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समझिए, आखिर कैसे संभव हुई इसरो की सफलता-दर-सफलता वाली उपलब्धि?

जन्माष्टमी की शुभ घड़ी यानी 4 सितंबर 2026 की रात जब श्रीहरिकोटा से GSLV-F17 ने उड़ान भरी और EOS-05 को निर्धारित कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया, तब यह केवल एक और रॉकेट लॉन्च नहीं था, बल्कि यह भारत की चार दशक से अधिक पुरानी अंतरिक्ष-यात्रा में तकनीकी परिपक्वता, संस्थागत अनुशासन और असफलताओं से सीखने की वैज्ञानिक संस्कृति का एक महत्वपूर्ण प्रमाण था। इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (ISRO) के आधिकारिक रिकॉर्ड में GSLV-F17/EOS-05 को 4 सितंबर 2026 के सफल मिशन के रूप में दर्ज किया गया है। हालांकि, इस सफलता का मूल्यांकन केवल राष्ट्रवादी उत्साह से करना वैज्ञानिक दृष्टि से अधूरा होगा। असली सवाल यह है— आखिर ISRO बार-बार कठिन अंतरिक्ष अभियानों को सफल बनाने की क्षमता कैसे विकसित कर पाया? इसका सटीक उत्तर किसी एक प्रतिभाशाली वैज्ञानिक, किसी एक सरकार या किसी एक तकनीक में नहीं है। वास्तव में इसका शानदार उत्तर है— सतत संस्थागत learning system, जिसको इस प्रकार समझा जा सकता है:- इसे भी पढ़ें: ISRO को कमजोर करने की साजिश हो रही या भारत को Space Superpower बनने की रणनीति पर काम चल रहा? पहला, ISRO की पहली ताकत— असफलता को अपराध नहीं, Data मानना: अंतरिक्ष विज्ञान में असफलता असामान्य नहीं है। दुनिया की सबसे बड़ी अंतरिक्ष एजेंसियां भी मिशन खोती रही हैं। ISRO भी इससे अछूता नहीं रहा। PSLV-C61/EOS-09 मिशन मई 2025 में पूरा नहीं हो सका। GSLV-F15/NVS-02 मिशन में भी उपग्रह को निर्धारित operational orbit तक पहुंचाने में समस्या आई। बावजूद इसके, ISRO के आधिकारिक launch record में इन घटनाओं को दर्ज किया गया है। महत्वपूर्ण यह है कि ISRO असफलता के बाद उसे छिपाने के बजाय failure analysis करता है। उदाहरण के लिए 2021 के GSLV-F10 मिशन की विफलता के बाद क्रायोजेनिक upper stage की anomaly की जांच के लिए विशेषज्ञों की Failure Analysis Committee गठित की गई थी। यही वैज्ञानिक संस्कृति किसी भी aerospace organisation की असली पूंजी होती है। Failure, फिर Analysis, फिर Modification, फिर Testing, फिर Reflight- यह चक्र जितनी तेजी और ईमानदारी से चलता है, उतनी ही तेजी से reliability बढ़ती है। दूसरा, GSLV-F17 की सफलता इसलिए महत्वपूर्ण है कि GSLV साधारण rocket नहीं है: ISRO के अनुसार GSLV तीन-stage vehicle है जिसमें solid, liquid और cryogenic upper stage शामिल हैं और इसे लगभग 2,000 किलोग्राम वर्ग के spacecraft को Geosynchronous Transfer Orbit में पहुंचाने के लिए डिजाइन किया गया है। क्रायोजेनिक तकनीक किसी भी अंतरिक्ष कार्यक्रम की अत्यंत कठिन तकनीकी क्षमताओं में से एक है। Liquid hydrogen और liquid oxygen को अत्यंत निम्न तापमान पर संभालना, turbopumps को नियंत्रित करना, combustion stability बनाए रखना और सही समय पर thrust उपलब्ध कराना—ये सभी अत्यधिक जटिल engineering challenges हैं। इसलिए GSLV की सफलता को केवल “rocket चला और satellite पहुंच गया” के स्तर पर देखना तकनीकी उपलब्धि को छोटा करना होगा। तीसरा, असली सफलता—Precision: अंतरिक्ष में “पास-पास” भी असफलता हो सकती है। रॉकेट को satellite को केवल अंतरिक्ष में नहीं पहुंचाना होता। उसे निर्धारित velocity, direction और orbital parameters के साथ पहुंचाना होता है। इसमें Guidance, Navigation and Control प्रणाली की भूमिका निर्णायक होती है। Inertial sensors, gyroscopes, accelerometers, onboard computers, telemetry और ground tracking systems लगातार vehicle की स्थिति और गति का अनुमान लगाते हैं। फिर flight-control system trajectory को नियंत्रित करता है। यानी रॉकेट का हर सेकंड गणित है। एक छोटी velocity error भविष्य में satellite के fuel budget को प्रभावित कर सकती है। यही कारण है कि GSLV-F17 जैसी सफलता वास्तव में हजारों calculations और लाखों engineering decisions की अंतिम अभिव्यक्ति होती है। चौथा, ISRO की सबसे बड़ी ताकत—System Engineering: ISRO की उपलब्धि को केवल rocket technology के रूप में देखना गलत होगा। एक अंतरिक्ष मिशन वास्तव में कई प्रणालियों का एक साथ काम करना है— Propulsion और Avionics और Software और Navigation और Telemetry और Communication और Satellite और Ground Station और Mission Control. इनमें से कोई एक critical subsystem विफल हुआ तो पूरा मिशन खतरे में पड़ सकता है। ISRO ने दशकों में इन प्रणालियों को अलग-अलग विकसित करने के बजाय एक integrated engineering ecosystem में विकसित किया है। यही उसकी institutional strength है। पांचवां, NASA से तुलना- संसाधन बनाम engineering culture: NASA के पास ISRO की तुलना में कहीं अधिक वित्तीय संसाधन, विशाल industrial ecosystem और private-sector partnerships हैं। NASA का मॉडल high-end science, deep-space exploration और अत्यंत जटिल वैज्ञानिक missions पर केंद्रित है। लेकिन ISRO की ताकत अलग है। भारत ने सीमित संसाधनों के भीतर high reliability और mission utility को प्राथमिकता दी। NASA जहां अत्यंत महंगे और technologically ambitious missions कर सकता है, ISRO ने comparatively frugal architecture के माध्यम से ऐसे missions विकसित किए जिनका प्रत्यक्ष उपयोग मौसम, संचार, navigation, agriculture, disaster management और Earth observation में होता है। यह तुलना “कौन बेहतर है?” की नहीं होनी चाहिए। यह दो अलग engineering philosophies की तुलना है। छठा, SpaceX से तुलना: यहां ISRO को सीखना भी होगा: SpaceX ने launch economics को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। Reusable rockets, rapid launch cadence, vertically integrated manufacturing और aggressive testing ने space-launch industry की पारंपरिक सोच को चुनौती दी है। ISRO की ताकत reliability और cost efficiency में रही है, लेकिन आने वाले दशक में उसके सामने बड़ा प्रश्न होगा— क्या वह केवल सफल launches करेगा या launches को mass-scale commercial service में बदल पाएगा? SpaceX की असली चुनौती यही है। भविष्य में भारत को केवल “कम लागत में satellite launch करने वाला देश” नहीं रहना चाहिए। उसे— Reusable Launch Vehicle और Rapid Turnaround और Private Space Industry और High Launch Frequency की दिशा में तेजी से बढ़ना होगा। सातवां, चीन से तुलना- भारत की अगली चुनौती: China ने अंतरिक्ष कार्यक्रम को राष्ट्रीय शक्ति के एक व्यापक instrument में बदल दिया है। उसका space programme launch vehicles, navigation, lunar exploration, space station, Earth observation और military space capabilities तक फैला हुआ है। भारत के लिए चीन की चुनौती केवल rocket technology नहीं है। चुनौती है—Scale। भारत को अब यह सोचना होगा कि क्या उसका space ecosystem अगले 10–20 वर्षों में चीन जैसी industrial scale हासिल कर सकता है? ISRO अकेले इसका उत्तर नहीं दे सकता। इसके लिए private companies, universities, semiconductor industry, materials science, propulsion companies और venture capital ecosystem को साथ आना होगा। आठवां, EOS-05 का महत्व—Space से Earth तक: EOS-05 की सफलता का एक बड़ा संदेश यह है कि space technology का अंतिम लक्ष्य केवल अंतरिक्ष में पहुंचना नहीं है। Earth observation का मतलब है- कृषि निगरानी, आपदा प्रबंधन, शहरी नियोजन, infrastructure monitoring, मौसम और पर्यावरण अध्ययन तथा रणनीतिक applications, यानी satellite की सफलता तभी पूर्ण मानी जाएगी जब उसका data जमीन पर decision-making को बेहतर बनाए। इसीलिए अंतरिक्ष कार्यक्रम को केवल launch statistics से मापना गलत होगा। असली सवाल है— एक सफल launch से भारत की जमीन पर कितनी नई क्षमता पैदा हुई? नौवां, ISRO का सबसे बड़ा competitive advantage—Frugal Engineering: ISRO की “कम लागत” वाली छवि अक्सर गलत तरीके से प्रस्तुत होती है। Frugal engineering का अर्थ घटिया engineering नहीं है। इसका अर्थ है—कम संसाधनों में अधिकतम engineering value। Proven technology का इस्तेमाल, indigenous components, modular architecture, extensive testing और mission objectives की स्पष्ट प्राथमिकता—इन सबने भारतीय space programme को टिकाऊ बनाया। लेकिन अब भारत को frugal engineering के अगले चरण में जाना होगा: Frugal Engineering से Scalable Engineering की ओर, यानी कम लागत के साथ बड़ी संख्या में उत्पादन और launches की क्षमता की ओर। दसवां,. सबसे महत्वपूर्ण पूंजी—Institutional Memory: ISRO की सफलता का शायद सबसे कम चर्चित कारण है institutional memory। एक वैज्ञानिक retire हो जाता है। लेकिन उसका अनुभव organisation में बना रहता है। एक mission समाप्त होता है। लेकिन उसका telemetry data अगली generation के engineers के काम आता है। एक failure होता है। लेकिन उसकी failure report अगली design review का हिस्सा बनती है। यही कारण है कि चार दशक पुरानी engineering knowledge आज के missions में दिखाई देती है। यह किसी भी देश के वैज्ञानिक संस्थान की सबसे मूल्यवान संपत्ति है। ग्यारहवां, ISRO को अब अपनी अगली परीक्षा के लिए तैयार होना होगा: GSLV-F17 की सफलता पर गर्व स्वाभाविक है। लेकिन अंतरिक्ष दौड़ अब बदल चुकी है। अगले दशक में केवल successful launches पर्याप्त नहीं होंगे। भारत को पांच मोर्चों पर आगे बढ़ना होगा— पहला—Reusable Launch Vehicles: Launch cost घटाने के लिए reusability निर्णायक होगी। दूसरा—Private Space Industry: ISRO को हर काम खुद करने वाली संस्था के बजाय technology enabler और national space architect बनना होगा। तीसरा—Semiconductor और advanced materials: Space technology की आत्मनिर्भरता केवल rocket engine से नहीं होगी। चौथा—Human Spaceflight: Gaganyaan भारत की engineering ecosystem की अगली बड़ी परीक्षा है। पांचवां—Deep Space Exploration: चंद्रमा, मंगल और आगे के missions भारत की scientific ambition का वास्तविक पैमाना तय करेंगे। वस्तुतः, ISRO की असली उपलब्धि rocket नहीं, scientific culture है। GSLV-F17/EOS-05 की सफलता को देखकर भारत को केवल यह नहीं कहना चाहिए कि— “हमने एक और rocket सफलतापूर्वक launch कर दिया।” सही निष्कर्ष इससे बड़ा है। भारत ने एक ऐसा scientific institution बनाया है जो—असफल होता है, असफलता का विश्लेषण करता है, अपनी तकनीक सुधारता है, फिर उड़ान भरता है और अगली बार अधिक परिपक्व होकर लौटता है। यही वैज्ञानिक सभ्यता की पहचान है। गौर कीजिए, जहां NASA की ताकत उसका विशाल scientific ecosystem है। वहीं SpaceX की ताकत उसकी disruptive commercial engineering है। जहां चीन की ताकत उसका scale और state-backed industrial mobilisation है। और ISRO की ऐतिहासिक ताकत रही है—सीमित संसाधनों में विश्वसनीय, स्वदेशी और उपयोगी अंतरिक्ष तकनीक विकसित करने की क्षमता। लेकिन 21वीं सदी के दूसरे चरण में भारत के सामने सवाल बदल चुका है। अब सवाल यह नहीं है कि— “क्या भारत अंतरिक्ष में पहुंच सकता है?” वह साबित हो चुका है। अब सवाल है— क्या भारत अंतरिक्ष में ऐसी स्थायी वैज्ञानिक-औद्योगिक शक्ति बन सकता है जो NASA जैसी research depth, SpaceX जैसी commercial speed और चीन जैसा scale—तीनों से सीखकर अपनी स्वतंत्र भारतीय space architecture तैयार कर सके? सच कहूं तो GSLV-F17/EOS-05 की सफलता उस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, मंजिल नहीं। और शायद यही इस उपलब्धि का सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक मूल्यांकन है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 7 Sep 2026 7:33 pm

बच्चों की मौत का जिम्मेदार कौन?

मानवीय हिमाकतों के चलते दिल्ली में और एक बड़ी दर्दनाक घटना घट गई। सत्य निकेतन के मोतीनगर स्थिति एक सालों पुरानी जर्जर हालत की बिल्डिंग मौत बनकर रिमझिम बारिश में भरभराकर गिर पड़ी। घटना की सूचना पाकर पहुंचे बच्चों के परिजनों की चीखें कलेजा फाड़ रही हैं। परिजन बिलख रहे हैं,मांए बदहवास और बेसुध हैं। स्थानीय पुलिस और हुकुमती अधिकारियों का घटनास्थल पर जमघट लगा है। राहत-बचाव कार्य जारी है। घायल बच्चे एम्स के ट्रामा सेंटर भिजवाए जा रहे हैं। लेकिन वहां से कुछ बच्चों के ना रहने की सूचनाएं हर किसी को झकझोर रही हैं। बिल्डिंग में रहने वाले बच्चे तकरीबन बाहरी प्रदेशों के थे। वह अपना उज्जवल भविष्य बनाने की चाह लेकर शिक्षा ग्रहण करने पहुंचे थे। पर, उन्हें क्या पता हादसों का रूप ले चुकी दिल्ली उनकी जान लील लेगी। पढ़ने वाले बच्चों के साथ दिल्ली में आए दिन कोई न कोई हादसा होता ही रहता है। राजेंद्र नगर स्थिति कोचिंग सेंटर की बेसमेंट में पानी भरने से हुई बच्चों की मौत को शायद ही कोई भूल पाया हो। मुखर्जी नगर की कोचिंग सेंटर में आग लगने की घटना को याद करके भी रोंगटे खड़े होते हैं। इस तरह की प्रत्येक घटनाओं पर जिम्मेदार अधिकारियों और नेताओं का हमेशा से एक ही बयान होता है। दोषी बख्शे नहीं जाएंगे, सख्त कार्रवाई होगी? इसके अलावा मृतकों के परिजनों को मुआवजा और घायलों की इलाज कराकर मामला रफा-दफा कर दिया जाता है और जब तक मीडिया में घटना की चर्चाएं होंगी, कार्रवाई के नाम पर सरकारी डंडा पीटा जाता रहेगा। शोर जैसे ही शांत होगा। जांच-पड़ताल ठंडे बस्ते में चली जाएंगी। जमीदोज हुई बिल्डिंग में ज्यादातर विश्वविधायल में पढ़ने वाले और सिविल सर्विसेज की तैयारी करने वाले मात्र 20-22 आयु के बच्चे रहते थे। मालिक ने बिल्डिंग को करीब 30 सालों से पीजी के लिए किसी अन्य को किराए पर दिया हुआ था। बिल्डिंग मानकों के एकदम विरुद्ध निर्मित हुई थी। क्षेत्रफल मात्र 55 गज का था जिसमें 30 कमरे बना रखे थे। बिल्डिंग 40 से 45 साल पुरानी बताई जाती है। जबकि, देखने में इससे भी कहीं पुरानी लगती थी। मालिक पर मुकदमा हुआ है। एकाध महीने बाद उसे जमानत मिल जाएगी। उसी जगह पर फिर से दूसरी बिल्डिंग तान दी जाएगी। इसे भी पढ़ें: दिल्ली में किस बात से बेबस 'ट्रिपल इंजन' सरकार? Satya Niketan हादसे पर Rahul Gandhi का BJP पर वार दिल्ली विश्वविद्यालय क्षेत्र में बने पीजी को लेकर ‘इंडियन जियोटेक्निकल काॅन्फ्रेस’ ने कुछ वर्ष पहले एक रिसर्च किया था जिसमें पाया था कि 85 फीसदी पीजी बच्चों के रहने के लायक नहीं हैं। इस तरह की रिसर्च रिपोर्ट को भी हुकूमतों ने दरकिनार किया। हादसे का शिकार हुई बिल्डिंग के निर्माण में घोर मानवीय हिमाकत का तांडव किया गया था। दिल्ली नगर निगम से लेकर, पुलिस, फायर ब्रिगेड और सरकार के अधिकारियों ने घूस खाया। घटनास्थल साउथ दिल्ली का सत्य निकेतन क्षेत्र है जिसे डूब या निचला-धरातल क्षेत्र भी कहते हैं। वहां बिल्डिंग बनाने की मात्र ढाई मंजिला इजाजत होती है। पर, अधिकारियों ने घूस खाकर पांच मंजिला तक बनवा दिया। दिल दहला देने वाले हादसे को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि बिल्डिंग में अवैध निर्माण होता रहा और जिम्मेदार लोग आंख मूंदकर तमाशबीन बने रहे। इतना ही नहीं, करीब 40 साल पुरानी इस बिल्डिंग में बारिश के दौरान हर साल बेसमेंट जलमग्न हो जाता था, जिससे इसकी नींव कमजोर होती गई और इस साल बजन नहीं सहन कर पाई जिससे भराभरकर ढह गई। हादसे की जिम्मेदारी शायद ही कोई ले? क्योंकि ऐसे हादसे दिल्ली में समय-समय पर होते रहे हैं। कुछ महीनों पहले ही एक अवैध होटल में आग लगने से विदेशी सहित कई लोग जलकर खाक हुए थे। बिल्डिंगों का गिरना तो दिल्ली में आम हो चुका है। दिल्ली में अवैध कॉलोनियों की भरमार है। कहने को तो अवैध हैं लेकिन अधिकारी घूस लेकर उसे चंद मिनटों में वैध कर देते हैं। दिल्ली में इस समय करीब 1731 अवैध काॅलोनियां और 650 से लेकर 675 झुग्गी झोपड़ियां हैं जिनमें ज्यादातर किराएदार ही रहते हैं। दिल्ली ऐसा शहर है जहां देश के सभी प्रांतों के लोग रोजी रोटी कमाने आते हैं। शिक्षा का हब भी दिल्ली है। जहां सिविल सेवा की तैयारियां करने बच्चे दूर-दराज से पहुंचते हैं। 5 लाख बच्चे सालाना सिविल सर्विसेज परीक्षा की तैयारी करने दिल्ली के मुखर्जी नगर आते हैं, रहने के लिए उन्हें पीजी चाहिए होता है। ऐसे में बच्चे सस्ता पीजी खोजते हैं, लेकिन उन्हें क्या पता सस्ता घर उनकी जान ले लेगा? वहीं, करीब 15 लाख बच्चे अन्य प्रदेशों के दिल्ली के विभिन्न कॉलेजों में अध्ययनरत हैं। जहां हादसा हुआ, उस इलाके में तकरीबन घर पीजी में तब्दील हैं। पीजी के नाम पर बड़ा नेक्सस उस इलाके में चलता है जिसका मकान होता है वह खुद पीजी संचालित नहीं करता, बल्कि वह किसी अन्य को ठेके पर दे देता है। ठेकेदार बच्चों को कमरों में भूसे की तरह ठूस देते हैं। जहां ना कोई सुविधा, न मानकों का इस्तेमाल, सिर्फ उन्हें कमाने से मतलब होता है। हादसे वाली बिल्डिंग गिरने का संकेत कुछ वर्षों से दे रही थी? लेकिन ना मालिक ने गौर किया और ना ही अधिकारियों ने? पिछले साल तीसरे माले की सीढ़ियों की छत का उपरी हिस्सा गिरा था जिसे रिपेयर करवाकर संभावित हादसे पर पर्दा डाल दिया गया। बिल्डिंग में 50 के आसपास बच्चे रहते थे। सभी यूपी-बिहार राज्यों से वास्ता रखते हैं। हादसा रविवार को होता है जिस दिन ज्यादातर बच्चे अपने कमरों में थे क्योंकि उस दिन क्लासें और ट्यूशन की छुट्टी थी। शनिवार रात को बच्चे बेखौफ होकर सोए थे, उन्हें नहीं पता था कि अगले दिन उनके साथ क्या होने वाला है। कुछ बच्चों की जाने चली गई है? कई गंभीर रूप से घायल हैं। घटना निसंदेह दुखदायक है। हादसे की जिम्मेदारी अधिकारियों को लेना चाहिए और सीख लेकर भविष्य में इस तरह की बिल्डिंग को पहले ही जमींदोज करने का संकल्प भी लेना चाहिए। डॉ. रमेश ठाकुर सदस्य, राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान (NIPCCD), भारत सरकार!

प्रभासाक्षी 7 Sep 2026 7:28 pm

पीएम मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 साल: हिमाचल भाजपा चलाएगी 'सेवा समर्पण अभियान'

पीएम मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 साल: हिमाचल भाजपा चलाएगी 'सेवा समर्पण अभियान'

समाचार नामा 7 Sep 2026 7:07 pm

'आप' विधायक को गुजरात हाई कोर्ट से राहत, विधानसभा सत्र में हिस्सा लेने के लिए 7 दिन की मिली अंतरिम जमानत

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समाचार नामा 7 Sep 2026 7:01 pm

राजस्थान नगर निकाय चुनाव में 125 सीट जीतेगी भाजपा: विधायक बालमुकुंद आचार्य

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समाचार नामा 7 Sep 2026 6:25 pm

पश्चिम बंगाल: मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी की काफू से मुलाकात, दिग्गज फुटबॉलर ने भेंट की 'खास जर्सी'

कोलकाता, 7 सितंबर (आईएएनएस)। ब्राजील के दिग्गज फुटबॉलर और वर्ल्ड कप विजेता काफू ने सोमवार को नबन्ना में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी से मुलाकात की। इस दौरान उनके साथ शताद्रु दत्ता भी मौजूद थे।

समाचार नामा 7 Sep 2026 6:07 pm

मुख्यमंत्री अधिकारी ने बंगाल में 'एबी पीएम-जेएवाई' की उपलब्धियों पर प्रकाश डाला

मुख्यमंत्री अधिकारी ने बंगाल में 'एबी पीएम-जेएवाई' की उपलब्धियों पर प्रकाश डाला

समाचार नामा 7 Sep 2026 5:29 pm

भारत का नया Strategic Power Centre बनने जा रहा है Great Nicobar, Andaman को परमाणु ताकत से लैस करने की तैयारी

हिंद महासागर में भारत की सामरिक क्षमता को नई धार देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल शुरू हुई है। हम आपको बता दें कि भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) के वैज्ञानिक अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह में स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) स्थापित करने की संभावनाओं का आकलन कर रहे हैं। यह कवायद द्वीपों की बढ़ती बिजली जरूरतों को पूरा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे भारत की एक व्यापक रणनीतिक सोच भी दिखाई देती है, जिसके केंद्र में ग्रेट निकोबार, पूर्वी हिंद महासागर और दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में शामिल मलक्का जलडमरूमध्य है। हम आपको बता दें कि परमाणु ऊर्जा विभाग की एक टीम 4 से 8 सितंबर तक अंडमान-निकोबार के दौरे पर है और द्वीपसमूह के तीनों जिलों में संभावित स्थानों का अध्ययन कर रही है। यह सर्वे ऐसे समय हो रहा है, जब यहां बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा परियोजनाएं आकार ले रही हैं और आने वाले वर्षों में बिजली की मांग तेजी से बढ़ने की संभावना है। BARC की टीम ने अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह के उपराज्यपाल एडमिरल डीके जोशी को प्रस्तावित SMR योजना, संभावित स्थलों और इसकी प्रमुख विशेषताओं की जानकारी भी दी है। इससे संकेत मिलता है कि यह योजना केवल तकनीकी विचार-विमर्श तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे द्वीपसमूह के भविष्य के विकास और भारत के सामरिक ढांचे के साथ जोड़कर देखा जा रहा है। इसे भी पढ़ें: ISRO को कमजोर करने की साजिश हो रही या भारत को Space Superpower बनने की रणनीति पर काम चल रहा? बढ़ती बिजली जरूरतों के बीच SMR का विकल्प दरअसल, अंडमान-निकोबार में प्रस्तावित विशाल परियोजनाओं के कारण ऊर्जा की जरूरत आने वाले समय में कई गुना बढ़ सकती है। विशेष रूप से ग्रेट निकोबार में अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, गहरे पानी वाला बहुउद्देशीय बंदरगाह, टाउनशिप और अन्य बिजली एवं बुनियादी ढांचा परियोजनाएं प्रस्तावित हैं। इसी पृष्ठभूमि में स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टरों का विकल्प महत्वपूर्ण बनकर उभरा है। हम आपको बता दें कि SMR अपेक्षाकृत छोटे आकार के परमाणु रिएक्टर होते हैं, जिन्हें स्थानीय और क्षेत्रीय ऊर्जा जरूरतों के अनुरूप विकसित किया जा सकता है। अंडमान-निकोबार जैसे दूरस्थ द्वीपीय क्षेत्रों में स्थिर और दीर्घकालिक बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिहाज से इनकी उपयोगिता महत्वपूर्ण मानी जा रही है। लेकिन इस पूरी कहानी का एक दूसरा और अधिक व्यापक पहलू भी है। परमाणु ऊर्जा के विस्तार के साथ-साथ भविष्य में परमाणु ईंधन की उपलब्धता भी एक महत्वपूर्ण रणनीतिक प्रश्न बनती जा रही है। चीन की समुद्र से यूरेनियम निकालने की नई तकनीक इसी बीच चीन से आई एक नई वैज्ञानिक उपलब्धि ने वैश्विक परमाणु ऊर्जा की बहस को एक नया आयाम दिया है। चीनी शोधकर्ताओं ने एक ऐसी नई सामग्री विकसित करने का दावा किया है, जो समुद्री जल से यूरेनियम निकालने में अमेरिकी ऊर्जा विभाग द्वारा पहले निर्धारित लक्ष्य से आठ गुना अधिक क्षमता दिखाती है। चीन के क़िंगदाओ स्थित चीनी विज्ञान अकादमी से जुड़े शोधकर्ताओं ने प्राकृतिक समुद्री जल के नमूनों से इस सामग्री के प्रति ग्राम से 50.4 मिलीग्राम तक यूरेनियम प्राप्त करने का दावा किया है। इसकी तुलना में अमेरिकी मानक लगभग 6 मिलीग्राम प्रति ग्राम था। इस नई सामग्री को PhosCage नाम दिया गया है। यह स्पंज जैसी आणविक संरचना है, जिसमें फॉस्फेट समूह मौजूद हैं। ये रासायनिक रूप से यूरेनियम को बांधने की क्षमता रखते हैं। शोधकर्ताओं ने बाद में इस सामग्री को मिलीमीटर आकार के छोटे मोतियों या बीड्स में बदल दिया, ताकि इसे प्रयोगशाला के बाहर भी अधिक आसानी से इस्तेमाल और वापस प्राप्त किया जा सके। इन बीड्स ने प्रति ग्राम सामग्री से 22.55 मिलीग्राम तक यूरेनियम निकाला और सात बार दोबारा इस्तेमाल किए जाने के बाद भी प्रभावी बने रहे। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह तकनीक समुद्री जल से यूरेनियम निकालने के लिए एक नया रास्ता खोल सकती है और भविष्य में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाले अधिक प्रभावी अवशोषक पदार्थों के विकास की नींव रख सकती है। समुद्र का यूरेनियम क्यों है इतना महत्वपूर्ण? परमाणु ऊर्जा का विस्तार करने वाले देशों के लिए यूरेनियम की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती है। चीन के मामले में यह चुनौती विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसका परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम घरेलू यूरेनियम उत्पादन की तुलना में कहीं तेजी से बढ़ रहा है। विश्व परमाणु संघ के आंकड़ों के अनुसार, चीन ने 2024 में घरेलू खदानों से लगभग 1,600 टन यूरेनियम का उत्पादन किया, जबकि उसके परमाणु रिएक्टरों की जरूरत लगभग 13,000 टन थी। इस बड़े अंतर के कारण चीन को यूरेनियम के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। यहीं समुद्र एक संभावित वैकल्पिक संसाधन के रूप में सामने आता है। हम आपको बता दें कि दुनिया में जमीन पर ज्ञात यूरेनियम संसाधन लगभग 7.9 मिलियन टन माने जाते हैं, जबकि महासागरों में अनुमानित रूप से करीब 4.5 अरब टन यूरेनियम मौजूद है। भूवैज्ञानिक समय के दौरान चट्टानों से बारिश के पानी द्वारा यूरेनियम बहकर नदियों के माध्यम से समुद्रों तक पहुंचता रहा है, जिसके कारण समुद्री जल में इसकी विशाल मात्रा जमा हो गई। समस्या यह है कि समुद्र में यूरेनियम की सांद्रता बेहद कम है। एक टन समुद्री जल में केवल लगभग 3.3 मिलीग्राम यूरेनियम पाया जाता है। इसका अर्थ है कि व्यावसायिक स्तर पर बड़ी मात्रा में यूरेनियम निकालने के लिए अत्यधिक मात्रा में समुद्री जल को संसाधित करना होगा। इसके अलावा समुद्री जल में यूरेनियम के साथ कई अन्य घुले हुए तत्व भी मौजूद रहते हैं, जिससे इसे अलग करना तकनीकी रूप से मुश्किल हो जाता है। वैनाडियम की चुनौती और चीन की नई सफलता इसके अलावा, समुद्री जल से यूरेनियम निकालने में वैनाडियम एक बड़ी चुनौती माना जाता रहा है। इसका कारण यह है कि वैनाडियम भी उन्हीं रासायनिक स्थानों से जुड़ सकता है, जिनका उपयोग यूरेनियम को पकड़ने के लिए किया जाता है। अमेरिका में इस चुनौती से निपटने के लिए वर्षों तक शोध किया गया। ओक रिज नेशनल लेबोरेटरी ने विशेष प्रकार के फाइबर विकसित किए, जबकि पैसिफिक नॉर्थवेस्ट नेशनल लेबोरेटरी ने प्राकृतिक रूप से बहने वाले समुद्री जल में इन तकनीकों का परीक्षण किया। 2016 तक अमेरिका की सबसे प्रभावी अवशोषक सामग्री समुद्री जल के लंबे संपर्क के बाद प्रति ग्राम लगभग 6 मिलीग्राम यूरेनियम निकालने में सक्षम थी। हालांकि यह तकनीक पारंपरिक यूरेनियम खनन की तुलना में काफी महंगी बनी रही और अमेरिकी ऊर्जा विभाग ने 2018 में कार्यक्रम समाप्त होने के बाद इस दिशा में अपनी सक्रियता काफी हद तक कम कर दी। उधर, चीन के क़िंगदाओ स्थित शोधकर्ताओं का दावा है कि उनकी नई सामग्री ने इस चुनौती के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है। दो अलग-अलग वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया कि बीड्स आधारित यह सामग्री कई धातुओं की मौजूदगी के बावजूद यूरेनियम को प्राथमिकता के साथ पकड़ने में सक्षम रही। विशेष रूप से यह वैनाडियम की तुलना में यूरेनियम को अधिक प्रभावी ढंग से अलग करने में सक्षम बताई गई है। हालांकि इस तकनीक की सीमाएं भी हैं। अभी यह प्रयोगशाला स्तर पर ही है। शोधकर्ताओं ने क़िंगदाओ के तट से समुद्री जल लेकर लगभग 25 लीटर पानी को प्रयोगशाला आधारित फ्लो सिस्टम से गुजारा था। इसका परीक्षण खुले समुद्र में नहीं किया गया है, जहां लहरें, समुद्री धाराएं, जैविक गतिविधियां और बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियां पूरी प्रक्रिया को अधिक जटिल बना सकती हैं। इसके अलावा, अभी तक यह भी स्पष्ट नहीं है कि समुद्र से प्राप्त यूरेनियम की उत्पादन लागत कितनी होगी। शोधकर्ताओं का अगला लक्ष्य इस तकनीक को बड़े स्तर पर विकसित करना और समुद्री जल से यूरेनियम निकालने की कुल लागत कम करना है। ग्रेट निकोबार: विकास परियोजना से कहीं अधिक उधर, भारत के संदर्भ में अंडमान-निकोबार में SMR की संभावनाओं का अध्ययन ऐसे समय हो रहा है, जब ग्रेट निकोबार एक विशाल विकास और रणनीतिक परियोजना के केंद्र के रूप में उभर रहा है। ग्रेट निकोबार परियोजना के तहत गलाथिया बे में एक इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, एक ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, टाउनशिप और उससे जुड़ा ऊर्जा एवं अन्य बुनियादी ढांचा विकसित करने की योजना है। सरकार इस परियोजना को रणनीतिक, रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण बता चुकी है। इसका उद्देश्य केवल व्यापार और कनेक्टिविटी बढ़ाना नहीं है। इसके जरिए भारत अंडमान सागर और दक्षिण-पूर्व एशिया में अपनी उपस्थिति मजबूत करना चाहता है और अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों के निकट एक बड़े समुद्री केंद्र का विकास करना चाहता है। देखा जाये तो ग्रेट निकोबार की भौगोलिक स्थिति इसे एक सामान्य विकास परियोजना से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बना देती है। भारत यहां अपनी आर्थिक पहुंच बढ़ाने के साथ-साथ समुद्री गतिविधियों की निगरानी और पूर्वी हिंद महासागर में अपनी सामरिक क्षमता को भी मजबूत करना चाहता है। यहीं से यह कहानी हिंद महासागर में बदलते शक्ति-संतुलन तक पहुंचती है। दरअसल, पूर्वी हिंद महासागर में चीन की बढ़ती सक्रियता के बीच ग्रेट निकोबार भारत की रणनीतिक तैयारियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनता जा रहा है। एक मजबूत और स्थायी रक्षा उपस्थिति भारत को समुद्री मार्गों की निगरानी और सुरक्षा में मदद कर सकती है तथा हिंद महासागर में विदेशी शक्तियों की बढ़ती मौजूदगी का मुकाबला करने की क्षमता भी बढ़ा सकती है। इस पूरी रणनीति के केंद्र में है मलक्का जलडमरूमध्य। हम आपको बता दें कि दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री चोकपॉइंट्स में शामिल मलक्का जलडमरूमध्य हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के बीच वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति का प्रमुख मार्ग है। भारी मात्रा में अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाज और ऊर्जा संसाधन इसी रास्ते से गुजरते हैं। ग्रेट निकोबार की भौगोलिक स्थिति भारत को मलक्का जलडमरूमध्य के पश्चिमी प्रवेश क्षेत्र के करीब एक महत्वपूर्ण रणनीतिक लाभ प्रदान करती है। ऐसे में यहां विकसित होने वाला बंदरगाह, हवाई अड्डा, ऊर्जा ढांचा और रक्षा उपस्थिति मिलकर भारत की समुद्री क्षमता को नई ताकत दे सकते हैं। INS Baaz और त्रि-सेवा कमान की अहमियत कैंपबेल बे स्थित INS Baaz की सामरिक भूमिका भी इसी संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण है। यह नौसैनिक एयर स्टेशन मलक्का जलडमरूमध्य और सिक्स डिग्री चैनल के महत्वपूर्ण समुद्री क्षेत्रों पर नजर रखने की दृष्टि से अहम माना जाता है। पूरे अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह की सामरिक अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां भारत की एकमात्र एकीकृत त्रि-सेवा कमान यानि अंडमान और निकोबार कमान स्थापित है। थलसेना, नौसेना और वायुसेना की संयुक्त कमान का गठन इस द्वीपसमूह की उस विशेष भौगोलिक स्थिति को देखते हुए किया गया था, जो अंतरराष्ट्रीय समुद्री संपर्क मार्गों के बेहद करीब स्थित है। द्वीपों की भौगोलिक स्थिति भारत को अपने समुद्री हितों की रक्षा करने और संभावित खतरों पर नजर रखने की क्षमता प्रदान करती है। यही कारण है कि अंडमान-निकोबार कमान भारत की व्यापक ‘एक्ट ईस्ट’ रणनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ऊर्जा, यूरेनियम और समुद्री शक्ति का नया समीकरण BARC का SMR सर्वे इस पूरी रणनीतिक तस्वीर में एक नया आयाम जोड़ता है। यदि अंडमान-निकोबार में छोटे मॉड्यूलर परमाणु रिएक्टर स्थापित होते हैं, तो वे तेजी से विकसित हो रहे नागरिक और रणनीतिक ढांचे को एक विश्वसनीय ऊर्जा आधार प्रदान कर सकते हैं। बंदरगाह, हवाई अड्डे, टाउनशिप और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए स्थिर बिजली उपलब्ध कराने के साथ SMR द्वीपों की ऊर्जा आत्मनिर्भरता और लचीलापन भी बढ़ा सकते हैं। वहीं चीन का समुद्री जल से यूरेनियम निकालने का नया प्रयोग यह संकेत देता है कि भविष्य में महासागर केवल व्यापार और सामरिक प्रतिस्पर्धा के केंद्र नहीं रहेंगे, बल्कि परमाणु ऊर्जा के लिए ईंधन संसाधनों की नई होड़ का भी मैदान बन सकते हैं। समुद्रों में अनुमानित 4.5 अरब टन यूरेनियम मौजूद होने का अनुमान परमाणु ऊर्जा के भविष्य के लिए एक बेहद आकर्षक संभावना प्रस्तुत करता है। हालांकि इसे व्यावसायिक रूप से निकालना अभी भी एक कठिन और महंगी तकनीकी चुनौती है। यदि भविष्य में ऐसी तकनीकें आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनती हैं, तो परमाणु ऊर्जा के लिए ईंधन आपूर्ति का वैश्विक समीकरण बदल सकता है। चीन जैसे देशों के लिए इससे आयातित यूरेनियम पर निर्भरता कम करने का रास्ता खुल सकता है। भारत के लिए क्या मायने? भारत के लिए अंडमान-निकोबार में परमाणु ऊर्जा की संभावनाएं और हिंद महासागर की सामरिक स्थिति एक-दूसरे से अलग मुद्दे नहीं हैं। एक तरफ SMR जैसी तकनीकें दूरस्थ द्वीपों को विश्वसनीय ऊर्जा उपलब्ध करा सकती हैं। दूसरी तरफ यही ऊर्जा तेजी से विकसित हो रहे बंदरगाहों, हवाई अड्डों और अन्य महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को मजबूत आधार दे सकती है। ग्रेट निकोबार में बनने वाला समुद्री और हवाई ढांचा भारत की आर्थिक और सामरिक उपस्थिति को मजबूत कर सकता है। मलक्का जलडमरूमध्य के निकट भारत की भौगोलिक स्थिति उसे वैश्विक समुद्री गतिविधियों पर बेहतर निगरानी का अवसर देती है। बहरहाल, अंडमान-निकोबार में SMR की संभावनाओं का यह सर्वे केवल एक परमाणु ऊर्जा परियोजना की शुरुआती कवायद नहीं दिखाई देता। यह उस बड़े भारतीय रणनीतिक नक्शे का हिस्सा है, जिसमें विकास, ऊर्जा, समुद्री व्यापार, राष्ट्रीय सुरक्षा और हिंद महासागर में बदलता शक्ति-संतुलन एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। साथ ही चीन का समुद्री जल से यूरेनियम निकालने का नया शोध यह भी दिखाता है कि परमाणु ऊर्जा की भविष्य की प्रतिस्पर्धा केवल जमीन पर मौजूद खदानों तक सीमित नहीं रह सकती। महासागर भी भविष्य में परमाणु ईंधन के एक संभावित विशाल स्रोत के रूप में उभर सकते हैं। और इस पूरे भू-रणनीतिक नक्शे पर भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बिंदुओं में से एक है ग्रेट निकोबार। यह एक ऐसा द्वीप है, जहां भारत की नजर केवल विकास परियोजनाओं पर नहीं है, बल्कि समुद्र के उस विशाल रास्ते पर भी है, जिससे होकर दुनिया के व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 7 Sep 2026 5:28 pm

Rajasthan में 'गुटबाजी राजनीति' के माहिर खिलाड़ी Sachin Pilot आखिर कैसे Punjab Congress को एकजुट कर पाएंगे?

राजस्थान में एक समय बगावत का रायता फैलाने वाले सचिन पायलट आखिर पंजाब कांग्रेस को एकजुट कैसे रख पाएंगे? यह सवाल इसलिए अहम है क्योंकि राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट की खुली जंग का खामियाजा कांग्रेस को विधानसभा चुनावों में उठाना पड़ा था। विडंबना देखिए, उस समय पंजाब के वरिष्ठ नेता सुखजिंदर सिंह रंधावा राजस्थान कांग्रेस के प्रभारी थे। अब भूमिकाएं बदल चुकी हैं। सचिन पायलट पंजाब कांग्रेस के प्रभारी बन गए हैं और रंधावा पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वारिंग के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं तथा चन्नी गुट के साथ खड़े हैं। ऐसे में पायलट के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि जो नेता अपने गृह प्रदेश में गुटबाजी की आग को नहीं बुझा पाया, वह पंजाब में बिखरी कांग्रेस को कैसे एकजुट करेगा? हम आपको बता दें कि कांग्रेस हाईकमान ने एआईसीसी महासचिव सचिन पायलट को भूपेश बघेल की जगह पंजाब का प्रभारी बनाकर भेजा है। भूपेश बघेल को असम की जिम्मेदारी दी गई है। पंजाब में 2027 की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं और कांग्रेस के पास अंदरूनी कलह सुलझाने के लिए बहुत अधिक समय नहीं है। ऐसे में 49 वर्षीय सचिन पायलट की नियुक्ति को कांग्रेस की ओर से एक बड़े राजनीतिक प्रयोग के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन सवाल उठता है कि राजस्थान का कभी का ‘बागी’ क्या अब पंजाब में ‘शांतिदूत’ की भूमिका निभा पाएगा? इसे भी पढ़ें: Uttar Pradesh समेत 5 States Assembly Elections की तारीखों को लेकर सामने आया बड़ा अपडेट देखा जाये तो सचिन पायलट का अपना राजनीतिक इतिहास इस जिम्मेदारी को और दिलचस्प बनाता है। 2014 में राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने संगठन को खड़ा किया और 2018 में पार्टी को सत्ता तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन सत्ता मिलते ही अशोक गहलोत और पायलट के बीच नेतृत्व, संगठन और राजनीतिक भविष्य को लेकर संघर्ष शुरू हो गया। जुलाई 2020 में यह संघर्ष खुली बगावत में बदल गया। पायलट अपने समर्थक विधायकों के साथ अलग हो गए, राज्य सरकार संकट में आई और उन्हें उपमुख्यमंत्री तथा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटा दिया गया। सचिन पायलट ने तब भाजपा में जाने से साफ इंकार किया था और कहा था कि उनकी लड़ाई कांग्रेस से नहीं, बल्कि गहलोत से है। वह कांग्रेस में रहे, लेकिन गहलोत-पायलट की प्रतिद्वंद्विता वर्षों तक पार्टी के लिए सिरदर्द बनी रही। बाद में सार्वजनिक तौर पर रिश्तों में नरमी दिखाई गई। 2025 में गहलोत ने यहां तक कहा कि “हम कब अलग थे?” लेकिन राजनीतिक इतिहास इतनी आसानी से मिटता नहीं। पायलट और गहलोत के बीच मतभेद खत्म होने के दावे के बावजूद समय-समय पर दोनों खेमों की दूरियां सामने आती रही हैं। यही नहीं, 2028 में होने वाले राजस्थान विधानसभा चुनावों से पहले गहलोत-पायलट की प्रतिस्पर्धा फिर तेज हो सकती है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि जिस नेता ने अपने ही प्रदेश में मजबूत राजनीतिक गुट खड़ा किया और गुटबाजी को हवा दी, वह दूसरे प्रदेश में गुटबाजी खत्म करने का कौन-सा सफल फार्मूला अपनाएगा? हालांकि पंजाब में पायलट के अनुभव का दूसरा पहलू भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने स्वयं देखा है कि अनसुलझी नेतृत्व की लड़ाई किसी राज्य इकाई को कितना नुकसान पहुंचा सकती है। शायद इसी अनुभव के कारण हाईकमान उन्हें एक ‘ऑर्गेनाइजेशनल फिक्सर’ के तौर पर आजमा रहा है। उधर, पंजाब कांग्रेस में संकट गंभीर है। पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के नेतृत्व वाला एक गुट राजा वारिंग को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने की मांग करता रहा है। हाईकमान ने जुलाई में वारिंग को पद पर बनाए रखा और चन्नी को चुनाव अभियान समिति की कमान दी, लेकिन इससे असंतोष खत्म नहीं हुआ। विपक्ष के नेता प्रताप सिंह बाजवा भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं बताए जाते। सुखजिंदर सिंह रंधावा और विजय इंदर सिंगला जैसे नेता भी वारिंग विरोधी खेमे में रहे हैं। भूपेश बघेल इस खींचतान को खत्म नहीं कर पाए। उन पर वारिंग के ज्यादा करीब होने और निष्पक्षता बनाए रखने में विफल रहने के आरोप लगे। उनके खिलाफ पंजाब के कुछ इलाकों में पोस्टर तक लगाए गए। अब पायलट की नियुक्ति को वारिंग विरोधी नेताओं को संतुष्ट करने की कोशिश माना जा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि वारिंग, चन्नी और रंधावा, सभी ने पायलट की नियुक्ति का स्वागत किया है। लेकिन असली परीक्षा स्वागत संदेशों से नहीं होगी। सवाल यह है कि क्या चन्नी वारिंग को हटाने की मांग छोड़ेंगे? क्या बाजवा, रंधावा और अन्य वरिष्ठ नेता एक मंच पर वास्तविक रूप से साथ आएंगे? इसके साथ ही राहुल गांधी का प्रस्तावित पंजाब बस दौरा, सचिन पायलट की पहली बड़ी परीक्षा हो सकता है। पायलट को केवल नेताओं की बैठकें नहीं करानी होंगी। उन्हें गुटों के बीच भरोसा पैदा करना होगा, टिकट वितरण को नए संघर्ष का कारण बनने से रोकना होगा और महत्वाकांक्षी नेताओं को समझाना होगा कि एक-दूसरे को कमजोर करने से अधिक नुकसान कांग्रेस का होगा। 2027 में कांग्रेस का मुकाबला भगवंत मान के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी सरकार से है। भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के संभावित गठजोड़ से मुकाबला और जटिल हो सकता है। क्षेत्रीय राजनीतिक ताकतें भी समीकरण बदल सकती हैं। इसलिए पंजाब सचिन पायलट के लिए महज एक नई जिम्मेदारी नहीं है। यह उनकी राजनीतिक परिपक्वता की सबसे कठिन परीक्षा है। राजस्थान में वह कभी कांग्रेस के भीतर बगावत का चेहरा बने थे, पंजाब में उन्हें समझौते और एकजुटता का चेहरा बनना है। देखना होगा कि क्या पायलट अपने अतीत से सबक लेकर पंजाब कांग्रेस को जोड़ पाएंगे, या पंजाब की गुटबाजी साबित करेगी कि कांग्रेस के भीतर कुछ दरारें इतनी गहरी हैं जिन्हें कोई भी प्रभारी भर नहीं सकता? -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 7 Sep 2026 5:24 pm

अन्ना हजारे की तबीयत पहले से काफी बेहतर, बॉम्बे हॉस्पिटल के डॉक्टर गौतम भंसाली ने दिया अपडेट

मुंबई, 7 सितंबर (आईएएनएस)। बॉम्बे हॉस्पिटल के डॉक्टर डॉ. गौतम भंसाली ने हॉस्पिटल में भर्ती सोशल एक्टिविस्ट अन्ना हजारे के हेल्थ को लेकर अपडेट दिया है। उन्होंने सोमवार को समाचार एजेंसी आईएएनएस से बात करते हुए कहा कि अन्ना हजारे की तबीयत में पहले से सुधार हो रहा है। उनको बॉम्बे हॉस्पिटल में भर्ती किए लगभग 6 दिन हो गए हैं। ट्रीटमेंट को वह अच्छा रेस्पॉन्स कर रहे हैं।

समाचार नामा 7 Sep 2026 4:29 pm

सहारनपुर मस्जिद का मामला एक कानूनी लड़ाई, न्यायालय पर पूरा भरोसा : इमरान मसूद

सहारनपुर मस्जिद का मामला एक कानूनी लड़ाई, न्यायालय पर पूरा भरोसा : इमरान मसूद

समाचार नामा 7 Sep 2026 2:38 pm

फारूक अब्दुल्ला के बयान पर भड़के विवेक बाली, बोले- यह हिंदू अधिकारियों को भी घाटी से निकालने की साजिश

फारूक अब्दुल्ला के बयान पर भड़के विवेक बाली, बोले- यह हिंदू अधिकारियों को भी घाटी से निकालने की साजिश

समाचार नामा 7 Sep 2026 2:38 pm

दिल्ली में जुटे Congress के एससी-एसटी सांसद, 3 प्रमुख नेताओं के शामिल न होने से गरमाई राजनीति

दिल्ली में जुटे Congress के एससी-एसटी सांसद, 3 प्रमुख नेताओं के शामिल न होने से गरमाई राजनीति

समाचार नामा 7 Sep 2026 2:35 pm

जेएसएससी-सीजीएल मामले में पूर्व डीजीपी की भूमिका संदिग्ध, कार्रवाई से हिचक रही हेमंत सरकार : बाबूलाल मरांडी

जेएसएससी-सीजीएल मामले में पूर्व डीजीपी की भूमिका संदिग्ध, कार्रवाई से हिचक रही हेमंत सरकार : बाबूलाल मरांडी

समाचार नामा 7 Sep 2026 2:25 pm

पुरानी 'साइकिल' में सपा ने लगाये नए 'राजनीतिक पुर्जे', अखिलेश की ‘शार्प’ और डिंपल की ‘सॉफ्ट’ राजनीति क्या गुल खिलाएगी?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनाव सिर्फ वोटों की गिनती से नहीं जीते जाते। यहां जाति, जज्बात, चेहरा और संदेश, इन चारों का सही तालमेल सत्ता तक पहुंचने का रास्ता बनाता है। 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर जरूर है, लेकिन सियासी बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव भी अपनी पुरानी साइकिल में नए राजनीतिक पुर्जे लगाने में जुटे हैं। मकसद सपा को उसकी पुरानी छवि से बाहर निकालना है, जिसे विरोधी लंबे समय से एक खास सामाजिक दायरे और सत्ता में कथित तौर पर आक्रामक राजनीति से जोड़ते रहे हैं। अखिलेश की नई रणनीति में जातीय समीकरण भी है, हिंदू प्रतीक भी हैं, पीडीए का विस्तार भी है और सबसे दिलचस्प बात यह है कि डिंपल यादव के रूप में एक नया और अपेक्षाकृत शांत चेहरा भी है। डिंपल की बढ़ती भूमिका और ‘सॉफ्ट पॉलिटिक्स’ देखा जाये तो अब तक डिंपल यादव की राजनीति अपेक्षाकृत संयमित और सीमित सार्वजनिक दायरे में दिखाई देती रही है। लेकिन हाल के समय में उनकी सक्रियता बढ़ी है। संसद से लेकर राजनीतिक मुद्दों तक उनकी मौजूदगी ज्यादा मुखर हुई है। यही बदलाव महज सामान्य राजनीतिक सक्रियता नहीं, बल्कि सपा की व्यापक रणनीति का एक अहम हिस्सा भी माना जा सकता है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में अक्सर आवाज जितनी ऊंची होती है, राजनीति उतनी ही असरदार दिखाई जाती है। आरोप-प्रत्यारोप, तीखे बयान और मंचीय हमले यहां आम बात हैं। ऐसे माहौल में डिंपल की शैली अलग दिखाई देती है। यानि कम शोर, संयमित भाषा, सहज व्यवहार और टकराव की बजाय संवाद का अंदाज। यही वजह है कि सपा के लिए उनका चेहरा राजनीतिक रूप से उपयोगी हो सकता है। कह सकते हैं कि अखिलेश यादव की राजनीति में धार वही है, लेकिन उसके साथ डिंपल की राजनीति का एक ‘सॉफ्ट टच’ जोड़ा जा रहा है। इसे भी पढ़ें: ‘पराये धन’ को अपना बनाना भाजपा से बेहतर कोई नहीं जानता... ‘पीडीए’ तंज पर अखिलेश यादव का तीखा पलटवार क्या डिंपल यादव हो सकती हैं मुख्यमंत्री पद का चेहरा? यहीं से एक बड़ा सियासी सवाल निकलता है कि क्या 2027 के विधानसभा चुनाव में डिंपल यादव समाजवादी पार्टी की मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार हो सकती हैं? फिलहाल सपा की राजनीति का केंद्रीय चेहरा अब भी अखिलेश यादव ही हैं। लेकिन राजनीति में हर बात की शुरुआत घोषणा से नहीं होती। कई बार किसी नेता की बढ़ती सक्रियता, बदलती भूमिका और सार्वजनिक स्वीकार्यता ही भविष्य के संकेत देने लगती है। डिंपल की कार्यशैली अखिलेश से अलग है। अखिलेश जहां सीधे राजनीतिक हमले करने और भाजपा के खिलाफ आक्रामक विपक्षी राजनीति का चेहरा हैं, वहीं डिंपल अपेक्षाकृत शांत और संतुलित दिखाई देती हैं। उनकी यही अलग पहचान भविष्य में सपा के लिए एक अतिरिक्त राजनीतिक पूंजी बन सकती है। इसके अलावा, उत्तर प्रदेश में अब कोई भी पार्टी महिलाओं को नजरअंदाज करने का जोखिम नहीं लेना चाहती। भाजपा अपनी महिला-केंद्रित योजनाओं और लाभार्थी राजनीति के जरिए महिला वोटरों पर लगातार पकड़ मजबूत करने की कोशिश करती रही है। दूसरी तरफ विपक्ष भी समझ चुका है कि सिर्फ जातीय समीकरणों से चुनावी लड़ाई पूरी नहीं होती। ‘आधी आबादी’ अब सिर्फ नारा नहीं, चुनावी समीकरण का बड़ा हिस्सा है। ऐसे में डिंपल यादव सपा के लिए एक प्रभावी महिला चेहरा बन सकती हैं। उनकी शांत और सहज छवि उन महिला मतदाताओं तक पहुंच बनाने में मदद कर सकती है, जो सपा को अब तक मुख्य रूप से पुरुष नेतृत्व वाली पार्टी के रूप में देखती रही हैं। अगर पार्टी महिलाओं के लिए ठोस राजनीतिक कार्यक्रम और भरोसेमंद संदेश के साथ मैदान में उतरती है, तो डिंपल उस अभियान का स्वाभाविक चेहरा बन सकती हैं। वैसे यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि वह मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार बनेंगी, लेकिन इतना जरूर है कि अगर सपा को 2027 में महिला मतदाताओं के बीच अपनी नई जमीन तैयार करनी है, तो डिंपल की भूमिका केवल एक सांसद या स्टार प्रचारक तक सीमित नहीं रह सकती। यूपी की राजनीति में जो नेता धीरे-धीरे अपनी जगह बनाता है, वह कई बार अचानक बड़े समीकरण का केंद्र बन जाता है। डिंपल के मामले में भी यही संभावना राजनीतिक चर्चा को दिलचस्प बनाती है। 2027 और सपा की नई सोशल इंजीनियरिंग अखिलेश यादव अच्छी तरह जानते हैं कि 2024 में बने राजनीतिक माहौल को 2027 की सत्ता तक पहुंचाने के लिए सिर्फ पुराने समीकरण काफी नहीं होंगे। दलित राजनीति की जमीन में बदलाव आया है, पिछड़ों के भीतर भी कई परतें हैं और सवर्ण मतदाताओं को लेकर नई राजनीतिक संभावनाएं तलाशनी पड़ रही हैं। यहीं से सामने आता है पीडीए का विस्तार। पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए सपा की नई राजनीतिक रणनीति का केंद्र रहा है। लेकिन अब अखिलेश ने इस राजनीतिक फार्मूले में एक नया मोड़ दिया है। ‘पी’ की व्याख्या में पंडितों यानी ब्राह्मणों को भी जोड़ने की कोशिश की गई है। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी भले बहुत बड़ी न हो, लेकिन उनका राजनीतिक प्रभाव हमेशा संख्या से ज्यादा रहा है। गांव की चौपाल हो या शहर की राजनीतिक बैठक, कई इलाकों में ब्राह्मण मतदाता चुनावी माहौल और समीकरण दोनों पर असर डालता है। बसपा ने 2007 में दलित-ब्राह्मण सामाजिक समीकरण को मजबूत करके सत्ता का रास्ता बनाया था। बाद में भाजपा के उभार और नरेंद्र मोदी की राजनीति के साथ बड़ी संख्या में ब्राह्मण मतदाता भाजपा के साथ मजबूती से जुड़ गए। अब अखिलेश उसी राजनीतिक जमीन में संभावनाएं तलाश रहे हैं। त्रिशूल, शिव और समाजवाद का नया प्रयोग अखिलेश यादव की राजनीति का एक और महत्वपूर्ण बदलाव हिंदू प्रतीकों को लेकर दिखाई देता है। वह अब केवल पुराने समाजवादी ढांचे में सिमटकर राजनीति नहीं करना चाहते। उन्हें मालूम है कि 2027 का उत्तर प्रदेश 1990 के दशक का उत्तर प्रदेश नहीं है। इसलिए सपा प्रमुख हिंदू धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों से दूरी बनाने की बजाय उन्हें अपनी राजनीतिक भाषा का हिस्सा बना रहे हैं। सनातन धर्म की चर्चा, हनुमान चालीसा का पाठ, ब्राह्मणों तक पहुंच और धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों में सक्रिय भागीदारी, यह सब एक व्यापक राजनीतिक संदेश का हिस्सा है। जनेश्वर मिश्र की जयंती के मौके पर त्रिशूल और शिव स्तुति के बीच ब्राह्मणों तक पहुंचने का संदेश इसी नई राजनीति की तस्वीर है। इटावा में केदारेश्वर महादेव मंदिर के निर्माण को भी इसी बड़े राजनीतिक संदर्भ में देखा जा सकता है। संदेश साफ है कि सपा सामाजिक न्याय की बात भी करेगी और हिंदू समाज के साथ संवाद भी बनाएगी। वैसे यह भाजपा के हिंदुत्व की सीधी नकल नहीं, बल्कि अपने लिए अलग राजनीतिक जगह बनाने की कोशिश है। लेकिन असली पेंच भी यही है। उत्तर प्रदेश में समीकरण बनाना आसान है मगर उन्हें मतदान केंद्र तक पहुंचाना मुश्किल है। अखिलेश यादव की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि ब्राह्मणों को जोड़ने की कोशिश में पीडीए का मूल आधार कमजोर नहीं हो। दूसरी चुनौती सपा की पुरानी राजनीतिक छवि है। भाजपा लगातार सपा के पिछले शासनकाल को कानून-व्यवस्था और कथित दबंग राजनीति के मुद्दे पर घेरती रही है। ऐसे में डिंपल यादव की बढ़ती भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। उनका संयमित और सहज व्यक्तित्व सपा की छवि को नया आयाम दे सकता है। लेकिन यूपी की राजनीति में सिर्फ मुस्कुराहट से चुनाव नहीं जीते जाते। सवाल यह भी है कि क्या ब्राह्मण मतदाता वास्तव में भाजपा से दूर होंगे? क्या दलितों का बड़ा हिस्सा सपा की तरफ आएगा? क्या पिछड़ों के बीच पीडीए की पकड़ और मजबूत होगी? और क्या महिला मतदाता सपा को एक नए नजरिए से देखेंगे? सवाल यह भी है कि क्या समाजवादी पार्टी अपनी पुरानी पहचान से बाहर निकलकर सचमुच एक व्यापक सामाजिक गठबंधन तैयार कर पाएगी? देखा जाये तो अखिलेश के सामने एक और चुनौती विपक्षी राजनीति के भीतर भी है। अगर सपा एक तरफ सवर्णों को जोड़ने की कोशिश करे और दूसरी तरफ उसके राजनीतिक सहयोगियों की भाषा उसी वर्ग को असहज करे, तो समीकरण बनने से पहले ही बिगड़ सकते हैं। यूपी में राजनीति का यही असली गणित है कि एक जाति को जोड़ो तो दूसरी की नाराजगी का डर, एक वर्ग को साधो तो दूसरे को संदेश देने की चुनौती। फिलहाल इतना साफ है कि अखिलेश यादव 2027 के लिए सिर्फ चुनाव नहीं लड़ रहे, बल्कि समाजवादी पार्टी का नया संस्करण तैयार कर रहे हैं। उसमें पुराना समाजवाद है, नया पीडीए है, ब्राह्मणों के लिए जगह है, हिंदू प्रतीकों की स्वीकार्यता है और महिला मतदाताओं तक पहुंचने के लिए डिंपल यादव जैसा एक अलग चेहरा भी है। यहां सवाल उठता है कि क्या ‘शार्प’ अखिलेश और ‘सॉफ्ट’ डिंपल का यह राजनीतिक संतुलन 2027 में सपा के लिए नई ताकत बनेगा? या फिर उत्तर प्रदेश की जातीय राजनीति के पुराने गड्ढे इस नई साइकिल की रफ्तार रोक देंगे? जवाब 2027 देगा, लेकिन इतना तय है कि इस बार साइकिल सिर्फ चलने नहीं, अपना नया रास्ता बनाने की कोशिश में है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 7 Sep 2026 1:38 pm

'रीतम सिंह जैसे व्यक्ति को प्रवक्ता कैसे बना दिया', पूर्व सैनिकों ने कांग्रेस नेता की टिप्पणियों पर पलटवार किया

'रीतम सिंह जैसे व्यक्ति को प्रवक्ता कैसे बना दिया', पूर्व सैनिकों ने कांग्रेस नेता की टिप्पणियों पर पलटवार किया

समाचार नामा 7 Sep 2026 12:15 pm

पीएम मोदी गुजरात को देंगे 35 हजार करोड़ रुपए की सौगात, मंगलवार को मुंबई में करेंगे ग्लोबल फिनटेक फेस्ट का उद्घाटन

पीएम मोदी गुजरात को देंगे 35 हजार करोड़ रुपए की सौगात, मंगलवार को मुंबई में करेंगे ग्लोबल फिनटेक फेस्ट का उद्घाटन

समाचार नामा 7 Sep 2026 12:13 pm

The Great Migration Story: भारत की 'हां' और बदला दुनिया नक्शा, लेकिन शर्त क्यों लगाई, जब इंसानों ने पहली बार अफ्रीका के बाहर रखा कदम, फिर क्या हुआ?

संयुक्त राष्ट्र संघ यानी कि यूनाइटेड नेशंस की जनरल असेंबली में दुनिया का पारंपरिक नक्शा बदलने का प्रस्ताव पारित हो गया है। नक्शे को बदलने के लिए अफ्रीकी देश टोगो की ओर से करेक्ट द मैप मुहिम चलाई गई थी। इसे अफ्रीकन यूनियन यानी कि एयू का समर्थन मिला था। प्रस्ताव में खासतौर पर अफ्रीका का आकार और हिस्सों को ज्यादा सही ढंग से दिखाने की बात कही गई थी। यूएन में इस प्रस्ताव को भारत, फ्रांस और इंग्लैंड समेत 164 देशों का समर्थन मिला है। जबकि एकमात्र अमेरिका ने इसके खिलाफ वोट किया है। इसके अलावा छह देशों स्टोनिया, जॉर्जिया, लिदवानिया, मुलदोवा, सर्बिया और यूक्रेन ने वोटिंग से दूरी बनाकर रखी। यूएन में हुए इस मतदान से दुनिया भर के संस्थानों में इस्तेमाल होने वाले नक्शों में बदलाव आएगा। यह खबर कई सवालों को जन्म देती है। जैसे कि क्या अब दुनिया का नक्शा बदल जाएगा? मरकेटर मैप इक्वल अर्थ मैप में क्या अंतर है? आखिर 450 साल पुराने नक्शे ने दुनिया को इतना अलग क्यों दिखाया और नए नक्शे में अफ्रीका अचानक इतना बड़ा नजर क्यों आया? संयुक्त राष्ट्र महासभा यूएन ने एक नए विश्व मानचित्र को मंजूरी दी है जिसमें महाद्वीपों का आकार एक दूसरे के मुकाबले ज्यादा सही दिखाया गया है। इसे भी पढ़ें: बड़ा दिखेगा अफ्रीका, घटेगा US-यूरोप का आकार...बदल गया दुनिया का 450 साल पुराना नक्शा, UN में पास हुआ ऐसा प्रस्ताव, बौखला गया अमेरिका क्यों लाया गया यह प्रस्ताव? प्रस्ताव में कहा गया कि 16वीं सदी में नौवहन के उद्देश्य से तैयार 'मर्केटर प्रोजेक्शन' उपयोग अब तक धरती पर देशों और महाद्वीपों को दिखाने के लिए किया जाता था। इसमें देशों और महाद्वीपों का आकार उनके असली क्षेत्रफल से बड़ा या छोटा दिखता था। टोगो की पहल और अफ्रीकी देशों की अगुआई में लाए गए इस प्रस्ताव का मकसद खास तौर पर अफ्रीका के आकार को दुनिया के नक्शों में अधिक वास्तविक रूप में दिखाना है। इस फैसले से देशों और महाद्वीपों के क्षेत्रफल पर कोई असर नहीं पड़ेगा। बस आकार में बदलाव हो सकता है। क्योंकि, नया नक्शा सीमाएं नहीं, बल्कि नक्शे पर पृथ्वी को दिखाने का तरीका बदलने वाला है। भारत का नक्शा थोड़ा अलग दिख सकता है, लेकिन बड़ा बदलाव नहीं होगा। मार्केटर क्या चीज है? मान लीजिए आपके हाथ में एक सेब है। सेब एकदम गोल। ठीक हमारी पृथ्वी की तरह। अब अगर आप उस सेब का छिलका उतारकर मेज पर बिल्कुल सपाट रख दें यानी समतल रख दें और फैलाने की कोशिश करेंगे तो वह किनारे से फटेगा या फिर आपको उसे जबरदस्ती खींचना पड़ेगा। यह भी हो सकता है। कुछ ऐसा उदाहरण आप संतरे को भी लेकर देख सकते हैं। जब आप संतरे को छीलते हैं और नीज पर रखते हैं तो शायद वो फैल भी सकता है या टूट भी सकता है। गोल धरती को चौकोर पन्ने पर उतारते वक्त भी बिल्कुल यही परेशानी आती है। करीब 450 साल पहले 1569 में गेराड्स मॉकेटर ने यही नक्शा तैयार किया था। उस दौर में हवाई जहाज नहीं थे। लोग समंदर में जहाजों से महीनों सफर करते। नाविक पानी में भटक ना जाए इसलिए मार्केटर ने नक्शे में रास्तों और दिशाओं को एकदम सीधी रेखाओं में रखा ताकि जहाजों को सही दिशा मिले। दिशाएं सीधी रखने के चक्कर में एक बड़ी भूल हुई। मार्केटर नक्शा समंदर में जहाजों को सही रास्ता दिखाने के लिए तो शानदार था लेकिन उसने दुनिया के देशों का असली आकार खराब कर दिया था। इसे भी पढ़ें: भारत तैयार है...यूक्रेन पहुंचकर जयशंकर ने किया ऐसा धमाका, रूस-अमेरिका दोनों हो जाएंगे हैरान क्या नक्शों को तत्काल मर्केटर से बदलना होगा? यह प्रस्ताव गैर-बाध्यकारी है। मतलब, दुनियाभर में इस्तेमाल होने वाले सभी नक्शों को तत्काल मर्केटर से बदलना अनिवार्य नहीं है। मुख्य उद्देश्य अधिक सटीक और समानुपातिक कार्टोग्राफिक मेथेडोलॉजी को प्रोत्साहित करना है। वोट से पहले UN ने टोगो के विदेश मंत्री रॉबर्ट डूसी के हवाले से कहा, 'मैप दुनिया के बारे में हमारी समझ को आकार देते हैं। वे शिक्षा को गाइड करते है, कल्पना को बढ़ावा देते है और सामूहिक सोच पर असर डालते हैं। द ग्रेट माइग्रेशन धरती पर इंसानी सफर की बुनियाद अफ्रीका की सरजमीं से ही पड़ी, जिसे इतिहास में ‘द ग्रेट माइग्रेशन’ का नाम मिला। वैज्ञानिकों का भी यही मानना है कि इसी महाद्वीप से निकलकर इंसान दुनिया के कोने-कोने में बसे और सभ्यताओं का विस्तार हुआ। मगर वक्त का अजीब फेर देखिए—जिस भूभाग ने पूरी मानव जाति को पहचान दी, वही सदियों तक दुनिया के कागजों पर अपनी सही भौगोलिक पहचान और वास्तविक आकार के लिए संघर्ष करता रहा। अब संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एक अहम प्रस्ताव को हरी झंडी दी है, जो दुनिया के सामने देशों और महाद्वीपों का बिल्कुल सटीक और यथार्थवादी खाका पेश करेगा। दरअसल, गोल घूमती धरती को किसी सपाट कागज पर हूबहू उतार पाना कभी आसान नहीं रहा। 16वीं सदी में जब तकनीक बेहद सीमित थी, तब 1569 में भूगोलवेत्ता गेरार्डस मर्केटर ने समुद्री जहाजों के रास्ते आसान करने के लिए एक नक्शा तैयार किया। उस दौर के व्यापार और नौवहन के लिए तो वह पैमाना कारगर रहा, लेकिन उसने भूगोल की सच्चाई को हमेशा के लिए उलझा दिया। ध्रुवों के पास वाले इलाके विशाल दिखने लगे और भूमध्य रेखा के करीब मौजूद अफ्रीका जैसे विशाल महाद्वीप नक्शे पर सिमट कर रह गए। कारोबार की सहूलियत के लिए बना वही खाका धीरे-धीरे देशों के आत्मसम्मान और उनकी अस्मिता की लड़ाई बन गया। अफ्रीकी मुल्क टोगो ने इस गैर-बराबरी को वैश्विक मंच पर मुखरता से उठाया, क्योंकि किसी भी समाज के लिए नक्शा सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि उसकी पहचान का आईना होता है। किसी भी अनजान मुल्क में पैर रखने से पहले इंसान नक्शे की नजर से ही उससे नाता जोड़ता है, और सही पहचान के साथ इस सफर को महसूस करने का अपना एक अलग गौरव है। भारत ने क्या शर्त लगाई भारत ने इस प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया है। लेकिन भारत ने साथ ही साफ किया है कि इसका मतलब किसी एक खास वर्ल्ड मैप को मंजूरी देना नहीं है। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि इस प्रस्ताव का देशों की सीमाओं, विवादित इलाकों या जगहों के नाम से कोई लेना देना नहीं है। भारत ने यह भी साफ़ किया है कि भारत का क्षेत्र जिसमें जम्मू कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश भी शामिल है, उसे भारत के आधिकारिक नक्शे के मुताबिक ही दिखाया जाना चाहिए। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारत की सीमा या क्षेत्र को गलत या भ्रामक तरीके से दिखाना भारत को मंज़ूर नहीं है। और भारत ने साफ़ कहा है कि अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को लेकर उसका रुख बिल्कुल स्पष्ट है। इस मुद्दे पर भारत ना तो अपना रुख बदलेगा और ना ही कोई समझौता करेगा। तो बेसिकली भारत ने यूएन के इस प्रस्ताव का समर्थन तो किया है लेकिन अपनी सीमा औरसंप्रभुता को लेकर अपना रुख बिल्कुल साफ और गैर समझौतावादी रखा है।

प्रभासाक्षी 7 Sep 2026 11:19 am

कर्नाटक में सूखाग्रस्त तालुकों की घोषणा में भेदभाव, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ने राज्य सरकार पर लगाया भेदभाव का आरोप

कर्नाटक में सूखाग्रस्त तालुकों की घोषणा में भेदभाव, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ने राज्य सरकार पर लगाया भेदभाव का आरोप

समाचार नामा 7 Sep 2026 10:31 am

सागर जहरीली शराब कांड: अस्पताल में 84 बीमार लोगों का इलाज जारी, 30 आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज

सागर जहरीली शराब कांड: अस्पताल में 84 बीमार लोगों का इलाज जारी, 30 आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज

समाचार नामा 7 Sep 2026 10:14 am

जयपुर में गरजे ओवैसी, मस्जिदों पर कार्रवाई से लेकर बुनियादी मुद्दों तक BJP को घेरा; हनुमान बेनीवाल के साथ दिखी नई जुगलबंदी

जयपुर में गरजे ओवैसी, मस्जिदों पर कार्रवाई से लेकर बुनियादी मुद्दों तक BJP को घेरा; हनुमान बेनीवाल के साथ दिखी नई जुगलबंदी

समाचार नामा 7 Sep 2026 8:40 am

पीएम मोदी का 'नाराज फूफा' वाला बयान सही, राहुल गांधी दूसरों के कंधे पर बंदूक रखकर चलाते हैं: राजू वाघमारे

शिवसेना प्रवक्ता राजू वाघमारे ने पीएम मोदी के 'नाराज फूफा' वाले बयान का समर्थन करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री की होमियोपैथी वाली टिप्पणी जेन-जी के लिए नहीं, बल्कि विपक्ष के लिए थी। उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी का काम दूसरों के कंधे पर बंदूक रखकर सरकार पर निशाना साधना है और उनकी स्थिति 'मेरी सूरत ही ऐसी है' वाली कहावत जैसी है।

देशबन्धु 6 Sep 2026 10:34 pm

बचपन का सपना हुआ साकार, इंजीनियर आर्यन मलिक बने लेफ्टिनेंट

भारतीय सेना में अधिकारी बनकर आर्यन ने बढ़ाया परिवार, गांव और क्षेत्र का गौरव; बधाई देने के लिए घर पहुंच रहे ग्रामीण

देशबन्धु 6 Sep 2026 9:56 pm

'जिम्मेदार व्यक्तियों को बख्शा नहीं जाएगा', दिल्ली बिल्डिंग हादसे पर बोलीं सीएम रेखा गुप्ता

'जिम्मेदार व्यक्तियों को बख्शा नहीं जाएगा', दिल्ली बिल्डिंग हादसे पर बोलीं सीएम रेखा गुप्ता

समाचार नामा 6 Sep 2026 7:53 pm

SRCC में PM मोदी के ‘दिमागी नक्सल’ बयान पर खरगे का हमला, बोले- युवाओं से संवाद का मौका राजनीतिक भाषण में बदला

प्रधानमंत्री मोदी करीब 13 साल बाद SRCC पहुंचे। उन्होंने कार्यक्रम स्थल तक पहुंचने के लिए मेट्रो की यात्रा भी की। वर्ष 2013 में वह गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में इसी कॉलेज में आए थे। अपने संबोधन में उन्होंने उस पुराने दौरे को याद करते हुए तब और अब के भारत की आर्थिक स्थिति की तुलना की।

देशबन्धु 6 Sep 2026 2:35 pm

पीएम मोदी के जन्मदिन पर गुजरात में एक महीने तक चलेगा 'सेवा समर्पण' अभियान, रविवार को हुआ कार्यशाला का आयोजन

पीएम मोदी के जन्मदिन पर गुजरात में एक महीने तक चलेगा 'सेवा समर्पण' अभियान, रविवार को हुआ कार्यशाला का आयोजन

समाचार नामा 6 Sep 2026 2:21 pm

सोना चार हजार रुपए और चांदी आठ हजार रुपए सस्ती हुई

नई दिल्ली, सोने और चांदी में इस हफ्ते बड़ी गिरावट देखने को मिली, जिससे दोनों कीमती धातुओं का दाम क्रमश: 4,000 रुपए और 8,000 रुपए से अधिक घट गया।

देशबन्धु 6 Sep 2026 1:05 pm

सागर जहरीली शराब कांड: सीएम मोहन यादव ने दिए कार्रवाई के निर्देश, बोले- 'सरकार बर्दाश्त नहीं करेगी ऐसी घटनाएं'

सागर जहरीली शराब कांड: सीएम मोहन यादव ने दिए कार्रवाई के निर्देश, बोले- 'सरकार बर्दाश्त नहीं करेगी ऐसी घटनाएं'

समाचार नामा 6 Sep 2026 12:08 pm

'मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के लिए संकटमोचक थे सुदिव्य सोनू', मंत्री के निधन पर कांग्रेस और झामुमो नेताओं ने जताया दुख

'मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के लिए संकटमोचक थे सुदिव्य सोनू', मंत्री के निधन पर कांग्रेस और झामुमो नेताओं ने जताया दुख

समाचार नामा 6 Sep 2026 8:13 am

हाईकोर्ट में बड़े बदलाव : केंद्र ने 8 राज्यों में नए चीफ जस्टिस नियुक्त किए

केंद्र सरकार ने देश के आठ हाईकोर्ट में नए मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति की है

देशबन्धु 6 Sep 2026 7:08 am

गुजरात भर के 40 शिक्षकों को 'राज्य के सर्वश्रेष्ठ शिक्षक' पुरस्कार से सम्मानित किया गया

गुजरात भर के 40 शिक्षकों को 'राज्य के सर्वश्रेष्ठ शिक्षक' पुरस्कार से सम्मानित किया गया

समाचार नामा 5 Sep 2026 11:32 pm

यूपी: सहारनपुर में मस्जिद गिराए जाने पर विपक्ष का हमला, बोले- कानून सभी के लिए समान होना चाहिए

यूपी: सहारनपुर में मस्जिद गिराए जाने पर विपक्ष का हमला, बोले- कानून सभी के लिए समान होना चाहिए

समाचार नामा 5 Sep 2026 10:23 pm

उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन 6 सितंबर से दो दिवसीय असम दौरे पर, कई कार्यक्रमों में लेंगे हिस्सा

उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन 6 सितंबर से दो दिवसीय असम दौरे पर, कई कार्यक्रमों में लेंगे हिस्सा

समाचार नामा 5 Sep 2026 10:21 pm

कांग्रेस में बड़ा संगठनात्मक फेरबदल : सचिन पायलट बने पंजाब प्रभारी , सुरजेवाला को गुजरात और कर्नाटक की जिम्मेदारी

कांग्रेस ने शनिवार को बड़ा संगठनात्मक बदलाव करते हुए कई राज्यों के लिए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) के नए प्रभारी नियुक्त किए हैं

देशबन्धु 5 Sep 2026 10:10 pm

'दिमागी नक्सल वो होम्योपैथिक गोली जिसने सबको बाहर निकाल दिया, पीएम मोदी का विपक्ष पर तंज

'दिमागी नक्सल वो होम्योपैथिक गोली जिसने सबको बाहर निकाल दिया, पीएम मोदी का विपक्ष पर तंज

समाचार नामा 5 Sep 2026 9:42 pm

‘कानून और संविधान का उल्लंघन,' सहारनपुर में मस्जिद गिराए जाने पर विपक्षी दलों ने जताया एतराज

‘कानून और संविधान का उल्लंघन,' सहारनपुर में मस्जिद गिराए जाने पर विपक्षी दलों ने जताया एतराज

समाचार नामा 5 Sep 2026 9:26 pm

संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया के नए नक्शे को दी मंजूरी

संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) ने एक ऐसे नए नक्शे को अपनाने के पक्ष में वोट किया है, जो धरती के महाद्वीपों का बिल्कुल सही आकार दिखाता है. इस प्रस्ताव के खिलाफ सिर्फ अमेरिका ने वोट किया

देशबन्धु 5 Sep 2026 6:41 pm

उत्तर प्रदेश 2027: चुनावी बिसात और बदलते समीकरण

उत्तर प्रदेश की राजनीति को भारतीय लोकतंत्र का हृदयस्थल माना जाता है। दिल्ली की गद्दी का रास्ता लखनऊ के गलियारों से होकर गुजरता है, यही कारण है कि देश के इस सबसे बड़े सूबे में होने वाली हर छोटी-बड़ी राजनीतिक हलचल का असर राष्ट्रीय फलक पर साफ दिखाई देता है। वर्ष 2026 की समाप्ति के करीब आते ही और 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट के साथ उत्तर प्रदेश में राजनीतिक दलों के बीच शह-मात का खेल पूरी तरह से शुरू हो चुका है। लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजों ने सूबे की राजनीतिक जमीन को जो नई शक्ल दी थी, उसके बाद हर दल अपनी रणनीतियों को धार देने में जुटा है। एक तरफ जहां भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) लगातार तीसरी बार उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज होकर इतिहास रचने की कवायद में जुटी है, वहीं दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी अपने 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के सहारे दस साल के सत्ता के वनवास को खत्म करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। इस बार का चुनाव केवल पारंपरिक नारों या वादों पर आधारित नहीं रहने वाला, बल्कि यह जमीन पर रची जा रही नई सामाजिक और गठबंधन राजनीति की प्रयोगशाला बनने जा रहा है। इस राजनीतिक उठापटक और नए समीकरणों के निर्माण के बीच हाल ही में लखनऊ से एक बेहद महत्वपूर्ण और रणनीतिक खबर सामने आई, जिसने राज्य के सियासी हलकों में नई बहस छेड़ दी है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तथा कॉकरोच जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता आशुतोष रांका के बीच लखनऊ में लगभग 90 मिनट यानी डेढ़ घंटे तक चली बंद कमरे की मैराथन मुलाकात ने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है। इस मुलाकात के मायने केवल एक शिष्टाचार भेंट तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह 2027 के महासमर से पहले उत्तर प्रदेश की युवा और छात्र राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है। आशुतोष रांका और अखिलेश यादव के बीच हुई इस चर्चा के केंद्र में मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के नौजवानों के मुद्दे, लगातार होती परीक्षाओं के पेपर लीक, बेरोजगारी, छात्रों की समस्याएं और उच्च शिक्षा में आ रही गिरावट जैसे विषय शामिल रहे। इसे भी पढ़ें: Uttar Pradesh BJP Regional Team 2027 | यूपी बीजेपी ने सभी छह क्षेत्रों की नई टीमों का किया ऐलान, सामाजिक समीकरण साधने पर जोर | Full List पार्टी के भीतर और बाहर इस मुलाकात को 'प्लान 2027' के एक अहम हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। दरअसल, उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया और बेहद जागरूक मतदाता वर्ग तैयार हो चुका है, जिसे राजनीतिक विश्लेषक 'जेन-जी' या पहली बार मतदान करने वाले युवा कहते हैं। यह युवा वर्ग पारंपरिक जातिगत राजनीति से ऊपर उठकर रोजगार, निष्पक्ष परीक्षाओं और आधुनिक अवसरों की मांग कर रहा है। अखिलेश यादव बखूबी जानते हैं कि केवल पारंपरिक मुस्लिम-यादव समीकरण या केवल सामान्य गठबंधनों के बूते भाजपा जैसी विशाल और साधन-संपन्न चुनावी मशीनरी को मात देना असंभव है। यही वजह है कि लोकसभा चुनाव में मिली सफलता के बाद सपा अब छोटे-छोटे वैचारिक समूहों, छात्र संगठनों और युवाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले चेहरों को अपने पाले में लाकर भाजपा के उस युवा वोट बैंक में सेंध लगाना चाहती है, जो कभी भगवा दल की सबसे बड़ी ताकत हुआ करता था। रांका और अखिलेश यादव की यह मुलाकात इस बात की तस्दीक करती है कि विपक्ष इस बार युवाओं के आक्रोश को एक ठोस राजनीतिक वोट बैंक में बदलने की मुकम्मल तैयारी कर चुका है। हालांकि, इस मुलाकात पर भाजपा ने भी फौरन तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। भाजपा प्रवक्ताओं का कहना है कि विपक्ष के पास कोई ठोस नीति या विकास का एजेंडा नहीं है, इसलिए वह केवल भ्रम फैलाने और छोटे-छोटे संगठनों के सहारे अपनी डूबती नैया बचाने का प्रयास कर रहा है। लेकिन राजनीति के जानकार इसे अलग नजरिए से देखते हैं। उनका मानना है कि उत्तर प्रदेश में जब भी कोई बड़ा सत्ता परिवर्तन हुआ है, उसके मूल में युवाओं और छात्रों का आंदोलन या उनका असंतोष ही रहा है। ऐसे में सीजेपी जैसी युवा केंद्रित ताकतों और सपा का करीब आना भविष्य के एक नए और बड़े सामाजिक-राजनैतिक मोर्चे की बुनियाद रख सकता है। यदि हम उत्तर प्रदेश की समूची राजनैतिक बिसात पर नजर डालें, तो इस समय सबसे बड़ा टकराव नैरेटिव यानी विमर्श गढ़ने को लेकर चल रहा है। समाजवादी पार्टी ने इस बार 'आरक्षण' और 'संविधान' को अपनी राजनीति के केंद्र में रख दिया है। 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष को 'संविधान बचाओ' के नारे से जो अप्रत्याशित लाभ मिला था, अखिलेश यादव उसे 2027 तक कायम रखना चाहते हैं। हालिया महीनों में उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरियों में आरक्षण की स्थिति, 69000 शिक्षक भर्ती का विवाद और पिछड़े-दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व को लेकर सपा ने एक आक्रामक रुख अख्तियार किया है। अखिलेश यादव लगातार जनसभाओं और सोशल मीडिया के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं कि वर्तमान सत्ताधारी दल दलितों और पिछड़ों के संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करने की साजिश रच रहा है। इस नैरेटिव के जरिए सपा सीधे तौर पर भाजपा के गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित वोट बैंक पर निशाना साध रही है, जिसने पिछले एक दशक से भाजपा की जीत में रीढ़ की हड्डी का काम किया है। सपा की इस रणनीति के जवाब में भारतीय जनता पार्टी भी खामोश नहीं बैठी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा ने अपनी संगठन मशीनरी को पूरी तरह से चुनावी मोड में डाल दिया है। भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका पन्ना प्रमुख और बूथ स्तर का ढांचा माना जाता है। पार्टी ने इस बार कागजी दावों को खारिज करते हुए हर एक बूथ कमेटी का भौतिक सत्यापन शुरू किया है। खासकर उन बूथों पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है, जहां पिछले चुनाव में विपक्ष को बढ़त मिली थी। इसके साथ ही, भाजपा सरकार अपनी कानून-व्यवस्था की सख्त छवि, बुनियादी ढांचे का विकास (जैसे एक्सप्रेसवे और औद्योगिक गलियारे) और केंद्र व राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों के एक बड़े नेटवर्क के भरोसे मैदान में उतर रही है। भाजपा का मानना है कि विकास और सुशासन का उनका यह 'डबल इंजन' मॉडल विपक्ष के जातिगत ध्रुवीकरण के प्रयासों को विफल कर देगा। लेकिन इस बार एनडीए गठबंधन के भीतर की आंतरिक खींचतान भी पूरी तरह सतह पर आ चुकी है। गठबंधन में शामिल छोटे दल जैसे निषाद पार्टी के डॉ. संजय निषाद, अपना दल (सोनेलाल) की अनुप्रिया पटेल और सुभासपा के ओम प्रकाश राजभर अपनी राजनीतिक जमीन बचाने और सीटों के सम्मानजनक बंटवारे के लिए भाजपा पर लगातार दबाव बना रहे हैं। हाल ही में एक सार्वजनिक मंच पर निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद के भावुक होने और आंसुओं के छलकने की घटना ने उत्तर प्रदेश की सियासत में भारी उबाल ला दिया था। जहां संजय निषाद ने इसे अपने समाज को हक न मिल पाने की पीड़ा बताया, वहीं अखिलेश यादव ने तुरंत इस पर तंज कसते हुए इसे भाजपा के साथ जाने का 'पश्चाताप और प्रायश्चित' करार दे दिया। यह घटना दर्शाती है कि निषाद और अन्य अति-पिछड़ी जातियों के वोट बैंक को लेकर दोनों पक्षों में कितनी जबर्दस्त रस्साकशी चल रही है। अखिलेश यादव ने साफ कर दिया है कि निषाद समाज भी उनके 'PDA' का एक अभिन्न हिस्सा है और यदि उनकी सरकार आती है, तो वे जातीय जनगणना कराकर हर समाज को उसका वास्तविक हक देंगे। दूसरी तरफ, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच का 'इंडिया' गठबंधन भी एक नाजुक मोड़ पर खड़ा है। यद्यपि अखिलेश यादव और कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने बार-बार यह दोहराया है कि 2027 का विधानसभा चुनाव दोनों दल मिलकर लड़ेंगे, लेकिन जमीनी स्तर पर सीटों के बंटवारे और प्रादेशिक नेतृत्व को लेकर दोनों दलों के स्थानीय नेताओं के बीच महत्वाकांक्षाओं का टकराव साफ दिखाई देता है। कांग्रेस जहां लोकसभा चुनाव के उत्साह के बाद उत्तर प्रदेश में अपने पुराने गौरव को हासिल करने के लिए अधिक सीटों की मांग कर रही है, वहीं समाजवादी पार्टी खुद को बड़े भाई की भूमिका में रखते हुए कांग्रेस को सीमित सीटों पर समेटने की रणनीति बना रही है। इसके अतिरिक्त, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती की खामोशी और उनकी अंदरूनी बैठकें भी इस त्रिकोणीय मुकाबले को और दिलचस्प बना रही हैं। मायावती अपने खिसकते दलित वोट बैंक को सहेजने के लिए नए सिरे से कैडर कैंप आयोजित कर रही हैं। यदि बसपा अपने पारंपरिक वोट को बचाने में सफल रहती है, तो इसका सीधा नुकसान सपा-कांग्रेस गठबंधन को उठाना पड़ सकता है, जिससे अंततः भाजपा को लाभ होने की संभावना बढ़ जाएगी। सियासत के इस खेल में शह और मात के मोहरे बिछ चुके हैं। जनता शांत है, लेकिन वह हर दल की चालों को बहुत बारीकी से देख रही है। रोजगार की तलाश में भटकता युवा, महंगाई से जूझता आम नागरिक और अपने अधिकारों के प्रति सजग होता जातियों का समूह ही अंततः यह तय करेगा कि 2027 में लखनऊ के सिंहासन पर किसका राजतिलक होगा। फिलहाल, राजनैतिक दलों की यह सरगर्मी और रणनीतिक मुलाकातों का दौर यह बताने के लिए काफी है कि उत्तर प्रदेश का आगामी चुनावी संग्राम बेहद रोमांचक, अप्रत्याशित और भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होने जा रहा है। - अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार

प्रभासाक्षी 5 Sep 2026 4:28 pm

कॅरियर की अंधी दौड़ में हांफती युवा पीढ़ी!

भारत युवाओं का देश है। जाहिर है ऐसे देश की चिंताएं बहुत अलग होती हैं। उसकी ज्यादातर आबादी को शिक्षा, रोजगार और सुंदर जीवन की कामना होती है। उनकी महत्वाकाक्षाएं, अवसरों की होड़ और दौड़। पाने की खुशी और न मिलने का आक्रोश सब साझा होते हैं। करियर में सफल होने, जल्दी और ज्यादा पाने की कामनाएं इस दौर का मूल्य हैं। ऐसे में शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों को गहरी चुनौती है। संकट के बादल गहरे हैं। समाधान के सूत्र न्यूनतम। बदलती कार्य संस्कृति सरकारों में नौकरियों के दरवाजे सिकुड़ रहे हैं। ज्यादातर नौकरियां निजी क्षेत्रों में ही हैं। नौ से पांच बजे की पक्की नौकरियां अब स्वप्न ही हैं। उनकी जगह गिग इकोनामी (फ्री लांस, कांट्रैक्ट वर्क) ने ले ली है। आर्थिक स्वतंत्रता की तो छोड़िए यह माडल भविष्य की अनिश्चितता और वित्तीय अस्थिरता भी ला रहा है, जिसके नाते बढ़ता मानसिक तनाव और अवसाद संकट को गहरा कर रहा है। हिंदुस्तान अलग तरह से चलता रहा है। परिवार इसकी प्राणवायु रहे हैं। परिवार का कोई एक आदमी नौकरी पर रहता था, शेष अपने घर-इलाके-गांव में बैठकर स्थानीय स्तर पर जो कर सकते थे करते थे। परिवार की छाया में सुरक्षा थी, संरक्षण था, बच्चों को संस्कारित करने के पारिवारिक उपक्रम थे। नई व्यवस्था ने एक परिवार में कई परिवार खड़े कर दिए हैं। इससे एक की जगह अब चार परिवार, चार चूल्हे और चार व्यवस्थाएं खड़ी करनी पड़ रही है। आप कितना भी कमा रहे हैं वह कम ही है। इसने नई पीढ़ी को ईएमआई के दुष्चक्र में फंसा कर नई व्यवस्थाओं का गुलाम बना दिया है। परिवार व्यवस्था भारत की संस्कृति का आधार रही है। वह संस्कारशाला भी है। इसे भी पढ़ें: तेजी से बदल रही है भारत की तस्वीर कार्य और जीवन का संतुलन कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने हमारे सामने नई चुनौतियां पेश की हैं। वे बेहतर सहायक से ज्यादा तनाव के वाहक हैं। युवाओं में एआई के कारण नौकरियां जाने और खुद के अप्रासंगिक हो जाने का भय बैठ गया है। वे इस पूरे दृश्य को बहुत चिंता से देख रहे हैं। री-स्किलिंग का दबाव उन्हें गहरे भय में डाल रहा है। इससे मानसिक थकान होना स्वाभाविक ही है। इस समय सबसे बड़ी चिंता कार्य और जीवन संतुलन की है। वर्क फ्राम होम और डिजिटल कनेक्टिविटी ने सारा कुछ बदलकर रख दिया है। काम के घंटे अब प्रायः 24 घंटे ही हैं। देर रात तक ई-मेल, रिर्पोट्स और मैसेज का जवाब देते हुए युवा ‘आलवेज आन’ मोड में रहते हैं। जिससे पारिवारिक जीवन, व्यक्तिगत समय और नींद सब प्रभावित हो रही है। बर्नआउट की बढ़ती दर, काम के अनिश्चित घंटे, स्पर्धा का वातावरण और टारगेट पूरे करने का दबाव साथ चलता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन(डब्लूएचओ) ने बर्नआउट को प्रोफेशनल बीमारी मान लिया है। यह अब भारतीय कारपोरेट जगत में एक अनिवार्य समस्या बन गयी है। सोशल मीडिया से बनती छवियां सोशल मीडिया ने समाज में अलग तरह की स्पर्धा की छवियां प्रस्तुत की हैं। अपने सुखद, आनंद के क्षणों को वायरल करने की बीमारी दूसरे की पीड़ा का कारण बन जाती है। किसी की बड़ी पदस्थापना, उसकी पार्टियां, रील्स, पर्यटन की तस्वीरें, महंगी जीवनशैली का विज्ञापन करना, सफलताओं के हाईलाइट्स देखकर तुलना और स्पर्धा की बातें तेज होती हैं। इससे हीनभावना और तनाव का जन्म भी होता है। परिजन और बच्चे भी अपने पालकों से ऐसी ही जीवन शैली की अपेक्षा करते हैं। ऐसे समय में युवाओं के लिए तनाव प्रबंधन की विधियां समझने और उन्हें जीवन की ठोस सच्चाइयों से जोड़ने की जरूरत है। योग, ध्यान के अनेक अभ्यास जीवन में शांति ला सकते हैं। जिंदगी के हमारे दृष्टिकोण में परिवर्तन ला सकते हैं। रील्स की तुरंतवादी जीवनशैली और जीवन के सतत संघर्ष को समझने की जरुरत है।सोशल मीडिया से प्रक्षेपित हो रही छवियों से प्रभावित होने के बजाए, लोगों के संघर्ष और उससे उपजी सफलताओं के पाठ भी पढ़े जाने चाहिए। उद्यमिता और उसके जोखिम नए समय ने युवाओं को उद्यमिता के गुर दिए हैं। यह पीढ़ी जोखिम उठाने और सफलताओं के नए शिखर छूने वाली पीढ़ी है। इसके मंत्र अलग हैं। वे जल्दी से सफलताओं के नए क्षितिज को छूना चाहते हैं। छू भी रहे हैं। कम आयु में उनकी सफलताएं विस्मित करने वाली हैं। उनके स्टार्टअप धूम मचा रहे हैं। सफलता की बड़ी कहानियां लिख रहे हैं। प्रेरित कर रहे हैं। इसके दूसरे पक्ष का विचार भी जरूरी है। हमें पता है कि 90 प्रतिशत से अधिक स्टार्टअप शुरुआती सालों में ही अन्यान्य कारणों से विफल हो जाते हैं। विफलता का डर, निवेशकों का दबाव, फंडिंग का संकट संस्थापकों और शुरुआती कर्मचारियों में मानसिक तनाव पैदा कर ही देता है। इतने बड़े देश में हर साल लाखों युवा हाथ काम मांगने के लिए खड़े हो जाते हैं। उनके पास डिग्रियां भी होती हैं। किंतु वे कौशल युक्त नहीं होते। वे डिग्रीधारी हैं किंतु किसी काम के नहीं हैं। बाजार की जरूरतें अलग हैं, उनके कौशल अलग हैं। ऐसे में बहुत योग्य लोगों को भी अपेक्षित नौकरी नहीं मिल पाती, अच्छे वेतन की तो जाने ही दीजिए। युवाओं के ज्यादातर संकट वास्तविक हैं। वे जानकारी से भरपूर हैं, उनके पास अवसरों का जनतंत्र है। आकांक्षाओं की बाढ़ है। वे सूचनाओं से लदे-फंदे हैं। यह ज्यादा सूचनाएं भी दुख और भ्रम का कारण बन रही हैं। आकांक्षाओं का बड़ा आकाश उतनी ही गहरी निराशा लेकर लाता है। यह साधारण नहीं है कि आईआईटी के विद्यार्थी आत्महत्या कर रहे हैं। ऐसे प्रतिभाशाली विद्यार्थियों का अवसान उनके परिवार,देश और समाज के लिए भी बड़ी क्षति है । परीक्षाओं में मिलती असफलताएं, लीक होते प्रश्नपत्र, परीक्षाओं की नष्ट होती शुचिता, सरकारी- प्रशासनिक तंत्र की कदाचार रोकने की विफलताओं ने युवाओं को गहरी चिंताएं दी हैं। शिक्षा के निजीकरण और उससे उपजे बाजारीकरण ने हालात बहुत बदल दिए हैं। महंगी शिक्षा के लिए परिवार कर्ज में डूब रहे हैं। प्रतिभा पलायन का संकट तो है ही। समाज में यह बात बहुत गहरे पैठ रही है इस देश में प्रतिभाशाली युवाओं की जगह नहीं बची है। यह तथ्य नहीं किंतु गहराई से फैलती धारणा है। आप बिना जुगाड़ के इस व्यवस्था में सफल नहीं हो सकते। किसी राष्ट्र जीवन में ऐसी धारणाएं ठीक नहीं हैं। हमें समझना होगा कि राष्ट्र से हम सबकी सामूहिक आकांक्षाएं,साझे प्रयासों से ही फलीभूत होंगी। भारत की आजादी के आठ दशक अभूतपूर्व प्रगति, एकत्व और जीवंत लोकतंत्र के प्रमाण हैं। हर राष्ट्र जीवन में चुनौतियां होती हैं, उससे जूझकर हम अपने संकटों का हल खोजते हैं। देश की युवा पीढ़ी भी अपने संकटों के बीच इस राष्ट्र जीवन के समक्ष उपस्थित प्रश्नों के ठोस और वाजिब हल जरुर तलाशेगी। युवा शक्ति की तेजस्विता, नवाचारों और आत्मविश्वास को देखकर यह विश्वास सहज ही होता है। - प्रो. संजय द्विवेदी (लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)

प्रभासाक्षी 5 Sep 2026 3:46 pm

शिक्षकों संग पीएम मोदी की खास बातचीत, पब्लिक स्पीकिंग पर मांगे टिप्स, बच्चों की 'रिपोर्टिंग स्किल्स' पर भी ली चुटकी

शिक्षकों संग पीएम मोदी की खास बातचीत, पब्लिक स्पीकिंग पर मांगे टिप्स, बच्चों की 'रिपोर्टिंग स्किल्स' पर भी ली चुटकी

समाचार नामा 5 Sep 2026 12:39 pm

China के सैन्य मॉडल की राह पर Pakistan! 50 साल बाद किए बड़े बदलाव, India के लिए क्या हैं मायने?

अब पाकिस्तान भी चीन के सैन्य मॉडल की राह पर चल पड़ा है। करीब पांच दशकों बाद पाकिस्तान ने अपने सैन्य कमांड ढांचे में बड़ा बदलाव करते हुए सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच समन्वित कमान को नई दिशा देने की कोशिश की है। इस पुनर्गठन का सबसे बड़ा फायदा फील्ड मार्शल असीम मुनीर को मिलता दिखाई दे रहा है, जिनके हाथों में पाकिस्तान की सैन्य व्यवस्था की ताकत पहले से कहीं अधिक केंद्रित हो सकती है। यह बदलाव केवल प्रशासनिक फेरबदल नहीं, बल्कि पाकिस्तान की सैन्य शक्ति, रणनीतिक हथियारों और युद्धकालीन फैसलों को अधिक केंद्रीकृत करने की व्यापक कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। हम आपको बता दें कि नए कानूनों और संवैधानिक बदलावों के बाद पाकिस्तान में चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज (CDF) की व्यवस्था को मजबूत किया गया है। असीम मुनीर पहले से सेना प्रमुख हैं और अब तीनों सेनाओं यानि थल सेना, नौसेना और वायुसेना, के बीच समन्वित कमान के केंद्र में भी हैं। पुरानी व्यवस्था में ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी का पद तीनों सेनाओं के बीच समन्वय की भूमिका निभाता था, लेकिन नई व्यवस्था में कमान का केंद्र और अधिक स्पष्ट रूप से एक व्यक्ति के आसपास सिमट गया है। इसे भी पढ़ें: SCO के मंच से चीन और पाकिस्तान को एक साथ धोकर मोदी ने दुनिया की वाहवाही लूट ली यही इस बदलाव का सबसे बड़ा संदेश है कि पाकिस्तान की सत्ता व्यवस्था में सेना अब केवल सबसे ताकतवर संस्था नहीं रहना चाहती, बल्कि अपनी ताकत को कानून और संस्थागत ढांचे के जरिए स्थायी रूप देना चाहती है। रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान ने अपने रणनीतिक सैन्य ढांचे को भी नए सिरे से संगठित करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। नेशनल स्ट्रैटेजिक कमांड जैसी व्यवस्था के जरिए परमाणु हथियारों, मिसाइल क्षमताओं और अन्य रणनीतिक संसाधनों की कमान को अधिक केंद्रीकृत करने की कोशिश की जा रही है। इससे पाकिस्तान के सामरिक निर्णयों में सेना की भूमिका और मजबूत होती दिखाई देती है। हम आपको बता दें कि पाकिस्तान का यह नया मॉडल चीन की सैन्य संरचना से भी प्रभावित माना जा रहा है। सेना, नौसेना, वायुसेना, मिसाइल और रणनीतिक क्षमताओं को एकीकृत कमान के तहत लाने की सोच का उद्देश्य युद्ध या संकट की स्थिति में तेज फैसले और संयुक्त सैन्य कार्रवाई बताया जा रहा है। पाकिस्तान लंबे समय से अपनी सैन्य क्षमताओं के आधुनिकीकरण में चीन के साथ सहयोग बढ़ाता रहा है और नया कमांड मॉडल भी उसी व्यापक रणनीतिक दिशा का हिस्सा माना जा रहा है। लेकिन भारत के लिए सवाल यह है कि क्या असीम मुनीर के हाथों में अधिक शक्ति आने से खतरा बढ़ जाएगा? देखा जाए तो इसका जवाब केवल हां या नहीं में नहीं दिया जा सकता। पाकिस्तान की सैन्य संरचना में केंद्रीकरण निश्चित रूप से भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक घटनाक्रम है। एकीकृत कमान से पाकिस्तान सीमित युद्ध, मिसाइल संचालन और बहु-क्षेत्रीय सैन्य अभियानों में बेहतर समन्वय की कोशिश कर सकता है। खासतौर पर भारत की पश्चिमी सीमा के संदर्भ में पाकिस्तान अपनी सैन्य तैयारी को अधिक संगठित करने का प्रयास करेगा। लेकिन पाकिस्तान को यह भ्रम पालने की जरूरत नहीं है कि कमांड स्ट्रक्चर बदलने से जमीन पर उसकी सामरिक वास्तविकता भी बदल जाएगी। भारत के सामने पाकिस्तान की चुनौती केवल हथियारों या पदों की नहीं है। भारत के पास कहीं अधिक व्यापक सैन्य, आर्थिक और तकनीकी क्षमता है। आधुनिक युद्ध केवल सैनिकों और मिसाइलों की संख्या से तय नहीं होते। अर्थव्यवस्था, रक्षा उत्पादन, तकनीक, खुफिया क्षमता, साइबर शक्ति, अंतरिक्ष क्षमता और राजनीतिक स्थिरता, ये सभी युद्ध शक्ति के महत्वपूर्ण आधार हैं। यहीं पाकिस्तान की सबसे बड़ी कमजोरी सामने आती है। एक तरफ पाकिस्तान सैन्य कमान को मजबूत और केंद्रीकृत कर रहा है, दूसरी तरफ उसकी अर्थव्यवस्था लगातार दबाव में है। देश राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक संकट और आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों से जूझता रहा है। बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा जैसे क्षेत्रों में सुरक्षा समस्याएं अलग हैं। ऐसे में केवल सेना प्रमुख के हाथों में अधिक अधिकार देने से पाकिस्तान की मूल समस्याएं समाप्त नहीं हो जाएंगी। यहां एक सवाल यह भी है कि क्या सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण पाकिस्तान की संस्थाओं को और कमजोर करेगा? देखा जाए तो पाकिस्तान का इतिहास बताता है कि वहां सेना और निर्वाचित सरकार के बीच शक्ति संतुलन हमेशा विवाद का विषय रहा है। अब यदि सैन्य कमान, रणनीतिक हथियारों और तीनों सेनाओं के समन्वय की शक्ति एक ही शीर्ष सैन्य नेतृत्व के इर्द-गिर्द केंद्रित होती है, तो नागरिक नियंत्रण को लेकर सवाल और गहरे होंगे। उधर, भारत को इस घटनाक्रम पर नजर जरूर रखनी होगी, हालांकि चिंता की कोई वजह नहीं है। क्योंकि नई कमान व्यवस्था से पाकिस्तान की सैन्य योजनाओं में तेजी और समन्वय आ सकता है, लेकिन भारत की रणनीतिक तैयारी भी अब पुरानी नहीं रही। नई दिल्ली के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पाकिस्तान की किसी भी सैन्य पुनर्संरचना का जवाब बयानबाजी से नहीं, बल्कि बेहतर तैयारी, मजबूत खुफिया तंत्र, आधुनिक तकनीक और निर्णायक सैन्य क्षमता से दिया जाए। असीम मुनीर के हाथों में ज्यादा ताकत आना पाकिस्तान के लिए शक्ति प्रदर्शन हो सकता है, लेकिन भारत के लिए यह एक स्पष्ट संकेत है कि पड़ोसी देश अपनी सैन्य संरचना को नए सिरे से ढाल रहा है। साथ ही पाकिस्तान को भी यह समझ लेना चाहिए कि पदों की ताकत और वास्तविक राष्ट्रीय शक्ति में बड़ा अंतर होता है। सेना प्रमुख को अधिक अधिकार देने से न अर्थव्यवस्था मजबूत होती है, न राजनीतिक संकट खत्म होता है और न ही सैन्य दुस्साहस की कीमत कम हो जाती है। बहरहाल, नई कमान, नया ढांचा और नए पद पाकिस्तान की सैन्य व्यवस्था को बदल सकते हैं, लेकिन दक्षिण एशिया की सामरिक सच्चाई नहीं बदल सकते। भारत तैयार है, सतर्क है और अपनी सुरक्षा के खिलाफ किसी भी चुनौती का जवाब देने की क्षमता रखता है। नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 5 Sep 2026 11:47 am

जीवन की राह में ज्ञान का दीप जलाते हैं शिक्षक

विश्वभर में लगभग सभी महापुरूषों ने शिक्षकों को राष्ट्र निर्माता की संज्ञा दी है। गुरू रूपी इन्हीं शिक्षकों को सम्मान देने के लिए प्रतिवर्ष 5 सितम्बर को ‘शिक्षक दिवस’ मनाया जाता है। यह एकमात्र ऐसा दिन है, जब छात्र अपने शिक्षकों अर्थात् गुरुओं को उपहार देते हैं। पहले जहां गुरूकुल परम्परा हुआ करती थी और उस समय जीवन की व्यावहारिक शिक्षाएं इन्हीं गुरूकुल में गुरु दिया करते थे, आज नए जमाने में गुरूओं का वही अहम कार्य शिक्षक पूरा कर रहे हैं, जो छात्रों के सच्चे मार्गदर्शक बनकर उन्हें स्कूल से लेकर कॉलेज तक वह शिक्षा देते हैं, जो उन्हें जीवन में बुलंदियों तक पहुंचाने में सहायक बनती है। आज भले ही शिक्षा प्राप्त करने या ज्ञानोपार्जन के लिए अनेक तकनीकी साधन सुलभ हैं किन्तु एक अच्छे शिक्षक की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता। जिस प्रकार एक अच्छा शिल्पकार किसी भी पत्थर को तराशकर उसे खूबसूरत रूप दे सकता है और एक कुम्हार गीली मिट्टी को सही आकार प्रदान कर सही आकार के खूबसूरत बर्तन बनाता है, समाज में वही भूमिका एक शिक्षक अदा करता है, इसीलिए शिक्षक को समाज के असली शिल्पकार का भी दर्जा दिया जाता है। इतिहास ऐसे शिक्षकों के उदाहरणों से भरा पड़ा है, जिन्होंने अपनी शिक्षा से अनेक लोगों के जीवन की दिशा ही बदल दी। भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति एवं द्वितीय राष्ट्रपति डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस के अवसर पर भारत में प्रतिवर्ष 5 सितम्बर को शिक्षकों के प्रति सम्मान प्रकट करने के उद्देश्य से शिक्षक दिवस मनाया जाता है। 13 मई 1962 को राधाकृष्णन देश के राष्ट्रपति बने और उसी वर्ष उनके कुछ छात्र उनका जन्मदिन मनाने के उद्देश्य से उनके पास गए तो उन्होंने उन छात्रों को परामर्श दिया कि उनके जन्मदिन को अध्यापन के प्रति उनके समर्पण के लिए ‘शिक्षक दिवस’ के रूप में मनाया जाए और इस प्रकार 5 सितम्बर 1962 से ही देश में यह दिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। 5 सितम्बर 1888 को एक निर्धन ब्राह्मण परिवार में जन्मे डा. राधाकृष्णन ने अपने जीवनकाल के 40 वर्ष एक आदर्श शिक्षक के रूप में समर्पित कर दिए। मद्रास प्रेसीडेंसी कॉलेज से शिक्षा ग्रहण करने के बाद उन्होंने मैसूर यूनिवर्सिटी, कलकत्ता यूनिवर्सिटी तथा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्यापन किया और लंदन में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में भी दर्शन शास्त्र पढ़ाया। 1931 में किंग जॉर्ज पंचम ने उन्हें नाइटहुड की उपाधि प्रदान की किन्तु उन्होंने देश की आजादी के बाद अपने नाम के साथ ‘सर’ लगाना बंद कर दिया। राधाकृष्णन 1947 से 1949 तक संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य रहे और 1954 में उन्हें ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। 1962 में ब्रिटिश अकादमी का सदस्य बनने पर उन्हें गोल्डन स्पर, इंग्लैंड के ‘ऑर्डर ऑफ मैरिट’ तथा 1975 में मरणोपरांत अमेरिकी सरकार द्वारा ‘टेम्पलटन पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। डा. राधाकृष्णन एक महान् दार्शनिक और आदर्श शिक्षक होने के साथ-साथ राजनीति में भी प्रवीण थे। इसे भी पढ़ें: Teachers Day 2026: जानिए Teachers Day का इतिहास, महत्व और देश के निर्माण में शिक्षकों का Role दर्शन शास्त्र जैसे गंभीर विषय को भी डा. राधाकृष्णन अपनी अद्भुत शैली से बेहद सरल और रोचक बना देते थे। जिस विषय का वे अध्यापन करते थे, पहले स्वयं उसका गहन अध्ययन करते थे। डा. राधाकृष्णन अपने व्याख्यानों के साथ-साथ विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से छात्रों को उच्च नैतिक मूल्यों को अपने आचरण में समाहित करने के लिए प्रेरित कर उनका बेहतर मार्गदर्शन भी करते थे। उनका कहना था कि हमें अपने शिक्षकों का सम्मान करना चाहिए क्योंकि शिक्षक के बिना इस दुनिया में हम सभी अधूरे हैं। शिक्षक ही हैं, जो देश के भविष्य के वास्तविक आकृतिकार हैं और हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं। राधाकृष्णन का कहना था कि हमें मानवता को उन नैतिक जड़ों तक वापस ले जाना चाहिए, जहां से अनुशासन और स्वतंत्रता दोनों का उद्गम हो। उनका कथन स्पष्ट था कि जब तक शिक्षक शिक्षा के प्रति समर्पित और प्रतिबद्ध नहीं होगा और शिक्षा को एक मिशन के रूप में नहीं अपनाएगा, तब तक अच्छी और उद्देश्यपूर्ण शिक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती। आज के दौर में अभिभावकों की सबसे बड़ी चिंता अक्सर यह रहती है कि उनका बच्चा पढ़ाई में अव्वल आए, प्रतिष्ठित संस्थान में प्रवेश पाए और आगे चलकर डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक या प्रशासनिक अधिकारी बने। निसंदेह जीवन में सफलता, उत्कृष्ट शिक्षा और व्यावसायिक उपलब्धियां महत्वपूर्ण हैं लेकिन केवल ऊंचे पद और बड़ी डिग्रियां किसी व्यक्ति को महान नहीं बनाती। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य बच्चे को सफल बनाने के साथ-साथ उसे एक संवेदनशील, विवेकशील, जिम्मेदार और अच्छा इंसान बनाना भी होना चाहिए। यदि ज्ञान के साथ संस्कार, चरित्र और मानवीय मूल्यों का विकास नहीं हुआ तो ऐसी शिक्षा अधूरी ही मानी जाएगी। हर बच्चे को नैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, व्यावहारिक और आध्यात्मिक मूल्यों से जुड़ी शिक्षा मिलनी चाहिए ताकि वह जीवन की कठिन परिस्थितियों में सही और गलत के बीच अंतर कर सके तथा अपने विवेक से बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय लेने में सक्षम बने। शिक्षा ऐसी हो, जो केवल प्रतियोगिता में आगे बढ़ने की क्षमता न दे बल्कि सहयोग, सहानुभूति, अनुशासन, ईमानदारी, सहिष्णुता और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना भी विकसित करे। यही गुण आगे चलकर परिवार, समाज और राष्ट्र को मजबूत बनाते हैं। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का शिक्षा-दर्शन भी इसी व्यापक दृष्टिकोण पर आधारित था। उनका विश्वास था कि सही शिक्षा व्यक्ति के चरित्र का निर्माण कर समाज की अनेक बुराइयों को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इसलिए शिक्षक दिवस केवल शिक्षकों के सम्मान का अवसर नहीं बल्कि शिक्षा के उद्देश्य पर आत्ममंथन का दिन भी है। उनके आदर्शों, शिक्षाओं और जीवन-मूल्यों को अपनाकर ही हम ऐसी पीढ़ी तैयार कर सकते हैं, जो ज्ञानवान होने के साथ संस्कारित, संवेदनशील और शांतिपूर्ण समाज के निर्माण में सक्रिय योगदान दे। - योगेश कुमार गोयल (लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)

प्रभासाक्षी 5 Sep 2026 11:45 am

राम और कृष्ण से जुड़े स्थान बनेंगे तीर्थ स्थल : सीएम मोहन यादव

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा है कि भगवान राम और कृष्ण का मध्य प्रदेश से गहरा नाता रहा है, इसलिए उनसे जुड़े स्थानों को तीर्थ स्थल के रूप में विकसित किया जाएगा

देशबन्धु 4 Sep 2026 11:25 pm

मणिपुर : सीएम खेमचंद का आह्वान, 'हिंसा खत्म करने और शांति कायम करने के लिए सब आएं साथ'

मणिपुर : सीएम खेमचंद का आह्वान, 'हिंसा खत्म करने और शांति कायम करने के लिए सब आएं साथ'

समाचार नामा 4 Sep 2026 10:20 pm

हल्द्वानी शुद्धिकरण विवाद पर आनंद दुबे बोले, सरकार कार्रवाई नहीं करेगी तो जाएंगे कोर्ट

हल्द्वानी शुद्धिकरण विवाद पर आनंद दुबे बोले, सरकार कार्रवाई नहीं करेगी तो जाएंगे कोर्ट

समाचार नामा 4 Sep 2026 7:59 pm

पुणे भारत की 'ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स' राजधानी बनने की राह पर: देवेंद्र फडणवीस

पुणे भारत की 'ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स' राजधानी बनने की राह पर: देवेंद्र फडणवीस

समाचार नामा 4 Sep 2026 5:59 pm

हार्परकॉलिन्स इंडिया 10 नवंबर को प्रकाशित करेगा सोनिया गांधी की बहुप्रतीक्षित आत्मकथा 'बिलॉन्गिंग'

हार्परकॉलिन्स इंडिया 10 नवंबर को प्रकाशित करेगा सोनिया गांधी की बहुप्रतीक्षित आत्मकथा 'बिलॉन्गिंग'

समाचार नामा 4 Sep 2026 4:23 pm

भोपाल के व्यापारियों-रहवासियों का पक्ष मजबूती से सुप्रीम कोर्ट में रख रही है सरकार : सीएम मोहन यादव

भोपाल के व्यापारियों-रहवासियों का पक्ष मजबूती से सुप्रीम कोर्ट में रख रही है सरकार : सीएम मोहन यादव

समाचार नामा 4 Sep 2026 2:25 pm

भारतीय शेयर बाजार लाल निशान में बंद

मुंबई, भारतीय शेयर बाजार गुरुवार के कारोबारी सत्र में गिरावट के साथ बंद हुआ।

देशबन्धु 4 Sep 2026 1:07 pm

भारत का सर्विसेज पीएमआई 54.1 रहा

नई दिल्ली, भारत के सर्विसेज सेक्टर में अगस्त में जोरदार वृद्धि देखने को मिली है और एचएसबीसी इंडिया सर्विसेज पीएमआई बढ़कर 54.1 पर पहुंच गया है।

देशबन्धु 4 Sep 2026 12:38 pm

पंजाब की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से राघव चड्ढा का नाम गायब, चिदंबरम ने ली चुटकी

मामले ने उस समय और राजनीतिक रंग ले लिया, जब पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर राघव चड्ढा को लेकर तंज कसा। उन्होंने SIR प्रक्रिया के तहत बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने का भी उल्लेख किया।

देशबन्धु 4 Sep 2026 11:30 am

प्रशांत किशोर का शिक्षकों पर बड़ा हमला, बोले- ‘गुरुजी से मस्टरवा बन गए’, जाति के नाम पर वोट देने से बिगड़ी शिक्षा व्यवस्था

प्रशांत किशोर का शिक्षकों पर बड़ा हमला, बोले- ‘गुरुजी से मस्टरवा बन गए’, जाति के नाम पर वोट देने से बिगड़ी शिक्षा व्यवस्था

समाचार नामा 4 Sep 2026 8:40 am

Jaishankar in Kyiv: जेलेंस्की से मुलाकात, रूस से तेल खरीद पर भारत ने साफ किया रुख; युद्ध खत्म करने पर जोर

Jaishankar in Kyiv: जेलेंस्की से मुलाकात, रूस से तेल खरीद पर भारत ने साफ किया रुख; युद्ध खत्म करने पर जोर

समाचार नामा 4 Sep 2026 7:48 am

भोपाल सीलिंग विवाद सुलझाने के लिए मध्य प्रदेश सरकार 'बीच का रास्ता' तलाश रही : कैलाश विजयवर्गीय

भोपाल सीलिंग विवाद सुलझाने के लिए मध्य प्रदेश सरकार 'बीच का रास्ता' तलाश रही : कैलाश विजयवर्गीय

समाचार नामा 3 Sep 2026 11:38 pm

कश्मीरी पंडितों को धमकी और राम मंदिर सीईओ नियुक्ति पर 'सियासत', भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने

कश्मीरी पंडितों को धमकी और राम मंदिर सीईओ नियुक्ति पर 'सियासत', भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने

समाचार नामा 3 Sep 2026 11:25 pm

भूपेंद्र यादव ने एनसीआर में प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए

भूपेंद्र यादव ने एनसीआर में प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए

समाचार नामा 3 Sep 2026 11:24 pm

भाजपा की 'बी टीम' के रूप में काम कर रही बसपा का जनाधार खत्म: रविदास मल्होत्रा

भाजपा की 'बी टीम' के रूप में काम कर रही बसपा का जनाधार खत्म: रविदास मल्होत्रा

समाचार नामा 3 Sep 2026 11:19 pm

'देश में कानून का राज, अब न्याय मिलेगा,' दिशा सालियान केस पर भाजपा विधायक का बयान

पालघर, 3 सितंबर (आईएएनएस)। महाराष्ट्र की सियासत में दिशा सालियान केस की सीबीआई जांच को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। इस मामले को लेकर वसई-विरार की भाजपा विधायक स्नेहा दुबे पंडित ने कहा कि न्याय व्यवस्था पर उन्हें पूरा भरोसा है और यह फैसला दिशा सालियान को न्याय दिलाने की दिशा में बड़ा कदम है।

देशबन्धु 3 Sep 2026 11:16 pm

संवैधानिक अधिकारियों के इस्तीफे पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र से मांगा जवाब

संवैधानिक अधिकारियों के इस्तीफे पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र से मांगा जवाब

समाचार नामा 3 Sep 2026 8:23 pm

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्‍व में भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही: केवल सिंह ढिल्लों

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही: केवल सिंह ढिल्लों

समाचार नामा 3 Sep 2026 7:50 pm

कश्मीरी पंडितों को धमकी पर शिवसेना सख्त, कहा- सुरक्षा सुनिश्चित करे उमर सरकार

कश्मीरी पंडितों को धमकी पर शिवसेना सख्त, कहा- सुरक्षा सुनिश्चित करे उमर सरकार

समाचार नामा 3 Sep 2026 7:49 pm

हीरे से लेकर हथियारों तक, Belgium के साथ मिलकर Modi ने Europe के लिए बनाया बड़ा गेम प्लान

भारत और बेल्जियम के रिश्तों की सबसे चमकदार पहचान हीरे रहे हैं। एंटवर्प से मुंबई और सूरत तक फैला कारोबार दोनों देशों को जोड़ता रहा है। लेकिन अब यह रिश्ता सिर्फ चमकते हीरों तक सीमित नहीं रहने वाला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डी वेवर की नई दिल्ली में हुई मुलाकात ने भारत-बेल्जियम संबंधों को रक्षा, सेमीकंडक्टर, हरित ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, समुद्री सुरक्षा, अंतरिक्ष, साइबर सुरक्षा और निवेश जैसे रणनीतिक क्षेत्रों तक विस्तार देने का स्पष्ट रोडमैप तैयार कर दिया है। बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डी वेवर की 2 से 4 सितंबर की भारत यात्रा और दोनों देशों के बीच हुए समझौते इस बात का संकेत हैं कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत यूरोप के साथ अपने संबंधों को नई सामरिक गहराई दे रहा है। प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि भारत अब द्विपक्षीय संबंधों को अलग-अलग घटनाओं के रूप में नहीं, बल्कि व्यापार, सुरक्षा, प्रौद्योगिकी और वैश्विक राजनीति को जोड़कर एक व्यापक रणनीतिक ढांचे में आगे बढ़ा रहा है। इतिहास की साझी विरासत, भविष्य की रणनीतिक साझेदारी हम आपको बता दें कि भारत-बेल्जियम संबंधों की जड़ें गहरी हैं। प्रथम विश्व युद्ध में फ्लैंडर्स के युद्धक्षेत्रों में 9,000 से अधिक भारतीय सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया था। बेल्जियम स्वतंत्र भारत के साथ 1947 में राजनयिक संबंध स्थापित करने वाले शुरुआती यूरोपीय देशों में शामिल था। अब 2027 में दोनों देश अपने राजनयिक संबंधों की 80वीं वर्षगांठ मनाएंगे। प्रधानमंत्री डी वेवर ने भारत यात्रा की शुरुआत राजघाट पर महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि देकर की। यह प्रतीकात्मक घटना उस रिश्ते की ओर इशारा करती है जिसकी बुनियाद लोकतंत्र, कानून के शासन, बहुलवाद और आपसी विश्वास पर टिकी है। इसे भी पढ़ें: SCO के मंच से चीन और पाकिस्तान को एक साथ धोकर मोदी ने दुनिया की वाहवाही लूट ली लेकिन इस बार इतिहास से अधिक महत्वपूर्ण भविष्य है। 15 जुलाई 2026 को ब्रुसेल्स में शुरू हुआ पहला भारत-बेल्जियम रणनीतिक संवाद अब दोनों देशों के संबंधों को नियमित और व्यापक संस्थागत आधार देगा। इसके तहत व्यापार और निवेश से लेकर हरित परिवर्तन, प्रौद्योगिकी, संपर्क, रक्षा और सुरक्षा तक सहयोग के लिए एक स्थायी मंच तैयार किया गया है। भारत-ईयू समीकरण में बेल्जियम की बढ़ती अहमियत इस यात्रा का सबसे बड़ा वैश्विक महत्व भारत-यूरोपीय संघ संबंधों से जुड़ा है। जनवरी 2026 में भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौते की वार्ता का सफल निष्कर्ष एक ऐतिहासिक घटनाक्रम माना जा रहा है। मोदी और डी वेवर ने इसके शीघ्र क्रियान्वयन पर जोर दिया है। भारत और यूरोपीय संघ दुनिया की दो बड़ी लोकतांत्रिक और आर्थिक शक्तियां हैं। ऐसे समय में जब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं भू-राजनीतिक तनाव, युद्ध और आर्थिक प्रतिस्पर्धा से प्रभावित हैं, भारत-ईयू आर्थिक साझेदारी का विस्तार केवल व्यापारिक मामला नहीं है। यह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को चीन-केंद्रित निर्भरता से बाहर निकालने और अधिक विविध तथा सुरक्षित व्यवस्था बनाने की रणनीति भी है। बेल्जियम इस समीकरण में विशेष भूमिका निभा सकता है। एंटवर्प यूरोप के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक और बंदरगाह केंद्रों में है। दूसरी ओर भारत हिंद महासागर क्षेत्र में एक विशाल बाजार और तेजी से उभरती आर्थिक शक्ति है। दोनों देशों का सहयोग यूरोप और भारत के बीच एक नए आर्थिक एवं लॉजिस्टिक गलियारे की नींव बन सकता है। पांच साल में व्यापार दोगुना करने का लक्ष्य दोनों प्रधानमंत्रियों ने अगले पांच वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए इंडिया-बेल्जियम इन्वेस्टमेंट फास्ट-ट्रैक मैकेनिज्म शुरू किया गया है, जो निवेश संबंधी बाधाओं को दूर करने और कंपनियों को सहायता देने का काम करेगा। बेल्जियम की संप्रभु निवेश संस्था एसएफपीआईएम और भारत के नेशनल इन्वेस्टमेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर फंड यानि एनआईआईएफ के बीच सहयोग से एक संभावित भारत-बेल्जियम आर्थिक और निवेश गलियारे की दिशा में भी काम होगा। सहयोग के नए क्षेत्रों की सूची बेहद महत्वपूर्ण है। इसमें सेमीकंडक्टर, फार्मास्यूटिकल्स, जैव प्रौद्योगिकी, रसायन, रक्षा विनिर्माण, महत्वपूर्ण खनिजों की रिफाइनिंग और रिसाइक्लिंग, परमाणु ऊर्जा और उन्नत विनिर्माण शामिल हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने साफ कहा कि बेल्जियम की सेमीकंडक्टर विशेषज्ञता और भारत का विशाल औद्योगिक पैमाना एक-दूसरे के पूरक हैं। बेल्जियम के विश्वस्तरीय आईमेक संस्थान को भारत के सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम से जोड़ने की पहल भविष्य में तकनीकी आत्मनिर्भरता के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। रक्षा सहयोग: रिश्तों का सबसे बड़ा रणनीतिक बदलाव इसके अलावा, भारत-बेल्जियम संबंधों में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव रक्षा और सुरक्षा के क्षेत्र में दिखाई देता है। दोनों देशों के रक्षा मंत्रालयों के बीच हस्ताक्षरित लेटर ऑफ इंटेंट नियमित सैन्य संवाद, स्टाफ वार्ता, प्रशिक्षण, अनुसंधान और रक्षा औद्योगिक साझेदारी का ढांचा तैयार करेगा। दोनों देश रक्षा सह-विकास और सह-उत्पादन की संभावनाएं तलाशेंगे। प्रधानमंत्री मोदी ने उन्नत रक्षा उपकरणों, विशेष रूप से जोरावर टैंक जैसे क्षेत्रों में सहयोग का उल्लेख किया। साथ ही बेल्जियम का नई दिल्ली में रक्षा अताशे नियुक्त करना और भारत का ब्रुसेल्स में स्थायी रक्षा अताशे नियुक्त करने का फैसला रिश्तों की बदलती प्राथमिकताओं का स्पष्ट संकेत है। बेल्जियम का युद्धपोत एलईओपोल्ड 1 नवंबर 2026 को भारत आएगा। यह मात्र नौसैनिक दौरा नहीं, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ते सहयोग का संकेत है। इसके अलावा, भारत और बेल्जियम ने आतंकवाद के खिलाफ भी मजबूत साझा रुख अपनाया है। बेल्जियम ने पहलगाम में 2025 के आतंकी हमले की निंदा दोहराई और सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ भारत के साथ एकजुटता दिखाई। दोनों देशों ने आतंकवाद, उसके सुरक्षित ठिकानों और वित्तपोषण के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया। वहीं, सीबीआई और बेल्जियम की संघीय पुलिस के बीच समझौता संगठित अपराध और साइबर अपराध के खिलाफ सहयोग को नई ताकत देगा। सूचना साझा करने, भगोड़ों का पता लगाने और क्षमता निर्माण में यह समझौता महत्वपूर्ण होगा। ग्रीन हाइड्रोजन से समुद्री शक्ति तक साथ ही हरित ऊर्जा सहयोग भी इस यात्रा की बड़ी उपलब्धि है। नवीकरणीय ऊर्जा पर नए एमओयू के तहत ग्रीन हाइड्रोजन, सौर ऊर्जा, ऊर्जा भंडारण, अपतटीय पवन ऊर्जा, बायो-एनर्जी और पंप्ड स्टोरेज में सहयोग बढ़ेगा। ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन से लेकर परिवहन, भंडारण और अंतिम उपयोग तक पूरी वैल्यू चेन में साझेदारी की योजना बनाई गई है। प्रधानमंत्री मोदी ने आंध्र प्रदेश के काकीनाडा में विकसित हो रहे विशाल ग्रीन अमोनिया प्रोजेक्ट का भी उल्लेख किया। समुद्री और बंदरगाह सहयोग भी सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। एंटवर्प और फ्लैंडर्स की बंदरगाह विशेषज्ञता, भारत के तेजी से विकसित होते बंदरगाह नेटवर्क और हिंद महासागर में भारत की भूमिका मिलकर नई संभावनाएं पैदा कर सकती हैं। लॉजिस्टिक्स, ड्रेजिंग, बंदरगाह विकास और अपतटीय पवन ऊर्जा में बेल्जियम की विशेषज्ञता भारत के लिए उपयोगी हो सकती है। वैश्विक राजनीति में साझा संदेश इसके अलावा, दोनों नेताओं ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की जरूरत पर जोर दिया। बेल्जियम ने एक बार फिर विस्तारित और सुधारित सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन किया। दोनों देशों ने एक-दूसरे की अस्थायी सदस्यता की उम्मीदवारी का भी समर्थन किया। यूक्रेन और पश्चिम एशिया पर दोनों देशों ने संवाद और कूटनीति के जरिए न्यायपूर्ण और स्थायी शांति की आवश्यकता पर जोर दिया। यह भारत की उस विदेश नीति के अनुरूप है जो किसी सैन्य गुट का हिस्सा बनने के बजाय संवाद, बहुपक्षवाद और रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता देती है। मोदी की कूटनीति का बड़ा संदेश देखा जाये तो भारत-बेल्जियम संबंधों का नया अध्याय प्रधानमंत्री मोदी की व्यापक कूटनीतिक सोच को दर्शाता है। मोदी ने पुराने हीरा व्यापार को आधुनिक रणनीतिक साझेदारी में बदलने का प्रयास किया है। अब एंटवर्प-मुंबई-सूरत का संबंध सेमीकंडक्टर, ग्रीन हाइड्रोजन, रक्षा उत्पादन, समुद्री संपर्क और निवेश से जुड़ रहा है। यही इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि भारत ने यूरोप के साथ अपने संबंधों को केवल बाजार तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें सुरक्षा, तकनीक और भू-राजनीति से जोड़ दिया है। प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीति की सफलता इस बात में है कि भारत आज एक साथ अमेरिका, यूरोप, रूस और ग्लोबल साउथ के साथ अपने हितों के आधार पर संबंधों को आगे बढ़ा रहा है। बेल्जियम के साथ यह नई साझेदारी भी उसी संतुलित और बहुआयामी कूटनीति का उदाहरण है। बहरहाल, हीरों की चमक से शुरू हुआ भारत-बेल्जियम संबंध अब हाई-टेक, हरित ऊर्जा और रक्षा सहयोग की नई रोशनी में प्रवेश कर रहा है। यदि तय समझौते जमीन पर उतरे, तो यह साझेदारी केवल दो देशों के रिश्तों को नहीं, बल्कि भारत-यूरोप के पूरे रणनीतिक समीकरण को नई दिशा दे सकती है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 3 Sep 2026 6:33 pm

'मैं इन युवाओं के साथ खड़ा हूं', बिहार छात्र आंदोलन के घायलों से मिले राहुल गांधी

'मैं इन युवाओं के साथ खड़ा हूं', बिहार छात्र आंदोलन के घायलों से मिले राहुल गांधी

समाचार नामा 3 Sep 2026 6:15 pm

राम मंदिर ट्रस्ट के सीईओ के तौर पर जितेंद्र मिश्रा की नियुक्ति पर एनडीए नेता बोले-'ऑपरेशन सिंदूर संभाला था, पारदर्शिता लाएंगे'

राम मंदिर ट्रस्ट के सीईओ के तौर पर जितेंद्र मिश्रा की नियुक्ति पर एनडीए नेता बोले-'ऑपरेशन सिंदूर संभाला था, पारदर्शिता लाएंगे'

समाचार नामा 3 Sep 2026 5:11 pm

राम मंदिर अयोध्या के सीईओ एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र की नियुक्ति के पीछे छिपे महत्वपूर्ण प्रशासनिक व सियासी संदेश को समझिए

उत्तरप्रदेश की आध्यात्मिक राजधानी अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण भारतीय राजनीति के सबसे लंबे और निर्णायक अध्यायों में से एक रहा है। इस मंदिर आंदोलन ने भारतीय राजनीति की दिशा बदली, भाजपा को राष्ट्रीय सत्ता के केंद्र तक पहुंचाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई और अंततः 22 जनवरी 2024 को रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा के साथ आंदोलन का सबसे बड़ा प्रतीकात्मक लक्ष्य पूरा हुआ। लेकिन इतिहास का दिलचस्प मोड़ यह है कि मंदिर बनने के बाद असली प्रशासनिक चुनौती शुरू हुई है, जिसके दृष्टिगत 2 सितंबर 2026 को श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने सेवानिवृत्त एयर मार्शल जितेंद्र कुमार मिश्र को अपना पहला पूर्णकालिक CEO नियुक्त किया। इसलिए मिश्र की नियुक्ति के पीछे छिपे महत्वपूर्ण प्रशासनिक व सियासी संदेश को समझना होगा। इसे भी पढ़ें: Operation Sindoor से अयोध्या तक: कौन है राम मंदिर ट्रस्ट के नए CEO एयर मार्शल जीतेंद्र मिश्रा, क्या होगी जिम्मेदारी मसलन, लगभग 5,585 आवेदनों में से बहुस्तरीय चयन प्रक्रिया के बाद तीन नामों के पैनल में से उनका चयन हुआ। मिश्र अप्रैल 2026 में भारतीय वायुसेना के पश्चिमी वायु कमान के प्रमुख पद से सेवानिवृत्त हुए थे और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उनकी भूमिका के कारण राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित रहे। सवाल इसलिए बड़ा है कि राम मंदिर जैसे धार्मिक-सांस्कृतिक संस्थान का CEO एक पूर्व शीर्ष सैन्य कमांडर ही क्यों? और उससे भी बड़ा सवाल यह कि क्या यह सिर्फ प्रशासनिक नियुक्ति है या अयोध्या के लिए तैयार किए जा रहे किसी बड़े संस्थागत मॉडल का संकेत? मेरे अनुभवजन्य आकलन में इसके कम-से-कम सात बड़े प्रशासनिक व सियासी संदेश हैं, जो इसप्रकार हैं:- पहला, राम मंदिर अब ‘आंदोलन’ नहीं, ‘सुव्यवस्थित संस्थान’ है: राम मंदिर आंदोलन के समय सबसे बड़ी आवश्यकता राजनीतिक-सामाजिक लामबंदी की थी, जबकि मंदिर निर्माण के बाद आवश्यकता बदल गई है। अब करोड़ों श्रद्धालुओं की व्यवस्था, दर्शन प्रणाली, सुरक्षा, दान, वित्त, कर्मचारियों, तकनीक, निर्माण, यातायात और अंतरराष्ट्रीय धार्मिक पर्यटन का प्रबंधन करना है। इसलिए CEO की नियुक्ति मूलतः इस बात की घोषणा है कि राम मंदिर अब केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि एक विशाल संस्थागत व्यवस्था है। खासकर यह परिवर्तन भाजपा और संघ परिवार के लिए भी महत्वपूर्ण है। जिस राम मंदिर ने राजनीतिक आंदोलन को ऊर्जा दी, वही मंदिर अब शासन और प्रशासन की क्षमता की परीक्षा का केंद्र बनने जा रहा है। दूसरा, ‘संत-आधारित प्रबंधन’ से ‘प्रोफेशनल मैनेजमेंट’ की ओर अग्रसर है: राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की मूल प्रकृति धार्मिक-सामाजिक है। लेकिन मंदिर के बढ़ते आकार और महत्व के साथ केवल पारंपरिक न्यास व्यवस्था पर्याप्त नहीं रह सकती। शायद CEO का पद बनाना इसी बदलाव का संकेत है। और CEO के लिए पूर्व एयर मार्शल का चयन और भी स्पष्ट संदेश देता है कि- संस्था को अब कॉरपोरेट-जैसी प्रशासनिक दक्षता, सैन्य-जैसी अनुशासनात्मक क्षमता और आधुनिक प्रबंधन की आवश्यकता महसूस हो रही है। मिश्र के चयन की प्रक्रिया भी असाधारण थी—5,585 आवेदन, 1,580 योग्य/उपयुक्त उम्मीदवार, 108 ऑनलाइन इंटरैक्शन, 16 आमने-सामने के उम्मीदवार और अंततः तीन नामों का पैनल। चयन समिति ने नेतृत्व, प्रबंधन अनुभव, ईमानदारी और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय महत्व की संस्था को संचालित करने की दृष्टि जैसे पहलुओं का मूल्यांकन किया। अर्थात संदेश साफ है कि अब राम मंदिर के प्रशासन में ‘कौन है?’ से ज्यादा महत्वपूर्ण ‘क्या कर सकता है?’ होने जा रहा है। तीसरा, ऑपरेशन सिंदूर से अयोध्या तक ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ से ‘राष्ट्रीय संस्कृति’ का सेतु है यह निर्णय: जितेंद्र मिश्र की नियुक्ति का सबसे प्रतीकात्मक पक्ष यही है कि जिस अधिकारी ने पश्चिमी वायु कमान का नेतृत्व किया और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सैन्य अभियानों की कमान से जुड़े रहे, वही अब राम मंदिर के प्रशासन का नेतृत्व करेंगे। उन्हें सर्वोत्तम युद्ध सेवा पदक से भी सम्मानित किया गया है। इसका अर्थ निकालने में सावधानी जरूरी है। यह कहना जल्दबाजी होगी कि सरकार या ट्रस्ट ने जानबूझकर ‘राष्ट्रीय सुरक्षा मॉडल’ को मंदिर प्रशासन में उतारने का निर्णय लिया है। लेकिन प्रतीकात्मक अर्थ को नकारना भी मुश्किल है। सीमा की रक्षा करने वाले सैन्य कमांडर से लेकर देश की सांस्कृतिक अस्मिता के सबसे बड़े प्रतीक के प्रबंधन तक की यात्रा— अपने आप में एक शक्तिशाली राजनीतिक प्रतीक है। यह संदेश भी पढ़ा जा सकता है कि अयोध्या को अब केवल धार्मिक नगर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय महत्व के सांस्कृतिक-सुरक्षा परिसर के रूप में विकसित करने की तैयारी है। चौथा, चढ़ावा विवाद के बाद ‘विश्वास’ की पुनर्स्थापना होगी: इस नियुक्ति के समय को सबसे अधिक गंभीरता से देखना होगा। राम मंदिर के चढ़ावे से जुड़े कथित वित्तीय अनियमितता मामले में गिरफ्तारियां हुईं और ट्रस्ट के प्रशासन पर सवाल उठे। हालिया ट्रस्ट बैठक में चढ़ावे की गिनती में मानवीय हस्तक्षेप घटाने के लिए तकनीक आधारित प्रणाली पर भी विचार किया गया। IIT और बैंकों से प्रस्ताव लिए जाने की खबर है। ऐसे समय में एक अत्यंत वरिष्ठ, गैर-राजनीतिक और अनुशासनप्रिय सैन्य अधिकारी को CEO बनाना एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि अब मंदिर प्रशासन में विश्वास केवल धार्मिक प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि संस्थागत पारदर्शिता से भी अर्जित करना होगा। लेकिन यहां राजनीतिक ईमानदारी जरूरी है। मिश्र की नियुक्ति को सीधे चढ़ावा विवाद का परिणाम कहना उपलब्ध तथ्यों से सिद्ध नहीं है। CEO चयन की प्रक्रिया जुलाई में शुरू हो चुकी थी और लगभग दो महीने चली। फिर भी दोनों घटनाओं का समय एक साथ आने से यह स्पष्ट है कि ट्रस्ट अपने प्रशासनिक ढांचे को अधिक मजबूत और जवाबदेह बनाने की दिशा में बढ़ रहा है। पांचवां, क्या RSS-BJP-VHP की पारंपरिक भूमिका बदल रही है?: यही वह सवाल है जिस पर सबसे ज्यादा राजनीतिक बहस होगी। राम मंदिर आंदोलन की राजनीतिक-सामाजिक धुरी में भाजपा के साथ RSS और विश्व हिंदू परिषद की भूमिका ऐतिहासिक रही है। अब जब मंदिर का संचालन एक पूर्व एयर मार्शल को सौंपा जा रहा है, तो क्या इसका अर्थ है कि पुराने राजनीतिक-सामाजिक नेटवर्क पर भरोसा कम हो रहा है? कांग्रेस नेता भूपेश बघेल ने इसी दिशा में राजनीतिक आरोप लगाया है कि भाजपा-RSS से जुड़े लोगों पर भरोसा कम होने के कारण सेना के अधिकारी को जिम्मेदारी दी गई। लेकिन इस आरोप को तथ्य नहीं, राजनीतिक व्याख्या के रूप में देखना चाहिए। दूसरी व्याख्या ज्यादा व्यावहारिक हो सकती है। वह यह कि RSS और VHP आंदोलन चला सकते हैं, वैचारिक-सामाजिक आधार दे सकते हैं, लेकिन प्रतिदिन लाखों श्रद्धालुओं, हजारों कर्मचारियों, वित्तीय प्रणालियों, तकनीकी ढांचे और सुरक्षा-समन्वय को चलाने के लिए अलग तरह की विशेषज्ञता चाहिए। इसलिए संभव है कि यह RSS/BJP से दूरी नहीं, बल्कि कार्य-विभाजन का नया चरण हो। छठा, मोदी मॉडल के बाद अब ‘अयोध्या मॉडल’ की परीक्षा का वक्त: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक विमर्श में राम मंदिर केवल धार्मिक मुद्दा नहीं रहा; वह सांस्कृतिक पुनर्जागरण, विरासत और विकास की राजनीति से भी जुड़ा रहा है। अब अयोध्या को विश्वस्तरीय धार्मिक-सांस्कृतिक शहर बनाने की चुनौती सामने है। यही वह जगह है जहां ‘अयोध्या मॉडल’ की परीक्षा होगी। क्या अयोध्या विश्वस्तरीय तीर्थ व्यवस्था बना पाएगी? वह करोड़ों श्रद्धालुओं को सुरक्षित दर्शन करा पाएगी? वह दान और वित्तीय व्यवस्था में पारदर्शिता स्थापित करेगी? वह स्थानीय नागरिकों के हितों की रक्षा करेगी? वह धार्मिक पर्यटन से रोजगार पैदा करेगी? वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की सांस्कृतिक छवि मजबूत करेगी? अगर इन सवालों का उत्तर सकारात्मक मिलता है तो राम मंदिर भाजपा के लिए केवल राजनीतिक प्रतीक नहीं रहेगा। वह प्रशासनिक सफलता का मॉडल भी बन सकता है। सातवां, 2027 की उत्तर प्रदेश राजनीति में अयोध्या का नया अर्थ कैसे समझाया जाएगा: यह सबसे बड़ा संदेश है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव सामने है। ऐसे समय में अयोध्या का राजनीतिक महत्व कम नहीं हुआ है, बल्कि उसकी प्रकृति बदल गई है। 2017 और 2022 की राजनीति में राम मंदिर मुख्यतः निर्माण और आस्था के सवाल से जुड़ा था। हालांकि, अब सवाल बदल गया है—वह यह कि राम मंदिर बनने के बाद अयोध्या कैसी बनी? यही प्रश्न 2027 के राजनीतिक विमर्श में महत्वपूर्ण हो सकता है। अगर अयोध्या में विश्वस्तरीय सुविधाएं, रोजगार, पर्यटन, बेहतर परिवहन और सुरक्षित तीर्थ व्यवस्था दिखाई देती है तो भाजपा इसे अपने विकास और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के संयुक्त मॉडल के रूप में प्रस्तुत कर सकती है। लेकिन यदि स्थानीय विस्थापन, महंगाई, यातायात, भीड़, पर्यावरण, प्रशासनिक भ्रष्टाचार या वित्तीय विवाद जैसे मुद्दे उभरते हैं तो विपक्ष को नया राजनीतिक हथियार मिल सकता है। इसलिए CEO की नियुक्ति का अप्रत्यक्ष चुनावी अर्थ भी है। अब राम मंदिर केवल भाजपा की वैचारिक पूंजी नहीं, बल्कि उसका प्रशासनिक प्रदर्शन भी राजनीतिक पूंजी बन सकता है। आठवां, ट्रस्ट का सामूहिक पुनर्गठन: गत 2 सितंबर की बैठक में केवल CEO नियुक्त नहीं किया गया, बल्कि तीन नए ट्रस्टियों—महेश भगचंदका, मदन मोहन पांडेय और निर्मला यादव—की नियुक्ति भी हुई। सबकी प्रमुख जिम्मेदारियों में फेरबदल हुआ और वित्तीय मामलों तथा दान प्रबंधन को लेकर भी महत्वपूर्ण फैसले किए गए। इसलिए इसे किसी एक पद की नियुक्ति कहना उचित नहीं होगा। यह राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के दूसरे चरण के पुनर्गठन जैसा दिखाई देता है। पहला चरण था—मंदिर निर्माण, और दूसरा चरण है—मंदिर संचालन। और तीसरा चरण संभवतः होगा—अयोध्या को वैश्विक धार्मिक-सांस्कृतिक केंद्र बनाना। और जितेंद्र मिश्र इसी दूसरे चरण के प्रमुख प्रशासक बनने जा रहे हैं। नौवां, मोदी, RSS और योगी के लिए इन नियुक्तियों के अलग-अलग अर्थ: देखा जाए तो इन महत्वपूर्ण नियुक्तियों के मोदी, RSS और योगी—तीनों के लिए अलग-अलग अर्थ हैं, जिसके दृष्टिगत इस नियुक्ति को तीन राजनीतिक स्तरों पर पढ़ा जा सकता है। जहां मोदी के लिए यह प्रशासनिक दक्षता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को जोड़ने का अवसर है। वहीं, RSS के लिए यह आंदोलन की वैचारिक सफलता के बाद संस्था को टिकाऊ और पेशेवर बनाने की चुनौती है। वहीं, उत्तर प्रदेश सरकार के लिए यह अयोध्या को केवल धार्मिक नगर नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े पर्यटन और सांस्कृतिक-आर्थिक केंद्रों में बदलने की परीक्षा है। और यहीं पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। दसवां, ट्रस्ट स्वतंत्र धार्मिक न्यास है, उसका CEO सीधे राज्य सरकार का अधिकारी नहीं है: अब भले ही ट्रस्ट स्वतंत्र धार्मिक न्यास है और उसका CEO सीधे राज्य सरकार का अधिकारी नहीं है। इसलिए दोनों के बीच अधिकार-क्षेत्र अलग हैं। लेकिन अयोध्या की सड़क, परिवहन, पुलिस, कानून-व्यवस्था, नगर विकास, पर्यटन और नागरिक सुविधाएं राज्य सरकार से जुड़ी हैं। इसलिए CEO और उत्तर प्रदेश प्रशासन के बीच समन्वय अयोध्या मॉडल की सफलता की निर्णायक शर्त होगा। ग्यारहवां, राम मंदिर आंदोलन व मंदिर निर्माण मुहिम की असली परीक्षा अब हुई शुरू : कहना न होगा कि जिस राम मंदिर आंदोलन ने भारतीय राजनीति को बदल दिया और मंदिर निर्माण ने आंदोलन को ऐतिहासिक उपलब्धि में बदला, उसकी असली परीक्षा अब शुरू हुई है। क्योंकि प्रशासन इस उपलब्धि को संस्थागत स्थायित्व में बदलने की कोशिश कर रहा है। एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र की नियुक्ति इसी परिवर्तन का सबसे बड़ा संकेत है। लेकिन उनकी सैन्य वर्दी की चमक से ज्यादा महत्वपूर्ण होगा उनका प्रशासनिक परिणाम। वह यह कि वे कितनी पारदर्शिता ला पाते हैं? दान व्यवस्था कितनी विश्वसनीय बनती है?श्रद्धालुओं को कितनी बेहतर सुविधाएं मिलती हैं? स्थानीय लोगों को अयोध्या के विकास में कितना हिस्सा मिलता है? ट्रस्ट कितना स्वायत्त और जवाबदेह रहता है? अंततोगत्वा, महत्वपूर्ण संदेश यह कि क्या राम मंदिर की भव्यता के साथ उसकी प्रशासनिक विश्वसनीयता भी उतनी ही भव्य बन पाएगी? यही वह प्रश्न है जो आने वाले वर्षों में राम मंदिर की राजनीतिक विरासत तय करेगा। क्योंकि अब राम मंदिर का सवाल केवल यह नहीं है कि “रामलला का मंदिर कितना भव्य है?” बल्कि मौलिक सवाल यह है कि “रामलला के मंदिर की व्यवस्था कितनी आदर्श है?” और शायद यही कारण है कि एक पूर्व एयर मार्शल को मंदिर का पहला CEO बनाया गया है। राम मंदिर आंदोलन ने सत्ता को बदलने का काम किया था; अब राम मंदिर का प्रशासन यह तय करेगा कि वह भारतीय संस्थागत संस्कृति को कितना बदल पाता है। यहीं से अयोध्या की राजनीति का अगला अध्याय शुरू होता है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 3 Sep 2026 4:41 pm

राष्ट्रीय आत्मविश्वास को मजबूत करता जीएसएलवी-एफ17 का प्रक्षेपण

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) जल्द ही जीएसएलवी-एफ 17 लॉन्च करके एक बड़ी उपलब्धि हासिल करने वाला है। यह मिशन अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट ईओएस-05 (जिसे पहले जीआई सैट-1ए कहा जाता था) को अंतरिक्ष में ले जाएगा। ईओएस-05 एक अत्याधुनिक इमेजिंग सैटेलाइट है जिसे आपदाओं के समय तेज़ी से तस्वीरें लेने के लिए बनाया गया है। इसरो ने ही इस स्पेसक्राफ्ट को विकसित किया है और इसका लॉन्च के समय वज़न 2,367 किलोग्राम होगा। ईओएस-05/जीआई सैट-1ए उस कमी को पूरा करेगा जो 2021 में ईओएस-03/जीआई सैट-1 के लॉन्च में आई रुकावट के कारण पैदा हुई थी। जीएसएलवी-एफ 10 मिशन इसके क्रायोजेनिक अपर स्टेज में तकनीकी खराबी के कारण विफल हो गया था। हालांकि लिफ्ट-ऑफ के बाद पहला और दूसरा स्टेज सामान्य रूप से काम कर रहे थे, लेकिन तीसरे स्टेज का क्रायोजेनिक इंजन चालू नहीं हो पाया, जिससे ईओएस-03 सैटेलाइट का नुकसान हो गया। इसरो का नया आत्मविश्वास इसरो के चेयरमैन डॉ. वी. नारायणन के अनुसार, ईओएस-05 सैटेलाइट पृथ्वी से लगभग 36,000 किलोमीटर ऊपर स्थित होकर पूरे देश की लगातार निगरानी करेगा। पीएसएलवी रॉकेट की लगातार दो विफलताओं के बाद, इसरो अपने अगले लॉन्च के लिए तैयार है। यह सैटेलाइट ठीक वैसे ही काम करेगा जैसे कोई पर्यवेक्षक ऊँची जगह से पूरे गाँव पर नज़र रखता है। डॉ. नारायणन ने बताया कि इसरो की योजना मार्च 2027 तक सात रॉकेट लॉन्च करने की है, जिसमें गगनयान मिशन (जीआई मिशन) की पहली बिना क्रू वाली उड़ान भी शामिल है। मौजूदा वित्तीय वर्ष के लिए, इसरो का लक्ष्य 12 सैटेलाइट बनाना और आठ रॉकेट लॉन्च करना है। ये मिशन संचार, नेविगेशन, पृथ्वी की निगरानी और वैज्ञानिक अनुसंधान को बेहतर बनाएंगे, साथ ही भविष्य में मानव अंतरिक्ष उड़ान और खोज के लिए आधार भी तैयार करेंगे। लॉन्च की तैयारियां इसरो, जीएसएलवी-एफ 17 लॉन्च के लिए अंतिम तैयारियां पूरी कर रहा है। यह लॉन्च 4 सितंबर 2026 को सुबह 2:55 बजे सतीश धवन स्पेस सेंटर, श्रीहरिकोटा के दूसरे लॉन्च पैड से निर्धारित है। जीएसएलवी-एफ 17 को 29 अगस्त 2026 को रात लगभग 8 बजे दूसरे लॉन्च पैड (एसएलपी) पर ले जाया गया। यह मिशन एक अहम चरण में पहुँच गया है, क्योंकि रॉकेट को टेक-ऑफ से पहले व्हीकल इंटीग्रेशन सेंटर (वीआईसी) से लॉन्च पैड पर ले जाया गया है। इसे भी पढ़ें: ISRO का धमाका, स्पेस में तैनात होगी भारत की तीसरी आंख EOS-05, कांपे चीन-पाकिस्तान यह मिशन ईओएस-05 GEO इमेजिंग सैटेलाइट (जीआई सैट-1ए) को सब-जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में भेजेगा। इस ऑर्बिट का पेरिगी (पृथ्वी के सबसे करीब का बिंदु) 170 किमी और एपोजी (सबसे दूर का बिंदु) 28,934 किमी होगा। 2025 और 2026 की शुरुआत में लगातार दो पीएसएलवी मिशन फेल होने के बाद, इस मिशन पर बारीकी से नज़र रखी जाएगी और इसके हर पहलू की विस्तार से जांच की जाएगी। इसरो पिछले आठ महीनों में कोई सफल रॉकेट लॉन्च नहीं कर पाया है, लेकिन अब एजेंसी एक बड़ी वापसी के लिए तैयार है। इसरो ने गड़बड़ी के कारणों की जांच के लिए लॉन्च रोक दिए थे, जिससे जीएसएलवी-एफ 17/ईओएस-05 मिशन उसके लॉन्च प्रोग्राम में भरोसा बहाल करने का एक अहम मौका बन गया है। उम्मीद है कि यह सैटेलाइट भारत की पृथ्वी की निगरानी, इमेजिंग और डेटा-आधारित गतिविधियों को बेहतर बनाएगा। यह मिशन भारत की अंतरिक्ष-आधारित पृथ्वी अवलोकन क्षमताओं में एक बड़ी प्रगति है और इससे और भी एडवांस्ड सैटेलाइट सिस्टम के विकास में मदद मिलेगी। ईओएस-05 के उद्देश्य ईओएस-05 एक पृथ्वी अवलोकन सैटेलाइट है जिसे जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से भारतीय उपमहाद्वीप और आसपास के क्षेत्रों की लगभग रियल-टाइम, हाई-टेम्पोरल-रिज़ॉल्यूशन वाली इमेजिंग करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। ईओएस-05 के मुख्य उद्देश्य साफ मौसम (बिना बादलों के) में बार-बार और बड़े इलाके की निगरानी करने पर केंद्रित हैं। सैटेलाइट की मुख्य क्षमताओं और लक्ष्यों में ये शामिल हैं: ईओएस-05 विज़िबल/नियर-इन्फ्रारेड और शॉर्ट-वेव इन्फ्रारेड बैंड में मल्टीस्पेक्ट्रल और हाइपरस्पेक्ट्रल इमेज लेता है। यह लगभग हर पाँच मिनट में चुनिंदा क्षेत्रों और हर तीस मिनट में पूरे भारतीय भू-भाग की इमेज लेता है, और मल्टीस्पेक्ट्रल मोड में लगभग 42 मीटर का स्थानिक रिज़ॉल्यूशन (स्पेशियल रिज़ॉल्यूशन) हासिल करता है। यह सैटेलाइट पृथ्वी के घूमने के साथ एक निश्चित स्थिति बनाए रखते हुए, लगभग 36,000 किमी की जियोसिंक्रोनस ऊंचाई से लगातार निगरानी करने में सक्षम बनाता है। यह कॉन्फ़िगरेशन एक ही बड़े इलाके को लगातार या लगभग लगातार कवर करता है, जबकि लो-अर्थ-ऑर्बिट इमेजिंग सैटेलाइट्स कुछ खास जगहों के ऊपर से केवल कभी-कभी ही गुज़रते हैं। इन क्षमताओं से जो मुख्य काम किए जा सकते हैं, उनमें ये शामिल हैं: (i) प्राकृतिक आपदाओं और अचानक होने वाली घटनाओं, जैसे चक्रवात, बाढ़, जंगल की आग, बादल फटने और आंधी-तूफान के लिए तेज़ी से निगरानी और समय रहते चेतावनी देना। (ii) मौसम पर नज़र रखना और पर्यावरण की निगरानी करना। (iii) खेती, वानिकी और प्राकृतिक संसाधनों का आकलन, जिसमें फसल की स्थिति, पेड़-पौधों की सेहत और जल निकायों की निगरानी शामिल है। (iv) रणनीतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए निगरानी, जिसमें राष्ट्रीय सीमाओं जैसे महत्वपूर्ण इलाकों पर लगातार नज़र रखना शामिल है। जीएसएलवी की जानकारी जीएसएलवी-एफ 17 मिशन इसरो का कुल मिलाकर 103वां और 2026 का दूसरा मिशन है। यह जीएसएलवी मार्क I और II के लिए 19वां और साल का पहला मिशन है। जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल एक एक्सपेंडेबल लॉन्च सिस्टम है, जो जीएसएलवी मार्क III से अलग है। जीएसएलवी मार्क-I में रूसी क्रायोजेनिक स्टेज का इस्तेमाल किया गया है, जबकि मार्क-II में भारत में बना अपर स्टेज इस्तेमाल होता है; तीसरे स्टेज को छोड़कर दोनों वर्शन का कॉन्फ़िगरेशन एक जैसा है। यह व्हीकल पीएसएलवी के भरोसेमंद पार्ट्स जैसे S125/S139 सॉलिड रॉकेट बूस्टर और विकास इंजन का इस्तेमाल करता है। 18 लॉन्च में से जीएसएलवी को 12 बार सफलता मिली है, जबकि चार बार पूरी तरह और दो बार आंशिक रूप से असफलता का सामना करना पड़ा है, जिससे इसकी सफलता दर 72.2% रही है। 2010 से ऑपरेशनल जीएसएलवी मार्क-II की लागत $47 मिलियन है। इसकी ऊंचाई 51.7 मीटर है, जो मार्क-I की 49.13 मीटर की ऊंचाई से ज़्यादा है। यह रॉकेट लो अर्थ ऑर्बिट में 5,000 किलोग्राम तक और जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में 2,500 किलोग्राम तक पेलोड ले जाने में सक्षम है, जो इसके पिछले वर्शन की तुलना में लगभग 1,000 किलोग्राम ज़्यादा है। यह 7,887 किलोन्यूटन का थ्रस्ट देता है और तीन स्टेज में काम करता है। निष्कर्ष पीएसएलवी रॉकेट की लगातार दो असफलताओं के बाद, इसरो अपने अगले लॉन्च के लिए तैयार है। तकनीकी उद्देश्यों के अलावा, एक सफल मिशन इसरो टीम का आत्मविश्वास काफी बढ़ाएगा और जनता का भरोसा भी मजबूत करेगा। उम्मीद है कि यह सैटेलाइट कई तरह के कामों में मदद करेगा, जैसे मौसम की जानकारी, आपदा की निगरानी (खासकर बाढ़, चक्रवात और जंगल की आग), खेती, वानिकी, और रणनीतिक व राष्ट्रीय सुरक्षा की निगरानी। - प्रोफ़ेसर (डॉ.) डी.के. पांडे विज़िटिंग सीनियर फ़ेलो, सेंटर फ़ॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज़, एडजंक्ट प्रोफ़ेसर, राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय, सलाहकार, एकेडमिक काउंसिल, फ़ॉरेन पॉलिसी स्कूल और GNOIT, पूर्व एसोसिएट डीन, SoB, गलगोटिया विश्वविद्यालय।

प्रभासाक्षी 3 Sep 2026 3:44 pm

पंजाब में अनाज घोटाले की गूंज

आम आदमी पार्टी के गठन का प्रमुख उद्देश्य भ्रष्टाचार से राजनीति को मुक्त करके उसमें शुचिता लाना था। लेकिन क्या आम आदमी पार्टी इस उद्देश्य में सफल रही। पंजाब सरकार पर काबिज आम आदमी पार्टी के रवैये से तो ऐसा नहीं दिख रहा। बल्कि वह पिछली कांग्रेसी सरकार के भ्रष्टाचार की धारा को ही आगे बढ़ाती दिख रही है। यह कहना है कि राज्य के अनाज आपूर्ति घोटाले के व्हिसल ब्लोअर गुरप्रीत सिंह का। गुरप्रीत सिंह का आरोप है कि इन घोटालों से राज्य को हजारों करोड़ का चूना लगा है। इससे हुई कमाई की बंदरबाट राज्य के मंत्रियों और ताकतवर अफसरों के बीच हुई है। बीते अप्रैल में राज्य के बीजेपी प्रमुख सुनील जाखड़ ने भी पंजाब सरकार पर आरोप लगाया था कि अनाज रखने वाली बोरियों की खरीद में भारी घोटाला किया गया है। उन्होंने आरोप लगाया था कि राज्य में 22 रूपए की दर से बोरी मिल रही थी, लेकिन आम आदमी पार्टी सरकार ने उसे तकरीबन दोगुने यानी 43 रूपए 89 पैसे की दर से खरीदा। इस घोटाले की उन्होंने जांच की मांग की थी। हालांकि बीजेपी अभी चुप है, लेकिन आने वाले दिनों में उसकी चुप्पी टूट सकती है। इसे भी पढ़ें: CJP प्रोटेस्ट क्यों हुआ कैंसिल, CJI ने ऐसा क्या कह दिया, PM मोदी से इसका क्या है कनेक्शन? दिल्ली के शराब घोटाले की तर्ज पर उसकी पंजाब सरकार पर अनाज खरीद घोटाले के आरोप लग रहे हैं। वैसे आरोप पुरानी कांग्रेस सरकार पर लगे थे। राज्य में नई सरकार आने के बाद आम आदमी पार्टी की जिम्मेदारी थी कि इसे रोके और उचित कानूनी उपाय करे। लेकिन जिस तरह से इस मामले की अनदेखी राज्य की मौजूदा सरकार कर रही है, उससे लगता नहीं कि वह इस मामले में ईमानदार है। ह्विसल ब्लोअर गुरप्रीत सिंह का कहना है कि इस सिलसिले में वे अधिकारियों और मंत्रियों से कई बार मिले, लेकिन बात कहीं से आगे बढ़ती नहीं दिख रही। राज्य में विधानसभा के चुनाव की उलटी गिनती शुरू होने में देर है। लेकिन जिस तरह अनाज घोटाले को लेकर पंजाब की सरकार को घेरने की कोशिश हो रही है, उसके संकेत साफ हैं। आने वाले विधानसभा चुनावों में पंजाब की भगवंत मान सरकार के लिए इसका जवाब देना आसान नहीं होगा। फिलहाल इस मुद्दे को राज्य के विपक्षी दल तूल देते हुए नजर नहीं आ रहे हैं। लेकिन इसकी गारंटी नहीं है कि आने वाले दिनों में, जब राज्य के विधानसभा चुनाव सिर पर होंगे, विपक्षी दल इस मामले में चुप बैठेंगे। पांच नदियों के प्रदेश पंजाब की ख्याति खेती-किसानी के लिए रही है। यहां की करीब तीन चौथाई आबादी सीधे या फिर परोक्ष रूप से खेती-किसानी से जुड़ी हुई है। जाहिर है कि यहां के लोगों के लिए खेती-किसानी ना सिर्फ जीवन रेखा है, बल्कि भावनात्मक मुद्दा भी है। इसलिए आने वाले दिनों में अगर अनाज घोटाले की तासीर बढ़ने लगे तो हैरत नहीं होनी चाहिए। पंजाब के कृषि उपज घोटाले के तार पिछली कांग्रेस सरकार से जुड़ते हैं। कांग्रेस की सरकार रहते राज्य के खाद्य और आपूर्ति विभाग से जुड़ी निविदाओं में जमकर धांधली हुई थी। इस मामले के तूल पकड़ने के बाद राज्य के विजिलेंस विभाग ने साल 2022 में लुधियाना में एफआईआर दर्ज की थी। इसकी जांच के दौरान कांग्रेसी सरकार के मंत्री रहे भारत भूषण आशु, ठेकेदार तेलू राम समेत खाद्य और आपूर्ति विभाग के कई अधिकारियों की गिरफ्तारी हुई थी। इसी मामले के एक आरोपी जूनियर अधिकारी राकेश सिंगला भगोड़ा घोषित हो चुका है और उसके लिए सीबीआई ने रेड कार्नर नोटिस जारी कर रखा है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि पंजाब की भगवंत मान सरकार पर अनाज घोटाले का आरोप कैसे चस्पा हो रहा है। राज्य को भ्रष्टाचार और नशा मुक्त करने के नारे के साथ सत्ता में आई पंजाब की भगवंत मान सरकार ने दरअसल इस भगोड़े अधिकारी के खिलाफ अब तक कोई ठोस कार्रवाई करती नजर नहीं आ रही है। अव्वल तो होना चाहिए कि टेंडर घोटाले की जांच करके दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होती, लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है। बल्कि इसकी कड़ी आगे जुड़ती जा रही है। लुधियाना में दर्ज मामले के व्हिसल ब्लोर गुरप्रीत सिंह हैं। उनका आरोप है कि नई सरकार के आने के बाद कहां तक घोटाला रूकता, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। दरअसल पंजाब में कृषि उपज की खरीद भारत सरकार के खाद्य निगम के लिए पंजाब सरकार करती है। इसके लिए उसे प्रति क्विंटल कमीशन मिलता है। असल गड़बड़ी यहीं हैं। गुरप्रीत सिंह का कहना है कि दरअसल असल खरीद कुछ और हो रही है और कागजों पर कुछ और दिखाया जा रहा है। चूंकि हर साल केंद्र सरकार खरीद के लिए निश्चित रकम राज्य को देती है, लिहाजा उसका हर साल वह हिसाब-किताब भी मांगती है। लेकिन दिलचस्प यह है कि साल 2017 में कांग्रेस के सत्ता में आने से लेकर 2022 में आई मान सरकार ने इस बारे में केंद्र को ठीक से हिसाब नहीं दिया है। इसकी वजह से केंद्र सरकार द्वारा इन वर्षों में राज्य को मिले 31 हजार करोड़ रूपए को केंद्र सरकार ने राज्य को कर्ज घोषित कर दिया है। इस कर्ज के एवज में पंजाब सरकार को इसकी दोगुनी रकम चुकानी पड़ेगी। गुरप्रीत सिंह का आरोप है कि कोविड महामारी के बहाने पड़ोसी राज्यों हरियाणा और उत्तर प्रदेश से अनाज की खरीद की गई। इसके लिए करीब साढ़े छह हजार करोड़ की बोगस बिलिंग की गई। फर्जी खरीद बाद में भी हुई। पंजाब में साल 2025 में भारी बाढ़ आई। इस दौरान राज्य में जितने अनाज की पैदावार नहीं हुई, उसकी तुलना में ज्यादा अनाज की राज्य में खरीद की गई। गुरप्रीत सिंह के मुताबिक, इस बार भी पिछले साल यानी 2024 जितने अनाज की खरीद दिखाई गई। दिलचस्प है कि साल 2022 में आपूर्ति घोटाले का मामला दर्ज होने के बाद इस बारे में राज्य सरकार ने खरीददारी की नई नीतियां बनाईं। राज्य ने लेबर कार्टेज एंड ट्रांसपोर्ट पालिसी बनाई। नई नीति की वजह से इस साल राज्य को करीब दो सौ करोड़ का फायदा हुआ। लेकिन अधिकारियों को यह रास नहीं आया, क्योंकि इसमें उनकी कमाई नहीं रही। फिर उन्होंने मिलीभगत करके इस नीति को साल 2024 में बदलकर तकरीबन पुरानी जैसी ही कर दिया। इसकी वजह से राज्य को अनाज खरीद में सालाना सौ करोड़ की चपत लग रही है। पंजाब की मान सरकार पर आरोप लगा है कि साल 2024 में उसने खरीद के लिए टेंडरों में भी हेरफेर किया। गुरप्रीत का आरोप है कि इसके जरिए कुछ चहेते ठेकेदारों को फायदा पहुंचाया गया और उनसे मिली रकम का दिल्ली के 2025 विधानसभा चुनाव में इस्तेमाल किया गया। गुरप्रीत सिंह ने इन सब घोटालों को लेकर सीबीआई की चंडीगढ़ यूनिट से शिकायत करके जांच की मांग की है। हालांकि सीबीआई के हाथ इस सिलसिले में बंधे हैं। क्योंकि इंडी गठबंधन में शामिल सरकारों ने अपने राज्यों में सीबीआई को जांच करने के अधिकार को वापस ले लिया था। दिलचस्प यह है कि टेंडर घोटाला और आपूर्ति घोटाला सामने आने और उसकी जांच होने के बाद प्रवर्तन निदेशालय ने आरोपी और भगोड़े अधिकारी राकेश सिंगला के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उसकी करीब साढ़े बाइस करोड़ की संपत्तियां सील कर रखी हैं। लेकिन राज्य की ओर से जांच आगे नहीं बढ़ रही है। जब केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों ने आंदोलन किया था, उसमें पंजाब के किसान और उनके संगठन बढ़चढ़कर हिस्सा ले रहे थे। देखना यह होगा कि विधानसभा चुनावों के वक्त ये संगठन सामने आते हैं या नहीं। राज्य के अगले विधानसभा चुनाव को लेकर शिरोमणि अकाली दल और बीजेपी में एक बार फिर गलबहियां होने की संभावना बढ़ गई है। यदि ऐसा होता है तो तय मानिए, विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी के लिए अनाज घोटाला वैसा ही सिरदर्द होगा, जैसा दिल्ली विधानसभा चुनाव में शीश महल और शराब घोटाला बना था। उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं..

प्रभासाक्षी 3 Sep 2026 3:25 pm

6,000 लीटर यूरिन प्रतिदिन, इंसानी पेशाब अब हिमालय पिघला रहा है, महाप्रलय का अल्टीमेटम

मई 2023, समुद्र तल से करीब 5300 मीटर की ऊंचाई पर खुंबू ग्लेशियर में हाड़ कंपा देने वाली ठंड, लेकिन वहां का नजारा किसी लग्जरी रिजॉर्ट जैसा था। करीब 1600 टेंट, गरजते हुए जनरेटर, एस्प्रेसो मशीन की खनक, बड़ी स्क्रीन वाले टीवी, गर्म पानी के शावर और कालीन बिछे टेंटों में अंडरफ्लोर हीटिंग। लेकिन चकाचौंध की इस भीड़ में एक शख्स हाथ में नोटबुक लिए चुपचाप घूम रहा था। वो न तो टेंट गिन रहा था और न ही एवरेस्ट फतह करने आए पर्वतारोहियों के चेहरे। वो बस एक अजीब सा हिसाब लगा रहा था कि इस बेस कैंप में लोग दिन भर में कितनी बार पेशाब करने जा रहे हैं। नोटबुक थामे इस शख्स का नाम था किमलाल गौतम, नेपाल के चीफ सर्वे ऑफिसर। उस वक्त शायद लोगों को उनका यह काम अजीब लगा होगा, लेकिन तीन साल बाद, जुलाई 2026 में जब उनकी यह गिनती साइंस जर्नल रीजनल एनवायरमेंटल चेंज में छपी, तो पूरी दुनिया के होश उड़ गए। आंकड़ा कहता है कि 2023 के सिर्फ एक क्लाइंबिंग सीजन में इंसानों की पैदा की गई गर्मी ने खुंबू ग्लेशियर की करीब 2,492 टन बर्फ पिघला दी। गौर कीजिए, यह तबाही सूरज की तपिश या मौसम के बदलाव से नहीं हुई, बल्कि कैंप में धुआं फेंकते जनरेटरों, धधकते चूल्हों और सबसे बढ़कर इंसानी शरीर से निकली गर्मी और पेशाब की वजह से हुई। तो अब सवाल सीधा और सनसनीखेज है-क्या इंसान का पेशाब दुनिया के सबसे ऊंचे ग्लेशियर को पिघला रहा है? आइए समझते हैं इस खौफनाक हकीकत की पूरी कहानी। इसे भी पढ़ें: पाकिस्तान से यारी पड़ी इतनी भारी, पुराना कर्ज चुकाने के लिए सऊदी ले रहा 8 अरब डॉलर का लोन क्या बेस कैंप का टॉयलेट बन चुका है टाइम बम? आप जवाब सुनेंगे तो आप हैरान हो जाएंगे क्योंकि इसका जवाब है हां। दरअसल जिन एवरेस्ट को हम एक दुर्गम और वीरान पहाड़ समझते हैं, उसका बेस कैंप अब सिर्फ कैंप नहीं रह गया है। सीजन में यहां पर करीब 2000 लोग आते हैं। पर्वतारोही होते हैं। गाइड, कुक, पोर्टर और डॉक्टर्स तक होते हैं। यानी कि कुछ महीनों के लिए यहां एक पूरा का पूरा मौसमी कस्बा बस जाता है। 2023 में नेपाल ने एवरेस्ट के लिए 478 परमिट जारी किए थे और उस वक्त यह रिकॉर्ड था। लेकिन 2026 में यह रिकॉर्ड भी टूट गया था क्योंकि संख्या पहुंच गई थी करीब 490 परमिट तक और यह नियम के मुताबिक हर विदेशी पर्वतारोही के साथ कम से कम एक नेपाली गाइड भी ऊपर जा रहा था। यानी कि एवरेस्ट का बेस जैसा कि हमने कहा कि वो एक सिर्फ कैंप नहीं रहा। क्या है ग्लेशियर लेक बर्स्ट फ्लड का खौफनाक सच? अब एक नई स्टडी से पता चला है कि इस गतिविधि की वजह से पिघल रहे खुम्बु ग्लेशियर को कितना नुकसान हो रहा है। रिसर्चर्स का अनुमान है कि हर वसंत में लगभग 30 लाख किलोग्राम ग्लेशियर की बर्फ पिघलकर खत्म हो जाती है, क्योंकि ये सुख-सुविधाएं जुटाने में काफी ऊर्जा खर्च होती है। 2023 में बेस कैंप में लगभग 1,600 टेंट में खाना पकाने, हीटिंग और बिजली के लिए 824 सिलेंडर लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG), 18,935 लीटर केरोसिन और 5,130 लीटर गैसोलीन का इस्तेमाल किया गया। सबसे चौंकाने वाली बातों में से एक यह है कि खुम्बु ग्लेशियर में अनुमानित 154 टन बर्फ के पिघलने के लिए इंसानी पेशाब जिम्मेदार है। जियोस्पेशियल साइंटिस्ट और इस स्टडी के मुख्य लेखक तथा नेपाल के चीफ सर्वे ऑफिसर, खिम लाल गौतम ने कहा अगर आप ज़्यादा पानी पीते हैं, तो आपको उसे शरीर से बाहर निकालना ही पड़ता है। उन्होंने ज़्यादा ऊंचाई पर शरीर को हाइड्रेटेड रखने की ज़रूरत का ज़िक्र करते हुए यह बात कही। हज़ारों पर्वतारोही और गाइड रोज़ाना 6,000 लीटर से ज़्यादा कचरा पैदा करते हैं। इसे भी पढ़ें: Strait of Hormuz में अमेरिका का महा-ऑपरेशन! Iran से भारी तनाव के बीच 40 युद्धपोतों ने 1.8 करोड़ बैरल तेल को दिया सुरक्षा कवच इंसानी गतिविधियों से पिघल रही 30 लाख किलो बर्फ! बेस कैंप में बने पिट-वॉल्ट टॉयलेट लगभग 2,000 लोगों का कचरा इकट्ठा करते हैं, जिसे नीचे लाया जाता है, लेकिन ज़्यादातर लोग ग्लेशियर पर ही पेशाब करते हैं, जो आस-पास के समुदायों के लिए पीने के पानी का स्रोत है। गौतम ने कहा, यह देखने के लिए कि हम हर साल कितनी ज़्यादा बर्फ़ खो रहे हैं, आपको वैज्ञानिक होने की ज़रूरत नहीं है। आप इसे अपनी आँखों से भी देख सकते हैं। गौतम 2011 से अब तक एवरेस्ट पर 365 से ज़्यादा दिन बिता चुके हैं। हालाँकि इंसानी पेशाब का असर चिंताजनक है, लेकिन नेपाल के क्लाइमेट साइंटिस्ट और त्रिभुवन यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ. सुदीप ठाकुरि ने कहा कि ये नतीजे कोई हैरानी की बात नहीं थे और हीटिंग, खाना पकाने और रोशनी के लिए इस्तेमाल होने वाले सभी तरह के ईंधन की तुलना में पेशाब का असर आख़िरकार कम ही होता है। इस स्टडी को करने के लिए गौतम ने बेस कैंप ऑपरेटरों से डेटा इकट्ठा किया। वहीं, लुइसियाना में अपने ऑफिस में, स्टडी की को-ऑथर और U.S. जियोलॉजिकल सर्वे की एमरिटस साइंटिस्ट वर्जीनिया बर्केट ने दशकों के सैटेलाइट डेटा को व्यवस्थित करने में मदद की। इस डेटा से ग्लेशियर पर समय के साथ तापमान में बदलाव का पता चलता था। जब गौतम ग्लेशियर पर हो रहे रियल-टाइम बदलावों की जांच कर रहे थे, तो बर्केट उन्हें ये आंकड़े भेजती रहती थीं। यह आसान नहीं था। लो अर्थ ऑर्बिट सैटेलाइट इन्फ्रारेड रेडिएशन या निकलने वाली गर्मी को मापते हैं, लेकिन अगर बादल छाए हों तो वे रीडिंग नहीं ले पाते—और एवरेस्ट पर बादल छाए रहना आम बात है। इसलिए टीम ने 1991 से 2023 तक की हर उस थर्मल इमेज को देखा जिसमें बादल नहीं थे। रिसर्चर्स ने उस दौरान ज़मीन की सतह के तापमान में आए बदलावों को देखा और बेस कैंप के नतीजों की तुलना ग्लेशियर के बर्फ़ीले हिस्से और ग्लेशियर के पास की एक दूसरी जगह से की। उन्होंने कहा कि यह चौंकाने वाला नतीजा था। हमने पाया कि बर्फ़ से ढके इलाके का तापमान बेस कैंप के मुकाबले सिर्फ़ आधा ही बढ़ा। इसे भी पढ़ें: US-Iran Tension के बीच फिर दहला West Asia, $100 के पार पहुंची Crude Oil की कीमतें ग्लेशियर झीलें’ बना लेता है ग्लेशियर के बाकी हिस्सों की तुलना में बेस कैंप का तापमान लगभग दोगुनी तेज़ी से बढ़ा। गौतम चेतावनी देते हैं कि इंसानों का असर इससे भी बुरा हो सकता है, क्योंकि उन्होंने हेलीकॉप्टर, ट्रेकर्स और याक जैसी गर्मी पैदा करने वाली चीज़ों को इसमें शामिल नहीं किया था। हालांकि हिमालय में बड़े पैमाने पर जलवायु परिवर्तन से बदलाव आ रहे हैं, लेकिन 2009 के बाद से एवरेस्ट के ग्लेशियरों में बर्फ पिघलने की दर लगभग दोगुनी हो गई है। और भले ही शरीर से निकलने वाले अपशिष्ट (मल-मूत्र) बर्फ पिघलने पर खाना पकाने जैसी गतिविधियों जितना असर न डालते हों, लेकिन इससे नेपाल की आर्थिक गतिविधियों खासकर पर्वतारोहण और पीने के पानी के स्रोतों, पनबिजली और सिंचाई के लिए खतरा पैदा होता है। गौतम का कहना है कि ग्लेशियर फटने से खतरनाक बाढ़ का भी खतरा है; शुरुआती रिपोर्टों से पता चलता है कि हाल ही में नेपाल और चीन में आई विनाशकारी बाढ़ की वजह यही थी। ऊंचाई पर शोध करने वाले पीटर हैकेट, जो इस अध्ययन में शामिल नहीं थे, कहते हैं कि बर्फ के इस तरह स्थानीय स्तर पर पिघलने से और अधिक हिमस्खलन हो सकते हैं और खतरनाक चढ़ाई और भी खतरनाक हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसका एक ऐसा असर भी है जिसे मापना मुश्किल है। 1981 में अकेले एवरेस्ट की चोटी पर चढ़ने वाले हैकेट ने कहा कि किसी ऊंचे कैंप में पहुँचने, सूर्यास्त के समय क्षितिज की ओर देखने और दर्जनों जमे हुए मल के ढेर देखने से ज़्यादा बुरा कुछ नहीं हो सकता।

प्रभासाक्षी 3 Sep 2026 2:10 pm

'भाजपा सांसद साबित करें वो इस देश के हैं या नहीं', पंजाब की मतदाता सूची से राघव चड्ढा का नाम कटने पर बोला विपक्ष

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समाचार नामा 3 Sep 2026 2:05 pm

परीक्षा विवाद को लेकर झारखंड सरकार पर बरसे प्रदीप भंडारी, पंजाब में 'सिंडिकेट' चलाने का आरोप

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समाचार नामा 3 Sep 2026 1:59 pm

राम मंदिर ट्रस्ट के सीईओ एयर मार्शल (रिटायर्ड) जितेंद्र मिश्रा पहुंचे अयोध्या, बोले-जीवन में दूसरी बार सेवा का मौका मिला

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समाचार नामा 3 Sep 2026 12:21 pm

हिंदू देवी-देवताओं का जिक्र, इसलिए 'वंदे मातरम' पर आपत्ति जताना बचकानी सोच: गीतांजलि अंगमो (आईएएनएस एक्सक्लूसिव)

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समाचार नामा 3 Sep 2026 12:14 pm

140 KM दूर से दुश्मन को निशाना बनाएगा भारत का Khagantak 243 Glide Bomb, परीक्षण सफल होते ही China, Pakistan की बढ़ी टेंशन

दुश्मनों पर अब आसमान से कहर बरपाने की भारत की ताकत और बढ़ गई है। भारतीय वायुसेना ने स्वदेशी लॉन्ग रेंज ग्लाइड बम ‘खगांतक-243’ का सफल परीक्षण किया है। 140 किलोमीटर से अधिक दूरी तक मार करने में सक्षम यह हथियार भारतीय लड़ाकू विमानों को दुश्मन के ठिकानों पर दूर से ही सटीक और घातक हमला करने की क्षमता देगा। भारतीय वायुसेना ने इस उपलब्धि को “Precision. Power. Pride” बताते हुए कहा है कि परीक्षण ने सभी निर्धारित उद्देश्यों को सफलतापूर्वक पूरा किया है। IAF के मुताबिक, यह भारतीय वायुसेना और भारतीय रक्षा उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है और आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया तथा रक्षा नवाचार के जरिए देश की मारक क्षमता को नई ऊंचाई तक पहुंचाने वाला कदम है। क्या है खगांतक-243, जो दुश्मन के लिए बन सकता है नया खतरा? हम आपको बता दें कि खगांतक-243 एक 300 किलोग्राम श्रेणी का एयरबोर्न लॉन्ग रेंज स्टैंड-ऑफ प्रिसिजन गाइडेड ग्लाइड बम है। इसकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि लड़ाकू विमान को लक्ष्य के ठीक ऊपर पहुंचने की जरूरत नहीं पड़ेगी। विमान सुरक्षित दूरी से इस हथियार को छोड़ सकता है और इसके बाद बम अपने पंखों और नियंत्रण सतहों की मदद से लक्ष्य की ओर ग्लाइड करेगा। यानी युद्ध की स्थिति में भारतीय लड़ाकू विमान दुश्मन के मजबूत एयर डिफेंस क्षेत्र में गहराई तक घुसने के जोखिम को कम करते हुए दूर से हमला कर सकते हैं। यही आधुनिक हवाई युद्ध की सबसे बड़ी जरूरत है। यानि दुश्मन पर हमला करो, लेकिन उसकी जवाबी मार की सीमा से बाहर रहो। इसे भी पढ़ें: SCO के मंच से चीन और पाकिस्तान को एक साथ धोकर मोदी ने दुनिया की वाहवाही लूट ली रिपोर्टों के मुताबिक, करीब 12,000 मीटर की ऊंचाई से छोड़े जाने पर खगांतक-243 की रेंज 140 किलोमीटर से अधिक हो सकती है। इसका डिजाइन भी खास है। इसमें एक बेलनाकार बॉडी, बीच में घूमने वाले ग्लाइड विंग और पीछे पांच नियंत्रण सतहें हैं, जो इसे लक्ष्य की दिशा में नियंत्रित करने में मदद करती हैं। 125 किलो विस्फोटक भराव, दुश्मन के ठिकानों पर सटीक प्रहार खगांतक-243 में Mk 81 जनरल-पर्पज ब्लास्ट-फ्रैगमेंटेशन वारहेड लगाया गया है, जिसमें करीब 125 किलोग्राम विस्फोटक भराव है। यह संयोजन इसे महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों, संरचनाओं और अन्य लक्ष्यों के खिलाफ प्रभावी हथियार बना सकता है। इस हथियार श्रेणी की एक और महत्वपूर्ण विशेषता इसका मॉड्यूलर डिजाइन है। यानी भविष्य में मिशन की जरूरत और ग्राहक की मांग के अनुसार अलग-अलग वारहेड और गाइडेंस कॉन्फिगरेशन विकसित किए जा सकते हैं। यही लचीलापन खगांतक श्रेणी को केवल एक हथियार नहीं, बल्कि भविष्य में विकसित होने वाली एक व्यापक प्रिसिजन स्ट्राइक क्षमता का आधार बना सकता है। BEL और JSR Dynamics की स्वदेशी साझेदारी साथ ही खगांतक-243 भारत के रक्षा उद्योग की साझेदारी का भी उदाहरण है। इसे भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) और JSR Dynamics ने मिलकर विकसित किया है। JSR Dynamics ने बम की बॉडी और नियंत्रण प्रणाली विकसित की है, जबकि BEL ने इलेक्ट्रॉनिक्स और गाइडेंस सबसिस्टम उपलब्ध कराए हैं। भारतीय वायुसेना पहले ही BEL को खगांतक-243 म्यूनिशन के लिए ऑर्डर दे चुकी है, हालांकि ऑर्डर की संख्या और अनुबंध की कीमत सार्वजनिक नहीं की गई है। इसका प्रारंभिक फ्लाइट टेस्ट प्लेटफॉर्म Su-30MKI है और भविष्य में इसे वायुसेना के अन्य विमानों के साथ भी एकीकृत किए जाने की संभावना है। चीन और पाक की तुलना में भारत का हथियार कितना मजबूत? यहां एक सवाल उठता है कि क्या चीन और पाकिस्तान के पास भी ऐसे हथियार हैं? इस सवाल का जवाब हां है लेकिन यह भी उल्लेखनीय है कि चीन और पाकिस्तान के पास मौजूद ऐसे हथियारों की अपेक्षा भारत के हथियार गुणवत्ता और मारक क्षमता में कहीं आगे हैं। हम आपको बता दें कि चीन और पाकिस्तान के पास भी स्टैंड-ऑफ प्रिसिजन गाइडेड ग्लाइड हथियार मौजूद हैं, लेकिन खगांतक-243 भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह देश की अपनी स्वदेशी उत्पादन और तकनीकी क्षमता को मजबूत करता है। चीन के पास लंबे समय से LS सीरीज जैसे प्रिसिजन गाइडेड ग्लाइड बम मौजूद हैं। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी में LS परिवार को ऐसे हथियारों के रूप में वर्णित किया गया है, जिनमें पारंपरिक बमों को गाइडेंस और ग्लाइड किट के जरिए स्टैंड-ऑफ प्रिसिजन हथियार में बदला जा सकता है। चीन इस क्षेत्र में लंबे समय से निवेश कर रहा है। इसके अलावा, पाकिस्तान के पास भी H-2 और H-4 Stand-Off Weapons जैसे हथियार उपलब्ध हैं। H-4 की घोषित रेंज लगभग 120 किलोमीटर बताई गई है, हालांकि इसकी क्षमताओं और कॉन्फिगरेशन से जुड़े कई विवरण अलग-अलग रूप में सामने आते रहे हैं। चीन और पाकिस्तान की अपेक्षा भारत के हथियार की विशेषता देखें तो सामने आता है कि भारत तेजी से अपनी स्वदेशी स्टैंड-ऑफ स्ट्राइक क्षमता को मजबूत कर रहा है। खगांतक-243 की 140 किलोमीटर से अधिक की रिपोर्टेड रेंज इसे पाकिस्तान के सार्वजनिक रूप से ज्ञात H-4 की घोषित 120 किमी रेंज से आगे रखती है। बदल जाएंगे सामरिक समीकरण इसके अलावा, खगांतक-243 का सबसे बड़ा रणनीतिक प्रभाव यह हो सकता है कि भारतीय वायुसेना को दूर से सटीक हमला करने का एक और स्वदेशी विकल्प मिलेगा। सीमा के पास तैनात दुश्मन के एयर डिफेंस, सैन्य ठिकाने, लॉजिस्टिक केंद्र और महत्वपूर्ण संरचनाएं भविष्य के संघर्ष में अधिक खतरे में आ सकती हैं। 140 किलोमीटर से अधिक दूरी तक हमला करने की क्षमता का अर्थ है कि लड़ाकू विमान लक्ष्य के ऊपर मंडराए बिना भी प्रहार कर सकता है। इससे विमान और पायलट का जोखिम कम हो सकता है तथा दुश्मन के लिए जवाबी कार्रवाई की चुनौती बढ़ सकती है। देखा जाये तो खगांतक-243 सिर्फ एक नया बम नहीं है। यह उस दिशा में भारत की तेज रफ्तार का संकेत है, जहां युद्ध के मैदान में विदेशी हथियारों पर निर्भरता कम होगी और भारतीय उद्योग सीधे भारत की मारक शक्ति तैयार करेगा। भारतीय वायुसेना का सफल परीक्षण साफ संदेश देता है कि अब भारत सिर्फ दुश्मन की सीमा तक पहुंचने की तैयारी नहीं कर रहा, बल्कि दूर आसमान से सटीक और घातक प्रहार करने की क्षमता को स्वदेशी ताकत के दम पर मजबूत कर रहा है। आने वाले समय में खगांतक-243 जैसे हथियार भारत की हवाई रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं और चीन से लेकर पाकिस्तान तक, दोनों मोर्चों पर भारत की स्टैंड-ऑफ स्ट्राइक क्षमता को नई धार दे सकते हैं। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 3 Sep 2026 11:21 am

अमेरिका, चीन और इजरायल आगे, लेकिन भारत भी बन सकता है वैश्विक एआई पावर: एलेक्स कार्प

चैपल हिल (नॉर्थ कैरोलिना), 3 सितंबर (आईएएनएस)। अमेरिकी सॉफ्टवेयर और डेटा एनालिटिक्स कंपनी पैलेंटिर टेक्नोलॉजीज के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) एलेक्स कार्प ने कहा है कि भारत एक प्रमुख आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) शक्ति के रूप में उभर सकता है। उन्होंने इसके लिए देश की तकनीकी प्रतिभा, ऊर्जा क्षेत्र में की गई पहल और उन्नत एआई मॉडल विकसित करने की क्षमता को प्रमुख कारण बताया।

समाचार नामा 3 Sep 2026 8:29 am

उत्तम कुमार की जन्म-शताब्दी पर पीएम मोदी ने दी श्रद्धांजलि, कहा- 'हर पीढ़ी को जोड़ती है उनकी सदाबहार अदाकारी'

नई दिल्ली, 3 सितंबर (आईएएनएस)। महानायक उत्तम कुमार की जन्म-शताब्दी के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें श्रद्धांजलि दी है। पीएम मोदी ने कहा कि महानायक उत्तम कुमार की सदाबहार अदाकारी हर पीढ़ी के लोगों को जोड़ती है।

समाचार नामा 3 Sep 2026 8:28 am

लाचित बरफुकन पुलिस अकादमी राष्ट्रीय स्तर के ट्रेनिंग हब के तौर पर उभर रही है: सरमा

लाचित बरफुकन पुलिस अकादमी राष्ट्रीय स्तर के ट्रेनिंग हब के तौर पर उभर रही है: सरमा

समाचार नामा 2 Sep 2026 11:22 pm

'चुनिंदा लोगों का धन बढ़ रहा, आम आदमी की जेब खाली', जीडीपी ग्रोथ के दावों पर अधीर रंजन चौधरी

'चुनिंदा लोगों का धन बढ़ रहा, आम आदमी की जेब खाली', जीडीपी ग्रोथ के दावों पर अधीर रंजन चौधरी

समाचार नामा 2 Sep 2026 11:18 pm

गुजरात में नकली दवाओं पर सरकार सख्त, स्वास्थ्य मंत्री ने कहा- जीरो टॉलरेंस नीति

गांधीनगर, 2 सितंबर (आईएएनएस)। गुजरात सरकार ने नकली और अवैध दवाओं के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए 'जीरो-टॉलरेंस' नीति अपनाई है। राज्य में 50 दवा कंपनियों के लाइसेंस रद्द किए गए हैं और घटिया दवाओं, खाने-पीने की चीजों में मिलावट और अवैध दवा नेटवर्क के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा रही है।

समाचार नामा 2 Sep 2026 10:37 pm

'सीता का चरित्र राम से भी महान था', सीएम शिवकुमार ने सोनिया गांधी के त्याग का दिया उदाहरण

'सीता का चरित्र राम से भी महान था', सीएम शिवकुमार ने सोनिया गांधी के त्याग का दिया उदाहरण

समाचार नामा 2 Sep 2026 10:18 pm

'इतिहास और संदर्भ को समझने की जरुरत', स्वरा भास्कर पर शाजिया इल्मी का पलटवार

'इतिहास और संदर्भ को समझने की जरुरत', स्वरा भास्कर पर शाजिया इल्मी का पलटवार

समाचार नामा 2 Sep 2026 10:17 pm

राजस्थान निकाय चुनाव: भाजपा ने जारी किया 'संकल्प पत्र', बड़ी जीत का किया दावा

राजस्थान निकाय चुनाव: भाजपा ने जारी किया 'संकल्प पत्र', बड़ी जीत का किया दावा

समाचार नामा 2 Sep 2026 10:15 pm

'सरकार मंदिर में धंधा चलाना चाहती है', राम मंदिर सीईओ की नियुक्ति पर भड़के इमरान मसूद

'सरकार मंदिर में धंधा चलाना चाहती है', राम मंदिर सीईओ की नियुक्ति पर भड़के इमरान मसूद

समाचार नामा 2 Sep 2026 9:38 pm

'कुछ दिनों तक मछली खाने में सावधानी बरतें', नेपाल में आई त्रासदी के बाद बिहार सरकार की लोगों से अपील

'कुछ दिनों तक मछली खाने में सावधानी बरतें', नेपाल में आई त्रासदी के बाद बिहार सरकार की लोगों से अपील

समाचार नामा 2 Sep 2026 9:15 pm

बलिया की बिटिया रागिनी के सपनों को मिले 'पंख', आप सांसद संजय सिंह के निर्देश पर 'आप' ने बढ़ाया मदद का हाथ

व्हीलचेयर और ₹25,000 की आर्थिक मदद से रागिनी की राह हुई आसान, जल्द लगेगा कृत्रिम पैर: संजय सिंह

देशबन्धु 2 Sep 2026 8:57 pm

1984 के सिख नरसंहार पर भगवंत मान सरकार राजनीति कर रही है : एचएस फूलका

1984 के सिख नरसंहार पर भगवंत मान सरकार राजनीति कर रही है : एचएस फूलका

समाचार नामा 2 Sep 2026 8:42 pm

केपीसीसी प्रमुख हरिप्रसाद ने राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर की निंदा की, बताया- 'गंभीर अन्याय'

केपीसीसी प्रमुख हरिप्रसाद ने राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर की निंदा की, बताया- 'गंभीर अन्याय'

समाचार नामा 2 Sep 2026 7:39 pm

तेजी से बदल रही है भारत की तस्वीर

भारत के सबसे बड़े औद्योगिक घरानों, टाटा, बिरला, रिलायंस, अडानी, आदि को अपना व्यवसायिक साम्राज्य खड़ा करने में दशकों लग गए थे। इन समूहों को अपनी सम्पत्ति को 100 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर तक पहुंचाने में लगभग 30 वर्षों का समय लगा था परंतु आज के युवावर्ग द्वारा स्थापित की जा रही कम्पनियों को अपनी सम्पत्ति को 100 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंचाने में केवल 1 से 3 वर्ष का समय लग रहा है। भारत में समय बहुत तेजी से बदल रहा है और भारतीय युवा आज भारत की तस्वीर बदलने को उतावाले होते दिखाई दे रहे हैं। जून 2026 में एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेन्स) का व्यवसाय करने वाली सर्वम कम्पनी ने अपनी स्थापना के केवल 3 वर्ष के अंदर ही 150 करोड़ (1.5 बिलियन) अमेरिकी डॉलर की सम्पत्ति खड़ी कर ली है। इसी प्रकार, आज जेप्टो एवं मेन्सा नामक ब्राण्ड कुछ ही महीनों में व्यवसाय के उस स्तर को प्राप्त कर लेते हैं, जिसे हासिल करने में पुरानी बड़ी कम्पनियों को कई दशक लग गए थे। आज के समय में टेक्नॉलोजी के क्षेत्र में स्थापित हो रही कम्पनियों की तुलना यदि इसी क्षेत्र में लगभग 20/25 वर्ष पूर्व स्थापित कम्पनियों से भी की जाय तो सम्पत्ति खड़ी करने के समय में बहुत अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। वर्ष 2000 में स्थापित कम्पनियों को यूनिकोन (100 करोड़ अमेरिकी डॉलर की सम्पत्ति बनाना) बनने में लगभग 20 वर्ष से अधिक का समय लग रहा था, वहीं वर्ष 2020 में स्थापित कम्पनियों को यूनिकोन बनने में केवल एक वर्ष का समय लग रहा है। वित्तीय क्षेत्र में स्थापित की गई कम्पनियों को यूनिकोन बनने में 30 वर्ष का समय लगा है। वहीं मेन्सा ब्राण्ड जैसी कम्पनी को यूनिकोन बनने में केवल 6 माह का समय लगा है। बाजार वही है, परंतु समय तेजी से बदल रहा है। इस परिवर्तन में भारतीय युवाओं की प्रमुख भूमिका रही है। आज भारत में व्यावसायिक घराने/खानदान एवं अमीर लोग कहीं पीछे छूट गए हैं एवं युवा पीढ़ी तेजी से बिलिनायर की सूची में अपनी जगह बना रही है। पिछले 5 वर्षों के दौरान भारत में एक लाख से अधिक नए स्टार्ट-अप स्थापित हुए हैं। आज भारत ने अपने आप को, अमेरिका एवं चीन के बाद, दुनिया के तीसरे सबसे बड़े स्टार्ट-अप इको सिस्टम में स्थापित कर लिया है। भारत में आज अधिक से अधिक लाभ अर्जित करने के उद्देश्य से उपभोक्ता उत्पादों को बढ़ावा देने वाले स्टार्ट अप बन रहे हैं। किराना उत्पादों से संबंधित ऐप अधिक संख्या में बनाए जा रहे हैं क्योंकि यूपीआई जैसा पेमेंट गेटवे पूर्व से ही उपलब्ध है और भुगतान प्रणाली को अलग से विकसित करने की आवश्यकता ही नहीं है। साथ ही, 140 करोड़ नागरिकों का बायोमेट्रिक डाटा पहिले से ही सत्यापित है और यह उपभोक्ता उत्पादों से सम्बंधित ऐप बनाने वाले इंजीनियरों को उपलब्ध भी है। भारत में डिजिटल लाकर में 750 करोड़ से अधिक दस्तावेज जमा हो चुके हैं। सस्ता इंटरनेट डाटा उपलब्ध है एवं 90 करोड़ से अधिक भारतीय इंटरनेट का उपयोग कर रहे हैं। इन परिस्थितियों के बीच आज 20 वर्ष के युवा एंटरप्रेन्योर को व्यवसाय स्थापना के प्रथम दिवस से ही पूरा भारत उसके उत्पाद के बाजार के रूप में उपलब्ध है। उक्त कारकों के चलते ही वर्ष 2021 में भारत में 45 नए यूनिकोन विकसित हुए थे। इसे भी पढ़ें: दुनिया जब बुरे दौर में है तब भारत के आर्थिक उजाले भारत के पास आज दुनिया के सबसे स्मार्ट एवं कुशल इंजीनीयर तो हैं परंतु हमारे पास अपने गूगल, अपना यू ट्यूब एवं अपना फेस बुक नहीं है। क्योंकि, भारत में उच्च स्तर का तकनीकी नवाचार नहीं हो पा रहा है जिससे उच्च तकनीकी के ऐप भारत में कम बन रहे हैं। हालांकि, विकसित देशों में जो भी उच्च स्तर के तकनीकी नवाचार हो रहे हैं इनमें भारतीय इंजिनीयरों की भी महती भूमिका रहती है। इसी कारण से भारतीय इंजीनियरों की विकसित देशों में भारी मांग है। भारतीय युवाओं को दिल्ली के जंतर मंतर पर आंदोलन करने के स्थान पर भारत में उच्च तकनीकी के नवाचार करने की ओर पूरा ध्यान देना चाहिए। अब तो विकसित देश भी यह मानने लगे हैं कि वर्तमान सदी केवल भारत की है। कई विकसित देशों सहित चीन में जनसंख्या वृद्धि दर अब ऋणात्मक हो चुकी है। साथ ही, इन देशों में वृद्ध नागरिकों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। पूरे विश्व में आज भारत एक युवा देश के रूप में उभर रहा है। अतः भारतीय युवाओं से न केवल भारत में आर्थिक विकास को गति देने बल्कि विश्व के अन्य कई देशों में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देने की अपेक्षा की जा रही है। कई देशों ने तो अपनी संसद में प्रस्ताव पास करने के उपरांत भारत सरकार से भारतीय युवाओं को इन देशों में भेजने की मांग की है। भारतीय युवा आज न केवल भारत में तेजी से यूनिकोन विकसित कर रहा है बल्कि आज भारतीय अन्य देशों में पहुंच कर अपने व्यापार का विस्तार भी कर रहे हैं, इसी कारण से आज प्रतिवर्ष भारत से लगभग 7 लाख नागरिक विभिन्न देशों में जाकर बस रहे हैं। श्री लक्ष्मी मित्तल ने ब्रिटेन में आरसेलोर स्टील कम्पनी खरीद ली है। यह कम्पनी पूर्व में बीमार कम्पनी की श्रेणी में शामिल थी परंतु मित्तल समूह ने इसे आज विश्व की सबसे बड़ी स्टील उत्पादक कम्पनी बना दिया है। इसी प्रकार वर्ष 2008 में टाटा समूह ने जैग्वार एवं लैंड रोवर कम्पनी को खरीद लिया था। भारतीय मूल के नागरिक आज ब्रिटेन में जायदाद निवेशकों के क्षेत्र में सबसे बड़े निवेशक माने जा रहे है। यूरोप में आज भारतीय कम्पनियां सबसे अधिक राशि का निवेश करती हुई दिखाई दे रही हैं और यूरोपीयन कम्पनियों का अधिग्रहण कर रही है। अमेरिका में भी लगभग यही स्थिति है। अमेरिका में सबसे बड़ी एल्यूमिनियम उत्पादक कम्पनी को भारतीय ने खरीद लिया है। इसी प्रकार, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, आईबीएम, अडोबी जैसी बड़ी कम्पनियों को भारतीय मूल के नागरिक ही चला रहे हैं। भारतीय मूल के ही अजय बांगा आज विश्व बैंक के मुख्य कार्यपालन अधिकारी बन गए हैं। भारत में आज 15 लाख इंजिनीयर प्रतिवर्ष बन रहे हैं। विश्व के लगभग समस्त देशों को आज भारतीय युवाओं की अत्यधिक आवश्यकता है। विशेष रूप से जापान एवं यूरोपीयन देशों में प्रौढ़ नागरिकों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। चीन से आज कई देश दूर भाग रहे हैं क्योंकि चीन ने विभिन्न देशों को कर्ज दे रखा है, यदि कोई देश इस कर्ज का भुगतान समय पर नहीं कर पाता है तो चीन उस देश के संसाधनों पर अपना अधिकार जताने लगता है। इससे इन देशों के साथ चीन के सम्बंध अच्छे नहीं रहे हैं। दूसरी ओर भारत में राजनैतिक स्थिरता है, जिसके चलते आज भारत के विश्व के लगभग समस्त देशों के साथ सौहार्दपूर्ण सम्बंध हैं। भारत आज विश्व के कई देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते सम्पन्न कर रहा है। आज स्थिति यह निर्मित हो रही है कि भारतीय यूनिकोन अमेरिकी कम्पनियों का अधिग्रहण करने की तैयारी कर रहे हैं। भारत आज जापान, इजराईल, रूस, यूएई एवं अमेरिका जैसे देशों का रणनीतिक साझीदार है। साथ ही, भारत के सम्बंध अब चीन के साथ भी सामान्य हो रहे है। भारत आज वैश्विक दक्षिणी क्षेत्र की आवाज बन रहा है क्योंकि विश्व के कई देशों का अब चीन पर भरोसा नहीं रहा है। भारत आज जी-20 देशों के समूह का भी सदस्य है, तो जी-7 देशों के समूह एवं वैश्विक दक्षिणी क्षेत्र के बीच एक पुल का काम करता हुए भी दिखाई दे रहा है। भारत एससीओ का भी सदस्य है तो ब्रिक्स का भी सदस्य है। साथ ही, भारत क्वाड का भी सदस्य है। इस प्रकार, भारत आज विश्व के लगभग समस्त महत्वपूर्ण समूहों का सदस्य है एवं भारत के विश्व के लगभग समस्त देशों के साथ बहुत अच्छे, सौहार्दपूर्ण, व्यावसायिक एवं व्यावहारिक सम्बंध हैं। इसी कारण से ही कुशल भारतीय युवाओं की मांग आज पूरे विश्व में कई देशों द्वारा की जा रही है। - प्रहलाद सबनानी सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक, भारतीय स्टेट बैंक के-8, चेतकपुरी कालोनी, झांसी रोड, लश्कर, ग्वालियर - 474 009

प्रभासाक्षी 2 Sep 2026 6:56 pm