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राहुल गांधी की खुली चुनौती, PM मोदी से बोले- अब सामने आइए

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष तथा लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फिर खुली बहस की चुनौती देते हुए कहा कि 'अब 24 घंटे हो गए मोदी जी, मैंने आपको चैलेंज दिया है

देशबन्धु 3 Nov 2026 9:13 pm

राजस्थान पंचायत चुनाव: सीएम भजनलाल शर्मा के पिता ने पैतृक गांव में डाला वोट, नगला सिंघाड़ा ने किया मतदान का बहिष्कार

राजस्थान पंचायत चुनाव: सीएम भजनलाल शर्मा के पिता ने पैतृक गांव में डाला वोट, नगला सिंघाड़ा ने किया मतदान का बहिष्कार

समाचार नामा 3 Nov 2026 7:22 pm

विपक्षी हुंकार शक्ति-प्रदर्शन नहीं, जनकल्याण का कारण बने

लोकतंत्र केवल सत्ता परिवर्तन की व्यवस्था नहीं, बल्कि जनआकांक्षाओं, नागरिक अधिकारों, जवाबदेही और सार्थक राजनीतिक संवाद की जीवंत प्रणाली है। इसकी मजबूती केवल सत्तारूढ़ दल की कार्यक्षमता से नहीं, बल्कि विपक्ष की जिम्मेदारी, उसकी वैचारिक परिपक्वता और जनहित के प्रति उसकी प्रतिबद्धता से भी निर्धारित होती है। लेकिन जब विपक्ष की राजनीति का केंद्र जनता के बुनियादी सवालों के बजाय सत्ता का विरोध, नेतृत्व पर व्यक्तिगत हमले और आरोपों की पुनरावृत्ति बन जाए, तब लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती को लेकर प्रश्न खड़े होना स्वाभाविक है। दिल्ली के रामलीला मैदान में कांग्रेस के नेतृत्व में लगभग बीस विपक्षी दलों का जुटना और वोट चोरी के मुद्दे पर हुंकार भरना इसी संदर्भ में राजनीतिक समीक्षा की अपेक्षा करता है। सवाल यह नहीं कि विपक्ष को रैली करने का अधिकार है या नहीं, बल्कि यह है कि ऐसी रैलियों से लोकतंत्र और आम जनता को आखिर क्या हासिल हो रहा है? रामलीला मैदान ऐतिहासिक रूप से जनआंदोलनों, राजनीतिक चेतना और लोकतांत्रिक प्रतिरोध का साक्षी रहा है। यहां उमड़ने वाली भीड़ को केवल राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि उससे जुड़े संदेश और उद्देश्य का मूल्यांकन भी आवश्यक है। कांग्रेस ने सहयोगी दलों को एक मंच पर लाकर अपनी राजनीतिक एकजुटता प्रदर्शित करने का प्रयास किया। दस लाख लोगों के जुटने का दावा किया गया था, लेकिन उपलब्ध विवरणों के अनुसार वास्तविक उपस्थिति इस दावे से काफी कम रही। फिर भी इस आयोजन का महत्त्व केवल भीड़ के आकार से नहीं, बल्कि उसके राजनीतिक संदेश से तय होना चाहिए। दुर्भाग्य यह है कि इस रैली में भी विपक्ष की ओर से वही पुराने आरोप, वही राजनीतिक भाषण और वही सत्ता विरोधी तेवर अधिक दिखाई दिए, जिनकी पुनरावृत्ति लंबे समय से होती रही है। इसे भी पढ़ें: कांग्रेस की रैली - ‘खाली खाली कुर्सियां, खाली खाली तम्बू हैं’ और भेजा...? वोट चोरी और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण अर्थात एसआईआर को लेकर विपक्ष ने गंभीर सवाल उठाए हैं। चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष का अधिकार ही नहीं, उसका दायित्व भी है। प्रत्येक वैध मतदाता का नाम मतदाता सूची में सुरक्षित रहना चाहिए और किसी भी पात्र नागरिक को मतदान के अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए आरोपों के साथ प्रमाण और तथ्यों की विश्वसनीयता भी आवश्यक है। जिन मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने का प्रश्न उठाया जा रहा है, उनमें मृतक, स्थायी रूप से अन्यत्र स्थानांतरित हो चुके और एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत मतदाता भी शामिल बताए गए हैं। निर्वाचन आयोग ने भी एसआईआर से जुड़े निर्णयों को तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिया गया बताया है। इस प्रक्रिया को लेकर न्यायालय में विचार और निर्देश भी सामने आए हैं। इसलिए इस पूरे विषय पर अंतिम निष्कर्ष तथ्यों, प्रमाणों और न्यायिक परीक्षण के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए। विपक्ष का दायित्व है कि वह चुनाव आयोग से पारदर्शिता की मांग करे, मतदाता सूची की त्रुटियों को उजागर करे और पात्र मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए ठोस प्रयास करे। लेकिन केवल वोट चोरी का नारा बुलंद करने से लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति विश्वास मजबूत नहीं होगा। यदि विपक्ष वास्तव में मतदाता अधिकारों को लेकर गंभीर है तो उसे प्रत्येक मतदान केंद्र पर अपने बूथ लेवल एजेंट नियुक्त करने, मतदाता सूची की जांच करने, वास्तविक विसंगतियों के प्रमाण जुटाने और प्रभावित नागरिकों को न्याय दिलाने की व्यवस्था मजबूत करनी चाहिए। लोकतंत्र की रक्षा नारों से कम और धरातल पर किए गए कार्यों से अधिक होती है। इस रैली का एक दूसरा पहलू भी है। कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की राजनीतिक एकजुटता का आधार क्या है? क्या यह एकजुटता किसी साझा आर्थिक दृष्टि, रोजगार नीति, कृषि सुधार, शिक्षा की गुणवत्ता, स्वास्थ्य सेवाओं, महंगाई, भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा, युवाओं के भविष्य और सामाजिक न्याय के व्यापक कार्यक्रम पर आधारित है? अथवा इसका मुख्य उद्देश्य नरेंद्र मोदी सरकार का विरोध करना और सत्ता के विरुद्ध राजनीतिक वातावरण तैयार करना है? यदि किसी गठबंधन की एकता का सबसे बड़ा आधार किसी एक नेता या सरकार का विरोध हो, तो उसकी वैचारिक स्थिरता और भविष्य की दिशा पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। सत्ता विरोध अपने आप में कोई राजनीतिक दर्शन नहीं हो सकता। लोकतंत्र में विपक्ष केवल आलोचक नहीं होता, वह वैकल्पिक नीतियों का निर्माता भी होता है। संसद में विधेयकों पर गंभीर चर्चा, सरकार की नीतियों का तथ्यात्मक परीक्षण, आर्थिक और सामाजिक समस्याओं पर वैकल्पिक सुझाव तथा जनता की आवाज को संस्थागत मंचों तक पहुंचाना उसकी बुनियादी जिम्मेदारी है। लेकिन जब राजनीतिक विमर्श आरोप-प्रत्यारोप, व्यक्तिगत कटाक्ष और विरोध प्रदर्शनों तक सीमित होने लगता है, तब जनता के वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। विपक्ष को यह समझना होगा कि प्रधानमंत्री की आलोचना करना और प्रधानमंत्री के विकल्प के रूप में अपनी योग्यता प्रमाणित करना दो अलग-अलग बातें हैं। पहली बात राजनीतिक विरोध है, जबकि दूसरी लोकतांत्रिक नेतृत्व की कसौटी है। आज भारत अनेक बुनियादी चुनौतियों के दौर से गुजर रहा है। युवाओं के लिए गुणवत्तापूर्ण रोजगार, किसानों की आय और कृषि की उत्पादकता, छोटे व्यापारियों की आर्थिक सुरक्षा, शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार, पर्यावरण संरक्षण, शहरी अव्यवस्था, बढ़ती आर्थिक विषमता और महिलाओं की सुरक्षा जैसे प्रश्न किसी एक दल के नहीं, पूरे राष्ट्र के प्रश्न हैं। क्या रामलीला मैदान की हुंकार इन विषयों पर कोई ठोस वैकल्पिक कार्यक्रम प्रस्तुत कर सकी? क्या विपक्ष ने यह बताया कि वह इन समस्याओं के समाधान के लिए कौन-सी नीतियां अपनाएगा? क्या उसने देश के सामने कोई साझा विकास दृष्टि रखी? इन सवालों का उत्तर ही इस रैली की राजनीतिक सार्थकता का वास्तविक मूल्यांकन करेगा। यह भी समझना आवश्यक है कि लोकतंत्र में भीड़ जुटाना और जनमत अर्जित करना अलग-अलग बातें हैं। भीड़ किसी क्षणिक राजनीतिक उत्तेजना, संगठनात्मक शक्ति अथवा विरोध की भावना से जुट सकती है, लेकिन स्थायी जनविश्वास विचारों, नीतियों, आचरण और परिणामों से अर्जित होता है। राजनीतिक दलों को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि विशाल मंच, बड़े भाषण और एकजुटता के प्रदर्शन से जनता का विश्वास स्वतः प्राप्त हो जाएगा। आज का मतदाता पहले की तुलना में अधिक जागरूक है। वह केवल यह नहीं सुनना चाहता कि सरकार ने क्या गलत किया, बल्कि यह भी जानना चाहता है कि विपक्ष उस स्थिति को सुधारने के लिए क्या करेगा। कांग्रेस के लिए यह आत्ममंथन का अवसर है। देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी होने के नाते उससे केवल विरोध की राजनीति नहीं, बल्कि वैचारिक नेतृत्व और रचनात्मक विपक्ष की अपेक्षा भी की जाती है। राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं को अपनी राजनीतिक ऊर्जा का उपयोग ऐसे मुद्दों पर करना चाहिए, जो समाज के व्यापक वर्गों को प्रभावित करते हैं। विपक्षी एकता तभी सार्थक होगी, जब वह साझा नकारात्मकता के बजाय साझा सकारात्मक एजेंडे पर आधारित होगी। विभिन्न दलों के बीच नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा और राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रहित के प्रश्नों पर सहमति बनाना आवश्यक है। वस्तुतः लोकतंत्र की प्राण-प्रतिष्ठा केवल चुनावों, रैलियों, नारों और राजनीतिक हुंकारों से नहीं होती। इसके लिए संस्थाओं की निष्पक्षता, नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा, राजनीतिक दलों की जवाबदेही, विचारों की स्वतंत्रता और जनहित के प्रति संवेदनशील शासन व्यवस्था आवश्यक है। सत्तापक्ष को भी आलोचना सुनने और अपनी कमियों को सुधारने का साहस दिखाना चाहिए, जबकि विपक्ष को प्रमाणों के साथ सवाल उठाने और समाधान प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए। लोकतंत्र किसी एक दल की बपौती नहीं, बल्कि समूचे राष्ट्र की साझी विरासत है। रामलीला मैदान की यह रैली विपक्ष के लिए केवल शक्ति प्रदर्शन का अवसर बनकर न रह जाए, बल्कि आत्ममंथन का कारण बने, यही समय की मांग है। सवाल यह नहीं कि विपक्ष मोदी सरकार के विरुद्ध कितनी बार एकजुट हो सकता है, बल्कि यह है कि वह देश के भविष्य के लिए कितनी बार एक सार्थक और विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत कर सकता है। लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए सत्ता का विरोध जरूरी हो सकता है, लेकिन उससे कहीं अधिक जरूरी है जनहित का समर्थन। लोकतंत्र को हुंकार से नहीं, विचार से; भीड़ से नहीं, विश्वास से और सत्ता की आलोचना से नहीं, जनकल्याण के ठोस संकल्प से मजबूती मिलती है। यही रामलीला मैदान की राजनीतिक गूंज से निकलने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण संदेश होना चाहिए। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

प्रभासाक्षी 3 Nov 2026 5:53 pm

इन 55 हजार मौंतों की आशंका पर चर्चा तक नहीं

देश में सत्तारुढ़ राजनीतिक दलों के लिए मौसम परिवर्तन के दुष्प्रभाव चिंता का विषय नहीं है। ऐसे परिवर्तनों की चपेट में आने वाले गरीब होते हैं। इनकी आवाज सुनने वाली देश में कोई सरकार नहीं है। सिर्फ इनकी सुनवाई के दावे किए जाते हैं, जबकि पर्यावरण के प्रभावों से बचाने के इंतजामों पर चर्चा तक नहीं होती है। क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के जारी किया गए नक्शे आंकड़े काफी डराने वाले हैं। अलनीनो के प्रभाव से उत्पन्न गर्मी से भारत में जहां 55,200 लोगों की मौत होने की आशंका है। इसके बावजूद यह मुद्दा देश के सत्तारुढ़ दलों के चिंता का सबब नहीं है। अल नीनो हीट मॉर्टेलिटी ट्रैकर (अल नीनो के कारण गर्मी से होने वाली मौतों का ट्रैकर) नामक इस भयावह नक्शे के मुताबिक नक्शे के अनुसार जून 2026 में शुरू होने वाली इस घटना से मार्च 2027 तक गर्मी के कारण 857,400 अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं, जो वैज्ञानिकों द्वारा एक महीने पहले लगाए गए अनुमान से 350,000 ज्यादा है। इनमें से एक-तिहाई मौतें नाइजीरिया, भारत और ब्राजील में होने का अनुमान है। इसे भी पढ़ें: Bhutan की पहाड़ियों से उठी जलप्रलय की आहट, आपदा से निबटने के लिए India कितना तैयार है? शोधकर्ताओं का अनुमान है कि जून के बाद से 'अल नीनो' के कारण 484,500 अतिरिक्त मौतें हुई हैं। इसके कुछ असर इस तरह दिखे हैं। इंडोनेशिया में जंगलों में आग लगना, भारत में अहम मानसूनी बारिश का न होना और मध्य अमेरिका में सूखा पड़ना। अल नीनो की वजह से इन नौ महीनों की इस अवधि के अनुमान में लगाई गईं आधी से ज्यादा अतिरिक्त मौतें अगले छह महीनों के भीतर होने की आशंका है और भारत पर इसका भयावह रूप देखने को मिल सकता है। इतिहास के पन्नों में 1877-1878 के 'सुपर अल नीनो' को सबसे विनाशकारी मौसमी घटनाओं में गिना जाता है। उस दौरान इसके प्रभाव से भारत, चीन और ब्राजील जैसे देशों में भयंकर सूखा पड़ा था। लगातार बारिश न होने के कारण फसलें पूरी तरह से बर्बाद हो गई थीं। इतिहास में इसे 'ग्रेट फेमाइन' के रूप में जाना जाता है। इस अकाल के कारण भुखमरी और बीमारियों से दुनिया भर में करोड़ों लोगों की दर्दनाक मौत हुई थी। वैज्ञानिकों का मानना है कि समुद्र की सतह के तापमान में अत्यधिक वृद्धि उस सदी के सबसे बड़े जलवायु संकट का कारण बनी थी। क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के सह-संस्थापक और यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो में अर्थशास्त्र के मिल्टन फ्रीडमैन डिस्टिंग्विश्ड सर्विस प्रोफेसर, माइकल ग्रीनस्टोन ने कहा है कि सुपर अलनीनो पर हमारा शोध नई पूर्वानुमान क्षमताओं का इस्तेमाल करके हमारे सामने मौजूद सबसे जरूरी सवालों में से एक का जवाब देता है। अत्यधिक गर्मी के कारण कहां लोगों की जान जाने का खतरा है? अल नीनो एक मौसमी घटना है, जिसमें मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। यह अल नीनो-सदर्न ऑसिलेशन का गर्म चरण है। यह एक प्राकृतिक मौसमी पैटर्न है जो दुनिया भर में वायुमंडलीय परिसंचरण, हवाओं के तंत्र और बारिश के वितरण को प्रभावित करता है। इंडोनेशिया में धधकती भयानक जंगलों की आग से लेकर प्रशांत महासागर में तूफानों की असामान्य सक्रियता तक अल नीनो का असर दुनिया के लगभग हर कोने में देखने को मिल रहा है। इस असामान्य मौसमी गतिविधि के कारण आने वाले समय में दुनिया भर में अलग-अलग क्षेत्रों में अत्यधिक तापमान और अनिश्चित बारिश और अन्य प्राकृतिक आपदाओं का खतरा काफी बढ़ गया है। दिसंबर में अल नीनो अपने चरम पर पहुंच सकता है, जिसके प्रभाव से नवंबर से जनवरी के बीच भारत में सामान्य से कम सर्दी पड़ने की संभावना है। हालांकि उत्तरी हिस्से में ठंड की तीव्रता पश्चिमी विक्षोभ, पहाड़ों पर बर्फबारी और उत्तर-पश्चिमी हवाओं पर निर्भर करती है। इस दौरान दिल्ली समेत पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान एवं बिहार में कभी-कभी शीतलहर की आशंका को खारिज नहीं किया जा सकता। मैदानों में तापमान कुछ समय के लिए गिर सकता है। फिर भी मौसम विज्ञानियों का मानना है कि इस बार लंबे समय तक कड़ाके की ठंड पड़ने की आशंका काफी कमजोर है। डब्ल्यूएमओ के अनुसार नवंबर से जनवरी के दौरान प्रशांत महासागर में अलनीनो की स्थिति और मजबूत हो सकती है। कई जलवायु माडल संकेत दे रहे हैं कि दिसंबर में यह चरम पर पहुंच सकता है। समुद्र की सतह के तापमान में परिवर्तन का असर मौसम पर पड़ता है। हालांकि इसका असर देश के सभी हिस्सों में एक समान नहीं होगा। भारत में मानसून के दौरान 13 प्रतिशत कम बारिश होने के बाद, अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह मौसमी घटना सर्दियों में तापमान बढ़ाएगी, क्या ये बारिश के पैटर्न को बिगाड़ेगी और क्या कृषि पर दबाव बढ़ाएगी? भारत के मामले में अल नीनो पर कड़ी नजर रखी जाती है, क्योंकि आमतौर पर इसके कारण दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान सामान्य से कम बारिश होने का खतरा बढ़ जाता है। बीते मानसूनी सीजन में भारत के अलग-अलग हिस्सों में बारिश का असमान वितरण देखने को मिला। मध्य भारत में तो लगभग सामान्य बारिश हुई, लेकिन पूर्वी और पूर्वात्तर भारत में 26 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई जिसे असाधारण सूखा माना जा सकता है। वहीं दक्षिणी राज्यों में भी औसत से 24 प्रतिशत कम बारिश हुई। अल नीनो के और मजबूत होने से भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य से ज्यादा गर्मी हो सकती है, जिससे जल संसाधनों और कृषि पर दबाव बढ़ सकता है। आने वाले महीनों में अल नीनो का बढ़ता असर भारत के जल संसाधनों, कृषि पैदावार और खाद्य सुरक्षा के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित होने वाला है। सरकार और कृषि विभागों को किसानों के लिए समय पर एडवाइजरी जारी करने, कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देने और जलाशयों में पानी के सही प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करना होगा ताकि संभावित खाद्य संकट से बचा जा सके। सवाल यही है क्या देश के सत्तारुढ़ राजनीतिक दलों ने अलनीनो के प्रभाव से होने वाली मौतें और पेयजल तथा कृषि की चुनौतियों से निपटने के कोई इंतजाम किए हैं। दरअसल इसकी चर्चा तक किसी राजनीतिक दल ने नहीं की हैं। करीब 50 हजार लोगों की संभावित मौतों का यह मसला देश के नेताओं के लिए चिंता की बात नहीं है। ये मौतें अचानक नहीं होंगी। गर्मी के प्रभाव और पानी की कमी और दूषित पेयजल की मजबूरी से होने वाली मौतें धीमी मौत् होती है। यही वजह है कि नेताओं को इसकी चिंता नहीं है। इसका प्रमुख कारण है कि ऐसी मौतों का मसला वोट नहीं दिला सकता। इसी वजह से हर साल पर्यावरण परिवर्तन से होने वाली मौतें कभी भी राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा पत्र में शामिल नहीं की जाती हैं।

प्रभासाक्षी 3 Nov 2026 5:46 pm

कांग्रेस की रैली - ‘खाली खाली कुर्सियां, खाली खाली तम्बू हैं’ और भेजा...?

फिल्म मेरा नाम जोकर के गीत ‘खाली-खाली कुर्सियां हैं खाली खाली तम्बू हैं’ के गीतकार गोपालदास ‘नीरज’ अगर 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई कांग्रेस की रैली को देखते तो वहां की खाली कुर्सियां व खाली तम्बू देख कर वैचारिक पक्ष से लिख रहे होते कि ‘खाली खाली भेजा है।’ रैली में किसी भी नेता द्वारा ऐसी कोई तथ्यात्मक बात नहीं कही गई जिससे यह साबित होता हो कि वोटों की चोरी हुई है और एसआईआर में गड़बड़ी है। जो जो बातें बोली गईं, चुनाव आयुक्त, प्रधानमंत्री व गृहमंत्री को लेकर जो जो अपशब्द बोले गए वो सब पिछले कई महीनों से गढ़े जा रहे झूठे नैरेटिव के प्रयासों से अतिरिक्त कुछ नहीं था। शायद यही कारण है कि न तो देशवासियों ने इस रैली से पहले विपक्ष को गंभीरता से लिया और न ही बाद में इन बातों पर ध्यान दे रहा है। कांग्रेस चाहे इस रैली को लेकर कितनी भी उत्साहित नजर आए परंतु यह तो सच्चाई है कि रैली में उमड़ी भीड़ दस लाख के दावे के मुकाबले कहीं अधिक कम रही। रही सही कसर केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजु ने यह दावा करके पूरी कर दी है कि कांग्रेस जिन तस्वीरों से रैली की भीड़ दिखा रही है वह कृत्रिम बुद्धिमता से तैयारी की गई है। इसे भी पढ़ें: रामलीला मैदान की इंडी गठबंधन की महारैली के सियासी निहितार्थ को समझिए रैली के दौरान व इससे पूर्व कथित जनसंसद में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने 2024 के लोकसभा चुनावों को जिस तरीके से अवैध बताया इससे तो उन्होंने अपने नेता पद को भी अवैधानिक घोषित कर दिया है। दुनिया के राजनीतिक इतिहास में शायद ही ऐसा कभी हुआ हो कि संवैधानिक पद पर विराजमान किसी नेता ने अपने ही पद को अवैध घोषित किया हो। अब प्रश्न है कि अगर उनका पद ही अवैध है तो वे इस पद से अभी तक चिपके हुए क्यों हैं? वैसे तो नेता प्रतिपक्ष कई महीनों से वोट चोरी का झूठ फैला रहे हैं परंतु कांग्रेस को वोट चोरी का अपना अभियान तेज करने का मौका कुछ दिन पहले की उस खबर से मिला, जिससे यह संदेश देने की कोशिश की गई थी कि एसआइआर के मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। हालांकि चुनाव आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय में शपथपत्र देकर स्पष्ट रूप से कहा कि एसआइआर पर सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से हुए। इसके बाद भी विपक्षी दल अपने इस हठ पर कायम हैं कि वोट चोरी हो रही है। वे इस तथ्य पर भी ध्यान देने के लिए तैयार नहीं कि जिन 13 करोड़ लोगों के नाम वोटर लिस्ट हटाए गए हैं, वे उनके हैं जो अन्यत्र जा बसे हैं या जिनकी मृत्यु हो गई है अथवा जिनके नाम दो-तीन जगह दर्ज थे। सच यह भी है कि 13 करोड़ लोगों का नाम हटाने का फैसला अंतिम नहीं है और वैध मतदाता अपना नाम वोटर लिस्ट में अभी भी शामिल करा सकते हैं। इतना होने के बावजूद उक्त रैली की कुर्सियां व तम्बू खाली होने के साथ-साथ वैचारिक रूप से भेजा खाली होना न कहा जाए तो क्या कहें? विडंबना यह भी है कि न्यायालय में एसआइआर के खिलाफ याचिका दायर करने वाले विपक्षी नेता कथित वोट चोरी के खिलाफ कोई प्रमाण अदालत के समक्ष पेश करने के बजाय दिखावटी संसद बुलाकर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ जन महाभियोग पारित करने जैसे स्वांग कर अपना ही उपहास ही उड़ा रहे हैं। रैली की वैचारिकता के साथ-साथ इसमें जुटी भीड़ को लेकर जिस तरह से झूठ का सहारा लेने के आरोप लग रहे हैं वह साफ दर्शाता है कि खुद विपक्ष इस रैली से निराश है और येन केन प्रकारेन रैली को अधिक से अधिक सफल होने के दावे कर रहा है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि विपक्षी दल ने रैली में भारी भीड़ दिखाने के लिए एआई से बनी फर्जी तस्वीरों का सहारा लिया है। किरेन रिजिजू ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर तेलंगाना से कांग्रेस सांसद वामसी गड्डम और अन्य नेताओं द्वारा साझा की गई एक तस्वीर को पोस्ट करते हुए कटाक्ष किया। रिजिजू ने लिखा कि रामलीला मैदान को खचाखच भरा दिखाने के लिए कांग्रेस पार्टी की फेक नैरेटिव टीम एआई से बनी नकली फोटो भी ठीक से नहीं बना पाई। सोशल मीडिया यूजर्स ने भी इस तस्वीर को तुरंत पकड़ लिया और दावा किया कि मंच पर दिख रहे राहुल गांधी और सोनिया गांधी के चेहरे और मूल रैली का मंच असली तस्वीरों से बिल्कुल अलग हैं। इससे पहले बीजेपी प्रवक्ता और सांसद संबित पात्रा कह चुके हैं कि रैली से पहले कांग्रेस ने 10 लाख लोगों के जुटने का दावा किया था, लेकिन हकीकत में 40 फीसदी मैदान खाली रहा। उन्होंने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि रैली में दिखाई गई भीड़ केवल ट्रिक फोटोग्राफी का नतीजा है, और ऐसी ट्रिक्स किसी को प्रधानमंत्री नहीं बना सकतीं। महात्मा गांधी मानते थे कि हिंसक और असत्य साधनों से कभी कोई संघर्ष नहीं जीता जा सकता। ईवीएम की तरह एसआईआर पर भी कांग्रेस लगातार झूठ पर झूठ बोल रही है और यही कारण है कि यह मुद्दा जनता के बीच कहीं ठहर नहीं पा रहा है। अगर सचमुच में चोरी हुई होती और इसके पक्ष में कांग्रेस के पास कोई प्रमाण है तो उसे संसद में पेश किया जाना चाहिए था और इस पर तथ्यात्मक बहस करनी चाहिए थी, वहां भी बात नहीं बनती तो अदालत का दरवाटा खटखटाना चाहिए था परंतु इसके विपरीत कांग्रेस ने नक्सलवादी हल्ला बोल शैली में जन संसद व रैली का आयोजन किया। अदालत का दरवाजा तो खटखटाया परंतु अभी तक उसमें अपने पक्ष में एक भी तथ्य प्रस्तुत नहीं कर पाई। कांग्रेस स्मरण रखे कि जब तक वैचारिक रूप से भेजा खाली रहेगा तब तक कुर्सियां व तम्बू भी समर्थकों को तरसते रहेंगे। - राकेश सैन

प्रभासाक्षी 3 Nov 2026 5:39 pm

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज पुणे मेट्रो लाइन-3 का करेंगे उद्घाटन

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समाचार नामा 3 Nov 2026 7:30 am

दिल्ली में GRAP-2 लागू, प्रदूषण से निपटने के लिए मेट्रो के 40 अतिरिक्त फेरे

दिल्ली-एनसीआर में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) के 'बहुत खराब' श्रेणी में पहुंचने के बाद सोमवार को तत्काल प्रभाव से ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (ग्रैप) का दूसरा चरण (ग्रैप-2) लागू कर दिया गया है

देशबन्धु 2 Nov 2026 11:45 pm

गृह मंत्रालय ने विदेशी नागरिकों के बेहतर प्रबंधन के लिए एफआरआरओ ढांचे का विस्तार किया

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समाचार नामा 2 Nov 2026 11:42 pm

ओडिशा: बीजेडी ने गंजम में बाढ़ के लिए जलाशय प्रबंधन में लापरवाही को जिम्मेदार ठहराया

ओडिशा: बीजेडी ने गंजम में बाढ़ के लिए जलाशय प्रबंधन में लापरवाही को जिम्मेदार ठहराया

समाचार नामा 2 Nov 2026 11:25 pm

तमिलनाडु : मुख्यमंत्री ने पुडुकोट्टई में 80 करोड़ रुपए की विकास परियोजनाओं का उद्घाटन किया

तमिलनाडु : मुख्यमंत्री ने पुडुकोट्टई में 80 करोड़ रुपए की विकास परियोजनाओं का उद्घाटन किया

समाचार नामा 2 Nov 2026 9:32 pm

पुणे मेट्रो की नई पिंक लाइन में क्या है खास बात? प्रधानमंत्री मोदी ने प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डाला

पुणे मेट्रो की नई पिंक लाइन में क्या है खास बात? प्रधानमंत्री मोदी ने प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डाला

समाचार नामा 2 Nov 2026 9:28 pm

सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार मामले में एफआईआर के खिलाफ तमिलनाडु के पूर्व मंत्री केएन नेहरू की याचिका खारिज की

सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार मामले में एफआईआर के खिलाफ तमिलनाडु के पूर्व मंत्री केएन नेहरू की याचिका खारिज की

समाचार नामा 2 Nov 2026 8:13 pm

राहुल गांधी का पीएम मोदी पर बड़ा हमला, विदेशी समर्थन को लेकर दी खुली बहस की चुनौती

कांग्रेस नेता बोले, आर्थिक व्यवस्था और सोशल मीडिया की भूमिका पर देश के सामने हो खुली चर्चा

देशबन्धु 2 Nov 2026 8:09 pm

दीया मिर्जा के वीडियो पर बीएमसी मेयर का हमला, बोलीं- हमें दिवाली मनाना सिखाने की जरूरत नहीं

मुंबई, 2 नवंबर (आईएएनएस)। बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) की महापौर ऋतु तावड़े ने सोमवार को बॉलीवुड अभिनेत्री दीया मिर्जा के प्रदूषण-मुक्त दिवाली से जुड़े वीडियो की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि उनका विरोध लगातार हिंदुत्व और उससे जुड़े लोगों के खिलाफ रहा है।

समाचार नामा 2 Nov 2026 7:43 pm

पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में घिरे अनंत सिंह, बिहार विधानसभा सचिवालय ने भेजा नोटिस

पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में घिरे अनंत सिंह, बिहार विधानसभा सचिवालय ने भेजा नोटिस

समाचार नामा 2 Nov 2026 7:40 pm

'स्वामित्व' योजना के तहत गुजरात के 14,866 गांवों की मैपिंग पूरी, ग्रामीणों को मालिकाना हक देने की तैयारी

'स्वामित्व' योजना के तहत गुजरात के 14,866 गांवों की मैपिंग पूरी, ग्रामीणों को मालिकाना हक देने की तैयारी

समाचार नामा 2 Nov 2026 7:09 pm

रामलीला मैदान की इंडी गठबंधन की महारैली के सियासी निहितार्थ को समझिए

दिल्ली के रामलीला मैदान में 1 नवंबर 2026 को आयोजित इंडी (INDIA) गठबंधन की महारैली केवल एक राजनीतिक सभा नहीं थी, बल्कि यह विपक्ष की ओर से चुनाव आयोग, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर उठाए जा रहे सवालों को राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाने का एक और बृहत प्रयास था। 'वोट बचाओ, देश बचाओ' और 'चलो दिल्ली' के संदेश के साथ आयोजित इस रैली में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी शरद पवार, नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी, सीपीआई, सीपीआई एम, सीपीआई एमएल सहित लगभग 20 विपक्षी दलों के नेताओं ने हिस्सा लिया। अधिकांश नेताओं ने गर्मजोशी पूर्वक मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग भी उठाई और निज अनुभवजन्य आरोप लगाए। सबसे अंत में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने संतुलित भाषण देते हुए एक परिपक्व नेता प्रतिपक्ष का परिचय दिया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर निशाना साधते हुए खट्टा मीठा आरोप लगाए, जिसमें ताना और दुलार दोनों शामिल रहा। इसे भी पढ़ें: Jairam Ramesh का BJP पर वार, Rahul Gandhi की अपील पर Delhi के बाजारों में बढ़ा व्यापार इस घटनाक्रम को समझने के लिए अग्रांकित सात महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी है:- पहला, चुनाव आयोग और एसआईआर को विपक्ष ने बनाया मुख्य राजनीतिक मुद्दा: रैली का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि विपक्ष ने अपनी लड़ाई को केवल केंद्र सरकार के विरोध तक सीमित न रखकर चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जोड़ने की कोशिश की। विपक्ष के प्रमुख आरोप हैं कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने और प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी से मतदान के अधिकार पर असर पड़ सकता है।राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और अखिलेश यादव सहित कई नेताओं ने इस मुद्दे को उठाया। विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। इसका राजनीतिक निहितार्थ यह है कि विपक्ष चुनावी निष्पक्षता को अपनी साझा राजनीतिक लड़ाई का आधार बनाना चाहता है। वह मतदाता सूची के विवाद को लोकतंत्र, संविधान और नागरिक अधिकारों के व्यापक सवाल से जोड़ रहा है। हालांकि, विपक्ष के आरोपों और चुनाव आयोग की प्रक्रिया के बीच वास्तविक स्थिति का निर्धारण दस्तावेजों, संबंधित मतदाता आंकड़ों और कानूनी जांच के आधार पर ही होना चाहिए। चुनाव आयोग की ओर से एसआईआर (SIR) के आदेशों को वैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप बताया गया है। दूसरा, विपक्षी एकजुटता का सार्वजनिक प्रदर्शन, लेकिन नेतृत्व का सवाल बरकरार: इस महारैली में राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, तेजस्वी यादव, फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती जैसे महत्वपूर्ण विपक्षी नेताओं की मौजूदगी महत्वपूर्ण रही। इससे विपक्ष ने यह संदेश देने की कोशिश की कि अलग-अलग राज्यों में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा रखने वाले दल राष्ट्रीय मुद्दों पर एक मंच पर आ सकते हैं। लेकिन एक बड़ा सवाल अभी भी कायम है: एक, गठबंधन का वास्तविक नेतृत्व किसके हाथ में होगा? दो, क्या कांग्रेस और क्षेत्रीय दल एक-दूसरे के राजनीतिक हितों को पर्याप्त जगह देंगे? तीन, क्या विपक्ष साझा मुद्दों पर आंदोलन के साथ-साथ साझा नीतिगत कार्यक्रम भी बना पाएगा? चार, क्या चुनाव के समय सीटों के बंटवारे और उम्मीदवार चयन पर सहमति कायम रह सकेगी? इसका सियासी निहितार्थ यह है कि प्रमुख विपक्षी नेताओं द्वारा एक मंच पर नेताओं का खड़ा होना और एक साझा राजनीतिक संगठन की तरह काम करना दो अलग-अलग बातें हैं। महारैली ने पहले पहलू को प्रदर्शित किया, जबकि दूसरे की परीक्षा आगे होगी। तीसरा, कांग्रेस की राष्ट्रीय भूमिका और राहुल गांधी की राजनीतिक रणनीति: रैली के आयोजन में कांग्रेस की प्रमुख भूमिका रही। खड़गे और राहुल गांधी ने चुनाव आयोग तथा केंद्र सरकार के खिलाफ विपक्ष की आवाज को सामने रखा। राहुल गांधी ने नागरिकों के मताधिकार को धर्म और राजनीतिक पहचान से ऊपर रखने की बात कही। दूसरी ओर, अखिलेश यादव और ममता बनर्जी ने अपने-अपने राज्यों से जुड़े एसआईआर के सवालों को भी उठाया। इस घटनाक्रम के तीन राजनीतिक पहलू हैं: एक, कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गतिविधियों का साझा मंच उपलब्ध कराने की कोशिश कर रही है। दो, राहुल गांधी के लिए लोकतंत्र और चुनावी निष्पक्षता का मुद्दा उनकी राष्ट्रीय राजनीतिक संवाद शैली का महत्वपूर्ण हिस्सा बन रहा है। तीन, क्षेत्रीय दल इस मंच के माध्यम से अपने राज्य के राजनीतिक मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श में जगह दे रहे हैं। लेकिन कांग्रेस की राष्ट्रीय भूमिका और गठबंधन के भीतर अन्य दलों की स्वायत्तता के बीच संतुलन बनाना एक महत्वपूर्ण चुनौती बनी रहेगी। चौथा, ममता, अखिलेश और अन्य क्षेत्रीय नेताओं के अपने राजनीतिक संदेश: महारैली में सभी नेताओं का भाषण एक जैसा नहीं था। जहां अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश की मतदाता सूची और कथित नाम कटने के मुद्दे को उठाया। वहीं, ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में एसआईआर के प्रभाव का विरोध किया। उधर, तेजस्वी यादव ने अपने भाषण में महाभारत के शकुनि का संदर्भ दिया और पूछा कि आज के कौन है? इसके पीछे उनका गहरा दर्द यह है कि बिहार के दिग्गज समाजवादी नेता और पूर्व स्वास्थ्य मंत्री शकुनि चौधरी के पुत्र और बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने तेजस्वी यादव के मुख्यमंत्री बनने की संभावनाओं पर तुषारापात कर दिया। वहीं, फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती ने लोकतांत्रिक अधिकारों और नागरिक भागीदारी के सवाल उठाए। इससे स्पष्ट होता है कि गठबंधन का साझा मंच होने के बावजूद उसके प्रत्येक घटक दल की अपनी क्षेत्रीय प्राथमिकताएं हैं। इस तरह से उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, जम्मू-कश्मीर और अन्य राज्यों में मतदाता सूची, सामाजिक समीकरण और चुनावी प्रतिस्पर्धा के अलग-अलग संदर्भ हैं। इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर एक नारा सभी राज्यों में समान राजनीतिक अर्थ नहीं रखता। पांचवां, भाजपा और विपक्ष के बीच टकराव अब चुनावी संस्थाओं के सवाल तक पहुंचा: इस रैली के बाद राजनीतिक बहस का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी सामने आया कि भाजपा और विपक्ष चुनावी प्रक्रिया को लेकर एक-दूसरे के विरुद्ध अलग-अलग राजनीतिक दावे पेश कर रहे हैं। जहां भाजपा ने विपक्ष के आरोपों को राजनीतिक अभियान का हिस्सा बताया है। वहीं विपक्ष का कहना है कि मतदाता सूची की विश्वसनीयता और चुनाव आयोग की जवाबदेही पर सवाल उठाना उसका लोकतांत्रिक अधिकार है। दिलचस्प बात यह है कि 1 नवंबर को ही दिल्ली के हरिनगर में भाजपा नेता हरदीप सिंह पूरी और दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने 1984 के सिख-विरोधी दंगों के पीड़ितों के न्याय से जुड़ा अपना विरोध मार्च भी आयोजित किया। इससे रैली के साथ एक अलग राजनीतिक और ऐतिहासिक विवाद भी जुड़ गया। इसका अर्थ यह है कि राजनीतिक विमर्श केवल एसआईआर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें 1984 की त्रासदी, न्याय, राजनीतिक जवाबदेही और विपक्ष की तारीख के चयन जैसे सवाल भी शामिल हो गए। छठा, क्या महारैली विपक्ष को जनांदोलन में बदलने की क्षमता रखती है?: किसी राजनीतिक रैली की सफलता का आकलन केवल भीड़ के आकार से नहीं किया जा सकता। असली कसौटी यह है कि उसका संदेश कितनी दूर तक पहुंचता है और उसके बाद संगठनात्मक स्तर पर क्या कार्रवाई होती है। इस दृष्टि से विपक्ष के सामने कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं: एक, मतदाता सूची से जुड़े आरोपों को प्रमाणों के साथ जनता के सामने रखना, क्योंकि घुसपैठियों को निकालने, दो जगहों के वोटर लिस्ट में शामिल लोगों को हटाने के फैसले को कांग्रेस व उसके समर्थक दल नाजायज़ नहीं ठहरा सकते हैं। दो, जिन मतदाताओं के नाम छूटने की शिकायत है, उनके मामलों का तथ्यात्मक समाधान कराना होगा। तीन, चुनाव आयोग के समक्ष अपनी आपत्तियों को संवैधानिक और कानूनी तरीके से उठाना होगा। चार, साझा राजनीतिक मुद्दों के साथ रोजगार, महंगाई, किसानों, युवाओं और आर्थिक विकास जैसे विषयों पर भी स्पष्ट कार्यक्रम प्रस्तुत करना होगा। पांच, गठबंधन के भीतर नेतृत्व और सीटों के बंटवारे पर व्यावहारिक सहमति बनाना होगा। छह, यह भी ध्यान रखना होगा कि रैली में उपस्थिति के आंकड़ों को लेकर राजनीतिक दावे और प्रतिदावे सामने आए हैं। इसलिए भीड़ के आधार पर देशव्यापी जनसमर्थन का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। सातवां, इस महारैली से केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के सामने क्या सवाल खड़े हुए?: इस घटनाक्रम ने तीन संस्थागत प्रश्नों को चर्चा में ला दिया है: एक, एसआईआर में पारदर्शिता कितनी है? और प्रत्येक पात्र नागरिक का मताधिकार सुरक्षित रहे। दो, चुनाव आयोग की जवाबदेही कैसे सुनिश्चित हो? और चुनावी संस्था पर जनता का विश्वास बना रहे। तीन, राजनीतिक दलों की शिकायतों का समाधान कैसे हो? और विवादों का निष्पक्ष और कानूनी निपटारा हो। यहां पर एक और महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है कि चुनाव आयोग की आलोचना करना और उसकी संवैधानिक स्वतंत्रता को कमजोर करना एक ही बात नहीं है। इसी प्रकार आयोग की स्वतंत्रता का सम्मान करने का अर्थ यह भी नहीं कि उसकी प्रक्रियाओं पर सवाल नहीं उठाए जा सकते। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में दोनों पक्षों के लिए पारदर्शिता, जवाबदेही और कानून का पालन आवश्यक है। सच कहूँ तो रामलीला मैदान से निकले राजनीतिक संदेश की असली परीक्षा आगे होगी। 1 नवंबर की महारैली ने विपक्षी एकजुटता, चुनावी निष्पक्षता और मतदाता अधिकारों को राष्ट्रीय राजनीतिक बहस में प्रमुखता दी है। इसने यह भी दिखाया कि अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं और क्षेत्रीय हितों वाले दल कुछ साझा मुद्दों पर एक मंच पर आ सकते हैं। लेकिन इस आयोजन से अपने आप विपक्ष की राजनीतिक एकजुटता स्थायी हो गई है या मतदाताओं के बीच उसके आरोप स्वीकार कर लिए गए हैं, ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। विपक्ष के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपने आरोपों को प्रमाणों से पुष्ट करे और साझा राजनीतिक कार्यक्रम को जमीन पर उतारे। वहीं चुनाव आयोग के लिए भी यह महत्वपूर्ण है कि वह मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर उठ रही शंकाओं का पारदर्शी तरीके से समाधान करे। दरअसल, रामलीला मैदान की इस महारैली का सबसे बड़ा राजनीतिक निहितार्थ यह है कि भारतीय राजनीति में अब चुनाव जीतने की प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता भी एक प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनती जा रही है। आखिरकार लोकतंत्र की मजबूती किसी एक राजनीतिक दल की जीत या हार से नहीं, बल्कि निष्पक्ष चुनाव, स्वतंत्र संस्थाओं और नागरिकों के भरोसे से तय होती है। यही शाश्वत सत्य है और मतदाता सूची में घालमेल एक संस्थागत बीमारी है, जिसके लिए पहले जिला प्रशासन की जिम्मेदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए, उसके बाद चुनाव आयोग की। ऐसा इसलिए कि कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेंस, आप आदि शासित राज्यों में चुनाव आयोग चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 2 Nov 2026 6:15 pm

आर्कबिशप पीटर मचाडो कौन हैं, जो चाहता है धर्मांतरण विरोधी कानून और गोहत्या कानून में बदलाव: कर्नाटक में कांग्रेस अ

आर्कबिशप की कॉन्ग्रेस अध्यक्ष खड़गे से मुलाकात के सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। बैंगलुरु में हुई इस मुलाकात के बाद आर्कबिशप ने खुद अपनी माँगों को सार्वजनिक किया।

ऑप इंडिया 2 Nov 2026 5:31 pm

इंडिया ब्लॉक की रैली फ्लॉप, 10 लाख की भीड़ जुटाने का दावा करने वाले हजारों में सिमट गए: संजय सेठ

इंडिया ब्लॉक की रैली फ्लॉप, 10 लाख की भीड़ जुटाने का दावा करने वाले हजारों में सिमट गए: संजय सेठ

समाचार नामा 2 Nov 2026 3:34 pm

ईरान को खत्म करने का प्लान! ट्रंप-नेतन्याहू की सीक्रेट बातचीत से हड़कंप

अमेरिकी मीडिया हस्ती और राजनीतिक टिप्पणीकार टकर कार्लसन ने दावा किया है कि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर ईरान के खिलाफ परमाणु हमला करने का दबाव डाल रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि वाशिंगटन कुछ ही दिनों के भीतर परमाणु हथियारों के इस्तेमाल को लेकर कोई फैसला ले सकता है। कार्लसन ने एक विस्तृत पोस्ट में लिखा है कि ये हथियार पहाड़ की ग्रेनाइट चट्टानों को भेदकर उन भूमिगत सुरंगों तक पहुंच सकते हैं, जहां कथित तौर पर परमाणु सामग्री को समृद्ध (एनरिच) करने का काम चल रहा है। कार्लसन ने लिखा इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के दबाव में ट्रंप प्रशासन कुछ ही दिनों में ईरान पर परमाणु हमला कर सकता है। उन्होंने आगे दावा किया कि नेतन्याहू इस तरह के अभियान के लिए जोर दे रहे हैं। उन्होंने एक अज्ञात सूत्र के हवाले से कहा बीबी (नेतन्याहू) इस बारे में ट्रंप को रोज फोन करते हैं। कार्लसन की पोस्ट में संभावित परमाणु हमले या नेतन्याहू द्वारा डाले जा रहे कथित दबाव के दावों के समर्थन में कोई ऐसा सबूत नहीं दिया गया, जिसकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि की जा सके। इसे भी पढ़ें: China हुआ सन्न, दुनिया हैरान, ट्रंप पर ऐसा भड़के जयशंकर, तगड़ा सुना दिया कार्लसन का दावा है कि नेतन्याहू युद्ध जारी रखना चाहते हैं। कार्लसन ने सैन्य कार्रवाई के कथित जोर को, पिछले हफ्ते इज़राइल में हुए चुनावों के बाद नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति से जोड़ा है। उन्होंने दावा किया कि ट्रम्प के सीधे हस्तक्षेप के बिना इज़रायली प्रधानमंत्री के लिए सरकार बनाना मुश्किल होगा, और अगर वे सत्ता से बाहर हो जाते हैं, तो उन्हें जांच का सामना करना पड़ सकता है और जेल भी जाना पड़ सकता है। कार्लसन ने लिखा कि नेतन्याहू को ट्रम्प के करीब रहना होगा। उन्हें इस युद्ध की ज़रूरत है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अमेरिका के कई वरिष्ठ अधिकारी नेतन्याहू के रुख का समर्थन कर रहे हैं और ईरान के साथ बातचीत के ज़रिए किसी समझौते के ख़िलाफ़ हैं। कार्लसन ने अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ और सेंटकॉम कमांडर ब्रैड कूपर का नाम लिया, और साथ ही दावा किया कि विदेश मंत्री मार्को रुबियो और CIA निदेशक जॉन रैटक्लिफ भी इज़रायली प्रधानमंत्री के इशारों पर चल रहे हैं। कार्लसन ने आगे दावा किया कि हाल ही में दोहा में हुई एक बैठक के दौरान, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ईरान के साथ शांति समझौते के मसौदे का विरोध किया था। उन्होंने इस दावे को साबित करने के लिए कोई विवरण या सबूत नहीं दिया। टिप्पणीकार ने यह भी कहा कि 27 सितंबर को नेतन्याहू चुपके से अबू धाबी गए थे, ताकि ईरान के ख़िलाफ़ अंतिम सैन्य अभियान के लिए संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का समर्थन हासिल कर सकें, लेकिन UAE ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। इसे भी पढ़ें: ट्रंप के रिजॉर्ट के पास मिसाइल की तरह नीचे आया विमान, फिर...9 की हुई मौत क्षेत्रीय और वैश्विक परिणामों को लेकर चेतावनी कार्लसन ने चेतावनी दी कि तनाव और बढ़ने से खाड़ी क्षेत्र और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं। उन्होंने होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल टैंकरों को हुए नुकसान और ऊर्जा तथा उर्वरक बाजारों में आई बाधाओं की ओर इशारा किया। उन्होंने दावा किया कि अक्टूबर में होर्मुज जलडमरूमध्य में, दुनिया भर में तेल ढोने वाले लगभग 850 सुपरटैंकरों में से 11 बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए थे। संभावित परमाणु हमले के परिणामों पर, कार्लसन ने आरोप लगाया कि 'पिकएक्स माउंटेन' पर ज़मीनी विस्फोट से फारस की खाड़ी प्रदूषित हो सकती है और 10 करोड़ लोगों की जलापूर्ति प्रभावित हो सकती है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि अमेरिका द्वारा परमाणु हथियारों का इस्तेमाल अन्य देशों के लिए एक मिसाल बन सकता है। कार्लसन ने दावा किया कि रूस ने कम से कम दो सरकारों से कहा है कि अगर अमेरिका ईरान पर परमाणु हमला करता है, तो उसे यूक्रेन के खिलाफ परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करने की छूट मिल जाएगी। उन्होंने उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया से जुड़े संभावित परमाणु तनाव का भी जिक्र किया। उन्होंने आगे आरोप लगाया कि अमेरिकी प्रशासन ने फरवरी से अपने परमाणु सिद्धांत में चुपचाप बदलाव किया है, ताकि तथाकथित युद्धक्षेत्र वाले परमाणु हथियारोंका इस्तेमाल करना आसान हो सके। इसे भी पढ़ें: ट्रंप के रिजॉर्ट के पास मिसाइल की तरह नीचे आया विमान, फिर...9 की हुई मौत ट्रंप कूटनीति के विकल्प पर कर रहे विचार टकर कार्लसन के ये दावे ऐसे समय में आए हैं जब वॉशिंगटन और तेहरान के बीच बातचीत दोबारा शुरू कराने के लिए कूटनीतिक कोशिशें जारी हैं, हालांकि नए सैन्य हमलों की संभावना पर भी चर्चा हो रही है। एक्सियोस (Axios) की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने शनिवार को फोन पर बात की। दोनों के बीच ईरान के साथ चल रही बातचीत की स्थिति और दोबारा सैन्य कार्रवाई शुरू करने की संभावना पर चर्चा हुई। रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू मंगलवार को होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के तुरंत बाद नए हमलों का दबाव बना रहे थे, जबकि राष्ट्रपति ट्रंप बातचीत को और मौका देना चाहते थे। एक इजरायली सूत्र ने इस बातचीत को कड़ा बताया, जबकि एक अमेरिकी सूत्र ने इसे सीधी और स्पष्ट बातचीत कहा। बाद में ट्रंप ने इसे बहुत अच्छी बातचीत बताया और पुष्टि की कि ईरान उन मुद्दों में शामिल था जिन पर बात हुई, हालांकि उन्होंने ज्यादा ब्योरा नहीं दिया। ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ बातचीत ठीक चल रही है और उन्हें कोई बहुत जल्दी नहीं है। हालांकि, उन्होंने यह संकेत भी दिया कि अमेरिका को अभी ईरान के एक-दो परमाणु ठिकानों पर ध्यान देने की जरूरत है, जिसमें उन्होंने खास तौर पर पिकेक्स माउंटेन का जिक्र किया। ट्रंप ने कहा हम यह 10 मिनट में कर सकते हैं। हमारे पास इसकी पूरी योजना है। आप पिकेक्स माउंटेन को देख सकते हैं। हमें उससे निपटना होगा और हम इसे बहुत तेजी से कर सकते हैं। इसी बीच, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने पिछले हफ्ते ईरान के राष्ट्रीय सुरक्षा प्रमुख मोहसिन रेज़ाई को एक पत्र भेजा, जिसमें बातचीत दोबारा शुरू करने की संभावना पर बात की गई थी। कतरी मध्यस्थों ने भी रविवार को लगातार तीसरे दिन ईरानी अधिकारियों के साथ चर्चा की, ताकि वॉशिंगटन और तेहरान के बीच सीधी बातचीत शुरू कराने के लिए सहमति बन सके। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि अभी तक कोई समझौता नहीं हुआ है और आगे की प्रगति इस बात पर निर्भर करती है कि अमेरिका, तेहरान के सवालों के जवाब कैसे देता है। अराघची ने कहा हम इस दिशा में हर संभव कोशिश कर रहे हैं और उम्मीद करते हैं कि दूसरा पक्ष इतनी समझदारी दिखाएगा कि अन्य रास्तों के बजाय कूटनीति को चुने। दूसरी तरफ, कार्लसन का दावा है कि ट्रंप इस समय वेंस और अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ की सलाह सुन रहे हैं, जिनका मानना है कि ईरान के साथ अब भी समझौता संभव है। कार्लसन ने अमेरिकी प्रशासन से परमाणु तनाव के खतरे की चेतावनी देते हुए कूटनीति का रास्ता अपनाने की अपील की।

प्रभासाक्षी 2 Nov 2026 3:34 pm

रामदास आठवले का राहुल गांधी पर तंज, 'पीएम मोदी को हटाना है तो चुनाव लड़ो, आंदोलन से नहीं होगा'

रामदास आठवले का राहुल गांधी पर तंज, 'पीएम मोदी को हटाना है तो चुनाव लड़ो, आंदोलन से नहीं होगा'

समाचार नामा 2 Nov 2026 1:31 pm

सीनेट पर कब्जा बरकरार रखने के लिए ट्रंप ने झोंकी ताकत, बोले- 'हमें जीतना ही होगा'

सीनेट पर कब्जा बरकरार रखने के लिए ट्रंप ने झोंकी ताकत, बोले- 'हमें जीतना ही होगा'

समाचार नामा 2 Nov 2026 7:20 am

वोटर लिस्ट में गड़बड़ी पर चुनाव आयोग सख्त, अब निलंबन के साथ दर्ज होगा आपराधिक मामला

मतदाता सूची तैयार करने में लापरवाही या जानबूझकर गड़बड़ी करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ चुनाव आयोग ने कड़ा रुख अपनाया है

देशबन्धु 1 Nov 2026 11:48 pm

पाटन को मिला नया कैंसर अस्पताल, आयुष्मान लाभार्थियों के लिए मुफ्त पीईटी स्कैन

पाटन, 1 नवंबर (आईएएनएस)। रविवार को पाटन में नए कैंसर अस्पताल के उद्घाटन के साथ, उत्तर गुजरात के निवासियों को अब कई विशेष कैंसर निदान और उपचार सेवाओं के लिए अहमदाबाद जाने की आवश्यकता नहीं होगी।

समाचार नामा 1 Nov 2026 11:40 pm

मणिपुर के मुख्यमंत्री ने सभी समुदायों के बीच एकता, शांति और सद्भाव का आह्वान किया

मणिपुर के मुख्यमंत्री ने सभी समुदायों के बीच एकता, शांति और सद्भाव का आह्वान किया

समाचार नामा 1 Nov 2026 11:33 pm

बिहार और बंगाल में 2 नवंबर को भाजपा की 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ' पदयात्रा, नितिन नवीन करेंगे नेतृत्व

बिहार और बंगाल में 2 नवंबर को भाजपा की 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ' पदयात्रा, नितिन नवीन करेंगे नेतृत्व

समाचार नामा 1 Nov 2026 11:31 pm

लोकतंत्र के इतिहास में एक काला अध्याय: आंध्र प्रदेश नगर निगम चुनाव पर जगन का बयान

लोकतंत्र के इतिहास में एक काला अध्याय: आंध्र प्रदेश नगर निगम चुनाव पर जगन का बयान

समाचार नामा 1 Nov 2026 11:29 pm

माता भगवती देवी शर्मा और अखंड दीप के 100 वर्ष भारतीय संस्कृति का पूर्णांक वर्ष : अमित शाह

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राजधानी नई दिल्ली में अखिल विश्व गायत्री परिवार की ओर से आयोजित शताब्दी समारोह में भाग लिया। इस दौरान उन्होंने कहा कि आज यहां पर हम पूजनीय गुरुदेव और वंदनीय माता भगवती के जीवनकाल के स्वर्णिम अध्याय को नमन करने के लिए एकत्रित हुए हैं।

देशबन्धु 1 Nov 2026 11:09 pm

सपा विधायक रविदास मेहरोत्रा का भाजपा पर निशाना, 'देश में बदलाव की लहर, रामलीला रैली ऐतिहासिक रही'

सपा विधायक रविदास मेहरोत्रा का भाजपा पर निशाना, 'देश में बदलाव की लहर, रामलीला रैली ऐतिहासिक रही'

समाचार नामा 1 Nov 2026 10:39 pm

ओडिशा के जेल महानिदेशक के खिलाफ पूर्व महिला जेलर ने यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई

ओडिशा के जेल महानिदेशक के खिलाफ पूर्व महिला जेलर ने यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई

समाचार नामा 1 Nov 2026 9:38 pm

'वोट चोरी के खिलाफ जनता सड़कों पर है', रामलीला रैली को विपक्ष ने बताया ऐतिहासिक

'वोट चोरी के खिलाफ जनता सड़कों पर है', रामलीला रैली को विपक्ष ने बताया ऐतिहासिक

समाचार नामा 1 Nov 2026 9:35 pm

दुर्गा पूजा भगदड़ के सबक, काली और जगधात्री पूजा के लिए जारी हुए नए सुरक्षा निर्देश

दुर्गा पूजा भगदड़ के सबक, काली और जगधात्री पूजा के लिए जारी हुए नए सुरक्षा निर्देश

समाचार नामा 1 Nov 2026 9:26 pm

'व्यापारियों को रैली की भीड़ नहीं, ग्राहकों की जरूरत है', राहुल गांधी पर भाजपा सांसद का तंज

'व्यापारियों को रैली की भीड़ नहीं, ग्राहकों की जरूरत है', राहुल गांधी पर भाजपा सांसद का तंज

समाचार नामा 1 Nov 2026 7:31 pm

पंजाब को लूटा गया, 1984 के दंगों पर आज तक नहीं मांगी माफी : हरसिमरत कौर बादल

पंजाब को लूटा गया, 1984 के दंगों पर आज तक नहीं मांगी माफी : हरसिमरत कौर बादल

समाचार नामा 1 Nov 2026 7:21 pm

राहुल गांधी की चेतावनी, 'वोट चोरी' के मामले में जेल जाएंगे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार

राहुल गांधी की चेतावनी, 'वोट चोरी' के मामले में जेल जाएंगे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार

समाचार नामा 1 Nov 2026 5:39 pm

श्रीलंकाई नौसेना ने तमिलनाडु के सात मछुआरों को पकड़ा

श्रीलंकाई नौसेना ने तमिलनाडु के सात मछुआरों को पकड़ा

समाचार नामा 1 Nov 2026 3:39 pm

नकारात्मक सोच इंडी गठबंधन की राजनीति का हिस्सा बन चुकी है : आलोक सिंह

नकारात्मक सोच इंडी गठबंधन की राजनीति का हिस्सा बन चुकी है : आलोक सिंह

समाचार नामा 1 Nov 2026 3:31 pm

रामलीला मैदान में इंडी गठबंधन की शक्ति प्रदर्शन रैली, रामलीला मैदान से लोकतंत्र बचाने का संदेश

रामलीला मैदान में इंडी गठबंधन की शक्ति प्रदर्शन रैली, रामलीला मैदान से लोकतंत्र बचाने का संदेश

समाचार नामा 1 Nov 2026 1:31 pm

'चलो दिल्ली' मार्च कांग्रेस के राजनीतिक पतन के ताबूत में आखिरी कील साबित होगा: जेपी नड्डा

'चलो दिल्ली' मार्च कांग्रेस के राजनीतिक पतन के ताबूत में आखिरी कील साबित होगा: जेपी नड्डा

समाचार नामा 1 Nov 2026 1:20 pm

सोना हजार रुपए और चांदी 13 हजार रुपए से अधिक सस्ती हुई

नई दिल्ली, सोने और चांदी में इस हफ्ते बड़ी गिरावट देखने को मिली, जिससे दोनों कीमती धातुओं का दाम क्रमश: 1,500 रुपए और 13,000 रुपए से अधिक घट गया।

देशबन्धु 1 Nov 2026 11:17 am

'आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में भूमिका निभा रहा मध्य प्रदेश', राज्य स्थापना दिवस पर पीएम मोदी ने दी शुभकामनाएं

'आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में भूमिका निभा रहा मध्य प्रदेश', राज्य स्थापना दिवस पर पीएम मोदी ने दी शुभकामनाएं

समाचार नामा 1 Nov 2026 8:19 am

रामलीला मैदान रैली के लिए दिल्ली में हाई अलर्ट, 4 हजार पुलिसकर्मी और 200 से ज्यादा CCTV तैनात

राजधानी दिल्ली के रामलीला मैदान में रविवार को होने वाली INDIA गठबंधन की प्रस्तावित रैली को लेकर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है

देशबन्धु 1 Nov 2026 7:20 am

राहुल गांधी ने दिया ज्ञानेश कुमार पर बड़े खुलासे का संकेत, बोले- वह CEC पद पर टिक नहीं पाएँगे

राहुल गांधी ने INDIA गठबंधन के मॉक संसद सत्र में कहा, 'ज्ञानेश कुमार CEC के पद पर नहीं टिक पाएंगे। खुलासे के बाद भी अगर बीजेपी उन्हें अड़ी रहती है तो हमें समझ आ जाएगा कि उनका खेल क्या है।' वहीं बीजेपी ने राहुल गांधी को 'मॉक पीएम' कहा।

सत्य हिंदी 1 Nov 2026 4:38 am

एआई डेटा सेंटर समेत चार परियोजनाओं पर विवाद, आश्वासन के बाद रोहित पवार ने वापस लिया आंदोलन

एआई डेटा सेंटर समेत चार परियोजनाओं पर विवाद, आश्वासन के बाद रोहित पवार ने वापस लिया आंदोलन

समाचार नामा 31 Oct 2026 10:38 pm

जेल से रिहाई के बाद आजम खान को ईडी ने हिरासत में लिया, वकीलों ने गिरफ्तारी पर उठाए सवाल

जेल से रिहाई के बाद आजम खान को ईडी ने हिरासत में लिया, वकीलों ने गिरफ्तारी पर उठाए सवाल

समाचार नामा 31 Oct 2026 10:35 pm

'वोट चोरी' विरोध मार्च को लेकर केटीआर का राहुल गांधी और रेवंत रेड्डी पर तंज

'वोट चोरी' विरोध मार्च को लेकर केटीआर का राहुल गांधी और रेवंत रेड्डी पर तंज

समाचार नामा 31 Oct 2026 10:06 pm

ऐतिहासिक होगी रामलीला मैदान की रैली, इन तीन मांगों को लेकर भरेंगे हुंकार: भूपेश बघेल

ऐतिहासिक होगी रामलीला मैदान की रैली, इन तीन मांगों को लेकर भरेंगे हुंकार: भूपेश बघेल

समाचार नामा 31 Oct 2026 8:31 pm

राष्ट्रीय एकता दिवस समारोह में शामिल हुए पीएम मोदी, सरदार पटेल की 151वीं जयंती पर आयोजित हुई भव्य परेड

राष्ट्रीय एकता दिवस समारोह में शामिल हुए पीएम मोदी, सरदार पटेल की 151वीं जयंती पर आयोजित हुई भव्य परेड

समाचार नामा 31 Oct 2026 6:37 pm

'रन फॉर यूनिटी': जोशी ने सरदार पटेल की विरासत को लेकर कांग्रेस पर निशाना साधा

'रन फॉर यूनिटी': जोशी ने सरदार पटेल की विरासत को लेकर कांग्रेस पर निशाना साधा

समाचार नामा 31 Oct 2026 6:27 pm

'मॉक पार्लियामेंट' को संजय निरुपम ने बताया नौटंकी, इंडिया ब्लॉक बोला-लोकतंत्र बचाने की लड़ाई

'मॉक पार्लियामेंट' को संजय निरुपम ने बताया नौटंकी, इंडिया ब्लॉक बोला-लोकतंत्र बचाने की लड़ाई

समाचार नामा 31 Oct 2026 6:23 pm

Bhutan की पहाड़ियों से उठी जलप्रलय की आहट, आपदा से निबटने के लिए India कितना तैयार है?

हिमालय की बर्फीली चोटियों से उठी एक प्राकृतिक हलचल ने भारत के पूर्वोत्तर और उत्तर बंगाल की चिंता बढ़ा दी है। भूटान की शिंताफू ग्लेशियर झील के फटने से निकला पानी नदियों के रास्ते भारत की ओर बढ़ा। प्रशासन ने अलर्ट जारी किया, गांव खाली कराए गए और बचाव एजेंसियों को मोर्चे पर लगाया गया। फिलहाल पानी का स्तर घटने के संकेत हैं, लेकिन एक नई अस्थायी झील बनने से खतरे का एक और पहलू सामने आ गया है। दरअसल, हिमालय की ऊंची चोटियों पर जमा बर्फ जब टूटती है, तो उसका असर केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रहता। कई बार हजारों फीट नीचे बसे गांवों, कस्बों और शहरों की जिंदगी भी इसकी चपेट में आ जाती है। भूटान में 29 अक्टूबर 2026 को हुई ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) की घटना ने एक बार फिर इसी खतरे की गंभीरता को सामने ला दिया है। इसे भी पढ़ें: Bhutan में हिमनद झील टूटने के बाद Alipurduar में 12 हजार लोग सुरक्षित निकाले गए हम आपको बता दें कि भूटान के गासा जिले के लेमथांग क्षेत्र में स्थित शिंताफू झील के बांधनुमा प्राकृतिक अवरोध के टूटने से भारी मात्रा में पानी बाहर निकला। इस घटना के बाद पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार, कूचबिहार और असम के धुबरी तथा कोकराझार जिलों में बाढ़ की आशंका को देखते हुए प्रशासन को सतर्क कर दिया गया। केंद्रीय जल आयोग (CWC) ने भी संभावित जलस्तर वृद्धि को लेकर विशेष बाढ़ परामर्श जारी किया। 6 से 7 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी का खतरा अंतरराष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र (ICIMOD) के अनुसार, घटना से पहले शिंताफू झील में लगभग 60 से 70 लाख घन मीटर पानी मौजूद था। यह करीब 2,400 से 2,800 ओलंपिक आकार के स्विमिंग पूल के बराबर है। हालांकि, वास्तव में कितना पानी बाहर निकला, इसका आकलन अभी किया जा रहा है। इस पानी का प्रवाह भूटान की मो छू नदी और आगे पुनात्सांगछू नदी तंत्र से होते हुए भारत में संकोश नदी की ओर बढ़ा। भारत में संकोश नदी पश्चिम बंगाल और असम के सीमावर्ती इलाकों के लिए महत्वपूर्ण है। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार, पानी को सीमा तक पहुंचने में लगभग छह से आठ घंटे लगने की आशंका जताई गई थी। यही वजह रही कि प्रशासन ने संभावित खतरे को गंभीरता से लेते हुए पहले ही सतर्कता बढ़ा दी। हजारों लोगों का पलायन, NDRF-SDRF तैनात उधर, पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार जिले में प्रशासन ने एहतियात के तौर पर लगभग 6,000 से 7,000 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया। इनमें नदी किनारे और संवेदनशील इलाकों में रहने वाले परिवार शामिल थे। राहत शिविरों में चार हजार से अधिक लोगों के लिए भोजन, राशन, बच्चों के लिए जरूरी खाद्य सामग्री और दूसरी सुविधाओं की व्यवस्था की गई। जलपाईगुड़ी और कूचबिहार में भी निगरानी बढ़ाई गई। प्रशासन ने लाउडस्पीकर के माध्यम से लोगों को नदी किनारों और निचले इलाकों से दूर रहने की चेतावनी दी। NDRF, SDRF और नागरिक सुरक्षा की टीमें तैनात की गईं। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने धुबरी और कोकराझार के संवेदनशील राजस्व क्षेत्रों में स्थिति पर नजर रखने के निर्देश दिए। उन्होंने संबंधित अधिकारियों और NDRF के साथ लगातार संपर्क बनाए रखने तथा लोगों से सरकारी निर्देशों का पालन करने की अपील की। खतरा टला या अभी बाकी है बड़ा जोखिम? ताजा रिपोर्टों के मुताबिक संकोश नदी का जलस्तर घटने लगा है। कोकराझार के जिला प्रशासन ने भी तत्काल बड़े पैमाने पर जलभराव की आशंका कम होने की बात कही है। पश्चिम बंगाल में फिलहाल बड़े नुकसान या जनहानि की सूचना नहीं है। लेकिन इस पूरी घटना में सबसे चिंताजनक तथ्य एक नई अस्थायी झील का निर्माण है। भूटान के राष्ट्रीय जल विज्ञान एवं मौसम विज्ञान केंद्र (NCHM) के अनुसार, पानी और मलबे के बहाव से टाक्त्सेमाखांग में एक नई झील बन गई है। यह सिंताफू छू और लुंगू छू नदियों के संगम के पास स्थित है। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी अस्थायी झीलें दोबारा बाढ़ का कारण बन सकती हैं। तेज बहाव अपने साथ चट्टानें और मलबा लाता है, जिससे नदी का रास्ता अवरुद्ध हो सकता है। यदि पानी का दबाव बढ़कर इस प्राकृतिक अवरोध को तोड़ता है, तो दूसरी बाढ़ पैदा हो सकती है। इसलिए भूटान में मो छू और पुनात्सांगछू नदी घाटियों के आसपास रहने वाले लोगों को भी सतर्क रहने की सलाह दी गई है। यहां सवाल उठता है कि आखिर क्यों फट रही हैं हिमालय की ग्लेशियर झीलें? देखा जाये तो इसका सबसे बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन और तेजी से पिघलते ग्लेशियरों को माना जाता है। ग्लेशियरों के पीछे हटने से उनके आसपास बड़ी-बड़ी झीलें बनती हैं। इनमें पानी अक्सर बर्फ, चट्टानों और हिमनदों से निकले मलबे के प्राकृतिक बांधों के पीछे जमा होता है। भारी बारिश, हिमस्खलन, चट्टानों का झील में गिरना, भूकंप और प्राकृतिक बांधों का कमजोर होना अचानक पानी के बाहर निकलने का कारण बन सकते हैं। इसी घटना को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF कहते हैं। यह सामान्य बाढ़ से अधिक खतरनाक हो सकती है, क्योंकि इसमें पानी के साथ भारी मात्रा में पत्थर, मिट्टी और मलबा भी तेजी से नीचे आता है। भारत की तैयारी पर उठते बड़े सवाल देखा जाये तो भूटान की यह घटना भारत के लिए केवल एक स्थानीय बाढ़ का मामला नहीं है। यह हिमालयी राज्यों की आपदा प्रबंधन व्यवस्था की भी परीक्षा है। भारत सरकार ने सितंबर 2026 में हिमालयी राज्यों की GLOF और हिमस्खलन संबंधी तैयारियों की समीक्षा की थी। इसमें शुरुआती चेतावनी प्रणाली, संवेदनशील झीलों की निगरानी, जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान और समय पर लोगों को सुरक्षित निकालने पर जोर दिया गया था। लेकिन अब कुछ सवालों के जवाब तलाशना जरूरी है। सवाल उठता है कि क्या भूटान और भारत के बीच ग्लेशियर झीलों के जलस्तर की वास्तविक समय में जानकारी साझा करने की व्यवस्था पर्याप्त है? क्या असम, अरुणाचल प्रदेश और उत्तर बंगाल के सभी संवेदनशील नदी तटीय गांवों तक समय रहते चेतावनी पहुंचाने का तंत्र मौजूद है? क्या नदियों पर बने बांधों और जलविद्युत परियोजनाओं की GLOF जैसी अचानक आने वाली बाढ़ से निपटने की क्षमता का नियमित परीक्षण हो रहा है? क्या प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षित आश्रय स्थल, निकासी मार्ग और प्रशिक्षित बचाव दल पर्याप्त संख्या में उपलब्ध हैं? क्या नई अस्थायी झील की लगातार निगरानी और उसके संभावित टूटने की स्थिति में दूसरी चेतावनी जारी करने की व्यवस्था तैयार है? बहरहाल, सबसे बड़ी जरूरत सीमा पार समन्वय, वैज्ञानिक निगरानी और जमीनी स्तर पर तैयारी की है। भूटान में हुई घटना ने स्पष्ट कर दिया है कि हिमालय की चोटियों पर पैदा होने वाला खतरा किसी अंतरराष्ट्रीय सीमा को नहीं पहचानता। आज पानी का स्तर घट रहा है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के दौर में ऐसी घटनाएं भविष्य में और गंभीर हो सकती हैं। इसलिए प्रशासन के लिए असली चुनौती बाढ़ आने के बाद राहत पहुंचाना नहीं, बल्कि बाढ़ आने से पहले हर संभावित खतरे को पहचानकर लोगों की जिंदगी बचाना है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 31 Oct 2026 5:57 pm

सरकार ने ईंधन करों में किया बड़ा संशोधन: पेट्रोल पर निर्यात शुल्क हटाया, डीजल और एटीएफ पर बढ़ाई ड्यूटी

केंद्र सरकार ने पेट्रोल के निर्यात पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क को घटाकर शून्य कर दिया है। साथ ही, डीजल और एविएशन टरबाइन फ्यूल (एटीएफ) पर विशेष निर्यात शुल्क में क्रमश: 3 रुपए प्रति लीटर और 0.50 रुपए प्रति लीटर की वृद्धि की है। यह जानकारी वित्त मंत्रालय द्वारा शनिवार को जारी अधिसूचना में दी गई।

देशबन्धु 31 Oct 2026 4:50 pm

भोपाल में सरदार पटेल की जयंती पर कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने किया रक्तदान

भोपाल में सरदार पटेल की जयंती पर कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने किया रक्तदान

समाचार नामा 31 Oct 2026 4:30 pm

नितिन नवीन जाएंगे हरियाणा, रोहतक में 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ' पदयात्रा में होंगे शामिल

नितिन नवीन जाएंगे हरियाणा, रोहतक में 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ' पदयात्रा में होंगे शामिल

समाचार नामा 31 Oct 2026 2:26 pm

अरुणाचल प्रदेश: भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेष तवांग पहुंचे, केंद्रीय मंत्री शेखावत बोले-पवित्र अवशेष के दर्शन का मिला सौभाग्य

अरुणाचल प्रदेश: भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेष तवांग पहुंचे, केंद्रीय मंत्री शेखावत बोले-पवित्र अवशेष के दर्शन का मिला सौभाग्य

समाचार नामा 31 Oct 2026 2:15 pm

धनतेरस : सोना या चांदी? छोटे निवेशकों के लिए क्या है बेहतर विकल्प

नई दिल्ली, रोशनी का पर्व 'दीपावली' बस आने वाला ही है। इसकी शुरुआत धनतेरस से होती है, जो 6 नवंबर को पड़ रहा है। इस दिन लोग सोना और चांदी समेत कई कीमती धातुएं खरीदते हैं।

देशबन्धु 31 Oct 2026 12:54 pm

अमेरिका व उसके मित्र देशों की आंतरिक तैयारियां देख किसी बाहरी खतरे का हो रहा स्पष्ट आभास?

अमेरिका अपनी वैश्विक बादशाहत बनाए रखने के लिए पूरी दुनिया को तृतीय विश्व युद्ध की आग में झोंकने वाला है! चाहे तेल का खेल हो या फिर मज़बूत सरकारों को अस्थिर करने का षड्यंत्र- अमेरिकी रणनीति हर मोर्चे पर पिटती हुई प्रतीत हुई। इसी की खीझ में अब वह खाड़ी और मध्य-पूर्व देशों, यूरोप और भारतीय उपमहाद्वीप में कुछ नया गुल खिलाने वाला है क्योंकि उसके 'पालतू कुत्तों' के पांव भी अब जमीन पर नहीं पड़ रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिज्ञों का कहना है कि रूस, चीन, भारत, ईरान, ब्राजील, अफगानिस्तान के खिलाफ वह ऐसा युद्ध छेड़ना चाहता है, ताकि इनकी आर्थिक कमर टूट जाए और जी-7 देशों की बादशाहत पूरी दुनिया पर बनी रहे। शायद इसलिए वह कुछ बड़ा करने वाला है और 90 दिन के लक्ष्य निर्धारित करते हुए अपनी तैयारियां पुख्ता कर रहा है। इसे भी पढ़ें: China को लगे 40 साल, Modi ने 12 साल में कर दिखाया! बचपन में गरीबी को झेलने वाले PM ने 49.6 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर उठाया इस बात की चुगली पूरी दुनिया की वह गिनी चुनी सरकारें कर रही हैं, जो ऐसी चेतावनियाँ दे रही हैं, जैसी शायद आखिरी बार दूसरे विश्व युद्ध से पहले देखने को मिली थीं। जहां एक तरफ अमेरिका का पेंटागन अपने सभी मिलिट्री बेस को 'ऑपरेशन फोर्ट्रेस' के तहत तैयार कर रहा है, जिसके तहत अमेरिकी सैन्य ठिकानों को इस तरह तैयार किया जाएगा कि वे बाहर से खाना, पानी या किसी भी तरह की सप्लाई मिले बिना पूरे 90 दिनों तक अपना काम चला सकें। वहीं दूसरी तरफ, यूरोपीय देशों ब्रिटेन, नीदरलैंड और फ्रांस एवं एशियाई देश जापान ने अपने नागरिकों से कह दिया है कि वे कम से कम 72 घंटे तक काम आने वाला इमरजेंसी सामान अपने घर में जमा करके रखें। इसमें खाने-पीने की चीजें, पानी, दवाइयाँ और यहाँ तक कि नकद पैसे भी शामिल हैं, ताकि अगर बिजली, पानी और दूसरी जरूरी सुविधाएँ बंद हो जाएँ, तो लोग बिना किसी बाहरी मदद के कम से कम 72 घंटे तक अपना काम चला सकें। भले ही सरकारें इसकी आधिकारिक वजह खराब मौसम, एल नीनो, बिजली गुल होने और साइबर अटैक जैसी स्थितियों को बता रही हैं, लेकिन सर्वाधिक ध्यान देने वाली बात ये है कि कोई भी खुलकर 'युद्ध' शब्द का इस्तेमाल नहीं कर रहा है। अब सवाल ये है कि आखिर अचानक दुनिया भर में ऐसी तैयारियाँ क्यों हो रही हैं? और अमेरिकी-यूरोपीय टारगेट पर आने वाले देश क्या तैयारियां कर रहे हैं? इसके पीछे सिर्फ दो संभावनाएँ हैं। पहली, ये सारी तैयारियाँ सिर्फ सुरक्षा के लिए की जा रही हैं और इनका किसी असली खतरे से कोई लेना-देना नहीं है। दूसरी, दुनिया की ये सारी सरकारें कुछ ऐसा जानती हैं, जिसके बारे में वे अभी हमें बता नहीं सकतीं या जानबूझकर बता नहीं रही हैं। और अगर दूसरी बात सही है, तो आखिर वो क्या है? सबसे बड़ी आशंका ये है कि अमेरिका में मिडटर्म चुनावों के बाद अमेरिका और ईरान के बीच फिर से युद्ध शुरू हो सकता है। साथ ही, यूरोप में रूस और यूक्रेन के बीच चल रहा युद्ध भी और ज्यादा भड़क सकता है। इधर, भारत के खिलाफ पाकिस्तान, चीन, बांग्लादेश आग उगल सकते हैं। इसलिए पहले मैं ईरान की बात करता हूँ। अगर इस बार दोबारा युद्ध शुरू होता है, तो इसकी शुरुआत सबसे ज्यादा संभावना के साथ बाब अल-मंदेब के पास हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच टकराव से हो सकती है। इसका मतलब ये है कि तेल की सप्लाई पर खतरा सिर्फ स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बाब अल-मंदेब के रास्ते पर भी बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। और धीरे-धीरे ये संकट स्वेज नहर तक फैल सकता है। आपको बता दूँ कि स्वेज नहर दुनिया के व्यापार का एक बेहद अहम रास्ता है। दावा है कि दुनिया का लगभग 25% व्यापार इसी रास्ते से गुजरता है। अगर ये रास्ता बंद हो गया, तो यूरोप, उत्तरी अमेरिका और एशिया के बीच व्यापार के रास्ते लगभग कटकर रह जाएँगे। दुनिया भर में सामान पहुँचाने में भारी रुकावट आएगी और तेल की सप्लाई पर भी बहुत बड़ा असर पड़ सकता है। और ये सब उस समय हो रहा है, जब अमेरिका का तीसरा एयरक्राफ्ट कैरियर 'थियोडोर रूजवेल्ट' मिडिल ईस्ट पहुँचने वाला है। इतना ही नहीं, अमेरिका ने अपने दूतावासों और सैन्य ठिकानों से गैर-जरूरी कर्मचारियों को भी मिडिल ईस्ट से निकलने के लिए कहा है। यानी अमेरिका वही तैयारियाँ दोबारा करता हुआ दिखाई दे रहा है, जैसी उसने इस साल 28 फरवरी को हुए हमले से पहले की थीं। और अब यूरोप की तरफ आइए। ऐसी रिपोर्टें आ रही हैं कि अमेरिका यूरोप में तैनात अपने नाटो सैनिकों में से लगभग एक-तिहाई सैनिकों को वापस बुला सकता है। इससे पहले अमेरिका दक्षिण कोरिया से अपना थाड (THAAD) एयर डिफेंस सिस्टम भी हटा चुका है। अब इस बात को समझिए कि दक्षिण कोरिया से थाड हटने के बाद उत्तर कोरिया से आने वाले संभावित मिसाइल हमलों से बचाव की उसकी क्षमता प्रभावित हो सकती है। ठीक उसी तरह, अगर अमेरिका यूरोप से अपने सैनिकों को वापस बुला लेता है, तो रूस के सामने यूरोप की सुरक्षा कमजोर पड़ सकती है। और रूस के राष्ट्रपति पुतिन इसी स्थिति का फायदा उठाना चाहते हैं। यही वजह है कि यूरोप के देश अपनी सेना और रक्षा पर खर्च लगातार बढ़ा रहे हैं। दूसरी तरफ, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और आम लोगों के लिए जरूरी सार्वजनिक सुविधाओं पर खर्च कम किया जा रहा है। यानी आम जनता की सुविधाओं पर दबाव बढ़ रहा है, लेकिन सेना और हथियारों पर खर्च बढ़ाने का सिलसिला रुक नहीं रहा है। यूरोप के देशों में इसी बात को लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं कि सरकारें आम लोगों की जरूरतों पर खर्च कम कर रही हैं, जबकि सेना और रक्षा पर लगातार ज्यादा पैसा लगा रही हैं। इसके बावजूद कोई भी देश अपनी रक्षा तैयारियों को धीमा करने के लिए तैयार नहीं दिख रहा है। यूरोपीय देश सेना और रक्षा पर अब उतना पैसा खर्च कर रहे हैं, जितना दूसरे विश्व युद्ध के बाद से किसी भी समय नहीं किया गया था। खासकर जर्मनी ने तो यहाँ तक कह दिया है कि उसके अस्पतालों को तैयार रहना चाहिए, ताकि जरूरत पड़ने पर वे एक ही रात में कम से कम 1,000 मरीजों का इलाज कर सकें। अब इन सारी बातों को एक साथ जोड़कर देखिए तो आभास होता है कि दुनिया की सरकारें अपने नागरिकों से इमरजेंसी सामान जमा करने को कह रही हैं। अमेरिका अपने सैन्य ठिकानों को 90 दिनों तक बिना बाहरी सप्लाई के चलने के लिए तैयार कर रहा है। मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सैन्य गतिविधियाँ बढ़ रही हैं, दूतावासों और सैन्य ठिकानों से गैर-जरूरी कर्मचारियों को हटाया जा रहा है और दुनिया के सबसे अहम तेल और व्यापारिक रास्तों पर खतरा मंडरा रहा है। दूसरी तरफ, अमेरिका के यूरोप से सैनिक वापस बुलाने की खबरों के बीच यूरोपीय देश अपनी सेना और हथियारों पर रिकॉर्ड स्तर पर पैसा खर्च कर रहे हैं। जर्मनी के अस्पतालों को एक ही रात में 1,000 मरीजों को संभालने के लिए तैयार रहने को कहा जा रहा है। यानी दुनिया की तमाम बड़ी ताकतें एक ही समय पर ऐसी तैयारियाँ कर रही हैं, जो युद्ध जैसी किसी बड़ी स्थिति में काम आ सकती हैं, लेकिन कोई भी खुलकर 'युद्ध' शब्द का इस्तेमाल नहीं कर रहा है! अब आप खुद सोचिए कि जब अलग-अलग देशों की सरकारें एक साथ इस तरह की तैयारियाँ कर रही हैं, तो आखिर उन्हें किस चीज का डर है? क्या ये सब सिर्फ सामान्य सुरक्षा तैयारियाँ हैं, या फिर सरकारें किसी ऐसी स्थिति के लिए तैयारी कर रही हैं, जिसके बारे में आम लोगों को अभी बताया नहीं जा रहा है? ब्रिक्स देशों को भी अब सावधान हो जाना चाहिए क्योंकि देर सबेर ये गाज उन्हीं पर गिरने वाली है। शुरुआत भले ही ईरान व रूस से हो, लेकिन देर सबेर भारत और चीन दोनों को लपेटा जाना तय है। पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने जी-2 और जी-3 की आड़ में खुद के वर्चस्व को कायम रखना चाहा, लेकिन जब बात नहीं बन पाई तो दुष्परिणाम कभी भी दिखाई पड़ सकता है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 31 Oct 2026 12:50 pm

भाजपा के रणनीतिकारों के सामने कई सवाल छोड़ गया एमएलसी चुनाव!

देश के चार राज्यों (उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक) की 28 विधान परिषद (एमएलसी) सीटों पर चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं, सभी राजनीतिक दल व विश्लेषक परिणामों का अध्ययन करके उसके अपने-अपने लाभ-हानि के हिसाब से मायने निकाल रहे हैं। लेकिन इस बार का यह चुनाव कई ऐसे सवाल छोड़ गया है जिनका जवाब राजनीतिक दलों के रणनीतिकारों के साथ विशेषकर उत्तर प्रदेश के संदर्भ में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को जल्द से जल्द तलाश ना होगा। क्योंकि भाजपा को अन्य दलों से अलग मानते हुए किसी व्यक्ति या परिवार की जागीर की जगह संगठन को सर्वोपरि मानने वाला राजनीतिक दल माना जाता है और वैसे भी अंदरूनी गुटबाजी से दूर अनुशासन वाली पार्टी मानने का दावा भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के द्वारा हमेशा सार्वजनिक रूप भी किया जाता है। लेकिन एमएलसी के चुनावों के परिणामों पर गौर करें तो उत्तर प्रदेश की हॉट सीट वाराणसी, लखनऊ व महाराष्ट्र में नागपुर जैसी हाईप्रोफाइल सीट पर हारने के पीछे भाजपा के कुछ राजनेताओं की अति महत्वाकांक्षा व अनुशासन का तार-तार होना बहुत बड़ी वज़ह माना जा रहा है। पहले पार्टी के अधिकांश राजनेता व कार्यकर्ता निस्वार्थ भाव से कार्य करते हुए धरातल पर नज़र आते थे, लेकिन लंबे समय से सत्ता का सुख लगातार भोगने के कारण अब पार्टी के कुछ राजनेताओं का अहंकार अपने चरम पर है और वह सत्ता के मद में चूर होकर के जनता को ठेंगा दिखाकर चिढ़ाते हुए पार्टी के केंद्रीय व प्रदेश नेतृत्व तक के भी दिशा-निर्देशों की आये दिन अनदेखी करने का कार्य कर रहे हैं। जबकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व गृहमंत्री अमित शाह के दौर की भारतीय जनता पार्टी की पहचान एक ऐसे राजनीतिक दल के रूप में होती है, जिसके कार्यकर्ता व नेता किसी भी स्तर के चुनाव को हल्के में नहीं लेते हैं। लेकिन जिस तरह से उत्तर प्रदेश के एमएलसी चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन रहा है, उसने तो पार्टी के रणनीतिकारों को जीती हुई व हारी हुई सभी ही सीटों के परिणाम पर विस्तार से विश्लेषण करने के लिए सोचने पर मजबूर कर ही दिया है। क्योंकि उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 में विधानसभा चुनाव हैं, पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को योगी सरकार के कार्यों के दम पर चुनावों में जीत की हैट्रिक लगाने की पूरी उम्मीद है। जिस वक्त में यूपी के विधानसभा चुनाव सर पर हैं उस वक्त में पार्टी के शीर्ष रणनीतिकार एमएलसी चुनावों में हर सीट पर भाजपा प्रत्याशी की जीत का अंतर बढ़ाकर के विपक्षी दलों के जनता की अदालत से पैर उखाड़कर के भाजपा के पक्ष में माहौल बनाना चाहते थे। लेकिन सूत्रों के अनुसार लगातार मीटिंग व ईटिंग के बाद भी कुछ भाजपा नेताओं की ही चीटिंग के चलते भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का यह दांव जन अदालत में उल्टा हो गया है, जिसका खामियाजा भारतीय जनता पार्टी को एमएलसी चुनावों की रणभूमि में कुछ सीटों पर हार के रूप में उठाना पड़ा है। इसे भी पढ़ें: विधान परिषद- छोटा चुनाव बड़े सबक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सीट वाराणसी, रक्षामंत्री राजनाथ सिंह की सीट लखनऊ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गढ़ नागपुर के एमएलसी सीटों के इन चुनाव परिणामों के बाद अब पार्टी में ही संगठन की रणनीति और प्रत्याशी चयन पर सवाल उठाने की गुपचुप सुगबुगाहट शुरू हो गई है। वहीं कुछ राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो हाईप्रोफाइल सीटों के साथ-साथ बाकी सीटों पर भी जीत का अंतर भाजपा के कुछ अपने ही लोगों का भीतरघात, दावेदारों व अन्य जिम्मेदार लोगों के द्वारा सही ढंग से वोट नहीं बनवाने, प्रत्याशी चयन पर सवाल, संगठन के द्वारा बनाई गई जीत की रणनीति और कुछ अपनों के ही द्वारा चुनाव में की गयी चीटिंग की चीख-चीखकर के स्वयं ही पोल खोलने का कार्य रही है। ऐसी स्थिति में विचारणीय तथ्य यह है कि उत्तर प्रदेश में आगामी वर्ष 2027 में विधानसभा के चुनाव हैं, भाजपा के केंद्रीय व प्रदेश नेतृत्व आये दिन चुनावी रणभूमि के लिए सटीक कारगर रणनीति बनाने के लिए छोटी व बड़ी मीटिंग करते रहते हैं और इन मीटिंग में केंद्रीय व प्रदेश स्तर के नेताओं से लेकर के भाजपा के मंडल स्तर के नेताओं व कार्यकर्ताओं तक की भी मौजूदगी समय-समय पर रहती है, मीटिंग में पार्टी के नेताओं के द्वारा चुनावी रणभूमि के लिए एक चाक-चौबंद रणनीति बनायी जाती है। लेकिन सूत्रों के अनुसार पार्टी में अब एक ऐसा लंबा-चौड़ा धड़ा तैयार हो गया है जो मीटिंग के बाद में ईटिंग कर निकलने के बाद से ही गुटबाजी व अपनी महत्वाकांक्षाओं के चलते संगठन सर्वोपरि के भाव का त्याग करके चीटिंग करने में लग जाता है। इसका ताजा उदाहरण हाल ही में सम्पन्न हुए उत्तर प्रदेश के 11 एमएलसी सीटों के चुनाव भी हैं, इन 11 सीटों में भाजपा 6 सीटें और समाजवादी पार्टी 5 सीटें जीती है। लेकिन सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि हार के साथ-साथ कुछ सीटों पर तो जैसे-तैसे ही भारतीय जनता पार्टी को जीत मिली है। हालांकि चुनाव परिणामों में दस सीटों पर सिटिंग एमएलसी ही दोबारा चुन लिए गए हैं। केवल लखनऊ स्नातक सीट पर ही बड़ा उलटफेर हुआ है, यहां भाजपा के मौजूदा एमएलसी अवनीश कुमार सिंह को सपा की कांति सिंह ने हरा दिया है। वैसे देखें तो वर्ष 2020 में इन सभी 11 सीटों के चुनाव में भाजपा ने छह, समाजवादी पार्टी ने तीन और निर्दलीय उम्मीदवारों ने दो सीटों पर जीत हासिल की थी, वहीं इस बार भाजपा की सीटें तो छह ही रह गई, लेकिन सपा की सीट तीन से बढ़कर के पांच सीट हो गई हैं। चुनावों के यह परिणाम उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा में अंदरुनी गुटबाजी और भविष्य में चुनावी रणभूमि में कांटे की टक्कर होने का संकेत दे रहे हैं। जो स्थिति उत्तर प्रदेश में हैट्रिक लगाने का सपना देख रही भाजपा हाईकमान के लिए एक गहन आत्ममंथन का विषय है। हालांकि उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के चुनावी तरकश में हैट्रिक लगाने के लिए जन अदालत में बताने के लिए कानून व्यवस्था में लेकर के बहुत सारे सरकार के शानदार कार्य हैं, लेकिन इन कार्यों पर पार्टी के कुछ शीर्ष राजनेताओं की अंदरूनी खींचतान, जबरदस्त आपसी गुटबाजी व महत्वकांक्षाएं भारी ना पड़े, इसके लिए समय रहते ही भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को ठोस व प्रभावी उपाय धरातल पर करने होंगे। - दीपक कुमार त्यागी अधिवक्ता, स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 31 Oct 2026 12:30 pm

China को लगे 40 साल, Modi ने 12 साल में कर दिखाया! बचपन में गरीबी को झेलने वाले PM ने 49.6 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर उठाया

बचपन में घोर गरीबी को बेहद करीब से देखने वाले और जीवनयापन के लिए रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने वाले नरेंद्र मोदी ने जब देश के प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी संभाली, तो उनके सामने भारत की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक थी गरीबी। करोड़ों लोगों के पास न पक्का मकान था, न बैंक खाता, न शौचालय, न रसोई गैस और न ही बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी ने गरीबों को सरकारी योजनाओं के केंद्र में रखते हुए गरीबी के अभिशाप से देश को बाहर निकालने का अभियान शुरू किया। अब इस अभियान के सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं जिसे अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी मान रही हैं। उल्लेखनीय है कि विश्व बैंक की अक्टूबर 2026 की ताजा रिपोर्ट भारत की इसी परिवर्तनकारी यात्रा पर वैश्विक मुहर लगा रही है। विश्व बैंक की रिपोर्ट: 49.6 करोड़ लोगों की जिंदगी में बदलाव विश्व बैंक की Poverty and Equity Brief, October 2026 के मुताबिक, भारत ने 2011 से 2023 के बीच अनुमानित 49.6 करोड़ लोगों को 4.20 डॉलर प्रतिदिन वाली निम्न-मध्यम आय वर्ग की गरीबी रेखा से ऊपर उठाया। इस अवधि में इस श्रेणी में आने वाली आबादी का अनुपात 57.7 प्रतिशत से घटकर 16.1 प्रतिशत रह गया। इससे भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अत्यंत गरीबी में रहने वाली आबादी का अनुपात 2011 के 27.1 प्रतिशत से घटकर 2023 में महज 2.6 प्रतिशत रह गया। विश्व बैंक ने भारत की इस प्रगति को दुनिया में गरीबी घटने की सबसे तेज प्रक्रियाओं में से एक बताया है। रिपोर्ट के अनुसार, मजबूत घरेलू उपभोग, रोजगार में वृद्धि, विशेषकर महिलाओं की बढ़ती रोजगार भागीदारी और खाद्य सब्सिडी सहित सामाजिक सुरक्षा योजनाओं ने इस बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसे भी पढ़ें: World Bank Report 2026 | भारत में अत्यधिक गरीबी घटकर 2.6% पर आई! विश्व बैंक की रिपोर्ट में ऐतिहासिक गिरावट और आय असमानता की चुनौती गरीबी के खिलाफ मोदी सरकार की रणनीति देखा जाये तो प्रधानमंत्री मोदी की आर्थिक नीतियों का एक महत्वपूर्ण आधार रहा है कि गरीबों को केवल आर्थिक सहायता देने के बजाय उन्हें बुनियादी सुविधाओं और वित्तीय व्यवस्था से जोड़ा जाए। जनधन योजना के जरिए करोड़ों बैंक खाते खुले। आधार और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर ने सरकारी सहायता सीधे लाभार्थियों तक पहुंचाने का रास्ता मजबूत किया। उज्ज्वला योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, आयुष्मान भारत, स्वच्छ भारत मिशन और जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं ने गरीब परिवारों के जीवन स्तर को प्रभावित किया। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के माध्यम से करोड़ों परिवारों को खाद्य सुरक्षा मिली। इसके साथ ही मुद्रा योजना, स्टार्टअप इंडिया, मेक इन इंडिया और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाओं के जरिए रोजगार, उद्यमिता और विनिर्माण क्षेत्र को प्रोत्साहित करने का प्रयास हुआ। वैश्विक संकट में भी भारत की आर्थिक मजबूती साथ ही कोरोना महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध, ऊर्जा संकट, महंगाई और वैश्विक व्यापारिक तनाव के बीच भारत ने अपनी आर्थिक विकास गति बनाए रखने की कोशिश की है। बुनियादी ढांचे पर सरकारी निवेश, डिजिटल अर्थव्यवस्था, घरेलू उपभोग और मजबूत बैंकिंग व्यवस्था ने अर्थव्यवस्था को सहारा दिया। भारत की डिजिटल भुगतान व्यवस्था और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण की क्षमता ने सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के क्रियान्वयन को भी अधिक प्रभावी बनाया है। क्या दुनिया में किसी नेता ने इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल की है? यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या दुनिया के किसी दूसरे नेता ने नरेंद्र मोदी जैसी आर्थिक उपलब्धि इतने कम समय में हासिल की है? तुलनात्मक रूप से देखें तो चीन ने 1978 के बाद लगभग चार दशकों में करीब 77 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकालने का ऐतिहासिक दावा किया था। वहीं भारत ने विश्व बैंक के अक्टूबर 2026 के आंकड़ों के अनुसार, 2011 से 2023 के बीच महज 12 वर्षों में 49.6 करोड़ लोगों को 4.20 डॉलर प्रतिदिन वाली निम्न-मध्यम आय वर्ग की गरीबी रेखा से ऊपर पहुंचाया। अत्यंत गरीबी का अनुपात भी इसी अवधि में 27.1 प्रतिशत से घटकर 2.6 प्रतिशत रह गया। चीन की चार दशक लंबी यात्रा के मुकाबले भारत की 12 वर्षों की यह उपलब्धि अपने आप में असाधारण है। इस उपलब्धि का राजनीतिक और नीतिगत महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि इस अवधि के अधिकांश वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीते हैं। 2014 में सत्ता संभालने के बाद मोदी सरकार ने गरीबों के बैंक खाते खोलने, सीधे आर्थिक सहायता पहुंचाने, मुफ्त राशन, आवास, रसोई गैस, स्वास्थ्य बीमा, स्वच्छता और ग्रामीण बुनियादी सुविधाओं के विस्तार को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया। जनधन-आधार-डीबीटी की व्यवस्था से लेकर गरीब कल्याण योजनाओं तक, इन नीतिगत पहलों ने गरीबी के खिलाफ अभियान को व्यापक आधार दिया। इसलिए 2014 के बाद लागू और विस्तारित इन नीतियों को इस ऐतिहासिक बदलाव का एक महत्वपूर्ण नीतिगत श्रेय निश्चित रूप से दिया जाना चाहिए। अभी बाकी है आर्थिक लड़ाई साथ ही विश्व बैंक ने रोजगार की गुणवत्ता, युवाओं की बेरोजगारी और क्षेत्रीय असमानता को लेकर भी चिंता जताई है। देश की लगभग 57 प्रतिशत गरीब आबादी उत्तर प्रदेश से पश्चिम बंगाल तक फैले राज्यों के एक क्षेत्र में केंद्रित है। 2017 से 2023 के बीच रोजगार में लगभग 13.4 करोड़ की वृद्धि हुई, जिसमें ग्रामीण महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का महत्वपूर्ण योगदान रहा। लेकिन युवाओं के लिए बेहतर और उत्पादक रोजगार उपलब्ध कराना अभी बड़ी चुनौती है। विश्व बैंक के अनुमान के मुताबिक, 4.20 डॉलर वाली गरीबी रेखा पर गरीबी की दर 2026 के 14.2 प्रतिशत से घटकर 2028 तक 12.1 प्रतिशत हो सकती है। बहरहाल, भारत की यह यात्रा केवल आंकड़ों की कहानी नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों के जीवन में आए बदलाव की कहानी है। रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने से लेकर देश के प्रधानमंत्री बनने तक का सफर तय करने वाले नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में गरीबी के खिलाफ चलाए गए अभियान ने महत्वपूर्ण परिणाम दिए हैं। अब चुनौती इस उपलब्धि को स्थायी आर्थिक समृद्धि में बदलने की है, ताकि गरीबी से बाहर आए परिवार दोबारा अभाव के अंधेरे में न लौटें और भारत विकसित राष्ट्र बनने के अपने लक्ष्य की ओर मजबूती से बढ़ सके। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 31 Oct 2026 12:22 pm

BREAKING: सरकारी नौकरियों में भर्ती की उम्र सीमा 5 साल बढ़ी, 30 अक्टूबर से लागू होगा नया नियम

BREAKING: सरकारी नौकरियों में भर्ती की उम्र सीमा 5 साल बढ़ी, 30 अक्टूबर से लागू होगा नया नियम

समाचार नामा 31 Oct 2026 8:29 am

प्रधानमंत्री मोदी ने नए नेविगेशन उपग्रह एनवीएस-03 की सफल लॉन्चिंग पर इसरो के वैज्ञानिकों को दी बधाई

नई दिल्ली, 31 अक्टूबर (आईएएनएस)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नए नेविगेशन उपग्रह एनवीएस-03 की सफल लॉन्चिंग पर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को बधाई दी है। उन्होंने कहा कि यह मिशन भारत की स्वदेशी सैटेलाइट नेविगेशन प्रणाली 'नाविक' को और मजबूत बनाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम है।

समाचार नामा 31 Oct 2026 7:43 am

1 नवंबर की कांग्रेस रैली पर विवाद, भाजपा बोली- सिख समुदाय की भावनाओं को पहुंची ठेस

1 नवंबर की कांग्रेस रैली पर विवाद, भाजपा बोली- सिख समुदाय की भावनाओं को पहुंची ठेस

समाचार नामा 30 Oct 2026 10:29 pm

विधान परिषद- छोटा चुनाव बड़े सबक

उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक की 28 विधान परिषद सीटों के चुनाव संपन्न हो चुके हैं। सर्वाधिक 11 सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश का चुनाव परिणाम आ चुका है जो भाजपा तथा सपा के बीच 6-5 के परिणाम से समाप्त हुआ। यह था तो छोटा चुनाव किंतु इस पर सभी राजनैतिक विश्लेषकों की दृष्टि थी कि 2027 विधानसभा चुनाव के पहले कौन क्लीन स्वीप करता है किंतु शिक्षकों व स्नातकों ने स्पष्ट संदेश दे दिया है कि आगामी चुनाव किसी भी दल या गठबंधन के लिए बहुत आसान नहीं होंगे। मुकाबला कांटे का होगा। जिस दल के प्रत्याशी व कार्यकर्ता धरातल पर उतर कर अपने मतदाताओं के साथ गहन संपर्क व संवाद में रहेंगे उन्हीं को लाभ होगा। विधान परिषद चुनावों में भाजपा मात्र छह सीटों पर पर अपनी साख बचाने में सफल रही जबकि समाजवादी पार्टी अपने पीडीए के बल पर पांच सीटें जीतने में सफल रही और यही नहीं उसने वाराणसी, आगरा व लखनऊ में बीजेपी के गढ़ों में परचम फहराकर भाजपा के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दीं। अब सपा में उत्साह का वातावरण है। उसके नेता व प्रवक्ता कह रहे हैं कि वर्ष 2024 में अयोध्या में भगवान राम का आशीर्वाद उन्हें प्राप्त हुआ और अब 2026 में काशी की नगरी में महादेव और लखनऊ में प्रभु श्रीराम के अनुज लक्ष्मणजी का भी आशीर्वाद मिल चुका है। सफलता से उत्साहित समाजवादी पार्टी अब इसी नैरेटिव को आगे बढ़ाएगी। इसे भी पढ़ें: चार राज्यों के विधान परिषद चुनावों के मिले-जुले परिणामों के महत्वपूर्ण सियासी संदेश भारतीय जनता पार्टी के लिए अत्यंत सतर्क हो जाने का समय आ गया है। यदि वर्ष 2024 में लोकसभा चुनाव के दौरान प्रदेश के मतदाताओं ने जो रवैया दिखाया था और सपा -कांग्रेस गठबंधन ने प्रदेश में लोकसभा की सर्वाधिक सीटें जीत ली थीं अगर वही रुख अभी भी बरकार है तब यह परिस्थितियों को और भी कठिन बना सकता है। भारतीय जनता पार्टी को सबसे बड़ा झटका रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के संसदीय क्षेत्र लखनऊ की स्नातक सीट पर लगा है। यहाँ पार्टी के प्रत्याशी इंजीनियर अवनीश सिंह को सपा प्रत्याशी कांति सिंह ने बहुत आसानी से पराजित कर दिया। यह स्पष्ट संकेत है कि अगर भाजपा ने अपना चुनावी प्रबंधन और कार्यकर्ताओं व मतदाताओं के मध्य अपना संवाद, संपर्क, व्यवहार नहीं सुधारा तो फिरऔर भी नुकसान उठाना पड़ सकता है। वाराणसी का परिणम भी स्थिति को गंभीर बना रहा है। प्रदेश के संगठन पर सवालिया निशान भी उठ रहे हैं। वाराणसी का जनमानस प्रश्न कर रहा है कि जो उम्मीदवार पिछले चुनावों में पराजित हो चुका था, जनता के मध्य कभी नहीं रहता, केवल चुनावो के छह महीने पूर्व गणेश परिक्रमा करके पार्टी का टिकट कैसे लेकर आ जाता है? ऐसी परिस्थितियों में उन कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरता है जो धरातल पर उतरकर पार्टी के लिए कड़ी मेहनत कर रहे होते हैं। वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में जितना विकास हुआ है उतनी किसी ने कल्पना भी नहीं करी थी फिर भी वहां भाजपा के वोट प्रतिशत में लगातार गिरावट और विधान परिषद की दोनों सीटों पर हार भाजपा के लिए चिंता का विषय है। काशी विश्वनाथ मंदिर का भव्य कारिडोर बना, जिससे पर्यटकों की संख्या में भारी वृद्धि हुई, रोप-वे बन रहा है, वाराणसी को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम मिलने जा रहा है, रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर क्रियाशील है, काशी को सांस्कृतिक-आध्यात्मिक गतिविधियों पूरे भारत से से जोड़ा जा रहा है, निवेशक आ रहे हैं, काशी -तमिल संगमम का आयोजन किया जा रहा है। इस सबके बाद भी वाराणसी में एमएलसी चुनावों में दोनों सीटों पर पराजय स्थानीय नेतृत्व पर सवाल खड़े कर रही है। वाराणसी की पराजय से यह बात भी उठ रही है कि वाराणसी नगर भाजपा में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। भाजपा के लिए अच्छी बात ये है कि विधानसभा चुनावों के पूर्व एक लिटमस टेस्ट हो गया। अभी भी भाजपा के पास कार्यकर्ताओं में उत्साह जागरण तथा अपनी रणनीति नए सिरे से गढ़ने के लिए पर्याप्त समय है। प्रदेश भाजपा की नवगठित कर्यकारिणी की बैठक होने जा रही है जिसमें हर बिंदु पर चर्चा होगी। यहाँ अमित शाह जी की अध्यक्षता में कडे़ कदम भी उठाए जा सकते हैं। दीपावली के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियां तथा भाजपा का चुनाव अभियान प्रारंभ होगा। भाजपा के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि जनमानस तो योगी-योगी कर रहा है किंतु कार्यकर्ताओं में उत्साह नहीं है। भाजपा के लिए अपने कार्यकर्ताओं में उत्साह जगाने का समय है क्योंकि विभिन्न कारणों से उणमें धरातल पर उत्साह नहीं दिखाई दे रहा है। अगर बीजेपी का कार्यकर्ता उत्साहित हो गया और घरों से निकल पड़ा तो फिर भाजपा आसानी से तीन सौ पार जा सकती है। भाजपा अपने कार्यकर्ताओं की नाराजगी जितनी जल्दी जितना कम कर लेगी, टिकट वितरण सही होगा, योगी आदित्यनाथ सरकार चुनावों से पूर्व एक लाख नौकरी देने का वादा सफलतापूर्वक पूरा कर लेगी और साथ ही अगर 69,000 शिक्षकों की भर्ती का मामला सुप्रीम कोर्ट से सुलझ जाएगा तो विधानसभा चुनाव भाजपा के नियंत्रण में आ जाएगा। - मृत्युंजय दीक्षित

प्रभासाक्षी 30 Oct 2026 6:51 pm

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: क्या अब सुधरेंगे फ्रॉड पीड़ितों के हालात?

भारत में डिजिटल क्रांति ने जहाँ आम नागरिक के जीवन को सुगम बनाया है, वहीं इसने एक ऐसे अदृश्य और खौफनाक अपराध तंत्र को भी जन्म दे दिया है जिसने देश की पूरी बैंकिंग और सुरक्षा व्यवस्था के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। आज के दौर में साइबर फ्रॉड और विशेष रूप से 'डिजिटल अरेस्ट' जैसी त्रासदियाँ किसी महामारी की तरह फैल चुकी हैं, जहाँ पलक झपकते ही किसी व्यक्ति की जीवनभर की गाढ़ी कमाई अपराधियों के खातों में चली जाती है। ऐसे माहौल में देश की सर्वोच्च अदालत, सुप्रीम कोर्ट का हालिया रुख न केवल डिजिटल और साइबर फ्रॉड के पीड़ितों के हक में एक ऐतिहासिक कदम है, बल्कि यह देश की बैंकिंग प्रणाली के लिए एक बेहद सख्त चेतावनी भी है। अदालत ने बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि बैंकों की लापरवाही या उनकी उचित सावधानी (ड्यू डिलिजेंस) में कमी के कारण कोई नागरिक ठगी का शिकार होता है, तो संबंधित बैंक को उस नुकसान की पूरी भरपाई करनी होगी। मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ का यह निर्देश इस मायने में क्रांतिकारी है क्योंकि यह पहली बार उपभोक्ताओं के नुकसान की सीधी जवाबदेही उन वित्तीय संस्थानों पर डालता है, जो सुरक्षा का दावा तो करते हैं लेकिन अपनी कमियों को छिपाने में लगे रहते हैं। अदालत द्वारा रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया को आगामी संशोधित 'केवाईसी गाइडलाइंस' में पीड़ितों को मुआवजा देने का प्रावधान अनिवार्य रूप से शामिल करने का आदेश देना एक ऐसा नीतिगत बदलाव है, जिसकी प्रतीक्षा लंबे समय से की जा रही थी। इस आदेश के तहत आरबीआई को तीस नवंबर दो हजार छब्बीस तक नए नियम अधिसूचित करने हैं, जो इकतीस दिसंबर दो हजार छब्बीस से देश भर में प्रभावी हो जाएंगे। अदालत का यह समयबद्ध दृष्टिकोण दर्शाता है कि न्यायपालिका इस संकट की गंभीरता को कितनी गहराई से महसूस कर रही है। इस पूरे संकट का सबसे स्याह पहलू यह है कि अब तक साइबर अपराध के मामलों में पूरी व्यवस्था का दृष्टिकोण केवल पीड़ित को उपदेश देने या उसे जागरूक करने तक ही सीमित रहा है। सरकारें, पुलिस और बैंक अक्सर विज्ञापनों के माध्यम से यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं कि किसी को अपना ओटीपी या पासवर्ड न बताएं। परंतु, आज का साइबर अपराध केवल ओटीपी चोरी करने तक सीमित नहीं रह गया है। 'डिजिटल अरेस्ट' जैसी नई और परिष्कृत तकनीकों में अपराधियों द्वारा कानून प्रवर्तन एजेंसियों का फर्जी रूप धरकर, पीड़ितों को मानसिक रूप से बंधक बना लिया जाता है और अत्यधिक मनोवैज्ञानिक दबाव में उनसे पैसे ऐंठे जाते हैं। ऐसे में साधारण नागरिक, चाहे वह कितना भी पढ़ा-लिखा क्यों न हो, भय और भ्रम के जाल में फंस जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस कड़वी सच्चाई को स्वीकार किया है कि इस साल देश में डिजिटल अरेस्ट और साइबर फ्रॉड के कारण जनता ने लगभग आठ सौ करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि गंवाई है। यह आंकड़ा केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि यह उन हजारों परिवारों की मानसिक प्रताड़ना, आर्थिक तबाही और टूटे हुए सपनों की दास्तां है, जिन्होंने अपनी जमा-पूंजी को सुरक्षित मानकर बैंकों के हवाले किया था। जब कोई अपराधी किसी खाते से करोड़ों रुपये ट्रांसफर करने में सफल हो जाता है, तो यह केवल पीड़ित की सादगी नहीं, बल्कि उस बैंक के सुरक्षा चक्र की पूर्ण विफलता होती है। अदालत ने इसी बिंदु पर प्रहार करते हुए बैंकों को निर्देश दिया है कि यदि किसी खाताधारक के सामान्य व्यवहार या पुराने पैटर्न से अलग कोई 'असामान्य ट्रांजैक्शन' या संदिग्ध लेनदेन होता है, तो बैंक को उस पर तुरंत अस्थाई रोक लगानी होगी। यह एक ऐसा सुरक्षात्मक कदम है जो अगर पहले से मुस्तैदी से लागू होता, तो आज आठ सौ करोड़ रुपये का यह राष्ट्रीय नुकसान रोका जा सकता था। इसे भी पढ़ें: डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) कानून क्या है? इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती क्यों दी गई है? इस पूरे संगठित अपराध की रीढ़ की हड्डी 'म्यूल अकाउंट्स' यानी वे फर्जी बैंक खाते हैं, जिनका उपयोग साइबर ठग अपनी पहचान छिपाने और पैसे को अलग-अलग खातों में घुमाने के लिए करते हैं। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि बिना बैंकों के भीतर बैठे कुछ भ्रष्ट तत्वों की मिलीभगत या फिर बैंकों के ढीले रवैये के, हजारों की संख्या में फर्जी दस्तावेजों पर खाते खोलना और उनमें करोड़ों का लेन-देन होना संभव नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इन फर्जी खातों के जाल पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए साफ किया है कि बैंकों को अपने ग्राहक को जानो की प्रक्रिया को केवल एक कागजी औपचारिकता नहीं, बल्कि एक अभेद्य सुरक्षा कवच बनाना होगा। अब तक बैंक इन फर्जी खातों के जरिए होने वाले अपराधों से खुद को अलग कर लेते थे और सारा दोष पुलिस या पीड़ित पर मढ़ दिया करते थे। लेकिन इस नए आदेश के बाद जब लापरवाही साबित होने पर मुआवजा देना बैंकों के लिए कानूनी रूप से अनिवार्य हो जाएगा, तब वित्तीय संस्थानों को अपनी तकनीकी सुरक्षा और आंतरिक निगरानी तंत्र को दुरुस्त करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। जब बैंकों को यह समझ आएगा कि सुरक्षा में चूक की कीमत उनके अपने मुनाफे से कटेगी, तब वे संदिग्ध खातों पर नजर रखने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और उन्नत सुरक्षा प्रणालियों में निवेश करने को तत्पर होंगे। इसके साथ ही, बैंकों को यह भी निर्देश दिया गया है कि वे किसी भी संदिग्ध डिजिटल अरेस्ट या वित्तीय धोखाधड़ी की गतिविधि की भनक लगते ही तुरंत नजदीकी पुलिस स्टेशन को सूचित करें, जिससे वित्तीय सुरक्षा और कानून व्यवस्था के बीच एक मजबूत और त्वरित तालमेल स्थापित हो सके। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक आदेश जितना स्वागत योग्य है, इसे जमीन पर उतारने की राह में उतनी ही जटिल चुनौतियां भी खड़ी हैं। सबसे बड़ा कानूनी और व्यावहारिक संकट यह उठेगा कि 'बैंक की लापरवाही' और 'ग्राहक की गलती' के बीच की महीन रेखा को कौन और कैसे तय करेगा। बैंक निश्चित रूप से हर मामले में अपनी कानूनी टीमों के सहारे यह साबित करने की पुरजोर कोशिश करेंगे कि उपभोक्ता ने स्वयं अपनी संवेदनशील वित्तीय जानकारियां या क्रेडेंशियल्स साझा किए थे, और इसलिए बैंक मुआवजे के लिए कतई उत्तरदायी नहीं है। इसके अलावा, बैंकिंग लॉबी की ओर से इस बात को लेकर भी कानूनी प्रतिरोध देखने को मिल सकता है कि तकनीकी रूप से सुरक्षित प्रणालियों के बावजूद यदि कोई उपभोक्ता 'सोशल इंजीनियरिंग' या मनोवैज्ञानिक दबाव (जैसे डिजिटल अरेस्ट) का शिकार होता है, तो उसकी पूरी वित्तीय देनदारी बैंक पर कैसे थोपी जा सकती है। इसके लिए आरबीआई को अपने संशोधित नियमों में बहुत स्पष्ट, निष्पक्ष और पारदर्शी मापदंड तय करने होंगे ताकि पीड़ितों को न्याय पाने के लिए बैंकों के चक्कर न काटने पड़ें और न ही उन्हें उपभोक्ता अदालतों के अंतहीन मुकदमों में उलझना पड़े। एक और चिंताजनक पहलू इस कानून के लागू होने की समयसीमा है। दिसंबर दो हजार छब्बीस तक का समय अपराधियों को नए रास्ते खोजने का मौका दे सकता है, इसलिए इस संक्रमण काल के दौरान भी बैंकों को अपनी स्वेच्छा से सुरक्षा मानकों को कड़ा करना चाहिए। निष्कर्षतः, सुप्रीम कोर्ट का यह कड़ा रुख देश के करोड़ों डिजिटल उपभोक्ताओं के लिए एक नई उम्मीद की किरण लेकर आया है। डिजिटल इंडिया का सपना तभी पूरी तरह साकार और सफल हो सकता है, जब देश का हर नागरिक डिजिटल रूप से खुद को सुरक्षित महसूस करे। अदालत ने अपना काम बखूबी कर दिया है और अब गेंद पूरी तरह से रिजर्व बैंक और देश के तमाम वाणिज्यिक बैंकों के पाले में है। उन्हें यह समझना होगा कि वित्तीय सुरक्षा में सेंध केवल एक व्यक्ति का नुकसान नहीं, बल्कि पूरी बैंकिंग व्यवस्था से जनता के भरोसे का उठ जाना है, और इस भरोसे को बनाए रखना अब उनकी कानूनी मजबूरी भी है। - अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार

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