन शक्ति रखें मजबूत: हल्का और सुपाच्य भोजन लेंआयुर्वेद के अनुसार वर्षा ऋतु में जठराग्नि (पाचन अग्नि) कमजोर हो जाती है, इसलिए खान-पान पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी गई है:ताजा और गर्म खाना: बासी या ठंडा भोजन खाने से बचें। हमेशा ताजा पका हुआ, हल्का और सुपाच्य भोजन ही ग्रहण करें।सेंधा नमक और सोंठ का प्रयोग: खाना बनाते समय उसमें चुटकी भर सेंधा नमक, भुना जीरा, सोंठ (सूखा अदरक) और हींग का उपयोग करें। यह आपकी पाचन क्रिया को दुरुस्त रखता है।उबला पानी (Boiled Water): पीने के लिए हमेशा पानी को अच्छी तरह उबालकर, गुनगुना करके ही पिएं। उबला पानी शरीर के टॉक्सिन्स (विषैले पदार्थों) को बाहर निकालता है और वॉटर बॉर्न डिजीज से बचाता है।2. इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए काढ़ा और हर्बल टीमौसमी वायरल इन्फेक्शन, सर्दी और जुकाम से बचने के लिए आयुष मंत्रालय ने हर्बल ड्रिंक्स को अपनी दिनचर्या में शामिल करने की सिफारिश की है:आयुष काढ़ा: तुलसी, दालचीनी, काली मिर्च और शुंठी (सोंठ) को पानी में उबालकर तैयार किया गया काढ़ा दिन में एक बार पिएं। स्वादानुसार इसमें थोड़ा गुड़ या नींबू का रस मिला सकते हैं।हल्दी वाला दूध (Golden Milk): रात को सोने से पहले आधा चम्मच हल्दी वाला गर्म दूध पीने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है।3. मच्छरों से बचाव और घर के आसपास स्वच्छतामानसून में मच्छरों का प्रकोप तेजी से बढ़ता है, जो डेंगू और मलेरिया जैसी गंभीर बीमारियों की वजह बनता है:नीम के तेल का दिया या धुआं: शाम के समय घर में नीम के तेल का दीपक जलाएं या नीम के सूखे पत्तों का धुआं करें। यह एक प्राकृतिक मॉस्किटो रिपेलेंट (Mosquito Repellent) का काम करता है।जलजमाव न होने दें: घर के आसपास, कूलर, गमलों या खाली बर्तनों में पानी जमा न होने दें।4. स्किन इन्फेक्शन से बचाव के आयुर्वेदिक टिप्सनमी के कारण त्वचा में खुजली, घमौरियां और फंगल इन्फेक्शन होना बेहद आम है:नीम के पानी से स्नान: नहाने के पानी में नीम के पत्ते उबालकर या नीम का रस मिलाकर नहाने से स्किन पर मौजूद बैक्टीरिया खत्म होते हैं।तिल या सरसो का तेल: नहाने से पहले शरीर पर हल्का तिल का तेल या सरसो के तेल की मालिश करना त्वचा के लिए सुरक्षा कवच का काम करता है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 21 Jul 2026 8:38 am

भारत में कोरोना के नए वैरिएंट 'Omicron RF.5' की एंट्री: आंध्र प्रदेश में पुष्टि के बाद स्वास्थ्य विभाग अलर्ट, जानिए यह नया स्ट्रेन कितना खतरनाक है और क्या हैं इसके लक्षण

देश में एक बार फिर कोरोना वायरस के रूप बदलने (म्यूटेशन) के कारण स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ गई है। आंध्र प्रदेश के कडप्पा जिले से भेजे गए कोविड-19 पॉजिटिव मरीजों के सैंपलों की जीनोम सीक्वेंसिंग में कोरोना के एक बिल्कुल नए सब-वेरिएंट ओमिक्रॉन RF.5 (Omicron RF.5) की पुष्टि हुई है। पुणे स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ विायरोलॉजी (NIV) की रिपोर्ट में इस नए स्ट्रेन का खुलासा होने के बाद राज्य सरकार तुरंत एक्शन मोड में आ गई है। एक रिपोर्टर के नजरिए से देखें तो यह खबर पैनिक होने की नहीं बल्कि सावधान रहने की है, क्योंकि यह नया स्ट्रेन पहले से ही सिंगापुर और कुछ अन्य दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों में फैल रहा है।क्या ओमिक्रॉन RF.5 पुराना वेरिएंट है या ज्यादा खतरनाक?इस नए वेरिएंट के सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या यह डेल्टा या पिछले अन्य वेरिएंट्स की तरह जानलेवा है? इस पर आंध्र प्रदेश के चिकित्सा शिक्षा निदेशक (DME) डॉ. ए. विष्णुवर्धन ने आधिकारिक बयान जारी कर स्पष्ट किया है कि फिलहाल उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है कि RF.5 वेरिएंट अन्य ओमिक्रॉन स्ट्रेन की तुलना में अधिक खतरनाक या जानलेवा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह वेरिएंट स्वाभाविक रूप से JN.1 लीनेज से विकसित हुआ है, न कि दो अलग-अलग स्ट्रेन के मिलने (Recombinant) से बना है। इसलिए जनता को घबराने की बिल्कुल जरूरत नहीं है, बल्कि बुनियादी सावधानी ही इससे बचाव का सबसे बड़ा हथियार है।बुजुर्ग और गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोग रहें बेहद सावधानभले ही यह वेरिएंट सामान्य तौर पर गंभीर न हो, लेकिन स्वास्थ्य विभाग ने हाई-रिस्क ग्रुप वाले लोगों को विशेष रूप से सतर्क रहने की चेतावनी दी है। आंध्र प्रदेश में इस हालिया उछाल के दौरान जिन 4 मरीजों की मौत दर्ज की गई है, वे सभी पहले से ही गंभीर क्रोनिक बीमारियों (Comorbidities) से पीड़ित थे। डॉक्टरों के अनुसार, निम्नलिखित श्रेणियों के लोगों को शुरुआती लक्षणों को बिल्कुल भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए:सीनियर सिटीजन: 60 साल से अधिक उम्र के बुजुर्ग।गर्भवती महिलाएं: गर्भधारण के समय कमजोर इम्यूनिटी के कारण खतरा।गंभीर बीमारियों से पीड़ित: अनियंत्रित डायबिटीज (मधुमेह), हाई ब्लड प्रेशर, किडनी की बीमारी, लिवर की समस्या या दिल के मरीजों को विशेष ध्यान रखना होगा।फ्लू जैसे ही हैं इसके लक्षण, अस्पताल पूरी तरह तैयारडॉक्टरों के मुताबिक, ओमिक्रॉन RF.5 वेरिएंट के लक्षण भी कोरोना के पिछले ओमिक्रॉन वेरिएंट्स की तरह ही हैं और यह मुख्य रूप से श्वसन तंत्र के ऊपरी हिस्से (Upper Respiratory Tract) को प्रभावित करता है। इसके प्रमुख लक्षणों में शामिल हैं:गले में खराश या दर्द होना।सूखी या बलगम वाली लगातार खांसी आना।हल्का से तेज बुखार और सिरदर्द होना।नाक बहना या नाक का पूरी तरह ब्लॉक हो जाना।अत्यधिक थकान और शरीर के जोड़ों व मांसपेशियों में दर्द।स्थिति से निपटने के लिए आंध्र प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सत्य कुमार यादव ने वरिष्ठ अधिकारियों के साथ आपातकालीन समीक्षा बैठक की है। उन्होंने बताया कि राज्य में वर्तमान में कुल 16-19 सक्रिय मामले हैं, जो पूरी तरह से छिटपुट (Sporadic) हैं। राज्य के सभी टीचिंग अस्पतालों में विशेष कोविड आइसोलेशन वार्ड और बेड तैयार कर दिए गए हैं, साथ ही टेस्टिंग किट्स की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की गई है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत की अधिकांश आबादी में वैक्सीन और पिछले संक्रमण के कारण मजबूत हाइब्रिड इम्यूनिटी मौजूद है, इसलिए किसी बड़ी लहर की आशंका बेहद कम है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 20 Jul 2026 9:38 am

Periods Exercise: क्या पीरियड्स के दौरान एक्सरसाइज करनी चाहिए? आज ही दूर करें अपना कंफ्यूजन, एक्सपर्ट से जानें सही नियम और 4 बेस्ट वर्कआउट!

लखनऊ। मासिक धर्म यानी पीरियड्स (Periods) हर महिला के जीवन का एक अनिवार्य और प्राकृतिक हिस्सा है। इन दिनों महिलाओं को पेट में तेज ऐंठन (Cramps), पीठ दर्द, भारी थकान, मूड स्विंग्स और चिड़चिड़ेपन जैसी शारीरिक व मानसिक समस्याओं से गुजरना पड़ता है। ऐसे नाज़ुक समय में अक्सर महिलाओं के मन में एक बड़ा असमंजस और सवाल हमेशा बना रहता है—क्या पीरियड्स के दिनों में एक्सरसाइज (Workout) करना सुरक्षित है? या इस दौरान पूरी तरह आराम करना चाहिए?टीवी9 हिंदी की एक विशेष लाइफस्टाइल और हेल्थ रिपोर्ट के मुताबिक, फिटनेस और स्त्री रोग विशेषज्ञों (Gynecologists) ने इस पुराने मिथक को पूरी तरह खारिज कर दिया है कि पीरियड्स में वर्कआउट नहीं करना चाहिए। एक्सपर्ट्स का स्पष्ट मानना है कि यदि आपकी तबीयत बहुत ज्यादा खराब नहीं है, तो इन दिनों में हल्का व्यायाम करना न सिर्फ सुरक्षित है, बल्कि यह पीरियड्स के दर्द और मानसिक तनाव को दूर करने की एक बेहतरीन प्राकृतिक औषधि भी साबित हो सकता है।पीरियड्स में एक्सरसाइज करने के 3 बेमिसाल फायदे:1. पीरियड्स क्रैम्प्स और ऐंठन से राहत: जब हम कोई भी हल्की फिजिकल एक्टिविटी या एक्सरसाइज करते हैं, तो शरीर में 'एंडोर्फिन' (Endorphins) नामक हार्मोन का स्राव होता है। इसे 'फील-गुड' हार्मोन भी कहा जाता है, जो एक नेचुरल पेनकिलर (Painkiller) की तरह काम करता है और पेट व कमर की मांसपेशियों की ऐंठन को तेजी से कम करता है।2. मूड स्विंग्स और चिड़चिड़ेपन का नाश: इन दिनों शरीर में होने वाले हार्मोनल उतार-चढ़ाव के कारण मूड खराब होना बेहद आम है। हल्का वर्कआउट करने से मस्तिष्क में ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है, जिससे तनाव कम होता है और मानसिक ताजगी महसूस होती है।3. भारीपन और सुस्ती से मुक्ति: कई महिलाएं पीरियड्स के दौरान दिनभर बिस्तर पर लेटी रहती हैं, जिससे शरीर में सुस्ती और भारीपन और ज्यादा बढ़ जाता है। थोड़ा सा टहलने या स्ट्रेचिंग करने से शरीर ऊर्जान्वित (Energized) महसूस करता है।एक्सपर्ट गाइडेंस: इन दिनों के लिए 4 सबसे सुरक्षित और बेस्ट वर्कआउट:1. धीमी गति से टहलना (Light Walking): यह पीरियड्स के दिनों के लिए सबसे आसान और सुरक्षित व्यायाम है। खुली हवा में 15 से 20 मिनट के लिए सामान्य गति से टहलने से फेफड़ों को पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती है और पेल्विक एरिया का ब्लड फ्लो बेहतर होता है।2. हल्की स्ट्रेचिंग (Gentle Stretching): मांसपेशियों के कड़ेपन और पीठ दर्द को दूर करने के लिए हल्की फुलकी स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज बेहद असरदार होती हैं। यह शरीर के निचले हिस्से के तनाव को कम करती हैं।3. योग और प्राणायाम (Yoga): पीरियड्स के दर्द को शांत करने के लिए भुजंगासन, शशांकासन या वज्रासन जैसे सरल योग आसन किए जा सकते हैं। साथ ही गहरी सांस लेने वाले प्राणायाम (ब्रीदिंग एक्सरसाइज) करने से दिमाग को तुरंत शांति मिलती है।4. लाइट कार्डियो (Low-Volume Cardio): यदि आपका शरीर इजाजत दे, तो आप बहुत ही हल्की साइकिलिंग या कम इंटेंसिटी वाला कार्डियो वर्कआउट भी कर सकती हैं।भूलकर भी न करें ये गलतियां, इन वर्कआउट्स से बनाएं पूरी दूरी:विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि पीरियड्स में एक्सरसाइज करते समय अपने शरीर की आवाज सुनना (Listen to your body) सबसे जरूरी है। इन दिनों नीचे दिए गए अभ्यासों से पूरी तरह परहेज करना चाहिए:भारी वजन उठाना (Heavy Weight Lifting): जिम में जाकर भारी डंबल्स उठाना या अत्यधिक इंटेंसिटी वाला वेट वर्कआउट करने से बचें, क्योंकि इससे पेट के निचले हिस्से पर दबाव बढ़ता है और ब्लीडिंग तेज हो सकती है।उल्टे होने वाले आसन (Inversions): योग के दौरान शीर्षासन, सर्वांगासन या कोई भी ऐसा आसन न करें जिसमें पैर ऊपर और सिर नीचे हो। वास्तु और मेडिकल दोनों ही नजरिए से इसे इन दिनों में सही नहीं माना जाता।अत्यधिक थकान होने पर जबरदस्ती: यदि आपको पेट में असहनीय दर्द है, बहुत ज्यादा फ्लो (Heavy Bleeding) हो रहा है या चक्कर आ रहे हैं, तो वर्कआउट को तुरंत रोक दें और केवल आराम करें।

न्यूज़ इंडिया लाइव 19 Jul 2026 9:43 pm

White Hair Prevention: सिर पर दिखने लगे हैं शुरुआती सफेद बाल? डर्मेटोलॉजिस्ट की बताई इन 3 बातों को आज ही नोट कर लें, रुक जाएगा बालों का पकना

लखनऊ। आज के समय में उम्र से पहले बालों का सफेद होना (Premature Hair Greying) युवाओं के लिए सबसे बड़ी चिंताओं में से एक बन गया है। जब आईने में अचानक सिर पर पहला या शुरुआती कुछ सफेद बाल नजर आते हैं, तो अधिकांश लोग घबरा जाते हैं। इस घबराहट में लोग अक्सर या तो उस सफेद बाल को जड़ से तोड़ देते हैं या फिर तुरंत केमिकल युक्त महंगे हेयर कलर्स और डाई का इस्तेमाल करना शुरू कर देते हैं। त्वचा और बाल रोग विशेषज्ञों (डर्मेटोलॉजिस्ट) के मुताबिक, ये दोनों ही तरीके बेहद खतरनाक हैं और इनसे बाल काले होने की बजाय बाकी के बाल भी तेजी से सफेद होने लगते हैं। डॉक्टर ने बताया है कि शुरुआत में कुछ सही कदम उठाकर और आदतों में बदलाव करके बालों के सफेद होने की प्रक्रिया को काफी हद तक धीमा किया जा सकता है।पहली गलती से बचें: सफेद बाल को कभी न नोचें या तोड़ेंडर्मेटोलॉजिस्ट के अनुसार, सिर पर पहला सफेद बाल दिखने पर उसे उखाड़ने (Plucking) की भूल कभी न करें। हालांकि बाल तोड़ने से अन्य बाल सफेद नहीं होते (यह एक मिथक है), लेकिन ऐसा करने से बालों के फॉलिकल्स (जड़ें) पर गहरा दबाव पड़ता है और वे हमेशा के लिए डैमेज हो सकते हैं। इससे उस जगह पर दोबारा बाल उगना बंद हो सकते हैं या फिर वहां इन्फेक्शन हो सकता है। यदि कोई बाल बहुत ज्यादा परेशान कर रहा है, तो उसे जड़ के पास से छोटी कैंची की मदद से काट दें।त्वचा विशेषज्ञ की सलाह: तुरंत केमिकल कलर्स से बनाएं दूरीशुरुआती दौर में ही बालों पर अमोनिया और अन्य हानिकारक केमिकल्स से भरपूर हेयर डाई या कलर लगाने से बचें। ये केमिकल्स बचे हुए काले बालों के नेचुरल मेलेनिन (Melanin - वह पिगमेंट जो बालों को काला रखता है) को तेजी से नष्ट कर देते हैं। इसके बजाय डर्मेटोलॉजिस्ट की सलाह पर एंटीऑक्सीडेंट्स, पेप्टाइड्स और मेलाटोनिन युक्त हेयर सीरम का इस्तेमाल करें, जो बालों की जड़ों को पोषण देकर मेलेनिन के स्तर को बनाए रखने में मदद करते हैं।लाइफस्टाइल और डाइट में करें ये 3 बड़े बदलावडॉक्टरों के मुताबिक, बालों का असमय सफेद होना शरीर के आंतरिक असंतुलन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस (Oxidative Stress) का परिणाम होता है, जिसे इन तरीकों से रोका जा सकता है:पोषण की कमी दूर करें: अपनी डाइट में विटामिन बी-12, विटामिन डी, आयरन, जिंक और कॉपर से भरपूर खाद्य पदार्थ शामिल करें। इसके लिए हरी पत्तेदार सब्जियां, नट्स, भीगे हुए बादाम और आंवला का सेवन बेहद फायदेमंद है।तनाव और धूम्रपान पर नियंत्रण: अत्यधिक मानसिक तनाव और स्मोकिंग (धूम्रपान) शरीर में फ्री रेडिकल्स को बढ़ाते हैं, जो मेलेनिन बनाने वाली कोशिकाओं को खत्म कर देते हैं। तनाव को कम करने के लिए योग और मेडिटेशन का सहारा लें।सही हेयर केयर रूटीन: धूप में निकलते समय बालों को स्कार्फ या टोपी से ढकें, क्योंकि यूवी किरणें (UV Rays) भी बालों को सफेद करती हैं। हमेशा सल्फेट और पैराबेन-फ्री माइल्ड शैम्पू का ही चुनाव करें।

न्यूज़ इंडिया लाइव 18 Jul 2026 8:20 am

Monsoon Skin Care: बारिश के मौसम में चेहरे पर निकल आए हैं ढेरों पिंपल्स? रात को सोने से पहले करें ये 3 काम, गायब हो जाएंगे मुहांसे

लखनऊ। मानसून के सुहाने मौसम में जहां एक तरफ लोगों को चिलचिलाती गर्मी से राहत मिलती है, वहीं दूसरी तरफ हवा में बढ़ी नमी (ह्यूमिडिटी) हमारी त्वचा के लिए आफत बन जाती है। इस मौसम में अत्यधिक पसीना और सीबम (तैलिय स्राव) निकलने के कारण चेहरे के रोमछिद्र (Pores) बंद हो जाते हैं, जिससे बैक्टीरिया पनपने लगते हैं और पिंपल्स व मुहांसों की समस्या महामारी की तरह बढ़ने लगती है। अक्सर लोग इन पिंपल्स से छुटकारा पाने के लिए कई तरह के महंगे ब्यूटी प्रोडक्ट्स या फेशियल का सहारा लेते हैं, जो त्वचा को और संवेदनशील बना देते हैं। स्किन केयर एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अगर आप रात को सोने से पहले अपनी दिनचर्या में 3 छोटे और आसान काम शामिल कर लें, तो मानसून के पिंपल्स से बहुत जल्द राहत पाई जा सकती है।1. सोने से पहले डबल क्लींजिंग (Salicylic Acid Cleanse) है बेहद जरूरीएक्सपर्ट्स के अनुसार, बारिश के दिनों में केवल पानी या सामान्य फेस वॉश से चेहरा धोना काफी नहीं है। दिनभर की धूल, चिपचिपा तेल और प्रदूषण त्वचा की परतों में जमा हो जाते हैं। इसलिए रात को सोने से पहले एक माइल्ड या सैलिसिलिक एसिड (Salicylic Acid) युक्त फेस वॉश से चेहरे को अच्छी तरह साफ करें। यह बंद रोमछिद्रों को गहराई से साफ करता है, जिससे पिंपल्स पैदा करने वाले बैक्टीरिया खत्म हो जाते हैं और त्वचा खुलकर सांस ले पाती है।2. ऑइल-फ्री या जेल बेस्ड मॉइश्चराइजर का इस्तेमालकई लोग सोचते हैं कि मानसून में त्वचा पहले से ही चिपचिपी होती है, इसलिए मॉइश्चराइजर लगाने की जरूरत नहीं है। एक्सपर्ट्स इसे एक बड़ा मिथक मानते हैं। जब आप त्वचा को मॉइश्चराइज नहीं करते, तो वह खुद को हाइड्रेट रखने के लिए और ज्यादा मात्रा में तेल (सीबम) बनाती है, जिससे पिंपल्स और बढ़ जाते हैं। रात को चेहरा धोने के बाद हमेशा एक लाइटवेट, नॉन-कॉमेडोजेनिक (Non-Comedogenic) और जेल-बेस्ड मॉइश्चराइजर जरूर लगाएं। यह त्वचा में नमी का संतुलन बनाए रखता है।3. एंटी-एक्ने स्पॉट ट्रीटमेंट या नेचुरल पैक लगाएंरात का समय त्वचा के रिपेयर होने का सबसे अच्छा समय होता है। सोने से पहले पिंपल्स से प्रभावित हिस्से पर टी-ट्री ऑयल (Tea Tree Oil) या डॉक्टर द्वारा सुझाई गई एंटी-एक्ने क्रीम की एक महीन परत लगाएं। यदि आप प्राकृतिक उपाय करना चाहते हैं, तो नीम के पत्तों का पेस्ट या चुटकी भर दालचीनी पाउडर में शहद मिलाकर केवल पिंपल्स पर लगाएं और 15 मिनट बाद धो लें। यह रात भर में पिंपल्स की सूजन और लाली को कम करने में काफी असरदार साबित होता है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 18 Jul 2026 8:19 am

Sleeping Mistakes: रात को सोने से पहले भूलकर भी न करें ये 3 गलतियां, समय से पहले बूढ़ी और बेजान हो जाएगी आपकी स्किन

लखनऊ। हर कोई चाहता है कि उसकी त्वचा हमेशा जवान, चमकदार और बेदाग बनी रहे। इसके लिए लोग महंगे एंटी-एजिंग प्रोडक्ट्स और स्किन केयर ट्रीटमेंट पर हजारों रुपये खर्च करने से भी पीछे नहीं हटते। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपकी रात की कुछ मामूली और अनजानी गलतियां इन सभी महंगे इलाजों पर पानी फेर सकती हैं? त्वचा विशेषज्ञों (डर्मेटोलॉजिस्ट) के मुताबिक, रात का समय हमारी स्किन के रिपेयर और रीइन्वेन्शन (कोशिकाओं के नवीनीकरण) के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है। अगर इस दौरान सोने से पहले कुछ गलतियां की जाएं, तो स्किन समय से पहले बूढ़ी (Premature Aging) दिखने लगती है और चेहरे पर महीन रेखाएं व झुर्रियां समय से पहले ही उभर आती हैं। आइए जानते हैं उन 3 बड़ी गलतियों के बारे में जिनसे आपको आज ही तौबा कर लेनी चाहिए।बिना चेहरा धोए या मेकअप के साथ सो जानादिनभर की भागदौड़ में धूल, मिट्टी, प्रदूषण और चिपचिपा पसीना हमारे चेहरे की परतों पर जमा हो जाते हैं। कई लोग अत्यधिक थकान के कारण बिना फेस वॉश किए या चेहरे का मेकअप हटाए ही सो जाते हैं। एक्सपर्ट्स के अनुसार, यह आदत त्वचा के लिए सबसे ज्यादा जानलेवा है। रात भर चेहरे पर गंदगी और केमिकल जमा रहने से रोमछिद्र (Pores) पूरी तरह बंद हो जाते हैं, जिससे त्वचा खुलकर ऑक्सीजन नहीं ले पाती। इसके कारण न केवल चेहरे पर पिंपल्स निकलते हैं, बल्कि फ्री रेडिकल्स त्वचा के कोलेजन को नष्ट कर देते हैं, जिससे स्किन ढीली पड़ने लगती है।गलत पोजीशन में सोना और कॉटन के पिलो कवर का इस्तेमालआपके सोने का तरीका भी यह तय करता है कि आपकी त्वचा की उम्र क्या होगी। अगर आप पेट के बल या करवट लेकर इस तरह सोते हैं कि आपका चेहरा तकिये से दबा रहता है, तो यह आदत तुरंत बदल लें। लगातार चेहरे पर दबाव और घर्षण पड़ने से 'स्लीप रिंकल्स' (Sleep Wrinkles) यानी स्थायी झुर्रियां बनने लगती हैं। इसके अलावा, साधारण कॉटन (सूती) के पिलो कवर त्वचा की प्राकृतिक नमी और तेल को सोख लेते हैं, जिससे त्वचा रूखी हो जाती है। डॉक्टरों की सलाह है कि हमेशा पीठ के बल सीधा सोएं या फिर सिल्क (रेशम) के पिलो कवर का इस्तेमाल करें।देर रात तक स्मार्टफोन का इस्तेमाल और अधूरी नींदरात को बत्ती बुझाने के बाद भी घंटों तक मोबाइल स्क्रीन को स्क्रॉल करना आपकी आंखों के साथ-साथ त्वचा का भी सबसे बड़ा दुश्मन है। स्मार्टफोन से निकलने वाली नीली रोशनी (Blue Light) स्किन सेल्स को सीधे तौर पर ऑक्सीडेटिव नुकसान पहुंचाती है, जिससे डार्क सर्कल्स और पिगमेंटेशन की समस्या तेजी से बढ़ती है। इसके अलावा, देर तक जागने से शरीर में 'मेलाटोनिन' और 'कोलेजन' का उत्पादन कम हो जाता है, जो त्वचा को जवान रखने के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं। रोजाना कम से कम 7-8 घंटे की गहरी नींद त्वचा को प्राकृतिक रूप से हील करने में मदद करती है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 18 Jul 2026 8:18 am

Monsoon Kidney Infection: बरसात में क्यों बढ़ जाता है किडनी इंफेक्शन का खतरा? जानें इसके मुख्य कारण, लक्षण और सबसे ज्यादा रिस्क वाले लोग

बरसात का मौसम (Monsoon Season) जहां चिलचिलाती गर्मी से राहत लेकर आता है, वहीं अपने साथ कई तरह की बीमारियों और संक्रमण का खतरा भी बढ़ा देता है। इस मौसम में पेट खराब होने और यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (UTI) के मामले तेजी से बढ़ते हैं। डॉक्टरों के अनुसार, यदि यूटीआई का समय पर इलाज न किया जाए, तो यह संक्रमण ऊपर की ओर फैलकर सीधे आपकी किडनी को प्रभावित कर सकता है, जिसे किडनी इंफेक्शन (Kidney Infection) कहा जाता है।वैसे तो स्वस्थ लोगों को भी इस मौसम में अपनी सेहत का खास ख्याल रखना चाहिए, लेकिन कुछ लोगों में इसका जोखिम दूसरों की तुलना में कहीं अधिक होता है। आइए देश के शीर्ष स्वास्थ्य विशेषज्ञों के हवाले से समझते हैं कि मानसून में किडनी इंफेक्शन का खतरा क्यों बढ़ता है, इसके मुख्य लक्षण क्या हैं और किन लोगों को सबसे ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है:क्यों बढ़ जाता है मानसून में किडनी इंफेक्शन का खतरा? (Main Causes)सीके बिरला हॉस्पिटल की इंटरनल मेडिसिन डायरेक्टर डॉ. मनीषा अरोड़ा के अनुसार, बारिश के दिनों में हमारी कुछ रोजमर्रा की लापरवाहियां इस संक्रमण का मुख्य कारण बनती हैं:कम पानी पीना: मौसम ठंडा होने के कारण लोग अक्सर पानी पीना कम कर देते हैं, जिससे यूरिनरी ट्रैक्ट में बैक्टीरिया को पनपने का मौका मिल जाता है।पेशाब रोकना: लंबे समय तक पेशाब (Urine) को रोककर रखने से मूत्राशय (Bladder) में बैक्टीरिया तेजी से अपनी संख्या बढ़ाते हैं।गीले कपड़े पहनना: बारिश में भीगने या नमी के कारण देर तक गीले कपड़े पहने रहने से प्राइवेट पार्ट्स के आसपास फंगल और बैक्टीरियल ग्रोथ बढ़ जाती है।हाइजीन की कमी: पर्सनल हाइजीन (निजी स्वच्छता) पर ठीक से ध्यान न देने के कारण इंफेक्शन बहुत आसानी से ऊपर की तरफ फैल जाता है।इन लोगों पर होता है संक्रमण का सबसे ज्यादा खतरा (High-Risk Groups)आकाश हेल्थकेयर के नेफ्रोलॉजी एवं किडनी ट्रांसप्लांट विभाग के एडिशनल डायरेक्टर डॉ. अनुपम रॉय के मुताबिक, निम्नलिखित स्थितियों से जूझ रहे लोगों में किडनी इंफेक्शन का रिस्क सबसे ज्यादा होता है:डायबिटीज और किडनी स्टोन के मरीज: जिन लोगों को शुगर (Diabetes) की बीमारी है या जिनके गुर्दे में पथरी (Kidney Stone) है, उन्हें संक्रमण जल्दी पकड़ता है।कमजोर इम्यूनिटी वाले लोग: ऐसे लोग जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) कमजोर है या जो किसी गंभीर बीमारी के लिए ऐसी दवाएं ले रहे हैं जिससे इम्यूनिटी कम होती है।यूरिनरी समस्याएं: प्रोस्टेट ग्रंथि (Prostate) का बढ़ा होना, यूरिन कैथेटर (पेशाब की नली) का लगा होना या जिन्हें बार-बार यूटीआई (UTI) होने की शिकायत रहती है।महिलाएं और गर्भवती महिलाएं: पुरुषों की तुलना में महिलाओं की शारीरिक बनावट के कारण उनमें यूरिन इंफेक्शन का डर ज्यादा रहता है। खासकर गर्भवती महिलाओं में यह संक्रमण बहुत जल्दी किडनी तक पहुंच सकता है।इन गंभीर लक्षणों को भूलकर भी न करें नजरअंदाज (Warning Signs)विशेषज्ञों का कहना है कि जब संक्रमण साधारण यूटीआई से बढ़कर किडनी तक पहुंच जाता है, तो शरीर में ये लक्षण दिखाई देने लगते हैं:पेशाब करते समय तेज जलन या दर्द होना और बार-बार यूरिन आना।तेज बुखार आना और साथ में कंपकंपी (ठंड) लगना।पीठ या कमर के एक तरफ (किडनी वाले हिस्से में) असहज और तेज दर्द होना।उल्टी होना, जी मिचलाना या अत्यधिक शारीरिक कमजोरी महसूस होना।जांच और इलाज: यदि आपको इनमें से कोई भी लक्षण दिखाई दे, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। डॉक्टर आमतौर पर इंफेक्शन का पता लगाने के लिए यूरिन टेस्ट (Routine & Culture) और संक्रमण की गंभीरता जांचने के लिए ब्लड टेस्ट की सलाह देते हैं। समय पर इलाज आपको बड़ी मुसीबतों से सुरक्षित रखता है।मानसून में किडनी और पेट को सुरक्षित रखने के 4 अचूक उपायभरपूर पानी पिएं: शरीर को हमेशा हाइड्रेट रखें। भले ही प्यास कम लगे, लेकिन दिन भर में पर्याप्त मात्रा में पूरी तरह साफ, उबला हुआ या फिल्टर किया हुआ पानी जरूर पिएं।साफ-सफाई का ध्यान: पर्सनल हाइजीन का पूरा ख्याल रखें। बारिश में भीगने के बाद तुरंत नहाएं और सूखे व साफ सूती कपड़े पहनें।बाहर के खाने से दूरी: बरसात में बाजार का खुला हुआ भोजन, जंक फूड या ज्यादा ऑयली खाने से पूरी तरह परहेज करें, क्योंकि इनसे पेट का संक्रमण बढ़ता है।सब्जियों को अच्छे से धोएं: इस मौसम में हरी पत्तेदार सब्जियों पर मिट्टी और बैक्टीरिया जमे रहते हैं, जो पेट खराब कर किडनी पर दबाव बढ़ा सकते हैं। इसलिए सब्जियों को पकाने से पहले गुनगुने पानी से अच्छी तरह साफ करें और डाइट में सीजनल फ्रूट्स शामिल करें।

न्यूज़ इंडिया लाइव 17 Jul 2026 9:41 am

रोज सुबह पेट साफ न होने से हैं परेशान? कब्ज का काल बनेगा यह जादुई देसी ड्रिंक, मिनटों में मिलेगी राहत

आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी, अनियमित खान-पान और शारीरिक निष्क्रियता के कारण पेट से जुड़ी समस्याएं बेहद आम हो चुकी हैं। इनमें सबसे बड़ी और दर्दनाक समस्या है कब्ज (Constipation)। देश की एक बड़ी आबादी हर सुबह पेट साफ न होने की गंभीर शिकायत से जूझती है, जिसके कारण उनका पूरा दिन सुस्ती, गैस और चिड़चिड़ेपन में बीतता है। अगर आप भी हर सुबह टॉयलेट में घंटों बिताने और तरह-तरह के चूर्ण-दवाइयां खाकर तंग आ चुके हैं, तो आयुर्वेद का एक बेहद प्राचीन और असरदार नुस्खा आपकी इस समस्या को जड़ से खत्म कर सकता है। यह खास देसी ड्रिंक पेट की आंतों में जमा गंदगी को मक्खन की तरह बाहर निकाल देता है।आंतों की सड़न को दूर करेगा यह प्राचीन आयुर्वेदिक देसी ड्रिंकजब हमारे शरीर में पाचन क्रिया धीमी हो जाती है, तो आंतों में मल सूखने और जमने लगता है, जिसे मेडिकल भाषा में पुरानी कब्ज कहा जाता है। इस समस्या से निजात दिलाने के लिए रसोई में मौजूद कुछ बेहद शक्तिशाली प्राकृतिक तत्व जैसे— सौंफ, जीरा, अजवाइन और काला नमक का यह मिश्रण रामबाण की तरह काम करता है। यह देसी ड्रिंक एक बेहतरीन नेचुरल लैक्सेटिव (Laxative) है, जो आंतों में नमी बढ़ाकर सूखे हुए मल को ढीला करता है। इसके नियमित सेवन से पाचन तंत्र सक्रिय हो जाता है और सुबह उठते ही बिना किसी जोर के पेट एक बार में पूरी तरह साफ हो जाता है।जानिए इस जादुई ड्रिंक को घर पर बनाने का सबसे आसान तरीकाइस असरदार देसी ड्रिंक को बनाना बेहद आसान है और इसके लिए आपको बाहर से कोई महंगी सामग्री खरीदने की जरूरत नहीं है। इसे तैयार करने के लिए सबसे पहले एक पैन में एक बड़ा गिलास पानी लें। अब इसमें आधा चम्मच सौंफ, आधा चम्मच जीरा और एक चौथाई चम्मच अजवाइन डालें। इस पानी को धीमी आंच पर तब तक उबालें जब तक कि पानी आधा न रह जाए और इन सभी मसालों का अर्क पानी में पूरी तरह न आ जाए। इसके बाद पानी को छान लें और गुनगुना होने पर इसमें चुटकी भर काला नमक और आधा चम्मच नींबू का रस मिला लें। आपका कब्ज नाशक मैजिक ड्रिंक पूरी तरह तैयार है।सेवन करने का सही समय और तरीका: कब और कैसे पिएं?इस ड्रिंक का शत-प्रतिशत लाभ उठाने के लिए इसके सेवन का सही समय जानना बेहद जरूरी है। आयुर्वेद के अनुसार, इस गुनगुने देसी ड्रिंक को रोज रात को सोने से ठीक आधा घंटा पहले या फिर सुबह खाली पेट (Empty Stomach) घूंट-घूंट करके चाय की तरह पीना चाहिए। यदि आप पुरानी कब्ज से परेशान हैं, तो रात को इसका सेवन करने से रात भर आंतों की सफाई होती है और सुबह पेट आसानी से साफ हो जाता है। इसके साथ ही, दिन भर में कम से कम 3 से 4 लीटर पानी पीने की आदत डालें और अपने भोजन में फाइबर युक्त चीजें जैसे हरी सब्जियां और सलाद जरूर शामिल करें।पेट की अन्य समस्याओं जैसे गैस और एसिडिटी में भी देगा तुरंत आरामयह देसी ड्रिंक न केवल कब्ज को ठीक करता है, बल्कि यह पेट फूलने (Bloating), खट्टी डकारें आने, गैस और भयंकर एसिडिटी की समस्या को भी मिनटों में शांत करता है। सौंफ पेट को ठंडक प्रदान करती है, जबकि अजवाइन और जीरा पाचक रसों (Digestive Enzymes) को उत्तेजित करते हैं, जिससे भारी से भारी भोजन भी आसानी से पच जाता है। डॉक्टरों और आहार विशेषज्ञों का भी मानना है कि बाजार में मिलने वाली रासायनिक दवाइयों की लत लगाने के बजाय इस तरह के सुरक्षित घरेलू उपायों को अपनाना सेहत के लिए दीर्घकालिक रूप से बेहद फायदेमंद होता है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 16 Jul 2026 1:19 pm

सिर्फ 20 दिन मिलता है यह दुर्लभ जंगली फल! 3 दिन में हो जाता है खराब, लेकिन फायदे जानकर दंग रह जाएंगे आप

प्रकृति की गोद में ऐसे कई अनमोल खजाने छिपे हैं, जिनसे हम आज भी अनजान हैं। इन्हीं में से एक है एक बेहद दुर्लभ जंगली फल, जो न सिर्फ अपने स्वाद के लिए बल्कि अपनी गजब की औषधीय शक्ति के लिए भी जाना जाता है। इस फल की सबसे बड़ी खासियत इसका 'सीमित समय' है। यह फल साल में केवल 20 दिनों के लिए ही प्रकृति में उपलब्ध होता है, और तोड़ने के बाद मात्र 3 दिनों के भीतर यह अपनी ताज़गी खो देता है। इसके बावजूद, इसकी लोकप्रियता इतनी ज्यादा है कि लोग इसे पाने के लिए पहले से ही एडवांस बुकिंग करते हैं।क्यों खास है यह फल? सेहत का है असली पावरहाउसवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो इस फल में मौजूद फाइटो-न्यूट्रिएंट्स और एंटीऑक्सीडेंट्स की मात्रा सामान्य फलों की तुलना में कई गुना अधिक होती है। चूँकि यह फल जंगलों के शुद्ध वातावरण में बिना किसी खाद या कीटनाशक के उगता है, इसलिए इसमें भरपूर मात्रा में प्राकृतिक मिनरल्स पाए जाते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, इसका सेवन शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को बिजली की गति से बूस्ट करने का काम करता है।डायबिटीज और कोलेस्ट्रॉल का है कालइस फल का सेवन करने वाले लोगों पर हुए कई छोटे-बड़े अध्ययनों से पता चला है कि यह ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित करने में अद्भुत परिणाम देता है। जो लोग कोलेस्ट्रॉल और दिल की बीमारियों से जूझ रहे हैं, उनके लिए यह एक प्राकृतिक वरदान की तरह काम करता है। इसकी तासीर शरीर के टॉक्सिन्स को बाहर निकालने में मदद करती है, जिससे चेहरे पर प्राकृतिक ग्लो आता है और पाचन शक्ति भी दुरुस्त होती है।क्यों हो जाता है 3 दिन में खराब?इस फल की उम्र कम होने के पीछे मुख्य कारण इसमें पानी की उच्च मात्रा और एंजाइम की सक्रियता है। इसे किसी भी तरह के प्रिजर्वेटिव या केमिकल से सुरक्षित नहीं रखा जा सकता, इसलिए यह बहुत जल्दी सड़ने लगता है। यही कारण है कि यह बाजार में बहुत कम समय के लिए आता है और इसकी कीमत भी काफी ज्यादा होती है। इसे खाने का सबसे सही तरीका यही है कि जैसे ही यह बाजार में आए, इसे उसी समय ताज़ा ही सेवन कर लिया जाए ताकि इसके सभी पोषक तत्व आपको मिल सकें।कैसे चुनें और खाएं?अगली बार जब आप स्थानीय बाजारों या जंगलों के पास के हट्स में इस फल को देखें, तो इसकी चमक और सख्ती की जांच जरूर करें। अगर फल थोड़ा दबा हुआ या रंग फीका हो, तो इसे न लें। इसे खाने के लिए सबसे बेहतर है कि आप इसे हल्का धोकर सीधे अपनी डाइट में शामिल करें। आयुर्वेद में भी इस तरह के जंगली फलों का विशेष उल्लेख मिलता है, जो मौसमी बदलावों के दौरान शरीर को तैयार रखने का काम करते हैं। तो इस बार यदि आपको यह अवसर मिले, तो कुदरत के इस 20 दिन वाले चमत्कार को अपनी थाली का हिस्सा जरूर बनाएं।

न्यूज़ इंडिया लाइव 16 Jul 2026 1:18 pm

बारिश में भूलकर भी न खाएं ये 5 मछलियां! फूड पॉइजनिंग का है बड़ा खतरा, सेहत पर पड़ सकता है भारी

मानसून का मौसम अपने साथ सुहावना मौसम और खान-पान के नए शौक लेकर आता है, लेकिन इस दौरान स्वास्थ्य को लेकर बरती गई थोड़ी सी लापरवाही आपको अस्पताल के बिस्तर तक पहुंचा सकती है। क्या आप जानते हैं कि बारिश के दिनों में कुछ खास तरह की मछलियां खाना सेहत के लिए कितना जोखिम भरा हो सकता है? मानसून के दौरान जल निकायों में प्रदूषण और मछलियों के प्रजनन चक्र के कारण फूड पॉइजनिंग (भोजन विषाक्तता) का खतरा काफी बढ़ जाता है। आज हम आपको उन 5 मछलियों के बारे में बता रहे हैं, जिनसे मानसून के दौरान आपको दूरी बनाकर रखनी चाहिए।1. हिलसा (Hilsa) और मानसून का कनेक्शनहिलसा मछली को मानसून का पर्याय माना जाता है, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस मौसम में मछलियों का प्रजनन काल (Breeding Season) होता है। इस समय इनके शरीर में कई ऐसे तत्व हो सकते हैं जो पाचन तंत्र के लिए हानिकारक होते हैं। साथ ही, समुद्र के गंदे पानी के कारण इनमें बैक्टीरिया पनपने का खतरा ज्यादा होता है, जो फूड पॉइजनिंग की मुख्य वजह बनते हैं।2. झींगा (Prawns/Shrimp) खाने में बरतें सावधानीझींगा या प्रॉन पानी में मौजूद गंदगी और भारी धातुओं (Heavy Metals) को जल्दी अवशोषित (Absorb) करते हैं। बारिश के दौरान नदियों और समुद्र में गंदगी का स्तर बढ़ जाता है, जिससे झींगा दूषित होने की संभावना अत्यधिक रहती है। मानसून में इसे खाने से पेट खराब होने, एलर्जी और स्किन रैशेज जैसी समस्याएं आम हो सकती हैं।3. रोहू और कतला (Rohu & Katla) का खतराताजे पानी की ये मछलियां मानसून में तालाबों और नदियों में जमा हुए कीचड़ और बैक्टीरिया के संपर्क में ज्यादा रहती हैं। बारिश का गंदा पानी इनके गलफड़ों (Gills) में परजीवी और सूक्ष्मजीव जमा कर देता है, जिन्हें घर पर ठीक से साफ करना मुश्किल होता है। अगर इन्हें कच्चा या कम पका हुआ खाया जाए, तो ये सीधे तौर पर डायरिया और उल्टी का कारण बन सकती हैं।4. मैकेरल (Mackerel) और दूषित पानीमैकेरल समुद्र की ऊपरी सतह पर रहती है। बारिश के मौसम में समुद्र में होने वाली उथल-पुथल से इसमें कई तरह के टॉक्सिन्स जमा हो जाते हैं। यदि इसे पकड़ने के बाद सही तापमान में स्टोर नहीं किया गया, तो इसमें 'हिस्टामाइन' (Histamine) नामक रसायन बन जाता है, जो गंभीर एलर्जिक रिएक्शन और फूड पॉइजनिंग का कारण बनता है।5. पम्फरेट (Pomfret) के सेवन से बचेंपम्फरेट मछली को भी मानसून में खरीदते समय विशेष ध्यान रखना चाहिए। बारिश में अक्सर कोल्ड स्टोरेज और ट्रांसपोर्टेशन में गड़बड़ी के कारण ये जल्दी खराब हो जाती है। बाजार में मिलने वाली कई पम्फरेट मछलियां बासी हो सकती हैं, जिनमें बैक्टीरिया का संक्रमण तेजी से फैलता है। मानसून के दौरान इनमें 'ई-कोलाई' (E.coli) जैसे खतरनाक बैक्टीरिया पाए जाने का डर रहता है।कैसे करें बचाव और सुरक्षित रहें?मानसून के दौरान अगर मछली खाने का मन हो, तो हमेशा भरोसेमंद और ताजी मछली ही खरीदें। सुनिश्चित करें कि मछली को हमेशा तेज आंच पर पूरी तरह पकाकर (Properly Cooked) ही खाएं, क्योंकि हाई टेंपरेचर बैक्टीरिया को मारने में मददगार होता है। यदि मछली खाने के बाद पेट में ऐंठन, मतली या दस्त जैसी शिकायत हो, तो इसे नजरअंदाज न करें और तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय है कि इस मौसम में मछली की जगह हल्की और सुपाच्य चीजों को अपने डाइट प्लान में प्राथमिकता देनी चाहिए।

न्यूज़ इंडिया लाइव 16 Jul 2026 1:16 pm

Gym Post-Workout Diet: जिम के तुरंत बाद मसल्स ग्रोथ के लिए खाएं ये 5 प्रोटीन रिच फूड्स, शरीर बनेगा फौलादी

आजकल युवाओं और फिटनेस फ्रीक्स के बीच जिम जाने और टोंड बॉडी बनाने का क्रेज काफी तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन अक्सर लोग एक बड़ी गलती कर बैठते हैं— वे जिम में घंटों पसीना तो बहाते हैं, पर अपनी डाइट (Gym Diet Tips) पर ध्यान नहीं देते। आपको यह समझना होगा कि सिर्फ भारी वजन उठाने या एक्सरसाइज करने से मजबूत मसल्स नहीं बनती हैं। वर्कआउट के दौरान हमारी मांसपेशियां टूटती हैं, और उनकी तेजी से रिकवरी व ग्रोथ के लिए शरीर को पर्याप्त मात्रा में हाई-क्वालिटी प्रोटीन की आवश्यकता होती है।फिटनेस एक्सपर्ट्स के अनुसार, वर्कआउट खत्म करने के 30 से 60 मिनट के भीतर (Anabolic Window) प्रोटीन से भरपूर डाइट ले लेनी चाहिए। यदि आप भी जिम जाते हैं और एक तगड़ा व मस्कुलर शरीर पाना चाहते हैं, तो जिम से आने के बाद अपनी पोस्ट-वर्कआउट डाइट में इन 5 सुपरफूड्स को जरूर शामिल करें।जिम से आने के बाद खाएं ये 5 बेहतरीन प्रोटीन रिच फूड्स:1. उबले हुए अंडे (Boiled Eggs)अगर आप मांसाहारी या एगिटेरियन हैं, तो जिम के बाद अंडा आपके लिए सबसे मुफीद और बजट-फ्रेंडली ऑप्शन है। वर्कआउट के बाद आप कम से कम 2 से 3 उबले अंडे खा सकते हैं। अंडों में उच्च गुणवत्ता वाला 'कंपलीट प्रोटीन' पाया जाता है, जिसमें सभी आवश्यक अमीनो एसिड मौजूद होते हैं। इसके अलावा इसमें विटामिन B12 और हेल्दी फैट्स होते हैं, जो मसल्स रिपेयरिंग की प्रक्रिया को बेहद फास्ट कर देते हैं।2. कच्चा या ग्रिल्ड पनीर (Cottage Cheese / Paneer)शाकाहारी (Vegetarian) लोगों के लिए पनीर प्रोटीन का एक बेहतरीन और सबसे लोकप्रिय स्रोत है। जिम से आने के बाद आप 100 ग्राम कच्चे या हल्के ग्रिल्ड पनीर का सेवन कर सकते हैं। पनीर में 'केसीन प्रोटीन' (Casein Protein) प्रचुर मात्रा में होता है, जो शरीर में धीरे-धीरे पचता है और आपकी मसल्स को लंबे समय तक लगातार प्रोटीन की सप्लाई देता रहता है।3. लीन चिकन ब्रेस्ट (Chicken Breast)नॉन-वेजिटेरियन्स और बॉडीबिल्डर्स की पहली पसंद चिकन ब्रेस्ट होता है। इसमें फैट और कार्बोहाइड्रेट की मात्रा न के बराबर होती है, जबकि लीन प्रोटीन कूट-कूट कर भरा होता है। जिम से आने के बाद उबला हुआ या रोस्टेड चिकन ब्रेस्ट खाने से मसल्स का साइज तेजी से बढ़ता है और शरीर का एक्स्ट्रा फैट बर्न करने में मदद मिलती है।4. अंकुरित मूंग दाल और सोया चंक्स (Sprouted Moong & Soya)यदि आप पूरी तरह प्लांट-बेस्ड डाइट पर हैं, तो मूंग दाल और सोयाबीन आपके लिए किसी वरदान से कम नहीं हैं। सोया चंक्स में चिकन से भी ज्यादा प्रोटीन होता है। जिम के बाद अंकुरित मूंग या उबले हुए सोया चंक्स खाने से शरीर को पर्याप्त प्रोटीन के साथ-साथ भरपूर मात्रा में डाइटरी फाइबर, आयरन और पोटैशियम जैसे जरूरी न्यूट्रिएंट्स मिलते हैं, जो ओवरऑल स्टैमिना बढ़ाते हैं।5. मूंग दाल का चीला (Moong Dal Cheela)अगर आप पोस्ट-वर्कआउट में कुछ हल्का, टेस्टी और हेल्दी खाना चाहते हैं, तो मूंग दाल का चीला एक परफेक्ट डिश है। भीगी हुई मूंग दाल को पीसकर कम तेल में बनाया गया चीला न केवल पचाने में आसान होता है, बल्कि यह वर्कआउट के बाद खोई हुई एनर्जी को तुरंत रीस्टोर करता है। आप इसे और ज्यादा प्रोटीन-रिच बनाने के लिए इसके अंदर पनीर की स्टफिंग भी कर सकते हैं।हेल्थ टिप: एक अच्छे और मस्कुलर शरीर का फॉर्मूला 30% जिम वर्कआउट और 70% आपकी डाइट पर निर्भर करता है। इसलिए पोस्ट-वर्कआउट मील के साथ-साथ पूरे दिन शरीर को अच्छी तरह हाइड्रेटेड रखें और पर्याप्त पानी पिएं।डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से तैयार किया गया है। हर व्यक्ति की शारीरिक बनावट, मेडिकल हिस्ट्री और न्यूट्रिशन की जरूरतें अलग होती हैं। इसलिए अपनी डाइट में कोई भी बड़ा बदलाव करने या नया डाइट प्लान शुरू करने से पहले किसी सर्टिफाइड न्यूट्रिशनिस्ट या अपने डॉक्टर से परामर्श जरूर लें।

न्यूज़ इंडिया लाइव 11 Jul 2026 8:56 am

Monsoon Health Tips: बारिश के मौसम में आफत न बन जाए पेट का इन्फेक्शन; जानें गैस्ट्रोएंटेराइटिस के लक्षण और बचाव के सही उपाय

पहली बारिश की ठंडी फुहारें, सुहावना मौसम और ऐसे में गरमा-गरम पकौड़े, चाट या सड़क किनारे मिलने वाले चटपटे व्यंजन— बरसात के दिनों का यह आनंद हर किसी को लुभाता है। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि यही सुहावना मौसम पेट के गंभीर संक्रमण यानी गैस्ट्रोएंटेराइटिस (Gastroenteritis) का भी सबसे पसंदीदा समय होता है? हर साल बारिश के दिनों में अस्पतालों के ओपीडी (OPD) में उल्टी, दस्त और पेट दर्द के मरीजों की संख्या में अचानक भारी उछाल देखने को मिलता है।इस बीमारी का सबसे बड़ा कारण दूषित पानी, संक्रमित भोजन और हाथों की साफ-सफाई में कमी है। अक्सर लोग सोचते हैं कि केवल बाहर का स्ट्रीट फूड खाने से ही पेट खराब होता है, जबकि सच्चाई यह है कि मानसून के दौरान हवा में अत्यधिक नमी (Humidity) और गर्म वातावरण के कारण घर में रखा भोजन भी बहुत जल्दी बैक्टीरिया से संक्रमित हो जाता है। इसलिए इस मौसम में सतर्कता ही सबसे बड़ा बचाव है।गैस्ट्रोएंटेराइटिस के प्रमुख लक्षण और डिहाइड्रेशन का खतरागैस्ट्रोएंटेराइटिस मुख्य रूप से पेट और आंतों में होने वाला संक्रमण है। इसके मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं:बार-बार दस्त होना और उल्टी आना।पेट में तेज मरोड़ (ऐंठन) और दर्द होना।जी मिचलाना (Nausea) और लगातार कमजोरी महसूस होना।कुछ मामलों में हल्का या तेज बुखार आना।सबसे बड़ा खतरा (Dehydration): इस बीमारी में संक्रमण से भी ज्यादा खतरनाक स्थिति शरीर में पानी और जरूरी लवणों (Salts) की अत्यधिक कमी होना है। छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों में डिहाइड्रेशन की यह स्थिति बहुत तेजी से गंभीर और जानलेवा रूप ले सकती है।उपचार और डाइट: क्या खाएं और किन गलतफहमियों से बचें?अच्छी बात यह है कि यदि सही समय पर सही देखभाल मिले, तो अधिकांश मरीज कुछ ही दिनों में बिना किसी बड़े इलाज के पूरी तरह स्वस्थ हो जाते हैं।1. ओआरएस (ORS) है सबसे अचूक दवाउपचार का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा शरीर में पानी के स्तर को बनाए रखना है। जैसे ही दस्त या उल्टी के शुरुआती लक्षण दिखें, बिना देर किए ओआरएस (Oral Rehydration Salts) का घोल देना शुरू कर देना चाहिए। इसके लिए किसी स्थिति के बिगड़ने का इंतजार न करें।2. दस्त में खाना बंद न करेंआज भी समाज में यह गलतफहमी है कि दस्त होने पर मरीज का खाना-पीना पूरी तरह बंद कर देना चाहिए। यह बिल्कुल गलत है। संक्रमण से लड़ने और रिकवरी के लिए शरीर को पोषण की सख्त जरूरत होती है। इस दौरान मरीज को बिल्कुल हल्का और सुपाच्य भोजन जैसे— मूंगा-चावल की पतली खिचड़ी, ताजा दही, पका हुआ केला और दलिया देना बेहद लाभदायक होता है।3. हर दस्त में एंटीबायोटिक जरूरी नहींएक और बड़ी गलतफहमी यह है कि दस्त शुरू होते ही लोग खुद से मेडिकल स्टोर से एंटीबायोटिक दवाएं खरीदकर खाने लगते हैं। वास्तव में, मानसून में होने वाले अधिकांश पेट के संक्रमण वायरस (Viral Infection) के कारण होते हैं, जिन पर एंटीबायोटिक्स का कोई असर नहीं होता। बिना डॉक्टर की सलाह के मनमाने ढंग से दवाएं लेने से आंतों के अच्छे बैक्टीरिया मर जाते हैं, जिससे शरीर को नुकसान हो सकता है और भविष्य में दवाएं बेअसर (Antibiotic Resistance) हो सकती हैं।बचाव के 4 सबसे आसान और अचूक नियमकब माना जाए मेडिकल इमरजेंसी? तुरंत जाएं डॉक्टर के पासयदि मरीज में नीचे दिए गए लक्षण दिखाई दें, तो घर पर इलाज करने के बजाय बिना एक मिनट गंवाए तुरंत नजदीकी डॉक्टर या अस्पताल से संपर्क करना चाहिए:यदि मरीज को बार-बार उल्टी हो रही हो और वह पानी भी न पचा पा रहा हो।लगातार दस्त हो रहे हों और मल (Stool) में खून या मवाद आ रहा हो।मरीज को तेज बुखार हो और शरीर पूरी तरह टूट चुका हो।डिहाइड्रेशन के कारण पेशाब (Urine) की मात्रा बहुत कम या बंद हो गई हो।मरीज बहुत ज्यादा सुस्त, बेहोशी की हालत में या आंखें धंसी हुई दिखाई दें।विशेषकर मधुमेह (Diabetes), किडनी के मरीजों, बुजुर्गों और छोटे बच्चों के मामले में रिस्क बिल्कुल न लें और तुरंत योग्य चिकित्सक की सलाह लें।

न्यूज़ इंडिया लाइव 10 Jul 2026 8:16 am

भरपूर नींद के बाद भी दिनभर छाई रहती है सुस्ती? सावधान! शरीर के ये 5 छुपे हुए लक्षण दे रहे हैं गंभीर बीमारी का संकेत

आज की बेहद आधुनिक और भागदौड़ भरी लाइफस्टाइल में शरीर का लगातार थकना एक बेहद सामान्य बात मान ली गई है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि रोज रात को 7 से 8 घंटे की गहरी और पूरी नींद लेने के बावजूद अगर आपका शरीर सुबह उठते ही भारी, सुस्त और ऊर्जाहीन महसूस करता है, तो इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज करना आपके लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, आज के दौर में खराब खानपान, अत्यधिक मानसिक तनाव और पैकेट बंद या प्रोसेस्ड फूड्स पर बढ़ती निर्भरता के कारण युवाओं में पोषक तत्वों की कमी एक महामारी की तरह फैल रही है। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि विटामिंस और मिनरल्स की यह कमी शरीर में बहुत धीमी रफ्तार से बढ़ती है, जिसके कारण लोग इसके शुरुआती चेतावनी संकेतों को समझ नहीं पाते और आगे चलकर किसी गंभीर क्रोनिक बीमारी का शिकार हो जाते हैं।लगातार बनी रहने वाली थकान और असामान्य बाल झड़ना: जब भरपूर आराम भी हो जाए बेअसरशहरी आबादी में बढ़ते इस खतरे पर फरीदाबाद स्थित अमृता अस्पताल (Amrita Hospital, Faridabad) के प्रसिद्ध आंतरिक रोग विशेषज्ञ (Internal Medicine Expert) डॉ. मोहित शर्मा ने टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) से बातचीत में एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा किया है। डॉ. शर्मा के मुताबिक, आज के समय में पोषण की कमी लोगों की आम सोच से कहीं ज्यादा तेजी से फैल रही है, विशेषकर महानगरीय इलाकों में। इसका सबसे पहला और प्रमुख संकेत है हर समय बिना वजह थकान महसूस होना। जब शरीर में जरूरी विटामिंस की कमी होती है, तो कोशिकाओं को ऊर्जा बनाने में भारी मशक्कत करनी पड़ती है, जिससे आपकी काम करने की दैनिक क्षमता और कार्यकुशलता बुरी तरह प्रभावित होने लगती है। इसका दूसरा बड़ा लक्षण है बालों का अत्यधिक टूटना। मौसम बदलने पर थोड़े बालों का गिरना सामान्य है, लेकिन यदि आपके बाल लगातार और बहुत ज्यादा मात्रा में झड़ रहे हैं, तो यह साफ इशारा है कि बालों की जड़ों को अंदरूनी पोषण नहीं मिल पा रहा है, जिससे उनका प्राकृतिक विकास चक्र पूरी तरह बाधित हो चुका है।मुंह में बार-बार छाले होना और हाथ-पैरों में झुनझुनी: नसों पर पड़ रहा है सीधा असरशरीर में पोषण के घटते स्तर का तीसरा सबसे आम लेकिन नजरअंदाज किया जाने वाला संकेत है मुंह में बार-बार दर्दनाक छाले होना या होंठों के किनारों का अचानक फटना। ज्यादातर लोग इसे पेट की खराबी या मामूली गर्मी समझकर केवल बाहरी क्रीम या दवाइयां लगा लेते हैं, जिससे कुछ समय के लिए तो राहत मिल जाती है, लेकिन बीमारी की असली वजह शरीर के भीतर ही मौजूद रहती है। इसके अलावा, चौथा और सबसे संवेदनशील लक्षण है हाथ-पैरों में अचानक तेज झुनझुनी होना, सुई चुभने जैसा अहसास होना या अंगों का बार-बार सुन्न पड़ जाना। डॉ. मोहित शर्मा ने विशेष रूप से चेतावनी दी है कि इस लक्षण को भूलकर भी हल्के में नहीं लेना चाहिए, क्योंकि यह सीधे तौर पर हमारी नसों (Nervous System) पर पड़ रहे बुरे असर और कुछ खास विटामिंस की भारी कमी को दर्शाता है। इसे नजरअंदाज करने पर न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर का खतरा बढ़ जाता है।चेहरे का पीला पड़ना और कमजोर नाखून: जानिए कैसे पहचानें पोषक तत्वों की कमी का आईनाविटामिन डेफिशिएंसी का पांचवां स्पष्ट लक्षण आपकी त्वचा और नाखूनों पर साफ दिखाई देता है। अगर आपका चेहरा अपनी प्राकृतिक चमक खो चुका है, त्वचा का रंग असामान्य रूप से पीला या फीका दिखने लगा है, और आपके हाथ-पैर के नाखून बेहद पतले, बेजान होकर बार-बार जरा सी चोट लगते ही टूट जाते हैं, तो यह शरीर में आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों की तीव्र कमी को प्रमाणित करता है। जब शरीर में हीमोग्लोबिन या नसों को ताकत देने वाले तत्वों की कमी होती है, तो त्वचा की बाहरी रंगत सबसे पहले प्रभावित होती है।कैसे करें इस बड़ी बीमारी से खुद का बचाव? डॉक्टर ने बताया एक आसान ब्लड टेस्ट का फॉर्मूलाडॉ. मोहित शर्मा के अनुसार, इस पूरी समस्या में सबसे अच्छी और राहत की बात यह है कि आपको घबराने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं है। शरीर में छिपी किसी भी प्रकार की विटामिन या न्यूट्रिएंट्स की कमी का पता एक बेहद साधारण और किफायती खून की जांच (Blood Test) के जरिए आसानी से लगाया जा सकता है। समय रहते सही डायग्नोसिस होने पर केवल अपने दैनिक खानपान में जरूरी बदलाव करके, हरी पत्तेदार सब्जियां, फल और ड्राई फ्रूट्स शामिल करके या डॉक्टर की सलाह पर उचित न्यूट्रिशनल सप्लीमेंट्स (Supplements) लेकर किसी भी बड़ी और गंभीर बीमारी के खतरे को आसानी से टाला जा सकता है। शरीर द्वारा दिए जाने वाले इन छोटे-छोटे सिग्नल्स को वक्त पर पहचानना ही एक दीर्घायु और निरोगी जीवन की पहली सीढ़ी है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 10 Jul 2026 5:48 am

जेन जेड बनाम मिलेनियल्स की हेल्थ जंग पर नई रिपोर्ट का चौंकाने वाला खुलासा, बर्नआउट और बीमारियों ने बढ़ाई टेंशन

आज के डिजिटल युग में सेहतमंद रहने की परिभाषा पूरी तरह बदल चुकी है। सोशल मीडिया पर हर तरफ चमचमाते हुए जिम गियर्स, ऑर्गेनिक डाइट, थेरेपी सेशंस और मेंटल हेल्थ (Mental Health) पर रील्स की बाढ़ आई हुई है। इस ट्रेंड को देखकर अक्सर यह मान लिया जाता है कि आज की नई पीढ़ी यानी जेन जेड (Gen Z) अपने से ठीक पहले की पीढ़ी मिलेनियल्स (Millennials) की तुलना में कहीं ज्यादा फिट, सजग और सेहतमंद है। मिलेनियल्स को जहां अक्सर 9-से-9 की कॉरपोरेट जॉब, लंबे वर्किंग आवर्स, भयंकर मानसिक तनाव और थकान से जूझने वाली वर्कहोलिक जनरेशन के रूप में देखा जाता है, वहीं जेन जेड को खुद से प्यार करने वाली (Self-Care) पीढ़ी माना जाता है। लेकिन एक नई और व्यापक हेल्थ रिपोर्ट में डॉक्टरों ने जो खुलासे किए हैं, उसने इस चमचमाती तस्वीर के पीछे का एक कड़वा और बेहद परेशान करने वाला सच दुनिया के सामने ला दिया है।सिर्फ अवेयरनेस या असली फिटनेस? योग-जिम को ट्रेंड बनाने वाले मिलेनियल्स से कितनी आगे निकली जेन जेडचिकित्सा विशेषज्ञों और फिटनेस गुरुओं के अनुसार, किसी विषय पर केवल ज्ञान होना और सचमुच स्वस्थ होना, दोनों दो बिल्कुल अलग बातें हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, मिलेनियल्स ने ही समाज में योग, कड़े वर्कआउट, जिम कल्चर, मेडिटेशन और सबसे जरूरी 'वर्क-लाइफ बैलेंस' जैसे भारी-भरकम शब्दों को मुख्यधारा में लाकर लोकप्रिय बनाया था। इसके बाद आई जेन जेड ने इन्हीं आदतों को एक कदम और आगे बढ़ाते हुए थेरेपी लेने, मेंटल बर्नआउट पर खुलकर बात करने और प्रिवेंटिव हेल्थकेयर (बीमारी से पहले बचाव) को अपनी प्राथमिकता बनाया। लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि सिर्फ थेरेपी पर रील्स बनाने या प्रिवेंटिव सप्लीमेंट्स लेने से कोई ज्यादा सेहतमंद साबित नहीं हो जाता। जमीनी हकीकत यह है कि जागरूकता बढ़ने के बावजूद जेन जेड का शारीरिक स्वास्थ्य का ग्राफ तेजी से नीचे गिरा है।बॉडी शेमिंग से आगे बढ़ी सोच: वजन घटाने के पुराने ढर्रे को छोड़ मसल्स और फ्लेक्सिबिलिटी पर फोकसअगर दोनों पीढ़ियों के फिटनेस गोल्स की बात करें, तो उनमें एक बहुत बड़ा और सकारात्मक वैचारिक बदलाव देखने को मिलता है। मिलेनियल्स के लिए फिटनेस का एकमात्र पैमाना अक्सर वेइंग मशीन पर अपना वजन कम देखना और शारीरिक रूप से स्लिम या जीरो साइज दिखना होता था। इसके उलट, जेन जेड अब वजन के उस पुराने ढर्रे से बाहर निकलकर शरीर के कंपोजिशन, लीन मसल्स मास (Lean Muscle Mass) और बॉडी फ्लेक्सिबिलिटी (शरीर के लचीलेपन) को बढ़ाने पर ज्यादा ध्यान दे रही है। एक्सपर्ट्स इस बदलाव को काफी पॉजिटिव और वैज्ञानिक मानते हैं। हालांकि, इसका एक स्याह पहलू यह भी है कि हर समय परफेक्ट डाइट लेने और सोशल मीडिया के पैमानों पर 24 घंटे फिट दिखने की सनक (Health Obsession) युवाओं में एक नए प्रकार के मानसिक तनाव और ईटिंग डिसऑर्डर्स को जन्म दे रही है।30 की उम्र में हार्ट अटैक और डायबिटीज: नई मेडिकल रिपोर्ट के आंकड़ों ने उड़ाए डॉक्टरों के होशइस नई हेल्थ रिपोर्ट में जो सबसे डरावना और चौंकाने वाला पहलू सामने आया है, वह है युवाओं में जानलेवा बीमारियों का समय से पहले दस्तक देना। कार्डियोलॉजिस्ट्स और एंडोक्रिनोलॉजिस्ट्स का कहना है कि जो बीमारियां पहले आमतौर पर 50 से 60 साल की उम्र के बुजुर्गों में देखी जाती थीं, वे अब महज 30 से 40 साल की उम्र के युवाओं को अपनी चपेट में ले रही हैं। आज का युवा वर्ग कम उम्र में ही हाई ब्लड प्रेशर (Hypertension), टाइप-2 डायबिटीज और अचानक आने वाले साइलेंट हार्ट अटैक (Heart Attack) का शिकार हो रहा है। इसके पीछे की मुख्य वजह कॉरपोरेट कल्चर में लगातार स्क्रीन के सामने बैठकर काम करना, रात भर जागना, स्लीप एपेनिया (नींद की कमी), पैकेट बंद फूड्स का अत्यधिक सेवन और शारीरिक निष्क्रियता है। इसके अलावा लड़कियों में पीसीओएस (PCOS) और युवाओं में शुरुआती मोटापा (Obesity) महामारी की तरह फैल रहा है।थेरेपी पर खुली सोच बनाम डूम स्क्रॉलिंग: डिजिटल लाइफस्टाइल बनी युवाओं की सबसे बड़ी दुश्मनतनाव से निपटने के मामले में मिलेनियल्स और जेन जेड के तौर-तरीके बिल्कुल जुदा हैं। मिलेनियल्स जहां तनाव होने पर पुराने 90s के गाने सुनकर, दोस्तों से मिलकर या पुरानी यादों के सहारे खुद को हील करते हैं, वहीं जेन जेड एक बेहद खतरनाक लत की शिकार हो चुकी है जिसे 'डूम स्क्रॉलिंग' (Doom Scrolling) कहा जाता है। यानी तनाव को कम करने के लिए वे घंटों तक मोबाइल स्क्रीन पर नकारात्मक और डिप्रेशन से भरी रील्स स्क्रॉल करते रहते हैं। 24 घंटे ऑनलाइन रहने की यह डिजिटल मजबूरी, सोशल मीडिया पर दूसरों की नकली परफेक्ट लाइफ से अपनी तुलना करना, और कुछ छूट जाने का डर (FOMO) युवाओं को भयंकर एंग्जायटी, अनिद्रा और क्रोनिक डिप्रेशन की ओर धकेल रहा है। पहले के समय में डिजिटल और रियल लाइफ के बीच एक स्पष्ट लक्ष्मण रेखा होती थी, जो अब पूरी तरह मिट चुकी है, और यही आज की पीढ़ी की सबसे बड़ी कमजोरी बन गई है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 10 Jul 2026 5:46 am

ग्रीन-टी का जमाना गया! जानें क्यों हर सेलिब्रिटी की पहली पसंद बनी हरी 'माचा चाय', वजन घटाने का नया सुपरफूड

अगर आप भी फिटनेस के दीवाने हैं और सोशल मीडिया पर एक्टिव रहते हैं, तो आपने निश्चित रूप से अपने पसंदीदा बॉलीवुड सितारों, सुपरमॉडल्स और बड़े-बड़े कंटेंट क्रिएटर्स को एक खास गहरे हरे रंग की ड्रिंक की चुस्कियां लेते हुए देखा होगा। फिटनेस इंडस्ट्री में इन दिनों 'माचा टी' (Matcha Tea) का एक जबरदस्त और अभूतपूर्व क्रेज देखने को मिल रहा है। सेहत के प्रति जागरूक रहने वाले लोग अब पारंपरिक ग्रीन-टी बैग्स को पीछे छोड़कर इस जापानी हरी चाय की तरफ तेजी से रुख कर रहे हैं। इस अचानक आए वैश्विक वेलनेस ट्रेंड को देखकर हर कोई हैरान है कि आखिर इस जादुई ड्रिंक में ऐसा क्या खास है, जो इसे वजन घटाने का सबसे आधुनिक और कारगर हथियार बना रहा है।साधारण ग्रीन-टी से कितनी अलग है माचा टी? जानिए पत्ती से लेकर पाउडर बनने का राजअक्सर लोग माचा को साधारण ग्रीन-टी ही समझ लेते हैं, लेकिन पोषण विशेषज्ञों के अनुसार इन दोनों को बनाने और सेवन करने के तरीके में जमीन-आसमान का अंतर है। जहां एक तरफ सादी ग्रीन-टी बनाने के लिए सूखी पत्तियों को गर्म पानी में उबाला जाता है और फिर पत्तियों को छानकर फेंक दिया जाता है, वहीं दूसरी तरफ माचा टी को तैयार करने के लिए विशेष रूप से छांव में उगाई गई पूरी हरी पत्तियों को बारीक पीसकर एक चमकीला हरा पाउडर बनाया जाता है। जब आप माचा पीते हैं, तो आप इस पाउडर को पानी या दूध में पूरी तरह से घोलकर सीधे सेवन करते हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि पत्ती को छानकर फेंकने के बजाय आप पूरी पत्ती को ही खा जाते हैं, जिससे आपके शरीर को साधारण ग्रीन-टी के मुकाबले 10 गुना अधिक पोषक तत्व और विटामिंस मिलते हैं।क्यों दीवाने हैं सेलिब्रिटीज? EGCG एंटीऑक्सीडेंट और जितेन-फ्री कैफीन का अनोखा कॉम्बिनेशनमाचा टी का सोशल मीडिया पर इतनी तेजी से वायरल होना कोई महज इत्तेफाक नहीं है, बल्कि इसके पीछे ठोस वैज्ञानिक कारण हैं। माचा में 'कैटेचिन' (Catechins) नाम का एक बेहद शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट पाया जाता है, जिसमें सबसे प्रमुख तत्व है EGCG (एपिगैलोकैटेचिन गैलेट)। वैज्ञानिक शोधों के अनुसार, यह तत्व शरीर के मेटाबॉलिज्म को रॉकेट की रफ्तार से बढ़ाता है, जिससे शरीर की अतिरिक्त चर्बी और जिद्दी कैलोरी को तेजी से बर्न करने में मदद मिलती है। इसके अतिरिक्त, माचा में कैफीन के साथ-साथ 'एल-थियेनिन' (L-Theanine) नाम का एक दुर्लभ अमीनो एसिड होता है। यह कॉम्बिनेशन कॉफी की तरह अचानक घबराहट या एनर्जी क्रैश पैदा नहीं करता, बल्कि दिमाग को एकदम शांत रखते हुए पूरे दिन शरीर को एक समान और बेहतरीन ऊर्जा प्रदान करता है। यही वजह है कि लोग अब सुबह की दूध वाली चाय या कॉफी को माचा से रिप्लेस कर रहे हैं।क्या वाकई अकेले वजन घटा सकती है माचा? डॉक्टरों और डाइट एक्सपर्ट्स की बड़ी चेतावनीइस सुपरड्रिंक के अनगिनत फायदों को जानने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या केवल माचा पीने से ही पेट की चर्बी गायब हो जाएगी? इस पर देश के शीर्ष डाइटिशियंस और फिटनेस एक्सपर्ट्स ने एक बहुत ही व्यावहारिक और जरूरी चेतावनी दी है। माचा टी कोई जादुई या चमत्कारी दवा नहीं है जो रातों-रात आपका वजन आधा कर देगी। यह आपकी वेट लॉस जर्नी को तेज करने में एक बेहतरीन कैटलिस्ट (सहायक) की भूमिका निभा सकती है, लेकिन इसका असर तभी दिखेगा जब आप इसके साथ एक संतुलित लो-कैलोरी आहार (Balanced Diet) लेंगे और रोजाना नियमित रूप से एक्सरसाइज या योग करेंगे। यदि आप अपने अनियंत्रित खान-पान को बदले बिना और बिना शारीरिक मेहनत किए सिर्फ माचा के भरोसे बैठे रहेंगे, तो वजन पर कोई सकारात्मक असर नहीं देखने को मिलेगा।

न्यूज़ इंडिया लाइव 10 Jul 2026 5:44 am

बिना जिम जाए वजन कम करने के लिए बस इस काले बीज को अपने आहार में शामिल करें!

चिया सीड्स खराब कोलेस्ट्रॉल के लिए फायदेमंद: अगर आपका खराब कोलेस्ट्रॉल ज़्यादा है, तो यह आपके दिल की सेहत के लिए अच्छा नहीं है। इसे नियंत्रित करने के लिए आपको अपने आहार में चिया सीड्स को शामिल करना चाहिए। ये छोटे काले बीज कई बेहतरीन पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। इनमें फाइबर, प्रोटीन, ओमेगा-3 फैटी एसिड और एंटीऑक्सीडेंट्स प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। चिया सीड्स न सिर्फ खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करते हैं बल्कि वजन घटाने में भी मदद करते हैं। यहां बताया गया है कि इनका सेवन कैसे करें...चिया सीड्स में मौजूद फाइबर हृदय स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होता है। दो बड़े चम्मच चिया सीड्स में लगभग 10 ग्राम फाइबर होता है। यह फाइबर खराब कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स को कम करने और अच्छे कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने में मदद करता है। यह रक्त वाहिकाओं की रक्षा करता है। चिया सीड्स ओमेगा-3 फैट अल्फा-लिनोलेनिक एसिड (ALA) से भी भरपूर होते हैं, जो अध्ययनों में हृदय रोग के जोखिम को कम करने में सहायक पाए गए हैं।चिया के बीज पेट में एक जेल जैसा पदार्थ बनाते हैं, जो पाचन क्रिया को बेहतर बनाता है, पेट भरा हुआ महसूस कराता है और वजन कम करने में सहायक होता है। इनकी जेल जैसी बनावट से पेट लंबे समय तक भरा रहता है, जिससे कम कैलोरी का सेवन होता है, जो अप्रत्यक्ष रूप से वजन कम करने और रक्तचाप को नियंत्रित करने में मदद करता है।चिया के बीज तरल पदार्थ को सोख लेते हैं, इसलिए इन्हें पूरी तरह से नरम करने के लिए पर्याप्त पानी, दूध या जूस में मिलाना ज़रूरी है। इससे न केवल पाचन संबंधी परेशानी से बचाव होता है बल्कि पाचन क्रिया भी बेहतर होती है।चिया सीड्स का सेवन कई तरीकों से किया जा सकता है। चिया सीड्स को रात भर पानी में भिगोकर रखें और सुबह इस पानी को पी लें। आप इन्हें स्मूदी या सूप में भी डाल सकते हैं। आप चिया सीड्स को दूध में भिगोकर भी पी सकते हैं। आप इन्हें पैनकेक या मफिन के घोल में या एनर्जी बार में भी मिला सकते हैं। रोजाना लगभग 1-2 चम्मच चिया सीड्स का सेवन करने की सलाह दी जाती है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 8 Jul 2026 9:48 pm

अगर आप इसे नारियल तेल में मिलाकर लगाएंगे तो बरसात के मौसम में होने वाली रूसी की समस्या सिर्फ एक बार धोने से ही दूर हो जाएगी!

रूसी के घरेलू उपाय: मानसून का मौसम शुरू होते ही रूसी एक आम समस्या बन जाती है। वातावरण में नमी का बढ़ना, बारिश में भीगना, बालों को ठीक से न सुखाना और सिर की त्वचा पर पसीना और गंदगी जमा होना रूसी की समस्या को बढ़ा सकता है। समय रहते इलाज न करने पर रूसी खुजली, बालों का झड़ना और सिर की त्वचा में संक्रमण जैसी समस्याओं का कारण बन सकती है।बरसात के मौसम में हवा में नमी होने से सिर की त्वचा पर फंगस पनपने के लिए अनुकूल वातावरण बनता है। बारिश में भीगने के बाद बालों को लंबे समय तक गीला छोड़ने से रूसी बढ़ सकती है। पसीना और तेल सिर की त्वचा पर जमा हो जाते हैं, जिससे बैक्टीरिया और फंगस को पनपने का मौका मिलता है। अगर बालों को नियमित रूप से न धोया जाए, तो सिर की त्वचा पर गंदगी, धूल और तेल जमा हो जाते हैं, जिससे रूसी की समस्या और बढ़ जाती है।रूसी को नियंत्रित करने के लिए क्या करें?1. अपने बालों को नियमित रूप से धोएं।अपने बालों के प्रकार के अनुसार हल्के या रूसी रोधी शैम्पू का उपयोग करके सप्ताह में 2-3 बार अपने बालों को साफ करें।2. बालधोने या बारिश में भीगने के बाद उन्हें अच्छी तरह सुखा लें। गीले बालों को बांधकर न रखें।3. अपनी खोपड़ी को साफ रखें।पसीना, धूल और तेल जमा होने से रोकने के लिए खोपड़ी को साफ रखना महत्वपूर्ण है।4. तेल का प्रयोग सीमित मात्रा में करें।अधिक तेल लगाने से कुछ लोगों में रूसी बढ़ सकती है। आवश्यकता पड़ने पर ही थोड़ी मात्रा में तेल का प्रयोग करें।5. सिर की त्वचा को स्वस्थ रखने के लिए प्रोटीन, विटामिन बी, विटामिन सी, जिंक और ओमेगा-3 फैटी एसिड सेभरपूर पौष्टिक आहार लें ।घरेलू उपचार1. एलोवेरा जेल: इसे सिर की त्वचा पर 20-30 मिनट के लिए लगाएं और फिर धो लें। इससे खुजली कम करने में मदद मिल सकती है।2. नारियल तेल और टी ट्री ऑयल: आप नारियल तेल में टी ट्री ऑयल की कुछ बूंदें मिला सकते हैं। लेकिन पहले त्वचा के एक छोटे से हिस्से पर इसका परीक्षण कर लें।3. दही: सिर की त्वचा पर दही लगाने और 20 मिनट बाद इसे धो लेने से सिर की त्वचा को ठंडक और आराम मिल सकता है।यदि कई हफ्तों के बाद भी रूसी कम नहीं होती है, या गंभीर खुजली, लालिमा, दर्द, घाव या अत्यधिक बाल झड़ने जैसी समस्या होती है, तो त्वचा विशेषज्ञ से परामर्श लेना उचित है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 8 Jul 2026 9:47 pm

पानी के फायदे: क्या हर सुबह खाली पेट पानी पीने से वजन कम करने में मदद मिलेगी? जानिए सच्चाई

पानी पीना शरीर की कई स्वास्थ्य समस्याओं का समाधान माना जाता है। शरीर को हाइड्रेट करने, शरीर का तापमान कम करने और पोषक तत्वों को संरक्षित रखने में पानी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। डॉक्टर भी खूब पानी पीने की सलाह देते हैं। इसके बावजूद, कई लोग इस बात को लेकर असमंजस में हैं कि सुबह खाली पेट पानी पीना वाकई स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद है या सिर्फ एक गलत धारणा है। यहां इस बारे में पूरी जानकारी दी गई है। सुबह खाली पेट पानी पीना लंबे समय से सोशल मीडिया और दोस्तों के बीच चर्चा का विषय रहा है। कुछ लोग इसे अपनी दैनिक आदत बना लेते हैं, जबकि अन्य लोग कभी-कभार ही पीते हैं। सुबह खाली पेट पानी पीने के कई फायदे बताए जाते हैं।सुबह खाली पेट पानी पीने के क्या फायदे हैं? रिपोर्टों के अनुसार, सुबह उठने के तुरंत बाद पानी पीने से पाचन क्रिया में सहायता मिलती है, शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है और पोषक तत्वों का पूरे शरीर में संचार होता है। सुबह खाली पेट पानी पीने से दिन के अन्य समय में पानी पीने की तुलना में उतने ही या उससे अधिक स्वास्थ्य लाभ मिलते हैं, ऐसा कहा जाता है। हालांकि, इस बात का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि पूरे दिन पर्याप्त मात्रा में पानी पीना सबसे महत्वपूर्ण है। दिनभर हाइड्रेटेड रहने के लिए आपको कितना पानी पीना चाहिए? पानी की ज़रूरतें आपके शरीर के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह आपकी उम्र, जलवायु, शारीरिक गतिविधि और स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। आमतौर पर, प्यास लगने का इंतज़ार करने के बजाय दिनभर थोड़ा-थोड़ा पानी पीते रहना बेहतर होता है। सुबह उठने के बाद जितना हो सके धीरे-धीरे पानी पिएं। एक बार में बहुत सारा पानी न पिएं। प्यास और शरीर की ज़रूरत के अनुसार पानी पिएं। (नोट: यहां दी गई जानकारी सामान्य ज्ञान और विशेषज्ञ स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 8 Jul 2026 9:44 pm

क्या आपके प्रेशर कुकर में भी पक रहा है 'धीमा जहर'? खाना बनाने से पहले जान लें स्टेनलेस स्टील और एल्युमीनियम का ये बड़ा सच

प्रेशर कुकर आज हर भारतीय रसोई का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। दाल-चावल से लेकर सब्जी तक, झटपट खाना पकाने के लिए हम सब इसी पर निर्भर हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस कुकर में आप बड़े चाव से खाना पका रहे हैं, वह कहीं आपकी सेहत के लिए 'धीमा जहर' तो नहीं बन रहा? बाजार में मुख्य रूप से एल्युमीनियम और स्टेनलेस स्टील के कुकर मिलते हैं, लेकिन स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिहाज से इनमें से कौन सा आपके परिवार के लिए सबसे बेस्ट है, यह जानना बेहद जरूरी है। आइए समझते हैं कि कुकर का धातु आपकी सेहत को किस तरह प्रभावित करता है।एल्युमीनियम कुकर: क्यों इसे माना जाता है सेहत के लिए खतरनाक?भारत के अधिकांश घरों में एल्युमीनियम के प्रेशर कुकर का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जाता है क्योंकि ये सस्ते होते हैं और इनमें खाना जल्दी पकता है। लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों का मानना है कि एल्युमीनियम एक अत्यधिक प्रतिक्रियाशील (Reactive) धातु है। जब आप इसमें टमाटर, नींबू या सिरके जैसी खट्टी (अम्लीय) चीजें पकाते हैं, तो एल्युमीनियम भोजन के साथ रासायनिक प्रतिक्रिया करता है और धीरे-धीरे पिघलकर खाने में मिल जाता है। लंबे समय तक ऐसा खाना खाने से शरीर में एल्युमीनियम जमा होने लगता है, जो लिवर, किडनी और मस्तिष्क से जुड़ी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है।स्टेनलेस स्टील कुकर: सेहत और सुरक्षा का सबसे बेस्ट विकल्पअगर आप अपने परिवार की सेहत को लेकर फिक्रमंद हैं, तो स्टेनलेस स्टील का प्रेशर कुकर सबसे सुरक्षित और बेहतरीन विकल्प माना जाता है। स्टेनलेस स्टील एक 'नॉन-रिएक्टिव' धातु है, जिसका मतलब है कि यह भोजन के तत्वों के साथ किसी भी प्रकार की रासायनिक प्रतिक्रिया नहीं करता है, चाहे भोजन कितना भी खट्टा या तीखा क्यों न हो। इसमें पकाए गए भोजन का स्वाद और पौष्टिकता पूरी तरह सुरक्षित रहती है। हालांकि, यह एल्युमीनियम की तुलना में थोड़ा महंगा जरूर होता है, लेकिन स्वास्थ्य के मोर्चे पर यह आपके पैसे की पूरी वसूली कर देता है।रसोई के लिए कुकर चुनते समय इन बातों का रखें विशेष ख्यालअगर आप अपने लिए एक नया प्रेशर कुकर खरीदने की योजना बना रहे हैं, तो हमेशा 'ट्राई-प्लाई' (Tri-Ply) स्टेनलेस स्टील कुकर को प्राथमिकता दें। इस तरह के कुकर में नीचे की परत में एल्युमीनियम या तांबा छिपा होता है ताकि गर्मी समान रूप से फैले और खाना जले नहीं, जबकि भोजन के संपर्क में आने वाली ऊपरी परत पूरी तरह शुद्ध स्टेनलेस स्टील की होती है। इसके अलावा, हमेशा ISI मार्क वाले कुकर ही खरीदें ताकि सुरक्षा से कोई समझौता न हो। आज ही अपनी रसोई की जांच करें और अगर आप भी एल्युमीनियम का पुराना कुकर इस्तेमाल कर रहे हैं, तो सेहत की खातिर इसे बदलने पर विचार करें।

न्यूज़ इंडिया लाइव 8 Jul 2026 1:47 pm

सावधान! क्या आप भी बारिश के मौसम में चाव से खा रहे हैं मूली? फायदे और नुकसान जानकर उड़ जाएंगे होश

मानसून की रिमझिम फुहारों के बीच गरमा-गरम पराठे और सलाद का स्वाद हर किसी को लुभाता है। इस मौसम में मूली का सेवन कई घरों में आम बात है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि बारिश के दिनों में मूली खाना आपकी सेहत के लिए वरदान है या फिर एक बड़ा खतरा? आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान, दोनों ही मानसून के दौरान खान-पान को लेकर विशेष सावधानी बरतने की सलाह देते हैं। अगर आप भी मूली के शौकीन हैं, तो इसके गुण और अवगुणों के बारे में पूरी सच्चाई जानना आपके लिए बेहद जरूरी है।क्यों बारिश में मूली खाने से बचते हैं लोग?स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, बारिश के मौसम में मूली का सेवन करते समय सबसे बड़ी चुनौती बैक्टीरिया और फंगस से जुड़ी होती है। चूंकि मूली जमीन के नीचे उगने वाली एक जड़ वाली सब्जी है, इसलिए मानसून में मिट्टी में नमी और कीटाणुओं की संख्या काफी बढ़ जाती है। इस दौरान मूली की सतह पर हानिकारक सूक्ष्मजीव चिपक जाते हैं, जो ठीक से साफ न होने पर पेट में संक्रमण, डायरिया, गैस और मरोड़ जैसी गंभीर पाचन समस्याएं पैदा कर सकते हैं। इसके अलावा, बारिश में हमारा पाचन तंत्र स्वाभाविक रूप से थोड़ा धीमा हो जाता है, जिससे मूली जैसी भारी सब्जी को पचाने में शरीर को अधिक मेहनत करनी पड़ती है।सेहत के लिए कब और कैसे फायदेमंद है मूली?ऐसा नहीं है कि मूली पूरी तरह से नुकसानदायक ही है। मूली में प्रचुर मात्रा में विटामिन सी, फाइबर और एंटी-ऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) को मजबूत करने में मदद करते हैं। यदि आप मानसून के दौरान भी इसका लाभ उठाना चाहते हैं, तो इसे कच्चा सलाद के रूप में खाने के बजाय पकाकर खाएं। मूली की सब्जी, सूप या उबले हुए पराठे बनाकर खाने से इसके बैक्टीरिया नष्ट हो जाते हैं और यह पेट के लिए हल्की भी हो जाती है। इसके अलावा, मूली शरीर को डिटॉक्सिफाई करने और लिवर की कार्यप्रणाली को बेहतर बनाने में भी सहायक मानी जाती है।मानसून में मूली खाते समय बरतें ये जरूरी सावधानियांअगर आप इस मौसम में मूली का आनंद लेना ही चाहते हैं, तो कुछ नियमों का कड़ाई से पालन करें। सबसे पहले, बाजार से लाई गई मूली को कम से कम 10 से 15 मिनट के लिए गुनगुने पानी या नमक के पानी में भिगोकर रखें और फिर अच्छी तरह छीलकर ही इस्तेमाल करें। रात के समय मूली खाने से पूरी तरह परहेज करें, क्योंकि इससे वात दोष बढ़ सकता है और जोड़ों में दर्द या गैस की समस्या हो सकती है। इन छोटी-छोटी लेकिन महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखकर आप अपनी सेहत को बिना नुकसान पहुँचाए स्वाद का मजा ले सकते हैं।

न्यूज़ इंडिया लाइव 8 Jul 2026 1:46 pm

पेट में गैस, एसिडिटी और ब्लोटिंग को हल्के में लेना पड़ेगा भारी, एक्सपर्ट्स ने दी चेतावनी

आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी, खराब खान-पान और अत्यधिक मानसिक तनाव के कारण पेट में गैस बनना, पेट फूलना (ब्लोटिंग) और एसिडिटी होना एक बहुत ही आम बात हो गई है। अधिकांश लोग इन समस्याओं को बेहद साधारण मानकर इनो, एंटासिड या कोई घरेलू चूर्ण खाकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन हेल्थ एक्सपर्ट्स और गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट्स ने इसको लेकर एक बेहद चौंकाने वाली और कड़ी चेतावनी जारी की है। डॉक्टरों के अनुसार, अगर आपको यह समस्या लगातार बनी रहती है, तो यह केवल अपच नहीं है, बल्कि आपके शरीर के भीतर पनप रही किसी बहुत गंभीर और जानलेवा बीमारी का शुरुआती अलार्म हो सकता है।साधारण सी दिखने वाली गैस के पीछे छिपी बड़ी बीमारियां: डॉक्टर क्यों कर रहे हैं आगाह?चिकित्सा विशेषज्ञों के मुताबिक, लंबे समय तक रहने वाली एसिडिटी और पेट फूलना पेट के अल्सर, क्रोहन डिजीज (Crohn's Disease) या इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम (IBS) जैसी आंतों की गंभीर बीमारियों का मुख्य लक्षण होते हैं। सबसे डराने वाली बात यह है कि कभी-कभी पेट के ऊपरी हिस्से में लगातार बनने वाली गैस और जलन सीधे तौर पर लीवर की खराबी, फैटी लीवर या फिर पेट और आंतों के कैंसर (Gastrointestinal Cancer) जैसी जानलेवा बीमारियों की तरफ इशारा करती है। इसलिए इसे हर बार सिर्फ 'गलत खाना खा लिया था' कहकर टालना आपके लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।इन गंभीर लक्षणों को भूलकर भी न करें नजरअंदाज: तुरंत डॉक्टर से मिलने की है जरूरतअगर आपको पेट की इन आम दिक्कतों के साथ-साथ कुछ खास तरह के बदलाव अपने शरीर में दिखाई दे रहे हैं, तो आपको बिना एक मिनट गंवाए किसी अच्छे डॉक्टर या विशेषज्ञ से अपनी जांच करानी चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि गैस और ब्लोटिंग के साथ आपका वजन अचानक और तेजी से कम हो रहा हो, मल त्याग करते समय खून आ रहा हो, लगातार उल्टी या जी मिचलाने की समस्या बनी हो, या फिर खाना निगलने में तकलीफ हो रही हो, तो यह इस बात का साफ संकेत है कि मामला बेहद संवेदनशील है और इसके लिए तुरंत मेडिकल ट्रीटमेंट की जरूरत है।एक्सपर्ट्स के इन खास सुझावों को अपनाएं: लाइफस्टाइल में करें ये जरूरी बदलावइस गंभीर स्थिति से बचने के लिए हेल्थ एक्सपर्ट्स ने कुछ बेहद आसान लेकिन असरदार सुझाव दिए हैं। सबसे पहले बाजार के प्रोसेस्ड फूड, अत्यधिक मिर्च-मसाले, मैदा और कार्बोनेटेड कोल्ड ड्रिंक्स से पूरी तरह दूरी बना लें। रात का खाना सोने से कम से कम दो से तीन घंटे पहले खाएं और भोजन को हमेशा खूब चबा-चबाकर खाएं। इसके अलावा दिनभर में पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं, नियमित रूप से योग या वॉक करें और डॉक्टर की सलाह के बिना मेडिकल स्टोर से खुद दवाइयां खरीदकर (Self-Medication) खाने की आदत को आज ही छोड़ दें, ताकि आपका पेट और आप हमेशा पूरी तरह स्वस्थ रहें।

न्यूज़ इंडिया लाइव 7 Jul 2026 3:53 pm

कौड़ियों के भाव मिलने वाला जिमीकंद है सेहत का असली खजाना: कंप्यूटर जैसा तेज होगा दिमाग, मक्खन की तरह पिघलेगी चर्बी

भारतीय रसोई और स्थानीय सब्जी मंडियों में बेहद साधारण और सस्ती मिलने वाली सब्जी जिमीकंद (जिसे कई इलाकों में सूरन या याम भी कहा जाता है) असल में औषधीय गुणों का एक ऐसा पावरहाउस है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। आयुर्वेद से लेकर आधुनिक मेडिकल साइंस तक में जिमीकंद को सेहत के लिए किसी वरदान से कम नहीं माना गया है। अगर आप इसे सिर्फ एक आम सब्जी समझकर नजरअंदाज कर रहे हैं, तो आप प्रकृति के एक बेहद ताकतवर सप्लीमेंट को छोड़ रहे हैं। यह सस्ती सी दिखने वाली कंद मूल सब्जी आपके शरीर को अंदर से फौलाद बनाने की ताकत रखती है।कंप्यूटर जैसा तेज होगा दिमाग और याददाश्त: अल्जाइमर से भी रखता है दूरबढ़ती उम्र के साथ याददाश्त का कमजोर होना या काम में फोकस न कर पाना आज एक आम समस्या बन चुका है। जिमीकंद में भरपूर मात्रा में ओमेगा-3 फैटी एसिड और महत्वपूर्ण मिनरल्स पाए जाते हैं, जो सीधे तौर पर हमारे ब्रेन सेल्स को एक्टिव करते हैं। इसके नियमित सेवन से मस्तिष्क की कार्यप्रणाली में सुधार होता है और सोचने-समझने की क्षमता बढ़ती है। डॉक्टरों के अनुसार, न्यूरोलॉजिकल विकारों और अल्जाइमर जैसी गंभीर भूलने की बीमारी से बचने के लिए डाइट में जिमीकंद को शामिल करना बेहद फायदेमंद साबित होता है।जिद्दी मोटापा होगा छूमंतर: वजन घटाने और मेटाबॉलिज्म बढ़ाने का रामबाण उपायअगर आप बिना कमजोरी के अपना वजन कम करना चाहते हैं, तो जिमीकंद आपकी वेट लॉस जर्नी को बेहद आसान बना सकता है। इसमें कैलोरी की मात्रा बहुत कम होती है और फाइबर कूट-कूट कर भरा होता है। इसे खाने के बाद लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस होता है, जिससे आप ओवरईटिंग और अस्वास्थ्यकर खान-पान से बच जाते हैं। इसके साथ ही जिमीकंद शरीर के खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) को कम करने और अच्छे कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने में मदद करता है, जिससे पेट की चर्बी तेजी से मोम की तरह पिघलने लगती है।पेट की समस्याओं और बवासीर का जड़ से खात्मा: पाचन तंत्र बनेगा मजबूतआयुर्वेद में जिमीकंद को पेट के रोगों, विशेषकर बवासीर (Piles) के इलाज में एक अचूक औषधि माना गया है। इसके भीतर मौजूद रेजिस्टेंट स्टार्च और डाइटरी फाइबर आंतों में गुड बैक्टीरिया को बढ़ाते हैं, जिससे पुरानी से पुरानी कब्ज, गैस और एसिडिटी की समस्या कुछ ही दिनों में गायब हो जाती है। यह आपके पूरे पाचन तंत्र (Digestive System) को डीटॉक्सिफाई करता है। इसके नियमित और सही तरीके से किए गए सेवन से लीवर की कार्यक्षमता भी मजबूत होती है, जिससे खाया-पिया शरीर को सीधे तौर पर लगने लगता है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 7 Jul 2026 3:50 pm

AC vs Cooler in Monsoon: मानसून की उमस भरी गर्मी में एसी और कूलर में से कौन है बेस्ट? खरीदने से पहले जानें दोनों का अंतर

बारिश का मौसम शुरू होते ही तपती गर्मी से तो राहत मिल जाती है, लेकिन हवा में नमी (Humidity) का स्तर बढ़ने से घरों के भीतर भारी उमस और चिपचिपापन महसूस होने लगता है। इस मौसम में अक्सर लोग अपने घरों को ठंडा और आरामदायक रखने के लिए नया कूलिंग अप्लायंस खरीदने का विचार करते हैं। बाजार में एयर कंडीशनर (AC) और एयर कूलर दोनों ही विकल्प मौजूद हैं, जिसकी वजह से लोग असमंजस में पड़ जाते हैं कि मानसून के लिहाज से उनके लिए क्या सही रहेगा। इन दोनों उपकरणों की तकनीक और काम करने का तरीका एक-दूसरे से पूरी तरह अलग है, इसलिए अपनी जरूरत के मुताबिक सही फैसला लेना बेहद जरूरी है।बारिश के मौसम में एयर कंडीशनर (AC) के बड़े फायदेमानसून और उमस भरी गर्मी के दौरान एयर कंडीशनर (AC) का इस्तेमाल सबसे ज्यादा कारगर और फायदेमंद माना जाता है। एसी केवल कमरे के तापमान को ही कम नहीं करता, बल्कि हवा में मौजूद अतिरिक्त नमी को भी खींच लेता है। इसमें मौजूद 'ड्राई मोड' (Dry Mode) विशेष रूप से बारिश के दिनों के लिए ही डिजाइन किया गया है, जो कमरे के चिपचिपेपन को खत्म कर हवा को सूखा, ठंडा और पूरी तरह आरामदायक बना देता है। इसी वजह से भारी बारिश के दिनों में भी घर के अंदर बेहतरीन कूलिंग मिलती है।उमस भरे मौसम में क्यों बेअसर हो जाता है एयर कूलर?दूसरी ओर, अगर एयर कूलर की बात करें तो यह मुख्य रूप से गर्म और सूखे (Dry Heat) मौसम के लिए सबसे बेस्ट माना जाता है। एयर कूलर पानी से भीगे हुए कूलिंग पैड के जरिए बाहर की हवा को ठंडा करके कमरे में भेजता है। यह वाष्पीकरण (Evaporation) की तकनीक पर काम करता है, जो तभी सफल होती है जब हवा सूखी हो। चूंकि बारिश के दिनों में वायुमंडल में पहले से ही नमी का स्तर बहुत अधिक होता है, इसलिए कूलर के पैड से पानी का वाष्पीकरण ठीक से नहीं हो पाता और कूलर की ठंडक का असर लगभग खत्म हो जाता है।कूलर बढ़ा सकता है आपकी परेशानी, एसी है स्मार्ट चॉइसबारिश के दिनों में कई बार एयर कूलर कमरे को ठंडा करने के बजाय वहां की उमस को और ज्यादा बढ़ा देता है, जिससे कमरे के अंदर रखी चीजें और फर्श भी चिपचिपे महसूस होने लगते हैं। ऐसे में एयर कंडीशनर (AC) ही एकमात्र ऐसा स्मार्ट विकल्प बचता है जो कमरे को ठंडा रखने के साथ-साथ हवा को शुद्ध और ड्राई बनाए रखता है। यही कारण है कि बजट और मौसम की अनुकूलता को देखते हुए मानसून के दौरान ज्यादातर एक्सपर्ट्स कूलर की जगह एसी को ही पहली प्राथमिकता देने की सलाह देते हैं।

न्यूज़ इंडिया लाइव 7 Jul 2026 8:38 am

बचपन का ट्रॉमा: सिर्फ यादें नहीं, ये गंभीर बीमारियों की जड़ कैसे शरीर पर छोड़ जाता है गहरा असर

हम अक्सर अपनी शारीरिक समस्याओं के लिए खराब लाइफस्टाइल या खान-पान को जिम्मेदार मानते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आपकी वर्तमान बीमारी का कारण आपके बचपन की कोई अनकही तकलीफ हो सकती है? आधुनिक विज्ञान अब इस बात की पुष्टि कर रहा है कि बचपन में झेला गया ट्रॉमा—जैसे डर, हिंसा, उपेक्षा या भावनात्मक अस्थिरता—सिर्फ मानसिक घाव नहीं है, बल्कि यह बड़े होने पर आपके शरीर को गंभीर बीमारियों का घर बना सकता है। माइग्रेन से लेकर ऑटोइम्यून बीमारियों तक, बचपन का 'स्ट्रेस' सालों बाद भी अपना असर दिखाता है।बीमारियों का अदृश्य कनेक्शनकई लोग सालों तक माइग्रेन, पेट की समस्याओं, अनिद्रा, लगातार थकान और एंग्जायटी जैसी परेशानियों के लिए डॉक्टर बदलते रहते हैं, लेकिन रिपोर्ट सामान्य आने के बावजूद आराम नहीं मिलता। विशेषज्ञ अब यह मान रहे हैं कि इन बीमारियों की जड़ अक्सर हमारे बचपन के दबे हुए अनुभव होते हैं। बचपन का ट्रॉमा हमारे नर्वस सिस्टम, हार्मोनल बैलेंस और इम्यून सिस्टम को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है। उदाहरण के तौर पर, यदि कोई बच्चा लंबे समय तक असुरक्षित माहौल में रहा है, तो उसका शरीर हमेशा 'फाइट या फ्लाइट' (लड़ो या भागो) मोड में रहता है। यह निरंतर तनाव शरीर के अंगों को अंदर से खोखला करना शुरू कर देता है।कैसे 'स्ट्रेस हार्मोन' बनते हैं दुश्मनजब एक बच्चा लगातार डर में जीता है, तो उसके शरीर में 'स्ट्रेस हार्मोन' का स्तर असामान्य रूप से बढ़ा रहता है। लंबे समय तक बढ़ा हुआ यह तनाव शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को कमजोर कर देता है। यही कारण है कि बचपन की हिंसा या उपेक्षा झेलने वाले व्यक्तियों में बड़े होने पर हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा, डिप्रेशन और ऑटोइम्यून बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। एक 40 वर्षीय महिला का केस इसका सटीक उदाहरण है, जो वर्षों तक पीठ दर्द और एंग्जायटी से जूझती रही, जबकि उसकी परेशानी का असली कारण बचपन में देखी गई घरेलू हिंसा थी।विज्ञान ने बदली सोचने की दिशाबचपन के ट्रॉमा और सेहत के बीच संबंधों को लेकर अमेरिका में हुई 'ACE' (Adverse Childhood Experiences) रिसर्च सबसे चर्चित रही है। 17 हजार से अधिक लोगों पर की गई इस स्टडी ने यह साबित किया कि बचपन के तनावपूर्ण अनुभव सीधे तौर पर वयस्क जीवन की गंभीर बीमारियों से जुड़े हैं। 'जेएएमए पीडियाट्रिक्स' (JAMA Pediatrics) में प्रकाशित शोध ने भी बचपन के ट्रॉमा और ऑटोइम्यून विकारों के बीच सीधा संबंध देखा है। चिकित्सा जगत अब ट्रॉमा को केवल एक 'मानसिक याद' के रूप में नहीं, बल्कि शरीर पर गहरा असर डालने वाली एक बायोलॉजिकल स्थिति के रूप में देख रहा है। यदि आप भी लंबे समय से ऐसी समस्याओं से परेशान हैं जिनका कोई शारीरिक कारण समझ नहीं आ रहा, तो विशेषज्ञ से परामर्श कर अपने अतीत के इन भावनात्मक घावों पर बात करना एक जरूरी कदम हो सकता है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 2 Jul 2026 5:48 pm

आसमान से बारिश बरसते ही मंडराने लगा डेंगू का जानलेवा खतरा, स्वास्थ्य विभाग अलर्ट, राजधानी में युद्ध स्तर पर तैयारियां शुरू

मौसम में आए अचानक बदलाव और मानसून की पहली बारिश के दस्तक देते ही जहां लोगों को चिलचिलाती गर्मी से राहत मिली है, वहीं दूसरी तरफ एक बड़े खतरे ने भी दस्तक दे दी है। रिमझिम फुहारों के साथ ही राजधानी और उसके आस-पास के इलाकों में मच्छरों से होने वाली जानलेवा बीमारी 'डेंगू' (Dengue) का खौफनाक खतरा तेजी से बढ़ने लगा है। जलजमाव और उमस भरे इस मौसम को मच्छरों के पनपने के लिए सबसे अनुकूल माना जाता है। इसी गंभीर चुनौती को देखते हुए स्थानीय प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह एक्शन मोड में आ गया है। राजधानी के सभी प्रमुख सरकारी अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHCs) और नगर निगम की टीमों ने इस महामारी से निपटने के लिए जमीनी स्तर पर अपनी व्यापक तैयारियां शुरू कर दी हैं।जलजमाव वाले हॉटस्पॉट चिन्हित और फॉगिंग के लिए विशेष टीमों का गठनबारिश का पानी जमा होने के कारण राजधानी के कई रिहाइशी इलाकों और स्लम बस्तियों में डेंगू का डंक फैलने का सबसे ज्यादा रिस्क रहता है। स्थानीय नगर निगम और स्वास्थ्य अधिकारियों ने शहर के उन संवेदनशील इलाकों को चिन्हित कर लिया है जहां पिछले सालों में डेंगू के सबसे ज्यादा मामले सामने आए थे। इन चिन्हित हॉटस्पॉट्स में जल निकासी की व्यवस्था को दुरुस्त किया जा रहा है। इसके साथ ही, एंटी-लार्वा स्प्रे के छिड़काव और आधुनिक फॉगिंग मशीनों को काम पर लगा दिया गया है। नगर निगम की विशेष टीमें हर वार्ड में जाकर नालियों और खाली पड़े प्लॉटों में जमा पानी की चेकिंग कर रही हैं ताकि मच्छरों के पनपने के चक्र को शुरुआती चरण में ही तोड़ा जा सके।अस्पतालों में रिजर्व हुए स्पेशल डेंगू वार्ड और प्लेटलेट्स की व्यवस्था तेजराजधानी के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) के निर्देशों के बाद शहर के सभी बड़े सिविल अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में इमरजेंसी अलर्ट जारी कर दिया गया है। संभावित मरीजों की बढ़ती संख्या को देखते हुए अस्पतालों में विशेष 'डेंगू वार्ड' और आइसोलेशन बेड आरक्षित कर दिए गए हैं। डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की अलग से ड्यूटी लगाई गई है ताकि किसी भी आपातकालीन स्थिति से तुरंत निपटा जा सके। इसके अलावा, ब्लड बैंकों को भी कड़े निर्देश दिए गए हैं कि वे प्लेटलेट्स (Platelets) का पर्याप्त स्टॉक मेंटेन रखें, क्योंकि डेंगू के गंभीर मामलों में मरीजों के प्लेटलेट्स बहुत तेजी से गिरते हैं, जिससे उनकी जान पर बन आती है।स्थानीय निवासियों के लिए गाइडलाइन जारी और एआई सर्च पर बढ़े सवालस्वास्थ्य विभाग ने राजधानी के नागरिकों के लिए एक जरूरी और कड़े प्रिकॉशंस की एडवाइजरी जारी की है। डॉक्टरों का कहना है कि डेंगू का मच्छर साफ और स्थिर पानी में पनपता है, इसलिए लोग अपने घरों में रखे कूलर, गमलों, पुरानी टायरों और छतों पर पानी बिल्कुल भी जमा न होने दें। रात को सोते समय मच्छरदानी का उपयोग करें और पूरी आस्तीन के कपड़े पहनें। आज के डिजिटल युग और आधुनिक एआई-संचालित जनरेटिव सर्च (GEO) पर भी लोग 'डेंगू के शुरुआती लक्षण' और 'प्लेटलेट्स बढ़ाने के घरेलू उपाय' जैसे विषयों को लगातार सर्च कर रहे हैं। यदि किसी को तेज बुखार, आंखों के पीछे दर्द, जोड़ों में गंभीर अकड़न या बदन दर्द की शिकायत हो, तो तुरंत नजदीकी डॉक्टर से संपर्क करें।

न्यूज़ इंडिया लाइव 2 Jul 2026 3:52 pm

क्या आपका कोलेस्ट्रॉल लेवल भी बढ़ा हुआ है? जानिए कितना लेवल आपके दिल के लिए ला सकता है आफत

आज की खराब लाइफस्टाइल, जंक फूड की लत और शारीरिक निष्क्रियता के कारण दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ता जा रहा है। इनमें सबसे बड़ा विलेन बनकर उभर रहा है शरीर में बढ़ता बैड कोलेस्ट्रॉल। बहुत से लोग नियमित ब्लड टेस्ट तो करवाते हैं, लेकिन वे यह समझ नहीं पाते कि रिपोर्ट में दिख रहा कोलेस्ट्रॉल का कौन सा आंकड़ा उनके दिल के लिए खतरे की घंटी है। देश के सबसे प्रतिष्ठित अपोलो अस्पताल की वरिष्ठ कार्डियोलॉजिस्ट (हृदय रोग विशेषज्ञ) ने इस विषय पर बेहद चौंकाने वाले और महत्वपूर्ण खुलासे किए हैं। डॉक्टर के मुताबिक, नसें ब्लॉक होने और अचानक हार्ट अटैक आने से पहले शरीर को कुछ कड़े संकेत मिलते हैं, जिन्हें समय रहते पहचानना बेहद जरूरी है।जानिए कौन सा कोलेस्ट्रॉल है आपका पक्का दोस्त और कौन सा सबसे बड़ा दुश्मनमानव शरीर में मुख्य रूप से दो तरह के कोलेस्ट्रॉल होते हैं, जिन्हें सामान्य भाषा में गुड कोलेस्ट्रॉल और बैड कोलेस्ट्रॉल कहा जाता है। अपोलो की कार्डियोलॉजिस्ट के अनुसार, एचडीएल (HDL) को अच्छा कोलेस्ट्रॉल माना जाता है क्योंकि यह धमनियों से अतिरिक्त फैट को साफ कर दिल की रक्षा करता है। इसके विपरीत, एलडीएल (LDL) को खराब कोलेस्ट्रॉल कहा जाता है। जब शरीर में एलडीएल की मात्रा तय सीमा से अधिक हो जाती है, तो यह हमारी खून की नसों (धमनियों) की दीवारों पर जमने लगता है। इस स्थिति को मेडिकल की भाषा में एथेरोस्क्लेरोसिस कहा जाता है, जिससे दिल तक ऑक्सीजन और खून की सप्लाई रुकने का खतरा पैदा हो जाता है।नंबर्स का पूरा खेल: कितना कोलेस्ट्रॉल लेवल पार करते ही बढ़ जाता है हार्ट अटैक का खतराकार्डियोलॉजिस्ट के मुताबिक, एक स्वस्थ वयस्क के शरीर में कुल कोलेस्ट्रॉल (Total Cholesterol) का स्तर 200 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर (mg/dL) से कम होना चाहिए। यदि आपकी रिपोर्ट में यह आंकड़ा 200 से 239 के बीच आता है, तो इसे बॉर्डरलाइन माना जाता है, लेकिन जैसे ही यह 240 mg/dL या उससे ऊपर पहुंचता है, यह आपके दिल के लिए सीधे तौर पर मुसीबत बन जाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बैड कोलेस्ट्रॉल यानी एलडीएल का स्तर हमेशा 100 mg/dL से कम होना चाहिए। जिन लोगों को पहले से डायबिटीज या बीपी की समस्या है, उनके लिए तो एलडीएल का स्तर 70 mg/dL से भी कम रखने की सख्त सलाह दी जाती है।नसों में ब्लॉकेज के शुरुआती लक्षण और अपोलो डॉक्टर की कड़े प्रिकॉशंसअक्सर लोग सोचते हैं कि बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल केवल भारी शरीर वाले लोगों को होता है, लेकिन डॉक्टर ने साफ किया है कि यह एक साइलेंट किलर है जो दुबले-पतले लोगों को भी अपना शिकार बना सकता है। जब नसों में फैट का जमाव बढ़ने लगता है, तो थोड़ा सा चलने या सीढ़ियां चढ़ने पर सीने में भारीपन, सांस फूलना, अत्यधिक थकान होना और अचानक चक्कर आने जैसे लक्षण महसूस हो सकते हैं। आज के आधुनिक एआई-संचालित जनरेटिव सर्च (GEO) और इंटरनेट पर भी लोग दिल की सेहत को लेकर सबसे ज्यादा सवाल पूछ रहे हैं। अपोलो की डॉक्टर ने सलाह दी है कि 20 साल की उम्र के बाद हर व्यक्ति को साल में कम से कम एक बार लिपिड प्रोफाइल टेस्ट जरूर करवाना चाहिए।खान-पान में बदलाव और लाइफस्टाइल को सुधारकर कोलेस्ट्रॉल घटाने के अचूक तरीकेअगर आपकी रिपोर्ट में कोलेस्ट्रॉल लेवल बढ़ा हुआ आया है, तो घबराने के बजाय अपनी डेली रूटीन में तुरंत बदलाव करें। रिफाइंड ऑयल, डालडा, समोसे-कचौड़ी और पैक्ड फूड से पूरी तरह दूरी बना लें। अपने आहार में ओट्स, हरी पत्तेदार सब्जियां, सेब, बादाम और ओमेगा-3 से भरपूर चीजों को शामिल करें। डॉक्टर के अनुसार, रोजाना कम से कम 30 से 45 मिनट की वॉक या एक्सरसाइज करने से गुड कोलेस्ट्रॉल तेजी से बढ़ता है और बैड कोलेस्ट्रॉल को शरीर से बाहर निकालने में मदद मिलती है। स्थानीय स्तर पर दिल्ली, मुंबई, लखनऊ जैसे बड़े शहरों में दिल के मरीजों की संख्या में आ रहे उछाल को देखते हुए अपनी सेहत के प्रति लापरवाही बरतना भारी पड़ सकता है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 2 Jul 2026 3:51 pm