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Gym Post-Workout Diet: जिम के तुरंत बाद मसल्स ग्रोथ के लिए खाएं ये 5 प्रोटीन रिच फूड्स, शरीर बनेगा फौलादी

आजकल युवाओं और फिटनेस फ्रीक्स के बीच जिम जाने और टोंड बॉडी बनाने का क्रेज काफी तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन अक्सर लोग एक बड़ी गलती कर बैठते हैं— वे जिम में घंटों पसीना तो बहाते हैं, पर अपनी डाइट (Gym Diet Tips) पर ध्यान नहीं देते। आपको यह समझना होगा कि सिर्फ भारी वजन उठाने या एक्सरसाइज करने से मजबूत मसल्स नहीं बनती हैं। वर्कआउट के दौरान हमारी मांसपेशियां टूटती हैं, और उनकी तेजी से रिकवरी व ग्रोथ के लिए शरीर को पर्याप्त मात्रा में हाई-क्वालिटी प्रोटीन की आवश्यकता होती है।फिटनेस एक्सपर्ट्स के अनुसार, वर्कआउट खत्म करने के 30 से 60 मिनट के भीतर (Anabolic Window) प्रोटीन से भरपूर डाइट ले लेनी चाहिए। यदि आप भी जिम जाते हैं और एक तगड़ा व मस्कुलर शरीर पाना चाहते हैं, तो जिम से आने के बाद अपनी पोस्ट-वर्कआउट डाइट में इन 5 सुपरफूड्स को जरूर शामिल करें।जिम से आने के बाद खाएं ये 5 बेहतरीन प्रोटीन रिच फूड्स:1. उबले हुए अंडे (Boiled Eggs)अगर आप मांसाहारी या एगिटेरियन हैं, तो जिम के बाद अंडा आपके लिए सबसे मुफीद और बजट-फ्रेंडली ऑप्शन है। वर्कआउट के बाद आप कम से कम 2 से 3 उबले अंडे खा सकते हैं। अंडों में उच्च गुणवत्ता वाला 'कंपलीट प्रोटीन' पाया जाता है, जिसमें सभी आवश्यक अमीनो एसिड मौजूद होते हैं। इसके अलावा इसमें विटामिन B12 और हेल्दी फैट्स होते हैं, जो मसल्स रिपेयरिंग की प्रक्रिया को बेहद फास्ट कर देते हैं।2. कच्चा या ग्रिल्ड पनीर (Cottage Cheese / Paneer)शाकाहारी (Vegetarian) लोगों के लिए पनीर प्रोटीन का एक बेहतरीन और सबसे लोकप्रिय स्रोत है। जिम से आने के बाद आप 100 ग्राम कच्चे या हल्के ग्रिल्ड पनीर का सेवन कर सकते हैं। पनीर में 'केसीन प्रोटीन' (Casein Protein) प्रचुर मात्रा में होता है, जो शरीर में धीरे-धीरे पचता है और आपकी मसल्स को लंबे समय तक लगातार प्रोटीन की सप्लाई देता रहता है।3. लीन चिकन ब्रेस्ट (Chicken Breast)नॉन-वेजिटेरियन्स और बॉडीबिल्डर्स की पहली पसंद चिकन ब्रेस्ट होता है। इसमें फैट और कार्बोहाइड्रेट की मात्रा न के बराबर होती है, जबकि लीन प्रोटीन कूट-कूट कर भरा होता है। जिम से आने के बाद उबला हुआ या रोस्टेड चिकन ब्रेस्ट खाने से मसल्स का साइज तेजी से बढ़ता है और शरीर का एक्स्ट्रा फैट बर्न करने में मदद मिलती है।4. अंकुरित मूंग दाल और सोया चंक्स (Sprouted Moong & Soya)यदि आप पूरी तरह प्लांट-बेस्ड डाइट पर हैं, तो मूंग दाल और सोयाबीन आपके लिए किसी वरदान से कम नहीं हैं। सोया चंक्स में चिकन से भी ज्यादा प्रोटीन होता है। जिम के बाद अंकुरित मूंग या उबले हुए सोया चंक्स खाने से शरीर को पर्याप्त प्रोटीन के साथ-साथ भरपूर मात्रा में डाइटरी फाइबर, आयरन और पोटैशियम जैसे जरूरी न्यूट्रिएंट्स मिलते हैं, जो ओवरऑल स्टैमिना बढ़ाते हैं।5. मूंग दाल का चीला (Moong Dal Cheela)अगर आप पोस्ट-वर्कआउट में कुछ हल्का, टेस्टी और हेल्दी खाना चाहते हैं, तो मूंग दाल का चीला एक परफेक्ट डिश है। भीगी हुई मूंग दाल को पीसकर कम तेल में बनाया गया चीला न केवल पचाने में आसान होता है, बल्कि यह वर्कआउट के बाद खोई हुई एनर्जी को तुरंत रीस्टोर करता है। आप इसे और ज्यादा प्रोटीन-रिच बनाने के लिए इसके अंदर पनीर की स्टफिंग भी कर सकते हैं।हेल्थ टिप: एक अच्छे और मस्कुलर शरीर का फॉर्मूला 30% जिम वर्कआउट और 70% आपकी डाइट पर निर्भर करता है। इसलिए पोस्ट-वर्कआउट मील के साथ-साथ पूरे दिन शरीर को अच्छी तरह हाइड्रेटेड रखें और पर्याप्त पानी पिएं।डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से तैयार किया गया है। हर व्यक्ति की शारीरिक बनावट, मेडिकल हिस्ट्री और न्यूट्रिशन की जरूरतें अलग होती हैं। इसलिए अपनी डाइट में कोई भी बड़ा बदलाव करने या नया डाइट प्लान शुरू करने से पहले किसी सर्टिफाइड न्यूट्रिशनिस्ट या अपने डॉक्टर से परामर्श जरूर लें।

न्यूज़ इंडिया लाइव 11 Jul 2026 8:56 am

Monsoon Health Tips: बारिश के मौसम में आफत न बन जाए पेट का इन्फेक्शन; जानें गैस्ट्रोएंटेराइटिस के लक्षण और बचाव के सही उपाय

पहली बारिश की ठंडी फुहारें, सुहावना मौसम और ऐसे में गरमा-गरम पकौड़े, चाट या सड़क किनारे मिलने वाले चटपटे व्यंजन— बरसात के दिनों का यह आनंद हर किसी को लुभाता है। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि यही सुहावना मौसम पेट के गंभीर संक्रमण यानी गैस्ट्रोएंटेराइटिस (Gastroenteritis) का भी सबसे पसंदीदा समय होता है? हर साल बारिश के दिनों में अस्पतालों के ओपीडी (OPD) में उल्टी, दस्त और पेट दर्द के मरीजों की संख्या में अचानक भारी उछाल देखने को मिलता है।इस बीमारी का सबसे बड़ा कारण दूषित पानी, संक्रमित भोजन और हाथों की साफ-सफाई में कमी है। अक्सर लोग सोचते हैं कि केवल बाहर का स्ट्रीट फूड खाने से ही पेट खराब होता है, जबकि सच्चाई यह है कि मानसून के दौरान हवा में अत्यधिक नमी (Humidity) और गर्म वातावरण के कारण घर में रखा भोजन भी बहुत जल्दी बैक्टीरिया से संक्रमित हो जाता है। इसलिए इस मौसम में सतर्कता ही सबसे बड़ा बचाव है।गैस्ट्रोएंटेराइटिस के प्रमुख लक्षण और डिहाइड्रेशन का खतरागैस्ट्रोएंटेराइटिस मुख्य रूप से पेट और आंतों में होने वाला संक्रमण है। इसके मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं:बार-बार दस्त होना और उल्टी आना।पेट में तेज मरोड़ (ऐंठन) और दर्द होना।जी मिचलाना (Nausea) और लगातार कमजोरी महसूस होना।कुछ मामलों में हल्का या तेज बुखार आना।सबसे बड़ा खतरा (Dehydration): इस बीमारी में संक्रमण से भी ज्यादा खतरनाक स्थिति शरीर में पानी और जरूरी लवणों (Salts) की अत्यधिक कमी होना है। छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों में डिहाइड्रेशन की यह स्थिति बहुत तेजी से गंभीर और जानलेवा रूप ले सकती है।उपचार और डाइट: क्या खाएं और किन गलतफहमियों से बचें?अच्छी बात यह है कि यदि सही समय पर सही देखभाल मिले, तो अधिकांश मरीज कुछ ही दिनों में बिना किसी बड़े इलाज के पूरी तरह स्वस्थ हो जाते हैं।1. ओआरएस (ORS) है सबसे अचूक दवाउपचार का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा शरीर में पानी के स्तर को बनाए रखना है। जैसे ही दस्त या उल्टी के शुरुआती लक्षण दिखें, बिना देर किए ओआरएस (Oral Rehydration Salts) का घोल देना शुरू कर देना चाहिए। इसके लिए किसी स्थिति के बिगड़ने का इंतजार न करें।2. दस्त में खाना बंद न करेंआज भी समाज में यह गलतफहमी है कि दस्त होने पर मरीज का खाना-पीना पूरी तरह बंद कर देना चाहिए। यह बिल्कुल गलत है। संक्रमण से लड़ने और रिकवरी के लिए शरीर को पोषण की सख्त जरूरत होती है। इस दौरान मरीज को बिल्कुल हल्का और सुपाच्य भोजन जैसे— मूंगा-चावल की पतली खिचड़ी, ताजा दही, पका हुआ केला और दलिया देना बेहद लाभदायक होता है।3. हर दस्त में एंटीबायोटिक जरूरी नहींएक और बड़ी गलतफहमी यह है कि दस्त शुरू होते ही लोग खुद से मेडिकल स्टोर से एंटीबायोटिक दवाएं खरीदकर खाने लगते हैं। वास्तव में, मानसून में होने वाले अधिकांश पेट के संक्रमण वायरस (Viral Infection) के कारण होते हैं, जिन पर एंटीबायोटिक्स का कोई असर नहीं होता। बिना डॉक्टर की सलाह के मनमाने ढंग से दवाएं लेने से आंतों के अच्छे बैक्टीरिया मर जाते हैं, जिससे शरीर को नुकसान हो सकता है और भविष्य में दवाएं बेअसर (Antibiotic Resistance) हो सकती हैं।बचाव के 4 सबसे आसान और अचूक नियमकब माना जाए मेडिकल इमरजेंसी? तुरंत जाएं डॉक्टर के पासयदि मरीज में नीचे दिए गए लक्षण दिखाई दें, तो घर पर इलाज करने के बजाय बिना एक मिनट गंवाए तुरंत नजदीकी डॉक्टर या अस्पताल से संपर्क करना चाहिए:यदि मरीज को बार-बार उल्टी हो रही हो और वह पानी भी न पचा पा रहा हो।लगातार दस्त हो रहे हों और मल (Stool) में खून या मवाद आ रहा हो।मरीज को तेज बुखार हो और शरीर पूरी तरह टूट चुका हो।डिहाइड्रेशन के कारण पेशाब (Urine) की मात्रा बहुत कम या बंद हो गई हो।मरीज बहुत ज्यादा सुस्त, बेहोशी की हालत में या आंखें धंसी हुई दिखाई दें।विशेषकर मधुमेह (Diabetes), किडनी के मरीजों, बुजुर्गों और छोटे बच्चों के मामले में रिस्क बिल्कुल न लें और तुरंत योग्य चिकित्सक की सलाह लें।

न्यूज़ इंडिया लाइव 10 Jul 2026 8:16 am

भरपूर नींद के बाद भी दिनभर छाई रहती है सुस्ती? सावधान! शरीर के ये 5 छुपे हुए लक्षण दे रहे हैं गंभीर बीमारी का संकेत

आज की बेहद आधुनिक और भागदौड़ भरी लाइफस्टाइल में शरीर का लगातार थकना एक बेहद सामान्य बात मान ली गई है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि रोज रात को 7 से 8 घंटे की गहरी और पूरी नींद लेने के बावजूद अगर आपका शरीर सुबह उठते ही भारी, सुस्त और ऊर्जाहीन महसूस करता है, तो इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज करना आपके लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, आज के दौर में खराब खानपान, अत्यधिक मानसिक तनाव और पैकेट बंद या प्रोसेस्ड फूड्स पर बढ़ती निर्भरता के कारण युवाओं में पोषक तत्वों की कमी एक महामारी की तरह फैल रही है। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि विटामिंस और मिनरल्स की यह कमी शरीर में बहुत धीमी रफ्तार से बढ़ती है, जिसके कारण लोग इसके शुरुआती चेतावनी संकेतों को समझ नहीं पाते और आगे चलकर किसी गंभीर क्रोनिक बीमारी का शिकार हो जाते हैं।लगातार बनी रहने वाली थकान और असामान्य बाल झड़ना: जब भरपूर आराम भी हो जाए बेअसरशहरी आबादी में बढ़ते इस खतरे पर फरीदाबाद स्थित अमृता अस्पताल (Amrita Hospital, Faridabad) के प्रसिद्ध आंतरिक रोग विशेषज्ञ (Internal Medicine Expert) डॉ. मोहित शर्मा ने टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) से बातचीत में एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा किया है। डॉ. शर्मा के मुताबिक, आज के समय में पोषण की कमी लोगों की आम सोच से कहीं ज्यादा तेजी से फैल रही है, विशेषकर महानगरीय इलाकों में। इसका सबसे पहला और प्रमुख संकेत है हर समय बिना वजह थकान महसूस होना। जब शरीर में जरूरी विटामिंस की कमी होती है, तो कोशिकाओं को ऊर्जा बनाने में भारी मशक्कत करनी पड़ती है, जिससे आपकी काम करने की दैनिक क्षमता और कार्यकुशलता बुरी तरह प्रभावित होने लगती है। इसका दूसरा बड़ा लक्षण है बालों का अत्यधिक टूटना। मौसम बदलने पर थोड़े बालों का गिरना सामान्य है, लेकिन यदि आपके बाल लगातार और बहुत ज्यादा मात्रा में झड़ रहे हैं, तो यह साफ इशारा है कि बालों की जड़ों को अंदरूनी पोषण नहीं मिल पा रहा है, जिससे उनका प्राकृतिक विकास चक्र पूरी तरह बाधित हो चुका है।मुंह में बार-बार छाले होना और हाथ-पैरों में झुनझुनी: नसों पर पड़ रहा है सीधा असरशरीर में पोषण के घटते स्तर का तीसरा सबसे आम लेकिन नजरअंदाज किया जाने वाला संकेत है मुंह में बार-बार दर्दनाक छाले होना या होंठों के किनारों का अचानक फटना। ज्यादातर लोग इसे पेट की खराबी या मामूली गर्मी समझकर केवल बाहरी क्रीम या दवाइयां लगा लेते हैं, जिससे कुछ समय के लिए तो राहत मिल जाती है, लेकिन बीमारी की असली वजह शरीर के भीतर ही मौजूद रहती है। इसके अलावा, चौथा और सबसे संवेदनशील लक्षण है हाथ-पैरों में अचानक तेज झुनझुनी होना, सुई चुभने जैसा अहसास होना या अंगों का बार-बार सुन्न पड़ जाना। डॉ. मोहित शर्मा ने विशेष रूप से चेतावनी दी है कि इस लक्षण को भूलकर भी हल्के में नहीं लेना चाहिए, क्योंकि यह सीधे तौर पर हमारी नसों (Nervous System) पर पड़ रहे बुरे असर और कुछ खास विटामिंस की भारी कमी को दर्शाता है। इसे नजरअंदाज करने पर न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर का खतरा बढ़ जाता है।चेहरे का पीला पड़ना और कमजोर नाखून: जानिए कैसे पहचानें पोषक तत्वों की कमी का आईनाविटामिन डेफिशिएंसी का पांचवां स्पष्ट लक्षण आपकी त्वचा और नाखूनों पर साफ दिखाई देता है। अगर आपका चेहरा अपनी प्राकृतिक चमक खो चुका है, त्वचा का रंग असामान्य रूप से पीला या फीका दिखने लगा है, और आपके हाथ-पैर के नाखून बेहद पतले, बेजान होकर बार-बार जरा सी चोट लगते ही टूट जाते हैं, तो यह शरीर में आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों की तीव्र कमी को प्रमाणित करता है। जब शरीर में हीमोग्लोबिन या नसों को ताकत देने वाले तत्वों की कमी होती है, तो त्वचा की बाहरी रंगत सबसे पहले प्रभावित होती है।कैसे करें इस बड़ी बीमारी से खुद का बचाव? डॉक्टर ने बताया एक आसान ब्लड टेस्ट का फॉर्मूलाडॉ. मोहित शर्मा के अनुसार, इस पूरी समस्या में सबसे अच्छी और राहत की बात यह है कि आपको घबराने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं है। शरीर में छिपी किसी भी प्रकार की विटामिन या न्यूट्रिएंट्स की कमी का पता एक बेहद साधारण और किफायती खून की जांच (Blood Test) के जरिए आसानी से लगाया जा सकता है। समय रहते सही डायग्नोसिस होने पर केवल अपने दैनिक खानपान में जरूरी बदलाव करके, हरी पत्तेदार सब्जियां, फल और ड्राई फ्रूट्स शामिल करके या डॉक्टर की सलाह पर उचित न्यूट्रिशनल सप्लीमेंट्स (Supplements) लेकर किसी भी बड़ी और गंभीर बीमारी के खतरे को आसानी से टाला जा सकता है। शरीर द्वारा दिए जाने वाले इन छोटे-छोटे सिग्नल्स को वक्त पर पहचानना ही एक दीर्घायु और निरोगी जीवन की पहली सीढ़ी है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 10 Jul 2026 5:48 am

जेन जेड बनाम मिलेनियल्स की हेल्थ जंग पर नई रिपोर्ट का चौंकाने वाला खुलासा, बर्नआउट और बीमारियों ने बढ़ाई टेंशन

आज के डिजिटल युग में सेहतमंद रहने की परिभाषा पूरी तरह बदल चुकी है। सोशल मीडिया पर हर तरफ चमचमाते हुए जिम गियर्स, ऑर्गेनिक डाइट, थेरेपी सेशंस और मेंटल हेल्थ (Mental Health) पर रील्स की बाढ़ आई हुई है। इस ट्रेंड को देखकर अक्सर यह मान लिया जाता है कि आज की नई पीढ़ी यानी जेन जेड (Gen Z) अपने से ठीक पहले की पीढ़ी मिलेनियल्स (Millennials) की तुलना में कहीं ज्यादा फिट, सजग और सेहतमंद है। मिलेनियल्स को जहां अक्सर 9-से-9 की कॉरपोरेट जॉब, लंबे वर्किंग आवर्स, भयंकर मानसिक तनाव और थकान से जूझने वाली वर्कहोलिक जनरेशन के रूप में देखा जाता है, वहीं जेन जेड को खुद से प्यार करने वाली (Self-Care) पीढ़ी माना जाता है। लेकिन एक नई और व्यापक हेल्थ रिपोर्ट में डॉक्टरों ने जो खुलासे किए हैं, उसने इस चमचमाती तस्वीर के पीछे का एक कड़वा और बेहद परेशान करने वाला सच दुनिया के सामने ला दिया है।सिर्फ अवेयरनेस या असली फिटनेस? योग-जिम को ट्रेंड बनाने वाले मिलेनियल्स से कितनी आगे निकली जेन जेडचिकित्सा विशेषज्ञों और फिटनेस गुरुओं के अनुसार, किसी विषय पर केवल ज्ञान होना और सचमुच स्वस्थ होना, दोनों दो बिल्कुल अलग बातें हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, मिलेनियल्स ने ही समाज में योग, कड़े वर्कआउट, जिम कल्चर, मेडिटेशन और सबसे जरूरी 'वर्क-लाइफ बैलेंस' जैसे भारी-भरकम शब्दों को मुख्यधारा में लाकर लोकप्रिय बनाया था। इसके बाद आई जेन जेड ने इन्हीं आदतों को एक कदम और आगे बढ़ाते हुए थेरेपी लेने, मेंटल बर्नआउट पर खुलकर बात करने और प्रिवेंटिव हेल्थकेयर (बीमारी से पहले बचाव) को अपनी प्राथमिकता बनाया। लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि सिर्फ थेरेपी पर रील्स बनाने या प्रिवेंटिव सप्लीमेंट्स लेने से कोई ज्यादा सेहतमंद साबित नहीं हो जाता। जमीनी हकीकत यह है कि जागरूकता बढ़ने के बावजूद जेन जेड का शारीरिक स्वास्थ्य का ग्राफ तेजी से नीचे गिरा है।बॉडी शेमिंग से आगे बढ़ी सोच: वजन घटाने के पुराने ढर्रे को छोड़ मसल्स और फ्लेक्सिबिलिटी पर फोकसअगर दोनों पीढ़ियों के फिटनेस गोल्स की बात करें, तो उनमें एक बहुत बड़ा और सकारात्मक वैचारिक बदलाव देखने को मिलता है। मिलेनियल्स के लिए फिटनेस का एकमात्र पैमाना अक्सर वेइंग मशीन पर अपना वजन कम देखना और शारीरिक रूप से स्लिम या जीरो साइज दिखना होता था। इसके उलट, जेन जेड अब वजन के उस पुराने ढर्रे से बाहर निकलकर शरीर के कंपोजिशन, लीन मसल्स मास (Lean Muscle Mass) और बॉडी फ्लेक्सिबिलिटी (शरीर के लचीलेपन) को बढ़ाने पर ज्यादा ध्यान दे रही है। एक्सपर्ट्स इस बदलाव को काफी पॉजिटिव और वैज्ञानिक मानते हैं। हालांकि, इसका एक स्याह पहलू यह भी है कि हर समय परफेक्ट डाइट लेने और सोशल मीडिया के पैमानों पर 24 घंटे फिट दिखने की सनक (Health Obsession) युवाओं में एक नए प्रकार के मानसिक तनाव और ईटिंग डिसऑर्डर्स को जन्म दे रही है।30 की उम्र में हार्ट अटैक और डायबिटीज: नई मेडिकल रिपोर्ट के आंकड़ों ने उड़ाए डॉक्टरों के होशइस नई हेल्थ रिपोर्ट में जो सबसे डरावना और चौंकाने वाला पहलू सामने आया है, वह है युवाओं में जानलेवा बीमारियों का समय से पहले दस्तक देना। कार्डियोलॉजिस्ट्स और एंडोक्रिनोलॉजिस्ट्स का कहना है कि जो बीमारियां पहले आमतौर पर 50 से 60 साल की उम्र के बुजुर्गों में देखी जाती थीं, वे अब महज 30 से 40 साल की उम्र के युवाओं को अपनी चपेट में ले रही हैं। आज का युवा वर्ग कम उम्र में ही हाई ब्लड प्रेशर (Hypertension), टाइप-2 डायबिटीज और अचानक आने वाले साइलेंट हार्ट अटैक (Heart Attack) का शिकार हो रहा है। इसके पीछे की मुख्य वजह कॉरपोरेट कल्चर में लगातार स्क्रीन के सामने बैठकर काम करना, रात भर जागना, स्लीप एपेनिया (नींद की कमी), पैकेट बंद फूड्स का अत्यधिक सेवन और शारीरिक निष्क्रियता है। इसके अलावा लड़कियों में पीसीओएस (PCOS) और युवाओं में शुरुआती मोटापा (Obesity) महामारी की तरह फैल रहा है।थेरेपी पर खुली सोच बनाम डूम स्क्रॉलिंग: डिजिटल लाइफस्टाइल बनी युवाओं की सबसे बड़ी दुश्मनतनाव से निपटने के मामले में मिलेनियल्स और जेन जेड के तौर-तरीके बिल्कुल जुदा हैं। मिलेनियल्स जहां तनाव होने पर पुराने 90s के गाने सुनकर, दोस्तों से मिलकर या पुरानी यादों के सहारे खुद को हील करते हैं, वहीं जेन जेड एक बेहद खतरनाक लत की शिकार हो चुकी है जिसे 'डूम स्क्रॉलिंग' (Doom Scrolling) कहा जाता है। यानी तनाव को कम करने के लिए वे घंटों तक मोबाइल स्क्रीन पर नकारात्मक और डिप्रेशन से भरी रील्स स्क्रॉल करते रहते हैं। 24 घंटे ऑनलाइन रहने की यह डिजिटल मजबूरी, सोशल मीडिया पर दूसरों की नकली परफेक्ट लाइफ से अपनी तुलना करना, और कुछ छूट जाने का डर (FOMO) युवाओं को भयंकर एंग्जायटी, अनिद्रा और क्रोनिक डिप्रेशन की ओर धकेल रहा है। पहले के समय में डिजिटल और रियल लाइफ के बीच एक स्पष्ट लक्ष्मण रेखा होती थी, जो अब पूरी तरह मिट चुकी है, और यही आज की पीढ़ी की सबसे बड़ी कमजोरी बन गई है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 10 Jul 2026 5:46 am

ग्रीन-टी का जमाना गया! जानें क्यों हर सेलिब्रिटी की पहली पसंद बनी हरी 'माचा चाय', वजन घटाने का नया सुपरफूड

अगर आप भी फिटनेस के दीवाने हैं और सोशल मीडिया पर एक्टिव रहते हैं, तो आपने निश्चित रूप से अपने पसंदीदा बॉलीवुड सितारों, सुपरमॉडल्स और बड़े-बड़े कंटेंट क्रिएटर्स को एक खास गहरे हरे रंग की ड्रिंक की चुस्कियां लेते हुए देखा होगा। फिटनेस इंडस्ट्री में इन दिनों 'माचा टी' (Matcha Tea) का एक जबरदस्त और अभूतपूर्व क्रेज देखने को मिल रहा है। सेहत के प्रति जागरूक रहने वाले लोग अब पारंपरिक ग्रीन-टी बैग्स को पीछे छोड़कर इस जापानी हरी चाय की तरफ तेजी से रुख कर रहे हैं। इस अचानक आए वैश्विक वेलनेस ट्रेंड को देखकर हर कोई हैरान है कि आखिर इस जादुई ड्रिंक में ऐसा क्या खास है, जो इसे वजन घटाने का सबसे आधुनिक और कारगर हथियार बना रहा है।साधारण ग्रीन-टी से कितनी अलग है माचा टी? जानिए पत्ती से लेकर पाउडर बनने का राजअक्सर लोग माचा को साधारण ग्रीन-टी ही समझ लेते हैं, लेकिन पोषण विशेषज्ञों के अनुसार इन दोनों को बनाने और सेवन करने के तरीके में जमीन-आसमान का अंतर है। जहां एक तरफ सादी ग्रीन-टी बनाने के लिए सूखी पत्तियों को गर्म पानी में उबाला जाता है और फिर पत्तियों को छानकर फेंक दिया जाता है, वहीं दूसरी तरफ माचा टी को तैयार करने के लिए विशेष रूप से छांव में उगाई गई पूरी हरी पत्तियों को बारीक पीसकर एक चमकीला हरा पाउडर बनाया जाता है। जब आप माचा पीते हैं, तो आप इस पाउडर को पानी या दूध में पूरी तरह से घोलकर सीधे सेवन करते हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि पत्ती को छानकर फेंकने के बजाय आप पूरी पत्ती को ही खा जाते हैं, जिससे आपके शरीर को साधारण ग्रीन-टी के मुकाबले 10 गुना अधिक पोषक तत्व और विटामिंस मिलते हैं।क्यों दीवाने हैं सेलिब्रिटीज? EGCG एंटीऑक्सीडेंट और जितेन-फ्री कैफीन का अनोखा कॉम्बिनेशनमाचा टी का सोशल मीडिया पर इतनी तेजी से वायरल होना कोई महज इत्तेफाक नहीं है, बल्कि इसके पीछे ठोस वैज्ञानिक कारण हैं। माचा में 'कैटेचिन' (Catechins) नाम का एक बेहद शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट पाया जाता है, जिसमें सबसे प्रमुख तत्व है EGCG (एपिगैलोकैटेचिन गैलेट)। वैज्ञानिक शोधों के अनुसार, यह तत्व शरीर के मेटाबॉलिज्म को रॉकेट की रफ्तार से बढ़ाता है, जिससे शरीर की अतिरिक्त चर्बी और जिद्दी कैलोरी को तेजी से बर्न करने में मदद मिलती है। इसके अतिरिक्त, माचा में कैफीन के साथ-साथ 'एल-थियेनिन' (L-Theanine) नाम का एक दुर्लभ अमीनो एसिड होता है। यह कॉम्बिनेशन कॉफी की तरह अचानक घबराहट या एनर्जी क्रैश पैदा नहीं करता, बल्कि दिमाग को एकदम शांत रखते हुए पूरे दिन शरीर को एक समान और बेहतरीन ऊर्जा प्रदान करता है। यही वजह है कि लोग अब सुबह की दूध वाली चाय या कॉफी को माचा से रिप्लेस कर रहे हैं।क्या वाकई अकेले वजन घटा सकती है माचा? डॉक्टरों और डाइट एक्सपर्ट्स की बड़ी चेतावनीइस सुपरड्रिंक के अनगिनत फायदों को जानने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या केवल माचा पीने से ही पेट की चर्बी गायब हो जाएगी? इस पर देश के शीर्ष डाइटिशियंस और फिटनेस एक्सपर्ट्स ने एक बहुत ही व्यावहारिक और जरूरी चेतावनी दी है। माचा टी कोई जादुई या चमत्कारी दवा नहीं है जो रातों-रात आपका वजन आधा कर देगी। यह आपकी वेट लॉस जर्नी को तेज करने में एक बेहतरीन कैटलिस्ट (सहायक) की भूमिका निभा सकती है, लेकिन इसका असर तभी दिखेगा जब आप इसके साथ एक संतुलित लो-कैलोरी आहार (Balanced Diet) लेंगे और रोजाना नियमित रूप से एक्सरसाइज या योग करेंगे। यदि आप अपने अनियंत्रित खान-पान को बदले बिना और बिना शारीरिक मेहनत किए सिर्फ माचा के भरोसे बैठे रहेंगे, तो वजन पर कोई सकारात्मक असर नहीं देखने को मिलेगा।

न्यूज़ इंडिया लाइव 10 Jul 2026 5:44 am

बिना जिम जाए वजन कम करने के लिए बस इस काले बीज को अपने आहार में शामिल करें!

चिया सीड्स खराब कोलेस्ट्रॉल के लिए फायदेमंद: अगर आपका खराब कोलेस्ट्रॉल ज़्यादा है, तो यह आपके दिल की सेहत के लिए अच्छा नहीं है। इसे नियंत्रित करने के लिए आपको अपने आहार में चिया सीड्स को शामिल करना चाहिए। ये छोटे काले बीज कई बेहतरीन पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। इनमें फाइबर, प्रोटीन, ओमेगा-3 फैटी एसिड और एंटीऑक्सीडेंट्स प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। चिया सीड्स न सिर्फ खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करते हैं बल्कि वजन घटाने में भी मदद करते हैं। यहां बताया गया है कि इनका सेवन कैसे करें...चिया सीड्स में मौजूद फाइबर हृदय स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होता है। दो बड़े चम्मच चिया सीड्स में लगभग 10 ग्राम फाइबर होता है। यह फाइबर खराब कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स को कम करने और अच्छे कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने में मदद करता है। यह रक्त वाहिकाओं की रक्षा करता है। चिया सीड्स ओमेगा-3 फैट अल्फा-लिनोलेनिक एसिड (ALA) से भी भरपूर होते हैं, जो अध्ययनों में हृदय रोग के जोखिम को कम करने में सहायक पाए गए हैं।चिया के बीज पेट में एक जेल जैसा पदार्थ बनाते हैं, जो पाचन क्रिया को बेहतर बनाता है, पेट भरा हुआ महसूस कराता है और वजन कम करने में सहायक होता है। इनकी जेल जैसी बनावट से पेट लंबे समय तक भरा रहता है, जिससे कम कैलोरी का सेवन होता है, जो अप्रत्यक्ष रूप से वजन कम करने और रक्तचाप को नियंत्रित करने में मदद करता है।चिया के बीज तरल पदार्थ को सोख लेते हैं, इसलिए इन्हें पूरी तरह से नरम करने के लिए पर्याप्त पानी, दूध या जूस में मिलाना ज़रूरी है। इससे न केवल पाचन संबंधी परेशानी से बचाव होता है बल्कि पाचन क्रिया भी बेहतर होती है।चिया सीड्स का सेवन कई तरीकों से किया जा सकता है। चिया सीड्स को रात भर पानी में भिगोकर रखें और सुबह इस पानी को पी लें। आप इन्हें स्मूदी या सूप में भी डाल सकते हैं। आप चिया सीड्स को दूध में भिगोकर भी पी सकते हैं। आप इन्हें पैनकेक या मफिन के घोल में या एनर्जी बार में भी मिला सकते हैं। रोजाना लगभग 1-2 चम्मच चिया सीड्स का सेवन करने की सलाह दी जाती है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 8 Jul 2026 9:48 pm

पानी के फायदे: क्या हर सुबह खाली पेट पानी पीने से वजन कम करने में मदद मिलेगी? जानिए सच्चाई

पानी पीना शरीर की कई स्वास्थ्य समस्याओं का समाधान माना जाता है। शरीर को हाइड्रेट करने, शरीर का तापमान कम करने और पोषक तत्वों को संरक्षित रखने में पानी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। डॉक्टर भी खूब पानी पीने की सलाह देते हैं। इसके बावजूद, कई लोग इस बात को लेकर असमंजस में हैं कि सुबह खाली पेट पानी पीना वाकई स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद है या सिर्फ एक गलत धारणा है। यहां इस बारे में पूरी जानकारी दी गई है। सुबह खाली पेट पानी पीना लंबे समय से सोशल मीडिया और दोस्तों के बीच चर्चा का विषय रहा है। कुछ लोग इसे अपनी दैनिक आदत बना लेते हैं, जबकि अन्य लोग कभी-कभार ही पीते हैं। सुबह खाली पेट पानी पीने के कई फायदे बताए जाते हैं।सुबह खाली पेट पानी पीने के क्या फायदे हैं? रिपोर्टों के अनुसार, सुबह उठने के तुरंत बाद पानी पीने से पाचन क्रिया में सहायता मिलती है, शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है और पोषक तत्वों का पूरे शरीर में संचार होता है। सुबह खाली पेट पानी पीने से दिन के अन्य समय में पानी पीने की तुलना में उतने ही या उससे अधिक स्वास्थ्य लाभ मिलते हैं, ऐसा कहा जाता है। हालांकि, इस बात का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि पूरे दिन पर्याप्त मात्रा में पानी पीना सबसे महत्वपूर्ण है। दिनभर हाइड्रेटेड रहने के लिए आपको कितना पानी पीना चाहिए? पानी की ज़रूरतें आपके शरीर के अनुसार अलग-अलग होती हैं। यह आपकी उम्र, जलवायु, शारीरिक गतिविधि और स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। आमतौर पर, प्यास लगने का इंतज़ार करने के बजाय दिनभर थोड़ा-थोड़ा पानी पीते रहना बेहतर होता है। सुबह उठने के बाद जितना हो सके धीरे-धीरे पानी पिएं। एक बार में बहुत सारा पानी न पिएं। प्यास और शरीर की ज़रूरत के अनुसार पानी पिएं। (नोट: यहां दी गई जानकारी सामान्य ज्ञान और विशेषज्ञ स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 8 Jul 2026 9:44 pm

बस इस छोटे से फल को खा लीजिए... और आप एक मिनट में ही नियंत्रण में आ जाएंगे!

पैशन फ्रूट से ब्लड शुगर कंट्रोल: एक बार डायबिटीज हो जाए तो यह अपने आप ठीक नहीं होती। इस बीमारी के लिए जीवन भर दवा लेनी पड़ती है। कुछ घरेलू नुस्खों से इसे कंट्रोल में रखा जा सकता है। कहा जाता है कि डायबिटीज के मरीजों को फल खाते समय सावधानी बरतनी चाहिए। लेकिन इस छोटे से फल को खाकर डायबिटीज को कंट्रोल किया जा सकता है। उच्च रक्त शर्करा के कारण:एक छोटी सी गलती भी शरीर में शर्करा का स्तर बढ़ा सकती है। इसीलिए मधुमेह होने पर हमें अपने खान-पान का विशेष ध्यान रखना चाहिए। यह पीला फल मधुमेह को नियंत्रित करने में रामबाण माना जाता है।इस फल का छिलका मधुमेह को नियंत्रित करता है:रक्त शर्करा को नियंत्रित करने वाले इस फल का नाम कृष्ण फल है। इसे फैशन फल भी कहा जाता है। इस फल का स्वाद मीठा और खट्टा होता है। यह खाने में भी बहुत स्वादिष्ट होता है।बहुत कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स:कृष्णा फल का ग्लाइसेमिक इंडेक्स बहुत कम होता है। इसी वजह से यह फल रक्त में शर्करा का स्तर बढ़ने नहीं देता।रक्त शर्करा को नियंत्रित करता है:कृष्णा फल का छिलका फाइबर और कार्बोहाइड्रेट से भरपूर होता है। इसलिए, इसका सेवन रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रण में रखता है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 8 Jul 2026 9:43 pm

क्या आपके प्रेशर कुकर में भी पक रहा है 'धीमा जहर'? खाना बनाने से पहले जान लें स्टेनलेस स्टील और एल्युमीनियम का ये बड़ा सच

प्रेशर कुकर आज हर भारतीय रसोई का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। दाल-चावल से लेकर सब्जी तक, झटपट खाना पकाने के लिए हम सब इसी पर निर्भर हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस कुकर में आप बड़े चाव से खाना पका रहे हैं, वह कहीं आपकी सेहत के लिए 'धीमा जहर' तो नहीं बन रहा? बाजार में मुख्य रूप से एल्युमीनियम और स्टेनलेस स्टील के कुकर मिलते हैं, लेकिन स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिहाज से इनमें से कौन सा आपके परिवार के लिए सबसे बेस्ट है, यह जानना बेहद जरूरी है। आइए समझते हैं कि कुकर का धातु आपकी सेहत को किस तरह प्रभावित करता है।एल्युमीनियम कुकर: क्यों इसे माना जाता है सेहत के लिए खतरनाक?भारत के अधिकांश घरों में एल्युमीनियम के प्रेशर कुकर का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जाता है क्योंकि ये सस्ते होते हैं और इनमें खाना जल्दी पकता है। लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों का मानना है कि एल्युमीनियम एक अत्यधिक प्रतिक्रियाशील (Reactive) धातु है। जब आप इसमें टमाटर, नींबू या सिरके जैसी खट्टी (अम्लीय) चीजें पकाते हैं, तो एल्युमीनियम भोजन के साथ रासायनिक प्रतिक्रिया करता है और धीरे-धीरे पिघलकर खाने में मिल जाता है। लंबे समय तक ऐसा खाना खाने से शरीर में एल्युमीनियम जमा होने लगता है, जो लिवर, किडनी और मस्तिष्क से जुड़ी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है।स्टेनलेस स्टील कुकर: सेहत और सुरक्षा का सबसे बेस्ट विकल्पअगर आप अपने परिवार की सेहत को लेकर फिक्रमंद हैं, तो स्टेनलेस स्टील का प्रेशर कुकर सबसे सुरक्षित और बेहतरीन विकल्प माना जाता है। स्टेनलेस स्टील एक 'नॉन-रिएक्टिव' धातु है, जिसका मतलब है कि यह भोजन के तत्वों के साथ किसी भी प्रकार की रासायनिक प्रतिक्रिया नहीं करता है, चाहे भोजन कितना भी खट्टा या तीखा क्यों न हो। इसमें पकाए गए भोजन का स्वाद और पौष्टिकता पूरी तरह सुरक्षित रहती है। हालांकि, यह एल्युमीनियम की तुलना में थोड़ा महंगा जरूर होता है, लेकिन स्वास्थ्य के मोर्चे पर यह आपके पैसे की पूरी वसूली कर देता है।रसोई के लिए कुकर चुनते समय इन बातों का रखें विशेष ख्यालअगर आप अपने लिए एक नया प्रेशर कुकर खरीदने की योजना बना रहे हैं, तो हमेशा 'ट्राई-प्लाई' (Tri-Ply) स्टेनलेस स्टील कुकर को प्राथमिकता दें। इस तरह के कुकर में नीचे की परत में एल्युमीनियम या तांबा छिपा होता है ताकि गर्मी समान रूप से फैले और खाना जले नहीं, जबकि भोजन के संपर्क में आने वाली ऊपरी परत पूरी तरह शुद्ध स्टेनलेस स्टील की होती है। इसके अलावा, हमेशा ISI मार्क वाले कुकर ही खरीदें ताकि सुरक्षा से कोई समझौता न हो। आज ही अपनी रसोई की जांच करें और अगर आप भी एल्युमीनियम का पुराना कुकर इस्तेमाल कर रहे हैं, तो सेहत की खातिर इसे बदलने पर विचार करें।

न्यूज़ इंडिया लाइव 8 Jul 2026 1:47 pm

सावधान! क्या आप भी बारिश के मौसम में चाव से खा रहे हैं मूली? फायदे और नुकसान जानकर उड़ जाएंगे होश

मानसून की रिमझिम फुहारों के बीच गरमा-गरम पराठे और सलाद का स्वाद हर किसी को लुभाता है। इस मौसम में मूली का सेवन कई घरों में आम बात है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि बारिश के दिनों में मूली खाना आपकी सेहत के लिए वरदान है या फिर एक बड़ा खतरा? आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान, दोनों ही मानसून के दौरान खान-पान को लेकर विशेष सावधानी बरतने की सलाह देते हैं। अगर आप भी मूली के शौकीन हैं, तो इसके गुण और अवगुणों के बारे में पूरी सच्चाई जानना आपके लिए बेहद जरूरी है।क्यों बारिश में मूली खाने से बचते हैं लोग?स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, बारिश के मौसम में मूली का सेवन करते समय सबसे बड़ी चुनौती बैक्टीरिया और फंगस से जुड़ी होती है। चूंकि मूली जमीन के नीचे उगने वाली एक जड़ वाली सब्जी है, इसलिए मानसून में मिट्टी में नमी और कीटाणुओं की संख्या काफी बढ़ जाती है। इस दौरान मूली की सतह पर हानिकारक सूक्ष्मजीव चिपक जाते हैं, जो ठीक से साफ न होने पर पेट में संक्रमण, डायरिया, गैस और मरोड़ जैसी गंभीर पाचन समस्याएं पैदा कर सकते हैं। इसके अलावा, बारिश में हमारा पाचन तंत्र स्वाभाविक रूप से थोड़ा धीमा हो जाता है, जिससे मूली जैसी भारी सब्जी को पचाने में शरीर को अधिक मेहनत करनी पड़ती है।सेहत के लिए कब और कैसे फायदेमंद है मूली?ऐसा नहीं है कि मूली पूरी तरह से नुकसानदायक ही है। मूली में प्रचुर मात्रा में विटामिन सी, फाइबर और एंटी-ऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) को मजबूत करने में मदद करते हैं। यदि आप मानसून के दौरान भी इसका लाभ उठाना चाहते हैं, तो इसे कच्चा सलाद के रूप में खाने के बजाय पकाकर खाएं। मूली की सब्जी, सूप या उबले हुए पराठे बनाकर खाने से इसके बैक्टीरिया नष्ट हो जाते हैं और यह पेट के लिए हल्की भी हो जाती है। इसके अलावा, मूली शरीर को डिटॉक्सिफाई करने और लिवर की कार्यप्रणाली को बेहतर बनाने में भी सहायक मानी जाती है।मानसून में मूली खाते समय बरतें ये जरूरी सावधानियांअगर आप इस मौसम में मूली का आनंद लेना ही चाहते हैं, तो कुछ नियमों का कड़ाई से पालन करें। सबसे पहले, बाजार से लाई गई मूली को कम से कम 10 से 15 मिनट के लिए गुनगुने पानी या नमक के पानी में भिगोकर रखें और फिर अच्छी तरह छीलकर ही इस्तेमाल करें। रात के समय मूली खाने से पूरी तरह परहेज करें, क्योंकि इससे वात दोष बढ़ सकता है और जोड़ों में दर्द या गैस की समस्या हो सकती है। इन छोटी-छोटी लेकिन महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखकर आप अपनी सेहत को बिना नुकसान पहुँचाए स्वाद का मजा ले सकते हैं।

न्यूज़ इंडिया लाइव 8 Jul 2026 1:46 pm

पेट में गैस, एसिडिटी और ब्लोटिंग को हल्के में लेना पड़ेगा भारी, एक्सपर्ट्स ने दी चेतावनी

आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी, खराब खान-पान और अत्यधिक मानसिक तनाव के कारण पेट में गैस बनना, पेट फूलना (ब्लोटिंग) और एसिडिटी होना एक बहुत ही आम बात हो गई है। अधिकांश लोग इन समस्याओं को बेहद साधारण मानकर इनो, एंटासिड या कोई घरेलू चूर्ण खाकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन हेल्थ एक्सपर्ट्स और गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट्स ने इसको लेकर एक बेहद चौंकाने वाली और कड़ी चेतावनी जारी की है। डॉक्टरों के अनुसार, अगर आपको यह समस्या लगातार बनी रहती है, तो यह केवल अपच नहीं है, बल्कि आपके शरीर के भीतर पनप रही किसी बहुत गंभीर और जानलेवा बीमारी का शुरुआती अलार्म हो सकता है।साधारण सी दिखने वाली गैस के पीछे छिपी बड़ी बीमारियां: डॉक्टर क्यों कर रहे हैं आगाह?चिकित्सा विशेषज्ञों के मुताबिक, लंबे समय तक रहने वाली एसिडिटी और पेट फूलना पेट के अल्सर, क्रोहन डिजीज (Crohn's Disease) या इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम (IBS) जैसी आंतों की गंभीर बीमारियों का मुख्य लक्षण होते हैं। सबसे डराने वाली बात यह है कि कभी-कभी पेट के ऊपरी हिस्से में लगातार बनने वाली गैस और जलन सीधे तौर पर लीवर की खराबी, फैटी लीवर या फिर पेट और आंतों के कैंसर (Gastrointestinal Cancer) जैसी जानलेवा बीमारियों की तरफ इशारा करती है। इसलिए इसे हर बार सिर्फ 'गलत खाना खा लिया था' कहकर टालना आपके लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।इन गंभीर लक्षणों को भूलकर भी न करें नजरअंदाज: तुरंत डॉक्टर से मिलने की है जरूरतअगर आपको पेट की इन आम दिक्कतों के साथ-साथ कुछ खास तरह के बदलाव अपने शरीर में दिखाई दे रहे हैं, तो आपको बिना एक मिनट गंवाए किसी अच्छे डॉक्टर या विशेषज्ञ से अपनी जांच करानी चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि गैस और ब्लोटिंग के साथ आपका वजन अचानक और तेजी से कम हो रहा हो, मल त्याग करते समय खून आ रहा हो, लगातार उल्टी या जी मिचलाने की समस्या बनी हो, या फिर खाना निगलने में तकलीफ हो रही हो, तो यह इस बात का साफ संकेत है कि मामला बेहद संवेदनशील है और इसके लिए तुरंत मेडिकल ट्रीटमेंट की जरूरत है।एक्सपर्ट्स के इन खास सुझावों को अपनाएं: लाइफस्टाइल में करें ये जरूरी बदलावइस गंभीर स्थिति से बचने के लिए हेल्थ एक्सपर्ट्स ने कुछ बेहद आसान लेकिन असरदार सुझाव दिए हैं। सबसे पहले बाजार के प्रोसेस्ड फूड, अत्यधिक मिर्च-मसाले, मैदा और कार्बोनेटेड कोल्ड ड्रिंक्स से पूरी तरह दूरी बना लें। रात का खाना सोने से कम से कम दो से तीन घंटे पहले खाएं और भोजन को हमेशा खूब चबा-चबाकर खाएं। इसके अलावा दिनभर में पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं, नियमित रूप से योग या वॉक करें और डॉक्टर की सलाह के बिना मेडिकल स्टोर से खुद दवाइयां खरीदकर (Self-Medication) खाने की आदत को आज ही छोड़ दें, ताकि आपका पेट और आप हमेशा पूरी तरह स्वस्थ रहें।

न्यूज़ इंडिया लाइव 7 Jul 2026 3:53 pm

कौड़ियों के भाव मिलने वाला जिमीकंद है सेहत का असली खजाना: कंप्यूटर जैसा तेज होगा दिमाग, मक्खन की तरह पिघलेगी चर्बी

भारतीय रसोई और स्थानीय सब्जी मंडियों में बेहद साधारण और सस्ती मिलने वाली सब्जी जिमीकंद (जिसे कई इलाकों में सूरन या याम भी कहा जाता है) असल में औषधीय गुणों का एक ऐसा पावरहाउस है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। आयुर्वेद से लेकर आधुनिक मेडिकल साइंस तक में जिमीकंद को सेहत के लिए किसी वरदान से कम नहीं माना गया है। अगर आप इसे सिर्फ एक आम सब्जी समझकर नजरअंदाज कर रहे हैं, तो आप प्रकृति के एक बेहद ताकतवर सप्लीमेंट को छोड़ रहे हैं। यह सस्ती सी दिखने वाली कंद मूल सब्जी आपके शरीर को अंदर से फौलाद बनाने की ताकत रखती है।कंप्यूटर जैसा तेज होगा दिमाग और याददाश्त: अल्जाइमर से भी रखता है दूरबढ़ती उम्र के साथ याददाश्त का कमजोर होना या काम में फोकस न कर पाना आज एक आम समस्या बन चुका है। जिमीकंद में भरपूर मात्रा में ओमेगा-3 फैटी एसिड और महत्वपूर्ण मिनरल्स पाए जाते हैं, जो सीधे तौर पर हमारे ब्रेन सेल्स को एक्टिव करते हैं। इसके नियमित सेवन से मस्तिष्क की कार्यप्रणाली में सुधार होता है और सोचने-समझने की क्षमता बढ़ती है। डॉक्टरों के अनुसार, न्यूरोलॉजिकल विकारों और अल्जाइमर जैसी गंभीर भूलने की बीमारी से बचने के लिए डाइट में जिमीकंद को शामिल करना बेहद फायदेमंद साबित होता है।जिद्दी मोटापा होगा छूमंतर: वजन घटाने और मेटाबॉलिज्म बढ़ाने का रामबाण उपायअगर आप बिना कमजोरी के अपना वजन कम करना चाहते हैं, तो जिमीकंद आपकी वेट लॉस जर्नी को बेहद आसान बना सकता है। इसमें कैलोरी की मात्रा बहुत कम होती है और फाइबर कूट-कूट कर भरा होता है। इसे खाने के बाद लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस होता है, जिससे आप ओवरईटिंग और अस्वास्थ्यकर खान-पान से बच जाते हैं। इसके साथ ही जिमीकंद शरीर के खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) को कम करने और अच्छे कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने में मदद करता है, जिससे पेट की चर्बी तेजी से मोम की तरह पिघलने लगती है।पेट की समस्याओं और बवासीर का जड़ से खात्मा: पाचन तंत्र बनेगा मजबूतआयुर्वेद में जिमीकंद को पेट के रोगों, विशेषकर बवासीर (Piles) के इलाज में एक अचूक औषधि माना गया है। इसके भीतर मौजूद रेजिस्टेंट स्टार्च और डाइटरी फाइबर आंतों में गुड बैक्टीरिया को बढ़ाते हैं, जिससे पुरानी से पुरानी कब्ज, गैस और एसिडिटी की समस्या कुछ ही दिनों में गायब हो जाती है। यह आपके पूरे पाचन तंत्र (Digestive System) को डीटॉक्सिफाई करता है। इसके नियमित और सही तरीके से किए गए सेवन से लीवर की कार्यक्षमता भी मजबूत होती है, जिससे खाया-पिया शरीर को सीधे तौर पर लगने लगता है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 7 Jul 2026 3:50 pm

AC vs Cooler in Monsoon: मानसून की उमस भरी गर्मी में एसी और कूलर में से कौन है बेस्ट? खरीदने से पहले जानें दोनों का अंतर

बारिश का मौसम शुरू होते ही तपती गर्मी से तो राहत मिल जाती है, लेकिन हवा में नमी (Humidity) का स्तर बढ़ने से घरों के भीतर भारी उमस और चिपचिपापन महसूस होने लगता है। इस मौसम में अक्सर लोग अपने घरों को ठंडा और आरामदायक रखने के लिए नया कूलिंग अप्लायंस खरीदने का विचार करते हैं। बाजार में एयर कंडीशनर (AC) और एयर कूलर दोनों ही विकल्प मौजूद हैं, जिसकी वजह से लोग असमंजस में पड़ जाते हैं कि मानसून के लिहाज से उनके लिए क्या सही रहेगा। इन दोनों उपकरणों की तकनीक और काम करने का तरीका एक-दूसरे से पूरी तरह अलग है, इसलिए अपनी जरूरत के मुताबिक सही फैसला लेना बेहद जरूरी है।बारिश के मौसम में एयर कंडीशनर (AC) के बड़े फायदेमानसून और उमस भरी गर्मी के दौरान एयर कंडीशनर (AC) का इस्तेमाल सबसे ज्यादा कारगर और फायदेमंद माना जाता है। एसी केवल कमरे के तापमान को ही कम नहीं करता, बल्कि हवा में मौजूद अतिरिक्त नमी को भी खींच लेता है। इसमें मौजूद 'ड्राई मोड' (Dry Mode) विशेष रूप से बारिश के दिनों के लिए ही डिजाइन किया गया है, जो कमरे के चिपचिपेपन को खत्म कर हवा को सूखा, ठंडा और पूरी तरह आरामदायक बना देता है। इसी वजह से भारी बारिश के दिनों में भी घर के अंदर बेहतरीन कूलिंग मिलती है।उमस भरे मौसम में क्यों बेअसर हो जाता है एयर कूलर?दूसरी ओर, अगर एयर कूलर की बात करें तो यह मुख्य रूप से गर्म और सूखे (Dry Heat) मौसम के लिए सबसे बेस्ट माना जाता है। एयर कूलर पानी से भीगे हुए कूलिंग पैड के जरिए बाहर की हवा को ठंडा करके कमरे में भेजता है। यह वाष्पीकरण (Evaporation) की तकनीक पर काम करता है, जो तभी सफल होती है जब हवा सूखी हो। चूंकि बारिश के दिनों में वायुमंडल में पहले से ही नमी का स्तर बहुत अधिक होता है, इसलिए कूलर के पैड से पानी का वाष्पीकरण ठीक से नहीं हो पाता और कूलर की ठंडक का असर लगभग खत्म हो जाता है।कूलर बढ़ा सकता है आपकी परेशानी, एसी है स्मार्ट चॉइसबारिश के दिनों में कई बार एयर कूलर कमरे को ठंडा करने के बजाय वहां की उमस को और ज्यादा बढ़ा देता है, जिससे कमरे के अंदर रखी चीजें और फर्श भी चिपचिपे महसूस होने लगते हैं। ऐसे में एयर कंडीशनर (AC) ही एकमात्र ऐसा स्मार्ट विकल्प बचता है जो कमरे को ठंडा रखने के साथ-साथ हवा को शुद्ध और ड्राई बनाए रखता है। यही कारण है कि बजट और मौसम की अनुकूलता को देखते हुए मानसून के दौरान ज्यादातर एक्सपर्ट्स कूलर की जगह एसी को ही पहली प्राथमिकता देने की सलाह देते हैं।

न्यूज़ इंडिया लाइव 7 Jul 2026 8:38 am

बचपन का ट्रॉमा: सिर्फ यादें नहीं, ये गंभीर बीमारियों की जड़ कैसे शरीर पर छोड़ जाता है गहरा असर

हम अक्सर अपनी शारीरिक समस्याओं के लिए खराब लाइफस्टाइल या खान-पान को जिम्मेदार मानते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आपकी वर्तमान बीमारी का कारण आपके बचपन की कोई अनकही तकलीफ हो सकती है? आधुनिक विज्ञान अब इस बात की पुष्टि कर रहा है कि बचपन में झेला गया ट्रॉमा—जैसे डर, हिंसा, उपेक्षा या भावनात्मक अस्थिरता—सिर्फ मानसिक घाव नहीं है, बल्कि यह बड़े होने पर आपके शरीर को गंभीर बीमारियों का घर बना सकता है। माइग्रेन से लेकर ऑटोइम्यून बीमारियों तक, बचपन का 'स्ट्रेस' सालों बाद भी अपना असर दिखाता है।बीमारियों का अदृश्य कनेक्शनकई लोग सालों तक माइग्रेन, पेट की समस्याओं, अनिद्रा, लगातार थकान और एंग्जायटी जैसी परेशानियों के लिए डॉक्टर बदलते रहते हैं, लेकिन रिपोर्ट सामान्य आने के बावजूद आराम नहीं मिलता। विशेषज्ञ अब यह मान रहे हैं कि इन बीमारियों की जड़ अक्सर हमारे बचपन के दबे हुए अनुभव होते हैं। बचपन का ट्रॉमा हमारे नर्वस सिस्टम, हार्मोनल बैलेंस और इम्यून सिस्टम को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है। उदाहरण के तौर पर, यदि कोई बच्चा लंबे समय तक असुरक्षित माहौल में रहा है, तो उसका शरीर हमेशा 'फाइट या फ्लाइट' (लड़ो या भागो) मोड में रहता है। यह निरंतर तनाव शरीर के अंगों को अंदर से खोखला करना शुरू कर देता है।कैसे 'स्ट्रेस हार्मोन' बनते हैं दुश्मनजब एक बच्चा लगातार डर में जीता है, तो उसके शरीर में 'स्ट्रेस हार्मोन' का स्तर असामान्य रूप से बढ़ा रहता है। लंबे समय तक बढ़ा हुआ यह तनाव शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को कमजोर कर देता है। यही कारण है कि बचपन की हिंसा या उपेक्षा झेलने वाले व्यक्तियों में बड़े होने पर हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा, डिप्रेशन और ऑटोइम्यून बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। एक 40 वर्षीय महिला का केस इसका सटीक उदाहरण है, जो वर्षों तक पीठ दर्द और एंग्जायटी से जूझती रही, जबकि उसकी परेशानी का असली कारण बचपन में देखी गई घरेलू हिंसा थी।विज्ञान ने बदली सोचने की दिशाबचपन के ट्रॉमा और सेहत के बीच संबंधों को लेकर अमेरिका में हुई 'ACE' (Adverse Childhood Experiences) रिसर्च सबसे चर्चित रही है। 17 हजार से अधिक लोगों पर की गई इस स्टडी ने यह साबित किया कि बचपन के तनावपूर्ण अनुभव सीधे तौर पर वयस्क जीवन की गंभीर बीमारियों से जुड़े हैं। 'जेएएमए पीडियाट्रिक्स' (JAMA Pediatrics) में प्रकाशित शोध ने भी बचपन के ट्रॉमा और ऑटोइम्यून विकारों के बीच सीधा संबंध देखा है। चिकित्सा जगत अब ट्रॉमा को केवल एक 'मानसिक याद' के रूप में नहीं, बल्कि शरीर पर गहरा असर डालने वाली एक बायोलॉजिकल स्थिति के रूप में देख रहा है। यदि आप भी लंबे समय से ऐसी समस्याओं से परेशान हैं जिनका कोई शारीरिक कारण समझ नहीं आ रहा, तो विशेषज्ञ से परामर्श कर अपने अतीत के इन भावनात्मक घावों पर बात करना एक जरूरी कदम हो सकता है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 2 Jul 2026 5:48 pm

क्या आपका कोलेस्ट्रॉल लेवल भी बढ़ा हुआ है? जानिए कितना लेवल आपके दिल के लिए ला सकता है आफत

आज की खराब लाइफस्टाइल, जंक फूड की लत और शारीरिक निष्क्रियता के कारण दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ता जा रहा है। इनमें सबसे बड़ा विलेन बनकर उभर रहा है शरीर में बढ़ता बैड कोलेस्ट्रॉल। बहुत से लोग नियमित ब्लड टेस्ट तो करवाते हैं, लेकिन वे यह समझ नहीं पाते कि रिपोर्ट में दिख रहा कोलेस्ट्रॉल का कौन सा आंकड़ा उनके दिल के लिए खतरे की घंटी है। देश के सबसे प्रतिष्ठित अपोलो अस्पताल की वरिष्ठ कार्डियोलॉजिस्ट (हृदय रोग विशेषज्ञ) ने इस विषय पर बेहद चौंकाने वाले और महत्वपूर्ण खुलासे किए हैं। डॉक्टर के मुताबिक, नसें ब्लॉक होने और अचानक हार्ट अटैक आने से पहले शरीर को कुछ कड़े संकेत मिलते हैं, जिन्हें समय रहते पहचानना बेहद जरूरी है।जानिए कौन सा कोलेस्ट्रॉल है आपका पक्का दोस्त और कौन सा सबसे बड़ा दुश्मनमानव शरीर में मुख्य रूप से दो तरह के कोलेस्ट्रॉल होते हैं, जिन्हें सामान्य भाषा में गुड कोलेस्ट्रॉल और बैड कोलेस्ट्रॉल कहा जाता है। अपोलो की कार्डियोलॉजिस्ट के अनुसार, एचडीएल (HDL) को अच्छा कोलेस्ट्रॉल माना जाता है क्योंकि यह धमनियों से अतिरिक्त फैट को साफ कर दिल की रक्षा करता है। इसके विपरीत, एलडीएल (LDL) को खराब कोलेस्ट्रॉल कहा जाता है। जब शरीर में एलडीएल की मात्रा तय सीमा से अधिक हो जाती है, तो यह हमारी खून की नसों (धमनियों) की दीवारों पर जमने लगता है। इस स्थिति को मेडिकल की भाषा में एथेरोस्क्लेरोसिस कहा जाता है, जिससे दिल तक ऑक्सीजन और खून की सप्लाई रुकने का खतरा पैदा हो जाता है।नंबर्स का पूरा खेल: कितना कोलेस्ट्रॉल लेवल पार करते ही बढ़ जाता है हार्ट अटैक का खतराकार्डियोलॉजिस्ट के मुताबिक, एक स्वस्थ वयस्क के शरीर में कुल कोलेस्ट्रॉल (Total Cholesterol) का स्तर 200 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर (mg/dL) से कम होना चाहिए। यदि आपकी रिपोर्ट में यह आंकड़ा 200 से 239 के बीच आता है, तो इसे बॉर्डरलाइन माना जाता है, लेकिन जैसे ही यह 240 mg/dL या उससे ऊपर पहुंचता है, यह आपके दिल के लिए सीधे तौर पर मुसीबत बन जाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बैड कोलेस्ट्रॉल यानी एलडीएल का स्तर हमेशा 100 mg/dL से कम होना चाहिए। जिन लोगों को पहले से डायबिटीज या बीपी की समस्या है, उनके लिए तो एलडीएल का स्तर 70 mg/dL से भी कम रखने की सख्त सलाह दी जाती है।नसों में ब्लॉकेज के शुरुआती लक्षण और अपोलो डॉक्टर की कड़े प्रिकॉशंसअक्सर लोग सोचते हैं कि बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल केवल भारी शरीर वाले लोगों को होता है, लेकिन डॉक्टर ने साफ किया है कि यह एक साइलेंट किलर है जो दुबले-पतले लोगों को भी अपना शिकार बना सकता है। जब नसों में फैट का जमाव बढ़ने लगता है, तो थोड़ा सा चलने या सीढ़ियां चढ़ने पर सीने में भारीपन, सांस फूलना, अत्यधिक थकान होना और अचानक चक्कर आने जैसे लक्षण महसूस हो सकते हैं। आज के आधुनिक एआई-संचालित जनरेटिव सर्च (GEO) और इंटरनेट पर भी लोग दिल की सेहत को लेकर सबसे ज्यादा सवाल पूछ रहे हैं। अपोलो की डॉक्टर ने सलाह दी है कि 20 साल की उम्र के बाद हर व्यक्ति को साल में कम से कम एक बार लिपिड प्रोफाइल टेस्ट जरूर करवाना चाहिए।खान-पान में बदलाव और लाइफस्टाइल को सुधारकर कोलेस्ट्रॉल घटाने के अचूक तरीकेअगर आपकी रिपोर्ट में कोलेस्ट्रॉल लेवल बढ़ा हुआ आया है, तो घबराने के बजाय अपनी डेली रूटीन में तुरंत बदलाव करें। रिफाइंड ऑयल, डालडा, समोसे-कचौड़ी और पैक्ड फूड से पूरी तरह दूरी बना लें। अपने आहार में ओट्स, हरी पत्तेदार सब्जियां, सेब, बादाम और ओमेगा-3 से भरपूर चीजों को शामिल करें। डॉक्टर के अनुसार, रोजाना कम से कम 30 से 45 मिनट की वॉक या एक्सरसाइज करने से गुड कोलेस्ट्रॉल तेजी से बढ़ता है और बैड कोलेस्ट्रॉल को शरीर से बाहर निकालने में मदद मिलती है। स्थानीय स्तर पर दिल्ली, मुंबई, लखनऊ जैसे बड़े शहरों में दिल के मरीजों की संख्या में आ रहे उछाल को देखते हुए अपनी सेहत के प्रति लापरवाही बरतना भारी पड़ सकता है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 2 Jul 2026 3:51 pm

Health Benefits of Banana: कच्चे और पके केले में कौन कौनसे विटामिन होते हैं?

Ripe Yellow And Raw Banana Benefits: केला सेहत के लिए एक बेहतरीन फल है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि हरे कच्चे और पीले पके केले के पोषक तत्वों में थोड़ा अंतर होता है? वैसे तो दोनों में लगभग समान विटामिन पाए जाते हैं, लेकिन पकने की प्रक्रिया के दौरान ...

वेब दुनिया 30 Jun 2026 9:55 am

Healthy Living Tips: महंगी दवाइयों के बिना कैसे रहें पूरी तरह फिट? जानिए रसोई के मसालों और 10 आसान आदतों का सेहतमंद गणित

आज की भागदौड़ भरी और व्यस्त जिंदगी में हर व्यक्ति खुद को पूरी तरह स्वस्थ और ऊर्जावान बनाए रखना चाहता है। लेकिन लगातार बढ़ता मानसिक तनाव, अनियमित दिनचर्या, गलत खान-पान और शारीरिक सक्रियता की कमी के कारण आजकल छोटी-मोटी स्वास्थ्य समस्याएं भी बेहद आम हो गई हैं। अच्छी बात यह है कि एक सेहतमंद और निरोग जीवन जीने के लिए हमेशा महंगी दवाइयों, विदेशी सप्लीमेंट्स या मंहगे जिम मेंबरशिप की जरूरत नहीं होती।हमारे अपने घर की रसोई में मौजूद कई साधारण मसाले, प्राकृतिक चीजें और कुछ बेहद आसान आदतें हमें ताउम्र बीमारियों से दूर रखने में मदद कर सकती हैं। यदि हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में बहुत छोटे-छोटे और अनुशासित बदलाव करें, तो शरीर और मन दोनों को 100% चार्ज रखा जा सकता है। आइए बिना किसी घुमाव-फिराव के सीधे जानते हैं उन बेहतरीन आदतों के बारे में, जो आपको हमेशा फिट रखेंगी।1. सुबह गुनगुने पानी से करें दिन की शुरुआतसुबह सोकर उठने के तुरंत बाद, बिना कुछ खाए, एक या दो गिलास हल्का गुनगुना पानी (Lukewarm Water) पीने की आदत डालें। यह आसान सा नियम रात भर से सोए हुए आपके पाचन तंत्र (Digestive System) को तुरंत सक्रिय कर देता है और शरीर में पानी की कमी (Dehydration) को दूर करता है। कुछ लोग वजन घटाने के लिए इसमें नींबू का रस या शहद मिलाकर पीते हैं, लेकिन जिन लोगों को अक्सर एसिडिटी, खट्टी डकारें या पेट में जलन की समस्या रहती है, उन्हें नींबू से बचते हुए केवल सादा गुनगुना पानी ही पीना चाहिए।2. घर का ताजा खाना: सेहत और लंबी उम्र की असली नींवअच्छी और फौलादी सेहत की सबसे मजबूत नींव हमारा संतुलित भोजन (Balanced Diet) है।क्या खाएं: कोशिश करें कि रोज डिब्बाबंद खाने के बजाय ताजा और घर का बना भोजन ही ग्रहण करें। अपनी रोज की थाली में हरी पत्तेदार सब्जियां, मौसमी फल, दालें, फाइबर से भरपूर साबुत अनाज, दूध, दही, पनीर और प्रोटीन से भरपूर अंकुरित अनाज (Sprouts) जरूर शामिल करें। ये सभी चीजें शरीर को जरूरी विटामिन, मिनरल, प्रोटीन और जरूरी एंटीऑक्सीडेंट्स प्रदान करती हैं।क्या न खाएं: बहुत ज्यादा तेल-मसाले वाले, डीप-फ्राई किए गए, पैकेट वाले स्नैक्स, अत्यधिक मीठे और मैदे से बने जंक फूड खाने से पूरी तरह तौबा कर लें। लंबे समय तक ऐसा अस्वस्थ भोजन खाना ही मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज, फैटी लीवर, हृदय रोग और कब्ज जैसी गंभीर पेट संबंधी बीमारियों का मुख्य कारण बनता है।3. हमारी रसोई में छिपा है औषधियों का खजानाभारतीय रसोई केवल स्वाद के लिए नहीं, बल्कि अपने बेहतरीन प्राकृतिक औषधीय गुणों (Medicinal Properties) के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती है:हल्दी: इसमें 'करक्यूमिन' नाम का तत्व पाया जाता है, जो सूजन कम करने (Anti-inflammatory) और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में अचूक है।अदरक और लहसुन: अदरक पाचन क्रिया को दुरुस्त रखती है और बदलते मौसम में खांसी-जुकाम से राहत देती है। वहीं, लहसुन का सीमित मात्रा में खाली पेट सेवन धमनियों को साफ रखता है और हृदय स्वास्थ्य (Heart Health) के लिए अत्यंत लाभकारी माना जाता है।तुलसी: यह एक बेहतरीन नेचुरल एंटीमाइक्रोबियल है, जो सर्दी-खांसी और इन्फेक्शन से शरीर की रक्षा करती है।जीरा, सौंफ और अजवाइन: दोपहर या रात के भारी भोजन के बाद थोड़ी सी मात्रा में भुना हुआ जीरा, सौंफ या अजवाइन चबाने से पेट में गैस, एसिडिटी और अपच जैसी समस्याओं से तुरंत राहत मिलती है।नोट: ध्यान रखें कि ये सभी घरेलू उपाय सामान्य स्वास्थ्य को बेहतर रखने और बीमारियों से बचाव के लिए उपयोगी हैं, लेकिन ये किसी गंभीर बीमारी का परमानेंट इलाज नहीं हैं।4. पर्याप्त पानी: शरीर के हर हिस्से का नेचुरल फ्यूलमानव शरीर का लगभग 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा पानी से बना है, इसलिए शरीर के हर एक अंग और कोशिकाओं को सुचारू रूप से काम करने के लिए पर्याप्त पानी की आवश्यकता होती है। भरपूर पानी पीने से टॉक्सिन्स (विषाक्त पदार्थ) शरीर से बाहर निकल जाते हैं, पाचन क्रिया तेज होती है और त्वचा पर एक प्राकृतिक चमक (ग्लो) बनी रहती है। इसलिए प्यास लगने का इंतजार न करें, बल्कि पूरे दिन जरूरत के अनुसार 8 से 10 गिलास पानी पीने का नियम बनाएं।5. योग और नियमित व्यायाम: 30 मिनट में बदलें अपनी बॉडीसिर्फ अच्छा और पौष्टिक खाना ही पर्याप्त नहीं है, जब तक शरीर उस ऊर्जा को सही तरीके से बर्न न करे। रोज सुबह या शाम को कम से कम 30 मिनट का समय अपने शरीर के लिए जरूर निकालें। आप चाहें तो तेज चाल से टहल सकते हैं (Brisk Walking), योग कर सकते हैं, साइकिल चला सकते हैं या कोई भी हल्की स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज कर सकते हैं।विशेष रूप से योगासन और प्राणायाम (जैसे अनुलोम-विलोम और कपालभाति) शरीर की मांसपेशियों को लचीला बनाते हैं, फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ाते हैं और मानसिक तनाव को चुटकियों में गायब कर देते हैं। नियमित वर्कआउट करने से वजन भी पूरी तरह कंट्रोल में रहता है।6. 8 घंटे की गहरी नींद: बॉडी रीबूटिंग का सबसे आसान तरीकाआजकल डिजिटल युग में देर रात तक मोबाइल स्क्रीन स्क्रॉल करने या लैपटॉप पर काम करने की वजह से लोगों की स्लीप साइकिल (Sleep Cycle) बुरी तरह प्रभावित हुई है। स्वस्थ और निरोग रहने के लिए हर वयस्क को रोज 7 से 9 घंटे की एक गहरी और सुकून भरी नींद लेना बेहद अनिवार्य है। जब हम सोते हैं, तब हमारा शरीर अंदरूनी अंगों की मरम्मत (Cellular Repair) करता है, मस्तिष्क को तरोताजा करता है और हमारे इम्यून सिस्टम (Immunity) को नए सिरे से मजबूत बनाता है।7. मानसिक स्वास्थ्य: शांत दिमाग ही है स्वस्थ शरीर का राजाअच्छी सेहत का मतलब सिर्फ बीमारियों से मुक्त शरीर नहीं है, बल्कि आपका मानसिक रूप से शांत रहना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। डिप्रेशन और एंग्जायटी से बचने के लिए रोज सुबह कुछ मिनट के लिए ध्यान (Meditation) लगाएं, गहरी सांसें लेने का अभ्यास करें। अपनी भागदौड़ से समय निकालकर कुछ पल प्रकृति के बीच बिताएं, पेड़-पौधों को निहारें। इसके साथ ही अपने परिवार के सदस्यों और सच्चे दोस्तों के साथ बैठकर खुलकर हंसना और मन की बातें साझा करना आपके मेंटल हेल्थ के लिए किसी रामबाण औषधि की तरह काम करता है।8. मौसमी और रंग-बिरंगे फल-सब्जियों को दें प्राथमिकताप्रकृति ने हर मौसम के अनुसार ऐसे फल और सब्जियां बनाई हैं, जो उस विशेष मौसम में हमारे शरीर की इम्युनिटी को मजबूत रखती हैं। उदाहरण के लिए गर्मियों और मानसून में आम, तरबूज, पपीता, सेब, अमरूद, लौकी, तोरी और सर्दियों में गाजर, चुकंदर, पालक जैसी चीजें भरपूर मात्रा में खानी चाहिए। कोशिश करें कि आपकी सलाद और भोजन की प्लेट में रंग-बिरंगी सब्जियां (जैसे लाल टमाटर, हरी मिर्च, बैंगनी प्याज, पीली शिमला मिर्च) शामिल हों, क्योंकि अलग-अलग रंगों के खाद्य पदार्थों से शरीर को विभिन्न प्रकार के दुर्लभ विटामिंस और मिनरल्स प्राप्त होते हैं।9. चीनी और नमक पर लगाएं कड़ा ब्रेक, सुबह की धूप से लें विटामिन Dबहुत ज्यादा रिफाइंड चीनी और अत्यधिक नमक का सेवन आज के समय में साइलेंट किलर बन चुके हैं। कोल्ड ड्रिंक्स, बाजार की मिठाइयां और पैकेट बंद नमकीनों से दूरी बनाएं, क्योंकि ये सीधे तौर पर हाई ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल को न्योता देते हैं।इसके साथ ही, हड्डियों और जोड़ों के दर्द से बचने के लिए रोज सुबह की हल्की और ताजी धूप में 15 से 20 मिनट जरूर बैठें। यह सूर्य की रोशनी हमारे शरीर के भीतर प्राकृतिक रूप से विटामिन D (Vitamin D) का निर्माण करती है, जो कैल्शियम को सोखने और हड्डियों को फौलादी बनाने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है।10. साफ-सफाई की छोटी आदतें लाएंगी आपकी जिंदगी में बड़ा बदलावसंक्रामक बीमारियों और इन्फेक्शन से बचने के लिए व्यक्तिगत स्वच्छता (Personal Hygiene) सबसे बड़ा हथियार है। कुछ भी खाने से पहले और बाथरूम का उपयोग करने के बाद हाथों को साबुन से कम से कम 20 सेकंड तक अच्छी तरह धोएं। रसोई घर को हमेशा साफ रखें और बाजार से लाए गए फल व सब्जियों को हमेशा साफ पानी से अच्छी तरह धोकर ही पकाएं या खाएं।इसके अतिरिक्त, हमेशा समय पर भोजन करने की आदत डालें, रात का डिनर हमेशा हल्का रखें और सोने से कम से कम 2 घंटे पहले कर लें। सिगरेट, तंबाकू और शराब जैसी जानलेवा आदतों से पूरी तरह दूरी बना लें। यदि आपके परिवार में पहले से ही शुगर, बीपी या हार्ट की बीमारी का इतिहास (Family History) रहा है, तो 30 की उम्र पार करने के बाद साल में एक बार अपना रूटीन फुल बॉडी चेकअप जरूर करवाएं। आपकी यही छोटी-छोटी सतर्कता आपको ताउम्र डॉक्टर और अस्पतालों के चक्कर लगाने से बचाएगी।

न्यूज़ इंडिया लाइव 28 Jun 2026 9:49 am

AC Side Effects on Health: दिनभर एसी में रहने वाले हो जाएं सावधान, डॉक्टर से जानिए 24 घंटे AC में रहने के 5 बड़े नुकसान

भयंकर गर्मी, चिलचिलाती धूप और उमस से बचने के लिए आजकल एयर कंडीशनर (AC) हमारी जिंदगी का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। घर हो, ऑफिस, कार या शॉपिंग मॉल— हर जगह हम खुद को एसी की ठंडी हवा में रखना पसंद करते हैं। एसी से तपती गर्मी से तुरंत राहत तो मिल जाती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि लगातार या 24 घंटे एसी के माहौल में रहना आपकी सेहत के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है?फरीदाबाद के एशियन हॉस्पिटल के रेस्पिरेट्री क्रिटिकल केयर एवं स्लीप मेडिसिन विभाग के डायरेक्टर एवं एचओडी (HOD) डॉ. मानव मनचंदा के अनुसार, दिनभर एसी में रहने से शरीर को कई गंभीर बीमारियां घेर सकती हैं। खासकर यदि आपके कमरे या केबिन में वेंटिलेशन (हवा के आने-जाने का रास्ता) सही न हो, तो यह रिस्क कई गुना बढ़ जाता है। आइए जानते हैं एसी के कारण होने वाली मुख्य समस्याओं और उनके वैज्ञानिक कारणों के बारे में।1. सांस संबंधी बीमारियां (Respiratory Issues): अस्थमा और एलर्जी मरीजों के लिए बड़ा खतरालंबे समय तक एसी के बंद कमरे में रहने से फेफड़ों और श्वसन तंत्र पर बहुत बुरा असर पड़ता है।कारण: एसी हवा को ठंडा करने के साथ-साथ उसकी प्राकृतिक नमी (Moisture) को पूरी तरह सोख लेता है। शुष्क हवा के कारण हमारे गले, सांस की नली और नाक के भीतर की श्लेष्मा झिल्ली (Mucous Membrane) सूख जाती है।लक्षण: इसके चलते नाक बंद होना, गले में लगातार खराश, सूखी खांसी और सांस लेने में भारीपन महसूस होने लगता है। जो लोग पहले से ही अस्थमा (Asthma), ब्रोंकाइटिस या साइनस की एलर्जी से पीड़ित हैं, ठंडी और शुष्क हवा उनके लक्षणों को तुरंत ट्रिगर कर देती है जिससे अटैक का खतरा बढ़ जाता है।2. एलर्जी और गंभीर साइनस (Allergy and Sinusitis): बार-बार छींक आना और नाक बहनाकई लोगों को एसी चालू करते ही लगातार छींकें आने लगती हैं। डॉ. मानव मनचंदा के मुताबिक, अगर एसी के फिल्टर्स की समय पर सफ़ाई न की जाए, तो उनमें धूल के कण, फंगस और बैक्टीरिया जमा हो जाते हैं। एसी चलने पर ये बारीक कण हवा के साथ पूरे कमरे में फैल जाते हैं। इसके संपर्क में आते ही लोगों को बार-बार छींक आने, नाक बहने, आंखों में तेज जलन और साइनस इन्फेक्शन की शिकायत होने लगती है।3. आंखों में सूखापन (Dry Eye Syndrome): खुजली और धुंधलापनज्यादा देर तक एसी में रहने वाले लोगों में आजकल 'ड्राई आई सिंड्रोम' (Dry Eye Syndrome) की समस्या तेजी से देखी जा रही है। एसी कमरे के भीतर की ह्यूमिडिटी (नमी) को बेहद कम कर देता है, जिससे हमारी आंखों की प्राकृतिक आंसू की परत (Tear Film) तेजी से वाष्पीकृत (Evaporate) हो जाती है। इसके कारण आंखों में हर वक्त सूखापन, लगातार जलन, आंखें लाल होना और कभी-कभी धुंधला दिखने की समस्या हो जाती है। जो लोग लेंस पहनते हैं या लगातार कंप्यूटर स्क्रीन के सामने बैठते हैं, उन्हें यह परेशानी सबसे ज्यादा झेलनी पड़ती है।4. लगातार सिरदर्द और थकान (Headache & Fatigue): वेंटिलेशन की कमी का सीधा असरअगर आप दिनभर एसी दफ्तर या घर में बैठते हैं और वहां ताजी हवा के आने का कोई साधन नहीं है, तो आपको अक्सर शाम होते-होते सिरदर्द और भारी थकान का अहसास होने लगेगा।कारण: पूरी तरह से सील बंद कमरों में लगातार एक ही हवा री-सर्कुलेट (घूमती) होती रहती है, जिससे कमरे के भीतर ऑक्सीजन का स्तर आंशिक रूप से कम होने लगता है और कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ने लगती है।असर: इसके अलावा, जब आप अचानक एसी के बेहद ठंडे तापमान से निकलकर बाहर की भीषण गर्मी में जाते हैं, तो शरीर का तापमान असंतुलित हो जाता है। थर्मल शॉक के कारण भी गंभीर सिरदर्द और मांसपेशियों में जकड़न (Fatigue) पैदा होती है।5. ड्राई स्किन की समस्या (Dry Skin): चेहरे का ग्लो और प्राकृतिक नमी हो जाती है खत्मलगातार एसी में बैठने का सबसे पहला और प्रत्यक्ष नुकसान हमारी त्वचा पर दिखाई देता है। एसी त्वचा की बाहरी परत (Epidermis) की नेचुरल नमी को खींच लेता है। इसके कारण त्वचा रूखी, बेजान और खिंची-खिंची सी होने लगती है। लंबे समय तक ऐसा होने से चेहरे का प्राकृतिक ग्लो (चमक) कम हो जाता है, होंठ फटने लगते हैं और त्वचा पर असमय झुर्रियां व खुजली की समस्या शुरू हो जाती है।एसी के साइड इफेक्ट्स से कैसे बचें? डॉ. मानव मनचंदा के जरूरी टिप्सतापमान रखें संतुलित: एसी को कभी भी 16 या 18 डिग्री जैसे बहुत ठंडे तापमान पर न चलाएं। डॉ. मनचंदा के अनुसार, मानव शरीर के लिए 24C से 26C का तापमान सबसे आदर्श और सुरक्षित माना जाता है। इससे बिजली भी बचती है और सेहत भी।वेंटिलेशन है जरूरी: दिनभर में कम से कम 1 से 2 घंटे के लिए एसी पूरी तरह बंद करें और कमरे के खिड़की-दरवाजे खोल दें, ताकि ताजी हवा और ऑक्सीजन अंदर आ सके और कमरे के बैक्टीरिया बाहर निकल सकें।हाइड्रेटेड रहें: एसी में रहते हुए प्यास कम लगती है, लेकिन शरीर में पानी की कमी हो जाती है। इसलिए थोड़ी-थोड़ी देर में पर्याप्त मात्रा में पानी, नारियल पानी या छाछ पीते रहें। त्वचा और होंठों पर अच्छा मॉइस्चराइजर और लिप बाम लगाएं।फिल्टर्स की सफ़ाई: हर 15 दिनों में अपने एसी के एयर फिल्टर को निकाल कर पानी से अच्छी तरह साफ करें, ताकि उसमें धूल और फंगस न पनप सके।

न्यूज़ इंडिया लाइव 28 Jun 2026 9:47 am

Monsoon Diseases Rules: बरसात के मौसम में तेजी से फैलती हैं ये 4 खतरनाक बीमारियां, जानें इनके लक्षण और खुद को बचाने के उपाय

कड़कड़ाती धूप और भीषण गर्मी के बाद जब बरसात का मौसम आता है, तो मौसम सुहाना हो जाता है और लोगों को गर्मी से बड़ी राहत मिलती है। लेकिन यह खूबसूरत मौसम अपने साथ सेहत से जुड़ी कई गंभीर चुनौतियां और बीमारियां भी लेकर आता है। बारिश के दौरान वातावरण में अचानक नमी (Humidity) का स्तर बेतहाशा बढ़ जाता है, और जगह-जगह जलभराव (Waterlogging) की समस्या आम हो जाती है। ऐसे रुके हुए पानी और उमस भरे माहौल में हानिकारक मच्छर, वायरस और बैक्टीरिया तेजी से पनपने लगते हैं।यही कारण है कि मानसून के दस्तक देते ही देश भर में संक्रामक बीमारियों का रिस्क कई गुना बढ़ जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, इस मौसम में बच्चों, बुजुर्गों और जिन लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) कमजोर होती है, उन्हें अपनी सेहत का विशेष ख्याल रखना चाहिए। आइए बिना किसी काट-छांट के सीधे जानते हैं कि बरसात के मौसम में कौन-कौन सी मुख्य बीमारियां फैलती हैं और उनके लक्षण क्या हैं।1. डेंगू (Dengue): रुके हुए साफ पानी में पनपता है इसका मच्छर, प्लेटलेट्स गिरना है मुख्य संकेतबरसात के दिनों में सबसे खतरनाक और जानलेवा बीमारियों में से एक डेंगू है, जिसका रिस्क इस मौसम में सबसे ज्यादा होता है।कारण: डेंगू की बीमारी एडीज एजिप्टी (Aedes Aegypti) प्रजाति के मादा मच्छर के काटने से फैलती है। इस मच्छर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह गंदे पानी में नहीं, बल्कि आपके घरों के आसपास जमा साफ और रुके हुए पानी में पनपता है। जैसे— घर की छत पर पड़े पुराने टायर, बंद पड़े कूलर, गमलों की ट्रे, खुली हुई पानी की टंकी या डिब्बे।प्रमुख लक्षण: डेंगू होने पर अचानक बहुत तेज बुखार आता है, जिसे 'हड्डी तोड़ बुखार' भी कहते हैं। इसके अलावा तेज सिरदर्द, आंखों के पिछले हिस्से में तेज चुभन और दर्द, मांसपेशियों व जोड़ों में भयंकर दर्द की समस्या होती है। इस बीमारी में मरीज के खून में मौजूद प्लेटलेट्स (Platelets) का स्तर तेजी से नीचे गिरने लगता है, जिससे समय पर इलाज न मिलने पर स्थिति बेहद नाजुक और जानलेवा हो सकती है।2. टाइफाइड (Typhoid): दूषित पानी और संक्रमित भोजन से लीवर-पाचन तंत्र पर होता है हमलाबारिश के मौसम में भारी जलभराव के कारण अक्सर पीने के पानी के पाइपलाइन में सीवेज या गंदा पानी मिक्स हो जाता है, जिससे जल स्रोत पूरी तरह संक्रमित हो जाते हैं।कारण: यह बीमारी साल्मोनेला टाइफी (Salmonella Typhi) नाम के बैक्टीरिया के कारण होती है, जो मुख्य रूप से दूषित पानी और मक्खियों द्वारा संक्रमित किए गए भोजन के जरिए हमारे शरीर में प्रवेश करता है। टाइफाइड का सीधा हमला इंसान के पाचन तंत्र और आंतों पर होता है।प्रमुख लक्षण: टाइफाइड के मरीजों को कई दिनों तक लगातार रहने वाला तेज बुखार, पेट में मरोड़ और तेज दर्द, लगातार सिरदर्द, अत्यधिक शारीरिक कमजोरी और भूख में भारी कमी जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है।3. वायरल फीवर (Viral Fever): तापमान के उतार-चढ़ाव से एक-दूसरे में तेजी से फैलता है संक्रमणबरसात के दिनों में कभी तेज धूप तो कभी अचानक तेज बारिश होने के कारण तापमान में लगातार उतार-चढ़ाव होता रहता है। हवा में मौजूद अत्यधिक नमी के कारण वायरस हवा में लंबे समय तक जीवित रहते हैं।कारण: मौसम में यह अचानक बदलाव हमारे शरीर के इम्यून सिस्टम को धीमा कर देता है, जिससे रेस्पिरेट्री और अन्य वायरल संक्रमण तेजी से फैलते हैं। वायरल फीवर एक अत्यधिक संक्रामक बीमारी है जो खांसने, छींकने या संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने से एक इंसान से दूसरे इंसान में बहुत आसानी से फैल जाती है।प्रमुख लक्षण: इसमें मरीज को कंपकंपी के साथ तेज बुखार, गले में भयंकर खराश या दर्द, सूखी या बलगम वाली खांसी, पूरे शरीर और पीठ में जकड़न व दर्द और अत्यधिक सुस्ती महसूस होती है।4. फूड पॉइजनिंग और दस्त (Food Poisoning & Diarrhea): सड़क किनारे के खुले खाने से पूरी तरह बनाएं दूरीउमस और गर्मी के इस मिले-जुले मौसम में बैक्टीरिया इतनी तेजी से बढ़ते हैं कि घर या बाहर रखा हुआ से खाना बहुत जल्दी खराब या बासी हो जाता है।कारण: कई बार अनजाने में खराब या फंगस लगा हुआ भोजन खा लेने से पेट में भयंकर इन्फेक्शन हो जाता है, जिसे फूड पॉइजनिंग कहते हैं। खासकर मानसून के दौरान सड़क किनारे (Street Food) मिल रहे खुले कटे हुए फल, चाट-पकौड़ी और दूषित पानी से बने जूस का सेवन करने से इसका खतरा सबसे ज्यादा होता है। लापरवाही बरतने पर फूड पॉइजनिंग इतनी गंभीर हो सकती है कि मरीज के शरीर में पानी की कमी (Dehydration) के कारण जान पर बन आती है।प्रमुख लक्षण: खाना खाने के कुछ घंटों बाद ही लगातार उल्टियां होना, पेट में असहनीय मरोड़ और दर्द, बार-बार दस्त (Diarrhea) होना, जी मिचलाना और शरीर का तापमान बढ़ना इसके मुख्य संकेत हैं।मानसून में सुरक्षित रहने के लिए अपनाएं ये जरूरी हेल्थ टिप्सकूलर और गमलों की सफ़ाई: अपने घर के भीतर या आसपास कहीं भी पानी जमा न होने दें। कूलर का पानी हफ्ते में एक बार जरूर बदलें और उसमें थोड़ा सा केरोसिन या पेट्रोल डाल दें।उबला हुआ पानी: इस पूरे मौसम में पानी को हमेशा अच्छी तरह उबालकर और छानकर ही पिएं, ताकि सभी बैक्टीरिया नष्ट हो जाएं।फुल आस्तीन के कपड़े: मच्छरों के काटने से बचने के लिए सोते समय मच्छरदानी या मॉस्किटो लिक्विड का इस्तेमाल करें और बाहर निकलते समय फुल आस्तीन के कपड़े पहनें।ताजा भोजन: हमेशा पूरी तरह ढका हुआ और ताजा बना हुआ गर्म भोजन ही ग्रहण करें। फ्रिज में रखे बहुत पुराने बासी खाने को खाने से पूरी तरह परहेज करें।सलाह: बरसात में होने वाली किसी भी बीमारी को साधारण मौसमी बुखार समझने की भूल न करें। यदि बुखार 2 दिन से ज्यादा रहता है, तो तुरंत नजदीकी डॉक्टर से संपर्क कर ब्लड टेस्ट करवाएं और बिना चिकित्सकीय परामर्श के मेडिकल स्टोर से लेकर कोई भी एंटीबायोटिक या पेनकिलर दवा न खाएं।

न्यूज़ इंडिया लाइव 28 Jun 2026 9:46 am

Cow Urine Study on Chikungunya: आईआईटी रुड़की की बड़ी खोज, चिकनगुनिया वायरस को 99% तक बेअसर कर सकता है गौ-मूत्र डिस्टिलेट

भारत में हर साल मानसून और मौसमी बदलावों के दौरान मच्छरों से पनपने वाली चिकनगुनिया (Chikungunya) जैसी खतरनाक बीमारियों का प्रकोप तेजी से बढ़ता है। इसकी वजह से न केवल हजारों लोगों की सेहत गंभीर रूप से बिगड़ती है और उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है, बल्कि आम जनता की खून-पसीने की कमाई भी इलाज में पानी की तरह बह जाती है। लेकिन अब इस जानलेवा वायरल बीमारी से निपटने की दिशा में भारतीय वैज्ञानिकों को एक बहुत बड़ी और अभूतपूर्व सफलता हाथ लगी है।भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की (IIT Roorkee) के शोधकर्ताओं ने एक हालिया अध्ययन में दावा किया है कि गौ-मूत्र डिस्टिलेट (Cow Urine Distillate - CUD) में कुछ बेहद प्रभावशाली जैव-सक्रिय यौगिक (Bioactive Compounds) मौजूद हैं, जो चिकनगुनिया वायरस के खिलाफ एक अचूक और मजबूत एंटीवायरल हथियार की तरह काम करते हैं।आईआईटी रुड़की की टीम ने लैब में किया परीक्षण, नतीजों ने वैज्ञानिकों को चौंकायायह ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण रिसर्च आईआईटी रुड़की के बायोसाइंसेज एंड बायोइंजीनियरिंग विभाग की प्रसिद्ध प्रोफेसर शैली तोमर और उनकी विशेषज्ञ टीम द्वारा अंजाम दिया गया है। इस विस्तृत शोध पत्र को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित ACS Agricultural Science & Technology जर्नल में आधिकारिक तौर पर प्रकाशित किया गया है। इस शोध को पूरा करने में देश भर के कई चोटी के आयुर्वेद विशेषज्ञों और बायोमेडिकल संस्थानों का भी तकनीकी सहयोग लिया गया।लैब में किए गए परीक्षणों के दौरान वैज्ञानिकों ने पाया कि गौ-मूत्र डिस्टिलेट में चिकनगुनिया के वायरस को लगभग पूरी तरह खत्म करने की अद्भुत क्षमता है। इस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए शोधकर्ताओं ने लैब डिश में चिकनगुनिया वायरस से संक्रमित मानव कोशिकाओं पर इसका प्रयोग किया। जब संक्रमित कोशिकाओं में महज 2 प्रतिशत की मात्रा में गौ-मूत्र डिस्टिलेट मिलाया गया, तो वायरस की क्षमता में 90 प्रतिशत तक की भारी गिरावट दर्ज की गई। वहीं, जब इस मिश्रण की मात्रा को बढ़ाकर 4 प्रतिशत किया गया, तो वायरस का प्रभाव 99 प्रतिशत से भी ज्यादा कम हो गया।एंजाइम ब्लॉक कर वायरस का प्रसार रोकता है बेंजोइक और हिप्यूरिक एसिडइस जटिल वैज्ञानिक शोध को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए आईआईटी के शोधकर्ताओं ने वायरोलॉजी, मेटाबोलॉमिक्स, मॉलेकुलर डॉकिंग और अत्याधुनिक बायोकेमिकल विश्लेषण (Biochemical Analysis) जैसी हाई-टेक तकनीकों का सहारा लिया। गहन जांच में सामने आया कि गौ-मूत्र डिस्टिलेट के भीतर प्राकृतिक रूप से बेंजोइक एसिड (Benzoic Acid), हिप्यूरिक एसिड (Hippuric Acid) और ओलेइक एसिड (Oleic Acid) जैसे बेहद शक्तिशाली कार्बनिक यौगिक पाए जाते हैं।ये यौगिक वायरस को मानव शरीर में जिंदा रहने और बढ़ने के लिए जरूरी प्रोटीनों के निर्माण को पूरी तरह बाधित कर देते हैं। इन अम्लों ने चिकनगुनिया वायरस के सबसे महत्वपूर्ण एंजाइम को चारों तरफ से ब्लॉक कर दिया, जिससे वायरस अपनी संख्या बढ़ाने (Replication) में पूरी तरह असमर्थ हो गया और दम तोड़ दिया।कलौंजी और काली मिर्च के साथ मिलकर बना 99.85% प्रभावी महा-मिश्रणइस पूरे वैज्ञानिक रिसर्च का सबसे जादुई और प्रभावशाली परिणाम तब देखने को मिला, जब शोधकर्ताओं ने इस गौ-मूत्र डिस्टिलेट को दो अन्य प्राकृतिक चीजों के साथ मिक्स किया। वैज्ञानिकों ने इसमें कलौंजी से निकाले गए तत्व थाइमोक्विनोन (Thymoquinone) और काली मिर्च से प्राप्त होने वाले पाइपरिन (Piperine) को एक निश्चित अनुपात में मिलाया।इन तीनों प्राकृतिक तत्वों के अनूठे मिश्रण ने लैब में मौजूद खतरनाक वायरल लोड को रिकॉर्ड 99.85 प्रतिशत तक पूरी तरह से नेस्तनाबूद कर दिया। रिसर्च हेड प्रोफेसर शैली तोमर के मुताबिक, इस चमत्कारी निष्कर्ष से आने वाले समय में चिकनगुनिया के साथ-साथ मच्छरों से फैलने वाले अन्य वायरल संक्रमणों जैसे डेंगू और जिका के खिलाफ भी एक सुरक्षित और प्रभावी एंटीवायरल दवा विकसित करने में बहुत बड़ी मदद मिलेगी।क्या सीधे तौर पर गौ-मूत्र का सेवन है सुरक्षित? विशेषज्ञों ने दी बड़ी चेतावनीहालांकि इस वैज्ञानिक रिसर्च में बेहद सकारात्मक और उम्मीद से बढ़कर परिणाम सामने आए हैं, लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आम जनता चिकनगुनिया होने पर सीधे तौर पर कच्चे या घरेलू स्तर पर गौ-मूत्र का सेवन शुरू कर दे। चिकित्सा विशेषज्ञों और स्वयं शोधकर्ताओं ने इस पर कड़ी चेतावनी जारी की है।लैब में इस्तेमाल किया गया तत्व एक बेहद रिफाइंड 'डिस्टिलेट' (Distillate) था, जिसे वैज्ञानिक पद्धतियों से तैयार किया गया था। इस खोज को एक प्रामाणिक दवा का रूप देने के लिए अभी इंसानों पर व्यापक क्लिनिकल ट्रायल्स (Clinical Trials) किए जाने बाकी हैं। बिना किसी योग्य डॉक्टर की लिखित सलाह के सीधे इसका इस्तेमाल करना लिवर, किडनी या पेट के लिए बेहद खतरनाक और नुकसानदेह साबित हो सकता है।पारंपरिक आयुर्वेद ज्ञान और आधुनिक एलोपैथी विज्ञान के बीच बनेगा मजबूत सेतुहेल्थ एक्सपर्ट्स और फार्मा वैज्ञानिकों के अनुसार, यह शोध भविष्य में भारत के आम और गरीब लोगों के लिए बेहद सस्ती, सुलभ और बिना किसी साइड-इफेक्ट वाली स्वदेशी दवा के निर्माण की दिशा में एक क्रांतिकारी मील का पत्थर साबित हो सकता है। यह अध्ययन इस बात का सबसे बेहतरीन उदाहरण है कि कैसे हमारे भारत के प्राचीन पारंपरिक आयुर्वेदिक ज्ञान (Traditional Ayurvedic Knowledge) को आधुनिक एलोपैथी विज्ञान और उन्नत तकनीकों की कसौटी पर कसकर दुनिया के सामने एक प्रामाणिक इलाज के रूप में पेश किया जा सकता है। चूंकि यह शुरुआती परिणाम है, इसलिए अंतिम रूप से मार्केट में दवा आने में अभी थोड़ा वक्त लगेगा। तब तक मौसमी बीमारियों से बचने के लिए डॉक्टर की सलाह पर ही दवाओं का सेवन करें।

न्यूज़ इंडिया लाइव 28 Jun 2026 9:44 am

सिर्फ 5 मिनट का यह एक आसन बदल देगा आपकी जिंदगी, जानिए रोज पश्चिमोत्तानासन करने के जादुई फायदे और सही तरीका

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, खराब लाइफस्टाइल और घंटों कुर्सी पर बैठकर काम करने की आदत ने लोगों को शारीरिक और मानसिक रूप से थका दिया है। ऐसे में खुद को फिट और ऊर्जावान बनाए रखने के लिए योग से बेहतर और कुछ नहीं हो सकता। योग विज्ञान में कई ऐसे आसन हैं जो पूरे शरीर पर एक साथ काम करते हैं, और उन्हीं में से एक बेहद प्रभावशाली आसन है 'पश्चिमोत्तानासन' (Seated Forward Bend Pose)। अगर आप इसे अपनी डेली रूटीन में शामिल करते हैं, तो यह आपके सिर से लेकर पैर के अंगूठे तक की मांसपेशियों को टोन करने की ताकत रखता है। आइए एक रिपोर्टर की नजर से जानते हैं कि रोजाना इस आसन का अभ्यास करने से आपके शरीर में क्या-क्या बदलाव आते हैं।पेट की चर्बी पिघलाने और पाचन तंत्र दुरुस्त करने में मददगारपश्चिमोत्तानासन का सबसे बड़ा और सीधा असर हमारे पेट और पाचन तंत्र पर पड़ता है। जब आप आगे की ओर झुकते हैं, तो आपके पेट के आंतरिक अंगों जैसे लिवर, किडनी और पैनक्रियाज पर गहरा दबाव बनता है, जिससे उनकी कार्यक्षमता में सुधार होता है। यह आसन पेट की जिद्दी चर्बी (Belly Fat) को तेजी से कम करने और मेटाबॉलिज्म को बूस्ट करने में मदद करता है। इसके नियमित अभ्यास से कब्ज, गैस, एसिडिटी और अपच जैसी पेट की पुरानी समस्याओं से हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाता है। डायबिटीज के मरीजों के लिए भी यह आसन इंसुलिन के प्रोडक्शन को संतुलित करने में बेहद कारगर माना गया है।रीढ़ की हड्डी को बनाएगा लोहे जैसा मजबूत और लचीलालगातार गलत पोस्चर में बैठने के कारण आजकल युवाओं में पीठ दर्द, कमर दर्द और रीढ़ की हड्डी का कड़ा होना एक आम समस्या बन चुका है। पश्चिमोत्तानासन करते समय जब पूरी पीठ आगे की तरफ खिंचती है, तो इससे रीढ़ की हड्डी (Spinal Cord) का लचीलापन बढ़ता है और वह मजबूत होती है। यह आसन आपकी हैमस्ट्रिंग मांसपेशियों, कंधों और कूल्हों को एक बेहतरीन स्ट्रेच देता है। यदि आपको अक्सर काम के बाद पीठ में दर्द या भारीपन महसूस होता है, तो रोजाना सुबह खाली पेट इसका अभ्यास करने से आपकी मांसपेशियों का तनाव पूरी तरह से खत्म हो जाएगा और शरीर का पोस्चर सुधरेगा।मानसिक तनाव दूर कर दिमाग को शांत करने की अचूक दवाशारीरिक फायदों के अलावा पश्चिमोत्तानासन मानसिक स्वास्थ्य के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। आगे झुकने की इस मुद्रा से मस्तिष्क में रक्त का संचार (Blood Circulation) बेहतर होता है, जिससे केंद्रीय तंत्रिका तंत्र शांत होता है। यह आसन कोर्टिसोल यानी स्ट्रेस हार्मोन के स्तर को कम करके मानसिक तनाव, एंग्जायटी और डिप्रेशन के लक्षणों को नियंत्रित करता है। जिन लोगों को रात में नींद न आने (Insomnia) की बीमारी है, उनके लिए यह आसन बेहद फायदेमंद है। यह दिमाग को गहरी शांति का एहसास कराता है, जिससे मन एकाग्र होता है और नींद की क्वालिटी में जबरदस्त सुधार होता है।जानिए पश्चिमोत्तानासन करने का सबसे सही और सुरक्षित तरीकाइस आसन का पूरा लाभ उठाने के लिए इसे सही तकनीक से करना बेहद जरूरी है। सबसे पहले फर्श पर योग मैट बिछाकर दोनों पैरों को सामने की ओर सीधा फैलाकर बैठ जाएं (दंडासन)। अपनी रीढ़ की हड्डी को बिल्कुल सीधा रखें। अब सांस भरते हुए अपने दोनों हाथों को ऊपर की ओर उठाएं और शरीर को ऊपर की तरफ खींचें। इसके बाद सांस छोड़ते हुए धीरे-धीरे आगे की तरफ झुकें और अपने हाथों से पैरों के अंगूठों को पकड़ने का प्रयास करें। कोशिश करें कि आपका माथा आपके घुटनों को छुए, लेकिन शुरुआत में शरीर के साथ ज्यादा जबरदस्ती न करें। इस अंतिम मुद्रा में 30 से 60 सेकंड तक सामान्य रूप से सांस लेते रहें और फिर धीरे-धीरे वापस सामान्य स्थिति में आ जाएं। गर्भवती महिलाओं, स्लिप डिस्क और गंभीर पीठ दर्द से पीड़ित लोगों को इसके अभ्यास से बचना चाहिए।

न्यूज़ इंडिया लाइव 28 Jun 2026 4:09 am

Diabetes Control Tips: बिना दवा के भी कंट्रोल हो सकती है शुगर! आजमाएं ये 10 जादुई और बेहद आसान घरेलू उपाय

Natural Remedies for Diabetes: आज के समय में मधुमेह किसी एक उम्र, देश या परिस्थिति तक सीमित नहीं रहा है। यह बीमारी तेजी से बढ़ रही है और विश्वभर में चिंता का विषय बन चुकी है। गलत खानपान, तनाव, शारीरिक गतिविधियों की कमी और अनियमित जीवनशैली इसके ...

वेब दुनिया 26 Jun 2026 4:08 pm

क्या यह सच्चा प्यार है या सिर्फ टाइम पास? इन 4 बड़े संकेतों से पहचानें अपने पार्टनर का असली इरादा

आज के दौर में एक ईमानदार और सच्चा रिश्ता ढूंढना सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन गया है। किसी को पसंद करना और किसी से निश्छल, सच्चा प्यार करना—दोनों दो बेहद अलग बातें हैं। अक्सर लोग किसी इंसान की केवल मौजूदगी, उसके साथ चंद अच्छे पल बिताने या उसके मीठे शब्दों को ही 'सच्चा प्यार' समझने की भूल कर बैठते हैं। लेकिन असलियत यह है कि सच्चा प्यार केवल खोखले शब्दों में नहीं, बल्कि इंसान के व्यवहार और उसके एक्शन (Actions) में दिखाई देता है। जो आपसे वाकई मोहब्बत करता है, उसकी परवाह उसके कदमों में दिखेगी, न कि सिर्फ बड़ी-बड़ी बातों में।आजकल बहुत से लोग ऐसे रिलेशनशिप में फंसे हुए हैं, जहां वे हर पल इसी कशमकश और उलझन में रहते हैं कि उनका साथी गंभीर है या केवल टाइम पास कर रहा है। रिश्ते में लगातार बनी रहने वाली असुरक्षा, मानसिक तनाव और हर वक्त का इंतजार मन में कई तरह के सवाल खड़े करता है। अगर आप भी इस दोराहे पर खड़े हैं, तो आइए जानते हैं उन स्पष्ट संकेतों के बारे में, जो आपके पार्टनर के असली इरादों की पोल खोल सकते हैं।1. व्यवहार में लगातार उतार-चढ़ाव (मूड स्विंग्स) होनाअगर आपका पार्टनर किसी दिन आपको दुनिया का सबसे खास इंसान महसूस कराता है, आपके ऊपर बेशुमार प्यार लुटाता है, लेकिन अगले ही दिन उसका व्यवहार पूरी तरह बदल जाता है और वह ऐसा बर्ताव करता है जैसे आप उसके लिए कोई मायने ही नहीं रखते—तो इस बात को बिल्कुल भी हल्के में न लें। प्यार में निरंतरता (Consistency) होती है। यदि आपके पार्टनर का मूड और व्यवहार आपके प्रति लगातार बदल रहा है, तो यह एक सामान्य बात नहीं है। इसके लिए आपको बार-बार बहाने ढूंढने या ओवरथिंकिंग करने की जरूरत नहीं है; यह अस्थिर व्यवहार साफ तौर पर दर्शाता है कि यह सच्चा प्यार तो बिल्कुल नहीं है।2. भविष्य और गंभीर (सीरियस) बातचीत से कतरानाकिसी भी रिश्ते की नींव को मजबूत और गहरा बनाने के लिए खुलकर बातचीत करना बेहद जरूरी होता है। जब आप अपने रिश्ते में आगे बढ़ने, भविष्य की योजनाओं या अपनी गहरी भावनाओं को लेकर कोई बात शुरू करते हैं, और आपका पार्टनर तुरंत विषय बदल देता है या इमोशनली जुड़ने से कतराता है, तो यह एक बड़ा रेड फ्लैग (Red Flag) है। यह इस बात का सीधा संकेत है कि वह आपके साथ अपना कोई भविष्य नहीं देखता और इस रिश्ते में गहराई तक नहीं जाना चाहता। एक सच्चा और स्वस्थ रिश्ता वही होता है, जिसमें दोनों पार्टनर बिना किसी डर के अपनी भावनाओं और भविष्य पर खुलकर चर्चा कर सकें।3. सुकून की जगह रिश्ते में लगातार बेचैनी और असुरक्षा रहनाप्यार एक ऐसा एहसास है जो इंसान को दुनिया का सबसे बड़ा सुकून और मानसिक शांति देता है। इसके विपरीत, अगर आपको अपने ही रिश्ते में हर समय केवल तड़प, असुरक्षा और इंतजार का सामना करना पड़ रहा है; यदि आप चौबीसों घंटे उसके एक मैसेज या कॉल की राह देखते रहते हैं और बार-बार उसके अजीब बिहेवियर को डिकोड करने की कोशिश में जुटे रहते हैं, तो समझ जाएं कि आपका मेंटल पीस (मानसिक शांति) पूरी तरह डिस्टर्ब हो चुका है। जब किसी इंसान के कहे गए शब्द और उसका असल व्यवहार आपस में मेल नहीं खाते, तब दिल में बेचैनी पैदा होती है। अगर कोई रिश्ता आपको लगातार मानसिक तनाव और ओवरथिंकिंग की ओर धकेल रहा है, तो वहां प्यार नहीं, सिर्फ टाइम पास हो रहा है।4. हर बार सिर्फ आपकी तरफ से एकतरफा कोशिशें होनाक्या आपके रिश्ते में बातचीत शुरू करने के लिए पहला कॉल या मैसेज हमेशा आपको ही करना पड़ता है? क्या मिलने का प्लान, डेट ऑर्गेनाइज करना या रिश्ते को बचाए रखने की जिम्मेदारी सिर्फ आपकी बन चुकी है? अगर जवाब हां है, तो आपको तुरंत कदम पीछे खींचने चाहिए और इस रिश्ते की हकीकत को ठंडे दिमाग से समझना चाहिए। कोई भी रिश्ता कभी भी एक इंसान की बैसाखी पर लंबा नहीं चल सकता। एक खूबसूरत रिश्ता तभी फलता-फूलता है जब दोनों तरफ से बराबर की कोशिशें हों, दोनों एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करें और रिलेशन को बनाए रखने के लिए समान रूप से प्रयास करें। एकतरफा खींचा जाने वाला रिश्ता सिर्फ समझौता होता है, प्यार नहीं।

न्यूज़ इंडिया लाइव 24 Jun 2026 9:52 am

Glowing Skin Tips: सुबह उठते ही चेहरे पर लगाएं ठंडे पानी का गोता; चमक उठेगा चेहरा और गायब हो जाएंगी झुर्रियां

आज के इस आधुनिक दौर में ग्लोइंग, बेदाग और खूबसूरत स्किन पाना हर किसी की चाहत होती है। चेहरे की चमक (Skin Glow) बढ़ाने के लिए लोग बाजार में मिलने वाले महंगे और केमिकल युक्त ब्यूटी प्रोडक्ट्स का धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं। हालांकि, कई बार इन केमिकल प्रोडक्ट्स को लगाने के बाद भी चेहरे पर कोई खास असर या निखार देखने को नहीं मिलता है, बल्कि स्किन को नुकसान होने का खतरा अलग से बढ़ जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि बिना एक भी रुपया खर्च किए, आप सिर्फ कुछ आसान घरेलू उपायों की मदद से अपने चेहरे पर मनचाहा निखार ला सकते हैं?ग्लोइंग स्किन के लिए आप रोज सुबह उठते ही बर्फ का एक छोटा सा और जादुई उपाय कर सकते हैं। इस आसान से नुस्खे को आजमाने से न सिर्फ चेहरे की रंगत सुधरेगी, बल्कि उम्र बढ़ने के साथ चेहरे पर दिखने वाली महीन रेखाएं (Fine Lines) और झुर्रियां भी काफी कम हो सकती हैं। आइए जानते हैं निखरी और स्वस्थ त्वचा के लिए आपको सुबह-सुबह क्या करना चाहिए और क्या है 'आइस वॉटर थेरेपी'।क्या है आइस वॉटर थेरेपी और इसे घर पर कैसे तैयार करें?चमकदार त्वचा पाने के लिए आपको सुबह सोकर उठते ही इस बेहद असरदार होममेड स्किन ट्रीटमेंट को करना होगा। इसे तैयार करना बेहद आसान है।सबसे पहले एक बड़ा सा बाउल (कटोरा) लें, जिसमें आपका चेहरा आसानी से आ सके।अब इस बाउल में फ्रिज से निकालकर कुछ आइस क्यूब्स (बर्फ के टुकड़े) डाल दें।इसके बाद इसमें सामान्य या थोड़ा सा साफ पानी मिला लें।लीजिए, आपका थेरेपी के लिए बिल्कुल ठंडा-ठंडा बर्फ का पानी बनकर तैयार है।चेहरे की सूजन दूर कर फाइन लाइन्स को कम करता है ठंडा पानीइस तैयार बर्फ के पानी वाले बाउल में आपको सुबह-सुबह अपने चेहरे को कम से कम 15 से 20 बार डुबाना (डिप करना) है। ध्यान रहे कि चेहरे को कुछ-कुछ सेकंड के लिए ही पानी में डालें और फिर बाहर निकालें।जब हमारा चेहरा इस अत्यधिक ठंडे पानी के संपर्क में आता है, तो त्वचा के बड़े हो चुके रोमछिद्र (Open Pores) सुड़कर छोटे हो जाते हैं। पोर्स छोटे होने की वजह से त्वचा में प्राकृतिक रूप से कसाव (Skin Tightening) आने लगता है। इसके अलावा, रातभर सोने के कारण सुबह चेहरे पर जो पफिनेस या सूजन दिखाई देती है, वह बर्फ के पानी से तुरंत दूर हो जाती है। नियमित रूप से ऐसा करने पर चेहरे की महीन रेखाएं और झुर्रियां धीरे-धीरे कम होने लगती हैं।25 की उम्र के बाद महिलाओं के लिए सबसे बेहतरीन नुस्खायह घरेलू उपाय खासकर 25 साल से अधिक उम्र की महिलाओं और पुरुषों के लिए बहुत ज्यादा फायदेमंद साबित होता है। दरअसल, 25 वर्ष की उम्र पार करने के बाद त्वचा में कोलाजन का बनना थोड़ा कम हो जाता है, जिससे चेहरे पर हल्की फाइन लाइन्स नजर आने लगती हैं। ऐसे में यह थेरेपी एंटी-एजिंग का काम करती है।हालांकि, यह ध्यान रखना बेहद जरूरी है कि छोटे बच्चों की नाजुक त्वचा के लिए यह कोल्ड ट्रीटमेंट बिल्कुल भी अच्छा नहीं होता है, इसलिए उन्हें इससे दूर रखें। इसके अलावा, जिन लोगों की स्किन बहुत ज्यादा ऑयली होती है, उनके लिए भी आइस वॉटर थेरेपी किसी वरदान से कम नहीं है। यह चेहरे के एक्स्ट्रा ऑयल (Sebum) को कंट्रोल करती है और आपको देती है एक इंस्टेंट फ्रेश लुक। अगर आपको किसी पार्टी या शादी में जाना है और तुरंत निखार चाहिए, तो आप इस थेरेपी की मदद ले सकते हैं।

न्यूज़ इंडिया लाइव 24 Jun 2026 9:51 am

प्रेग्नेंसी में कमर दर्द और अनिद्रा से हैं परेशान, रोज करें ये खास योग, मिलेंगे हैरान कर देने वाले फायदे

गर्भावस्था का सफर जितना खूबसूरत होता है, उतनी ही चुनौतियां भी लेकर आता है। जैसे-जैसे वजन बढ़ता है, शरीर में दर्द, हार्मोनल बदलाव और रात-रात भर करवट बदलते हुए नींद न आने की समस्या आम हो जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक नियमित 'योग' अभ्यास आपकी इन तमाम परेशानियों को दूर कर सकता है? एक्सपर्ट्स के अनुसार, 'प्रीनेटल योग' (Prenatal Yoga) न केवल शरीर को आराम देता है, बल्कि मानसिक तनाव को कम कर प्रसव (Delivery) की प्रक्रिया को भी आसान बनाता है।शारीरिक और मानसिक शांति का अचूक नुस्खाडॉ. नेहा शुक्ला बताती हैं कि गर्भावस्था में एक सक्रिय जीवनशैली बनाए रखना मां और बच्चे दोनों के लिए बेहद जरूरी है। प्रीनेटल योग में नियंत्रित श्वास (Breathing), हल्की स्ट्रेचिंग और रिलैक्सेशन तकनीकों का उपयोग किया जाता है। यह न सिर्फ आपके शरीर की मांसपेशियों को मजबूत करता है, बल्कि प्रसव से जुड़ी चिंताओं, भविष्य की जिम्मेदारियों और हार्मोनल उतार-चढ़ाव के कारण होने वाले तनाव को कम कर मन को शांत रखने में मदद करता है। नियमित अभ्यास से महिलाओं में आत्मविश्वास और भावनात्मक संतुलन बना रहता है।प्राणायाम: प्रसव के समय का सबसे बड़ा सहाराप्रीनेटल योग का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा प्राणायाम है। गहरी और नियंत्रित सांस लेने की तकनीकें शरीर में ऑक्सीजन के प्रवाह (Blood Flow) को बेहतर बनाती हैं। ये ब्रीदिंग एक्सरसाइज प्रसव के दौरान महिलाओं को शांत और केंद्रित रहने में मदद करती हैं। इसके अलावा, जैसे-जैसे प्रेग्नेंसी आगे बढ़ती है, पीठ, कमर और कूल्हों पर दबाव बढ़ने लगता है। विशेष योगासन न केवल शरीर की लचक बढ़ाते हैं, बल्कि सही पोस्चर बनाए रखकर कमर दर्द, शरीर की जकड़न और सूजन जैसी समस्याओं से राहत दिलाने में मददगार साबित होते हैं।योग शुरू करने से पहले रखें इन बातों का ध्यानयोग के कई फायदे हैं, लेकिन गर्भावस्था एक संवेदनशील अवस्था है, इसलिए हर योगासन सुरक्षित नहीं होता। डॉ. नेहा शुक्ला के अनुसार, गहरे ट्विस्ट, कठिन बैकबेंड और ज्यादा तीव्र व्यायाम से हमेशा बचना चाहिए। विशेष रूप से जिन महिलाओं को हाई बीपी, गंभीर एनीमिया, प्लेसेंटा प्रिविया या समय से पहले प्रसव (Preterm Labor) का खतरा हो, उन्हें बहुत सावधानी बरतनी चाहिए। बिना डॉक्टर और किसी प्रशिक्षित योग एक्सपर्ट की सलाह के योग शुरू न करें। सही गाइडेंस में किया गया योग आपकी प्रेग्नेंसी को एक खुशनुमा अनुभव बना सकता है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 22 Jun 2026 4:16 pm

कजिन मैरिज पर सबसे बड़ा वैज्ञानिक खुलासा: क्यों पाकिस्तान में तेजी से गायब हो रहे हैं इंसानी जीन?

दुनियाभर के कई देशों और संस्कृतियों में कजिन मैरिज (चचेरे, ममेरे, फुफेरे भाई-बहनों के बीच शादी) का चलन काफी पुराना है। खासकर मुस्लिम देशों में सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर इसे बेहद सामान्य और सही माना जाता है। वर्ल्ड पापुलेशन रिव्यू (World Population Review) के आंकड़ों के मुताबिक, पाकिस्तान में कजिन मैरिज की दर दुनिया में सबसे ज्यादा है। हालांकि, सामाजिक रूप से स्वीकार्य होने के बावजूद, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इस तरह की शादियां आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहद खतरनाक साबित हो रही हैं। हालिया साइंटिफिक रिसर्च में यह चेतावनी दी गई है कि कजिन मैरिज के कारण बच्चों में गंभीर जेनेटिक डिसऑर्डर (आनुवंशिक विकार) और कई जानलेवा बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।क्या है 'ह्यूमन नॉकआउट', जिसने वैज्ञानिकों को चौंकाया?मशहूर विज्ञान पत्रिका 'नेचर' (Nature) में प्रकाशित एक बेहद चौंकाने वाली स्टडी के अनुसार, पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर 'ह्यूमन नॉकआउट' (Human Knockout) की स्थिति देखी जा रही है। रिसर्च में शामिल लगभग 34,000 लोगों में यह दुर्लभ कंडीशन पाई गई है। ह्यूमन नॉकआउट एक ऐसी आनुवंशिक स्थिति है, जिसमें इंसान के शरीर में मौजूद कम से कम एक जीन या तो पूरी तरह से काम करना बंद कर देता है (स्विच ऑफ हो जाता है) या फिर वह शरीर से हमेशा के लिए गायब हो जाता है।कजिन मैरिज से कैसे गायब हो जाते हैं शरीर के जरूरी जीन?जीव विज्ञान के अनुसार, हर इंसान के शरीर में प्रत्येक जीन की दो कॉपी होती हैं—एक कॉपी माता से और दूसरी पिता से मिलती है। जब आपस में करीबी खून के रिश्ते या कजिन के बीच शादी होती है, तो माता और पिता दोनों का पारिवारिक डीएनए (DNA) एक जैसा होने के कारण बच्चों में दोनों तरफ से एक जैसा ही म्यूटेशन (आनुवंशिक बदलाव) ट्रांसफर हो जाता है। इस म्यूटेशन के टकराव से बच्चे के शरीर में वह विशेष जीन पूरी तरह से नष्ट या गायब हो जाता है। पाकिस्तान जीनोम रिसोर्स में शामिल हर पांच में से एक इंसान में कम से कम एक जीन पूरी तरह गायब पाया गया है, और पूरी रिसर्च के दौरान लगभग 6500 जीन 'स्विच ऑफ' मिले हैं।चूहों पर नहीं, अब इंसानी जीन पर होगी रिसर्च; दवा उद्योग में आएगा बड़ा बदलावइस ऐतिहासिक जीनोमिक अध्ययन में दक्षिण एशियाई देशों के करीब 1,73,303 जीनोम का बारीकी से आकलन किया गया है। अब तक किसी भी नई दवा या इलाज का परीक्षण (Medical Trial) इंसानों से पहले चूहों पर किया जाता था। लेकिन वैज्ञानिक कई बार इस बात से परेशान रहते थे कि चूहों और इंसानों के जीन पूरी तरह अलग तरीके से काम करते हैं, जिससे चूहों पर सफल रही दवाएं इंसानों पर बेअसर साबित हो जाती थीं और करोड़ों डॉलर व बरसों की मेहनत बर्बाद हो जाती थी। अब पाकिस्तान में मिले इन 'ह्यूमन नॉकआउट्स' की मदद से वैज्ञानिक सीधे यह पता लगा सकेंगे कि किसी खास जीन के गायब होने से इंसानी शरीर और सेहत पर क्या सीधा असर पड़ता है, जिससे कई असाध्य बीमारियों के सटीक इलाज और नई दवाएं बनाने में एक बहुत बड़ा क्लू (सुराग) मिल गया है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 22 Jun 2026 3:51 pm

FSSAI Ghee Adulteration Test: रसोई में रखा घी असली है या नकली? FSSAI ने बताया घर पर मिलावट पहचानने का सबसे आसान तरीका

भारतीय व्यंजनों में घी का एक बेहद खास स्थान है। दाल में तड़का लगाना हो, गरमा-गरम रोटियों पर चुपड़ना हो या फिर स्वादिष्ट मिठाइयां बनानी हों, घी के बिना हर स्वाद अधूरा लगता है। शुद्ध देसी घी न केवल खाने का जायका बढ़ाता है, बल्कि इसमें मौजूद गुड फैट्स हमारी सेहत, इम्यून सिस्टम और हड्डियों को भी मजबूत बनाते हैं। यही वजह है कि अमूमन हर भारतीय घर के किचन में घी का डिब्बा जरूर मिल जाएगा।लेकिन, आज के दौर में सेहत के लिए इतना जरूरी होने के बाद भी कई लोग घी खाने से कतराने लगे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण बाजार में मिलने वाले घी में बढ़ती मिलावट है। चंद पैसों के मुनाफे के लिए मिलाया जाने वाला नकली घी सेहत सुधारने के बजाय शरीर को गंभीर रूप से बीमार कर रहा है। ऐसे में देश की शीर्ष खाद्य सुरक्षा संस्था FSSAI (भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण) ने उपभोक्ताओं को जागरूक करने के लिए घर पर ही घी की शुद्धता जांचने के कुछ बेहद असरदार टिप्स शेयर किए हैं।मिलावटी घी क्या होता है और इसमें किन खतरनाक चीजों को मिलाया जाता है?मिलावटी या नकली घी तैयार करने के लिए माफिया बेहद घटिया और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक तरकीबों का इस्तेमाल करते हैं। घी की मात्रा और उसका वजन बढ़ाने के लिए इसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित चीजें मिलाई जाती हैं:सस्ते तेल और डालडा (वनस्पति): हाइड्रोजनीकृत खाद्य वसा या वनस्पति घी को असली घी में सबसे ज्यादा मिक्स किया जाता है।स्टार्च और उबले आलू: घी को गाढ़ा और दानेदार टेक्सचर देने के लिए इसमें मैश किए हुए उबले आलू या शकरकंद मिला दिए जाते हैं।केमिकल और आर्टिफिशियल फ्रेशनर: नकली घी में असली जैसी खुशबू और पीलापन लाने के लिए प्रतिबंधित फ्रेशनर, स्वीटनर और यूरिया जैसे खतरनाक रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है, जो लिवर और किडनी को सीधा नुकसान पहुंचाते हैं।FSSAI का 'शुगर टेस्ट': घर बैठे मिंटों में ऐसे करें असली-नकली घी की पहचानFSSAI ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल (X) पर एक वीडियो जारी कर बताया है कि आप अपने घर की रसोई में ही बेहद आसान वैज्ञानिक तरीके से यह पता लगा सकते हैं कि आपके घी में वनस्पति या डालडा की मिलावट है या नहीं। इस टेस्ट को करने की स्टेप-बाय-स्टेप विधि नीचे दी गई है:सबसे पहले एक साफ कांच की परखनली (Test Tube) या छोटा कांच का पारदर्शी गिलास लें और उसमें 1 मिलीलीटर पिघला हुआ घी डालें।अब इस पिघले हुए घी में बराबर मात्रा में यानी 1 मिलीलीटर सांद्र हाइड्रोक्लोरिक एसिड (Concentrated HCl) मिलाएं।इसके बाद इस मिश्रण में आधा चम्मच टेबल शुगर (घर में इस्तेमाल होने वाली सामान्य पिसी हुई चीनी) डालें।अब टेस्ट ट्यूब के मुंह को सुरक्षित तरीके से बंद करके इस पूरे मिश्रण को कम से कम दो मिनट तक बहुत अच्छी तरह हिलाएं (Shake करें)।हिलाने के बाद मिश्रण को करीब 5 मिनट के लिए बिल्कुल स्थिर छोड़ दें ताकि एसिड और घी की परतें अलग-अलग हो सकें।जांच का परिणाम (Result):यदि घी पूरी तरह शुद्ध है: तो घी या एसिड के रंग में कोई भी बदलाव नहीं होगा, वह अपने प्राकृतिक रंग में ही रहेगा।यदि घी मिलावटी है: अगर घी में वनस्पति, डालडा या खराब फैट मिलाया गया होगा, तो एसिड वाली नीचे की परत का रंग बदलकर गहरा लाल या गुलाबी (Red or Pink) हो जाएगा।केमिकल टेस्ट करते समय बरतें विशेष सावधानीFSSAI ने साफ किया है कि चूंकि इस टेस्ट में हाइड्रोक्लोरिक एसिड (HCl) का उपयोग होता है, जो कि एक बेहद तेज और ज्वलनशील एसिड है, इसलिए इसे करते समय अत्यधिक सावधानी रखनी चाहिए।एसिड की बूंदें आपकी त्वचा या आंखों पर न गिरें, इसके लिए टेस्ट करते समय हाथों में ग्लव्स (दस्ताने) जरूर पहनें। यदि आप घर पर यह टेस्ट करने में असहज महसूस करते हैं, तो अपने नजदीकी सरकारी या FSSAI द्वारा प्रमाणित नेशनल लैब में भी घी का सैंपल भेजकर उसकी शुद्धता की प्रामाणिक जांच करवा सकते हैं। सेहत से समझौता न करें; सूचित रहें, सुरक्षित रहें!

न्यूज़ इंडिया लाइव 22 Jun 2026 9:49 am

किडनी के मरीज आज ही दूरी बना लें इन 5 चीजों से, पोटैशियम की अधिक मात्रा बढ़ा सकती है गंभीर खतरा

शरीर को स्वस्थ रखने में किडनी (गुर्दा) की भूमिका सबसे अहम होती है, जो खून को साफ करने और टॉक्सिन्स को बाहर निकालने का काम करती है। लेकिन जब किडनी की कार्यक्षमता कमजोर होने लगती है, तो शरीर में कुछ खास पोषक तत्वों, विशेषकर पोटैशियम को फिल्टर करना मुश्किल हो जाता है। रक्त में पोटैशियम का स्तर बढ़ना (हाइपरकलेमिया) किडनी के मरीजों के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है, जिससे दिल की धड़कन अनियंत्रित होने का खतरा रहता है। आइए जानते हैं ऐसे 5 तरह के फूड्स के बारे में जिन्हें किडनी की बीमारी में तुरंत अपनी डाइट से बाहर कर देना चाहिए।1. केला और एवोकैडो जैसे हाई-पोटैशियम फलआम तौर पर फलों को सेहत के लिए बहुत अच्छा माना जाता है, लेकिन किडनी के मरीजों के लिए कुछ फल जहर के समान काम कर सकते हैं। केले में पोटैशियम की मात्रा बहुत अधिक होती है। इसके अलावा एवोकैडो, कीवी, संतरा और खुबानी (एप्रिकॉट) भी पोटैशियम के बड़े स्रोत हैं। अगर आपकी किडनी सही से काम नहीं कर रही है, तो इन फलों का सेवन करने से बचें। इनकी जगह डॉक्टर की सलाह पर सेब, पपीता या अमरूद का सीमित मात्रा में सेवन किया जा सकता है।2. हरी पत्तेदार सब्जियां और पालकपालक, ब्रोकली और अन्य हरी पत्तेदार सब्जियां वैसे तो आयरन और विटामिन्स से भरपूर होती हैं, लेकिन इनमें पोटैशियम भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। पकाने के बाद भी इनमें पोटैशियम की डेंसिटी बनी रहती है। किडनी के मरीजों को कच्चा सलाद या पालक का सूप पीने से पूरी तरह परहेज करना चाहिए। सब्जियों का इस्तेमाल करने से पहले उन्हें 'लीचिंग' प्रक्रिया (काटकर गर्म पानी में कुछ देर उबालकर पानी फेंक देना) से गुजारना बेहतर होता है, जिससे पोटैशियम की मात्रा कुछ हद तक कम हो जाती है।3. आलू, शकरकंद और जमीन के नीचे उगने वाली कंदभारतीय रसोई में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला आलू और सर्दियों में चाव से खाया जाने वाला शकरकंद (स्वीट पोटैटो) भी पोटैशियम का खजाना हैं। इसके साथ ही अरबी और जिमीकंद जैसी कंद वाली सब्जियों में भी यह तत्व बहुत ज्यादा होता है। किडनी की गंभीर समस्याओं (CKD) से जूझ रहे लोगों को आलू या शकरकंद का अत्यधिक सेवन करने से सख्त मना किया जाता है, क्योंकि यह सीधे तौर पर क्रिएटिनिन और पोटैशियम के स्तर को बिगाड़ सकता है।4. टमाटर और उससे बनी प्यूरी या सॉससब्जी का स्वाद बढ़ाने वाला टमाटर भी किडनी रोगियों के लिए चिंता का कारण बन सकता है। एक कप टमाटर की प्यूरी में बहुत अधिक मात्रा में पोटैशियम होता है। बाजार में मिलने वाले टोमैटो केचप, सॉस और रेडी-टू-ईट कढ़ी या सूप का सेवन करने से किडनी पर दबाव बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। डाइट एक्सपर्ट्स के अनुसार, किडनी के मरीजों को अपनी सब्जियों में टमाटर की ग्रेवी का उपयोग न्यूनतम या बिल्कुल बंद कर देना चाहिए।5. सूखे मेवे, नट्स और साबुत अनाजबादाम, काजू, अखरोट, पिस्ता और किशमिश जैसे कड़क और सूखे मेवे सेहत के लिए जितने अच्छे हैं, किडनी के लिए उतने ही भारी पड़ सकते हैं। नट्स और बीजों में पोटैशियम के साथ-साथ फास्फोरस भी बहुत ज्यादा होता है, जो कमजोर किडनी के लिए फिल्टर करना नामुमकिन हो जाता है। इसके अलावा सफेद चावल की तुलना में ब्राउन राइस और होल व्हीट (साबुत अनाज) में पोटैशियम का स्तर अधिक होता है, इसलिए डॉक्टर किडनी के मरीजों को रिफाइंड अनाज का सीमित सेवन करने की सलाह देते हैं।

न्यूज़ इंडिया लाइव 21 Jun 2026 12:46 pm

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