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चुनाव आयोग पर शक पैदा कर रहे हैं राहुल गांधी, कांग्रेस हताशा से घिरी : बीवाई विजयेंद्र

चुनाव आयोग पर शक पैदा कर रहे हैं राहुल गांधी, कांग्रेस हताशा से घिरी : बीवाई विजयेंद्र

समाचार नामा 1 Oct 2026 2:34 pm

भाजपा नेताओं ने कहा-इंडी ब्लॉक की बैठक का कोई एजेंडा नहीं, सब जानती है जनता

भाजपा नेताओं ने कहा-इंडी ब्लॉक की बैठक का कोई एजेंडा नहीं, सब जानती है जनता

समाचार नामा 1 Oct 2026 2:31 pm

महंगाई का झटका: कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर ₹62.50 महंगा, एटीएफ (ATF) के दाम ₹16/लीटर बढ़े; घरेलू गैस की कीमतें स्थिर

सरकारी तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) ने अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क कीमतों में मजबूती के अनुरूप गुरुवार से 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमत में 62.50 रुपए की बढ़ोतरी की है।

देशबन्धु 1 Oct 2026 12:17 pm

हाईटेक होते वृद्धाश्रम और बेदखल होता बुढ़ापा

पुणे के समीप संचालित एक आधुनिक वृद्धाश्रम में जब एक बेसहारा बुजुर्ग के दाखिले के लिए संपर्क किया गया, तो वहां का मासिक शुल्क पचास हजार रुपये बताया गया। यह केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह हमारे समकालीन समाज के बदलते चरित्र, नैतिक पतन और बुजुर्गों के प्रति संवेदनहीनता का एक भयावह दस्तावेज़ है। भारत जैसे विकासशील देश में, जहां एक आम कामकाजी नागरिक या सेवानिवृत्त व्यक्ति की पूरी मासिक आय भी अक्सर इस आंकड़े तक नहीं पहुंच पाती, वहां बुढ़ापे की शरणस्थली का इतना खर्चीला होना एक गंभीर सामाजिक संकट की ओर इशारा करता है। यह इस कड़वी हकीकत को उजागर करता है कि जो वृद्धाश्रम कभी करुणा, सेवा और निस्वार्थ आश्रय के पवित्र केंद्र हुआ करते थे, वे अब कॉर्पोरेट शैली के आलीशान रिसॉर्ट्स और फाइव स्टार होटलों में तब्दील हो चुके हैं। जब जीवन के अंतिम पड़ाव पर मिलने वाली सुरक्षा और गरिमा भी पूरी तरह से बाजारवाद की वस्तु बन जाए, तो समाज के गरीब, निम्न-मध्यमवर्गीय और सर्वहारा बुजुर्गों के जीवित रहने की उम्मीदें ही दम तोड़ने लगती हैं। यह स्थिति इस बुनियादी लोकतांत्रिक और मानवीय सवाल को जन्म देती है कि क्या सम्मान से जीने और शांति से मरने का अधिकार केवल समाज के धनाढ्य वर्ग तक ही सीमित रह गया है? इस संकट की जड़ें हमारे सामाजिक और पारिवारिक ढांचे में आए गहरे बिखराव से जुड़ी हुई हैं। भारत की पहचान सदियों से संयुक्त परिवार की उस व्यवस्था से रही है, जहां बुजुर्गों को घर का 'बरगद' माना जाता था, जिनकी छत्रछाया में पूरी गोत्र और पीढ़ियां खुद को सुरक्षित महसूस करती थीं। लेकिन वैश्वीकरण, तीव्र शहरीकरण और आधुनिक जीवनशैली की अंधी दौड़ ने इस पारंपरिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया है। आज की युवा पीढ़ी रोजगार, करियर और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की तलाश में महानगरों या सुदूर विदेशों की ओर पलायन कर रही है, जहां उनके जीवन में माता-पिता के लिए स्थान संकुचित होता जा रहा है। कई मामलों में तो युवा दंपति बुजुर्गों को अपने साथ रखना एक अनुत्पादक बोझ समझने लगते हैं। इसी पारिवारिक अलगाव और सामाजिक लाचारी को आज कॉर्पोरेट जगत ने एक बहुत बड़े व्यावसायिक अवसर के रूप में पहचान लिया है। अब इन संस्थानों को 'वृद्धाश्रम' जैसे पारंपरिक और संवेदनशील नामों के बजाय 'सीनियर लिविंग सोसाइटीज', 'सिल्वर होम्स' या 'रिटायरमेंट रिसॉर्ट्स' जैसे आकर्षक और भ्रामक नामों से प्रचारित किया जा रहा है, ताकि समाज में बुजुर्गों को छोड़ने के अपराध बोध को एक स्टेटस सिंबल में बदला जा सके। इसे भी पढ़ें: International Day for Older Persons: वृद्ध व्यक्ति परिवार पर बोझ नहीं, बल्कि परिवार और समाज की जीवित पूंजी हैं! महीने के पचास हजार रुपये या उससे अधिक की भारी-भरकम राशि वसूलने वाले ये हाईटेक आश्रम अपने विज्ञापनों में वातानुकूलित कमरों, आलीशान आंतरिक सज्जा, चौबीस घंटे वाई-फाई, आधुनिक जिम, स्विमिंग पूल, क्लब हाउस और कस्टमाइज्ड डाइट प्लान जैसी सुख-सुविधाओं का बढ़-चढ़कर दावा करते हैं। यह पूरा परिदृश्य बाहर से देखने पर अत्यंत आकर्षक और किसी पर्यटन स्थल जैसा प्रतीत हो सकता है, परंतु गहराई से विचार करने पर इसकी खोखली और वीरान प्रकृति साफ दिखाई देती है। जीवन के सांध्यकाल में पहुंचे, अपनों से उपेक्षित और अकेलेपन से जूझ रहे किसी बुजुर्ग को बुढ़ापे में इन कृत्रिम और यांत्रिक सुख-सुविधाओं की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि उन्हें दो पल के सच्चे प्यार, अपनों के साथ संवाद और मानसिक संबल की दरकार होती है। इन कॉर्पोरेट संस्थानों ने सुख और विलासिता के साधन तो ऊंचे दामों पर बेच दिए, लेकिन वे उस मानवीय अपनत्व और मानसिक शांति को नहीं बेच पाए जो केवल एक परिवार के भीतर ही संभव है। यह एक ऐसी विडंबना है जहां बुजुर्गों के पास सोने के लिए मखमली बिस्तर तो मौजूद है, लेकिन उस पर चैन की नींद सोने के लिए जरूरी पारिवारिक स्नेह और मानसिक संतोष पूरी तरह नदारद है। इस पूरे परिदृश्य का सबसे मार्मिक और चिंताजनक पहलू यह है कि इस नई व्यवस्था ने देश के गरीब और मध्यम वर्ग के बुजुर्गों को पूरी तरह से हाशिए पर धकेल दिया है। भारत की एक बहुत बड़ी आबादी आज भी असंगठित क्षेत्रों में दिहाड़ी मजदूरी या छोटे-मोटे काम करके अपना जीवन यापन करती है, जिनके पास न तो भविष्य के लिए कोई बड़ी जमापूंजी होती है और न ही बुढ़ापे को सुरक्षित करने के लिए कोई सरकारी पेंशन। यदि ऐसे परिवारों में संतानों द्वारा माता-पिता का परित्याग कर दिया जाए, तो वे इन महंगे आश्रमों की चौखट तक लांघने की कल्पना भी नहीं कर सकते। परिणामस्वरूप, ऐसे बेसहारा वृद्ध सड़कों पर, रेलवे स्टेशनों पर या धार्मिक स्थलों के बाहर अत्यंत दयनीय परिस्थितियों में भीख मांगने या लावारिस मौत मरने को मजबूर हो जाते हैं। दूसरी ओर, देश की विशाल जनसंख्या के अनुपात में सरकारी वृद्धाश्रमों की संख्या नगण्य है, और जो गिने-चुने मुफ्त या चैरिटेबल आश्रम संचालित भी हो रहे हैं, उनमें से अधिकांश की स्थिति इतनी जर्जर और अमानवीय है कि वहां बुनियादी स्वच्छता, शुद्ध पेयजल और न्यूनतम चिकित्सा सुविधाओं का भी घोर अभाव रहता है। ऐसे में देश के निर्धन बुजुर्गों के लिए बुढ़ापा एक अभिशाप और अंतहीन यातना का पर्याय बन चुका है। यद्यपि भारत सरकार ने बुजुर्गों के अधिकारों और उनके भरण-पोषण की रक्षा के लिए 'माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007' जैसा कड़ा कानून बनाया है, जिसके तहत संतानों के लिए अपने वृद्ध माता-पिता की देखभाल करना कानूनी रूप से अनिवार्य है। लेकिन व्यावहारिक धरातल पर इस कानून की सीमाएं और विफलताएं साफ नजर आती हैं। कोई भी भारतीय माता-पिता, चाहे उन पर दुखों का कितना भी पहाड़ क्यों न टूट पड़े, अपने ही बच्चों के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराने या उन्हें जेल भिजवाने के लिए कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। वे सामाजिक लोक-लाज, समाज के उपहास और अपनी अगाध ममता के वशीभूत होकर चुपचाप अपमान और प्रताड़ना को सहना ही अपनी नियति मान लेते हैं। इसी कानूनी लाचारी और सामाजिक संकोच का अनुचित लाभ उठाकर कई असंवेदनशील संतानें बुजुर्गों को उनकी अपनी ही गाढ़ी कमाई से बनाए गए घरों से बेदखल कर देती हैं और व्यवस्था मूकदर्शक बनी रहती है। जब जीवन की बुनियादी आवश्यकताएं जैसे कि शिक्षा, स्वास्थ्य और अब बुढ़ापे का आश्रय भी पूरी तरह से बेलगाम बाजारवाद और पूंजीपतियों के हवाले कर दिए जाते हैं, तो समाज में सामाजिक और आर्थिक असमानता की खाई और अधिक चौड़ी तथा हिंसक हो जाती है। इसलिए, निजी वृद्धाश्रमों के इस अनियंत्रित और संवेदनहीन व्यावसायीकरण पर तुरंत रोक लगाना अनिवार्य हो गया है। सरकार को इन निजी संस्थानों की मनमानी फीसों और कार्यप्रणाली को नियंत्रित करने के लिए एक सख्त नियामक संस्था या वैधानिक निकाय का गठन करना चाहिए, जो यह सुनिश्चित करे कि कोई भी व्यावसायिक घराना किसी बुजुर्ग की मजबूरी और लाचारी का सौदा न कर सके। इसके साथ ही, सरकार को देश के प्रत्येक जिले में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल के आधार पर ऐसे किफायती, स्वच्छ और सुरक्षित वृद्धाश्रमों का निर्माण करना चाहिए, जहां मध्यम और गरीब वर्ग के बुजुर्ग बिना किसी आर्थिक मानसिक तनाव के गरिमापूर्ण जीवन व्यतीत कर सकें। साथ ही, कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) के नियमों में संशोधन करके बड़ी कंपनियों के मुनाफे का एक निश्चित हिस्सा गरीब बुजुर्गों के मुफ्त आश्रय, भोजन और चिकित्सा के लिए अनिवार्य रूप से आरक्षित किया जाना चाहिए। अंततः, केवल कड़े कानून बनाने, अदालती आदेशों या सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन मात्र से इस अत्यंत संवेदनशील समस्या का पूर्ण और स्थाई समाधान संभव नहीं है। यह एक गंभीर सामाजिक, मानसिक और नैतिक व्याधि है, जिसका उपचार हमें अपने परिवारों और व्यक्तिगत चेतना से प्रारंभ करना होगा। हमें अपनी शिक्षा प्रणाली और पारिवारिक संस्कारों में ऐसे नैतिक मूल्यों को पुनर्जीवित करना होगा जो नई पीढ़ी को यह समझा सकें कि माता-पिता कोई उपयोग के बाद फेंक दी जाने वाली वस्तु या वित्तीय दायित्व नहीं हैं, बल्कि वे हमारे जीवन की सबसे अमूल्य धरोहर और सांस्कृतिक पूंजी हैं। जिस समाज या राष्ट्र में उसके बुजुर्गों की आंखों में अकेलेपन का आंसू, तिरस्कार का दर्द और असुरक्षा का भाव व्याप्त हो, वह समाज विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में कितनी भी प्रगति क्यों न कर ले, आत्मिक और नैतिक रूप से सदैव दरिद्र ही रहेगा। पुणे के आश्रम का यह पचास हजार रुपये का मासिक शुल्क हम सभी के लिए एक गंभीर चेतावनी है, जिसे यदि आज हमने अनदेखा कर दिया, तो आने वाले समय में बुढ़ापा केवल धनवानों का एक विशेषाधिकार बनकर रह जाएगा और देश की एक बहुत बड़ी गरीब आबादी के हिस्से में केवल लाचारी, सड़कों की धूल और घोर उपेक्षा ही आएगी। समय रहते इस बाजारवाद के विरुद्ध खड़े होना और अपनी सामाजिक आत्मा को जगाना आज के समय की सबसे बड़ी पुकार है। - अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार

प्रभासाक्षी 1 Oct 2026 11:46 am

झारखंड में एसआईआर की प्रक्रिया का अंतिम चरण शुरू, नोटिस पाने वाले 63 लाख मतदाताओं के घर तक पहुंचेंगे बीएलओ

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समाचार नामा 1 Oct 2026 10:42 am

'स्वच्छता ही सेवा' अभियान: दिल्ली में अलग-अलग जगह केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों ने चलाया सफाई अभियान

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समाचार नामा 1 Oct 2026 10:37 am

सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ उद्धव-कांग्रेस का मोर्चा, भाजपा बोली- घुसपैठियों को बचाना चाहता है विपक्ष

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार द्वारा लिए गए वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के फैसले ने महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली तक सियासी पारा चढ़ा दिया है।

देशबन्धु 1 Oct 2026 12:25 am

कर्नाटक में एसआईआर विवाद के बीच सीएम ने मांगा फॉर्म-7 का डेटा, बोले- हर असली मतदाता का अधिकार सुरक्षित रहे

कर्नाटक में एसआईआर विवाद के बीच सीएम ने मांगा फॉर्म-7 का डेटा, बोले- हर असली मतदाता का अधिकार सुरक्षित रहे

समाचार नामा 30 Sep 2026 11:27 pm

चुनाव केवल सरकार बनाने और सत्ता से हटाने का माध्यम नहीं, चार वर्षों का हिसाब भी लेना है: प्रशांत किशोर

चुनाव केवल सरकार बनाने और सत्ता से हटाने का माध्यम नहीं, चार वर्षों का हिसाब भी लेना है: प्रशांत किशोर

समाचार नामा 30 Sep 2026 10:37 pm

सपा सरकार में केवल गुंडागर्दी और जमीन कब्जाने की घटनाएं, सत्ता का मिला था पूरा संरक्षण: अनिल राजभर

सपा सरकार में केवल गुंडागर्दी और जमीन कब्जाने की घटनाएं, सत्ता का मिला था पूरा संरक्षण: अनिल राजभर

समाचार नामा 30 Sep 2026 10:24 pm

हरियाणा की राजस्व व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ बनाना है: सीएम नायब सिंह सैनी

हरियाणा की राजस्व व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ बनाना है: सीएम नायब सिंह सैनी

समाचार नामा 30 Sep 2026 8:39 pm

भाजपा की 'बल्लारी चलो' से प्रेरित है कांग्रेस की 'भारत जोड़ो 2.0' पदयात्रा: विजयेंद्र

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समाचार नामा 30 Sep 2026 8:34 pm

ग्रीन एनर्जी स्कीम 2035 तक 900 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में 'बड़ा कदम': पीएम मोदी

ग्रीन एनर्जी स्कीम 2035 तक 900 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में 'बड़ा कदम': पीएम मोदी

समाचार नामा 30 Sep 2026 7:40 pm

पश्चिम बंगाल में बाल विवाह और कम उम्र में मां बनने के मामलों पर सरकार सख्त, जीरो टॉलरेंस का अपनाया रुख

पश्चिम बंगाल में बाल विवाह और कम उम्र में मां बनने के मामलों पर सरकार सख्त, जीरो टॉलरेंस का अपनाया रुख

समाचार नामा 30 Sep 2026 6:34 pm

डिजिटल रुपया क्या है? यह यूपीआई से कैसे अलग है? इसे बिना इंटरनेट के चलाने के लिए आरबीआई क्या तैयारी कर रही है?

डिजिटल रुपया (e₹) और यूपीआई (UPI) दोनों डिजिटल भुगतान से जुड़े हैं, लेकिन दोनों की प्रकृति अलग है। आइए सबसे पहले जानते हैं कि डिजिटल रुपया क्या है? दरअसल डिजिटल रुपया या e₹ भारत की केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (CBDC) है। इसे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) जारी करता है, इसलिए यह स्वयं रुपये का डिजिटल रूप है—जैसे ₹100 का नोट भौतिक रूप में है, वैसे ही e₹ डिजिटल रूप में। इसे डिजिटल वॉलेट में रखा जा सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक ने साफ किया है कि डिजिटल रुपया अब खुदरा व थोक दोनों क्षेत्रों में पायलट चरण में है। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार 'ई' ₹ को बैंकों और गैर-बैंक संस्थाओं के डिजिटल वॉलेट में रखा जा सकता है। इससे व्यक्ति-से-व्यक्ति और व्यक्ति-से-दुकानदार भुगतान किया जा सकता है। गौरतलब है कि आरबीआई के 'ई'₹ वॉलेट में न्यूनतम राशि रखने की जरूरत नहीं है और इसके इस्तेमाल पर अलग से शुल्क नहीं है। इसे भी पढ़ें: UPI पेमेंट्स का हिसाब रखना हुआ आसान, ऐसे देखें अलग-अलग ऐप के लेनदेन आरबीआई ने यह भी साफ किया है कि बिना इंटरनेट से संभव हो सकने वाला 'ई'₹ भुगतान अभी बड़े पैमाने पर आम लोगों के लिए शुरू नहीं हुआ है, क्योंकि इसके अलग-अलग तकनीकी विकल्पों का लगातार परीक्षण किया जा रहा है। इसलिए इसकी अंतिम तकनीक, लेन-देन की सीमा, सुरक्षा व्यवस्था और आम लोगों के लिए लॉन्च की तारीख को लेकर अभी कोई निश्चित घोषणा नहीं हुई है। उल्लेखनीय है कि भारतीय रिजर्व बैंक ने 2022 में जारी ढांचे के तहत कार्ड, वॉलेट और मोबाइल उपकरणों के जरिए बिना इंटरनेट या दूरसंचार कनेक्टिविटी के भी कुछ ऑफलाइन भुगतान की अनुमति दी थी, जिसके तहत भुगतान आमने-सामने यानी निकट दूरी पर किया जाता है। बाद में यूपीआई लाइट एक्स के जरिये एनएफसी आधारित ऑफलाइन भुगतान की सुविधा भी विकसित की गई। # अब आइए जानते हैं कि e₹ और UPI में मुख्य अंतर क्या है? एक, डिजिटल रुपया (e₹) आरबीआई की डिजिटल मुद्रा है, जबकि UPI भुगतान का आधुनिक डिजिटल माध्यम है। दो, डिजिटल रुपया (e₹) डिजिटल वॉलेट में रखा जा सकता है, जबकि यूपीआई में बैंक खाते से सीधे भुगतान होता है। तीन, डिजिटल रुपया व्यक्ति और दुकानदार के बीच सीधा भुगतान किया जा सकता है। जबकि यूपीआई क्यूआरकोड, मोबाइल नंबर या यूपीआई आईडी से भुगतान किया जा सकता है। चार, भविष्य में ब्लू टूथ, एनएफसी के जरिए बिना इंटरनेट भुगतान की सुविधा देने पर काम हो रहा है। जबकि यूपीआई में सीमित ऑफलाइन विकल्प विकसित किए हुए हैं। पांच, डिजिटल रुपया रुपये का डिजिटल रूप है जोभुगतान करने का माध्यम/प्रणाली है। इसे आरबीआई जारी करता है। जबकि UPI का संचालन NPCI करता है। छह, डिजिटल रुपया कहाँ रहता है? e₹ वॉलेट में बैंक खाते से भुगतान होता है। जबकि यूपीआई की भूमिका डिजिटल मुद्रापैसा भेजने का माध्यम है। सात, डिजिटल रुपया भुगतान का आधार e₹ से e₹ वॉलेट में लेन-देन हो सकता है। बैंक खाते से बैंक खाते में भुगतान हो एकता है। अब इंटरनेट के बिना RBI इसके लिए ऑफलाइन तकनीकें विकसित/परीक्षण कर रहा है। जबकि UPI में भी UPI Lite X जैसी NFC-आधारित ऑफलाइन सुविधा है। RBI स्वयं स्पष्ट करता है कि e₹ डिजिटल रुपये का रूप है, जबकि UPI भुगतान का माध्यम है। e₹ को बैंक खाते से निकालकर अलग डिजिटल वॉलेट में रखा जा सकता है और CBDC लेन-देन में धन सीधे दो e₹ वॉलेट के बीच स्थानांतरित हो सकता है। चूंकि बिना इंटरनेट e₹ चलाने की RBI की तैयारी है। इसलिए यह सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। RBI के अनुसार ऑफलाइन e₹ के लिए अलग-अलग तकनीकी समाधान तलाशे और परीक्षण किए जा रहे हैं। इनमें प्रमुख रूप से: एक, Telecom-assisted offline: ऐसी व्यवस्था जिसमें इंटरनेट उपलब्ध न हो, लेकिन मोबाइल/टेलीकॉम कनेक्टिविटी उपलब्ध हो। दो, NFC आधारित भुगतान: दो पास-पास रखे NFC-सक्षम उपकरणों के बीच संचार के जरिए लेन-देन। यानी भविष्य में इंटरनेट न होने पर भी बहुत छोटी दूरी में फोन को टैप करके भुगतान संभव बनाने की दिशा में काम हो रहा है। RBI ने इसे e₹ के ऑफलाइन प्रयोगों में शामिल बताया है। तीन, RBI ने छोटे मूल्य के ऑफलाइन डिजिटल भुगतानों के लिए व्यापक ढांचा बनाया है: इसमें कार्ड, वॉलेट और मोबाइल उपकरणों के जरिए बिना इंटरनेट/टेलीकॉम कनेक्टिविटी के proximity यानी आमने-सामने भुगतान की व्यवस्था का प्रावधान है। चार, एक आसान उदाहरण: मान लीजिए किसी दूरदराज के गांव में इंटरनेट बंद है। सामान्य UPI भुगतान में बैंक से भुगतान कराने के लिए नेटवर्क की समस्या आ सकती है। भविष्य के ऑफलाइन e₹ मॉडल में फोन के डिजिटल वॉलेट में पहले से मौजूद e₹ का इस्तेमाल स्थानीय रूप से किया जा सकेगा। NFC जैसे समाधान में दो नजदीकी उपकरण आपस में डेटा का आदान-प्रदान कर सकते हैं। इसका उद्देश्य मूलतः डिजिटल भुगतान को नकदी जैसी उपलब्धता देना है—विशेषकर कमजोर इंटरनेट वाले ग्रामीण, दूरदराज या नेटवर्क-विहीन क्षेत्रों में। एक पंक्ति में यदि कहूं तो UPI पैसे भेजने का डिजिटल रास्ता है, जबकि e₹ स्वयं डिजिटल रुपया है। RBI की ऑफलाइन रणनीति का लक्ष्य e₹ को इस तरह विकसित करना है कि इंटरनेट न होने पर भी डिजिटल भुगतान के कुछ रूप संभव हों। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 30 Sep 2026 6:02 pm

NDA से अलग होकर अब योगी से भिड़ेंगे 'मोदी के हनुमान'?चिराग पासवान का UP प्लान क्या है,चौंका देगी सच्चाई!

मुझे शर्म आती है कि मैं इस सरकार के साथ हूं... प्रशासन पूरी तरह निकम्मा हो चुका है। यह किसी विपक्षी नेता का हमला नहीं, बल्कि केंद्र सरकार में मंत्री और खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हनुमान कहने वाले चिराग पासवान का खुला ऐलान-ए-जंग है। बिहार में बेलगाम अपराध और हालिया वारदातों पर चिराग के इन तल्ख तेवरों ने सूबे से लेकर दिल्ली तक के सियासी गलियारों में भूचाल ला दिया है। हैरानी इसलिए भी है क्योंकि जिस सरकार पर वह सवाल उठा रहे हैं, उसमें चिराग खुद हिस्सेदार हैं। जिस प्रशासन को वो निकम्मा बता रहे हैं, उसकी कमान सीधे डिप्टी सीएम और गृह मंत्री सम्राट चौधरी के हाथों में है। वही सम्राट चौधरी, जिन्हें सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाने में चिराग का कंधा भी लगा था। ऐसे में बड़ा सवाल यही उठता है कि आखिर चिराग पासवान के मन में पक क्या रहा है? क्या यह सम्राट चौधरी के खिलाफ सत्ता के भीतर से शुरू हुई कोई सुनियोजित घेराबंदी है? या फिर इसकी पटकथा 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को देखते हुए लिखी जा रही है? क्या बिहार में दबाव बनाकर चिराग यूपी में बीजेपी से अपनी शर्तों पर गठबंधन की जमीन तलाश रहे हैं? अपनों पर ही चिराग का यह तीखा वार महज़ कानून-व्यवस्था पर गुस्सा है, या फिर एनडीए के भीतर किसी बड़े सियासी खेल की शुरुआत? आइए आज इस बगावती तेवर के पीछे की रणनीति का एमआरआई स्कैन करते हैं। महज़ कानून-व्यवस्था पर गुस्सा है,या किसी सियासी खेल की शुरुआत 26 सितंबर को सिटी पोस्ट के कॉनक्लेव में चिराग पासवान पहुंचे थे। उनसे सवाल पूछा गया क्या आप मानते हैं कि बिहार में अपराधी बेखौफ हैं। दलित सुरक्षित नहीं है। बेटियां सुरक्षित नहीं है। इस पर चिराग पासवान का जवाब था कोई भी सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहा है। आज की तारीख में। यह चिंता हमारी सरकार की है। एक सहयोगी और सरकार का हिस्सा होने के नाते मैं खुद इस सवाल से नहीं भाग सकता हूं। मुझे खुद शर्मिंदगीगी होती है जब मैं सोचता हूं कि मैं एक ऐसी सरकार के साथ हूं जहां ऐसी घटनाएं हो रही हैं। यह चिंता का विषय है और इसको कतई हम लोग हल्के में जाने नहीं दे सकते। चिराग ने आगे कहा राष्ट्रीय स्तर पर मेरे बिहार की छवि कैसी जा रही है? हमारे बिहार की बेटियों में सोचिए कैसे डर और सुरक्षा का माहौल उत्पन्न हो गया है। आज की तारीख में कोई बच्ची मुझे बता दीजिए जो शाम को निकलने से पहले 100 बार ना सोचती होगी। तो ऐसे में जिस सरकार का मैं हिस्सा हूं मेरी वह सरकार एक्सेंस ऑफ सिक्योरिटी ना दे पाए यह तो मैं स्वीकार नहीं करूंगा। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में मंत्री चिराग पासवान के बयान का टोन नया नहीं है। बिहार में यह टोन बहुत पुराना है। उन्हीं के गठबंधन के सबसे बड़े नेता नरेंद्र मोदी खुद इसी टोन में बयान देते रहे हैं। गृह मंत्री अमित शाह इस टोन का इस्तेमाल करते रहे हैं। ऐसे शब्दावली का इस्तेमाल करते रहे हैं। पूरी बीजेपी इसी भाषा में राष्ट्रीय जनता दल यानी आरजेडी, लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव को निशाना बनाती रहती है। हमले किए जाते हैं कि लालू राज में बिहार में सूर्यास्त के बाद कोई घर से निकल नहीं पाता था। इसे भी पढ़ें: BJP नेता Smriti Irani का हमला, हार के बाद Congress कर रही संवैधानिक संस्थाओं का अपमान क्या सम्राट चौधरी के खिलाफ सत्ता के भीतर शुरू हुई सुनियोजित घेराबंदी? चिराग उस गठबंधन का हिस्सा हैं जो बिहार में सरकार चला रही है। लोजपा रामविलास के 19 विधायक हैं। सम्राट चौधरी की सरकार में पार्टी के दो मंत्री भी हैं। लोकसभा में पार्टी के पांच सांसद हैं। केंद्र सरकार में एक मंत्री भी हैं जो कि खुद चिराग पासवान हैं। लेकिन बिहार में बढ़ते क्राइम पर उनकी चिंता अब तक सिर्फ बयानों में ही दिखी है। लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने एक्स पर लिखा है इस्तीफा देने के लिए किस शुभ मुहूर्त का इंतजार कर रहे हैं चिराग पासवान शर्म का बोझ उठाकर भी सत्ता का हिस्सा बने रहना कोई चिराग पासवान जी से सीखे। बहन बेटियों की सुरक्षा के लिए पूरी तरह से असुरक्षित हो चुके बिहार की वजह से जब सरकार का हिस्सा होने में उन्हें शर्मिंदगीगी महसूस हो ही रही है तो इस्तीफा देने की हिम्मत कौन से मुहूर्त के इंतजार में रुकी हुई है। चिराग पासवान के बयान की वजह से सम्राट चौधरी या उनकी सरकार की कार्यशैली खास बदलती दिख तो नहीं रही है या उनके बयान का लोड लेते हुए भी सम्राट चौधरी नहीं दिख रहे हैं। चिराग बीजेपी पर अटैक करके उसे बेवजह तो नाराज नहीं ही करना चाहेंगे। दिल्ली का समन उन्हें क्यों चाहिए? तो क्या यह कहीं पर निगाहें और कहीं पर निशाना वाला मामला है। इसे समझने के लिए 2025 बिहार चुनाव से ऐन पहले के वक्त को देखना होगा। जून जुलाई के महीने में एक के बाद एक चिराग के बयान आ रहे थे। लगातार नीतीश कुमार के नेतृत्व में चल रही सरकार को टारगेट कर रहे थे। यहां तक कह गए कि बिहार में ऐसा लगता है कि पुलिस प्रशासन ने अपराधियों के सामने सरेंडर कर दिया है। तब भी चिराग पासवान यही कह रहे थे कि उन्हें एक ऐसी सरकार का समर्थन करने पर दुख है। तब इन बयानों का विश्लेषण हुआ कि यह सब सीट शेयरिंग के टेबल पर जाने की तैयारी है। प्रेशर क्रिएट किया जा रहा है ताकि लोजपा रामविलास को ज्यादा से ज्यादा सीटें एनडीए में मिल सके। यूपी का चुनाव भी एक फैक्टर हुआ यह कि जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने दलित और महादलित दो कैटेगरी बांट दिया और जिसकी वजह से किसी जमाने में दलितों की राजनीति करने वाले रामविलास पासवान सिर्फ पासवान के नेता बनकर रह गए क्योंकि बाकी महादलितों के नेता या तो नीतीश कुमार हो गए या जीतन राम मांझी हो गए। वो दर्द आज भी पासवान की पार्टी को है कि पूरी राजनीतिक जमा पूंजी खत्म कर दी। अब वो मजबूरी है। रहना तो एनडीए में ही है। जा भी नहीं सकेंगे क्योंकि सत्ता सबको अच्छी लगती है। मलाई खाना सबको अच्छा लगता है। लेकिन स्टेटमेंट देकर दबाव बनाने की कोशिश है। चिराग पासवान फिर 2025 वाली भाषा का इस्तेमाल करने लगे हैं। कह रहे हैं कि उन्हें दुख और शर्मिंदगीगी महसूस हो रही है कि वह एक ऐसी सरकार का समर्थन कर रहे हैं जो बिहार में सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पा रही। लेकिन अब किस चुनाव में सीट शेयरिंग के टेबल पर बारगेनिंग करना चाहते हैं चिराग पासवान। यूपी में चुनाव होने वाले हैं। जहां चिराग पासवान चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। वह पार्टी का विस्तार करना चाहते हैं। तो चुनाव में अपनी पार्टी के लिए ज्यादा से ज्यादा सीटें मांगेंगे। पिछले बिहार चुनाव में भी सीट लेने के लिए नीतीश कुमार पर अटैक कर रहे थे। चिराग पासवान एक अच्छे बारगेनर हैं। इसलिए यूपी का चुनाव भी एक फैक्टर है। यूपी में जदयू कौन बनेगा और कौन होगा नीतीश कुमार? उत्तर प्रदेश में विधनसभा चुनाव वैसे तो अगले बरस है, लेकिन राजनीतिक दलों की ओर से तैयारियां तेज हो चली हैं। इस बार चुनावी मैदान में बिहार की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) भी उतरने की तैयारी में है। पार्टी प्रमुख और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने प्रयागराज में यूथ बोले तो कार्यक्रम के जरिए विधानसभा चुनाव के लिए अभियान का आगाज किया है। पार्टी ने साफ किया है कि उनकी तैयारी सभी 403 सीटों पर चल रही है। प्रयागराज से चिराग पासवान के ऐलान ने प्रदेश में राजनीतिक हलचल को तेज किया है। दरअसल, लोजपा (रामविलास) केंद्र और बिहार में एनडीए के साथ है। वहीं, यूपी चुनाव में पार्टी की तैयारी भाजपा को टक्कर देने की है। चिराग ने तो यह तक कह दिया है कि गठबंधन हो या ना हो उनकी पार्टी यूपी चुनाव लड़ेगी जरूर। यह बयान सुनते ही पॉलिटिक्स पर नजर रखने वालों को 2020 का बिहार चुनाव याद आ सकता है। जब खुद चिराग ने कहा था कि एनडीए गठबंधन में उन्हें 15 सीटें दी जा रही थी। उन्होंने नीतीश कुमार से भी नाराजगी जाहिर की थी तब जिसकी वजह से चिराग पासवान ने अकेले ही बिहार चुनाव में उतरने का निर्णय किया था। वह उतरे भी चुनाव लड़े उन्हें जीत तो हासिल नहीं हुई लेकिन उनकी वजह से जदयू को ठीक-ठाक नुकसान हो गया। नतीजों के बाद कहा गया कि चिराग जिस मिशन पर निकले थे यानी निकाले गए थे वह आखिरकार पूरा हुआ। यानी कम सीटें चिराग पासवान के लिए किसी गठबंधन में साथ रहने के नजरिए से रेड फ्लैग है। तो ऐसी स्थिति में इसे भी पढ़ें: श्री चरणी ने T20I Bowling Rankings में रचा इतिहास, 817 पॉइंट्स के साथ बनाया नया रिकॉर्ड प्रयागराज में दिखा चिराग पासवान का नया तेवर 28 सितंबर को प्रयागराज में आयोजित 'यूथ बोले तो' संवाद कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान बिल्कुल जुदा अंदाज में नजर आए। पारंपरिक राजनीतिक पहनावे को छोड़ वे कैजुअल जींस और टी-शर्ट में युवाओं के बीच पहुंचे। मंच से नौजवानों के साथ शिक्षा, रोजगार, स्किल डेवलपमेंट और राजनीति में युवाओं की सक्रियता पर खुलकर चर्चा करते हुए उन्होंने बड़ा सियासी ऐलान किया। चिराग ने साफ लफ्जों में कहा कि इसमें किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिएलोजपा (रामविलास) पूरी मजबूती के साथ उत्तर प्रदेश का 2027 विधानसभा चुनाव लड़ेगी। हालांकि जिस यूपी में बीजेपी, निषाद पार्टी, सुभाजपा और आरएलडी को उनकी मांग के मुताबिक सीटें देने के मूड में नहीं है, वहां एक नया बटाईदार पार्टी को क्यों ही पसंद आएगा? यह अब तक तो तय नहीं है। पता चला है कि मामला सीटों को लेकर ही फंस सकता है। लेकिन चिराग अपनी ओर से पूरा जोर लगा रहे हैं। माहौल बनाने के लिए कॉन्सर्ट नुमा कार्यक्रमों के आयोजन किए जा रहे हैं। स्टूडेंट्स को संवाद के जरिए जोड़ने की कोशिश हो रही है।

प्रभासाक्षी 30 Sep 2026 4:46 pm

आठ सरकारी विभागों पर 38,000 करोड़ रुपए का भुगतान बकाया: कर्नाटक ठेकेदार संघ

आठ सरकारी विभागों पर 38,000 करोड़ रुपए का भुगतान बकाया: कर्नाटक ठेकेदार संघ

समाचार नामा 30 Sep 2026 4:23 pm

मल्लिकार्जुन खड़गे का EC पर तीखा हमला: 2-8 अक्टूबर तक संसद से सड़क तक मार्च, 6 तारीख को EC दफ्तर का घेराव

मल्लिकार्जुन खड़गे का EC पर तीखा हमला: 2-8 अक्टूबर तक संसद से सड़क तक मार्च, 6 तारीख को EC दफ्तर का घेराव

समाचार नामा 30 Sep 2026 2:45 pm

'स्कूलों में अभिभावकों और जनता के जाने पर कोई पाबंदी नहीं', असम सरकार ने खबरों का किया खंडन

'स्कूलों में अभिभावकों और जनता के जाने पर कोई पाबंदी नहीं', असम सरकार ने खबरों का किया खंडन

समाचार नामा 30 Sep 2026 2:34 pm

असम को मिलेगा चौथा कृषि कॉलेज, बराक घाटी में 84.6 एकड़ जमीन आवंटित

असम को मिलेगा चौथा कृषि कॉलेज, बराक घाटी में 84.6 एकड़ जमीन आवंटित

समाचार नामा 30 Sep 2026 2:31 pm

'घबराए हुए हैं यूपी के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री', केशव प्रसाद मौर्य के बयान पर सपा सांसद का पलटवार

'घबराए हुए हैं यूपी के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री', केशव प्रसाद मौर्य के बयान पर सपा सांसद का पलटवार

समाचार नामा 30 Sep 2026 2:26 pm

भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ी मिलावटखोरी रोकने की व्यवस्था

बिडंबना ही कहेंगे कि जिस मिलावटखोरी से हर साल देश में करीब दो लाख लोग मौत की भेंट चढ़ जाते हैं, फिर भी हमारी कानूनी तंत्र इस पर प्रभावी रोक लगाने में नाकाम रहा है। वैसे तो हर साल त्योहारी सीजन के साथ ही मिलावटखोरी की चर्चा तेज हो जाती है। लेकिन इन दिनों इस चर्चा की वजह महाराष्ट्र के तेजतर्रार आईएएस अधिकारी तुकाराम मुंढे की कार्रवाई है। मुंढे ने जब से महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन यानी एफडीए के आयुक्त का पद संभाला है, मिलावटखोरों की शामत आ गई है। उन्होंने खाद्य कानूनों और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ अभियान छेड़ दिया है। महाराष्ट्र एफडीए की टीमों ने शुरुआती 100 दिनों में ही 904 से ज्यादा छापे मारकर 450 से अधिक मिलावटखोरों को गिरफ्तार किया और करोड़ों के मिलावटी खाद्य पदार्थ जब्त किए। इस कार्रवाई से महाराष्ट्र में डिटर्जेंट और रसायनों से बने नकली दूध और ताड़ के तेल से बनने वाले 'एनालॉग पनीर' का रैकेट ध्वस्त हो गया है। नियमों और स्वच्छता मानकों की अनदेखी करने वाले कई नामी फूड चेन्स, बड़े रेस्तराओं आदि के लाइसेंस तक निलंबित या रद्द किए जा चुके हैं। महाराष्ट्र की घटनाएं इसलिए सामने आ रही हैं, क्योंकि वहां तेज-तर्रार अधिकारी खाद्य प्रशासन को मिला है। दूसरे इलाकों में ऐसी कार्रवाई नजर नहीं आती। इसका मतलब यह नहीं है कि भारत में मिलावटखोरी बंद हो गई है। इससे शायद ही किसी को इनकार हो कि शुद्ध खाना और दवा प्राप्त करना हर व्यक्ति का अधिकार है। ब्रिटेन और अमेरिका में ध्यान रखा जाता है कि उपभोक्ताओं तक वही सामान पहुंचे, जो शुद्ध है। ऐसी व्यवस्था भारत में भी की गई है। 2006 में संसद से पारित खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम के तहत भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण यानी एफएसएसएआई का गठन किया गया है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत कार्यरत इस संस्था का दायित्व खाद्य पदार्थों के मानकों पर निगाह रखना और उन्हें तोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई करना है। राज्यों की पुलिस, प्रशासन और आपूर्ति अधिकारियों को भी अधिकार है कि वे मिलावटखोरी रोकें। त्योहारी सीजन में ये संस्थाएं कार्रवाइयां करती भी हैं। इसे भी पढ़ें: Jan Gan Man: शिक्षा मंत्री ने इस्तीफा दिया, क्या शिक्षा व्यवस्था सुधर गयी? इसी तरह क्या Gyanesh Kumar के इस्तीफा देने भर से चुनाव व्यवस्था सुधर जायेगी? सरकारी आंकड़ों के अनुसार, साल 2020 से हर साल करीब एक लाख से अधिक खाद्य नमूनों की जांच की जा रही है। नियमों का उल्लंघन करने पर करीब आठ हजार से ज्यादा खाद्य व्यावसायिक लाइसेंस रद्द भी किए गए हैं। लेकिन देश में इस पर प्रभावी नियंत्रण नहीं लगाया जा सका है। रोक ना लग पाने के पीछे मोटे तौर पर तीन कारण नजर आते हैं। पहला है, मुनाफाखोरी की बढ़ती प्रवृत्ति, दूसरा नैतिकता का क्षरण और तीसरा कारण निश्चित तौर पर प्रशासनिक विफलता और भ्रष्टाचार है। विनोबा भावे ने करीब आठ दशक पहले लिखे अपने निबंध ‘नवयुवकों से दो बातें’ में कहा है कि देश में सुराख ही सुराख हैं। उन्होंने राष्ट्ररूपी घड़े में बने इन सुराखों को सदाचार से भरने की अपील की है। कुछ उसी तरह व्यवस्था में अब भी सुराख हैं। हमारे तंत्र के बड़े हिस्से से सदाचार और कर्तव्यपराणयता गायब है। वह राष्ट्र निर्माण के भाव से दूर है। इस वजह से वक्त पर कार्रवाई नहीं होती। कई बार तंत्र को जानकारी होती है कि फलां कारोबारी आटे में पत्थर का सफेद बुरादा मिला रहा है, चावलों में प्लास्टिक के दाने फेंट रहा है, दवाओं के सैंपल में गड़बड़ी कर रहा है, नकली मावे की मिठाई बेच रहा है, जाली शराब बिक रही है। वक्त पर इन गड़बड़ियों की जानकारी होने के बावजूद मुनाफाखोर से मिलने वाली चंद रकम के एवज में वह चुप रह जाता है। भले ही नकली दूध पीने से नागरिक बीमार हो रहा हो या नकली शराब से निर्दोष जान जा रही हो। नैतिकता का क्षरण भी मिलावटखोरी के लिए जिम्मेदार है। नैतिकता की कमी मुनाफाखोर कारोबारी और उत्पादक के साथ तंत्र में भी पैठी हुई है। सत्ता संभालते वक्त प्रधानमंत्री मोदी ने तंत्र को चेताया था कि सब चलता है-वाली मानसिकता की अब गुंजाइश नहीं रही। शुरू में इससे ग्रस्त लोगों में भय दिखा, लेकिन अब तंत्र का बड़ा हिस्सा उसी पुराने ढर्रे पर चलता दिखता है, इसलिए मुनाफाखोरों और मिलावटखोरों का डर कम हो चला है। स्वास्थ्य संविधान के समवर्ती सूची का विषय है, इसलिए इस मामले में केंद्र के साथ राज्य सरकारों को भी कार्रवाई का अधिकार है। ऐसे में तंत्र को प्रभावी और जवाबदेह बनाने के लिए केंद्र और राज्यों की सरकारों को जीरो टालरेंस की नीति अख्तियार करना जरूरी लगता है। तभी मुनाफाखोर, मिलावटखोर और लापरवाह प्रशासनिक तंत्र के पेंच कसे जा सकते हैं। पड़ोसी देश चीन का मिलावटखोरी रोकने वाला 'फूड सेफ्टी लॉ' दुनिया के सबसे कठोर कानूनों में से एक है। जिसके तहत जानबूझकर खाद्य पदार्थों में खतरनाक मिलावट करने वालों को मृत्युदंड देने का प्रावधान है। चीन में साल 2008 में दूध में मेलामाइन रसायन मिलाने के चर्चित मामले के दोषियों को मौत की सजा दी गई थी। स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वाली मिलावटखोरों को इस कानून के तहत आजीवन कारावास के साथ ही भारी आर्थिक जुर्माने का भी प्रावधान है। चीन में खाद्य नियमों का उल्लंघन करने, घटिया या मानकरहित उत्पाद बेचने और सबूत नष्ट करने वाली कंपनियों और कारोबारियों पर वहां भारी-भरकम जुर्माना लगाया जाता है। साथ ही व्यवसाय का लाइसेंस रद्द भी किया जाता है। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में खाद्य सुरक्षा और मिलावटखोरी पर रोक के लिए कड़े कानून हैं। फूड स्टैंडर्ड्स ऑस्ट्रेलिया एंड न्यूजीलैंड की जवाबदेही है कि वह दोनों देशों के खाद्य मानक तैयार करे। खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने और मिलावटखोरी रोकने के लिए राज्यों के साथ ही स्थानीय निकायों की भी जवाबदेही है। दोनों देशों में खाद्य सुरक्षा नियमों का उल्लंघन करने, असुरक्षित या मिलावटी भोजन बेचने वाली कंपनियों और निगमों पर भारी जुर्माने का प्रावधान है। यहां जानबूझकर सार्वजनिक नुकसान या डर फैलाने के इरादे से खाद्य पदार्थों में मिलावट को गंभीर अपराध माना जाता है। ऐसे मामलों में 25 साल तक की जेल हो सकती है। संयुक्त राज्य अमेरिका में भी मिलावटखोरी के खिलाफ सख्त और प्रभावी कानून है, जिसे लागू करने की जवाबदेही फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन यानी एफडीए की है। अमेरिका में मिलावटखोरी पर लगाम के लिए संघीय फूड, ड्रग और कॉस्मेटिक एक्ट है, जो यहां का मुख्य और सबसे बड़ा कानून है। इस कानून के तहत ऐसे खाद्य पदार्थों, दवा या सौंदर्य प्रसाधन को मिलावटी माना जाता है, जो तय मानकों को पूरा नहीं करते या जिसमें हानिकारक पदार्थ मिलाया गया हो। इस कानून के तहत गलत और भ्रामक लेबलिंग पर भी रोक का प्रावधान है। अमेरिका में एक और फूड सेफ्टी मॉडर्नइजेशन एक्ट है, जिसका मकसद मिलावट और संक्रमण को निरोधात्मक कार्रवाई करना है। इन कानूनों के तहत अमेरिका में मिलावटी या दूषित खाद्य पदार्थ और दवाएं बेचना गंभीर अपराध है। इनका उल्लंघन करने वाली कंपनियों और व्यक्तियों पर भारी जुर्माने, जेल की सजा और उत्पादों को तुरंत नष्ट करने या जब्त करने की व्यवस्था है। अमेरिका की तरह ब्रिटेन में भी खाद्य पदार्थों में मिलावट और धोखाधड़ी रोकने के लिए सख्त कानूनी व्यवस्था है। यहां के फूड सेफ्टी एक्ट के तहत स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भोजन बेचना या तैयार करना गंभीर अपराध है। खाद्य मानकों और मिलावट पर नजर रखने के लिए यहां फूड स्टैंडर्ड एजेंसी है। कुछ इसी अंदाज में हमारे यहां भी कठोर कानून और नियमन की जरूरत है। तभी मिलावटखोरी को रोका जा सकता है और भारतीय नागरिकों को सुरक्षित माहौल मुहैया कराया जा सकता है। उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

प्रभासाक्षी 30 Sep 2026 1:34 pm

CWC बैठक में सोनिया गांधी बोलीं- अच्छा हुआ पहले चले गए नीतीश कुमार

सूत्रों के अनुसार, सोनिया गांधी ने कहा कि नीतीश कुमार पर भरोसा करना मुश्किल था और उनका INDIA गठबंधन से अलग होना पहले से उनकी राजनीतिक दिशा का हिस्सा था। उन्होंने कथित तौर पर कहा कि नीतीश गठबंधन से बाहर निकलने के लिए रास्ते तलाश रहे थे।

देशबन्धु 30 Sep 2026 1:18 pm

राजाओं को लड़ने के लिए देवियों ने दी तलवारें, NCERT Book के नये अध्याय में भारतीय प्रतिरोध की कहानी ने बदल डाली तस्वीर!

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद यानि एनसीईआरटी एक बार फिर से सुर्खियों में है। दरअसल कक्षा नौ की सामाजिक विज्ञान पुस्तक ने भारतीय मध्यकालीन इतिहास को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। मंगलवार को जारी ‘अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड—भाग दो’ में ‘रेजिस्टेंस एंड रेजिलिएंस’ यानी प्रतिरोध और दृढ़ता नामक अध्याय के जरिए सातवीं शताब्दी के बाद भारतीय उपमहाद्वीप में हुए लगातार आक्रमणों और उनके खिलाफ हुए प्रतिरोध को प्रमुखता दी गई है। पुस्तक में युद्ध और धार्मिक परंपराओं के संबंध का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि सातवीं शताब्दी से अनेक राजा और राजकुमार संघर्ष के समय काली, दुर्गा, भवानी और शक्ति के अन्य रूपों को रक्षक के रूप में मानते थे। सबसे चर्चित हिस्सा उन देवी-प्रदत्त तलवारों का है, जिनका उल्लेख पुस्तक ऐतिहासिक परंपराओं के संदर्भ में करती है। पुस्तक के अनुसार, बस्तर के शासक अन्नमरजा के बारे में मान्यता है कि उन्हें माणिक्यदेवी यानी दंतेश्वरी से तलवार प्राप्त हुई थी। इसी तरह विजयनगर के कुमार कम्पण के बारे में कहा गया है कि उन्होंने मदुरै में सल्तनत की सेनाओं के खिलाफ देवी से प्राप्त तलवार का इस्तेमाल किया। मराठा शासक छत्रपति शिवाजी के बारे में भी पारंपरिक मान्यता का उल्लेख है कि उन्हें तुलजा भवानी से तलवार मिली थी। इसे भी पढ़ें: BPSC को पॉलिटेक्निक संस्थानों में विभागाध्यक्ष के 218 पदों पर नहीं मिला एक भी आवेदन हम आपको बता दें कि पुस्तक मध्यकालीन भारत को केवल राजवंशों के उत्थान-पतन के रूप में नहीं, बल्कि आक्रमण, संघर्ष और प्रतिरोध के लंबे दौर के रूप में प्रस्तुत करती है। इसमें कहा गया है कि सातवीं शताब्दी के बाद उपमहाद्वीप में लगातार आक्रमण हुए, जिनके पीछे क्षेत्रीय विस्तार के साथ धार्मिक उद्देश्य भी रहे। पुस्तक अरब, तुर्क, मुगल और यूरोपीय शक्तियों के खिलाफ भारतीय शासकों और समुदायों के प्रतिरोध को दर्ज करती है। राजपूतों, अहोमों, विजयनगर, मराठों, सिखों और जाटों के संघर्षों को भी इसमें स्थान दिया गया है। अध्याय में यह भी कहा गया है कि भारतीय समाज ने बाहरी चुनौतियों का सामना केवल सैन्य स्तर पर नहीं किया, बल्कि अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान को भी बनाए रखा। महाराणा प्रताप का अकबर के खिलाफ संघर्ष, अहोमों द्वारा मुगल विस्तार का प्रतिरोध और सरायघाट का युद्ध, विजयनगर की भूमिका तथा मराठों की स्वराज्य की अवधारणा को इसी संदर्भ में रखा गया है। हालांकि पुस्तक में मुगलों के साथ कछवाहों जैसे कुछ राजपूत समूहों के सहयोग का भी उल्लेख है, लेकिन समग्र प्रस्तुति में प्रतिरोध को अपेक्षाकृत अधिक प्रमुखता मिली है। वहीं सिख इतिहास के हिस्से में मुगल शासन के दौरान गुरु अर्जन देव, गुरु तेग बहादुर और गुरु गोबिंद सिंह से जुड़े संघर्ष और बलिदान का उल्लेख करते हुए पुस्तक मुगल राज्य की सिख गुरुओं के प्रति क्रूरता को इतिहास में दुर्लभ उदाहरणों वाला बताती है। मंदिरों के विध्वंस और पुनर्निर्माण, काशी विश्वनाथ मंदिर, भक्ति परंपरा और सूफी परंपरा का भी अध्याय में उल्लेख है। इस पूरी तस्वीर के बीच एनसीईआरटी प्रमुख दिनेश सकलानी ने कहा है कि माध्यमिक स्तर पर सामाजिक विज्ञान की पढ़ाई का उद्देश्य विद्यार्थियों में विश्लेषणात्मक क्षमता, आलोचनात्मक जिज्ञासा, संवाद की क्षमता और विभिन्न संस्कृतियों को समझने की क्षमता विकसित करना है। उनके अनुसार, नई पुस्तक इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। देखा जाये तो नई किताब इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल इतिहास के कुछ नए प्रसंग नहीं जोड़ती, बल्कि विद्यार्थियों के सामने मध्यकालीन भारत को देखने का एक अलग ढांचा रखती है, जहां आक्रमण के साथ प्रतिरोध, युद्ध के साथ आस्था और सत्ता के साथ सांस्कृतिक अस्तित्व की लड़ाई को केंद्रीय स्थान दिया गया है।

प्रभासाक्षी 30 Sep 2026 1:16 pm

बैठक शुरू होने से पहले ही बिखरा 'इंडी' गठबंधन, राहुल को नेता मानने को कोई तैयार नहीं: शिवराज सिंह चौहान

बैठक शुरू होने से पहले ही बिखरा 'इंडी' गठबंधन, राहुल को नेता मानने को कोई तैयार नहीं: शिवराज सिंह चौहान

समाचार नामा 30 Sep 2026 12:29 pm

पप्पू यादव बोले- 'नेताओं की जिंदगी में अय्याशी के अलावा कुछ नहीं', बेगूसराय की घटना के बाद महिला सुरक्षा पर पूछे सवाल

पप्पू यादव बोले- 'नेताओं की जिंदगी में अय्याशी के अलावा कुछ नहीं', बेगूसराय की घटना के बाद महिला सुरक्षा पर पूछे सवाल

समाचार नामा 30 Sep 2026 12:27 pm

राज्यसभा चुनाव: सपा ने राम गोपाल यादव और धनराज परिमल नाथवानी को बनाया उम्मीदवार, आज दाखिल करेंगे नामांकन

राज्यसभा चुनाव: सपा ने राम गोपाल यादव और धनराज परिमल नाथवानी को बनाया उम्मीदवार, आज दाखिल करेंगे नामांकन

समाचार नामा 30 Sep 2026 10:37 am

पीएम मोदी ने शेयर किया गीता का श्लोक, बताया- स्वाभाविक कर्मों में तत्परता से मिलती है परम सिद्धि

पीएम मोदी ने शेयर किया गीता का श्लोक, बताया- स्वाभाविक कर्मों में तत्परता से मिलती है परम सिद्धि

समाचार नामा 30 Sep 2026 8:32 am

उज्जैन शाही मस्जिद विवाद पर वीएचपी का आरोप, बोले- यह माहौल बिगाड़ने की सुनियोजित कोशिश

महाकाल की नगरी उज्जैन में सड़क को चौड़ा करने का एक सरकारी प्रोजेक्ट अब विवादों में घिर गया है। एक तरफ सिंहस्थ कुंभ को देखते हुए शहर को सुंदर बनाने की योजना है

देशबन्धु 29 Sep 2026 11:28 pm

एसआईआर पर कांग्रेस के आरोपों को भाजपा ने बताया राजनीतिक भ्रम, बोले-गुजरात चुनाव से पहले ही हार की स्वीकार

एसआईआर पर कांग्रेस के आरोपों को भाजपा ने बताया राजनीतिक भ्रम, बोले-गुजरात चुनाव से पहले ही हार की स्वीकार

समाचार नामा 29 Sep 2026 10:26 pm

असम के मुख्यमंत्री ने बिना पैसे के नौकरियों को लेकर कांग्रेस पर सवाल उठाए

असम के मुख्यमंत्री ने बिना पैसे के नौकरियों को लेकर कांग्रेस पर सवाल उठाए

समाचार नामा 29 Sep 2026 10:24 pm

राहुल गांधी को चुनाव आयुक्तों को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया नहीं पता : प्रवीण खंडेलवाल

राहुल गांधी को चुनाव आयुक्तों को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया नहीं पता : प्रवीण खंडेलवाल

समाचार नामा 29 Sep 2026 8:38 pm

मदरसों के मुद्दे पर सपा प्रमुख अखिलेश यादव का बयान स्वागत योग्य: काजी नज्म अली

मदरसों के मुद्दे पर सपा प्रमुख अखिलेश यादव का बयान स्वागत योग्य: काजी नज्म अली

समाचार नामा 29 Sep 2026 8:34 pm

आम आदमी पार्टी के नेता मंत्रियों के आवासों पर कब्जा कर रहे हैं: सुनील जाखड़

आम आदमी पार्टी के नेता मंत्रियों के आवासों पर कब्जा कर रहे हैं: सुनील जाखड़

समाचार नामा 29 Sep 2026 8:33 pm

झारखंड में एसआईआर की प्रक्रिया तेज: सीईओ ने राजनीतिक दलों के साथ की बैठक

झारखंड में एसआईआर की प्रक्रिया तेज: सीईओ ने राजनीतिक दलों के साथ की बैठक

समाचार नामा 29 Sep 2026 8:26 pm

राहुल की चुटकी, खड़गे का पलटवार और थरूर पर तंज, CWC बैठक में गूंजे ठहाके

चुनाव आयोग और वोटर लिस्ट पर चली लंबी चर्चा, लेकिन राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और शशि थरूर के बीच हुई मजेदार बातचीत ने सबका ध्यान खींचा

देशबन्धु 29 Sep 2026 7:29 pm

'देश में जो चुनाव हो रहे हैं, वो निष्पक्ष नहीं हैं', जयराम रमेश का दावा

'देश में जो चुनाव हो रहे हैं, वो निष्पक्ष नहीं हैं', जयराम रमेश का दावा

समाचार नामा 29 Sep 2026 5:59 pm

सीएमआरएल-एक्सालॉजिक मामला: पिनाराई विजयन, वीणा और रियास के खिलाफ एफआईआर की मांग वाली याचिका पर फैसला सुरक्षित

सीएमआरएल-एक्सालॉजिक मामला: पिनाराई विजयन, वीणा और रियास के खिलाफ एफआईआर की मांग वाली याचिका पर फैसला सुरक्षित

समाचार नामा 29 Sep 2026 4:13 pm

'इस बार विपक्ष ने नहीं, मीडिया ने सबूतों के साथ किया खुलासा', नितिन नवीन के बयान पर मनोज झा का पलटवार

'इस बार विपक्ष ने नहीं, मीडिया ने सबूतों के साथ किया खुलासा', नितिन नवीन के बयान पर मनोज झा का पलटवार

समाचार नामा 29 Sep 2026 4:07 pm

'जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा बहाल करने के प्रस्ताव में अफसरशाही का दखल', एनसी का दावा

'जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा बहाल करने के प्रस्ताव में अफसरशाही का दखल', एनसी का दावा

समाचार नामा 29 Sep 2026 3:23 pm

हेड कॉन्स्टेबल से मारपीट पर सौरभ भारद्वाज-जरनैल सिंह समेत 'आप' कार्यकर्ताओं पर एफआईआर

हेड कॉन्स्टेबल से मारपीट पर सौरभ भारद्वाज-जरनैल सिंह समेत 'आप' कार्यकर्ताओं पर एफआईआर

समाचार नामा 29 Sep 2026 2:56 pm

'संवैधानिक संस्थाओं को बदनाम करने की आदत बना चुके हैं', भाजपा नेताओं ने विपक्ष को घेरा

'संवैधानिक संस्थाओं को बदनाम करने की आदत बना चुके हैं', भाजपा नेताओं ने विपक्ष को घेरा

समाचार नामा 29 Sep 2026 2:40 pm

यूपी-बिहार विधान परिषद चुनाव: भाजपा ने दोनों राज्यों में उम्मीदवारों का किया ऐलान, बिहार में जदयू को 4 सीटें

भाजपा की ओर से यूपी और बिहार में उम्मीदवारों की घोषणा के बाद विधान परिषद चुनाव की तस्वीर अब और स्पष्ट हो गई है। यूपी में पार्टी ने छह सीटों पर प्रत्याशी उतारे हैं, जबकि बिहार में भाजपा और जदयू के बीच आठ सीटों का बंटवारा सामने आया है।

देशबन्धु 29 Sep 2026 2:15 pm

Surgical Strike की उस रात भारत ने दुश्मनों को कर दिया था स्पष्ट, छत पर छिपो या पाताल में, भारतीय सुरक्षा बल हर हाल में ढूँढ़ कर मार गिराएंगे

दस साल पहले 28-29 सितंबर की रात भारत ने नियंत्रण रेखा पार कर आतंकवाद के उन ठिकानों पर प्रहार किया था, जिन्हें लंबे समय से सीमा पार आतंक की मशीनरी का हिस्सा माना जाता रहा था। यह केवल कुछ आतंकी ठिकानों पर की गई सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि भारत की सुरक्षा नीति में एक निर्णायक मोड़ था। उरी हमले में 19 भारतीय सैनिकों की शहादत के बाद हुई 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक ने यह संकेत दिया था कि सीमा पार से आतंकवाद को केवल कूटनीतिक या सीमित सैन्य प्रतिक्रिया तक सीमित रखने का पुराना ढांचा बदल रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते सप्ताह यानि 27 सितंबर 2026 को ‘मन की बात’ में इसी बदलाव को रेखांकित करते हुए 2016 की कार्रवाई को ऐतिहासिक उपलब्धि बताया था। उन्होंने कहा कि भारतीय सैनिक नियंत्रण रेखा पार कर आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई करने में सक्षम हैं, यह देखकर दुनिया हैरान रह गई थी। प्रधानमंत्री ने 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक को बालाकोट और 2025 के ऑपरेशन सिंदूर से जोड़ते हुए भारत की आतंकवाद विरोधी नीति में लगातार आए बदलाव को सामने रखा था। इसे भी पढ़ें: पाकिस्तान के बेतूके सवालः भारत के सटीक जबाव देखा जाये तो असल बदलाव समझने के लिए 2016 से पहले की तस्वीर देखनी होगी। संसद हमले और 2008 के मुंबई हमले जैसे बड़े आतंकवादी हमलों के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी रणनीतिक दुविधा यही थी कि पाकिस्तान की धरती से संचालित आतंकवाद का सैन्य जवाब देने पर कहीं दो परमाणु-संपन्न देशों के बीच व्यापक युद्ध न छिड़ जाए। इसी आशंका ने लंबे समय तक भारत की नीति को संयम की सीमा में रखा। लेकिन उरी ने इस गणित को बदल दिया। 28-29 सितंबर 2016 को भारतीय विशेष बलों ने नियंत्रण रेखा पार कर पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में आतंकी घुसपैठ के लिए इस्तेमाल किए जा रहे ठिकानों को निशाना बनाया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि सरकार ने इस कार्रवाई को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया। संदेश बिल्कुल स्पष्ट था कि आतंकवाद और उसके बुनियादी ढांचे के बीच दूरी बनाकर भारत को रोकने की रणनीति अब पहले जैसी प्रभावी नहीं मानी जाएगी। यहीं से भारत की प्रतिरोधक रणनीति का नया अध्याय शुरू हुआ। 2019 में पुलवामा हमले के बाद बालाकोट में हवाई कार्रवाई ने जवाब की भौगोलिक सीमा को नियंत्रण रेखा से आगे बढ़ाया। यानी 2016 में जहाँ जमीनी कार्रवाई नियंत्रण रेखा के पार आतंकी ठिकानों तक पहुँची थी, वहीं बालाकोट एअर स्ट्राइक ने यह दिखाया कि भारत आवश्यकता पड़ने पर पाकिस्तान के भीतर भी आतंकवादी बुनियादी ढांचे को निशाना बना सकता है। फिर 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद ऑपरेशन सिंदूर ने इस रणनीति को एक और स्तर पर पहुँचा दिया। 7 मई 2025 को पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में नौ आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया गया। मोदी सरकार ने इसे केंद्रित और नियंत्रित कार्रवाई बताया तथा कहा कि पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना नहीं बनाया गया। यानी उरी, बालाकोट और ऑपरेशन सिंदूर, यह तीनों एक जैसी सैन्य कार्रवाइयाँ नहीं थीं। इनके तरीके, हथियार, लक्ष्य और भौगोलिक दायरे अलग थे। लेकिन इनके पीछे दिखाई देने वाला रणनीतिक संदेश एक ही था कि भारत आतंकवादी हमले और उसके पीछे मौजूद बुनियादी ढांचे को पूरी तरह अलग-अलग घटनाएँ मानकर नहीं चलेगा। इस तरह 2016 का अभियान भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा सोच में निर्णायक बदलाव था। भारत ने तथाकथित ‘रणनीतिक संयम’ से आगे बढ़कर ऐसी प्रतिरोधात्मक कार्रवाई की दिशा पकड़ी जिसमें पूर्ण युद्ध की सीमा पार किए बिना अपनी क्षमता दिखाई गई। यही इस बदलाव का सबसे बड़ा रणनीतिक अर्थ है। इसका निशाना केवल आतंकवादी संगठन नहीं, बल्कि प्रॉक्सी युद्ध का पूरा गणित है। हालांकि भारत की कार्रवाइयों के बावजूद प्रॉक्सी युद्ध समाप्त नहीं हुआ है। खतरे ने अपना रूप बदला है। ड्रोन के जरिए हथियार और मादक पदार्थ भेजना, छोटे प्रशिक्षित घुसपैठ दल और कम दृश्यता वाली आतंकवादी कार्रवाइयाँ इसी बदलती रणनीति का हिस्सा मानी जा रही हैं। जम्मू क्षेत्र और पीर पंजाल के दक्षिण में बढ़ा सुरक्षा फोकस भी इसी बदलाव को दर्शाता है। बहरहाल, दस साल पहले सवाल था कि आतंकी हमले के बाद भारत जवाब देगा या नहीं? उरी के बाद वह सवाल बदल गया। अब सवाल यह है कि जवाब किस स्तर पर होगा, उसकी सीमा क्या होगी और आतंकवाद के पीछे मौजूद ढांचे पर उसकी कीमत कितनी भारी पड़ेगी। 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक ने इस बदलाव को दृश्यमान किया; बालाकोट ने उसे आगे बढ़ाया और ऑपरेशन सिंदूर ने उसकी अगली तस्वीर सामने रख दी। यही बीते दशक का सबसे बड़ा सामरिक संदेश है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 29 Sep 2026 1:41 pm

राम और शिव के बारे में रेवंत रेड्डी की टिप्पणियां हिंदू धर्म के प्रति उनकी घोर अज्ञानता को प्रदर्शित कर रही हैं

भारतीय राजनीति में भगवानों के नाम पर सियासत कोई नई बात नहीं, लेकिन सवाल तब खड़ा होता है जब सत्ता की राजनीति में भगवानों को भी जाति, वर्ग और क्षेत्र के खांचों में बांटने की कोशिश होने लगे। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के ताजा बयान ने यही सवाल देश के सामने ला खड़ा किया है कि क्या अब भगवान राम और भगवान शिव को भी राजनीति के अलग-अलग खेमों में खड़ा किया जाएगा? क्या राम को अमीरों का और शिव को गरीबों का भगवान बताकर आस्था को भी वोटबैंक की राजनीति में बांटने की कोशिश होगी? सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि एक मुख्यमंत्री के मुंह से निकले ऐसे शब्द देश की धार्मिक और सामाजिक एकता को कहां ले जाएंगे? हम आपको बता दें कि एक कार्यक्रम में भाजपा पर निशाना साधते हुए तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने कहा कि “शिव गरीबों के भगवान हैं, जबकि राम अमीरों के भगवान हैं।” उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा ने भगवान राम को “चुरा” लिया है और उत्तर भारत में चुनावी सफलता के लिए राम की भावना और आस्था का राजनीतिक इस्तेमाल किया। रेड्डी ने अपने तर्क को उत्तर-दक्षिण और द्रविड़-आर्य पहचान से भी जोड़ा। उनका कहना था कि “हम द्रविड़ हैं और उत्तर भारत के लोग आर्य हैं। हम शिव के भक्त हैं और वे राम के भक्त हैं।” उन्होंने सवाल उठाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा नेता मंचों से “हर हर महादेव” क्यों नहीं कहते और केवल “जय श्रीराम” का उद्घोष क्यों सुनाई देता है? रेड्डी ने कहा कि जब दक्षिण भारत में “हर हर महादेव” बोला जाता है तो भाजपा को यह पसंद नहीं आता। इसे भी पढ़ें: Danam Nagender पर Supreme Court के फैसले के बाद बोले KTR, Rahul Gandhi और Revanth Reddy को तमाचा यहीं से विवाद ने राजनीतिक रूप ले लिया। केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता बंडी संजय कुमार ने रेड्डी पर भगवान राम और भगवान शिव के बीच राजनीतिक विभाजन खड़ा करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री को यह नहीं भूलना चाहिए कि उसी तेलंगाना में वेमुलवाड़ा को दक्षिण काशी और भद्राचलम को दक्षिण अयोध्या कहा जाता है। ऐसे में राम और शिव को उत्तर और दक्षिण की सीमाओं में बांटना उचित नहीं है। बंडी संजय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वाराणसी और काशी विश्वनाथ से जुड़ाव का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद नरेंद्र मोदी पहले प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने वेमुलवाड़ा स्थित श्री राजराजेश्वर स्वामी मंदिर का दौरा किया। देखा जाये तो भारतीय राजनीति में धर्म को चुनावी हथियार बनाने की प्रवृत्ति कोई नई बात नहीं है। लेकिन जब राजनीति सीधे भगवानों के बीच भी वर्ग, क्षेत्र और विचारधारा की दीवार खड़ी करने लगे, तब सवाल सिर्फ किसी एक पार्टी या नेता का नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में आस्था की मर्यादा का बन जाता है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी का ताजा बयान इसी वजह से गंभीर राजनीतिक बहस का विषय बन गया है। सवाल उठ रहा है कि भगवान राम और भगवान शिव को राजनीति के दो अलग-अलग खेमों में खड़ा करने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी? क्या किसी भी राजनीतिक दल के लिए यह उचित है कि करोड़ों लोगों की साझा आस्था को “अमीर बनाम गरीब” या “उत्तर बनाम दक्षिण” की राजनीतिक श्रेणियों में बांट दिया जाए? वैसे रेवंत रेड्डी का यह पहला विवादित बयान नहीं है। दिसंबर 2025 में उन्होंने हिंदू देवी-देवताओं की संख्या और अलग-अलग पूजा परंपराओं को लेकर भी ऐसी टिप्पणियां की थीं, जिन पर भाजपा और अन्य विपक्षी दलों ने हिंदू आस्था का मजाक उड़ाने का आरोप लगाया था। यही वजह है कि अब यह सवाल और तेज हो रहा है कि रेवंत रेड्डी के राजनीतिक भाषणों में हिंदू आस्था ही बार-बार निशाने पर क्यों दिखाई देती है? यहां हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि यह सवाल उठाना किसी दूसरे धर्म के प्रति पूर्वाग्रह नहीं है; बल्कि उद्देश्य यह पूछना है कि सत्ता और राजनीति में धार्मिक आस्थाओं के साथ समान मर्यादा क्यों नहीं होनी चाहिए? साथ ही यहां सवाल यह भी उठता है कि धर्म और भगवान पर टिप्पणी कर रहे मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी को हिंदू धर्म के बारे में कितना ज्ञान है? राम को अमीरों का भगवान बता रहे रेड्डी को शायद यह पता नहीं कि भगवान राम का शबरी के आश्रम में जाना और उनकी भक्ति स्वीकार करना, निषादराज गुह के साथ उनका आत्मीय संबंध तथा वनवासी समाज के लोगों के साथ उनका लगाव इस बात के उदाहरण हैं कि राम के लिए भक्त की सामाजिक या आर्थिक स्थिति जरा भी महत्व नहीं रखती। जिन राम ने पिता के वचन की लाज रखने के लिए सारा राजपाट छोड़कर वन की राह पकड़ ली उन्हें अमीरों का भगवान बताना बेशर्मी की पराकाष्ठा है। वहीं भगवान शिव की आराधना में भी भक्तिभाव को ही प्रमुख माना जाता है। एक और बात रेवंत रेड्डी को जाननी चाहिए कि रामचरितमानस के उत्तरकांड में भगवान राम स्वयं शिव की महिमा बताते हुए कहते हैं कि शंकर की आराधना के बिना उनकी भक्ति भी प्राप्त नहीं हो सकती। यानी जिस राम को राजनीति में “अमीरों का भगवान” और शिव को “गरीबों का भगवान” बताकर दो वर्गों में बांटने की कोशिश की जा रही है, उसी राम की परंपरा शिव को अपनी भक्ति का मार्ग बताती है। देखा जाये तो रेड्डी के बयान के बाद कांग्रेस को यह बताना चाहिए कि क्या 'भगवानों को बांटना' उसकी नई राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है? राम को अमीर और शिव को गरीब बताकर आखिर हासिल क्या होगा? उत्तर भारत को राम और दक्षिण भारत को शिव से जोड़कर क्या देश की एकता मजबूत होगी? भगवान किसी पार्टी की संपत्ति नहीं हैं। न राम भाजपा के हैं, न शिव कांग्रेस के। आस्था करोड़ों भारतीयों की निजी और सांस्कृतिक विरासत है। राजनीति को अगर धर्म से दूरी नहीं रखनी है तो कम-से-कम धर्म के प्रति मर्यादा तो रखनी ही होगी। भगवानों के नाम पर वोट मांगने की राजनीति हो या भगवानों को ही राजनीति के अखाड़े में एक-दूसरे के सामने खड़ा करने की सियासत हो, दोनों ही रूपों में आस्था का राजनीतिक इस्तेमाल सवालों के कठघरे में खड़ा होता है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 29 Sep 2026 1:37 pm

रेवंत रेड्डी के बयान पर सियासी घमासान, भाजपा बोली-देश को बांटने की कोशिश, कांग्रेस ने किया बचाव

रेवंत रेड्डी के बयान पर सियासी घमासान, भाजपा बोली-देश को बांटने की कोशिश, कांग्रेस ने किया बचाव

समाचार नामा 29 Sep 2026 1:31 pm

प्रधानमंत्री लगातार कर रहे हैं विदेशी मुद्रा बचाने की अपील

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने एक बार पुनः भारतीय नागरिकों से आग्रह किया है कि वे आवश्यक नहीं हो तो सोना नहीं खरींदे अथवा कम मात्रा में खरीदें। साथ ही आपने यह भी अपील की है कि विदेशी पर्यटन को टालने का प्रयास करें एवं विदेश में जाकर शादी ब्याह के कार्यक्रम नहीं करें। यह समय की मांग है कि भारतीय नागरिक विदेशी मुद्रा को बचाने के उद्देश्य से स्वदेशी मंत्र को अपनायें। माननीय प्रधानमंत्री जी को देश के नागरिकों से उक्त आग्रह इसलिए करना पड़ा है क्योंकि वैश्विक स्तर पर परिस्थियां लगातार बिगड़ रही हैं। भारत चूंकि आर्थिक विकास के उस चक्र में आ गया है जहां छोटी सी चूक भी भारत में तेज गति से हो रहे आर्थिक विकास पर बहुत अधिक विपरीत प्रभाव डाल सकती है। इस कठिन दौर में भारत को बहुत संभल कर आगे बढ़ने की आवश्यकता है। रूस यूक्रेन युद्ध लम्बे समय से लगातार चल रहा है, इजरायल हमास युद्ध जारी ही था कि अमेरिका ईरान के बीच युद्ध छिड़ गया। उधर, अमेरिका में ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने के साथ ही विभिन्न देशों से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर टैरिफ की तलवार लगातार लटक रही है। वैश्विक स्तर पर इन विपरीत परिस्थितियों के बीच कई देशों के विदेशी व्यापार पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। इसमें भारत भी शामिल है, क्योंकि भारत अपनी कच्चे तेल की कुल खपत का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अन्य देशों से आयात करता है। इसी प्रकार, भारत देश में स्वर्ण की कुल मांग का भी 90 प्रतिशत से अधिक भाग आयात करता है। विशेष रूप से, अमेरिका ईरान के बीच छिड़े युद्ध के बाद स्ट्रेट ओफ होर्मुज से कच्चे तेल की आपूर्ति लगभग ठप्प पड़ गई है। भारत में होने वाले कच्चे तेल की कुल आपूर्ति का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से आता है। अतः भारत पर उक्त वर्णित परिस्थितियों का विशेष प्रभाव हुआ है। पिछले वर्ष भारत द्वारा 7,200 करोड़ अमेरिकी डॉलर का स्वर्ण आयात किया गया है, पिछले वर्ष की तुलना में यह 32 प्रतिशत अधिक है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्वर्ण की कीमतों में हुए तेज उछाल के चलते ही भारत के स्वर्ण आयात के बिल में 32 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है अन्यथा स्वर्ण आयात की मात्रा में कुछ कमी ही दर्ज हुई है। भारत के कुल आयात में कच्चे तेल के आयात की भागीदारी सबसे अधिक है, इसके बाद स्वर्ण के आयात की भागीदारी रहती है। इसके चलते भारत का विदेशी व्यापार घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है। इसे, यदि समय रहते नहीं सम्भाला गया तो भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर अतिरिक्त दबाव आने लगेगा और अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुपए की कीमत और अधिक नीचे आने लगेगी। इसे भी पढ़ें: Pakistan के भीतर जाकर भारत ने किया आतंकवाद पर करारा प्रहार! Islamabad में SCO Meeting Attend कर India ने चल दिया बड़ा दाँव दूसरे, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से कई देशों में मुद्रा स्फीति की दर लगातार बढ़ रही है एवं इसके कारण एवं ब्याज दरों में वृद्धि के चलते इन देशों में बांड यील्ड भी लगातार बढ़ रही है। आज, विभिन्न देशों में बांड यील्ड पिछले कई वर्षों के उच्च स्तर पर आ गई है। जैसे, अमेरिका में 10 वर्षीय बांड यील्ड 4.80 प्रतिशत के उच्च स्तर से भी ऊपर पहुंच गई है, ब्रिटेन में 5.25 प्रतिशत (पिछले 18 वर्षों के उच्चत्तम स्तर पर है), फ्रान्स में 4.24 प्रतिशत (पिछले 17 वर्षों के उच्चत्तम स्तर पर है), जर्मनी में 3.37 प्रतिशत (पिछले 15 वर्षों के उच्चत्तम स्तर पर है), जापान में 2.99 प्रतिशत जहां पर शून्य प्रतिशत हुआ करती थी (पिछले 30 वर्षों के उच्चत्तम स्तर पर है), कनाडा में 3.75 प्रतिशत, ब्राजील में 14.56 प्रतिशत, ऑस्ट्रेलिया में 5.23 प्रतिशत, सिंगापुर में 2.40 प्रतिशत, दक्षिण कोरिया में 4.41 प्रतिशत एवं भारत में 6.98 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई है। यदि विकसित देशों में यदि मुद्रा स्फीति की दर और अधिक बढ़ती है तो इसे नियंत्रण में लाने के उद्देश्य से ब्याज की दरों को बढ़ाया जा सकता है इससे इन देशों में बांड यील्ड और अधिक बढ़ेंगी, जिसके चलते भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं से विदेशी मुद्रा में किए गए निवेश की निकासी होगी और यह राशि विकसित देशों में हस्तांतरित होगी क्योंकि इन देशों में बांड यील्ड आकर्षक स्तर पर पहुंच गई है। इन परिस्थितियों के बीच यदि भारत से भी विदेशी मुद्रा निवेश की निकासी प्रारम्भ होती है तो भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर अतिरिक्त दबाव आएगा और अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुपए के मूल्य में तेज गिरावट दृष्टिगोचर होगी जिससे भारत में आयात और अधिक महंगे होने लगेंगे, इस प्रकार भारत में आयातित मंहगाई की अतिरिक्त मार पड़ेगी। इस बढ़ी हुई मंहगाई को नियंत्रित करने के लिए भारत को भी मजबूर होकर ब्याज दरों में वृद्धि करना होगी। ब्याज दरों में वृद्धि का विपरीत प्रभाव देश की सरकार द्वारा जारी किए जाने वाले बांड पर अदा की जाने वाली ब्याज की राशि पर भी पड़ता है, इससे सरकारों को अपने बजट में से और अधिक राशि के भुगतान का प्रावधान ब्याज के रूप में करना होता है और अपने पूंजीगत खर्चों एवं जनता की भलाई के लिए चलाई जा रही विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं पर पर खर्च की जाने वाली राशि में कटौती करनी होती है। लम्बे समय तक चलने वाले अधिक ब्याज दर के साइकल से देश में मंदी की आशंका भी बढ़ती है। विकसित देश आज इस समस्या से झूझते हुए दिखाई दे रहे हैं। भारत को इस दबाव से बचाने की आवश्यकता है। तीसरे, भारत के पास आज 75,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक का विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है। जापान के पास 1.2 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर एवं चीन के पास 3.4 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार उपलब्ध है। भारत अपने विदेशी मुद्रा भंडार को एक लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर तक ले जाना चाहता है क्योंकि इससे भारत को भविष्य में विदेशी व्यापार में होने वाली किसी भी प्रकार की परेशानी से बचाया जा सकेगा। यह तभी सम्भव हो सकेगा, जब भारतीय नागरिक विदेशी मुद्रा का सोच समझकर उपयोग करें। स्वर्ण की खरीद से, विदेश में पर्यटन करने से एवं विदेश में शादियों के कार्यक्रम आयोजित करने से विदेशी मुद्रा का खर्च बढ़ता है जिससे भारत के विदेशी मुद्रा भंडार कम होते हैं। चौथे, भारतीय नागरिकों में स्वर्ण के प्रति आकर्षण कुछ अधिक मात्रा में ही है। यह सही है कि स्वर्ण भविष्य में आर्थिक सुरक्षा प्रदान करता हुआ दिखाई देता है परंतु देश के विकास की दृष्टि से यह सुप्त मुद्रा के रूप में ही देखा जाता है। स्वर्ण में किए गए निवेश पर किसी भी प्रकार की आय का अर्जन नहीं होता है क्योंकि स्वर्ण में निवेश की गई राशि उत्पादक निवेश की श्रेणी में नहीं गिनी जाती है। एक अनुमान के अनुसार भारतीय परिवारों के पास लगभग 25,000 टन से अधिक का स्वर्ण भंडार मौजूद है, जिसकी बाजार कीमत लगभग 5 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर है, जो भारत के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 125 प्रतिशत है। इतनी भारी भरकम राशि का निवेश निष्क्रिय एवं अनुत्पादक अस्तियों में होने के चलते लाखों करोड़ रुपए की राशि पर किसी प्रकार की आय का अर्जन नहीं हो रहा है। यदि इसी निवेश को उत्पादक कार्यों में लगाया जाय तो देश की अर्थव्यवस्था को और अधिक गतिशील एवं प्रभावशाली बनाया जा सकता है। अतः भारत में यह लगातार प्रयास किया जा रहा है कि निवेश को अनुत्पादक अस्तियों में घटा कर उत्पादक अस्तियों में लगाया जाय। अतः अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उक्त वर्णित विपरीत परिस्थितियों के बीच भारत के प्रधानमंत्री, भारतीय नागरिकों से उक्त तीन आग्रह लगातार कर रहे हैं ताकि भारत की आर्थिक विकास दर को अक्षुण बनाए रखा जा सके, भारत में किए गए विदेशी मुद्रा के निवेश को भारत से बाहर निकलने से रोका जा सके एवं भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को और अधिक मजबूत बनाया जा सके ताकि भारत को भविष्य में विदेशी व्यापार में आने वाली किसी भी परेशानी से बचाया जा सके। - प्रहलाद सबनानी सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक, भारतीय स्टेट बैंक के-8, चेतकपुरी कालोनी, झांसी रोड, लश्कर, ग्वालियर - 474 009

प्रभासाक्षी 29 Sep 2026 1:23 pm

चुनाव आयोग से जुड़े विवाद पर कांग्रेस बनाएगी रणनीति, ज्ञानेश कुमार को जाना होगा : मीरा कुमार

चुनाव आयोग से जुड़े विवाद पर कांग्रेस बनाएगी रणनीति, ज्ञानेश कुमार को जाना होगा : मीरा कुमार

समाचार नामा 29 Sep 2026 12:37 pm

सीईसी ज्ञानेश कुमार के अकेले फैसले लेने के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट अगले हफ्ते करेगा सुनवाई

सीईसी ज्ञानेश कुमार के अकेले फैसले लेने के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट अगले हफ्ते करेगा सुनवाई

समाचार नामा 29 Sep 2026 12:26 pm

एलपीयू मामले पर सियासत तेज, कांग्रेस सांसद चन्नी और रंधावा ने 'आप' सरकार पर साधा निशाना

एलपीयू मामले पर सियासत तेज, कांग्रेस सांसद चन्नी और रंधावा ने 'आप' सरकार पर साधा निशाना

समाचार नामा 29 Sep 2026 11:34 am

कमजोर वैश्विक संकेतों के बीच शेयर बाजार की धीमी शुरुआत

मुंबई, घरेलू शेयर बाजार मंगलवार को सुस्त शुरुआत के साथ खुले। कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और कमजोर वैश्विक संकेतों के बीच बेंचमार्क इंडेक्स में लगभग 0.2 प्रतिशत की गिरावट देखी गई।

देशबन्धु 29 Sep 2026 11:11 am

कोलकाता के एसआरएफटीआई में छात्रों के दो गुटों में झड़प, अधीर रंजन बोले- 'बहुत गलत है'

कोलकाता के एसआरएफटीआई में छात्रों के दो गुटों में झड़प, अधीर रंजन बोले- 'बहुत गलत है'

समाचार नामा 28 Sep 2026 11:52 pm

बेला एस्टेट के मतदाताओं का मुद्दा उठा, राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर लगाए गंभीर आरोप

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने यमुना किनारे स्थित बेला एस्टेट इलाके के मतदाताओं का मुद्दा उठाते हुए चुनाव आयोग की मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं

देशबन्धु 28 Sep 2026 11:32 pm

केरल: राहुल गांधी पर टिप्पणी को लेकर वीडी सतीशन का राजीव चंद्रशेखर पर पलटवार

केरल: राहुल गांधी पर टिप्पणी को लेकर वीडी सतीशन का राजीव चंद्रशेखर पर पलटवार

समाचार नामा 28 Sep 2026 11:27 pm

'अगर बहुमत खिलाफ था तो ये आयोग के फैसले थे ही नहीं', ईसीआई के कार्यप्रणाली पर कपिल सिब्बल

'अगर बहुमत खिलाफ था तो ये आयोग के फैसले थे ही नहीं', ईसीआई के कार्यप्रणाली पर कपिल सिब्बल

समाचार नामा 28 Sep 2026 10:16 pm

नागांव उपचुनाव: समागुरी में रकीबुल हुसैन का विरोध

नागांव उपचुनाव: समागुरी में रकीबुल हुसैन का विरोध

समाचार नामा 28 Sep 2026 10:02 pm

'वोट चोरी' के खिलाफ जनता जाग चुकी है, सीईसी का इस्तीफा और गिरफ्तारी होगी : राकेश सिन्हा

'वोट चोरी' के खिलाफ जनता जाग चुकी है, सीईसी का इस्तीफा और गिरफ्तारी होगी : राकेश सिन्हा

समाचार नामा 28 Sep 2026 9:14 pm

एडवोकेट एचएस फुल्का ने की 18 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर कानूनी ढांचे की मांग

एडवोकेट एचएस फुल्का ने की 18 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर कानूनी ढांचे की मांग

समाचार नामा 28 Sep 2026 8:24 pm

मैसूरु दशहरा का उद्घाटन करेंगे अभिनव गविसिद्धेश्वर महास्वामीजी, सीएम शिवकुमार की सांस्कृतिक भव्यता देखने की अपील

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समाचार नामा 28 Sep 2026 8:22 pm

'वोट चोरी' और मतदाता सूची में गड़बड़ी के आरोपों को लेकर जयपुर में कांग्रेस का प्रदर्शन

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समाचार नामा 28 Sep 2026 8:16 pm

टीएमसी नाम-निशान मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला मान्य होगा : भाजपा सांसद नरेश बंसल

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समाचार नामा 28 Sep 2026 8:08 pm

बिहार में कानून व्यवस्था में काफी सुधार, जल्दी ही सभी घटनाओं पर लगेगी रोक : देवेश चंद्र ठाकुर

बिहार में कानून व्यवस्था में काफी सुधार, जल्दी ही सभी घटनाओं पर लगेगी रोक : देवेश चंद्र ठाकुर

समाचार नामा 28 Sep 2026 7:53 pm

कर्नाटक के 84 विधानसभा क्षेत्रों से होकर गुजरेगी कांग्रेस की 'भारत जोड़ो यात्रा 2.0'

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समाचार नामा 28 Sep 2026 6:06 pm

Pakistan के भीतर जाकर भारत ने किया आतंकवाद पर करारा प्रहार! Islamabad में SCO Meeting Attend कर India ने चल दिया बड़ा दाँव

भले ही भारत और पाकिस्तान के बीच दुश्मनी की तलवारें खिंची हुई हों, भले ही हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा के वार्षिक सत्र के दौरान दोनों देशों के बीच चले वाकयुद्ध को पूरी दुनिया ने देखा हो, लेकिन भारत ने पाकिस्तान की अध्यक्षता में हुई शंघाई सहयोग संगठन यानि एससीओ की राष्ट्रीय समन्वयक बैठक में हिस्सा लेकर दुनिया को एक बड़ा कूटनीतिक संदेश दे दिया है। 28 से 30 सितंबर तक इस्लामाबाद में हो रही इस बैठक में भारत की ओर से संयुक्त सचिव आलोक डिमरी प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। पाकिस्तान की 2026-27 की अध्यक्षता में यह पहली बड़ी बैठक है, जिसमें संगठन के आगामी कार्यक्रमों और बैठकों का कैलेंडर तय किया जाना है। भारत की इस भागीदारी ने साफ कर दिया है कि नई दिल्ली बहुपक्षीय मंचों से पीछे हटने की बजाय वहां अपनी रणनीतिक मौजूदगी और प्रभाव को और मजबूत करने की नीति पर आगे बढ़ रही है। साथ ही, आतंकवाद और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भारत का कड़ा रुख भी बरकरार है। हम आपको बता दें कि पाकिस्तान ने अपनी अध्यक्षता के लिए ‘दृष्टि को कार्रवाई में बदलना: संपर्क, नवाचार और साझा समृद्धि’ का विषय चुना है। इस एजेंडे के जरिए इस्लामाबाद क्षेत्रीय संपर्क, आर्थिक सहयोग, नवाचार और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने का संदेश देना चाहता है। लेकिन पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि जिस मंच को वह अपनी कूटनीतिक सक्रियता दिखाने के अवसर के रूप में पेश कर रहा है, उसी मंच पर भारत लगातार आतंकवाद के प्रश्न को केंद्रीय सुरक्षा मुद्दे के रूप में सामने रखता आया है। इसे भी पढ़ें: UN में भारत का पाकिस्तान पर जोरदार पलटवार, कश्मीर से ओसामा तक की याद दिलाई उल्लेखनीय है कि भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय स्तर पर लंबे समय से कोई सार्थक व्यापक संवाद नहीं है। इसके बावजूद भारत ने शंघाई सहयोग संगठन के बहुपक्षीय ढांचे को द्विपक्षीय विवादों से अलग रखा है। यही नई दिल्ली की कूटनीतिक रणनीति का महत्वपूर्ण पहलू है। पाकिस्तान के साथ सामान्य द्विपक्षीय संबंधों की बहाली और बहुपक्षीय मंच पर भारत की भागीदारी, दोनों को अलग-अलग रखा गया है। यहीं पाकिस्तान की कूटनीतिक चुनौती स्पष्ट होती है। इस्लामाबाद को एससीओ की अध्यक्षता मिली है, लेकिन भारत के साथ उसके संबंधों में वह परिस्थितियां अब भी मौजूद हैं जिनके कारण व्यापक द्विपक्षीय संवाद बंद पड़ा है। इसके बावजूद भारत पाकिस्तान की मेजबानी में होने वाली संगठनात्मक बैठकों में भाग लेकर यह संदेश दे रहा है कि बहुपक्षीय संस्थाओं को बंधक बनाकर द्विपक्षीय विवादों का समाधान नहीं किया जा सकता। हम आपको यह भी बता दें कि भारत के एजेंडे में आतंकवाद का मुद्दा एक बार फिर सबसे ऊपर रहने वाला है। खास बात यह है कि इस बार जवाब पाकिस्तान की जमीन पर, उसी के मंच पर दिया जाएगा। पाकिस्तान जब एससीओ के क्षेत्रीय आतंकवाद-रोधी ढांचे की अध्यक्षता कर रहा है, तब भारत के लिए यह मंच इस्लामाबाद को आतंकवाद के सवाल पर सीधे घेरने का महत्वपूर्ण अवसर है। नई दिल्ली लगातार आतंकवाद, उग्रवाद और अलगाववाद के खिलाफ सामूहिक कार्रवाई की मांग करती रही है। साथ ही भारत सीमा पार आतंकवाद तथा संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिबंधित आतंकी संगठनों के खिलाफ ठोस कार्रवाई को पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने की बुनियादी शर्त मानता है। ऐसे में एससीओ के मंच से पाकिस्तान में ही आतंकवाद का मुद्दा उठाना इस्लामाबाद के लिए कहीं अधिक कड़ा कूटनीतिक संदेश होगा। साथ ही कनेक्टिविटी के सवाल पर भी भारत की स्थिति स्पष्ट है। नई दिल्ली एससीओ के संपर्क और क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग से जुड़े प्रयासों का समर्थन करती है, लेकिन उसकी स्पष्ट शर्त है कि ऐसी कोई भी परियोजना सदस्य देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन नहीं कर सकती। यानी भारत संपर्क के खिलाफ नहीं है, बल्कि वह संपर्क के नाम पर विवादित क्षेत्रों अथवा संप्रभुता से जुड़े सिद्धांतों को दरकिनार करने के खिलाफ अपनी स्थिति कायम रखता है। भारत की यही नीति पिछले वर्षों में भी दिखाई दी है। 2017 में एससीओ का पूर्ण सदस्य बनने के बाद भारत ने संगठन की विभिन्न गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी की। अक्टूबर 2024 में विदेश मंत्री एस. जयशंकर पाकिस्तान में एससीओ के शासनाध्यक्षों की बैठक में शामिल हुए थे। जुलाई 2026 में भी भारतीय प्रतिनिधिमंडल सीमा सुरक्षा से जुड़े एससीओ कार्यक्रम के लिए इस्लामाबाद गया था। भारतीय अधिकारी एससीओ के आतंकवाद-रोधी ढांचे से जुड़े अभ्यासों और विशेषज्ञ बैठकों में भी भाग लेते रहे हैं। अब नजर 2027 पर है। पाकिस्तान अगस्त 2027 में इस्लामाबाद में एससीओ राष्ट्राध्यक्ष शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। पाकिस्तान ने संकेत दिया है कि संगठन के सभी सदस्य देशों के नेताओं को निमंत्रण दिया जाएगा, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल होंगे। लेकिन निमंत्रण मिलना और प्रधानमंत्री का पाकिस्तान जाना दो अलग-अलग विषय हैं। हम आपको यह भी बता दें कि शंघाई सहयोग संगठन की स्थापना 2001 में चीन, रूस, कजाखस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान ने की थी। भारत और पाकिस्तान 2017 में पूर्ण सदस्य बने थे। बाद में ईरान और बेलारूस भी इसमें शामिल हुए। संगठन का दायरा सुरक्षा से लेकर आर्थिक सहयोग, क्षेत्रीय संपर्क और आतंकवाद, अलगाववाद तथा उग्रवाद के खिलाफ सहयोग तक फैला हुआ है। बहरहाल, इस्लामाबाद की बैठक महज एक प्रशासनिक बैठक नहीं है। पाकिस्तान इसे अपनी अध्यक्षता के प्रभाव को स्थापित करने के अवसर के रूप में देख रहा है, जबकि भारत इसी मंच का इस्तेमाल अपनी सुरक्षा प्राथमिकताओं, आतंकवाद-विरोधी दृष्टिकोण और क्षेत्रीय संपर्क संबंधी सिद्धांतों को मजबूती से रखने के लिए कर रहा है। पाकिस्तान के सामने चुनौती यह है कि संगठन की अध्यक्षता उसके हाथ में होने के बावजूद भारत की भागीदारी उसकी शर्तों पर नहीं, बल्कि भारत की घोषित रणनीतिक प्राथमिकताओं के साथ आगे बढ़ रही है। यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण सामरिक और कूटनीतिक संदेश है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 28 Sep 2026 6:03 pm

गांधीनगर नगर निगम चुनाव से पहले, भाजपा के 44 उम्मीदवारों ने 'जनसेवा' की शपथ ली

गांधीनगर नगर निगम चुनाव से पहले, भाजपा के 44 उम्मीदवारों ने 'जनसेवा' की शपथ ली

समाचार नामा 28 Sep 2026 5:52 pm

गायत्री बिश्नोई मामले से ध्यान भटकाने के लिए एलपीयू में कराया हंगामा, मंत्री मनजिंदर सिरसा ने 'आप' पर लगाया गंभीर आरोप

गायत्री बिश्नोई मामले से ध्यान भटकाने के लिए एलपीयू में कराया हंगामा, मंत्री मनजिंदर सिरसा ने 'आप' पर लगाया गंभीर आरोप

समाचार नामा 28 Sep 2026 5:11 pm

चुनावी हार से राहुल गांधी को सीखने की जरूरत, नहीं सीखेंगे तो जनता वोट की चोट देती रहेगी: नितिन नवीन

चुनावी हार से राहुल गांधी को सीखने की जरूरत, नहीं सीखेंगे तो जनता वोट की चोट देती रहेगी: नितिन नवीन

समाचार नामा 28 Sep 2026 4:56 pm

जम्मू-कश्मीर विधानसभा में हंगामा, भाजपा विधायकों ने 'वेल' में जाकर नकली कार्यवाही की

जम्मू-कश्मीर विधानसभा में हंगामा, भाजपा विधायकों ने 'वेल' में जाकर नकली कार्यवाही की

समाचार नामा 28 Sep 2026 4:40 pm

रांची में डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा के अपमान का मामला, भाजपा नेताओं ने दिया एफआईआर का आवेदन

रांची में डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा के अपमान का मामला, भाजपा नेताओं ने दिया एफआईआर का आवेदन

समाचार नामा 28 Sep 2026 3:52 pm

रोहित पवार ने किसानों के लिए तुरंत मदद की मांग की, कहा-'1972 के ऐतिहासिक सूखे से भी बदतर हालात'

रोहित पवार ने किसानों के लिए तुरंत मदद की मांग की, कहा-'1972 के ऐतिहासिक सूखे से भी बदतर हालात'

समाचार नामा 28 Sep 2026 3:37 pm

प्रवेश वर्मा के थप्पड़ कांड पर भाजपा नेता राम कदम बोले-कानून हाथ में लेने का समर्थन नहीं करेंगे

प्रवेश वर्मा के थप्पड़ कांड पर भाजपा नेता राम कदम बोले-कानून हाथ में लेने का समर्थन नहीं करेंगे

समाचार नामा 28 Sep 2026 3:20 pm

भारत चल पड़ा है नई औद्योगिक क्रांति के पथ पर

भारत में आज एक नई औद्योगिक क्रांति प्रारम्भ हो चुकी है, यह विचार अमेरिका की एक जानी मानी निवेश बैंक- जेफ्रीज ने व्यक्त किये हैं। भारत में, विशेष रूप से डाटा केंद्र स्थापित करने के उद्देश्य से करोड़ों अमेरिकी डॉलर का निवेश होता हुआ दिखाई दे रहा है। भारत में डाटा केंद्र स्थापित करने पर केंद्र सरकार की ओर से टैक्स में भारी भरकम छूट भी प्रदान की जा रही है। अतः भारत में डाटा केंद्र स्थापित करने की तो जैसे होड़ सी मच गई है। पिछले 5 वर्षों के दौरान भारत में डाटा केंद्रों की क्षमता दोगुनी हो चुकी है एवं आगे आने वाले 5 वर्षों के दौरान यह क्षमता बढ़कर 10 GW हो जाने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। वैश्विक स्तर पर डाटा केंद्र अब एक महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में उभर रहा है। साथ ही, भारत में सेमीकंडक्टर उत्पादन इकाईयों को उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना के अंतर्गत लाभ प्रदान किया जा रहा है, इसके लिए 1,300 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि निर्धारित की गई है। इसका परिणाम यह है कि सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में विनिर्माण इकाईयों की स्थापना हेतु भारत में 2,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निवेश किया जा चुका है, और यह आगे भी जारी हैं। इसे भी पढ़ें: जीडीपी से नहीं जमीन पर नजर आए बदलाव भारत आज उन चुनिंदा देशों में से एक है, जिनके पास स्पेस क्षेत्र से सम्बंधित नवीनतम तकनीकी उपलब्ध है। भारत में स्पेस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था वर्ष 2030 तक 5 गुना तक बढ़ सकती है। वैश्विक स्तर पर एयरो स्पेस के क्षेत्र में मांग एवं आपूर्ति में असंतुलन के चलते भारत लाभ की स्थिति में पहुंच गया है क्योंकि कम लागत और कुशल इंजीनीयरिंग टैलेंट आज भारत में ही सम्भव है। इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में भारत आज केवल पुर्जों को इकट्ठा कर उत्पाद बनाने का कार्य करने तक सीमित नहीं है बल्कि इस क्षेत्र में उच्चस्तरीय उत्पादों का निर्माण भी करने लगा है। 6 वर्षों में मोबाइल कम्पोनेंट में घरेलू वैल्यू एडीशन लगभग 20 प्रतिशत से बढ़कर 50 प्रतिशत तक होने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। सोलर के क्षेत्र में भारत आज वैश्विक स्तर पर दूसरा सबसे बड़ा सोलर पीवी का उत्पादक देश बन गया है। इसका परिणाम यह है कि वर्तमान में भारत की 35 GW की सोलर क्षमता चालू है एवं 100 GW की क्षमता पर निर्माण कार्य चालू है। एशिया की सबसे बड़ी 100 कम्पनियों की सूची में आज भारत की 34 कम्पनियां शामिल हो चुकी हैं। कुल मिलाकर, पूर्व में भारत केवल फार्मा, टेक्स्टायल, चमड़ा उत्पाद, कृषि उत्पाद (मसाला, आदि) स्टील, ऑटोमोबील एवं सूचना प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में ही वैश्विक स्तर पर उक्त उत्पादों का निर्यात करने में सफल हो रहा था परंतु आज स्थितियां बदल गई हैं एवं अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों जैसे डाटा केंद्र, सेमीकंडक्टर उत्पादन, स्पेस क्षेत्र, इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र, सोलर क्षेत्र, सुरक्षा क्षेत्र में भी वैश्विक स्तर पर भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। भारत में उपलब्ध टैलेंट एवं श्रम के भरोसे विश्व की कई बड़ी कम्पनियों के बीच आज भारत में विशाल वैश्विक योग्यता केंद्रों (जीसीसी) की स्थापना करने की होड़ सी लग गई है। ब्रिटेन में फार्मा के क्षेत्र में कार्य करने वाली कम्पनी - एस्ट्रा जेनेका ने चेन्नई में एक विशाल वैश्विक योग्यता केंद्र की स्थापना की है। बैंक ऑफ अमेरिका ने अपना सबसे बड़ा बैक ऑफिस कार्यालय पुणे में स्थापित किया है, इस बैंक के पूरे विश्व में बैक ऑफिस में कार्य कर रहे 11,000 कर्मचारी इस केंद्र का ब्रेन बन गए हैं। अमेरिका के सबसे पुराने वित्तीय संस्थानों में से एक बैंक ओफ न्यूयॉर्क, मेलोन ने पुणे एवं चेन्नई में वैश्विक योग्यता केंद्रों की स्थापना की है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में कार्य करने वाली बोस्टन की एक कम्पनी ने फरवरी 2026 में हैदराबाद में विशाल स्तर पर अपने एक अंतरराष्ट्रीय कार्यालय की स्थापना की है। बेंगलुरु, हैदराबाद, चेन्नई एवं पुणे में आज 1,700 से अधिक वैश्विक योग्यता केंद्र स्थापित किए जा चुके हैं, इन केंद्रों में 19 लाख से अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं। भारत आज आउटसोर्सिंग हब से आगे बढ़कर उच्च स्तरीय टैलेंट केंद्र के रूप में स्थापित हो रहा है। भारत में स्थापित किए गए कुल वैश्विक योग्यता केंद्रों में से लगभग 65 प्रतिशत केंद्र अमेरिकी कम्पनियों द्वारा स्थापित किए गए हैं। इन कम्पनियों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में की जा रही रीसर्च का कार्य इन केंद्रों पर सम्पन्न हो रहा है एवं टेक्नॉलजी के क्षेत्र में नए नए उत्पादों का निर्माण भी इन्हीं केंद्रों में किया जा रहा है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्य कर रही अमेरिका की ही एक कम्पनी ट्रूब्रिज ने भी फरवरी 2026 में मुंबई में वैश्विक योग्यता केंद्र की स्थापना की है, इस केंद्र को आगे आने वाले समय में और अधिक विस्तार दिया जाने वाला है। इसी प्रकार, बीमा, बैंकिंग, स्वास्थ्य, साइबर सिक्युरिटी, फार्मा एवं सुरक्षा के क्षेत्रों में कार्यरत अनेक कंपनियां भारत में अपने वैश्विक योग्यता केंद्रों की स्थापना कर रही हैं। पूर्व में, अमेरिका एवं अन्य विकसित देशों को भारत से ब्रेन ड्रेन हो रहा था, परंतु अब परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं एवं अब विशेष रूप से अमेरिका से भारत को रिवर्स ब्रैन ड्रेन होने लगा है क्योंकि ट्रम्प प्रशासन की नीतियों के चलते अन्य देशों से अमेरिका में जाने वाले टैलेंट का अमेरिका में रहना अब मुश्किल हो रहा है। अमेरिका एवं अन्य यूरोपीयन देशों में पूंजीवाद एवं साम्यवाद की नीतियों के चलते इन देशों में जन्म दर भी लगातार कम हो रही है। इन देशों में समाज में प्रत्येक व्यक्ति केवल अपने आप पर ध्यान केंद्रित किए हुए है। विवाह जैसी अति पवित्र संस्था को पश्चिमी देशों ने केवल मौज मस्ती का माध्यम बना दिया गया है। केवल कामुकता के लिए विवाह नहीं किया जाता है जबकि यह एक सामाजिक जिम्मेदारी है। भारतीय दर्शन में अपने कुल को आगे बढ़ाने के लिए विवाह को एक पवित्र संस्था माना गया है। जबकि, पश्चिमी देशों में आज विवाह को आवश्यक ही नहीं माना जा रहा है बल्कि वहां के नागरिक लिव इन रिलेशनशिप में भी रहने लगे हैं। इन देशों में तलाक की दर में अतुलनीय वृद्धि दर्ज हो रही है। इन देशों में सामान्य जीवन यापन की लागत बहुत अधिक महंगी हो रही है। साथ ही, पश्चिमी दर्शन में पुनर्जन्म में विश्वास नहीं किया जाता है, जो कुछ भी भोगना है केवल इसी जन्म में सम्पन्न करना है। अतः इन देशों में अपनी पीढ़ी को आगे बढ़ाने के लिए बच्चे पैदा करना आवश्यक नहीं समझा जा रहा है। इन देशों में समाज की जीवन शैली ही इस प्रकार की बन गई है कि केवल अपने आप पर ध्यान केंद्रित करें एवं अपनी काया को किसी प्रकार का कष्ट नहीं होना चाहिए, परिवार पर एवं समाज पर किसी नागरिक का ध्यान बहुत कम है। पश्चिमी देशों में नागरिक, “मैं और केवल मैं” किस प्रकार अधिक से अधिक सुखी रह सकता हूं, इस विषय पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित किए हुए हैं। यह विशेषताएं पूंजीवाद एवं साम्यवाद पर आधारित अर्थव्यवस्थाओं में बहुत मुखर रूप से उभर का सामने आती है। बच्चे पैदा करने का निर्णय भी बचत एवं खर्च की दृष्टि को सामने रखकर लिया जा रहा है। चूंकि मैं अपने बच्चे पर होने वाले खर्च को वहन नहीं कर सकता हूं अतः मुझे बच्चे पैदा ही नहीं करना है। पश्चिमी देशों में सामान्य परिवार चलाने की लागतें बढ़ती जा रही है अतः परिवार में “डबल इनकम नो किड्ज़” (डिंक) का विचार भी जोर पकड़ता जा रहा है। इन देशों में पूंजीवाद एवं साम्यवाद पर आधारित आर्थिक नीतियों ने नागरिकों को दिमागी तौर पर दिवालिया बना दिया है। इन देशों में नागरिकों का पूरा ध्यान केवल भौतिकवादी विकास पर ही केंद्रित हो गया है। परिवार एवं समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी का एहसास समाप्त सा हो गया है। आज पश्चिमी देशों के नागरिक, विशेष रूप से प्रौढ़ नागरिक, जीवन के अपने अंतिम पलों को सहज बनाने के उद्देश्य से भारत में शिफ्ट हो रहे हैं। भारत की अध्यात्म नगरी ऋषिकेश, हरिद्वार, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड आदि स्थानों पर विकसित देशों के नागरिकों की जैसे बाढ़ सी आ गई है। कुछ देशों के नागरिक गोवा जैसे राज्यों में भी आकर बस रहे हैं। क्योंकि, भारत के इन स्थलों पर उन्हें मानसिक शांति प्राप्त हो रही है। पहिले तो ये विदेशी नागरिक योगा एवं आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के उद्देश्य से भारत आते हैं परंतु यहां आने के उपरांत उन्हें जो आत्मिक शांति प्राप्त होती है, उसके चलते ये लोग भारत में ही बस जाते हैं। - प्रहलाद सबनानी सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक, भारतीय स्टेट बैंक के-8, चेतकपुरी कालोनी, झांसी रोड, लश्कर, ग्वालियर - 474 009

प्रभासाक्षी 28 Sep 2026 2:47 pm

यूएस फेड : गोल्ड-सिल्वर ईटीएफ 3.6 प्रतिशत तक गिरावट

मुंबई, अमेरिका में ब्याज दरों में बढ़ोतरी की उम्मीद के चलते सोमवार को सोने और चांदी की कीमतों को ट्रैक करने वाले गोल्ड-सिल्वर ईटीएफ (एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स) में 3.6 प्रतिशत तक की बड़ी गिरावट देखने को मिली।

देशबन्धु 28 Sep 2026 1:58 pm

अब हफ्ते में 5 दिन ही खुलेंगे बैंक? रातों-रात ऐसा क्या हुआ, 3-Day Bank Strike क्यों टाल दी गई

पिछले सात दिनों से पूरे देश के सीने पर एक भारी सस्पेंस लटका हुआ था। एक ही चेतावनी, एक ही डर कि 28, 29 और 30 सितंबर यानी लगातार 72 घंटे तक देश के बैंकों का दिल धड़कना बंद कर देगा! शटर नहीं उठेंगे, तिजोरियों पर ताले लटके रहेंगे और 30 सितंबर की महा-क्लोज़िंग के बीच देश की पूरी वित्तीय व्यवस्था वेंटिलेटर पर आ जाएगी। हमारे पिछले एमआरआई के एपिसोड में भी हमने इस आने वाले तूफ़ान की एक-एक आहट से आपको रूबरू कराया था। लेकिन फिर घड़ी की सुइयां रात के साढ़े नौ बजाती हैं। रविवार की रात जब पूरा देश सोने की तैयारी कर रहा था, ठीक उसी वक्त परदे के पीछे एक ऐसी बाज़ी पलटी जाती है, जिसने सबको सन्न कर दिया! अब देश की जनता और करोड़ों खाताधारकों के मन में सीधा सवाल यह कौंध रहा है कि आखिर रविवार की आधी रात को ऐसी कौन सी बातचीत हुई? बंद कमरों में ऐसा क्या समझौता हुआ कि जो यूनियंस आर-पार की जंग के मूड में थीं, जो कर्मचारी आक्रोश में सड़कों पर उतरने को तैयार थे, उन्होंने आखिरी वक्त में अपने कदम पीछे क्यों खींच लिए? क्या सरकार ने कर्मचारियों की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी मांग यानी '5-डे बैंकिंग' को आखिरकार मंजूरी दे दी है? क्या अब हर शनिवार को देश की सभी बैंक शाखाएं पूरी तरह बंद रहेंगी? या फिर सरकार ने कर्मचारियों की दुखती रग पर हाथ रखकर कोई ऐसा दांव चल दिया, जिसे यूनियनें झेल नहीं पाईं? सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न अगर शनिवार की छुट्टी पर कोई फैसला हुआ ही नहीं, तो फिर ऐन वक्त पर यह हड़ताल वापस क्यों ली गई? क्या यह बैंक कर्मचारियों की कोई बड़ी रणनीतिक बढ़त है, ग्राहकों के हित में लिया गया फैसला है या फिर सरकार और यूनियनों के बीच केवल वक्त हासिल करने की कोई अंदरूनी चाल? आज के एपिसोड में हम बैंक हड़ताल टलने के पीछे की इनसाइड स्टोरी, आधी रात को बने समझौतों और आपके बैंक जाने से जुड़े हर नियम का एमआरआई स्कैन करेंगे। क्या थी बैंक कर्मचारियों की मांग 27 सितंबर को रात में करीब 9:30 बजे इंडियन बैंक्स एसोसिएशन यानी कि आईबीए और यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस यानी कि यूएफबीयू के बीच में एक बैठक होती है। इसके बाद यूनियंस ने 28, 29 और 30 सितंबर को प्रस्तावित हड़ताल को वापस लेने की घोषणा कर दी। सबसे पहले समझते हैं विवाद क्या था। आज जो वर्तमान में अगर हम बैंकिंग देखें तो महीने के दूसरे और चौथे शनिवार को बैंक की ब्रांचेस बंद रहती हैं। यानी कि बाकी शनिवार में कार्य दिवस रहता है। बैंक यूनियंस की बेसिक डिमांड यह थी कि सभी शनिवार को अवकाश घोषित किया जाए। यानी बैंकिंग में पांच डे वर्क वीक लागू हो। जैसा कि LIC में और सरकारी अस्पताल सरकारी कार्यालयों में लागू होता है। इसे भी पढ़ें: 28 से 30 सितंबर तक Bank Strike का ऐलान, PSU Banks में शाखा कामकाज रहेगा प्रभावित मांग को कर्माचरियों और ग्राहकों के नजरिए से समझें बैंक कर्मचारी से अगर आप पूछिए तो उसका कहना होगा कि बैंक का काम केवल बैंक की शाखा का शटर गिरते ही समाप्त नहीं होता। ग्राहकों से जुड़े काम की रिपोर्टिंग, लक्ष्य और दूसरी जिम्मेदारियां भी होती हैं। यूनियंस का तर्क है 5 दिन के कार्य सप्ताह पर गंभीरता से फैसला होना चाहिए। कर्मचारी बेहद दबाव में काम कर रहे हैं। अब ग्राहक से पूछिएगा जो सोमवार से शुक्रवार अपनी नौकरी करता है और उसके लिए शनिवार बैंक जाकर काम निपटाने का एक सुविधाजनक दिन हो सकता है। सरकार ने भी इसी बात को अपनी सार्वजनिक अपील में उठाया था कि बचे हुए शनिवार बहुत से ग्राहकों के लिए बैंकिंग सेवाएं लेने का मौका है। यह सरकार का पक्ष है। सवाल केवल कर्मचारियों की छुट्टी का नहीं रह जाता। सवाल यह भी है कि अगर बैंक का कार्य सप्ताह बदले तो ग्राहकों की पहुंच कैसे बनी रहेगी? इसे भी पढ़ें: 5 दिन बैंक बंद! कर्मचारियों के साथ ऐसा क्या हुआ? मेगा हड़ताल पर आ गए सभी, वजह जानकर आप भी चौंक जाएंगे बैठक में क्या तय हुआ बातचीत के बाद बैंक यूनियनों ने हड़ताल वापस लेने का ऐलान किया। यूएफबीयू कई बैंक कर्मचारी और अधिकारियों के संगठनों का ग्रुप है। यूएफबीयू ने सात बैंक यूनियन की ओर से एक संयुक्त बयान जारी किया है। जिसमें कहा है कि आईबीए और यूएफबीयू की एक हाई लेवल कमेटी तुरंत बनाई जाएगी। यह कमेटी बाकी शनिवार को छुट्टी देने के मुद्दे पर बात करेगी। कमेटी सभी संभावित विकल्पों पर विचार करेगी। अलग-अलग पक्षों से बात करेगी और ऐसा रास्ता निकालेगी और या निकालने की कोशिश करेगी जो बैंक कर्मचारियों के साथ-साथ ग्राहकों के लिए भी ठीक हो। बैंक यूनियंस की एक बड़ी मांग थी। यह मांग स्केल फोर और उससे ऊपर के बैंक अधिकारियों के लिए परफॉर्मेंस लिंक इंसेंटिव यानी काम के आधार पर मिलने वाली इंसेंटिव की योजना से जुड़ी है। यूनियनों ने इस योजना को वापस लेने की मांग की थी। इस पर भी बातचीत आगे बढ़ाने की बात हुई है। यूएफबीयू के मुताबिक आईबीए सरकार के सामने इस योजना के बदलाव का प्रस्ताव रखेगा ताकि यूनियनों की मांगों को ध्यान में रखा जा सके। इसके बाद जो मुद्दे बचेंगे उन पर दोनों पक्ष बातचीत करेंगे और जल्द कोई हल निकालने की कोशिश होगी। हड़ताल इतनी अहम क्यों थी? हड़ताल 28 से 30 सितंबर तक होनी थी। 30 सितंबर बैंकों के लिए हाफ ईयर क्लोजिंग का दिन होता है। इस दिन बैंक में कई जरूरी काम निपटाए जाते हैं। जैसे खातों का हिसाब मिलाना, पैसों का मिलान करना, जरूरी रकम का इंतजाम करना और ट्रेजरी और मार्केट से जुड़े काम पूरे करना। अगर 28 से 30 सितंबर तक बैंक बंद रहते हैं तो उससे ठीक पहले शनिवार और रविवार सैटरडे संडे भी पड़ रहा था। ऐसे में बैंकिंग सेवाएं लगातार 5 दिन तक प्रभावित हो सकती थी। इसी वजह से वित्त मंत्रालय ने 21 सितंबर को बैंक कर्मचारियों से हड़ताल पर नहीं जाने की अपील की थी। मंत्रालय ने कहा था कि हड़ताल से बैंकिंग सेवाएं प्रभावित होंगी। लोगों को परेशानी होंगी और बैंकों के कामकाज पर भी असर पड़ेगा। मंत्रालय के मुताबिक इसका नुकसान आखिरकार बैंक कर्मचारियों के हितों पर भी पड़ सकता है। इसके बाद 23 सितंबर को वित्त मंत्रालय ने पब्लिक सेक्टर बैंकों और रीजनल रूरल बैंकों को निर्देश दिया था कि 27 सितंबर यानी रविवार को भी बैंक खुले रहेंगे। रविवार को काम का अतिरिक्त वेतन और अनिश्चितकालीन हड़ताल की चेतावनी यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (UFBU) द्वारा देर रात जारी किए गए आधिकारिक सर्कुलर से एक और बड़ी बात सामने आई है। वित्त मंत्रालय के निर्देश पर रविवार, 27 सितंबर को जिन बैंक कर्मचारियों और अधिकारियों ने शाखाओं में जाकर काम किया, उनके मुआवजे पर भी सहमति बन गई है। सर्कुलर के मुताबिक, रविवार को काम करने वाले क्लेरिकल और सब-स्टाफ कर्मचारियों को बायपार्टाइट समझौते के तहत दोगुना ओवर-टाइम (Double OT) भत्ता दिया जाएगा, जबकि अधिकारियों को इसके एवज में एक दिन का अतिरिक्त वेतन मिलेगा। गौरतलब है कि यूनियनों ने 28 से 30 सितंबर की हड़ताल के बाद 26 अक्टूबर से अनिश्चितकालीन हड़ताल का भी नोटिस दे रखा था। इस समझौते में 5-डे बैंकिंग और पीएलआई (PLI) के अलावा 8 मार्च 2024 से अटके पुराने मुद्दे जैसे एनपीएस से ओपीएस (OPS), पेंशन अपडेशन और नई भर्तियों के समाधान पर भी तेजी से बात करने पर सहमति बनी है। पांच दिन काम की मांग आखिर आई कहां से? यह जो पूरा विवाद है कि पांच दिन काम हो और दो दिन छुट्टी मिले। ये बात आई कहां से? बैंक यूनियनों का कहना है कि पहले बैंक सोमवार से शुक्रवार तक काम करते थे और शनिवार को आधे दिन का काम होता था। साल 2015 में हुए एक समझौते के बाद महीने के दूसरे और चौथे शनिवार को छुट्टी कर दी गई यानी कि सेकंड सैटरडे लेकिन बाकी शनिवार अभी भी पूरे दिन कामकाजी होते हैं। अब यूएफबीयू चाहता है कि बाकी शनिवार को भी छुट्टी मिले। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक यूनियन का कहना है कि केंद्र और राज्य सरकार के दफ्तरों, आरबीआई, LIC, प्राइवेट कंपनियों, स्टॉक मार्केट, मनी मार्केट और विदेशी मुद्रा बाजार में पहले से 5 दिन का काम होता है। अभी तीन दिन की बैंक हड़ताल टल गई है। लेकिन 5 दिन काम और दो दिन छुट्टी की मांग पर आखिरी फैसला अभी नहीं हुआ है। ना इसे मंजूरी मिली है और ना ही कहा जा सकता है कि विवाद हमेशा के लिए समाप्त हो गया है। हड़ताल टालने के लिए किया गया रेडिमेड उपाय तो नहीं ? समिति कब बनती है? बैठक कब करती है? ग्राहकों की सुविधा के लिए क्या प्रस्ताव रखती है? उसके बाद सरकार और संबंधित संस्थाएं इस पर क्या निर्णय लेती हैं? यही तीन कदम बताएंगे कि रविवार रात की बातचीत किसी स्थाई समाधान की शुरुआत थी या केवल हड़ताल को रुकवाने के लिए किया गया एक रेडीमेड उपाय था। इस पूरी कहानी को एक वाक्य में समझें तो बैंक हड़ताल टली है। 5 दिन की बैंकिंग पर अभी कोई फाइनल मुहर नहीं लगी। रविवार रात आईबीए और यूनियंस के बीच बातचीत से एक उच्च स्तरीय समिति बनाने और अंतिम तौर पर जो दूसरे लंबित मुद्दे हैं उन पर चर्चा के लिए केवल सहमति बनी है और इसी के बाद यूनियंस ने प्रस्तावित हड़ताल वापस ले ली है। ग्राहकों को तत्काल राहत मिली है। लेकिन शनिवार की बैंकिंग के अंतिम फैसले पर फाइनल मुहर लगनी बाकी है।

प्रभासाक्षी 28 Sep 2026 1:57 pm

बसपा सुप्रीमो मायावती ने चंद्रशेखर को बताया भाजपा का एजेंट, कहा- EVM में धांधली करके जितवाया नगीना से चुनाव

मायावती ने नगीना सांसद को लेकर दावा किया कि चंद्रशेखर आजाद का नगीना क्षेत्र में कोई खास जनाधार नहीं था, इसके बावजूद वह चुनाव जीत गए। उन्होंने आरोप लगाया कि EVM में कथित गड़बड़ी के जरिए बीजेपी ने उन्हें चुनाव जितवाया। मायावती ने यह भी आरोप लगाया कि चंद्रशेखर आजाद बीजेपी के इशारे पर काम करते हैं।

देशबन्धु 28 Sep 2026 1:55 pm

शिवसेना (यूबीटी) ने चुनाव आयोग पर वोटिंग से वंचित करने का लगाया आरोप, 'सामना' में जन-आक्रोश की चेतावनी

शिवसेना (यूबीटी) ने चुनाव आयोग पर वोटिंग से वंचित करने का लगाया आरोप, 'सामना' में जन-आक्रोश की चेतावनी

समाचार नामा 28 Sep 2026 12:36 pm

एनएसई के शेयर आईपीओ इश्यू प्राइस में हुई गिरावट

मुंबई, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया (एनएसई) के हाल ही में सूचीबद्ध हुए शेयर सोमवार को अपने आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) के इश्यू प्राइस से नीचे फिसल गए। इसके साथ ही, शेयर बाजार में लिस्टिंग के बाद अपने उच्चतम स्तर से इनमें 6 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई।

देशबन्धु 28 Sep 2026 12:22 pm

बैंक हड़ताल टली, ग्राहकों को मिली राहत

नई दिल्ली, सरकारी बैंक कर्मचारियों के संघ यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (यूएफबीयू) की ओर से प्रस्तावित 28-30 सितंबर तक की हड़ताल टलने से ग्राहकों को राहत मिली है और सभी बैंकों में कामकाज सामान्य बना हुआ है। यह जानकारी कई सरकारी बैंकों की ओर से सोमवार को दी गई।

देशबन्धु 28 Sep 2026 12:18 pm

बैंकों की तीन दिवसीय हड़ताल टली, सभी शनिवारों की छुट्टी घोषित करने पर चर्चा होगी

सभी शनिवारों की छुट्टी घोषित करने की मांग पर चर्चा के लिए एक उच्च-स्तरीय समिति बनाने की घोषणा के बाद हड़ताल टाली गई है.

देशबन्धु 28 Sep 2026 11:47 am

सोने और चांदी की कीमतें 2.5 प्रतिशत तक गिरीं

मुंबई, सोने और चांदी में सोमवार के सत्र में गिरावट देखने को मिली और शुरुआती कारोबार में ही दोनों कीमती धातुओं का दाम करीब 2.5 प्रतिशत तक कम हो गया।

देशबन्धु 28 Sep 2026 11:21 am

वैश्विक संकेतों से भारतीय शेयर बाजार में गिरावट

मुंबई, कमजोर वैश्विक संकेतों से भारतीय शेयर बाजार सोमवार के कारोबारी सत्र में गिरावट के साथ खुला। सुबह 9:17 पर सेंसेक्स 526.96 अंक या 0.71 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 73,368.78 और निफ्टी 174.20 अंक या 0.75 प्रतिशत की गिरावट के साथ 22,966.30 पर था।

देशबन्धु 28 Sep 2026 10:56 am

'दृढ़ संकल्प और सादगी का संगम थे अशोक सिंहल', जन्मशताब्दी पर पीएम मोदी ने लिखा भावुक लेख

'दृढ़ संकल्प और सादगी का संगम थे अशोक सिंहल', जन्मशताब्दी पर पीएम मोदी ने लिखा भावुक लेख

समाचार नामा 28 Sep 2026 10:15 am

‘पहले कांग्रेस को भी नहीं पूछा, अब मजबूरी में महात्मा गांधी’, ममता बनर्जी की विपक्ष से एकजुटता की अपील पर भाजपा का तंज

‘पहले कांग्रेस को भी नहीं पूछा, अब मजबूरी में महात्मा गांधी’, ममता बनर्जी की विपक्ष से एकजुटता की अपील पर भाजपा का तंज

समाचार नामा 28 Sep 2026 9:53 am

धरपुरम में गरजेंगे सीएम विजय, सत्यबामा के लिए 30 सितंबर को करेंगे प्रचार

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और तमिलगा वेट्ट्री कजगम (टीवीके) के अध्यक्ष सी. जोसेफ विजय 30 सितंबर को धरपुरम में एक जनसभा को संबोधित करेंगे। इस सभा में वे 6 अक्टूबर को होने वाले विधानसभा उपचुनाव में पार्टी की उम्मीदवार पी. सत्यबामा के लिए प्रचार करेंगे।

देशबन्धु 28 Sep 2026 7:40 am