मोजतबा खामेनेई का सुराग पाने में छूट रहे CIA और मोसाद के पसीने, बना हुआ है सस्पेंस
ईरान में नवरोज के मौके पर उम्मीद जताई जा रही थी कि मोजतबा खामेनेई अपने पिता की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए जनता के सामने आएंगे और संबोधन देंगे। हालांकि ऐसा नहीं हुआ। पूरे दिन के इंतजार के बाद केवल उनका एक आधिकारिक संदेश जारी किया गया, जिससे उनकी मौजूदगी तो पुष्टि हुई, लेकिन स्थान को लेकर रहस्य और गहरा गया।
डिमोना शहर इजरायल के सबसे संवेदनशील इलाकों में से एक माना जाता है। यह शिमोन पेरेस नेगेव परमाणु केंद्र से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इजरायल इस केंद्र को एक अनुसंधान सुविधा बताता है, हालांकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे लेकर कई तरह की आशंकाएं जताई जाती रही हैं।
तिब्बतियों के लिए पहचान का सवाल है चीन का 'जातीय एकता कानून'
चीन के नए कानून को लेकर तिब्बती समुदाय में डर है कि उनकी भाषा, संस्कृति और पहचान को धीरे‑धीरे हाशिये पर धकेला जा रहा है. चीन की ऐसी ही नीतियों का विरोध करने पर डॉ. ज्याल लो को तिब्बत छोड़कर कनाडा में निर्वासित होना पड़ा
क्या यूरोप में सेंटर-राइट और फार-राइट के बीच मिट रही है दूरियां?
यूरोपीय संसद में सेंटर-राइट पार्टी अब धुर-दक्षिणपंथी पार्टी के साथ हाथ मिला रही है. इससे यूरोपीय संघ की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है
क्यूबा में फिर ब्लैकआउट, मार्च में तीसरी बार पूरा देश अंधेरे में
क्यूबा में शनिवार को बिजली ग्रिड ढहने से तीसरी बार मार्च में देशभर में ब्लैकआउट हुआ. नुएवितास थर्मोइलेक्ट्रिक प्लांट की इकाई में अचानक खराबी और ईंधन संकट ने बिजली तंत्र को फिर अस्थिर कर दिया
35 साल बाद राइनलैंड पैलेटिनेट में बदलेगी सरकार
एएफडी ने पश्चिमी राज्य में राइनलैंड पैलेटिनेट में रिकॉर्ड बढ़त दर्ज की है और लगभग 20 प्रतिशत मतों के साथ पश्चिमी जर्मनी में अब तक का अपना सबसे बड़ा प्रदर्शन करने जा रही है
ईरान पर हमलों के खिलाफ यूरोप में गूंजा विरोध
अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर किए गए सैन्य हमलों के खिलाफ पूरे यूरोप में बढ़ते विरोध प्रदर्शनों के तहत हजारों प्रदर्शनकारी लंदन की सड़कों पर उतर आए और जमकर नारेबाजी की
ईरान की मुख्य सैन्य कमान ‘खातम अल-अनबिया सेंट्रल हेडक्वार्टर’ ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका ईरान के पावर प्लांट्स पर हमला करता है
डीएचएस शटडाउन से हवाई अड्डों पर हाहाकार, लंबी कतारों से यात्री परेशान
ट्रंप प्रशासन द्वारा इमीग्रेशन एंड कस्टम इंफोर्समेंट (ईसीई) के एजेंटों को तैनात करने के फैसले के बीच परिवहन सुरक्षा प्रशासन पर बढ़ते दबाव को कम करने की कोशिश की जा रही है
ईरान की लंबी दूरी की मिसाइल क्षमता क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती : इजरायली राष्ट्रपति
ईरान के जवाबी मिसाइल हमलों में इजरायल के दक्षिणी शहर अराद में भारी तबाही के बाद राष्ट्रपति इसहाक हर्ज़ोग ने क्षेत्र का दौरा किया
28 फरवरी 2026 यानी ईरान जंग का पहला दिन। अमेरिका और इजराइल ने ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई समेत दर्जनों टॉप लीडर्स को मार दिया। शुरुआती 100 घंटे में ही 50 हजार करोड़ रुपए के बम बरसाए गए। ट्रम्प और नेतन्याहू को जल्द से जल्द जीत की उम्मीद थी। 22 मार्च 2026 यानी ईरान जंग का 23वां दिन। ईरान ने इजराइल के डिमोना और अराद शहर पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। इसमें 300 से ज्यादा लोग घायल हुए। यानी अब भी ईरान पूरी ताकत से पलटवार कर रहा है। जंग के शुरुआती 23 दिनों में किसका-कितना नुकसान, आखिर कौन जीत रहा और आगे क्या सिनैरियो बन रहे; मंडे मेगा स्टोरी में पूरी कहानी… ***** ग्राफिक्स: अंकुर बंसल और अजीत सिंह -------- ये खबर भी पढ़िए…क्या पूरे मिडिल ईस्ट पर नेतन्याहू की नजर:'ग्रेटर इजराइल' क्या है, जिसके लिए ईरान जंग के बीच लेबनान पर कब्जा कर रहा इजराइल पूरी दुनिया की नजर ईरान जंग पर टिकी है। उधर इजराइल तेजी से लेबनान पर जमीनी कब्जा करने में जुटा है। इजराइल का कहना है कि वो हिजबुल्ला के सैन्य ढांचे और हथियारों को खत्म करना चाहता है। कई विश्लेषकों का मानना है कि नेतन्याहू ‘ग्रेटर इजराइल’ को हकीकत बनाने में जुटे हैं। पूरी खबर पढ़िए…
‘जंग के बीच गुजरता हर दिन पहले से ज्यादा भारी है। न चैन से सो पा रहे हैं, न जी पा रहे हैं। हमें तो रोज के खाने के लिए भी जद्दोजहद करनी पड़ रही है। हमारी मेंटल हेल्थ दिन ब दिन बिगड़ती जा रही है। अब बिल्कुल लाचार महसूस कर रहे हैं। ये भी नहीं जानते कि आगे क्या होने वाला है।‘ ईरान में मेडिकल की पढ़ाई कर रहीं कश्मीर की फलक घर नहीं लौट पा रहीं। वो तेहरान से तो सुरक्षित निकल गईं, लेकिन ईरान और अजरबैजान बॉर्डर पर अस्तारा चौकी के पास फंसी हुई हैं। बॉर्डर पर वो अकेली नहीं हैं। उनके साथ ही 180 भारतीय स्टूडेंट्स फंसे हुए हैं। इनकी शिकायत है कि एंबेसी ने टिकिट और वीजा कराने को कहा था, जिसके बाद कोम शहर से इवैकुएशन शुरू हुआ लेकिन अजरबैजान के बॉर्डर पर आकर फंस गए। न कंट्री कोड मिला और न घर लौट सके। बुक कराए फ्लाइट टिकिट भी बर्बाद हो गए लेकिन एंबेसी से कोई जवाब नहीं मिला।‘ ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच चल रही जंग में अब तक 2565 लोगों की मौतें हो चुकी है। अभी जंग थमने के आसार नहीं दिख रहे हैं। वहीं ईरान में करीब 1200 भारतीय स्टूडेंट फंसे हैं, जिनमें 900 जम्मू-कश्मीर के हैं। दैनिक भास्कर ने जंग के बीच बॉर्डर पर फंसे स्टूडेंट्स और उनकी फैमिली से बातचीत की। ‘1 से 1.5 लाख की टिकिट खरीदी, लेकिन घर नहीं लौट सके‘श्रीनगर की रहने वाली फलक तेहरान यूनिवर्सिटी से मेडिकल की पढ़ाई कर रही हैं। वे बताती हैं, ‘भारत सरकार अब तक हमें इवेक्युएट नहीं कर सकी है। हमसे यही कहा जा रहा है कि खुद के खर्च पर लौटना होगा। इससे पहले जब तेहरान से रेस्क्यू कर हमें कोम शहर लाया गया था, तब भी हम वहां भी 10 दिन फंसे रहे। एंबेसी से कोई जवाब नहीं मिल रहा था।‘ ‘फिर बताया गया कि हमें अजरबैजान के रास्ते भारत भेजा जा सकता है लेकिन पूरा खर्च हमें खुद उठाना होगा। हम भी अब और रिस्क नहीं लेना चाहते थे इसलिए हामी भर दी। हमसे कहा गया था कि PNR नंबर और कंफर्म टिकिट देने के बाद ही हमें कोम शहर से आगे भेजा जाएगा।‘ ‘हमने 1 से 1.5 लाख रुपए खर्च कर टिकिट कराया, बाकी इंतजाम भी कर लिए। सारे डॉक्यूमेंट्स जमा करने के बाद हमें ईरान-अजरबैजान बॉर्डर पर अस्तारा पोस्ट के पास लाया गया लेकिन भारत लौटने के लिए क्लीयरेंस नहीं मिला। हम करीब 180 स्टूडेंट्स यहीं फंसे हुए हैं।' ‘हमें भरोसा दिलाया गया था कि हर दिन 50 स्टूडेंट्स को बॉर्डर क्रॉस करने की परमिशन दी जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अब हमें टिकिट कैंसिल कराने और नुकसान उठाने को कहा जा रहा है। हमें एंबेसी से भी कोई मदद नहीं मिल रही है।‘ 20 दिन से एक से दूसरे शहर में घूम रहे, अब बॉर्डर पर फंसेफलक आगे कहती हैं, ‘हम पिछले 20 दिनों से यहां फंसे हुए हैं। अब तो चैन से नींद भी नहीं आ रही है। खाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। हमारी मानसिक स्थिति बिगड़ती जा रही है। हमें बताया गया है कि हमारे लिए होटल में ठहरने का इंतजाम है, लेकिन यहां कुछ नहीं मिला। खाने-पीने और बाकी जरूरतों के इंतजाम खुद करने पड़ रहे हैं।‘ ‘बस एक काम जो हम नहीं कर सकते, वो ईरान से बाहर निकलने का है। हमें अजरबैजान से बॉर्डर क्रॉस करने का क्लीयरेंस नहीं मिल रहा है।‘ ‘हम दूर-दराज वाले ऐसे इलाके में फंसे हैं, जहां नेटवर्क लगभग ना के बराबर है। फैमिली से भी बात नहीं हो पा रही है। कई स्टूडेंट्स के पास पैसे खत्म हो रहे हैं, कार्ड काम नहीं कर रहे और बैंकिंग सिस्टम साथ नहीं दे रहा है। हम इतना लाचार महसूस कर रहे हैं कि समझ नहीं पा रहे, आगे क्या करें।‘ ‘ईरान में हालात अभी अस्थिर हैं। हमें बार-बार एक जगह से दूसरी जगह शिफ्ट किया जा रहा है। इस खौफ और अनिश्चितता के माहौल में हम मेंटली बिल्कुल थक चुके हैं। हमारी बस यही गुजारिश हैं कि कुछ भी करके हमें यहां से जल्द निकालें। अगर अपने पैसे खर्च करने के बाद भी हम यहां से नहीं निकल पा रहे, तो अब हमारे पास रास्ता ही क्या बचता है।‘ स्टूडेंट बोले- ये जंग पहले से ज्यादा भयानक ईरान में फंसे श्रीनगर के एक स्टूडेंट ने पहचान जाहिर न करने की शर्त पर हमसे बात की। वो कहते हैं, ‘अभी ईरान में फंसा हूं। पिछले एक साल में ये तीसरी बार है, जब हमें जंग के कारण देश लौटने के लिए कहा जा रहा है। ‘पहली बार तब कहा गया, जब करीब 10-12 दिनों तक जंग के हालात रहे थे। तब भी हम डरे हुए थे, लेकिन अब के हालात पहले से कहीं ज्यादा भयानक है। पहले ये सिर्फ दो देशों की लड़ाई थी लेकिन अब इसमें कई देश शामिल हो गए हैं। अबकी हालात कंट्रोल से बाहर लग रहे हैं।‘ ‘हमें लगातार हवाई हमलों, ड्रोन और ब्लास्ट की आवाजें सुनाई देती हैं। कई बार धमाके बहुत करीब से महसूस होते हैं। रात काटनी मुश्किल हो जाती है, हम सो नहीं पाते और हर वक्त खौफ में जीते हैं। हमें रीलोकेट कर दिया गया है। तेहरान के हाई रिस्क इलाकों से निकालकर सेफ जगहों पर लाया गया है, लेकिन खतरा कम नहीं हुआ है।‘ ‘हमारे साथ कई स्टूडेंट्स को इवैक्यूएशन के लिए आर्मेनिया और अजरबैजान जैसे बॉर्डर इलाकों में शिफ्ट किया गया है। कुछ आर्मेनिया के रास्ते भारत लौटने में कामयाब रहे, लेकिन हम सब कई दिनों से अजरबैजान में फंसे हुए हैं। हमने महंगे टिकिट बुक करा लिए, सभी डॉक्यूमेंट्स जमा कर दिए और हर गाइडलाइन फॉलो की लेकिन फिर भी कोई क्लियर जवाब नहीं मिला।‘ ‘हमारे पैसे खत्म हो रहे हैं। कुछ स्टूडेंट्स बीमार पड़ रहे हैं। टेंशन बहुत बढ़ चुकी है। हमारे साथ-साथ घर वाले भी परेशान हैं। बार-बार इवैक्यूएशन के स्थिति ने पढ़ाई-लिखाई चौपट कर दी है। MBBS का कोर्स, जो 5–6 साल में पूरा हो जाना चाहिए। अब वो 7 साल या उससे ज्यादा भी खिंच सकता है। क्योंकि जंग की वजह से एग्जाम टलेंगे, इसका असर करियर पर पड़ेगा।‘ पेरेंट्स परेशान, बोले- बस बच्चे सुरक्षित लौट आएंश्रीनगर की रहने वाली शाहीन अख्तर का बेटा ईरान से मेडिकल की पढ़ाई कर रहा है। वे कहती हैं, ‘जंग में बेटा भी फंसा है। बाकी पेरेंट्स की तरह हम भी उसकी सलामती को लेकर परेशान हैं।‘ ‘ईरान से कई स्टूडेंट्स को आर्मेनिया के रास्ते पहले ही निकाला जा चुका है, लेकिन अब भी बड़ी संख्या में स्टूडेंट्स क्लीयरेंस न मिलने के कारण अजरबैजान बॉर्डर पर फंसे हैं। इनमें मेरा बेटा भी है।‘ ‘हम लगातार ऑफिशियल चैनल के जरिए अथॉरिटीज के संपर्क में थे। मीटिंग्स भी हुईं। हमसे बच्चों के लिए टिकिट और वीजा करने के लिए कहा गया। भरोसा दिलाया गया कि उन्हें सुरक्षित रास्तों से बॉर्डर तक पहुंचाया जाएगा और फिर भारत इवैकुएट कर लिया जाएगा।‘ ‘स्टूडेंट्स को लगभग 50-50 के ग्रुप में भेजने के लिए कहा गया था। इस पर यकीन करते हुए तय तारीखों पर हमने टिकिट भी बुक कर दी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कई पेरेंट्स ने तो पहली टिकिट कैंसिल होने के बाद दोबारा भी टिकिट बुक कराई, लेकिन अब तक बच्चे नहीं लौटे।‘ ‘स्टू़डेंट्स से कुछ ग्रुप्स निकाले गए, कई अब भी फंसे‘शाहीन आगे बताती हैं, ‘जिन स्टूडेंट्स के निकलने के लिए 18, 19 और 21 तारीख तय की गई थी, वो अब भी ईरान-अजरबैजान के बॉर्डर पर फंसे हैं। उनके पास वैलिड टिकिट भी है, लेकिन मौजूदा पाबंदियों के कारण उन्हें बॉर्डर क्रॉस करने की परमिशन नहीं मिल रही है।‘ ‘कुछ स्टूडेंट 15-16 दिनों से इंतजार कर रहे हैं। बॉर्डर बंद होने की वजह से उनमें कुछ के टिकिट पहले ही कैंसिल हो चुके हैं। स्टूडेंट्स और उनके परिवार दोनों परेशान हैं। मेरी भारत सरकार, खासकर विदेश मंत्रालय से अपील है कि ये मुद्दा तुरंत अजरबैजान सरकार के सामने उठाया जाए ताकि बॉर्डर क्लीयरेंस मिल सके और बच्चे घर लौट सकें।’ हम मिडिल क्लास परिवार, हमारे पैसे बर्बाद-बच्चे भी नहीं लौटेइसके बाद हमने श्रीनगर में रहने वाले मोहम्मद अनवर से बात की। उनकी बेटी भी अजरबैजान में फंसी है। वे कहते हैं, ’हम सब मिडिल क्लास परिवारों से हैं, कोई भी हाईफाई फैमिली से नहीं है। हमने पहले जो टिकिट बुक की, वो एग्जिट कोड न मिलने से बेकार हो गई। इसके बाद दोबारा टिकिट बुक करनी पड़ी। इस बार कीमत लगभग तीन गुना ज्यादा थी।’ ’टिकिट और वीजा का इंतजाम करना हमारी जिम्मेदारी थी, हमने पूरी की। अब एग्जिट कोड जारी करना हमारे हाथ में नहीं है, ये तो अधिकारियों की जिम्मेदारी है। अब हमारे बच्चे भाग-भागकर सिर्फ शारीरिक तौर पर ही नहीं, मेंटली भी बहुत परेशान हो चुके हैं। घबराहट और तनाव में बीमार भी पड़ रहे हैं। सरकार से यही गुजारिश है कि इस मुश्किल वक्त में दखल देकर हमारी मदद करें।’ ये खराब मैनेजमेंट और कोऑर्डिनेशन का नतीजाबडगाम के रहने वाले सुहैल मुजम्मिल का बेटा भी अजरबैजान बॉर्डर पर फंसा है। उनका मानना है कि इवैकुएशन में आ रही दिक्कत की सबसे बड़ी वजह खराब कोऑर्डिनेशन है। वे कहते हैं, ‘अजरबैजान बॉर्डर पर बच्चे इसलिए फंसे हैं क्योंकि उनके इवैक्यूएशन की जिम्मेदारी संभालने वालों का तरीका सही नहीं है। जिन स्टूडेंट्स को बाद की तारीख मिली थी, वो पहले बॉर्डर क्रॉस कर चुके हैं, जबकि जिनकी बुकिंग पहले की थी, वे अब भी फंसे हुए हैं।‘ ‘यही खराब मैनेजमेंट पूरे संकट की जड़ है। एंबेसी से कॉन्टैक्ट करने का भी कोई सही जरिया नहीं है। पेरेंट्स की बच्चों से भी बात नहीं हो पा रही है, जब उनमें से कोई कॉल करता है तभी बात हो पाती है।‘ ये सिर्फ इवैक्यूएशन नहीं, उनके फ्यूचर का सवालजेकेएसए कंवीनर नासिर खुएहामी का कहना है कि पिछले तीन हफ्तों में ईरान और इजराइल के बीच जारी संघर्ष ने भारतीय स्टूडेंट्स, खासकर कश्मीर के बच्चों के लिए मुश्किल हालात पैदा कर दिए हैं। कश्मीर घाटी से करीब 2,000 स्टूडेंट्स ईरान के मशहद, शिराज, अराक और तेहरान जैसे शहरों में पढ़ रहे हैं। ‘पिछले एक साल में ये तीसरी बार है, जब जंग के चलते स्टूडेंट्स को इवैक्यूएशन का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि मौजूदा स्थिति पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक है। बड़ी संख्या में स्टूडेंट्स बाकी औपचारिकताएं पूरी करने के बावजूद अजरबैजान बॉर्डर पर फंसे हुए हैं।‘ ‘स्टूडेंट्स की सेफ्टी तो मसला है ही। साथ ही बार-बार होने वाले इवैक्यूएशन ने उनका एकेडमिक फ्यूचर बर्बाद कर दिया है। MBBS जैसा कोर्स अब 7-7.5 साल तक खिंच सकता है। इससे उनका आगे का करियर भी प्रभावित हो सकता है। इसलिए ये सिर्फ इवैक्यूएशन का मुद्दा नहीं है, बल्कि हजारों स्टूडेंट्स के फ्यूचर और उनके परिवारों से जुड़ा बड़ा सवाल है। इस वक्त तत्काल और सख्त एक्शन की जरूरत है।‘ ……………….ये खबर भी पढ़िए ‘हॉस्टल के पास मिसाइलें गिरीं, पता नहीं बचूंगी या नहीं’ कश्मीर के अनंतनाग में रहने वाले बिलाल अहमद भट्ट की बेटी ईरान की राजधानी तेहरान में MBBS की पढ़ाई कर रही है। 9 मार्च की रात 3 बजे बिलाल के पास उसका फोन आया। वो रो रही थी। बिलखते हुए बोली- ‘अब्बू, मेरे हॉस्टल के पास मिसाइलें गिरने की आवाज आ रही हैं, बमबारी हो रही है। पता नहीं आज रात बचूंगी या नहीं। मुझे बचा लो।’ पढ़िए पूरी खबर…
हमने होर्मुज को नहीं किया बंद, अगर तेहरान के इंफ्रास्ट्रक्चर पर हुआ हमला तो मिलेगी सजा: ईरान
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 48 घंटे वाले अल्टीमेटम का ईरान के सबसे बड़े मिलिट्री कमांड यूनिट खातम-अल-अंबिया ने जवाब दिया है
ईरान रणनीति पर रिपब्लिकन सीनेटर की नाराज़गी: ट्रंप प्रशासन पर सवाल
एक प्रभावशाली रिपब्लिकन सीनेटर ने ईरान संघर्ष में ट्रंप प्रशासन के उद्देश्यों की अस्पष्टता पर चिंता जताई है। उन्होंने चेतावनी दी कि यह रुख प्रमुख सहयोगियों के साथ संबंधों को कमजोर कर सकता है
बांग्लादेश में दर्दनाक हादसा ट्रेन और बस की टक्कर में 12 की मौत
बांग्लादेश में एक बड़ी दुर्घटना में रविवार सुबह कोमिला में पडुआ बाजार लेवल क्रॉसिंग पर एक मेल ट्रेन और बस की भीषण टक्कर हो गई। इस हादसे में कम से कम 12 लोगों की मौत हो गई और 20 अन्य घायल हो गए
ट्रंप की धमकी एयरपोर्ट सुरक्षा के लिए आईसीई एजेंट तैनात करेंगे
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गृह सुरक्षा विभाग (डीएचएस) के बंद होने के बीच एयरपोर्ट पर सिक्योरिटी के लिए आव्रजन और सीमा शुल्क प्रवर्तन (आईसीई) एजेंट्स को तैनात करने की धमकी दी है
ट्रंप की चेतावनी 48 घंटे में होर्मुज स्ट्रेट न खुला तो ईरानी पावर प्लांट्स पर हमला
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने धमकी दी है कि अगर ईरान 48 घंटों के भीतर होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह से नहीं खोलता है तो संयुक्त राज्य अमेरिका ईरानी पावर प्लांट्स को निशाना बनाएगा
यूएन महासचिव की अपील नस्लवाद मिटाने के लिए दुनिया आए एकजुट
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने दुनिया भर में बढ़ते नस्लवाद को लेकर चिंता जताई है और इसे खत्म करने के लिए एकजुट होकर काम करने की अपील की है
ईरान रेड क्रेसेंट सोसायटी के अध्यक्ष पीरहुसैन कोलिवंद ने कहा है कि अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ अपनी “आक्रामक कार्रवाई” की शुरुआत से अब तक 80,000 से ज्यादा नागरिक स्थानों पर हमले किए हैं
ईरान का बड़ा मिसाइल हमला इजरायल के न्यूक्लियर सिटी डिमोना और अराद में तबाही
इजरायल के दक्षिणी शहरों में न्यूक्लियर सिटी डिमोना के साथ अराद में ईरान ने बड़ा मिसाइल अटैक किया है। शनिवार को दक्षिणी शहरों डिमोना और अराद में ईरानी हमलों में 100 से ज्यादा लोग घायल हो गए
मेरी कहानी एक साधारण स्पोर्ट्स कोच की नहीं, उस पिता की है, जिसने अपने दोनों अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बच्चों को खो दिया… लेकिन खेल और सपने को मरने नहीं दिया। 2004 में नेशनल चैंपियन तीरंदाज बेटी वोल्गा एक सड़क हादसे में चली गई। अकादमी बंद हो गई। परिवार बिखरने लगा। उसके बाद बेटे लेनिन ने MBBS छोड़ धनुष उठा लिया- अपने लिए नहीं, मेरे और अपनी बहन के अधूरे सपने के लिए। धीरे-धीरे वह इंटरनेशनल खिलाड़ी बना, कोच बना और अकादमी को फिर से खड़ा किया। लेकिन 2010 में, जिस दिन उसे राज्य सम्मान मिला, उसी दिन लौटते वक्त रास्ते में एक सड़क हादसे में उसकी भी मौत हो गई। बाद में, 55 साल की उम्र में मैं फिर पिता बना। बेटी शिवानी पैदा हुई। मैंने दो साल की उम्र में ही उसके हाथ में धनुष थमा दिया। आज वह भी इंटरनेशनल खिलाड़ी बन चुकी है। अब यही कहूंगा- ‘मेरा बेटा लेनिन गया नहीं… वह शिवानी के रूप में जिंदा है।’ मैं सत्यनारायण चेरूकुरी हूं। ‘चेरूकुरी वोल्गा आर्चरी अकादमी’ चलाता हूं। 1959 में आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले के नंदीवाड़ा गांव में पैदा हुआ। हम कुल पांच भाई-बहन थे- दो भाई और तीन बहनें। वक्त के साथ सब छूटते चले गए… और अब मैं ही अकेला बचा हूं। उस वक्त हमारा इलाका हर साल बाढ़ से जूझता था। खेती पर निर्भर परिवार के लिए हालात आसान नहीं थे- हर साल कुछ न कुछ उजड़ जाता था। इसी वजह से, 1964 में मेरी नानी के कहने पर पूरा परिवार विजयवाड़ा आ गया। यहां हालात थोड़ा संभले। नानी ने पिता को एक बैलगाड़ी दिला दी, जिससे उन्होंने सामान ढोने का काम शुरू किया। घर चलने लगा। पिता सिर्फ किसान या मजदूर नहीं थे, उन्हें नाचने का भी शौक था। शायद वहीं से मेरे अंदर भी कला और खेल दोनों का बीज पड़ा। पिता चाहते थे कि मैं कुचिपुड़ी डांसर बनूं। उनके कहने पर मैंने बाकायदा डांस सीखना शुरू भी किया। इस समय तक आंध्र में डांस में भी मेरी एक पहचान बन चुकी थी। सब ठीक चल रहा था, लेकिन तभी शादी हो गई… और फिर धीरे-धीरे डांस छूट गया। जिंदगी ने जैसे उस मोड़ पर एक अलग दिशा पकड़ ली। डांस छूटने के बाद मेरा झुकाव छात्र राजनीति की तरफ बढ़ा। उस दौर में मैं सीपीआई के छात्र संगठन एआईएसएफ यानी ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन से जुड़ा और संगठन के काम में लगातार सक्रिय रहा। इसी सिलसिले में मुझे लंबे समय तक रूस में रहने का मौका मिला। रूस में सोच बदलने वाला दौर था। वहां मैंने लेनिन को पढ़ा और धीरे-धीरे उनसे प्रभावित होता चला गया। वहां अक्सर कहा जाता कि ‘लेनिन’ का मतलब लिखने वाला पेन होता है। उसी समय मन में एक बात बैठ गई- अगर कभी बेटा हुआ, तो उसका नाम लेनिन रखूंगा। कुछ साल बाद जब मैं वापस भारत लौटा, तो जिंदगी अपने सामान्य ढर्रे पर लौट आई। पहले मुझे बेटी पैदा हुई। उसका नाम मैंने वोल्गा रखा और उसके डेढ़ साल बाद बेटा हुआ। उसका नाम लेनिन रखा। इधर, पार्टी के काम के सिलसिले में मेरा जंगलों और आदिवासी इलाकों में भी आना-जाना लगा रहता। कई बार वहां दिनों-दिन रुकना पड़ता। वहीं मैंने पहली बार तीरंदाजी को करीब से देखा। धीरे-धीरे मैंने भी तीर चलाना सीख लिया। जब घर लौटा, तो लगा कि जो सीखा है, उसे आगे बढ़ाना चाहिए। मैंने लेनिन को भी तीरंदाजी सिखाने की कोशिश की। लेकिन उस समय उसकी दिलचस्पी कुचिपुड़ी डांस में ज्यादा थी। वह उसी में मशगूल रहता था। हां, बीच-बीच में शौक के तौर पर तीर पकड़ लेता था। लेकिन एक बात साफ थी- लेनिन के जन्म के साथ ही मैंने एक सपना देख लिया था कि उसे तीरंदाजी में आगे ले जाना है। सिर्फ खेलने तक नहीं, बल्कि एक दिन उसे इंटरनेशनल खिलाड़ी और कोच के रूप में देखना है। इसी सोच के साथ 1997 में मैंने छह बच्चों के साथ ‘कृष्णा डिस्ट्रिक्ट आर्चरी अकादमी’ शुरू की। लेनिन और वोल्गा- दोनों वहीं प्रैक्टिस करने लगे। हालांकि उस वक्त तक लेनिन ने तय नहीं किया था कि वह तीरंदाजी को करियर बनाएगा। वह डांस में भी उतना ही जुड़ा हुआ था। फिर 2000 में एक मोड़ आया। स्कूल गेम्स में लेनिन ने तीरंदाजी में नेशनल चैंपियनशिप जीत ली। यहीं से मैंने ठान लिया- अब इसे इसी में आगे बढ़ाना है। मैंने उस समय देश के जाने-माने कोच लिंबा राम और मंगल सिंह को अकादमी से जोड़ा। उनसे कहा- लेनिन को तैयार करना है। ट्रेनिंग शुरू हुई। लेनिन ने भी खुद को पूरी तरह तीरंदाजी में झोंक दिया। 2003 तक वह यूनिवर्सिटी चैंपियन बन चुका था। नाम बनने लगा था। लेकिन घर के अंदर एक अलग ही बात चलती थी। मेरी बेटी वोल्गा चाहती थी कि उसका भाई डॉक्टर बने। दोनों में डेढ़ साल का ही फर्क था, लेकिन रिश्ता बहुत गहरा था। वोल्गा को जो भी चाहिए होता- वह मुझसे नहीं, सीधे लेनिन से कहती थी। उसे थम्स अप पीना बहुत पसंद था। लेनिन उसे मना करता, डांटता भी था… लेकिन फिर खुद ही जाकर लाता था। पॉपकॉर्न, चिकन- सब वही लाता था उसके लिए। असल में, वोल्गा के लिए लेनिन सिर्फ भाई नहीं- उसका सबसे भरोसेमंद साथी था। और इस दौरान वोल्गा खुद भी पीछे नहीं थी। 2004 तक वह अंडर-14, 17 और 19 कैटेगरी में खेल चुकी थी। पांच बार गोल्ड मेडल जीत चुकी थी। तीरंदाजी में नेशनल चैंपियन थी। घर में एक तरफ मेरा सपना था- लेनिन तीरंदाजी में आगे बढ़े और दूसरी तरफ वोल्गा का सपना- भाई डॉक्टर बने। दोनों अपने-अपने तरीके से एक-दूसरे के लिए जी रहे थे। लेनिन मेडिकल एंट्रेंस की तैयारी भी कर रहा था। वह वोल्गा का सपना पूरा करना चाहता था- डॉक्टर बनने का। लेकिन 29 नवंबर 2004 को सब कुछ अचानक रुक गया। दोपहर करीब साढ़े 12 बजे का वक्त था। मैं और लेनिन स्टेडियम में थे। बच्चे प्रैक्टिस कर रहे थे। मैं उन्हें तीर पकड़ने का तरीका समझा रहा था। सब कुछ सामान्य था। तभी फोन आया। उधर से मेरी पत्नी की रोने की आवाज थी। उन्होंने बस इतना कहा- ‘जल्दी घर आओ… वोल्गा…’ आवाज साफ नहीं थी, लेकिन बात समझ आ गई- कुछ गंभीर हुआ है। मैंने लेनिन की तरफ देखा और कहा, ‘चलो, घर चलते हैं।’ हम तुरंत स्टेडियम से निकले। रास्ते भर मन में एक ही सवाल था- क्या हुआ होगा? घर के पास पहुंचे तो भीड़ दिखी। दिल बैठ गया। मैं भागते हुए अंदर गया। लेनिन पीछे था। अंदर देखा- वोल्गा जमीन पर पड़ी थी। कोई कुछ नहीं बोल रहा था। कुछ ही देर में साफ हो गया- वह नहीं रही। कॉलेज से स्कूटी पर लौट रही थी। घर से थोड़ी ही दूरी पर बस ने टक्कर मार दी। मौके पर ही मौत हो गई। सुबह जाते वक्त बस इतना कहा था- ‘पापा, कॉलेज जा रही हूं… शाम को ग्राउंड चलेंगे।’ वह रोज की तरह ही गई थी। लेकिन उस दिन… वह शाम कभी नहीं आई। वोल्गा के जाने के बाद कुछ समझ नहीं आ रहा था। अकादमी बंद कर दी। घर का माहौल पूरी तरह बदल गया। मेरी पत्नी वोल्गा को याद कर-करके रोतीं। मैं उन्हें संभालने की कोशिश करता, लेकिन खुद भी भीतर से टूट चुका था। लेनिन सबसे ज्यादा बदला हुआ दिख रहा था। वह लगभग चुप हो गया था। कम बोलता था। बस कभी-कभी पूछता- ‘पापा, ये क्या हो गया… भगवान दीदी को क्यों ले गए?’ इन सबके बीच भी लेनिन ने तीरंदाजी नहीं छोड़ी। वह प्रैक्टिस के लिए जाता रहा। शायद वही उसका सहारा था। कुछ दिन बाद उसका एमबीबीएस में एडमिशन हो गया। उसने पढ़ाई शुरू कर दी। लेकिन घर का सन्नाटा बना रहा। करीब दो साल तक हम पति-पत्नी घर से बाहर नहीं निकले। न किसी से मिलना, न बात करना। घर में पहले जो आवाजें थीं- हंसी, नोक-झोंक, सब खत्म हो गई। इसी बीच लेनिन ने एक दिन साफ कहा- ‘पापा, मैं एमबीबीएस नहीं करूंगा। मैं तीरंदाजी करना चाहता हूं। हमें फिर से अकादमी शुरू करनी चाहिए।’ उस दिन वह हमें अकादमी ले गया। पहले दिन अकादमी पहुंचे तो सब सूना था। मैदान खाली पड़ा था। कुछ पुराने टारगेट धूल में पड़े थे। लेनिन ने खुद जाकर तीर-कमान उठाए। कुछ बच्चों को बुलाया, जो पहले यहां आते थे। धीरे-धीरे 4-5 बच्चे आ गए। वह उन्हें लाइन में खड़ा करता, तीर पकड़ने का तरीका बताता। खुद डेमो देता। ‘ऐसे पकड़ो… ध्यान सीधा रखो…’ मैं और मेरी पत्नी एक तरफ खड़े देख रहते थे। थोड़े दिन में उस मैदान में फिर से आवाजें सुनाई दे रही थीं- तीर के लगने की आवाज, बच्चों की हलचल। अकादमी फिर चल पड़ी। धीरे-धीरे बच्चे बढ़ने लगे… और वह जगह फिर से जिंदा होने लगी। अकादमी दोबारा शुरू हुई, तो लेनिन ने एक और फैसला लिया। उसने कहा- अब इसका नाम ‘वोल्गा आर्चरी अकादमी’ होगा। उसका तर्क साफ था- ‘वोल्गा को दुनिया जानेगी। उसका नाम यहीं से जिंदा रहेगा।’ और उसी नाम से अकादमी चलने लगी। इसके बाद लेनिन पूरी तरह इसमें जुट गया। खुद भी ट्रेनिंग लेता और छोटे बच्चों को सिखाता। सुबह से शाम तक मैदान में रहता। धीरे-धीरे असर दिखने लगा बच्चे बढ़ने लगे। पुराने खिलाड़ी लौटे। कुछ नए जुड़े। अकादमी फिर से नेशनल लेवल तक खिलाड़ियों को भेजने लगी। इसी दौरान उसने एक बड़ा फैसला लिया। एमबीबीएस छोड़ दिया। वह जानता था कि तीरंदाजी मेरे लिए सिर्फ खेल नहीं, जिंदगी है। शायद यह भी समझ गया था कि मैं अब अकेले इसे संभाल नहीं पाऊंगा। उसने कुचिपुड़ी डांस भी छोड़ दिया। धीरे-धीरे उसने अपने सारे रास्ते समेटकर एक ही दिशा चुन ली- तीरंदाजी की। असल में, वह सिर्फ अपना करियर नहीं बना रहा था। वह मेरा सपना और वोल्गा की याद- दोनों को साथ लेकर चल रहा था। 2005 तक हालात पूरी तरह बदल चुके थे। देश के अलग-अलग हिस्सों से बच्चे यहां आने लगे थे। उधर, लेनिन खुद भी आगे बढ़ रहा था। केरल में उसने नेशनल चैंपियनशिप जीती। आंध्र प्रदेश के लिए गोल्ड मेडल लाया और फिर- उसका चयन इंडियन टीम में हो गया। अब वह सिर्फ कोच का बेटा नहीं, खुद एक उभरता हुआ इंटरनेशनल खिलाड़ी बन गया था। बेटी के जाने के बाद घर में सन्नाटा था, लेकिन अब पूरा ध्यान लेनिन पर था। वही उम्मीद था। वही सहारा। धीरे-धीरे हम तीनों- मैं, मेरी पत्नी और लेनिन वोल्गा की याद के साथ उसी सपने को जीने लगे। लेनिन ने भी खुद को पूरी तरह तीरंदाजी में झोंक दिया। कम उम्र में ही उसकी पहचान बनने लगी। महज 18 साल की उम्र में वह लेवल-3 कोच बन गया। तीरंदाजी की टेकनीक ‘कंपाउंड बो’ में उसका प्रदर्शन लगातार बेहतर होता गया। नेशनल जीता, फिर इंटरनेशनल सर्किट में नाम बना। वह सिंगापुर गया, वहां ट्रेनिंग ली। वहीं के एक कोच ने मुझसे कहा था- ‘लेनिन बहुत आगे जाएगा।’ उस वक्त यह बात हौसला देती थी… और बाद में सच भी साबित हुई। 2010 तक आते-आते लेनिन एक जाना-माना खिलाड़ी था। उसी साल कॉमनवेल्थ गेम्स में हमारे अकादमी के खिलाड़ियों ने सिल्वर मेडल जीते। राज्य सरकार ने 23 सितंबर को हैदराबाद में उसे सम्मानित करने के लिए बुलाया। कार्यक्रम खत्म हुआ। बारिश तेज थी। हम कार से विजयवाड़ा लौट रहे थे। विजयवाड़ा में हजारों लोग उसके स्वागत के इंतजार में थे। शाम करीब 4:40 बजे थे। विजयवाड़ा से कुछ दूरी पहले अचानक सामने एक ऑटो ने यू-टर्न लिया। लेनिन गाड़ी चला रहा था। उसने बचाने की कोशिश की, ब्रेक मारी… गाड़ी उछली… और कुछ सेकंड में सब खत्म हो गया। लेनिन दूर जा गिरा। मौके पर ही उसकी मौत हो गई। मैं भी घायल था। सिर में चोट थी, हाथ टूट गया था… लेकिन उससे बड़ा झटका यह था कि जिस दिन उसे सम्मान मिला, उसी दिन वह चला गया। 24 साल का मेरा बेटा, जो देश के लिए खेल रहा था… नहीं रहा। उसने अपने छोटे से करियर में बहुत कुछ किया था। नेशनल चैंपियन रहा, इंडियन टीम का हिस्सा रहा। रेलवे में नौकरी मिली और सबसे अहम- अकादमी को खड़ा किया। अब जब मैं अकादमी में देखता, तो हर कोना उसकी याद दिलाता है। उसके जाने के बाद एक पल को लगा- सब खत्म हो गया। लेकिन फिर एक सवाल सामने था- जो बच्चे यहां सीख रहे हैं, उनका क्या होगा? मैंने उसी दिन तय किया- अकादमी बंद नहीं होगी। जिस दिन लेनिन की मौत हुई… उसी दिन मैं अकादमी गया। काम किया। शाम को बच्चे मेरे पास आए। बोले- ‘सर, हम सब लेनिन हैं… आप अकेले नहीं हैं।’ उनकी बात सुनकर लगा- शायद यही रास्ता है। उस दिन के बाद अकादमी एक दिन के लिए भी बंद नहीं हुई। लेकिन लेनिन के जाने के बाद दोबारा हिम्मत मेरी पत्नी ने दी। उसने कहा कि अब घर में नहीं रहना है। पहले हम अकादमी से थोड़ा दूर रहते थे। लेनिन के जाने के बाद मैं और मेरी पत्नी अकादमी में ही शिफ्ट हो गए। हम यहीं रहने लगे। पत्नी ने कहा कि अकादमी के बच्चे अब हमारे बच्चे हैं। फिर वोल्गा और लेनिन दोनों के नाम की जायदाद मैंने अकादमी में लगा दी। लेनिन को गए करीब डेढ़ साल हो चुके थे। घर और अकादमी- दोनों ही जैसे चुप थे। उसी दौरान एक दिन मेरी पत्नी ने कहा- उसे बच्चा चाहिए। मेरी उम्र 55 साल थी। एक पल को लगा- क्या यह सही समय है? लेकिन फिर लगा, शायद यही आगे बढ़ने का रास्ता है। मैंने हां कह दी। 2012 में हमारे घर शिवानी पैदा हुई। शुरू से ही उसमें कुछ अलग था। मैं उसे देखता… तो बार-बार लेनिन याद आता। धीरे-धीरे यह एहसास और गहरा होता गया- उसके हाव-भाव, चलने का तरीका, खेलने का अंदाज… सब कुछ कहीं न कहीं लेनिन जैसा लगता। दो साल की हुई, तो मैंने उसके हाथ में धनुष दे दिया। यह कोई तय फैसला नहीं था, बस यूं ही। उसने उसे पकड़ लिया… और फिर छोड़ना नहीं चाहा। वह इसी अकादमी में पली-बढ़ी। मैदान, टारगेट, तीर- यही सब उसके खिलौने थे। समय के साथ उसने अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी है। आज वह अंडर-9 तीरंदाजी में देश की चैंपियन है और अंडर-12 और अंडर-14 में विश्व चैंपियान तीरंदाज। अमेरिका और जर्मनी से लोग उस पर डॉक्युमेंट्री बनाने भी आए। अब वह आगे की तैयारी कर रही है। टारगेट है- ओलंपिक मेडल लाना। मैं अक्सर कहता हूं- मुझे शिवानी नहीं, उसमें लेनिन दिखाई देता है। मेरे दो बच्चे चले गए… लेकिन मेरे लिए लेनिन कहीं गया नहीं। वह हर दिन यहीं है- शिवानी की आदतों में, उसकी मेहनत में, उसके खेल में। शायद इसलिए मैं अब पीछे मुड़कर ज्यादा नहीं देखता। बस एक ही बात दिमाग में रहती है- लेनिन का नाम आगे बढ़ाना है। लेकिन इस वक्त मेरे साथ सदमा देने वाली बात हुई है। मेरी अकादमी से तैयार अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों को कुछ कोच ने पैसे देकर खरीद लिया है। उन चैंपियन ने पैसे लेकर उन्हें अपना कोच बता दिया है, जबकि उनका कोच मेरा बेटा लेनिन था। मैंने इस मामले को अदालत में चुनौती दी है। मेरा मन बहुत दुखी हुआ जब गुरु-शिष्या की परंपरा को तोड़कर कुछ लोग पैसों के लिए बिक गए। दुखी होता हूं जब वे इंटरव्यू में लेनिन की बजाय किसी और का नाम लिया जाता है। (सत्यानाराण चेरूकुरी ने अपने ये जज्बात भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से साझा किए) 1- संडे जज्बात-पुलिस ने मेरे प्राइवेट पार्ट पर ईंट बांधी:सिर कुर्सी में बांधकर उल्टा टांगा, मैं वकील बनकर केस खुद लड़ा- 12 साल बाद जीता 18 साल की उम्र में पुलिस ने मुझे हत्या के मामले में आरोपी बना दिया। मैंने अपने केस की खुद पैरवी की और 12 साल बाद बाइज्जत बरी हुआ। अपना केस लड़ने के लिए लॉ किया और अब मैं एडवोकेट अमित चौधरी हूं। मेरठ बार एसोसिएशन का सदस्य भी हूं। मेरी जिंदगी पर जल्द ही एक फिल्म बन रही है, जो नेटफ्लिक्स पर रिलीज होगी। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- संडे जज्बात-दोस्त की प्रेमिका प्रेग्नेंट हुई, रेप केस मुझपर चला:पंचायत ने 6 लाख में सौदा किया, 5 साल जेल में रहा, अब बाइज्जत बरी बिहार के दरभंगा जिले का रहने वाला मैं मुकेश कुशवाहा। मुझ पर 17 साल की लड़की के रेप और पॉक्सो एक्ट के तहत मुकदमा चला। वो लड़की मेरे दोस्त की प्रेमिका थी। दोस्त ने उसे प्रेग्नेंट किया था, लेकिन मुकदमा मुझ पर चला। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें
इलाहाबाद का चकिया। सफेद कुर्ता, सिर पर साफा पहने, चेहरे पर मुस्कान लिए एक माफिया। फिल्म धुरंधर-2 शुरुआती सीन से ही आपको सीधे यूपी के माफिया और सांसद रहे अतीक अहमद के दौर में ले जाएगी। 15 अप्रैल, 2023 को पुलिस के सुरक्षा घेरे में अतीक और उसके भाई अशरफ अहमद की हत्या कर दी गई थी। धुरंधर-2 के किरदार आतिफ अहमद ने अतीक अहमद को फिर से चर्चा में ला दिया है। आतिफ अहमद के तार पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI, आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा और अंडरवर्ल्ड से जुड़े दिखाए गए हैं। फिल्म में भले ही डिस्क्लेमर है, लेकिन आतिफ का किरदार हूबहू अतीक अहमद से मिल रहा है। हमने फिल्म में दिखाए आतिफ अहमद से जुड़े हर सीन और डायलॉग्स को देखा। फिल्म के दावे और अतीक की मौत पर यूपी पुलिस की जांच रिपोर्ट और चार्जशीट के फैक्ट्स से तुलना की। फिल्म में 3 बार माफिया आतिफ की एंट्रीधुरंधर-2 फिल्म 3 घंटे 52 मिनट की है। फिल्म ने ओपनिंग डे पर वर्ल्डवाइड 236 करोड़ रुपए की कमाई कर नया रिकॉर्ड बनाया है। सीन: 1 चकिया का ड्रग्स किंगपहले सीन में इलाहाबाद में उसके दबदबे और ड्रग्स के बिजनेस को दिखाया गया है। आतिफ किसी से मिलने नहीं जाता था, बल्कि लोग उससे चरस, अफीम, हशीश और टॉर्च पाउडर जैसी ड्रग्स खरीदने इलाहाबाद के चकिया आते थे। सीन: 2पाकिस्तान से कनेक्शनदूसरे सीन में यूपी के DGP संजय कुमार को दिखाया है। ये किरदार पूर्व DGP प्रशांत कुमार की तरह दिखता है। इस सीन में यूपी पुलिस को पहली बार पता चलता है कि आतिफ का कनेक्शन पाकिस्तान से है। वो भारत में फेक करंसी और ड्रग्स की सप्लाई में शामिल है। यूपी पुलिस को ये बात पता चलती है तो आतिफ की गैंग पर कार्रवाई शुरू हो जाती है। आतिफ और उसके भाई अशरफ को गिरफ्तार किया जाता है। फिल्म में दावा: 2016 में हुई नोटबंदी ISI और अंडरवर्ल्ड सरगना दाऊद इब्राहिम के फेक करेंसी रैकेट को बेनकाब करने का मास्टरप्लान था। भारतीय सुरक्षा एजेंसी ने यूपी पुलिस को बताया कि पाकिस्तान से जुडे़ फेक करेंसी रैकेट में यूपी का आतिफ अहमद शामिल है। हकीकत: अतीक अहमद से जुड़े उमेश पाल हत्याकांड और हथियार तस्करी मामले की जांच प्रयागराज पुलिस और UP-STF ने की थी। अतीक के विदेशी लिंक होने की वजह से जांच में ATS को भी शामिल किया गया। 13 जुलाई, 2023 को CJM कोर्ट में जांच एजेंसी ने पहली चार्जशीट दाखिल की। चार्जशीट में अतीक अहमद के कबूलनामे और सबूतों के आधार पर बताया गया कि अतीक की गैंग IS-227 का ISI से सीधा कनेक्शन था। हालांकि, यूपी पुलिस की चार्जशीट में अतीक से जुड़े फेक करंसी रैकेट का जिक्र कहीं भी नहीं किया गया है। लिहाजा, फिल्म में अतीक से जुड़ा फेक करंसी का दावा सच नहीं है। फिल्म में दावा: नोटबंदी से पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने UP के DGP के साथ मिलकर आतिफ अहमद को गिरफ्तार कराया।हकीकत: नवंबर 2016 में नोटबंदी के समय उत्तर प्रदेश के DGP सैयद जावेद अहमद थे। वे 1 जनवरी 2016 को DGP बनाए गए थे। फिल्म में DGP संजय कुमार का किरदार यूपी के पूर्व DGP प्रशांत कुमार की तरह दिखता है। 1990 बैच के IPS अधिकारी प्रशांत कुमार उस समय DGP नहीं थे। प्रशांत कुमार फरवरी 2024 में DGP बने और मई 2025 में रिटायर हुए। फिल्म में दिखाई गई टाइमलाइन सही नहीं है। फिल्म में दावा: आतिफ अहमद का ISI और आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से कनेक्शन था। वो नेपाल और पंजाब के रास्ते भारत में अवैध हथियारों की तस्करी में शामिल था।हकीकत: यूपी पुलिस ने दावा किया था कि मौत से पहले प्रयागराज के शाहगंज थाने में पूछताछ के दौरान अतीक ने कबूल किया था कि उसका ISI और लश्कर-ए-तैयबा से संपर्क था। पुलिस के दावे के मुताबिक, अतीक ने कहा था- ‘मेरे पास हथियारों की कमी नहीं है। मेरे सीधे संबंध ISI और लश्कर-ए-तैयबा से हैं। पाकिस्तान से ड्रोन के जरिए पंजाब बॉर्डर पर हथियार गिराए जाते हैं और ISI से जुड़े लोग उन लोकेशन पर जाकर हथियार उठा लेते हैं। मैं ISI और लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े कुछ लोगों के ठिकाने जानता हूं। मेरे भाई अशरफ को बाकी लोगों की पूरी जानकारी है।’ अतीक ने पुलिस को बताया कि मुझे उन जगहों की जानकारी है, जहां ये हथियार छिपाकर रखे गए हैं। वहां कोई मकान नंबर नहीं हैं। अगर पुलिस मुझे और मेरे भाई को साथ ले चलें, तो हम उन जगहों की पहचान कर सकते हैं। इस कबूलनामे के बाद UP-STF अतीक और अशरफ को चकिया के कसारी-मसारी के जंगल में ले गई थी। वहां हथियार छिपाए गए थे। इसके बाद दोनों को रूटीन मेडिकल चेकअप के लिए ले जाया गया। यहीं उनकी हत्या कर दी गई। अतीक को लेकर किया गया यूपी पुलिस का ये दावा कभी साबित नहीं हो पाया। जम्मू-कश्मीर के पूर्व DGP एसपी वैद्य कहते हैं, ‘अतीक अहमद सांसद होते हुए भी कुख्यात गैंगस्टर था। उसके पास से ब्रिटिश बुलडॉग रिवॉल्वर 455 बोर और एक वाल्थर पी88 जैसी विदेशी पिस्टल बरामद की गई। ये दोनों ही हाई-प्रोफाइल वेपन हैं, जो आसानी से नहीं मिल सकते।’ उत्तर प्रदेश पुलिस के पूर्व डीजीपी डॉ. विक्रम सिंह कहते हैं, ‘अतीक अहमद ने कबूला था उमेश पाल की हत्या में ISI के भेजे हथियार इस्तेमाल हुए थे। ये हथियार पंजाब से यूपी लाए गए थे। अतीक के इस बयान के बाद STF ने उसके घर और दूसरे ठिकानों पर छापा मारा तो बड़ी संख्या में पाकिस्तान ऑर्डिनेंस फैक्ट्री की मुहर लगे कारतूस और हथियार मिले थे।’ सीन: 3आतिफ और अशरफ का मर्डरआखिरी सीन पुलिस सुरक्षा घेरे में आतिफ अहमद की हत्या का है। इस सीन में हर एंगल को ठीक वैसा ही दिखाया गया है, जैसे 15 अप्रैल 2023 की रात 10:30 बजे पुलिस कस्टडी में, मीडिया के कैमरों के सामने अतीक अहमद की हत्या हुई थी। हमलावर पत्रकार बनकर पुलिस सुरक्षा के अंदर आ जाते हैं। अतीक अहमद मीडिया के सामने कहता है- 'मेन बात है कि गुड्डू मुस्लिम'... तभी अचानक हमलावर नजदीक आकर उसके सिर पर गोली मारते हैं। अतीक और उसके भाई अशरफ को मारने के बाद तीनों हमलावर पुलिस के सामने सरेंडर कर देते हैं। फिल्म में दावा: पाकिस्तान में बैठा ISI अधिकारी इलियास कश्मीरी उर्फ मेजर इकबाल (अर्जुन रामपाल) अतीक की मौत का LIVE वीडियो देख रहा था। अतीक-अशरफ की हत्या से उसकी प्लानिंग फेल हो गई। हकीकत: 3 जून 2011 को अमेरिका के ड्रोन हमले में इलियास कश्मीरी मारा गया था। उस वक्त वो साथियों के साथ सेब के बगीचे में बैठा था। वहीं, अतीक की हत्या 2023 में हुई। यहां भी टाइमलाइन मैच नहीं करती है। STF और RAW को मिला था अतीक का ISI कनेक्शन दैनिक भास्कर ने अतीक के ISI कनेक्शन पर यूपी STF के एक सीनियर ऑफिसर से बात की। उन्होंने बताया, ‘अतीक अहमद की मौत से पहले 2021 में UP-STF और खुफिया एजेंसी रॉ ने एक जॉइंट ऑपरेशन चलाया। सितंबर 2021 में जीशान कमर नाम के आतंकी को पकड़ा गया था। जीशान उस पाकिस्तानी कैंप में जुड़ा था, जहां कसाब को ट्रेनिंग दी गई थी।’ ‘जीशान ने UP-STF को बताया कि 2017 में वो प्रयागराज से पाकिस्तान गया था। तब अतीक के भाई अशरफ ने पासपोर्ट अधिकारी को लेटर भेजा था, ताकि पासपोर्ट जल्द मिल जाए। इस तरह पहली बार अतीक के ISI कनेक्शन का पता चला था।’ ……………… अतीक से जुड़ी ये ग्राउंड रिपोर्ट भी पढ़ें कहां है अतीक की पत्नी शाइस्ता और गुड्डू बमबाज 24 फरवरी, 2023 जया पाल की जिंदगी की सबसे बुरी तारीख है। इस दिन उनके पति और पेशे से वकील उमेश पाल की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। हत्याकांड का मास्टरमाइंड अतीक अहमद था। उमेश की हत्या में शामिल 10 में से 6 आरोपी मारे जा चुके हैं। अतीक की पत्नी शाइस्ता, गुड्डू मुस्लिम के अलावा शूटर अरमान और साबिर पकड़े नहीं गए। पढ़ें पूरी खबर...
अमेरिका-ईरान युद्ध के चलते महंगाई की चपेट में आ सकता है चीन: रिपोर्ट
अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण बढ़ती वैश्विक ऊर्जा कीमतों से चीन डिफ्लेशन (मंदी जैसी स्थिति) से तो बाहर निकल सकता है
हाल ही में चाइना मीडिया ग्रुप ने 'उच्च स्तरीय इंटरव्यू' कार्यक्रम के तहत तुर्कमेनिस्तान के राष्ट्रीय नेता और पीपुल्स काउंसिल के अध्यक्ष गुरबांगुली बर्दिमुहामेदोव का साक्षात्कार लिया
ट्रंप प्रशासन को पहला बड़ा झटका तब लगा जब ईरान ने कतर के रास लाफान गैस हब को निशाना बनाया। यह दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी (लिक्विफाइड नेचुरल गैस) उत्पादन केंद्रों में से एक है और वैश्विक गैस आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा यहीं से संचालित होता है।
ईरान ने तुर्की-ओमान हमलों से किया इनकार
Iran Denies Trkiye-Oman Attacks
ईरान राष्ट्रपति पेजेश्कियान बोले – मुस्लिम देशों से नहीं चाहते युद्ध
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने स्पष्ट किया है कि उनका देश मुस्लिम देशों के साथ किसी भी तरह का युद्ध या टकराव नहीं चाहता
ईरान का ब्रिटेन को सख्त संदेश – बढ़ी भागीदारी तो मिलेगा जवाब
इजरायल-अमेरिका के साथ जारी संघर्ष के बीच ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने यूनाइटेड किंगडम को कड़ी चेतावनी दी है
दक्षिण कोरिया: ऑटो पार्ट्स फैक्ट्री आग में 10 की मौत, 59 घायल
दक्षिण कोरिया के डेजॉन में एक कार पार्ट्स फैक्ट्री में लगी भीषण आग में 10 लोगों की मौत हो गई जबकि चार अन्य अब भी लापता हैं
होर्मुज जलडमरूमध्य में नेपाली नागरिक हिरासत में
नेपाल सरकार ने पुष्टि की कि होर्मुज जलडमरूमध्य के समुद्री मार्ग में चल रहे एक जहाज पर कार्यरत एक नेपाली नागरिक को ईरानी अधिकारियों ने हिरासत में ले लिया है
‘हमारे मुख्यमंत्री हमें पहचानते तक नहीं, हमें गालियां देते हैं। बांग्लादेश जाने को कहते हैं। हम बांग्लादेश के नहीं, असम के हैं। हमारे पास सारे कागज हैं, लेकिन क्या कर सकते हैं। वे मुख्यमंत्री हैं, बड़े आदमी हैं। हम तो कुछ भी नहीं’ ये बेबसी असम के कामरूप जिले के सोंताली गांव में रहने वाले मोफिज अली की है। वे परिवार के साथ ब्रह्मपुत्र नदी के बीचों-बीच एक टापू पर रहते हैं। इस जगह को चर इलाका कहते हैं। यहां की लगभग पूरी आबादी बांग्ला बोलने वाले मुस्लिमों की है, जिन्हें असम में मियां मुस्लिम कहते हैं। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा अपने भाषणों में मियां मुस्लिमों को निशाने पर रखते हैं। पिछले कुछ भाषण और सोशल मीडिया पोस्ट में उन्होंने मियां मुस्लिमों पर ऐसे बयान दिए, जिससे मुख्यमंत्री और मियां मुस्लिम दोनों विवादों में आ गए। असम की 126 सीटों पर 9 अप्रैल को वोटिंग होगी। हिमंता जलुकबाड़ी सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। उन्होंने 20 मार्च को नामांकन दाखिल कर दिया है। BJP जीती तो वे दोबारा मुख्यमंत्री पद की शपथ ले सकते हैं। CM पद की शपथ लेते हुए उन्होंने कहा था, ‘मैं भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूंगा, भारत की संप्रभुता और अखंडता अक्षुण्ण रखूंगा, भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना, संविधान और विधि के अनुसार सभी लोगों के प्रति न्याय करूंगा’ हालांकि उनके बयान इस शपथ से मेल नहीं खाते। कभी वे कहते हैं कि मियां मुस्लिमों को इतना परेशान करो कि असम छोड़कर चले जाएं। कभी कहते हैं, मियां मुस्लिम किडनी दे देंगे, पर वोट नहीं देंगे। आखिर क्या हो गया कि हिमंता एक समुदाय के बारे में आक्रामक बयान दे रहे हैं। यही समझने दैनिक भास्कर की टीम दूसरे पक्ष यानी मियां मुस्लिमों के पास पहुंची। कामरूप का सोंताली गांवयहां 95% आबादी मियां मुस्लिमसबसे पहले हम गुवाहाटी से करीब 75 किलोमीटर दूर कामरूप जिले के सोंताली गांव पहुंचे। सोंताली समारिया विधानसभा सीट में है। समारिया विधानसभा क्षेत्र में करीब 1.3 लाख लोग रहते हैं, इनमें करीब 95% मियां मुस्लिम हैं। सोंताली के बाजार में अशरफ से मिले। उम्र करीब 35 साल। अशरफ कहते हैं, ‘यहां माहौल अच्छा नहीं है। हमारे मुख्यमंत्री हिटलर और डोनाल्ड ट्रम्प की तरह शासन चला रहे हैं। सीधे बोलते हैं कि मुसलमानों को हटाओ और बांग्लादेश भेजो।’ साेंताली से करीब 5 किमी दूर ब्रह्मपुत्र नदी का किनारा है। मियां मुस्लिमों की कहानी इसी जगह से जुड़ी है। यहां के ज्यादातर मर्द लुंगी पहने नजर आएंगे। कुछ महिलाएं नथुनों के निचले हिस्से में नथ पहनती हैं। इनका मुख्य पेशा खेती, मछली पकड़ना और बेचना है। हम नाव से एक आईलैंड पर पहुंचे। इसे बोको गांव कहते हैं। मियां मुस्लिम यहां रहकर खेती करते हैं। बाढ़ आती है, तब उसी बाजार की तरफ चले जाते हैं, जहां से हम यहां आए थे। ये मिट्टी वाला एरिया है। कुछ-कुछ दूरी पर झोपड़ियां बनी हैं। दोपहर हो चुकी थी। खेतों में काम करके थक चुकी कुछ महिलाएं और पुरुष ऊंचे चबूतरे पर बैठकर आराम कर रहे थे। हमने इन लोगों से पूछा कि मुख्यमंत्री आपके बारे में बयान देते हैं, क्या आपने सुने हैं? जवाब कुद्दुस अली देते हैं। कहते हैं, ‘मुख्यमंत्री हमारे बारे में बहुत खराब बोलते हैं। वे पहले कांग्रेस में थे, तब यहां आते थे। तब हम भी उन्हें पसंद करते थे, लेकिन अब नहीं करते। BJP में जाने के बाद उन्होंने हिंदू-मुस्लिम की राजनीति शुरू कर दी है।’ ‘असम में 60% हिंदू और 40% मुस्लिम आबादी है। हिंदू-मुस्लिम की राजनीति करने से उन्हें ज्यादा हिंदू वोट मिलेंगे और वे जीत सकते हैं। इसीलिए बांग्लादेश का मुद्दा उठा रहे हैं। हमारे पास आधार कार्ड, पैन कार्ड, वोटर आईडी सब है। फिर भी हमें बांग्लादेशी बता रहे हैं। वे बोलते हैं कि मियां हटाओ, देश बचाओ।’ महिलाएं बोलीं- CM ने पैसे दिए, लेकिन घर तोड़ दियाअसम सरकार अरुणोदय योजना के तहत महिलाओं को हर महीने 1,450 रुपए देती है। मुफ्त राशन भी मिलता है। हमने योजना का फायदा लेने वाली मुस्लिम महिलाओं से बात की। वे अरुणोदय योजना के अलावा सेल्फ हेल्प ग्रुप को मिलने वाले 10 हजार रुपए से खुश हैं। वे कहती हैं कि मुख्यमंत्री अच्छे हैं। हालांकि, एक महिला शिकायती लहजे में बोलीं, ‘मुझे कुछ नहीं दिया, तो मैं उन्हें क्यों अच्छा कहूं। हमारा तो घर तोड़ दिया। वो मुझे बिल्कुल पसंद नहीं हैं।’ हिमंता कब और कैसे मियां मुस्लिमों के खिलाफ होते गए1979 से 1985 के बीच असम में बांग्लादेश से आए घुसपैठियों के खिलाफ अखिल असम छात्र संघ के नेतृत्व में आंदोलन हुआ था। इस पर ‘इन्फिल्ट्रेशन-जेनेसिस ऑफ असम मूवमेंट’ किताब लिखने वाले प्रो. अब्दुल मन्नान बताते हैं कि पहले हिमंता इस तरह नहीं बोलते थे। वे कांग्रेस में थे, तब उन्होंने कहा था कि गुजरात में पानी के पाइप में मुस्लिमों का खून बहता है। और अब कहते हैं कि मुस्लिमों ने असम को बर्बाद कर दिया। वे सिर्फ सत्ता पाने के लिए ये सब कर रहे हैं। 1. मुस्लिम विवाह कानून रद्द कियाअसम सरकार ने 23 फरवरी, 2024 को करीब 89 साल पुराने असम मुस्लिम विवाह और तलाक पंजीकरण अधिनियम 1935 को रद्द कर दिया। तब हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा था कि इस कानून में निकाह को रजिस्टर्ड करने की परमिशन देने वाले प्रावधान शामिल थे, भले ही दूल्हा और दुल्हन 18 और 21 साल की कानूनी उम्र तक न पहुंचे हों। इससे सरकार को बाल विवाह रोकने में मदद मिलेगी।2. एक से ज्यादा शादी करने पर रोकअसम विधानसभा ने बहुविवाह पर रोक लगाने के लिए 27 नवंबर, 2025 को विधेयक पारित किया। इस कानून के तहत एक पत्नी के रहते हुए दूसरी शादी करने पर 7 साल तक की सजा हो सकती है। असम में हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 लागू है। इसके तहत हिंदू दो शादी नहीं कर सकते। 3. 1,281 मदरसे बंद किएहिमंता सरकार ने 27 जनवरी 2021 को असम मदरसा शिक्षा (प्रांतीयकरण) अधिनियम, 1995 और असम मदरसा शिक्षा (शिक्षकों की सेवाओं का प्रांतीयकरण और शैक्षणिक संस्थानों का पुनर्गठन) अधिनियम, 2018 को निरस्त कर दिया। इससे 1,281 मदरसों को मिडिल इंग्लिश यानी ME स्कूल में बदल दिया गया। इसका असर अहमद की कहानी से समझिए। अहमद 8वीं में पढ़ता है। सरकारी मदरसा बंद होने के बाद उसे कुरान सीखने के लिए 150 किमी दूर दूसरे जिले होजाई जाता है। अहमद का मदरसा अब मिडिल स्कूल है। उसमें कुरान नहीं पढ़ाई जाती। इसलिए वह निजी मदरसे में जाता है। इस मसले पर असमिया परिषद के जनरल सेक्रेटरी मुक्तार मंडल कहते हैं, ‘देश का कानून समान है, लेकिन हिमंता सरकार ने मुसलमानों को टारगेट करके कानून लागू किया है, ताकि मुस्लिम कोर्ट- कचहरी में दौड़ते रह जाएं।’ 4. 5 समुदायों को असमिया मुस्लिम का दर्जा, मियां मुस्लिम इससे बाहरहिमंता 5 मुस्लिम समुदायों को खिलंजिया, यानी भूमि पुत्र बताते हैं। इसमें गोरिया, मोरिया, जोलहा, देशी और सैयद शामिल हैं। ये सभी असमिया भाषा बोलते हैं। गोरिया, मोरिया, जोलहा चाय बागानों के आसपास बसे हैं। देशी मुसलमान निचले असम में रहते हैं। सैयद को असमिया मुसलमान कहा जाता है। एक फैसला चुनाव आयोग काबाकी राज्यों में SIR, लेकिन असम में SRदेशभर में वोटर की पहचान के लिए स्पेशल इंसेंटिव रिवीजन, यानी SIR की प्रोसेस चल रही है। असम को इससे बाहर रखा गया। चुनाव आयोग ने कहा कि राज्य में चल रही NRC, यानी नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन की प्रक्रिया अब तक पूरी नहीं हुई है। इसके बाद सिर्फ 10 दिन के अंदर 17 नवंबर 2025 को चुनाव आयोग ने असम में स्पेशल रिवीजन यानी SR कराने का आदेश जारी कर दिया। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने असम की बेदखली पर जारी रिपोर्ट में बताया था कि दरांग में 1,300, लखीमपुर में 500 और नगांव में 1 हजार से ज्यादा परिवार बेघर हुए। प्रभावितों में 90% से ज्यादा मियां मुस्लिम हैं। कांग्रेस लीडर और गुवाहाटी हाईकोर्ट के सीनियर वकील हाफिज रशीद अहमद चौधरी इस पर सवाल उठाते हैं। वे कहते हैं, ‘राज्य में जहां-जहां सरकार ने अतिक्रमण हटाने के लिए अभियान चलाया है, वहां अब लोग नहीं रहते। घर टूटने की वजह से वे दूसरी जगह शिफ्ट हो गए। बीएलओ उनके वेरिफिकेशन के लिए जाएंगे, लेकिन वहां कोई नहीं मिलेगा। इससे सैकड़ों नाम कट सकते हैं।’ असमिया मुस्लिम बोले- मियां मुस्लिम हमारी जमीन हड़प रहेकामरूप जिले के सोयगांव में रहने वाले अबुल कासिम असमिया मुस्लिम हैं। वे कहते हैं, ‘हमारे गांव में बांग्लादेशी घुसपैठिए (मियां मुस्लिम) रहते हैं। उन लोगों ने हमारी जमीन हड़प ली। कोर्ट में केस चल रहा है। जमीनों का टैक्स हम भरते हैं, लेकिन रहते वे हैं। हम सब हिंदू-मुस्लिम गोरिया- मोरिया भाई-भाई हैं, लेकिन मियां मुस्लिम के साथ नहीं हैं।’ मंजू बीबी गोरिया मुस्लिम समुदाय से हैं। वे कहती हैं, कुछ मियां लोगों की वजह से हमें परेशानी होती है। चोरी-डकैती की घटनाओं से डर का माहौल रहता है। खासकर लड़कियां असुरक्षित महसूस करती हैं। हालांकि, मोहम्मद तमीज अली अबुल और मंजू बीबी से अलग राय रखते हैं। वे कहते हैं ‘मुख्यमंत्री सिर्फ दिखावा करते हैं। हमारे लिए कुछ नहीं करते। ये कई साल से चल रहा है। मुख्यमंत्री गोरिया मुस्लिम के साथ नहीं हैं। वे मियां के साथ हैं। हिमंता असमिया मुस्लिम के नाम पर राजनीति कर रहे हैं।’ ‘मियां मुस्लिमों को सभी योजनाओं का फायदा क्यों मिलता है। वे बांग्लादेशी हैं तो उन्हें हमसे ज्यादा फायदा क्यों मिल रहा है। मुख्यमंत्री के बोलने से नहीं होगा, करना पड़ेगा। हम खिलंजिया (स्वदेशी) मुस्लिम, मियां मुस्लिम से अलग हैं। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री हमारी जमीन लौटाएं और हमें बसाएं।’ ‘मुस्लिमों को आपस में लड़ाने की कोशिश’वहीं, प्रो. अब्दुल मन्नान कहते हैं, ‘मुस्लिमों को आपस में लड़ाने की कोशिश की जा रही है। गोरिया, मोरिया को कितना खिलंजिया माना गया है, इसका जवाब मुख्यमंत्री को देना होगा। हजारों खिलंजिया का नाम वोटर लिस्ट से काटा गया। ये BJP की स्ट्रैटजी है कि मियां मुस्लिम के खिलाफ दूसरे ग्रुप को खड़ा करे।’ ‘हिमंता बिस्वा सरमा स्ट्रैटजी बनाने में माहिर हैं। उन्होंने पहले एजेंडा चलाया कि झारखंड में घुसपैठिए हैं। अगर BJP की सरकार आई, तो सबको भगा देंगे। दो महीने वहां खूंटा गाड़कर बैठे रहे, लेकिन क्या हुआ। वे कुछ समय तक कुछ लोगों को मूर्ख बना सकते हैं, लेकिन हमेशा नहीं बना सकते।’ कांग्रेस से BJP में आए हिमंता, असम में सरकार बनवाई …………………….. असम से ये ग्राउंड रिपोर्ट भी पढ़ेंक्या महिलाएं खोलेंगी BJP की जीत का रास्ता, स्कीम से मुस्लिम भी खुश कामरूप जिले में एक महिला साइकिल पर बेटी को लेकर जा रही थी। हमने पूछा- सरकारी योजनाओं के पैसे मिले क्या? जवाब मिला- ‘हां, मिले हैं।’ हमने पूछा, अबकी बार किसकी सरकार? वे मुस्कुराकर बोलीं- ‘BJP की।’ असम में करीब हर चौक-चौराहे पर सरकारी योजनाओं और उनका फायदा लेने वालों की तस्वीरें हैं, जिनमें CM हिमंता बिस्वा सरमा महिलाओं को चेक देते दिख रहे हैं। इन योजनाओं से मुस्लिम महिलाएं भी खुश हैं। पढ़िए पूरी खबर...
Cuba Crisis: क्यूबा पर मंडराते संकट के बादल, ट्रंप की 'आसन्न कार्रवाई' की चेतावनी से हड़कंप
ट्रंप प्रशासन ने क्यूबा की घेराबंदी तेज कर दी है। आम जनता बुनियादी संसाधनों की कमी से जूझ रही है। अमेरिकी प्रतिबंधों, तेल की किल्लत के कारण पूरे क्यूबा में ब्लैकआउट (बिजली कटौती) की स्थिति है।
US Iran War: अमेरिकी F-35 लाइटनिंग विमान पर हमले का दावा, आपात लैंडिंग की पुष्टि
अमेरिकी रक्षा अधिकारियों के हवाले से सामने आई रिपोर्ट्स में कहा गया है कि मिसाइल हमले के बाद संबंधित एफ-35 को आपात स्थिति में लैंडिंग करनी पड़ी, लेकिन विमान और पायलट दोनों सुरक्षित हैं।
नेतन्याहू बोले- US को युद्ध में हमने नहीं घसीटा, दावा- ईरान की परमाणु-मिसाइल क्षमता लगभग खत्म
पत्रकारों से बातचीत में नेतन्याहू ने कहा, “हम जीत रहे हैं और ईरान तबाह हो रहा है।” उन्होंने यह भी कहा कि ईरान के मिसाइल और ड्रोन भंडार को भारी नुकसान पहुंचाया जा रहा है और इन्हें पूरी तरह नष्ट कर दिया जाएगा।
तुलसी गबार्ड ने कहा, ईरान में अमेरिका एवं इजरायल के युद्ध के उद्देश्य एक जैसे नहीं
गबार्ड के बयान से यह स्पष्ट हुआ कि भले ही अमेरिका और इजराइल एक ही मोर्चे पर खड़े हों, लेकिन उनके सैन्य लक्ष्य अलग-अलग हैं। इजराइल ने हाल के हमलों में ईरान के धार्मिक नेताओं और सैन्य कमांडरों को सीधे निशाना बनाया है।
अमेरिकी कांग्रेस में 200 बिलियन डॉलर युद्ध फंडिंग पर तीखी बहस
ईरान युद्ध की बढ़ती लागत और इसके वैश्विक बाजारों पर प्रभाव ने अमेरिकी कांग्रेस में विभाजन को और गहरा कर दिया है
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची के बीच व्हाइट हाउस में हुई बैठक ने वैश्विक राजनीति में एक अहम संदेश दिया
2026 में अधिक सक्रिय राजकोषीय नीति का कार्यान्वयन जारी रहेगा : चीनी वित्त मंत्रालय
चीनी वित्त मंत्रालय ने '2025 में चीन की राजकोषीय नीति के कार्यान्वयन पर रिपोर्ट' जारी की है, जिसमें बताया गया है कि वर्ष 2025 में चीन की अर्थव्यवस्था ने समग्र रूप से स्थिर और सुचारू प्रगति बनाए रखी तथा राजकोषीय संचालन व्यवस्थित और संतुलित रहा
हालात ठीक नहीं, युद्ध को रोकने की जरूरत: तेहरान यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर
मिडिल ईस्ट तनाव का असर पूरी दुनिया पर पड़ने लगा है। पहले यूएस-इजरायल की ईरान पर एयर स्ट्राइक फिर जवाबी कार्रवाई इसके बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर तनातनी, खार्ग पर अमेरिका के हमले से होते हुए अब बात ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमले तक पहुंच गई है

