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एक लाख नौकरियां खत्म, क्यों ढीले हुए फोल्क्सवागन के कल पुर्जे

2016 में फोल्क्सवागन बिक्री के लिहाज से दुनिया की सबस बड़ी कार कंपनी बनी, लेकिन 10 साल बाद कंपनी अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ती दिख रही है

देशबन्धु 27 Aug 2026 12:46 am

गुजरात : सुरेंद्रनगर का वढ़वाण 'बांधणी कला' का हब, 75 फीसदी आबादी की आजीविका का बना सहारा

गुजरात : सुरेंद्रनगर का वढ़वाण 'बांधणी कला' का हब, 75 फीसदी आबादी की आजीविका का बना सहारा

समाचार नामा 26 Aug 2026 11:47 pm

विरोध प्रदर्शन करें पर ना हो सीमाओं का अतिक्रमण

आये दिन होने वाले प्रदर्शनों के चलते सामान्य जनजीवन को बंधक बना देने की प्रवृति पर दिल्ली उच्च न्यायालय की टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है कि प्रदर्शनों के कारण कई बार तो जीवन मरण तक के हालात पैदा हो जाते हैं। अन्य सब कारणों और परिणामों को थोड़ी देर के लिए अलग कर भी दिया जाएं तो भी हालात यहां तक हो जाते हैं कि यातायात प्रभावित होने से तत्काल मेडिकल रिलिफ की आवश्यकता वाले बीमारों तक का जीवन संकट में पड़ जाता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि लोकतंत्र में अपनी बात कहने, अपनी बात रखने और अपना विरोध अंकित कराने का सबको अधिकार है। केई गलत हो रहा है तो उसका विरोध भी होना चाहिए पर इसका मतलब यह तो नहीं होना चाहिए कि हम अपनी बात कहने के चक्कर में दूसरों को अपने सामान्य नागरिक अधिकारों से वंचित कर दें। विरोध प्रदर्शन के साथ ही साथ दायित्व भी होता है। शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का विरोध भी नहीं होता पर कब इस तरह के प्रदर्शन हिंसक हो जाते हैं और कानून व्यवस्था के गंभीर हालात हो जाते हैं इसका खामियाजा प्रदर्शनकारियों को नहीं अपितु प्रशासन और आमजन को भुगतना पड़ता है। सीजीपी के हालिया प्रदर्शनों के दौरान दिल्ली में जो हालात बने और जयपुर में पिछले दिनों सीजीपी द्वारा स्कूल प्रकरण को लेकर ग्रामवासियों और सीजीपी लोगों के साथ हालात बने यह अपने आप में गंभीर हो जाता है। रांची और देश के अन्य स्थानों के प्रदर्शनों को भी इसी संदर्भ में देखना होगा। शहर की सामान्य व्यवस्था को ही प्रभावित करने वाले स्थानों पर प्रदर्शन स्वीकृति पर भी प्रश्न उठना स्वाभाविक है। न्यायमूर्ति अमित महाजन की यह टिप्पणी महत्वपूर्ण हो जाती है कि शहर के बीच प्रदर्शन की अनुमति क्यों कर दी जानी चाहिए। दरअसल सीजीपी द्वारा जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किये गये और यह प्रदर्शन देखते देखते हिंसक हो गया। इसके बाद प्रदर्शनकारियों और पुलिस प्रशासन और पक्ष प्रतिपक्ष द्वारा एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल जाता है पर मूल कारण को नजरअंदाज कर दिया जाता है। इससे पहले 2017-18 में जलकट्टू घटना के संदर्भ में गठित न्यायमूर्ति राजेश्वरन आयोग की सिफारिशें भी महत्वपूर्ण हो जाती है। लोकतंत्र में विरोध अधिकार हो सकता है पर विरोध का एक तरीका होता है। शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का सबको अधिकार है पर अपने विरोध प्रदर्शन के चक्कर में अन्य और वह भी आमनागरिकों का जनजीवन प्रभावित करने का किसी को अधिकार नहीं हो सकता। विरोध के चलते कानून हाथ में लेना या क्षेत्राधिकार से बाहर जाना एक सभ्य समाज और सभ्य नागरिक की पहचान नहीं हो सकती। सरकारी या निजी संपत्ती को नुकसान पहुंचाना या कानून को हाथ में लेने का अधिकार किसी को नहीं दिया जा सकता। एक बात यह भी समझनी होगी कि पुलिस प्रशासन भी आखिर आदमी है और देखा जाएं तो उनका मरण दोनों तरफ से हो जाता है। यदि प्रदर्शनकारियों को एक सीमा से अधिक बढ़ने पर रोके नहीं तो प्रशासन की विफलता कहने में कोई देरी नहीं लगाता, यहां तक कि प्रशासन की इंटेलिजेंस फैलियर जैसे आरोप लग जाते हैं। प्रदर्शन के हिंसक होने पर प्रशासन द्वारा कार्रवाई की आलोचना आम हो जाती है पर जब कई बार प्रदर्शनकारियों द्वारा प्रदर्शन के दौरान बेरिकेड़ तोड़ने, पत्थरबाजी, तोड़फोड़ और निरपराध आमजन को निशाने पर लेने लगते हैं तो एक बात साफ हो जानी चाहिए कि फिर प्रशासन गुलाब के फूल देकर तो प्रदर्शन को नियंत्रित नहीं कर सकता हांलाकि प्रशासन को भी संयम बरतते हुए ही कदम उठाने चाहिए। दरअसल तस्वीर के दोनों पक्षों को देखना होगा। यदि प्रदर्शन सामान्य होता है और अनुमति प्राप्त शांतिपूर्ण प्रदर्शन हो तो उस पर पुलिस प्रशासन की सख्ती को किसी भी हालात में स्वीकारा नहीं जा सकता पर प्रदर्शनकारियों द्वारा लक्ष्मण रेखा लांघी जाती है तो उस पर प्रशासन को भी कानूनी दायरें में रहते हुए कार्रवाई तो करनी ही पड़ेगी। इसे भी पढ़ें: जयपुर से लेकर भोपाल और गया से उन्नाव तक...Gen Z तो झांकी थी, पूरी पिक्चर दिखा रहे Gen अल्फा? अब जयपुर के स्कूल की घटना का विश्लेषण करें तो हालात की ओर ध्यान दिलाना एक उचित कदम हो सकता है पर स्कूल या किसी भी सरकारी-गैरसरकारी संस्थान का निरीक्षण का अधिकार किस कानून ने दे दिया है। एक सीमा तक प्रदर्शन आपका अधिकार हो सकता है पर प्रदर्शन से माहौल को तनावपूर्ण और द्वेषतापूर्ण बनाने की किसी भी व्यवस्था में अनुमति नहीं दी जा सकती और नहीं दी भी जानी चाहिए। प्रशासन, प्रदर्शनकारियों और आमजन को अपनी सीमाओं को समझना होगा। सुर्खियों में बनने के लिए कदम उठाना किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता। क्या कभी सोचा है कि हमारे प्रदर्शन से प्रदर्शन वाले शहरवासियों को कितना प्रभावित करता है। प्रदर्शन वाले शहर का कहीं ज्यादा तो कहीं कम यातायात प्रभावित हो जाता है। निजी व सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था बाधित हो जाती है। मरीजों व जरुरी काम वालों को बीच रास्ते अटकना पड़ जाता है। नौकरीपेशा या धंधे पर जाने वाले रास्ते में ही अटक जाते है। दैनिक काम के आधार पर रोजी रोटी कमाने वालों की मजदूरी अटक जाती है। शहर की सभी तरह की सप्लाई चैन बाधित हो जाती है। पुलिस प्रशासन व्यवस्था बनाये रखने के लिए व्यस्त हो जाता है तो लोगों में असुरक्षा की भावना बनती है और बाहर निकलने से पहले सोचने को मजबूर हो जाते हैं। और अब तो प्रशासन द्वारा ऐसे शहरों में इंटरनेट बंद करने तक का निर्णय कर लिया जाता है जिससे सामान्य गतिविधियां, बैंकिंग व्यवस्था, सूचनाओं का आदान-प्रदान और पढ़ाई-लिखाई तक पर असर पड़ता है। ऐसे में दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अमित महाजन की यह टिप्पणी कि शहर को बेवजह बंधक बनाने की इजाजत कैसे दी जा सकती है। प्रशासन भी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। पहले तो प्रशासन को भी चाहिए कि प्रदर्शन आदि के लिए ऐसा स्थान निर्धारित हो जहां से सामान्य जनजीवन किसी तरह से प्रभावित ना हो सके। आम जन, शहरी यातायात, शहर का दैनिक जनजीवन किसी तरह से प्रभावित ना हो। ऐसी व्यवस्था हो जिससे प्रदर्शनकारियों की बात वे जहां पहुंचाना चाहते हैं वहां तक पहुंचाई जा सके। प्रदर्शनकारियों को भी प्रदर्शन के दौरान शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखनी चाहिए। असामाजिक तत्वों को किसी तरह का मौका ही नहीं दिया जाना चाहिए। जब किसी प्रदर्शन के दौरान हिंसा या गलत गतिविधियां होने लगती है और व्यवस्था हाथों से निकलने लगती है व प्रशासन द्वारा सख्ती होती है तो यह सामान्य जबाव होता है कि हिंसा या हालात बिगाड़ने वाले असामाजिक तत्व उनमें से नहीं थे पर ऐसा कहने मात्र से जिम्मेदारी से नहीं बचा जा सकता। इसलिए दिल्ली उच्च न्यायालय व न्यायालयों द्वारा पूर्व में भी दी गई टिप्पणियों को गंभीरता से प्रदर्शनकर्ताओं और प्रशासन दोनों को समझना होगा व दोषारोपण के नाम पर जिम्मेदारी से भागने की इजाजत किसी भी हालत में नहीं दी जा सकती। अपनी बात कहने के अधिकार के साथ दूसरों के मौलिक अधिकारों का भी सम्मान करना होगा। कानून व्यवस्था को हाथ में लेने या सीमाओं को लांघने का अधिकार किसी को नहीं दिया जा सकता। - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

प्रभासाक्षी 26 Aug 2026 5:34 pm

जातिगत जनगणना सम्बन्धी कांग्रेस-भाजपा के सियासी दांव-पेचों को यूँ जानिए

जातिगत जनगणना पर कांग्रेस का भाजपा के खिलाफ मौजूदा हमला केवल “जाति गिनी जाए या नहीं” का सवाल नहीं है, बल्कि असली लड़ाई अब डेटा की विश्वसनीयता, सामाजिक न्याय की राजनीति और उससे बनने वाले नए राजनीतिक समीकरण की है। यही वजह है कि अगस्त 2026 में राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर मौजूदा जाति-जनगणना पद्धति पर आपत्ति जताई है। इसलिए जातिगत जनगणना सम्बन्धी कांग्रेस-भाजपा के सियासी दांव-पेचों को ऐसे जानिए। कांग्रेस का तर्क है कि यदि जातियों के नाम दर्ज करने के लिए स्पष्ट, पूर्व-निर्धारित सूची/कोडिंग व्यवस्था नहीं होगी, तो अलग-अलग नाम, वर्तनी और उपजातियों के कारण आंकड़े अविश्वसनीय हो सकते हैं। इसलिए उसने इसे दुरुस्त करने की मांग उठाई, ताकि जातिगत जनगणना सही तरह से हो सके। मजे की बात तो यह है कि कांग्रेस ने 2011 में जिस जातिगत जनगणना के आंकड़ों को छुपाने में ही अपनी भलाई समझी थी, उसी ने अब भाजपा पर दबाव बना दिया कि जातिगत जनगणना करवाओ और भाजपा को यह बात माननी पड़ी, क्योंकि लालू-नीतीश की समझदारी के सामने भाजपा नेतृत्व विवश हो गया। इसे भी पढ़ें: क्यों ठुकराई PM की कुर्सी? प्रियंका पर राहुल को तरजीह, बच्चन परिवार से क्यों बिगड़े रिश्ते, 10 नवंबर को सोनिया गांधी बड़ा खुलासा करने वाली हैं! चाहे लालू प्रसाद हों या नीतीश कुमार, इन्होंने सबके लिए कम और अपनी जातियों और उससे पहले दोस्तों के लिए बहुत कुछ सोचा। इसलिए डेढ़-दो दशक बाद ही सही, लेकिन दोनों को सत्ता से बेदखल होना पड़ा। यही वजह है कि जब केंद्र सरकार ने पिछले साल जब जाति जनगणना कराने की तारीखों का ऐलान किया, तभी स्पष्ट था कि यह काम चुनौतीपूर्ण रहने वाला है। देश की राजनीति में जाति हमेशा अहम रही है, लेकिन इसे निश्चित करना उतना ही मुश्किल। अभी जनगणना की प्रक्रिया शुरू ही हुई है और जाति की गणना दूसरे चरण में की जाएगी, लेकिन सवाल उठने शुरू हो गए हैं। कांग्रेस का आरोप है कि जाति जनगणना में अन्य पिछड़ी जातियों (OBC) का कॉलम नहीं है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने आंकड़े जुटाने के सरकारी तरीकों पर भी अंगुली उठाई और कहा कि जाति जनगणना में जाति का कॉलम खुला रखकर एक सवाल छोड़ दिया गया है, यानी यहां सभी को अपनी जाति खुद लिखनी है। अब चूंकि देश के विभिन्न हिस्सों में एक ही जाति को अलग-अलग नामों से जाना जाता है, तो आंकड़े उलझे हुए मिल सकते हैं। इससे कोई निष्कर्ष निकालना बहुत मुश्किल होगा। वाकई, इस आशंका को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता। क्योंकि 2011 की सामाजिक-आर्थिक और जातिगत जनगणना में भी इसी फॉर्मेट का इस्तेमाल किया गया था। तब 46 लाख से ज्यादा जातियां, उपजातियां, उपनाम दर्ज हो गए थे। इन आंकड़ों में इतनी विसंगति थी कि सरकार ने इनको जारी ही नहीं किया। इसलिए कांग्रेस का ताजा सुझाव है कि लोगों पर छोड़ने के बजाय जातियों की पहले से एक तय सूची/लिस्ट होनी चाहिए। इससे एक जाति एक ही नाम से दर्ज होगी और स्पेलिंग की भी गलती नहीं होगी। उल्लेखनीय है कि जाति जनगणना का उद्देश्य केवल यह पता लगाना नहीं है कि देश में कितनी जातियां और उनकी कितनी आबादी है, बल्कि यह जानना भी आवश्यक है कि अलग-अलग सामाजिक समूहों की वास्तविक स्थिति क्या है। अबतक असमानता दूर करने के लिए लागू की गई नीतियां कितनी कारगर रहीं और आगे उनमें किन बदलावों की दरकार है, इसकी सही तस्वीर जानने के लिए आंकड़ों की शुद्धता मायने रखती है। इसी से शिक्षा, रोजगार और सरकारी योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा। और अगर किसी तरह का सवाल या संदेह है, तो उसे पहले ही दूर कर लिया जाना चाहिए। इसके लिए जो भी सुझाव आते हैं, उन पर विचार-विमर्श करने में हर्ज नहीं है। साथ ही, यह भी स्पष्ट रहना बहुत जरूरी है कि जुटाए गए आंकड़ों का इस्तेमाल किस तरह किया जाएगा। चूंकि जाति जनगणना का देश की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति पर गहरा असर पड़ने वाला है। इसलिए प्रक्रिया पूरी तरह भरोसेमंद और सवालों के परे होनी चाहिए। अब आइए सबसे पहले इस जातिगत जनगणना के लाभ-हानि को समझने की कोशिश करते हैं। # जातिगत जनगणना के संभावित फायदे इस प्रकार हैं:- पहला, नीति पहली बार वास्तविक सामाजिक आंकड़ों पर टिक सकती है। किस जाति की कितनी आबादी है, उसकी शिक्षा, रोजगार, आय और सरकारी योजनाओं तक पहुंच कैसी है—इसका बेहतर आधार मिल सकता है। इससे कल्याणकारी योजनाओं को अधिक लक्षित किया जा सकता है। दूसरा, आरक्षण पर बहस अधिक तथ्य आधारित हो सकती है। अभी अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की वास्तविक जनसंख्या को लेकर अलग-अलग अनुमान हैं। इसलिए विश्वसनीय आंकड़े मिलने पर प्रतिनिधित्व और आरक्षण की समीक्षा का आधार मजबूत हो सकता है। तीसरा, “जिसकी जितनी संख्या...” राजनीति को आंकड़ों की परीक्षा से गुजरना पड़ेगा। कांग्रेस लंबे समय से इसी तर्क को आगे बढ़ा रही है। लेकिन आंकड़े आने के बाद यह नारा भी चुनौती में बदल सकता है—क्योंकि हर जाति अपने वास्तविक सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन और प्रतिनिधित्व का हिसाब मांगेगी। # जातिगत जनगणना के संभावित नुकसान भी कम गंभीर नहीं होंगे पहली बड़ी समस्या जाति की पहचान को स्थायी राजनीतिक पहचान बना देने का खतरा है। अगर आंकड़ों का इस्तेमाल केवल चुनावी टिकट, आरक्षण और वोट-बैंक की राजनीति के लिए हुआ तो सामाजिक विभाजन और तीखा हो सकता है। दूसरी बड़ी समस्या डेटा की गुणवत्ता है। भारत में हजारों जातियां और उपजातियां हैं; एक ही समुदाय के अलग-अलग स्थानीय नाम और वर्तनी हैं। 2011 के सामाजिक-आर्थिक एवं जाति आंकड़ों में ऐसी तकनीकी समस्याओं का हवाला सरकार पहले भी दे चुकी है। इसलिए कांग्रेस की मौजूदा आपत्ति पूरी तरह खारिज करने लायक भी नहीं है। सवाल यह है कि जाति गिनने के बाद उसे सही ढंग से वर्गीकृत और सत्यापित कैसे किया जाएगा। # फिर भाजपा पर कांग्रेस इतनी आक्रामक क्यों है? यहीं इस विवाद का राजनीतिक अर्थ सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है। चूंकि 2024 के बाद कांग्रेस ने “जाति जनगणना + सामाजिक न्याय + प्रतिनिधित्व” को अपनी राजनीति का महत्वपूर्ण आधार बनाया। भाजपा ने अप्रैल 2025 में आगामी जनगणना में जाति को शामिल करने का निर्णय लिया और इसे सामाजिक न्याय की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया। अर्थात कांग्रेस की पुरानी मांग को स्वीकार करके भाजपा ने कांग्रेस का एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा अपने हाथ में ले लिया। इसलिए अब कांग्रेस की रणनीति है: “जाति जनगणना हुई तो सही, लेकिन ऐसी हो कि उसका आंकड़ा ही भरोसेमंद न रहे—तो इसका क्या फायदा?” यही कारण है कि कांग्रेस अब जनगणना कराने के फैसले का विरोध नहीं, बल्कि उसकी पद्धति पर हमला कर रही है। हालिया रिपोर्टों में कांग्रेस ने बिहार और तेलंगाना की तरह पूर्व-निर्धारित जाति सूची और बेहतर कोडिंग/सत्यापन की मांग की है। # भाजपा के लिए असली राजनीतिक चुनौती को ऐसे समझिए भाजपा के सामने दिलचस्प स्थिति है। अगर जातिगत जनगणना से पता चलता है कि OBC आबादी और उसकी आंतरिक संरचना बहुत बड़ी है, तो OBC प्रतिनिधित्व और आरक्षण की मांग और मजबूत हो सकती है। लेकिन भाजपा के पास इसका दूसरा राजनीतिक रास्ता भी है—वह कह सकती है कि जाति की संख्या महत्वपूर्ण है, लेकिन गरीब, महिला, युवा, किसान और वंचित व्यक्ति की आर्थिक-सामाजिक स्थिति उससे भी महत्वपूर्ण है। यानी भाजपा की राजनीति “OBC पहचान” को व्यापक “गरीब/वंचित कल्याण” के नैरेटिव में समाहित करने की कोशिश कर सकती है। # कांग्रेस के लिए भी यह दोधारी तलवार है कांग्रेस यदि जातिगत जनगणना को अपनी बड़ी राजनीतिक जीत बनाती है, तो उसे आगे यह भी बताना पड़ेगा कि जाति के आंकड़े आने के बाद वह वास्तव में करेगी क्या? क्या आरक्षण की सीमा बदलेगी? क्या OBC के भीतर अति-पिछड़ों को अलग लाभ मिलेगा? क्या निजी क्षेत्र में प्रतिनिधित्व की मांग उठेगी? क्या आर्थिक पिछड़ेपन को भी समान महत्व मिलेगा? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या जातिगत आंकड़ों के आधार पर संसाधनों का पुनर्वितरण होगा? इन सवालों का ठोस जवाब देना आसान नहीं होगा। अलबत्ता, मेरी दृष्टि में असली मुद्दा यह है कि जातिगत जनगणना अपने-आप में न लाभ है, न नुकसान। उससे निकले आंकड़ों का इस्तेमाल किस नीति के लिए होता है, यही निर्णायक होगा। एक अच्छी व्यवस्था में: जाति की गणना - सामाजिक-आर्थिक स्थिति - शिक्षा/रोजगार - सरकारी प्रतिनिधित्व - योजनाओं का वास्तविक लाभ समयबद्ध समीक्षा, इन सभी को जोड़ना चाहिए। और सबसे महत्वपूर्ण बात—जातिगत जनगणना को जातिगत संघर्ष की जनगणना नहीं, सामाजिक असमानता की वैज्ञानिक मैपिंग बनाना होगा। यही वह बिंदु है जहां कांग्रेस का भाजपा पर हमला राजनीतिक रूप से समझ में आता है, लेकिन भाजपा की ओर से उठाया गया “हमने तो जाति जनगणना कराने का निर्णय कर ही दिया” वाला पलटवार भी उतना ही प्रभावी हो सकता है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि कांग्रेस का वर्तमान हमला केवल जातिगत जनगणना के खिलाफ नहीं, बल्कि “कौन सही आंकड़ा देगा और उस आंकड़े की राजनीतिक व्याख्या कौन करेगा”—इस लड़ाई का हिस्सा है। आने वाले वर्षों में यही डेटा आरक्षण, परिसीमन, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और OBC राजनीति की दिशा बदल सकता है। याद दिला दें कि कांग्रेस नेता राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने एक बार कहा था कि जाति खत्म होनी चाहिए, पर जब तक यह है तब तक जानना जरूरी है कि इससे प्रभावित लोगों की हालत वास्तव में कैसी है। लेकिन उनके अनुयायी कांग्रेसी राजनीतिज्ञों, नौकरशाहों, न्यायविदों और उद्योगपतियों ने, उनके नाम पर सियासत करने वाले समाजवादियों व राष्ट्रवादियों ने जाति गत पहचान को, इससे जुड़ी व्यवस्थाओं को खत्म तो नहीं ही किया, बल्कि ऐसी-ऐसी नीतियां बना डालीं जिससे कि यह व्यवस्था खूब फल फूल रही है और नेताओं के वोट बैंक बन चुकी है। एक ओर तो दो अलग-अलग जातियों के स्त्री-पुरूष के सहयोग से पैदा हुए वर्णसंकर बच्चे की जाति क्या होगी, स्पष्ट कानून नहीं है, जिससे यह जमात फल फूल रही है। वहीं, दूसरी ओर विभिन्न जातियों में आरक्षण वाली जो अंधी प्रतियोगिता पैदा हो गई, उसने जाति व्यवस्था को और अधिक मजबूती प्रदान कर दी। इससे अंतरजातीय/अंतर्धार्मिक विवाह को मिला प्रोत्साहन भी निरर्थक साबित हुआ। आलम यह है कि आज विभिन्न जातियों के बीच गठबंधन बनाकर एक दूसरे को सियासी व सामाजिक मात देने की रणनीति बनने लगी है। दलितों, आदिवासियों और ओबीसीज के लोग एक दूसरे में शामिल होने की होड़ मचाये हुए हैं। वहीं, इनके लोग सत्तागत नाकामियों, और प्रशासनिक उदासीनता का सारा ठीकरा सामान्य यानी सवर्ण जातियों पर फोड़ देते हैं। शायद इसलिए कि समाज का इंजन समझे जाने वाले सवर्ण लोगों ने भी ऐसी नीतियां नहीं बनवाई, जिससे सबको फायदा पहुंचे। उन्होंने ऐसे उपाय किए कि उनके राजनीतिक वंशवाद की तरह दलितों, आदिवासियों और ओबीसीज में भी परिवार विशेष को बढ़ावा मिला और पीढ़ी दर पीढ़ी आरक्षण का फायदा ऐसे लोग उठाते रहें। इससे उनके ही कोटि के अन्य लोग वंचित रह गए और सामाजिक न्याय व आरक्षण की नीति अपने मूल उद्देश्यों से भटक गई। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 26 Aug 2026 5:28 pm

उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन और पीएम मोदी ने तेलंगाना के सूर्यापेट में हुई बस दुर्घटना पर जताया दुख

उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन और पीएम मोदी ने तेलंगाना के सूर्यापेट में हुई बस दुर्घटना पर जताया दुख

समाचार नामा 26 Aug 2026 2:15 pm

भारतीय शेयर बाजार में तेजी के साथ कारोबार शुरू

मुंबई, मजबूत वैश्विक संकेतों के चलते भारतीय शेयर बाजार बुधवार के कारोबारी सत्र में तेजी के साथ खुला। सेंसेक्स 236.01 अंक या 0.30 प्रतिशत की तेजी के साथ 77,892.10 और निफ्टी 7.40 अंक की मामूली तेजी के साथ 24,341.95 पर था।

देशबन्धु 26 Aug 2026 1:25 pm

'अब बेटियों की सुरक्षा में सेंध लगाने वालों को सीधे जेल या जहन्नुम मिलता है', सीएम योगी का सपा पर हमला

'अब बेटियों की सुरक्षा में सेंध लगाने वालों को सीधे जेल या जहन्नुम मिलता है', सीएम योगी का सपा पर हमला

समाचार नामा 26 Aug 2026 1:08 pm

दुश्मनों पर दनादन बरसेंगी मिसाइलें, भारत में Private Companies भी बनाएंगी Missiles, Rajnath Singh ने DRDO की Technology Transfer को दी मंजूरी

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए भारत की युद्ध-तैयारी को नई धार देने की दिशा में बड़ा फैसला किया है। DRDO द्वारा विकसित पारंपरिक मिसाइल प्रणालियों की तकनीक निजी भारतीय कंपनियों को देने की मंजूरी देकर भारत ने चीन और पाकिस्तान को भी चौंकाने वाला संदेश दिया है। जहां चीन और पाकिस्तान में मिसाइल निर्माण मुख्यतः सरकारी रक्षा कंपनियों के हाथों में केंद्रित है, वहीं भारत अब सरकारी उपक्रमों के साथ-साथ निजी उद्योगों को भी इस सामरिक उत्पादन श्रृंखला में उतार रहा है। इसका मतलब है कि भविष्य में युद्ध की स्थिति में भारत के पास मिसाइल उत्पादन के कई स्रोत होंगे। यदि कभी चीन और पाकिस्तान के साथ एक साथ दो मोर्चों पर संघर्ष की स्थिति बनी, तो भारत केवल अपने मौजूदा भंडार पर निर्भर नहीं रहेगा, बल्कि व्यापक औद्योगिक नेटवर्क के सहारे उत्पादन बढ़ाकर दे दनादन, दे दनादन मिसाइलों की मारक क्षमता बनाए रखने की स्थिति में होगा। यह फैसला केवल ‘मेक इन इंडिया’ नहीं, बल्कि युद्ध के समय मिसाइल सप्लाई चेन को अटूट बनाए रखने की रणनीति है। देखा जाये तो भारत ने अपनी रक्षा नीति में एक ऐसा निर्णायक कदम उठाया है, जो आने वाले वर्षों में देश की युद्ध क्षमता, सैन्य आपूर्ति श्रृंखला और सामरिक आत्मनिर्भरता की तस्वीर बदल सकता है। भारत की रक्षा नीति में जो बदलाव हुआ है उसका अर्थ यह है कि देश अब रक्षा अनुसंधान को सरकारी प्रयोगशाला से निकालकर बड़े पैमाने के औद्योगिक उत्पादन में बदलना चाहता है। इसे भी पढ़ें: क्या Gen-Z होना सुरक्षा नियम तोड़ने का लाइसेंस है? Kargil में महिला पर्यटक के आचरण से उठे कई गंभीर सवाल इस नीति के दायरे में वायु रक्षा, हवा से हवा में मार करने वाली, टैंक रोधी और सतह से सतह पर मार करने वाली अनेक मिसाइल प्रणालियों की तकनीक उद्योग तक पहुंच सकती है। इसमें आकाश, नाग, VSHORADS, अस्त्र, रुद्रम, प्रलय और मैन-पोर्टेबल एंटी-टैंक मिसाइलों जैसी प्रणालियां शामिल हैं। मिसाइल तकनीक का हस्तांतरण पात्रता, प्रमाणन और नियामकीय शर्तों के अधीन होगा। इसका सबसे बड़ा सामरिक लाभ यह है कि युद्ध के समय किसी एक सरकारी उत्पादन इकाई या सीमित आपूर्तिकर्ता पर निर्भरता कम होगी और देश के भीतर व्यापक उत्पादन नेटवर्क तैयार किया जा सकेगा। देखा जाये तो ईरान के साथ 2026 के संघर्ष ने दुनिया को एक कठोर सैन्य सबक दिया है। सबक यह है कि युद्ध में केवल मिसाइल तकनीक होना पर्याप्त नहीं है, उनके विशाल और लगातार भरते रहने वाले भंडार भी जरूरी हैं। CSIS के आकलन के अनुसार ईरान संघर्ष के दौरान अमेरिका के Patriot और THAAD इंटरसेप्टर भंडार पर भारी दबाव पड़ा; Patriot की उपलब्ध संख्या एक हजार से नीचे और THAAD लगभग 250 तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया। विश्लेषण में यह भी चेतावनी दी गई कि घटते भंडार अमेरिका को भविष्य के संघर्षों में इंटरसेप्शन के मामले में अधिक जोखिम लेने के लिए मजबूर कर सकते हैं। यही नहीं, कुछ आकलनों में अमेरिका द्वारा अपने पूर्व-युद्ध Patriot भंडार का लगभग दो-तिहाई तक इस्तेमाल होने की बात कही गई है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि उत्पादन क्षमता बढ़ाने के प्रयासों के बावजूद Patriot और अन्य उन्नत इंटरसेप्टरों के भंडार को पुराने स्तर तक पहुंचाने में करीब तीन वर्ष या उससे अधिक लग सकते हैं। अन्य विश्लेषण यह भी बताते हैं कि Tomahawk जैसी मिसाइलों के नए उत्पादन में लंबा समय लगता है और उन्नत हथियारों की कमी दूर करना वर्षों का काम है। इसके अलावा, इस तरह की भी रिपोर्टें आईं कि अमेरिका को दूसरे देशों में मौजूद अपने सैन्य अड्डों से मिसाइलें वापस मंगवानी पड़ीं। रिपोर्टों में कहा गया कि मध्य-पूर्व में मौजूद अमेरिकी और सहयोगी सैन्य नेटवर्क के संसाधनों, तैनाती और उत्पादन क्षमता पर भारी दबाव पड़ा और पेंटागन को भंडार भरने तथा उत्पादन तेज करने के लिए अतिरिक्त कदम उठाने पड़े। यही इस पूरे घटनाक्रम का वास्तविक रणनीतिक संदेश है कि यदि एक बड़ी शक्ति का मिसाइल भंडार एक क्षेत्रीय युद्ध से इतना दबाव महसूस कर सकता है, तो एक साथ दो मोर्चों या किसी बड़े शक्ति संघर्ष की स्थिति कितनी चुनौतीपूर्ण हो सकती है। भारत के लिए यही सबसे महत्वपूर्ण चेतावनी है। चीन और पाकिस्तान की दोहरी चुनौती वाले वातावरण में भारत किसी एक उत्पादन लाइन के भरोसे नहीं रह सकता। युद्ध लंबा खिंचा तो मिसाइलों का प्रश्न केवल “कौन सी मिसाइल बेहतर है” नहीं, बल्कि “कितनी जल्दी और कितनी संख्या में फिर बनाई जा सकती है” बन जाता है। हम आपको यह भी बता दें कि भारत अंतरिक्ष क्षेत्र में इसका सफल प्रयोग पहले ही कर चुका है। निजी क्षेत्र के लिए अंतरिक्ष गतिविधियां खोलने और IN-SPACe जैसे ढांचे के बाद Skyroot Aerospace और Agnikul Cosmos ने सब-ऑर्बिटल लॉन्च का सफल प्रदर्शन किया। Dhruva Space के नैनो-सैटेलाइट PSLV मिशन से लॉन्च हुए, जबकि Pixxel ने अपने पृथ्वी अवलोकन उपग्रह अंतरिक्ष में भेजे। निजी कंपनियों को ISRO की सुविधाओं और तकनीकी समर्थन तक पहुंच भी दी गई। अब रक्षा क्षेत्र, विशेषकर मिसाइल उत्पादन में वैसी ही औद्योगिक ऊर्जा पैदा करने की कोशिश दिखाई दे रही है। DRDO के Development-cum-Production Partner मॉडल के तहत मार्च 2026 तक 134 कंपनियां भागीदार बन चुकी थीं, 2180 तकनीक हस्तांतरण समझौते हुए और 2,780 से अधिक बौद्धिक संपदा अधिकार उद्योग के उपयोग के लिए खोले गए। साथ ही रक्षा क्षेत्र में निजी भागीदारी बढ़ने का आर्थिक प्रभाव भी स्पष्ट है। 2025-26 में भारत का रक्षा उत्पादन रिकॉर्ड 1.78 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा, जिसमें निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी 24 प्रतिशत रही। रक्षा निर्यात 2013-14 के 686 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में रिकॉर्ड 38,424 करोड़ रुपये पहुंच गया और भारत 80 से अधिक देशों को रक्षा उत्पाद निर्यात कर रहा है। इस निर्यात में निजी क्षेत्र का योगदान 17,353 करोड़ रुपये, यानी 45.16 प्रतिशत रहा। यही कारण है कि मिसाइल तकनीक हस्तांतरण को केवल औद्योगिक नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय युद्ध तैयारी की नीति के रूप में देखना चाहिए। अधिक कंपनियां उत्पादन में उतरेंगी तो क्षमता बढ़ेगी, आपूर्ति श्रृंखला फैलेगी, MSME जुड़ेंगे, तकनीकी प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और युद्धकाल में उत्पादन को तेजी से बढ़ाने की संभावना मजबूत होगी। बहरहाल, अब भारत का सामरिक लक्ष्य सिर्फ मिसाइल बनाना ही नहीं, बल्कि युद्ध के दौरान उन्हें लगातार बनाते रहने की क्षमता हासिल करना है। अमेरिका-ईरान संघर्ष ने बता दिया है कि आधुनिक युद्ध में गोला बारूद और मिसाइलों का भंडार किसी भी महाशक्ति की कमजोर नस बन सकता है। भारत ने समय रहते इस सबक को समझ लिया तो DRDO की तकनीक और निजी उद्योग की उत्पादन क्षमता का यह गठजोड़ आने वाले दशक में भारत की सबसे बड़ी सामरिक ताकतों में से एक साबित हो सकता है।

प्रभासाक्षी 26 Aug 2026 11:19 am

तमिलनाडु CM विजय के 100 दिन पर रजनीकांत ने साधी चुप्पी, कैमरे में कैद हुआ पल

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समाचार नामा 26 Aug 2026 8:30 am

असम ने 'विकसित भारत-जी राम जी' योजना में समुदाय-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाया: सीएम सरमा

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समाचार नामा 25 Aug 2026 10:19 pm

102 तालुकों में सूखे जैसे हालात, केंद्र को रिपोर्ट सौंपी जाएगी: कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री

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समाचार नामा 25 Aug 2026 10:16 pm

घाटी में कार्यरत प्रधानमंत्री पैकेज के तहत कर्मचारियों को मिली 'धमकी', कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति ने सुरक्षा पर उठाए सवाल

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समाचार नामा 25 Aug 2026 9:15 pm

जयशंकर और डोभाल की रूस-चीन यात्रा के कूटनीतिक संदेश को ऐसे समझिए

महान भारतीय कूटनीतिज्ञ आचार्य चाणक्य ने कहा था कि हर मित्रता के पीछे कुछ स्वार्थ होता है। स्वार्थ के बिना कोई मित्रता नहीं हो सकती। यह एक कड़वा सच है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर उनकी बात हू-ब-हू लागू होती है। उनकी इसी बात से प्रेरणा लेते हुए समकालीन भारतीय नेतृत्व यानी भारत दुनिया की किसी एक शक्ति-धुरी में बंधने के बजाय रूस, चीन और पश्चिम—तीनों के साथ अपने हितों के अनुसार समानांतर कूटनीति चला रहा है। स्वाभाविक है कि कूटनीतिक संतुलन में बाधाएं आएंगी ही और सम्बन्धों में थोड़ी सी गफलत भारत को बहुत क्षति पहुंचा सकती है। इसलिए जब जब ऐसी सम्भावनाएं बलवती दिखाई देती हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भरोसेमंद सिपहसालार सक्रिय हो जाते हैं। वाकई, यह संयोग नहीं है कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर रूस में और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल चीन में लगभग एक ही समय में अपने अपने होमवर्क को दुरुस्त करने को लेकर सक्रिय हैं। गत 23–24 अगस्त को जयशंकर ने मॉस्को में भारत-रूस सहयोग पर बातचीत की, जबकि डोभाल 24–25 अगस्त को बीजिंग में चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ भारत-चीन सीमा विवाद पर 25वें विशेष प्रतिनिधि दौर में हिस्सा लिए। इसके गहरे कूटनीतिक निहितार्थ हैं। इसे भी पढ़ें: Russia में Jaishankar, China में Doval, Japan में Piyush Goyal ने संभाला मोर्चा, आखिर क्या है Modi का मिशन? अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो एक ही समय में भारत की तरफ से दो महत्वपूर्ण कूटनीतिक यात्राएं चल रही है, जिसके दृष्टिगत विदेश मंत्री एस. जयशंकर रूस में हैं, जबकि NSA अजीत डोभाल चीन में रणनीतिक बातचीत कर रहे हैं। दरअसल, ये यात्राएं भारत की उस कुशल विदेश नीति का हिस्सा है, जिसमें सर्वाधिक मजबूत दुश्मन देश चीन के साथ तनाव कम करने का प्रयास तो शामिल है ही, लगे हाथ अपने पुराने वफादार मित्र रूस संग पुराने संबंधों को बदली हुई परिस्थितियों में और मजबूती देने की भगीरथ कोशिश चल रही है। इसी के तरहत राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल सीमा विवाद को लेकर होने वाली बातचीत में हिस्सा लिए। इस दौरान द्विपक्षीय संबंधों से जुड़े कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। खासकर अक्टूबर 2024 में रूस के कजान में हुए ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की मुलाकात ने द्विपक्षीय संबंधों में आए तनाव को जो कम करने की शुरुआत की थी, उसके बाद से ही दोनों देशों के बीच संवाद बढ़ा है जबकि यह गलवान झड़प के बाद थम सा गया था। हालांकि सुधार के संकेतों के बावजूद यह नहीं कह सकते कि भरोसा पूरी तरह लौट आया है, क्योंकि हाल में अरुणाचल प्रदेश को लेकर पेइचिंग द्वारा अपनाया गया रुख इसका सच्चा सबूत है। यही वजह है कि चीन और रूस दोनों से पुनः बातचीत की जरूरत आन पड़ी है। वहीं ब्रिक्स की मेजबानी से पहले उपजे अरुणाचल गतिरोध के पीछे भी चीनी चाल को समझने की जरूरत है। यह ठीक है कि दोनों ही देशों का हित सीमा पर शांति और स्थिरता में निहित है। उसके मद्देनजर यह यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि सितंबर में भारत को ब्रिक्स सम्मेलन की मेजबानी करनी है। इसमें शी चिनफिंग के भी आने की चर्चा है, लेकिन उन्होंने कन्नी काटने के बहाने ढूंढ लिए हैं। उल्लेखनीय है कि पिछले साल अगस्त के आखिर में जब पीएम मोदी SCO समिट के लिए चीन के तियानजिन गए थे, तो वहां शी के साथ मुलाकात ने द्विपक्षीय संबंधों को गति देने में मदद की थी। तब दोनों ने दोहराया था कि भारत और चीन विकास के साझेदार है और आपसी मतभेद विवाद में नहीं बदलने चाहिए। यह बात आज भी उतना ही सच है। उधर, भारत पर बढ़ते अमेरिकी दबाव के बीच जयशंकर की मॉस्को यात्रा की अहमियत भी मौजूदा भू-राजनीति को देखते हुए अहम हो जाती है, क्योंकि गत सोमवार को उन्होंने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की। फिर वे अपने समकक्ष से मिले। इस दौरान बातचीत के अजेंडे में व्यापार और ऊर्जा से लेकर वैश्विक मुद्दे तक शामिल रहे है, क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय कसौटी पर ये खरे उतरे हुए द्विपक्षीय सम्बन्ध हैं। यद्यपि नई दिल्ली-मॉस्को संबंधों को लगातार अमेरिकी दबाव का सामना करना पड़ा है। खासकर यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में ईरान जिस तरह उलझा पड़ा है, आगे कूटनीतिक चुनौती और बड़ी हो सकती है। याद रहे कि जब बेहद मुश्किल हालात में भी तियानजिन से मोदी, पूतिन और चिनफिंग की तस्वीर आई तो उसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा था, खासकर अमेरिका-यूरोप का। उस समय ट्रंप प्रशासन ने टैरिफ वॉर छेड़ रखी थी। जबकि आज वैश्विक परिस्थितियां तब से ज्यादा जटिल है। दुनिया का थानेदार अमेरिका अब भी टैरिफ को हथियार बनाने की कोशिश कर रहा है और ऊर्जा. संकट बरकरार है। लिहाजा भारत को संतुलित नीति अपनाने की जरूरत है। मेरे विचार में विदेश मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की कूटनीतिक यात्रा का सबसे बड़ा संदेश यह है कि— पहला, रूस में जयशंकर: पुरानी दोस्ती को नए आर्थिक आधार देना पसंद किए हैं। जयशंकर की मॉस्को यात्रा सिर्फ रक्षा संबंधों की औपचारिक समीक्षा नहीं थी, बल्कि व्यापार, ऊर्जा, उर्वरक, परमाणु ऊर्जा, विज्ञान-तकनीक और अन्य क्षेत्रों में सहयोग को आगे बढ़ाना इसका महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। इसका अर्थ है कि भारत रूस को केवल हथियारों के पुराने आपूर्तिकर्ता के रूप में नहीं, बल्कि ऊर्जा, परमाणु, तकनीक और व्यापार का दीर्घकालीन साझेदार बनाना चाहता है। और यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि रूस पर पश्चिमी दबाव के बावजूद भारत अपने रणनीतिक स्वायत्तता के सिद्धांत को छोड़ना नहीं चाहता। दूसरा, चीन में डोभाल सीमा विवाद को 'सुरक्षा चैनल' में संभालना चाहते हैं। डोभाल का बीजिंग जाना बिल्कुल अलग प्रकृति की कूटनीति है। वे वांग यी के साथ सीमा प्रश्न पर विशेष प्रतिनिधि वार्ता कर रहे हैं। 2020 के गलवान संकट के बाद भारत-चीन संबंधों में सबसे बड़ी समस्या यही रही है कि सीमा पर शांति के बिना सामान्य संबंध कितने आगे बढ़ सकते हैं। भारत का संदेश पहले ही स्पष्ट किया गया है—सीमा पर शांति और स्थिरता अच्छे द्विपक्षीय संबंधों की बुनियादी शर्त है। इसलिए डोभाल की बातचीत का वास्तविक परीक्षण यह होगा कि क्या LAC पर स्थायी सैन्य स्थिरता, गश्त व्यवस्था और विश्वास बहाली की दिशा में कोई ठोस प्रगति होती है। तीसरा, दोनों यात्राओं को साथ रखकर देखें तो असली रणनीति दिखाई देती है। वह यह कि यहाँ भारत की कूटनीति का एक दिलचस्प ढांचा दिखाई देता है: मॉस्को — सामरिक/ऊर्जा/आर्थिक सुरक्षा। नई दिल्ली — बहुपक्षीय नेतृत्व और BRICS। बीजिंग — सीमा सुरक्षा और तनाव प्रबंधन। और इसके समानांतर अमेरिका, यूरोप, जापान तथा QUAD के साथ भारत के संबंध भी चलते रहेंगे। अर्थात भारत का विकल्प Russia या USA अथवा China या USA नहीं है। विकल्प है—जहाँ भारतीय हित जिस साझेदारी की मांग करें, वहाँ उस साझेदारी को आगे बढ़ाना। यही रणनीतिक स्वायत्तता का व्यावहारिक रूप है। भारत की बहु-संरेखीय कूटनीति पर विशेषज्ञ विश्लेषण भी इसी व्यापक प्रवृत्ति की ओर संकेत करता है। चौथा, सबसे महत्वपूर्ण कड़ी—शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा है। इस पूरे घटनाक्रम को सितंबर में प्रस्तावित BRICS शिखर सम्मेलन से अलग करके देखना कठिन है। Reuters के अनुसार शी जिनपिंग के सितंबर में नई दिल्ली आने की संभावना है, हालांकि यात्रा की आधिकारिक पुष्टि उस रिपोर्ट के समय तक नहीं हुई थी। इसलिए डोभाल-वांग बातचीत को केवल सीमा वार्ता मानना अधूरा होगा। भारत शायद पहले यह सुनिश्चित करना चाहता है कि LAC पर तनाव नियंत्रित हो → सैन्य जोखिम घटे → राजनीतिक संवाद बढ़े → मोदी-शी मुलाकात के लिए वातावरण बने → BRICS में भारत अपनी प्राथमिकताएँ आगे बढ़ाए। पांचवां, लेकिन भारत चीन पर 'नरम' नहीं हुआ है। यह अंतर समझना बहुत जरूरी है। संवाद ≠ समझौता। तनाव कम करना ≠ सीमा विवाद छोड़ना। व्यापार बढ़ाना ≠ रणनीतिक भरोसा लौटना। भारत चीन के साथ संवाद बढ़ा रहा है क्योंकि दोनों परमाणु शक्ति संपन्न पड़ोसी हैं और लंबी सीमा पर लगातार तनाव भारत के लिए आर्थिक और सैन्य दोनों दृष्टि से महंगा है। इसलिए डोभाल का बीजिंग जाना कमजोरी का संकेत नहीं बल्कि नियंत्रित प्रतिस्पर्धा (managed competition) की रणनीति के रूप में देखा जा सकता है। छठा, रूस और चीन—दोनों को एक साथ संभालने की चुनौती है। भारत के लिए असली कूटनीतिक परीक्षा यह है कि रूस और चीन की बढ़ती निकटता के बीच मॉस्को से अपने विशेष संबंध बचाए जाएँ और बीजिंग के साथ सीमा तनाव भी नियंत्रित किया जाए। यदि भारत रूस से बहुत दूर जाता है तो चीन-रूस धुरी मजबूत हो सकती है। यदि भारत चीन के साथ अत्यधिक तनाव रखता है तो दो मोर्चों पर रणनीतिक दबाव बढ़ सकता है। इसलिए जयशंकर और डोभाल की यात्राएँ एक व्यापक रणनीति का हिस्सा दिखाई देती हैं: रूस को दूर मत जाने दो। चीन को अनियंत्रित मत होने दो। अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर मत हो। और भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखो। सातवां, आने वाले महीनों में चार परिणाम सबसे महत्वपूर्ण होंगे। पहला—LAC: क्या चीन सीमा पर स्थायी सैन्य स्थिरता के लिए तैयार होता है? दूसरा—रूस: क्या भारत-रूस व्यापार और भुगतान व्यवस्था रक्षा से आगे बढ़कर ऊर्जा, तकनीक और निवेश तक पहुँचती है? तीसरा—BRICS: क्या भारत रूस-चीन प्रभाव के बीच BRICS को अपने आर्थिक और वैश्विक दक्षिण के एजेंडे के लिए इस्तेमाल कर पाता है? चौथा—अमेरिका: क्या Washington भारत की रूस-नीति और चीन से संवाद को स्वीकार करते हुए भारत को Indo-Pacific में अपना प्रमुख साझेदार बनाए रखता है? निष्कर्ष यह कि जयशंकर का मॉस्को और डोभाल का बीजिंग दौरा वास्तव में दो अलग-अलग यात्राएँ नहीं, बल्कि एक ही भारतीय रणनीति के दो पहलू हैं। जयशंकर रणनीतिक गहराई संभाल रहे हैं और डोभाल सीमा सुरक्षा। भारत का लक्ष्य शायद रूस और चीन में से किसी एक को चुनना नहीं, बल्कि दोनों के साथ संबंधों को इस तरह संतुलित करना है कि भारत की सामरिक स्वायत्तता, आर्थिक सुरक्षा और सीमा-सुरक्षा—तीनों एक साथ मजबूत हों। और सितंबर का BRICS सम्मेलन इस कूटनीतिक कवायद की अगली बड़ी परीक्षा बन सकता है। इसलिए कूटनीतिक संतुलनअपरिहार्य है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 25 Aug 2026 6:40 pm

वन्देमातरम् को लेकर संग्राम क्यों? क्या कांग्रेस जिन्ना के मार्ग पर जा रही है?

वन्देमातरम आज विवाद का विषय बना दिया है। जबकि यह सत्य है कि जब बंकिम बाबू ने इसकी रचना की थी, तब उनके मन में किसी के मन को आहत करने का कोई विचार नहीं था। उनका भाव केवल मातृभूमि के वंदन का था। देश में वन्देमातरम के अंतिम दो भाग का पहली बार विरोध विभाजन की मानसिकता रखने वाले मोहम्मद अली जिन्ना ने किया। आज उसी मार्ग पर कांग्रेस कदम बढ़ाती दिख रही है। यह बात सही है कि देश का सम्मान करने वाली किसी भी बात पर राजनीति नहीं होना चाहिए, लेकिन केवल वोट की चाहत के चलते ऐसा करना और भी खतरनाक हो जाता है। वन्दे मातरम् भारत की स्वतंत्रता चेतना, मातृभूमि के प्रति समर्पण और राष्ट्रीय स्वाभिमान का ऐसा उद्घोष है, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में असंख्य भारतीयों के भीतर देशभक्ति की ज्वाला प्रज्वलित की। यही कारण है कि आज जब वन्दे मातरम् के पूर्ण या आंशिक गायन को लेकर राजनीतिक बहस खड़ी होती है, तो प्रश्न केवल गीत की पंक्तियों का नहीं रह जाता, बल्कि राष्ट्रीय चेतना और राजनीतिक दृष्टिकोण का भी बन जाता है। इसे भी पढ़ें: क्यों ठुकराई PM की कुर्सी? प्रियंका पर राहुल को तरजीह, बच्चन परिवार से क्यों बिगड़े रिश्ते, 10 नवंबर को सोनिया गांधी बड़ा खुलासा करने वाली हैं! आज सवाल यह है कि वन्दे मातरम् पर संग्राम क्यों? कांग्रेस की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि 1937 में इसके दो पदों के गायन को लेकर निर्णय हुआ था, इसलिए उसी परंपरा का पालन होना चाहिए। लेकिन 1937 की परिस्थितियों को 2026 के भारत पर उसी रूप में लागू करना कितना उचित है, इस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। 1937 में भारत स्वतंत्र नहीं था। अंग्रेजी शासन था, साम्प्रदायिक तनाव थे और देश की राजनीतिक परिस्थितियां अत्यंत जटिल थीं। कांग्रेस उस समय आज की तरह सत्ता प्राप्त करने वाला चुनावी राजनीतिक दल नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख राजनीतिक मंच थी। जिसमें सभी देश भक्त शामिल थे। आज की कांग्रेस उससे अलग है। वन्दे मातरम् को लेकर कांग्रेस के भीतर भी यह चर्चा हुई कि इसके कुछ अंशों को लेकर मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग की आपत्तियों को कैसे देखा जाए। ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि कांग्रेस कार्यसमिति ने 1937 में इस विषय पर विचार किया था और सार्वजनिक अवसरों पर पहले दो पदों के प्रयोग की व्यवस्था बनी। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या उस समय की राजनीतिक परिस्थिति आज के स्वतंत्र भारत के लिए भी अंतिम मानक होनी चाहिए? भारत आज एक संप्रभु गणराज्य है। संविधान सभा ने 24 जनवरी 1950 को वन्दे मातरम् के ऐतिहासिक महत्व को स्वीकार करते हुए इसे राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान सम्मान देने की व्यवस्था की थी। वन्दे मातरम् को राष्ट्रीय गीत का दर्जा प्राप्त है। इसलिए इसे केवल कांग्रेस, भाजपा या किसी अन्य राजनीतिक दल के चश्मे से देखना उचित नहीं है। यहां यह सवाल भी उठता है कि जब यह राष्ट्र गीत है, तब इसे लेकर अराष्ट्रीय कार्य करने की राजनीति क्यों की जा रही है। यह आत्म मंथन का विषय हो सकता है। यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट करना भी आवश्यक है। वन्दे मातरम् संविधान के मूल पाठ में लिखकर नागरिकों के लिए अनिवार्य गायन के रूप में शामिल नहीं था। लेकिन चूँकि वन्देमातरम गाने को लेकर क़ानून बन गया है, तब सभी को इसका पालन करना ही चाहिए, कांग्रेस को भी। आज अगर कांग्रेस इसका विरोध करती है, तो इसे संविधान का अपमान ही कहा जाना उचित होगा। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय गीत को लेकर नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं और इसके पूर्ण छह अंतरे वाले संस्करण को सार्वजनिक प्रसारण में बढ़ावा दिया गया है। जुलाई 2026 में राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण कानून में संशोधन का प्रस्ताव भी लाया गया, जिसमें राष्ट्रीय गीत को जानबूझकर रोकने या उसके गायन में व्यवधान डालने के विरुद्ध कानूनी संरक्षण देने की बात है। इसलिए बहस को तथ्यों के आधार पर ही आगे बढ़ाना चाहिए। वन्दे मातरम् की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी पहचान किसी एक राजनीतिक दल से नहीं जुड़ी। कांग्रेस के अधिवेशनों में इसका गायन हुआ। 1896 में कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे गाया था। स्वतंत्रता आंदोलन में यह अंग्रेजी शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बना। ऐसे में यह कहना कि वन्दे मातरम् भाजपा की देन है, इतिहास के साथ अन्याय होगा। भाजपा तो स्वतंत्रता के बाद बनी; वन्दे मातरम् उससे बहुत पहले भारतीय राष्ट्रचेतना का हिस्सा बन चुका था। फिर वही प्रश्न उठता है कि आज इसके दो पदों या पूरे गीत को लेकर इतना राजनीतिक संघर्ष क्यों? क्या इसके पीछे वोट बैंक की राजनीति है? इस प्रश्न का उत्तर किसी एक दल के बारे में निश्चित रूप से देना उचित नहीं होगा, क्योंकि राजनीतिक मंशा का प्रमाण तथ्यों से ही स्थापित किया जा सकता है। लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि जब राष्ट्रीय प्रतीकों को बार-बार चुनावी गणित से जोड़ दिया जाता है, तब राष्ट्रहित पीछे और राजनीतिक हित आगे दिखाई देने लगता है। वन्दे मातरम् का सम्मान करना किसी धर्म विशेष का समर्थन करना नहीं है। यह मातृभूमि के प्रति सम्मान और स्वतंत्रता संघर्ष की स्मृति से जुड़ा राष्ट्रीय भाव है। भारत की शक्ति ही उसकी विविधता है। यहां पूजा-पद्धतियां अलग हो सकती हैं, भाषाएं अलग हो सकती हैं, पर मातृभूमि के प्रति सम्मान का भाव साझा हो सकता है। इसलिए वन्दे मातरम् को हिन्दू बनाम मुस्लिम विवाद में बदल देना उसके ऐतिहासिक और राष्ट्रीय स्वरूप को छोटा करना है। कांग्रेस के लिए भी यह आत्ममंथन का समय है। यदि 1937 के निर्णय को आज भी राजनीतिक ढाल बनाया जाएगा, तो यह प्रश्न उठेगा कि क्या स्वतंत्र भारत की परिस्थितियों में भी वही दृष्टिकोण अपरिवर्तित रहना चाहिए? और यदि कांग्रेस स्वयं वन्दे मातरम् के इतिहास की भागीदार रही है, तो उसे इस गीत को लेकर अस्पष्टता के बजाय स्पष्ट राष्ट्रीय दृष्टिकोण सामने रखना चाहिए। इसी प्रकार सत्ता पक्ष को भी यह ध्यान रखना होगा कि राष्ट्रभक्ति किसी पर थोपी जाने वाली भावना नहीं है। राष्ट्रगीत का सम्मान बढ़े, उसके इतिहास को नई पीढ़ी जाने और उसके प्रति स्वाभाविक श्रद्धा विकसित हो, यह अधिक स्थायी रास्ता है। कानून और राजनीतिक आह्वान अपनी जगह हैं, लेकिन राष्ट्रभाव अंततः मन से पैदा होता है। वन्दे मातरम् को राजनीति के अखाड़े से निकालकर राष्ट्रचेतना के केंद्र में स्थापित करने की आवश्यकता है। इसे कांग्रेस बनाम भाजपा का विषय बनाना भी गलत है और हिन्दू बनाम मुस्लिम का विषय बनाना भी। यह भारत की स्वतंत्रता यात्रा का अमूल्य अध्याय है। कांग्रेस को अपने राजनीतिक उत्थान से आगे बढ़कर देश के उत्थान के बारे में सोचना चाहिए। वन्दे मातरम् किसी दल की संपत्ति नहीं, भारत की राष्ट्रीय विरासत है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम पूछें जब इसके शब्दों में मातृभूमि के प्रति वंदन है, इसके इतिहास में स्वतंत्रता का संघर्ष है और इसकी स्मृति में असंख्य देशभक्तों का त्याग है, तब इसे विवाद का नहीं, संवाद का विषय बनाया जाना चाहिए। राजनीति अपनी जगह रहे, लेकिन राष्ट्र सबसे ऊपर रहे। वन्दे मातरम् केवल गाया न जाए, उसकी भावना को जीवन में उतारा जाए। यही भारत के प्रति सच्ची वंदना होगी। - सुरेश हिंदुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार 103 अग्रवाल अपार्टमेंट कैलाश टॉकीज के पास, नई सड़क लश्कर ग्वालियर मध्यप्रदेश

प्रभासाक्षी 25 Aug 2026 6:32 pm

खबरों की दुनिया में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की चुनौती, यहां आंखों देखा और कानों सुना भी झूठ हो सकता है!

मीडिया की दुनिया के लिए यह सबसे कठिन समय है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) ने सब कुछ हिलाकर रख दिया है। अगले पांच वर्षों में न्यूज रुम का चेहरा बदलने के संकल्प के साथ इस नए ज्ञान क्षेत्र ने जितने कम समय में अपनी उपयोगिता बनाई है, वह चकित करने वाली है। जिस दौर में समूचा मीडिया विश्वसनीयता और प्रामणिकता के संकट से जूझ रहा है, ऐसे समय में एआई के लिए मीडिया समूहों का उत्साह और उसकी स्वीकार्यता वास्तव में आश्चर्य में डालने वाली है। सही मायनों में यह वह समय है जब आंखों देखी तथा कानों सुनी बातें भी छलावा और धोखा साबित हो रही हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीपफेक तकनीक ने सूचनाओं का ऐसा धुंधला समंदर रच दिया है, जहाँ कुछ क्षणों में फर्जी खबरें सच का लिबास पहनकर तैरने लगती हैं। ऐसे में सवाल केवल यह नहीं है कि खबर कितनी तेजी से आप तक पहुँच रही है, बल्कि असली चुनौती यह है कि उस पर भरोसा कितना किया जाए। मशीनी एल्गोरिदम शब्दों को सजा सकता है, आंकड़े जोड़ सकता है, लेकिन सच को तलाशने की नैतिक हिम्मत और मानवीय संवेदना केवल एक निष्पक्ष पत्रकार के पास ही होती है। डीपफेक से मुकाबला- युद्ध और राजनीतिक भाषणों के फर्जी वीडियो और आडियो वायरल हो जाना अब नई बात नहीं रही। पिछले चुनाव में भी कई दिवंगत नेताओं के वीडियो चले जिसमें वे अपनी पार्टी के वोट की अपीलें कर रहे हैं। जनमत को प्रभावित करने के लिए ऐसे प्रयास चरम पर हैं, जिनकी विश्वसनीयता शून्य है। 'वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम' की एक रिर्पोट में एआई जनित गलत सूचनाओं को दुनिया के बड़े खतरों में बताया गया है। आज दुनिया और देश के अनेक बड़े मीडिया हाउस आधिकारिक तौर पर एआई का उपयोग डेटा विश्लेषण और अनुवाद के लिए कर रहे हैं। इसमें दो राय नहीं कि कई हजार पेज के डेटा का आंकलन -विश्लेषण सामान्य मनुष्य के लिए कई महीनों का काम है जिसे एआई के टूल्स मिनटों में संभव कर रहे हैं। बावजूद इसके अनेक मीडिया आउटलेट्स एआई से खबरें या विश्लेषण लिखवाकर हंसी के पात्र बन रहे हैं। ऐसे में संशोधन, सुधार और मानवीय हस्तक्षेप से मुक्त सामग्री से कचरा तो बढ़ ही रहा है, विश्वनीयता के नए संकट सामने हैं। बड़े भाषा माडल (एलएलएम) कभी पूरी तरह से काल्पनिक आंकड़े, अदालत के फैसला और ऐतिहासिक घटनाएं गढ़ते हुए दिखते हैं। जिसे सामान्य पाठक सच समझ बैठता है। तकनीकी विशेषज्ञ इसे हैलुसिनेशन कह रहे हैं। जिसका सीधा आशय यह है कि जिन चीजों के सटीक जवाब एआई के पास नहीं होते वह उनके मनगढंत उत्तर प्रस्तुत कर देता है। सजग संपादक और संपादकीय दृष्टि के अभाव में यह सामग्री कई तरह से संकट पैदा कर सकती है। इसे भी पढ़ें: नितिन नवीन की नई टीमः नई ऊर्जा और नया संतुलन खबरों में सच की तलाश- सच और झूठ का फासला बहुत कम हो गया है। खबरों का सत्यापन पत्रकारिता की पहली शर्त है। लेकिन होड़ और दौड़ में वह धूमिल हो रही है। सामान्य से लगते कामों में एआई का उपयोग तो किया जा रहा है किया भी जाना चाहिए। किंतु किसी खोजी रिपोर्ट के लिए जमीनी स्तर पर जाकर काम करना, कागजात की जांच करना पत्रकारों की ही जिम्मेदारी है। तकनीक पर अति निर्भरता के समय में हमें उसके गंभीर खतरों का भी भान होना चाहिए। मैदानी पत्रकारिता में मिट्टी की जो खुशबू है वह मैदान में उतरे बिना प्रामणिक और भरोसेमंद नहीं हो सकती। मानवीय संस्पर्श और संवेदना किसी खबर का वितान बड़ा कर सकती है। जाहिर तौर पर पत्रकारिता की निर्भरता पूरी तरह एआई टूल्स पर संभव नहीं है। पत्रकारिता जहां निष्पक्षता, समाज के हित-सद्भाव, दलगत राजनीति से ऊपर उठकर चिंतन को प्राथमिकता देती है, वहीं एल्गोरिदम का पूर्वाग्रह संभव है। अतः इसे समझने की जरुरत है। एआई माडल उसी डेटा से सीखते हैं जो उपलब्ध है। ऐसे में उपलब्ध डेटा अगर किसी प्रकार के पूर्वाग्रह से ग्रस्त है तो एआई भी उसी प्रकार के परिणाम देगा। कई शोध बताते हैं कि पश्चिमी मानकों पर ट्रेंड एआई माडल अक्सर विकासशील देशों के सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों पर गलत संदर्भ प्रस्तुत करते हैं। आसानी से अर्जित नहीं होता भरोसा- भरोसा या विश्वास वह शब्द है जिसे प्राप्त करना आसान नहीं है। आप भले एआई का उपयोग करें किंतु जैसे ही आप यह लिखते हैं कि –“खबर एआई द्वारा बनी है और इसे मानव संपादक के द्वारा देख लिया गया है।” पाठक का भरोसा एआई जनित खबर पर तुरंत कम हो जाता है। पाठक वास्तविक पत्रकारों और लेखकों द्वारा लिखी गई सामग्री को ज्यादा भरोसेमंद मानते हैं। कोई भी अखबार या मीडिया हाउस सालों-साल में यह प्रतिष्ठा अर्जित करता है। उसे एआई के नए माध्यम तुरंत समाप्त कर सकते हैं। दूसरी ओर कापीराइट और बौद्धिक संपदा से जुड़े संकट भी सामने खड़े हैं। कई प्रमुख मीडिया संगठन इस बात पर आपत्ति कर रहे हैं तो कई ने बिना अनुमति और बिना भुगतान उनकी सामग्री के उपयोग के लिए एआई कंपनियों पर मुकदमे भी किए थे। ऐसे में तमाम ऐसे विवाद अभी भी एआई के साथ जुड़े हुए हैं। बताया जाता है कि इंटरनेट पर हजारों की संख्या में ऐसी वेबसाइट्स तैर रही हैं जो केवल विज्ञापन से पैसे कमाने के लिए झूठ का व्यापार कर रही हैं। वे हर पल एआई से झूठी खबरें गढ़ते हुए पोस्ट करती रहती हैं। मीडिया वाचडाग न्यूज गार्ड ने ऐसे तमाम अविश्वसनीय वेबसाइटों की पहचान की है। ऐसे में सच और झूठ के बीच मीडिया के सत्यान्वेषण का धर्म सहम कर रह जाता है। हम सब मानते हैं संपादकीय विवेक का कभी कोई विकल्प नहीं हो सकता। इस दौर में भी यह एक सच्चाई है। नैतिक विवेक और समाज की गहरी समझ के बिना किया गया कोई भी संवाद या संचार संकट ही खड़ा करेगा। मुख्यधारा के मीडिया की ओर लौटना होगा- सारी तकनीकी क्रांति के बाद भी मुख्यधारा के मीडिया का वजूद बचा रहेगा क्योंकि एआई जनित भ्रमों, फर्जी खबरों की बाढ़ के बीच हमें सत्यापित जानकारी की ओर लौटना ही है। ऐसे में ‘प्रिंट इज डेड’ जैसी अवधारणाओं के बीच भी मुख्यधारा का मीडिया अपनी विशेषताओं के कारण, संपादकीय गुणवत्ता के कारण बना और बचा रहेगा। सत्य आसानी से नहीं मिलता, इसे समाज भी स्वीकारेगा। इसके साथ ही प्रामणिक और भरोसेमंद मंचों की ओर लौटना ही होगा। क्योंकि यहां प्रामणिक मंच केवल खबरों का व्यापार नहीं कर रहे होगें बल्कि वे अपनी खबरों के सच होने के गारंटी भी देगें। जाहिर है पारंपरिक मीडिया के लिए वह दिन बहुत खास होगा। डीपफेक और एल्गोरिदम के समय में अब चुनौती ही असली और सही खबर पाना है। क्या वो आपके पास है? - प्रो.संजय द्विवेदी (लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)

प्रभासाक्षी 25 Aug 2026 5:38 pm

नेहरू ने जिसे बोला था भाई वो निभाता रहा दुश्मनी, मगर अब 'दोस्त' बन कर दिल्ली आ रहा है!

नेहरू ने जिस चीन को कभी ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के नारे के साथ गले लगाया था, उसने भारत के साथ दोस्ती से ज्यादा दुश्मनी निभाई। 1962 की धोखाधड़ी से लेकर गलवान की खूनी झड़प तक, सीमा पर तनाव, घुसपैठ और सामरिक दबाव, बीजिंग का ट्रैक रिकॉर्ड भारत के सामने साफ है। लेकिन अब वही चीन दोस्ती, स्थिरता और सहयोग की भाषा बोलते हुए दिल्ली आने की तैयारी कर रहा है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के अगले महीने नई दिल्ली में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन में शामिल होने की संभावना है। यहां सवाल यह है कि क्या चीन वास्तव में रिश्ते सुधारना चाहता है, या बदलती वैश्विक परिस्थितियों में भारत के साथ सामरिक समीकरण को अपने हित में ढालना चाहता है? माना जा रहा है कि शी जिनपिंग 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए भारत आ सकते हैं। यह यात्रा कई मायनों में असाधारण होगी। यदि यह योजना अंतिम रूप लेती है तो शी जिनपिंग करीब सात साल बाद भारत आएंगे। इस यात्रा की सबसे दिलचस्प बात उनके साथ आने वाला विशाल चीनी प्रतिनिधिमंडल है। बताया जा रहा है कि शी जिनपिंग के साथ करीब 400 अधिकारी भारत आ सकते हैं। यह संख्या उनकी 2019 की भारत यात्रा के दौरान आए चीनी अधिकारियों की तुलना में दोगुनी से भी ज्यादा है। उस समय प्रतिनिधिमंडल में 200 से कम अधिकारी शामिल थे। इसे भी पढ़ें: BRICS Summit 2026: हंसो, बना रखी है क्यूं ये सूरत रोनी? एक जगह अगर जमा होंगे तीनों- मोदी-जिनपिंग और पुतिन भारतीय सूत्रों के अनुसार, चीनी अधिकारी होटल, सुरक्षा व्यवस्था और यात्रा से जुड़े प्रोटोकॉल को अंतिम रूप देने में जुटे हुए हैं। हालांकि शी जिनपिंग की यात्रा योजना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ संभावित द्विपक्षीय बैठक का एजेंडा अभी अंतिम रूप नहीं ले पाया है। चीनी विदेश मंत्रालय ने भी फिलहाल यात्रा की औपचारिक पुष्टि नहीं की है, लेकिन इतना जरूर कहा है कि चीन BRICS सहयोग को बहुत महत्व देता है और भारत की अध्यक्षता में होने वाले इस वर्ष के BRICS शिखर सम्मेलन की सफलता का समर्थन करता है। यानी संदेश साफ है कि बीजिंग अभी अंतिम घोषणा से बच रहा है, लेकिन दिल्ली की दिशा में उसकी कूटनीतिक गतिविधियां तेज हैं। देखा जाये तो भारत और चीन के बीच संबंध किसी सामान्य कूटनीतिक उतार-चढ़ाव का परिणाम नहीं हैं। दोनों देशों के बीच अविश्वास की जड़ें गहरी हैं और इसका सबसे बड़ा कारण है चीन का सीमा पर लगातार आक्रामक रवैया। 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प ने दोनों देशों के रिश्तों को लगभग सबसे निचले स्तर पर पहुंचा दिया था। इस संघर्ष में 20 भारतीय जवान शहीद हुए, जबकि चीन को भी बड़ा सैन्य नुकसान हुआ। इसके बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC पर दोनों देशों के बीच लंबे समय तक भारी सैन्य तनाव बना रहा। हजारों सैनिक, भारी हथियार, तोपखाना और सैन्य ढांचा सीमा के संवेदनशील इलाकों में तैनात रहा। आखिरकार अक्टूबर 2024 में दोनों देशों के बीच डिसइंगेजमेंट समझौते के बाद तनाव कम करने की दिशा में प्रगति हुई। लेकिन सीमा विवाद खत्म नहीं हुआ है। सैन्य गतिरोध के कुछ मोर्चे शांत जरूर हुए हैं, मगर मूल विवाद अब भी जस का तस है। यही कारण है कि चीन की मौजूदा ‘दोस्ती’ को केवल उसके शब्दों से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार से परखा जाएगा। उधर, शी जिनपिंग की संभावित यात्रा से पहले भारत और चीन के बीच उच्चस्तरीय कूटनीतिक संपर्क तेज हो गए हैं। भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और भारत-चीन सीमा प्रश्न पर विशेष प्रतिनिधि अजित डोभाल बीजिंग में हैं। 25 अगस्त को डोभाल ने चीन के उपराष्ट्रपति हान झेंग से मुलाकात की। दोनों पक्षों ने सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखने के साथ-साथ आर्थिक, राजनीतिक और बहुपक्षीय मंचों पर द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के उपायों पर चर्चा की। डोभाल ने चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ भारत-चीन सीमा प्रश्न पर विशेष प्रतिनिधियों की वार्ता के 25वें दौर में भी हिस्सा लिया। इन वार्ताओं में केवल सीमा विवाद ही नहीं, बल्कि द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी चर्चा हुई। यहां भारत की रणनीति को समझना बेहद जरूरी है। दिल्ली ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि भारत-चीन संबंधों को केवल व्यापार, BRICS या बहुपक्षीय सहयोग के सहारे सामान्य नहीं बनाया जा सकता। सीमा पर शांति और स्थिरता ही व्यापक रिश्तों की बुनियाद होगी। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत अब 1962 से पहले वाली उस कूटनीतिक भूल को दोहराने के मूड में नहीं दिखता, जिसमें राजनीतिक दोस्ती के नारों के बीच सामरिक खतरे को नजरअंदाज कर दिया गया था। वहीं शी जिनपिंग के साथ संभावित रूप से 400 अधिकारियों का आना महज प्रोटोकॉल की बात नहीं है। इतना बड़ा प्रतिनिधिमंडल इस बात का संकेत है कि चीन इस यात्रा को केवल एक औपचारिक BRICS सम्मेलन के रूप में नहीं देख रहा। इसमें कई स्तरों पर बातचीत की संभावनाएं हो सकती हैं। मसलन अर्थव्यवस्था, व्यापार, निवेश, प्रौद्योगिकी, सीमा प्रबंधन, बहुपक्षीय सहयोग और वैश्विक रणनीतिक मुद्दों पर चर्चा हो सकती है। चीन संभवतः यह भी देखना चाहता है कि भारत के साथ संबंधों में कितनी तेजी से सामान्यीकरण संभव है और किन क्षेत्रों में दोनों देश प्रतिस्पर्धा के बावजूद सहयोग कर सकते हैं। लेकिन यही भारत के लिए सबसे बड़ी सावधानी का विषय भी है। चीन के साथ संबंधों की सबसे बड़ी चुनौती यह रही है कि बीजिंग अक्सर आर्थिक और राजनीतिक संबंधों को आगे बढ़ाने की कोशिश करता है, जबकि सीमा विवाद को अलग खांचे में रखने की बात करता है। भारत अब इस दृष्टिकोण को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं दिखता। गलवान के बाद नई दिल्ली की सोच साफ है कि जब सीमा पर बंदूकें तनी हों, तब बाकी रिश्तों में सामान्यता का दिखावा लंबे समय तक नहीं चल सकता। साथ ही शी जिनपिंग की संभावित दिल्ली यात्रा को केवल भारत-चीन द्विपक्षीय रिश्तों के चश्मे से देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे वैश्विक शक्ति संतुलन की बड़ी राजनीति भी है। देखा जाये तो BRICS आज केवल एक आर्थिक मंच नहीं रह गया है। यह उस उभरती विश्व व्यवस्था का प्रतीक बन रहा है जिसमें अमेरिका और पश्चिमी देशों के प्रभुत्व को चुनौती देने वाली शक्तियां अपनी भूमिका मजबूत करना चाहती हैं। चीन के लिए भारत की अहमियत कई कारणों से बढ़ी है। भारत ग्लोबल साउथ की एक प्रमुख आवाज है, दुनिया की सबसे तेजी से उभरती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और हिंद-प्रशांत से लेकर पश्चिम एशिया, रूस और अमेरिका तक जटिल कूटनीतिक संतुलन बनाए हुए है। यही चीन की रणनीतिक दुविधा भी है। एक तरफ वह भारत को एशिया में अपना प्रमुख प्रतिद्वंद्वी मानता है, दूसरी तरफ अमेरिका के साथ बढ़ती प्रतिस्पर्धा और वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में वह भारत को पूरी तरह अपने खिलाफ धकेलने का जोखिम भी नहीं लेना चाहता। यानी बीजिंग की गणना शायद यह है कि भारत से टकराव की लागत कम की जाए, लेकिन एशिया में अपनी रणनीतिक बढ़त भी छोड़ी न जाए। वहीं भारत के सामने चुनौती दोहरी है। एक तरफ चीन के साथ स्थायी तनाव बनाए रखना आर्थिक, सैन्य और कूटनीतिक रूप से महंगा पड़ सकता है। दूसरी तरफ बिना ठोस सुरक्षा गारंटी के संबंधों को तेजी से सामान्य करना रणनीतिक जोखिम पैदा कर सकता है। इसलिए भारत को चीन के साथ संबंधों में तीन स्तरों पर आगे बढ़ना होगा। एक तो सीमा पर वास्तविक और सत्यापित स्थिरता बने। केवल बैठकों और बयानों से काम नहीं चलेगा। LAC पर सैन्य गतिविधियों, सैनिकों की तैनाती और बुनियादी ढांचे के सवाल पर ठोस प्रगति जरूरी होगी। दूसरा, आर्थिक संबंधों में रणनीतिक सावधानी बरतनी होगी। भारत और चीन के बीच व्यापारिक संबंधों की अपनी अहमियत है, लेकिन महत्वपूर्ण तकनीकी क्षेत्रों, महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे और संवेदनशील आपूर्ति श्रृंखलाओं में राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी। इसके अलावा, बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग बढ़ाना होगा लेकिन सामरिक स्वायत्तता के साथ। BRICS हो, SCO हो या अन्य वैश्विक मंच, भारत चीन के साथ वहां काम कर सकता है जहां उसके हित मिलते हों, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति या हिंद-प्रशांत में अपनी रणनीतिक स्थिति से समझौता करेगा। उधर, नई दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय बैठक होती है तो यह संबंधों को नई दिशा देने का महत्वपूर्ण अवसर हो सकता है। अक्टूबर 2024 के डिसइंगेजमेंट समझौते के बाद दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय संपर्कों में धीरे-धीरे बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में दिल्ली में होने वाली संभावित बैठक यह तय कर सकती है कि दोनों देश सिर्फ तनाव प्रबंधन तक सीमित रहेंगे या संबंधों को चरणबद्ध तरीके से सामान्य करने की दिशा में आगे बढ़ेंगे। लेकिन भारत के लिए यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि कोई भी कूटनीतिक गर्मजोशी गलवान की स्मृति और सीमा विवाद की वास्तविकता पर पर्दा न डाल दे। क्योंकि भारत और चीन के रिश्तों में असली परीक्षा फोटो-ऑप, हाथ मिलाने और साझा बयान नहीं हैं। असली परीक्षा हिमालय की उन चोटियों पर होगी जहां दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने खड़ी हैं। बहरहाल, शी जिनपिंग का संभावित भारत दौरा निश्चित रूप से एक बड़ा कूटनीतिक घटनाक्रम है। सात साल बाद चीन के राष्ट्रपति का भारत आना, 400 अधिकारियों के बड़े प्रतिनिधिमंडल की तैयारी और अजित डोभाल की बीजिंग में सक्रिय कूटनीति, ये सभी संकेत देते हैं कि दोनों देश संबंधों के नए समीकरण तलाश रहे हैं। लेकिन भारत के लिए यह केवल रिश्ते सुधारने का अवसर नहीं, बल्कि अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करने की परीक्षा भी है। नेहरू के दौर में चीन को ‘भाई’ मानने की राजनीति का अंत 1962 की कड़वी हकीकत के साथ हुआ था। गलवान ने यह याद दिलाया कि इतिहास के सबक भुलाए नहीं जा सकते। अब अगर वही चीन दोस्ती का हाथ लेकर दिल्ली आता है तो भारत को हाथ मिलाने से परहेज नहीं करना चाहिए, लेकिन हाथ मिलाते समय अपनी सीमा, अपनी सुरक्षा और अपनी सामरिक शक्ति पर पकड़ ढीली नहीं पड़नी चाहिए। दिल्ली की नई चीन नीति शायद इसी एक वाक्य में समेटी जा सकती है कि बातचीत होगी, व्यापार भी होगा, सहयोग भी होगा; लेकिन भरोसा अब शब्दों पर नहीं, जमीन पर चीन के व्यवहार से तय होगा। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 25 Aug 2026 5:20 pm

संसद कमेटी की बैठक में बवाल, पैलेट गन पर चर्चा की जिद पर अड़ा विपक्ष

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समाचार नामा 25 Aug 2026 4:48 pm

भारतीयों की सेहत से खिलवाड़? विदेश में प्रीमियम और भारत में मिलावटी... समझें ब्रांड्स का 'डबल स्टैंडर्ड'

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समाचार नामा 25 Aug 2026 4:33 pm

बांके बिहारी मंदिर विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने दान और चढ़ावे की सुरक्षा पर जताई सख्ती, जानिए क्या कहा

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समाचार नामा 25 Aug 2026 4:28 pm

पश्चिम बंगाल एसआईआर मामला: 37 लाख अपीलों पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता

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समाचार नामा 25 Aug 2026 4:23 pm

गडकरी ने 'अब इतना काम नहीं कर पाउँगा' वाले बयान पर दी सफाई, रिटायरमेंट की अटकलों को नकारा

नितिन गडकरी के रिटायरमेंट की अटकलें तब लगीं जब एक वीडियो में वह नई पीढ़ी को मौके देने की बात करते सुने गए। गडकरी ने कहा था, 'अब मैं उतना काम नहीं कर सकता... मैं लोगों से अपील करता हूँ कि वे युवाओं को ज़्यादा काम दें।'

सत्य हिंदी 25 Aug 2026 2:06 pm

BRICS Summit 2026: हंसो, बना रखी है क्यूं ये सूरत रोनी? एक जगह अगर जमा होंगे तीनों- मोदी-जिनपिंग और पुतिन

हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनूर मालूम है, जिस तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा। भारत की तरफ से अमेरिका को पैगाम साफ साफ दिया जा रहा है। सवाल है कि अमेरिका बार बार अमेरिका के हुनर का इम्तिहान क्यों ले रहा है? इम्तिहान कुछ ऐसा कि जो जवाब मिलेगा वो पचा नहीं पाएंगे।डोनाल्ड ट्रंप अब भारत पर टैरिफ लगा रहे हैं। रूस से तेल क्यों लेते हो ये कहकर आंखें दिखा रहे हैं। नैतिकता का पाठ पढ़ा रहे हैं। एक बार चाणक्य ने विदेशी संबंधों को लेकर कहा था कि किसी भी देश को ऐसी मित्रता या गठबंधन तुरंत समाप्त कर देना चाहिए। जिससे भविष्य में उसे नुकसान हो। अमेरिका से भारत की मित्रता या गठबंधन खत्म तो नहीं हो सकता। लेकिन अमेरिका को भारत ने कुछ चीजें स्पष्ट कर दी है। सबसे पहले तो हमारे लिए हमारा राष्ट्रहित सर्वोपरि है और भारत किसी भी दबाव के आगे झुकने वाला देश नहीं है। अगले महीने नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन समेत दुनिया के कई बड़े नेता शामिल हो सकते हैं। भारत 5 साल बाद इस सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है। यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) और यूरोप में युद्ध के कारण दुनिया भर में तनाव का माहौल है। ब्रिक्स संगठन अब एशिया, अफ्रीका, मिडिल ईस्ट और लैटिन अमेरिका तक फैल चुका है, और इस सम्मेलन में समूह के कई देशों के शीर्ष नेताओं के जुटने की उम्मीद है। सम्मेलन में शामिल होने वाले संभावित प्रमुख नेता: राष्ट्रपति दक्षिण अफ्रीका: सिरिल रामफोसा मिस्र: अब्देल फतह अल-सीसी बेलारूस: अलेक्सांद्र लुकाशेंको कजाकिस्तान: कासिम-जोमार्ट तोकायेव इंडोनेशिया: प्रबोवो सुबियांतो क्यूबा: मिगुएल डियाज-कैनेल नाइजीरिया: बोला टीनूबू उज्बेकिस्तान: शौकत मिर्जियोयेव प्रधानमंत्री मलेशिया: अनवर इब्राहिम थाईलैंड: अनुतिन चार्नविराकुल इथियोपिया: अबी अहमद अन्य देशों के प्रतिनिधि ब्राजील: घरेलू व्यस्तताओं के कारण राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला डा सिल्वा के शामिल होने की उम्मीद नहीं है; उनकी जगह विदेश मंत्री मौरो विएरा देश का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। युगांडा: उपराष्ट्रपति जेसिका अलुपो शामिल हो सकती हैं। वियतनाम: प्रधानमंत्री ले मिन्ह हुंग प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। संयुक्त अरब अमीरात (UAE): राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की जगह अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के आने की संभावना है। इसे भी पढ़ें: Russia के सबसे अजीब इलाके को बचाएगा भारत, पुतिन-जयशंकर की मुलाकात पर बड़ा खुलासा! इस बार का एजेंडा क्या है? कागज़ पर तो एजेंडा व्यापार, विकास के लिए फ़ंडिंग और ग्लोबल संस्थाओं में सुधार पर केंद्रित है, लेकिन बंद दरवाज़ों के पीछे होने वाली बैठकों में मिडिल ईस्ट के टकराव और ईरान व UAE के बीच मतभेदों का मुद्दा हावी रहने की संभावना है। उम्मीद है कि ईरान समिट के घोषणा-पत्र में हालिया टकराव, हमलों और प्रतिबंधों पर अपना पक्ष रखने के लिए ज़ोर देगा, जिससे बातचीत काफ़ी मुश्किल हो सकती है। ब्रिक्स आम सहमति के आधार पर काम करता है, जिसका मतलब है कि कोई एक प्रतिनिधिमंडल भी किसी विवादित पैराग्राफ़ पर सहमति को रोक सकता है। पश्चिम एशिया से जुड़े शब्दों को लेकर ही दबाव है। हर किसी की अपनी रेड लाइन हैं। इसे भी पढ़ें: 60 अरब डॉलर, रूस से विदेश मंत्री जयशंकर का बड़ा ऐलान शी-पुतिन की मुलाक़ात व्लादिमीर पुतिन और शी जिनपिंग की मौजूदगी भारत की कूटनीतिक संतुलन बनाने की कोशिशों में एक नया पहलू जोड़ेगी। न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स ने अधिकारियों के हवाले से बताया है कि शी के साथ लगभग 400 अधिकारियों का एक बड़ा दल शिखर सम्मेलन में शामिल हो सकता है। यह सात वर्षों में उनकी पहली यात्रा होगी और दोनों प्रतिद्वंद्वियों के बीच रिश्तों में सुधार का एक नया संकेत होगा। चीनी नेता की मौजूदगी पर BRICS के एजेंडे से ज़्यादा इस बात पर नज़र रहेगी कि यह 2020 में सीमा पर हुई घातक झड़पों के बाद बीजिंग और नई दिल्ली के रिश्तों को स्थिर करने की कोशिशों के बारे में क्या संकेत देता है। रूसी राष्ट्रपति पुतिन भी एक क्षेत्रीय मंच पर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात करना चाहते हैं और साथ ही दोनों देशों के बीच व्यापार सहयोग बढ़ाने पर ज़ोर दे रहे हैं। क्रेमलिन में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ हुई बैठक में, पुतिन ने पिछले साल आई गिरावट के बाद रूस और भारत के बीच व्यापार में हुई रिकवरी का ज़िक्र किया। इसके बाद उन्होंने विदेश मंत्री से प्रधानमंत्री तक अपनी शुभकामनाएँ पहुँचाने को कहा। पश्चिमी देशों के दबाव के बावजूद, भारत रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा के क्षेत्र में करीबी संबंध बनाए हुए है। वहीं, 'लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल' पर सालों तक चले सैन्य तनाव के बाद चीन के साथ रिश्ते बेहतर हुए हैं, हालांकि दोनों देशों के बीच रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता अभी भी बनी हुई है।

प्रभासाक्षी 25 Aug 2026 1:46 pm

अरविंद केजरीवाल को अभिजीत दीपके ने बताया बेस्ट सीएम, स्टालिन और विजयन का भी लिया नाम

सीजेपी संस्थापक अभिजीत दीपके ने जवाहरलाल नेहरू को पसंदीदा प्रधानमंत्री बताया और एमके स्टालिन, पिनराई विजयन व अरविंद केजरीवाल के काम की तारीफ की। सीजेपी ने पांच सितंबर के दिल्ली मार्च का भी ऐलान किया।

देशबन्धु 25 Aug 2026 11:46 am

सामने से बातचीत, पीछे से युद्ध की तैयारी... China बना रहा अमेरिका को तबाह करने वाले Hypersonic Weapons, US भी कर रहा बीजिंग की घेराबंदी

डोनाल्ड ट्रंप पिछले दिनों चीन की यात्रा कर चुके हैं और अब उन्होंने दावा किया है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग दो सप्ताह के भीतर अमेरिका आने वाले हैं। सामने से दिख रहा है कि दोनों देशों के नेता बातचीत कर रहे हैं, उच्चस्तरीय संपर्क बनाए हुए हैं और दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं तनाव को नियंत्रित करने का संदेश दे रही हैं। लेकिन इस कूटनीतिक मुस्कान के पीछे हकीकत बिल्कुल अलग है। वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच एक नया शीत युद्ध पूरी रफ्तार से चल रहा है और उससे भी ज्यादा खतरनाक बात यह है कि दोनों पक्ष भविष्य के संभावित युद्ध की तैयारी अभी से कर रहे हैं। हम आपको बता दें कि व्यापार, तकनीक, ताइवान, दक्षिण चीन सागर और इंडो-पैसिफिक में प्रभाव की लड़ाई अब कूटनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रह गयी है। चीन अपनी मिसाइल और हाइपरसोनिक ताकत को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहा है, जबकि अमेरिका प्रशांत महासागर के द्वीपों, सैन्य ठिकानों और सहयोगी देशों के नेटवर्क के जरिए बीजिंग को घेरने की रणनीति तैयार कर रहा है। यानी सामने बातचीत है, लेकिन पर्दे के पीछे युद्ध की शतरंज बिछ चुकी है। इसे भी पढ़ें: Russia में Jaishankar, China में Doval, Japan में Piyush Goyal ने संभाला मोर्चा, आखिर क्या है Modi का मिशन? चीन का नया हाइपरसोनिक दांव, अमेरिका की युद्ध मशीन पर सीधा निशाना इस उभरते टकराव में चीन का सबसे नया और सबसे खतरनाक कदम उसकी हाइपरसोनिक क्षमता से जुड़ा है। रिपोर्टों के मुताबिक चीनी सेना ने ऐसे हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल विकसित किए हैं, जो हवा से हवा में मार करने वाले हथियार लॉन्च कर सकते हैं। यह क्षमता अमेरिका के उन महंगे और अत्यंत महत्वपूर्ण विमानों के लिए बड़ा खतरा बन सकती है, जो अब तक युद्धक्षेत्र से हजारों किलोमीटर दूर रहकर अपेक्षाकृत सुरक्षित माने जाते थे। चीन का निशाना केवल किसी लड़ाकू विमान को गिराना नहीं है। उसकी रणनीति अमेरिका की पूरी एयर ऑपरेशन आर्किटेक्चर को चोट पहुंचाने की है। अमेरिकी टैंकर विमान, एयरबोर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम और E-4B Nightwatch जैसे उड़ते कमांड पोस्ट अमेरिका की सैन्य ताकत की रीढ़ हैं। टैंकर लड़ाकू विमानों को लंबी दूरी तक पहुंच देते हैं, AWACS दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखता है और एयरबोर्न कमांड प्लेटफॉर्म युद्ध संचालन को नियंत्रित करते हैं। अगर चीन इन “दूर लेकिन निर्णायक” लक्ष्यों तक पहुंचने की क्षमता हासिल कर लेता है, तो अमेरिका की पूरी हवाई युद्ध प्रणाली दबाव में आ सकती है। चीन की मिसाइल ताकत का पैमाना भी इस खतरे को और गंभीर बनाता है। अमेरिकी आकलन के अनुसार चीन के पास 2024 तक कम से कम 3,150 बैलिस्टिक मिसाइलें और लगभग 300 ग्राउंड लॉन्च्ड क्रूज मिसाइलें थीं। DF-17 से लॉन्च किया गया हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल लगभग 1,500 मील तक जा सकता है, जबकि DF-27 की अनुमानित रेंज लगभग 5,000 मील है। यानी चीन अब केवल अपने तटीय क्षेत्र की रक्षा की तैयारी नहीं कर रहा, बल्कि अमेरिकी सैन्य ठिकानों और दूरस्थ ऑपरेशनल नेटवर्क को भी खतरे में लाने की क्षमता बढ़ा रहा है। हालांकि इस हथियार के इस्तेमाल की अपनी जटिलताएं भी हैं। हजारों किलोमीटर दूर उड़ते विमान को निशाना बनाने के लिए बेहद सटीक और लगातार अपडेट होने वाली टारगेटिंग जानकारी चाहिए। मिसाइल की लंबी “किल चेन” को बाधित किया जा सकता है और बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्च को परमाणु हमले के रूप में गलत समझे जाने का खतरा भी मौजूद है। लेकिन अगर चीन इन तकनीकी चुनौतियों को प्रभावी ढंग से पार कर लेता है, तो अमेरिका के लिए यह रणनीतिक सिरदर्द बन सकता है। अमेरिका की घेराबंदी, चीन का जवाब अमेरिका की रणनीति भी कम आक्रामक नहीं है। वॉशिंगटन प्रशांत क्षेत्र में जापान, ताइवान और फिलीपींस जैसे सहयोगियों के सहारे चीन को पहली द्वीप श्रृंखला के भीतर सीमित रखने की कोशिश कर रहा है। दूसरी ओर गुआम, कैरोलाइन द्वीप और टिनियन जैसे ठिकाने अमेरिकी सैन्य अभियानों के महत्वपूर्ण लॉन्चपैड हैं। अमेरिका की योजना है कि छोटे-छोटे द्वीपों और ठिकानों पर अपनी सैन्य क्षमता को फैलाया जाए ताकि चीन के सामने एक ही बड़ा लक्ष्य न रहे, बल्कि उसे असंख्य ठिकानों और लॉन्च पोजीशन से जूझना पड़े। इन द्वीपों को समुद्र में किलों की तरह इस्तेमाल करने की तैयारी है। NMESIS जैसे लगभग 300 किलोमीटर रेंज वाले हथियारों के जरिए चीन की नौसेना के लिए समुद्री इलाकों को खतरनाक बनाने की रणनीति तैयार की जा रही है। इसके पीछे अंतरिक्ष, हवा, जमीन और समुद्र के नीचे तक फैला निगरानी नेटवर्क काम करेगा। लेकिन चीन भी इस अमेरिकी घेराबंदी को समझ चुका है। बीजिंग की रॉकेट फोर्स अब उन्हीं अमेरिकी एयरबेस और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की तैयारी कर रही है, जिनके सहारे वॉशिंगटन भविष्य के किसी संघर्ष में चीन पर दबाव बनाना चाहता है। यही इस नए हथियारों के मुकाबले की असली तस्वीर है। यानि अमेरिका चीन को द्वीपों से घेरना चाहता है, जबकि चीन मिसाइलों से उन द्वीपों और अमेरिकी ठिकानों को निशाने पर लेना चाहता है। ट्रंप और जिनपिंग की मुलाकात, लेकिन तनाव जस का तस इस बीच डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की है कि शी जिनपिंग दो सप्ताह में अमेरिका आ सकते हैं। ट्रंप ने अपने चीन दौरे और बीजिंग के ग्रेट हॉल का उल्लेख करते हुए व्हाइट हाउस परिसर में नए निर्माण, बॉलरूम और एक सैन्य परिसर की योजना का भी जिक्र किया। हालांकि जिनपिंग की प्रस्तावित यात्रा को लेकर चीन की ओर से उपलब्ध सामग्री में कोई अलग आधिकारिक घोषणा नहीं थी। यह संभावित मुलाकात दोनों देशों के बीच संवाद जारी रहने का संकेत जरूर है, लेकिन इससे रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता खत्म होने के कोई संकेत नहीं मिलते। ताइवान, व्यापार, तकनीक, दक्षिण चीन सागर और इंडो-पैसिफिक पर दोनों देशों के हित सीधे टकराते हैं। इसलिए कूटनीतिक बातचीत का एक उद्देश्य तनाव को नियंत्रित करना भी है, ताकि यह प्रतिस्पर्धा अनियंत्रित सैन्य टकराव में न बदल जाए। अमेरिका की सबसे बड़ी कमजोरी है खाली होते हथियार भंडार उधर, शिंगटन के लिए सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि जिस समय वह चीन के साथ संभावित लंबे संघर्ष की तैयारी कर रहा है, उसके हथियार भंडार पहले ही भारी दबाव में हैं। यूक्रेन युद्ध के दौरान अमेरिका और उसके सहयोगियों ने बड़े पैमाने पर हथियार उपलब्ध कराए। इसके बाद ईरान के साथ संघर्ष ने प्रिसिजन हथियारों और एयर डिफेंस इंटरसेप्टर की मांग और बढ़ा दी। स्थिति इतनी गंभीर है कि अमेरिका के सामने अब केवल महंगे और अत्याधुनिक हथियारों का उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं माना जा रहा। कई सिस्टमों की उत्पादन अवधि तीन से चार साल तक हो सकती है। इसलिए अब “प्रिसाइज मास” की सोच पर जोर दिया जा रहा है। यानी बड़ी संख्या में सस्ते ड्रोन, सेंसर और ऐसे हथियार तैयार करना जिन्हें तेजी से बनाया जा सके और युद्ध में बड़ी संख्या में इस्तेमाल किया जा सके। बहरहाल, ट्रंप और जिनपिंग की मुलाकातें दुनिया को तनाव कम होने का संदेश दे सकती हैं, लेकिन जमीन पर अमेरिका और चीन दोनों भविष्य के संघर्ष के लिए अपनी-अपनी सैन्य मशीन को तैयार कर रहे हैं। चीन हाइपरसोनिक हथियारों और विशाल मिसाइल शक्ति से अमेरिकी सैन्य नेटवर्क की नसों पर वार करने की क्षमता विकसित कर रहा है। वहीं अमेरिका द्वीपों, गठबंधनों, पनडुब्बियों और फैले हुए सैन्य ठिकानों के जरिए चीन को घेरने की कोशिश कर रहा है। अब सवाल यह उठता है कि बातचीत की मेज के पीछे दोनों महाशक्तियां जिस युद्ध की तैयारी कर रही हैं, अगर वह कभी वास्तविक संघर्ष में बदल गया तो प्रशांत महासागर में पहला वार कौन करेगा और कौन उसे सहने के लिए ज्यादा तैयार होगा? -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 25 Aug 2026 11:42 am

दिल्ली: बवाना क्षेत्र की परियोजनाओं को लेकर मंत्री रविंद्र इंद्राज सिंह ने पीडब्ल्यूडी को दिए सुझाव

दिल्ली: बवाना क्षेत्र की परियोजनाओं को लेकर मंत्री रविंद्र इंद्राज सिंह ने पीडब्ल्यूडी को दिए सुझाव

समाचार नामा 24 Aug 2026 11:26 pm

10 साल में 152 पेपर लीक, अब कमेटी बनाने से क्या होगा सुधार: राजद विधायक भाई वीरेंद्र

10 साल में 152 पेपर लीक, अब कमेटी बनाने से क्या होगा सुधार: राजद विधायक भाई वीरेंद्र

समाचार नामा 24 Aug 2026 6:20 pm

गड़बड़ा जाएंगे सभी राजनीतिक दलों के समीकरण ? 2029 से ही One Nation One Election को लागू करने की तैयारी तेज !

भले ही देश की तमाम राजनीतिक पार्टियां आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों के लिए अपनी-अपनी बिसात बिछाने में जुटी हों, लेकिन भारतीय राजनीति की इस शतरंज पर जल्द ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक और बड़ा ‘मास्टरस्ट्रोक’ चलने की संभावना जोर पकड़ रही है। हम आपको बता दें कि ‘एक देश, एक चुनाव’ का विचार अब महज बहस या चुनावी नारा नहीं रह गया है, भारत इसके क्रियान्वयन से कुछ ही कदम दूर दिखाई दे रहा है। एक ओर भाजपा देशभर में विभिन्न सामाजिक और पेशेवर वर्गों के बीच इस विचार के समर्थन में अभियान चलाकर जनमत तैयार करने में जुटी है, वहीं इस मुद्दे पर विचार कर रही संयुक्त संसदीय समिति भी राज्यों, विधायिकाओं, शिक्षाविदों, कानूनी विशेषज्ञों और अन्य हितधारकों से व्यापक चर्चा के बाद अपनी रिपोर्ट को अंतिम रूप देने के चरण में पहुंच रही है। ऐसे में सियासी हलकों में यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या चुनावी राजनीति की मौजूदा बिसात बदलने वाली है और क्या ‘एक देश, एक चुनाव’ मोदी सरकार की अगली बड़ी राजनीतिक चाल साबित होगी। हम आपको बता दें कि मौजूदा विधेयकों की मूल रूपरेखा के अनुसार देश में लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक चक्र में लाने की पहली वास्तविक संभावना 2034 से बनती है। संसद की संयुक्त समिति संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्रशासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 की जांच कर रही है। इन प्रावधानों का उद्देश्य अगले चुनाव चक्र में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ लाना है। लेकिन राजनीतिक सत्ता का गणित शायद अब 2034 तक इंतजार करने के मूड में नहीं है। इसे भी पढ़ें: Russia में Jaishankar, China में Doval, Japan में Piyush Goyal ने संभाला मोर्चा, आखिर क्या है Modi का मिशन? एनडीए के शासन वाले 22 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में से 11 में अगले दो वर्षों के भीतर विधानसभा चुनाव होने हैं। यदि इन राज्यों में एनडीए अपनी सरकारें बरकरार रखता है, तो 2029 में लोकसभा चुनाव के साथ इन्हें चुनावी चक्र में लाने के लिए जनवरी 2029 तक विधानसभाएं भंग करने का विकल्प सामने आ सकता है। आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और ओडिशा में विधानसभा चुनाव पहले से ही लोकसभा चुनाव के साथ होते रहे हैं। इस प्रकार इन चार राज्यों को समन्वित चुनावी चक्र में लाना अपेक्षाकृत आसान होगा। इसके अलावा, संवैधानिक रास्ता भी राजनीतिक चर्चा के केंद्र में है। संविधान का अनुच्छेद 174(2)(b) राज्यपाल को विधानसभा भंग करने का अधिकार देता है, हालांकि सामान्य परिस्थितियों में यह फैसला मंत्रिपरिषद की सलाह पर होता है। विधानसभा भंग होने के बाद जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत निर्धारित समय सीमा में चुनाव कराना आवश्यक होता है। यही वह संवैधानिक खिड़की है, जिसके जरिए 2029 के साथ चुनावों का समन्वय करने की राजनीतिक संभावना तलाशी जा रही है। यहीं से ‘एक देश, एक चुनाव’ का प्रशासनिक तर्क सीधे राजनीतिक रणनीति में बदल जाता है। सवाल यह है कि क्या किसी निर्वाचित विधानसभा का कार्यकाल तीन या चार वर्ष तक घटाकर चुनावी चक्र को एक साथ लाना महज चुनाव सुधार होगा, या फिर यह सत्ता की सुविधानुसार राजनीतिक कैलेंडर को पुनर्गठित करने की शुरुआत होगी? एनडीए के लिए यह योजना चुनावी संसाधनों, संगठनात्मक ताकत और राष्ट्रीय नेतृत्व की लोकप्रियता को एक साथ मैदान में उतारने का अवसर बन सकती है। एक ही समय में लोकसभा और विधानसभा चुनाव होने पर राष्ट्रीय मुद्दों की लहर राज्य-स्तरीय समीकरणों को प्रभावित कर सकती है। राजनीतिक दृष्टि से यह विपक्ष के लिए बड़ी चुनौती होगी। पंजाब में 2027 और हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, मिजोरम तथा तेलंगाना में 2028 में चुनाव प्रस्तावित हैं। इनके बाद चुनी जाने वाली विधानसभाओं का कार्यकाल 2029 के लोकसभा चुनाव तक केवल एक या दो वर्ष पुराना होगा, जबकि यदि भविष्य में उन्हें लोकसभा चुनाव के चक्र से जोड़ा जाता है तो उनकी अवधि को लेकर अलग संवैधानिक और राजनीतिक बहस खड़ी होगी। दूसरी ओर, 2028 में मध्य प्रदेश, मेघालय, नागालैंड, राजस्थान और त्रिपुरा जैसे राज्यों के चुनाव तथा 2029 के आसपास विभिन्न राज्यों के अलग-अलग चुनावी कार्यक्रम देश के मौजूदा बिखरे हुए चुनाव चक्र की जटिलता को दिखाते हैं। संयुक्त संसदीय समिति के अध्यक्ष पी.पी. चौधरी ने इस संभावना पर साफ कहा है कि 2029 में चुनावों को आगे बढ़ाकर एक साथ कराने का फैसला समिति के अधिकार क्षेत्र से बाहर है और यह संबंधित एनडीए मुख्यमंत्रियों पर निर्भर करेगा। हम आपको याद दिला दें कि यह समिति दिसंबर 2024 में गठित हुई थी और राज्यों में सरकारों, विधायिकाओं, शिक्षाविदों, विधि विशेषज्ञों और अन्य हितधारकों से संवाद कर रही है। उसकी रिपोर्ट इस वर्ष संसद के शीतकालीन सत्र में आने की उम्मीद है। लेकिन राजनीतिक मोर्चे पर विपक्ष पहले ही अपनी तलवारें खींच चुका है। कांग्रेस का तर्क है कि ‘एक देश, एक चुनाव’ असंवैधानिक, अलोकतांत्रिक और जवाबदेही की भावना के विरुद्ध है। विपक्ष का सवाल यह भी है कि यदि विधानसभा का जनादेश पांच वर्ष के लिए है, तो उसे राजनीतिक सुविधा के लिए बीच में समाप्त करना मतदाता के अधिकारों और संघीय ढांचे के साथ किस हद तक न्याय करेगा। यह विवाद उस समय और तीखा हो सकता है, जब परिसीमन को लेकर केंद्र और विपक्षी दलों के बीच पहले से ही अविश्वास मौजूद है। दरअसल, 2029 का संभावित प्रयोग केवल चुनावी तारीखें मिलाने की कवायद नहीं होगा। यह भारतीय राजनीति में केंद्र बनाम राज्यों, राष्ट्रीय नेतृत्व बनाम क्षेत्रीय मुद्दों और चुनावी दक्षता बनाम लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की नई लड़ाई छेड़ सकता है। एनडीए इसे स्थिरता, कम खर्च और बार-बार लगने वाली आचार संहिता से मुक्ति के रूप में पेश कर रहा है, जबकि विपक्ष इसे राज्यों की राजनीतिक स्वायत्तता और अलग जनादेशों को राष्ट्रीय चुनाव की छाया में समेटने की कोशिश बता कर इसका विरोध कर रहा है। बहरहाल, 2029 का सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि लोकसभा और 22 राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होंगे या नहीं। असली सियासी पहेली यह है कि क्या ‘एक देश, एक चुनाव’ के बहाने भारतीय राजनीति का चुनावी कैलेंडर बदलेगा, या फिर सत्ता के खेल का पूरा बोर्ड ही नए सिरे से सजाया जाएगा? वैसे यह स्पष्ट नजर आ रहा है कि 2029 की लड़ाई सिर्फ वोटों की नहीं बल्कि चुनाव की टाइमिंग को लेकर भी होगी। कौन अपनी सरकार बचाएगा, किसकी विधानसभा का कार्यकाल घटेगा और किसे राष्ट्रीय लहर का सहारा मिलेगा, यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 24 Aug 2026 6:18 pm

जंतर-मंतर की सियासी झाड़फूंक: संविधान, राजनीति और सामाजिक न्याय की असली परीक्षा!

नई दिल्ली स्थित ऐतिहासिक धरना-प्रदर्शन स्थल जंतर-मंतर (वोट क्लब के बाद) पर 21 अगस्त 2026 को हुआ ‘आरक्षण हटाओ’ आंदोलन वास्तव में आरक्षण सुधार मुहिम बनकर रह गया। हालांकि इसके सामाजिक मिजाज और जनहितकारी तेवरों ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह घटनाक्रम भारतीय राजनीति के लिए महज एक और धरना नहीं है, बल्कि यह उस असंतोष की राजनीतिक अभिव्यक्ति है जो सरकारी नौकरियों, प्रतियोगी परीक्षाओं और उच्च शिक्षा में अवसरों को लेकर सामान्य वर्ग के एक प्रतिभाशाली हिस्से, खासकर जेन-जी युवाओं में दिखाई दे रहा है। साथ ही प्रौढ़ और बुजुर्ग समाजसेवियों का समर्थन भी उन्हें प्राप्त है। इसलिए जंतर-मंतर की सियासी झाड़फूंक पर गौर फरमाना आवश्यक है, क्योंकि संविधान, राजनीति और सामाजिक न्याय की असली परीक्षा यहीं से शुरू होती है जो कब खत्म होगी, शायद नेताओं को भी नहीं पता, क्योंकि दो नावों की सवारी करने में वे माहिर जो होते हैं। कहना न होगा कि जिस तरह से 21 अगस्त को बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर पहुंचे और अनुमति न मिलने के बावजूद 22 अगस्त को भी प्रदर्शन जारी रहा और दिल्ली पुलिस द्वारा 50 से अधिक लोगों को हिरासत में लिए जाने की रिपोर्ट सामने आई, उसने केंद्र सरकार और पुलिस प्रशासन की पक्षपाती भूमिका का भी पर्दाफाश कर दिया। इसे भी पढ़ें: दिमागी नक्सल विवाद पर P Chidambaram का Kiren Rijiju को करारा जवाब, बोले- 'हमें गर्व है' इससे सामान्य वर्ग के आन्दोलनकारियों, जो मोदी सरकार के प्रबल समर्थक लोगों में शुमार किये जाते हैं, को यूजीसी मुहिम के बाद आरक्षण सुधार मुहिम के रूप में दूसरा बड़ा धक्का लगा। वस्तुतः, प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांग थी कि सरकारी सहायता और आरक्षण का आधार जाति के बजाय आर्थिक वंचना को अधिक महत्व दे। लेकिन यहीं से असली बहस शुरू होती है, वह यह कि- पहला यह कि, जब अपनी सरकार से आरक्षण पर सवाल पूछना अपराध नहीं है तो फिर दिल्ली पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर पर अनुमति क्यों नहीं दी? फिर शांतिपूर्ण लोगों पर बल प्रयोग और गिरफ्तारी क्यों की गई? इस जनप्रदर्शन का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि आरक्षण पर असहमति को अपने-आप सामाजिक न्याय-विरोधी मानने के बजाय इसे सार्वजनिक नीति की बहस के रूप में देखने की गुंजाइश दिखाई देती है। यह distinction महत्वपूर्ण है। जैसे आरक्षण की आलोचना करना और वंचित वर्गों के अधिकारों का विरोध करना एक ही बात नहीं है। उसी तरह, आरक्षण का समर्थन करना और आरक्षण व्यवस्था के हर वर्तमान प्रावधान को सही मानना भी एक ही बात नहीं है। यही वह बीच का क्षेत्र है जहां गंभीर पत्रकारिता और नीति-विमर्श होना चाहिए। यद्यपि जंतर-मंतर के आंदोलनों और पत्रकारों से जुड़े घटनाक्रम पर अलग से कतिपय कार्यक्रम भी सामने आया है। इससे उनका व्यापक दृष्टिकोण समझने में मदद मिलती है कि वे आंदोलन को केवल तत्काल राजनीतिक नारे के रूप में नहीं, बल्कि उसके पीछे के सामाजिक और राजनीतिक संदेश के रूप में देखते हैं। दूसरा यह कि आंदोलन की सबसे मजबूत दलील क्या है? आंदोलनकारियों का सबसे मजबूत प्रश्न है: अगर गरीबी सभी जातियों में मौजूद है, तो आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति की मदद केवल उसकी जाति देखकर क्यों तय हो? यह सवाल भावनात्मक होने के साथ-साथ नीतिगत भी है। प्रदर्शन में मेरिट, आर्थिक आधार और आरक्षण नीति पर श्वेत पत्र (White Paper) की मांग उठी। यह मांग सरकार को असहज कर सकती है क्योंकि इससे बहस सीधे आंकड़ों पर आ जाएगी: आरक्षण का वास्तविक लाभ किसे मिला? किन परिवारों को पीढ़ियों से लाभ मिल रहा है? कौन से समुदाय अभी भी प्रतिनिधित्व से बाहर हैं? आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के युवाओं के लिए पर्याप्त अवसर हैं या नहीं? सरकारी नौकरियां इतनी हैं भी या नहीं कि आरक्षण की पूरी बहस को केवल कोटे के प्रश्न तक सीमित किया जा सके? इसलिए White Paper की मांग को केवल आरक्षण-विरोधी नारा मानकर खारिज करना उचित नहीं होगा। तीसरा यह कि, लेकिन आंदोलन की सबसे बड़ी वैचारिक कमजोरी भी यहीं है! सिर्फ गरीबी सामाजिक पिछड़ेपन का पूरा मापदंड नहीं है। किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति बदल सकती है, लेकिन सामाजिक पहचान और उससे जुड़े भेदभाव के अनुभव हमेशा उसी गति से नहीं बदलते। यही आरक्षण समर्थक पक्ष की मूल दलील है। इसलिए यदि आंदोलन यह मान ले कि गरीबी = पिछड़ापन तो उसका तर्क अधूरा रह जाएगा। भारत में आरक्षण केवल गरीबी हटाने की योजना नहीं है, बल्कि इसका संबंध सामाजिक प्रतिनिधित्व और ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को संस्थागत अवसर देने से भी है। इसीलिए आर्थिक सहायता और आरक्षण को पूरी तरह समानार्थी मानना संवैधानिक और सामाजिक दोनों दृष्टि से समस्या पैदा करता है। चौथा यह कि, चिराग पासवान जैसों की प्रतिक्रिया क्यों महत्वपूर्ण है? गत 22 अगस्त को चिराग पासवान ने आरक्षण को खैरात नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार बताते हुए कहा कि यह किसी आंदोलन के कहने मात्र से समाप्त नहीं हो सकता। राजनीतिक दृष्टि से यह प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण है, क्योंकि यदि एक ओर सामान्य वर्ग के युवाओं में असंतोष बढ़ता है, तो दूसरी ओर SC/ST/OBC राजनीतिक समूहों के लिए आरक्षण केवल सरकारी नीति नहीं बल्कि प्रतिनिधित्व और सामाजिक सुरक्षा का प्रश्न है। इसलिए कोई भी राष्ट्रीय दल सीधे तौर पर एक पक्ष चुनकर दूसरे को खोने का जोखिम नहीं उठा सकता। यही वजह है कि भाजपा सहित सभी दलों के सामने आने वाले समय में कठिन सामाजिक-संतुलन की चुनौती होगी। जबकि वास्तविकता यह है कि इसी आरक्षण की आड़ में कतिपय दलित/आदिवासी परिवार फल फूल रहे हैं और अपने ही वर्ग के वंचित लोगों की हकमारी कर रहे हैं। चूंकि संसद और सुप्रीम कोर्ट अबतक इनके पक्ष में है, इसलिए ये वास्तविक दलितों/आदिवासियों को फलने फूलने के मौके नहीं दिए और इसके लिए मनुवादियों यानी सामान्य वर्ग के लोगों को जिम्मेदार ठहराकर अपना सियासी हित साधते आए हैं। मौजूदा आंदोलन से यह स्थिति भी बदलेगी। पांचवां यह कि, ब्रजेश पाठक का हस्तक्षेप भी राजनीतिक संकेत है। उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने आंदोलनकारी छात्रों के नेता हर्ष दूबे से मुलाकात कर उनकी शिकायतों को आगे पहुंचाने और केंद्रीय मंत्री से बातचीत कराने का आश्वासन दिया। यह छोटा घटनाक्रम नहीं है। इसका अर्थ यह निकाला जा सकता है कि सरकार के भीतर भी यह समझ है कि आंदोलन को केवल ‘आरक्षण विरोध’ कहकर नज़रअंदाज़ करना राजनीतिक रूप से पर्याप्त रणनीति नहीं होगी। संवाद शुरू होना ही इस आंदोलन की पहली राजनीतिक उपलब्धि है। लेकिन संवाद का अर्थ मांगों को स्वीकार करना नहीं है। छठा यह कि, संविधान बनाम आंदोलन: असली सीमा कहां है? यहां सबसे जरूरी सावधानी है। आरक्षण व्यवस्था संविधान, संसद और सुप्रीम कोर्ट के विकसित होते न्यायशास्त्र से जुड़ी हुई है। इसलिए इसे केवल सड़क के आंदोलन से समाप्त या पूरी तरह पुनर्गठित नहीं किया जा सकता। दूसरी तरफ लोकतंत्र में किसी नीति की आलोचना करने के लिए संविधान-विरोधी होना आवश्यक नहीं। यही लोकतांत्रिक संतुलन है: आरक्षण का संवैधानिक अस्तित्व सुरक्षित रहे, लेकिन आरक्षण की नीतियों पर लोकतांत्रिक समीक्षा का अधिकार भी सुरक्षित रहे। इसलिए ‘आरक्षण पर चर्चा ही नहीं हो सकती’ और ‘आरक्षण तुरंत खत्म कर दो’—दोनों अतियां हैं। सातवां यह कि, SC/ST Act को आरक्षण बहस में जोड़ना आंदोलन को कमजोर कर सकता है। जंतर-मंतर के कुछ प्रदर्शनकारियों ने SC/ST Act को समाप्त करने की मांग भी उठाई। राजनीतिक दृष्टि से यह आंदोलन के लिए जोखिम है। क्यों? क्योंकि आरक्षण की समीक्षा पर आर्थिक, प्रशासनिक और प्रतिनिधित्व आधारित बहस हो सकती है। लेकिन SC/ST Act का विषय मुख्यतः अत्याचार, भेदभाव और कानूनी संरक्षण से जुड़ा है। दोनों को एक ही मुद्दा बना देने से आंदोलन का मुख्य प्रश्न—आरक्षण सुधार—एक अलग और अधिक विवादास्पद राजनीतिक लड़ाई में बदल सकता है। यदि आंदोलन व्यापक सामाजिक समर्थन चाहता है तो उसे अपने एजेंडे में स्पष्ट प्राथमिकता रखनी होगी। आठवां यह कि, ‘मेरिट’ की बहस को भी अधिक वैज्ञानिक बनाने की जरूरत है। ‘मेरिट बचाओ’ एक प्रभावी नारा है। लेकिन मेरिट केवल परीक्षा में मिले अंकों का नाम नहीं है। एक गरीब सरकारी स्कूल का विद्यार्थी, जिसके पास महंगी कोचिंग, अंग्रेजी माध्यम, डिजिटल संसाधन और शिक्षित पारिवारिक वातावरण नहीं है, और दूसरी ओर अत्यधिक संसाधन वाले परिवार का विद्यार्थी—दोनों की परीक्षा-तैयारी की परिस्थितियां समान नहीं होतीं। इसलिए भारत को ऐसी नीति चाहिए जो प्रतिस्पर्धा की गुणवत्ता भी बचाए और अवसर की असमानता भी कम करे। यही वास्तविक meritocracy होगी। नौवां यह कि, आंदोलन यदि सफल होना चाहता है तो उसे ‘आरक्षण हटाओ’ से आगे जाना होगा और 'आरक्षण सुधारो' की बात करनी होगी। यही सबसे निर्णायक राजनीतिक बिंदु है। यदि आंदोलन का संदेश केवल “आरक्षण समाप्त करो” रहता है, तो इसका सामाजिक आधार सीमित रहेगा। लेकिन यदि इसका एजेंडा बनता है आरक्षण सुधारो और “समान अवसर + पारदर्शी आरक्षण + वास्तविक वंचित तक लाभ + आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं के लिए मजबूत सहायता + गुणवत्तापूर्ण शिक्षा + सरकारी भर्ती में पारदर्शिता” तो इसका प्रभाव बहुत व्यापक हो सकता है। तब यह किसी एक जाति के खिलाफ आंदोलन नहीं बल्कि नीति-सुधार आंदोलन बन सकता है। दसवां यह कि, राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ा खतरा यह है कि भारतीय राजनीति ने लंबे समय से जातीय समूहों को चुनावी गणित की इकाइयों के रूप में देखा है। यह आंदोलन उस गणित में एक नया प्रश्न जोड़ रहा है: क्या आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन गैर-आरक्षित युवा भी एक स्वतंत्र राजनीतिक दबाव समूह बन सकता है? यदि उत्तर हां है, तो राजनीतिक दलों को केवल जातीय समीकरणों के आधार पर घोषणापत्र तैयार करना कठिन होगा। उन्हें रोजगार, शिक्षा, परीक्षा प्रणाली, छात्रवृत्ति, कोचिंग, आर्थिक सहायता और आरक्षण के वास्तविक लाभार्थियों पर ठोस नीति देनी पड़ेगी। ग्यारहवां यह कि, क्या आरक्षण समर्थन या आरक्षण विरोध के बीच आरक्षण सुधार की वास्तविक राजनीतिक उपयोगिता सिद्ध की जाएगी। क्योंकि इस दृष्टिकोण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इससे बहस को एक सरल binary से बाहर निकालने की संभावना पैदा होगी। आरक्षण समर्थक बनाम आरक्षण विरोधी के बजाय बहस हो कि सामाजिक न्याय कैसे अधिक न्यायपूर्ण बने? यह प्रश्न ज्यादा कठिन है, लेकिन ज्यादा लोकतांत्रिक भी। क्योंकि संभव है कि वर्तमान व्यवस्था में कुछ ऐसे लोग हों जिन्हें सहायता की जरूरत है लेकिन वे उससे बाहर हैं। और यह भी संभव है कि कुछ ऐसे लोग हों जो ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदाय से आते हैं और आज भी सामाजिक भेदभाव तथा प्रतिनिधित्व की कमी का सामना करते हैं। लिहाजा एक न्यायपूर्ण नीति को दोनों वास्तविकताओं को स्वीकार करना होगा। निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि आरक्षण खत्म करने की नहीं, बल्कि आरक्षण को अधिक न्यायपूर्ण बनाने की बहस होनी चाहिए? जंतर-मंतर का आंदोलन अभी इतना बड़ा नहीं हो गया है कि इसे तत्काल राष्ट्रीय राजनीतिक परिवर्तन का संकेत कहा जाए। लेकिन इसे नजरअंदाज करना भी राजनीतिक भूल होगी। 21–22 अगस्त की भीड़, सोशल मीडिया से जुटाव, हिरासत, मेरिट और आर्थिक आधार की मांग, White Paper की मांग और राजनीतिक नेताओं की प्रतिक्रियाएं बताती हैं कि आरक्षण पर एक नया विमर्श आकार ले रहा है। असल सवाल शायद यह नहीं है कि “आरक्षण रहे या खत्म हो?” बल्कि यह है कि क्या भारत ऐसा सामाजिक न्याय मॉडल बना सकता है जिसमें ऐतिहासिक सामाजिक वंचना का समाधान भी हो, वास्तविक गरीब को उसकी जाति से परे अवसर भी मिले, मेरिट और प्रतिस्पर्धा की गुणवत्ता भी बनी रहे और आरक्षण का लाभ सबसे वंचित व्यक्ति तक पारदर्शी तरीके से पहुंचे?” यदि इस प्रश्न पर राष्ट्रीय सहमति बनाने की कोशिश होती है, तो जंतर-मंतर का यह आंदोलन भारतीय राजनीति के लिए एक क्षणिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि आरक्षण नीति की अगली पीढ़ी पर बहस की शुरुआत साबित हो सकता है। और, सरकार के लिए सबसे समझदार रास्ता होगा—न आंदोलन को दबाना, न उसकी हर मांग स्वीकार करना; बल्कि आंकड़ों के साथ White Paper, विशेषज्ञ संवाद और व्यापक सामाजिक परामर्श शुरू करना। यही लोकतांत्रिक और संवैधानिक रास्ता है। पहले भी यहीं पर कांग्रेसी और समाजवादी सरकारें चूक कीं हैं, और जनाधार बचाने के चक्कर में उन्हें अपनी सरकार तक गंवानी पड़ी है। आज भाजपा भी इसी दुविधा में है, और अगर यही हाल रहा तो बांकीपुर और दतिया उपचुनाव परिणाम की तरह उसकी आने वाली सरकारें भी विफलता प्राप्त करेंगी, क्योंकि जब मूल जनाधार छिटकेगा, तब नीतिगत रूप से हासिल जनाधार की मरूभूमि वाली मृगमरीचिका का पता चलेगा। तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। इसलिए समय रहते ही सावधान हो जाइए। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 24 Aug 2026 5:20 pm

Russia में Jaishankar, China में Doval, Japan में Piyush Goyal ने संभाला मोर्चा, आखिर क्या है Modi का मिशन?

भारत की कूटनीति इस समय तीन अलग-अलग राजधानियों में एक साथ अपनी बिसात बिछा रही है। मॉस्को में रूस के साथ ऊर्जा, व्यापार और रणनीतिक साझेदारी को नई गति देने की कोशिश; बीजिंग में चीन के साथ सबसे संवेदनशील सीमा विवाद को संभालते हुए रिश्तों को स्थिर करने की कवायद और टोक्यो में जापानी पूंजी, तकनीक और विनिर्माण को भारत की विकास गाथा से जोड़ने का अभियान। विदेश मंत्री एस. जयशंकर, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल की ये यात्राएं बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की बहुस्तरीय रणनीति की तीन परस्पर जुड़ी हुई चालें हैं। जयशंकर का रूस दौरा सबसे पहले मॉस्को यात्रा की बात करें तो आपको बता दें कि जयशंकर की दो दिवसीय रूस यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब भारत पर अमेरिकी टैरिफ और रूसी ऊर्जा खरीद को लेकर दबाव बढ़ा हुआ है। मॉस्को में वह रूस के प्रथम उपप्रधानमंत्री डेनिस मंतुरोव के साथ भारत-रूस अंतर-सरकारी आयोग यानि IRIGC-TEC की 27वीं बैठक की सह-अध्यक्षता कर रहे हैं और विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव से क्षेत्रीय तथा वैश्विक मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं। इसे भी पढ़ें: लोकहित के नाम पर Parliament में हंगामा, हर घंटे ₹1.5 Crore के नुकसान का कौन है जिम्मेदार? हम आपको बता दें कि भारत-रूस व्यापार 2024-25 में रिकॉर्ड 68.7 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है, लेकिन तस्वीर का दूसरा पक्ष यह है कि भारतीय निर्यात केवल 4.88 अरब डॉलर रहा। यानी व्यापार तेजी से बढ़ा है, मगर संतुलन भारत के पक्ष में नहीं है। इसलिए नई दिल्ली अब केवल रूसी तेल खरीदने वाले साझेदार की भूमिका से आगे बढ़कर बाजार पहुंच, निवेश, भुगतान व्यवस्था, लॉजिस्टिक्स और कनेक्टिविटी के सवालों को केंद्र में ला रही है। भारत और रूस ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर, नॉर्दर्न सी रूट और चेन्नई-व्लादिवोस्तोक कॉरिडोर जैसे विकल्पों का महत्व बढ़ जाता है। यह रणनीति दर्शाती है कि भू-राजनीतिक दबाव के बावजूद भारत अपने पुराने, परखे हुए रणनीतिक साझेदार के साथ ऊर्जा, रक्षा, व्यापार और संपर्क के विकल्प खुले रखना चाहता है। यह यात्रा राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की अगले महीने संभावित भारत यात्रा से पहले भी हो रही है, जिससे इसकी राजनीतिक अहमियत और बढ़ जाती है। अजित डोभाल का चीन दौरा उधर, मॉस्को में भारत साझेदारी को मजबूत कर रहा है, तो बीजिंग में उसकी प्राथमिकता सीमा विवाद जैसे संवेदनशील मुद्दों को सुलझाने में लगी हुई है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल 25वें भारत-चीन विशेष प्रतिनिधि संवाद के लिए चीन के दौरे पर हैं, जहां उनकी मुलाकात चीन के विदेश मंत्री वांग यी से होनी है। हम आपको याद दिला दें कि साल 2003 में शुरू किया गया यह तंत्र लगभग 3,488 किलोमीटर लंबे सीमा विवाद के राजनीतिक समाधान के लिए बनाया गया था। 25 दौर की बातचीत के बावजूद अंतिम समाधान दूर है, लेकिन दोनों देश इसे तनाव नियंत्रित करने और संवाद बनाए रखने का महत्वपूर्ण माध्यम मानते हैं। खासकर 2020 के बाद सीमा पर पैदा हुई गंभीर स्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत-चीन संबंधों का भविष्य केवल व्यापार या राजनीतिक संपर्क से तय नहीं होगा। जयशंकर का संदेश भी इसी रणनीतिक सोच को रेखांकित करता है। यानि सीमा पर शांति और स्थिरता, अच्छे संबंधों की पूर्व शर्त है। देखा जाये तो डोभाल की यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब दोनों पक्ष तनाव कम करने और संबंधों को सामान्य बनाने के लिए कुछ कदम उठा रहे हैं, लेकिन सीमा का प्रश्न अब भी निर्णायक है। बातचीत का उद्देश्य केवल विवाद को प्रबंधित करना नहीं, बल्कि उस राजनीतिक जगह को तैयार करना भी है जिसमें भारत और चीन के शीर्ष नेतृत्व के बीच आगे संवाद संभव हो सके। साथ ही डोभाल की यात्रा भी ऐसे समय हो रही है जब चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का अगले महीने भारत का दौरा लगभग तय माना जा रहा है। पीयूष गोयल का जापान दौरा इसके अलावा, तीसरा मोर्चा टोक्यो में खुलता है, जहां पीयूष गोयल 200 सदस्यीय कारोबारी प्रतिनिधिमंडल के साथ जापान पहुंचे हैं। यह प्रतिनिधिमंडल टोक्यो, नागोया और ओसाका में सरकारों और उद्योग जगत के साथ बैठकों के जरिए निवेश, व्यापार और तकनीकी सहयोग को नई दिशा देने की कोशिश करेगा। हम आपको बता दें कि भारत की नजर केवल अधिक जापानी निवेश पर नहीं है। लक्ष्य कहीं बड़ा है। लक्ष्य यह है कि जापानी कंपनियां भारत में केवल बेचें नहीं, बल्कि निर्माण करें, डिजाइन करें, नई तकनीक विकसित करें और भारत को वैश्विक निर्यात केंद्र के रूप में इस्तेमाल करें। सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, उन्नत विनिर्माण और नई प्रौद्योगिकियां इस अभियान के प्रमुख क्षेत्र हैं। हम आपको बता दें कि जापान ने भारत में एक दशक के दौरान 10 ट्रिलियन येन निवेश का लक्ष्य रखा है। भारत अब चाहता है कि इस दशक के अंत तक देश में सक्रिय जापानी कंपनियों की संख्या दोगुनी हो। नागोया की औद्योगिक और ऑटोमोबाइल क्षमता, टोक्यो की वित्तीय एवं तकनीकी ताकत और ओसाका के नवाचार तंत्र के साथ भारत अपने विनिर्माण भविष्य की नई साझेदारी तलाश रहा है। मॉस्को, बीजिंग और टोक्यो की इन तीन यात्राओं को एक साथ देखें तो भारत की रणनीति स्पष्ट दिखाई देती है। रूस से ऊर्जा और रणनीतिक स्वायत्तता; चीन से सीमा तनाव को नियंत्रित करते हुए सुरक्षा संतुलन; और जापान से पूंजी, तकनीक तथा वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी हिस्सेदारी मजबूत करना। यही भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौती भी है। यानि किसी एक धुरी का हिस्सा बने बिना सभी महत्वपूर्ण धुरियों के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार संबंध चलाना। दुनिया जब व्यापार युद्धों, टैरिफ, युद्धों, सप्लाई चेन संकट और महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा से गुजर रही है, तब भारत तीन अलग-अलग राजधानियों में तीन अलग भाषाओं में, लेकिन एक ही संदेश के साथ बात कर रहा है। भारत स्पष्ट कर रहा है कि वह साझेदारी करेगा, दबाव में नहीं झुकेगा; संवाद करेगा, लेकिन सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा; और निवेश चाहेगा, लेकिन केवल बाजार बनने के लिए नहीं बल्कि वैश्विक विनिर्माण और तकनीकी शक्ति बनने के लिए। बहरहाल, मॉस्को से बीजिंग और टोक्यो तक फैली यह कूटनीतिक त्रिकोणीय चाल इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका लक्ष्य केवल आज के संकटों को संभालना नहीं, बल्कि 2030 के भारत की आर्थिक, सामरिक और तकनीकी स्थिति तय करना है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 24 Aug 2026 4:17 pm

लोकहित के नाम पर Parliament में हंगामा, हर घंटे ₹1.5 Crore के नुकसान का कौन है जिम्मेदार?

जिस देश में करोड़ों लोगों को साफ पीने का पानी, पर्याप्त बिजली, राशन, स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं मयस्सर नहीं हैं, वहां सिर्फ आम लोगों की भलाई के नाम पर संसद में हंगामा करके अरबों रूपए स्वाह कर दिए जाते हैं। संसद में अब तक मानसून सत्र के दौरान हंगामे और व्यवधान के कारण लोकसभा में 7,023 मिनट का समय बर्बाद हो। अर्थात प्रति मिनट करीब ₹2.5 लाख खर्च का अनुमान हुआ। यह आंकड़ा करीब ₹175 करोड़ बैठता है। देश के लोकतंत्र का मंदिर है संसद, जहां पर जनता की, उनके अधिकारों, मुद्दों की आवाज़ गूंजनी चाहिए। लेकिन वहां अभी तक के मानसून सत्र में सिर्फ शोर सुनाई दिया। विपक्ष का हंगामा कान के पर्दों को फाड़ रहा है। सवाल ये है कि इस शोर का बिल कौन भर रहा है? तो जवाब है—देश की जनता। क्योंकि संसद में हर मिनट हंगामा होता है तो सिर्फ बहस नहीं रुकती, बल्कि करीब ढाई लाख रुपये भी पानी की तरह बहते रहते हैं। संसद के मानसून सत्र के दौरान विपक्ष ने सरकार पर नीट पेपर परीक्षा, राम मंदिर चंदा चोरी जैसे मामलों में गृहमंत्री अमित शाह के बयान को लेकर कई दिनों तक हंगामा किया। जिससे संसद की र्कारवाई बाधित होती रही। संसद में विधायी कामकाज नहीं हो सको। संसद की कार्रवाई कई बार अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई। सबसे अहम बात ये कि सदन स्थगित होने पर भी ये खर्च रुकता नहीं है। संसद की सुरक्षा, वहां के कर्मचारी, तकनीकी व्यवस्था और पूरा संसदीय तंत्र उसी तरह चलता रहता है। इसलिए जब कार्यवाही बार-बार बाधित होती है, तब करोड़ों रुपये का बोझ सीधे जनता की जेब पर पड़ता है। इसे भी पढ़ें: उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा मानसून सत्र संसद की कार्यवाही एक दिन के लिए अगर स्थगित होती है तो इसके पीछे 9 करोड़ रुपये का घाटा होता है। इस रकम को प्रति घंटे और प्रति मिनट के आधार पर यह प्रति घंटे एक करोड़ पचास लाख यानी डेढ़ करोड़ होती है। यह आंकड़ा इस साल के बजट सत्र के दौरान लोकसभा में पीठासीन स्पीकर जगदंबिका पाल ने दिया था। साल 2014 से लेकर 2024 के आंकड़ों पर गौर करें तो बार-बार सदन के स्थगित होने की वजह से सरकारी तिजोरी का करीब 3300 करोड़ रुपया पूरी तरह बर्बाद हो चुका है। संसद के इस तरह से बार-बार ठप होने पर ना सिर्फ जरूरी काम रुकते हैं, बल्कि लोगों के पैसे पर भी असर पड़ता है। इसी तरह संसद के साल 2025 के मॉनसून सत्र दौरान सांसदों ने देशहित की बजाय अपनी राजनीति में अधिक समय गंवा दिया। लोकसभा में सांसदों को 120 घंटे देश के मुद्दों पर चर्चा करनी थी, लेकिन वास्तव में सिर्फ 37 घंटे ही काम हुआ। अर्थात 83 घंटे बेकार गए। केवल 31% काम हुआ और बाकी 69% समय सांसदों की आपसी राजनीति और हंगामे में बर्बाद हो गया। राज्यसभा का भी यही हाल था। यहां भी 120 घंटे काम होना चाहिए था, लेकिन सिर्फ 47 घंटे ही काम किया गया। मतलब 73 घंटे बर्बाद हो गए। राज्यसभा में भी सांसदों ने सिर्फ 38% काम किया। लोकसभा में 83 घंटे काम नहीं हुआ, जिससे लगभग 124 करोड़ 50 लाख रुपये जनता के पैसे बर्बाद हो गए। वहीं राज्यसभा में 73 घंटे की बर्बादी से करीब 80 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। पिछले मानसून सत्र में दोनों सदनों में मिलाकर कुल 204 करोड़ 50 लाख रुपये बर्बाद हो गए। यह पैसा जनता के काम पर खर्च हो सकता था, लेकिन हंगामे और राजनीति की वजह से व्यर्थ चला गया। संसद के चलने में करोड़ों के इस खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा अर्थात करीब 35 से 40 प्रतिशत खर्च इन्हीं सांसदों के वेतन, भत्तों और सुविधाओं पर होता है जो संसद में खड़े होकर चीखते हैं, हंगामा बरपाते हैं, बिलों को पेश तक नहीं होने दे रहे। इन सांसदों को एक लाख रुपये मासिक वेतन, 70 हजार रुपये निर्वाचन क्षेत्र भत्ता, 60 हजार रुपये कार्यालय और सहायक खर्च दिया जाता है। इसके अलावा दिल्ली आने पर प्रतिदिन 2 हजार रुपये का विशेष भत्ता और यात्रा सुविधाएं भी मिलती हैं। संसद सचिवालय के हजारों कर्मचारियों पर करीब 25 से 30 प्रतिशत खर्च होता है। इसमें प्रशासनिक अधिकारी, रिपोर्टर, ट्रांसलेटर्स, रिसर्च स्टाफ, स्टेनोग्राफर, मार्शल, डेटा एंट्री ऑपरेटर और सफाई कर्मचारियों का वेतन शामिल है। करीब 20 प्रतिशत खर्च संसद की हाई-टेक व्यवस्थाओं पर होता है। बिजली-पानी, संसद टीवी की लाइव ब्रॉडकास्टिंग, हाई-एंड रिकॉर्डिंग सिस्टम, डिजिटल वोटिंग पैनल, साथ में इनका खाना-पीना और रोज छपने वाले सैकड़ों विधायी दस्तावेजों की लागत इसी में आता है। 10 से 15 प्रतिशत खर्च संसद की सुरक्षा व्यवस्था पर होता है। दिल्ली पुलिस, सीआरपीएफ, संसद सुरक्षा सेवा, 24 घंटे चलने वाला सीसीटीवी नेटवर्क, आधुनिक स्कैनर और बायोमेट्रिक सिस्टम, ये सब तब भी चलते रहते हैं जब सदन में काम ठप हो जाता है। मतलब देश के खजाने के खर्च का मीटर लगातार घूमता रहता है। लोकसभा में कार्यवाही स्थगित करने का अधिकार स्पीकर यानी अध्यक्ष के पास होता है। राज्यसभा में यह अधिकार सभापति की कुर्सी पर बैठे उपराष्ट्रपति या उनकी गैरमौजूदगी में बैठक को संचालित कर रहे उपसभापति या पीठासीन अधिकारी के पास होता है। संसद की कार्यवाही स्थगित होने का मतलब है कि सदन की बैठक को कुछ समय के लिए या फिर पूरे दिन के लिए रोक दिया जाए। सदन में व्यवस्था बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होने पर वह अधिकार का प्रयोग कर सकते हैं। सवाल यह भी है कि क्या विपक्ष जानबूझकर हंगामा करता है? लोकतंत्र में विपक्ष का काम सरकार से जवाब मांगना भी होता है। कई बार विपक्ष की तरफ से चर्चा की मांग, जांच की मांग, मंत्री का बयान, प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति को लेकर विरोध किया जाता है। अगर उसकी मांग स्वीकार नहीं होती तो विरोध तेज हो सकता है। वहीं दूसरी तरफ सरकार का कहना होता है कि चर्चा नियमों के अनुसार होनी चाहिए और बाधा होने से जनता का काम रुकता है। इसलिए हर मामले को राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में देखना चाहिए। कई बार विपक्ष आरोप लगाता है कि चर्चा की अनुमति नहीं दी गई, जरूरी मुद्दों पर समय नहीं दिया गया, जवाब नहीं दिया गया। जबकि सरकार का पक्ष होता है कि विपक्ष जानबूझकर कार्यवाही नहीं चलने देता। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस और विपक्षी दल ही संसद में हंगामा करते हैं। जब भाजपा विपक्ष में थी, तब भी यही हाल था। भाजपा के सांसद संसद में जमकर हंगामा करके संसद को ठप्प कर देते थे। सारे दल इस लिहाज से एक जैसे नजर आते हैं। सर्वाधिक आश्चर्य की बात यह है कि संसद में अरबों रुपए बर्बाद करके जो हंगामा किया जाता है, वह देश के लोगों की भलाई के नाम पर होता है। इससे बेहतर तो यही है कि इस धन राशि को सीधे विकास कार्यों में खर्च किया जाता। लगता यही है कि किसी को इस तरह की बर्बादी का अफसोस नहीं है। देश के लोग इस मामले में लाचार बने हुए हैं। किसे दोषी ठहाराएं और किसी सही, लेकिन इतना जरूर है कि यह नौबत देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और आम लोगों के हित में नहीं है। - योगेन्द्र योगी

प्रभासाक्षी 24 Aug 2026 4:13 pm

Mecca Defence Pact के बहाने बदल रहा है Bangladesh का रणनीतिक खेल, भारत को चारों ओर से घेरने की तैयारी!

तारिक रहमान की भारत यात्रा टलने का असल कारण अब धीरे-धीरे सामने आ रहा है। भले ही ढाका इस फैसले के पीछे शेख हसीना की भारत से की गई वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस और उससे बिगड़े कूटनीतिक माहौल का हवाला दे रहा हो, लेकिन इसके पीछे एक बड़ा रणनीतिक समीकरण भी आकार लेता दिख रहा है। संकेत बताते हैं कि तारिक रहमान का ध्यान फिलहाल नई दिल्ली की यात्रा से अधिक बदलते क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और मक्का पैक्ट में बांग्लादेश की संभावित भागीदारी पर केंद्रित है। ‘बांग्लादेश फर्स्ट’ की नीति के तहत ढाका पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब के साथ उभरते इस सुरक्षा ढांचे में अपने लिए संभावनाएं तलाश रहा है। ऐसे में भारत यात्रा को टालना बांग्लादेश की नई विदेश नीति, उसकी रणनीतिक प्राथमिकताओं और दक्षिण एशिया में अपने विकल्पों का दायरा बढ़ाने की कोशिश का भी संकेत माना जा रहा है। ढाका का स्पष्ट संदेश है कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान की भारत यात्रा को लेकर कोई जल्दबाजी नहीं है। बांग्लादेशी नेतृत्व का कहना है कि पर्याप्त द्विपक्षीय प्रगति और राष्ट्रीय हितों के अनुरूप समझ बनने पर ही यात्रा का समय तय होगा। दूसरी ओर, भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी संबंधों को “पारस्परिक हित” की कसौटी पर परखने की बात कही है। दोनों पक्षों की भाषा में समानता दिखाई देती है, लेकिन असली प्रश्न यह है कि ‘राष्ट्रीय हित’ की उनकी परिभाषाएं कितनी दूर तक एक-दूसरे से मेल खाती हैं। इसे भी पढ़ें: चौराहे पर बांग्लादेश: बदलाव, अनिश्चितता और नई राह की तलाश हम आपको बता दें कि वर्तमान तनाव के केंद्र में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का भारत में निर्वासन और उनके प्रत्यर्पण का बांग्लादेशी आग्रह है। इसी महीने नई दिल्ली से शेख हसीना की वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस ने ढाका की नाराजगी और बढ़ा दी। बांग्लादेश इसे अपने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के रूप में देखता है, जबकि भारत ने आयोजन में अपनी भूमिका से इंकार किया है। हसीना के प्रत्यर्पण का मुद्दा दोनों देशों के बीच राजनीतिक विश्वास की परीक्षा बन चुका है। इसी पृष्ठभूमि में रहमान की भारत यात्रा के लिए “अनुकूल वातावरण” बनाने की बात कही जा रही है। लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। असली सामरिक संकेत बांग्लादेश के संभावित मक्का संयुक्त रक्षा समझौते की ओर झुकाव में छिपे हैं। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच हुए इस ढांचे में 'किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमला सभी पर हमला' माने जाने की अवधारणा शामिल है। बांग्लादेशी मंत्रियों ने इसमें शामिल होने की संभावना के प्रति सकारात्मक रुख दिखाते हुए अंतिम निर्णय को राष्ट्रीय हितों से जोड़ा है। यदि ढाका इस व्यवस्था से जुड़ता है, तो दक्षिण एशिया और उसके आसपास के सामरिक समीकरणों में एक नई परत जुड़ सकती है। भारत के लिए चिंता का सबसे महत्वपूर्ण पहलू पाकिस्तान की बढ़ती भूमिका है। 1971 के इतिहास के बाद लंबे समय तक भारत-बांग्लादेश संबंधों में जो सामरिक निकटता रही, उसमें अब स्पष्ट परिवर्तन दिखाई दे रहा है। ढाका ने पाकिस्तान के साथ व्यापार, कूटनीतिक संपर्क और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने की इच्छा जताई है। यदि यह प्रक्रिया मक्का रक्षा ढांचे जैसी किसी व्यापक सुरक्षा संरचना से जुड़ती है, तो भारत को अपनी पूर्वी सीमा के सामरिक परिवेश का नए सिरे से आकलन करना पड़ सकता है। इसके साथ चीन का कारक भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। बांग्लादेश अपनी विदेश नीति को अमेरिका, चीन, पाकिस्तान और अन्य शक्तियों के साथ संतुलित संबंधों की दिशा में विविधतापूर्ण बनाने का प्रयास कर रहा है। बीजिंग के लिए बंगाल की खाड़ी और दक्षिण एशिया में अपनी रणनीतिक उपस्थिति बढ़ाने का अवसर पहले से मौजूद है। ऐसे में यदि भारत-ढाका संवाद कमजोर पड़ता है और बांग्लादेश वैकल्पिक साझेदारों की ओर तेजी से बढ़ता है, तो चीन की आर्थिक और संभावित सामरिक पहुंच भारत की पूर्वी और समुद्री रणनीति के लिए अधिक महत्वपूर्ण चुनौती बन सकती है। देखा जाये तो भारत के सामने चुनौती केवल सीमा सुरक्षा की नहीं है। 4,096 किलोमीटर लंबी भारत-बांग्लादेश सीमा, अवैध आव्रजन, सीमा प्रबंधन और बाड़बंदी जैसे मुद्दे पहले ही संबंधों को प्रभावित कर रहे हैं। ढाका का आरोप है कि भारत बिना पर्याप्त कूटनीतिक सत्यापन के लोगों को सीमा पार भेज रहा है, जबकि भारत अपनी सुरक्षा और आव्रजन चिंताओं को प्रमुखता देता है। फिर भी इस उभरते तनाव को भारत और बांग्लादेश के स्थायी विच्छेद के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। दोनों देश भूगोल से बंधे हैं और उनके आर्थिक, सुरक्षा तथा संपर्क हित गहराई से जुड़े हुए हैं। साथ ही यदि बांग्लादेश मक्का पैक्ट में शामिल होता है, तो सवाल उठता है कि इससे ढाका और चीन के रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा? देखा जाये तो मक्का पैक्ट में तुर्किये की मौजूदगी सबसे महत्वपूर्ण बात है। तुर्किये जहां नाटो का सदस्य और पश्चिमी सुरक्षा ढांचे का हिस्सा है, वहीं चीन के साथ उसके संबंध प्रतिस्पर्धा और सहयोग, दोनों पर टिके हैं। आर्थिक संपर्क, व्यापार और व्यापक यूरेशियाई राजनीति में दोनों के हित कई जगह मिलते हैं, लेकिन उइगर मुद्दे और मध्य एशिया जैसे प्रश्नों पर मतभेद भी मौजूद हैं। इसलिए बांग्लादेश यदि इस तुर्किये-पाकिस्तान-सऊदी सुरक्षा ढांचे में प्रवेश करता है, तो वह चीन-विरोधी खेमे में सीधे शामिल होने की बजाय एक बहुस्तरीय रणनीतिक संतुलन की नीति अपना सकता है। दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान स्वयं चीन का निकटतम रणनीतिक साझेदार है, जबकि तुर्किये मक्का पैक्ट के माध्यम से अपने रक्षा-औद्योगिक और भू-राजनीतिक प्रभाव का विस्तार चाहता है। ऐसे में ढाका के लिए मक्का पैक्ट और चीन के साथ मजबूत आर्थिक-सामरिक संबंध परस्पर विरोधी होने की बजाय समानांतर विकल्प भी बन सकते हैं। लेकिन यदि इस रक्षा ढांचे का विस्तार किसी ऐसे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन की दिशा में होता है, जहां चीन और तुर्किये के हित आमने-सामने आने लगें, तो बांग्लादेश को कठिन कूटनीतिक स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। यहां प्रश्न यह भी उठता है कि यदि बांग्लादेश मक्का पैक्ट में शामिल होता है तो भारत पर क्या असर होगा? देखा जाये तो ऐसी स्थिति में भारत की चिंता यह होगी कि कहीं बांग्लादेश किसी औपचारिक या अनौपचारिक बहु-ध्रुवीय सुरक्षा नेटवर्क का हिस्सा बनकर नई दिल्ली की पारंपरिक रणनीतिक बढ़त को सीमित न कर दे। हालांकि यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि ढाका किसी भारत विरोधी गठबंधन का हिस्सा बन जाएगा। फिर भी भारत के लिए संदेश स्पष्ट है कि बांग्लादेश को केवल 1971 की ऐतिहासिक साझेदारी के चश्मे से देखने की बजाय उसे एक स्वतंत्र रणनीतिक शक्ति के रूप में समझना होगा। यदि नई दिल्ली और ढाका के बीच राजनीतिक संवाद कमजोर रहता है, तो पाकिस्तान, चीन और तुर्किये जैसे देशों के लिए वहां अपना प्रभाव बढ़ाने की गुंजाइश स्वाभाविक रूप से बढ़ सकती है। बहरहाल, नई दिल्ली के लिए यह स्पष्ट संकेत है कि ढाका अब पुराने समीकरणों में बंधकर चलने को तैयार नहीं है। भारत को बांग्लादेश के साथ अपने रिश्ते को शेख हसीना के दौर की राजनीतिक निकटता या 1971 की ऐतिहासिक विरासत के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए। यदि भारत और बांग्लादेश के बीच संवाद और विश्वास का अंतराल बढ़ता है, तो उस खाली जगह को भरने के लिए पाकिस्तान, चीन और तुर्किये जैसी बाहरी शक्तियां स्वाभाविक रूप से अधिक सक्रिय होंगी और इसका असर केवल द्विपक्षीय संबंधों पर नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया और बंगाल की खाड़ी के शक्ति संतुलन पर पड़ेगा। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 24 Aug 2026 4:06 pm

क्यों ठुकराई PM की कुर्सी? प्रियंका पर राहुल को तरजीह, बच्चन परिवार से क्यों बिगड़े रिश्ते, 10 नवंबर को सोनिया गांधी बड़ा खुलासा करने वाली हैं!

भारतीय राजनीति में ये सवाल अक्सर पूछा जाता है कि आखिर सोनिया गांधी प्रधानमंत्री क्यों नहीं बनीं? साल 2004 में यूपीए गठबंधन के पास पूर्ण बहुमत होने के बावजूद सोनिया ने पीएम की कुर्सी क्यों ठुकरा दी? सोनिया गांधी ने प्रियंका के बदले राहुल को क्यों राजनीति में आगे किया। जब राहुल को आगे कर ही दिया तो फिर मनमोहन सिंह की सरकार में उन्हें कभी मंत्री क्यों नहीं बनने दिया? सोनिया जब पीएम नहीं बनी तो पहले दावेदार तो प्रणव मुखर्जी थे पर उन्होंने मनमोहन सिंह का नाम क्यों फाइनल करवा दिया? सवाल ये भी पूछा जाता है कि डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री तो बने लेकिन बागडोर सोनिया के ही हाथ में रही। इन सबके बीच में पारिवारिक दोस्त रहे अमिताभ बच्चन से उनके रिश्ते किस बात पर बिगड़े? सोनिया गांधी से जुड़े जितने भी सवाल हैं, उन सभी सवालों से अब पर्दा उठने वाला है। सोनिया गांधी ये वो नाम है जो 80 के दशक से ही भारतीय राजनीति में चर्चा का विषय बना रहा और आज भी है। दरअसल,कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी अपने संस्मरण में निजी जिंदगी से लेकर राजनीति तक के सफर की कहानी बताने जा रही हैं। ये कहानी किसी मीडिया ब्रीफ्रिंग या वीडियो के माध्यम से नहीं नहीं बल्कि अपनी किताब बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ लव के माध्यम से बताइंगी। सोनिया के जीवन पर लिखी किताब 10 नवंबर को वैश्विक स्तर पर ख्याति प्राप्त पब्लिशर अल्फ्रेड ए नोफ के प्रकाशन से जारी होगी। इसमें नेहरू, गांधी परिवार में शादी के बाद का जीवन, राजनीति में प्रवेश और प्रधानमंत्री पद ठुकराने के फैसले जैसे महत्वपूर्ण प्रसंग शामिल हैं। 10 नवंबर को प्रकाशित होने वाली किताब को लेकर सोनिया गांधी कहती हैं कि उनके परिवार के बारे में बहुत कुछ लिखा गया। लेकिन उनके इरादों, काम औऱ मानवीय पहलुओं को उस तरह नहीं समझा गया। कई मायनों में ये किताब उनकी इंसानियत को समर्पित है। जब मैंने राजनीति से कुछ दूरी बनाकर पीछे मुड़कर अपने जीवन को देखा तो मुझे अपनी कहानी में प्यार और वफादारी का एक दागा साफ नजर आया। ये धागा इटली के एक छोटे शहर से बिताए साधारण बचपन से शुरू होकर भारत में राजीव गांधी की पत्नी और इंदिरा गांधी की बहू के रूप में बिताए तक जाता है। इसे भी पढ़ें: Cheeni Kum hai! एथनॉल का असर या त्योहारों का, अचानक क्यों आसमान छूने लगे चीनी के दाम? 10 लाइन में समझें पूरा मामला सोनिया की ताजपोशी और केसरी जबरन पार्टी दफ्तर में नजरबंद सोनिया गांधी ने सक्रिय राजनीति में एंट्री का फैसला किया तो केसरी के ना चाहते हुए भी पार्टी ने सोनिया को पार्टी प्रमुख बना दिया। इसकी भी एक दिल्चस्प कहानी है जब 1997 के आखिर में सोनिया गांधी ने घोषणा की कि वो कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार करेंगी। तब कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी ने सोनिया को कांग्रेस के लिए 'तारणहार' बताते हुए पार्टी में उनका स्वागत तो किया। लेकिन जब सोनिया को कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने की मांग उठी, तब केसरी ने हिचकिचाहट ज़ाहिर की। कहते हैं जिस दिन सोनिया पार्टी अध्यक्ष चुनी गई केसरी को जबरन पार्टी दफ्तर में नजरबंद रखा था। पवार-अनवर-संगमा का विरोध, सोनिया का इस्तीफा शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर ने विदेशी होने के कारण सोनिया को पीएम के चेहरे के तौर पर प्रोजेक्ट किए जाने का विरोध किया तो सोनिया ने पार्टी प्रमुख पद से इस्तीफा दे दिया। तीनों बागियों को कांग्रेस से निकाले जाने के बाद सोनिया ने इस्तीफा वापस लिया। इसे भी पढ़ें: जयपुर से लेकर भोपाल और गया से उन्नाव तक...Gen Z तो झांकी थी, पूरी पिक्चर दिखा रहे Gen अल्फा? आखिर क्यों नहीं पीएम बन पाईं सोनिया? 2004 का लोकसभा चुनाव अटल बिहारी वाजपेयी के सामने सोनिया गांधी की राजनीतिक हैसियत बहुत छोटी थी। अटल जी ने देश को इंडिया शाइनिंग का नारा दिया यानी की उनके कार्यकाल की वजह से देश चमक रहा है। ये पॉजिटिव कैंपेन था लेकिन इसका असर नेगेटिव हो गया और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे कद्दावर नेता के लिए एनडीए की सरकार हार गई। किसी ने सोचा भी नहीं था कि सोनिया गांधी अटल बिहारी वाजपेयी के सामने कांग्रेस को जीत दिलाईंगी। उन्हीं के फॉर्मूले पर एनडीए की जगह यूपीए बनेगी। इसके साथ ही उसके अंतर्गत एक गठबंधन की सरकार देश में बनेगी। ये सोनिया गांधी के युग की शुरुआत थी और गांधी परिवार के शीर्ष पर आने की वापसी। जब 2004 में कांग्रेस सरकार बनाने की स्थिति में आई कांग्रेस ही नहीं उसके तमाम सहयोगी दल भी जब यह चाहते थे कि सोनिया गांधी ही प्रधानमंत्री बने, तो फिर उन्होंने ना क्यों कह दिया? ना कहा भी तो प्रधानमंत्री पार्टी की तरफ से कौन होगा? यह तो चुनने का अधिकार उन्हीं के पास था। स सबसे सीनियर प्रणव मुखर्जी थे। अनुभवी थे। फिर सोनिया ने उनकी जगह मनमोहन सिंह का नाम पीएम के लिए आगे क्यों बढ़ाया? क्या इसलिए कि सोनिया को उन पर ज्यादा भरोसा था? उन पर जो सुपर पीएम होने के इल्जाम लगते हैं, उसमें किस हद तक सच्चाई है? प्रियंका के बदले राहुल को क्यों राजनीति में आगे किया जब सोनिया गांधी के सामने उत्तराधिकार की बात आई, उनके सामने दो विकल्प थे। राहुल और प्रियंका। तो सोनिया गांधी ने प्रियंका के बदले राहुल को क्यों आगे किया? वह भी तब जब प्रियंका के बारे में कहा जाता था कि उनमें उनकी दादी इंदिरा गांधी का अक्ष दिखता है। राहुल को हमेशा से ही राजीव का राजनीतिक उत्तराधिकारी मान लिया गया था। या फिर यह सोनिया गांधी का ही फैसला रहा कि राहुल ही आगे पार्टी को लीड करेंगे। अगर सोनिया ने किसी मकाम पर यह तय भी कर लिया कि राहुल ही आगे पार्टी का सारा कामकाज देखेंगे तो जब मौका था मतलब यूपीए की सरकार थी। सोनिया सबसे ताकतवर थी। तो उन्होंने राहुल को कभी मनमोहन सिंह की सरकार में मंत्री क्यों नहीं बनने दिया? जबकि उस वक्त के कई सीनियर नेताओं ने भी यह मांग उनसे की थी। इसे भी पढ़ें: शिखा है, जनेऊ पहनते हैं? PM ने राम के मर्म को अयोध्या में समझाया, वो क्या इंटरव्यूअर्स को समझ नहीं आया, मंदिर का नया CEO ब्राह्मण ही बनेगा? कांग्रेस ही नहीं 544 पन्नों वाली ऑटोबायोग्राफी पर बीजेपी की भी नजर इन सवालों का जवाब उम्मीद की जा रही है कि 10 नवंबर को मिले। कांग्रेस ही नहीं बीजेपी की भी नजर सोनिया गांधी की इस 544 पन्नों वाली ऑटोबायोग्राफी पर है जो अल्फ्रेड ए नो पब्लिशिंग हाउस से छप रही है। अहम बात यह है कि अपने करियर के आखिरी मोड़ पर सोनिया गांधी जो किताब लिख रही हैं उसमें सच्चाई कितनी है और अपनी छवि बेहतर करने की कोशिश कितनी?

प्रभासाक्षी 24 Aug 2026 2:16 pm

थलापति विजय को 2029 का पीएम उम्मीदवार बता रही TVK, कांग्रेस बोली- ‘सिर्फ सपने देखने से....'

थलापति विजय को 2029 का पीएम उम्मीदवार बता रही TVK, कांग्रेस बोली- ‘सिर्फ सपने देखने से....'

समाचार नामा 24 Aug 2026 2:10 pm

आरक्षण विरोधी प्रदर्शन दिल्ली से यूपी तक, देर रात पुलिस की कार्रवाई

आरक्षण नीति और नए यूजीसी नियमों के खिलाफ दिल्ली से लेकर यूपी तक प्रदर्शन तेज हो गया। राजधानी दिल्ली के कनॉट प्लेस आउटर सर्कल पर सैकड़ों लोग जुटे। पुलिस ने देर रात तक दर्जनों प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया

देशबन्धु 24 Aug 2026 7:13 am

कलकत्ता हाई कोर्ट ने कोलकाता में 'अवैध' निर्माण को गिराने पर लगाई रोक

कलकत्ता हाई कोर्ट ने कोलकाता में 'अवैध' निर्माण को गिराने पर लगाई रोक

समाचार नामा 23 Aug 2026 10:26 pm

हरिद्वार में संतों ने 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' का किया समर्थन, बोले- लोकतंत्र और विकास दोनों होंगे मजबूत

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समाचार नामा 23 Aug 2026 6:38 pm

कर्नाटक के मुख्यमंत्री बोले- समानता और भाईचारा हमारे जीवन का अभिन्न अंग होना चाहिए।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री बोले- समानता और भाईचारा हमारे जीवन का अभिन्न अंग होना चाहिए।

समाचार नामा 23 Aug 2026 6:33 pm

तेलंगाना में ऑटो चालकों से हड़ताल वापस लेने की अपील, किराया बढ़ाने की मांग पर बनेगी समिति: परिवहन मंत्री

तेलंगाना में ऑटो चालकों से हड़ताल वापस लेने की अपील, किराया बढ़ाने की मांग पर बनेगी समिति: परिवहन मंत्री

समाचार नामा 23 Aug 2026 6:31 pm

यूपी: मुजफ्फरनगर में दलित नाबालिग लड़की के साथ गैंगरेप पर आक्रोश, दो लोग गिरफ्तार

यूपी: मुजफ्फरनगर में दलित नाबालिग लड़की के साथ गैंगरेप पर आक्रोश, दो लोग गिरफ्तार

समाचार नामा 23 Aug 2026 6:30 pm

मोदी सरकार के 12 वर्षों में जम्मू-कश्मीर में लौटी सामान्य स्थिति, शांति और विकास: जितेंद्र सिंह

मोदी सरकार के 12 वर्षों में जम्मू-कश्मीर में लौटी सामान्य स्थिति, शांति और विकास: जितेंद्र सिंह

समाचार नामा 23 Aug 2026 6:26 pm

खाद्य सुरक्षा नियमों के उल्लंघन पर एफएसएसएआई की सख्त कार्रवाई

नई दिल्ली, भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने रविवार को कहा कि निरीक्षण के दौरान खाद्य सुरक्षा नियमों के गंभीर उल्लंघन और अनुपालन में कमी पाए जाने के बाद उसने दिल्ली और दमन की दो खाद्य कारोबार इकाइयों के खिलाफ कड़ी नियामकीय कार्रवाई की है।

देशबन्धु 23 Aug 2026 5:08 pm

'हाथ में तिरंगा, अंतरिक्ष और 140 करोड़ का सपना हमारा संकल्प', राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस पर पीएम मोदी ने दी शुभकामनाएं

'हाथ में तिरंगा, अंतरिक्ष और 140 करोड़ का सपना हमारा संकल्प', राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस पर पीएम मोदी ने दी शुभकामनाएं

समाचार नामा 23 Aug 2026 8:37 am

महिलाओं की पहचान खुद से, हिंसा और भेदभाव पर कड़ा सवाल : राहुल गांधी

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने शनिवार को पुणे में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में महिलाओं की आजादी और पितृसत्ता पर खुलकर बात की

देशबन्धु 22 Aug 2026 10:36 pm

इथेनॉल मिलाने के फैसले से आम लोगों को नुकसान और चीनी की सप्लाई में रुकावट: अशोक गहलोत

इथेनॉल मिलाने के फैसले से आम लोगों को नुकसान और चीनी की सप्लाई में रुकावट: अशोक गहलोत

समाचार नामा 22 Aug 2026 6:27 pm

Maharashtra में Auto Rickshaw, Taxi Drivers के लिए Marathi Mandatory क्यों की गयी? मराठी सीखने के लिए दबाव क्यों डालना?

महाराष्ट्र में ऑटो रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए मराठी का व्यावहारिक ज्ञान अनिवार्य करने का फैसला अब केवल सरकारी घोषणा नहीं, बल्कि जमीनी कार्रवाई का रूप ले चुका है। राज्यभर में शुरू हुई जांच के पहले ही दिन 1,268 व्यावसायिक यात्री वाहन चालकों मुख्यतः ऑटो और टैक्सी चालकों, को मराठी का पर्याप्त ज्ञान नहीं होने पर नोटिस जारी कर दिया गया। राज्य सरकार इसे यात्रियों की सुविधा, सुरक्षा और महाराष्ट्र की भाषा-संस्कृति से जोड़ रही है, लेकिन इस कार्रवाई ने रोज़गार, प्रवासी चालकों की आजीविका, नियमों की अस्पष्टता और कानूनी वैधता को लेकर गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए हैं। महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक के अनुसार, राज्य में ऑटो और टैक्सी चलाने के लिए मराठी का ‘वर्किंग नॉलेज’ यानी व्यावहारिक ज्ञान अनिवार्य है। राज्य सरकार का तर्क है कि चालकों को रोजमर्रा के कामकाज में यात्रियों से संवाद करना पड़ता है और कई शिकायतें मिली हैं कि कुछ चालक मराठी में यात्रियों की बात, दिशा-निर्देश या सामान्य निर्देश तक नहीं समझ पाते। मंत्री का कहना है कि मराठी का व्यावहारिक ज्ञान केवल नियम पालन का मामला नहीं, बल्कि यात्रियों की सुविधा और सुरक्षा से भी जुड़ा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या भाषा जानना सचमुच यात्री सुरक्षा का प्रश्न है, या फिर सुरक्षा के नाम पर एक ऐसी व्यवस्था लागू की जा रही है जिसकी कसौटियां अभी तक स्पष्ट नहीं हैं? हम आपको याद दिला दें कि राज्य सरकार ने मई में मराठी की बुनियादी जानकारी अनिवार्य करने की घोषणा की थी और गैर-मराठी चालकों के लिए मराठी प्रशिक्षण पाठ्यक्रम शुरू कराया गया। 105 दिनों तक चले अभियान में लगभग 1.65 लाख चालकों को प्रशिक्षण देकर प्रमाणपत्र जारी किए गए। मुंबई में पहले के अभियान में करीब 1.25 लाख चालकों ने भाग लिया था, जिनमें 7,750 चालक परीक्षा में असफल रहे, जबकि 14,000 से अधिक प्रशिक्षण पूरा नहीं कर सके। अब 15 अगस्त तक मराठी सीखने की समयसीमा समाप्त होने के बाद सरकार ने सीधे जांच और कार्रवाई का रास्ता अपनाया है। इसे भी पढ़ें: Maharashtra RTO ने 1499 Auto Taxi चालकों को जारी किया नोटिस, मराठी न जानने पर कार्रवाई राज्यव्यापी जांच के पहले दिन शाम तक 8,217 चालकों का परीक्षण किया गया। इनमें मुंबई महानगर क्षेत्र में 3,995 चालक शामिल थे, जिनमें से 604 को मराठी का पर्याप्त व्यावहारिक ज्ञान नहीं होने पर नोटिस दिया गया। राज्य के बाकी हिस्सों में 4,222 चालकों की जांच हुई और 664 को नोटिस जारी किए गए। यह जांच अभियान 30 सितंबर तक जारी रहेगा। चालकों को एक महीने का समय दिया गया है। यदि वे इसके बाद भी मराठी में संतोषजनक ढंग से जवाब नहीं दे सके, तो उनका बैज तीन महीने के लिए निलंबित किया जा सकता है। इसके बाद उन्हें फिर एक महीने का अवसर मिलेगा। लगातार उल्लंघन की स्थिति में कार्रवाई और कठोर हो सकती है। हम आपको बता दें कि जांच के दौरान चालकों को 16 सवालों के जरिए परखा जा रहा है। इनमें रोजमर्रा की बातचीत से जुड़े वाक्य शामिल हैं, जैसे— “मला CNG भरायचे आहे, थोडे थांबावे लागेल” अर्थात मुझे सीएनजी भरवानी है, थोड़ी देर रुकना होगा; “माझी रिक्षा/टॅक्सी शेअरिंगची आहे” यानी मेरी रिक्शा या टैक्सी शेयरिंग की है; और “मीटर चालू केले आहे” अर्थात मीटर चालू कर दिया है। प्रश्न यात्रियों से गंतव्य पूछने, रास्ता समझने, किराया, मीटर और स्टैंड से जुड़े संवाद पर आधारित हैं। परिवहन विभाग ने जांच की वीडियोग्राफी कराने के भी निर्देश दिए हैं। हम आपको बता दें कि यह प्रशिक्षण कोंकण साहित्य परिषद के माध्यम से कराया गया था और इसका समापन स्वतंत्रता दिवस पर हुआ। राज्य सरकार का दावा है कि उसका उद्देश्य किसी की रोजी-रोटी छीनना नहीं, बल्कि मराठी भाषा और महाराष्ट्र की पहचान व संस्कृति को संरक्षित करना है। यहीं से विवाद का दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण पक्ष शुरू होता है यानि कानून। हम आपको याद दिला दें कि 2017 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने ऑटो रिक्शा परमिट के लिए मराठी दक्षता की एक ऐसी ही शर्त को रद्द कर दिया था। अदालत ने कहा था कि ऑटो रिक्शा ‘मोटर कैब’ की श्रेणी में आते हैं और महाराष्ट्र मोटर व्हीकल्स रूल्स के नियम 24 में भाषा संबंधी प्रावधान सार्वजनिक सेवा वाहन बैज के कुछ मामलों से जुड़ा है, लेकिन मोटर कैब को उसमें विशेष रूप से बाहर रखा गया है। अदालत ने स्पष्ट किया था कि नियम 24 के आधार पर ऑटो रिक्शा कॉन्ट्रैक्ट कैरिज परमिट के लिए मराठी दक्षता अनिवार्य नहीं बनाई जा सकती। अब राज्य सरकार का कहना है कि वर्तमान कार्रवाई मौजूदा नियमों के अनुपालन और संशोधित महाराष्ट्र मोटर व्हीकल्स रूल्स, 1989 के तहत की जा रही है। अधिकारियों का तर्क है कि 2017 का फैसला परमिट से संबंधित था, जबकि मौजूदा व्यवस्था बैज, प्राधिकरण और उनके नवीनीकरण से जुड़ी है। सरकार यह भी कहती है कि व्यावहारिक मराठी ज्ञान की शर्त 1989 से ही नियमों में मौजूद थी, लेकिन उसका कड़ाई से पालन नहीं हुआ। फिर भी सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है, ‘वर्किंग नॉलेज ऑफ मराठी’ की स्पष्ट परिभाषा क्या है? टैक्सी यूनियनों ने आशंका जताई है कि नियमों में यह नहीं बताया गया कि व्यावहारिक ज्ञान का मानक क्या होगा। सेवा सारथी टैक्सी यूनियन के नेता डीएम गोसावी ने चेतावनी दी है कि अस्पष्टता आरटीओ में भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे सकती है। सेवानिवृत्त आरटीओ अधिकारियों का भी कहना है कि संशोधित नियमों में यह स्पष्ट नहीं है कि परीक्षा मौखिक होगी या लिखित, पास होने का मानक क्या होगा और सभी जगह एक जैसी जांच कैसे सुनिश्चित की जाएगी। राज्य सरकार के सामने इसलिए दोहरी चुनौती है। एक ओर उसे राज्य की भाषा और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करनी है, दूसरी ओर लाखों चालकों, जिनमें बड़ी संख्या प्रवासी और सीमित औपचारिक शिक्षा वाले श्रमिकों की है, उनकी आजीविका भी सुरक्षित रखनी है। रिपोर्टों के मुताबिक, मुंबई में ही 2.8 लाख से अधिक ऑटो रिक्शा और लगभग 20,000 टैक्सी परमिट हैं, जिनसे शिफ्टों में अनुमानित पांच लाख चालक जुड़े हैं। यहां सबसे तीखा सवाल यह है कि क्या राज्य सरकार प्रशिक्षण और सहयोग की नीति को प्राथमिकता देगी या भाषा परीक्षा को लाइसेंस और बैज निलंबन का हथियार बनाएगी? क्या 16 सवालों की परीक्षा वास्तव में किसी चालक की संवाद क्षमता का निष्पक्ष पैमाना है? और सबसे अहम सवाल यह है कि क्या संशोधित नियम अदालत की कसौटी पर टिकेंगे? बहरहाल, मराठी सीखना और उसका सम्मान करना एक बात है, लेकिन किसी की आजीविका को भाषा की ऐसी परीक्षा से जोड़ना, जिसकी परिभाषा और मानक ही स्पष्ट न हों, प्रशासनिक मनमानी का रास्ता भी खोल सकता है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 22 Aug 2026 3:16 pm

चौराहे पर बांग्लादेश: बदलाव, अनिश्चितता और नई राह की तलाश

बांग्लादेश आज अपने इतिहास के एक ऐसे संवेदनशील मोड़ पर खड़ा है, जिसे कूटनीतिक और राजनीतिक विश्लेषक 'चौराहे' का नाम दे रहे हैं। सत्ता के तख्तापलट, व्यापक छात्र आंदोलनों और एक दीर्घकालिक शासन के अचानक अंत के बाद, यह दक्षिण एशियाई राष्ट्र वर्तमान में एक अभूतपूर्व परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। जब कोई देश ऐसे चौराहे पर खड़ा होता है, तो सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न यही उठता है कि 'जाए तो जाए कहां?' क्या यह देश एक पूर्ण, पारदर्शी और समावेशी लोकतंत्र की ओर बढ़ेगा, या फिर यह राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक मंदी और आंतरिक संघर्षों के एक ऐसे चक्रव्यूह में फंस जाएगा जिससे निकलना आने वाले दशकों तक मुश्किल हो जाएगा? यह संपादकीय इसी गंभीर प्रश्न के विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण करता है, जिसमें राजनीतिक पुनर्गठन, प्रशासनिक चुनौतियां, आर्थिक संकट, सामाजिक ताना-बाना और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के जटिल समीकरण शामिल हैं। अगस्त 2024 में शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग सरकार के पतन के बाद, बांग्लादेश ने नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार की स्थापना देखी। इस बदलाव को देश की जनता, विशेषकर युवाओं ने 'दूसरा स्वतंत्रता आंदोलन' या 'सच्ची मुक्ति' का नाम दिया। छात्र आंदोलनों ने जिस तरह एक शक्तिशाली शासन को उखाड़ फेंका, उसने पूरी दुनिया को चौंका दिया। लेकिन सत्ता बदल देना जितना चुनौतीपूर्ण होता है, व्यवस्था को संभालना और एक नई पारदर्शी प्रणाली का निर्माण करना उससे कहीं अधिक जटिल होता है। शुरुआती दौर में जो उत्साह और उम्मीदें थीं, वे धीरे-धीरे प्रशासनिक और व्यावहारिक चुनौतियों के धरातल पर आकर थमती दिखाई दे रही हैं। अंतरिम सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह देश में सामान्य स्थिति कब और कैसे बहाल करे, और एक ऐसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया की शुरुआत करे जो निष्पक्ष, पारदर्शी और सर्वस्वीकार्य हो। जब एक लंबा राजनीतिक ढांचा अचानक ढह जाता है, तो देश में एक बड़ा राजनीतिक शून्य पैदा हो जाता है। बांग्लादेश वर्तमान में इसी शून्यता से जूझ रहा है। अवामी लीग के कमजोर होने के बाद, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और जमात-ए-इस्लामी जैसी पार्टियां राजनीतिक पटल पर फिर से सक्रिय हो गई हैं। इस चौराहे पर खड़ा बांग्लादेश अगर सही दिशा में कदम बढ़ाना चाहता है, तो उसे सबसे पहले अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं को पुनर्जीवित करना होगा। देश में एक ऐसे स्वतंत्र और शक्तिशाली चुनाव आयोग की आवश्यकता है, जिस पर सभी राजनीतिक दलों और आम जनता को पूरा भरोसा हो। अतीत में चुनावों की निष्पक्षता पर लगे दागों को धोना इस नए आयोग की सबसे बड़ी परीक्षा होगी। इसे भी पढ़ें: India Bangladesh Ganga Water Treaty पर Bihar से उठ रहे सवालों का जवाब Modi सरकार को देना ही होगा इसके साथ ही, केवल सरकार बदल देना काफी नहीं है। जब तक पुलिस, न्यायपालिका और नौकरशाही का राजनीतिकरण बंद नहीं होगा, तब तक किसी भी नए लोकतांत्रिक ढांचे की नींव कमजोर ही रहेगी। अंतरिम सरकार ने इसके लिए विभिन्न आयोगों का गठन किया है, लेकिन इन सुधारों को जमीन पर उतारना एक लंबी और कठिन प्रक्रिया है। देश में एक ऐसा राजनीतिक माहौल तैयार करना होगा जहां हर विचारधारा को अपनी बात रखने का मौका मिले, बशर्ते वह लोकतांत्रिक मूल्यों के दायरे में हो। प्रतिशोध की राजनीति को छोड़कर समावेशी राजनीति को अपनाना ही बांग्लादेश को इस चौराहे से सुरक्षित बाहर निकाल सकता है। राजनीतिक उथल-पुथल का सबसे सीधा और गहरा असर किसी भी देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। बांग्लादेश, जो कभी विकास दर के मामले में दक्षिण एशिया का चमकता सितारा माना जाता था, आज गंभीर आर्थिक चुनौतियों से घिरा हुआ है। लंबे समय तक चले कर्फ्यू, हड़तालों, इंटरनेट शटडाउन और कारखानों के बंद रहने के कारण देश की आर्थिक रीढ़ को भारी नुकसान पहुंचा है। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था का मुख्य स्तंभ उसका रेडीमेड गारमेंट उद्योग है। देश के कुल निर्यात का लगभग 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है और यह लाखों लोगों, विशेषकर महिलाओं को रोजगार देता है। राजनीतिक अस्थिरता के कारण कई विदेशी खरीदारों ने अपने ऑर्डर वियतनाम, भारत और कंबोडिया जैसे देशों की तरफ मोड़ दिए हैं। अगर बांग्लादेश को अपनी अर्थव्यवस्था को बचाना है, तो उसे जल्द से जल्द इन कारखानों में पूर्ण सुरक्षा और निर्बाध उत्पादन सुनिश्चित करना होगा ताकि वैश्विक बाजारों में उसका खोया हुआ भरोसा वापस लौट सके। आर्थिक मोर्चे पर दूसरी बड़ी समस्या देश का विदेशी मुद्रा भंडार है, जो पिछले कुछ समय से लगातार दबाव में है। इसके साथ ही, बैंकिंग क्षेत्र में बड़े पैमाने पर गैर-निष्पादित आस्तियां यानी डूबता हुआ कर्ज एक गंभीर संकट बन चुका है। केंद्रीय बैंक और अंतरिम सरकार वित्तीय अनुशासन लागू करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन जब तक बैंकिंग प्रणाली से भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद को पूरी तरह खत्म नहीं किया जाता, तब तक आर्थिक स्थिरता एक दूर का सपना बनी रहेगी। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक से मिलने वाली वित्तीय सहायता इस समय देश के लिए एक संजीवनी की तरह है, लेकिन इसके साथ आने वाली शर्तें भी देश की आंतरिक नीतियों को प्रभावित कर रही हैं। आम नागरिक के लिए सबसे बड़ी समस्या रसोई का बजट और रोजगार है। आवश्यक वस्तुओं की आसमान छूती कीमतें और दैनिक जीवन का खर्च आम जनता के धैर्य की परीक्षा ले रहा है। छात्र आंदोलन की मुख्य मांग ही रोजगार के समान अवसर और कोटा प्रणाली में सुधार थी। अब जब नई व्यवस्था आ चुकी है, तो युवाओं को रोजगार के वास्तविक अवसर प्रदान करना सरकार के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि युवाओं की उम्मीदें निराशा में बदलीं, तो सामाजिक अशांति का एक नया दौर शुरू हो सकता है। किसी भी देश की प्रगति उसके सामाजिक सद्भाव और आंतरिक सुरक्षा पर टिकी होती है। सत्ता परिवर्तन के बाद के हफ्तों में बांग्लादेश ने कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर भारी शिथिलता देखी। पुलिस थानों पर हमले, पुलिसकर्मियों की अनुपस्थिति और प्रशासनिक पंगुता के कारण देश में एक प्रकार की अराजकता की स्थिति पैदा हो गई थी। हालांकि धीरे-धीरे स्थिति में सुधार हो रहा है, लेकिन पूरी तरह से सुरक्षित माहौल का निर्माण होना अभी बाकी है। इस बदलाव के दौर में बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदू समुदाय, के खिलाफ हिंसा और उनकी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं सामने आईं। हालांकि नागरिक समाज और छात्रों ने इन संपत्तियों की रक्षा के लिए मानव श्रृंखलाएं बनाईं, लेकिन इन घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बांग्लादेश की छवि को प्रभावित किया है। एक धर्मनिरपेक्ष और समावेशी बांग्लादेश का निर्माण तभी संभव है जब हर नागरिक, चाहे उसका धर्म या जाति कुछ भी हो, खुद को पूरी तरह सुरक्षित महसूस करे। इसके अलावा, अतीत के शासकों और उनके समर्थकों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होना स्वाभाविक है, लेकिन यह कार्रवाई न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए, न कि प्रतिशोध की भावना से। यदि नई व्यवस्था भी वही गलतियां दोहराती है जो पुरानी व्यवस्था ने की थीं, तो देश में लोकतंत्र का आगमन केवल एक छलावा बनकर रह जाएगा। समाज में शांति और स्थिरता तभी लौट सकती है जब लोगों को यह विश्वास हो कि नई सरकार निष्पक्षता और न्याय के पथ पर चल रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बांग्लादेश एक बेहद महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक चौराहे पर खड़ा है। बंगाल की खाड़ी में अपनी रणनीतिक स्थिति के कारण बांग्लादेश हमेशा से वैश्विक शक्तियों के आकर्षण का केंद्र रहा है। भारत, चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका और पश्चिम के देशों के साथ संबंधों को संतुलित करना अंतरिम और आने वाली चुनी हुई सरकार के लिए एक बहुत बड़ी कूटनीतिक परीक्षा होगी। भारत और बांग्लादेश का इतिहास, संस्कृति और भूगोल एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। शेख हसीना के कार्यकाल में दोनों देशों के संबंध अपने सबसे सुनहरे दौर में थे। सत्ता परिवर्तन के बाद, भारत के लिए बांग्लादेश में एक नया कूटनीतिक परिदृश्य सामने आया है। बांग्लादेश की नई सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह भारत के साथ पारस्परिक सम्मान और समानता के आधार पर मजबूत संबंध बनाए रखना चाहती है। दोनों देशों के बीच सीमा सुरक्षा, तीस्ता जल विवाद, व्यापार और पारगमन जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, जिनका समाधान परिपक्व कूटनीति के माध्यम से ही निकाला जा सकता है। भारत के लिए भी यह जरूरी है कि वह बांग्लादेश की जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का सम्मान करे और वहां की नई व्यवस्था के साथ रचनात्मक जुड़ाव बनाए रखे। दूसरी तरफ, चीन बांग्लादेश के बुनियादी ढांचे के विकास में एक बड़ा साझेदार रहा है। वह इस बदलाव के दौर में भी अपने आर्थिक हितों को सुरक्षित रखने की कोशिश कर रहा है। इसके समानांतर, संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय संघ ने बांग्लादेश में लोकतांत्रिक सुधारों और मानवाधिकारों की बहाली का पुरजोर समर्थन किया है। बांग्लादेश को इस बात का ध्यान रखना होगा कि वह महाशक्तियों की आपसी प्रतिस्पर्धा का अखाड़ा न बने, बल्कि अपनी विदेश नीति को देश के आर्थिक और रणनीतिक हितों के अनुरूप संचालित करे। किसी भी एक गुट की तरफ झुकाव देश की संप्रभुता और आर्थिक विकास के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। चौराहे पर बांग्लादेश, जाए तो जाए कहां? इस प्रश्न का उत्तर किसी एक व्यक्ति या एक सरकार के पास नहीं है। इसका उत्तर बांग्लादेश की सामूहिक चेतना, उसके राजनीतिक दलों की परिपक्वता और उसके युवाओं के संकल्प में छिपा है। बांग्लादेश के पास इतिहास रचने और एक नए, समृद्ध व लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में उभरने का यह एक अभूतपूर्व अवसर है। लेकिन इस मार्ग पर चलते हुए उसे अति-राष्ट्रवाद, प्रतिशोध की राजनीति, धार्मिक कट्टरता और आर्थिक कुप्रबंधन के गड्ढों से बचना होगा। इस चौराहे से आगे बढ़ने का केवल एक ही सही रास्ता है: एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करना जहां कानून का शासन सर्वोपरि हो, जहां अर्थव्यवस्था का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे, और जहां हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सुरक्षा की गारंटी मिले। दुनिया उम्मीद और कौतूहल के साथ बांग्लादेश की ओर देख रही है, और यह समय बांग्लादेश के नेतृत्व के लिए अपनी दूरदर्शिता और दृढ़ता साबित करने का है। - अशोक भाटिया, वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार

प्रभासाक्षी 22 Aug 2026 3:08 pm

कश्मीर पर अमेरिकी सुर बदलेः भारत का कद बढ़ा, पाक बेचैन

अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर का 19 अगस्त 2026 को श्रीनगर में दिया गया यह बयान कि जम्मू-कश्मीर “भारत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा” है, सामान्य कूटनीतिक टिप्पणी मानकर नजरअंदाज करने योग्य नहीं है। यह ऐसे समय आया है जब कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान की धारणाओं के बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार नए समीकरण बन रहे हैं। गोर ने जम्मू-कश्मीर की निरन्तर सुधर रही सुरक्षा स्थिति की बात कही और अमेरिकी यात्रा संबंधी परामर्श पर पुनर्विचार के संकेत भी दिए। पाकिस्तान ने इस बयान पर अमेरिका के शीर्ष राजनयिक को तलब कर तीखा विरोध दर्ज कराया। इस पूरे घटनाक्रम को केवल कश्मीर के संदर्भ में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसे भारत-अमेरिका संबंधों में आ रहे व्यापक परिवर्तन, दक्षिण एशिया की बदलती सामरिक संरचना और पाकिस्तान की घटती कूटनीतिक प्रभावशीलता के संदर्भ में समझना अधिक उचित होगा। अमेरिका की कश्मीर नीति में लंबे समय से एक प्रकार की सावधानी रही है। वाशिंगटन सामान्यतः भारत और पाकिस्तान के बीच संवाद तथा शांतिपूर्ण समाधान की बात करता रहा है। अमेरिकी विदेश विभाग की पूर्व घोषित नीति भी जम्मू-कश्मीर में सामान्य स्थिति और राजनीतिक-आर्थिक स्थिरता की वापसी का समर्थन करती रही है। इसलिए गोर का श्रीनगर में जाकर जम्मू-कश्मीर को भारत का “महत्वपूर्ण हिस्सा” कहना निश्चित रूप से भाषा के स्तर पर एक उल्लेखनीय परिवर्तन है। लेकिन इसे अमेरिका की पूरी कश्मीर नीति में तत्काल और औपचारिक परिवर्तन मानना भी जल्दबाजी होगी। किसी राजदूत का बयान और किसी सरकार की औपचारिक नीति में अंतर होता है। फिर भी कूटनीति में शब्दों का अपना महत्व होता है। विशेष रूप से तब, जब वही शब्द उस भूभाग में बोले जाएं जिसे पाकिस्तान दशकों से अंतरराष्ट्रीय विवाद के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। इस दृष्टि से गोर का बयान भारत के लिए मनोवैज्ञानिक और कूटनीतिक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण है। इसे भी पढ़ें: अमेरिकी राजदूत सर्जियो गौर की जम्मू-कश्मीर यात्रा ने चीनी-पाकिस्तानी चालों को किया दुरुस्त! इस बयान का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष जम्मू-कश्मीर की बदलती जमीन से जुड़ा है। गोर ने सुरक्षा व्यवस्था में सुधार का उल्लेख करते हुए यात्रा संबंधी अमेरिकी परामर्श में कमी लाने की संभावना जताई है। इसका अर्थ यह है कि वाशिंगटन अब कश्मीर को केवल सुरक्षा संकट या आतंकवाद की दृष्टि से देखने के बजाय पर्यटन, आर्थिक गतिविधियों और सामान्य जनजीवन की संभावनाओं वाले क्षेत्र के रूप में भी देख रहा है। यहीं से भारत-अमेरिका संबंधों की नई रोशनी दिखाई देती है। दोनों देशों के संबंध अब केवल व्यापार या रक्षा तक सीमित नहीं हैं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव, समुद्री सुरक्षा, प्रौद्योगिकी, ऊर्जा, आपूर्ति-शृंखला और वैश्विक शक्ति-संतुलन जैसे विषयों ने भारत को अमेरिका के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बना दिया है। हालांकि दोनों देशों के बीच व्यापार और शुल्क जैसे मुद्दों पर मतभेद भी मौजूद हैं, फिर भी व्यापक सामरिक साझेदारी अपनी उपयोगिता बनाए हुए है। हाल में अमेरिकी विदेश मंत्री की भारत यात्रा का उद्देश्य भी तनावों के बीच संबंधों को सुदृढ़ करना और व्यापार तथा ऊर्जा सहयोग को आगे बढ़ाना था। इसलिए कश्मीर पर अमेरिकी भाषा को भारत-अमेरिका संबंधों के व्यापक पुनर्संतुलन का हिस्सा मानना अधिक तार्किक होगा। अमेरिका के लिए भारत अब केवल दक्षिण एशिया का एक बड़ा देश नहीं, बल्कि एशिया में शक्ति-संतुलन का प्रमुख आधार है। भारत के लिए भी अमेरिका महत्वपूर्ण है, लेकिन भारत ने अपनी विदेश नीति को किसी एक शक्ति के साथ पूर्ण निर्भरता के बजाय रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित रखा है। यही कारण है कि भारत अमेरिका के साथ साझेदारी बढ़ाते हुए रूस, यूरोप, पश्चिम एशिया और अन्य शक्तियों के साथ भी अपने संबंध बनाए रखता है। कश्मीर के संदर्भ में यह घटनाक्रम पाकिस्तान के लिए निश्चित रूप से असहज करने वाला है। इस्लामाबाद ने गोर के बयान को अस्वीकार करते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर एक विवादित क्षेत्र है और उसका अंतिम निर्धारण होना बाकी है। पाकिस्तान ने इसे अमेरिका की पूर्व स्थिति से विचलन बताते हुए औपचारिक विरोध दर्ज कराया। पाकिस्तान की समस्या यह है कि वह कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी विदेश नीति का केंद्रीय विषय बनाए रखना चाहता है, जबकि विश्व राजनीति की प्राथमिकताएं तेजी से बदल रही हैं। आतंकवाद, आर्थिक स्थिरता, चीन का बढ़ता प्रभाव, पश्चिम एशिया का संकट, समुद्री सुरक्षा और वैश्विक आपूर्ति-शृंखलाएं आज बड़ी शक्तियों की चिंता के केंद्र में हैं। ऐसे वातावरण में केवल कश्मीर के प्रश्न को बार-बार अंतरराष्ट्रीयकरण करने की पाकिस्तानी कोशिशों की प्रभावशीलता सीमित होती जा रही है। भारत ने दूसरी ओर लगातार यह रेखांकित किया है कि जम्मू-कश्मीर से जुड़े विषय भारत की संप्रभुता और द्विपक्षीय संबंधों के दायरे में आते हैं। गोर का श्रीनगर दौरा स्वयं इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि एक प्रमुख अमेरिकी राजनयिक ने जम्मू-कश्मीर की यात्रा की, वहां के निर्वाचित नेतृत्व से मुलाकात की और क्षेत्र की सुरक्षा तथा आर्थिक संभावनाओं पर सकारात्मक टिप्पणी की। यह पाकिस्तान की उस कोशिश के विपरीत है जिसमें वह कश्मीर को केवल विवाद और अस्थिरता के चश्मे से प्रस्तुत करना चाहता है। फिर भी भारत को इस बयान से अत्यधिक उत्साहित होकर यह मान लेने से बचना चाहिए कि अमेरिका ने कश्मीर पर अपनी संपूर्ण नीति बदल दी है। अमेरिका की विदेश नीति परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है और वह भारत तथा पाकिस्तान दोनों के साथ अपने हितों को संतुलित करने की कोशिश करता है। आज भी वाशिंगटन के लिए पाकिस्तान आतंकवाद-रोध, क्षेत्रीय सुरक्षा और अफगानिस्तान सहित कुछ विषयों में उपयोगी साझेदार है। अतः भारत के लिए इस बयान का वास्तविक महत्व किसी औपचारिक अमेरिकी नीति-परिवर्तन से अधिक उस कूटनीतिक वातावरण में है, जिसमें भारत की स्थिति को पहले की तुलना में अधिक गंभीरता से लिया जा रहा है। यहां एक और महत्वपूर्ण बात है। कूटनीति में किसी देश का महत्व केवल इस बात से तय नहीं होता कि कितने देश उसके पक्ष में बयान दे रहे हैं, बल्कि इससे तय होता है कि वैश्विक शक्तियों के हित उसके साथ कितने गहरे जुड़े हैं। आज भारत की आर्थिक क्षमता, विशाल बाजार, तकनीकी सामर्थ्य, लोकतांत्रिक संस्थाएं, युवा शक्ति और सामरिक स्थिति उसे विश्व व्यवस्था का महत्वपूर्ण स्तंभ बनाती हैं। इसी बदलती वास्तविकता का प्रभाव कश्मीर पर भी दिखाई देना स्वाभाविक है। गोर का बयान इसलिए भारत के लिए एक उपलब्धि से अधिक एक संकेत है-संकेत इस बात का कि जम्मू-कश्मीर को लेकर अंतरराष्ट्रीय विमर्श धीरे-धीरे बदल रहा है। पाकिस्तान के लिए यह चेतावनी है कि केवल पुराने नारों और कूटनीतिक दबाव से वह कश्मीर को विश्व राजनीति के केंद्र में नहीं रख सकता और अमेरिका के लिए यह उसके बदलते हितों के अनुरूप संतुलन साधने की कोशिश है। अंततः कश्मीर की स्थायी शांति केवल अंतरराष्ट्रीय बयानों से नहीं, बल्कि लोकतंत्र, विकास, सुरक्षा, जनभागीदारी और सीमा-पार आतंकवाद के अंत से सुनिश्चित होगी। भारत को इस नए कूटनीतिक वातावरण का उपयोग आक्रामक प्रचार के बजाय जिम्मेदार और आत्मविश्वासी राष्ट्र की तरह करना चाहिए। सर्जियो गोर का बयान इस बदलती तस्वीर की एक महत्वपूर्ण झलक है-जहां कश्मीर को लेकर भारत की स्थिति पहले की अपेक्षा अधिक स्पष्ट अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता प्राप्त करती दिखाई दे रही है और पाकिस्तान की कूटनीतिक चुनौती पहले से अधिक कठिन होती जा रही है। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

प्रभासाक्षी 22 Aug 2026 3:05 pm

रेवंत रेड्डी का अमेरिका दौरा रद्द, जेडी वेंस और जोहरान ममदानी से होने वाली मुलाकातों पर उठे सवाल

केंद्र के फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि प्रस्तावित अमेरिकी कार्यक्रम में न्यूयॉर्क सिटी के मेयर जोहरान ममदानी और अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस से संभावित मुलाकातों ने मामले को संवेदनशील बना दिया।

देशबन्धु 22 Aug 2026 3:03 pm

भगवंत मान की पत्नी पर गंभीर आरोपों के बाद हमलावर विपक्ष, मांगा पंजाब के मुख्यमंत्री का इस्तीफा

भगवंत मान की पत्नी पर गंभीर आरोपों के बाद हमलावर विपक्ष, मांगा पंजाब के मुख्यमंत्री का इस्तीफा

समाचार नामा 22 Aug 2026 2:42 pm

वंदे मातरम की विरासत की रक्षा के लिए भाजपा ने प्रस्ताव किया पारित, सीडब्ल्यूसी के फैसले की निंदा की

वंदे मातरम की विरासत की रक्षा के लिए भाजपा ने प्रस्ताव किया पारित, सीडब्ल्यूसी के फैसले की निंदा की

समाचार नामा 22 Aug 2026 2:09 pm

India Bangladesh Ganga Water Treaty पर Bihar से उठ रहे सवालों का जवाब Modi सरकार को देना ही होगा

1996 की भारत-बांग्लादेश गंगा जल संधि दिसंबर में समाप्त होने वाली है, ऐसे में ढाका नई संधि की मांग तेज कर रहा है और सूखे के मौसम में न्यूनतम जल प्रवाह की गारंटी जैसी शर्त जोड़ना चाहता है, मगर केंद्र और बिहार में सत्तारुढ़ एनडीए के एक प्रमुख घटक जनता दल यूनाइटेड के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने अपने लेख के माध्यम से जो सवाल उठाए हैं, उसने पूरे मामले का नया मोड़ दे दिया है। उनका संदेश साफ है कि भारत को केवल बांग्लादेश के साथ नई संधि पर विचार नहीं करना चाहिए, बल्कि उससे पहले यह तय करना होगा कि बदलती जलवायु, घटते प्रवाह और बढ़ती जरूरतों के बीच गंगा का पानी भारत के अपने राज्यों खासकर बिहार के बीच किस आधार पर बांटा जाएगा। यही वह सवाल है जो 2026 के बाद गंगा की राजनीति को केवल जल बंटवारे का मुद्दा नहीं रहने देता, बल्कि इसे राष्ट्रीय हित, सीमा सुरक्षा, क्षेत्रीय कूटनीति और सामरिक रणनीति के केंद्र में ला खड़ा करता है। दरअसल, ढाका चाहता है कि नई संधि में एक ‘गारंटी क्लॉज’ शामिल हो, जिसके तहत सूखे के मौसम में बांग्लादेश को गंगा के पानी की एक न्यूनतम मात्रा सुनिश्चित की जाए। 1977 के समझौते में इस तरह की गारंटी का प्रावधान था, लेकिन 1996 की संधि में इसे शामिल नहीं किया गया। बांग्लादेश का तर्क है कि जलवायु परिवर्तन, अनिश्चित होते सूखे मौसम के प्रवाह और पानी की घटती उपलब्धता के कारण पुराना फार्मूला अब उसकी जरूरतों और वर्तमान परिस्थितियों को प्रतिबिंबित नहीं करता। इसे भी पढ़ें: Bangladesh PM Tarique Rahman की India visit पर फैसला नहीं, ढाका ने दी सफाई लेकिन ठीक यही तर्क भारत, विशेषकर बिहार के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है। संजय झा का सवाल है कि तीन दशक पुरानी गणना के आधार पर भारत खुद को एक और लंबे अंतरराष्ट्रीय दायित्व में क्यों बांधे? गंगा का अविरल प्रवाह बिहार में कई हिस्सों में टूट रहा है, नदी के चैनल बदल रहे हैं, कई इलाकों में भूजल संकट गहरा रहा है और दूसरी ओर दक्षिण बिहार के सूखा प्रभावित क्षेत्रों के साथ-साथ उत्तर बिहार के बाढ़ग्रस्त इलाके भी पानी की असमानता से जूझ रहे हैं। ऐसे में जब नदी का व्यवहार ही बदल चुका है तो 1996 के आंकड़ों और फार्मूले को भविष्य के लिए स्थायी मान लेना बिहार के हितों पर भारी पड़ सकता है। देखा जाये तो फरक्का पर विवाद इस पूरी बहस का सबसे संवेदनशील केंद्र है। बांग्लादेश लंबे समय से फरक्का बैराज को सूखे मौसम में उसके हिस्से के जल प्रवाह में कमी के लिए जिम्मेदार ठहराता रहा है। वहां की ओर से इसे लेकर तीखी भाषा भी इस्तेमाल की गई है। भारत का पक्ष अलग है। भारत फरक्का को बांध नहीं बल्कि एक डायवर्जन संरचना मानता है, जिसका उद्देश्य गंगा के पानी का एक हिस्सा हुगली नदी प्रणाली की ओर मोड़ना है, जबकि शेष प्रवाह बांग्लादेश की दिशा में आगे बढ़ता है। भारत यह भी कहता रहा है कि जल प्रवाह से जुड़ा डेटा संयुक्त नदी आयोग के माध्यम से साझा किया जाता है। लेकिन अब असली सवाल केवल फरक्का नहीं है। सवाल यह है कि गंगा पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता तय करने से पहले भारत के भीतर गंगा बेसिन वाले राज्यों यानि उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के अधिकारों और जरूरतों का वैज्ञानिक आकलन क्यों नहीं होना चाहिए? यही वह बिंदु है जहां संजय झा की मांग बिहार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। बिहार की आबादी 1996 के मुकाबले काफी बढ़ चुकी है। पीने के पानी, सिंचाई और औद्योगिक जरूरतों का दबाव भी कई गुना बढ़ा है। राज्य को यदि अपनी कृषि, सिंचाई परियोजनाओं और जल प्रबंधन के लिए दीर्घकालिक योजना बनानी है तो उसे पहले से यह पता होना चाहिए कि गंगा बेसिन में उसका वास्तविक और न्यायसंगत हिस्सा कितना है। नई संधि से पहले भारत के भीतर वैज्ञानिक जल आवंटन बिहार के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक लाभ हो सकता है। भारत के लिए भी यह केवल बिहार बनाम बांग्लादेश का प्रश्न नहीं है। गंगा भारत और बांग्लादेश के बीच साझा 54 प्रमुख नदियों वाले व्यापक जल संबंधों का हिस्सा है। यदि भारत बिना घरेलू जल संतुलन तय किए बांग्लादेश को न्यूनतम प्रवाह की गारंटी देता है, तो भविष्य में सूखे के गंभीर वर्षों में अपने राज्यों की जरूरतों और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के बीच टकराव पैदा हो सकता है। इसलिए नई संधि का आधार 1950 के दशक या 1990 के दशक के आंकड़े नहीं, बल्कि वर्तमान हाइड्रोलॉजिकल डेटा, जलवायु अनुमान, वास्तविक प्रवाह और समय-समय पर समीक्षा की व्यवस्था होना चाहिए। भारत की संसदीय समिति भी इस दिशा में संकेत दे चुकी है कि संधि के नवीनीकरण पर बातचीत में बिहार और पश्चिम बंगाल की चिंताओं, अपडेटेड जल आंकड़ों और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को शामिल किया जाना चाहिए। इसका अर्थ साफ है कि नई व्यवस्था यदि बनती है तो वह पुराने अंकगणित की कॉपी नहीं हो सकती। दूसरी तरफ, मान लीजिये कि अगर संधि समाप्त हो जाती है और नई संधि नहीं हो पाती तब क्या होगा? ऐसे में संभव है कि बांग्लादेश इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने की कोशिश कर सकता है। ढाका संयुक्त राष्ट्र समेत विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जल अधिकार और सूखे के मौसम में जल संकट का सवाल उठा सकता है। इससे भारत पर कूटनीतिक दबाव बढ़ाने की कोशिश होगी और द्विपक्षीय संबंधों में एक नया तनाव पैदा हो सकता है। बांग्लादेश घरेलू राजनीति में भी गंगा जल को एक संवेदनशील राष्ट्रवादी मुद्दे के रूप में इस्तेमाल कर सकता है। ऐसे में भारत पर इसका असर केवल कूटनीतिक छवि तक सीमित नहीं रहेगा। जल विवाद सीमा पार सहयोग, नदी प्रबंधन, व्यापार और व्यापक भारत-बांग्लादेश संबंधों को प्रभावित कर सकता है। यही कारण है कि नई दिल्ली के लिए सबसे समझदारी भरा रास्ता न तो आंख बंद करके पुरानी संधि का नवीनीकरण है और न ही जल प्रश्न को अनिश्चितता में छोड़ देना। भारत को इस मौके का इस्तेमाल एक मजबूत, आधुनिक और संतुलित जल रणनीति बनाने में करना चाहिए। पहले अपने राज्यों के हितों का वैज्ञानिक निर्धारण, फिर बांग्लादेश के साथ पारदर्शी बातचीत। नई संधि में वास्तविक प्रवाह के आधार पर आवंटन, छोटे समीक्षा चक्र, जलवायु परिवर्तन के अनुसार संशोधन और असाधारण परिस्थितियों के लिए स्पष्ट प्रावधान किए जा सकते हैं। बहरहाल, दिसंबर 2026 की समयसीमा इसलिए केवल एक संधि की समाप्ति नहीं है। यह भारत के सामने अपनी गंगा नीति को नए सिरे से लिखने का अवसर है। और अगर इस बार बिहार के हितों, बदलती जलवायु और राष्ट्रीय जल सुरक्षा को केंद्र में रखकर फैसला हुआ, तो नई व्यवस्था केवल कूटनीतिक समझौता नहीं, बल्कि भारत की दीर्घकालिक सामरिक और जल सुरक्षा की मजबूत नींव बन सकती है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 22 Aug 2026 11:41 am

दुनिया देखती रह गई, Russia ने India को Nuclear Energy Power बनाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी

पूरी दुनिया में मशहूर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की दोस्ती का एक बड़ा रणनीतिक लाभ भारत को मिलने जा रहा है और यह घटनाक्रम अमेरिका समेत पूरे पश्चिमी जगत के लिए चौंकाने वाला है। हम आपको बता दें कि भारत और रूस के बीच उभरती परमाणु साझेदारी मात्र कोई बिजली उत्पादन का समझौता नहीं है बल्कि यह ऊर्जा सुरक्षा, अत्याधुनिक परमाणु तकनीक, छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों, बड़े परमाणु संयंत्रों और उच्च तकनीकी विनिर्माण के जरिए भारत की सामरिक शक्ति को नई ऊंचाई देने वाला समीकरण बनने जा रही है। देखा जाये तो ऐसे समय में जबकि पश्चिमी देश वैश्विक ऊर्जा और उच्च प्रौद्योगिकी आपूर्ति शृंखलाओं पर अपना प्रभाव बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं, तब भारत और रूस के बीच परमाणु सहयोग का नई दिशा पकड़ना भू-राजनीतिक समीकरणों में एक बड़ा संदेश है। यह साझेदारी भारत को केवल ऊर्जा की अतिरिक्त क्षमता नहीं देगी, बल्कि उसे तकनीकी आत्मनिर्भरता, औद्योगिक विस्तार और रणनीतिक स्वायत्तता की उस स्थिति तक पहुंचाने में मदद कर सकती है, जहाँ नई दिल्ली वैश्विक शक्ति संतुलन में कहीं अधिक मजबूत और निर्णायक भूमिका निभाए। हम आपको बता दें कि भारत के परमाणु क्षेत्र में हाल के नियामकीय बदलावों ने विदेशी परमाणु प्रौद्योगिकी के लिए नए अवसर खोले हैं। लेकिन इसका सबसे बड़ा लाभ उस देश को मिलने की संभावना है, जिसके पास केवल डिजाइन नहीं, बल्कि वास्तविक परिचालन अनुभव भी मौजूद है। रूस इस दौड़ में इसलिए आगे दिखाई देता है क्योंकि उसके पास बड़े परमाणु संयंत्रों के साथ-साथ छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों के संचालन का व्यावहारिक अनुभव है। इसे भी पढ़ें: Vishwakhabram: Putin के Kuril Islands पहुँचते ही भड़क उठीं Sanae Takaichi, Japan-Russia के बीच जोरदार भिड़ंत से दुनिया हैरान SMR तकनीक भारत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। पारंपरिक परमाणु बिजलीघर विशाल निवेश, बड़े भूभाग और लंबी निर्माण अवधि की मांग करते हैं। इसके विपरीत छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर अपेक्षाकृत कम क्षमता वाले, चरणबद्ध तरीके से स्थापित किए जा सकने वाले और विशेष जरूरतों के अनुसार तैनात किए जा सकते हैं। इन्हें दूरदराज के क्षेत्रों, सीमित ग्रिड वाले इलाकों, औद्योगिक क्लस्टरों और ऊर्जा-गहन डेटा सेंटरों के लिए उपयोगी माना जा रहा है। रूस का अकादमिक लोमोनोसोव इस दिशा में विशेष महत्व रखता है। यह एक तैरता हुआ परमाणु ऊर्जा संयंत्र है, जिसमें दो 35 मेगावाट क्षमता के मॉड्यूल हैं और जिसने वाणिज्यिक संचालन के जरिए फ्लोटिंग न्यूक्लियर पावर की व्यवहार्यता प्रदर्शित की है। भारत जैसे विशाल समुद्री तट वाले देश के लिए यह मॉडल केवल तकनीकी जिज्ञासा नहीं, बल्कि एक संभावित रणनीतिक विकल्प है। भविष्य में तटीय औद्योगिक क्षेत्रों, बंदरगाहों, द्वीपीय क्षेत्रों और दूरस्थ इलाकों की ऊर्जा जरूरतों के लिए ऐसी तकनीक अत्यंत उपयोगी हो सकती है। देखा जाये तो भारत-रूस सहयोग का दूसरा बड़ा आधार बड़े परमाणु रिएक्टर हैं। तमिलनाडु का कुडनकुलम परमाणु बिजली संयंत्र इस साझेदारी की सबसे मजबूत मिसाल है। रूस की VVER तकनीक पर आधारित इकाइयों ने दोनों देशों के बीच परमाणु सहयोग को प्रयोगशाला से निकालकर जमीन पर उतारा है। अब नई पीढ़ी के VVER-1200 जैसे उच्च क्षमता वाले रिएक्टरों और भारत में इनके क्रमिक निर्माण की संभावनाओं पर भी चर्चा का विस्तार हो रहा है। देखा जाये तो यहां भारत का सबसे बड़ा लाभ केवल अतिरिक्त बिजली क्षमता नहीं है। यदि रूसी डिजाइन वाले परमाणु संयंत्रों और SMR के उपकरणों का स्थानीयकरण भारत में होता है, तो देश परमाणु ऊर्जा का उपभोक्ता भर नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक परमाणु आपूर्ति शृंखला का हिस्सा बन सकता है। इससे भारतीय कंपनियों को उच्च तकनीकी विनिर्माण, विशेष इस्पात, भारी इंजीनियरिंग, नियंत्रण प्रणालियों और परमाणु उपकरण निर्माण में अवसर मिलेंगे। यही ‘मेक इन इंडिया’ को परमाणु क्षेत्र में वास्तविक गहराई दे सकता है। यहां लागत का प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है। भारत की स्वदेशी दबावयुक्त भारी जल रिएक्टर तकनीक की तुलना में रूसी रिएक्टरों की लागत कुछ अधिक हो सकती है, लेकिन पश्चिमी देशों के कई प्रस्तावित रिएक्टरों की तुलना में रूसी विकल्प अपेक्षाकृत प्रतिस्पर्धी माना जाता है। हम आपको बता दें कि परमाणु ऊर्जा में केवल ईंधन की कीमत निर्णायक नहीं होती; निर्माण अवधि, वित्तपोषण की लागत और परियोजना में होने वाली देरी अंतिम लागत को कई गुना बढ़ा सकती है। इसलिए रूस का अनुभव और क्रमिक निर्माण का मॉडल भारत के लिए आर्थिक रूप से भी आकर्षक हो सकता है। लेकिन इस साझेदारी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका सामरिक निहितार्थ है। ऊर्जा आयात पर निर्भर भारत के लिए परमाणु ऊर्जा स्थिर बेसलोड बिजली उपलब्ध कराने का साधन है। सौर और पवन ऊर्जा के विपरीत परमाणु संयंत्र चौबीसों घंटे बिजली दे सकते हैं। जैसे-जैसे भारत की अर्थव्यवस्था, डेटा अवसंरचना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रक्षा उत्पादन और उन्नत विनिर्माण का विस्तार होगा, बिजली की मांग में भारी वृद्धि होगी। ऐसे में परमाणु ऊर्जा भारत की ऊर्जा सुरक्षा का रणनीतिक स्तंभ बन सकती है। इसके अलावा, रूस के साथ गहरा परमाणु सहयोग भारत को जो बड़ा लाभ देता है वह है रणनीतिक स्वायत्तता। भारत यदि केवल पश्चिमी प्रौद्योगिकी या किसी एक आपूर्ति शृंखला पर निर्भर रहता है, तो भू-राजनीतिक दबाव उसकी ऊर्जा योजनाओं को प्रभावित कर सकते हैं। रूस के साथ सहयोग भारत को विकल्प देता है और बहुध्रुवीय परमाणु साझेदारी की क्षमता बढ़ाता है। साथ ही, भारत अपने स्वदेशी SMR और परमाणु कार्यक्रमों को भी समानांतर रूप से आगे बढ़ा सकता है। देखा जाये तो भारत का लक्ष्य अब केवल अधिक बिजली पैदा करना नहीं होना चाहिए। असली लक्ष्य ऐसी परमाणु क्षमता विकसित करना है, जिसमें विदेशी सहयोग से तकनीक, अनुभव और विनिर्माण क्षमता हासिल करते हुए देश धीरे-धीरे डिजाइन, उत्पादन और आपूर्ति में आत्मनिर्भर बने। रूस के साथ साझेदारी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पुल बन सकती है। बहरहाल, आने वाले वर्षों में भारत-रूस परमाणु सहयोग का असली मूल्य मेगावाट में नहीं, बल्कि उस रणनीतिक क्षमता में मापा जाएगा जो भारत को ऊर्जा-सुरक्षित, तकनीकी रूप से सक्षम और वैश्विक परमाणु उद्योग में अधिक प्रभावशाली बनाएगी। यदि स्थानीयकरण, लागत नियंत्रण, सुरक्षा मानकों और स्वदेशी क्षमता निर्माण के बीच सही संतुलन बनाया गया, तो यह साझेदारी भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ उसकी सामरिक शक्ति को भी नई ऊंचाई दे सकती है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 22 Aug 2026 11:35 am

BJP Mission 2027: 7 राज्यों के चुनाव पर BJP का फोकस! नई टीम की पहली बैठक में Gen Z को साधने की तैयारी

BJP Mission 2027: 7 राज्यों के चुनाव पर BJP का फोकस! नई टीम की पहली बैठक में Gen Z को साधने की तैयारी

समाचार नामा 22 Aug 2026 11:00 am

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह एक निजी लैब के उद्घाटन के लिए आज पहुंचेंगे नोएडा, सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह एक निजी लैब के उद्घाटन के लिए आज पहुंचेंगे नोएडा, सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद

समाचार नामा 22 Aug 2026 10:40 am

'चवन्नी' वाले बयान पर घिरे अखिलेश यादव! जयंत चौधरी के समर्थन में उतरीं मायावती, पूरे जाट समाज से माफ़ी की मांग

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समाचार नामा 22 Aug 2026 10:35 am

जयंत चौधरी को लेकर अखिलेश की टिप्पणी पर भड़कीं मायावती, लिखा- सपा गिरगिट की तरह रंग बदल लेती है

जयंत चौधरी को लेकर अखिलेश की टिप्पणी पर भड़कीं मायावती, लिखा- सपा गिरगिट की तरह रंग बदल लेती है

समाचार नामा 22 Aug 2026 9:37 am

राहुल गांधी सरकार को जवाबदेह बना रहे हैं: उमर

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने दिल्ली में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के विरोध-प्रदर्शन का समर्थन करते हुए कहा कि वह सरकार को जवाबदेह बना रहे हैं

देशबन्धु 22 Aug 2026 7:30 am

असम में क्यों हो रहा है इतना निवेश

लगातार बढ़ते विदेशी निवेश की वजह से आने वाले औद्योगिक बदलाव के कारण अब असम की वैश्विक पहचान 'चाय से चिप' तक बनाने वाले राज्य की बन रही है. लेकिन ये छवि चिंतामुक्त नहीं है

देशबन्धु 22 Aug 2026 12:44 am

मेरठ में पुलिस पर मारपीट के आरोपों से गरमाया मामला, DIG सहारनपुर करेंगे जांच

दिग्विजय भाटी का वीडियो वायरल, तत्कालीन SSP अविनाश पांडेय समेत पुलिसकर्मियों पर लगाए गंभीर आरोप; सपा विधायक अतुल प्रधान ने कार्रवाई की मांग की

देशबन्धु 21 Aug 2026 10:46 pm

चुनावी मुद्दों पर आक्रामक हुए राहुल गांधी

कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी इन दिनों एक ओर चुनावी मुद्दों को लेकर आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं, तो दूसरी ओर आगामी विधानसभा चुनावों से पहले विपक्षी गठबंधनों को मजबूत करने की कोशिशों में जुटे हैं

देशबन्धु 21 Aug 2026 10:40 pm

'वंदे मातरम' पर घमासान तेज, भाजपा और कांग्रेस नेता आमने-सामने

'वंदे मातरम' पर घमासान तेज, भाजपा और कांग्रेस नेता आमने-सामने

समाचार नामा 21 Aug 2026 10:14 pm

31 दिन बाद पैलेट गन केस में FIR! राहुल गांधी के धरने के बाद दिल्ली पुलिस ने मानी मांग

31 दिन बाद पैलेट गन केस में FIR! राहुल गांधी के धरने के बाद दिल्ली पुलिस ने मानी मांग

समाचार नामा 21 Aug 2026 6:40 pm

भारतीय शेयर बाजार बंद, मेटल और बैंकिंग स्टॉक्स में हुई खरीदारी

मुंबई, भारतीय शेयर बाजार शुक्रवार के कारोबारी सत्र में करीब सपाट बंद हुआ। दिन के अंत में सेंसेक्स 3 अंक की मामूली बढ़त के साथ 77,540.83 और निफ्टी 20.15 अंक या 0.08 प्रतिशत की तेजी के साथ 24,252.00 पर था।

देशबन्धु 21 Aug 2026 5:28 pm

पंजाब में फिर साथ आएंगे अकाली दल-भाजपा, मजीठिया के बयान से गठबंधन की अटकलें तेज

पंजाब में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले अकाली दल और भाजपा के संभावित गठबंधन की अटकलें तेज हैं। बिक्रम मजीठिया और हरसिमरत कौर के बयानों से चर्चा बढ़ी।

देशबन्धु 21 Aug 2026 4:01 pm

'वंदे मातरम्' के अपमान से Congress के तुष्टिकरण की पोल खुली, Nehru से लेकर Rahul Gandhi तक एक ही पैटर्न?

एक बंगाली कहावत है - “मायेर स्तबेर अर्धेक ग्रहण, अर्धेक बर्जन, ए कैमन सन्तानेर भक्ति?” मातृभूमि के स्तुति गीत को आधा स्वीकारना और आधा त्यागना, यह किस प्रकार की संतान की भक्ति है? भद्र बंगाल की सौ वर्षों की व्यथा, वेदना ही इस लोकोक्ति रूप में प्रकट हुई है। भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम का शायद ही कोई दूसरा गीत “वन्दे मातरम्” जितना भावात्मक, राजनीतिक और ऐतिहासिक रहा हो। बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय जी की यह रचना केवल साहित्य नहीं अपितु वह स्वदेशी आन्दोलन, क्रांतिकारियों और राष्ट्रीय जागरण का उद्भट उद्घोष बनी थी। 15 अगस्त, 2026 को कांग्रेस के केंद्रीय कार्यालय दिल्ली में कारित घृणित कृत्य से कांग्रेस का इस्लामिक डीएनए पुनः सिद्ध हो गया है। वंदे मातरम् के इस अपमान के समय नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, दशक भर कांग्रेस अध्यक्ष रही सोनिया गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे उपस्थित थे। दुस्साहस और दुर्भाग्य का विषय यह है कि इन तीनों ने ही वंदे मातरम् के अपमान के इस दुष्कृत्य को प्रारंभ किया था। इसे भी पढ़ें: बुरे काम का नतीजा बुरा ही होता है, बाहरी दिल्ली के बेताज बादशाह रहे Sajjan Kumar की सत्ता, सियासत और सजा की कहानी यही संदेश देती है इस दुर्भाग्यजनक घटना के बाद कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ताओं ने देश को स्पष्टीकरण देना प्रारंभ किया कि - “सोनिया गांधी ने वंदे मातरम् का अपमान नहीं किया बल्कि वे बुजुर्ग खड़गे जी को खड़े होने के कारण असहज होता देखकर उनके लिए कुर्सी मंगा रही थी”। यहीं से कांग्रेस नेतृत्व की मूढ़ता, राष्ट्र अनास्था व मुस्लिम तुष्टिकरण के पक्ष में दुराग्रह रखने के चरित्र की पुनरावृत्ति दिखाई पड़ती है। इस घटनाक्रम के अंतरतत्व को समझिए। कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ताओं को अपने नेतृत्व द्वारा ‘वंदे मातरम्’ का यह अपमान बुरा लगा इसलिए ही उन्होंने बिना केंद्र या प्रदेश नेतृत्व के कहे ही इस घटना पर कांग्रेस नेतृत्व का बचाव प्रारंभ कर दिया था। हजारों कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने सोशल मीडिया पर लाखों पोस्ट डाली और कांग्रेस नेतृत्व का बचाव किया। यह ‘वंदे मातरम्’ और ‘मुस्लिम तुष्टिकरण की कांग्रेसी प्रवृत्ति’ के विरोध का प्रतीक था। इस मनोभाव को कांग्रेस के इटालियन नेतृत्व ने समझने का प्रयास ही नहीं किया। कांग्रेस ने इस घटना पर अपने कार्यकर्ताओं की भावनाओं को नहीं समझा तो भी कोई बात नहीं होती। कांग्रेस ने तो अपनी हठधर्मिता, अड़ियलपन, मति मूढ़ता की हद तो तब दिखा दी जब उसने अपनी राष्ट्रीय वर्किंग कमेटी में ‘वंदे मातरम्’ को पूर्ण रूप में नहीं गाने के लिए प्रस्ताव ही पारित कर दिया। ‘वंदे मातरम्’ के हाल ही में किए गए अपराध और अपमान के संदर्भ में कांग्रेस के प्रवक्ता और आधिकारिक व्यक्तव्य जो कह रहे हैं उसमें वे गांधी जी, नेताजी सुभाषचंद्र, गुरुदेव रबिन्द्रनाथ टैगोर आदि का नाम लेते हुए इस गीत के विभाजन को उनकी से हुआ बता रहे हैं। यह एक भ्रमजाल और झूठ का पहाड़ है। गांधी जी तो इस बात के पक्षधर थे कि यह गीत संपूर्ण देश को जोड़ने वाला प्राणतत्त्व है और इसे इसके पूर्ण वैभव के साथ संपूर्णतः स्वीकार किया जाना चाहिए। गांधी जी ने इसके समर्थन में अपनी स्पष्ट राय रखी थी, किंतु जवाहरलाल नेहरू ने तुष्टिकरण की अपनी राजनैतिक कुटिलताओं और प्राथमिकताओं के चलते गांधी जी की एक न चलने दी। इतिहास यह भी है कि, यह दुखद एतिहासिक पृष्ठ रहस्यमयी भी है। रहस्य यह कि - “अंततः वह कौन सी कमजोर नस थी,, जिसके आधार पर नेहरू जी ऐसे निर्णय भी गांधी जी से करवा लेते थे जिनके लिए गांधी जी कभी भी तैयार नहीं थे”। गांधी जी वंदेमातरम् विभाजन हेतु असहमत थे। गांधी जी बंग-भंग हेतु भी सहमत नहीं थे। गांधी जी ने कहा था कि “इस देश का विभाजन मेरी लाश पर होगा”। गांधी जी स्वतंत्रता पश्चात् कांग्रेस को विसर्जित करने हेतु भी संकल्पित थे। गांधी जी ने कहा था कि स्वतंत्रता पश्चात् हम एक बूँद की स्याही लेंगे और यह लिख देंगे - “इस देश में गौहत्या वैसा ही दंड होगा जैसा मानव हत्या के लिए होता है”। स्वच्छता, हिंदी राष्ट्रभाषा, ग्रामवासी भारत आदि हेतु भी गांधी जी प्रतिबद्ध थे। कांग्रेस ने सात दशकों की सत्ता में इन विषयों को त्याज्य रखा। ‘भारत में रामराज स्थापना’ को कांग्रेस का लक्ष्य बनाया था किंतु ‘नेहरू-गांधी कांग्रेस’ मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए श्रीराम को ही कल्पना सिद्ध करने के प्रयास में लग गई। कांग्रेस स्वयं को सेकुलर सिद्ध करने के अनथक प्रयास करने लगी थी और ‘रामेश्वरम् रामसेतु’ के विध्वंस, विनाश, भंजन, खंडन हेतु मशीनें समुद्रतट पर भेज चुकी थी। ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ हेतु कांग्रेस ने न जाने कितने ही कांड इस देश में किया और सतत-निरंतर किए हैं। आश्चर्य और दुस्साहस का विषय यह है कि ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ के लिए देश भर से लताड़े जाने के बाद भी कांग्रेस नेतृत्व इस बात को समझ ही नहीं रहा है। हाँ, कांग्रेस का जमीनी कार्यकर्ता इस बात कोई समझ भी रहा है और वह कांग्रेस की ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ की नीति के विरोध में भी है, तब ही तो ‘कार्यकर्ता बेचारे’ ने सोशल मीडिया पर लाखों की संख्या में आकर यह कहा था कि “सोनिया जी वंदे मातरम् का गान रोक नहीं रही थी बल्कि खड़गे जी के लिए कुर्सी बुला रही थी”। ‘वंदे मातरम्’ और ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ की यह कांग्रेस कार्यकर्ता की नैसर्गिक प्रतिक्रिया थी जिसे कांग्रेस नेतृत्व ने स्वीकार करना चाहिए थे किंतु कांग्रेस ने ‘राम पथ’ को नहीं बल्कि ‘रोम पथ’ को चुना हुआ है। 26 अक्टू.- 1 नव. 1937 की कलकत्ता कांग्रेस कार्यसमिति में ‘वंदे मातरम्’ गान के विभाजन की अनुशंसा और कुछ नहीं बल्कि एक ‘इमोशनल राष्ट्रीय ब्लैक मेल’ था। यह देश विभाजन में अपना हित देखने वाले नेताओं द्वारा निर्मित ‘ब्लैकमेल’ था। आदरणीय बंकिम बाबू ने जब भारतमाता को केवल एक भौगोलिक भू-भाग के रूप में नहीं, बल्कि साक्षात् देवी और जननी के रूप में देखा, तो उनके मानस में 'सोनार बांग्ला' और संपूर्ण भारतवर्ष का एक ऐसा दिव्य चित्र उभर आया, जिसने औपनिवेशिक दास्तां के अंधकार को चीरकर रख दिया। विडंबना, वंचना, विसंगति, विचित्र, यह है कि जिस गीत ने स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों, क्रांतिकारियों और हुतात्माओं को हँसते-हँसते फाँसी के फंदों को जयमाल मान लेने की असीम शक्ति दी, उसी महान कृति को स्वतंत्रता के पश्चात राजनीति और तुष्टिकरण के बवंडर में उलझा दिया गया। मुस्लिम तुष्टिकरण के मकड़जाल ने वंदेमातरम् को कोई एक सौ वर्षों तक, उसके पूर्ण गान से वंचित रखा। प्रश्न यह है कि यदि प्रथम दो छंद पहले से ही कई कांग्रेस सभाओं में प्रचलित थे, तो 1937 में उसे औपचारिक रूप से सीमित करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? वस्तुतः कांग्रेस, मुस्लिम तुष्टिकरण का समायोजन कर रही थी। कांग्रेस द्वारा गांधी जी, गुरुदेव रबिंद्रनाथ व नेताजी की ढाल लेकर ‘वंदे मातरम्’ का विरोध ग़लत है। इतिहासकार एस. मुखर्जी ने अपनी पुस्तक Muslim Politics के पृष्ठ क्र. 53 पर इसे कांग्रेस द्वारा मुसलमानों को संतुष्ट करने के लिए गीत को “mutilate” (अंगभंग) करने जैसा बताया है। इतिहासकार ए. जी. नूरानी ने “Vande Mataram: A Historical Lesson”, Economic and Political Weekly, Vol. 8, 9 जून 1973, पृष्ठ क्र. 1039–1043 में लिखा है कि “वन्दे मातरम् का विभाजन केवल एक पक्ष की कायरता थी”। इतिहासकार सब्यसाची भट्टाचार्य ने भी अपनी पुस्तक Vande Mataram: The Biography of a Song में देश के अनेक अग्रणी मुस्लिम नेताओं द्वारा ‘वंदे मातरम्’ पूर्णतः आनंदपूर्वक गाने की घटनाओं का विस्तृत उल्लेख किया है। यही सत्य है शेष कांग्रेस के झूठ का पहाड़! - डॉ. प्रवीण दाताराम

प्रभासाक्षी 21 Aug 2026 3:26 pm

ताकि बचा रहे बचपन

किशोरों और बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए यूरोप के कई देशों ने पंद्रह या सोलह साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर पाबंदी लगानी शुरू कर दी है। इसका अगुआ होने का श्रेय ऑस्ट्रेलिया को है, जिसने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के इंस्टाग्राम, फेसबुक, टिकटॉक, एक्स यानी ट्विटर और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्मों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी है। इसी तरह फ्रांस ऐसा कानून बनाने वाला यूरोप का पहला देश हो गया है। वहां की संसद ने पंद्रह साल तक के बच्चों के सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर रोक लगाने का कानून पारित कर दिया है। हालांकि यह कानून खटाई में पड़ गया है। फ्रांस के सर्वोच्च न्यायालय ने इस कानून को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन माना है। अदालत का कहना है कि नाबालिगों पर प्रतिबंध लगाने के चक्कर में यह कानून असल में हर नागरिक पर सोशल मीडिया का उपयोग करने से पहले अपनी उम्र साबित करने का दबाव बनाता है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैंक्रो इस इस कानून के प्रबल समर्थक हैं। अदालत के फैसले के बाद उन्होंने कहा है कि इस कानून को लागू करने के लिए अदालती फैसले के मद्देनजर जरूरी सुधार करके फिर से इसे संसद से पारित कराया जाएगा। फ्रांस के इस फैसले से स्पष्ट है कि वह किशोरों के सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर लगाम लगाने के लिए पीछे नहीं हटने जा रहा है। जिस पश्चिमी दुनिया में सोशल मीडिया का आविष्कार हुआ, जिन्होंने कभी अरब देशों में क्रांति के लिए सोशल मीडिया की सराहना की थी, अब उन्हें ही यह माध्यम अपने ही बच्चों का दुश्मन लगने लगा है। इसकी वजह है, वहां के बच्चों और किशोरों का बिगड़ता मानसिक स्वास्थ्य और पढ़ाई का गिरता स्तर। इसकी वजह से अमेरिका तक में सोशल मीडिया कंपनियों के खिलाफ लोगों में नाराजगी दिख रही है। प्रसिद्ध न्यूज एजेंसी रायटर्स ने आईपोस कंपनी के साथ हाल ही में एक सर्वे किया है। इसमें शामिल 61 फीसद लोगों ने कहा कि सोशल मीडिया कंपनियों पर सरकार को और सख्त निगरानी रखनी चाहिए। इस सर्वे में शामिल 66 प्रतिशत लोग तो 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए उम्र के प्रमाणीकरण की प्रक्रिया लागू करने पर जोर दिया है। वैसे अमेरिका के फ्लोरिडा जैसे कुछ राज्यों में चौदह साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक है। इसे भी पढ़ें: असामाजिक हो रहे सोशल मीडिया का नियमन जरूरी दुनियाभर में बच्चों और किशोंरों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक के लिए उनके मानसिक स्वास्थ्य में आ रही गिरावट और बढ़ते मानसिक तनाव को जिम्मेदार माना जा रहा है। कई शोधों से पता चला है कि लगातार स्क्रीन देखने और सोशल मीडिया के इस्तेमाल से बच्चे दूसरों की लाइफस्टाइल से खुद की तुलना करने लग रहे हैं। इससे उनमें हीन भावना, तनाव और डिप्रेशन बढ़ रहा है। इसकी वजह से उनकी नींद में कमी हो रही है। देर रात तक फोन चलाने के कारण भी बच्चों की सोने की आदत बिगड़ रही है। इससे उनमें चिड़चिड़ाहट बढ़ रही है। जिससे उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ रहा है। जानकारों का मानना है कि सोशल मीडिया ऐप्स का अलगोरिदम ऐसा है, जिससे बच्चे ही नहीं, बड़े भी उसके लत का शिकार हो रहे हैं. इससे वे स्क्रीन के आदी हो रहे हैं। कई बार कम उम्र के बच्चों के सामने आत्महत्या, हिंसा या उम्र के हिसाब से गलत सामग्री भी आती है। वैसे सोशल मीडिया का अलगोरिदम ऐसा है कि नकारात्मक, हिंसा प्रधान और सेक्स से जुड़ी खबरें और दृश्य जल्दी वायरल होते हैं। सोशल मीडिया ट्रोलिंग और अभद्र टिप्पणियों का बड़ा और आसान माध्यम बन गया है। इनकी वजह से बच्चे मानसिक प्रताड़ना का शिकार हो रहे हैं। बच्चों को फंसाने वाले अपराधी उन्हे आसानी से अपना शिकार बना लेते हैं। इसीलिए दुनिया में कई देशों की सरकारें बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर रोक लगाने की तैयारी में हैं। रोक लगाने वालों में इंडोनेशिया भी शामिल हो चुका है, जिसने मार्च 2026 से इसके नियम लागू कर दिए हैं। इनके अनुसार, 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए यूट्यूब, टिकटॉक, फेसबुक और रोब्लॉक्स जैसे हाई-रिस्क प्लेटफॉर्म्स पर पाबंदी लगा दी गई है। इंडोनेशिया की तरह मलयेशिया ने भी ऑनलाइन सुरक्षा अधिनियम के तहत 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट बनाने पर रोक लगा रखी है। संयुक्त अरब अमीरात ने बच्चों के लिए सोशल मीडिया के लिए न्यूनतम उम्र 15 वर्ष तय की है। इससे कम उम्र के बच्चों के अकाउंट बनाने पर यहां पूरी तरह रोक है। यूरोप के देश डेनमार्क में 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया ब्लॉक करने का कानून बन चुका है। बच्चों की उम्र की जांच के लिए सरकार डिजिटल एविडेंस ऐप पर काम कर रही है। इसी तरह ब्रिटेन की सरकार ने भी 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है, जो जनवरी 2027 से प्रभावी होने जा रही है। तुर्की में भी 15 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखने के लिए कानून को मंजूरी मिल चुकी है, जिसे 2026 के अंत तक लागू किया जाना है। चीन में किशोरों के लिए सोशल मीडिया पर पूरी तरह पाबंदी तो नहीं है, लेकिन उनके लिए सख्त माइनर मोड लागू है, जो रात के समय सोशल मीडिया ऐप्स के इस्तेमाल और स्क्रीन टाइम को सीमित करता है। ब्राजील का बाल एवं किशोर डिजिटल कानून 17 मार्च, 2026 से लागू हो चुका है। जिसके तहत 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों को अपने सोशल मीडिया खाते को माता-पिता या कानूनी अभिभावक से जोड़ना अनिवार्य है। इसके अलावा, यह कानून युवाओं के लगातार स्क्रॉल जैसी आदतों पर प्रतिबंध लगाता है। जर्मनी में भी इसी तरह का नियम लागू हो चुका है। स्वीडन समेत कई अन्य देश भी ऐसी तैयारी में हैं। अपने यहां कर्नाटक राज्य भी ऐसे कानून पर काम कर रहा है। जबकि नोएडा के जिला प्रशासन ने स्कूलों में ऑनलाइन के इस्तेमाल को सीमित करने का निर्देश दिया है। विदेशों की तुलना में जरा भारत को देखिए, यहां दिल्ली के जंतर-मंतर पर युवाओं और किशोरों ने जिस तरह अभद्र और अश्लील गालियों का कैमरे के सामने प्रदर्शन किया, उसे सोशल मीडिया के जरिए पूरी दुनिया ने देखा है। दिलचस्प है कि इसे प्रगतिशील बौद्धिकों के एक वर्ग ने समर्थन किया। दो राय नहीं कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल अगर सही तरीके से किया जाए तो उसकी पहुंच और त्वरा समाज को कई तरह के फायदे दिला सकती है। खामियां उजागर करके तंत्र पर दबाव बनाया जा सकता है। लेकिन हमें यह स्वीकार करने की हिचक नहीं होनी चाहिए कि देश में सोशल मीडिया अर्धनग्नता और अश्लीलता का वाहक बनता जा रहा है। इन्फ्लूएंसर बनने, रीच बढ़ाने और लाइक के जरिए कमाई के चक्कर में शरीफ परिवारों की महिलाओं को भी अंग प्रदर्शन से परहेज नहीं रहा। सोशल मीडिया के लिएकोई सेंसर नीति न होने की वजह से सबकी पहुंच किशोरों और बच्चों तक हो रही है। इसलिए भी जरूरी है कि पश्चिम की तरह अपने यहां भी इस पर ध्यान दिया जाए और महामारी बनने से पहले इस पर लगाम लगाने की कोशिश शुरू हो। नियमों का उल्लंघन करने पर सोशल मीडिया कंपनियों पर भारी जुर्माना लगाया जाता है। दिसंबर 2010 में ट्यूनिशिया से शुरू लोकतंत्र समर्थक लहर सोशल मीडिया के इतिहास का निर्णायक बिंदु है। सोशल मीडिया के सहारे यह लहर काहिरा के तहरीर चौक से सीरिया और लीबिया होते हुए समूचे अरब जगत में फैल गई। इतिहास में इस लहर को अरब स्प्रिंग यानी अरब का बसंत और पिंक रिवोल्यूशन या गुलाबी क्रांति के रूप में दर्ज है। अरब देशों में बदलाव लाने की सोच के विस्तार के पीछे सोशल मीडिया को बड़ा जरिया माना गया। लंबे यूरोपीय शासन और शिक्षा-दीक्षा के चलते भारतीय मानस अपनी सांस्कृतिक जड़ों और मूल्यों से कहीं ज्यादा प्रभावित है। इसलिए भारत में सोशल मीडिया पर ऑस्ट्रेलिया और दूसरे पश्चिमी देशों जैसे सवाल नहीं उठे। अगर इन देशों से पहले यहां सवाल उठते तो उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बता दिया जाता। बहरहाल उम्मीद की जानी चाहिए कि हम भी पश्चिमी देशों से सबक लेंगे और अपने यहां के बचपन को स्वस्थ रखने और बचाने की कोशिश जरूर करेंगे। उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

प्रभासाक्षी 21 Aug 2026 2:56 pm

Rahul Gandhi की 'धरना-छाप' राजनीति क्या गुल खिलाएगी? LoP छात्रों का वास्तव में भला चाहते हैं या सिर्फ सुर्खियों में जगह चाहते हैं?

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी आज एक प्रदर्शनकारी छात्र साहिल लोचव को साथ लेकर पुलिस अधिकारियों के पास पहुंचे और आरोप लगाया कि जंतर-मंतर पर 20 जुलाई के छात्र आंदोलन के दौरान कथित पेलेट गन कार्रवाई में घायल हुए छात्र की शिकायत पर एफआईआर दर्ज नहीं की जा रही है। पुलिस अधिकारियों से मुलाकात के बाद जब राहुल गांधी संतुष्ट नहीं हुए तो उन्होंने वहीं धरना शुरू कर दिया और संदेश साफ था, “एफआईआर नहीं, तो धरना जारी रहेगा।” यहीं से सवाल उठता है कि राहुल गांधी आखिर किस लड़ाई को लड़ रहे हैं? एक पीड़ित छात्र को न्याय दिलाने की कानूनी लड़ाई, पुलिस कार्रवाई की जवाबदेही तय कराने की लड़ाई, या फिर छात्र राजनीति के उभरते मैदान में अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराने की लड़ाई लड़ रहे हैं? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राहुल गांधी कोई सामान्य प्रदर्शनकारी नहीं हैं। वह देश की लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। उनके पास संसद का मंच है, सरकार को जवाबदेह बनाने की संवैधानिक हैसियत है और पूरे विपक्ष की राजनीतिक आवाज बनने का अवसर भी। फिर कभी प्रधानमंत्री के घर के बाहर तो कभी थाने पहुंचकर धरने पर बैठ जाना क्या उस पद की गरिमा और जिम्मेदारी के अनुरूप राजनीति है? इसे भी पढ़ें: उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा मानसून सत्र धरना देना लोकतंत्र में गलत नहीं है। सरकार और पुलिस के खिलाफ विरोध करना भी विपक्ष का अधिकार है। लेकिन जब देश का नेता प्रतिपक्ष पुलिस स्टेशन की सीढ़ियों पर बैठकर कहे कि जब तक एफआईआर दर्ज नहीं होगी, वह नहीं हटेगा, तब सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या राजनीतिक दबाव ही अब राहुल गांधी की प्राथमिक रणनीति बन गया है? यहां मामला और दिलचस्प इसलिए भी है क्योंकि राहुल गांधी जिस घटना को लेकर धरने पर बैठे, वह घटना अब केवल एक छात्र की शिकायत या पुलिस थाने की कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गई है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को हुए छात्र प्रदर्शन और उसके बाद पुलिस कार्रवाई का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। शीर्ष अदालत ने हाल में पुलिस की कथित ज्यादती और बल प्रयोग के आरोपों की जांच के लिए एक हाई-पावर्ड समिति गठित करने का फैसला किया है। साथ ही पुलिस अधिकारियों ने राहुल गांधी को यह भी बताया है कि 20 जुलाई की घटना से जुड़े कई मामले दर्ज हैं और उनकी जांच क्राइम ब्रांच तथा स्पेशल सेल को सौंपी गई है। यानी सवाल यह नहीं है कि साहिल लोचव की शिकायत पर अलग से कार्रवाई होनी चाहिए या नहीं। यदि किसी संज्ञेय अपराध की शिकायत है और कानून के अनुसार एफआईआर बनती है, तो कार्रवाई अवश्य होनी चाहिए। पीड़ित को न्याय मिलना ही चाहिए। लेकिन सवाल राहुल गांधी की राजनीतिक शैली का है। सवाल उठता है कि क्या लोकसभा में विपक्ष के नेता को यह जानकारी नहीं थी कि मामला सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में है? क्या उन्हें नहीं पता था कि घटना की जांच पहले से विभिन्न स्तरों पर चल रही है? और यदि उन्हें यह सब पता था, तो फिर पुलिस स्टेशन के बाहर धरने का राजनीतिक उद्देश्य क्या था? यहीं से इस पूरी कहानी की जड़ तक जाना जरूरी है। सवाल उठता है कि जंतर-मंतर पर आखिर हुआ क्या था? दरअसल, 20 जुलाई को दिल्ली में बड़ी संख्या में छात्र परीक्षा व्यवस्था, कथित पेपर लीक और शिक्षा सुधारों की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे थे। आंदोलन का आयोजन कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP के नेतृत्व में हुआ था और प्रदर्शनकारियों की मांगों में परीक्षा प्रणाली में सुधार तथा शिक्षा से जुड़े सवाल प्रमुख थे। जंतर-मंतर से संसद की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तनाव पैदा हुआ। आरोप लगे कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर अत्यधिक बल प्रयोग किया, लाठीचार्ज किया और पेलेट गन का इस्तेमाल हुआ। कई वीडियो और तस्वीरों के बाद पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठे। राहुल गांधी ने भी इस मुद्दे को जोरदार ढंग से उठाया और बाद में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को सीधे निशाने पर लिया। लेकिन दिल्ली पुलिस का पक्ष बिल्कुल अलग रहा। पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि प्रदर्शन अवैध था और पुलिस ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए अधिकतम संयम बरता। पुलिस का दावा है कि बल का इस्तेमाल हालात बिगड़ने और हिंसा या अव्यवस्था की स्थिति पैदा होने के बाद किया गया। घटना के दौरान पुलिसकर्मियों के घायल होने की बात भी सामने आई थी। यही वजह है कि इस मामले को केवल एकतरफा राजनीतिक नारे में समेटना आसान नहीं है। यदि छात्रों पर अनावश्यक या अनुपातहीन बल प्रयोग हुआ है तो दोषियों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। लेकिन यदि प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई और पुलिसकर्मी भी घायल हुए, तो जांच में उस पक्ष को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। शायद इसी जटिलता के कारण सुप्रीम कोर्ट की जांच समिति का महत्व बढ़ जाता है। इसलिए सवाल उठता है कि ऐसे में राहुल गांधी का धरना क्यों हो रहा है? सवाल उठता है कि क्या यह न्याय के लिए दबाव है, या फिर राजनीतिक दृश्य रचने की कोशिश है? दरअसल, राहुल गांधी की राजनीति में पिछले कुछ समय से एक पैटर्न दिखाई देता है। मुद्दा उठाइए, सरकार पर सीधा हमला कीजिए और फिर सड़क पर उतरकर उस मुद्दे को राजनीतिक प्रतीक में बदल दीजिए। यह रणनीति विपक्षी राजनीति में असरदार हो सकती है, लेकिन नेता प्रतिपक्ष के पद पर बैठे व्यक्ति से सवाल भी बड़ा होता है। सवाल उठता है कि क्या हर मामले में धरना ही अंतिम राजनीतिक हथियार होना चाहिए? कभी प्रधानमंत्री के घर के बाहर धरने की राजनीति और अब पुलिस थाने पहुंचकर एफआईआर की मांग पर बैठ जाना...राहुल गांधी की यह छापामार शैली उन्हें सुर्खियां तो दिलाती है, लेकिन क्या इससे उनकी संस्थागत भूमिका कमजोर नहीं पड़ती? संसद में सरकार से जवाब मांगना, दस्तावेजों के आधार पर आरोप लगाना, संसदीय जांच की मांग करना और न्यायिक प्रक्रिया को मजबूत करना, ये भी नेता प्रतिपक्ष के उतने ही महत्वपूर्ण हथियार हैं। इसके अलावा, एक सवाल यह भी उठता है कि क्या यह छात्रों की राजनीति में राहुल गांधी की अपनी जगह बनाने की कोशिश है? देखा जाये तो इस पूरे घटनाक्रम का राजनीतिक संदर्भ भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कॉकरोच जनता पार्टी विभिन्न राज्यों में स्कूलों की स्थिति, शिक्षा व्यवस्था और छात्रों की समस्याओं को लेकर अभियान चलाकर लगातार सुर्खियां बटोर रही है। जंतर-मंतर का आंदोलन भी इसी व्यापक छात्र असंतोष का हिस्सा बनकर सामने आया था। ऐसे में राहुल गांधी भी शायद यह संदेश देना चाहते हैं कि छात्रों की आवाज उठाने वाला सबसे बड़ा राष्ट्रीय चेहरा वही हैं। साहिल लोचव के साथ पुलिस स्टेशन पहुंचना, उनकी चोटों का मुद्दा उठाना और एफआईआर के लिए धरने पर बैठना, यह सब एक मजबूत राजनीतिक दृश्य भी है। सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी को लगने लगा है कि छात्र राजनीति का यह मैदान उनके हाथ से निकल सकता है? क्या कॉकरोच जनता पार्टी के शिक्षा और स्कूलों से जुड़े अभियान ने राहुल गांधी को यह एहसास कराया है कि केवल संसद में भाषण देना काफी नहीं, बल्कि छात्रों के बीच जाकर अपनी मौजूदगी दर्ज करानी होगी? या फिर यह राहुल गांधी की उस पुरानी राजनीतिक शैली का विस्तार है, जिसमें वह सत्ता के खिलाफ खुद को सीधे संघर्षरत व्यक्ति के रूप में पेश करना चाहते हैं? देखा जाये तो राहुल गांधी को छात्रों के साथ खड़े होने का पूरा अधिकार है। पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाना भी उनका कर्तव्य है। पेलेट गन के कथित इस्तेमाल की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग भी पूरी तरह वैध राजनीतिक मुद्दा है। लेकिन नेता प्रतिपक्ष की राजनीति केवल धरने की राजनीति नहीं हो सकती। जब सुप्रीम कोर्ट जांच की प्रक्रिया शुरू कर चुका हो, जब पुलिस के अनुसार संबंधित मामलों की जांच क्राइम ब्रांच और स्पेशल सेल कर रही हो, तब राहुल गांधी को यह भी बताना चाहिए कि उनका धरना जांच को किस तरह आगे बढ़ाएगा। अगर अलग शिकायत पर एफआईआर जरूरी है, तो उसे कानूनी प्रक्रिया के तहत दर्ज कराया जाना चाहिए और उस प्रक्रिया की निगरानी की मांग की जानी चाहिए। लेकिन हर बार कैमरों के सामने धरना देकर राजनीतिक दबाव बनाना एक गंभीर सवाल छोड़ जाता है कि क्या राहुल गांधी व्यवस्था से लड़ रहे हैं, या व्यवस्था से लड़ने का दृश्य तैयार कर रहे हैं? राहुल गांधी को समझना होगा कि छात्रों की आवाज बनने के लिए केवल पुलिस थाने की सीढ़ियों पर बैठना काफी नहीं। छात्रों को बेहतर परीक्षा व्यवस्था, मजबूत स्कूल, जवाबदेह संस्थाएं और ठोस शिक्षा नीति चाहिए। राहुल गांधी चाहें तो वह जो सुधार करना चाहते हैं वह कांग्रेस शासित राज्यों में शुरू करवा सकते हैं। राहुल गांधी को समझना होगा कि धरना तस्वीर बनाता है, लेकिन राजनीति की असली परीक्षा तस्वीर के बाद शुरू होती है। - नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 21 Aug 2026 2:44 pm

Cheeni Kum hai! एथनॉल का असर या त्योहारों का, अचानक क्यों आसमान छूने लगे चीनी के दाम? 10 लाइन में समझें पूरा मामला

जिस देश में दिन की शुरुआत सुबह की चाय से होती है, जहां त्यौहार मिठाई के बगैर अधूरे लगते हैं। जहां घर से लेकर दुकान तक चीनी रोजमर्रा की जरूरत है। वहां चीनी की कीमत सिर्फ एक कमोडिटी का रेट नहीं बल्कि घर के बजट का सवाल है। लेकिन इस बीच चीनी के दाम अचानक ऐसे भागे हैं कि बाजार में सवाल सिर्फ यह नहीं कि चीनी कितनी महंगी हुई बल्कि सवाल यह है कि आखिर चीनी इतनी महंगी क्यों हुई? सबसे बड़ा सवाल क्या आने वाले दिनों में इस महंगाई की मिठास और कड़वी होने वाली है? जिस चीनी के दाम कुछ समय पहले तक लगभग ₹45 किलो के आसपास थे उसमें बहुत कम समय में जबरदस्त उछाल आया है। चीनी के दाम बीते 20 दिनों में ₹22 तक की बढ़ोतरी हुई है। हालात तो यहां तक पहुंच गए हैं कि दुनिया भर को चीनी बेचने वाला भारत अब इसके आयात की तैयारी कर रहा है। जमाखोरी रोकने की तरकीबें निकाली जा रही हैं और आपातकालीन स्टॉक को मार्केट में उतारने की तैयारियां की जा रही हैं। ऐसे में आज के एमआरआई में हम चीनी के इसी कड़वे अर्थशास्त्र को डिकोड करेंगे। इसे भी पढ़ें: आजकल सब डायबिटीज के शिकार हो रहे हैं...चीनी की बढ़ती कीमतों पर बिहार सरकार के मंत्री का ये बयान सुना आपने? 1. 12 दिन के भीतर 21% दाम बढ़े सबसे पहले ग्राउंड रियलिटी यानी दामों की बात करते हैं। उपभोक्ता मामलों के विभाग के आंकड़ों के मुताबिक 18 अगस्त 2026 को देश में चीनी का औसत रिटेल दाम 52.3 प्रति किलो था। पिछले साल के मुकाबले 13% ज्यादा। लेकिन यह तो सिर्फ एक सरकारी औसत है। असली कहानी तो गली मोहल्ले की दुकानों पर चल रही है। महज 12 दिन के भीतर यानी 7 अगस्त से लेकर 1920 अगस्त के बीच प्रमुख शहरों में चीनी के दाम 19 से 21% तक बढ़ चुके हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक रिटेल मार्केट में जो चीनी ₹52 किलो बिक रही थी, वह अब ₹62 तक पहुंच गई है। महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिसे चीनी व्यापार के एक बड़े सेंटर के तौर पर जाना जाता है। वहां थोक चीनी के दाम अगस्त की शुरुआत से अब तक करीब 20% बढ़कर ₹5350 प्रति क्विंटल के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए हैं। पंजाब के रिटेल मार्केट में चीनी ₹65 प्रति किलो तक बिक रही है। वहीं मुंबई और भोपाल जैसे शहरों में भी कीमतें 58 से ₹63 प्रति किलो के बीच झूल रही हैं। मार्केट के जानकारों का मानना है कि आगे वाले दिनों में कीमतें और बढ़ सकती हैं। ऐसे में सवाल है कि जिस देश ने 2021-22 में 12 मिलियन टन से ज़्यादा चीनी दुनिया भर में बेची, जो लगातार दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी निर्यातक रहा है, वहां अचानक चीनी कम कैसे पड़ गई? 2. देश में चीनी की मांग और सप्लाई का असली खेल क्या है? भारत में सालाना करीब 2.83 करोड़ टन चीनी की घरेलू मांग रहती है। मौजूदा सीजन में देश 7 लाख टन चीनी का निर्यात भी कर चुका है। ऐसे में मौजूदा उत्पादन का स्तर घरेलू जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ निर्यात की मांग संभालने के लिए नाकाफी साबित हो रहा है, जिससे मांग और आपूर्ति का संतुलन बिगड़ गया है। 3. इथेनॉल की बढ़ती मांग है क्या सबसे बड़ा विलन? भारत ने गन्ने का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने में बढ़ा दिया है, क्योंकि वह आयातित कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है और E20 का लक्ष्य हासिल करना चाहता है। सरकार ने हाल के वर्षों में इस मकसद से कई डिस्टिलरी बनाने पर ज़ोर दिया है। ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन (AIDA) के मुताबिक, इससे इथेनॉल बनाने की क्षमता बढ़कर 2025 के मध्य तक 499 जगहों पर सालाना लगभग 1,822 करोड़ लीटर हो जाएगी। AIDA की ओर से इंडिया टुडे के साथ शेयर किए गए आंकड़ों के अनुसार, इथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल (फीडस्टॉक) में गन्ने की हिस्सेदारी लगभग 30-35% है, जबकि बाकी हिस्सा मक्का और चावल से आता है। इस बदलाव का असर चीनी बाज़ार पर पड़ा है। लखनऊ यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर और कृषि विशेषज्ञ सुधीर पंवार ने इंडिया टुडे को बताया एथेनॉल बनाने के लिए गन्ने का इस्तेमाल दूसरी तरफ़ मोड़ने की वजह से भारत में चीनी की कीमतें बढ़ गई हैं। पंवार का कहना है कि चीनी बाज़ार में इतनी ज़्यादा तंगी नहीं होनी चाहिए थी और उन्हें शक है कि कीमतों में इस उछाल के पीछे उत्पादन के अलावा और भी वजहें हैं। उन्होंने कहा चीनी के लिए बाज़ार का अनुमान इतना बुरा नहीं था, जिससे चीनी का स्टॉक रखने वालों और रिटेलर्स द्वारा बाज़ार में हेरफेर का संकेत मिलता है। उन्होंने आगे कहा, अगर गन्ने को एथेनॉल बनाने के काम में नहीं लगाया जाता, तो कीमतें काबू में रहतीं। उनकी मुख्य चिंता यह है कि भारत की ईंधन नीति खाने-पीने की चीज़ों की कीमतों की कीमत पर नहीं होनी चाहिए। उत्तर प्रदेश योजना आयोग के पूर्व सदस्य पंवार ने बताया, गन्ने को इथेनॉल की ओर मोड़ने का काम चीनी की कीमत पर नहीं होना चाहिए और इससे खाने-पीने की चीज़ों के दाम भी नहीं बढ़ने चाहिए। हमें भारत में गन्ने के उत्पादन और चीनी की ज़रूरतों, साथ ही अंतरराष्ट्रीय हालात और चीनी की कीमतों के सही अनुमान की ज़रूरत है। फसल की बीमारी से सप्लाई की स्थिति पर भी असर पड़ा है। 2025-26 में, खासकर उत्तर प्रदेश में, फसल की बीमारी के कारण गन्ने की उत्पादकता और चीनी की रिकवरी में गिरावट आई। यह तब हुआ जब गन्ने की खेती का रकबा बढ़ा था। द टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई में गन्ने की खेती का रकबा धान, दाल, कपास और तिलहन जैसी अन्य फसलों की तुलना में पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 1.5% ज़्यादा था। इसे भी पढ़ें: चीनी के स्टॉक पर नजर, सरकार ने अपने नोटिफिकेशन में क्या निर्देश दिए हैं? 4. भारत चीनी पर इंपोर्ट ड्यूटी क्यों कम कर रहा है? सरकार की नीति से पता चलता है कि हालात कितनी तेज़ी से बदले हैं। ब्राज़ील के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी निर्यातक देश है। यह 1960 से चीनी का निर्यात कर रहा है और 2021-22 में इसने सबसे ज़्यादा, यानी 12 मिलियन टन से ज़्यादा चीनी का निर्यात किया था। लेकिन देश की निर्यात नीति धीरे-धीरे सख़्त होती गई क्योंकि सरकार ने घरेलू स्तर पर चीनी की उपलब्धता को प्राथमिकता दी। 2025-26 के चीनी सीज़न के लिए, भारत ने लगभग 2 मिलियन मीट्रिक टन का निर्यात कोटा मंज़ूर किया है, जो 2021-22 में निर्यात किए गए 12 मिलियन टन से कहीं कम है। इसके बाद 2026 में भारत ने 13 मई से 30 सितंबर तक चीनी के एक्सपोर्ट पर तुरंत रोक लगा दी। सरकार का मकसद घरेलू सप्लाई को सुरक्षित रखना, कीमतों को कंट्रोल करना और प्रोडक्शन तथा ग्लोबल कमोडिटी मार्केट में अनिश्चितता के लिए तैयारी करना था। यह रोक इसलिए अहम है क्योंकि इससे पहले भारत ने लंबे समय के लिए आम शिपमेंट पर पूरी तरह रोक लगाने के बजाय एक्सपोर्ट पर पाबंदियां, कोटा और मात्रा की सीमाएं तय करने का तरीका अपनाया था। पहले की पाबंदियों के दौरान भी, अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे देशों को छोटे कोटा-आधारित और खास प्राथमिकता वाले शिपमेंट जारी रहे थे। इन उपायों के बावजूद, घरेलू कीमतें लगातार बढ़ती रही हैं। ऑल इंडिया शुगर ट्रेड एसोसिएशन (AISTA) के अनुसार, मौजूदा 2025-26 मार्केटिंग ईयर में फरवरी तक भारत ने 2,01,547 टन चीनी का एक्सपोर्ट किया, जिसमें संयुक्त अरब अमीरात (UAE) सबसे बड़ा डेस्टिनेशन बनकर उभरा। अब, रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकार चीनी पर इंपोर्ट ड्यूटी कम करने के अगले कदम पर विचार कर रही है। इस कदम से लगभग एक दशक में पहली बार विदेश से चीनी भारत आ सकती है, जिससे त्योहारों के मौसम की शुरुआत में घरेलू सप्लाई में आसानी हो सकती है। 5. देश में चीनी का बफर स्टॉक कम हो रहा? रेटिंग एजेंसी इकरा (ICRA) के अनुमान के मुताबिक, सितंबर 2026 तक देश में चीनी का क्लोजिंग स्टॉक घटकर महज 43 लाख टन रह जाने की संभावना है, जो पिछले साल इसी अवधि में 53 लाख टन था। चिंता की बात यह है कि 43 लाख टन का यह बफर स्टॉक देश की सिर्फ दो महीने की घरेलू खपत की भरपाई करने के लिए ही पर्याप्त है। सितंबर 2026 तक देश में क्लोजिंग चीनी स्टॉक घटकर करीब 43 लाख टन रहने का अनुमान। पिछले साल यह स्टॉक 53 लाख टन था, जिसमें करीब 10 लाख टन की गिरावट आई है। 43 लाख टन का यह बफर स्टॉक देश की महज 2 महीने की घरेलू जरूरत के बराबर है। 6. सरकार अचानक चीनी को लेकर क्यों घबराई हुई है? चीनी की कीमतों में यह उछाल रातों-रात नहीं आया है। भारत में चीनी की खुदरा कीमतें 2023 की शुरुआत में लगभग ₹40-45 प्रति किलोग्राम थीं, जो अगस्त 2026 तक बढ़कर ₹50 प्रति किलोग्राम से ज़्यादा हो गईं। हालांकि, राज्यों, चीनी की क्वालिटी और बाज़ार के हिसाब से कीमतों में काफी अंतर होता है। कीमतों में तेज़ी हाल के महीनों में आई है। अगस्त 2026 के मध्य तक, पूरे भारत में चीनी की औसत कीमत लगभग ₹51.7-52.3 प्रति किलोग्राम तक पहुँच गई थी। यह एक महीने में लगभग 7-8% और अगस्त 2025 के मध्य में लगभग ₹46.3 प्रति किलोग्राम की कीमत के मुकाबले साल-दर-साल आधार पर लगभग 12-13% की बढ़ोतरी है। लेकिन त्योहारों के मौसम से ठीक पहले कीमतों में आए इस उछाल ने केंद्र सरकार को कदम उठाने पर मजबूर कर दिया है। इसलिए अधिकारी सिर्फ़ आयात (इंपोर्ट) के बारे में ही नहीं सोच रहे हैं। वे थोक व्यापारियों द्वारा जमा की जा सकने वाली चीनी की मात्रा पर पाबंदी लगाने पर भी विचार कर रहे हैं, ताकि जमाखोरी और स्टॉक जमा करने से कमी और न बढ़े। 7. सरकार ने कीमतें नियंत्रित करने के लिए क्या नियम बनाए हैं? सरकार ने चीनी व्यापारियों और डीलरों पर स्टॉक रखने की सीमा लागू कर दी है। नए नियमों के तहत महीने में 10 मीट्रिक टन से अधिक चीनी का कारोबार करने वाले डीलर 15 दिन से अधिक की खपत का स्टॉक जमा करके नहीं रख सकते। चीनी के आयात को टैक्स फ्री भी कर दिया है। निर्यात पर 30 सितंबर 2026 तक रोक लगा दी है। 8. चीनी संकट को लेकर सरकार को झेलनी पड़ रही राजनीतिक आलोचना चीनी की बढ़ती कीमतों पर अब राजनीतिक विरोध भी शुरू हो गया है। एक्टिविस्ट और टीम भारत के संस्थापक तहसीन पूनावाला ने आरोप लगाया कि गन्ने को एथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़े जाने के कारण यह संकट पैदा हुआ है। इसके साथ ही उन्होंने इस नीति से लाभ उठाने वालों पर भी सवाल खड़े किए हैं। सोशल मीडिया मंच एक्स पर जारी एक वीडियो संदेश में पूनावाला ने कहा कि भारत ने भारी मात्रा में चीनी का निर्यात किया। लेकिन गन्ने को एथेनॉल उत्पादन की तरफ मोड़े जाने से स्थिति ऐसी हो गई कि भारत को निर्यात पर प्रतिबंध लगाना पड़ा। इस फैसले से चीनी के दाम तेजी से बढ़े और अब सरकार चीनी पर आयात शुल्क हटाने की योजना बना रही है। पूनावाला ने यह आरोप भी लगाया कि इस स्थिति से राजनेताओं और उनके परिवारों को फायदा हुआ है। उन्होंने घोषणा की कि उनका संगठन टीम भारत, जो E20 पेट्रोल के तेजी से लागू होने को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहा है और सरकार से बातचीत में जुटा है, 22 और 23 अगस्त को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन और भूख हड़ताल करेगा। सरकार के लिए फिलहाल सबसे तात्कालिक चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि देश के सबसे बड़े त्योहारी खरीदारी सीजन की शुरुआत में यह रोजमर्रा की आवश्यक वस्तु आम जनता की पहुंच से बाहर न हो जाए। हालांकि, इस मामले से जुड़ा व्यापक नीतिगत सवाल अधिकारियों के लिए सुलझाना काफी अधिक चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। 9. चीनी शेयरों में पैसा लगाने वाले निवेशकों के लिए क्या रिस्क है? सबसे बड़ा रिस्क सरकारी दखल है। चीनी के दाम जितने ज्यादा बढ़ेंगे, सरकार कीमतें घटाने के सख्त कदम उठाएगी। इससे मिलों का मार्जिन अचानक घट सकता है। अगर कंपनियों का मार्जिन घटेगा तो शेयरों में आई तेजी गिरावट में बदल सकती है। 10. रॉ शुगर का आयात 1 अक्‍टूबर तक ड्यूटी फ्री घरेलू बाजार में चीनी की सप्लाई सुधारने और बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाते हुए रॉ-शुगर का आयात टैक्‍स फ्री कर दिया है। विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) के नोटिफिकेशन के मुताबिक, सरकार ने 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी के ड्यूटी फ्री आयात को मंजूरी दी है। इस फैसले के बाद अब बिना कोई आयात शुल्क चुकाए विदेशों से 10 लाख टन रॉ-शुगर भारत मंगाई जा सकेगी, जिससे स्थानीय बाजारों में चीनी की उपलब्धता बढ़ेगी।

प्रभासाक्षी 21 Aug 2026 2:17 pm

क्या कैप्टन ने सरकार के 'कप्तान' पर ही सवाल उठा दिये हैं? अमरिंदर ने Modi-ism का जिक्र कर क्या संदेश दिया?

पंजाब विधानसभा चुनावों से पहले राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह ने व्यक्ति-केंद्रित राजनीति पर सवाल उठाते हुए एक बड़ा राजनीतिक सवाल दागा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और पिछले एक दशक की उपलब्धियों को स्वीकार करते हुए कैप्टन ने अंग्रेजी समाचार-पत्र में अपने आलेख के जरिए यह संकेत दिया है कि अब भाजपा और देश की राजनीति को सिर्फ एक नाम और एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द सिमटने की बजाय मजबूत संस्थाओं, जवाबदेही और स्थायी लोकतांत्रिक ढांचे की ओर बढ़ना चाहिए। एक तरह से कैप्टन ने भाजपा को भी सलाह दे डाली है कि मोदी-इज़्म की अगली मंजिल केवल मोदी के नाम पर आगे बढ़ना नहीं, बल्कि ऐसी संस्था-केंद्रित व्यवस्था खड़ी करना होनी चाहिए, जो किसी एक नेता से परे जाकर देश की राजनीतिक और प्रशासनिक ताकत को स्थायी आधार दे सके। अपने आलेख में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने साफ तौर पर कहा है कि नरेंद्र मोदी के दौर ने भारतीय राजनीति और शासन की दिशा बदल दी है। उनके अनुसार, मोदी ने भारतीय जनता पार्टी को राजनीति के एक सीमित दायरे से निकालकर देशव्यापी शक्ति में बदला। डिजिटल सार्वजनिक ढांचे, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, वित्तीय समावेशन, स्वच्छता, आवास, बिजली और बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों में हुए कामों का उल्लेख करते हुए उन्होंने माना कि मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि सरकार की पहुंच और डिलीवरी क्षमता का विस्तार रही है। इसे भी पढ़ें: ‘ऐसे समझौते...’: Harsimrat Badal ने SAD-BJP Alliance की अटकलों को फिर दी हवा, Punjab में होगी वापसी? लेकिन कैप्टन का असली संदेश इससे आगे जाता है। उनका तर्क है कि किसी भी लोकतंत्र की सफलता को केवल एक शक्तिशाली नेता की उपलब्धियों से नहीं मापा जा सकता। मजबूत सरकार और मजबूत नेता महत्वपूर्ण हैं, लेकिन लोकतंत्र की असली मजबूती मजबूत संस्थाओं, जवाबदेही और संवैधानिक संतुलन से आती है। उन्होंने सवाल उठाया कि मोदी-इज़्म की अगली यात्रा आखिर किस दिशा में होगी? क्या वह एक व्यक्ति के नेतृत्व के इर्द-गिर्द सीमित रहेगा या फिर ऐसी संस्थागत व्यवस्था खड़ी करेगा, जो किसी भी व्यक्ति के सत्ता से हटने के बाद भी देश को आगे बढ़ाती रहे? यहीं से कैप्टन अमरिंदर सिंह का आलेख राजनीतिक रूप से और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। भाजपा के वरिष्ठ नेता होते हुए भी उन्होंने संसद की भूमिका, संसदीय समितियों की जांच, संघीय विमर्श, संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता और नागरिक अधिकारों जैसे मुद्दों को खुलकर उठाया है। उनका कहना है कि लोकतंत्र केवल नियमित चुनावों का नाम नहीं है। चुनावी जीत किसी सरकार को जनादेश जरूर देती है, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि सत्ता के इस्तेमाल पर संस्थागत नियंत्रण कितना प्रभावी है। कैप्टन ने विशेष रूप से संसद की समितियों और संसदीय जांच की भूमिका पर जोर दिया है। उनके अनुसार, बड़े फैसलों से पहले गंभीर विचार-विमर्श और समितियों की जांच को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। संघीय ढांचे के सवाल पर भी उनका संकेत साफ है कि केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन तथा संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता लोकतंत्र की दीर्घकालिक मजबूती के लिए जरूरी है। उनका एक और महत्वपूर्ण तर्क कल्याणकारी योजनाओं को लेकर है। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा कि खाद्य सुरक्षा, आवास, छात्रवृत्ति और सामाजिक सुरक्षा जैसी योजनाओं को किसी नेता की उदारता या राजनीतिक उपहार के रूप में नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकार और राज्य के दायित्व के रूप में देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक, जब शासन का आधार व्यक्ति की छवि से आगे बढ़कर संस्थागत अधिकारों और जवाबदेही पर टिकेगा, तभी विकास की प्रक्रिया स्थायी और निष्पक्ष बन सकेगी। आलेख में कैप्टन ने संविधान की मूल अवधारणाओं पर भी अपनी बात रखी है। उनका कहना है कि बहुलतावाद, धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद जैसे शब्दों पर राजनीतिक मतभेद हो सकते हैं, लेकिन संवैधानिक व्यवस्था को केवल राजनीतिक नारों के आधार पर नहीं आंका जा सकता। उनका तर्क है कि समाजवाद का अर्थ निजी क्षेत्र का विरोध या राज्य का पूर्ण नियंत्रण नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक न्याय तथा अवसरों की समानता भी है। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने मोदी सरकार की उपलब्धियों को नकारने की बजाय उन्हें भारत की नई राजनीतिक वास्तविकता का हिस्सा माना है। उनका कहना है कि पिछले एक दशक में भारत ने ऊर्जा, महत्वाकांक्षा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत पहचान हासिल की है। लेकिन उन्होंने यह भी चेताया है कि किसी नेता की ऐतिहासिक सफलता का अंतिम पैमाना केवल उसकी व्यक्तिगत लोकप्रियता या चुनावी जीत नहीं होती। असली कसौटी यह होती है कि उसके बाद देश की संस्थाएं कितनी मजबूत, स्वायत्त और सक्षम बनकर उभरती हैं। यानी, कैप्टन का संदेश सीधे तौर पर मोदी के नेतृत्व को खारिज करने का नहीं, बल्कि उसकी अगली मंजिल तय करने का है। उनका मानना है कि मोदी-इज़्म का अगला चरण व्यक्ति-केंद्रित राजनीति से संस्था-केंद्रित राष्ट्र निर्माण की ओर बढ़ना चाहिए। मजबूत नेतृत्व अपनी जगह जरूरी है, लेकिन उसे संविधान, संसद, न्यायिक एवं संवैधानिक संस्थाओं और नागरिक अधिकारों की मजबूती के साथ आगे बढ़ना होगा। देखा जाये तो पंजाब के चुनावी माहौल में एक वरिष्ठ भाजपा नेता और दो बार के पूर्व मुख्यमंत्री की ओर से उठाया गया यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह केवल पंजाब की राजनीति तक सीमित नहीं है। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपने आलेख के जरिए राष्ट्रीय राजनीति के सामने एक बुनियादी सवाल रखा है कि क्या भारत का अगला विकास चरण केवल मजबूत नेता के भरोसे आगे बढ़ेगा, या फिर ऐसा संस्थागत ढांचा तैयार करेगा जो किसी भी नेता से बड़ा, ज्यादा टिकाऊ और आने वाली पीढ़ियों के लिए अधिक जवाबदेह हो? कुल मिलाकर देखें तो कैप्टन के शब्दों का सार यही है कि भारत को मजबूत नेतृत्व चाहिए, लेकिन उससे भी ज्यादा मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाएं। और शायद यही वह बहस है, जिसे उन्होंने पंजाब चुनावों से पहले अपने आलेख के जरिए राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 21 Aug 2026 1:59 pm

Manipur में 'No NRC, No Census' आंदोलन क्यों पकड़ रहा रफ्तार? आखिर क्यों सड़कों पर उतर रही है जनता?

मणिपुर में जनगणना से पहले एनआरसी की मांग को लेकर शुरू हुआ आंदोलन अब बड़ा रूप ले चुका है और राज्य सरकार ही नहीं बल्कि केंद्र सरकार की चिंताएं भी बढ़ती जा रही हैं। मणिपुर में बड़े प्रयासों के बाद शांति स्थापित हुई लेकिन नये आंदोलन के चलते प्रशासन के हाथ पांव फूल रहे हैं और जनगणना प्रशिक्षण का काम कुछ जिलों में रोकना पड़ गया है। देखा जाये तो मणिपुर में ‘नो एनआरसी, नो सेंसस’ का नारा अब केवल जनगणना रोकने की मांग तक सीमित नहीं रह गया है। इसके पीछे विस्थापन, जनसंख्या में बदलाव, भूमि अधिकार, पहचान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर लंबे समय से चली आ रही चिंताएं हैं। तीन साल से अधिक समय से जातीय हिंसा की मार झेल रहे मणिपुर में जनगणना से पहले एनआरसी की मांग अब एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक मुद्दे का रूप ले चुकी है। बताया जा रहा है कि वर्तमान आंदोलन की सबसे बड़ी चिंता 40 हजार से अधिक आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों से जुड़ी है। चुराचांदपुर या मोरेह से विस्थापित कोई मैतेई परिवार आज इम्फाल के राहत शिविर में रह रहा है, तो जनगणना में उसकी वर्तमान स्थिति दर्ज हो सकती है। इसी तरह इम्फाल से विस्थापित कोई कुकी परिवार चुराचांदपुर में गिना जा सकता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या जनगणना मणिपुर की वास्तविक जनसंख्या संरचना दर्ज करेगी या हिंसा और विस्थापन से अस्थायी रूप से बदले भूगोल को? यह चिंता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जनगणना के आंकड़े भविष्य में विकास योजनाओं, संसाधनों के आवंटन, परिसीमन, आरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को प्रभावित कर सकते हैं। इसे भी पढ़ें: Manipur में 20 से 22 अगस्त तक बंद रहेंगे सभी स्कूल और कॉलेज, सरकार ने जारी किया आदेश इसी पृष्ठभूमि में कैंपेन फॉर जस्ट एंड फेयर डिलिमिटेशन के नेतृत्व में आंदोलन तेज हुआ। 48 घंटे के बंद के दौरान कई घाटी जिलों में सड़कें जाम की गईं, प्रदर्शन हुए और मुख्यमंत्री व गृह मंत्री के पुतले जलाए गए। छात्रों और महिलाओं की भागीदारी ने आंदोलन को व्यापक जनरूप दिया। अब सरकारी कार्यालयों के बहिष्कार का भी ऐलान किया गया है, जबकि आवश्यक सेवाओं को इससे अलग रखा गया है। बढ़ते तनाव के बीच राज्य सरकार ने शिक्षण संस्थानों को तीन दिन के लिए बंद करने का आदेश दिया है। बताया जा रहा है कि आंदोलन की मूल मांग है कि जनगणना से पहले नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स यानी एनआरसी को लागू या अपडेट किया जाए। देखा जाये तो यहां एनआरसी और जनगणना में अंतर समझना जरूरी है। जनगणना का उद्देश्य आबादी की गणना और उसकी सामाजिक-आर्थिक जानकारी जुटाना है, जबकि एनआरसी का संबंध भारतीय नागरिकों की पहचान से है। नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 14ए और 2003 के नियम इसके कानूनी ढांचे से जुड़े हैं। आंदोलन समर्थकों का तर्क है कि पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि राज्य की वैध जनसांख्यिकीय आबादी कौन है, उसके बाद ही नई जनगणना के आंकड़ों को भविष्य के प्रशासनिक और राजनीतिक फैसलों का आधार बनाया जाए। देखा जाये तो मणिपुर में यह मांग नई नहीं है। विधानसभा 2022 और फिर 2024 में एनआरसी लागू करने संबंधी प्रस्ताव पारित कर चुकी है। राज्य जनसंख्या आयोग का गठन भी इसी बहस की पृष्ठभूमि में हुआ। लेकिन सबसे विवादास्पद मुद्दा कट-ऑफ वर्ष का है। कई नागरिक संगठनों की मांग है कि 1951 को आधार बनाया जाए, जबकि राज्य मंत्रिमंडल ने इनर लाइन परमिट के संदर्भ में 1961 को ‘मूल निवासी’ निर्धारण का आधार स्वीकार किया था। यही अंतर अब आंदोलन की राजनीतिक धार को और तेज कर रहा है। जनसांख्यिकीय बदलाव की आशंका के पीछे पुराने आंकड़ों का भी हवाला दिया जा रहा है। हम आपको बता दें कि 1961 में मणिपुर की दशकीय जनसंख्या वृद्धि 35.04 प्रतिशत और 1971 में 37.52 प्रतिशत रही, जबकि 2011 में यह 24.50 प्रतिशत थी। समर्थकों का कहना है कि ऐसे बदलावों की गंभीर जांच होनी चाहिए। हालांकि यह भी उतना ही जरूरी है कि जनसंख्या वृद्धि को सीधे अवैध प्रवास का प्रमाण नहीं मान लिया जाए। हर दावा तथ्यों और प्रमाणों की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। यहीं यह बहस सबसे संवेदनशील हो जाती है। म्यांमार सीमा से लगे मणिपुर में अवैध प्रवास का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहा है। लेकिन कुकी-जो समुदायों के म्यांमार के चिन समुदायों से जातीय संबंध भी हैं। इसलिए पूरे समुदाय को अवैध प्रवास की दृष्टि से देखना न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत हो सकता है, बल्कि पहले से विभाजित समाज में अविश्वास को और गहरा कर सकता है। एनआरसी पर बहस प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए, किसी समुदाय के सामूहिक संदेहीकरण के आधार पर नहीं। उधर, अब 2027 की जनगणना इस विवाद का तात्कालिक केंद्र बन गई है। पहले चरण में सितंबर में हाउस लिस्टिंग प्रस्तावित है, जबकि फरवरी 2027 में जनसंख्या और सामाजिक-आर्थिक विवरण जुटाए जाने हैं। इसी बीच लिलोंग के एसडीओ द्वारा जनगणना प्रशिक्षण कार्यक्रम रद्द किया जाना तनाव कम करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब ज्ञापन, प्रदर्शन और चेतावनियां पहले से मौजूद थीं, तब राजनीतिक संवाद पहले क्यों नहीं शुरू हुआ? इसी बीच विभिन्न समुदायों और संगठनों के नेताओं का एक 10 सदस्यीय दल दिल्ली रवाना हुआ है, ताकि केंद्र के समक्ष एनआरसी और जनगणना का मुद्दा उठाया जा सके। दिल्ली जाना जरूरी हो सकता है, क्योंकि एनआरसी और जनगणना जैसे फैसलों में केंद्र की भूमिका निर्णायक है। लेकिन हर बार स्थानीय संकट के बाद दिल्ली की ओर देखना राजनीतिक नेतृत्व की सीमाओं को भी उजागर करता है। देखा जाये तो जनगणना शासन, विकास और कल्याण के लिए अनिवार्य है। लेकिन यहां सवाल यह है कि क्या लंबे विस्थापन, अधूरी पुनर्वास प्रक्रिया और गहरे जनसांख्यिकीय अविश्वास के बीच की गई जनगणना मणिपुर की सामान्य सामाजिक संरचना का वास्तविक चित्र पेश कर पाएगी? बहरहाल, सरकार को आंदोलन को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानने की बजाय उसके पीछे छिपे विश्वास के संकट को समझना होगा। एक प्रशिक्षण कार्यक्रम रद्द कर देना या दिल्ली में ज्ञापन सौंप देना पर्याप्त नहीं होगा। मणिपुर को तथ्य-आधारित एनआरसी बहस, विस्थापितों की सुरक्षित वापसी, जनगणना की विश्वसनीयता और सभी समुदायों की संवैधानिक सुरक्षा पर गंभीर राजनीतिक संवाद चाहिए। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 21 Aug 2026 1:39 pm

राहुल गांधी का धरना आक्रामक सियासी कनेक्ट, विपक्ष और बाकी कांग्रेस को पसंद आयेगा?

Rahul Gandhi aggressive political strategy- राहुल गांधी ने कांग्रेस की विपक्षी राजनीति को आक्रामक रणनीति में बदल दिया है। छात्र आंदोलनों, युवाओं, Gen Z और महिलाओं के मुद्दों को उठाकर वह नई राजनीतिक जमीन तैयार कर रहे हैं। क्या कांग्रेस इस रास्ते पर चलेगी?

सत्य हिंदी 21 Aug 2026 11:41 am

Modi ने पिछले साल China जाने से पहले चली थी तगड़ी चाल, अब Xi Jinping के India आने से पहले खेल दिया बड़ा दाँव

पिछले वर्ष जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए चीन जाने वाले थे, तो उन्होंने उससे ठीक पहले जापान का दौरा किया था। 29 और 30 अगस्त 2025 को जापान में वार्षिक भारत-जापान शिखर सम्मेलन में भाग लेने के बाद मोदी सीधे 31 अगस्त से 1 सितंबर तक SCO समिट के लिए चीन के तियानजिन पहुंचे थे। उस समय भी घटनाक्रम का सामरिक संदेश स्पष्ट था कि भारत एशिया की बड़ी शक्तियों के साथ अपने रिश्तों को अलग-अलग खांचों में नहीं, बल्कि अपनी राष्ट्रीय रणनीति के अनुसार आगे बढ़ा रहा है। अब एक बार फिर वैसा ही दिलचस्प और महत्वपूर्ण संयोग सामने आया है। अगले महीने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए भारत आने की संभावना से पहले जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइज़ुमी की भारत यात्रा के दौरान नई दिल्ली और टोक्यो ने रक्षा एवं समुद्री सुरक्षा सहयोग को नई दिशा देने वाले अहम फैसले किए हैं। संदेश को सीधे शब्दों में कहें तो चीन देखता रह गया और भारत ने जापान के साथ हिंद-प्रशांत की सुरक्षा, नौसैनिक सहयोग, रक्षा तकनीक और लॉजिस्टिक्स से जुड़ी साझेदारी को और मजबूत कर लिया। इसे भी पढ़ें: Vishwakhabram: Putin के Kuril Islands पहुँचते ही भड़क उठीं Sanae Takaichi, Japan-Russia के बीच जोरदार भिड़ंत से दुनिया हैरान देखा जाये तो यह केवल एक रक्षा मंत्री की औपचारिक यात्रा नहीं है। पिछले महीने, 1 से 3 जुलाई 2026 के बीच जापान की प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची भी भारत आई थीं। नई दिल्ली में 16वें भारत-जापान वार्षिक शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों देशों ने 10 अरब डॉलर से अधिक के द्विपक्षीय समझौतों और आर्थिक, सामरिक तथा रक्षा सहयोग को आगे बढ़ाने पर सहमति बनाई। अब जापानी रक्षा मंत्री की यात्रा और इसी समय भारत में मौजूद जापान के बड़े निवेशक प्रतिनिधिमंडल ने यह संकेत और मजबूत कर दिया है कि भारत-जापान संबंध अब सुरक्षा और आर्थिक शक्ति के संयुक्त ढांचे में बदल रहे हैं। नई दिल्ली में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और उनके जापानी समकक्ष शिंजिरो कोइज़ुमी के बीच हुई द्विपक्षीय वार्ता की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि समुद्री सुरक्षा सहयोग पर मेमोरेंडम ऑफ अरेंजमेंट (MoA) रही। इसके तहत दोनों देशों की नौसेनाओं के बीच समुद्री गतिविधियों की निगरानी, मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस, सूचनाओं के आदान-प्रदान, खोज एवं बचाव तथा मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR) के क्षेत्र में सहयोग का व्यापक ढांचा तैयार होगा। इस समझौते का महत्व केवल तकनीकी नहीं, बल्कि गहरे सामरिक निहितार्थों वाला है। हिंद महासागर से लेकर पश्चिमी प्रशांत तक समुद्री मार्गों पर नियंत्रण और नौवहन की स्वतंत्रता आज एशिया की सबसे बड़ी रणनीतिक प्रतिस्पर्धाओं में शामिल है। दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर में चीन की बढ़ती आक्रामकता और समुद्री मौजूदगी के बीच भारत और जापान का समुद्री समन्वय मजबूत होना शक्ति संतुलन की राजनीति में महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। देखा जाये तो यह कोई औपचारिक सैन्य गठबंधन की घोषणा नहीं है, लेकिन इसका मतलब साफ है कि भारत और जापान साझा सूचना, बेहतर समुद्री निगरानी, परस्पर लॉजिस्टिक सहयोग और संयुक्त क्षमता निर्माण के जरिए हिंद-प्रशांत में अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत कर रहे हैं। हम आपको बता दें कि भारत-जापान रक्षा सहयोग पिछले एक दशक में लगातार गहराता गया है। 2014 में औपचारिक रूप से स्थापित ‘विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी’ को दोनों देशों के नेतृत्व ने लगातार मजबूत किया। प्रधानमंत्री मोदी की जापान यात्राओं और दोनों देशों के बीच नियमित उच्चस्तरीय संवाद ने इस रिश्ते को नई गति दी। इस साझेदारी की बुनियाद साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और मुक्त एवं खुले हिंद-प्रशांत की समान सोच पर टिकी है। 2014 के बाद हुए रक्षा समझौतों ने सैन्य सहयोग को संस्थागत स्वरूप दिया। 2020 में हुआ पारस्परिक आपूर्ति और सेवाएं समझौता दोनों देशों की सेनाओं के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण साबित हुआ। MILAN और JAIMEX जैसे नौसैनिक अभ्यासों में इस व्यवस्था ने जहाजों और विमानों को अधिक सहज लॉजिस्टिक सहायता उपलब्ध कराने का आधार तैयार किया। साथ ही रक्षा प्रौद्योगिकी में भी दोनों देश अब प्रतीकात्मक सहयोग से आगे निकल चुके हैं। 2024 में औपचारिक रूप से आगे बढ़ा जापान के UNICORN इंटीग्रेटेड कम्युनिकेशन एंटीना सिस्टम का भारतीय नौसेना के लिए सह-विकास, दोनों देशों का पहला संयुक्त रक्षा उपकरण प्रोजेक्ट है। अब नई वार्ता में समुद्री सुरक्षा के साथ-साथ माइन काउंटरमेजर्स, संयुक्त जहाज निर्माण और पारस्परिक शिप रिपेयर सुविधाओं को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया है। इसके अलावा, भारत की उत्पादन क्षमता और जापान की उच्च तकनीकी विशेषज्ञता को ‘मेक इन इंडिया’ के ढांचे से जोड़ने की कोशिश विशेष महत्व रखती है। इसका अर्थ केवल हथियार खरीदना नहीं, बल्कि भविष्य में संयुक्त उत्पादन, तकनीकी साझेदारी और रक्षा औद्योगिक क्षमता का विस्तार है। साथ ही दोनों देशों के बीच सैन्य अभ्यासों का दायरा भी बढ़ रहा है। धर्म गार्जियन और JAIMEX जैसे अभ्यासों को और व्यापक बनाने पर सहमति बनी है, जबकि वीर गार्जियन-26 एक नए चरण का संकेत है। इस अभ्यास में पहली बार जापानी लड़ाकू विमान भारत में भाग लेंगे। दोनों देशों ने DRDO और जापान की Acquisition, Technology and Logistics Agency (ATLA) के बीच रक्षा अनुसंधान एवं विकास सहयोग गहरा करने और एक डिफेंस इंडस्ट्री फोरम आयोजित करने की योजना पर भी जोर दिया है। इसके अलावा, कूटनीतिक और सामरिक समन्वय को आगे बढ़ाने के लिए इस वर्ष टोक्यो में प्रस्तावित चौथी भारत-जापान विदेश एवं रक्षा मंत्रियों की 2+2 बैठक की तैयारी तेज करने का भी फैसला हुआ है। साथ ही दोनों देश इंडो-पैसिफिक लॉजिस्टिक्स नेटवर्क (IPLN) के जरिए प्राकृतिक आपदाओं के दौरान राहतकर्मियों और जरूरी सामग्री को तेजी से पहुंचाने की क्षमता विकसित कर रहे हैं। देखा जाये तो इस पूरी साझेदारी का एक और महत्वपूर्ण आयाम आर्थिक सुरक्षा है। जापान की Free and Open Indo-Pacific अवधारणा और भारत की MAHASAGAR यानि Mutual and Holistic Advancement for Security and Growth Across Regions पहल के बीच बढ़ती समानता इस रिश्ते को केवल सैन्य दृष्टि से नहीं, बल्कि आपूर्ति श्रृंखला, निवेश, प्रौद्योगिकी और आर्थिक सुरक्षा के स्तर पर भी मजबूत कर रही है। जापानी प्रधानमंत्री की हालिया यात्रा, अरबों डॉलर के समझौते और भारत आए निवेशक प्रतिनिधिमंडल इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा दिखाई देते हैं। देखा जाये तो भारत और जापान का रिश्ता, कोई आज की भू-राजनीति की उपज नहीं है। इसके सांस्कृतिक सूत्र 752 ईस्वी तक जाते हैं, जब भारतीय बौद्ध भिक्षु बोधिसेन ने जापान के नारा स्थित तोदाइजी मंदिर में महान बुद्ध प्रतिमा का अभिषेक किया था। आधुनिक काल में स्वामी विवेकानंद, रवींद्रनाथ टैगोर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और रास बिहारी बोस जैसे व्यक्तित्वों ने दोनों देशों के संबंधों को नई गहराई दी। 1903 में स्थापित जापान-इंडिया एसोसिएशन आज भी जापान की सबसे पुरानी अंतरराष्ट्रीय मैत्री संस्थाओं में से एक है। लेकिन अब इतिहास और रणनीति एक ही दिशा में आगे बढ़ते दिख रहे हैं। पिछले साल मोदी जापान से होकर चीन गए थे; अब चीनी राष्ट्रपति के भारत आने से पहले जापान के साथ रक्षा साझेदारी का नया अध्याय खुला है। जापानी प्रधानमंत्री की यात्रा, विशाल आर्थिक समझौते, निवेशक प्रतिनिधिमंडल और अब रक्षा मंत्री के साथ समुद्री सुरक्षा समझौते, ये घटनाएं अलग-अलग नहीं हैं। इनका सामूहिक संदेश बेहद धारदार है कि भारत किसी एक शक्ति केंद्र की परिधि में नहीं घूम रहा। वह चीन से संवाद भी करेगा, ब्रिक्स और SCO जैसे मंचों पर साथ भी बैठेगा, लेकिन साथ ही जापान जैसे रणनीतिक साझेदारों के साथ हिंद-प्रशांत में अपनी सैन्य, आर्थिक और तकनीकी स्थिति भी मजबूत करता रहेगा। बहरहाल, प्राचीन सांस्कृतिक रिश्तों से लेकर हिंद महासागर और प्रशांत में संयुक्त नौसैनिक अभ्यासों तक, भारत-जापान संबंध अब एक नई रणनीतिक ऊंचाई पर पहुंच चुके हैं। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 21 Aug 2026 11:25 am

हरियाणा में भाजपा का टिफिन महाकुंभ 23 अगस्त को

हरियाणा में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) 23 अगस्त को टिफिन महाकुंभ का आयोजन करेगी। यह महाकुंभ राज्य में भाजपा के सभी 27 सांगठनिक जिलों में आयोजित किये जाएंगे

देशबन्धु 21 Aug 2026 7:50 am

झारखंडः जेएसएससी-सीजीएल रद्द करने के विरोध में चयनित अभ्यर्थियों ने निकाली तिरंगा यात्रा, फैसला वापस लेने की मांग

झारखंड कर्मचारी चयन आयोग की संयुक्त स्नातक स्तरीय (सीजीएल) परीक्षा के जरिए की गई नियुक्तियां रद्द किए जाने के विरोध में चयनित अभ्यर्थियों का आंदोलन तेज होता जा रहा है

देशबन्धु 21 Aug 2026 3:30 am

बिहार: 'अपने घर' का सपना साकार, चाबी पाकर भावुक लाभार्थियों ने सरकार को दिया धन्यवाद

बिहार: 'अपने घर' का सपना साकार, चाबी पाकर भावुक लाभार्थियों ने सरकार को दिया धन्यवाद

समाचार नामा 20 Aug 2026 10:16 pm

राष्ट्रीय राजमार्गों पर निर्माण संबंधी प्रतिबंधों के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगा केरल

राष्ट्रीय राजमार्गों पर निर्माण संबंधी प्रतिबंधों के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगा केरल

समाचार नामा 20 Aug 2026 10:15 pm

अमेरिकी राजदूत सर्जियो गौर की जम्मू-कश्मीर यात्रा ने चीनी-पाकिस्तानी चालों को किया दुरुस्त!

जरा गौर कीजिए, जब चीन अरुणाचल प्रदेश में भारत को आंखें दिखा रहा हो, जब अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर का जम्मू-कश्मीर/लद्दाख पहुंचना और जम्मू-कश्मीर को भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा बताना भारतीय कूटनीति की कितनी बड़ी सफलता है, क्योंकि यह परोक्ष रूप से चीन को संदेश है कि भारत का साथ मिलते ही अमेरिका अन्य एशियाई 'बदमाशों' को रौंद डालेगा। उधर, पाकिस्तान को संदेश है कि इस्लामिक नाटो उसकी सुरक्षा की गारंटी नहीं बनेगा, यदि अमेरिका खुलकर भारत के साथ खड़ा रहेगा। जी हां, अमेरिकी राजदूत की 19–20 अगस्त 2026 की जम्मू-कश्मीर और लद्दाख यात्रा को केवल एक राजनयिक दौरा मानना पर्याप्त नहीं होगा। इसे भी पढ़ें: Sergio Gor के बयान से तिलमिलाये Pakistan ने Trump Administration पर उतारी भड़ास, US Diplomat Natalie Baker को तलब कर थमाया Strong Demarche खासकर श्रीनगर में उनका यह कहना कि जम्मू-कश्मीर “भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा” है और अमेरिकी यात्रा-परामर्श की समीक्षा के संकेत देना, वाशिंगटन के पुराने कश्मीर-संबंधी सार्वजनिक रुख की तुलना में महत्वपूर्ण राजनीतिक-सामरिक संकेत देता है। इससे कई सवाल उपजते हैं, जिनके निहितार्थ को समझना भी जरूरी है:- पहला सवाल है कि क्या वास्तव में अमेरिकी स्टैंड बदल गया है? तो जवाब होगा कि अपेक्षित सावधानी जरूरी है। अभी इसे अमेरिका की औपचारिक कश्मीर-नीति में पूर्ण परिवर्तन कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन राजनयिक भाषा और व्यवहार में बदलाव का संकेत स्पष्ट है। पहले अमेरिकी नीति का सार्वजनिक ढांचा मुख्यतः यह रहा कि कश्मीर भारत-पाकिस्तान के बीच विवादित विषय है और दोनों देशों को बातचीत के माध्यम से समाधान निकालना चाहिए। 2019 के बाद भी अमेरिकी अधिकारियों ने इस मूल स्थिति को बनाए रखा था। इसके विपरीत, गोर ने भारतीय प्रशासित जम्मू-कश्मीर में जाकर उसे “भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा” कहा। पाकिस्तान ने इसे अमेरिकी पारंपरिक रुख से विचलन मानते हुए अमेरिकी प्रभारी राजदूत को तलब कर औपचारिक विरोध दर्ज कराया। इसलिए फिलहाल इसे “नीति परिवर्तन” से अधिक “नीति-संकेत में परिवर्तन” कहना उचित होगा। दूसरा सवाल है कि इस यात्रा का सबसे बड़ा संदेश क्या है? क्या कश्मीर को जमीन पर देखकर आकलन हुआ है? तो जवाब होगा कि गोर का दौरा छह साल से अधिक अंतराल के बाद किसी अमेरिकी राजदूत की कश्मीर यात्रा है। उन्होंने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से मुलाकात की और सुरक्षा व्यवस्था तथा बदलते माहौल का प्रत्यक्ष आकलन किया। यह महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि अमेरिका की कश्मीर संबंधी धारणा अब केवल इस्लामाबाद, नई दिल्ली या अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों पर निर्भर नहीं रह सकती। राजदूत का स्वयं श्रीनगर जाना और फिर सुरक्षा स्थिति पर सकारात्मक टिप्पणी करना वाशिंगटन के नीति-निर्माताओं को एक अलग जमीनी इनपुट देता है। तीसरा सवाल यह है कि Travel Advisory में बदलाव—छोटा दिखने वाला बड़ा संकेत है? तो जवाब होगा कि गोर ने जम्मू-कश्मीर के लिए अमेरिकी यात्रा-परामर्श की समीक्षा के संकेत दिए हैं। अगर आगे अमेरिका अपने मौजूदा “Do Not Travel” स्तर को नीचे करता है, तो इसका असर केवल अमेरिकी पर्यटकों पर नहीं पड़ेगा। यह संदेश जाएगा कि सुरक्षा परिस्थितियों में सुधार हुआ है। सामान्य आर्थिक गतिविधियां बढ़ रही हैं। पर्यटन के लिए क्षेत्र अधिक खुल रहा है। अंतरराष्ट्रीय जोखिम-धारणा बदल रही है। यानी कश्मीर के लिए यह सुरक्षा से पर्यटन और पर्यटन से निवेश की दिशा में सकारात्मक कूटनीतिक संकेत बन सकता है। चौथा सवाल यह है कि क्या यह परिदृश्य पाकिस्तान के लिए बड़ा कूटनीतिक झटका है? तो कहना न होगा कि इस बयान की सबसे तीखी प्रतिक्रिया पाकिस्तान से आई है। इस्लामाबाद ने इसे अपनी दशकों पुरानी कश्मीर कूटनीति के प्रतिकूल माना और अमेरिकी राजनयिक को तलब किया। पाकिस्तान के लिए समस्या सिर्फ गोर का बयान नहीं है, बल्कि समस्या यह है कि यदि अमेरिका जैसा प्रभावशाली देश धीरे-धीरे कश्मीर को “भारत-पाकिस्तान के विवाद” की भाषा से हटाकर “भारत के महत्वपूर्ण हिस्से” की भाषा में संबोधित करने लगे, तो पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक रणनीति कमजोर हो सकती है। पांचवां सवाल यह है कि क्या चीन का कोण भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता? तो जवाब होगा कि गोर का कार्यक्रम केवल श्रीनगर तक सीमित नहीं रहा; वह लद्दाख भी गए। यह समय विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि लद्दाख भारत-चीन सीमा-सुरक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है। इसलिए यात्रा का एक व्यापक संदेश यह भी हो सकता है कि अमेरिका भारत के पश्चिमी और उत्तरी दोनों रणनीतिक मोर्चों को अपने Indo-Pacific और South/Central Asia दृष्टिकोण से देख रहा है। छठा सवाल यह है कि क्या भारत-अमेरिका संबंधों में कश्मीर की भूमिका बदल सकती है? तो कहना न होगा कि यह घटनाक्रम भारत-अमेरिका संबंधों के उस व्यापक पुनर्संतुलन का हिस्सा हो सकता है जिसमेंआतंकवाद के विरुद्ध सहयोग, चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला, हिंद-प्रशांत रणनीति, रक्षा एवं तकनीकी साझेदारी, ऊर्जा एवं व्यापार, और दक्षिण एशिया में भारत की बढ़ती रणनीतिक भूमिका एक-दूसरे से जुड़ रहे हैं। गोर स्वयं भारत में अमेरिकी राजदूत होने के साथ South and Central Asian Affairs के Special Envoy भी हैं। इसलिए उनकी टिप्पणी का महत्व सामान्य राजदूत की टिप्पणी से अधिक माना जा सकता है। सातवां सवाल यह है कि क्या भारत को अति-उत्साहित होने से भी बचना होगा? तो जवाब होगा कि यहां एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक सावधानी बरतनी जरूरी है क्योंकि एक राजदूत का बयान अमेरिकी सरकार की पूरी औपचारिक विदेश नीति का विकल्प नहीं होता। जब तक अमेरिकी विदेश विभाग या व्हाइट हाउस अपनी आधिकारिक नीति में स्पष्ट बदलाव घोषित नहीं करता, तब तक यह कहना कि “अमेरिका ने कश्मीर पर पाकिस्तान को छोड़कर भारत का पक्ष ले लिया है” अतिशयोक्ति होगी। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि अमेरिकी सार्वजनिक कूटनीतिक भाषा में एक उल्लेखनीय बदलाव दिखाई दे रहा है। आठवां सवाल यह है कि सबसे बड़ा रणनीतिक निहितार्थ क्या है? तो जवाब होगा कि मेरे आकलन में इस यात्रा का वास्तविक महत्व चार शब्दों में है: “Narrative → Ground Reality → Policy.” यदि अमेरिका को जमीनी स्तर पर कश्मीर में सुरक्षा, राजनीतिक प्रक्रिया, पर्यटन और आर्थिक सामान्यीकरण दिखाई देता है और उसके आधार पर उसकी यात्रा चेतावनी कम होती है, तो धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव भी बदल सकता है। यही भारत के लिए सबसे बड़ा कूटनीतिक लाभ होगा। निष्कर्षतः, सर्जियो गोर की कश्मीर यात्रा को भारत की कूटनीतिक उपलब्धि के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन इसे अभी अमेरिकी कश्मीर नीति का अंतिम परिवर्तन घोषित करना जल्दबाजी होगी। असली परीक्षा अगले चरण में होगी—क्या Washington अपनी आधिकारिक भाषा बदलेगा, क्या travel advisory घटेगी और क्या भविष्य में अमेरिकी अधिकारी कश्मीर को भारत के आंतरिक प्रशासनिक-सुरक्षा संदर्भ में अधिक स्पष्टता से देखेंगे? अगर इन तीनों प्रश्नों का उत्तर “हाँ” होता है, तो गोर की यह यात्रा दक्षिण एशिया की कूटनीति में एक महत्वपूर्ण turning point सिद्ध हो सकती है। # क्या ईरान में पिटी अमेरिकी भद्द और पाकिस्तान के दोगले रवैये से अचंभित अमेरिका ने ऐसा किया हाँ—इसे एक संभावित कारण के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन निर्णायक कारण कहना अभी जल्दबाजी होगी। उपलब्ध घटनाक्रम को जोड़ें तो अमेरिकी सोच में पाकिस्तान को लेकर विश्वसनीयता का प्रश्न जरूर उभरता है। सवाल है कि क्या ईरान प्रकरण ने अमेरिका को पाकिस्तान को नए नजरिये से देखने पर मजबूर किया? जवाब होगा कि ईरान-अमेरिका संकट में पाकिस्तान ने एक तरफ अमेरिका के साथ संवाद और मध्यस्थता की भूमिका निभाई, जबकि दूसरी तरफ ईरान के प्रति अपनी निकटता और क्षेत्रीय हितों को भी साधता रहा। विशेषज्ञों ने भी पाकिस्तान की निष्पक्ष मध्यस्थ के रूप में विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं—विशेषकर ईरान, अफगानिस्तान और सऊदी अरब से उसके एक साथ जुड़े हितों को देखते हुए। यानी Washington के लिए संदेश यह हो सकता है कि पाकिस्तान को एक भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार की बजाय आवश्यकता पड़ने पर उपयोगी लेकिन स्वार्थ-आधारित साझेदार के रूप में देखना अधिक व्यावहारिक है। लेकिन कश्मीर पर गोर का बयान सिर्फ पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए? मेरे आकलन में नहीं। क्योंकि सर्जियो गोर ने श्रीनगर में जम्मू-कश्मीर को “भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा” कहा और क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था की प्रशंसा करते हुए अमेरिकी Travel Advisory की समीक्षा की बात कही। इसके बाद पाकिस्तान ने अमेरिकी राजनयिक को बुलाकर औपचारिक विरोध दर्ज कराया और कहा कि यह अमेरिकी पारंपरिक कश्मीर-रुख के विपरीत है। इसलिए इसके पीछे कई परतें हो सकती हैं: 1. ईरान: पाकिस्तान की मध्यस्थता और दोहरे हितों से अमेरिकी रणनीतिक संदेह बढ़ा हो। 2. आतंकवाद: अमेरिका के लिए पाकिस्तान की उपयोगिता और विश्वसनीयता का मूल्यांकन फिर से हो रहा हो। 3. भारत: चीन के मुकाबले भारत का रणनीतिक महत्व लगातार बढ़ रहा है। 4. कश्मीर: जमीनी सुरक्षा परिस्थितियों को देखकर अमेरिकी धारणा में बदलाव की शुरुआत हुई हो। 5. पाकिस्तान: Washington अब Islamabad को South Asia का अनिवार्य रणनीतिक केंद्र मानने की बजाय भारत को अधिक महत्व दे रहा हो। सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि यह बदलाव ईरान संकट के बाद पाकिस्तान की भूमिका बढ़ने के ठीक उसी दौर में दिखाई दे रहा है। पाकिस्तान ने अमेरिका-ईरान वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभाकर अपनी कूटनीतिक उपयोगिता बढ़ाने की कोशिश की थी। लेकिन यदि उसी समय अमेरिका का शीर्ष राजनयिक भारत में जाकर कहता है कि J&K भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा है, तो यह पाकिस्तान के लिए निश्चित रूप से बड़ा कूटनीतिक झटका है। इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि अमेरिका का संदेश है: “Pakistan may be useful, but India is strategically indispensable.” हालांकि अभी इसे अमेरिकी नीति का औपचारिक परिवर्तन नहीं कहा जा सकता। अगली निर्णायक परीक्षा यह होगी कि Washington अपनी आधिकारिक Kashmir language और Travel Advisory में वास्तव में क्या बदलाव करता है। और एक बड़ा प्रश्न इससे निकलता है—क्या ईरान संकट, पाकिस्तान की कथित दोहरी कूटनीति और चीन की बढ़ती चुनौती ने अमेरिका को अंततः यह समझा दिया है कि दक्षिण एशिया में पाकिस्तान से अधिक भरोसेमंद और दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदार भारत है? यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण यक्ष प्रश्न है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 20 Aug 2026 6:20 pm

कर्नाटक: कॉलेज के प्रिंसिपल पर 'वंदे मातरम' के नारे रोकने के आरोप में मामला दर्ज

कर्नाटक: कॉलेज के प्रिंसिपल पर 'वंदे मातरम' के नारे रोकने के आरोप में मामला दर्ज

समाचार नामा 20 Aug 2026 6:15 pm

'वंदे मातरम' विवाद पर अमित शाह का गंभीर आरोप, 'कांग्रेस विभाजन के बीज बोने वाली ऐतिहासिक भूल दोहरा रही'

'वंदे मातरम' विवाद पर अमित शाह का गंभीर आरोप, 'कांग्रेस विभाजन के बीज बोने वाली ऐतिहासिक भूल दोहरा रही'

समाचार नामा 20 Aug 2026 4:50 pm

बुरे काम का नतीजा बुरा ही होता है, बाहरी दिल्ली के बेताज बादशाह रहे Sajjan Kumar की सत्ता, सियासत और सजा की कहानी यही संदेश देती है

1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों में उम्रकैद की सजा काट रहे सज्जन कुमार का गुरुवार को दिल्ली में निधन हो गया। वह 80 वर्ष के थे। एक समय ग्रामीण और बाहरी दिल्ली की राजनीति के सबसे ताकतवर चेहरों में गिने जाने वाले, जाट समाज में व्यापक जनाधार रखने वाले और राष्ट्रीय राजधानी की सियासत में कांग्रेस की सत्ता का मजबूत स्तंभ रहे सज्जन कुमार की जिंदगी आखिरकार एक ऐसे मोड़ पर खत्म हुई, जिसे उनके राजनीतिक उत्थान और बाद के पतन की पूरी कहानी के रूप में देखा जा सकता है। सत्ता के शिखर से लेकर तिहाड़ जेल तक का उनका सफर इस कड़वे सच की याद दिलाता है कि बुरे काम का अंजाम बुरा ही होता है। हम आपको बता दें कि पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार को तिहाड़ जेल से सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया था, जहां चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। अस्पताल की ओर से उनकी मौत के कारण को लेकर तत्काल कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। सज्जन कुमार अपने जीवन के अंतिम वर्षों में 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों में मिली उम्रकैद की सजा काट रहे थे। इसे भी पढ़ें: 1984 दंगा केस में उम्रकैद काट रहे पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार की मौत, दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में तोड़ा दम हम आपको बता दें कि सज्जन कुमार दिल्ली की राजनीति में 1970 के दशक से ही प्रभावशाली चेहरा बनकर उभरे थे। उन्होंने 1977 में पार्षद के रूप में अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की और इसके बाद बाहरी दिल्ली लोकसभा सीट से तीन बार सांसद चुने गए। ग्रामीण दिल्ली और जाट बहुल इलाकों में उनकी पकड़ बेहद मजबूत मानी जाती थी। 1980 के दशक में वह दिल्ली कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल थे। स्थानीय संगठन, ग्रामीण मतदाता और जाट समाज में उनके मजबूत आधार ने उन्हें कांग्रेस की राजनीति का बड़ा खिलाड़ी बना दिया था। एक समय ऐसा था जब बाहरी दिल्ली की राजनीति में सज्जन कुमार का नाम ही सत्ता और प्रभाव का पर्याय माना जाता था। लेकिन जिस राजनीतिक ताकत ने उन्हें दशकों तक प्रभावशाली बनाए रखा, वही ताकत 1984 के सिख विरोधी दंगों के आरोपों और फिर लंबे कानूनी संघर्ष के सामने धीरे-धीरे कमजोर पड़ती चली गई। हम आपको याद दिला दें कि 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके अंगरक्षकों द्वारा हत्या के बाद देश, विशेषकर दिल्ली में सिख विरोधी हिंसा भड़क उठी थी। इसके पीछे ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद पैदा हुई परिस्थितियों को भी महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि के रूप में देखा गया था। दिल्ली में कई दिनों तक हिंसा का भयावह दौर चला था। सिखों के घरों, दुकानों और धार्मिक स्थलों को निशाना बनाया गया था। हजारों लोगों की जान गई। अलग-अलग आकलनों में मृतकों की संख्या अलग रही, लेकिन दिल्ली में 2,700 से अधिक सिखों के मारे जाने की पुष्टि हुई, जबकि देशभर में मृतकों की संख्या 3,000 से अधिक बताई गई। इसी हिंसा से जुड़े कई मामलों में सज्जन कुमार का नाम सामने आया। उन पर हिंसक भीड़ का नेतृत्व करने, लोगों को उकसाने, आपराधिक साजिश और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने जैसे गंभीर आरोप लगे। अगले तीन दशकों से अधिक समय तक उनके खिलाफ मुकदमों का सिलसिला चलता रहा और कई मामलों में उन्हें कभी राहत मिली तो कभी कानूनी शिकंजा कसता गया। सज्जन कुमार के राजनीतिक और कानूनी जीवन का सबसे बड़ा मोड़ 17 दिसंबर 2018 को आया। दिल्ली हाईकोर्ट ने निचली अदालत के 2013 के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें उन्हें बरी कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने सज्जन कुमार को 1984 के दंगों के दौरान दिल्ली के राज नगर पार्ट-1, पालम कॉलोनी में पांच सिखों की हत्या और एक गुरुद्वारे को जलाने से जुड़े मामले में दोषी ठहराया। अदालत ने उन्हें आपराधिक साजिश और हिंसा के लिए उकसाने सहित गंभीर अपराधों का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। अपने फैसले में दिल्ली हाईकोर्ट ने 1984 की सिख विरोधी हिंसा को “मानवता के खिलाफ अपराध” तक करार दिया था। अदालत ने यह भी निर्देश दिया था कि सज्जन कुमार को अपने प्राकृतिक जीवन के शेष समय तक जेल में रहना होगा। यहीं से वह नेता, जो कभी दिल्ली की सत्ता के गलियारों में बेहद प्रभावशाली माना जाता था, तिहाड़ जेल की सलाखों के पीछे पहुंच गया। हम आपको यह भी बता दें कि 1984 के दंगों से जुड़े आरोपों के बावजूद कांग्रेस लंबे समय तक सज्जन कुमार के साथ खड़ी रही। वह पार्टी के बड़े नेताओं में गिने जाते रहे और वर्षों तक पार्टी की राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा बने रहे। हालांकि समय के साथ राजनीतिक दबाव बढ़ता गया। 2009 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर को दिए गए चुनाव टिकट वापस ले लिए थे। इसके बाद सज्जन कुमार धीरे-धीरे पार्टी के भीतर हाशिये पर चले गए। 2018 में दिल्ली हाईकोर्ट से उम्रकैद की सजा मिलने के बाद उन्होंने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। इसके साथ ही कांग्रेस के साथ उनका औपचारिक रिश्ता समाप्त हो गया। जिस पार्टी में वह कभी दिल्ली की राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरों में शामिल थे, उसी पार्टी से उनका राजनीतिक सफर अंततः अलगाव और हाशिये पर खत्म हुआ। साथ ही 2018 की सजा सज्जन कुमार के खिलाफ अंतिम कानूनी कार्रवाई नहीं थी। फरवरी 2025 में दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने उन्हें 1984 के दंगों से जुड़े एक अन्य मामले में भी उम्रकैद की सजा सुनाई। यह मामला सरस्वती विहार क्षेत्र में भीड़ के हमले से जुड़ा था, जिसमें पिता-पुत्र जसवंत सिंह और तरुणदीप सिंह को कथित रूप से जिंदा जलाकर मार दिए जाने का मामला सामने आया था। अभियोजन पक्ष ने सज्जन कुमार के लिए मृत्युदंड की मांग की थी, लेकिन अदालत ने उनकी उम्र और स्वास्थ्य समेत अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई। इस तरह सज्जन कुमार को 1984 की हिंसा से जुड़े अलग-अलग मामलों में एक से अधिक बार उम्रकैद की सजा मिली और वह जीवन के अंतिम समय तक तिहाड़ जेल में ही रहे। साथ ही इस वर्ष जनवरी में सज्जन कुमार को 1984 के दंगों से जुड़े जनकपुरी और विकासपुरी क्षेत्रों के हिंसा भड़काने के आरोप वाले दो अलग-अलग मामलों में दिल्ली की अदालत से बरी कर दिया गया था। लेकिन इन बरी होने के फैसलों से उनकी रिहाई का रास्ता नहीं खुला, क्योंकि वह अन्य मामलों में उम्रकैद की सजा काट रहे थे। उनकी 2018 की दोषसिद्धि और सजा के खिलाफ चुनौती भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित थी। यानी कानूनी लड़ाई के लंबे दौर में कुछ मामलों में उन्हें राहत जरूर मिली, लेकिन 1984 के दंगों से जुड़े अपराधों में हुई दोषसिद्धियों ने उनकी जिंदगी की दिशा पूरी तरह बदल दी। देखा जाये तो सज्जन कुमार का राजनीतिक जीवन भारतीय राजनीति की उन कहानियों में शामिल हो गया है, जहां एक नेता का जनाधार और राजनीतिक प्रभाव लंबे समय तक उसे मजबूत बनाए रखता है, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया अंततः दशकों पुराने मामलों तक पहुंचती है। 1977 में पार्षद से राजनीतिक शुरुआत करने वाला नेता तीन बार लोकसभा पहुंचा। बाहरी दिल्ली में उसका व्यापक जनाधार था, ग्रामीण और जाट बहुल क्षेत्रों में उसकी मजबूत पकड़ थी और वह कांग्रेस की दिल्ली इकाई का बड़ा चेहरा था। लेकिन 1984 की हिंसा का दाग उसके राजनीतिक कद से कहीं ज्यादा भारी साबित हुआ। करीब चार दशक तक चले मुकदमों, राजनीतिक विवादों, जनाक्रोश और कानूनी लड़ाइयों के बाद सज्जन कुमार को उम्रकैद की सजा मिली। कांग्रेस से उनका रिश्ता टूटा, राजनीतिक प्रभाव खत्म हुआ और जीवन के अंतिम वर्ष तिहाड़ जेल में बीते। देखा जाये तो 80 वर्ष की उम्र में उनका निधन उस दौर का अंत है, जिसमें सज्जन कुमार कभी बाहरी दिल्ली की राजनीति के सबसे शक्तिशाली नेताओं में गिने जाते थे। लेकिन उनकी अंतिम पहचान एक ऐसे पूर्व कांग्रेस सांसद की बन गई, जो 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों में दोषी ठहराए जाने के बाद उम्रकैद की सजा काट रहा था। सज्जन कुमार की कहानी सत्ता के शिखर से जेल की सलाखों तक पहुंचने की कहानी है। यह उस राजनीतिक प्रभाव की भी कहानी है, जो वर्षों तक कायम रहा, और उस न्यायिक संघर्ष की भी, जिसने दशकों बाद अपना फैसला सुनाया। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सत्ता कितनी भी बड़ी क्यों न हो, समय और कानून के सामने उसका प्रभाव हमेशा कायम नहीं रहता। सज्जन कुमार का जीवन और अंत इसी कड़वे सच की एक बड़ी राजनीतिक कहानी बनकर दर्ज हो गया। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 20 Aug 2026 4:45 pm