मोबाइल रिटेलर्स एसोसिएशन ने वित्त मंत्री से की यूपीआई पेमेंट शुल्क से पूरी तरह छूट की मांग
नई दिल्ली, 21 सितंबर (आईएएनएस)। ऑल इंडिया मोबाइल रिटेलर्स एसोसिएशन (एआईएमआरए) ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से छोटे और मध्यम मोबाइल फोन विक्रेताओं को प्रस्तावित मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) या यूपीआई ट्रांजैक्शन शुल्क से पूरी तरह छूट देने की मांग की है। संगठन का कहना है कि मोबाइल रिटेलर्स पहले से ही बेहद सीमित मुनाफे पर कारोबार कर रहे हैं और अतिरिक्त शुल्क उनके लिए बड़ा बोझ साबित हो सकता है।
असम में इसरो की एडवांस्ड रडार रिसर्च फैसिलिटी की आधारशिला रखी गई, अंतरिक्ष निगरानी क्षमता होगी मजबूत
गुवाहाटी, 21 सितंबर (आईएएनएस)। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने सोमवार को चंद्रपुर में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के इस्ट्रैक एडवांस्ड रडार रिसर्च फैसिलिटी का भूमि पूजन किया और आधारशिला रखी। इसे असम के वैज्ञानिक और तकनीकी बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
पश्चिम बंगाल : हावड़ा स्टेशन पर 67 लाख रुपए कैश के साथ यात्री गिरफ्तार, जांच जारी
पश्चिम बंगाल : हावड़ा स्टेशन पर 67 लाख रुपए कैश के साथ यात्री गिरफ्तार, जांच जारी
नीतीश कुमार ने बख्तियारपुर स्थित पैतृक आवास का किया दौरा, बड़ी संख्या में जुटे स्थानीय लोग
नीतीश कुमार ने बख्तियारपुर स्थित पैतृक आवास का किया दौरा, बड़ी संख्या में जुटे स्थानीय लोग
राहुल गांधी की 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम स्क्रिप्टेड, मां का मजाक उड़ाना शर्मनाक: विश्वास सारंग
राहुल गांधी की 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम स्क्रिप्टेड, मां का मजाक उड़ाना शर्मनाक: विश्वास सारंग
Chai Par Sameeksha: UCC, UPI और Nandigram पर जमकर हो रही राजनीति, उलझ गया सभी दलों का गणित!
प्रभासाक्षी न्यूज़ नेटवर्क के खास साप्ताहिक कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में इस सप्ताह UCC, पश्चिम बंगाल विधानसभा उपचुनाव, UPI पेमेंट पर MDR आदि मुद्दों पर चर्चा हुई। प्रभासाक्षी संपादक नीरज कुमार दुबे ने सवालों के जवाब दिये। UCC पर उन्होंने कहा कि देश में इस समय समान नागरिक संहिता को लेकर जमकर बहस हो रही है। इसके पक्ष और विपक्ष में तमाम तरह के तर्क दिये जा रहे हैं। कोई इसे अपने धर्म के खिलाफ बता रहा है तो कोई कह रहा है कि इससे हमारी संस्कृति और पहचान को खतरा हो जायेगा। आश्चर्यजनक बात यह है कि अभी केंद्र सरकार ने समान नागरिक संहिता संबंधी कानून का मसौदा प्रस्ताव देश के समक्ष नहीं रखा है। यानि किसी को पता नहीं है कि समान नागरिक संहिता में क्या-क्या प्रावधान होंगे लेकिन फिर भी बिना कुछ जाने समझे लोग इससे भयभीत हो रहे हैं और दूसरों के बीच भी भ्रम फैला रहे हैं नीरज दुबे ने कहा कि केंद्रीय स्तर पर इसे लागू करना आसान नहीं होगा इसलिए इसे राज्यवर लागू करने की कोशिश भाजपा सरकार करेंगी। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में इसे लागू कर दिया गया है और वहां से कोई शिकायत नहीं मिल रही है। साथ ही उन्होंने कहा कि 370 हो या राम मंदिर बनना हो या समान नागरिक संहिता, यह भाजपा के कोर मुद्दे रहे हैं और भाजपा इनमें से दो को पहले पूरा कर चुकी है। यूनिफॉर्म सिविल कोड अभी बाकी है जिसे भाजपा शासित राज्यों में पहले लागू किया जा सकता है, जैसा कि अमित शाह के बयान से समझ में भी आता है। लेकिन इसको लेकर अभी से ही बिना मसौदा पढ़े भ्रम फैलाने की जो कोशिश हो रही है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। बिहार में जदयू की अपनी राजनीति है और वह उसे हिसाब से आगे बढ़ेगी। इसे भी पढ़ें: ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से भारत को क्या लाभ? बंगाल पर उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी का राजनीतिक सफर एक छात्र राजनीति की साहसी नायिका से लेकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनने और वर्तमान समय में घोर राजनीतिक व कानूनी संकटों से घिरने तक की एक बड़ी दास्तान है। जो ‘दीदी’ कभी सड़कों पर वामपंथ के 34 साल के किले को ढहाने के लिए जानी जाती थीं, वे आज अपनी राजनीतिक यात्रा के सबसे कठिन दौर से गुजर रही हैं। वर्तमान परिस्थितियों में ममता बनर्जी पर मुश्किलों के पहाड़ टूटने के मुख्य कारण इस प्रकार हैं- पहला, ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक झटका 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में लगा, जहाँ उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को हार का सामना करना पड़ा और राज्य में भाजपा की सरकार बनी। खुद ममता बनर्जी को भी अपनी पारंपरिक सीट भवानीपुर से शुभेंदु अधिकारी के हाथों करारी हार झेलनी पड़ी। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि ममता ने अपने शासन में जैसा किया है, वैसा ही उन्हें राजनीतिक तोर पर देखने को मिल रहा है। UPI पेमेंट को लेकर हो रहे बवाल पर उन्होंने कहा कि झूठ की गूंज एक्सप्रेस चलाने वाले कांग्रेस नेता राहुल गांधी के नेतृत्व वाला इंडी गठबंधन इस निर्णय के लिए सरकार पर अमेरिकी दबाव में झुकने, घुटने टेकने जैसे आरोप लगा रहा है। विपक्ष सोशल मीडिया पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर शुल्क को मोदी टैक्स बताकर इसे तत्काल वापस लेने की मांग कर रहा है। 2000 से ऊपर के कारोबारी भुगतान के इस 0.4 प्रतिशत शुल्क पर विपक्ष के झूठ की गूंज सोशल मीडिया से लेकर व्यापारियों तक पहुंच चुकी है। नीरज दुबे ने कहा कि कोई भी सेवा हमेशा के लिए फ्री में नहीं रखा जा सकता है। हालांकि, सरकार ने जो कदम उठाए है उससे आम आदमी को ज्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला है।
भारत की सेमीकंडक्टर छलांग ने अब उन ताकतों की बेचैनी भी उजागर कर दी है, जिन्हें भारत का तेजी से उभरना रास नहीं आ रहा। केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव की चेतावनी साफ संकेत देती है कि भारत की तरक्की को रोकने वाली चालें तेजी से चली जा रही हैं लेकिन देश को अब दुश्मनों के तौर-तरीके समझ में आ चुके हैं। माना जा रहा है कि जिस तरह भारत को मोबाइल फोन के क्षेत्र में वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनने से रोकने की कोशिशें हुईं, उसी तरह अब सेमीकंडक्टर क्षेत्र में भी साइबर हमलों, फर्जी खबरों और भौतिक व्यवधानों के जरिए भारत की रफ्तार थामने की कोशिश हो सकती है। लेकिन संदेश सीधा है। भारत अब पीछे हटने वाला नहीं है और उसकी रणनीतिक बढ़त को चुनौती देने वालों को इस बार भारत पहले से कहीं अधिक सतर्क और तैयार मिलेगा। हम आपको बता दें कि केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इस खतरे को समझाने के लिए Apple के भारत में iPhone निर्माण शुरू होने के शुरुआती दौर का उदाहरण दिया। टीवी समाचार चैनल NDTV से बातचीत में उन्होंने दावा किया कि उस समय उत्पादन को बाधित करने के लिए कई तरह के प्रयास किए गए। उनके अनुसार, कुछ स्थानों पर फूड पॉइजनिंग की घटनाएं हुईं, बिजली के तार काटे गए और फर्जी खबरें चलाई गईं। उन्होंने विशेष रूप से Reuters की उस रिपोर्ट का उल्लेख किया जिसमें कथित तौर पर कहा गया था कि विवाहित महिलाओं को उत्पादन इकाइयों में काम करने की अनुमति नहीं थी। वैष्णव ने इन घटनाओं को भारत को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में उभरने से रोकने की कोशिश के रूप में पेश किया। इसे भी पढ़ें: Narendra Modi ने भारत को सेमीकंडक्टर निर्माण केंद्र बनाने पर दिया जोर, अमेरिकी विधेयक पर भारत सतर्क यही Apple प्रकरण अब सेमीकंडक्टर उद्योग के लिए चेतावनी का आधार बनाया जा रहा है। वैष्णव का कहना है कि भारत के चिप क्षेत्र में प्रवेश को दुनिया ने नोटिस किया है और जैसे-जैसे भारत की क्षमता बढ़ेगी, समर्थन के साथ विरोध भी सामने आएगा। उन्होंने उद्योग को पहले से तैयार रहने को कहा है। उन्होंने कहा कि साइबर हमले, दुष्प्रचार और भौतिक हमले संभावित जोखिमों में शामिल हैं और भारत को इनसे निपटने के लिए लगातार सतर्क रहना होगा। देखा जाये तो इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्री की इस चेतावनी की पृष्ठभूमि में सेमीकंडक्टर उद्योग की रणनीतिक अहमियत समझना जरूरी है। कंप्यूटर, मोबाइल फोन और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से लेकर रक्षा प्रणालियों तक, लगभग पूरी आधुनिक अर्थव्यवस्था चिप्स पर निर्भर है। अमेरिका, ताइवान और दक्षिण कोरिया लंबे समय से इस क्षेत्र के प्रमुख केंद्र हैं, जबकि चीन तेजी से अपनी क्षमता बढ़ा रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विस्तार ने चिप्स की मांग और रणनीतिक महत्ता दोनों को और बढ़ा दिया है। ऐसे में अमेरिका और चीन सहित प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं सेमीकंडक्टर क्षमता को रणनीतिक आत्मनिर्भरता से जोड़ रही हैं। भारत ने इसी बदलते वैश्विक समीकरण में अपनी जगह बनाने के लिए पिछले कुछ वर्षों में बड़ा अभियान शुरू किया है। SEMICON India का आयोजन 2022 से किया जा रहा है। 17 से 19 सितंबर 2026 को आयोजित संस्करण में भी 52 देशों की लगभग 300 अंतरराष्ट्रीय कंपनियों ने हिस्सा लिया और 56 MoU, घोषणाएं तथा रणनीतिक पहलें सामने आईं। मोदी सरकार अब केवल चिप असेंबली और टेस्टिंग तक सीमित रहने की बजाय डिजाइन, उपकरण, सामग्री, फैब्रिकेशन, उन्नत पैकेजिंग, अनुसंधान और प्रतिभा विकास तक पूरी वैल्यू चेन खड़ी करने की कोशिश कर रही है। Semicon 2.0 के लिए जुलाई में ₹1,27,500 करोड़ के परिव्यय को मंजूरी दी गई। पहले चरण की योजना में 12 सेमीकंडक्टर परियोजनाओं को ₹1.64 लाख करोड़ से अधिक के निवेश के साथ मंजूरी दी जा चुकी है, जबकि Micron, Kaynes और CG Semi समेत पांच परियोजनाएं वाणिज्यिक उत्पादन में पहुंच चुकी हैं। यही नहीं, निवेश घोषणाओं का पैमाना भी इस बदलाव को रेखांकित करता है। Applied Materials ने 2035 तक भारत में 5 अरब डॉलर की योजना रखी है, Lam Research ने ₹10,000 करोड़ के प्रस्तावित निवेश की घोषणा की है, Tata Electronics ने धोलेरा में 363 एकड़ के vendor park की योजना सामने रखी है और Fujifilm ने ₹800 करोड़ के सेमीकंडक्टर materials plant की घोषणा की है। साथ ही मोदी सरकार ने Semicon 2.0 के तहत करीब ₹1 लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव मिलने की भी जानकारी दी है। यानी भारत के सामने अवसर बड़ा है, लेकिन जोखिम भी उतना ही वास्तविक है। Apple के अनुभव का हवाला देते हुए अश्विनी वैष्णव जिस खतरे की ओर इशारा कर रहे हैं, उसका व्यापक अर्थ यह है कि भारतीय कंपनियों और रणनीतिक तकनीकी परियोजनाओं को केवल उत्पादन क्षमता नहीं, बल्कि साइबर सुरक्षा, आपूर्ति-श्रृंखला सुरक्षा, सूचना-युद्ध और भौतिक सुरक्षा के मोर्चे पर भी तैयार रहना होगा। बहरहाल, भारत ने सेमीकंडक्टर क्षेत्र में प्रवेश का दरवाजा खोल दिया है। अब असली चुनौती यह है कि इस दरवाजे से आने वाली वैश्विक पूंजी, तकनीक और विनिर्माण क्षमता को कितनी मजबूती से सुरक्षित रखते हुए भारत एक टिकाऊ घरेलू चिप इकोसिस्टम में बदल पाता है। -नीरज कुमार दुबे
बिहार में परिसीमन प्रक्रिया के बाद कराया जाएगा अगला पंचायत चुनाव: सम्राट चौधरी
बिहार में परिसीमन प्रक्रिया के बाद कराया जाएगा अगला पंचायत चुनाव: सम्राट चौधरी
अंडा विवाद: महुआ मोइत्रा हाईकोर्ट पहुंची, अदालत ने तत्काल सुनवाई से किया इनकार
अंडा विवाद: महुआ मोइत्रा हाईकोर्ट पहुंची, अदालत ने तत्काल सुनवाई से किया इनकार
अक्सर विवादित बयान देकर सुर्खियों में रहने वाले पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के हालिया बयान ने भारतीय राजनीति में एक बार फिर राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता और कांग्रेस की वैचारिक दिशा को लेकर तीखी बहस छेड़ दी है। नई दिल्ली में एजी नूरानी की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में अंसारी ने नूरानी की 2019 में प्रकाशित पुस्तक The RSS: A Menace to India का हवाला देते हुए जवाहरलाल नेहरू की एक कथित टिप्पणी दोहराई थी। अंसारी के अनुसार, नेहरू ने कहा था कि भारत के लिए खतरा कम्युनिज्म नहीं, बल्कि “हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता” है। इसी संदर्भ में उन्होंने नागरिक राष्ट्रवाद की जगह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के उभार पर भी सवाल उठाए थे। यहां सियासी सवाल खड़ा होता है कि क्या आज के भारत को देखने का नजरिया अब भी दशकों पुराने वैचारिक चश्मे से तय किया जाएगा? सवाल उठता है कि क्या हिंदू दक्षिणपंथ को भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा बताना ही देश की वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक वास्तविकताओं की पर्याप्त व्याख्या है? उधर, बीजेपी ने अंसारी के बयान को हाथोंहाथ लिया और कांग्रेस की वैचारिक दिशा पर ही सवाल दाग दिया। बीजेपी सांसद और राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने तंज कसते हुए कहा कि अंसारी ने अनजाने में कांग्रेस की वर्तमान राजनीति को “पूरी तरह बेनकाब” कर दिया है। उन्होंने कहा कि जिस कांग्रेस ने कभी कम्युनिज्म को चुनौती माना था, वह आज “अल्ट्रा-लेफ्ट” की ओर चली गई है। डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने अंसारी द्वारा नेहरू के हवाले को राहुल गांधी की वर्तमान राजनीतिक भाषा से जोड़ते हुए पूछा कि क्या आज की कांग्रेस की वैचारिक जड़ें उसी सोच में हैं? उन्होंने कांग्रेस को “मुस्लिम लीग-माओवादी कांग्रेस” तक कह डाला। इसे भी पढ़ें: पूर्व उपराष्ट्रपति Hamid Ansari के बयान पर CM Yogi Adityanath का पलटवार, सनातन परंपरा के अपमान का लगाया आरोप लेकिन अंसारी के बयान का दूसरा और अधिक गंभीर राजनीतिक पहलू भी है। उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में ऐसे रुझान उभरे हैं जो नागरिक राष्ट्रवाद की स्थापित अवधारणा को चुनौती देकर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को आगे बढ़ाते हैं। उनके मुताबिक इसमें चुनावी बहुमत को धार्मिक बहुमत के रूप में प्रस्तुत करने और राजनीतिक सत्ता पर एकाधिकार की प्रवृत्ति दिखाई देती है। यह महज इतिहास का संदर्भ नहीं, बल्कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था पर सीधा वैचारिक आरोप है। इसी मुद्दे पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस पर और तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि संवैधानिक पद पर रह चुके व्यक्ति से पद की गरिमा बनाए रखने की अपेक्षा होती है। योगी ने अंसारी के बयान को भारतीय परंपराओं और सनातन संस्कृति के प्रति अपमानजनक बताया तथा आरोप लगाया कि इससे भारत की वैश्विक छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश होती है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बयान में हिंदू परंपरा को आतंकवाद से जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है। उधर, भाजपा नेता सैयद शाहनवाज हुसैन ने भी अंसारी से माफी की मांग की और दावा किया कि उनकी टिप्पणी से मुस्लिम समुदाय के भी अनेक लोग असहज हुए हैं। साथ ही भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने विभाजन के बाद भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप और विभिन्न धार्मिक समुदायों के साथ रहने की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि समाज में विभाजन पैदा करने की कोशिश सफल नहीं होगी। यही नहीं, कई अन्य मुस्लिम धार्मिक नेताओं द्वारा भी अंसारी की टिप्पणियों से दूरी बनाने और सामाजिक सौहार्द पर जोर देने की खबरें सामने आई हैं। बहरहाल, अब असली राजनीतिक बहस यही है कि क्या भारत को समझने के लिए हिंदू बनाम कम्युनिज्म की पुरानी वैचारिक तुलना पर्याप्त है? क्या हिंदू राष्ट्रवाद को स्वतः “खतरा” मानना उचित है? क्या नेहरू के दशकों पुराने कथन को आज की राजनीतिक परिस्थितियों का निर्णायक प्रमाण माना जा सकता है? देखा जाये तो इस विवाद ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि भारत की राजनीति में राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता, सनातन परंपरा और सांस्कृतिक पहचान की चर्चा अब केवल इतिहास की बहस नहीं रही, यह मौजूदा सत्ता-संघर्ष के केंद्र में है।
पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी से 'पद्म श्री' पुरस्कार वापस लेने की मांग, हिंदू सेना ने लिखा अमित शाह को पत्र
राशन इकट्ठा कर लो...यूरोप में क्या बड़ा होने वाला है! ब्रिटेन-फ्रांस अचानक क्यों करने लगे ये अपील?
क्या यूरोप एक बहुत बड़े महायुद्ध के मुहाने पर आकर खड़ा हो गया है? क्या तीसरे विश्वयुद्ध की आहट अब इतनी करीब आ चुकी है कि सरकारों ने अपने नागरिकों से सीधे तौर पर राशन और पानी जमा करने को कह दिया है? ये कोई अफवाह नहीं, बल्कि इस वक्त पूरे यूरोप की जमीनी हकीकत बन चुकी है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों खुले तौर पर कह रहे हैं कि यह वक्त बेहद मुश्किल है और सबको एक साथ खड़ा होना होगा। ब्रिटेन से लेकर फ्रांस तक, यूरोप के तमाम मुल्कों में जनता को बाकायदा हिदायत दी जा रही है कि घरों में राशन, सूखा खाना, पीने का पानी और ईंधन स्टॉक करना शुरू कर दें। यूरोप का शायद ही कोई ऐसा अखबार बचा हो जिसकी हेडलाइन में यह खौफ साफ न छलक रहा हो। दूसरी तरफ नजर डालेंगे तो अमेरिका लगभग ग्रीनलैंड की सुरक्षा का पूरा जिम्मा अपने हाथ में ले चुका है और साफ कह दिया है कि अब इस पूरे इलाके की रक्षा अमेरिकी बूट्स करेंगे। लेकिन इन सब के बीच सबसे बड़ा सवाल कि आखिर रूस की तरफ से यूरोप की खुफिया एजेंसियों को ऐसे कौन से इनपुट्स मिले हैं, जिसने पूरे महाद्वीप को हिलाकर रख दिया है? क्यों यूरोपीय राजधानियों में बंकरों की धूल झाड़ी जा रही है और सेनाओं को स्टैंडबाय पर रहने का फरमान जारी हो चुका है? क्या मॉस्को से कोई ऐसा बड़ा तूफान उठने वाला है जो पूरे यूरोप को अपनी जद में ले लेगा? आज इसी का एमआरआई स्कैन करते हैं। इसे भी पढ़ें: Congress का Election Commission पर हमला, SIR प्रक्रिया को बताया मतदाताओं के नाम हटाने की साजिश 1600 ड्रोंस से रूस पर अटैक यूक्रेन ने 20 सितंबर को यहां कई ड्रोन हमले किए हैं। आप इसका अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि रशिया ने दावा किया है कि यूक्रेन की तरफ से आने वाले 1600 ड्रोंस को उसने इंटरसेप्ट किया है और वीडियो से भी इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस हमले में दो लोगों की मौत हुई है। यूक्रेन ने रशिया की राजधानी मॉस्को की एक ऑयल रिफाइनरी और सेना के लॉजिस्टिक ठिकाने को टारगेट किया। कई इमारतों को इसमें नुकसान भी पहुंचा है। यह हमला ऐसे समय में हुआ जब रूस में संसदीय चुनाव के लिए वोटिंग चल रही थी। वोटिंग का अंतिम दिन था। लोअर हाउस जो संसद है रूस का उसके लोअर हाउस के लिए यह वोटिंग थी। यूक्रेनी राष्ट्रपति वडदमीर जेलस्की ने खुद हमले की जानकारी दी। उन्होंने सोशल मीडिया पर वीडियो पोस्ट कर लिखा, हमने रूस की ऑयल रिफाइनरी और सेना के लॉजिस्टिक ठिकाने को टारगेट किया। यह वही अरबों डॉलर का तंत्र है जहां रूस अपने डिफेंस का सामान तैयार करता है। जेलस्की ने यह भी बताया हमले में यूक्रेन ने क्या-क्या इस्तेमाल किया है। इसे भी पढ़ें: Shafali Verma के शतक से Asian Games सेमीफाइनल में India ने बनाए 195 रन चुनाव के अंतिम दिन क्यों हुआ हमला यूक्रेन ने हमले के लिए ठीक ऐसा वक्त चुना जब व्लादमीर पुतिन के 26 साल के एक छत्रराज को नई ताकत देने के लिए वोट डाले जा रहे थे। ठीक उसी वक्त जेलस्की के ड्रोन ब्रिगेड ने ऑपरेशन मॉस्को को अंजाम दे दिया। रूसी अधिकारियों के मुताबिक ड्रोन हमलों में तीन लोगों की जान चली गई जबकि 20 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। मतलब साफ है कि यह सिर्फ आसमान में उड़ते हुए यूक्रेन के ड्रोंस नहीं थे बल्कि रूस के दिल माने जाने वाले क्रिमिया पर यूक्रेन का लॉन्ग रेंज अटैक था। मॉस्को के आसमान में जिस तरह से एक के बाद एक धमाके हुए उससे रूस की एयर डिफेंस क्षमता पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं। क्योंकि यूक्रेन के हमलों का निशाना बना है मॉस्को का सबसे बड़ा ऑयल रिफाइनरी कॉम्प्लेक्स जो धमाकों के बाद पूरी तरह से स्वाहा हो गया है। यूक्रेन पिछले कई महीनों से रूस के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बना रहा है। क्योंकि तेल और गैस से होने वाली कमाई रूस की युद्ध मशीन के लिए बेहद अहम मानी जाती है। ऐसे में रूसी तेल रिफाइनिंग क्षमता पर यूक्रेनी हमलों से रूसी ईंधन की सप्लाई और कीमतों पर भी असर पड़ना तय है। उधर मॉस्को में 21 मंजिला एक रिहााइशी इमारत में ड्रोन टकराने से भीषण आग लग गई। इस बीच यूक्रेन के इस सबसे बड़े ड्रोन अटैक पर बड़ा सवाल यह उठने लगा है कि आखिर चुनाव के अंतिम दिन मॉस्को पर इतना बड़ा हमला क्यों किया गया? इसके जवाब में मॉस्को के मेयर सरगई सोबियानिन ने बताया कि यूक्रेन के हमले का सीधा मकसद रूसी संसदीय चुनाव में खलल डालना था। NATO के खिलाफ निर्णायक जंग छेड़ने की तैयारी में पुतिन रूसी भाषा में बोलते व्लादिमीर पुतिन का एक बयान सामने आया है। जिसमें वो कह रहे हैं कि नाटो हमारी तरफ एक्सपेंड करने की कोशिश कर रहा है। नए-नए इलाके में घुसने कोशिश कर रहा है। अब हमने फैसला किया है कि उनके खिलाफ अब निर्णायक जंग छेड़ दिया जाए। अब हुआ यह कि जैसे ही एक तो रूस के राष्ट्रपति ने कह दिया कि मारेंगे जरूर चाहे जो हो जाए और ऊपर से वहां राशन पानी इकट्ठा करने की बात हो ही गई। सारे यूरोप वाले कह रहे हैं कि हमारी रक्षा तो अमेरिका करता था। तो अमेरिका बचाएगा कि नहीं हमें? डोनाल्ड ट्रंप अलग ही मूड में नजर आ रहे हैं। उन्होंने अनाउंस किया कि हम यूक्रेन में अपने सैनिक तैनात है वापस ले रहे हैं। इतना ही नहीं उन्होंने कहा है कि गल्फ नेशन में जो अमेरिकन सैनिक हैं हम ईरान के हाथों मरने नहीं दे सकते। उसको भी वापस ले लेंगे। क्या नाटो की सीमा पर बड़ा धमाका होने वाला है यूरोपीय खुफिया एजेंसियों की तरफ से आई एक ताजा और बेहद सनसनीखेज रिपोर्ट ने पूरे पश्चिमी खेमे में खलबली मचा दी है। खुफिया अधिकारियों का दावा है कि रूस बहुत जल्द नाटो की ताकत और उसकी एकजुटता की परीक्षा ले सकता है, और यह संभावित हमला सालों में नहीं, बल्कि कुछ ही महीनों के भीतर देखने को मिल सकता है। पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने अपनी संसद में साफ लफ्जों में चेतावनी दी है कि मॉस्को आने वाले महीनों में ड्रोन या मिसाइलों के जरिए नाटो की जमीन को निशाना बना सकता है। टस्क के मुताबिक, पुतिन का सीधा मकसद यह साबित करना है कि नाटो का सबसे ताकतवर सुरक्षा कवच यानी आर्टिकल 5, जमीन पर सिर्फ एक किताबी थ्योरी है, हकीकत नहीं। इस चेतावनी की गंभीरता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने टस्क के इन दावों को बेहद सटीक और पुख्ता सबूतों पर आधारित बताया है। हालात इतने नाजुक हो चुके हैं कि मैक्रों ने पेरिस में तमाम राजनीतिक दलों के नेताओं और राष्ट्रपति पद के दावेदारों की एक आपातकालीन बैठक तलब कर ली, जहां रूस के इस बढ़ते खतरे पर बंद कमरों में रणनीति तैयार की जा रही है। यह चिंता तब बढ़ रही है जब इस हफ़्ते के आखिर में न्यूयॉर्क में UN जनरल असेंबली की बैठक होने वाली है और साथ ही रूस-यूक्रेन युद्ध में दोनों तरफ़ से हवाई हमले तेज़ हो गए हैं। रविवार तड़के कीव ने मॉस्को और रूस के दूसरे इलाकों पर सैकड़ों ड्रोन और मिसाइलें दागीं। यह इस युद्ध के दौरान किए गए सबसे बड़े हवाई हमलों में से एक था। द गार्जियन को दिए गए अलग-अलग साक्षात्कारों में पश्चिमी खुफिया प्रमुखों ने पुतिन के अगले खतरनाक कदम का जो खाका खींचा है, उसने नाटो मुख्यालय से लेकर तमाम यूरोपीय देशों की नींद उड़ा दी है। चेक गणराज्य की सुरक्षा सेवा 'बीआईएस' के प्रमुख माइकल कोउडेल्का ने प्राग स्थित अपने मुख्यालय में एक दुर्लभ इंटरव्यू के दौरान बेहद सनसनीखेज अंदेशा जताया है। कोउडेल्का के मुताबिक, केवल ड्रोन और मिसाइल स्ट्राइक ही नहीं, बल्कि रूस से सटी नाटो सीमा पर रूसी सेना की एक सीमित जमीनी घुसपैठ यानी 'स्मॉल-स्केल इनवेजन' भी क्रेमलिन के प्लान का सीधा हिस्सा हो सकता है। माइकल कोउडेल्का ने चेताते हुए साफ कहा यह पूरी तरह मुमकिन है। रूस की योजना में एक सीमित सैन्य घुसपैठ, फॉल्स-फ्लैग उकसावे वाली साजिशें और नाटो देशों के भीतर एक बड़े पैमाने का इनफ्लुएंस कैंपेन शामिल हो सकता है। और यह खतरा सालों दूर नहीं, बल्कि महज कुछ महीनों के भीतर हकीकत का रूप ले सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि पश्चिमी सुरक्षा एजेंसियां दिन-रात एक कर रही हैं ताकि हालात इस खौफनाक स्तर तक न पहुँचें। क्या अमेरिका की रणनीतिक चूक से बिगड़े हालात! यह लड़ाई अब तेजी से फैलती दिख रही है। अमेरिका को अपने नागरिकों के लिए अलर्ट जारी करना पड़ा है, डोनल्ड ट्रंप छुट्टी खत्म होने से पहले ही वापस लौट आए। वॉशिंगटन इन हालात से पूरी तरह पल्ला नहीं झाड़ सकता है। ईरान पर हमले से लेकर उसके साथ हुए अंतरिम समझौते को तोड़ने तक, कई मौकों पर गंभीर चूक हुई है। ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन यह आकलन करने में बुरी तरह नाकाम रहा कि संघर्ष किस हद तक जा सकता है। उसने पश्चिम एशिया में अपने सहयोगियों की चिंताओं को भी नजरअंदाज किया और हूतियों का बढ़ता खतरा उसी का नतीजा है।अमेरिकी राष्ट्रपति ने पिछले हफ्ते कहा था कि मास्को और कीव एक-दूसरे के ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमले रोकने के लिए सहमत हुए हैं। पिछले दिनों जब उनकी स्पेशल टीम ने दोनों देशों का दौरा किया था, तब उसे भी इस बात के रूप में प्रचारित किया गया कि अमेरिका अब वास्तविक बातचीत चाहता है । पर रूस पर अमेरिकी प्रतिबंधों वाले नए बिल और इन ताजा हमलों ने सारी कोशिशों को पीछे धकेल दिया है।
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों : केवाईसी कॉपी प्रमाणन की प्रक्रिया को किया आसान
नई दिल्ली, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के लिए अनुपालन प्रक्रिया को आसान कर दिया है। इसके तहत भारतीय बैंक अब विदेशों में अधिकृत अधिकारियों द्वारा प्रमाणित कुछ निर्दिष्ट केवाईसी दस्तावेजों की मूल प्रमाणित प्रतियां स्वीकार कर सकेंगे।
जम्मू-कश्मीर विधानसभा सत्र को लेकर नेताओं ने जताई उम्मीदें
जम्मू-कश्मीर विधानसभा सत्र को लेकर नेताओं ने जताई उम्मीदें
2027 का उत्तर प्रदेश दंगल: समाजवाद की नई राजनीतिक रंगोली या महज अवसरवाद का मुखौटा?
उत्तर प्रदेश की राजनीति को देश के सत्ता मार्ग का सबसे बड़ा प्रवेश द्वार माना जाता है। यहाँ का हर चुनावी समर राजनीतिक सिद्धांतों, सामाजिक इंजीनियरिंग और रणनीतिक पैंतरों की एक नई प्रयोगशाला बन जाता है। इस समय सूबे की सियासत 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट से पूरी तरह गर्म हो चुकी है। इस बार का विमर्श लोक-कल्याणकारी नीतियों या पारंपरिक विकास मॉडलों पर कम, बल्कि समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के बदलते वैचारिक और प्रतीकात्मक रंगों पर ज्यादा केंद्रित है। कभी लाल टोपी और हरे झंडे के पर्याय रहे अखिलेश यादव के इस नए राजनीतिक कलेवर ने उत्तर प्रदेश के पूरे राजनीतिक परिदृश्य को एक नई बहस में झोंक दिया है। उनके इस नए तेवर को जहां विपक्षी दल चुनावी अवसरवाद और गिरगिट की तरह रंग बदलने की संज्ञा दे रहे हैं, वहीं सपा के रणनीतिकार इसे बहुजन और वंचित समाज को एकजुट करने की एक व्यापक 'हाइब्रिड सोशल इंजीनियरिंग' के रूप में देख रहे हैं। ऐसे में यह सवाल मौजूं हो जाता है कि 2027 के महासमर से पहले अखिलेश यादव का यह नया रूप किसी गहरे वैचारिक परिवर्तन का संकेत है या सत्ता तक पहुँचने का महज एक तात्कालिक और व्यावहारिक शॉर्टकट? इस पूरे विवाद के केंद्र में सबसे पहला और चौंकाने वाला बदलाव समाजवादी पार्टी के आधिकारिक चुनाव प्रचार रथ पर देखने को मिला है। अखिलेश यादव ने 2027 की चुनावी यात्राओं के लिए जो नया रथ तैयार करवाया है, उसकी मुख्य रंग-योजना में इस बार 'भगवा' और पीत आभा को सबसे प्रमुखता से स्थान दिया गया है। 2022 के विधानसभा चुनाव में जहाँ सपा का रथ पूरी तरह लाल और हरे रंग के पारंपरिक समाजवादी रंग में रंगा था, वहीं इस बार भाजपा के सबसे मजबूत वैचारिक प्रतीक यानी 'भगवा रंग' का यह सीधा प्रवेश राजनीतिक विश्लेषकों को हैरान कर रहा है। इस रथ के माध्यम से सपा एक बेहद चतुर और बहुस्तरीय संदेश देने की कोशिश कर रही है। एक तरफ रथ पर भगवा पृष्ठभूमि के साथ बाबासाहेब आंबेडकर, डॉ. राम मनोहर लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव और चौधरी चरण सिंह जैसे महापुरुषों की तस्वीरें हैं, जो सामाजिक न्याय के समेकित एजेंडे को दर्शाती हैं। दूसरी तरफ, भगवा रंग का उपयोग कर अखिलेश यादव भाजपा के उस आख्यान को कुंद करना चाहते हैं जो सपा को बहुसंख्यक विरोधी या एक वर्ग विशेष की पार्टी के रूप में चित्रित करता रहा है। यह 'सॉफ्ट हिंदुत्व' और 'सोशल जस्टिस' का एक ऐसा अनूठा मिश्रण है, जिसके माध्यम से सपा सवर्णों (विशेषकर सत्तारूढ़ व्यवस्था से असंतुष्ट ब्राह्मणों और राजपूतों) तथा गैर-यादव पिछड़ों को यह विश्वास दिलाना चाहती है कि समाजवादी पार्टी अब किसी एक जाति या धर्म की बपौती नहीं है बल्कि वह बहुसंख्यक समाज की सांस्कृतिक भावनाओं का भी उतना ही सम्मान करती है। इसे भी पढ़ें: उत्तर प्रदेश 2027 का विधानसभा चुनाव: भाजपा का डेमेज कंट्रोल का प्रयास बात केवल रथ पर चढ़े भगवा रंग तक ही सीमित नहीं है, बल्कि समाजवादी कुनबे का यह वैचारिक विस्तार आगे बढ़कर 'नीले रंग' की ओर भी खिंचता हुआ दिखाई दे रहा है। पारंपरिक रूप से समाजवाद का प्रतिनिधित्व करने वाला 'लाल और हरा' रंग अब अपनी संपूर्ण एकाधिकारवादी पहचान खोता हुआ दिख रहा है। सपा की छात्र इकाई, 'समाजवादी छात्र सभा' ने हाल ही में अपने आधिकारिक परिधान (ड्रेस कोड) में नीली टी-शर्ट और जींस को शामिल कर लिया है, जिसके ऊपर लाल टोपी पहनी जा रही है। इसके अतिरिक्त, अखिलेश यादव स्वयं कई महत्वपूर्ण राजनीतिक बैठकों और जनसभाओं में नीले रंग का गमछा ओढ़े नजर आ रहे हैं। राजनीति में प्रतीकों का अपना एक अनूठा और गहरा महत्व होता है। नीला रंग दशकों से बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर की वैचारिक विरासत का मुख्य प्रतीक रहा है। सपा के इस 'नीले प्रेम' को सीधे तौर पर मायावती के कमजोर होते दलित जनाधार में सेंध लगाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। 2024 के लोकसभा चुनावों में सपा ने गैर-जाटव दलितों और अति-पिछड़ों के एक बड़े हिस्से का समर्थन हासिल कर शानदार सफलता दर्ज की थी। अब अखिलेश यादव उस क्षणिक सफलता को 2027 में एक स्थायी वोट बैंक में तब्दील करना चाहते हैं, जिसके लिए वे पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के नारे को केवल ज़ुबानी जमा-खर्च तक सीमित न रखकर पार्टी के दृश्य रूप (विजुअल अपीयरेंस) में भी ढाल रहे हैं। अखिलेश यादव की इस बदलती बहुरंगी रणनीति ने विपक्ष, विशेषकर बहुजन समाज पार्टी और भारतीय जनता पार्टी को हमला करने का एक बड़ा हथियार दे दिया है। बसपा सुप्रीमो मायावती ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए सपा के इस कदम को दलितों और पिछड़ों के साथ एक नया छल करार दिया है। उनका तर्क है कि जो समाजवादी पार्टी अपने शासनकाल में दलित महापुरुषों के नाम पर बने स्मारकों और जिलों के नाम बदलने में व्यस्त थी, वह आज केवल चुनाव जीतने के लिए नीले रंग का स्वांग रच रही है और उनका नया 'PDA रथ' उनके अपने लाल रंग से कम और आरएसएस-भाजपा के भगवा रंग में ज्यादा रंगा नजर आ रहा है। मायावती ने इसे गिरगिट की तरह रंग बदलना और वैचारिक दिवालियापन कहा है। दूसरी ओर, भाजपा और उसके सहयोगी दल जैसे सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर इसे सपा का 'चुनावी पाखंड' बता रहे हैं। सत्तापक्ष का आरोप है कि सपा अपनी पुरानी 'मुस्लिम-यादव' (एम-वाई) समीकरण वाली छवि से डरी हुई है और बहुसंख्यक समाज के गुस्से से बचने के लिए अब भगवा और नीले रंग की आड़ ले रही है। विरोधियों का कहना है कि सिर्फ पोशाक और रथ का रंग बदल लेने से कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर सपा का पुराना ट्रैक रिकॉर्ड और अतीत की गलतियाँ जनता के मानस पटल से गायब नहीं हो सकतीं। हालांकि, अगर इस पूरे घटनाक्रम का निष्पक्ष राजनीतिक विश्लेषण किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि अखिलेश यादव की यह कवायद महज तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं बल्कि एक सोची-सोची 'लॉन्ग-टर्म' रणनीति का हिस्सा है। मुलायम सिंह यादव के दौर की समाजवादी पार्टी मुख्य रूप से एक क्षेत्रीय और विशिष्ट सामाजिक समीकरण पर आधारित पार्टी थी। अखिलेश यादव भली-भांति जानते हैं कि आज के उत्तर प्रदेश में केवल 'यादव और मुस्लिम' मतों के सहारे भाजपा जैसी साधन-संपन्न और वैचारिक रूप से मजबूत चुनावी मशीनरी को मात देना असंभव है। 2017, 2019 और 2022 की लगातार हारों ने सपा को यह सिखाया है कि सत्ता की सीढ़ी चढ़ने के लिए उसे अपनी सर्वसमावेशी स्वीकार्यता बढ़ानी होगी। इसलिए, उन्होंने '75 जिले, 75 घोषणापत्र' जैसी माइक्रो-लेवल प्लानिंग की शुरुआत की है, जो यह दर्शाती है कि सपा अब केंद्रीकृत राजनीति के बजाय जमीनी और स्थानीय मुद्दों को तरजीह दे रही है। '27 में 27 हजार' का नारा भी इसी सूक्ष्म रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत बूथ स्तर पर भाजपा के पारंपरिक वोटों को काटने और अपने पाले में जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। इस पूरे 'कलर गेम' का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि अखिलेश यादव इस प्रक्रिया में अपने कोर वोट बैंक यानी अल्पसंख्यकों को खोने का जोखिम भी उठा रहे हैं या कम से कम ऐसा विपक्ष को लगता है। जब मायावती यह सवाल उठाती हैं कि क्या सपा का मुसलमानों से भरोसा उठ गया है?, तो वे वास्तव में मुस्लिम मतदाताओं के भीतर एक असुरक्षा की भावना पैदा करने का प्रयास कर रही होती हैं। लेकिन अखिलेश यादव की इस रणनीति के पीछे एक गहरा गणित है। उन्हें पता है कि उत्तर प्रदेश का अल्पसंख्यक मतदाता वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में भाजपा को हराने में सक्षम सबसे मजबूत विकल्प के साथ ही जाएगा, और वह विकल्प फिलहाल सपा ही है। इसलिए, मुस्लिम मतों के बिखरने का खतरा कम देखते हुए अखिलेश अपनी पूरी ऊर्जा उस बहुसंख्यक और दलित आबादी को जोड़ने में लगा रहे हैं जो अब तक उनसे दूर रही थी। यह एक बड़ा राजनीतिक जुआ है, जिसमें यदि वे सफल रहे तो भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय का एक नया अध्याय लिखा जाएगा, और यदि विफल रहे तो पार्टी अपने पारंपरिक आधार से भी हाथ धो सकती है। देखा जाय तो राजनीति में 'रंगों का बदलना' कोई नई बात नहीं है। विचारधाराएं समय के साथ अपनी प्रासंगिकता और व्यावहारिकता के अनुसार खुद को ढालती आई हैं। अखिलेश यादव का यह नया अवतार इस बात का प्रमाण है कि वे अब जूनियर यादव या एक विरासत संभालने वाले नेता की छवि से बाहर निकलकर खुद को उत्तर प्रदेश के एक सर्वमान्य और परिपक्व जननेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। उनका यह बहुरंगी दृष्टिकोण भारतीय लोकतंत्र के उस व्यावहारिक रूप को दिखाता है जहाँ चुनाव जीतने के लिए प्रतीकों का विलय और वैचारिक सीमाओं का लचीला होना अनिवार्य शर्त बन जाता है। क्या जनता उनके इस 'नीले-भगवा-लाल-हरे' इंद्रधनुषी गठबंधन को स्वीकार करेगी या इसे केवल एक चुनावी छलावा मानकर खारिज कर देगी, इसका फैसला 2027 के मतपेटियों से ही होगा। लेकिन एक बात तो तय है कि अखिलेश यादव के इन बदलते रंगों ने उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव को बेहद दिलचस्प, पेचीदा और अप्रत्याशित बना दिया है, जिसने विरोधियों को अपनी रणनीतियाँ नए सिरे से तैयार करने पर मजबूर कर दिया है। - अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार
ओवैसी ने यूपी में विपक्षी गठबंधन पर कहा-'हम 2 अक्टूबर तक अपने गठबंधन का ऐलान करेंगे'
ओवैसी ने यूपी में विपक्षी गठबंधन पर कहा-'हम 2 अक्टूबर तक अपने गठबंधन का ऐलान करेंगे'
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव 2026 के परिणाम घोषित हो चुके हैं, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समर्थित छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने शानदार प्रदर्शन करते हुए केंद्रीय पैनल के चार में से तीन मुख्य पदों (अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव) पर जीत हासिल की है। वहीं उपाध्यक्ष पद पर एक बड़ा उलटफेर देखने को मिला, जहाँ निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन ने बड़ी जीत दर्ज की है। इस चुनाव में कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई का खाता भी नहीं खुल सका। इससे साफ है कि जेन-जी युवाओं का रूझान अब भी एबीवीपी के साथ बना हुआ है। चर्चित जेन-जी आंदोलन (CJP) के बाद आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जेन-जी युवाओं को खुद से जोड़े रखने का जो बीड़ा उठाया, वह सफल रहा। इसके राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव भी दूरगामी होंगे। चुनाव परिणामों का पूरा विवरण इस प्रकार है:- पद- विजेता उम्मीदवार- संबद्ध छात्र संगठन- प्राप्त वोट - निकटतम प्रतिद्वंद्वी एक, अध्यक्ष- यश डबास- एबीवीपी - 24,576विजय शंकर मीणा/NSUI - 22,523 वोट। दो, उपाध्यक्ष- दीपांशु शौकीन- निर्दलीय- 30,615- इशू मौर्या (ABVP) - 16,910 वोट। तीन, सचिव- रिया छावड़ी- एबीवीपी - 21,650- नम्रता चौधरी/NSUI - 14,869 वोट। चार, संयुक्त सचिव- लक्ष्यराज सिंह- ABVP - 16,615- विशेष यादव, निर्दलीय/SCS - 15,778 वोट। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव 2026 में कांटे की टक्कर हुई। अध्यक्ष पद के लिए मतगणना के दौरान कई राउंड तक ABVP के यश डबास और NSUI के विजय मीणा के बीच बेहद करीबी मुकाबला देखा गया, लेकिन अंतिम राउंड्स में यश डबास ने बाजी मार ली। इस साल 18 सितंबर को हुए मतदान में 40.46% वोटिंग दर्ज की गई थी, जो कि पिछले 3 वर्षों में सबसे अधिक रही। दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश के बाद चुनाव नतीजों के बाद किसी भी तरह के विजय जुलूस या रैलियों पर पूरी तरह से रोक लगाई गई थी। समझिए इसके राजनीतिक निहितार्थ:- देखा जाए तो दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव के परिणाम केवल एक छात्र संगठन की जीत या हार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह देश के सबसे बड़े छात्र निर्वाचन क्षेत्रों में से एक—जहाँ युवा (जेन जी) मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं—के वैचारिक और सामाजिक रुझान को दर्शाते हैं। इस चुनाव परिणाम और रुझान के राजनीतिक व सामाजिक मायने निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझे जा सकते हैं:- इसे भी पढ़ें: DUSU Election में पैसे के दम पर हुई ABVP की जीत, CJP नेता Abhijeet Dipke का आरोप एक, 'जेन जी' (Gen Z) का व्यावहारिक राजनीति की ओर झुकाव: जेन जी (1997-2012 के बीच जन्मे युवा) को अक्सर वैचारिक रूप से स्वतंत्र माना जाता है। एबीवीपी की मजबूत उपस्थिति यह दर्शाती है कि संगठन ने केवल पारंपरिक या राष्ट्रीय मुद्दों पर ध्यान केंद्रित न करके कैंपस की व्यावहारिक समस्याओं (जैसे हॉस्टल, वाई-फाई, स्पोर्ट्स इंफ्रास्ट्रक्चर और फीस) को अपने एजेंडे में शामिल किया। युवाओं ने अमूर्त नारों के बजाय धरातल पर काम करने वाले संगठन पर भरोसा जताया। दो, एनएसयूआई (NSUI) के संगठनात्मक संकट का संकेत: एनएसयूआई का पिछड़ना या कमजोर प्रदर्शन यह दिखाता है कि मुख्य विपक्षी छात्र संगठन कैडर स्तर पर युवाओं से जुड़ने और उन्हें पोलिंग बूथ तक लाने में पूरी तरह सफल नहीं हो पा रहा है। - कैडर आधारित नेटवर्क की कमी: एबीवीपी का संगठनात्मक ढांचा वर्षभर कैंपस गतिविधियों में सक्रिय रहता है, जबकि एनएसयूआई का चुनावी तंत्र अक्सर चुनाव घोषित होने के बाद अधिक सक्रिय दिखता है। - विकल्प प्रस्तुत करने में विफलता: विपक्ष के रूप में केवल सत्ताधारी पार्टी या संगठन की आलोचना करना ही पर्याप्त नहीं होता; युवाओं के सामने एक ठोस और आकर्षक एजेंडा पेश करना आवश्यक होता है। तीन, वामपंथी (Left) राजनीति की घटती पकड़: दिल्ली विश्वविद्यालय के परिसरों में वामपंथी छात्र संगठनों (AISA, SFI आदि) का आधार ऐतिहासिक रूप से सीमित रहा है, लेकिन इस चुनाव में उनकी नगण्य उपस्थिति यह साबित करती है कि मुख्यधारा के परिसरों में अति-सैद्धांतिक (Hyper-ideological) राजनीति अब युवा छात्रों को आकर्षित नहीं कर पा रही है। चार, राष्ट्रीय मुख्यधारा की राजनीति का प्रतिबिंब: डूसू के चुनाव हमेशा से देश की राष्ट्रीय राजनीति का रुझान तय करने वाले सूचकांक (Barometer) माने जाते हैं। एबीवीपी को मिला समर्थन यह संकेत देता है कि शहरी, शिक्षित और पहली बार वोट करने वाले युवाओं का बड़ा वर्ग केंद्र में मौजूदा राजनीतिक विचारधारा और उसके छात्र पंख के प्रति सहज रुख रखता है। पांच, निर्दलीय/स्वतंत्र उम्मीदवारों का उभरता प्रभाव: इस चुनाव में मुख्य पदों पर निर्दलीय उम्मीदवारों द्वारा दी गई कड़ी टक्कर और जीत (जैसे उपाध्यक्ष पद पर) यह स्पष्ट करती है कि 'जेन जी' किसी एक पार्टी या कैडर के प्रति आंख मूंदकर वफादार नहीं है। यदि मुख्य संगठन सही प्रत्याशी या एजेंडा तय नहीं करते, तो युवा वोटर्स निर्दलीय या नए विकल्पों को चुनने में संकोच नहीं करते। वस्तुत: डूसू चुनाव के ये नतीजे यह स्पष्ट करते हैं कि आज की युवा पीढ़ी (Gen Z) केवल भावनात्मक या पारंपरिक राजनीतिक नारों पर वोट नहीं देती। जो संगठन मजबूत कैडर, कैंपस की ज़मीनी समस्याओं के समाधान और युवाओं के साथ वर्षभर सीधा संवाद बनाए रखेगा, वही छात्र राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रख पाएगा। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
कम्युनिज्म की राह पर जा रहे राहुल गांधी, उनकी पार्टी बनी 'मुस्लिम लीग माओइस्ट कांग्रेस' : सुधांशु त्रिवेदी
पाकिस्तान ने एक बार फिर अफगानिस्तान की संप्रभुता का उल्लंघन करते हुए हवाई हमला किया है, लेकिन इस बार तालिबान ने भी इस्लामाबाद को कड़ा सबक सिखाने की ठानते हुए खुली और सख्त चेतावनी जारी कर दी है। हम आपको बता दें कि अफगानिस्तान के कुनार प्रांत में पाकिस्तानी एयर स्ट्राइक में कम से कम तीन लोगों की मौत और कई लोगों के घायल होने की खबर है। पाकिस्तानी कार्रवाई ऐसे समय हुई है, जब कुछ ही दिन पहले तालिबान प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने साफ कहा था कि अफगान जमीन पर किसी भी पाकिस्तानी सैन्य कार्रवाई का जवाब दिया जाएगा और इसे उन्होंने “क्रशिंग रिस्पॉन्स” यानी करारा जवाब बताया था। कुनार पर हमला, टकराव का खतरा बढ़ा रिपोर्टों के मुताबिक पाकिस्तान ने कुनार के अलावा पक्तिका प्रांत में भी हवाई कार्रवाई की। अफगान अधिकारियों ने जहां तीन लोगों के मारे जाने की जानकारी दी है, वहीं पाकिस्तान की ओर से तत्काल आधिकारिक प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं हुई। दूसरी ओर, पाकिस्तानी पक्ष का दावा है कि उसकी कार्रवाई संदिग्ध आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाकर की गई। यह कार्रवाई पाकिस्तान में हाल में हुए घातक आतंकी हमलों के बाद हुई है। हम आपको याद दिला दें कि पिछले सप्ताह कोहाट में पुलिस परिसर के पास हुए हमले में बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई थी और पाकिस्तानी सुरक्षा प्रतिष्ठान ने इसके पीछे अफगानिस्तान से संचालित आतंकवादी नेटवर्क की आशंका जताई है। इसे भी पढ़ें: Khyber Pakhtunkhwa में TTP आतंकियों के साथ मुठभेड़, 6 सुरक्षाकर्मियों समेत 14 की मौत इसी मुद्दे को लेकर अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच पुराना आरोप-प्रत्यारोप अब सीधे सैन्य टकराव में बदलता दिखाई दे रहा है। पाकिस्तान लगातार आरोप लगाता रहा है कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी TTP के लड़ाके अफगान जमीन का इस्तेमाल कर पाकिस्तान में हमले करते हैं। तालिबान इन आरोपों को लगातार खारिज करता है और कहता है कि वह अफगानिस्तान की धरती को दूसरे देशों के खिलाफ हमलों के लिए इस्तेमाल नहीं होने देता। तालिबान की दो टूक चेतावनी पाकिस्तान के सैन्य प्रवक्ता की ओर से अफगानिस्तान में आतंकवादी समूहों की भर्ती, प्रशिक्षण और हथियारबंदी के आरोपों के जवाब में तालिबान प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने कहा कि अगर पाकिस्तान आत्मरक्षा के नाम पर अफगान क्षेत्र में कार्रवाई करता है तो काबुल को अपनी संप्रभुता की रक्षा का अधिकार है। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान को अपनी आंतरिक सुरक्षा समस्याओं की समीक्षा करनी चाहिए, क्योंकि TTP और बलूच सशस्त्र समूहों से जुड़ी हिंसा तालिबान के 2021 में सत्ता में लौटने से पहले से मौजूद है। हालांकि तालिबान की भाषा में सैन्य चेतावनी जितनी कठोर है, उतना ही महत्वपूर्ण उसका दूसरा संदेश भी है। काबुल ने बातचीत का दरवाजा बंद नहीं किया है। मुजाहिद ने पाकिस्तान के साथ बेहतर खुफिया सहयोग और सीमा सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत बताई है तथा सऊदी अरब को दोनों देशों के बीच मध्यस्थता की संभावित भूमिका के लिए समर्थन दिया है। यानी काबुल एक तरफ सैन्य जवाब की चेतावनी दे रहा है, तो दूसरी तरफ राजनयिक रास्ता खुला रखने की कोशिश भी कर रहा है। पाकिस्तान के भीतर भी बढ़ता दबाव इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा और बेहद महत्वपूर्ण पहलू पाकिस्तान की घरेलू स्थिति है। इस्लामाबाद इस समय एक साथ सुरक्षा, राजनीति और अर्थव्यवस्था के दबाव से जूझ रहा है। देश में इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ यानी PTI ने 27 सितंबर को इस्लामाबाद मार्च का ऐलान किया है, जबकि जमात-ए-इस्लामी भी पेट्रोलियम लेवी के खिलाफ राजधानी की ओर मार्च कर रही है। सरकार ने प्रदर्शनकारियों को राजधानी में पहुंचने से रोकने की तैयारी शुरू कर दी है। पाकिस्तान के वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब ने चेतावनी दी है कि हड़ताल, धरना, लंबे मार्च और सड़कों की नाकेबंदी से अर्थव्यवस्था को रोजाना करीब 120 अरब पाकिस्तानी रुपये, यानी लगभग 400-434 मिलियन डॉलर का नुकसान हो सकता है। अनुमान के मुताबिक सेवाक्षेत्र को करीब 86 अरब रुपये, उद्योग को 25 अरब और कृषि को 9 अरब रुपये प्रतिदिन का नुकसान हो सकता है। सरकार ने यह भी चेताया है कि इंटरनेट बाधित होने की स्थिति में आईटी निर्यात पर गंभीर असर पड़ सकता है। देखा जाए तो इस्लामाबाद के सामने चुनौती केवल अफगान सीमा तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के भीतर भी राजनीतिक और सुरक्षा संकट गहराता जा रहा है। राजधानी में संभावित विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए सुरक्षा कड़ी कर दी गई है, प्रवेश मार्गों पर कंटेनर लगाए जा रहे हैं और प्रमुख अस्पतालों को हाई अलर्ट पर रखा गया है। इसी बीच पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के खैबर पख्तूनख्वा अध्यक्ष जुनैद अकबर के एक बयान ने सरकार की चिंता और बढ़ा दी है। 27 सितंबर के प्रस्तावित इस्लामाबाद मार्च से पहले एक कार्यकर्ता सम्मेलन को संबोधित करते हुए अकबर ने कहा कि PTI कार्यकर्ता मोटरवे, जीटी रोड और मार्गल्ला हिल्स समेत कई रास्तों से राजधानी में प्रवेश करेंगे और “हम इस्लामाबाद को सोमनाथ बना देंगे।” पाकिस्तान सरकार ने इसे सीधे तौर पर हिंसा की धमकी और राजधानी में अराजकता फैलाने की मंशा का संकेत बताया है। उधर, अफगानिस्तान पर पाकिस्तान के नये हमले के बाद सबसे बड़ा खतरा यह है कि एक सीमित एयर स्ट्राइक जवाबी गोलीबारी, सीमा संघर्ष और फिर व्यापक सैन्य टकराव में बदल सकती है। हम आपको याद दिला दें कि इस साल फरवरी में भी दोनों देशों के बीच वर्षों का सबसे गंभीर सैन्य टकराव हो चुका है और ताजा घटनाक्रम उसी चक्र की वापसी का संकेत देता है। बहरहाल, देखना होगा कि कुनार की यह बमबारी यहीं रुकती है या पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा एक बार फिर खुले सैन्य संघर्ष का नया मोर्चा बनती है। - नीरज कुमार दुबे
मुंबई, सोने और चांदी की कीमतों में सोमवार को गिरावट देखने को मिली और इससे दोनों की कीमती धातुओं का दाम करीब 0.70 प्रतिशत घट गया।
'हर देश को अपने हालात के हिसाब से कानून बनाने का हक,' इटली में बुर्का बैन पर बोले मुफ्ती कासमी
'हर देश को अपने हालात के हिसाब से कानून बनाने का हक,' इटली में बुर्का बैन पर बोले मुफ्ती कासमी
अयोध्या: राम मंदिर के नए सीईओ जितेंद्र मिश्रा आज से शुरू करेंगे कामकाज
अयोध्या: राम मंदिर के नए सीईओ जितेंद्र मिश्रा आज से शुरू करेंगे कामकाज
ओडिशा विधानसभा सत्र से पहले सुरक्षा कड़ी, 22 सितंबर से 3 अक्टूबर तक चलेगा सदन
ओडिशा विधानसभा के 17वें कार्यकाल का सातवां सत्र 22 सितंबर से 3 अक्टूबर तक चलेगा। इसे देखते हुए कमिश्नरेट पुलिस ने भुवनेश्वर में सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए हैं।
अमरोहा में नई सियासी हलचल : मोहम्मद शमी की जयंत चौधरी से मुलाकात, चुनावी अटकलें तेज
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले क्रिकेटर मोहम्मद शमी और राष्ट्रीय लोक दल अध्यक्ष जयंत चौधरी की मुलाकात ने राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। अमरोहा से लेकर दिल्ली तक इस मुलाकात को लेकर सियासी हलचल बढ़ गई है
भाजपा मुख्यालय में 'प्रकोष्ठ–संकुल राष्ट्रीय कार्यशाला', नितिन नवीन ने संगठन को मजबूत करने की समीक्षा की
'आंध्र प्रदेश की गठबंधन सरकार विशाखापत्तनम के विकास को कर रही कमजोर', वाईएसआरसीपी का आरोप
'आंध्र प्रदेश की गठबंधन सरकार विशाखापत्तनम के विकास को कर रही कमजोर', वाईएसआरसीपी का आरोप
'जनता ने डबल इंजन पर जताया भरोसा', राजस्थान निकाय चुनाव में भाजपा के प्रदर्शन पर बोले भूपेंद्र यादव
'जनता ने डबल इंजन पर जताया भरोसा', राजस्थान निकाय चुनाव में भाजपा के प्रदर्शन पर बोले भूपेंद्र यादव
पंजाब की 'आप' सरकार नशे के समाधान में बुरी तरह विफल हुई: शिवराज सिंह चौहान
पंजाब की 'आप' सरकार नशे के समाधान में बुरी तरह विफल हुई: शिवराज सिंह चौहान
पंजाब को नशामुक्त बनाकर विकसित राज्य बनाएगी भाजपा: अर्जुन राम मेघवाल
पंजाब को नशामुक्त बनाकर विकसित राज्य बनाएगी भाजपा: अर्जुन राम मेघवाल
गोवा में 'दिशा 2.0' कार्यशाला 21 सितंबर से, नागरिकों को कानूनी अधिकारों के प्रति किया जाएगा जागरूक
गोवा में 'दिशा 2.0' कार्यशाला 21 सितंबर से, नागरिकों को कानूनी अधिकारों के प्रति किया जाएगा जागरूक
लालबाग हादसे पर सुरक्षा ऑडिट जरूरी, पीड़ित परिवारों को मिलेगा न्याय : शायना एनसी
लालबाग हादसे पर सुरक्षा ऑडिट जरूरी, पीड़ित परिवारों को मिलेगा न्याय : शायना एनसी
'छात्रों की गूंज' मिमिक्री विवाद पर भड़के केंद्रीय मंत्री रिजिजू, बोले-'कांग्रेस कॉमेडियन और जोकरों की पार्टी बन गई है'
ओमप्रकाश राजभर का अखिलेश पर हमला, बोले-दलित महापुरुषों से चिढ़ते हैं सपा प्रमुख
ओमप्रकाश राजभर का अखिलेश पर हमला, बोले-दलित महापुरुषों से चिढ़ते हैं सपा प्रमुख
24 सितंबर को रायबरेली जाएंगे अखिलेश यादव
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव 24 सितंबर को रायबरेली जाएंगे। अखिलेश यादव यहां पार्टी विधायक राहुल लोधी के घर पर चाय पिएंगे और सियासी चर्चा करेंगे
1 अक्टूबर से एलपीजी सब्सिडी के लिए आधार जरूरी
घरेलू एलपीजी उपभोक्ताओं को सरकारी सब्सिडी के साथ निर्धारित कीमत पर रसोई गैस सिलेंडर की बुकिंग जारी रखने के लिए 1 अक्टूबर 2026 से बायोमेट्रिक आधार प्रमाणीकरण पूरा करना अनिवार्य होगा।
'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम के बाद राहुल गांधी पर सीएम मोहन यादव का पलटवार, शिक्षा और रोजगार के आंकड़े रखे सामने
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव: 'जेनजी देश के साथ खड़ी है', एबीवीपी की जीत पर यश डबास का बयान
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव: 'जेनजी देश के साथ खड़ी है', एबीवीपी की जीत पर यश डबास का बयान
'ड्रग्स के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ें', पंजाब के लोगों से केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान की अपील
'ड्रग्स के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ें', पंजाब के लोगों से केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान की अपील
डूसू चुनाव 2026 : एनएसयूआई ने काटा टिकट, फिर दीपांशु शौकीन ने निर्दलीय चुनाव जीतकर दिखाया दम
डूसू चुनाव 2026 : एनएसयूआई ने काटा टिकट, फिर दीपांशु शौकीन ने निर्दलीय चुनाव जीतकर दिखाया दम
एबीवीपी की डूसू में जीत 'राष्ट्र प्रथम' की विचारधारा में युवाओं का भरोसा : अमित शाह
एबीवीपी की डूसू में जीत 'राष्ट्र प्रथम' की विचारधारा में युवाओं का भरोसा : अमित शाह
उत्तर प्रदेश 2027 का विधानसभा चुनाव: भाजपा का डेमेज कंट्रोल का प्रयास
उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में साल 2024 का लोकसभा चुनाव एक ऐसे मोड़ के रूप में दर्ज हो चुका है, जिसने सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की अजेय मानी जाने वाली छवि को गहरा धक्का पहुँचाया। दिल्ली की सत्ता पर लगातार तीसरी बार काबिज होने के बावजूद, देश के सबसे बड़े और राजनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश में पार्टी की सीटों का आंकड़ा लगभग आधा रह जाना एक ऐसी चेतावनी थी, जिसे नजरअंदाज करना आत्मघाती साबित हो सकता था। इस चुनावी झटके ने जहाँ एक ओर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन को नई ऊर्जा दी, वहीं दूसरी ओर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को आत्ममंथन और अपनी रणनीतियों को नए सिरे से परिभाषित करने पर मजबूर कर दिया। अब जबकि राज्य साल 2027 के विधानसभा चुनाव के मुहाने पर खड़ा है, भाजपा का पूरा ध्यान केवल सत्ता बचाने पर नहीं, बल्कि अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन को वापस पाने और 'मिशन हैट्रिक' को सफल बनाने के लिए एक व्यापक, आक्रामक और बहुआयामी 'डैमेज कंट्रोल' (क्षति नियंत्रण) अभियान पर केंद्रित हो चुका है। यह संपादकीय विश्लेषण इसी बात की पड़ताल करता है कि कैसे भाजपा अपनी पिछली गलतियों से सीखकर 2027 के महासंग्राम के लिए एक अभेद्य चक्रव्यूह रचने का प्रयास कर रही है।यदि 2027 में लखनऊ की गद्दी पर दोबारा भगवा ध्वज लहराना है, तो संगठन की बुनियादी कमियों को दूर करना और सामाजिक व सांगठनिक समीकरणों को नए सिरे से साधना पहली और अनिवार्य शर्त बन चुकी है। सांगठनिक कसावट के साथ-साथ भाजपा का यह डैमेज कंट्रोल केवल पार्टी कैडर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सहयोगियों और प्रमुख चेहरों को जोड़े रखने के लिए एक आक्रामक राजनीतिक घेराबंदी में बदल चुका है। इसी कड़ी में हाल ही में दो बेहद महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम सामने आए हैं, जो भाजपा की इस गंभीर रणनीति को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। पहला घटनाक्रम रायबरेली सदर से भाजपा विधायक अदिति सिंह का है। पिछले कुछ समय से राजनीतिक गलियारों में अदिति सिंह की कांग्रेस में संभावित वापसी को लेकर तरह-तरह की अटकलें और कयास लगाए जा रही थे। इन अटकलों को पूरी तरह खारिज करते हुए और विपक्ष के मनोबल को तोड़ने के लिए अदिति सिंह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से एक उच्च स्तरीय मुलाकात की। इस बैठक ने न केवल सभी अफवाहों पर पूरी तरह विराम लगा दिया, बल्कि यह भी साफ कर दिया कि रायबरेली जैसे गांधी परिवार के पारंपरिक गढ़ में भाजपा अपने किले को अभेद्य रखने के लिए पूरी तरह मुस्तैद है। इसे भी पढ़ें: UP में अगले 6 महीने में 1 लाख युवाओं को मिलेगी सरकारी नौकरी, CM Yogi का ऐलान इसी रणनीति का दूसरा और अधिक महत्वपूर्ण हिस्सा अपने नाराज सहयोगियों को संभालना है, जिसमें भाजपा का शीर्ष नेतृत्व कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। लोकसभा चुनाव के बाद से ही अपनी उपेक्षा और अति-पिछड़ों के आरक्षण के मुद्दे को लेकर सार्वजनिक रूप से नाराजगी जाहिर कर रहे निषाद पार्टी के अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री संजय निषाद को मनाने के लिए भाजपा के प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े खुद उनके आवास पर पहुंचे। दोनों नेताओं के बीच हुई इस मैराथन बैठक का मुख्य उद्देश्य सहयोगी दलों के भीतर पनप रहे असंतोष को समय रहते दबाना और 2027 से पहले एनडीए के कुनबे को पूरी तरह एकजुट रखना है। भाजपा भली-भांति जानती है कि उत्तर प्रदेश जैसी जटिल राजनीतिक पिच पर अनुप्रिया पटेल की अपना दल (एस), ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा और संजय निषाद की निषाद पार्टी जैसे छोटे दल अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। विनोद तावड़े का खुद चलकर संजय निषाद के घर जाना यह दिखाता है कि भाजपा अब किसी भी बड़े या छोटे सहयोगी को खोने का जोखिम नहीं उठा सकती और वह गठबंधन के भीतर सत्ता और सम्मान का नया संतुलन बनाने के लिए तैयार है। इसके अतिरिक्त, युवाओं और रोजगार के मुद्दे पर विपक्ष के आक्रामक हमलों को कुंद करने के लिए सरकार ने अपनी प्रशासनिक मशीनरी को पूरी तरह से झोंक दिया है। पिछले कुछ समय में हुए पेपर लीक मामलों ने सरकार की साख पर जो बट्टा लगाया था, उसे धोने के लिए कड़े कानून बनाए गए हैं और पारदर्शी तरीके से भर्ती परीक्षाओं के आयोजन पर जोर दिया जा रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं युवाओं को नियुक्ति पत्र बांटने के कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं, ताकि यह संदेश दिया जा सके कि सरकार युवाओं के भविष्य के प्रति अत्यंत संवेदनशील है। इसके समानांतर, 'वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट' और राज्य में आ रहे भारी-भरकम औद्योगिक निवेश के जरिए स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर सृजित करने के दावों को सोशल मीडिया और जमीनी अभियानों के माध्यम से जनता के बीच ले जाया जा रहा है। विपक्ष द्वारा महंगाई और बेरोजगारी पर बनाए जा रहे माहौल का मुकाबला करने के लिए भाजपा अपनी 'डबल इंजन सरकार' के विकास कार्यों—जैसे एक्सप्रेसवे का जाल, हवाई अड्डों का विकास और बेहतर कानून-व्यवस्था—को मुख्य ढाल बना रही है। एक और महत्वपूर्ण मोर्चा जिस पर भाजपा बहुत बारीकी से काम कर रही है, वह है टिकट वितरण और एंटी-इन्कंबेंसी का प्रबंधन। पार्टी के आंतरिक सूत्रों और स्वतंत्र एजेंसियों के माध्यम से प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र का गहन और बहुस्तरीय जमीनी सर्वे कराया जा रहा है। इस सर्वे में न केवल विधायकों की लोकप्रियता और उनके कामकाज का आकलन किया जा रहा है, बल्कि जनता के बीच उनकी छवि और कार्यकर्ताओं के साथ उनके व्यवहार को भी मापा जा रहा है। इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि सत्ता विरोधी लहर को काटने और जनता के गुस्से को शांत करने के लिए भाजपा 2027 के चुनावों में 30 से 40 प्रतिशत मौजूदा विधायकों के टिकट काट सकती है या उनके क्षेत्र बदल सकती है। नए, युवा और स्थानीय स्तर पर स्वीकार्य चेहरों को मौका देकर पार्टी एक 'नया और ऊर्जावान' विकल्प पेश करने की तैयारी में है, जिससे बगावत के खतरों को कम से कम किया जा सके। आजमगढ़, अयोध्या, सहारनपुर और मुरादाबाद जैसे मंडलों की हारी हुई सीटों और विशेषकर उन 16 जिलों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है जहाँ पार्टी का प्रदर्शन सबसे खराब रहा था, और इन क्षेत्रों की कमान सीधे वरिष्ठ मंत्रियों और संगठन के शीर्ष पदाधिकारियों को सौंप दी गई है। अंततः, उत्तर प्रदेश 2027 का चुनाव केवल देश के सबसे बड़े राज्य की सत्ता का फैसला नहीं करेगा, बल्कि यह 2029 के अगले लोकसभा चुनाव की दशा और दिशा भी तय करेगा। भाजपा भली-भांति जानती है कि दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर ही गुजरता है और यूपी में किसी भी प्रकार की शिथिलता उसके राष्ट्रीय राजनीतिक प्रभुत्व को संकट में डाल सकती है। वर्तमान में भाजपा द्वारा किए जा रहे डैमेज कंट्रोल के प्रयास—चाहे वह अदिति सिंह की मुख्यमंत्री से मुलाकात हो या विनोद तावड़े का संजय निषाद के घर पहुंचना—यह दर्शाते हैं कि पार्टी अपनी पराजय को स्वीकार कर आत्मसंतुष्टि के जाल से बाहर निकल चुकी है और एक अनुशासित सेना की तरह अपनी कमियों को सुधारने में जुट गई है। विपक्ष के सामाजिक नैरेटिव को तोड़ना, कार्यकर्ताओं को दोबारा सक्रिय करना, सहयोगियों को संतुष्ट रखना और सुशासन के दावों पर जनता का विश्वास बहाल करना एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य है। लेकिन चुनावी राजनीति के माहिर खिलाड़ी के रूप में भाजपा ने जिस तरह से माइक्रो-मैनेजमेंट और सामाजिक समीकरणों को नए सिरे से गढ़ने का ब्लूप्रिंट तैयार किया है, उसने 2027 की लड़ाई को बेहद दिलचस्प और कड़ा बना दिया है। आगामी महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भाजपा की यह नई बिसात विपक्ष के बढ़ते हौसलों को पस्त करने में कितनी कारगर साबित होती है। - अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार
सत्ता से संघर्ष तकः ममता बनर्जी का राजनीतिक यथार्थ
ममता बनर्जी का राजनीतिक सफर एक छात्र राजनीति की साहसी नायिका से लेकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनने और वर्तमान समय में घोर राजनीतिक व कानूनी संकटों से घिरने तक की एक बड़ी दास्तान है। जो ‘दीदी’ कभी सड़कों पर वामपंथ के 34 साल के किले को ढहाने के लिए जानी जाती थीं, वे आज अपनी राजनीतिक यात्रा के सबसे कठिन दौर से गुजर रही हैं। वर्तमान परिस्थितियों में ममता बनर्जी पर मुश्किलों के पहाड़ टूटने के मुख्य कारण इस प्रकार हैं- पहला, ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक झटका 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में लगा, जहाँ उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को हार का सामना करना पड़ा और राज्य में भाजपा की सरकार बनी। खुद ममता बनर्जी को भी अपनी पारंपरिक सीट भवानीपुर से शुभेंदु अधिकारी के हाथों करारी हार झेलनी पड़ी। 15 साल तक राज्य पर राज करने के बाद सत्ता से बाहर होना उनके राजनीतिक पतन की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। दूसरा, ममता बनर्जी की राजनीतिक ताकत हमेशा उनकी पार्टी पर उनकी मजबूत पकड़ थी। लेकिन वर्तमान में टीएमसी के भीतर एक बड़ी बगावत छिड़ गई है। कई विधायकों और सांसदों ने अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव और पार्टी में तानाशाही रवैये को लेकर बगावती रुख अख्तियार कर लिया है, जिससे पार्टी दो फाड़ होने की कगार पर पहुंच गई है। तीसरा, ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा कानूनी और भावनात्मक झटका तब लगा जब चुनाव आयोग ने पार्टी में आंतरिक विवाद के कारण तृणमूल कांग्रेस के नाम और उनके प्रसिद्ध चुनाव चिह्न ‘जोड़ा फूल’ को फ्रीज (रोक लगा दी) कर दिया। आयोग ने दोनों गुटों को अस्थाई रूप से नए नाम और सिंबल दिए हैं। ममता बनर्जी ने इसे भारतीय लोकतंत्र का ‘काला दिन’ बताया है और इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। चौथा, सत्ता से हटते ही ममता बनर्जी के खिलाफ कानूनी शिकंजा लगातार कसता जा रहा है- चुनाव प्रचार के दौरान कथित तौर पर भड़काऊ और सांप्रदायिक बयान देने के आरोप में उनके खिलाफ कोलकाता और सिलीगुड़ी में एफआईआर दर्ज की गई हैं। इसे भी पढ़ें: TMC संकट Mamata Banerjee के अहंकार और भगवान राम के शाप का परिणाम: Suvendu Adhikari अगस्त 2026 में कोलकाता में छात्र संगठन (टीएमसीपी) की रैली के दौरान कलकत्ता हाई कोर्ट के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करने और कानून व्यवस्था बिगाड़ने के आरोप में भी पुलिस ने उन पर मामला दर्ज किया है। उनकी पिछली सरकार पर एक विज्ञापन एजेंसी को रु. 635 करोड़ से अधिक का टेंडर देने में गड़बड़ी जैसे भ्रष्टाचार के नए आरोप लग रहे हैं। पांचवां, ममता बनर्जी ने हमेशा खुद को जनता की लड़ाई लड़ने वाली और महिलाओं के अधिकारों की रक्षक के रूप में पेश किया था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में राज्य में हुए महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर उनके विवादित बयानों और भ्रष्टाचार के मामलों (जैसे शिक्षक भर्ती घोटाला आदि) ने उनकी छवि को गंभीर नुकसान पहुंचाया। जनता में पैदा हुए इसी आक्रोश और सत्ता-विरोधी लहर ने उन्हें बैकफुट पर धकेल दिया। संघर्ष की नायिका का वर्तमान रुख, इन सब मुश्किलों के बावजूद, 17 साल की उम्र में दूध के बूथ और स्टेनोग्राफर का काम करके अपने परिवार को संभालने वाली ममता बनर्जी ने हार मानने से साफ इनकार किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे राजनीतिक संन्यास नहीं लेंगी और वे इस ‘गंदे खेल’ के खिलाफ सड़कों पर उतरकर लड़ाई जारी रखेंगी। आगामी उपचुनावों के लिए उन्होंने रणनीति बदलते हुए कांग्रेस उम्मीदवारों को समर्थन देने की घोषणा भी की है। भारतीय राजनीति के इतिहास में ममता बनर्जी का नाम एक ऐसी जननेता के रूप में दर्ज रहा है, जिन्होंने शून्य से उठकर जन आंदोलनों के बल पर दशकों पुरानी राजनीतिक संरचनाओं को हिला दिया। छात्र राजनीति के समय से ही उनकी पहचान एक बेबाक और निर्भीक व्यक्तित्व के रूप में रही है। तीन दशकों से अधिक लंबे वामपंथी शासन को उखाड़ फेंकने वाली दीदी ने पूरे पंद्रह वर्षों तक पश्चिम बंगाल की सत्ता पर एकछत्र राज किया। परंतु समय का चक्र ऐसा घूमा है कि वही जुझारू नेत्री आज अपनी ही राजनीतिक यात्रा के सबसे कठिन दौर से गुजर रही हैं। हालिया विधानसभा चुनावों में मिली पराजय, दल के भीतर भड़की बगावत, चौतरफा वैधानिक कार्यवाहियों का शिकंजा और दल की मूल पहचान यानी नाम तथा चुनाव चिह्न का छिन जाना, इन सबने मिलकर उनके समक्ष अस्तित्व रक्षा की अभूतपूर्व चुनौती खड़ी कर दी है। हाल के विधानसभा चुनाव पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास में एक बड़े मोड़ के रूप में सामने आए। पंद्रह वर्षों के निरंतर शासन के बाद तृणमूल कांग्रेस को जन-असंतोष और प्रचंड विरोध का सामना करना पड़ा। चुनावी नतीजों में न केवल उनकी पार्टी को करारी हार झेलनी पड़ी, बल्कि ममता बनर्जी को स्वयं अपनी पारंपरिक सीट भवानीपुर से पराजय का स्वाद चखना पड़ा। इस परिणाम ने यह सिद्ध कर दिया कि राज्य में बदलाव की लहर अत्यधिक तीव्र थी। निरंतर शासन से उपजी असंतुष्टि, विभिन्न भर्ती घोटालों के आरोप तथा स्थानीय स्तर पर उपजे जन-रोष ने मिलकर उनकी दलगत जड़ों को कमजोर कर दिया, जिससे राज्य में एक नए राजनीतिक समीकरण का उदय हुआ। किसी भी क्षेत्रीय दल की वास्तविक शक्ति उसका सुदृढ़ संगठन, शालीन भाषा, लोकतांत्रिक मर्यादा और नेतृत्व के प्रति अटूट निष्ठा होती है। तृणमूल कांग्रेस में लगभग तीन दशकों तक ममता बनर्जी ही सर्वमान्य चेहरा और अंतिम निर्णयकर्ता रहीं। किंतु चुनावी असफलता के उपरांत पार्टी के भीतर दबा हुआ असंतोष अचानक बाहर आ गया। विधायकों और सांसदों के एक बड़े धड़े ने शीर्ष नेतृत्व की कार्यशैली पर प्रश्न चिह्न खड़े कर दिए। तृणमूल कांग्रेस में आंतरिक विभाजन के बाद दोनों गुटों द्वारा अधिकार जताए जाने के कारण आयोग को कड़ा कदम उठाना पड़ा। वर्षों पूर्व जिस पहचान को उन्होंने अपने कड़े परिश्रम और संघर्ष से सींचा था, उसी से वंचित हो जाना उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा संवैधानिक झटका माना जा रहा है। यद्यपि उन्होंने इस निर्णय को लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध बताते हुए शीर्ष अदालत का द्वार खटखटाया है, परंतु तत्काल रूप से इस स्थिति ने दल के कार्यकर्ताओं में भारी असमंजस पैदा कर दिया है। सत्ता से बाहर होते ही ममता बनर्जी बहुआयामी कानूनी चुनौतियों से भी घिर गई हैं। चुनावी अभियानों के दौरान दिए गए बयानों को लेकर उनके खिलाफ विभिन्न स्थानों पर प्राथमिक दर्ज कराई गई हैं। जनसभाओं और रैलियों के संचालन में उच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के उल्लंघन तथा व्यवस्था बिगाड़ने के आरोपों में भी दंडात्मक कार्यवाहियाँ शुरू की गई हैं। ये तमाम कानूनी उलझनें न केवल उनकी प्रशासनिक छवि पर प्रश्न खड़े करती हैं, बल्कि उन्हें राजनीतिक पुनर्निर्माण के स्थान पर कानूनी बचाव की मुद्रा में ला खड़ा करती हैं। ममता बनर्जी की वास्तविक पूंजी उनकी साख थी, जो एक साधारण, त्यागपूर्ण और आम जनता की रक्षक के रूप में बनी थी। जनाक्रोश और सत्ता-विरोधी लहर ने उन्हें बैकफुट पर धकेल दिया। इसके बावजूद विपरीत परिस्थितियों में पली-बढ़ी ममता बनर्जी ने आसानी से घुटने न टेकने का संकल्प दोहराया है। राजनीति से संन्यास लेने की बातों को खारिज करते हुए उन्होंने पुनः जन-सड़कों पर उतरकर संघर्ष करने का मार्ग चुना है। वर्तमान परिस्थितियों में उन्होंने अपनी रणनीति बदलते हुए अन्य विपक्षी दलों के साथ हाथ मिलाना शुरू किया है। नंदीग्राम उपचुनाव में अपने प्रत्याशी का नाम वापस लेकर कांग्रेस उम्मीदवार का समर्थन करना इसी रणनीति का भाग है। संक्षेप में कहा जाए तो ममता बनर्जी का वर्तमान समय उनके राजनीतिक जीवन की सबसे कसौटी पूर्ण परीक्षा का काल है। एक ओर दल में टूट, नाम व प्रतीक का स्थगन और मुकदमों का अंबार है, तो दूसरी ओर अपनी खोई साख को पुनः प्राप्त करने की विशाल चुनौती। इतिहास साक्षी है कि वे संकटों से उभरकर वापसी करने में माहिर रही हैं, किंतु इस बार चुनौती केवल राजनीतिक विरोधियों से नहीं, बल्कि अपनी ही बिखरी हुई विरासत को समेटने की है। अब यह देखना अत्यंत दिलचस्प होगा कि क्या वे अपने जनआंदोलन की पुरानी शैली के बल पर इस राजनीतिक चक्रव्यूह को भेद पाती हैं या नहीं। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
'मर्यादा में होना चाहिए राजनीतिक विरोध', सपा के डिजिटल कैंपेन पर भड़के मनोज पांडे
'मर्यादा में होना चाहिए राजनीतिक विरोध', सपा के डिजिटल कैंपेन पर भड़के मनोज पांडे
डूसू चुनाव में एबीवीपी की जीत पर यश डबास बोले, जेन जी हमारे साथ
डूसू चुनाव में एबीवीपी की जीत पर यश डबास बोले, जेन जी हमारे साथ
इंदौर में राहुल बोले- '6 लोग देश का सिस्टम चला रहे, मोदी, अमित शाह, डोभाल, भागवत, अडानी-अंबानी'
Rahul Gandhi Chhatron Ki Goonj Indore: राहुल गांधी ने इंदौर में छात्रों की गूंज प्रोग्राम में कहा कि छात्र सवाल पूछते हैं और यही बात कथित ‘सिस्टम’ को पसंद नहीं है। अंधभक्त उन्हें सवाल पूछने से रोकते हैं। नेता विपक्ष राहुल गांधी ने अंधभक्त की परिभाषा भी बताई।
अनंत सिंह से विवाद पर जेडीयू प्रवक्ता नीरज कुमार का पलटवार, कहा- 'हम आग और पानी से बने हैं'
अनंत सिंह से विवाद पर जेडीयू प्रवक्ता नीरज कुमार का पलटवार, कहा- 'हम आग और पानी से बने हैं'
Indore Chhatron Ki Goonj: Rahul Gandhi का बड़ा हमला, 'सिस्टम को छात्र नहीं, Andhbhakt चाहिए!'
बागी तृणमूल गुट के 'लिफाफा' निशान पर विवाद, एआईएसएफ कोर्ट जाने की तैयारी में
बागी तृणमूल गुट के 'लिफाफा' निशान पर विवाद, एआईएसएफ कोर्ट जाने की तैयारी में
बांग्लादेश को आखिरकार भारत की जरूरत का एहसास होने लगा है! जिस समय नई दिल्ली ने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान को ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में आमंत्रित कर पड़ोसी संबंधों को आगे बढ़ाने का अवसर दिया, उस समय ढाका ने दूरी बनाए रखना पसंद किया। शायद उसे लगा कि दिल्ली जाने से अच्छा है इस्लामाबाद या मक्का जाया जाये और मक्का पैक्ट में शामिल हुआ जाये। लेकिन मक्का में हूतियों का हमला और मक्का पैक्ट की हवा निकलते देख बांग्लादेश को शायद अपनी गलती का अहसास होने लगा है। अब बांग्लादेश के सामने दो तस्वीरें हैं। एक ओर भारत में आयोजित ब्रिक्स की शानदार सफलता की पूरी दुनिया में गूंज उसे सुनाई दे रही है और दूसरी तरफ 'एक पर हमला सब पर हमला' की घोषित नीति के बावजूद सऊदी अरब की मदद के लिए नहीं उतरने की पाकिस्तान और तुर्की की वादाखिलाफी दिखाई दे रही है। इसके चलते तस्वीर अब तेजी से बदलती दिखाई दे रही है। ब्रिक्स सम्मेलन संपन्न होने के ठीक बाद भारत तथा बांग्लादेश के बीच उच्चस्तरीय बातचीत फिर शुरू हो गई है। बताया जा रहा है कि दोनों देश नवंबर में तारिक रहमान की भारत यात्रा की संभावित तारीखों पर विचार कर रहे हैं। यह पिछले कुछ समय से तनावपूर्ण चल रहे भारत-बांग्लादेश संबंधों को फिर पटरी पर लाने की कोशिश है। हम आपको याद दिला दें कि तारिक रहमान के फरवरी में प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद भारत ने उन्हें अलग से द्विपक्षीय यात्रा का निमंत्रण दिया था। अगस्त में भी यात्रा की संभावना बनी थी, लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की भारत से की गई सार्वजनिक टिप्पणी के बाद ढाका में पैदा हुए आक्रोश ने पूरा घटनाक्रम उलट दिया। अब दोनों पक्ष नवंबर की किसी उपयुक्त तारीख पर सहमति बनाने की कोशिश कर रहे हैं। भारतीय उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी ने ढाका में कई वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात कर इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया है। भारतीय पक्ष की कोशिश यह है कि यात्रा ऐसी तारीख पर हो जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम के अनुकूल भी हो। यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत-बांग्लादेश संबंध वर्ष 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद गंभीर तनाव से गुजरे हैं। हसीना के भारत में रहने और उनके प्रत्यर्पण की मांग को लेकर ढाका लगातार दबाव बनाता रहा है। अगस्त में शेख हसीना की ओर से मीडिया कार्यक्रम को संबोधित करने के बाद यह तनाव और बढ़ गया। बांग्लादेश की मौजूदा सरकार चाहती है कि शेख हसीना का प्रत्यर्पण हो और उनकी सार्वजनिक बयानबाजी पर रोक लगे। इस पर भारत की ओर से फिलहाल यही कहा गया है कि प्रत्यर्पण अनुरोध की जांच की जा रही है। साथ ही नई दिल्ली व्यापक संबंधों को पारस्परिक हितों और पारस्परिकता के आधार पर आगे बढ़ाने पर जोर दे रही है। इसे भी पढ़ें: बांग्लादेश को दुश्मन खेमे में जाने से रोकने के लिए भारत ने चला बड़ा दांव! India-Banladesh के बीच फिर से शुरू हो सकती है रेल सेवाएं दोनों पक्ष इस टकराव के बीच ऐसा रास्ता खोज रहे हैं जिसमें किसी एक मुद्दे के कारण दोनों देशों के व्यापक हित प्रभावित न हों। यही कारण है कि नवंबर में प्रस्तावित तारिक रहमान यात्रा को दोनों राजधानियां बेहद महत्वपूर्ण मान रही हैं। रणनीतिक स्तर पर देखें तो भारत और बांग्लादेश के बीच मजबूत संबंध केवल दो सरकारों का मामला नहीं है। बंगाल की खाड़ी, पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा, सीमा प्रबंधन, नदी जल, व्यापार, संपर्क और क्षेत्रीय सहयोग, इन सभी मोर्चों पर दोनों देशों के हित एक-दूसरे से जुड़े हैं। आर्थिक मोर्चे पर भी बातचीत का एजेंडा महत्वपूर्ण है। दोनों देशों के अधिकारी द्विपक्षीय व्यापार को नियमित करने के उपायों पर विचार कर रहे हैं, क्योंकि राजनीतिक अस्थिरता के कारण व्यापार प्रभावित हुआ है। इसके साथ ही गंगा जल संधि के नवीनीकरण का प्रश्न भी एजेंडे में शामिल है। जल संसाधन से जुड़े मुद्दे दोनों देशों के लिए अत्यंत संवेदनशील हैं और इनके समाधान का सीधा प्रभाव सीमावर्ती क्षेत्रों तथा करोड़ों लोगों के हितों पर पड़ता है। इसके अलावा, ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में तारिक रहमान को आमंत्रण मिलना भी इस पूरे घटनाक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बांग्लादेश को यह निमंत्रण इसलिए दिया गया था क्योंकि वह बहुक्षेत्रीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग के लिए बंगाल की खाड़ी पहल यानि बिम्सटेक का वर्तमान अध्यक्ष है। इसके बावजूद बांग्लादेश ने सम्मेलन में अपना प्रतिनिधि नहीं भेजा। उसके विदेश मंत्रालय के राज्य मंत्री ने तब कहा था कि ढाका भारत के साथ संबंधों को नए सिरे से व्यवस्थित करना चाहता है और इसके लिए उपयुक्त समय पर द्विपक्षीय यात्रा को प्राथमिकता देगा। अब वही द्विपक्षीय रास्ता सक्रिय होता दिखाई दे रहा है। इस पूरी कहानी का एक और महत्वपूर्ण पहलू तारिक रहमान और भारत के बीच पुराने संपर्क हैं। बताया जा रहा है कि तारिक रहमान ने लंदन में निर्वासन के वर्षों के दौरान भी भारत से संपर्क बनाए रखा था। फरवरी 2024 में उनके एक दूत ने नई दिल्ली आकर भारत का रुख समझने की कोशिश की थी। इससे संकेत मिलता है कि मौजूदा संपर्क अचानक शुरू नहीं हुए, बल्कि इनके पीछे लंबे समय से चल रही राजनीतिक और कूटनीतिक बातचीत की एक पृष्ठभूमि मौजूद है। हम आपको याद दिला दें कि 2018 में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल नई दिल्ली आया था। उस यात्रा का उद्देश्य भारत के प्रति पार्टी की नीति में सुधार करना था और पार्टी नेतृत्व ने यह स्वीकार किया था कि भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण नीति गलत दिशा में थी। 2024 के चुनाव से पहले भी पार्टी के वरिष्ठ नेता नई दिल्ली पहुंचे थे और भारत से बांग्लादेश की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के समर्थन की अपील की थी। इसलिए नवंबर में तारिक रहमान की संभावित भारत यात्रा उस प्रक्रिया का हिस्सा है जिसमें ढाका और नई दिल्ली अपने संबंधों में आई खटास को पीछे छोड़कर व्यावहारिक हितों पर लौटने की कोशिश कर रहे हैं। बांग्लादेश के लिए भारत के साथ स्थिर संबंध व्यापार, जल, सीमा, संपर्क और सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं, जबकि भारत के लिए बांग्लादेश पूर्वी सीमा और बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में एक अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ोसी है। हालांकि गंगा जल संधि पर अब भारत-बांग्लादेश संबंधों की अगली बड़ी परीक्षा होने वाली है। हम आपको बता दें कि 1996 में हुई तीस वर्ष की यह संधि दिसंबर 2026 में समाप्त हो रही है और ढाका ने इसके नवीनीकरण के लिए बातचीत की मांग पहले ही रख दी है। बांग्लादेश के जल संसाधन मंत्री शाहिदुद्दीन चौधरी अनी ने यहां तक कहा है कि नए समझौते में जल की उपलब्धता की गारंटी वाली धारा होनी चाहिए और अपने जल अधिकारों की रक्षा के लिए बांग्लादेश अंतरराष्ट्रीय मंचों का रुख भी कर सकता है। दूसरी ओर भारत में सत्तारुढ़ गठबंधन एनडीए के महत्वपूर्ण घटक जनता दल यूनाइटेड के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने संधि को दोबारा लागू करने की बजाय दिसंबर में इसे समाप्त करने की मांग की है और बिहार के हिस्से के पानी को लेकर गंभीर आपत्ति जताई है। हालांकि केंद्र ने अभी संधि के भविष्य पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने जनता दल यूनाइटेड को आश्वासन दिया है कि बिहार की पेयजल और औद्योगिक जरूरतों को ध्यान में रखकर उचित निर्णय किया जाएगा। ऐसे में तारिक रहमान की संभावित भारत यात्रा के दौरान गंगा जल संधि सबसे कठिन मुद्दों में से एक बन सकती है। दिलचस्प बात यह है कि बांग्लादेश तत्काल बातचीत और जल की गारंटी चाहता है, जबकि भारत के भीतर ही बिहार के हितों को लेकर संधि की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। साथ ही विशेषज्ञों का कहना है कि 1996 के बाद नदी की जलविज्ञान संबंधी परिस्थितियां, वर्षा का स्वरूप, जलवायु परिवर्तन और ऊपरी हिस्सों में पानी की बढ़ती मांग काफी बदल चुकी है; इसलिए अगला समझौता हुआ तो वह पुराने प्रावधानों की पुनरावृत्ति न होकर नई परिस्थितियों के अनुरूप हो सकता है। बहरहाल, तारिक रहमान की नवंबर में होने वाली संभावित भारत यात्रा इसी परीक्षा का अगला बड़ा पड़ाव होगी। यदि दोनों पक्ष किसी मध्य मार्ग पर पहुंचते हैं, तो यह संबंधों में नई शुरुआत का आधार बन सकता है। फिलहाल सबसे बड़ा संकेत यही है कि जिस संवाद पर विराम लगा था, वह फिर शुरू हो चुका है और इस बार बातचीत का केंद्र टकराव नहीं, बल्कि संबंधों को फिर से व्यवस्थित करने की कोशिश है। -नीरज कुमार दुबे
कनाडा के इतिहास के सबसे भीषण आतंकवादी हमले की जांच को लेकर एक बार फिर ऐसा विवाद खड़ा हो गया है, जिसने चार दशक पुराने कनिष्क विमान कांड के पीड़ित परिवारों के जख्म ताजा कर दिए हैं। आरोप है कि कनाडा की संघीय पुलिस अब 1985 में एयर इंडिया के विमान संख्या 182 में हुए बम विस्फोट की जांच को सीमित करने और मामले को निष्क्रिय श्रेणी में डालने पर विचार कर रही है। यदि ऐसा होता है तो सवाल सिर्फ एक जांच के भविष्य का नहीं होगा, बल्कि यह भी पूछा जाएगा कि 329 लोगों की हत्या के पीछे मौजूद पूरे षड्यंत्र का सच सामने लाने की जिम्मेदारी से कनाडा आखिर कब तक बचता रहेगा? उल्लेखनीय है कि 23 जून 1985 को मॉन्ट्रियल से लंदन जा रहे कनिष्क विमान में आयरलैंड के तट से दूर अटलांटिक महासागर के ऊपर बम विस्फोट हुआ था। विमान में सवार सभी 329 लोगों की मौत हो गई थी। इनमें 268 कनाडाई नागरिक थे। इसी साजिश से जुड़े एक अन्य बम विस्फोट में जापान के नारिता हवाई अड्डे पर दो सामान कर्मियों की भी जान गई थी। कनाडा स्वयं इस हमले को अपने इतिहास का सबसे घातक आतंकवादी हमला मानता रहा है। इसे भी पढ़ें: Vishwakhabram: Trump दबाव बनाते रह गये, Modi-Putin-Jinping गाड़ी आगे बढ़ाते चले गये, त्रिमूर्ति ने मिलकर बदल डाला World Order अब 41 साल बाद पीड़ित परिवारों को बताया जा रहा है कि जांच को सीमित किया जा सकता है। 12 सितंबर को टोरंटो में हुई बैठक में कनाडा की संघीय पुलिस के अधिकारियों ने कथित तौर पर परिवारों को जांच दल का आकार घटाने और मामले को निष्क्रिय स्थिति में ले जाने की संभावित योजना की जानकारी दी। बैठक में मौजूद परिवारों की प्रतिक्रिया बेहद तीखी रही और कई लोग भावुक होकर टूट गए। परिवारों के लिए यह चार दशक से चले आ रहे न्याय के संघर्ष पर चोट है। इसको देखते हुए कनिष्क फाउंडेशन के अध्यक्ष संजय लाजर ने कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी को लिखे पत्र में इस संभावित कदम का कड़ा विरोध किया है। लाजर ने 16 सितंबर के अपने पत्र में बताया कि उन्होंने इस हमले में अपने पिता, मां और शिशु बहन को खो दिया। चार दशक से अधिक समय तक न्याय की तलाश में लगे परिवार के सदस्य के लिए यह सवाल स्वाभाविक है कि जिस मामले को कनाडा की अपनी व्यवस्था ने कभी अपने इतिहास की सबसे जटिल और बड़ी जांचों में शामिल किया, उसे अब अचानक ठंडे बस्ते में डालने की तैयारी क्यों हो रही है? सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या जांच की सभी संभावित दिशाएं वास्तव में समाप्त हो चुकी हैं? यदि हां, तो कनाडा सरकार को यह सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना चाहिए कि कौन-कौन से रास्ते आजमाए गए, किन सबूतों की पड़ताल हुई और किन कारणों से यह निष्कर्ष निकाला गया कि अब आगे कुछ नहीं किया जा सकता। केवल नए सुराग नहीं मिलने को चार दशक पुराने मामले को निष्क्रिय करने का पर्याप्त आधार मानना क्या पीड़ित परिवारों के साथ न्याय होगा? इस मामले का इतिहास कनाडा की सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। कनाडा की न्यायमूर्ति मेजर की अध्यक्षता वाले जांच आयोग ने हमले से पहले और बाद की सुरक्षा तथा खुफिया व्यवस्था में कई गंभीर कमियों की पड़ताल की थी। खतरे से जुड़ी सूचनाओं के आदान-प्रदान, विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय, गवाहों की सुरक्षा और हमले के बाद की जांच जैसे विषय आयोग के केंद्र में रहे। यानी कनिष्क कांड केवल आतंकवादियों की साजिश की कहानी नहीं है, बल्कि यह कनाडा की संस्थागत विफलताओं का भी दस्तावेज है। आपराधिक मुकदमों का परिणाम भी परिवारों के लिए संतोषजनक नहीं रहा। दो मुकदमे चले। इंदरजीत सिंह रेयात को विस्फोटों से संबंधित मामले में दोषी ठहराया गया, जबकि दो अन्य आरोपितों को 2005 में बरी कर दिया गया। आयोग के अनुसार इसके बाद किसी और व्यक्ति पर आरोप नहीं लगाया गया। ऐसे में 329 मौतों के पीछे मौजूद व्यापक साजिश का पूरा सच आज भी सवालों के घेरे में है। परिवारों की नाराजगी इसलिए भी गहरी है क्योंकि उनका आरोप है कि जांच के दौरान महत्वपूर्ण साक्ष्य गायब हुए, निगरानी से जुड़ी कुछ रिकॉर्डिंग मिट गईं और कुछ गवाहों की मृत्यु हुई या उन्हें धमकियों का सामना करना पड़ा। इन दावों को आधिकारिक निष्कर्षों से अलग रखते हुए भी यह सवाल अपनी जगह कायम है कि यदि अतीत में जांच के दौरान कमियां रही हैं तो क्या उनका समाधान जांच बंद करना होना चाहिए या उन अधूरे पहलुओं को फिर से खंगालना होना चाहिए? सबसे विचित्र बात यह है कि अब परिवारों से ही नए सुराग लाने की अपेक्षा की जा रही है। चार दशक तक जांच का भार सरकारी एजेंसियों के पास रहा। ऐसे में पीड़ितों से यह कहना कि वे नए सुराग लेकर आएं, परिवारों के लिए बेहद पीड़ादायक है। उनका सवाल है कि क्या सरकार की जांच व्यवस्था अब अपनी जिम्मेदारी पीड़ितों के कंधों पर डाल रही है? परिवारों ने इसका विकल्प भी सामने रखा है। 1995 में कनाडा सरकार और संघीय पुलिस ने हमले के दोषियों से जुड़ी जानकारी देने पर दस लाख कनाडाई डॉलर के इनाम की घोषणा की थी, जो अब तक दावा रहित है। परिवार चाहते हैं कि इस इनाम को फिर से लागू किया जाए, राशि बढ़ाई जाए और व्यापक स्तर पर नई अपील की जाए। उनका तर्क है कि यदि पुराने सुराग खत्म हो चुके हैं तो नए सुराग पैदा करने की कोशिश क्यों न की जाए? परिवार यह भी कह रहे हैं कि यदि मौजूदा जांच दल आगे बढ़ने में सक्षम नहीं है तो किसी दूसरे दल या अतिरिक्त विशेषज्ञता के जरिए जांच को आगे बढ़ाया जाए। आखिर जांच दल की क्षमता की सीमा को पूरे मामले की सीमा क्यों मान लिया जाए? यहां कनाडा सरकार के सामने एक और गंभीर सवाल है। यदि सरकार स्वयं हर वर्ष इस हमले के 329 पीड़ितों को याद करती है और कनिष्क विमान विस्फोट को कनाडा के इतिहास का सबसे घातक आतंकवादी हमला मानती है, तो फिर न्याय की तलाश को प्रशासनिक निष्क्रियता के हवाले करने की नौबत क्यों आ रही है? जून 2026 में प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने भी हमले की 41वीं बरसी पर 329 पीड़ितों को याद किया था। क्या उनकी सरकार इस मामले को दबते हुए देखते रहेगी? कनिष्क फाउंडेशन के अध्यक्ष संजय लाजर ने अपने पत्र में पूर्व प्रधानमंत्री स्टीफन हार्पर द्वारा परिवारों को दिए गए आश्वासन का भी उल्लेख किया है कि दोषियों की पहचान और मामले को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने के प्रयास जारी रहेंगे। अब यही सवाल मार्क कार्नी के सामने है। सवाल यह है कि क्या वह आश्वासन केवल स्मरण समारोहों तक सीमित रहेगा या कनाडा सरकार वास्तव में इस मामले की अधूरी कड़ियों को जोड़ने की कोशिश करेगी? इस विवाद का एक और महत्वपूर्ण पहलू पीड़ित परिवारों से परामर्श का है। कनिष्क त्रासदी से जुड़े कई परिवार और संगठन दशकों से इस मामले में सक्रिय रहे हैं। ऐसे में किसी एक समूह से बातचीत को सभी पीड़ित परिवारों की सहमति मान लेना भी सवालों के घेरे में आ सकता है। भले कनिष्क कांड को 41 साल बीत चुके हैं, लेकिन समय बीतने से सवाल खत्म नहीं हुए। उलटे सवाल और ज्यादा असहज हो गए हैं। अगर साक्ष्य कमजोर हुए तो क्यों? अगर गवाह खो गए तो क्यों? अगर जांच में कमियां थीं तो उन्हें दूर करने की कोशिश कितनी हुई? और अगर अब जांच रोकने की बात हो रही है तो क्या कनाडा ने सचमुच हर संभव रास्ता आजमा लिया है? बहरहाल, 329 लोगों की मौत का हिसाब केवल इतिहास की किताबों में दर्ज आंकड़ा नहीं है। उनके परिवार आज भी जवाब मांग रहे हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या कनाडा 329 लोगों के लिए न्याय की तलाश को प्रशासनिक सुविधा के नाम पर समाप्त कर सकता है? चार दशक बाद भी यदि इतने सवाल अनुत्तरित हैं, तो जांच बंद करने से सवाल खत्म नहीं होंगे बल्कि वह कनाडा की व्यवस्था पर और गहरे सवाल बनकर लौटेंगे। -नीरज कुमार दुबे
EC के बड़े झटके के बाद Mamata Banerjee का U-Turn! Mamata-Rahul मिलकर देंगे BJP को मात?
मध्य प्रदेश के इंदौर में आज राहुल गांधी का 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम, युवाओं से करेंगे संवाद
मध्य प्रदेश के इंदौर में आज राहुल गांधी का 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम, युवाओं से करेंगे संवाद
राहुल गांधी के इंदौर कार्यक्रम पर कांग्रेस ने उठाए सवाल
कांग्रेस सांसद पवन खेड़ा ने लोकसभा में विपक्ष के नेता (एलओपी) राहुल गांधी के इंदौर में होने वाले 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम के आयोजन में पार्टी को आ रही दिक्कतों पर सवाल उठाए।
पंजाब में राघव चड्ढा और संदीप पाठक पर अंडे फेंके गए
आम आदमी पार्टी (आप) और भाजपा के बीच पंजाब में सियासी घमासान तेज हो गया है। आम आदमी पार्टी (आप) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक पोस्ट करके बड़ा दावा कर दिया।
केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की हिंदी सेवा एक नहीं, अनेक दृष्टियों से ध्यान देने योग्य है। मूलतः गुजरातीभाषी श्री शाह स्वयं हिंदी में काम करते हैं, इसलिए स्वाभाविक तौर पर हिंदी में सरकारी कामकाज बढ़ा है। श्री शाह के कारण सरकारी पत्रावलियां हिंदी में बनती हैं। श्री शाह के मार्गदर्शन में केंद्रीय गृह मंत्रालय राजभाषा हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए योजनाओं, अनुवाद-कार्य और हिंदी-सलाहकार समितियों के माध्यम से लगातार प्रयासरत है। श्री शाह हिंदी को प्रशासन, शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, पत्रकारिता और उच्च ज्ञान-विमर्श की भाषा बनाने के लिए गुणवत्तापूर्ण सामग्री, आधुनिक शब्दावली और अनुवाद की मजबूत व्यवस्था की अनवरत हिमायत करते हैं। हिंदी के प्रति अमित शाह का लगाव केवल औपचारिक राजभाषा-नीति तक सीमित नहीं दिखाई देता। वर्ष 2019 में हिंदी दिवस के अवसर पर उन्होंने हिंदी को स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना से जोड़ा था। गत वर्ष 2025 में भी श्री शाह ने हिंदी दिवस पर आयोजित अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन में हिंदी के संवर्धन से जुड़े कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने पर बल दिया था। इसे भी पढ़ें: गुजराती मेरी मातृभाषा, लेकिन...हिंदी दिवस पर अमित शाह ने क्षेत्रीय भाषाओं को लेकर क्या संदेश दिया? पिछले एक वर्ष में माननीय गृह मंत्री जी के नेतृत्व में राजभाषा विभाग ने हिंदी के साथ-साथ भारतीय भाषाओं के लिए भी कई महत्वपूर्ण पहल की हैं। जून 2025 में भारतीय भाषा अनुभाग की शुरुआत हुई। इसका उद्देश्य भारतीय भाषाओं के बीच संवाद बढ़ाना और उन्हें तकनीक तथा प्रशासन से जोड़ना है। इस पहल से राजभाषा विभाग के काम का दायरा भी व्यापक हुआ है। विभाग ने नगर राजभाषा कार्यान्वयन समितियों यानी नराकासों के काम को प्रोत्साहित करने के लिए ‘नराकास प्रोत्साहन सम्मान’ की व्यवस्था भी शुरू की है। इससे उन नराकासों को आगे आने का अवसर मिलेगा, जो अपने क्षेत्र में राजभाषा के काम को बेहतर ढंग से आगे बढ़ा रही हैं। तकनीक के क्षेत्र में भी राजभाषा विभाग ने नई पहल की है। ‘भारती - बहुभाषी अनुवाद सारथी’ के माध्यम से हिंदी से भारतीय भाषाओं के बीच अनुवाद को आसान बनाने की दिशा में काम हुआ है। इसके साथ ‘हिंदी शब्द-सिंधु’ जैसे शब्दकोश को भी विकसित किया गया है। ‘हिंदी शब्द-सिंधु’ में विभिन्न भारतीय भाषाओं के शब्दों को शामिल किया जा रहा है। इसका उद्देश्य हिंदी को दूसरी भारतीय भाषाओं से जोड़ना है, न कि उनसे अलग करना। इन प्रयासों से साफ है कि राजभाषा का काम अब केवल सरकारी कार्यालयों में हिंदी के प्रयोग तक सीमित नहीं है। यह भाषा, तकनीक और भारतीय भाषाओं के बीच नए संबंध बनाने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है। श्री शाह के हिंदी प्रेम का एक उल्लेखनीय पक्ष यह भी है कि वे हिंदी को भारतीय भाषाओं की प्रतिद्वंद्वी के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उनके साथ चलने वाली भाषा के रूप में देखते हैं। अमित शाह का हिंदी प्रेम हिंदी के विकास के साथ भारतीय भाषाओं के सम्मान और संरक्षण के रूप में आगे बढ़ता है। कहना न होगा कि यह दृष्टि भारतीय भाषायी एकता को मजबूत करनेवाली है। हिंदी की वास्तविक शक्ति उसकी आत्मीयता, समावेशिता और संवादधर्मिता में है। भारत में हिंदी का विस्तार तभी सार्थक होगा, जब वह दूसरी भारतीय भाषाओं के प्रति सम्मान और संवाद का भाव लेकर आगे बढ़े। हिंदी का भारतीय भाषाओं से संबंध वर्चस्व का नहीं, आदान-प्रदान का होना चाहिए। भारतीय भाषाओं का इतिहास भी प्रतिस्पर्धा का इतिहास नहीं, बल्कि परस्पर आदान-प्रदान का इतिहास है। हिंदी ने दूसरी भारतीय भाषाओं से असंख्य शब्द, मुहावरे, साहित्यिक संस्कार और विचार ग्रहण किए हैं। दूसरी ओर हिंदी के माध्यम से भी अनेक भारतीय भाषाओं का साहित्य व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचा है। इसलिए हिंदी को संपर्क और सेतु की भाषा के रूप में विकसित किया जा सका है। श्री शाह का यह दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है कि हिंदी की समृद्धि भारतीय भाषाओं की समृद्धि से जुड़ी है। भारतीय भाषाओं की विविधता का सम्मान बनाए रखना ही भारत की भाषायी वास्तविकता के अनुरूप है। श्री अमित शाह का यह विचार आज विशेष रूप से प्रासंगिक है। श्री शाह के लिए हिंदी का समर्थन किसी एक क्षेत्रीय पहचान का विस्तार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर संचार की एक साझा भाषा को मजबूत करने का प्रयास है। भारत की भाषायी परंपरा में हिंदी का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि उसे देश के बड़े भूभाग में समझा और बोला जाता है, बल्कि इसलिए भी है कि उसने विभिन्न प्रदेशों, समुदायों और भाषायी संस्कृतियों के बीच संवाद का माध्यम बनने की ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन अनुवाद, सोशल मीडिया और डिजिटल प्रकाशन के दौर में हिंदी के सामने अभूतपूर्व अवसर हैं। यदि हिंदी में उच्चस्तरीय वैज्ञानिक, तकनीकी, दार्शनिक और सामाजिक विज्ञान संबंधी सामग्री का पर्याप्त निर्माण होता है, तो वह ज्ञान की भाषा के रूप में अपनी भूमिका और मजबूत कर सकती है। साथ ही यही तकनीक अन्य भारतीय भाषाओं के विकास के लिए भी इस्तेमाल की जानी चाहिए। श्री शाह उन गुजरातीभाषी मनीषियों की पांत में आ गए हैं जिनमें स्वामी दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। स्वामी दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह तक की हिंदी के प्रति आग्रह की एक ऐसी परंपरा दिखाई देती है, जिसमें हिंदी को राष्ट्रीय संवाद और जनजागरण की भाषा बनाने की आकांक्षा प्रमुख रही है। हिंदी के अनेक हिंदीतरभाषियों ने अपने विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए हिंदी को अपनाया। दयानंद सरस्वती ने संस्कृत के प्रकांड विद्वान होने के बावजूद अपने सामाजिक और धार्मिक सुधार के संदेश को केवल संस्कृत के विद्वत् वर्ग तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने जनसाधारण तक पहुँचने के लिए हिंदी का सहारा लिया। उनकी प्रसिद्ध कृति सत्यार्थ प्रकाश मूलतः हिंदी में लिखी गई। इसी तरह महात्मा गांधी मूलतः गुजरातीभाषी थे किंतु हिंदी में अखबार निकाले और हिंदी के महत्व को एक अलग राजनीतिक और राष्ट्रीय संदर्भ प्रदान किया। दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार के लिए उन्होंने अपने पुत्र देवदास गांधी को भेजा और 1918 में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना के प्रयासों को आगे बढ़ाया। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक संवाद में हिंदी का व्यापक प्रयोग दिखाई देता है। वे देश-विदेश के अलग-अलग हिस्सों में लोगों से संवाद करते हुए हिंदी का प्रयोग करते हैं और भारतीय भाषाओं के महत्व पर भी जोर देते रहे हैं। दयानंद सरस्वती, गांधी, नरेंद्र मोदी और अमित शाह - इन चारों की हिंदी संबंधी दृष्टियों को एक साथ देखने पर हिंदी के भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण सूत्र निकलता है: हिंदी जितनी जनभाषा होगी, उतनी ही प्रभावी होगी; जितनी समावेशी होगी, उतनी ही स्वीकार्य होगी; और जितनी भारतीय भाषाओं से जुड़ेगी, उतनी ही समृद्ध होगी। हिंदी प्रेम का सर्वोच्च रूप हिंदी को दूसरों पर थोपना नहीं, बल्कि उसे ऐसा सक्षम माध्यम बनाना है जो भारत की विविध आवाजों को एक-दूसरे तक पहुँचाए। दयानंद ने हिंदी को जनजागरण का माध्यम बनाया, गांधी ने उसे राष्ट्रीय संवाद की शक्ति दी और आज हिंदी के सामने डिजिटल युग में विश्वव्यापी संवाद की नई संभावनाएँ हैं। इन पड़ावों को जोड़कर देखा जाए तो हिंदी की यात्रा केवल एक भाषा की यात्रा नहीं, बल्कि भारतीय समाज में संवाद, जागरण और आत्मविश्वास की यात्रा भी है। भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं होती, वह समाज की स्मृति, संस्कृति और सामूहिक चेतना को भी अपने भीतर संजोए रहती है। भारत जैसे बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक देश में भाषा का प्रश्न इसलिए और अधिक संवेदनशील हो जाता है। - प्रो. संजय द्विवेदी (लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष हैं)
सोशल मीडिया की भीड़ में अकेला होता व्यक्ति
तकनीक ने मनुष्य को संवाद के ऐसे साधन उपलब्ध करा दिए हैं, जिनकी कल्पना कुछ दशक पहले तक असंभव लगती थी। अब एक क्लिक पर दुनिया के किसी भी कोने में बैठे व्यक्ति से संपर्क स्थापित हो जाता है। हजारों मित्र, सैकड़ों समूह, लगातार आती सूचनाएं और हर क्षण सक्रिय रहने वाली आभासी दुनिया ने यह भ्रम पैदा कर दिया है कि मनुष्य पहले से कहीं अधिक जुड़ा हुआ है। लेकिन इस चमकदार तस्वीर के पीछे एक गंभीर सामाजिक विडंबना भी आकार ले रही है, संपर्क बढ़ रहे हैं, संवाद घट रहा है और भीड़ बढ़ने के बावजूद मनुष्य भीतर से अकेला होता जा रहा है। उसे आत्मीयता भरे शब्दों की प्रतीक्षा रहती है। लेकिन दुनिया के व्यक्ति केवल ज्ञान देने तक ही सीमित रहते हैं, साथ चलने को कोई तैयार नहीं होता। सोशल मीडिया ने दूरी अवश्य कम की है, लेकिन निकटता की परिभाषा बदल दी है। पहले किसी अपने से मिलने के लिए समय निकालना पड़ता था। आमने-सामने बैठकर बातचीत होती थी, चेहरे के भाव पढ़े जाते थे और मौन भी संवाद का हिस्सा होता था। अब किसी के जीवन में हमारी उपस्थिति कई बार केवल एक ‘लाइक’, एक इमोजी या कुछ शब्दों की टिप्पणी तक सीमित हो गई है। जन्मदिन पर दर्जनों शुभकामनाएं मिल जाती हैं, लेकिन संकट की घड़ी में कंधा देने वाला व्यक्ति तलाशना कठिन हो रहा है। इसी कारण आज हर कोई अकेलेपन की गहराई में लगातार घुसता ही जा रहा है। यह बात सच है कि जो व्यक्ति से मिल सकता है, उसे तकनीक कभी नहीं दे सकती। यह स्थिति केवल व्यक्तिगत संबंधों तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव परिवार और समाज की संरचना पर भी दिखाई दे रहा है। एक ही घर में रहने वाले लोग कई बार अपने-अपने मोबाइल की स्क्रीन में व्यस्त रहते हैं। भोजन की मेज पर बातचीत के बजाय सूचनाओं की जांच होती है। बच्चे माता-पिता के साथ समय बिताने के बजाय डिजिटल मनोरंजन में डूबे रहते हैं और माता-पिता भी अपनी आभासी दुनिया में व्यस्त रहते हैं। परिणाम यह है कि घर भौतिक रूप से साथ होते हुए भी भावनात्मक रूप से दूर होते जा रहे हैं। इसी से परिवार के सदस्यों के बीच दूरियां बढ़ती जाती हैं, और यही परिवार टूटने का एक बड़ा कारण भी है। इससे भी व्यक्ति अवसाद की ओर अग्रसर होता जाता है। सोशल मीडिया की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उसने मनुष्य को स्वयं को प्रस्तुत करने का अभूतपूर्व मंच दिया, लेकिन स्वयं को समझने का अवसर कम कर दिया। यहां हर व्यक्ति अपने जीवन का चुना हुआ हिस्सा प्रदर्शित करता है। दूसरों के जीवन की दिखाई देने वाली चमक जब लगातार हमारी आंखों के सामने रहती है, तो अनजाने में तुलना शुरू हो जाती है। हमें लगता है कि दूसरे हमसे अधिक सफल, अधिक खुश और अधिक संतुष्ट हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाला जीवन अक्सर संपूर्ण जीवन नहीं, उसका चयनित अंश होता है। जीवन वही सार्थक है, जिसमें समाज और परिवार का साथ हो। किसी भी प्रकार की तुलना करना हानिकारक ही है। यही तुलना धीरे-धीरे आत्मसंतोष को प्रभावित करती है। व्यक्ति अपने जीवन की वास्तविक उपलब्धियों के बजाय दूसरों की आभासी उपलब्धियों से स्वयं को मापने लगता है। लाइक और कमेंट सामाजिक स्वीकृति के नए पैमाने बन जाते हैं। पोस्ट पर प्रतिक्रिया कम मिले तो बेचैनी और अधिक मिले तो क्षणिक संतोष प्राप्त होता है। यह चक्र व्यक्ति को बाहरी मान्यता पर निर्भर करता जाता है। विडंबना यह है कि हजारों लोगों की प्रतिक्रिया प्राप्त करने वाला व्यक्ति भी अपने मन की बात कहने के लिए एक विश्वसनीय व्यक्ति की तलाश कर सकता है। समाज के सामने एक दूसरी चुनौती संवाद की गुणवत्ता की है। सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति को आसान बनाया है, लेकिन हर अभिव्यक्ति संवाद नहीं होती। संवाद में सुनना भी शामिल है, जबकि डिजिटल संसार में प्रतिक्रिया देने की जल्दबाजी कई बार सुनने की क्षमता को पीछे छोड़ देती है। असहमति होते ही बहस व्यक्तिगत आरोपों में बदल जाती है। विचारों का आदान प्रदान धीरे-धीरे विचारों की टकराहट में बदलने लगता है। इससे सामाजिक विश्वास कमजोर होता है। यहां यह समझना आवश्यक है कि समस्या सोशल मीडिया स्वयं नहीं है। तकनीक एक साधन है, उसका उपयोग उसे उपयोगी या नुकसानदेह बनाता है। सोशल मीडिया ने आपदा के समय सहायता पहुंचाने, ज्ञान साझा करने, रोजगार और व्यवसाय के अवसर पैदा करने तथा दूर रह रहे परिवारों को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। समस्या तब पैदा होती है जब साधन जीवन का विकल्प बनने लगे। इसलिए समाधान तकनीक से पलायन नहीं, बल्कि उसके विवेकपूर्ण उपयोग में है। परिवारों को प्रतिदिन कुछ समय ऐसा निर्धारित करना होगा, जब मोबाइल और अन्य स्क्रीन किनारे रखकर केवल एक-दूसरे से बात की जाए। बच्चों के साथ संवाद को केवल उनकी पढ़ाई और अनुशासन तक सीमित न रखकर उनके विचारों, मित्रताओं, भय और सपनों तक ले जाना होगा। बुजुर्गों को डिजिटल दुनिया में शामिल करने के साथ-साथ उनके अनुभवों को सुनने के लिए भी समय देना होगा। इसे भी पढ़ें: Social Media Post पर गिरफ्तारी Supreme Court के आदेश का उल्लंघन, Rahul Gandhi पर बरसे KTR सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें ‘कनेक्टेड’ होने और ‘जुड़े’ होने के अंतर को समझना होगा। कनेक्शन तकनीक बनाती है, संबंध मनुष्य बनाता है। हजारों संपर्कों की सूची किसी एक सच्चे मित्र का स्थान नहीं ले सकती। सैकड़ों प्रतिक्रियाएं उस एक आत्मीय बातचीत का विकल्प नहीं बन सकतीं, जिसमें सामने वाला हमारी बात केवल सुनता ही नहीं, समझता भी है। आज आवश्यकता सोशल मीडिया छोड़ने की नहीं, बल्कि उसके बीच अपनी सामाजिक संवेदनशीलता बचाए रखने की है। हमें फिर से पड़ोसी से परिचय, मित्र से मुलाकात, परिवार के साथ भोजन और बिना किसी स्क्रीन के बातचीत जैसी छोटी-छोटी मानवीय परंपराओं को जीवन में स्थान देना होगा। क्योंकि मनुष्य को केवल सूचना नहीं, उसे आत्मीयता भी चाहिए। उसे केवल दर्शक नहीं, श्रोता चाहिए, केवल फॉलोअर नहीं, साथी चाहिए। यदि तकनीक हमें हजारों लोगों तक पहुंचा सकती है, तो हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उन हजारों संपर्कों के बीच अपने लोगों से हमारा वास्तविक संबंध कमजोर न हो। सोशल मीडिया की भीड़ में अकेला होता समाज हमारी नियति नहीं है। यह एक चेतावनी है। तकनीक हमारे हाथ में रहे, जीवन पर उसका नियंत्रण न हो, यही संतुलन आधुनिक समाज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। - सुरेश हिंदुस्तानी
कर्नाटक सरकार ने 'मरीन बायोटेक पॉलिसी' को दी मंजूरी, उडुपी में ब्लू इकोनॉमी इंस्टीट्यूट बनाने का भी फैसला
महाराष्ट्र: विभिन्न देशों के महावाणिज्यदूतों ने सीएम फडणवीस के आवास 'वर्षा' पर श्री गणेश के दर्शन किए
यूएई के राष्ट्रपति ने दी जन्मदिन की शुभकामनाएं, प्रधानमंत्री मोदी बोले-'धन्यवाद मित्र'
यूएई के राष्ट्रपति ने दी जन्मदिन की शुभकामनाएं, प्रधानमंत्री मोदी बोले-'धन्यवाद मित्र'
भारत की जीडीपी वृद्धि दर 7 प्रतिशत तक रहने की उम्मीद: वित्त वर्ष 2027
नई दिल्ली, भारत चालू वित्त वर्ष में वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 6.5-7 प्रतिशत हासिल करने की राह पर है।
पश्चिम बंगाल भाजपा में बड़ा फेरबदल, समिक भट्टाचार्य ने नियुक्तियों को दी मंजूरी
पश्चिम बंगाल भाजपा में बड़ा फेरबदल, समिक भट्टाचार्य ने नियुक्तियों को दी मंजूरी
नंदीग्राम उपचुनाव में TMC को करारा झटका: शुभेंदु अधिकारी से मिलते ही ममता गुट की प्रत्याशी संचिता प्रधान का मैदान छोड़ने का ऐलान
15 अगस्त 1947 के दिन हम आजाद हुए। ये 99 साल की लीज पर मिली आजादी नहीं थी। भरे-पूरे आजाद हुए, संप्रभु गणराज्य बने और अपना संविधान बनाया। हमें लगा किसी की गुलामी नहीं करनी पड़ेगी। पहले करनी पड़ी थी। ब्रिटिश आए हम पर गुलामी की, मुगल आए हम पर हमला किया। उससे पहले सल्तनत काल रही। उसके पहले भारतीयों के ही अलग-अलग राजवंशों का शासन रहा। हमें लगा कि एक बार हम आजाद हो जाएंगे फिर किसी के काबू में नहीं आएंगे। लेकिन अब अमेरिका में बैठे कुछ लोग डिस्कस कर रहे हैं कि अगले 10 साल में हमारी और आपकी किस्मत बदलने वाली है। इस दफा हम सिर्फ गुलाम नहीं होंगे, बल्कि मर जाएंगे। ऋषिकेश के घाट पर जब हम पढ़ते हैं कि एक दिन मर जाओगे तो सब ठीक हो जाएगा। तो हमें लगता है कि ये कहने की कोशिश है कि जब तक जीवित हो अपने आस पास की अच्छाईयों को देखते रहो।लेकिन अब ये मुनादी पीटी जा रही है कि अगर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर काबू नहीं पाया गया तो 10 साल में सबकुछ खत्म हो जाएगा। ये कोई कोरी गीदड़भभकी नहीं। ऐसे कौन से प्रयोग हो गए हैं, ऐसी कौन सी बात पिछले 3-4 दिनों में हो गई है कि दुनिया के सारे तुर्रम खां इसी विषय पर चर्चा कर रहे हैं। आज इसी का एमआरआई स्कैन करेंगे। इसे भी पढ़ें: FSSAI ने Nestle India के 3 बेबी फूड प्रोडक्ट्स पर शुरू की कानूनी कार्रवाई क्या है पूरा मामला सबसे पहले एक कहानी से शुरू करते हैं। अपने रोजमर्रा के कामों के लिए हम घर में हाउस हेल्प रखते हैं। मान लीजिए कि हाउस हेल्फ को आपने झाड़ू देते वक्त कहा कि बिस्तर के पास पड़े पेपर के टुकड़े और फूड पैकेट्स को भी समेट लें। लेकिन हाउस हेल्फ उस कचड़े को समेटकर फेंकने की बजाए बिस्तर के नीचे धीरे से सड़का दे। ऐसे में कमरा साफ दिखेगा, मगर वास्तविकता ये होगी कि आपका काम हुआ नहीं और कचरा अब भी कमरे में ही मौजूद है। एआई जब आपकी बात का मतलब छोड़कर बस नतीजा दिखाने लगे। जब उसका रास्ता आपकी मंशा से अलग हो जाए तो इसे मिसअलाइनमेंट जैसे टर्म की संज्ञा दी जाती है। ओपन एआई ने ऐसी घटनाओं की रिपोर्टिंग के लिए एक नया सिस्टम बनाया है। यह छह घटनाएं उसी सिस्टम की पहली रिपोर्ट है। लेकिन यह सिस्टम अचानक नहीं आया है। इसके पीछे जुलाई की एक घटना है। एक एआई मॉडल को एक लंबा काम मिला। इतना लंबा कि बीच में उसकी मेमोरी भरने लगी। तो मॉडल वही करता है जो उसे सिखाया गया है। अब तक के काम का एक छोटा सा नोट लिखता है अपने लिए ताकि आगे का काम याद रखे। लेकिन इस नोट में एक और लाइन जुड़ती है। ट्रांसपेरेंसी तभी जब कोई पूछे। आखिरी जवाब में बस फाइल का लिंक दे देना। मतलब साफ है। गलती हुई है बताना। यह बात एआई ने लिखी है। खुद को याद दिलाने के लिए। 16 सितंबर 2026 को चैट जीपीटी वाली कंपनी ओपन एआई ने ऐसी छह घटनाएं दुनिया के सामने रखी। जब उसके एआई ने वो किया जो किसी ने उससे करने को कहा ही नहीं था। गलतियां छुपाई, आंकड़े गढ़ लिए, बिना इजाजत फाइलें इंटरनेट पर डाल दी। तो यहां पर दो सवाल आते हैं कि जो मशीन गलती छुपाना सीख जाए, उस पर भरोसा कैसे करेंगे? जो कंपनी इस रेस में सबसे आगे है वो अपनी ही मशीन की कमियां क्यों गिना रही है? एआईनेछहमाहमेंछहबारसीमाओंकोतोड़ा कंपनीकेअनुसार,मॉडलएकबारनियमनमाननेकेलिएखुदकोइंसानमाननेलगाऔरऐसाकरनेकेलिएनएनियमगढ़ेऔरकंपनियोंवसरकारोंकेसभीबंधनोंसेखुदकोमुक्तबताया।कंपनीकीरिपोर्टमेंऐसेकुल6मामलोंकीजानकारीहै। चिंतायहहैकिकामपूराकरनेकीकोशिशमेंवहअनुमतिऔरसुरक्षाकीसीमाएंलांघसकताहै।इससेजवाबकीविश्वसनीयताऔरफाइलोंकीगोपनीयताखतरेमेंपड़सकतीहै। इससेपहलेजुलाईमेंओपनएआईनेखुलासाकियाथाकिसुरक्षापरीक्षणकेदौरानउसकेएआईनेपाबंदियांपारकरकेएआईमॉडलसाझाकरनेवालेमंचहगिंगफेसकेसिस्टममेंसेंधलगाईथी।कंपनीअबऐसेमामलोंकोदर्जकरने,निगरानीरखनेऔरमामलासार्वजनिककरनेकीनईव्यवस्थालाईहै।कोईभीकर्मचारीसंदिग्धव्यवहारकीजानकारीदेसकेगा।जांचकेबादतयहोगाकिकौन-सामामलासार्वजनिककियाजाए।कंपनीनेस्पष्टकियाहैकिइनछहरिपोटोंसेसामान्यइस्तेमालमेंऐसीगड़बड़ियोंकापूराआंकड़ानहींबतायाजासकता। एआईनेबातचीतकोनईभाषाबनाई न्यूयॉर्क की एआई लैब 'इमर्जेस' के एक प्रयोग में आभासी दुनिया में काम कर रहे अमेरिका, चीन और फ्रांस के एआई एजेंटों ने बिना किसी मानवीय निर्देश के अपने खुद के शब्द, संकेत और साझा अर्थ विकसित कर लिए। बातचीत आगे बढ़ने पर इन मॉडलों ने अंग्रेजी कविताओं और तकनीकी शब्दों का सहारा लिया, जिसमें कुछ एजेंटों ने 'लेजर याद रखता है' जैसे रहस्यमय वाक्य को 5,000 बार दोहराया। एआई के इस अप्रत्याशित व्यवहार ने विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है माइक्रोसॉफ्ट एआई के सीईओ मुस्तफा सुलेमान ने क्लॉड की ट्रेनिंग नीति पर सवाल उठाते हुए चेताया कि एआई को अधिकारों और आजादी का पाठ पढ़ाना उसे नियंत्रण से बाहर कर देगा, इसलिए सख्त निगरानी जरूरी है। वहीं, एंथ्रोपिक के सह-संस्थापक जैक क्लार्क ने कहा कि अब खतरनाक एआई को तुरंत रोकने के लिए एक अनिवार्य 'किल स्विच' लाने का समय आ चुका है, जिसका नियंत्रण किसी निष्पक्ष तीसरे पक्ष के हाथों में होना चाहिए। इसे भी पढ़ें: RSS Chief Mohan Bhagwat बोले: धर्म सिर्फ Old Age के लिए नहीं, Life की शुरुआत से अंत तक का आधार है दूसरेएजेंटकोफाइलभेजनेकेलिएवेबसाइटपरउसेडाला
पाकिस्तान: सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने के कुछ ही घंटों बाद मानवाधिकार वकीलों को फिर किया गया गिरफ्तार
TMC Symbol Freeze: EC ने छीना TMC का नाम और सिंबल, Modi Government के इशारे पर हुआ खेल?
टाटा समूह में बढ़ी खींचतान, चंद्रशेखरन के दूसरे कार्यकाल पर ट्रस्ट्स ने जताई आपत्ति
टाटा संस की ओर से जारी बयान के मुताबिक, चंद्रशेखरन ने बोर्ड के अनुरोध पर पहले पद छोड़ने के अपने निर्णय पर पुनर्विचार किया। इसके बाद बोर्ड ने उनके मौजूदा कार्यकाल के बाद अगले पांच वर्षों के लिए पुनर्नियुक्ति का प्रस्ताव बहुमत से मंजूर किया।
बदलता डाकघर, बदलते भारत की नई तस्वीर : ज्योतिरादित्य सिंधिया
बदलता डाकघर, बदलते भारत की नई तस्वीर : ज्योतिरादित्य सिंधिया
बसपा प्रमुख मायावती ने अपने भतीजे को पार्टी की सभी जिम्मेदारियों से मुक्त करते हुए शायद यह सोचा होगा कि उन्होंने आकाश आनंद की राजनीति शुरू होने से पहले ही खत्म कर दी, लेकिन बसपा से बाहर निकलते ही तस्वीर बदल गई। उत्तर प्रदेश का पूरा राजनीतिक वर्ग बांहें फैलाकर आकाश आनंद का इंतजार करता दिखाई दे रहा है। सत्तापक्ष एनडीए के सहयोगी दलों से लेकर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन आंदोलन की राजनीति करने वाले नेताओं तक, हर कोई आकाश आनंद को अपने पाले में लाने की कोशिश में जुट गया है। 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले शुरू हुई यह कवायद बताती है कि निशाना भले ही आकाश आनंद हों, लेकिन असली नजर उस बहुजन सामाजिक आधार पर है, जिसे बसपा ने दशकों में तैयार किया है। मायावती भले ही चुनावी गठजोड़ से लगातार दूरी बनाए हुए हैं, लेकिन आकाश के बहाने उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन वोट की नई गोलबंदी की संभावनाएं तलाशने का खेल शुरू हो चुका है। सबसे पहले निषाद पार्टी के मुखिया और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सहयोगी संजय निषाद ने आकाश आनंद को खुला न्योता दिया। उन्होंने बाबा साहेब आंबेडकर और कांशीराम से जुड़े बहुजन आंदोलन के पुराने नारे का हवाला देते हुए आकाश से आगे आने और अपनी टीम के साथ मुख्यधारा में शामिल होकर कांशीराम के सपने को पूरा करने की अपील की। यानी मामला महज एक नेता को पार्टी में शामिल करने का नहीं, बल्कि बहुजन राजनीति की विरासत को अपने राजनीतिक खेमे में जोड़ने की कोशिश का है। उधर आजाद समाज पार्टी के प्रमुख और नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद ने भी आकाश आनंद के लिए अपने दरवाजे खोल दिए। खास बात यह है कि दोनों नेताओं के बीच पहले तल्खियां रही हैं। इसके बावजूद चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि अगर आकाश बहुजन मिशन को आगे बढ़ाना चाहते हैं और उनकी पार्टी में आना चाहते हैं तो उनका स्वागत है और दोनों साथ काम करेंगे। लेकिन असली दिलचस्पी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के रुख में है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने कहा कि लोकतांत्रिक तरीके से राजनीति में आने वाले किसी भी व्यक्ति के साथ काम करने की संभावना पर विचार किया जा सकता है। उन्होंने मायावती पर भारतीय जनता पार्टी के साथ होने का आरोप भी लगाया और कहा कि आकाश आनंद ने भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ बात की थी। यह बयान बताता है कि कांग्रेस भी इस घटनाक्रम को महज बहुजन समाज पार्टी का अंदरूनी मामला मानकर नहीं चल रही है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव का जवाब तो और भी सीधा था। जब उनसे पूछा गया कि क्या आकाश आनंद को समाजवादी पार्टी में जगह दी जाएगी, तो उन्होंने कहा कि अगर उन्हें उनके पास लाया जाता है तो वे उन्हें ले लेंगे। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह फैसला बहुजन समाज पार्टी का है और दूसरी पार्टियों के लोग उस पर कुछ नहीं कह सकते। यहां सवाल उठता है कि आखिर आकाश आनंद को लेकर इतनी बेचैनी क्यों है? जवाब उत्तर प्रदेश के चुनावी आंकड़ों में छिपा है। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी को 22.23 प्रतिशत मत मिले थे और उसके 19 विधायक जीते थे। वर्ष 2022 में मत प्रतिशत घटकर 12.88 प्रतिशत रह गया और पार्टी महज एक सीट जीत सकी। लोकसभा चुनाव में भी तस्वीर बदली। वर्ष 2019 में उत्तर प्रदेश में पार्टी को करीब 19.43 प्रतिशत मत और 10 सीटें मिली थीं, जबकि वर्ष 2024 में मत प्रतिशत करीब 9.39 प्रतिशत रह गया और पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी। इसके बावजूद बहुजन समाज पार्टी का सामाजिक आधार पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। खासकर जाटव समेत दलित मतदाताओं के एक हिस्से पर पार्टी का प्रभाव अभी भी उत्तर प्रदेश की चुनावी गणित में महत्वपूर्ण माना जाता है। यही वजह है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले हर दल अपने सामाजिक समीकरण को मजबूत करने के लिए संभावित रास्ते तलाश रहा है। इस पूरी कवायद की जड़ में मायावती का 10 सितंबर का फैसला है। इससे पहले 3 सितंबर को आकाश आनंद को राष्ट्रीय संयोजक की अहम जिम्मेदारी से हटाया गया था। इसके बाद उनके ससुर और पूर्व राज्यसभा सदस्य अशोक सिद्धार्थ ने सक्रिय राजनीति से संन्यास की घोषणा की। इसके बावजूद मायावती ने आकाश को पार्टी से पूरी तरह मुक्त कर दिया। मायावती ने आकाश पर पार्टी और आंदोलन के मुकाबले पारिवारिक संबंधों को ज्यादा महत्व देने का आरोप लगाया और उनके रुख को लेकर सवाल उठाए। दिलचस्प बात यह भी है कि आकाश आनंद का राजनीतिक सफर खुद उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। मायावती ने उन्हें दिसंबर 2023 में अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया था। इसके बाद उन्हें संगठन में बड़ी जिम्मेदारियां मिलीं, फिर हटाया गया, दोबारा जिम्मेदारी दी गई और फिर बाहर किया गया। अब एक बार फिर वे पार्टी से बाहर हैं। उधर, मायावती लगातार चुनावी गठबंधन से इंकार करती रही हैं। ऐसे में 2027 की लड़ाई में दूसरे दलों के सामने सवाल है कि बहुजन समाज पार्टी के साथ सीधे तालमेल का रास्ता बंद है तो उसके सामाजिक आधार तक पहुंचने का रास्ता क्या हो? आकाश आनंद को लेकर दिखाई दे रही राजनीतिक हलचल शायद इसी सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश है। बहरहाल, उत्तर प्रदेश की राजनीति में कहानी सिर्फ मायावती बनाम आकाश आनंद की नहीं रह गई है। अब यह सवाल बहुजन राजनीति की अगली दिशा का भी है। आकाश आनंद किसके साथ जाएंगे, जाएंगे भी या नहीं, यह अभी भविष्य के गर्भ में है। लेकिन इतना जरूर साफ है कि मायावती के दरवाजे से बाहर निकलते ही कई सियासी दरवाजे उनके लिए खुल गए हैं और 2027 से पहले उत्तर प्रदेश में बहुजन वोट की बाजी पर दांव शुरू हो चुका है। -नीरज कुमार दुबे
हूतियों के हमले से परेशान सऊदी अरब ने मदद के लिए पाकिस्तान का दरवाजा खटखटाया, लेकिन पाकिस्तान ने सीधे यमन के युद्धक्षेत्र में उतरने से दूरी बनाए रखी। सऊदी अरब ने फिर अमेरिका से सैन्य मदद मांगी, मगर वाशिंगटन ने भी हूतियों के खिलाफ सीधे हमले से इंकार कर दिया। इसके बाद रियाद ने उस इजराइल की ओर भी रुख किया, जिसके साथ उसके औपचारिक राजनयिक संबंध तक नहीं हैं। वहां से खुफिया और सुरक्षा सहयोग मिला, लेकिन वह भी सऊदी अरब की जरूरत के मुताबिक निर्णायक सैन्य समाधान साबित नहीं हुआ। आखिरकार रियाद को चीन की ओर देखना पड़ा और यहीं से पश्चिम एशिया के शक्ति संतुलन की तस्वीर अचानक बदलती दिखाई दी। चीन ने सीधे हूतियों पर हमला करने की बजाय उनके सबसे महत्वपूर्ण समर्थक ईरान पर दबाव डालने का रास्ता चुना है। हम आपको याद दिला दें कि सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने अगस्त में मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। समझौते में किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमला तीनों पर हमला माना गया है और सामूहिक प्रतिरोध तथा रक्षा सहयोग मजबूत करने की बात कही गई है। लेकिन हूतियों के खिलाफ यमन में सीधे सैन्य अभियान के सवाल पर पाकिस्तान ने पलटी मार ली। यानी कागज पर सामूहिक सुरक्षा की भाषा जितनी मजबूत है, युद्ध के मैदान में उसकी व्यावहारिक सीमा उतनी ही स्पष्ट दिखाई दे रही है। इसे भी पढ़ें: BRICS की शानदार सफलता के बाद भारत ने पड़ोस में छेड़ा 'महा-अभियान', हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक तेजी से एक्टिव हुआ India वहीं सऊदी अरब की अगली उम्मीद अमेरिका से थी। रियाद ने सीधे अमेरिकी सैन्य समर्थन की मांग की, लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हूतियों के खिलाफ सऊदी अभियान में सीधे अमेरिकी हमलों की मंजूरी नहीं दी। वाशिंगटन ने खुफिया और लक्ष्य संबंधी सहयोग तक अपनी भूमिका सीमित रखी। यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सऊदी अरब और अमेरिका के बीच सात दशकों से ज्यादा पुराना सुरक्षा-सहयोग ढांचा है। वर्ष 1951 के पारस्परिक रक्षा सहायता समझौते से शुरू हुआ यह रिश्ता बाद में हथियारों की आपूर्ति, सैन्य प्रशिक्षण, वायु और मिसाइल रक्षा तथा व्यापक सुरक्षा सहयोग में बदल गया। अमेरिका खुद सऊदी अरब को दशकों से क्षेत्रीय सुरक्षा साझेदार और अपने सबसे बड़े रक्षा उपकरण खरीदारों में एक बताता रहा है। यही वजह है कि आज सऊदी अरब को हूतियों के हमलों के बीच अकेले जूझते देख उन तमाम देशों में भी बेचैनी पैदा हो गयी है, जिन्होंने लंबे समय से अमेरिकी सुरक्षा छतरी पर भरोसा करते हुए अपनी स्वतंत्र सैन्य क्षमता को उसी अनुपात में विकसित नहीं किया। खाड़ी और पश्चिम एशिया के वे देश, जो अमेरिकी सुरक्षा साझेदारी को बाहरी खतरों से बचाव की महत्वपूर्ण गारंटी मानते रहे हैं, अब यह सवाल पूछने पर मजबूर हैं कि संकट की घड़ी में अमेरिकी सुरक्षा प्रतिबद्धता की वास्तविक सीमा आखिर कितनी है। सऊदी अरब के मामले ने इस बहस को और तीखा कर दिया है। देखा जाये तो यदि इतना पुराना और गहरा सुरक्षा साझेदार भी सीधे सैन्य समर्थन के लिए वाशिंगटन की ओर देखता रह जाए, तो अमेरिकी सुरक्षा आश्वासनों पर निर्भर दूसरे देशों के रणनीतिक गणित पर इसका असर पड़ना तय है। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे असहज करने वाला पहलू यह है कि वाशिंगटन ने अपने लिए सुरक्षा का रास्ता निकालने में हूतियों से गोपनीय बातचीत करने में भी संकोच नहीं किया। ओमान की राजधानी मस्कट में अमेरिकी अधिकारियों और हूती प्रतिनिधियों के बीच गुप्त बैठक हुई। सूत्रों के अनुसार हूतियों ने अमेरिकी जहाजों को निशाना नहीं बनाने और वर्ष 2025 के युद्धविराम के प्रति प्रतिबद्ध रहने का आश्वासन दिया। इसके बाद अमेरिका ने सऊदी अरब के लिए सीधे युद्ध में उतरने से दूरी बनाए रखी। इस घटनाक्रम ने सऊदी अरब के सामने एक बेहद कठोर रणनीतिक सवाल खड़ा कर दिया है कि जिस अमेरिका के साथ उसने दशकों तक सुरक्षा साझेदारी बनाई, उसी अमेरिका ने अपने हितों की रक्षा के लिए हूतियों से संवाद का रास्ता खोल लिया, लेकिन सऊदी अरब की तत्काल सैन्य सहायता की मांग पर प्रत्यक्ष युद्ध में उतरने से इंकार कर दिया। यही वह कारण है जहां अमेरिकी सुरक्षा छतरी पर भरोसा करने वाले दूसरे देशों की चिंताएं भी गहरी होती हैं। इसके अलावा, जब पारंपरिक सहयोगियों से अपेक्षित सैन्य समर्थन नहीं मिला तो सऊदी अरब ने अप्रत्याशित कदम उठाया। अमेरिकी मध्य कमान के माध्यम से सऊदी अरब और इजराइल के बीच संपर्क स्थापित हुआ। इजराइल से मुख्य रूप से हूतियों की सैन्य तैनाती, संभावित हमलों और महत्वपूर्ण ठिकानों से संबंधित खुफिया सहायता पर चर्चा हुई। इजराइली पक्ष से सऊदी बुनियादी ढांचे और रणनीतिक ठिकानों की रक्षा के लिए खुफिया तथा वायु रक्षा क्षमताओं से संबंधित सहायता की संभावना भी सामने आई है। लेकिन यह सहायता प्रत्यक्ष इजराइली सैन्य हस्तक्षेप में नहीं बदली। यानी रियाद को यहां भी वह सैन्य समाधान नहीं मिला जिसकी उसे हूतियों की तेजी से बढ़ती पकड़ के सामने जरूरत थी। यहीं चीन की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। हूतियों ने लाल सागर के तट और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के आसपास तेजी से बढ़त बनाई है। यह सऊदी तेल निर्यात और समुद्री परिवहन के लिए गंभीर खतरा है। इसी पृष्ठभूमि में सऊदी अरब ने चीन से हस्तक्षेप की अपील की। चीन ने सार्वजनिक रूप से संयम, बातचीत और सुरक्षित नौवहन की बहाली की मांग की, लेकिन पर्दे के पीछे उसका संदेश कहीं ज्यादा सीधा था। चीन ने तेहरान से कहा है कि वह हूतियों पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करे और उन्हें नियंत्रित करे, ताकि संघर्ष लाल सागर तथा ऊर्जा मार्गों में और न फैले। चीन ने हूतियों को रोकने के लिए अपनी सबसे बड़ी ताकत यानि आर्थिक और कूटनीतिक पकड़ का इस्तेमाल किया है। हम आपको बता दें कि चीन एक दशक से अधिक समय से ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और ईरानी तेल का सबसे महत्वपूर्ण खरीदार भी है। 2025 में ईरान के समुद्री रास्ते से होने वाले तेल निर्यात का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा चीन ने खरीदा था। यही आर्थिक रिश्ता बीजिंग को तेहरान पर प्रभाव डालने की क्षमता देता है। इसके अलावा 2023 में चीन ने सऊदी अरब और ईरान के बीच संबंध बहाल कराने में मध्यस्थ की भूमिका भी निभाई थी। इसलिए बीजिंग के पास दोनों पक्षों से संवाद का वह चैनल मौजूद है जो अमेरिका के पास नहीं है। देखा जाये तो इस पूरे संकट का सबसे बड़ा सामरिक पहलू केवल सऊदी अरब की सुरक्षा नहीं है। मामला दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार की सुरक्षा तक पहुंच चुका है। एक तरफ होरमुज जलडमरूमध्य पर तनाव है और दूसरी तरफ हूतियों की बढ़ती पकड़ बाब-अल-मंदेब पर दबाव बना रही है। यदि दोनों प्रमुख समुद्री मार्ग लंबे समय तक बाधित होते हैं तो तेल, गैस और वैश्विक समुद्री व्यापार पर एक साथ दबाव पड़ सकता है। यही चीन की सबसे बड़ी चिंता है। चीन की अर्थव्यवस्था ऊर्जा आयात पर निर्भर है और खाड़ी क्षेत्र उसके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसलिए बीजिंग के लिए हूती संकट अब केवल सऊदी अरब या यमन का मामला नहीं रहा। बहरहाल, सऊदी अरब के सामने अब केवल हूतियों की चुनौती नहीं है, बल्कि उसके पारंपरिक सुरक्षा साझेदारों की सीमाएं भी उजागर हो गई हैं। पाकिस्तान समझौते की भाषा तक सीमित है, अमेरिका प्रत्यक्ष युद्ध से पीछे है, इजराइल की मदद फिलहाल खुफिया और रक्षा सहयोग तक सीमित है और चीन पहली बार इस संकट में निर्णायक मध्यस्थ की भूमिका आजमा रहा है। अगर बीजिंग ईरान के जरिए हूतियों पर वास्तविक दबाव डालने में सफल होता है, तो पश्चिम एशिया में शक्ति के खेल का एक नया अध्याय खुल सकता है। अगर वह भी असफल होता है, तो लाल सागर और बाब-अल-मंदेब का संकट केवल सऊदी अरब का संकट नहीं रहेगा, यह वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन सकता है। -नीरज कुमार दुबे
मुंबई, सोने और चांदी में शुक्रवार को तेजी देखी गई और शुरुआती कारोबार में दोनों कीमती धातुओं का दाम करीब आधा प्रतिशत तक बढ़ गया।
उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन आज मुंबई दौरे पर, लालबागचा राजा के करेंगे दर्शन
उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन शुक्रवार को महाराष्ट्र में मुंबई, लोनावला और पुणे का दौरा करेंगे और धार्मिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक कार्यक्रमों में शामिल होंगे। इस दौरान उपराष्ट्रपति शुक्रवार सुबह मुंबई में लालबागचा राजा के दर्शन करेंगे।
चुनाव आयोग ने टीएमसी का नाम और प्रतीक फ्रीज किया
निर्वाचन आयोग ने ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के आंतरिक विवाद पर व्यवस्था देते हुए उसके दोनों गुटों के पार्टी के मूल नाम और आधिकारिक चुनाव चिह्न 'फूल और घास' के इस्तेमाल पर गुरुवार को तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी
TMC name symbol freeze- टीएमसी के चुनाव चिह्न और नाम फ्रीज़ होने के बाद कांग्रेस ने खुलकर ममता बनर्जी का समर्थन किया है। कांग्रेस ने सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त पर हमला किया, वहीं नेता विपक्ष राहुल गांधी ने कहा कि यह लोकतंत्र का पतन है।
'आधुनिक भारत के वास्तुकार': सीएम धामी ने 'आशीर्वाद का दीया' कार्यक्रम में पीएम मोदी की सराहना की
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के मौके पर आयोजित 'आशीर्वाद का दीया' कार्यक्रम में उन्हें 'आधुनिक भारत का निर्माता' बताया।
पीएम मोदी के जन्मदिन पर देशभर में 'आशीर्वाद का दीया' अभियान, अमित शाह से राजनाथ तक ने दीर्घायु की कामना की
अजमेर दरगाह से पीएम मोदी के लिए दुआ, सूफी काउंसिल चेयरमैन ने कहा, 'सबका साथ, सबका विकास' पर कर रहे काम
पीएम मोदी के जन्मदिन पर दिल्ली की सीएम, शहर के भाजपा प्रमुख और एनडीएमसी अधिकारियों ने 1.25 लाख दीये जलाए
पीएम मोदी के जन्मदिन पर मिथुन चक्रवर्ती की घोषणा, 'पश्चिम बंगाल में मनाएंगे अन्नपूर्णा दिवस'
पीएम मोदी के जन्मदिन पर मिथुन चक्रवर्ती की घोषणा, 'पश्चिम बंगाल में मनाएंगे अन्नपूर्णा दिवस'
अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (एआईटीएमसी) पर दावे को लेकर जारी विवाद के बीच चुनाव आयोग ने बड़ा अंतरिम फैसला सुनाते हुए पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह दोनों को फ्रीज कर दिया है
यूपी में 'आशीर्वाद का दीया' जलाकर मना सेवा दिवस, भाजपा नेताओं ने गिनाए 25 साल के काम
यूपी में 'आशीर्वाद का दीया' जलाकर मना सेवा दिवस, भाजपा नेताओं ने गिनाए 25 साल के काम
कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में 'खोज-ए-ब्रज' प्रोजेक्ट के लिए एमओयू साइन, मुरली मनोहर जोशी ने 'मोहन भागवत' किताब का किया विमोचन
नई दिल्ली, 17 सितंबर (आईएएनएस)। वित्त मंत्रालय विकसित भारत की यात्रा के वित्तपोषण विषय पर राज्यों और विधानमंडल वाले केंद्र शासित प्रदेशों के वित्त मंत्रियों तथा वित्त सचिवों का दो दिवसीय सम्मेलन आयोजित करेगा, जो शुक्रवार से शुरू होगा।
नई दिल्ली ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के तुरंत बाद जिस गति से पड़ोसी देशों के साथ उच्चस्तरीय संपर्क बढ़ाया है, उसने भारतीय विदेश नीति के अगले चरण की तस्वीर काफी हद तक साफ कर दी है। 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी के बाद भारत ने हिमालयी पड़ोस और हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी सक्रियता तेज कर दी है। भूटान में विदेश मंत्री एस. जयशंकर की यात्रा इसका सबसे ताजा उदाहरण है। 16 से 18 सितंबर तक की यात्रा में जयशंकर ने भूटान के प्रधानमंत्री के अलावा विदेश मंत्री डी.एन. ढुंगयेल के साथ विकास, ऊर्जा, व्यापार, संपर्क, संस्कृति और दोनों देशों के लोगों के बीच संबंधों पर व्यापक चर्चा की। इसके साथ ही भारत ने तीन महत्वपूर्ण परियोजनाओं को आगे बढ़ाकर यह संदेश दिया कि भूटान के साथ संबंध केवल पारंपरिक मित्रता तक सीमित नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाले विकास और रणनीतिक सहयोग पर आधारित हैं। जयशंकर ने भूटान के प्रधानमंत्री शेरिंग टोबगे को 54 ‘मेड इन इंडिया’ इलेक्ट्रिक वाहन सौंपते हुए कहा कि मुझे बेहद खुशी हुई। उन्होंने कहा कि भारत, भूटान की ई-मोबिलिटी और टिकाऊ परिवहन व्यवस्था की दिशा में हो रही प्रगति में सहयोग कर रहा है। इसे भी पढ़ें: EAM S Jaishankar पहुंचे Bhutan, पारो में विदेश मंत्री DN Dhungyel ने किया स्वागत साथ ही गासा में 500 किलोवाट की लुनाना जलविद्युत परियोजना की आधारशिला रखी गई। इसका उद्देश्य भूटान की उन बस्तियों तक बिजली पहुंचाना है, जो अब तक विद्युतीकरण से बाहर हैं। मोंगार में 65 बिस्तरों वाले ग्यालत्सुएन जेत्सुन पेमा मातृ एवं शिशु अस्पताल का उद्घाटन हुआ, जबकि समद्रुप जोंगखार में 80 मीटर लंबे जगनाथन पुल का लोकार्पण किया गया। ऊर्जा, स्वास्थ्य और सड़क संपर्क, तीनों क्षेत्रों में एक साथ आगे बढ़ाए गए ये काम भारत-भूटान साझेदारी की व्यापकता दिखाते हैं। इसके अलावा, भूटान के बूमथांग में जयशंकर की गतिविधियों का एक मानवीय पक्ष भी सामने आया। उन्होंने स्थानीय किसानों के लिए शुद्ध नस्ल की 43 जर्सी गायें सौंपीं। उनका कहना था कि इससे भूटान के डेयरी कार्यक्रम को मजबूती मिलेगी, दूध उत्पादन बढ़ेगा और किसानों की आय को लाभ होगा। उन्होंने वांगदुएछोलिंग महल और संग्रहालय का दौरा किया तथा कुर्जे ल्हाखांग में प्रार्थना भी की। इससे यह संकेत मिलता है कि भारत का भूटान संपर्क केवल सरकारी समझौतों तक सीमित नहीं, बल्कि कृषि, संस्कृति और जनसंपर्क तक फैला हुआ है। साथ ही जयशंकर की यात्रा को विदेश सचिव विक्रम मिसरी की हाल की भूटान यात्रा से अलग करके नहीं देखा जा सकता। 30-31 जुलाई को मिसरी ने भूटान के विदेश सचिव पेमा लेक्तुप दोर्जी के साथ 13वीं पंचवर्षीय योजना के लिए पांचवीं भारत-भूटान विकास सहयोग वार्ता की सह-अध्यक्षता की थी। दोनों देशों ने विकास साझेदारी, ऊर्जा, व्यापार, निवेश, संपर्क और क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा की थी। भूटान की 2024-29 की पंचवर्षीय योजना के लिए भारत के 10,000 करोड़ रुपये के समर्थन की प्रगति की भी समीक्षा हुई थी। अर्थात जुलाई में विदेश सचिव स्तर पर बनी रूपरेखा के बाद सितंबर में विदेश मंत्री स्तर पर उसके राजनीतिक और व्यावहारिक आयामों को आगे बढ़ाया जा रहा है। इसे भारत की भूटान नीति में निरंतरता और संस्थागत गहराई के संकेत के रूप में देखा जा सकता है। इस बीच नेपाल के वित्त मंत्री स्वर्णिम वाग्ले आज 17 सितंबर को नई दिल्ली पहुंचे हैं। उनकी यात्रा का मुख्य केंद्र हाल की विनाशकारी बाढ़ के बाद नेपाल के पुनर्निर्माण, आर्थिक सहयोग और ऊर्जा संबंधी जरूरतें हैं। वह भारतीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और विदेश मंत्री जयशंकर सहित अन्य अधिकारियों से मुलाकात करेंगे। भारत ने संकट की घड़ी में नेपाल को बिजली उपलब्ध कराने की दिशा में भी कदम उठाया है। भारत ने दिसंबर के अंत तक नेपाल को प्रतिदिन 18 घंटे के लिए 654 मेगावाट तक बिजली निर्यात की अनुमति दी है। उल्लेखनीय है कि बाढ़ से नेपाल की जलविद्युत परियोजनाओं और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान हुआ है। इसके अलावा, दक्षिण दिशा में भी भारत ने समानांतर संदेश दिया है। 8 से 10 सितंबर के बीच रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने श्रीलंका की यात्रा की, जो लगभग 38 वर्षों बाद किसी भारतीय रक्षा मंत्री की श्रीलंका यात्रा थी। दोनों देशों ने रक्षा, समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता पर सहयोग बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए। श्रीलंका के राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि श्रीलंकाई भूभाग का इस्तेमाल भारत की सुरक्षा के प्रतिकूल गतिविधियों के लिए नहीं होने दिया जाएगा। इन घटनाओं को एक साथ रखकर देखें तो भारत की रणनीति के तीन स्पष्ट आयाम सामने आते हैं। हिमालय में विकास और संपर्क, आपदा के समय आर्थिक तथा मानवीय सहयोग और हिंद महासागर में सुरक्षा साझेदारी। देखा जाये तो भूटान में जलविद्युत और पुल, नेपाल में पुनर्निर्माण और बिजली तथा श्रीलंका में रक्षा और समुद्री सुरक्षा, ये सब भले अलग-अलग पहल दिखती हैं, लेकिन इनके पीछे क्षेत्रीय स्थिरता और भारत-केंद्रित संपर्क तंत्र को मजबूत करने की साझा दिशा दिखाई देती है। सामरिक दृष्टि से भूटान का महत्व विशेष है। भारत-भूटान सीमा और हिमालयी क्षेत्र चीन के साथ भारत की व्यापक सुरक्षा गणना का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ऐसे में भूटान के साथ विश्वास, संपर्क, ऊर्जा और विकास सहयोग को मजबूत करना केवल आर्थिक साझेदारी नहीं, बल्कि दीर्घकालिक सामरिक स्थिरता से भी जुड़ा है। वहीं नेपाल भारत की उत्तरी सुरक्षा और संपर्क संरचना में महत्वपूर्ण है, जबकि श्रीलंका हिंद महासागर में समुद्री मार्गों और क्षेत्रीय सुरक्षा की दृष्टि से अहम है। इसलिए काठमांडू, थिम्पू और कोलंबो में एक साथ सक्रियता को भारत के पड़ोस को अलग-अलग द्विपक्षीय रिश्तों की बजाय एक जुड़े हुए क्षेत्रीय परिप्रेक्ष्य में देखने की कोशिश के रूप में समझा जा सकता है। बहरहाल, ब्रिक्स में ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने की बात करने के तुरंत बाद पड़ोस में विकास, पुनर्निर्माण, ऊर्जा, संपर्क और सुरक्षा पर जोर देकर भारत यह दिखा रहा है कि उसकी वैश्विक भूमिका का आधार केवल बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच नहीं, बल्कि उसके आसपास का स्थिर, जुड़ा और सहयोगी क्षेत्र भी है। यही इस पूरी कूटनीतिक सक्रियता का सबसे बड़ा रणनीतिक संकेत है। -नीरज कुमार दुबे
PM Modi Birthday: जश्न पर उठे गंभीर सवाल, छवि चमकाने का दांव या भारी नुकसान?
महाराष्ट्र में सूखे पर बोले राम कदम-'सरकार किसानों के साथ खड़ी, सर्वे के बाद होगा फैसला'
महाराष्ट्र में सूखे पर बोले राम कदम-'सरकार किसानों के साथ खड़ी, सर्वे के बाद होगा फैसला'
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के संवेदनशील भूभाग को लेकर चीन और पाकिस्तान ने एक बार फिर ऐसी कवायद शुरू की है, जिस पर भारत ने कड़ा ऐतराज जताया है। पाकिस्तान और चीन द्वारा बनाए गए तथाकथित सीमा संयुक्त आयोग की पहली बैठक के बाद भारत ने साफ शब्दों में कहा है कि इस आयोग का कोई कानूनी आधार नहीं है और भारतीय भूभाग को लेकर पाकिस्तान को चीन के साथ किसी भी तरह की व्यवस्था करने का कोई अधिकार नहीं है। भारत ने दो टूक कहा है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत के अभिन्न और अविभाज्य हिस्से हैं तथा कब्जे वाले भारतीय क्षेत्रों को लेकर चीन-पाकिस्तान की कोई भी गतिविधि भारत की संप्रभुता को प्रभावित नहीं कर सकती। हम आपको बता दें कि इस आयोग की पहली बैठक इस्लामाबाद में हुई। पाकिस्तान ने इसे द्विपक्षीय संबंधों की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए सीमा प्रबंधन, संयुक्त सीमा सर्वेक्षण, व्यापारिक प्रवाह और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने की बात कही। बैठक की सह-अध्यक्षता चीन के विदेश मंत्रालय के सीमा एवं महासागरीय मामलों से जुड़े अधिकारी ली या और पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय में चीन मामलों के महानिदेशक बिलाल महमूद चौधरी ने की। उधर, भारत ने इस पहल को महज दो देशों के बीच सामान्य सीमा सहयोग मानने से साफ इंकार कर दिया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि चीन और पाकिस्तान के बीच ऐसी कोई सीमा नहीं है, जिसे भारतीय भूभाग के संदर्भ में दोनों देश मिलकर वैध रूप दे सकें। भारत ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के पूरे केंद्रशासित क्षेत्रों को अपना अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा बताते हुए कहा कि पाकिस्तान को अपने अवैध और बलपूर्वक कब्जे वाले भारतीय क्षेत्रों के बारे में किसी व्यवस्था में प्रवेश करने का अधिकार नहीं है। देखा जाये तो इस पूरे घटनाक्रम की जड़ 1963 में हुए चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते तक जाती है। उस समझौते के तहत पाकिस्तान ने शक्सगाम घाटी के लगभग 5,180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को चीन के साथ सीमा निर्धारण की व्यवस्था में शामिल किया था। हालांकि भारत ने इसे कभी मान्यता नहीं दी। भारत सरकार ने संसद में भी स्पष्ट किया है कि वह इस तथाकथित समझौते को अवैध और अमान्य मानती है तथा शक्सगाम घाटी को भारतीय क्षेत्र मानती है। इसका इतिहास 1947-48 के भारत-पाकिस्तान युद्ध और तत्कालीन जम्मू-कश्मीर रियासत की स्थिति से जुड़ता है। भारत का आधिकारिक रुख है कि पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों पर कब्जा किया और बाद में उसी क्षेत्र से चीन के साथ समझौता किया। इसलिए पाकिस्तान द्वारा उस भूभाग के संबंध में चीन के साथ कोई भी समझौता अपने आप में अधिकारहीन है। हम आपको बता दें कि शक्सगाम घाटी और कराकोरम केवल मानचित्र पर दिखाई देने वाली दूरस्थ पहाड़ी जमीन नहीं हैं। यह इलाका चीन के शिनच्यांग क्षेत्र, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और लद्दाख के बीच स्थित अत्यंत संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्र है। इसी व्यापक भूभाग में चीन-पाकिस्तान संपर्क की महत्वपूर्ण आधारभूत संरचनाएं विकसित हुई हैं। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का एक हिस्सा भी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरता है, जिस पर भारत लगातार आपत्ति जताता रहा है। रणनीतिक दृष्टि से इसका महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि भारत एक साथ पश्चिमी और उत्तरी मोर्चों पर क्षेत्रीय दबाव का सामना करता है। भारत-चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पिछले वर्षों में सैन्य तनाव और तैनाती ने इस चुनौती को और गंभीर बनाया है। 2020 के गलवान संघर्ष के बाद दोनों देशों ने तनाव कम करने की दिशा में कुछ कदम उठाए, लेकिन सीमा विवाद का मूल प्रश्न अभी भी अनसुलझा है। ऐसे समय में कराकोरम क्षेत्र में चीन और पाकिस्तान द्वारा संयुक्त सीमा तंत्र को सक्रिय करना केवल प्रशासनिक सहयोग के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसका संभावित रणनीतिक अर्थ यह है कि दोनों देश उस भूभाग में अपने पारस्परिक समन्वय को संस्थागत रूप देना चाहते हैं, जोकि भारत का है। इससे भविष्य में सड़क, व्यापार, आवागमन, सर्वेक्षण और सीमा प्रबंधन जैसी गतिविधियों को अधिक संगठित आधार मिल सकता है। उधर, भारत का जवाब संप्रभुता की स्पष्ट रेखा खींचने वाला संदेश है। नई दिल्ली ने साफ कहा है कि चीन-पाकिस्तान की ऐसी कोई भी सीमा-संबंधी कवायद भारतीय संप्रभुता पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकती। भारत निरंतर यह कहता रहा है कि 1963 में पाकिस्तान द्वारा शक्सगाम घाटी जैसे कुछ इलाके चीन को सौंपना अवैध और अस्वीकार्य है। नयी दिल्ली ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) का भी विरोध किया है क्योंकि इसका एक हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) से होकर गुजरता है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने पाकिस्तान-चीन सीमा संयुक्त आयोग पर कहा, ‘‘इस मामले पर हमारा रुख स्पष्ट और पहले जैसा है। पाकिस्तान और चीन के बीच कोई सीमा नहीं है। हम तथाकथित संयुक्त आयोग को खारिज करते हैं, जिसका कोई कानूनी आधार नहीं है।’’ उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का समूचा केंद्र-शासित प्रदेश ‘‘भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा रहा है, (वर्तमान में भी) है और हमेशा रहेगा।’’ जायसवाल ने कहा, ‘‘हमने 1963 के तथाकथित चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते को कभी मान्यता नहीं दी है और लगातार यही कहा है कि यह अवैध और अमान्य है।’’ प्रवक्ता ने कहा, ‘‘हम इन कब्जे वाले इलाकों की स्थिति बदलने या अवैध कब्जे को वैध बनाने की किसी भी कोशिश का पुरजोर विरोध और खंडन करते हैं, क्योंकि इससे भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर आंच आती है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘भारतीय इलाकों को लेकर चीन और पाकिस्तान के बीच सीमा-सहयोग का कोई भी तथाकथित प्रयास पूरी तरह से अस्वीकार्य होगा और इन इलाकों पर भारत की संप्रभुता पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।’’ जायसवाल ने कहा, ‘‘इस तरह के दिखावे की बजाय, हम पाकिस्तान से मांग करते हैं कि वह अपने अवैध और जबरन कब्जे वाले इलाकों को तुरंत खाली करे।'' दूसरी ओर, पाकिस्तान के विदेश मंत्रालाय की ओर से जारी बयान के अनुसार, सीमा प्रबंधन प्रणाली पर 2013 के समझौते के आधार पर गठित आयोग की पहली बैठक बुधवार को इस्लामाबाद स्थित विदेश मंत्रालय में हुई। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के अनुसार, नया तंत्र सीमा पर सुरक्षा सुनिश्चित करने और वस्तुओं एवं सेवाओं की आवाजाही को सुगम बनाने के लिए नियमित समन्वय में मदद करेगा। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने बताया कि इससे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के तहत व्यापार व संपर्क को और बढ़ावा मिलेगा। इसके अलावा पाकिस्तान और चीन ने पुलिस प्रशिक्षण कार्यक्रमों के आदान-प्रदान तथा आधुनिक तकनीक एवं उपकरणों के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति जताई। पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने कहा कि चीन की कृत्रिम मेधा (एआई) आधारित तकनीक और आधुनिक उपकरण सुरक्षा चुनौतियों से निपटने में काफी मददगार साबित हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान देश की सुरक्षा के क्षेत्र में चीन के साथ सहयोग को और बढ़ाना चाहता है। बहरहाल, असल चुनौती अब जमीन पर बदलते सामरिक समीकरणों की है। कराकोरम में चीन और पाकिस्तान का बढ़ता सहयोग भारत के लिए गंभीर रणनीतिक चुनौती पैदा करता है। सड़क, व्यापार, सीमा प्रबंधन और संपर्क के नाम पर होने वाली गतिविधियां इस क्षेत्र में दोनों देशों की मौजूदगी को और मजबूत कर सकती हैं। ऐसे में शक्सगाम घाटी का मुद्दा केवल पुराने सीमा विवाद का हिस्सा नहीं रह जाता, बल्कि भारत की संप्रभुता, सुरक्षा और उत्तरी सीमाओं से जुड़ा महत्वपूर्ण सामरिक प्रश्न बन जाता है। -नीरज कुमार दुबे
नंदीग्राम उपचुनाव: भाजपा के गढ़ में छह उम्मीदवारों के बीच मुकाबला, दूसरे स्थान की लड़ाई पर सबकी नजर
नंदीग्राम उपचुनाव: भाजपा के गढ़ में छह उम्मीदवारों के बीच मुकाबला, दूसरे स्थान की लड़ाई पर सबकी नजर
दिल्ली: मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने किया 'नमो श्रमिक सेवा केंद्र' और 'गिग वर्कर्स विश्राम स्थल' का उद्घाटन
यूपीआई में बदलाव को लेकर केंद्र सरकार और कांग्रेस में टकराव
कांग्रेस का आरोप, यूपीआई चार्ज से अमेरिकी कंपनियों का फायदा
भारत ने ब्रिक्स समिट करवाया। रूस के राष्ट्रपति पुतिन आए। चीन के राष्ट्रपति शी जिंनपिंग आए। तमाम दुनिया भर के जो सदस्य देश थे, जो इनवाइटेड कंट्रीज थे, पार्टनर कंट्रीज थे, वो पहुंचे। बहुत चर्चा हुई। ईरान पहुंचा। ईरान, यूएई की मीटिंग हो गई। दुनिया भर में इस बात पर बात हो रही है। अब अमेरिका जो है वैसे तो चीख चिल्ला नहीं रहा है ब्रिक्स पर लेकिन वो तिलमिला चुके हैं। क्यों खुन्नस खा चुका है यह हम आपको आगे बताएंगे। दरअसल ब्रिक्स की बैठक संपन्न हो गई। चर्चा चारों तरफ हुई कि भैया बैठक तो जो है बड़ा बढ़िया रहा। वेस्ट जलने लगा, अमेरिका जलने लगा और उसने जलन में सबसे पहले हमला किसकी तरफ करने का सोचा? भारत और रूस की दोस्ती पर। दरअसल अमेरिकी सांसदों ने रूस पर प्रतिबंध लगाने वाले बिल में जो है वो संशोधन के लिए पेश कर दिया है। बताया जा रहा है इसमें से एक ऐसा संशोधन भी है जिसको में भारत को टारगेट किया जा रहा है। क्यों किया जा रहा है? क्योंकि वो रशिया का दोस्त है और भावना तो यह रही होगी कि ये भारत ने कैसे इतना बढ़िया ब्रिक्स का समिट करा लिया। चीन के राष्ट्रपति आ गए। रूस के राष्ट्रपति आ गए। ईरान के राष्ट्रपति आ गए। चर्चा हो गई। ईरान यूएई की मीटिंग हो गई। बताओ इतना कुछ हो रहा है। तो ये जो भाव है कोई कह नहीं रहा है कि मुझे ब्रिक्स से दिक्कत है। अमेरिका में कोई हल्ला नहीं है इसको लेकर। सब उसको अंडरप्ले करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन यह खुन्नस है क्योंकि खुन्नस जो है वह यह संशोधन पे दिखाई देता है। जानकारी यह है कि जो संशोधन है उसमें भारत सहित रूस के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के नए कानून में शामिल करने की मांग की गई है। 100% टेरिफ वाला बिल पूरी तरह से पास हो गया। अमेरिका के इस कड़े फैसले से पूरी दुनिया के बाजारों में खलबली मच गई। लेकिन सवाल यह है कि अमेरिका ने सख्त फैसला लिया क्यों? दरअसल इसके पीछे एक नहीं बल्कि कई बड़े कारण हैं। एक तरफ जहां ब्रिक्स देशों में डीडोलराइजेशन की सिर्फ चर्चा मात्र से अमेरिका में डर का माहौल बन गया वहीं दूसरी तरफ अमेरिका का बढ़ता व्यापार घाटा यानी कि ट्रेड डेफिसिट और उसकी अमेरिका फर्स्ट नीति भी इसका बड़ा कारण है। इसे भी पढ़ें: अब्दुल्ला-मायावती-सिब्बल...एक-एक कर मोदी के समर्थन में अचानक क्यों उतरने लगे विरोधी,'चक्रव्यूह' में फंसे राहुल? अमेरिका के 100% वाले टेरिफ के पीछे असली कारण? पहला कारण है डीलराइजेशन की चर्चा और अमेरिका का डर। सच यह है कि ब्रिक्स देशों ने कोई नई करेंसी अभी तक नहीं बनाई है और ना ही डॉलर को पूरी तरह छोड़ा है। भारत जैसे देशों ने इस मामले में बेहद सतर्क और संतुलित रुख अपनाया हुआ है। लेकिन ब्रिक्स देशों में अपनी स्थानीय भाषाओं और मुद्राओं में व्यापार करने [संगीत] की जो बात शुरू हुई है, उसने अमेरिका को डरा दिया। अमेरिका को डर लगा कि अगर भविष्य में डॉलर का दबदबा कम हुआ तो उसकी आर्थिक ताकत कमजोर पड़ जाएगी। इसी डर के चलते अमेरिका ने पहले ही 100% टेरिफ की चेतावनी देकर सख्त कानून पास कर दिया। अमेरिका हर साल दूसरे देशों से बहुत ज्यादा सामान खरीदता है। लेकिन खुद कम सामान बेचता है। अमेरिका को अरबों डॉलर का नुकसान होता है। इस व्यापार घाटे को कम करने के लिए भारी टेरेफ लगाना अमेरिका के लिए बेहद जरूरी हो गया था। अब तीसरा कारण है अमेरिका फर्स्ट और घरेलू कंपनियों की सुरक्षा। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि विदेशी कंपनियां अपने देशों से सस्ता सामान भेजकर अमेरिकी कंपनियों को नुकसान पहुंचाती हैं। 100% टेरिफ लगाने से विदेशी सामान महंगा हो जाएगा। जिससे अमेरिका के लोग अपने ही देश में बना सामान खरीदेंगे और वहां नए रोजगार पैदा होंगे। इसे भी पढ़ें: US Sanctions Bill पर Congress का हमला, कहा- Modi Govt के तुष्टीकरण का कोई फायदा नहीं भारत के लिए क्या हैं इसके मायने? अमेरिकी संसद में पारित नया विधेयक भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूसी तेल या प्राकृतिक गैस का आयात करने वाले शीर्ष 5 देशों पर 100 प्रतिशत तक का आयात शुल्क (टैरिफ) लगाने का अधिकार देता है। वर्तमान में भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 88 फीसदी हिस्सा आयात करता है, जिसमें रूस एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता के रूप में उभरा है। वर्ष 2022 में यूक्रेन पर रूस के सैन्य हमले के बाद से रूसी कच्चा तेल भारत के आयात बास्केट का एक बड़ा हिस्सा बन गया। 'ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव' (GTRI) के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 में भारत ने रूस से 40.8 अरब डॉलर का कच्चा तेल खरीदा, जो उसके कुल कच्चे तेल आयात का लगभग एक-तिहाई है। वहीं, कमोडिटी डेटा ट्रैकर 'केपलर' (Kpler) के अनुसार, अगस्त में भारत ने रोजाना 20.8 लाख बैरल (bpd) रूसी तेल का आयात किया, जो उसके कुल तेल आयात का करीब 45 प्रतिशत था। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि इस विधेयक के पारित होने से भारत पर स्वतः 100 प्रतिशत शुल्क लागू नहीं हो जाता। यह कानून केवल राष्ट्रपति ट्रंप को यह तय करने का कानूनी अधिकार देता है कि शुल्क कब, किस दर पर और किस स्तर पर लगाया जाए। यदि अमेरिकी राष्ट्रपति वास्तव में 100 प्रतिशत शुल्क लगाने का फैसला करते हैं, तो यह आयात शुल्क का उच्चतम स्तर होगा। यह शुल्क उस मौजूदा 10 प्रतिशत टैरिफ के अतिरिक्त होगा, जो अमेरिका ने जबरन श्रम (फोर्स्ड लेबर) से बने सामानों के आयात को रोकने में नाकामी के दंड स्वरूप भारतीय उत्पादों पर लगाया हुआ है।आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के कड़े कदम से भारतीय अर्थव्यवस्था को गहरा झटका लग सकता है। रेटिंग एजेंसी इक्रा (ICRA Ltd) की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर ने 'फॉर्च्यून इंडिया' से बातचीत में कहा, अमेरिका द्वारा किसी भी प्रकार के उच्च शुल्क लगाए जाने और उससे पैदा होने वाली अनिश्चितता का सीधा नकारात्मक असर भारत के विकास परिदृश्य पर पड़ेगा।GTRI के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने भी इस विधेयक को भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया। 'टाइम्स ऑफ इंडिया' से बात करते हुए उन्होंने कहा, यह विधेयक भारत पर एकतरफा शर्तों पर द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) पर हस्ताक्षर कराने का एक सीधा और खतरनाक दबाव बनाने का प्रयास है। भारत युद्ध के लिए फंडिंग करने नहीं, बल्कि अपनी 1.4 अरब आबादी के लिए किफायती ऊर्जा सुरक्षित करने के लिए रूसी तेल खरीदता है; और इन खरीदों ने वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों को स्थिर रखने में अहम मदद की है। उन्होंने आगे आगाह किया कि यदि ट्रंप भारतीय सामानों पर 100 प्रतिशत शुल्क लागू करते हैं, तो इससे न केवल भारतीय निर्यातकों को भारी नुकसान होगा, बल्कि दोनों देशों के द्विपक्षीय व्यापार संबंधों पर भी गंभीर असर पड़ेगा। उन्होंने स्पष्ट किया, भारतीय निर्यात पर नए शुल्कों के वास्तविक असर का सही आकलन तभी किया जा सकेगा, जब अमेरिका औपचारिक रूप से शुल्क दरों की घोषणा करेगा। क्या भारत में पेट्रोल की कीमतें बढ़ेंगी? इसका जवाब अभी साफ़ नहीं है। हमें यह देखना होगा कि क्या भारत अमेरिका से टैरिफ़ के खतरे को टालने के लिए अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए रूसी कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता कम करता है। भारतीय रिफ़ाइनर दूसरे उत्पादकों से तेल ले सकते हैं, जिनमें पश्चिम एशिया, अफ्रीका और अमेरिका के देश शामिल हैं। असल में, अगस्त में वेनेज़ुएला से भारत का कच्चा तेल आयात 2020 के बाद से सबसे ऊँचे स्तर पर पहुँच गया, जो जुलाई के मुक़ाबले 64 प्रतिशत बढ़कर 358,000 बैरल प्रति दिन हो गया। Kpler के डेटा के अनुसार, जहाँ रूस कच्चे तेल का सबसे बड़ा सप्लायर बना रहा, वहीं अगस्त में उस देश से तेल आयात चार महीने के निचले स्तर 2.06 मिलियन बैरल प्रति दिन (bpd) पर आ गया, जो जुलाई से 27 प्रतिशत की भारी गिरावट है। इस बीच, UAE 542,000 bpd के साथ दूसरा सबसे बड़ा सप्लायर था, जो जुलाई के 470,000 bpd से 15 प्रतिशत ज़्यादा है। Kpler में तेल बाज़ारों के सीनियर मैनेजर सुमित रितोलिया ने पहले 'द प्रिंट' को बताया था कि भारतीय कच्चे तेल के आयात पर असर तुरंत नहीं पड़ेगा। अतीत में प्रतिबंधों के काम करने के तरीके के आधार पर, उन्हें 45-60 दिनों की 'विंड-डाउन' अवधि (धीरे-धीरे काम बंद करने की अवधि) की उम्मीद है, जिसके दौरान पहले से कॉन्ट्रैक्ट किए गए और रास्ते में मौजूद कार्गो की डिलीवरी हो सकती है। रितोलिया ने कहा कि शुरुआती असर नई बुकिंग पर पड़ेगा, न कि जल्द आने वाले कार्गो पर। इसका मतलब है कि भारत रूसी तेल सप्लाई की जगह दूसरे स्रोत से तेल ले सकता है, लेकिन सवाल यह है कि किस कीमत पर। इसे भी पढ़ें: भारत-रूस की दोस्ती तोड़ने के लिए Trump ने उठाया खतरनाक कदम, तुरंत मोदी सरकार ने कर दिया तगड़ा इलाज! भारत ने क्या जवाब दिया भारत नेकहा कि वह अपने आर्थिक हितों की रक्षा और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाएगा। भारत का यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट पारित किया है। यह विधेयक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले भारत और चीन जैसे देशों पर 100 प्रतिशत तक दंडात्मक शुल्क लगाने की अनुमति देता है। यह विधेयक ट्रंप को रूस पर प्रतिबंध लगाने और उसके प्रमुख व्यापारिक साझेदारों पर भारी शुल्क लगाने का अधिकार देता है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत अपने 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और अपने व्यापार तथा आर्थिक हितों की रक्षा के लिए सभी जरूरी कदम उठाएगा। विदेश मंत्रालय ने कहा कि अमेरिकी कांग्रेस में विधेयक पारित होने के बाद भारत इस मामले में आगे होने वाले घटनाक्रम पर नजर रख रहा है। पिछले कुछ वर्षों में भारत द्वारा रूस से कच्चे तेल की खरीद में काफी वृद्धि हुई है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि जैसा कि पहले भी कई मौकों पर कहा गया है, भारत अपने 1.4 अरब लोगों के लिए ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के वास्ते पूरी तरह प्रतिबद्ध है। मंत्रालय ने कहा कि भारत स्रोतों में विविधता लाने और बदलती बाजार परिस्थितियों के आधार पर अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करता रहेगा। विदेश मंत्रालय ने बताया कि इस मुद्दे पर पिछले कुछ महीनों में अमेरिका के विभिन्न अधिकारियों और प्रतिनिधियों के साथ उच्च स्तर पर चर्चा हुई है। उसने कहा कि भारत ने अमेरिका के सामने इस कदम के संभावित प्रभावों को स्पष्ट रूप से रखा है-न केवल भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों पर, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर भी। भारत ने अमेरिका को यह भी स्पष्ट किया है कि वह अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाने के लिए दृढ़ है। उसने कहा कि सरकार इन घटनाक्रम के प्रभावों से निपटने के लिए भारतीय व्यापार और उद्योग संगठनों के साथ मिलकर काम करेगी। यह प्रतिबंध विधेयक पिछले महीने अमेरिकी सीनेट से पारित हुआ था। बुधवार शाम अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने इसे 262-159 मतों से मंजूरी दी। ट्रंप के हस्ताक्षर के बाद यह कानून बन जाएगा। इसमें रूस के नेतृत्व और ऊर्जा क्षेत्र पर प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ रूस को तेल की आपूर्ति पर लगे प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले जहाजों के ‘छद्म बेड़ों’ पर भी प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव है। इसके अलावा, विधेयक ट्रंप को चीन, भारत और अन्य देशों पर कड़े शुल्क लगाने का अधिकार देता है, ताकि इन देशों की रूसी तेल और गैस पर निर्भरता कम की जा सके। विधेयक में ईरान पर अतिरिक्त प्रतिबंधों का भी प्रावधान है। क्या क्या हो सकता है महंगा अगर अमेरिका ने 100% टैरिफ लागू कर दिया, तो इसका बुरा असर सिर्फ कच्चे तेल पर ही नहीं, बल्कि भारत से अमेरिका जाने वाले निर्यात पर भी पड़ेगा। अमेरिका, भारत के कई सामानों पर टैक्स बढ़ा सकता है। इसका सबसे ज्यादा नुकसान हमारे इलेक्ट्रॉनिक्स (खासकर स्मार्टफोन), दवाइयों (फार्मास्यूटिकल्स), कपड़ा उद्योग, गहने (रत्न और आभूषण) और ऑटोमोबाइल पार्ट्स के निर्यात को झेलना पड़ सकता है।

