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दीया मिर्जा का वीडियो हटाने पर भड़कीं ज्योति गायकवाड़, भाजपा पर लगाया मुद्दों से भटकाने का आरोप

दीया मिर्जा का वीडियो हटाने पर भड़कीं ज्योति गायकवाड़, भाजपा पर लगाया मुद्दों से भटकाने का आरोप

समाचार नामा 2 Nov 2026 10:32 pm

तमिलनाडु : मुख्यमंत्री ने पुडुकोट्टई में 80 करोड़ रुपए की विकास परियोजनाओं का उद्घाटन किया

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समाचार नामा 2 Nov 2026 9:32 pm

पुणे मेट्रो की नई पिंक लाइन में क्या है खास बात? प्रधानमंत्री मोदी ने प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डाला

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समाचार नामा 2 Nov 2026 9:28 pm

सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार मामले में एफआईआर के खिलाफ तमिलनाडु के पूर्व मंत्री केएन नेहरू की याचिका खारिज की

सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार मामले में एफआईआर के खिलाफ तमिलनाडु के पूर्व मंत्री केएन नेहरू की याचिका खारिज की

समाचार नामा 2 Nov 2026 8:13 pm

राहुल गांधी का पीएम मोदी पर बड़ा हमला, विदेशी समर्थन को लेकर दी खुली बहस की चुनौती

कांग्रेस नेता बोले, आर्थिक व्यवस्था और सोशल मीडिया की भूमिका पर देश के सामने हो खुली चर्चा

देशबन्धु 2 Nov 2026 8:09 pm

दीया मिर्जा के वीडियो पर बीएमसी मेयर का हमला, बोलीं- हमें दिवाली मनाना सिखाने की जरूरत नहीं

मुंबई, 2 नवंबर (आईएएनएस)। बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) की महापौर ऋतु तावड़े ने सोमवार को बॉलीवुड अभिनेत्री दीया मिर्जा के प्रदूषण-मुक्त दिवाली से जुड़े वीडियो की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि उनका विरोध लगातार हिंदुत्व और उससे जुड़े लोगों के खिलाफ रहा है।

समाचार नामा 2 Nov 2026 7:43 pm

'स्वामित्व' योजना के तहत गुजरात के 14,866 गांवों की मैपिंग पूरी, ग्रामीणों को मालिकाना हक देने की तैयारी

'स्वामित्व' योजना के तहत गुजरात के 14,866 गांवों की मैपिंग पूरी, ग्रामीणों को मालिकाना हक देने की तैयारी

समाचार नामा 2 Nov 2026 7:09 pm

रामलीला मैदान की इंडी गठबंधन की महारैली के सियासी निहितार्थ को समझिए

दिल्ली के रामलीला मैदान में 1 नवंबर 2026 को आयोजित इंडी (INDIA) गठबंधन की महारैली केवल एक राजनीतिक सभा नहीं थी, बल्कि यह विपक्ष की ओर से चुनाव आयोग, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर उठाए जा रहे सवालों को राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाने का एक और बृहत प्रयास था। 'वोट बचाओ, देश बचाओ' और 'चलो दिल्ली' के संदेश के साथ आयोजित इस रैली में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी शरद पवार, नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी, सीपीआई, सीपीआई एम, सीपीआई एमएल सहित लगभग 20 विपक्षी दलों के नेताओं ने हिस्सा लिया। अधिकांश नेताओं ने गर्मजोशी पूर्वक मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग भी उठाई और निज अनुभवजन्य आरोप लगाए। सबसे अंत में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने संतुलित भाषण देते हुए एक परिपक्व नेता प्रतिपक्ष का परिचय दिया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर निशाना साधते हुए खट्टा मीठा आरोप लगाए, जिसमें ताना और दुलार दोनों शामिल रहा। इसे भी पढ़ें: Jairam Ramesh का BJP पर वार, Rahul Gandhi की अपील पर Delhi के बाजारों में बढ़ा व्यापार इस घटनाक्रम को समझने के लिए अग्रांकित सात महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी है:- पहला, चुनाव आयोग और एसआईआर को विपक्ष ने बनाया मुख्य राजनीतिक मुद्दा: रैली का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि विपक्ष ने अपनी लड़ाई को केवल केंद्र सरकार के विरोध तक सीमित न रखकर चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जोड़ने की कोशिश की। विपक्ष के प्रमुख आरोप हैं कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने और प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी से मतदान के अधिकार पर असर पड़ सकता है।राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और अखिलेश यादव सहित कई नेताओं ने इस मुद्दे को उठाया। विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। इसका राजनीतिक निहितार्थ यह है कि विपक्ष चुनावी निष्पक्षता को अपनी साझा राजनीतिक लड़ाई का आधार बनाना चाहता है। वह मतदाता सूची के विवाद को लोकतंत्र, संविधान और नागरिक अधिकारों के व्यापक सवाल से जोड़ रहा है। हालांकि, विपक्ष के आरोपों और चुनाव आयोग की प्रक्रिया के बीच वास्तविक स्थिति का निर्धारण दस्तावेजों, संबंधित मतदाता आंकड़ों और कानूनी जांच के आधार पर ही होना चाहिए। चुनाव आयोग की ओर से एसआईआर (SIR) के आदेशों को वैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप बताया गया है। दूसरा, विपक्षी एकजुटता का सार्वजनिक प्रदर्शन, लेकिन नेतृत्व का सवाल बरकरार: इस महारैली में राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, तेजस्वी यादव, फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती जैसे महत्वपूर्ण विपक्षी नेताओं की मौजूदगी महत्वपूर्ण रही। इससे विपक्ष ने यह संदेश देने की कोशिश की कि अलग-अलग राज्यों में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा रखने वाले दल राष्ट्रीय मुद्दों पर एक मंच पर आ सकते हैं। लेकिन एक बड़ा सवाल अभी भी कायम है: एक, गठबंधन का वास्तविक नेतृत्व किसके हाथ में होगा? दो, क्या कांग्रेस और क्षेत्रीय दल एक-दूसरे के राजनीतिक हितों को पर्याप्त जगह देंगे? तीन, क्या विपक्ष साझा मुद्दों पर आंदोलन के साथ-साथ साझा नीतिगत कार्यक्रम भी बना पाएगा? चार, क्या चुनाव के समय सीटों के बंटवारे और उम्मीदवार चयन पर सहमति कायम रह सकेगी? इसका सियासी निहितार्थ यह है कि प्रमुख विपक्षी नेताओं द्वारा एक मंच पर नेताओं का खड़ा होना और एक साझा राजनीतिक संगठन की तरह काम करना दो अलग-अलग बातें हैं। महारैली ने पहले पहलू को प्रदर्शित किया, जबकि दूसरे की परीक्षा आगे होगी। तीसरा, कांग्रेस की राष्ट्रीय भूमिका और राहुल गांधी की राजनीतिक रणनीति: रैली के आयोजन में कांग्रेस की प्रमुख भूमिका रही। खड़गे और राहुल गांधी ने चुनाव आयोग तथा केंद्र सरकार के खिलाफ विपक्ष की आवाज को सामने रखा। राहुल गांधी ने नागरिकों के मताधिकार को धर्म और राजनीतिक पहचान से ऊपर रखने की बात कही। दूसरी ओर, अखिलेश यादव और ममता बनर्जी ने अपने-अपने राज्यों से जुड़े एसआईआर के सवालों को भी उठाया। इस घटनाक्रम के तीन राजनीतिक पहलू हैं: एक, कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गतिविधियों का साझा मंच उपलब्ध कराने की कोशिश कर रही है। दो, राहुल गांधी के लिए लोकतंत्र और चुनावी निष्पक्षता का मुद्दा उनकी राष्ट्रीय राजनीतिक संवाद शैली का महत्वपूर्ण हिस्सा बन रहा है। तीन, क्षेत्रीय दल इस मंच के माध्यम से अपने राज्य के राजनीतिक मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श में जगह दे रहे हैं। लेकिन कांग्रेस की राष्ट्रीय भूमिका और गठबंधन के भीतर अन्य दलों की स्वायत्तता के बीच संतुलन बनाना एक महत्वपूर्ण चुनौती बनी रहेगी। चौथा, ममता, अखिलेश और अन्य क्षेत्रीय नेताओं के अपने राजनीतिक संदेश: महारैली में सभी नेताओं का भाषण एक जैसा नहीं था। जहां अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश की मतदाता सूची और कथित नाम कटने के मुद्दे को उठाया। वहीं, ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में एसआईआर के प्रभाव का विरोध किया। उधर, तेजस्वी यादव ने अपने भाषण में महाभारत के शकुनि का संदर्भ दिया और पूछा कि आज के कौन है? इसके पीछे उनका गहरा दर्द यह है कि बिहार के दिग्गज समाजवादी नेता और पूर्व स्वास्थ्य मंत्री शकुनि चौधरी के पुत्र और बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने तेजस्वी यादव के मुख्यमंत्री बनने की संभावनाओं पर तुषारापात कर दिया। वहीं, फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती ने लोकतांत्रिक अधिकारों और नागरिक भागीदारी के सवाल उठाए। इससे स्पष्ट होता है कि गठबंधन का साझा मंच होने के बावजूद उसके प्रत्येक घटक दल की अपनी क्षेत्रीय प्राथमिकताएं हैं। इस तरह से उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, जम्मू-कश्मीर और अन्य राज्यों में मतदाता सूची, सामाजिक समीकरण और चुनावी प्रतिस्पर्धा के अलग-अलग संदर्भ हैं। इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर एक नारा सभी राज्यों में समान राजनीतिक अर्थ नहीं रखता। पांचवां, भाजपा और विपक्ष के बीच टकराव अब चुनावी संस्थाओं के सवाल तक पहुंचा: इस रैली के बाद राजनीतिक बहस का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी सामने आया कि भाजपा और विपक्ष चुनावी प्रक्रिया को लेकर एक-दूसरे के विरुद्ध अलग-अलग राजनीतिक दावे पेश कर रहे हैं। जहां भाजपा ने विपक्ष के आरोपों को राजनीतिक अभियान का हिस्सा बताया है। वहीं विपक्ष का कहना है कि मतदाता सूची की विश्वसनीयता और चुनाव आयोग की जवाबदेही पर सवाल उठाना उसका लोकतांत्रिक अधिकार है। दिलचस्प बात यह है कि 1 नवंबर को ही दिल्ली के हरिनगर में भाजपा नेता हरदीप सिंह पूरी और दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने 1984 के सिख-विरोधी दंगों के पीड़ितों के न्याय से जुड़ा अपना विरोध मार्च भी आयोजित किया। इससे रैली के साथ एक अलग राजनीतिक और ऐतिहासिक विवाद भी जुड़ गया। इसका अर्थ यह है कि राजनीतिक विमर्श केवल एसआईआर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें 1984 की त्रासदी, न्याय, राजनीतिक जवाबदेही और विपक्ष की तारीख के चयन जैसे सवाल भी शामिल हो गए। छठा, क्या महारैली विपक्ष को जनांदोलन में बदलने की क्षमता रखती है?: किसी राजनीतिक रैली की सफलता का आकलन केवल भीड़ के आकार से नहीं किया जा सकता। असली कसौटी यह है कि उसका संदेश कितनी दूर तक पहुंचता है और उसके बाद संगठनात्मक स्तर पर क्या कार्रवाई होती है। इस दृष्टि से विपक्ष के सामने कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं: एक, मतदाता सूची से जुड़े आरोपों को प्रमाणों के साथ जनता के सामने रखना, क्योंकि घुसपैठियों को निकालने, दो जगहों के वोटर लिस्ट में शामिल लोगों को हटाने के फैसले को कांग्रेस व उसके समर्थक दल नाजायज़ नहीं ठहरा सकते हैं। दो, जिन मतदाताओं के नाम छूटने की शिकायत है, उनके मामलों का तथ्यात्मक समाधान कराना होगा। तीन, चुनाव आयोग के समक्ष अपनी आपत्तियों को संवैधानिक और कानूनी तरीके से उठाना होगा। चार, साझा राजनीतिक मुद्दों के साथ रोजगार, महंगाई, किसानों, युवाओं और आर्थिक विकास जैसे विषयों पर भी स्पष्ट कार्यक्रम प्रस्तुत करना होगा। पांच, गठबंधन के भीतर नेतृत्व और सीटों के बंटवारे पर व्यावहारिक सहमति बनाना होगा। छह, यह भी ध्यान रखना होगा कि रैली में उपस्थिति के आंकड़ों को लेकर राजनीतिक दावे और प्रतिदावे सामने आए हैं। इसलिए भीड़ के आधार पर देशव्यापी जनसमर्थन का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। सातवां, इस महारैली से केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के सामने क्या सवाल खड़े हुए?: इस घटनाक्रम ने तीन संस्थागत प्रश्नों को चर्चा में ला दिया है: एक, एसआईआर में पारदर्शिता कितनी है? और प्रत्येक पात्र नागरिक का मताधिकार सुरक्षित रहे। दो, चुनाव आयोग की जवाबदेही कैसे सुनिश्चित हो? और चुनावी संस्था पर जनता का विश्वास बना रहे। तीन, राजनीतिक दलों की शिकायतों का समाधान कैसे हो? और विवादों का निष्पक्ष और कानूनी निपटारा हो। यहां पर एक और महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है कि चुनाव आयोग की आलोचना करना और उसकी संवैधानिक स्वतंत्रता को कमजोर करना एक ही बात नहीं है। इसी प्रकार आयोग की स्वतंत्रता का सम्मान करने का अर्थ यह भी नहीं कि उसकी प्रक्रियाओं पर सवाल नहीं उठाए जा सकते। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में दोनों पक्षों के लिए पारदर्शिता, जवाबदेही और कानून का पालन आवश्यक है। सच कहूँ तो रामलीला मैदान से निकले राजनीतिक संदेश की असली परीक्षा आगे होगी। 1 नवंबर की महारैली ने विपक्षी एकजुटता, चुनावी निष्पक्षता और मतदाता अधिकारों को राष्ट्रीय राजनीतिक बहस में प्रमुखता दी है। इसने यह भी दिखाया कि अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं और क्षेत्रीय हितों वाले दल कुछ साझा मुद्दों पर एक मंच पर आ सकते हैं। लेकिन इस आयोजन से अपने आप विपक्ष की राजनीतिक एकजुटता स्थायी हो गई है या मतदाताओं के बीच उसके आरोप स्वीकार कर लिए गए हैं, ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। विपक्ष के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपने आरोपों को प्रमाणों से पुष्ट करे और साझा राजनीतिक कार्यक्रम को जमीन पर उतारे। वहीं चुनाव आयोग के लिए भी यह महत्वपूर्ण है कि वह मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर उठ रही शंकाओं का पारदर्शी तरीके से समाधान करे। दरअसल, रामलीला मैदान की इस महारैली का सबसे बड़ा राजनीतिक निहितार्थ यह है कि भारतीय राजनीति में अब चुनाव जीतने की प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता भी एक प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनती जा रही है। आखिरकार लोकतंत्र की मजबूती किसी एक राजनीतिक दल की जीत या हार से नहीं, बल्कि निष्पक्ष चुनाव, स्वतंत्र संस्थाओं और नागरिकों के भरोसे से तय होती है। यही शाश्वत सत्य है और मतदाता सूची में घालमेल एक संस्थागत बीमारी है, जिसके लिए पहले जिला प्रशासन की जिम्मेदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए, उसके बाद चुनाव आयोग की। ऐसा इसलिए कि कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेंस, आप आदि शासित राज्यों में चुनाव आयोग चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 2 Nov 2026 6:15 pm

किताबों और खिलौनों की उम्र में हिंसा का पाठ क्यों पढ़ रहे हैं बच्चे?

बचपन को मासूमियत, निश्छलता, संवेदनशीलता और खिलखिलाती मुस्कान का पर्याय माना जाता है। बच्चों के हाथों में खिलौने अच्छे लगते हैं, पत्थर और ईंटें नहीं, उनकी आंखों में सपने अच्छे लगते हैं, किसी के प्रति नफरत और हिंसा नहीं। लेकिन जब 8-10 वर्ष की उम्र के बच्चे भी किसी दूसरे मासूम की जान लेने पर उतारू हो जाएं, तब सवाल केवल एक बच्चे के असामान्य व्यवहार का नहीं रह जाता बल्कि पूरे सामाजिक परिवेश, पारिवारिक संस्कारों, शिक्षा व्यवस्था और हमारी बदलती जीवनशैली का हो जाता है। हरियाणा के पंचकूला में छह साल की विशेष आवश्यकता वाली बच्ची पर तीसरी कक्षा के आठ वर्षीय छात्र द्वारा किया गया बर्बर हमला इसी भयावह वास्तविकता का आईना है। जब पंचकूला के सेक्टर-20 स्थित राजकीय संस्कृति मॉडल स्कूल में हुई इस हृदयविदारक घटना का वीडियो देखा तो मन बेहद विचलित हो उठा। आरोपी छात्र बच्ची को एक खाली कक्षा में ले गया, वहां उसके बाल पकड़कर घसीटा, बेंच पर सिर पटका, लातें मारी तथा ईंट, पत्थर और गमले से उसके सिर तथा चेहरे पर बार-बार प्रहार किए। करीब 96 सैकेंड तक चली इस हिंसा का दृश्य कक्षा में लगे सीसीटीवी कैमरे में दर्ज हुआ। सबसे विचलित करने वाली बात यह है कि हमला करने वाला कोई व्यस्क अपराधी नहीं बल्कि 8 वर्ष का बच्चा है। यह घटना जितनी पीड़ित बच्ची के लिए भयावह है, उतनी ही उस बच्चे के मानसिक और सामाजिक विकास को लेकर भी गंभीर चिंता पैदा करती है। आखिर इतनी छोटी उम्र में किसी बच्चे के भीतर इतनी आक्रामकता कहां से आती है? क्या उसने हिंसा को सामान्य व्यवहार मान लिया है? क्या वह किसी के दर्द और असहायता को महसूस करने की क्षमता खो रहा है? और सबसे बड़ा सवाल यह कि हमारे घरों, स्कूलों और समाज में ऐसा क्या बदल रहा है कि बचपन की भाषा में प्रेम और संवेदना की जगह हिंसा प्रवेश करती जा रही है? उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज में जिस तरह बच्ची के असहाय हो जाने के बाद भी हमला जारी रहने की बात सामने आई है, वह सामान्य बाल-सुलभ झगड़े से कहीं अधिक गंभीर है। इसे भी पढ़ें: नई पीढ़ी को बौद्धिक परतंत्रता और सांस्कृतिक अलगाव से बचाना जरुरी इस घटना ने एक ऐसा प्रश्न हमारे सामने खड़ा किया है, जिससे मुंह मोड़ना अब संभव नहीं है कि आखिर बच्चों के मन में हिंसा के बीज कौन बो रहा है? बच्चों और किशोरों में हिंसक व्यवहार का कोई एक कारण नहीं होता। परिवार में हिंसा देखना, कठोर अथवा असंगत अनुशासन, भावनात्मक उपेक्षा, कमजोर अभिभावकीय निगरानी, साथियों का दबाव, सामाजिक अलगाव और व्यवहार पर नियंत्रण की कठिनाइयां इसके जोखिम को बढ़ा सकती हैं। सबसे पहले सवाल परिवारों से है। आज अनेक घरों में बच्चों को महंगे खिलौने, स्मार्टफोन, टैबलेट और मनोरंजन के तमाम साधन तो उपलब्ध करा दिए जाते हैं लेकिन उनके साथ बैठकर बातचीत करने, उनकी भावनाएं समझने और उनके व्यवहार को दिशा देने का समय लगातार कम होता जा रहा है। माता-पिता अपनी व्यस्तताओं में उलझे हैं और कई बार बच्चे अपनी भावनात्मक उलझनों के साथ अकेले रह जाते हैं। घर में माता-पिता के झगड़े, गाली-गलौज, मारपीट, अपमानजनक भाषा और छोटी-छोटी बातों पर हिंसक प्रतिक्रिया देखने वाले बच्चों के मन पर इसका गहरा प्रभाव पड़ सकता है। बच्चा वही सीखता है, जो अपने आसपास बार-बार देखता है। यदि घर में समस्या का समाधान संवाद से नहीं बल्कि चीखने, धमकाने और हाथ उठाने से होता है तो उसके लिए हिंसा धीरे-धीरे व्यवहार का स्वीकार्य तरीका बन सकती है। दूसरा बड़ा सवाल डिजिटल दुनिया का है। मोबाइल फोन और इंटरनेट ने बच्चों के सामने ज्ञान और मनोरंजन के असंख्य अवसर खोले हैं लेकिन इसी दुनिया में हिंसक वीडियो, मारधाड़ वाले खेल, अपमानजनक सामग्री और आक्रामक व्यवहार को महिमामंडित करने वाले दृश्य भी मौजूद हैं। समस्या तब गंभीर हो जाती है, जब बच्चा बिना किसी निगरानी के घंटों ऐसी सामग्री देखता है और उसे यह समझाने वाला कोई नहीं होता कि पर्दे पर दिखाई जाने वाली हिंसा वास्तविक जीवन में किसी के शरीर, मन और अस्तित्व को कितनी गहरी चोट पहुंचाती है। तीसरी चिंता बच्चों में संवेदनशीलता और सहानुभूति के विकास की है। आज हम बच्चों को प्रतियोगिता में आगे निकलना, जीतना और दूसरों से बेहतर प्रदर्शन करना तो सिखा रहे हैं लेकिन हार स्वीकार करना, दूसरों की भावनाओं का सम्मान करना, कमजोर की मदद करना और क्रोध पर नियंत्रण रखना कितना सिखा रहे हैं? क्या स्कूलों में नैतिक शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तकों तक सिमट गई है? क्या बच्चों को यह समझाया जा रहा है कि किसी को चोट पहुंचाना बहादुरी नहीं, कमजोरी है? किसी दूसरे की पीड़ा देखकर मन में करुणा पैदा होना ही मानवीय संवेदना का आधार है। यदि यही संवेदना विकसित नहीं होगी तो शिक्षा की बड़ी-बड़ी डिग्रियां भी सभ्य समाज की गारंटी नहीं बन सकतीं। यहां स्कूलों की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। पंचकूला की घटना ने सीसीटीवी कैमरों की मौजूदगी और वास्तविक निगरानी के बीच के अंतर को उजागर किया है। कैमरे लगे होना सुरक्षा नहीं है, उनकी सतत निगरानी, समय पर हस्तक्षेप और जवाबदेही ही सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। सवाल है कि एक छह साल की बच्ची स्कूल परिसर में एक अन्य छात्र के साथ ऐसी स्थिति में कैसे पहुंच गई, जहां उस पर लगातार हमला होता रहा और किसी शिक्षक या कर्मचारी को समय रहते इसकी जानकारी नहीं मिली? यदि स्कूल में शिक्षकों की कमी थी, एक शिक्षक को कई कक्षाओं की जिम्मेदारी संभालनी पड़ रही थी अथवा ड्यूटी व्यवस्था में कोई खामी थी तो यह भी जांच का विषय है। यह पहली घटना नहीं है, जब स्कूलों में बच्चों के बीच हिंसा ने पूरे देश को झकझोरा हो। वर्ष 2017 में गुरुग्राम के रेयान इंटरनेशनल स्कूल में सात वर्षीय प्रद्युम्न ठाकुर की हत्या, 2018 में दिल्ली के एक सरकारी स्कूल में चाकूबाजी, 2019 में तमिलनाडु के कोडईकनाल में क्रिकेट विवाद के बाद छात्र की हत्या, 2021 में छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में छात्र की चाकू मारकर हत्या, 2025 में अहमदाबाद में छात्र की हत्या और 2026 में सूरत में स्कूल परिसर में चाकूबाजी जैसी घटनाएं अलग-अलग समय पर सामने आ चुकी हैं। इन सभी मामलों की परिस्थितियां अलग हैं लेकिन एक बात समान है कि स्कूल, जिन्हें बच्चों के लिए सबसे सुरक्षित स्थान होना चाहिए, वहां भी हिंसा की घटनाएं सामने आ रही हैं। अब समय आ गया है कि सरकार और शिक्षा विभाग स्कूलों की सुरक्षा को केवल औपचारिक निरीक्षण और कागजी दिशा-निर्देशों तक सीमित न रखें। प्रत्येक स्कूल में पर्याप्त शिक्षक, प्रशिक्षित काउंसलर, विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए प्रशिक्षित सहयोगी कर्मचारी, संवेदनशील स्थानों पर सतत निगरानी और शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई की व्यवस्था होनी चाहिए। प्रत्येक बच्चे की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्कूल प्रबंधन, शिक्षकों और प्रशासन की जवाबदेही तय होनी चाहिए। अभिभावकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। बच्चों के व्यवहार में अचानक आक्रामकता, दूसरों को चोट पहुंचाने की प्रवृत्ति, क्रोध पर नियंत्रण न रहना, पश्चाताप का अभाव, जानवरों अथवा कमजोर बच्चों के प्रति क्रूरता जैसे संकेतों को सामान्य शरारत समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। बच्चों को दंडित करने के बजाय उनकी भावनाओं को समझना, उन्हें अपनी बात कहने का अवसर देना और प्रेम के साथ स्पष्ट अनुशासन सिखाना जरूरी है। खेलकूद, रचनात्मक गतिविधियां, सामूहिक सहभागिता और सामाजिक सेवा जैसी गतिविधियां भी उनमें सहयोग, धैर्य और सहानुभूति विकसित कर सकती हैं। पंचकूला की घटना हमें एक कठोर सच्चाई से रूबरू कराती है कि बच्चों का भविष्य केवल अच्छे स्कूल, महंगी शिक्षा, आधुनिक तकनीक और बेहतर सुविधाओं से सुरक्षित नहीं हो सकता। उसके लिए अच्छे संस्कार, भावनात्मक सुरक्षा, मानवीय संवेदना और जिम्मेदार अभिभावक भी उतने ही आवश्यक हैं। जिस समाज में बच्चे दूसरों का दर्द महसूस करना भूलने लगें, वहां विकास के तमाम दावे खोखले साबित होने लगते हैं। आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि पंचकूला में एक 8 वर्षीय बच्चे ने 6 साल की बच्ची पर हमला क्यों किया बल्कि यह है कि हम ऐसी नौबत आने से पहले क्या कर रहे थे और भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने के लिए क्या करेंगे? जिस उम्र में बच्चों को अक्षर ज्ञान, दोस्ती, खेल और मानवीय रिश्तों का अर्थ समझना चाहिए, उस उम्र में यदि उनके हाथों में ईंट और पत्थर दिखाई देने लगें तो यह केवल एक परिवार या स्कूल की विफलता नहीं बल्कि हमारी सामूहिक सामाजिक चेतना की पराजय है। हमें तय करना होगा कि बच्चों को केवल प्रतियोगिता में जीतना सिखाना है या इंसानियत के साथ जीना भी क्योंकि बचपन यदि हिंसक हो गया तो भविष्य सभ्य कैसे होगा? और यदि स्कूलों में बच्चे सुरक्षित नहीं तो फिर उनके सुरक्षित भविष्य की गारंटी कौन देगा? - योगेश कुमार गोयल (लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में निरंतर सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार हैं)

प्रभासाक्षी 2 Nov 2026 6:10 pm

आर्कबिशप पीटर मचाडो कौन हैं, जो चाहता है धर्मांतरण विरोधी कानून और गोहत्या कानून में बदलाव: कर्नाटक में कांग्रेस अ

आर्कबिशप की कॉन्ग्रेस अध्यक्ष खड़गे से मुलाकात के सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। बैंगलुरु में हुई इस मुलाकात के बाद आर्कबिशप ने खुद अपनी माँगों को सार्वजनिक किया।

ऑप इंडिया 2 Nov 2026 5:31 pm

इंडिया ब्लॉक की रैली फ्लॉप, 10 लाख की भीड़ जुटाने का दावा करने वाले हजारों में सिमट गए: संजय सेठ

इंडिया ब्लॉक की रैली फ्लॉप, 10 लाख की भीड़ जुटाने का दावा करने वाले हजारों में सिमट गए: संजय सेठ

समाचार नामा 2 Nov 2026 3:34 pm

ईरान को खत्म करने का प्लान! ट्रंप-नेतन्याहू की सीक्रेट बातचीत से हड़कंप

अमेरिकी मीडिया हस्ती और राजनीतिक टिप्पणीकार टकर कार्लसन ने दावा किया है कि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर ईरान के खिलाफ परमाणु हमला करने का दबाव डाल रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि वाशिंगटन कुछ ही दिनों के भीतर परमाणु हथियारों के इस्तेमाल को लेकर कोई फैसला ले सकता है। कार्लसन ने एक विस्तृत पोस्ट में लिखा है कि ये हथियार पहाड़ की ग्रेनाइट चट्टानों को भेदकर उन भूमिगत सुरंगों तक पहुंच सकते हैं, जहां कथित तौर पर परमाणु सामग्री को समृद्ध (एनरिच) करने का काम चल रहा है। कार्लसन ने लिखा इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के दबाव में ट्रंप प्रशासन कुछ ही दिनों में ईरान पर परमाणु हमला कर सकता है। उन्होंने आगे दावा किया कि नेतन्याहू इस तरह के अभियान के लिए जोर दे रहे हैं। उन्होंने एक अज्ञात सूत्र के हवाले से कहा बीबी (नेतन्याहू) इस बारे में ट्रंप को रोज फोन करते हैं। कार्लसन की पोस्ट में संभावित परमाणु हमले या नेतन्याहू द्वारा डाले जा रहे कथित दबाव के दावों के समर्थन में कोई ऐसा सबूत नहीं दिया गया, जिसकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि की जा सके। इसे भी पढ़ें: China हुआ सन्न, दुनिया हैरान, ट्रंप पर ऐसा भड़के जयशंकर, तगड़ा सुना दिया कार्लसन का दावा है कि नेतन्याहू युद्ध जारी रखना चाहते हैं। कार्लसन ने सैन्य कार्रवाई के कथित जोर को, पिछले हफ्ते इज़राइल में हुए चुनावों के बाद नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति से जोड़ा है। उन्होंने दावा किया कि ट्रम्प के सीधे हस्तक्षेप के बिना इज़रायली प्रधानमंत्री के लिए सरकार बनाना मुश्किल होगा, और अगर वे सत्ता से बाहर हो जाते हैं, तो उन्हें जांच का सामना करना पड़ सकता है और जेल भी जाना पड़ सकता है। कार्लसन ने लिखा कि नेतन्याहू को ट्रम्प के करीब रहना होगा। उन्हें इस युद्ध की ज़रूरत है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अमेरिका के कई वरिष्ठ अधिकारी नेतन्याहू के रुख का समर्थन कर रहे हैं और ईरान के साथ बातचीत के ज़रिए किसी समझौते के ख़िलाफ़ हैं। कार्लसन ने अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ और सेंटकॉम कमांडर ब्रैड कूपर का नाम लिया, और साथ ही दावा किया कि विदेश मंत्री मार्को रुबियो और CIA निदेशक जॉन रैटक्लिफ भी इज़रायली प्रधानमंत्री के इशारों पर चल रहे हैं। कार्लसन ने आगे दावा किया कि हाल ही में दोहा में हुई एक बैठक के दौरान, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ईरान के साथ शांति समझौते के मसौदे का विरोध किया था। उन्होंने इस दावे को साबित करने के लिए कोई विवरण या सबूत नहीं दिया। टिप्पणीकार ने यह भी कहा कि 27 सितंबर को नेतन्याहू चुपके से अबू धाबी गए थे, ताकि ईरान के ख़िलाफ़ अंतिम सैन्य अभियान के लिए संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का समर्थन हासिल कर सकें, लेकिन UAE ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। इसे भी पढ़ें: ट्रंप के रिजॉर्ट के पास मिसाइल की तरह नीचे आया विमान, फिर...9 की हुई मौत क्षेत्रीय और वैश्विक परिणामों को लेकर चेतावनी कार्लसन ने चेतावनी दी कि तनाव और बढ़ने से खाड़ी क्षेत्र और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं। उन्होंने होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल टैंकरों को हुए नुकसान और ऊर्जा तथा उर्वरक बाजारों में आई बाधाओं की ओर इशारा किया। उन्होंने दावा किया कि अक्टूबर में होर्मुज जलडमरूमध्य में, दुनिया भर में तेल ढोने वाले लगभग 850 सुपरटैंकरों में से 11 बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए थे। संभावित परमाणु हमले के परिणामों पर, कार्लसन ने आरोप लगाया कि 'पिकएक्स माउंटेन' पर ज़मीनी विस्फोट से फारस की खाड़ी प्रदूषित हो सकती है और 10 करोड़ लोगों की जलापूर्ति प्रभावित हो सकती है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि अमेरिका द्वारा परमाणु हथियारों का इस्तेमाल अन्य देशों के लिए एक मिसाल बन सकता है। कार्लसन ने दावा किया कि रूस ने कम से कम दो सरकारों से कहा है कि अगर अमेरिका ईरान पर परमाणु हमला करता है, तो उसे यूक्रेन के खिलाफ परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करने की छूट मिल जाएगी। उन्होंने उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया से जुड़े संभावित परमाणु तनाव का भी जिक्र किया। उन्होंने आगे आरोप लगाया कि अमेरिकी प्रशासन ने फरवरी से अपने परमाणु सिद्धांत में चुपचाप बदलाव किया है, ताकि तथाकथित युद्धक्षेत्र वाले परमाणु हथियारोंका इस्तेमाल करना आसान हो सके। इसे भी पढ़ें: ट्रंप के रिजॉर्ट के पास मिसाइल की तरह नीचे आया विमान, फिर...9 की हुई मौत ट्रंप कूटनीति के विकल्प पर कर रहे विचार टकर कार्लसन के ये दावे ऐसे समय में आए हैं जब वॉशिंगटन और तेहरान के बीच बातचीत दोबारा शुरू कराने के लिए कूटनीतिक कोशिशें जारी हैं, हालांकि नए सैन्य हमलों की संभावना पर भी चर्चा हो रही है। एक्सियोस (Axios) की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने शनिवार को फोन पर बात की। दोनों के बीच ईरान के साथ चल रही बातचीत की स्थिति और दोबारा सैन्य कार्रवाई शुरू करने की संभावना पर चर्चा हुई। रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू मंगलवार को होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के तुरंत बाद नए हमलों का दबाव बना रहे थे, जबकि राष्ट्रपति ट्रंप बातचीत को और मौका देना चाहते थे। एक इजरायली सूत्र ने इस बातचीत को कड़ा बताया, जबकि एक अमेरिकी सूत्र ने इसे सीधी और स्पष्ट बातचीत कहा। बाद में ट्रंप ने इसे बहुत अच्छी बातचीत बताया और पुष्टि की कि ईरान उन मुद्दों में शामिल था जिन पर बात हुई, हालांकि उन्होंने ज्यादा ब्योरा नहीं दिया। ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ बातचीत ठीक चल रही है और उन्हें कोई बहुत जल्दी नहीं है। हालांकि, उन्होंने यह संकेत भी दिया कि अमेरिका को अभी ईरान के एक-दो परमाणु ठिकानों पर ध्यान देने की जरूरत है, जिसमें उन्होंने खास तौर पर पिकेक्स माउंटेन का जिक्र किया। ट्रंप ने कहा हम यह 10 मिनट में कर सकते हैं। हमारे पास इसकी पूरी योजना है। आप पिकेक्स माउंटेन को देख सकते हैं। हमें उससे निपटना होगा और हम इसे बहुत तेजी से कर सकते हैं। इसी बीच, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने पिछले हफ्ते ईरान के राष्ट्रीय सुरक्षा प्रमुख मोहसिन रेज़ाई को एक पत्र भेजा, जिसमें बातचीत दोबारा शुरू करने की संभावना पर बात की गई थी। कतरी मध्यस्थों ने भी रविवार को लगातार तीसरे दिन ईरानी अधिकारियों के साथ चर्चा की, ताकि वॉशिंगटन और तेहरान के बीच सीधी बातचीत शुरू कराने के लिए सहमति बन सके। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि अभी तक कोई समझौता नहीं हुआ है और आगे की प्रगति इस बात पर निर्भर करती है कि अमेरिका, तेहरान के सवालों के जवाब कैसे देता है। अराघची ने कहा हम इस दिशा में हर संभव कोशिश कर रहे हैं और उम्मीद करते हैं कि दूसरा पक्ष इतनी समझदारी दिखाएगा कि अन्य रास्तों के बजाय कूटनीति को चुने। दूसरी तरफ, कार्लसन का दावा है कि ट्रंप इस समय वेंस और अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ की सलाह सुन रहे हैं, जिनका मानना है कि ईरान के साथ अब भी समझौता संभव है। कार्लसन ने अमेरिकी प्रशासन से परमाणु तनाव के खतरे की चेतावनी देते हुए कूटनीति का रास्ता अपनाने की अपील की।

प्रभासाक्षी 2 Nov 2026 3:34 pm

रामदास आठवले का राहुल गांधी पर तंज, 'पीएम मोदी को हटाना है तो चुनाव लड़ो, आंदोलन से नहीं होगा'

रामदास आठवले का राहुल गांधी पर तंज, 'पीएम मोदी को हटाना है तो चुनाव लड़ो, आंदोलन से नहीं होगा'

समाचार नामा 2 Nov 2026 1:31 pm

देश के नागर विमानन क्षेत्र में बड़े सुधारों की तैयारी: केंद्र सरकार लागू करेगी नए 'भारतीय वायुयान नियम', वर्ष 2027 से होंगे प्रभावी

केंद्र सरकार ने देश के नागर विमानन क्षेत्र के लिए एक नया और व्यापक नियामकीय ढांचा अधिसूचित किया है। नागर विमानन मंत्रालय के अनुसार, 'भारतीय वायुयान नियम, 2026' 1 जनवरी 2027 से लागू होंगे और लगभग नौ दशकों से लागू विमान नियम, 1937 का स्थान लेंगे।

देशबन्धु 2 Nov 2026 12:30 pm

सीनेट पर कब्जा बरकरार रखने के लिए ट्रंप ने झोंकी ताकत, बोले- 'हमें जीतना ही होगा'

सीनेट पर कब्जा बरकरार रखने के लिए ट्रंप ने झोंकी ताकत, बोले- 'हमें जीतना ही होगा'

समाचार नामा 2 Nov 2026 7:20 am

वोटर लिस्ट में गड़बड़ी पर चुनाव आयोग सख्त, अब निलंबन के साथ दर्ज होगा आपराधिक मामला

मतदाता सूची तैयार करने में लापरवाही या जानबूझकर गड़बड़ी करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ चुनाव आयोग ने कड़ा रुख अपनाया है

देशबन्धु 1 Nov 2026 11:48 pm

पाटन को मिला नया कैंसर अस्पताल, आयुष्मान लाभार्थियों के लिए मुफ्त पीईटी स्कैन

पाटन, 1 नवंबर (आईएएनएस)। रविवार को पाटन में नए कैंसर अस्पताल के उद्घाटन के साथ, उत्तर गुजरात के निवासियों को अब कई विशेष कैंसर निदान और उपचार सेवाओं के लिए अहमदाबाद जाने की आवश्यकता नहीं होगी।

समाचार नामा 1 Nov 2026 11:40 pm

मणिपुर के मुख्यमंत्री ने सभी समुदायों के बीच एकता, शांति और सद्भाव का आह्वान किया

मणिपुर के मुख्यमंत्री ने सभी समुदायों के बीच एकता, शांति और सद्भाव का आह्वान किया

समाचार नामा 1 Nov 2026 11:33 pm

बिहार और बंगाल में 2 नवंबर को भाजपा की 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ' पदयात्रा, नितिन नवीन करेंगे नेतृत्व

बिहार और बंगाल में 2 नवंबर को भाजपा की 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ' पदयात्रा, नितिन नवीन करेंगे नेतृत्व

समाचार नामा 1 Nov 2026 11:31 pm

माता भगवती देवी शर्मा और अखंड दीप के 100 वर्ष भारतीय संस्कृति का पूर्णांक वर्ष : अमित शाह

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राजधानी नई दिल्ली में अखिल विश्व गायत्री परिवार की ओर से आयोजित शताब्दी समारोह में भाग लिया। इस दौरान उन्होंने कहा कि आज यहां पर हम पूजनीय गुरुदेव और वंदनीय माता भगवती के जीवनकाल के स्वर्णिम अध्याय को नमन करने के लिए एकत्रित हुए हैं।

देशबन्धु 1 Nov 2026 11:09 pm

सपा विधायक रविदास मेहरोत्रा का भाजपा पर निशाना, 'देश में बदलाव की लहर, रामलीला रैली ऐतिहासिक रही'

सपा विधायक रविदास मेहरोत्रा का भाजपा पर निशाना, 'देश में बदलाव की लहर, रामलीला रैली ऐतिहासिक रही'

समाचार नामा 1 Nov 2026 10:39 pm

पीडीए और इंडी गठबंधन के बूते यूपी नहीं जीत पाएंगे अखिलेश यादव : ओपी राजभर

पीडीए और इंडी गठबंधन के बूते यूपी नहीं जीत पाएंगे अखिलेश यादव : ओपी राजभर

समाचार नामा 1 Nov 2026 10:35 pm

ओडिशा के जेल महानिदेशक के खिलाफ पूर्व महिला जेलर ने यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई

ओडिशा के जेल महानिदेशक के खिलाफ पूर्व महिला जेलर ने यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई

समाचार नामा 1 Nov 2026 9:38 pm

'वोट चोरी के खिलाफ जनता सड़कों पर है', रामलीला रैली को विपक्ष ने बताया ऐतिहासिक

'वोट चोरी के खिलाफ जनता सड़कों पर है', रामलीला रैली को विपक्ष ने बताया ऐतिहासिक

समाचार नामा 1 Nov 2026 9:35 pm

दुर्गा पूजा भगदड़ के सबक, काली और जगधात्री पूजा के लिए जारी हुए नए सुरक्षा निर्देश

दुर्गा पूजा भगदड़ के सबक, काली और जगधात्री पूजा के लिए जारी हुए नए सुरक्षा निर्देश

समाचार नामा 1 Nov 2026 9:26 pm

'व्यापारियों को रैली की भीड़ नहीं, ग्राहकों की जरूरत है', राहुल गांधी पर भाजपा सांसद का तंज

'व्यापारियों को रैली की भीड़ नहीं, ग्राहकों की जरूरत है', राहुल गांधी पर भाजपा सांसद का तंज

समाचार नामा 1 Nov 2026 7:31 pm

पंजाब को लूटा गया, 1984 के दंगों पर आज तक नहीं मांगी माफी : हरसिमरत कौर बादल

पंजाब को लूटा गया, 1984 के दंगों पर आज तक नहीं मांगी माफी : हरसिमरत कौर बादल

समाचार नामा 1 Nov 2026 7:21 pm

श्रीलंकाई नौसेना ने तमिलनाडु के सात मछुआरों को पकड़ा

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समाचार नामा 1 Nov 2026 3:39 pm

नकारात्मक सोच इंडी गठबंधन की राजनीति का हिस्सा बन चुकी है : आलोक सिंह

नकारात्मक सोच इंडी गठबंधन की राजनीति का हिस्सा बन चुकी है : आलोक सिंह

समाचार नामा 1 Nov 2026 3:31 pm

नितिन नवीन का राहुल गांधी पर निशाना, कहा-'जनता के मत से बनी सरकार का कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता'

नितिन नवीन का राहुल गांधी पर निशाना, कहा-'जनता के मत से बनी सरकार का कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता'

समाचार नामा 1 Nov 2026 1:38 pm

रामलीला मैदान में इंडी गठबंधन की शक्ति प्रदर्शन रैली, रामलीला मैदान से लोकतंत्र बचाने का संदेश

रामलीला मैदान में इंडी गठबंधन की शक्ति प्रदर्शन रैली, रामलीला मैदान से लोकतंत्र बचाने का संदेश

समाचार नामा 1 Nov 2026 1:31 pm

'चलो दिल्ली' मार्च कांग्रेस के राजनीतिक पतन के ताबूत में आखिरी कील साबित होगा: जेपी नड्डा

'चलो दिल्ली' मार्च कांग्रेस के राजनीतिक पतन के ताबूत में आखिरी कील साबित होगा: जेपी नड्डा

समाचार नामा 1 Nov 2026 1:20 pm

सोना हजार रुपए और चांदी 13 हजार रुपए से अधिक सस्ती हुई

नई दिल्ली, सोने और चांदी में इस हफ्ते बड़ी गिरावट देखने को मिली, जिससे दोनों कीमती धातुओं का दाम क्रमश: 1,500 रुपए और 13,000 रुपए से अधिक घट गया।

देशबन्धु 1 Nov 2026 11:17 am

'आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में भूमिका निभा रहा मध्य प्रदेश', राज्य स्थापना दिवस पर पीएम मोदी ने दी शुभकामनाएं

'आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में भूमिका निभा रहा मध्य प्रदेश', राज्य स्थापना दिवस पर पीएम मोदी ने दी शुभकामनाएं

समाचार नामा 1 Nov 2026 8:19 am

रामलीला मैदान रैली के लिए दिल्ली में हाई अलर्ट, 4 हजार पुलिसकर्मी और 200 से ज्यादा CCTV तैनात

राजधानी दिल्ली के रामलीला मैदान में रविवार को होने वाली INDIA गठबंधन की प्रस्तावित रैली को लेकर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है

देशबन्धु 1 Nov 2026 7:20 am

एआई डेटा सेंटर समेत चार परियोजनाओं पर विवाद, आश्वासन के बाद रोहित पवार ने वापस लिया आंदोलन

एआई डेटा सेंटर समेत चार परियोजनाओं पर विवाद, आश्वासन के बाद रोहित पवार ने वापस लिया आंदोलन

समाचार नामा 31 Oct 2026 10:38 pm

जेल से रिहाई के बाद आजम खान को ईडी ने हिरासत में लिया, वकीलों ने गिरफ्तारी पर उठाए सवाल

जेल से रिहाई के बाद आजम खान को ईडी ने हिरासत में लिया, वकीलों ने गिरफ्तारी पर उठाए सवाल

समाचार नामा 31 Oct 2026 10:35 pm

कर्नाटक: मांड्या में एआरएआई को भूमि आवंटन पर कुमारस्वामी-शिवकुमार में तीखी नोकझोंक

कर्नाटक: मांड्या में एआरएआई को भूमि आवंटन पर कुमारस्वामी-शिवकुमार में तीखी नोकझोंक

समाचार नामा 31 Oct 2026 10:32 pm

'वोट चोरी' विरोध मार्च को लेकर केटीआर का राहुल गांधी और रेवंत रेड्डी पर तंज

'वोट चोरी' विरोध मार्च को लेकर केटीआर का राहुल गांधी और रेवंत रेड्डी पर तंज

समाचार नामा 31 Oct 2026 10:06 pm

ऐतिहासिक होगी रामलीला मैदान की रैली, इन तीन मांगों को लेकर भरेंगे हुंकार: भूपेश बघेल

ऐतिहासिक होगी रामलीला मैदान की रैली, इन तीन मांगों को लेकर भरेंगे हुंकार: भूपेश बघेल

समाचार नामा 31 Oct 2026 8:31 pm

राष्ट्रीय एकता दिवस समारोह में शामिल हुए पीएम मोदी, सरदार पटेल की 151वीं जयंती पर आयोजित हुई भव्य परेड

राष्ट्रीय एकता दिवस समारोह में शामिल हुए पीएम मोदी, सरदार पटेल की 151वीं जयंती पर आयोजित हुई भव्य परेड

समाचार नामा 31 Oct 2026 6:37 pm

'रन फॉर यूनिटी': जोशी ने सरदार पटेल की विरासत को लेकर कांग्रेस पर निशाना साधा

'रन फॉर यूनिटी': जोशी ने सरदार पटेल की विरासत को लेकर कांग्रेस पर निशाना साधा

समाचार नामा 31 Oct 2026 6:27 pm

'मॉक पार्लियामेंट' को संजय निरुपम ने बताया नौटंकी, इंडिया ब्लॉक बोला-लोकतंत्र बचाने की लड़ाई

'मॉक पार्लियामेंट' को संजय निरुपम ने बताया नौटंकी, इंडिया ब्लॉक बोला-लोकतंत्र बचाने की लड़ाई

समाचार नामा 31 Oct 2026 6:23 pm

सरकार ने ईंधन करों में किया बड़ा संशोधन: पेट्रोल पर निर्यात शुल्क हटाया, डीजल और एटीएफ पर बढ़ाई ड्यूटी

केंद्र सरकार ने पेट्रोल के निर्यात पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क को घटाकर शून्य कर दिया है। साथ ही, डीजल और एविएशन टरबाइन फ्यूल (एटीएफ) पर विशेष निर्यात शुल्क में क्रमश: 3 रुपए प्रति लीटर और 0.50 रुपए प्रति लीटर की वृद्धि की है। यह जानकारी वित्त मंत्रालय द्वारा शनिवार को जारी अधिसूचना में दी गई।

देशबन्धु 31 Oct 2026 4:50 pm

भोपाल में सरदार पटेल की जयंती पर कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने किया रक्तदान

भोपाल में सरदार पटेल की जयंती पर कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने किया रक्तदान

समाचार नामा 31 Oct 2026 4:30 pm

नितिन नवीन जाएंगे हरियाणा, रोहतक में 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ' पदयात्रा में होंगे शामिल

नितिन नवीन जाएंगे हरियाणा, रोहतक में 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ' पदयात्रा में होंगे शामिल

समाचार नामा 31 Oct 2026 2:26 pm

अरुणाचल प्रदेश: भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेष तवांग पहुंचे, केंद्रीय मंत्री शेखावत बोले-पवित्र अवशेष के दर्शन का मिला सौभाग्य

अरुणाचल प्रदेश: भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेष तवांग पहुंचे, केंद्रीय मंत्री शेखावत बोले-पवित्र अवशेष के दर्शन का मिला सौभाग्य

समाचार नामा 31 Oct 2026 2:15 pm

अमेरिका व उसके मित्र देशों की आंतरिक तैयारियां देख किसी बाहरी खतरे का हो रहा स्पष्ट आभास?

अमेरिका अपनी वैश्विक बादशाहत बनाए रखने के लिए पूरी दुनिया को तृतीय विश्व युद्ध की आग में झोंकने वाला है! चाहे तेल का खेल हो या फिर मज़बूत सरकारों को अस्थिर करने का षड्यंत्र- अमेरिकी रणनीति हर मोर्चे पर पिटती हुई प्रतीत हुई। इसी की खीझ में अब वह खाड़ी और मध्य-पूर्व देशों, यूरोप और भारतीय उपमहाद्वीप में कुछ नया गुल खिलाने वाला है क्योंकि उसके 'पालतू कुत्तों' के पांव भी अब जमीन पर नहीं पड़ रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिज्ञों का कहना है कि रूस, चीन, भारत, ईरान, ब्राजील, अफगानिस्तान के खिलाफ वह ऐसा युद्ध छेड़ना चाहता है, ताकि इनकी आर्थिक कमर टूट जाए और जी-7 देशों की बादशाहत पूरी दुनिया पर बनी रहे। शायद इसलिए वह कुछ बड़ा करने वाला है और 90 दिन के लक्ष्य निर्धारित करते हुए अपनी तैयारियां पुख्ता कर रहा है। इसे भी पढ़ें: China को लगे 40 साल, Modi ने 12 साल में कर दिखाया! बचपन में गरीबी को झेलने वाले PM ने 49.6 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर उठाया इस बात की चुगली पूरी दुनिया की वह गिनी चुनी सरकारें कर रही हैं, जो ऐसी चेतावनियाँ दे रही हैं, जैसी शायद आखिरी बार दूसरे विश्व युद्ध से पहले देखने को मिली थीं। जहां एक तरफ अमेरिका का पेंटागन अपने सभी मिलिट्री बेस को 'ऑपरेशन फोर्ट्रेस' के तहत तैयार कर रहा है, जिसके तहत अमेरिकी सैन्य ठिकानों को इस तरह तैयार किया जाएगा कि वे बाहर से खाना, पानी या किसी भी तरह की सप्लाई मिले बिना पूरे 90 दिनों तक अपना काम चला सकें। वहीं दूसरी तरफ, यूरोपीय देशों ब्रिटेन, नीदरलैंड और फ्रांस एवं एशियाई देश जापान ने अपने नागरिकों से कह दिया है कि वे कम से कम 72 घंटे तक काम आने वाला इमरजेंसी सामान अपने घर में जमा करके रखें। इसमें खाने-पीने की चीजें, पानी, दवाइयाँ और यहाँ तक कि नकद पैसे भी शामिल हैं, ताकि अगर बिजली, पानी और दूसरी जरूरी सुविधाएँ बंद हो जाएँ, तो लोग बिना किसी बाहरी मदद के कम से कम 72 घंटे तक अपना काम चला सकें। भले ही सरकारें इसकी आधिकारिक वजह खराब मौसम, एल नीनो, बिजली गुल होने और साइबर अटैक जैसी स्थितियों को बता रही हैं, लेकिन सर्वाधिक ध्यान देने वाली बात ये है कि कोई भी खुलकर 'युद्ध' शब्द का इस्तेमाल नहीं कर रहा है। अब सवाल ये है कि आखिर अचानक दुनिया भर में ऐसी तैयारियाँ क्यों हो रही हैं? और अमेरिकी-यूरोपीय टारगेट पर आने वाले देश क्या तैयारियां कर रहे हैं? इसके पीछे सिर्फ दो संभावनाएँ हैं। पहली, ये सारी तैयारियाँ सिर्फ सुरक्षा के लिए की जा रही हैं और इनका किसी असली खतरे से कोई लेना-देना नहीं है। दूसरी, दुनिया की ये सारी सरकारें कुछ ऐसा जानती हैं, जिसके बारे में वे अभी हमें बता नहीं सकतीं या जानबूझकर बता नहीं रही हैं। और अगर दूसरी बात सही है, तो आखिर वो क्या है? सबसे बड़ी आशंका ये है कि अमेरिका में मिडटर्म चुनावों के बाद अमेरिका और ईरान के बीच फिर से युद्ध शुरू हो सकता है। साथ ही, यूरोप में रूस और यूक्रेन के बीच चल रहा युद्ध भी और ज्यादा भड़क सकता है। इधर, भारत के खिलाफ पाकिस्तान, चीन, बांग्लादेश आग उगल सकते हैं। इसलिए पहले मैं ईरान की बात करता हूँ। अगर इस बार दोबारा युद्ध शुरू होता है, तो इसकी शुरुआत सबसे ज्यादा संभावना के साथ बाब अल-मंदेब के पास हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच टकराव से हो सकती है। इसका मतलब ये है कि तेल की सप्लाई पर खतरा सिर्फ स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बाब अल-मंदेब के रास्ते पर भी बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। और धीरे-धीरे ये संकट स्वेज नहर तक फैल सकता है। आपको बता दूँ कि स्वेज नहर दुनिया के व्यापार का एक बेहद अहम रास्ता है। दावा है कि दुनिया का लगभग 25% व्यापार इसी रास्ते से गुजरता है। अगर ये रास्ता बंद हो गया, तो यूरोप, उत्तरी अमेरिका और एशिया के बीच व्यापार के रास्ते लगभग कटकर रह जाएँगे। दुनिया भर में सामान पहुँचाने में भारी रुकावट आएगी और तेल की सप्लाई पर भी बहुत बड़ा असर पड़ सकता है। और ये सब उस समय हो रहा है, जब अमेरिका का तीसरा एयरक्राफ्ट कैरियर 'थियोडोर रूजवेल्ट' मिडिल ईस्ट पहुँचने वाला है। इतना ही नहीं, अमेरिका ने अपने दूतावासों और सैन्य ठिकानों से गैर-जरूरी कर्मचारियों को भी मिडिल ईस्ट से निकलने के लिए कहा है। यानी अमेरिका वही तैयारियाँ दोबारा करता हुआ दिखाई दे रहा है, जैसी उसने इस साल 28 फरवरी को हुए हमले से पहले की थीं। और अब यूरोप की तरफ आइए। ऐसी रिपोर्टें आ रही हैं कि अमेरिका यूरोप में तैनात अपने नाटो सैनिकों में से लगभग एक-तिहाई सैनिकों को वापस बुला सकता है। इससे पहले अमेरिका दक्षिण कोरिया से अपना थाड (THAAD) एयर डिफेंस सिस्टम भी हटा चुका है। अब इस बात को समझिए कि दक्षिण कोरिया से थाड हटने के बाद उत्तर कोरिया से आने वाले संभावित मिसाइल हमलों से बचाव की उसकी क्षमता प्रभावित हो सकती है। ठीक उसी तरह, अगर अमेरिका यूरोप से अपने सैनिकों को वापस बुला लेता है, तो रूस के सामने यूरोप की सुरक्षा कमजोर पड़ सकती है। और रूस के राष्ट्रपति पुतिन इसी स्थिति का फायदा उठाना चाहते हैं। यही वजह है कि यूरोप के देश अपनी सेना और रक्षा पर खर्च लगातार बढ़ा रहे हैं। दूसरी तरफ, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और आम लोगों के लिए जरूरी सार्वजनिक सुविधाओं पर खर्च कम किया जा रहा है। यानी आम जनता की सुविधाओं पर दबाव बढ़ रहा है, लेकिन सेना और हथियारों पर खर्च बढ़ाने का सिलसिला रुक नहीं रहा है। यूरोप के देशों में इसी बात को लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं कि सरकारें आम लोगों की जरूरतों पर खर्च कम कर रही हैं, जबकि सेना और रक्षा पर लगातार ज्यादा पैसा लगा रही हैं। इसके बावजूद कोई भी देश अपनी रक्षा तैयारियों को धीमा करने के लिए तैयार नहीं दिख रहा है। यूरोपीय देश सेना और रक्षा पर अब उतना पैसा खर्च कर रहे हैं, जितना दूसरे विश्व युद्ध के बाद से किसी भी समय नहीं किया गया था। खासकर जर्मनी ने तो यहाँ तक कह दिया है कि उसके अस्पतालों को तैयार रहना चाहिए, ताकि जरूरत पड़ने पर वे एक ही रात में कम से कम 1,000 मरीजों का इलाज कर सकें। अब इन सारी बातों को एक साथ जोड़कर देखिए तो आभास होता है कि दुनिया की सरकारें अपने नागरिकों से इमरजेंसी सामान जमा करने को कह रही हैं। अमेरिका अपने सैन्य ठिकानों को 90 दिनों तक बिना बाहरी सप्लाई के चलने के लिए तैयार कर रहा है। मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सैन्य गतिविधियाँ बढ़ रही हैं, दूतावासों और सैन्य ठिकानों से गैर-जरूरी कर्मचारियों को हटाया जा रहा है और दुनिया के सबसे अहम तेल और व्यापारिक रास्तों पर खतरा मंडरा रहा है। दूसरी तरफ, अमेरिका के यूरोप से सैनिक वापस बुलाने की खबरों के बीच यूरोपीय देश अपनी सेना और हथियारों पर रिकॉर्ड स्तर पर पैसा खर्च कर रहे हैं। जर्मनी के अस्पतालों को एक ही रात में 1,000 मरीजों को संभालने के लिए तैयार रहने को कहा जा रहा है। यानी दुनिया की तमाम बड़ी ताकतें एक ही समय पर ऐसी तैयारियाँ कर रही हैं, जो युद्ध जैसी किसी बड़ी स्थिति में काम आ सकती हैं, लेकिन कोई भी खुलकर 'युद्ध' शब्द का इस्तेमाल नहीं कर रहा है! अब आप खुद सोचिए कि जब अलग-अलग देशों की सरकारें एक साथ इस तरह की तैयारियाँ कर रही हैं, तो आखिर उन्हें किस चीज का डर है? क्या ये सब सिर्फ सामान्य सुरक्षा तैयारियाँ हैं, या फिर सरकारें किसी ऐसी स्थिति के लिए तैयारी कर रही हैं, जिसके बारे में आम लोगों को अभी बताया नहीं जा रहा है? ब्रिक्स देशों को भी अब सावधान हो जाना चाहिए क्योंकि देर सबेर ये गाज उन्हीं पर गिरने वाली है। शुरुआत भले ही ईरान व रूस से हो, लेकिन देर सबेर भारत और चीन दोनों को लपेटा जाना तय है। पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने जी-2 और जी-3 की आड़ में खुद के वर्चस्व को कायम रखना चाहा, लेकिन जब बात नहीं बन पाई तो दुष्परिणाम कभी भी दिखाई पड़ सकता है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 31 Oct 2026 12:50 pm

भाजपा के रणनीतिकारों के सामने कई सवाल छोड़ गया एमएलसी चुनाव!

देश के चार राज्यों (उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक) की 28 विधान परिषद (एमएलसी) सीटों पर चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं, सभी राजनीतिक दल व विश्लेषक परिणामों का अध्ययन करके उसके अपने-अपने लाभ-हानि के हिसाब से मायने निकाल रहे हैं। लेकिन इस बार का यह चुनाव कई ऐसे सवाल छोड़ गया है जिनका जवाब राजनीतिक दलों के रणनीतिकारों के साथ विशेषकर उत्तर प्रदेश के संदर्भ में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को जल्द से जल्द तलाश ना होगा। क्योंकि भाजपा को अन्य दलों से अलग मानते हुए किसी व्यक्ति या परिवार की जागीर की जगह संगठन को सर्वोपरि मानने वाला राजनीतिक दल माना जाता है और वैसे भी अंदरूनी गुटबाजी से दूर अनुशासन वाली पार्टी मानने का दावा भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के द्वारा हमेशा सार्वजनिक रूप भी किया जाता है। लेकिन एमएलसी के चुनावों के परिणामों पर गौर करें तो उत्तर प्रदेश की हॉट सीट वाराणसी, लखनऊ व महाराष्ट्र में नागपुर जैसी हाईप्रोफाइल सीट पर हारने के पीछे भाजपा के कुछ राजनेताओं की अति महत्वाकांक्षा व अनुशासन का तार-तार होना बहुत बड़ी वज़ह माना जा रहा है। पहले पार्टी के अधिकांश राजनेता व कार्यकर्ता निस्वार्थ भाव से कार्य करते हुए धरातल पर नज़र आते थे, लेकिन लंबे समय से सत्ता का सुख लगातार भोगने के कारण अब पार्टी के कुछ राजनेताओं का अहंकार अपने चरम पर है और वह सत्ता के मद में चूर होकर के जनता को ठेंगा दिखाकर चिढ़ाते हुए पार्टी के केंद्रीय व प्रदेश नेतृत्व तक के भी दिशा-निर्देशों की आये दिन अनदेखी करने का कार्य कर रहे हैं। जबकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व गृहमंत्री अमित शाह के दौर की भारतीय जनता पार्टी की पहचान एक ऐसे राजनीतिक दल के रूप में होती है, जिसके कार्यकर्ता व नेता किसी भी स्तर के चुनाव को हल्के में नहीं लेते हैं। लेकिन जिस तरह से उत्तर प्रदेश के एमएलसी चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन रहा है, उसने तो पार्टी के रणनीतिकारों को जीती हुई व हारी हुई सभी ही सीटों के परिणाम पर विस्तार से विश्लेषण करने के लिए सोचने पर मजबूर कर ही दिया है। क्योंकि उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 में विधानसभा चुनाव हैं, पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को योगी सरकार के कार्यों के दम पर चुनावों में जीत की हैट्रिक लगाने की पूरी उम्मीद है। जिस वक्त में यूपी के विधानसभा चुनाव सर पर हैं उस वक्त में पार्टी के शीर्ष रणनीतिकार एमएलसी चुनावों में हर सीट पर भाजपा प्रत्याशी की जीत का अंतर बढ़ाकर के विपक्षी दलों के जनता की अदालत से पैर उखाड़कर के भाजपा के पक्ष में माहौल बनाना चाहते थे। लेकिन सूत्रों के अनुसार लगातार मीटिंग व ईटिंग के बाद भी कुछ भाजपा नेताओं की ही चीटिंग के चलते भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का यह दांव जन अदालत में उल्टा हो गया है, जिसका खामियाजा भारतीय जनता पार्टी को एमएलसी चुनावों की रणभूमि में कुछ सीटों पर हार के रूप में उठाना पड़ा है। इसे भी पढ़ें: विधान परिषद- छोटा चुनाव बड़े सबक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सीट वाराणसी, रक्षामंत्री राजनाथ सिंह की सीट लखनऊ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गढ़ नागपुर के एमएलसी सीटों के इन चुनाव परिणामों के बाद अब पार्टी में ही संगठन की रणनीति और प्रत्याशी चयन पर सवाल उठाने की गुपचुप सुगबुगाहट शुरू हो गई है। वहीं कुछ राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो हाईप्रोफाइल सीटों के साथ-साथ बाकी सीटों पर भी जीत का अंतर भाजपा के कुछ अपने ही लोगों का भीतरघात, दावेदारों व अन्य जिम्मेदार लोगों के द्वारा सही ढंग से वोट नहीं बनवाने, प्रत्याशी चयन पर सवाल, संगठन के द्वारा बनाई गई जीत की रणनीति और कुछ अपनों के ही द्वारा चुनाव में की गयी चीटिंग की चीख-चीखकर के स्वयं ही पोल खोलने का कार्य रही है। ऐसी स्थिति में विचारणीय तथ्य यह है कि उत्तर प्रदेश में आगामी वर्ष 2027 में विधानसभा के चुनाव हैं, भाजपा के केंद्रीय व प्रदेश नेतृत्व आये दिन चुनावी रणभूमि के लिए सटीक कारगर रणनीति बनाने के लिए छोटी व बड़ी मीटिंग करते रहते हैं और इन मीटिंग में केंद्रीय व प्रदेश स्तर के नेताओं से लेकर के भाजपा के मंडल स्तर के नेताओं व कार्यकर्ताओं तक की भी मौजूदगी समय-समय पर रहती है, मीटिंग में पार्टी के नेताओं के द्वारा चुनावी रणभूमि के लिए एक चाक-चौबंद रणनीति बनायी जाती है। लेकिन सूत्रों के अनुसार पार्टी में अब एक ऐसा लंबा-चौड़ा धड़ा तैयार हो गया है जो मीटिंग के बाद में ईटिंग कर निकलने के बाद से ही गुटबाजी व अपनी महत्वाकांक्षाओं के चलते संगठन सर्वोपरि के भाव का त्याग करके चीटिंग करने में लग जाता है। इसका ताजा उदाहरण हाल ही में सम्पन्न हुए उत्तर प्रदेश के 11 एमएलसी सीटों के चुनाव भी हैं, इन 11 सीटों में भाजपा 6 सीटें और समाजवादी पार्टी 5 सीटें जीती है। लेकिन सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि हार के साथ-साथ कुछ सीटों पर तो जैसे-तैसे ही भारतीय जनता पार्टी को जीत मिली है। हालांकि चुनाव परिणामों में दस सीटों पर सिटिंग एमएलसी ही दोबारा चुन लिए गए हैं। केवल लखनऊ स्नातक सीट पर ही बड़ा उलटफेर हुआ है, यहां भाजपा के मौजूदा एमएलसी अवनीश कुमार सिंह को सपा की कांति सिंह ने हरा दिया है। वैसे देखें तो वर्ष 2020 में इन सभी 11 सीटों के चुनाव में भाजपा ने छह, समाजवादी पार्टी ने तीन और निर्दलीय उम्मीदवारों ने दो सीटों पर जीत हासिल की थी, वहीं इस बार भाजपा की सीटें तो छह ही रह गई, लेकिन सपा की सीट तीन से बढ़कर के पांच सीट हो गई हैं। चुनावों के यह परिणाम उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा में अंदरुनी गुटबाजी और भविष्य में चुनावी रणभूमि में कांटे की टक्कर होने का संकेत दे रहे हैं। जो स्थिति उत्तर प्रदेश में हैट्रिक लगाने का सपना देख रही भाजपा हाईकमान के लिए एक गहन आत्ममंथन का विषय है। हालांकि उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के चुनावी तरकश में हैट्रिक लगाने के लिए जन अदालत में बताने के लिए कानून व्यवस्था में लेकर के बहुत सारे सरकार के शानदार कार्य हैं, लेकिन इन कार्यों पर पार्टी के कुछ शीर्ष राजनेताओं की अंदरूनी खींचतान, जबरदस्त आपसी गुटबाजी व महत्वकांक्षाएं भारी ना पड़े, इसके लिए समय रहते ही भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को ठोस व प्रभावी उपाय धरातल पर करने होंगे। - दीपक कुमार त्यागी अधिवक्ता, स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 31 Oct 2026 12:30 pm

इंदिरा गांधी की 42वीं पुण्यतिथि पर कांग्रेस नेताओं ने दी श्रद्धांजलि, देश की 'आयरन लेडी' बताया

इंदिरा गांधी की 42वीं पुण्यतिथि पर कांग्रेस नेताओं ने दी श्रद्धांजलि, देश की 'आयरन लेडी' बताया

समाचार नामा 31 Oct 2026 12:26 pm

China को लगे 40 साल, Modi ने 12 साल में कर दिखाया! बचपन में गरीबी को झेलने वाले PM ने 49.6 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर उठाया

बचपन में घोर गरीबी को बेहद करीब से देखने वाले और जीवनयापन के लिए रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने वाले नरेंद्र मोदी ने जब देश के प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी संभाली, तो उनके सामने भारत की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक थी गरीबी। करोड़ों लोगों के पास न पक्का मकान था, न बैंक खाता, न शौचालय, न रसोई गैस और न ही बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी ने गरीबों को सरकारी योजनाओं के केंद्र में रखते हुए गरीबी के अभिशाप से देश को बाहर निकालने का अभियान शुरू किया। अब इस अभियान के सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं जिसे अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी मान रही हैं। उल्लेखनीय है कि विश्व बैंक की अक्टूबर 2026 की ताजा रिपोर्ट भारत की इसी परिवर्तनकारी यात्रा पर वैश्विक मुहर लगा रही है। विश्व बैंक की रिपोर्ट: 49.6 करोड़ लोगों की जिंदगी में बदलाव विश्व बैंक की Poverty and Equity Brief, October 2026 के मुताबिक, भारत ने 2011 से 2023 के बीच अनुमानित 49.6 करोड़ लोगों को 4.20 डॉलर प्रतिदिन वाली निम्न-मध्यम आय वर्ग की गरीबी रेखा से ऊपर उठाया। इस अवधि में इस श्रेणी में आने वाली आबादी का अनुपात 57.7 प्रतिशत से घटकर 16.1 प्रतिशत रह गया। इससे भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अत्यंत गरीबी में रहने वाली आबादी का अनुपात 2011 के 27.1 प्रतिशत से घटकर 2023 में महज 2.6 प्रतिशत रह गया। विश्व बैंक ने भारत की इस प्रगति को दुनिया में गरीबी घटने की सबसे तेज प्रक्रियाओं में से एक बताया है। रिपोर्ट के अनुसार, मजबूत घरेलू उपभोग, रोजगार में वृद्धि, विशेषकर महिलाओं की बढ़ती रोजगार भागीदारी और खाद्य सब्सिडी सहित सामाजिक सुरक्षा योजनाओं ने इस बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसे भी पढ़ें: World Bank Report 2026 | भारत में अत्यधिक गरीबी घटकर 2.6% पर आई! विश्व बैंक की रिपोर्ट में ऐतिहासिक गिरावट और आय असमानता की चुनौती गरीबी के खिलाफ मोदी सरकार की रणनीति देखा जाये तो प्रधानमंत्री मोदी की आर्थिक नीतियों का एक महत्वपूर्ण आधार रहा है कि गरीबों को केवल आर्थिक सहायता देने के बजाय उन्हें बुनियादी सुविधाओं और वित्तीय व्यवस्था से जोड़ा जाए। जनधन योजना के जरिए करोड़ों बैंक खाते खुले। आधार और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर ने सरकारी सहायता सीधे लाभार्थियों तक पहुंचाने का रास्ता मजबूत किया। उज्ज्वला योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, आयुष्मान भारत, स्वच्छ भारत मिशन और जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं ने गरीब परिवारों के जीवन स्तर को प्रभावित किया। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के माध्यम से करोड़ों परिवारों को खाद्य सुरक्षा मिली। इसके साथ ही मुद्रा योजना, स्टार्टअप इंडिया, मेक इन इंडिया और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाओं के जरिए रोजगार, उद्यमिता और विनिर्माण क्षेत्र को प्रोत्साहित करने का प्रयास हुआ। वैश्विक संकट में भी भारत की आर्थिक मजबूती साथ ही कोरोना महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध, ऊर्जा संकट, महंगाई और वैश्विक व्यापारिक तनाव के बीच भारत ने अपनी आर्थिक विकास गति बनाए रखने की कोशिश की है। बुनियादी ढांचे पर सरकारी निवेश, डिजिटल अर्थव्यवस्था, घरेलू उपभोग और मजबूत बैंकिंग व्यवस्था ने अर्थव्यवस्था को सहारा दिया। भारत की डिजिटल भुगतान व्यवस्था और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण की क्षमता ने सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के क्रियान्वयन को भी अधिक प्रभावी बनाया है। क्या दुनिया में किसी नेता ने इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल की है? यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या दुनिया के किसी दूसरे नेता ने नरेंद्र मोदी जैसी आर्थिक उपलब्धि इतने कम समय में हासिल की है? तुलनात्मक रूप से देखें तो चीन ने 1978 के बाद लगभग चार दशकों में करीब 77 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकालने का ऐतिहासिक दावा किया था। वहीं भारत ने विश्व बैंक के अक्टूबर 2026 के आंकड़ों के अनुसार, 2011 से 2023 के बीच महज 12 वर्षों में 49.6 करोड़ लोगों को 4.20 डॉलर प्रतिदिन वाली निम्न-मध्यम आय वर्ग की गरीबी रेखा से ऊपर पहुंचाया। अत्यंत गरीबी का अनुपात भी इसी अवधि में 27.1 प्रतिशत से घटकर 2.6 प्रतिशत रह गया। चीन की चार दशक लंबी यात्रा के मुकाबले भारत की 12 वर्षों की यह उपलब्धि अपने आप में असाधारण है। इस उपलब्धि का राजनीतिक और नीतिगत महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि इस अवधि के अधिकांश वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीते हैं। 2014 में सत्ता संभालने के बाद मोदी सरकार ने गरीबों के बैंक खाते खोलने, सीधे आर्थिक सहायता पहुंचाने, मुफ्त राशन, आवास, रसोई गैस, स्वास्थ्य बीमा, स्वच्छता और ग्रामीण बुनियादी सुविधाओं के विस्तार को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया। जनधन-आधार-डीबीटी की व्यवस्था से लेकर गरीब कल्याण योजनाओं तक, इन नीतिगत पहलों ने गरीबी के खिलाफ अभियान को व्यापक आधार दिया। इसलिए 2014 के बाद लागू और विस्तारित इन नीतियों को इस ऐतिहासिक बदलाव का एक महत्वपूर्ण नीतिगत श्रेय निश्चित रूप से दिया जाना चाहिए। अभी बाकी है आर्थिक लड़ाई साथ ही विश्व बैंक ने रोजगार की गुणवत्ता, युवाओं की बेरोजगारी और क्षेत्रीय असमानता को लेकर भी चिंता जताई है। देश की लगभग 57 प्रतिशत गरीब आबादी उत्तर प्रदेश से पश्चिम बंगाल तक फैले राज्यों के एक क्षेत्र में केंद्रित है। 2017 से 2023 के बीच रोजगार में लगभग 13.4 करोड़ की वृद्धि हुई, जिसमें ग्रामीण महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का महत्वपूर्ण योगदान रहा। लेकिन युवाओं के लिए बेहतर और उत्पादक रोजगार उपलब्ध कराना अभी बड़ी चुनौती है। विश्व बैंक के अनुमान के मुताबिक, 4.20 डॉलर वाली गरीबी रेखा पर गरीबी की दर 2026 के 14.2 प्रतिशत से घटकर 2028 तक 12.1 प्रतिशत हो सकती है। बहरहाल, भारत की यह यात्रा केवल आंकड़ों की कहानी नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों के जीवन में आए बदलाव की कहानी है। रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने से लेकर देश के प्रधानमंत्री बनने तक का सफर तय करने वाले नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में गरीबी के खिलाफ चलाए गए अभियान ने महत्वपूर्ण परिणाम दिए हैं। अब चुनौती इस उपलब्धि को स्थायी आर्थिक समृद्धि में बदलने की है, ताकि गरीबी से बाहर आए परिवार दोबारा अभाव के अंधेरे में न लौटें और भारत विकसित राष्ट्र बनने के अपने लक्ष्य की ओर मजबूती से बढ़ सके। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 31 Oct 2026 12:22 pm

BREAKING: सरकारी नौकरियों में भर्ती की उम्र सीमा 5 साल बढ़ी, 30 अक्टूबर से लागू होगा नया नियम

BREAKING: सरकारी नौकरियों में भर्ती की उम्र सीमा 5 साल बढ़ी, 30 अक्टूबर से लागू होगा नया नियम

समाचार नामा 31 Oct 2026 8:29 am

प्रधानमंत्री मोदी ने नए नेविगेशन उपग्रह एनवीएस-03 की सफल लॉन्चिंग पर इसरो के वैज्ञानिकों को दी बधाई

नई दिल्ली, 31 अक्टूबर (आईएएनएस)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नए नेविगेशन उपग्रह एनवीएस-03 की सफल लॉन्चिंग पर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को बधाई दी है। उन्होंने कहा कि यह मिशन भारत की स्वदेशी सैटेलाइट नेविगेशन प्रणाली 'नाविक' को और मजबूत बनाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम है।

समाचार नामा 31 Oct 2026 7:43 am

1 नवंबर की कांग्रेस रैली पर विवाद, भाजपा बोली- सिख समुदाय की भावनाओं को पहुंची ठेस

1 नवंबर की कांग्रेस रैली पर विवाद, भाजपा बोली- सिख समुदाय की भावनाओं को पहुंची ठेस

समाचार नामा 30 Oct 2026 10:29 pm

विधान परिषद- छोटा चुनाव बड़े सबक

उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक की 28 विधान परिषद सीटों के चुनाव संपन्न हो चुके हैं। सर्वाधिक 11 सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश का चुनाव परिणाम आ चुका है जो भाजपा तथा सपा के बीच 6-5 के परिणाम से समाप्त हुआ। यह था तो छोटा चुनाव किंतु इस पर सभी राजनैतिक विश्लेषकों की दृष्टि थी कि 2027 विधानसभा चुनाव के पहले कौन क्लीन स्वीप करता है किंतु शिक्षकों व स्नातकों ने स्पष्ट संदेश दे दिया है कि आगामी चुनाव किसी भी दल या गठबंधन के लिए बहुत आसान नहीं होंगे। मुकाबला कांटे का होगा। जिस दल के प्रत्याशी व कार्यकर्ता धरातल पर उतर कर अपने मतदाताओं के साथ गहन संपर्क व संवाद में रहेंगे उन्हीं को लाभ होगा। विधान परिषद चुनावों में भाजपा मात्र छह सीटों पर पर अपनी साख बचाने में सफल रही जबकि समाजवादी पार्टी अपने पीडीए के बल पर पांच सीटें जीतने में सफल रही और यही नहीं उसने वाराणसी, आगरा व लखनऊ में बीजेपी के गढ़ों में परचम फहराकर भाजपा के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दीं। अब सपा में उत्साह का वातावरण है। उसके नेता व प्रवक्ता कह रहे हैं कि वर्ष 2024 में अयोध्या में भगवान राम का आशीर्वाद उन्हें प्राप्त हुआ और अब 2026 में काशी की नगरी में महादेव और लखनऊ में प्रभु श्रीराम के अनुज लक्ष्मणजी का भी आशीर्वाद मिल चुका है। सफलता से उत्साहित समाजवादी पार्टी अब इसी नैरेटिव को आगे बढ़ाएगी। इसे भी पढ़ें: चार राज्यों के विधान परिषद चुनावों के मिले-जुले परिणामों के महत्वपूर्ण सियासी संदेश भारतीय जनता पार्टी के लिए अत्यंत सतर्क हो जाने का समय आ गया है। यदि वर्ष 2024 में लोकसभा चुनाव के दौरान प्रदेश के मतदाताओं ने जो रवैया दिखाया था और सपा -कांग्रेस गठबंधन ने प्रदेश में लोकसभा की सर्वाधिक सीटें जीत ली थीं अगर वही रुख अभी भी बरकार है तब यह परिस्थितियों को और भी कठिन बना सकता है। भारतीय जनता पार्टी को सबसे बड़ा झटका रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के संसदीय क्षेत्र लखनऊ की स्नातक सीट पर लगा है। यहाँ पार्टी के प्रत्याशी इंजीनियर अवनीश सिंह को सपा प्रत्याशी कांति सिंह ने बहुत आसानी से पराजित कर दिया। यह स्पष्ट संकेत है कि अगर भाजपा ने अपना चुनावी प्रबंधन और कार्यकर्ताओं व मतदाताओं के मध्य अपना संवाद, संपर्क, व्यवहार नहीं सुधारा तो फिरऔर भी नुकसान उठाना पड़ सकता है। वाराणसी का परिणम भी स्थिति को गंभीर बना रहा है। प्रदेश के संगठन पर सवालिया निशान भी उठ रहे हैं। वाराणसी का जनमानस प्रश्न कर रहा है कि जो उम्मीदवार पिछले चुनावों में पराजित हो चुका था, जनता के मध्य कभी नहीं रहता, केवल चुनावो के छह महीने पूर्व गणेश परिक्रमा करके पार्टी का टिकट कैसे लेकर आ जाता है? ऐसी परिस्थितियों में उन कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरता है जो धरातल पर उतरकर पार्टी के लिए कड़ी मेहनत कर रहे होते हैं। वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में जितना विकास हुआ है उतनी किसी ने कल्पना भी नहीं करी थी फिर भी वहां भाजपा के वोट प्रतिशत में लगातार गिरावट और विधान परिषद की दोनों सीटों पर हार भाजपा के लिए चिंता का विषय है। काशी विश्वनाथ मंदिर का भव्य कारिडोर बना, जिससे पर्यटकों की संख्या में भारी वृद्धि हुई, रोप-वे बन रहा है, वाराणसी को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम मिलने जा रहा है, रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर क्रियाशील है, काशी को सांस्कृतिक-आध्यात्मिक गतिविधियों पूरे भारत से से जोड़ा जा रहा है, निवेशक आ रहे हैं, काशी -तमिल संगमम का आयोजन किया जा रहा है। इस सबके बाद भी वाराणसी में एमएलसी चुनावों में दोनों सीटों पर पराजय स्थानीय नेतृत्व पर सवाल खड़े कर रही है। वाराणसी की पराजय से यह बात भी उठ रही है कि वाराणसी नगर भाजपा में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। भाजपा के लिए अच्छी बात ये है कि विधानसभा चुनावों के पूर्व एक लिटमस टेस्ट हो गया। अभी भी भाजपा के पास कार्यकर्ताओं में उत्साह जागरण तथा अपनी रणनीति नए सिरे से गढ़ने के लिए पर्याप्त समय है। प्रदेश भाजपा की नवगठित कर्यकारिणी की बैठक होने जा रही है जिसमें हर बिंदु पर चर्चा होगी। यहाँ अमित शाह जी की अध्यक्षता में कडे़ कदम भी उठाए जा सकते हैं। दीपावली के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियां तथा भाजपा का चुनाव अभियान प्रारंभ होगा। भाजपा के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि जनमानस तो योगी-योगी कर रहा है किंतु कार्यकर्ताओं में उत्साह नहीं है। भाजपा के लिए अपने कार्यकर्ताओं में उत्साह जगाने का समय है क्योंकि विभिन्न कारणों से उणमें धरातल पर उत्साह नहीं दिखाई दे रहा है। अगर बीजेपी का कार्यकर्ता उत्साहित हो गया और घरों से निकल पड़ा तो फिर भाजपा आसानी से तीन सौ पार जा सकती है। भाजपा अपने कार्यकर्ताओं की नाराजगी जितनी जल्दी जितना कम कर लेगी, टिकट वितरण सही होगा, योगी आदित्यनाथ सरकार चुनावों से पूर्व एक लाख नौकरी देने का वादा सफलतापूर्वक पूरा कर लेगी और साथ ही अगर 69,000 शिक्षकों की भर्ती का मामला सुप्रीम कोर्ट से सुलझ जाएगा तो विधानसभा चुनाव भाजपा के नियंत्रण में आ जाएगा। - मृत्युंजय दीक्षित

प्रभासाक्षी 30 Oct 2026 6:51 pm

भारतीय शेयर बाजार गिरावट के साथ हुआ बंद

मुंबई, भारतीय शेयर बाजार शुक्रवार के कारोबारी सत्र में बड़ी गिरावट के साथ बंद हुआ।

देशबन्धु 30 Oct 2026 5:49 pm

भारत में तेजी से घट रही गरीबी: वर्ल्ड बैंक

नई दिल्ली, भारत ने गरीबी में बीते एक दशक में दुनिया की सबसे तेज गिरावट में से एक दर्ज की है और देश में 2011 से 2023 के बीच करीब 49.6 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकले हैं।

देशबन्धु 30 Oct 2026 5:31 pm

भारत को 1.5 अरब स्क्वायर फीट प्राइवेट एजुकेशन इन्फ्रा की होगी आवश्यकता

नई दिल्ली, भारत को वित्त वर्ष 35 तक करीब 1.5 अरब स्क्वायर फीट अतिरिक्त प्राइवेट एजुकेशन इन्फ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता होगी।

देशबन्धु 30 Oct 2026 4:23 pm

भाजपा की 'लोकतंत्र बचाओ' रैली पर उदित राज का हमला, बोले- दबाव में है सरकार

भाजपा की 'लोकतंत्र बचाओ' रैली पर उदित राज का हमला, बोले- दबाव में है सरकार

समाचार नामा 30 Oct 2026 4:21 pm

Mock Parliament या Public Impeachment को लेकर क्या कहता है भारत का संविधान?

संसद में हंगामा और संसद के बाहर ड्रामा। यह लाइन आज के विपक्ष पर खूब फिट बैठती है। एक ओर संसद की कार्यवाही को लगातार बाधित किया जाता है दूसरी ओर किसी नेता के घर पर संसद की कार्यवाही का मंचन कर सुर्खियां हासिल करने की कोशिश की जाती है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अभियान को 'जन महाभियोग' का नाम दे रहे विपक्षी दलों ने जिस मॉक पार्लियामेंट का आयोजन किया है उस पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। यहां सवाल यह भी उठता है कि बात-बात पर संविधान की पुस्तक दिखाने वाले राहुल गांधी ने क्या संविधान को पढ़ा ही नहीं है? दरअसल भारतीय संविधान में किसी राजनीतिक दल, विपक्षी गठबंधन या संगठन को संसद अथवा विधानसभा का मॉक सत्र आयोजित कर उसे संवैधानिक कार्यवाही का स्वरूप देने या अपनी ओर से जन महाभियोग चलाने का कोई अधिकार नहीं दिया गया है। संविधान ने संसद और विधानसभाओं के गठन, सत्र संचालन तथा महाभियोग जैसी प्रक्रियाओं के लिए स्पष्ट प्रावधान निर्धारित किए हैं। इसलिए इन संवैधानिक व्यवस्थाओं के समानांतर राजनीतिक मंच खड़ा करना और उसे संसदीय या महाभियोग की कार्यवाही के रूप में प्रस्तुत करना संवैधानिक मर्यादाओं और निर्धारित संस्थागत प्रक्रियाओं पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। संविधान में समानांतर संसद की कोई व्यवस्था नहीं हम आपको बता दें कि संविधान का अनुच्छेद 85 स्पष्ट करता है कि संसद के सत्र बुलाने का अधिकार राष्ट्रपति के पास है। वहीं अनुच्छेद 174 के तहत राज्य विधानमंडल का सत्र बुलाने का अधिकार राज्यपाल को दिया गया है। अनुच्छेद 118 संसद के दोनों सदनों को अपनी कार्यवाही संचालित करने के लिए नियम बनाने का अधिकार देता है। इसका मतलब बिल्कुल स्पष्ट है कि संसद की बैठक, कार्यवाही, अध्यक्षता और विधायी निर्णय किसी राजनीतिक संगठन की मनमर्जी से नहीं चल सकते। इसे भी पढ़ें: Ministry of Corporate Affairs ने NCLT और NCLAT को पूरी तरह Hijack कर लिया है, CJI Surya Kant ने Modi सरकार पर की बेहद कड़ी टिप्पणी साथ ही अनुच्छेद 105 के तहत संसद के सदस्यों को प्राप्त विशेषाधिकार भी इसी संवैधानिक संस्था और उसकी कार्यवाही से संबंधित हैं। किसी निजी आयोजन में शामिल होने वाले राजनीतिक नेताओं को इन विशेषाधिकारों का लाभ नहीं मिलता। इसलिए किसी आयोजन को संसद की कार्यवाही के रूप में प्रस्तुत करना संवैधानिक अधिकारों और वास्तविक राजनीतिक गतिविधि के बीच की सीमा को धुंधला करता है। 2010 का मॉक पार्लियामेंट विवाद इसका प्रमाण है उल्लेखनीय है कि 20 अगस्त 2010 को लोकसभा में हंगामे के बाद लगभग 70 सांसदों ने सदन के भीतर ही मॉक पार्लियामेंट आयोजित कर दी थी। इस घटना पर तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने नाराजगी जताई थी। 25 अगस्त 2010 को हुई सर्वदलीय बैठक में राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों ने इस घटना पर खेद जताया था। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि संसद जैसी संवैधानिक संस्था की कार्यवाही का राजनीतिक प्रदर्शन स्वयं संसदीय व्यवस्था के भीतर भी गंभीर आपत्ति का विषय बना था। साथ ही जन महाभियोग संविधान की निर्धारित प्रक्रिया का विकल्प नहीं है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ जन महाभियोग आयोजित करने का विचार इससे भी अधिक गंभीर संवैधानिक प्रश्न खड़ा करता है। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन आधारों पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है। इसके लिए अनुच्छेद 124(4) में निर्धारित प्रक्रिया लागू होती है। हम आपको बता दें कि न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत लोकसभा में कम से कम 100 या राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर से प्रस्ताव प्रस्तुत किया जा सकता है। प्रस्ताव स्वीकार होने पर जांच समिति गठित होती है। आरोपों की जांच के बाद दोनों सदनों में निर्धारित विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना आवश्यक है। उसके बाद राष्ट्रपति द्वारा हटाने का आदेश जारी किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में जनता की किसी प्रतीकात्मक संसद, राजनीतिक गठबंधन या पूर्व लोकसभा अध्यक्ष की अध्यक्षता वाली निजी सभा के लिए कोई स्थान निर्धारित नहीं है। इसलिए किसी राजनीतिक आयोजन में मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ आरोपों की सुनवाई करना, प्रतीकात्मक प्रस्ताव पारित करना या जन महाभियोग की घोषणा करना वास्तविक संवैधानिक महाभियोग नहीं हो सकता। ऐसे आयोजन से किसी संवैधानिक पदाधिकारी की स्थिति पर कोई कानूनी प्रभाव नहीं पड़ता। नाम बदलने से संवैधानिक प्रश्न समाप्त नहीं होता साथ ही यदि मॉक पार्लियामेंट का नाम बदलकर जन संसद अथवा जन महाभियोग कर दिया जाए तो इससे उसकी संवैधानिक स्थिति नहीं बदल जाती। किसी आयोजन की वैधता उसके नाम से नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक गतिविधियों से निर्धारित होती है। कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों को समझना चाहिए कि संविधान शांतिपूर्ण विरोध और राजनीतिक अभिव्यक्ति का अधिकार देता है। लेकिन इन अधिकारों के आधार पर किसी को संसद की वैधानिक शक्तियां अथवा महाभियोग की संवैधानिक प्रक्रिया अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं मिलता। इसलिए मॉक पार्लियामेंट को वास्तविक संसदीय सत्र और जन महाभियोग को वास्तविक संवैधानिक महाभियोग के रूप में पेश करना कानूनी रूप से निराधार है। ऐसी कार्यवाहियां किसी संवैधानिक निर्णय को जन्म नहीं दे सकतीं और न ही संसद द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का स्थान ले सकती हैं। बहरहाल, संविधान ने संसद बनाई है, राजनीतिक दलों को अपनी संसद बनाने का अधिकार नहीं दिया। संविधान ने महाभियोग की प्रक्रिया निर्धारित की है, राजनीतिक मंचों को महाभियोग का फैसला सुनाने का अधिकार नहीं दिया। यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक तथ्य है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 30 Oct 2026 3:54 pm

उत्तर प्रदेश: लखनऊ में पार्टी की राज्य कार्यसमिति की बैठक करेंगे अमित शाह, सीएम योगी सहित कई नेता होंगे शामिल

उत्तर प्रदेश: लखनऊ में पार्टी की राज्य कार्यसमिति की बैठक करेंगे अमित शाह, सीएम योगी सहित कई नेता होंगे शामिल

समाचार नामा 30 Oct 2026 8:35 am

पीएम किसान सम्मान निधि की 24वीं किस्त आज, यूपी के 2.24 करोड़ किसानों को मिलेगा लाभ

मोदी-योगी सरकार अन्नदाता किसान की समृद्धि के लिए निरंतर कदम बढ़ा रही है। डबल इंजन सरकार खेत से लेकर किसानों के सम्मान तक कार्य कर रही है। इसी क्रम में शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात के बनासकांठा से किसानों के खाते में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि की 24वीं किस्त भेजेंगे।

देशबन्धु 30 Oct 2026 7:30 am

20 साल के सुशासन का जश्न, 24 नवंबर को जेडीयू मनाएगी बड़ा उत्सव

जनता दल (यूनाइटेड) 24 नवंबर को ‘सुशासन दिवस’ के रूप में मनाएगी। यह दिन 2005 में नीतीश कुमार के बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभालने की 20वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में मनाया जाएगा।

देशबन्धु 30 Oct 2026 7:20 am

एमपीएससी परीक्षा लीक जांच: आयोग ने जवाब दाखिल करने की अंतिम तिथि 16 नवंबर निर्धारित की

एमपीएससी परीक्षा लीक जांच: आयोग ने जवाब दाखिल करने की अंतिम तिथि 16 नवंबर निर्धारित की

समाचार नामा 29 Oct 2026 10:39 pm

'शांति समझौता बातचीत के पक्षधर गुट पर लागू होता है': असम सीएम ने मंत्री की 'उल्फा' संबंधी टिप्पणी पर स्पष्टीकरण दिया

'शांति समझौता बातचीत के पक्षधर गुट पर लागू होता है': असम सीएम ने मंत्री की 'उल्फा' संबंधी टिप्पणी पर स्पष्टीकरण दिया

समाचार नामा 29 Oct 2026 8:34 pm

MLC चुनाव में बीजेपी को अपने ही गढ़ों में झटका, पटना से काशी और लखनऊ से नागपुर तक हार की चर्चा

चार राज्यों की विधान परिषद की 28 सीटों पर हुए चुनाव के नतीजों ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। बीजेपी ने 12 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि उसके सहयोगी दलों को तीन सीटें मिलीं। इस तरह एनडीए के खाते में कुल 15 सीटें आईं।

देशबन्धु 29 Oct 2026 8:17 pm

जम्मू-कश्मीर की कहानी अब सिर्फ अतीत की चुनौतियां नहीं, वर्तमान के प्रयास और भविष्य की संभावनाएं भी : एलजी मनोज सिन्हा

जम्मू-कश्मीर की कहानी अब सिर्फ अतीत की चुनौतियां नहीं, वर्तमान के प्रयास और भविष्य की संभावनाएं भी : एलजी मनोज सिन्हा

समाचार नामा 29 Oct 2026 7:18 pm

चार राज्यों के विधान परिषद चुनावों के मिले-जुले परिणामों के महत्वपूर्ण सियासी संदेश

चार राज्यों के विधान परिषद चुनावों के मिले-जुले परिणामों में भले ही भाजपा-राजग को बढ़त मिली हो, लेकिन उत्तरप्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भाजपा -राजग को विपक्षी दलों द्वारा कड़ी टक्कर मिली है, जबकि कर्नाटक की चारो सीट जीतकर भाजपा राजग ने वहां की सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी को जबर्दस्त सियासी पटखनी दी है। वहीं, कांग्रेस के सामने संगठनात्मक चुनौती खड़ी हुई है। उसे एक मात्र नागपुर स्नातक सीट मिली है। लेकिन आरएसएस मुख्यालय होने और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के क्षेत्र में मिली कांग्रेस को यह जीत इस बात का संकेत है कि सवर्ण वोटर अब भाजपा की अतिवादी दलित-ओबीसी नीतियों से ऊब चुके हैं और कांग्रेस के अच्छे उम्मीदवार को जितवाने से भी उन्हें गुरेज नहीं है। इसे भी पढ़ें: RSS के किले Nagpur और Modi के गढ़ Varanasi में BJP की करार हार से सत्ता पक्ष की नींद उड़ी यदि राजनीतिक नजरिए से देखा जाए तो उत्तर प्रदेश में सपा की मजबूती और बिहार में जन सुराज का आगाज—बीजेपी-एनडीए को सवर्ण वोटरों की उदासीनता के दृष्टिगत सावधान कर रहे हैं। भले ही चार राज्यों की 28 विधान परिषद सीटों के नतीजे 28 अक्टूबर 2026 को सामने आए, लेकिन इन मिले जुले परिणामों ने उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक और महाराष्ट्र में भारतीय राजनीति की एक दिलचस्प तस्वीर पेश की है। जहां भाजपा और उसके राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के सहयोगियों ने कुल 28 सीटों में से 16 सीट पर जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस को एक मात्र सीट मिली है। दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने पांच सीटें जीतकर अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराई, तो बिहार में जन सुराज को पहली सफलता मिली। महाराष्ट्र में भी मुकाबला पूरी तरह एकतरफा नहीं रहा और भाजपा नीत महायुति गठबंधन को कांग्रेस नीत महा विकास अघाड़ी की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी शरद पवार से कड़ी टक्कर मिली है। इन नतीजों का महत्व केवल जीत और हार की संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि ये राजनीतिक दलों की संगठनात्मक क्षमता, स्थानीय नेतृत्व, शिक्षक एवं स्नातक मतदाताओं से जुड़ाव और विपक्षी गठबंधनों के भीतर प्रतिस्पर्धा के बारे में भी संकेत देते हैं। जहां तक चारों राज्यों के चुनावी गणित का सवाल है तो यह जान लीजिए कि गत 23 अक्टूबर 2026 को उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक और महाराष्ट्र की विधान परिषद की कुल 28 सीटों के लिए मतदान हुआ, जिसकी मतगणना 28 अक्टूबर को हुई। उत्तर प्रदेश की 11, बिहार की 8, कर्नाटक की 4 और महाराष्ट्र की 5 यानी कुल 28 सीटों के नतीजे आए। उत्तर प्रदेश की कुल 11 सीटें में से भाजपा को 6 और समाजवादी पार्टी (सपा) को 5 सीटों पर जीत मिली, यानी मुकाबला कांटे का रहा। वहीं, बिहार की कुल 8 सीटों में भाजपा को 3 और जनता दल (यूनाइटेड) को 1 सीट मिली। यानी भाजपा नीत राजग 8 सीटों में से 4 सीटें जितने में कामयाब रहा। जबकि मुख्य विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) को 1, जन सुराज पार्टी को 1 और निर्दलीय को 2 सीटें मिली हैं। इस प्रकार बिहार में भाजपा सबसे अधिक तीन सीटें जीतने वाली पार्टी रही। निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी दो सीटें हासिल कीं। इनकी भी पृष्ठभूमि भाजपाई ही रही है। वहीं, कर्नाटक की कुल 4 सीटों में भाजपा को 3 सीटें और जनता दल (सेक्युलर) को 1 सीट मिली। यहां की सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस 0 पर आऊट हो गई। कर्नाटक में भाजपा-जद(एस) गठबंधन ने चारों सीटें जीत लीं। वहीं, महाराष्ट्र की कुल 5 सीटों में भाजपा को 1, शिवसेना (महायुति) को 1, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) को 2 और कांग्रेस को 1 सीट मिली। वहीं, महाराष्ट्र विधान परिषद की नागपुर स्नातक निर्वाचन सीट के चुनाव आयोग और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कांग्रेस उम्मीदवार अभिजीत वंजारी ने इस सीट पर जीत दर्ज की है। उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार सुधाकर कोहले को शिकस्त दी है। # भाजपा और राजग के लिए क्या संदेश? चार राज्यों में 16 सीटें जीतना भाजपा और उसके सहयोगियों के लिए संगठनात्मक सफलता का संकेत है। विशेष रूप से कर्नाटक में चारों सीटों पर जीत ने विपक्षी गठबंधन के समन्वय और कांग्रेस की स्थानीय चुनावी रणनीति पर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, इन परिणामों को सीधे विधानसभा चुनावों के जनादेश के बराबर मानना उचित नहीं होगा। भाजपा के सामने अब इस सफलता को व्यापक जनसंपर्क, स्थानीय समस्याओं के समाधान और आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारी से जोड़ने की चुनौती है। # कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस द्वारा चारों राज्यों में मात्र एक सीट जीत पाना उसके लिए गंभीर राजनीतिक सवाल पैदा करता है। खासकर कर्नाटक में उसकी अपनी सरकार है, फिर भी पार्टी किसी सीट पर जीत हासिल नहीं कर सकी। इसके तीन संभावित सबक हैं: एक, स्थानीय स्तर पर संगठन और उम्मीदवार चयन की समीक्षा आवश्यक है। दो, शिक्षक एवं स्नातक जैसे विशिष्ट मतदाता वर्गों से निरंतर संवाद जरूरी है। तीन, गठबंधन की राजनीति के साथ-साथ अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान को भी मजबूत करना होगा। हालांकि, विधान परिषद चुनावों के मतदाता सीमित और विशिष्ट वर्गों से आते हैं। इसलिए इन नतीजों के आधार पर कांग्रेस के समूचे जनाधार के बारे में अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। # उत्तर प्रदेश में सपा ने भाजपा को क्या चुनौती दी? उत्तर प्रदेश के नतीजे खास महत्व रखते हैं, क्योंकि राज्य में 2027 की शुरुआत में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। भाजपा ने कई सीटों पर अपना प्रभाव बनाए रखा, लेकिन सपा ने पांच सीटें जीतकर यह दिखाया कि वह विधान परिषद के चुनावों में भी प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता रखती है। सपा को वाराणसी की दो सीटों पर सफलता मिलना भी उल्लेखनीय रहा। इसका सियासी अर्थ यह है कि दोनों दलों को अपने संगठन, स्थानीय नेतृत्व और मतदाता संपर्क पर ध्यान देना होगा। फिर भी, विधान परिषद के सीमित मतदाता वर्ग और विधानसभा के व्यापक मतदाता वर्ग में अंतर है। इसलिए इन नतीजों को आगामी विधानसभा चुनाव का निश्चित संकेत नहीं माना जा सकता। # बिहार में जन सुराज की जीत क्यों महत्वपूर्ण है? बिहार के दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में जन सुराज के सुरेश प्रसाद राय ने कांग्रेस के निवर्तमान विधान परिषद सदस्य मदन मोहन झा को 324 मतों से हराया। इससे जन सुराज को विधान परिषद में पहली चुनावी सफलता मिली। पटना शिक्षक सीट पर राजद ने भाजपा के नवल किशोर यादव को हराया, जबकि सारण में निर्दलीय उम्मीदवार राहुल राज ने जीत दर्ज की। इन परिणामों से तीन बातें सामने आती हैं: एक, नए राजनीतिक विकल्प की गुंजाइश: जन सुराज ने सीमित लेकिन महत्वपूर्ण चुनावी सफलता हासिल की। दो, स्थानीय असंतोष का महत्व: पुराने और स्थापित उम्मीदवारों को भी मतदाताओं की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है। तीन, निर्दलीय उम्मीदवारों की प्रासंगिकता: स्थानीय पहचान और मतदाताओं से सीधा संपर्क दलगत समर्थन के अतिरिक्त भी भूमिका निभा सकता है। जन सुराज के लिए असली चुनौती इस सफलता को दूसरे क्षेत्रों में भी संगठनात्मक विस्तार में बदलना होगी। # महाराष्ट्र का संदेश- मुकाबला बहुकोणीय है: महाराष्ट्र में महायुति और विपक्षी गठबंधन के बीच मुकाबला मिश्रित रहा। शरद पवार के नेतृत्व वाली राकांपा (एसपी) ने पुणे स्नातक और छत्रपति संभाजीनगर स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में जीत हासिल की। वहीं भाजपा और महायुति के अन्य सहयोगियों को भी सफलता मिली। जबकि नागपुर स्नातक सीट पर कांग्रेस ने बाजी मारी। यह परिणाम बताता है कि राज्य की राजनीति को केवल एक दल बनाम दूसरे दल के रूप में समझना पर्याप्त नहीं है। गठबंधन, स्थानीय उम्मीदवार, क्षेत्रीय नेतृत्व और मतदाता समूहों की प्राथमिकताएं भी परिणामों को प्रभावित करती हैं। # क्या इन चुनावों से राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय होगी? विधान परिषद चुनावों में केवल निर्धारित शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के पात्र मतदाता मतदान करते हैं। इन चुनावों में मतपत्रों का इस्तेमाल होता है, ईवीएम का नहीं। इसलिए इन परिणामों से संगठनात्मक ताकत, स्थानीय असंतोष और उम्मीदवारों की स्वीकार्यता के संकेत तो मिलते हैं, लेकिन पूरे राज्य या देश की जनता की राजनीतिक पसंद का सीधा अनुमान नहीं लगाया जा सकता। इसके बावजूद, परिणाम तीन व्यापक प्रश्न जरूर खड़े करते हैं: एक, क्या सत्तारूढ़ दल अपनी स्थानीय उपलब्धियों और संगठन को प्रभावी चुनावी समर्थन में बदल पा रहे हैं? दो, क्या विपक्षी दल स्थानीय स्तर पर मजबूत उम्मीदवार और साझा रणनीति तैयार कर पा रहे हैं? तीन, क्या नए राजनीतिक दल और निर्दलीय उम्मीदवार स्थापित दलों के लिए कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में चुनौती बन सकते हैं? वस्तुत: चार राज्यों के विधान परिषद चुनावों का सबसे बड़ा सियासी संदेश यह है कि भाजपा-राजग को समग्र बढ़त मिली है, लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा कायम है। उत्तर प्रदेश में सपा की सफलता, बिहार में जन सुराज का प्रवेश, कर्नाटक में कांग्रेस की हार और महाराष्ट्र में मिला-जुला परिणाम—ये सभी अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों को दर्शाते हैं। किसी एक राज्य की सफलता को दूसरे राज्य में दोहराया हुआ जनादेश मानना उचित नहीं होगा। अंततः राजनीतिक दलों के लिए इन चुनावों की उपयोगिता इसी में है कि वे मतदाताओं के संदेश को समझें, संगठनात्मक कमियों की पहचान करें और जनता के मुद्दों पर अपनी जवाबदेही बढ़ाएं। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 29 Oct 2026 6:43 pm

Pakistan के खिलाफ Rajnath Singh के तेवर देख बगलें झांकने लगा America, India की Defence Diplomacy ने पूरी दुनिया में छोड़ा प्रभाव

राजनाथ सिंह की रक्षा कूटनीति ने अमेरिका के सामने भारत की सुरक्षा चिंताओं को जिस दृढ़ता और दोटूक अंदाज में रखा है, उसने पाकिस्तान को सैन्य सहायता देने के मुद्दे पर वाशिंगटन को भी असहज स्थिति में ला खड़ा किया। एफ-16 लड़ाकू विमानों के लिए अमेरिकी सहायता पैकेज पर भारत की कड़ी आपत्ति और पाकिस्तान को दी जाने वाली संवेदनशील तकनीक के तीसरे देश तक पहुंचने की आशंका उठाकर राजनाथ सिंह ने स्पष्ट कर दिया कि भारत अब अपनी सुरक्षा के सवाल पर किसी भी तरह की ढिलाई बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। आतंकवाद पर दोहरे मापदंडों के खिलाफ रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का सख्त संदेश इस बात का संकेत है कि भारत-अमेरिका की रणनीतिक साझेदारी अपनी जगह है, लेकिन पाकिस्तान के मामले में भारत अपने हितों से समझौता नहीं करेगा। देखा जाये तो रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक बार फिर साबित किया है कि बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन में भारत की रक्षा कूटनीति केवल बैठकों और औपचारिक बयानों तक सीमित नहीं है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों की स्पष्ट पैरवी करने, मित्र देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी मजबूत करने और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भारत की शर्तों को प्रभावी ढंग से सामने रखने का माध्यम भी है। इसे भी पढ़ें: Philippines ने भी लिया BrahMos, Rajnath Singh ने वैश्विक मंच पर दिखाई भारत की ताकत हम आपको बता दें कि फिलीपींस के सेबू में आसियान रक्षा मंत्रियों की बैठक के दौरान राजनाथ सिंह ने अमेरिका के सामने पाकिस्तान को एफ-16 लड़ाकू विमानों के लिए सहायता पैकेज देने का मुद्दा उठाया। इसके साथ ही जापान और ऑस्ट्रेलिया के रक्षा मंत्रियों के साथ उनकी मुलाकातों ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की बढ़ती रणनीतिक सक्रियता का एक महत्वपूर्ण संदेश दिया। राजनाथ सिंह ने भारत का पक्ष इतनी स्पष्टता से रखा कि वाशिंगटन के लिए पाकिस्तान को दी जाने वाली सैन्य सहायता के दुष्परिणामों पर जवाब देना और इस्लामाबाद का बचाव करना मुश्किल हो गया। अमेरिका के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के साथ बातचीत में राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान के एफ-16 कार्यक्रम से जुड़े सहायता पैकेज पर भारत की गंभीर चिंता व्यक्त की। हम आपको बता दें कि अमेरिका का 64.9 करोड़ डॉलर का यह पैकेज पाकिस्तान के लड़ाकू विमानों की परिचालन क्षमता और रखरखाव को मजबूत करने से जुड़ा है। इसमें एवियोनिक्स सुधार, तकनीकी उपकरण, स्पेयर पार्ट्स, प्रशिक्षण, सिमुलेटर और लॉजिस्टिक सहायता जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। भारत की आपत्ति का मूल प्रश्न यही है कि पाकिस्तान को मिलने वाली ऐसी सैन्य सहायता का वास्तविक इस्तेमाल किस उद्देश्य से होगा और इसका दक्षिण एशिया की सुरक्षा पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। भारत लंबे समय से सीमा पार आतंकवाद का मुद्दा उठाता रहा है। ऐसे में पाकिस्तान की सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने वाले किसी भी कदम को नई दिल्ली क्षेत्रीय सुरक्षा के व्यापक संदर्भ में देखती है। राजनाथ सिंह ने अमेरिकी पक्ष को इस बात के लिए भी आगाह किया कि पाकिस्तान को दी जाने वाली संवेदनशील सैन्य तकनीक किसी तीसरे देश तक पहुंच सकती है। देखा जाये तो यह चिंता केवल भारत-पाकिस्तान संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि तकनीकी सुरक्षा, हथियारों के प्रसार और व्यापक क्षेत्रीय सामरिक संतुलन से भी जुड़ी है। राजनाथ सिंह की कूटनीतिक पहल का महत्व इस बात में है कि भारत ने अपनी सुरक्षा संबंधी चिंताओं को सीधे अमेरिकी नेतृत्व के सामने स्पष्टता और दृढ़ता के साथ रखा है। भारत ने यह संदेश दिया है कि रणनीतिक साझेदारी अपनी जगह है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर वह चुप्पी नहीं साधेगा। आतंकवाद पर दोहरा मापदंड नहीं चलेगा राजनाथ सिंह ने अपने अमेरिकी समकक्ष के साथ बातचीत के दौरान आतंकवाद के खिलाफ शून्य-सहिष्णुता की नीति पर जोर दिया। उनका संदेश स्पष्ट था कि आतंकवादी संगठनों को समर्थन, प्रशिक्षण या वित्तीय सहायता देने वाले देशों के प्रति अंतरराष्ट्रीय समुदाय का रवैया सुसंगत और कठोर होना चाहिए। अमेरिकी रक्षा मंत्री ने भी सीमा पार आतंकवाद से मुकाबले में भारत के प्रति समर्थन दोहराया। यह भारत के लिए महत्वपूर्ण कूटनीतिक आधार है, क्योंकि आतंकवाद के विरुद्ध सहयोग तभी प्रभावी हो सकता है जब सुरक्षा संबंधी चिंताओं को केवल बयानों में नहीं, बल्कि व्यावहारिक नीतियों में भी जगह मिले। इसके अलावा, भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी के दस वर्षीय ढांचे की समीक्षा, सैन्य आदान-प्रदान, समुद्री सुरक्षा और रक्षा आपूर्ति शृंखलाओं पर चर्चा से यह भी स्पष्ट होता है कि दोनों देश अपने सहयोग को व्यापक रणनीतिक दिशा देना चाहते हैं। भारत का प्रयास है कि अमेरिका के साथ साझेदारी मजबूत बनी रहे, लेकिन उसके साथ ही पाकिस्तान को सैन्य सहायता देने जैसे मुद्दों पर भारतीय चिंताओं को नजरअंदाज न किया जाए। जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ ‘JAI’: हिंद-प्रशांत में रणनीतिक संदेश साथ ही राजनाथ सिंह की कूटनीति का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ उनकी बातचीत है। जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइज़ुमी के साथ चर्चा में समुद्री सुरक्षा, नौसैनिक जहाज निर्माण, डिजाइन और माइन काउंटरमेजर्स क्षमताओं में सहयोग जैसे मुद्दे शामिल रहे। जापान की तकनीकी विशेषज्ञता और भारत की विनिर्माण क्षमता को जोड़ने की संभावनाएं रक्षा औद्योगिक सहयोग को नई दिशा दे सकती हैं। जापान के साथ वायुसेना सहयोग बढ़ाने और रक्षा उद्योग से जुड़ी कंपनियों के बीच संपर्क मजबूत करने पर भी जोर दिया गया। यह सहयोग केवल सैन्य अभ्यासों तक सीमित नहीं है; इसका उद्देश्य दीर्घकाल में रक्षा क्षमताओं, तकनीकी सहयोग और औद्योगिक साझेदारी को मजबूत करना भी है। ऑस्ट्रेलिया के उपप्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री रिचर्ड मार्ल्स के साथ बैठक में दोनों देशों ने रक्षा सहयोग की समीक्षा की और आपसी समन्वय बढ़ाने पर चर्चा की। राजनाथ सिंह ने उन्हें फरवरी 2027 में बेंगलुरु में प्रस्तावित एयरो इंडिया में शामिल होने का निमंत्रण भी दिया। इसी बीच राजनाथ सिंह की जापानी और ऑस्ट्रेलियाई समकक्षों के साथ तस्वीर तथा उनका संदेश, ‘JAI: Japan, Australia, India’, विशेष राजनीतिक और रणनीतिक महत्व रखता है। यह तीनों देशों के बीच सहयोग, विश्वास और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में साझा हितों का प्रतीक है। एक स्वतंत्र, खुला और सुरक्षित हिंद-प्रशांत भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया की साझेदारी का प्रमुख आधार बना हुआ है। राजनाथ सिंह के नेतृत्व में रक्षा कूटनीति का व्यापक दृष्टिकोण इन बैठकों को एक साथ देखने पर राजनाथ सिंह की रक्षा कूटनीति के दो महत्वपूर्ण आयाम सामने आते हैं। एक तो अमेरिका जैसे प्रमुख रणनीतिक साझेदार के सामने पाकिस्तान को सैन्य सहायता देने के दुष्परिणामों पर स्पष्ट आपत्ति दर्ज कराना। दूसरा, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे विश्वसनीय साझेदारों के साथ रक्षा, तकनीक, समुद्री सुरक्षा और औद्योगिक सहयोग को आगे बढ़ाना। यही सक्रिय रक्षा कूटनीति की विशेषता है। भारत किसी एक देश के साथ संबंधों पर निर्भर रहने के बजाय कई स्तरों पर साझेदारियां मजबूत कर रहा है। वह अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए क्षेत्रीय सहयोग का दायरा भी बढ़ाना चाहता है। बहरहाल, पाकिस्तान को एफ-16 सहायता पर अमेरिकी मंत्री के सामने दोटूक आपत्ति और जापान-ऑस्ट्रेलिया के साथ ‘JAI’ का संदेश, ये दोनों घटनाक्रम मिलकर भारत की उस रक्षा नीति को रेखांकित करते हैं, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा पर दृढ़ता और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी का विस्तार साथ-साथ चलते हैं। राजनाथ सिंह के नेतृत्व में भारत की रक्षा कूटनीति का यही व्यापक दृष्टिकोण उसे बदलते वैश्विक परिदृश्य में अधिक सक्रिय और प्रभावशाली भूमिका निभाने का अवसर देता है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 29 Oct 2026 5:50 pm

महाराष्ट्र: नागपुर में अपनी जीत पर सीएम फडणवीस पर बरसी कांग्रेस, डिलीट पोस्ट को बनाया मुद्दा

महाराष्ट्र: नागपुर में अपनी जीत पर सीएम फडणवीस पर बरसी कांग्रेस, डिलीट पोस्ट को बनाया मुद्दा

समाचार नामा 29 Oct 2026 4:34 pm

'असहमति की आवाज को दबाने कोशिश,' शिक्षकों पर सीएम सुवेंदु के बयान पर सौगत रॉय का पलटवार

'असहमति की आवाज को दबाने कोशिश,' शिक्षकों पर सीएम सुवेंदु के बयान पर सौगत रॉय का पलटवार

समाचार नामा 29 Oct 2026 4:28 pm

नई पीढ़ी को बौद्धिक परतंत्रता और सांस्कृतिक अलगाव से बचाना जरुरी

संकटग्रस्त और बिखरती पारिवारिक व्यवस्था, ध्वस्त होते जीवन-मूल्य, अपनी जड़ों से उखड़ती पीढ़ी वर्तमान की सबसे बड़ी चुनौतियां हैं। इनके बीच उपनिवेशवादी मानसिकता से प्रभावित शिक्षा व्यवस्था हमें अभी भी जकड़े हुए है। अंग्रेजों के जाने के आठ दशक बाद भी अपनी शिक्षा व्यवस्था को हम उन संकटों से मुक्त नहीं करा पाए हैं, जो हमें हमारी लंबी दासता ने दिये थे। इस शिक्षा व्यवस्था के नाते 'इंडिया' से 'भारत' की ओर हमारा प्रवास संभव नहीं हो पा रहा है। धर्मपाल जी की किताब 'द ब्यूटीफुल ट्री' हमें जिस भारत के दर्शन कराती है, वहां प्रत्येक गांव में एक या अधिक स्कूल थे। ये हर तरह का ज्ञान और कौशल दे रहे थे। अंग्रेजों ने इस समूची भारतीय शिक्षा व्यवस्था का 'कैसे' ध्वंस किया? 'क्यों किया' यह जानना अनिवार्य है। महात्मा गांधी के आरंभिक लेखन में इस क्षत-विक्षत हो रहे भारत का दर्द दिखता है। अंग्रेजी शिक्षा ने हमें 'कमजोर और कम भारतीय' बनाया। साथ ही अपनी जमीन और उसके मूल्यों के प्रति हिकारत और हीनता बोध पैदा किया। यह आत्मदैन्य या 'एहसास-ए-कमतरी' आज भी हमें जकड़े हुए है। इसे भी पढ़ें: Education और Innovation को बढ़ावा देने के लिए 15 October को मनाते हैं World Students Day किताबों तक सिमटी शिक्षाः अंग्रेजी शिक्षा ने 'घर' और 'स्कूल' के बीच दूरी बनाई। इस पढ़ाई ने हमें यह सिखाया कि स्कूल कोई ऊंची जगह है और घर ठीक नहीं है। इस हीनता में फंसकर हमने अपनी संस्कारशाला 'परिवार' और उसके द्वारा दिए जा रहे मूल्यों को कमतर मान लिया। बच्चों में नैतिक मूल्य, आदर और सामाजिक जिम्मेदारियां परिवार और समाज द्वारा सिखाई जाती थीं। यह जिम्मेदारी भी पूरी तरह स्कूलों पर डाल दी गई। इससे परिवारों की भूमिका गौण होती चली गई । शिक्षा मुख्य रूप से किताबों और चार दीवारों तक सीमित हो गई। फलतः बच्चे घर के पारंपरिक कामकाज, खेती, दस्तकारी और व्यावहारिक जीवन के अनुभवों से दूर होते गए। ये सभी काम पहले घर के माध्यम से स्वतः सीखते थे। अंग्रेजों की नकल सिर्फ भाषा तक नहीं रही बल्कि वह हमारे जीवन में भी प्रवेश कर गई। खानपान, परिधान, दिनचर्या , कैलेण्डर सब बदल गये। स्कूल जब बदलते हैं तो वह पूरा सांस्कृतिक परिवेश बदलने की क्षमता रखते हैं। यह हमने हिंदुस्तान में होते हुए देखा। इसीलिए उस जमाने में भारत के गवर्नर जनरल रहे लॉर्ड विलियम बेंटिक ने कहा था, पढ़ने के बाद वे हमारी नकल करने लगे हैं। क्या से क्या हो गए देखते-देखतेः ऐसा देश जहां सब 'स्वधर्म' पर चलते हुए अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं। अगर उस समाज में घरों ताले नहीं हैं, चोरियां नहीं होती,लोग झूठ नहीं बोलते, ऊंच-नीच नहीं है तो सोचिए कि वह समाज और उसकी शिक्षा कैसी रही होगी? अनेक विदेशी यात्रियों ने भारत के बारे में अपने जो अनुभव दर्ज किए हैं। वे हैरान करने वाले हैं। अंग्रेजों ने अपनी शिक्षा व्यवस्था से भारतीय समाज का मानस बदल दिया। नतीजतन समाज बदला, उसके मूल्यों में व्यापक बदलाव हुए। सरकार, पुलिस, कोर्ट-कचहरी, प्रशासन तंत्र का महत्व बना। हमारी स्वायत्तता और समाज केंद्रित व्यवस्थाएं नष्ट हुईं। हम सरकार के सामने याचक की तरह खड़े हो गए। गांव उजड़ने लगे। स्थानीय उद्यम नष्ट हुए। कुटीर उद्योग तबाह हो गए। पारिवारिक कौशल नष्ट हुए। गैर-बराबरी बढ़ती गई। अपनी चीजों से ही नफ़रत करने वाला समाज विकसित हुआ। अंग्रेजी शिक्षा ने भारत में गहरे विभाजन पैदा किए। अलीट और नान अलीट का बंटवारा, 'भारत' और 'इंडिया' की पृथक पहचान बन गया। हम यह समझ ही नहीं पाए कि पांव छूने, नमस्कार करने और हाथ मिलाने में अंतर क्या है और श्रेष्ठ क्या है? हर जानकारी नहीं है ज्ञानः हर जानकारी ज्ञान नहीं है। इस शिक्षा व्यवस्था ने ज्ञान के नाम पर ढेरों जानकारियां परोस दीं। इनका जीवन संघर्षों में कोई उपयोग नहीं । हम 'मानने' को 'जानना' समझने लगे हैं। 'क्यों' का विचार मन में आता ही नहीं। अपनी जिस शिक्षा व्यवस्था से हमने 1750 में दुनिया का 33 प्रतिशत उत्पादन और व्यापार सुनिश्चित किया था । अंग्रेजी राज और उसकी शिक्षा ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा। अपनी स्वायत्तता से अग्रणी समाज कैसे सरकारी प्रशासनिक तंत्र से चौपट हो जाता, भारत इसकी ही कहानी है। नई अंग्रेजी शिक्षा मुक्त नहीं करती थी। बांधती थी। सेवक बनाने पर जोर था। जबकि गुरुकुल पद्धति, स्थानीय हस्तकलाएं, कृषि ज्ञान और स्वदेशी विज्ञान हाशिए पर चले गए। आधुनिक शिक्षा ने पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को नष्ट कर दिया। ये प्रणालियां स्थानीय समाज की जरूरतों के अनुकूल थीं। 'लोक' की उपेक्षा से ऐसा समाज खड़ा हुआ जो अपनी जड़ों से उखड़ा हुआ है। स्कूल आधुनिक और पश्चिमी मूल्यों को बढ़ावा देते रहे हैं, जबकि अधिकांश भारतीय घर पारंपरिक और सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़े होते हैं। इस वैचारिक अंतर के कारण घर और विद्यालय के परिवेश में टकराव की स्थिति उत्पन्न हो रही है। इस शिक्षा प्रणाली ने अंग्रेजों की नीतियों को सही ठहराने वाला एक ऐसा वर्ग तैयार किया जो मानसिक रूप से उपनिवेशवादी सोच का समर्थन करने लगा। इसने देश की आर्थिकी और बौद्धिक संपदा को परतंत्र बनाए रखा। जब तक हम अपनी माटी के ज्ञान और भाषा का सम्मान करना नहीं सीखेंगे, तब तक औपनिवेशिक छांव से पूरी तरह मुक्त होना असंभव है। अंग्रेजी की लंबी छायाः भारत ने स्थानीय भाषाओं में अपना सब कुछ विकसित किया था। अब अंग्रेजी थोप दी गई। वह सिर्फ भाषा की तरह नहीं “कौशल' की तरह आई। इसे न जानने वाले कमतर माने जाने लगे। शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होने के कारण आम जनता के लिए उच्च शिक्षा और विज्ञान के दरवाजे बंद हो गए। रटने वाली शिक्षा को बढ़ावा मिला, जिससे मौलिक सोच, अनुसंधान और स्वतंत्र चिंतन पर विपरीत प्रभाव पड़ा। अंग्रेजी जानने वाले शिक्षित वर्ग और पारंपरिक शिक्षा पाने वाले या अशिक्षित आम जनमानस के बीच एक गहरी खाई बन गई। ऐसे में 'कोलोनिजियम' को 'डिकोड' करने के जैसे सचेतन प्रयास किए जाने थे, हमने कहां किए? आज भी इसकी छाया आपको सरकारी कामकाज में दिखेगी। शिक्षा मंत्रालय को मानव संसाधन मंत्रालय बनाया गया। फिर उसे शिक्षा मंत्रालय बनाया गया है। जबकि संस्कृति मंत्रालय को शिक्षा से अलग रखा गया है। क्या संस्कृति और शिक्षा एक-दूसरे के पूरक नहीं हैं? गुलामी के लंबे कालखंड में आक्रांताओं ने हमारे विश्वविद्यालयों को बार-बार लूटा, नष्ट किया। अंग्रेजों ने जड़ों पर चोट की। मानसिकता बदली। हीन भावना भरी और हमारे अपने लोगों को हमारे विचार के विरुद्ध खड़ा कर दिया। इस संकट से आज भी हिंदुस्तान जूझ रहा है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम बौद्धिक गुलामी की बेड़ियों को तोड़ें, जो हमें अपनी ही माटी में पराया बनाती है। जब तक हमारी शिक्षा हमारी अपनी संस्कृति, भाषा और मौलिक चिंतन से नहीं जुड़ेगी, तब तक हम वास्तविक अर्थों में स्वतंत्र नहीं हो सकते। उपनिवेशवाद के छोड़े अंधेरों को मिटाकर ही हम एक आत्मविश्वासी, स्वदेशी और सशक्त भारतीय समाज का निर्माण कर सकते हैं। प्रो. संजय द्विवेदी (लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। भारतीय जन संचार संस्थान-आईआईएमसी के महानिदेशक रहे हैं।)

प्रभासाक्षी 29 Oct 2026 4:28 pm

आईआरसीटीसी मनी लॉन्ड्रिंग मामले में लालू यादव को दिल्ली हाईकोर्ट से राहत, ईडी को नोटिस

आईआरसीटीसी मनी लॉन्ड्रिंग मामले में लालू यादव को दिल्ली हाईकोर्ट से राहत, ईडी को नोटिस

समाचार नामा 29 Oct 2026 4:11 pm

Tata Group पर राजनीति करते ही फँस गये Rahul Gandhi, Aircel Founder के पुराने बयान ने खोली Congress के जमाने की पोल

टाटा समूह के नेतृत्व से जुड़े विवाद पर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के आरोपों और केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के जवाब के बीच अब एयरसेल के संस्थापक सी. शिवशंकरन का बयान भी चर्चा में है। हम आपको याद दिला दें कि शिवशंकरन ने पूर्ववर्ती यूपीए शासनकाल के दौरान कारोबारियों पर कथित राजनीतिक दबाव का अपना अनुभव साझा किया था। उन्होंने कहा था कि उस समय कारोबार बढ़ने पर उद्यमियों को अपनी कंपनी किसी खास व्यक्ति को बेचने के लिए दबाव का सामना करना पड़ता था, जबकि आज कारोबारी माहौल पहले से अलग है। उनके बयान ने कांग्रेस शासनकाल में उद्योग जगत और राजनीतिक सत्ता के संबंधों पर बहस को एक नया संदर्भ दिया है। राहुल गांधी का आरोप, टाटा विवाद पर सरकार को घेरा हम आपको बता दें कि राहुल गांधी ने 28 अक्टूबर को सोशल मीडिया मंच एक्स पर आरोप लगाया कि टाटा को आपराधिक तरीके से बर्बाद किया जा रहा है और देश के बड़े कारोबारी नेता इस मुद्दे पर बोलने से डर रहे हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को निशाने पर लेते हुए सवाल किया कि कारोबारी कब तक चुप रहेंगे और क्या भारतीय कारोबार सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों की जागीर है। दरअसल, यह विवाद टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के प्रस्ताव को लेकर टाटा ट्रस्ट्स की ओर से उठाई गई आपत्तियों के बीच सामने आया था। राहुल गांधी ने इस आंतरिक कॉरपोरेट विवाद को सरकार और कारोबारी जगत के संबंधों से जोड़ते हुए राजनीतिक मुद्दा बनाया। इसे भी पढ़ें: Tata Group पर Rahul Gandhi के आरोपों पर Nirmala Sitharaman का पलटवार, कांग्रेस पर साधा निशाना निर्मला सीतारमण ने कांग्रेस के लाइसेंस-कोटा राज का उठाया मुद्दा राहुल गांधी के आरोपों पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पलटवार करते हुए कहा कि नेता प्रतिपक्ष को हर मुद्दे का राजनीतिकरण करने से बचना चाहिए। उन्होंने व्यावसायिक और कानूनी मामलों को बिना ठोस आधार के आपराधिक करार देने पर भी आपत्ति जताई। सीतारमण ने कांग्रेस के शासनकाल के लाइसेंस-कोटा राज का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि उस व्यवस्था ने भारतीय उद्यमियों की कारोबारी क्षमता और उद्यमशीलता को बाधित किया। इसके विपरीत उन्होंने केंद्र की मौजूदा सरकार की नीतियों को उद्योग, निवेश और रोजगार सृजन को प्रोत्साहित करने वाला बताया। इसके बाद, राहुल गांधी ने जवाब में सवाल किया कि टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के प्रतिनिधियों को अमित शाह के आवास पर किस कारोबारी या कानूनी मामले के सिलसिले में बुलाया गया था। इस तरह दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप और तेज हो गए। एयरसेल संस्थापक का बयान: कारोबार बढ़ने पर कंपनी बेचने का दबाव दूसरी ओर, आपको याद दिला दें कि एयरसेल के संस्थापक सी. शिवशंकरन ने मई 2024 में उद्यमी और पॉडकास्ट होस्ट राज शमानी के कार्यक्रम में अपने कारोबारी अनुभव साझा किए थे। शिवशंकरन ने कहा था कि पहले भारत में कारोबार बढ़ने पर उद्यमियों को कंपनी किसी खास व्यक्ति को बेचने के लिए दबाव का सामना करना पड़ता था। एयरसेल में अपनी 74 प्रतिशत हिस्सेदारी की 2006 में मैक्सिस को हुई बिक्री का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा था कि उन्हें इस सौदे से लगभग 3,400 करोड़ रुपये मिले, जबकि उनके मुताबिक एटीएंडटी को बेचने पर उन्हें आठ अरब डॉलर तक मिल सकते थे। उन्होंने कहा कि उस समय उन्हें सबसे ऊंची पेशकश स्वीकार करने का अवसर नहीं मिला। शिवशंकरन ने तत्कालीन कारोबारी माहौल और मौजूदा स्थिति की तुलना करते हुए कहा था, “Today no one can pressurize you”, साथ ही उन्होंने भारत को अब उदारीकृत अर्थव्यवस्था बताया था। उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर कहा था कि पहले कारोबारियों को किसी खास खरीदार को कंपनी बेचने के लिए दबाव झेलना पड़ता था, जबकि अब उद्यमी अपना कारोबार बनाने और आगे बढ़ाने के लिए अधिक स्वतंत्र महसूस कर सकते हैं। हम आपको बता दें कि एयरसेल की बिक्री को लेकर शिवशंकरन ने पहले भी आरोप लगाए थे कि उन पर कंपनी को बाजार मूल्य से कम कीमत पर बेचने का दबाव बनाया गया। तत्कालीन दूरसंचार मंत्री दयानिधि मारन और उनके भाई कलानिधि मारन से जुड़े आरोपों की जांच हुई थी। हालांकि, 2017 में विशेष सीबीआई अदालत ने मारन बंधुओं को मामले में आरोपमुक्त कर दिया था। उद्योग जगत पर दबाव या कारोबार की आजादी? बहरहाल, राहुल गांधी का आरोप है कि कारोबारी नेता मौजूदा सरकार के दबाव में खुलकर बोलने से बच रहे हैं। इसके जवाब में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कांग्रेस के शासनकाल की लाइसेंस-कोटा व्यवस्था पर सवाल उठाए। वहीं, एयरसेल के संस्थापक सी. शिवशंकरन का बयान इस बहस को एक अलग संदर्भ देता है। उन्होंने अपने कारोबारी अनुभव साझा करते हुए बताया था कि पहले उद्यमियों पर अपनी कंपनी किसी खास खरीदार को बेचने का दबाव बनाया जाता था। उन्होंने मौजूदा कारोबारी माहौल को पहले से अलग बताया। खैर...अब सारा प्रकरण जनता के सामने है और चुनावों के दौरान जनता की अदालत में ही फैसला होगा कि कौन सही है और कौन गलत। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 29 Oct 2026 3:03 pm

एक नवंबर से डिफॉल्ट होगा डायरेक्ट प्लान: म्यूचुअल फंड्स

मुंबई, एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (एएमसी) के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर म्यूचुअल फंड स्कीमों में एक नवंबर से डायेक्ट प्लान डिफॉल्ट होंगे।

देशबन्धु 29 Oct 2026 2:31 pm

RSS के किले Nagpur और Modi के गढ़ Varanasi में BJP की करार हार से सत्ता पक्ष की नींद उड़ी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जैसे ही सोशल मीडिया पर कांग्रेस की सीटों की संख्या को लेकर तंज कसते हुए पूछा कि आखिर कांग्रेस को कितनी सीटें मिलीं, उसके कुछ ही समय बाद महाराष्ट्र के नागपुर में कांग्रेस ने जीत दर्ज कर अपना खाता खोल दिया। इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में भी भाजपा को दोनों विधान परिषद सीटों पर हार का सामना करना पड़ा और विपक्षी समाजवादी पार्टी ने जीत हासिल की। इस तरह कांग्रेस पर कटाक्ष करने की कोशिश में भाजपा खुद ही राजनीतिक कटाक्ष का निशाना बन गई। RSS के मुख्यालय नागपुर में कांग्रेस की जीत और मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में विपक्ष की सफलता ने इन MLC चुनावों के नतीजों को एक नया राजनीतिक मोड़ दे दिया। देखा जाये तो चार राज्यों के विधान परिषद चुनावों के नतीजों ने राष्ट्रीय राजनीति में एक दिलचस्प तस्वीर पेश की है। भाजपा के नेतृत्व वाले NDA ने कुल 28 सीटों में 16 पर जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस को केवल महाराष्ट्र की नागपुर स्नातक सीट पर सफलता मिली। लेकिन इन परिणामों का राजनीतिक महत्व केवल सीटों के कुल आंकड़े तक सीमित नहीं है। महाराष्ट्र में नागपुर और उत्तर प्रदेश में वाराणसी की हार ने भाजपा के लिए प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उसके संगठनात्मक प्रभाव पर चर्चा शुरू कर दी है। इसे भी पढ़ें: डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) कानून क्या है? इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती क्यों दी गई है? हम आपको बता दें कि महाराष्ट्र की नागपुर स्नातक निर्वाचन सीट पर कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने भाजपा के सुधाकर कोहले को 3,271 मतों से हराकर सीट बरकरार रखी। वंजारी को 67,231 और कोहले को 63,960 वोट मिले। लगभग दो दिन चली मतगणना में दूसरे वरीयता के मत निर्णायक साबित हुए। इस निर्वाचन क्षेत्र का महत्व इसलिए भी है कि नागपुर RSS का मुख्यालय होने के साथ-साथ मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का गृहक्षेत्र भी है। यह परिणाम भाजपा के लिए स्थानीय स्तर पर संगठन और मतदाता संपर्क की समीक्षा का अवसर है। गडकरी लंबे समय तक इसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं और भाजपा ने इस बार भी सीट वापस पाने के लिए अभियान चलाया था। इसके बावजूद कांग्रेस की लगातार दूसरी जीत बताती है कि मजबूत वैचारिक और संगठनात्मक आधार वाले क्षेत्र में भी चुनावी परिणाम स्वतः सुनिश्चित नहीं होते। दूसरी ओर, कांग्रेस ने इस जीत को भाजपा के शुरुआती दावों के जवाब के रूप में पेश किया। महाराष्ट्र कांग्रेस ने मुख्यमंत्री फडणवीस की उस सोशल मीडिया पोस्ट पर तंज कसा, जिसमें उन्होंने कांग्रेस के शून्य सीटों पर रहने की बात कही थी। नागपुर का परिणाम आने के बाद पार्टी ने उनकी पोस्ट हटाए जाने को लेकर भी कटाक्ष किया। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने इसे भाजपा के राजनीतिक दावों के लिए झटका बताया। वहीं उत्तर प्रदेश के चुनावों में वाराणसी का परिणाम और भी महत्वपूर्ण रहा। समाजवादी पार्टी ने वाराणसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में लाल बिहारी यादव के माध्यम से अपनी सीट बरकरार रखी। इसके साथ ही सपा के आशुतोष सिन्हा ने वाराणसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में भी जीत हासिल की। इस तरह प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र से जुड़ी दोनों विधान परिषद सीटें भाजपा के हाथ से निकल गईं। पूरे उत्तर प्रदेश में भाजपा ने 11 में से छह और सपा ने पांच सीटें जीतीं। वैसे इन नतीजों का अर्थ यह नहीं है कि वाराणसी के सभी मतदाताओं ने भाजपा के खिलाफ मतदान किया है। विधान परिषद के शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों का मतदाता वर्ग सीमित और विशिष्ट है। फिर भी, 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले वाराणसी में दोनों सीटों पर हार सपा के लिए राजनीतिक उत्साह बढ़ाने वाली और भाजपा के लिए स्थानीय संगठन की समीक्षा करने वाली घटना है। हम आपको यह भी बता दें कि प्रधानमंत्री मोदी ने MLC चुनावों में कांग्रेस के शुरुआती कमजोर प्रदर्शन पर तंज कसा था। इसके जवाब में कांग्रेस नेताओं ने नागपुर और वाराणसी के परिणामों को सामने रखकर भाजपा पर पलटवार किया। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि प्रधानमंत्री को कांग्रेस की सीटों की संख्या पर टिप्पणी करने के साथ यह भी आत्ममंथन करना चाहिए कि वाराणसी में भाजपा दोनों सीटें क्यों हार गई और RSS के गढ़ नागपुर में कांग्रेस ने जीत कैसे हासिल की? उन्होंने बेरोजगारी, महंगाई और निजी निवेश से जुड़े मुद्दों का उल्लेख करते हुए दावा किया कि मतदाताओं ने केंद्र सरकार की नीतियों के प्रति असंतोष जताया है। वहीं कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने भी प्रधानमंत्री की बैलेट पेपर वाली टिप्पणी पर पलटवार करते हुए नागपुर और वाराणसी के परिणामों का उल्लेख किया। उनका तर्क था कि यदि भाजपा बैलेट पेपर से हुए चुनावों के नतीजों को कांग्रेस की कमजोरी का प्रमाण बता रही है, तो उसे अपने उन क्षेत्रों में हार पर भी जवाब देना चाहिए जहां भाजपा की मजबूत राजनीतिक मौजूदगी मानी जाती है। दूसरी ओर, समग्र तस्वीर में NDA की 16 सीटों की जीत महत्वपूर्ण है। कर्नाटक में भाजपा-जेडीएस गठबंधन ने चारों सीटें जीतीं, उत्तर प्रदेश में भाजपा छह सीटों पर विजयी रही और बिहार में भाजपा-जदयू ने मिलकर चार सीटें हासिल कीं। दूसरी ओर, महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी ने पांच में से तीन सीटें जीतीं और उत्तर प्रदेश में सपा ने पांच सीटों पर सफलता हासिल की। इन परिणामों से तीन राजनीतिक संदेश निकलते हैं। एक तो NDA का कुल प्रदर्शन उसे मनोवैज्ञानिक बढ़त देता है। दूसरा, नागपुर और वाराणसी जैसे प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में हार भाजपा के लिए स्थानीय चुनावी समीकरणों और संगठनात्मक रणनीति की समीक्षा का विषय है। तीसरा, कांग्रेस और INDIA गठबंधन के लिए क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ समन्वय और चुनावी प्रदर्शन को मजबूत करना जरूरी है। बहरहाल, नागपुर और वाराणसी में भाजपा की हार को महज स्थानीय चुनावी घटनाक्रम बताकर खारिज नहीं किया जा सकता। एक ओर NDA ने कुल सीटों के आंकड़े में बढ़त बनाकर अपनी चुनावी ताकत का प्रदर्शन किया, तो दूसरी ओर विपक्ष ने उन क्षेत्रों में भाजपा को शिकस्त दी, जिनकी पहचान उसके मजबूत राजनीतिक प्रभाव से जुड़ी है। RSS के मुख्यालय नागपुर में कांग्रेस की जीत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में समाजवादी पार्टी की सफलता ने भाजपा के राजनीतिक दावों के बीच असहज सवाल खड़े कर दिए हैं। अब निगाहें आगामी विधानसभा चुनावों पर हैं, देखना होगा कि क्या विपक्ष इन प्रतीकात्मक जीतों को व्यापक जनसमर्थन में बदलकर भाजपा के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर पाएगा, या भाजपा इन झटकों से सबक लेकर अपने गढ़ों में फिर पकड़ मजबूत करेगी? -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 29 Oct 2026 2:30 pm