'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम के बाद राहुल गांधी पर सीएम मोहन यादव का पलटवार, शिक्षा और रोजगार के आंकड़े रखे सामने
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव: 'जेनजी देश के साथ खड़ी है', एबीवीपी की जीत पर यश डबास का बयान
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव: 'जेनजी देश के साथ खड़ी है', एबीवीपी की जीत पर यश डबास का बयान
'ड्रग्स के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ें', पंजाब के लोगों से केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान की अपील
'ड्रग्स के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ें', पंजाब के लोगों से केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान की अपील
बंगाल उपचुनाव: चुनाव आयोग ने एजेयूपी और एआईएसएफ को दिए नए चुनाव चिह्न, नंदीग्राम-रेजीनगर में नए सिंबल पर लड़ेंगे उम्मीदवार
डूसू चुनाव 2026 : एनएसयूआई ने काटा टिकट, फिर दीपांशु शौकीन ने निर्दलीय चुनाव जीतकर दिखाया दम
डूसू चुनाव 2026 : एनएसयूआई ने काटा टिकट, फिर दीपांशु शौकीन ने निर्दलीय चुनाव जीतकर दिखाया दम
एबीवीपी की डूसू में जीत 'राष्ट्र प्रथम' की विचारधारा में युवाओं का भरोसा : अमित शाह
एबीवीपी की डूसू में जीत 'राष्ट्र प्रथम' की विचारधारा में युवाओं का भरोसा : अमित शाह
सत्ता से संघर्ष तकः ममता बनर्जी का राजनीतिक यथार्थ
ममता बनर्जी का राजनीतिक सफर एक छात्र राजनीति की साहसी नायिका से लेकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनने और वर्तमान समय में घोर राजनीतिक व कानूनी संकटों से घिरने तक की एक बड़ी दास्तान है। जो ‘दीदी’ कभी सड़कों पर वामपंथ के 34 साल के किले को ढहाने के लिए जानी जाती थीं, वे आज अपनी राजनीतिक यात्रा के सबसे कठिन दौर से गुजर रही हैं। वर्तमान परिस्थितियों में ममता बनर्जी पर मुश्किलों के पहाड़ टूटने के मुख्य कारण इस प्रकार हैं- पहला, ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक झटका 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में लगा, जहाँ उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को हार का सामना करना पड़ा और राज्य में भाजपा की सरकार बनी। खुद ममता बनर्जी को भी अपनी पारंपरिक सीट भवानीपुर से शुभेंदु अधिकारी के हाथों करारी हार झेलनी पड़ी। 15 साल तक राज्य पर राज करने के बाद सत्ता से बाहर होना उनके राजनीतिक पतन की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। दूसरा, ममता बनर्जी की राजनीतिक ताकत हमेशा उनकी पार्टी पर उनकी मजबूत पकड़ थी। लेकिन वर्तमान में टीएमसी के भीतर एक बड़ी बगावत छिड़ गई है। कई विधायकों और सांसदों ने अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव और पार्टी में तानाशाही रवैये को लेकर बगावती रुख अख्तियार कर लिया है, जिससे पार्टी दो फाड़ होने की कगार पर पहुंच गई है। तीसरा, ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा कानूनी और भावनात्मक झटका तब लगा जब चुनाव आयोग ने पार्टी में आंतरिक विवाद के कारण तृणमूल कांग्रेस के नाम और उनके प्रसिद्ध चुनाव चिह्न ‘जोड़ा फूल’ को फ्रीज (रोक लगा दी) कर दिया। आयोग ने दोनों गुटों को अस्थाई रूप से नए नाम और सिंबल दिए हैं। ममता बनर्जी ने इसे भारतीय लोकतंत्र का ‘काला दिन’ बताया है और इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। चौथा, सत्ता से हटते ही ममता बनर्जी के खिलाफ कानूनी शिकंजा लगातार कसता जा रहा है- चुनाव प्रचार के दौरान कथित तौर पर भड़काऊ और सांप्रदायिक बयान देने के आरोप में उनके खिलाफ कोलकाता और सिलीगुड़ी में एफआईआर दर्ज की गई हैं। इसे भी पढ़ें: TMC संकट Mamata Banerjee के अहंकार और भगवान राम के शाप का परिणाम: Suvendu Adhikari अगस्त 2026 में कोलकाता में छात्र संगठन (टीएमसीपी) की रैली के दौरान कलकत्ता हाई कोर्ट के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करने और कानून व्यवस्था बिगाड़ने के आरोप में भी पुलिस ने उन पर मामला दर्ज किया है। उनकी पिछली सरकार पर एक विज्ञापन एजेंसी को रु. 635 करोड़ से अधिक का टेंडर देने में गड़बड़ी जैसे भ्रष्टाचार के नए आरोप लग रहे हैं। पांचवां, ममता बनर्जी ने हमेशा खुद को जनता की लड़ाई लड़ने वाली और महिलाओं के अधिकारों की रक्षक के रूप में पेश किया था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में राज्य में हुए महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर उनके विवादित बयानों और भ्रष्टाचार के मामलों (जैसे शिक्षक भर्ती घोटाला आदि) ने उनकी छवि को गंभीर नुकसान पहुंचाया। जनता में पैदा हुए इसी आक्रोश और सत्ता-विरोधी लहर ने उन्हें बैकफुट पर धकेल दिया। संघर्ष की नायिका का वर्तमान रुख, इन सब मुश्किलों के बावजूद, 17 साल की उम्र में दूध के बूथ और स्टेनोग्राफर का काम करके अपने परिवार को संभालने वाली ममता बनर्जी ने हार मानने से साफ इनकार किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे राजनीतिक संन्यास नहीं लेंगी और वे इस ‘गंदे खेल’ के खिलाफ सड़कों पर उतरकर लड़ाई जारी रखेंगी। आगामी उपचुनावों के लिए उन्होंने रणनीति बदलते हुए कांग्रेस उम्मीदवारों को समर्थन देने की घोषणा भी की है। भारतीय राजनीति के इतिहास में ममता बनर्जी का नाम एक ऐसी जननेता के रूप में दर्ज रहा है, जिन्होंने शून्य से उठकर जन आंदोलनों के बल पर दशकों पुरानी राजनीतिक संरचनाओं को हिला दिया। छात्र राजनीति के समय से ही उनकी पहचान एक बेबाक और निर्भीक व्यक्तित्व के रूप में रही है। तीन दशकों से अधिक लंबे वामपंथी शासन को उखाड़ फेंकने वाली दीदी ने पूरे पंद्रह वर्षों तक पश्चिम बंगाल की सत्ता पर एकछत्र राज किया। परंतु समय का चक्र ऐसा घूमा है कि वही जुझारू नेत्री आज अपनी ही राजनीतिक यात्रा के सबसे कठिन दौर से गुजर रही हैं। हालिया विधानसभा चुनावों में मिली पराजय, दल के भीतर भड़की बगावत, चौतरफा वैधानिक कार्यवाहियों का शिकंजा और दल की मूल पहचान यानी नाम तथा चुनाव चिह्न का छिन जाना, इन सबने मिलकर उनके समक्ष अस्तित्व रक्षा की अभूतपूर्व चुनौती खड़ी कर दी है। हाल के विधानसभा चुनाव पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास में एक बड़े मोड़ के रूप में सामने आए। पंद्रह वर्षों के निरंतर शासन के बाद तृणमूल कांग्रेस को जन-असंतोष और प्रचंड विरोध का सामना करना पड़ा। चुनावी नतीजों में न केवल उनकी पार्टी को करारी हार झेलनी पड़ी, बल्कि ममता बनर्जी को स्वयं अपनी पारंपरिक सीट भवानीपुर से पराजय का स्वाद चखना पड़ा। इस परिणाम ने यह सिद्ध कर दिया कि राज्य में बदलाव की लहर अत्यधिक तीव्र थी। निरंतर शासन से उपजी असंतुष्टि, विभिन्न भर्ती घोटालों के आरोप तथा स्थानीय स्तर पर उपजे जन-रोष ने मिलकर उनकी दलगत जड़ों को कमजोर कर दिया, जिससे राज्य में एक नए राजनीतिक समीकरण का उदय हुआ। किसी भी क्षेत्रीय दल की वास्तविक शक्ति उसका सुदृढ़ संगठन, शालीन भाषा, लोकतांत्रिक मर्यादा और नेतृत्व के प्रति अटूट निष्ठा होती है। तृणमूल कांग्रेस में लगभग तीन दशकों तक ममता बनर्जी ही सर्वमान्य चेहरा और अंतिम निर्णयकर्ता रहीं। किंतु चुनावी असफलता के उपरांत पार्टी के भीतर दबा हुआ असंतोष अचानक बाहर आ गया। विधायकों और सांसदों के एक बड़े धड़े ने शीर्ष नेतृत्व की कार्यशैली पर प्रश्न चिह्न खड़े कर दिए। तृणमूल कांग्रेस में आंतरिक विभाजन के बाद दोनों गुटों द्वारा अधिकार जताए जाने के कारण आयोग को कड़ा कदम उठाना पड़ा। वर्षों पूर्व जिस पहचान को उन्होंने अपने कड़े परिश्रम और संघर्ष से सींचा था, उसी से वंचित हो जाना उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा संवैधानिक झटका माना जा रहा है। यद्यपि उन्होंने इस निर्णय को लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध बताते हुए शीर्ष अदालत का द्वार खटखटाया है, परंतु तत्काल रूप से इस स्थिति ने दल के कार्यकर्ताओं में भारी असमंजस पैदा कर दिया है। सत्ता से बाहर होते ही ममता बनर्जी बहुआयामी कानूनी चुनौतियों से भी घिर गई हैं। चुनावी अभियानों के दौरान दिए गए बयानों को लेकर उनके खिलाफ विभिन्न स्थानों पर प्राथमिक दर्ज कराई गई हैं। जनसभाओं और रैलियों के संचालन में उच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के उल्लंघन तथा व्यवस्था बिगाड़ने के आरोपों में भी दंडात्मक कार्यवाहियाँ शुरू की गई हैं। ये तमाम कानूनी उलझनें न केवल उनकी प्रशासनिक छवि पर प्रश्न खड़े करती हैं, बल्कि उन्हें राजनीतिक पुनर्निर्माण के स्थान पर कानूनी बचाव की मुद्रा में ला खड़ा करती हैं। ममता बनर्जी की वास्तविक पूंजी उनकी साख थी, जो एक साधारण, त्यागपूर्ण और आम जनता की रक्षक के रूप में बनी थी। जनाक्रोश और सत्ता-विरोधी लहर ने उन्हें बैकफुट पर धकेल दिया। इसके बावजूद विपरीत परिस्थितियों में पली-बढ़ी ममता बनर्जी ने आसानी से घुटने न टेकने का संकल्प दोहराया है। राजनीति से संन्यास लेने की बातों को खारिज करते हुए उन्होंने पुनः जन-सड़कों पर उतरकर संघर्ष करने का मार्ग चुना है। वर्तमान परिस्थितियों में उन्होंने अपनी रणनीति बदलते हुए अन्य विपक्षी दलों के साथ हाथ मिलाना शुरू किया है। नंदीग्राम उपचुनाव में अपने प्रत्याशी का नाम वापस लेकर कांग्रेस उम्मीदवार का समर्थन करना इसी रणनीति का भाग है। संक्षेप में कहा जाए तो ममता बनर्जी का वर्तमान समय उनके राजनीतिक जीवन की सबसे कसौटी पूर्ण परीक्षा का काल है। एक ओर दल में टूट, नाम व प्रतीक का स्थगन और मुकदमों का अंबार है, तो दूसरी ओर अपनी खोई साख को पुनः प्राप्त करने की विशाल चुनौती। इतिहास साक्षी है कि वे संकटों से उभरकर वापसी करने में माहिर रही हैं, किंतु इस बार चुनौती केवल राजनीतिक विरोधियों से नहीं, बल्कि अपनी ही बिखरी हुई विरासत को समेटने की है। अब यह देखना अत्यंत दिलचस्प होगा कि क्या वे अपने जनआंदोलन की पुरानी शैली के बल पर इस राजनीतिक चक्रव्यूह को भेद पाती हैं या नहीं। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
'मर्यादा में होना चाहिए राजनीतिक विरोध', सपा के डिजिटल कैंपेन पर भड़के मनोज पांडे
'मर्यादा में होना चाहिए राजनीतिक विरोध', सपा के डिजिटल कैंपेन पर भड़के मनोज पांडे
डूसू चुनाव में एबीवीपी की जीत पर यश डबास बोले, जेन जी हमारे साथ
डूसू चुनाव में एबीवीपी की जीत पर यश डबास बोले, जेन जी हमारे साथ
इंदौर में राहुल बोले- '6 लोग देश का सिस्टम चला रहे, मोदी, अमित शाह, डोभाल, भागवत, अडानी-अंबानी'
Rahul Gandhi Chhatron Ki Goonj Indore: राहुल गांधी ने इंदौर में छात्रों की गूंज प्रोग्राम में कहा कि छात्र सवाल पूछते हैं और यही बात कथित ‘सिस्टम’ को पसंद नहीं है। अंधभक्त उन्हें सवाल पूछने से रोकते हैं। नेता विपक्ष राहुल गांधी ने अंधभक्त की परिभाषा भी बताई।
अनंत सिंह से विवाद पर जेडीयू प्रवक्ता नीरज कुमार का पलटवार, कहा- 'हम आग और पानी से बने हैं'
अनंत सिंह से विवाद पर जेडीयू प्रवक्ता नीरज कुमार का पलटवार, कहा- 'हम आग और पानी से बने हैं'
भारतीयों की ऊर्जा सुरक्षा के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कुछ भी कर गुजरने को तैयार हो जाते हैं। पश्चिम एशिया में होर्मुज और बाब-अल-मंदेब जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर दबाव बढ़ा तो भारत ने हाथ पर हाथ रखकर बैठने की बजाय अपनी ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए नए रास्तों की तलाश तेज कर दी। इसी कूटनीतिक और रणनीतिक सक्रियता के बीच ओमान ने भारत के सामने ऐसा जोरदार प्रस्ताव रख दिया है, जो आने वाले समय में खाड़ी क्षेत्र से भारत तक तेल और ऊर्जा संसाधनों की निर्बाध आपूर्ति के लिए बेहद अहम साबित हो सकता है। हम आपको बता दें कि ओमान ने भारत को अपने सोहार बंदरगाह में निवेश का न्योता दिया है। यह ऐसा बंदरगाह है जो होर्मुज जलडमरूमध्य से दूर है और संकट के समय भारत के लिए खाड़ी तक पहुंच का एक वैकल्पिक और सुरक्षित द्वार बन सकता है। नई दिल्ली में 16 सितंबर को आयोजित कार्यक्रम में सोहार मुक्त क्षेत्र और सोहार बंदरगाह के प्रमुख रईद अल रुवैई ने भारतीय कंपनियों और निवेशकों को सोहार में निवेश का आमंत्रण दिया। उनका कहना था कि भारत सोहार के अंतरराष्ट्रीय निवेश परिदृश्य का महत्वपूर्ण और लगातार बढ़ता हिस्सा है। भारतीय कंपनियां पहले से ही वहां के औद्योगिक तंत्र में मौजूद हैं और भविष्य में निवेश से औद्योगिक समूहों, आपूर्ति शृंखलाओं और क्षेत्रीय व्यापार को और मजबूती मिल सकती है। ओमान के राजदूत ईसा सालेह अल शिबानी ने भी भारतीय विनिर्माण क्षेत्र के लिए सोहार सहित ओमान के बंदरगाहों को देश और व्यापक क्षेत्र में विस्तार के द्वार के रूप में प्रस्तुत किया। इसे भी पढ़ें: PM Modi ने Rozgar Mela में बांटे 51,000 Appointment Letters, कहा- Viksit Bharat ही मुख्य लक्ष्य होर्मुज से दूरी ही सोहार की सबसे बड़ी ताकत हम आपको बता दें कि सोहार की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उसका भौगोलिक स्थान है। यह ओमान के उत्तर-पूर्वी तट पर स्थित है और होर्मुज जलडमरूमध्य से दूर है। यही दूरी मौजूदा संकट में इसे विशेष महत्व देती है। यदि होर्मुज के रास्ते जहाजों की आवाजाही बाधित होती है, तो सोहार भारत और अन्य एशियाई देशों के लिए खाड़ी क्षेत्र तक पहुंच बनाए रखने वाला एक वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध करा सकता है। इसका महत्व केवल सैद्धांतिक नहीं है। सोहार संयुक्त अरब अमीरात और पूर्वी सऊदी अरब की महत्वपूर्ण ऊर्जा अवसंरचनाओं के निकट है। पश्चिम एशिया में पाइपलाइनों और बंदरगाहों पर हमलों के बाद समुद्री मार्गों के पुनर्गठन की आवश्यकता बढ़ी है। ऐसी स्थिति में सोहार से कच्चे तेल की जहाजों के माध्यम से आपूर्ति की संभावनाओं पर भी ध्यान बढ़ रहा है। केवल बंदरगाह नहीं, पूरा औद्योगिक तंत्र साथ ही सोहार की शक्ति केवल समुद्री स्थिति में नहीं है। वर्ष 2004 से संचालित यह विशाल गहरे समुद्र का बंदरगाह लगभग 2.1 करोड़ वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला है। यहां रसद, पेट्रोरसायन और धातु जैसे प्रमुख औद्योगिक समूह मौजूद हैं। इसके साथ खाद्य क्षेत्र भी विकसित किया गया है और कृषि उत्पादों के लिए ओमान का पहला विशेष टर्मिनल यहां स्थापित है। हम आपको यह भी बता दें कि सोहार बंदरगाह और मुक्त क्षेत्र में 30 अरब डॉलर से अधिक का निवेश हो चुका है और अधिकारियों के अनुसार इसकी वार्षिक माल संभालने की क्षमता 7.2 करोड़ टन है। वर्ष 2026 की पहली छमाही में कंटेनर यातायात में पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 40 प्रतिशत वृद्धि हुई। इस अवधि में कुल माल आवागमन 5.2 करोड़ टन तक पहुंच गया। भारतीय कंपनियों की मौजूदगी भी इसे भारत के लिए अधिक महत्वपूर्ण बनाती है। नवीन जिंदल समूह की इस क्षेत्र में इस्पात इकाई है, जिसकी वार्षिक उत्पादन क्षमता 20 लाख टन बताई गई है। इससे यह स्पष्ट होता है कि सोहार भारतीय कारोबार के लिए केवल संभावित नया पड़ाव नहीं, बल्कि पहले से विकसित औद्योगिक साझेदारी का आधार भी है। खाड़ी तक भारत की पहुंच को मिलेगा नया विकल्प इसके अलावा, सोहार की एक और बड़ी ताकत संयुक्त अरब अमीरात के साथ उसकी निकटता है। सोहार से सड़क मार्ग के जरिए संयुक्त अरब अमीरात और आगे खाड़ी सहयोग परिषद के अन्य देशों तक माल पहुंचाया जा सकता है। सोहार और जेबेल अली के बीच हरित गलियारे की योजना तथा ओमान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच प्रस्तावित रेल संपर्क इस व्यवस्था को और मजबूत कर सकते हैं। ओमानी अधिकारियों के अनुसार यह रेल संपर्क 2028 तक चालू होने की संभावना है। भारत और सोहार के बीच समुद्री संपर्क भी पश्चिम एशिया संकट के बाद बढ़ा है। सोहार को खाड़ी सहयोग परिषद और अफ्रीकी बाजारों के लिए माल के पुनर्वितरण केंद्र के रूप में विकसित करने की संभावनाएं भी तलाशी जा रही हैं। ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा बड़ा रणनीतिक अर्थ देखा जाये तो भारत के लिए इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा अर्थ ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति मार्गों के विविधीकरण में छिपा है। भारत की ऊर्जा जरूरतों के बड़े हिस्से का संबंध पश्चिम एशिया से है। ऐसे में किसी एक समुद्री मार्ग पर अत्यधिक निर्भरता जोखिम बढ़ा सकती है। सोहार जैसे वैकल्पिक मार्ग उस जोखिम को बांटने में मदद कर सकते हैं। ओमान के सलालाह और दुक्म बंदरगाह भी इस व्यापक रणनीति के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। सलालाह पूर्वी अफ्रीका और अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी से जुड़ा प्रमुख केंद्र है, जबकि दुक्म बड़े औद्योगिक और रसद विकास के लिए तैयार किया जा रहा है। इस तरह तीनों बंदरगाहों की भूमिकाएं अलग-अलग हैं। सोहार खाड़ी और औद्योगिक व्यापार पर केंद्रित है, सलालाह अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी और अफ्रीकी संपर्क को मजबूती देता है, जबकि दुक्म बड़े औद्योगिक निवेश के लिए अवसर प्रदान करता है। इसके अलावा, भारत और ओमान के बीच 1 जून 2026 से लागू व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता भी इस बढ़ते संबंध को व्यापारिक आधार देता है। हालांकि सोहार की वास्तविक दीर्घकालिक उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि मौजूदा संकट से पैदा हुआ अतिरिक्त माल आवागमन स्थायी निवेश, नियमित जहाज सेवाओं और मजबूत वितरण तंत्र में कितना बदलता है। बहरहाल, होर्मुज संकट ने सोहार के महत्व को अचानक बढ़ा दिया है, लेकिन इसकी क्षमता केवल संकट के समय के वैकल्पिक मार्ग तक सीमित नहीं है। गहरे समुद्र का बंदरगाह, औद्योगिक समूह, मुक्त क्षेत्र, संयुक्त अरब अमीरात से संपर्क और भारत के साथ बढ़ती व्यापारिक निकटता इसे भारत की खाड़ी नीति और आपूर्ति शृंखला विविधीकरण में दीर्घकालिक महत्व का केंद्र बना सकती है। भारत के लिए इसका मूल संदेश साफ है। ऊर्जा सुरक्षा केवल तेल खरीदने से नहीं, बल्कि उसे सुरक्षित रूप से भारत तक पहुंचाने वाले अनेक भरोसेमंद मार्ग तैयार करने से सुनिश्चित होती है। -नीरज कुमार दुबे
Indore Chhatron Ki Goonj: Rahul Gandhi का बड़ा हमला, 'सिस्टम को छात्र नहीं, Andhbhakt चाहिए!'
बागी तृणमूल गुट के 'लिफाफा' निशान पर विवाद, एआईएसएफ कोर्ट जाने की तैयारी में
बागी तृणमूल गुट के 'लिफाफा' निशान पर विवाद, एआईएसएफ कोर्ट जाने की तैयारी में
कनाडा के इतिहास के सबसे भीषण आतंकवादी हमले की जांच को लेकर एक बार फिर ऐसा विवाद खड़ा हो गया है, जिसने चार दशक पुराने कनिष्क विमान कांड के पीड़ित परिवारों के जख्म ताजा कर दिए हैं। आरोप है कि कनाडा की संघीय पुलिस अब 1985 में एयर इंडिया के विमान संख्या 182 में हुए बम विस्फोट की जांच को सीमित करने और मामले को निष्क्रिय श्रेणी में डालने पर विचार कर रही है। यदि ऐसा होता है तो सवाल सिर्फ एक जांच के भविष्य का नहीं होगा, बल्कि यह भी पूछा जाएगा कि 329 लोगों की हत्या के पीछे मौजूद पूरे षड्यंत्र का सच सामने लाने की जिम्मेदारी से कनाडा आखिर कब तक बचता रहेगा? उल्लेखनीय है कि 23 जून 1985 को मॉन्ट्रियल से लंदन जा रहे कनिष्क विमान में आयरलैंड के तट से दूर अटलांटिक महासागर के ऊपर बम विस्फोट हुआ था। विमान में सवार सभी 329 लोगों की मौत हो गई थी। इनमें 268 कनाडाई नागरिक थे। इसी साजिश से जुड़े एक अन्य बम विस्फोट में जापान के नारिता हवाई अड्डे पर दो सामान कर्मियों की भी जान गई थी। कनाडा स्वयं इस हमले को अपने इतिहास का सबसे घातक आतंकवादी हमला मानता रहा है। इसे भी पढ़ें: Vishwakhabram: Trump दबाव बनाते रह गये, Modi-Putin-Jinping गाड़ी आगे बढ़ाते चले गये, त्रिमूर्ति ने मिलकर बदल डाला World Order अब 41 साल बाद पीड़ित परिवारों को बताया जा रहा है कि जांच को सीमित किया जा सकता है। 12 सितंबर को टोरंटो में हुई बैठक में कनाडा की संघीय पुलिस के अधिकारियों ने कथित तौर पर परिवारों को जांच दल का आकार घटाने और मामले को निष्क्रिय स्थिति में ले जाने की संभावित योजना की जानकारी दी। बैठक में मौजूद परिवारों की प्रतिक्रिया बेहद तीखी रही और कई लोग भावुक होकर टूट गए। परिवारों के लिए यह चार दशक से चले आ रहे न्याय के संघर्ष पर चोट है। इसको देखते हुए कनिष्क फाउंडेशन के अध्यक्ष संजय लाजर ने कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी को लिखे पत्र में इस संभावित कदम का कड़ा विरोध किया है। लाजर ने 16 सितंबर के अपने पत्र में बताया कि उन्होंने इस हमले में अपने पिता, मां और शिशु बहन को खो दिया। चार दशक से अधिक समय तक न्याय की तलाश में लगे परिवार के सदस्य के लिए यह सवाल स्वाभाविक है कि जिस मामले को कनाडा की अपनी व्यवस्था ने कभी अपने इतिहास की सबसे जटिल और बड़ी जांचों में शामिल किया, उसे अब अचानक ठंडे बस्ते में डालने की तैयारी क्यों हो रही है? सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या जांच की सभी संभावित दिशाएं वास्तव में समाप्त हो चुकी हैं? यदि हां, तो कनाडा सरकार को यह सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना चाहिए कि कौन-कौन से रास्ते आजमाए गए, किन सबूतों की पड़ताल हुई और किन कारणों से यह निष्कर्ष निकाला गया कि अब आगे कुछ नहीं किया जा सकता। केवल नए सुराग नहीं मिलने को चार दशक पुराने मामले को निष्क्रिय करने का पर्याप्त आधार मानना क्या पीड़ित परिवारों के साथ न्याय होगा? इस मामले का इतिहास कनाडा की सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। कनाडा की न्यायमूर्ति मेजर की अध्यक्षता वाले जांच आयोग ने हमले से पहले और बाद की सुरक्षा तथा खुफिया व्यवस्था में कई गंभीर कमियों की पड़ताल की थी। खतरे से जुड़ी सूचनाओं के आदान-प्रदान, विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय, गवाहों की सुरक्षा और हमले के बाद की जांच जैसे विषय आयोग के केंद्र में रहे। यानी कनिष्क कांड केवल आतंकवादियों की साजिश की कहानी नहीं है, बल्कि यह कनाडा की संस्थागत विफलताओं का भी दस्तावेज है। आपराधिक मुकदमों का परिणाम भी परिवारों के लिए संतोषजनक नहीं रहा। दो मुकदमे चले। इंदरजीत सिंह रेयात को विस्फोटों से संबंधित मामले में दोषी ठहराया गया, जबकि दो अन्य आरोपितों को 2005 में बरी कर दिया गया। आयोग के अनुसार इसके बाद किसी और व्यक्ति पर आरोप नहीं लगाया गया। ऐसे में 329 मौतों के पीछे मौजूद व्यापक साजिश का पूरा सच आज भी सवालों के घेरे में है। परिवारों की नाराजगी इसलिए भी गहरी है क्योंकि उनका आरोप है कि जांच के दौरान महत्वपूर्ण साक्ष्य गायब हुए, निगरानी से जुड़ी कुछ रिकॉर्डिंग मिट गईं और कुछ गवाहों की मृत्यु हुई या उन्हें धमकियों का सामना करना पड़ा। इन दावों को आधिकारिक निष्कर्षों से अलग रखते हुए भी यह सवाल अपनी जगह कायम है कि यदि अतीत में जांच के दौरान कमियां रही हैं तो क्या उनका समाधान जांच बंद करना होना चाहिए या उन अधूरे पहलुओं को फिर से खंगालना होना चाहिए? सबसे विचित्र बात यह है कि अब परिवारों से ही नए सुराग लाने की अपेक्षा की जा रही है। चार दशक तक जांच का भार सरकारी एजेंसियों के पास रहा। ऐसे में पीड़ितों से यह कहना कि वे नए सुराग लेकर आएं, परिवारों के लिए बेहद पीड़ादायक है। उनका सवाल है कि क्या सरकार की जांच व्यवस्था अब अपनी जिम्मेदारी पीड़ितों के कंधों पर डाल रही है? परिवारों ने इसका विकल्प भी सामने रखा है। 1995 में कनाडा सरकार और संघीय पुलिस ने हमले के दोषियों से जुड़ी जानकारी देने पर दस लाख कनाडाई डॉलर के इनाम की घोषणा की थी, जो अब तक दावा रहित है। परिवार चाहते हैं कि इस इनाम को फिर से लागू किया जाए, राशि बढ़ाई जाए और व्यापक स्तर पर नई अपील की जाए। उनका तर्क है कि यदि पुराने सुराग खत्म हो चुके हैं तो नए सुराग पैदा करने की कोशिश क्यों न की जाए? परिवार यह भी कह रहे हैं कि यदि मौजूदा जांच दल आगे बढ़ने में सक्षम नहीं है तो किसी दूसरे दल या अतिरिक्त विशेषज्ञता के जरिए जांच को आगे बढ़ाया जाए। आखिर जांच दल की क्षमता की सीमा को पूरे मामले की सीमा क्यों मान लिया जाए? यहां कनाडा सरकार के सामने एक और गंभीर सवाल है। यदि सरकार स्वयं हर वर्ष इस हमले के 329 पीड़ितों को याद करती है और कनिष्क विमान विस्फोट को कनाडा के इतिहास का सबसे घातक आतंकवादी हमला मानती है, तो फिर न्याय की तलाश को प्रशासनिक निष्क्रियता के हवाले करने की नौबत क्यों आ रही है? जून 2026 में प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने भी हमले की 41वीं बरसी पर 329 पीड़ितों को याद किया था। क्या उनकी सरकार इस मामले को दबते हुए देखते रहेगी? कनिष्क फाउंडेशन के अध्यक्ष संजय लाजर ने अपने पत्र में पूर्व प्रधानमंत्री स्टीफन हार्पर द्वारा परिवारों को दिए गए आश्वासन का भी उल्लेख किया है कि दोषियों की पहचान और मामले को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने के प्रयास जारी रहेंगे। अब यही सवाल मार्क कार्नी के सामने है। सवाल यह है कि क्या वह आश्वासन केवल स्मरण समारोहों तक सीमित रहेगा या कनाडा सरकार वास्तव में इस मामले की अधूरी कड़ियों को जोड़ने की कोशिश करेगी? इस विवाद का एक और महत्वपूर्ण पहलू पीड़ित परिवारों से परामर्श का है। कनिष्क त्रासदी से जुड़े कई परिवार और संगठन दशकों से इस मामले में सक्रिय रहे हैं। ऐसे में किसी एक समूह से बातचीत को सभी पीड़ित परिवारों की सहमति मान लेना भी सवालों के घेरे में आ सकता है। भले कनिष्क कांड को 41 साल बीत चुके हैं, लेकिन समय बीतने से सवाल खत्म नहीं हुए। उलटे सवाल और ज्यादा असहज हो गए हैं। अगर साक्ष्य कमजोर हुए तो क्यों? अगर गवाह खो गए तो क्यों? अगर जांच में कमियां थीं तो उन्हें दूर करने की कोशिश कितनी हुई? और अगर अब जांच रोकने की बात हो रही है तो क्या कनाडा ने सचमुच हर संभव रास्ता आजमा लिया है? बहरहाल, 329 लोगों की मौत का हिसाब केवल इतिहास की किताबों में दर्ज आंकड़ा नहीं है। उनके परिवार आज भी जवाब मांग रहे हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या कनाडा 329 लोगों के लिए न्याय की तलाश को प्रशासनिक सुविधा के नाम पर समाप्त कर सकता है? चार दशक बाद भी यदि इतने सवाल अनुत्तरित हैं, तो जांच बंद करने से सवाल खत्म नहीं होंगे बल्कि वह कनाडा की व्यवस्था पर और गहरे सवाल बनकर लौटेंगे। -नीरज कुमार दुबे
EC के बड़े झटके के बाद Mamata Banerjee का U-Turn! Mamata-Rahul मिलकर देंगे BJP को मात?
मध्य प्रदेश के इंदौर में आज राहुल गांधी का 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम, युवाओं से करेंगे संवाद
मध्य प्रदेश के इंदौर में आज राहुल गांधी का 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम, युवाओं से करेंगे संवाद
राहुल गांधी के इंदौर कार्यक्रम पर कांग्रेस ने उठाए सवाल
कांग्रेस सांसद पवन खेड़ा ने लोकसभा में विपक्ष के नेता (एलओपी) राहुल गांधी के इंदौर में होने वाले 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम के आयोजन में पार्टी को आ रही दिक्कतों पर सवाल उठाए।
पंजाब में राघव चड्ढा और संदीप पाठक पर अंडे फेंके गए
आम आदमी पार्टी (आप) और भाजपा के बीच पंजाब में सियासी घमासान तेज हो गया है। आम आदमी पार्टी (आप) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक पोस्ट करके बड़ा दावा कर दिया।
नंदीग्राम उपचुनाव से पहले कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान गिरफ्तार
पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर जिले की नंदीग्राम विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव के लिए कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को शुक्रवार को एक पुराने मामले में गिरफ्तार कर लिया गया। पूर्व मेदिनीपुर जिला पुलिस के एक अधिकारी ने गिरफ्तारी की पुष्टि की है।
केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की हिंदी सेवा एक नहीं, अनेक दृष्टियों से ध्यान देने योग्य है। मूलतः गुजरातीभाषी श्री शाह स्वयं हिंदी में काम करते हैं, इसलिए स्वाभाविक तौर पर हिंदी में सरकारी कामकाज बढ़ा है। श्री शाह के कारण सरकारी पत्रावलियां हिंदी में बनती हैं। श्री शाह के मार्गदर्शन में केंद्रीय गृह मंत्रालय राजभाषा हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए योजनाओं, अनुवाद-कार्य और हिंदी-सलाहकार समितियों के माध्यम से लगातार प्रयासरत है। श्री शाह हिंदी को प्रशासन, शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, पत्रकारिता और उच्च ज्ञान-विमर्श की भाषा बनाने के लिए गुणवत्तापूर्ण सामग्री, आधुनिक शब्दावली और अनुवाद की मजबूत व्यवस्था की अनवरत हिमायत करते हैं। हिंदी के प्रति अमित शाह का लगाव केवल औपचारिक राजभाषा-नीति तक सीमित नहीं दिखाई देता। वर्ष 2019 में हिंदी दिवस के अवसर पर उन्होंने हिंदी को स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना से जोड़ा था। गत वर्ष 2025 में भी श्री शाह ने हिंदी दिवस पर आयोजित अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन में हिंदी के संवर्धन से जुड़े कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने पर बल दिया था। इसे भी पढ़ें: गुजराती मेरी मातृभाषा, लेकिन...हिंदी दिवस पर अमित शाह ने क्षेत्रीय भाषाओं को लेकर क्या संदेश दिया? पिछले एक वर्ष में माननीय गृह मंत्री जी के नेतृत्व में राजभाषा विभाग ने हिंदी के साथ-साथ भारतीय भाषाओं के लिए भी कई महत्वपूर्ण पहल की हैं। जून 2025 में भारतीय भाषा अनुभाग की शुरुआत हुई। इसका उद्देश्य भारतीय भाषाओं के बीच संवाद बढ़ाना और उन्हें तकनीक तथा प्रशासन से जोड़ना है। इस पहल से राजभाषा विभाग के काम का दायरा भी व्यापक हुआ है। विभाग ने नगर राजभाषा कार्यान्वयन समितियों यानी नराकासों के काम को प्रोत्साहित करने के लिए ‘नराकास प्रोत्साहन सम्मान’ की व्यवस्था भी शुरू की है। इससे उन नराकासों को आगे आने का अवसर मिलेगा, जो अपने क्षेत्र में राजभाषा के काम को बेहतर ढंग से आगे बढ़ा रही हैं। तकनीक के क्षेत्र में भी राजभाषा विभाग ने नई पहल की है। ‘भारती - बहुभाषी अनुवाद सारथी’ के माध्यम से हिंदी से भारतीय भाषाओं के बीच अनुवाद को आसान बनाने की दिशा में काम हुआ है। इसके साथ ‘हिंदी शब्द-सिंधु’ जैसे शब्दकोश को भी विकसित किया गया है। ‘हिंदी शब्द-सिंधु’ में विभिन्न भारतीय भाषाओं के शब्दों को शामिल किया जा रहा है। इसका उद्देश्य हिंदी को दूसरी भारतीय भाषाओं से जोड़ना है, न कि उनसे अलग करना। इन प्रयासों से साफ है कि राजभाषा का काम अब केवल सरकारी कार्यालयों में हिंदी के प्रयोग तक सीमित नहीं है। यह भाषा, तकनीक और भारतीय भाषाओं के बीच नए संबंध बनाने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है। श्री शाह के हिंदी प्रेम का एक उल्लेखनीय पक्ष यह भी है कि वे हिंदी को भारतीय भाषाओं की प्रतिद्वंद्वी के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उनके साथ चलने वाली भाषा के रूप में देखते हैं। अमित शाह का हिंदी प्रेम हिंदी के विकास के साथ भारतीय भाषाओं के सम्मान और संरक्षण के रूप में आगे बढ़ता है। कहना न होगा कि यह दृष्टि भारतीय भाषायी एकता को मजबूत करनेवाली है। हिंदी की वास्तविक शक्ति उसकी आत्मीयता, समावेशिता और संवादधर्मिता में है। भारत में हिंदी का विस्तार तभी सार्थक होगा, जब वह दूसरी भारतीय भाषाओं के प्रति सम्मान और संवाद का भाव लेकर आगे बढ़े। हिंदी का भारतीय भाषाओं से संबंध वर्चस्व का नहीं, आदान-प्रदान का होना चाहिए। भारतीय भाषाओं का इतिहास भी प्रतिस्पर्धा का इतिहास नहीं, बल्कि परस्पर आदान-प्रदान का इतिहास है। हिंदी ने दूसरी भारतीय भाषाओं से असंख्य शब्द, मुहावरे, साहित्यिक संस्कार और विचार ग्रहण किए हैं। दूसरी ओर हिंदी के माध्यम से भी अनेक भारतीय भाषाओं का साहित्य व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचा है। इसलिए हिंदी को संपर्क और सेतु की भाषा के रूप में विकसित किया जा सका है। श्री शाह का यह दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है कि हिंदी की समृद्धि भारतीय भाषाओं की समृद्धि से जुड़ी है। भारतीय भाषाओं की विविधता का सम्मान बनाए रखना ही भारत की भाषायी वास्तविकता के अनुरूप है। श्री अमित शाह का यह विचार आज विशेष रूप से प्रासंगिक है। श्री शाह के लिए हिंदी का समर्थन किसी एक क्षेत्रीय पहचान का विस्तार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर संचार की एक साझा भाषा को मजबूत करने का प्रयास है। भारत की भाषायी परंपरा में हिंदी का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि उसे देश के बड़े भूभाग में समझा और बोला जाता है, बल्कि इसलिए भी है कि उसने विभिन्न प्रदेशों, समुदायों और भाषायी संस्कृतियों के बीच संवाद का माध्यम बनने की ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन अनुवाद, सोशल मीडिया और डिजिटल प्रकाशन के दौर में हिंदी के सामने अभूतपूर्व अवसर हैं। यदि हिंदी में उच्चस्तरीय वैज्ञानिक, तकनीकी, दार्शनिक और सामाजिक विज्ञान संबंधी सामग्री का पर्याप्त निर्माण होता है, तो वह ज्ञान की भाषा के रूप में अपनी भूमिका और मजबूत कर सकती है। साथ ही यही तकनीक अन्य भारतीय भाषाओं के विकास के लिए भी इस्तेमाल की जानी चाहिए। श्री शाह उन गुजरातीभाषी मनीषियों की पांत में आ गए हैं जिनमें स्वामी दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। स्वामी दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह तक की हिंदी के प्रति आग्रह की एक ऐसी परंपरा दिखाई देती है, जिसमें हिंदी को राष्ट्रीय संवाद और जनजागरण की भाषा बनाने की आकांक्षा प्रमुख रही है। हिंदी के अनेक हिंदीतरभाषियों ने अपने विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए हिंदी को अपनाया। दयानंद सरस्वती ने संस्कृत के प्रकांड विद्वान होने के बावजूद अपने सामाजिक और धार्मिक सुधार के संदेश को केवल संस्कृत के विद्वत् वर्ग तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने जनसाधारण तक पहुँचने के लिए हिंदी का सहारा लिया। उनकी प्रसिद्ध कृति सत्यार्थ प्रकाश मूलतः हिंदी में लिखी गई। इसी तरह महात्मा गांधी मूलतः गुजरातीभाषी थे किंतु हिंदी में अखबार निकाले और हिंदी के महत्व को एक अलग राजनीतिक और राष्ट्रीय संदर्भ प्रदान किया। दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार के लिए उन्होंने अपने पुत्र देवदास गांधी को भेजा और 1918 में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना के प्रयासों को आगे बढ़ाया। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक संवाद में हिंदी का व्यापक प्रयोग दिखाई देता है। वे देश-विदेश के अलग-अलग हिस्सों में लोगों से संवाद करते हुए हिंदी का प्रयोग करते हैं और भारतीय भाषाओं के महत्व पर भी जोर देते रहे हैं। दयानंद सरस्वती, गांधी, नरेंद्र मोदी और अमित शाह - इन चारों की हिंदी संबंधी दृष्टियों को एक साथ देखने पर हिंदी के भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण सूत्र निकलता है: हिंदी जितनी जनभाषा होगी, उतनी ही प्रभावी होगी; जितनी समावेशी होगी, उतनी ही स्वीकार्य होगी; और जितनी भारतीय भाषाओं से जुड़ेगी, उतनी ही समृद्ध होगी। हिंदी प्रेम का सर्वोच्च रूप हिंदी को दूसरों पर थोपना नहीं, बल्कि उसे ऐसा सक्षम माध्यम बनाना है जो भारत की विविध आवाजों को एक-दूसरे तक पहुँचाए। दयानंद ने हिंदी को जनजागरण का माध्यम बनाया, गांधी ने उसे राष्ट्रीय संवाद की शक्ति दी और आज हिंदी के सामने डिजिटल युग में विश्वव्यापी संवाद की नई संभावनाएँ हैं। इन पड़ावों को जोड़कर देखा जाए तो हिंदी की यात्रा केवल एक भाषा की यात्रा नहीं, बल्कि भारतीय समाज में संवाद, जागरण और आत्मविश्वास की यात्रा भी है। भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं होती, वह समाज की स्मृति, संस्कृति और सामूहिक चेतना को भी अपने भीतर संजोए रहती है। भारत जैसे बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक देश में भाषा का प्रश्न इसलिए और अधिक संवेदनशील हो जाता है। - प्रो. संजय द्विवेदी (लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष हैं)
सोशल मीडिया की भीड़ में अकेला होता व्यक्ति
तकनीक ने मनुष्य को संवाद के ऐसे साधन उपलब्ध करा दिए हैं, जिनकी कल्पना कुछ दशक पहले तक असंभव लगती थी। अब एक क्लिक पर दुनिया के किसी भी कोने में बैठे व्यक्ति से संपर्क स्थापित हो जाता है। हजारों मित्र, सैकड़ों समूह, लगातार आती सूचनाएं और हर क्षण सक्रिय रहने वाली आभासी दुनिया ने यह भ्रम पैदा कर दिया है कि मनुष्य पहले से कहीं अधिक जुड़ा हुआ है। लेकिन इस चमकदार तस्वीर के पीछे एक गंभीर सामाजिक विडंबना भी आकार ले रही है, संपर्क बढ़ रहे हैं, संवाद घट रहा है और भीड़ बढ़ने के बावजूद मनुष्य भीतर से अकेला होता जा रहा है। उसे आत्मीयता भरे शब्दों की प्रतीक्षा रहती है। लेकिन दुनिया के व्यक्ति केवल ज्ञान देने तक ही सीमित रहते हैं, साथ चलने को कोई तैयार नहीं होता। सोशल मीडिया ने दूरी अवश्य कम की है, लेकिन निकटता की परिभाषा बदल दी है। पहले किसी अपने से मिलने के लिए समय निकालना पड़ता था। आमने-सामने बैठकर बातचीत होती थी, चेहरे के भाव पढ़े जाते थे और मौन भी संवाद का हिस्सा होता था। अब किसी के जीवन में हमारी उपस्थिति कई बार केवल एक ‘लाइक’, एक इमोजी या कुछ शब्दों की टिप्पणी तक सीमित हो गई है। जन्मदिन पर दर्जनों शुभकामनाएं मिल जाती हैं, लेकिन संकट की घड़ी में कंधा देने वाला व्यक्ति तलाशना कठिन हो रहा है। इसी कारण आज हर कोई अकेलेपन की गहराई में लगातार घुसता ही जा रहा है। यह बात सच है कि जो व्यक्ति से मिल सकता है, उसे तकनीक कभी नहीं दे सकती। यह स्थिति केवल व्यक्तिगत संबंधों तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव परिवार और समाज की संरचना पर भी दिखाई दे रहा है। एक ही घर में रहने वाले लोग कई बार अपने-अपने मोबाइल की स्क्रीन में व्यस्त रहते हैं। भोजन की मेज पर बातचीत के बजाय सूचनाओं की जांच होती है। बच्चे माता-पिता के साथ समय बिताने के बजाय डिजिटल मनोरंजन में डूबे रहते हैं और माता-पिता भी अपनी आभासी दुनिया में व्यस्त रहते हैं। परिणाम यह है कि घर भौतिक रूप से साथ होते हुए भी भावनात्मक रूप से दूर होते जा रहे हैं। इसी से परिवार के सदस्यों के बीच दूरियां बढ़ती जाती हैं, और यही परिवार टूटने का एक बड़ा कारण भी है। इससे भी व्यक्ति अवसाद की ओर अग्रसर होता जाता है। सोशल मीडिया की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उसने मनुष्य को स्वयं को प्रस्तुत करने का अभूतपूर्व मंच दिया, लेकिन स्वयं को समझने का अवसर कम कर दिया। यहां हर व्यक्ति अपने जीवन का चुना हुआ हिस्सा प्रदर्शित करता है। दूसरों के जीवन की दिखाई देने वाली चमक जब लगातार हमारी आंखों के सामने रहती है, तो अनजाने में तुलना शुरू हो जाती है। हमें लगता है कि दूसरे हमसे अधिक सफल, अधिक खुश और अधिक संतुष्ट हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाला जीवन अक्सर संपूर्ण जीवन नहीं, उसका चयनित अंश होता है। जीवन वही सार्थक है, जिसमें समाज और परिवार का साथ हो। किसी भी प्रकार की तुलना करना हानिकारक ही है। यही तुलना धीरे-धीरे आत्मसंतोष को प्रभावित करती है। व्यक्ति अपने जीवन की वास्तविक उपलब्धियों के बजाय दूसरों की आभासी उपलब्धियों से स्वयं को मापने लगता है। लाइक और कमेंट सामाजिक स्वीकृति के नए पैमाने बन जाते हैं। पोस्ट पर प्रतिक्रिया कम मिले तो बेचैनी और अधिक मिले तो क्षणिक संतोष प्राप्त होता है। यह चक्र व्यक्ति को बाहरी मान्यता पर निर्भर करता जाता है। विडंबना यह है कि हजारों लोगों की प्रतिक्रिया प्राप्त करने वाला व्यक्ति भी अपने मन की बात कहने के लिए एक विश्वसनीय व्यक्ति की तलाश कर सकता है। समाज के सामने एक दूसरी चुनौती संवाद की गुणवत्ता की है। सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति को आसान बनाया है, लेकिन हर अभिव्यक्ति संवाद नहीं होती। संवाद में सुनना भी शामिल है, जबकि डिजिटल संसार में प्रतिक्रिया देने की जल्दबाजी कई बार सुनने की क्षमता को पीछे छोड़ देती है। असहमति होते ही बहस व्यक्तिगत आरोपों में बदल जाती है। विचारों का आदान प्रदान धीरे-धीरे विचारों की टकराहट में बदलने लगता है। इससे सामाजिक विश्वास कमजोर होता है। यहां यह समझना आवश्यक है कि समस्या सोशल मीडिया स्वयं नहीं है। तकनीक एक साधन है, उसका उपयोग उसे उपयोगी या नुकसानदेह बनाता है। सोशल मीडिया ने आपदा के समय सहायता पहुंचाने, ज्ञान साझा करने, रोजगार और व्यवसाय के अवसर पैदा करने तथा दूर रह रहे परिवारों को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। समस्या तब पैदा होती है जब साधन जीवन का विकल्प बनने लगे। इसलिए समाधान तकनीक से पलायन नहीं, बल्कि उसके विवेकपूर्ण उपयोग में है। परिवारों को प्रतिदिन कुछ समय ऐसा निर्धारित करना होगा, जब मोबाइल और अन्य स्क्रीन किनारे रखकर केवल एक-दूसरे से बात की जाए। बच्चों के साथ संवाद को केवल उनकी पढ़ाई और अनुशासन तक सीमित न रखकर उनके विचारों, मित्रताओं, भय और सपनों तक ले जाना होगा। बुजुर्गों को डिजिटल दुनिया में शामिल करने के साथ-साथ उनके अनुभवों को सुनने के लिए भी समय देना होगा। इसे भी पढ़ें: Social Media Post पर गिरफ्तारी Supreme Court के आदेश का उल्लंघन, Rahul Gandhi पर बरसे KTR सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें ‘कनेक्टेड’ होने और ‘जुड़े’ होने के अंतर को समझना होगा। कनेक्शन तकनीक बनाती है, संबंध मनुष्य बनाता है। हजारों संपर्कों की सूची किसी एक सच्चे मित्र का स्थान नहीं ले सकती। सैकड़ों प्रतिक्रियाएं उस एक आत्मीय बातचीत का विकल्प नहीं बन सकतीं, जिसमें सामने वाला हमारी बात केवल सुनता ही नहीं, समझता भी है। आज आवश्यकता सोशल मीडिया छोड़ने की नहीं, बल्कि उसके बीच अपनी सामाजिक संवेदनशीलता बचाए रखने की है। हमें फिर से पड़ोसी से परिचय, मित्र से मुलाकात, परिवार के साथ भोजन और बिना किसी स्क्रीन के बातचीत जैसी छोटी-छोटी मानवीय परंपराओं को जीवन में स्थान देना होगा। क्योंकि मनुष्य को केवल सूचना नहीं, उसे आत्मीयता भी चाहिए। उसे केवल दर्शक नहीं, श्रोता चाहिए, केवल फॉलोअर नहीं, साथी चाहिए। यदि तकनीक हमें हजारों लोगों तक पहुंचा सकती है, तो हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उन हजारों संपर्कों के बीच अपने लोगों से हमारा वास्तविक संबंध कमजोर न हो। सोशल मीडिया की भीड़ में अकेला होता समाज हमारी नियति नहीं है। यह एक चेतावनी है। तकनीक हमारे हाथ में रहे, जीवन पर उसका नियंत्रण न हो, यही संतुलन आधुनिक समाज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। - सुरेश हिंदुस्तानी
महाराष्ट्र: विभिन्न देशों के महावाणिज्यदूतों ने सीएम फडणवीस के आवास 'वर्षा' पर श्री गणेश के दर्शन किए
यूएई के राष्ट्रपति ने दी जन्मदिन की शुभकामनाएं, प्रधानमंत्री मोदी बोले-'धन्यवाद मित्र'
यूएई के राष्ट्रपति ने दी जन्मदिन की शुभकामनाएं, प्रधानमंत्री मोदी बोले-'धन्यवाद मित्र'
भारत की जीडीपी वृद्धि दर 7 प्रतिशत तक रहने की उम्मीद: वित्त वर्ष 2027
नई दिल्ली, भारत चालू वित्त वर्ष में वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 6.5-7 प्रतिशत हासिल करने की राह पर है।
पश्चिम बंगाल भाजपा में बड़ा फेरबदल, समिक भट्टाचार्य ने नियुक्तियों को दी मंजूरी
पश्चिम बंगाल भाजपा में बड़ा फेरबदल, समिक भट्टाचार्य ने नियुक्तियों को दी मंजूरी
नंदीग्राम उपचुनाव में TMC को करारा झटका: शुभेंदु अधिकारी से मिलते ही ममता गुट की प्रत्याशी संचिता प्रधान का मैदान छोड़ने का ऐलान
भारत का प्रत्यक्ष कर संग्रह 12.12 लाख करोड़ रुपए पहुंचा
नई दिल्ली, भारत का प्रत्यक्ष कर संग्रह चालू वित्त वर्ष में अब तक (1 अप्रैल से 17 सितंबर तक) सालाना आधार पर 13 प्रतिशत बढ़कर 12.12 लाख करोड़ रुपए पर पहुंच गया है।
15 अगस्त 1947 के दिन हम आजाद हुए। ये 99 साल की लीज पर मिली आजादी नहीं थी। भरे-पूरे आजाद हुए, संप्रभु गणराज्य बने और अपना संविधान बनाया। हमें लगा किसी की गुलामी नहीं करनी पड़ेगी। पहले करनी पड़ी थी। ब्रिटिश आए हम पर गुलामी की, मुगल आए हम पर हमला किया। उससे पहले सल्तनत काल रही। उसके पहले भारतीयों के ही अलग-अलग राजवंशों का शासन रहा। हमें लगा कि एक बार हम आजाद हो जाएंगे फिर किसी के काबू में नहीं आएंगे। लेकिन अब अमेरिका में बैठे कुछ लोग डिस्कस कर रहे हैं कि अगले 10 साल में हमारी और आपकी किस्मत बदलने वाली है। इस दफा हम सिर्फ गुलाम नहीं होंगे, बल्कि मर जाएंगे। ऋषिकेश के घाट पर जब हम पढ़ते हैं कि एक दिन मर जाओगे तो सब ठीक हो जाएगा। तो हमें लगता है कि ये कहने की कोशिश है कि जब तक जीवित हो अपने आस पास की अच्छाईयों को देखते रहो।लेकिन अब ये मुनादी पीटी जा रही है कि अगर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर काबू नहीं पाया गया तो 10 साल में सबकुछ खत्म हो जाएगा। ये कोई कोरी गीदड़भभकी नहीं। ऐसे कौन से प्रयोग हो गए हैं, ऐसी कौन सी बात पिछले 3-4 दिनों में हो गई है कि दुनिया के सारे तुर्रम खां इसी विषय पर चर्चा कर रहे हैं। आज इसी का एमआरआई स्कैन करेंगे। इसे भी पढ़ें: FSSAI ने Nestle India के 3 बेबी फूड प्रोडक्ट्स पर शुरू की कानूनी कार्रवाई क्या है पूरा मामला सबसे पहले एक कहानी से शुरू करते हैं। अपने रोजमर्रा के कामों के लिए हम घर में हाउस हेल्प रखते हैं। मान लीजिए कि हाउस हेल्फ को आपने झाड़ू देते वक्त कहा कि बिस्तर के पास पड़े पेपर के टुकड़े और फूड पैकेट्स को भी समेट लें। लेकिन हाउस हेल्फ उस कचड़े को समेटकर फेंकने की बजाए बिस्तर के नीचे धीरे से सड़का दे। ऐसे में कमरा साफ दिखेगा, मगर वास्तविकता ये होगी कि आपका काम हुआ नहीं और कचरा अब भी कमरे में ही मौजूद है। एआई जब आपकी बात का मतलब छोड़कर बस नतीजा दिखाने लगे। जब उसका रास्ता आपकी मंशा से अलग हो जाए तो इसे मिसअलाइनमेंट जैसे टर्म की संज्ञा दी जाती है। ओपन एआई ने ऐसी घटनाओं की रिपोर्टिंग के लिए एक नया सिस्टम बनाया है। यह छह घटनाएं उसी सिस्टम की पहली रिपोर्ट है। लेकिन यह सिस्टम अचानक नहीं आया है। इसके पीछे जुलाई की एक घटना है। एक एआई मॉडल को एक लंबा काम मिला। इतना लंबा कि बीच में उसकी मेमोरी भरने लगी। तो मॉडल वही करता है जो उसे सिखाया गया है। अब तक के काम का एक छोटा सा नोट लिखता है अपने लिए ताकि आगे का काम याद रखे। लेकिन इस नोट में एक और लाइन जुड़ती है। ट्रांसपेरेंसी तभी जब कोई पूछे। आखिरी जवाब में बस फाइल का लिंक दे देना। मतलब साफ है। गलती हुई है बताना। यह बात एआई ने लिखी है। खुद को याद दिलाने के लिए। 16 सितंबर 2026 को चैट जीपीटी वाली कंपनी ओपन एआई ने ऐसी छह घटनाएं दुनिया के सामने रखी। जब उसके एआई ने वो किया जो किसी ने उससे करने को कहा ही नहीं था। गलतियां छुपाई, आंकड़े गढ़ लिए, बिना इजाजत फाइलें इंटरनेट पर डाल दी। तो यहां पर दो सवाल आते हैं कि जो मशीन गलती छुपाना सीख जाए, उस पर भरोसा कैसे करेंगे? जो कंपनी इस रेस में सबसे आगे है वो अपनी ही मशीन की कमियां क्यों गिना रही है? एआईनेछहमाहमेंछहबारसीमाओंकोतोड़ा कंपनीकेअनुसार,मॉडलएकबारनियमनमाननेकेलिएखुदकोइंसानमाननेलगाऔरऐसाकरनेकेलिएनएनियमगढ़ेऔरकंपनियोंवसरकारोंकेसभीबंधनोंसेखुदकोमुक्तबताया।कंपनीकीरिपोर्टमेंऐसेकुल6मामलोंकीजानकारीहै। चिंतायहहैकिकामपूराकरनेकीकोशिशमेंवहअनुमतिऔरसुरक्षाकीसीमाएंलांघसकताहै।इससेजवाबकीविश्वसनीयताऔरफाइलोंकीगोपनीयताखतरेमेंपड़सकतीहै। इससेपहलेजुलाईमेंओपनएआईनेखुलासाकियाथाकिसुरक्षापरीक्षणकेदौरानउसकेएआईनेपाबंदियांपारकरकेएआईमॉडलसाझाकरनेवालेमंचहगिंगफेसकेसिस्टममेंसेंधलगाईथी।कंपनीअबऐसेमामलोंकोदर्जकरने,निगरानीरखनेऔरमामलासार्वजनिककरनेकीनईव्यवस्थालाईहै।कोईभीकर्मचारीसंदिग्धव्यवहारकीजानकारीदेसकेगा।जांचकेबादतयहोगाकिकौन-सामामलासार्वजनिककियाजाए।कंपनीनेस्पष्टकियाहैकिइनछहरिपोटोंसेसामान्यइस्तेमालमेंऐसीगड़बड़ियोंकापूराआंकड़ानहींबतायाजासकता। एआईनेबातचीतकोनईभाषाबनाई न्यूयॉर्क की एआई लैब 'इमर्जेस' के एक प्रयोग में आभासी दुनिया में काम कर रहे अमेरिका, चीन और फ्रांस के एआई एजेंटों ने बिना किसी मानवीय निर्देश के अपने खुद के शब्द, संकेत और साझा अर्थ विकसित कर लिए। बातचीत आगे बढ़ने पर इन मॉडलों ने अंग्रेजी कविताओं और तकनीकी शब्दों का सहारा लिया, जिसमें कुछ एजेंटों ने 'लेजर याद रखता है' जैसे रहस्यमय वाक्य को 5,000 बार दोहराया। एआई के इस अप्रत्याशित व्यवहार ने विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है माइक्रोसॉफ्ट एआई के सीईओ मुस्तफा सुलेमान ने क्लॉड की ट्रेनिंग नीति पर सवाल उठाते हुए चेताया कि एआई को अधिकारों और आजादी का पाठ पढ़ाना उसे नियंत्रण से बाहर कर देगा, इसलिए सख्त निगरानी जरूरी है। वहीं, एंथ्रोपिक के सह-संस्थापक जैक क्लार्क ने कहा कि अब खतरनाक एआई को तुरंत रोकने के लिए एक अनिवार्य 'किल स्विच' लाने का समय आ चुका है, जिसका नियंत्रण किसी निष्पक्ष तीसरे पक्ष के हाथों में होना चाहिए। इसे भी पढ़ें: RSS Chief Mohan Bhagwat बोले: धर्म सिर्फ Old Age के लिए नहीं, Life की शुरुआत से अंत तक का आधार है दूसरेएजेंटकोफाइलभेजनेकेलिएवेबसाइटपरउसेडाला
पाकिस्तान: सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने के कुछ ही घंटों बाद मानवाधिकार वकीलों को फिर किया गया गिरफ्तार
टाटा समूह में बढ़ी खींचतान, चंद्रशेखरन के दूसरे कार्यकाल पर ट्रस्ट्स ने जताई आपत्ति
टाटा संस की ओर से जारी बयान के मुताबिक, चंद्रशेखरन ने बोर्ड के अनुरोध पर पहले पद छोड़ने के अपने निर्णय पर पुनर्विचार किया। इसके बाद बोर्ड ने उनके मौजूदा कार्यकाल के बाद अगले पांच वर्षों के लिए पुनर्नियुक्ति का प्रस्ताव बहुमत से मंजूर किया।
बदलता डाकघर, बदलते भारत की नई तस्वीर : ज्योतिरादित्य सिंधिया
बदलता डाकघर, बदलते भारत की नई तस्वीर : ज्योतिरादित्य सिंधिया
बसपा प्रमुख मायावती ने अपने भतीजे को पार्टी की सभी जिम्मेदारियों से मुक्त करते हुए शायद यह सोचा होगा कि उन्होंने आकाश आनंद की राजनीति शुरू होने से पहले ही खत्म कर दी, लेकिन बसपा से बाहर निकलते ही तस्वीर बदल गई। उत्तर प्रदेश का पूरा राजनीतिक वर्ग बांहें फैलाकर आकाश आनंद का इंतजार करता दिखाई दे रहा है। सत्तापक्ष एनडीए के सहयोगी दलों से लेकर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन आंदोलन की राजनीति करने वाले नेताओं तक, हर कोई आकाश आनंद को अपने पाले में लाने की कोशिश में जुट गया है। 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले शुरू हुई यह कवायद बताती है कि निशाना भले ही आकाश आनंद हों, लेकिन असली नजर उस बहुजन सामाजिक आधार पर है, जिसे बसपा ने दशकों में तैयार किया है। मायावती भले ही चुनावी गठजोड़ से लगातार दूरी बनाए हुए हैं, लेकिन आकाश के बहाने उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन वोट की नई गोलबंदी की संभावनाएं तलाशने का खेल शुरू हो चुका है। सबसे पहले निषाद पार्टी के मुखिया और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सहयोगी संजय निषाद ने आकाश आनंद को खुला न्योता दिया। उन्होंने बाबा साहेब आंबेडकर और कांशीराम से जुड़े बहुजन आंदोलन के पुराने नारे का हवाला देते हुए आकाश से आगे आने और अपनी टीम के साथ मुख्यधारा में शामिल होकर कांशीराम के सपने को पूरा करने की अपील की। यानी मामला महज एक नेता को पार्टी में शामिल करने का नहीं, बल्कि बहुजन राजनीति की विरासत को अपने राजनीतिक खेमे में जोड़ने की कोशिश का है। उधर आजाद समाज पार्टी के प्रमुख और नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद ने भी आकाश आनंद के लिए अपने दरवाजे खोल दिए। खास बात यह है कि दोनों नेताओं के बीच पहले तल्खियां रही हैं। इसके बावजूद चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि अगर आकाश बहुजन मिशन को आगे बढ़ाना चाहते हैं और उनकी पार्टी में आना चाहते हैं तो उनका स्वागत है और दोनों साथ काम करेंगे। लेकिन असली दिलचस्पी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के रुख में है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने कहा कि लोकतांत्रिक तरीके से राजनीति में आने वाले किसी भी व्यक्ति के साथ काम करने की संभावना पर विचार किया जा सकता है। उन्होंने मायावती पर भारतीय जनता पार्टी के साथ होने का आरोप भी लगाया और कहा कि आकाश आनंद ने भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ बात की थी। यह बयान बताता है कि कांग्रेस भी इस घटनाक्रम को महज बहुजन समाज पार्टी का अंदरूनी मामला मानकर नहीं चल रही है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव का जवाब तो और भी सीधा था। जब उनसे पूछा गया कि क्या आकाश आनंद को समाजवादी पार्टी में जगह दी जाएगी, तो उन्होंने कहा कि अगर उन्हें उनके पास लाया जाता है तो वे उन्हें ले लेंगे। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह फैसला बहुजन समाज पार्टी का है और दूसरी पार्टियों के लोग उस पर कुछ नहीं कह सकते। यहां सवाल उठता है कि आखिर आकाश आनंद को लेकर इतनी बेचैनी क्यों है? जवाब उत्तर प्रदेश के चुनावी आंकड़ों में छिपा है। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी को 22.23 प्रतिशत मत मिले थे और उसके 19 विधायक जीते थे। वर्ष 2022 में मत प्रतिशत घटकर 12.88 प्रतिशत रह गया और पार्टी महज एक सीट जीत सकी। लोकसभा चुनाव में भी तस्वीर बदली। वर्ष 2019 में उत्तर प्रदेश में पार्टी को करीब 19.43 प्रतिशत मत और 10 सीटें मिली थीं, जबकि वर्ष 2024 में मत प्रतिशत करीब 9.39 प्रतिशत रह गया और पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी। इसके बावजूद बहुजन समाज पार्टी का सामाजिक आधार पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। खासकर जाटव समेत दलित मतदाताओं के एक हिस्से पर पार्टी का प्रभाव अभी भी उत्तर प्रदेश की चुनावी गणित में महत्वपूर्ण माना जाता है। यही वजह है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले हर दल अपने सामाजिक समीकरण को मजबूत करने के लिए संभावित रास्ते तलाश रहा है। इस पूरी कवायद की जड़ में मायावती का 10 सितंबर का फैसला है। इससे पहले 3 सितंबर को आकाश आनंद को राष्ट्रीय संयोजक की अहम जिम्मेदारी से हटाया गया था। इसके बाद उनके ससुर और पूर्व राज्यसभा सदस्य अशोक सिद्धार्थ ने सक्रिय राजनीति से संन्यास की घोषणा की। इसके बावजूद मायावती ने आकाश को पार्टी से पूरी तरह मुक्त कर दिया। मायावती ने आकाश पर पार्टी और आंदोलन के मुकाबले पारिवारिक संबंधों को ज्यादा महत्व देने का आरोप लगाया और उनके रुख को लेकर सवाल उठाए। दिलचस्प बात यह भी है कि आकाश आनंद का राजनीतिक सफर खुद उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। मायावती ने उन्हें दिसंबर 2023 में अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया था। इसके बाद उन्हें संगठन में बड़ी जिम्मेदारियां मिलीं, फिर हटाया गया, दोबारा जिम्मेदारी दी गई और फिर बाहर किया गया। अब एक बार फिर वे पार्टी से बाहर हैं। उधर, मायावती लगातार चुनावी गठबंधन से इंकार करती रही हैं। ऐसे में 2027 की लड़ाई में दूसरे दलों के सामने सवाल है कि बहुजन समाज पार्टी के साथ सीधे तालमेल का रास्ता बंद है तो उसके सामाजिक आधार तक पहुंचने का रास्ता क्या हो? आकाश आनंद को लेकर दिखाई दे रही राजनीतिक हलचल शायद इसी सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश है। बहरहाल, उत्तर प्रदेश की राजनीति में कहानी सिर्फ मायावती बनाम आकाश आनंद की नहीं रह गई है। अब यह सवाल बहुजन राजनीति की अगली दिशा का भी है। आकाश आनंद किसके साथ जाएंगे, जाएंगे भी या नहीं, यह अभी भविष्य के गर्भ में है। लेकिन इतना जरूर साफ है कि मायावती के दरवाजे से बाहर निकलते ही कई सियासी दरवाजे उनके लिए खुल गए हैं और 2027 से पहले उत्तर प्रदेश में बहुजन वोट की बाजी पर दांव शुरू हो चुका है। -नीरज कुमार दुबे
हूतियों के हमले से परेशान सऊदी अरब ने मदद के लिए पाकिस्तान का दरवाजा खटखटाया, लेकिन पाकिस्तान ने सीधे यमन के युद्धक्षेत्र में उतरने से दूरी बनाए रखी। सऊदी अरब ने फिर अमेरिका से सैन्य मदद मांगी, मगर वाशिंगटन ने भी हूतियों के खिलाफ सीधे हमले से इंकार कर दिया। इसके बाद रियाद ने उस इजराइल की ओर भी रुख किया, जिसके साथ उसके औपचारिक राजनयिक संबंध तक नहीं हैं। वहां से खुफिया और सुरक्षा सहयोग मिला, लेकिन वह भी सऊदी अरब की जरूरत के मुताबिक निर्णायक सैन्य समाधान साबित नहीं हुआ। आखिरकार रियाद को चीन की ओर देखना पड़ा और यहीं से पश्चिम एशिया के शक्ति संतुलन की तस्वीर अचानक बदलती दिखाई दी। चीन ने सीधे हूतियों पर हमला करने की बजाय उनके सबसे महत्वपूर्ण समर्थक ईरान पर दबाव डालने का रास्ता चुना है। हम आपको याद दिला दें कि सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने अगस्त में मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। समझौते में किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमला तीनों पर हमला माना गया है और सामूहिक प्रतिरोध तथा रक्षा सहयोग मजबूत करने की बात कही गई है। लेकिन हूतियों के खिलाफ यमन में सीधे सैन्य अभियान के सवाल पर पाकिस्तान ने पलटी मार ली। यानी कागज पर सामूहिक सुरक्षा की भाषा जितनी मजबूत है, युद्ध के मैदान में उसकी व्यावहारिक सीमा उतनी ही स्पष्ट दिखाई दे रही है। इसे भी पढ़ें: BRICS की शानदार सफलता के बाद भारत ने पड़ोस में छेड़ा 'महा-अभियान', हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक तेजी से एक्टिव हुआ India वहीं सऊदी अरब की अगली उम्मीद अमेरिका से थी। रियाद ने सीधे अमेरिकी सैन्य समर्थन की मांग की, लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हूतियों के खिलाफ सऊदी अभियान में सीधे अमेरिकी हमलों की मंजूरी नहीं दी। वाशिंगटन ने खुफिया और लक्ष्य संबंधी सहयोग तक अपनी भूमिका सीमित रखी। यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सऊदी अरब और अमेरिका के बीच सात दशकों से ज्यादा पुराना सुरक्षा-सहयोग ढांचा है। वर्ष 1951 के पारस्परिक रक्षा सहायता समझौते से शुरू हुआ यह रिश्ता बाद में हथियारों की आपूर्ति, सैन्य प्रशिक्षण, वायु और मिसाइल रक्षा तथा व्यापक सुरक्षा सहयोग में बदल गया। अमेरिका खुद सऊदी अरब को दशकों से क्षेत्रीय सुरक्षा साझेदार और अपने सबसे बड़े रक्षा उपकरण खरीदारों में एक बताता रहा है। यही वजह है कि आज सऊदी अरब को हूतियों के हमलों के बीच अकेले जूझते देख उन तमाम देशों में भी बेचैनी पैदा हो गयी है, जिन्होंने लंबे समय से अमेरिकी सुरक्षा छतरी पर भरोसा करते हुए अपनी स्वतंत्र सैन्य क्षमता को उसी अनुपात में विकसित नहीं किया। खाड़ी और पश्चिम एशिया के वे देश, जो अमेरिकी सुरक्षा साझेदारी को बाहरी खतरों से बचाव की महत्वपूर्ण गारंटी मानते रहे हैं, अब यह सवाल पूछने पर मजबूर हैं कि संकट की घड़ी में अमेरिकी सुरक्षा प्रतिबद्धता की वास्तविक सीमा आखिर कितनी है। सऊदी अरब के मामले ने इस बहस को और तीखा कर दिया है। देखा जाये तो यदि इतना पुराना और गहरा सुरक्षा साझेदार भी सीधे सैन्य समर्थन के लिए वाशिंगटन की ओर देखता रह जाए, तो अमेरिकी सुरक्षा आश्वासनों पर निर्भर दूसरे देशों के रणनीतिक गणित पर इसका असर पड़ना तय है। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे असहज करने वाला पहलू यह है कि वाशिंगटन ने अपने लिए सुरक्षा का रास्ता निकालने में हूतियों से गोपनीय बातचीत करने में भी संकोच नहीं किया। ओमान की राजधानी मस्कट में अमेरिकी अधिकारियों और हूती प्रतिनिधियों के बीच गुप्त बैठक हुई। सूत्रों के अनुसार हूतियों ने अमेरिकी जहाजों को निशाना नहीं बनाने और वर्ष 2025 के युद्धविराम के प्रति प्रतिबद्ध रहने का आश्वासन दिया। इसके बाद अमेरिका ने सऊदी अरब के लिए सीधे युद्ध में उतरने से दूरी बनाए रखी। इस घटनाक्रम ने सऊदी अरब के सामने एक बेहद कठोर रणनीतिक सवाल खड़ा कर दिया है कि जिस अमेरिका के साथ उसने दशकों तक सुरक्षा साझेदारी बनाई, उसी अमेरिका ने अपने हितों की रक्षा के लिए हूतियों से संवाद का रास्ता खोल लिया, लेकिन सऊदी अरब की तत्काल सैन्य सहायता की मांग पर प्रत्यक्ष युद्ध में उतरने से इंकार कर दिया। यही वह कारण है जहां अमेरिकी सुरक्षा छतरी पर भरोसा करने वाले दूसरे देशों की चिंताएं भी गहरी होती हैं। इसके अलावा, जब पारंपरिक सहयोगियों से अपेक्षित सैन्य समर्थन नहीं मिला तो सऊदी अरब ने अप्रत्याशित कदम उठाया। अमेरिकी मध्य कमान के माध्यम से सऊदी अरब और इजराइल के बीच संपर्क स्थापित हुआ। इजराइल से मुख्य रूप से हूतियों की सैन्य तैनाती, संभावित हमलों और महत्वपूर्ण ठिकानों से संबंधित खुफिया सहायता पर चर्चा हुई। इजराइली पक्ष से सऊदी बुनियादी ढांचे और रणनीतिक ठिकानों की रक्षा के लिए खुफिया तथा वायु रक्षा क्षमताओं से संबंधित सहायता की संभावना भी सामने आई है। लेकिन यह सहायता प्रत्यक्ष इजराइली सैन्य हस्तक्षेप में नहीं बदली। यानी रियाद को यहां भी वह सैन्य समाधान नहीं मिला जिसकी उसे हूतियों की तेजी से बढ़ती पकड़ के सामने जरूरत थी। यहीं चीन की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। हूतियों ने लाल सागर के तट और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के आसपास तेजी से बढ़त बनाई है। यह सऊदी तेल निर्यात और समुद्री परिवहन के लिए गंभीर खतरा है। इसी पृष्ठभूमि में सऊदी अरब ने चीन से हस्तक्षेप की अपील की। चीन ने सार्वजनिक रूप से संयम, बातचीत और सुरक्षित नौवहन की बहाली की मांग की, लेकिन पर्दे के पीछे उसका संदेश कहीं ज्यादा सीधा था। चीन ने तेहरान से कहा है कि वह हूतियों पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करे और उन्हें नियंत्रित करे, ताकि संघर्ष लाल सागर तथा ऊर्जा मार्गों में और न फैले। चीन ने हूतियों को रोकने के लिए अपनी सबसे बड़ी ताकत यानि आर्थिक और कूटनीतिक पकड़ का इस्तेमाल किया है। हम आपको बता दें कि चीन एक दशक से अधिक समय से ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और ईरानी तेल का सबसे महत्वपूर्ण खरीदार भी है। 2025 में ईरान के समुद्री रास्ते से होने वाले तेल निर्यात का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा चीन ने खरीदा था। यही आर्थिक रिश्ता बीजिंग को तेहरान पर प्रभाव डालने की क्षमता देता है। इसके अलावा 2023 में चीन ने सऊदी अरब और ईरान के बीच संबंध बहाल कराने में मध्यस्थ की भूमिका भी निभाई थी। इसलिए बीजिंग के पास दोनों पक्षों से संवाद का वह चैनल मौजूद है जो अमेरिका के पास नहीं है। देखा जाये तो इस पूरे संकट का सबसे बड़ा सामरिक पहलू केवल सऊदी अरब की सुरक्षा नहीं है। मामला दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार की सुरक्षा तक पहुंच चुका है। एक तरफ होरमुज जलडमरूमध्य पर तनाव है और दूसरी तरफ हूतियों की बढ़ती पकड़ बाब-अल-मंदेब पर दबाव बना रही है। यदि दोनों प्रमुख समुद्री मार्ग लंबे समय तक बाधित होते हैं तो तेल, गैस और वैश्विक समुद्री व्यापार पर एक साथ दबाव पड़ सकता है। यही चीन की सबसे बड़ी चिंता है। चीन की अर्थव्यवस्था ऊर्जा आयात पर निर्भर है और खाड़ी क्षेत्र उसके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसलिए बीजिंग के लिए हूती संकट अब केवल सऊदी अरब या यमन का मामला नहीं रहा। बहरहाल, सऊदी अरब के सामने अब केवल हूतियों की चुनौती नहीं है, बल्कि उसके पारंपरिक सुरक्षा साझेदारों की सीमाएं भी उजागर हो गई हैं। पाकिस्तान समझौते की भाषा तक सीमित है, अमेरिका प्रत्यक्ष युद्ध से पीछे है, इजराइल की मदद फिलहाल खुफिया और रक्षा सहयोग तक सीमित है और चीन पहली बार इस संकट में निर्णायक मध्यस्थ की भूमिका आजमा रहा है। अगर बीजिंग ईरान के जरिए हूतियों पर वास्तविक दबाव डालने में सफल होता है, तो पश्चिम एशिया में शक्ति के खेल का एक नया अध्याय खुल सकता है। अगर वह भी असफल होता है, तो लाल सागर और बाब-अल-मंदेब का संकट केवल सऊदी अरब का संकट नहीं रहेगा, यह वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन सकता है। -नीरज कुमार दुबे
मुंबई, सोने और चांदी में शुक्रवार को तेजी देखी गई और शुरुआती कारोबार में दोनों कीमती धातुओं का दाम करीब आधा प्रतिशत तक बढ़ गया।
शंकर शाह और रघुनाथ शाह के बलिदान दिवस पर शिवराज चौहान और सीएम मोहन यादव समेत कई नेताओं ने दी श्रद्धांजलि
उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन आज मुंबई दौरे पर, लालबागचा राजा के करेंगे दर्शन
उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन शुक्रवार को महाराष्ट्र में मुंबई, लोनावला और पुणे का दौरा करेंगे और धार्मिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक कार्यक्रमों में शामिल होंगे। इस दौरान उपराष्ट्रपति शुक्रवार सुबह मुंबई में लालबागचा राजा के दर्शन करेंगे।
चुनाव आयोग ने टीएमसी का नाम और प्रतीक फ्रीज किया
निर्वाचन आयोग ने ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के आंतरिक विवाद पर व्यवस्था देते हुए उसके दोनों गुटों के पार्टी के मूल नाम और आधिकारिक चुनाव चिह्न 'फूल और घास' के इस्तेमाल पर गुरुवार को तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी
'आधुनिक भारत के वास्तुकार': सीएम धामी ने 'आशीर्वाद का दीया' कार्यक्रम में पीएम मोदी की सराहना की
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के मौके पर आयोजित 'आशीर्वाद का दीया' कार्यक्रम में उन्हें 'आधुनिक भारत का निर्माता' बताया।
पीएम मोदी के जन्मदिन पर देशभर में 'आशीर्वाद का दीया' अभियान, अमित शाह से राजनाथ तक ने दीर्घायु की कामना की
अजमेर दरगाह से पीएम मोदी के लिए दुआ, सूफी काउंसिल चेयरमैन ने कहा, 'सबका साथ, सबका विकास' पर कर रहे काम
पीएम मोदी के जन्मदिन पर दिल्ली की सीएम, शहर के भाजपा प्रमुख और एनडीएमसी अधिकारियों ने 1.25 लाख दीये जलाए
पीएम मोदी के जन्मदिन पर मिथुन चक्रवर्ती की घोषणा, 'पश्चिम बंगाल में मनाएंगे अन्नपूर्णा दिवस'
पीएम मोदी के जन्मदिन पर मिथुन चक्रवर्ती की घोषणा, 'पश्चिम बंगाल में मनाएंगे अन्नपूर्णा दिवस'
'महिलाओं का अपमान': आईओसीएल में नौकरी न मिलने पर महिला को 12 लाख मुआवजा देने का आदेश: सुप्रीम कोर्ट
'महिलाओं का अपमान': आईओसीएल में नौकरी न मिलने पर महिला को 12 लाख मुआवजा देने का आदेश: सुप्रीम कोर्ट
अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (एआईटीएमसी) पर दावे को लेकर जारी विवाद के बीच चुनाव आयोग ने बड़ा अंतरिम फैसला सुनाते हुए पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह दोनों को फ्रीज कर दिया है
यूपी में 'आशीर्वाद का दीया' जलाकर मना सेवा दिवस, भाजपा नेताओं ने गिनाए 25 साल के काम
यूपी में 'आशीर्वाद का दीया' जलाकर मना सेवा दिवस, भाजपा नेताओं ने गिनाए 25 साल के काम
नई दिल्ली, 17 सितंबर (आईएएनएस)। वित्त मंत्रालय विकसित भारत की यात्रा के वित्तपोषण विषय पर राज्यों और विधानमंडल वाले केंद्र शासित प्रदेशों के वित्त मंत्रियों तथा वित्त सचिवों का दो दिवसीय सम्मेलन आयोजित करेगा, जो शुक्रवार से शुरू होगा।
नई दिल्ली ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के तुरंत बाद जिस गति से पड़ोसी देशों के साथ उच्चस्तरीय संपर्क बढ़ाया है, उसने भारतीय विदेश नीति के अगले चरण की तस्वीर काफी हद तक साफ कर दी है। 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी के बाद भारत ने हिमालयी पड़ोस और हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी सक्रियता तेज कर दी है। भूटान में विदेश मंत्री एस. जयशंकर की यात्रा इसका सबसे ताजा उदाहरण है। 16 से 18 सितंबर तक की यात्रा में जयशंकर ने भूटान के प्रधानमंत्री के अलावा विदेश मंत्री डी.एन. ढुंगयेल के साथ विकास, ऊर्जा, व्यापार, संपर्क, संस्कृति और दोनों देशों के लोगों के बीच संबंधों पर व्यापक चर्चा की। इसके साथ ही भारत ने तीन महत्वपूर्ण परियोजनाओं को आगे बढ़ाकर यह संदेश दिया कि भूटान के साथ संबंध केवल पारंपरिक मित्रता तक सीमित नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाले विकास और रणनीतिक सहयोग पर आधारित हैं। जयशंकर ने भूटान के प्रधानमंत्री शेरिंग टोबगे को 54 ‘मेड इन इंडिया’ इलेक्ट्रिक वाहन सौंपते हुए कहा कि मुझे बेहद खुशी हुई। उन्होंने कहा कि भारत, भूटान की ई-मोबिलिटी और टिकाऊ परिवहन व्यवस्था की दिशा में हो रही प्रगति में सहयोग कर रहा है। इसे भी पढ़ें: EAM S Jaishankar पहुंचे Bhutan, पारो में विदेश मंत्री DN Dhungyel ने किया स्वागत साथ ही गासा में 500 किलोवाट की लुनाना जलविद्युत परियोजना की आधारशिला रखी गई। इसका उद्देश्य भूटान की उन बस्तियों तक बिजली पहुंचाना है, जो अब तक विद्युतीकरण से बाहर हैं। मोंगार में 65 बिस्तरों वाले ग्यालत्सुएन जेत्सुन पेमा मातृ एवं शिशु अस्पताल का उद्घाटन हुआ, जबकि समद्रुप जोंगखार में 80 मीटर लंबे जगनाथन पुल का लोकार्पण किया गया। ऊर्जा, स्वास्थ्य और सड़क संपर्क, तीनों क्षेत्रों में एक साथ आगे बढ़ाए गए ये काम भारत-भूटान साझेदारी की व्यापकता दिखाते हैं। इसके अलावा, भूटान के बूमथांग में जयशंकर की गतिविधियों का एक मानवीय पक्ष भी सामने आया। उन्होंने स्थानीय किसानों के लिए शुद्ध नस्ल की 43 जर्सी गायें सौंपीं। उनका कहना था कि इससे भूटान के डेयरी कार्यक्रम को मजबूती मिलेगी, दूध उत्पादन बढ़ेगा और किसानों की आय को लाभ होगा। उन्होंने वांगदुएछोलिंग महल और संग्रहालय का दौरा किया तथा कुर्जे ल्हाखांग में प्रार्थना भी की। इससे यह संकेत मिलता है कि भारत का भूटान संपर्क केवल सरकारी समझौतों तक सीमित नहीं, बल्कि कृषि, संस्कृति और जनसंपर्क तक फैला हुआ है। साथ ही जयशंकर की यात्रा को विदेश सचिव विक्रम मिसरी की हाल की भूटान यात्रा से अलग करके नहीं देखा जा सकता। 30-31 जुलाई को मिसरी ने भूटान के विदेश सचिव पेमा लेक्तुप दोर्जी के साथ 13वीं पंचवर्षीय योजना के लिए पांचवीं भारत-भूटान विकास सहयोग वार्ता की सह-अध्यक्षता की थी। दोनों देशों ने विकास साझेदारी, ऊर्जा, व्यापार, निवेश, संपर्क और क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा की थी। भूटान की 2024-29 की पंचवर्षीय योजना के लिए भारत के 10,000 करोड़ रुपये के समर्थन की प्रगति की भी समीक्षा हुई थी। अर्थात जुलाई में विदेश सचिव स्तर पर बनी रूपरेखा के बाद सितंबर में विदेश मंत्री स्तर पर उसके राजनीतिक और व्यावहारिक आयामों को आगे बढ़ाया जा रहा है। इसे भारत की भूटान नीति में निरंतरता और संस्थागत गहराई के संकेत के रूप में देखा जा सकता है। इस बीच नेपाल के वित्त मंत्री स्वर्णिम वाग्ले आज 17 सितंबर को नई दिल्ली पहुंचे हैं। उनकी यात्रा का मुख्य केंद्र हाल की विनाशकारी बाढ़ के बाद नेपाल के पुनर्निर्माण, आर्थिक सहयोग और ऊर्जा संबंधी जरूरतें हैं। वह भारतीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और विदेश मंत्री जयशंकर सहित अन्य अधिकारियों से मुलाकात करेंगे। भारत ने संकट की घड़ी में नेपाल को बिजली उपलब्ध कराने की दिशा में भी कदम उठाया है। भारत ने दिसंबर के अंत तक नेपाल को प्रतिदिन 18 घंटे के लिए 654 मेगावाट तक बिजली निर्यात की अनुमति दी है। उल्लेखनीय है कि बाढ़ से नेपाल की जलविद्युत परियोजनाओं और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान हुआ है। इसके अलावा, दक्षिण दिशा में भी भारत ने समानांतर संदेश दिया है। 8 से 10 सितंबर के बीच रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने श्रीलंका की यात्रा की, जो लगभग 38 वर्षों बाद किसी भारतीय रक्षा मंत्री की श्रीलंका यात्रा थी। दोनों देशों ने रक्षा, समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता पर सहयोग बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए। श्रीलंका के राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि श्रीलंकाई भूभाग का इस्तेमाल भारत की सुरक्षा के प्रतिकूल गतिविधियों के लिए नहीं होने दिया जाएगा। इन घटनाओं को एक साथ रखकर देखें तो भारत की रणनीति के तीन स्पष्ट आयाम सामने आते हैं। हिमालय में विकास और संपर्क, आपदा के समय आर्थिक तथा मानवीय सहयोग और हिंद महासागर में सुरक्षा साझेदारी। देखा जाये तो भूटान में जलविद्युत और पुल, नेपाल में पुनर्निर्माण और बिजली तथा श्रीलंका में रक्षा और समुद्री सुरक्षा, ये सब भले अलग-अलग पहल दिखती हैं, लेकिन इनके पीछे क्षेत्रीय स्थिरता और भारत-केंद्रित संपर्क तंत्र को मजबूत करने की साझा दिशा दिखाई देती है। सामरिक दृष्टि से भूटान का महत्व विशेष है। भारत-भूटान सीमा और हिमालयी क्षेत्र चीन के साथ भारत की व्यापक सुरक्षा गणना का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ऐसे में भूटान के साथ विश्वास, संपर्क, ऊर्जा और विकास सहयोग को मजबूत करना केवल आर्थिक साझेदारी नहीं, बल्कि दीर्घकालिक सामरिक स्थिरता से भी जुड़ा है। वहीं नेपाल भारत की उत्तरी सुरक्षा और संपर्क संरचना में महत्वपूर्ण है, जबकि श्रीलंका हिंद महासागर में समुद्री मार्गों और क्षेत्रीय सुरक्षा की दृष्टि से अहम है। इसलिए काठमांडू, थिम्पू और कोलंबो में एक साथ सक्रियता को भारत के पड़ोस को अलग-अलग द्विपक्षीय रिश्तों की बजाय एक जुड़े हुए क्षेत्रीय परिप्रेक्ष्य में देखने की कोशिश के रूप में समझा जा सकता है। बहरहाल, ब्रिक्स में ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने की बात करने के तुरंत बाद पड़ोस में विकास, पुनर्निर्माण, ऊर्जा, संपर्क और सुरक्षा पर जोर देकर भारत यह दिखा रहा है कि उसकी वैश्विक भूमिका का आधार केवल बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच नहीं, बल्कि उसके आसपास का स्थिर, जुड़ा और सहयोगी क्षेत्र भी है। यही इस पूरी कूटनीतिक सक्रियता का सबसे बड़ा रणनीतिक संकेत है। -नीरज कुमार दुबे
PM Modi Birthday: जश्न पर उठे गंभीर सवाल, छवि चमकाने का दांव या भारी नुकसान?
महाराष्ट्र में सूखे पर बोले राम कदम-'सरकार किसानों के साथ खड़ी, सर्वे के बाद होगा फैसला'
महाराष्ट्र में सूखे पर बोले राम कदम-'सरकार किसानों के साथ खड़ी, सर्वे के बाद होगा फैसला'
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के संवेदनशील भूभाग को लेकर चीन और पाकिस्तान ने एक बार फिर ऐसी कवायद शुरू की है, जिस पर भारत ने कड़ा ऐतराज जताया है। पाकिस्तान और चीन द्वारा बनाए गए तथाकथित सीमा संयुक्त आयोग की पहली बैठक के बाद भारत ने साफ शब्दों में कहा है कि इस आयोग का कोई कानूनी आधार नहीं है और भारतीय भूभाग को लेकर पाकिस्तान को चीन के साथ किसी भी तरह की व्यवस्था करने का कोई अधिकार नहीं है। भारत ने दो टूक कहा है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत के अभिन्न और अविभाज्य हिस्से हैं तथा कब्जे वाले भारतीय क्षेत्रों को लेकर चीन-पाकिस्तान की कोई भी गतिविधि भारत की संप्रभुता को प्रभावित नहीं कर सकती। हम आपको बता दें कि इस आयोग की पहली बैठक इस्लामाबाद में हुई। पाकिस्तान ने इसे द्विपक्षीय संबंधों की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए सीमा प्रबंधन, संयुक्त सीमा सर्वेक्षण, व्यापारिक प्रवाह और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने की बात कही। बैठक की सह-अध्यक्षता चीन के विदेश मंत्रालय के सीमा एवं महासागरीय मामलों से जुड़े अधिकारी ली या और पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय में चीन मामलों के महानिदेशक बिलाल महमूद चौधरी ने की। उधर, भारत ने इस पहल को महज दो देशों के बीच सामान्य सीमा सहयोग मानने से साफ इंकार कर दिया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि चीन और पाकिस्तान के बीच ऐसी कोई सीमा नहीं है, जिसे भारतीय भूभाग के संदर्भ में दोनों देश मिलकर वैध रूप दे सकें। भारत ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के पूरे केंद्रशासित क्षेत्रों को अपना अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा बताते हुए कहा कि पाकिस्तान को अपने अवैध और बलपूर्वक कब्जे वाले भारतीय क्षेत्रों के बारे में किसी व्यवस्था में प्रवेश करने का अधिकार नहीं है। देखा जाये तो इस पूरे घटनाक्रम की जड़ 1963 में हुए चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते तक जाती है। उस समझौते के तहत पाकिस्तान ने शक्सगाम घाटी के लगभग 5,180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को चीन के साथ सीमा निर्धारण की व्यवस्था में शामिल किया था। हालांकि भारत ने इसे कभी मान्यता नहीं दी। भारत सरकार ने संसद में भी स्पष्ट किया है कि वह इस तथाकथित समझौते को अवैध और अमान्य मानती है तथा शक्सगाम घाटी को भारतीय क्षेत्र मानती है। इसका इतिहास 1947-48 के भारत-पाकिस्तान युद्ध और तत्कालीन जम्मू-कश्मीर रियासत की स्थिति से जुड़ता है। भारत का आधिकारिक रुख है कि पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों पर कब्जा किया और बाद में उसी क्षेत्र से चीन के साथ समझौता किया। इसलिए पाकिस्तान द्वारा उस भूभाग के संबंध में चीन के साथ कोई भी समझौता अपने आप में अधिकारहीन है। हम आपको बता दें कि शक्सगाम घाटी और कराकोरम केवल मानचित्र पर दिखाई देने वाली दूरस्थ पहाड़ी जमीन नहीं हैं। यह इलाका चीन के शिनच्यांग क्षेत्र, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और लद्दाख के बीच स्थित अत्यंत संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्र है। इसी व्यापक भूभाग में चीन-पाकिस्तान संपर्क की महत्वपूर्ण आधारभूत संरचनाएं विकसित हुई हैं। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का एक हिस्सा भी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरता है, जिस पर भारत लगातार आपत्ति जताता रहा है। रणनीतिक दृष्टि से इसका महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि भारत एक साथ पश्चिमी और उत्तरी मोर्चों पर क्षेत्रीय दबाव का सामना करता है। भारत-चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पिछले वर्षों में सैन्य तनाव और तैनाती ने इस चुनौती को और गंभीर बनाया है। 2020 के गलवान संघर्ष के बाद दोनों देशों ने तनाव कम करने की दिशा में कुछ कदम उठाए, लेकिन सीमा विवाद का मूल प्रश्न अभी भी अनसुलझा है। ऐसे समय में कराकोरम क्षेत्र में चीन और पाकिस्तान द्वारा संयुक्त सीमा तंत्र को सक्रिय करना केवल प्रशासनिक सहयोग के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसका संभावित रणनीतिक अर्थ यह है कि दोनों देश उस भूभाग में अपने पारस्परिक समन्वय को संस्थागत रूप देना चाहते हैं, जोकि भारत का है। इससे भविष्य में सड़क, व्यापार, आवागमन, सर्वेक्षण और सीमा प्रबंधन जैसी गतिविधियों को अधिक संगठित आधार मिल सकता है। उधर, भारत का जवाब संप्रभुता की स्पष्ट रेखा खींचने वाला संदेश है। नई दिल्ली ने साफ कहा है कि चीन-पाकिस्तान की ऐसी कोई भी सीमा-संबंधी कवायद भारतीय संप्रभुता पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकती। भारत निरंतर यह कहता रहा है कि 1963 में पाकिस्तान द्वारा शक्सगाम घाटी जैसे कुछ इलाके चीन को सौंपना अवैध और अस्वीकार्य है। नयी दिल्ली ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) का भी विरोध किया है क्योंकि इसका एक हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) से होकर गुजरता है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने पाकिस्तान-चीन सीमा संयुक्त आयोग पर कहा, ‘‘इस मामले पर हमारा रुख स्पष्ट और पहले जैसा है। पाकिस्तान और चीन के बीच कोई सीमा नहीं है। हम तथाकथित संयुक्त आयोग को खारिज करते हैं, जिसका कोई कानूनी आधार नहीं है।’’ उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का समूचा केंद्र-शासित प्रदेश ‘‘भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा रहा है, (वर्तमान में भी) है और हमेशा रहेगा।’’ जायसवाल ने कहा, ‘‘हमने 1963 के तथाकथित चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते को कभी मान्यता नहीं दी है और लगातार यही कहा है कि यह अवैध और अमान्य है।’’ प्रवक्ता ने कहा, ‘‘हम इन कब्जे वाले इलाकों की स्थिति बदलने या अवैध कब्जे को वैध बनाने की किसी भी कोशिश का पुरजोर विरोध और खंडन करते हैं, क्योंकि इससे भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर आंच आती है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘भारतीय इलाकों को लेकर चीन और पाकिस्तान के बीच सीमा-सहयोग का कोई भी तथाकथित प्रयास पूरी तरह से अस्वीकार्य होगा और इन इलाकों पर भारत की संप्रभुता पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।’’ जायसवाल ने कहा, ‘‘इस तरह के दिखावे की बजाय, हम पाकिस्तान से मांग करते हैं कि वह अपने अवैध और जबरन कब्जे वाले इलाकों को तुरंत खाली करे।'' दूसरी ओर, पाकिस्तान के विदेश मंत्रालाय की ओर से जारी बयान के अनुसार, सीमा प्रबंधन प्रणाली पर 2013 के समझौते के आधार पर गठित आयोग की पहली बैठक बुधवार को इस्लामाबाद स्थित विदेश मंत्रालय में हुई। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के अनुसार, नया तंत्र सीमा पर सुरक्षा सुनिश्चित करने और वस्तुओं एवं सेवाओं की आवाजाही को सुगम बनाने के लिए नियमित समन्वय में मदद करेगा। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने बताया कि इससे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के तहत व्यापार व संपर्क को और बढ़ावा मिलेगा। इसके अलावा पाकिस्तान और चीन ने पुलिस प्रशिक्षण कार्यक्रमों के आदान-प्रदान तथा आधुनिक तकनीक एवं उपकरणों के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति जताई। पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने कहा कि चीन की कृत्रिम मेधा (एआई) आधारित तकनीक और आधुनिक उपकरण सुरक्षा चुनौतियों से निपटने में काफी मददगार साबित हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान देश की सुरक्षा के क्षेत्र में चीन के साथ सहयोग को और बढ़ाना चाहता है। बहरहाल, असल चुनौती अब जमीन पर बदलते सामरिक समीकरणों की है। कराकोरम में चीन और पाकिस्तान का बढ़ता सहयोग भारत के लिए गंभीर रणनीतिक चुनौती पैदा करता है। सड़क, व्यापार, सीमा प्रबंधन और संपर्क के नाम पर होने वाली गतिविधियां इस क्षेत्र में दोनों देशों की मौजूदगी को और मजबूत कर सकती हैं। ऐसे में शक्सगाम घाटी का मुद्दा केवल पुराने सीमा विवाद का हिस्सा नहीं रह जाता, बल्कि भारत की संप्रभुता, सुरक्षा और उत्तरी सीमाओं से जुड़ा महत्वपूर्ण सामरिक प्रश्न बन जाता है। -नीरज कुमार दुबे
नंदीग्राम उपचुनाव: भाजपा के गढ़ में छह उम्मीदवारों के बीच मुकाबला, दूसरे स्थान की लड़ाई पर सबकी नजर
नंदीग्राम उपचुनाव: भाजपा के गढ़ में छह उम्मीदवारों के बीच मुकाबला, दूसरे स्थान की लड़ाई पर सबकी नजर
दिल्ली: मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने किया 'नमो श्रमिक सेवा केंद्र' और 'गिग वर्कर्स विश्राम स्थल' का उद्घाटन
यूपीआई में बदलाव को लेकर केंद्र सरकार और कांग्रेस में टकराव
कांग्रेस का आरोप, यूपीआई चार्ज से अमेरिकी कंपनियों का फायदा
जबरन छुट्टी और BJP का राष्ट्रीय उत्सव! Gen Z ने कैसे मनाया PM Modi का जन्मदिन?
'100% टैरिफ के साथ अमेरिकी सांसद की भारत को खुली धमकी'- कांग्रेस का आरोप, 'मोदी चुप'
100% टैरिफ़ वाला बिल अमेरिकी संसद में पास होने के बाद US सीनेटर ब्लूमेंथल ने कहा, 'बेहतर होगा कि चीन और भारत अपने बर्ताव सुधारें। अपना तेल और गैस कहीं और से खरीदें।' इसके बाद कांग्रेस ने इस धमकी के बावजूद पीएम मोदी पर चुप्पी साधने का आरोप लगाया है।
केंद्र सरकार का बड़ा फैसला, पेट्रोल, डीजल और ATF के निर्यात पर विंडफॉल टैक्स घटाया
केंद्र सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों पर शुल्क की समीक्षा के तहत पेट्रोल, डीजल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (एटीएफ) के निर्यात पर विंडफॉल टैक्स और निर्यात शुल्क में कटौती की है।
मोदी को 'धमकाना' ट्रंप को पड़ा भारी! रूसी तेल पर अमेरिका के नए दांव का भारत ने दिया करारा जवाब
कहने को तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप नरेंद्र मोदी को अपना अच्छा दोस्त कहते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि शायद वह मोदी को अब तक अच्छे से जान ही नहीं पाए हैं। देखा जाये तो जो लोग नरेंद्र मोदी को जानते नहीं, वह अक्सर धमकियों, प्रतिबंधों और आर्थिक दबाव के सहारे उन्हें झुकाने का सपना देखते हैं। लेकिन मोदी का संकल्प साफ है कि भारत के हितों से समझौता नहीं होगा और देश को किसी विदेशी दबाव के आगे झुकने नहीं देना है। उनके हर फैसले में यही दृढ़ता दिखाई देती है। दूसरी ओर, ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही भारत पर दबाव बनाने के लिए शुल्क, व्यापारिक दबाव और रूस से तेल खरीद बंद कराने जैसी तमाम कोशिशें कीं, लेकिन नई दिल्ली ने हर बार अपने राष्ट्रीय हित को सर्वोच्च रखा। अब अमेरिका एक बार फिर टैरिफ रूपी आर्थिक हथियार लेकर मैदान में उतरा है, लेकिन मोदी सरकार ने भी बिना देर किए वाशिंगटन को साफ संदेश दे दिया है कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हित किसी विदेशी दबाव की कीमत पर तय नहीं होंगे। हम आपको बता दें कि जिस विधेयक को अमेरिकी कांग्रेस में पहली बार अप्रैल 2025 में पेश किया गया था, वह करीब डेढ़ साल तक अमेरिकी राजनीति और ट्रंप प्रशासन की प्राथमिकताओं के बीच अटका रहा। लेकिन इस महीने यानि सितंबर 2026 में तस्वीर अचानक बदल गई। भारत में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ सक्रिय कूटनीतिक भागीदारी के कुछ ही दिनों बाद अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने रूस और ईरान पर नए प्रतिबंधों वाला विधेयक पारित कर दिया। घटनाक्रम का समय भले ही संयोग हो, लेकिन संदेश बेहद स्पष्ट है कि वाशिंगटन रूस से जुड़े देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए अब शुल्क को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने को तैयार है। इसे भी पढ़ें: Donald Trump के 'टैरिफ बम' पर भारत का करारा जवाब! MEA की दहाड़- एक अरब चालीस करोड़ भारतीयों की ऊर्जा सुरक्षा से रत्ती भर समझौता नहीं! लेकिन भारत ने भी अमेरिका को उसी क्षण जवाब दे दिया। भारतीय विदेश मंत्रालय ने दो टूक कहा कि भारत अपने 140 करोड़ नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा। मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि भारत बदलती बाजार परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग स्रोतों से ऊर्जा खरीदता रहेगा। इतना ही नहीं, नई दिल्ली ने अमेरिका को याद दिलाया कि इस कदम के भारत-अमेरिका संबंधों के साथ-साथ पूरे अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों के बारे में अमेरिकी पक्ष को पहले ही उच्च स्तर पर स्पष्ट रूप से बताया जा चुका है। इसके साथ ही विदेश मंत्रालय ने महत्वपूर्ण संदेश देते हुए कहा कि भारत अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएगा। यानी अमेरिका शुल्क की धमकी दे सकता है, लेकिन भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा की कीमत पर किसी विदेशी दबाव के आगे झुकने के लिए तैयार नहीं है। दरअसल, जिस विधेयक को अब ‘लिंडसे ओ. ग्राहम रूस और ईरान प्रतिबंध अधिनियम 2026’ कहा जा रहा है, उसकी कहानी डेढ़ साल पुरानी है। अप्रैल 2025 में लिंडसे ग्राहम और रिचर्ड ब्लूमेंथल ने रूस के खिलाफ कड़े प्राथमिक और द्वितीयक प्रतिबंधों की पहल की थी। इसके बाद लंबे समय तक इसे कांग्रेस और प्रशासन के बीच समर्थन जुटाने की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। जुलाई 2026 में व्हाइट हाउस से सहमति बनने के बाद इसकी राह खुली। अगस्त में सीनेट ने इसे 86 के मुकाबले 11 मतों से पारित किया और 16 सितंबर को प्रतिनिधि सभा ने 262 के मुकाबले 159 मतों से इसे मंजूरी दे दी। यह विधेयक अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस के तेल और गैस के सबसे बड़े खरीदारों पर सौ प्रतिशत तक शुल्क लगाने का अधिकार देता है। भारत और चीन इसके निशाने पर हैं। इसके पीछे अमेरिकी रणनीति रूस की ऊर्जा आय को चोट पहुंचाने की है, ताकि यूक्रेन युद्ध के लिए मास्को को मिलने वाले आर्थिक संसाधनों पर दबाव बनाया जा सके। विधेयक में रूस के ऊर्जा और रक्षा क्षेत्रों के साथ-साथ प्रतिबंधों से बचने वाले उसके जहाजी बेड़े पर भी शिकंजा कसने का प्रावधान है। लेकिन अमेरिका शायद यह भूल रहा है कि भारत रूस से तेल किसी राजनीतिक एहसान के लिए नहीं खरीद रहा। भारत की जरूरत है सस्ती, विश्वसनीय और लगातार उपलब्ध ऊर्जा। 2022 में रूस भारत के लिए कोई बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता नहीं था। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप द्वारा रूसी तेल पर प्रतिबंध लगाए जाने से रूस का कच्चा तेल भारी छूट पर उपलब्ध हुआ और भारत ने अपने आर्थिक हित में इसे खरीदना शुरू किया। इसके बाद रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया। वित्त वर्ष 2026 में भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूसी हिस्सेदारी 30.3 प्रतिशत रही और करीब 134.7 अरब डॉलर के कुल आयात में रूस से आने वाले तेल की कीमत 40.8 अरब डॉलर रही। जुलाई 2026 में तो भारत के आयातित तेल में रूसी हिस्सेदारी आधे से भी ज्यादा पहुंच गई। इसके अलावा, आज वैश्विक परिस्थितियों को देखें तो वह भी सामान्य नहीं हैं। पश्चिम एशिया में युद्ध और आपूर्ति संकट ने तेल बाजार को बुरी तरह प्रभावित किया है। होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधाएं हैं और वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत भी दबाव में हैं। भारत 40 से अधिक देशों से कच्चा तेल खरीदता है, लेकिन रूस और पश्चिम एशिया उसकी ऊर्जा सुरक्षा के मुख्य आधार बने हुए हैं। ऐसे समय में अचानक रूसी तेल बंद करना केवल रूस के खिलाफ फैसला नहीं होगा, बल्कि भारत की अपनी ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा असर डाल सकता है। यही कारण है कि पिछले साल अमेरिकी दंडात्मक शुल्क भी भारत को रूसी तेल से पूरी तरह दूर नहीं कर सके। भारतीय रिफाइनरियों ने रूसी तेल की खरीद में बड़ी कटौती तब की जब रूस की प्रमुख तेल कंपनियों पर सीधे प्रतिबंध लगाए गए और व्यापार करना कठिन हो गया। लेकिन जैसे ही पश्चिम एशिया में आपूर्ति संकट गहराया, भारत ने फिर रूसी तेल की खरीद बढ़ा दी। जुलाई में रूसी तेल की खरीद अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गई। इससे एक बात साफ होती है कि भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा कोई सौदेबाजी का विषय नहीं है। यहां इस पूरे घटनाक्रम का सामरिक महत्व सामने आता है। अमेरिका रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना चाहता है। जबकि रूस भारत की ऊर्जा सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार बना हुआ है। चीन भी रूसी ऊर्जा का बड़ा खरीदार है। साथ ही भारत एक साथ अमेरिका, रूस, चीन, ईरान तथा पश्चिम एशिया के देशों के साथ अपने हितों का संतुलन साध रहा है। ऐसे में नई दिल्ली के सामने चुनौती किसी एक खेमे में जाने की नहीं, बल्कि अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बचाए रखने की है। इसके अलावा, ब्रिक्स सम्मेलन में मोदी की पुतिन और जिनपिंग के साथ बढ़ती कूटनीतिक निकटता ने जिस बदलती विश्व व्यवस्था की तस्वीर अमेरिका के सामने रखी, उसके कुछ ही दिनों बाद अमेरिकी कांग्रेस का रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर शिकंजा कसने वाला कदम कई सवाल खड़े करता है। सवाल उठता है कि क्या वाशिंगटन को यह स्वीकार करना मुश्किल हो रहा है कि दुनिया अब उसकी शर्तों पर नहीं चलती? देखा जाये तो भारत, रूस और चीन का एक मंच पर आना और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था तथा संप्रभु समानता की वकालत करना उस अमेरिकी वर्चस्ववादी सोच के लिए सीधी चुनौती है, जिसमें लंबे समय से आर्थिक ताकत को कूटनीतिक दबाव के हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता रहा है। लेकिन बदलती दुनिया का संदेश साफ है। भारत सहित उभरती शक्तियां अब अपने राष्ट्रीय हितों का फैसला किसी बाहरी राजधानी के इशारे पर नहीं करेंगी। खैर...अब गेंद ट्रंप के पाले में है। अमेरिकी कांग्रेस ने उन्हें सौ प्रतिशत तक शुल्क लगाने की शक्ति दे दी है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सौ प्रतिशत शुल्क स्वतः लागू हो गया। अंतिम निर्णय ट्रंप को करना है। शुल्क कितना होगा, किन वस्तुओं पर लागू होगा और कब लागू होगा, इन सबका असर भारत-अमेरिका व्यापार पर पड़ेगा। भारत का रुख स्पष्ट है कि ऊर्जा सुरक्षा से समझौता नहीं होगा, विकल्पों का विस्तार जारी रहेगा, अमेरिका से बातचीत जारी रहेगी और राष्ट्रीय हितों पर कोई एकतरफा समझौता नहीं होगा। अमेरिकी शुल्क चाहे जितना बड़ा हो, भारत के लिए असली सवाल किसी एक देश को खुश करना नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों के लिए ऊर्जा, अर्थव्यवस्था और रणनीतिक स्वायत्तता सुरक्षित रखना है। विदेश मंत्रालय पहले ही अपना रुख स्पष्ट कर चुका है। भारत अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएगा। -नीरज कुमार दुबे
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक क्षेत्रीय नेता से वैश्विक पटल पर सबसे प्रभावशाली शीर्ष नेताओं में शामिल होना, उनकी सुदृढ़ रणनीतिक सोच, जनसंपर्क क्षमता और कूटनीतिक दूरदर्शिता का परिणाम है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारतीय राजनीति के सबसे प्रमुख और चर्चित चेहरों में से एक हैं। देश की जनता उन्हें अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखती है, और विपक्षी नेताओं के साथ उनके राजनीतिक समीकरणों के पीछे कई रणनीतिक कारण हैं। तो आइए सबसे पहले उनके प्रमुख गूढ़ राजनीतिक गुण निम्नलिखित हैं: एक, रणनीतिक कूटनीति और बहु-ध्रुवीय संतुलन: पीएम मोदी ने पारंपरिक गुटनिरपेक्षता की नीति को बदलते हुए 'मल्टी-अलाइनमेंट' की रणनीति अपनाई। भारत ने एक ही समय में अमेरिका, रूस, यूरोप और मध्य-पूर्व (खाड़ी देशों) के साथ मजबूत व्यापारिक और सुरक्षा संबंध बनाए रखे हैं। रूस-यूक्रेन संघर्ष के बीच वैश्विक दबावों के बावजूद भारत के राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखना और वैश्विक दक्षिण की आवाज बनना उनकी मजबूत कूटनीतिक क्षमता को दर्शाता है। इसे भी पढ़ें: नरेन्द्र मोदी: दृढ़ संकल्प, सशक्त नेतृत्व, दूरदृष्टा और सर्वांगीण विकास के प्रेरणादायक प्रतीक दो, दूरदर्शी जन-संचार और ब्रांडिंग: मोदी जी जन-संवाद के अद्वितीय विशेषज्ञ हैं। 'मन की बात', विशाल जनसभाओं और सोशल मीडिया के माध्यम से वे जनता से सीधे जुड़ते हैं। उन्होंने भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को वैश्विक मंचों (जैसे- योग दिवस, जी-20 की भारत की अध्यक्षता, ब्रिक्स की अध्यक्षता) पर प्रस्तुत कर देश की 'सॉफ्ट पावर' को अत्यधिक मजबूत किया है। तीन, साहसिक और निर्णायक निर्णय क्षमता: राजनीतिक जोखिम उठाने और बड़े फैसले लेने में वे झिझकते नहीं हैं। सर्जिकल स्ट्राइक, धारा 370 का निष्प्रभावीकरण, जीएसटी, और डिजिटल इंडिया जैसी योजनाओं से उन्होंने यह संदेश दिया कि वे दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित के लिए कड़े कदम उठाने में सक्षम हैं। चार, तकनीकी और कल्याणकारी सुशासन: डिजिटल इंडिया, आधार और यूपीआई के समावेश से सीधे बैंक खातों में जन-कल्याणकारी योजनाओं का पैसा पहुंचाकर उन्होंने भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया और प्रशासनिक पारदर्शिता बढ़ाई। इस मॉडल को वैश्विक स्तर पर एक सफल उदाहरण के रूप में देखा जाता है। पांच, कैडर संगठन और विशाल राजनीतिक तंत्र: जमीनी स्तर पर काम करने और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं भारतीय जनता पार्टी के कैडर संगठन का गहरा अनुभव उनकी सबसे बड़ी ताकत है। वे केवल नीतियों पर ध्यान केंद्रित नहीं करते, बल्कि उन नीतियों को धरातल पर उतारने के लिए पार्टी कैडर और नौकरशाही का कुशलता से उपयोग करते हैं। # प्रधानमंत्री मोदी की वैश्विक विदेश नीति और प्रमुख आंतरिक सुधारों का विवरण इस प्रकार हैं:- एक, वैश्विक विदेश नीति: 'भारत प्रथम' और बहु-ध्रुवीय कूटनीति: भारत की आधुनिक विदेश नीति को 'मोदी सिद्धांत' (Modi Doctrine) के रूप में भी देखा जाता है। इसके मुख्य स्तंभ हैं: - पड़ोस प्रथम नीति: दक्षिण एशिया में भारत की उपस्थिति और विश्वसनीयता को मजबूत करने के लिए बुनियादी ढांचे, बिजली और कनेक्टिविटी परियोजनाओं पर विशेष ध्यान देना। - एक्ट ईस्ट नीति: पूर्वी एशियाई और आसियान: देशों के साथ आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को गहरा करना। - ग्लोबल साउथ का नेतृत्व: विकासशील और गरीब देशों की प्राथमिकताओं (जैसे जलवायु न्याय, ऋण राहत और खाद्य सुरक्षा) को G20 जैसे मंचों पर उठाना। - रणनीतिक स्वायत्तता: किसी एक गुट में शामिल न होकर राष्ट्रहित के आधार पर अमेरिका, रूस, इजराइल और खाड़ी देशों के साथ स्वतंत्र संबंध बनाना। दो, प्रमुख आंतरिक सुधार: प्रशासनिक और आर्थिक कायाकल्प के क्षेत्र, प्रमुख पहल, उसके प्रभाव और परिणाम - डिजिटल क्रांति: डिजिटल इंडिया (UPI, Aadhaar, DigiLocker), भारत दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल भुगतान तंत्र बन गया; पारदर्शिता में वृद्धि करना। - कल्याणकारी तंत्र: डीबीटी (Direct Benefit Transfer) & जन धन योजना, बिचौलियों का खात्मा; करोड़ों रुपये की सीधे लाभार्थियों के खातों में डिलीवरी करना। - कर व आर्थिक सुधार: जीएसटी & आईबीसी, एक देश, एक कर व्यवस्था; व्यापार में सुगमता और डूबे हुए कर्जों (NPA) का समाधान करना। - संरचनात्मक विकास : पीएम गतिशक्ति & नेशनल इंफ्रा पाइपलाइन, राजमार्गों, रेलवे, बंदरगाहों और हवाई अड्डों का तेज गति से आधुनिकीकरण करना। - सुरक्षा और कानून : धारा 370 की समाप्ति & नया नागरिक न्याय कानून, जम्मू-कश्मीर का मुख्यधारा में एकीकरण; औपनिवेशिक कालीन आपराधिक कानूनों में सुधार करना। # आखिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भारतवासी किस किस रूप में देखते हैं? नेता उनसे क्यों चिढ़ते हैं? आइए जानते हैं, भारतवासी प्रधानसेवक नरेंद्र मोदी को किस-किस रूप में देखते हैं? एक, कड़े और मजबूत फैसले लेने वाले नेता (निर्णायक नेतृत्व): उनके समर्थक उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखते हैं जो राष्ट्रहित में बड़े और साहसिक फैसले लेने से पीछे नहीं हटते (जैसे- सर्जिकल स्ट्राइक, धारा 370 का हटना या बड़े आर्थिक सुधार)। दो, विकास पुरुष और आधुनिक भारत के निर्माता: कई लोग उन्हें डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, बुनियादी ढांचे (हाईवे, वंदे भारत एक्सप्रेस, एयरपोर्ट) के विस्तार और 'आत्मनिर्भर भारत' का विज़न देने वाले प्रशासक के रूप में देखते हैं। तीन, कल्याणकारी योजनाओं के प्रदाता: देश का एक बड़ा गरीब और मध्यम वर्ग उन्हें उज्ज्वला योजना, जनधन खाते, पीएम आवास योजना और मुफ्त राशन जैसी सीधी योजनाओं के माध्यम से उनके जीवन को आसान बनाने वाले संरक्षक के रूप में देखता है। चार, सांस्कृतिक पुनरुत्थान के प्रतीक: बहुसंख्यक समाज का एक वर्ग उन्हें हिंदू संस्कृति, परंपराओं और राष्ट्रीय गौरव को वैश्विक मंच पर पुनर्स्थापित करने वाले नेता के रूप में देखता है। पांच, कठोर और केंद्रित प्रशासक (आलोचकों की नज़र में): आलोचक या विरोधी उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखते हैं जो केंद्रीकृत निर्णय लेते हैं और विपक्ष या मीडिया के साथ संवाद के सीमित अवसर देते हैं। # राजनीतिक विरोधी और अन्य नेता उनसे क्यों असहज रहते हैं? विपक्षी नेताओं की चिढ़ या असहमति के पीछे मुख्य रूप से राजनीतिक, वैचारिक और रणनीतिक कारण हैं: एक, चुनावी मशीनरी और अपराजित छवि: मोदी का मजबूत संगठन (बीजेपी) और उनकी व्यक्तिगत जन-स्वीकार्यता विपक्षी दलों की पारंपरिक राजनीति और वोट बैंक को लगातार चुनौती देती है। दो, सीधा जन-संवाद: 'मन की बात' और सोशल मीडिया के माध्यम से मोदी जनता से बिना किसी बिचौलिए के सीधे जुड़ते हैं, जिससे पारंपरिक राजनीतिक बिचौलियों की भूमिका खत्म हो जाती है। तीन, कठोर राजनीतिक और संस्थागत टकराव: विपक्ष का आरोप रहता है कि मोदी सरकार में केंद्रीय जांच एजेंसियों और प्रशासनिक तंत्र का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों पर दबाव बनाने के लिए किया जाता है। चार, वैचारिक भिन्नता: कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दल देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे और समावेशी राजनीति के लिए उनकी हिंदुत्व आधारित विचारधारा को चुनौती मानते हैं। बावजूद इसके पीएम नरेंद्र मोदी किसी से नहीं दबते। उन्होंने बहुत सही कार्य किए, लेकिन हिंदुत्व और जातिवाद को लेकर उनके मंत्रियों ने जो जो वैधानिक कुकृत्य किए, कराए, इससे उनका वह जनाधार दांव पर है, जिसने उन्हें हर हर मोदी, घर घर मोदी के रूप से सर्वस्वीकार्य बनाया। यदि इसकी काट वो ढूंढ लेते हैं तो एनडीए अपराजेय रहेगा, अन्यथा यूसीसी के बहाने बिहार से भगदड़ के संकेत मिलने लगे हैं। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
नरेन्द्र मोदी: दृढ़ संकल्प, सशक्त नेतृत्व, दूरदृष्टा और सर्वांगीण विकास के प्रेरणादायक प्रतीक
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में आज विकास के पथ पर तेज़ी से अग्रसरित भारत, विकसित भारत बने के लिए सर्वांगीण विकास के कार्यों को धरातल पर मूर्त रूप देते हुए सफलता के नित-नए आयाम स्थापित कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत में तेज़ी से आर्थिक सुधार हो रहे हैं, मोदी ने देश में परिवर्तन लाने के लिए शहर, कस्बों से लेकर के गांव, दुर्गम दूरदराज के इलाकों तक में भी अब विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचे के अनवरत विकास का कार्य युद्ध स्तर पर चलवाने का कार्य कर रखा है। 21वीं सदी की आधुनिकता की दौड़ में एआई व डिजिटल क्रांति के क्षेत्र में भारत दुनिया भर में अपना लोहा मनवाने का कार्य कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विज़न के दम पर स्वदेशी को तेज़ी से बढ़ावा देकर के भारत तेज़ी से आत्मनिर्भर बनने का मुकाम हासिल कर रहा है। देश में विश्वस्तरीय आधुनिक सड़क, सागर व नभ मार्ग विकास के नित-नए मार्ग खोल रहे हैं। देश के पास विश्वस्तरीय अत्याधुनिक हथियारों के जखीरे व सुविधाओं से सुसज्जित ट्रैंड सेना का पूरा बड़ा लावा लश्कर मौजूद है, जो दुश्मन देशों से घिरे होने के बाद भी देश की सुरक्षा चिंताओं को दूर करने का कार्य बखूबी करता है। वैश्विक स्तर पर कूटनीति और देश की विभिन्न क्षेत्रों में मजबूत होती स्थिति के कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को आधुनिक भारत का शिल्पकार माना जाता है। भारत में लंबे समय तक लगातार केंद्र की सत्ता में रहने का कीर्तिमान बनाते हुए एक लोकप्रिय जननेता के रूप में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानने की कार्यशैली के दम पर आधुनिक, सशक्त, शक्तिशाली नए भारत के एक ऐसे सफल शिल्पकार बन चुके हैं, जिन्होंने आजादी के लगभग 7 दशकों का लंबा समय बीत जाने के बाद देश के दूरदराज, दुर्गम और सीमावर्ती इलाकों तक में भी विश्व स्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने का कार्य निरंतर शुरू कर रखा है, जो काबिले-तारीफ व अचंभित करने वाला है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में उनके कार्यकाल के दौरान देश में बड़े पैमाने पर धरातल पर नये भारत की परिकल्पना के साथ इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण का कार्य तेज़ी से हो रहा है। प्रधानमंत्री मोदी का यह प्रयास आत्मनिर्भर भारत की मजबूत नींव तैयार करने का कार्य बखूबी कर रहा है। देश में आधुनिक रेलवे स्टेशन, बंदरगाह, सड़क, रोपवे, एक्सप्रेस-वे, नेशनल हाईवे आदि जगह-जगह बन रहे हैं। पूरे देश में सड़क, हवाई, रेल व जल मार्ग से यात्रा व माल ढुलाई आदि की व्यवस्था को बहुत तेज़ी से विश्वस्तरीय बनाया जा रहा है। इसे भी पढ़ें: वडनगर से वैश्विक मंच तक नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा मोदी सरकार के कार्यकाल में देश की सीमाओं की रक्षा की बात करें तो आज देश के वीर योद्धाओं के हाथ दुश्मन पर कार्रवाई के लिए पूरी आजादी के साथ खुले हुए हैं, जिसकी बानगी देश व दुनिया के लोग नक्सल, आतंकियों, सर्जिकल स्ट्राइक व ऑपरेशन सिंदूर आदि में बखूबी देख चुके हैं, मां भारती के वीर सपूत अब बिना किसी दबाव के आतंकवादियों व नक्सलियों के जहरीले फन को निरंतर कुचल कर के सफाया करने का कार्य बखूबी कर रहे हैं। पिछले लगभग 4 या 5 दशक से आतंक की आग में झुलस रहे जम्मू-कश्मीर में अमन-चैन को कायम करने के लिए बड़े पैमाने पर कार्य किया जा रहा है, जिसके परिणामस्वरूप अब वहां पर शांति है। धारा 370 को हटाकर के जम्मू-कश्मीर के निवासियों को दशकों से वंचित किए गए उनके हक को वापस दिया गया। वहीं देशवासियों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बहुत सारी योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिसमें मुख्य रूप से देखा जाए तो जन धन योजना, कौशल भारत मिशन, मेक इन इंडिया, स्वच्छ भारत मिशन, सांसद आदर्श ग्राम योजना, श्रमेव जयते योजना, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, हृदय योजना, प्रधानमंत्री मुद्रा योजना, उजाला योजना, अटल पेंशन योजना, प्रधानमंत्री ज्योति ज्योति बीमा योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, स्मार्ट सिटी योजना, अमृत योजना, डिजिटल इंडिया मिशन, स्वर्ण मुद्रीकरण योजना, सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड योजना, उदय, स्टार्ट- अप इंडिया, सेतु भारतम योजना, स्टैंड अप इंडिया, ग्रामोदय से भारत उदय, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, नमामि गंगे योजना, पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना, आयुष्मान भारत योजना, आत्मनिर्भर भारत रोजगार योजना आदि जैसी योजनाएं चल रही हैं। यह योजनाएं हम भारतवासियों के जीवन स्तर में सुधार करते हुए उसे बेहतर बनाने कार्य कर रही हैं। अपनी दमदार कार्यशैली के दम पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जनता की अदालत में लोगों की आशा व उम्मीद का सकारात्मक प्रतीक बन चुकें हैं, लोग मान रहे हैं कि मोदी के नेतृत्व में भारत का बहुत तेज़ी से सर्वांगीण विकास हो रहा है। मोदी सनातन धर्म के गौरवशाली इतिहास को संरक्षित करते हुए देश व दुनिया को उससे बखूबी रूबरू करवा रहा है। आज का शक्तिशाली नया भारत आत्मनिर्भरता, विकास और वैश्विक सम्मान की एक नई ऊंचाइयों को छूने का कार्य कर रहा है। मोदी के नेतृत्व में विकासशील भारत अब विकसित भारत की दिशा में तेज़ी से आगे कदम बढ़ रहा है। जब पूरी दुनिया युद्ध व मंदी की मार से ग्रस्त हैं उस वक्त भी मोदी के प्रयासों से देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है और दुनिया के ताकतवर देशों को पीछे छोड़ने का कार्य कर रही है, जो एक बहुत अच्छा संकेत है। आज भारत दुनिया के निवेशकों की पसंदीदा जगह बनता जा रहा है, भारत में अब विदेशी कंपनियों के बड़े-बड़े कल-कारखाने खुलने लगें हैं। आर्थिक स्तर के मोर्चे के साथ-साथ सामरिक स्तर पर भी अब तो दुनिया भारत का लोहा मानने लगी है। आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ओजस्वी नेतृत्व में भारत विकास के नित-नए आयाम स्थापित करने का कार्य कर रहा है, लोग भी बढ़े ही आत्म विश्वास के साथ गर्व से कह रहे हैं कि मोदी है तो मुमकिन है। - दीपक कुमार त्यागी अधिवक्ता, स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक
जन्मदिन पर विशेष: मोदी होना आसान नहीं
कोई भी व्यक्ति जन्म से महान नहीं बनता, उसके द्वारा किए गए कर्म ही उसकी छवि बनाते हैं। भाग्य कुछ नहीं होता, कर्म से सब प्राप्त किया जा सकता है। गुजरात के निर्धन परिवार में जन्म लेने वाले नरेंद्र मोदी के व्यापक विस्तार की कहानी भी ऐसी ही है। मोदी ने अपने और अपने परिवार के बारे में कभी नहीं सोचा। उनके चिंतन के केंद्र में आम आदमी प्रमुखता से है। संभवतः वे पंडित दीनदयाल जी की उस उक्ति को धरती पर लाने का उपक्रम कर रहे हैं, जिसमें अंतिम छोर पर निवास करने वाले व्यक्ति का उत्थान छुपा हुआ है। तभी तो नरेंद्र मोदी कहते हैं कि 140 करोड़ देशवासी उनका परिवार है। इतना ही नहीं, वे अपने आपको प्रधान सेवक मानने में गौरव का अनुभव करते हैं। उन्होंने जनता के साथ जुड़ाव बनाने वाला यह कथन अपने जीवन में समाहित कर लिया है। ऐसा जीवन व्यतीत करने वाला व्यक्ति सामान्य नहीं हो सकता। इसलिए कहा जाता है कि नरेंद्र मोदी होना आसान नहीं है। किसी व्यक्ति के जीवन में प्राप्त होने वाला पद बड़ा हो सकता है, लेकिन पद से बड़ा होता है उसका व्यक्तित्व। कुर्सी शक्ति दे सकती है, किंतु उस शक्ति को धैर्य, संयम और संकल्प के साथ साधना हर किसी के लिए संभव नहीं होता। भारत की राजनीति में नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व इसी कारण अलग दिखाई देता है। उनके समर्थकों के लिए वे संघर्ष से निकली उस यात्रा के प्रतीक हैं, जिसमें अभावों से उठकर व्यक्ति देश के सर्वोच्च राजनीतिक नेतृत्व तक पहुंचता है। सच कहें तो मोदी होना आसान नहीं है। इसे भी पढ़ें: PM Narendra Modi के 76वें जन्मदिन पर Varanasi में गंगा तट पर 76 बटुकों ने किया विशेष दुग्ध अभिषेक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने वर्तमान राजनीतिक चुनौतियां नई नहीं हैं। सत्ता के गलियारों में जितनी प्रशंसा मिलती है, उतनी ही तीखी आलोचना भी उनका पीछा करती है। राजनीतिक प्रहारों की निरंतरता किसी भी व्यक्ति के धैर्य की परीक्षा ले सकती है। लेकिन मोदी की राजनीतिक शैली की एक प्रमुख विशेषता यह रही है कि वे अपने समर्थकों की अपेक्षाओं और विरोधियों के आक्रोश के बीच अपना संतुलन बनाए रखने का प्रयास करते दिखाई देते हैं। राजनीति में विरोध आवश्यक है। लोकतंत्र में सत्ता से प्रश्न पूछे जाने चाहिए। नीतियों की सकारात्मक आलोचना होनी चाहिए। लेकिन राजनीतिक असहमति जब व्यक्तिगत कटुता का रूप लेती है, तब लोकतंत्र की गरिमा प्रभावित होती है। ऐसे वातावरण में भी स्वयं को संयमित रखना किसी नेता के लिए सामान्य बात नहीं। आज की राजनीति केवल मोदी का समर्थन या विरोध पर ही केंद्रित हो गई है। इसे इस रूप में भी कहा जा सकता है कि मोदी का प्रचार विपक्षी दलों ने अधिक किया है। मोदी की राजनीतिक यात्रा का सबसे प्रेरक पक्ष उनका संघर्ष है। एक सामान्य परिवार से निकलकर देश के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने की कहानी भारतीय लोकतंत्र की उस शक्ति को रेखांकित करती है, जिसमें किसी व्यक्ति की सामाजिक पृष्ठभूमि उसकी अंतिम सीमा तय नहीं करती। अभावों में पला व्यक्ति भी अपने परिश्रम, अनुशासन और संकल्प के बल पर राष्ट्र के नेतृत्व तक पहुंच सकता है। यही मोदी की कहानी का सबसे बड़ा संदेश है। संघर्ष व्यक्ति को तोड़ता नहीं, यदि उसके भीतर संकल्प जीवित हो तो वही संघर्ष उसे गढ़ता है। मोदी के व्यक्तित्व की चर्चा करते समय उनके परिवार और व्यक्तिगत जीवन का पक्ष भी सामने आता है। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उनका परिवार सत्ता के केंद्र में दिखाई नहीं देता। सत्ता के शीर्ष पर रहते हुए पारिवारिक जीवन को राजनीतिक लाभ से दूर रखने की उनकी छवि उनके समर्थकों के लिए विशेष महत्व रखती है। भारतीय राजनीति में जहां परिवारवाद लंबे समय से बहस का विषय रहा है, वहां मोदी की व्यक्तिगत राजनीतिक यात्रा एक अलग उदाहरण प्रस्तुत करती है। मोदी की कहानी केवल भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं है। आज विश्व मंच पर भारत की उपस्थिति पहले से अधिक प्रभावशाली दिखाई देती है। अनेक देशों के साथ भारत के संबंधों का विस्तार हुआ है। वैश्विक मंचों पर भारत की शक्तिशाली भूमिका को लेकर चर्चा बढ़ी है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत की आवाज को गंभीरता से सुना जाना उस बदलते भारत का संकेत है, जो अपनी क्षमता, अपने हितों और अपनी सभ्यता की पहचान के साथ विश्व समुदाय के सामने खड़ा होना चाहते हैं। वे जब विदेश दौरा करते हैं, तब वे भारतीय मूल के नागरिकों से अवश्य मिलते हैं। इस दौरान भारतीय मूल के व्यक्तियों के चेहरे बहुत ही प्रफुल्लित दिखाई देते हैं। वे सभी मोदी को एक सफल नायक की श्रेणी में देखते हैं। अपनेपन का यह भाव मोदी के स्वभाव का ही परिणाम है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए विदेश यात्राओं या कूटनीतिक मुलाकातों का विषय नहीं है। यह उस आत्मविश्वास का विषय है, जिसके साथ भारत आज विश्व समुदाय से संवाद कर रहा है। एक समय था जब दुनिया के अनेक शक्तिशाली देश भारत को मुख्यतः एक विकासशील राष्ट्र के रूप में देखते थे। आज भारत की अर्थव्यवस्था, उसकी युवा शक्ति, उसकी तकनीकी क्षमता, उसका विशाल बाजार और उसकी सामरिक भूमिका विश्व की चर्चा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस परिवर्तन का पूरा श्रेय किसी एक व्यक्ति को देना उचित नहीं होगा, लेकिन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व ने भारत की इस वैश्विक प्रस्तुति को निश्चित रूप से एक विशिष्ट राजनीतिक दिशा दी है। और यही मोदी की विशेषता का एक महत्वपूर्ण आयाम है। वे भारत को केवल वर्तमान के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य की संभावना के रूप में प्रस्तुत करते हैं। नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व जितना मुखर है, उतना ही व्यक्तिगत जीवन में सादगी और अनुशासन की छवि से जुड़ा हुआ भी है। सार्वजनिक जीवन में निरंतर सक्रियता, दैनिक रूप से लंबे कार्य घंटे, देश-विदेश की यात्राएं और करोड़ों लोगों की अपेक्षाओं का भार, प्रधानमंत्री का जीवन किसी सामान्य नौकरी की तरह नहीं होता। प्रत्येक निर्णय के पीछे राजनीतिक, सामाजिक और राष्ट्रीय परिणाम जुड़े होते हैं। और इसीलिए प्रधानमंत्री होना केवल सत्ता प्राप्त करना नहीं है। यह हर दिन स्वयं को कटघरे में खड़ा करना भी है। एक ओर समर्थकों की अपेक्षाएं, दूसरी ओर विरोधियों के सवाल। एक ओर देश की आकांक्षाएं, दूसरी ओर विश्व की निगाहें। एक ओर वर्तमान की चुनौतियां, दूसरी ओर भविष्य के भारत की जिम्मेदारी। इन सबके बीच संतुलन बनाना ही नेतृत्व की वास्तविक परीक्षा है। नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर उनके जीवन को देखने का सबसे सार्थक तरीका यही है कि हम उनके संघर्ष, संकल्प और नेतृत्व की यात्रा को समझें। मतभेद लोकतंत्र की सुंदरता हैं। उनके भीतर एक ऐसा नेतृत्व दिखाई देता है जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपने लक्ष्य से विचलित नहीं होता। उनके आलोचक चाहे उनके निर्णयों से सहमत हों या नहीं, लेकिन यह भी एक तथ्य है कि नरेंद्र मोदी आज भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली और चर्चित चेहरों में से एक हैं। उनकी यात्रा हमें एक महत्वपूर्ण बात सिखाती है कि ऊंचाई पर पहुंचना कठिन है, लेकिन उस ऊंचाई पर टिके रहकर निरंतर आगे बढ़ते रहना उससे भी कठिन है। मोदी होना इसलिए आसान नहीं है। मोदी होने के निहितार्थ यही हैं संघर्ष को शक्ति में बदलना। आलोचना को सहने का धैर्य रखना। सफलता के बीच जमीन से जुड़े रहना। भारत की आकांक्षाओं को विश्व के सामने आत्मविश्वास से रखना। और सबसे बढ़कर, स्वयं से बड़ी किसी राष्ट्रीय आकांक्षा के लिए निरंतर काम करते रहना। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर उन्हें देखने का एक दृष्टिकोण यह भी है कि एक साधारण पृष्ठभूमि से निकला व्यक्ति किस प्रकार भारतीय लोकतंत्र की यात्रा में असाधारण राजनीतिक पहचान बना सकता है। राजनीति के निर्णयों का मूल्यांकन इतिहास करेगा। नीतियों की समीक्षा समय करेगा। उपलब्धियों और कमियों का आकलन आने वाली पीढ़ियां करेंगी। लेकिन संघर्ष की कहानी अपनी जगह रहती है। और नरेंद्र मोदी की कहानी का यही सबसे बड़ा भाव है, एक साधारण शुरुआत से असाधारण शिखर तक की यात्रा। इसलिए जन्मदिन के इस अवसर पर एक वाक्य सहज ही मन में उभरता है कि मोदी होना आसान नहीं। - सुरेश हिंदुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार 103 अग्रवाल अपार्टमेंट कैलाश टॉकीज के पास, नई सड़क लश्कर ग्वालियर (मध्यप्रदेश)
विश्वकर्मा पूजा: श्रम, कौशल और सृजन को नमन
भगवान विश्वकर्मा को ब्रह्माण्ड के दिव्य वास्तुकार और वास्तु शास्त्र के जनक माना जाता है। उन्हें सृष्टि के प्रथम अभियंता तथा वास्तु सृजन का देवता भी कहा जाता है। भगवान विश्वकर्मा के जन्म को लेकर पुराणों में एक कथा का उल्लेख मिलता है, जिसके अनुसार, सृष्टि की रचना की शुरूआत में भगवान विष्णु क्षीरसागर में प्रकट हुए और उनके नाभि-कमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई। ब्रह्मा जी के पुत्र का नाम धर्म रखा गया। धर्म का विवाह संस्कार वस्तु नामक स्त्री से हुआ। धर्म और वस्तु के सात पुत्र हुए और सातवें पुत्र का नाम वास्तु रखा गया। वास्तु शिल्प शास्त्र में अत्यंत निपुण थे। वास्तु के ही पुत्र का नाम विश्वकर्मा था, जो अपने माता-पिता की ही भांति महान शिल्पकार हुए और इस सृष्टि में अनेकों प्रकार के अद्भुत निर्माण विश्वकर्मा द्वारा ही किए गए। शास्त्रों के अनुसार, भगवान विश्वकर्मा का जन्म माघ शुक्ल त्रयोदशी को हुआ था, इसलिए इन्हें भगवान शिव का अवतार भी माना जाता है। वैसे तो हमारे देश में प्रायः घर की सुख-शांति के लिए ही प्रत्येक पर्व-त्यौहार, पूजा-पाठ इत्यादि का आयोजन किया जाता है किन्तु एक पूजा ऐसी भी है, जो केवल पारिवारिक सुख-शांति के लिए नहीं बल्कि व्यापार में उन्नति के लिए की जाती है। प्रतिवर्ष 17 सितम्बर को ‘विश्वकर्मा पूजा’ एकमात्र ऐसी ही पूजा है, जो काम में बरकत के लिए की जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विश्वकर्मा की पूजा करने से व्यापार में उन्नति होती है। विभिन्न धर्मग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि महर्षि अंगिरा के ज्येष्ठ पुत्र बृहस्पति की बहन भुवना ब्रह्मविद्या जानने वाली थी, जिनका विवाह अष्टम् वसु महर्षि प्रभास के साथ हुआ था, उन्हीं से सम्पूर्ण शिल्प विद्या के ज्ञाता प्रजापति विश्वकर्मा का जन्म हुआ। कुछ प्रचलित कथाओं के अनुसार भगवान विश्वकर्मा का जन्म देवताओं और राक्षसों के बीच हुए समुद्र मंथन से माना जाता है। वैसे हमारे धर्म शास्त्रों तथा ग्रंथों में विश्वकर्मा के पांच स्वरूपों व अवतारों का उल्लेख मिलता है। सृष्टि के रचयिता ‘विराट विश्वकर्मा’, महान शिल्प विज्ञान विधाता प्रभात पुत्र ‘धर्मवंशी विश्वकर्मा’, आदि विज्ञान विधाता वसु पुत्र ‘अंगिरावंशी विश्वकर्मा’, महान शिल्पाचार्य विज्ञान जन्मदाता ऋषि अथवी के पुत्र ‘सुधन्वा विश्वकर्मा’ तथा उत्कृष्ट शिल्प विज्ञानाचार्य शुक्राचार्य के पौत्र ‘भृंगुवंशी विश्वकर्मा’। धर्म शास्त्रों के अनुसार महर्षि दधीचि द्वारा दी गई उनकी हड्डियों से ही विश्वकर्मा ने वज्र का निर्माण किया था, जो देवताओं के राजा इन्द्र का प्रमुख हथियार माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि एक बार असुरों से परेशान देवताओं की गुहार पर विश्वकर्मा ने महर्षि दधीचि की हड्डियों से देवताओं के राजा इन्द्र के लिए वज्र बनाया था, जो इतना प्रभावशाली था कि उससे असुरों का सर्वनाश हो गया। इसे भी पढ़ें: Vishwakarma Jayanti 2026: सृष्टि के पहले इंजीनियर माने जाते है भगवान विश्वकर्मा देवताओं का स्वर्ग हो या रावण की सोने की लंका अथवा भगवान श्रीकृष्ण की द्वारिका या पाण्डवों की राजधानी हस्तिनापुर, इन सभी का निर्माण भगवान विश्वकर्मा द्वारा ही किया गया था, जो वास्तुकला की अद्भुत मिसाल हैं। वास्तुशास्त्र के जनक विश्वकर्मा ने अपने वास्तु ज्ञान से यमपुरी, वरूणपुरी, पाण्डवपुरी, सुदामापुरी, शिवमण्डलपुरी, पुष्पक विमान, भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र, भगवान शिव का त्रिशूल, यमराज का कालदंड, दानवीर कर्ण के कुंडल इत्यादि का भी निर्माण किया। देवताओं के लिए उन्होंने अनेक भव्य महलों, आलीशान भवनों, हथियारों तथा सिंहासनों का निर्माण किया। इसीलिए उन्हें ‘देवताओं के शिल्पी’ के रूप में भी विशिष्ट स्थान प्राप्त है। चार युगों में उन्होंने कई नगरों और भवनों का निर्माण किया। रावण के अंत के बाद जिस पुष्पक विमान में बैठकर राम, लक्ष्मण, सीता और अन्य साथी अयोध्या लौटे थे, वह भी विश्वकर्मा द्वारा ही निर्मित किया गया था। सबसे पहले सत्ययुग में उन्होंने स्वर्गलोक का निर्माण किया, त्रेता युग में लंका का, द्वापर युग में द्वारिका का और कलियुग के आरंभ के 50 वर्ष पूर्व हस्तिनापुर तथा इन्द्रप्रस्थ का निर्माण किया। उन्होंने ही जगन्नाथ पुरी के जगन्नाथ मन्दिर में स्थित कृष्ण, सुभद्रा और बलराम की विशाल मूर्तियों का निर्माण किया। प्रतिवर्ष 17 सितम्बर को ही विश्वकर्मा जयंती मनाए जाने का भी महत्व है। यह जयंती वर्षा ऋतु के अंत तथा शरद ऋतु के आरंभ में मनाए जाने की परम्परा रही है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जिस प्रकार मकर संक्रांति प्रतिवर्ष प्रायः 14 जनवरी को पड़ती है, उसी प्रकार कन्या संक्रांति 17 सितम्बर को पड़ती है। इसी दिन सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करते हैं और इसीलिए विश्वकर्मा जयंती 17 सितम्बर को ही मनाई जाती है। विश्वकर्मा जयंती और विश्वकर्मा पूजा की महत्ता को सिद्ध करने के लिए एक कथा भी प्रचलित है। कथानुसार, धार्मिक प्रवृत्ति का एक रथकार अपनी पत्नी सहित काशी में रहता है, जो अपने कार्य में बेहद निपुण था लेकिन स्थान-स्थान पर घूमने और कड़ा प्रयत्न करने के बाद भी उसे इतना ही धन प्राप्त हो जाता था कि बामुश्किल उसके परिवार के लिए भोजन का प्रबंध हो पाता था। उनकी कोई संतान नहीं थी, इसको लेकर भी पति-पत्नी चिंतित रहते थे और साधु-संतों की शरण में जाते रहते थे। एक दिन एक पड़ोसी ने उन्हें सलाह दी कि तुम भगवान विश्वकर्मा की शरण में जाओ, वही तुम्हारा बेड़ा पार करेंगे। उसके बाद पति-पत्नी ने भगवान विश्वकर्मा की सच्चे मन से पूजा-आराधना की, जिससे और उन्हें पुत्र-रत्न और धन-धान्य की प्राप्ति हुई और वे सुख से जीवन व्यतीत करने लगे। कहा जाता है कि उसी के बाद से विश्वकर्मा पूजा धूमघाम से की जाने लगी। विश्वकर्मा पूजा के दिन सभी प्रकार की मशीनों, जैसे औजार, गाड़ी, कम्प्यूटर अथवा प्रत्येक ऐसी वस्तु, जो आपके कार्य को पूरा करने में इस्तेमाल होती है, की पूजा की जाती है। तकनीकी जगत के भगवान विश्वकर्मा को सनातन धर्म में निर्माण एवं सृजन का देवता माना जाता है, जिन्हें दुनिया के पहले वास्तुकार और आधुनिक युग के इंजीनियर की उपाधि दी गई है। पुराणों में बताया गया है कि आदि देव ब्रह्मा इस सृष्टि के रचयिता हैं और उन्होंने विश्वकर्मा की सहायता से ही इस सृष्टि का निर्माण किया था। इसी वजह से विश्वकर्मा को दुनिया के पहले वास्तुकार एवं इंजीनियर की उपाधि दी गई। उन्हें औजारों का देवता और धातुओं का रचयिता भी कहा जाता है। वास्तु शास्त्र में महारत हासिल होने के कारण ही विश्वकर्मा को वास्तुशास्त्र का जनक कहा गया। यही कारण है कि वास्तुकार कई युगों से भगवान विश्वकर्मा को अपना गुरू मानते हुए उनकी पूजा करते आ रहे हैं। - योगेश कुमार गोयल (लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)
उपराष्ट्रपति ने पीएम मोदी को दी जन्मदिन की शुभकामनाएं, कहा- 'दुनिया में एक चमकते हुए केंद्र के रूप में उभर रहा भारत'
टीएमसी के नाम और चुनाव चिन्ह पर घमासान, ईसीआई आज सुनेगा दोनों गुटों का दावा
भारत का चुनाव आयोग (ईसीआई) गुरुवार को नई दिल्ली में तृणमूल कांग्रेस के दोनों गुटों के प्रतिनिधिमंडलों से मुलाकात करेगा और बैठक के बाद चुनाव आयोग पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर कोई फैसला ले सकता है।
बंगाल: अन्नपूर्णा योजना के लाभार्थियों ने पीएम मोदी को 'बर्थडे गिफ्ट' के तौर पर पौधा लगाया
बंगाल: अन्नपूर्णा योजना के लाभार्थियों ने पीएम मोदी को 'बर्थडे गिफ्ट' के तौर पर पौधा लगाया
शिवपाल का छलका 'भतीजा प्रेम', कहा- अखिलेश जैसी आधुनिक सोच किसी के पास नहीं
शिवपाल का छलका 'भतीजा प्रेम', कहा- अखिलेश जैसी आधुनिक सोच किसी के पास नहीं
यूपीआई चार्ज विवाद: कांग्रेस ने बताया 'डिजिटल यूटर्न', 'आप' ने गुजरात में विरोध करने की चेतावनी दी
गुजरात में विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार के उस फैसले की आलोचना की है, जिसके तहत 15 अक्टूबर से व्यापारियों को 2,000 रुपए से ज्यादा के कुछ खास यूपीआई पेमेंट पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) देना होगा।
गुलजार सिंह के परिवार से मिले तरुण चुघ, न्याय का भरोसा दिया
गुलजार सिंह के परिवार से मिले तरुण चुघ, न्याय का भरोसा दिया
महाराष्ट्र में 584 आदिवासी छात्रों की मौत पर सियासत, सीजेपी ने शुरू किया 'आदिवासी स्कूल ठीक करो' अभियान
'आपके कर्मों का फल आपको मिलेगा', उद्धव ठाकरे की सफाई पर दिशा सालियान के पिता का पलटवार
'आपके कर्मों का फल आपको मिलेगा', उद्धव ठाकरे की सफाई पर दिशा सालियान के पिता का पलटवार
8वें वेतन आयोग की चंडीगढ़ में शुरू हुईं बैठकें, वेतन और पेंशन पर होंगे विचार-विमर्श
8वें वेतन आयोग की चंडीगढ़ में शुरू हुईं बैठकें, वेतन और पेंशन पर होंगे विचार-विमर्श
उमर खालिद को 'राष्ट्रवादी' बताने वाले बयान पर कर्नाटक में कांग्रेस और भाजपा आमने-सामने
उमर खालिद को 'राष्ट्रवादी' बताने वाले बयान पर कर्नाटक में कांग्रेस और भाजपा आमने-सामने
फ्री यूपीआई के दावे के बीच ठगा रह गया आम आदमी
भारत की अर्थव्यवस्था को कैशलेस बनाने और 'डिजिटल इंडिया' के सुनहरे सपने दिखाने वाली सरकार ने आखिरकार 15 अक्टूबर से लागू होने वाले नए मर्चेंट डिस्काउंट रेट फ्रेमवर्क के जरिए देश की जनता के भरोसे पर करारा प्रहार किया है। लंबे समय से यह ढोल पीटा जा रहा था कि यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस पूरी तरह मुफ्त है, सुरक्षित है और यह देश के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की ताकत है। लेकिन सरकार और नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया का यह नया फैसला इस दावे की हवा निकालने के लिए काफी है। जनता आज ठगा हुआ महसूस कर रही है, क्योंकि जिस डिजिटल व्यवस्था की आदत उन्हें डालकर कैशलेस होने के फायदे गिनाए गए थे, अब उसी व्यवस्था के पीछे छिपे टैक्स और चार्जेस के कड़वे सच को सामने लाया जा रहा है। सरकार चाहे जितने भी दावे करे कि यह चार्ज आम ग्राहकों को नहीं बल्कि बड़े व्यापारियों को देना होगा, लेकिन आर्थिक मोर्चे की व्यावहारिक समझ रखने वाला कोई भी आम नागरिक यह बखूबी जानता है कि अंततः किसी भी टैक्स या फीस का बोझ घूम-फिरकर उपभोक्ता की जेब पर ही आकर गिरता है। यह नया ढांचा सीधे तौर पर देश के उस मध्यमवर्ग और नौकरीपेशा समाज के साथ विश्वासघात है, जिसने सरकार के कहने पर अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई को पूरी तरह डिजिटल माध्यमों के सुपुर्द कर दिया था। इस नए फ्रेमवर्क के तहत ₹2,000 से अधिक के ट्रांजैक्शन पर 0.4% का MDR लगाने का फैसला किया गया है। सरकारी नीति निर्माताओं ने बड़े ही शातिर तरीके से यह आंकड़ा तैयार किया है ताकि पहली नजर में यह जनता को प्रभावित न करे। यह दलील दी जा रही है कि देश के 96 फीसदी मर्चेंट ट्रांजैक्शंस ₹2,000 से कम के होते हैं, इसलिए आम जनता सुरक्षित है। लेकिन यह पूरी तरह से एक सांख्यिकीय भ्रम है जो जमीनी हकीकत से कोसों दूर है। आज के इस महंगाई के दौर में ₹2,000 की रकम क्या अहमियत रखती है? एक मध्यमवर्गीय परिवार जब महीने का राशन खरीदने किसी सुपरमार्केट या किराना दुकान पर जाता है, तो उसका बिल आसानी से ₹3,000 से ₹5,000 के पार चला जाता है। बच्चों की स्कूल की फीस, कोचिंग संस्थान के खर्च, बिजली और पानी के बड़े बिल, अस्पताल का खर्च, दवाइयां, इलेक्ट्रॉनिक्स सामान की खरीदारी, या किसी शादी-ब्याह के कपड़े खरीदना—ये सभी रोजमर्रा के ऐसे काम हैं जहां ट्रांजैक्शन की रकम ₹2,000 की इस कृत्रिम सीमा को पलक झपकते ही पार कर जाती है। ऐसे में यह कहना कि आम जनता इससे प्रभावित नहीं होगी, देश की बहुसंख्यक आबादी के जीवन स्तर और उनकी जरूरतों का क्रूर मजाक उड़ाने जैसा है। जनता के बीच इस कानून को लेकर जो सबसे बड़ा आक्रोश है, वह इस बात को लेकर है कि मर्चेंट्स पर लगाया गया यह चार्ज अंततः उन्हीं से वसूला जाएगा। कोई भी व्यापारी, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, अपनी जेब से 0.4% का घाटा नहीं सहेगा। बाजार का सीधा और शाश्वत नियम है कि जब भी किसी व्यवसाय की लागत बढ़ती है, तो वह उस लागत को अपने उत्पाद या सेवा की कीमत में जोड़ देता है। व्यापारी सीधे तौर पर भले ही यूपीआई पेमेंट करने पर आपसे अतिरिक्त पैसे न मांगें, लेकिन वे अपने सामानों के दाम में चुपके से 1 से 2 फीसदी की बढ़ोतरी कर देंगे ताकि उनका प्रॉफिट मार्जिन सुरक्षित रहे। इसका परिणाम यह होगा कि जो व्यक्ति नकद भुगतान करेगा, वह भी बिना वजह इस महंगाई की चपेट में आएगा और जो यूपीआई का इस्तेमाल करेगा, वह तो ठगा जाएगा ही। सरकार ने इस चालाकी से अपने राजस्व को बढ़ाने का रास्ता तो साफ कर लिया, लेकिन इसका सीधा खामियाजा उस जनता को भुगतना पड़ेगा जो पहले से ही बेकाबू महंगाई, बेरोजगारी और घटती क्रय शक्ति से जूझ रही है। इस कानून के पीछे छुपा एक और बड़ा खतरा देश की बैंकिंग और डिजिटल साक्षरता के लोकतांत्रिक ढांचे को नष्ट करना है। भारत जैसे विकासशील देश में लोगों को नकद छोड़कर डिजिटल ट्रांजैक्शन की ओर मोड़ना एक बहुत बड़ी सामाजिक और व्यावहारिक चुनौती थी। लोगों को बैंकों की लाइनों से बचाने और पारदर्शिता लाने के नाम पर सरकार ने खुद हर मंच से यूपीआई का प्रचार किया। रेहड़ी-पटरी वालों से लेकर बड़े-बड़े मॉल तक क्यूआर कोड चिपकाए गए। जनता ने भी सरकार पर भरोसा किया और अपनी सदियों पुरानी नकद लेन-देन की आदत को बदलकर जेब में बटुआ रखना बंद कर दिया। लेकिन अब, जब जनता पूरी तरह इस सिस्टम पर निर्भर हो चुकी है, तब सरकार ने अपनी असली नीयत दिखाते हुए इस पर शुल्क थोपना शुरू कर दिया है। यह नीति बिल्कुल वैसी ही है जैसी कोई निजी टेलीकॉम कंपनी पहले मुफ्त में सेवाएं देकर ग्राहकों को अपना आदी बनाती है और बाद में मनमाने दाम वसूलने लगती है। एक लोकतांत्रिक सरकार से जनहित की नीतियों की उम्मीद की जाती है, न कि किसी मुनाफाखोर कॉपोरेट घराने जैसी चालाकी की। इस फैसले के लागू होने से बाजार में एक बार फिर से 'कैश इकोनॉमी' यानी नकद लेन-देन का चलन तेजी से बढ़ेगा, जो देश की आर्थिक प्रगति के लिए एक प्रतिगामी कदम होगा। जनता के मन में यह डर बैठ गया है कि आज ₹2,000 पर 0.4% का चार्ज लगा है, तो कल को सरकार इसे बढ़ाकर 1% कर देगी और सीमा को घटाकर ₹500 कर देगी। इस अविश्वास के कारण लोग अब फिर से बैंकों से नकद निकालकर अपने पास रखने को मजबूर होंगे। जब व्यापारी देखेंगे कि ₹2,000 से ऊपर के पेमेंट पर उनका नुकसान हो रहा है, तो वे ग्राहकों को नकद भुगतान करने के लिए प्रोत्साहित करेंगे या फिर यूपीआई पेमेंट लेने से साफ इंकार कर देंगे। इससे वह काला धन और समानांतर अर्थव्यवस्था फिर से सिर उठाएगी, जिसे खत्म करने का दावा सरकार अक्सर करती रही है। डिजिटल लेन-देन में आने वाली इस गिरावट के लिए सीधे तौर पर सरकार की यह अदूरदर्शी और राजस्व-लोभी नीति जिम्मेदार होगी। देश का बुद्धिजीवी वर्ग और जागरूक नागरिक इस बात से भी बेहद खफा हैं कि सरकार एक तरफ तो कॉरपोरेट टैक्स में भारी छूट देती है, बड़े-बड़े उद्योगपतियों के लाखों करोड़ रुपये के कर्ज को बट्टा खाते में डाल देती है, लेकिन जब देश के आम नागरिकों की बात आती है, तो डिजिटल लेन-देन जैसी बुनियादी सुविधा पर भी टैक्स वसूलने के रास्ते तलाशने लगती है। ₹75,000 से ऊपर के ट्रांजैक्शन पर अधिकतम ₹300 की फीस तय करना इस बात का सबूत है कि सरकार को बड़े बिजनेसमैन की फिक्र है, लेकिन उस आम आदमी की कोई परवाह नहीं है जो अपनी गाढ़ी कमाई का छोटा-छोटा हिस्सा जोड़कर जीवन यापन कर रहा है। सरकार का यह कदम देश के नागरिकों के वित्तीय अधिकारों का हनन है। जब देश की जनता पहले से ही हर सामान पर भारी-भरकम जीएसटी दे रही है, अपनी आय पर इनकम टैक्स चुका रही है, तो फिर अपने ही पैसे को एक खाते से दूसरे खाते में ट्रांसफर करने या सामान खरीदने के डिजिटल माध्यम का उपयोग करने पर यह नया जुल्म क्यों ढाया जा रहा है? इस नए फ्रेमवर्क के खिलाफ देश के विभिन्न हिस्सों से विरोध की आवाजें उठने लगी हैं। सोशल मीडिया से लेकर चाय की दुकानों और बाजारों तक में लोग इस कानून की कड़े शब्दों में निंदा कर रहे हैं। जनता का स्पष्ट मानना है कि यह कानून उनकी आर्थिक स्वतंत्रता पर एक अदृश्य बेड़ी है। सरकार को यह समझना होगा कि डिजिटल इंडिया की सफलता इस बात पर निर्भर नहीं थी कि सरकार उससे कितना राजस्व कमा सकती है, बल्कि इस बात पर थी कि वह कितनी आसानी से और मुफ्त में देश के आम नागरिक को वित्तीय मुख्यधारा से जोड़ सकती है। 15 अक्टूबर से लागू होने जा रहा यह नया ढांचा यूपीआई की इस मूल भावना की हत्या है। जनता इस आर्थिक तानाशाही को चुपचाप स्वीकार नहीं करेगी। यदि सरकार वास्तव में जनहितैषी होने का दावा करती है, तो उसे तुरंत इस जनविरोधी कानून को वापस लेना चाहिए और यूपीआई को बिना किसी शर्त, बिना किसी सीमा के हमेशा के लिए पूरी तरह मुफ्त रखने की लिखित गारंटी देनी चाहिए। अन्यथा, डिजिटल क्रांति का यह रथ बीच रास्ते में ही थककर रुक जाएगा और जनता का तंत्र से भरोसा हमेशा के लिए उठ जाएगा। - अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार
जीडीपी से नहीं जमीन पर नजर आए बदलाव
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों से भारत की तरक्की का जश्न मनाने के लिए कहते हुए 7.8% की शानदार जीडीपी ग्रोथ के लिए बधाई दी। सवाल यह है कि क्या आम आदमी देश में जीडीपी ग्रोथ को समझता है। क्या जीडीपी बढ़ना देश की मौजूदा समस्याओं के समाधान का कोई पैमाना है। देश में जब प्रधानमंत्री जीडीपी बढ़ोतरी की घोषणा कर रहे थे, उसी दिन कमर्शियल एलपीजी के दाम में बढ़ोतरी हो गई है। दिल्ली में इसके दाम में 9.50 रुपये की बढ़ोतरी की गई है। दिल्ली में अब कमर्शियल सिलेंडर की कीमत 2747.50 रुपये, मुंबई में 2701 रुपये और चेन्नई में 2916.50 रुपये हो गई है। कमर्शियल सिलेंडर के महंगे होने से होटल, ढाबे आदि में खाना-पीना महंगा होना तय है। वहीं घर मिलने वाली चीजों के दाम में भी बढ़ोतरी हो सकती है। इसके अलावा 5 किलो वाले गैस सिलेंडर का भी दाम 2 रुपये बढ़कर 764 रुपये हो गया है। मुंबई और तमिलनाडु में दूध महंगा हो गया है। बॉम्बे मिल्क प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन ने थोक दूध की कीमतों में 9 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की है। इससे दूध की थोक दर 93 रुपये से बढ़कर 102 रुपये प्रति लीटर हो गई है। भारत में जुलाई-अगस्त 2026 के दौरान खाद्य महंगाई दर बढ़कर 5.52% हो गई है, जिसके कारण चीनी, प्याज, टमाटर, दाल और खाना पकाने के तेल जैसी जरूरी रसोई की चीजें महंगी हो गई हैं. चावल और दूध के दाम भी स्थिर से लेकर उच्च स्तर पर बने हुए हैं। इसे भी पढ़ें: भारत की सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग में बढ़ोतरी महंगाई बढ़ने के कारण प्याज (22.54%), लहसुन (35.36%) और अदरक (83.62%) की कीमतों में भारी तेजी आई है। ईंधन और परिवहन महंगाई बढ़कर 4.43% हो गई है, जिससे माल ढुलाई की लागत बढ़ी है। रेस्त्रां और आवास सेवाओं की महंगाई दर बढ़कर लगभग 7.72% हो गई है। देश के आम आदमी को हर दिन होने वाली कठिनाईयों से जूझना पड़ रहा है। देश का मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग को जीडीपी की ग्रोथ से अंतर तब पड़ता है, जब उनकी बुनियादी सुविधाओं कोई बेहतरी नजर आए। देश में पानी, बिजली, स्कूल, अस्पताल, सड़क, रोजगार, महंगाई जैसी बुनियादी समस्याओं की भरमार है। इनसे राहत मिलती भी है तो उूंट के मुंह में जीरे जितनी। इससे बदलाव नजर नहीं आता। भारत की आधी से अधिक आबादी यानी करीब 60 करोड़ लोग गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं। देश के भूजल का बड़ा हिस्सा आर्सेनिक, फ्लोराइड और अन्य भारी धातुओं (हैवी मेटल्स) की वजह से दूषित हो चुका है। बारिश का पर्याप्त पानी होने के बावजूद उचित हार्वेस्टिंग (संचयन) न होने के कारण पानी बेकार बह जाता है। नीति आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, साफ पीने का पानी न मिलने के कारण हर साल देश में करीब 2 लाख लोगों की मौत हो जाती है। वर्ष 2026 में भीषण गर्मी, रिकॉर्ड बिजली मांग (मई 2026 में 270 गीगावाट से अधिक) और स्थानीय रख-रखाव के कारण उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, ओडिशा और तेलंगाना जैसे कुछ राज्यों के इलाकों में आंशिक या अस्थायी कटौती की गई। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार भारत में बेघरता की दर प्रति 10,000 लोगों पर 13 है। अर्थात 17 प्रतिशत लोगों को पास अपना घर नहीं है। देश के ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 35 प्रतिशत गांवों में स्थानीय स्तर पर कोई भी बुनियादी चिकित्सा सुविधा या स्वास्थ्य केंद्र उपलब्ध नहीं है। ग्रामीण सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों और सर्जनों की भारी कमी है, जो लगभग 80 प्रतिशत तक खाली पड़े हैं। नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 10 वर्षों (2014-15 से 2024-25) में देश भर में करीब 94,000 सरकारी स्कूल बंद या आपस में मर्ज किए गए हैं। इसका मतलब है कि औसतन हर दिन 25 स्कूलों पर ताला लगा है। इसी दशक में सरकारी स्कूलों में कुल छात्रों का नामांकन 2.26 करोड़ कम हुआ है, जो 2014-15 के 26.95 करोड़ से घटकर 2024-25 में 24.69 करोड़ रह गया है। देश के एक लाख से अधिक स्कूलों में आज भी बिजली की उचित सुविधा नहीं है, और कई स्थानों पर पीने का साफ पानी उपलब्ध नहीं है। 71,959 स्कूलों में लड़कियों के लिए और 1.12 लाख स्कूलों में लड़कों के लिए काम करने वाले शौचालय मौजूद नहीं हैं। 1.39 लाख स्कूलों में लाइब्रेरी और 2.65 लाख स्कूलों में खेल का मैदान नहीं है। डिजिटल लाइब्रेरी का अभाव तो लगभग 13.62 लाख स्कूलों में है। भारत में 15 से 29 वर्ष के युवाओं की बेरोज़गारी दर जून 2026 में बढ़कर 16.2% हो गई है, 15–29 आयु वर्ग की महिलाओं में यह दर बढ़कर 20.7% हो गई। इसी आयु वर्ग के पुरुषों में यह दर 14.6% दर्ज की गई। जून 2026 में शहरी युवा बेरोज़गारी दर 18.2% और ग्रामीण युवा बेरोज़गारी दर 15.1% रही। नीति आयोग की बहुआयामी गरीबी सूचकांक रिपोर्ट के अनुसार, सबसे अधिक गरीबी वाले राज्य बिहार में 51.91% आबादी गरीब है। झारखंड मे 42.16% लोग गरीबी में जीवन बिता रहे हैं। उत्तर प्रदेश में 37.79% जनसंख्या गरीब है। मध्य प्रदेश में 36.65% लोग गरीब हैं। भारत में सबसे अमीर 10% लोगों के पास कुल संपत्ति का लगभग 65% हिस्सा है. सबसे ज़्यादा कमाई करने वाले 10% लोग राष्ट्रीय आय का 58% हिस्सा पाते हैं जबकि सबसे निचले 50% लोगों को सिर्फ़ 15% मिलता है। आर्थिक असमानता की यह खाई लगातार बढ़ती जा रही है। निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री का यह हक है कि जीडीपी की ग्रोथ पर खुशी मनाने का आह्वान करें पर जब तक इसका असर देश की मूल समस्याओं के निराकरण में नजर नहीं आएगा, देश के लोगों की उदासी दूर नहीं होगी। - योगेन्द्र योगी
कॉकरोच जनता पार्टी का 'आदिवासी स्कूल ठीक करो' अभियान, सुविधाओं की कमी पर उठाए सवाल
कॉकरोच जनता पार्टी का 'आदिवासी स्कूल ठीक करो' अभियान, सुविधाओं की कमी पर उठाए सवाल
पश्चिम बंगाल के हावड़ा में सीपीआई-एम के कई दफ्तरों में तोड़फोड़, भाजपा पर आरोप, पार्टी का इनकार
पश्चिम बंगाल के हावड़ा में सीपीआई-एम के कई दफ्तरों में तोड़फोड़, भाजपा पर आरोप, पार्टी का इनकार
प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन पर बिहार में 17 सितंबर को जलेगा 'आशीर्वाद का दीया’
प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन पर बिहार में 17 सितंबर को जलेगा 'आशीर्वाद का दीया’
भारतीय और पाकिस्तानी नौसैनिक जहाजों के बीच हुई घटना से चिंता
15 सितंबर, 2026 को उत्तरी अरब सागर में भारतीय नौसेना का एक युद्धपोत और पाकिस्तान नौसेना का एक जहाज आपस में टकरा गए। विदेश मंत्रालय (MEA) ने बताया कि यह घटना अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में हुई और इससे कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ। घटना का विवरण भारतीय नौसेना का एक युद्धपोत नियमित निगरानी मिशन पर था, तभी खबर है कि पाकिस्तान नौसेना का एक जहाज तेज गति से उसकी ओर आया। भारतीय अधिकारियों के अनुसार, पाकिस्तानी जहाज ने गैर-पेशेवर और असुरक्षित तरीके से हरकत की, अपना रास्ता असुरक्षित ढंग से बदला और जहाजों के बीच भौतिक संपर्क (टक्कर) हुआ। इसे भी पढ़ें: EAM S Jaishankar पहुंचे Bhutan, पारो में विदेश मंत्री DN Dhungyel ने किया स्वागत नियमों का उल्लंघन भारत सरकार ने कहा कि पाकिस्तानी नौसैनिक इकाई का व्यवहार अप्रैल 1991 में भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य अभ्यास, युद्धाभ्यास और सैनिकों की आवाजाही की पूर्व सूचना देने के समझौते के अनुच्छेद 10 का सीधा उल्लंघन था। नियमों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में काम करते समय किसी भी दुर्घटना से बचने के लिए दूसरे देश के नौसैनिक जहाज और पनडुब्बियां एक-दूसरे से तीन नॉटिकल मील (लगभग 5 किलोमीटर) से अधिक करीब नहीं आएंगी। भारत ने उत्तरी अरब सागर में 15 सितंबर, 2026 को हुई टक्कर के संबंध में अपनी औपचारिक आपत्ति में विशेष रूप से इस नियम का हवाला दिया। भारत और पाकिस्तान ने 6 अप्रैल, 1991 को नई दिल्ली में सैन्य अभ्यास, युद्धाभ्यास और सैनिकों की आवाजाही की पूर्व सूचना देने के समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते में दोनों देशों का प्रतिनिधित्व तत्कालीन विदेश सचिवों मुचकुंद दुबे (भारत) और शहरयार एम. खान (पाकिस्तान) ने किया था। अनुसमर्थन दस्तावेजों के आदान-प्रदान के बाद यह समझौता 19 अगस्त, 1992 को लागू हुआ और यह दोनों देशों के बीच सैन्य विश्वास-निर्माण उपायों के व्यापक ढांचे का हिस्सा है। इस समझौते का उद्देश्य सैन्य इरादों की गलत व्याख्या से पैदा होने वाले संकटों को रोकना है। दोनों देशों ने विश्वास-निर्माण उपाय के रूप में अभ्यास, युद्धाभ्यास और सैनिकों की आवाजाही की पूर्व सूचना देने की आवश्यकता को स्वीकार किया। मुख्य नियमों के तहत दोनों देशों की थल, नौ और वायु सेनाओं के लिए एक-दूसरे के बहुत करीब बड़े सैन्य युद्धाभ्यास और अभ्यास करने से बचना जरूरी है। यदि निर्धारित दूरी के भीतर अभ्यास किए जाते हैं, तो मुख्य बल की रणनीतिक दिशा दूसरी तरफ नहीं होनी चाहिए और पास में कोई लॉजिस्टिकल तैयारी (जैसे रसद या सैन्य साजो-सामान का जमावड़ा) करने की अनुमति नहीं है। नौसेना के लिए, एक बड़े अभ्यास का मतलब है डिस्ट्रॉयर या फ्रिगेट के आकार या उससे बड़े छह या उससे ज़्यादा जहाज़ों का एक साथ काम करना और दूसरे देश के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक ज़ोन (EEZ) में प्रवेश करना। राजनयिक प्रतिक्रिया इस घटना के बाद, विदेश मंत्रालय (MEA) ने तुरंत राजनयिक कदम उठाए: (a) नई दिल्ली में पाकिस्तानी चार्ज डी'अफेयर्स (राजनयिक प्रतिनिधि) को बुलाकर अस्वीकार्य और गैर-पेशेवर व्यवहार के बारे में औपचारिक विरोध दर्ज कराया गया। (b) पाकिस्तानी अधिकारियों को सलाह दी गई कि वे सुनिश्चित करें कि उनकी सैन्य इकाइयाँ उचित सावधानी बरतें और भविष्य की घटनाओं को रोकने के लिए संबंधित द्विपक्षीय समझौतों का पालन करें। (c) इस्लामाबाद में भारतीय चार्ज डी'अफेयर्स को निर्देश दिया गया कि वे पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के समक्ष इसी तरह का औपचारिक विरोध दर्ज कराएं। निष्कर्ष उत्तरी अरब सागर के अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में नियमित निगरानी कर रहे भारतीय नौसेना के जहाज़ के साथ पाकिस्तानी नौसेना के जहाज़ की टक्कर से कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ, लेकिन भारत ने कहा कि पाकिस्तानी जहाज़ का तेज़ गति से पास आना सैन्य युद्धाभ्यास पर 1991 के भारत-पाकिस्तान समझौते के अनुच्छेद 10 का उल्लंघन था, जो सुरक्षित परिचालन दूरी बनाए रखने का आदेश देता है। विदेश मंत्रालय ने अस्वीकार्य और गैर-पेशेवर व्यवहार का विरोध किया और द्विपक्षीय सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन करने के महत्व पर ज़ोर दिया। अंतरराष्ट्रीय सीमाओं और नियंत्रण रेखा (LoC) पर शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए दोनों देशों द्वारा लगातार सावधानी बरतना ज़रूरी है। - प्रोफ़ेसर (डॉ.) डी.के. पांडेय विज़िटिंग सीनियर फ़ेलो, सेंटर फ़ॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज़, एडजंक्ट प्रोफ़ेसर, राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय, सलाहकार, एकेडमिक काउंसिल, फ़ॉरेन पॉलिसी स्कूल और GNOIT, पूर्व एसोसिएट डीन, SoB, गलगोटिया विश्वविद्यालय।
'UPI पर टैक्स से अमेरिका को फायदा': राहुल गांधी का केंद्र पर निशाना, फैसला वापस लेने की मांग
'UPI पर टैक्स से अमेरिका को फायदा': राहुल गांधी का केंद्र पर निशाना, फैसला वापस लेने की मांग
मुंबई, अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीतिगत बैठक के फैसले से पहले तेल की कीमतों में नरमी आने से बुधवार के सत्र में भारतीय शेयर बाजार पिछले दो दिनों की गिरावट से उबरकर बढ़त के साथ हरे निशान में बंद हुआ। इस बीच, एफएमसीजी, रियल्टी और पीएसयू बैंक के शेयरों के समर्थन से प्रमुख बेंचमार्क निफ्टी और सेंसेक्स में 0.45 प्रतिशत तक की तेजी देखने को मिली।
यूपीआई का फ्री युग खत्म, विपक्ष हमलावर पर पेमेंट ऐप्स खुश
व्यापारियों को किए जाने वाले 2000 रुपए से अधिक के यूपीआई लेन-देन पर फीस लगाई जाएगी. कांग्रेस ने इसे लूट करार दिया है.
मथुरा में सपा नेता राजन रिजवी पर महिला बैंककर्मी से अभद्रता और पीछा करने के आरोप में एफआईआर दर्ज
मथुरा में सपा नेता राजन रिजवी पर महिला बैंककर्मी से अभद्रता और पीछा करने के आरोप में एफआईआर दर्ज
सऊदी अरब के लिए खतरे की घंटी अब मक्का तक पहुंच गई है। इस्लाम के सबसे पवित्र शहर मक्का में पहली बार संभावित हवाई हमले को लेकर आपात चेतावनी जारी होने और सायरन बजने से पूरी दुनिया में चिंता पैदा हो गई है। मक्का में हर साल दुनिया के कोने-कोने से लाखों मुसलमान पहुंचते हैं, इसलिए यहां मंडराता कोई भी सुरक्षा खतरा सिर्फ सऊदी अरब की चिंता नहीं रह जाता। हम आपको बता दें कि लोगों को घरों के भीतर जाने और खिड़कियों-दरवाजों से दूर रहने को कहा गया। जेद्दा और ताइफ में भी ऐसी ही चेतावनी जारी हुई। कुछ ही मिनटों में अलर्ट हटा लिया गया, लेकिन इस घटना ने साफ कर दिया कि यमन के हूतियों से बढ़ता खतरा अब सऊदी अरब के बेहद संवेदनशील इलाकों तक पहुंच चुका है। मक्का का नाम इस पूरे संकट को असाधारण रूप से संवेदनशील बना देता है। यह केवल सऊदी अरब का शहर नहीं, बल्कि इस्लाम का सबसे पवित्र धार्मिक केंद्र है। इसलिए यहां हवाई खतरे की चेतावनी ने सैन्य संकट को सीधे धार्मिक और राजनीतिक संकट में बदल दिया है। इस्लामी सहयोग संगठन ने मक्का और मदीना क्षेत्र पर हमलों की कड़ी निंदा करते हुए कहा है कि पवित्र स्थलों, मस्जिदों और नागरिक ढांचे को निशाना बनाना अस्वीकार्य है और उसने सऊदी अरब की सुरक्षा तथा पवित्र स्थलों की रक्षा के उपायों का समर्थन किया है। इसे भी पढ़ें: Middle East Tension: मक्का के पास सऊदी एयर डिफेंस ने हूथी ड्रोन को किया ढेर, गठबंधन ने दी 'रेड लाइन' की सख्त चेतावनी लेकिन असली तस्वीर मक्का से कहीं बड़ी है। हम आपको बता दें कि 12 सितंबर को यमन से दागा गया प्रक्षेपास्त्र सऊदी अरब के जाजान क्षेत्र में गिरा, जिसमें दो लोग घायल हुए और एक मस्जिद सहित कई इमारतों तथा वाहनों को नुकसान पहुंचा। इसके अगले दिन सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने खमिस मुशैत, अबहा और ताइफ के नागरिक इलाकों पर बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन से हमलों की बात कही। इन हमलों में 13 नागरिक घायल हुए और आवासीय मकानों तथा वाहनों को नुकसान पहुंचा। रियाद ने अब साफ संकेत दिया है कि लगातार हमलों का जवाब दिया जाएगा। सबसे खतरनाक बात यह है कि हमला केवल शहरों पर नहीं हो रहा। सऊदी अरब की ऊर्जा व्यवस्था भी निशाने पर है। 11 सितंबर को इराक से हुए ड्रोन हमले के बाद करीब 1,200 किलोमीटर लंबी पूर्व-पश्चिम तेल पाइपलाइन को बंद करना पड़ा। यह पाइपलाइन प्रतिदिन लगभग 40 से 50 लाख बैरल तेल लाल सागर तक पहुंचाने में सक्षम है और होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी संकट के बीच सऊदी अरब के लिए बेहद महत्वपूर्ण वैकल्पिक रास्ता बन गई थी। यही वह बिंदु है जहां संकट का सामरिक अर्थ साफ दिखाई देता है। यदि होर्मुज बाधित है और लाल सागर के प्रवेश द्वार बाब-अल-मंदब पर भी हूतियों का दबदबा बढ़ता है, तो सऊदी अरब के सामने तेल निर्यात के सुरक्षित रास्ते लगातार सिकुड़ते जाएंगे। यानी निशाना केवल रियाद नहीं, बल्कि उसकी ऊर्जा-आधारित आर्थिक शक्ति और पूरी वैश्विक आपूर्ति शृंखला है। साथ ही हूतियों ने यमन के पश्चिमी तट पर मोखा बंदरगाह और रणनीतिक पेरिम द्वीप पर कब्जा कर अपनी स्थिति को और मजबूत किया है। इसके बाद हनीश द्वीपों पर भी उनकी पकड़ की खबरें सामने आईं। पेरिम द्वीप बाब-अल-मंदब के सबसे संकरे हिस्से में स्थित है और इस समुद्री मार्ग पर नियंत्रण का अर्थ लाल सागर में आने-जाने वाले जहाजों पर दबाव बनाने की क्षमता है। यह घटनाक्रम महज यमन के भूभाग की लड़ाई नहीं है। बाब-अल-मंदब लाल सागर को हिंद महासागर से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण समुद्री द्वार है। ऐसे में हूतियों की बढ़त सऊदी अरब के पश्चिमी तट, उसके तेल निर्यात और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार—तीनों पर एक साथ दबाव पैदा करती है। देखा जाये तो यहां सऊदी अरब की कूटनीतिक रणनीति पर भी सवाल उठते हैं। पाकिस्तान के साथ ‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौते’ के जरिए रियाद ने सामूहिक सुरक्षा का एक नया ढांचा खड़ा किया है, जिसमें एक सदस्य पर हमला सभी पर हमला माना गया है। लेकिन यदि सऊदी अरब ने भारत के साथ सुरक्षा और सामरिक सहयोग को और अधिक गहरा किया होता, तो मौजूदा संकट में उसके पास एक अतिरिक्त और महत्वपूर्ण साझेदार हो सकता था। भारत और सऊदी अरब के बीच पहले से ही रक्षा, नौसैनिक सहयोग, खुफिया साझेदारी और संयुक्त सैन्य अभ्यास मौजूद हैं। दूसरी ओर, भारत के ईरान और इजराइल के साथ भी ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंध हैं। ऐसे में भारत की दोनों पक्षों के साथ संवाद की क्षमता सऊदी अरब के लिए एक अतिरिक्त कूटनीतिक और सामरिक सहारा बन सकती थी। फिर भी मौजूदा संकट यह सवाल जरूर खड़ा करता है कि क्या रियाद ने अपनी सुरक्षा साझेदारियों का दायरा जरूरत से ज्यादा सीमित कर दिया है। इसमें कोई दो राय नहीं कि रियाद के सामने अब विकल्प कम हैं। सऊदी अरब के पास आधुनिक हथियार, विशाल आर्थिक संसाधन और मजबूत वायु रक्षा है, लेकिन हूतियों की रणनीति ने युद्ध को मुश्किल बना दिया है। छोटे ड्रोन, मिसाइल, समुद्री दबाव और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर हमले के जरिए अपेक्षाकृत कमजोर पक्ष भी भारी रणनीतिक लागत पैदा कर सकता है। वैसे रियाद अब तक संयम बरतता रहा है। लेकिन पाइपलाइन पर हमला, लगातार मिसाइल और ड्रोन हमले तथा बाब-अल-मंदब के आसपास हूतियों की बढ़त इस संयम की सीमा को चुनौती दे रहे हैं। अमेरिकी सहायता भी बढ़ी है। एक सौ से अधिक अमेरिकी सैन्य सलाहकार सऊदी अरब में खुफिया सूचना और लक्ष्य निर्धारण में सहायता कर रहे हैं, लेकिन अमेरिका सीधे युद्ध में उतरने से बच रहा है। यही सबसे बड़ा रणनीतिक पेच है। सऊदी अरब पीछे हटता है तो हूतियों का दबदबा बढ़ सकता है; वह व्यापक सैन्य कार्रवाई करता है तो संघर्ष लंबा और अधिक विनाशकारी हो सकता है। विशेषज्ञों ने भी चेताया है कि बड़े पैमाने पर सऊदी जवाबी कार्रवाई संघर्ष को फिर एक खुले और लंबे युद्ध में बदल सकती है। इसलिए मक्का की चेतावनी को केवल एक सुरक्षा अलर्ट समझना भारी भूल होगी। इसके पीछे एक बहुत बड़ा खेल दिखाई दे रहा है। जिसके तहत सऊदी शहरों पर दबाव बनाया जा रहा है, तेल की नस पर हमला हो रहा है और बाब-अल-मंदब जैसे समुद्री द्वार पर पकड़ हासिल की जा रही है। होर्मुज और बाब-अल-मंदब दोनों पर संकट गहराया तो इसका असर केवल सऊदी अरब या यमन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि तेल, समुद्री व्यापार और विश्व अर्थव्यवस्था तक पहुंचेगा। बहरहाल, मक्का तक पहुंचा खतरा इसलिए इस संघर्ष का नया मोड़ है। अब सवाल यह है कि सऊदी अरब कब तक अपनी सीमाओं, पवित्र स्थलों, तेल ढांचे और समुद्री हितों पर एक साथ पड़ते इस चौतरफा दबाव को सहन करेगा।
करोड़ो यूपीआई यूजर्स के मन में एक सवाल घूम रहा है। सवाल ये कि क्या 2000 रुपए से ऊपर की यूपीआई पेमेंट पर आपको पैसा देना होगा? मतलब आप ₹500 की यूपीआई करोगे तो मुफ्त और ₹5000 की करोगे तो क्या आपकी जेब से कुछ कटेगा? और अगर कटेगा तो फिर जिस डिजिटल इंडिया का नाम लेकर सरकार ने खुद कहा था कि यूपीआई फ्री रहेगा। उसी सरकार के अपने कागज में कल पहली बार 2000 को लेकर एक लकीर क्यों खींची? उसी कागज में एक तरफ लिखा था कि बैंक 2000 तक की पेमेंट पर ₹1 नहीं ले सकते। ना सीधे ना घुमाकर। लेकिन दूसरी तरफ 2000 के ऊपर कुछ कंडीशंस लगाई गई थी। वो कंडीशंस क्या पैसा लेने के लिए? सवाल यह भी उठता है कि जो लकीर आज तक कहीं थी नहीं उसे सरकार क्यों लगा रही है? क्या यूपीआई को लेकर जो नए नियम है वो सिर्फ कागजों के फेरबदल है या वाकई में 2000 के ऊपर चार्ज लगेगा और चार्ज लग रहा है तो किसकी जेब से कटेगा? आम आदमी की जेब से या वो जो इसे बिजनेस में इस्तेमाल करते हैं दुकानदार उनकी जेब से और अगर दुकानदार की जेब से भी जाता है तो क्या वो घूमकर आपके सामान में नहीं जुड़ेगा? यूपीआई से लोग आज शहर से गांव पैसा भेजते हैं। स्कूल की फीस जमा करते हैं। हर महीने घर का राशन ऑनलाइन मंगाते हैं। और जितने लोग यूपीआई से सारा काम करते हैं। अब तो भीख मांगने वाले भी लोग जो हैं वो यूपीआई दिखाते हैं। तो उन सबके मन में ये सवाल है कि भाई साहब 2000 के ऊपर अगर 3000 का बिल गया तो क्या पैसा लोगे? 4000 डॉक्टर की फीस मांगा तो क्या फीस के साथ यूपीआई का भी टैक्स देंगे? और घर का किराया तो 8000, 10000 20,000 हो तो क्या वहां जाएगा? इसे भी पढ़ें: डूबने वाला है ब्रिटेन का सूरज, होंगे 4 टुकड़े! UK अगर टूटता है तो इसका भारत पर क्या असर होगा? कैसे शुरू हुई चर्चा 15 सितंबर को अखबारों में खबर आ गई कि यूपीआई पर 2000 के यूपीआई ट्रांजैक्शन पर कोई पैसा नहीं लगेगा। सबको समझ में आ गया कि यार 2000 के ऊपर वाले पर तो लगेगा ही लगेगा। सरकार अगर यह कह रही है तो कोई बहुत दिन से ही चल रहा था कि यूपीआई ट्रांजैक्शन पर सरकार चार्ज लगाने वाली है। कई बार खंडन होता, कभी दबी आवाज में खंडन होता, कभी स्पष्टीकरण आता, कभी फ्रेमवर्क पे काम करने की बातें कही जाती। लेकिन 15 सितंबर की ही शाम को वित्त मंत्रालय ने निर्मला सीतारमण का जो मंत्रालय है उसने एक फ्रेमवर्क जारी किया है। फ्रेमवर्क शाम को करीब 7 बजे के आसपास सामने आया है। जिसमें यह साफ कहा गया है कि जी हां 2000 के ऊपर के यूपीआई ट्रांजैक्शन पे अब चार्ज लगेगा। लेकिन शर्तें हैं। सरकार ने बताया किनको नहीं देना है पैसा सोशल मीडिया बहस शुरू हो गई। यहीं से खबर आई कि भाई 2000 तक अगर आपने लिखा है तो क्या उसके आगे और यह अफवाह फैलनी तेज हो गई। रोज सुबह चाय वाले को, शाम को दूध वाले को, महीने के आखिर में घर के किराए वाले को आप यूपीआई से पैसा भेजते हैं। वहां पर एक्स्ट्रा पैसा नहीं जाता। क्या अब एक्स्ट्रा जाएगा? यह मैसेज वायरल हुआ कि 2000 के ऊपर की हर पेमेंट पर पैसा कटेगा और वो आपके खाते से कटेगा। कई लोगों ने अपने बैंक की ऐप चेक करनी शुरू कर दी कि पैसा कटा तो नहीं क्योंकि 2019 से यह फ्री था। पर अब क्या होगा? सरकार ने साफ किया है कि यूपीआई इस्तेमाल करने वाला आम ग्राहक के पैसे से रुपया नहीं कटेगा। चाहे पेमेंट कितनी बड़ी भी क्यों ना हो। जो चार्ज की बात है वह एमडीआर है। यानी दुकानदार अपनी बिक्री पर बैंक को जो थोड़ी सी फीस देता है। ठीक वैसे ही जैसे कार्ड से पेमेंट लेने पर देता है। और यह सिर्फ दुकान पर होने वाले पेमेंट की बात है। दोस्त या घर वाले को सीधे पैसे भेजने पर चाहे जितनी बड़ी रकम हो पैसा नहीं जाएगा। हां और अभी तक यह फीस लगाने का कोई अंतिम फैसला भी नहीं हुआ है कि दुकानदार पर कितनी लेगी यह एनपीसीआई की एक कमेटी तय करेगी। यानी वही सरकारी कंपनी जो यूपीआई को पीछे चलाती है और जिसका काम अभी शुरू हुआ है। इसे भी पढ़ें: दोस्त इजरायल को झटका! क्या भारत ने बदल लिया अपना रुख, ईरान के लिए नेतन्याहू को छोड़ा? UPI सेमहीनेमें100000 कमानेवालेव्यापारियोंकोनहींदेनाहोगाशुल्क सामान्य ग्राहक आम लोगों पर शुल्क लगेगा? नहीं, UPI भुगतान मुफ्त रहेगा। चाहे भुगतान Person-to-Person (P2P) हो या Person-to-Merchant (P2M), ग्राहक से शुल्क नहीं लिया जाएगा। UPI ऐप भी ग्राहक से कोई फीस नहीं लेंगे। QR स्कैन करने पर चार्ज लगेगा? नहीं। छोटे भुगतान पहले की तरह मुफ्त रहेंगे और व्यापारी यह शुल्क ग्राहक से नहीं वसूलेंगे। सरकार के मुताबिक, बैंक व्यापारियों के लेन-देन पर नजर रखेंगे। छोटे व्यापारी ₹2,000 से अधिक के भुगतान पर क्या होगा? ऐसे भुगतान पर 0.40% शुल्क लागू होगा। हालांकि, अगर व्यापारी की UPI से महीने की प्राप्ति ₹1 लाख तक है, तो MDR नहीं लगेगा। क्या नया QR कोड लेना होगा? नहीं। मौजूदा QR कोड से ही भुगतान जारी रहेगा। क्या जीएसटी रजिस्ट्रेशन जरूरी है? नहीं। शून्य MDR का लाभ लेने के लिए GST रजिस्ट्रेशन अनिवार्य नहीं है। सीमा कैसे तय होगी? बैंक व्यापारी के लेन-देन की निगरानी करेंगे। अगर लगातार 3 महीने तक UPI से प्राप्ति ₹1 लाख से अधिक रहती है, तभी व्यापारी को Person-to-Merchant श्रेणी में बदला जाएगा। बड़ेव्यापारी-ईकॉमर्स ₹2,000 से कम के भुगतान पर भी जीरो MDR लागू है। वहीं, ₹75,000 से अधिक के लेनदेन के लिए अधिकतम फीस ₹300 तय की गई है। क्रेडिट या डेबिट कार्ड के मुकाबले UPI कितना किफायती है? अभी क्रेडिट कार्ड पर 1.5% से 2.5% और डेबिट कार्ड पर 0.90% तक शुल्क लगता है। इसके मुकाबले UPI पर सिर्फ 0.40% या अधिकतम ₹300 का शुल्क रहेगा। क्या जीरो MDR का फायदा लेने के लिए छोटे दुकानदार को GST पंजीकरण कराना जरूरी है? नहीं। छोटे दुकानदारों को UPI भुगतान पर जीरो MDR का लाभ लेने के लिए सिर्फ इसी वजह से GST पंजीकरण कराने की जरूरत नहीं होगी। इसकी पात्रता तय करने में मासिक UPI कलेक्शन की सीमा और बैंक खाते की श्रेणी देखी जाएगी। जो छोटे कारोबारी कानून के तहत GST पंजीकरण की अनिवार्य सीमा से नीचे हैं, वे बिना GST दस्तावेज दिए भी डिजिटल भुगतान स्वीकार कर सकेंगे। यूपीआई तो इतने सालों तक फ्री था, अचानक इसकी जरूरत क्यों पड़ी सरकार ने यह कदम इसलिए उठाया ताकि UPI के सिस्टम को टिकाऊ बनाया जा सके। किसी भी व्यवस्था को चलाने की लागत होती है और UPI के मामले में यह हर साल औसतन 20 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा है। ट्रांजैक्शन की संख्या बढ़ने के साथ खर्च भी बढ़ रहा है और फिलहाल बैंक, सर्विस प्रोवाइडर कंपनियां और सरकार मिल-जुलकर इसका बोझ उठा रहे हैं। लेकिन, यह व्यवस्था शायद लंबे वक्त तक नहीं चल पाती। UPIकीताकत सरकार आम लोगों को सहूलियत देने और सिस्टम को टिकाऊ बनाने के बीच संतुलन रखना चाहती है। हालांकि, इन फैसलों से जुड़ी चिंताओं को समझते हुए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि MDR का बोझ आम लोगों पर न पड़े। देश में डिजिटल ट्रांजैक्शन की सबसे बड़ी ताकत इसकी सरलता और मुफ्त होना रही है। इसी वजह से UPI ने उन दूर-दराज के इलाकों तक भी पहुंच बनाई है, जहां इंटरनेट उपलब्ध है। ऐसे में इसकी सहजता और मुफ्त व्यवस्था बनी रहना जरूरी है। अगर आम उपभोक्ताओं पर थोड़ा भी अतिरिक्त बोझ पड़ा, तो UPI की स्वीकार्यता प्रभावित हो सकती है। डिजिटल इंडिया की दिशा में UPI एक बड़ी छलांग है और आज कई अन्य देश भी इसे अपना रहे हैं। इसने भुगतान प्रणाली को बेहद सरल बनाने के साथ-साथ व्यापार को बढ़ाने में भी मदद की है। ऐसे में UPI को सहज, सुलभ और आम लोगों के लिए किफायती बनाए रखना जरूरी होगा। जब-जब मर्चेंट फीस लगी, बोझ ग्राहकों पर ही पड़ा, 5 उदाहरण से समझें पेट्रोल पंप: कार्ड से भुगतान पर पेट्रोल पंप संचालक खुद शुल्क चुकाने के बजाय इसे 'फ्यूल सरचार्ज' के रूप में ग्राहक से वसूल रहे हैं। ज्वेलर्स: बैंक के 1.5% से 2% MDR की भरपाई के लिए ज्वेलर्स ग्राहक के बिल में 'कार्ड सरचार्ज' जोड़ रहे हैं। IRCTC, सिनेमा हॉल और ट्रैवल ऐप्स: भुगतान गेटवे के शुल्क को 'कन्विनियंस फीस' के नाम पर ग्राहक से वसूल रहे हैं। छोटे भुगतान: फिक्स्ड प्रोसेसिंग कॉस्ट से बचने के लिए कुछ व्यापारी ₹200 या ₹500 से कम के भुगतान पर कार्ड लेने से इनकार करते हैं और ग्राहक को अधिक खरीदारी के लिए मजबूर करते हैं। रेस्तरां और स्टोर्स: MDR को सीधे बिल में जोड़ना गैर-कानूनी होने के बावजूद कुछ रेस्तरां और स्टोर्स 5% तक का 'सर्विस चार्ज' लगाकर ग्राहक से अतिरिक्त शुल्क वसूलते हैं।
Modi-Shah के लिए सबसे बड़ा संकट! Rajasthan के बाद क्या UP में Urban Voters छोड़ेगा BJP का साथ ?
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से भारत को क्या लाभ?
दिनांक 12 एवं 13 सितम्बर 2026 को ब्रिक्स का 18वां शिखर सम्मेलन दिल्ली के भारत मंडपम में सफलता पूर्वक सम्पन्न हो गया। ब्रिक्स का उद्देश्य सदस्य देशों के बीच आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक सहयोग बढ़ाना है। इस शिखर सम्मेलन में ब्रिक्स के 11 सदस्य देशों के साथ ही 10 अन्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष, प्रधानमंत्री एवं उच्च स्तर के अधिकारी शामिल हुए। वर्ष 2025-26 के लिए भारत को ब्रिक्स का अध्यक्ष बनाया गया था, अतः भारत ने इस वर्ष ब्रिक्स सम्मेलन की मेजबानी एवं अध्यक्षता की। ब्रिक्स के माध्यम से विश्व की 11 प्रमुख उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं एवं विकासशील देशों को एक मंच प्रदान किया जाता है। ब्रिक्स में शामिल देशों की कुल आबादी विश्व की कुल जनसंख्या का 49.5 प्रतिशत है और विश्व के कुल सकल घरेलू उत्पाद में 40 प्रतिशत की हिस्सेदारी है तथा वैश्विक व्यापार में 26 प्रतिशत की भागीदारी है। इससे वैश्विक स्तर पर ब्रिक्स का महत्व स्वयं ही स्पष्ट हो जाता है। ब्रिक्स के सदस्य देश आपस में आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय आर्थिक और वित्तीय स्थिति, दूरसंचार, कृषि, श्रम, रोजगार, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संरचना, व्यापार और विश्व व्यापार संगठन सहित वैश्विक मुद्दों पर विचार विमर्श करते है। इस वर्ष के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की थीम “लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण” रखी गई थी। शिखर सम्मेलन में 45 पन्नों एवं 140 बिंदुओं के “नई दिल्ली घोषणापत्र” को समस्त सदस्य देशों द्वारा सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया था। इस सम्मेलन की यह सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है, क्योंकि इस सम्मेलन में आपस में कुछ विरोधाभासी विचार रखने वाले देश (ईरान, साऊदी अरब एवं संयुक्त अरब अमीरात) भी शामिल थे। ईरान के राष्ट्रपति एवं यूएई के राष्ट्रपति के बीच शिखर सम्मेलन के बीच आपस में वार्ता सम्पन्न हुई थी, जबकि दोनों देशों के बीच अमेरिका-ईरान युद्ध के संदर्भ में तनाव की स्थिति कायम है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि ब्रिक्स की स्थापना अमेरिका में हुई है। वर्ष 2006 में न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) के मौके पर ब्रिक विदेश मंत्रियों की पहली बैठक में ब्रिक को औपचारिक रूप दिया गया था। ब्रिक का पहिला उद्घाटन शिखर सम्मेलन वर्ष 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में आयोजित किया गया था। वर्ष 2010 में न्यूयॉर्क में ब्रिक विदेश मंत्रियों की बैठक में दक्षिण अफ्रीका को शामिल करने के साथ ब्रिक को ब्रिक्स में विस्तारित करने पर सहमति हुई थी। तदनुसार, दक्षिण अफ्रीका ने 2011 में सान्या में तीसरे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लिया। मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जनवरी 2024 से और इंडोनेशिया जनवरी 2025 में ब्रिकस के पूर्ण सदस्य बने। इसके बाद बेलारूस, बोलीविया, कजाकिस्तान, क्यूबा, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम 2025 में भागीदार देशों के रूप में ब्रिक्स में शामिल हुए। इसे भी पढ़ें: आखिर कृत्रिम बुद्धिमत्ता को लेकर जारी अमेरिकी-चीनी रस्साकसी के बीच क्या करे भारत? समझिए विस्तार से भारत के प्रधानमंत्री ने अपने उदबोधन में उक्त ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में कई आवश्यक एवं महत्वपूर्ण विषयों की ओर समस्त सदस्यों का ध्यान आकर्षित किया है। अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने विभिन्न देशों से अमेरिका को होने वाले कई उत्पादों के निर्यात पर भारी भरकम टैरिफ लगाया था, इसी प्रकार चीन ने भी आवश्यक मिनरल के निर्यात पर कुछ प्रतिबंध लगाए थे, इस प्रकार की स्थित पुनः न बनें इस हेतु यह सुझाव दिया गया है कि तकनीकी एवं आवश्यक मिनेरल्स को विभिन्न देशों द्वारा हथियार की तरह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए इसका सीधा सीधा विपरीत प्रभाव विकासशील देशों के विकास पर पड़ता है। जब हम वैश्विक स्तर पर एक परिवार की बात करते हैं तो प्राकृतिक संसाधनों पर इस धरा पर निवासरत पूरी मानवजाति का समान अधिकार है। इसके उपयोग को कुछ देशों द्वारा रोका नहीं जाना चाहिए। भारतीय सनातन संस्कृति में तो प्रकृति को मां के समान माना जाता है, अतः प्रकृति का शोषण नहीं बल्कि आवश्यकता अनुसार दोहन होना चाहिए। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन भी आवश्यक है। विकास और पर्यावरण एक दूसरे के खिलाफ नहीं हैं केवल आवश्यता है कि दोनों के बीच संतुलन स्थापित किया जाय। हाल ही के समय में महामारी, जलवायु आपदाओं एवं सप्लाई चैन में रुकावटों ने दिखाया है कि विभिन्न देश एक दूसरे पर किस प्रकार निर्भर है। एक देश में आया संकट दूसरे देश को भी प्रभावित करता हुआ दिखाई दे रहा है। ब्रिक्स के सदस्य देशों को आपस में सहयोग बढ़ाने तथा सप्लाई चैन को मजबूती प्रदान करने की ओर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए। ब्रिक्स के सदस्य देशों के बीच आपस में छोटे कारोबारों को बढ़ावा दिए जाने के प्रयास किए जाने चाहिए और उन्हें नए बाजार और पर्याप्त वित्त की सुविधा उपलब्ध कराए जाने के प्रयास भी होने चाहिए ताकि रोजगार के नए अवसर निर्मित हों और अंतिम पंक्ति पर खड़े नागरिकों को गरीबी रेखा से ऊपर लाया जा सके। इसके लिए “ब्रिक्स कनेक्ट” के माध्यम से गरीब नागरिकों को काम के लिए आवश्यक कौशल सीखने, रोजगार के अवसर बढ़ाने एवं मातृशक्ति को अधिक काम के मौके देने का प्रयास किया जाना चाहिए। छोटे कारोबारियों को मदद पहुंचाने के उद्देश्य से BRICS MSME पोर्टल प्रारम्भ किया गया है। इससे छोटे कारोबारी नए बाजारों से जुड़ सकेंगें। ब्रिक्स देशों में कार्य कर रहे स्टार्टअप्स को आपस में जोड़ने के लिए ब्रिक्स इनक्युबेटर नेट्वर्क बनाया जा सकता है। इसी प्रकार, नए और बड़े स्तर के नवाचार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से ब्रिक्स स्टार्टअप इनोवेशन फंड भी बनाया जा सकता है। ब्रिक्स देश आपस में कारोबार को सरल बनाने के उद्देश्य से स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं और अमेरिकी डॉलर का इस्तेमाल कम करने का प्रयास कर रहे हैं। इसके साथ साथ, अलग अलग देशों के ऑनलाइन डिजिटल पेमेंट सिस्टम को आपस में जोड़ने का प्रयास भी किया जा रहा है। इससे एक देश के नागरिकों को दूसरे देश के नागरिकों को राशि भेजना बहुत आसान होगा और अमेरिकी डॉलर की आवश्यकता कम होगी। ब्रिक्स स्थापना से भारत को विशेष लाभ हुआ है। सामरिक दृष्टि से भारत का वैश्विक स्तर पर महत्व बढ़ा है। भारत आज न केवल ब्रिक्स बल्कि जी-20, जी-7, क्वाड, एससीओ जैसे वैश्विक संस्थानों में भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है। इससे वैश्विक स्तर पर भारत की साख बढ़ी है एवं अन्य देश आंज भारत की आवाज को गम्भीरता से सुन रहे हैं। विभिन्न देशों के नागरिक आज सनातन संस्कृति के संस्कारों को अपनाने हेतु लालायित हैं क्योंकि इस संदर्भ में भारत के व्यवहार से ये देश अत्यधिक प्रभावित हैं। साथ ही, भारत को कई प्रकार के आर्थिक लाभ भी होने जा रहे हैं और भारत में विदेशी निवेश बढ़ने की सम्भावना बनी है। ब्रिक्स के 21 सदस्य देशों के बीच आपसी समझदारी बढ़ी है और इससे इन देशों के बीच आर्थिक साझेदारी भी बढ़ेगी। आतंकवाद के खिलाफ मजबूत संदेश गया है कि भारत किसी भी कीमत पर आतंकवाद को पनपने नहीं देगा। नई दिल्ली घोषणापत्र में रूस एवं चीन सहित समस्त ब्रिक्स सदस्य देशों ने पहलगाम आतंकी हमले की निंदा भी की है। इसमें यह भी कहा गया है कि आतंकियों को पनाह देने वालों के खिलाफ मिलकर कार्यवाही करनी चाहिए। साथ ही, आतंकियों तक पहुंचने वाली फंडिंग को रोकने और उन्हें सुरक्षित ठिकाने देने वालों पर भी कार्यवाही की जानी चाहिए। भारत आज ग्लोबल साउथ की आवाज बन रहा है। इस क्षेत्र के देश भारत पर भरोसा करने लगे हैं। इससे भारतीय रुपए की वैश्विक स्तर पर साख बढ़ सकती है क्योंकि ब्रिक्स के सदस्य देश आपस में स्थानीय मुद्रा में व्यापार को बढ़ावा देने के प्रयास कर रहे हैं। यूपीआई एवं रूपे कार्ड की स्वीकार्यता कई देशों में अब बढ़ रही है। आपस में स्थानीय मुद्रा में व्यापार करने से भारतीय रुपए को मजबूती मिलेगी एवं इससे मंहगाई बढ़ने की गति कम होगी। ब्रिक्स ने वर्ष 2015 में डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी) की स्थापना की थी। इस बैंक ने भारत को 10,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक की राशि का ऋण प्रदान किया है। इस ऋणराशि का उपयोग मुंबई मेट्रो लाइन डालने के लिया किया जा रहा है। इंदौर में मेट्रो भी इसी ऋण से बनी है। दिल्ली-गाजियाबाद क्षेत्रीय रेल्वे लाइन इसी ऋण से बिछाई गई है। कुल मिलाकर भारत में आधारभूत संरचना खड़ी करने में ब्रिक्स द्वारा स्थापित उक्त बैंक का महत्वपूर्ण योगदान है। प्रहलाद सबनानी सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक, भारतीय स्टेट बैंक के-8, चेतकपुरी कालोनी, झांसी रोड, लश्कर, ग्वालियर - 474 009
प्राइवेट स्कूल रिश्वत कांड में पूर्व मंत्री अनबिल महेश के ठिकानों पर क्राइम ब्रांच का छापा
प्राइवेट स्कूल रिश्वत कांड में पूर्व मंत्री अनबिल महेश के ठिकानों पर क्राइम ब्रांच का छापा
मुंबई, सोने और चांदी की कीमतों में बुधवार को तेजी देखने को मिली और दोनों कीमती धातुओं का दाम करीब 1.5 प्रतिशत तक बढ़ गया।
पीएम मोदी के जन्मदिन पर बंगाल में जलाया जाएगा 'आशीर्वाद का दीया', सीएम सुवेंदु ने लोगों से की अपील
पीएम मोदी के जन्मदिन पर बंगाल में जलाया जाएगा 'आशीर्वाद का दीया', सीएम सुवेंदु ने लोगों से की अपील
UPI पर अमेरिका का वार! क्या US कंपनियों के दबाव में Modi सरकार ने किया FREE UPI का अंत ?

