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हमें पितृसत्ता की अधूरी कहानी क्यों सुनाई गई? Patriarchy? Think Again

भारत की शुरुआती वैदिक सभ्यता में महिलाओं का समाज में बहुत सम्मानजनक स्थान था, जहाँ उन्हें शिक्षा और धार्मिक अनुष्ठानों का पूरा अधिकार था। वैदिक साहित्य में गार्गी और मैत्रेयी जैसी महिलाओं के उदाहरण मिलते हैं, जो दार्शनिक चर्चाओं और बौद्धिक विमर्श में सक्रिय थीं।

ऑप इंडिया 17 Sep 2026 1:09 am

बंगाल: अन्नपूर्णा योजना के लाभार्थियों ने पीएम मोदी को 'बर्थडे गिफ्ट' के तौर पर पौधा लगाया

बंगाल: अन्नपूर्णा योजना के लाभार्थियों ने पीएम मोदी को 'बर्थडे गिफ्ट' के तौर पर पौधा लगाया

समाचार नामा 16 Sep 2026 11:52 pm

शिवपाल का छलका 'भतीजा प्रेम', कहा- अखिलेश जैसी आधुनिक सोच किसी के पास नहीं

शिवपाल का छलका 'भतीजा प्रेम', कहा- अखिलेश जैसी आधुनिक सोच किसी के पास नहीं

समाचार नामा 16 Sep 2026 11:12 pm

यूपीआई चार्ज विवाद: कांग्रेस ने बताया 'डिजिटल यूटर्न', 'आप' ने गुजरात में विरोध करने की चेतावनी दी

गुजरात में विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार के उस फैसले की आलोचना की है, जिसके तहत 15 अक्टूबर से व्यापारियों को 2,000 रुपए से ज्यादा के कुछ खास यूपीआई पेमेंट पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) देना होगा।

देशबन्धु 16 Sep 2026 10:46 pm

गुलजार सिंह के परिवार से मिले तरुण चुघ, न्याय का भरोसा दिया

गुलजार सिंह के परिवार से मिले तरुण चुघ, न्याय का भरोसा दिया

समाचार नामा 16 Sep 2026 10:30 pm

संभल की डेमोग्राफी: हिंदू 13 हजार से हुए 47 हजार, मुस्लिम 23 हजार से हो गए 1 लाख 71 हजार

2011 की जनगणना के अनुसार संभल शहर की डेमोग्राफी 77.67% मुस्लिम आबादी जबकि हिंदू आबादी सिर्फ 22% वाली बताई गई है। वर्तमान में मुस्लिम 80% तक।

ऑप इंडिया 16 Sep 2026 10:30 pm

'आपके कर्मों का फल आपको मिलेगा', उद्धव ठाकरे की सफाई पर दिशा सालियान के पिता का पलटवार

'आपके कर्मों का फल आपको मिलेगा', उद्धव ठाकरे की सफाई पर दिशा सालियान के पिता का पलटवार

समाचार नामा 16 Sep 2026 8:34 pm

डिजिटल अर्थव्यवस्था पर कराधान के मुद्दे का शांत और गहन अध्ययन जरूरी है: निर्मला सीतारमण

बेंगलुरु, 16 सितंबर (आईएएनएस)। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बुधवार को कहा कि डिजिटल अर्थव्यवस्था पर कराधान से जुड़े फैसले लेते समय भारत, अन्य देशों और भविष्य में आने वाले निवेश पर पड़ने वाले प्रभावों का सावधानीपूर्वक अध्ययन किया जाना चाहिए।

समाचार नामा 16 Sep 2026 8:33 pm

8वें वेतन आयोग की चंडीगढ़ में शुरू हुईं बैठकें, वेतन और पेंशन पर होंगे विचार-विमर्श

8वें वेतन आयोग की चंडीगढ़ में शुरू हुईं बैठकें, वेतन और पेंशन पर होंगे विचार-विमर्श

समाचार नामा 16 Sep 2026 8:21 pm

उमर खालिद को 'राष्ट्रवादी' बताने वाले बयान पर कर्नाटक में कांग्रेस और भाजपा आमने-सामने

उमर खालिद को 'राष्ट्रवादी' बताने वाले बयान पर कर्नाटक में कांग्रेस और भाजपा आमने-सामने

समाचार नामा 16 Sep 2026 7:16 pm

फ्री यूपीआई के दावे के बीच ठगा रह गया आम आदमी

भारत की अर्थव्यवस्था को कैशलेस बनाने और 'डिजिटल इंडिया' के सुनहरे सपने दिखाने वाली सरकार ने आखिरकार 15 अक्टूबर से लागू होने वाले नए मर्चेंट डिस्काउंट रेट फ्रेमवर्क के जरिए देश की जनता के भरोसे पर करारा प्रहार किया है। लंबे समय से यह ढोल पीटा जा रहा था कि यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस पूरी तरह मुफ्त है, सुरक्षित है और यह देश के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की ताकत है। लेकिन सरकार और नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया का यह नया फैसला इस दावे की हवा निकालने के लिए काफी है। जनता आज ठगा हुआ महसूस कर रही है, क्योंकि जिस डिजिटल व्यवस्था की आदत उन्हें डालकर कैशलेस होने के फायदे गिनाए गए थे, अब उसी व्यवस्था के पीछे छिपे टैक्स और चार्जेस के कड़वे सच को सामने लाया जा रहा है। सरकार चाहे जितने भी दावे करे कि यह चार्ज आम ग्राहकों को नहीं बल्कि बड़े व्यापारियों को देना होगा, लेकिन आर्थिक मोर्चे की व्यावहारिक समझ रखने वाला कोई भी आम नागरिक यह बखूबी जानता है कि अंततः किसी भी टैक्स या फीस का बोझ घूम-फिरकर उपभोक्ता की जेब पर ही आकर गिरता है। यह नया ढांचा सीधे तौर पर देश के उस मध्यमवर्ग और नौकरीपेशा समाज के साथ विश्वासघात है, जिसने सरकार के कहने पर अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई को पूरी तरह डिजिटल माध्यमों के सुपुर्द कर दिया था। इस नए फ्रेमवर्क के तहत ₹2,000 से अधिक के ट्रांजैक्शन पर 0.4% का MDR लगाने का फैसला किया गया है। सरकारी नीति निर्माताओं ने बड़े ही शातिर तरीके से यह आंकड़ा तैयार किया है ताकि पहली नजर में यह जनता को प्रभावित न करे। यह दलील दी जा रही है कि देश के 96 फीसदी मर्चेंट ट्रांजैक्शंस ₹2,000 से कम के होते हैं, इसलिए आम जनता सुरक्षित है। लेकिन यह पूरी तरह से एक सांख्यिकीय भ्रम है जो जमीनी हकीकत से कोसों दूर है। आज के इस महंगाई के दौर में ₹2,000 की रकम क्या अहमियत रखती है? एक मध्यमवर्गीय परिवार जब महीने का राशन खरीदने किसी सुपरमार्केट या किराना दुकान पर जाता है, तो उसका बिल आसानी से ₹3,000 से ₹5,000 के पार चला जाता है। बच्चों की स्कूल की फीस, कोचिंग संस्थान के खर्च, बिजली और पानी के बड़े बिल, अस्पताल का खर्च, दवाइयां, इलेक्ट्रॉनिक्स सामान की खरीदारी, या किसी शादी-ब्याह के कपड़े खरीदना—ये सभी रोजमर्रा के ऐसे काम हैं जहां ट्रांजैक्शन की रकम ₹2,000 की इस कृत्रिम सीमा को पलक झपकते ही पार कर जाती है। ऐसे में यह कहना कि आम जनता इससे प्रभावित नहीं होगी, देश की बहुसंख्यक आबादी के जीवन स्तर और उनकी जरूरतों का क्रूर मजाक उड़ाने जैसा है। जनता के बीच इस कानून को लेकर जो सबसे बड़ा आक्रोश है, वह इस बात को लेकर है कि मर्चेंट्स पर लगाया गया यह चार्ज अंततः उन्हीं से वसूला जाएगा। कोई भी व्यापारी, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, अपनी जेब से 0.4% का घाटा नहीं सहेगा। बाजार का सीधा और शाश्वत नियम है कि जब भी किसी व्यवसाय की लागत बढ़ती है, तो वह उस लागत को अपने उत्पाद या सेवा की कीमत में जोड़ देता है। व्यापारी सीधे तौर पर भले ही यूपीआई पेमेंट करने पर आपसे अतिरिक्त पैसे न मांगें, लेकिन वे अपने सामानों के दाम में चुपके से 1 से 2 फीसदी की बढ़ोतरी कर देंगे ताकि उनका प्रॉफिट मार्जिन सुरक्षित रहे। इसका परिणाम यह होगा कि जो व्यक्ति नकद भुगतान करेगा, वह भी बिना वजह इस महंगाई की चपेट में आएगा और जो यूपीआई का इस्तेमाल करेगा, वह तो ठगा जाएगा ही। सरकार ने इस चालाकी से अपने राजस्व को बढ़ाने का रास्ता तो साफ कर लिया, लेकिन इसका सीधा खामियाजा उस जनता को भुगतना पड़ेगा जो पहले से ही बेकाबू महंगाई, बेरोजगारी और घटती क्रय शक्ति से जूझ रही है। इस कानून के पीछे छुपा एक और बड़ा खतरा देश की बैंकिंग और डिजिटल साक्षरता के लोकतांत्रिक ढांचे को नष्ट करना है। भारत जैसे विकासशील देश में लोगों को नकद छोड़कर डिजिटल ट्रांजैक्शन की ओर मोड़ना एक बहुत बड़ी सामाजिक और व्यावहारिक चुनौती थी। लोगों को बैंकों की लाइनों से बचाने और पारदर्शिता लाने के नाम पर सरकार ने खुद हर मंच से यूपीआई का प्रचार किया। रेहड़ी-पटरी वालों से लेकर बड़े-बड़े मॉल तक क्यूआर कोड चिपकाए गए। जनता ने भी सरकार पर भरोसा किया और अपनी सदियों पुरानी नकद लेन-देन की आदत को बदलकर जेब में बटुआ रखना बंद कर दिया। लेकिन अब, जब जनता पूरी तरह इस सिस्टम पर निर्भर हो चुकी है, तब सरकार ने अपनी असली नीयत दिखाते हुए इस पर शुल्क थोपना शुरू कर दिया है। यह नीति बिल्कुल वैसी ही है जैसी कोई निजी टेलीकॉम कंपनी पहले मुफ्त में सेवाएं देकर ग्राहकों को अपना आदी बनाती है और बाद में मनमाने दाम वसूलने लगती है। एक लोकतांत्रिक सरकार से जनहित की नीतियों की उम्मीद की जाती है, न कि किसी मुनाफाखोर कॉपोरेट घराने जैसी चालाकी की। इस फैसले के लागू होने से बाजार में एक बार फिर से 'कैश इकोनॉमी' यानी नकद लेन-देन का चलन तेजी से बढ़ेगा, जो देश की आर्थिक प्रगति के लिए एक प्रतिगामी कदम होगा। जनता के मन में यह डर बैठ गया है कि आज ₹2,000 पर 0.4% का चार्ज लगा है, तो कल को सरकार इसे बढ़ाकर 1% कर देगी और सीमा को घटाकर ₹500 कर देगी। इस अविश्वास के कारण लोग अब फिर से बैंकों से नकद निकालकर अपने पास रखने को मजबूर होंगे। जब व्यापारी देखेंगे कि ₹2,000 से ऊपर के पेमेंट पर उनका नुकसान हो रहा है, तो वे ग्राहकों को नकद भुगतान करने के लिए प्रोत्साहित करेंगे या फिर यूपीआई पेमेंट लेने से साफ इंकार कर देंगे। इससे वह काला धन और समानांतर अर्थव्यवस्था फिर से सिर उठाएगी, जिसे खत्म करने का दावा सरकार अक्सर करती रही है। डिजिटल लेन-देन में आने वाली इस गिरावट के लिए सीधे तौर पर सरकार की यह अदूरदर्शी और राजस्व-लोभी नीति जिम्मेदार होगी। देश का बुद्धिजीवी वर्ग और जागरूक नागरिक इस बात से भी बेहद खफा हैं कि सरकार एक तरफ तो कॉरपोरेट टैक्स में भारी छूट देती है, बड़े-बड़े उद्योगपतियों के लाखों करोड़ रुपये के कर्ज को बट्टा खाते में डाल देती है, लेकिन जब देश के आम नागरिकों की बात आती है, तो डिजिटल लेन-देन जैसी बुनियादी सुविधा पर भी टैक्स वसूलने के रास्ते तलाशने लगती है। ₹75,000 से ऊपर के ट्रांजैक्शन पर अधिकतम ₹300 की फीस तय करना इस बात का सबूत है कि सरकार को बड़े बिजनेसमैन की फिक्र है, लेकिन उस आम आदमी की कोई परवाह नहीं है जो अपनी गाढ़ी कमाई का छोटा-छोटा हिस्सा जोड़कर जीवन यापन कर रहा है। सरकार का यह कदम देश के नागरिकों के वित्तीय अधिकारों का हनन है। जब देश की जनता पहले से ही हर सामान पर भारी-भरकम जीएसटी दे रही है, अपनी आय पर इनकम टैक्स चुका रही है, तो फिर अपने ही पैसे को एक खाते से दूसरे खाते में ट्रांसफर करने या सामान खरीदने के डिजिटल माध्यम का उपयोग करने पर यह नया जुल्म क्यों ढाया जा रहा है? इस नए फ्रेमवर्क के खिलाफ देश के विभिन्न हिस्सों से विरोध की आवाजें उठने लगी हैं। सोशल मीडिया से लेकर चाय की दुकानों और बाजारों तक में लोग इस कानून की कड़े शब्दों में निंदा कर रहे हैं। जनता का स्पष्ट मानना है कि यह कानून उनकी आर्थिक स्वतंत्रता पर एक अदृश्य बेड़ी है। सरकार को यह समझना होगा कि डिजिटल इंडिया की सफलता इस बात पर निर्भर नहीं थी कि सरकार उससे कितना राजस्व कमा सकती है, बल्कि इस बात पर थी कि वह कितनी आसानी से और मुफ्त में देश के आम नागरिक को वित्तीय मुख्यधारा से जोड़ सकती है। 15 अक्टूबर से लागू होने जा रहा यह नया ढांचा यूपीआई की इस मूल भावना की हत्या है। जनता इस आर्थिक तानाशाही को चुपचाप स्वीकार नहीं करेगी। यदि सरकार वास्तव में जनहितैषी होने का दावा करती है, तो उसे तुरंत इस जनविरोधी कानून को वापस लेना चाहिए और यूपीआई को बिना किसी शर्त, बिना किसी सीमा के हमेशा के लिए पूरी तरह मुफ्त रखने की लिखित गारंटी देनी चाहिए। अन्यथा, डिजिटल क्रांति का यह रथ बीच रास्ते में ही थककर रुक जाएगा और जनता का तंत्र से भरोसा हमेशा के लिए उठ जाएगा। - अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार

प्रभासाक्षी 16 Sep 2026 6:52 pm

जीडीपी से नहीं जमीन पर नजर आए बदलाव

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों से भारत की तरक्की का जश्न मनाने के लिए कहते हुए 7.8% की शानदार जीडीपी ग्रोथ के लिए बधाई दी। सवाल यह है कि क्या आम आदमी देश में जीडीपी ग्रोथ को समझता है। क्या जीडीपी बढ़ना देश की मौजूदा समस्याओं के समाधान का कोई पैमाना है। देश में जब प्रधानमंत्री जीडीपी बढ़ोतरी की घोषणा कर रहे थे, उसी दिन कमर्शियल एलपीजी के दाम में बढ़ोतरी हो गई है। दिल्ली में इसके दाम में 9.50 रुपये की बढ़ोतरी की गई है। दिल्ली में अब कमर्शियल सिलेंडर की कीमत 2747.50 रुपये, मुंबई में 2701 रुपये और चेन्नई में 2916.50 रुपये हो गई है। कमर्शियल सिलेंडर के महंगे होने से होटल, ढाबे आदि में खाना-पीना महंगा होना तय है। वहीं घर मिलने वाली चीजों के दाम में भी बढ़ोतरी हो सकती है। इसके अलावा 5 किलो वाले गैस सिलेंडर का भी दाम 2 रुपये बढ़कर 764 रुपये हो गया है। मुंबई और तमिलनाडु में दूध महंगा हो गया है। बॉम्बे मिल्क प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन ने थोक दूध की कीमतों में 9 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की है। इससे दूध की थोक दर 93 रुपये से बढ़कर 102 रुपये प्रति लीटर हो गई है। भारत में जुलाई-अगस्त 2026 के दौरान खाद्य महंगाई दर बढ़कर 5.52% हो गई है, जिसके कारण चीनी, प्याज, टमाटर, दाल और खाना पकाने के तेल जैसी जरूरी रसोई की चीजें महंगी हो गई हैं. चावल और दूध के दाम भी स्थिर से लेकर उच्च स्तर पर बने हुए हैं। इसे भी पढ़ें: भारत की सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग में बढ़ोतरी महंगाई बढ़ने के कारण प्याज (22.54%), लहसुन (35.36%) और अदरक (83.62%) की कीमतों में भारी तेजी आई है। ईंधन और परिवहन महंगाई बढ़कर 4.43% हो गई है, जिससे माल ढुलाई की लागत बढ़ी है। रेस्त्रां और आवास सेवाओं की महंगाई दर बढ़कर लगभग 7.72% हो गई है। देश के आम आदमी को हर दिन होने वाली कठिनाईयों से जूझना पड़ रहा है। देश का मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग को जीडीपी की ग्रोथ से अंतर तब पड़ता है, जब उनकी बुनियादी सुविधाओं कोई बेहतरी नजर आए। देश में पानी, बिजली, स्कूल, अस्पताल, सड़क, रोजगार, महंगाई जैसी बुनियादी समस्याओं की भरमार है। इनसे राहत मिलती भी है तो उूंट के मुंह में जीरे जितनी। इससे बदलाव नजर नहीं आता। भारत की आधी से अधिक आबादी यानी करीब 60 करोड़ लोग गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं। देश के भूजल का बड़ा हिस्सा आर्सेनिक, फ्लोराइड और अन्य भारी धातुओं (हैवी मेटल्स) की वजह से दूषित हो चुका है। बारिश का पर्याप्त पानी होने के बावजूद उचित हार्वेस्टिंग (संचयन) न होने के कारण पानी बेकार बह जाता है। नीति आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, साफ पीने का पानी न मिलने के कारण हर साल देश में करीब 2 लाख लोगों की मौत हो जाती है। वर्ष 2026 में भीषण गर्मी, रिकॉर्ड बिजली मांग (मई 2026 में 270 गीगावाट से अधिक) और स्थानीय रख-रखाव के कारण उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, ओडिशा और तेलंगाना जैसे कुछ राज्यों के इलाकों में आंशिक या अस्थायी कटौती की गई। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार भारत में बेघरता की दर प्रति 10,000 लोगों पर 13 है। अर्थात 17 प्रतिशत लोगों को पास अपना घर नहीं है। देश के ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 35 प्रतिशत गांवों में स्थानीय स्तर पर कोई भी बुनियादी चिकित्सा सुविधा या स्वास्थ्य केंद्र उपलब्ध नहीं है। ग्रामीण सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों और सर्जनों की भारी कमी है, जो लगभग 80 प्रतिशत तक खाली पड़े हैं। नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 10 वर्षों (2014-15 से 2024-25) में देश भर में करीब 94,000 सरकारी स्कूल बंद या आपस में मर्ज किए गए हैं। इसका मतलब है कि औसतन हर दिन 25 स्कूलों पर ताला लगा है। इसी दशक में सरकारी स्कूलों में कुल छात्रों का नामांकन 2.26 करोड़ कम हुआ है, जो 2014-15 के 26.95 करोड़ से घटकर 2024-25 में 24.69 करोड़ रह गया है। देश के एक लाख से अधिक स्कूलों में आज भी बिजली की उचित सुविधा नहीं है, और कई स्थानों पर पीने का साफ पानी उपलब्ध नहीं है। 71,959 स्कूलों में लड़कियों के लिए और 1.12 लाख स्कूलों में लड़कों के लिए काम करने वाले शौचालय मौजूद नहीं हैं। 1.39 लाख स्कूलों में लाइब्रेरी और 2.65 लाख स्कूलों में खेल का मैदान नहीं है। डिजिटल लाइब्रेरी का अभाव तो लगभग 13.62 लाख स्कूलों में है। भारत में 15 से 29 वर्ष के युवाओं की बेरोज़गारी दर जून 2026 में बढ़कर 16.2% हो गई है, 15–29 आयु वर्ग की महिलाओं में यह दर बढ़कर 20.7% हो गई। इसी आयु वर्ग के पुरुषों में यह दर 14.6% दर्ज की गई। जून 2026 में शहरी युवा बेरोज़गारी दर 18.2% और ग्रामीण युवा बेरोज़गारी दर 15.1% रही। नीति आयोग की बहुआयामी गरीबी सूचकांक रिपोर्ट के अनुसार, सबसे अधिक गरीबी वाले राज्य बिहार में 51.91% आबादी गरीब है। झारखंड मे 42.16% लोग गरीबी में जीवन बिता रहे हैं। उत्तर प्रदेश में 37.79% जनसंख्या गरीब है। मध्य प्रदेश में 36.65% लोग गरीब हैं। भारत में सबसे अमीर 10% लोगों के पास कुल संपत्ति का लगभग 65% हिस्सा है. सबसे ज़्यादा कमाई करने वाले 10% लोग राष्ट्रीय आय का 58% हिस्सा पाते हैं जबकि सबसे निचले 50% लोगों को सिर्फ़ 15% मिलता है। आर्थिक असमानता की यह खाई लगातार बढ़ती जा रही है। निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री का यह हक है कि जीडीपी की ग्रोथ पर खुशी मनाने का आह्वान करें पर जब तक इसका असर देश की मूल समस्याओं के निराकरण में नजर नहीं आएगा, देश के लोगों की उदासी दूर नहीं होगी। - योगेन्द्र योगी

प्रभासाक्षी 16 Sep 2026 6:45 pm

कॉकरोच जनता पार्टी का 'आदिवासी स्कूल ठीक करो' अभियान, सुविधाओं की कमी पर उठाए सवाल

कॉकरोच जनता पार्टी का 'आदिवासी स्कूल ठीक करो' अभियान, सुविधाओं की कमी पर उठाए सवाल

समाचार नामा 16 Sep 2026 6:01 pm

पश्चिम बंगाल के हावड़ा में सीपीआई-एम के कई दफ्तरों में तोड़फोड़, भाजपा पर आरोप, पार्टी का इनकार

पश्चिम बंगाल के हावड़ा में सीपीआई-एम के कई दफ्तरों में तोड़फोड़, भाजपा पर आरोप, पार्टी का इनकार

समाचार नामा 16 Sep 2026 6:00 pm

भारतीय और पाकिस्तानी नौसैनिक जहाजों के बीच हुई घटना से चिंता

15 सितंबर, 2026 को उत्तरी अरब सागर में भारतीय नौसेना का एक युद्धपोत और पाकिस्तान नौसेना का एक जहाज आपस में टकरा गए। विदेश मंत्रालय (MEA) ने बताया कि यह घटना अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में हुई और इससे कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ। घटना का विवरण भारतीय नौसेना का एक युद्धपोत नियमित निगरानी मिशन पर था, तभी खबर है कि पाकिस्तान नौसेना का एक जहाज तेज गति से उसकी ओर आया। भारतीय अधिकारियों के अनुसार, पाकिस्तानी जहाज ने गैर-पेशेवर और असुरक्षित तरीके से हरकत की, अपना रास्ता असुरक्षित ढंग से बदला और जहाजों के बीच भौतिक संपर्क (टक्कर) हुआ। इसे भी पढ़ें: EAM S Jaishankar पहुंचे Bhutan, पारो में विदेश मंत्री DN Dhungyel ने किया स्वागत नियमों का उल्लंघन भारत सरकार ने कहा कि पाकिस्तानी नौसैनिक इकाई का व्यवहार अप्रैल 1991 में भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य अभ्यास, युद्धाभ्यास और सैनिकों की आवाजाही की पूर्व सूचना देने के समझौते के अनुच्छेद 10 का सीधा उल्लंघन था। नियमों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में काम करते समय किसी भी दुर्घटना से बचने के लिए दूसरे देश के नौसैनिक जहाज और पनडुब्बियां एक-दूसरे से तीन नॉटिकल मील (लगभग 5 किलोमीटर) से अधिक करीब नहीं आएंगी। भारत ने उत्तरी अरब सागर में 15 सितंबर, 2026 को हुई टक्कर के संबंध में अपनी औपचारिक आपत्ति में विशेष रूप से इस नियम का हवाला दिया। भारत और पाकिस्तान ने 6 अप्रैल, 1991 को नई दिल्ली में सैन्य अभ्यास, युद्धाभ्यास और सैनिकों की आवाजाही की पूर्व सूचना देने के समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते में दोनों देशों का प्रतिनिधित्व तत्कालीन विदेश सचिवों मुचकुंद दुबे (भारत) और शहरयार एम. खान (पाकिस्तान) ने किया था। अनुसमर्थन दस्तावेजों के आदान-प्रदान के बाद यह समझौता 19 अगस्त, 1992 को लागू हुआ और यह दोनों देशों के बीच सैन्य विश्वास-निर्माण उपायों के व्यापक ढांचे का हिस्सा है। इस समझौते का उद्देश्य सैन्य इरादों की गलत व्याख्या से पैदा होने वाले संकटों को रोकना है। दोनों देशों ने विश्वास-निर्माण उपाय के रूप में अभ्यास, युद्धाभ्यास और सैनिकों की आवाजाही की पूर्व सूचना देने की आवश्यकता को स्वीकार किया। मुख्य नियमों के तहत दोनों देशों की थल, नौ और वायु सेनाओं के लिए एक-दूसरे के बहुत करीब बड़े सैन्य युद्धाभ्यास और अभ्यास करने से बचना जरूरी है। यदि निर्धारित दूरी के भीतर अभ्यास किए जाते हैं, तो मुख्य बल की रणनीतिक दिशा दूसरी तरफ नहीं होनी चाहिए और पास में कोई लॉजिस्टिकल तैयारी (जैसे रसद या सैन्य साजो-सामान का जमावड़ा) करने की अनुमति नहीं है। नौसेना के लिए, एक बड़े अभ्यास का मतलब है डिस्ट्रॉयर या फ्रिगेट के आकार या उससे बड़े छह या उससे ज़्यादा जहाज़ों का एक साथ काम करना और दूसरे देश के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक ज़ोन (EEZ) में प्रवेश करना। राजनयिक प्रतिक्रिया इस घटना के बाद, विदेश मंत्रालय (MEA) ने तुरंत राजनयिक कदम उठाए: (a) नई दिल्ली में पाकिस्तानी चार्ज डी'अफेयर्स (राजनयिक प्रतिनिधि) को बुलाकर अस्वीकार्य और गैर-पेशेवर व्यवहार के बारे में औपचारिक विरोध दर्ज कराया गया। (b) पाकिस्तानी अधिकारियों को सलाह दी गई कि वे सुनिश्चित करें कि उनकी सैन्य इकाइयाँ उचित सावधानी बरतें और भविष्य की घटनाओं को रोकने के लिए संबंधित द्विपक्षीय समझौतों का पालन करें। (c) इस्लामाबाद में भारतीय चार्ज डी'अफेयर्स को निर्देश दिया गया कि वे पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के समक्ष इसी तरह का औपचारिक विरोध दर्ज कराएं। निष्कर्ष उत्तरी अरब सागर के अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में नियमित निगरानी कर रहे भारतीय नौसेना के जहाज़ के साथ पाकिस्तानी नौसेना के जहाज़ की टक्कर से कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ, लेकिन भारत ने कहा कि पाकिस्तानी जहाज़ का तेज़ गति से पास आना सैन्य युद्धाभ्यास पर 1991 के भारत-पाकिस्तान समझौते के अनुच्छेद 10 का उल्लंघन था, जो सुरक्षित परिचालन दूरी बनाए रखने का आदेश देता है। विदेश मंत्रालय ने अस्वीकार्य और गैर-पेशेवर व्यवहार का विरोध किया और द्विपक्षीय सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन करने के महत्व पर ज़ोर दिया। अंतरराष्ट्रीय सीमाओं और नियंत्रण रेखा (LoC) पर शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए दोनों देशों द्वारा लगातार सावधानी बरतना ज़रूरी है। - प्रोफ़ेसर (डॉ.) डी.के. पांडेय विज़िटिंग सीनियर फ़ेलो, सेंटर फ़ॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज़, एडजंक्ट प्रोफ़ेसर, राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय, सलाहकार, एकेडमिक काउंसिल, फ़ॉरेन पॉलिसी स्कूल और GNOIT, पूर्व एसोसिएट डीन, SoB, गलगोटिया विश्वविद्यालय।

प्रभासाक्षी 16 Sep 2026 4:49 pm

'UPI पर टैक्स से अमेरिका को फायदा': राहुल गांधी का केंद्र पर निशाना, फैसला वापस लेने की मांग

'UPI पर टैक्स से अमेरिका को फायदा': राहुल गांधी का केंद्र पर निशाना, फैसला वापस लेने की मांग

समाचार नामा 16 Sep 2026 4:35 pm

शेयर बाजार हरे निशान में बंद

मुंबई, अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीतिगत बैठक के फैसले से पहले तेल की कीमतों में नरमी आने से बुधवार के सत्र में भारतीय शेयर बाजार पिछले दो दिनों की गिरावट से उबरकर बढ़त के साथ हरे निशान में बंद हुआ। इस बीच, एफएमसीजी, रियल्टी और पीएसयू बैंक के शेयरों के समर्थन से प्रमुख बेंचमार्क निफ्टी और सेंसेक्स में 0.45 प्रतिशत तक की तेजी देखने को मिली।

देशबन्धु 16 Sep 2026 4:26 pm

यूपीआई का फ्री युग खत्म, विपक्ष हमलावर पर पेमेंट ऐप्स खुश

व्यापारियों को किए जाने वाले 2000 रुपए से अधिक के यूपीआई लेन-देन पर फीस लगाई जाएगी. कांग्रेस ने इसे लूट करार दिया है.

देशबन्धु 16 Sep 2026 3:22 pm

मथुरा में सपा नेता राजन रिजवी पर महिला बैंककर्मी से अभद्रता और पीछा करने के आरोप में एफआईआर दर्ज

मथुरा में सपा नेता राजन रिजवी पर महिला बैंककर्मी से अभद्रता और पीछा करने के आरोप में एफआईआर दर्ज

समाचार नामा 16 Sep 2026 2:31 pm

Pakistan के साथ Mecca Pact Sign कर Saudi Arabia ने बड़ी गलती की, India से संबंध मजबूत किये होते तो आज ये दिन नहीं देखना पड़ता!

सऊदी अरब के लिए खतरे की घंटी अब मक्का तक पहुंच गई है। इस्लाम के सबसे पवित्र शहर मक्का में पहली बार संभावित हवाई हमले को लेकर आपात चेतावनी जारी होने और सायरन बजने से पूरी दुनिया में चिंता पैदा हो गई है। मक्का में हर साल दुनिया के कोने-कोने से लाखों मुसलमान पहुंचते हैं, इसलिए यहां मंडराता कोई भी सुरक्षा खतरा सिर्फ सऊदी अरब की चिंता नहीं रह जाता। हम आपको बता दें कि लोगों को घरों के भीतर जाने और खिड़कियों-दरवाजों से दूर रहने को कहा गया। जेद्दा और ताइफ में भी ऐसी ही चेतावनी जारी हुई। कुछ ही मिनटों में अलर्ट हटा लिया गया, लेकिन इस घटना ने साफ कर दिया कि यमन के हूतियों से बढ़ता खतरा अब सऊदी अरब के बेहद संवेदनशील इलाकों तक पहुंच चुका है। मक्का का नाम इस पूरे संकट को असाधारण रूप से संवेदनशील बना देता है। यह केवल सऊदी अरब का शहर नहीं, बल्कि इस्लाम का सबसे पवित्र धार्मिक केंद्र है। इसलिए यहां हवाई खतरे की चेतावनी ने सैन्य संकट को सीधे धार्मिक और राजनीतिक संकट में बदल दिया है। इस्लामी सहयोग संगठन ने मक्का और मदीना क्षेत्र पर हमलों की कड़ी निंदा करते हुए कहा है कि पवित्र स्थलों, मस्जिदों और नागरिक ढांचे को निशाना बनाना अस्वीकार्य है और उसने सऊदी अरब की सुरक्षा तथा पवित्र स्थलों की रक्षा के उपायों का समर्थन किया है। इसे भी पढ़ें: Middle East Tension: मक्का के पास सऊदी एयर डिफेंस ने हूथी ड्रोन को किया ढेर, गठबंधन ने दी 'रेड लाइन' की सख्त चेतावनी लेकिन असली तस्वीर मक्का से कहीं बड़ी है। हम आपको बता दें कि 12 सितंबर को यमन से दागा गया प्रक्षेपास्त्र सऊदी अरब के जाजान क्षेत्र में गिरा, जिसमें दो लोग घायल हुए और एक मस्जिद सहित कई इमारतों तथा वाहनों को नुकसान पहुंचा। इसके अगले दिन सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने खमिस मुशैत, अबहा और ताइफ के नागरिक इलाकों पर बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन से हमलों की बात कही। इन हमलों में 13 नागरिक घायल हुए और आवासीय मकानों तथा वाहनों को नुकसान पहुंचा। रियाद ने अब साफ संकेत दिया है कि लगातार हमलों का जवाब दिया जाएगा। सबसे खतरनाक बात यह है कि हमला केवल शहरों पर नहीं हो रहा। सऊदी अरब की ऊर्जा व्यवस्था भी निशाने पर है। 11 सितंबर को इराक से हुए ड्रोन हमले के बाद करीब 1,200 किलोमीटर लंबी पूर्व-पश्चिम तेल पाइपलाइन को बंद करना पड़ा। यह पाइपलाइन प्रतिदिन लगभग 40 से 50 लाख बैरल तेल लाल सागर तक पहुंचाने में सक्षम है और होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी संकट के बीच सऊदी अरब के लिए बेहद महत्वपूर्ण वैकल्पिक रास्ता बन गई थी। यही वह बिंदु है जहां संकट का सामरिक अर्थ साफ दिखाई देता है। यदि होर्मुज बाधित है और लाल सागर के प्रवेश द्वार बाब-अल-मंदब पर भी हूतियों का दबदबा बढ़ता है, तो सऊदी अरब के सामने तेल निर्यात के सुरक्षित रास्ते लगातार सिकुड़ते जाएंगे। यानी निशाना केवल रियाद नहीं, बल्कि उसकी ऊर्जा-आधारित आर्थिक शक्ति और पूरी वैश्विक आपूर्ति शृंखला है। साथ ही हूतियों ने यमन के पश्चिमी तट पर मोखा बंदरगाह और रणनीतिक पेरिम द्वीप पर कब्जा कर अपनी स्थिति को और मजबूत किया है। इसके बाद हनीश द्वीपों पर भी उनकी पकड़ की खबरें सामने आईं। पेरिम द्वीप बाब-अल-मंदब के सबसे संकरे हिस्से में स्थित है और इस समुद्री मार्ग पर नियंत्रण का अर्थ लाल सागर में आने-जाने वाले जहाजों पर दबाव बनाने की क्षमता है। यह घटनाक्रम महज यमन के भूभाग की लड़ाई नहीं है। बाब-अल-मंदब लाल सागर को हिंद महासागर से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण समुद्री द्वार है। ऐसे में हूतियों की बढ़त सऊदी अरब के पश्चिमी तट, उसके तेल निर्यात और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार—तीनों पर एक साथ दबाव पैदा करती है। देखा जाये तो यहां सऊदी अरब की कूटनीतिक रणनीति पर भी सवाल उठते हैं। पाकिस्तान के साथ ‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौते’ के जरिए रियाद ने सामूहिक सुरक्षा का एक नया ढांचा खड़ा किया है, जिसमें एक सदस्य पर हमला सभी पर हमला माना गया है। लेकिन यदि सऊदी अरब ने भारत के साथ सुरक्षा और सामरिक सहयोग को और अधिक गहरा किया होता, तो मौजूदा संकट में उसके पास एक अतिरिक्त और महत्वपूर्ण साझेदार हो सकता था। भारत और सऊदी अरब के बीच पहले से ही रक्षा, नौसैनिक सहयोग, खुफिया साझेदारी और संयुक्त सैन्य अभ्यास मौजूद हैं। दूसरी ओर, भारत के ईरान और इजराइल के साथ भी ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंध हैं। ऐसे में भारत की दोनों पक्षों के साथ संवाद की क्षमता सऊदी अरब के लिए एक अतिरिक्त कूटनीतिक और सामरिक सहारा बन सकती थी। फिर भी मौजूदा संकट यह सवाल जरूर खड़ा करता है कि क्या रियाद ने अपनी सुरक्षा साझेदारियों का दायरा जरूरत से ज्यादा सीमित कर दिया है। इसमें कोई दो राय नहीं कि रियाद के सामने अब विकल्प कम हैं। सऊदी अरब के पास आधुनिक हथियार, विशाल आर्थिक संसाधन और मजबूत वायु रक्षा है, लेकिन हूतियों की रणनीति ने युद्ध को मुश्किल बना दिया है। छोटे ड्रोन, मिसाइल, समुद्री दबाव और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर हमले के जरिए अपेक्षाकृत कमजोर पक्ष भी भारी रणनीतिक लागत पैदा कर सकता है। वैसे रियाद अब तक संयम बरतता रहा है। लेकिन पाइपलाइन पर हमला, लगातार मिसाइल और ड्रोन हमले तथा बाब-अल-मंदब के आसपास हूतियों की बढ़त इस संयम की सीमा को चुनौती दे रहे हैं। अमेरिकी सहायता भी बढ़ी है। एक सौ से अधिक अमेरिकी सैन्य सलाहकार सऊदी अरब में खुफिया सूचना और लक्ष्य निर्धारण में सहायता कर रहे हैं, लेकिन अमेरिका सीधे युद्ध में उतरने से बच रहा है। यही सबसे बड़ा रणनीतिक पेच है। सऊदी अरब पीछे हटता है तो हूतियों का दबदबा बढ़ सकता है; वह व्यापक सैन्य कार्रवाई करता है तो संघर्ष लंबा और अधिक विनाशकारी हो सकता है। विशेषज्ञों ने भी चेताया है कि बड़े पैमाने पर सऊदी जवाबी कार्रवाई संघर्ष को फिर एक खुले और लंबे युद्ध में बदल सकती है। इसलिए मक्का की चेतावनी को केवल एक सुरक्षा अलर्ट समझना भारी भूल होगी। इसके पीछे एक बहुत बड़ा खेल दिखाई दे रहा है। जिसके तहत सऊदी शहरों पर दबाव बनाया जा रहा है, तेल की नस पर हमला हो रहा है और बाब-अल-मंदब जैसे समुद्री द्वार पर पकड़ हासिल की जा रही है। होर्मुज और बाब-अल-मंदब दोनों पर संकट गहराया तो इसका असर केवल सऊदी अरब या यमन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि तेल, समुद्री व्यापार और विश्व अर्थव्यवस्था तक पहुंचेगा। बहरहाल, मक्का तक पहुंचा खतरा इसलिए इस संघर्ष का नया मोड़ है। अब सवाल यह है कि सऊदी अरब कब तक अपनी सीमाओं, पवित्र स्थलों, तेल ढांचे और समुद्री हितों पर एक साथ पड़ते इस चौतरफा दबाव को सहन करेगा।

प्रभासाक्षी 16 Sep 2026 1:43 pm

जब-जब मर्चेंट फीस लगी, बोझ ग्राहकों पर ही पड़ा, 5 उदाहरण से समझें, UPI पेमेंट पर हर सवाल का जवाब यहां मिल सकता

करोड़ो यूपीआई यूजर्स के मन में एक सवाल घूम रहा है। सवाल ये कि क्या 2000 रुपए से ऊपर की यूपीआई पेमेंट पर आपको पैसा देना होगा? मतलब आप ₹500 की यूपीआई करोगे तो मुफ्त और ₹5000 की करोगे तो क्या आपकी जेब से कुछ कटेगा? और अगर कटेगा तो फिर जिस डिजिटल इंडिया का नाम लेकर सरकार ने खुद कहा था कि यूपीआई फ्री रहेगा। उसी सरकार के अपने कागज में कल पहली बार 2000 को लेकर एक लकीर क्यों खींची? उसी कागज में एक तरफ लिखा था कि बैंक 2000 तक की पेमेंट पर ₹1 नहीं ले सकते। ना सीधे ना घुमाकर। लेकिन दूसरी तरफ 2000 के ऊपर कुछ कंडीशंस लगाई गई थी। वो कंडीशंस क्या पैसा लेने के लिए? सवाल यह भी उठता है कि जो लकीर आज तक कहीं थी नहीं उसे सरकार क्यों लगा रही है? क्या यूपीआई को लेकर जो नए नियम है वो सिर्फ कागजों के फेरबदल है या वाकई में 2000 के ऊपर चार्ज लगेगा और चार्ज लग रहा है तो किसकी जेब से कटेगा? आम आदमी की जेब से या वो जो इसे बिजनेस में इस्तेमाल करते हैं दुकानदार उनकी जेब से और अगर दुकानदार की जेब से भी जाता है तो क्या वो घूमकर आपके सामान में नहीं जुड़ेगा? यूपीआई से लोग आज शहर से गांव पैसा भेजते हैं। स्कूल की फीस जमा करते हैं। हर महीने घर का राशन ऑनलाइन मंगाते हैं। और जितने लोग यूपीआई से सारा काम करते हैं। अब तो भीख मांगने वाले भी लोग जो हैं वो यूपीआई दिखाते हैं। तो उन सबके मन में ये सवाल है कि भाई साहब 2000 के ऊपर अगर 3000 का बिल गया तो क्या पैसा लोगे? 4000 डॉक्टर की फीस मांगा तो क्या फीस के साथ यूपीआई का भी टैक्स देंगे? और घर का किराया तो 8000, 10000 20,000 हो तो क्या वहां जाएगा? इसे भी पढ़ें: डूबने वाला है ब्रिटेन का सूरज, होंगे 4 टुकड़े! UK अगर टूटता है तो इसका भारत पर क्या असर होगा? कैसे शुरू हुई चर्चा 15 सितंबर को अखबारों में खबर आ गई कि यूपीआई पर 2000 के यूपीआई ट्रांजैक्शन पर कोई पैसा नहीं लगेगा। सबको समझ में आ गया कि यार 2000 के ऊपर वाले पर तो लगेगा ही लगेगा। सरकार अगर यह कह रही है तो कोई बहुत दिन से ही चल रहा था कि यूपीआई ट्रांजैक्शन पर सरकार चार्ज लगाने वाली है। कई बार खंडन होता, कभी दबी आवाज में खंडन होता, कभी स्पष्टीकरण आता, कभी फ्रेमवर्क पे काम करने की बातें कही जाती। लेकिन 15 सितंबर की ही शाम को वित्त मंत्रालय ने निर्मला सीतारमण का जो मंत्रालय है उसने एक फ्रेमवर्क जारी किया है। फ्रेमवर्क शाम को करीब 7 बजे के आसपास सामने आया है। जिसमें यह साफ कहा गया है कि जी हां 2000 के ऊपर के यूपीआई ट्रांजैक्शन पे अब चार्ज लगेगा। लेकिन शर्तें हैं। सरकार ने बताया किनको नहीं देना है पैसा सोशल मीडिया बहस शुरू हो गई। यहीं से खबर आई कि भाई 2000 तक अगर आपने लिखा है तो क्या उसके आगे और यह अफवाह फैलनी तेज हो गई। रोज सुबह चाय वाले को, शाम को दूध वाले को, महीने के आखिर में घर के किराए वाले को आप यूपीआई से पैसा भेजते हैं। वहां पर एक्स्ट्रा पैसा नहीं जाता। क्या अब एक्स्ट्रा जाएगा? यह मैसेज वायरल हुआ कि 2000 के ऊपर की हर पेमेंट पर पैसा कटेगा और वो आपके खाते से कटेगा। कई लोगों ने अपने बैंक की ऐप चेक करनी शुरू कर दी कि पैसा कटा तो नहीं क्योंकि 2019 से यह फ्री था। पर अब क्या होगा? सरकार ने साफ किया है कि यूपीआई इस्तेमाल करने वाला आम ग्राहक के पैसे से रुपया नहीं कटेगा। चाहे पेमेंट कितनी बड़ी भी क्यों ना हो। जो चार्ज की बात है वह एमडीआर है। यानी दुकानदार अपनी बिक्री पर बैंक को जो थोड़ी सी फीस देता है। ठीक वैसे ही जैसे कार्ड से पेमेंट लेने पर देता है। और यह सिर्फ दुकान पर होने वाले पेमेंट की बात है। दोस्त या घर वाले को सीधे पैसे भेजने पर चाहे जितनी बड़ी रकम हो पैसा नहीं जाएगा। हां और अभी तक यह फीस लगाने का कोई अंतिम फैसला भी नहीं हुआ है कि दुकानदार पर कितनी लेगी यह एनपीसीआई की एक कमेटी तय करेगी। यानी वही सरकारी कंपनी जो यूपीआई को पीछे चलाती है और जिसका काम अभी शुरू हुआ है। इसे भी पढ़ें: दोस्त इजरायल को झटका! क्या भारत ने बदल लिया अपना रुख, ईरान के लिए नेतन्याहू को छोड़ा? UPI सेमहीनेमें100000 कमानेवालेव्यापारियोंकोनहींदेनाहोगाशुल्क सामान्य ग्राहक आम लोगों पर शुल्क लगेगा? नहीं, UPI भुगतान मुफ्त रहेगा। चाहे भुगतान Person-to-Person (P2P) हो या Person-to-Merchant (P2M), ग्राहक से शुल्क नहीं लिया जाएगा। UPI ऐप भी ग्राहक से कोई फीस नहीं लेंगे। QR स्कैन करने पर चार्ज लगेगा? नहीं। छोटे भुगतान पहले की तरह मुफ्त रहेंगे और व्यापारी यह शुल्क ग्राहक से नहीं वसूलेंगे। सरकार के मुताबिक, बैंक व्यापारियों के लेन-देन पर नजर रखेंगे। छोटे व्यापारी ₹2,000 से अधिक के भुगतान पर क्या होगा? ऐसे भुगतान पर 0.40% शुल्क लागू होगा। हालांकि, अगर व्यापारी की UPI से महीने की प्राप्ति ₹1 लाख तक है, तो MDR नहीं लगेगा। क्या नया QR कोड लेना होगा? नहीं। मौजूदा QR कोड से ही भुगतान जारी रहेगा। क्या जीएसटी रजिस्ट्रेशन जरूरी है? नहीं। शून्य MDR का लाभ लेने के लिए GST रजिस्ट्रेशन अनिवार्य नहीं है। सीमा कैसे तय होगी? बैंक व्यापारी के लेन-देन की निगरानी करेंगे। अगर लगातार 3 महीने तक UPI से प्राप्ति ₹1 लाख से अधिक रहती है, तभी व्यापारी को Person-to-Merchant श्रेणी में बदला जाएगा। बड़ेव्यापारी-ईकॉमर्स ₹2,000 से कम के भुगतान पर भी जीरो MDR लागू है। वहीं, ₹75,000 से अधिक के लेनदेन के लिए अधिकतम फीस ₹300 तय की गई है। क्रेडिट या डेबिट कार्ड के मुकाबले UPI कितना किफायती है? अभी क्रेडिट कार्ड पर 1.5% से 2.5% और डेबिट कार्ड पर 0.90% तक शुल्क लगता है। इसके मुकाबले UPI पर सिर्फ 0.40% या अधिकतम ₹300 का शुल्क रहेगा। क्या जीरो MDR का फायदा लेने के लिए छोटे दुकानदार को GST पंजीकरण कराना जरूरी है? नहीं। छोटे दुकानदारों को UPI भुगतान पर जीरो MDR का लाभ लेने के लिए सिर्फ इसी वजह से GST पंजीकरण कराने की जरूरत नहीं होगी। इसकी पात्रता तय करने में मासिक UPI कलेक्शन की सीमा और बैंक खाते की श्रेणी देखी जाएगी। जो छोटे कारोबारी कानून के तहत GST पंजीकरण की अनिवार्य सीमा से नीचे हैं, वे बिना GST दस्तावेज दिए भी डिजिटल भुगतान स्वीकार कर सकेंगे। यूपीआई तो इतने सालों तक फ्री था, अचानक इसकी जरूरत क्यों पड़ी सरकार ने यह कदम इसलिए उठाया ताकि UPI के सिस्टम को टिकाऊ बनाया जा सके। किसी भी व्यवस्था को चलाने की लागत होती है और UPI के मामले में यह हर साल औसतन 20 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा है। ट्रांजैक्शन की संख्या बढ़ने के साथ खर्च भी बढ़ रहा है और फिलहाल बैंक, सर्विस प्रोवाइडर कंपनियां और सरकार मिल-जुलकर इसका बोझ उठा रहे हैं। लेकिन, यह व्यवस्था शायद लंबे वक्त तक नहीं चल पाती। UPIकीताकत सरकार आम लोगों को सहूलियत देने और सिस्टम को टिकाऊ बनाने के बीच संतुलन रखना चाहती है। हालांकि, इन फैसलों से जुड़ी चिंताओं को समझते हुए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि MDR का बोझ आम लोगों पर न पड़े। देश में डिजिटल ट्रांजैक्शन की सबसे बड़ी ताकत इसकी सरलता और मुफ्त होना रही है। इसी वजह से UPI ने उन दूर-दराज के इलाकों तक भी पहुंच बनाई है, जहां इंटरनेट उपलब्ध है। ऐसे में इसकी सहजता और मुफ्त व्यवस्था बनी रहना जरूरी है। अगर आम उपभोक्ताओं पर थोड़ा भी अतिरिक्त बोझ पड़ा, तो UPI की स्वीकार्यता प्रभावित हो सकती है। डिजिटल इंडिया की दिशा में UPI एक बड़ी छलांग है और आज कई अन्य देश भी इसे अपना रहे हैं। इसने भुगतान प्रणाली को बेहद सरल बनाने के साथ-साथ व्यापार को बढ़ाने में भी मदद की है। ऐसे में UPI को सहज, सुलभ और आम लोगों के लिए किफायती बनाए रखना जरूरी होगा। जब-जब मर्चेंट फीस लगी, बोझ ग्राहकों पर ही पड़ा, 5 उदाहरण से समझें पेट्रोल पंप: कार्ड से भुगतान पर पेट्रोल पंप संचालक खुद शुल्क चुकाने के बजाय इसे 'फ्यूल सरचार्ज' के रूप में ग्राहक से वसूल रहे हैं। ज्वेलर्स: बैंक के 1.5% से 2% MDR की भरपाई के लिए ज्वेलर्स ग्राहक के बिल में 'कार्ड सरचार्ज' जोड़ रहे हैं। IRCTC, सिनेमा हॉल और ट्रैवल ऐप्स: भुगतान गेटवे के शुल्क को 'कन्विनियंस फीस' के नाम पर ग्राहक से वसूल रहे हैं। छोटे भुगतान: फिक्स्ड प्रोसेसिंग कॉस्ट से बचने के लिए कुछ व्यापारी ₹200 या ₹500 से कम के भुगतान पर कार्ड लेने से इनकार करते हैं और ग्राहक को अधिक खरीदारी के लिए मजबूर करते हैं। रेस्तरां और स्टोर्स: MDR को सीधे बिल में जोड़ना गैर-कानूनी होने के बावजूद कुछ रेस्तरां और स्टोर्स 5% तक का 'सर्विस चार्ज' लगाकर ग्राहक से अतिरिक्त शुल्क वसूलते हैं।

प्रभासाक्षी 16 Sep 2026 1:40 pm

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से भारत को क्या लाभ?

दिनांक 12 एवं 13 सितम्बर 2026 को ब्रिक्स का 18वां शिखर सम्मेलन दिल्ली के भारत मंडपम में सफलता पूर्वक सम्पन्न हो गया। ब्रिक्स का उद्देश्य सदस्य देशों के बीच आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक सहयोग बढ़ाना है। इस शिखर सम्मेलन में ब्रिक्स के 11 सदस्य देशों के साथ ही 10 अन्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष, प्रधानमंत्री एवं उच्च स्तर के अधिकारी शामिल हुए। वर्ष 2025-26 के लिए भारत को ब्रिक्स का अध्यक्ष बनाया गया था, अतः भारत ने इस वर्ष ब्रिक्स सम्मेलन की मेजबानी एवं अध्यक्षता की। ब्रिक्स के माध्यम से विश्व की 11 प्रमुख उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं एवं विकासशील देशों को एक मंच प्रदान किया जाता है। ब्रिक्स में शामिल देशों की कुल आबादी विश्व की कुल जनसंख्या का 49.5 प्रतिशत है और विश्व के कुल सकल घरेलू उत्पाद में 40 प्रतिशत की हिस्सेदारी है तथा वैश्विक व्यापार में 26 प्रतिशत की भागीदारी है। इससे वैश्विक स्तर पर ब्रिक्स का महत्व स्वयं ही स्पष्ट हो जाता है। ब्रिक्स के सदस्य देश आपस में आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय आर्थिक और वित्तीय स्थिति, दूरसंचार, कृषि, श्रम, रोजगार, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संरचना, व्यापार और विश्व व्यापार संगठन सहित वैश्विक मुद्दों पर विचार विमर्श करते है। इस वर्ष के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की थीम “लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण” रखी गई थी। शिखर सम्मेलन में 45 पन्नों एवं 140 बिंदुओं के “नई दिल्ली घोषणापत्र” को समस्त सदस्य देशों द्वारा सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया था। इस सम्मेलन की यह सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है, क्योंकि इस सम्मेलन में आपस में कुछ विरोधाभासी विचार रखने वाले देश (ईरान, साऊदी अरब एवं संयुक्त अरब अमीरात) भी शामिल थे। ईरान के राष्ट्रपति एवं यूएई के राष्ट्रपति के बीच शिखर सम्मेलन के बीच आपस में वार्ता सम्पन्न हुई थी, जबकि दोनों देशों के बीच अमेरिका-ईरान युद्ध के संदर्भ में तनाव की स्थिति कायम है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि ब्रिक्स की स्थापना अमेरिका में हुई है। वर्ष 2006 में न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) के मौके पर ब्रिक विदेश मंत्रियों की पहली बैठक में ब्रिक को औपचारिक रूप दिया गया था। ब्रिक का पहिला उद्घाटन शिखर सम्मेलन वर्ष 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में आयोजित किया गया था। वर्ष 2010 में न्यूयॉर्क में ब्रिक विदेश मंत्रियों की बैठक में दक्षिण अफ्रीका को शामिल करने के साथ ब्रिक को ब्रिक्स में विस्तारित करने पर सहमति हुई थी। तदनुसार, दक्षिण अफ्रीका ने 2011 में सान्या में तीसरे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लिया। मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जनवरी 2024 से और इंडोनेशिया जनवरी 2025 में ब्रिकस के पूर्ण सदस्य बने। इसके बाद बेलारूस, बोलीविया, कजाकिस्तान, क्यूबा, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम 2025 में भागीदार देशों के रूप में ब्रिक्स में शामिल हुए। इसे भी पढ़ें: आखिर कृत्रिम बुद्धिमत्ता को लेकर जारी अमेरिकी-चीनी रस्साकसी के बीच क्या करे भारत? समझिए विस्तार से भारत के प्रधानमंत्री ने अपने उदबोधन में उक्त ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में कई आवश्यक एवं महत्वपूर्ण विषयों की ओर समस्त सदस्यों का ध्यान आकर्षित किया है। अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने विभिन्न देशों से अमेरिका को होने वाले कई उत्पादों के निर्यात पर भारी भरकम टैरिफ लगाया था, इसी प्रकार चीन ने भी आवश्यक मिनरल के निर्यात पर कुछ प्रतिबंध लगाए थे, इस प्रकार की स्थित पुनः न बनें इस हेतु यह सुझाव दिया गया है कि तकनीकी एवं आवश्यक मिनेरल्स को विभिन्न देशों द्वारा हथियार की तरह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए इसका सीधा सीधा विपरीत प्रभाव विकासशील देशों के विकास पर पड़ता है। जब हम वैश्विक स्तर पर एक परिवार की बात करते हैं तो प्राकृतिक संसाधनों पर इस धरा पर निवासरत पूरी मानवजाति का समान अधिकार है। इसके उपयोग को कुछ देशों द्वारा रोका नहीं जाना चाहिए। भारतीय सनातन संस्कृति में तो प्रकृति को मां के समान माना जाता है, अतः प्रकृति का शोषण नहीं बल्कि आवश्यकता अनुसार दोहन होना चाहिए। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन भी आवश्यक है। विकास और पर्यावरण एक दूसरे के खिलाफ नहीं हैं केवल आवश्यता है कि दोनों के बीच संतुलन स्थापित किया जाय। हाल ही के समय में महामारी, जलवायु आपदाओं एवं सप्लाई चैन में रुकावटों ने दिखाया है कि विभिन्न देश एक दूसरे पर किस प्रकार निर्भर है। एक देश में आया संकट दूसरे देश को भी प्रभावित करता हुआ दिखाई दे रहा है। ब्रिक्स के सदस्य देशों को आपस में सहयोग बढ़ाने तथा सप्लाई चैन को मजबूती प्रदान करने की ओर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए। ब्रिक्स के सदस्य देशों के बीच आपस में छोटे कारोबारों को बढ़ावा दिए जाने के प्रयास किए जाने चाहिए और उन्हें नए बाजार और पर्याप्त वित्त की सुविधा उपलब्ध कराए जाने के प्रयास भी होने चाहिए ताकि रोजगार के नए अवसर निर्मित हों और अंतिम पंक्ति पर खड़े नागरिकों को गरीबी रेखा से ऊपर लाया जा सके। इसके लिए “ब्रिक्स कनेक्ट” के माध्यम से गरीब नागरिकों को काम के लिए आवश्यक कौशल सीखने, रोजगार के अवसर बढ़ाने एवं मातृशक्ति को अधिक काम के मौके देने का प्रयास किया जाना चाहिए। छोटे कारोबारियों को मदद पहुंचाने के उद्देश्य से BRICS MSME पोर्टल प्रारम्भ किया गया है। इससे छोटे कारोबारी नए बाजारों से जुड़ सकेंगें। ब्रिक्स देशों में कार्य कर रहे स्टार्टअप्स को आपस में जोड़ने के लिए ब्रिक्स इनक्युबेटर नेट्वर्क बनाया जा सकता है। इसी प्रकार, नए और बड़े स्तर के नवाचार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से ब्रिक्स स्टार्टअप इनोवेशन फंड भी बनाया जा सकता है। ब्रिक्स देश आपस में कारोबार को सरल बनाने के उद्देश्य से स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं और अमेरिकी डॉलर का इस्तेमाल कम करने का प्रयास कर रहे हैं। इसके साथ साथ, अलग अलग देशों के ऑनलाइन डिजिटल पेमेंट सिस्टम को आपस में जोड़ने का प्रयास भी किया जा रहा है। इससे एक देश के नागरिकों को दूसरे देश के नागरिकों को राशि भेजना बहुत आसान होगा और अमेरिकी डॉलर की आवश्यकता कम होगी। ब्रिक्स स्थापना से भारत को विशेष लाभ हुआ है। सामरिक दृष्टि से भारत का वैश्विक स्तर पर महत्व बढ़ा है। भारत आज न केवल ब्रिक्स बल्कि जी-20, जी-7, क्वाड, एससीओ जैसे वैश्विक संस्थानों में भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है। इससे वैश्विक स्तर पर भारत की साख बढ़ी है एवं अन्य देश आंज भारत की आवाज को गम्भीरता से सुन रहे हैं। विभिन्न देशों के नागरिक आज सनातन संस्कृति के संस्कारों को अपनाने हेतु लालायित हैं क्योंकि इस संदर्भ में भारत के व्यवहार से ये देश अत्यधिक प्रभावित हैं। साथ ही, भारत को कई प्रकार के आर्थिक लाभ भी होने जा रहे हैं और भारत में विदेशी निवेश बढ़ने की सम्भावना बनी है। ब्रिक्स के 21 सदस्य देशों के बीच आपसी समझदारी बढ़ी है और इससे इन देशों के बीच आर्थिक साझेदारी भी बढ़ेगी। आतंकवाद के खिलाफ मजबूत संदेश गया है कि भारत किसी भी कीमत पर आतंकवाद को पनपने नहीं देगा। नई दिल्ली घोषणापत्र में रूस एवं चीन सहित समस्त ब्रिक्स सदस्य देशों ने पहलगाम आतंकी हमले की निंदा भी की है। इसमें यह भी कहा गया है कि आतंकियों को पनाह देने वालों के खिलाफ मिलकर कार्यवाही करनी चाहिए। साथ ही, आतंकियों तक पहुंचने वाली फंडिंग को रोकने और उन्हें सुरक्षित ठिकाने देने वालों पर भी कार्यवाही की जानी चाहिए। भारत आज ग्लोबल साउथ की आवाज बन रहा है। इस क्षेत्र के देश भारत पर भरोसा करने लगे हैं। इससे भारतीय रुपए की वैश्विक स्तर पर साख बढ़ सकती है क्योंकि ब्रिक्स के सदस्य देश आपस में स्थानीय मुद्रा में व्यापार को बढ़ावा देने के प्रयास कर रहे हैं। यूपीआई एवं रूपे कार्ड की स्वीकार्यता कई देशों में अब बढ़ रही है। आपस में स्थानीय मुद्रा में व्यापार करने से भारतीय रुपए को मजबूती मिलेगी एवं इससे मंहगाई बढ़ने की गति कम होगी। ब्रिक्स ने वर्ष 2015 में डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी) की स्थापना की थी। इस बैंक ने भारत को 10,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक की राशि का ऋण प्रदान किया है। इस ऋणराशि का उपयोग मुंबई मेट्रो लाइन डालने के लिया किया जा रहा है। इंदौर में मेट्रो भी इसी ऋण से बनी है। दिल्ली-गाजियाबाद क्षेत्रीय रेल्वे लाइन इसी ऋण से बिछाई गई है। कुल मिलाकर भारत में आधारभूत संरचना खड़ी करने में ब्रिक्स द्वारा स्थापित उक्त बैंक का महत्वपूर्ण योगदान है। प्रहलाद सबनानी सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक, भारतीय स्टेट बैंक के-8, चेतकपुरी कालोनी, झांसी रोड, लश्कर, ग्वालियर - 474 009

प्रभासाक्षी 16 Sep 2026 12:57 pm

प्राइवेट स्कूल रिश्वत कांड में पूर्व मंत्री अनबिल महेश के ठिकानों पर क्राइम ब्रांच का छापा

प्राइवेट स्कूल रिश्वत कांड में पूर्व मंत्री अनबिल महेश के ठिकानों पर क्राइम ब्रांच का छापा

समाचार नामा 16 Sep 2026 12:35 pm

सोने और चांदी का दाम बढ़ा

मुंबई, सोने और चांदी की कीमतों में बुधवार को तेजी देखने को मिली और दोनों कीमती धातुओं का दाम करीब 1.5 प्रतिशत तक बढ़ गया।

देशबन्धु 16 Sep 2026 12:26 pm

पीएम मोदी के जन्मदिन पर बंगाल में जलाया जाएगा 'आशीर्वाद का दीया', सीएम सुवेंदु ने लोगों से की अपील

पीएम मोदी के जन्मदिन पर बंगाल में जलाया जाएगा 'आशीर्वाद का दीया', सीएम सुवेंदु ने लोगों से की अपील

समाचार नामा 16 Sep 2026 12:25 pm

यूपीआई मर्चेंट भुगतान पर शुल्क को कांग्रेस ने बताया- मोदी सरकार की 'द ग्रेट UPI लूट'

2000 रुपये से अधिक के यूपीआई मर्चेंट भुगतान पर 0.4% शुल्क लगाए जाने के सरकार के फैसले पर कांग्रेस ने मोदी सरकार को घेरा और इसे 'जेब काटो योजना' करार दिया। राहुल गांधी ने कहा कि दुकानदार पर लगने वाली फ़ीस क़ीमतों में जुड़कर ग्राहक की जेब से आएगी।

सत्य हिंदी 16 Sep 2026 1:52 am

UPI से 2,000 रुपये से ऊपर लेनदेन पर शुल्क, 15 अक्टूबर से लागू

सरकार ने यूपीआई के जरिये 2,000 रुपये से अधिक के मर्चेंट ट्रांजेक्शन पर 0.4 प्रतिशत शुल्क तय किया है जो 15 अक्टूबर से लागू होगा। वित्त मंत्रालय ने मंगलवार शाम एक प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि व्यक्तिगत यूपीआई खातों से मर्चेंट खातों में भुगतान पर 2,000 रुपये से अधिक के लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लागू होगा

देशबन्धु 15 Sep 2026 9:44 pm

‘समान नागरिक संहिता कबूल नहीं है', मुस्लिम धर्मगुरुओं ने जताई आपत्ति

‘समान नागरिक संहिता कबूल नहीं है', मुस्लिम धर्मगुरुओं ने जताई आपत्ति

समाचार नामा 15 Sep 2026 9:08 pm

एक्सप्लेनर: नए यूपीए फ्रेमवर्क में पी2पी लेनदेन पर नहीं लगेगा चार्ज, ग्राहकों को जारी रहेगी छूट

नए यूपीआई फ्रेमवर्क से किसी भी पर्सन-टू-पर्सन (पी2पी) लेनदेन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, क्योंकि इस तरह के लेनदेन को एमडीआर ढांचे से बाहर रखा गया है। यह जानकारी मंगलवार को वित्त मंत्रालय द्वारा जारी एक्सप्लेनर में दी गई।

देशबन्धु 15 Sep 2026 8:33 pm

केपटाउन: दिल्ली के स्पीकर विजेंद्र गुप्ता कॉमनवेल्थ कॉन्फ्रेंस में 'समावेशी लोकतंत्र' पर रखेंगे विचार

केपटाउन: दिल्ली के स्पीकर विजेंद्र गुप्ता कॉमनवेल्थ कॉन्फ्रेंस में 'समावेशी लोकतंत्र' पर रखेंगे विचार

समाचार नामा 15 Sep 2026 8:16 pm

'भाजपा के गुलाम', डीएमके ने पार्टी नेताओं के खिलाफ मामलों को लेकर टीवीके की आलोचना की

'भाजपा के गुलाम', डीएमके ने पार्टी नेताओं के खिलाफ मामलों को लेकर टीवीके की आलोचना की

समाचार नामा 15 Sep 2026 8:03 pm

जेपीएससी-जेएसएससी मामले में कोर्ट का फैसला मान्य होगा: कांग्रेस नेता राकेश सिन्हा

जेपीएससी-जेएसएससी मामले में कोर्ट का फैसला मान्य होगा: कांग्रेस नेता राकेश सिन्हा

समाचार नामा 15 Sep 2026 7:36 pm

क्या दिखाता है 2027 यूपी चुनाव से पहले अखिलेश यादव का ‘नीला दांव’

समाजवादी पार्टी की छात्रसभा अब नीली टी-शर्ट और जींस में नजर आएगी. यूपी की राजनीति में नीला रंग अंबेडकरवादी और बहुजन राजनीति से जुड़ा रहा है. क्या अखिलेश यादव की कोशिश 2027 से पहले एक नई सामाजिक पहचान बनाने की है

देशबन्धु 15 Sep 2026 7:14 pm

आतंकी मसूद पर पाकिस्तान की नई नौटंकी

आतंकवाद के प्रश्न पर पाकिस्तान की भूमिका लंबे समय से विश्व समुदाय के लिए चिंता का विषय रही है। आतंकवाद के विरुद्ध कठोर कार्रवाई का दिखावा और आतंकी संगठनों के प्रति नरम रवैया, पाकिस्तान की विदेश एवं सुरक्षा नीति के इस विरोधाभासी चरित्र ने उसकी विश्वसनीयता को लगातार कठघरे में खड़ा किया है। आतंकी सरगना मसूद अजहर को लेकर पाकिस्तान की हालिया कार्रवाई भी इसी विरोधाभास की एक नई कड़ी के रूप में देखी जा रही है। उसे भगोड़ा घोषित करना और उसकी गिरफ्तारी पर इनाम की घोषणा करना पहली दृष्टि में कठोर कार्रवाई का संकेत देता है, लेकिन पाकिस्तान के पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए इसके पीछे की वास्तविक मंशा पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। मसूद अजहर कोई सामान्य अपराधी नहीं है। वह भारत में हुए अनेक आतंकी हमलों से जुड़े उन कुख्यात चेहरों में रहा है, जिनकी गतिविधियों ने न केवल भारत की सुरक्षा को चुनौती दी, बल्कि दक्षिण एशिया में आतंकवाद के नेटवर्क की भयावहता को भी उजागर किया। वर्ष 1999 में इंडियन एयरलाइंस के विमान के अपहरण के बाद यात्रियों की रिहाई के बदले भारत को जिन आतंकवादियों को छोड़ना पड़ा, उनमें मसूद अजहर भी शामिल था। इसके बाद उसने आतंकवादी गतिविधियों के जिस नेटवर्क को आगे बढ़ाया, उसने भारत की सुरक्षा व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी कीं। विडंबना यह है कि जिस व्यक्ति को भारत लंबे समय से आतंकवाद का प्रमुख चेहरा मानता रहा है, उसी मसूद अजहर को लेकर पाकिस्तान अब यह दावा कर रहा है कि वह उसकी पकड़ से बाहर है और संभवतः अफगानिस्तान में छिपा हुआ है। यदि यह दावा सही है तो सवाल यह उठता है कि पाकिस्तान की सुरक्षा और खुफिया एजेंसियां इतने कुख्यात आतंकी के संबंध में इतनी अनभिज्ञ कैसे हो सकती हैं? और यदि वह पाकिस्तान से बाहर है तो उसके संगठनात्मक नेटवर्क, आर्थिक संसाधनों और संपर्कों पर कार्रवाई क्यों दिखाई नहीं देती? यहीं से पाकिस्तान की कार्रवाई पर संदेह की परतें गहरी होने लगती हैं। पाकिस्तान की जांच एजेंसी एफआईए द्वारा मसूद अजहर को अपने अत्यंत खतरनाक आतंकवादियों की सूची में शामिल किया जाना अपने आप में महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। लेकिन केवल किसी आतंकी को सूचीबद्ध कर देना आतंकवाद के विरुद्ध निर्णायक कार्रवाई नहीं माना जा सकता। असली कसौटी गिरफ्तारी, न्यायिक प्रक्रिया, आतंकी नेटवर्क का विघटन और उसके वित्तीय स्रोतों पर प्रभावी प्रहार है। यदि कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित रह जाए, तो वह आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय दबाव को टालने की प्रशासनिक कवायद बनकर रह जाती है। भारत के सुरक्षा तंत्र से जुड़े इनपुट यदि यह संकेत देते हैं कि मसूद अजहर पाकिस्तान में ही छिपा हुआ है, तो पाकिस्तान के दावे की विश्वसनीयता और भी संदिग्ध हो जाती है। हालांकि ऐसे खुफिया दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक होती है, लेकिन पाकिस्तान का अतीत उसके वर्तमान दावों पर सहज विश्वास करने की अनुमति नहीं देता। पाकिस्तान का यह दोहरा चरित्र नया नहीं है। दुनिया पहले भी देख चुकी है कि आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई का दावा करने वाला पाकिस्तान अपनी ही धरती पर छिपे कुख्यात आतंकवादियों की मौजूदगी से लंबे समय तक इनकार करता रहा। ओसामा बिन लादेन का पाकिस्तान में पाया जाना इस संदर्भ में सबसे चर्चित उदाहरण है। अमेरिकी कार्रवाई में एबटाबाद में लादेन के मारे जाने के बाद पाकिस्तान के उन दावों की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न उठे थे, जिनमें वह अपनी धरती पर आतंकवादी सरगनाओं की मौजूदगी से अनभिज्ञता जताता रहा था। आतंकी मसूद अजहर पर पाकिस्तान सरकार की कार्यवाही को इसलिए भी संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है, क्योंकि पाकिस्तान में आतंकी सरगनाओं पर न तो सरकार का नियंत्रण है और न ही सेना की ही चलती है। आतंकियों का अपना एक तंत्र है। जिनमें कोई भी दखल नहीं दे सकता। पाकिस्तान में तीन शक्ति केंद्र माने जाते हैं, जिनमें सरकार, सेना और आतंकवादी हैं। कई बार यह भी देखने में आता है कि वहां की सरकार किसकी होगी, यह आतंकी और सेना तय करती है। इसलिए सरकार, आतंकियों पर कठोर कार्यवाही करने का सामर्थ्य नहीं जुटा पाती। और आतंकी फलीभूत होते रहते हैं। इस पृष्ठभूमि में मसूद अजहर पर घोषित इनाम को केवल कानून-व्यवस्था की कार्रवाई के रूप में देखना कठिन है। इसके पीछे पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि सुधारने की मंशा भी दिखाई देती है। विशेषकर आतंकवाद के वित्तपोषण और धनशोधन से जुड़े अंतरराष्ट्रीय मानकों के संदर्भ में पाकिस्तान पर लगातार दबाव रहा है। ऐसे समय में किसी कुख्यात आतंकी के विरुद्ध सार्वजनिक कार्रवाई का प्रदर्शन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को यह संदेश देने का प्रयास हो सकता है कि पाकिस्तान आतंकवाद के विरुद्ध सक्रिय है। लेकिन आज विश्व पहले की तुलना में कहीं अधिक सतर्क है। आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष में अब केवल घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय यह देखता है कि आतंकवादी संगठनों की वित्तीय धमनियां कितनी प्रभावी ढंग से रोकी गईं, उनके प्रशिक्षण शिविरों और नेटवर्क पर क्या कार्रवाई हुई, आतंकी सरगनाओं को न्याय के कठघरे में कब लाया गया और आतंकवाद को संरक्षण देने वाली संरचनाओं को कितना ध्वस्त किया गया। पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति भी उसके लिए एक बड़ी चुनौती है। विदेशी सहायता, ऋण और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से मिलने वाली आर्थिक सहायता उसके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसे में आतंकवाद के वित्तपोषण को लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव उसके आर्थिक हितों से सीधे जुड़ जाता है। यदि पाकिस्तान आतंकवाद पर प्रभावी कार्रवाई करने में विफल रहता है तो उस पर आर्थिक एवं वित्तीय प्रतिबंधों का दबाव बढ़ सकता है। इसलिए उसके द्वारा की जाने वाली प्रत्येक कार्रवाई को उसके आर्थिक और कूटनीतिक संदर्भ में भी परखना आवश्यक है। भारत के लिए यह समय पाकिस्तान के किसी भी दावे से प्रभावित होने के बजाय तथ्यों, प्रमाणों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के आधार पर अपनी आतंकवाद विरोधी नीति को और सुदृढ़ करने का है। आतंकवाद किसी एक देश की समस्या नहीं है। यह वैश्विक शांति, लोकतांत्रिक संस्थाओं और मानव सभ्यता के लिए चुनौती है। इसलिए आतंकवाद को संरक्षण देने वाली किसी भी व्यवस्था के प्रति अंतरराष्ट्रीय समुदाय को शून्य-सहनशीलता की नीति अपनानी होगी। मसूद अजहर पर इनाम की घोषणा यदि वास्तविक कार्रवाई की दिशा में पहला कदम है तो पाकिस्तान को उसे प्रमाणित करने में देर नहीं करनी चाहिए। उसे चाहिए कि वह मसूद अजहर की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करे, यदि वह पाकिस्तान में है तो उसे गिरफ्तार करे, उसके नेटवर्क को ध्वस्त करे और उसके विरुद्ध पारदर्शी न्यायिक कार्रवाई सुनिश्चित करे। अन्यथा यह कार्रवाई भी पाकिस्तान की उन अनेक घोषणाओं की सूची में जुड़ जाएगी, जिनमें शब्द बहुत थे, लेकिन परिणाम नगण्य। आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में अब दुनिया को दावों की नहीं, कार्रवाई की भाषा चाहिए। पाकिस्तान यदि वास्तव में अपनी छवि बदलना चाहता है तो उसे नौटंकी से आगे बढ़कर प्रमाण प्रस्तुत करने होंगे। क्योंकि आतंकवाद के सवाल पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की स्मृति अब इतनी कमजोर नहीं रही कि पुरानी चालें नए आवरण में आसानी से सफल हो जाएं। - सुरेश हिंदुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार

प्रभासाक्षी 15 Sep 2026 6:59 pm

मेलोडी, ठेकुआ, मखाना-सत्तू— भारत की 'फूड डिप्लोमेसी' का नया दौर

रोम वाला वो क्लिप शायद आपकी फीड पर भी घूमा होगा। पीएम मोदी इटली की पीएम जॉर्जिया मेलोनी को एक छोटा-सा टॉफी पैकेट थमाते हैं, और मेलोनी मुस्कुराते हुए बोल पड़ती हैं— He gifted us a very, very good toffee। संयोग ऐसा कि टॉफी का नाम ही था मेलोडी! बस, इंटरनेट ने दोनों नामों को जोड़कर बना दिया 'Melodi', और वो मीठा पल रातोंरात एक मीम बन गया। एक साधारण-सी पार्ले टॉफी ने पूरे सोशल मीडिया पर राज कर लिया। लेकिन अगर आप इसे सिर्फ इत्तेफाक समझ रहे हैं, तो थोड़ा रुकिए। भारत की विदेश नीति में डिप्लोमेसी की अपनी अहमियत है ही, मगर पिछले कुछ बरसों में खाना भी उसमें एक चुपचाप मगर मजबूत किरदार निभाने लगा है। खाना अब सिर्फ पेट भरने की चीज़ नहीं रहा — यह एक सोची-समझी सॉफ्ट पावर की चाल बन चुका है। जैसे भाषा, संगीत या सिनेमा किसी देश की पहचान गढ़ते हैं, वैसे ही अब थाली भी एक तरह की चुप कूटनीतिक ज़बान बोलने लगी है। एक टॉफी, एक मिठाई, या किसी गाला डिनर का मेन्यू — ये सिर्फ मेहमाननवाज़ी नहीं, बल्कि बहुत सोच-समझकर गढ़ा गया एक संदेश होता है। दिल्ली में ब्रिक्स, थाली में इशारे टाइमिंग पर गौर करें तो मई 2026 में पीएम मोदी की पांच देशों की यात्रा का आख़िरी पड़ाव इटली ही था। मेलोनी को मेलोडी टॉफी सौंपना महज एक हल्का-फुल्का पल नहीं था, इसके पीछे की टाइमिंग सोच-समझकर तय की गई लगती है। वीडियो वायरल होते ही वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल का बयान आया कि पिछले 12 वर्षों में भारत का टॉफी निर्यात 166% बढ़ चुका है। यानी एक मामूली-सा गिफ्ट भी सरकार ने आसानी से एक आर्थिक नैरेटिव में बदल दिया — देखिए, भारत की मिठास अब दुनिया के बाज़ार में बिक रही है। यही डिप्लोमेसी की असली चाल है — जो चीज़ सोशल मीडिया पर वायरल हो जाए, उसे आंकड़ों के सहारे एक आर्थिक कहानी में ढाल दो। ठेकुआ जब स्लोवाकिया की संसद तक पहुंचा यह सिर्फ एक तोहफा नहीं था — यह बिहार की सीधी-सादी सांस्कृतिक पहचान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर मिली एक तरह की इज़्ज़त थी। जो मिठाई कभी सिर्फ त्योहारों तक सीमित मानी जाती थी, वह अब भारत की कूटनीतिक पहचान का हिस्सा बन चुकी है। बारीकी से देखें तो यह कोई अचानक शुरू हुआ चलन नहीं है। 2023 में जब भारत ने G20 की मेज़बानी की थी, तभी से इस रणनीति की झलक दिखनी शुरू हो गई थी। भारत मंडपम के उस गाला डिनर का पूरा मेन्यू वसुधैव कुटुंबकम यानी एक धरती, एक परिवार, एक भविष्य की थीम पर सजाया गया था। रागी डोसा, बाजरा खीर, कजू मटर मखाना से लेकर गोलगप्पे और समोसे तक — विदेशी मेहमानों को भारत के मिलेट्स और स्ट्रीट फूड, दोनों का ज़ायका एक साथ चखाया गया। यहीं से भारत ने खाने को महज़ मेहमाननवाज़ी नहीं, बल्कि एक कूटनीतिक हथियार की तरह बरतना शुरू किया। अब बारी मखाने और सत्तू की बिहार के सीएम सम्राट चौधरी ने इसे हर बिहारवासी के लिए गर्व का पल बताया, और बात भी सही है — जो मखाना और सत्तू कभी सिर्फ बिहार के गांव-देहात की रसोई तक सीमित थे, वे अब दुनिया के सबसे बड़े कूटनीतिक मंचों में से एक तक पहुंच चुके हैं। यह बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और परंपरा, दोनों के लिए एक बड़ी वैश्विक पहचान है। मेलोडी टॉफी से लेकर मखाने तक — भारत की गिफ्ट और मेन्यू डिप्लोमेसी में एक साफ पैटर्न नज़र आता है। हल्के-फुल्के निजी तोहफे (टॉफी, ठेकुआ) रिश्तों में अपनापन घोलने के लिए इस्तेमाल होते हैं, जबकि बड़े मंचों के मेन्यू और वेलकम किट (G20, BRICS) पूरे देश की सांस्कृतिक और कृषि विविधता दिखाने का ज़रिया बनते हैं। और इस पूरी कहानी में बिहार बार-बार लौटकर आता है — कभी ठेकुए के रूप में, तो कभी मखाना-सत्तू के रूप में। एक राज्य जिसे अक्सर सिर्फ राजनीतिक सुर्खियों के लिए जाना जाता रहा है, वह अब अपने स्वाद और परंपरा के दम पर दुनिया की सबसे बड़ी कूटनीतिक मेज़ों तक पहुंच चुका है। - संजीव कुमार मिश्र

प्रभासाक्षी 15 Sep 2026 6:56 pm

तो अब शुभेंदु करेंगे गरबा मर्यादा की भी रक्षा?

जिस प्रकार शुद्ध हिंदू उत्सव गरबा में गैर हिंदुओं को शामिल करने की विकृत सेकुलर आवाजें उठने लगीं हैं उनको देखते हुए लगता है कि मुख्यतः गुजरात और महाराष्ट्र में होने वाले गरबा उत्सवों की मर्यादा रक्षा के लिए तेजस्वी हिंदू ध्वज वाहक एवं पश्चिम बंगाल के महानायक मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की सहायता मांगने का समय आ गया है . अब सब हैं कि सेक्युलर तालिबानी आवाजों के विरुद्ध हिंदुओं को चाहिए कि अपना अंगद समान पैर जमाया जाए। बंगाल से सीख ली जाए, जहाँ तेजस्वी वीर हिंदू नायक मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी दुर्गा पूजा को उसकी मूल गरिमा लौटाने का प्रयास कर रहे हैं। उनसे सीखकर गरबा को पतन से बचाया जाए। गरबा शक्ति की उपासना से जुड़ा पारंपरिक हिंदू पूजा-स्वरूप है। यह धनकुबेरों और हिंदू-भावना विहीन भीड़ के लिए मस्ती-मस्ती का कार्निवल नहीं है। इसे भी पढ़ें: Nandigram By-Election 50 हजार से ज्यादा वोटों से जीतेगी BJP, Suvendu Adhikari का बड़ा दावा गरबा कोई सेक्युलर मनोरंजन “मेला” नहीं है। यह माँ अम्बा की भक्ति का हिंदू प्रतीक है। जो माँ दुर्गा की पूजा नहीं करते, जो उनके सामने शीश नहीं झुकाते, उनको गरबा में शामिल होने का कोई अधिकार नहीं। इसका मूल रूप और अर्थ हिंदू ब्रह्मांड-दृष्टि, प्रतीकों और दिव्य स्त्री-शक्ति की साधना से आता है। “गरबा” शब्द संस्कृत शब्द “गर्भ” से निकला है। पारंपरिक रूप में नर्तक एक घेरे में गर्भ दीप—छेदों वाले मिट्टी के घड़े में जलते दीये —या देवी की मूर्ति के चारों ओर नृत्य अभ्यर्थना करते हैं। दीपक जीवन-शक्ति, शरीर के भीतर दिव्य उपस्थिति और देवी की सृजन-शक्ति का प्रतीक है। वृत्ताकार गति हिंदू चिंतन में काल के चक्र—सृष्टि, स्थिति और प्रलय—को दर्शाती है। गरबा शरद नवरात्रि में होता है, अर्थात् दुर्गा के नौ रूपों को समर्पित नौ रातों में। यह पर्व महिषासुर पर दुर्गा की विजय का स्मरण है, जैसा देवी माहात्म्य (मार्कंडेय पुराण) में वर्णित है। भक्त माँ की स्तुति के गीत (गर्बी) गाते हैं, ताली देते हैं और नृत्य को पूजा तथा कृतज्ञता का माध्यम बनाते हैं। पारंपरिक माहौल में स्थान पवित्र माना जाता है: प्रायः नंगे पाँव नाचते हैं, आरती होती है, और केंद्र में दीपक या मूर्ति ही मुख्य रहती है। नवरात्रि व्रत माँ भगवती की भक्ति का चिह्न है। गरबा और डांडिया रास (जहाँ डंडे देवी के आयुधों के प्रतीक हैं) गुजरात में इसी भक्ति की सामाजिक अभिव्यक्ति बने। लोक-नृत्य के रूप में यह शादियों और अन्य अवसरों पर भी होता रहा है, पर इसका सबसे विस्तृत और मुख्य संदर्भ दुर्गा-पूजा का नवरात्रि चक्र ही है। क्योंकि यह रूप देवी और उनके प्रतीकों के इर्द-गिर्द बुना गया है, पारंपरिक हिंदू साधक और संगठन इसे श्रद्धा का कर्म मानते हैं, सेक्युलर-गैरहिंदू मनोरंजन नहीं। जो दुर्गा को दिव्य माता नहीं मानते, मूर्ति-पूजा और धर्मिक विश्वास को अस्वीकार करते हैं, वे इस अनुष्ठान के उद्देश्य से बाहर हैं। गरबा को सिर्फ “फन मेला” कहना उसे उसके धर्मिक अर्थ से काट देता है और पूजा-भक्ति को तमाशा बना देता है। अन्य धर्मों के अनुष्ठानों से तुलना स्वाभाविक है। ईद की नमाज़ इस्लामी मज़हब के अनुसार निर्धारित है। गैर-मुसलमानों से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वे औपचारिक नमाज़ में मजहबी कर्तव्य के रूप में शामिल हों; वह स्थान और स्वरूप उन लोगों का है जो उस आस्था को स्वीकार करते हैं। अनेक परंपराओं में मूल उपासना-कर्म की सीमाएँ ऐसी ही हैं। नवरात्रि में गर्भ दीप या दुर्गा की मूर्ति के चारों ओर होने वाला गरबा उसी श्रेणी का आस्था-विशिष्ट कर्म है, राज्य द्वारा थोपा गया खुला सांस्कृतिक मेला नहीं। आज कई स्थानों पर गरबा अत्यधिक व्यावसायिक हो चुका है और हिंदू-भावना विहीन इवेंट मैनेजरों के हाथों विकृत हो रहा है। समय आ गया है कि अंगद समान हिंदू आस्था और मर्यादा का पैर जमाया जाए। बंगाल से सीख ली जाए, जहाँ तेजस्वी वीर हिंदू नायक मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी दुर्गा पूजा को उसकी मूल गरिमा लौटाने का प्रयास कर रहे हैं। उनसे सीखकर गरबा को पतन से बचाया जाए। यूनेस्को ने 2023 में गरबा को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया। उसमें इसके हिंदू सामाजिक स्वरूप और शक्ति/स्त्री-ऊर्जा के वृत्त को बनाए रखते हुए लोगों को जोड़ने की क्षमता का उल्लेख है। विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों का कहना सही है कि यह देवी-पूजा का रूप है, इसलिए प्रवेश उन्हीं का हो जो इस आस्था को साझा करते हैं। गरबा स्थलों पर प्रवेश नियंत्रण और पहचान जाँच की माँग इसीलिए है। मिश्रित आयोजनों में तनाव, हिंदू लड़कियों को निशाना बनाने, अपमान और उत्पीड़न की घटनाएँ सामने आई हैं। गैर-हिंदुओं द्वारा हिंदू देवताओं का मज़ाक उड़ाने और “गरबा के बहाने हिंदू लड़कियों को छेड़ने” की खबरें भी आती रही हैं। हिंदुओं को समावेशिता का पाठ पढ़ाने की ज़रूरत नहीं। भारत का संविधान हिंदू-बहुल समाज में बना। यह कानून के समक्ष समानता, धर्म की स्वतंत्रता और प्रत्येक समुदाय को अपने धार्मिक कार्यों के प्रबंधन का अधिकार देता है। भारतीय संविधान हिंदू समावेशिता की अभिव्यक्ति है। गरबा सनातन धर्म की मर्यादा से बँधा है। हिंदू अपनी संवेदनाओं के अनुरूप प्रवेश की शर्तें रख सकते हैं। मंदिर, मठ और पारंपरिक संप्रदाय पहले से कुछ अनुष्ठान-स्थानों पर मर्यादा के अनुसार प्रवेश नियंत्रित करते हैं। दुर्गा-पूजा पर आधारित सामुदायिक गरबा पर भी वही तर्क लागू होना चाहिए। अब साधु-संन्यासियों और पारंपरिक हिंदू स्वरों से अपील करनी चाहिए कि वे विशिष्ट हिंदू रूपों की मर्यादा स्पष्ट करें और उसकी रक्षा करें। ये माँगें धार्मिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अनुकूल हैं। शास्त्रीय नवरात्रि रूप में गरबा दुर्गा भगवती—माता और शक्ति के स्वरूप—के प्रति भक्ति का हिंदू अनुष्ठान है। गर्भ-दीप, वृत्ताकार गति, स्तुति-गीत तटस्थ मनोरंजन नहीं हैं। जो यह विश्वास नहीं रखते, वे इसके धार्मिक उद्देश्य से बाहर हैं, जैसे गैर-मुसलमान ईद की औपचारिक नमाज़ की संरचना से बाहर हैं। अनुष्ठान के पारंपरिक स्वरूप की रक्षा का अर्थ यह नहीं कि नृत्य की व्यापक लोकप्रियता से इनकार किया जाए। अर्थ यह है कि पूजा-केंद्रित कर्म अपने आप खुली सेक्युलर पार्टी नहीं बन जाता। जो आयोजक इसे उपासना मानते हैं, उन्हें भागीदारी का ढाँचा उसी के अनुसार रखने का अधिकार है। - तरुण विजय (लेखक पूर्व सांसद और वरिष्ठ पत्रकार हैं)

प्रभासाक्षी 15 Sep 2026 6:14 pm

कर्नाटक कांग्रेस प्रमुख ने उमर खालिद को 'राष्ट्रवादी' बताया, भाजपा ने किया पलटवार

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समाचार नामा 15 Sep 2026 5:50 pm

चंद्रनाथ रथ की हत्या के पीछे 'भतीजों का गिरोह' था: सुवेंदु अधिकारी

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समाचार नामा 15 Sep 2026 5:40 pm

राजस्थान निकाय चुनाव में भाजपा का शानदार प्रदर्शन, जनता ने कांग्रेस को नकारा: डॉ. अनिल पटेल

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समाचार नामा 15 Sep 2026 5:21 pm

मनोज झा ने यूसीसी को बताया 'डॉग व्हिसल पॉलिटिक्स', सरकार पर साधा निशाना

मनोज झा ने यूसीसी को बताया 'डॉग व्हिसल पॉलिटिक्स', सरकार पर साधा निशाना

समाचार नामा 15 Sep 2026 4:58 pm

कर्नाटक: सीएम डीके शिवकुमार ने भाजपा पर 'वंदे मातरम' विवाद को लेकर अशांति फैलाने का लगाया आरोप

कर्नाटक: सीएम डीके शिवकुमार ने भाजपा पर 'वंदे मातरम' विवाद को लेकर अशांति फैलाने का लगाया आरोप

समाचार नामा 15 Sep 2026 3:32 pm

मेघालय के मुख्यमंत्री ने तीन मोबाइल चिकित्सा इकाइयों का किया शुभारंभ, राज्य में अंतिम छोर तक स्वास्थ्य सेवा पहुंचाने का लक्ष्य

मेघालय के मुख्यमंत्री ने तीन मोबाइल चिकित्सा इकाइयों का किया शुभारंभ, राज्य में अंतिम छोर तक स्वास्थ्य सेवा पहुंचाने का लक्ष्य

समाचार नामा 15 Sep 2026 2:33 pm

यूसीसी पर अमित शाह के बयान का सम्मान, यूपी में सबसे पहले करेंगे लागू : अनिल राजभर

यूसीसी पर अमित शाह के बयान का सम्मान, यूपी में सबसे पहले करेंगे लागू : अनिल राजभर

समाचार नामा 15 Sep 2026 2:32 pm

डूबने वाला है ब्रिटेन का सूरज, होंगे 4 टुकड़े! UK अगर टूटता है तो इसका भारत पर क्या असर होगा?

क्या जिन अंग्रजों ने हम पर 200 साल राज किया उनका अपना देश अब टूट रहा है? ये सवाल इसलिए क्योंकि 14 सितंबर को वेल्स की राजधानी कैरेटिफ के एक होटल में यूनाइटेड किंगडम के चार देशों में से तीन के मुखिया एक मेज पर बैठते हैं और फिर ये तीनों एक कागज पर हस्ताक्षर करते हैं। जिसमें वो कहते हैं कि अपना भविष्य वो खुद तय करना चाहते हैं। ब्रिटेन कभी ये शब्द ही ताकत का दूसरा नाम हुआ करता था। वो साम्राज्य जिसके बारे में कहा जाता था कि इसका सूरज कभी नहीं डूबता। लेकिन आज ब्रिटेन महज एक दशक में सात प्रधानमंत्री को देख चुका है। लिज ट्रस सिर्फ 45 दिन टिकीं, बोरिस जॉनसन अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए, ऋषि सुनक दो साल से कम पद पर रहे और अबकी बार भी दो साल तक पूरे नहीं कर पाए। ऐसे अस्थिर दौर में देश की अर्थव्यवस्था डांवाडोल है। अमीर लोग देश छोड़ कर जा रहे हैं। सड़कों पर हिंसा आम हो चली है और लोग पूछ रहे हैं कि ये ब्रिटेन को क्या हो गया है? दरसअल, जिस इंग्लैंड को आप एक देश समझते हैं वो यूनाइटेड किंगडम के चार टुकड़ों (इंग्लैंड, वेल्स, स्कॉटलैंड, नॉर्दन आइलैंड) में से एक टुकड़ा है। ऐसे में सवाल ये है कि बाकी तीन टुकड़े यूके से क्यों अलग होना चाहते हैं? एक और दिलचस्प बात आपको बता दें कि दरअसल, आप अक्सर यूनाइटेड किंगडम के झंडे के प्रिंट वाला टी-शर्ट या बैग इस्तेमाल करते होंगे वो तीन झंडों को सिलकर बना है, लेकिन इसमें वेल्स है ही नहीं। फुटबॉल के मैदान पर चारों की टीम अलग-अलग खेलती है। लेकिन पासपोर्ट सभी का एक है। 2014 में स्कॉटलैंड ने अपनी जनता से वोट करवाया था, तब 100 में से 55% लोगों ने कहा कि हम यूनाइटेड किंगडम के साथ रहेंगे। 2022 में यूके की सबसे बड़ी अदालत ने कह दिया कि दोबारा वोट करवाना है तो बगैर लंदन की इजाजत के बगैर नहीं होगा। वेल्स के मुखिया ने भले ही आजादी के कागज पर दस्तगत किए। लेकिन उनके अपने लोगों में 100 में से सिर्फ 26% लोग अजादी चाहते हैं। यूके का सबसे बड़ा स्टील कारखाना खुद वेल्स में है। सवाल ये है कि ये चार देश एक कैसे हैं, एक हैं तो अलग कैसे होंगे। इनकी चाबी जब लंदन के पास है तो ये तीनों कागज लिखकर किसे दिखाना चाह रहे हैं। इसके साथ ही सबसे अहम और हमारे मतलब का सवाल कि यूनाइटेड किंगडम अगर टूटता है तो इसका भारत पर क्या असर होगा? इसे भी पढ़ें: ब्रिटेन जाने वालों की होश उड़ा देगी ये खबर! भारत भी चौंका ब्रिटेन के पतन की कहानी 19वीं सदी ब्रिटेन की सदी थी। उस वक्त दुनिया की 25 फीसदी जमीन उसके कब्जे में थी। दुनिया की 20 फीसदी आबादी उसके अधीन थी। ब्रिटिश पाउंड दुनिया की रिजर्व करेंसी था, वैसे ही जैसे आज अमेरिकी डॉलर है। उस ब्रिटेन ने दुनिया को बहुत कुछ दिया। इंडस्ट्रियल रेवोल्यूशन वहीं से शुरू हुआ। भाप के इंजन, रेलवे, वैश्विक व्यापार। ब्रिटेन ने दुनिया को आधुनिकता सिखाई, लेकिन यहां यह जिक्र भी जरूरी है कि यह साम्राज्य खून और शोषण पर खड़ा था। वह सूरज जो कभी नहीं डूबता था, भारत, अफ्रीका और कैरेबियन के लाखों लोगों के खून पसीने की कीमत पर चमकता था। पतन की कहानी समझने के लिए उदय की असलियत का पता होना चाहिए। वैसे तो दूसरे विश्वयुद्ध ने जाहिर कर दिया था कि ब्रिटेन अब कमजोर हो रहा है और अमेरिका नई ताकत बनकर उभर रहा था, लेकिन उसकी ताकत को पहला बड़ा झटका लगा। 1956 में मिस्र ने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया। ब्रिटेन और फ्रांस ने सैन्य कार्रवाई की, लेकिन अमेरिका ने कहा, रुको और ब्रिटेन रुक गया। जीसी पेन जैसे कई इतिहासकारों ने माना है कि स्वेज संकट ने ब्रिटेन के एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में पतन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पीएम का बयान और मच गया हंगामा 14 सितंबर 2026 को स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड के नेता कार्डिफ शहर में इकट्ठा हुए हैं। उन्होंने मिलकर एक एमओयू पर साइन भी किए हैं। जो इन तीनों यानी स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड की ब्रिटेन से आजादी का समर्थन करता है। एमओयू में लिखा गया है कि इन तीनों को आत्मनिर्णय का अधिकार है और जरूरत पड़ने पर वह अपने-अपने यहां जनमत संग्रह भी करवा सकते हैं। स्कॉटलैंड तो 2014 में एक रेफरेंडम करवा भी चुका है और उत्तरी आयरलैंड 1998 के गुड फ्राइडे एग्रीमेंट की वजह से ब्रिटेन के साथ बना हुआ है। वेल्स में भी 1990 के दशक में आजादी को लेकर प्रोटेस्ट हो चुके हैं। हालिया बवाल जो मचा है वह ब्रिटिश प्राइम मिनिस्टर एंडडी बर्नहम की एक टिप्पणी की वजह से शुरू हुआ था। 9 सितंबर को वह हाउस ऑफ कॉमंस में बोल रहे थे। एसएपी के क्रिस लॉ ने उनसे स्कॉटलैंड के जनमत संग्रह पर सवाल कर लिया। इसके जवाब में बर्नहम ने कहा कि स्कॉटलैंड के मामले में भी वही स्थिति लागू होती है, वही नियम लागू होते हैं जो नॉर्दन आइलैंड के मामले में होते हैं। यानी अगर जनता के बीच बहुत स्पष्ट बहुमत को लेकर समर्थन है तो जनमत संग्रह के सवाल पर विचार किया जा सकता है। प्रधानमंत्री की इस टिप्पणी के बाद स्कॉटलैंड के फर्स्ट मिनिस्टर जॉन शिवनी ने तो यह तक कह दिया कि एंडडी बर्नहम यूनाइटेड किंगडम के आखिरी प्रधानमंत्री होंगे। उनके बाद ब्रिटेन बट जाएगा। ट्रंप ने डाला आग में घी ट्रंप 12 सितंबर को डबलिन पहुंचे थे। वहां उन्होंने कह दिया कि वो एक यूनाइटेड आयरलैंड देखना पसंद करेंगे। नॉर्दर्न आयरलैंड का रिपब्लिक ऑफ आयरलैंड के साथ जुड़ना एक अच्छी बात होगी। फैंटास्टिक चीज होगी। उन्होंने ऐसा बोला। ब्रिटेन के खिलाफ ट्रंप अपने नए कार्यकाल की शुरुआत से ही एकदम लगे हुए हैं। पहले वह अपने दोस्त एलन मस्क के साथ मिलकर पूर्व प्रधानमंत्री की स्टारमर को ट्रोल किया करते थे और अब वो बर्नहम को ट्रोल कर रहे हैं। वैसे ट्रंप की यूनाइटेड आयरलैंड वाली टिप्पणी के पीछे एक पॉलिटिकल स्ट्रेटजी भी हो सकती है। नवंबर महीने में अमेरिका में मिड टर्म इलेक्शन है जिसमें ट्रंप हारते नजर आ रहे हैं। अमेरिका में 3 करोड़ से ज्यादा आयरिश मूल के लोग रहते हैं। हो सकता है कि इसी वोट बैंक को रिझाने के लिए ट्रंप ऐसी टिप्पणी कर रहे हो। 1998 में भी जब बिल क्लिंटन ने आयरलैंड और ब्रिटेन के बीच गुड फ्राइडे एग्रीमेंट करवाया था। तब भी आयरिश वोटर्स ने डेमोक्रेट्स को खूब वोट दिया था। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में उनकी पांच सीट ज्यादा आई थी उस साल। हो सकता है कि ट्रंप भी उसी तरह का कोई तीर मारने की कोशिश कर रहे हो। इसे भी पढ़ें: The Partition of Britain | दुनिया पर राज करने वाले ब्रिटेन का अंत करीब? बगावत की आग में झुलसा वेस्टमिंस्टर, तीन देशों ने दागा आजादी का पैगाम! 14 सितंबर को क्या हुआ 14 सितंबर 2026 को स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड के नेता कार्डिफ शहर में इकट्ठा हुए हैं। उन्होंने मिलकर एक एमओयू पर साइन भी किए हैं। जो इन तीनों यानी स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड की ब्रिटेन से आजादी का समर्थन करता है। एमओयू में लिखा गया है कि इन तीनों को आत्मनिर्णय का अधिकार है और जरूरत पड़ने पर वह अपने-अपने यहां जनमत संग्रह भी करवा सकते हैं। क्या है तीनों नेताओं का मकसद जॉनस्विनी (स्कॉटलैंड): स्कॉटलैंडकोआजाददेशबनानावईयूकीसदस्यतालेना इनका लक्ष्य है।इसके पीछे ये तर्क दिया जा रहा है कि अर्थव्यवस्था,टैक्स,ऊर्जावअन्यफैसलेदेशमेंहीहों।शिकायतःब्रिटेननेईयूछोड़ा,जबकि62%स्कॉटलैंडवासीसाथरहनाचाहतेथे। स्कॉटलैंडकेतेल,गैस,समुद्रीइलाकेकालाभब्रिटेनकोमिलरहा। रुनएपइओरवर्थ (वेल्स):स्वतंत्रवेल्सको बनान लक्ष्य है। तर्क है कि वेल्स कोब्रिटेनसेउचितफंडनहींमिलता।प्राकृतिकसंसाधनोंवनीतियोंपरनियंत्रणनहींहै।तपुलिस,न्यायव्यवस्थाऔरवित्तीयअधिकारवेल्सकोसौंपेजाएं।आजादीकोवेल्सकीसंवैधानिकयात्राकाअंतिमपड़ावबतारहेइओरवर्थ। मिशेल ओ'नील (नॉर्दन आयरलैंड) उत्तरी आयरलैंड व आयरलैंड गणराज्य को मिलाकर एक देश बनाना। द्वीप के लोगों को संवैधानिक भविष्य तय करने दिया जाए। 1998 की डील रेफरेंडम में एकीकरण की अनुमति। चारों हिस्सों की अपनी-अपनी पहचान यूके के नक्शे को देखेंगे तो आपको इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दन आयरलैंड दिख रहे होंगे। इन चारों से मिलकर बनता है यूनाइटेड किंगडम जिसका पूरा नाम है यूनाइटेड किंगडम ऑफ ग्रेट ब्रिटेन एंड नॉर्दन आयरलैंड। अब चारों हिस्सों की अपनी-अपनी पहचान भी है। इंग्लैंड की राजधानी लंदन है। स्कॉटलैंड की राजधानी है एडिन्रा। वेल्स की राजधानी है कार्टिफ जहां पे आज ये मीटिंग हुई है। और नॉर्दन आयरलैंड की राजधानी है बेलफास्ट। यह सब कहलाते तो ब्रिटेन का हिस्सा ही हैं। लेकिन विदेश नीति इन तीनों की,डिफेंस के जो मामले हैं वो यूनाइटेड किंगडम से चलाए जाते हैं। इसलिए इन तीनों इलाकों में जो प्रतिनिधि चुने जाते हैं, उन्हें कहा जाता है फर्स्ट मिनिस्टर। भारत की चीफ मिनिस्टर की तरह आप इन्हें समझ सकते हैं। लेकिन उनकी भूमिका एक स्टेट से बढ़कर होती है। अब स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दन आयरलैंड के पास अपनी-अपनी विधानसभा है और कुछ-कुछ अलग-अलग अधिकार हैं। इंग्लैंड में इस तरह की कोई अलग से संसद या विधानसभा नहीं है। इंग्लैंड से जो जुड़े मामले हैं वो यूनाइटेड किंगडम की संसद के कानून से ही बनाए जाते हैं। वहीं से मंजूर होते हैं। ये तीनों इलाके ब्रिटेन का हिस्सा कैसे बने हैं? वेल्स ब्रिटेन के पश्चिम में है। पहाड़ों वाला इलाका है। 10वीं शताब्दी में जब विलियम द कॉनकरर ने इंग्लैंड पर कब्जा किया। उसके बाद इंग्लैंड के शासकों की नजर थी। वो वेल्स पर बन गई थी। वेल्स में उस समय कई छोटे-छोटे राज्य और राजघराने थे। इंग्लैंड के राजा पूरे वेल्स पर एक साथ कब्जा नहीं कर पाए। लेकिन उन्होंने वेल्स की सीमा पर बहुत सारे किले बना लिए और किलों के जरिए वहां पर वो देखरेख करने लगे और धीरे-धीरे अपना प्रभाव बढ़ाने लगे। पर 1280 के दशक में इंग्लैंड के राजा एडवर्ड फर्स्ट ने वेल्स के खिलाफ मिलिट्री कैंपेन शुरू किया। उनकी सेना ने वेल्स के अहम इलाकों पर कब्जा किया और कई विशाल किले बनवाए। कैनफोन, कॉनवी और हारले जैसे किले जो बहुत फेमस किले हैं वह उसी दौर के बनाए गए थे। लेकिन 16वीं सदी में इंग्लैंड के राजा हेनरी ए्थ के समय दो ऐसे कानून पास हुए जिसकी वजह से आज ये पूरी स्थिति बनी। जिन्हें कहते हैं एक्ट्स ऑफ यूनियन। इन कानूनों का मकसद वेल्स और इंग्लैंड के बीच मौजूदा जो उस समय जो मौजूदा कानूनी दीवारें थी उसको हटाना था और उन्हीं के बदौलत वेल्स को इंग्लैंड की राजनीतिक व्यवस्था में शामिल किया गया। इसी कानून के बाद वेल्स ब्रिटेन का हिस्सा बना। इसे भी पढ़ें: Essar की EET Retail ब्रिटेन में SGN Retail का 40 करोड़ पाउंड में करेगी अधिग्रहण स्कॉटलैंड ब्रिटेन के उत्तरी हिस्से में पड़ता है। कई सदियों तक स्कॉटलैंड एक अलग देश हुआ करता था। उसका अपना राजा था। अलग कानूनी व्यवस्था थी। दक्षिण में इंग्लैंड था और दोनों देशों के बीच में सीमा को लेकर संघर्ष चलता चलता रहता था। इंग्लैंड ने स्कॉटलैंड को कब्जाने की पहली बड़ी कोशिश की थी। 1296 में। इंग्लैंड के राजा एडवर्ड फर्स्ट ने स्कॉटलैंड पर हमला किया और वहां के राजा जॉन बेलील को हटा दिया। अंग्रेजी सेना ने स्कॉटलैंड के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया। लेकिन यह नियंत्रण ज्यादा समय तक नहीं चल सका। स्कॉटलैंड में विद्रोह हुआ। विलियम वालेस और बाद में रॉबर्ट द ब्रूस ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ लड़ाई लड़ी। 1314 में बन कबर्न की लड़ाई में रॉबर्ट द ब्रूस ने अंग्रेजी सेना को हरा दिया। और 1328 में इंग्लैंड ने स्कॉटलैंड की आजादी को मान्यता दे दी। करीब 400 साल तक स्कॉटलैंड आजाद रहा। लेकिन 1707 में बड़ा बदलाव हुआ। उस समय स्कॉटलैंड आर्थिक मुश्किलों से गुजर रहा था और इंग्लैंड के साथ व्यापार और राजनीतिक संबंधों को लेकर भी वहां पे तनाव था दोनों के बीच। इंग्लैंड ने उस समय ऑफर दिया कि आप हमारे साथ आ जाइए। इंग्लैंड में अपना विलय कर लीजिए। अपना कानून अलग रखिएगा लेकिन देश एक होगा। इसी को लेकर 1706 में दोनों देशों के बीच एक संधि हो गई और स्कॉटलैंड इंग्लैंड की मातहत आ गया। स्कॉटलैंड की अलग संसद खत्म हो गई और उसके जो सांसद थे वो नई ब्रिटिश संसद में शामिल हो गए। 20वीं सदी में फिर से यह मांग उठी कि स्कॉटलैंड के घरेलू मामलों पर फैसले लेने के लिए उसके पास भी अधिकार होने चाहिए। इसका होता है कि 1997 में 1997 में एक जनमत संग्रह होता है। करीब 74 74% लोगों ने इसके पक्ष में वोट दिया। इसके बाद 1999 में स्कॉटलैंड पार्लियामेंट दोबारा अस्तित्व में आई। इसे डेवोल्यूशन कहा गया। नॉर्दन आयरलैंड 1801 से ही आयरलैंड ग्रेट ब्रिटेन का हिस्सा बन गया था। लेकिन वहां आजादी की मुहिम वेल्स और स्कॉटलैंड के मुकाबले काफी तेज थी। 1916 में डबलिन में ईस्टर राइजिंग हुआ। आरिश रिपब्लिकन आंदोलन के नेताओं ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह किया और आइलैंड को एक आजाद मुल्क घोषित करने की कोशिश की। विद्रोह कुछ ही दिनों में दबा दिया गया। लेकिन ब्रिटिश सरकार द्वारा इसके नेताओं को फांसी दी गई और उससे क्या हुआ कि आरिश जनता भड़क गई और एक नेशनलिस्ट मूवमेंट वहां पर तेज हो गया। इसके बाद सिंफेन पार्टी तेजी से उभरी। 1918 के चुनाव में उसने आयरलैंड में बड़ी जीत हासिल की। उसके सांसदों ने लंदन की ब्रिटिश सांसद में जाने के बजाय डबलिन में ही अपनी अलग संसद बनाने का फैसला किया जिसे डॉयल आयरन कहा गया और स्वतंत्र आई स्टेट की मांग को आगे बढ़ाया गया। इसके बाद 1919 से 1921 तक आयरलैंड की आजादी के लिए लड़ाई चलती रही। आयरलैंड के उत्तर में छह काउंटियां यूनाइटेड किंगडम में ही रही। यही इलाका बाद में नॉर्दर्न आयरलैंड कहलाया। वो इसलिए क्योंकि नॉर्दन आइलैंड में खासकर अलस्टर नाम के इलाके की कुछ हिस्सों में जो थी वो प्रोटेस्टेंट्स क्रिश्चियंस की आबादी वहां पे ज्यादा थी और वो ब्रिटेन के साथ रहना चाहते थे। दूसरी तरफ कैथोलिक राष्ट्रवादी समूह जो थे जिसके कई लोग पूरे आयरलैंड को एक देश के रूप में देखना चाहते थे। इसलिए जब आयरलैंड का विभाजन हुआ तो नॉर्दन आयरलैंड यूनाइटेड किंगडम में बना रहा। ब्रिटेन के बंटने का भारत पर असर ब्रिटेन UNSC का स्थायी सदस्य (P5) है। विभाजन के बाद ब्रिटेन की वैश्विक हैसियत और भू-राजनीतिक प्रभाव में भारी गिरावट आएगी। इससे UNSC में स्थायी सीट के लिए भारत की दावेदारी को नैतिक और रणनीतिक बल मिलेगा, क्योंकि सिकुड़ता हुआ ब्रिटेन अपनी पुरानी ताकत खो चुका होगा। भारत को सिर्फ लंदन (वेस्टमिंस्टर) से रिश्ते संभालने के बजाय एडिनबर्ग (स्कॉटलैंड), डबलिन (आयरलैंड) और कार्डिफ (वेल्स) के साथ अलग-अलग स्वतंत्र द्विपक्षीय रिश्ते और दूतावास स्थापित करने होंगे। भारत हमेशा से संप्रभु राष्ट्रों की क्षेत्रीय अखंडता का समर्थक रहा है। किसी स्थापित लोकतंत्र के टूटने से वैश्विक स्तर पर अलगाववादी ताकतों को शह मिल सकती है, जिसे लेकर नई दिल्ली बेहद सतर्क रहेगी। ब्रिटेन अपने आंतरिक विवादों और पुनर्गठन में इस कदर उलझ जाएगा कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसकी मौजूदगी सीमित हो जाएगी। भारत को सुरक्षा और रक्षा तकनीक (जेट इंजन, नौसैनिक उपकरण) के मामले में फ्रांस, अमेरिका या खुद की घरेलू क्षमताओं पर अधिक निर्भर रहना पड़ेगा। भारतीय छात्रों और कामगारों के लिए नियम बदल सकते हैं। यदि स्कॉटलैंड स्वतंत्र होकर ईयू की नीतियों की ओर बढ़ता है, तो वहां भारतीय छात्रों के लिए वर्क वीजा या आव्रजन के नियम लंदन के कड़े नियमों से ज्यादा उदार हो सकते हैं। यूके में रहने वाले लाखों भारतीय मूल के लोग मुख्य रूप से इंग्लैंड में केंद्रित हैं। विभाजन के बाद उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी और प्रभाव पर भी नया समीकरण बनेगा। कुल मिलाकर कहे तो ब्रिटेन के टूटने से लंदन की वैश्विक सौदेबाजी की ताकत कमजोर होगी। भारत के लिए यह स्थिति एक तरफ नए व्यापारिक और कूटनीतिक दरवाजे खोलेगी, वहीं दूसरी तरफ सुरक्षा परिषद में सुधार की भारतीय मांग को एक ठोस आधार प्रदान करेगी।

प्रभासाक्षी 15 Sep 2026 1:34 pm

तमिलनाडु के परिवार कल्याण कार्यक्रम में जुड़ा बांझपन का इलाज, जन्म दर में भारी गिरावट के बाद लिया फैसला

चेन्नई, 15 सितंबर (आईएएनएस)। रजिस्टर्ड जन्मों में लगातार कमी और तेजी से बूढ़ी होती आबादी को देखते हुए, तमिलनाडु सरकार ने अपने परिवार कल्याण कार्यक्रम में बांझपन के इलाज को शामिल करने के लिए कदम उठाए हैं। ऐसा करने वाला वह देश का पहला राज्य बन गया है।

समाचार नामा 15 Sep 2026 12:28 pm

विमल इलायची को दिल्ली हाईकोर्ट से बड़ा झटका: महाराष्ट्र एफडीए (FDA) के नोटिस के खिलाफ याचिका खारिज

दिल्ली उच्च न्यायालय ने विमल इलायची से जुड़ी कंपनी पीबी एग्रो द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें विमल पान मसाला के कथित छद्म विज्ञापन को लेकर महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) द्वारा बॉलीवुड अभिनेताओं शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को जारी किए गए कारण बताओ नोटिस को चुनौती दी गई थी।

देशबन्धु 15 Sep 2026 11:40 am

अभियंता दिवस पर ओम बिड़ला और केंद्रीय मंत्रियों ने दी शुभकामनाएं, भारत रत्न विश्वेश्वरैया को किया नमन

नई दिल्ली, 15 सितंबर (आईएएनएस)। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला और केंद्रीय मंत्रियों ने राष्ट्रीय इंजीनियर्स (अभियंता) दिवस पर बधाई दी है। इसके साथ ही भारत रत्न डॉ. मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की जयंती पर उनको याद करते हुए नमन किया है।

समाचार नामा 15 Sep 2026 8:40 am

आरएसएस के पांचवें सरसंघचालक के. एस. सुदर्शन की पुण्यतिथि पर नेताओं ने दी श्रद्धांजलि

आरएसएस के पांचवें सरसंघचालक के. एस. सुदर्शन की पुण्यतिथि पर नेताओं ने दी श्रद्धांजलि

समाचार नामा 15 Sep 2026 8:32 am

कांग्रेस में बड़े फेरबदल की तैयारी, 130 के इंटरव्यू, क्या राहुल इस बार अपनी टीम बना पायेंगे

कांग्रेस संगठन में बड़े बदलाव की तैयारी है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने करीब 130 नेताओं का इंटरव्यू लिया। AICC सचिवों की समीक्षा के बाद कई नेताओं की जिम्मेदारियां बदल सकती हैं। कहा जा रहा है राहुल गांधी को अब अपनी टीम बनाने का मौका मिल रहा है।

सत्य हिंदी 15 Sep 2026 8:26 am

69वें राष्ट्रमंडल संसदीय सम्मेलन के लिए भारतीय प्रतिनिधिमंडल केप टाउन पहुंचा

69वें राष्ट्रमंडल संसदीय सम्मेलन के लिए भारतीय प्रतिनिधिमंडल केप टाउन पहुंचा

समाचार नामा 14 Sep 2026 11:55 pm

पंजाब भाजपा नेताओं ने 'नशा मुक्त यात्राओं' की पर्याप्त सुरक्षा के लिए डीजीपी से मुलाकात की

पंजाब भाजपा नेताओं ने 'नशा मुक्त यात्राओं' की पर्याप्त सुरक्षा के लिए डीजीपी से मुलाकात की

समाचार नामा 14 Sep 2026 10:25 pm

'यह मेरी आखिरी मुलाकात हो सकती है', मुंबई मार्च से पहले भावुक हुए मनोज जरांगे पाटिल

मराठा आरक्षण आंदोलन के प्रमुख नेता मनोज जरांगे पाटिल ने अपने अनशन के 17वें दिन बेहद भावुक अपील की। पाटिल ने बताया कि उन्होंने सलाइन और अन्य चिकित्सा सहायता लेना बंद कर दिया है, जिससे उनकी शारीरिक स्थिति लगातार बिगड़ रही है। मुंबई की उनकी आगामी यात्रा महाराष्ट्र के लोगों के साथ उनकी आखिरी मुलाकात भी हो सकती है।

देशबन्धु 14 Sep 2026 10:18 pm

डीएससी घोटाले को लेकर जगन ने चंद्रबाबू पर एक और हमला बोला

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समाचार नामा 14 Sep 2026 10:15 pm

मराठा आरक्षण के लिए सिर्फ छत्रपति परिवार के हस्ताक्षर ही नहीं, बल्कि कानूनी समर्थन की भी जरूरत: महाराष्ट्र के मंत्री

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समाचार नामा 14 Sep 2026 10:03 pm

राजस्थान निकाय चुनाव के नतीजे भाजपा के विस्तार का संकेत: सुधांशु त्रिवेदी

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समाचार नामा 14 Sep 2026 9:51 pm

BRICS में भारत की शानदार कूटनीतिक सफलता ने 'Brand Modi' को और मजबूत कर दिया है

दिल्ली में हुई ब्रिक्स शिखर बैठक को अगर केवल एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन मानकर देखा जाएगा तो उसकी असली राजनीतिक अहमियत समझ में नहीं आएगी। देखा जाये तो यह बैठक ऐसे समय में हुई, जब दुनिया कई मोर्चों पर तनाव, युद्ध, अविश्वास और बदलते शक्ति-संतुलन से गुजर रही है। ऐसे माहौल में भारत ने जिस तरह अलग-अलग ध्रुवों के देशों को एक मंच पर बैठाया, संवाद के रास्ते खोले और मतभेदों के बावजूद सहयोग की जमीन तैयार की, वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति के लिए एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि के तौर पर सामने आई है। ब्रिक्स की इस बैठक की सबसे बड़ी सफलता यही रही कि भारत ने उन देशों के बीच भी संवाद की संभावना पैदा की, जिनके बीच गहरे मतभेद हैं। ईरान और खाड़ी के देशों के बीच बातचीत इसका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण है। पश्चिम एशिया लंबे समय से टकराव, अविश्वास और संघर्ष का मैदान बना हुआ है। ऐसे समय में दिल्ली का मंच बातचीत के लिए उपलब्ध होना अपने आप में भारत की बढ़ती स्वीकार्यता का संकेत है। प्रधानमंत्री मोदी ने यह दिखाया कि भारत किसी एक खेमे का हिस्सा बनकर नहीं, बल्कि अलग-अलग पक्षों से संवाद करते हुए अपने लिए स्वतंत्र कूटनीतिक स्थान बना सकता है। इसे भी पढ़ें: 'कमजोर' पटरी पर तेजी से दौड़ने का प्रयास कर रही भारत-चीन 'दोस्ती' की रेल कहीं डिरेल ना हो जाए! भारत और चीन के बीच हुई बातचीत भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। सीमा विवाद और लंबे समय से चले आ रहे तनाव के बावजूद दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व का आमने-सामने बैठना इस बात का प्रमाण है कि भारत अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं से समझौता किए बिना संवाद के दरवाजे बंद नहीं करता। यही वह बिंदु है जहां मोदी की कूटनीति की ताकत दिखाई देती है। अमेरिका से संबंध भी कायम हैं, रूस के साथ रिश्ते भी बने हुए हैं, चीन से संवाद भी हो रहा है और पश्चिम एशिया के अलग-अलग देशों के साथ भारत की स्वीकार्यता लगातार बढ़ रही है। यानी भारत किसी एक शक्ति के पीछे चलने के बजाय अपनी शर्तों पर संबंधों का संतुलन साध रहा है। यही सफलता उस राजनीतिक नैरेटिव को भी कमजोर करती है, जिसमें बार-बार यह सवाल उठाया जाता रहा कि अगर पड़ोसी देश पाकिस्तान ने मक्का समझौता कर लिया, दूसरे देशों के साथ अपने समीकरण बना लिए और क्षेत्रीय स्तर पर भारत के खिलाफ गतिविधियां बढ़ीं तो क्या भारत की विदेश नीति असफल हो गई? विदेश नीति को केवल पड़ोस की तत्काल घटनाओं से मापना वास्तविक तस्वीर को छोटा कर देना है। असली सवाल यह है कि दुनिया की बड़ी शक्तियां भारत को किस नजर से देख रही हैं और संकट के समय कितने देश भारत के साथ बातचीत के लिए तैयार हैं। दिल्ली की बैठक ने इस सवाल का जवाब काफी हद तक दे दिया है। यहां प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिगत कूटनीतिक छवि भी महत्वपूर्ण हो जाती है। नरेंद्र मोदी, व्लादिमीर पुतिन और शी चिनफिंग की तस्वीरें जिस तरह वैश्विक स्तर पर चर्चा में आई हैं, उनका राजनीतिक संदेश तस्वीर से कहीं बड़ा है। यह तस्वीर बताती है कि भारत का नेतृत्व एक साथ दुनिया की अलग-अलग शक्तियों के साथ संवाद करने की स्थिति में है। पश्चिमी देशों के लिए भी यह संदेश महत्वपूर्ण है कि भारत को नजरअंदाज करके वैश्विक राजनीति की कोई बड़ी रणनीति पूरी नहीं हो सकती। इसका घरेलू राजनीतिक असर भी कम नहीं होगा। भाजपा लंबे समय से प्रधानमंत्री मोदी की मजबूत वैश्विक छवि को अपनी राजनीतिक पूंजी के रूप में इस्तेमाल करती रही है। ब्रिक्स की दिल्ली बैठक उस पूंजी को और मजबूत करने का अवसर देती है। विपक्ष यदि यह कहता है कि सरकार की विदेश नीति कमजोर पड़ गई है, तो भाजपा के पास दिल्ली में जुटे वैश्विक नेताओं, भारत की मध्यस्थ भूमिका और अलग-अलग शक्ति केंद्रों के साथ संवाद को सामने रखने का मजबूत राजनीतिक आधार तैयार हो गया है। सबसे बड़ी बात यह है कि दिल्ली में मिली यह कूटनीतिक सफलता केवल एक शिखर सम्मेलन की सफलता बनकर नहीं रहने वाली। इसका सीधा और दीर्घकालिक लाभ भारत की सामरिक स्थिति को मिल सकता है। रूस, चीन, अमेरिका, यूरोप, ईरान और खाड़ी देशों जैसे अलग-अलग शक्ति केंद्रों के साथ एक साथ संवाद कायम रखने की मोदी की क्षमता ने यह संदेश दिया है कि भारत किसी दबाव या धड़े की राजनीति में बंधा हुआ नहीं है, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर दुनिया की बड़ी शक्तियों के साथ संबंध तय करने की स्थिति में है। इसका असर आने वाले समय में व्यापार, निवेश, ऊर्जा सुरक्षा, सामरिक सहयोग और भारत की वैश्विक हैसियत, हर मोर्चे पर दिखाई दे सकता है। साथ ही इस सफलता का एक घरेलू राजनीतिक पहलू भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आगामी पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा इस उपलब्धि को प्रधानमंत्री मोदी के मजबूत नेतृत्व और भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा के प्रमाण के रूप में जनता के सामने रख सकती है। विपक्ष यदि विदेश नीति को लेकर सरकार पर सवाल उठाता है, तो भाजपा के पास दिल्ली में एक साथ जुटे विश्व के बड़े नेताओं और मोदी की सक्रिय कूटनीतिक भूमिका को सामने रखने का अवसर होगा। यानी ब्रिक्स की सफलता सिर्फ दिल्ली की कूटनीतिक मेज पर मोदी की जीत नहीं है; यह आने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा के लिए एक बड़ा राजनीतिक हथियार और मोदी की नेतृत्व छवि को और मजबूत करने वाली उपलब्धि भी बन सकती है। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की सफलता ने घरेलू राजनीति में ब्रांड मोदी को और मजबूत कर दिया है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 14 Sep 2026 7:56 pm

Modi की Delhi में छक्के लगा गये Putin, Global South में Russia का नया Power Network देखकर Trump हैरान

नई दिल्ली में BRICS का मंच इस बार सिर्फ दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्थाओं की बैठक नहीं बल्कि तेजी से बदलती विश्व व्यवस्था का एक जीवंत कूटनीतिक नक्शा नजर आया। इसका सबसे स्पष्ट संकेत रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन की दिल्ली यात्रा में दिखाई देता है। 11 और 12 सितंबर के दौरान पुतिन ने भारत, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, मलेशिया, इथियोपिया और संयुक्त अरब अमीरात के शीर्ष नेतृत्व के साथ अलग-अलग बातचीत की। यानी एक ही मंच पर एशिया, अफ्रीका, अरब जगत और Global South की अलग-अलग रणनीतिक धुरियों को साधने की कोशिश दिखाई दी है। सबसे महत्वपूर्ण बैठक स्वाभाविक रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ रही। यह सिर्फ भारत-रूस संबंधों की समीक्षा नहीं थी, बल्कि ऐसे समय में हुई है जब रूस पश्चिमी प्रतिबंधों के दबाव में है, भारत अपनी strategic autonomy को बनाए रखते हुए अमेरिका, यूरोप और रूस, तीनों के साथ संबंधों को संतुलित कर रहा है और दुनिया ऊर्जा तथा व्यापार के नए संकटों से गुजर रही है। मोदी और पुतिन ने रक्षा, ऊर्जा, व्यापार, अंतरिक्ष, राजनीतिक सहयोग, critical minerals और औद्योगिक साझेदारी जैसे क्षेत्रों की समीक्षा की। दोनों देशों ने व्यापार और औद्योगिक सहयोग को आगे बढ़ाने पर भी जोर दिया। इसे भी पढ़ें: यही तो मोदी की खास बात है...अचानक किया हस्तक्षेप और BRICS को पश्चिम विरोधी मंच बनने से रोक दिया इसके बाद पुतिन की दक्षिण अफ्रीकी राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा के साथ बातचीत हुई। यहां रूस का लक्ष्य साफ दिखाई देता है। अफ्रीका में अपने राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव को लगातार मजबूत करना। रामाफोसा ने रूस-दक्षिण अफ्रीका व्यापार बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया, जबकि पुतिन ने अफ्रीकी देशों के साथ संबंधों को विशेष महत्व देने की बात कही। मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी के साथ बैठक और भी रणनीतिक है। रूस और मिस्र के रिश्तों में ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा और परमाणु सहयोग पहले से महत्वपूर्ण हैं। बातचीत में रूसी अनाज की आपूर्ति और मिस्र में एल-दबाआ परमाणु परियोजना का मुद्दा सामने आया। यानी रूस मध्य पूर्व में सिर्फ राजनीतिक खिलाड़ी नहीं, बल्कि ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा का भी महत्वपूर्ण साझेदार बनकर मौजूद है। मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम के साथ बातचीत रूस की दक्षिण-पूर्व एशिया नीति की ओर इशारा करती है। यह संबंध BRICS से आगे ASEAN और Indo-Pacific की आर्थिक तथा रणनीतिक संभावनाओं तक जाता है। वहीं इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबी अहमद के साथ बातचीत रूस की अफ्रीका नीति का दूसरा महत्वपूर्ण सिरा है। यह एक ऐसा अफ्रीकी देश है जिसके साथ मॉस्को के राजनयिक संबंध 120 वर्ष से भी अधिक पुराने हैं। फिर आता है संयुक्त अरब अमीरात। अबू धाबी के क्राउन प्रिंस खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के साथ पुतिन की बैठक विशेष महत्व रखती है, क्योंकि UAE अरब दुनिया में रूस का एक प्रमुख आर्थिक साझेदार है। साथ ही ईरान और खाड़ी के बीच चल रहे तनाव के दौर में मॉस्को का अबू धाबी से संवाद उसकी मध्यस्थ और संतुलनकारी भूमिका को भी मजबूत करता है। इस पूरी श्रृंखला को एक साथ देखें तो तस्वीर बेहद स्पष्ट है। पुतिन दिल्ली में सिर्फ BRICS Summit में हिस्सा लेने नहीं आए थे, वह BRICS के भीतर रूस की strategic connectivity को मजबूत करने भी आये थे। देखा जाये तो भारत से लेकर दक्षिण अफ्रीका, मिस्र से UAE और मलेशिया से इथियोपिया तक, रूस उन देशों से संवाद बढ़ा रहा है जो अमेरिकी नेतृत्व वाली पश्चिमी व्यवस्था के विकल्प के रूप में किसी न किसी रूप में अधिक बहुध्रुवीय विश्व की वकालत करते हैं। यही दिल्ली BRICS की असली कहानी है। रूस पश्चिम से टकराव के बीच अकेला नहीं दिखना चाहता; वह एशिया, अफ्रीका और मध्य पूर्व में अपने लिए वैकल्पिक आर्थिक, ऊर्जा, व्यापारिक और राजनीतिक नेटवर्क तैयार कर रहा है। दूसरी ओर भारत इस पूरे समीकरण में सबसे महत्वपूर्ण संतुलनकारी शक्ति है। इस तरह BRICS का मंच अब केवल रूस-चीन की धुरी नहीं रह गया है। यह कई शक्तियों के बीच बातचीत का ऐसा मंच बन रहा है जहां मॉस्को को नई साझेदारियां, नई दिल्ली को strategic autonomy और Global South को अपनी सामूहिक bargaining power दिखाई दे रही है। यही वजह है कि दिल्ली में पुतिन की ये छह मुलाकातें उस विश्व व्यवस्था की झलक हैं जिसमें शक्ति का केंद्र धीरे-धीरे एक ध्रुव से निकलकर कई दिशाओं में फैल रहा है। यहां एक बात और काबिलेगौर है कि अमेरिका ने पुतिन को विश्व राजनीति में अलग थलग करने के लिए पूरा जोर लगाया लेकिन पुतिन की शक्ति बढ़ती जा रही है और उन्हें अपनी स्थिति मजबूत बनाये रखने में भारत और चीन भरपूर मदद भी दे रहे हैं। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 14 Sep 2026 7:41 pm

यही तो मोदी की खास बात है...अचानक किया हस्तक्षेप और BRICS को पश्चिम विरोधी मंच बनने से रोक दिया

महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति को किसी देश के दबाव का हथियार नहीं बनने देने से लेकर समुद्र में काम करने वाले नाविकों की सुरक्षा तक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़े दो बेहद अहम मुद्दे उठाए। उन्होंने साफ कहा कि दुनिया की आधुनिक अर्थव्यवस्था जिन महत्वपूर्ण खनिजों पर तेजी से निर्भर हो रही है, उनकी आपूर्ति सुरक्षित और भरोसेमंद रहनी चाहिए। साथ ही, उन्होंने संकट के समय नाविकों को मदद पहुंचाने के लिए आपात सहायता तंत्र बनाने का प्रस्ताव रखा। यानी नई दिल्ली में मोदी ने एक तरफ संसाधनों की सुरक्षा का सवाल उठाया, तो दूसरी तरफ वैश्विक व्यापार की उस मानवीय कड़ी पर ध्यान खींचा, जिस पर समुद्र के रास्ते होने वाला पूरा कारोबार टिका है। मोदी ने इसी क्रम में समुद्री व्यापार और नाविकों की सुरक्षा को भी प्रमुखता दी। उन्होंने कहा कि वैश्विक व्यापार तभी सुचारु रूप से आगे बढ़ सकता है, जब समुद्री मार्ग सुरक्षित रहें, आपूर्ति मार्ग खुले रहें और नाविक सुरक्षित रहें। पश्चिम एशिया तथा काला सागर क्षेत्र के संघर्षों का असर समुद्री व्यापार और भारतीय नाविकों की सुरक्षा पर पड़ा है। इससे पहले ईरान और रूस के राष्ट्राध्यक्षों के साथ अपनी अलग-अलग बैठकों में भी मोदी ने समुद्री आवाजाही की स्वतंत्रता, व्यापार की निर्बाध आवाजाही और नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा उठाया था। इसे भी पढ़ें: BRICS Summit 2026 की सफलता पर बोले S Jaishankar, बंटी दुनिया में भारत ने बनाई सहमति शिखर सम्मेलन के दौरान उन्होंने नाविकों के लिए आपात सहायता तंत्र बनाने का प्रस्ताव भी रखा। इसका उद्देश्य संकट के समय समुद्री अधिकारियों और संबंधित देशों के तंत्र को जोड़कर संकट संबंधी सूचनाएं पहुंचाना, चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराना, परिवारों तक सूचना पहुंचाना और जरूरत पड़ने पर बचाव तथा निकासी अभियान में मदद करना है। समुद्री व्यापार पर बढ़ते संघर्षों के असर के बीच यह प्रस्ताव सीधे तौर पर वैश्विक व्यापार की उस कमजोर कड़ी को सामने लाता है, जिस पर करोड़ों टन माल की आवाजाही टिकी हुई है। लेकिन नई दिल्ली शिखर सम्मेलन में मोदी की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक रेखा ब्रिक्स के स्वरूप को लेकर रही। उन्होंने इस धारणा को स्वीकार नहीं किया कि ब्रिक्स पश्चिम के खिलाफ खड़ा कोई राजनीतिक गठबंधन है। मोदी ने कहा कि ब्रिक्स किसी के विरुद्ध नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलने वाला समावेशी मंच है। पिछले दो दशकों में ब्रिक्स ने अपनी अलग पहचान बनाई है और अब उसके सामने चुनौती अपनी एकता तथा सहमति को ठोस परिणामों में बदलने की है। यही वजह रही कि मोदी ने ग्लोबल साउथ को केवल निर्णयों का पालन करने वाला पक्ष बनाए रखने की बजाय नियम बनाने में प्रभावी भूमिका देने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि दुनिया के अनेक देश वैश्विक संकटों की पहली कतार में खड़े हैं, लेकिन निर्णय लेने की व्यवस्था में पीछे हैं। इस असंतुलन को बदलने के लिए वैश्विक शासन व्यवस्था को आज की आर्थिक और राजनीतिक वास्तविकताओं के अनुरूप बनाना होगा। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अधिक प्रतिनिधित्व की मांग भी इसी संदर्भ में सामने आई। मोदी ने ब्रिक्स के भीतर युवाओं, राजनयिकों और नीति-निर्माताओं को बातचीत की कला, व्यावहारिक प्रशिक्षण और कानूनी विशेषज्ञता उपलब्ध कराने की बात भी रखी, ताकि ग्लोबल साउथ केवल बनाए गए नियमों का पालन करने वाला नहीं, बल्कि नियमों को आकार देने वाला समूह बने। उन्होंने ब्रिक्स के भीतर व्यापारिक अड़चनों को घटाने, निवेश बढ़ाने और कारोबारी संबंधों को मजबूत करने पर भी जोर दिया। भारत की अध्यक्षता में कृषि, स्वास्थ्य, कौशल और स्मार्ट बिजली तंत्र जैसे क्षेत्रों में सहयोग के नए ढांचे बनाए गए हैं। ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार बढ़ाने के लिए दस प्रमुख व्यापारिक बाधाओं को हटाने, हर वर्ष सौ नए उद्यमों को सदस्य देशों के बाजारों तक पहुंचाने और एक हजार नई कारोबारी साझेदारियां विकसित करने का लक्ष्य भी सामने रखा गया है। इस पूरे घटनाक्रम में मोदी की रणनीति साफ दिखाई दी। महत्वपूर्ण खनिजों से लेकर समुद्री सुरक्षा, व्यापार से लेकर वैश्विक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व तक, उन्होंने ब्रिक्स को किसी ध्रुव के खिलाफ खड़ा करने के बजाय वैश्विक व्यवस्था में अधिक हिस्सेदारी मांगने वाले मंच के रूप में पेश किया। संदेश यही रहा कि भविष्य साझा है तो उसे आकार देने का अधिकार भी साझा होना चाहिए। नई दिल्ली घोषणा के साथ ब्रिक्स ने इसी दिशा में आगे बढ़ने की साझा प्राथमिकताएं तय कीं। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 14 Sep 2026 7:38 pm

असंभव को संभव कर दिखाना सबके बस की बात नहीं, Delhi में सुबह 4 बजे तक चली थी Modi की खास Diplomacy, तब जाकर माने थे Iran-UAE

नई दिल्ली में संपन्न BRICS शिखर सम्मेलन के बीच भारत ने उस वक्त बड़ी कूटनीतिक कामयाबी हासिल की, जब पश्चिम एशिया के युद्ध को लेकर आमने-सामने खड़े ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) एक साझा BRICS घोषणा पर सहमत हो गए। करीब छह महीने से जारी युद्ध और लगातार बढ़ते क्षेत्रीय तनाव के बीच दोनों देशों के बीच सहमति बनना सिर्फ BRICS के लिए नहीं, बल्कि भारत की कूटनीतिक भूमिका के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है। दरअसल, BRICS के विदेश मंत्रियों की मई में हुई बैठक के दौरान ईरान और UAE के बीच मतभेद इतने गहरे थे कि संयुक्त बयान तक जारी नहीं हो पाया था। पश्चिम एशिया में युद्ध को लेकर दोनों देशों की प्राथमिकताएं और संघर्ष की व्याख्या अलग-अलग थी। ऐसे में दिल्ली शिखर सम्मेलन से पहले सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि ऐसी भाषा तैयार की जाए, जिस पर ईरान और UAE समेत BRICS के सभी सदस्य देश एक साथ खड़े हो सकें। इसे भी पढ़ें: UNSC में India की स्थायी सदस्यता का रास्ता साफ ! US, UK, France, Russia के बाद China भी आ गया साथ भारत की अध्यक्षता में हुई लंबी और बेहद कठिन बातचीत के बाद आखिरकार वह रास्ता निकाला गया। बातचीत आधी रात के बाद तक चलती रही और करीब चार बजे तक सहमति बनाने की कोशिशें जारी रहीं। अंतिम घोषणा में किसी एक देश को सीधे तौर पर युद्ध के लिए जिम्मेदार ठहराने के बजाय पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव पर सामूहिक चिंता जताई गई। सभी पक्षों से अधिकतम संयम बरतने और ऐसे कदमों से बचने की अपील की गई, जो स्थिति को और बिगाड़ सकते हैं। इस पूरी कवायद का सबसे बड़ा राजनीतिक संकेत उस समय सामने आया, जब ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और UAE के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के बीच BRICS सम्मेलन के इतर मुलाकात हुई। युद्ध शुरू होने के बाद दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच यह सबसे महत्वपूर्ण संपर्कों में से एक माना जा रहा है। खास बात यह है कि यह बैठक ऐसे समय हुई, जब क्षेत्रीय संघर्ष ने ईरान और खाड़ी देशों के रिश्तों को बेहद संवेदनशील बना दिया है। हम आपको बता दें कि BRICS की नई दिल्ली घोषणा में पश्चिम एशिया की स्थिति पर चिंता जताते हुए नागरिकों की सुरक्षा, संप्रभुता और क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर दिया गया है। इसके साथ ही वैश्विक व्यापार और समुद्री आवाजाही को सुरक्षित रखने की जरूरत भी रेखांकित की गई। घोषणा का मकसद किसी पक्ष की जीत या हार तय करना नहीं, बल्कि ऐसी न्यूनतम साझा जमीन तैयार करना था, जिस पर अलग-अलग रणनीतिक हित रखने वाले देश भी एक साथ खड़े हो सकें। यहीं भारत की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। BRICS के विस्तार के बाद संगठन के भीतर अब सिर्फ आर्थिक हितों का मेल नहीं है, बल्कि ईरान, UAE और अन्य देशों के बीच गंभीर भू-राजनीतिक मतभेद भी मौजूद हैं। ऐसे माहौल में सर्वसम्मति से घोषणा पारित कराना अपने आप में एक राजनीतिक उपलब्धि है। भारतीय कूटनीति ने पक्ष के साथ खड़े होने की बजाय ऐसी भाषा पर जोर दिया, जिसे विरोधी धड़े भी स्वीकार कर सकें। देखा जाये तो इसका असर BRICS की विश्वसनीयता पर भी पड़ेगा। अगर युद्ध जैसे बेहद संवेदनशील मुद्दे पर ईरान और UAE जैसे विरोधी हितों वाले देश एक ही घोषणा पर हस्ताक्षर कर सकते हैं, तो दिल्ली शिखर सम्मेलन ने यह संदेश जरूर दिया है कि BRICS सिर्फ आर्थिक सहयोग का मंच नहीं रह गया है। अब वह ऐसे भू-राजनीतिक संकटों में भी साझा रुख बनाने की कोशिश कर रहा है, जहां वैश्विक शक्तियों के बीच सीधा टकराव मौजूद है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 14 Sep 2026 4:36 pm

बंगाल में बड़ा सियासी उलटफेर: TMC के 20 बागी सांसदों में से 17 BJP में, 3 का बाहर से समर्थन

बंगाल में बड़ा सियासी उलटफेर: TMC के 20 बागी सांसदों में से 17 BJP में, 3 का बाहर से समर्थन

समाचार नामा 14 Sep 2026 4:32 pm

पंजाब में राष्ट्रवाद, राज्य की एकता और सीमाओं की सुरक्षा के मुद्दे पर चुनाव लड़ेगी भाजपा: राजीव बब्बर

पंजाब में राष्ट्रवाद, राज्य की एकता और सीमाओं की सुरक्षा के मुद्दे पर चुनाव लड़ेगी भाजपा: राजीव बब्बर

समाचार नामा 14 Sep 2026 4:24 pm

नौगांव लोकसभा उपचुनाव को लेकर गौरव गोगोई बोले- 'डर की राजनीति बनाम जनता के साहस की परीक्षा'

नौगांव लोकसभा उपचुनाव को लेकर गौरव गोगोई बोले- 'डर की राजनीति बनाम जनता के साहस की परीक्षा'

समाचार नामा 14 Sep 2026 4:15 pm

UNSC में India की स्थायी सदस्यता का रास्ता साफ ! US, UK, France, Russia के बाद China भी आ गया साथ

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी को अब वह बड़ा रणनीतिक समर्थन मिलता दिखाई दे रहा है, जिस पर लंबे समय से पूरी दुनिया की नजर थी। नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान, संयुक्त राष्ट्र महासचिव अंतोनियो गुतारेस की मौजूदगी में चीन और रूस ने भारत को संयुक्त राष्ट्र, विशेषकर सुरक्षा परिषद में बड़ी भूमिका देने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराकर भारत के दावे को नई ताकत दे दी है। इससे पहले ब्रिटेन, फ्रांस और अमेरिका भी सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन कर चुके हैं, लेकिन हर बार यह मामला चीन की असहमति पर आकर अटक जाता था। अब पहली बार ऐसा संकेत मिल रहा है कि चीन का रुख भी बदल रहा है। रूस के साथ चीन का समर्थन मिलना केवल भारत की कूटनीतिक जीत नहीं, बल्कि सुरक्षा परिषद की दशकों पुरानी शक्ति-संरचना के सामने एक बेहद महत्वपूर्ण रणनीतिक संदेश भी है। इस घटनाक्रम को तमाम अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक भारत के लिए बड़ी जीत बता रहे हैं। अमेरिकी अर्थशास्त्री और कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जेफ्री सैक्स ने तो यहां तक कहा है कि भारत के अलावा कोई दूसरा देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के छठे स्थायी सदस्य बनने का इतना मजबूत दावा नहीं रखता। सैक्स ने भारत की करीब डेढ़ अरब की आबादी, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, वैश्विक प्रभाव और कूटनीतिक क्षमता को इसकी सबसे बड़ी ताकत बताया। उनका कहना है कि भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है, क्रय शक्ति के आधार पर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में लगातार अपनी प्रभावशाली भूमिका साबित कर रहा है। इसे भी पढ़ें: PM Modi और UAE क्राउन प्रिंस की मुलाकात, रणनीतिक और निवेश साझेदारी पर बनी सहमति हम आपको यह भी बता दें कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की नई दिल्ली घोषणा में चीन और रूस ने स्पष्ट रूप से भारत और ब्राजील की संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद में बड़ी भूमिका निभाने की आकांक्षा के प्रति अपना समर्थन दोहराया है। चीन का यह रुख खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह लंबे समय से भारत की स्थायी सदस्यता की मांग का खुलकर समर्थन करने से बचता रहा है। सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता रखने वाला चीन यदि भारत के दावे के समर्थन में खड़ा होता है, तो यह भारत के लिए बड़ी राहत की बात है। उल्लेखनीय है कि सुरक्षा परिषद में फिलहाल पांच स्थायी सदस्य हैं। चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका। इनके पास वीटो पावर है, जिसके जरिये इनमें से कोई भी देश किसी महत्वपूर्ण प्रस्ताव को रोक सकता है। इसके अलावा दस अस्थायी सदस्य होते हैं, जिनका कार्यकाल दो वर्ष का होता है। इसके अलावा, विडंबना देखिए कि 1945 में जिस वैश्विक शक्ति-संतुलन को ध्यान में रखकर यह व्यवस्था बनाई गई थी, वही ढांचा आज भी लगभग उसी रूप में कायम है। जबकि दुनिया की आबादी, अर्थव्यवस्था, शक्ति-संतुलन और राजनीतिक वास्तविकताएं बदल गईं, लेकिन सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का ढांचा नहीं बदला। यही वह बिंदु है जहां संयुक्त राष्ट्र सुधार की जरूरत सबसे ज्यादा दिखाई देती है। जिस संस्था का मूल उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा कायम करना है, वही संस्था जब दुनिया के बड़े हिस्से को निर्णय प्रक्रिया से पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दे पाती, तो उसकी वैधता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की विशाल आबादी और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का ढांचा बेहद असंतुलित है। देखा जाये तो दुनिया के संकटों का असर जिन देशों और समाजों पर सबसे ज्यादा पड़ता है, निर्णय लेने की मेज पर उनकी आवाज उतनी ही कमजोर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसी असमानता को रेखांकित करते हुए वैश्विक निर्णय व्यवस्था को विशेषाधिकारों की पिरामिड जैसी संरचना बताया है। उन्होंने कहा कि ऊपर बैठे शक्तिशाली देश निर्णय लेते हैं और नीचे मौजूद देशों को उन निर्णयों के परिणाम भुगतने पड़ते हैं। उन्होंने इस विशेषाधिकार की पिरामिड को साझेदारी के मंच में बदलने का आह्वान किया है। उनका यह संदेश केवल ब्रिक्स तक सीमित नहीं है, बल्कि मौजूदा वैश्विक व्यवस्था के सामने एक सीधी चुनौती है। प्रधानमंत्री मोदी और संयुक्त राष्ट्र महासचिव अंतोनियो गुतारेस की मुलाकात में भी बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और बहुपक्षीय संस्थाओं, विशेषकर सुरक्षा परिषद में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया गया। दोनों नेताओं ने संघर्षों, समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता, सतत विकास, मानव-केंद्रित कृत्रिम बुद्धिमत्ता, नवीकरणीय ऊर्जा और वैश्विक खाद्य सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा की। यह अपने आप में संकेत है कि आज की वैश्विक समस्याएं इतनी व्यापक हो चुकी हैं कि उन्हें पुराने शक्ति-संतुलन और सीमित प्रतिनिधित्व वाली संस्थाओं के सहारे नहीं संभाला जा सकता। देखा जाये तो भारत की स्थायी सदस्यता का सामरिक महत्व यहीं से सामने आता है। भारत केवल दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश नहीं है; वह एशिया की एक निर्णायक शक्ति, परमाणु शक्ति, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और ग्लोबल साउथ की प्रमुख आवाज है। भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी स्थान मिलने का अर्थ होगा एशिया और विकासशील दुनिया की निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक हिस्सेदारी बढ़ना। रणनीतिक स्तर पर चीन और रूस का समर्थन भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक पूंजी है। इससे यह धारणा कमजोर होती है कि भारत की स्थायी सदस्यता केवल पश्चिमी देशों की इच्छा पर निर्भर है। अब रूस और चीन जैसे स्थायी सदस्य भी इसके समर्थन में खुलकर खड़े दिखाई दे रहे हैं। यह भारत की उस कूटनीति की सफलता है जो एक साथ पश्चिम, रूस, चीन और ग्लोबल साउथ के साथ संवाद बनाए रखते हुए अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ा रही है। बहरहाल, मुद्दा सिर्फ भारत को स्थायी सदस्य बनाने का नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र को 21वीं सदी की वास्तविकताओं के अनुरूप बदलने का है। अगर दुनिया की सबसे बड़ी आबादी और प्रमुख उभरती शक्तियों को निर्णय की मेज पर पर्याप्त जगह नहीं मिलती, तो संयुक्त राष्ट्र वैश्विक समस्याओं का समाधान करने वाली संस्था कम और पुराने शक्ति-संतुलन की संरचना ज्यादा दिखाई देगा। दुनिया बदल चुकी है; अब संयुक्त राष्ट्र को भी बदलना ही होगा। और इस बदलाव की सबसे मजबूत दावेदारी आज भारत के पास है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 14 Sep 2026 3:13 pm

भारत की सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग में बढ़ोतरी

जापान क्रेडिट रेटिंग एजेन्सी (जेसीआरए) ने भारत की सार्वभौम (सावरेन) क्रेडिट रेटिंग में सुधार करते हुए इसे BBB+ से बढ़ाकर A- कर दिया है। भारत की सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग में बढ़ोतरी कई कारणों के चलते की गई है। भारतीय अर्थव्यवस्था लगातार विकास के पथ पर तेजी से दौड़ रही है और भारत के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 8 प्रतिशत की वृद्धि दर बनी हुई है। भारत आज पूरे विश्व में समस्त बड़े देशों के बीच सबसे तेज गति से आगे बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बन गई है एवं भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में अपनी भूमिका का निर्वहन करता हुआ दिखाई दे रहा है। दूसरा, भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, इस देश में नागरिकों को अपने विचार रखने की आजादी है अतः विश्व के अन्य देश भारत की ओर आकर्षित हो रहे हैं और भारत में विदेशी निवेश लगातार बढ़ रहा है। अभी हाल ही में अन्य देशों में निवासरत भारत के मूल नागरिकों ने भारत में 13,600 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि भारतीय बैंकों में जमा की है। यह भारत की शक्ति एवं मजबूती को दर्शाता है। तीसरा, भारत में आर्थिक सुधार कार्यक्रम लगातार चल रहे है। हाल ही में, वस्तु एवं सेवा कर की दरों में कमी की गई थी जिसके चलते भारतीय नागरिकों की जेब में एक लाख करोड़ रुपए से अधिक की राशि पहुंची है, इससे भारतीय नागरिकों की खर्च करने की क्षमता में वृद्धि हुई है। चौथा, भारत में डिजिटल आधारभूत संरचना को मजबूती प्रदान की गई है। भारतीय यूपीआई की मांग अब विश्व के अन्य देशों द्वारा भी की जा रही है। जनधन योजना के अंतर्गत देश के करोड़ों नागरिकों के बैंक खाते खोले गए हैं, जिन्हें आधार से जोड़ दिया गया है और स्मार्ट मोबाइल आज जैसे जेब में बैंक का कार्य करता हुआ दिखाई दे रहा है। डिरेक्ट बेनिफिट ट्रान्स्फर योजना को भी बहुत सरल बना दिया गया है। इससे देश में भ्रष्टाचार में कमी आई है। पांचवां, भारत में हाल ही के समय में वित्तीय क्षेत्र में मजबूती आई है। मार्च 2026 को समाप्त हुए वित्तीय वर्ष में भारतीय बैंकों में सकल गैर निष्पादनकारी आस्तियां 1.8 प्रतिशत से भी नीचे आ गई हैं। यह अपने आप में एक रिकार्ड है। छठा, सरकारी खर्चों के उपयोग में अब सुधार दृष्टिगोचर है और इसकी गुणवत्ता भी सुधरी है। केंद्र सरकार के पूंजीगत खर्च पिछले 5 वर्षों में तीन गुना हो गए हैं। इससे भारत में रेल, रोड एवं पोर्ट की आधारभूत संरचना विकसित हुई है, जो विदेशी निवेशकों को भी भारत में अपना निवेश बढ़ाने के लिए आकर्षित कर रही है। सांतवा, भारत के विदेशी मुद्रा भंडार 68,400 करोड़ अमेरिकी डॉलर के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गए हैं, जो कि भारत के लिए बहुत अच्छा सुरक्षा कवच बन गया है। आंठवां, भारत का वित्तीय घाटा वित्तीय वर्ष 2020-21 में 9.2 प्रतिशत था, जो वित्तीय वर्ष 2025-26 में घटकर 4.4 प्रतिशत के स्तर पर नीचे आ गया है। भारतीय अर्थव्यवस्था में उक्त 8 मानकों पर हुए सुधार के चलते जापान क्रेडिट रेटिंग एजेन्सी ने भारत के सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग में बढ़ौतरी की है। विश्व की क्रेडिट रेटिंग एजेन्सीयों द्वारा विभिन्न देशों की आर्थिक एवं वित्तीय स्थिति के आधार पर इन देशों की क्रेडिट रेटिंग निर्धारित की जाती है। इन देशों द्वारा अथवा इन देशों के बैकों द्वारा एवं इन देशों की कम्पनियों द्वारा वैश्विक बाजार से उधार ली जाने वाली राशि पर ब्याज की दर इस क्रेडिट रेटिंग के आधार पर निर्धारित होती है। यदि क्रेडिट रेटिंग उच्च स्तर की रहती है तो उस देश द्वारा अंतरराष्ट्रीय बाजार में ली जाने वाली ऋणराशि पर ब्याज की दर कम निर्धारित होती है। दूसरे, इससे उस देश में विदेशी निवेश आकर्षित होता है, क्योंकि इन देशों में किया गया विदेशी निवेश सुरक्षित माना जाता है। विभिन्न क्रेडिट रेटिंग एजेन्सी द्वारा निम्न प्रकार की क्रेडिट रेटिंग प्रदान की जाती है। AAA - यह प्राइम क्रेडिट रेटिंग मानी जाती है एवं यह देश निवेश की दृष्टि से इन्वेस्टमेंट ग्रेड का है। AA - क्रेडिट रेटिंग भी हाई ग्रेड की मानी जाती है। A - क्रेडिट रेटिंग अपर मीडीयम ग्रेड की मानी जाती है। BBB - क्रेडिट रेटिंग लोअर मीडीयम ग्रेड को दर्शाती है। BB - क्रेडिट रेटिंग नोन-इन्वेस्टमेंट ग्रेड एवं स्पेक्युलेटिव की श्रेणी में गिनी जाती है। B - क्रेडिट रेटिंग हाइली स्पेक्युलटिव श्रेणी में आती है एवं C - क्रेडिट रेटिंग अधिकतम रिस्क की श्रेणी में गिनी जाती है। भारत की क्रेडिट रेटिंग BBB+ ग्रेड में मानी जा रही थी जो अब सुधरकर A- कर दिया गया है। इसे भी पढ़ें: Western Dedicated Freight Corridor क्या है? Modi के Infra Model की बड़ी तस्वीर हर कोई हैरान है पश्चिमी देशों की क्रेडिट रेटिंग एजेन्सीयों ने भारत की सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग में पिछले कई वर्षों से बदलाव ही नहीं किया है जबकि भारत ने इस दौरान विशेष रूप से आर्थिक एवं वित्तीय क्षेत्र में अतुलनीय सुधार करते हुए विकास दर को बढ़ाने में सफलता प्राप्त की है। फिच नामक क्रेडिट रेटिंग एजेन्सी ने भारत की सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग को अगस्त 2006 के बाद से परिवर्तित ही नहीं किया है, जो BBB- के स्तर पर लगातार बनी हुई है। इसी प्रकार, स्टैंडर्ड एंड पूअर नामक क्रेडिट रेटिंग एजेन्सी द्वारा 18 वर्ष पश्चात भारत की सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग को 27 अगस्त 2026 को अपग्रेड करते हुए इसे BBB के स्तर पर ले आया गया है। एक अन्य क्रेडिट रेटिंग एजेन्सी मूडी ने जून 2020 के पश्चात भारत की सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग में कोई परिवर्तन नहीं किया है और भारत को Baa3 की सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग दी हुई है। उक्त एजेन्सीयां भारत की सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग को उचित तरीके से नहीं दर्शाती हैं। जबकि, भारत के आर्थिक संकेतक बहुत मजबूत बने हुए हैं। हाल ही में, विश्व के चार प्रमुख वित्तीय संस्थानों ने भारत के आर्थिक विकास के संदर्भ में विशेष रिपोर्ट जारी की है। जिसमें भारत की आर्थिक प्रगति की सराहना की गई है। जेफ्रीज नामक वित्तीय संस्थान की रिपोर्ट कहती है कि मोबाइल फोन, स्टील, सीमेंट, सोलर पैनल एवं ट्रक के निर्माण के क्षेत्र में भारत आज दुनिया में दूसरे स्थान पर आ गया है। वर्ष 2014 में स्पेस के क्षेत्र में भारत में केवल एक स्टार्टअप था आज भारत में इस क्षेत्र में 400 से अधिक स्टार्टअप कार्य कर रहे हैं। चिप निर्माण में 12 प्रोजेक्ट पर भारत में काम हो रहा है एवं 2,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निवेश इस क्षेत्र में हो रहा है। साथ ही, 3 विनिर्माण इकाईयों में उत्पादन भी प्रारम्भ हो गया है। जेफ्रीज ने इस रिपोर्ट को नाम दिया है “इंडिया न्यू इंडस्ट्रीयल रेवोल्यूशन”। दूसरी रिपोर्ट आई है बैंक ओफ अमेरिका से, जो कहती है कि भारत में बहुत कुछ बदल रहा है। पिछले 24 माह में भारत में 18 सुधार कार्यक्रम लागू हुए हैं। वस्तु एवं सेवा कर के ढांचे में 5 के स्थान पर मुख्यतः अब 2 दरें लागू कर दी गई हैं एवं इसे बहुत सरल बना दिया गया है। 12 लाख रुपए की कमाई तक, आय कर शून्य कर दिया गया है। नए लेबर कोड्ज भी लागू कर दिए गए हैं एवं सोशल सिक्यरिटी का दायरा भी बढ़ा दिया गया है। तीसरी रिपोर्ट आई है (BERNSTEIN) बॉर्नस्टीन नामक संस्थान से, जो कहती है कि भारत के विकास में कुछ हिस्सा सरकारी सहयोग से आ रहा है। केंद्र सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में अपने पूंजीगत खर्चों में भारी वृद्धि की है। जून 2026 तिमाही में भारत की 200 सबसे बड़ी कम्पनियों की आय 12 प्रतिशत बढ़ी है। वस्तु एवं सेवा कर की दरों में कमी करने से नागरिकों की जेब में करीब 20,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि पहुंची है। भारत के गांवों में कमजोर मानसून के बावजूद उत्पादों की मांग मजबूत बनी हुई है। चौथी रिपोर्ट आई है मोर्गन सटेनली नामक संस्थान से, इसके अनुसार, पिछले वर्ष विश्व के 24 स्टॉक मार्केट में से भारत का मार्केट, रिटर्न देने के मामले में 23वें स्थान पर रहा है। यह कड़वा सच है। परंतु, ऊपर जाने के रास्ता लम्बा है पर यहीं से निकलता है। अभी भारत का सेन्सेक्स 76000 के आसपास हैं, जो जून 27 तक बढ़कर परिस्थिति अनुसार, 89000 अथवा 100000 के स्तर तक पहुंच सकता है। भारतीय कम्पनियों के शेयर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कुछ सस्ते हो गए है। चूंकि भारतीय स्टॉक मार्केट ने पिछले वर्ष अच्छे रिटर्न नहीं दिए हैं अतः मार्केट इस वर्ष इस गलती को सुधारने को तैयार हो रहा है। भारत में निवेश, नागरिकों की बचत से आ रहा है, प्रति माह करोड़ों नागरिक SIP के माध्यम से हजारों करोड़ रुपए का निवेश देश के पूंजी बाजार में कर रहे हैं। भारतीय शेयर बाजार में आज देशी निवेशकों का निवेश विदेशी निवेशकों के निवेश की तुलना में अधिक हो गया है। जब विदेशी निवेशक वापिस भारतीय शेयर बाजार में लौटेंगे तो उन्हें आज की तुलना में महंगे शेयर खरीदने होंगे। अर्थात, भारतीय शेयर बाजार गिरा जरूर है, परंतु इसीलिए आगे का रास्ता लम्बा हो सकता है लेकिन जाना उसे ऊपर की ओर ही है। वैश्विक स्तर की उक्त चार बैंकिंग संस्थानों की रिपोर्ट स्पष्ट कहती हैं कि भारत विकास के राह पर बहुत तेज गति से आगे बढ़ रहा है एवं भारत के आर्थिक एवं वित्तीय क्षेत्र में लगातार सुधार कार्यक्रम लागू किए जा रहे हैं। अब पश्चिमी देशों की क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों द्वारा भी भारत की सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग में सुधार किया जाएगा, ऐसी आशा की जानी चाहिए। - प्रहलाद सबनानी सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक, भारतीय स्टेट बैंक के-8, चेतकपुरी कालोनी, झांसी रोड, लश्कर, ग्वालियर - 474 009

प्रभासाक्षी 14 Sep 2026 2:12 pm

2029 से पहले 21 राज्यों में लागू होगा Uniform Civil Code, मुस्लिमों को फायदा होगा या नुकसान?

समान नागरिक संहिता पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बयान के बाद देश की राजनीति में जैसे भूचाल-सा आ गया है लेकिन हंगामा कर रहे लोगों को समझना चाहिए कि Uniform Civil Code का विचार आज की राजनीतिक बहस की उपज नहीं है। संविधान निर्माताओं ने ही इसकी कल्पना की थी और संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य को पूरे देश में समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करने का निर्देश दिया गया। संविधान सभा में डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने भी स्पष्ट किया था कि विवाह और उत्तराधिकार जैसे क्षेत्रों को समान नागरिक कानून के दायरे में लाने की संवैधानिक मंशा है। यानी UCC संविधान की मूल बहस का हिस्सा था, कोई अचानक सामने आया राजनीतिक एजेंडा नहीं। इसके बावजूद आजादी के बाद लंबे समय तक वोट बैंक की राजनीति और तुष्टिकरण की नीति के चलते कांग्रेस तथा उसके समर्थन वाली सरकारें विभिन्न समुदायों के निजी कानूनों को छूने से बचती रहीं। मगर नरेंद्र मोदी सरकार इस मुद्दे पर चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ रही है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का ताजा बयान इस संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। मुंबई में अमित शाह ने कहा कि 2029 से पहले भाजपा-एनडीए शासित सभी 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू कर दी जाएगी। उन्होंने कहा कि तीन तलाक खत्म कर मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार देने की दिशा में कदम उठाया गया है और कई राज्यों में UCC की प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी है। शाह का संदेश साफ है कि मोदी सरकार UCC को केवल चुनावी घोषणा बनाकर छोड़ने के मूड में नहीं है, बल्कि राज्य सरकारों के जरिए इसे विस्तार देने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। इसे भी पढ़ें: Maharashtra News: गरबा पंडालों में आधार कार्ड और तिलक जरूरी, Nitesh Rane ने Muslim एंट्री पर रोक का किया समर्थन उधर, अमित शाह के इस ऐलान के साथ ही विपक्ष ने इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने में देर नहीं की। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद ने कहा है कि किसी भी विचारधारा को संविधान से ऊपर नहीं रखा जा सकता। उन्होंने उत्तराखंड और दूसरे राज्यों में लागू या प्रस्तावित UCC को उच्च न्यायपालिका की कसौटी पर परखे जाने की बात कही और कहा कि मौलिक अधिकार तथा धार्मिक स्वतंत्रता जैसे सवालों पर अंतिम निर्णय अदालतों को करना होगा। कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने इससे भी आगे बढ़कर सवाल किया कि UCC से बेरोजगारी, महंगाई या पेट्रोल-डीजल की कीमतों जैसी आर्थिक समस्याएं कैसे दूर होंगी। उनका आरोप है कि सरकार इस मुद्दे के जरिए मुसलमानों को निशाना बनाने की राजनीति कर रही है। देखा जाये तो यहीं से UCC की असली राजनीतिक लड़ाई सामने आती है। एक पक्ष इसे समानता, लैंगिक न्याय और एक समान नागरिक अधिकारों की दिशा में संवैधानिक कदम बता रहा है, तो दूसरा पक्ष इसे धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों से जोड़कर देख रहा है। लेकिन राजनीतिक आरोपों से अलग इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि UCC का संवैधानिक आधार मौजूद है और व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े विषयों पर कानून बनाने का अधिकार राज्यों और केंद्र दोनों के पास है। विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और दत्तक ग्रहण जैसे विषय संविधान की सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची में आते हैं। इसलिए केवल संसद से केंद्रीय कानून की प्रतीक्षा करने की बजाय राज्य भी अपने-अपने स्तर पर कानून बना सकते हैं। सबसे अहम बात यह है कि अब UCC को लेकर बहस केवल राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं है। मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 के उन प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा था कि UCC का समय आ गया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने यह भी संकेत दिया था कि अगर मुस्लिम उत्तराधिकार कानून के किसी प्रावधान को रद्द कर दिया गया तो वैधानिक व्यवस्था में खालीपन पैदा हो सकता है। अदालत ने यह सवाल भी उठाया था कि ऐसे व्यापक बदलाव का रास्ता न्यायपालिका की बजाय विधायिका के माध्यम से क्यों न निकले। यानी सुप्रीम कोर्ट ने UCC की संवैधानिक बहस को नकारा नहीं, बल्कि व्यापक कानून बनाने की जिम्मेदारी विधायिका की ओर इंगित की। यही नहीं, विधि आयोग का रिकॉर्ड भी इस बहस को एकतरफा नहीं रहने देता। 21वें विधि आयोग ने 2018 में ‘Reforms of Family Law’ परामर्श पत्र जारी किया था। बाद में 22वें विधि आयोग ने जून 2023 में UCC पर नए सिरे से जनता, धार्मिक संगठनों और दूसरे हितधारकों से सुझाव मांगे। सरकार के अनुसार 21वें आयोग ने अंतिम रिपोर्ट नहीं दी और 22वां आयोग भी UCC पर अपनी रिपोर्ट पूरी नहीं कर सका। इस तरह यह मामला व्यापक परामर्श और विधायी विकल्पों की पड़ताल की प्रक्रिया में रहा है। अब सवाल यह है कि UCC वास्तव में जमीन पर कैसा दिखता है? उत्तराखंड इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। 27 जनवरी 2025 से वहां UCC लागू है और विवाह, तलाक, भरण-पोषण तथा उत्तराधिकार जैसे मामलों के लिए धर्म के आधार पर अलग-अलग व्यवस्था के स्थान पर एक समान ढांचा लागू किया गया है। राज्य का आधिकारिक UCC पोर्टल लगातार विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और अन्य सेवाओं के पंजीकरण के आंकड़े उपलब्ध करा रहा है। यानी यह केवल कागज पर बना कानून नहीं है, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था के स्तर पर काम कर रहा है। इसके बाद गुजरात ने मार्च 2026 में UCC विधेयक पारित किया। करीब आठ घंटे की बहस और विपक्ष के विरोध के बीच पारित इस कानून का उद्देश्य विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और live-in relationships से जुड़े मामलों के लिए समान कानूनी ढांचा तैयार करना है। इसके बाद मई 2026 में असम विधानसभा ने भी UCC विधेयक पारित कर दिया। असम का कानून बहुविवाह पर रोक, विवाह और लिव-इन-रिलेशनशिप के पंजीकरण तथा उत्तराधिकार में समानता जैसे प्रावधानों पर केंद्रित है। अनुसूचित जनजातियों को उनकी संवैधानिक और प्रथागत व्यवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए इसके दायरे से बाहर रखा गया है। गोवा का उदाहरण भी इस बहस में अक्सर निर्णायक रूप से सामने आता है। वहां ऐतिहासिक रूप से पुर्तगाली सिविल कोड से विकसित एक साझा नागरिक कानून व्यवस्था लंबे समय से मौजूद है। इसलिए भारत में यह दावा भी टिकता नहीं कि अलग-अलग समुदायों के लिए समान नागरिक कानून लागू करना अपने आप में असंभव या प्रशासनिक रूप से अव्यावहारिक है। या फिर यह किसी तरह का भेदभाव करता है। इसलिए अमित शाह के 2029 वाले ऐलान को सिर्फ एक चुनावी नारे के रूप में देखना ठीक नहीं होगा। उत्तराखंड में कानून लागू हो चुका है, गुजरात और असम विधायी रास्ते पर आगे बढ़ चुके हैं और गोवा का अपना ऐतिहासिक अनुभव मौजूद है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने UCC की आवश्यकता पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है और विधि आयोग ने भी इस विषय पर व्यापक परामर्श की प्रक्रिया चलाई है। अब देखना होगा कि मोदी सरकार इस मुद्दे पर कैसे आगे बढ़ती है। राज्यों से शुरुआत हो चुकी है इसलिए देखना होगा कि क्या केंद्रीय स्तर पर भी इस संबंध में कोई कानून आता है या नहीं? साथ ही विपक्ष की आपत्तियां यह भी दर्शा रही हैं कि यूसीसी को अदालतों में चुनौतियां दी जाएंगी, राज्यों में प्रावधानों को लेकर बहस होगी और धार्मिक स्वतंत्रता बनाम समान नागरिक अधिकारों का प्रश्न भी उठेगा। यहां विपक्ष को समझना होगा कि UCC कोई असंवैधानिक या अचानक थोपा गया विचार नहीं है। संविधान का अनुच्छेद 44, संविधान सभा की बहस, न्यायपालिका की टिप्पणियां और अब राज्यों में बन रही वास्तविक कानूनी व्यवस्था, इन सभी को साथ रखकर देखें तो साफ है कि UCC पर अब देश बहुत आगे निकल चुका है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 14 Sep 2026 1:45 pm

दोस्त इजरायल को झटका! क्या भारत ने बदल लिया अपना रुख, ईरान के लिए नेतन्याहू को छोड़ा?

क्या ब्रिक्स डिक्लेरेशन भारत की विदेश नीति में किसी बड़े बदलाव की तरफ इशारा है? ब्रिक्स ब्रिक समिट का संयुक्त बयान जारी हो चुका है और इस बयान में पूरे फोरम ने कई मुद्दों पर काफी सख्त रुख अपनाया है। मसलन लेबनन के मुद्दे पर इजराइल का सीधा नाम लेते हुए आलोचना की गई है और लेबनान में सीजफायर का पालन करने पर जोर दिया गया है। लेकिन अमेरिका की एकतरफ़ा पाबंदियों की आलोचना करते समय ट्रंप या अमेरिका का कोई भी नाम का जिक्र नहीं किया गया है। इस संयुक्त बयान पर सभी देशों की सहमति बनवाना भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती थी क्योंकि इस साल ब्रिक्स की अध्यक्षता और सम्मेलन की मेजबानी दोनों भारत ही कर रहा है। अब देखना यह होगा कि इस बयान में इस्तेमाल किए गए शब्दों को बाकी देश किस तरह समझते हैं और भारत की तरफ से दिए गए संकेतों को किस तरह से लिया जाता है। पूरे बयान में बहुत सावधानी से शब्दों का चुनाव किया गया है। मिसाल के तौर पर देखें तो इसमें यूएन के दायरे से बाहर जाकर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों की आलोचना की गई है। लेकिन अमेरिका का नाम नहीं लिया गया है। इसी तरह परमाणु ठिकानों पर हमले की निंदा की गई है। लेकिन ईरान का जिक्र नहीं है। इजराइल यहां जरूर एक अपवाद के तौर पर सामने आया है। गाजा और लेबनान से जुड़े कई हिस्से इजराइल का नाम सीधे तौर पर साझा बयान में शामिल करते हैं। इस संयुक्त बयान को तैयार करना इसलिए भी मुश्किल था क्योंकि ईरान, यूएई और सऊदी अरब मिडिल ईस्ट में चल रही जंग को लेकर अलग-अलग तरह की भाषा चाहते थे। ऐसे में सभी की सहमति से बयान जारी हो जाना भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जा रही है। खासकर इसलिए क्योंकि पहले ऐसी अटकलें थी कि रूस और ईरान अमेरिका के खिलाफ काफी कड़ी भाषा इस्तेमाल करवाना चाहेंगे जिसका भारत और ब्रिक्स के दूसरे देश विरोध कर सकते हैं। लेकिन आखिर में सभी देशों में कंसेंसस बन गया और साझा बयान जारी हो गया। इजराइल को लेकर ब्रिक्स के बयान में गजा में मानवीय मदद पहुंचाने पर जोर दिया गया है। साथ ही फिलिस्तीनियों को जबरन उनके घरों और जमीन से हटाने का विरोध किया गया है। इसे भी पढ़ें: CPI ने BRICS घोषणापत्र का किया स्वागत, वैश्विक व्यवस्था में सुधार की वकालत की अमेरिका का नाम नहीं, लेकिन प्रतिबंधों की आलोचना घोषणापत्र की सबसे अहम बातों में से एक है एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों का मुद्दा। घोषणापत्र में कहा गया हम अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ एकतरफा दबाव वाले कदमों को लागू करने की निंदा करते हैं। हम फिर से कहते हैं कि ऐसे कदमों खासकर एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों और सेकेंडरी प्रतिबंधों के दूरगामी नकारात्मक असर होते हैं। इसमें यह भी कहा गया कि ऐसे कदमों का गरीबों पर बहुत बुरा असर पड़ता है। इसमें अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के खिलाफ एकतरफा दबाव वाले कदमों जिनमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से मंज़ूरी न लेने वाले प्रतिबंध भी शामिल हैं। दोनों ही बयानों में अमेरिका का नाम नहीं लिया गया है। लेकिन यह भाषा रूस और ईरान के लिए अहम है, जो ब्रिक्स के सदस्य हैं और जिन पर अमेरिका ने कई तरह की पाबंदियां लगा रखी हैं। ये दोनों देश लंबे समय से वॉशिंगटन की पाबंदी वाली नीतियों की आलोचना करते रहे हैं। इसलिए, इस भाषा में मॉस्को और तेहरान की एक अहम चिंता का ध्यान रखा गया है, लेकिन साथ ही घोषणापत्र को वॉशिंगटन पर सीधे हमले जैसा भी नहीं बनाया गया है। ब्रिक्स ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों के खिलाफ़ एकतरफ़ा टैरिफ और नॉन-टैरिफ़ उपायों को लेकर भी गहरी चिंता जताई है, और इसमें भी किसी देश का नाम नहीं लिया गया है। डोनाल्ड ट्रंप के व्हाइट हाउस में लौटने के बाद से यह मुद्दा और भी अहम हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने बार-बार ब्रिक्स को अमेरिका-विरोधी कहा है। उन्होंने इस समूह के साथ जुड़ने वाले देशों पर अतिरिक्त 10 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी दी है और डॉलर को कमज़ोर करने की कोशिशों पर 100 प्रतिशत ड्यूटी लगाने की चेतावनी भी दी है। ये तनाव सिर्फ़ ब्रिक्स समूह तक ही सीमित नहीं हैं। भारत को भी रूस से तेल खरीदने के कारण अमेरिकी टैरिफ़ का सामना करना पड़ा है। नई दिल्ली ने इस कदम को अनुचित, गैर-वाजिब और तर्कहीन बताया है और साथ ही अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए ज़रूरी कदम उठाने का संकल्प लिया है। इसे भी पढ़ें: जाते-जाते भारत में बड़ा धमाका कर गए जिनपिंग, पूरी दुनिया हैरान! बिना नाम लिए ईरान के पक्ष का समर्थन कैसे करता है यह घोषणापत्र पश्चिम एशिया के मुद्दे पर आम सहमति बनाना खास तौर पर मुश्किल था, क्योंकि ईरान और UAE इस टकराव को लेकर अलग-अलग राय रख रहे थे। ईरान ने इस बात के लिए भी BRICS की आलोचना की थी कि उसने अमेरिका और इज़राइल के हवाई हमलों के खिलाफ कोई बयान जारी नहीं किया, और वह इस समूह से समर्थन की उम्मीद कर रहा था। आखिरी घोषणापत्र में तेहरान के लिए ऐसी बातें कही गई हैं जिनका वह हवाला दे सकता है, लेकिन इसमें उसका नाम नहीं लिया गया है। BRICS ने नागरिक बुनियादी ढांचे और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की पूरी सुरक्षा-निगरानी वाली शांतिपूर्ण परमाणु सुविधाओं पर जानबूझकर किए गए हमलों पर गहरी चिंता जताई। इस हिस्से में ईरान, अमेरिका या इज़राइल का नाम नहीं लिया गया है। हालांकि, टकराव के संदर्भ में, यह तेहरान के उस तर्क का समर्थन करता हुआ दिखता है कि उसकी सुरक्षित परमाणु सुविधाओं पर हमले अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन थे। BRICS ने देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने का भी आह्वान किया और पश्चिम एशिया में अधिकतम संयम बरतने की अपील की। सबसे अहम बात यह है कि यह हिस्सा सदस्यों के अपने-अपने राष्ट्रीय रुख को याद दिलाता है, जिससे युद्ध के बारे में अलग-अलग राय रखने वाले देश अपनी व्यक्तिगत स्थिति छोड़े बिना एक ही टेक्स्ट पर सहमत हो पाते हैं। इसे भी पढ़ें: अगर तुमने...ब्रिक्स से लौटते ही जिनपिंग ने ट्रंप को क्या धमकी दे डाली? इजरायल पर BRICS का सीधा निशाना, लेबनान से सेना वापस बुलाने की मांग BRICS घोषणापत्र में इजरायल को लेकर स्पष्ट और सख्त रुख अपनाया गया है। गाजा में जारी हिंसा पर चिंता जताते हुए BRICS ने फिलिस्तीनियों के जबरन विस्थापन का विरोध किया है। साथ ही 1967 की सीमाओं के आधार पर पूर्वी यरुशलम को राजधानी बनाकर संप्रभु फिलिस्तीनी राष्ट्र के गठन के समर्थन को दोहराया गया है। घोषणापत्र में दक्षिण अफ्रीका की ओर से इजरायल के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) में चल रही कार्यवाही का भी उल्लेख किया गया। BRICS ने कहा कि गाजा में मानवीय सहायता की आपूर्ति सुनिश्चित करना इजरायल का कानूनी दायित्व है। लेबनान के मुद्दे पर BRICS ने युद्धविराम का स्वागत करते हुए सभी पक्षों से इसकी शर्तों का पालन करने और UNSC प्रस्ताव 1701 को पूरी तरह लागू करने की अपील की। साथ ही युद्धविराम के लगातार उल्लंघन और लेबनान की संप्रभुता एवं क्षेत्रीय अखंडता के उल्लंघन की निंदा की गई। घोषणापत्र में सीधे इजरायल से लेबनान के इलाकों से अपनी सेना वापस बुलाने को कहा गया। BRICS ने इजरायल से लेबनान सरकार के साथ हुए समझौते की शर्तों का सम्मान करने और उन सभी लेबनानी क्षेत्रों से अपनी सेनाएं हटाने का आह्वान किया, जहां वे अभी भी मौजूद हैं। UNSC Resolution 1701 को 2006 में इजरायल-हिजबुल्लाह युद्ध के बाद अपनाया गया था। इसमें इजरायली सेना की वापसी और दक्षिणी लेबनान में लेबनानी सेना तथा संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिकों की तैनाती की बात कही गई थी। BRICS के घोषणापत्र में अमेरिका का नाम लिए बिना एकतरफा प्रतिबंधों की आलोचना की गई है। वहीं परमाणु प्रतिष्ठानों से जुड़े हिस्से में ईरान का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया गया। लेकिन इजरायल का नाम स्पष्ट रूप से लिया गया और लेबनानी क्षेत्र से उसकी सेनाओं की वापसी की मांग की गई। तो, क्या भारत का रुख बदला है? सख्त भाषा के बावजूद, यह घोषणा अपने आप में भारत के रुख में कोई बुनियादी बदलाव नहीं दिखाती। ब्रिक्स (BRICS) घोषणा सभी 11 सदस्यों की सहमति वाला दस्तावेज़ है, न कि सिर्फ़ भारत का बयान। अध्यक्ष के तौर पर भारत का काम ऐसे तरीके खोजना था जिन्हें अलग-अलग हितों वाले देश स्वीकार कर सकें। भारत ने पश्चिम एशिया में बातचीत और कूटनीति की वकालत जारी रखी है, साथ ही फ़िलिस्तीन के लिए 'टू-स्टेट सॉल्यूशन' (दो-देश समाधान) का समर्थन किया है और इज़राइल के साथ करीबी रिश्ते भी बनाए रखे हैं। ब्रिक्स (BRICS) सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन की मुलाक़ात में, नई दिल्ली ने फिर से कहा कि विवादों को बातचीत और कूटनीति से सुलझाया जाना चाहिए। साथ ही, नेविगेशन, व्यापार और समुद्री यात्रियों की सुरक्षा के महत्व पर भी ज़ोर दिया गया। इसी तरह, भारत का व्यापक नज़रिया अलग-अलग गुटों के साथ संबंध बनाए रखने का रहा है। वह रूस और यूक्रेन, दोनों के साथ संपर्क बनाए हुए है, अमेरिका और इज़राइल के साथ भी उसके अहम संबंध हैं और ईरान के साथ भी बातचीत के रास्ते खुले रखे हैं। लेकिन जिस माहौल में भारत यह संतुलन बना रहा है, वह अब बदल गया है। ग्लोबल अनसर्टेनिटी का ही नतीजा है कि भारत चीन तमाम डिफरेंसेस को छोड़ के इस समय आगे बढ़ने के लिए तैयार है। तो मुझे नहीं लगता है भारत के लिए कोई डिप्लोमेटिक एक आप ये कहे कि कोई एम्बरेसमेंट होगा। भारत इससे और सशक्त होगा।

प्रभासाक्षी 14 Sep 2026 1:41 pm

भारत में अगस्त माह में महंगाई 9.92 प्रतिशत रही: सरकार

नई दिल्ली, सरकार द्वारा सोमवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, देश में थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) आधारित महंगाई अगस्त 2026 के लिए 9.92 प्रतिशत रही, जो जुलाई में 9.78 प्रतिशत थी।

देशबन्धु 14 Sep 2026 1:17 pm

सरकार : भारत में अगस्त माह में महंगाई थोक मूल्य सूचकांक 9.92 प्रतिशत रही

नई दिल्ली, सरकार द्वारा सोमवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, देश में थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) आधारित महंगाई अगस्त 2026 के लिए 9.92 प्रतिशत रही, जो जुलाई में 9.78 प्रतिशत थी।

देशबन्धु 14 Sep 2026 1:16 pm

कच्चे तेल की कीमतों में उछाल

नई दिल्ली, पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है।

देशबन्धु 14 Sep 2026 12:47 pm

चुनाव में हार के लिए विजयन और एमवी गोविंदन पर उठे सवाल: केरल

कोझिकोड, सीपीआई (एम) के मजबूत गढ़ कन्नूर में ही पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की अप्रत्यक्ष रूप से आलोचना हो रही है।

देशबन्धु 14 Sep 2026 12:36 pm

ब्रिक्स की सफलतापूर्वक मेजबानी के लिए पीएम मोदी की सराहना: चंद्रबाबू नायडू

अमरावती, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की सफलतापूर्वक मेजबानी के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सराहना की है।

देशबन्धु 14 Sep 2026 12:32 pm

हिंदी भाषा को सियासी नहीं, जमीनी हकीकत के नजरिए से आंकिए

भारत में हिंदी भाषा को लेकर चलने वाली राजनीति और उसकी जमीनी हकीकत के बीच एक बड़ा अंतर है, जो लगातार गहराता चला गया। हालांकि अब इसे पाटने और इससे लेकर गाहे बगाहे उत्पन्न होते रहने वाले मतभेदों को दूर करने की जरूरत है। एक तरफ जहां हिंदी को राजनीतिक ध्रुवीकरण और भाषाई अस्मिता के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, वहीं व्यावहारिक धरातल पर इसकी स्थिति बिल्कुल अलग नजर आती है। इसलिए जनसामान्य के नजरिए से ही इसका सम्यक समाधान अपेक्षित है। खासकर भारतीय अभिजात्य वर्ग यानी अंग्रेजी दां लोगों के इशारे पर दक्षिण-पश्चिम-पूर्वी भारतीय भाषाओं यथा तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मराठी भाषा-भाषियों में हिंदी के प्रति जो भाषाई सौतियाडाह दिखाई देती है, उससे स्थिति और जटिल हो जाती है। यदि तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मराठी भाषा-भाषी भी पंजाबी, बंग्ला और गुजराती भाषा-भाषियों की तरह हिंदी के प्रति सहज, सहनशील और जागरूक रहें तो भारत के हिंदी व प्रतिस्पर्धी भाषाई विवाद को न्यूनतम किया जा सकता है। इसे भी पढ़ें: Hindi Diwas 2026: विश्व में हिन्दी का बढ़ता प्रभाव # देश में हिंदी भाषा को लेकर जारी सियासत के कुछ मुख्य पहलू इस प्रकार हैं:- पहला, 'एक राष्ट्र, एक भाषा' का नैरेटिव: केंद्र की राजनीति में अक्सर हिंदी को पूरे देश की संपर्क भाषा (Link Language) या राष्ट्रीय पहचान के रूप में पेश करने की कोशिश की जाती है। दूसरा, गैर-हिंदी राज्यों का विरोध: तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में हिंदी को 'थोप जाने' (Hindi Imposition) का मुद्दा बनाकर क्षेत्रीय दल अपनी राजनीति को मजबूत करते हैं। तीसरा, वोट बैंक और ध्रुवीकरण: उत्तर भारत में हिंदी प्रेम का कार्ड खेलकर मतदातों को लुभाया जाता है, जबकि दक्षिण में 'हिंदी विरोध' क्षेत्रीय पहचान और भाषाई स्वाभिमान को बचाने का बड़ा जरिया बन जाता है। # जहां तक संवैधानिक और व्यावहारिक हकीकत की बात है तो इसके विभिन्न आयामों और उनकी वैधानिक व व्यावहारिक स्थिति पर गौर करना लाजिमी है:- पहली, राष्ट्रीय भाषा (National Language) : भारतीय संविधान में हिंदी को 'राजभाषा' (Official Language) का दर्जा प्राप्त है (अनुच्छेद 343), 'राष्ट्रभाषा' का नहीं। भारत की 22 आधिकारिक भाषाएं समान हैं। दूसरी, जनसंख्या और पहुंच : 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 43.6% भारतीयों की मातृभाषा हिंदी (और उसकी बोलियां) है। यह देश की सबसे बड़ी बोली जाने वाली भाषा है। तीसरी, बाजार की हकीकत : राजनीति भले ही विरोध करे, लेकिन बॉलीवुड, ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म, डिजिटल मीडिया और कॉर्पोरेट विज्ञापन दक्षिण और पूर्व के राज्यों में भी हिंदी में ही फल-फूल रहे हैं। चौथी, रोजगार की चुनौती : हिंदी भाषी राज्यों के युवा उच्च शिक्षा, विज्ञान और कॉर्पोरेट नौकरियों के लिए आज भी अंग्रेजी पर ही निर्भर हैं। हिंदी पट्टी में शिक्षा की गुणवत्ता का अभाव एक बड़ी चुनौती है। # हिंदी भाषा से जुड़ी मुख्य जमीनी सच्चाई इस प्रकार है जिन्हें नजरअंदाज करने से नीतिगत उलझने बढ़ेंगी एक, भाषा थोपने से जुड़ा डर: गैर-हिंदी भाषी राज्यों की मुख्य चिंता यह है कि यदि केंद्रीय परीक्षाओं और नौकरियों में हिंदी को प्राथमिकता दी गई, तो उनके युवाओं के अवसर सीमित हो जाएंगे। दो, बोलियों का नुकसान: अवधी, ब्रज, भोजपुरी, मैथिली और गढ़वाली जैसी समृद्ध बोलियों को हिंदी के व्यापक छत्र के नीचे समेटने से उनकी अपनी भाषाई विविधता कमजोर हो रही है। तीन, अंग्रेजी का दबदबा: हिंदी की राजनीति करने वाले नेताओं के अपने बच्चे भी अक्सर अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ते हैं, जिससे आम जनता के लिए रोजगार आधारित शिक्षा का अंतर बना रहता है। सच कहूं तो हिंदी भाषा भारत को जोड़ने का एक सशक्त माध्यम है, लेकिन इसे किसी राजनीतिक एजेंडे या अनिवार्यता के बजाय आपसी संवाद और बाजार की जरूरत के तहत स्वाभाविक रूप से विकसित होने देना ही देश के बहुभाषी ताने-बाने को मजबूत रख सकता है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 14 Sep 2026 10:57 am

श्री गणेश चतुर्थी पर राहुल गांधी और खड़गे समेत विपक्ष के कई नेताओं ने दी शुभकामनाएं

श्री गणेश चतुर्थी पर राहुल गांधी और खड़गे समेत विपक्ष के कई नेताओं ने दी शुभकामनाएं

समाचार नामा 14 Sep 2026 10:36 am

Hindi Diwas 2026: विश्व में हिन्दी का बढ़ता प्रभाव

वर्तमान में हिन्दी भारत की सीमाओं से बाहर निकलकर विश्व के कई देशों में अपना परचम स्थापित कर रही है। यह हिंदी के अंतर्राष्ट्रीय होने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। आज भारतीय मूल के व्यक्ति हिंदी के विस्तार में अभूतपूर्व योगदान दे रहे हैं। इतना ही नहीं अमेरिका, चीन सहित विश्व के लगभग 11 देशों में हिन्दी के समाचार पत्र प्रकाशित हो रहे हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि हिंदी भारतीय संस्कृति, संवेदना और आत्मीयता का वैश्विक स्वर बनती जा रही है। यह भाषा भारत की मिट्टी से जन्म लेकर आज विश्व के अनेक देशों में संवाद, साहित्य, शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक जुड़ाव का माध्यम बन रही है। हिन्दी की यह यात्रा केवल शब्दों के विस्तार की यात्रा नहीं है, यह भारत की उस सांस्कृतिक चेतना का विस्तार है, जिसने सदियों से सम्पूर्ण विश्व को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश दिया है। हिन्दी की शक्ति उसके विशाल शब्द भंडार और उसकी आत्मीयता में भी है। यह भाषा सहजता से लोगों को जोड़ती है। भारत से बाहर बसे भारतीय समुदायों ने हिन्दी को अपनी जड़ों से जोड़े रखने का महत्वपूर्ण माध्यम बनाया है। मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद और टोबैगो, गुयाना तथा दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में भारतीय मूल के लोगों ने हिन्दी के सांस्कृतिक प्रकाश को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया है। इसे भी पढ़ें: हिंदी का सम्मान ही भारतीय भाषाओं और संस्कृति की असली ताकत मॉरीशस हिन्दी की वैश्विक यात्रा का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। वहाँ हिन्दी का अध्ययन विद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में होता है। साहित्यिक गतिविधियों, सांस्कृतिक आयोजनों और भारतीय परंपराओं से जुड़े कार्यक्रमों में हिन्दी का विशेष स्थान दिखाई देता है। मॉरीशस में हिन्दी का विस्तार यह प्रमाणित करता है कि भाषा भौगोलिक सीमाओं से बाहर निकलकर भावनाओं और संस्कारों की जीवंत धारा है। फिजी में हिन्दी का एक विशिष्ट रूप ‘फिजियन हिन्दी’ के रूप में विकसित हुआ है। भारतीय मूल के लोगों के बीच यह संवाद और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण माध्यम बनी। यह हिन्दी की उस विशेष क्षमता को दर्शाती है, जिसमें वह अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों में पहुँचकर स्थानीय परिवेश के साथ संवाद करते हुए अपना नया स्वरूप ग्रहण कर सकती है। सूरीनाम, गुयाना तथा त्रिनिदाद और टोबैगो में भी भारतीय मूल के समुदायों ने हिन्दी को धार्मिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक परंपराओं के साथ जोड़े रखा। इन देशों में हिन्दी का महत्व भारतीय विरासत की स्मृति के रूप में भी है। भजन, रामायण-पाठ, सांस्कृतिक आयोजन और भारतीय पर्व हिन्दी को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आज के समय में हिन्दी का प्रभाव भारतीय मूल के समुदाय से बाहर निकल रहा है, की आबादी तक सीमित नहीं है। आज यह अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में हिन्दी सीखने और समझने वालों की संख्या लगातार बढ़ी है। भारतीय सिनेमा, टेलीविजन, डिजिटल माध्यम, संगीत और सोशल मीडिया ने हिन्दी को वैश्विक स्तर पर नई दृश्यता प्रदान की है। आज भारत से जुड़ने की इच्छा रखने वाला विश्व का युवा वर्ग हिन्दी के शब्दों और अभिव्यक्तियों से परिचित हो रहा है। विश्व के देशों में हिन्दी के प्रकाशन लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। जिनमें फिजी में शांतिदूत हिन्दी साप्ताहिक, मॉरीशस में आर्योदय, वसंत, इंद्रधनुष आदि, यहाँ हिन्दी पत्रकारिता का इतिहास 1909 से मिलता है। इसी प्रकार अमेरिका में हिन्दी जगत, कर्मभूमि, नवरंग टाइम्स, भारत समाचार, नमस्ते यूएसए, सेतु, विश्वा आदि हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं का उल्लेख मिलता है। कनाडा में सरस्वती पत्र सहित हिन्दी के साहित्यिक, सांस्कृतिक प्रकाशन हो रहे हैं। ब्रिटेन में पुरवाई, न्यूज़ीलैंड में भारत-दर्शन, ऑस्ट्रेलिया में ऑस्ट्रेलियांचल सहित हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन, संयुक्त अरब अमीरात में अभिव्यक्ति, अनुभूति आदि, नेपाल में तरंग को पहला हिन्दी साप्ताहिक और जय नेपाल को पहला हिन्दी दैनिक बताया गया है। आज के डिजिटल युग ने हिन्दी के विस्तार को अभूतपूर्व गति दी है। इंटरनेट और स्मार्टफोन ने भाषा की भौगोलिक सीमाओं को लगभग समाप्त कर दिया है। हिन्दी में समाचार, साहित्य, शिक्षा, मनोरंजन, ज्ञान-विज्ञान और सामाजिक संवाद की सामग्री बड़ी मात्रा में उपलब्ध है। सोशल मीडिया के माध्यम से हिन्दी लिखने और पढ़ने वालों का नया वर्ग सामने आया है। हिन्दी अब केवल मुद्रित पृष्ठों की भाषा न होकर मोबाइल स्क्रीन, डिजिटल मंच और वैश्विक संवाद का भी प्रभावशाली माध्यम बन चुकी है। हिन्दी के वैश्विक विस्तार में भारतीय साहित्य की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। कबीर, तुलसीदास, प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर और हरिवंश राय बच्चन जैसे रचनाकारों ने हिन्दी को ऐसी साहित्यिक ऊँचाई प्रदान की, जिसने भाषा को मानवीय संवेदना की अभिव्यक्ति बना दिया। हिन्दी साहित्य में जीवन, प्रकृति, परिवार, संघर्ष, आध्यात्मिकता और मानवता के विविध रंग मिलते हैं। यही व्यापकता हिन्दी को विश्व के पाठकों से जोड़ने की क्षमता प्रदान करती है। हिन्दी की वैश्विक प्रतिष्ठा में विश्व हिन्दी सम्मेलन जैसी संस्थागत पहल का भी विशेष योगदान है। ऐसे मंच हिन्दी के विद्वानों, साहित्यकारों, शिक्षाविदों और भाषा प्रेमियों को एक साथ लाते हैं। इससे हिन्दी के अध्ययन, अध्यापन, साहित्य और अंतरराष्ट्रीय विस्तार पर गंभीर विमर्श को गति मिलती है। आज आवश्यकता हिन्दी को केवल भावनाओं की भाषा मानने की नहीं, बल्कि ज्ञान, विज्ञान, तकनीक, व्यापार और वैश्विक संवाद की समर्थ भाषा के रूप में विकसित करने की है। नई तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अनुवाद प्रणाली और डिजिटल शिक्षा हिन्दी के लिए नए अवसर लेकर आए हैं। यदि इन क्षेत्रों में हिन्दी की शब्दावली, तकनीकी सामग्री और उच्च स्तरीय शिक्षण संसाधनों का निरंतर विस्तार किया जाए तो हिन्दी की वैश्विक उपयोगिता और बढ़ सकती है। हिन्दी का भविष्य उसके बोलने वालों की संख्या से अधिक उसकी उपयोगिता और गुणवत्ता पर निर्भर करेगा। दुनिया में अनेक भाषाएँ अपनी विशिष्ट पहचान के साथ आगे बढ़ रही हैं। हिन्दी भी अपनी वैज्ञानिक क्षमता, साहित्यिक समृद्धि और सांस्कृतिक शक्ति के आधार पर विश्व की प्रमुख भाषाओं में अपना स्थान और अधिक सुदृढ़ कर सकती है। भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका भी हिन्दी के लिए नए द्वार खोल रही है। आज विश्व भारत को केवल एक बड़े बाजार के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कृति, तकनीक, लोकतंत्र और शांति की महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में देख रहा है। ऐसे समय में हिन्दी भारत की आवाज को दुनिया तक पहुँचाने का सशक्त माध्यम बन सकती है। हिन्दी का वैश्विक विस्तार भाषायी सह अस्तित्व और सांस्कृतिक संवाद का विषय है। भारत की परंपरा सभी भाषाओं और संस्कृतियों का सम्मान करती है। हिन्दी इसी भावना के साथ विश्व की भाषाओं के बीच अपना स्थान बना सकती है। आज हिन्दी भारत की सीमाओं से बाहर निकलकर अनेक महाद्वीपों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है। आने वाला समय हिन्दी के लिए और अधिक संभावनाओं से भरा है। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम हिन्दी को गर्व के साथ अपनाएँ, उसे आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से जोड़ें और दुनिया के साथ संवाद की भाषा बनाएँ। हिन्दी भारत की आवाज है, भारतीय संस्कृति की संवेदना है और विश्व के साथ भारत के आत्मीय संवाद का एक सशक्त माध्यम है। जिस भाषा में करोड़ों लोगों के सपने, संवेदनाएँ और जीवन की धड़कनें व्यक्त होती हैं, उसका वैश्विक आकाश निश्चित रूप से और विस्तृत होगा। - डॉ. वन्दना सेन (लेखिका भारतीय भाषा मंच, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास की प्रान्त संयोजक हैं)

प्रभासाक्षी 14 Sep 2026 10:34 am

राहुल गांधी को इस्लामिक स्कॉलर का जवाब- 'भारत सनातन की भूमि, इसकी संस्कृति में मांसाहारी भोजन का स्थान नहीं'

राहुल गांधी को इस्लामिक स्कॉलर का जवाब- 'भारत सनातन की भूमि, इसकी संस्कृति में मांसाहारी भोजन का स्थान नहीं'

समाचार नामा 14 Sep 2026 10:09 am

हिंदी हमारी पहचान, हमारा स्वाभिमान: ओम बिड़ला और केंद्रीय मंत्रियों ने हिंदी दिवस पर देशवासियों को दी बधाई

हिंदी हमारी पहचान, हमारा स्वाभिमान: ओम बिड़ला और केंद्रीय मंत्रियों ने हिंदी दिवस पर देशवासियों को दी बधाई

समाचार नामा 14 Sep 2026 8:34 am

कांग्रेस ने चीनी राष्ट्रपति के साथ बैठक को लेकर प्रधानमंत्री से पूछे सवाल

कांग्रेस ने चीनी राष्ट्रपति के साथ बैठक को लेकर प्रधानमंत्री से पूछे सवाल

समाचार नामा 13 Sep 2026 6:29 pm

असम के सीएम ने जोरहाट में किया रेलवे ओवरब्रिज का उद्घाटन, बोले-बेहतर कनेक्टिविटी बनेगी विकास का आधार

असम के सीएम ने जोरहाट में किया रेलवे ओवरब्रिज का उद्घाटन, बोले-बेहतर कनेक्टिविटी बनेगी विकास का आधार

समाचार नामा 13 Sep 2026 4:28 pm

बिहार : 'जदयू मतलब नीतीश कुमार’ से गरमाई बिहार की सियासत

बिहार : 'जदयू मतलब नीतीश कुमार’ से गरमाई बिहार की सियासत

समाचार नामा 13 Sep 2026 4:21 pm

बिना रजिस्ट्रेशन वाले प्राइवेट रिहैब सेंटरों को नोटिस जारी: मेंटल हेल्थ अथॉरिटी

अगरतला, त्रिपुरा के स्टेट मेंटल हेल्थ अथॉरिटी की ओर से 19 अनधिकृत प्राइवेट रिहैबिलिटेशन सेंटरों को 'शो-कॉज नोटिस' जारी किए गए हैं।

देशबन्धु 13 Sep 2026 2:41 pm

90 प्रतिशत आपराधिक घटनाओं में सामने आता है सपा कनेक्शन: अनिल राजभर

लखनऊ, उत्तर प्रदेश के जौनपुर में विशाल यादव की हत्या को लेकर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री अनिल राजभर ने समाजवादी पार्टी पर तीखा हमला बोला है।

देशबन्धु 13 Sep 2026 2:26 pm

आतंकवाद के खिलाफ भारत की बात को मिला वैश्विक समर्थन: मंत्री प्रफुल्ल पानसेरिया

सूरत, दिल्ली में आयोजित 'ब्रिक्स' शिखर सम्मेलन में पहलगाम आतंकी हमले समेत दुनिया के किसी भी हिस्से में होने वाली आतंकवादी घटनाओं और टेरर फंडिंग की निंदा को भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता माना जा रहा है।

देशबन्धु 13 Sep 2026 2:10 pm

तृणमूल के नाम और चुनाव चिह्न पर फैसले को लेकर अनिश्चितता: बंगाल उपचुनाव

कोलकाता, चुनाव आयोग की ओर से तृणमूल कांग्रेस के दो विरोधी गुटों के साथ अलग-अलग बैठकें की गईं और पार्टी के नाम व चुनाव चिह्न पर उनके दावों को सुना गया।

देशबन्धु 13 Sep 2026 1:36 pm