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राहुल गांधी सरकार को जवाबदेह बना रहे हैं: उमर

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने दिल्ली में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के विरोध-प्रदर्शन का समर्थन करते हुए कहा कि वह सरकार को जवाबदेह बना रहे हैं

देशबन्धु 22 Aug 2026 7:30 am

असम में क्यों हो रहा है इतना निवेश

लगातार बढ़ते विदेशी निवेश की वजह से आने वाले औद्योगिक बदलाव के कारण अब असम की वैश्विक पहचान 'चाय से चिप' तक बनाने वाले राज्य की बन रही है. लेकिन ये छवि चिंतामुक्त नहीं है

देशबन्धु 22 Aug 2026 12:44 am

मेरठ में पुलिस पर मारपीट के आरोपों से गरमाया मामला, DIG सहारनपुर करेंगे जांच

दिग्विजय भाटी का वीडियो वायरल, तत्कालीन SSP अविनाश पांडेय समेत पुलिसकर्मियों पर लगाए गंभीर आरोप; सपा विधायक अतुल प्रधान ने कार्रवाई की मांग की

देशबन्धु 21 Aug 2026 10:46 pm

चुनावी मुद्दों पर आक्रामक हुए राहुल गांधी

कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी इन दिनों एक ओर चुनावी मुद्दों को लेकर आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं, तो दूसरी ओर आगामी विधानसभा चुनावों से पहले विपक्षी गठबंधनों को मजबूत करने की कोशिशों में जुटे हैं

देशबन्धु 21 Aug 2026 10:40 pm

'वंदे मातरम' पर घमासान तेज, भाजपा और कांग्रेस नेता आमने-सामने

'वंदे मातरम' पर घमासान तेज, भाजपा और कांग्रेस नेता आमने-सामने

समाचार नामा 21 Aug 2026 10:14 pm

31 दिन बाद पैलेट गन केस में FIR! राहुल गांधी के धरने के बाद दिल्ली पुलिस ने मानी मांग

31 दिन बाद पैलेट गन केस में FIR! राहुल गांधी के धरने के बाद दिल्ली पुलिस ने मानी मांग

समाचार नामा 21 Aug 2026 6:40 pm

USCIRF बनाम RSS: आरोप, अधिकार-सीमा और भारत-अमेरिका संबंधों की अग्निपरीक्षा

अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) ने एक बार फिर भारत को लेकर अपनी कठोर भाषा तेज कर दी है।गत 20 अगस्त 2026 को RSS प्रमुख मोहन भागवत की प्रस्तावित अमेरिका यात्रा से ठीक पहले आयोग के अध्यक्ष आसिफ महमूद (मुस्लिम) और आयुक्त जीन मिल्स (ईसाई) ने RSS नेताओं को उच्चस्तरीय अमेरिकी मुलाकातों और रजनयिक सम्मान से दूर रखने तथा धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन के लिए जिम्मेदार पाए जाने वाले RSS सदस्यों पर प्रतिबंध लगाने की वकालत की। उल्लेखनीय है कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के 29 अगस्त 2026 को न्यूयॉर्क में Universal Oneness Celebrations में शामिल होने का कार्यक्रम है। यह आयोजन American Hindus for Engagement and Dialogue (AHEAD) कर रहा है। बता दें कि जहां USCIRF चेयरमैन आसिफ महमूद ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी RSS के सदस्य हैं और RSS को उन्होंने एक “umbrella organisation” बताया, जिसके कुछ सहयोगी संगठनों पर ईसाइयों और मुसलमानों सहित धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमलों में शामिल होने का आरोप लगाया। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि RSS प्रमुख मोहन भागवत अमेरिका आने वाले हैं। इसे भी पढ़ें: Mohan Bhagwat US Visit से पहले USCIRF ने फिर अलापा Anti India Narrative राग, RSS पर प्रतिबंध लगाने की उठाई माँग वहीं, USCIRF कमिश्नर जीन मिल्स ने कहा कि अमेरिकी सरकार को धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन के लिए जिम्मेदार पाए जाने वाले RSS से जुड़े लोगों पर targeted sanctions लगाने चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि RSS नेताओं को उच्चस्तरीय बैठकों या राजनयिक सम्मान की सुविधा नहीं दी जानी चाहिए, भले ही कोई RSS नेता भारत सरकार से संबद्ध हो। देखा जाए तो उन दोनों का यह बयान मार्च 2026 की USCIRF वार्षिक रिपोर्ट से अलग कोई मामूली टिप्पणी नहीं है, क्योंकि मार्च की रिपोर्ट में USCIRF ने भारत को फिर Country of Particular Concern (CPC) घोषित करने की अमेरिकी सरकार से सिफारिश की और RSS तथा R&AW जैसी भारतीय संस्थाओं/संगठनों के खिलाफ लक्षित प्रतिबंधों की अनुशंसा की थी। लेकिन यहीं से तथ्य और राजनीतिक व्याख्या को अलग करना जरूरी है। ऐसा इसलिए कि- पहला, USCIRF ने वास्तव में क्या आरोप लगाया? USCIRF का मूल आरोप यह है कि भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा, भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता के क्षरण की स्थिति गंभीर हुई है और सरकार ने कुछ मामलों में इसे रोकने के लिए पर्याप्त कार्रवाई नहीं की। लिहाजा 2026 की रिपोर्ट में आयोग ने भारत के संबंध में RSS को भी अपनी प्रतिबंध-संबंधी सिफारिश में शामिल किया। उसका तर्क RSS और उससे जुड़े संगठनों/समूहों पर धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा या दबाव से जुड़े आरोपों पर आधारित है। लेकिन तथ्य-जांच का महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि USCIRF की रिपोर्ट को यह साबित करने वाला न्यायिक फैसला नहीं माना जा सकता कि RSS या उसके प्रत्येक सदस्य ने धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन किया है। आयोग एक fact-finding और policy-recommendation body है, अदालत नहीं। यदि उसका रुख भारत विरोधी है तो इसके किसी भी सदस्यों या उनके संरक्षकों की भारत सम्बन्धी गतिविधियों को प्रतिबंधित कर देना चाहिए और पाकिस्तान व बंगलादेश में अल्पसंख्यकों की बद्तर स्थिति के बारे में उनकी राय पर सवाल पूछना चाहिए। दूसरा, क्या USCIRF ने RSS पर प्रतिबंध लगा दिया है? नहीं। यह सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है। USCIRF अमेरिकी सरकार की स्वतंत्र, द्विदलीय संघीय आयोग है, जिसे 1998 के International Religious Freedom Act के तहत बनाया गया था। उसका काम विदेशों में धार्मिक स्वतंत्रता की निगरानी करना और राष्ट्रपति, विदेश मंत्री तथा कांग्रेस को नीतिगत सिफारिशें देना है। इसलिए headlines में यदि यह कहा जाए कि अमेरिका ने RSS पर प्रतिबंध लगा दिया, तो वह तथ्यात्मक रूप से गलत होगा। जबकि सही बात यह है कि USCIRF ने अमेरिकी सरकार से RSS से जुड़े व्यक्तियों पर लक्षित प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की है। गत 20 अगस्त के बयान में भी आयोग ने प्रतिबंध लगाने की वकालत की है; यह स्वयं लागू किया गया अमेरिकी प्रतिबंध नहीं है। तीसरा, क्या USCIRF अमेरिकी विदेश नीति तय करता है? नहीं। यही उसकी अधिकार-सीमा की सबसे बड़ी सीमा है।USCIRF की सिफारिशें राष्ट्रपति, विदेश मंत्री और कांग्रेस के लिए प्रभावशाली इनपुट हो सकती हैं, लेकिन वे अपने-आप बाध्यकारी नहीं हैं। CPC का अंतिम सरकारी निर्धारण USCIRF नहीं करता; अमेरिकी व्यवस्था में संबंधित कार्यपालिका संस्थाओं की भूमिका रहती है। इसलिए USCIRF की रिपोर्ट को अमेरिकी न्यायिक निर्णय, अमेरिकी प्रतिबंध आदेश या भारत के खिलाफ अमेरिकी सरकार की अंतिम नीति के रूप में प्रस्तुत करना गलत होगा। चौथा, फिर भारत सरकार इतनी तीखी प्रतिक्रिया क्यों देती है? भारत ने मार्च 2026 की USCIRF रिपोर्ट को स्पष्ट शब्दों में खारिज किया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने USCIRF की भारत संबंधी प्रस्तुति को motivated and biased बताया और कहा कि आयोग वर्षों से भारत की स्थिति की distorted and selective तस्वीर पेश करता रहा है। भारत की आपत्ति का सार तीन स्तरों पर समझा जा सकता है: पहला—चयनात्मकता। इसके तहत भारत का तर्क है कि USCIRF घटनाओं को व्यापक भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक और संवैधानिक संदर्भ से अलग करके देखता है। दूसरा—स्रोतों की विश्वसनीयता। इसके तहत नई दिल्ली का आरोप है कि आयोग कई बार ऐसे स्रोतों और नैरेटिव पर निर्भर करता है जिन्हें भारत पक्षपाती या वैचारिक मानता है। तीसरा—सार्वभौमिकता। इसके तहत भारत यह स्वीकार नहीं करता कि किसी विदेशी आयोग को भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं और संवैधानिक व्यवस्था का अंतिम निर्णायक बनने दिया जाए। यह प्रतिरोध केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं है; भारत और USCIRF के बीच यह विवाद कई वर्षों से चला आ रहा है। USCIRF 2020 से भारत को CPC बनाए जाने की सिफारिश करता रहा है पांचवां, USCIRF की विश्वसनीयता का निष्पक्ष परीक्षण यहां अंध-समर्थन और अंध-विरोध—दोनों से बचना चाहिए। USCIRF कोई निजी NGO नहीं है। यह अमेरिकी कांग्रेस द्वारा स्थापित स्वतंत्र और द्विदलीय संघीय आयोग है। इसलिए उसकी रिपोर्ट को महज एक एनजीओ की राय कहकर खारिज करना भी तथ्यात्मक रूप से गलत होगा। लेकिन दूसरी ओर, उसकी रिपोर्ट को अंतिम सत्य मान लेना भी उचित नहीं। सवाल है आखिर ऐसा क्यो? क्योंकि USCIRF स्वयं policy recommendations देता है; वह न्यायालय नहीं है और उसके निष्कर्ष किसी आरोपी संगठन के खिलाफ स्वतः कानूनी दोषसिद्धि नहीं बनते। अतः सही पत्रकारिता यह होगी कि USCIRF को गंभीर स्रोत माना जाए, लेकिन उसके आरोपों को स्वतंत्र रूप से सत्यापित किया जाए। यही संतुलित तथ्य-जांच है। छठा, सबसे विवादास्पद बिंदु: RSS और हिंसा के बीच संबंध USCIRF का तर्क RSS और उससे जुड़े संगठनों के कथित व्यवहार को व्यापक धार्मिक स्वतंत्रता संकट के संदर्भ में रखता है। लेकिन यहां भी RSS, RSS से जुड़े संगठन, स्थानीय कार्यकर्ता और किसी घटना में आरोपी व्यक्ति को एक ही श्रेणी मान लेना विश्लेषणात्मक गलती होगी। किसी संगठन के किसी सदस्य या उससे जुड़े समूह पर आरोप लगना अपने-आप पूरे संगठन की कानूनी जिम्मेदारी सिद्ध नहीं करता। इसलिए पत्रकारिता का मूल प्रश्न होना चाहिए कि किस घटना में किस व्यक्ति पर क्या आरोप लगा? जांच किस एजेंसी ने की? अदालत ने क्या कहा? दोषसिद्धि हुई या नहीं? और उस व्यक्ति का RSS से संस्थागत संबंध किस स्तर का था? यही वह जगह है जहां USCIRF के व्यापक राजनीतिक निष्कर्षों की स्वतंत्र fact-checking आवश्यक हो जाती है। सातवां, क्या प्रधानमंत्री मोदी को RSS का सदस्य कहना तथ्यात्मक रूप से सही है? USCIRF के वर्तमान अध्यक्ष ने 20 अगस्त के बयान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को RSS का सदस्य बताया और RSS को BJP का ideological parent कहा। यहां भाषा का चुनाव महत्वपूर्ण है। नरेंद्र मोदी का RSS से गहरा और सार्वजनिक रूप से documented ऐतिहासिक संबंध है; वे RSS के प्रचारक रहे हैं और उनका राजनीतिक जीवन संघ की पृष्ठभूमि से निकला है। लेकिन वर्तमान औपचारिक सदस्यता और RSS से ऐतिहासिक/वैचारिक संबंध एक ही बात नहीं हैं। अतः मोदी का RSS से कोई संबंध नहीं कहना गलत होगा, लेकिन प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए RSS के औपचारिक संगठनात्मक सदस्य के रूप में कार्य कर रहे हैं कहना भी बिना स्पष्ट प्रमाण के अत्यधिक सरलीकरण होगा। आठवां, क्या यह महज धार्मिक स्वतंत्रता का मामला है? नहीं—इसमें कूटनीति भी स्पष्ट रूप से शामिल है। गत 20 अगस्त का बयान मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा से ठीक पहले आया है। USCIRF ने विशेष रूप से अमेरिकी सरकार से RSS नेताओं को उच्चस्तरीय बैठकों और राजनयिक सम्मान से दूर रखने की बात कही है। इससे विवाद का स्वरूप बदल जाता है। अब प्रश्न केवल यह नहीं है कि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति कैसी है, बल्कि प्रश्न यह भी है कि क्या अमेरिकी सरकारी प्रतिष्ठान RSS को भारत की राजनीति और समाज में उसकी भूमिका के कारण एक राजनीतिक actor की तरह treat करे या धार्मिक स्वतंत्रता के अपने मानकों के आधार पर अलग से scrutinize करे? यहीं से मामला भारत-अमेरिका संबंधों की संवेदनशील सीमा को छूता है। नौवां, भारत-अमेरिका संबंधों पर कितना असर पड़ेगा? मेरे आकलन में तत्काल रणनीतिक संकट की संभावना कम, लेकिन राजनीतिक friction बढ़ने की संभावना अधिक है। भारत और अमेरिका के संबंध अब केवल धार्मिक स्वतंत्रता के प्रश्न पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि इनमें शामिल हैं: Indo-Pacific और QUAD, चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला, रक्षा सहयोग, तकनीक और semiconductor supply chains, ऊर्जा और व्यापार, आतंकवाद-विरोधी सहयोग, critical minerals और वैश्विक supply chains आदि। इसलिए USCIRF की सिफारिश अकेले भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी को पटरी से उतारने की संभावना कम है। लेकिन यदि अमेरिकी कार्यपालिका USCIRF की सिफारिशों को व्यापक प्रतिबंध नीति में बदलती है, तब स्थिति गंभीर हो सकती है। दसवां, असली Red Line क्या होगी? इसे तीन स्तर पर अलग-अलग समझने होंगे। स्तर 1 — USCIRF की रिपोर्ट: राजनीतिक और कूटनीतिक दबाव। प्रभाव सीमित लेकिन मीडिया और कांग्रेस में महत्वपूर्ण। स्तर 2 — अमेरिकी प्रशासन द्वारा कुछ व्यक्तियों पर visa/financial restrictions: भारत-अमेरिका संबंधों में वास्तविक friction। स्तर 3 — RSS जैसी संस्था पर व्यापक अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंध अथवा भारत की रक्षा/रणनीतिक साझेदारी से जोड़कर punitive measures: यह कहीं अधिक गंभीर diplomatic confrontation पैदा कर सकता है। अभी उपलब्ध तथ्यों के आधार पर हम स्तर 1 पर हैं; इसलिए अमेरिका ने RSS पर प्रतिबंध लगा दिया कहना अतिशयोक्ति होगी। ग्यारहवां, भारत को क्या करना चाहिए? सबसे मजबूत जवाब केवल आक्रोश नहीं हो सकता, बल्कि भारत को तीन समानांतर मोर्चों पर काम करना चाहिए: पहला—तथ्य आधारित counter-narrative: जहां USCIRF का तथ्य गलत है, वहां घटना-दर-घटना जवाब दिया जाए। आप गलत हैं से अधिक प्रभावी होगा— यह आरोप है, यह उसका स्रोत है, यह जांच का परिणाम है और यह न्यायिक रिकॉर्ड है। दूसरा—अपनी संस्थागत पारदर्शिता मजबूत करना: यदि कहीं धार्मिक हिंसा, जबरन धर्मांतरण, मंदिर-मस्जिद-चर्च पर हमला या अल्पसंख्यकों के अधिकारों का उल्लंघन हुआ है तो दोषी के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए—चाहे आरोपी किसी भी राजनीतिक या सामाजिक विचारधारा से जुड़ा हो। यही भारत की अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता का सबसे मजबूत कवच होगा। तीसरा—Washington में राजनीतिक संवाद: भारत को अमेरिकी प्रशासन, कांग्रेस, think tanks और diaspora के साथ लगातार संवाद रखना चाहिए। क्योंकि USCIRF की राय और पूरी अमेरिकी विदेश नीति एक ही चीज नहीं हैं। # क्या भारत-अमेरिका संबंधों के लिए यह विरोधाभास वास्तविक कूटनीतिक संदेश पैदा करता है? सवाल है कि आखिर भारत के बारे में अमेरिकी संस्थाओं के रुख अलग-अलग क्यों दिखते हैं? क्योंकि इस विरोधाभास से भारत-अमेरिका संबंधों के निमित्त वास्तविक कूटनीतिक संदेश पैदा करता है। वह यह कि- एक, अमेरिका में विदेश नीति एक ही आवाज से नहीं चलती: व्हाइट हाउस, विदेश विभाग, व्यापार प्रतिनिधि (USTR), कांग्रेस और USCIRF जैसी संस्थाओं के अपने-अपने अधिकार, प्राथमिकताएं और राजनीतिक दृष्टिकोण हैं। इसलिए एक संस्था भारत को रणनीतिक साझेदार मान सकती है, जबकि दूसरी मानवाधिकार या धार्मिक स्वतंत्रता के मुद्दे पर कड़ी आलोचना कर सकती है। दो, रणनीतिक हित बनाम मूल्य-आधारित दबाव: भारत- अमेरिका के लिए Indo-Pacific, चीन की चुनौती, रक्षा, तकनीक, सप्लाई-चेन और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण साझेदार है। दूसरी तरफ USCIRF का मूल कार्य ही धार्मिक स्वतंत्रता की निगरानी और उस पर दबाव बनाना है। USCIRF की 2026 India page पर भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति को लेकर लगातार गंभीर चिंता दर्ज है। तीन, व्यापार में भी यही पैटर्न दिखाई देता है: व्यापार में भी यही पैटर्न दिखाई देता है, उदाहरण के लिए, 2026 में USTR ने भारत को कुछ कथित unfair trade practices के संदर्भ में निशाना बनाया और अतिरिक्त शुल्क की संभावना जताई, जबकि व्यापक रणनीतिक संबंध अपनी जगह चलते रहे। चार, भागवत प्रकरण में असली पेच: 20 अगस्त को USCIRF ने मोहन भागवत की प्रस्तावित 29 अगस्त की न्यूयॉर्क यात्रा से पहले RSS के सदस्यों पर targeted sanctions और RSS नेताओं को उच्चस्तरीय राजनयिक सम्मान न देने की मांग की है। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि यह USCIRF की मांग है, अमेरिकी सरकार का घोषित फैसला नहीं। यही अंतर इस पूरे घटनाक्रम को समझने की कुंजी है। पांच, क्या इससे भारत-अमेरिका संबंध सुधरेंगे? अल्पकाल में—नहीं, तनाव बढ़ने की संभावना अधिक है। यदि USCIRF जैसी संस्थाएं लगातार RSS, भारत की धार्मिक स्वतंत्रता और भारतीय संस्थाओं पर दबाव डालती हैं, तो नई दिल्ली में इसे भारत के आंतरिक राजनीतिक-सामाजिक मामलों में अमेरिकी हस्तक्षेप के रूप में देखा जा सकता है। भारत पहले भी USCIRF की रिपोर्टों को selective और distorted बताकर खारिज करता रहा है। लेकिन दीर्घकाल में इससे भारत-अमेरिका रणनीतिक संबंध टूटने की संभावना कम है, क्योंकि दोनों देशों के साझा हित बहुत बड़े हैं—विशेषकर चीन, Indo-Pacific, रक्षा, तकनीक, निवेश और वैश्विक सप्लाई-चेन। लिहाजा मेरा आकलन है कि इस पूरे घटनाक्रम को मैं “रणनीतिक साझेदारी बनाम मूल्य-आधारित अमेरिकी दबाव” के टकराव के रूप में देखता हूँ। इसमें अमेरिका की दुविधा यह है कि वह भारत को चीन के मुकाबले महत्वपूर्ण रणनीतिक शक्ति भी मानना चाहता है और भारत की घरेलू नीतियों पर अपना मूल्य-आधारित दबाव भी बनाए रखना चाहता है। वहीं, भारत की दुविधा उलटी है—वह अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी चाहता है, लेकिन अपनी राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था पर अमेरिकी संस्थाओं की निगरानी या टिप्पणी स्वीकार करने को तैयार नहीं है। इसलिए “रिश्ते सुधरेंगे या बिगड़ेंगे?” का सबसे सटीक उत्तर है—रिश्ते टूटेंगे नहीं, लेकिन उनमें अधिक लेन-देन वाली कूटनीति और अधिक सार्वजनिक खींचतान देखने को मिल सकती है। और भागवत प्रकरण इस बड़े सवाल को और तीखा करता है: क्या अमेरिका भारत को समान संप्रभु रणनीतिक साझेदार मानता है, या साझेदारी के साथ अपनी घरेलू राजनीतिक-वैचारिक शर्तें भी जोड़ना चाहता है? यही आने वाले महीनों का महत्वपूर्ण कूटनीतिक प्रश्न होगा। वस्तुतः, USCIRF को न तो अमेरिका का अंतिम फैसला समझना चाहिए और न ही उसकी हर रिपोर्ट को साजिश कहकर समाप्त कर देना चाहिए। और भारत को भी धार्मिक स्वतंत्रता के वास्तविक प्रश्नों पर आत्मसंतुष्ट नहीं होना चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ, किसी विदेशी आयोग द्वारा लगाए गए व्यापक आरोपों को बिना न्यायिक परीक्षण के RSS, भारत सरकार या करोड़ों भारतीयों के सामूहिक चरित्र का प्रमाण मान लेना भी गंभीर बौद्धिक त्रुटि होगी। USCIRF की शक्ति उसकी रिपोर्ट में है; उसकी सीमा यह है कि वह अदालत नहीं है। जबकि भारत की शक्ति उसकी संप्रभुता में है; उसकी चुनौती यह है कि उस संप्रभुता को लोकतांत्रिक संस्थाओं, कानून के शासन और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की विश्वसनीय रक्षा से लगातार प्रमाणित करना होगा। यहां सबसे बड़ा खतरा USCIRF की एक रिपोर्ट नहीं है, अपितु सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होगा जब भारत और अमेरिका इस विवाद को तथ्य-जांच और संवाद के बजाय परस्पर अविश्वास की स्थायी राजनीति में बदल दें। और सबसे बड़ी रणनीतिक भूल यह होगी कि धार्मिक स्वतंत्रता के प्रश्न को भारत-अमेरिका की व्यापक रणनीतिक साझेदारी का विकल्प बना दिया जाए। दिल्ली को Washington की हर आलोचना से डरने की जरूरत नहीं—लेकिन उसे हर आलोचना को तथ्य के तराजू पर तौलने की जरूरत जरूर है। इसी तरह Washington को भी यह समझना होगा कि भारत कोई ऐसा देश नहीं है जिसकी लोकतांत्रिक और संवैधानिक वैधता किसी विदेशी आयोग के प्रमाणपत्र से तय होगी। अंततः फैसला रिपोर्ट नहीं, तथ्य करेंगे; आरोप नहीं, प्रमाण करेंगे; और दबाव नहीं, लोकतांत्रिक संस्थाओं का आचरण भारत की वैश्विक साख तय करेगा। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 21 Aug 2026 5:07 pm

पंजाब में फिर साथ आएंगे अकाली दल-भाजपा, मजीठिया के बयान से गठबंधन की अटकलें तेज

पंजाब में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले अकाली दल और भाजपा के संभावित गठबंधन की अटकलें तेज हैं। बिक्रम मजीठिया और हरसिमरत कौर के बयानों से चर्चा बढ़ी।

देशबन्धु 21 Aug 2026 4:01 pm

'वंदे मातरम्' के अपमान से Congress के तुष्टिकरण की पोल खुली, Nehru से लेकर Rahul Gandhi तक एक ही पैटर्न?

एक बंगाली कहावत है - “मायेर स्तबेर अर्धेक ग्रहण, अर्धेक बर्जन, ए कैमन सन्तानेर भक्ति?” मातृभूमि के स्तुति गीत को आधा स्वीकारना और आधा त्यागना, यह किस प्रकार की संतान की भक्ति है? भद्र बंगाल की सौ वर्षों की व्यथा, वेदना ही इस लोकोक्ति रूप में प्रकट हुई है। भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम का शायद ही कोई दूसरा गीत “वन्दे मातरम्” जितना भावात्मक, राजनीतिक और ऐतिहासिक रहा हो। बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय जी की यह रचना केवल साहित्य नहीं अपितु वह स्वदेशी आन्दोलन, क्रांतिकारियों और राष्ट्रीय जागरण का उद्भट उद्घोष बनी थी। 15 अगस्त, 2026 को कांग्रेस के केंद्रीय कार्यालय दिल्ली में कारित घृणित कृत्य से कांग्रेस का इस्लामिक डीएनए पुनः सिद्ध हो गया है। वंदे मातरम् के इस अपमान के समय नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, दशक भर कांग्रेस अध्यक्ष रही सोनिया गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे उपस्थित थे। दुस्साहस और दुर्भाग्य का विषय यह है कि इन तीनों ने ही वंदे मातरम् के अपमान के इस दुष्कृत्य को प्रारंभ किया था। इसे भी पढ़ें: बुरे काम का नतीजा बुरा ही होता है, बाहरी दिल्ली के बेताज बादशाह रहे Sajjan Kumar की सत्ता, सियासत और सजा की कहानी यही संदेश देती है इस दुर्भाग्यजनक घटना के बाद कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ताओं ने देश को स्पष्टीकरण देना प्रारंभ किया कि - “सोनिया गांधी ने वंदे मातरम् का अपमान नहीं किया बल्कि वे बुजुर्ग खड़गे जी को खड़े होने के कारण असहज होता देखकर उनके लिए कुर्सी मंगा रही थी”। यहीं से कांग्रेस नेतृत्व की मूढ़ता, राष्ट्र अनास्था व मुस्लिम तुष्टिकरण के पक्ष में दुराग्रह रखने के चरित्र की पुनरावृत्ति दिखाई पड़ती है। इस घटनाक्रम के अंतरतत्व को समझिए। कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ताओं को अपने नेतृत्व द्वारा ‘वंदे मातरम्’ का यह अपमान बुरा लगा इसलिए ही उन्होंने बिना केंद्र या प्रदेश नेतृत्व के कहे ही इस घटना पर कांग्रेस नेतृत्व का बचाव प्रारंभ कर दिया था। हजारों कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने सोशल मीडिया पर लाखों पोस्ट डाली और कांग्रेस नेतृत्व का बचाव किया। यह ‘वंदे मातरम्’ और ‘मुस्लिम तुष्टिकरण की कांग्रेसी प्रवृत्ति’ के विरोध का प्रतीक था। इस मनोभाव को कांग्रेस के इटालियन नेतृत्व ने समझने का प्रयास ही नहीं किया। कांग्रेस ने इस घटना पर अपने कार्यकर्ताओं की भावनाओं को नहीं समझा तो भी कोई बात नहीं होती। कांग्रेस ने तो अपनी हठधर्मिता, अड़ियलपन, मति मूढ़ता की हद तो तब दिखा दी जब उसने अपनी राष्ट्रीय वर्किंग कमेटी में ‘वंदे मातरम्’ को पूर्ण रूप में नहीं गाने के लिए प्रस्ताव ही पारित कर दिया। ‘वंदे मातरम्’ के हाल ही में किए गए अपराध और अपमान के संदर्भ में कांग्रेस के प्रवक्ता और आधिकारिक व्यक्तव्य जो कह रहे हैं उसमें वे गांधी जी, नेताजी सुभाषचंद्र, गुरुदेव रबिन्द्रनाथ टैगोर आदि का नाम लेते हुए इस गीत के विभाजन को उनकी से हुआ बता रहे हैं। यह एक भ्रमजाल और झूठ का पहाड़ है। गांधी जी तो इस बात के पक्षधर थे कि यह गीत संपूर्ण देश को जोड़ने वाला प्राणतत्त्व है और इसे इसके पूर्ण वैभव के साथ संपूर्णतः स्वीकार किया जाना चाहिए। गांधी जी ने इसके समर्थन में अपनी स्पष्ट राय रखी थी, किंतु जवाहरलाल नेहरू ने तुष्टिकरण की अपनी राजनैतिक कुटिलताओं और प्राथमिकताओं के चलते गांधी जी की एक न चलने दी। इतिहास यह भी है कि, यह दुखद एतिहासिक पृष्ठ रहस्यमयी भी है। रहस्य यह कि - “अंततः वह कौन सी कमजोर नस थी,, जिसके आधार पर नेहरू जी ऐसे निर्णय भी गांधी जी से करवा लेते थे जिनके लिए गांधी जी कभी भी तैयार नहीं थे”। गांधी जी वंदेमातरम् विभाजन हेतु असहमत थे। गांधी जी बंग-भंग हेतु भी सहमत नहीं थे। गांधी जी ने कहा था कि “इस देश का विभाजन मेरी लाश पर होगा”। गांधी जी स्वतंत्रता पश्चात् कांग्रेस को विसर्जित करने हेतु भी संकल्पित थे। गांधी जी ने कहा था कि स्वतंत्रता पश्चात् हम एक बूँद की स्याही लेंगे और यह लिख देंगे - “इस देश में गौहत्या वैसा ही दंड होगा जैसा मानव हत्या के लिए होता है”। स्वच्छता, हिंदी राष्ट्रभाषा, ग्रामवासी भारत आदि हेतु भी गांधी जी प्रतिबद्ध थे। कांग्रेस ने सात दशकों की सत्ता में इन विषयों को त्याज्य रखा। ‘भारत में रामराज स्थापना’ को कांग्रेस का लक्ष्य बनाया था किंतु ‘नेहरू-गांधी कांग्रेस’ मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए श्रीराम को ही कल्पना सिद्ध करने के प्रयास में लग गई। कांग्रेस स्वयं को सेकुलर सिद्ध करने के अनथक प्रयास करने लगी थी और ‘रामेश्वरम् रामसेतु’ के विध्वंस, विनाश, भंजन, खंडन हेतु मशीनें समुद्रतट पर भेज चुकी थी। ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ हेतु कांग्रेस ने न जाने कितने ही कांड इस देश में किया और सतत-निरंतर किए हैं। आश्चर्य और दुस्साहस का विषय यह है कि ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ के लिए देश भर से लताड़े जाने के बाद भी कांग्रेस नेतृत्व इस बात को समझ ही नहीं रहा है। हाँ, कांग्रेस का जमीनी कार्यकर्ता इस बात कोई समझ भी रहा है और वह कांग्रेस की ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ की नीति के विरोध में भी है, तब ही तो ‘कार्यकर्ता बेचारे’ ने सोशल मीडिया पर लाखों की संख्या में आकर यह कहा था कि “सोनिया जी वंदे मातरम् का गान रोक नहीं रही थी बल्कि खड़गे जी के लिए कुर्सी बुला रही थी”। ‘वंदे मातरम्’ और ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ की यह कांग्रेस कार्यकर्ता की नैसर्गिक प्रतिक्रिया थी जिसे कांग्रेस नेतृत्व ने स्वीकार करना चाहिए थे किंतु कांग्रेस ने ‘राम पथ’ को नहीं बल्कि ‘रोम पथ’ को चुना हुआ है। 26 अक्टू.- 1 नव. 1937 की कलकत्ता कांग्रेस कार्यसमिति में ‘वंदे मातरम्’ गान के विभाजन की अनुशंसा और कुछ नहीं बल्कि एक ‘इमोशनल राष्ट्रीय ब्लैक मेल’ था। यह देश विभाजन में अपना हित देखने वाले नेताओं द्वारा निर्मित ‘ब्लैकमेल’ था। आदरणीय बंकिम बाबू ने जब भारतमाता को केवल एक भौगोलिक भू-भाग के रूप में नहीं, बल्कि साक्षात् देवी और जननी के रूप में देखा, तो उनके मानस में 'सोनार बांग्ला' और संपूर्ण भारतवर्ष का एक ऐसा दिव्य चित्र उभर आया, जिसने औपनिवेशिक दास्तां के अंधकार को चीरकर रख दिया। विडंबना, वंचना, विसंगति, विचित्र, यह है कि जिस गीत ने स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों, क्रांतिकारियों और हुतात्माओं को हँसते-हँसते फाँसी के फंदों को जयमाल मान लेने की असीम शक्ति दी, उसी महान कृति को स्वतंत्रता के पश्चात राजनीति और तुष्टिकरण के बवंडर में उलझा दिया गया। मुस्लिम तुष्टिकरण के मकड़जाल ने वंदेमातरम् को कोई एक सौ वर्षों तक, उसके पूर्ण गान से वंचित रखा। प्रश्न यह है कि यदि प्रथम दो छंद पहले से ही कई कांग्रेस सभाओं में प्रचलित थे, तो 1937 में उसे औपचारिक रूप से सीमित करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? वस्तुतः कांग्रेस, मुस्लिम तुष्टिकरण का समायोजन कर रही थी। कांग्रेस द्वारा गांधी जी, गुरुदेव रबिंद्रनाथ व नेताजी की ढाल लेकर ‘वंदे मातरम्’ का विरोध ग़लत है। इतिहासकार एस. मुखर्जी ने अपनी पुस्तक Muslim Politics के पृष्ठ क्र. 53 पर इसे कांग्रेस द्वारा मुसलमानों को संतुष्ट करने के लिए गीत को “mutilate” (अंगभंग) करने जैसा बताया है। इतिहासकार ए. जी. नूरानी ने “Vande Mataram: A Historical Lesson”, Economic and Political Weekly, Vol. 8, 9 जून 1973, पृष्ठ क्र. 1039–1043 में लिखा है कि “वन्दे मातरम् का विभाजन केवल एक पक्ष की कायरता थी”। इतिहासकार सब्यसाची भट्टाचार्य ने भी अपनी पुस्तक Vande Mataram: The Biography of a Song में देश के अनेक अग्रणी मुस्लिम नेताओं द्वारा ‘वंदे मातरम्’ पूर्णतः आनंदपूर्वक गाने की घटनाओं का विस्तृत उल्लेख किया है। यही सत्य है शेष कांग्रेस के झूठ का पहाड़! - डॉ. प्रवीण दाताराम

प्रभासाक्षी 21 Aug 2026 3:26 pm

ताकि बचा रहे बचपन

किशोरों और बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए यूरोप के कई देशों ने पंद्रह या सोलह साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर पाबंदी लगानी शुरू कर दी है। इसका अगुआ होने का श्रेय ऑस्ट्रेलिया को है, जिसने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के इंस्टाग्राम, फेसबुक, टिकटॉक, एक्स यानी ट्विटर और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्मों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी है। इसी तरह फ्रांस ऐसा कानून बनाने वाला यूरोप का पहला देश हो गया है। वहां की संसद ने पंद्रह साल तक के बच्चों के सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर रोक लगाने का कानून पारित कर दिया है। हालांकि यह कानून खटाई में पड़ गया है। फ्रांस के सर्वोच्च न्यायालय ने इस कानून को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन माना है। अदालत का कहना है कि नाबालिगों पर प्रतिबंध लगाने के चक्कर में यह कानून असल में हर नागरिक पर सोशल मीडिया का उपयोग करने से पहले अपनी उम्र साबित करने का दबाव बनाता है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैंक्रो इस इस कानून के प्रबल समर्थक हैं। अदालत के फैसले के बाद उन्होंने कहा है कि इस कानून को लागू करने के लिए अदालती फैसले के मद्देनजर जरूरी सुधार करके फिर से इसे संसद से पारित कराया जाएगा। फ्रांस के इस फैसले से स्पष्ट है कि वह किशोरों के सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर लगाम लगाने के लिए पीछे नहीं हटने जा रहा है। जिस पश्चिमी दुनिया में सोशल मीडिया का आविष्कार हुआ, जिन्होंने कभी अरब देशों में क्रांति के लिए सोशल मीडिया की सराहना की थी, अब उन्हें ही यह माध्यम अपने ही बच्चों का दुश्मन लगने लगा है। इसकी वजह है, वहां के बच्चों और किशोरों का बिगड़ता मानसिक स्वास्थ्य और पढ़ाई का गिरता स्तर। इसकी वजह से अमेरिका तक में सोशल मीडिया कंपनियों के खिलाफ लोगों में नाराजगी दिख रही है। प्रसिद्ध न्यूज एजेंसी रायटर्स ने आईपोस कंपनी के साथ हाल ही में एक सर्वे किया है। इसमें शामिल 61 फीसद लोगों ने कहा कि सोशल मीडिया कंपनियों पर सरकार को और सख्त निगरानी रखनी चाहिए। इस सर्वे में शामिल 66 प्रतिशत लोग तो 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए उम्र के प्रमाणीकरण की प्रक्रिया लागू करने पर जोर दिया है। वैसे अमेरिका के फ्लोरिडा जैसे कुछ राज्यों में चौदह साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक है। इसे भी पढ़ें: असामाजिक हो रहे सोशल मीडिया का नियमन जरूरी दुनियाभर में बच्चों और किशोंरों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक के लिए उनके मानसिक स्वास्थ्य में आ रही गिरावट और बढ़ते मानसिक तनाव को जिम्मेदार माना जा रहा है। कई शोधों से पता चला है कि लगातार स्क्रीन देखने और सोशल मीडिया के इस्तेमाल से बच्चे दूसरों की लाइफस्टाइल से खुद की तुलना करने लग रहे हैं। इससे उनमें हीन भावना, तनाव और डिप्रेशन बढ़ रहा है। इसकी वजह से उनकी नींद में कमी हो रही है। देर रात तक फोन चलाने के कारण भी बच्चों की सोने की आदत बिगड़ रही है। इससे उनमें चिड़चिड़ाहट बढ़ रही है। जिससे उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ रहा है। जानकारों का मानना है कि सोशल मीडिया ऐप्स का अलगोरिदम ऐसा है, जिससे बच्चे ही नहीं, बड़े भी उसके लत का शिकार हो रहे हैं. इससे वे स्क्रीन के आदी हो रहे हैं। कई बार कम उम्र के बच्चों के सामने आत्महत्या, हिंसा या उम्र के हिसाब से गलत सामग्री भी आती है। वैसे सोशल मीडिया का अलगोरिदम ऐसा है कि नकारात्मक, हिंसा प्रधान और सेक्स से जुड़ी खबरें और दृश्य जल्दी वायरल होते हैं। सोशल मीडिया ट्रोलिंग और अभद्र टिप्पणियों का बड़ा और आसान माध्यम बन गया है। इनकी वजह से बच्चे मानसिक प्रताड़ना का शिकार हो रहे हैं। बच्चों को फंसाने वाले अपराधी उन्हे आसानी से अपना शिकार बना लेते हैं। इसीलिए दुनिया में कई देशों की सरकारें बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर रोक लगाने की तैयारी में हैं। रोक लगाने वालों में इंडोनेशिया भी शामिल हो चुका है, जिसने मार्च 2026 से इसके नियम लागू कर दिए हैं। इनके अनुसार, 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए यूट्यूब, टिकटॉक, फेसबुक और रोब्लॉक्स जैसे हाई-रिस्क प्लेटफॉर्म्स पर पाबंदी लगा दी गई है। इंडोनेशिया की तरह मलयेशिया ने भी ऑनलाइन सुरक्षा अधिनियम के तहत 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट बनाने पर रोक लगा रखी है। संयुक्त अरब अमीरात ने बच्चों के लिए सोशल मीडिया के लिए न्यूनतम उम्र 15 वर्ष तय की है। इससे कम उम्र के बच्चों के अकाउंट बनाने पर यहां पूरी तरह रोक है। यूरोप के देश डेनमार्क में 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया ब्लॉक करने का कानून बन चुका है। बच्चों की उम्र की जांच के लिए सरकार डिजिटल एविडेंस ऐप पर काम कर रही है। इसी तरह ब्रिटेन की सरकार ने भी 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है, जो जनवरी 2027 से प्रभावी होने जा रही है। तुर्की में भी 15 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखने के लिए कानून को मंजूरी मिल चुकी है, जिसे 2026 के अंत तक लागू किया जाना है। चीन में किशोरों के लिए सोशल मीडिया पर पूरी तरह पाबंदी तो नहीं है, लेकिन उनके लिए सख्त माइनर मोड लागू है, जो रात के समय सोशल मीडिया ऐप्स के इस्तेमाल और स्क्रीन टाइम को सीमित करता है। ब्राजील का बाल एवं किशोर डिजिटल कानून 17 मार्च, 2026 से लागू हो चुका है। जिसके तहत 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों को अपने सोशल मीडिया खाते को माता-पिता या कानूनी अभिभावक से जोड़ना अनिवार्य है। इसके अलावा, यह कानून युवाओं के लगातार स्क्रॉल जैसी आदतों पर प्रतिबंध लगाता है। जर्मनी में भी इसी तरह का नियम लागू हो चुका है। स्वीडन समेत कई अन्य देश भी ऐसी तैयारी में हैं। अपने यहां कर्नाटक राज्य भी ऐसे कानून पर काम कर रहा है। जबकि नोएडा के जिला प्रशासन ने स्कूलों में ऑनलाइन के इस्तेमाल को सीमित करने का निर्देश दिया है। विदेशों की तुलना में जरा भारत को देखिए, यहां दिल्ली के जंतर-मंतर पर युवाओं और किशोरों ने जिस तरह अभद्र और अश्लील गालियों का कैमरे के सामने प्रदर्शन किया, उसे सोशल मीडिया के जरिए पूरी दुनिया ने देखा है। दिलचस्प है कि इसे प्रगतिशील बौद्धिकों के एक वर्ग ने समर्थन किया। दो राय नहीं कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल अगर सही तरीके से किया जाए तो उसकी पहुंच और त्वरा समाज को कई तरह के फायदे दिला सकती है। खामियां उजागर करके तंत्र पर दबाव बनाया जा सकता है। लेकिन हमें यह स्वीकार करने की हिचक नहीं होनी चाहिए कि देश में सोशल मीडिया अर्धनग्नता और अश्लीलता का वाहक बनता जा रहा है। इन्फ्लूएंसर बनने, रीच बढ़ाने और लाइक के जरिए कमाई के चक्कर में शरीफ परिवारों की महिलाओं को भी अंग प्रदर्शन से परहेज नहीं रहा। सोशल मीडिया के लिएकोई सेंसर नीति न होने की वजह से सबकी पहुंच किशोरों और बच्चों तक हो रही है। इसलिए भी जरूरी है कि पश्चिम की तरह अपने यहां भी इस पर ध्यान दिया जाए और महामारी बनने से पहले इस पर लगाम लगाने की कोशिश शुरू हो। नियमों का उल्लंघन करने पर सोशल मीडिया कंपनियों पर भारी जुर्माना लगाया जाता है। दिसंबर 2010 में ट्यूनिशिया से शुरू लोकतंत्र समर्थक लहर सोशल मीडिया के इतिहास का निर्णायक बिंदु है। सोशल मीडिया के सहारे यह लहर काहिरा के तहरीर चौक से सीरिया और लीबिया होते हुए समूचे अरब जगत में फैल गई। इतिहास में इस लहर को अरब स्प्रिंग यानी अरब का बसंत और पिंक रिवोल्यूशन या गुलाबी क्रांति के रूप में दर्ज है। अरब देशों में बदलाव लाने की सोच के विस्तार के पीछे सोशल मीडिया को बड़ा जरिया माना गया। लंबे यूरोपीय शासन और शिक्षा-दीक्षा के चलते भारतीय मानस अपनी सांस्कृतिक जड़ों और मूल्यों से कहीं ज्यादा प्रभावित है। इसलिए भारत में सोशल मीडिया पर ऑस्ट्रेलिया और दूसरे पश्चिमी देशों जैसे सवाल नहीं उठे। अगर इन देशों से पहले यहां सवाल उठते तो उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बता दिया जाता। बहरहाल उम्मीद की जानी चाहिए कि हम भी पश्चिमी देशों से सबक लेंगे और अपने यहां के बचपन को स्वस्थ रखने और बचाने की कोशिश जरूर करेंगे। उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

प्रभासाक्षी 21 Aug 2026 2:56 pm

Rahul Gandhi की 'धरना-छाप' राजनीति क्या गुल खिलाएगी? LoP छात्रों का वास्तव में भला चाहते हैं या सिर्फ सुर्खियों में जगह चाहते हैं?

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी आज एक प्रदर्शनकारी छात्र साहिल लोचव को साथ लेकर पुलिस अधिकारियों के पास पहुंचे और आरोप लगाया कि जंतर-मंतर पर 20 जुलाई के छात्र आंदोलन के दौरान कथित पेलेट गन कार्रवाई में घायल हुए छात्र की शिकायत पर एफआईआर दर्ज नहीं की जा रही है। पुलिस अधिकारियों से मुलाकात के बाद जब राहुल गांधी संतुष्ट नहीं हुए तो उन्होंने वहीं धरना शुरू कर दिया और संदेश साफ था, “एफआईआर नहीं, तो धरना जारी रहेगा।” यहीं से सवाल उठता है कि राहुल गांधी आखिर किस लड़ाई को लड़ रहे हैं? एक पीड़ित छात्र को न्याय दिलाने की कानूनी लड़ाई, पुलिस कार्रवाई की जवाबदेही तय कराने की लड़ाई, या फिर छात्र राजनीति के उभरते मैदान में अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराने की लड़ाई लड़ रहे हैं? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राहुल गांधी कोई सामान्य प्रदर्शनकारी नहीं हैं। वह देश की लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। उनके पास संसद का मंच है, सरकार को जवाबदेह बनाने की संवैधानिक हैसियत है और पूरे विपक्ष की राजनीतिक आवाज बनने का अवसर भी। फिर कभी प्रधानमंत्री के घर के बाहर तो कभी थाने पहुंचकर धरने पर बैठ जाना क्या उस पद की गरिमा और जिम्मेदारी के अनुरूप राजनीति है? इसे भी पढ़ें: उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा मानसून सत्र धरना देना लोकतंत्र में गलत नहीं है। सरकार और पुलिस के खिलाफ विरोध करना भी विपक्ष का अधिकार है। लेकिन जब देश का नेता प्रतिपक्ष पुलिस स्टेशन की सीढ़ियों पर बैठकर कहे कि जब तक एफआईआर दर्ज नहीं होगी, वह नहीं हटेगा, तब सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या राजनीतिक दबाव ही अब राहुल गांधी की प्राथमिक रणनीति बन गया है? यहां मामला और दिलचस्प इसलिए भी है क्योंकि राहुल गांधी जिस घटना को लेकर धरने पर बैठे, वह घटना अब केवल एक छात्र की शिकायत या पुलिस थाने की कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गई है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को हुए छात्र प्रदर्शन और उसके बाद पुलिस कार्रवाई का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। शीर्ष अदालत ने हाल में पुलिस की कथित ज्यादती और बल प्रयोग के आरोपों की जांच के लिए एक हाई-पावर्ड समिति गठित करने का फैसला किया है। साथ ही पुलिस अधिकारियों ने राहुल गांधी को यह भी बताया है कि 20 जुलाई की घटना से जुड़े कई मामले दर्ज हैं और उनकी जांच क्राइम ब्रांच तथा स्पेशल सेल को सौंपी गई है। यानी सवाल यह नहीं है कि साहिल लोचव की शिकायत पर अलग से कार्रवाई होनी चाहिए या नहीं। यदि किसी संज्ञेय अपराध की शिकायत है और कानून के अनुसार एफआईआर बनती है, तो कार्रवाई अवश्य होनी चाहिए। पीड़ित को न्याय मिलना ही चाहिए। लेकिन सवाल राहुल गांधी की राजनीतिक शैली का है। सवाल उठता है कि क्या लोकसभा में विपक्ष के नेता को यह जानकारी नहीं थी कि मामला सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में है? क्या उन्हें नहीं पता था कि घटना की जांच पहले से विभिन्न स्तरों पर चल रही है? और यदि उन्हें यह सब पता था, तो फिर पुलिस स्टेशन के बाहर धरने का राजनीतिक उद्देश्य क्या था? यहीं से इस पूरी कहानी की जड़ तक जाना जरूरी है। सवाल उठता है कि जंतर-मंतर पर आखिर हुआ क्या था? दरअसल, 20 जुलाई को दिल्ली में बड़ी संख्या में छात्र परीक्षा व्यवस्था, कथित पेपर लीक और शिक्षा सुधारों की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे थे। आंदोलन का आयोजन कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP के नेतृत्व में हुआ था और प्रदर्शनकारियों की मांगों में परीक्षा प्रणाली में सुधार तथा शिक्षा से जुड़े सवाल प्रमुख थे। जंतर-मंतर से संसद की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तनाव पैदा हुआ। आरोप लगे कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर अत्यधिक बल प्रयोग किया, लाठीचार्ज किया और पेलेट गन का इस्तेमाल हुआ। कई वीडियो और तस्वीरों के बाद पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठे। राहुल गांधी ने भी इस मुद्दे को जोरदार ढंग से उठाया और बाद में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को सीधे निशाने पर लिया। लेकिन दिल्ली पुलिस का पक्ष बिल्कुल अलग रहा। पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि प्रदर्शन अवैध था और पुलिस ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए अधिकतम संयम बरता। पुलिस का दावा है कि बल का इस्तेमाल हालात बिगड़ने और हिंसा या अव्यवस्था की स्थिति पैदा होने के बाद किया गया। घटना के दौरान पुलिसकर्मियों के घायल होने की बात भी सामने आई थी। यही वजह है कि इस मामले को केवल एकतरफा राजनीतिक नारे में समेटना आसान नहीं है। यदि छात्रों पर अनावश्यक या अनुपातहीन बल प्रयोग हुआ है तो दोषियों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। लेकिन यदि प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई और पुलिसकर्मी भी घायल हुए, तो जांच में उस पक्ष को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। शायद इसी जटिलता के कारण सुप्रीम कोर्ट की जांच समिति का महत्व बढ़ जाता है। इसलिए सवाल उठता है कि ऐसे में राहुल गांधी का धरना क्यों हो रहा है? सवाल उठता है कि क्या यह न्याय के लिए दबाव है, या फिर राजनीतिक दृश्य रचने की कोशिश है? दरअसल, राहुल गांधी की राजनीति में पिछले कुछ समय से एक पैटर्न दिखाई देता है। मुद्दा उठाइए, सरकार पर सीधा हमला कीजिए और फिर सड़क पर उतरकर उस मुद्दे को राजनीतिक प्रतीक में बदल दीजिए। यह रणनीति विपक्षी राजनीति में असरदार हो सकती है, लेकिन नेता प्रतिपक्ष के पद पर बैठे व्यक्ति से सवाल भी बड़ा होता है। सवाल उठता है कि क्या हर मामले में धरना ही अंतिम राजनीतिक हथियार होना चाहिए? कभी प्रधानमंत्री के घर के बाहर धरने की राजनीति और अब पुलिस थाने पहुंचकर एफआईआर की मांग पर बैठ जाना...राहुल गांधी की यह छापामार शैली उन्हें सुर्खियां तो दिलाती है, लेकिन क्या इससे उनकी संस्थागत भूमिका कमजोर नहीं पड़ती? संसद में सरकार से जवाब मांगना, दस्तावेजों के आधार पर आरोप लगाना, संसदीय जांच की मांग करना और न्यायिक प्रक्रिया को मजबूत करना, ये भी नेता प्रतिपक्ष के उतने ही महत्वपूर्ण हथियार हैं। इसके अलावा, एक सवाल यह भी उठता है कि क्या यह छात्रों की राजनीति में राहुल गांधी की अपनी जगह बनाने की कोशिश है? देखा जाये तो इस पूरे घटनाक्रम का राजनीतिक संदर्भ भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कॉकरोच जनता पार्टी विभिन्न राज्यों में स्कूलों की स्थिति, शिक्षा व्यवस्था और छात्रों की समस्याओं को लेकर अभियान चलाकर लगातार सुर्खियां बटोर रही है। जंतर-मंतर का आंदोलन भी इसी व्यापक छात्र असंतोष का हिस्सा बनकर सामने आया था। ऐसे में राहुल गांधी भी शायद यह संदेश देना चाहते हैं कि छात्रों की आवाज उठाने वाला सबसे बड़ा राष्ट्रीय चेहरा वही हैं। साहिल लोचव के साथ पुलिस स्टेशन पहुंचना, उनकी चोटों का मुद्दा उठाना और एफआईआर के लिए धरने पर बैठना, यह सब एक मजबूत राजनीतिक दृश्य भी है। सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी को लगने लगा है कि छात्र राजनीति का यह मैदान उनके हाथ से निकल सकता है? क्या कॉकरोच जनता पार्टी के शिक्षा और स्कूलों से जुड़े अभियान ने राहुल गांधी को यह एहसास कराया है कि केवल संसद में भाषण देना काफी नहीं, बल्कि छात्रों के बीच जाकर अपनी मौजूदगी दर्ज करानी होगी? या फिर यह राहुल गांधी की उस पुरानी राजनीतिक शैली का विस्तार है, जिसमें वह सत्ता के खिलाफ खुद को सीधे संघर्षरत व्यक्ति के रूप में पेश करना चाहते हैं? देखा जाये तो राहुल गांधी को छात्रों के साथ खड़े होने का पूरा अधिकार है। पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाना भी उनका कर्तव्य है। पेलेट गन के कथित इस्तेमाल की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग भी पूरी तरह वैध राजनीतिक मुद्दा है। लेकिन नेता प्रतिपक्ष की राजनीति केवल धरने की राजनीति नहीं हो सकती। जब सुप्रीम कोर्ट जांच की प्रक्रिया शुरू कर चुका हो, जब पुलिस के अनुसार संबंधित मामलों की जांच क्राइम ब्रांच और स्पेशल सेल कर रही हो, तब राहुल गांधी को यह भी बताना चाहिए कि उनका धरना जांच को किस तरह आगे बढ़ाएगा। अगर अलग शिकायत पर एफआईआर जरूरी है, तो उसे कानूनी प्रक्रिया के तहत दर्ज कराया जाना चाहिए और उस प्रक्रिया की निगरानी की मांग की जानी चाहिए। लेकिन हर बार कैमरों के सामने धरना देकर राजनीतिक दबाव बनाना एक गंभीर सवाल छोड़ जाता है कि क्या राहुल गांधी व्यवस्था से लड़ रहे हैं, या व्यवस्था से लड़ने का दृश्य तैयार कर रहे हैं? राहुल गांधी को समझना होगा कि छात्रों की आवाज बनने के लिए केवल पुलिस थाने की सीढ़ियों पर बैठना काफी नहीं। छात्रों को बेहतर परीक्षा व्यवस्था, मजबूत स्कूल, जवाबदेह संस्थाएं और ठोस शिक्षा नीति चाहिए। राहुल गांधी चाहें तो वह जो सुधार करना चाहते हैं वह कांग्रेस शासित राज्यों में शुरू करवा सकते हैं। राहुल गांधी को समझना होगा कि धरना तस्वीर बनाता है, लेकिन राजनीति की असली परीक्षा तस्वीर के बाद शुरू होती है। - नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 21 Aug 2026 2:44 pm

Cheeni Kum hai! एथनॉल का असर या त्योहारों का, अचानक क्यों आसमान छूने लगे चीनी के दाम? 10 लाइन में समझें पूरा मामला

जिस देश में दिन की शुरुआत सुबह की चाय से होती है, जहां त्यौहार मिठाई के बगैर अधूरे लगते हैं। जहां घर से लेकर दुकान तक चीनी रोजमर्रा की जरूरत है। वहां चीनी की कीमत सिर्फ एक कमोडिटी का रेट नहीं बल्कि घर के बजट का सवाल है। लेकिन इस बीच चीनी के दाम अचानक ऐसे भागे हैं कि बाजार में सवाल सिर्फ यह नहीं कि चीनी कितनी महंगी हुई बल्कि सवाल यह है कि आखिर चीनी इतनी महंगी क्यों हुई? सबसे बड़ा सवाल क्या आने वाले दिनों में इस महंगाई की मिठास और कड़वी होने वाली है? जिस चीनी के दाम कुछ समय पहले तक लगभग ₹45 किलो के आसपास थे उसमें बहुत कम समय में जबरदस्त उछाल आया है। चीनी के दाम बीते 20 दिनों में ₹22 तक की बढ़ोतरी हुई है। हालात तो यहां तक पहुंच गए हैं कि दुनिया भर को चीनी बेचने वाला भारत अब इसके आयात की तैयारी कर रहा है। जमाखोरी रोकने की तरकीबें निकाली जा रही हैं और आपातकालीन स्टॉक को मार्केट में उतारने की तैयारियां की जा रही हैं। ऐसे में आज के एमआरआई में हम चीनी के इसी कड़वे अर्थशास्त्र को डिकोड करेंगे। इसे भी पढ़ें: आजकल सब डायबिटीज के शिकार हो रहे हैं...चीनी की बढ़ती कीमतों पर बिहार सरकार के मंत्री का ये बयान सुना आपने? 1. 12 दिन के भीतर 21% दाम बढ़े सबसे पहले ग्राउंड रियलिटी यानी दामों की बात करते हैं। उपभोक्ता मामलों के विभाग के आंकड़ों के मुताबिक 18 अगस्त 2026 को देश में चीनी का औसत रिटेल दाम 52.3 प्रति किलो था। पिछले साल के मुकाबले 13% ज्यादा। लेकिन यह तो सिर्फ एक सरकारी औसत है। असली कहानी तो गली मोहल्ले की दुकानों पर चल रही है। महज 12 दिन के भीतर यानी 7 अगस्त से लेकर 1920 अगस्त के बीच प्रमुख शहरों में चीनी के दाम 19 से 21% तक बढ़ चुके हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक रिटेल मार्केट में जो चीनी ₹52 किलो बिक रही थी, वह अब ₹62 तक पहुंच गई है। महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिसे चीनी व्यापार के एक बड़े सेंटर के तौर पर जाना जाता है। वहां थोक चीनी के दाम अगस्त की शुरुआत से अब तक करीब 20% बढ़कर ₹5350 प्रति क्विंटल के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए हैं। पंजाब के रिटेल मार्केट में चीनी ₹65 प्रति किलो तक बिक रही है। वहीं मुंबई और भोपाल जैसे शहरों में भी कीमतें 58 से ₹63 प्रति किलो के बीच झूल रही हैं। मार्केट के जानकारों का मानना है कि आगे वाले दिनों में कीमतें और बढ़ सकती हैं। ऐसे में सवाल है कि जिस देश ने 2021-22 में 12 मिलियन टन से ज़्यादा चीनी दुनिया भर में बेची, जो लगातार दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी निर्यातक रहा है, वहां अचानक चीनी कम कैसे पड़ गई? 2. देश में चीनी की मांग और सप्लाई का असली खेल क्या है? भारत में सालाना करीब 2.83 करोड़ टन चीनी की घरेलू मांग रहती है। मौजूदा सीजन में देश 7 लाख टन चीनी का निर्यात भी कर चुका है। ऐसे में मौजूदा उत्पादन का स्तर घरेलू जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ निर्यात की मांग संभालने के लिए नाकाफी साबित हो रहा है, जिससे मांग और आपूर्ति का संतुलन बिगड़ गया है। 3. इथेनॉल की बढ़ती मांग है क्या सबसे बड़ा विलन? भारत ने गन्ने का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने में बढ़ा दिया है, क्योंकि वह आयातित कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है और E20 का लक्ष्य हासिल करना चाहता है। सरकार ने हाल के वर्षों में इस मकसद से कई डिस्टिलरी बनाने पर ज़ोर दिया है। ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन (AIDA) के मुताबिक, इससे इथेनॉल बनाने की क्षमता बढ़कर 2025 के मध्य तक 499 जगहों पर सालाना लगभग 1,822 करोड़ लीटर हो जाएगी। AIDA की ओर से इंडिया टुडे के साथ शेयर किए गए आंकड़ों के अनुसार, इथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल (फीडस्टॉक) में गन्ने की हिस्सेदारी लगभग 30-35% है, जबकि बाकी हिस्सा मक्का और चावल से आता है। इस बदलाव का असर चीनी बाज़ार पर पड़ा है। लखनऊ यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर और कृषि विशेषज्ञ सुधीर पंवार ने इंडिया टुडे को बताया एथेनॉल बनाने के लिए गन्ने का इस्तेमाल दूसरी तरफ़ मोड़ने की वजह से भारत में चीनी की कीमतें बढ़ गई हैं। पंवार का कहना है कि चीनी बाज़ार में इतनी ज़्यादा तंगी नहीं होनी चाहिए थी और उन्हें शक है कि कीमतों में इस उछाल के पीछे उत्पादन के अलावा और भी वजहें हैं। उन्होंने कहा चीनी के लिए बाज़ार का अनुमान इतना बुरा नहीं था, जिससे चीनी का स्टॉक रखने वालों और रिटेलर्स द्वारा बाज़ार में हेरफेर का संकेत मिलता है। उन्होंने आगे कहा, अगर गन्ने को एथेनॉल बनाने के काम में नहीं लगाया जाता, तो कीमतें काबू में रहतीं। उनकी मुख्य चिंता यह है कि भारत की ईंधन नीति खाने-पीने की चीज़ों की कीमतों की कीमत पर नहीं होनी चाहिए। उत्तर प्रदेश योजना आयोग के पूर्व सदस्य पंवार ने बताया, गन्ने को इथेनॉल की ओर मोड़ने का काम चीनी की कीमत पर नहीं होना चाहिए और इससे खाने-पीने की चीज़ों के दाम भी नहीं बढ़ने चाहिए। हमें भारत में गन्ने के उत्पादन और चीनी की ज़रूरतों, साथ ही अंतरराष्ट्रीय हालात और चीनी की कीमतों के सही अनुमान की ज़रूरत है। फसल की बीमारी से सप्लाई की स्थिति पर भी असर पड़ा है। 2025-26 में, खासकर उत्तर प्रदेश में, फसल की बीमारी के कारण गन्ने की उत्पादकता और चीनी की रिकवरी में गिरावट आई। यह तब हुआ जब गन्ने की खेती का रकबा बढ़ा था। द टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई में गन्ने की खेती का रकबा धान, दाल, कपास और तिलहन जैसी अन्य फसलों की तुलना में पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 1.5% ज़्यादा था। इसे भी पढ़ें: चीनी के स्टॉक पर नजर, सरकार ने अपने नोटिफिकेशन में क्या निर्देश दिए हैं? 4. भारत चीनी पर इंपोर्ट ड्यूटी क्यों कम कर रहा है? सरकार की नीति से पता चलता है कि हालात कितनी तेज़ी से बदले हैं। ब्राज़ील के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी निर्यातक देश है। यह 1960 से चीनी का निर्यात कर रहा है और 2021-22 में इसने सबसे ज़्यादा, यानी 12 मिलियन टन से ज़्यादा चीनी का निर्यात किया था। लेकिन देश की निर्यात नीति धीरे-धीरे सख़्त होती गई क्योंकि सरकार ने घरेलू स्तर पर चीनी की उपलब्धता को प्राथमिकता दी। 2025-26 के चीनी सीज़न के लिए, भारत ने लगभग 2 मिलियन मीट्रिक टन का निर्यात कोटा मंज़ूर किया है, जो 2021-22 में निर्यात किए गए 12 मिलियन टन से कहीं कम है। इसके बाद 2026 में भारत ने 13 मई से 30 सितंबर तक चीनी के एक्सपोर्ट पर तुरंत रोक लगा दी। सरकार का मकसद घरेलू सप्लाई को सुरक्षित रखना, कीमतों को कंट्रोल करना और प्रोडक्शन तथा ग्लोबल कमोडिटी मार्केट में अनिश्चितता के लिए तैयारी करना था। यह रोक इसलिए अहम है क्योंकि इससे पहले भारत ने लंबे समय के लिए आम शिपमेंट पर पूरी तरह रोक लगाने के बजाय एक्सपोर्ट पर पाबंदियां, कोटा और मात्रा की सीमाएं तय करने का तरीका अपनाया था। पहले की पाबंदियों के दौरान भी, अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे देशों को छोटे कोटा-आधारित और खास प्राथमिकता वाले शिपमेंट जारी रहे थे। इन उपायों के बावजूद, घरेलू कीमतें लगातार बढ़ती रही हैं। ऑल इंडिया शुगर ट्रेड एसोसिएशन (AISTA) के अनुसार, मौजूदा 2025-26 मार्केटिंग ईयर में फरवरी तक भारत ने 2,01,547 टन चीनी का एक्सपोर्ट किया, जिसमें संयुक्त अरब अमीरात (UAE) सबसे बड़ा डेस्टिनेशन बनकर उभरा। अब, रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकार चीनी पर इंपोर्ट ड्यूटी कम करने के अगले कदम पर विचार कर रही है। इस कदम से लगभग एक दशक में पहली बार विदेश से चीनी भारत आ सकती है, जिससे त्योहारों के मौसम की शुरुआत में घरेलू सप्लाई में आसानी हो सकती है। 5. देश में चीनी का बफर स्टॉक कम हो रहा? रेटिंग एजेंसी इकरा (ICRA) के अनुमान के मुताबिक, सितंबर 2026 तक देश में चीनी का क्लोजिंग स्टॉक घटकर महज 43 लाख टन रह जाने की संभावना है, जो पिछले साल इसी अवधि में 53 लाख टन था। चिंता की बात यह है कि 43 लाख टन का यह बफर स्टॉक देश की सिर्फ दो महीने की घरेलू खपत की भरपाई करने के लिए ही पर्याप्त है। सितंबर 2026 तक देश में क्लोजिंग चीनी स्टॉक घटकर करीब 43 लाख टन रहने का अनुमान। पिछले साल यह स्टॉक 53 लाख टन था, जिसमें करीब 10 लाख टन की गिरावट आई है। 43 लाख टन का यह बफर स्टॉक देश की महज 2 महीने की घरेलू जरूरत के बराबर है। 6. सरकार अचानक चीनी को लेकर क्यों घबराई हुई है? चीनी की कीमतों में यह उछाल रातों-रात नहीं आया है। भारत में चीनी की खुदरा कीमतें 2023 की शुरुआत में लगभग ₹40-45 प्रति किलोग्राम थीं, जो अगस्त 2026 तक बढ़कर ₹50 प्रति किलोग्राम से ज़्यादा हो गईं। हालांकि, राज्यों, चीनी की क्वालिटी और बाज़ार के हिसाब से कीमतों में काफी अंतर होता है। कीमतों में तेज़ी हाल के महीनों में आई है। अगस्त 2026 के मध्य तक, पूरे भारत में चीनी की औसत कीमत लगभग ₹51.7-52.3 प्रति किलोग्राम तक पहुँच गई थी। यह एक महीने में लगभग 7-8% और अगस्त 2025 के मध्य में लगभग ₹46.3 प्रति किलोग्राम की कीमत के मुकाबले साल-दर-साल आधार पर लगभग 12-13% की बढ़ोतरी है। लेकिन त्योहारों के मौसम से ठीक पहले कीमतों में आए इस उछाल ने केंद्र सरकार को कदम उठाने पर मजबूर कर दिया है। इसलिए अधिकारी सिर्फ़ आयात (इंपोर्ट) के बारे में ही नहीं सोच रहे हैं। वे थोक व्यापारियों द्वारा जमा की जा सकने वाली चीनी की मात्रा पर पाबंदी लगाने पर भी विचार कर रहे हैं, ताकि जमाखोरी और स्टॉक जमा करने से कमी और न बढ़े। 7. सरकार ने कीमतें नियंत्रित करने के लिए क्या नियम बनाए हैं? सरकार ने चीनी व्यापारियों और डीलरों पर स्टॉक रखने की सीमा लागू कर दी है। नए नियमों के तहत महीने में 10 मीट्रिक टन से अधिक चीनी का कारोबार करने वाले डीलर 15 दिन से अधिक की खपत का स्टॉक जमा करके नहीं रख सकते। चीनी के आयात को टैक्स फ्री भी कर दिया है। निर्यात पर 30 सितंबर 2026 तक रोक लगा दी है। 8. चीनी संकट को लेकर सरकार को झेलनी पड़ रही राजनीतिक आलोचना चीनी की बढ़ती कीमतों पर अब राजनीतिक विरोध भी शुरू हो गया है। एक्टिविस्ट और टीम भारत के संस्थापक तहसीन पूनावाला ने आरोप लगाया कि गन्ने को एथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़े जाने के कारण यह संकट पैदा हुआ है। इसके साथ ही उन्होंने इस नीति से लाभ उठाने वालों पर भी सवाल खड़े किए हैं। सोशल मीडिया मंच एक्स पर जारी एक वीडियो संदेश में पूनावाला ने कहा कि भारत ने भारी मात्रा में चीनी का निर्यात किया। लेकिन गन्ने को एथेनॉल उत्पादन की तरफ मोड़े जाने से स्थिति ऐसी हो गई कि भारत को निर्यात पर प्रतिबंध लगाना पड़ा। इस फैसले से चीनी के दाम तेजी से बढ़े और अब सरकार चीनी पर आयात शुल्क हटाने की योजना बना रही है। पूनावाला ने यह आरोप भी लगाया कि इस स्थिति से राजनेताओं और उनके परिवारों को फायदा हुआ है। उन्होंने घोषणा की कि उनका संगठन टीम भारत, जो E20 पेट्रोल के तेजी से लागू होने को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहा है और सरकार से बातचीत में जुटा है, 22 और 23 अगस्त को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन और भूख हड़ताल करेगा। सरकार के लिए फिलहाल सबसे तात्कालिक चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि देश के सबसे बड़े त्योहारी खरीदारी सीजन की शुरुआत में यह रोजमर्रा की आवश्यक वस्तु आम जनता की पहुंच से बाहर न हो जाए। हालांकि, इस मामले से जुड़ा व्यापक नीतिगत सवाल अधिकारियों के लिए सुलझाना काफी अधिक चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। 9. चीनी शेयरों में पैसा लगाने वाले निवेशकों के लिए क्या रिस्क है? सबसे बड़ा रिस्क सरकारी दखल है। चीनी के दाम जितने ज्यादा बढ़ेंगे, सरकार कीमतें घटाने के सख्त कदम उठाएगी। इससे मिलों का मार्जिन अचानक घट सकता है। अगर कंपनियों का मार्जिन घटेगा तो शेयरों में आई तेजी गिरावट में बदल सकती है। 10. रॉ शुगर का आयात 1 अक्‍टूबर तक ड्यूटी फ्री घरेलू बाजार में चीनी की सप्लाई सुधारने और बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाते हुए रॉ-शुगर का आयात टैक्‍स फ्री कर दिया है। विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) के नोटिफिकेशन के मुताबिक, सरकार ने 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी के ड्यूटी फ्री आयात को मंजूरी दी है। इस फैसले के बाद अब बिना कोई आयात शुल्क चुकाए विदेशों से 10 लाख टन रॉ-शुगर भारत मंगाई जा सकेगी, जिससे स्थानीय बाजारों में चीनी की उपलब्धता बढ़ेगी।

प्रभासाक्षी 21 Aug 2026 2:17 pm

क्या कैप्टन ने सरकार के 'कप्तान' पर ही सवाल उठा दिये हैं? अमरिंदर ने Modi-ism का जिक्र कर क्या संदेश दिया?

पंजाब विधानसभा चुनावों से पहले राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह ने व्यक्ति-केंद्रित राजनीति पर सवाल उठाते हुए एक बड़ा राजनीतिक सवाल दागा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और पिछले एक दशक की उपलब्धियों को स्वीकार करते हुए कैप्टन ने अंग्रेजी समाचार-पत्र में अपने आलेख के जरिए यह संकेत दिया है कि अब भाजपा और देश की राजनीति को सिर्फ एक नाम और एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द सिमटने की बजाय मजबूत संस्थाओं, जवाबदेही और स्थायी लोकतांत्रिक ढांचे की ओर बढ़ना चाहिए। एक तरह से कैप्टन ने भाजपा को भी सलाह दे डाली है कि मोदी-इज़्म की अगली मंजिल केवल मोदी के नाम पर आगे बढ़ना नहीं, बल्कि ऐसी संस्था-केंद्रित व्यवस्था खड़ी करना होनी चाहिए, जो किसी एक नेता से परे जाकर देश की राजनीतिक और प्रशासनिक ताकत को स्थायी आधार दे सके। अपने आलेख में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने साफ तौर पर कहा है कि नरेंद्र मोदी के दौर ने भारतीय राजनीति और शासन की दिशा बदल दी है। उनके अनुसार, मोदी ने भारतीय जनता पार्टी को राजनीति के एक सीमित दायरे से निकालकर देशव्यापी शक्ति में बदला। डिजिटल सार्वजनिक ढांचे, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, वित्तीय समावेशन, स्वच्छता, आवास, बिजली और बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों में हुए कामों का उल्लेख करते हुए उन्होंने माना कि मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि सरकार की पहुंच और डिलीवरी क्षमता का विस्तार रही है। इसे भी पढ़ें: ‘ऐसे समझौते...’: Harsimrat Badal ने SAD-BJP Alliance की अटकलों को फिर दी हवा, Punjab में होगी वापसी? लेकिन कैप्टन का असली संदेश इससे आगे जाता है। उनका तर्क है कि किसी भी लोकतंत्र की सफलता को केवल एक शक्तिशाली नेता की उपलब्धियों से नहीं मापा जा सकता। मजबूत सरकार और मजबूत नेता महत्वपूर्ण हैं, लेकिन लोकतंत्र की असली मजबूती मजबूत संस्थाओं, जवाबदेही और संवैधानिक संतुलन से आती है। उन्होंने सवाल उठाया कि मोदी-इज़्म की अगली यात्रा आखिर किस दिशा में होगी? क्या वह एक व्यक्ति के नेतृत्व के इर्द-गिर्द सीमित रहेगा या फिर ऐसी संस्थागत व्यवस्था खड़ी करेगा, जो किसी भी व्यक्ति के सत्ता से हटने के बाद भी देश को आगे बढ़ाती रहे? यहीं से कैप्टन अमरिंदर सिंह का आलेख राजनीतिक रूप से और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। भाजपा के वरिष्ठ नेता होते हुए भी उन्होंने संसद की भूमिका, संसदीय समितियों की जांच, संघीय विमर्श, संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता और नागरिक अधिकारों जैसे मुद्दों को खुलकर उठाया है। उनका कहना है कि लोकतंत्र केवल नियमित चुनावों का नाम नहीं है। चुनावी जीत किसी सरकार को जनादेश जरूर देती है, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि सत्ता के इस्तेमाल पर संस्थागत नियंत्रण कितना प्रभावी है। कैप्टन ने विशेष रूप से संसद की समितियों और संसदीय जांच की भूमिका पर जोर दिया है। उनके अनुसार, बड़े फैसलों से पहले गंभीर विचार-विमर्श और समितियों की जांच को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। संघीय ढांचे के सवाल पर भी उनका संकेत साफ है कि केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन तथा संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता लोकतंत्र की दीर्घकालिक मजबूती के लिए जरूरी है। उनका एक और महत्वपूर्ण तर्क कल्याणकारी योजनाओं को लेकर है। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा कि खाद्य सुरक्षा, आवास, छात्रवृत्ति और सामाजिक सुरक्षा जैसी योजनाओं को किसी नेता की उदारता या राजनीतिक उपहार के रूप में नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकार और राज्य के दायित्व के रूप में देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक, जब शासन का आधार व्यक्ति की छवि से आगे बढ़कर संस्थागत अधिकारों और जवाबदेही पर टिकेगा, तभी विकास की प्रक्रिया स्थायी और निष्पक्ष बन सकेगी। आलेख में कैप्टन ने संविधान की मूल अवधारणाओं पर भी अपनी बात रखी है। उनका कहना है कि बहुलतावाद, धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद जैसे शब्दों पर राजनीतिक मतभेद हो सकते हैं, लेकिन संवैधानिक व्यवस्था को केवल राजनीतिक नारों के आधार पर नहीं आंका जा सकता। उनका तर्क है कि समाजवाद का अर्थ निजी क्षेत्र का विरोध या राज्य का पूर्ण नियंत्रण नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक न्याय तथा अवसरों की समानता भी है। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने मोदी सरकार की उपलब्धियों को नकारने की बजाय उन्हें भारत की नई राजनीतिक वास्तविकता का हिस्सा माना है। उनका कहना है कि पिछले एक दशक में भारत ने ऊर्जा, महत्वाकांक्षा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत पहचान हासिल की है। लेकिन उन्होंने यह भी चेताया है कि किसी नेता की ऐतिहासिक सफलता का अंतिम पैमाना केवल उसकी व्यक्तिगत लोकप्रियता या चुनावी जीत नहीं होती। असली कसौटी यह होती है कि उसके बाद देश की संस्थाएं कितनी मजबूत, स्वायत्त और सक्षम बनकर उभरती हैं। यानी, कैप्टन का संदेश सीधे तौर पर मोदी के नेतृत्व को खारिज करने का नहीं, बल्कि उसकी अगली मंजिल तय करने का है। उनका मानना है कि मोदी-इज़्म का अगला चरण व्यक्ति-केंद्रित राजनीति से संस्था-केंद्रित राष्ट्र निर्माण की ओर बढ़ना चाहिए। मजबूत नेतृत्व अपनी जगह जरूरी है, लेकिन उसे संविधान, संसद, न्यायिक एवं संवैधानिक संस्थाओं और नागरिक अधिकारों की मजबूती के साथ आगे बढ़ना होगा। देखा जाये तो पंजाब के चुनावी माहौल में एक वरिष्ठ भाजपा नेता और दो बार के पूर्व मुख्यमंत्री की ओर से उठाया गया यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह केवल पंजाब की राजनीति तक सीमित नहीं है। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपने आलेख के जरिए राष्ट्रीय राजनीति के सामने एक बुनियादी सवाल रखा है कि क्या भारत का अगला विकास चरण केवल मजबूत नेता के भरोसे आगे बढ़ेगा, या फिर ऐसा संस्थागत ढांचा तैयार करेगा जो किसी भी नेता से बड़ा, ज्यादा टिकाऊ और आने वाली पीढ़ियों के लिए अधिक जवाबदेह हो? कुल मिलाकर देखें तो कैप्टन के शब्दों का सार यही है कि भारत को मजबूत नेतृत्व चाहिए, लेकिन उससे भी ज्यादा मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाएं। और शायद यही वह बहस है, जिसे उन्होंने पंजाब चुनावों से पहले अपने आलेख के जरिए राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 21 Aug 2026 1:59 pm

मध्य प्रदेश में करोड़ों कमाने वाली मंडियों में सुविधाओं का टोटा : जीतू पटवारी

मध्य प्रदेश में करोड़ों कमाने वाली मंडियों में सुविधाओं का टोटा : जीतू पटवारी

समाचार नामा 21 Aug 2026 12:27 pm

राहुल गांधी का धरना आक्रामक सियासी कनेक्ट, विपक्ष और बाकी कांग्रेस को पसंद आयेगा?

Rahul Gandhi aggressive political strategy- राहुल गांधी ने कांग्रेस की विपक्षी राजनीति को आक्रामक रणनीति में बदल दिया है। छात्र आंदोलनों, युवाओं, Gen Z और महिलाओं के मुद्दों को उठाकर वह नई राजनीतिक जमीन तैयार कर रहे हैं। क्या कांग्रेस इस रास्ते पर चलेगी?

सत्य हिंदी 21 Aug 2026 11:41 am

Modi ने पिछले साल China जाने से पहले चली थी तगड़ी चाल, अब Xi Jinping के India आने से पहले खेल दिया बड़ा दाँव

पिछले वर्ष जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए चीन जाने वाले थे, तो उन्होंने उससे ठीक पहले जापान का दौरा किया था। 29 और 30 अगस्त 2025 को जापान में वार्षिक भारत-जापान शिखर सम्मेलन में भाग लेने के बाद मोदी सीधे 31 अगस्त से 1 सितंबर तक SCO समिट के लिए चीन के तियानजिन पहुंचे थे। उस समय भी घटनाक्रम का सामरिक संदेश स्पष्ट था कि भारत एशिया की बड़ी शक्तियों के साथ अपने रिश्तों को अलग-अलग खांचों में नहीं, बल्कि अपनी राष्ट्रीय रणनीति के अनुसार आगे बढ़ा रहा है। अब एक बार फिर वैसा ही दिलचस्प और महत्वपूर्ण संयोग सामने आया है। अगले महीने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए भारत आने की संभावना से पहले जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइज़ुमी की भारत यात्रा के दौरान नई दिल्ली और टोक्यो ने रक्षा एवं समुद्री सुरक्षा सहयोग को नई दिशा देने वाले अहम फैसले किए हैं। संदेश को सीधे शब्दों में कहें तो चीन देखता रह गया और भारत ने जापान के साथ हिंद-प्रशांत की सुरक्षा, नौसैनिक सहयोग, रक्षा तकनीक और लॉजिस्टिक्स से जुड़ी साझेदारी को और मजबूत कर लिया। इसे भी पढ़ें: Vishwakhabram: Putin के Kuril Islands पहुँचते ही भड़क उठीं Sanae Takaichi, Japan-Russia के बीच जोरदार भिड़ंत से दुनिया हैरान देखा जाये तो यह केवल एक रक्षा मंत्री की औपचारिक यात्रा नहीं है। पिछले महीने, 1 से 3 जुलाई 2026 के बीच जापान की प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची भी भारत आई थीं। नई दिल्ली में 16वें भारत-जापान वार्षिक शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों देशों ने 10 अरब डॉलर से अधिक के द्विपक्षीय समझौतों और आर्थिक, सामरिक तथा रक्षा सहयोग को आगे बढ़ाने पर सहमति बनाई। अब जापानी रक्षा मंत्री की यात्रा और इसी समय भारत में मौजूद जापान के बड़े निवेशक प्रतिनिधिमंडल ने यह संकेत और मजबूत कर दिया है कि भारत-जापान संबंध अब सुरक्षा और आर्थिक शक्ति के संयुक्त ढांचे में बदल रहे हैं। नई दिल्ली में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और उनके जापानी समकक्ष शिंजिरो कोइज़ुमी के बीच हुई द्विपक्षीय वार्ता की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि समुद्री सुरक्षा सहयोग पर मेमोरेंडम ऑफ अरेंजमेंट (MoA) रही। इसके तहत दोनों देशों की नौसेनाओं के बीच समुद्री गतिविधियों की निगरानी, मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस, सूचनाओं के आदान-प्रदान, खोज एवं बचाव तथा मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR) के क्षेत्र में सहयोग का व्यापक ढांचा तैयार होगा। इस समझौते का महत्व केवल तकनीकी नहीं, बल्कि गहरे सामरिक निहितार्थों वाला है। हिंद महासागर से लेकर पश्चिमी प्रशांत तक समुद्री मार्गों पर नियंत्रण और नौवहन की स्वतंत्रता आज एशिया की सबसे बड़ी रणनीतिक प्रतिस्पर्धाओं में शामिल है। दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर में चीन की बढ़ती आक्रामकता और समुद्री मौजूदगी के बीच भारत और जापान का समुद्री समन्वय मजबूत होना शक्ति संतुलन की राजनीति में महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। देखा जाये तो यह कोई औपचारिक सैन्य गठबंधन की घोषणा नहीं है, लेकिन इसका मतलब साफ है कि भारत और जापान साझा सूचना, बेहतर समुद्री निगरानी, परस्पर लॉजिस्टिक सहयोग और संयुक्त क्षमता निर्माण के जरिए हिंद-प्रशांत में अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत कर रहे हैं। हम आपको बता दें कि भारत-जापान रक्षा सहयोग पिछले एक दशक में लगातार गहराता गया है। 2014 में औपचारिक रूप से स्थापित ‘विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी’ को दोनों देशों के नेतृत्व ने लगातार मजबूत किया। प्रधानमंत्री मोदी की जापान यात्राओं और दोनों देशों के बीच नियमित उच्चस्तरीय संवाद ने इस रिश्ते को नई गति दी। इस साझेदारी की बुनियाद साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और मुक्त एवं खुले हिंद-प्रशांत की समान सोच पर टिकी है। 2014 के बाद हुए रक्षा समझौतों ने सैन्य सहयोग को संस्थागत स्वरूप दिया। 2020 में हुआ पारस्परिक आपूर्ति और सेवाएं समझौता दोनों देशों की सेनाओं के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण साबित हुआ। MILAN और JAIMEX जैसे नौसैनिक अभ्यासों में इस व्यवस्था ने जहाजों और विमानों को अधिक सहज लॉजिस्टिक सहायता उपलब्ध कराने का आधार तैयार किया। साथ ही रक्षा प्रौद्योगिकी में भी दोनों देश अब प्रतीकात्मक सहयोग से आगे निकल चुके हैं। 2024 में औपचारिक रूप से आगे बढ़ा जापान के UNICORN इंटीग्रेटेड कम्युनिकेशन एंटीना सिस्टम का भारतीय नौसेना के लिए सह-विकास, दोनों देशों का पहला संयुक्त रक्षा उपकरण प्रोजेक्ट है। अब नई वार्ता में समुद्री सुरक्षा के साथ-साथ माइन काउंटरमेजर्स, संयुक्त जहाज निर्माण और पारस्परिक शिप रिपेयर सुविधाओं को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया है। इसके अलावा, भारत की उत्पादन क्षमता और जापान की उच्च तकनीकी विशेषज्ञता को ‘मेक इन इंडिया’ के ढांचे से जोड़ने की कोशिश विशेष महत्व रखती है। इसका अर्थ केवल हथियार खरीदना नहीं, बल्कि भविष्य में संयुक्त उत्पादन, तकनीकी साझेदारी और रक्षा औद्योगिक क्षमता का विस्तार है। साथ ही दोनों देशों के बीच सैन्य अभ्यासों का दायरा भी बढ़ रहा है। धर्म गार्जियन और JAIMEX जैसे अभ्यासों को और व्यापक बनाने पर सहमति बनी है, जबकि वीर गार्जियन-26 एक नए चरण का संकेत है। इस अभ्यास में पहली बार जापानी लड़ाकू विमान भारत में भाग लेंगे। दोनों देशों ने DRDO और जापान की Acquisition, Technology and Logistics Agency (ATLA) के बीच रक्षा अनुसंधान एवं विकास सहयोग गहरा करने और एक डिफेंस इंडस्ट्री फोरम आयोजित करने की योजना पर भी जोर दिया है। इसके अलावा, कूटनीतिक और सामरिक समन्वय को आगे बढ़ाने के लिए इस वर्ष टोक्यो में प्रस्तावित चौथी भारत-जापान विदेश एवं रक्षा मंत्रियों की 2+2 बैठक की तैयारी तेज करने का भी फैसला हुआ है। साथ ही दोनों देश इंडो-पैसिफिक लॉजिस्टिक्स नेटवर्क (IPLN) के जरिए प्राकृतिक आपदाओं के दौरान राहतकर्मियों और जरूरी सामग्री को तेजी से पहुंचाने की क्षमता विकसित कर रहे हैं। देखा जाये तो इस पूरी साझेदारी का एक और महत्वपूर्ण आयाम आर्थिक सुरक्षा है। जापान की Free and Open Indo-Pacific अवधारणा और भारत की MAHASAGAR यानि Mutual and Holistic Advancement for Security and Growth Across Regions पहल के बीच बढ़ती समानता इस रिश्ते को केवल सैन्य दृष्टि से नहीं, बल्कि आपूर्ति श्रृंखला, निवेश, प्रौद्योगिकी और आर्थिक सुरक्षा के स्तर पर भी मजबूत कर रही है। जापानी प्रधानमंत्री की हालिया यात्रा, अरबों डॉलर के समझौते और भारत आए निवेशक प्रतिनिधिमंडल इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा दिखाई देते हैं। देखा जाये तो भारत और जापान का रिश्ता, कोई आज की भू-राजनीति की उपज नहीं है। इसके सांस्कृतिक सूत्र 752 ईस्वी तक जाते हैं, जब भारतीय बौद्ध भिक्षु बोधिसेन ने जापान के नारा स्थित तोदाइजी मंदिर में महान बुद्ध प्रतिमा का अभिषेक किया था। आधुनिक काल में स्वामी विवेकानंद, रवींद्रनाथ टैगोर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और रास बिहारी बोस जैसे व्यक्तित्वों ने दोनों देशों के संबंधों को नई गहराई दी। 1903 में स्थापित जापान-इंडिया एसोसिएशन आज भी जापान की सबसे पुरानी अंतरराष्ट्रीय मैत्री संस्थाओं में से एक है। लेकिन अब इतिहास और रणनीति एक ही दिशा में आगे बढ़ते दिख रहे हैं। पिछले साल मोदी जापान से होकर चीन गए थे; अब चीनी राष्ट्रपति के भारत आने से पहले जापान के साथ रक्षा साझेदारी का नया अध्याय खुला है। जापानी प्रधानमंत्री की यात्रा, विशाल आर्थिक समझौते, निवेशक प्रतिनिधिमंडल और अब रक्षा मंत्री के साथ समुद्री सुरक्षा समझौते, ये घटनाएं अलग-अलग नहीं हैं। इनका सामूहिक संदेश बेहद धारदार है कि भारत किसी एक शक्ति केंद्र की परिधि में नहीं घूम रहा। वह चीन से संवाद भी करेगा, ब्रिक्स और SCO जैसे मंचों पर साथ भी बैठेगा, लेकिन साथ ही जापान जैसे रणनीतिक साझेदारों के साथ हिंद-प्रशांत में अपनी सैन्य, आर्थिक और तकनीकी स्थिति भी मजबूत करता रहेगा। बहरहाल, प्राचीन सांस्कृतिक रिश्तों से लेकर हिंद महासागर और प्रशांत में संयुक्त नौसैनिक अभ्यासों तक, भारत-जापान संबंध अब एक नई रणनीतिक ऊंचाई पर पहुंच चुके हैं। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 21 Aug 2026 11:25 am

हरियाणा में भाजपा का टिफिन महाकुंभ 23 अगस्त को

हरियाणा में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) 23 अगस्त को टिफिन महाकुंभ का आयोजन करेगी। यह महाकुंभ राज्य में भाजपा के सभी 27 सांगठनिक जिलों में आयोजित किये जाएंगे

देशबन्धु 21 Aug 2026 7:50 am

झारखंडः जेएसएससी-सीजीएल रद्द करने के विरोध में चयनित अभ्यर्थियों ने निकाली तिरंगा यात्रा, फैसला वापस लेने की मांग

झारखंड कर्मचारी चयन आयोग की संयुक्त स्नातक स्तरीय (सीजीएल) परीक्षा के जरिए की गई नियुक्तियां रद्द किए जाने के विरोध में चयनित अभ्यर्थियों का आंदोलन तेज होता जा रहा है

देशबन्धु 21 Aug 2026 3:30 am

बिहार: 'अपने घर' का सपना साकार, चाबी पाकर भावुक लाभार्थियों ने सरकार को दिया धन्यवाद

बिहार: 'अपने घर' का सपना साकार, चाबी पाकर भावुक लाभार्थियों ने सरकार को दिया धन्यवाद

समाचार नामा 20 Aug 2026 10:16 pm

राष्ट्रीय राजमार्गों पर निर्माण संबंधी प्रतिबंधों के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगा केरल

राष्ट्रीय राजमार्गों पर निर्माण संबंधी प्रतिबंधों के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगा केरल

समाचार नामा 20 Aug 2026 10:15 pm

कर्नाटक: कॉलेज के प्रिंसिपल पर 'वंदे मातरम' के नारे रोकने के आरोप में मामला दर्ज

कर्नाटक: कॉलेज के प्रिंसिपल पर 'वंदे मातरम' के नारे रोकने के आरोप में मामला दर्ज

समाचार नामा 20 Aug 2026 6:15 pm

'वंदे मातरम' विवाद पर अमित शाह का गंभीर आरोप, 'कांग्रेस विभाजन के बीज बोने वाली ऐतिहासिक भूल दोहरा रही'

'वंदे मातरम' विवाद पर अमित शाह का गंभीर आरोप, 'कांग्रेस विभाजन के बीज बोने वाली ऐतिहासिक भूल दोहरा रही'

समाचार नामा 20 Aug 2026 4:50 pm

बुरे काम का नतीजा बुरा ही होता है, बाहरी दिल्ली के बेताज बादशाह रहे Sajjan Kumar की सत्ता, सियासत और सजा की कहानी यही संदेश देती है

1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों में उम्रकैद की सजा काट रहे सज्जन कुमार का गुरुवार को दिल्ली में निधन हो गया। वह 80 वर्ष के थे। एक समय ग्रामीण और बाहरी दिल्ली की राजनीति के सबसे ताकतवर चेहरों में गिने जाने वाले, जाट समाज में व्यापक जनाधार रखने वाले और राष्ट्रीय राजधानी की सियासत में कांग्रेस की सत्ता का मजबूत स्तंभ रहे सज्जन कुमार की जिंदगी आखिरकार एक ऐसे मोड़ पर खत्म हुई, जिसे उनके राजनीतिक उत्थान और बाद के पतन की पूरी कहानी के रूप में देखा जा सकता है। सत्ता के शिखर से लेकर तिहाड़ जेल तक का उनका सफर इस कड़वे सच की याद दिलाता है कि बुरे काम का अंजाम बुरा ही होता है। हम आपको बता दें कि पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार को तिहाड़ जेल से सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया था, जहां चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। अस्पताल की ओर से उनकी मौत के कारण को लेकर तत्काल कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। सज्जन कुमार अपने जीवन के अंतिम वर्षों में 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों में मिली उम्रकैद की सजा काट रहे थे। इसे भी पढ़ें: 1984 दंगा केस में उम्रकैद काट रहे पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार की मौत, दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में तोड़ा दम हम आपको बता दें कि सज्जन कुमार दिल्ली की राजनीति में 1970 के दशक से ही प्रभावशाली चेहरा बनकर उभरे थे। उन्होंने 1977 में पार्षद के रूप में अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की और इसके बाद बाहरी दिल्ली लोकसभा सीट से तीन बार सांसद चुने गए। ग्रामीण दिल्ली और जाट बहुल इलाकों में उनकी पकड़ बेहद मजबूत मानी जाती थी। 1980 के दशक में वह दिल्ली कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल थे। स्थानीय संगठन, ग्रामीण मतदाता और जाट समाज में उनके मजबूत आधार ने उन्हें कांग्रेस की राजनीति का बड़ा खिलाड़ी बना दिया था। एक समय ऐसा था जब बाहरी दिल्ली की राजनीति में सज्जन कुमार का नाम ही सत्ता और प्रभाव का पर्याय माना जाता था। लेकिन जिस राजनीतिक ताकत ने उन्हें दशकों तक प्रभावशाली बनाए रखा, वही ताकत 1984 के सिख विरोधी दंगों के आरोपों और फिर लंबे कानूनी संघर्ष के सामने धीरे-धीरे कमजोर पड़ती चली गई। हम आपको याद दिला दें कि 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके अंगरक्षकों द्वारा हत्या के बाद देश, विशेषकर दिल्ली में सिख विरोधी हिंसा भड़क उठी थी। इसके पीछे ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद पैदा हुई परिस्थितियों को भी महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि के रूप में देखा गया था। दिल्ली में कई दिनों तक हिंसा का भयावह दौर चला था। सिखों के घरों, दुकानों और धार्मिक स्थलों को निशाना बनाया गया था। हजारों लोगों की जान गई। अलग-अलग आकलनों में मृतकों की संख्या अलग रही, लेकिन दिल्ली में 2,700 से अधिक सिखों के मारे जाने की पुष्टि हुई, जबकि देशभर में मृतकों की संख्या 3,000 से अधिक बताई गई। इसी हिंसा से जुड़े कई मामलों में सज्जन कुमार का नाम सामने आया। उन पर हिंसक भीड़ का नेतृत्व करने, लोगों को उकसाने, आपराधिक साजिश और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने जैसे गंभीर आरोप लगे। अगले तीन दशकों से अधिक समय तक उनके खिलाफ मुकदमों का सिलसिला चलता रहा और कई मामलों में उन्हें कभी राहत मिली तो कभी कानूनी शिकंजा कसता गया। सज्जन कुमार के राजनीतिक और कानूनी जीवन का सबसे बड़ा मोड़ 17 दिसंबर 2018 को आया। दिल्ली हाईकोर्ट ने निचली अदालत के 2013 के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें उन्हें बरी कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने सज्जन कुमार को 1984 के दंगों के दौरान दिल्ली के राज नगर पार्ट-1, पालम कॉलोनी में पांच सिखों की हत्या और एक गुरुद्वारे को जलाने से जुड़े मामले में दोषी ठहराया। अदालत ने उन्हें आपराधिक साजिश और हिंसा के लिए उकसाने सहित गंभीर अपराधों का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। अपने फैसले में दिल्ली हाईकोर्ट ने 1984 की सिख विरोधी हिंसा को “मानवता के खिलाफ अपराध” तक करार दिया था। अदालत ने यह भी निर्देश दिया था कि सज्जन कुमार को अपने प्राकृतिक जीवन के शेष समय तक जेल में रहना होगा। यहीं से वह नेता, जो कभी दिल्ली की सत्ता के गलियारों में बेहद प्रभावशाली माना जाता था, तिहाड़ जेल की सलाखों के पीछे पहुंच गया। हम आपको यह भी बता दें कि 1984 के दंगों से जुड़े आरोपों के बावजूद कांग्रेस लंबे समय तक सज्जन कुमार के साथ खड़ी रही। वह पार्टी के बड़े नेताओं में गिने जाते रहे और वर्षों तक पार्टी की राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा बने रहे। हालांकि समय के साथ राजनीतिक दबाव बढ़ता गया। 2009 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर को दिए गए चुनाव टिकट वापस ले लिए थे। इसके बाद सज्जन कुमार धीरे-धीरे पार्टी के भीतर हाशिये पर चले गए। 2018 में दिल्ली हाईकोर्ट से उम्रकैद की सजा मिलने के बाद उन्होंने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। इसके साथ ही कांग्रेस के साथ उनका औपचारिक रिश्ता समाप्त हो गया। जिस पार्टी में वह कभी दिल्ली की राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरों में शामिल थे, उसी पार्टी से उनका राजनीतिक सफर अंततः अलगाव और हाशिये पर खत्म हुआ। साथ ही 2018 की सजा सज्जन कुमार के खिलाफ अंतिम कानूनी कार्रवाई नहीं थी। फरवरी 2025 में दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने उन्हें 1984 के दंगों से जुड़े एक अन्य मामले में भी उम्रकैद की सजा सुनाई। यह मामला सरस्वती विहार क्षेत्र में भीड़ के हमले से जुड़ा था, जिसमें पिता-पुत्र जसवंत सिंह और तरुणदीप सिंह को कथित रूप से जिंदा जलाकर मार दिए जाने का मामला सामने आया था। अभियोजन पक्ष ने सज्जन कुमार के लिए मृत्युदंड की मांग की थी, लेकिन अदालत ने उनकी उम्र और स्वास्थ्य समेत अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई। इस तरह सज्जन कुमार को 1984 की हिंसा से जुड़े अलग-अलग मामलों में एक से अधिक बार उम्रकैद की सजा मिली और वह जीवन के अंतिम समय तक तिहाड़ जेल में ही रहे। साथ ही इस वर्ष जनवरी में सज्जन कुमार को 1984 के दंगों से जुड़े जनकपुरी और विकासपुरी क्षेत्रों के हिंसा भड़काने के आरोप वाले दो अलग-अलग मामलों में दिल्ली की अदालत से बरी कर दिया गया था। लेकिन इन बरी होने के फैसलों से उनकी रिहाई का रास्ता नहीं खुला, क्योंकि वह अन्य मामलों में उम्रकैद की सजा काट रहे थे। उनकी 2018 की दोषसिद्धि और सजा के खिलाफ चुनौती भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित थी। यानी कानूनी लड़ाई के लंबे दौर में कुछ मामलों में उन्हें राहत जरूर मिली, लेकिन 1984 के दंगों से जुड़े अपराधों में हुई दोषसिद्धियों ने उनकी जिंदगी की दिशा पूरी तरह बदल दी। देखा जाये तो सज्जन कुमार का राजनीतिक जीवन भारतीय राजनीति की उन कहानियों में शामिल हो गया है, जहां एक नेता का जनाधार और राजनीतिक प्रभाव लंबे समय तक उसे मजबूत बनाए रखता है, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया अंततः दशकों पुराने मामलों तक पहुंचती है। 1977 में पार्षद से राजनीतिक शुरुआत करने वाला नेता तीन बार लोकसभा पहुंचा। बाहरी दिल्ली में उसका व्यापक जनाधार था, ग्रामीण और जाट बहुल क्षेत्रों में उसकी मजबूत पकड़ थी और वह कांग्रेस की दिल्ली इकाई का बड़ा चेहरा था। लेकिन 1984 की हिंसा का दाग उसके राजनीतिक कद से कहीं ज्यादा भारी साबित हुआ। करीब चार दशक तक चले मुकदमों, राजनीतिक विवादों, जनाक्रोश और कानूनी लड़ाइयों के बाद सज्जन कुमार को उम्रकैद की सजा मिली। कांग्रेस से उनका रिश्ता टूटा, राजनीतिक प्रभाव खत्म हुआ और जीवन के अंतिम वर्ष तिहाड़ जेल में बीते। देखा जाये तो 80 वर्ष की उम्र में उनका निधन उस दौर का अंत है, जिसमें सज्जन कुमार कभी बाहरी दिल्ली की राजनीति के सबसे शक्तिशाली नेताओं में गिने जाते थे। लेकिन उनकी अंतिम पहचान एक ऐसे पूर्व कांग्रेस सांसद की बन गई, जो 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों में दोषी ठहराए जाने के बाद उम्रकैद की सजा काट रहा था। सज्जन कुमार की कहानी सत्ता के शिखर से जेल की सलाखों तक पहुंचने की कहानी है। यह उस राजनीतिक प्रभाव की भी कहानी है, जो वर्षों तक कायम रहा, और उस न्यायिक संघर्ष की भी, जिसने दशकों बाद अपना फैसला सुनाया। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सत्ता कितनी भी बड़ी क्यों न हो, समय और कानून के सामने उसका प्रभाव हमेशा कायम नहीं रहता। सज्जन कुमार का जीवन और अंत इसी कड़वे सच की एक बड़ी राजनीतिक कहानी बनकर दर्ज हो गया। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 20 Aug 2026 4:45 pm

राहुल गांधी का बड़ा दावा- पीएम मोदी का शासन आखिरी दौर में, उत्तराधिकारी की तलाश शुरू

सीडब्ल्यूसी बैठक में राहुल गांधी ने पीएम नरेंद्र मोदी के राजनीतिक भविष्य को लेकर बड़ा दावा किया। खरगे ने शिक्षा, रोजगार, राम मंदिर ट्रस्ट और चीन सीमा मुद्दे पर सरकार को घेरा।

देशबन्धु 20 Aug 2026 2:50 pm

Mohan Bhagwat US Visit से पहले USCIRF ने फिर अलापा Anti India Narrative राग, RSS पर प्रतिबंध लगाने की उठाई माँग

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत की अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन यात्रा शुरू होने से ठीक पहले अमेरिकी संस्था यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (USCIRF) ने एक बार फिर भारत, भाजपा और आरएसएस को निशाने पर लिया है। 25 अगस्त से शुरू होने वाली भागवत की प्रस्तावित तीन देशों की यात्रा से पहले आयोग ने न केवल आरएसएस नेताओं को अमेरिका में “हाई-लेवल मीटिंग्स” और कूटनीतिक सम्मान नहीं देने की मांग की, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता के कथित उल्लंघनों के लिए जिम्मेदार पाए जाने वाले आरएसएस सदस्यों पर प्रतिबंध लगाने तक की वकालत कर दी। USCIRF के अध्यक्ष और पाकिस्तानी-अमेरिकी चिकित्सक आसिफ महमूद तथा आयुक्त जीन मिल्स के बयानों को आयोग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर साझा किया। महमूद ने आरएसएस को सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी का वैचारिक अभिभावक बताते हुए उसके संबद्ध संगठनों पर धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमलों के आरोप लगाए। वहीं जीन मिल्स ने कहा कि आरएसएस नेताओं को, भले ही वे भारतीय सरकार से जुड़े हों, उच्चस्तरीय मुलाकातें या कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं दिया जाना चाहिए। मिल्स ने कहा कि इसकी बजाय अमेरिका को उन लोगों पर प्रतिबंध लगाने पर ध्यान देना चाहिए, जिन्हें धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन का जिम्मेदार माना जाता है। इसे भी पढ़ें: भारतीय परंपराओं में निहित है संवाद, संवाद से ही होता है समाधान देखा जाये तो यह कोई अचानक आया बयान नहीं है। मार्च में जारी अपनी वार्षिक रिपोर्ट में भी USCIRF ने भारत को धार्मिक स्वतंत्रता के मामले में कठघरे में खड़ा करते हुए आरएसएस और भारत की खुफिया एजेंसी RAW तक के खिलाफ लक्षित अमेरिकी प्रतिबंधों की सिफारिश की थी। इनमें संपत्ति फ्रीज करने और अमेरिका में प्रवेश प्रतिबंध जैसे कदम शामिल करने की बात कही गई। यह आयोग बार-बार भारत को “कंट्री ऑफ पर्टिकुलर कंसर्न” यानी CPC घोषित करने की सिफारिश करता रहा है। यह एक ऐसा वर्गीकरण है, जिसमें चीन और उत्तर कोरिया जैसे देशों को भी शामिल किया जाता है। वहीं भारत ने USCIRF की इस रिपोर्ट और उसके आरोपों को सिरे से खारिज किया था। विदेश मंत्रालय ने इसे “विकृत और चयनात्मक तस्वीर” पेश करने वाला दस्तावेज बताया था, जो संदिग्ध स्रोतों और वैचारिक आख्यानों पर आधारित है। यह भी महत्वपूर्ण है कि USCIRF एक अमेरिकी संघीय सरकारी निकाय जरूर है, लेकिन उसकी भूमिका केवल सलाहकारी है और उसकी सिफारिशें बाध्यकारी नहीं हैं। यही कारण है कि आयोग की लगातार कठोर सिफारिशों के बावजूद अमेरिकी प्रशासन ने भारत को CPC घोषित करने या आरएसएस अथवा RAW पर प्रतिबंध लगाने जैसी मांगों को स्वीकार नहीं किया है। इसके विपरीत, अमेरिका और भारत के बीच रणनीतिक, रक्षा, तकनीकी और भू-राजनीतिक साझेदारी लगातार विस्तार पाती रही है। दूसरी ओर, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की आगामी यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर चुका है। अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में स्थानीय भारतीय संगठनों और प्रवासी संस्थाओं के निमंत्रण पर होने वाली इस यात्रा के दौरान भागवत भारतीय मूल के लोगों और विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों से संवाद करेंगे। यहीं से USCIRF के ताजा हमले के राजनीतिक और वैचारिक संदर्भ पर सवाल खड़े होते हैं। आखिर जिस संगठन ने लगभग एक शताब्दी में भारत के सामाजिक जीवन में अपनी गहरी उपस्थिति बनाई, सेवा, शिक्षा, आपदा राहत, सामाजिक संगठन और राष्ट्रीय चेतना के क्षेत्र में विशाल स्वयंसेवी नेटवर्क खड़ा किया, उसके प्रमुख की प्रवासी भारतीयों से मुलाकात को पहले ही संदेह और प्रतिबंध की भाषा में क्यों देखा जा रहा है? देखा जाये तो आरएसएस को केवल राजनीतिक चश्मे से देखना ही उसकी सबसे बड़ी गलत व्याख्या है। देशभर में स्वयंसेवकों का व्यापक सामाजिक और सेवा कार्य, प्राकृतिक आपदाओं में राहत अभियान, शिक्षा एवं सामाजिक उत्थान से जुड़े प्रयास और राष्ट्रहित को केंद्र में रखने वाली उसकी संगठनात्मक परंपरा उसके लंबे सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। यही व्यापक सामाजिक आधार और प्रवासी भारतीय समाज के बीच बढ़ती स्वीकार्यता संभवतः उन समूहों को असहज करती है, जो भारत की राजनीति और समाज को केवल धार्मिक उत्पीड़न की एक पूर्वनिर्धारित कहानी के जरिए देखना चाहते हैं। इसके अलावा, USCIRF के दस्तावेजों और बयानों पर नजर डालें तो भाजपा और आरएसएस के खिलाफ उसका नफरत भरा रुख स्पष्ट दिखाई देता है। यह आयोग भाजपा और आरएसएस के संस्थागत संबंधों को “भेदभाव के माहौल” से जोड़ता रहा है और नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), धर्मांतरण विरोधी कानूनों तथा गोहत्या निषेध से जुड़े प्रावधानों को भी इसी व्यापक राजनीतिक ढांचे के हिस्से के रूप में प्रस्तुत कर चुका है। साथ ही इस आयोग की ओर से भारत के लोकतांत्रिक, संवैधानिक और न्यायिक ढांचे को उसके अपने संदर्भ में समझने की बजाय हर नीति और कानूनी कार्रवाई को धार्मिक उत्पीड़न के पूर्वनिर्धारित फ्रेम में फिट करने की कोशिश की जाती है। उदाहरण के लिए भारत CAA को पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में धार्मिक उत्पीड़न झेलने वाले अल्पसंख्यकों के लिए तेज नागरिकता प्रक्रिया वाला मानवीय कानून बताता है। लेकिन USCIRF इसे लगातार घरेलू अल्पसंख्यकों के अधिकारों को प्रभावित करने वाले उपकरण के रूप में पेश करता रहा है। इसी तरह दंगों, आतंकवाद या वित्तीय अपराध जैसे गंभीर मामलों में आरोपित व्यक्तियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई अथवा अदालतों द्वारा जमानत से इंकार को भी कई बार “धार्मिक अल्पसंख्यकों के मनमाने उत्पीड़न” की भाषा में पेश किया जाता है। इस दृष्टिकोण में भारत की स्वतंत्र न्यायपालिका, बहुस्तरीय अपील व्यवस्था और संवैधानिक प्रक्रिया को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता। दूसरी ओर, भारत सरकार और कई भारतीय-अमेरिकी संगठनों ने USCIRF के रवैये पर दोहरे मापदंडों का सवाल भी उठाया है। सवाल उठाया गया है कि यह आयोग भारत को धार्मिक स्वतंत्रता पर लगातार उपदेश देता है, लेकिन अमेरिका और कनाडा में हिंदू मंदिरों पर तोड़फोड़, आगजनी, भारतीय मूल के लोगों के खिलाफ घृणा अपराधों और संगठित धमकी की घटनाओं पर खामोश रहता है। यही नहीं, इस आयोग के नेतृत्व की पृष्ठभूमि को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। साथ ही USCIRF की रिपोर्टिंग, स्रोत चयन और निष्कर्षों में लगातार दिखाई देने वाले पैटर्न इसकी निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न उठाते हैं। बहरहाल, USCIRF भले ही मोहन भागवत की विदेश यात्रा से पहले प्रतिबंधों, कूटनीतिक बहिष्कार और आरएसएस के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर कितना भी शोर मचाता रहे, लेकिन जमीनी तस्वीर इससे अलग दिखाई दे रही है। अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में रह रहे संघ से जुड़े स्वयंसेवक और भारतीय समुदाय के लोग अपने सरसंघचालक के स्वागत को उत्सुक नजर आ रहे हैं और उनके मार्गदर्शक संबोधन को सुनने के लिए आतुर हैं। संघ के शताब्दी वर्ष में मोहन भागवत की यह यात्रा वैश्विक भारतीय समाज के साथ संवाद का अवसर बन रही है। ऐसे में आलोचकों और USCIRF की ओर से उठाया जाने वाला विरोध का शोर, प्रवासी भारतीयों और स्वयंसेवकों के उत्साह तथा व्यापक जनसंपर्क के बीच दबकर रह जाने की संभावना है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 20 Aug 2026 2:39 pm

जयपुर से लेकर भोपाल और गया से उन्नाव तक...Gen Z तो झांकी थी, पूरी पिक्चर दिखा रहे Gen अल्फा?

कहीं क्लॉस रूम में पंखा नहीं चलता, कहीं पीने का पानी नहीं है। कहीं टॉयलेट इस्तेमाल करने लायक नहीं है। कहीं शिक्षक नहीं है तो कहीं मिड-डे मील में कीड़े मिलने की शिकायत है। अब इन सब के खिलाफ स्कूलों के बच्चे आवाज उठा रहे हैं। जेन जी के बाद अब जेन एल्फा भी अपने हक के लिए सड़कों पर उतरते दिख रहे हैं। बीते कुछ हफ्तों में देश के कई राज्यों से स्कूल-कॉलेज के बच्चों के प्रदर्शन की तस्वीर सामने आ रही है। इन प्रोटेस्ट में एक कहानी राजस्थान के जयपुर की है, जहां मूक-बधिर छात्रों ने प्रदर्शन किया और सरकार ने एक्शन भी लिया। वहीं उत्तर प्रदेश में तो जेन एल्फा ने विधायक का काफिला तक रोक दिया।इन सभी जगहों पर मुद्दे अलग-अलग थे। स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को बुनियादी सुविधाओं के लिए आखिर सड़क पर क्यों उतरना पड़ रहा है? जेन जी के दौर में शिक्षा और परीक्षाओं को लेकर बड़े-बड़े विरोध देखने को मिले। अब जेन एल्फा भी उसी रास्ते पर आगे बढ़ते दिख रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि यह बच्चे छोटे हैं, स्कूल में हैं, लेकिन अपनी मांग को लेकर बिल्कुल साफ हैं। इसे भी पढ़ें: CJI के बाद अब PM मोदी के बयान ने कौन सी नई पार्टी बनवा दी, दनादन जुड़ गए लाखों लोग, कॉकरोच जैसा क्रेज! स्कूल जाने के लिए पक्की सड़क की मांग को लेकर बच्चे कलेक्ट्रेट पहुंचे 11 अगस्त को, उत्तर प्रदेश के हमीरपुर ज़िले की चंदू पुर ग्राम पंचायत के छात्र और ग्रामीण तिरंगा यात्रा के ज़रिए लगभग 5 किलोमीटर दूर अपने स्थानीय कलेक्ट्रेट पहुंचे। बच्चों ने अपने स्कूल तक जाने के लिए पक्की सड़क की मांग की। उन्होंने कहा कि उन्हें कीचड़ से होकर गुज़रना पड़ता है, खासकर बारिश के मौसम में और आज़ादी के बाद से इस इलाके में कोई पक्की सड़क नहीं बनी है। वे ज़िला मजिस्ट्रेट के दफ़्तर के गेट पर बैठ गए और कहा कि जब तक काम शुरू नहीं होगा, वे वहीं डटे रहेंगे। प्रशासन ने बताया कि सड़क बनाने का प्रोजेक्ट, जिसकी लागत लगभग 1 करोड़ रुपये आंकी गई है, कई सालों से अटका हुआ था। एक अधिकारी ने बताया कि वन विभाग से NOC मिल गई है और प्रस्ताव सरकार को भेज दिया गया है; मंज़ूरी मिलने के बाद टेंडर निकाला जाएगा। हालांकि, हमीरपुर के इस विरोध-प्रदर्शन ने बच्चों के इस आंदोलन से जुड़ा एक अहम सवाल भी खड़ा कर दिया। यह आंदोलन कितना बच्चों की अपनी पहल है और कितना उनके आस-पास के बड़ों की वजह से हो रहा है? हमीरपुर के ADM ने आरोप लगाया कि कुछ असामाजिक तत्व बच्चों को आगे करके इस मामले को तूल दे रहे हैं।हालांकि, प्रदर्शनकारी सड़क का काम शुरू करने की मांग करते रहे। इसे भी पढ़ें: शिखा है, जनेऊ पहनते हैं? PM ने राम के मर्म को अयोध्या में समझाया, वो क्या इंटरव्यूअर्स को समझ नहीं आया, मंदिर का नया CEO ब्राह्मण ही बनेगा? यूपी, एमपी, महाराष्ट्र, बिहार और राजस्थान में नई पीढ़ी का विरोध-प्रदर्शन 28 जुलाई को उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में भी कुछ ऐसा ही हुआ। किशनपुर कस्बे के सर्वोदय इंटर कॉलेज के करीब 1,500 छात्र अपनी क्लास से बाहर निकल आए और कॉलेज की सुविधाओं के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन किया। उनकी मांगों में सही डेस्क और बेंच, टॉयलेट, पीने का पानी, मिड-डे मील और लाइब्रेरी व कंप्यूटर लैब जैसी सुविधाओं की कमी को दूर करना शामिल था। स्कूल प्रशासन को झुकना पड़ा। अधिकारियों ने कहा कि मांगों को पूरा किया जाएगा, जिसमें हर क्लास में चार पंखे लगाना, बिजली की वायरिंग ठीक करना और मिड-डे मील की व्यवस्था करना शामिल है। बच्चे बुनियादी सुविधाओं की मांग कर रहे थे, और लगभग हर जगह यही पैटर्न देखने को मिला। बिहार में गया के सिमुआरा मिडिल स्कूल के करीब 40-50 छात्र SDM से सीधे बात करने के लिए लगभग चार किलोमीटर पैदल चलकर उनके ऑफिस पहुंचे। जूनियर अधिकारियों से नहीं, बल्कि सीधे बड़े अधिकारी से। उनकी शिकायतों में खाने लायक मिड-डे मील देना, गंदे टॉयलेट की सफाई, क्लास में पंखे, टूटी बेंच बदलना और खराब हैंडपंप की मरम्मत करवाना शामिल था। प्रशासन ने जांच के आदेश दिए और हेडमास्टर को शिकायतों को दूर करने के लिए समय-सीमा दी। राजस्थान के बाड़मेर में, छात्रों ने टीचर की खाली पोस्ट को लेकर सरकारी स्कूलों के गेट पर ताला लगा दिया। यह विरोध तब तक जारी रहा जब तक ज़िला शिक्षा अधिकारी ने छात्रों को भरोसा नहीं दिलाया कि तुरंत तीन टीचर तैनात किए जाएंगे। जालौर में भी छात्रों ने टीचर की कमी को लेकर इसी तरह विरोध किया। मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में एक रेजिडेंशियल स्कूल के छात्रों ने मेस के खाने की क्वालिटी को लेकर विरोध किया। उनका आरोप था कि दाल और सब्ज़ी में बार-बार कीड़े मिल रहे थे। वहीं, महाराष्ट्र में छात्रों ने टॉयलेट, पानी की सप्लाई और टीचर के स्कूल न आने को लेकर विरोध किया। कई छात्रों ने बोर्ड परीक्षा से पहले टीचर की मांग की। अलग-अलग राज्य, लेकिन बुनियादी सुविधाओं के लिए एक जैसा संघर्ष। जेन अल्फा अपने शिक्षण संस्थानों को जवाब देने के लिए मजबूर करने के वास्ते एकजुटता का इस्तेमाल कर रहे हैं। वे शिकायत करने के पारंपरिक तरीके से आगे बढ़कर अपनी समस्याओं को सड़कों पर ला रहे हैं। डेफ एंड म्यूट के छात्रों ने किया प्रदर्शन जयपुर के सरकारी सेठ आनंदी लाल पोदार हायर सेकेंडरी स्कूल फॉर डेफ एंड म्यूट के छात्रों ने स्कूल की बदहाल हालत के खिलाफ प्रदर्शन किया। बच्चों की शिकायतें सिर्फ एक दो नहीं थी। स्कूल के टॉयलेट खराब थे। पीने के पानी में दिक्कत थी। की बिल्डिंग की हालत जजर थी और कई दूसरी बुनियादी सुविधाएं भी ठीक नहीं थी। स्टूडेंट्स ने साइन लैंग्वेज के जरिए अपनी बात रखी और सोशल मीडिया में इस प्रोटेस्ट से जुड़े कई वीडियो भी वायरल हुए। स्कूल में 12वीं तक के छात्र पढ़ते हैं। यहां 17 क्लासरूम्स हैं। 592 छात्र हैं और शिक्षकों के 76 पद मंजूर हैं। लेकिन बच्चों की शिकायत थी कि स्कूल की हालत लगातार खराब होती जा रही है। टॉयलेट इतने खराब थे कि उनका इस्तेमाल करना भी मुश्किल हो गया था। पीने के पानी की व्यवस्था भी ठीक नहीं थी। स्कूल की दीवारों और क्लासरूम में दरारें थी जिससे बच्चों की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े हो रहे थे। स्कूल बस भी खराब हालत में थी। सफाई के नाम पर जगह-जगह कचरा पड़ा था। मामला सामने आने के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के प्रतिनिधि स्कूल पहुंचे। इसे भी पढ़ें: सिर के बदले सिर! कौन है जनरल रेजाई, जिसे मोजतबा ने बनाया ईरान का 'सिक्योरिटी बॉस' हमीरपुर, उन्नाव के बाद अब बस्ती में रोका एलएलए का काफिला उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में 28 जुलाई को करीब 1500 स्टूडेंट्स स्कूल से बाहर निकल आए। किशनपुर के सर्वोदय इंटर कॉलेज में छठी से 12वीं तक के छात्रों ने 5 से 6 घंटे तक धरना दिया। उनकी शिकायत थी कि क्लासरूम में बिजली और पंखे नहीं है। कहीं पंखों से करंट लगने की शिकायत है। डेस्क बेंच कम है। टॉयलेट गंदे हैं। पीने का पानी सुरक्षित नहीं है। मिड डे मील तय मेन्यू के हिसाब से नहीं मिलता और स्कूल में लाइब्रेरी, कंप्यूटर लैब और खेल की सुविधाएं भी नहीं है। प्रिंसिपल ने बाद में ज्यादातर मांगे मानने की बात कही। यूपी के ही पीलीभीत के जवाहर नवोदय विद्यालय में भी 10वीं और 11वीं और साथ ही साथ 12वीं के छात्रों ने प्रदर्शन किया। हमीरपुर, उन्नाव के बाद अब बस्ती में MLA का काफिला स्कूली बच्चों ने रोक लिया. बच्चों ने विधायक से जर्जर सड़क बनवाने की मांग की। इस पर विधायक ने अफसरों से बात कर जल्द ही सड़क बनवाने का आश्वासन देकर शांत कराया है। जेन ज़ी से सीख रही है जेन अल्फा हाल के इन विरोध-प्रदर्शनों में हिस्सा लेने वाले अधिकांश बच्चे इतने छोटे हैं कि उन्हें अभी वोट देने का अधिकार भी नहीं है। उनके पास कोई औपचारिक राजनीतिक ताकत नहीं है। वे किसी चुनाव के जरिए सरकार नहीं बदल सकते और ज्यादातर मामलों में, जिन संस्थानों के खिलाफ वे खड़े हैं, उन पर भी उनका प्रभाव बेहद सीमित है। इसके बावजूद, उन्होंने प्रभाव डालने का एक नया जरिया विजिबिलिटी का ढूंढ निकाला है और इसे असरदार बनाने के लिए सोशल मीडिया उनका सबसे मजबूत हथियार बनकर उभरा है। सड़क पर तख्तियां थामे मार्च करते या किसी सरकारी दफ्तर के बाहर धरने पर बैठे स्कूली बच्चों के समूह को नजरअंदाज करना प्रशासन के लिए बेहद मुश्किल हो जाता है, खासकर तब जब इन प्रदर्शनों के वीडियो इंटरनेट पर तेजी से वायरल होने लगते हैं। ये बच्चे जेन ज़ी को बिल्कुल इसी तौर-तरीके और भाषा का इस्तेमाल करते हुए देखकर बड़े हो रहे हैं, और ऐसा लगता है कि जेन अल्फा ने यह सबक वक्त से पहले ही सीख लिया है। सड़क की मांग को लेकर कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन कर रहे बच्चों का वीडियो री-शेयर करते हुए सीजेपी (CJP) प्रदर्शन के नेताओं में से एक, सौरव दास ने लिखा शाबाश जेन अल्फा! हमें यही करने की जरूरत है अपने भविष्य की जिम्मेदारी खुद संभालना। जेन अल्फा की मांगें क्यों अहम हैं उनकी मांगों से कुछ खास बातें भी पता चलती हैं। पहले की पीढ़ियों के छात्र अक्सर खराब इंफ्रास्ट्रक्चर, टीचरों की कमी, सुविधाओं की कमी और अनियमित सेवाओं को रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा मानकर स्वीकार कर लेते थे। आज विरोध करने वाले बच्चे क्लासरूम में पंखे न होने, टीचर न होने और स्कूल तक सड़क न होने जैसी चीज़ों को सामान्य मानने को तैयार नहीं हैं। वे ऐसे भारत में बड़े हो रहे हैं जहाँ फ़ोन पर ही यह जानकारी मिल जाती है कि दूसरी जगहों पर चीज़ें कैसे काम करती हैं। वे देख सकते हैं कि वे किन चीज़ों से वंचित रह रहे हैं, और इसीलिए, 'अल्फा' पीढ़ी में गुस्सा है। इन बच्चों के आस-पास मौजूद बड़े लोग ज़ाहिर तौर पर इनमें से कुछ विरोध-प्रदर्शनों को आकार देंगे। लेकिन इससे जेन अल्फा की शिकायतें कम वास्तविक नहीं हो जातीं।

प्रभासाक्षी 20 Aug 2026 2:37 pm

क्या Gen-Z होना सुरक्षा नियम तोड़ने का लाइसेंस है? Kargil में महिला पर्यटक के आचरण से उठे कई गंभीर सवाल

सोशल मीडिया पर इस समय एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें एक महिला पर्यटक भारतीय सेना के जवानों के साथ बहस कर रही है और खुद को “Gen-Z” बताकर सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दे रही है। शायद इस महिला को पता नहीं कि सीमा पर खड़े सैनिक की ड्यूटी कोई पर्यटन सेवा नहीं है और राष्ट्रीय सुरक्षा कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है जिसे किसी पर्यटक की सुविधा, बहस या अधिकारों के नाम पर दरकिनार कर दिया जाए। साथ ही वीडियो में महिला खुद को “Gen-Z” बताते हुए यह कहती सुनाई देती है कि वह “यह बकवास बर्दाश्त नहीं करेगी।” यहां सवाल यह उठता है कि क्या किसी पीढ़ी का टैग राष्ट्रीय सुरक्षा प्रोटोकॉल से ऊपर हो सकता है? बताया जा रहा है कि वायरल वीडियो में दिखी घटना कारगिल सेक्टर के एक संवेदनशील हाई-एल्टीट्यूड चेक पोस्ट की है, जहां पर्यटकों के एक समूह को प्रतिबंधित दिशा में आगे बढ़ने से रोका गया। बताया जा रहा है कि संबंधित क्षेत्र में प्रवेश के लिए आवश्यक अनुमति और सुरक्षा नियम लागू थे। एक अन्य विवरण में इसे मिनामार्ग या मिनीमार्ग चेक पोस्ट के पास अस्थायी सड़क प्रतिबंध से जुड़ा बताया गया है। वीडियो में दिख रही तस्वीर बेहद स्पष्ट है। एक तरफ शांत रहकर सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन कराने की कोशिश करता जवान और दूसरी तरफ अपनी यात्रा, दूरी और अधिकारों का हवाला देकर बहस करता पर्यटक समूह। इसे भी पढ़ें: Sergio Gor के बयान से तिलमिलाये Pakistan ने Trump Administration पर उतारी भड़ास, US Diplomat Natalie Baker को तलब कर थमाया Strong Demarche महिला पर्यटक का यह तर्क कि “हम Gen-Z हैं, हम यह सब बर्दाश्त नहीं करेंगे”, दरअसल उस मानसिकता को उजागर करता है जिसमें व्यक्तिगत सुविधा को व्यवस्था और सुरक्षा से ऊपर मान लिया जाता है। Gen-Z होना न कोई विशेष सुरक्षा पास है, न ही यह कानून और राष्ट्रीय सुरक्षा प्रोटोकॉल को चुनौती देने का लाइसेंस है। सेना यह नहीं देखती कि सामने खड़ा व्यक्ति किस पीढ़ी का है; उसे यह देखना होता है कि सीमा सुरक्षित रहे, कोई संदिग्ध गतिविधि न हो और कोई नागरिक अनजाने में किसी खतरे की जद में न पहुंच जाए। देखा जाये तो कारगिल और नियंत्रण रेखा के आसपास के इलाके सामान्य पर्यटन स्थल नहीं हैं। यह वही संवेदनशील भूभाग है जहां भारत ने युद्ध का सामना किया है, जहां घुसपैठ और आतंकी गतिविधियों का इतिहास रहा है और जहां मौसम, दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां तथा सैन्य गतिविधियां हर समय सुरक्षा की अलग चुनौतियां पैदा करती हैं। ऐसे में सड़क बंद होना, आवाजाही नियंत्रित होना, चेकिंग होना या किसी क्षेत्र में प्रवेश के लिए अनुमति मांगना कोई “एंटी-टूरिस्ट” रवैया नहीं, बल्कि एक जरूरी सुरक्षा व्यवस्था है। सेना और सुरक्षा एजेंसियों को वहां इसलिए तैनात रहना पड़ता है क्योंकि सीमावर्ती इलाकों में खतरे केवल दिखाई देने वाले नहीं होते। कई बार खुफिया सूचना के आधार पर तलाशी या घेराबंदी की जरूरत पड़ सकती है। कभी सैन्य काफिले की आवाजाही होती है, कभी खराब मौसम या भूस्खलन के कारण रास्ता असुरक्षित हो जाता है और कभी किसी संभावित खतरे को देखते हुए नागरिकों की आवाजाही अस्थायी रूप से रोकी जाती है। ऐसे निर्णय किसी एक पर्यटक को परेशान करने के लिए नहीं, बल्कि दर्जनों या सैकड़ों लोगों की जान बचाने के लिए लिए जाते हैं। बर्फीली चोटियों, दुर्गम सड़कों और हर वक्त मौजूद संभावित खतरे के बीच जवान इसलिए तैनात है ताकि देश के नागरिक सुरक्षित रहें और पर्यटन जैसी सामान्य गतिविधियां भी संभव हो सकें। ऐसे में किसी पर्यटक का जवानों से यह पूछना कि रास्ता आखिर क्यों बंद किया गया है, हर परिस्थिति में उचित नहीं कहा जा सकता, क्योंकि सुरक्षा बलों के पास मौजूद खुफिया जानकारी, किसी विशेष इनपुट या चल रहे ऑपरेशन का कारण सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। कई बार एक मामूली-सा खुलासा भी सुरक्षा अभियान और जवानों की जान को जोखिम में डाल सकता है। देश पुलवामा में सुरक्षा बलों के काफिले पर हुए आतंकी हमले की भयावहता देख चुका है और पहलगाम में पर्यटकों को निशाना बनाकर किए गए आतंकी हमले की त्रासदी भी झेल चुका है। ऐसे अनुभव साफ बताते हैं कि संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा को लेकर एक छोटी-सी चूक कितनी भारी पड़ सकती है। इसलिए पर्यटकों को यह समझना होगा कि जब सेना या सुरक्षा बल किसी रास्ते को बंद करते हैं या आगे बढ़ने से रोकते हैं, तो हर निर्णय के पीछे की वजह कैमरे के सामने बताना संभव नहीं होता। ऐसे में जवान से बहस करना, वीडियो बनाकर उस पर अनावश्यक प्रतिबंध लगाने का आरोप लगाना या सुरक्षा व्यवस्था पर सवालिया निशान खड़ा करना केवल असंवेदनशीलता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की गंभीरता को न समझ पाने का उदाहरण है। सुरक्षा के मामले में सहयोग और धैर्य ही समझदारी है, क्योंकि कई बार जिस खतरे को आम नागरिक देख नहीं सकता, उसे रोकने के लिए ही जवान वहां खड़ा होता है। साथ ही वायरल हो रहे वीडियो में पर्यटक समूह के कुछ सदस्य यह कहते भी दिखाई देते हैं कि वे सैकड़ों किलोमीटर दूर से वहां पहुंचे हैं। लेकिन ऐसे लोगों को समझना होगा कि लंबी यात्रा किसी प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश का अधिकारपत्र नहीं बन जाती। यदि किसी क्षेत्र के लिए परमिट जरूरी है तो पहले उसकी जानकारी लेना और नियमों का पालन करना पर्यटक की जिम्मेदारी है। विशेष रूप से लद्दाख और अन्य संरक्षित सीमावर्ती क्षेत्रों में नियम परिस्थितियों और सुरक्षा स्थिति के अनुसार बदल सकते हैं। सैन्य प्रतिष्ठानों, चेक पोस्टों और रणनीतिक स्थानों पर फोटोग्राफी या वीडियोग्राफी भी प्रतिबंधित हो सकती है। इस पूरे प्रकरण का सबसे चिंताजनक पहलू वह भाषा और रवैया है, जिसमें सुरक्षा व्यवस्था को व्यक्तिगत अधिकारों के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश दिखाई देती है। लोकतंत्र में सवाल पूछने का अधिकार है, लेकिन संवेदनशील सैन्य चौकी पर ऑपरेशन या सुरक्षा प्रतिबंध के दौरान बहस करके आदेश बदलवाने का अधिकार किसी को नहीं है। संसद, टैक्स या किसी पीढ़ी का नाम लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा की जरूरतों को चुनौती देना न तो लोकतंत्र को मजबूत करता है और न ही नागरिक अधिकारों की रक्षा करता है। दूसरी ओर, सोशल मीडिया पर इस वीडियो को लेकर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली जोकि स्वाभाविक है। लोगों ने महिला पर्यटक और उसके साथियों के रवैये को अहंकारी और गैर-जिम्मेदाराना बताया है। “Gen-Z” वाली टिप्पणी पर मीम्स भी बन रहे हैं, लेकिन इस घटना को केवल मनोरंजन के रूप में देखने की बजाय इससे एक गंभीर सबक लेने की जरूरत है। कैमरे के सामने हंगामा करके वायरल होना आसान है, लेकिन सीमा की सुरक्षा में एक छोटी-सी चूक की कीमत कितनी बड़ी हो सकती है, इसका अंदाजा वहां तैनात जवान को हमसे कहीं बेहतर है। यह चेतावनी केवल उस महिला पर्यटक के लिए नहीं, बल्कि उन सभी लोगों के लिए है जो सोशल मीडिया की लोकप्रियता, व्यक्तिगत सुविधा या पीढ़ीगत पहचान के नाम पर सुरक्षा नियमों को हल्के में लेते हैं। राष्ट्र की सुरक्षा किसी हैशटैग, नारे या वायरल वीडियो के हिसाब से नहीं चल सकती। सीमा पर तैनात सैनिक को अपना काम करने दीजिए। यदि रास्ता बंद है तो रुकिए, यदि अनुमति चाहिए तो परमिट लीजिए और यदि सुरक्षा बल वापस लौटने को कहें तो सहयोग कीजिए। देखा जाये तो इस घटना ने एक जरूरी संदेश जरूर दे दिया है कि यात्रा का अधिकार जिम्मेदारी के साथ आता है और राष्ट्रीय सुरक्षा के सामने व्यक्तिगत सुविधा का कोई दावा नहीं चल सकता। सीमा की हकीकत को सभी को समझना होगा। जेन जी हो या कोई भी हो, वर्दी का सम्मान कीजिए, प्रोटोकॉल का पालन कीजिए और याद रखिए, जवान आपकी आजादी रोकने के लिए नहीं, आपकी सुरक्षा और देश की सीमाओं की रक्षा के लिए वहां खड़े हैं। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 20 Aug 2026 1:41 pm

CM थलापति विजय का बड़ा बयान: 'सारे सबूत मेरे पास हैं...', आखिर किसे दी खुलासे की धमकी?

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समाचार नामा 20 Aug 2026 10:35 am

उपराष्ट्रपति ने मावीरन ओंडिवीरन के बलिदान दिवस और राजीव गांधी की जयंती पर दी श्रद्धांजलि

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समाचार नामा 20 Aug 2026 10:25 am

तमिलनाडु के वेदारण्यम के नमक उत्पादक वार्षिक लक्ष्य के करीब पहुंचे, गर्मी से उत्पादन में हुई वृद्धि

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समाचार नामा 20 Aug 2026 10:25 am

झारखंड की शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा, 'जेएसएससी और जेपीएससी को लेकर सरकार का फैसला साहसिक'

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समाचार नामा 20 Aug 2026 10:17 am

चेन्नई पहुंचे अमित शाह, आज करेंगे परिषद बैठक की अध्यक्षता

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह बुधवार रात चेन्नई पहुंचे, जहां वह गुरुवार को चेन्नई के निकट कोवलम में आयोजित होने वाली दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद (सदर्न जोनल काउंसिल) की 31वीं बैठक की अध्यक्षता करेंगे

देशबन्धु 20 Aug 2026 7:40 am

राजस्थान नगर निकाय चुनाव घोषित, 9 और 11 को मतदान

राजस्थान में नगर निकाय चुनावों का इंतजार खत्म हो गया है। राज्य निर्वाचन आयोग ने बुधवार को राज्य में होने वाले नगर निकाय चुनावों की घोषणा कर दी। चुनाव दो चरणों में 9 और 11 सितंबर को कराए जाएं

देशबन्धु 20 Aug 2026 7:20 am

लोकसभा सीटें अगले 25 साल तक स्थिर- कांग्रेस ने परिसीमन पर रखा स्पष्ट रुख

कांग्रेस ने परिसीमन को लेकर स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा है कि लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों की संख्या अगले 25 वर्षों तक नहीं बढ़ाई जानी चाहिए और इन्हीं सीटों में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण दिया जाना चाहिए

देशबन्धु 19 Aug 2026 10:30 pm

महाराष्ट्र में धर्मांतरण विरोधी कानून पर सपा और कांग्रेस ने जताई आपत्ति

महाराष्ट्र में धर्मांतरण विरोधी कानून पर सपा और कांग्रेस ने जताई आपत्ति

समाचार नामा 19 Aug 2026 10:20 pm

कलकत्ता हाई कोर्ट ने जनगणना में शिक्षकों की ड्यूटी पर फैसला सुरक्षित रखा

कलकत्ता हाई कोर्ट ने जनगणना में शिक्षकों की ड्यूटी पर फैसला सुरक्षित रखा

समाचार नामा 19 Aug 2026 7:12 pm

अखिलेश यादव के वार पर जयंत चौधरी का संयमित पलटवार, पश्चिमी यूपी की राजनीति में नया उबाल

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी का नाम लिए बिना ऐसा तंज कसा है जिसकी गूंज सीधे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सियासी मैदान तक पहुंच गई। अखिलेश ने कहा, “कहां-कहां से आ गए थे, चवन्नी का रुपया बना दिया, फिर भी…”। दरअसल अखिलेश ने अपने इस बयान के जरिये पुराने साथी को राजनीति में आगे बढ़ाने का दावा किया और फिर साथी द्वारा उन्हें छोड़ देने पर अपनी शिकायत दर्ज कराई लेकिन इस दौरान उनके जो तेवर रहे उसने पश्चिमी यूपी की सियासत को गर्मा दिया है। रालोद कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आये हैं और अखिलेश यादव के पुतले फूंक रहे हैं। यही नहीं, रालोद प्रमुख जयंत चौधरी ने भी अखिलेश पर पलटवार करते हुए दर्शा दिया है कि एक्शन का रिएक्शन तत्काल होगा। हालांकि अखिलेश के तंज पर जयंत चौधरी ने पलटवार तल्खी की बजाय बेहद नपे-तुले अंदाज में किया। उन्होंने कहा, “वो अपनी बात कहें तो अच्छा है। उनके साथ खड़े होने वाले हर सहयोगी… इस तरह की बयानबाजी से सोचने को मजबूर हो रहे हैं।” जयंत ने आगे कहा, “लोकतंत्र है, यहां जनता सबको बनाती है और सबको बिगाड़ती है।” जब उनसे पूछा गया कि अखिलेश उन्हें इतना क्यों याद कर रहे हैं, तो उन्होंने गेंद वापस अखिलेश के पाले में डालते हुए कहा, “ये तो आप लोग उनसे जाकर पूछिए।” दरअसल, यह सिर्फ दो नेताओं की निजी राजनीतिक नोकझोंक नहीं है। इसके पीछे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बदलते जातीय और गठबंधन समीकरण की पूरी पटकथा पढ़ी जा सकती है। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा और रालोद ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। इस गठबंधन में जाट-मुस्लिम समीकरण को साधने की कोशिश साफ दिखाई दी थी। अखिलेश यादव ने जयंत चौधरी को राज्यसभा भेजने में भी भूमिका निभाई। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले पूर्व प्रधानमंत्री और जयंत के दादा चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न मिलने के बाद रालोद ने एनडीए का दामन थाम लिया। अब जयंत भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा हैं और केंद्र सरकार में राज्यमंत्री हैं। यही बदलाव अखिलेश के मौजूदा हमले को राजनीतिक धार देता है। सपा प्रमुख लगातार पीडीए यानि पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के सामाजिक समीकरण को मजबूत करने की कोशिश में हैं। पश्चिमी यूपी में उनकी चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि यहां सपा का पारंपरिक मुस्लिम-यादव आधार पूर्वांचल या मध्य यूपी की तरह निर्णायक नहीं रहा है। ऐसे में गुर्जर, दलित, अन्य पिछड़ी जातियों और गैर-जाट मतदाताओं को जोड़ना सपा की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। जयंत चौधरी का रालोद इस गणित में छोटी पार्टी जरूर है, लेकिन पश्चिमी यूपी में उसका प्रभाव उसके चुनावी आंकड़ों से कहीं ज्यादा राजनीतिक वजन रखता है। जाट समुदाय में चौधरी चरण सिंह की विरासत और रालोद की पकड़ अब भी गठबंधन राजनीति के लिए अहम है। भाजपा के साथ जयंत की मौजूदगी एनडीए को पश्चिमी यूपी में जाट समर्थन को साधने का अतिरिक्त आधार देती है। यही कारण है कि अखिलेश का “चवन्नी” वाला तंज महज पुरानी दोस्ती का हिसाब नहीं, बल्कि नए सामाजिक समीकरणों की जंग भी माना जा रहा है। दिलचस्प यह है कि अखिलेश ने हाल में अपने नेताओं-कार्यकर्ताओं को चुनावी समय में सोच-समझकर बयान देने की नसीहत दी थी, ताकि भाजपा को कोई राजनीतिक लाभ न मिले। इसके तुरंत बाद जयंत पर निशाना साधना बताता है कि सियासी प्राथमिकताएं कभी-कभी रणनीतिक संयम पर भारी पड़ जाती हैं। उधर, जयंत ने तीखा पलटवार करने की बजाय संयम चुना। शायद इसलिए कि वह अखिलेश के बनाए जाट बनाम गैर-जाट नैरेटिव में फंसना नहीं चाहते। उनकी सौम्य प्रतिक्रिया का संदेश भी उतना ही राजनीतिक है। इसका अर्थ यह है कि रालोद अब सपा के साथ नहीं बल्कि एनडीए के साथ ही अपना भविष्य देख रहा है। बहरहाल, “चवन्नी” और “रुपया” की यह लड़ाई असल में पश्चिमी यूपी की उस सियासी तिजोरी की लड़ाई है, जिसकी चाबी जाट, मुस्लिम, दलित, गुर्जर और अन्य पिछड़े मतदाताओं के हाथ में है। देखा जाये तो चुनावी राजनीति में सवाल यह नहीं कि किसने किसे रुपया बनाया; असली सवाल यह है कि जनता की नजर में अब कौन कितने का है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 19 Aug 2026 6:23 pm

झारखंड में नियुक्ति घोटाले की सीबीआई जांच हो, 'बड़ी मछ्ली' को बचाने की कोशिश: दीपक प्रकाश

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समाचार नामा 19 Aug 2026 5:19 pm

नवीन पटनायक ने एमएमडीआर संशोधन बिल का किया विरोध, कहा-ओडिशा की वित्तीय स्वायत्तता को होगा नुकसान

नवीन पटनायक ने एमएमडीआर संशोधन बिल का किया विरोध, कहा-ओडिशा की वित्तीय स्वायत्तता को होगा नुकसान

समाचार नामा 19 Aug 2026 5:12 pm

कोलकाता के होटल में आग लगने से 9 की मौत, भाजपा नेता ने फायर सेफ्टी पर उठाए सवाल

कोलकाता के होटल में आग लगने से 9 की मौत, भाजपा नेता ने फायर सेफ्टी पर उठाए सवाल

समाचार नामा 19 Aug 2026 5:11 pm

राजस्थान: कांग्रेस के 'पंचायत टास्क फोर्स' का गठन, युवाओं को 50 प्रतिशत प्रतिनिधित्व देने की तैयारी

राजस्थान: कांग्रेस के 'पंचायत टास्क फोर्स' का गठन, युवाओं को 50 प्रतिशत प्रतिनिधित्व देने की तैयारी

समाचार नामा 19 Aug 2026 5:08 pm

'बाबा जी, मेरी जवानी के सपने मत देखो’... बाबा रामदेव पर क्यों भड़की कंगना रनौत ? अब एक्ट्रेस ने दिया तीखा जवाब

'बाबा जी, मेरी जवानी के सपने मत देखो’... बाबा रामदेव पर क्यों भड़की कंगना रनौत ?अब एक्ट्रेस ने दिया तीखा जवाब

समाचार नामा 19 Aug 2026 4:35 pm

ईडी को मिली होगी ठोस जानकारी, तभी हुई आज़म खान के ठिकानों पर कार्रवाई: मौलाना शहाबुद्दीन

ईडी को मिली होगी ठोस जानकारी, तभी हुई आज़म खान के ठिकानों पर कार्रवाई: मौलाना शहाबुद्दीन

समाचार नामा 19 Aug 2026 3:28 pm

सिविल ड्रेस में किन लोगों ने छात्रों पर हमला किया था, इसकी जांच होनी चाहिए : रोहित पवार

सिविल ड्रेस में किन लोगों ने छात्रों पर हमला किया था, इसकी जांच होनी चाहिए : रोहित पवार

समाचार नामा 19 Aug 2026 2:17 pm

जेप्टो का ग्राहकों को झटका: फ्री डिलीवरी के लिए बढ़ाई न्यूनतम ऑर्डर राशि, अब ₹199 से ₹299 का करना होगा ऑर्डर

क्विक-कॉमर्स कंपनी जेप्टो ने फ्री डिलीवरी पाने के लिए न्यूनतम ऑर्डर मूल्य (मिनिमम ऑर्डर वैल्यू) बढ़ा दिया है। कंपनी ने सामान्य समय में इसे 149 रुपए से बढ़ाकर 199 रुपए कर दिया है, जबकि अधिक मांग (पीक डिमांड) के दौरान यह सीमा 299 रुपए तक पहुंच रही है। इस बदलाव के साथ जेप्टो की फ्री डिलीवरी नीति अब प्रतिस्पर्धी कंपनियों ब्लिंकिट और इंस्टामार्ट के समान स्तर पर आ गई है।

देशबन्धु 19 Aug 2026 2:07 pm

सपा सांसद अवधेश प्रसाद का दावा, यूपी विधानसभा चुनाव 2027 में 50 सीटें भी नहीं जीत पाएगी भाजपा

सपा सांसद अवधेश प्रसाद का दावा, यूपी विधानसभा चुनाव 2027 में 50 सीटें भी नहीं जीत पाएगी भाजपा

समाचार नामा 19 Aug 2026 2:01 pm

भाजपा ने कहा था- 'ना खाएंगे, ना खाने देंगे', लेकिन भ्रष्टाचार पर कोई एक्शन नहीं लिया गया : रोहित पवार

भाजपा ने कहा था- 'ना खाएंगे, ना खाने देंगे', लेकिन भ्रष्टाचार पर कोई एक्शन नहीं लिया गया : रोहित पवार

समाचार नामा 19 Aug 2026 1:55 pm

सत्येंद्र जैन की गिरफ्तारी पंजाब चुनाव से पहले बीजेपी की साजिश, शाह ने दबाव डाला: केजरीवाल

आम आदमी पार्टी ने एंटी-करप्शन ब्रांच द्वारा सत्येंद्र जैन की गिरफ्तारी को पंजाब चुनावों से ठीक पहले पार्टी को कमजोर करने की बीजेपी की साजिश करार दिया है। इधर, केजरीवाल ने कहा है 'अमित शाह जी बतायें कि उन्होंने जाँच एजेंसी पर दबाव डालकर सत्येन्द्र जैन को क्यों गिरफ़्तार करवाया'।

सत्य हिंदी 19 Aug 2026 1:37 pm

वैश्विक दवाब से सोने-चांदी के दाम गिरे, सिल्वर करीब 2 प्रतिशत फिसला

मुंबई, वैश्विक बाजारों से मिले कमजोर संकेतों के बीच बुधवार को घरेलू सर्राफा और वायदा बाजार में सोने-चांदी की कीमतों में तेज गिरावट दर्ज की गई। बढ़ते अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और वैश्विक स्तर पर सुरक्षित निवेश की बदलती धारणा के कारण कीमती धातुओं पर दबाव बना हुआ है, जिसका असर मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर भी साफ दिखाई दिया, जहां सोना 1.54 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम से नीचे फिसल गया, जबकि चांदी 2.30 लाख रुपए प्रति किलोग्राम के स्तर से नीचे आ गई।

देशबन्धु 19 Aug 2026 1:30 pm

सोनिया गांधी क्यों नहीं बनीं प्रधानमंत्री? अब खुद बताएंगी पूरी कहानी, किताब में अपनों को खोने से लेकर राजनीति तक के किस्से

सोनिया गांधी क्यों नहीं बनीं प्रधानमंत्री? अब खुद बताएंगी पूरी कहानी, किताब में अपनों को खोने से लेकर राजनीति तक के किस्से

समाचार नामा 19 Aug 2026 12:30 pm

तेजस्वी के मार्च को लेकर एनडीए के नेताओं ने कहा- 'करियर बचाओ मार्च'

तेजस्वी के मार्च को लेकर एनडीए के नेताओं ने कहा- 'करियर बचाओ मार्च'

समाचार नामा 19 Aug 2026 12:23 pm

पीएम केयर्स फंड में 8,452 करोड़ रुपये का बैलेंस, खर्च को लेकर कांग्रेस ने सरकार से पूछा सवाल

पीएम केयर्स फंड की ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार 31 मार्च 2025 तक 8,452.07 करोड़ रुपये का बैलेंस था। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने फंड के सीमित इस्तेमाल और पारदर्शिता पर सवाल उठाए।

देशबन्धु 19 Aug 2026 10:06 am

कावेरी विवाद पर राष्ट्रपति से गुहार - तमिलनाडु किसान संगठन 4 सितंबर को दिल्ली में

नेशनल साउथ इंडियन रिवर्स इंटरलिंकिंग फार्मर्स एसोसिएशन के राज्य अध्यक्ष पी. अय्याकन्नू ने मंगलवार को कहा कि संगठन ने अगले महीने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से मिलने का अनुरोध किया है

देशबन्धु 19 Aug 2026 7:40 am

CJP संसद मार्च पर जांच- सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज की अगुवाई में आज बनेगी कमेटी

सुप्रीम कोर्ट ने आज संसद मार्च के दौरान पुलिस की कार्रवाई की जांच के लिए एक हाई-पावर कमेटी बनाने का फैसला किया है

देशबन्धु 19 Aug 2026 7:08 am

जंतर मंतर पुलिस बर्बरताः राहुल का रिजिजू को जवाब- दिमाग से खाली लोग... अपनी ग़लती नहीं दिखती

जंतर मंतर पर पुलिस बर्बरता की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी बनाएगी। लेकिन केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू दिल्ली पुलिस की तारीफें कर रहे हैं। इस पर राहुल गांधी ने कहा कि देश के बच्चों से झूठ मत बोलिए। उनके पास आँखें हैं और याददाश्त भी।

सत्य हिंदी 18 Aug 2026 1:07 pm

निफ्टी कंपनियों के मुनाफे की औसत वृद्धि दर 18 प्रतिशत पर रही

मुंबई, निफ्टी में शामिल कंपनियों के मुनाफे की औसत वृद्धि दर वित्त वर्ष 27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में सालाना आधार पर 18 प्रतिशत रही है।

देशबन्धु 18 Aug 2026 12:59 pm

सोने और चांदी की कीमतों में तेजी

मुंबई, सोने और चांदी की कीमतों में सोमवार के सत्र में तेजी देखी गई। इससे दोनों कीमती धातुओं का दाम करीब 1,800 रुपए बढ़ गया है।

देशबन्धु 18 Aug 2026 12:54 pm

Gyanesh Kumar की तारीफ कर Donald Trump ने भारत में विपक्षी दलों की 'बेचैनी' और बढ़ा दी है

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत की चुनाव व्यवस्था और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की तारीफ कर भारतीय राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। ट्रंप ने भारत में मतदाता पहचान की अनिवार्यता और विशाल स्तर पर चुनाव कराने की क्षमता का हवाला देते हुए अमेरिका में कड़े मतदाता पहचान नियम लागू करने की अपनी मुहिम को फिर हवा दी है। लेकिन इस बयान का असर केवल अमेरिका तक सीमित रहने वाला नहीं है। भारत में यह बयान चुनाव आयोग पर विपक्ष के आरोपों और सत्ता पक्ष की राजनीतिक रणनीति के बीच पहले से चल रही जंग को और तेज कर सकता है। हम आपको बता दें कि ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच ट्रूथ सोशल पर कहा कि ज्ञानेश कुमार ने अमेरिकी प्रशासन से पूछा था कि वैध फोटो पहचान पत्र के बिना अमेरिका में चुनाव कैसे हो सकते हैं? उन्होंने भारत के पिछले आम चुनाव में करीब 64 करोड़ 60 लाख मतदाताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि डाक से मतदान करने वालों की संख्या एक प्रतिशत से भी कम रही और मतदाताओं के लिए वैध फोटो पहचान पत्र जरूरी था। इसके साथ ही उन्होंने अमेरिका में मतदाता पहचान और नागरिकता से जुड़े कड़े नियम लागू करने वाले 'सेव अमेरिका अधिनियम' को पारित करने की मांग दोहराई। इसे भी पढ़ें: Donald Trump ने की भारतीय चुनाव प्रणाली की तारीफ़, भारत की तर्ज पर अमेरिका में भी लागू हो 'SAVE अमेरिका एक्ट' ट्रंप का तर्क है कि मतदाता की पहचान और नागरिकता की कड़ी जांच चुनाव की विश्वसनीयता बढ़ा सकती है। हम आपको बता दें कि इस प्रस्तावित कानून में संघीय चुनावों के लिए पंजीकरण के समय नागरिकता का दस्तावेज, मतदान केंद्र पर फोटो पहचान और डाक से मतदान पर कड़े प्रतिबंध जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। अमेरिका में इस अधिनियम के विरोधियों का तर्क है कि गैर नागरिकों द्वारा चुनावी धोखाधड़ी बहुत दुर्लभ है और कठोर दस्तावेजी नियम उन पात्र मतदाताओं के लिए मुश्किल पैदा कर सकते हैं जिनके पास पासपोर्ट या जन्म प्रमाण पत्र आसानी से उपलब्ध नहीं है। इस बीच, भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने ट्रंप के बयान का समर्थन करते हुए कहा है कि भारत के पिछले चुनाव में 64.6 करोड़ मतदाताओं के लिए पहचान पत्र की अनिवार्यता इस बात का मजबूत उदाहरण है कि अमेरिका को भी सेव अमेरिका अधिनियम लागू करना चाहिए। दूसरी ओर, ट्रंप के बयान के बाद भारत में राजनीति गरमा गयी है। सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी ट्रंप के बयान को विपक्ष के चुनाव संबंधी आरोपों के खिलाफ मजबूत राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है। सत्ता पक्ष का यह भी तर्क है कि दुनिया का एक प्रमुख नेता भारत की विशाल चुनावी व्यवस्था और मतदाता पहचान प्रणाली को उदाहरण के रूप में देख रहा है। वहीं ट्रंप के बयान के बाद विपक्ष के मतदाता सूची में गड़बड़ी, बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित किए जाने और वोट चोरी जैसे आरोपों को हवा निकलती नजर आ रही है। ट्रंप की ओर से ज्ञानेश कुमार की प्रशंसा भारत में विपक्षी दलों को इसलिए भी नहीं पच रही क्योंकि वह संसद में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने के अलावा उनके खिलाफ तमाम राजनीतिक आरोपों से लेकर निजी आक्षेप तक लगा चुके हैं। बदले हालात में विपक्ष यह तर्क दे रहा है कि किसी विदेशी नेता की प्रशंसा से भारत के भीतर चुनाव आयोग को लेकर उठे सवाल खत्म नहीं होते। विपक्ष विशेष गहन पुनरीक्षण यानि एसआईआर की कवायद और मतदाता सूचियों में कथित विसंगतियों को लेकर अपने आरोपों पर भी कायम है। उधर, ज्ञानेश कुमार की सार्वजनिक छवि अब दो बिल्कुल विपरीत खेमों में बंटी दिखाई दे रही है। सत्ता समर्थक और तटस्थ वर्ग उन्हें ऐसी चुनावी व्यवस्था के संचालक के रूप में देख रहा है जिसकी विशालता और तकनीकी क्षमता दुनिया के लिए उदाहरण है। वहीं आलोचक अब भी कह रहे हैं कि अंतरराष्ट्रीय प्रशंसा घरेलू विवादों को मिटा नहीं सकती। वैसे भारतीय चुनाव आयोग पर हमलावर रहने वाले विपक्षी दलों को यह समझना होगा कि अपनी हार के कारणों पर मंथन करने की बजाय भारतीय चुनाव आयोग पर ही सारा ठीकरा फोड़ देने से उन्हें सफलता नहीं मिलेगी। भारतीय निर्वाचन आयोग की पूरी दुनिया में साख है जोकि विपक्ष के राजनीतिक आरोपों से खराब नहीं होगी। भारत की चुनावी ताकत का वैश्विक पहलू बेहद महत्वपूर्ण है। भारतीय चुनाव आयोग के अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण और लोकतांत्रिक प्रबंधन कार्यक्रमों के जरिए सौ से अधिक देशों के चुनाव अधिकारियों को मतदाता पंजीकरण, मतदान केंद्र प्रबंधन, महिला भागीदारी और सुरक्षित तकनीक के प्रशिक्षण का लाभ मिला है। भारतीय चुनाव आयुक्तों ने अतीत में कंबोडिया, यूगोस्लाविया, नामीबिया तथा अन्य तमाम देशों में चुनावी व्यवस्थाओं में भी सहायता की है। यही नहीं, भारत की इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों और फोटो पहचान आधारित व्यवस्था को भी कई विकासशील देशों ने उपयोगी माना है। साथ ही संयुक्त राष्ट्र की ओर से अक्सर विभिन्न देशों में चुनाव के दौरान भारतीय निर्वाचन आयोग के अधिकारियों को पर्यवेक्षक बनाकर भेजा जाता है जोकि गौरव की बात है। बहरहाल, एक ओर दुनिया भारत के चुनाव मॉडल को लोकतंत्र की ताकत मान रही है, दूसरी ओर देश के भीतर उसी व्यवस्था पर सबसे तीखा सियासी हमला जारी है। आने वाले समय में असली लड़ाई केवल मतदाता पहचान की नहीं होगी, बल्कि इस सवाल की होगी कि चुनाव आयोग पर जनता का भरोसा किसके तर्क से बनेगा और किसके आरोप से टूटेगा। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 18 Aug 2026 11:51 am

भाजपा ने तीन राज्यों के प्रभारियों का किया ऐलान, सतीश पूनिया को पंजाब तो विनोद तावड़े को यूपी की कमान

भाजपा ने उत्तर प्रदेश, पंजाब और गुजरात के लिए नए प्रदेश प्रभारियों का ऐलान किया है। विनोद तावड़े को यूपी, सतीश पूनिया को पंजाब और तरुण चुघ को गुजरात की जिम्मेदारी मिली।

देशबन्धु 18 Aug 2026 11:47 am

‘दिमाग़ी नक्सल’ के शोर में असली सवाल गुम क्यों? शिक्षा सुधार की जगह बदनामी की राजनीति क्यों

Dimaagi Naxal PM Modi:‘दिमाग़ी नक्सल’ के नए राजनीतिक शब्द के बीच असली सवाल शिक्षा और युवाओं के भविष्य का है। वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष का सवाल है कि क्या बदनामी की राजनीति से छात्र आंदोलन का जवाब दिया जा सकता है?

सत्य हिंदी 18 Aug 2026 5:56 am

जेएसएससी‑सीजीएल रद्द - 2000 से ज्यादा अभ्यर्थियों की नौकरी पर संकट

झारखंड सरकार द्वारा जेएसएससी-सीजीएल परीक्षा रद्द किए जाने के फैसले के बाद इस परीक्षा के जरिए चयनित होकर विभिन्न पदों पर कार्यरत अभ्यर्थियों में नाराजगी फैल गई

देशबन्धु 17 Aug 2026 10:41 pm

आबकारी केस: हाई कोर्ट ने केजरीवाल-सिसोदिया को सीबीआई की याचिका पर जवाब देने के लिए दिया और समय

आबकारी केस: हाई कोर्ट ने केजरीवाल-सिसोदिया को सीबीआई की याचिका पर जवाब देने के लिए दिया और समय

समाचार नामा 17 Aug 2026 10:26 pm

छात्र आंदोलन की जीत - जेएसएससी‑सीजीएल परीक्षा रद्द, सरकार झुकी

झारखंड में 24 दिनों से चल रहे छात्र आंदोलन के बीच हेमंत सोरेन सरकार ने आंदोलनकारियों की सबसे बड़ी मांग मानते हुए वर्ष 2024 में आयोजित जेएसएससी-सीजीएल परीक्षा को रद्द करने का फैसला किया है

देशबन्धु 17 Aug 2026 10:22 pm

दिल्ली भाजपा ने नितिन नवीन की तिरंगे के साथ फर्जी तस्वीर को लेकर पुलिस में दर्ज कराई शिकायत

दिल्ली भाजपा ने नितिन नवीन की तिरंगे के साथ फर्जी तस्वीर को लेकर पुलिस में दर्ज कराई शिकायत

समाचार नामा 17 Aug 2026 8:38 pm

उत्तर प्रदेश की सत्ता में इंडिया गठबंधन के लिए 27 साल तक कोई वैकेंसी नहीं : मुख्तार अब्बास नकवी

उत्तर प्रदेश की सत्ता में इंडिया गठबंधन के लिए 27 साल तक कोई वैकेंसी नहीं : मुख्तार अब्बास नकवी

समाचार नामा 17 Aug 2026 8:33 pm

बिप्लब देब बने भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव, पूर्वोत्तर के दो अन्य नेताओं को भी मिली अहम जिम्मेदारी

बिप्लब देब बने भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव, पूर्वोत्तर के दो अन्य नेताओं को भी मिली अहम जिम्मेदारी

समाचार नामा 17 Aug 2026 8:28 pm

तृणमूल छात्र विंग स्थापना दिवस पर रैली करने की अनुमति के लिए कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंची

तृणमूल छात्र विंग स्थापना दिवस पर रैली करने की अनुमति के लिए कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंची

समाचार नामा 17 Aug 2026 8:27 pm

कर्नाटक: रिजर्व फॉरेस्‍ट में शिकारियों के 'एनकाउंटर' मामले पर भाजपा ने प्रदेश सरकार से जांच की मांग की

कर्नाटक: रिजर्व फॉरेस्ट में शिकारियों के 'एनकाउंटर' मामले पर भाजपा ने प्रदेश सरकार से जांच की मांग की

समाचार नामा 17 Aug 2026 8:16 pm

डॉ. हेमांग जोशी बने भाजपा युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष, गुजरात के तीन नेताओं को राष्ट्रीय टीम में मिली अहम जिम्मेदारी

डॉ. हेमांग जोशी बने भाजपा युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष, गुजरात के तीन नेताओं को राष्ट्रीय टीम में मिली अहम जिम्मेदारी

समाचार नामा 17 Aug 2026 6:08 pm

भाजपा राष्ट्रीय पदाधिकारियों की नई सूची ने जो सियासी संकेत दिया है वह सबके समझ में आने वाली बात नहीं है

नितिन नबीन की बहुप्रतीक्षित टीम का आज आखिरकार ऐलान हो ही गया। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने संगठन में लंबे समय से चल रही कवायद को अंजाम देते हुए अपनी नई राष्ट्रीय टीम सामने रख दी है। इस टीम में अनुभव, क्षेत्रीय संतुलन, सामाजिक समीकरण और चुनावी जरूरतों का ऐसा मिश्रण तैयार किया गया है, जिसमें पार्टी के पुराने दिग्गजों से लेकर नए चेहरों तक को जिम्मेदारी दी गई है। लेकिन इस पूरी कवायद में दो फैसले राजनीतिक चर्चा के केंद्र में हैं। एक तो अमित मालवीय को आईटी सेल प्रमुख की जिम्मेदारी से बाहर का रास्ता दिखाया गया है, जबकि पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की राष्ट्रीय महासचिव के तौर पर भाजपा के शीर्ष संगठन में वापसी हुई है। हम आपको बता दें कि आईटी और सोशल मीडिया सेल की कमान अब छत्तीसगढ़ के दीपक म्हास्के को दी गई है। वहीं अनिल बलूनी मीडिया प्रभारी की अपनी जिम्मेदारी पर कायम हैं। यानी भाजपा ने डिजिटल मोर्चे पर चेहरे में बदलाव किया है, लेकिन मीडिया प्रबंधन के मौजूदा ढांचे में निरंतरता बनाए रखी है। इस बदलाव को केवल संगठनात्मक फेरबदल मानना मुश्किल है। यह संकेत है कि नितिन नबीन डिजिटल और राजनीतिक नैरेटिव की लड़ाई में नई रणनीति और नए चेहरों के साथ उतरना चाहते हैं। साथ ही चूंकि नितिन नबीन छत्तीसगढ़ में पार्टी के प्रभारी रह चुके हैं ऐसे में वह जानते हैं कि उस राज्य के किस नेता की कार्यक्षमता का उपयोग कहां पर करना पार्टी के लिए ज्यादा फायदेमंद रहेगा। इसे भी पढ़ें: PM Modi का नई BJP टीम पर पूरा भरोसा, बोले- संगठन और जनसेवा पर दें ध्यान इसके अलावा, स्मृति ईरानी की वापसी इस टीम का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश है। उन्हें उत्तर प्रदेश का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है। आक्रामक राजनीतिक शैली, संसदीय अनुभव और विपक्ष के खिलाफ मुखर राजनीतिक लड़ाई के लिए पहचाने जाने वाली स्मृति ईरानी को संगठन के शीर्ष स्तर पर लाना बताता है कि भाजपा उत्तर प्रदेश जैसे निर्णायक राज्य में राजनीतिक सक्रियता को और धार देना चाहती है। राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है। उनके साथ तीरथ सिंह रावत, राम माधव, बैजयंत पांडा, डी. पुरंदेश्वरी, रेखा वर्मा, वर्षाबेन नरेंद्रभाई दोशी, डॉ. भारती प्रवीण पवार, मनप्रीत सिंह बादल, लाल सिंह आर्य, एम. नागराजा, प्रो. तारिक मंसूर और डॉ. मधुचंद्र कर को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली है। छह महिला उपाध्यक्षों की मौजूदगी से महिला प्रतिनिधित्व का संदेश भी स्पष्ट है। इसके अलावा, राष्ट्रीय महासचिवों की टीम में विनोद तावड़े, सुनील बंसल, बिप्लब कुमार देब, स्मृति ईरानी, डॉ. सतीश पूनिया, गजेंद्र पटेल, हरीश द्विवेदी और संजय भाटिया शामिल हैं। संगठन के स्तर पर बीएल संतोष राष्ट्रीय महासचिव संगठन बने हुए हैं, जबकि शिवप्रकाश और सौदान सिंह को राष्ट्रीय संयुक्त महासचिव संगठन की जिम्मेदारी मिली है। इसका अर्थ है कि नबीन ने संगठन की अनुभवी मशीनरी को बनाए रखते हुए राजनीतिक मोर्चे पर अपनी टीम को विस्तार दिया है। साथ ही 16 राष्ट्रीय सचिवों की सूची में भी व्यापक क्षेत्रीय संतुलन दिखाई देता है। कविता पाटीदार, के. सुरेंद्रन, डॉ. भोला सिंह, डॉ. प्रदीप वर्मा, जगदीश ईश्वरभाई पटेल, आम आदमी पार्टी से भाजपा में आये डॉ. संदीप पाठक और फांगनॉन कोन्याक, संगीता यादव, अनिल एंटनी, डॉ. एम. वेंकटेशन, मनोज तिग्गा, सिद्धार्थ शंभू, डॉ. स्वदेश सिंह, मृगांका देब बर्मन, रोहन गुप्ता और जय प्रकाश को राष्ट्रीय सचिव बनाया गया है। इनमें दक्षिण, पूर्वोत्तर, पूर्वी भारत, हिंदी पट्टी और शहरी राजनीतिक पृष्ठभूमि, सभी को जगह मिली है। नई टीम के अन्य हिस्से भी राजनीतिक संकेत दे रहे हैं। केंद्रीय कार्यालय प्रभारी तरुण चुग और केंद्रीय कार्यालय सचिव महेंद्र पांडे बनाए गए हैं। नॉर्थ-ईस्ट कोऑर्डिनेटर की जिम्मेदारी डॉ. संबित पात्रा और संयुक्त कोऑर्डिनेटर की जिम्मेदारी राजीव बब्बर को दी गई है। सभी सेल्स के समन्वय की कमान विष्णु दत्त शर्मा को मिली है, जबकि ऋतुराज सिन्हा और विष्णु वर्धन रेड्डी संयुक्त समन्वयक होंगे। मोर्चों की कमान भी सामाजिक और चुनावी विस्तार को ध्यान में रखकर तय की गई है। युवा मोर्चा के अध्यक्ष डॉ. हेमंग जोशी, महिला मोर्चा की अध्यक्ष रूप कुमारी चौधरी, ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष अमरपाल मौर्य, किसान मोर्चा के अध्यक्ष बंसीलाल गुर्जर, एससी मोर्चा के अध्यक्ष शिवेश कुमार राम, एसटी मोर्चा के अध्यक्ष डॉ. मन्नालाल रावत और अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष कुंवर बसीत अली बनाए गए हैं। इससे भाजपा ने समाज के अलग-अलग वर्गों के बीच संगठनात्मक पहुंच को मजबूत करने की कोशिश की है। वित्तीय मोर्चे पर केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल को राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष और राजस्थान के राजेश मंगल को संयुक्त कोषाध्यक्ष बनाया गया है। पीयूष गोयल के प्रशासनिक और आर्थिक अनुभव का लाभ संगठन के वित्तीय प्रबंधन को मिल सकता है। पीयूष गोयल पहले भी पार्टी के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष रह चुके हैं। यहां सवाल यह है कि अब देखना यह होगा कि 'एक व्यक्ति एक पद' के सिद्धांत को महत्व देने वाली भाजपा क्या पीयूष गोयल से केंद्रीय मंत्री का पद छोड़ने को कहती है या फिर वह दोनों पदों पर बने रहेंगे? कुल मिलाकर नितिन नबीन की टीम का संदेश साफ है कि भाजपा अब संगठन को केवल पदाधिकारियों की सूची के रूप में नहीं, बल्कि चुनावी मशीनरी के रूप में कसना चाहती है। राम माधव की रणनीतिक समझ, वसुंधरा राजे का जनाधार, स्मृति ईरानी की आक्रामक राजनीतिक शैली, सुनील बंसल का संगठनात्मक अनुभव, पीयूष गोयल की प्रशासनिक क्षमता और दक्षिण-पूर्वोत्तर से आए नेताओं का क्षेत्रीय अनुभव पार्टी के लिए अलग-अलग मोर्चों पर उपयोगी साबित हो सकता है। लेकिन असली चुनौती भी यहीं से शुरू होती है। अलग-अलग क्षमताओं और महत्वाकांक्षाओं वाले नेताओं को एक सूत्र में बांधना, राज्यों में गुटबाजी को नियंत्रित करना, डिजिटल नैरेटिव को विपक्ष के हमलों के सामने प्रभावी बनाना, संगठन और सरकार के बीच तालमेल कायम रखना और आगामी चुनावों में इन नियुक्तियों के जरिये साधे गये सामाजिक समीकरणों को वास्तविक वोटों में बदलना आसान नहीं होगा। नितिन नबीन ने टीम चुन ली है; अब इस टीम को परिणाम देने वाली राजनीतिक ताकत में बदलना उनकी सबसे बड़ी परीक्षा होगी। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 17 Aug 2026 5:43 pm

आखिर जन सुराज पार्टी और लोजपा रामविलास के बीच पक रही सियासी खिचड़ी के निहितार्थ क्या हैं? समझिए

बिहार में जन सुराज पार्टी के नवनिर्वाचित विधायक प्रशांत किशोर और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान के बीच जो राजनीतिक खिचड़ी पकने की चर्चा है, वह उत्तरप्रदेश की राजनीति से अभिप्रेरित है। चूंकि प्रशांत किशोर मशहूर चुनावी रणनीतिकार भी हैं और लगभग सभी प्रमुख पार्टियों के रणनीतिक घाटों की पानी का स्वाद चख चुके हैं, इसलिए उनसे जुड़ी इस आशय की चर्चा भी अनायास नहीं है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सामाजिक न्याय क्रांति और मंडल बनाम कमंडल की मतलबी राजनीति की कड़ी में जहां उत्तरप्रदेश में चार-चार बार दलित नेत्री सुश्री मायावती को मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला और उनकी बहुजन समाज पार्टी तीन बार गठबंधन के तहत और एक बार पूर्ण बहुमत से यूपी की सत्ता में आई। लेकिन बिहार में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद, जदयू के हुक्मरान नीतीश कुमार ने लोजपा के राम विलास पासवान और उनके पुत्र चिराग पासवान को कभी पूर्ण रूप से उभरने ही नहीं दिया और गठबंधन में भी कमजोर बनाए रखा। यही वजह है कि बिहार में नए जमाने की राजनीति के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने चिराग पासवान के साथ गठबंधन की सम्भवनाओं को हवा दिलवाकर बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, जनता दल यूनाइटेड के सुप्रीमो नीतीश कुमार और राष्ट्रीय जनता दल नेता तेजस्वी यादव के समक्ष एक तगड़ी चुनौती पेश करने की अपनी मंशा उजागर कर दी है। चिराग पासवान जिस तरह से खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हनुमान करार देते हैं, इससे उनकी भी बेचैनी बढ़ेगी हो। यह ठीक है कि जन सुराज पार्टी और लोजपा रामविलास के बीच किसी औपचारिक गठबंधन की सार्वजनिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है। लेकिन अगस्त 2026 की ताजा राजनीतिक हलचल को देखें तो दोनों के बीच संभावित सियासी तालमेल की चर्चा को महज अफवाह मानकर खारिज करना भी जल्दबाजी होगी। क्योंकि हाल की रिपोर्टों में दोनों के करीब आने और भाजपा-राजद से अलग एक संभावित धुरी की चर्चा सामने आई है। इससे एनडीए की राजनीति में चिराग पासवान का रुतबा बढ़ना भी स्वाभाविक है। फिर भी यदि चिराग पासवान को दलित मुख्यमंत्री बनाने के स्वप्न प्रशांत किशोर यदि दिखाते हैं, या फिर उपमुख्यमंत्री पद का भी सियासी चारा डालते हैं तो मिशन 2029 के संसदीय चुनाव और 2030 के विधानसभा चुनावों को लेकर एनडीए और महागठबंधन के हाथपांव फूलना स्वाभाविक है। इसे भी पढ़ें: Prashant Kishor ने Bihar विधानसभा में ली शपथ, बोले- यह मेरे लिए गर्व और जिम्मेदारी का पल आइए अब यह समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर इस मनोवांछित सियासी खिचड़ी में क्या-क्या पक रहा है? और इसके राजनीतिक स्वाद के मिजाज से इसके क्या क्या मायने हो सकते हैं- पहला, लोजपा युवराज चिराग पासवान के लिए यह NDA के भीतर दबाव की राजनीति हो सकती है, क्योंकि चिराग पासवान पहले भी सीट बंटवारे और NDA के भीतर अपनी राजनीतिक हैसियत को लेकर स्वतंत्र रुख दिखाते रहे हैं। 2025 में भी उनके प्रशांत किशोर से संभावित संपर्क की खबरें सामने आई थीं। इसलिए सियासत में हर खुली हुई सम्भवनाओं और उससे बनने बिगड़ने वाली हवा से इंकार नहीं किया जा सकता है। दूसरा, जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर के लिए लोजपा रामविलास प्रमुख चिराग पासवान एक महत्वपूर्ण सामाजिक-पॉलिटिकल पुल हो सकते हैं। ऐसा इसलिए कि जन सुराज अपने को BJP और RJD—दोनों से अलग विकल्प के रूप में स्थापित करना चाहता है। अब बांकीपुर में किशोर की जीत ने उन्हें सिर्फ आंदोलनकारी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय चुनावी ताकत के रूप में भी स्थापित किया है। तीसरा, सबसे दिलचस्प संभावना है—'माइनस BJP, माइनस RJD' राजनीति। यानी कि ताजा राजनीतिक चर्चाओं में इसी तरह के पुनर्संयोजन की संभावना उठ रही है। इसका अर्थ होगा कि चिराग पासवान अपना दलित/पासवान प्रभाव और जन सुराज पार्टी अपना युवा, गैर-पारंपरिक तथा शहरी-मध्यवर्गीय आधार जोड़ने की कोशिश करे। दोनों ने यदि रणनीतिक रूप से सवर्णों को तरजीह दी तो भाजपा/कांग्रेस के लिए यह किसी झटके की तरह होगा। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि दोनों की राजनीतिक जरूरतें अलग अलग हैं। चाहे चिराग पासवान हों या प्रशांत किशोर, दोनों अपना स्वतंत्र राजनीतिक स्पेस बढ़ाना चाहते हैं, साथ ही खुद को तीसरे विकल्प के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। जहां चिराग पासवान NDA में रहते हुए अपना bargaining power बढ़ाना चाहते हैं, वहीं प्रशांत किशोर BJP और RJD दोनों से दूरी दिखाना चाहते हैं। इस बात में कोई दो राय नही कि उत्तरप्रदेश के जाटवों के वोट बैंक के तरह ही बिहार में भी पासवान वोट का मजबूत आधार है, जबकि प्रशांत किशोर युवा, शिक्षित और बदलाव चाहने वाले मतदाताओं पर जोर देते हैं। वह संगठन और चुनावी नेटवर्क के कार्यसाधक हैं। उनमें नया राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने और अभियान चलाने की अद्भुत क्षमता है। लिहाजा यहीं से असली सवाल पैदा होता है—क्या चिराग NDA के भीतर रहकर जन सुराज से तालमेल करेंगे, या भविष्य में कोई व्यापक वैकल्पिक मोर्चा बनेगा? अलबत्ता, इन चर्चाओं में एक और बड़ा संकेत निहित है। वह यह कि प्रशांत किशोर अब केवल विधानसभा की राजनीति तक सीमित नहीं दिख रहे, बल्कि जन सुराज की नजर विधान परिषद के चुनावी क्षेत्रों पर भी बताई जा रही है। यानी संगठन को लगातार चुनावी मशीनरी में बदलने की कोशिश हो रही है। दूसरी ओर चिराग पासवान ने भी हाल के दिनों में ऐसे मुद्दे उठाए हैं जिन पर सरकार/NDA के भीतर असहजता पैदा हो सकती है। उदाहरण के लिए, उन्होंने गत दिनों बिहार की शराबबंदी नीति की प्रभावशीलता पर खुलकर सवाल उठाया। यानी दोनों के बीच संभावित तालमेल का आधार केवल जातीय गणित नहीं, बल्कि 'एंटी-एस्टैब्लिशमेंट' और 'नया विकल्प' का राजनीतिक नैरेटिव भी बन सकता है। मगर सबसे बड़ी अड़चन भी यही है। खासकर प्रशांत किशोर की राजनीति का मूल दावा ही है कि वे पारंपरिक राजनीतिक दलों के गठजोड़ से अलग व्यवस्था खड़ी करेंगे। 2025 में उन्होंने चिराग के साथ गठबंधन की संभावना को सार्वजनिक रूप से नकारते हुए कहा था कि उनका गठबंधन जनता के साथ है। इसलिए यदि आज दोनों के बीच नजदीकी बढ़ती है, तो इसे सीधा चुनावी गठबंधन मानने के बजाय 'रणनीतिक संवाद' समझना ज्यादा उचित होगा। मेरी नजर में असली खेल के दृष्टिगत 2026 का गठबंधन कम और 2029–30 की जमीन तैयार करने की कवायद ज्यादा हो सकती है। वाकई यदि चिराग + जन सुराज साथ आते हैं तो बिहार में तीन ध्रुव उभर सकते हैं:- पहला, NDA बनाम RJD; दूसरा, महागठबंधन बनाम जन सुराज–LJP(RV जैसा वैकल्पिक ध्रुव। और यदि इस तीसरे ध्रुव में पप्पू यादव, उपेंद्र कुशवाहा या दूसरे छोटे सामाजिक आधार वाले नेता भी किसी रूप में जुड़ते हैं, तो बिहार की पारंपरिक दो-ध्रुवीय राजनीति के लिए यह गंभीर चुनौती बन सकती है। इस परिस्थिति में सामान्य जातियों के वोटबैंक का महत्व और अधिक बढ़ जाएगा। क्योंकि यूपी में भी ओबीसी सियासत से ब्राह्मण परेशान होकर मायावती के साथ हो लिए थे। कुछ ऐसा ही उभार बिहार में भी नजर आ रहा है, खासकर सोशल मीडिया पर सवर्ण विरोधी पोस्टों की बाढ़। फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण संकेत यही है कि दोनों की तरफ से औपचारिक गठबंधन की घोषणा नहीं हुई है। इसलिए 'खिचड़ी पक रही है' कहना राजनीतिक संकेतों के लिहाज से उचित है, लेकिन 'खिचड़ी तैयार हो गई है' कहना अभी तथ्यात्मक रूप से जल्दबाजी होगी। शायद वह बीरबल की खिचड़ी न बन जाए। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 17 Aug 2026 5:40 pm

प्रधानमंत्री मोदी का लालकिले से 'विकसित भारत' का संकल्प

ऐतिहासिक लालकिले की प्राचीर केवल पत्थरों की एक संरचना नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत के उतार-चढ़ाव, उसकी आकांक्षाओं, उसकी नियति और उसके सामूहिक संकल्पों की मूक गवाह रही है। हर वर्ष 15 अगस्त को इस प्राचीर से देश के प्रधानमंत्री जब राष्ट्र को संबोधित करते हैं, तो वह केवल एक औपचारिक भाषण नहीं होता, बल्कि वह आने वाले समय के लिए देश का नीतिगत और वैचारिक रोडमैप होता है। स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी ऐतिहासिक प्राचीर से वर्ष 2047 तक भारत को एक 'विकसित राष्ट्र' बनाने का जो अटूट संकल्प दोहराया है, वह देश की समकालीन राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज के लिए एक युगांतकारी मोड़ है। 'विकसित भारत' का यह विजन महज़ एक राजनीतिक नारा नहीं है, बल्कि यह 140 करोड़ नागरिकों की सामूहिक चेतना को जगाने और उन्हें राष्ट्र निर्माण के एक महायज्ञ में आहुति देने के लिए प्रेरित करने वाला एक व्यापक राष्ट्रीय दर्शन है। जब हम इस विराट संकल्प की बात करते हैं, तो हमें इसके ऐतिहासिक संदर्भ और प्रासंगिकता को गहराई से समझना होगा। भारत ने लगभग दो सदियों तक औपनिवेशिक दासता और आर्थिक शोषण का दंश झेला है। 1947 में जब देश स्वतंत्र हुआ, तब हमारी अर्थव्यवस्था जर्जर थी, साक्षरता दर दयनीय थी और अकाल तथा गरीबी जैसी बुनियादी चुनौतियां हमारे सामने थीं। शुरुआती दशकों में भारत का मुख्य ध्यान आत्मनिर्भरता और बुनियादी अस्तित्व की रक्षा पर था। हमने खाद्यान्न संकट से निपटने के लिए हरित क्रांति की, अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए सैन्य तंत्र को मजबूत किया और धीरे-धीरे एक ठोस औद्योगिक आधार तैयार किया। आज, स्वतंत्रता के इस दौर में, भारत उस स्थिति से बहुत आगे निकल चुका है और अब हम केवल एक अस्तित्व बनाए रखने वाले देश नहीं हैं, बल्कि हम वैश्विक पटल पर एक नई दिशा तय करने वाले राष्ट्र बन चुके हैं। यह संकल्प इस बात का प्रतीक है कि अब भारत अपनी विकासशील छवि के खोल को तोड़कर वैश्विक शक्तियों की अग्रिम पंक्ति में खड़े होने के लिए पूरी तरह तैयार है। 2047 का वर्ष इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमारी स्वतंत्रता का शताब्दी वर्ष होगा, और कोई भी राष्ट्र अपनी स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होने पर दुनिया के सामने अपनी सफलता का क्या प्रमाण प्रस्तुत करता है, यही उसका वास्तविक ऐतिहासिक मूल्यांकन होता है। इस व्यापक संकल्प को धरातल पर उतारने के लिए देश के चार प्रमुख वर्गों को विकास का मुख्य केंद्र बिंदु बनाया गया है, जिन्हें युवा, महिला, किसान और गरीब के रूप में रेखांकित किया गया है। इन चारों स्तंभों के समग्र सशक्तिकरण के बिना किसी भी विकसित समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। भारत आज दुनिया का सबसे युवा देश है और हमारी जनसांख्यिकीय लाभांश हमारी सबसे बड़ी ताकत है। विकसित भारत का सपना तभी सच हो सकता है जब इस युवा ऊर्जा को सही दिशा, उत्कृष्ट शिक्षा और वैश्विक स्तर का कौशल मिले। देश में स्टार्टअप इकोसिस्टम का तेजी से विस्तार और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से शिक्षा को रोजगारोन्मुख बनाना इसी दिशा में उठाए गए बड़े कदम हैं। इसके साथ ही, विकसित भारत का दूसरा अनिवार्य पहलू महिलाओं का सशक्तिकरण और उनके नेतृत्व में होने वाला विकास है। जब तक देश की आधी आबादी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से पूरी तरह सक्रिय नहीं होगी, तब तक विकास की रफ्तार अधूरी रहेगी। सेनाओं में महिलाओं की भागीदारी से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होती महिलाओं की बढ़ती संख्या इस बात का प्रमाण है कि वे अब नीति निर्धारण के केंद्र में आ रही हैं। इसी तरह, भारत की आत्मा आज भी गांवों में बसती है और हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि है। विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए कृषि क्षेत्र में तकनीकी सुधार, आधुनिक खेती को बढ़ावा और वैश्विक कृषि आपूर्ति श्रृंखला में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाना आवश्यक है। किसान जब पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर आधुनिक कृषि-उद्यमी बनेगा, तभी ग्रामीण भारत समृद्ध होगा। अंत में, अंत्योदय की भावना के अनुरूप समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुंचना चाहिए, क्योंकि किसी भी राष्ट्र को तब तक विकसित नहीं कहा जा सकता जब तक कि बहुआयामी गरीबी का पूरी तरह उन्मूलन न हो जाए और हर नागरिक को सम्मानजनक जीवन स्तर न मिल जाए। इसे भी पढ़ें: PM Modi का नई BJP टीम पर पूरा भरोसा, बोले- संगठन और जनसेवा पर दें ध्यान आर्थिक मोर्चे पर, भारत आज दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और शीर्ष वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं की ओर अग्रसर है। लेकिन विकसित देश बनने के लिए हमें केवल सकल घरेलू उत्पाद के आकार को ही नहीं बढ़ाना है, बल्कि प्रति व्यक्ति आय और नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में भी गुणात्मक सुधार करना होगा। इसके लिए विनिर्माण और आत्मनिर्भरता पर विशेष बल देना आवश्यक है। 'मेक इन इंडिया' अभियान के तहत भारत आज मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग, रक्षा उत्पादन और इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में एक वैश्विक केंद्र के रूप में उभर रहा है। रक्षा क्षेत्र में, जहां कभी हम पूरी तरह आयातों पर निर्भर थे, आज हम स्वदेशी अत्याधुनिक सैन्य उपकरणों का निर्माण कर रहे हैं और उनका निर्यात भी बढ़ा रहे हैं। भारतीय कॉर्पोरेट जगत को अब वैश्विक कंपनियों की तर्ज पर अपनी क्षमता का विस्तार करना होगा ताकि भारतीय ब्रांड दुनिया भर के बाजारों में अग्रणी भूमिका निभा सकें। इसके साथ ही, देश के बुनियादी ढांचे का कायाकल्प किया जा रहा है। आधुनिक रेलवे, एक्सप्रेसवे का विस्तृत नेटवर्क, जलमार्गों का विकास और हवाई अड्डों का आधुनिकीकरण देश की लॉजिस्टिक्स लागत को कम करने और व्यापार को सुगम बनाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। एक मजबूत और आधुनिक बुनियादी ढांचा ही विकसित भारत की ठोस नींव बनेगा, जो देश के औद्योगिक विकास को नई गति प्रदान करेगा। तकनीक और नवाचार के इस युग में जो देश अग्रणी रहेगा, वही दुनिया के भविष्य को दिशा देगा। भारत ने डिजिटल क्षेत्र में जो क्रांति की है, उसने दुनिया के विकसित देशों को भी अचंभित किया है। हमारा डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और डिजिटल लेनदेन की व्यवस्था आज वैश्विक स्तर पर एक मिसाल बन चुकी है। भारत ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह केवल तकनीक का उपभोक्ता नहीं है, बल्कि वह विश्व को सस्ती, सुरक्षित और समावेशी तकनीक देने वाला प्रदाता भी है। विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में बढ़ता निवेश इस विजन को और स्पष्ट करता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर मिशन, क्वांटम कंप्यूटिंग, अंतरिक्ष अनुसंधान और ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में भारत का बढ़ता कदम यह दर्शाता है कि हम भविष्य की तकनीकों के मामले में दुनिया के अग्रणी देशों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं। तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर और संप्रभु होना विकसित भारत की एक अनिवार्य शर्त है, जो हमें वैश्विक मंच पर एक अद्वितीय पहचान दिलाएगी। संकल्प जितना विराट होता है, उसकी राह की चुनौतियां भी उतनी ही कठिन होती हैं। विकसित भारत के मार्ग में कई आंतरिक और बाह्य चुनौतियां हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। देश की आर्थिक प्रगति के साथ-साथ क्षेत्रीय और सामाजिक असमानता को पाटना एक बड़ी चुनौती है। विकास का लाभ समाज के हर वर्ग और देश के हर कोने तक समान रूप से पहुंचना चाहिए। इसके अलावा, भारत को पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच एक कुशल संतुलन बनाना होगा। जलवायु परिवर्तन के खतरों को देखते हुए नवीकरणीय ऊर्जा को अपनाना और सतत विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करना युद्धस्तर पर आवश्यक है। प्रशासनिक स्तर पर, हमारी व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और नागरिक-अनुकूल बनना होगा, क्योंकि लालफीताशाही और भ्रष्टाचार विकास की गति को धीमा करते हैं। वैश्विक मोर्चे पर, वर्तमान समय की भू-राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक व्यवधान भी हमारे सामने चुनौतियां खड़ी करते हैं, जिनसे निपटने के लिए भारत को अपनी कूटनीतिक कुशलता और आंतरिक आर्थिक सुदृढ़ता को निरंतर मजबूत बनाए रखना होगा। इस पूरे महायज्ञ में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका देश के नागरिकों की है। कोई भी देश केवल सरकार की नीतियों, बजट या घोषणाओं से विकसित नहीं बनता। सरकार मार्ग प्रशस्त कर सकती है, बुनियादी ढांचा दे सकती है, लेकिन उस पर चलकर देश को आगे ले जाने का काम नागरिकों के सामूहिक प्रयासों से ही संभव होता है। विकसित भारत का संकल्प तब तक अधूरा है जब तक देश का हर नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति पूरी तरह सजग नहीं होता। चाहे वह करों का ईमानदारी से भुगतान करना हो, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना हो, पर्यावरण को बचाना हो, या फिर अपने-अपने कार्यक्षेत्र में पूर्ण ईमानदारी और उत्कृष्टता के साथ योगदान देना हो—ये सभी नागरिक प्रयास मिलकर एक विशाल राष्ट्रीय शक्ति का निर्माण करते हैं। जब देश के नागरिक 'राष्ट्र प्रथम' की भावना को अपने जीवन का मूल मंत्र बना लेंगे, तो भारत की प्रगति को कोई रोक नहीं पाएगा। निष्कर्षतः विकसित भारत का संकल्प केवल आर्थिक आंकड़ों या ऊंची इमारतों तक सीमित नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ एक ऐसे भारत का निर्माण करना है जो आर्थिक रूप से समृद्ध हो, तकनीकी रूप से अग्रणी हो, सामाजिक रूप से समरस और न्यायपूर्ण हो, और सांस्कृतिक रूप से अपनी समृद्ध जड़ों से जुड़ा हुआ हो। यह एक ऐसे भारत का सपना है जहां हर नागरिक को समान अवसर, उत्कृष्ट शिक्षा और स्वास्थ्य सुरक्षा मिले। लालकिले की प्राचीर से गूंजा यह संकल्प देश के लिए एक महान आह्वान है। आने वाले दो दशक भारत के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष होने जा रहे हैं। यदि हम सब मिलकर पूरी निष्ठा और राष्ट्रीय गौरव की भावना के साथ इस संकल्प के प्रति समर्पित हो जाएं, तो निश्चित रूप से वर्ष 2047 में जब भारत अपनी स्वतंत्रता की शताब्दी मना रहा होगा, तब वह विश्व पटल पर एक परम वैभवशाली, समर्थ और विकसित राष्ट्र के रूप में स्थापित होगा। अशोक भाटिया, वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार

प्रभासाक्षी 17 Aug 2026 5:37 pm

उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा मानसून सत्र

संसदीय मर्यादाओं का क्षरण कब तक? आखिर कब हम संसद के एक-एक मिनट का उपयोग करने की पात्रता विकसित करेंगे? आजादी की 80वीं वर्षगांठ की आयोजना से पूर्व भारत में संसद का मानसून सत्र जिस निराशाजनक स्थिति, नाउम्मीदी और उपेक्षापूर्ण स्थितियां के साथ संपन्न हुआ, वह केवल किसी एक दल, सरकार या विपक्ष की विफलता नहीं है, बल्कि हमारी संसदीय संस्कृति के सामने खड़ा एक गंभीर प्रश्नचिह्न है। 25 दिनों तक चले इस सत्र में तीखी राजनीतिक बहस के बजाय हंगामा, नारेबाजी, गतिरोध और कार्यवाही बाधित करने की प्रवृत्ति अधिक प्रभावी रही। प्रश्न यह नहीं है कि सत्ता पक्ष सही था या विपक्ष, प्रश्न यह है कि क्या हमारी संसद अपने मूल दायित्व-जनता के प्रश्नों पर गंभीर विमर्श, सरकार की जवाबदेही और राष्ट्रहित में कानून निर्माण को पूरा कर पा रही है? इस सत्र के आंकड़े स्वयं बहुत कुछ कह रहे हैं। लोकसभा की उत्पादकता बमुश्किल 19 प्रतिशत रही, जबकि राज्यसभा में लगभग 39 प्रतिशत काम हो पाया। लोकसभा में एक भी दिन प्रश्नकाल पूरा नहीं हो सका। यह स्थिति इसलिए अधिक चिंताजनक है क्योंकि प्रश्नकाल संसद की आत्मा माना जाता है। देश की जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों को सरकार से प्रश्न पूछने और सरकार को उनका उत्तर देने का अवसर ही यदि सदन में उपलब्ध न हो, तो लोकतंत्र की जवाबदेही किस रास्ते से सुनिश्चित होगी? 28 जुलाई को लोकसभा में अपेक्षाकृत ठीक काम हुआ, जबकि राज्यसभा में भी केवल कुछ दिन ही सार्थक कार्यवाही हो सकी। शेष समय का बड़ा हिस्सा राजनीतिक टकराव की भेंट चढ़ गया। संसद केवल ईंट-पत्थर से बनी इमारत नहीं है। वह भारत की सामूहिक चेतना का सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच है। वहां देश के करोड़ों नागरिकों की आकांक्षाएं, समस्याएं और सपने पहुंचते हैं। किसान, मजदूर, विद्यार्थी, महिला, व्यापारी, युवा, गरीब और वंचित वर्ग-सभी की आवाज संसद के माध्यम से राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनती है। इसलिए संसद का एक मिनट भी केवल सांसद का समय नहीं होता, वह देश की जनता के धन, विश्वास और लोकतांत्रिक अधिकार का समय होता है। संसद का प्रत्येक व्यर्थ गया मिनट वास्तव में जनता के विश्वास से घटा हुआ एक मिनट है। दुर्भाग्य यह है कि संसद में हंगामा अब अपवाद नहीं, बल्कि संसदीय राजनीति का लगभग नियमित हथियार बनता जा रहा है। मुद्दे उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है, सरकार को घेरना विपक्ष का दायित्व है और असहमति लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन असहमति को संवाद में बदलने के बजाय कार्यवाही रोक देना लोकतंत्र को मजबूत नहीं करता। विरोध की भी एक मर्यादा होती है। यदि विपक्ष अपनी बात रखने के लिए सदन को चलने ही न दे और सत्ता पक्ष विपक्ष की आवाज सुनने की बजाय राजनीतिक बहुमत को ही पर्याप्त समझे, तो दोनों मिलकर संसदीय लोकतंत्र की आत्मा को कमजोर करते हैं। इसे भी पढ़ें: Lok Sabha में मात्र 19% और Rajya Sabha में 39.17% हो सका कामकाज, Parliament के कामकाज का रिपोर्ट कार्ड देखकर खुद तय कीजिये सांसद पास हुए या फेल! इस सत्र में कुछ घटनाएं इस गिरावट को और स्पष्ट करती हैं। लोकसभा अध्यक्ष ने सत्र के समापन पर पारंपरिक समापन भाषण नहीं दिया। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस द्वारा लोकसभा अध्यक्ष के साथ होने वाली चाय पार्टी का बहिष्कार किया जाना भी केवल एक कार्यक्रम का बहिष्कार नहीं माना जा सकता। यह सदन के भीतर बढ़ती राजनीतिक कटुता का संकेत है। लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, मनभेद लोकतंत्र के लिए घातक हैं। संसद में बहस के बाद हाथ मिलाने की संस्कृति विकसित होनी चाहिए, बहस के बाद दूरी बढ़ाने की नहीं। इस मानसून सत्र को नीट-यूजी पेपर लीक, जंतर-मंतर छात्र आंदोलन, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग और राम मंदिर में दान चोरी जैसे मुद्दों के लिए भी याद किया जाएगा। जंतर-मंतर पर हुई हिंसा के बाद विपक्ष केंद्रीय गृहमंत्री से जवाब मांग रहा था। जब सत्र के अंतिम दिनों में गृहमंत्री जवाब देने को तैयार हुए तो विपक्ष द्वारा उनका वक्तव्य सुनने से इनकार करना संसदीय विवेक की कसौटी पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। यदि विपक्ष को सरकार के जवाब से असहमति थी, तो उसे सुनकर तथ्यात्मक प्रतिवाद करना अधिक प्रभावी लोकतांत्रिक रास्ता होता। संसद में जवाब सुनने से इनकार करना प्रश्न का समाधान नहीं, प्रश्न को अनुत्तरित छोड़ना है। यह भी सच है कि तमाम गतिरोध के बीच संसद ने कुछ महत्वपूर्ण काम किए। विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक यानी एफसीआरए को सरकार ने विरोध के बीच संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा। सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 दोनों सदनों में पारित हुआ, जिसका उद्देश्य परीक्षाओं में अनुचित साधनों पर अंकुश लगाना और दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करना है। बैंकिंग रिकॉर्ड को नए डिजिटल ढांचे से जोड़ने, जन्म-मृत्यु के विलंबित पंजीकरण को अधिक कठोर बनाने तथा अन्य विधायी एवं प्रशासनिक सुधारों की दिशा में भी कदम उठे। केरल का नाम विधिवत केरलम किए जाने का निर्णय भी इसी सत्र का हिस्सा रहा। ये उपलब्धियां बताती हैं कि यदि संसद चले तो कम समय में भी महत्वपूर्ण काम संभव है। लेकिन सवाल फिर वही है-जब संसद चल सकती है तो उसे बार-बार रोकने की आवश्यकता क्यों पड़ती है? क्या हम यह भूल गए हैं कि लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव जीतना नहीं है? लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ है-विचारों का सम्मान, असहमति की स्वीकार्यता, संवाद की निरंतरता और निर्णय प्रक्रिया में जनता की भागीदारी। सत्ता पक्ष को यह समझना होगा कि बहुमत उसे शासन करने का अधिकार देता है, लेकिन विपक्ष को सुनने से मुक्त नहीं करता। दूसरी ओर विपक्ष को यह स्वीकार करना होगा कि विरोध का अधिकार संसद को निष्क्रिय करने का अधिकार नहीं है। अतीत में हमारी संसदीय परंपरा ने अनेक कठिन दौर देखे हैं। तीखी बहसें हुईं, वैचारिक संघर्ष हुए, सरकारों की आलोचना हुई, लेकिन संसद को संवाद का मंच बनाए रखने की कोशिश होती रही। आज आवश्यकता है कि हम उस परंपरा को पुनर्जीवित करें। राजनीतिक दलों को अपने भीतर यह आत्ममंथन करना होगा कि क्या वे जनता के बीच जाकर यह कह सकते हैं कि हमने संसद में आपके प्रश्नों के लिए उपलब्ध समय का पूरा उपयोग किया? क्या कोई सांसद गर्व से कह सकता है कि उसने अपने कार्यकाल के प्रत्येक संसदीय अवसर को राष्ट्रहित में लगाया? संसद में हंगामा करना आसान है, लेकिन संसद चलाना चरित्र, संयम और लोकतांत्रिक परिपक्वता मांगता है। नारे लगाने के लिए ऊर्जा चाहिए, लेकिन तथ्यपूर्ण बहस के लिए अध्ययन चाहिए। माइक के सामने खड़े होने के लिए राजनीतिक उत्साह चाहिए, लेकिन कानून बनाने के लिए दूरदृष्टि चाहिए। कार्यवाही रोकने के लिए संख्या पर्याप्त हो सकती है, लेकिन राष्ट्र निर्माण के लिए विवेक, धैर्य और संवाद आवश्यक है। आजादी के 80वें वर्ष की ओर बढ़ते भारत के लिए यह आत्ममंथन का समय है। हमने विज्ञान, अर्थव्यवस्था, तकनीक और वैश्विक प्रतिष्ठा के अनेक क्षेत्रों में बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं। लेकिन क्या हमारी राजनीतिक संस्थाएं भी उसी गति से परिपक्व हुई हैं? क्या हम संसदीय प्रणाली को इतना सशक्त बना पाए हैं कि संसद के एक-एक मिनट का अधिकतम उपयोग कर सकें? क्या हम अपनी असहमति को इतनी गरिमा दे पाए हैं कि विरोध भी हो और संवाद भी बना रहे? क्या हम सत्ता को इतनी विनम्रता और विपक्ष को इतना विवेक दे पाए हैं कि दोनों मिलकर लोकतंत्र को मजबूत करें? इन प्रश्नों के उत्तर केवल संसद भवन के भीतर नहीं खोजे जाने चाहिए। राजनीतिक दलों के नेतृत्व, सांसदों, संसदीय कार्यप्रणाली और अंततः हम नागरिकों-सभी को इस पर विचार करना होगा। जनता को भी यह प्रश्न पूछना चाहिए कि उसका प्रतिनिधि संसद में कितनी बार उपस्थित रहा, कितने प्रश्न पूछे, कितनी बहसों में भाग लिया और राष्ट्र के लिए क्या सार्थक योगदान दिया। लोकतंत्र केवल पांच वर्ष में एक बार वोट देने से मजबूत नहीं होता, लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब जनता अपने प्रतिनिधियों से निरंतर जवाब मांगती है। हंगामा किसी दल की विजय नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की सामूहिक पराजय है। संसद चलेगी तो प्रश्न पूछे जाएंगे, प्रश्न पूछे जाएंगे तो सरकार जवाब देगी, जवाब मिलेगा तो नीतियों की समीक्षा होगी और सार्थक कानून बनेंगे। यही लोकतंत्र की जीवन-धारा है। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

प्रभासाक्षी 17 Aug 2026 5:08 pm

भारत में पाकिस्तानियों को मिल गई नागरिकता?

किसी पाकिस्तानी को आज के दौर में हिंदुस्तान में बसाना, उन्हें पनाह देना या फिर नागरिकता देनी वाली बात, शायद ही किसी के गले उतरे? बसाना तो दूर, ऐसा सोचना मात्र भी, सूरज का पूरब की जगह पश्चिम से निकलने जैसा माना जाएगा। पर, यह कोरी कल्पना पिछले दिनों हकीकत में तब्दील हुई। भारत में 56 साल पहले आए पाकिस्तानियों को नागरिकता दी गई है। वह भी एकाध लोगों को नहीं, बल्कि हजारों को। सरकार ने पिछले महीने बकायदा एक रंगारंग कार्यक्रम कर, ढोल-नगाड़े बजाकर विस्थापित पाकिस्तानियों को नागरिकता प्रमाण पत्र बांटे। ताज्जुब यह भी है कि ऐसा चमत्कार हुकूमत ने ऐसे माहौल में किया, जब समूचे भारत में विभिन्न देशों के घुसपैठियों को निकालकर उन्हें खदेड़ने का अभियान केंद्रीय व राज्य स्तरों पर छिड़ा हो। इस अभियान की बानगी हमने हाल में संपन्न हुए पांच राज्यों के विधाानसभा चुनाव के दौरान भी देखा। जब दो बॉर्डर राज्य, असम और पश्चिम बंगाल, का चुनाव इसी मसले के इर्दगिर्द घूमा। घुसपैठियों के अलावा भारत में कुछ वर्षों से एनआरसी और सीएए का भी शोर है। बावजूद इसके सरकार ने पाकिस्तानियों को नागरिकता देने का बड़ा जाखिम उठाया। सरकार ने यह कदम क्यों उठाया? हालांकि, इस फैसले के सियासी मायने बहुतेरे हैं, जिसकी तस्वीर आने वाले दिनों में दिखाई भी देगी। सरकार ने विस्थापितों को नागरिकता हिंदुस्तान के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में दी है। जिले का नाम है पीलीभीत जो नेपाल बॉर्डर से एकदम सटा हुआ है जिसकी पहचान बांसुरी निमार्ण के अलावा तराई क्षेत्र के लिए भी प्रसिद्ध है। पीलीभीत को मिनी पंजाब भी कहते हैं। प्राकृतिक सौंदर्य से लबरेज, जैव-विविधता के अलावा विश्व प्रसिद्ध टाइगर रिजर्व तो है ही, धान की पैदावार के लिए भी जिला पूरे प्रदेश में विख्यात है। सरकार ने जिन परिवारों को बसाने का फैसला किया है उनमें बंगाली हिन्दू, बौद्ध, जैन और सिख शामिल हैं। भारत के नक्शे में देखें, तो पीलीभीत हिंदुस्तान के एक अलहदे छोर पर बसा है जहां करीब पांच दशक से भी ज्यादा पहले पाकिस्तान से आए विस्थापित लोग बस गए थे। तभी, से वह विभिन्न सरकारों से नागरिकता मांगते आए हैं। सरकारी कागजों के मुताबिक पूर्वी पाकिस्तान से वर्ष 1959 से 1971 के बीच पाकिस्तान से पीड़ित होकर कुछेक परिवार भारत आए थे। शुरूआत में यह परिवार कई राज्यों में भटकते रहे, कहीं ठिकाना नहीं मिला। आखिरकार उन्हें बाद में यही जिला मुफीद लगा। पीलीभीत के अलावा कुछ नागरिकता रामपुर और बिजनौर में बसे विस्थापितों को भी दी गई है। इसे भी पढ़ें: 'हिंदुओं को किसी तरह सहन कर रहे हैं पाकिस्तान के मुसलमान', Zardari के इस बयान पर भड़के Javed Akhtar, Pakistan President को दिखाया आईना पीलीभीत के जिस क्षेत्र में यह परिवार रहते आए हैं वह जगह कभी विरान होती थी। इन लोगों ने इसे रहने लायक बनाया और उबड़खाबड़ जगहों पर मेहनत करके उसे खेतीबाड़ी के लिए तैयार किया। आज इस क्षेत्र में अच्छी फसलें उगती हैं। सभी के पास कागजी दस्तावेजों के रूप में भारतीय आधार कार्ड, पैन कार्ड, राशन कार्ड इत्यादि पहले से मौजूद हैं। साथ ही लंबे वक्त से मतदान भी करते आए हैं। लेकिन नागरिकता और मालिकाना हक से वंचित थे, जिसे मौजूदा योगी सरकार ने पूरा कर दिया। ये परिवार पीलीभीत जिले के अमरिया, न्यूरिया, शारदा डैम की तलहटी सहित आसपास के क्षेत्रों में बसे हैं। सरकार ने उन्हें खेती और आवास के लिए जमीन तो पहले से दी हुई हैं। लेकिन मालिकाना हैसियत नहीं दी, जिसके लिए यह लोग दशकों जद्दोजहद कर रहे थे। प्रत्येक चुनावों में इनसे के झूठा आश्वासन हुआ। पूर्ववर्ती बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी की सरकारों ने भी इनको नागरिकता दिलवाने का दिलासा दिया। पर, कुछ राजनैतिक अड़चनों के चलते वादा पूरा नही ंकर पाए। बीते 2022 के विधानसभा चुनाव में इनके साथ वादा किया गया था, जिसे अब पूरा किया गया। प्रदेश सरकार की पहल पर सभी पीड़ित परिवारों को सूचीबद्ध करके नागरिकता और मालिकाना के प्रमाण बांटे गए हैं। नागरिकता करीब 2500 परिवारों को दी गई हैं जिनकी कुल संख्या 15 हजार के आसपार है। ऐसा करके सरकार ने शायद विपक्षी दलों को बड़ा सियासी मुद्दा बैठे-बिठाए थमा दिया है। ये लोग वर्ष 1960 से 1975 के बीच धार्मिक प्रताड़ना के चलते पूर्वी बंगालादेश जो अब पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा है, से भारत आए थे और उत्तर प्रदेश के तराई के जिले पीलीभीत में आकर बसे। ये क्षेत्र पीलीभीत जिले की कलीनगर व पूरनपुर तहसीलों में आते हैं जहां ये करीब 25-26 गांवों में बसे हैं। पिछले महीने 29 जून को सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का जिले में दौरा हुआ जिसमें मुख्यमंत्री ने इनको ना सिर्फ नागरिकता के प्रमाण पत्र बांटे, बल्कि मालिकाना हक के सरकारी कागज भी दिए। यह फैसला चुनाव के ऐन वक्त लिया गया। प्रदेश में मात्र 6-7 महीनों बाद विधानसभा के चुनाव होने हैं। इसलिए सरकार के इस निर्णय पर प्रदेश की राजनीति जमकर गर्माई हुई है। विपक्षी पार्टियों ने सीधे-सीधे एक बड़े वोटबैंक को साधने का आरोप मौजूदा सरकार पर लगाया है। पाकिस्तानी विस्थापियों को बसाने का यह पहला चरण है, अभी दूसरा चरण शेष है। 35 हजार लोग और हैं जो बहराईच, बाराबंकी, गोंडा, लखीमपुर, बिजनौर जैसे जिलों में बसे हैं। सभी को चिंहित किया जा चुका है, अगले कुछ महीनों बाद इन्हें भी मुकम्मल नागरिकता देने का फैसला हो चुका है। सरकारी आंकड़ों की माने तो प्रदेश के करीब सात-आठ जिलों में कुल 55 हजार विस्थापित पाकिस्तानियों की आबादी है, इनमें प्रत्येक वर्ष तेजी से इजाफा भी हो रहा है। 56 वर्ष पहले धार्मिक प्रताड़ना के रूप में मात्र 12 हजार 380 लोग आए थे। आबादी बढ़ाने के पीछे इनका मकसद था कि बढ़ी आबादी से सरकारों को वोटिंग का लालच देकर किसी भी दल पर दबाव बना सकेंगे। कमोबेश, हुआ भी वैसा ही। अपने योजनाओं में यह लोग आज सफल हुए हैं। - डॉ. रमेश ठाकुर सदस्य, राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान (NIPCCD), भारत सरकार!

प्रभासाक्षी 17 Aug 2026 5:00 pm

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देशबन्धु 17 Aug 2026 4:08 pm

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देशबन्धु 17 Aug 2026 3:38 pm