राहुल गांधी का प्रयागराज आकर छात्रों से संवाद करना अपने आप में कोई असामान्य राजनीतिक घटना नहीं है। लोकतंत्र में विपक्ष के नेता का युवाओं के बीच जाना, उनकी समस्याएं सुनना और सरकार से सवाल पूछना बिल्कुल स्वाभाविक है। लेकिन राजनीति में किसी कार्यक्रम का समाचार बन जाना और उसका चुनावी प्रभाव पैदा करना, ये दो बिल्कुल अलग बातें हैं। यही अंतर उत्तर प्रदेश की राजनीति के संदर्भ में राहुल गांधी के प्रयागराज कार्यक्रम ‘छात्रों की गूंज’ को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। कांग्रेस ने इस कार्यक्रम को पेपर लीक, बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं और युवाओं की समस्याओं के खिलाफ एक बड़े अभियान के रूप में पेश किया है। प्रयागराज का चयन भी प्रतीकात्मक है, क्योंकि यह देश के प्रमुख शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षा केंद्रों में गिना जाता है। कांग्रेस का दावा है कि वह छात्रों की आवाज को राष्ट्रीय स्तर पर उठाना चाहती है। लेकिन यहां पहला राजनीतिक सवाल खड़ा होता है कि क्या प्रयागराज में छात्रों की एक बड़ी सभा को पूरे उत्तर प्रदेश के युवा मतदाताओं के राजनीतिक रुझान का संकेत मान लिया जाए? इसे भी पढ़ें: संसदीय-गतिरोध से नहीं चलेगा लोकतंत्र, संवाद ही है समाधान देखा जाये तो राजनीति में भीड़ और वोट के बीच संगठन नाम की एक चीज होती है। किसी नेता के कार्यक्रम में हजारों लोग आ सकते हैं, सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हो सकते हैं और मीडिया में कई घंटे तक बहस हो सकती है, लेकिन विधानसभा चुनाव 403 सीटों पर लड़ा जाता है। वहां उम्मीदवार चाहिए, स्थानीय नेतृत्व चाहिए, बूथ स्तर का संगठन चाहिए, चुनाव प्रबंधन चाहिए और सबसे महत्वपूर्ण, ऐसा स्थायी मतदाता आधार चाहिए जो मतदान के दिन पार्टी के साथ खड़ा हो। यहीं कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती दिखाई देती है। हम आपको याद दिला दें कि 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को केवल दो सीटें मिली थीं और उसका वोट शेयर लगभग 2.33 प्रतिशत रहा था। यह आंकड़ा किसी सामान्य चुनावी उतार-चढ़ाव का नहीं, बल्कि राज्य में कांग्रेस के संगठनात्मक पतन का संकेत था। हां, 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में उल्लेखनीय वापसी की। कांग्रेस ने छह लोकसभा सीटें जीतीं और उसका प्रदर्शन 2022 की तुलना में स्पष्ट रूप से बेहतर हुआ। लेकिन इस सफलता का कारण समाजवादी पार्टी का कांग्रेस के साथ INDIA गठबंधन में शामिल होना था। दोनों दलों ने मिलकर चुनाव लड़ा और विपक्षी वोटों का एक बड़ा हिस्सा एकजुट हुआ। इसलिए 2024 के परिणाम को सीधे-सीधे कांग्रेस के स्वतंत्र उत्तर प्रदेश जनाधार का प्रमाण मानना राजनीतिक रूप से जल्दबाजी होगी। और यही सवाल 2027 के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। अगर कांग्रेस वास्तव में उत्तर प्रदेश में अपने दम पर इतनी मजबूत हो चुकी है, तो फिर उसके अपने ही सांसदों और नेताओं को समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन जल्द तय करने की जरूरत क्यों महसूस हो रही है? अभी एक दिन पहले ही तमाम समाचार रिपोर्टों में कांग्रेस के उत्तर प्रदेश के सांसदों द्वारा 2027 के चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन को जल्द अंतिम रूप देने की मांग सामने आई है। साथ ही, प्रदेश कांग्रेस के भीतर गठबंधन को लेकर मतभेदों की खबरें भी आती रही हैं। इसलिए राहुल गांधी से एक सीधा सवाल पूछा जा सकता है कि अगर कांग्रेस का अपना जनाधार इतना मजबूत है, तो 2027 में उसे समाजवादी पार्टी के सहारे की जरूरत क्यों है? वैसे यह सवाल गठबंधन के खिलाफ नहीं है। गठबंधन लोकतांत्रिक राजनीति का सामान्य हिस्सा है। लेकिन तब 2024 की सफलता को कांग्रेस की अकेले की ताकत बताना भी उचित नहीं होगा। यदि सफलता गठबंधन की संयुक्त ताकत से आई है, तो उसका श्रेय भी ईमानदारी से साझा करना होगा। यही कारण है कि प्रयागराज का ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन इसे 2027 के चुनाव की दिशा बदल देने वाला कार्यक्रम मानने के लिए अभी बहुत कुछ साबित होना बाकी है। कांग्रेस को यह बताना होगा कि प्रयागराज की सभा के बाद वह कितने छात्रों को अपने साथ जोड़ पाती है। कितने जिलों में उसका छात्र संगठन सक्रिय है? कितने विधानसभा क्षेत्रों में उसका मजबूत स्थानीय संगठन है? कितनी सीटों पर वह अपने दम पर चुनाव लड़ने की वास्तविक स्थिति में है? और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या छात्रों के मुद्दे को लेकर उसका अभियान चुनाव तक लगातार जमीन पर दिखाई देगा या यह भी दूसरे राजनीतिक अभियानों की तरह कुछ दिनों की सुर्खियों तक सीमित रह जाएगा? साथ ही कांग्रेस को यह भी बताना चाहिए कि राहुल गांधी अब तक छात्रों की गूंज के जितने कार्यक्रम कर चुके हैं उसमें उमड़ी भीड़ में से कितने लोगों ने कांग्रेस की सदस्यता ली? यहां एक और महत्वपूर्ण बात है। कांग्रेस के लिए युवाओं और छात्रों का मुद्दा उठाना राजनीतिक रूप से स्वाभाविक है, लेकिन केवल सरकार की आलोचना करने से कोई पार्टी युवाओं का स्थायी राजनीतिक विकल्प नहीं बन जाती। छात्रों को भाषण नहीं, समाधान चाहिए। उन्हें समय पर परीक्षा चाहिए, पारदर्शी भर्ती चाहिए, पेपर लीक से सुरक्षा चाहिए, परिणाम और नियुक्ति में अनावश्यक देरी से मुक्ति चाहिए और ऐसी शिक्षा चाहिए जो उन्हें रोजगार के योग्य बनाए। इसलिए कांग्रेस से सवाल है कि वह केवल यह नहीं बताए कि सरकार ने क्या गलत किया, बल्कि यह भी बताए कि कांग्रेस सत्ता में होती तो क्या अलग करती? कांग्रेस को सिर्फ सरकार की आलोचना करने की बजाय बताना चाहिए कि पेपर लीक रोकने के लिए उसका मॉडल क्या है? परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही कैसे तय होगी? भर्ती कैलेंडर को कानूनी या प्रशासनिक रूप से कैसे सुनिश्चित किया जाएगा? परीक्षा और परिणाम के बीच समय सीमा क्या होगी? और अगर किसी परीक्षा में अनियमितता साबित होती है तो छात्रों के नुकसान की भरपाई का उसका मॉडल क्या होगा? इसके अलावा, सरकार पर सवालों की बौछार कर रही कांग्रेस से भी उसकी ऐतिहासिक राजनीतिक जिम्मेदारी पर सवाल पूछा जाना चाहिए। देश और उत्तर प्रदेश में लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली पार्टी आज शिक्षा व्यवस्था की हर समस्या पर इस तरह बोल नहीं सकती जैसे उसका इस व्यवस्था के निर्माण और उसकी कमियों से कोई संबंध ही नहीं रहा। इसलिए असली सवाल यह है कि “कांग्रेस ने दशकों तक देश और उत्तर प्रदेश में शासन किया। अगर आज शिक्षा व्यवस्था में इतनी गंभीर कमियां हैं, तो क्या कांग्रेस अपने लंबे शासन की ऐतिहासिक जिम्मेदारी स्वीकार करती है?” कांग्रेस से यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि “अगर उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह विफल है, जैसा कांग्रेस अपने राजनीतिक अभियान में बताती है, तो स्वतंत्र ASER के आंकड़ों में पिछले वर्षों में कई बुनियादी learning outcomes में सुधार कैसे दिखाई दे रहा है?” देखा जाये तो प्रयागराज में राहुल गांधी का कार्यक्रम इसलिए राजनीतिक रूप से दिलचस्प है क्योंकि यह केवल छात्र संवाद नहीं है। कांग्रेस स्वयं इसे 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले युवाओं के बीच अपनी जगह बनाने के प्रयास के रूप में देख रही है। लेकिन कांग्रेस के लिए चुनौती यह है कि छात्र और युवा मतदाता एकसमान राजनीतिक समूह नहीं हैं। किसी परीक्षा में पेपर लीक से नाराज छात्र जरूरी नहीं कि उसी कारण से विधानसभा चुनाव में किसी खास पार्टी को वोट दे। बेरोजगारी एक बड़ा मुद्दा हो सकती है, लेकिन उसके साथ कानून-व्यवस्था, जातीय समीकरण, कल्याणकारी योजनाएं, स्थानीय उम्मीदवार, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की लोकप्रियता, महिला मतदाता, किसान और क्षेत्रीय मुद्दे भी चुनावी व्यवहार को प्रभावित करते हैं। इसलिए ‘छात्रों की गूंज’ को 2027 के चुनाव का निर्णायक संकेत मान लेना जल्दबाजी होगी। हम आपको यह भी याद दिला दें कि दो-तीन महीने पहले कांग्रेस ने रायबरेली में भी एक बड़ी जनसभा की थी और उसमें राहुल गांधी ने बड़ी हुंकार भरी थी लेकिन क्या उससे यूपी में कोई राजनीतिक समीकरण बना या बिगड़ा? राहुल गांधी का प्रयागराज कार्यक्रम कांग्रेस को मीडिया की सुर्खियां दे सकता है। छात्रों के बीच राजनीतिक चर्चा पैदा कर सकता है। सरकार पर दबाव भी बना सकता है। लेकिन इससे अपने आप यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि इससे उत्तर प्रदेश का चुनावी गणित बदल गया है। 2027 का उत्तर प्रदेश चुनाव किसी एक सभा, किसी एक भाषण या किसी एक नेता की लोकप्रियता से तय नहीं होगा। वह बूथ पर तय होगा, विधानसभा क्षेत्र के सामाजिक समीकरणों पर तय होगा, स्थानीय उम्मीदवारों की स्वीकार्यता पर तय होगा और सबसे बढ़कर इस बात पर तय होगा कि कौन-सा गठबंधन किस वोट को वास्तविक मतदान में बदल पाता है। इसलिए मुद्दा यह नहीं है कि “प्रयागराज के कार्यक्रम का क्या राजनीतिक असर होगा?” मुद्दा यह है कि 403 विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस का संगठन कितना बड़ा है? और कांग्रेस के पास शिक्षा और रोजगार से जुड़ी समस्याओं का अपना ठोस व समयबद्ध समाधान क्या है? साथ ही प्रयागराज के चयन को केवल छात्रों के मुद्दे तक सीमित करके देखना भी शायद पूरी तस्वीर नहीं होगी। इसके पीछे पूर्वांचल की राजनीति में कांग्रेस की अपनी पुरानी राजनीतिक स्मृतियों को फिर से सक्रिय करने और उस भूगोल में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश भी देखी जा सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 2014 में वाराणसी को अपनी संसदीय राजनीति का प्रमुख आधार बनाया था और उसके बाद पूर्वांचल राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आया। वाराणसी और प्रयागराज स्टेशनों के बीच मात्र एक जंक्शन की दूरी है। ऐसे में प्रयागराज का चयन पूर्वांचल के राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र में एक प्रतीकात्मक जवाब देने की कोशिश के रूप में भी देखा जा सकता है। एक तरफ मोदी का वाराणसी, दूसरी तरफ नेहरू-गांधी परिवार की इलाहाबाद-प्रयागराज की ऐतिहासिक स्मृति। साथ ही यह संयोग भी महत्वपूर्ण है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने इलाहाबाद सीट 40 साल बाद वापस जीती थी। कांग्रेस के उज्ज्वल रमण सिंह ने भाजपा के नीरज त्रिपाठी को 58,795 मतों से हराया था और 1984 में अमिताभ बच्चन की जीत के बाद पहली बार कांग्रेस इस सीट पर लौटी। उल्लेखनीय है कि जवाहरलाल नेहरू इलाहाबाद की फूलपुर संसदीय सीट से चुनाव लड़ते थे। इसके साथ ही प्रयागराज में नेहरू परिवार से जुड़ी स्मृतियां जैसे कि आनंद भवन और स्वराज भवन आदि हैं और राहुल गांधी के दादा फिरोज जहांगीर गांधी की कब्र भी यहीं है। बहरहाल, प्रयागराज के सफल कार्यक्रम के बाद अब सवाल यह है कि क्या यह विरासत आज के युवा मतदाता को उसी तरह राजनीतिक रूप से आंदोलित कर सकती है जैसे वह कांग्रेस के पुराने दौर में करती थी? -नीरज कुमार दुबे
महिला आरक्षण पर बदले सियासी समीकरण! इस विपक्षी पार्टी ने किया BJP का समर्थन, रिजिजू ने कही बड़ी बात
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2027 के चुनाव में सपा के साथ रहेंगे, अखिलेश यादव बनेंगे मुख्यमंत्री: बाबू सिंह कुशवाहा
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देश को नक्सलवाद-माओवाद के आतंक से मुक्ति दिलाने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने दो नये अहम अभियान प्रारंभ किये हैं- पहला, भारत को घुसपैठियों से मुक्त करना तथा दूसरा है, युवाओं को नशे की लत से मुक्ति दिलाना। भारत के किशोरों तथा युवाओं को हर प्रकार के नशे से मुक्ति दिलाने के लिए 2 अगस्त 2026 को प्रधानमंत्री मोदी ने “नशा मुक्त युवा, विकसित भारत संकल्प अभियान“ का प्रारंभ करते हुए एक वीडियो संदेश जारी किया है। अपने सन्देश में प्रधानमंत्री मोदी ने कहाकि जो युवा नशे से लड़कर बाहर निकलते हैं वे कमजोर नहीं, बल्कि असली योद्धा होते हैं। समाज को उनका सम्मान करना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि भारत में ड्रग्स की सप्लाई दुश्मन देशों की आतंकी साजिश का ही एक हिस्सा है। दुश्मन देश भारतीय युवाओं को नशे के जाल में धकेलना चाहते हैं ताकि भारत कभी भी एक सशक्त एवं विकसित देश के रूप में स्थापित न हो सके। इस साजिश को हम सबको मिलकर नाकाम करना होगा। विकसित भारत का लक्ष्य तभी पूरा होगा जब देश का युवा शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होने के साथ ही नशे से भी दूर रहेगा। अगले 100 सप्ताह तक हर रविवार को कला, संस्कृति, खेल और अन्य गतिविधियों के माध्यम से नशामुक्ति का संदेश देश भर में पहुंचाया जाएगा। नशे की लत युवाओं के सपनों और परिवार दोनों को ही तोड़ देती है। नशा केवल व्यक्ति या परिवार को ही नहीं बल्कि राष्ट्र की ताकत को भी कमजोर करता है। इसे भी पढ़ें: संसदीय-गतिरोध से नहीं चलेगा लोकतंत्र, संवाद ही है समाधान इस अभियान का उद्देश्य युवाओं को नशे से दूर रहने के लिए प्रेरित करना और उन्हें अपने समाज में बदलाव लाने के लिए आगे बढ़ाना है। प्रत्येक रविवार को देशभर में अलग-अलग कार्यक्रम होंगे जिसमें वॉकाथन और दौड़, खेल प्रतियोगिताएं,योग और ध्यान सत्र, सांस्कृतिक कार्यक्रम, नुक्कड़ नाटक, नशा विरोधी जागरूकता अभियान, चर्चा और संवाद कार्यक्रम, पेंटिग्स व आर्ट्स प्रतियोगिताएं तथा सामुदायिक सहभागिता कार्यक्रम आयोजित किये जाएंगे। यह अभियन 125 से अधिक आध्यात्मिक,सामाजिक तथा सरकारी संगठनों के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है। ब्रहमकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय, आर्ट ऑफ़ लिविंग, गायत्री परिवार, इस्कॉन से लेकर माताअमृतानंदमयी मठ जैसे संगठन इस अभियान से जुड़ कर कार्य कर रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का वैचारिक संगठन विश्व हिंदू परिषद पहले से ही व्यापक स्तर पर नशामुक्ति अभियान चला रहा है। युवाओं में नशे के विरुद्ध जागरूकता लाने के साथ ही गृहमंत्री अमित शाह ने भी नशे की जड़ों पर प्रहार करने का युद्ध छेड़ रखा हैं। ड्रग्स माफियाओं पर कार्रवाई कई गुना बढ़ गई है। तस्करी करके बड़ी मात्रा में विदेशों से आने वाली ड्रग्स की जब्ती बंदरगाहों तथा एयरपोर्ट्स की जा रही है और उसे नष्ट किया जा रहा है। वर्ष 2021 में 2988 किलो हेरेाइन, 2022 में 927 किलो गांजा, 2023 में 122 किलो मेफेड्रोन, 2024 में 770 किलो मेथाफाटेमाइन और 2026 में फिर 522 किलो गांजा बरामद किया जा चुका है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के अनुसार 2020 से मई 2025 तक तक 116 बड़े मामलों में कार्रवाई करते हुए 1,09,318 किलोग्राम नशीले पदार्थ जब्त किए गए हैं और उनको नष्ट किया गया है। वर्तामन समय में नशे का सबसे बड़ा केन्द्र पंजाब तथा पूर्वोत्तर के कई छोटे राज्य हैं। विदेशी आतंकी संगठनों द्वारा जम्मू-कश्मीर व पूर्वोत्तर के युवाओं को नशे की लत में धकेलने का प्रयास लगातार किया जा रहा है हैं। अपने कुत्सित प्रयासों को सफल बनाने के लिये ये लोग स्थानीय स्तर के अपराधियों व बिगडैल युवाओं का सहारा लेते हैं। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पंजाब में नशे के संकट पर चिंता जताते हुए कहा था कि नशा राज्य के अस्तित्व पर खतरा बन सकता है। संगठित गिरोहों की जांच में पुलिस प्रशासन के साथ ही अदालत को भी सतर्क रहना होगा। भारत में ड्रग्स की खेप कई रास्तों से आती है। बांग्लादेश-पाकिस्तान तथा नेपाल सीमा से ड्रग्स आसानी से आ-जा रहा है। गुजरात के समुद्री तट से भी नशे का कारोबार कंटेनर और समुद्री मार्ग से चलता आ रहा है हालांकि, सरकार के प्रयासों से कुछ रोकथाम हुई है किंतु खतरा बरकरार है। म्यामांर से भी ड्रग्स की तस्करी हो रही है। यही नहीं छोटे-छोटे देश मलेशिया, सिंगापुर, थाईलैंड, मालदीव, हांगकांग सहित तमाम देशों से ड्रग्स की सप्लाई अनेक प्रकार से हो रही है। पाक परस्त आतंकी संगठन ड्रोन आदि के माध्यम से सीमावर्ती क्षेत्रों में ड्रग्स, हथियार व धन को गिराते रहते हैं। इस प्रकार नशे की सप्लाई अनेक तरीकों से होती है और उन्हें भारत के किशोरों तथा युवाओं तक विभिन्न तरीकों से पहुंचाया जाता है। वर्ष 2025 में एम्स के सर्वे में पाया गया कि 11 से 14 वर्ष की उम्र में ही किशोर नशीले पदार्थों के संपर्क मे आ गए थे। इन विषम परिस्थितियों को देखते हुए यह वृहद अभियान प्रारंभ किया गया है। नशे से आतंकवाद को पनपने में बहुत मदद मिलाती है इसलिए, यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन के बाद 28 हजार से अधिक स्थानों पर एक करोड़ से अधिक युवाओं ने भाग लिया और एक साथ नशा मुक्त भारत की शपथ ली। नशामुक्ति का यह अभियान राजनीति से दूर रहकर चलना चाहिए तभी भारत के किशोर, युवा और परिवार तथा बहन-बेटियां सुरक्षित जीवन जी सकेंगी और वर्ष-2047 तक भारत विकसित भारत बनकर उभर सकेगा। - मृत्युंजय दीक्षित
अकाली दल का बड़ा ऐलान, महिला आरक्षण और परिसीमन बिल का करेगा समर्थन; भाजपा से गठबंधन के संकेत तेज
अकाली दल ने महिला आरक्षण और परिसीमन बिल के समर्थन का ऐलान किया है। सुखबीर बादल की पीएम मोदी से मुलाकात के बाद भाजपा-अकाली गठबंधन की अटकलें तेज हो गई हैं।
राघव चड्ढा की पीएम मोदी से मुलाकात, पंजाब चुनाव से पहले मिलेगी बड़ी जिम्मेदारी? बढ़ी सियासी हलचल
राघव चड्ढा ने पीएम मोदी से मुलाकात की और तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा कीं। पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले उनकी संभावित बड़ी भूमिका को लेकर सियासी अटकलें तेज हैं।
UPI के जरिए होने वाले डिजिटल भुगतान पर लग सकता है MDR चार्ज, SBI चेयरमैन ने कही यह बात
UPI पर संभावित चार्ज को लेकर पैदा हुई आशंकाओं के बीच पेमेंट्स काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) ने स्पष्ट किया है कि ग्राहकों के लिए UPI भुगतान मुफ्त बना रहेगा। छोटे कारोबारियों को भी डिजिटल पेमेंट स्वीकार करने के लिए कोई शुल्क नहीं देना होगा।
योगी सरकार UP के सभी यूनिवर्सिटी-कॉलेजों में नशा विरोधी अभियान शुरू करने जा रही। रोज नशे के खिलाफ शपथ होगी और पदार्थों की ब्रिकी पर रोक होगी।
भारत पर 100 % टैरिफ वाला बिल, यूएस सेनट से पारित हुआ है। भारत समेत 5 देश ऐसे हैं, जहां पर 100 % टैरिफ वाला बिल, यूएस में पास हो गया है। रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 % टैरिफ अब यूएस लगाएगा। 31 अगस्त को यूएस हाउस ओफ रिप्रेजेंटेटिव में रखा जाएगा, लेकिन अमेरिकी सीनेट से ये पारित हो गया है। 86 जो सीनेट के सदस्य हैं, यानि संसद उन्हों ने इसके समर्थन में वोट किया। इसके पारित होने के बाद पांच देशों के खिलाफ 100 % तक का टैरिफ लगाया जा सकता है। हालांकि कि ये पूरा अधिकार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को होगा, लेकिन अगर ये बिल पारित हो जाता है, तो भारत और वैसे देश जो रूस से सबसे अधिक मात्रा में तेल आयात करते हैं, उन पर संकट पैदा हो सकता है।लेकिन ये पूरा अधिकार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को होगा, लेकिन भारत के लिए ये ऐसा बिल है, जो आने वाले वक्त में भारत को मुश्किलों में डाल सकते हैं। इसे भी पढ़ें: Strait of Hormuz पर Iran-Oman के बीच ऐतिहासिक समझौता, US Sanctions के बीच क्या बदलेगी दुनिया की सूरत? यह विधेयक (Bill) क्या है? अमेरिकी सेनेट ने 86-11 के भारी बहुमत से लिंडसे ओ. ग्राहम सेंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 पारित किया है। इस द्विपक्षीय विधेयक का नाम दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम के नाम पर रखा गया है, जो इसके मुख्य वास्तुकारों में से एक थे। बिल का मुख्य उद्देश्य रूस और ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाना और उन देशों पर शिकंजा कसना जो मॉस्को (रूस) के साथ बड़े पैमाने पर ऊर्जा व्यापार जारी रखे हुए हैं। यह कानून अमेरिकी राष्ट्रपति को उन देशों से आयात होने वाले सामानों पर 100% तक का सीमा शुल्क लगाने का अधिकार देता है, जो रूसी तेल या प्राकृतिक गैस के दुनिया के शीर्ष 5 खरीदारों में शामिल हैं। इस विधेयक में और कौन से प्रतिबंध प्रस्तावित हैं? यह विधेयक सिर्फ रूसी तेल खरीदारों पर शुल्क लगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कई अन्य कठोर प्रतिबंध शामिल हैं। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, वरिष्ठ राजनीतिक और सैन्य अधिकारियों, और कुलीन वर्गों पर सीधे प्रतिबंध। रूस के बैंकों, वित्तीय संस्थानों और युद्ध प्रयासों को वित्तपोषित करने वाली संस्थाओं पर पाबंदी। रूस द्वारा मौजूदा प्रतिबंधों से बचने और तेल निर्यात से कमाई जारी रखने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले पुराने और दूसरे देशों के झंडे वाले तेल टैंकरों पर प्रतिबंधों का विस्तार। इसके तहत ईरान के ऊर्जा और हथियार क्षेत्रों पर प्रतिबंधों को आगे बढ़ाया गया है। रूस की अर्थव्यवस्था और उसके सैन्य अभियान को मिलने वाली फंडिंग को रोकना। इसे भी पढ़ें: Iran के पास कभी नहीं होंगे Nuclear Weapons, बातचीत से गिरेंगे Oil Prices, जेडी वेंस का दावा भारत के सामने जल्द क्या चुनौती आ सकती है? यदि यह विधेयक पूरी तरह से कानून बनता है, तो राष्ट्रपति के पास शीर्ष 5 रूसी तेल खरीदारों से अमेरिका आने वाले सामानों पर 100% शुल्क लगाने की शक्ति होगी। भारत और चीन दुनिया में रूसी कच्चे तेल के सबसे बड़े खरीदारों में से हैं। इस कानून की संरचना ऐसे की गई है कि देशों को अमेरिका के साथ व्यापार बनाए रखने और रूस से सस्ता तेल खरीदने में से किसी एक को चुनना पड़े। डार्लीन ग्राहम (दिवंगत सीनेटर की बहन) ने कहा कि यह विधेयक रूस की अर्थव्यवस्था को संभाले रखने वाले प्रमुख देशों को एक सरल लेकिन महत्वपूर्ण विकल्प चुनने के लिए मजबूर करता है – अमेरिका के साथ व्यापार करने का विकल्प या रूस से सस्ता तेल खरीदने का विकल्प। भारत चर्चा में क्यों है? 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से भारत ने रियायती दरों पर रूसी कच्चा तेल खरीदना काफी बढ़ा दिया है। रूस पहले भारत के लिए तेल का कोई बड़ा सप्लायर नहीं था, लेकिन मॉस्को और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू होने और यूरोप द्वारा रूसी कच्चा तेल खरीदना बंद करने के बाद, यह भारत के लिए भारी छूट पर उपलब्ध हो गया। इस बदलाव से भारतीय रिफाइनरों को कच्चे तेल की लागत कम करने और ग्लोबल एनर्जी मार्केट में रुकावटों के बावजूद सप्लाई सुनिश्चित करने में मदद मिली है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से शिपिंग में रुकावटों के बीच रूसी तेल पर निर्भरता और भी महत्वपूर्ण हो गई है, क्योंकि इन रुकावटों ने मध्य पूर्व से ऊर्जा की सप्लाई को प्रभावित किया है। नई दिल्ली ने बार-बार कहा है कि उसकी ऊर्जा खरीद राष्ट्रीय हित, ऊर्जा सुरक्षा और किफायती व भरोसेमंद सप्लाई सुनिश्चित करने की ज़रूरत से तय होती है। भारत पहले से ही टैरिफ़ के दबाव का सामना कर रहा है यह प्रस्तावित कानून तब आया है जब वाशिंगटन पहले ही रूस से तेल खरीदने के लिए भारत पर अतिरिक्त शुल्क लगा चुका है। हालाँकि, पहले उठाए गए कदमों से भारतीय रिफाइनर रूस से कच्चा तेल खरीदने से तुरंत नहीं रुके। मध्य पूर्व में चल रहे संघर्ष से ऊर्जा बाज़ार प्रभावित हो रहे हैं और इस क्षेत्र से होने वाली सप्लाई को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है, ऐसे में भारतीय रिफाइनरों के लिए रूसी कच्चा तेल एक महत्वपूर्ण स्रोत बना हुआ है। एक रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, अकेले जून 2026 में भारत का रूसी तेल का आयात 34% बढ़ गया। अमेरिका ने 100% टैरिफ लगा दिया तो क्या होगा? अगर बड़े पैमाने पर 100% टैरिफ लगाया जाता है, तो अमेरिकी इंपोर्टर्स के लिए भारतीय सामान काफी महंगे हो जाएंगे। इसका असर खास तौर पर इंजीनियरिंग के सामान, फार्मास्यूटिकल्स, केमिकल्स, टेक्सटाइल्स और ऑटो पार्ट्स जैसे एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड सेक्टर पर पड़ सकता है। अगर भारतीय प्रोडक्ट्स काफी महंगे हो जाते हैं, तो अमेरिकी खरीदार दूसरे देशों में वैकल्पिक सप्लायर्स की तलाश कर सकते हैं। नतीजतन, भारतीय एक्सपोर्टर्स को कम डिमांड, कम मार्जिन या कॉम्पिटिटिव बने रहने के लिए अतिरिक्त लागत का कुछ हिस्सा खुद उठाने की ज़रूरत का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे टैरिफ का खतरा भारतीय कंपनियों को अपने एक्सपोर्ट मार्केट में विविधता लाने और पॉलिसी बनाने वालों पर वाशिंगटन के साथ बातचीत करने का दबाव बढ़ाने के लिए भी प्रेरित कर सकता है। कुछ अमेरिकी सांसद क्यों इसके विरोध में हैं? हालांकि बिल को सीनेट का भारी समर्थन मिला, लेकिन कुछ सांसदों ने ट्रंप को टैरिफ लगाने के लिए व्यापक अधिकार देने पर चिंता जताई है। आलोचकों का तर्क है कि टैरिफ से अमेरिकी कंज्यूमर्स और बिज़नेस के लिए लागत बढ़ सकती है, ऐसे समय में जब परिवारों को पहले से ही रहने-सहने के ऊंचे खर्चों का सामना करना पड़ रहा है। सीनेटर रॉन वाइडेन ने कहा कि अमेरिका में ऐसे लोग हैं जो आर्थिक रूप से बहुत मुश्किल हालात (आर्थिक तंगी) से गुज़र रहे हैं। रिपब्लिकन सीनेटर रैंड पॉल और वाइडेन द्वारा नए टैरिफ अधिकार को हटाने के लिए लाए गए एक संशोधन को सीनेट ने खारिज कर दिया। सीनेटर राफेल वार्नॉक, जिन्होंने टैरिफ प्रावधानों पर चिंता जताई थी, ने कहा कि उन्हें ट्रंप प्रशासन से सुरक्षा उपायों के बारे में लिखित आश्वासन मिला है। वार्नॉक ने कहा हमें पुतिन की आक्रामकता पर रोक लगाने और इस राष्ट्रपति के टैरिफ सिस्टम पर रोक लगाने के बीच चुनाव नहीं करना चाहिए। अगर ट्रंप अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल करते हैं, तो हम उन्हें कोर्ट में देखेंगे। विधेयक में ईरान को भी निशाना क्यों बनाया गया है? यह विधेयक ईरान सेंक्शन एक्ट ऑफ 1996 की अवधि को बढ़ाकर 2031 तक करने का प्रस्ताव रखता है। इसका मुख्य उद्देश्य ईरान के ऊर्जा क्षेत्र पर आर्थिक दबाव बनाए रखना है। यह विधेयक वॉशिंगटन (अमेरिका) के दो सबसे बड़े भू-राजनीतिक विरोधियों रूस और ईरान को एक साथ निशाना बनाता है। छूट किसे और कैसे मिल सकती है? विधेयक में कुछ शर्तों के तहत देशों को प्रतिबंधों या टैरिफ से छूट देने का प्रावधान है। जैसे यदि कोई देश रूस के कुल प्राकृतिक गैस निर्यात का 15% से कम आयात करता है और रूसी ऊर्जा पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए कदम उठा रहा है, तो वह छूट का पात्र हो सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति के पास यह अधिकार होगा कि यदि उन्हें लगता है कि ऐसा करना अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है, तो वे किसी भी देश पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों या शुल्कों को टाल या माफ कर सकते हैं। आगे क्या होगा? सेनेट से पारित होने के बाद यह विधेयक अब अमेरिकी संसद के निचले सदन 'हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स' में जाएगा। अगस्त के अंत में जब सांसद छुट्टियों से वापस लौटेंगे, तब इस पर विचार होने की संभावना है। इस बिल को कानून बनने और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के पास हस्ताक्षर के लिए भेजने से पहले निचले सदन द्वारा पास किया जाना अनिवार्य है। इसका मतलब है कि नया टैरिफ लागू होने से पहले अभी भी एक महत्वपूर्ण विधायी और राजनयिक प्रक्रिया बाकी है।
अगर भारत-पाक युद्ध हुआ तो क्या India के खिलाफ अपनी सेना उतारेंगे Turkey और Saudi Arabia?
नाटो के भीतर जब अमेरिका और उसके सहयोगियों के बीच भरोसे की दरारें गहरी हो रही हैं, ठीक उसी समय पश्चिम एशिया में एक नया शक्ति-केंद्र खड़ा करने की कोशिश शुरू हो गई है। मक्का में तुर्किये, सऊदी अरब और पाकिस्तान ने ऐसा रक्षा समझौता किया है, जिसकी सबसे अहम लाइन में साफ कहा गया है कि तीनों में से किसी एक पर हमला हुआ तो उसे तीनों पर हमला माना जाएगा। यही वह बिंदु है, जो इस समझौते को सामान्य सैन्य सहयोग से उठाकर एक संभावित नए क्षेत्रीय सुरक्षा गठबंधन में बदल देता है। हालांकि इसे अभी आधिकारिक तौर पर ‘सुन्नी नाटो’ कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन इसके भीतर उसकी बुनियादी तस्वीर जरूर दिखाई देने लगी है। देखा जाये तो मक्का में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन का एक मंच पर आना अपने आप में बड़ा संदेश है। खास बात यह है कि यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब पश्चिम एशिया पहले ही ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव की आग में झुलस रहा है। सऊदी अरब पर ईरान और उसके सहयोगी संगठनों के हमलों का खतरा है। पाकिस्तान अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है और तुर्किये पश्चिम एशिया में अपनी भूमिका लगातार बढ़ा रहा है। यानी तीनों देश एक-दूसरे की जरूरत बन गए हैं। इसे भी पढ़ें: Iran ने Saudi Arabia, पाकिस्तान और Turkey के रक्षा समझौते को बताया बेअसर क्यों हुआ त्रि-पक्षीय समझौता? वर्तमान हालात को देखें तो सऊदी को चाहिए सुरक्षा, पाकिस्तान को पैसा और तुर्किये को ताकत, इसलिए तीनों एक साथ आ गये हैं। हालांकि इस गठजोड़ को समझने के लिए तीनों देशों के हितों को अलग-अलग देखना होगा। सबसे पहले सऊदी अरब की बात करें तो उसके सामने सबसे बड़ा सवाल सुरक्षा का है। दशकों तक रियाद ने अमेरिकी सुरक्षा छाते पर भरोसा किया। लेकिन अब सऊदी नेतृत्व यह मानकर चल रहा है कि बदलती अमेरिकी नीति में किसी एक बाहरी शक्ति पर पूरी तरह निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। ईरान और उसके सहयोगियों की मिसाइल तथा ड्रोन क्षमता ने इस खतरे को और वास्तविक बना दिया है। ऐसे में सऊदी अरब ने अपना सुरक्षा कवच चौड़ा करना शुरू किया है। पाकिस्तान उसके लिए स्वाभाविक साझेदार है। पाकिस्तानी सेना दशकों से सऊदी सुरक्षा बलों को प्रशिक्षण देती रही है और हाल के महीनों में पाकिस्तान ने सऊदी अरब में सैनिकों, लड़ाकू विमानों, ड्रोन और वायु रक्षा प्रणालियों की मौजूदगी भी बढ़ाई है। वहीं पाकिस्तान की जरूरत बिल्कुल दूसरी है। आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान को सऊदी अरब से निवेश और आर्थिक मदद चाहिए, जबकि तुर्किये से रक्षा तकनीक और सैन्य सहयोग चाहिए। बदले में पाकिस्तान अपनी सेना और परमाणु क्षमता को मुस्लिम दुनिया की सुरक्षा में सबसे बड़ा सैन्य योगदान बताकर अपनी भू-राजनीतिक अहमियत बढ़ाना चाहता है। वहीं तुर्किये की बात करें तो एर्दोगन लंबे समय से अपने देश को सिर्फ नाटो का सदस्य नहीं, बल्कि मुस्लिम दुनिया की एक स्वतंत्र शक्ति के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। तुर्किये के पास अत्याधुनिक ड्रोन, रक्षा उद्योग और बड़ी सैन्य ताकत है। पाकिस्तान के साथ उसका रक्षा सहयोग पहले ही तेजी से बढ़ चुका है। यह गठबंधन किसके खिलाफ है? अब सवाल उठता है कि यह गठबंधन किसके खिलाफ है? इस सवाल का जवाब हालांकि तीनों देशों ने नहीं में दिया है। तुर्किये ने साफ कहा है कि समझौता रक्षात्मक है, यह किसी खास देश या संगठन को निशाना नहीं बनाता और दूसरे क्षेत्रीय देशों के लिए भी खुला है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सिर्फ दस्तावेज की भाषा नहीं देखी जाती, टाइमिंग भी देखी जाती है। और इस समझौते की टाइमिंग बहुत कुछ कहती है क्योंकि इस समय ईरान और सऊदी अरब के बीच तनाव चरम पर है। ईरान समर्थित हूती, इराकी मिलिशिया और अन्य समूहों की गतिविधियों ने खाड़ी देशों की सुरक्षा चिंता बढ़ाई है। दूसरी तरफ इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष ने पूरे क्षेत्र को बारूद के ढेर में बदल दिया है। इसलिए यह समझौता भले ही ईरान का नाम न ले, लेकिन ईरान के लिए इसका संदेश साफ है कि सऊदी अरब अब अकेला नहीं है। ईरान की बढ़ेंगी मुश्किलें वहीं इस समझौते के बाद ईरान के लिए नई चुनौती खड़ी हो गयी है। तेहरान अब तक पश्चिम एशिया में अपने प्रभाव का बड़ा हिस्सा सहयोगी और प्रॉक्सी संगठनों के नेटवर्क के जरिए कायम करता रहा है। लेकिन यदि सऊदी अरब को पाकिस्तान की सैन्य क्षमता और तुर्किये की रक्षा तकनीक का समर्थन मिलने लगे तो क्षेत्रीय समीकरण बदल सकते हैं। यही कारण है कि मक्का समझौते को ईरान के खिलाफ सीधा सैन्य गठबंधन नहीं होते हुए भी ईरान के लिए रणनीतिक चुनौती जरूर माना जा सकता है। इजराइल-अमेरिका को भी संदेश दिलचस्प बात यह है कि इस गठबंधन का एक और बड़ा संदेश इजरायल के लिए भी है। पश्चिम एशिया में जिस ‘सुन्नी धुरी’ की चर्चा लंबे समय से होती रही है, वह अब सिर्फ राजनीतिक अवधारणा नहीं रहना चाहती। साथ ही यह अमेरिका के लिए भी खतरे की घंटी है और यह समझौता वाशिंगटन के लिए भी सुखद खबर नहीं है। दरअसल सऊदी अरब और तुर्किये दोनों अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था के पुराने साझेदार हैं। लेकिन यदि यही देश अपनी सुरक्षा के लिए अलग क्षेत्रीय सैन्य ढांचा बनाने लगें तो इसका अर्थ साफ है कि अमेरिकी सुरक्षा छतरी पर भरोसा कम हो रहा है। यही इस समझौते का सबसे बड़ा दीर्घकालिक रणनीतिक अर्थ हो सकता है। सुन्नी नाटो सिर्फ कल्पना है या हकीकत? इसके अलावा, यदि मक्का मॉडल सफल होता है और उसमें दूसरे सुन्नी देश शामिल होते हैं, तो पश्चिम एशिया में अमेरिका के नेतृत्व वाली सुरक्षा व्यवस्था के समानांतर एक क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचा खड़ा हो सकता है। सवाल उठता है कि इसमें और कौन-से देश शामिल हो सकते हैं? इसके जवाब में कतर, मिस्र, संयुक्त अरब अमीरात और सीरिया जैसे देशों के नाम संभावित सदस्य के रूप में सामने आ रहे हैं। हालांकि यह भी एक तथ्य है कि यूएई की कई क्षेत्रीय मुद्दों पर सऊदी अरब और तुर्किये से अलग नीति रही है। साथ ही मिस्र भी किसी ऐसे सैन्य गठबंधन में फंसना नहीं चाहेगा जो उसे सीधे किसी क्षेत्रीय युद्ध में धकेल दे। वहीं सीरिया अपनी युद्धोत्तर परिस्थितियों से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा है। इसलिए ‘सुन्नी नाटो’ का विस्तार संभव जरूर है, लेकिन आसान नहीं है। त्रि-पक्षीय समझौते का भारत पर क्या होगा असर? अब सवाल यह है कि इस रक्षा समझौते का भारत पर क्या असर पड़ेगा और अगर भारत-पाकिस्तान के बीच फिर सैन्य टकराव हुआ तो क्या तुर्किये और सऊदी अरब पाकिस्तान के साथ खड़े होंगे और भारत के खिलाफ युद्ध लड़ेंगे? देखा जाये तो भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता पाकिस्तान की बढ़ती रणनीतिक क्षमता है। तुर्किये पहले से ही पाकिस्तान का करीबी सैन्य साझेदार है और कश्मीर से लेकर रक्षा सहयोग तक उसका रुख भारत के लिए चिंता का विषय रहा है। 2025 के भारत-पाकिस्तान सैन्य टकराव में भी अंकारा ने खुलकर पाकिस्तान का समर्थन किया था। ऐसे में भविष्य में पाकिस्तान को तुर्किये से ड्रोन, हथियार, तकनीक, खुफिया सहयोग और सैन्य सहायता का अधिक संगठित समर्थन मिल सकता है। हालांकि सऊदी अरब को तुर्किये के साथ एक ही नजर से देखना सही नहीं होगा क्योंकि रियाद के पाकिस्तान से गहरे रक्षा संबंध जरूर हैं, लेकिन भारत भी उसके लिए ऊर्जा, व्यापार, निवेश और रणनीतिक सहयोग का अहम साझेदार है। इसलिए भारत-पाकिस्तान संघर्ष की स्थिति में तुर्किये का पाकिस्तान के पक्ष में खुलकर खड़ा होना ज्यादा संभावित है, जबकि सऊदी अरब के लिए सीधे भारत के खिलाफ युद्ध में उतरना आसान नहीं होगा। वह पाकिस्तान को राजनीतिक, आर्थिक या सीमित सैन्य-लॉजिस्टिक मदद दे सकता है, लेकिन मक्का समझौते की मौजूदा सार्वजनिक भाषा से यह नहीं कहा जा सकता कि पाकिस्तान पर हमले की स्थिति में सऊदी और तुर्किये अपने आप भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ देंगे। यही वजह है कि भारत के लिए असली चिंता इस समझौते की ‘सामूहिक युद्ध’ वाली भाषा से ज्यादा पाकिस्तान को मिलने वाली संभावित अतिरिक्त सैन्य और रणनीतिक ताकत है। पाकिस्तान का विरोधाभास हालांकि इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान का सबसे बड़ा विरोधाभास भी सबके सामने आया है। जिस देश की अपनी सीमाओं पर लगातार तनाव है, जिसे अफगानिस्तान सीमा पर संघर्ष का सामना करना पड़ रहा है, जिसके बलूचिस्तान प्रांत ने आजादी का ऐलान कर दिया है, जिसके अवैध कब्जे वाले पीओके में विद्रोह और दमन तेज होता जा रहा है, वह देश अब मुस्लिम दुनिया की सामूहिक सुरक्षा का प्रहरी बनने की भूमिका तलाश रहा है। देखा जाये तो पाकिस्तान के आंतरिक संकटों के बीच यह समझौता उसके लिए अपनी अंतरराष्ट्रीय प्रासंगिकता दिखाने का अवसर भी बन गया है। कई सवालों के जवाब समय देगा वैसे मक्का समझौते की असली परीक्षा तब होगी जब तीनों में से किसी एक पर वास्तविक सैन्य हमला होगा। अगर सऊदी अरब पर हूती या किसी अन्य ईरान समर्थित समूह का बड़ा हमला होता है, तो क्या पाकिस्तान और तुर्किये युद्ध में उतरेंगे? अगर पाकिस्तान पर हमला होता है, तो क्या सऊदी अरब और तुर्किये सैनिक भेजेंगे? और अगर भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध होता है, तो क्या रियाद अपने भारत संबंधों को दांव पर लगाकर इस्लामाबाद के साथ खड़ा होगा? इन सवालों का जवाब अभी किसी के पास नहीं है। लेकिन एक बात साफ है कि मक्का में सिर्फ एक समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हुए हैं। पश्चिम एशिया में शक्ति के नए समीकरण की नींव रखी गई है। बहरहाल, नाटो की छतरी के नीचे मतभेद बढ़ रहे हैं और उसी समय मुस्लिम दुनिया के तीन देश अपनी सुरक्षा को एक-दूसरे से जोड़ रहे हैं। अभी इसे ‘सुन्नी नाटो’ कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन यदि इसमें दूसरे देश जुड़ते हैं, संयुक्त सैन्य अभ्यास बढ़ते हैं, खुफिया और हथियार सहयोग संस्थागत होता है और ‘एक पर हमला, सभी पर हमला’ सिर्फ कागज की लाइन न रहकर वास्तविक सैन्य नीति बन जाती है, तो आने वाले वर्षों में पश्चिम एशिया का नक्शा बदल सकता है। -नीरज कुमार दुबे
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मुंबई, भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के तहत मुंबई में गुरुवार से ब्रिक्स वेव्स बाजार 2026 का शुभारंभ हुआ।
मोहन भागवत का युवाओं से संवाद राष्ट्र निर्माण की दिशा में अहम कदम: सतीश महाना
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पंजाब में 2027 का विधानसभा चुनाव बेहद दिलचस्प होने की संभावना है। राज्य में आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, भाजपा और शिरोमणि अकाली दल प्रमुख राजनीतिक ताकतों के रूप में चुनाव मैदान में उतर सकते हैं। यदि भाजपा और अकाली दल के बीच दोबारा गठबंधन होता है, तो इसका असर चुनावी गणित पर पड़ सकता है।
FCRA Bill पर हल्ला मचा रहे विपक्षी दलों और ईसाई संगठनों को मार्को रुबियो का बयान सुनना चाहिए
केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) संशोधन विधेयक को लेकर देश में तो इस समय व्यापक बहस छिड़ी ही हुई है, साथ ही इसकी गूंज अमेरिका तक सुनाई दे रही है। दिलचस्प बात यह है कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो पहले स्वयं यह कह चुके हैं कि किसी भी देश में विदेशी फंड से संचालित संस्थाओं को वहां की संप्रभु सरकार के समानांतर व्यवस्था नहीं चलानी चाहिए और उन्हें मेजबान देश के कानूनों का सम्मान करना चाहिए। इसके बावजूद अमेरिकी सांसद राइली मूर भारत के प्रस्तावित कानून की आलोचना कर रहे हैं। दूसरी ओर, मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात के बाद स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार ने उन्हें आश्वस्त किया है कि प्रस्तावित संशोधन को पूर्व प्रभाव (रेट्रोस्पेक्टिव) से लागू नहीं किया जाएगा। इन घटनाक्रमों के बीच मोदी सरकार का स्पष्ट संदेश है कि विदेशी धन प्राप्त करने वाले संगठनों के संचालन में पारदर्शिता, जवाबदेही और भारतीय कानूनों का पालन सर्वोच्च प्राथमिकता रहेगा। हम आपको बता दें कि केंद्र सरकार के आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में एफसीआरए के तहत पंजीकृत सक्रिय संगठनों की संख्या घटी है, लेकिन विदेशी चंदे का प्रवाह बना हुआ है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2024-25 में 16,200 संगठनों को लगभग 22,963 करोड़ रुपये का विदेशी योगदान प्राप्त हुआ। वहीं बड़ी संख्या में ऐसे संगठनों के एफसीआरए लाइसेंस निरस्त या समाप्त भी किए गए हैं। सरकार का कहना है कि केवल वैध पंजीकरण रखने वाले संगठनों को ही विदेशी धन प्राप्त करने और उसका उपयोग करने का अधिकार होना चाहिए। इसे भी पढ़ें: संसद में सत्ता-विपक्ष की टकरार! Kharge के दावे पर Kiren Rijiju का तीखा वार हम आपको बता दें कि सरकार द्वारा लाए गए संशोधन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यदि किसी संस्था का एफसीआरए पंजीकरण समाप्त हो जाता है, रद्द हो जाता है, नवीनीकृत नहीं होता या संस्था स्वयं उसे छोड़ देती है, तो विदेशी धन से निर्मित परिसंपत्तियों के प्रबंधन के लिए एक नामित प्राधिकरण की व्यवस्था की जाएगी। यदि बाद में संस्था का पंजीकरण बहाल हो जाता है तो संबंधित संपत्तियां और अप्रयुक्त विदेशी योगदान वापस कर दिए जाएंगे। यदि ऐसा नहीं होता, तो कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी। केंद्र सरकार का तर्क है कि यह व्यवस्था किसी नए अधिकार का सृजन नहीं, बल्कि पहले से मौजूद प्रावधानों को अधिक स्पष्ट और व्यवस्थित बनाने का प्रयास है। वहीं प्रस्तावित संशोधन को लेकर कुछ चर्च संगठनों ने आशंकाएं भी व्यक्त की हैं। उनका कहना है कि कानून की कुछ धाराएं अत्यधिक कठोर हैं और उन्हें संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजा जाना चाहिए। इसी उद्देश्य से विभिन्न चर्च संगठनों के प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की और अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं। वहीं मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने अमित शाह के साथ बैठक के बाद कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री ने स्पष्ट आश्वासन दिया है कि प्रस्तावित संशोधन को पूर्व प्रभाव से लागू नहीं किया जाएगा। हम आपको यह भी बता दें कि केंद्र सरकार ने इन आशंकाओं का विस्तार से जवाब भी दिया है। सरकार का कहना है कि प्रस्तावित कानून किसी विशेष धर्म, समुदाय या विचारधारा को निशाना नहीं बनाता। एफसीआरए के प्रावधान सभी विदेशी चंदा प्राप्त करने वाले संगठनों पर समान रूप से लागू होते हैं। केंद्र सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि किसी धार्मिक स्थल से जुड़ी संपत्ति का मामला आता है तो उसके धार्मिक स्वरूप को कानूनन सुरक्षित रखा जाएगा। साथ ही, नामित प्राधिकरण के आदेश अंतिम नहीं होंगे और उनके विरुद्ध न्यायालय में अपील का अधिकार भी उपलब्ध रहेगा। उधर, इस पूरे विवाद का अंतरराष्ट्रीय पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। अमेरिकी सांसद राइली मूर ने आरोप लगाया कि यह कानून चर्चों और ईसाई संस्थाओं के खिलाफ है। हालांकि स्वयं अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने पिछले वर्ष यह कहा था कि विदेशी सहायता कार्यक्रम मेजबान देशों की सरकारों के समानांतर नहीं चलने चाहिए और विदेशी वित्तपोषित संस्थाओं को संबंधित देश की नीतियों और कानूनों के अनुरूप काम करना चाहिए। यही कारण है कि भारत के संदर्भ में उठ रही आलोचना पर दोहरे मापदंड का प्रश्न भी सामने आया है। देखा जाये तो लोकतंत्र में किसी भी कानून पर बहस और समीक्षा का अधिकार सभी को है, लेकिन भारत की संप्रभुता और राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हैं। यदि कोई संगठन विदेशी चंदे के सहारे पूरी पारदर्शिता और भारतीय कानूनों का पालन करते हुए जनकल्याण का कार्य करता है, तो उसके लिए इस कानून से घबराने का कोई कारण नहीं होना चाहिए। इसके विपरीत, जिन संस्थाओं या तत्वों ने विदेशी धन का उपयोग नियमों से इतर गतिविधियों, अपारदर्शी वित्तीय लेन-देन या भारत में अस्थिरता और अशांति फैलाने के प्रयासों के लिए किया है, उनके लिए स्वाभाविक रूप से चिंता की स्थिति पैदा हो सकती है क्योंकि प्रस्तावित संशोधन निगरानी, जवाबदेही और कानूनी अनुपालन को और मजबूत करने का प्रयास करता है। मोदी सरकार का कहना है कि यह कानून किसी धर्म या समुदाय को लक्षित नहीं करता, बल्कि विदेशी अंशदान के नियमन और पारदर्शिता के लिए समान रूप से लागू होगा। ऐसे में यदि विदेशी फंडिंग के नाम पर नियमों की अनदेखी करने वालों की मुश्किलें बढ़ती हैं, तो इसे कानून के दायरे में जवाबदेही सुनिश्चित करने की प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए। बहरहाल, संसद में होने वाली चर्चा के बाद कानून का अंतिम स्वरूप तय होगा, लेकिन यह स्पष्ट है कि विदेशी धन के उपयोग पर प्रभावी निगरानी और राष्ट्रीय हितों की रक्षा किसी भी संप्रभु राष्ट्र की वैध जिम्मेदारी है। -नीरज कुमार दुबे
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पहली तिमाही में बेहतर रहे भारतीय कंपनियों के नतीजे
नई दिल्ली, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में भारतीय कंपनियों के नतीजे उम्मीद से बेहतर रहे हैं।
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असम के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा ने छात्रों से की अपील, कहा- डिग्री के साथ स्किल भी जरूरी, तभी मिलेंगे रोजगार के मौके
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भाजपा नेता ने मौलाना रशीदी की मानसिकता पर उठाए सवाल, भागवत की जेन-जी से बातचीत की सराहना की
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तमिलनाडु: सीएम विजय ने 8 अगस्त को परिसीमन पर सांसदों की बुलाई बैठक
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पंजाब में ऋण चुकाने की लागत कुल राजस्व के 23 प्रतिशत से अधिक: मनीष तिवारी
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मेघालय: विपक्षी दल ने प्रमुख सार्वजनिक मुद्दों पर कार्रवाई की मांग को लेकर निकाला मार्च
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'कर्मों का फल भुगतना पड़ता है', अतीक अहमद के बेटे की मौत पर बोले भाजपा विधायक
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'भाखड़ा बांध पूरी तरह सुरक्षित है', पंजाब के मंत्री ने विधानसभा को बताया
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1 लाख से अधिक गैर-मराठी चालकों ने व्यावहारिक मराठी सीखी: मंत्री प्रताप सरनाइक
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राज्यसभामेंनीरजडांगीकोबड़ीजिम्मेदारी, राजस्थानकांग्रेसकीराजनीतिमेंबढ़ाकदसंगठनमेंबदलेसमीकरण
नईदिल्ली/जयपुर. कांग्रेसनेतृत्वनेराज्यसभासांसदनीरजडांगीकोराज्यसभामेंपार्टीकासचेतक (व्हिप) नियुक्तकरनकेवलसंसदमेंउन्हेंमहत्वपूर्णजिम्मेदारीसौंपीहै, बल्किइसफैसलेकोराजस्थानकांग्रेसकीराजनीतिकेलिहाजसेभीएकबड़ेसंदेशकेरूपमेंदेखाजारहाहै. कांग्रेससंसदीयदलकीअध्यक्षसोनियागांधीकेनिर्देशपरजारीइसनियुक्तिनेयहसंकेतदियाहैकिपार्टीकाशीर्षनेतृत्वनीरजडांगीपरलगातारभरोसाजतारहाहै. राजनीतिकविश्लेषकोंकामाननाहैकियहफैसलाराजस्थानकांग्रेसमेंडांगीकीसंगठनात्मकऔरराजनीतिकभूमिकाकोऔरमजबूतकरेगा. राज्यसभामेंव्हिपकेरूपमेंनीरजडांगीअबपार्टीसांसदोंकेबीचसमन्वयस्थापितकरने, सदनमेंउनकीउपस्थितिसुनिश्चितकरने, महत्वपूर्णविधेयकोंपरपार्टीलाइनकेअनुरूपमतदानकरानेऔरसंसदीयरणनीतिकोप्रभावीढंगसेलागूकरानेकीजिम्मेदारीनिभाएंगे. संसदमेंयहपदसंगठनात्मकदृष्टिसेअत्यंतमहत्वपूर्णमानाजाताहैऔरआमतौरपरयहजिम्मेदारीउन्हींनेताओंकोदीजातीहै, जिनपरपार्टीनेतृत्वकोपूर्णविश्वासहोताहै. डांगीकीनियुक्तिऐसेसमयहुईहैजबकांग्रेसआगामीविधानसभाचुनावोंकीतैयारियोंकेसाथसंगठनकोमजबूतकरनेकीरणनीतिपरकामकररहीहै. ऐसेमेंराजस्थानसेजुड़ेएकनेताकोसंसदमेंअहमजिम्मेदारीमिलनाप्रदेशकीराजनीतिमेंभीविशेषमहत्वरखताहै. इसेकांग्रेसहाईकमानद्वाराराजस्थानइकाईकोदियागयाएकसकारात्मकराजनीतिकसंकेतमानाजारहाहै. राजनीतिकविश्लेषकोंकाकहनाहैकिनीरजडांगीलंबेसमयसेपूर्वमुख्यमंत्रीअशोकगहलोतकेविश्वस्तसहयोगीमानेजातेहैं. हालांकिउनकीनईजिम्मेदारीकोकेवलकिसीएकगुटसेजोड़करदेखनाउचितनहींहोगा. इसेकांग्रेसनेतृत्वद्वारासंगठनात्मकअनुभवऔरसंसदीयक्षमताकेआधारपरकियागयानिर्णयमानाजारहाहै. इससेयहसंकेतभीमिलताहैकिपार्टीराजस्थानकेअनुभवीनेताओंकोराष्ट्रीयस्तरपरअधिकजिम्मेदारियांदेनेकीनीतिपरआगेबढ़रहीहै. डांगीकीनियुक्तिकाअसरराजस्थानकांग्रेसकेभीतरउनकेराजनीतिकप्रभावकोबढ़ानेवालामानाजारहाहै. संगठनात्मकबैठकों, उम्मीदवारचयनऔरसंसदीयमामलोंमेंउनकीरायपहलेकीतुलनामेंअधिकमहत्वपूर्णहोसकतीहै. साथहीकार्यकर्ताओंकेबीचभीउनकाराजनीतिककदमजबूतहोनेकीसंभावनाजताईजारहीहै. हालांकिइससेप्रदेशकांग्रेसकेअंदरकिसीतत्कालराजनीतिकबदलावयाशक्तिसंतुलनमेंपरिवर्तनकानिष्कर्षनिकालनाअभीजल्दबाजीहोगी. नीरजडांगीकाराजनीतिकसफरसंघर्षऔरसंगठनात्मकसक्रियतासेजुड़ारहाहै. वर्ष 2004 से 2009 तकउन्होंनेराजस्थानयुवाकांग्रेसकेप्रदेशअध्यक्षकेरूपमेंसंगठनकोमजबूतकिया. विधानसभाचुनावोंमेंहारकेबावजूदउन्होंनेपार्टीनहींछोड़ीऔरलगातारसंगठनकेलिएकार्यकरतेरहे. इसीनिष्ठाऔरअनुभवकेआधारपरकांग्रेसनेउन्हेंवर्ष 2020 मेंपहलीबारराज्यसभाभेजाऔरवर्ष 2026 मेंलगातारदूसरीबारराज्यसभासदस्यबनाया. अबव्हिपकीजिम्मेदारीदेकरपार्टीनेउनकेप्रतिअपनाविश्वासऔरमजबूतकरदियाहै. राजनीतिकजानकारोंकामाननाहैकिसंसदमेंसक्रियभूमिकानिभानेवालेनेताओंकोभविष्यमेंसंगठनऔरसरकारसेजुड़ेबड़ेदायित्वभीमिलसकतेहैं. हालांकियहभविष्यकीराजनीतिकपरिस्थितियोंऔरपार्टीकेनिर्णयोंपरनिर्भरकरेगा. फिलहालइतनास्पष्टहैकिराज्यसभामेंव्हिपबनाएजानेकेबादनीरजडांगीकाराष्ट्रीयस्तरपरराजनीतिकमहत्वबढ़ाहैऔरराजस्थानकांग्रेसमेंभीउनकीभूमिकापहलेसेअधिकप्रभावशालीमानीजाएगी. कांग्रेसकीयहनियुक्तिकेवलसंसदीयव्यवस्थातकसीमितनहींमानीजारही, बल्किइसेराजस्थानमेंपार्टीसंगठनकोमजबूतकरनेऔरअनुभवीनेतृत्वकोराष्ट्रीयस्तरपरआगेलानेकीरणनीतिकाहिस्साभीमानाजारहाहै. आनेवालेसमयमेंयहदेखनामहत्वपूर्णहोगाकिसंसदऔरसंगठनदोनोंस्तरोंपरनीरजडांगीइसनईजिम्मेदारीकाकिसतरहनिर्वहनकरतेहैंऔरइसकाराजस्थानकांग्रेसकीराजनीतिपरकितनाव्यापकप्रभावपड़ताहै.
सीएम सुवेंदु अधिकारी ने कोलकाता में 27 अवैध इमारतों के मामले में लाइव पूछताछ की चेतावनी दी
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बिहार सरकार ने एमएसएमई के लिए अलग निदेशालय बनाया, पहली बार छोटे उद्योगों की चिंता : श्याम सुंदर भीमसरिया
तमिलनाडु: उदयनिधि ने सीएम विजय को कावेरी विवाद पर विपक्ष के सवालों का जवाब देने की चुनौती दी
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माइक से ध्वनि प्रदूषण न फैलाएं, टीएमसी ने राज्य का माहौल बिगाड़ा : समिक भट्टाचार्य
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सरकार हर मुद्दे पर चर्चा को तैयार, विपक्ष सिर्फ बयानबाजी कर रहा: भाजपा सांसद नरेश बंसल
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सीबीआई की कार्रवाई, 2021 बंगाल चुनाव के बाद हिंसा में हुई हत्या के मामले में घोषित अपराधी गिरफ्तार
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सदन का वॉकआउट करके कांग्रेस खुद को पहुंचा रही नुकसान, सरकार चर्चा के लिए तैयार : किरेन रिजिजू
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वाईएसआरसीपी सांसदों ने केंद्र सरकार से वाईएस जगन की सुरक्षा पर दखल देने की मांग की
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पश्चिम बंगाल में मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने पर सियासत, इमाम बोले- बनाया जा रहा दबाव
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बिहार में राहुल गांधी और अन्य विपक्षी सांसदों के खिलाफ अदालत में शिकायत दर्ज
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दिल्ली विधानसभा स्पीकर ने मानसून सत्र से पहले सुरक्षा व्यवस्था का लिया जायजा
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संसद नहीं चलने देना विपक्ष की साजिश, सरकार हर मुद्दे पर बहस के लिए तैयार : भाजपा
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राजस्थान के मुख्यमंत्री विधानसभा सत्र से पहले दिल्ली पहुंचे, गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की
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नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश में भूस्खलन: राहुल गांधी, प्रियंका-खड़गे ने घायलों के जल्द स्वस्थ होने की कामना की
तमिलनाडु ने धान किसानों की सुरक्षा के लिए 34.72 करोड़ रुपए की बीज सब्सिडी शुरू की
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बृजभूषण शरण सिंह के समर्थन में उमड़ी भीड़ जनता के विश्वास का प्रतीक: प्रतीक भूषण सिंह
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लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे पर दरारें: परियोजना निदेशक बर्खास्त, निर्माण एजेंसी को कारण बताओ नोटिस जारी
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14 अगस्त को इस्तीफा देंगे कर्नाटक विधान परिषद के सभापति बसवराज होरट्टी, कांग्रेस के फैसले पर जताई नाराजगी
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भारत-चीन सीमा की अपुष्ट तस्वीरें वायरल, आधिकारिक स्रोतों पर ही भरोसा करने की अपील
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गोंडा में बृजभूषण शरण सिंह की 'सत्यमेव जयते रैली', बोले- साजिश के तहत बदनाम किया गया
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कलकत्ता हाई कोर्ट ने सीबीआई को आरजी कर केस में नई जांच में तेजी लाने का निर्देश दिया
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भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों का आरोप, मिनी यूनिट्स की प्रमुख सेवाओं में कटौती कर रहा बीएमएचआरसी
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नाराज कर्नाटक विधान परिषद अध्यक्ष होरट्टी 14 अगस्त को पद से इस्तीफा देंगे
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भाजपा ने संसद में व्यवधान उत्पन्न करने के लिए खड़गे और राहुल गांधी की आलोचना की
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मौलाना साजिद रशीदी का आदर्श ओसामा बिन लादेन रहा होगा: मिथिलेश तिवारी
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मजहब के नाम पर दरार डालने वाले मुसलमान नहीं, आत्मघाती आतंकवादी हैं : माधवी लता
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तेलंगाना भाजपा अध्यक्ष ने 500 करोड़ रुपए के धान की हेराफेरी की जांच की मांग की
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Cockroach Janata Party का बड़ा ऐलान! 11 सदस्यीय नेशनल वर्किंग कमिटी का गठन, जिम्मेदारियों का हुआ बंटवारा
महाराष्ट्र: मनोज जरांगे ने कुनबी प्रमाणपत्र रद्द करने को लेकर राज्य सरकार पर साजिश का आरोप लगाया
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केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू की राहुल गांधी से बात, परिसीमन विधेयक के लिए मांगा समर्थन
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अमरावती, 6 अगस्त (आईएएनएस)। जनसेना के राज्यसभा सांसद लिंगमनेनी रमेश ने आंध्र प्रदेश में दो नए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) स्तर के संस्थानों की स्थापना की मांग की है। उन्होंने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को पत्र लिखकर राज्य में तृतीयक स्वास्थ्य सेवाओं के ढांचे को मजबूत करने के लिए हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया।
इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल में भारत का प्रदर्शन उम्मीद से कहीं बेहतर रहा। भारत ने 13 स्वर्ण, 17 रजत और 9 कांस्य सहित कुल 39 पदक जीते। वह पदक तालिका में चौथे नंबर पर रहा। पहली नजर में यह प्रदर्शन बर्मिंघम 2022 के 61 पदक से कमजोर दिख सकता है, लेकिन आंकड़े अलग कहानी बताते हैं। इस बार ग्लासगो में सिर्फ 10 खेल शामिल थे, जबकि बर्मिंघम में 19 खेल खेले गए थे। बैडमिंटन, कुश्ती, शूटिंग, हॉकी, टेबल टेनिस और क्रिकेट जैसे खेल ग्लासगो गेम्स का हिस्सा नहीं थे, जिनसे 2022 में भारत को 30 पदक मिले थे। इसके अलावा भारत ने 210 खिलाड़ियों की जगह सिर्फ 123 खिलाड़ियों का दल भेजा। इनमें से 38 खिलाड़ी पदक जीतकर लौटे, यानी सफलता की दर 31 प्रतिशत रही। बर्मिंघम में यह आंकड़ा 29 प्रतिशत था। ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल शुरू होने से पहले भारतीय ओलंपिक संघ और विभिन्न खेल महासंघों की आंतरिक रिपोर्ट में भारत को 6 स्वर्ण समेत 31 पदक मिलने का अनुमान लगाया गया था। भारतीय खिलाड़ियों ने अनुमान से दोगुना से भी ज्यादा स्वर्ण जीते। कुल पदक में भी आगे निकल गए। ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल में भारत का सबसे सफल खेल बॉक्सिंग रहा। 14 मुक्केबाजों के दल में से 10 खिलाड़ी पदक जीतकर लौटे। इसमें 7 स्वर्ण और 3 रजत शामिल रहे। यानी 71 प्रतिशत मेडल कन्वर्जन रेट। बर्मिंघम 2022 में यह आंकड़ा 58 प्रतिशत था। पदक वितरण समारोह के दौरान सात बार भारत का राष्ट्रगान बजना न सिर्फ ग्लासगो में मौजूद भारतीय दर्शकों के लिए गर्व का पल था, बल्कि इस बात का सबूत भी था कि इस गैर-पारंपरिक खेल को गांवों और छोटे कस्बों तक ले जाने की पहल काफी हद तक सफल रही है। भारतीय बॉक्सरों के प्रदर्शन की जितनी भी प्रशंसा की जाए वो कम है। इसे भी पढ़ें: राष्ट्रमंडल खेल 2026: चुनौतियों के बीच चमका भारत जूडो में भारत ने पहली बार राष्ट्रमंडल खेल इतिहास में स्वर्ण जीता। अस्मिता डे और हर्ष सिंह ने स्वर्ण जीता। यामिनी मौर्य ने रजत और उन्नति शर्मा ने कांस्य जीतकर कुल चार पदक भारत की झोली में डाले। हालांकि 14 सदस्यीय भारतीय टीम के दो खिलाड़ी अरुण कुमार और तुलिका मान डोपिंग के कारण बाहर हो गए। इसी तरह, एथलीटों और पैरा-एथलीटों ने 16 पदक जीते। इनमें से कुछ ने तो नए राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी बनाए। वेटलिफ्टर्स ने आठ और पदक जीते। इन पदकों में ओलंपियन मीराबाई चानू का जीता हुआ एक स्वर्ण पदक भी शामिल था, जिससे उन्होंने स्वर्ण पदकों की हैट्रिक पूरी की; मणिपुर की इस एथलीट ने इससे पहले 2018 गोल्ड कोस्ट और 2022 बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेल में भी स्वर्ण पदक जीता था। असल में, मीराबाई चानू की शानदार कामयाबी के बावजूद, भारतीय वेटलिफ्टरों का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा। इस निराशा की एक वजह यह है कि डोपिंग के आरोपों के कारण कम से कम दो भारतीय वेटलिफ्टरों की एंट्री वापस लेनी पड़ी। छह अन्य खिलाड़ी—कड़ी टक्कर न होने के बावजूद—लड़ने के जज़्बे की कमी या तकनीकी गलतियों की वजह से स्वर्ण पदक जीतने का मौका चूक गए। एथलेटिक्स ने भारत को 10 पदक दिलाए, लेकिन एक भी स्वर्ण नहीं आया। नीरज चोपड़ा रजत जीत सके। उनके साथ डेब्यू कर रहे यशवीर सिंह ने कांस्य जीता। गुलवीर सिंह ने 10 हजार मीटर में सिल्वर और 5 हजार मीटर रेस में कांस्य जीतकर इतिहास रचा। गुलवीर एक ही कॉमनवेल्थ गेम्स में एथलेटिक्स में दो पदक जीतने वाले वह भारत के पहले खिलाड़ी भी बनें। तेजस्विन शंकर ने डेकाथलन में भारत का पहला राष्ट्रमंडल पदक दिलाया। सरवेश कुशारे, श्रीशंकर, प्रवीण चित्रावेल और सीमा कालीरामना भी पदक जीतने में सफल रहे। हालांकि स्प्रिंट और रिले टीम से बड़ी उम्मीदें थीं, वह खाली हाथ रही। इसमें कोई दो राय नहीं है कि मोदी सरकार के 12 वर्षों के शासन में देश में खेलों का संस्थागत विकास तेजी से हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बार यह दोहराया है कि खेल देश में एकता बढ़ाने, युवाओं को प्रेरित करने और भारत को एक आत्मविश्वासी और उभरती हुई वैश्विक ताकत के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। उनकी यह सोच कार्यों में भी दिखाई देती है, जैसे कि ‘खेलो इंडिया’और ‘टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम यानी टॉप्स’ जैसे प्रमुख कार्यक्रमों के माध्यम से। इन पहलों ने देश में खेलों की पूरी व्यवस्था को नया रूप दिया है और भारत को खेलकूद के प्रति समर्पित एक राष्ट्र बना दिया है। इन योजनाओं के कारण भारतीय खिलाड़ियों को बेहतर वित्तीय सहायता, आधुनिक प्रशिक्षण और अंतरराष्ट्रीय स्तर का एक्सपोजर मिला है, जिसके परिणामस्वरूप ओलंपिक, पैरालंपिक, कॉमनवेल्थ और एशियाई खेलों में भारत का प्रदर्शन लगातार सुधरा है। नई प्रतिभाओं को पदक जीतने वाले खिलाड़ी में बदलने में 'खेलो इंडिया' कार्यक्रम की अहम भूमिका रही है। इस कार्यक्रम के तहत अब तक 2781 से अधिक खिलाड़ियों को प्रशिक्षण, उपकरण, चिकित्सा देखभाल और वित्तीय सहायता दी गई है। सरकार ने खेलो इंडिया योजना पर 36,441 करोड़ रुपये का भारी निवेश मंजूर किया है। वर्ष 2026-31 के लिए संशोधित खेलो इंडिया योजना को मंजूरी दी है। राष्ट्रीय खेल महासंघों को मजबूत बनाने के लिए बड़े पैमाने पर वित्तीय सहायता दी जा रही है। देश के दूर-दराज और ग्रामीण इलाकों से भी उभरती प्रतिभाओं को खोजा जा रहा है। स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण और मार्गदर्शन की सुविधाएं देने के लिए देशभर में 1041 खेलो इंडिया केंद्र स्थापित किए गए हैं। इसके साथ ही, 32 खेलो इंडिया सेंटर ऑफ एक्सीलेंस और 301 खेल अकादमियों को मान्यता दी गई है, जिससे खेलों का पूरा इकोसिस्टम और मजबूत हुआ है। खेलो इंडिया सीओई में खिलाड़ियों को विशेषज्ञ कोचिंग, पोषण और उच्चस्तरीय प्रशिक्षण की सुविधा दी जा रही है। मोदी सरकार की इन पहलों का जमीन पर जबरदस्त असर भी दिख रहा है। 2022 एशियाई खेलों में भारत के 42 पदकों में से 124 पदक विजेता 'खेलो इंडिया' से प्रशिक्षित खिलाड़ी थे। वहीं पेरिस 2024 ओलंपिक में खेलो इंडिया के 28 खिलाड़ियों ने देश का प्रतिनिधित्व किया था। 'खेलो इंडिया' के खिलाड़ियों ने अब तक करीब 6000 राष्ट्रीय रिकॉर्ड और 1400 अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाए हैं, जो भारत के जमीनी स्तर के खेलकूद के कार्यक्रमों की प्रगति को दर्शाता है। कोच और खेल विशेषज्ञ मानते हैं कि कॉन्टिनेंटल या ग्लोबल इवेंट्स में प्रतियोगिता का स्तर कहीं ज्यादा होता है। ऐसे में किसी एथलीट या खिलाड़ी की काबिलियत और कड़ी मेहनत की असली परीक्षा एशियन गेम्स या ओलंपिक्स में होती है। हालांकि कॉमनवेल्थ गेम्स में जीते गए मेडल का महत्व कम नहीं आंका जाना चाहिए। इस बार युवा खिलाड़ियों ने दिखाया है कि भारत का खेल भविष्य पहले से कहीं ज्यादा उज्ज्वल दिख रहा है, कई खेलों में नई पीढ़ी के टैलेंटेड एथलीट सुर्खियां बटोर रहे हैं। राष्ट्रमंडल खेल जैसी प्रतियोगिता में किए गए प्रदर्शन को आम तौर पर भविष्य में सुधार के पैमाने और अपनी खूबियों व कमियों के आकलन के तौर पर देखा जाता है। राष्ट्रमंडल खेल के बाद अब भारतीय खिलाड़ियों की नजर एशियन गेम्स में दमदार प्रदर्शन करने पर है। 20 वें एशियाई खेल का आगाज 19 सितंबर से जापान के नागोया में होग। भारत इस बार हांग्जो 2022 के अपने ऐतिहासिक 107 पदकों के रिकॉर्ड को तोड़ने के इरादे से मैदान में उतरेगा। इसीलिए भारतीय खिलाड़ियों को राष्ट्रमंडल खेल में अपने प्रदर्शन पर गर्व करते हुए एशियन गेम्स में पेश आने वाली चुनौतियों के हिसाब से बिना एक भी पल गवाएं तैयारियां शुरू कर देनी चाहिए। क्योंकि जब विदेशी धरती पर तिरंगा लहराता है और जन-गण-मन गूंजता है, तो वह पल केवल एक खिलाड़ी की जीत नहीं, बल्कि पूरे देश का गौरव बन जाता है। - डॉ. आशीष वशिष्ठ (स्वतंत्र पत्रकार) लखनऊ, उत्तर प्रदेश (भारत)
अमित शाह से मिले TMC के बागी मुस्लिम सांसद, मस्जिद में अजान को लेकर उठाया बड़ा मुद्दा, जाने क्या है पूरा मामला
भारत को क्लीन एनर्जी टेक्नोलॉजी का ग्लोबल प्रोड्यूसर बनना चाहिए: एचडी कुमारस्वामी
नई दिल्ली, 6 अगस्त (आईएएनएस)। केंद्रीय इस्पात और भारी उद्योग मंत्री एचडी कुमारस्वामी ने गुरुवार को कहा कि भारत को क्लीन एनर्जी टेक्नोलॉजी का ग्लोबल प्रोड्यूसर बनना चाहिए। ऐसा इसलिए है, क्योंकि तेजी से बदलती दुनिया में किसी देश की ताकत सिर्फ एनर्जी रिसोर्स तक पहुंच से तय नहीं होती, बल्कि भविष्य को चलाने वाली टेक्नोलॉजी के लिए मैन्युफैक्चरिंग, इनोवेशन और मजबूत सप्लाई चेन बनाने की उसकी क्षमता से तय होती है।
संसद में जारी गतिरोध के लिए सरकार जिम्मेदार, भाजपा घबराई हुई है: रमाशंकर राजभर
संसद में जारी गतिरोध के लिए सरकार जिम्मेदार, भाजपा घबराई हुई है: रमाशंकर राजभर
कैबिनेट ने एनएच-15 के गुवाहाटी-तेजपुर कॉरिडोर को मंजूरी दी: प्रधानमंत्री मोदी
कैबिनेट ने एनएच-15 के गुवाहाटी-तेजपुर कॉरिडोर को मंजूरी दी: प्रधानमंत्री मोदी
जेनजी के साथ आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का संवाद स्वागतयोग्य: संजय निरुपम
जेनजी के साथ आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का संवाद स्वागतयोग्य: संजय निरुपम
समाजवादी पार्टी ने हमेशा ब्राह्मणों का अपमान किया: भाजपा विधायक नंद किशोर गुर्जर
समाजवादी पार्टी ने हमेशा ब्राह्मणों का अपमान किया: भाजपा विधायक नंद किशोर गुर्जर
सीबीआई ने गुवाहाटी से आरोपी अरूप दास को किया गिरफ्तार, अभिजीत सरकार हत्याकांड में था फरार
सीबीआई ने गुवाहाटी से आरोपी अरूप दास को किया गिरफ्तार, अभिजीत सरकार हत्याकांड में था फरार
एआईएसए प्रमुख नेहा 7 अगस्त से शुरू होने वाले 'जेनजी राइजिंग' अभियान का नेतृत्व करेंगी
एआईएसए प्रमुख नेहा 7 अगस्त से शुरू होने वाले 'जेनजी राइजिंग' अभियान का नेतृत्व करेंगी
पंजाब: विधानसभा में अवैध खनन के मुद्दे पर हंगामा, हाउस कमेटी बनाने की मांग
पंजाब: विधानसभा में अवैध खनन के मुद्दे पर हंगामा, हाउस कमेटी बनाने की मांग
बीटीसी प्रमुख मोहिलारी ने बाढ़ प्रभावित शिवसागर में राहत अभियान का नेतृत्व किया, सहायता सामग्री भी बांटी
दतिया में जीत का पुरस्कार नायक को, देर से जारी हुआ नियुक्ति पत्र
दतिया में जीत का पुरस्कार नायक को, देर से जारी हुआ नियुक्ति पत्र
कैबिनेट ने असम में 8,970 करोड़ रुपए की गुवाहाटी-तेजपुर 4-लेन हाईवे परियोजना को दी मंजूरी
कैबिनेट ने असम में 8,970 करोड़ रुपए की गुवाहाटी-तेजपुर 4-लेन हाईवे परियोजना को दी मंजूरी
राज्यसभा में राघव चड्ढा ने उठाया डॉक्टरों-डायग्नोस्टिक सेंटरों के 'कट मनी' का मुद्दा, कहा- मरीजों पर पड़ता है बोझ
महिलाओं का सम्मान हमारे संस्कार, शब्द से ठेस पहुंची तो खेद है: अश्वनी शर्मा
महिलाओं का सम्मान हमारे संस्कार, शब्द से ठेस पहुंची तो खेद है: अश्वनी शर्मा
दो दिन में दूसरी बार राहुल गांधी से मिले किरेन रिजिजू, क्या मानसून सत्र में लौटेगी बहस और कामकाज की रफ्तार?
अरुणाचल प्रदेश: जेपी नड्डा ने बाढ़ प्रभावित इलाकों का किया दौरा, समीक्षा बैठक की
अरुणाचल प्रदेश: जेपी नड्डा ने बाढ़ प्रभावित इलाकों का किया दौरा, समीक्षा बैठक की

