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12 साल पहले मोदी ने ‘मेक इन इंडिया’ का संकल्प लिया, अब यूपी 1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य हासिल करेगा: अमित शाह

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने शुक्रवार को यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो के उद्घाटन समारोह में कहा कि आज का दिन मणिकांचन योग लेकर आया है

देशबन्धु 25 Sep 2026 10:25 pm

‘सोने की चिड़िया’ भारत में हुनरमंदों को नहीं मिला मंच, यूपी ने लोकल उत्पादों को ग्लोबल पहचान दी: योगी

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि भारत कभी दुनिया में ‘सोने की चिड़िया’ के रूप में जाना जाता था। लेकिन देश की शक्तियां विभाजित हुईं तो भारत गुलाम हुआ

देशबन्धु 25 Sep 2026 10:22 pm

यूपी में निवेश का सच क्या है? अखिलेश ने खोली भाजपा सरकार की पोल

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने शुक्रवार को भाजपा सरकार पर उत्तर प्रदेश में निवेश के नाम पर झूठा प्रचार करने का आरोप लगाया

देशबन्धु 25 Sep 2026 10:11 pm

सीईसी ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें वरना महाभियोग की कार्रवाई की जाए: राशिद अल्वी

सीईसी ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें वरना महाभियोग की कार्रवाई की जाए: राशिद अल्वी

समाचार नामा 25 Sep 2026 8:27 pm

'भगवा रंग की बसें कांग्रेस को पसंद नहीं आएंगी', मध्य प्रदेश के सीएम मोहन यादव

'भगवा रंग की बसें कांग्रेस को पसंद नहीं आएंगी', मध्य प्रदेश के सीएम मोहन यादव

समाचार नामा 25 Sep 2026 8:08 pm

Election Commission भेदभाव तो करता है! आम लोगों और VIP Voters के साथ आखिर अलग अलग सलूक क्यों होते हैं?

नई दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर चल रही कवायद के बीच एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने पूरी प्रक्रिया पर फिर से बहस तेज कर दी है। हम आपको बता दें कि जिन प्रमुख और चर्चित मतदाताओं के नाम पर एसआईआर के दौरान नोटिस जारी हुए थे, उनमें से अधिकांश के विवरण और दस्तावेजों का सत्यापन अब पूरा कर लिया गया है और उन्हें अंतिम मतदाता सूची में शामिल किए जाने के लिए हरी झंडी मिल गई है। इनमें पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, विदेश मंत्री एस जयशंकर, दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी जैसे चर्चित नाम शामिल हैं। इसके अलावा विदेश सचिव विक्रम मिस्री, पूर्व नीति आयोग के उपाध्यक्ष रहे अरविंद पनगढ़िया, भाजपा विधायक कैलाश गहलोत, पूर्व सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी, सीबीआई निदेशक प्रवीण सूद और दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग सहित कई अन्य प्रमुख लोगों को भी एसआईआर के दौरान नोटिस मिला था। चुनाव अधिकारियों के अनुसार इन मामलों की व्यक्तिगत रूप से जांच की गई और संबंधित मतदाताओं से आवश्यक जानकारी तथा दस्तावेज हासिल किए गए। सत्यापन पूरा होने के बाद इनके नाम अंतिम मतदाता सूची में शामिल किए जाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई है। इसे भी पढ़ें: Gyanesh Kumar से तीखे सवाल क्यों पूछने लगे Modi के 'हनुमान' Chirag Paswan? क्या NDA में भी बढ़ रहे हैं मतभेद? दरअसल, इन चर्चित नामों को नोटिस मिलने के बाद सवाल उठने लगे थे कि आखिर ऐसे लोगों के नाम भी एसआईआर की जांच के दायरे में कैसे आ गए? चुनाव अधिकारियों का कहना है कि मतदाता विवरण में कुछ तार्किक विसंगतियां मिली थीं या फिर मौजूदा विवरण पिछली गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया से जुड़े अभिलेखों से मेल नहीं खा रहा था। इसी आधार पर संबंधित मतदाताओं को नोटिस जारी किए गए। अधिकारियों के मुताबिक नोटिस मिलना अपने आप में मतदाता सूची से नाम काटे जाने का संकेत नहीं है, बल्कि यह संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने और जरूरी दस्तावेज उपलब्ध कराने का अवसर देता है। लेकिन असली सवाल यहीं से पैदा होता है। दिल्ली में एसआईआर के तहत करीब 33 लाख मतदाताओं को नोटिस जारी किए जाने की बात सामने आई है। यानी यह प्रक्रिया केवल कुछ चर्चित चेहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर लाखों आम मतदाताओं पर पड़ रहा है। नोटिस जारी होने के बाद आम मतदाता को निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपनी पात्रता और विवरण साबित करने के लिए दस्तावेज जुटाने पड़ रहे हैं। दूसरी तरफ चर्चित और प्रभावशाली लोगों के मामलों में अधिकारियों द्वारा संपर्क कर दस्तावेज जुटाने और सत्यापन पूरा करने की प्रक्रिया सामने आई है। यही अंतर अब एसआईआर की पूरी कवायद के केंद्र में आ गया है। कुछ रिपोर्टों में आरोप लगाया गया है कि दिल्ली के एसआईआर में अधिकारियों के स्तर पर वीआईपी मतदाताओं की पहचान कर उनके सत्यापन के लिए अलग तरह की सुविधा उपलब्ध कराई गई। इन रिपोर्टों के अनुसार सामान्य मतदाताओं को जहां नोटिस के बाद सुनवाई और दस्तावेजी प्रक्रिया से गुजरना पड़ रहा है, वहीं प्रभावशाली मतदाताओं के मामलों में प्रक्रिया अपेक्षाकृत आसान रही। यह आरोप चुनावी प्रक्रिया की समानता और पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। हालांकि चुनाव अधिकारियों का आधिकारिक पक्ष यह है कि नोटिस जारी करने का आधार मतदाता के पद या प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि एसआईआर के दौरान सामने आई विसंगतियां हैं और सभी मामलों में निर्धारित प्रक्रिया के तहत सत्यापन किया जा रहा है। हम आपको बता दें कि अंतिम मतदाता सूची चार नवंबर को प्रकाशित की जानी है, जबकि नोटिसों के निस्तारण की प्रक्रिया 29 अक्टूबर तक पूरी की जानी है। इस पूरे घटनाक्रम में फिलहाल सबसे अहम बात यही है कि जिन चर्चित मतदाताओं के नाम एसआईआर के दौरान सवालों के घेरे में आए, वे सत्यापन के बाद अंतिम सूची में जगह पाने की स्थिति में हैं। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि लाखों आम मतदाताओं के मामलों का निस्तारण किस गति और किस समान प्रक्रिया के तहत होता है और चार नवंबर को प्रकाशित होने वाली अंतिम सूची एसआईआर को लेकर उठे सवालों का कितना स्पष्ट जवाब देती है। बहरहाल, इतना तो दिख ही रहा है कि चुनाव आयोग की ओर से आम और खास में फर्क किया जा रहा है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 25 Sep 2026 4:36 pm

Gyanesh Kumar से तीखे सवाल क्यों पूछने लगे Modi के 'हनुमान' Chirag Paswan? क्या NDA में भी बढ़ रहे हैं मतभेद?

अब तक चुनाव आयोग पर सवाल उठाने वालों में विपक्ष सबसे आगे था, लेकिन अब सत्ता पक्ष के भीतर से भी चुनाव आयोग को लेकर आवाज उठने लगी है। यही इस पूरे विवाद का सबसे अहम पहलू है। केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के प्रमुख सहयोगी चिराग पासवान ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से साफ कहा है कि अगर चुनाव प्रक्रिया को लेकर लोगों के मन में सवाल उठ रहे हैं तो चुनाव आयोग को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। उनका कहना है कि आयोग को सफाई राहुल गांधी को नहीं, बल्कि देश की जनता को देनी चाहिए। हम आपको बता दें कि मामला इसलिए गरम है क्योंकि चुनाव आयोग के भीतर ही मतभेदों की खबर सामने आई है। द इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल के मुताबिक तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में कम से कम 14 मौकों पर मुख्य चुनाव आयुक्त के नेतृत्व में लिए जा रहे फैसलों और निर्देशों पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं। ये आपत्तियां मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े कामकाज, प्रपत्रों में बदलाव, आंकड़ों और मतदाता सूची से नाम हटाने जैसे मुद्दों को लेकर थीं। इसे भी पढ़ें: Chirag Paswan ने पटना में कहा, Paper Leak रोकने के लिए सख्त कदम जरूरी अब यहां से कहानी विपक्ष बनाम चुनाव आयोग की सीधी लड़ाई से आगे निकल जाती है। विपक्ष पहले से आरोप लगा रहा है कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल हैं। राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग तक कर दी है। कांग्रेस सहित विपक्षी दल संसद में भी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी में हैं। उधर, सत्ता पक्ष की तरफ से भाजपा ने इन आरोपों को खारिज किया है। भाजपा ने कहा है कि आयोग के भीतर अलग-अलग राय होना किसी संस्था के कामकाज का सामान्य हिस्सा है और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए। भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने भी इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कहा कि उसमें किसी चुनाव आयुक्त का प्रत्यक्ष या अनौपचारिक बयान नहीं है। दूसरी तरफ चुनाव आयोग का कहना है कि आंतरिक टिप्पणियां, तकनीकी सुझाव और आपत्तियां किसी बहुसदस्यीय संस्था की सामान्य निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हैं और विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं। लेकिन चिराग पासवान के बयान ने इस पूरे मामले का राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। चिराग ने विपक्ष के आरोपों को सही ठहराने के बजाय मुद्दे की जड़ पर हाथ रखा है, यानी उन्होंने जनता के भरोसे की बात कही है। उनका तर्क है कि विपक्ष राजनीति करेगा, यह उसका काम है, लेकिन अगर आम मतदाता ही चुनाव प्रक्रिया को लेकर संदेह करने लगे तो यह गंभीर बात है। इसलिए चुनाव आयोग को मजबूती से अपना पक्ष जनता के सामने रखना चाहिए। देखा जाये तो राजनीति में यही वह मोड़ होता है जहां बात आरोप-प्रत्यारोप से निकलकर भरोसे के सवाल पर आ जाती है। चुनाव जीतने-हारने का फैसला जनता करती है, लेकिन चुनाव कराने वाली संस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होने लगें तो उसका असर किसी एक दल की राजनीति तक सीमित नहीं रहता। खासकर तब, जब आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों की संख्या भी सामने आ चुकी हो और बाहर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा हो। ऊपर से चुनाव आयोग की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त के प्रस्तावित युवा मतदाता जागरूकता कार्यक्रमों के स्थगित होने की खबर भी आई है। आयोग ने इसे कार्यक्रमों की तारीखों में होने वाले सामान्य बदलाव से जोड़ा है, जबकि सूत्रों के मुताबिक ये कार्यक्रम अनिश्चितकाल के लिए टाल दिए गए हैं। यानी फिलहाल सियासत की गेंद चुनाव आयोग के पाले में है। विपक्ष सवालों की बौछार कर रहा है, भाजपा उसका बचाव कर रही है, लेकिन अब सहयोगी दल की तरफ से भी यही कहा जा रहा है कि सवाल उठ रहे हैं तो जवाब साफ-साफ दिया जाए। यही इस विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश है। मामला अब सिर्फ यह नहीं रह गया कि कौन किस पर आरोप लगा रहा है; असली सवाल यह है कि चुनावी व्यवस्था को लेकर जनता के मन में उठ रहे संदेहों का जवाब कौन और किस तरह देगा। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 25 Sep 2026 4:32 pm

एसआईआर को लेकर ईसीआई में असहमति के विवाद पर पप्पू यादव बोले-'ज्ञानेश कुमार ने संविधान का गला घोंटा'

एसआईआर को लेकर ईसीआई में असहमति के विवाद पर पप्पू यादव बोले-'ज्ञानेश कुमार ने संविधान का गला घोंटा'

समाचार नामा 25 Sep 2026 4:29 pm

29 नवंबर को दुनिया देखेगी RSS की ताकत, Centenary Year के तहत सालभर चले अभियान का Delhi में बड़े आयोजन के साथ होगा समापन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष का सालभर चला अभियान अब अपने अंतिम चरण में पहुंच रहा है। पिछले साल विजयादशमी से शुरू हुई गतिविधियों का समापन 29 नवंबर को नई दिल्ली में एक बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम के साथ प्रस्तावित है, जिसे संघ प्रमुख मोहन भागवत संबोधित करेंगे। संघ की योजना के मुताबिक इस आयोजन में करीब एक लाख स्वयंसेवक गणवेश में और लगभग 50 हजार आमंत्रित नागरिक शामिल हो सकते हैं। हम आपको बता दें कि संघ ने अपने सौवें वर्ष को केवल स्मरण और उत्सव तक सीमित रखने की बजाय देशव्यापी जनसंपर्क और सामाजिक संवाद के अभियान के रूप में आगे बढ़ाया। इसकी योजना में गांव-गांव और बस्ती-बस्ती संपर्क, सामाजिक समरसता बैठकें, हिंदू सम्मेलन, प्रबुद्ध नागरिकों के साथ संवाद तथा युवाओं के लिए विशेष कार्यक्रम शामिल किए गए। वर्ष की शुरुआत से ही संघ ने अपने संगठनात्मक ढांचे को व्यापक सामाजिक संपर्क से जोड़ने पर जोर दिया। इसे भी पढ़ें: Vanakkam Poorvottar: Meghalaya में BJP ने कर दिया बहुत बड़ा खेल, एक झटके में बदल डाला विधानसभा का पूरा गणित इस अभियान का एक महत्वपूर्ण पहलू सामाजिक समरसता रहा। संघ की घोषित योजना के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों के मंडलों और शहरी बस्तियों में सम्मेलन आयोजित किए गए, जबकि देश के विभिन्न हिस्सों में सामाजिक सद्भाव बैठकों के माध्यम से जाति, क्षेत्र और सामाजिक विभाजन से ऊपर उठकर संवाद का प्रयास किया गया। संघ की योजना में 11,360 खंडों और नगरों में सामाजिक सद्भाव बैठकों तथा 924 जिलों में प्रमुख नागरिकों के साथ संवाद का उल्लेख किया गया था। सालभर चले इस अभियान की पहुंच का अंदाजा संघ द्वारा जारी आंकड़ों से भी लगाया जा सकता है। संघ के अनुसार, देशभर में 62,555 विजयादशमी कार्यक्रमों में 32 लाख से अधिक स्वयंसेवकों ने गणवेश में भाग लिया। संघ ने यह भी बताया कि एक लाख से अधिक स्थानों पर उसकी गतिविधियां संचालित हो रही हैं। इन आंकड़ों को संघ अपने बढ़ते सामाजिक विस्तार और स्वयंसेवकों की भागीदारी के संकेत के रूप में प्रस्तुत करता है। इस शताब्दी वर्ष का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं रहा। अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में भी संघ से जुड़े संगठनों के माध्यम से संवाद और सामाजिक संपर्क के कार्यक्रम हुए। सितंबर 2026 में मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क, टोरंटो और लंदन में विभिन्न समुदायों, धार्मिक नेताओं, शिक्षाविदों और भारतीय मूल के लोगों के साथ संवाद किया। संघ के अनुसार इन कार्यक्रमों का केंद्र सामाजिक समरसता, सेवा, सांस्कृतिक संवाद और ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की अवधारणा रही। देश के भीतर भी इस पूरे वर्ष को संघ ने सेवा, सामाजिक संपर्क, परिवार, पर्यावरण, आत्मनिर्भरता और नागरिक दायित्व जैसे विषयों से जोड़ने का प्रयास किया। संघ के 2025-26 के वार्षिक विवरण के अनुसार देशभर में बड़ी संख्या में सेवा गतिविधियां शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक कल्याण और आत्मनिर्भरता जैसे क्षेत्रों में संचालित की गईं। साथ ही युवा पीढ़ी से संवाद भी इस शताब्दी वर्ष की एक महत्वपूर्ण कड़ी रहा है। खास तौर पर जेन-जी और जेनरेशन अल्फा के साथ संवाद के जरिए संघ ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि नई पीढ़ी को केवल निर्देश देने की बजाय उसकी बात सुनना और उसके सवालों का तार्किक उत्तर देना भी जरूरी है। मुंबई में युवाओं के साथ संवाद के दौरान मोहन भागवत ने लोकतंत्र में विरोध और असहमति को भी संवाद का हिस्सा बताया तथा युवाओं को देश की अगली पीढ़ी के रूप में देखने की बात कही। संघ के दृष्टिकोण से देखें तो राष्ट्र निर्माण में युवाओं की ऊर्जा, अनुशासन, सेवा और नागरिक जिम्मेदारी को जोड़ना उसकी दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है। इसी क्रम में समकालीन मुद्दों पर संघ प्रमुख का सार्वजनिक संवाद भी लगातार दिखाई देता रहा है, चाहे सामाजिक समरसता का प्रश्न हो, परिवार और पर्यावरण का विषय हो, आत्मनिर्भरता हो या नागरिक दायित्व। संघ स्वयं अपने शताब्दी वर्ष के प्रमुख लक्ष्यों में सामाजिक समरसता, पारिवारिक मूल्यों, पर्यावरण संरक्षण, आत्मनिर्भरता और नागरिक जिम्मेदारी को रखता है। यही वजह है कि संघ की सौ वर्षों की यात्रा केवल संगठन के विस्तार की कहानी नहीं, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ने और सेवा के माध्यम से राष्ट्र निर्माण में योगदान देने की यात्रा है। बहरहाल, आरएसएस का शताब्दी वर्ष केवल सौ वर्ष पूरे होने का समारोह नहीं, बल्कि संगठन के लिए अपने सामाजिक आधार, संपर्क अभियान और वैश्विक संवाद को प्रदर्शित करने का बड़ा अवसर रहा है। अब निगाहें 29 नवंबर के दिल्ली कार्यक्रम पर हैं, जहां सालभर की गतिविधियों को एक बड़े सार्वजनिक मंच पर समेटने की तैयारी है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 25 Sep 2026 4:29 pm

शेयर बाजार में बड़ी गिरावट

मुंबई, पिछले दिन की बड़ी गिरावट के बाद हफ्ते के आखिरी कारोबारी दिन शुक्रवार को भारतीय शेयर बाजार बढ़त के साथ हरे निशान में बंद हुआ। इस दौरान प्रमुख बेंचमार्क निफ्टी और सेंसेक्स में 0.43 प्रतिशत तक की तेजी देखने को मिली।

देशबन्धु 25 Sep 2026 4:15 pm

जब 'वंदे मातरम' गाने पर लगता था जुर्माना, फिर भी क्रांतिकारियों के होठों पर रहा आजादी का तराना

जब 'वंदे मातरम' गाने पर लगता था जुर्माना, फिर भी क्रांतिकारियों के होठों पर रहा आजादी का तराना

समाचार नामा 25 Sep 2026 2:21 pm

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाया जाए, एसआईआर पर रोक लगे: पिनाराई विजयन

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाया जाए, एसआईआर पर रोक लगे: पिनाराई विजयन

समाचार नामा 25 Sep 2026 2:20 pm

सीईसी के खिलाफ महाभियोग की तैयारी पर भड़की भाजपा, प्रवीण खंडेलवाल बोले- बेनकाब होगा विपक्ष का चेहरा

सीईसी के खिलाफ महाभियोग की तैयारी पर भड़की भाजपा, प्रवीण खंडेलवाल बोले- बेनकाब होगा विपक्ष का चेहरा

समाचार नामा 25 Sep 2026 2:13 pm

नेतन्याहू ने अपने भाषण से इस्लामिक वर्ल्ड में ही करा दी फूट? 77 देशों का वॉकआउट, 4 प्रमुख मुस्लिम बहुल मुल्क अपनी सीट पर जमे रहे, Abraham Accords है वजह?

संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) का मंच गुरुवार को उस वक्त वैश्विक कूटनीति के सबसे बड़े ड्रामे का गवाह बना, जब इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के पोडियम पर कदम रखते ही दर्जनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों ने एक साथ सदन छोड़ दिया। ईरान, गाज़ा और पश्चिम एशिया के सुलगते हालात पर दुनिया को संबोधित करने आए नेतन्याहू के सामने हॉल की कुर्सियां तेजी से खाली होने लगीं। मगर, पीछे हटने के बजाय नेतन्याहू ने तल्ख तेवर अपनाते हुए सदन में मौजूद लोगों से कहा शुरू करने से पहले एक छोटा सा ऐलान अगर इस हॉल में कोई और नैतिक कायर बचा है जिसने अभी तक सदन नहीं छोड़ा है, तो कृपया अब निकल जाए। लगभग 77 देशों के प्रतिनिधियों ने इस बड़े वॉकआउट का हिस्सा बनकर इज़रायल के खिलाफ अपनी नाराजगी दर्ज कराई। इनमें सऊदी अरब, कतर, मिस्र, जॉर्डन, तुर्की, ईरान, पाकिस्तान और इंडोनेशिया जैसे कई प्रमुख मुस्लिम और अरब मुल्क शामिल थे। लेकिन इस कूटनीतिक बवंडर के बीच सबसे चौंकाने वाला पहलू वो था जो हुआ ही नहीं। चार प्रमुख मुस्लिम-बहुल देश अपनी सीटों पर जमे रहे। संयुक्त अरब अमीरात (UAE), बहरीन, मोरक्को और अज़रबैजान ने इस सामूहिक बहिष्कार से खुद को पूरी तरह अलग रखा। अब सवाल यह उठता है कि जब अधिकांश इस्लामिक दुनिया नेतन्याहू को खुला संदेश दे रही थी, तब इन चार मुल्कों ने विरोध की इस लहर में शामिल न होने का फैसला क्यों किया? क्या यह अब्राहम अकॉर्ड्स (Abraham Accords) की रणनीतिक प्रतिबद्धता थी, ऊर्जा और रक्षा समझौतों का दबाव, या फिर बंद कमरों की वह कूटनीति जो सार्वजनिक नारों से ऊपर राष्ट्रीय हितों को तरजीह देती है? इसे भी पढ़ें: याद है ये...नेतन्याहू ने पेजर दिखा हिलाई पूरी दुनिया, UN रह गया हैरान, ईरान परेशान नेतान्याहू के UNGA भाषण के दौरान क्या हुआ? UN जनरल असेंबली के 81वें सेशन में नेतान्याहू का भाषण ऐसे समय में हुआ जब गाज़ा में संघर्ष जारी था और इज़राइल व ईरान के बीच बड़े पैमाने पर सैन्य तनाव बना हुआ था। जैसे ही वे पोडियम की ओर बढ़े, कई देशों के प्रतिनिधिमंडल हॉल से बाहर चले गए, जिससे इज़राइली प्रधानमंत्री के लिए श्रोताओं की संख्या काफी कम हो गई। खबरों के अनुसार, इन 77 देशों में मध्य पूर्व, एशिया, अफ्रीका, यूरोप, लैटिन अमेरिका और कैरिबियन क्षेत्र के देश शामिल थे। इस संख्या के बारे में एक ज़रूरी बात ध्यान देने वाली है। 77 देशों की इस गिनती का मतलब यह नहीं है कि उन सभी प्रतिनिधिमंडलों ने मिलकर वॉकआउट (विरोध में बाहर जाना) किया। खबरों के मुताबिक, कुछ प्रतिनिधिमंडल तब हॉल में मौजूद नहीं थे जब नेतान्याहू ने भाषण शुरू किया, जबकि कुछ अन्य उनके पोडियम पर आते ही बाहर चले गए। दरअसल, नेतन्याहू के सभागार में पहुंचने पर कुछ नेताओं ने उनका स्वागत किया तो कुछ ने विरोध जताया। कई प्रतिनिधि बाहर निकल गए और उनके भाषण के दौरान ज्यादातर सीट खाली दिखाई दीं। नेतन्याहू ने जोर देकर कहा कि ईरान पर हमला करना उनके लिए अब तक के सबसे आसान फैसलों में से एक था और उन्होंने सभागार से बाहर जाने वाले प्रतिनिधियों को नैतिक रूप से कायर करार दिया। उन्होंने कहा अगर नैतिक रूप से कोई और कायर अब भी सभागार में मौजूद है और बाहर नहीं गया है तो कृपया अभी चला जाए। फिलिस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास को संयुक्त राष्ट्र महासभा में शामिल होने के लिए अमेरिका द्वारा एक बार फिर वीजा नहीं दिए जाने के कारण उन्हें पहले से रिकॉर्ड किए गए वीडियो संदेश के जरिए महासभा को संबोधित करना पड़ा। अब्बास की उनके देश में लोकप्रियता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके प्रभाव में कमी आई है, लेकिन अपने संबोधन में उन्होंने स्पष्ट किया कि वह खुद को दरकिनार किए जाने को चुपचाप स्वीकार नहीं करेंगे। अब्बास ने कहा कि हम अपनी मातृभूमि नहीं छोड़ेंगे। हम विस्थापन स्वीकार नहीं करेंगे और हम किसी को भी अपनी ओर से हमारे भविष्य का फैसला नहीं करने देंगे। पूरे सप्ताह विश्व के कई नेताओं ने अपने भाषणों में फलस्तीनियों की स्थिति का उल्लेख किया और अब्बास ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इजराइल के खिलाफ अधिक ठोस कदम उठाने का आग्रह किया। इस बीच, हमास के एक प्रवक्ता ने कहा कि बोर्ड ऑफ पीस द्वारा गाजा के पुनर्निर्माण के लिए छह महीने की 2.45 अरब डॉलर की योजना पेश किए जाने के बाद संगठन शांति समझौते के अगले चरणों को आगे बढ़ाने के लिए तैयार है। हमास के प्रवक्ता हाजेम कासिम ने कहा कि उनका संगठन बोर्ड ऑफ पीस की रूपरेखा को लागू करने के लिए पूरी तरह तैयार है, हालांकि उन्होंने हथियार डालने की किसी योजना का उल्लेख नहीं किया। इजराइल ने कहा है कि जब तक हमास हथियार नहीं डालता, वह पुनर्निर्माण की अनुमति नहीं देगा। ईयू के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक और 27 सदस्यीय यूरोपीय संघ के अनुमान के अनुसार गाजा के पुनर्निर्माण के लिए 71 अरब यूरो (80.8 अरब डॉलर) की जरूरत है, लेकिन अब तक केवल एक अरब यूरो (1.1 अरब डॉलर) ही जुटाए जा सके हैं। इसे भी पढ़ें: कोई और कायर रह गया है? निकल जाओ...UN के मंच से नेतन्याहू ने ऐसा दहाड़ा, खाली हो गया पूरा हॉल कौन से प्रमुख मुस्लिम देश इसमें शामिल रहे? चार मुस्लिम-बहुल देश अलग दिखे क्योंकि वे उन 77 प्रतिनिधिमंडलों की सूची में शामिल नहीं थे जो अनुपस्थित थे या जिन्होंने चैंबर छोड़ दिया था – ये देश हैं संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, मोरक्को और अज़रबैजान। उनके फैसले खास तौर पर अहम हैं क्योंकि इन चारों ने इज़राइल के साथ अलग-अलग स्तर पर राजनयिक और रणनीतिक संबंध बनाए रखे हैं, जबकि गाज़ा युद्ध और इज़राइल के व्यापक सैन्य अभियानों को लेकर मुस्लिम दुनिया में तीखे मतभेद रहे हैं। UAE, बहरीन और मोरक्को ने 'अब्राहम समझौते'से जुड़े सामान्यीकरण समझौतों के ज़रिए इज़राइल के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित किए हैं। वहीं, अज़रबैजान ने कई दशकों में इज़राइल के साथ एक अलग रणनीतिक साझेदारी विकसित की है, खासकर रक्षा, ऊर्जा और क्षेत्रीय सुरक्षा के क्षेत्रों में। अब्राहम समझौता क्या हैं? अब्राहम समझौते, अमेरिका के समर्थन वाले उन समझौतों की एक श्रृंखला हैं, जिनसे इज़राइल और कई अरब व मुस्लिम-बहुल देशों के बीच संबंध सामान्य हुए। UAE और बहरीन ने सितंबर 2020 में इज़राइल के साथ औपचारिक रूप से समझौतों पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद दिसंबर 2020 में मोरक्को ने भी संबंधों को सामान्य करने के समझौते पर हस्ताक्षर किए। इन समझौतों से राजनयिक रास्ते खुले या बहाल हुए और व्यापार, पर्यटन, निवेश, तकनीक और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा मिला। UAE-इज़राइल समझौते ने दोनों देशों के बीच शांति, राजनयिक संबंधों और पूर्ण सामान्यीकरण की संधि स्थापित की। बहरीन ने भी इज़राइल के साथ शांति और सामान्यीकरण का समर्थन करने वाले एक घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए। बाद में मोरक्को और इज़राइल ने राजनयिक और कांसुलर संबंध स्थापित करने के लिए एक संयुक्त घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए। इन समझौतों का मतलब यह नहीं था कि इन देशों ने फ़िलिस्तीनी राष्ट्र का समर्थन करना बंद कर दिया या फ़िलिस्तीनी मुद्दे पर इज़राइल के साथ अपने मतभेदों को छोड़ दिया। इसके बजाय, इन्होंने ऐसे औपचारिक राजनयिक रास्ते बनाए जिनसे शामिल देश गंभीर क्षेत्रीय तनाव के समय भी बातचीत जारी रख सके। नेतान्याहू के भाषण के दौरान UAE क्यों मौजूद रहा? UAE उन शुरुआती अरब देशों में से एक था जिसने 'अब्राहम समझौते' (Abraham Accords) के तहत इज़राइल के साथ पूरे राजनयिक संबंध स्थापित किए। इस समझौते पर औपचारिक रूप से सितंबर 2020 में हस्ताक्षर किए गए थे, जिसके बाद राजनयिक मिशन स्थापित किए गए और आर्थिक संबंध बढ़ाए गए। गाज़ा युद्ध को लेकर बड़े मतभेदों के बावजूद UAE ने इज़राइल के साथ बातचीत जारी रखी है। उसका तरीका यह रहा है कि राजनयिक रास्ते खुले रखे जाएं और साथ ही फ़िलिस्तीनी मुद्दे और मानवीय चिंताओं पर अलग से अपना पक्ष रखा जाए। बहरीन क्यों मौजूद रहा? बहरीन 'अब्राहम समझौते' पर हस्ताक्षर करने वाला एक और प्रमुख अरब देश था। बहरीन और इज़राइल ने 2020 में औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित किए, जिससे सरकार-से-सरकार के बीच सीधे संपर्क के रास्ते बने, जो पहले मौजूद नहीं थे। बहरीन का फ़ैसला इसलिए भी खास था क्योंकि सऊदी अरब, कतर, कुवैत और ओमान समेत कई अन्य खाड़ी अरब देश उन देशों में शामिल थे जो नेतान्याहू के भाषण के दौरान या तो मौजूद नहीं थे या वहां से चले गए थे। इसे भी पढ़ें: UNGA में बोले Benjamin Netanyahu, New York के मेयर जोहरान ममदानी यहूदियों को खतरे में डाल रहे गाज़ा में तनाव के बावजूद मोरक्को क्यों बना रहा? मोरक्को का रुख़ थोड़ा अलग और पेचीदा है। उत्तरी अफ़्रीका का यह देश उन देशों के समूह का हिस्सा है जिनके इज़राइल के साथ संबंध सामान्य होने की चर्चा अक्सर 'अब्राहम एकॉर्ड्स' (Abraham Accords) के तहत होती है। हालाँकि, UAE और बहरीन के उलट, मोरक्को ने सितंबर 2020 में इज़राइल, UAE और बहरीन के साथ मिलकर 'अब्राहम एकॉर्ड्स' के मूल समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए थे। इसके बजाय, मोरक्को और इज़राइल ने दिसंबर 2020 में अपने संबंधों को सामान्य करने के समझौते की घोषणा की। बाद में अमेरिकी अधिकारियों ने मोरक्को के साथ संबंधों के सामान्य होने की प्रक्रिया को 'अब्राहम एकॉर्ड्स' की व्यापक प्रक्रिया का ही हिस्सा माना। तब से मोरक्को और इज़राइल के बीच राजनयिक और आर्थिक संबंध बने हुए हैं। अज़रबैजान ने नेतन्याहू के भाषण का बहिष्कार क्यों नहीं किया? अज़रबैजान का मामला उन तीन अरब देशों से अलग है, क्योंकि उसने 'अब्राहम एकॉर्ड्स' पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। वहाँ मौजूद रहने के उसके फ़ैसले को बाकू और तेल अवीव के बीच लंबे समय से चले आ रहे रणनीतिक संबंधों के ज़रिए बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। इज़राइल और अज़रबैजान ने रक्षा, सुरक्षा, ऊर्जा, व्यापार और तकनीक के क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर सहयोग विकसित किया है। जनवरी 2026 में दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में अज़रबैजान के विदेश मंत्रालय ने इस रिश्ते को 'रणनीतिक साझेदारी' बताया था। रक्षा और सैन्य सहयोग रक्षा सहयोग, अज़रबैजान और इज़राइल के संबंधों के सबसे अहम हिस्सों में से एक है। अज़रबैजान इज़राइली रक्षा उपकरणों का एक बड़ा ग्राहक रहा है, और दोनों देशों के बीच सुरक्षा के मामले में करीबी संपर्क बना हुआ है। यह रिश्ता कई सालों में विकसित हुआ है और अज़रबैजान की व्यापक सुरक्षा नीति का एक अहम हिस्सा बन गया है। इज़राइली सरकार से जुड़े विश्लेषणों में अज़रबैजान को इज़राइल के रक्षा उत्पादों के प्रमुख ग्राहकों में से एक बताया गया है। वॉकआउट करने वाले देश तुवालु, तुर्कमेनिस्तान, यमन, मिस्र, पनामा, सेनेगल, फिलिस्तीन, सूडान, ट्यूनीशिया, तुर्की, वेनेजुएला, एंटीगुआ और बारबुडा, बेलीज, कांगो, ओमान, कतर, सऊदी अरब, टोंगा, उज्बेकिस्तान, अंगोला, बारबाडोस, कोलंबिया, कोमोरोस, डोमिनिका, जिबूती, उत्तरी मैसेडोनिया, सैन मैरिनो, दक्षिण अफ्रीका, सोमालिया, अल्जीरिया, बांग्लादेश, ब्रुनेई दारुस्सलाम, ब्राजील, चिली, कांगो गणराज्य, लेबनान, लाइबेरिया, इरिट्रिया, चाड, मध्य अफ्रीकी गणराज्य, लीबिया, मॉरिटानिया, जॉर्डन, निकारागुआ, मेडागास्कर, नाइजर, पेरू, सेंट लूसिया, स्लोवेनिया, अफगानिस्तान, बहामास, बोस्निया और हर्जेगोविना, बोत्सवाना, उत्तर कोरिया, इस्वातिनी, सीरिया, युगांडा, पाकिस्तान, लेसोथो, बोलीविया, स्पेन, क्यूबा, ​​​​इक्वेटोरियल गिनी, ईरान, किर्गिस्तान, इराक, मोज़ाम्बिक, म्यांमार, मालदीव, इंडोनेशिया, कुवैत, नामीबिया, मलेशिया, गुयाना और केन्या।

प्रभासाक्षी 25 Sep 2026 12:42 pm

झारखंड : 110वीं जयंती पर याद किए गए पंडित दीनदयाल उपाध्याय, भाजपा नेताओं ने 'अंत्योदय' के संकल्प को दोहराया

झारखंड : 110वीं जयंती पर याद किए गए पंडित दीनदयाल उपाध्याय, भाजपा नेताओं ने 'अंत्योदय' के संकल्प को दोहराया

समाचार नामा 25 Sep 2026 12:09 pm

नोएल टाटा की आपत्ति खारिज, एन. चंद्रशेखरन ही बने रहेंगे टाटा संस के बॉस

अब टाटा संस के बोर्ड ने इन आपत्तियों को खारिज करते हुए कहा है कि चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति का फैसला कंपनी के नियमों के अनुरूप लिया गया है। कंपनी ने अपने जवाब में यह भी कहा है कि जिस प्रावधान का हवाला नोएल टाटा ने दिया है, वह मौजूदा चेयरमैन की पुनर्नियुक्ति पर लागू नहीं होता।

देशबन्धु 25 Sep 2026 11:56 am

पं. दीनदयाल उपाध्यायः विचारों की वह मशाल जो आज भी प्रज्वलित है

कुछ व्यक्तित्व अपने जीवन की लंबाई से नहीं बल्कि अपने विचारों की गहराई और कर्मों की व्यापकता से इतिहास में स्थान बनाते हैं। पं. दीनदयाल उपाध्याय ऐसे ही व्यक्तित्व थे। साधारण जीवन जीते हुए उन्होंने भारतीय राजनीति, समाज और अर्थचिंतन को भारतीय संस्कृति और परंपरा से जोड़ने का प्रयास किया। उनका जीवन सादगी, अनुशासन, संगठन, राष्ट्रसेवा और वैचारिक प्रतिबद्धता का उदाहरण रहा। उनकी जयंती केवल एक राजनीतिक व्यक्तित्व को याद करने का अवसर नहीं बल्कि उनके विचारों और सार्वजनिक जीवन की भूमिका को समझने का अवसर भी है। 25 सितंबर 1916 को मथुरा जिले के नगला चंद्रभान गांव में जन्मे दीनदयाल उपाध्याय का बचपन कठिन परिस्थितियों में बीता। कम उम्र में ही उन्होंने माता-पिता को खो दिया और उनका पालन-पोषण रिश्तेदारों के संरक्षण में हुआ। कठिनाइयों के बावजूद शिक्षा के प्रति उनका लगाव कम नहीं हुआ। वे पढ़ाई में अत्यंत प्रतिभाशाली थे और विभिन्न स्तरों पर छात्रवृत्तियां प्राप्त करते रहे। पिलानी में शिक्षा के बाद उन्होंने कानपुर के सनातन धर्म कॉलेज में अध्ययन किया। 1937 में छात्र जीवन के दौरान उनका संपर्क राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से हुआ। आगे चलकर उन्होंने अपना जीवन पूर्णकालिक संगठनात्मक कार्य को समर्पित कर दिया। दीनदयाल उपाध्याय के लिए राजनीति केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं थी, वे इसे समाज और राष्ट्र की सेवा का साधन मानते थे। 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना के समय वे उसके संगठन निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका में आए और आगे चलकर पार्टी के अखिल भारतीय महामंत्री बने। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निधन के बाद संगठन को मजबूत करने और देशभर में उसका विस्तार करने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। 1967 में वे भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। उनकी सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक देन ‘एकात्म मानववाद’ मानी जाती है। उनका विचार था कि मनुष्य को केवल आर्थिक आवश्यकताओं के आधार पर नहीं समझा जा सकता। मनुष्य शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का समन्वित रूप है और उसके जीवन में भौतिक प्रगति के साथ नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास भी आवश्यक है। इसी प्रकार व्यक्ति समाज से अलग नहीं है। व्यक्ति, समाज और राष्ट्र एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसलिए विकास का उद्देश्य केवल उत्पादन और आर्थिक आंकड़ों को बढ़ाना नहीं, मनुष्य और समाज के संतुलित विकास को सुनिश्चित करना होना चाहिए। दीनदयाल उपाध्याय का आर्थिक चिंतन भी इसी दृष्टि पर आधारित था। वे ऐसी अर्थव्यवस्था के समर्थक थे, जिसमें विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। इसी विचार से जुड़ा उनका ‘अंत्योदय’ का सिद्धांत आज भी उनके चिंतन की प्रमुख पहचान है। उनका मानना था कि किसी भी विकास व्यवस्था की सफलता का वास्तविक पैमाना यह होना चाहिए कि समाज के सबसे कमजोर और अंतिम व्यक्ति के जीवन में कितना सुधार आया। इस दृष्टि से उनका चिंतन सामाजिक समावेशन और मानव-केंद्रित विकास की चर्चा में आज भी संदर्भित किया जाता है। इसे भी पढ़ें: अंत्योदय: विकसित भारत की मानवीय आधारशिला दीनदयाल उपाध्याय केवल राजनेता और संगठनकर्ता ही नहीं, लेखक और पत्रकार भी थे। उन्होंने लेखनी को सामाजिक जागरण का माध्यम बनाया। उन्होंने ‘राष्ट्रधर्म’, ‘पाञ्चजन्य’ और ‘स्वदेश’ जैसे प्रकाशनों के माध्यम से राष्ट्र, समाज, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और राजनीति से जुड़े विषयों पर लिखा। उनके लेखन में सरल भाषा के साथ वैचारिक स्पष्टता दिखाई देती थी। उनका ‘पॉलिटिकल डायरी’ स्तंभ भी चर्चित रहा। पत्रकारिता को लेकर वे तथ्यपरकता और जिम्मेदारी पर जोर देते थे। उपलब्ध सामग्री के अनुसार, वे समाचारों को संदर्भ से काटकर प्रस्तुत करने के विरुद्ध थे और पत्रकार की जिम्मेदारी को महत्वपूर्ण मानते थे। उनका व्यक्तिगत जीवन अत्यंत सादा था। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन संगठन और सार्वजनिक कार्यों में लगाया। पद और प्रतिष्ठा के बावजूद उनका रहन-सहन सामान्य रहा। यही सादगी उनके व्यक्तित्व की विशेष पहचान बनी। उनके समर्थकों और सहयोगियों के संस्मरणों में उनके सहज व्यवहार, अनुशासन और कार्यकर्ताओं के साथ निकट संबंधों का उल्लेख मिलता है। वे संगठन को केवल पदों और संरचनाओं से नहीं, समर्पित कार्यकर्ताओं के माध्यम से मजबूत करने में विश्वास रखते थे। दीनदयाल उपाध्याय का जीवन बहुत लंबा नहीं था। 11 फरवरी 1968 को मुगलसराय रेलवे स्टेशन के निकट एक रेलवे डिब्बे के पास उनका शव मिला। उनकी मृत्यु की परिस्थितियों ने लंबे समय तक प्रश्न खड़े किए और यह घटना भारतीय राजनीतिक इतिहास की चर्चित घटनाओं में शामिल रही। उस समय वे भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे और उनके निधन से पार्टी को बड़ा झटका लगा। उनका राजनीतिक जीवन और दर्शन भारतीय राजनीति में लंबे समय तक चर्चा का विषय रहा है। उनके विचारों से सहमत और असहमत दोनों पक्षों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि उनके चिंतन को उसके मूल संदर्भ में समझा जाए। एकात्म मानववाद, अंत्योदय, विकेंद्रीकरण, स्वावलंबन, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्र केंद्रित विकास उनके विचारों के प्रमुख पक्ष रहे। उनकी रचनाओं और भाषणों में राष्ट्र, संस्कृति, अर्थव्यवस्था, लोकतंत्र और सामाजिक जीवन पर व्यापक चिंतन मिलता है। पं. दीनदयाल उपाध्याय का जीवन इस बात का उदाहरण है कि सीमित साधनों और कठिन परिस्थितियों में भी कोई व्यक्ति अपने विचार, अनुशासन और कर्म के बल पर सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण प्रभाव छोड़ सकता है। उन्होंने राजनीति को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के बजाय संगठन और सेवा से जोड़ने पर बल दिया। उनका एकात्म मानववाद व्यक्ति और समाज के संबंधों को समग्र दृष्टि से देखने का प्रयास था जबकि अंत्योदय का विचार विकास के लाभ को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने की आवश्यकता पर केंद्रित था। उनकी जयंती पर उन्हें याद करने का अर्थ केवल उनके नाम और योगदान का स्मरण करना नहीं बल्कि यह समझना भी है कि सार्वजनिक जीवन में विचार, सादगी, अनुशासन और सामाजिक जिम्मेदारी का क्या महत्व है। दीनदयाल उपाध्याय का जीवन भले ही अल्प रहा लेकिन उनके विचारों पर आज भी चर्चा होती है। यही किसी विचारक की सबसे बड़ी विरासत होती है कि उसके जाने के बाद भी उसके विचार समाज को प्रश्न पूछने, सोचने और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते रहें। - योगेश कुमार गोयल (लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)

प्रभासाक्षी 25 Sep 2026 10:24 am

अंत्योदय: विकसित भारत की मानवीय आधारशिला

भारत की विकास यात्रा आज ऐसे दौर में है, जब आर्थिक शक्ति, तकनीकी क्षमता, डिजिटल परिवर्तन और वैश्विक प्रभाव के नए अध्याय लिखे जा रहे हैं। 2026-27 की पहली तिमाही में भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.8 प्रतिशत दर्ज की गई है और देश को विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में तेजी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन किसी राष्ट्र की वास्तविक समृद्धि केवल उसके सकल घरेलू उत्पाद, ऊंची इमारतों, आधुनिक सड़कों या वैश्विक रैंकिंग से तय नहीं होती। उसकी सबसे बड़ी कसौटी यह है कि विकास की रोशनी उस व्यक्ति तक कितनी पहुंची है, जो विकास की कतार में सबसे पीछे खड़ा है। यहीं से अंत्योदय का विचार प्रासंगिक होता है। हर वर्ष 25 सितंबर को अंत्योदय दिवस मनाया जाता है। यह दिन पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती का दिन है और 25 सितंबर 2014 को भारत सरकार ने इसे अंत्योदय दिवस के रूप में घोषित किया था। इसी अवसर पर दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना को भी शुरू किया गया था, जिसका उद्देश्य ग्रामीण गरीब युवाओं को कौशल और रोजगार के अवसरों से जोड़ना था। इसलिए अंत्योदय दिवस केवल किसी महापुरुष की स्मृति का दिवस नहीं, बल्कि विकास की दिशा और उसकी प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करने का अवसर है। ‘अंत्योदय’ दो शब्दों से बना है-‘अंत्य’ अर्थात सबसे अंतिम और ‘उदय’ अर्थात उत्थान। लेकिन इसका अर्थ केवल किसी गरीब व्यक्ति को सहायता देना नहीं है। अंत्योदय का व्यापक अर्थ है-ऐसी व्यवस्था का निर्माण जिसमें कोई व्यक्ति अवसरों से वंचित न रहे, कोई परिवार बुनियादी सुविधाओं के अभाव में पीछे न छूटे और विकास की प्रक्रिया का लाभ समाज के अंतिम छोर तक पहुंचे। दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानववाद’ में मनुष्य केवल आर्थिक उत्पादन की इकाई नहीं है। उसके शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा-सभी का संतुलित विकास आवश्यक है। यही अंत्योदय को महज कल्याणकारी कार्यक्रम से आगे ले जाकर मानव-केंद्रित विकास-दर्शन बनाता है। आज प्रश्न यह नहीं है कि भारत विकास कर रहा है या नहीं। प्रश्न यह है कि भारत के विकास का लाभ किस गति से, किस गहराई से और किस अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रहा है। यही वह प्रश्न है जो अंत्योदय दिवस को 2026 में और अधिक महत्वपूर्ण बनाता है। भारत 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है। यह लक्ष्य केवल आर्थिक आकार बढ़ाने का लक्ष्य नहीं हो सकता। विकसित भारत का अर्थ विकसित गांव, सक्षम नागरिक, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य, सम्मानजनक रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, डिजिटल पहुंच, उद्यमिता और अवसरों की समान उपलब्धता भी है। 2026 में नीति-निर्माण में ‘समावेशी मानव विकास’ को विकसित भारत की चर्चा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है। यही कारण है कि आज अंत्योदय की आवश्यकता पहले से कम नहीं, बल्कि अधिक है। आर्थिक विकास जितना तेज होगा, उतनी ही जरूरी होगी यह सावधानी कि विकास की दौड़ में कोई पीछे न छूट जाए। तकनीक जितनी शक्तिशाली होगी, उतना ही जरूरी होगा कि डिजिटल विभाजन कम हो। नए रोजगार जितने पैदा होंगे, उतनी ही आवश्यकता होगी कि गरीब और ग्रामीण युवा उनके लिए आवश्यक कौशल प्राप्त कर सकें। भारत में अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़े करोड़ों श्रमिकों के संदर्भ में नीति आयोग ने भी यह रेखांकित किया है कि तकनीक अपने आप समावेशी परिवर्तन नहीं ला सकती, अवसरों और सामाजिक सुरक्षा तक पहुंच सुनिश्चित करना भी जरूरी है। इस दृष्टि से अंत्योदय का नया अर्थ ‘सहायता से सशक्तिकरण’ होना चाहिए। गरीब को केवल अनुदान नहीं, अवसर मिले। किसान को केवल राहत नहीं, बेहतर उत्पादकता और बाजार मिले। श्रमिक को केवल रोजगार नहीं, कौशल और सामाजिक सुरक्षा मिले। महिला को केवल कल्याणकारी योजना नहीं, शिक्षा, संपत्ति, उद्यमिता और निर्णय-क्षमता में भागीदारी मिले। ग्रामीण युवा को केवल नौकरी की तलाश में शहर की ओर जाने की मजबूरी न हो, बल्कि उसके गांव और कस्बे में ही कौशल, डिजिटल सुविधा और उद्यम का वातावरण बने। यही अंत्योदय का आधुनिक स्वरूप हो सकता है-व्यक्ति को लाभार्थी से भागीदार बनाना। 2014 में शुरू हुई दीनदयाल अंत्योदय योजना ने ग्रामीण और शहरी गरीबों के लिए आजीविका तथा कौशल-विकास को महत्व दिया था। सरकार ने उस समय ग्रामीण एवं शहरी गरीबों के उत्थान के लिए कौशल विकास और आजीविका के अवसरों को विस्तार देने की बात कही थी। आज आवश्यकता इस सोच को और व्यापक बनाने की है। अंत्योदय को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कौशल, आवास, पोषण, वित्तीय समावेशन, डिजिटल कनेक्टिविटी और सामाजिक सुरक्षा के बीच एक समन्वित दृष्टिकोण बनाना होगा। भारत की अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ यह जिम्मेदारी भी बढ़ती है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2025-26 में वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.7 प्रतिशत रही और 2026-27 की पहली तिमाही में यह 7.8 प्रतिशत रही। भारत को विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य भी सार्वजनिक नीति और आर्थिक विमर्श में प्रमुखता से व्यक्त किया गया है, 2026 के केंद्रीय बजट पर प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया में भी यह लक्ष्य दोहराया गया। लेकिन आर्थिक महाशक्ति बनने की यात्रा तभी व्यापक अर्थों में सफल होगी, जब आर्थिक शक्ति का सामाजिक आधार भी उतना ही मजबूत हो। विश्वगुरु बनने की आकांक्षा केवल विश्व को ज्ञान देने से पूरी नहीं होगी, अपने समाज के अंतिम व्यक्ति को गरिमापूर्ण जीवन देने से भी उसकी परीक्षा होगी। भारत की प्राचीन चेतना में ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ जैसे विचार रहे हैं। अंत्योदय इसी मानवीय परंपरा का आधुनिक सामाजिक-आर्थिक रूप माना जा सकता है। यह कहता है कि राष्ट्र की समृद्धि का अर्थ केवल कुछ लोगों की समृद्धि नहीं, बल्कि समूचे समाज की उन्नति है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय की स्मृति को जीवंत रखने का सबसे सार्थक तरीका केवल उनके चित्र पर माल्यार्पण करना नहीं, बल्कि उनके विचार के मानवीय पक्ष को व्यवहार में उतारना है। उनका जीवन सादगी, संगठन, राष्ट्रसेवा और वैचारिक प्रतिबद्धता से जुड़ा रहा। उनका अंत्योदय दर्शन आने वाली पीढ़ियों को यह प्रश्न पूछने की प्रेरणा देता है कि हमारे विकास का अंतिम लाभार्थी कौन है और क्या वह वास्तव में विकास की मुख्यधारा में आ पाया है? 2047 का विकसित भारत केवल सरकार के प्रयासों से नहीं बनेगा। इसके लिए शासन, समाज, उद्योग, स्वयंसेवी संस्थाओं, शिक्षण संस्थानों और नागरिकों-सभी की भागीदारी आवश्यक होगी। गांवों में स्थानीय उद्यमिता बढ़ानी होगी, युवाओं को कौशल देना होगा, शिक्षा की गुणवत्ता सुधारनी होगी, स्वास्थ्य सेवाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना होगा और सरकारी योजनाओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना होगा। डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और नई तकनीकें इस पहुंच को तेज कर सकती हैं, 2026 में नीति आयोग की डीपीआई-2047 रूपरेखा ने भी डिजिटल अवसंरचना को समावेशी और उत्पादकता-आधारित विकास से जोड़ा है। अंत्योदय का सबसे बड़ा संदेश यही है कि राष्ट्र की प्रगति को ऊपर से नीचे नहीं, नीचे से ऊपर भी देखना होगा। जब अंतिम गांव आगे बढ़ेगा, भारत आगे बढ़ेगा। जब अंतिम परिवार आत्मनिर्भर होगा, भारत मजबूत होगा। जब अंतिम बच्चा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पाएगा, भारत का भविष्य मजबूत होगा। जब अंतिम श्रमिक को सम्मान और सुरक्षा मिलेगी, भारत की विकास यात्रा अधिक मानवीय होगी। अंत्योदय दिवस इसलिए केवल 25 सितंबर का एक स्मृति-दिवस नहीं होना चाहिए। इसे राष्ट्र के विकास की नैतिक कसौटी बनाने की आवश्यकता है। दीनदयाल उपाध्याय की स्मृति को युगों तक जीवित रखने वाला सबसे प्रभावी स्मारक कोई भवन या प्रतिमा नहीं, बल्कि ऐसा भारत होगा जिसमें अंतिम व्यक्ति स्वयं को व्यवस्था से बाहर नहीं, बल्कि राष्ट्र की मुख्यधारा का सम्मानित भागीदार महसूस करे। विकसित भारत की ऊंचाई उसकी आर्थिक शक्ति से दिखाई देगी, लेकिन उसकी वास्तविक महानता इस बात से पहचानी जाएगी कि उसकी विकास-यात्रा कितनी दूर तक और कितने लोगों तक पहुंची है। अंत्योदय उसी यात्रा का मानवीय आधार है। 2047 का भारत यदि समृद्ध, सशक्त, आत्मनिर्भर और न्यायपूर्ण बनना चाहता है, तो विकास की हर मंजिल पर उसे एक बार पीछे मुड़कर उस अंतिम व्यक्ति को देखना होगा-क्योंकि जिस दिन अंतिम व्यक्ति का उदय होगा, उसी दिन भारत के उदय की पूर्णता होगी। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

प्रभासाक्षी 25 Sep 2026 10:21 am

Election Commission Row: SIR को लेकर घमासान, राहुल गांधी ने मांगा CEC ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा; आज कांग्रेस का मार्च

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समाचार नामा 25 Sep 2026 10:10 am

दीनदयाल उपाध्याय को उपराष्ट्रपति ने दी श्रद्धांजलि, कहा- 'राष्ट्र निर्माण की यात्रा को प्रेरित करते हैं उनके आदर्श'

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समाचार नामा 25 Sep 2026 10:09 am

SIR 'वोट चोरी' पर कांग्रेस का मोदी पर हमला: एक PM ने Gen Z को वोट का अधिकार दिया, दूसरा छीनने पर तुला है

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि राजीव गांधी ने 1988 में मतदान की उम्र 21 से घटाकर 18 कर Gen Z को सशक्त बनाया जबकि पीएम मोदी स्पेशल समरी रिवीजन रोककर Gen Z को मतदाता सूची से बाहर रखना चाहते हैं।

सत्य हिंदी 25 Sep 2026 10:04 am

भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन जयपुर पहुंचे, युवाओं से संवाद और पदाधिकारियों के साथ करेंगे बैठक

भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन जयपुर पहुंचे, युवाओं से संवाद और पदाधिकारियों के साथ करेंगे बैठक

समाचार नामा 25 Sep 2026 7:50 am

मध्य प्रदेश: रिश्वत मांगने के आरोप में कृषि विभाग के दो और अधिकारी सस्पेंड, केंद्रीय मंत्री शिवराज का बड़ा एक्शन

मध्य प्रदेश: रिश्वत मांगने के आरोप में कृषि विभाग के दो और अधिकारी सस्पेंड, केंद्रीय मंत्री शिवराज का बड़ा एक्शन

समाचार नामा 24 Sep 2026 11:12 pm

राहुल गांधी का बड़ा हमला: वोट चोरी देशद्रोह, ज्ञानेश कुमार से तत्काल इस्तीफे की मांग

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष तथा लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने गुरुवार को कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने 'वोट चोरी' कराई है और उनको तत्काल इस्तीफा देकर सरकारी गवाह बन जाना चाहिए

देशबन्धु 24 Sep 2026 10:28 pm

चुनाव में कोई कहीं भी जा सकता है, देश राहुल गांधी की ओर देख रहा: अजय राय

चुनाव में कोई कहीं भी जा सकता है, देश राहुल गांधी की ओर देख रहा: अजय राय

समाचार नामा 24 Sep 2026 8:32 pm

नंदीग्राम उपचुनाव: कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को कलकत्ता हाई कोर्ट से बड़ी राहत

नंदीग्राम उपचुनाव: कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को कलकत्ता हाई कोर्ट से बड़ी राहत

समाचार नामा 24 Sep 2026 8:03 pm

Xi Jinping US Visit: अभी तो सिर्फ ट्रेलर सामने आया है, पूरी पिक्चर दिसम्बर में सामने आयेगी, तब दुनिया का हैरान होना तय है

वॉशिंगटन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के स्वागत के लिए जिस स्तर का राजकीय सम्मान दिखाया गया, उसे देखकर पूरी दुनिया हतप्रभ है। लेकिन सितम्बर में अमेरिका में दिखी यह कूटनीति सिर्फ ट्रेलर है क्योंकि पिक्चर अभी बाकी है जोकि दिसम्बर में दिखाई जायेगी। वैसे वॉशिंगटन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के स्वागत का दृश्य मई में बीजिंग में हुए ट्रंप-शी शिखर संवाद की याद दिला रहा है। जिस तरह चीन यात्रा के दौरान शी जिनपिंग ने ट्रंप का भव्य स्वागत किया था और बाद में झोंगनानहाई में स्वयं उनकी अगवानी की थी, उसी तरह अब अमेरिका पहुंचने पर ट्रंप ने प्रोटोकॉल से हटकर ज्वाइंट बेस एंड्रयूज पर स्वयं शी जिनपिंग का स्वागत किया। सैन्य बैंड, लाल कालीन, सम्मान गार्ड और लड़ाकू विमान के फ्लाईपास्ट के बीच हुआ यह स्वागत केवल राजकीय औपचारिकता नहीं, बल्कि अमेरिका-चीन संबंधों में चल रही कूटनीतिक गर्माहट का बड़ा संकेत माना जा रहा है। साथ ही करीब छह दशक में किसी विदेशी नेता के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति की ओर से बेस पर इस तरह की व्यक्तिगत अगवानी असाधारण मानी जा रही है। देखा जाये तो शी की यह यात्रा ऐसे समय हो रही है जब अमेरिका और चीन के रिश्ते प्रतिस्पर्धा और सहयोग के बीच एक नए संतुलन की तलाश में हैं। व्यापार शुल्क, दुर्लभ खनिज, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ताइवान और ईरान जैसे मुद्दे दोनों देशों के बीच गंभीर मतभेदों का कारण बने हुए हैं, लेकिन दोनों पक्ष अब टकराव को नियंत्रित रखने और बातचीत जारी रखने पर जोर दे रहे हैं। व्यापार युद्ध के बाद बनी अस्थायी व्यापार-समझ को आगे बढ़ाने की कोशिश भी इसी दिशा का संकेत है। इसे भी पढ़ें: अमेरिकी धरती पर खड़े होकर ट्रंप को घेरना आसान नहीं, मगर मैक्रों, पेजेशकियन, अहमद अल-शरा और सिल्वा ने ये कर दिखाया शी जिनपिंग ने भी साफ संकेत दिया है कि चीन और अमेरिका को प्रतिद्वंद्वी की बजाय साझेदार के रूप में संबंधों को आगे बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि दोनों देशों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा समाप्त हो गई है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अत्याधुनिक तकनीक में दोनों के बीच होड़ जारी है, ताइवान का प्रश्न बेहद संवेदनशील बना हुआ है और व्यापार तथा आपूर्ति श्रृंखला को लेकर भी मतभेद कायम हैं। इसलिए वॉशिंगटन में हो रही बातचीत को पूर्ण समझौते की बजाय तनाव कम करने और संबंधों को स्थिर रखने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन इस पूरी तस्वीर का एक और महत्वपूर्ण पहलू है भारत और रूस। दिसंबर में ट्रंप की मुलाकात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से होने की संभावनाएं भी सामने आ रही हैं। मोदी के दिसंबर में अमेरिका जाने की संभावना है, जहां चौदह और पंद्रह दिसंबर को फ्लोरिडा में होने वाली जी-20 बैठक के दौरान उनकी ट्रंप से द्विपक्षीय बातचीत हो सकती है। वहीं रूस ने अभी पुतिन-ट्रंप दिसंबर शिखर बैठक की पुष्टि नहीं की है। लेकिन अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के अनुसार पुतिन को दिसंबर में मियामी में होने वाली जी-20 बैठक के लिए आमंत्रित किया गया है और वहां ट्रंप के साथ मुलाकात की संभावना है। हालांकि क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा है कि अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है और बैठक के एजेंडे पर चर्चा करना भी जल्दबाजी होगी। देखा जाये तो इन संभावित मुलाकातों को हाल में नई दिल्ली में संपन्न हुए अठारहवें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के संदर्भ में देखना खासा महत्वपूर्ण है। भारत की मेजबानी में हुए इस सम्मेलन में नरेंद्र मोदी, शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन के बीच जिस स्तर का संवाद और सार्वजनिक गर्मजोशी दिखाई दी, उसने वैश्विक कूटनीति में खासा ध्यान खींचा। मोदी और शी ने द्विपक्षीय संबंधों, सीमा शांति, व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े मुद्दों पर बातचीत की, जबकि मोदी और पुतिन ने रक्षा, ऊर्जा, व्यापार, अंतरिक्ष और अन्य क्षेत्रों में सहयोग की समीक्षा की। ब्रिक्स सम्मेलन की तस्वीरें भी अपने आप में एक बड़ा कूटनीतिक संदेश थीं। एक ओर भारत और रूस के बीच मजबूत रणनीतिक संबंध, दूसरी ओर भारत और चीन के बीच लंबे तनाव के बाद संवाद की वापसी। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषण में मोदी, पुतिन और शी की साथ दिखाई देने वाली तस्वीरों को बदलती वैश्विक शक्ति समीकरणों के प्रतीक के रूप में देखा गया। यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें ट्रंप की रणनीति को समझा जा सकता है। अमेरिका के सामने अब ऐसी दुनिया है जहां चीन, रूस और भारत तीनों के साथ उसके अलग-अलग स्तर के हित, मतभेद और संभावित सहयोग मौजूद हैं। चीन के साथ व्यापार और तकनीक, रूस के साथ यूक्रेन युद्ध और ऊर्जा, जबकि भारत के साथ व्यापार, रक्षा, तकनीक और रणनीतिक सहयोग, तीनों रिश्ते एक-दूसरे से पूरी तरह अलग नहीं हैं। भारत के मामले में रूस से उसके ऊर्जा संबंध और अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता एक साथ चल रही हैं। रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिकी दबाव ने दोनों देशों के बीच आर्थिक बातचीत को जटिल बनाया है। ऐसे में मोदी-ट्रंप वार्ता में व्यापार, ऊर्जा और रणनीतिक संबंध महत्वपूर्ण विषय हो सकते हैं। इसलिए दिसंबर का संभावित कूटनीतिक दौर केवल अलग-अलग द्विपक्षीय मुलाकातों की श्रृंखला नहीं होगा। सितंबर के नई दिल्ली ब्रिक्स सम्मेलन में मोदी, पुतिन और शी की जुगलबंदी के बाद अब ट्रंप के सामने इन तीनों शक्तियों के साथ अपने संबंधों को अलग-अलग मोर्चों पर संभालने की चुनौती है। वॉशिंगटन में शी का भव्य स्वागत इसी व्यापक कूटनीतिक गणित की शुरुआत माना जा सकता है, जहां अमेरिका टकराव के साथ-साथ संवाद और समझौते के रास्ते भी खुले रखना चाहता है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 24 Sep 2026 6:54 pm

नकली व बेलगाम दवाओं के खिलाफ अब अदालत का ही आसरा

भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में जहां जन-कल्याण को शासन का मूलमंत्र माना जाता है, वहां स्वास्थ्य का क्षेत्र एक गंभीर संक्रमण काल से गुजर रहा है। बीमारियां जिस रफ्तार से बढ़ रही हैं, उससे कहीं अधिक तेजी से चिकित्सा के नाम पर इंसानी जिंदगियों से खिलवाड़ का एक भयावह और अनैतिक तंत्र विकसित हो चुका है। हाल ही में फार्मास्युटिकल क्षेत्र में मुनाफे की हवस और मरीजों के साथ हो रही धोखाधड़ी की गूंज देश की सबसे बड़ी अदालत में सुनाई दी है। न्याय के सर्वोच्च मंदिर ने दवा निर्माताओं, अस्पतालों और सरकारी नियामक संस्थाओं के रवैये पर जो तल्ख टिप्पणियां की हैं, उसने हमारे पूरे स्वास्थ्य तंत्र की रीढ़ को हिलाकर रख दिया है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ द्वारा एक मामले की सुनवाई के दौरान प्रयुक्त यह वाक्य—यह तो सीधे तौर पर दिन-दहाड़े डकैती है—महज एक टिप्पणी नहीं, बल्कि उस लाचार भारतीय नागरिक की सामूहिक चीख का प्रतिनिधित्व करता है, जो बीमारी से पहले इलाज के खर्च और उसमें होने वाली जालसाजी से मर जाता है। न्यायालय के समक्ष जो तथ्य उभरकर सामने आए हैं, वे किसी भी संवेदनशील समाज को स्तब्ध करने के लिए पर्याप्त हैं। खासकर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझ रहे मरीजों के घावों पर जिस तरह मुनाफाखोरी का नमक छिड़का जा रहा है, वह अमानवीयता की पराकाष्ठा है। अदालत के संज्ञान में लाया गया कि कैंसर की एक आवश्यक जीवन रक्षक दवा, जिसकी कीमत निर्माता कंपनी द्वारा रिटेलर के लिए महज ₹2,700 तय की जाती है, उस पर अधिकतम खुदरा मूल्य पूरे ₹27,000 छाप दिया जाता है। यानी कि लागत और थोक मूल्य से ठीक दस गुना अधिक दाम पर उस दवा को बेचे जाने की खुली छूट दे दी गई। एक पीड़ित परिवार और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा दायर की गई जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए माननीय न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने इस अकल्पनीय मूल्य अंतर पर गहरी नाराजगी जताई। अदालत ने सीधे शब्दों में सवाल पूछा कि मरीजों को इस तरह बेदर्दी से लूटने की इजाजत व्यवस्था कैसे दे सकती है? निर्माता कंपनियां और बड़ी-बड़ी कॉरपोरेट फार्मेसियां मिलकर मरीजों की जेब पर जो डाका डाल रही हैं, उस पर राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण और स्वास्थ्य मंत्रालय जैसी नियामक इकाइयां आंखें मूंदकर क्यों बैठी हैं? इसे भी पढ़ें: दवा कंपनियों की लूट पर Supreme Court ने की सख्त टिप्पणी, 'दिनदहाड़े डकैती और वसूली' पर प्रशासन चुप क्यों है? यह मामला सिर्फ निजी क्षेत्र की लूट तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के खजाने और टैक्सपेयर्स के पैसे में सेंधमारी का भी एक बड़ा घोटाला साबित हो रहा है। आज केंद्र सरकार 'आयुष्मान भारत', CGHS और DGHS जैसी लोक-कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से गरीब और मध्यम वर्ग के इलाज का खर्च उठाती है। निजी अस्पताल इन्हीं बढ़ी हुई और मनमानी एमआरपी पर दवाएं खरीदते हैं और बाद में सरकारी खजाने से उसका शत-प्रतिशत रीइम्बर्समेंट क्लेम करते हैं। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि चंद दवा माफियाओं और निजी अस्पतालों की तिजोरियां भरने के लिए आम जनता के खून-पसीने की गाढ़ी कमाई को पानी की तरह बहाया जा रहा है। करदाताओं का पैसा जो देश के बुनियादी ढांचे और लोक-कल्याण में लगना चाहिए था, वह दवा कंपनियों की साठगांठ की भेंट चढ़ रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस ओर ध्यान दिलाते हुए इसे 'स्पष्ट रूप से देश और जनता के साथ एक बड़ा फ्रॉड' करार दिया है। इस संदर्भ में एक अहम सुझाव यह भी आया कि क्यों न देश की सभी जीवन रक्षक दवाओं को एक एकीकृत मूल्य-नियंत्रण के दायरे में ला दिया जाए, जिससे जेनेरिक और ब्रांडेड दवाओं का यह पूरा कृत्रिम भ्रम ही समाप्त हो जाए और दवाएं समान दाम पर उपलब्ध हो सकें। एक तरफ जहां दवाओं के नाम पर यह संस्थागत और कानूनी लूट जारी है, वहीं दूसरी तरफ 'नकली दवाओं' का एक समानांतर और अंडरग्राउंड अंडरवर्ल्ड चल रहा है, जो सीधे मौत का व्यापार कर रहा है। हाल ही में बेंगलुरु में विशेष जांच दल और औषधि नियंत्रण विभाग द्वारा संयुक्त छापेमारी में एक बहुत बड़े अंतरराज्यीय नकली कैंसर दवा रैकेट का भंडाफोड़ हुआ है। जांच में जो तथ्य सामने आए, वे रोंगटे खड़े करने वाले हैं। वीरेश कुमार जैन नामक एक फार्मासिस्ट की मुख्य संलिप्तता वाले इस गिरोह ने करीब 90 से अधिक प्रतिष्ठित अस्पतालों और क्लीनिकों में पिछले पांच वर्षों से नकली तथा एक्सपायर्ड हो चुकी कैंसर और आईसीयू दवाओं की धड़ल्ले से आपूर्ति की। ये अपराधी एक्सपायर हो चुकी दवाओं को दोबारा प्रोसेस करते थे, उन्हें चमचमाते नए डिब्बों में पैक करते थे, नामचीन अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय फार्मा ब्रांडों के नकली होलोग्राम और लेबल लगाते थे और अस्पतालों के परचेजिंग डिपार्टमेंट को आकर्षित करने के लिए पचास प्रतिशत तक के भारी डिस्काउंट का लालच देते थे। पांच साल तक, यानी कि 1,800 से अधिक दिनों तक अस्पतालों के खरीद तंत्र ने बिना किसी लैब टेस्टिंग या प्रामाणिकता की जांच किए, सिर्फ मुनाफे के लालच में इन नकली दवाओं को खरीदा और उन लाचार मरीजों के जिस्म में कीमोथेरेपी के नाम पर जहर के रूप में उतार दिया जो अपनी जिंदगी की आखिरी उम्मीद लेकर वहां आए थे। इस घिनौने अपराध की जद सिर्फ बेंगलुरु तक सीमित नहीं है; इसके तार कर्नाटक से लेकर हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, तमिलनाडु और महाराष्ट्र तक फैले हुए हैं। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि नकली दवाओं का नेटवर्क देशव्यापी नेटवर्क बन चुका है। कुछ समय पूर्व नागपुर के सरकारी अस्पताल में भी एक ऐसा ही सनसनीखेज मामला सामने आया था, जहां मरीजों को दी जाने वाली गोलियों में मुख्य औषधीय साल्ट की जगह साधारण टेलकम पाउडर भरा हुआ था। जब किसी मरीज को एंटीबायोटिक या कैंसर रोधी दवाओं के नाम पर टेलकम पाउडर या चाक की गोलियां दी जाएंगी, तो उसका ठीक होना तो दूर, बीमारी और अधिक आक्रामक होकर उसकी जान ले लेगी। कानून के नजरिए से देखें तो यह धारा 302 यानी सीधे-सीधे हत्या का मामला बनता है, न कि केवल ट्रेडमार्क के उल्लंघन या मिलावट का। ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 में कहने को तो आजीवन कारावास और जब्त माल की कीमत का तीन गुना जुर्माने जैसे सख्त कानूनी प्रावधान शामिल किए गए हैं, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर अपराधियों को इसका कोई खौफ नजर नहीं आता। वजह साफ है—कमजोर लूपहोल्स का फायदा उठाकर अपराधी अक्सर जमानत पर बाहर आ जाते हैं और फिर से अपना वही खूनी कारोबार शुरू कर देते हैं। यही कारण है कि देश की जनता और न्यायविदों को अब इस भयावह संकट से उबरने के लिए न्यायपालिका की ओर देखना पड़ रहा है। अब जब पानी सिर से ऊपर जा चुका है, तो अदालती हस्तक्षेप ही एकमात्र उम्मीद बची है। अदालतों में दायर हालिया याचिकाओं में यह मांग बिल्कुल जायज है कि नकली और अत्यधिक महंगी दवाओं के मामलों की जांच के लिए तीन महीने की सख्त समय-सीमा तय हो और फास्ट ट्रैक कोर्ट के माध्यम से एक वर्ष के भीतर दोषियों को फांसी या उम्रकैद जैसी नजीर बनने वाली सजाएं दी जाएं। साथ ही, इस धंधे से अर्जित की गई अपराधियों और उनके परिवारों की पूरी चल-अचल संपत्ति को तुरंत कुर्क किया जाना चाहिए। दवा उद्योग को आत्ममंथन करना होगा कि जब आबकारी विभाग अपनी शराब की बोतलों पर क्यूआर कोड और ट्रैक-एंड-ट्रेस मैकेनिज्म लागू करके एक-एक बूंद का हिसाब रख सकता है, तो ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया देश की जीवन रक्षक दवाओं के लिए वैसा ही अचूक और फुलप्रूफ डिजिटल बारकोडिंग सिस्टम देशव्यापी स्तर पर अनिवार्य क्यों नहीं कर पा रहा है? शीर्ष 300 ब्रांडों पर क्यूआर कोड का नियम लागू करना एक स्वागत योग्य कदम है, लेकिन इसे देश की हर छोटी-बड़ी मेडिकल वाइल और टैबलेट स्ट्रिप पर अनिवार्य करना होगा। दवाइयों के इस दोतरफा संकट—एक तरफ कृत्रिम रूप से बढ़ाई गई बेलगाम कीमतें और दूसरी तरफ नकली दवाओं का जानलेवा जाल—ने चिकित्सा पेशे की विश्वसनीयता को भी दांव पर लगा दिया है। जब तक सरकारें राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखाएंगी और स्वास्थ्य को कॉर्पोरेट घरानों के मुनाफे का जरिया बनने से नहीं रोकेंगी, तब तक आम आदमी को न्याय नहीं मिल सकता। फार्मा लॉबी की ताकत के आगे सरकारी अमले की कथित और रहस्यमयी चुप्पी इस बात का संकेत है कि बिना अदालती हंटर के यह तंत्र सुधरने वाला नहीं है। 2,700 की दवा को 27,000 में बेचना अगर डकैती है, तो नकली दवाएं बेचना सीधे-सीधे नरसंहार है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले की अगली सुनवाई की तारीखें तय कर सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि अदालत का यह सख्त रुख देश की नीति-नियंताओं की कुंभकर्णी नींद को तोड़ेगा। देश को अब भाषणों और आश्वासनों की नहीं, बल्कि एक ऐसे कठोर कानून और पारदर्शी मूल्य निर्धारण व्यवस्था की जरूरत है, जहां किसी भी मां, बहन या पिता को पैसे के अभाव में या नकली दवा के जहर के कारण तड़प-तड़प कर दम न तोड़ना पड़े। स्वास्थ्य हर नागरिक का मौलिक अधिकार है, और इसे मुनाफाखोरों की मंडी बनने से बचाना ही आज के समय की सबसे बड़ी राष्ट्रीय चुनौती है। अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार

प्रभासाक्षी 24 Sep 2026 6:52 pm

ब्राह्मणों पर टिप्पणी करने वाले अब 'पी' का अर्थ पंडित बता रहे, जनता को गुमराह कर रहे: मनोज पांडे

ब्राह्मणों पर टिप्पणी करने वाले अब 'पी' का अर्थ पंडित बता रहे, जनता को गुमराह कर रहे: मनोज पांडे

समाचार नामा 24 Sep 2026 6:26 pm

आईआईटी-बॉम्बे के छात्र की मौत के बाद मिड-सेमेस्टर परीक्षाएं स्थगित

आईआईटी-बॉम्बे के छात्र की मौत के बाद मिड-सेमेस्टर परीक्षाएं स्थगित

समाचार नामा 24 Sep 2026 3:48 pm

चुनाव आयोग पर उठे सवालों पर नकवी बोले-'असहमति लोकतंत्र में ही संभव, तानाशाही में नहीं'

चुनाव आयोग पर उठे सवालों पर नकवी बोले-'असहमति लोकतंत्र में ही संभव, तानाशाही में नहीं'

समाचार नामा 24 Sep 2026 3:25 pm

अयोध्या दीपोत्सव की तैयारी तेज, योगी के नेतृत्व में इस बार और भव्य होगा आयोजन : वेदप्रकाश

अयोध्या दीपोत्सव की तैयारी तेज, योगी के नेतृत्व में इस बार और भव्य होगा आयोजन : वेदप्रकाश

समाचार नामा 24 Sep 2026 2:32 pm

दिमासा भाषा के संरक्षण के लिए असम सरकार का बड़ा कदम, मंत्रियों का पैनल गठित

दिमासा भाषा के संरक्षण के लिए असम सरकार का बड़ा कदम, मंत्रियों का पैनल गठित

समाचार नामा 24 Sep 2026 2:32 pm

Gautam Adani ने की जबरदस्त वापसी! Mukesh Ambani को पछाड़ कर फिर बने नंबर-1, India में अमीरों की संख्या भी बढ़ी

भारत के कारोबारी जगत में एक बार फिर बड़ा उलटफेर हुआ है। एम3एम हुरुन इंडिया रिच लिस्ट 2026 ने गौतम अडानी और उनके परिवार को देश के सबसे अमीर परिवार के रूप में फिर से नंबर एक पर पहुंचा दिया है। अडानी परिवार की कुल संपत्ति अब 9.23 लाख करोड़ रुपये आंकी गई है, जबकि पिछले साल शीर्ष स्थान पर रहे मुकेश अंबानी और उनका परिवार 8.63 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति के साथ दूसरे स्थान पर है। यानी अडानी परिवार ने 59,400 करोड़ रुपये की बढ़त के साथ पहला स्थान हासिल किया है। यह वापसी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हाल के दिनों में अडानी समूह और स्वयं गौतम अडानी को लेकर कई विवाद खड़े किये गये थे। लेकिन विवादों से सफलतापूर्वक बाहर आते हुए अडानी की कारोबारी ताकत और उनके समूह से जुड़ी संपत्ति में फिर उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। एक साल में अडानी परिवार की संपत्ति 13 प्रतिशत बढ़ी, जबकि अंबानी परिवार की संपत्ति में 10 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इसे भी पढ़ें: BRICS Summit 2026: Gautam Adani से मिले Cyril Ramaphosa, भारत-दक्षिण अफ्रीका निवेश पर बड़ी चर्चा लेकिन इस कहानी की अहमियत सिर्फ इतनी नहीं है कि गौतम अडानी फिर से नंबर एक अमीर बन गए हैं। हुरुन की रिपोर्ट भारत में तेजी से बढ़ती संपत्ति की भी बड़ी तस्वीर दिखाती है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में अब 391 ऐसे अरबपति हैं जिनकी संपत्ति अमेरिकी डॉलर में एक अरब डॉलर या उससे ज्यादा है। पांच साल पहले ऐसे अरबपतियों की संख्या 237 थी। वहीं, कम से कम 1,000 करोड़ रुपये की संपत्ति रखने वाले भारतीयों की संख्या बढ़कर 1,810 हो गई है। इन सभी की कुल संपत्ति 187.5 लाख करोड़ रुपये है, जो भारत की अर्थव्यवस्था के आकार के करीब आधे के बराबर है। यानी भारत में सिर्फ अरबपतियों की संख्या ही नहीं बढ़ रही, बल्कि देश में बड़े पैमाने पर नई संपत्ति भी तैयार हो रही है। खास बात यह है कि यह संपत्ति वृद्धि ऐसे समय हुई जब शेयर बाजार में कमजोरी रही। इस अवधि में सूची में शामिल कुल संपत्ति 12.8 प्रतिशत बढ़ी, जबकि निफ्टी 50 में 3.9 प्रतिशत और सेंसेक्स में 5.8 प्रतिशत की गिरावट आई। इसका अर्थ यह है कि अमीरी की इस तस्वीर को केवल शेयर बाजार की तेजी से समझना गलत होगा। कारोबार में हिस्सेदारी, कंपनियों का मूल्यांकन, ऑर्डर बुक, उत्पादन क्षमता, बुनियादी ढांचे में निवेश और निर्यात मांग जैसे कारक इसमें बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। उधर, अडानी की वापसी इसी बदलते आर्थिक परिदृश्य से जुड़ी दिखाई देती है। हुरुन के मुताबिक एयरोस्पेस और रक्षा क्षेत्र की संपत्ति में 69 प्रतिशत की वृद्धि हुई। हरित ऊर्जा और औद्योगिक उत्पादों में 31-31 प्रतिशत, धातु एवं खनन में 30 प्रतिशत, औषधि क्षेत्र में 25 प्रतिशत और वित्तीय सेवाओं में 23 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। हुरुन के संस्थापक और मुख्य शोधकर्ता अनस रहमान जुनैद ने ऑर्डर बुक, बुनियादी ढांचे में निवेश, विनिर्माण क्षमता और निर्यात मांग को संपत्ति निर्माण के महत्वपूर्ण इंजन बताया है। बुनियादी ढांचा, ऊर्जा, औद्योगिक गतिविधियां, हरित ऊर्जा और अन्य बड़े पूंजीगत क्षेत्रों में निवेश उस व्यापक आर्थिक बदलाव से जुड़े हैं जिसे हुरुन ने इस सूची में दर्ज किया है। देखा जाये तो विकसित भारत के निर्माण की चर्चा में बुनियादी ढांचा, ऊर्जा सुरक्षा, विनिर्माण क्षमता, रक्षा उत्पादन और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्र केंद्रीय भूमिका रखते हैं। इस बीच भारत के सबसे अमीर परिवारों की तस्वीर भी बदल रही है। एलएन मित्तल परिवार 93 प्रतिशत की छलांग के साथ तीसरे स्थान पर पहुंच गया है और उसकी संपत्ति 3.39 लाख करोड़ रुपये हो गई है। अनिल अग्रवाल परिवार 87 प्रतिशत वृद्धि के साथ नौवें स्थान पर आया है, जबकि टॉरेंट फार्मास्यूटिकल्स से जुड़े समीर मेहता परिवार ने 52 प्रतिशत वृद्धि के बाद शीर्ष दस में जगह बनाई है। एक और बड़ा बदलाव यह है कि भारत की नई संपत्ति तेजी से तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रक्षा, सेमीकंडक्टर और हरित ऊर्जा से पैदा हो रही है। पहली बार कृत्रिम बुद्धिमत्ता को अलग संपत्ति-सृजन क्षेत्र के रूप में दर्ज किया गया है। इस क्षेत्र से जुड़े 19 लोग सूची में हैं, जिनकी संयुक्त संपत्ति 3.07 लाख करोड़ रुपये है। एआई, एयरोस्पेस एवं रक्षा और सेमीकंडक्टर क्षेत्र मिलकर 48 लोगों की 4.26 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। साथ ही भारत में औद्योगिक उत्पाद क्षेत्र सबसे बड़ा क्षेत्र बना हुआ है, जिसमें 166 नाम हैं। इसी क्षेत्र से 44 नए लोग सूची में आए। यह संकेत है कि भारत में संपत्ति निर्माण की कहानी केवल उपभोक्ता बाजार की नहीं, बल्कि कारखानों, उत्पादन, बुनियादी ढांचे, रक्षा, ऊर्जा और तकनीक की भी बन रही है। दूसरी तरफ उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं, खाद्य एवं पेय, उपभोक्ता वस्तुओं और खुदरा जैसे क्षेत्रों में संपत्ति में गिरावट दर्ज हुई। सबसे खास बात यह है कि भारत में नई संपत्ति का बड़ा हिस्सा अब लोग अपनी मेहनत और कारोबार के दम पर खड़ा कर रहे हैं। हुरुन की सूची में शामिल 1,266 उद्यमी यानी करीब 70 प्रतिशत लोग स्वनिर्मित हैं। पांच साल पहले यह आंकड़ा 55 प्रतिशत था। यानी अब पहले से कहीं ज्यादा भारतीय अपने दम पर कारोबार खड़ा कर रहे हैं और बड़ी संपत्ति बना रहे हैं। वहीं गौतम अडानी का फिर नंबर एक बनना इसी बड़ी आर्थिक कहानी का एक प्रमुख अध्याय है। 2022 में अडानी और अंबानी परिवारों की संयुक्त संपत्ति बाकी शीर्ष आठ परिवारों से 5.84 लाख करोड़ रुपये अधिक थी। 2026 में तस्वीर उलट गई है। दोनों की संयुक्त संपत्ति 17.86 लाख करोड़ रुपये है, जबकि बाकी आठ की कुल संपत्ति 21.15 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है। यानी भारत की संपत्ति अब धीरे-धीरे शीर्ष दो परिवारों से आगे भी फैल रही है। फिर भी अडानी की नंबर एक पर वापसी का संदेश साफ है। आलोचनाओं, बाजार के उतार-चढ़ाव और कारोबारी चुनौतियों के बीच उनकी संपत्ति में 13 प्रतिशत की वृद्धि हुई और वह फिर भारत के सबसे अमीर परिवार के शीर्ष स्थान पर पहुंच गए। बहरहाल, भारत की अर्थव्यवस्था जिस दिशा में बढ़ रही है, उसमें बुनियादी ढांचा, विनिर्माण, ऊर्जा, रक्षा, हरित ऊर्जा और नई तकनीक निर्णायक होते जा रहे हैं। अडानी की कारोबारी उपस्थिति इन क्षेत्रों के बड़े हिस्से में है। इसलिए उनकी वापसी सिर्फ अमीरी की सूची में नंबर बदलने की घटना नहीं, बल्कि भारत में पूंजी और संपत्ति निर्माण के बदलते केंद्रों की एक तस्वीर भी है। विकसित भारत की महत्वाकांक्षा को जमीन पर उतारने के लिए जिन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निवेश की जरूरत है, उनमें निजी क्षेत्र की भूमिका महत्वपूर्ण है और अडानी समूह की गतिविधियां इसी व्यापक निवेश चक्र का एक हिस्सा हैं। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 24 Sep 2026 1:54 pm

5 दिन बैंक बंद! कर्मचारियों के साथ ऐसा क्या हुआ? मेगा हड़ताल पर आ गए सभी, वजह जानकर आप भी चौंक जाएंगे

अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति थॉमस जैफर्सन ने बैंक्स और फाइनेंशियल स्टैब्लिशमेंट को देश की बॉर्डर पर तैनात आर्मी से भी ज्यादा खतरनाक बताया था। बात सही भी है। सरकारों को अपने प्रशासन, डिप्लोमेसी और युद्ध तक चलाने के लिए बैंक्स और कर्ज की जरूरत पड़ती ही हैं। जैफर्सन का इशारा इस बात पर था कि बैंक सिर्फ पैसे के लेन-देन की जगह नहीं हैं, बल्कि वे पूरे देश की नब्ज और सत्ता की रीढ़ हैं। जब यह रीढ़ कुछ दिनों के लिए भी काम करना बंद कर दे, तो पूरा देश ठहर जाता है। 28 सितंबर से यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (UFBU) की देशव्यापी हड़ताल इसी हकीकत की याद दिलाती है। फर्ज कीजिए महीने का आखिरी हफ्ता है। आपकी सैलरी आनी है। ईएमआई भी जानी होगी। किसी को चेक जमा करना है। किसी को बैंक से कैश निकालना है। और इसी बीच खबर आती है कि 28, 29 और 30 सितंबर को देश भर में बैंक स्ट्राइक होने वाली है। और कैलेंडर देखिए आप 26 सितंबर को फोर्थ सैटरडे है। बैंक की छुट्टी। 27 सितंबर संडे है बैंक की छुट्टी। और 28, 29 और 30 सितंबर को स्ट्राइक का कॉल है। यानी बैंक ब्रांच से काम करने वाले लोगों के लिए दिक्कत 3 दिन की नहीं लगातार 5 दिन तक खींच सकती है। फाइनेंस मिनिस्ट्री ने भी कहा है कि वीकेंड के साथ मिलकर यह स्ट्राइक बैंकिंग सर्विज पर 5 दिन जैसा असर डाल सकती है। तो सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बैंक कर्मचारी स्ट्राइक क्यों कर रहे हैं? आपके लिए सवाल है क्या 30 तारीख की सैलरी आएगी? यूपीआई चलेगा या नहीं चलेगा? एटीएम में पैसा मिलेगा या नहीं? चेक क्लियर होगा, ईएमआई कटेगी और आपका कोई जरूरी काम बैंक ब्रांच में अटका हुआ है तो क्या अभी निपटा लेना चाहिए? आखिर ऐसा क्या हो गया है कि लाखों बैंक कर्मचारी काम-काज चोड़कर सड़कों पर उतरने की तैयारी कर चुके हैं। सरकार इस मुद्दे पर क्या कर रही है? तमाम मामलों का एमआरआई स्कैन करेंगे। किसने बुलाई हड़ताल और क्यों बैंक कर्मचारियों के संगठन यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस UFBU ने इस हरताल को बुलाया है। बैंक कर्मचारियों का कहना है कि बैंक्स में हफ्ते में पांच दिन के काम की व्यवस्था होनी चाहिए और हर शनिवार छुट्टी होनी चाहिए। बैंक यूनियन की मुख्य मांग है कि हफ्ते में सिर्फ पांच दिन बैंक खोलने की व्यवस्ता लागू हो। अभी बैंक हर महीने के दूसरे और चौथे शनिवार को बंद रहते हैं लेकिन बाकी दो शनिवार काम होता है। यूनियंस चाहती हैं कि सभी शनिवार को छुट्टी हो और सोमवार से शुक्रवार तक बैंक काम करें। दूसरी बड़ी मांग पीएलआई यानि परफॉर्मेंश लिंक्ड इंसेंटिव की है। इस योजना को वापस लेने की मांग है। सरकार ने फिलहाल इस योजना को स्थगित कर दिया है। नए बैंक कर्मचारियों के लिए न्यू पेंशन स्कीम की जगह ओल्ड पेंशन स्कीम (ओपीएस) लागू करने की मांग की गई है। इसके अलावा पेंशन अपडेट करना, पेंशन पर युनिफॉर्म, डीए पेंशनर्स के लिए मेडिकल इंशोरेंस, प्रीमियम में राहत जैसी कई और मांगे भी है, जिन पर बैंक यूनियन सरकार से एक्शन की डिमांड कर रही है। इससे पहले 11 सितंबर को भी बैंक कर्मियों ने इनी मांगों को लेकर एक दिन की हड़ताल की थी। सरकार से बाचीत भी हुई थी, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकलने की वजह से अब वो तीन दिन की हड़ताल पर जा रहा है। म्युच्युअल फंड,इंशोरेंस प्रोडक्ट भी बेच रहे बैंक कर्मचारी बैंक कर्मचारियों की जितनी भी मांगे हैं उन में से सबसे बड़ी मांग जिस पर वो टस से मस नहीं होना चाहते वो 5-day वर्किंग है। बैंक कर्मियों के मुताबिक उन पर काम का बहुत जादा बोझ है, जिसके चलते वो ये डिमांड पिछले 10 साल से कर रहे है। बैंक कर्मियों के मुताबिक उनसे सामान्य बैंकिंग ऑपरेशन्स के अलावा भी कई काम कराए जाते सरकार की स्कीम्स लागू करना है। म्युचल फंड्स और इंशोरेंस जैसे प्रोडक्ट को बेचना है। ये भी काम बैंक वाले कर रहे हैं। कर्मचारियों के मुताबिक बैंकों की भर्ती प्रक्रिया बेहद ढीली है। जिसके चलते मैनपावर की कमी हमेशा बनी रहती है। इसी वज़ह से बैंकों में काम करने वाले लोग रोजाना 2-3 घंटे पहले ही ज्यादा काम करते है। बैंक कर्मचारियों के मताबिक एलआईसी जैसे कई फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन्स में 5-day working का नियम है यानी पांच दिन काम होता है तो बैंक में क्यों पांच दिन नहीं हो सकता। आप दस तरह के काम बैंक कर्मचारियों से करा रहे हैं, तो बैंक कर्मचारी कह रहे हैं कि हम भी तो इंसान हैं, हमारा भी परिवार है। क्या दिनभर सिर्फ नोट ही गिनते रहे। बैंक यूनियन्स के मुताबिक मार्च 2024 में इंडियन बैंक्स असोसियेशन आईवीए के साथ द्विपक्षीय समझोता हुआ और इसमें सहमती बनी थी। लेकिन इसे लागू करने के लिए अभी तक सरकार की आधिकारिक मंजूरी और अधिसूचना का इंतजार है। बैंक खुद किस तरह की दिक्कत की तैयारी कर रहे हैं एसबीआई ने कस्टमर्स के लिए एडवाइज़री जारी की है। बैंक ने कहा कि जो जरूरी बैंकिंग ट्रांजैक्शंस हैं उन्हें स्ट्राइक की तारीखों से पहले पूरा कर लें। कैश चाहिए तो एटीएम का इस्तेमाल करें। ADWM यानी ऐसी मशीन जहां से कई जगह कैश निकालने के साथ जमा भी किया जा सकता है। बैंक ने कस्टमर सर्विस पॉइंट्स इस्तेमाल करने के लिए भी कहा है और सबसे जरूरी इंटरनेट बैंकिंग, यo, मोबाइल बैंकिंग, यूपीआई और दूसरे डिजिटल चैनल्स को प्रेफर करने को कहा है। साथ में यह भी कि स्ट्राइक के दौरान जरूरी बैंकिंग सर्विज चालू रखने की पूरी कोशिश की जाएगी। ऐसे ही कुछ नोटिसेस बैंक ऑफ बौदा, Canरा बैंक, PNB सारे बैंक्स ने निकाले हैं। अगर आपका काम ब्रांच पर डिपेंड करता है बैंक की तो उसे आखिरी दिन के भरोसे मत छोड़िए। इस वक्त यूपीआई बिना किसी दिक्कत के चलेगा। यह स्ट्राइक बैंक कर्मचारियों की है। यूपीआई जैसे डिजिटल पेमेंट सिस्टम को बंद करने का कोई ऐलान नहीं है। इंटरनेट बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग और बैंक एप्स भी नॉर्मल रहेंगे। इसी तरह ऑनलाइन एनईएफटी और आरटीजीएस भी चलते रहने चाहिए। आरबीआई के मुताबिक एनईएफटी पूरे साल 24ों घंटे उपलब्ध है। आरटीजीएस भी 24 घंटे साल के चलता रहता है। हम 10 दिन का वेतन गंवा सकते हैं, क्या देश 10 दिन बैंक बंदी झेल सकता है? कर्मचारी यूनियनें हड़ताल के दौरान वेतन कटने के डर को अपनी सबसे बड़ी ताकत में तब्दील करने की अपील कर रही हैं। बैंककर्मियों का स्पष्ट तर्क है कि दो-तीन दिन या दस दिन का वेतन कटने से कर्मचारियों के घरों पर असर जरूर पड़ेगा, लेकिन वे झेल लेंगे। सवाल यह है कि क्या सरकार और देश की अर्थव्यवस्था बैंकों की राष्ट्रव्यापी पूर्ण बंदी को इतने दिन बर्दाश्त कर सकती है? कर्मचारियों का मानना है कि वेतन बचाने के लिए अगर वे आज पीछे हटे, तो उनकी बारगेनिंग पावर खत्म हो जाएगी, इसलिए वे अपनी सामूहिक ताकत दिखाने के मूड में हैं। संडे को भी खुलेंगे बैंक देशभर में सभी बैंक इस हफ्ते रविवार को भी खुले रहेंगे। वित्त मंत्रालय ने जानकारी दी है कि RBI ने 27 सितंबर को देश की सभी बैंक शाखाओं, दफ्तरों और एटीएम-लिंक ब्रांचों समेत सभी सर्विसेज को पूरी तरह चालू रखने की मंजूरी दी है। वित्त मंत्रालय ने कहा कि जनता की जरूरी बैंकिंग जरूरतों पर लंबे समय तक असर न पड़े, इसे सुनिश्चित करने के लिए सभी सरकारी बैंक और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक रविवार, 27 सितंबर को सामान्य रूप से काम करेंगे। रिजर्व बैंक ने सभी शाखाओं, कार्यालयों, एटीएम-लिंक ब्रांचों और करेंसी चेस्ट्स को इस दिन पूरी तरह चालू रखने की मंजूरी दी है। कर्मचारियों के भीतर सरकार और मैनेजमेंट के उस कदम को लेकर भी तीखा गुस्सा है, जिसके तहत रविवार (27 सितंबर) को शाखाएं या करेंसी चेस्ट खुलवाने की अनुमति ली गई थी। कर्मचारियों का कहना है कि एक रविवार को बैंक खोल देने से हड़ताल का असर कम नहीं होगा। अगर कर्मचारी सड़कों पर डटे रहे, तो हर गुजरते दिन के साथ ग्राहकों, कारोबारियों और पूरी अर्थव्यवस्था का दबाव सरकार पर बढ़ेगा। उनका संदेश साफ है कि जंग सिर्फ एक दिन की छुट्टी या काम की नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व और अधिकारों की पहचान कराने की है। सरकार का क्या कहना है? 21 सितंबर को सरकार ने कहा कि यूनियंस के साथ कई दौर की बातचीत और कंसिलिएशंस हुई हैं। बाकी मुद्दे बातचीत से हल किए जा सकते हैं और कर्मचारियों को स्ट्राइक से बचना चाहिए ताकि बैंकिंग सर्विज ना रुके। सरकार का दूसरा तर्क है कि शनिवार सिर्फ बैंक कर्मचारी के लिए वर्किंग डे नहीं है। कई कस्टमर्स, कई ग्राहक, आम लोग उसी दिन बैंक जाते हैं। 2015 में दूसरे और चौथे शनिवार को बैंक हॉलिडे मनाया गया था। लेकिन सरकार का कहना है कि बाकी शनिवार उन लोगों के लिए काम आते हैं जो सोमवार से शुक्रवार नौकरी या किसी दूसरे काम की वजह से ब्रांच नहीं जा पाते। तीसरा और इस बार सरकार का सबसे बड़ा कंसर्न है टाइमिंग। 30 सितंबर को हाफ ईयरली क्लोजिंग है। इस दिन बैंक सिर्फ सामान्य कस्टमर ट्रांजैक्शंस नहीं करते। बैंक अपने रिकॉर्ड्स भी मिलाते हैं। इसलिए फाइनेंस मिनिस्ट्री का कहना है कि इस वक्त स्ट्राइक का असर सिर्फ बैंक काउंटर तक नहीं रहेगा। बिजनेस, सरकारी ट्रांजैक्शन, इंटरनेशनल बैंकिंग तक असर पड़ सकता है। और सरकार सिर्फ अपील भी नहीं कर रही है, तैयारी भी कर रही है। डिपार्टमेंट ऑफ फाइनेंसियल सर्विज के 21 सितंबर के मेमो के मुताबिक 18 सितंबर को क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप की एक मीटिंग हुई। इसके बाद 21 सितंबर को पब्लिक सेक्टर बैंक्स, रीजनल रूरल बैंक्स और आईबीए के अधिकारियों के साथ स्ट्राइक की तैयारी पर चर्चा हुई। फिर होम मिनिस्ट्री से राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों को एडवाइज़री जारी करने में मदद मांगी गई। इसे भी पढ़ें: क्या सच में मनमर्जी करते हुए ज्ञानेश कुमार ने सरकार की शक्तियों को भी ठेंगा दिखा दिया? SIR के बीच चुनाव आयुक्तों में मतभेद की खबरों को ऑब्जर्वेशन और डिसेंट से समझें किस चीज की सुरक्षा के लिए? करेंसी चेस्ट यानी वो जगह जहां बैंकों के लिए बड़ी मात्रा में कैश रखा जाता है। चेक क्लियरिंग प्रोसेसिंग सेंटर्स, डाटा सेंटर्स, डाटा रिकवरी सेंटर्स, ट्रेजरी ऑपरेशन, आईटी सेंटर्स, साइबर सिक्योरिटी सेल, एटीएम साथ ही बैंक ब्रांच के आसपास लॉ एंड ऑर्डर बनाए रखने और जो कर्मचारी स्ट्राइक में शामिल नहीं है, उनकी सुरक्षा की बात भी कही गई है। राज्यों से स्ट्राइक से जुड़ी जानकारी और इंटेलिजेंस इनपुट भी मांगे गए हैं। तो सरकार की तैयारी सिर्फ इतनी नहीं है कि किसी तरह बैंक का शटर खुला रहे। कोशिश यह है कि बैंकिंग के पीछे चलने वाली पूरी मशीनरी, कैश, चेक, डाटा, आईटी, ट्रेजरी जितना हो सके वह चलता रहे। फाइनेंस मिनिस्ट्री ने बैंकों से यह भी कहा है कि एटीएम में इनफ कैश रखा जाए। जरूरी सर्विसेस के लिए बैकअप प्लान रहे और डिजिटल चैनल्स चलते रहें।

प्रभासाक्षी 24 Sep 2026 1:23 pm

Modi के Gujarat की Hilsa Fish के आयात पर Tarique Rahman ने लगा दी रोक, India-Bangladesh रिश्तों में आई नई टेंशन

भारत और बांग्लादेश के कूटनीतिक संबंध पहले ही खराब दौर से गुजर रहे हैं। ऐसे में बांग्लादेश की तारिक रहमान सरकार ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृहराज्य गुजरात की हिलसा मछली का आयात रोक कर इस चिंगारी को और भड़का दिया है। हम आपको बता दें कि मंगलवार शाम बांग्लादेश ने भारत से हिलसा मंगाने वाले आयात परमिट रद्द कर दिए। पिछले करीब दो महीनों में बांग्लादेश लगभग 550 टन भारतीय हिलसा मंगा चुका था, लेकिन अब अचानक इस व्यापार पर रोक लगा दी गई है। मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यह फैसला ऐसे समय आया है जब बांग्लादेश खुद हिलसा की कमी और बढ़ती कीमतों से जूझ रहा है। यानी जिस भारतीय हिलसा की जरूरत बांग्लादेश के अपने बाजार को पड़ रही थी, उसी पर रोक लगाकर ढाका ने भारत के साथ पहले से तनावपूर्ण चल रहे रिश्तों में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। देखा जाये तो यह फैसला ऐसे समय आया है जब बांग्लादेश में हिलसा की स्थानीय पकड़ पिछले कुछ वर्षों के मुकाबले कमजोर हुई है और वहां कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। बांग्लादेशी मछुआरा महासंघ के अध्यक्ष रवींद्रनाथ बर्मन ने आरोप लगाया कि कुछ व्यापारियों ने भारत की गुजरात वाली हिलसा को बांग्लादेशी हिलसा बताकर बेचने की कोशिश की, जिससे उपभोक्ताओं के साथ धोखा हुआ। इसे भी पढ़ें: BRICS की सफलता और Mecca Pact की विफलता देख Bangladesh ने बदला रुख, नवंबर में India आने को आतुर हैं PM Tarique Rahman लेकिन असली कहानी इससे कहीं बड़ी है। हिलसा सिर्फ एक मछली नहीं है। बंगाली समाज में इसका स्वाद, परंपरा, धार्मिक रीति और सांस्कृतिक पहचान से गहरा संबंध है। बांग्लादेश इसे अपनी राष्ट्रीय मछली मानता है, जबकि पश्चिम बंगाल में भी पद्मा की हिलसा को विशेष प्रतिष्ठा हासिल है। हम आपको बता दें कि पद्मा गंगा की एक प्रमुख वितरिका है, जो आगे मेघना से मिलकर बंगाल की खाड़ी में जाती है। यही वजह है कि पद्मा और मेघना की हिलसा भारत में महंगी कीमत पर भी खरीदी जाती है। विडंबना देखिए कि बांग्लादेश लंबे समय से भारत को सीमित मात्रा में हिलसा भेजता रहा है, लेकिन दूसरी तरफ भारत से सैकड़ों टन हिलसा खरीद भी रहा है। पिछले दो महीनों में भारत से करीब 500 टन हिलसा बांग्लादेश पहुंची और अतिरिक्त 150 से 200 टन की प्रक्रिया भी चल रही थी। इनमें बड़ी मात्रा गुजरात के भरूच और नर्मदा क्षेत्र की हिलसा की बताई गई है। इसका कारण स्वाद से ज्यादा अर्थशास्त्र है। बांग्लादेश में पद्मा और मेघना की अच्छी हिलसा लगभग 2,200 से 2,800 टका प्रति किलो तक पहुंच सकती है, जबकि गुजरात की हिलसा वहां के थोक बाजार में लगभग 500 से 700 टका प्रति किलो की लागत पर पहुंचती है और खुदरा बाजार में करीब 1,500 से 1,800 टका प्रति किलो में बिक सकती है। यानी बांग्लादेश के लिए गुजरात की हिलसा स्थानीय कमी को पूरा करने का अपेक्षाकृत सस्ता माध्यम बन गई है। यही वह कारण है जहां बांग्लादेश का मौजूदा फैसला सवालों के घेरे में आता है। अगर भारतीय हिलसा वहां की आपूर्ति व्यवस्था, प्रसंस्करण उद्योग और कीमतों को संभालने में उपयोगी है, तो अचानक आयात परमिट रोकने से सबसे सीधा असर वहां के बाजार और उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है। दूसरी तरफ भारत में भी इसका असर होगा। पश्चिम बंगाल के व्यापारियों के अनुसार गुजरात में मौजूदा हिलसा की उपलब्धता भी सीमित हो चुकी है और कोलकाता के बाजार में म्यांमार की हिलसा ही एक प्रमुख विकल्प बच सकती है। भारत के लिए दूसरी बड़ी चुनौती घरेलू उत्पादन की है। पश्चिम बंगाल में हिलसा का उत्पादन वर्ष 2001 के करीब 80 हजार टन से घटकर 2013 में लगभग 15 हजार टन और 2020 में करीब 10 हजार टन रह गया था। इसके पीछे बंगाल की खाड़ी में अत्यधिक मछली पकड़ने को एक प्रमुख कारण बताया गया है। इसी कमी ने गुजरात की हिलसा के लिए बाजार तैयार किया। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनुसार गुजरात ने 2025-26 में करीब 14,588 टन हिलसा का उत्पादन किया। वहीं बांग्लादेश में भी हिलसा का उत्पादन गिरा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वार्षिक उत्पादन 2022 के 5,71,324 टन से घटकर 2025 में करीब 5 लाख टन रह गया। इसी दौरान कीमतों में भारी उछाल आया। ऐसे में भारत से आने वाली अपेक्षाकृत सस्ती हिलसा की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है। मगर सबसे बड़ा खतरा उपभोक्ता भरोसे का है। पश्चिम बंगाल और दिल्ली जैसे बाजारों में गुजरात और गंगा की हिलसा में अंतर करना कई खरीदारों के लिए आसान नहीं है। कुछ व्यापारियों ने खुद माना कि खरीदार को यह पता लगाना कठिन हो सकता है कि मछली वास्तव में कहां की है। ऐसे में गलत नाम से बिक्री का आरोप सिर्फ व्यापारिक विवाद नहीं, बल्कि खाद्य पारदर्शिता का मुद्दा भी बन जाता है। इस पूरे घटनाक्रम का व्यापक निहितार्थ साफ है। हिलसा अब सिर्फ स्वाद और परंपरा का विषय नहीं रही। यह सीमा-पार व्यापार, कीमत, स्थानीय उत्पादन, उपभोक्ता विश्वास और दोनों देशों के बाजारों की परस्पर निर्भरता का प्रतीक बन चुकी है। बांग्लादेश भारत से हिलसा खरीदकर अपनी कमी पूरी करता है, जबकि भारत में बंगाली उपभोक्ता बांग्लादेशी पद्मा हिलसा के लिए तरसते हैं। देखा जाये तो एक ही मछली है, लेकिन सीमा के दोनों ओर उसकी आर्थिक और सांस्कृतिक भूमिका अलग है। देखना होगा कि बांग्लादेश का यह परमिट-रोक फैसला अस्थायी प्रशासनिक कदम साबित होता है या हिलसा व्यापार में एक लंबी खींचतान की शुरुआत करता है। दुर्गापूजा से ठीक पहले लिया गया यह फैसला भारत के बाजार में पद्मा हिलसा की संभावित उपलब्धता पर भी असर डाल सकता है। उधर, बांग्लादेश के लिए भी चुनौती कम नहीं है क्योंकि जिस भारतीय आपूर्ति ने उसकी घरेलू और औद्योगिक जरूरतों में एक खाली जगह भरी है, उसे अचानक रोकने का असर अंततः वहां के बाजार पर ही दिखाई देगा। बहरहाल, हिलसा की यह कहानी अब सिर्फ स्वाद, परंपरा और बंगाली भावनाओं की कहानी नहीं रह गई है। यह भारत और बांग्लादेश के बीच बदलते व्यापारिक समीकरणों और एक-दूसरे पर निर्भर बाजारों की भी कहानी है। बांग्लादेश जिस भारतीय हिलसा को अपनी आपूर्ति की कमी पूरी करने के लिए खरीदता है, वही बांग्लादेशी पद्मा हिलसा भारत में दुर्लभता और प्रतिष्ठा के कारण सोने के भाव बिकती है। यानी एक ही मछली सीमा के इस पार भावनाओं की कीमत तय करती है और उस पार जरूरत की। ऐसे में अचानक व्यापार पर लगाई गई रोक सिर्फ मछली की आवाजाही रोकने का फैसला नहीं है। यह दोनों तरफ के बाजार, व्यापारियों और उपभोक्ताओं के लिए एक बड़ा सवाल छोड़ती है कि आखिर हिलसा के बहाने रिश्तों और व्यापार का यह खेल कब तक चलता रहेगा? -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 24 Sep 2026 12:17 pm

वैश्विक संकेतों से लाल निशान में खुला भारतीय शेयर बाजार

मुंबई, कमजोर वैश्विक संकेतों से भारतीय शेयर बाजार गुरुवार को लाल निशान में खुला।

देशबन्धु 24 Sep 2026 11:33 am

प्रधानमंत्री मोदी 24 सितंबर को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से 'सेवा यात्रा' के प्रतिभागियों से करेंगे संवाद

प्रधानमंत्री मोदी 24 सितंबर को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से 'सेवा यात्रा' के प्रतिभागियों से करेंगे संवाद

समाचार नामा 23 Sep 2026 11:17 pm

मतदाता सूची से लाखों नाम हटाना लोकतंत्र के लिए खतरा

चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया को लेकर जारी विवाद के बीच कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं

देशबन्धु 23 Sep 2026 10:33 pm

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन 25 सितंबर को जयपुर पहुंचेंगे

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन 25 सितंबर को जयपुर पहुंचेंगे

समाचार नामा 23 Sep 2026 10:20 pm

झारखंड भाजपा की सह-प्रभारी बनने पर निवेदिता सिंह ने जताई खुशी, बोलीं- 'संगठन को मजबूत करना प्राथमिकता'

झारखंड भाजपा की सह-प्रभारी बनने पर निवेदिता सिंह ने जताई खुशी, बोलीं- 'संगठन को मजबूत करना प्राथमिकता'

समाचार नामा 23 Sep 2026 10:09 pm

'नो फ्री लंच' बना केरल में नया सियासी मुद्दा, सीएम सतीशन पर भड़के बिनॉय विश्वम

'नो फ्री लंच' बना केरल में नया सियासी मुद्दा, सीएम सतीशन पर भड़के बिनॉय विश्वम

समाचार नामा 23 Sep 2026 10:06 pm

'जनता ने सिर्फ बयानबाजी और पोस्टरबाजी के लिए छोड़ा', सपा प्रमुख अखिलेश यादव पर बरसे संजय निषाद

'जनता ने सिर्फ बयानबाजी और पोस्टरबाजी के लिए छोड़ा', सपा प्रमुख अखिलेश यादव पर बरसे संजय निषाद

समाचार नामा 23 Sep 2026 8:07 pm

'वंदे मातरम' गैरकानूनी या राष्ट्रविरोधी नहीं, यह राष्ट्रभक्ति का प्रतीक : श्याम रजक

'वंदे मातरम' गैरकानूनी या राष्ट्रविरोधी नहीं, यह राष्ट्रभक्ति का प्रतीक : श्याम रजक

समाचार नामा 23 Sep 2026 7:55 pm

नवनियुक्त प्रभारी-सह प्रभारी 'विकसित भारत' के सपने को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे : नितिन नवीन

नवनियुक्त प्रभारी-सह प्रभारी 'विकसित भारत' के सपने को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे : नितिन नवीन

समाचार नामा 23 Sep 2026 7:26 pm

चुनाव आयोग के बचाव में भाजपा: अपनी हार-जीत बताई, आयुक्तों को यूपीए सरकार में मिले पुरस्कारों की संख्या गिनाई

पात्रा ने कहा कि 2014 के बाद से विपक्षी दलों को लगातार चुनावी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है और इसी कारण उनके मुताबिक अब चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।

देशबन्धु 23 Sep 2026 5:04 pm

राजनीति में कुसंस्कार को बढ़ावा देती कांग्रेस

कांग्रेस पार्टी चुनावों में लगातार पराजय का सामना कर रही है जिसने पार्टी युवराज राहुल गांधी को हताश कर दिया है। उनको इस हताशा से उबारने के लिए कांग्रेस ने पेपर लीक तथा छात्रों की अन्य समस्याओं को आधार बनाकर “छात्रों की गूंज” नाम का अभियान अभियान आरंभ किया जिससे कांग्रेस तथा राहुल गाँधी को छात्रों व युवाओं के एकमात्र हितैषी के रूप में स्थापित किया जा सके। जेन ज़ी के जोर शोर और सोशल मीडिया पर तमाम हल्ले गुल्ले के साथ शुरू हुआ राहुल गांधी का छात्रों की गूंज कार्यक्रम पहले झूठे तथा गलत तथ्यों के कारण चर्चा में रहा और फिर अर्मादित, अनुशासनहीन व्यवहार के कारण। पहले चरण में मनुस्मृति के अपमान से आरम्भ हुआ ये कार्यक्रम अगले चरण में राहुल और संदीप दीक्षित ने द्वारा प्रधानमंत्री पर अशालीन कटाक्ष तक पहुंचा जिसमें एक विदेशी महिला राष्ट्राध्यक्ष पर अपमानजनक टिप्पणी की गयी, उसका विवाद अभी शांत भी नहीं हुआ था कि ये लोग इंदौर पहुँच गए। मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में 19 सितंबर 2026 को छात्रों की गूँज का आयोजन किया गया। यहाँ एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिमिक्री की गई उनकी विदेश नीति का मजाक बनाया गया। सोशल मीडिया इन्फ़्लुएन्सर पुलकित मणि ने उनकी मां का भी उपहास उड़ाया और राहुल गांधी ने उनका इस कुकृत्य में साथ दिया। इंदौर में जो कुछ हुआ उसकी निंदा केवल भारतीय जनता पार्टी ही नहीं अपितु कांग्रेस के सहयोगी समाजवादी पार्टी व शिवसेना का उद्धव गुट भी कर रहा है। मुंबई में शिवसेना नेता आनंद दुबे ने कहा कि मंच से किसी के परिवार के बारे में आपत्तिजनक बात करना उचित नहीं है। आने वाले समय में सभी राजनैतिक दलों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए। मर्यादा नहीं टूटनी चाहिए। भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस के इस कृत्य को सर्कस व राहुल गांधी को “असंस्कारी नाराज फूफा“ करार दिया है। इसे भी पढ़ें: छात्रों के कार्यक्रम में नकारात्मक राजनीति क्यों? कांग्रेस के मंच पर जिस प्रकार पुलकित मणि से मिमिक्री कराई गयी वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के निकृष्टतम उपयोग का उदाहरण है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राहुल गाँधी पर निशाना साधते हुए कहा कि मैं एक वीडियो देख रहा था जिसमें उन्होंने नारी शक्ति का अपमान किया है। लोगों में संस्कार नहीं है। हमारी परंपरा कहती है- पहले आप। रास्ते में बुजुर्ग, महिला, दिव्यांग को पहले जाने देना हमारा संस्कार है लेकिन जो भारत को अपमानित करने का लक्ष्य मान लेते हैं वे कुटुम्बकम भाव को नहीं समझ सकते। सत्य, असत्य और अर्धसत्य होता है और कुछ लोग अर्धसत्य कहकर ही भारत की छवि धूमिल करना चाहते हैं। राहुल के मंच से मोदी जी की मां का उपहास भारत माता का उपहास है, भारत की समस्त मातृशक्ति का उपहास है। मां के उपहास को भारत की मूल आत्मा कतई स्वीकार नहीं करेगी और न ही कभी माफ करने वाली है। यह सत्य है भारत की सनातन आस्था वाली आम जनता इस प्रकार से किए जाने वाले स्त्री अपमान को सहन नहीं करती और समय आने पर उत्तर देती है। बिहार विधान सभा चुनाव में कांग्रेस के मंच से पीएम मोदी की मां को गाली दी गई और बिहार में कांग्रेस का सफाया हो गया । इसी प्रकार राहुल गांधी अपने बयान, “लोग मंदिरों में लड़कियां छेड़ने के लिए जाते हैं” के बाद हुस अपना हश्र भी देख सकते हैं। राहुल गांधी पूरी तरह से भ्रम फ़ैलाने की राजनीति कर रहे हैं और विकृत मानसिकता से ग्रस्त हो चुके हैं। उनका एकमात्र लक्ष्य प्रधानमंत्री मोदी की छवि को धूमिल करना, सनातन संस्कृति को बदनाम करना तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर भरत की बदलती हुई तस्वीर की विकृत छवि प्रस्तुत करना है। किंतु हो इसका विपरीत रहा है राहुल गांधी अपने ही बुने जाल में फंसते जा रहे हैं। इससे उनका निकल पाना या सुधर जाना बहुत कठिन हो गया है । राहुल गांधी के असभ्य व्यवहार के कारण युवा वर्ग उनसे नहीं जुड़ पा रहा है। कांग्रेस का सबसे दुर्भाग्यूपर्ण पहलू यह है कि कोई भी वरिष्ठ नेता राहुल को समझाने के लिए आगे नहीं आता, उनको युवराज का दर्जा हासिल है इसके चाटुकार लोग इंदौर जैसी घटनाओं का समर्थन करने के लिए उतर पड़ते हैं। देश के युवाओं में आक्रोश है जिसके कारण कामेडियन पुलकित मणि के शो एक के बाद एक रद्द हो रहे हैं। राहुल गांधी के मंच से पर हुई मिमिक्री को हिंदुस्तान की हर मां और संपूर्ण मातृशक्ति का अपमान बताया जा रहा है लेकिन कांग्रेस के प्रवक्ता और आई टी सेल ण केवल इसके बचाव में लगे हैं वरन इसको मास्टर स्ट्रोक बता रहे हैं। उधर दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों ने छात्रसंघ के चुनाव परिणामों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को 3-1 से विजयी बनाकर बता दिया कि देश का युवा क्या पसंद करता है। - मृत्युंजय दीक्षित

प्रभासाक्षी 23 Sep 2026 4:43 pm

छात्रों के कार्यक्रम में नकारात्मक राजनीति क्यों?

लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति संवाद है। सरकार और विपक्ष के बीच वैचारिक विरोध होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन जब राजनीतिक संवाद का केंद्र नीतियों और जनसमस्याओं से हटकर व्यक्तियों पर टिप्पणियों, आरोपों, कटाक्षों और उपहास तक सीमित होने लगे तो लोकतांत्रिक विमर्श की गंभीरता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। वर्तमान में भारत की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यह है कि राजनीतिक दल रचनात्मक विरोध की जगह अनुचित आरोप प्रत्यारोप की परिधि में लगातार सक्रिय हैं। इस प्रकार की राजनीति देश के लोकतंत्र के उत्थान का मार्ग बिलकुल भी तैयार नहीं कर सकती। अभी कुछ पूर्व इंदौर में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम से जुड़ा मिमिक्री विवाद इसका ताजा उदाहरण है। कार्यक्रम का मूल विषय विद्यार्थियों की समस्याओं, शिक्षा, परीक्षाओं, रोजगार और छात्रावास जैसी चिंताओं से जुड़ा था। लेकिन ऐसा लगा कि कार्यक्रम अपने मूल उद्देश्य से भटक कर आरोपों और व्यक्तिगत खिल्ली उडाने पर ही केंद्रित होकर रह गया। आज चिंता इस बात की है कि छात्रों के सामने समस्या नहीं समाधान की चर्चा होना चाहिए। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने छात्रों के सामने इस अंदाज में अपनी बात रखने का प्रयास किया कि छात्र सरकार के विरोध में खड़े हो जाएं। जिन बातों का उल्लेख छात्रों के समक्ष होना चाहिए, वे मुद्दे भी कार्यक्रम में पूरी तरह गायब दिखाई दिए। ऐसे में सवाल उठता है कि हमारे राजनीतिक दल छात्रों को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं। इसे भी पढ़ें: प्रधानमंत्री की मां हो या गरीब की... Indore Mimicry Row पर Akhilesh Yadav का बड़ा बयान हालांकि कार्यक्रम में कुछ मुद्दों पर सरकार पर सवाल भी उठाए। लेकिन ऐसे सवाल छात्रों के बीच नहीं आना चाहिए। कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिमिक्री को लेकर शुरू हुआ विवाद देखते ही देखते राजनीतिक बहस का प्रमुख विषय बन गया। विपक्ष की ओर से इसे राजनीतिक व्यंग्य और अभिव्यक्ति के अधिकार के संदर्भ में देखा गया। क्या अभिव्यक्ति इस प्रकार की होना चाहिए, कदापि नहीं। यहां प्रश्न केवल मिमिक्री का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या राजनीतिक कार्यक्रमों में गंभीर मुद्दों को केंद्र में रखने के बजाय व्यक्तिगत कटाक्ष और उपहास को अधिक स्थान मिलना चाहिए? राजनीति में व्यंग्य कोई नई बात नहीं है। लोकतंत्र में व्यंग्य सत्ता से सवाल पूछने का माध्यम भी रहा है। नेता, सरकारें और नीतियां आलोचना के विषय बनती रही हैं। लेकिन व्यंग्य और व्यक्तिगत अवमानना के बीच एक महीन रेखा होती है। राजनीतिक विरोध कितना तीखा हो, यह राजनीतिक परिस्थितियां तय कर सकती हैं, लेकिन सार्वजनिक जीवन में भाषा और व्यवहार की मर्यादा का प्रश्न हमेशा बना रहता है। इंदौर की घटना में भी यही बहस सामने आई। इस पूरे प्रसंग से एक बड़ा सवाल जरूर निकलता है कि क्या विद्यार्थियों के मंच पर विद्यार्थियों के मूल प्रश्न पीछे छूट जाने चाहिए? यदि किसी छात्र को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल रही, यदि परीक्षा व्यवस्था को लेकर उसके मन में चिंता है, यदि रोजगार उसके भविष्य का सबसे बड़ा प्रश्न है या किसी छात्रा के सामने सुरक्षित और किफायती आवास की समस्या है, तो राजनीति का दायित्व है कि वह इन प्रश्नों को मजबूती से उठाए। इन सवालों के उत्तर भी उसी गंभीरता से मांगे जाने चाहिए। विपक्ष यदि सरकार की शिक्षा नीति से असहमत है तो उसे आंकड़ों के साथ अपना पक्ष रखना चाहिए। सरकार यदि विपक्ष के आरोपों को गलत मानती है तो उसे आंकड़ों और तथ्यों के साथ जवाब देना चाहिए। यही स्वस्थ लोकतांत्रिक बहस का रास्ता है। दुर्भाग्य यह है कि आज आरोप लगाना आसान हो गया है और आरोप का जवाब भी एक नए आरोप से देने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। एक नेता किसी नीति पर सवाल उठाता है तो जवाब में नीति की चर्चा करने के बजाय उसके पुराने बयान खोजे जाते हैं। किसी सरकार के निर्णय पर सवाल उठता है तो विपक्ष के पुराने कार्यकाल की कमियां गिनाई जाती हैं। किसी नेता की आलोचना होती है तो उसके जवाब में दूसरे नेता की आलोचना सामने आ जाती है। इस प्रकार राजनीतिक संवाद एक ऐसी प्रतिस्पर्धा में बदल जाता है जिसमें यह साबित करने की कोशिश होती है कि सामने वाला अधिक गलत है। लेकिन जनता का सवाल इससे अलग है कि आप क्या करेंगे? राजनीतिक दलों की ठोस योजनाएं क्या हैं। इन सवालों का उत्तर किसी आरोप से नहीं दिया जा सकता। राजनीति में व्यक्तिगत आक्षेप इसलिए भी चिंता का विषय हैं क्योंकि वे धीरे-धीरे राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा बन जाते हैं। नेता जिस भाषा का इस्तेमाल करते हैं, उसका प्रभाव समाज पर भी पड़ता है। समर्थक उसी भाषा को दोहराते हैं और फिर राजनीतिक मतभेद सामाजिक कटुता में बदलने लगते हैं। लोकतंत्र में विरोध होना चाहिए, लेकिन विरोध का अर्थ वैमनस्य नहीं है। आज विपक्ष की ओर से सरकार के प्रति पूरी तरह कटुता का व्यवहार किया जा रहा है। इंदौर के कार्यक्रम में भी कटुता का खेल खेला गया। क्या छात्र ऐसी कटुता को अपने उत्थान और विकास के लिए जरूरी मानते हैं। यह सवाल राजनीतिक दलों से पूछने का साहस भी छात्रों को करना चाहिए। यहां यह भी आवश्यक है कि इस प्रश्न को केवल एक दल या एक नेता तक सीमित न किया जाए। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, राजनीतिक मर्यादा की कसौटी सबके लिए समान होनी चाहिए। यदि विपक्ष किसी नेता की मिमिक्री करता है तो उसकी समीक्षा होनी चाहिए; यदि सत्ता पक्ष विपक्षी नेताओं पर व्यक्तिगत कटाक्ष करता है तो उस पर भी उतनी ही गंभीरता से सवाल उठना चाहिए। लोकतांत्रिक मर्यादा किसी एक दल की संपत्ति नहीं है। विपक्ष को भी लोकतान्त्रिक मर्यादा के तहत कार्यक्रम करना चाहिए। इंदौर का कार्यक्रम राजनीतिक सभा या रैली नहीं था, वह छात्रों का कार्यक्रम था, इसलिए इस कार्यक्रम में प्रथम दृष्टया राजनीतिक आरोप लगना ही नहीं चाहिए। राजनीतिक दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि वे अपने विरोधी को कितनी तीखी भाषा में जवाब दे सकते हैं। चुनौती यह है कि वे जनता के सामने अपनी नीतियों और योजनाओं को कितनी स्पष्टता से रख सकते हैं। आरोप-प्रत्यारोप से तालियां मिल सकती हैं, सोशल मीडिया पर चर्चा हो सकती है और समर्थकों का उत्साह भी बढ़ सकता है, लेकिन इससे समस्याओं का समाधान नहीं होता। बेरोजगार युवा को रोजगार चाहिए, उसे यह जानने में रुचि है कि सरकार और विपक्ष उसके लिए क्या करेंगे। विद्यार्थी को बेहतर शिक्षा चाहिए, उसे यह जानना है कि परीक्षा व्यवस्था कैसे विश्वसनीय बनेगी। परिवार को सुरक्षित भविष्य चाहिए, उसे राजनीतिक कटाक्षों से अधिक ठोस नीतियों की आवश्यकता है। इसलिए आज राजनीति को फिर से मुद्दों की ओर लौटने की जरूरत है। विरोध कीजिए, लेकिन नीतियों का विरोध कीजिए। सरकार से सवाल पूछिए, लेकिन तथ्यों के साथ पूछिए। विपक्ष के आरोपों का उत्तर दीजिए, लेकिन वैकल्पिक नीति के साथ दीजिए। व्यंग्य कीजिए, लेकिन ऐसी सीमा का ध्यान रखिए जहां राजनीतिक आलोचना व्यक्तिगत अपमान में न बदल जाए। लोकतंत्र में असहमति आवश्यक है, किंतु असहमति को संवाद में बदलना उससे भी अधिक आवश्यक है। राजनीति का उद्देश्य केवल यह सिद्ध करना नहीं होना चाहिए कि दूसरा पक्ष गलत है, राजनीति का बड़ा उद्देश्य यह बताना होना चाहिए कि जनता के लिए सही रास्ता क्या है और उस रास्ते पर चलने की योजना क्या है। आज जनता राजनीतिक दलों से यही अपेक्षा कर रही है कि वे आरोपों की राजनीति से आगे बढ़ें और समाधान की राजनीति को केंद्र में लाएं। यदि राजनीति लगातार व्यक्तियों के इर्द-गिर्द घूमती रही तो मुद्दे पीछे छूट जाएंगे। और जब मुद्दे पीछे छूटते हैं, तब लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष जनता की वास्तविक समस्याएं भी राजनीतिक विमर्श से बाहर होने लगती हैं। इसलिए समय की मांग स्पष्ट है कि कटाक्ष कम हों, संवाद बढ़े, आरोप कम हों, तथ्य बढ़ें और व्यक्तियों से अधिक मुद्दों पर राजनीति हो। यही लोकतंत्र की गरिमा भी है और जनता के प्रति राजनीति की वास्तविक जिम्मेदारी भी। - सुरेश हिंदुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार

प्रभासाक्षी 23 Sep 2026 4:39 pm

भाजपा के नए प्रदेश प्रभारी: नितिन नबीन ने बदली राज्यों की जिम्मेदारी, विनोद तावड़े को यूपी की कमान

भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन ने राज्यों के प्रभारियों की नई जिम्मेदारियां तय की हैं। विनोद तावड़े को यूपी और सतीश पूनिया को पंजाब का प्रभारी बनाया गया है।

देशबन्धु 23 Sep 2026 3:39 pm

शालीमार बाग में मस्जिद पर बुलडोजर कार्रवाई का मुस्लिम नेताओं ने किया विरोध, कहा- 'इबादत से रोकने की हो रही कोशिश'

शालीमार बाग में मस्जिद पर बुलडोजर कार्रवाई का मुस्लिम नेताओं ने किया विरोध, कहा- 'इबादत से रोकने की हो रही कोशिश'

समाचार नामा 23 Sep 2026 3:13 pm

अगर अमेरिका ने सौ प्रतिशत का टैरिफ थोपा तो !

अमेरिकी संसद के दोनों सदनों से ‘सैंक्शनिंग रशा एंड ईरान एक्ट’ के पारित होने को लेकर देश में आशंकाओं के बादलों का उठना स्वाभाविक है। आज जिस आर्थिकी और विश्व व्यवस्था को तकरीबन पूरी दुनिया ने अपना रखा है, उसकी वजह से पूरी दुनिया को लगता है कि अमेरिका के सहयोग के बिना वह एक कदम आगे नहीं रख सकती। वैश्विक आर्थिकी में डालर के वर्चस्व के चलते ज्यादातर देशों को लगता है कि अगर अमेरिका की आंखें टेढ़ी हुईं तो उस पर महाविपत्ति आ जाएगी। इसी सोच का ही असर है कि इस अधिनियम के पारित होने के बाद भारत के प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस की नजर में भारतीय विदेश नीति नाकाम नजर आने लगी है। सैद्धांतिक रूप से भारतीय वामपंथी इकोसिस्टम अमेरिका का हर पल खुला विरोध करता है, लेकिन उसे भी अमेरिकी टैरिफ कानून भारतीय हित के खिलाफ नजर आ रहा है। इन सबके बीच भारत सरकार की प्रतिक्रिया संतुलित और सधी हुई है। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारत अपनी 140 करोड़ की आबादी की ऊर्जा सुरक्षा के लिए दृढ़ है। जाहिर है, भारत को झुकाने की सोच रखने वाले ट्रंप प्रशासन को ऐसी प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं रही होगी। ऐसे में अमेरिका के अगले कदम पर निगाह रखना ज्यादा जरूरी हो जाता है। रूस और ईरान से अगर भारत द्वारा तेल खरीदने का बुनियादी लक्ष्य रूस- यूक्रेन युद्ध को बढ़ावा देना या ईरान-इजरायल युद्ध में अमेरिका और इजरायल का विरोध नहीं है। दरअसल भारत मौजूदा माहौल में अपनी भारी-भरकम जनसंख्या के लिए किफायती ऊर्जा सुरक्षा को संरक्षित कर रहा है। इसलिए भारत का न झुकना देश के विपक्षी दलों और अमेरिकी सरकार के लिए हैरतअंगेज भले ही हो, भारतीय हितों के अनुकूल नहीं है। वैसे जब से ट्रंप ने अमेरिकी राष्ट्रपति का पद संभाला है, अपने ऊल-जलूल फैसलों के लिए ही वे जाने गए हैं। यह पहला मौका नहीं है कि उन्होंने इस कानून के जरिए भारत को दबाने की कोशिश की है। बीते साल एक अगस्त 2025 से उन्होंने भारतीय वस्तुओं पर 25 प्रतिशत का टैरिफ लगा दिया था। जिससे उनके ही बाजार में भारतीय वस्तुएं और सामान महंगे होने लगे थे। तब चालाकी दिखाते हुए ट्रंप प्रशासन ने फार्मास्युटिकल्स को इस टैरिफ से अलग रखा था। इसकी वजह यह है कि भारत से अमेरिका आने वाली दवाएं सस्ती पड़ती हैं। भारतीय रत्न और आभूषणों पर टैरिफ लगाने का बहुत असर नहीं पड़ा था। क्योंकि रत्न और आभूषण स्वभाव से ही महंगे होते हैं और उन्हें खरीदने वाले लोगों के लिए इनकी महंगाई मायने नहीं रखती। ठीक वैसे ही, जैसे भारत में महंगा होने के बावजूद सोने की खरीद-बिक्री पर असर नहीं पड़ा है। भारतीय सामान जब बढ़े टैरिफ के चलते अमेरिकी बाजार में महंगे होने लगे तो अमेरिका में भी ट्रंप प्रशासन के इस फैसले के खिलाफ सवाल उठने लगे। तब तक अमेरिकी प्रशासन को भी समझ आने लगा था कि उसने कैसा कदम उठाया है। इसका असर यह हुआ कि फरवरी 2026 में ट्रंप प्रशासन को टैरिफ में कटौती करनी पड़ी। इसे भी पढ़ें: इस बार भी मोदी नहीं जाएंगे UNGA, Jaishankar ही संभालेंगे मोर्चा, क्या Trump से आमना-सामना नहीं चाहते PM? पश्चिमी एशिया का हालिया संकट अमेरिका की ही देन है। जब से यह संकट बढ़ा है, भारत ने रूस से तेल की खरीददारी बढ़ा दी है। यह भारत की मजबूरी भी है। बीती जुलाई में भारत ने अपने कुल तेल आयात का 51.4 प्रतिशत तेल अकेले रूस से खरीदा था। रूस से तेल खरीद का भारतीय मकसद मौजूदा हालात में अपने लिए किफायती दरों पर तेल हासिल करना है। भारत का यह अधिकार है और मौजूदा हालात में अगर भारत झुकता है तो इसे भारतीय नागरिक शायद ही पसंद करेगा। भारत की तुलना में चीन ना सिर्फ रूस, बल्कि ईरान से भी भारी मात्रा में तेल खरीद रहा है। रूस से तेल खरीदना उसके लिए ज्यादा आसान और सस्ता है। चूंकि दोनों देशों की सीमाएं मिलती हैं और तेल की आपूर्ति पाइपलाइन के जरिए आसानी से होती है, इसलिए चीन भी टैरिफ युद्ध के निशाने पर होने के बावजूद तेल खरीद से पीछे नहीं हट रहा तो फिर हमें ही क्यों पीछे रहना चाहिए। इसमें दो राय नहीं कि अगर अमेरिकी राष्ट्रपति इस कानून के तहत भारत पर सौ प्रतिशत टैरिफ थोपते हैं तो भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात को बड़ा झटका लग सकता है। जानने की बात है कि भारत से अमेरिका भेजे जाने वाले सामानों में टेक्सटाइल्स, रत्न और आभूषण, आटोमोबाइल और इंजीनियरिंग उत्पाद ज्यादा है। टैरिफ अगर बढ़ेगा तो अमेरिकी बाजार में इनकी कीमतें महंगी होंगी, जिससे उनकी मांग घट सकतकी है। इससे भारतीय निर्यातकों को नुकसान हो सकता है। कुछ जानकारों को लगता है कि इससे रूस से जारी तेल खरीद से मिल रही अरबों रूपए की राहत खटाई में पड़ सकती है। यहां ध्यान देने की बात यह भी है कि भारत, अमेरिका से व्यापार समझौते को लेकर बातचीत जारी रखे हुए है। अगर सौ प्रतिशत टैरिफ लागू किया जाता है तो इस प्रस्तावित व्यापार समझौते में अड़चन आ सकती है। हो सकता है कि यह बातचीत ही खटाई में पड़ जाए। बेशक अमेरिका भारत का बड़ा कारोबारी साझीदार है। लेकिन मोदी के 2024 में सत्ता में आने के बाद से अब तक करीब चालीस देशों से मुक्त व्यापार समझौता किए जा चुके हैं। भारत ने हाल ही में यूरोपीय संघ से भी ऐसा समझौता किया है। भारत का मॉरीशस, संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रेलिया, यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ, ब्रिटेन, ओमान, न्यूजीलैंड आदि से मुक्त व्यापार समझौते या व्यापक आर्थिक साझेदारी का समझौता कर चुका है। भारत सरकार के ही आंकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अपने कारोबारी नेटवर्क का विस्तार करते हुए नौ बड़े मुक्त व्यापार समझौते भी किए हैं। यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ यानी ईएफटीए में आइसलैंड, लिकटेंस्टीन, नॉर्वे और स्विट्जरलैंड शामिल हैं। इसी तरह भारत ने आसियान देशों, जापान, दक्षिण कोरिया और साफ्टा के सदस्य देशों के साथ पारंपरिक कारोबारी समझौता कर चुका है। अगर अमेरिका भारत पर टैरिफ थोपता है तो देश को चाहिए कि इन देशों के जरिए कारोबार को बढ़ावा दे। वैसे भी टैरिफ थोपने की दशा में भारतीय कारोबारी दूसरे देशों के जरिए अमेरिका में अपना माल भेज सकते हैं। उम्मीद कर सकते हैं कि सरकार भी ऐसी राह तलाशने की कोशिश में जुटी होगी। फिर भारतीय अर्थव्यवस्था भी पहले जैसी नहीं रही, इसलिए हताश और चिंतित होने की जरूरत नहीं है, भारत को अमेरिकी बाजार में घुसने के लिए वैकल्पिक राहों की तलाश तेज करनी होगी। - उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं..

प्रभासाक्षी 23 Sep 2026 3:06 pm

पुलिस स्टेशन में आधिकारिक आवेदन जमा करें, एक्टर नानी के अनुरोध पर तेलंगाना के सीएम रेवंत रेड्डी का जवाब

हैदराबाद, 23 सितंबर (आईएएनएस)। तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने बुधवार को अभिनेता नानी के उस अनुरोध का जवाब दिया, जिसमें उन्होंने हैदराबाद के आरटीसी एक्स रोड्स में अपनी फिल्म 'द पैराडाइज' के प्रीमियर शो में जाने की अनुमति मांगी थी।

समाचार नामा 23 Sep 2026 2:38 pm

दवा कंपनियों की लूट पर Supreme Court ने की सख्त टिप्पणी, 'दिनदहाड़े डकैती और वसूली' पर प्रशासन चुप क्यों है?

बीमारी इंसान को केवल शारीरिक रूप से नहीं तोड़ती, बल्कि इलाज का खर्च कई परिवारों की आर्थिक कमर भी तोड़ देता है। ऐसे समय में जब कोई परिवार कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहा हो, तब जीवन बचाने वाली दवा की कीमत में दस गुना तक का अंतर सामने आए तो सवाल सिर्फ महंगी दवा का नहीं रह जाता, बल्कि पूरी व्यवस्था की जवाबदेही का बन जाता है। हम आपको बता दें कि सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को दवाओं की कीमतों में इसी भयावह अंतर पर गंभीर चिंता जताते हुए ऐसे सवाल उठाए हैं, जिनका जवाब सरकार, दवा कंपनियों, नियामक संस्थाओं और अस्पतालों, सभी को देना होगा। मामला उस समय बेहद गंभीर हो गया जब अदालत के सामने बताया गया कि कैंसर की एक आवश्यक दवा खुदरा विक्रेताओं को करीब 2,700 रुपये में उपलब्ध कराई जाती है, लेकिन उसी दवा पर 27,000 रुपये का अधिकतम खुदरा मूल्य अंकित है। यानी खुदरा मूल्य उस कीमत का लगभग दस गुना है जिस पर दवा खुदरा विक्रेता तक पहुंच रही है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने इस अंतर पर कड़ा सवाल उठाते हुए पूछा कि आखिर किसी मरीज से इतनी बड़ी रकम क्यों वसूली जानी चाहिए और जिन अधिकारियों को ऐसी व्यवस्था पर निगरानी रखनी चाहिए, वे चुप क्यों हैं। इसे भी पढ़ें: Facebook और X पर एंटी नेशनल कंटेंट हटाने की मांग खारिज, Supreme Court का दखल से इनकार देखा जाये तो यहां से सवालों की पूरी श्रृंखला शुरू होती है। अगर दवा की वास्तविक आपूर्ति कीमत और मरीज से वसूले जाने वाले मूल्य के बीच इतना बड़ा अंतर हो सकता है, तो मूल्य-निर्धारण की निगरानी कौन कर रहा है? अगर नियामक संस्थाएं मौजूद हैं, तो ऐसी कीमतें बाजार में पहुंचती कैसे हैं? और अगर नियम हैं, तो उनका पालन कराने की जिम्मेदारी किसकी है? सर्वोच्च न्यायालय ने इस अंतर को लेकर बेहद कठोर भाषा का इस्तेमाल किया और इसे मरीजों के साथ ‘दिनदहाड़े डकैती’ तथा ‘वसूली’ जैसे शब्दों से जोड़ा। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि जब जीवनरक्षक दवा की कीमत इतनी अधिक हो जाती है तो मजबूर मरीज क्या करे? अदालत के समक्ष यह बात भी रखी गई कि इलाज के लिए परिवारों को मकान और गहने तक बेचने पड़ते हैं। यही इस पूरे मामले का सबसे दर्दनाक पहलू है। देखा जाये तो एक स्वस्थ व्यक्ति किसी वस्तु की ऊंची कीमत देखकर उसे खरीदने से इंकार कर सकता है, लेकिन गंभीर बीमारी से जूझ रहा मरीज दवा को आसानी से मना नहीं कर सकता। कैंसर की दवा, हृदय की दवा या किसी दूसरी गंभीर बीमारी की आवश्यक औषधि उसके लिए विलासिता नहीं, जिंदगी की जरूरत है। ऐसे में मरीज और उसके परिवार की मजबूरी ही बाजार में उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है। सवाल यह भी है कि क्या किसी अस्पताल की अपनी दवा दुकान से ही दवा खरीदने के लिए मरीज को मजबूर किया जाना चाहिए? हम आपको बता दें कि याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि कुछ निजी अस्पताल मरीजों को बाहर से सस्ती दवा खरीदने की अनुमति नहीं देते और अस्पताल की ही दवा दुकान से महंगी दवा लेने के लिए मजबूर करते हैं। इन आरोपों की अंतिम कानूनी पुष्टि होना अभी बाकी है, लेकिन अदालत ने इन परिस्थितियों और कीमतों के अंतर को गंभीरता से लिया है। देखा जाये तो मामला तब और गंभीर हो जाता है जब सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का पैसा इसमें शामिल हो। सर्वोच्च न्यायालय ने चिंता जताई कि यदि किसी सरकारी स्वास्थ्य योजना के तहत अस्पताल महंगी कीमत पर दवा की प्रतिपूर्ति हासिल करता है, तो अंततः उस खर्च का भार करदाताओं पर पड़ सकता है। अदालत ने ऐसी स्थिति में सार्वजनिक धन के दुरुपयोग की आशंका पर भी सवाल उठाया। यहां सरकार और नियामक तंत्र से एक और बड़ा सवाल है। जब दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए व्यवस्था मौजूद है, तो क्या उसका दायरा पर्याप्त है? सुनवाई के दौरान यह मुद्दा सामने आया कि कई दवाएं मूल्य-सीमा के दायरे से बाहर हैं और गैर-अनुसूचित दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने को लेकर नियामकीय खालीपन मौजूद है। हालांकि इस पूरे मामले में यह भी जरूरी है कि हर ऊंची कीमत को अपने आप घोटाला या हर अस्पताल और दवा कंपनी को दोषी न माना जाए। अस्पतालों के एक प्रमुख संगठन ने हाल में कहा है कि दवाओं का अधिकतम खुदरा मूल्य अस्पताल तय नहीं करते और खरीद कीमत तथा मरीज से लिए गए मूल्य के अंतर को अलग-अलग परिस्थितियों में जांचना चाहिए। इसलिए असली जरूरत पारदर्शी जांच, कीमतों की स्पष्ट जानकारी और जिम्मेदारी तय करने की है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय की मौजूदा सुनवाई ने कम से कम एक महत्वपूर्ण दरवाजा खोल दिया है कि अब सवाल पूछा जा रहा है। और आम आदमी के लिए यही सबसे बड़ी उम्मीद है। अदालत ने केवल महंगी दवा की शिकायत सुनकर मामला आगे नहीं बढ़ाया, बल्कि यह पूछा कि कीमत तय करने की व्यवस्था क्या है, नियामक कहां है, मरीज पर इतना बोझ क्यों है और सार्वजनिक धन का इस्तेमाल किस तरह हो रहा है। हम आपको बता दें कि अगली सुनवाई 29 सितंबर 2026 को होनी है, जिसमें दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने और सस्ती जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता से जुड़े प्रस्तावों पर आगे विचार होना है। सर्वोच्च न्यायालय की यह सख्ती इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि स्वास्थ्य कोई ऐसा बाजार नहीं होना चाहिए जहां मरीज की मजबूरी मुनाफे का अवसर बन जाए। जरूरत अब सिर्फ तीखी टिप्पणियों की नहीं, बल्कि ऐसी ठोस व्यवस्था की है जिसमें दवा की वास्तविक लागत, निर्माता का मूल्य, खुदरा मूल्य और मरीज से वसूली जाने वाली रकम के बीच पारदर्शिता हो। क्योंकि बीमारी से लड़ रहा आम आदमी पहले ही जिंदगी की लड़ाई लड़ रहा है। उसे इलाज के नाम पर कीमतों की ऐसी भूलभुलैया में धकेलना, जहां वह अपनी जिंदगी बचाने के लिए घर-गहने बेचने को मजबूर हो जाए, तब इस व्यवस्था पर सवाल उठना बिल्कुल स्वाभाविक है। सर्वोच्च न्यायालय ने इन सवालों को अदालत की चौखट से बाहर समाज के सामने ला दिया है। अब निगाह इस बात पर है कि इन सवालों के बाद व्यवस्था बदलती है या फिर महंगी दवाओं का यह खेल उसी तरह चलता रहता है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 23 Sep 2026 1:44 pm

‘आप बचेंगे नहीं’, चुनाव आयोग पर खुलासे को लेकर राहुल गांधी बोले- ये संविधान पर हमला

कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका को लेकर भी कई आरोप लगाए हैं। पार्टी का दावा है कि चुनाव आयोग के दो अन्य सदस्यों की ओर से पिछले कुछ महीनों में कई शिकायतें की गईं और महत्वपूर्ण फैसलों को लेकर उन्हें पर्याप्त जानकारी या परामर्श नहीं दिया गया।

देशबन्धु 23 Sep 2026 1:37 pm

क्या सच में मनमर्जी करते हुए ज्ञानेश कुमार ने सरकार की शक्तियों को भी ठेंगा दिखा दिया? SIR के बीच चुनाव आयुक्तों में मतभेद की खबरों को ऑब्जर्वेशन और डिसेंट से समझें

क्या चुनाव आयोग के अंदर किसी की मनमर्जी चल रही है? आखिर क्या सच में दो चुनाव आयुक्तों ने नियम पालन न होने की शिकायत दर्ज कराई थी? क्या नए वोटरों को जोड़ने की प्रक्रिया में कोई अड़चने पैदा करने की कोशिश की गई। फॉर्म-6 की शक्तियों के मामले में सरकार की शक्तियों को भी ठेंगा दिखा दिया गया? चुनाव आयोग के जिन अधिकारियों को वोटर जोड़ने और हटाने का हक है, उनके हाथ क्या किसी ने बांध दिए? देशभर के वोटरों के डेटा को दिल्ली से कंट्रोल करने का चलन क्या शुरू किया गया? महीनों में 14 बार और एक ही दिन में कम से कम चार बार दो चुनाव आयुक्तिों को अपनी आपत्ति लिखित में दर्ज करानी पड़ी। इन आपत्तियों के बावजूद फैसले क्यों ले लिए गए। क्या सच में ऐसी परिस्थितियां बनी की चुनाव आयुक्तों को जाकर कैबिनेट सेक्रेटरी से शिकायत करनी पड़ गई। इसे भी पढ़ें: SIR पर अंदरूनी मतभेद की खबरों को चुनाव आयोग ने किया खारिज, कहा- 'सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए', विपक्ष का CEC ज्ञानेश कुमार पर तीखा हमला मीडिया रिपोर्ट में क्या कहा गया 10 महीनों में 14 बार बिना जानकारी लिए गए बड़े फैसले, दो चुनाव आयुक्तों ने दर्ज कराई लिखित आपत्ति भारतीय चुनाव आयोग (ECI) के भीतर कामकाज और पारदर्शिता को लेकर बड़ा अंदरूनी विवाद सामने आया है। द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट के मुताबिक, तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के दो चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में बिना उनकी जानकारी के लिए गए कई बड़े फैसलों और जारी किए गए आदेशों पर कड़ा ऐतराज जताया है। 10 महीनों में कम से कम 14 बार उठाई आपत्ति अखबार की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी द्वारा नवंबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच दर्ज की गई लिखित आपत्तियों की समीक्षा की गई है। इस दौरान दोनों आयुक्तों ने कम से कम 14 बार लिखित रूप से आपत्ति दर्ज कराते हुए सवाल किया कि आखिर उनकी सहमति और जानकारी के बिना ये आदेश और निर्णय कैसे जारी किए गए। रिपोर्ट के अनुसार, ये आपत्तियां मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को भी भेजी गई थीं। इसे भी पढ़ें: Election Commissioners की साख पर गहराया महा-संकट! निष्पक्षता पर उठी उंगली, क्या Supreme Court लेगा चुनाव आयोग में असहमति का स्वतः संज्ञान? किन अहम मुद्दों पर था दोनों आयुक्तों का ऐतराज? रिपोर्ट के मुताबिक, दो आयुक्तों द्वारा दर्ज की गई आपत्तियां मतदाता सूची और पंजीकरण प्रक्रिया से जुड़े अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण मामलों से संबंधित थीं। इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं: विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया: मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण से जुड़ी कार्यप्रणाली और उस पर लिए गए फैसले। फॉर्म-6 में बदलाव: नए मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़े फॉर्म-6 में किए गए संशोधन। मतदाताओं के नाम जोड़ना और हटाना: वोटर लिस्ट में नए नामों को शामिल करने और पुराने नामों को हटाने की प्रक्रिया। डेटा तक पहुंच: मतदाता सूची (Electoral Roll) के संवेदनशील डेटाबेस का रखरखाव और उसकी एक्सेस। अपील प्रक्रिया: मतदाता सूची से जुड़े निर्णयों के खिलाफ दायर होने वाली अपीलों की सुनवाई और निपटारे की व्यवस्था। चुनाव आयोग का जवाब चुनाव आयोग के सूत्रों ने उस मीडिया रिपोर्ट को खारिज कर दिया जिसमें दावा किया गया था कि स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) को लेकर चुनाव आयोग के अंदर मतभेद हैं। सूत्रों ने कहा कि SIR से जुड़े फैसलों समेत सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से सर्वसम्मति से लिए गए थे। सूत्रों ने कहा भारत के चुनाव आयोग के सभी फैसले, जिनमें SIR भी शामिल है, सर्वसम्मति से और दोनों चुनाव आयुक्तों तथा मुख्य चुनाव आयुक्त की मंजूरी से लिए गए हैं। ECI सूत्रों ने कहा कि हालांकि किसी भी मामले पर दोनों चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त की अपनी-अपनी राय हो सकती है, लेकिन भारत के चुनाव आयोग के सभी फैसले जिनमें SIR भी शामिल है। सर्वसम्मति से और दोनों चुनाव आयुक्तों तथा मुख्य चुनाव आयुक्त की मंजूरी से लिए गए हैं। भारतीय चुनाव आयोग (ECI) में फैसलों को लेकर सामने आई अंदरूनी आपत्तियों की खबरों के बीच अब आयोग से जुड़े सूत्रों का स्पष्टीकरण सामने आया है। सूत्रों के मुताबिक, विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े मसलों पर दोनों चुनाव आयुक्तों ने अपनी टिप्पणियां और सवाल जरूर रखे थे, जिन पर अंतिम फैसला लेने से पहले विचार भी किया गया था। हालांकि, किसी भी चुनाव आयुक्त ने अंतिम फैसले के खिलाफ कोई औपचारिक 'डिसेंट' (असहमति नोट) दर्ज नहीं कराया। आयोग का कहना है कि जिन फैसलों पर सवाल उठाए जा रहे हैं, उन सभी आदेशों पर तीनों सदस्यों के हस्ताक्षर मौजूद हैं। क्या होता है ऑब्जर्वेशन और डिसेंट में फर्क? चुनाव आयोग के सूत्रों का कहना है कि किसी भी नीतिगत मामले पर आंतरिक चर्चा के दौरान आयुक्तों द्वारा सवाल उठाना या टिप्पणियां (ऑब्जर्वेशन) करना एक सामान्य और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। ऑब्जर्वेशन (टिप्पणी/राय): चर्चा के दौरान किसी बिंदु पर स्पष्टीकरण मांगना या सुझाव देना। डिसेंट (औपचारिक असहमति): जब कोई आयुक्त बहुमत के अंतिम फैसले से पूरी तरह असहमत हो और आधिकारिक रिकॉर्ड पर अपनी असहमति दर्ज कराए। तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों की भूमिका व अधिकार बराबर होते हैं। यदि किसी मुद्दे पर मतभेद हो, तो निर्णय बहुमत के आधार पर लिया जाता है। यह स्पष्टीकरण उस मीडिया रिपोर्ट के बाद आया है जिसमें दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में SIR से जुड़े फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्ति जताई थी और कई कदम बिना उनकी जानकारी के उठाए जाने पर सवाल खड़े किए थे। पहले भी आयोग में दर्ज हो चुके हैं बड़े 'डिसेंट' चुनाव आयोग के कामकाज में आयुक्तों के बीच मतभेद या अलग राय दर्ज कराने का यह पहला मामला नहीं है। भारतीय चुनावी इतिहास में ऐसे कई अहम मौके आए हैं: 2019 का अशोक लवासा मामला: 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने आदर्श आचार संहिता से जुड़ी शिकायतों (जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण भी शामिल थे) के निपटारे पर अपने साथी आयुक्तों से अलग राय दर्ज कराई थी। 2009 का गोपालस्वामी विवाद: वर्ष 2009 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने सोनिया गांधी से जुड़े एक मामले में चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी और नवीन चावला के रुख से अलग औपचारिक राय रखी थी। एक सदस्यीय निकाय से तीन सदस्यीय आयोग तक का सफर वर्तमान में चुनाव आयोग तीन सदस्यीय निकाय के तौर पर काम करता है, लेकिन व्यवस्था हमेशा ऐसी नहीं थी। 1950 में जब निर्वाचन आयोग का गठन हुआ था, तब यह केवल मुख्य चुनाव आयुक्त वाला एक सदस्यीय निकाय था। 1950 से लेकर 1989 तक आयोग इसी एकल व्यवस्था के तहत संचालित होता रहा। बाद में इसे बहु-सदस्यीय बनाया गया, ताकि सभी महत्वपूर्ण चुनावी फैसलों में सामूहिक चर्चा और आम सहमति सुनिश्चित की जा सके। विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग की इस रिपोर्ट के बाद राजनीतिक प्रतिक्रिया हुई है; विपक्षी पार्टियों और नेताओं ने चुनाव आयोग के कामकाज पर सवाल उठाए हैं और CEC ज्ञानेश कुमार से जवाबदेही की मांग की है। मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कांग्रेस ने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार चुनाव आयोग को अपनी मर्ज़ी से चला रहे हैं। पार्टी ने कहा कि 'शिकायतों से साफ़ है कि तीन सदस्यों वाले चुनाव आयोग में सिर्फ़ ज्ञानेश कुमार की ही चलती है। कांग्रेस ने कुमार पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इशारे पर काम करने का आरोप लगाया और चुनाव आयोग में 'वोट चोरी' और राजनीतिक दखलंदाज़ी के अपने पुराने आरोपों को दोहराया। पार्टी ने कहा ज्ञानेश अपने बॉस मोदी की तरह ही तानाशाह की तरह काम कर रहे हैं और मोदी को खुश करने के लिए 'वोट चोरी' में लगे हैं। हमने पहले भी कहा है - मोदी ने चुनाव आयोग पर कब्ज़ा कर लिया है। ज्ञानेश कुमार मोदी की कठपुतली हैं। इंडियन एक्सप्रेस की यह रिपोर्ट इस बात को साबित करती है। मोदी और ज्ञानेश ने मिलकर देश के लोकतंत्र को भारी नुकसान पहुँचाया है। लेकिन याद रखें - जब समय आएगा, तो सभी को जवाबदेह ठहराया जाएगा, ज़िम्मेदारी तय की जाएगी। इस अपराध के लिए सज़ा ज़रूर मिलेगी। समाजवादी पार्टी (SP) के प्रमुख अखिलेश यादव ने इस रिपोर्ट को 'बेहद गंभीर' बताया और आरोप लगाया कि चुनाव आयुक्त अपनी सही ज़िम्मेदारियाँ नहीं निभा पा रहे हैं। उन्होंने तर्क दिया कि अगर किसी स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के सदस्य फ़ैसले लेने के लिए आज़ाद नहीं हैं या उनकी चिंताओं को नहीं सुना जाता है, तो इसके लोकतंत्र पर गंभीर असर पड़ेंगे। समाजवादी पार्टी के नेता ने कहा, इसका सीधा मतलब है कि सभी चुनाव आयुक्त अपनी सही ज़िम्मेदारियाँ नहीं निभा पा रहे हैं। अगर किसी स्वतंत्र संस्था के सदस्यों को सही काम करने की आज़ादी नहीं है या उनकी बात नहीं सुनी जाती है, तो ये लोकतंत्र के लिए बेहद घातक और खतरनाक हालात हैं। सत्ता में बैठे लोगों के हाथों की कठपुतली बनकर लोकतंत्र के साथ धोखा करना एक गंभीर संवैधानिक अपराध है। यह लोकतंत्र को खत्म करने की साज़िश से कम नहीं है। यादव ने सुप्रीम कोर्ट से भी इस मामले का स्वतः संज्ञान लेने की अपील की। TMC सांसद अभिषेक बनर्जी ने CEC को तुरंत हटाने और कोर्ट की निगरानी में जाँच के आदेश देने की माँग की। उन्होंने कहा, सिर्फ़ एक राजनीतिक पार्टी को फ़ायदा पहुँचाने के लिए लाखों वोटरों को वोट देने के अधिकार से वंचित करना हमारे लोकतंत्र की नींव पर प्रहार है। इसके लिए ज़िम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। पश्चिम बंगाल चुनावों के बाद, INDIA गठबंधन की सभी विपक्षी पार्टियों ने CJI और SC जजों को पत्र लिखकर गंभीर चिंताएँ जताई थीं। हालाँकि, उन आरोपों की न तो जाँच हुई और न ही उन पर ज़रूरी गौर किया गया। जब लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले गंभीर सवाल बार-बार उठाए जाते हैं और फिर भी उन पर कोई सुनवाई नहीं होती, तो इससे संस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठना लाज़मी है। सुप्रीम कोर्ट इससे मुँह नहीं मोड़ सकता। अंतिम ज़िम्मेदारी उसी की है। क्या CJI की अध्यक्षता वाली बेंच इस पर कोई कदम उठाएगी?

प्रभासाक्षी 23 Sep 2026 12:30 pm

कच्चे तेल की कीमतों में नरमी से भारतीय शेयर में बाजार बढ़त

मुंबई, भारतीय शेयर बाजार मंगलवार के कारोबारी सत्र में तेजी के साथ खुला। सुबह 9:20 पर सेंसेक्स 260 अंक या 0.36 प्रतिशत की तेजी के साथ 74,782 और निफ्टी 83 अंक या 0.35 प्रतिशत की मजबूती के साथ 23,411 पर था।

देशबन्धु 23 Sep 2026 12:06 pm

Meta Share Surge: एक दिन में 2 लाख करोड़ रुपये बढ़ी मार्क जुकरबर्ग की दौलत, AI रणनीति से मिला बड़ा फायदा

Meta Share Surge: एक दिन में 2 लाख करोड़ रुपये बढ़ी मार्क जुकरबर्ग की दौलत, AI रणनीति से मिला बड़ा फायदा

समाचार नामा 23 Sep 2026 10:40 am

रामपुर के मौलाना बोले- 'यूपी के अंदर कांग्रेस में अपने बलबूते सरकार बनाने का दम नहीं', इमरान मसूद को भी दिया जवाब

रामपुर के मौलाना बोले- 'यूपी के अंदर कांग्रेस में अपने बलबूते सरकार बनाने का दम नहीं', इमरान मसूद को भी दिया जवाब

समाचार नामा 23 Sep 2026 10:21 am

पंजाब: विधानसभा चुनाव से पहले ड्रग्स के पैसे को लेकर चिंताएं

पंजाब में विधानसभा चुनाव होने में कुछ ही महीने बचे हैं। नशीले पदार्थों की जब्ती और नार्को-टेररिज्म के नेटवर्क का भंडाफोड़ होने की लगातार खबरें आ रही हैं और इस पर सख्ती भी बरती जा रही है, फिर भी समाज के एक वर्ग का नशीले पदार्थों के गैर-कानूनी और अनैतिक धंधे में शामिल होना जारी है, जो चिंता का विषय बना हुआ है।

देशबन्धु 23 Sep 2026 7:10 am

'आप' में शामिल होने पर कोई डील नहीं हुई, भगवंत मान के विजन से प्रभावित: रविंदर सिंह ब्रह्मपुरा

'आप' में शामिल होने पर कोई डील नहीं हुई, भगवंत मान के विजन से प्रभावित: रविंदर सिंह ब्रह्मपुरा

समाचार नामा 22 Sep 2026 11:45 pm

तेलंगाना: एससी-एसटी समुदायों के यौन उत्पीड़न पीड़ितों को 'ग्रीन चैनल' से फंड जारी करने का निर्देश

तेलंगाना: एससी-एसटी समुदायों के यौन उत्पीड़न पीड़ितों को 'ग्रीन चैनल' से फंड जारी करने का निर्देश

समाचार नामा 22 Sep 2026 8:08 pm

भाजपा की संगठनात्मक भूमिका जिम्मेदारी है, पद नहीं : हरियाणा सीएम सैनी

भाजपा की संगठनात्मक भूमिका जिम्मेदारी है, पद नहीं : हरियाणा सीएम सैनी

समाचार नामा 22 Sep 2026 6:11 pm

चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग की तीन दिवसीय अमेरिका यात्रा के कूटनीतिक मायने

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निमंत्रण पर 23 से 25 सितंबर 2026 तक अमेरिका की राजकीय यात्रा पर रहेंगे। शी जिनपिंग 23 सितंबर को वाशिंगटन पहुंचेंगे। उनका यह दौरा 25 सितंबर को समाप्त होगा, जिसके बाद उनकी वापसी होगी। इस दौरान दोनों नेताओं के बीच शिखर वार्ता होगी, जिसमें व्यापार, टैरिफ, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और अन्य वैश्विक मुद्दों पर चर्चा की जाएगी। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की अमेरिका यात्रा वैश्विक भू-राजनीति (Geopolitics) और दोनों देशों के रिश्तों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा शी जिनपिंग का स्वागत करने और स्टेट डिनर देने के फैसले से साफ है कि दोनों महाशक्तियां तनाव को कम कर नए तालमेल की ओर बढ़ना चाहती हैं। लिहाजा इस यात्रा पर पूरी दुनिया के कूटनीतिज्ञों की नजर होगी। इस पर रूस और भारत की खास नजर बनी रहेगी, क्योंकि अमेरिका चाहेगा कि रूस और भारत से प्रगाढ़ हो रहे चीन के रिश्तों में कुछ खलल पैदा किया जाए। चूंकि अमेरिका ने सोवियत संघ और भारत के खिलाफ चीन को रणनीतिक मजबूती दी थी, लेकिन बाद में भी उसकी भूल साबित हुई। चीन को काबू में रखने के लिए अमेरिका ने भारत को शह दिया, लेकिन यहां भी उसका दांव उल्टा पड़ गया। इसलिए अमेरिका अब रूस और चीन से वन टू वन, और फिर जी-3 के माध्यम से बातचीत करने को उतावला है ताकि भारत, जापान, फ्रांस, दक्षिण कोरिया, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और ईरान जैसे महत्वाकांक्षी देशों को काबू में रखा जा सके। लेकिन यदि चीन व्यवहारिक कूटनीति को छोड़कर अमेरिकी मायाजाल में फंसता है तो फिर कहीं का नहीं रहेगा, क्योंकि भारत और रूस की समझदारी इतनी परिपक्व व मजबूत है कि उन्हें आंख दिखाने वाले उसी अंतर्राष्ट्रीय फजीहत को प्राप्त करेंगे, जैसा कि अभी अमेरिका भुगत रहा है। # इस यात्रा के प्रमुख कूटनीतिक मायने: एक, व्यापार युद्ध और टैरिफ में संतुलन: अमेरिका द्वारा चीनी सामानों पर अत्यधिक टैरिफ और निर्यात प्रतिबंध लगाने के बावजूद चीन ने रेयर अर्थ खनिजों और महत्वपूर्ण तकनीकों की सप्लाई रोककर कड़ा रुख अपनाया। इस यात्रा का प्राथमिक उद्देश्य नए व्यापारिक समझौते की रूपरेखा तैयार करना और दोनों देशों के बीच जारी आर्थिक/व्यापारिक तनाव को कम करना है। दो, रेयर अर्थ और AI की होड़: स्मार्टफोन, रक्षा सामग्री, इलेक्ट्रिक वाहनों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के लिए आवश्यक रेयर अर्थ खनिजों की वैश्विक आपूर्ति पर चीन का नियंत्रण है। अमेरिका अपनी सप्लाई चेन को सुरक्षित रखना चाहता है, जबकि चीन अमेरिका द्वारा सेमीकंडक्टर/चिप तकनीक पर लगाए गए प्रतिबंधों में ढील चाहता है। तीन, वैश्विक स्थिरता और मध्य-पूर्व संकट: दुनिया के दो बड़े नेताओं का मिलना वैश्विक बाजारों और अर्थव्यवस्था में स्थिरता का संदेश देता है। वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ते तनाव और रणनीतिक समुद्री रास्तों को सुचारू रखने जैसे मुद्दों पर दोनों देश कूटनीतिक सहयोग की गुंजाइश तलाश रहे हैं। चार, ताइवान और क्षेत्रीय सुरक्षा: चीन हमेशा से ताइवान पर अपने संप्रभु अधिकारों का दावा करता आया है। इस बैठक में अमेरिकी हथियारों की ताइवान को बिक्री पर चर्चा हो सकती है। बीजिंग इस मंच का इस्तेमाल अमेरिका को ताइवान के मामले में हस्तक्षेप कम करने का कूटनीतिक दबाव बनाने के लिए करेगा। # कूटनीतिक संदर्भ के क्षेत्र, अमेरिकी हित और चीनी हित व्यापार में अमेरिकी सोयाबीन व कृषि उत्पादों की बिक्री व बाजार पहुंच पर डील करेगा, जबकि चीन टैरिफ दरों में कमी और आर्थिक स्थिरता पर जोर देगा। - तकनीक में अमेरिका AI और सेमीकंडक्टर क्षेत्र में अपनी बढ़त बनाए रखना चाहेगा, जबकि चीन अमेरिकी टेक एक्सपोर्ट बैन और प्रतिबंधों से राहत चाहेगा। - सप्लाई चेन में अमेरिका रेयर अर्थ मिनरल्स की बिना बाधा आपूर्ति चाहेगा, जबकि चीन वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग में केंद्रीय भूमिका बनाए रखना चाहेगा। # अमेरिका और चीन की डील से भारत और रूस पर क्या- क्या असर पड़ सकते हैं? अमेरिका और चीन की यह द्विपक्षीय बातचीत और 'प्रबंधित प्रतिस्पर्धा' की दिशा में कदम भारत और रूस के रणनीतिक और आर्थिक हितों पर गहरा प्रभाव डालते हैं, क्योंकि अमेरिका और चीन पुराने अंतर्राष्ट्रीय सहयोगी रहे हैं? # अमेरिका और चीन की डील से भारत पर असर एक, सामरिक दबाव : भारत के लिए अमेरिका-चीन का संबंध एक दोधारी तलवार है। यदि अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक या रणनीतिक सहमति बनती है, तो भारत को डर रहता है कि अमेरिका इंडो-पैसिफिक रीजन में चीन के खिलाफ उतनी सख्ती नहीं दिखाएगा, जितनी भारत अपनी सुरक्षा (जैसे LAC विवाद) के लिए चाहता है। दो, क्वाड (QUAD) का भविष्य: यदि ट्रंप-शी वार्ता से दोनों देशों के बीच तनाव कम होता है, तो 'क्वाड' (अमेरिका, भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया) का जो सैन्य और रणनीतिक जोर चीन को घेरने पर था, वह थोड़ा सुस्त पड़ सकता है। तीन, सप्लाई चेन और व्यापार: चीन और अमेरिका के बीच व्यापारिक गतिरोध कम होने से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में जो विकल्प भारत (Make in India) के रूप में उभर रहा था, उस गति पर असर पड़ सकता है। हालांकि, अमेरिका-चीन की तकनीकी प्रतिस्पर्धा बनी रहने के कारण भारत को टेक/सेमीकंडक्टर निर्माण में फायदा मिलता रहेगा। चार, भारत को वैश्विक बाजार और तेल की कीमतों में स्थिरता का लाभ मिलता है जबकि चीन के खिलाफ अमेरिका का कड़ा समर्थन कम होने और ट्रेड में दबाव का जोखिम बना रहेगा। # अमेरिका और चीन की डील से रूस पर असर एक, चीन पर बढ़ती निर्भरता: रूस और चीन वर्तमान में असीमित साझेदारी में हैं। लेकिन यदि चीन और अमेरिका अपने आर्थिक रिश्तों को सुधार लेते हैं, तो रूस को डर रहेगा कि चीन अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव में आकर रूस को मिलने वाली आर्थिक और तकनीकी मदद को सीमित कर सकता है। दो, रूस-यूक्रेन युद्ध और कूटनीति: अमेरिका-चीन शिखर वार्ता में यदि रूस-यूक्रेन संघर्ष या वैश्विक प्रतिबंधों पर कोई गुप्त सहमति बनती है, तो मॉस्को के लिए पश्चिमी प्रतिबंधों से बचने के रास्ते (जैसे चीन के जरिए व्यापार) कठिन हो सकते हैं। तीन, मॉस्को की रणनीतिक स्थिति: रूस नहीं चाहता कि अमेरिका और चीन इतने करीब आ जाएं कि दुनिया में फिर से अमेरिका-चीन की G2 (दो महाशक्तियों का प्रभुत्व) वाली व्यवस्था स्थापित हो जाए, क्योंकि इससे रूस का वैश्विक वजन कम होता है। चार, रूस को चीन से आर्थिक व्यापार जारी रहने की उम्मीद रहेगी। जबकि चीन द्वारा अमेरिकी प्रतिबंधों के डर से रूस को दी जाने वाली मदद सीमित करने का जोखिम बना रहेगा। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 22 Sep 2026 6:11 pm

नशे के खिलाफ भाजपा के अभियान से 'आप' की भगवंत मान सरकार घबरा गई : अनिल विज

नशे के खिलाफ भाजपा के अभियान से 'आप' की भगवंत मान सरकार घबरा गई : अनिल विज

समाचार नामा 22 Sep 2026 6:09 pm

संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रासंगिकता पर उठते सवाल

अमेरिका-ईरान युद्ध हो या फिर रुस यूक्रेन युद्ध और इसी तरह दुनिया के देशों के सामने आ रही गंभीर समस्याओं के चलते संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रासंगिकता पर सवाल उठने लगे हैं। अमेरिका-ईरान युद्ध के चलते आज दुनिया के देश ईंधन की समस्या से दो चार हो रहे हैं। शक्तिशाली देशों के दादागिरी चरम पर पहुंचती जा रही है। आज हार्मुज का रास्ता बंद है तो अन्य वैकल्पिक रास्तों पर भी अवरोध आ रहे हैं। दुनिया के अन्य देशों की समस्याओं के प्रति कोई गंभीर नहीं है। पेट्रोल पदार्थों और एलपीजी की आवाजाही प्रभावित होने से ईंधन के भावों में बेतहासा बढ़ोतरी हो रही है। ऊर्जा संकट हो रहा है। आवागमन के साधनों का प्रमुख माध्यम पेट्रोल-डीजल आदि है और उनकी उपलब्धता पर पड़ रहे असर के कारण सभी देशों में सीधे आमजन प्रभावित हो रहे हैं। आखिर ऐसे समय में ही संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। पर जो तस्वीर सामने आ रही हैं वह साफ है कि युद्ध करने वाले देशों पर दबाव ड़ालने की स्थिति में ना तो कोई वैश्विक संस्था रह गई है और ना ही कोई सर्वमान्य वैश्विक नेता। आखिर यह कोई एक दिन का पराभव तो नहीं हैं बल्कि देखा जाएं तो संयुक्त राष्ट्र को तो योजनाबद्ध तरीके से शक्तिहीन किया गया है। अमेरिका जैसे देशों द्वारा बिना बजह फण्डिंग बाधित या कम की जाती है तो वीटो पॉवर स्वयं में नकारात्मक भूमिका में है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में नए सदस्यों के प्रवेश को टाला जा रहा है तो इसे पंगु बनाने में कोई कमी नहीं छोड़ी जा रही है। इसमें कोई दो राय नहीं कि कोविड के दौरान संयुक्त राष्ट्र संघ ने सकारात्मक भूमिका निभाई। देशों के बीच परस्पर सहयोग व समन्वय का परिणाम यह रहा कि दुनिया के देश कोविड वैश्विक संकट से मुकाबला करने में सफल रहे। खैर पर दुनिया के देशों के बीच युद्ध, युद्ध के हालात और तनाव की स्थिति को कम करने में संयुक्त राष्ट्र संघ पूरी तरह विफल रहा है। इस विफलता के कारणों का अलग से विश्लेषण किया जा सकता है। पर एक बात साफ है कि आज संयुक्त राष्ट्र संघ पर समग्र रुप से देखा जाएं तो भरोसा 57 प्रतिशत ही रह गया है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रति नकारात्मक विचार रखने वालों का प्रतिशत 37 प्रतिशत ही है। भरोसे के यह आंकड़ें अगस्त 26 के ही हैं और यह प्यू रिसर्च की हालिया रिपोर्ट में सामने आये हैं। दुनिया के देशों में संयुक्त राष्ट्र संघ पर सबसे कम भरोसा करने वाला देश इजरायल है। इजरायल के 79 प्रतिशत लोग संयुक्त राष्ट्र संघ पर भरोसा नहीं रखते। इजरायल ही क्या जापान, तुर्की, पाकिस्तान, ग्रीस, फिलिस्तीनी क्षेत्र के देश आदि ऐसे देष है जो यूएन पर भरोसे के मामले में लकारात्मक सोच रखते हैं। हांलाकि कनाड़ा, अमेरिका, नाइजीरिया, अधिकांश योरोपीय देश, घाना, केन्या व अधिकांश एशिया प्रशांत के देशों का भरोसा अधिक है। यह देश संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रति सोच सकारात्मक रखते हैं। नाइजीरिया, फ्रांस यहां तक कि अमेरिका आदि में संयुक्त राष्ट्र् के प्रति सकारात्मकता में अच्छी खासी गिरावट देखने को मिली है। दुनिया के देशों में एकमात्र श्रीलका ऐसा देश है जहां संयुक्त राष्ट्र् संघ के प्रति भरोसे में बढ़ोतरी देखी गई है। इसे भी पढ़ें: Imran Khan की पार्टी के कार्यकर्ताओं की हड्डी-पसली तोड़ने की तैयारी! Pakistan में बड़ी संख्या में लोगों के घायल होने की संभावना के चलते खाली कराये जा रहे अस्पताल सौ टके का सवाल यह है कि आज यूएन दुनिया के देशों के बीच संघर्ष या तनाव कम करने में निर्णायक भूमिका नहीं निभा पा रहा है। अमेरिका-ईरान या रुस-यूक्रेन युद्ध सबके सामने है। यह कोई दो देशों के बीच युद्ध नहीं है अपितु इन युद्धों की आंच दुनिया के अधिकांश देशों पर किसी ना किसी रुप में पहुंच रही है। आज वर्चस्व सिद्ध करने या दादागिरी ही एक मात्र ध्येय रह गया है। पर रुस और अमेरिका अभी भी यह नहीं समझ पा रहे कि युद्धारंभ से पहले चंद घंटों या चंद दिनों का युद्ध समझ कर जोश में आ गए थे आज हालात उनके लिए ना निगलते बन रही हैं और ना ही निगलते बन रही है। इन युद्धों ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि सामने वाला देश कितना भी छोटा क्यों ना हो पर युद्ध को लंबा किसनी की क्षमता उसमें हैं। अमेरिका इजरायल ने जब ईरान पर आक्रमण किया तब उन्होंने बहुत गाल बजाएं थे पर आज जो हालात है वह सबके सामने हैं। यही रुस यूक्रेन की बात है चंद दिनों का युद्ध कब सालों लंबा युद्ध होता जा रहा है यह सबके सामने हैं। आज संयुक्त राष्ट्र संघ प्रभावी या कारगर होता तो हालात इतने खराब नहीं होते। आज संयुक्त राष्ट्र संघ नख-दंत विहीन संस्था रह गया है। अमेरिका सहित विकसित देश फण्डिंग में कमी कर देते हैं या रोक देते हें तो यूएन अपने आप में इतना सक्षम नहीं है कि देशों पर दबाव बना सके। सुरक्षा परिषद का वीटो का अधिकार भी एक प्रमुख बाधा ही है। सुरक्षा परिषद में भारत के प्रवेश को लंबे समय से रोका जा रहा है। नए सदस्य किसी को स्वीकार ही नहीं हो रहे। एक बात साफ हो जानी चाहिए कि संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन एक सकारात्मक संदेश के साथ हुआ था। समय आ गया है जब दुनिया के देशों को संयुक्त राष्ट्र् संघ की भूमिका नए सीरे से तय करनी होगी। यूएन को दिखावटी संस्था के स्थान पर अधिकारपूर्ण और निर्णय क्षमता युक्त संस्था बनानी होगी। लोगों में विश्वास बनाना होगा कि यूएन केवल संस्था नहीं अपितु वह अपने दायित्वों को पूरा करने और दादागिरी करने वाले देशों पर लगाम लगाने की स्थिति में हो या ना हो पर एक ऐसा भ्रम तो पैदा करने की स्थिति में हो ताकि शक्तिशाली देशों की मोनोपोली को सीमित किया जा सके। - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

प्रभासाक्षी 22 Sep 2026 5:48 pm

मध्य प्रदेश के कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने अपने बयान पर खेद जताया

मध्य प्रदेश के कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने अपने बयान पर खेद जताया

समाचार नामा 22 Sep 2026 3:33 pm

'आप' सरकार नशे को बढ़ावा देने वालों के साथ: तरुण चुघ

'आप' सरकार नशे को बढ़ावा देने वालों के साथ: तरुण चुघ

समाचार नामा 22 Sep 2026 2:07 pm

न्यूयॉर्क में भारत ने पेश किया डिजिटल हेल्थ का मॉडल, स्वास्थ्य सचिव बोलीं-'एआई से बदलेगी तस्वीर'

नई दिल्ली, 22 सितंबर (आईएएनएस)। स्वास्थ्य सचिव पुण्या सलिला श्रीवास्तव ने न्यूयॉर्क में भारत के वाणिज्य दूतावास में आयोजित 'ग्राउंडिंग द फ्रंटियर: ए ग्लोबल साउथ एआई फ्रेमवर्क' विषय पर चर्चा के दौरान ग्लोबल साउथ के लिए एआई और डिजिटल हेल्थ इनोवेशन में भारत के अनुभव को साझा किया। उन्होंने कहा कि भारत यह दिखा रहा है कि कैसे मजबूत डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और संदर्भ-आधारित डेटा से चलने वाली एआई बड़े पैमाने पर हेल्थकेयर सर्विस को बदल सकती है।

समाचार नामा 22 Sep 2026 1:43 pm

Union Ministers Assets: मोदी कैबिनेट के मंत्री कहां लगाते हैं पैसा? FD से शेयर बाजार तक सामने आया निवेश का तरीका

Union Ministers Assets: मोदी कैबिनेट के मंत्री कहां लगाते हैं पैसा? FD से शेयर बाजार तक सामने आया निवेश का तरीका

समाचार नामा 22 Sep 2026 12:40 pm

चीन पर चढ़ा Made In India का खुमार, 5 महीने में 9.36 अरब की शॉपिंग

जिस चीन के साथ भारत का व्यापार लंबे समय से एकतरफा नजर आता रहा है। अब भारतीय सामान की डिमांड तेजी से यहां बढ़ रही है। सिर्फ 5 महीने में चीन ने भारत से करीब ₹9.6 अरब डॉलर यानी लगभग ₹80,000 करोड़ का सामान खरीदा है। लेकिन इसको लेकर सबसे बड़ी बात यह है कि यह आंकड़ा पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले करीब 39% ज्यादा है। यानी दुनिया के सबसे बड़े मैन्युफैक्चरिंग देशों में शामिल चीन अब भारत से भी ज्यादा सामान मंगवाने लगा है। लेकिन आखिर ऐसा क्यों बदल रहा है? चीन के बाजार में मेड इन इंडिया की पकड़ बढ़ती कैसे दिखाई दे रही है? क्या यह भारत चीन की व्यापारिक किशस्तों में किसी बड़े बदलाव का संकेत है? ताजा कॉमर्स मिनिस्ट्री के आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल से अगस्त तक 2026 के दौरान भारत का चीन को निर्यात कुल 39% बढ़कर यहां पर 9.6 अरब डॉलर पहुंच गया है। ये आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस अवधि में भारत के पुराने ब्रिक्स सम साझेदार चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका को कुल भारतीय निर्यात 34% बढ़कर यहां पर 19.9 अरब डॉलर हो गया है। यानी इन चार देशों के बीच चीन भारत के निर्यात का सबसे बड़ा बाजार रहा। यह बढ़ोतरी ऐसे समय में हुई है जब भारत अपने मैन्युफैक्चरिंग बेस को बढ़ाना चाहता है और ग्लोबल सप्लाई चेन में बड़ी भूमिका निभाना चाहता है। इस कोशिश में इलेक्ट्रॉनिक्स एक अहम सेक्टर बनकर उभरा है। सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि अप्रैल-अगस्त की अवधि में चीन को इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट पिछले साल के मुकाबले 15 प्रतिशत से ज़्यादा बढ़ा। इससे पहले पिछले फाइनेंशियल ईयर के दौरान इलेक्ट्रॉनिक्स शिपमेंट में ज़बरदस्त बढ़ोतरी हुई थी। इसे भी पढ़ें: Iranian Airlines के Flight संचालन पर गहराएगा संकट, US प्रतिबंधों पर China से बातचीत जारी चीन भारत से खरीद क्यों रहा है? हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इलेक्ट्रॉनिक्स इस बढ़ोतरी के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में शामिल है। भारत से चीन जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक्स सामान जो हैं इसमें प्रिंटेड सर्किट बोर्ड्स हैं, स्मार्टफोनस हैं, डिस्प्ले मॉड्यूल्स और टेलीकॉम इक्विपमेंट जैसी तमाम चीजें शामिल हैं। ऐसे में वैश्विक स्तर पर एआई डाटा सेंटर्स और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की जो मांग है इससे बढ़ रही है जिससे इलेक्ट्रॉनिक सप्लाई चेन में भी ज्यादा बदलाव देखने को मिल रहा है और भारत इस बढ़ती मांग का एक हिस्सा पकड़ने की कोशिश कर रहा है। इसका मतलब यही है कि चीन ने भारतीय सामान के लिए अपना पूरा बाजार खोल दिया है। या फिर यह इसको आप ऐसे नहीं देख सकते कि भारत चीन का व्यापार संतुलित अभी धीरे-धीरे होता नजर आएगा। उदाहरण के लिए अगर आपको समझाएं तो अप्रैल और अगस्त 2026 27 के दौरान भारत ने चीन से करीब 65.49 अरब डॉलर का सामान आयत किया। यानी भारत का चीन से आयत अभी भी चीन को किए जाने वाले निर्यात से कई गुना ज्यादा है। इस 5 महीने की अवधि में चीन भारत का सबसे बड़ा इंपोर्ट सोर्स रहा है। इसलिए 9 6 अरब डॉलर का आंकड़ा एक सकारात्मक एक्सपोर्ट डेवलपमेंट जरूर है। लेकिन इसे भारत चीन के व्यापार घाटी के खत्म होने के तौर पर देखना सही नहीं होगा। इसे भी पढ़ें: Chinese Communist Party ने Zhang Youxia और Liu Zhenli को सेना व पार्टी से निकाला AI की मांग से इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट में बढ़ोतरी मार्च में खत्म हुए फाइनेंशियल ईयर में चीन को भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट तीन गुना बढ़कर $3.18 बिलियन हो गया, हालांकि यह बढ़ोतरी एक कम शुरुआती स्तर से हुई थी। इन शिपमेंट्स में प्रिंटेड सर्किट बोर्ड असेंबली, स्मार्टफोन, डिस्प्ले मॉड्यूल और टेलीकॉम इक्विपमेंट शामिल थे। इंडस्ट्री के अधिकारियों का कहना है कि AI और डेटा सेंटर्स के ग्लोबल विस्तार से भारतीय मैन्युफैक्चरर्स के इक्विपमेंट और कंपोनेंट्स की मांग बढ़ रही है। यह बढ़ोतरी भारत के मैन्युफैक्चरिंग लक्ष्यों के लिए अहम है क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक्स उन सेक्टर्स में से एक है जिसे नई दिल्ली बढ़ाना चाहती है, क्योंकि कंपनियां अपनी सप्लाई चेन में विविधता ला रही हैं। इसे भी पढ़ें: टैरिफ पर अमेरिकी सांसद ने दी धमकी तो भारत ने भी तगड़ा सुना दिया, ट्रैप हैरान! इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट में भी बढ़ोतरी चीन को होने वाले एक्सपोर्ट में बढ़ोतरी सिर्फ़ इलेक्ट्रॉनिक्स तक ही सीमित नहीं है। ब्लूमबर्ग न्यूज़ के अनुसार, अप्रैल-अगस्त की अवधि में इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट पिछले साल के मुकाबले लगभग 21 प्रतिशत बढ़ा। इस बढ़ोतरी में मशीनरी और उसके पार्ट्स, ऑटो कंपोनेंट्स और हैंड टूल्स शामिल थे। इस व्यापक बढ़ोतरी से पता चलता है कि भारतीय मैन्युफैक्चरर्स को चीनी बाज़ार में नए मौके मिल रहे हैं। लेकिन एक्सपोर्टर्स को इस रफ़्तार को बनाए रखना होगा और ज़्यादा तरह के प्रोडक्ट्स का एक्सपोर्ट करना होगा, ताकि इन फ़ायदों का दोनों देशों के बीच व्यापार पर कोई ठोस असर पड़ सके। भारतीय एक्सपोर्ट के लिए चीन अभी भी एक छोटा बाज़ार है हाल की बढ़ोतरी के बावजूद, भारतीय सामान के लिए चीन अभी भी एक छोटा बाज़ार बना हुआ है। मार्च में खत्म हुए फाइनेंशियल ईयर में भारत के कुल एक्सपोर्ट में चीन की हिस्सेदारी लगभग 4.4 प्रतिशत रही, जो एक साल पहले 3 प्रतिशत से थोड़ी ज़्यादा थी। अमेरिका, जो भारत का सबसे बड़ा एक्सपोर्ट बाज़ार है, भारत के कुल एक्सपोर्ट का लगभग पांचवां हिस्सा है। इससे भारतीय कंपनियों के लिए चीन में अपने कारोबार को बढ़ाने, खासकर मैन्युफैक्चर्ड सामान के मामले में, काफी गुंजाइश बनती है। लेकिन भारत जो सामान चीन को बेचता है और जो वहां से खरीदता है, उसके बीच भी काफी बड़ा अंतर है। ट्रेड डेफिसिट (व्यापार घाटा) एक बड़ी समस्या बनी हुई है ब्लूमबर्ग न्यूज़ की रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च में खत्म हुए साल में भारत ने 131.6 अरब डॉलर का चीनी सामान आयात किया। भारत के कुल आयात में चीनी सामान की हिस्सेदारी लगभग 17 प्रतिशत थी। इसलिए, चीन से भारत के इंपोर्ट की वैल्यू, चीन को भारत के एक्सपोर्ट की तुलना में कई गुना ज़्यादा थी। इस वजह से, हाल ही में एक्सपोर्ट बढ़ने के बावजूद दोनों देशों के बीच ट्रेड डेफिसिट (व्यापार घाटा) में कोई खास बदलाव नहीं आया। इस बढ़ोतरी के स्वरूप को लेकर भी कुछ अनिश्चितता है। चीन के कस्टम्स डेटा में भारत से प्रिंटेड सर्किट बोर्ड के इंपोर्ट में ऐसी कोई बढ़ोतरी नहीं दिखती है। इसके बजाय, ज़्यादातर बढ़ोतरी स्मार्टफ़ोन और दूसरे टेलीकॉम प्रोडक्ट्स के मामले में दिखती है। इंडस्ट्री के अधिकारियों का कहना है कि दोनों देशों के सामानों को क्लासिफ़ाई करने के तरीकों में अंतर की वजह से यह ठीक-ठीक पता लगाना मुश्किल है कि इस बढ़ोतरी की असल वजह क्या है। दिशा में बदलाव, लेकिन अभी पूरी तरह उलटाव नहीं हाल के वर्षों में रिश्ते काफी खराब होने के बाद, भारत और चीन अपने आर्थिक संबंधों को बेहतर बनाने की कोशिश कर रहे हैं, और इसी वजह से एक्सपोर्ट में बढ़ोतरी हुई है। ग्लोबल ट्रेड के तौर-तरीकों में बदलाव के साथ-साथ, दोनों पक्ष ट्रेड और सप्लाई-चेन से जुड़े मुद्दों पर भी ध्यान दे रहे हैं। भारत के लिए, चीन को एक्सपोर्ट बढ़ने से उसकी मैन्युफैक्चरिंग क्षमताएं बढ़ाने और ग्लोबल वैल्यू चेन में बड़ी भूमिका निभाने की कोशिशों को मदद मिल सकती है। लेकिन हाल के आंकड़े अभी कुल ट्रेड संबंधों में किसी बड़े बदलाव का संकेत नहीं देते हैं। भारत चीन को ज़्यादा इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग का सामान और दूसरे मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट बेच रहा है। साथ ही, भारत के ट्रेड में चीनी सामान का हिस्सा अभी भी बहुत बड़ा है। भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए तुरंत चुनौती यह है कि वे हाल की ग्रोथ को बनाए रखें और इसे कंपोनेंट्स, सब-असेंबली और तैयार प्रोडक्ट्स तक फैलाएं। बहरहाल, भारत और चीन के बीच पिछले कुछ सालों से सीमा और रणनीतिक मुद्दों को लेकर तनाव रहा है। इसके बावजूद दोनों देशों के बीच व्यापार जारी है। अब अगर राजनीतिक स्तर पर संबंध और आर्थिक संपर्क में सुधार आता है तो व्यापार के कुछ क्षेत्रों में इसका असर साफ दिखाई दे सकता है। लेकिन व्यापार के आंकड़ों से अभी यह निष्कर्ष निकाला नहीं जा सकता कि दोनों देशों के रिश्तों में व्यापक बदलाव हो चुका है।

प्रभासाक्षी 22 Sep 2026 12:21 pm

‘घुसपैठियों’ को मनमाने तरीके से तीसरे देशों में खदेड़ रहे हैं Trump, Washington Post की रिपोर्ट से हुए खुलासे से पूरी दुनिया में मचा हड़कंप

अमेरिका अब किसी विदेशी नागरिक को अपने देश से बाहर निकालने के लिए उसके मूल देश के दरवाजे पर दस्तक देने और वहां से हरी झंडी मिलने का इंतजार नहीं करता। ट्रंप प्रशासन ने निर्वासन की पूरी परिभाषा ही बदल दी है। जिस व्यक्ति को अमेरिका से बाहर करना है, उसका देश उसे वापस लेगा या नहीं, इस बात पर अब अमेरिका माथापच्ची करने में समय नहीं गंवाता। अमेरिका अब खुद उसके लिए कोई तीसरा ठिकाना तलाश रहा है और उसे वहां पहुंचाने के लिए अपनी तिजोरी से धन खर्च कर रहा है। यानी जिस व्यक्ति को अमेरिका नहीं रखना चाहता, उसे उसके अपने देश में भेजने की बजाय किसी ऐसे देश में धकेला जा रहा है, जिससे उसका कोई नाता तक नहीं है। इस पूरी कवायद में अमेरिका उन देशों को पैसा भी दे रहा है, ताकि वे इन लोगों को अपने यहां रखने के लिए तैयार हो जाएं। यह केवल निर्वासन नहीं, बल्कि अमेरिकी धन, कूटनीतिक दबाव और वैश्विक प्रभाव के सहारे खड़ा किया जा रहा एक ऐसा तंत्र है, जिसमें अमेरिका तय कर रहा है कि उसके यहां से निकाला गया व्यक्ति आखिर दुनिया के किस कोने में पहुंचेगा। देखा जाये तो अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की आव्रजन नीति अब केवल सीमा बंद करने, गिरफ्तारी और निर्वासन तक सीमित नहीं रह गई है। अमेरिकी समाचार पत्र वॉशिंगटन पोस्ट ने अपनी एक पड़ताल में जो खुलासा किया है उससे पूरी दुनिया में हड़कंप मच गया है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिकी विदेश विभाग के जिस तंत्र का मूल काम दुनिया भर से उत्पीड़ित लोगों को शरण और पुनर्वास दिलाना था, उसी को अब दूसरे देशों में लोगों को धकेलने वाली एक विशाल निर्वासन व्यवस्था में बदल दिया गया है। इस पूरी कवायद के लिए कम से कम 410 करोड़ डॉलर की राशि स्वीकृत या प्रतिबद्ध की जा चुकी है और 31 देशों के साथ समझौते किए गए हैं। इसे भी पढ़ें: Prabhasakshi NewsRoom: Donald Trump की लोकप्रियता धड़ाम! 32% पर पहुंची Approval Rating, अमेरिकी जनता का भरोसा टूटा रिपोर्ट के मुताबिक इस पूरी व्यवस्था के केंद्र में विदेश विभाग के भीतर बनाया गया नया कार्यालय है। इसका नेतृत्व क्रिश्चियन एरहार्ट कर रहे हैं, जो पहले करीब दो दशक तक अमेरिकी दूतावासों की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े रहे थे। अब वही अधिकारी अफ्रीका और दूसरे क्षेत्रों में घूम-घूमकर सरकारों को ऐसे लोगों को स्वीकार करने के लिए तैयार कर रहे हैं, जिनका उन देशों से कोई संबंध तक नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक क्रिश्चियन एरहार्ट को कई विदेशी सरकारों के सामने सामान्य अधिकारी नहीं, बल्कि सीधे व्हाइट हाउस के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। उनके पीछे ट्रंप प्रशासन के प्रभावशाली अधिकारी स्टीफन मिलर की निर्णायक भूमिका बताई गई है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अमेरिका इन देशों को केवल कूटनीतिक दबाव से नहीं मना रहा, बल्कि भारी आर्थिक प्रोत्साहन भी दे रहा है। कम से कम 81 करोड़ डॉलर सीधे 13 विदेशी सरकारों को देने की प्रतिबद्धता सामने आई है। इसके अतिरिक्त अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन के लिए 179 करोड़ डॉलर और संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी संस्था के लिए 124 करोड़ डॉलर की राशि का प्रावधान किया गया है। इन संस्थाओं को इन समझौतों का प्रत्यक्ष पक्ष नहीं बताया गया है, लेकिन संबंधित देशों को निर्वासित लोगों को स्वीकार करने के लिए तैयार करने की प्रक्रिया में इन पैसों को प्रोत्साहन के रूप में इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई है। यानी तस्वीर बेहद साफ है। जिस व्यवस्था में कभी अमेरिका दूसरे देशों से भागकर आए लोगों को सुरक्षित जीवन देने के लिए धन लगाता था, अब उसी धन का इस्तेमाल ऐसे देशों को तैयार करने में हो रहा है जो अमेरिका से निकाले गए लोगों को अपने यहां रखने के लिए राजी हों। ट्रंप प्रशासन ने शरणार्थी पुनर्वास की पुरानी दिशा को पलटकर उसे निर्वासन केंद्रित बना दिया है। प्रशासन के अपने एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्वीकार किया है कि संबंधित विभाग की दिशा पूरी तरह बदल दी गई है। बताया जा रहा है कि कोस्टा रिका भेजी गई उड़ानों में चीन, रूस, ईरान और अफगानिस्तान के लोग थे। इस्वातिनी भेजे गए लोगों में वियतनाम, लाओस, क्यूबा और जमैका के नागरिक शामिल थे। युगांडा केवल अफ्रीकी नागरिकों को लेने पर सहमत हुआ, जबकि कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य ने अफ्रीकी नागरिकों को ही स्वीकार करने से इंकार कर दिया। कुछ देश गंभीर अपराधों के आरोपियों को भी लेने के लिए तैयार हैं, जबकि कुछ ने अपराध की प्रकृति के आधार पर सीमाएं तय की हैं। अब तक 25 हजार से अधिक लोगों को कम से कम 28 तीसरे देशों में भेजे जाने का अनुमान है। इनमें करीब 20 हजार लोग मेक्सिको भेजे गए। बाकी लोगों को मुख्यतः अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों में धकेला गया। अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि इनमें ऐसे लोग हैं जिनके खिलाफ अंतिम निर्वासन आदेश हैं, लेकिन उनके अपने देश उन्हें वापस लेने से इंकार करते हैं या उन्हें वहां भेजने पर उत्पीड़न का खतरा है। प्रशासन का दावा है कि तीसरे देश का रास्ता ऐसे कठिन मामलों को निपटाने का साधन है। लेकिन यहीं से इस नीति का सबसे गंभीर कानूनी पक्ष शुरू होता है। आलोचकों और आव्रजन वकीलों का आरोप है कि तीसरे देश में भेजकर वहां से संबंधित व्यक्ति को उसके मूल देश में जबरन भेजे जाने का रास्ता बनाया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय शरणार्थी कानून में ऐसे स्थान पर भेजना जहां व्यक्ति को उत्पीड़न या यातना का खतरा हो, गंभीर कानूनी सवाल खड़े करता है। गत शुक्रवार को एक संघीय अपीली अदालत ने इस नीति को गैरकानूनी ठहराते हुए कहा कि प्रभावित लोगों को तीसरे देश में भेजे जाने से पहले पर्याप्त सूचना और अपने भय या खतरे से जुड़े दावे रखने का अवसर नहीं दिया गया। हालांकि प्रशासन से इस फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देने की उम्मीद है। दूसरी ओर, पनामा का मामला इस पूरी व्यवस्था की असली तस्वीर दिखाता है। जनवरी 2025 में अमेरिका ने 299 लोगों को पनामा भेजा, जबकि उनका पनामा से कोई संबंध नहीं था। इनमें ईरानी नागरिक अरसलान सालेह फर्द भी थे। उन्हें न स्थायी निवास मिला, न काम करने का अधिकार और न ही अपने भविष्य की कोई स्पष्ट राह। भाषा की समस्या, आर्थिक तंगी और कानूनी अनिश्चितता ने उन्हें ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया जहां वह महीनों तक एक अस्थायी व्यवस्था में फंसे रहे। इस पूरी नीति का सामरिक महत्व केवल आव्रजन तक सीमित नहीं है। दरअसल, अमेरिका अब निर्वासन को विदेश नीति के एक औजार में बदलता दिखाई दे रहा है। अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कमजोर या आर्थिक रूप से निर्भर देशों को धन देकर लोगों को स्वीकार कराने से वॉशिंगटन को उन सरकारों पर नया प्रभाव हासिल करने का अवसर मिलता है। लेकिन इससे मानवाधिकारों पर अमेरिकी विश्वसनीयता भी कमजोर पड़ सकती है, क्योंकि जिन देशों में गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों की अमेरिकी रिपोर्टें स्वयं मौजूद हैं, उन्हीं देशों के साथ निर्वासन समझौते किए जा रहे हैं। साथ ही रणनीतिक स्तर पर ट्रंप प्रशासन एक और संदेश दे रहा है। अमेरिका में प्रवेश या वहां टिके रहना ही नहीं, बल्कि निर्वासन के बाद आपका अगला ठिकाना भी वॉशिंगटन तय कर सकता है। यह व्यवस्था संभावित प्रवासियों के बीच भय पैदा करने के लिए भी इस्तेमाल हो रही है। यानी निर्वासन अब वैश्विक स्तर पर बनाया गया निवारक दबाव तंत्र बनता जा रहा है। यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि अमेरिका ने शरणार्थियों के संरक्षण के लिए बने अपने पुराने ढांचे को इतनी तेजी से उलटकर निर्वासन की मशीनरी क्यों बना दिया? उससे भी बड़ा सवाल यह है कि जब इस व्यवस्था के लिए अरबों डॉलर की आर्थिक प्रतिबद्धताएं की जा रही हैं, दर्जनों देशों को धन के सहारे तैयार किया जा रहा है और हजारों लोगों को ऐसे देशों में भेजा जा रहा है जिनसे उनका कोई रिश्ता नहीं, तो क्या यह केवल सीमा नियंत्रण की नीति है या अमेरिकी विदेश नीति के चरित्र में एक बुनियादी बदलाव है? बहरहाल, वॉशिंगटन पोस्ट की पड़ताल का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है कि अमेरिका की शरणार्थी व्यवस्था का एक हिस्सा अब शरण देने की बजाय लोगों को अमेरिका से बाहर धकेलने के लिए इस्तेमाल हो रहा है। साथ ही इस पूरी मशीनरी के पीछे केवल सीमा नहीं, पैसा, कूटनीति, दबाव और वैश्विक शक्ति का इस्तेमाल दिखाई दे रहा है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 22 Sep 2026 12:02 pm

ओम प्रकाश राजभर ने Modi का नाम लेकर कर दिया बड़ा दावा, क्या वाकई UP के चार टुकड़े होने वाले हैं?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनावी मौसम अभी पूरी तरह चढ़ा भी नहीं है, लेकिन सियासी चौपाल पर ऐसा मुद्दा उछल गया है, जिसकी गूंज लखनऊ से लेकर दिल्ली तक सुनाई दे रही है। उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के प्रमुख ओम प्रकाश राजभर ने दावा किया है कि आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश चार हिस्सों में बंटेगा और जातीय जनगणना के बाद इस दिशा में रास्ता साफ हो जाएगा। इतना ही नहीं, राजभर ने पूर्वांचल के अलग राज्य बनने पर उसके पहले मुख्यमंत्री के तौर पर अपने समाज के व्यक्ति का दावा भी ठोक दिया। देवरिया और अंबेडकरनगर में दिए गए अपने बयानों में ओम प्रकाश राजभर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कथित बातचीत का हवाला देते हुए कहा कि जातीय जनगणना के बाद राज्य के पुनर्गठन में कोई दिक्कत नहीं रहेगी। राजभर ने जिन चार हिस्सों की बात की, उनमें पूर्वांचल, मध्यांचल, बुंदेलखंड और हरित प्रदेश शामिल हैं। उन्होंने यह भी कहा कि पूर्वांचल में राजभर समाज का बड़ा वोट आधार है, इसलिए अलग राज्य बनने पर पहला मुख्यमंत्री राजभर समाज का बेटा होगा। उल्लेखनीय है कि यह बयान ऐसे समय आया है जब उत्तर प्रदेश 2027 के विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रहा है। इसे भी पढ़ें: 2027 का उत्तर प्रदेश दंगल: समाजवाद की नई राजनीतिक रंगोली या महज अवसरवाद का मुखौटा? देखा जाये तो राजभर ने सिर्फ राज्य के नक्शे पर लकीर खींचने की बात नहीं की है बल्कि उस लकीर के पार सत्ता की कुर्सी पर भी अपना सामाजिक दावा रख दिया है। यही वजह है कि यह मामला महज प्रशासनिक पुनर्गठन की बहस नहीं रह जाता, बल्कि उत्तर प्रदेश की जातीय और क्षेत्रीय राजनीति के बीच सीधा उतर जाता है। मायावती ने 2011 में चलाई थी बड़ी चाल वैसे राजभर ने कोई नया कुआं नहीं खोदा है। उत्तर प्रदेश को छोटे राज्यों में बांटने की मांग दो दशक से ज्यादा समय से अलग-अलग रूपों में उठती रही है। सबसे ठोस पहल नवंबर 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती की सरकार ने की थी। तत्कालीन विधानसभा ने उत्तर प्रदेश को पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध प्रदेश और पश्चिम प्रदेश में बांटने का प्रस्ताव पारित किया था। मायावती सरकार का तर्क था कि इतने विशाल राज्य में प्रशासन और विकास को प्रभावी ढंग से चलाना कठिन है और छोटे राज्य क्षेत्रीय जरूरतों पर ज्यादा फोकस कर सकते हैं। प्रस्ताव केंद्र को भेजा गया, लेकिन आगे मामला नहीं बढ़ा। 2014 में केंद्र सरकार ने संसद में बताया था कि 2011 का प्रस्ताव प्राप्त हुआ था, राज्य सरकार से अतिरिक्त जानकारी मांगी गई थी, लेकिन उस समय उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से वह जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई और केंद्र के पास उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं था। पश्चिम से पूर्वांचल तक अलग-अलग सुर यह भी उल्लेखनीय है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अलग राज्य या हरित प्रदेश की मांग भी पुरानी है। राष्ट्रीय लोक दल के संस्थापक अजित सिंह समेत कई नेताओं ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए अलग राज्य की वकालत की थी। गन्ना, खेती, कारोबार, उद्योग और दिल्ली की नजदीकी को इसके पक्ष में प्रमुख तर्कों के तौर पर रखा जाता रहा है। मगर पूर्वांचल की कहानी अलग है। यहां समर्थक कहते रहे हैं कि विशाल आबादी, आर्थिक पिछड़ापन, रोजगार के लिए पलायन और लखनऊ से दूरी के कारण क्षेत्र को अलग प्रशासनिक इकाई मिलनी चाहिए। बुंदेलखंड के लिए भी अलग राज्य की मांग लंबे समय से उठती रही है, लेकिन उसकी पेचीदगी यह है कि प्रस्तावित क्षेत्र उत्तर प्रदेश के साथ-साथ मध्य प्रदेश तक फैला हुआ है। देखा जाये तो मोटे तौर पर पुराने प्रस्तावों में पश्चिम प्रदेश में पश्चिमी और कुछ मध्य-पश्चिमी जिलों का बड़ा हिस्सा, अवध प्रदेश में मध्य क्षेत्र, बुंदेलखंड में झांसी, जालौन, ललितपुर, हमीरपुर, महोबा, बांदा और चित्रकूट जैसे जिले तथा पूर्वांचल में वाराणसी, गोरखपुर, आजमगढ़, बलिया, गाजीपुर, प्रयागराज, मिर्जापुर, सोनभद्र समेत पूर्वी उत्तर प्रदेश का बड़ा इलाका शामिल रहा है। इन सीमाओं को लेकर अलग-अलग प्रस्तावों में फर्क भी रहा है। सवाल सिर्फ नक्शे का नहीं, नीयत और व्यवस्था का भी है छोटे राज्यों के समर्थकों का तर्क है कि छोटा प्रशासन ज्यादा चुस्त होगा, क्षेत्रीय समस्याओं पर सरकार की पकड़ बढ़ेगी और विकास की प्राथमिकताएं स्थानीय जरूरतों के हिसाब से तय की जा सकेंगी। विरोध में यह सवाल भी उठता है कि क्या केवल राज्य छोटा कर देने से गरीबी, बेरोजगारी, पलायन और क्षेत्रीय असमानता खत्म हो जाएगी? नए राज्यों के गठन के साथ राजधानी, विधानसभा, उच्च न्यायालय, सरकारी कर्मचारियों, संपत्तियों, कर्ज, राजस्व और संस्थानों के बंटवारे जैसी बड़ी प्रशासनिक और वित्तीय चुनौतियां भी सामने आती हैं। आखिरी फैसला लखनऊ नहीं, संसद करेगी यहां यह भी उल्लेखनीय है कि संविधान का अनुच्छेद 3 साफ करता है कि नए राज्य का गठन, मौजूदा राज्य की सीमा या क्षेत्र में बदलाव का अधिकार संसद के पास है। ऐसा विधेयक राष्ट्रपति की सिफारिश के बिना संसद में पेश नहीं किया जा सकता। प्रभावित राज्य की विधानसभा से उसके विचार मांगे जाते हैं, लेकिन उसकी सहमति अनिवार्य नहीं है। यानी अगर कभी उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन की वास्तविक प्रक्रिया शुरू होती है तो मामला लंबी संवैधानिक और राजनीतिक प्रक्रिया से होकर गुजरेगा। बहरहाल, फिलहाल ओम प्रकाश राजभर ने उत्तर प्रदेश की सियासत में पुरानी चिंगारी पर फिर से फूंक मार दी है। अब देखना यह है कि यह सिर्फ चुनावी मौसम की गरमागरम हुंकार बनकर रह जाती है या सचमुच उत्तर प्रदेश के नक्शे पर नई लकीर खींचने की कवायद शुरू होती है। क्योंकि यूपी की राजनीति में एक बात बड़ी पुरानी है, यहां चुनाव आते ही मुद्दे सिर्फ उठते नहीं, कई बार पूरे भूगोल को ही हिला देने लगते हैं। राजभर के बयान पर प्रतिक्रियाएं आने भी लग गयी हैं। भाजपा के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने इसे चुनावी जुमला बताते हुए कहा है कि केंद्र या प्रदेश सरकार की ऐसी कोई मंशा नहीं है, जबकि भाजपा नेता संजीव बालियान ने यूपी को चार हिस्सों में बांटने के विचार का समर्थन किया है। वहीं विपक्ष ने कहा है कि सत्ता पक्ष की ओर से ध्यान भटकाने के प्रयास हो रहे हैं ताकि मूल मुद्दों की ओर जनता का ध्यान नहीं जाये। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 22 Sep 2026 11:29 am

चांदी 2.40 लाख रुपये प्रति किलो नीचे

मुंबई, सोने और चांदी मंगलवार को सपाट खुले और शुरुआत कारोबार में दोनों कीमती धातु एक सीमित दायरे में बने हुए थे।

देशबन्धु 22 Sep 2026 11:02 am

तमिलनाडु : सीएम विजय छठी से आठवीं कक्षा के लिए विस्तारित 'कामराज नाश्ता योजना' शुरू करेंगे

तमिलनाडु : सीएम विजय छठी से आठवीं कक्षा के लिए विस्तारित 'कामराज नाश्ता योजना' शुरू करेंगे

समाचार नामा 22 Sep 2026 9:27 am

पीएम मोदी ने महाराष्ट्र को सूखाग्रस्त घोषित किया तो जलाएंगे दीये : कांग्रेस सांसद

पीएम मोदी ने महाराष्ट्र को सूखाग्रस्त घोषित किया तो जलाएंगे दीये : कांग्रेस सांसद

समाचार नामा 22 Sep 2026 8:35 am

'हिंदुओं के खिलाफ बोलने से इज्जत नहीं बढ़ेगी', हामिद अंसारी पर यासिर जिलानी का जुबानी हमला

'हिंदुओं के खिलाफ बोलने से इज्जत नहीं बढ़ेगी', हामिद अंसारी पर यासिर जिलानी का जुबानी हमला

समाचार नामा 21 Sep 2026 11:59 pm

असम में इसरो की एडवांस्ड रडार रिसर्च फैसिलिटी की आधारशिला रखी गई, अंतरिक्ष निगरानी क्षमता होगी मजबूत

गुवाहाटी, 21 सितंबर (आईएएनएस)। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने सोमवार को चंद्रपुर में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के इस्ट्रैक एडवांस्ड रडार रिसर्च फैसिलिटी का भूमि पूजन किया और आधारशिला रखी। इसे असम के वैज्ञानिक और तकनीकी बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

समाचार नामा 21 Sep 2026 8:31 pm

पश्चिम बंगाल : हावड़ा स्टेशन पर 67 लाख रुपए कैश के साथ यात्री गिरफ्तार, जांच जारी

पश्चिम बंगाल : हावड़ा स्टेशन पर 67 लाख रुपए कैश के साथ यात्री गिरफ्तार, जांच जारी

समाचार नामा 21 Sep 2026 7:59 pm

नीतीश कुमार ने बख्तियारपुर स्थित पैतृक आवास का किया दौरा, बड़ी संख्या में जुटे स्थानीय लोग

नीतीश कुमार ने बख्तियारपुर स्थित पैतृक आवास का किया दौरा, बड़ी संख्या में जुटे स्थानीय लोग

समाचार नामा 21 Sep 2026 7:31 pm

राहुल गांधी की 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम स्क्रिप्टेड, मां का मजाक उड़ाना शर्मनाक: विश्वास सारंग

राहुल गांधी की 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम स्क्रिप्टेड, मां का मजाक उड़ाना शर्मनाक: विश्वास सारंग

समाचार नामा 21 Sep 2026 7:16 pm

Chai Par Sameeksha: UCC, UPI और Nandigram पर जमकर हो रही राजनीति, उलझ गया सभी दलों का गणित!

प्रभासाक्षी न्यूज़ नेटवर्क के खास साप्ताहिक कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में इस सप्ताह UCC, पश्चिम बंगाल विधानसभा उपचुनाव, UPI पेमेंट पर MDR आदि मुद्दों पर चर्चा हुई। प्रभासाक्षी संपादक नीरज कुमार दुबे ने सवालों के जवाब दिये। UCC पर उन्होंने कहा कि देश में इस समय समान नागरिक संहिता को लेकर जमकर बहस हो रही है। इसके पक्ष और विपक्ष में तमाम तरह के तर्क दिये जा रहे हैं। कोई इसे अपने धर्म के खिलाफ बता रहा है तो कोई कह रहा है कि इससे हमारी संस्कृति और पहचान को खतरा हो जायेगा। आश्चर्यजनक बात यह है कि अभी केंद्र सरकार ने समान नागरिक संहिता संबंधी कानून का मसौदा प्रस्ताव देश के समक्ष नहीं रखा है। यानि किसी को पता नहीं है कि समान नागरिक संहिता में क्या-क्या प्रावधान होंगे लेकिन फिर भी बिना कुछ जाने समझे लोग इससे भयभीत हो रहे हैं और दूसरों के बीच भी भ्रम फैला रहे हैं नीरज दुबे ने कहा कि केंद्रीय स्तर पर इसे लागू करना आसान नहीं होगा इसलिए इसे राज्यवर लागू करने की कोशिश भाजपा सरकार करेंगी। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में इसे लागू कर दिया गया है और वहां से कोई शिकायत नहीं मिल रही है। साथ ही उन्होंने कहा कि 370 हो या राम मंदिर बनना हो या समान नागरिक संहिता, यह भाजपा के कोर मुद्दे रहे हैं और भाजपा इनमें से दो को पहले पूरा कर चुकी है। यूनिफॉर्म सिविल कोड अभी बाकी है जिसे भाजपा शासित राज्यों में पहले लागू किया जा सकता है, जैसा कि अमित शाह के बयान से समझ में भी आता है। लेकिन इसको लेकर अभी से ही बिना मसौदा पढ़े भ्रम फैलाने की जो कोशिश हो रही है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। बिहार में जदयू की अपनी राजनीति है और वह उसे हिसाब से आगे बढ़ेगी। इसे भी पढ़ें: ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से भारत को क्या लाभ? बंगाल पर उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी का राजनीतिक सफर एक छात्र राजनीति की साहसी नायिका से लेकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनने और वर्तमान समय में घोर राजनीतिक व कानूनी संकटों से घिरने तक की एक बड़ी दास्तान है। जो ‘दीदी’ कभी सड़कों पर वामपंथ के 34 साल के किले को ढहाने के लिए जानी जाती थीं, वे आज अपनी राजनीतिक यात्रा के सबसे कठिन दौर से गुजर रही हैं। वर्तमान परिस्थितियों में ममता बनर्जी पर मुश्किलों के पहाड़ टूटने के मुख्य कारण इस प्रकार हैं- पहला, ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक झटका 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में लगा, जहाँ उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को हार का सामना करना पड़ा और राज्य में भाजपा की सरकार बनी। खुद ममता बनर्जी को भी अपनी पारंपरिक सीट भवानीपुर से शुभेंदु अधिकारी के हाथों करारी हार झेलनी पड़ी। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि ममता ने अपने शासन में जैसा किया है, वैसा ही उन्हें राजनीतिक तोर पर देखने को मिल रहा है। UPI पेमेंट को लेकर हो रहे बवाल पर उन्होंने कहा कि झूठ की गूंज एक्सप्रेस चलाने वाले कांग्रेस नेता राहुल गांधी के नेतृत्व वाला इंडी गठबंधन इस निर्णय के लिए सरकार पर अमेरिकी दबाव में झुकने, घुटने टेकने जैसे आरोप लगा रहा है। विपक्ष सोशल मीडिया पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर शुल्क को मोदी टैक्स बताकर इसे तत्काल वापस लेने की मांग कर रहा है। 2000 से ऊपर के कारोबारी भुगतान के इस 0.4 प्रतिशत शुल्क पर विपक्ष के झूठ की गूंज सोशल मीडिया से लेकर व्यापारियों तक पहुंच चुकी है। नीरज दुबे ने कहा कि कोई भी सेवा हमेशा के लिए फ्री में नहीं रखा जा सकता है। हालांकि, सरकार ने जो कदम उठाए है उससे आम आदमी को ज्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला है।

प्रभासाक्षी 21 Sep 2026 6:27 pm

गुजरात सरकार का बड़ा फैसला: टॉप जिला-तालुका अधिकारियों को मिलेगा 'अटल सुशासन पुरस्कार'

गुजरात सरकार का बड़ा फैसला: टॉप जिला-तालुका अधिकारियों को मिलेगा 'अटल सुशासन पुरस्कार'

समाचार नामा 21 Sep 2026 6:07 pm

India की Chip Power से घबरा गईं वैश्विक ताकतें! Ashwini Vaishnaw ने जो खुलासा किया है वो आपको हैरान कर देगा

भारत की सेमीकंडक्टर छलांग ने अब उन ताकतों की बेचैनी भी उजागर कर दी है, जिन्हें भारत का तेजी से उभरना रास नहीं आ रहा। केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव की चेतावनी साफ संकेत देती है कि भारत की तरक्की को रोकने वाली चालें तेजी से चली जा रही हैं लेकिन देश को अब दुश्मनों के तौर-तरीके समझ में आ चुके हैं। माना जा रहा है कि जिस तरह भारत को मोबाइल फोन के क्षेत्र में वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनने से रोकने की कोशिशें हुईं, उसी तरह अब सेमीकंडक्टर क्षेत्र में भी साइबर हमलों, फर्जी खबरों और भौतिक व्यवधानों के जरिए भारत की रफ्तार थामने की कोशिश हो सकती है। लेकिन संदेश सीधा है। भारत अब पीछे हटने वाला नहीं है और उसकी रणनीतिक बढ़त को चुनौती देने वालों को इस बार भारत पहले से कहीं अधिक सतर्क और तैयार मिलेगा। हम आपको बता दें कि केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इस खतरे को समझाने के लिए Apple के भारत में iPhone निर्माण शुरू होने के शुरुआती दौर का उदाहरण दिया। टीवी समाचार चैनल NDTV से बातचीत में उन्होंने दावा किया कि उस समय उत्पादन को बाधित करने के लिए कई तरह के प्रयास किए गए। उनके अनुसार, कुछ स्थानों पर फूड पॉइजनिंग की घटनाएं हुईं, बिजली के तार काटे गए और फर्जी खबरें चलाई गईं। उन्होंने विशेष रूप से Reuters की उस रिपोर्ट का उल्लेख किया जिसमें कथित तौर पर कहा गया था कि विवाहित महिलाओं को उत्पादन इकाइयों में काम करने की अनुमति नहीं थी। वैष्णव ने इन घटनाओं को भारत को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में उभरने से रोकने की कोशिश के रूप में पेश किया। इसे भी पढ़ें: Narendra Modi ने भारत को सेमीकंडक्टर निर्माण केंद्र बनाने पर दिया जोर, अमेरिकी विधेयक पर भारत सतर्क यही Apple प्रकरण अब सेमीकंडक्टर उद्योग के लिए चेतावनी का आधार बनाया जा रहा है। वैष्णव का कहना है कि भारत के चिप क्षेत्र में प्रवेश को दुनिया ने नोटिस किया है और जैसे-जैसे भारत की क्षमता बढ़ेगी, समर्थन के साथ विरोध भी सामने आएगा। उन्होंने उद्योग को पहले से तैयार रहने को कहा है। उन्होंने कहा कि साइबर हमले, दुष्प्रचार और भौतिक हमले संभावित जोखिमों में शामिल हैं और भारत को इनसे निपटने के लिए लगातार सतर्क रहना होगा। देखा जाये तो इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्री की इस चेतावनी की पृष्ठभूमि में सेमीकंडक्टर उद्योग की रणनीतिक अहमियत समझना जरूरी है। कंप्यूटर, मोबाइल फोन और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से लेकर रक्षा प्रणालियों तक, लगभग पूरी आधुनिक अर्थव्यवस्था चिप्स पर निर्भर है। अमेरिका, ताइवान और दक्षिण कोरिया लंबे समय से इस क्षेत्र के प्रमुख केंद्र हैं, जबकि चीन तेजी से अपनी क्षमता बढ़ा रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विस्तार ने चिप्स की मांग और रणनीतिक महत्ता दोनों को और बढ़ा दिया है। ऐसे में अमेरिका और चीन सहित प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं सेमीकंडक्टर क्षमता को रणनीतिक आत्मनिर्भरता से जोड़ रही हैं। भारत ने इसी बदलते वैश्विक समीकरण में अपनी जगह बनाने के लिए पिछले कुछ वर्षों में बड़ा अभियान शुरू किया है। SEMICON India का आयोजन 2022 से किया जा रहा है। 17 से 19 सितंबर 2026 को आयोजित संस्करण में भी 52 देशों की लगभग 300 अंतरराष्ट्रीय कंपनियों ने हिस्सा लिया और 56 MoU, घोषणाएं तथा रणनीतिक पहलें सामने आईं। मोदी सरकार अब केवल चिप असेंबली और टेस्टिंग तक सीमित रहने की बजाय डिजाइन, उपकरण, सामग्री, फैब्रिकेशन, उन्नत पैकेजिंग, अनुसंधान और प्रतिभा विकास तक पूरी वैल्यू चेन खड़ी करने की कोशिश कर रही है। Semicon 2.0 के लिए जुलाई में ₹1,27,500 करोड़ के परिव्यय को मंजूरी दी गई। पहले चरण की योजना में 12 सेमीकंडक्टर परियोजनाओं को ₹1.64 लाख करोड़ से अधिक के निवेश के साथ मंजूरी दी जा चुकी है, जबकि Micron, Kaynes और CG Semi समेत पांच परियोजनाएं वाणिज्यिक उत्पादन में पहुंच चुकी हैं। यही नहीं, निवेश घोषणाओं का पैमाना भी इस बदलाव को रेखांकित करता है। Applied Materials ने 2035 तक भारत में 5 अरब डॉलर की योजना रखी है, Lam Research ने ₹10,000 करोड़ के प्रस्तावित निवेश की घोषणा की है, Tata Electronics ने धोलेरा में 363 एकड़ के vendor park की योजना सामने रखी है और Fujifilm ने ₹800 करोड़ के सेमीकंडक्टर materials plant की घोषणा की है। साथ ही मोदी सरकार ने Semicon 2.0 के तहत करीब ₹1 लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव मिलने की भी जानकारी दी है। यानी भारत के सामने अवसर बड़ा है, लेकिन जोखिम भी उतना ही वास्तविक है। Apple के अनुभव का हवाला देते हुए अश्विनी वैष्णव जिस खतरे की ओर इशारा कर रहे हैं, उसका व्यापक अर्थ यह है कि भारतीय कंपनियों और रणनीतिक तकनीकी परियोजनाओं को केवल उत्पादन क्षमता नहीं, बल्कि साइबर सुरक्षा, आपूर्ति-श्रृंखला सुरक्षा, सूचना-युद्ध और भौतिक सुरक्षा के मोर्चे पर भी तैयार रहना होगा। बहरहाल, भारत ने सेमीकंडक्टर क्षेत्र में प्रवेश का दरवाजा खोल दिया है। अब असली चुनौती यह है कि इस दरवाजे से आने वाली वैश्विक पूंजी, तकनीक और विनिर्माण क्षमता को कितनी मजबूती से सुरक्षित रखते हुए भारत एक टिकाऊ घरेलू चिप इकोसिस्टम में बदल पाता है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 21 Sep 2026 6:00 pm

बिहार में परिसीमन प्रक्रिया के बाद कराया जाएगा अगला पंचायत चुनाव: सम्राट चौधरी

बिहार में परिसीमन प्रक्रिया के बाद कराया जाएगा अगला पंचायत चुनाव: सम्राट चौधरी

समाचार नामा 21 Sep 2026 4:36 pm

अंडा विवाद: महुआ मोइत्रा हाईकोर्ट पहुंची, अदालत ने तत्काल सुनवाई से किया इनकार

अंडा विवाद: महुआ मोइत्रा हाईकोर्ट पहुंची, अदालत ने तत्काल सुनवाई से किया इनकार

समाचार नामा 21 Sep 2026 4:31 pm

Hamid Ansari ने हिंदू राष्ट्रवाद को खतरा बताकर खड़ा किया विवाद, पलटवार में योगी और सुधांशु त्रिवेदी ने लपेट दिया!

अक्सर विवादित बयान देकर सुर्खियों में रहने वाले पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के हालिया बयान ने भारतीय राजनीति में एक बार फिर राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता और कांग्रेस की वैचारिक दिशा को लेकर तीखी बहस छेड़ दी है। नई दिल्ली में एजी नूरानी की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में अंसारी ने नूरानी की 2019 में प्रकाशित पुस्तक The RSS: A Menace to India का हवाला देते हुए जवाहरलाल नेहरू की एक कथित टिप्पणी दोहराई थी। अंसारी के अनुसार, नेहरू ने कहा था कि भारत के लिए खतरा कम्युनिज्म नहीं, बल्कि “हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता” है। इसी संदर्भ में उन्होंने नागरिक राष्ट्रवाद की जगह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के उभार पर भी सवाल उठाए थे। यहां सियासी सवाल खड़ा होता है कि क्या आज के भारत को देखने का नजरिया अब भी दशकों पुराने वैचारिक चश्मे से तय किया जाएगा? सवाल उठता है कि क्या हिंदू दक्षिणपंथ को भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा बताना ही देश की वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक वास्तविकताओं की पर्याप्त व्याख्या है? उधर, बीजेपी ने अंसारी के बयान को हाथोंहाथ लिया और कांग्रेस की वैचारिक दिशा पर ही सवाल दाग दिया। बीजेपी सांसद और राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने तंज कसते हुए कहा कि अंसारी ने अनजाने में कांग्रेस की वर्तमान राजनीति को “पूरी तरह बेनकाब” कर दिया है। उन्होंने कहा कि जिस कांग्रेस ने कभी कम्युनिज्म को चुनौती माना था, वह आज “अल्ट्रा-लेफ्ट” की ओर चली गई है। डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने अंसारी द्वारा नेहरू के हवाले को राहुल गांधी की वर्तमान राजनीतिक भाषा से जोड़ते हुए पूछा कि क्या आज की कांग्रेस की वैचारिक जड़ें उसी सोच में हैं? उन्होंने कांग्रेस को “मुस्लिम लीग-माओवादी कांग्रेस” तक कह डाला। इसे भी पढ़ें: पूर्व उपराष्ट्रपति Hamid Ansari के बयान पर CM Yogi Adityanath का पलटवार, सनातन परंपरा के अपमान का लगाया आरोप लेकिन अंसारी के बयान का दूसरा और अधिक गंभीर राजनीतिक पहलू भी है। उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में ऐसे रुझान उभरे हैं जो नागरिक राष्ट्रवाद की स्थापित अवधारणा को चुनौती देकर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को आगे बढ़ाते हैं। उनके मुताबिक इसमें चुनावी बहुमत को धार्मिक बहुमत के रूप में प्रस्तुत करने और राजनीतिक सत्ता पर एकाधिकार की प्रवृत्ति दिखाई देती है। यह महज इतिहास का संदर्भ नहीं, बल्कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था पर सीधा वैचारिक आरोप है। इसी मुद्दे पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस पर और तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि संवैधानिक पद पर रह चुके व्यक्ति से पद की गरिमा बनाए रखने की अपेक्षा होती है। योगी ने अंसारी के बयान को भारतीय परंपराओं और सनातन संस्कृति के प्रति अपमानजनक बताया तथा आरोप लगाया कि इससे भारत की वैश्विक छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश होती है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बयान में हिंदू परंपरा को आतंकवाद से जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है। उधर, भाजपा नेता सैयद शाहनवाज हुसैन ने भी अंसारी से माफी की मांग की और दावा किया कि उनकी टिप्पणी से मुस्लिम समुदाय के भी अनेक लोग असहज हुए हैं। साथ ही भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने विभाजन के बाद भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप और विभिन्न धार्मिक समुदायों के साथ रहने की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि समाज में विभाजन पैदा करने की कोशिश सफल नहीं होगी। यही नहीं, कई अन्य मुस्लिम धार्मिक नेताओं द्वारा भी अंसारी की टिप्पणियों से दूरी बनाने और सामाजिक सौहार्द पर जोर देने की खबरें सामने आई हैं। बहरहाल, अब असली राजनीतिक बहस यही है कि क्या भारत को समझने के लिए हिंदू बनाम कम्युनिज्म की पुरानी वैचारिक तुलना पर्याप्त है? क्या हिंदू राष्ट्रवाद को स्वतः “खतरा” मानना उचित है? क्या नेहरू के दशकों पुराने कथन को आज की राजनीतिक परिस्थितियों का निर्णायक प्रमाण माना जा सकता है? देखा जाये तो इस विवाद ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि भारत की राजनीति में राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता, सनातन परंपरा और सांस्कृतिक पहचान की चर्चा अब केवल इतिहास की बहस नहीं रही, यह मौजूदा सत्ता-संघर्ष के केंद्र में है।

प्रभासाक्षी 21 Sep 2026 4:10 pm

पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी से 'पद्म श्री' पुरस्कार वापस लेने की मांग, हिंदू सेना ने लिखा अमित शाह को पत्र

पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी से 'पद्म श्री' पुरस्कार वापस लेने की मांग, हिंदू सेना ने लिखा अमित शाह को पत्र

समाचार नामा 21 Sep 2026 3:06 pm

राशन इकट्ठा कर लो...यूरोप में क्या बड़ा होने वाला है! ब्रिटेन-फ्रांस अचानक क्यों करने लगे ये अपील?

क्या यूरोप एक बहुत बड़े महायुद्ध के मुहाने पर आकर खड़ा हो गया है? क्या तीसरे विश्वयुद्ध की आहट अब इतनी करीब आ चुकी है कि सरकारों ने अपने नागरिकों से सीधे तौर पर राशन और पानी जमा करने को कह दिया है? ये कोई अफवाह नहीं, बल्कि इस वक्त पूरे यूरोप की जमीनी हकीकत बन चुकी है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों खुले तौर पर कह रहे हैं कि यह वक्त बेहद मुश्किल है और सबको एक साथ खड़ा होना होगा। ब्रिटेन से लेकर फ्रांस तक, यूरोप के तमाम मुल्कों में जनता को बाकायदा हिदायत दी जा रही है कि घरों में राशन, सूखा खाना, पीने का पानी और ईंधन स्टॉक करना शुरू कर दें। यूरोप का शायद ही कोई ऐसा अखबार बचा हो जिसकी हेडलाइन में यह खौफ साफ न छलक रहा हो। दूसरी तरफ नजर डालेंगे तो अमेरिका लगभग ग्रीनलैंड की सुरक्षा का पूरा जिम्मा अपने हाथ में ले चुका है और साफ कह दिया है कि अब इस पूरे इलाके की रक्षा अमेरिकी बूट्स करेंगे। लेकिन इन सब के बीच सबसे बड़ा सवाल कि आखिर रूस की तरफ से यूरोप की खुफिया एजेंसियों को ऐसे कौन से इनपुट्स मिले हैं, जिसने पूरे महाद्वीप को हिलाकर रख दिया है? क्यों यूरोपीय राजधानियों में बंकरों की धूल झाड़ी जा रही है और सेनाओं को स्टैंडबाय पर रहने का फरमान जारी हो चुका है? क्या मॉस्को से कोई ऐसा बड़ा तूफान उठने वाला है जो पूरे यूरोप को अपनी जद में ले लेगा? आज इसी का एमआरआई स्कैन करते हैं। इसे भी पढ़ें: Congress का Election Commission पर हमला, SIR प्रक्रिया को बताया मतदाताओं के नाम हटाने की साजिश 1600 ड्रोंस से रूस पर अटैक यूक्रेन ने 20 सितंबर को यहां कई ड्रोन हमले किए हैं। आप इसका अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि रशिया ने दावा किया है कि यूक्रेन की तरफ से आने वाले 1600 ड्रोंस को उसने इंटरसेप्ट किया है और वीडियो से भी इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस हमले में दो लोगों की मौत हुई है। यूक्रेन ने रशिया की राजधानी मॉस्को की एक ऑयल रिफाइनरी और सेना के लॉजिस्टिक ठिकाने को टारगेट किया। कई इमारतों को इसमें नुकसान भी पहुंचा है। यह हमला ऐसे समय में हुआ जब रूस में संसदीय चुनाव के लिए वोटिंग चल रही थी। वोटिंग का अंतिम दिन था। लोअर हाउस जो संसद है रूस का उसके लोअर हाउस के लिए यह वोटिंग थी। यूक्रेनी राष्ट्रपति वडदमीर जेलस्की ने खुद हमले की जानकारी दी। उन्होंने सोशल मीडिया पर वीडियो पोस्ट कर लिखा, हमने रूस की ऑयल रिफाइनरी और सेना के लॉजिस्टिक ठिकाने को टारगेट किया। यह वही अरबों डॉलर का तंत्र है जहां रूस अपने डिफेंस का सामान तैयार करता है। जेलस्की ने यह भी बताया हमले में यूक्रेन ने क्या-क्या इस्तेमाल किया है। इसे भी पढ़ें: Shafali Verma के शतक से Asian Games सेमीफाइनल में India ने बनाए 195 रन चुनाव के अंतिम दिन क्यों हुआ हमला यूक्रेन ने हमले के लिए ठीक ऐसा वक्त चुना जब व्लादमीर पुतिन के 26 साल के एक छत्रराज को नई ताकत देने के लिए वोट डाले जा रहे थे। ठीक उसी वक्त जेलस्की के ड्रोन ब्रिगेड ने ऑपरेशन मॉस्को को अंजाम दे दिया। रूसी अधिकारियों के मुताबिक ड्रोन हमलों में तीन लोगों की जान चली गई जबकि 20 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। मतलब साफ है कि यह सिर्फ आसमान में उड़ते हुए यूक्रेन के ड्रोंस नहीं थे बल्कि रूस के दिल माने जाने वाले क्रिमिया पर यूक्रेन का लॉन्ग रेंज अटैक था। मॉस्को के आसमान में जिस तरह से एक के बाद एक धमाके हुए उससे रूस की एयर डिफेंस क्षमता पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं। क्योंकि यूक्रेन के हमलों का निशाना बना है मॉस्को का सबसे बड़ा ऑयल रिफाइनरी कॉम्प्लेक्स जो धमाकों के बाद पूरी तरह से स्वाहा हो गया है। यूक्रेन पिछले कई महीनों से रूस के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बना रहा है। क्योंकि तेल और गैस से होने वाली कमाई रूस की युद्ध मशीन के लिए बेहद अहम मानी जाती है। ऐसे में रूसी तेल रिफाइनिंग क्षमता पर यूक्रेनी हमलों से रूसी ईंधन की सप्लाई और कीमतों पर भी असर पड़ना तय है। उधर मॉस्को में 21 मंजिला एक रिहााइशी इमारत में ड्रोन टकराने से भीषण आग लग गई। इस बीच यूक्रेन के इस सबसे बड़े ड्रोन अटैक पर बड़ा सवाल यह उठने लगा है कि आखिर चुनाव के अंतिम दिन मॉस्को पर इतना बड़ा हमला क्यों किया गया? इसके जवाब में मॉस्को के मेयर सरगई सोबियानिन ने बताया कि यूक्रेन के हमले का सीधा मकसद रूसी संसदीय चुनाव में खलल डालना था। NATO के खिलाफ निर्णायक जंग छेड़ने की तैयारी में पुतिन रूसी भाषा में बोलते व्लादिमीर पुतिन का एक बयान सामने आया है। जिसमें वो कह रहे हैं कि नाटो हमारी तरफ एक्सपेंड करने की कोशिश कर रहा है। नए-नए इलाके में घुसने कोशिश कर रहा है। अब हमने फैसला किया है कि उनके खिलाफ अब निर्णायक जंग छेड़ दिया जाए। अब हुआ यह कि जैसे ही एक तो रूस के राष्ट्रपति ने कह दिया कि मारेंगे जरूर चाहे जो हो जाए और ऊपर से वहां राशन पानी इकट्ठा करने की बात हो ही गई। सारे यूरोप वाले कह रहे हैं कि हमारी रक्षा तो अमेरिका करता था। तो अमेरिका बचाएगा कि नहीं हमें? डोनाल्ड ट्रंप अलग ही मूड में नजर आ रहे हैं। उन्होंने अनाउंस किया कि हम यूक्रेन में अपने सैनिक तैनात है वापस ले रहे हैं। इतना ही नहीं उन्होंने कहा है कि गल्फ नेशन में जो अमेरिकन सैनिक हैं हम ईरान के हाथों मरने नहीं दे सकते। उसको भी वापस ले लेंगे। क्या नाटो की सीमा पर बड़ा धमाका होने वाला है यूरोपीय खुफिया एजेंसियों की तरफ से आई एक ताजा और बेहद सनसनीखेज रिपोर्ट ने पूरे पश्चिमी खेमे में खलबली मचा दी है। खुफिया अधिकारियों का दावा है कि रूस बहुत जल्द नाटो की ताकत और उसकी एकजुटता की परीक्षा ले सकता है, और यह संभावित हमला सालों में नहीं, बल्कि कुछ ही महीनों के भीतर देखने को मिल सकता है। पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने अपनी संसद में साफ लफ्जों में चेतावनी दी है कि मॉस्को आने वाले महीनों में ड्रोन या मिसाइलों के जरिए नाटो की जमीन को निशाना बना सकता है। टस्क के मुताबिक, पुतिन का सीधा मकसद यह साबित करना है कि नाटो का सबसे ताकतवर सुरक्षा कवच यानी आर्टिकल 5, जमीन पर सिर्फ एक किताबी थ्योरी है, हकीकत नहीं। इस चेतावनी की गंभीरता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने टस्क के इन दावों को बेहद सटीक और पुख्ता सबूतों पर आधारित बताया है। हालात इतने नाजुक हो चुके हैं कि मैक्रों ने पेरिस में तमाम राजनीतिक दलों के नेताओं और राष्ट्रपति पद के दावेदारों की एक आपातकालीन बैठक तलब कर ली, जहां रूस के इस बढ़ते खतरे पर बंद कमरों में रणनीति तैयार की जा रही है। यह चिंता तब बढ़ रही है जब इस हफ़्ते के आखिर में न्यूयॉर्क में UN जनरल असेंबली की बैठक होने वाली है और साथ ही रूस-यूक्रेन युद्ध में दोनों तरफ़ से हवाई हमले तेज़ हो गए हैं। रविवार तड़के कीव ने मॉस्को और रूस के दूसरे इलाकों पर सैकड़ों ड्रोन और मिसाइलें दागीं। यह इस युद्ध के दौरान किए गए सबसे बड़े हवाई हमलों में से एक था। द गार्जियन को दिए गए अलग-अलग साक्षात्कारों में पश्चिमी खुफिया प्रमुखों ने पुतिन के अगले खतरनाक कदम का जो खाका खींचा है, उसने नाटो मुख्यालय से लेकर तमाम यूरोपीय देशों की नींद उड़ा दी है। चेक गणराज्य की सुरक्षा सेवा 'बीआईएस' के प्रमुख माइकल कोउडेल्का ने प्राग स्थित अपने मुख्यालय में एक दुर्लभ इंटरव्यू के दौरान बेहद सनसनीखेज अंदेशा जताया है। कोउडेल्का के मुताबिक, केवल ड्रोन और मिसाइल स्ट्राइक ही नहीं, बल्कि रूस से सटी नाटो सीमा पर रूसी सेना की एक सीमित जमीनी घुसपैठ यानी 'स्मॉल-स्केल इनवेजन' भी क्रेमलिन के प्लान का सीधा हिस्सा हो सकता है। माइकल कोउडेल्का ने चेताते हुए साफ कहा यह पूरी तरह मुमकिन है। रूस की योजना में एक सीमित सैन्य घुसपैठ, फॉल्स-फ्लैग उकसावे वाली साजिशें और नाटो देशों के भीतर एक बड़े पैमाने का इनफ्लुएंस कैंपेन शामिल हो सकता है। और यह खतरा सालों दूर नहीं, बल्कि महज कुछ महीनों के भीतर हकीकत का रूप ले सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि पश्चिमी सुरक्षा एजेंसियां दिन-रात एक कर रही हैं ताकि हालात इस खौफनाक स्तर तक न पहुँचें। क्या अमेरिका की रणनीतिक चूक से बिगड़े हालात! यह लड़ाई अब तेजी से फैलती दिख रही है। अमेरिका को अपने नागरिकों के लिए अलर्ट जारी करना पड़ा है, डोनल्ड ट्रंप छुट्टी खत्म होने से पहले ही वापस लौट आए। वॉशिंगटन इन हालात से पूरी तरह पल्ला नहीं झाड़ सकता है। ईरान पर हमले से लेकर उसके साथ हुए अंतरिम समझौते को तोड़ने तक, कई मौकों पर गंभीर चूक हुई है। ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन यह आकलन करने में बुरी तरह नाकाम रहा कि संघर्ष किस हद तक जा सकता है। उसने पश्चिम एशिया में अपने सहयोगियों की चिंताओं को भी नजरअंदाज किया और हूतियों का बढ़ता खतरा उसी का नतीजा है।अमेरिकी राष्ट्रपति ने पिछले हफ्ते कहा था कि मास्को और कीव एक-दूसरे के ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमले रोकने के लिए सहमत हुए हैं। पिछले दिनों जब उनकी स्पेशल टीम ने दोनों देशों का दौरा किया था, तब उसे भी इस बात के रूप में प्रचारित किया गया कि अमेरिका अब वास्तविक बातचीत चाहता है । पर रूस पर अमेरिकी प्रतिबंधों वाले नए बिल और इन ताजा हमलों ने सारी कोशिशों को पीछे धकेल दिया है।

प्रभासाक्षी 21 Sep 2026 2:06 pm