‘ये चुनाव विजय Vs स्टालिन की लड़ाई है।’ 23 फरवरी, 2026 को थलापति विजय ने पहली बार ये बात कही। तमिलनाडु के वेल्लोर में उनकी रैली थी। इतने लोग आए कि नेशनल हाईवे-48 थम गया। ट्रैफिक इतना कि 4 घंटे तक गाड़ियां हिल नहीं पाईं। यही दीवानगी वोट में बदली और विजय की सिर्फ दो साल पुरानी पार्टी तमिझागा वेत्री कड़गम तमिलनाडु की सत्ता के करीब पहुंच गई। पॉलिटिक्स में विजय की बिल्कुल फिल्मी एंट्री। 4 मई की शाम 6 बजे तक TVK 105, DMK 59 और AIADMK 48 सीटों पर बढ़त बनाए हुए थी। बहुमत के लिए 118 सीटें चाहिए। यही रिजल्ट रहा, तो TVK को सरकार बनाने के लिए सिर्फ 10 सीटों की जरूरत है। सिनेमा के पर्दे पर 'मास्टर' बनकर सिस्टम सुधारने वाले, 'मर्सल' बनकर करप्शन से लड़ने वाले और 'लिओ' बनकर दुश्मनों को खत्म करने वाले विजय अब तमिलनाडु की सरकार चलाएंगे। विजय को इतनी बड़ी जीत की 5 वजहें 1. विजय का स्टारडम, विजय ही पार्टी, विजय ही मुद्दा 28 साल के भास्कर चेन्नई में रहते हैं। DMK और स्टालिन के समर्थक थे। सरकार का काम भी पसंद करते थे। 23 अप्रैल को वोटिंग वाले दिन थलापति विजय की पार्टी TVK को वोट दे दिया। बोले कि माहौल बदल गया है। अब विजय ही इकलौते विकल्प हैं। वही तमिलनाडु में बदलाव ला सकते हैं। ये सिर्फ भास्कर की कहानी नहीं है। सेंट्रल और नॉर्थ तमिलनाडु के अलग-अलग इलाकों में चुनाव से 2 दिन पहले वोटर का मूड बदल गया। चुनाव की कवरेज करते हुए हम थलापति विजय की लहर महसूस कर पा रहे थे। हमने विजय की कई रैलियां और रोड शो भी कवर किए। चेन्नई के टीनगर की रैली में विजय के लिए लोगों में दीवानगी देखी। विजय को देखते ही एक शख्स पहले जोर से चिल्लाया, फिर रोने लगा। विजय की एक झलक के लिए उसने 6 घंटे धूप में खड़े होकर इंतजार किया था। विजय का रोड शो शाम को 4 बजे था, लेकिन भीड़ सुबह 11 बजे से जुटने लगी। पूरे इलाके में बैरिकेडिंग कर दी गई। हजारों लोग तेज धूप में बैरिकेड के पीछे खड़े रहे। मकसद सिर्फ एक, विजय की एक झलक मिल जाए। बस से 300 किमी सफर करके आया एक लड़का, बेटे को लेकर आई मां, 61 साल की बुजुर्ग महिला सभी को सिर्फ एक बार विजय को देखना था। इन लोगों को नहीं पता था कि विजय सरकार में आकर क्या करेंगे, उनके मेनिफेस्टो में क्या वादे हैं, वे स्टालिन सरकार से क्या अलग करेंगे। फिर भी वे विजय को मुख्यमंत्री बनते देखना चाहते थे। विजय की ये जीत उनके स्टारडम की ही जीत है। विचारधारा, पार्टी, चुनावी गुणा-गणित, लोकलुभावन वादे सब पीछे रह गए। विजय का थलापति कल्ट फिगर इन सब को पछाड़कर आगे निकल गया। पूरे तमिलनाडु में लोग विजय के अलावा न उनकी पार्टी के नेताओं को जानते हैं और न ही दूसरे नेताओं की पार्टी में कोई अहमियत है। विजय की पार्टी से चुनाव लड़े ज्यादातर नेता DMK और AIADMK के बागी या पूर्व नेता हैं। 2. MGR के रास्ते चले, पॉलिटिक्स के लिए फिल्में छोड़ी MGR के नाम से मशहूर एमजी रामचंद्रन भारत के पहले फिल्म स्टार थे, जो मुख्यमंत्री बने। 1977 से 1987 तक तमिलनाडु के CM रहे। उन्होंने ही AIADMK बनाई थी। विजय तमिल फिल्मों में मौजूदा दौर के सबसे बड़े स्टार हैं। करियर के पीक पर रहते हुए राजनीति में एंट्री की। उनसे पहले सुपरस्टार रजनीकांत और कमल हासन राजनीति में तब आए थे, जब उनकी फिल्में चलना बंद हो गई थीं। 2024 में आई GOAT फिल्म में विजय डबल रोल में थे। इसने बॉक्स ऑफिस पर 450 करोड़ से ज्यादा का बिजनेस किया और उनकी पॉलिटिकल एंट्री से पहले माहौल बना दिया। 2023 में आई लियो ने दुनियाभर में 600 करोड़ रुपए कमाए। 2023 में ही आई फिल्म वारिसु ने विजय को तमिलनाडु का बेटा और अन्ना यानी बड़ा भाई वाली इमेज दी। फिल्में सुपरहिट हो रही थीं, लेकिन अचानक विजय ने पॉलिटिक्स में एंट्री का ऐलान कर दिया। इसके बाद जन नायगम उनकी आखिरी फिल्म होती, लेकिन ये विवादों की वजह से रिलीज ही नहीं हो पाई। 3. फैन क्लब पॉलिटिक्स, लाखों फैन की कार्यकर्ता बन गए थलापति विजय ने भले दो साल पहले पार्टी बनाई हो, लेकिन वे अपने फैन क्लब के जरिए 20 साल से सोशल वर्क कर रहे थे। तमिलनाडु के अलग-अलग इलाकों में संगठन बनाना और फिर उनके जरिए सोशल वर्क करना। विजय 20 साल पहले से 2026 की तैयारी कर रहे थे। तमिलनाडु में फैन क्लब कल्चर बहुत बड़ा है। हर सुपरस्टार के इलाकों, शहरों के नाम से फैन क्लब होते हैं। ये क्लब पसंदीदा स्टार के नाम पर सोशल वर्क करते हैं, लेकिन इसके पीछे खुद स्टार ही होता है। विजय के तमिलनाडु में सैकड़ों फैन क्लब हैं। यही फैन क्लब पार्टी स्ट्रक्चर में बदल गए। फैन क्लब का ढांचा काफी हद तक किसी पॉलिटिकल पार्टी की तरह होता है। स्टेट लेवल पर लीडरशिप होती है। इसके बाद इलाकों के हिसाब से कोऑर्डिनेटर्स काम करते हैं। सबसे नीचे एरिया और बूथ वॉलंटियर्स होते हैं। विजय राजनीति में नहीं आए थे, तब तक ये फैन क्लब ब्लड डोनेशन कैंप, मेडिकल कैंप लगाने जैसे काम करते रहे। गरीबों को खाना-कपड़े देकर मदद करते रहे। सरकारी दफ्तरों, अस्पताल, पुलिस, कोर्ट के मामलों में मदद करते रहे। इससे लोगों का विजय पर भरोसा बढ़ता गया। TVK के चीफ स्पोक्सपर्सन फेलिक्स गेराल्ड बताते हैं, 'विजय ने पार्टी नहीं बनाई थी, तब से विजय का फैन क्लब थलापति विजय मक्कल इयक्कम नाम से चलता था। बाद में इसी को पार्टी में बदल दिया गया। 2021 में फैन क्लब से जुड़े 130 लोगों ने लोकल बॉडी चुनाव लड़ा था। इनमें से 115 जीत गए। विजय ने पार्टी लॉन्च करने के पहले ही जमीन का अंदाजा लगा लिया था। कहने को वे 2024 में राजनीति में आए, लेकिन ये उनके फैन क्लब की मेहनत का नतीजा है।’ चुनाव के करीब 2-3 साल पहले से विजय मौजूदा मुख्यमंत्री स्टालिन के खिलाफ प्रचार कर रहे थे। हालांकि BJP और AIADMK के लिए उनका रवैया थोड़ा नरम दिखा। हमने फेलिक्स से पूछा कि विजय BJP को लेकर नरम रवैया क्यों रखते हैं? फेलिक्स जवाब देते हैं, ‘हम भ्रष्टाचार के खिलाफ है। DMK सही मायने में सेक्युलर पार्टी भी नहीं है। हम BJP की भी आलोचना करते हैं। विजय ने साफ किया है BJP वैचारिक रूप से हमारी विरोधी है।’ 4. क्रिश्चियन-मुस्लिम वोट DMK से विजय की तरफ शिफ्ट विजय ने चुनाव लड़ने का ऐलान किया तो TVK के मंच से पहली बार कहा- मेरा नाम है जोसेफ विजय। उन्होंने साफ कर दिया कि वे क्रिश्चियन है। तमिलनाडु में मुस्लिम और क्रिश्चियन मिलाकर करीब 12% वोटर हैं। अब तक ये वोट बैंक DMK का था। विजय की एंट्री ने क्रिश्चियन वोट तो काटे ही, मुस्लिमों के भी बड़े तबके को अपने पाले में किया। मुस्लिम और क्रिश्चियन वोट ज्यादातर शहरी इलाकों में हैं। यहीं TVK मजबूत बनकर उभरी है। तमिलनाडु में 1967 से सत्ता सिर्फ DMK और AIADMK के पास रही। विजय ने इस दीवार को गिरा दिया। लोगों को एक विकल्प की तलाश में थी। सुपरस्टार रजनीकांत पार्टी बनाकर पीछे हट गए, कमल हासन बेअसर रहे, लेकिन विजय ने उस खाली जगह को भर दिया। सीनियर जर्नलिस्ट आर. रंगराज कहते हैं- विजय ने DMK के 13 से 14% और AIADMK के करीब 10% वोट काटकर अपना वोट बैंक बड़ा बना लिया। फर्स्ट टाइम वोटर्स भी विजय की तरफ चले गए। TVK ने 30-33% का बड़ा वोट बैंक अपने पाले में किया है। 5. युवाओं और महिलाओं का एकतरफा समर्थन युवाओं और महिलाओं में विजय के लिए अलग ही दीवानगी है। एक पूरी पीढ़ी उनकी फिल्में देखकर बड़ी हुई है। यही पीढ़ी फर्स्ट और सेकेंड टाइम वोटर है, जिन्होंने विजय को वोट दिया है। युवा और महिला आबादी करीब 2 करोड़ हैं। तमिलनाडु के करीब 20-25% वोटों पर विजय का सीधा असर है। विजय अपनी रैलियों और सभाओं में कास्ट पॉलिटिक्स करते नहीं दिखे। उनका फोकस महिला और युवा वोटबैंक पर रहा। उनकी पार्टी युवाओं और महिलाओं से सीधे जुड़ी। पहली बार वोट देने वाले 18-25 साल के युवाओं के लिए विजय स्टाइल आइकन के साथ-साथ उम्मीद भी थे। नीट का विरोध और शराब के खिलाफ सख्त रुख युवाओं-महिलाओं को विजय के करीब लाया। अल्पसंख्यक, यानी मुस्लिम-क्रिश्चियन और युवा-महिला वोट मिला लें, तो करीब 25% वोट विजय के पक्ष में एकतरफा एकजुट हुआ। बचे वोट DMK और AIADMK में बंट गए। यही विजय की जीत की सबसे बड़ी वजह है। …………………………..चुनाव नतीजों पर ये खबर भी पढ़ें बंगाल के रुझानों में BJP को बहुमत, भवानीपुर में ममता आगे बंगाल की 293 सीटों पर वोटों की गिनती जारी है। एक सीट फालता पर 21 मई को फिर वोटिंग होगी। शुरुआती रुझान में BJP को बहुमत मिला है। BJP 191 और TMC 96 सीटों पर आगे चल रही है। BJP को 45%, TMC को 42% वोट मिलते दिख रहे हैं। काउंटिंग के दौरान राज्य में चार जगह हिंसा-झड़प हुई। आसनसोल में TMC ऑफिस कैंप में तोड़फोड़, तो जमुरिया में आगजनी की गई। भवानीपुर से ममता बनर्जी आगे हैं। सुवेंदु अधिकारी पीछे चल रहे हैं। पढ़ें पूरी खबर
पश्चिम बंगाल में पहली बार बीजेपी की सरकार होगी। दोपहर 1 बजे तक के रुझानों में बीजेपी 184 सीटों के साथ बहुमत से कहीं आगे है, जबकि टीएमसी 91 सीटों पर सिमटती दिख रही है। 2021 के मुकाबले बीजेपी के महज 7% वोट बढ़े, लेकिन सीटें 117 बढ़ती दिख रही हैं। ममता अपना गढ़ भी नहीं बचा पाईं। जिन 119 सीटों पर टीएमसी पिछले 15 साल से लगातार काबिज थी, उनमें से 65 सीटें यानी करीब 55% सीटें बीजेपी छीनती दिख रही है। लेकिन ये सब कैसे हुआ, जानेंगे इलेक्शन एक्सप्लेनर में… सबसे पहले वो आंकड़ा, जो बीजेपी की जीत की गहराई को बताता है… अब जानिए बीजेपी की जीत के 5 बड़े फैक्टर… 2011 में खाता न खोल पाने वाली बीजेपी ने 2021 में 77 सीटें जीतीं और अब बंगाल में सरकार बनाने वाली है। पिछली दो बार आंकड़े साफ बताते हैं कि बीजेपी को 50% से ज्यादा हिंदुओं का वोट मिला। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है- हिंदू वोटर्स का अपने पक्ष में ध्रुवीकरण। हिंदुओं को लामबंद करने के लिए इस चुनाव में बीजेपी ने कई दांव चले… हिंदू ध्रुवीकरण के आड़े आ रहे ‘माछ-भात’ को हथियार बनाया ‘काबा बनाम मां काली’ का नैरेटिव बनाया ममता ने बतौर नेता और सीएम अपना महिला वोट बैंक तैयार किया। टीएमसी में 9 महिला सांसद और 39 महिला विधायक भी हैं। बीजेपी ने ममता के इसी कोर वोटबैंक को साधा… महिलाओं को ₹3000 देने का वादा, सरकारी नौकरी में 33% आरक्षण महिला आरक्षण बिल के नाम पर टीएमसी को महिला-विरोधी बताया पीड़ित महिलाओं के परिजनों को टिकट दिए पीएम, 12 सीएम, 15 केंद्रीय मंत्रियों ने मांगे वोट 15 दिन तक बंगाल में रहे शाह 4 केंद्रीय + 4 बंगाली नेताओं का कोर ग्रुप बनाया बूथ से जिले तक का माइक्रो-मैनेजमेंट बीजेपी के बंगाल जीतने से नेशनल पॉलिटिक्स पर क्या असर पड़ेगा? ***** ग्राफिक्स- दृगचंद्र भुर्जी------------------- चुनाव से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए… दीदी बोली थीं- तृणमूल रही तो फिर मिलेंगे:मोदी ने कहा- प्याज खाता हूं, दिमाग नहीं, राहुल का तीर मिस; चुनाव के वायरल मोमेंट्स ‘रहा गुलशन तो फूल खिलेंगे, तृणमूल रहा तो फिर मिलेंगे।’ बंगाल नतीजो में टीएमसी हारती दिखी, तो ममता बनर्जी का ये डॉयलाग फिर वायरल हो गया। 5 राज्यों के चुनाव के दौरान ऐसे कई मोमेंट्स आए, जिन्हें हमने 3 मिनट के वीडियो में बुना है। क्लिक करके देखिए
‘रहा गुलशन तो फूल खिलेंगे, तृणमूल रहा तो फिर मिलेंगे।’ बंगाल नतीजो में टीएमसी हारती दिखी, तो ममता बनर्जी का ये डॉयलाग फिर वायरल हो गया। 5 राज्यों के चुनाव के दौरान ऐसे कई मोमेंट्स आए, जिन्हें हमने 3 मिनट के वीडियो में बुना है। ऊपर तस्वीर पर क्लिक करके आप भी देखिए-
जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ हाल ही में हुए जुबानी तनाव के बावजूद वह अमेरिका के साथ सहयोग नहीं छोड़ेंगे।
सीनेटर वार्नॉक ने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आलोचना की, बताया मतदान अधिकारों पर बड़ा झटका
डेमोक्रेटिक सीनेटर राफेल वार्नॉक ने रविवार को अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट के मतदान अधिकारों से जुड़े फैसले की कड़ी आलोचना की
30 अप्रैल 2026। रात करीब 8 बजे। कोलकाता के सखावत मेमोरियल स्कूल के बाहर भारी बारिश हो रही थी। तभी एक गाड़ी आकर रुकी। सफेद साड़ी, पैरों में रबड़ की चप्पल। अपने सिग्नेचर स्टाइल में बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी उतरीं, और सीधे स्ट्रॉन्ग रूम की तरफ बढ़ चलीं। केंद्रीय बलों ने उन्हें रोकने की कोशिश की। ममता ने चुनाव नियमों का हवाला दिया और अंदर चली गईं। करीब चार घंटे तक वहीं डटी रहीं। रात 12 बजे बाहर निकलीं और कहा- अगर EVM चुराने या काउंटिंग में धांधली हुई, तो हम जान की बाजी लगाकर लड़ेंगे। जवाब में BJP ने कहा– ये हार का डर है। लेकिन जो लोग ममता बनर्जी को जानते हैं, उनके लिए यह कोई नई बात नहीं थी। यह वही ममता हैं, जो 1975 में जेपी की कार के बोनट पर चढ़ गई थीं। जिन्हें 1993 में राइटर्स बिल्डिंग की सीढ़ियों पर बालों से पकड़कर घसीटा गया, तो 18 साल बाद बदला लिया। और जो 2021 में प्लास्टर चढ़े पैर के साथ व्हीलचेयर पर बैठकर चुनाव जीती थीं। मंडे मेगा स्टोरी में उन्हीं ‘स्ट्रीट फाइटर दीदी’ यानी ममता बनर्जी की रोचक कहानी… ****अब 2026 का चुनाव सिर्फ वोट की लड़ाई नहीं है। ममता ने इस बार ‘बंगाली अस्मिता’ को अपनी सबसे बड़ी ढाल बनाया। केंद्र सरकार को रैलियों में ‘दिल्ली के जमींदार’ कहा। खुद को ‘बंगाल की उस क्रांतिकारी मिट्टी की बेटी’ बताया जो अपने लोगों की गरिमा के लिए आखिरी सांस तक लड़ने को तैयार है। यह कहानी 30-B हरीश चटर्जी स्ट्रीट के उस दो कमरे के मकान से शुरू हुई थी। उस मोनाबाबा से, जिसने 15 साल की उम्र में अपना बचपन गंवाया और एक जिद ठान ली कि लड़ती रहूंगी। कार के बोनट से लेकर व्हीलचेयर तक, रॉइटर्स बिल्डिंग की सीढ़ियों से लेकर भवानीपुर के स्ट्रॉन्ग रूम तक- वह जिद आज भी जिंदा है। लेकिन ममता अर्श पर रहेंगी या फर्श पर, ये आज विधानसभा चुनाव के नतीजों से तय होगा।****** ग्राफिक्स: अंकुर बंसल और महेंद्र वर्मा --------------------------- ये खबर भी पढ़ें… बंगाल में BJP की सरकार बनती क्यों दिख रही:मछली का भोज, शाह की नई स्ट्रैटजी और SIR; BJP के 5 बड़े दांव पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के बाद हुए ज्यादातर एग्जिट पोल में BJP की सरकार बनती दिख रही है। 7 में से 5 बड़ी एजेंसियों के सर्वे बीजेपी को बहुमत से ज्यादा सीटें दे रहे हैं। नतीजे 4 मई को आएंगे। पढ़ें पूरी खबर…
होर्मुज में सख्ती बढ़ाने के डोनाल्ड ट्रंप ने दिए संकेत, ईरान बोला- फिर भड़क सकता है युद्ध
दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में शामिल होर्मुज जलडमरूमध्य इस समय दोनों देशों के बीच तनाव का मुख्य केंद्र बना हुआ है। ट्रंप ने चेतावनी दी है कि इस मार्ग से होने वाली तेल आपूर्ति में और अधिक व्यवधान आ सकता है।
नरगिस मोहम्मदी से जुड़े एक फाउंडेशन ने उनकी सेहत को लेकर चिंताजनक जानकारी साझा की है। फाउंडेशन के अनुसार, नरगिस को अस्पताल ले जाने से पहले दो बार बेहोशी की स्थिति का सामना करना पड़ा।
टैंकर ट्रैकर्स फर्म का दावा, 'ईरानी सुपरटैंकर ने यूएस नाकाबंदी को दिया चकमा'
ईरान का एक सुपरटैंकर अमेरिकी नाकेबंदी को चकमा देकर एशिया-प्रशांत क्षेत्र तक पहुंच गया है। मॉनिटरिंग फर्म 'टैंकरट्रैकर्सडॉटकॉम' के अनुसार, जहाज लगभग 1.9 मिलियन बैरल कच्चा तेल लेकर वहां से निकल गया
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान को लेकर विवाद और गहरा गया है, जिसमें उन्होंने ईरानी जहाजों की जब्ती कार्रवाई को पाइरेट्स जैसा (समुद्री लुटेरों) बताया
ईरान के प्रस्ताव पर ट्रंप का सख्त रुख
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की ओर से भेजे गए नए प्रस्ताव पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि वह जल्द ही इसकी समीक्षा करेंगे, लेकिन उन्हें नहीं लगता कि यह स्वीकार्य होगा
भाजपा अगर 500-700 वोटों से आगे हो, तो दोबारा गिनती की मांग करें: सीएम ममता
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने पार्टी के काउंटिंग एजेंटों को निर्देश दिया कि वे उन बूथों पर तत्काल दोबारा गिनती की मांग करें
बांग्लादेश बार एसोसिएशन चुनाव: अवामी लीग से जुड़े वकीलों के नामांकन रद्द होने पर वैश्विक आलोचना
बांग्लादेश सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) ने 13-14 मई को होने वाले चुनाव के लिए 90 में से 42 वकीलों के नामांकन पत्र यह कहते हुए खारिज कर दिए कि उनका अवामी लीग से संबंध है
पाकिस्तान: मानवाधिकार वकीलों की अपील सुनवाई में देरी पर अधिकार संगठन चिंतित
पाकिस्तान के मानवाधिकार परिषद (एचआरसी-पाकिस्तान) ने शनिवार को सरकार और संबंधित न्यायिक अधिकारियों से मानवाधिकार वकील ईमान ज़ैनब मजारी-हाज़िर और हादी अली चट्ठा के कानूनी अधिकारों की तत्काल रक्षा सुनिश्चित करने की मांग की
आईडीएफ का सबसे बड़ा वार, हिजबुल्लाह के 120 ठिकाने ध्वस्त
इजराइल डिफेंस फोर्स (आईडीएफ) ने बताया कि उसने हिजबुल्लाह के लगभग 120 ठिकानों पर हमला किया है
दक्षिण कोरिया-ईरान में बातचीत, होर्मुज स्ट्रेट पर सुरक्षित आवाजाही शुरू करने की अपील
दक्षिण कोरिया के विदेश मंत्री चो ह्यून ने अपने ईरानी समकक्ष अब्बास अराघची से फोन पर बात की और होर्मुज स्ट्रेट से फिर से जहाजों की सुरक्षित आवाजाही शुरू करने की अपील की।
मैं ललिता हूं और हरियाणा के रोहतक की रहने वाली हूं। कभी मेरी पहचान एक फैशन डिजाइनर के तौर पर थी। रसूखदार परिवारों से कपड़ों के ऑर्डर मिलते थे। रंग, कपड़े, डिजाइन और ग्लैमर की दुनिया में मेरी पहचान थी। मेरे पति अपना बिजनेस संभालते थे। जिंदगी आराम से गुजर रही थी और पैसों की भी कोई कमी नहीं थी। मुझे लगता था कि जिंदगी ने मुझे सब कुछ दे दिया है, लेकिन सिर्फ 15 साल की उम्र में मुझे दो बार टीबी हुई। बड़ी मुश्किल से उससे उबरी, लेकिन असली लड़ाई अभी बाकी थी। आगे चलकर कैंसर ने मुझे तीन बार अपनी चपेट में लिया और एक बार मेरे पति को भी। साल 1995। मेरी उम्र थी 19 साल। दिल्ली में पढ़ाई कर रही थी, तभी एक दिन ब्रेस्ट में तेज दर्द उठा। पहले लगा नॉर्मल समस्या होगी, लेकिन दर्द बढ़ता गया। घबराकर मैंने पापा को बताया और उन्होंने तुरंत मुझे रोहतक बुला लिया। जांच में डॉक्टरों ने बताया कि ब्रेस्ट में गांठ है। उस दौर में मैमोग्राफी जैसी सुविधाएं आसानी से उपलब्ध नहीं थीं। डॉक्टरों ने ऑपरेशन की सलाह दी। 19 साल की उम्र में पहली बार ऑपरेशन थिएटर के बाहर खड़ी मैं डर से कांप रही थी, लेकिन सर्जरी सफल रही और गांठ निकाल दी गई। मेरे ऑपरेशन के जख्म अभी भरे भी नहीं थे कि घर पर एक और तूफान आ गया। पिता को लिवर कैंसर होने का पता चला। वह रिटायर्ड अफसर थे, मजबूत इंसान थे, लेकिन कुछ ही महीनों में बीमारी ने उन्हें मुझसे छीन लिया। पिता मेरे लिए पैसा और प्रॉपर्टी छोड़ गए थे, इसलिए भविष्य की चिंता नहीं थी, लेकिन जिस इंसान के भरोसे मैं खड़ी थी, वही चला गया। मां से मुझे कभी वह अपनापन नहीं मिला। बचपन से घर में काम करने वाली अम्मा ने मुझे पाला, जिन्हें मैं आज भी ‘हंसो मां’ कहती हूं। पापा के जाने के बाद खुद को संभालना मेरी जिंदगी की सबसे मुश्किल लड़ाइयों में से एक था। 1997 में मैंने सोचा था कि जिंदगी फिर पटरी पर लौट रही है। मैं पढ़ाई के लिए दोबारा दिल्ली आ गई थी, लेकिन तभी नाभी के पास तेज दर्द शुरू हुआ। जांच में पता चला कि मुझे बार्थोलिन ग्लैंड कैंसर है, जो वजाइना के हिस्से में होता है। दूसरी बार ‘कैंसर’ शब्द सुनते ही मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। पापा अब इस दुनिया में नहीं थे और मां ने साफ कह दिया- ‘मैं ऑपरेशन के लिए नहीं आऊंगी।’ यह सुनकर मुझे दुख कम, खालीपन ज्यादा महसूस हुआ। आखिर में मैंने दोस्तों को सब बताया। वही मेरे परिवार की तरह खड़े रहे। उन्होंने अस्पताल के चक्कर लगाए, हिम्मत दी और सर्जरी करवाई। लगा कि लड़ाई खत्म हो गई… लेकिन सिर्फ छह महीने बाद उसी जगह फिर दर्द शुरू हो गया, जहां कैंसर का ऑपरेशन हुआ था। जैसे ही लगा कि जिंदगी फिर सामान्य हो रही है, डॉक्टरों ने बताया कि बार्थोलिन ग्लैंड में कैंसर दोबारा लौट आया है। मुझे फिर ऑपरेशन थिएटर में जाना पड़ा। सर्जरी हुई। धीरे-धीरे संभल रही थी कि छह महीने के भीतर मेरी तबीयत फिर बिगड़ गई। जांच रिपोर्ट ने एक और झटका दिया- इस बार कैंसर फैलोपियन ट्यूब के हिस्से तक पहुंच चुका था। इलाज लंबा, दर्दनाक और थका देने वाला था, लेकिन डॉक्टर किसी तरह मेरी फैलोपियन ट्यूब बचाने में कामयाब रहे। मैं बार-बार कैंसर को हराने की कोशिश कर रही थी, लेकिन हर अस्पताल के कमरे में मुझे पापा की गैरमौजूदगी सबसे ज्यादा चुभती थी। कैंसर की लंबी लड़ाई लड़कर जब घर लौटी, तो घर में मां रोज शादी के लिए दबाव बनाने लगीं। मैं मानसिक रूप से इतनी थक चुकी थी कि बस उस माहौल से बाहर निकलना चाहती थी। तब मेरी उम्र 28 साल थी। एक जाट लड़के को पसंद करती थी। मैंने उससे शादी करने का फैसला कर लिया। उसे और उसके परिवार को साफ बता दिया था कि मैं कैंसर सर्वाइवर हूं। मुझे लगा था कैंसर सर्वाइवर होना उनके लिए सबसे बड़ा सवाल होगा, लेकिन उन्हें मेरे कैंसर से नहीं, मेरी उम्र से परेशानी थी- मैं उनके बेटे से पांच साल बड़ी थी। आखिरकार शादी हो गई। लेकिन ससुराल पहुंचते ही एक नई लड़ाई शुरू हो गई। मुझसे घूंघट करने को कहा जाता, हर बात पर रोक-टोक होती। हॉस्टल में पली मेरी आजाद जिंदगी अचानक परंपराओं के घेरे में कैद की जाने लगी। घूंघट न करने पर अक्सर झगड़े होते। आखिरकार रोज के तनाव से तंग आकर मैं पति के साथ अलग रहने लगी। किराए के छोटे से घर में नई शुरुआत की और फैशन डिजाइनिंग सीखी। मैंने बीएएमएस की पढ़ाई की थी। इसलिए शौक में आयुर्वेद की प्रैक्टिस करती थी और साथ ही कपड़े डिजाइन कर अच्छी कमाई भी हो रही थी। शादी को छह साल हो चुके थे और हमारा एक साल का बेटा था। जिंदगी आखिरकार सामान्य लगने लगी थी। फिर एक दिन सब बदल गया। मैं रोहतक से बाहर थी, तभी पति का फोन आया- ‘मेरा मुंह खुलना बंद हो गया है, डॉक्टर के पास जा रहा हूं।’ मैं घबरा गई। तुरंत वापस लौटी और उन्हें अस्पताल लेकर गई। जांच में पता चला कि उन्हें गले का कैंसर है। पति एक महीने तक अस्पताल में भर्ती रहे। 45 बार कीमोथेरेपी हुई। पैसों की कमी नहीं थी, लेकिन अपनों का साथ नहीं था। मेरी सास अपने बेटे को देखने तक नहीं आईं। उनकी सर्जरी 12 घंटे चली- सुबह 9 बजे से रात 9 बजे तक। बाहर मैं एक साल के बच्चे को गोद में लेकर बैठी थी और अंदर पति जिंदगी की लड़ाई लड़ रहे थे। तीन महीने बाद उनकी हालत सुधरने लगी। उन दिनों मैं अपनी आयुर्वेद की पढ़ाई के भरोसे जड़ी-बूटियों का काढ़ा बनाती थी, जिससे उनकी रिकवरी में सहारा मिला। पति के ठीक होने के बाद भी हमारे भीतर का डर खत्म नहीं हुआ। हम दोनों मौत को इतने करीब से देख चुके थे कि पैसा, बिजनेस और भाग-दौड़ अचानक बहुत छोटे लगने लगे। हमने तय किया- अब जिंदगी सिर्फ कमाने के लिए नहीं, सुकून से जीने के लिए होगी। मेरे पति ने अपना एग्रीकल्चर प्रोडक्ट बिजनेस छोड़ दिया। मैं फैशन डिजाइनिंग कर रही थी, लेकिन जिंदगी मुझे एक बिल्कुल नए रास्ते की ओर ले जा रही थी। एक दिन मुझे रेडियो के टॉक शो में बुलाया गया। वहां डायरेक्टर ने एक कपड़ा मेरी तरफ बढ़ाया और पूछा- बताओ, यह किस धागे से बना है? मैं जवाब नहीं दे पाई। उन्होंने कहा- तुम फैशन डिजाइनर हो और इसे नहीं पहचानतीं? यह रेजा कपास है। उनकी बात मेरे दिल पर लग गई। मैंने तुरंत कहा- मुझे 15 दिन दीजिए, मैं इसके बारे में सब जानकर लौटूंगी। मैंने इंटरनेट खंगाला, लोगों से पूछा, रिकॉर्ड ढूंढ़े- लेकिन कुछ नहीं मिला। आखिरकार पुरानी किताबों में इसका जिक्र मिला। कबीरदास और गरीबदास की रचनाओं में रेजा कपास पर बातें मिलीं, जिसे पढ़कर लगा कि मैं किसी भूली हुई विरासत के पीछे चल पड़ी हूं। रेजा सूत की कहानी ने मुझे भीतर तक बेचैन कर दिया। मैंने तय किया कि सिर्फ इसके बारे में पढ़ना नहीं, इसे अपने हाथों से समझना है। हरियाणा में एक पुराने मुस्लिम परिवार का पता चला, जो पीढ़ियों से चरखा चलाना सिखाता था। मैं उनके पास गई, चरखा सीखा और फिर एक चरखा अपने घर लेकर आई। मैंने अपने पति को भी यह सिखाया। हैरानी की बात यह थी कि जिस मन ने सालों तक अस्पताल, कैंसर और मौत का डर झेला था, उसे चरखे की आवाज में शांति मिलने लगी। धीरे-धीरे चरखा हमारे लिए सिर्फ हुनर नहीं, मानसिक इलाज जैसा बन गया। फिर मुझे लगा कि अगर इसने हमें सुकून दिया है, तो शायद उन लोगों को भी दे सकता है, जिनकी जिंदगी दुखों से भरी है। मैं जेलों में गई और कैदियों को चरखा सिखाना शुरू किया। उनके हाथों से निकला सूत कपड़ों में बदलता और उन्हें यह एहसास देता कि वे अब भी किसी काम के हैं। बाद में हमने हैंडलूम की मशीन पर धागों को कातना शुरू किया। अब तक मेरी सोच नहीं बदली थी। मेरा काम भी बदल गया था। मैंने हरियाणा में 1970 में खत्म हो चुकी रेजा कपास की खेती को फिर से जिंदा करने की ठानी। बड़ी मशक्कत से इसके बीज खोज पाई। आज मैं किसानों को रेजा कपास का बीज देती हूं और उनसे इसकी खेती करवाती हूं। उसी कपास से खादी के कपड़े बनाती हूं। उन कपड़ों पर डिजाइन खुद तैयार करती हूं। आज ये कपड़े देश ही नहीं, विदेशों तक पहुंच रहे हैं। मेरी जानकारी में पूरे भारत में सिर्फ मैं ही रेजा कपास से डिजाइनर कपड़े बना रही हूं। लेकिन मेरी असली कमाई कपड़े नहीं। यह धागा है। जब यह घूमता है, तो मेरे भीतर का शोर धीमा पड़ जाता है। हर धागे के साथ लगता है कि मैं अपने टूटे हिस्सों को फिर से जोड़ रही हूं। हमने जिंदगी बहुत तेज भागकर जी थी- बीमारी, पैसा, बिजनेस, अस्पताल… सब देखा। अब हमने धीरे जीना सीखा है। आज भी मेरे पास घर, पैसा और सुविधाएं हैं, लेकिन सबसे बड़ी दौलत शांति है। पहले मैं सिर्फ कपड़े बुनती थी, अब अपनी जिंदगी को फिर से बुन रही हूं। (ललिता ने अपने ये जज्बात भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से साझा किए) ---------------------------------------- 1- संडे जज्बात-हम अधेड़ कुंवारे कौवों जैसे अपशकुन माने जाते हैं:सरकार हमें देती है पेंशन, जाने कितने जानवरों से रेप करते पकड़े गए लोग मुझे मेरे नाम से कम, रं@#% कहकर ज्यादा बुलाते हैं। मुझे शुभ कामों से दूर रखा जाता है। गलती से पहुंच जाऊं तो लोगों का चेहरा उतर जाता है। मैं वीरेंद्र दून। हरियाणा के जिला हांसी के गांव पेटवाड़ का रहने वाला हूं। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- संडे जज्बात-मैंने 20 अपनों को गोली मारी:अपनों पर गोली चलाना आसान नहीं था, लेकिन बम-धमाके में साथियों की मौत ने मुझे झकझोर दिया था मैं शरतचंद्र बुरुदा हूं, ओडिशा के मलकानगिरी जिले के सरपल्ली गांव का रहने वाला। एक रिटायर्ड पुलिस अधिकारी हूं। 1990 के दशक के आखिर में जब मैंने पुलिस की नौकरी जॉइन की, तब ओडिशा के दंडकारण्य इलाके में नक्सलवाद अपने चरम पर था। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें
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म्यांमार की नेता आंग सान सू की को जेल से रिहा कर दिया गया है। उन्हें नजरबंदी (हाउस अरेस्ट) में भेज दिया गया है

