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ममता बनर्जी के काफिले पर हमला 'सुनियोजित साजिश', टीएमसी ने भाजपा पर लगाया आरोप
ममता बनर्जी के काफिले पर हमला 'सुनियोजित साजिश', टीएमसी ने भाजपा पर लगाया आरोप
एशिया में ईरान और रूस के दांवपेंच से निपटने के लिए या फिर अमेरिका और चीन की शह पर पहले पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच और अब तुर्किये के साथ भी मक्का में जो रक्षा समझौते हुए हैं, उसके दृष्टिगत भारतवासियों के दिलोदिमाग में बस एक ही सवाल कौंध रहा है कि क्या कथित 'इस्लामिक नाटो' से भारत की कूटनीतिक चुनौतियां बढ़ेंगी? क्या इससे निपटने में रूस-ईरान से रक्षा सम्बन्धों को और मजबूती दी जानी चाहिए? या फिर अमेरिका या चीन या फिर दोनों के इशारे पर हुए इस गठबंधन के पीछे कोई परोक्ष चाल तो नहीं है? तो जवाब होगा कि हाँ—भारत की कूटनीतिक चुनौतियाँ बढ़ सकती हैं, लेकिन इसे अभी सीधे-सीधे “इस्लामिक NATO” कहना जल्दबाजी होगी। दरअसल, गत 7 अगस्त 2026 को मक्का में सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान ने एक संयुक्त रक्षा समझौता किया है, जिसमें एक पर सशस्त्र हमला तीनों पर हमला माना जाएगा। यह पहले के सऊदी-पाकिस्तान रक्षा समझौते का विस्तार है। लिहाजा भारत के लिए असली चिंता यह है कि- इसे भी पढ़ें: तीन तिगाड़ा काम...पाक-सऊदी-तुर्किये की यारी क्या भारत पर पड़ेगी भारी? 'सुन्नी NATO' से हम कितने मजबूत, इस रिपोर्ट में जानें पहली, पाकिस्तान को नया रणनीतिक ऑक्सीजन मिल सकता है: पाकिस्तान के पास परमाणु क्षमता, तुर्किये के पास मजबूत रक्षा उद्योग/सैन्य क्षमता और सऊदी अरब के पास वित्तीय व ऊर्जा शक्ति है। इन तीनों का संयोजन पाकिस्तान को भारत के मुकाबले कूटनीतिक और सैन्य दबाव बनाने के नए साधन दे सकता है। दूसरा, तुर्किये का शामिल होना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है: भारत-पाकिस्तान तनाव के दौरान तुर्किये ने कई बार इस्लामाबाद के पक्ष में राजनीतिक रुख अपनाया है। अब यदि वह किसी औपचारिक सामूहिक रक्षा व्यवस्था का हिस्सा है, तो भविष्य के भारत-पाकिस्तान संकट में उसका वजन और बढ़ सकता है। तीसरा, सऊदी अरब को पाकिस्तान का “स्थायी सैन्य सहयोगी” मान लेना भी गलत होगा: रियाद के भारत के साथ बड़े आर्थिक, ऊर्जा और रणनीतिक हित हैं। इसलिए सऊदी नेतृत्व के लिए पाकिस्तान के साथ रक्षा सहयोग और भारत के साथ रणनीतिक संबंध—दोनों को साथ लेकर चलना संभवतः अधिक उपयोगी है। यक्ष प्रश्न : क्या इसके पीछे रूस विरोधी अमेरिका की चाल हो सकती है? जवाब: संभावना को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन अभी इसका प्रमाण नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि जनवरी 2026 में ही रणनीतिक विश्लेषण में यह कहा जा रहा था कि तुर्किये इस तरह के गठबंधन का इस्तेमाल NATO के भीतर अपनी bargaining power बढ़ाने और “hedging” के लिए कर सकता है। चूंकि अमेरिका के लिए ऐसा ढांचा कुछ परिस्थितियों में उपयोगी भी हो सकता है, क्योंकि ईरान के विरुद्ध क्षेत्रीय deterrence बढ़ाना, पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य बोझ कम करना, सऊदी सुरक्षा को वैकल्पिक रूप से मजबूत करना, तुर्किये को पश्चिमी सुरक्षा ढांचे से पूरी तरह दूर जाने से रोकना और पाकिस्तान को चीन के पूर्ण प्रभाव में जाने से रोकना उसका असली मकसद है। इसलिए इसे “अमेरिका के खिलाफ गठबंधन” मानना उतना ही गलत होगा जितना इसे निश्चित रूप से “अमेरिकी परियोजना” मान लेना। सुलगता सवाल: और जहाँ तक चीन की बात है? यहाँ मामला और दिलचस्प है। जवाब: चीन के पाकिस्तान के साथ अत्यंत गहरे रक्षा संबंध हैं और सऊदी अरब के साथ उसके आर्थिक संबंध लगातार बढ़े हैं। यदि यह त्रिकोण आगे चलकर विस्तृत होता है, तो बीजिंग को पश्चिम एशिया–पाकिस्तान–हिंद महासागर के बीच अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर मिल सकता है। लेकिन चीन के लिए भी समस्या है: सऊदी अरब अमेरिका से पूरी तरह अलग नहीं होना चाहता और तुर्किये NATO का सदस्य है। इसलिए इसे अभी चीन-नेतृत्व वाला गठबंधन कहना वास्तविकता से आगे निकलना होगा। # आखिर भारत को किस बात से सबसे ज्यादा सावधान रहना चाहिए? मेरे आकलन में “इस्लामिक NATO” शब्द से ज्यादा महत्वपूर्ण इसके संभावित नेटवर्क प्रभाव हैं। यदि भविष्य में इसमें कतर, अजरबैजान, मिस्र या अन्य मुस्लिम-बहुल देश किसी रूप में जुड़ते हैं, तो तस्वीर बदल सकती है। मई में पाकिस्तान की ओर से तुर्किये और कतर के संभावित जुड़ाव की बात भी सामने आई थी। तब भारत को तीन मोर्चों पर चुनौती मिल सकती है: पश्चिम एशिया → पाकिस्तान → तुर्किये, यानी पाकिस्तान को पहली बार भारत के विरुद्ध केवल द्विपक्षीय नहीं बल्कि बहु-देशीय कूटनीतिक समर्थन तंत्र बनाने का अवसर मिल सकता है। लेकिन भारत की स्थिति भी कमजोर नहीं है, क्योंकि भारत को प्रतिक्रिया में किसी “anti-Islamic bloc” में जाने की जरूरत नहीं है। उलटे भारत की ताकत उसकी multi-alignment diplomacy है। चूंकि भारत को एक साथ सऊदी अरब और UAE से रणनीतिक संबंध है, इजरायल से रक्षा एवं तकनीकी सहयोग है, मिस्र और ग्रीस से समुद्री सहयोग है, ईरान से चाबहार संपर्क है, अमेरिका से Indo-Pacific साझेदारी है, रूस से रक्षा संबंध है और खाड़ी देशों में विशाल भारतीय प्रवासी समुदाय है, जिसका लाभ भारत को उठाना चाहिए। यही भारत का सबसे बड़ा जवाब होगा—किसी एक धुरी में शामिल होना नहीं, बल्कि इतनी मजबूत बहुध्रुवीय स्थिति बनाना कि कोई धुरी भारत को घेर न सके। निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि अभी इसे “भारत को घेरने की साजिश” कहना अतिशयोक्ति होगी। लेकिन पाकिस्तान–तुर्किये–सऊदी रक्षा समझौता भारत के लिए एक वास्तविक strategic signal जरूर है। और सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि “इसके पीछे अमेरिका है या चीन?”, बल्कि यह है कि क्या दोनों महाशक्तियाँ अपने-अपने हित के लिए इस नए क्षेत्रीय समीकरण का इस्तेमाल करने की कोशिश करेंगी? इसकी संभावना काफी अधिक है। और एक महत्वपूर्ण बात: इस गठबंधन को “इस्लामिक NATO” कहना स्वयं इन देशों की आधिकारिक भाषा नहीं है; विश्लेषकों ने भी इस लेबल को भ्रामक बताया है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
अफसरों जिम्मेदार ठहराने से होगा समस्याओं का समाधान
देश की सरकारों के पास हर समस्या का एक लाइलाज रामबाण इलाज यह है कि किसी समस्या की गहराई के उपचार के बजाए कानून बना दिया जाए। सरकारें हर समस्या का इलाज व्यवहारिक धरातल पर नहीं बल्कि कानून में ढूंढने की आदी हो चुकी हैं। देश में हर क्षेत्र में एक के बाद एक नए कानून बनाए जा रहे हैं, किन्तु समस्याएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। जितने भी नए कानून बनाए जा रहे हैं, या पुराने कानूनों मे संशोधन किया जा रहा, उसका सारा भार देश के आम लोगों पर ही डाला जा रहा है। इन काूननों में कहीं लापरवाही बरतने या अनदेखी के लिए देश के आला अफसर जिम्मेदार नहीं हैं। आजादी से लेकर आज तक ऐसा कोई कानून केंद्र या किसी राज्य ने नहीं बनाया है कि यदि कोई घटना—दुर्घटना या कांड होगा तो उसके लिए सीधे अफसर भी जिम्मेदार माने जाएंगे। संशोधित केंद्रीय पेपर लीक कानून में अनुचित साधनों का इस्तेमाल करने पर कम से कम 5 वर्ष और अधिकतम 10 वर्ष तक की सजा होगी। अधिकतम जुर्माना 10 लाख रुपये से बढ़ाकर 50 लाख रुपये कर दिया गया है। संगठित अपराधों में 7 से 10 वर्ष तक की सजा और 10 करोड़ रुपये तक जुर्माने का प्रावधान किया गया है। पेपर लीक का नया केंद्रीय कानून बनाने के बावजूद झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) परीक्षा में पेपर लीक और अनियमितताएं हुईं। इस मामले में अब तक 11 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है और जेपीएससी के चेयरमैन एल. खियांगटे ने इस्तीफा भी दे दिया। केंद्र सरकार के बनाए पेपर लीक परीक्षा कानून देश में एक अगस्त से अस्तित्व मे आ चुका है। इसके बावजूद देश में भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक मामले थम नहीं रहे हैं। इसे भी पढ़ें: जंतर-मंतर पर Students के लिए आवाज, झारखंड में छात्रों पर हुए लाठीचार्ज पर चुप्पी, वाह क्या दोगलापन है! राजस्थान में अप्रैल 2022 में एंटी पेपर लीक एक्ट लागू किया गया। गुजरात में मार्च 2023 से सख्त नकल और पेपर लीक विरोधी कानून लागू। उत्तराखंड में वर्ष 2023 में प्रतियोगी परीक्षा अध्यादेश/कानून लागू किया गया। झारखंड में वर्ष 2023 में अनुचित साधनों की रोकथाम के लिए अधिनियम बनाया गया। हरियाणा में सितंबर 2021 से प्रभावी कानून लागू है। इसी तरह असम, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, अरुणाचल प्रदेश, ओडिशा और आंध्र प्रदेश आदि राज्यों में भी अलग-अलग वर्षों में इससे जुड़े कड़े कानूनी प्रावधान या अधिनियम बनाए जा चुके हैं। केंद्र और इतने राज्यों में पेपर लीक कानून के बाद भी पेपर लीक की घटनाएं थम नहीं रही है। पेपर लीक की तरह देश में बलात्कार के मामलों में बेहद कठोर कानून बनाए गए थे। बलात्कार और इसके साथ हत्या के मामलों में फांसी तक का प्रावधान किया गया है। 2012 में दिल्ली में एक छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार और हत्या के दोषी चार भारतीय पुरुषों को फांसी दे दी गई थी। निर्भया बलात्कार हत्याकांड से लोगों में आक्रोश फैल गया था और भारत में बलात्कार विरोधी नए कानून बनाए गए। आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2018 के तहत 12 साल से कम उम्र की बच्चियों के बलात्कार में मृत्युदंड का प्रावधान किया गया। गैंग रेप में न्यूनतम सजा 20 साल से आजीवन की गई। इतने कठोर कानून के लागू होने के बावजूद देश में बलात्कार—हत्या के मामले बढ़ते चले गए। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के मुताबिक देश के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में साल 2023 में 31,982 महिलाओं के साथ बलात्कार के मामले दर्ज हुए। इससे जाहिर है कि नए कठोर कानूनों का अपराधियों को कोई भय नहीं है। ये कानून महज कागज का पुलिन्दा साबित हो रहे हैं। यही भ्रष्टाचार का भी हाल है। देश में भ्रष्टाचार रोकने के लिए कठोर कानून बने हुए हैं, इसके बावजूद देश से भ्रष्टाचार खत्म होना तो दूर बल्कि कम तक नहीं हो सका। आए दिन कहीं न कहीं भ्रष्टाचार की खबरें आती रहती हैं। भ्रष्टाचार खत्म नहीं करने के लिए कभी किसी अफसर को जिम्मेदार नहीं माना गया। बेशक उनके विभाग का ही कोई भ्रष्टाचारी क्यों न पकड़ा जाए। आज तक जितने भी कानून बनाए गए हैं, उसमें अफसरों की जिम्मेदारी कहीं भी तय नहीं की गई। मसलन सड़क पर गडढा होने से यदि कोई सड़क दुर्घटना होती है या फिर बगैर अग्नि सुरक्षा उपायों के संचालित किसी व्यवसायिक भवन में अग्नि दुर्घटना होती है तो इसके निगरानी करने वाले अफसर जिम्मेदार ठहराए जाएंगे, ऐसा कोई कानून नहीं बना है। यही प्रमुख वजह है कि चाहे पेपर लीक हों या किसी तरह का बड़ा हादसा, कानूनों को सख्त कर दिया जाता है, किन्तु जिम्मेदार अधिकारियों की जिम्मेदारी तय नहीं की जाती। इसका बड़ा उदाहरण मेलों, धार्मिक स्थलों पर होने वाले आयोजनों में भगदड़ के दौरान होने वाली मौतें हैं। ऐसा शायद ही कोई साल जाता होगा, जब ऐसे हादसे नहीं होते होंगे। ऐसे हादसों में अब तक देश भर में हजारों लोगों की मौत हो चुकी है। इसके बावजूद अफसरों की ज्मिमेदारी तय नहीं की गई। ऐसा कोई कानून नहीं बनाया गया कि ऐसे आयोजनों में हादसों के लिए सीधे अफसर जिम्मेदार ठहराएं जाएंगे, उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलेगा और उन्हे जेल की सजा भुगतनी पड़ेगी। अफसरों की लापरवाही से हुए हादसों और इससे बच निकलने का बड़ा उदाहरण राजस्थान का है। जहां दो साल पहले स्कूल की छत्त गिरने से 10 से ज्यादा बच्चों की मौत हो गई, इसके बाद भी स्कूल की छत्त गिरने या दीवार गिरने के हादसे होते रहे, किन्तु एक भी अफसर को आपराधिक आरोपी नहीं माना गया। किसी पर एफआईआर दर्ज नहीं हुई। पुलिस ने आईएएस अफसर तो दूर बल्कि शिक्षा विभाग के किसी अफसर के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की। राजस्थान सहित देश के लाखों सरकारी स्कूलों की इमारतों की हालत खस्ता है। सरकारों के पास इतना बजट ही नहीं है कि इतना रखरखाव किया जा सके। यह निश्चित है कि चुनी हुई सरकारें लंबे अर्से तक देश के लोगों की आंखों में धूल नहीं झौंक सकती, उन्हें कानून बनाने के साथ ही धरातल पर समस्याओं का समाधान ढूंढना होगा। देश में बुनियादी सुविधाओं की पहुंच आम नागरिकों तक बढ़ानी होगी। इसकी कमी से हर साल बिजली, पानी, सड़क, स्कूल, अस्पताल के अभाव जैसे मुद्दों पर धरने, प्रदर्शन, आंदोलन होते हैं, किन्तु इनका स्थायी समाधान नहीं होता। सरकारों की हालत 'खेत खाए गदहा और मार खाए जुलहा' जैसी है। जब तक सरकारें और जिम्मेदार अफसर अपनी जिम्मेदारी से भागते रहेंगे। ऐसी समस्याओं का समाधान नहीं होगा, बेशक कितने भी नए कानून बन जाएं। - योगेन्द्र योगी
Chai Par Sameeksha: Punjab Politics में शुरू हुआ गजब का खेल, उधर संसद में चल रहा है आंकड़ों का गेम
प्रभासाक्षी के साप्ताहिक कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में इस सप्ताह हमने पंजाब की राजनीति और संसद में चल रहे हंगामे पर चर्चा की। हमेशा की तरह इस कार्यक्रम में मौजूद रहे प्रभासाक्षी के संपादक नीरज कुमार दुबे। पंजाब को लेकर हमने नीरज दुबे पूछा। नीरज दुबे ने कहा कि पंजाब में फिलहाल के घटनाक्रमों पर नजर डालें तो कई चीजें एक साथ चल रही है। सबसे पहले उन्होंने कहा कि हमने देखा कि सुखबीर बादल जो कि शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष हैं, उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात होती है। इसके बाद इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि क्या एक बार फिर से पंजाब में अकाली दल और भाजपा एक साथ आ सकती है। उन्होंने कहा कि दोनों दलों में पुराना गठबंधन रहा है। हालांकि, किसान आंदोलन के समय दोनों अलग-अलग हुए थे। लेकिन अब ऐसा लगता है कि अकाली दल को यह समझ में आ गया है कि बिना गठबंधन उसे फायदा होने वाले नहीं है। इसलिए शायद अब भाजपा के साथ एक बार फिर से समीकरण को बैठाने की कोशिश की जा रही है। नीरज दुबे ने कहा कि पंजाब की परिस्थितियों को देखें तो ग्रामीण क्षेत्रों में बीजेपी के लिए स्थितियां अभी भी अनुकूल नहीं है। यहां पर अकाली दल मजबूत है। दूसरी ओर अकाली दल को बीजेपी की वजह से शहरी वोट मिल जाते हैं। ऐसे में दोनों गठबंधनों के लिए यह पहले कारगर हुआ करता था। एक बार फिर से कुछ इसी तरीके की उम्मीद की जा रही है। प्रकाश सिंह बादल के निधन के बाद अकाली दल की स्थितियां सामान्य नहीं है। पार्टी में टूट भी हुई। सुखबीर सिंह बादल पर बेअदबी का आरोप भी लगा। तो ऐसे कई मामले हुए जो कि अकाली दल के लिए काफी चुनौतियां लेकर आई। हालांकि अब अकाली दल अपने खोए हुए जनाधार को वापस पाना चाहता है और शायद इसी वजह से भाजपा के साथ एक बार गठबंधन की फिर से चर्चा तेज हो गई है। इसे भी पढ़ें: Punjab में रोजगार स्थिति पर श्वेत पत्र लाए AAP सरकार: SAD नेता Daljit Singh Cheema कांग्रेस को लेकर नीरज कुमार दुबे ने कहा कि भले ही राहुल गांधी कैप्टन अमरिंदर सिंह को लेकर अच्छी बातें कर रहे हैं लेकिन अमरिंदर सिंह ने कह दिया है कि वह भाजपा के साथ है और आगे भी रहेंगे। इसके साथ ही उन्होंने कांग्रेस के भीतर मचे घमासान पर भी बड़ी बात कही। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के लिए स्थितियां अनुकूल दिखाई नहीं दे रही है। कांग्रेस आज से तीन-चार महीने पहले पंजाब में सत्ता के करीब दिखाई दे रही थी क्योंकि आम आदमी पार्टी का कुछ खास प्रदर्शन नहीं रहा है। लेकिन अब कांग्रेस के भीतर आपस में ही गुटबाजी शुरू हो गई है। चरणजीत सिंह चन्नी और वहां के प्रदेश अध्यक्ष राजा वरिंग के बीच लगातार आर पार चल रहा है। भूपेश बघेल प्रभारी के तौर पर आज तक सफल नहीं हो पाए हैं। ऐसे में पंजाब में कितने सफल होंगे इस पर सब की निगाहें रहने वाली है। संसद को लेकर नीरज कुमार दुबे ने साफ तौर पर कहा कि सरकार पूरी तरीके से डीलिमिटेशन बिल को लेकर आगे बढ़ रही है। लगातार अमित शाह इसी को लेकर बैठक कर रहे हैं। विपक्ष उन पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। इसी वजह से विपक्ष उनके बयान की मांग कर रहा है। हालांकि सरकार इसको लेकर बहुत ज्यादा प्रेशर में नहीं है। सरकार को जो बिल जरूरी लग रहे हैं, उसे वह पास कर ले रही है। हालांकि, लोकतंत्र के लिए बिल्कुल अच्छी चीज नहीं है। बिना बहस के कोई बिल पास हो जाए यह ठीक नहीं लगता। इसीलिए सरकार डीलिमिटेशन बिल और महिला आरक्षण बिल को लेकर एक सहमति बनाने की कोशिश कर रही है ताकि एक अच्छा संदेश जाए। हमने देखा किस तरीके से सरकार की ओर से कांग्रेस नेताओं से संपर्क किया गया। हालांकि कांग्रेस नेता अभी भी अपने रुख पर अड़े हुए हैं। देखना है कि अगले सप्ताह में किस तरीके से संसद में कार्यवाही हमें देखने को मिलती है।
चाय की टपरी पर 5 रुपये की कटिंग से लेकर बड़े-बड़े मॉल्स में हज़ारों का सामान खरीदने तक'स्कैन किया और पे किया'ये अब हमारे आम दिन चर्या का हिस्सा बन चुका है। आज सब्जी की रेहड़ी वाला भी छुट्टे पैसे मांगने की जगह सीधा क्यूआर कोड (QR Code) आगे बढ़ा देता है। डिजिटल इंडिया ने हमारी जेब से कैश का झंझट तो खत्म कर दिया, लेकिन क्या यह आराम अब ज़्यादा दिन का मेहमान नहीं है? भारत फिर से कैश वाले ज़माने में लौट रहा है! भारत-पे के पूर्व को-फाउंडर अशनीर ग्रोवर ने सोशल मीडिया पर ऐसा ही कुछ दावा करके पूरे देश में खलबली मचा दी है। सुनने में अजीब ज़रूर लगेगा, पर जिस रफ्तार से नियम बदल रहे हैं और पेमेंट्स पर पेंच फंस रहे हैं, वो दिन दूर नहीं जब आपको अपनी जेब में फिर से गांधी जी के नोटों की गड्डी सजानी पड़ जाए! क्या सच में मुफ़्त यूपीआई का ज़माना जाने वाला है? क्या आपके गूगल पे, फोनपे और पेटीएम से अब पैसे कटने वाले हैं या फिर यह सिर्फ दुकानदारों का नया सिरदर्द है? आइए, यूपीआई पर चार्ज के इस पूरे गणित का पर्दाफाश करते हैं! एमडीआर आखिर होता क्या है? जब आप किसी दुकान पर कार्ड या डिजीटल पेमेंट से पैसा देते हैं तो पेमेंट सिस्टम को चलाने वाली कंपनियों और बैंकों को एक फीस मिलती है। इसी फीस को एमडीआर यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट कहा जाता है। फिलहाल यूपीआई पूरी तरह फ्री है। इसका मतलब है कि बैंकों और कंपनियों को इसे चलाने के लिए अपनी जेब से पैसा खर्च करना पड़ता है। इस पूरे विवाद की जड़ में है टैक्सेशन एंड अदर लॉ अमेंडमेंट बिल 2026। 6 अगस्त 2026 को लोकसभा में हंगामे के बीच बगैर चर्चा ध्वनि मत से इस बिल को पारित किया गया। यह बिल पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम एक्ट 2007 में संशोधन करता है। अब तक कानून यह था कि यूपीआई और रुपए डेबिट कार्ड के जरिए होने वाले भुगतान पर कोई भी बैंक या सर्विस प्रोवाइडर कोई शुल्क माने एमडीआर नहीं वसूल कर सकता है। पुराने कानून की धारा 10 ए स्पष्ट रूप से बैंकों को ऐसे चार्ज लगाने से रोकती थी। लेकिन नए संशोधन ने सरकार को यह अधिकार दे दिया है कि वह भविष्य में नोटिफिकेशन के जरिए यह तय कर सकें कि किन डिजिटल पेमेंट मोड पर शुल्क लगाया जा सकता है और किन्हें मुफ्त रखा जाना चाहिए। आसान भाषा में कहें तो अब तक जो कानूनी गारंटी थी कि यूपीआई मुफ्त रहेगा वो खत्म हो गई है। लोकसभा पास कर चुकी है बिल वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पिछले हफ्ते लोकसभा में टैक्सेशन एंड अदर लॉज ( अमेंडमेंट) बिल 2026 पेश किया था, जिसे लोकसभा पास कर चुकी है। यह बिल सरकार को UPI और रूपे कार्ड से होने वाले ट्रांजैक्शंस पर जीरो MDR की व्यवस्था में बदलाव करने का कानूनी आधार देता है। अभी बैंक और पेमेंट सर्विस देने वाली कंपनियां यूपीआईऔर रूपे डेबिट कार्ड के जरिए पेमेंट के लिए यूजर्स से कोई चार्ज नहीं ले सकती हैं। मंत्रालय ने बयान में कहा, 'इस बिल के संसद से पास होने के बाद UPI और अन्य सेवाओं पर NPCI की अध्यक्षता वाली कमिटी तय करेगी कि कोई एमडीआर लगेगा या नहीं। सरकार ने साफ की तस्वीर सरकार यह स्पष्ट रूप से बताना चाहती है कि यूजर्स के लिए कोई चार्ज नहीं होगा। पेमेंट करने वाले उपभोक्ताओं पर कोई ट्रांजैक्शन चार्ज नहीं लगेगा। सभी पर्सन टु पर्सन ट्रांजैक्शन भी बिना किसी चार्ज के होते रहेंगे। मर्चेंट्स के बारे में मंत्रालय ने कहा कि एमडीआर चार्जेज जब भी लागू होंगे, ये कुछ ही मर्चेट ट्रांजैक्शंस पर लगेंगे। संशोधन की जरूरत क्यों पड़ी? मंत्रालय ने कहा कि हकीकत में यह संशोधन इस बात का प्रावधान करने के लिए है, जिससे यूपीआई लंबे समय तक चलता रहे, टेक्नॉलजी बेहतर हो सके और जो भी जोखिम उभरे, उनका अच्छी तरह से सामना किया जा सके। मंत्रालय ने कहा कि यूपीआई से बढ़ते लेनदेन को देखते हुए साइबर सिक्योरिटी और इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने की जरूरत है। साथ ही, ज्यादा कंपनिया अपना कामकाज बढ़ा सकें, इसके लिए प्रतिस्पर्द्धा बढ़ाने की जरूरत भी है। इसके लिए आत्मनिर्भर रेवेन्यू मॉडल की जरूरत है। आरबीआई गवर्नर ने भी दिलाया भरोसा आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने इस मुद्दे पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा पेमेंट जैसे पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश जरूरी है और इसके लिए किसी ना किसी को तो पेमेंट करना ही होगा। हमारे सामने आसान विकल्प है। या तो आम जनता टैक्स के जरिए इसके लिए पेमेंट करें या फिर यूजर पे मॉडल को अपनाते हुए मर्चेंट डिस्काउंट रेट एमडीआर लागू करें। अभी सरकार हमारे लिए संशोधन ला रही है। लागत का पेमेंट तो किसी ना किसी को करना ही होगा। द हिंदू में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार सरकारी आंकड़े कहते हैं कि सरकार ने पेमेंट कंपनियों को नुकसान से बचाने के लिए अब तक लगभग 11349 करोड़ की सब्सिडी दी है। लेकिन यूपीआई का दायरा इतना बढ़ गया है कि अब सरकार के लिए हर साल हजारों करोड़ की सब्सिडी देना मुश्किल हो रहा है। जुलाई 2026 में ही यूपीआई ने 23.6 अरब ट्रांजैक्शन किए जिनकी कीमत 29.9 ट्रिलियन थी। इतनी बड़ी व्यवस्था को सुरक्षित रखने के लिए भारी निवेश की जरूरत है। बाहरी दबाव वाला दावा कितना सही? इस पूरे फैसले पर कांग्रेस ने सवाल उठाए हैं। 6 अगस्त को कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने एक लंबा चौड़ा ट्वीट किया जिसमें दावा किया कि मोदी सरकार द्वारा लाया गया'टैक्सेशन एंड अदर लॉज़ (अमेंडमेंट) बिल, 2026 उस वैधानिक गारंटी को समाप्त कर देता है जो अब तक यूपीआई लेने देन को शुल्क मुफ्त बनाए हुए था।उन्होंने कहा था कि 'यह कदम अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि की 2026 की उस रिपोर्ट के बाद उठाया गया है, जिसमें यूपीआई और RuPay के शुल्क-मुक्त होने की आलोचना की गई थी और आरोप लगाया गया था कि उन्होंने Visa और मास्टरकार्ड जैसे अमेरिकी पेमेंट प्लेटफॉर्मों को बाजार से बाहर कर दिया है। क्या सरकार अपने अच्छे मित्र डॉनल्ड ट्रंप के दबाव में डिजिटल भुगतान क्षेत्र को अमेरिकी कपनियों के लिए खोलना चाहती है? इस आरोप पर मंत्रालय ने कहा यह आधारहीन, पूरी तरह झूठ और गुमराह करने वाली बात है। वित्त मंत्री ने कहा कि एमडीआर का पैसा ग्राहकों से नहीं बल्कि मर्चेंट से लिया जाता है। इससे बैंक और फिनटेक कंपनियां यूपीआई की तकनीक, सुरक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर पर ज्यादा निवेश कर सकेंगी जिसका फायदा सभी यूपीआई यूज़र्स को मिलेगा। मर्चेंट ट्रांजक्शन का असर आखिरकार ग्राहकों पर पड़ सकता है? जयराम रमेश ने इसका जवाब दिया। उनका कहना है कि सरकार भले ही यह कह रही हो कि एमडीआर दुकानदार से लिया जाएगा। ग्राहक से नहीं लेकिन इसका असर आखिरकार ग्राहकों पर ही पड़ सकता है। उनका तर्क है कि दुकानदार अपनी लागत निकालने के लिए सामान की कीमत बढ़ा सकते हैं या अलग-अलग पेमेंट तरीकों के लिए अलग-अलग कीमत रख सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि मर्चेंट सिर्फ बड़े कारोबारी नहीं होते। इसमें छोटे दुकानदार, किराना स्टोर और रे पटरी वाले भी शामिल हैं। यानी अगर कोई चार्ज आया तो उसका असर छोटे कारोबारियों पर भी पड़ सकता है। यानी सरकार और विपक्ष के बीच असली सवाल यही है कि अगर भविष्य में यूपीआई और एमडीआर आता है तो उसका बोझ आखिर किस पर पड़ेगा?
पश्चिम एशिया में जारी अस्थिरता और समुद्री व्यापार मार्गों पर बढ़ते जोखिम के बीच रूस ने भारत के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को एक नई दिशा देने वाला बड़ा प्रस्ताव सामने रखा है। रूस के उप प्रधानमंत्री मरात खुसनुलिन ने मॉस्को से हिंद महासागर तक सीधे रेल संपर्क की संभावनाएं तलाशने की बात कही है। उन्होंने कहा है कि बोस्फोरस और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे रणनीतिक समुद्री मार्गों पर बढ़ते जोखिमों को देखते हुए रूस और भारत के बीच वैकल्पिक जमीनी संपर्क विकसित करना जरूरी हो गया है। रूसी समाचार एजेंसी TASS के हवाले से खुसनुलिन ने कहा कि तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के रास्ते भारत तक पहुंचने वाले विकल्पों पर विचार किया जा सकता है और भारत तक पहुंच उपलब्ध कराने वाला कोई भी विकल्प स्वीकार्य होगा। देखा जाये तो यह प्रस्ताव केवल रेलवे लाइन बिछाने की सामान्य योजना नहीं है। इसके पीछे बदलती वैश्विक भू-राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार मार्गों की विश्वसनीयता और रूस-भारत के बीच लंबे समय से चली आ रही रणनीतिक दोस्ती का बड़ा आयाम छिपा है। खास तौर पर ऐसे समय में जब पश्चिम एशिया के संघर्ष ने दुनिया को यह दिखा दिया है कि किसी एक समुद्री चोकपॉइंट पर अत्यधिक निर्भरता वैश्विक व्यापार के लिए कितनी बड़ी कमजोरी बन सकती है। इसे भी पढ़ें: मोदी हैं कि मानते नहीं...ट्रंप 100% टैरिफ वाला बिल लाते रह गए, इधर जिगरी रूस से तेल के बाद अब क्या लाने की तैयारी में भारत? होर्मुज संकट ने बढ़ाई वैकल्पिक रास्ते की जरूरत रूस के इस प्रस्ताव को समझने के लिए मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों को देखना जरूरी है। 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल की ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के बाद पश्चिम एशिया में तनाव तेजी से बढ़ा। ईरान की जवाबी मिसाइल और ड्रोन कार्रवाइयों के बाद फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री यातायात पर गंभीर असर पड़ा। रिपोर्टों के मुताबिक होर्मुज से होकर गुजरने वाला वैश्विक तेल व्यापार का करीब पांचवां हिस्सा प्रभावित हुआ। हम आपको बता दें कि होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है और यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में शामिल है। इसी तरह तुर्किये के नियंत्रण वाला बोस्फोरस जलडमरूमध्य काला सागर को मरमारा सागर से जोड़ता है। ऐसे समुद्री ‘चोकपॉइंट’ किसी भी संकट की स्थिति में अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकते हैं। यही वजह है कि मॉस्को अब समुद्री मार्गों के साथ-साथ वैकल्पिक स्थलीय व्यापार नेटवर्क विकसित करने पर जोर दे रहा है। भारत इस योजना के केंद्र में क्यों? इस प्रस्ताव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि रूस ने संभावित रेल मार्ग के अंतिम गंतव्य के रूप में भारत को विशेष महत्व दिया है। यह संयोग नहीं है। भारत और रूस पहले से ही International North-South Transport Corridor (INSTC) के प्रमुख साझेदार हैं। लगभग 7200 किलोमीटर लंबा यह बहु-माध्यमीय कॉरिडोर रूस को ईरान और भारत से जोड़ने की महत्वाकांक्षी परियोजना है। इसमें रेल, सड़क और समुद्री परिवहन का संयोजन शामिल है। मौजूदा व्यवस्था में रूस से आने वाला माल कजाखस्तान और तुर्कमेनिस्तान होते हुए ईरान पहुंच सकता है। वहां से रेल नेटवर्क के जरिए बंदर अब्बास जैसे बंदरगाहों तक और फिर समुद्री रास्ते से भारत भेजा जा सकता है। पूर्वी शाखा में कजाखस्तान-तुर्कमेनिस्तान-ईरान मार्ग की भूमिका महत्वपूर्ण है। इस लिहाज से रूसी उप प्रधानमंत्री खुसनुलिन का प्रस्ताव बिल्कुल शून्य से शुरू होने वाली परियोजना नहीं, बल्कि मौजूदा कनेक्टिविटी ढांचे को और आगे बढ़ाने की सोच है। लक्ष्य यह हो सकता है कि आने वाले समय में रूस और भारत के बीच माल ढुलाई को ज्यादा तेज, भरोसेमंद और बहुविकल्पीय बनाया जाए। अभी ‘मॉस्को से भारत’ सीधी ट्रेन नहीं हालांकि इस खबर ने यात्रियों और रेलवे प्रेमियों की कल्पना को जरूर हवा दी है, लेकिन फिलहाल इसे मॉस्को से दिल्ली या मुंबई तक चलने वाली सीधी यात्री ट्रेन समझना जल्दबाजी होगी। अभी तक रूस या भारत की ओर से इस तरह की यात्री सेवा या पर्यटन केंद्रित ट्रेन की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। रूसी उप प्रधानमंत्री के प्रस्ताव का मूल उद्देश्य फ्रेट, लॉजिस्टिक्स और रणनीतिक कनेक्टिविटी है। वैसे भी यात्री सेवा शुरू करने में कई व्यावहारिक अड़चनें होंगी जैसे कई देशों के वीजा, अलग-अलग रेल गेज, सीमा और सुरक्षा जांच, विभिन्न देशों के रेलवे के बीच समय-सारिणी का तालमेल तथा यात्री सुविधाओं का अभाव। लेकिन भविष्य की संभावना को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता। यदि कॉरिडोर स्थिर, सुरक्षित और आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनता है तो बाद में यात्री रेल सेवा की संभावना तलाशना संभव होगा। ऐसी ट्रेन यूरेशिया के विशाल भूभाग, मध्य एशिया और ऐतिहासिक सिल्क रूट के शहरों को जोड़ने वाली असाधारण यात्रा बन सकती है। भारत के लिए बड़ा रणनीतिक लाभ वैसे रूस के इस प्रस्ताव का सबसे बड़ा फायदा भारत को कनेक्टिविटी की रणनीतिक विविधता के रूप में मिल सकता है। भारत की विदेश और आर्थिक नीति लंबे समय से यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रही है कि उसकी व्यापारिक आपूर्ति किसी एक मार्ग या एक देश पर निर्भर न रहे। इसलिए रूस से भारत तक मजबूत स्थलीय नेटवर्क बनने पर भारतीय कारोबारियों को रूसी बाजार तक पहुंच का एक वैकल्पिक रास्ता मिलेगा। इससे मशीनरी, ऊर्जा संसाधन, उर्वरक, धातु, कृषि उत्पाद और अन्य वस्तुओं की आवाजाही अधिक लचीली हो सकती है। दूसरा बड़ा लाभ समय और लागत का हो सकता है। INSTC का मूल उद्देश्य भी पारंपरिक समुद्री मार्गों की तुलना में माल परिवहन को तेज और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना है। पूर्ण रूप से विकसित नेटवर्क भारत-रूस व्यापार को नई गति दे सकता है। एक और सबसे महत्वपूर्ण लाभ ऊर्जा सुरक्षा है। होर्मुज जैसी किसी एक संवेदनशील समुद्री पट्टी पर निर्भरता कम होने से भारत वैश्विक संकटों के दौरान अपनी आपूर्ति श्रृंखला को ज्यादा प्रभावी ढंग से संभाल सकता है। पाकिस्तान वाला रास्ता सबसे कठिन कड़ी हालांकि प्रस्तावित मार्ग में पाकिस्तान का नाम आना इसे रणनीतिक रूप से बेहद दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण बनाता है। रूस ने संभावित विकल्पों में तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान का उल्लेख किया है। लेकिन भारत-पाकिस्तान संबंधों की मौजूदा जटिलताओं को देखते हुए इस रास्ते को तत्काल व्यवहार्य मानना कठिन होगा। यही कारण है कि भारत के लिए ईरान और मध्य एशिया के रास्ते विकसित होने वाले वैकल्पिक नेटवर्क अधिक व्यावहारिक महत्व रखते हैं। चीन के लिए भी बदलता समीकरण इस परियोजना का एक व्यापक भू-राजनीतिक प्रभाव चीन पर भी पड़ सकता है। चीन ने वर्षों से Belt and Road Initiative के जरिए यूरेशिया में अपनी परिवहन और आर्थिक पहुंच बढ़ाई है। इसके मुकाबले भारत-रूस समर्थित INSTC और उससे जुड़े नए रेल नेटवर्क यूरेशिया में एक वैकल्पिक आर्थिक गलियारा मजबूत कर सकते हैं। भारत को इससे यह अवसर मिलेगा कि वह चीन केंद्रित कनेक्टिविटी मॉडल के समानांतर अपना प्रभाव क्षेत्र विकसित करे। मध्य एशिया, ईरान और रूस के साथ भारत के आर्थिक संबंधों को भी इससे मजबूती मिल सकती है। रूस-भारत की दोस्ती का नया आर्थिक अध्याय सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह प्रस्ताव भारत और रूस के रिश्तों को केवल रक्षा और ऊर्जा सहयोग तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उन्हें कनेक्टिविटी और व्यापार की नई धुरी पर ले जाता है। रूस के लिए भारत हिंद महासागर तक पहुंच का महत्वपूर्ण द्वार है, जबकि भारत के लिए रूस यूरेशिया के विशाल बाजार तक पहुंच का प्रमुख साझेदार है। इसलिए दोनों देशों के हित इस परियोजना में स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे से जुड़ते हैं। देखा जाये तो बदलती दुनिया में समुद्री रास्तों पर जोखिम बढ़ रहे हैं और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं लगातार नए झटकों का सामना कर रही हैं। ऐसे में रूस का मॉस्को से हिंद महासागर तक रेल संपर्क का विचार भले ही अभी शुरुआती चरण में हो, लेकिन इसकी रणनीतिक दिशा बेहद स्पष्ट है। यानि व्यापार के लिए सिर्फ एक रास्ते पर निर्भर मत रहिए, विकल्पों का ऐसा नेटवर्क तैयार कीजिए जिसे संकट भी आसानी से बाधित न कर सके। बहरहाल, भारत के लिए यह सिर्फ रूस तक पहुंचने वाली रेल लाइन नहीं होगी। यह यूरेशिया से हिंद महासागर तक भारत की रणनीतिक पहुंच, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापारिक स्वायत्तता और वैश्विक कनेक्टिविटी को मजबूत करने वाला संभावित नया गलियारा बन सकती है। और अगर भारत-रूस की पुरानी मित्रता इस परियोजना को राजनीतिक इच्छाशक्ति और आर्थिक निवेश का आधार देती है, तो आने वाले वर्षों में यह कॉरिडोर एशिया की बदलती भू-आर्थिक तस्वीर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है। -नीरज कुमार दुबे
भारतीय वैज्ञानिक प्रोफेसर दीपक धर को स्टैटिस्टिकल मैकेनिक्स में योगदान के लिए 2026 का डिराक मेडल मिला, इससे पहले पद्म भूषण पा चुके हैं।
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Modi-Yogi ने 'Mission 2027' को सफल बनाने के लिए कसी कमर, कई BJP MLAs के टिकट पर लटकी तलवार!
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट अब साफ सुनाई देने लगी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले सप्ताहांत दिल्ली दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन से मुलाकात कर उत्तर प्रदेश के चुनावी समीकरण और रणनीति पर चर्चा की। प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद योगी ने इसे ‘सुशासन के मार्ग पर लगातार आगे बढ़ने’ के लिए प्रेरणा देने वाला बताया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस मुलाकात को सिर्फ शिष्टाचार भेंट के तौर पर नहीं देखा जा रहा। दिल्ली में शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात के साथ ही उत्तर प्रदेश भाजपा ने संगठन को चुनावी मोड में डालते हुए नई नियुक्तियों का ऐलान कर दिया है। पार्टी ने छह संगठनात्मक क्षेत्रों और विभिन्न मोर्चों के प्रभारियों की घोषणा की है। नई टीम में करीब 60 फीसदी नए चेहरों को जगह दी गई है। साफ है कि भाजपा अब मिशन 2027 को केवल नारों तक सीमित रखने की बजाय बूथ से लेकर विधानसभा क्षेत्र तक संगठन को सक्रिय करने की तैयारी में है। इसे भी पढ़ें: PM Modi ने 'भारत छोड़ो आंदोलन' के वीरों को किया याद, साहस को बताया हर भारतीय की प्रेरणा नई व्यवस्था में प्रदेश महामंत्री दिलीप पटेल को अवध, अभिजात मिश्रा को गोरखपुर, प्रदेश उपाध्यक्ष रमेश सिंह को काशी और गीता शाक्य को बृज क्षेत्र की जिम्मेदारी दी गई है। राम प्रताप चौहान को पश्चिम तथा शंकर लोधी को कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र का प्रभारी बनाया गया है। भाजपा ने इस बार सात की जगह आठ प्रदेश महामंत्री बनाए हैं। इसमें राजेश चौधरी को युवा मोर्चा, संजय राय को ओबीसी मोर्चा, धर्मेंद्र सिंह को अनुसूचित मोर्चा, कामेश्वर सिंह को महिला मोर्चा, प्रियंका रावत को अनुसूचित जनजाति मोर्चा, देवेश कोरी को अल्पसंख्यक मोर्चा और शंकर गिरि को किसान मोर्चे की जिम्मेदारी दी गई है। यह बदलाव महज संगठनात्मक फेरबदल नहीं माना जा रहा। भाजपा की रणनीति साफ तौर पर हर सामाजिक वर्ग और हर क्षेत्र में अपनी राजनीतिक पकड़ को चुनाव से पहले मजबूत करने की दिखाई दे रही है। मोर्चों और क्षेत्रीय समितियों के जरिए पार्टी अपने संदेश को गांव और बूथ तक पहुंचाने की तैयारी में है। नौ अगस्त से शुरू हुई तिरंगा यात्रा को भी इसी व्यापक जनसंपर्क अभियान की कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। लखनऊ में आयोजित तिरंगा यात्रा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी ने भाजपा के चुनावी सक्रियता के संकेत और मजबूत कर दिए हैं। अब टिकट पर भाजपा का ‘परफॉर्मेंस टेस्ट’ संगठन के बाद अगला बड़ा सवाल उम्मीदवारों का है। पार्टी के भीतर विधानसभा सीटों पर संभावित उम्मीदवारों को लेकर शुरुआती मंथन आरम्भ हो चुका है। खास तौर पर मौजूदा विधायकों का रिपोर्ट कार्ड तैयार कराया जा रहा है। उनके कामकाज, क्षेत्र में सक्रियता और जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता का आकलन सर्वे के जरिए किए जाने की बात सामने आ रही है। यानी सिर्फ विधायक होना टिकट की गारंटी नहीं होगा। जिस विधायक के खिलाफ स्थानीय स्तर पर नाराजगी होगी या जिसका प्रदर्शन कमजोर माना जाएगा, उसके स्थान पर नया चेहरा उतारने का विकल्प खुला रहेगा। भाजपा इस बार युवाओं को बड़ी संख्या में मौका देने की तैयारी में बताई जा रही है और इनमें महिलाओं की भी महत्वपूर्ण हिस्सेदारी हो सकती है। यही वजह है कि आने वाले महीनों में कई मौजूदा विधायकों के टिकट पर संशय बना रह सकता है। इसी बीच भाजपा के भीतर एक और दिलचस्प सवाल उठ रहा है। एक-दो लोकसभा सांसद विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा जता रहे हैं, जबकि कुछ सांसद अपने परिजनों के लिए टिकट मांग रहे हैं। ऐसे में भाजपा के सामने परिवारवाद से खुद को दूर रखने की चुनौती भी होगी। एनडीए में सीटों का ‘गणित’ भी आसान नहीं उम्मीदवारों के साथ ही एनडीए के भीतर सीट बंटवारे का सवाल भी जल्द महत्वपूर्ण होने वाला है। भाजपा के सहयोगी दलों को मोटे तौर पर अपने संभावित हिस्से का अंदाजा पहले से है, लेकिन पिछली बार चुनाव बाद एनडीए में शामिल हुए सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर के साथ सीटों को लेकर औपचारिक बातचीत अहम होगी। राजभर की पार्टी पहले ही ज्यादा सीटों पर अपनी दावेदारी के संकेत देती रही है। एनडीए के दूसरे सहयोगी भी अपनी राजनीतिक ताकत के आधार पर अधिक सीटों के लिए मोलभाव करना चाह रहे हैं। ऐसे में भाजपा के सामने चुनौती यह होगी कि सहयोगियों को पर्याप्त राजनीतिक स्पेस देते हुए अपनी सीटों और संगठनात्मक वर्चस्व में संतुलन कैसे कायम रखा जाए। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन पहले ही साफ कर चुके हैं कि भाजपा 2027 का चुनाव एनडीए सहयोगियों के साथ लड़ेगी और गठबंधन को मजबूत रखते हुए सत्ता में वापसी का लक्ष्य है। योगी के चेहरे पर ही दांव सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भाजपा ने नेतृत्व को लेकर कोई भ्रम नहीं छोड़ा है। नितिन नबीन पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि 2027 के विधानसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ ही भाजपा का चेहरा होंगे और पार्टी उनके नेतृत्व में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने के लक्ष्य के साथ मैदान में उतरेगी। यही वजह है कि योगी भी सत्ता में हैट्रिक लगाकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में नया इतिहास रचने के लिए पूरी ताकत झोंकते दिखाई दे रहे हैं। देखा जाये तो भाजपा के लिए यह चुनाव केवल सरकार बचाने की लड़ाई नहीं बल्कि योगी मॉडल को जनादेश दिलाने की परीक्षा भी है। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी लगातार पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक राजनीति के जरिए भाजपा को चुनौती देने की कोशिश कर रही है। ऐसे में भाजपा भी संगठन में ओबीसी, दलित, महिला, युवा और किसान मोर्चों को सक्रिय करके सामाजिक समीकरणों को साधने की तैयारी में है। चुनावी राजनीति जैसे-जैसे गर्म होगी, संवेदनशील मुद्दों पर भाजपा और विपक्ष के बीच टकराव भी बढ़ने के आसार हैं। नवरात्रि से बढ़ेगा ‘मोदी फैक्टर’ भाजपा की रणनीति केवल संगठन और टिकट तक सीमित नहीं रहने वाली। बताया जा रहा है कि शारदीय नवरात्रि से उत्तर प्रदेश में केंद्रीय मंत्रियों के दौरे बढ़ाए जाएंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भी राज्य में अधिक से अधिक कार्यक्रम कराने की योजना है। यानी आने वाले महीनों में यूपी भाजपा का चुनावी अभियान संगठन, सरकार और केंद्रीय नेतृत्व, तीनों मोर्चों पर एक साथ दिखाई देगा। देखा जाये तो राजनीतिक संदेश बिल्कुल स्पष्ट है कि भाजपा 2027 की लड़ाई को समय से पहले शुरू करना चाहती है। संगठन में नए चेहरों की एंट्री, विधायकों का रिपोर्ट कार्ड, संभावित टिकटों पर सर्वे, युवाओं और महिलाओं को अवसर, एनडीए में सीटों का गणित और मोदी-योगी की जोड़ी को केंद्र में रखकर अभियान, इन सभी कड़ियों को जोड़ें तो भाजपा की चुनावी रणनीति की तस्वीर सामने आती है। अब असली परीक्षा यह होगी कि भाजपा अपने संगठनात्मक अनुशासन और सामाजिक समीकरणों को कितनी कुशलता से वोट में बदल पाती है। विपक्ष की पीडीए राजनीति के सामने भाजपा का सामाजिक विस्तार कितना असरदार साबित होता है, सहयोगी दल कितनी सीटों पर संतुष्ट होते हैं और मौजूदा विधायकों में कितनों को दोबारा मौका मिलता है, इन सवालों के जवाब आने वाले महीनों में उत्तर प्रदेश की चुनावी पटकथा तय करेंगे। फिलहाल इतना तय है कि योगी के दिल्ली दौरे और भाजपा की नई संगठनात्मक नियुक्तियों के साथ उत्तर प्रदेश में मिशन-2027 की उलटी गिनती तेज हो चुकी है। अब लखनऊ से लेकर दिल्ली तक हर राजनीतिक कदम की निगाह 2027 के लखनऊ पर होगी। -नीरज कुमार दुबे
Amit Shah's Counter-Attack Strategy! 20 दिन बाद संसद में क्यों तैयार हुए गृहमंत्री?
ममता बनर्जी के काफिले पर हमले के बाद सियासत गरम, शुभेंदु अधिकारी बोले- ‘वहां BJP का कोई नहीं था’
ममता बनर्जी के हलीशहर दौरे के दौरान काफिले के विरोध के बाद बंगाल की राजनीति गरमा गई। शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि मौके पर BJP का कोई कार्यकर्ता नहीं था।
दिल्ली विधानसभा में आज दूसरी बैठक: मानसून सत्र का अहम दिन
दिल्ली विधानसभा के आठवें सत्र के छठे सेशन की दूसरी बैठक सोमवार को होगी। इसमें मानसून सत्र के लिए बिजनेस एडवाइजरी कमिटी द्वारा मंजूर किए गए तीन बिलों में से कुछ बिल पेश किए जा सकते हैं।
छात्र आंदोलन : आज विधानसभा घेराव, रांची में जुटने छात्र
झारखंड में भर्ती परीक्षाओं में कथित धांधली और पेपर लीक के खिलाफ चल रहे छात्र आंदोलन के बीच छात्रों ने 10 अगस्त को विधानसभा घेराव का ऐलान किया गया है
झारखंड: परीक्षा अनियमितताओं की सीआईडी जांच के बीच 3 जेपीएससी सदस्यों ने इस्तीफा दिया
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पिछले 2 साल में राजनांदगांव को मिले 267 करोड़, संस्कारधानी को बनाएंगे स्वच्छ-सुंदर: उपमुख्यमंत्री अरुण साव
भाजपा मुद्दों से ध्यान भटका रही, पीडीए की बढ़ती ताकत से घबराई सरकार: अवधेश प्रसाद
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तमिलनाडु: कार्ति चिदंबरम ने लोकसभा सीटों में वृद्धि के खिलाफ चेतावनी दी
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पंजाब बीजेपी प्रमुख बोले-'विधानसभा चुनावों की रणनीति बनाने के लिए नितिन नवीन के साथ हुई बैठक'
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भारत छोड़ो दिवस: सांसद बांसुरी स्वराज और भाजपा नेताओं ने स्वतंत्रता सेनानियों व शहीदों को दी श्रद्धांजलि
राहुल गांधी ने छात्रों पर 20 जुलाई की पुलिस कार्रवाई को लेकर पीएम मोदी और अमित शाह पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि सरकार को छात्रों के मुद्दे पर जवाब देना होगा।
युवाओं को गुमराह करने और बेरोजगारी के लिए राहुल गांधी और कांग्रेस जिम्मेदारः रामकृपाल यादव
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त्रिपुरा विलेज कमेटी चुनावों के लिए आदिवासी सहयोगियों के साथ चुनावी रणनीति बनाएगी भाजपा
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2027 के चुनाव में सपा के साथ रहेंगे, अखिलेश यादव बनेंगे मुख्यमंत्री: बाबू सिंह कुशवाहा
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देश को नक्सलवाद-माओवाद के आतंक से मुक्ति दिलाने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने दो नये अहम अभियान प्रारंभ किये हैं- पहला, भारत को घुसपैठियों से मुक्त करना तथा दूसरा है, युवाओं को नशे की लत से मुक्ति दिलाना। भारत के किशोरों तथा युवाओं को हर प्रकार के नशे से मुक्ति दिलाने के लिए 2 अगस्त 2026 को प्रधानमंत्री मोदी ने “नशा मुक्त युवा, विकसित भारत संकल्प अभियान“ का प्रारंभ करते हुए एक वीडियो संदेश जारी किया है। अपने सन्देश में प्रधानमंत्री मोदी ने कहाकि जो युवा नशे से लड़कर बाहर निकलते हैं वे कमजोर नहीं, बल्कि असली योद्धा होते हैं। समाज को उनका सम्मान करना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि भारत में ड्रग्स की सप्लाई दुश्मन देशों की आतंकी साजिश का ही एक हिस्सा है। दुश्मन देश भारतीय युवाओं को नशे के जाल में धकेलना चाहते हैं ताकि भारत कभी भी एक सशक्त एवं विकसित देश के रूप में स्थापित न हो सके। इस साजिश को हम सबको मिलकर नाकाम करना होगा। विकसित भारत का लक्ष्य तभी पूरा होगा जब देश का युवा शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होने के साथ ही नशे से भी दूर रहेगा। अगले 100 सप्ताह तक हर रविवार को कला, संस्कृति, खेल और अन्य गतिविधियों के माध्यम से नशामुक्ति का संदेश देश भर में पहुंचाया जाएगा। नशे की लत युवाओं के सपनों और परिवार दोनों को ही तोड़ देती है। नशा केवल व्यक्ति या परिवार को ही नहीं बल्कि राष्ट्र की ताकत को भी कमजोर करता है। इसे भी पढ़ें: संसदीय-गतिरोध से नहीं चलेगा लोकतंत्र, संवाद ही है समाधान इस अभियान का उद्देश्य युवाओं को नशे से दूर रहने के लिए प्रेरित करना और उन्हें अपने समाज में बदलाव लाने के लिए आगे बढ़ाना है। प्रत्येक रविवार को देशभर में अलग-अलग कार्यक्रम होंगे जिसमें वॉकाथन और दौड़, खेल प्रतियोगिताएं,योग और ध्यान सत्र, सांस्कृतिक कार्यक्रम, नुक्कड़ नाटक, नशा विरोधी जागरूकता अभियान, चर्चा और संवाद कार्यक्रम, पेंटिग्स व आर्ट्स प्रतियोगिताएं तथा सामुदायिक सहभागिता कार्यक्रम आयोजित किये जाएंगे। यह अभियन 125 से अधिक आध्यात्मिक,सामाजिक तथा सरकारी संगठनों के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है। ब्रहमकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय, आर्ट ऑफ़ लिविंग, गायत्री परिवार, इस्कॉन से लेकर माताअमृतानंदमयी मठ जैसे संगठन इस अभियान से जुड़ कर कार्य कर रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का वैचारिक संगठन विश्व हिंदू परिषद पहले से ही व्यापक स्तर पर नशामुक्ति अभियान चला रहा है। युवाओं में नशे के विरुद्ध जागरूकता लाने के साथ ही गृहमंत्री अमित शाह ने भी नशे की जड़ों पर प्रहार करने का युद्ध छेड़ रखा हैं। ड्रग्स माफियाओं पर कार्रवाई कई गुना बढ़ गई है। तस्करी करके बड़ी मात्रा में विदेशों से आने वाली ड्रग्स की जब्ती बंदरगाहों तथा एयरपोर्ट्स की जा रही है और उसे नष्ट किया जा रहा है। वर्ष 2021 में 2988 किलो हेरेाइन, 2022 में 927 किलो गांजा, 2023 में 122 किलो मेफेड्रोन, 2024 में 770 किलो मेथाफाटेमाइन और 2026 में फिर 522 किलो गांजा बरामद किया जा चुका है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के अनुसार 2020 से मई 2025 तक तक 116 बड़े मामलों में कार्रवाई करते हुए 1,09,318 किलोग्राम नशीले पदार्थ जब्त किए गए हैं और उनको नष्ट किया गया है। वर्तामन समय में नशे का सबसे बड़ा केन्द्र पंजाब तथा पूर्वोत्तर के कई छोटे राज्य हैं। विदेशी आतंकी संगठनों द्वारा जम्मू-कश्मीर व पूर्वोत्तर के युवाओं को नशे की लत में धकेलने का प्रयास लगातार किया जा रहा है हैं। अपने कुत्सित प्रयासों को सफल बनाने के लिये ये लोग स्थानीय स्तर के अपराधियों व बिगडैल युवाओं का सहारा लेते हैं। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पंजाब में नशे के संकट पर चिंता जताते हुए कहा था कि नशा राज्य के अस्तित्व पर खतरा बन सकता है। संगठित गिरोहों की जांच में पुलिस प्रशासन के साथ ही अदालत को भी सतर्क रहना होगा। भारत में ड्रग्स की खेप कई रास्तों से आती है। बांग्लादेश-पाकिस्तान तथा नेपाल सीमा से ड्रग्स आसानी से आ-जा रहा है। गुजरात के समुद्री तट से भी नशे का कारोबार कंटेनर और समुद्री मार्ग से चलता आ रहा है हालांकि, सरकार के प्रयासों से कुछ रोकथाम हुई है किंतु खतरा बरकरार है। म्यामांर से भी ड्रग्स की तस्करी हो रही है। यही नहीं छोटे-छोटे देश मलेशिया, सिंगापुर, थाईलैंड, मालदीव, हांगकांग सहित तमाम देशों से ड्रग्स की सप्लाई अनेक प्रकार से हो रही है। पाक परस्त आतंकी संगठन ड्रोन आदि के माध्यम से सीमावर्ती क्षेत्रों में ड्रग्स, हथियार व धन को गिराते रहते हैं। इस प्रकार नशे की सप्लाई अनेक तरीकों से होती है और उन्हें भारत के किशोरों तथा युवाओं तक विभिन्न तरीकों से पहुंचाया जाता है। वर्ष 2025 में एम्स के सर्वे में पाया गया कि 11 से 14 वर्ष की उम्र में ही किशोर नशीले पदार्थों के संपर्क मे आ गए थे। इन विषम परिस्थितियों को देखते हुए यह वृहद अभियान प्रारंभ किया गया है। नशे से आतंकवाद को पनपने में बहुत मदद मिलाती है इसलिए, यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन के बाद 28 हजार से अधिक स्थानों पर एक करोड़ से अधिक युवाओं ने भाग लिया और एक साथ नशा मुक्त भारत की शपथ ली। नशामुक्ति का यह अभियान राजनीति से दूर रहकर चलना चाहिए तभी भारत के किशोर, युवा और परिवार तथा बहन-बेटियां सुरक्षित जीवन जी सकेंगी और वर्ष-2047 तक भारत विकसित भारत बनकर उभर सकेगा। - मृत्युंजय दीक्षित
अकाली दल का बड़ा ऐलान, महिला आरक्षण और परिसीमन बिल का करेगा समर्थन; भाजपा से गठबंधन के संकेत तेज
अकाली दल ने महिला आरक्षण और परिसीमन बिल के समर्थन का ऐलान किया है। सुखबीर बादल की पीएम मोदी से मुलाकात के बाद भाजपा-अकाली गठबंधन की अटकलें तेज हो गई हैं।
राघव चड्ढा की पीएम मोदी से मुलाकात, पंजाब चुनाव से पहले मिलेगी बड़ी जिम्मेदारी? बढ़ी सियासी हलचल
राघव चड्ढा ने पीएम मोदी से मुलाकात की और तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा कीं। पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले उनकी संभावित बड़ी भूमिका को लेकर सियासी अटकलें तेज हैं।
शिवभक्तों की कांवड़ यात्रा को सकुशल संपन्न करवाना बहुत बड़ी चुनौती!
देवाधिदेव भगवान महादेव के प्रिय श्रावण मास में मां गंगा के जल से अपने आराध्य भगवान भोलेनाथ के जलाभिषेक के लिए दिल्ली और आसपास स्थित विभिन्न राज्यों के शिवभक्तों का उत्तराखंड से कांवड़ लाने के लिए अब तांता लगना शुरू हो गया है। इस बार तो कांवड़ यात्रा के शुरुआती दिनों में ही शिवभक्तों की भारी भीड़ सड़कों पर नज़र आने लगी है। कांवड यात्रा के मद्देनजर ही उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश के विभिन्न जनपदों, दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान आदि में शिवभक्तों की सुरक्षा के सिस्टम ने बेहद ही चाक-चौबंद व्यवस्था की है। शिवभक्तों के लिए रेलवे, परिवहन, विधुत विभाग आदि ने भी विशेष तैयारियां की हैं। सिस्टम ने पवित्र श्रावण मास में देवाधिदेव भगवान महादेव के करोड़ों शिवभक्तों को शांतिपूर्ण व भक्तिमय वातावरण में सकुशल कांवड़ यात्रा करवाने के लिए सुरक्षा, भोजन, पेयजल, चिकित्सा आदि व्यवस्था की बड़े पैमाने पर तैयारियां की है। कांवड़ यात्रा को सकुशल संपन्न करवाने के लिए उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा व राजस्थान आदि का पुलिस-प्रशासन दिन-रात एक करके अपने पूरे दल-बल के साथ सड़कों पर उतरकर के धरातल पर व्यवस्था बनाने में जुटा हुआ है। हालांकि पुलिस-प्रशासन को इस वर्ष कांवड़ियों की संख्या में भारी इज़ाफ़ा होने की उम्मीद है। ऐसी स्थिति में विशेषकर उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश के पुलिस-प्रशासन के ऊपर पर एक तरफ तो कांवड़ियों के लिए विभिन्न आवश्यक व्यवस्था बनाने की चुनौती है, वहीं दूसरी तरफ़ चाक-चौबंद सुरक्षा व्यवस्था करने कि अहम जिम्मेदारी है। वैसे भी उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव का वर्ष होने के चलते वहां के सिस्टम के सामने भगवान शिव की भक्ति के वातावरण को बनाएं रखने की बड़ी चुनौती खड़ी है। हालांकि यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देशों पर सिस्टम के द्वारा जिस तरह से उत्तर प्रदेश में शिवभक्त कांवड़ियों का सेवाभाव के साथ पलक-पांवड़े बिछाकर के स्वागत किया जाता है और कांवड़ियों को किसी प्रकार की कोई असुविधा ना हो इसका विशेष ध्यान रखा जाता है, इस स्थिति ने पिछले कई सालों से शिवभक्त कांवड़ियों की संख्या में भारी इज़ाफ़ा करने का कार्य कर दिया है। जिसके चलते कांवड़ियों की सुरक्षा के लिए धरातल पर एक बेहद फुलप्रूफ व्यवस्था बनाते हुए चाक-चौबंद व्यवस्था करना चुनौती पूर्ण कार्य बन गया है। हर वर्ष की तरह ही कांवड़ यात्रा में पुलिस-प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह लाखों शिवभक्तों के बीच छिपे हुए चंद अराजकता फैलाने वाले हुड़दंगियों व नशेड़ियों की कैसे पहचान करें। हालांकि उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड के पुलिस-प्रशासन के पास भक्तों की भारी भीड़ को नियंत्रण करने व उनके लिए समुचित व्यवस्था करने का दशकों पुराना लंबा अनुभव है, जिस अनुभव के ही बलबूते पर ही इन राज्यों का सरकारी अमला हर वर्ष ऐसे मेलों में उत्पन्न विकट से भी विकट परिस्थितियों से भी आसानी से निपट लेता है। लेकिन इस बार तो शुरूआती दिनों से ही शिवभक्त कांवड़ियों की भारी भीड़ उमड़ती नज़र आ रही है, बड़ी संख्या में ही कांवड़िए मां गंगा का दिव्य जल लेकर के अपने गंतव्य स्थल की तरफ़ वापस चल दिए और एक-एक दिन के साथ ही शिवभक्त कांवड़ियों की यह संख्या तेज़ी से बढ़ती जा रही है। वहीं उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में कुछ हुड़दंगियों के द्वारा बवाल किये जाने की भी घटनाएं भी सामने आने लगी हैं। जिसके चलते ही उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश में शुरूआती दौर के दिनों में ही कांवड़ यात्रा मार्ग के अधिकांश रास्तों पर ट्रैफिक डायवर्ट करते हुए बहुत सारी जगहों पर ट्रैफिक को वन-वे तक भी करना पड़ गया है, हालांकि ऐसा करने से लोगों को काफ़ी असुविधा भी हो रही है, लेकिन पुलिस-प्रशासन के पास इसके अलावा कोई विकल्प अभी तो मौजूद नहीं है। इसे भी पढ़ें: मेरठ में CM Yogi ने कांवड़ियों पर बरसाए फूल, बोले- 4 से 5 करोड़ शिव भक्तों के आने की उम्मीद वैसे भी हमारे प्यारे देश में जिस तरह का माहौल चल रहा है, उस स्थिति में शिवभक्त कांवड़ियों की सुरक्षा की पूरी व्यवस्था को चाक-चौबंद करने के लिए ट्रैफिक डायवर्ट व वन-वे करने की यह व्यवस्था सिस्टम का बेहद जरूरी कदम है। इसलिए ही उत्तराखंड से लेकर के कांवड़ यात्रा के पूरे मार्ग पर अब चप्पे-चप्पे पर होमगार्ड, ट्रैफिक पुलिस, पुलिस, पीएसी, आरएएफ, एटीएस आदि तक का बेहद ही सख्त पहरा नज़र आने लग गया है। गंगा घाटों पर एनडीआरएफ, एसडीआरएफ व गोताखोरों की टीम दल-बल के साथ तैनात हैं, कांवड़ यात्रा मार्ग पर जगह-जगह अग्निशमन विभाग के जांबाजों, जिला प्रशासन की टीम, चिकित्सा विभाग की टीम, नगर निगम, नगर पालिका परिषद जिला पंचायत व ग्राम पंचायत आदि के कर्मचारियों, अधिकारियों ने चौबीस घंटे मोर्चा संभाल रखा है। वहीं पुलिस-प्रशासन के आला अधिकारी स्वयं पूरी टीम के साथ सड़कों पर उतरे हुए हैं और हर व्यवस्था को स्वयं परखने का कार्य कर रहे हैं। कांवड़ यात्रा मार्ग पर किसी भी तरह का कोई भी विवाद खड़ा होने पर पुलिस-प्रशासन तुरंत सूझबूझ से मामले को शांत कराते हुए, दोषियों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्यवाही करते हुए माहौल को सामान्य करने का कार्य बखूबी कर रहा है। सरकार व सिस्टम कांवड़ यात्रा के दौरान किसी भी तरह की कोई लापरवाही व कोई भी चूक बिल्कुल भी नहीं चाहता है। बेहतर व्यवस्था बनाने के लिए सख्ती का आलम यह हो गया है कि गाजियाबाद तक में भी 29 जुलाई से ही भारी वाहनों के लिए कांवड़ यात्रा मार्ग को बंद करते हुए रास्ते के बहुत सारे कट बंद कर दिए है और कांवड़ियों की सुरक्षा के लिए रास्ते वन-वे करने की युद्ध स्तर पर तैयारियां चल रही हैं। वैसे कांवड़ यात्रा के दौरान हर वर्ष ही क्षेत्रवासियों को असुविधाओं का सामना करना पड़ता है। लेकिन अलग कांवड़ यात्रा मार्ग ना होने से पुलिस-प्रशासन के पास कम से कम फिलहाल तो अन्य कोई विकल्प उपलब्ध नहीं है। कांवड़ यात्रा में सुरक्षा व्यवस्था का आलम देखें तो गाजियाबाद जनपद में ही, पुलिस कमिश्नर जे. रविंद्र गौड़, जिलाधिकारी रविंद्र कुमार मांदड, नगरायुक्त विक्रमादित्य सिंह मलिक, मुख्य अग्निशमन अधिकारी राहुल पाल व अन्य सभी आवश्यक विभागों के मुखिया अपनी पूरी टीम के साथ चौबीसों घंटे मुस्तैद खड़े हुए नज़र आते हैं। कांवड़ियों की सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर पुलिस कमिश्नर जे. रविंद्र गौड़ ने जनपद में पड़ने वाले करीब 80 किलोमीटर लंबे कांवड़ यात्रा मार्ग को बीटों में विभाजित करके अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपी दी हैं। उन्होंने स्थाई कंट्रोल रूम, मुख्य कंट्रोल रूम, सब कंट्रोल रूम और अस्थाई कंट्रोल रूम बनाए हैं। कांवड़ यात्रा मार्ग को लाइट व सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में रखा गया है। सुरक्षा के दृष्टिकोण से जगह-जगह पुलिस ने बैरियर लगाए गए हैं। सार्वजनिक घोषणा प्रणाली बनाई गई है, रियल टाइम मॉनिटरिंग के अनुसार व्यवस्था बनाने की तैयारी। सुरक्षा के मद्देनजर नियमित रूप से डॉग स्कवायड, बम निरोधक दस्ता और लोकल इंटेलीजेंस की टीम के साथ पुलिस चेकिंग अभियान चलाते हुए, कांवड़ यात्रा को सकुशल संपन्न करवाने में दिन-रात व्यस्त है। पीआरवी एवं चीता मोबाइलों को कांवड़ यात्रा मार्ग पर लगाया गया है। घाटों पर एनडीआरएफ, एसडीआरएफ व गोताखोरों की टीम तैनात की गयी हैं। दमकल की गाड़ियां विभिन्न स्थानों पर तैनात हैं, चिकित्सकों व पैरा मेडिकल स्टाफ की टीम तैनात हैं, एंबुलेंस तैनात हैं, पथ-प्रकाश की समुचित व्यवस्था की गयी है, पेयजल की व्यवस्था की गयी है। जिलाधिकारी रविंद्र कुमार मांदड ने कांवड़ यात्रा को सुरक्षित और सुव्यवस्थित बनाने के लिए 6 कंट्रोल रूम और 2 विशेष हेल्पलाइन शुरू की हैं। 11 जोनल, 24 सेक्टर और 108 सब मजिस्ट्रेट तैनात किए गए हैं। कांवड़ यात्रा मार्ग पर लगें शिविरों की अनुमति देते समय ही आग से बचाव हेतु अग्निरोधी यंत्र, रेत की बाल्टी एवं पानी का ड्रम आदि रखवाने के लिए शिविर आयोजकों को निर्देशित किया गया है। कांवड़ शिविरों में विद्युत सुरक्षा उपायों के किये जाने का निर्देश दिए गए हैं। कांवड़ मार्ग के निकट कोई नया बखेड़ा खड़ा ना हो इसके लिए मीट, मछली और अंडा आदि की दुकानों को बंद करवा दिया गया है, शराब की दुकानों को ढंक दिया गया गया है। किसी प्रकार की कोई दुर्घटना ना घट जाये इसलिए कांवड़ की ऊंचाई 10 फुट एवं चौड़ाई 12 फुट तक रखने के निर्देश दिए गए है। डाक कांवड़ में मानकों के अनुसार म्यूजिक सिस्टम पर 75 डेसीबेल तक का ही शोर मान्य है, इस तरह की चाक-चौबंद व्यवस्था उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश के पूरे कांवड़ यात्रा मार्ग के सभी जनपदों में की गई है। हालांकि पुलिस-प्रशासन के द्वारा की गयी बेहद चाक-चौबंद व्यवस्था के बाद भी कांवड़ यात्रा मार्ग पर आने वाले दिनों किसी भी तरह से माहौल खराब करने वाले लोगों से निपटने की एक बड़ी चुनौती खड़ी है। क्योंकि यात्रा के दौरान कांवड़ छूने, कांवड़ के वाहनों से टकराने आदि छुटपुट बातों का बतंगड़ ना बने उससे निपटना बड़ा चुनौतीपूर्ण है। वैसे भी पिछले कुछ वर्षों से देश में जिस तेज़ी से धैर्य व छोटे-बड़े की शर्म, आपसी भाईचारा और सामाजिक समरसता, आपसी सहयोग का भाव दिन-प्रतिदिन बहुत तेज़ी से कम होता जा रहा है, कांवड़ यात्रा मार्ग में इसका प्रभाव अब वर्ष दर वर्ष स्पष्ट रूप से नज़र आने लगा है। जिसके चलते ही अब तो बिना सिर-पैर के विवाद भी कांवड़ यात्रा में बहुत बड़ी चुनौती पैदा करने लग गए हैं। हालांकि कांवड़ यात्रा को सकुशल संपन्न कराने के लिए उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश आदि में पुलिस-प्रशासन जबरदस्त ढंग से सक्रिय है और देवाधिदेव भगवान महादेव की कृपा से इस वर्ष भी कांवड़ यात्रा दिव्य, अलौकिक, यादगार बन कर के सकुशल संपन्न होगी। - दीपक कुमार त्यागी अधिवक्ता, स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक
UPI के जरिए होने वाले डिजिटल भुगतान पर लग सकता है MDR चार्ज, SBI चेयरमैन ने कही यह बात
UPI पर संभावित चार्ज को लेकर पैदा हुई आशंकाओं के बीच पेमेंट्स काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) ने स्पष्ट किया है कि ग्राहकों के लिए UPI भुगतान मुफ्त बना रहेगा। छोटे कारोबारियों को भी डिजिटल पेमेंट स्वीकार करने के लिए कोई शुल्क नहीं देना होगा।
योगी सरकार UP के सभी यूनिवर्सिटी-कॉलेजों में नशा विरोधी अभियान शुरू करने जा रही। रोज नशे के खिलाफ शपथ होगी और पदार्थों की ब्रिकी पर रोक होगी।
अगर भारत-पाक युद्ध हुआ तो क्या India के खिलाफ अपनी सेना उतारेंगे Turkey और Saudi Arabia?
नाटो के भीतर जब अमेरिका और उसके सहयोगियों के बीच भरोसे की दरारें गहरी हो रही हैं, ठीक उसी समय पश्चिम एशिया में एक नया शक्ति-केंद्र खड़ा करने की कोशिश शुरू हो गई है। मक्का में तुर्किये, सऊदी अरब और पाकिस्तान ने ऐसा रक्षा समझौता किया है, जिसकी सबसे अहम लाइन में साफ कहा गया है कि तीनों में से किसी एक पर हमला हुआ तो उसे तीनों पर हमला माना जाएगा। यही वह बिंदु है, जो इस समझौते को सामान्य सैन्य सहयोग से उठाकर एक संभावित नए क्षेत्रीय सुरक्षा गठबंधन में बदल देता है। हालांकि इसे अभी आधिकारिक तौर पर ‘सुन्नी नाटो’ कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन इसके भीतर उसकी बुनियादी तस्वीर जरूर दिखाई देने लगी है। देखा जाये तो मक्का में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन का एक मंच पर आना अपने आप में बड़ा संदेश है। खास बात यह है कि यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब पश्चिम एशिया पहले ही ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव की आग में झुलस रहा है। सऊदी अरब पर ईरान और उसके सहयोगी संगठनों के हमलों का खतरा है। पाकिस्तान अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है और तुर्किये पश्चिम एशिया में अपनी भूमिका लगातार बढ़ा रहा है। यानी तीनों देश एक-दूसरे की जरूरत बन गए हैं। इसे भी पढ़ें: Iran ने Saudi Arabia, पाकिस्तान और Turkey के रक्षा समझौते को बताया बेअसर क्यों हुआ त्रि-पक्षीय समझौता? वर्तमान हालात को देखें तो सऊदी को चाहिए सुरक्षा, पाकिस्तान को पैसा और तुर्किये को ताकत, इसलिए तीनों एक साथ आ गये हैं। हालांकि इस गठजोड़ को समझने के लिए तीनों देशों के हितों को अलग-अलग देखना होगा। सबसे पहले सऊदी अरब की बात करें तो उसके सामने सबसे बड़ा सवाल सुरक्षा का है। दशकों तक रियाद ने अमेरिकी सुरक्षा छाते पर भरोसा किया। लेकिन अब सऊदी नेतृत्व यह मानकर चल रहा है कि बदलती अमेरिकी नीति में किसी एक बाहरी शक्ति पर पूरी तरह निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। ईरान और उसके सहयोगियों की मिसाइल तथा ड्रोन क्षमता ने इस खतरे को और वास्तविक बना दिया है। ऐसे में सऊदी अरब ने अपना सुरक्षा कवच चौड़ा करना शुरू किया है। पाकिस्तान उसके लिए स्वाभाविक साझेदार है। पाकिस्तानी सेना दशकों से सऊदी सुरक्षा बलों को प्रशिक्षण देती रही है और हाल के महीनों में पाकिस्तान ने सऊदी अरब में सैनिकों, लड़ाकू विमानों, ड्रोन और वायु रक्षा प्रणालियों की मौजूदगी भी बढ़ाई है। वहीं पाकिस्तान की जरूरत बिल्कुल दूसरी है। आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान को सऊदी अरब से निवेश और आर्थिक मदद चाहिए, जबकि तुर्किये से रक्षा तकनीक और सैन्य सहयोग चाहिए। बदले में पाकिस्तान अपनी सेना और परमाणु क्षमता को मुस्लिम दुनिया की सुरक्षा में सबसे बड़ा सैन्य योगदान बताकर अपनी भू-राजनीतिक अहमियत बढ़ाना चाहता है। वहीं तुर्किये की बात करें तो एर्दोगन लंबे समय से अपने देश को सिर्फ नाटो का सदस्य नहीं, बल्कि मुस्लिम दुनिया की एक स्वतंत्र शक्ति के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। तुर्किये के पास अत्याधुनिक ड्रोन, रक्षा उद्योग और बड़ी सैन्य ताकत है। पाकिस्तान के साथ उसका रक्षा सहयोग पहले ही तेजी से बढ़ चुका है। यह गठबंधन किसके खिलाफ है? अब सवाल उठता है कि यह गठबंधन किसके खिलाफ है? इस सवाल का जवाब हालांकि तीनों देशों ने नहीं में दिया है। तुर्किये ने साफ कहा है कि समझौता रक्षात्मक है, यह किसी खास देश या संगठन को निशाना नहीं बनाता और दूसरे क्षेत्रीय देशों के लिए भी खुला है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सिर्फ दस्तावेज की भाषा नहीं देखी जाती, टाइमिंग भी देखी जाती है। और इस समझौते की टाइमिंग बहुत कुछ कहती है क्योंकि इस समय ईरान और सऊदी अरब के बीच तनाव चरम पर है। ईरान समर्थित हूती, इराकी मिलिशिया और अन्य समूहों की गतिविधियों ने खाड़ी देशों की सुरक्षा चिंता बढ़ाई है। दूसरी तरफ इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष ने पूरे क्षेत्र को बारूद के ढेर में बदल दिया है। इसलिए यह समझौता भले ही ईरान का नाम न ले, लेकिन ईरान के लिए इसका संदेश साफ है कि सऊदी अरब अब अकेला नहीं है। ईरान की बढ़ेंगी मुश्किलें वहीं इस समझौते के बाद ईरान के लिए नई चुनौती खड़ी हो गयी है। तेहरान अब तक पश्चिम एशिया में अपने प्रभाव का बड़ा हिस्सा सहयोगी और प्रॉक्सी संगठनों के नेटवर्क के जरिए कायम करता रहा है। लेकिन यदि सऊदी अरब को पाकिस्तान की सैन्य क्षमता और तुर्किये की रक्षा तकनीक का समर्थन मिलने लगे तो क्षेत्रीय समीकरण बदल सकते हैं। यही कारण है कि मक्का समझौते को ईरान के खिलाफ सीधा सैन्य गठबंधन नहीं होते हुए भी ईरान के लिए रणनीतिक चुनौती जरूर माना जा सकता है। इजराइल-अमेरिका को भी संदेश दिलचस्प बात यह है कि इस गठबंधन का एक और बड़ा संदेश इजरायल के लिए भी है। पश्चिम एशिया में जिस ‘सुन्नी धुरी’ की चर्चा लंबे समय से होती रही है, वह अब सिर्फ राजनीतिक अवधारणा नहीं रहना चाहती। साथ ही यह अमेरिका के लिए भी खतरे की घंटी है और यह समझौता वाशिंगटन के लिए भी सुखद खबर नहीं है। दरअसल सऊदी अरब और तुर्किये दोनों अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था के पुराने साझेदार हैं। लेकिन यदि यही देश अपनी सुरक्षा के लिए अलग क्षेत्रीय सैन्य ढांचा बनाने लगें तो इसका अर्थ साफ है कि अमेरिकी सुरक्षा छतरी पर भरोसा कम हो रहा है। यही इस समझौते का सबसे बड़ा दीर्घकालिक रणनीतिक अर्थ हो सकता है। सुन्नी नाटो सिर्फ कल्पना है या हकीकत? इसके अलावा, यदि मक्का मॉडल सफल होता है और उसमें दूसरे सुन्नी देश शामिल होते हैं, तो पश्चिम एशिया में अमेरिका के नेतृत्व वाली सुरक्षा व्यवस्था के समानांतर एक क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचा खड़ा हो सकता है। सवाल उठता है कि इसमें और कौन-से देश शामिल हो सकते हैं? इसके जवाब में कतर, मिस्र, संयुक्त अरब अमीरात और सीरिया जैसे देशों के नाम संभावित सदस्य के रूप में सामने आ रहे हैं। हालांकि यह भी एक तथ्य है कि यूएई की कई क्षेत्रीय मुद्दों पर सऊदी अरब और तुर्किये से अलग नीति रही है। साथ ही मिस्र भी किसी ऐसे सैन्य गठबंधन में फंसना नहीं चाहेगा जो उसे सीधे किसी क्षेत्रीय युद्ध में धकेल दे। वहीं सीरिया अपनी युद्धोत्तर परिस्थितियों से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा है। इसलिए ‘सुन्नी नाटो’ का विस्तार संभव जरूर है, लेकिन आसान नहीं है। त्रि-पक्षीय समझौते का भारत पर क्या होगा असर? अब सवाल यह है कि इस रक्षा समझौते का भारत पर क्या असर पड़ेगा और अगर भारत-पाकिस्तान के बीच फिर सैन्य टकराव हुआ तो क्या तुर्किये और सऊदी अरब पाकिस्तान के साथ खड़े होंगे और भारत के खिलाफ युद्ध लड़ेंगे? देखा जाये तो भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता पाकिस्तान की बढ़ती रणनीतिक क्षमता है। तुर्किये पहले से ही पाकिस्तान का करीबी सैन्य साझेदार है और कश्मीर से लेकर रक्षा सहयोग तक उसका रुख भारत के लिए चिंता का विषय रहा है। 2025 के भारत-पाकिस्तान सैन्य टकराव में भी अंकारा ने खुलकर पाकिस्तान का समर्थन किया था। ऐसे में भविष्य में पाकिस्तान को तुर्किये से ड्रोन, हथियार, तकनीक, खुफिया सहयोग और सैन्य सहायता का अधिक संगठित समर्थन मिल सकता है। हालांकि सऊदी अरब को तुर्किये के साथ एक ही नजर से देखना सही नहीं होगा क्योंकि रियाद के पाकिस्तान से गहरे रक्षा संबंध जरूर हैं, लेकिन भारत भी उसके लिए ऊर्जा, व्यापार, निवेश और रणनीतिक सहयोग का अहम साझेदार है। इसलिए भारत-पाकिस्तान संघर्ष की स्थिति में तुर्किये का पाकिस्तान के पक्ष में खुलकर खड़ा होना ज्यादा संभावित है, जबकि सऊदी अरब के लिए सीधे भारत के खिलाफ युद्ध में उतरना आसान नहीं होगा। वह पाकिस्तान को राजनीतिक, आर्थिक या सीमित सैन्य-लॉजिस्टिक मदद दे सकता है, लेकिन मक्का समझौते की मौजूदा सार्वजनिक भाषा से यह नहीं कहा जा सकता कि पाकिस्तान पर हमले की स्थिति में सऊदी और तुर्किये अपने आप भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ देंगे। यही वजह है कि भारत के लिए असली चिंता इस समझौते की ‘सामूहिक युद्ध’ वाली भाषा से ज्यादा पाकिस्तान को मिलने वाली संभावित अतिरिक्त सैन्य और रणनीतिक ताकत है। पाकिस्तान का विरोधाभास हालांकि इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान का सबसे बड़ा विरोधाभास भी सबके सामने आया है। जिस देश की अपनी सीमाओं पर लगातार तनाव है, जिसे अफगानिस्तान सीमा पर संघर्ष का सामना करना पड़ रहा है, जिसके बलूचिस्तान प्रांत ने आजादी का ऐलान कर दिया है, जिसके अवैध कब्जे वाले पीओके में विद्रोह और दमन तेज होता जा रहा है, वह देश अब मुस्लिम दुनिया की सामूहिक सुरक्षा का प्रहरी बनने की भूमिका तलाश रहा है। देखा जाये तो पाकिस्तान के आंतरिक संकटों के बीच यह समझौता उसके लिए अपनी अंतरराष्ट्रीय प्रासंगिकता दिखाने का अवसर भी बन गया है। कई सवालों के जवाब समय देगा वैसे मक्का समझौते की असली परीक्षा तब होगी जब तीनों में से किसी एक पर वास्तविक सैन्य हमला होगा। अगर सऊदी अरब पर हूती या किसी अन्य ईरान समर्थित समूह का बड़ा हमला होता है, तो क्या पाकिस्तान और तुर्किये युद्ध में उतरेंगे? अगर पाकिस्तान पर हमला होता है, तो क्या सऊदी अरब और तुर्किये सैनिक भेजेंगे? और अगर भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध होता है, तो क्या रियाद अपने भारत संबंधों को दांव पर लगाकर इस्लामाबाद के साथ खड़ा होगा? इन सवालों का जवाब अभी किसी के पास नहीं है। लेकिन एक बात साफ है कि मक्का में सिर्फ एक समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हुए हैं। पश्चिम एशिया में शक्ति के नए समीकरण की नींव रखी गई है। बहरहाल, नाटो की छतरी के नीचे मतभेद बढ़ रहे हैं और उसी समय मुस्लिम दुनिया के तीन देश अपनी सुरक्षा को एक-दूसरे से जोड़ रहे हैं। अभी इसे ‘सुन्नी नाटो’ कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन यदि इसमें दूसरे देश जुड़ते हैं, संयुक्त सैन्य अभ्यास बढ़ते हैं, खुफिया और हथियार सहयोग संस्थागत होता है और ‘एक पर हमला, सभी पर हमला’ सिर्फ कागज की लाइन न रहकर वास्तविक सैन्य नीति बन जाती है, तो आने वाले वर्षों में पश्चिम एशिया का नक्शा बदल सकता है। -नीरज कुमार दुबे
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मुंबई, भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के तहत मुंबई में गुरुवार से ब्रिक्स वेव्स बाजार 2026 का शुभारंभ हुआ।
मोहन भागवत का युवाओं से संवाद राष्ट्र निर्माण की दिशा में अहम कदम: सतीश महाना
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FCRA Bill पर हल्ला मचा रहे विपक्षी दलों और ईसाई संगठनों को मार्को रुबियो का बयान सुनना चाहिए
केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) संशोधन विधेयक को लेकर देश में तो इस समय व्यापक बहस छिड़ी ही हुई है, साथ ही इसकी गूंज अमेरिका तक सुनाई दे रही है। दिलचस्प बात यह है कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो पहले स्वयं यह कह चुके हैं कि किसी भी देश में विदेशी फंड से संचालित संस्थाओं को वहां की संप्रभु सरकार के समानांतर व्यवस्था नहीं चलानी चाहिए और उन्हें मेजबान देश के कानूनों का सम्मान करना चाहिए। इसके बावजूद अमेरिकी सांसद राइली मूर भारत के प्रस्तावित कानून की आलोचना कर रहे हैं। दूसरी ओर, मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात के बाद स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार ने उन्हें आश्वस्त किया है कि प्रस्तावित संशोधन को पूर्व प्रभाव (रेट्रोस्पेक्टिव) से लागू नहीं किया जाएगा। इन घटनाक्रमों के बीच मोदी सरकार का स्पष्ट संदेश है कि विदेशी धन प्राप्त करने वाले संगठनों के संचालन में पारदर्शिता, जवाबदेही और भारतीय कानूनों का पालन सर्वोच्च प्राथमिकता रहेगा। हम आपको बता दें कि केंद्र सरकार के आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में एफसीआरए के तहत पंजीकृत सक्रिय संगठनों की संख्या घटी है, लेकिन विदेशी चंदे का प्रवाह बना हुआ है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2024-25 में 16,200 संगठनों को लगभग 22,963 करोड़ रुपये का विदेशी योगदान प्राप्त हुआ। वहीं बड़ी संख्या में ऐसे संगठनों के एफसीआरए लाइसेंस निरस्त या समाप्त भी किए गए हैं। सरकार का कहना है कि केवल वैध पंजीकरण रखने वाले संगठनों को ही विदेशी धन प्राप्त करने और उसका उपयोग करने का अधिकार होना चाहिए। इसे भी पढ़ें: संसद में सत्ता-विपक्ष की टकरार! Kharge के दावे पर Kiren Rijiju का तीखा वार हम आपको बता दें कि सरकार द्वारा लाए गए संशोधन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यदि किसी संस्था का एफसीआरए पंजीकरण समाप्त हो जाता है, रद्द हो जाता है, नवीनीकृत नहीं होता या संस्था स्वयं उसे छोड़ देती है, तो विदेशी धन से निर्मित परिसंपत्तियों के प्रबंधन के लिए एक नामित प्राधिकरण की व्यवस्था की जाएगी। यदि बाद में संस्था का पंजीकरण बहाल हो जाता है तो संबंधित संपत्तियां और अप्रयुक्त विदेशी योगदान वापस कर दिए जाएंगे। यदि ऐसा नहीं होता, तो कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी। केंद्र सरकार का तर्क है कि यह व्यवस्था किसी नए अधिकार का सृजन नहीं, बल्कि पहले से मौजूद प्रावधानों को अधिक स्पष्ट और व्यवस्थित बनाने का प्रयास है। वहीं प्रस्तावित संशोधन को लेकर कुछ चर्च संगठनों ने आशंकाएं भी व्यक्त की हैं। उनका कहना है कि कानून की कुछ धाराएं अत्यधिक कठोर हैं और उन्हें संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजा जाना चाहिए। इसी उद्देश्य से विभिन्न चर्च संगठनों के प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की और अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं। वहीं मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने अमित शाह के साथ बैठक के बाद कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री ने स्पष्ट आश्वासन दिया है कि प्रस्तावित संशोधन को पूर्व प्रभाव से लागू नहीं किया जाएगा। हम आपको यह भी बता दें कि केंद्र सरकार ने इन आशंकाओं का विस्तार से जवाब भी दिया है। सरकार का कहना है कि प्रस्तावित कानून किसी विशेष धर्म, समुदाय या विचारधारा को निशाना नहीं बनाता। एफसीआरए के प्रावधान सभी विदेशी चंदा प्राप्त करने वाले संगठनों पर समान रूप से लागू होते हैं। केंद्र सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि किसी धार्मिक स्थल से जुड़ी संपत्ति का मामला आता है तो उसके धार्मिक स्वरूप को कानूनन सुरक्षित रखा जाएगा। साथ ही, नामित प्राधिकरण के आदेश अंतिम नहीं होंगे और उनके विरुद्ध न्यायालय में अपील का अधिकार भी उपलब्ध रहेगा। उधर, इस पूरे विवाद का अंतरराष्ट्रीय पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। अमेरिकी सांसद राइली मूर ने आरोप लगाया कि यह कानून चर्चों और ईसाई संस्थाओं के खिलाफ है। हालांकि स्वयं अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने पिछले वर्ष यह कहा था कि विदेशी सहायता कार्यक्रम मेजबान देशों की सरकारों के समानांतर नहीं चलने चाहिए और विदेशी वित्तपोषित संस्थाओं को संबंधित देश की नीतियों और कानूनों के अनुरूप काम करना चाहिए। यही कारण है कि भारत के संदर्भ में उठ रही आलोचना पर दोहरे मापदंड का प्रश्न भी सामने आया है। देखा जाये तो लोकतंत्र में किसी भी कानून पर बहस और समीक्षा का अधिकार सभी को है, लेकिन भारत की संप्रभुता और राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हैं। यदि कोई संगठन विदेशी चंदे के सहारे पूरी पारदर्शिता और भारतीय कानूनों का पालन करते हुए जनकल्याण का कार्य करता है, तो उसके लिए इस कानून से घबराने का कोई कारण नहीं होना चाहिए। इसके विपरीत, जिन संस्थाओं या तत्वों ने विदेशी धन का उपयोग नियमों से इतर गतिविधियों, अपारदर्शी वित्तीय लेन-देन या भारत में अस्थिरता और अशांति फैलाने के प्रयासों के लिए किया है, उनके लिए स्वाभाविक रूप से चिंता की स्थिति पैदा हो सकती है क्योंकि प्रस्तावित संशोधन निगरानी, जवाबदेही और कानूनी अनुपालन को और मजबूत करने का प्रयास करता है। मोदी सरकार का कहना है कि यह कानून किसी धर्म या समुदाय को लक्षित नहीं करता, बल्कि विदेशी अंशदान के नियमन और पारदर्शिता के लिए समान रूप से लागू होगा। ऐसे में यदि विदेशी फंडिंग के नाम पर नियमों की अनदेखी करने वालों की मुश्किलें बढ़ती हैं, तो इसे कानून के दायरे में जवाबदेही सुनिश्चित करने की प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए। बहरहाल, संसद में होने वाली चर्चा के बाद कानून का अंतिम स्वरूप तय होगा, लेकिन यह स्पष्ट है कि विदेशी धन के उपयोग पर प्रभावी निगरानी और राष्ट्रीय हितों की रक्षा किसी भी संप्रभु राष्ट्र की वैध जिम्मेदारी है। -नीरज कुमार दुबे
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पहली तिमाही में बेहतर रहे भारतीय कंपनियों के नतीजे
नई दिल्ली, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में भारतीय कंपनियों के नतीजे उम्मीद से बेहतर रहे हैं।
मध्य प्रदेश में शुरू होगा 6 महीने का जन विश्वास अभियान, जनता के बीच जाएंगे मंत्री-अधिकारी
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राजेंद्र माथुर- विचारों की पत्रकारिता के नायक
राजेंद्र माथुर की पूरी जीवन यात्रा एक साधारण आम आदमी की कथा है। वे इतने साधारण हैं कि असाधारण लगने लगते हैं। उन्होंने जो कुछ पाया, एकाएक नहीं पाया; संघर्ष से पाया, नियमित लेखन से पाया और अपनी रचनाशीलता से पाया। इसी संघर्ष की वृत्ति ने उन्हें असाधारण पत्रकार और संपादक बना दिया। राजेंद्र माथुर का पत्रकारीय व्यक्तित्व इस बात से तय होता है कि आखिर उनके लेखन में विचारों की गहराई कितनी है। अपने अखबार को ऊंचाइयों पर ले जाने का उनका संकल्प कितना गहरा है और हमारे समय के प्रश्नों के जवाब तलाशने तथा नए सवाल खड़े करने की कितनी प्रश्नाकुलता संबंधित व्यक्ति में है। राजेंद्र माथुर का संपादकीय और पत्रकारीय व्यक्तित्व इस बात की गवाही देता है कि वे असहज प्रश्नों से मुंह नहीं चुराते, बल्कि उनसे दो-दो हाथ करते हैं। वे सवालों से जूझते हैं और उनके सही एवं प्रासंगिक उत्तर तलाशने की कोशिश करते हैं। वे सही मायने में पत्रकारिता में विचारों के एक ऐसे प्रतीक पुरुष बनकर सामने आए, जिन्होंने अपने लेखन के माध्यम से एक बौद्धिक उत्तेजना का सृजन किया और हिंदी को एक ऐसी भाषा तथा विराट अनुभव-संसार दिया, जिसकी प्रतीक्षा में वह सालो से खड़ी थी। इस मायने में राजेंद्र माथुर की उपस्थिति अपने समय में एक कद्दावर पत्रकार-संपादक की मौजूदगी है। वरिष्ठ पत्रकार श्री सूर्यकांत बाली के मुताबिक,“माथुर साहब जैसा बोलते थे, वैसा ही लिखते थे। वे धाराप्रवाह, विचार-परिपूर्ण और रूपक-अलंकृत बोलते थे, तो धाराप्रवाह, विचार-परिपूर्ण और रूपक-अलंकृत लिखते भी थे।” ऐसे में कहा जा सकता है कि राजेंद्र माथुर के पत्रकारीय एवं संपादकीय व्यक्तित्व में एक बौद्धिक आकर्षण दिखता है। उनके लेखन में भारत-जिज्ञासा, भारत-अनुराग और भारत-स्वप्न पूरी समग्रता में प्रकट होते हैं। वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने लिखा है कि “राजेंद्र माथुर में बौद्धिकता और सच्चरित्रता का असाधारण संगम था, इसीलिए वे हिंदी पत्रकारिता में शिखर स्थान पा सके। वे असाधारण शैलीकार थे। अंग्रेजी साहित्य के प्राध्यापक होने के बावजूद उनकी हिंदी लेखन शैली बिंब-प्रधान थी। उनके मुहावरे अपने होते थे। उनमें अभिव्यंजना की अद्भुत शक्ति थी। हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में वे एक शैलीकार के रूप में याद किए जाएंगे।” इसे भी पढ़ें: अब शिवाजी, चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह जैसे लोग क्यों नहीं मिलते? राजेंद्र माथुर एक श्रेष्ठ संपादक थे। उनकी उपस्थिति ही 'नईदुनिया' और 'नवभारत टाइम्स' को एक ऐसा समाचार पत्र बनाने में सफल हुई, जिस पर हिंदी पत्रकारिता को नाज है। 'नवभारत टाइम्स' में श्री माथुर के सहयोगी रहे श्री विष्णु खरे ने लिखा है कि, “राजेंद्र माथुर महान संपादक होने का अभिनय करने की कोई जरूरत महसूस नहीं करते थे। दरअसल, लिबास से लेकर बोलचाल तक उनकी कोई बनावटी शैली या लहजा नहीं था; वे अपने मामूलीकरण में विश्वास करते थे, वैशिष्ट्य में नहीं। उनकी संपादकीय आदेशों या हुक्मों से नहीं, एक गुणात्मक तथा नैतिक विकिरण से चलती” राजेंद्र माथुर का पत्रकारीय व्यक्तित्व बेहद प्रेरक था। आज की पत्रकारिता और मीडिया संस्थानों में घुस आई तमाम बुराइयों से उनका व्यक्तित्व एकदम अलग था। संपादक की जैसी शास्त्रीय परिभाषाएं बताई गई हैं, श्री माथुर उन पर पूरी तरह फिट बैठते हैं। उनके समकक्ष पत्रकारों की राय में, जिस समय वे दिल्ली में 'नवभारत टाइम्स' जैसे बड़े अखबार के संपादक थे, वे सत्ता के लाभ उठा सकते थे। आज की पत्रकारिता में जिस तरह पत्रकार एवं संपादक सत्ता से लाभ लेकर मंत्री से लेकर राज्यसभा की सीटें ले रहे हैं, श्री माथुर भी ऐसे प्रलोभनों के पास जा सकते थे। किंतु उन्होंने तमाम चर्चाओं के बीच इससे खुद को बचाया। पत्रकार विष्णु खरे अपने लेख में इस बात की पुष्टि भी करते हैं। सही मायने में राजेंद्र माथुर एक ऐसे संपादक के रूप में सामने आते हैं, जिन्होंने अपने पत्रकारीय व्यक्तित्व को वह ऊंचाई दी जिसके लिए पीढ़ियां उन्हें याद कर रही हैं। उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खूबी हिंदी पत्रकारिता को लेकर उनकी चिंताएं हैं। वे हिंदी पत्रकारिता के एक ऐसे संपादक थे, जो लगातार यह सोचते रहे कि हिंदी पत्रकारिता का विचार-दारिद्र्य कैसे दूर किया जाए और कैसे हिंदी में एक संपूर्ण अखबार निकले तथा उसे व्यापक लोकस्वीकृति भी मिल सके। 'नवभारत टाइम्स' के कार्यकारी संपादक रहे स्व. सुरेंद्र प्रताप सिंह ने उनकी इन चिंताओं को निकटता से देखा था। वे लिखते हैं, “माथुर साहब का गहन इतिहास-बोध, शुद्ध श्रद्धा और उससे उत्पन्न गरिमामय अतीत की मरीचिका पर आधारित हिंदी पत्रकारिता की कमजोर आधारभूमि के बारे में उन्हें बार-बार सचेत करता रहता था। वे भूतकाल के वायवीय स्वर्णिम अतीत में जीने वाले नहीं थे। वे स्वप्नदर्शी थे और अपने सपनों की उदात्तता के साथ उन्होंने कभी किसी प्रकार का समझौता नहीं किया। हिंदी पत्रकारिता का वर्तमान परिदृश्य उन्हें बार-बार विचलित तो कर देता था, लेकिन एक कुशल अभियात्री की तरह उन्होंने अपने जहाज की दिशा को क्षणिक प्रलोभनों के लिए किसी अन्य रास्ते पर डालने के बारे में क्षणिक विचार भी नहीं किया।” उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व की विशिष्टता यह भी है कि वे अंग्रेजी के प्राध्यापक और विद्वान होने के बावजूद अपने लेखन की भाषा के नाते हिंदी को चुनते हैं। हिंदी उनकी सांसों में बसती थी। हिंदी पत्रकारिता को नई जमीन तोड़ने के लिए प्रेरित करने और हिंदी लेखकों एवं पत्रकारों की एक पूरी पीढ़ी का निर्माण करने का काम श्री माथुर जीवन भर करते रहे। इंदौर से लेकर दिल्ली तक उनकी पूरी यात्रा में एक भारत-प्रेम, भारत-बोध और हिंदी-प्रेम साफ नजर आता है। शायद इसी के चलते वे देश की पत्रकारिता को एक नई और सही दिशा देने में सफल रहे। श्री मधुसूदन आनंद लिखते हैं, “माथुर साहब ने अंग्रेजी में एम.ए. किया था और अंग्रेजी भाषा पर उनकी पकड़ अंग्रेजी पत्रकारों को भी विस्मय में डालती थी। लेकिन उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को चुना, तो शायद इसलिए कि वे अपनी बात अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना चाहते थे। अगर यह कहा जाए कि हिंदी पत्रकारों की एक पीढ़ी माथुर साहब को पढ़कर पली और बढ़ी है, तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। उनके असामयिक निधन के बाद 'नवभारत टाइम्स' को देश के दूर-दूर के इलाकों से हजारों पत्र प्राप्त हुए थे। ये वे पाठक थे, जो उनके उत्कट राष्ट्र-प्रेम, समाज के प्रति उनके सरोकारों, इतिहास की अतल गहराइयों से अनमोल तथ्य ढूंढ कर लाने के उनके सामर्थ्य और शालीन भाषा में राजनेताओं की खिंचाई करने के उनके साहस पर मुग्ध थे।” उनके व्यक्तित्व की एक बड़ी विशेषता थी, जिसे उनके सहयोगी रहे सूर्यकांत बाली इन शब्दों में रेखांकित करते हैं,“हमारे प्रधान संपादक को कोई पांचवां काम आता है, इस पर तो मुझे पूरा शक है: बस सोचना, पढ़ना, बतियाना और लिखना, उनकी सारी दुनिया इन चार कामों में सिमट चुकी थी।” श्री माथुर के व्यक्तित्व पर यह एक मुकम्मल टिप्पणी है, जो बताती है कि वे किस तरह के पत्रकार-संपादक थे। उनका पत्रकारीय व्यक्तित्व इसीलिए एक अलग किस्म की आभा के साथ सामने आता है, जिसमें एक बौद्धिक तेज और आकर्षण निरंतर दिखता है। उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे एक ऐसे लेखक-संपादक के तौर पर सामने आते हैं, जो पूर्णकालिक पत्रकार थे। वे किसी साहित्य की परंपरा से आने वाले संपादक नहीं थे। अतः उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को साहित्यकार-संपादकों द्वारा दी गई भाषा और उसके मुहावरों से अलग एक अनूठी पत्रकारीय भाषा का अनुभव दिया। हिंदी को संवाद, संचार और सूचना की भाषा बनाने में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। सही मायने में वे एक ऐसे संपादक और लेखक के रूप में सामने आते हैं, जिन्होंने बहुत से अनछुए विषयों को हिंदी के अनुभव का विषय बनाया, जिन पर पहले अंग्रेजी के पत्रकारों का एकाधिकार माना जाता था। उन्होंने भावनाओं से ऊपर विचार और बौद्धिकता को महत्व दिया। इसके चलते हिंदी को एक नई भाषा, एक नया अनुभव और अभिव्यक्ति का एक नया संबल मिला। उनकी बौद्धिकता ने हिंदी पत्रकारिता को अंग्रेजी अखबारों के सामने सम्मान से खड़े होने लायक बनाया, जिससे हिंदी पत्रकारिता ने एक नया आत्मविश्वास और नई ऊर्जा हासिल की। आज हिंदी पत्रकारिता पर जिस तरह बाजारवादी ताकतों का दबाव गहरा रहा है, ऐसे समय में राजेंद्र माथुर के बहाने हिंदी पत्रकारिता की पड़ताल एक आवश्यक विमर्श बन गई है। शायद उनकी स्मृति के बहाने हम कुछ ऐसे रास्ते तलाश पाएं, जो हमें इस कठिन समय में अपने मूल्यों के साथ काम करने का हौसला दे सकें। - प्रो.संजय द्विवेदी (लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)
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