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लोकसभा सीटें बढ़ाकर 850 करने की तैयारी:2029 चुनाव तक महिलाओं के लिए कैसे आरक्षित होगी हर तीसरी सीट; 8 सवालों में पूरी कहानी

1952 में जब देश में पहली बार लोकसभा चुनाव हुए, तब संसद में 489 सीटें थीं और आबादी थी करीब 36 करोड़। आज आबादी 140 करोड़ पार कर चुकी है, लेकिन पिछले 50 साल से सीटें 543 पर जमी हैं। अब सरकार ने सरकार ने 16 से 18 अप्रैल के बीच संसद का विशेष सत्र बुलाया है और एक साथ तीन बड़े काम करने की तैयारी में है- लोकसभा सीटें बढ़ाकर 850 करना, देश का नया चुनावी नक्शा खींचना (यानी परिसीमन), और 2023 में पास हुए महिला आरक्षण कानून को असल में लागू करना। लेकिन यह इतना सीधा नहीं है। दक्षिण के राज्यों को डर है कि उनकी सीटें घटेंगी। विपक्ष पूछ रहा है कि बंगाल चुनाव से ठीक पहले इतनी हड़बड़ी क्यों और सबसे बड़ा सवाल- महिला आरक्षण असल में लागू कब से होगा? ऐसे ही 8 जरूरी सवालों के जवाब, जानेंगे भास्कर एक्सप्लेनर में... सवाल-1: महिला आरक्षण का कानून 2023 में ही पास हो गया था, तो अब तीन नए बिल क्यों लाने पड़े?जवाबः केंद्र सरकार ने 19 सितंबर 2023 को संविधान (128वां संशोधन) विधेयक पेश किया था। इसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान था। 20 सितंबर को लोकसभा, 21 सितंबर को राज्यसभा और 28 सितंबर 2023 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी के बाद यह बिल कानून बन गया। लेकिन लागू नहीं हो सका। क्यों? क्योंकि उस कानून में शर्त थी कि आरक्षण नई जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन के बाद ही लागू होगा। नई जनगणना का डेटा आने में करीब दो साल और लग सकते हैं। यानी परिसीमन 2034 के चुनाव तक टल सकता था। इसी को बदलने के लिए सरकार ने 16 से 18 अप्रैल के बीच संसद का विशेष सत्र बुलाया है और तीन नए बिल ला रही है: इन बिलों के तीन मकसद हैं… सवाल 2: लोकसभा सीटें बढ़ाकर 850 करने की जरूरत क्यों पड़ रही है? जवाबः मौजूदा सीटों का बंटवारा 1971 की जनगणना पर आधारित है। तब एक सांसद औसतन 10 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता था, जो अब बढ़कर 25 लाख से ऊपर पहुंच गया है। लेकिन राजनीतिक जानकार एक और बात भी कहते हैं। लोकसभा में अभी 74 महिला सांसद हैं, यानी सिर्फ 13.6%। 543 सीटों पर 33% आरक्षण लागू होता, तो 181 सीटें महिलाओं के लिए रिजर्व होतीं और कई पुरुष सांसदों को अपनी सीटें छोड़नी पड़तीं। इससे पार्टियों के भीतर बगावत का खतरा था। अनुमान है कि परिसीमन के बाद 816 सीटें हो जाएंगी, यानी 273 नई सीटें जुड़ेंगी। लगभग इतनी ही सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। यानी मौजूदा पुरुष सांसदों पर सीधा असर कम होगा। सवाल 3: परिसीमन के लिए 2011 का पुराना डेटा क्यों, नई जनगणना का इंतजार क्यों नहीं?जवाबः लोकतांत्रिक मानकों के हिसाब से परिसीमन हमेशा ताजा जनगणना के आधार पर होना चाहिए। लेकिन अगर 2027 की जनगणना का इंतजार किया गया, तो महिला आरक्षण 2034 तक लागू नहीं हो पाएगा। पीएम नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देश की महिलाओं को पत्र लिखा- ‘महिलाओं का अधिकार अब और टाला नहीं जा सकता और 2029 के चुनाव से इसे लागू होना चाहिए।’ लेकिन मोदी सरकार की इस जल्दबाजी पर सवाल भी उठ रहे हैं- इन सवालों को लेकर गृहमंत्री अमित शाह ने कहा, ‘यह विधेयक 2023 में पास हुआ था। अब बात वादे को पूरा करने की है। संसद ने देश की महिलाओं को 33% आरक्षण देने का वादा किया है। इस वादे को जल्द से जल्द पूरा किया जाना चाहिए।’ सवाल-4: दक्षिण के राज्यों ने आबादी काबू में रखी, तो क्या अब उनकी सीटें घटेंगी और हिंदी भाषी राज्यों की बढ़ेंगी?जवाबः यह डर नया नहीं है। 1976 और 2001 में भी परिसीमन इसीलिए टाला गया था, क्योंकि उत्तर और दक्षिण की जनसंख्या में बड़ा अंतर था। आज भी यही चिंता है। दक्षिण के राज्यों ने परिवार नियोजन अपनाया, आबादी काबू में रखी, लेकिन जनसंख्या आधारित परिसीमन में उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व घट सकता है। तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन ने चेतावनी दी है कि अगर परिसीमन से राज्य को नुकसान हुआ तो 1950-60 के दशक जैसा आंदोलन होगा। तेलंगाना के सीएम रेवंत रेड्डी ने दक्षिण के सभी मुख्यमंत्रियों को चिट्ठी लिखकर एकजुट होने और पीएम मोदी से सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की है। इलेक्शन एनालिस्ट से पॉलिटिकल एक्टिविस्ट बने योगेंद्र यादव का कहना है कि अगर 2011 की जनगणना के आधार पर आनुपातिक परिसीमन हुआ तो केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और पंजाब को नुकसान होगा, जबकि हिंदी भाषी राज्यों को फायदा। इससे संघीय ढांचे का नाजुक संतुलन बिगड़ सकता है। केंद्र सरकार बार-बार भरोसा दे रही है कि राज्यों की आनुपातिक हिस्सेदारी से छेड़छाड़ नहीं होगी। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि सीटों का बंटवारा परिसीमन आयोग करेगा और आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर होगा। इससे दक्षिण को नुकसान नहीं, फायदा होगा। अनुपातिक प्रतिनिधित्व, यानी लोकसभा में राज्यों की मौजूदा हिस्सेदारी की हिसाब से परिसीमन में सीटें बांटी जाएंगी। उदाहरण से समझते हैं- तमिलनाडु में अभी लोकसभा की 39 सीटें हैं, यानी अनुपातिक हिस्सेदारी हुई- (39/543) 100 = 7.18%। अगर लोकसभा की सीटें 543 से बढ़कर 850 हो जाएंगी, तो इस फॉर्मूले से तमिलनाडु की लोकसभा सीटें बढ़कर 61 हो जाएंगी। सवाल-5: महिलाओं को आरक्षण कब से मिलेगा और परिसीमन कब लागू होगा?जवाबः इसके लिए पहले परिसीमन आयोग बनेगा। इसके अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज होते हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त और राज्य चुनाव आयुक्त सदस्य होते हैं। हर राज्य के लिए 5 लोकसभा और 5 विधानसभा सदस्य सहयोगी सदस्य होते हैं। हालांकि इन्हें वोट देने का हक नहीं होता। भारत के पिछले चार परिसीमन आयोगों को अंतिम आदेश जारी करने में 3 से साढ़े 5 साल लगे थे। 2002 में शुरू हुआ परिसीमन 2008 में पूरा हुआ, यानी 6 साल में। सरकार की कोशिश है कि यह सब 2029 के लोकसभा चुनाव तक लागू हो जाए। आरक्षित सीटें हर चुनाव में बारी-बारी बदलती रहेंगी। SC/ST कोटे की भी एक-तिहाई सीटें उसी वर्ग की महिलाओं के लिए रिजर्व होंगी। सवाल-6: क्या विधानसभाओं में भी महिला आरक्षण लागू होगा?जवाबः हां। नारी शक्ति वंदन अधिनियम (106वां संविधान संशोधन अधिनियम, 2023) के तहत लोकसभा के साथ-साथ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में भी एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। ज्यादातर राज्यों की विधानसभा सीटें 2001 की जनगणना पर आधारित हैं, असम और जम्मू-कश्मीर को छोड़कर। पूर्वोत्तर के 4 राज्यों- नागालैंड, मणिपुर, अरुणाचल और मिजोरम में तो विधानसभा क्षेत्र 2001 से भी पुराने आधार पर हैं। इसलिए इन सभी जगहों पर भी नए सिरे से परिसीमन होगा। सवाल-7: अगर परिसीमन आयोग का फैसला गलत लगे, तो क्या कोर्ट जा सकते हैं?जवाबः परिसीमन आयोग के आदेश कानून की तरह लागू होते हैं। आर्टिकल 329 और परिसीमन अधिनियम 2002 की धारा 10 के तहत इनके खिलाफ अदालत में नहीं जाया जा सकता। संसद और विधानसभाएं भी इनमें बदलाव नहीं कर सकतीं। हालांकि 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने किशोरचंद्र छगनलाल राठौर बनाम भारत सरकार मामले में एक अहम फैसला दिया। कोर्ट ने कहा कि आर्टिकल 329 न्यायिक समीक्षा को पूरी तरह खत्म नहीं करता। अगर कोई आदेश स्पष्ट रूप से मनमाना हो, समानता और निष्पक्षता जैसे संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ हो या गलत इरादे से लिया गया हो, तो हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट उसकी जांच कर सकती हैं। छोटे-मोटे सीमा बदलाव जैसे मुद्दों पर कोर्ट दखल नहीं देगा और यह भी ध्यान रखेगा कि उसकी वजह से चुनाव में देरी न हो। हालांकि मीडिया रिपोर्ट है कि 2026 का परिसीमन आयोग ज्यादा ताकतवर होगा, जिसके फैसलों को कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकेगी। सवाल-8: संसद में तीनों बिल पास होना कितना आसान या मुश्किल है?जवाबः संविधान संशोधन के लिए लोकसभा में 'विशेष बहुमत' चाहिए। यानी कुल 543 में से कम से कम आधे यानी 272 सांसद उपस्थित होने चाहिए। जितने भी सांसद उपस्थित हों, उनके दो-तिहाई का समर्थन। मान लीजिए सभी 543 सांसद मतदान करें, तो बिल पारित कराने के लिए 362 वोट चाहिए। अभी NDA के पास 292 सांसद हैं। विपक्ष के 233। यानी अकेले NDA बिल नहीं पास करा सकता। विपक्ष का सहयोग जरूरी है। BJP, कांग्रेस, JDU, LJP(R) समेत कई दलों ने व्हिप जारी कर दिया है। माना जा रहा है कि जैसे 2023 में महिला आरक्षण बिल बिना विरोध के पास हुआ था, वैसा इस बार होने की उम्मीद कम है। क्योंकि विपक्षी गठबंधन INDIA का कहना है कि हम महिला आरक्षण के समर्थन में तो है, लेकिन परिसीमन के खिलाफ है। इसका हम संसद में विरोध करेंगे। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने कहा, सरकार जो प्रस्ताव पेश कर रही है, उसका महिला आरक्षण से कोई लेना-देना नहीं है। जाति जनगणना को नजरअंदाज कर OBC, दलित और आदिवासियों के हक की चोरी हो रही है। दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर जैसे राज्यों के साथ किसी भी तरह का अन्याय हम बर्दाश्त नहीं करेंगे। ------------ चुनाव से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए… ममता के सिर पर रॉड मारी, लगा बचेंगी नहीं: बंगाल में जो आता है, क्यों छा जाता है; क्या अब बीजेपी की बारी है जैसे बंगाली रसगुल्ले की चाशनी कपड़ों पर गिर जाए, तो जल्दी छूटती नहीं है। वैसे ही बंगाल में एक बार जो सरकार में आता है, सालों तक टिकता है। आजादी के बाद से पश्चिम बंगाल में सिर्फ तीन पार्टियों ने सत्ता संभाली है। कांग्रेस ने 20 साल, CPI(M) ने 34 साल और TMC ने 15 साल। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक पैटर्न है। पूरी खबर पढ़िए…

दैनिक भास्कर 16 Apr 2026 5:05 am

ब्लैकबोर्ड-जान बचानी थी, तो सिर पर बांध ली भगवा पट्टी:दंगे की तस्वीर ने मेरी जिंदगी बर्बाद की- चेहरा इस्तेमाल हुआ, लेकिन मिला कुछ नहीं

2002 गुजरात दंगे के दो पोस्टर बॉय की कहानी, जिनमें हिंदुत्व का चेहरा बने मोची अशोक परमार आज दो वक्त की रोटी को मोहताज हैं। सर्दी, गर्मी, बरसात सड़क पर सोते हैं। वह उस वक्त 27 साल के थे। आज 51 साल के हैं। उनसे मिलने मैं अहमदाबाद के शाहपुर इलाके पहुंचा- ‘केटी देसाई स्कूल’। बगल में एक नीम के पेड़ नीचे अशोक परमार की दुकान है- एक बंद अलमारी और नीचे रखा पतला, मटमैला गत्ता। आसपास के लोगों से पता चला कि वे सिविल हॉस्पिटल गए हैं- कुछ दिन पहले उन्हें लकवा मार गया है। मैं दुकान पर उनका इंतजार करता हूं। वह दो घंटे बाद लौटे- दुबले-पतले, फटी टी-शर्ट और पैंट पहने। लंगड़ाते हुए हाथ में दवाइयों से भरी थैली है। मैंने पूछा- आप ही अशोक परमार हैं? लाल आंख, काले-मुरझाए चेहरे से वो तेज आवाज में बोले- हां… वही, जिसे 2002 में हिंदुत्व का चेहरा बनाया गया था। अब भोजन से ज्यादा दवाइयां खाता हूं। थैली से दवाएं दिखाते हुए कहते हैं- ये दवाइयां तो सरकारी अस्पताल से मिल जाती हैं… लेकिन खाना? वह फ्री में नहीं मिलता। अब तो बस मौत का इंतजार है। पहले तो जूते-चप्पल सिलकर किसी तरह 50-100 रुपए कमा लेता था… अब लकवे ने वह भी छीन लिया’, इतना कहकर वे चुपचाप दुकान के बाहर झाड़ू लगाने लगते हैं। ब्लैकबोर्ड में आज अशोक परमार और कुतुबुद्दीन अंसारी की कहानी, जिन्हें 2002 गुजरात दंगे का पोस्टर बॉय बनाया गया। अशोक परमार को हिंदुत्व का चेहरा और कुतुबुद्दीन अंसारी को मुस्लिम दर्द का चेहरा, लेकिन उन तस्वीरों की वजह से आज दोनों की जिंदगी स्याह बन चुकी है। झाड़ू लगाने के बाद अशोक गमछा बिछाते हैं। मैं उनके साथ बातचीत के लिए बैठ जाता हूं। वह कहते हैं- जो बात करनी है, जल्दी कर लीजिए। यहां आप जैसे मीडिया वालों को देखकर लोग जुटने लगते हैं। मुझे खाना खाने भी जाना है। आज का खाना आप खिला देंगे क्या? मुझे तो रोज दो वक्त का खाना दूसरों से मांगना पड़ता है। पिछले साल दिसंबर में लकवा मार गया था, तो दो महीने दुकान बंद रही। पिछले महीने से ही इसे खोला है। मैंने कहा- चलिए, पहले खाना खा लेते हैं, फिर बात करेंगे। कहते हैं- नहीं-नहीं, पहले बात कर लीजिए। अब मुझे भूख कम लगती है। बस जिंदा हूं। इस जिंदगी से तंग आकर कई बार खुद को मारने की कोशिश की। डिप्रेशन की दवाइयों की ओवरडोज ली, लेकिन मरा नहीं। सांस है कि निकलती नहीं। अब सोचता हूं, खुद से नहीं मरूंगा, वर्ना लोग कहेंगे- अशोक कितना कायर था। उनकी हालत देखकर ताज्जुब होता है। दिमाग में गुजरात दंगे की वही तस्वीर उभर आती है- पीछे आग का गुबार और सामने काली शर्ट में माथे पर भगवा पट्टी बांधे और गुस्से में लोहे की रॉड उठाए यही अशोक परमार थे। अब मैं उन्हें पोस्टर बॉय बनाने वाली उस तस्वीर को दिखाते हुए पूछता हूं- इस तस्वीर में आप ही हैं? अशोक गुस्से में बोल पड़ते हैं- इसी फोटो ने मेरी जिंदगी बर्बाद कर दी। पता नहीं, उस मुंबई के पत्रकार को मैंने क्यों फोटो खींचने को कहा। दरअसल, यह गोधरा कांड के अगले दिन 28 फरवरी 2002 की बात है। सुबह के 10 बज रहे थे। शहर की सारी दुकानें बंद थीं। पता चला कि शाहपुर चौराहे के पास दंगाई तांडव मचा रहे हैं। मुस्लिम बस्तियों को आग के हवाले किया जा रहा है। चौराहे और सड़कों पर जलते टायर बिखरे हैं। यह पूरा इलाका मुसलमानों का है। थोड़ी देर बाद हल्ला मचा कि दंगाई मेरी दुकान की तरफ आ रहे हैं। उनके हाथ में पेट्रोल और जलते टायर हैं। मैंने तुरंत दुकान बंद की और अपने भाई के घर की तरफ भागा। उधर भी भीड़ थी। रास्ते में मुझे एक भगवा पट्टी गिरी दिखी। भीड़ से बचने के लिए मैंने उसे माथे पर बांध लिया, ताकि दंगाई समझ सकें कि मैं भी हिंदू हूं। जैसे ही शाहपुर चौराहे पर पहुंचा, एक फोटो पत्रकार मिला। वह बेचैन था। मुझे देखकर बोला, ‘मैं काफी देर से एक गुस्सैल चेहरे की तलाश में हूं, जो हिंदुत्व का गुस्सा दिखा सके। आपका चेहरा वैसा ही लग रहा है। पीछे आग की लपटें उठ रही थीं। मैंने सड़क पर पड़ी एक लोहे की रॉड उठाई और दोनों हाथ ऊपर उठाए और कहा- ‘मेरी फोटो खींच लो।’ उसने मेरी फोटो खींची और चला गया। मुझे बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि उस फोटो की वजह से मैं गुजरात दंगे का चेहरा बन जाऊंगा। अगले दिन मेरी वह फोटो टीवी पर गुजरात दंगाई के रूप में दिखाई जाने लगी। उस समय इलाके के लोगों को छोड़कर किसी को पता नहीं था कि वह शख्स मैं ही हूं। ‘आपके परिवार में कौन-कौन हैं?’ कोई नहीं। तभी तो 24 साल से इस सड़क पर जिंदगी बिता रहा हूं। इसी जगह चबूतरे पर सोता हूं। कोई खाना दे दे, तो भूख मिटा लेता हूं। अभी दो दिन पहले ही मेरी भाभी की मौत हुई है। वही भाभी, जिन्होंने मुझे घर से निकाल दिया था। 1990 की बात है। 7वीं में पढ़ता था। पिताजी मोची का काम करते थे, लेकिन बीमार रहते थे। अचानक उनकी मौत हो गई। मां पहले ही गुजर गई थीं। कुछ समय तक भाई ने पिताजी का काम संभाला। हम दो भाई और दो बहनें हैं। दोनों की शादी हो चुकी थी। भाभी मुझे घर पर देखकर गाली-गलौज करती थीं। खाना नहीं देती थीं। कहतीं- जाओ, रुपए कमाकर लाओ, तब खाना मिलेगा। तुम पढ़ोगे और तुम्हारा भाई काम करेगा? उनकी बातें सुन-सुनकर परेशान हो गया था। एक दिन उनसे खूब लड़ा। भाई घर आए, तो उन्हें पता चला। उस दिन उन्होंने मुझे मारा और घर से निकाल दिया। गाली देते हुए बोले- तुम्हारी वजह से मेरी बीवी मुझे मारती है। अब लौटकर मत आना। उसके बाद मैंने पढ़ाई छोड़ दी और पिताजी की दुकान पर बैठने लगा। 5-10 रुपए की कमाई हो जाती, किसी तरह खाना खा लेता था। तब से इसी सड़क पर हूं। थोड़ा बड़ा हुआ, तो एक दूसरी बिरादरी की लड़की से प्यार हो गया। हम दोनों 5 साल साथ रहे। लड़की के घर वालों को जब पता चला, तो उन्होंने उसकी शादी कहीं और कर दी। मेरे पास कुछ था भी नहीं, शादी करके लाता, तो रखता कहां? इसलिए उसे जाने दिया। उसके बाद यह दंगा हो गया। '2002 गुजरात दंगे के बाद क्या हुआ?’ क्या बताऊं, उसके बाद तो जिंदगी दो जोड़ी कपड़ों में आ गई। टी-शर्ट, पैंट, जो अभी पहने हूं और एक जोड़ी इस अलमारी में है। रात में एक शख्स यहां अपनी ऑटो खड़ी करते हैं, उसी में सोता हूं। 2012 में दुकान के साथ मेरी एक तस्वीर वायरल हुई, तब पुलिस पकड़कर मुझे ले गई। मैंने सब सच-सच बता दिया। 14 दिन साबरमती जेल में रखा, उसके बाद छोड़ दिया। बाहर आया तो कुछ लोगों ने मुझे मारने की कोशिश की। गोली चलाई, लेकिन बच गया। अब सोचता हूं, मर ही गया होता, तो आज मौत का इंतजार न करना पड़ता। 2012 में मुझे खोजते हुए मीडिया के लोग यहां पहुंचे, तब से उनका तांता लगने लगा। मीडिया वाले आकर एक ही बात पूछते हैं। मन करता था कि भाग जाऊं, लेकिन कहां जाता? टीवी पर, नेताओं के भाषणों में, जहां भी गुजरात दंगे का जिक्र होता, मेरी तस्वीर दिखाई जाती। कई बार मैं हिंदू नेताओं के पास गया और कहा- हिंदुत्व के नाम पर मेरी तस्वीर इस्तेमाल करते हो, रहने के लिए एक छत ही दे दीजिए। कोई काम दे दीजिए, ताकि घर बसा सकूं। वे कहते- तुम्हें अपनी जाति का पता है…? और भगा देते। उसके बाद मैंने हिंदुओं के धार्मिक कार्यक्रमों में जाना बंद कर दिया। इस बातचीत के दौरान अब यहां लोग जमा होने लगे हैं। अशोक कई बार कह चुके हैं- अब रहने दीजिए। चलिए, खाना खिला दीजिए, वर्ना 3 बजे के बाद होटल बंद हो जाएंगे। हम दोनों ऑटो से खाना खाने निकल जाते हैं। वह बताते हैं- आप लोगों से बात करते हुए मुझे पुरानी बातें याद आने लगती हैं। सोचकर पागल हो जाता हूं। यहां लोग मुझे दो वक्त खाना खिला देते हैं। जरूरत पड़ने पर 50-100 रुपए भी दे देते हैं। राजस्थानी और मुस्लिम मेरी काफी मदद करते हैं। सोचिए, मुझे 5 करोड़ गुजरातियों का चेहरा बताया गया, लेकिन कोई पूछता नहीं। ऑटो रुकते ही एक होटल में जाते हैं। दोनों यहां खाना खाते हैं। वापस लौटते हुए अशोक कहते हैं, 'कुछ पैसे हों तो दे दीजिए, जेब में सिर्फ 20 रुपए हैं।’ मैं कुछ पैसे उनकी जेब में डालते हुए ‘सोनी की चाली’ इलाके की ओर निकल पड़ता हूं। गुजरात दंगे के दूसरे ‘पोस्टर बॉय’ कुतुबुद्दीन अंसारी के घर। कुतुबुद्दीन उस वक्त 28 साल के थे। यहां पहुंचने पर पता चला कि वह ऊपरी माले पर सिलाई का काम कर रहे हैं। एक पतली सीढ़ी से ऊपर पहुंचता हूं। मुझे देखते ही वह कहते हैं- जब कोई मुझे गुजरात दंगे का पोस्टर बॉय कहता है, तो दुख होता है। मेरा अपना नाम है। चाहता हूं कि लोग उसी नाम से बुलाएं। अब उन बातों पर चर्चा नहीं करना चाहता। मेरे बच्चे बड़े हो गए हैं। जो बेटा दंगे के वक्त मेरी पत्नी की कोख में था, उसकी हाल ही में शादी हुई है। अब बेटा-बहू डांटते हैं कि अब्बू कब तक उन बातों को दोहराते रहोगे। अच्छा नहीं लगता… इसलिए अब उन सब के बारे में बात नहीं करना चाहता। कई बार गुजारिश करता हूं, तब वह बातचीत के लिए राजी होते हैं। ऊपर माले से नीचे आकर एक कमरे में बैठते हैं। बातचीत शुरू करते ही कहते हैं- उस तस्वीर ने मेरी पूरी जिंदगी चौपट कर दी। अब अल्लाह के करम से दो वक्त की रोटी खा रहा हूं और परिवार के साथ शांति से हूं। दरअसल, यहां नरोडा हाईवे के एक तरफ दंगा भड़का। उसके बाद जगह-जगह लाशें बिछ गईं। उनके हाथों में बम-बारूद, पेट्रोल और जलते हुए टायर थे- भयावह मंजर था। दंगाई सड़क पर मुसलमान को देखते ही तलवार से काट रहे थे। उस दिन अच्छा था कि पुलिस की एक गाड़ी पहुंची और हमें किसी तरह एक राहत कैंप में लेकर गई। वहां रहने-खाने की सुविधा नहीं थी। उस समय मेरी पत्नी 5 महीने की गर्भवती थी। गोद में डेढ़ साल की बेटी भी थी। ऐसा लग रहा था कि दंगाई कभी भी यहां आ सकते हैं। खैर, एक-दो दिन में दंगा थोड़ा शांत हुआ। लगा कि शायद सब ठीक हो रहा है। मैं पत्नी-बेटी को लेकर राहत कैंप से घर लौट आया। बस्ती में बमुश्किल दो-चार घरों में ही लोग बचे थे। कुछ मारे गए थे, बाकी भाग चुके थे। लेकिन 1 मार्च 2002 को दोपहर 2 बजे अचानक फिर से दंगाई पेट्रोल बम और तलवार लेकर बस्ती में पहुंचे। वे दुकानों में आग लगाने लगे। मुसलमान मिलता तो उसे मार देते। गर्भवती महिलाओं के पेट में तलवार घोंप रहे थे। मैं यह सब घर की दूसरी मंजिल की दीवार के एक झरोखे से देख रहा था। अब तय हो गया था कि दंगाई हमारे घर में भी घुसेंगे और मार देंगे। आखिरी वक्त में बस अल्लाह का नाम ले रहा था। तभी सामने से पुलिस की गाड़ी दिखी, जिसमें कुछ पुलिसकर्मी बैठे थे। मैं झरोखे से जोर-जोर से चीख रहा था- साहब, बचा लो! जब लगा कि मेरी आवाज उन तक नहीं पहुंच रही, तो बालकनी में आकर चिल्लाने लगा। उसके बाद कुछ पुलिसकर्मी तुरंत गाड़ी से उतरे और मेरे पास पहुंचे। मैं उनके सामने हाथ जोड़कर रहम की भीख मांगने लगा। उसी गाड़ी में बैठे एक पत्रकार ने मेरी रोती-बिलखती, हाथ जोड़े तस्वीर खींच ली। उसके बाद पुलिस हमें राहत कैंप में ले गई। अगले दिन मेरी तस्वीर पीड़ित मुसलमानों के चेहरे के रूप में अखबारों में छपी। एक-दो दिनों में यही तस्वीर हर जगह फैल गई। उसके बाद पत्रकार इस तस्वीर के जरिए मुझे खोजने लगे। राहत कैंप में कुछ पत्रकारों ने मुझे पहचान लिया। इसके बाद मेरी तस्वीर लगातार छपने लगी- एक तरफ हिंदुत्व के चेहरे के रूप में अशोक परमार की और दूसरी तरफ पीड़ित मुसलमान के रूप में मेरी। ‘आप उस वक्त भी सिलाई करते थे?’ हां, यह हमारा खानदानी काम है। दंगे से पहले मैं अहमदाबाद की एक बड़ी फैक्ट्री में काम करता था। वहां सुनील नाम का एक दोस्त था। वह मुझे घर से लेकर जाता और वापस छोड़ता भी था। 27 फरवरी को जब गोधरा कांड हुआ, तो शाम में फैक्ट्री में घोषणा हुई कि बाहर माहौल ठीक नहीं है। सभी घर चले जाएं। दंगा रुकने तक फैक्ट्री बंद रहेगी। उसके बाद मैं घर आ गया। जब मेरी फोटो आई, तो मीडिया और पार्टियों के नेता मेरे पास आने लगे। उस दौरान कई महीने तक इलाके में कर्फ्यू लगा रहा। यह नया घर 2008 में बनवाया था। इससे कुछ ही दूर मेरे हिंदू दोस्त सुनील का घर था, लेकिन उसने मुझसे बात करना बंद कर दिया। फैक्ट्री में करीब एक साल काम किया था, लेकिन मालिक ने निकाल दिया। उनका कहना था- मीडिया वाले तुम्हारा इंटरव्यू ले रहे हैं, भीड़ लग रही है, इसलिए तुम्हें नहीं रख सकते। नौकरी गई, तो सोचा था कि काश उस दंगे में मर गया होता, तो यह न होता। दिन-रात मीडिया वाले घर के बाहर जमे रहते थे। काम-धंधा चौपट हो गया था, जहां भी गुजरात दंगों में मारे गए मुसलमानों की बात होती, मेरी ही तस्वीर दिखाई जाती। तंग आकर मैंने शहर छोड़ दिया और कोलकाता चला गया। तीन-चार साल वहां रहा, फिर चुपके से अहमदाबाद लौट आया। इसी बीच कुछ समाजसेवी संस्थाओं ने बुलाकर कहा- गुमनाम रहने से कुछ नहीं होगा। जिंदा बचे हो, तो लोग पूछेंगे ही, इसी में जिंदगी बिताओ। इसके बाद मैंने 5,000 रुपए में पांच सिलाई मशीनें खरीदीं और घर पर काम शुरू कर दिया। लेकिन 13 सितंबर 2008 की बात है। दिल्ली में बम धमाका हुआ था। हमले की जिम्मेदारी आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिद्दीन ने ली थी। उसने सरकार को एक मेल भेजा था, जिसमें लिखा था- 'आंख के बदले आंख’, यानी गुजरात दंगों में मारे गए मुसलमानों का बदला लेंगे। मेल के नीचे मेरी फोटो लगा दी थी। अगले दिन सुबह 7 बजे से ही मीडिया के लोग मेरे घर जमा हो गए। पत्नी और बच्चे डर गए। शाम होते-होते मुझे पुलिस उठा ले गई, लेकिन कुछ स्थानीय लोगों की कोशिश से छोड़ दिया गया। 2013 में ‘राजधानी एक्सप्रेस’ फिल्म आई। उसमें मुझे आतंकवादी की तरह दिखाया गया। उसमें एक सीन में एक पुलिस अफसर के दफ्तर में मेरी फोटो लगी है, सामने एक आतंकी खड़ा है। पहले पुलिस मेरी तस्वीर पर बंदूक तानती है, फिर आतंकी को गोली मार देती है। फिल्म के बारे में दोस्तों ने बताया, तब मुझे पता चला। मैंने डायरेक्टर पर केस कर दिया, लेकिन कुछ नहीं हुआ और 2019 में मामला बंद कर दिया गया। मैंने उस पत्रकार से भी सवाल किया, जिसने मेरी फोटो खींची थी। उसके पास माफी के अलावा कोई जवाब नहीं था। नहीं पता था कि एक तस्वीर मेरी जिंदगी इस तरह बर्बाद कर देगी। खैर… मेरी बेटी के बच्चे की तबीयत खराब है, अब मुझे जाना होगा। शाम हो चुकी है।’ कहते-कहते वह सहम जाते हैं। कैमरा बंद करते ही कहते हैं, ‘सच कहूं, तो मुझे मोबाइल से भी डर लगता है। उस पर ऐसी ही खबरें देखकर परेशान हो जाता हूं। मेरी हालत तो फिर भी कुछ ठीक है, लेकिन अशोक का सब खत्म हो गया। वह महीने-पंद्रह दिन में खाना खाने मेरे घर आ जाता है। उसे कुछ पैसे दे देता हूं। अब क्या कर सकता हूं, मेरे भी बाल-बच्चे हैं। अब मैं 52 साल का हूं। ---------------------------------------------- 1- ब्लैकबोर्ड-वो बेटी जैसी थी, उसके पिता बोले-तूने इसका रेप किया:25 साल बाद जेल से बरी, आज भी लगता है कोई मारने आ रहा है 57 साल के आजाद खान अपने भाई की किराने की दुकान पर बेसुध बैठे हुए हैं। तीन महीने पहले ही 25 साल बाद जेल से बाइज्जत बरी होकर आए हैं। अकेले में कुछ बुदबुदा रहे हैं। पूछने पर कहते हैं- पूरी जिंदगी काल-कोठरी में गुजार दी। अब किसी से क्या ही बात करूं, क्या ही बचा है! पूरी कहानी यहां पढ़ें 2- ब्लैकबोर्ड-हट्टा-कट्टा भर्ती हुआ, फौज ने विकलांग बनाकर भेज दिया:8 महीने कोमा में रहा, होश आया तो पता चला- मुझे आर्मी से निकाल दिया ‘डेढ़ महीने से मुझे ‘महाराजा’ पनिशमेंट दी जा रही थी, जिसमें सिर के बल डेढ़-डेढ़ घंटे रहना होता था। एक दिन मैं बॉक्सिंग की ट्रेनिंग ले रहा था। तभी एक जोरदार पंच मेरे सिर पर लगा और मैं गिर पड़ा। अफसर चिल्लाए- चेतन, उठो और लड़ो। मैंने कहा- अब नहीं लड़ पाऊंगा, सर। लेकिन उन्होंने कहा- नहीं चेतन, तुम्हें भिड़ना होगा। पूरी कहानी यहां पढ़ें

दैनिक भास्कर 16 Apr 2026 5:04 am

क्या बंगाल में BJP-RSS का माइक्रो मैनेजमेंट बनेगा गेमचेंजर:जीत की 12 स्ट्रैटजी; हिंदुओं की वोटिंग बढ़ाने, डर खत्म करने के लिए अलग टीमें

पश्चिम बंगाल की सियासत में इस बार कुछ बड़ा पक रहा है। विधानसभा चुनाव से पहले BJP और RSS खामोशी से अब तक की सबसे बड़ी बिसात बिछा चुके हैं। बूथ से लेकर बॉर्डर तक संगठन एक्टिव हैं। BJP ने सीनियर लीडर रहीं सुषमा स्वराज का फॉर्मूला ‘1 बूथ-10 यूथ’ पश्चिम बंगाल की सभी 294 सीटों पर लागू किया है। क्या है BJP-RSS की 12 रणनीतियां, जो बंगाल की राजनीति का समीकरण बदल सकती है, यही समझने के लिए हम कोलकाता पहुंचे। राज्य के अलग-अलग हिस्सों का चुनावी माहौल देखा। इसे जितना समझने की कोशिश की, तस्वीर उतनी ही उलझती गई। लोग कह रहे हैं, ‘इस बार बंगाल की राजनीति और मौसम, दोनों का मिजाज एक जैसा है। कब क्या बदल जाए, कहना मुश्किल है। कुछ लोगों का मानना है कि ममता बनर्जी की वापसी लगभग तय है। उनके मुताबिक BJP की सीटें बढ़ सकती हैं, लेकिन सरकार बनाना आसान नहीं होगा। एक वर्ग ये मानता है कि BJP का चुनावी गणित सही बैठ गया, तो सत्ता परिवर्तन बड़ी बात नहीं होगी। 2021 की एक भूल से सबक, BJP ने भी रणनीति बदलीडॉ. धनपत राम अग्रवाल, स्वदेशी जागरण मंच के अखिल भारतीय सह संयोजक हैं। ये संगठन RSS से जुड़ा है और पश्चिम बंगाल में एक्टिव है। डॉ. अग्रवाल बताते हैं, ‘BJP को 2021 में ही सरकार बनाने की उम्मीद थी। उसे 2019 के लोकसभा चुनाव में 18 सीटें मिली थीं। लोकसभा की एक सीट पर विधानसभा की एवरेज 7 सीटें होती है। पार्टी का गणित था कि विधानसभा चुनाव में 18 7 यानी 126 सीटेें मिल जाएंगी। रिजल्ट उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा और सिर्फ 77 सीटें मिलीं।’ ‘BJP ने माना कि संगठन की कुछ गलतियां थी। बीते 5 साल में बूथ लेवल तक सुधार किया गया। सभी रीजन- सेंट्रल, नॉर्थ, साउथ बंगाल और जंगल महाल में बूथ लेवल तक तैयारी की गई है। उम्मीद है कि BJP 150 से ज्यादा सीटें जीतेगी।’ BJP की नई स्ट्रैटजी, बॉटम टू टॉप अप्रोचBJP का फोकस किसान, युवा, महिला, व्यापारी और मजदूरों पर है। इन वर्गों से अलग-अलग बैठकें कर उनके सुझाव मेनिफेस्टो में शामिल किए गए। पार्टी इसे बॉटम टू अप स्ट्रैटजी बता रही है। इस बार प्रचार के शोर से ज्यादा माइक्रो मैनेजमेंट पर जोर है। ये 4 हिस्सों में है… 1. वन बूथ-टेन यूथ ये सुषमा स्वराज का दिया फॉर्मूला है। हर बूथ पर 10 युवाओं की टोली तैनात है। उनके साथ अनुभवी कन्वीनर (संयोजक) काम कर रहे है। मंडल स्तर के कार्यकर्ता भी लगे है। कोई बूथ ऐसा नहीं है, जहां BJP के कार्यकर्ता एक्टिव न हों। 2. YM, यानी युवा और महिला फैक्टरBJP की इंटरनल रिपोर्ट में महिलाएं और युवा निर्णायक वोटर समूह के तौर पर सामने आए हैं। इसलिए पार्टी संदेशखाली और आरजीकर मेडिकल कॉलेज में ट्रेनी डॉक्टर से रेप की घटनाओं के जरिए महिला सुरक्षा का मुद्दा उठा रही है। खासकर ग्रामीण इलाकों में, जहां पुरुषों का पलायन ज्यादा है। बंगाल में करीब 3.26 करोड़ महिला वोटर हैं। 2021 के विधानसभा चुनाव में 50% महिलाओं ने TMC को वोट दिया था। इसकी वजह लक्ष्मी भंडार योजना को माना गया। इसके मुकाबले इस बार BJP ने अन्नपूर्णा योजना के तहत 3 हजार रुपए देने का वादा किया है। राज्य में रोजगार और शिक्षा की स्थिति BJP के चुनावी नैरेटिव का अहम हिस्सा है। पार्टी दावा करती है कि इंडस्ट्री में निवेश ठहरा हुआ है। 6800 कंपनियां राज्य छोड़ चुकी हैं। लॉ एंड ऑर्डर की वजह से निवेश नहीं आ रहा है और राज्य पर कर्ज बढ़ा है। 3. दलबदलुओं को तवज्जो नहीं2021 में BJP ने दूसरी पार्टियों से आए 100 से ज्यादा नेताओं को टिकट दिए थे। इनमें ज्यादातर TMC से थे। इससे BJP के पुराने कार्यकर्ता नाराज हो गए। कई नेता चुनाव हारने के बाद TMC में वापस चले गए। इस बार पार्टी ज्यादा अलर्ट रही। दलबदलुओं की बजाय पार्टी नेताओं को तरजीह दी गई। 4. मुस्लिमों को टिकट नहीं BJP ने इस बार एक भी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया। 2021 में 6 मुस्लिम कैंडिडेट थे। पार्टी बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा काे भी मुद्दा बना रही है। BJP का ये भी दावा है कि मुस्लिमों का एक धड़ा ममता सरकार से नाराज है। बदलती डेमोग्राफी और बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा फैक्टरबांग्लादेश में हिंदुओं के साथ हिंसा और दीपू दास की हत्या भी एक फैक्टर है। BJP के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य कहते हैं, ‘पश्चिम बंगाल धीरे-धीरे बांग्लादेश बन रहा है। घुसपैठियों की वजह से सीमा से सटे जिलों की डेमोग्राफी बदल रही है। पश्चिम बंगाल की जमीन का इस्तेमाल बिहार, झारखंड, पूर्वांचल और सीमांचल की डेमोग्राफी बदलने के लिए किया जा रहा है।’ समिक भट्टाचार्य बताते हैं, ‘इस बार चुनाव जनता और तृणमूल कांग्रेस के बीच है। हमने तैयारी कर ली है। पहाड़ से समुद्र तक, कूचबिहार से काकद्वीप तक, दार्जिलिंग से आसनसोल तक, गंगोत्री से गंगासागर तक इस बार BJP की सरकार बनेगी।’ लोगों से बिना डरे वोट देने की अपील, लेकिन RSS पदाधिकारी खुद डरेRSS से जुड़े संगठन पर्चे बांटकर राष्ट्रवादी पार्टी को वोट देने की अपील कर रहा है। पदाधिकारियों के मुताबिक, मतदाताओं से NOTA का इस्तेमाल न करने की अपील की जा रही है, ताकि वे स्थिर सरकार चुनें। लोगों से कहा गया है कि वे सुबह-सुबह वोट डालने जाएं, क्योंकि दोपहर 12 बजे के बाद कई इलाकों में वोटिंग के दौरान गड़बड़ी और हंगामे की आशंका बढ़ जाती है। RSS का रीजनल ऑफिस ‘केशव भवन’ कोलकाता में है। यहां मिले पदाधिकारियों ने कैमरे पर बात नहीं की। हालांकि, एक पदाधिकारी बोले कि अगर TMC के लोग चुनाव में हमें मारेंगे, तो इस बार हम भी उन्हें मारेंगे। फिर तुरंत बोले, ‘ये लिखिएगा मत, वरना वे मुझे जेल में डाल सकते हैं।’ उनकी बात में डर था। हैरानी हुई कि आम लोगों से बिना डरे वोटिंग की अपील करने वाले RSS के लोग खुद इतना डरे हुए हैं। VHP का दावा: BJP 150 सीट जीतकर सरकार बनाएगी, TMC के एक करोड़ वोट घटेंगेRSS पदाधिकारी ने हमारी बात विश्व हिंदू परिषद के नेता सचिंद्रनाथ सिंह से करवाई। वे दावा करते हैं, ‘इस बार BJP 150 सीटें जीतकर बंगाल में सरकार बनाएगी। यह सिर्फ चुनावी उम्मीद नहीं, बल्कि सौ साल की हिंदुत्व साधना की सिद्धि का परिणाम होगा।’ सचिंद्रनाथ सिंह आरोप लगाते हैं कि TMC के कार्यकर्ता घर-घर जाकर महिलाओं पर दबाव बनाते हैं। बच्चों के सिर पर हाथ रखकर TMC को वोट देने की कसम दिलाते हैं। इससे निपटने के लिए गांवों में क्विक रिस्पॉन्स टीम बनाई जा रही हैं। ये संवेदनशील बूथों के बारे में चुनाव आयोग को जानकारी देंगी। वोटों का गणित समझाते हुए सचिंद्रनाथ सिंह कहते हैं, ‘पिछले विधानसभा चुनाव में BJP को करीब 2.3 करोड़ और TMC को 2.9 करोड़ वोट मिले थे। SIR से TMC के एक करोड़ वोट घट सकते हैं।’ पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान करीब 91 लाख नाम हटाए गए हैं। सबसे ज्यादा 4.5 लाख नाम मुस्लिम बहुल जिले मुर्शिदाबाद से कम हुए हैं। नॉर्थ 24 परगना में 3.25 नाम हटाए गए हैं। हालांकि हटाए गए वोटर को इसके खिलाफ अपील का एक मौका मिलेगा। जंगल महाल और नॉर्थ बंगाल में BJP मजबूत, साउथ बंगाल TMC का पावर हाउस2021 के विधानसभा चुनाव में BJP नॉर्थ बंगाल में सबसे मजबूत थी। यहां की 54 सीटों में से BJP को 30 और TMC को 24 सीटें मिलीं। कूचबिहार और अलीपुरद्वार में पार्टी ने क्लीन स्वीप किया। जंगलमहाल की 42 सीटों में 17 BJP और 25 TMC को मिली थीं। 2019 के लोकसभा चुनाव में यहां BJP आगे थी, लेकिन 2021 में TMC ने वापसी की। इस बार BJP दोनों इलाकों को सेफ जोन मान रही है। साउथ बंगाल TMC का सबसे मजबूत गढ़ है। यहां मुस्लिम और शहरी लिबरल वोटर ज्यादा हैं। यहां की 167 सीटों में 153 TMC ने जीती थीं। नॉर्थ और साउथ 24 परगना, हावड़ा, हुगली और कोलकाता में उसे एकतरफा जीत मिली थी। BJP को सिर्फ 14 सीटें मिलीं। ये जीत मतुआ आबादी वाले इलाकों में मिले। इस बार BJP यहां उन हिंदू वोटर्स तक पहुंच रही है, जो डर की वजह से वोट डालने नहीं निकलते। पांच पत्तों की इकोनॉमी पर नजर, मतुआ-राजबंशी तक पहुंचा RSSझारग्राम, पश्चिम मेदिनीपुर, पुरुलिया, बांकुरा के अलावा उत्तर बंगाल में आदिवासी आबादी है। इनकी रोजी-रोटी चाय, साल, तेंदू, पान और तंबाकू के पत्तों से चलती है। बंगाल में करीब 42 से 45 लाख आदिवासी वोटर हैं। राज्य की 294 सीटों में से 16 सीटें ST के लिए रिजर्व हैं, लेकिन आदिवासियों का प्रभाव 45 से 50 सीटों पर है। RSS ने इनके इलाकों में शाखाएं बढ़ाईं, स्कूल खोले और स्थानीय त्योहारों के जरिए उनके बीच जगह बनाई। BJP चुनाव में इसी नेटवर्क का इस्तेमाल कर रही है। खासकर जंगलमहाल में, जहां पहले लेफ्ट पार्टियों का मजबूत वोट बैंक था। धीरे–धीरे ये BJP में शिफ्ट हो गया। इसके अलावा BJP ने मतुआ, राजवंशी और बांग्लादेश से आए हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता दिलाने के लिए काम किया। CAA का सबसे ज्यादा असर नॉर्थ 24 परगना, नादिया कूचबिहार, अलीपुरद्वार और जलपाईगुड़ी में है। 2021 के चुनाव के बाद RSS ने बॉर्डर वाले इलाकों में शाखाएं बढ़ाई हैं। मतुआ बांग्लादेश से आए शरणार्थी हैं। बंगाल की आबादी में इनकी हिस्सेदारी 4% से 5% है। दलित आबादी में ये करीब 17% हैं। ये समुदाय नादिया, नॉर्थ और साउथ 24 परगना में रहता है और करीब 15 सीटों पर जीत-हार तय करता है। इसी तरह राजबंशी समुदाय कूचबिहार, अलीपुरद्वार, जलपाईगुड़ी और दार्जिलिंग की 54 सीटों में से करीब 25-30 सीटों पर निर्णायक हैं। एक्सपर्ट बोले- ममता सरकार के खिलाफ गुस्सा, लेकिन BJP भुना नहीं पा रहीपश्चिम बंगाल की राजनीति पर रिसर्च कर रहे रवींद्र भारती विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बिश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं, ‘पिछले 3-4 चुनावों में TMC ने 30% जीत डर के माहौल से हासिल की है। वे BJP समर्थकों को डराते हैं कि वोट दोगे, तो घर से निकाल देंगे। लक्ष्मी भंडार योजना का फायदा नहीं मिलेगा, बूथ पर कैमरे से देख लेंगे।’ ‘इस बार चुनाव आयोग ने सुरक्षा बढ़ाई है, लेकिन डर का माहौल फिर भी बना हुआ है। पश्चिम बंगाल की राजनीति में हिंसा के जरिए जीतने की प्रवृत्ति रही है। हाल में मालदा और मुर्शिदाबाद में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन, यानी SIR का काम कर रहे न्यायिक अधिकारियों पर हमले इसके उदाहरण हैं।’ उन्होंने कहा, ‘TMC और ममता बनर्जी के खिलाफ एंटी इनकम्बेंसी है, लेकिन इसका फायदा BJP को नहीं मिलेगा। BJP के संगठन में कमियां हैं। ये कमियां 2021 में भी थीं। BJP ने ममता के खिलाफ मजबूत CM फेस नहीं दिया। शुभेंदु अधिकारी को विधानसभा में एक्टिव रखा, लेकिन संगठन में उनसे मतभेद रहे।’ ‘पिछले चुनाव के मुकाबले RSS बंगाल में ज्यादा एक्टिव दिख रहा है। BJP का बूथ पर मजबूत संगठन नहीं है, लेकिन RSS के कार्यकर्ता काम कर रहे हैं। PM मोदी और अमित शाह की रैलियों से डोर-टू-डोर कैंपेन तक RSS का योगदान है।’ ‘पिछले 5 साल में ममता सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे, लेकिन BJP बड़ा आंदोलन खड़ा नहीं कर पाई। पार्टी के सीनियर नेता मानते रहे कि गुजरात या मध्य प्रदेश में बिना किसी आंदोलन के सरकार बनी। ऐसे में बंगाल में आंदोलन से फायदा नहीं होगा, लेकिन यहां की राजनीति में आंदोलन जरूरी होते हैं। इसी वजह से BJP का संगठन मजबूत नहीं हो सका।’ प्रो. चक्रवर्ती आगे कहते हैं, ‘पश्चिम बंगाल में डेमोग्राफिक बदलाव हुआ है। राज्य में 35% मुस्लिम आबादी है। ये 146 विधानसभा सीटों में 20% से 80% तक हैं। यहां लेफ्ट-लिबरल वोटर भी मजबूत हैं। लेफ्ट परंपरा काफी लंबी रही है। प्रेसिडेंसी कॉलेज, कलकत्ता यूनिवर्सिटी जैसे संस्थानों से निकले लिबरल सोच वाले लोग ममता के खिलाफ तो हैं, लेकिन BJP की विचारधारा को स्वीकार नहीं करेंगे।’ प्रो. चक्रवर्ती के मुताबिक, ‘BJP ने बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार और मुर्शिदाबाद दंगों जैसे मुद्दे उठाए हैं। 2021 में BJP को लगभग 94% और 2024 के लोकसभा चुनाव में 95% हिंदू वोट मिले। इसमें बहुत ज्यादा बढ़ोतरी की संभावना नहीं दिख रही है।’ ………………………..पश्चिम बंगाल चुनाव पर ये ग्राउंड रिपोर्ट भी पढ़ें… हिंदू बाप-बेटे को काट डाला, बंगाल में चुनावी मुद्दा नहीं 11 अप्रैल 2025 को वक्फ संशोधन कानून के विरोध में मुर्शिदाबाद के जाफराबाद में रैली निकाली गई। बेकाबू भीड़ ने पारुल के पति हरगोविंद दास और बेटे चंदन को घर के सामने ही काट डाला। जाफराबाद में लोग इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बता रहे हैं और TMC को हटाने की बात कर रहे हैं, जबकि यहां से 142 किमी दूर मालदा में इसकी चर्चा भी नहीं है। पढ़ें पूरी खबर...

दैनिक भास्कर 16 Apr 2026 4:59 am

‘तौसीफ बोला- शिव भगवान नहीं, ब्रह्माजी को गाली दी’:हनीमून की डिटेल पूछता, प्राइवेट पार्ट घूरता; TCS केस में अब तक कितने खुलासे

‘मई 2025 की बात है, मैंने सोमवार का व्रत रखा था। तभी तौसीफ अत्तार पास आया और मेरे टेबल पर रखी महादेव की मूर्ति देखकर बोला कि क्या ये सच में भगवान हैं। अगर पार्वती ने गणेश को जन्म दिया, तो इन्हें क्यों नहीं पता था। फिर हंसने लगा। वो अक्सर हिंदू धर्म और देवी-देवताओं का मजाक उड़ाता था। एक दिन उसने कहा कि ब्रह्मा ने अपनी बेटी के साथ गलत काम किया था।‘ ‘तौसीफ ऑफिस में बिजनेस प्रोसेस लीडर है। हम एक टीम में नहीं थे, फिर भी वो मेरे पास आता और निजी जिंदगी के बारे में बातें करता। पूछता कि क्या तुम्हारा बॉयफ्रेंड है। वो ऑफिस की लड़कियों को सिर से पैर तक घूरता और आंख मारता। मैंने सीनियर्स से शिकायत की, लेकिन कुछ नहीं हुआ, इसलिए पुलिस के पास जाना पड़ा।‘ ये आपबीती 25 साल की उस लड़की की है, जिसकी शिकायत के बाद नासिक पुलिस ने टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) के 7 अधिकारियों को गिरफ्तार किया है। 26 मार्च से 3 अप्रैल के बीच 9 महिलाओं ने FIR दर्ज कराई। उन्होंने कंपनी के मुस्लिम टीम लीडर्स और HR मैनेजर पर सेक्शुअल हैरेसमेंट समेत जबरन धर्म परिवर्तन जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं। नई फीमेल वर्कर्स को टारगेट कर ब्रेनवॉश का पैटर्न हमने जांच कर रही नासिक पुलिस की SIT के अफसर से बात की। उन्होंने बताया कि मामले के तार ह्यूमन ट्रैफिकिंग, धर्मांतरण और विदेशी फंडिंग से भी जुड़े हो सकते हैं। इसकी जांच हो रही है। आरोपियों के बैकग्राउंड और ऑफिशियल रिकॉर्ड्स देखे जा रहे हैं। पीड़ित महिलाएं महाराष्ट्र पुलिस की निगरानी में हैं। SIT से जुड़े सोर्स कहते हैं, ‘पहली FIR 26 मार्च को देवलाली कैंप पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई थी। इसके बाद 8 और महिलाओं ने शिकायत दर्ज कराई। इनके बयानों से यौन शोषण, जोर-जबरदस्ती और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का पैटर्न सामने आया है।‘ ‘ज्यादातर गवाही में पाया गया कि पीड़ित महिलाओं को पहले अलग-अलग तरीकों से अप्रोच किया गया। फिर नौकरी के दबाव, प्रमोशन और काम सिखाने के बहाने टारगेट किया गया। पुलिस ने बयानों के आधार पर TCS कंपनी के दानिश शेख, तौसीफ अत्तार, रजा मेमन, शाहरुख कुरैशी, आसिफ अंसारी, शफी शेख और अश्विनी चनानी को गिरफ्तार किया है। कंपनी की HR मैनेजर निदा खान अभी फरार हैं।’ 9 में से 3 महिलाओं की FIR मिली…पहली पीड़ितसीनियर पूछते- हनीमून पर कहां गई, क्या-क्या किया पीड़ित महिला ने 2 अप्रैल को नासिक के मुंबई नाका पुलिस स्टेशन में FIR कराई है। उसके मुताबिक, जून 2025 से 31 मार्च 2026 तक वो TCS ऑफिस में एसोसिएट थी। पति काम के सिलसिले में पुणे में रहते हैं। FIR में उसने बताया, ‘24 जून 2025 को मुझे 3 महीने के ट्रेनिंग प्रोग्राम में शामिल किया गया। रजा मेमन का मेरी ट्रेनिंग से कोई लेना-देना नहीं था, फिर भी वो मेरे पास आकर पर्सनल लाइफ के बारे में पूछते। कहते थे कि पति के साथ क्यों नहीं रहती, हनीमून पर कहां गई थी। वहां क्या किया, कैसे किया। रजा मेमन के साथ शाहरुख कुरैशी भी था।‘ ट्रेनिंग में आसिफ अंसारी भी अक्सर मेरे पास आ जाता। सटकर बैठता और गलत तरह से छूता। कभी जांघ या कंधे पर हाथ रख देता। एक दिन लंच के वक्त हाथ गोद में रख दिया। फिर बोला- अगर कोई फिजिकल नीड हो, तो बताओ, पूरा कर दूंगा। महिला ने बताया, ‘सीनियर तौसीफ अत्तार ने भी गलत बर्ताव किया। वो भी टीम में नहीं था, फिर भी पास आकर खाने के लिए पूछता। अश्लील तरीके में पूछता, 'क्या संतरे लाई हो। छोटे वाले लाई हो या बड़े वाले।' वो चेहरा सटाता और छूता था। जब सवाल किया, तो कहा, 'क्या तुम्हें आगे नहीं बढ़ना।‘ पीड़ित के मुताबिक, शाहरुख कुरैशी, रजा मेमन, आसिफ अंसारी, तौसीफ अत्तार और शफी शेख ने उसे फिजिकली और मेंटली टॉर्चर किया। हिंदू देवी-देवताओं को अपशब्द कहे, जिससे उसकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंची। उसने HR सेल में शिकायत की, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। तब उसने मुंबई नाका थाने में शिकायत की। दूसरी पीड़ित‘ईश्वर वही जो अदृश्य है, हिंदू देवी-देवता झूठे’ मुंबई नाका पुलिस स्टेशन पर दर्ज शिकायत के मुताबिक, जनवरी से दिसंबर 2025 तक उसका ऑफिस में यौन उत्पीड़न हुआ। महिला कंपनी में क्रेडिट कार्ड कस्टमर्स की शिकायतें सुनती थी। उसने बताया, ‘तौसीफ अत्तार अपने धर्म को ऊंचा दिखाता और हिंदू धर्म को नीचा। वो कहता कि सच्चा ईश्वर वही है, जो अदृश्य है। हिंदू धर्म में देवता दिखते हैं, इसलिए झूठे हैं।‘ ‘दिसंबर 2025 की बात है। मैं लंच के बाद छाछ पी रही थी, तभी तौसीफ आया और पूछा- ‘क्या पी रही हो?' मैंने कहा- 'छाछ पी रही हूं।' उसने अजीब नजरों से देखा और कहा- मेरे पास भी छाछ है, क्या पीना चाहोगी। ये कहते हुए उसने प्राइवेट पार्ट की ओर इशारा किया।’ तीसरी पीड़ितभगवान कृष्ण और शिव को लेकर गलत बातें कीं तीसरी FIR में पीड़ित ने बताया, ‘मैं दिसंबर 2024 में ऑफिस में थी। तब शफी शेख काम के बहाने पास आकर बैठ गया और जानबूझकर मेरे पैर से अपना पैर रगड़ने की कोशिश की। फिर मेरा कीपैड इस्तेमाल करने के बहाने गलत तरह से छुआ। मैंने कुर्सी दूर कर ली, तो हंसते हुए चला गया।‘ ‘फरवरी 2026 में तौसीफ ने मेरे धर्म को नीचा दिखाने की कोशिश की। उसने कहा कि कृष्ण ने 16 हजार महिलाओं से शादी की, इससे पता चलता है कि कृष्ण कैसे थे। क्या भगवान शंकर को ये नहीं पता था कि गणेश पार्वती के बेटे हैं। अगर नहीं पता था तो देवी पार्वती को बेटा कैसे हुआ। उन्होंने गणेश का सिर क्यों काट दिया।‘ 40 दिन के 'अंडरकवर ऑपरेशन' से खुलासा मामले की जांच कर रहे SIT चीफ और सहायक पुलिस आयुक्त संदीप मिटके कहते हैं कि नासिक पुलिस को जांच के दौरान अहम बातें पता चलीं। जांच टीम के एक सीनियर अफसर नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘फरवरी में कुछ लड़कियों ने हमसे गोपनीय तरीके से संपर्क किया। उन्होंने बताया कि कंपनी में बहुत खराब माहौल है, लड़कियां खुलकर बोलने से डर रही हैं। आरोपों की सच्चाई जानने के लिए हमने पुलिस कमिश्नर संदीप कार्णिक के निर्देश पर एक प्लान बनाया।‘ 7 महिला पुलिसकर्मियों को अंडरकवर तैनात किया गया। ये हाउसकीपिंग स्टाफ और बाकी छोटे पदों पर काम करने वाले कर्मचारियों के तौर पर कंपनी के अंदर गईं। ‘ऑफिसर्स ने 40 दिनों तक नजर रखी कि क्या आरोपी मीटिंग में या महिला कर्मचारियों के वर्क स्टेशन पर दुर्व्यवहार कर रहे थे। ये अंडरकवर ड्यूटी के बाद हर दिन सीनियर्स को अपडेट देती थीं।‘ जांच के दौरान एक महिला कर्मचारी ने 26 मार्च को देवलाली पुलिस स्टेशन में पहली FIR दर्ज कराई। उसने कंपनी के सीनियर अधिकारी पर रेप का आरोप लगाया। 2 अप्रैल तक कुल 9 केस दर्ज हुए। इनमें आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है। आरोपी स्टाफ सस्पेंड, TCS चेयरमैन बोले- केस परेशान करने वाला टाटा सन्स के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन ने कहा कि ये केस परेशान करने वाला है। हम पुलिस का सहयोग कर रहे हैं। TCS किसी भी तरह के उत्पीड़न और जबरदस्ती के प्रति लंबे समय से 'जीरो टॉलरेंस' अपनाता रहा है। इस मामले में भी कंपनी सख्त रुख अपना रही है। सरकारी वकील बोलीं- कंपनी की ऑपरेशंस हेड ने आरोपियों की मदद की पीड़ित पक्ष की सरकारी वकील किरण बेंडभर कहती हैं, ‘ये गंभीर मामला है, जिसमें पीड़ित के यौन उत्पीड़न और मानसिक उत्पीड़न के आरोप शामिल हैं। साथ ही आरोपियों ने वर्कप्लेस में कथित तौर पर आपत्तिजनक व्यवहार किया।‘ ‘जांच में पाया गया है कि कंपनी की ऑपरेशंस हेड ने POSH यानी यौन उत्पीड़न के लिए रोकथाम समिति की सदस्य होने के बावजूद शिकायत पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि आरोपियों की मदद की। इससे उनकी हिम्मत बढ़ी और वे दूसरी महिलाओं को भी परेशान करने लगे।‘ ………………ये खबर भी पढ़ें… कैप्टन बाबा के 58 अश्लील वीडियो, कहता था, ‘मैं शिव का अवतार, संबंध बनाओ, पवित्र हो जाओगी’ ‘शादी के बाद मुझे बेटा नहीं हो रहा था। ससुराल में ताने मिलते थे। तंग आकर मैं कैप्टन बाबा के पास गई। बाबा ने गारंटी दी कि तंत्र-पूजा से सब ठीक हो जाएगा। उन्होंने मुझे तांबे के लोटे से पानी पिलाया और कुछ खाने को दिया। थोड़ी देर बाद मेरा सिर घूमने लगा और शरीर सुन्न पड़ गया। इसी का फायदा उठाकर बाबा ने मेरा रेप किया और बोला- मैं शिव का अवतार हूं, मेरे साथ संबंध बनाकर तुम पवित्र हो गई हो।’ पढ़ें पूरी खबर...

दैनिक भास्कर 16 Apr 2026 4:59 am

पाकिस्तान: सरकारी अस्पताल में गंभीर लापरवाही बनी बच्चों में एचआईवी फैलने की वजह

एक नई जांच-पड़ताल वाली र‍िकॉर्ड‍िंग में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के एक सरकारी अस्पताल के बच्चों के वार्ड में 'गंभीर लापरवाही और गलत इलाज' का मामला सामने आया है।

देशबन्धु 15 Apr 2026 11:55 pm

अमेरिका के बिना होर्मुज मिशन की योजना बना रहा है यूरोप : रिपोर्ट

यूरोपीय देश अमेरिका और ईरान के बीच एक महीने से ज्यादा समय तक चले संघर्ष के बाद होर्मुज स्ट्रेट को लेकर एक योजना तैयार कर रहे हैं

देशबन्धु 15 Apr 2026 11:27 pm

मेलोनी का सख्त रुख, इटली ने इजरायल से रक्षा समझौता निलंबित किया

इटली सरकार का यह फैसला ऐसे समय आया है जब उसने हाल के हफ्तों में इजरायल की लेबनान में सैन्य कार्रवाई की खुलकर आलोचना की थी। इन हमलों में सैकड़ों लोगों की मौत और हजारों के घायल होने की खबरों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय में चिंता बढ़ा दी है।

देशबन्धु 15 Apr 2026 9:33 am

मध्य पूर्व संकट का सैन्य समाधान नहीं, शांति के लिए वार्ता जरूरी: संयुक्त राष्ट्र महासचिव

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने मध्य पूर्व की मौजूदा स्थिति पर चिंता जताई। उन्‍होंने कहा क‍ि संकट का कोई सैन्य समाधान नहीं है

देशबन्धु 15 Apr 2026 9:15 am

अमेरिका की मध्यस्थता में इजरायल और लेबनान के बीच उच्च स्तरीय वार्ता शुरू

अमेरिका की मध्यस्थता में इजरायल और लेबनान के बीच एक दुर्लभ और उच्च स्तरीय सीधी बैठक संपन्न हुई। बीते 30 वर्षों में यह पहला अवसर था जब दोनों देशों ने इस स्तर पर प्रत्यक्ष संवाद किया है।

देशबन्धु 15 Apr 2026 9:00 am

अमेरिका और ईरान के बीच दो दिनों में हो सकती है वार्ता, ट्रंप बोले- पाकिस्तान में बैठक की उम्मीद

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ सीधी बातचीत का दूसरा राउंड “अगले दो दिनों में” हो सकता है। यह एक संभावित डिप्लोमैटिक शुरुआत का संकेत है

देशबन्धु 15 Apr 2026 8:53 am

यूरोप के ऊर्जा संकट पर ट्रंप ने यूके की नीतियों पर उठाए सवाल, तेल उत्पादन बढ़ाने की सलाह

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने ऊर्जा नीति और यूरोप की स्थिति को लेकर तीखी टिप्पणी की है। ट्रंप ने यूके को अधिक तेल उत्पादन बढ़ाने और पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर ध्यान देने की सलाह दी।

देशबन्धु 15 Apr 2026 6:00 am

जब ममता के सिर पर रॉड मारी, लगा बचेंगी नहीं:बंगाल में जो आता है, क्यों छा जाता है; क्या अब बीजेपी की बारी है

साल 1990। अगस्त का महीना। ज्योति बसु की लेफ्ट सरकार ने बस का किराया बढ़ा दिया। विरोध में लोग सड़कों पर उतर आए। भीड़ को काबू करने के लिए पुलिस ने गोली चलाई और तीन लोग मारे गए। कांग्रेस ने हड़ताल का ऐलान किया। दक्षिण कोलकाता के हाजरा इलाके से मार्च निकालने की जिम्मेदारी मिली बंगाल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी को। ‘माय अनफॉरगेटेबल मेमोरीज’ में ममता लिखती हैं- ‘हाजरा में CPI(M) कार्यकर्ताओं की एक टुकड़ी पहले से मौजूद थी। जैसे ही हम आगे बढ़े, उन्होंने हमला कर दिया। सबसे पहले लालू आलम ने मेरे सिर पर लोहे की रॉड मारी। मैं खून से भीग गई। फिर कई और वार हुए। होश आया तो अस्पताल में थी। डॉक्टरों को लग रहा था कि मौत तय है, लेकिन मैं बच गई।’ इस घटना के 8 साल बाद 1998 में ममता ने कांग्रेस छोड़ दी और 1998 में तृणमूल कांग्रेस यानी TMC बनाई। 2011 में TMC ने 34 साल से जारी लेफ्ट सरकार को उखाड़ फेंका और तब से बंगाल की सत्ता पर ममता बनर्जी का ही राज है। जैसे बंगाली रसुगुल्ले की चाशनी कपड़ों पर गिर जाए, तो जल्दी छूटती नहीं है। वैसे ही बंगाल में एक बार जो सरकार में आता है, सालों तक टिकता है। आजादी के बाद से पश्चिम बंगाल में सिर्फ तीन पार्टियों ने सत्ता संभाली है। कांग्रेस ने 20 साल, CPI(M) ने 34 साल और TMC ने 15 साल। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक पैटर्न है। आज के इलेक्शन एक्सप्लेनर में इसी पैटर्न से जुड़े 2 सवालों को समझेंगे… पहला- आखिर बंगाल में जो आता है, लंबे वक्त तक छा क्यों जाता है? दूसरा- कांग्रेस, लेफ्ट, TMC के बाद क्या बंगाल में अब BJP की बारी है? पहले सवाल का जवाब इन 5 वजहों में छिपा है… वजह-1: बंगाल में सबसे बड़ा कैडर बेस कोलकाता के सीनियर जर्नलिस्ट प्रभाकर मणि तिवारी बताते हैं कि कोई पार्टी जब लंबे समय तक सत्ता में रहती है। तो उसका खासकर गांवों में संगठन मजबूत हो जाता है। पहले इसका फायदा लेफ्ट को मिला और आज TMC को। वजह-2: दिल्ली बनाम बंगाल का नैरेटिव सीनियर जर्नलिस्ट प्रभाकर मणि तिवारी बताते हैं कि पश्चिम बंगाल के लोगों के दिमाग में ‘बंगाली अस्मिता’ सबसे अहम है। वे अपना हीरो बनाना जानते हैं। चाहे वो रविंद्रनाथ टैगोर हों या सुभाष चंद्र बोस। या फिर कोई हीरो या खिलाड़ी।’ वजह-3: पर्सनैलिटी कल्ट यानी चेहरे को चुनता है बंगाल बंगाल के चुनाव हमेशा एक चेहरे के इर्द-गिर्द घूमते हैं… पश्चिम बंगाल की सीनियर जर्नलिस्ट शिखा मुखर्जी बताती हैं, 'पश्चिम बंगाल में सारे चुनाव चेहरे पर लड़े जाते हैं। आजादी के बाद कांग्रेस के पास आंदोलन से निकले नेता थे, जिसके चलते कांग्रेस ने 20 साल तक सत्ता संभाली। फिर लेफ्ट के ज्योति बसु का कल्ट बना। इसके बाद ममता बनर्जी TMC का चेहरा हैं। पिछले कुछ चुनावों से ममता के सामने लेफ्ट या कांग्रेस के पास कोई चेहरा नहीं है।’ वजह-4: वोटबैंक की सटीक चुनावी इंजीनियरिंग वजह-5: बिखरा हुआ विपक्ष सीनियर जर्नलिस्ट शिखा मुखर्जी बताती हैं, 'बंगाल के ज्यादातर चुनाव बाइपोलर, यानी दो पार्टियों के बीच हुए हैं। जब कांग्रेस सत्ता में थी, तब लेफ्ट विपक्ष में था। फिर लेफ्ट सत्ता में आई, तो कांग्रेस विपक्ष में चली गई। TMC के आने के बाद भी पहले लेफ्ट, फिर कांग्रेस विपक्ष में बैठी। अब बीजेपी उसे टक्कर दे रही है। क्या कांग्रेस, लेफ्ट, टीएमसी के बाद अब बंगाल में बीजेपी की बारी है? 2016 में बीजेपी के पास बंगाल विधानसभा में सिर्फ 3 सीटें थीं। 2021 में 77 हो गईं। वोट शेयर 10% से 38% तक पहुंचा। यह छलांग कैसे लगी? पांच चीजें काम आईं- लेफ्ट-कांग्रेस का वोट बीजेपी की तरफ शिफ्ट होना, हिंदुत्व कार्ड, मतुआ समुदाय को CAA का वादा, RSS का जमीनी नेटवर्क और सुवेंदु अधिकारी जैसे TMC के बड़े नेताओं का पार्टी में आना। सुवेंदु अधिकारी की कहानी तो बंगाल की राजनीति में अलग ही अध्याय है। नवंबर 2020 में ममता के सबसे करीबी सिपहसालार ने इस्तीफा दिया। दिसंबर में अमित शाह ने मेदिनीपुर के मंच पर उनके गले में बीजेपी का गमछा डाला। TMC ने उन्हें 'मीरजाफर' कहा। ममता ने सीधे उनके गढ़ नंदीग्राम से चुनाव लड़ने का ऐलान किया। सुवेंदु ने जवाब दिया- अगर 50,000 वोटों से नहीं हराया, तो राजनीति छोड़ दूंगा। 2 मई 2021 को गिनती हुई। 16वें राउंड तक ममता 800 वोट आगे थीं। 17वें राउंड में पासा पलट गया। सुवेंदु 1956 वोटों से जीत गए। पहली बार किसी 'सिटिंग CM' ने अपनी सीट गंवाई। अब 2026 में सुवेंदु ने ममता के गढ़ भवानीपुर से पर्चा भरा है। बीजेपी की गणित सीधा है- 2021 में BJP ने 294 में से 77 सीटों जीतें थी और 75 सीटें सिर्फ 10% से कम मार्जिन से हारी थी। 2026 में इस बार BJP अगर TMC के 5% वोट शेयर भी अपने पाले में कर ले, तो मोटा-मोटी 77+75 यानी 152 सीटें जीत सकती है। यानी बहुमत के 148 सीटों से 4 ज्यादा। लेकिन रास्ता आसान नहीं है। सेफोलॉजिस्ट से नेता बने योगेंद्र यादव का आकलन है कि 2021 के मुकाबले जमीन पर बीजेपी कमजोर हुई है और SIR के बावजूद बीजेपी सरकार बनाने में कामयाब नहीं होगी। बंगाल का इतिहास बताता है कि जब भी कोई पार्टी यहां सत्ता में आई, उसने दशकों तक राज किया। कांग्रेस 20 साल, लेफ्ट 34 साल। सीनियर जर्नलिस्ट सुमन भट्टाचार्य कहते हैं- ‘बंगाल के लोग बेहद वफादार होते हैं। एक बार पसंद कर लिया तो लंबे समय तक जिताते हैं। अगर बीजेपी एक बार ध्रुवीकरण में सफल हो गई, तो अगले 15-20 साल तक वह जीतती रह सकती है।’ लेकिन यह 'अगर' बड़ा है। बंगाल में हर जीतने वाली पार्टी की पांच खूबियां रही हैं- मजबूत कैडर, बंगाली अस्मिता का नैरेटिव, एक करिश्माई चेहरा, सटीक वोटबैंक, और बिखरा हुआ विपक्ष। बीजेपी के पास अभी इनमें से कुछ हैं, कुछ नहीं। सुवेंदु जैसा चेहरा है। RSS का नेटवर्क है। हिंदुत्व का नैरेटिव है। लेकिन गहरा जमीनी कैडर अभी भी TMC के मुकाबले कमजोर है। बंगाली अस्मिता का नैरेटिव अभी भी ममता के पास है। और ममता खुद एक ऐसा 'पर्सनैलिटी कल्ट' हैं, जिसका कोई विकल्प बीजेपी के पास नहीं। ------------ बंगाल चुनाव से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए… सोनिया ने 9 दिन इंतजार कराया, बागी हो गईं ममता: बंगाल में कभी 39% वोट पाने वाली कांग्रेस, 2.9% पर सिमटी; क्या जानबूझकर हार रहे राहुल 1952 में पहली बार पश्चिम बंगाल में चुनाव हुए। 238 में से 150 सीटें कांग्रेस ने जीतीं। लेफ्ट फ्रंट को 41 और जनसंघ वाले राइट ब्लॉक को 13 सीट मिलीं। पं. नेहरू और महात्मा गांधी के पर्सनल डॉक्टर रहे बिधान चंद्र रॉय मुख्यमंत्री बने। लगातार 20 साल और कुल 25 साल कांग्रेस सरकार में रही, लेकिन 1977 के बाद वो अपना सीएम नहीं बना पाई। अब कोई विधायक भी नहीं है। वोट शेयर भी सिमटकर 3% से कम हो गया। पूरी खबर पढ़िए…

दैनिक भास्कर 15 Apr 2026 5:08 am

1000 करोड़ की डील पर हुमायूं-BJP से दोस्ती कभी नहीं:बंगाल में बाबरी बनकर रहेगी, ओवैसी के नेता TMC से पैसा ले रहे

पहले ये वीडियो देखिए…’हुमायूं कबीर तू चोर है, दलाल है…’ वीडियो में दिख रहे शख्स हुमायूं कबीर हैं। सरेराह खुद को चोर कहने वाले से उलझ पड़े और उसके पीछे भागे। Video Courtesy- ABP हुमायूं को चोर क्यों कहा, ये वीडियो देखिए… ’मैंने शुभेंदु अधिकारी से बोला कि मुझे पैसा चाहिए, ये पूरा लक्ष्य 1000 करोड़ रुपए में पूरा होगा।’ इस वीडियो में हुमायूं BJP नेताओं के साथ एक हजार करोड़ रुपए की डील के बारे में बता रहे थे। 6 दिसंबर 2025 को मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में बाबरी मस्जिद का शिलान्यास करने के बाद हुमायूं को ममता ने पार्टी से निकाल दिया। इन सभी मसलों पर हुमायूं कबीर से सीधी बातचीत। पढ़िए पूरा इंटरव्यू… सवाल: आप कांग्रेस, TMC और BJP तीनों पार्टियों में रह चुके हैं, अब किस आधार पर वोट मांग रहे हैं?जवाब: 2016 में जब TMC ने टिकट नहीं दिया, तब मैं निर्दलीय चुनाव लड़ा। महज 17 दिन के चुनाव प्रचार में ही TMC को कमजोर कर दिया था। TMC काफी पीछे थी, इसलिए हुमायूं कबीर से पंगा लेने से पहले किसी भी पार्टी को सोचना चाहिए। मैं कोई फालतू आदमी नहीं हूं। अपने इलाके का जमीन से जुड़ा नेता हूं। भरोसा दिलाता हूं कि यहां लोग हुमायूं कबीर को देखकर वोट देते हैं। आपको ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी की रैली से ज्यादा ज्यादा भीड़ मेरी रैली में दिखेगी। सवाल: एक वायरल वीडियो में आप 1000 करोड़ रुपए की लेनदेन की बात कर रहे हैं। क्या मामला है?जवाब: किसी ने मुझे दिल्ली के एक पत्रकार से मिलवाया था। बीते साल दिसंबर में जब वो सिलीगुड़ी आए, तो मिलने का समय मांगा। 19 दिसंबर 2025 की बात है। मैंने उन्हें दोपहर 12 बजे बहरामपुर में मिलने के लिए बुलाया, लेकिन वो नहीं आ सके। फिर शाम 4 बजे उनका फोन आया और बोले कि दूर से आए हैं, अगर मुलाकात हो जाए, तो मैंने बुला लिया। शाम करीब 7 बजे वो घर आए। उनके साथ एक महाराज भी थे। मैं उन्हें नहीं जानता था। दोनों लगभग 51 मिनट बैठे। पत्रकार ने पूछा कि TMC ने आपको सस्पेंड कर दिया है, अब क्या करेंगे, कैसे राजनीति करेंगे। कांग्रेस में जाएंगे या कुछ और करेंगे। मैंने कहा कि 30 साल कांग्रेस, 7 साल TMC और 17 महीने BJP में रहा। अब किसी के अंडर काम नहीं करूंगा। मुलाकात के बाद से ही उनका फोन बंद है। अब बताइए वीडियो में हुए सवाल-जवाब अगर कोई बाहर जाकर बदल दे, तो क्या करें। अब जवाब तो मुझे ही देना है। सवाल: MP के CM मोहन यादव और असम के CM हिमंता से मुलाकात और बातचीत के आरोपों पर क्या कहेंगे?जवाब: मोहन यादव से कभी नहीं मिला, न कभी बात हुई। हिमंता से भी कोई बात नहीं हुई। जब तक जिंदा रहूंगा, कभी BJP और RSS के साथ नहीं मिलूंगा। यही मेरा एजेंडा है। मैं मुसलमानों के साथ गद्दारी नहीं करूंगा। मेरे लिए पहले कौम है, मुसलमान लोग हैं, उसके बाद राजनीति और पार्टी है। सवाल: वायरल वीडियो के बाद औवेसी ने आपसे समर्थन ले लिया, क्या वजह लगती है?जवाब: ओवैसी को बड़ा भाई मानता हूं। वे लंदन से पढ़े-लिखे बैरिस्टर है, सांसद हैं, इसलिए उनकी इज्जत करता हूं। उनकी पार्टी के स्टेट लीडर इमरान सोलंकी गड़बड़ी कर रहे हैं। कुछ और नेता भी TMC से मिले हुए हैं। ये अभिषेक और I-PAC के जरिए काफी पैसा लेते हैं। AIMIM का राष्ट्रीय प्रवक्ता आदिल हुसैन और प्रदेश अध्यक्ष इमरान सोलंकी दोनों बंगाली नहीं हैं। ये TMC से पैसे लेकर उसकी भाषा बोलते हैं। ओवैसी को इनकी जांच करानी चाहिए। सवाल: मतलब आप ये कहना चाहते हैं कि ओवैसी की पार्टी के लोग TMC से मिले हुए हैं?जवाब: हां, बिल्कुल। पहले ओवैसी ने 8 सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कही थी। फिर मुझसे बात करके 12 सीटें देने की गुजारिश की। फिर आदिल ने पैसे ले लिए और वो मुझसे 14 सीटें मांगने लगा। इस तरह ओवैसी की पार्टी बंगाल में कभी खड़ी नहीं हो सकेगी। सवाल: वीडियो वायरल होने के बाद क्या आपकी असदुद्दीन ओवैसी से कोई बात हुई?जवाब: नहीं, कोई बात नहीं हुई। पहले जब सीट बंटवारे को लेकर हमारी बात हो रही थी, तब मैंने डिप्टी CM का पद मांगा था। हालांकि उन्होंने सीधे CM बनाने की बात कही थी। वीडियो वायरल होने के बाद मैंने खुद उनसे बात करने की कोशिश की थी, लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया। अगले दिन मीडिया से पता चला कि उनकी पार्टी ने हमसे समर्थन वापस ले लिया है। सवाल: वायरल वीडियो आपका है या नहीं, सच क्या है?जवाब: वो मेरा ही वीडियो है, लेकिन AI के जरिए मेरी बातें बदली गई हैं। मैंने हाईकोर्ट में चैलेंज किया है। मेरा सवाल है कि जब वीडियो 19 दिसंबर को रिकॉर्ड किया गया, तो 5 महीने बाद अप्रैल में क्यों जारी किया गया। जब वो लोग (TMC) मेरा सामना नहीं कर पाए और लगा चुनाव हार जाएंगे, तो ऐसा वीडियो ले आए। सवाल: क्या बाबरी मस्जिद बनेगी, ये कितना बड़ा मुद्दा है? जवाब: बाबरी तो बनेगी, इसे न BJP रोक पाएगी और न TMC। अयोध्या में दोबारा बाबरी मस्जिद बनाने के लिए 5 एकड़ जमीन दी जानी थी, लेकिन ये अयोध्या से 15 किमी दूर दी गई। वहां मुस्लिम आबादी भी नहीं है। यहां (मुर्शिदाबाद) 72% मुस्लिम हैं, इसलिए यहां मस्जिद बनवा रहा हूं। ये इबादत की जगह है। इसके लिए हमने एक ट्रस्ट बनाया है। अभी चुनाव लड़ने की वजह से मैंने ट्रस्ट से इस्तीफा दे दिया है। सवाल: अगर बंगाल में TMC और BJP किसी को बहुमत नहीं मिला, तो आप किसे समर्थन देंगे?जवाब: इस बार किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिलने वाला है। इस स्थिति में दूसरी राजनीतिक पार्टियां मुझसे समर्थन मांगेंगी। सरकार बनाने के लिए जो मुझे सपोर्ट करेगा, उसी के साथ जाएंगे। …………………. ये खबर भी पढ़ें… हिंदू बाप-बेटे को काट डाला, बंगाल में चुनावी मुद्दा नहीं पश्चिम बंगाल में मुर्शिदाबाद ही नहीं, बीते 5 साल में मालदा, कूचबिहार, नादिया, झाड़ग्राम, बीरभूम और संदेशखाली में कई हिंसक घटनाएं हुईं। इन इलाकों में विधानसभा की कुल 76 विधानसभा सीटें हैं। इनमें से 54 सीटें TMC और 22 BJP के पास हैं। हिंसा का इन सीटों क्या असर है, पढ़िए पूरी खबर…

दैनिक भास्कर 15 Apr 2026 5:05 am

ईरान-अमेरिका तनाव के बीच शी जिनपिंग की पहल, शांति के लिए चार सूत्रीय फॉर्मूला पेश

शी जिनपिंग ने जोर देकर कहा कि किसी भी संघर्ष का स्थायी समाधान केवल संवाद और कूटनीति के जरिए ही संभव है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि दुनिया को दोबारा “जंगलराज” की ओर नहीं बढ़ना चाहिए, जहां ताकतवर देश अपनी शक्ति के बल पर फैसले थोपें।

देशबन्धु 14 Apr 2026 4:21 pm

होर्मुज में अमेरिकी नाकाबंदी को झटका, ईरान की अनुमति से चीनी टैंकर सुरक्षित गुजरा

रिपोर्ट्स के मुताबिक, “रिच स्टारी” नाम का चीनी मेथनॉल टैंकर ईरान की अनुमति लेकर होर्मुज स्ट्रेट से गुजर गया। इस जहाज पर करीब 2.5 लाख बैरल मेथनॉल लदा था, जिसे संयुक्त अरब अमीरात के हमरिया पोर्ट से लोड किया गया था।

देशबन्धु 14 Apr 2026 11:53 am

होर्मुज पर अब ट्रंप-जिनपिंग आमने-सामने, चीन की अमेरिका को दो टूक- हमारे मामलों में न दे दखल

चीन के रक्षा मंत्री एडमिरल डोंग जून ने अमेरिका को चेतावनी जारी की। उन्होंने साफ कहा कि ईरान के साथ चीन के द्विपक्षीय व्यापार और ऊर्जा समझौतों में किसी भी तरह का बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जाएगा।

देशबन्धु 14 Apr 2026 8:31 am

ईरान को कभी परमाणु हथियार नहीं मिलेंगे : ट्रंप

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ईरान “परमाणु हथियार हासिल नहीं करेगा” और यह पुष्टि की कि अमेरिका ने नौसैनिक नाकाबंदी शुरू कर दी है क्योंकि वे तेहरान पर वार्ता में लौटने के लिए दबाव बना रहे हैं

देशबन्धु 14 Apr 2026 8:24 am

मध्यस्थ नहीं संदेशवाहक की भूम‍िका में था पाकिस्तान : र‍िपोर्ट

पाकिस्तान की अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका असल में किसी “मध्यस्थ” जैसी नहीं बल्कि एक “कुरियर” यानी संदेश पहुंचाने वाले की तरह थी

देशबन्धु 14 Apr 2026 8:21 am

यूएन प्रमुख की अपील: अमेरिका-ईरान संवाद जारी रहे

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत जारी रखने की अपील की है

देशबन्धु 14 Apr 2026 8:13 am

नाचती लड़की का हाथ पकड़ा और भगा ले गया लड़का:मैतेई लोगों में शादी की अनोखी परंपरा, पैदा होते ही बच्चे को खिला देते हैं नमक

शाम के 5 बजे हैं। एक सुनसान जगह पर कुछ लोग जमीन को चौकोर खोद रहे हैं। आसपास भीड़ है। आधे घंटे बाद खुदाई करने वालों को गड्ढे में कुछ नजर आया। कुछ पल बाद दो-तीन लोग उस गड्‌ढे में उतरे और एक लाश बाहर निकालकर रख दी। लाश के कई हिस्से कंकाल में तब्दील हो चुके हैं। इसके बाद सधे तरीके से लाश की खोपड़ी को धड़ से अलग कर दिया। भीड़ से एक लड़का शराब की बोतल लिए आगे आता है। कपाल को उठाता है और शराब से धोने लगता है। पास ही खड़ा दूसरा शख्स मंत्र जैसे कुछ बुदबुदाने लगता है। तभी भीड़ से एक और शख्स सफेद कपड़ा लेकर आगे आता है। घर वाले उसे शराब से धुले कपाल पर पगड़ी की तरह बांध देते हैं। इसके बाद कपाल को एक मटके में रख, पास में मौजूद पत्थर पर टिका दिया। इस पत्थर को लोग ‘लुफउनुंग’ कह रहे हैं। कुछ देर बाद खोपड़ी और धड़ को दोबारा वहीं गाड़कर मिट्टी समतल कर दी गई। दैनिक भास्कर की सीरीज ‘हम लोग’ में मैं मनीषा भल्ला इस बार लाई हूं मणिपुर के मैतेई समुदाय की कहानी। इनकी आबादी करीब 15 लाख है… जिस प्रक्रिया का मैंने ऊपर जिक्र किया वो मैतई समुदाय के अंतिम संस्कार की है। जो मौत के एक साल बाद यानी बरसी पर की जाती है। इसे फूरा कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि इससे मरे हुए व्यक्ति का आशीर्वाद बना रहता है। मैतई समुदाय को जानने के लिए मैं मणिपुर की राजधानी इंफाल के एक मोहल्ले- लैटोनजामखोरी में पहुंची हूं। शाम के 4 बजे हैं। सड़क पर सन्नाटा है। यहां एक घर के आंगन में कुछ लोग गोल घेरे में बैठे हैं। इनके बीच सफेद धोती-कुर्ता पहने एक पुरोहित उकड़ू बैठा है। उसने मुर्गे का मुंह कसकर पकड़ रखा है। मुर्गा छटपटा रहा है। आसपास के लोग टक-टकी लगाए देख रहे हैं। सबका ध्यान मुर्गे की टांगों पर है। कुछ ही देर में मुर्गा मर जाता है। पुरोहित मुर्गे को उठाकर एक लड़के को दिखाते हुए मैतेई में कहता है- 'देख, दोनों टांगें बराबर हैं… मतलब तुम्हारी शादी में आ रही अड़चन दूर हो जाएगी।’ इतना सुनते ही लड़का और उसके पास बैठे लोग राहत की सांस लेते हैं। पुरोहित फिर समझाता है- 'अगर मुर्गे की दाहिनी टांग ऊपर होती तो बहुत शुभ होता…और बायीं टांग ऊपर होती तो अशुभ। लेकिन दोनों बराबर हैं… यानी मुश्किल है, पर समाधान भी है।’ मेरे साथ मणिपुर के कल्चरल एक्टिविस्ट लैरेल्लाकपम इबोम्चा मैतेई हैं। बताते हैं- ‘ये येनखौंगतंबा है। यहां ‘येन’ मतलब मुर्गा, ‘खौंग’ मतलब पंजे और ‘तंबा’ यानी देखना… यानी मुर्गे के पंजों से किस्मत देखना।’ करीब 20 मिनट बाद हम इंफाल के दूसरे मोहल्ले में पहुंच जाते हैं। मोहल्ले में रंग-बिरंगी रोशनी है। लोग धीरे-धीरे एक जगह जमा हो रहे हैं। यहां कुछ कुर्सियां रखी हैं। सामने एक स्टेज है… जिस पर सफेद कपड़ों में दो पुरोहित बैठे हैं। पुरोहित पोटसछंग मौरोलैर मैतेई और निंथउजम कोकिल मैतेई माइक संभालते हैं और एक कहानी सुनाते हैं। स्टेज पर कलाकार इन कहानियों पर अभिनय करते हैं। वे कभी जोश से भर जाते हैं तो कभी भावुक होकर रुक जाते हैं। पुरोहित बता रहे हैं- ‘मणिपुर में 1562 के आसपास मैतेई राजा मोंगजांबा हुआ करते थे। घुड़सवारी में माहिर और बेहद बहादुर। उसी दौर में चीन का एक राक्षसी राजा था, जो हर दिन यहां के 10 इंसान और 10 जानवर मारकर खा जाता था। पूरा इलाका उससे खौफ में था।’ पुरोहित इशारे से बताते हैं- परेशान लोग अपने राजा के पास जाकर कहते हैं- अब इसका अंत जरूरी है। इसके बाद राजा ने एक बड़े चाकू से चीनी राजा को मार गिराया। यह कहानी यहां हर हफ्ते इस किस्सागोई डांस में दोहराई जाती है। इसमें कलाकार मैतेई राजाओं की बहादुरी के किस्सों पर अभिनय करते हैं। घर के कोने में महज एक दीवार इनका मंदिर होती है इसके बाद मैं कल्चरल एक्टिविस्ट इबोम्चा के घर पहुंची। घर के कोने में एक अलग सी दीवार है। उस पर कुछ फल रखे हैं। वे बताते हैं- ‘यही हमारा मंदिर है। मैतेई भाषा में इसे सनामहिस्म कहते हैं। इससे बुरी आत्माएं नहीं आतीं।’ मैं बात कर ही रही थी, तभी इबोम्चा के परिवार ने खाना परोस दिया। खाने में चिकन, बतख का मांस और चावल थे। साथ में कबोक, क्वा, थोईथिंग और हमईबोन नाम की सब्जियां भी परोसी गईं। मैंने खाना खाया। रात धीरे-धीरे गहरा रही थी, इसलिए मैं होटल लौट आई। सुबह मैं इबोम्चा के साथ कार से पूर्वी इंफाल के खुर्रई पुथीबा लैईकई गांव के लिए निकल गई। यह गांव करीब 35 किलोमीटर दूर था। गांव में सबसे पहले दो छोटे-छोटे प्राकृतिक झरने दिखाई दिए। मैतेई भाषा में इन्हें थुमखौंग कहते हैं। मैं कार से उतर कर झरनों के पास पहुंची। यहां पानी पीया तो यह नमकीन जैसा लगा। इबोम्चा ने बताया ये मैतेई समुदाय की परंपराओं की लाइफलाइन है। हम फिर कार में सवार हो गए। आधे घंटे के बाद पुथीबा लैईकई गांव पहुंचे। यहां मेरी मुलाकात जोशिता चानू से हुई। मैंने उनसे झरने के पानी का जिक्र किया। वे बताती हैं- ‘हम इन झरने के नमकीन पानी को मटकों में इकट्ठा करते हैं। फिर इसे लैरंग, यानी भट्ठी पर रखी टिन के बने कनस्टर में डालकर उबालते हैं। धीरे-धीरे नमक ऊपर आता है। इसकी प्लेट्स बनाकर सुखाई जाती है। फिर इन्हीं प्लेट्स को बारीक करके थुम, यानी नमक बनाया जाता है। तैयार नमक को बाजार में भी बेचा जाता है। यह काम यहां कई परिवार करते हैं।' पैदा होते ही बच्चे को चटाया जाता है नमक जोशिता बताती हैं- ‘जब बच्चा पैदा होता है तो उसे यह नमक चटाया जाता है। मरने पर भी इसे शव की जीभ पर रखा जाता है। शादी-ब्याह समेत हर त्योहार में यह अनिवार्य है।’ वे हमें एक और मैतेई इंग्सींबिराक्सी गांव ले जाती हैं। यह गांव करीब 30 किलोमीटर दूर है। गांव में दाखिल होते हैं, नजर पड़ती है सफेद रंग के पापड़ के आकार की चीजों पर, जो सुखाई जा रही हैं। जोशिता बताती हैं- ‘यहां चावल को फर्मेंट किया जा रहा है। इससे एक लोकल शराब बनाई जाएगी, जिसे हमई कहते हैं। पांच दिन में यह तैयार हो जाती है।’ वे बताती हैं कि- ‘हमारे यहां महिलाएं शराब नहीं पीतीं।’ इसके बाद हम यहां से पास ही के एक और गांव एंग्सीनबीराकसी पहुंचते हैं। यहां मल्लयुद्ध होने वाला है, जिसे देखने के लिए भीड़ जमा है। मैतेई भाषा में इसे लोग यूबी लकपी कह रहे हैं। इसमें हिस्सा लेने वाले युवक अपने शरीर पर तेल लगाकर तैयार हैं। सात-सात खिलाड़ियों वाली दो टीमें हैं। इसमें खिलाड़ियों को एक-दूसरे से नारियल छीनना होता है। नारियल पर भी इतना तेल लगा दिया जाता है कि खिलाड़ियों के हाथ में न आए। जीतने वाले को सफेद कपड़ा और कुछ पैसे दिए जाते हैं। हालांकि, शाम गहरा रही थी, इसलिए मल्लयुद्ध देखे बिना ही हम इंफाल के लिए रवाना हो जाते हैं। मैतेई लड़के-लड़कियां भागकर करते हैं शादी अगले दिन इंफाल में मैं एंथ्रोपॉलोजिस्ट शाकमाचा सिंह के पास पहुंची। वे बताते हैं मैतेई समाज में शादी की रस्म अलग है। आमतौर पर यहां लड़का-लड़की घर से भागकर शादी करते हैं। इस रस्म के लिए होली की रात गांव के बाहर एक त्योहार थाबलचोंग्बा मनाया जाता है। इसमें लड़कियां गोल घेरे में डांस करती हैं। इसी दौरान कोई लड़का उनमें से एक लड़की को चुनता है। फिर वह लड़की का हाथ पकड़ लेता है। पास ही बैठे लड़कियों के माता-पिता इसे ध्यान से देख रहे होते हैं कि उनकी बेटी का हाथ किस लड़के ने पकड़ा। हाथ पकड़ना माना जाता है कि वह लड़का इस लड़की से शादी करना चाहता है। इसके बाद वह लड़का, लड़की से मिलने के लिए गांव आता है। दोनों को मिलने-जुलने के लिए पूरा समय और निजी जगह दी जाती है, ताकि वे एक-दूसरे को अच्छी तरह समझ सकें। लड़की के परिवार वाले भी नजर रखते हैं कि वह लड़का कौन है? कैसा है? अगर परिवार को लड़का ठीक नहीं लगता तो वे अपनी बेटी को उससे मिलने से रोक देते हैं। अगर लड़की और परिवार दोनों लड़के को पसंद कर लेते हैं तो लड़का, लड़की को भगाकर अपने घर ले जाता है। भागने के लिए लड़की की मंजूरी है जरूरी शाकमाचा बताते हैं- ‘जब लड़के के परिवार को पता चलता है कि उनका बेटा लड़की को भगाकर लाया है तो वे अपने बड़े-बुजुर्गों के साथ लड़की के घर पहुंचते हैं। उनके हाथों में नमक की थाली, फल और पान होते हैं। वहां पहुंचकर वे लड़की के परिवार से माफी मांगते हैं।’ इस दौरान लड़की भी साथ होती है। लड़की से पूछा जाता है- ‘क्या इस लड़के ने तुम्हें जबरदस्ती भगाया, या यह तुम्हारी मर्जी से हुआ?’ ऐसे में लड़की का जवाब मायने रखता है। अगर लड़की कह देती है कि लड़का उसे बहला-फुसला कर ले गया तो लड़के को तुरंत समुदाय और गांव से निकाल दिया जाता है। अगर लड़की अपनी सहमति बताती है तो दोनों की शादी तय हो जाती है। जलसा लाने का दिया जाता है न्योता शाकमाचा बताते हैं- 'जब शादी से दो दिन पहले बोर जातरा, यानी एक यात्रा होती है। इसमें लड़की के घर का सबसे छोटा लड़का कुछ लोगों के साथ दूल्हे के घर जाकर न्योता देता है कि- वह हमारे घर हाईचिंग पोट यानी जलसा लेकर आएं। इसके बाद लड़के के गांव की महिलाएं जलसा लेकर लड़की के घर जाती हैं। वे सिर पर बांस की एक टोकरी में गहने, फल और नमक की 5 प्लेट लेकर चलती हैं। इस टोकरी को फिंगारुख कहते हैं। इस जातरा की अगुवाई एक सुहागन महिला करती है, जिसके बच्चे हों और माता-पिता भी। इसके दो दिन बाद शादी होती है। मंडप में पहले लड़का दाखिल होता है, फिर लड़की। इसके बाद फेरे होते हैं। लड़की, लड़के को फूल देती है। लड़का, लड़की के गले में मफलर जैसा कपड़ा डालता है। ये कपड़ा तनखुल नगा समुदाय के हाथ का ही बना होना चाहिए। मैतेई लोग तनखुल नगा समुदाय को अपना भाई मानते हैं। इसके बाद दूल्हा, दुल्हन के भाइयों से पान के पत्ते की अदला-बदली करता है। फिर दोनों, बुजुर्गों से आशीर्वाद लेते हैं। यहां शादी की रस्म पूरी हो जाती है।' शाकमाचा बताते हैं- 'शादी होने के बाद लड़का, लड़की को साथ नहीं ले जाता। पहले लड़का अकेले ही अपने घर लौटता है। इसके कुछ घंटे बाद लड़की विदा होती है। ससुराल की चौखट पर बांस जलाकर धुआं किया जाता है। इस धुएं से होकर लड़का-लड़की के घर के अंदर दाखिल होते हैं। इसके पांच दिन बाद मंगानी चकोदा नाम की रस्म होती है, जिसमें पूरे खानदान और गोत्र को भोज दिया जाता है।' इस सीरीज में अगले हफ्ते पढ़िए ऐसे ही अनोखे कोया लोगों की कहानी…. ---------------------------------------------------- 1- 100 किलो का पत्थर उठाया, लड़की बोली- तुमसे करूंगी शादी:औरतें 5 पति भी रख सकती हैं, 1800 अनोखे ‘टोडा’ लोगों की कहानी सुबह की हल्की धुंध अभी पहाड़ियों से हटी नहीं है। घास पर जमी ओस चमक रही है। मैदान के किनारे जंगल में एक पुराने पेड़ के नीचे लोग जमा हुए हैं। इसी पेड़ के नीचे एक बड़ा इम्तिहान होने वाला है। पूरी कहानी यहां पढ़ें 2- शरीर के ऊपरी हिस्से पर कपड़े नहीं पहनतीं बोंडा महिलाएं:शादी ठुकराने पर लड़कीवालों का घर तोड़ देते हैं, मृत्युभोज में खाते हैं गाय का मांस सुबह करीब 10 बजे का वक्त। मिट्टी से लिपा-पुता एक कच्चा घर। बाहर सिर मुंडाए दो महिलाएं बैठी हैं। उम्र करीब 38-40 साल। ऊपरी बदन लगभग नंगा। बाकी शरीर पर नाम मात्र के कपड़े। छाती छिपाने के लिए मोतियों और कौड़ियों से बनी मालाएं। पूरी कहानी यहां पढ़ें

दैनिक भास्कर 14 Apr 2026 5:04 am

हिंदू बाप-बेटे को काट डाला, बंगाल में चुनावी मुद्दा नहीं:हिंसा वाली 76 सीटें, लोग बोले- पुलिस छिप जाती है, ममता बचातीं नहीं

पश्चिम बंगाल में मुर्शिदाबाद का जाफराबाद इलाका। शाम के करीब 5 बजे। पारुल दास रोज की तरह घर की चौखट पर बैठी थीं। पास में खंभे पर CCTV कैमरे लगे हैं। दीवार पर शमशेरगंज पुलिस का नंबर लिखा है। घर के आसपास सेना और BSF जवान तैनात हैं। 50 कदम दूर BSF की बख्तरबंद गाड़ी खड़ी है। सुरक्षा के ये इंतजाम एक साल पहले हुई हिंसा की वजह से थे। 11 अप्रैल 2025 को वक्फ संशोधन कानून के विरोध में यहां रैली निकाली गई। बेकाबू भीड़ ने पारुल के पति हरगोविंद दास और बेटे चंदन को घर के सामने ही काट डाला। बंगाल ही नहीं, देशभर में घटना का विरोध हुआ। राज्य में 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में विधानसभा चुनाव हैं। जाफराबाद में लोग इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बता रहे हैं और TMC को हटाने की बात कर रहे हैं, जबकि यहां से 142 किमी दूर मालदा में इसकी चर्चा भी नहीं है। मुर्शिदाबाद ही नहीं, बीते 5 साल में मालदा, कूचबिहार, नादिया, झाड़ग्राम, बीरभूम और संदेशखाली में कई हिंसक घटनाएं हुईं। इन इलाकों में विधानसभा की कुल 76 विधानसभा सीटें हैं। इनमें से 54 सीटें TMC और 22 BJP के पास हैं। ‘भीड़ ने पति-बेटे को मार दिया, सरकार से आज तक मदद नहीं मिली’ सबसे पहले हम पारुल दास से मिले। हमें देखते ही वहां कुछ और लोग कैमरा लेकर पहुंच गए। पूछने पर पता चला कि इंटेलिजेंस अफसर हैं और हमारी बातचीत रिकॉर्ड करने आए हैं। परिवार के साथ हुई घटना का जिक्र करते ही पारूल भावुक हो गईं। वे बांग्ला में कहती हैं, ‘आज भी पति और बेटे का इंतजार करती हूं। जानती हूं, वे नहीं आएंगे, लेकिन क्या करूं। भीड़ ने जिस तरह आंखों के सामने दोनों को काट डाला, वो मंजर आज भी सपने में आता है। हमें पुलिस और सरकार से न तब मदद मिली, न अब मिल रही है। जो कुछ भी किया, वो शुभेंदु अधिकारी ने किया। वही समय-समय पर मदद करते रहे हैं।‘ आपके घर पर कई पार्टियों के झंडे लगे हैं, क्या चुनाव में मदद का कोई वादा मिला? पारुल कहती हैं, ‘आसपास TMC वाले आते हैं, लेकिन हमारे यहां शुभेंदु अधिकारी के अलावा कोई नहीं आया।‘ पारुल अब बीड़ी बनाकर परिवार का खर्च चला रही हैं। वे कहती हैं, ‘अफसोस यही है कि पति-बेटे की हत्या के 13 दोषियों को सजा हुई, लेकिन फांसी नहीं मिली।’ ‘पार्टियां चुनाव में सिर्फ वोट मांगती हैं, मुसीबत में नहीं आतीं’जाफराबाद में हम कुछ और महिलाओं से मिले। हिंसा के सवाल पर वे कहती हैं, ‘हम खौफ के माहौल में जी रहे थे, लेकिन 24 घंटे BSF की तैनाती और CCTV कैमरे लगने से डर कम हुआ है।‘ चुनाव को लेकर उनका कहना है कि नेता बस वोट मांगने आते हैं, लेकिन मुसीबत पड़ने पर कोई नहीं पूछता। अबकी शांति बनी रहे इसलिए वोट करेंगे। ‘हिंदू-मुस्लिम कहकर भड़काती है BJP, TMC से सुरक्षा की उम्मीद नहीं’ इसके बाद हम मुर्शिदाबाद के घनश्यामपुर गांव पहुंचे। ये बॉर्डर वाला इलाका है। बांग्लादेश सिर्फ 4 किमी दूर है। यहां मिले सलीम हिंसा के मुद्दे पर कहते हैं, ‘अभी शांति है क्योंकि ममता अच्छी CM हैं। हिंसा के पीछे BJP का हाथ है। वही हिंदू-मुस्लिम करती है, इसलिए माहौल बिगड़ता है। हम सब मिलकर रहते हैं।‘ मुर्शिदाबाद के धुलियान में रहने वाले मनोरंजन घोष का कहना हैं, ‘पिछले साल 11 अप्रैल को वक्फ बिल को लेकर रैली निकलने की जानकारी थी, लेकिन उन्हीं लोगों ने हिंसा कर दी। यहां 33.21% हिंदू हैं, बाकी मुस्लिम हैं। इस बार TMC की सरकार बदल देंगे।‘ यहीं रहने वाले सुमन दास कहते हैं, ‘हिंसा वाले दिन पुलिस ने ही थाने पर ताला लगा दिया था। इस सरकार से सुरक्षा की उम्मीद कैसे करेंगे।‘ मालदा में हिंदू बोले- दंगों में थाने बंद करके छिप जाती है पुलिस मुर्शिदाबाद के बाद हम मालदा पहुंचे। यहां पिछले साल मोथाबाड़ी इलाके में रामनवमी से पहले हिंसा भड़की थी। पुलिस थाने के पास चौराहे पर जहां हिंसा हुई, वहां मस्जिद-मंदिर आसपास हैं। यहां ज्यादातर लोग कैमरे पर बात करने को राजी नहीं हुए, सिर्फ कृष्ण मंडल से बात हुई। वे कहते हैं, ‘रामनवमी के दिन पटाखे जलाए गए थे। हिंदुओं पर आरोप लगा कि उन्होंने मस्जिद के पास पटाखे फोड़े, जबकि ऐसा नहीं हुआ था। सैकड़ों की भीड़ ने दुकानों और घरों में तोड़फोड़ कर दी। सब लूट लिया। हम शिकायत भी नहीं कर सके क्योंकि हिंसा शुरू होते ही पुलिस खुद छिप गई थी। BSF जवानों के आने पर हालात काबू में आए। हम डर में जीते हैं, इसलिए इससे छुटकारा पाने के लिए वोट करेंगे।‘ नादिया, झाड़ग्राम और बीरभूम में तनाव, जवान तैनातअब बात बाकी हिंसा वाले इलाकों की। नादिया में राजनीतिक हत्या मुद्दा है और लोगों के बीच उसकी चर्चा भी है। यहां हाईवे से ही BSF तैनात नजर आती है। दूरदराज वाले इलाकों में भी जवान मौजूद हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि यहां हिंसा होती है, लेकिन उसे वोट में कन्वर्ट करना आसान नहीं है। बीरभूम के कई इलाकों में चुनाव से पहले तनाव का माहौल है। हमने जहां भी कैमरा ऑन करने की कोशिश की, लोगों ने यही पूछा कि किस पार्टी ने भेजा है। कोई भी बात करने को तैयार नहीं हुआ। यहां TMC मजबूत दिख रही है। वोटिंग और नतीजे वाले दिन हिंसा की आशंका को लेकर पुलिस मुस्तैद है। इधर, 74.06% हिंदू आबादी वाले कूचबिहार में जगह-जगह कमल के पोस्टर दिखे। यहां की 9 में से 7 सीटों पर BJP का कब्जा है और वो इस बार भी मजबूत दिख रही है। चुनाव पर हिंसा और तनाव का असर नहीं दिख रहा है। वहीं, झाड़ग्राम में चुनावी माहौल में होने वाली हिंसा को रोकने के लिए सुरक्षा बल लगातार फ्लैग मार्च कर रहे हैं। TMC, BJP और लेफ्ट के बीच कड़ा मुकाबला है। संदेशखाली में जमीन कब्जा करने और महिलाओं के उत्पीड़न के मामलों की चर्चा है, क्योंकि BJP इसे लेकर खास अभियान चला रही है। हालांकि, लोगों के बीच इसकी चर्चा नहीं है। एक्सपर्ट बोले- बंगाल में हिंसा आम बात, ये चुनाव में मुद्दा नहीं इस बार चुनाव में हिंसा मुद्दा है या नहीं, इस पर पॉलिटिकल एनालिस्ट प्रभाकर मणि तिवारी कहते हैं, ‘बंगाल चुनाव में हिंसा परंपरा बन चुकी है। मुर्शिदाबाद, बीरभूम और इसके आसपास के इलाकों में छोटी-बड़ी घटनाएं होती हैं, लेकिन मुद्दा नहीं बन पातीं। हावड़ा और हुगली में भी पहले कई बार हिंसा हुई, लेकिन चुनाव में कभी इसका असर नहीं दिखा।‘ हिंसा वाले इलाकों में कौन पार्टी मजबूत है? इस पर वे कहते हैं, ‘मालदा, गनी खान के समय से ही कांग्रेस का गढ़ रहा है। हालांकि, अब कई इलाकों में TMC ने घुसपैठ कर ली है। पिछले साल 4 सीटें BJP ने भी जीती। इसी तरह मुर्शिदाबाद में भी 22 में से 20 सीटें TMC के पास हैं, लेकिन दो सीटों पर BJP जीती है। बीरभूम और मुर्शिदाबाद में TMC मजबूत है। मालदा में भी एकाध सीट कांग्रेस जीत सकती है, इसके अलावा TMC ही मजबूत दिख रही है।‘ मुर्शिदाबाद के शमशेरगंज में चंदन हत्याकांड की काफी चर्चा है, चुनाव में इसका कितना असर होगा? प्रभाकर कहते हैं, ‘इसका ज्यादा असर नहीं होने वाला। अभी वहां TMC मजबूत है।‘ पॉलिटिकल एक्सपर्ट सुमन भट्टाचार्य का भी मानना है कि बंगाल में हिंसा होती है, लेकिन ये चुनावी मुद्दा नहीं बनती। खासकर मुर्शिदाबाद, मालदा और इसके आसपास के इलाकों में हिंसा आम बात है।‘ ममता बोली थीं- मुस्लिम हिंसा भी करेंगे, तो सपोर्ट करेंगेBJP प्रवक्ता बिमल शंकर नंदा कहते हैं, ‘ममता बनर्जी ने भी कहा था कि जो गाय दूध देती है, अगर वो लात भी मारेगी तो सहेंगे। उनके कहने का मतलब साफ है कि अगर इस समुदाय (मुस्लिम) के लोग हिंसा भी करते हैं, तो उसे सपोर्ट करेंगे।‘ वहीं, TMC प्रवक्ता रिजू दत्ता कहते हैं, ‘राज्य में लॉ एंड ऑर्डर की जिम्मेदारी हमारी है। अगर कभी हिंसा होती, तो हमारी ही जिम्मेदारी बनेगी। देश के PM और केंद्रीय गृह मंत्री बंगाल में आकर बोलते हैं कि सबका हिसाब होगा, कब्र से निकालेंगे। BJP ही हिंसा और खून खराबा कराती है।‘ …………….ये खबर भी पढ़ें… सोनिया ने 9 दिन इंतजार कराया, बागी हो गईं ममता पश्चिम बंगाल में लगातार 20 साल और कुल 25 साल कांग्रेस सरकार में रही, लेकिन 1977 के बाद वो अपना सीएम नहीं बना पाई। अब उसका कोई विधायक भी नहीं है। कभी 39% से ज्यादा वोट शेयर भी सिमटकर 3% से कम हो गया। आखिर पश्चिम बंगाल में सत्ता से दूर कैसे हुई कांग्रेस; इलेक्शन एक्सप्लेनर में पूरी कहानी…

दैनिक भास्कर 14 Apr 2026 5:02 am

ईरान पर नाकाबंदी: अमेरिका-इजरायल की नई रणनीतिक तालमेल

प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने एक सरकारी बैठक में कहा क‍ि लड़ाई हर समय जारी है। हम ईरान पर नौसैनिक नाकाबंदी लगाने के राष्ट्रपति ट्रंप के कड़े रुख का समर्थन करते हैं

देशबन्धु 13 Apr 2026 10:55 pm

ऑस्ट्रेलिया में पहली बार महिला बनीं आर्मी चीफ, 125 साल के बाद आया ये मौका; किसे मिली कमान?

रक्षा मंत्री रिचर्ड मार्ल्स ने लेफ्टिनेंट जनरल सुसान कोयले को देश की थल सेना का प्रमुख नियुक्त करने का ऐलान किया। 125 वर्षों के इतिहास में यह पहली बार है जब कोई महिला इस सर्वोच्च पद पर पहुंची है।

देशबन्धु 13 Apr 2026 11:56 am

ईरान संघर्ष के बाद बदला वैश्विक समीकरण: अमेरिका कमजोर, चीन-रूस को मिला रणनीतिक लाभ

इस संघर्ष का सबसे सीधा असर मध्य पूर्व में अमेरिका की भूमिका पर पड़ा है। दशकों से इस क्षेत्र में सुरक्षा गारंटर माने जाने वाले अमेरिका की विश्वसनीयता पर अब सवाल उठने लगे हैं।

देशबन्धु 13 Apr 2026 11:10 am

ट्रंप बनाम पोप लियो: ईरान नीति पर बयान से बढ़ा टकराव, दोनों के बीच तीखी जुबानी जंग

विवाद की शुरुआत तब हुई, जब पोप लियो ने अमेरिका की ईरान नीति और युद्ध को लेकर आलोचनात्मक रुख अपनाया। उन्होंने इस संघर्ष को “अन्यायपूर्ण” बताया और अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिकी प्रशासन की नीतियों पर सवाल उठाए।

देशबन्धु 13 Apr 2026 11:09 am

पूर्व अमेरिकी सेक्रेटरी ऑफ स्टेट की चेतावनी, 'रणनीतिक विफलता' की ओर बढ़ रहा है अमेरिका

वाशिंगटन की हालिया सैन्य सफलता भविष्य में बड़ी रणनीतिक समस्या बन सकती है

देशबन्धु 13 Apr 2026 9:16 am

अमेरिका-ईरान वार्ता विफल होने के बाद निक्की हेली बोलीं- तेहरान के साथ बातचीत समय की बर्बादी है

भारतीय मूल की रिपब्लिकन नेता निक्की हेली ने कहा कि अमेरिका का ईरान के साथ बातचीत से पीछे हटना सही था

देशबन्धु 13 Apr 2026 9:01 am

ट्रंप का दावा: ईरान बातचीत में पूरी तरह बेदम

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ने कहा है कि ईरान की सैन्य ताकत अब काफी कमजोर हो चुकी है और बातचीत में उसके पास अब कोई मजबूत विकल्प नहीं बचा है

देशबन्धु 13 Apr 2026 8:45 am

मुकुल चौधरी को क्रिकेटर बनाने पिता जेल गए:सबसे तेज गेंद फेंकने वाले अशोक शर्मा खेती करने लगे थे; IPL के 7 राइजिंग स्टार्स के किस्से

राजस्थान की राजधानी जयपुर से 80 किमी दूर रामपुरा कस्बा। अक्षय और अशोक नाम के दो भाई घर के आंगन में अक्सर क्रिकेट खेलते। बड़े भाई की गेंद कभी छोटे की छाती पर लगती तो कभी सिर पर। बदला लेने के लिए अशोक तेज गेंद फेंकने की खूब प्रैक्टिस करता। कुछ सालों में ही उसकी बॉलिंग का खौफ पूरे इलाके में फैल गया। घर में पैसों की तंगी थी। पिता खेती करके और अखबार बेचकर महीने के महज 10 हजार रुपए कमाते थे। इसलिए एक बेटे को ही एकेडमी भेज सकते थे। बड़े भाई ने कहा- तू खेल। अशोक ने जयपुर की अरावली क्रिकेट एकेडमी जॉइन कर ली। वहां कोच विवेक यादव खूब सपोर्ट करते। कोविड-19 में कोच की मौत हो गई तो अशोक ने एकेडमी और क्रिकेट दोनों छोड़ दिए। पिता के साथ खेतों में समय बिताने लगा। उसी अशोक शर्मा ने IPL के इस सीजन की सबसे तेज गेंद फेंकी है। स्पीड- 154.2 किमी/घंटे। IPL 2026 ने अभी 25% रास्ता ही तय किया है और अशोक शर्मा जैसे कई राइजिंग स्टार्स सामने आ चुके हैं; मंडे मेगा स्टोरी में ऐसे ही 7 खिलाड़ियों की सुनी-अनसुनी रोचक कहानी... ***** ग्राफिक्स: दृगचंद्र भुर्जी और अजीत सिंह -------- IPL से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए… IPL में कैसा खेल रहे टी-20 वर्ल्ड चैंपियंस:सैमसन ने शतक लगाया, चक्रवर्ती-बुमराह को विकेट नहीं मिल रहे; रिंकू, हार्दिक और अर्शदीप फ्लॉप IPL में 19वें सीजन के 18 मैच खत्म हो चुके हैं। भारत को टी-20 वर्ल्ड चैंपियन बनाने वाले 15 प्लेयर्स अलग-अलग टीमों में खेल रहे हैं। प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट संजू सैमसन ने शनिवार को ही शतक लगा दिया। उनके साथी अभिषेक शर्मा ने भी 74 रन की पारी खेली। पूरी खबर पढ़िए…

दैनिक भास्कर 13 Apr 2026 4:59 am

ईरानी संस्था का दावा, संघर्ष के दौरान मारे गए तीन हजार से ज्यादा लोग

ईरान संघर्ष के दौरान तीन हजार से ज्यादा लोगों के मारे जाने का दावा ईरान की एक संस्था ने किया है। इसमें महिलाओं के मुकाबले पुरुषों की संख्या ज्यादा है

देशबन्धु 12 Apr 2026 11:04 pm

गालिबाफ ने बताया आखिर क्यों विफल हुई इस्लामाबाद शांति वार्ता? कहा- अमेरिका पर भरोसा नहीं

वार्ता के खत्म होते ही ईरान के शीर्ष वार्ताकार और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने खुलकर अमेरिका पर निशाना साधा और बातचीत के असफल होने के लिए सीधे तौर पर वॉशिंगटन को जिम्मेदार ठहराया।

देशबन्धु 12 Apr 2026 4:29 pm

US-ईरान वार्ता फेल: क्या यह तेहरान की रणनीतिक चाल? बदलते समीकरणों में किसके हाथ में बढ़त

विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति दरअसल ईरान की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकती है, जिसमें वह सैन्य टकराव से ज्यादा कूटनीतिक दबाव और आर्थिक संतुलन का खेल खेल रहा है।

देशबन्धु 12 Apr 2026 4:17 pm

ईरान-अमेरिका तनाव बढ़ा: वार्ता विफल होने के बाद ट्रंप की सख्त चेतावनी, नौसैनिक नाकाबंदी का संकेत

ट्रंप द्वारा शेयर किए गए ‘Just the News’ के आर्टिकल में दावा किया गया है कि यदि ईरान अमेरिका की मांगें नहीं मानता, तो उसके खिलाफ नौसैनिक नाकाबंदी (Naval Blockade) लागू की जा सकती है।

देशबन्धु 12 Apr 2026 2:08 pm

आरएसएस-भाजपा संविधान को कमजोर करना चाहते हैं : राहुल गांधी

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने रविवार को 'रन फॉर अंबेडकर, रन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन' मैराथन की शुरुआत की

देशबन्धु 12 Apr 2026 10:19 am

अमेरिका-ईरान में 20 घंटे से ज्यादा हुई चर्चा, नहीं हुई कोई डील: जेडी वेंस

पाकिस्तान में ईरान और अमेरिका के बीच सीजफायर को लेकर 20 घंटे से भी ज्यादा समय तक बातचीत हुई, लेकिन कोई हल नहीं निकला

देशबन्धु 12 Apr 2026 9:59 am

भारत का 'विजन 2047' नीतियों पर आधारित : विनय क्वात्रा

अमेरिका में भारत के राजदूत विनय क्वात्रा ने टेक्सास में एक कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कहा कि 2047 तक 'विकसित राष्ट्र' बनने की भारत की यात्रा शैक्षणिक और नीतिगत विमर्श पर आधारित है

देशबन्धु 12 Apr 2026 9:49 am

मार्को रुबियो ने ईरान से जुड़े तीन व्यक्तियों के ग्रीन कार्ड रद्द किए

अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने तीन ईरानी नागरिकों का कानूनी स्थायी निवासी दर्जा खत्म कर दिया है। इन लोगों के ईरान की सरकार से जुड़े लोगों से संबंध बताए जा रहे हैं

देशबन्धु 12 Apr 2026 9:45 am

ईरान के साथ बातचीत के बीच ट्रंप ने किया अमेरिका की जीत का दावा

अमेरिका इस समय पाकिस्तान और ईरान के साथ इस्लामाबाद में आमने-सामने उच्च स्तर की त्रिपक्षीय बातचीत कर रहा है

देशबन्धु 12 Apr 2026 9:00 am

संडे जज्बात-मैंने नक्सली बने 20 अपनों को गोली मारी:अपनों पर गोली चलाना आसान नहीं था, लेकिन बम-धमाके में साथियों की मौत ने झकझोर दिया था

मैं शरतचंद्र बुरुदा हूं, ओडिशा के मलकानगिरी जिले के सरपल्ली गांव का रहने वाला। एक रिटायर्ड पुलिस अधिकारी हूं। 1990 के दशक के आखिर में जब मैंने पुलिस की नौकरी जॉइन की, तब ओडिशा के दंडकारण्य इलाके में नक्सलवाद अपने चरम पर था। आंध्र प्रदेश और ओडिशा की सीमा पर स्थित चित्रकुंडा इलाका उस वक्त नक्सलियों के एकतरफा कंट्रोल में था। 19 दिसंबर 1998 की रात, चित्रकुंडा थाने के अंतर्गत आने वाली मल्लिगुड़ा जुडाम पोस्ट पर नक्सलियों ने हमला कर दिया। हमले में पोस्ट पर तैनात सभी पुलिसकर्मी मारे गए। इसके बाद पुलिस प्रशासन चिंतित हो गया। हालात पर काबू पाने के लिए एक स्थानीय आदिवासी पुलिस अधिकारी की तलाश शुरू हुई, जो इलाके की भौगोलिक बनावट को अच्छी तरह जानता हो और स्थानीय भाषा समझता-बोलता हो। साथ ही नक्सलियों के बीच का आदमी हो। उस वक्त मैं ओडिशा के कोरापुट जिले में तैनात था। मुझे इस जिम्मेदारी के लिए सबसे बेहतर पाया गया और बुलाकर वहां तैनात किया गया। हालांकि, मैं वहां बिल्कुल नहीं जाना चाहता था, क्योंकि वह मेरा अपना इलाका था और वहां के लोग अपने थे। मैं सोच रहा था- अपने ही लोगों के सामने एक पुलिस अफसर बनकर कैसे खड़ा हो पाऊंगा? अगर गोली चलानी पड़ी, तो कैसे चलाऊंगा? एक तरफ ड्यूटी थी, तो दूसरी तरफ अपने लोग। आखिरकार, मैंने ड्यूटी को चुना। दरअसल, नक्सलियों ने चित्रकोंडा थाने के तहत 1962 में बने बालिमेला बांध के खिलाफ विरोध शुरू कर दिया था और इलाके में अपनी पकड़ मजबूत करने में जुट गए थे। उन्होंने आस-पास के गांवों और ओडिशा के दंडकारण्य क्षेत्र में लोगों को प्रशासन के खिलाफ भड़काना शुरू कर दिया। मजदूरों के अधिकार के नाम पर गांव वालों को अपने साथ जोड़ने लगे और धीरे-धीरे उन्हें नक्सल आंदोलन में शामिल करने लगे। बांध के खिलाफ उन्होंने एक तरह से संगठित मुहिम ही छेड़ दी। उस वक्त हमारी मल्लिगुड़ा पोस्ट पर कुल 35 सुरक्षा बल के जवान तैनात थे। वहां शौच की बड़ी समस्या थी- करीब 500 मीटर दूर एक नाले के पास जाना पड़ता था। साल 2001 की बात है। उस दिन हमारा एक सिपाही उसी नाले के पास शौच के लिए गया। वहां नक्सलियों ने उसे चारों तरफ से घेर लिया और उसे 28 गोलियां मारीं। यह हमला एक सुनियोजित साजिश के तहत किया गया था। दरअसल, नक्सलियों को उम्मीद थी कि एक सिपाही पर हमला होने की खबर मिलते ही बाकी सुरक्षा बल भी मौके पर पहुंच जाएगा और फिर हम सभी को जमीन में बिछाई अपनी एंटी-बारूदी सुरंग यानि लैंडमाइन से एक साथ उड़ा देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बीएसएफ ने हमें इस घटना की जानकारी दे दी थी। सभी पुलिस मुख्यालय अलर्ट हो गए थे। उसके बाद फोर्स के कमांडेंट, डिप्टी सुपरिंटेंडेंट, एंटी-नक्सल फोर्स और बाकी पुलिस अधिकारी मौके पर अलग-अलग हिस्सों में जाने के लिए तैयार हुए। वहां जाने के दो रास्ते थे- एक सड़क के जरिए और दूसरा मोटर लॉन्च के जरिए। हमने मोटर लॉन्च वाला रास्ता चुना। लेकिन उस पूरे रास्ते में नक्सलियों ने जगह-जगह लैंडमाइन बिछा रखी थीं। हम आगे बढ़ते रहे। जाते समय तो सब कुछ सामान्य लग रहा था, लेकिन लौटते वक्त अचानक रास्ते में बिछी बारूदी सुरंगें फटने लगीं। मेरी मोटर लॉन्च आगे निकल चुकी थी, इसलिए मैं और मेरे कुछ साथी बच गए। पीछे मुड़कर देखा, तो दिल दहल गया- पीछे आ रही हमारे साथियों की गाड़ियां एक-एक कर धमाकों में उड़ रही थीं। कुछ ही पलों में सब खत्म हो गया… सभी साथी मार दिए गए। उसके बाद नक्सलियों ने हमारा पीछा किया और हम पर फायरिंग शुरू कर दी। उस वक्त भागने के अलावा हमारे पास कोई रास्ता नहीं था। अगर मैं भावनाओं में बहकर साथियों के लिए वापस लौटता, तो जिंदा न बचता। उस दिन अपने साथियों को पीछे छोड़कर भागना मेरे लिए सबसे दर्दनाक फैसला था। उसके बाद कई दिनों तक नींद नहीं आई। आंखें बंद करता, तो वही मंजर सामने आ जाता- साथियों की मौत, धमाकों की आवाजें… सब कुछ। उस दौरान जब भी फील्ड में जाता, उन साथियों की याद बार-बार लौट आती। आज भी वही होता है। आज भी अगर मेरे पीछे अचानक कोई गाड़ी आती दिखती है, तो चौंक जाता हूं- एक पल के लिए लगता है, कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं। आखिर वह हमला मेरी जिंदगी का टर्निंग प्वाइंट बन गया। मैंने तय कर लिया कि अब नक्सलियों को नहीं छोड़ूंगा। अब तक मैं बातचीत का रास्ता अपना रहा था, लेकिन यह तरीका कारगर साबित नहीं हो रहा था। मैंने प्लान तैयार करना शुरू किया। मैं उन्हीं के बीच पला-बढ़ा था और उनका मुझ पर भरोसा था, इसलिए मैंने उसी भरोसे को ताकत बनाया। सबसे पहले उनके इलाकों में अपनी खुफिया टीमें तैयार करनी शुरू की और उन्हें अलग-अलग जगहों पर तैनात करना शुरू किया। वे टीमें मुझे नक्सलियों की हर गतिविधि की जानकारी देने लगीं- कौन कहां जा रहा है, किस इलाके में उनकी मौजूदगी है, वगैरह-वगैरह। हालांकि, भले ही रिटायर हो चुका हूं, फिर भी एनकाउंटर की पूरी रणनीति आपसे साझा नहीं कर सकता। यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला है। फिलहाल, उन जानकारियों के आधार पर मैं अपनी रणनीति तैयार करता और एक-एक करके उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू करता। उस दौरान हमने नक्सली बने अपने लगभग 20 लोगों का एनकाउंटर किया। यहीं से ओडिशा में नक्सलवाद के खात्मे की शुरुआत हुई। मैं जिस तरह एक के बाद एक एनकाउंटर कर रहा था, उससे नक्सलियों के निशाने पर आ गया। उन्हीं के बीच का आदमी था- उनकी चाल, उनका तरीका, सब जानता था… और शायद यही वजह थी कि वे भी मुझे किसी भी हालत में खत्म करना चाहते थे। कई बार तो मेरी पुलिस चौकी उड़ाने की कोशिश की। हर बार लगा कि अब बचना मुश्किल है… लेकिन किसी तरह बच जाता था। जब वह मुझे नहीं मार पाए तो मेरे परिवार को निशाना बनाने लगे। 2006 में उन्होंने सबसे पहले मेरे पिता जी को निशाना बनाया। वह एक गाड़ी से जा रहे थे। तभी, अचानक, नक्सलियों ने उनकी गाड़ी में विस्फोट कर दिया। धमाका इतना जोरदार था कि गाड़ी पलट गई। उस गाड़ी में सवार दो लोगों की मौके पर ही मौत हो गई… और मेरे पिता जी गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। लेकिन कहानी यहीं नहीं रुकी। इसके बाद भी मेरे परिवार के कई लोगों पर हमले हुए। कोई बुरी तरह घायल हुआ, कोई किसी तरह बचा। दरअसल, अब नक्सली मेरा हौसला तोड़ में जुट गए थे। वे जानते थे कि सीधे मुझ तक पहुंचना मुश्किल है… इसलिए उन्होंने मेरे अपने लोगों को ही निशाना बनाना शुरू कर दिया। इसी बीच… एक और घटना हुई, जिसने मुझे फिर से अंदर तक झकझोर दिया। एक लड़का जो कि कोई मुखबिर नहीं था। बस इलाके के एक गांव का जवान लड़का था। सीधा-सादा… और, सच कहूं, इंसानियत के नाते मेरी मदद कर रहा था। उस दिन वह मुझसे मिलने आया था। हम मिले, थोड़ी बात हुई… और फिर वह वापस अपने गांव लौट गया। मुझे क्या पता था कि यही मुलाकात उसकी जिंदगी की आखिरी मुलाकात बन जाएगी। रास्ते में… नक्सलियों ने उसे घेर लिया। उसे कोई मौका नहीं दिया। वहीं उसकी हत्या कर दी। जब मुझे ये खबर मिली… मैं कुछ पल के लिए बिल्कुल सन्न रह गया। एक ही बात दिमाग में घूमने लगी- क्या उसकी मौत की वजह मैं हूं? सच बताऊं, उस दिन पहली बार मुझे लगा कि ये लड़ाई सिर्फ मेरी नहीं रही… इसमें अब बेगुनाह लोग भी कुर्बान हो रहे हैं। दरअसल, जंगल में काम करते-करते ऐसा होता है। लोग आपके करीब आ जाते हैं। हर कोई मुखबिर नहीं होता… हर कोई खुफिया नहीं होता। कई लोग तो बस इसलिए मदद करते हैं क्योंकि वे इस हिंसा से परेशान होते हैं… क्योंकि वे चाहते हैं कि हालात बदलें। ऐसा नहीं है कि उस दौरान मैं केवल एनकाउंटर ही कर रहा था। मैंने कई नक्सलियों की गिरफ्तारियां भी कराईं और कई लोगों को आत्मसमर्पण भी करवाया। ऐसे ही एक नक्सली की कहानी है, जिसे मैं आज तक नहीं भूल पाया। मैंने एक बड़े नक्सली नेता को गिरफ्तार किया था। उसका नाम नहीं बता सकता। वह अपने ग्रुप का सी-कमांडर था। दरअसल, उसके घर में चोरी हो गई थी। वह बार-बार पुलिस स्टेशन जा रहा था, लेकिन उसे कोई मदद नहीं मिल रही थी। आखिरकार वह नक्सलियों के पास पहुंचा। नक्सलियों न सिर्फ उसका चोरी हुआ सामान बरामद करवाया, बल्कि हर तरह से उसका साथ दिया। जिसके बाद वह भी नक्सलियों बन गया। इसके अलावा नक्सल प्रभावित इलाकों में न तो ठीक से स्कूल हैं, न साफ पानी की व्यवस्था और न ही बाकी बुनियादी सुविधाएं। इन्हीं समस्याओं के नाम पर नक्सली लोगों को बरगलाते हैं और अपने गुट में शामिल करते हैं। लिहाजा, यही कहूंगा कि कुछ गलतियां हमारी भी हैं, जिनका नक्सली फायदा उठाते हैं। अगर इन चीजों को ठीक किया जाए, तो नक्सलवाद काफी हद तक अपने आप खत्म हो जाएगा। फिलहाल, आखिर में कहूंगा कि अपने काम से तो संतुष्ट हूं, लेकिन अपने ही लोगों के खिलाफ लड़ाई लड़ने का मुझे अफसोस भी है। न चाहते हुए भी उन पर गोलियां चलानी पड़ीं। (शरतचंद्र बुरुदा ने अपने ये जज्बात भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से साझा किए) ---------------------------------------- 1- संडे जज्बात-उन्होंने हेलिकॉप्टर से लाश भेजी, हम ट्रेनें भर देंगे:दिल्ली वालों ने पीट-पीटकर मार डाला मेरा बेटा, क्योंकि हमारी शक्ल अलग है मैं अरुणाचल प्रदेश के ईटानगर की रहने वाली मरीना नीडो हूं- नीडो तानिया की मां, जिसे दिल्ली में भीड़ ने पीट-पीटकर मार दिया। अगर ऐसी नफरत बढ़ती रही, तो किसी दिन हालात खतरनाक हो सकते हैं। हम बस इतना चाहते हैं कि- आप हमें समझिए। हम अलग दिखते हैं, लेकिन अलग नहीं हैं। हम भी इसी देश के हैं। मेरे बेटे को सिर्फ इसलिए मार दिया गया, क्योंकि उसका चेहरा आपसे अलग था। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- संडे जज्बात-पुलिस ने मेरे प्राइवेट पार्ट पर ईंट बांधी:सिर कुर्सी में बांधकर उल्टा टांगा, मैं वकील बनकर केस खुद लड़ा- 12 साल बाद जीता 18 साल की उम्र में पुलिस ने मुझे हत्या के मामले में आरोपी बना दिया। मैंने अपने केस की खुद पैरवी की और 12 साल बाद बाइज्जत बरी हुआ। अपना केस लड़ने के लिए लॉ किया और अब मैं एडवोकेट अमित चौधरी हूं। मेरठ बार एसोसिएशन का सदस्य भी हूं। मेरी जिंदगी पर जल्द ही एक फिल्म बन रही है, जो नेटफ्लिक्स पर रिलीज होगी। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें

दैनिक भास्कर 12 Apr 2026 4:57 am

करुणानिधि की सीट पर डेढ़ लाख उत्तर भारतीय, मारवाड़ी पार्षद:चेन्नई के राजस्थानी बोले- हम तमिल बोलते हैं, तमिलों को हिंदी सिखा दी

तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई की मिंट स्ट्रीट पर एक बाजार है- सौकार पेठ। यहां घूमते हुए एक महिला की आवाज सुनाई देती है- ‘भाया, यो केले कतो में दियो? थोड़ो सस्तो लगाओ, रोज रो काम है।’ राजस्थान में सुनी ये मारवाड़ी भाषा चेन्नई में सुनकर मैं चौंक जाता हूं। ज्यादा चौंकाने वाली बात ये कि फल बेच रहा लोकल तमिल शख्स हिंदी में जवाब देता है। मारवाड़ी बोल रही महिला का नाम निर्मला राजपुरोहित है। वे बचपन में ही मां के साथ चेन्नई आई थीं। अब इस परिवार की दूसरी पीढ़ी यहां रह रही है। निर्मला के पति का एक्सपोर्ट का बिजनेस है। सौकार पेठ इलाके में राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के करीब डेढ़ लाख लोग रहते हैं। हिंदी विरोध की राजनीति करने वाली DMK ने यहां से मारवाड़ी को पार्षद का टिकट दिया, वे जीते भी। तमिलनाडु में 23 अप्रैल को वोटिंग होनी है। इस बार भी मुकाबला DMK अलायंस और BJP+AIADMK के बीच है। 200 साल से रह रहे उत्तर भारतीय, करुणानिधि को दो बार जितायाब्रिटिश दौर में चेन्नई आधुनिक शहर की तरह बसना शुरू हुआ। पोर्ट सिटी होने की वजह से ये इलाका दक्षिण भारत में कारोबार का बड़ा केंद्र बना। राजस्थान और गुजरात के मारवाड़ी कारोबारी यहां आए और साहूकारी, यानी फाइनेंसिंग का काम करने लगे। इसी साहूकारी की वजह से इलाके का नाम सौकार पेठ पड़ गया। ये इलाका हार्बर विधानसभा सीट में आता है। 1977 से सिर्फ एक बार छोड़ दें, तो ये सीट DMK ही जीतती आई है। DMK चीफ रहे एम. करुणानिधि भी दो बार जीते। सिर्फ 2011 में AIADMK को जीत मिली। 2016 और 2021 में ये सीट DMK के पास ही रही। पीके शेखर बाबू यहां से विधायक हैं। इस बार भी DMK ने उन्हें ही टिकट दिया है। 2021 में BJP कैंडिडेट यहां दूसरे नंबर पर रहे थे। अब उत्तर भारतीयों की बातनागौर के अगरचंद बैलगाड़ी से 2200 किमी चलकर चेन्नई पहुंचे सौकार पेठ में हमारी मुलाकात अगरचंद मानमल परिवार से हुई। अगरचंद 1820 में राजस्थान के नागौर के कुचैरा गांव से बैलगाड़ी से चेन्नई आए थे। उस वक्त राजस्थान में अकाल पड़ा था। परिवार के पन्नालाल चौगड़िया बताते हैं कि मेरे पूर्वजों ने ईस्ट इंडिया कंपनी में भी नौकरी की थी। पन्नालाल का अभी फार्मा सेक्टर में करोड़ों का बिजनेस है। उनके मुताबिक, अगरचंद उत्तर भारत से चेन्नई पहुंचने वाले संभवत: पहले मारवाड़ी जैन थे। उनके बाद उत्तर भारत से कारोबारियों के आने का सिलसिला शुरू हो गया। अगली पीढ़ी में मानमल जी ने बिजनेस शुरू किया। इस परिवार ने मारवाड़ी जैनों को चेन्नई में बसने में मदद की। ‘हम खुद को नॉर्थ इंडियन नहीं कहते, तमिल बोलते हैं’पन्नालाल आगे बताते हैं, ‘अब हम खुद को नॉर्थ इंडियन नहीं बोलते। हमें यहां 200 साल हो गए हैं। चेन्नई में रहने वाले ज्यादातर तमिल इतने वक्त से यहां नहीं रहते। हमें जितनी अच्छी हिंदी आती है, उससे ज्यादा तमिल आती है।’ मुझे नहीं लगता कि नॉर्थ इंडियंस के लिए तमिलनाडु से ज्यादा सुरक्षित जगह कोई हो सकती है। DMK के करुणानिधि हों, या AIADMK के एमजी रामचंद्रन, वे हमारे दादाजी के पैर छूकर ही चुनाव प्रचार शुरू करते थे। भाषाई विवाद और इस पर होने वाली राजनीति पर पन्नालाल के बड़े भाई कहते हैं, 'मीडिया ये मुद्दा उछालती है। हमें इसकी वजह से कोई दिक्कत नहीं हुई। तमिलों के बीच रहते हुए कभी महसूस नहीं हुआ कि हम बाहर से हैं।’ DMK के सपोर्ट से पार्षद बने राजेश जैन, बोले- तमिल पर गर्व इस इलाके के पार्षद राजेश जैन हैं। वे मध्यप्रदेश के इंदौर के दोंदवाड़ा से रहने वाले हैं। वे बताते हैं, ‘10वीं तक पढ़ाई के बाद मैं 1987 में चेन्नई आ गया था। शुरू में चाय की दुकान में काम किया। फिर नौकरी की। नौकरी से मोहभंग हुआ, तो खुद का बिजनेस शुरू किया। अब रियल्टी और टेक्सटाइल का कारोबार करता हूं। करोड़ों का बिजनेस है।’ राजेश स्टालिन की पार्टी DMK से पार्षद चुने गए। वे चेन्नई के इकलौते उत्तर भारतीय पार्षद हैं। राजेश कहते हैं कि इससे पहले कभी तमिलनाडु की स्थानीय पार्टी ने उत्तर भारतीयों को सपोर्ट नहीं किया, लेकिन DMK ने मुझे टिकट दिया और मैं चुनाव जीतकर आया। DMK हिंदी विरोधी नहीं है, बल्कि तमिल भाषा पर गर्व करते हैं और ये उनका अधिकार है। बीकानेर से घूमने आए थे मनीष, फिर यहीं रह गए, अब तीन दुकानें राजस्थान के बीकानेर से चेन्नई आकर बसे मनीष पारिक की भी ऐसी ही कहानी है। वे बताते हैं, ‘2003 में दादा-दादी के साथ चेन्नई आया था। ये शहर पसंद आ गया। पहले छोटी-मोटी नौकरी की। 23 साल से चेन्नई में हूं। मेरी तीन दुकानें हैं। यहां के लोग बहुत अच्छे हैं। वे नॉर्थ की तरह बेवजह परेशान नहीं करते। चेन्नई आने के दो साल में ही मैंने तमिल सीख ली। अब तमिल में कस्टमर से डील करता हूं।’ निर्मला 53 साल से चेन्नई में, पहनावा अब भी मारवाड़ी मनीष की दुकान के पास हमें निर्मला राजपुरोहित मिलीं। वे 1973 में परिवार के साथ राजस्थान के जालोर से चेन्नई आई थीं। निर्मला बताती हैं, ‘राजस्थान तो पीछे छूट गया, लेकिन पहनावा हो या खाना-पीना, सब मारवाड़ी ही है।' 'मुझे तो आज तक भाषा या फिर किसी भी वजह से परेशान नहीं किया गया। यहां रात को 11 बजे भी निकलो, तो डर नहीं लगता। हमने तो यहां तमिलों को हिंदी और मारवाड़ी सिखा दी। हमारे घर में नाश्ता भी इडली-सांभर ही होता है।’ विकास के पिता 20 दिन के लिए आए थे, अब 20 हजार करोड़ रुपए की कंपनी सौकार पेठ में ज्वेलरी की सबसे बड़ी दुकान विकास मेहता की है। उनके दादा राजस्थान में मेथी दाने का कारोबार करते थे। एक बार विकास के पिता पेमेंट लेने चेन्नई आए थे। डीलर ने कहा कि पेमेंट में टाइम लगेगा। वे 20 दिन के लिए यहीं रुक गए। इसी दौरान एक सुनार के यहां काम करने लगे। मन लगा तो पूरा काम समझ लिया। 1971 में अपनी ज्वेलरी शॉप खोली। आज इस परिवार की जोहरी ज्वेलर्स नाम से 20 हजार करोड़ रुपए की कंपनी है। विकास की पढ़ाई चेन्नई में ही हुई है। वे फर्राटेदार तमिल बोलते हैं। कहते हैं कि धंधे में भाषा सीखना जरूरी है। तमिलनाडु में DMK+ Vs AIADMK, एक फेज में चुनाव असम और केरलम में वोटिंग हो चुकी हैं, पढ़िए यहां कौन आगे...1.असम में हिमंता आगे, 90 सीटें जीत सकता है NDA, कांग्रेस को 15-20 सीटों के आसार असम में फिर हिमंता सरकार बन सकती है। BJP और सहयोगी पार्टियां 90 सीटों पर आगे नजर आ रही हैं। 2021 में NDA को 75 सीटें मिली थीं। कांग्रेस को 15 से 20 सीटें मिलने के आसार हैं। बदरुद्दीन अजमल की AIUDF, TMC और बाकी पार्टियों को 1 से 2 सीटें तक मिल सकती हैं। पढ़ें पूरी खबर... 2. केरलम में कांग्रेस+ को 70-80 सीटों के आसार, लेफ्ट को मिल सकती हैं 60 से 70 सीटें केरलम में 9 अप्रैल को 140 सीटों पर वोटिंग हो चुकी है। यहां लेफ्ट के गठबंधन LDF और कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF के बीच नेक टू नेक फाइट है। UDF को 70 से 80 और LDF को 60 से 70 सीटें मिल सकती हैं। BJP को 3 से 5 सीटें मिलने के आसार हैं। BJP लोकल बॉडी इलेक्शन में जीत के बाद भी 20 से 25 सीटों पर ही फाइट दे रही है। पढ़ें पूरी खबर...

दैनिक भास्कर 12 Apr 2026 4:53 am

बांग्लादेश में नियुक्तियों पर विवाद, रुमीन फरहाना ने बीएनपी सरकार पर साधा निशाना

बांग्लादेश की स्वतंत्र सांसद रुमीन फरहाना ने सत्तारूढ़ बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी सरकार पर अहम पदों पर पार्टी से जुड़े लोगों की नियुक्ति को लेकर तीखा हमला बोला है

देशबन्धु 12 Apr 2026 4:50 am