...

भोपाल सीलिंग विवाद सुलझाने के लिए मध्य प्रदेश सरकार 'बीच का रास्ता' तलाश रही : कैलाश विजयवर्गीय

भोपाल सीलिंग विवाद सुलझाने के लिए मध्य प्रदेश सरकार 'बीच का रास्ता' तलाश रही : कैलाश विजयवर्गीय

समाचार नामा 3 Sep 2026 11:38 pm

कश्मीरी पंडितों को धमकी और राम मंदिर सीईओ नियुक्ति पर 'सियासत', भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने

कश्मीरी पंडितों को धमकी और राम मंदिर सीईओ नियुक्ति पर 'सियासत', भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने

समाचार नामा 3 Sep 2026 11:25 pm

भूपेंद्र यादव ने एनसीआर में प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए

भूपेंद्र यादव ने एनसीआर में प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए

समाचार नामा 3 Sep 2026 11:24 pm

भाजपा की 'बी टीम' के रूप में काम कर रही बसपा का जनाधार खत्म: रविदास मल्होत्रा

भाजपा की 'बी टीम' के रूप में काम कर रही बसपा का जनाधार खत्म: रविदास मल्होत्रा

समाचार नामा 3 Sep 2026 11:19 pm

'देश में कानून का राज, अब न्याय मिलेगा,' दिशा सालियान केस पर भाजपा विधायक का बयान

पालघर, 3 सितंबर (आईएएनएस)। महाराष्ट्र की सियासत में दिशा सालियान केस की सीबीआई जांच को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। इस मामले को लेकर वसई-विरार की भाजपा विधायक स्नेहा दुबे पंडित ने कहा कि न्याय व्यवस्था पर उन्हें पूरा भरोसा है और यह फैसला दिशा सालियान को न्याय दिलाने की दिशा में बड़ा कदम है।

देशबन्धु 3 Sep 2026 11:16 pm

संवैधानिक अधिकारियों के इस्तीफे पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र से मांगा जवाब

संवैधानिक अधिकारियों के इस्तीफे पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र से मांगा जवाब

समाचार नामा 3 Sep 2026 8:23 pm

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्‍व में भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही: केवल सिंह ढिल्लों

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही: केवल सिंह ढिल्लों

समाचार नामा 3 Sep 2026 7:50 pm

कश्मीरी पंडितों को धमकी पर शिवसेना सख्त, कहा- सुरक्षा सुनिश्चित करे उमर सरकार

कश्मीरी पंडितों को धमकी पर शिवसेना सख्त, कहा- सुरक्षा सुनिश्चित करे उमर सरकार

समाचार नामा 3 Sep 2026 7:49 pm

हीरे से लेकर हथियारों तक, Belgium के साथ मिलकर Modi ने Europe के लिए बनाया बड़ा गेम प्लान

भारत और बेल्जियम के रिश्तों की सबसे चमकदार पहचान हीरे रहे हैं। एंटवर्प से मुंबई और सूरत तक फैला कारोबार दोनों देशों को जोड़ता रहा है। लेकिन अब यह रिश्ता सिर्फ चमकते हीरों तक सीमित नहीं रहने वाला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डी वेवर की नई दिल्ली में हुई मुलाकात ने भारत-बेल्जियम संबंधों को रक्षा, सेमीकंडक्टर, हरित ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, समुद्री सुरक्षा, अंतरिक्ष, साइबर सुरक्षा और निवेश जैसे रणनीतिक क्षेत्रों तक विस्तार देने का स्पष्ट रोडमैप तैयार कर दिया है। बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डी वेवर की 2 से 4 सितंबर की भारत यात्रा और दोनों देशों के बीच हुए समझौते इस बात का संकेत हैं कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत यूरोप के साथ अपने संबंधों को नई सामरिक गहराई दे रहा है। प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि भारत अब द्विपक्षीय संबंधों को अलग-अलग घटनाओं के रूप में नहीं, बल्कि व्यापार, सुरक्षा, प्रौद्योगिकी और वैश्विक राजनीति को जोड़कर एक व्यापक रणनीतिक ढांचे में आगे बढ़ा रहा है। इतिहास की साझी विरासत, भविष्य की रणनीतिक साझेदारी हम आपको बता दें कि भारत-बेल्जियम संबंधों की जड़ें गहरी हैं। प्रथम विश्व युद्ध में फ्लैंडर्स के युद्धक्षेत्रों में 9,000 से अधिक भारतीय सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया था। बेल्जियम स्वतंत्र भारत के साथ 1947 में राजनयिक संबंध स्थापित करने वाले शुरुआती यूरोपीय देशों में शामिल था। अब 2027 में दोनों देश अपने राजनयिक संबंधों की 80वीं वर्षगांठ मनाएंगे। प्रधानमंत्री डी वेवर ने भारत यात्रा की शुरुआत राजघाट पर महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि देकर की। यह प्रतीकात्मक घटना उस रिश्ते की ओर इशारा करती है जिसकी बुनियाद लोकतंत्र, कानून के शासन, बहुलवाद और आपसी विश्वास पर टिकी है। इसे भी पढ़ें: SCO के मंच से चीन और पाकिस्तान को एक साथ धोकर मोदी ने दुनिया की वाहवाही लूट ली लेकिन इस बार इतिहास से अधिक महत्वपूर्ण भविष्य है। 15 जुलाई 2026 को ब्रुसेल्स में शुरू हुआ पहला भारत-बेल्जियम रणनीतिक संवाद अब दोनों देशों के संबंधों को नियमित और व्यापक संस्थागत आधार देगा। इसके तहत व्यापार और निवेश से लेकर हरित परिवर्तन, प्रौद्योगिकी, संपर्क, रक्षा और सुरक्षा तक सहयोग के लिए एक स्थायी मंच तैयार किया गया है। भारत-ईयू समीकरण में बेल्जियम की बढ़ती अहमियत इस यात्रा का सबसे बड़ा वैश्विक महत्व भारत-यूरोपीय संघ संबंधों से जुड़ा है। जनवरी 2026 में भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौते की वार्ता का सफल निष्कर्ष एक ऐतिहासिक घटनाक्रम माना जा रहा है। मोदी और डी वेवर ने इसके शीघ्र क्रियान्वयन पर जोर दिया है। भारत और यूरोपीय संघ दुनिया की दो बड़ी लोकतांत्रिक और आर्थिक शक्तियां हैं। ऐसे समय में जब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं भू-राजनीतिक तनाव, युद्ध और आर्थिक प्रतिस्पर्धा से प्रभावित हैं, भारत-ईयू आर्थिक साझेदारी का विस्तार केवल व्यापारिक मामला नहीं है। यह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को चीन-केंद्रित निर्भरता से बाहर निकालने और अधिक विविध तथा सुरक्षित व्यवस्था बनाने की रणनीति भी है। बेल्जियम इस समीकरण में विशेष भूमिका निभा सकता है। एंटवर्प यूरोप के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक और बंदरगाह केंद्रों में है। दूसरी ओर भारत हिंद महासागर क्षेत्र में एक विशाल बाजार और तेजी से उभरती आर्थिक शक्ति है। दोनों देशों का सहयोग यूरोप और भारत के बीच एक नए आर्थिक एवं लॉजिस्टिक गलियारे की नींव बन सकता है। पांच साल में व्यापार दोगुना करने का लक्ष्य दोनों प्रधानमंत्रियों ने अगले पांच वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए इंडिया-बेल्जियम इन्वेस्टमेंट फास्ट-ट्रैक मैकेनिज्म शुरू किया गया है, जो निवेश संबंधी बाधाओं को दूर करने और कंपनियों को सहायता देने का काम करेगा। बेल्जियम की संप्रभु निवेश संस्था एसएफपीआईएम और भारत के नेशनल इन्वेस्टमेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर फंड यानि एनआईआईएफ के बीच सहयोग से एक संभावित भारत-बेल्जियम आर्थिक और निवेश गलियारे की दिशा में भी काम होगा। सहयोग के नए क्षेत्रों की सूची बेहद महत्वपूर्ण है। इसमें सेमीकंडक्टर, फार्मास्यूटिकल्स, जैव प्रौद्योगिकी, रसायन, रक्षा विनिर्माण, महत्वपूर्ण खनिजों की रिफाइनिंग और रिसाइक्लिंग, परमाणु ऊर्जा और उन्नत विनिर्माण शामिल हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने साफ कहा कि बेल्जियम की सेमीकंडक्टर विशेषज्ञता और भारत का विशाल औद्योगिक पैमाना एक-दूसरे के पूरक हैं। बेल्जियम के विश्वस्तरीय आईमेक संस्थान को भारत के सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम से जोड़ने की पहल भविष्य में तकनीकी आत्मनिर्भरता के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। रक्षा सहयोग: रिश्तों का सबसे बड़ा रणनीतिक बदलाव इसके अलावा, भारत-बेल्जियम संबंधों में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव रक्षा और सुरक्षा के क्षेत्र में दिखाई देता है। दोनों देशों के रक्षा मंत्रालयों के बीच हस्ताक्षरित लेटर ऑफ इंटेंट नियमित सैन्य संवाद, स्टाफ वार्ता, प्रशिक्षण, अनुसंधान और रक्षा औद्योगिक साझेदारी का ढांचा तैयार करेगा। दोनों देश रक्षा सह-विकास और सह-उत्पादन की संभावनाएं तलाशेंगे। प्रधानमंत्री मोदी ने उन्नत रक्षा उपकरणों, विशेष रूप से जोरावर टैंक जैसे क्षेत्रों में सहयोग का उल्लेख किया। साथ ही बेल्जियम का नई दिल्ली में रक्षा अताशे नियुक्त करना और भारत का ब्रुसेल्स में स्थायी रक्षा अताशे नियुक्त करने का फैसला रिश्तों की बदलती प्राथमिकताओं का स्पष्ट संकेत है। बेल्जियम का युद्धपोत एलईओपोल्ड 1 नवंबर 2026 को भारत आएगा। यह मात्र नौसैनिक दौरा नहीं, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ते सहयोग का संकेत है। इसके अलावा, भारत और बेल्जियम ने आतंकवाद के खिलाफ भी मजबूत साझा रुख अपनाया है। बेल्जियम ने पहलगाम में 2025 के आतंकी हमले की निंदा दोहराई और सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ भारत के साथ एकजुटता दिखाई। दोनों देशों ने आतंकवाद, उसके सुरक्षित ठिकानों और वित्तपोषण के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया। वहीं, सीबीआई और बेल्जियम की संघीय पुलिस के बीच समझौता संगठित अपराध और साइबर अपराध के खिलाफ सहयोग को नई ताकत देगा। सूचना साझा करने, भगोड़ों का पता लगाने और क्षमता निर्माण में यह समझौता महत्वपूर्ण होगा। ग्रीन हाइड्रोजन से समुद्री शक्ति तक साथ ही हरित ऊर्जा सहयोग भी इस यात्रा की बड़ी उपलब्धि है। नवीकरणीय ऊर्जा पर नए एमओयू के तहत ग्रीन हाइड्रोजन, सौर ऊर्जा, ऊर्जा भंडारण, अपतटीय पवन ऊर्जा, बायो-एनर्जी और पंप्ड स्टोरेज में सहयोग बढ़ेगा। ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन से लेकर परिवहन, भंडारण और अंतिम उपयोग तक पूरी वैल्यू चेन में साझेदारी की योजना बनाई गई है। प्रधानमंत्री मोदी ने आंध्र प्रदेश के काकीनाडा में विकसित हो रहे विशाल ग्रीन अमोनिया प्रोजेक्ट का भी उल्लेख किया। समुद्री और बंदरगाह सहयोग भी सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। एंटवर्प और फ्लैंडर्स की बंदरगाह विशेषज्ञता, भारत के तेजी से विकसित होते बंदरगाह नेटवर्क और हिंद महासागर में भारत की भूमिका मिलकर नई संभावनाएं पैदा कर सकती हैं। लॉजिस्टिक्स, ड्रेजिंग, बंदरगाह विकास और अपतटीय पवन ऊर्जा में बेल्जियम की विशेषज्ञता भारत के लिए उपयोगी हो सकती है। वैश्विक राजनीति में साझा संदेश इसके अलावा, दोनों नेताओं ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की जरूरत पर जोर दिया। बेल्जियम ने एक बार फिर विस्तारित और सुधारित सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन किया। दोनों देशों ने एक-दूसरे की अस्थायी सदस्यता की उम्मीदवारी का भी समर्थन किया। यूक्रेन और पश्चिम एशिया पर दोनों देशों ने संवाद और कूटनीति के जरिए न्यायपूर्ण और स्थायी शांति की आवश्यकता पर जोर दिया। यह भारत की उस विदेश नीति के अनुरूप है जो किसी सैन्य गुट का हिस्सा बनने के बजाय संवाद, बहुपक्षवाद और रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता देती है। मोदी की कूटनीति का बड़ा संदेश देखा जाये तो भारत-बेल्जियम संबंधों का नया अध्याय प्रधानमंत्री मोदी की व्यापक कूटनीतिक सोच को दर्शाता है। मोदी ने पुराने हीरा व्यापार को आधुनिक रणनीतिक साझेदारी में बदलने का प्रयास किया है। अब एंटवर्प-मुंबई-सूरत का संबंध सेमीकंडक्टर, ग्रीन हाइड्रोजन, रक्षा उत्पादन, समुद्री संपर्क और निवेश से जुड़ रहा है। यही इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि भारत ने यूरोप के साथ अपने संबंधों को केवल बाजार तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें सुरक्षा, तकनीक और भू-राजनीति से जोड़ दिया है। प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीति की सफलता इस बात में है कि भारत आज एक साथ अमेरिका, यूरोप, रूस और ग्लोबल साउथ के साथ अपने हितों के आधार पर संबंधों को आगे बढ़ा रहा है। बेल्जियम के साथ यह नई साझेदारी भी उसी संतुलित और बहुआयामी कूटनीति का उदाहरण है। बहरहाल, हीरों की चमक से शुरू हुआ भारत-बेल्जियम संबंध अब हाई-टेक, हरित ऊर्जा और रक्षा सहयोग की नई रोशनी में प्रवेश कर रहा है। यदि तय समझौते जमीन पर उतरे, तो यह साझेदारी केवल दो देशों के रिश्तों को नहीं, बल्कि भारत-यूरोप के पूरे रणनीतिक समीकरण को नई दिशा दे सकती है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 3 Sep 2026 6:33 pm

'मैं इन युवाओं के साथ खड़ा हूं', बिहार छात्र आंदोलन के घायलों से मिले राहुल गांधी

'मैं इन युवाओं के साथ खड़ा हूं', बिहार छात्र आंदोलन के घायलों से मिले राहुल गांधी

समाचार नामा 3 Sep 2026 6:15 pm

राम मंदिर ट्रस्ट के सीईओ के तौर पर जितेंद्र मिश्रा की नियुक्ति पर एनडीए नेता बोले-'ऑपरेशन सिंदूर संभाला था, पारदर्शिता लाएंगे'

राम मंदिर ट्रस्ट के सीईओ के तौर पर जितेंद्र मिश्रा की नियुक्ति पर एनडीए नेता बोले-'ऑपरेशन सिंदूर संभाला था, पारदर्शिता लाएंगे'

समाचार नामा 3 Sep 2026 5:11 pm

राम मंदिर अयोध्या के सीईओ एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र की नियुक्ति के पीछे छिपे महत्वपूर्ण प्रशासनिक व सियासी संदेश को समझिए

उत्तरप्रदेश की आध्यात्मिक राजधानी अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण भारतीय राजनीति के सबसे लंबे और निर्णायक अध्यायों में से एक रहा है। इस मंदिर आंदोलन ने भारतीय राजनीति की दिशा बदली, भाजपा को राष्ट्रीय सत्ता के केंद्र तक पहुंचाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई और अंततः 22 जनवरी 2024 को रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा के साथ आंदोलन का सबसे बड़ा प्रतीकात्मक लक्ष्य पूरा हुआ। लेकिन इतिहास का दिलचस्प मोड़ यह है कि मंदिर बनने के बाद असली प्रशासनिक चुनौती शुरू हुई है, जिसके दृष्टिगत 2 सितंबर 2026 को श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने सेवानिवृत्त एयर मार्शल जितेंद्र कुमार मिश्र को अपना पहला पूर्णकालिक CEO नियुक्त किया। इसलिए मिश्र की नियुक्ति के पीछे छिपे महत्वपूर्ण प्रशासनिक व सियासी संदेश को समझना होगा। इसे भी पढ़ें: Operation Sindoor से अयोध्या तक: कौन है राम मंदिर ट्रस्ट के नए CEO एयर मार्शल जीतेंद्र मिश्रा, क्या होगी जिम्मेदारी मसलन, लगभग 5,585 आवेदनों में से बहुस्तरीय चयन प्रक्रिया के बाद तीन नामों के पैनल में से उनका चयन हुआ। मिश्र अप्रैल 2026 में भारतीय वायुसेना के पश्चिमी वायु कमान के प्रमुख पद से सेवानिवृत्त हुए थे और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उनकी भूमिका के कारण राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित रहे। सवाल इसलिए बड़ा है कि राम मंदिर जैसे धार्मिक-सांस्कृतिक संस्थान का CEO एक पूर्व शीर्ष सैन्य कमांडर ही क्यों? और उससे भी बड़ा सवाल यह कि क्या यह सिर्फ प्रशासनिक नियुक्ति है या अयोध्या के लिए तैयार किए जा रहे किसी बड़े संस्थागत मॉडल का संकेत? मेरे अनुभवजन्य आकलन में इसके कम-से-कम सात बड़े प्रशासनिक व सियासी संदेश हैं, जो इसप्रकार हैं:- पहला, राम मंदिर अब ‘आंदोलन’ नहीं, ‘सुव्यवस्थित संस्थान’ है: राम मंदिर आंदोलन के समय सबसे बड़ी आवश्यकता राजनीतिक-सामाजिक लामबंदी की थी, जबकि मंदिर निर्माण के बाद आवश्यकता बदल गई है। अब करोड़ों श्रद्धालुओं की व्यवस्था, दर्शन प्रणाली, सुरक्षा, दान, वित्त, कर्मचारियों, तकनीक, निर्माण, यातायात और अंतरराष्ट्रीय धार्मिक पर्यटन का प्रबंधन करना है। इसलिए CEO की नियुक्ति मूलतः इस बात की घोषणा है कि राम मंदिर अब केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि एक विशाल संस्थागत व्यवस्था है। खासकर यह परिवर्तन भाजपा और संघ परिवार के लिए भी महत्वपूर्ण है। जिस राम मंदिर ने राजनीतिक आंदोलन को ऊर्जा दी, वही मंदिर अब शासन और प्रशासन की क्षमता की परीक्षा का केंद्र बनने जा रहा है। दूसरा, ‘संत-आधारित प्रबंधन’ से ‘प्रोफेशनल मैनेजमेंट’ की ओर अग्रसर है: राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की मूल प्रकृति धार्मिक-सामाजिक है। लेकिन मंदिर के बढ़ते आकार और महत्व के साथ केवल पारंपरिक न्यास व्यवस्था पर्याप्त नहीं रह सकती। शायद CEO का पद बनाना इसी बदलाव का संकेत है। और CEO के लिए पूर्व एयर मार्शल का चयन और भी स्पष्ट संदेश देता है कि- संस्था को अब कॉरपोरेट-जैसी प्रशासनिक दक्षता, सैन्य-जैसी अनुशासनात्मक क्षमता और आधुनिक प्रबंधन की आवश्यकता महसूस हो रही है। मिश्र के चयन की प्रक्रिया भी असाधारण थी—5,585 आवेदन, 1,580 योग्य/उपयुक्त उम्मीदवार, 108 ऑनलाइन इंटरैक्शन, 16 आमने-सामने के उम्मीदवार और अंततः तीन नामों का पैनल। चयन समिति ने नेतृत्व, प्रबंधन अनुभव, ईमानदारी और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय महत्व की संस्था को संचालित करने की दृष्टि जैसे पहलुओं का मूल्यांकन किया। अर्थात संदेश साफ है कि अब राम मंदिर के प्रशासन में ‘कौन है?’ से ज्यादा महत्वपूर्ण ‘क्या कर सकता है?’ होने जा रहा है। तीसरा, ऑपरेशन सिंदूर से अयोध्या तक ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ से ‘राष्ट्रीय संस्कृति’ का सेतु है यह निर्णय: जितेंद्र मिश्र की नियुक्ति का सबसे प्रतीकात्मक पक्ष यही है कि जिस अधिकारी ने पश्चिमी वायु कमान का नेतृत्व किया और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सैन्य अभियानों की कमान से जुड़े रहे, वही अब राम मंदिर के प्रशासन का नेतृत्व करेंगे। उन्हें सर्वोत्तम युद्ध सेवा पदक से भी सम्मानित किया गया है। इसका अर्थ निकालने में सावधानी जरूरी है। यह कहना जल्दबाजी होगी कि सरकार या ट्रस्ट ने जानबूझकर ‘राष्ट्रीय सुरक्षा मॉडल’ को मंदिर प्रशासन में उतारने का निर्णय लिया है। लेकिन प्रतीकात्मक अर्थ को नकारना भी मुश्किल है। सीमा की रक्षा करने वाले सैन्य कमांडर से लेकर देश की सांस्कृतिक अस्मिता के सबसे बड़े प्रतीक के प्रबंधन तक की यात्रा— अपने आप में एक शक्तिशाली राजनीतिक प्रतीक है। यह संदेश भी पढ़ा जा सकता है कि अयोध्या को अब केवल धार्मिक नगर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय महत्व के सांस्कृतिक-सुरक्षा परिसर के रूप में विकसित करने की तैयारी है। चौथा, चढ़ावा विवाद के बाद ‘विश्वास’ की पुनर्स्थापना होगी: इस नियुक्ति के समय को सबसे अधिक गंभीरता से देखना होगा। राम मंदिर के चढ़ावे से जुड़े कथित वित्तीय अनियमितता मामले में गिरफ्तारियां हुईं और ट्रस्ट के प्रशासन पर सवाल उठे। हालिया ट्रस्ट बैठक में चढ़ावे की गिनती में मानवीय हस्तक्षेप घटाने के लिए तकनीक आधारित प्रणाली पर भी विचार किया गया। IIT और बैंकों से प्रस्ताव लिए जाने की खबर है। ऐसे समय में एक अत्यंत वरिष्ठ, गैर-राजनीतिक और अनुशासनप्रिय सैन्य अधिकारी को CEO बनाना एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि अब मंदिर प्रशासन में विश्वास केवल धार्मिक प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि संस्थागत पारदर्शिता से भी अर्जित करना होगा। लेकिन यहां राजनीतिक ईमानदारी जरूरी है। मिश्र की नियुक्ति को सीधे चढ़ावा विवाद का परिणाम कहना उपलब्ध तथ्यों से सिद्ध नहीं है। CEO चयन की प्रक्रिया जुलाई में शुरू हो चुकी थी और लगभग दो महीने चली। फिर भी दोनों घटनाओं का समय एक साथ आने से यह स्पष्ट है कि ट्रस्ट अपने प्रशासनिक ढांचे को अधिक मजबूत और जवाबदेह बनाने की दिशा में बढ़ रहा है। पांचवां, क्या RSS-BJP-VHP की पारंपरिक भूमिका बदल रही है?: यही वह सवाल है जिस पर सबसे ज्यादा राजनीतिक बहस होगी। राम मंदिर आंदोलन की राजनीतिक-सामाजिक धुरी में भाजपा के साथ RSS और विश्व हिंदू परिषद की भूमिका ऐतिहासिक रही है। अब जब मंदिर का संचालन एक पूर्व एयर मार्शल को सौंपा जा रहा है, तो क्या इसका अर्थ है कि पुराने राजनीतिक-सामाजिक नेटवर्क पर भरोसा कम हो रहा है? कांग्रेस नेता भूपेश बघेल ने इसी दिशा में राजनीतिक आरोप लगाया है कि भाजपा-RSS से जुड़े लोगों पर भरोसा कम होने के कारण सेना के अधिकारी को जिम्मेदारी दी गई। लेकिन इस आरोप को तथ्य नहीं, राजनीतिक व्याख्या के रूप में देखना चाहिए। दूसरी व्याख्या ज्यादा व्यावहारिक हो सकती है। वह यह कि RSS और VHP आंदोलन चला सकते हैं, वैचारिक-सामाजिक आधार दे सकते हैं, लेकिन प्रतिदिन लाखों श्रद्धालुओं, हजारों कर्मचारियों, वित्तीय प्रणालियों, तकनीकी ढांचे और सुरक्षा-समन्वय को चलाने के लिए अलग तरह की विशेषज्ञता चाहिए। इसलिए संभव है कि यह RSS/BJP से दूरी नहीं, बल्कि कार्य-विभाजन का नया चरण हो। छठा, मोदी मॉडल के बाद अब ‘अयोध्या मॉडल’ की परीक्षा का वक्त: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक विमर्श में राम मंदिर केवल धार्मिक मुद्दा नहीं रहा; वह सांस्कृतिक पुनर्जागरण, विरासत और विकास की राजनीति से भी जुड़ा रहा है। अब अयोध्या को विश्वस्तरीय धार्मिक-सांस्कृतिक शहर बनाने की चुनौती सामने है। यही वह जगह है जहां ‘अयोध्या मॉडल’ की परीक्षा होगी। क्या अयोध्या विश्वस्तरीय तीर्थ व्यवस्था बना पाएगी? वह करोड़ों श्रद्धालुओं को सुरक्षित दर्शन करा पाएगी? वह दान और वित्तीय व्यवस्था में पारदर्शिता स्थापित करेगी? वह स्थानीय नागरिकों के हितों की रक्षा करेगी? वह धार्मिक पर्यटन से रोजगार पैदा करेगी? वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की सांस्कृतिक छवि मजबूत करेगी? अगर इन सवालों का उत्तर सकारात्मक मिलता है तो राम मंदिर भाजपा के लिए केवल राजनीतिक प्रतीक नहीं रहेगा। वह प्रशासनिक सफलता का मॉडल भी बन सकता है। सातवां, 2027 की उत्तर प्रदेश राजनीति में अयोध्या का नया अर्थ कैसे समझाया जाएगा: यह सबसे बड़ा संदेश है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव सामने है। ऐसे समय में अयोध्या का राजनीतिक महत्व कम नहीं हुआ है, बल्कि उसकी प्रकृति बदल गई है। 2017 और 2022 की राजनीति में राम मंदिर मुख्यतः निर्माण और आस्था के सवाल से जुड़ा था। हालांकि, अब सवाल बदल गया है—वह यह कि राम मंदिर बनने के बाद अयोध्या कैसी बनी? यही प्रश्न 2027 के राजनीतिक विमर्श में महत्वपूर्ण हो सकता है। अगर अयोध्या में विश्वस्तरीय सुविधाएं, रोजगार, पर्यटन, बेहतर परिवहन और सुरक्षित तीर्थ व्यवस्था दिखाई देती है तो भाजपा इसे अपने विकास और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के संयुक्त मॉडल के रूप में प्रस्तुत कर सकती है। लेकिन यदि स्थानीय विस्थापन, महंगाई, यातायात, भीड़, पर्यावरण, प्रशासनिक भ्रष्टाचार या वित्तीय विवाद जैसे मुद्दे उभरते हैं तो विपक्ष को नया राजनीतिक हथियार मिल सकता है। इसलिए CEO की नियुक्ति का अप्रत्यक्ष चुनावी अर्थ भी है। अब राम मंदिर केवल भाजपा की वैचारिक पूंजी नहीं, बल्कि उसका प्रशासनिक प्रदर्शन भी राजनीतिक पूंजी बन सकता है। आठवां, ट्रस्ट का सामूहिक पुनर्गठन: गत 2 सितंबर की बैठक में केवल CEO नियुक्त नहीं किया गया, बल्कि तीन नए ट्रस्टियों—महेश भगचंदका, मदन मोहन पांडेय और निर्मला यादव—की नियुक्ति भी हुई। सबकी प्रमुख जिम्मेदारियों में फेरबदल हुआ और वित्तीय मामलों तथा दान प्रबंधन को लेकर भी महत्वपूर्ण फैसले किए गए। इसलिए इसे किसी एक पद की नियुक्ति कहना उचित नहीं होगा। यह राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के दूसरे चरण के पुनर्गठन जैसा दिखाई देता है। पहला चरण था—मंदिर निर्माण, और दूसरा चरण है—मंदिर संचालन। और तीसरा चरण संभवतः होगा—अयोध्या को वैश्विक धार्मिक-सांस्कृतिक केंद्र बनाना। और जितेंद्र मिश्र इसी दूसरे चरण के प्रमुख प्रशासक बनने जा रहे हैं। नौवां, मोदी, RSS और योगी के लिए इन नियुक्तियों के अलग-अलग अर्थ: देखा जाए तो इन महत्वपूर्ण नियुक्तियों के मोदी, RSS और योगी—तीनों के लिए अलग-अलग अर्थ हैं, जिसके दृष्टिगत इस नियुक्ति को तीन राजनीतिक स्तरों पर पढ़ा जा सकता है। जहां मोदी के लिए यह प्रशासनिक दक्षता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को जोड़ने का अवसर है। वहीं, RSS के लिए यह आंदोलन की वैचारिक सफलता के बाद संस्था को टिकाऊ और पेशेवर बनाने की चुनौती है। वहीं, उत्तर प्रदेश सरकार के लिए यह अयोध्या को केवल धार्मिक नगर नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े पर्यटन और सांस्कृतिक-आर्थिक केंद्रों में बदलने की परीक्षा है। और यहीं पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। दसवां, ट्रस्ट स्वतंत्र धार्मिक न्यास है, उसका CEO सीधे राज्य सरकार का अधिकारी नहीं है: अब भले ही ट्रस्ट स्वतंत्र धार्मिक न्यास है और उसका CEO सीधे राज्य सरकार का अधिकारी नहीं है। इसलिए दोनों के बीच अधिकार-क्षेत्र अलग हैं। लेकिन अयोध्या की सड़क, परिवहन, पुलिस, कानून-व्यवस्था, नगर विकास, पर्यटन और नागरिक सुविधाएं राज्य सरकार से जुड़ी हैं। इसलिए CEO और उत्तर प्रदेश प्रशासन के बीच समन्वय अयोध्या मॉडल की सफलता की निर्णायक शर्त होगा। ग्यारहवां, राम मंदिर आंदोलन व मंदिर निर्माण मुहिम की असली परीक्षा अब हुई शुरू : कहना न होगा कि जिस राम मंदिर आंदोलन ने भारतीय राजनीति को बदल दिया और मंदिर निर्माण ने आंदोलन को ऐतिहासिक उपलब्धि में बदला, उसकी असली परीक्षा अब शुरू हुई है। क्योंकि प्रशासन इस उपलब्धि को संस्थागत स्थायित्व में बदलने की कोशिश कर रहा है। एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र की नियुक्ति इसी परिवर्तन का सबसे बड़ा संकेत है। लेकिन उनकी सैन्य वर्दी की चमक से ज्यादा महत्वपूर्ण होगा उनका प्रशासनिक परिणाम। वह यह कि वे कितनी पारदर्शिता ला पाते हैं? दान व्यवस्था कितनी विश्वसनीय बनती है?श्रद्धालुओं को कितनी बेहतर सुविधाएं मिलती हैं? स्थानीय लोगों को अयोध्या के विकास में कितना हिस्सा मिलता है? ट्रस्ट कितना स्वायत्त और जवाबदेह रहता है? अंततोगत्वा, महत्वपूर्ण संदेश यह कि क्या राम मंदिर की भव्यता के साथ उसकी प्रशासनिक विश्वसनीयता भी उतनी ही भव्य बन पाएगी? यही वह प्रश्न है जो आने वाले वर्षों में राम मंदिर की राजनीतिक विरासत तय करेगा। क्योंकि अब राम मंदिर का सवाल केवल यह नहीं है कि “रामलला का मंदिर कितना भव्य है?” बल्कि मौलिक सवाल यह है कि “रामलला के मंदिर की व्यवस्था कितनी आदर्श है?” और शायद यही कारण है कि एक पूर्व एयर मार्शल को मंदिर का पहला CEO बनाया गया है। राम मंदिर आंदोलन ने सत्ता को बदलने का काम किया था; अब राम मंदिर का प्रशासन यह तय करेगा कि वह भारतीय संस्थागत संस्कृति को कितना बदल पाता है। यहीं से अयोध्या की राजनीति का अगला अध्याय शुरू होता है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 3 Sep 2026 4:41 pm

राष्ट्रीय आत्मविश्वास को मजबूत करता जीएसएलवी-एफ17 का प्रक्षेपण

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) जल्द ही जीएसएलवी-एफ 17 लॉन्च करके एक बड़ी उपलब्धि हासिल करने वाला है। यह मिशन अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट ईओएस-05 (जिसे पहले जीआई सैट-1ए कहा जाता था) को अंतरिक्ष में ले जाएगा। ईओएस-05 एक अत्याधुनिक इमेजिंग सैटेलाइट है जिसे आपदाओं के समय तेज़ी से तस्वीरें लेने के लिए बनाया गया है। इसरो ने ही इस स्पेसक्राफ्ट को विकसित किया है और इसका लॉन्च के समय वज़न 2,367 किलोग्राम होगा। ईओएस-05/जीआई सैट-1ए उस कमी को पूरा करेगा जो 2021 में ईओएस-03/जीआई सैट-1 के लॉन्च में आई रुकावट के कारण पैदा हुई थी। जीएसएलवी-एफ 10 मिशन इसके क्रायोजेनिक अपर स्टेज में तकनीकी खराबी के कारण विफल हो गया था। हालांकि लिफ्ट-ऑफ के बाद पहला और दूसरा स्टेज सामान्य रूप से काम कर रहे थे, लेकिन तीसरे स्टेज का क्रायोजेनिक इंजन चालू नहीं हो पाया, जिससे ईओएस-03 सैटेलाइट का नुकसान हो गया। इसरो का नया आत्मविश्वास इसरो के चेयरमैन डॉ. वी. नारायणन के अनुसार, ईओएस-05 सैटेलाइट पृथ्वी से लगभग 36,000 किलोमीटर ऊपर स्थित होकर पूरे देश की लगातार निगरानी करेगा। पीएसएलवी रॉकेट की लगातार दो विफलताओं के बाद, इसरो अपने अगले लॉन्च के लिए तैयार है। यह सैटेलाइट ठीक वैसे ही काम करेगा जैसे कोई पर्यवेक्षक ऊँची जगह से पूरे गाँव पर नज़र रखता है। डॉ. नारायणन ने बताया कि इसरो की योजना मार्च 2027 तक सात रॉकेट लॉन्च करने की है, जिसमें गगनयान मिशन (जीआई मिशन) की पहली बिना क्रू वाली उड़ान भी शामिल है। मौजूदा वित्तीय वर्ष के लिए, इसरो का लक्ष्य 12 सैटेलाइट बनाना और आठ रॉकेट लॉन्च करना है। ये मिशन संचार, नेविगेशन, पृथ्वी की निगरानी और वैज्ञानिक अनुसंधान को बेहतर बनाएंगे, साथ ही भविष्य में मानव अंतरिक्ष उड़ान और खोज के लिए आधार भी तैयार करेंगे। लॉन्च की तैयारियां इसरो, जीएसएलवी-एफ 17 लॉन्च के लिए अंतिम तैयारियां पूरी कर रहा है। यह लॉन्च 4 सितंबर 2026 को सुबह 2:55 बजे सतीश धवन स्पेस सेंटर, श्रीहरिकोटा के दूसरे लॉन्च पैड से निर्धारित है। जीएसएलवी-एफ 17 को 29 अगस्त 2026 को रात लगभग 8 बजे दूसरे लॉन्च पैड (एसएलपी) पर ले जाया गया। यह मिशन एक अहम चरण में पहुँच गया है, क्योंकि रॉकेट को टेक-ऑफ से पहले व्हीकल इंटीग्रेशन सेंटर (वीआईसी) से लॉन्च पैड पर ले जाया गया है। इसे भी पढ़ें: ISRO का धमाका, स्पेस में तैनात होगी भारत की तीसरी आंख EOS-05, कांपे चीन-पाकिस्तान यह मिशन ईओएस-05 GEO इमेजिंग सैटेलाइट (जीआई सैट-1ए) को सब-जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में भेजेगा। इस ऑर्बिट का पेरिगी (पृथ्वी के सबसे करीब का बिंदु) 170 किमी और एपोजी (सबसे दूर का बिंदु) 28,934 किमी होगा। 2025 और 2026 की शुरुआत में लगातार दो पीएसएलवी मिशन फेल होने के बाद, इस मिशन पर बारीकी से नज़र रखी जाएगी और इसके हर पहलू की विस्तार से जांच की जाएगी। इसरो पिछले आठ महीनों में कोई सफल रॉकेट लॉन्च नहीं कर पाया है, लेकिन अब एजेंसी एक बड़ी वापसी के लिए तैयार है। इसरो ने गड़बड़ी के कारणों की जांच के लिए लॉन्च रोक दिए थे, जिससे जीएसएलवी-एफ 17/ईओएस-05 मिशन उसके लॉन्च प्रोग्राम में भरोसा बहाल करने का एक अहम मौका बन गया है। उम्मीद है कि यह सैटेलाइट भारत की पृथ्वी की निगरानी, इमेजिंग और डेटा-आधारित गतिविधियों को बेहतर बनाएगा। यह मिशन भारत की अंतरिक्ष-आधारित पृथ्वी अवलोकन क्षमताओं में एक बड़ी प्रगति है और इससे और भी एडवांस्ड सैटेलाइट सिस्टम के विकास में मदद मिलेगी। ईओएस-05 के उद्देश्य ईओएस-05 एक पृथ्वी अवलोकन सैटेलाइट है जिसे जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से भारतीय उपमहाद्वीप और आसपास के क्षेत्रों की लगभग रियल-टाइम, हाई-टेम्पोरल-रिज़ॉल्यूशन वाली इमेजिंग करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। ईओएस-05 के मुख्य उद्देश्य साफ मौसम (बिना बादलों के) में बार-बार और बड़े इलाके की निगरानी करने पर केंद्रित हैं। सैटेलाइट की मुख्य क्षमताओं और लक्ष्यों में ये शामिल हैं: ईओएस-05 विज़िबल/नियर-इन्फ्रारेड और शॉर्ट-वेव इन्फ्रारेड बैंड में मल्टीस्पेक्ट्रल और हाइपरस्पेक्ट्रल इमेज लेता है। यह लगभग हर पाँच मिनट में चुनिंदा क्षेत्रों और हर तीस मिनट में पूरे भारतीय भू-भाग की इमेज लेता है, और मल्टीस्पेक्ट्रल मोड में लगभग 42 मीटर का स्थानिक रिज़ॉल्यूशन (स्पेशियल रिज़ॉल्यूशन) हासिल करता है। यह सैटेलाइट पृथ्वी के घूमने के साथ एक निश्चित स्थिति बनाए रखते हुए, लगभग 36,000 किमी की जियोसिंक्रोनस ऊंचाई से लगातार निगरानी करने में सक्षम बनाता है। यह कॉन्फ़िगरेशन एक ही बड़े इलाके को लगातार या लगभग लगातार कवर करता है, जबकि लो-अर्थ-ऑर्बिट इमेजिंग सैटेलाइट्स कुछ खास जगहों के ऊपर से केवल कभी-कभी ही गुज़रते हैं। इन क्षमताओं से जो मुख्य काम किए जा सकते हैं, उनमें ये शामिल हैं: (i) प्राकृतिक आपदाओं और अचानक होने वाली घटनाओं, जैसे चक्रवात, बाढ़, जंगल की आग, बादल फटने और आंधी-तूफान के लिए तेज़ी से निगरानी और समय रहते चेतावनी देना। (ii) मौसम पर नज़र रखना और पर्यावरण की निगरानी करना। (iii) खेती, वानिकी और प्राकृतिक संसाधनों का आकलन, जिसमें फसल की स्थिति, पेड़-पौधों की सेहत और जल निकायों की निगरानी शामिल है। (iv) रणनीतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए निगरानी, जिसमें राष्ट्रीय सीमाओं जैसे महत्वपूर्ण इलाकों पर लगातार नज़र रखना शामिल है। जीएसएलवी की जानकारी जीएसएलवी-एफ 17 मिशन इसरो का कुल मिलाकर 103वां और 2026 का दूसरा मिशन है। यह जीएसएलवी मार्क I और II के लिए 19वां और साल का पहला मिशन है। जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल एक एक्सपेंडेबल लॉन्च सिस्टम है, जो जीएसएलवी मार्क III से अलग है। जीएसएलवी मार्क-I में रूसी क्रायोजेनिक स्टेज का इस्तेमाल किया गया है, जबकि मार्क-II में भारत में बना अपर स्टेज इस्तेमाल होता है; तीसरे स्टेज को छोड़कर दोनों वर्शन का कॉन्फ़िगरेशन एक जैसा है। यह व्हीकल पीएसएलवी के भरोसेमंद पार्ट्स जैसे S125/S139 सॉलिड रॉकेट बूस्टर और विकास इंजन का इस्तेमाल करता है। 18 लॉन्च में से जीएसएलवी को 12 बार सफलता मिली है, जबकि चार बार पूरी तरह और दो बार आंशिक रूप से असफलता का सामना करना पड़ा है, जिससे इसकी सफलता दर 72.2% रही है। 2010 से ऑपरेशनल जीएसएलवी मार्क-II की लागत $47 मिलियन है। इसकी ऊंचाई 51.7 मीटर है, जो मार्क-I की 49.13 मीटर की ऊंचाई से ज़्यादा है। यह रॉकेट लो अर्थ ऑर्बिट में 5,000 किलोग्राम तक और जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में 2,500 किलोग्राम तक पेलोड ले जाने में सक्षम है, जो इसके पिछले वर्शन की तुलना में लगभग 1,000 किलोग्राम ज़्यादा है। यह 7,887 किलोन्यूटन का थ्रस्ट देता है और तीन स्टेज में काम करता है। निष्कर्ष पीएसएलवी रॉकेट की लगातार दो असफलताओं के बाद, इसरो अपने अगले लॉन्च के लिए तैयार है। तकनीकी उद्देश्यों के अलावा, एक सफल मिशन इसरो टीम का आत्मविश्वास काफी बढ़ाएगा और जनता का भरोसा भी मजबूत करेगा। उम्मीद है कि यह सैटेलाइट कई तरह के कामों में मदद करेगा, जैसे मौसम की जानकारी, आपदा की निगरानी (खासकर बाढ़, चक्रवात और जंगल की आग), खेती, वानिकी, और रणनीतिक व राष्ट्रीय सुरक्षा की निगरानी। - प्रोफ़ेसर (डॉ.) डी.के. पांडे विज़िटिंग सीनियर फ़ेलो, सेंटर फ़ॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज़, एडजंक्ट प्रोफ़ेसर, राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय, सलाहकार, एकेडमिक काउंसिल, फ़ॉरेन पॉलिसी स्कूल और GNOIT, पूर्व एसोसिएट डीन, SoB, गलगोटिया विश्वविद्यालय।

प्रभासाक्षी 3 Sep 2026 3:44 pm

पंजाब में अनाज घोटाले की गूंज

आम आदमी पार्टी के गठन का प्रमुख उद्देश्य भ्रष्टाचार से राजनीति को मुक्त करके उसमें शुचिता लाना था। लेकिन क्या आम आदमी पार्टी इस उद्देश्य में सफल रही। पंजाब सरकार पर काबिज आम आदमी पार्टी के रवैये से तो ऐसा नहीं दिख रहा। बल्कि वह पिछली कांग्रेसी सरकार के भ्रष्टाचार की धारा को ही आगे बढ़ाती दिख रही है। यह कहना है कि राज्य के अनाज आपूर्ति घोटाले के व्हिसल ब्लोअर गुरप्रीत सिंह का। गुरप्रीत सिंह का आरोप है कि इन घोटालों से राज्य को हजारों करोड़ का चूना लगा है। इससे हुई कमाई की बंदरबाट राज्य के मंत्रियों और ताकतवर अफसरों के बीच हुई है। बीते अप्रैल में राज्य के बीजेपी प्रमुख सुनील जाखड़ ने भी पंजाब सरकार पर आरोप लगाया था कि अनाज रखने वाली बोरियों की खरीद में भारी घोटाला किया गया है। उन्होंने आरोप लगाया था कि राज्य में 22 रूपए की दर से बोरी मिल रही थी, लेकिन आम आदमी पार्टी सरकार ने उसे तकरीबन दोगुने यानी 43 रूपए 89 पैसे की दर से खरीदा। इस घोटाले की उन्होंने जांच की मांग की थी। हालांकि बीजेपी अभी चुप है, लेकिन आने वाले दिनों में उसकी चुप्पी टूट सकती है। इसे भी पढ़ें: CJP प्रोटेस्ट क्यों हुआ कैंसिल, CJI ने ऐसा क्या कह दिया, PM मोदी से इसका क्या है कनेक्शन? दिल्ली के शराब घोटाले की तर्ज पर उसकी पंजाब सरकार पर अनाज खरीद घोटाले के आरोप लग रहे हैं। वैसे आरोप पुरानी कांग्रेस सरकार पर लगे थे। राज्य में नई सरकार आने के बाद आम आदमी पार्टी की जिम्मेदारी थी कि इसे रोके और उचित कानूनी उपाय करे। लेकिन जिस तरह से इस मामले की अनदेखी राज्य की मौजूदा सरकार कर रही है, उससे लगता नहीं कि वह इस मामले में ईमानदार है। ह्विसल ब्लोअर गुरप्रीत सिंह का कहना है कि इस सिलसिले में वे अधिकारियों और मंत्रियों से कई बार मिले, लेकिन बात कहीं से आगे बढ़ती नहीं दिख रही। राज्य में विधानसभा के चुनाव की उलटी गिनती शुरू होने में देर है। लेकिन जिस तरह अनाज घोटाले को लेकर पंजाब की सरकार को घेरने की कोशिश हो रही है, उसके संकेत साफ हैं। आने वाले विधानसभा चुनावों में पंजाब की भगवंत मान सरकार के लिए इसका जवाब देना आसान नहीं होगा। फिलहाल इस मुद्दे को राज्य के विपक्षी दल तूल देते हुए नजर नहीं आ रहे हैं। लेकिन इसकी गारंटी नहीं है कि आने वाले दिनों में, जब राज्य के विधानसभा चुनाव सिर पर होंगे, विपक्षी दल इस मामले में चुप बैठेंगे। पांच नदियों के प्रदेश पंजाब की ख्याति खेती-किसानी के लिए रही है। यहां की करीब तीन चौथाई आबादी सीधे या फिर परोक्ष रूप से खेती-किसानी से जुड़ी हुई है। जाहिर है कि यहां के लोगों के लिए खेती-किसानी ना सिर्फ जीवन रेखा है, बल्कि भावनात्मक मुद्दा भी है। इसलिए आने वाले दिनों में अगर अनाज घोटाले की तासीर बढ़ने लगे तो हैरत नहीं होनी चाहिए। पंजाब के कृषि उपज घोटाले के तार पिछली कांग्रेस सरकार से जुड़ते हैं। कांग्रेस की सरकार रहते राज्य के खाद्य और आपूर्ति विभाग से जुड़ी निविदाओं में जमकर धांधली हुई थी। इस मामले के तूल पकड़ने के बाद राज्य के विजिलेंस विभाग ने साल 2022 में लुधियाना में एफआईआर दर्ज की थी। इसकी जांच के दौरान कांग्रेसी सरकार के मंत्री रहे भारत भूषण आशु, ठेकेदार तेलू राम समेत खाद्य और आपूर्ति विभाग के कई अधिकारियों की गिरफ्तारी हुई थी। इसी मामले के एक आरोपी जूनियर अधिकारी राकेश सिंगला भगोड़ा घोषित हो चुका है और उसके लिए सीबीआई ने रेड कार्नर नोटिस जारी कर रखा है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि पंजाब की भगवंत मान सरकार पर अनाज घोटाले का आरोप कैसे चस्पा हो रहा है। राज्य को भ्रष्टाचार और नशा मुक्त करने के नारे के साथ सत्ता में आई पंजाब की भगवंत मान सरकार ने दरअसल इस भगोड़े अधिकारी के खिलाफ अब तक कोई ठोस कार्रवाई करती नजर नहीं आ रही है। अव्वल तो होना चाहिए कि टेंडर घोटाले की जांच करके दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होती, लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है। बल्कि इसकी कड़ी आगे जुड़ती जा रही है। लुधियाना में दर्ज मामले के व्हिसल ब्लोर गुरप्रीत सिंह हैं। उनका आरोप है कि नई सरकार के आने के बाद कहां तक घोटाला रूकता, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। दरअसल पंजाब में कृषि उपज की खरीद भारत सरकार के खाद्य निगम के लिए पंजाब सरकार करती है। इसके लिए उसे प्रति क्विंटल कमीशन मिलता है। असल गड़बड़ी यहीं हैं। गुरप्रीत सिंह का कहना है कि दरअसल असल खरीद कुछ और हो रही है और कागजों पर कुछ और दिखाया जा रहा है। चूंकि हर साल केंद्र सरकार खरीद के लिए निश्चित रकम राज्य को देती है, लिहाजा उसका हर साल वह हिसाब-किताब भी मांगती है। लेकिन दिलचस्प यह है कि साल 2017 में कांग्रेस के सत्ता में आने से लेकर 2022 में आई मान सरकार ने इस बारे में केंद्र को ठीक से हिसाब नहीं दिया है। इसकी वजह से केंद्र सरकार द्वारा इन वर्षों में राज्य को मिले 31 हजार करोड़ रूपए को केंद्र सरकार ने राज्य को कर्ज घोषित कर दिया है। इस कर्ज के एवज में पंजाब सरकार को इसकी दोगुनी रकम चुकानी पड़ेगी। गुरप्रीत सिंह का आरोप है कि कोविड महामारी के बहाने पड़ोसी राज्यों हरियाणा और उत्तर प्रदेश से अनाज की खरीद की गई। इसके लिए करीब साढ़े छह हजार करोड़ की बोगस बिलिंग की गई। फर्जी खरीद बाद में भी हुई। पंजाब में साल 2025 में भारी बाढ़ आई। इस दौरान राज्य में जितने अनाज की पैदावार नहीं हुई, उसकी तुलना में ज्यादा अनाज की राज्य में खरीद की गई। गुरप्रीत सिंह के मुताबिक, इस बार भी पिछले साल यानी 2024 जितने अनाज की खरीद दिखाई गई। दिलचस्प है कि साल 2022 में आपूर्ति घोटाले का मामला दर्ज होने के बाद इस बारे में राज्य सरकार ने खरीददारी की नई नीतियां बनाईं। राज्य ने लेबर कार्टेज एंड ट्रांसपोर्ट पालिसी बनाई। नई नीति की वजह से इस साल राज्य को करीब दो सौ करोड़ का फायदा हुआ। लेकिन अधिकारियों को यह रास नहीं आया, क्योंकि इसमें उनकी कमाई नहीं रही। फिर उन्होंने मिलीभगत करके इस नीति को साल 2024 में बदलकर तकरीबन पुरानी जैसी ही कर दिया। इसकी वजह से राज्य को अनाज खरीद में सालाना सौ करोड़ की चपत लग रही है। पंजाब की मान सरकार पर आरोप लगा है कि साल 2024 में उसने खरीद के लिए टेंडरों में भी हेरफेर किया। गुरप्रीत का आरोप है कि इसके जरिए कुछ चहेते ठेकेदारों को फायदा पहुंचाया गया और उनसे मिली रकम का दिल्ली के 2025 विधानसभा चुनाव में इस्तेमाल किया गया। गुरप्रीत सिंह ने इन सब घोटालों को लेकर सीबीआई की चंडीगढ़ यूनिट से शिकायत करके जांच की मांग की है। हालांकि सीबीआई के हाथ इस सिलसिले में बंधे हैं। क्योंकि इंडी गठबंधन में शामिल सरकारों ने अपने राज्यों में सीबीआई को जांच करने के अधिकार को वापस ले लिया था। दिलचस्प यह है कि टेंडर घोटाला और आपूर्ति घोटाला सामने आने और उसकी जांच होने के बाद प्रवर्तन निदेशालय ने आरोपी और भगोड़े अधिकारी राकेश सिंगला के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उसकी करीब साढ़े बाइस करोड़ की संपत्तियां सील कर रखी हैं। लेकिन राज्य की ओर से जांच आगे नहीं बढ़ रही है। जब केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों ने आंदोलन किया था, उसमें पंजाब के किसान और उनके संगठन बढ़चढ़कर हिस्सा ले रहे थे। देखना यह होगा कि विधानसभा चुनावों के वक्त ये संगठन सामने आते हैं या नहीं। राज्य के अगले विधानसभा चुनाव को लेकर शिरोमणि अकाली दल और बीजेपी में एक बार फिर गलबहियां होने की संभावना बढ़ गई है। यदि ऐसा होता है तो तय मानिए, विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी के लिए अनाज घोटाला वैसा ही सिरदर्द होगा, जैसा दिल्ली विधानसभा चुनाव में शीश महल और शराब घोटाला बना था। उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं..

प्रभासाक्षी 3 Sep 2026 3:25 pm

6,000 लीटर यूरिन प्रतिदिन, इंसानी पेशाब अब हिमालय पिघला रहा है, महाप्रलय का अल्टीमेटम

मई 2023, समुद्र तल से करीब 5300 मीटर की ऊंचाई पर खुंबू ग्लेशियर में हाड़ कंपा देने वाली ठंड, लेकिन वहां का नजारा किसी लग्जरी रिजॉर्ट जैसा था। करीब 1600 टेंट, गरजते हुए जनरेटर, एस्प्रेसो मशीन की खनक, बड़ी स्क्रीन वाले टीवी, गर्म पानी के शावर और कालीन बिछे टेंटों में अंडरफ्लोर हीटिंग। लेकिन चकाचौंध की इस भीड़ में एक शख्स हाथ में नोटबुक लिए चुपचाप घूम रहा था। वो न तो टेंट गिन रहा था और न ही एवरेस्ट फतह करने आए पर्वतारोहियों के चेहरे। वो बस एक अजीब सा हिसाब लगा रहा था कि इस बेस कैंप में लोग दिन भर में कितनी बार पेशाब करने जा रहे हैं। नोटबुक थामे इस शख्स का नाम था किमलाल गौतम, नेपाल के चीफ सर्वे ऑफिसर। उस वक्त शायद लोगों को उनका यह काम अजीब लगा होगा, लेकिन तीन साल बाद, जुलाई 2026 में जब उनकी यह गिनती साइंस जर्नल रीजनल एनवायरमेंटल चेंज में छपी, तो पूरी दुनिया के होश उड़ गए। आंकड़ा कहता है कि 2023 के सिर्फ एक क्लाइंबिंग सीजन में इंसानों की पैदा की गई गर्मी ने खुंबू ग्लेशियर की करीब 2,492 टन बर्फ पिघला दी। गौर कीजिए, यह तबाही सूरज की तपिश या मौसम के बदलाव से नहीं हुई, बल्कि कैंप में धुआं फेंकते जनरेटरों, धधकते चूल्हों और सबसे बढ़कर इंसानी शरीर से निकली गर्मी और पेशाब की वजह से हुई। तो अब सवाल सीधा और सनसनीखेज है-क्या इंसान का पेशाब दुनिया के सबसे ऊंचे ग्लेशियर को पिघला रहा है? आइए समझते हैं इस खौफनाक हकीकत की पूरी कहानी। इसे भी पढ़ें: पाकिस्तान से यारी पड़ी इतनी भारी, पुराना कर्ज चुकाने के लिए सऊदी ले रहा 8 अरब डॉलर का लोन क्या बेस कैंप का टॉयलेट बन चुका है टाइम बम? आप जवाब सुनेंगे तो आप हैरान हो जाएंगे क्योंकि इसका जवाब है हां। दरअसल जिन एवरेस्ट को हम एक दुर्गम और वीरान पहाड़ समझते हैं, उसका बेस कैंप अब सिर्फ कैंप नहीं रह गया है। सीजन में यहां पर करीब 2000 लोग आते हैं। पर्वतारोही होते हैं। गाइड, कुक, पोर्टर और डॉक्टर्स तक होते हैं। यानी कि कुछ महीनों के लिए यहां एक पूरा का पूरा मौसमी कस्बा बस जाता है। 2023 में नेपाल ने एवरेस्ट के लिए 478 परमिट जारी किए थे और उस वक्त यह रिकॉर्ड था। लेकिन 2026 में यह रिकॉर्ड भी टूट गया था क्योंकि संख्या पहुंच गई थी करीब 490 परमिट तक और यह नियम के मुताबिक हर विदेशी पर्वतारोही के साथ कम से कम एक नेपाली गाइड भी ऊपर जा रहा था। यानी कि एवरेस्ट का बेस जैसा कि हमने कहा कि वो एक सिर्फ कैंप नहीं रहा। क्या है ग्लेशियर लेक बर्स्ट फ्लड का खौफनाक सच? अब एक नई स्टडी से पता चला है कि इस गतिविधि की वजह से पिघल रहे खुम्बु ग्लेशियर को कितना नुकसान हो रहा है। रिसर्चर्स का अनुमान है कि हर वसंत में लगभग 30 लाख किलोग्राम ग्लेशियर की बर्फ पिघलकर खत्म हो जाती है, क्योंकि ये सुख-सुविधाएं जुटाने में काफी ऊर्जा खर्च होती है। 2023 में बेस कैंप में लगभग 1,600 टेंट में खाना पकाने, हीटिंग और बिजली के लिए 824 सिलेंडर लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG), 18,935 लीटर केरोसिन और 5,130 लीटर गैसोलीन का इस्तेमाल किया गया। सबसे चौंकाने वाली बातों में से एक यह है कि खुम्बु ग्लेशियर में अनुमानित 154 टन बर्फ के पिघलने के लिए इंसानी पेशाब जिम्मेदार है। जियोस्पेशियल साइंटिस्ट और इस स्टडी के मुख्य लेखक तथा नेपाल के चीफ सर्वे ऑफिसर, खिम लाल गौतम ने कहा अगर आप ज़्यादा पानी पीते हैं, तो आपको उसे शरीर से बाहर निकालना ही पड़ता है। उन्होंने ज़्यादा ऊंचाई पर शरीर को हाइड्रेटेड रखने की ज़रूरत का ज़िक्र करते हुए यह बात कही। हज़ारों पर्वतारोही और गाइड रोज़ाना 6,000 लीटर से ज़्यादा कचरा पैदा करते हैं। इसे भी पढ़ें: Strait of Hormuz में अमेरिका का महा-ऑपरेशन! Iran से भारी तनाव के बीच 40 युद्धपोतों ने 1.8 करोड़ बैरल तेल को दिया सुरक्षा कवच इंसानी गतिविधियों से पिघल रही 30 लाख किलो बर्फ! बेस कैंप में बने पिट-वॉल्ट टॉयलेट लगभग 2,000 लोगों का कचरा इकट्ठा करते हैं, जिसे नीचे लाया जाता है, लेकिन ज़्यादातर लोग ग्लेशियर पर ही पेशाब करते हैं, जो आस-पास के समुदायों के लिए पीने के पानी का स्रोत है। गौतम ने कहा, यह देखने के लिए कि हम हर साल कितनी ज़्यादा बर्फ़ खो रहे हैं, आपको वैज्ञानिक होने की ज़रूरत नहीं है। आप इसे अपनी आँखों से भी देख सकते हैं। गौतम 2011 से अब तक एवरेस्ट पर 365 से ज़्यादा दिन बिता चुके हैं। हालाँकि इंसानी पेशाब का असर चिंताजनक है, लेकिन नेपाल के क्लाइमेट साइंटिस्ट और त्रिभुवन यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ. सुदीप ठाकुरि ने कहा कि ये नतीजे कोई हैरानी की बात नहीं थे और हीटिंग, खाना पकाने और रोशनी के लिए इस्तेमाल होने वाले सभी तरह के ईंधन की तुलना में पेशाब का असर आख़िरकार कम ही होता है। इस स्टडी को करने के लिए गौतम ने बेस कैंप ऑपरेटरों से डेटा इकट्ठा किया। वहीं, लुइसियाना में अपने ऑफिस में, स्टडी की को-ऑथर और U.S. जियोलॉजिकल सर्वे की एमरिटस साइंटिस्ट वर्जीनिया बर्केट ने दशकों के सैटेलाइट डेटा को व्यवस्थित करने में मदद की। इस डेटा से ग्लेशियर पर समय के साथ तापमान में बदलाव का पता चलता था। जब गौतम ग्लेशियर पर हो रहे रियल-टाइम बदलावों की जांच कर रहे थे, तो बर्केट उन्हें ये आंकड़े भेजती रहती थीं। यह आसान नहीं था। लो अर्थ ऑर्बिट सैटेलाइट इन्फ्रारेड रेडिएशन या निकलने वाली गर्मी को मापते हैं, लेकिन अगर बादल छाए हों तो वे रीडिंग नहीं ले पाते—और एवरेस्ट पर बादल छाए रहना आम बात है। इसलिए टीम ने 1991 से 2023 तक की हर उस थर्मल इमेज को देखा जिसमें बादल नहीं थे। रिसर्चर्स ने उस दौरान ज़मीन की सतह के तापमान में आए बदलावों को देखा और बेस कैंप के नतीजों की तुलना ग्लेशियर के बर्फ़ीले हिस्से और ग्लेशियर के पास की एक दूसरी जगह से की। उन्होंने कहा कि यह चौंकाने वाला नतीजा था। हमने पाया कि बर्फ़ से ढके इलाके का तापमान बेस कैंप के मुकाबले सिर्फ़ आधा ही बढ़ा। इसे भी पढ़ें: US-Iran Tension के बीच फिर दहला West Asia, $100 के पार पहुंची Crude Oil की कीमतें ग्लेशियर झीलें’ बना लेता है ग्लेशियर के बाकी हिस्सों की तुलना में बेस कैंप का तापमान लगभग दोगुनी तेज़ी से बढ़ा। गौतम चेतावनी देते हैं कि इंसानों का असर इससे भी बुरा हो सकता है, क्योंकि उन्होंने हेलीकॉप्टर, ट्रेकर्स और याक जैसी गर्मी पैदा करने वाली चीज़ों को इसमें शामिल नहीं किया था। हालांकि हिमालय में बड़े पैमाने पर जलवायु परिवर्तन से बदलाव आ रहे हैं, लेकिन 2009 के बाद से एवरेस्ट के ग्लेशियरों में बर्फ पिघलने की दर लगभग दोगुनी हो गई है। और भले ही शरीर से निकलने वाले अपशिष्ट (मल-मूत्र) बर्फ पिघलने पर खाना पकाने जैसी गतिविधियों जितना असर न डालते हों, लेकिन इससे नेपाल की आर्थिक गतिविधियों खासकर पर्वतारोहण और पीने के पानी के स्रोतों, पनबिजली और सिंचाई के लिए खतरा पैदा होता है। गौतम का कहना है कि ग्लेशियर फटने से खतरनाक बाढ़ का भी खतरा है; शुरुआती रिपोर्टों से पता चलता है कि हाल ही में नेपाल और चीन में आई विनाशकारी बाढ़ की वजह यही थी। ऊंचाई पर शोध करने वाले पीटर हैकेट, जो इस अध्ययन में शामिल नहीं थे, कहते हैं कि बर्फ के इस तरह स्थानीय स्तर पर पिघलने से और अधिक हिमस्खलन हो सकते हैं और खतरनाक चढ़ाई और भी खतरनाक हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसका एक ऐसा असर भी है जिसे मापना मुश्किल है। 1981 में अकेले एवरेस्ट की चोटी पर चढ़ने वाले हैकेट ने कहा कि किसी ऊंचे कैंप में पहुँचने, सूर्यास्त के समय क्षितिज की ओर देखने और दर्जनों जमे हुए मल के ढेर देखने से ज़्यादा बुरा कुछ नहीं हो सकता।

प्रभासाक्षी 3 Sep 2026 2:10 pm

'भाजपा सांसद साबित करें वो इस देश के हैं या नहीं', पंजाब की मतदाता सूची से राघव चड्ढा का नाम कटने पर बोला विपक्ष

'भाजपा सांसद साबित करें वो इस देश के हैं या नहीं', पंजाब की मतदाता सूची से राघव चड्ढा का नाम कटने पर बोला विपक्ष

समाचार नामा 3 Sep 2026 2:05 pm

परीक्षा विवाद को लेकर झारखंड सरकार पर बरसे प्रदीप भंडारी, पंजाब में 'सिंडिकेट' चलाने का आरोप

परीक्षा विवाद को लेकर झारखंड सरकार पर बरसे प्रदीप भंडारी, पंजाब में 'सिंडिकेट' चलाने का आरोप

समाचार नामा 3 Sep 2026 1:59 pm

राम मंदिर ट्रस्ट के सीईओ एयर मार्शल (रिटायर्ड) जितेंद्र मिश्रा पहुंचे अयोध्या, बोले-जीवन में दूसरी बार सेवा का मौका मिला

राम मंदिर ट्रस्ट के सीईओ एयर मार्शल (रिटायर्ड) जितेंद्र मिश्रा पहुंचे अयोध्या, बोले-जीवन में दूसरी बार सेवा का मौका मिला

समाचार नामा 3 Sep 2026 12:21 pm

हिंदू देवी-देवताओं का जिक्र, इसलिए 'वंदे मातरम' पर आपत्ति जताना बचकानी सोच: गीतांजलि अंगमो (आईएएनएस एक्सक्लूसिव)

हिंदू देवी-देवताओं का जिक्र, इसलिए 'वंदे मातरम' पर आपत्ति जताना बचकानी सोच: गीतांजलि अंगमो (आईएएनएस एक्सक्लूसिव)

समाचार नामा 3 Sep 2026 12:14 pm

140 KM दूर से दुश्मन को निशाना बनाएगा भारत का Khagantak 243 Glide Bomb, परीक्षण सफल होते ही China, Pakistan की बढ़ी टेंशन

दुश्मनों पर अब आसमान से कहर बरपाने की भारत की ताकत और बढ़ गई है। भारतीय वायुसेना ने स्वदेशी लॉन्ग रेंज ग्लाइड बम ‘खगांतक-243’ का सफल परीक्षण किया है। 140 किलोमीटर से अधिक दूरी तक मार करने में सक्षम यह हथियार भारतीय लड़ाकू विमानों को दुश्मन के ठिकानों पर दूर से ही सटीक और घातक हमला करने की क्षमता देगा। भारतीय वायुसेना ने इस उपलब्धि को “Precision. Power. Pride” बताते हुए कहा है कि परीक्षण ने सभी निर्धारित उद्देश्यों को सफलतापूर्वक पूरा किया है। IAF के मुताबिक, यह भारतीय वायुसेना और भारतीय रक्षा उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है और आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया तथा रक्षा नवाचार के जरिए देश की मारक क्षमता को नई ऊंचाई तक पहुंचाने वाला कदम है। क्या है खगांतक-243, जो दुश्मन के लिए बन सकता है नया खतरा? हम आपको बता दें कि खगांतक-243 एक 300 किलोग्राम श्रेणी का एयरबोर्न लॉन्ग रेंज स्टैंड-ऑफ प्रिसिजन गाइडेड ग्लाइड बम है। इसकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि लड़ाकू विमान को लक्ष्य के ठीक ऊपर पहुंचने की जरूरत नहीं पड़ेगी। विमान सुरक्षित दूरी से इस हथियार को छोड़ सकता है और इसके बाद बम अपने पंखों और नियंत्रण सतहों की मदद से लक्ष्य की ओर ग्लाइड करेगा। यानी युद्ध की स्थिति में भारतीय लड़ाकू विमान दुश्मन के मजबूत एयर डिफेंस क्षेत्र में गहराई तक घुसने के जोखिम को कम करते हुए दूर से हमला कर सकते हैं। यही आधुनिक हवाई युद्ध की सबसे बड़ी जरूरत है। यानि दुश्मन पर हमला करो, लेकिन उसकी जवाबी मार की सीमा से बाहर रहो। इसे भी पढ़ें: SCO के मंच से चीन और पाकिस्तान को एक साथ धोकर मोदी ने दुनिया की वाहवाही लूट ली रिपोर्टों के मुताबिक, करीब 12,000 मीटर की ऊंचाई से छोड़े जाने पर खगांतक-243 की रेंज 140 किलोमीटर से अधिक हो सकती है। इसका डिजाइन भी खास है। इसमें एक बेलनाकार बॉडी, बीच में घूमने वाले ग्लाइड विंग और पीछे पांच नियंत्रण सतहें हैं, जो इसे लक्ष्य की दिशा में नियंत्रित करने में मदद करती हैं। 125 किलो विस्फोटक भराव, दुश्मन के ठिकानों पर सटीक प्रहार खगांतक-243 में Mk 81 जनरल-पर्पज ब्लास्ट-फ्रैगमेंटेशन वारहेड लगाया गया है, जिसमें करीब 125 किलोग्राम विस्फोटक भराव है। यह संयोजन इसे महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों, संरचनाओं और अन्य लक्ष्यों के खिलाफ प्रभावी हथियार बना सकता है। इस हथियार श्रेणी की एक और महत्वपूर्ण विशेषता इसका मॉड्यूलर डिजाइन है। यानी भविष्य में मिशन की जरूरत और ग्राहक की मांग के अनुसार अलग-अलग वारहेड और गाइडेंस कॉन्फिगरेशन विकसित किए जा सकते हैं। यही लचीलापन खगांतक श्रेणी को केवल एक हथियार नहीं, बल्कि भविष्य में विकसित होने वाली एक व्यापक प्रिसिजन स्ट्राइक क्षमता का आधार बना सकता है। BEL और JSR Dynamics की स्वदेशी साझेदारी साथ ही खगांतक-243 भारत के रक्षा उद्योग की साझेदारी का भी उदाहरण है। इसे भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) और JSR Dynamics ने मिलकर विकसित किया है। JSR Dynamics ने बम की बॉडी और नियंत्रण प्रणाली विकसित की है, जबकि BEL ने इलेक्ट्रॉनिक्स और गाइडेंस सबसिस्टम उपलब्ध कराए हैं। भारतीय वायुसेना पहले ही BEL को खगांतक-243 म्यूनिशन के लिए ऑर्डर दे चुकी है, हालांकि ऑर्डर की संख्या और अनुबंध की कीमत सार्वजनिक नहीं की गई है। इसका प्रारंभिक फ्लाइट टेस्ट प्लेटफॉर्म Su-30MKI है और भविष्य में इसे वायुसेना के अन्य विमानों के साथ भी एकीकृत किए जाने की संभावना है। चीन और पाक की तुलना में भारत का हथियार कितना मजबूत? यहां एक सवाल उठता है कि क्या चीन और पाकिस्तान के पास भी ऐसे हथियार हैं? इस सवाल का जवाब हां है लेकिन यह भी उल्लेखनीय है कि चीन और पाकिस्तान के पास मौजूद ऐसे हथियारों की अपेक्षा भारत के हथियार गुणवत्ता और मारक क्षमता में कहीं आगे हैं। हम आपको बता दें कि चीन और पाकिस्तान के पास भी स्टैंड-ऑफ प्रिसिजन गाइडेड ग्लाइड हथियार मौजूद हैं, लेकिन खगांतक-243 भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह देश की अपनी स्वदेशी उत्पादन और तकनीकी क्षमता को मजबूत करता है। चीन के पास लंबे समय से LS सीरीज जैसे प्रिसिजन गाइडेड ग्लाइड बम मौजूद हैं। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी में LS परिवार को ऐसे हथियारों के रूप में वर्णित किया गया है, जिनमें पारंपरिक बमों को गाइडेंस और ग्लाइड किट के जरिए स्टैंड-ऑफ प्रिसिजन हथियार में बदला जा सकता है। चीन इस क्षेत्र में लंबे समय से निवेश कर रहा है। इसके अलावा, पाकिस्तान के पास भी H-2 और H-4 Stand-Off Weapons जैसे हथियार उपलब्ध हैं। H-4 की घोषित रेंज लगभग 120 किलोमीटर बताई गई है, हालांकि इसकी क्षमताओं और कॉन्फिगरेशन से जुड़े कई विवरण अलग-अलग रूप में सामने आते रहे हैं। चीन और पाकिस्तान की अपेक्षा भारत के हथियार की विशेषता देखें तो सामने आता है कि भारत तेजी से अपनी स्वदेशी स्टैंड-ऑफ स्ट्राइक क्षमता को मजबूत कर रहा है। खगांतक-243 की 140 किलोमीटर से अधिक की रिपोर्टेड रेंज इसे पाकिस्तान के सार्वजनिक रूप से ज्ञात H-4 की घोषित 120 किमी रेंज से आगे रखती है। बदल जाएंगे सामरिक समीकरण इसके अलावा, खगांतक-243 का सबसे बड़ा रणनीतिक प्रभाव यह हो सकता है कि भारतीय वायुसेना को दूर से सटीक हमला करने का एक और स्वदेशी विकल्प मिलेगा। सीमा के पास तैनात दुश्मन के एयर डिफेंस, सैन्य ठिकाने, लॉजिस्टिक केंद्र और महत्वपूर्ण संरचनाएं भविष्य के संघर्ष में अधिक खतरे में आ सकती हैं। 140 किलोमीटर से अधिक दूरी तक हमला करने की क्षमता का अर्थ है कि लड़ाकू विमान लक्ष्य के ऊपर मंडराए बिना भी प्रहार कर सकता है। इससे विमान और पायलट का जोखिम कम हो सकता है तथा दुश्मन के लिए जवाबी कार्रवाई की चुनौती बढ़ सकती है। देखा जाये तो खगांतक-243 सिर्फ एक नया बम नहीं है। यह उस दिशा में भारत की तेज रफ्तार का संकेत है, जहां युद्ध के मैदान में विदेशी हथियारों पर निर्भरता कम होगी और भारतीय उद्योग सीधे भारत की मारक शक्ति तैयार करेगा। भारतीय वायुसेना का सफल परीक्षण साफ संदेश देता है कि अब भारत सिर्फ दुश्मन की सीमा तक पहुंचने की तैयारी नहीं कर रहा, बल्कि दूर आसमान से सटीक और घातक प्रहार करने की क्षमता को स्वदेशी ताकत के दम पर मजबूत कर रहा है। आने वाले समय में खगांतक-243 जैसे हथियार भारत की हवाई रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं और चीन से लेकर पाकिस्तान तक, दोनों मोर्चों पर भारत की स्टैंड-ऑफ स्ट्राइक क्षमता को नई धार दे सकते हैं। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 3 Sep 2026 11:21 am

अमेरिका, चीन और इजरायल आगे, लेकिन भारत भी बन सकता है वैश्विक एआई पावर: एलेक्स कार्प

चैपल हिल (नॉर्थ कैरोलिना), 3 सितंबर (आईएएनएस)। अमेरिकी सॉफ्टवेयर और डेटा एनालिटिक्स कंपनी पैलेंटिर टेक्नोलॉजीज के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) एलेक्स कार्प ने कहा है कि भारत एक प्रमुख आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) शक्ति के रूप में उभर सकता है। उन्होंने इसके लिए देश की तकनीकी प्रतिभा, ऊर्जा क्षेत्र में की गई पहल और उन्नत एआई मॉडल विकसित करने की क्षमता को प्रमुख कारण बताया।

समाचार नामा 3 Sep 2026 8:29 am

उत्तम कुमार की जन्म-शताब्दी पर पीएम मोदी ने दी श्रद्धांजलि, कहा- 'हर पीढ़ी को जोड़ती है उनकी सदाबहार अदाकारी'

नई दिल्ली, 3 सितंबर (आईएएनएस)। महानायक उत्तम कुमार की जन्म-शताब्दी के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें श्रद्धांजलि दी है। पीएम मोदी ने कहा कि महानायक उत्तम कुमार की सदाबहार अदाकारी हर पीढ़ी के लोगों को जोड़ती है।

समाचार नामा 3 Sep 2026 8:28 am

लाचित बरफुकन पुलिस अकादमी राष्ट्रीय स्तर के ट्रेनिंग हब के तौर पर उभर रही है: सरमा

लाचित बरफुकन पुलिस अकादमी राष्ट्रीय स्तर के ट्रेनिंग हब के तौर पर उभर रही है: सरमा

समाचार नामा 2 Sep 2026 11:22 pm

'चुनिंदा लोगों का धन बढ़ रहा, आम आदमी की जेब खाली', जीडीपी ग्रोथ के दावों पर अधीर रंजन चौधरी

'चुनिंदा लोगों का धन बढ़ रहा, आम आदमी की जेब खाली', जीडीपी ग्रोथ के दावों पर अधीर रंजन चौधरी

समाचार नामा 2 Sep 2026 11:18 pm

गुजरात में नकली दवाओं पर सरकार सख्त, स्वास्थ्य मंत्री ने कहा- जीरो टॉलरेंस नीति

गांधीनगर, 2 सितंबर (आईएएनएस)। गुजरात सरकार ने नकली और अवैध दवाओं के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए 'जीरो-टॉलरेंस' नीति अपनाई है। राज्य में 50 दवा कंपनियों के लाइसेंस रद्द किए गए हैं और घटिया दवाओं, खाने-पीने की चीजों में मिलावट और अवैध दवा नेटवर्क के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा रही है।

समाचार नामा 2 Sep 2026 10:37 pm

'सीता का चरित्र राम से भी महान था', सीएम शिवकुमार ने सोनिया गांधी के त्याग का दिया उदाहरण

'सीता का चरित्र राम से भी महान था', सीएम शिवकुमार ने सोनिया गांधी के त्याग का दिया उदाहरण

समाचार नामा 2 Sep 2026 10:18 pm

'इतिहास और संदर्भ को समझने की जरुरत', स्वरा भास्कर पर शाजिया इल्मी का पलटवार

'इतिहास और संदर्भ को समझने की जरुरत', स्वरा भास्कर पर शाजिया इल्मी का पलटवार

समाचार नामा 2 Sep 2026 10:17 pm

राजस्थान निकाय चुनाव: भाजपा ने जारी किया 'संकल्प पत्र', बड़ी जीत का किया दावा

राजस्थान निकाय चुनाव: भाजपा ने जारी किया 'संकल्प पत्र', बड़ी जीत का किया दावा

समाचार नामा 2 Sep 2026 10:15 pm

'सरकार मंदिर में धंधा चलाना चाहती है', राम मंदिर सीईओ की नियुक्ति पर भड़के इमरान मसूद

'सरकार मंदिर में धंधा चलाना चाहती है', राम मंदिर सीईओ की नियुक्ति पर भड़के इमरान मसूद

समाचार नामा 2 Sep 2026 9:38 pm

'कुछ दिनों तक मछली खाने में सावधानी बरतें', नेपाल में आई त्रासदी के बाद बिहार सरकार की लोगों से अपील

'कुछ दिनों तक मछली खाने में सावधानी बरतें', नेपाल में आई त्रासदी के बाद बिहार सरकार की लोगों से अपील

समाचार नामा 2 Sep 2026 9:15 pm

1984 के सिख नरसंहार पर भगवंत मान सरकार राजनीति कर रही है : एचएस फूलका

1984 के सिख नरसंहार पर भगवंत मान सरकार राजनीति कर रही है : एचएस फूलका

समाचार नामा 2 Sep 2026 8:42 pm

केपीसीसी प्रमुख हरिप्रसाद ने राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर की निंदा की, बताया- 'गंभीर अन्याय'

केपीसीसी प्रमुख हरिप्रसाद ने राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर की निंदा की, बताया- 'गंभीर अन्याय'

समाचार नामा 2 Sep 2026 7:39 pm

तेजी से बदल रही है भारत की तस्वीर

भारत के सबसे बड़े औद्योगिक घरानों, टाटा, बिरला, रिलायंस, अडानी, आदि को अपना व्यवसायिक साम्राज्य खड़ा करने में दशकों लग गए थे। इन समूहों को अपनी सम्पत्ति को 100 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर तक पहुंचाने में लगभग 30 वर्षों का समय लगा था परंतु आज के युवावर्ग द्वारा स्थापित की जा रही कम्पनियों को अपनी सम्पत्ति को 100 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंचाने में केवल 1 से 3 वर्ष का समय लग रहा है। भारत में समय बहुत तेजी से बदल रहा है और भारतीय युवा आज भारत की तस्वीर बदलने को उतावाले होते दिखाई दे रहे हैं। जून 2026 में एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेन्स) का व्यवसाय करने वाली सर्वम कम्पनी ने अपनी स्थापना के केवल 3 वर्ष के अंदर ही 150 करोड़ (1.5 बिलियन) अमेरिकी डॉलर की सम्पत्ति खड़ी कर ली है। इसी प्रकार, आज जेप्टो एवं मेन्सा नामक ब्राण्ड कुछ ही महीनों में व्यवसाय के उस स्तर को प्राप्त कर लेते हैं, जिसे हासिल करने में पुरानी बड़ी कम्पनियों को कई दशक लग गए थे। आज के समय में टेक्नॉलोजी के क्षेत्र में स्थापित हो रही कम्पनियों की तुलना यदि इसी क्षेत्र में लगभग 20/25 वर्ष पूर्व स्थापित कम्पनियों से भी की जाय तो सम्पत्ति खड़ी करने के समय में बहुत अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। वर्ष 2000 में स्थापित कम्पनियों को यूनिकोन (100 करोड़ अमेरिकी डॉलर की सम्पत्ति बनाना) बनने में लगभग 20 वर्ष से अधिक का समय लग रहा था, वहीं वर्ष 2020 में स्थापित कम्पनियों को यूनिकोन बनने में केवल एक वर्ष का समय लग रहा है। वित्तीय क्षेत्र में स्थापित की गई कम्पनियों को यूनिकोन बनने में 30 वर्ष का समय लगा है। वहीं मेन्सा ब्राण्ड जैसी कम्पनी को यूनिकोन बनने में केवल 6 माह का समय लगा है। बाजार वही है, परंतु समय तेजी से बदल रहा है। इस परिवर्तन में भारतीय युवाओं की प्रमुख भूमिका रही है। आज भारत में व्यावसायिक घराने/खानदान एवं अमीर लोग कहीं पीछे छूट गए हैं एवं युवा पीढ़ी तेजी से बिलिनायर की सूची में अपनी जगह बना रही है। पिछले 5 वर्षों के दौरान भारत में एक लाख से अधिक नए स्टार्ट-अप स्थापित हुए हैं। आज भारत ने अपने आप को, अमेरिका एवं चीन के बाद, दुनिया के तीसरे सबसे बड़े स्टार्ट-अप इको सिस्टम में स्थापित कर लिया है। भारत में आज अधिक से अधिक लाभ अर्जित करने के उद्देश्य से उपभोक्ता उत्पादों को बढ़ावा देने वाले स्टार्ट अप बन रहे हैं। किराना उत्पादों से संबंधित ऐप अधिक संख्या में बनाए जा रहे हैं क्योंकि यूपीआई जैसा पेमेंट गेटवे पूर्व से ही उपलब्ध है और भुगतान प्रणाली को अलग से विकसित करने की आवश्यकता ही नहीं है। साथ ही, 140 करोड़ नागरिकों का बायोमेट्रिक डाटा पहिले से ही सत्यापित है और यह उपभोक्ता उत्पादों से सम्बंधित ऐप बनाने वाले इंजीनियरों को उपलब्ध भी है। भारत में डिजिटल लाकर में 750 करोड़ से अधिक दस्तावेज जमा हो चुके हैं। सस्ता इंटरनेट डाटा उपलब्ध है एवं 90 करोड़ से अधिक भारतीय इंटरनेट का उपयोग कर रहे हैं। इन परिस्थितियों के बीच आज 20 वर्ष के युवा एंटरप्रेन्योर को व्यवसाय स्थापना के प्रथम दिवस से ही पूरा भारत उसके उत्पाद के बाजार के रूप में उपलब्ध है। उक्त कारकों के चलते ही वर्ष 2021 में भारत में 45 नए यूनिकोन विकसित हुए थे। इसे भी पढ़ें: दुनिया जब बुरे दौर में है तब भारत के आर्थिक उजाले भारत के पास आज दुनिया के सबसे स्मार्ट एवं कुशल इंजीनीयर तो हैं परंतु हमारे पास अपने गूगल, अपना यू ट्यूब एवं अपना फेस बुक नहीं है। क्योंकि, भारत में उच्च स्तर का तकनीकी नवाचार नहीं हो पा रहा है जिससे उच्च तकनीकी के ऐप भारत में कम बन रहे हैं। हालांकि, विकसित देशों में जो भी उच्च स्तर के तकनीकी नवाचार हो रहे हैं इनमें भारतीय इंजिनीयरों की भी महती भूमिका रहती है। इसी कारण से भारतीय इंजीनियरों की विकसित देशों में भारी मांग है। भारतीय युवाओं को दिल्ली के जंतर मंतर पर आंदोलन करने के स्थान पर भारत में उच्च तकनीकी के नवाचार करने की ओर पूरा ध्यान देना चाहिए। अब तो विकसित देश भी यह मानने लगे हैं कि वर्तमान सदी केवल भारत की है। कई विकसित देशों सहित चीन में जनसंख्या वृद्धि दर अब ऋणात्मक हो चुकी है। साथ ही, इन देशों में वृद्ध नागरिकों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। पूरे विश्व में आज भारत एक युवा देश के रूप में उभर रहा है। अतः भारतीय युवाओं से न केवल भारत में आर्थिक विकास को गति देने बल्कि विश्व के अन्य कई देशों में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देने की अपेक्षा की जा रही है। कई देशों ने तो अपनी संसद में प्रस्ताव पास करने के उपरांत भारत सरकार से भारतीय युवाओं को इन देशों में भेजने की मांग की है। भारतीय युवा आज न केवल भारत में तेजी से यूनिकोन विकसित कर रहा है बल्कि आज भारतीय अन्य देशों में पहुंच कर अपने व्यापार का विस्तार भी कर रहे हैं, इसी कारण से आज प्रतिवर्ष भारत से लगभग 7 लाख नागरिक विभिन्न देशों में जाकर बस रहे हैं। श्री लक्ष्मी मित्तल ने ब्रिटेन में आरसेलोर स्टील कम्पनी खरीद ली है। यह कम्पनी पूर्व में बीमार कम्पनी की श्रेणी में शामिल थी परंतु मित्तल समूह ने इसे आज विश्व की सबसे बड़ी स्टील उत्पादक कम्पनी बना दिया है। इसी प्रकार वर्ष 2008 में टाटा समूह ने जैग्वार एवं लैंड रोवर कम्पनी को खरीद लिया था। भारतीय मूल के नागरिक आज ब्रिटेन में जायदाद निवेशकों के क्षेत्र में सबसे बड़े निवेशक माने जा रहे है। यूरोप में आज भारतीय कम्पनियां सबसे अधिक राशि का निवेश करती हुई दिखाई दे रही हैं और यूरोपीयन कम्पनियों का अधिग्रहण कर रही है। अमेरिका में भी लगभग यही स्थिति है। अमेरिका में सबसे बड़ी एल्यूमिनियम उत्पादक कम्पनी को भारतीय ने खरीद लिया है। इसी प्रकार, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, आईबीएम, अडोबी जैसी बड़ी कम्पनियों को भारतीय मूल के नागरिक ही चला रहे हैं। भारतीय मूल के ही अजय बांगा आज विश्व बैंक के मुख्य कार्यपालन अधिकारी बन गए हैं। भारत में आज 15 लाख इंजिनीयर प्रतिवर्ष बन रहे हैं। विश्व के लगभग समस्त देशों को आज भारतीय युवाओं की अत्यधिक आवश्यकता है। विशेष रूप से जापान एवं यूरोपीयन देशों में प्रौढ़ नागरिकों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। चीन से आज कई देश दूर भाग रहे हैं क्योंकि चीन ने विभिन्न देशों को कर्ज दे रखा है, यदि कोई देश इस कर्ज का भुगतान समय पर नहीं कर पाता है तो चीन उस देश के संसाधनों पर अपना अधिकार जताने लगता है। इससे इन देशों के साथ चीन के सम्बंध अच्छे नहीं रहे हैं। दूसरी ओर भारत में राजनैतिक स्थिरता है, जिसके चलते आज भारत के विश्व के लगभग समस्त देशों के साथ सौहार्दपूर्ण सम्बंध हैं। भारत आज विश्व के कई देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते सम्पन्न कर रहा है। आज स्थिति यह निर्मित हो रही है कि भारतीय यूनिकोन अमेरिकी कम्पनियों का अधिग्रहण करने की तैयारी कर रहे हैं। भारत आज जापान, इजराईल, रूस, यूएई एवं अमेरिका जैसे देशों का रणनीतिक साझीदार है। साथ ही, भारत के सम्बंध अब चीन के साथ भी सामान्य हो रहे है। भारत आज वैश्विक दक्षिणी क्षेत्र की आवाज बन रहा है क्योंकि विश्व के कई देशों का अब चीन पर भरोसा नहीं रहा है। भारत आज जी-20 देशों के समूह का भी सदस्य है, तो जी-7 देशों के समूह एवं वैश्विक दक्षिणी क्षेत्र के बीच एक पुल का काम करता हुए भी दिखाई दे रहा है। भारत एससीओ का भी सदस्य है तो ब्रिक्स का भी सदस्य है। साथ ही, भारत क्वाड का भी सदस्य है। इस प्रकार, भारत आज विश्व के लगभग समस्त महत्वपूर्ण समूहों का सदस्य है एवं भारत के विश्व के लगभग समस्त देशों के साथ बहुत अच्छे, सौहार्दपूर्ण, व्यावसायिक एवं व्यावहारिक सम्बंध हैं। इसी कारण से ही कुशल भारतीय युवाओं की मांग आज पूरे विश्व में कई देशों द्वारा की जा रही है। - प्रहलाद सबनानी सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक, भारतीय स्टेट बैंक के-8, चेतकपुरी कालोनी, झांसी रोड, लश्कर, ग्वालियर - 474 009

प्रभासाक्षी 2 Sep 2026 6:56 pm

दुनिया जब बुरे दौर में है तब भारत के आर्थिक उजाले

दुनिया आज जिस दौर से गुजर रही है, वह आर्थिक और सामरिक दोनों दृष्टियों से असाधारण चुनौतियों का दौर है। रूस-यूक्रेन युद्ध के प्रभाव, पश्चिम एशिया में तनाव, अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा, वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता, आपूर्ति शृंखला में व्यवधान और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने दुनिया की बड़ी-बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के सामने कठिन प्रश्न खड़े कर दिए हैं। ऐसे समय में भारत की अर्थव्यवस्था ने जिस मजबूती का परिचय दिया है, वह केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं, बल्कि बदलते भारत की सामर्थ्य का प्रमाण है। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में भारत की 7.8 प्रतिशत वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि ने वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में भारत को ऐसी उम्मीद के रूप में प्रस्तुत किया है, जिसकी ओर दुनिया आश्चर्य और विश्वास दोनों के साथ देख रही है। इस विकास दर ने वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर में भारत की आर्थिक शक्ति और आत्मविश्वास को नई ऊंचाई दी है एवं एक उजाला बिखेरा है। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वृद्धि ऐसे समय दर्ज हुई है, जब परिस्थितियां सामान्य नहीं थीं। महंगाई, ऊर्जा संकट, भू-राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में उतार-चढ़ाव के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास पथ मजबूत बना रहा। पिछले वर्ष इसी तिमाही में विकास दर 6.9 प्रतिशत थी। यानी एक वर्ष में आर्थिक वृद्धि की गति में उल्लेखनीय सुधार दिखाई दिया है। घरेलू मांग की मजबूती, सरकारी पूंजीगत व्यय, विनिर्माण, निर्माण और निर्यात जैसे क्षेत्रों का योगदान इस प्रदर्शन के पीछे महत्वपूर्ण रहा है। आर्थिक विकास का वास्तविक अर्थ तभी समझ में आता है, जब उसे उसके वैश्विक संदर्भ में देखा जाए। आज दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं केवल आर्थिक नीतियों से प्रभावित नहीं हो रहीं, बल्कि युद्ध, कूटनीतिक तनाव, ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक संबंध भी उनकी दिशा तय कर रहे हैं। अमेरिका और चीन के बीच आर्थिक एवं रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। पश्चिम एशिया का तनाव ऊर्जा बाजार और वैश्विक आपूर्ति तंत्र के लिए चिंता पैदा करता है। इन परिस्थितियों में भारत का अपेक्षाकृत तेज आर्थिक विकास यह संकेत देता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था ने अपने लिए ऐसे मजबूत घरेलू आधार तैयार किए हैं, जो बाहरी झटकों को सहने की क्षमता रखते हैं। यही वह परिवर्तन है जो भारत को केवल एक बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक शक्ति बनने की दिशा में आगे ले जा रहा है। भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका विशाल घरेलू बाजार है। करोड़ों उपभोक्ताओं की मांग, बढ़ता मध्यम वर्ग, डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार, बुनियादी ढांचे पर निवेश और बदलती उपभोग संस्कृति ने अर्थव्यवस्था को आंतरिक गति प्रदान की है। जब वैश्विक बाजार अनिश्चित हों, तब घरेलू मांग अर्थव्यवस्था के लिए सुरक्षा-कवच का काम करती है। इसीलिए वर्तमान विकास दर में घरेलू मांग की मजबूती को विशेष महत्व दिया जाना चाहिए। इसे भी पढ़ें: वित्तीय वर्ष 2026-27 की प्रथम तिमाही में आर्थिक विकास दर ने चौंकाया इस आर्थिक प्रदर्शन की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि वृद्धि केवल एक क्षेत्र के सहारे नहीं टिकी है। विनिर्माण क्षेत्र में 9.2 प्रतिशत की वृद्धि इस बात का संकेत है कि भारत धीरे-धीरे उत्पादन आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। लंबे समय तक भारत की अर्थव्यवस्था को मुख्यतः सेवा क्षेत्र की शक्ति के रूप में देखा जाता रहा, लेकिन अब देश में उत्पादन बढ़ाने, घरेलू उद्योगों को प्रोत्साहन देने और बुनियादी ढांचे के विस्तार की दिशा में किए गए प्रयासों से औद्योगिक क्षेत्र के लिए नई संभावनाएं पैदा हुई हैं। निर्माण क्षेत्र भी रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। सड़कें, रेल, बंदरगाह, हवाई अड्डे, आवास, औद्योगिक गलियारे और डिजिटल बुनियादी ढांचे में निवेश का प्रभाव केवल आर्थिक वृद्धि के आंकड़ों में नहीं दिखाई देता, बल्कि उससे भविष्य की आर्थिक क्षमता भी निर्मित होती है। भारत की वर्तमान आर्थिक यात्रा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अपनाई गई नीतियों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पिछले वर्षों में सरकार ने बुनियादी ढांचे, डिजिटल भुगतान, वित्तीय समावेशन, विनिर्माण, नए उद्यम, आत्मनिर्भरता, ऊर्जा सुरक्षा और औपचारिक अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने पर लगातार जोर दिया है। जनधन खातों से लेकर डिजिटल भुगतान तक और राजमार्गों से लेकर रेलवे के आधुनिकीकरण तक, आर्थिक गतिविधियों का एक व्यापक तंत्र तैयार हुआ है। वस्तु एवं सेवा कर ने देश के बड़े बाजार को अधिक एकीकृत करने में भूमिका निभाई है। दिवाला एवं दिवालियापन संहिता जैसी व्यवस्थाओं ने कारोबारी वातावरण को अधिक व्यवस्थित बनाने का प्रयास किया है। उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाओं ने अनेक क्षेत्रों में घरेलू उत्पादन और निवेश को बढ़ावा दिया है। इन नीतियों का वास्तविक मूल्यांकन केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि उनके परिणामों से होना चाहिए। सकल घरेलू उत्पाद के ताजा आंकड़े इस दिशा में एक सकारात्मक संकेत अवश्य देते हैं। आम नागरिक के लिए आर्थिक विकास का अर्थ तभी सार्थक है, जब उसके जीवन में रोजगार के अवसर बढ़ें, आय में वृद्धि हो, महंगाई नियंत्रित रहे, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर हों तथा जीवन की समग्र गुणवत्ता में सुधार आए। सकल घरेलू उत्पाद हमें अर्थव्यवस्था की गति बताता है, लेकिन यह नहीं बताता कि उस विकास का लाभ समाज के विभिन्न वर्गों तक किस प्रकार पहुंच रहा है। इसलिए भारत की अगली चुनौती तेज विकास से आगे बढ़कर गुणवत्तापूर्ण और समावेशी विकास सुनिश्चित करना है। आर्थिक विकास की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी रोजगार है। विनिर्माण और निर्माण क्षेत्र का विस्तार इसलिए आशाजनक है क्योंकि ये बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करने की क्षमता रखते हैं। लेकिन भविष्य में भारत को ऐसे उद्योगों की आवश्यकता होगी, जो बड़ी संख्या में युवाओं को सम्मानजनक और स्थायी रोजगार दे सकें। भारत की युवा आबादी उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। यदि उसे कौशल, शिक्षा, तकनीक और रोजगार के पर्याप्त अवसर मिलते हैं तो यही युवा शक्ति भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने की सबसे बड़ी ऊर्जा बन सकती है। भारत का लक्ष्य केवल आत्मनिर्भर बनना नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में नेतृत्वकारी भूमिका निभाना होना चाहिए। आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से अलग होना नहीं, बल्कि अपनी क्षमताओं को इतना मजबूत करना है कि भारत वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सके। आज दुनिया चीन के विकल्प के रूप में विभिन्न उत्पादन केंद्रों की तलाश कर रही है। भारत के पास विशाल बाजार, युवा मानव संसाधन, तकनीकी क्षमता और लोकतांत्रिक व्यवस्था जैसी विशिष्ट ताकतें हैं। यदि भारत विनिर्माण, अर्धचालक, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उत्पादन, नवीकरणीय ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष तकनीक और उच्च गुणवत्ता वाली सेवाओं में अपनी क्षमता बढ़ाता है, तो वह वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में कहीं अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा सकता है। 2047 का विकसित भारत केवल सरकार का संकल्प नहीं, बल्कि देशवासियों की सामूहिक आकांक्षा है। 7.8 प्रतिशत की विकास दर इस यात्रा में एक उत्साहजनक पड़ाव है, मंजिल नहीं। भारत को लगातार उच्च विकास दर, मजबूत वित्तीय व्यवस्था और स्थिर आर्थिक वातावरण के साथ-साथ बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि उत्पादकता, कौशल विकास, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा पर भी समान ध्यान देना होगा। भारत की आर्थिक कहानी अब केवल आंकड़ों की कहानी नहीं रह गई है। यह आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और वैश्विक नेतृत्व की कहानी बन रही है। दुनिया जब युद्ध और आर्थिक अस्थिरता की छाया में अपनी दिशा तलाश रही है, तब भारत का मजबूत आर्थिक प्रदर्शन उसे एक भरोसेमंद और संभावनाशील शक्ति के रूप में स्थापित कर रहा है। 7.8 प्रतिशत की विकास दर निश्चित रूप से भारत के लिए गर्व का विषय है। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि भारत ने यह संदेश दिया है कि वैश्विक संकटों के बीच भी उसकी आर्थिक बुनियाद मजबूत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चल रही आर्थिक नीतियों और योजनाओं को अब अगले चरण में अधिक रोजगार, अधिक निवेश, अधिक उत्पादन और अधिक समान अवसरों से जोड़ना होगा। भारत के आर्थिक आकाश पर उगता यह उजाला तभी स्थायी प्रकाश बनेगा, जब विकास की रोशनी देश के अंतिम व्यक्ति के जीवन तक पहुंचे। यही 2047 के विकसित भारत की वास्तविक कसौटी होगी और यही आर्थिक शक्ति को जनशक्ति में बदलने का मार्ग भी। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

प्रभासाक्षी 2 Sep 2026 6:53 pm

मध्य प्रदेश: 'जनसेवा कनेक्ट' पहल के तहत शिवपुरी में पोस्ट ऑफिस को डिजिटल अपग्रेड मिला

मध्य प्रदेश: 'जनसेवा कनेक्ट' पहल के तहत शिवपुरी में पोस्ट ऑफिस को डिजिटल अपग्रेड मिला

समाचार नामा 2 Sep 2026 6:23 pm

'7 लाख घरों को पीएनजी कनेक्शन और शहरों में 24 घंटे बिजली', राजस्थान निकाय चुनाव में भाजपा का वादा

'7 लाख घरों को पीएनजी कनेक्शन और शहरों में 24 घंटे बिजली', राजस्थान निकाय चुनाव में भाजपा का वादा

समाचार नामा 2 Sep 2026 6:18 pm

जीडीपी : वृद्धि दर 2.6 प्रतिशत होने पर केंद्र ने किया खारिज

नई दिल्ली, केंद्र सरकार ने बुधवार को उन दावों को खारिज कर दिया, जिसमें दावा किया गया था कि वित्त वर्ष 27 की पहली तिमाही के आंकड़े को अच्छा दिखाने के लिए पिछले साल की पहली तिमाही की चालू जीडीपी के आंकड़े को संशोधित करके 86 लाख करोड़ रुपए से घटाकर 80 लाख करोड़ रुपए कर दिया गया है। अगर ऐसा नहीं किया गया होता तो चालू कीमतों में जीडीपी की ग्रोथ 2.6 प्रतिशत थी।

देशबन्धु 2 Sep 2026 6:10 pm

केटीआर ने कांग्रेस के 1,000 दिनों के कार्यकाल पर हमला बोला, 'चार्जशीट' जारी की

केटीआर ने कांग्रेस के 1,000 दिनों के कार्यकाल पर हमला बोला, 'चार्जशीट' जारी की

समाचार नामा 2 Sep 2026 5:49 pm

जी20 की आम सहमति को चीन ने रोका

एशविले, अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने कहा कि चीन ने जी20 वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक गवर्नरों की बैठक में आम सहमति बनने से रोक दिया।

देशबन्धु 2 Sep 2026 4:52 pm

'छात्रों की जीत': सीजेपी के आशुतोष रांका ने राजस्थान के स्कूल की मरम्मत का स्वागत किया

'छात्रों की जीत': सीजेपी के आशुतोष रांका ने राजस्थान के स्कूल की मरम्मत का स्वागत किया

समाचार नामा 2 Sep 2026 4:36 pm

मनोज झा ने राहुल गांधी के 'वोट चोरी' वाले बयान का किया समर्थन, भाजपा बोली-लगा रहे बेबुनियाद आरोप

मनोज झा ने राहुल गांधी के 'वोट चोरी' वाले बयान का किया समर्थन, भाजपा बोली-लगा रहे बेबुनियाद आरोप

समाचार नामा 2 Sep 2026 4:07 pm

CJP प्रोटेस्ट क्यों हुआ कैंसिल, CJI ने ऐसा क्या कह दिया, PM मोदी से इसका क्या है कनेक्शन?

NEET-UG पेपर लीक के विरोध प्रदर्शनों में शामिल लोगों के खिलाफ दर्ज मामलों को जब सुप्रीम कोर्ट ने अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए रद्द किया, तब अदालत कक्ष में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के बीच एक-दूसरे की सराहना देखने को मिली। यह पार्टी मुख्य न्यायाधीश की एक टिप्पणी के व्यंग्यात्मक जवाब के रूप में अस्तित्व में आई थी। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने यह फैसला दिल्ली पुलिस और चार राज्य सरकारों द्वारा शीर्ष अदालत से संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली विशेष शक्तियों का उपयोग करने की अपील के बाद सुनाया। केंद्र सरकार पर केस वापस लेने के वादे से मुकरने का आरोप लगाते हुए CJP ने 5 सितंबर को एक मार्च निकालने का ऐलान किया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आने के बाद इस विरोध प्रदर्शन को वापस ले लिया गया। क्यों सीजेपी ऐन मौके पर पीछे हट गई और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिक्चर में आ गए। बीजेपी के पीछे हटने का मतलब यह कि उन्होंने 5 सितंबर का अपना विरोध प्रदर्शन वापस ले लिया है। पर जो वजह बताई जा रही है असली बात वही है या फिर कहानी में कुछ ट्विस्ट भी है। सीजेपी का प्रोग्राम था, तारीख भी तय हो चुकी थी। 5 सितंबर की। पर फिर कहानी में यू टर्न आ गया। केंद्र सरकार पीछे हटी तो कॉकरोच जनता पार्टी वाले भी। सीजेपी वालों ने ऐलान किया 5 सितंबर को अब कोई विरोध प्रदर्शन नहीं होगा। बस इसके कुछ ही देर बाद सीन में एंट्री हुई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की। उन्होंने वर्टिकल में कोई इंस्टा पर रील नहीं डाला है। बच्चों से कोई अपील भी नहीं की है। बीजेपी के अंदर से जो खबर आई है वो यह है कि प्रधानमंत्री जेन जी से संवाद करेंगे। इसे भी पढ़ें: नीट प्रदर्शनकारियों पर दर्ज प्राथमिकी रद्द होने पर कॉजपा ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को बताया बड़ी जीत PM मोदी की Gen Z के साथ प्रस्तावित बातचीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 5 सितंबर यानी शिक्षक दिवस पर दिल्ली के श्री राम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स (SRCC) जाने की संभावना है। यह दौरा इसलिए भी अहम है क्योंकि SRCC अपने 100 साल पूरे कर रहा है। न्यूज़ एजेंसी ANI की रिपोर्ट के मुताबिक, मोदी के कॉलेज के शताब्दी समारोह में शामिल होने और छात्रों से बातचीत करने की उम्मीद है। इस प्रस्तावित दौरे का एक अहम हिस्सा मोदी और Gen Z छात्रों के बीच सीधी बातचीत हो सकती है। इस सेशन से छात्रों को प्रधानमंत्री के साथ अपने विचार, उम्मीदें और चिंताएं साझा करने का मौका मिलने की संभावना है। यह बातचीत ऐसे समय में हो रही है जब BJP 'जेन-Z' (Gen Z) तक पहुँचने की कोशिश कर रही है। पार्टी युवाओं से जुड़ने और वोटरों की अगली पीढ़ी के साथ बातचीत को मज़बूत करने के लिए एक खास रणनीति पर काम कर रही है। बीजेपी ने हाल ही में 'जेन ज़ेड' (Gen Z) तक पहुँचने के अपने कार्यक्रम के लिए एक टीम बनाई है। इसका मकसद सीनियर नेताओं और युवा प्रतिनिधियों को एक साथ लाना है। इस पहल का उद्देश्य युवा भारतीयों की उम्मीदों को समझना और बातचीत व भागीदारी के लिए और मौके बनाना है। उम्मीद है कि पार्टी युवाओं के साथ बातचीत को केवल पारंपरिक राजनीतिक कार्यक्रमों तक सीमित रखने के बजाय, सीधे जुड़ने और बातचीत करने पर ध्यान देगी। बीजेपी का युवाओं तक पहुँचने का प्लान HT की पिछली रिपोर्ट के अनुसार, बीजेपी ने 'जेन ज़ी' (Gen Z) तक पहुँचने के लिए एक खास टीम बनाई है। पार्टी नेताओं ने छोटी सभाओं, कैंपस प्रोग्राम और सीधे बातचीत के ज़रिए युवाओं को जोड़ने के तरीकों पर चर्चा की। अगस्त में, बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन ने लोगों तक पहुँचने की योजना पर एक बैठक की। इसमें नेताओं ने कहा कि युवाओं को जोड़ने का काम लगातार चलना चाहिए, न कि यह सिर्फ़ बड़े राजनीतिक कार्यक्रमों तक ही सीमित रहे। पार्टी की युवा रणनीति पर चर्चा के लिए अहम राज्यों जैसे चुनाव वाले उत्तर प्रदेश, पंजाब और गुजरात के करीब 45 नेताओं को भी शामिल किया गया। पार्टी युवाओं के लिए एक अभियान की भी योजना बना रही है, जिसमें बाइक यात्रा, हैकाथॉन, मैराथन, साइकिलिंग इवेंट और इनोवेशन चैलेंज जैसी गतिविधियाँ शामिल होंगी। बीजेपी की युवा शाखा 17 सितंबर को वडनगर-वाराणसी मोटरसाइकिल यात्रा शुरू करने वाली है। पार्टी के 'सेवा पखवाड़ा' में स्कूली छात्रों, कॉलेज जाने वाले युवाओं, पोस्ट-ग्रेजुएट स्कॉलर्स और युवा इनोवेटर्स के लिए कार्यक्रम शामिल होंगे। इसे भी पढ़ें: CJP ने 5 सितंबर का 'Delhi March' वापस लिया, SC में केंद्र के आश्वासन के बाद बड़ा फैसला BJP के लिए Gen Z क्यों अहम है? पिछले महीने, NEET विवाद को लेकर युवाओं के विरोध-प्रदर्शनों ने सरकार को हिलाकर रख दिया था और आखिरकार धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा। बाद में प्रधान ने कहा कि विरोध-प्रदर्शनों के दौरान Gen Z को गुमराह करने की कोशिशें की गई थीं। इन विरोध-प्रदर्शनों में हज़ारों युवा सड़कों पर उतर आए। छात्रों और युवा संगठनों ने पेपर लीक, छात्रों की आत्महत्या और परीक्षा प्रणाली में गड़बड़ियों को लेकर जवाबदेही की मांग की। विरोध-प्रदर्शनों के दौरान 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) की आवाज़ भी प्रमुखता से सुनाई दी। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा कि इन विरोध-प्रदर्शनों से बीजेपी की छवि को नुकसान पहुंचा है और विपक्षी पार्टियों को यह समझना चाहिए कि युवा CJP जैसे समूहों की ओर क्यों आकर्षित हुए। शिक्षा मंत्रालय छोड़ने के बाद, प्रधान ने अगस्त में कहा था कि NEET विरोध-प्रदर्शनों के दौरान कुछ लोगों ने 'जेन ज़ी' (Gen Z) को गुमराह करने की कोशिश की थी। उन्होंने इस विवाद के चलते अपना इस्तीफ़ा देने के फ़ैसले का भी बचाव किया। सीजेपी ने क्यों वापस लिया प्रोटेस्ट 5 सितंबर से फिर आंदोलन शुरू करने वाली कॉकरोच जनता पार्टी ने अब अपने हाथ पीछे खींच लिए। तो सुप्रीम कोर्ट में एक सुनवाई थी। इस बात पर कि स्टूडेंट प्रदर्शन को लेकर देश भर में दर्ज एफआईआर का क्या होगा? सीजीपी की शुरुआत से यह मांग थी कि एक छात्र के खिलाफ भी कारवाई नहीं होनी चाहिए। मोदी सरकार और बीजेपी के लोगों के बीच जिन कुछ बिंदुओं पर सहमति बनी थी और जंतरमंतर वाला प्रोटेस्ट वापस हुआ था उनमें से एक तो यही था। तो देश की सबसे बड़ी अदालत में जब यह मामला गूंजा तो वहां सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि 20 जुलाई से 25 जुलाई के बीच हुए छात्र प्रदर्शनों के संबंध में किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में दर्ज एफआईआर पर आगे कारवाई या जांच नहीं होगी। इन सभी एफआईआर को हर मकसद के लिए बंद माना जाएगा। इसके बाद 5 सितंबर को होने वाले विरोध मार्च को वापस लेने की बात सीजेपी के प्रवक्ता सौरभ दास ने कह दी कि सितंबर 5 को जो हमारा पीसफुल प्रोटेस्ट मार्च था इंडिया गेट से न्यू पुलिस हेड क्वार्टर्स तक वो हम लोग कॉल ऑफ कर रहे हैं क्योंकि हमारे सारे डिमांड्स सरकार ने मान लिया तीन जजों की बेंच कर रही सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई तीन जजों की बेंच कर रही है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत के अलावा बेंच में जस्टिस जॉय मौल्या बागची और जस्टिस बी मोहना भी शामिल है। भारत सरकार का पक्ष रख रहे हैं सॉललीिसिटर जनरल तुषार मेहता। मेहता ने अदालत में कहा कि सिर्फ दिल्ली पुलिस के मामले में केंद्र सरकार ही ने नहीं बल्कि बिहार, असम, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र की राज्य सरकारों ने स्टूडेंट प्रोटेस्ट को लेकर दर्ज सभी एफआईआर रद्द करने की बात मान ली है। बच्चों के लिए हम कितना सोचते हैं। उनका दुख मेरा दुख है। यह अदालत में भी सरकार बता चुकी थी।

प्रभासाक्षी 2 Sep 2026 1:47 pm

मल्लिकार्जुन खड़गे की नजर में जीडीपी का मतलब 'गांधी परिवार डेवलपमेंट प्रोग्राम': शायना एनसी

मल्लिकार्जुन खड़गे की नजर में जीडीपी का मतलब 'गांधी परिवार डेवलपमेंट प्रोग्राम': शायना एनसी

समाचार नामा 2 Sep 2026 1:18 pm

कांग्रेस की शक्ति योजना ने कर्नाटक की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की रीढ़ तोड़ दी : भाजपा

कांग्रेस की शक्ति योजना ने कर्नाटक की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की रीढ़ तोड़ दी : भाजपा

समाचार नामा 2 Sep 2026 12:16 pm

यूपी के उत्पाद अब जर्मनी में मचाएंगे धूम, निवेश को भी मिलेगा नया विस्तार : केशव प्रसाद मौर्य

यूपी के उत्पाद अब जर्मनी में मचाएंगे धूम, निवेश को भी मिलेगा नया विस्तार : केशव प्रसाद मौर्य

समाचार नामा 2 Sep 2026 12:10 pm

बंगाल में बिना लाइसेंस सरकारी जमीन पर चल रहे कई होटल-रेस्टोरेंट : दिलीप घोष

बंगाल में बिना लाइसेंस सरकारी जमीन पर चल रहे कई होटल-रेस्टोरेंट : दिलीप घोष

समाचार नामा 2 Sep 2026 11:59 am

नितेश राणे ने राहुल गांधी पर साधा निशाना, कहा-'ये लोग हिंदुत्व के खिलाफ कर रहे काम' (आईएएनएस इंटरव्यू)

नितेश राणे ने राहुल गांधी पर साधा निशाना, कहा-'ये लोग हिंदुत्व के खिलाफ कर रहे काम' (आईएएनएस इंटरव्यू)

समाचार नामा 2 Sep 2026 11:51 am

जीतू पटवारी का सीएम मोहन यादव को पत्र-'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम के लिए नेहरू स्टेडियम की मांग

जीतू पटवारी का सीएम मोहन यादव को पत्र-'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम के लिए नेहरू स्टेडियम की मांग

समाचार नामा 2 Sep 2026 11:49 am

सुर्खियों में रहने के लिए विवादित बयान देने वालीं Swara Bhasker को Jauhar पर टिप्पणी करना भारी पड़ा, Priyanka Chaturvedi ने दिया करारा जवाब

फिल्म पद्मावत के जौहर दृश्य को लेकर अभिनेत्री स्वरा भास्कर एक बार फिर विवादों के केंद्र में हैं। दिल्ली में आयोजित ‘Woman, Life, Freedom’ कार्यक्रम में उनकी टिप्पणियों का वीडियो वायरल हुआ, जिसके बाद उन पर रानी पद्मावती और जौहर करने वाली महिलाओं को अपमानित करने के आरोप लगे। विवाद बढ़ा तो स्वरा सामने आईं और कहा कि उनकी बात को “पूरी तरह गलत तरीके से अनुवादित और प्रसारित” किया गया है। लेकिन सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि स्वरा ने वास्तव में क्या कहा। बड़ा सवाल यह भी है कि आखिर उनकी सार्वजनिक टिप्पणियां बार-बार ऐसे विवादों का रूप क्यों ले लेती हैं, जिनके बाद उन्हें सफाई देनी पड़ती है कि “मेरा मतलब वह नहीं था”? हम आपको बता दें कि 31 अगस्त को दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित चर्चा के दौरान स्वरा भास्कर ने पद्मावत के क्लाइमैक्स का जिक्र करते हुए कहा कि सैकड़ों महिलाओं को जौहर करते देख उन्होंने सोचा कि यदि वह स्वयं कभी यौन हिंसा की शिकार होतीं तो फिल्म का संदेश उन्हें क्या महसूस कराता। स्वरा का तर्क था कि ऐसी प्रस्तुति किसी बलात्कार पीड़िता को यह महसूस करा सकती है कि जीवित रहना कम सम्मानजनक है और मृत्यु को चुनना अधिक “बहादुरी” है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या ऐसे समाज में, जहां यौन हिंसा गंभीर समस्या है, फिल्मों को महिलाओं की “पवित्रता” को उनके जीवन से अधिक मूल्यवान दिखाना चाहिए। उन्होंने जौहर दृश्य में एक गर्भवती महिला के शॉट पर भी आपत्ति जताई और इसे लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी। इसे भी पढ़ें: GDP वृद्धि के आंकड़ों पर Mallikarjun Kharge का हमला, बेरोजगारी और महंगाई पर सरकार को घेरा विवाद तब बढ़ा जब सोशल मीडिया पर यह आरोप लगाया गया कि स्वरा ने रानी पद्मावती और जौहर करने वाली महिलाओं को “कायर” कहा है। इसके बाद स्वरा ने इंस्टाग्राम पर वीडियो जारी कर स्पष्ट किया कि उन्होंने न तो रानी पद्मावती को कायर कहा और न ही जौहर करने वाली अन्य महिलाओं को। स्वरा ने कहा कि उनका मूल आशय यह था कि फिल्म का दृश्य आधुनिक दौर के यौन हिंसा पीड़ितों तक कौन-सा संदेश पहुंचा सकता है। उन्होंने कहा कि यदि कोई महिला बलात्कार के बाद जीवित रहती है, तो उसे कभी यह महसूस नहीं कराया जाना चाहिए कि उसके जीवन या सम्मान का मूल्य कम हो गया है। यहां सवाल उठता है कि क्या स्वरा इतिहास के सबसे कठिन संदर्भ को नजरअंदाज कर रही हैं? स्वरा भास्कर का यह कहना कि बलात्कार या यौन हिंसा के बाद भी महिला का जीवन, सम्मान और अस्तित्व पूरी तरह मूल्यवान है, अपने आप में एक महत्वपूर्ण और आधुनिक मानवीय तर्क है। किसी भी पीड़िता को आत्महत्या, आत्मदाह या मृत्यु के लिए प्रेरित करना न तो स्वीकार्य है और न ही उसका महिमामंडन किया जाना चाहिए। लेकिन पद्मावत के जौहर प्रसंग और आधुनिक बलात्कार पीड़िताओं की परिस्थितियों को एक ही पैमाने पर रख देना इतिहास की जटिलताओं को अत्यधिक सरल बना देता है। जौहर की ऐतिहासिक चर्चा युद्ध, पराजय, सामूहिक हिंसा, दासता और विजेता की सत्ता के भयावह संदर्भ में होती है। उस समय महिलाओं के सामने सिर्फ यौन हिंसा का खतरा नहीं, बल्कि बंदी बनाए जाने, दासता, जबरन हरम में भेजे जाने और जीवन भर विजेता की संपत्ति बनकर रहने जैसी परिस्थितियों का भय भी मौजूद बताया जाता है। ऐसे में जौहर को केवल “महिलाओं को अपनी पवित्रता बचाने के लिए मरने का संदेश” कहकर खारिज कर देना क्या उस ऐतिहासिक त्रासदी को पर्याप्त रूप से समझना है? शिवसेना (यूबीटी) की राज्यसभा सांसद रहीं प्रियंका चतुर्वेदी ने भी स्वरा भास्कर के तर्क का विरोध करते हुए बहस में एक महत्वपूर्ण आयाम जोड़ा है। उनका कहना था कि युद्ध और आक्रमण जैसी चरम परिस्थितियों में मृत्यु, दासता या विजेता के हरम में जबरन जीवन बिताने के बीच महिलाओं द्वारा लिया गया निर्णय उनकी व्यक्तिगत राय के रूप में भी देखा जाना चाहिए। प्रियंका चतुर्वेदी का तर्क मूलतः यह है कि उस निर्णय से असहमति हो सकती है, उसके ऐतिहासिक विवरणों पर बहस हो सकती है, लेकिन उन महिलाओं के सामने मौजूद परिस्थितियों को नजरअंदाज कर उनके फैसले को हल्के ढंग से देखना उचित नहीं है। देखा जाये तो यही इस विवाद का केंद्रीय प्रश्न है कि क्या आज की सुरक्षित, आधुनिक और संवैधानिक दृष्टि से सदियों पुराने युद्धकालीन निर्णयों का मूल्यांकन करना पर्याप्त है? इतिहास का अध्ययन करते समय यह याद रखना आवश्यक है कि अतीत के लोगों के पास वे विकल्प नहीं थे जो आज हमारे पास हैं। आधुनिक समाज में आत्मदाह का समर्थन नहीं किया जा सकता। लेकिन जौहर की ऐतिहासिक व्याख्या करते समय उसके संदर्भ को समझना आवश्यक है। जौहर को केवल “पवित्रता बचाने के लिए आत्महत्या” के रूप में देखना अधूरा दृष्टिकोण है। युद्धकालीन परिस्थितियों में यह सामूहिक रूप से विजेता के सामने समर्पण न करने और दासता को स्वीकार न करने की त्रासद प्रतिक्रिया के रूप में भी देखा जाता है। इसलिए यह कहना कि जौहर करने वाली महिलाएं “जीना नहीं चाहती थीं” या उनका निर्णय केवल स्त्री-विरोधी सामाजिक मानसिकता का परिणाम था, यह उस समय के हालात की वास्तविकता को नकारना है। हम आपको यह भी बता दें कि स्वरा भास्कर का पद्मावत से विवाद नया नहीं है। जनवरी 2018 में फिल्म की रिलीज के बाद उन्होंने निर्देशक संजय लीला भंसाली को एक खुला पत्र लिखा था। उस पत्र में भी उन्होंने फिल्म के जौहर दृश्य और महिलाओं की गरिमा को यौन शुचिता से जोड़ने पर सवाल उठाए थे। पद्मावत में दीपिका पादुकोण ने रानी पद्मावती की भूमिका निभाई थी, जबकि शाहिद कपूर और रणवीर सिंह भी फिल्म के प्रमुख कलाकार थे। फिल्म मलिक मोहम्मद जायसी की 16वीं शताब्दी की रचना पद्मावत से प्रेरित थी और रिलीज से पहले ही बड़े विवादों में घिर चुकी थी। फिल्म का जौहर दृश्य उसके सबसे चर्चित दृश्यों में शामिल रहा और आज, वर्षों बाद भी, वही दृश्य बहस का केंद्र बना हुआ है। वहीं स्वरा भास्कर के बयान के बाद उनके आलोचकों ने उन्हें निशाने पर ले लिया है। स्वरा भास्कर के आलोचकों का कहना है कि उनके साथ समस्या केवल विचारों की नहीं, बल्कि विचार व्यक्त करने की शैली की भी है। दरअसल, उनके बयान अक्सर इतने तीखे और उत्तेजक अंदाज में सामने आते हैं कि सोशल मीडिया पर तूफान खड़ा हो जाता है। फिर विवाद बढ़ने पर स्वरा का स्पष्टीकरण आता है कि उनकी बात का अर्थ कुछ और था। इस बार भी स्वरा ने कहा कि उन्होंने रानी पद्मावती को “कायर” नहीं कहा। स्वरा भास्कर के आलोचक एक और असहज सवाल भी उठा रहे हैं कि क्या लगातार सार्वजनिक चर्चा में बने रहने की इच्छा उनकी बयानबाजी को प्रभावित करती है? यहां एक और गंभीर प्रश्न उठता है कि क्या हम इतिहास को उसके अपने समय और परिस्थितियों में समझेंगे, या आज के नैतिक मानदंडों से उसका तत्काल फैसला करेंगे? स्वरा भास्कर और उन जैसी सोच रखने वालों को यह समझना होगा कि हर बार विवाद पैदा होने के बाद यह कहना कि “मेरा मतलब यह नहीं था”, सार्वजनिक संवाद की समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। अगर बात बार-बार गलत समझी जा रही है, तो केवल श्रोताओं और आलोचकों को दोष देने की बजाय वक्ता को भी अपनी भाषा, उदाहरणों और प्रस्तुति पर विचार करना चाहिए। बहरहाल, पद्मावत और जौहर पर बहस जारी रह सकती है और जारी रहनी भी चाहिए। लेकिन बहस का आधार न तो इतिहास का अंध-महिमामंडन होना चाहिए और न ही आधुनिक दृष्टि के नाम पर अतीत की जटिल परिस्थितियों को खारिज कर देना चाहिए। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 2 Sep 2026 11:38 am

जम्मू-कश्मीर में एक-दूसरे के खिलाफ प्रदर्शन करेंगी एनसी और भाजपा, कानून व्यवस्था के मद्देनजर सुरक्षाबलों की तैनाती

जम्मू-कश्मीर में एक-दूसरे के खिलाफ प्रदर्शन करेंगी एनसी और भाजपा, कानून व्यवस्था के मद्देनजर सुरक्षाबलों की तैनाती

समाचार नामा 2 Sep 2026 11:13 am

पीएम मोदी समेत कई नेताओं ने आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण को दी जन्मदिन की बधाई

पीएम मोदी समेत कई नेताओं ने आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण को दी जन्मदिन की बधाई

समाचार नामा 2 Sep 2026 11:12 am

तमिलनाडु भाजपा नेता तिरुचि में होने वाली बैठक में स्थानीय चुनावों और उपचुनावों पर करेंगे चर्चा

तमिलनाडु भाजपा नेता तिरुचि में होने वाली बैठक में स्थानीय चुनावों और उपचुनावों पर करेंगे चर्चा

समाचार नामा 2 Sep 2026 10:33 am

नितेश राणे का हिजाब-बुर्के पर सख्त रुख, बोले-जरूरत पड़ी तो प्रतिबंध पर विचार करेगी महाराष्ट्र सरकार (आईएएनएस इंटरव्यू)

नितेश राणे का हिजाब-बुर्के पर सख्त रुख, बोले-जरूरत पड़ी तो प्रतिबंध पर विचार करेगी महाराष्ट्र सरकार (आईएएनएस इंटरव्यू)

समाचार नामा 2 Sep 2026 10:19 am

आरक्षण पर तेजस्वी यादव का BJP-NDA पर हमला, बोले- बड़े पदों पर SC-ST-OBC की हिस्सेदारी इतनी कम क्यों?

आरक्षण पर तेजस्वी यादव का BJP-NDA पर हमला, बोले- बड़े पदों पर SC-ST-OBC की हिस्सेदारी इतनी कम क्यों?

समाचार नामा 2 Sep 2026 8:30 am

एलजी टीएस संधू ने 'वेस्ट-टू-वेल्थ' मॉडल अपनाने का आह्वान किया

एलजी टीएस संधू ने 'वेस्ट-टू-वेल्थ' मॉडल अपनाने का आह्वान किया

समाचार नामा 1 Sep 2026 9:19 pm

राम मंदिर ट्रस्ट विवाद पर विहिप की डैमेज कंट्रोल की कवायद, केंद्रीय सलाहकार ने संतों से की मुलाकात,

राम मंदिर ट्रस्ट विवाद पर विहिप की डैमेज कंट्रोल की कवायद, केंद्रीय सलाहकार ने संतों से की मुलाकात,

समाचार नामा 1 Sep 2026 8:25 pm

'डेड इकोनॉमी' विवाद पर कांग्रेस नेता राकेश सिन्हा का पलटवार, बोले-जीडीपी आंकड़ों से नहीं छिपेगी जमीनी हकीकत

'डेड इकोनॉमी' विवाद पर कांग्रेस नेता राकेश सिन्हा का पलटवार, बोले-जीडीपी आंकड़ों से नहीं छिपेगी जमीनी हकीकत

समाचार नामा 1 Sep 2026 8:10 pm

'लोगों की बात सुनें, नियमों का पालन करें और काम की क्वालिटी सुनिश्चित करें', गुजरात सीएम की पंचायत प्रतिनिधियों से अपील

'लोगों की बात सुनें, नियमों का पालन करें और काम की क्वालिटी सुनिश्चित करें', गुजरात सीएम की पंचायत प्रतिनिधियों से अपील

समाचार नामा 1 Sep 2026 8:01 pm

7.8 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ देश की तरक्की को दिखाती है: सीएम देवेंद्र फडणवीस

7.8 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ देश की तरक्की को दिखाती है: सीएम देवेंद्र फडणवीस

समाचार नामा 1 Sep 2026 7:22 pm

भाजपा का 'बल्लारी चलो' मार्च: येदियुरप्पा ने कर्नाटक सरकार को उखाड़ फेंकने का लिया संकल्प

भाजपा का 'बल्लारी चलो' मार्च: येदियुरप्पा ने कर्नाटक सरकार को उखाड़ फेंकने का लिया संकल्प

समाचार नामा 1 Sep 2026 6:21 pm

'शुक्र है हम बिना वीजा के गोरखपुर जा सकते हैं', रवि किशन के 'स्पेन' वाले बयान पर चंद्रशेखर का तंज

'शुक्र है हम बिना वीजा के गोरखपुर जा सकते हैं', रवि किशन के 'स्पेन' वाले बयान पर चंद्रशेखर का तंज

समाचार नामा 1 Sep 2026 6:11 pm

SCO के मंच से चीन और पाकिस्तान को एक साथ धोकर मोदी ने दुनिया की वाहवाही लूट ली

एससीओ शिखर सम्मेलन में वैसे तो सभी सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने अपने अपने संबोधन में तमाम तरह के मुद्दे उठाये लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन में शामिल मुद्दों की विविधता और सबको साथ लेकर चलने के जज्बे ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। साथ ही तमाम अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक भी यह देखकर हैरान हैं कि कैसे मोदी ने मंच पर साथ मौजूद चीन के राष्ट्रपति और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को जबरदस्त तरीके से घेर लिया। हम आपको बता दें कि शहबाज शरीफ के सामने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को कठघरे में खड़ा किया तो वहीं संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सवाल पर चीन को भी आड़े हाथ लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आतंकवाद पर मोदी ने दो टूक कहा कि जो देश आतंकियों को पनाह देते हैं और आतंकवाद को अपनी नीति के औजार के रूप में इस्तेमाल करते हैं, उन्हें स्पष्ट संदेश दिया जाना चाहिए कि आतंक कभी किसी की रणनीतिक संपत्ति नहीं बन सकता। वहीं कनेक्टिविटी के नाम पर संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से समझौते को अस्वीकार करते हुए उन्होंने चीन को भी साफ संदेश दिया। किर्गिज गणराज्य की राजधानी बिश्केक में 31 अगस्त से 1 सितंबर तक आयोजित 26वें शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन में भारत ने अपनी मौजूदगी को महज औपचारिक भागीदारी तक सीमित नहीं रखा। प्रधानमंत्री मोदी ने एससीओ के 25 वर्षों की यात्रा को अगले 25 वर्षों की दिशा तय करने के अवसर में बदलते हुए भारत का स्पष्ट एजेंडा सामने रखा। सिक्योरिटी, कनेक्टिविटी और अपॉर्च्युनिटी के जरिये मोदी का संदेश था कि अब केवल घोषणाओं और संवाद से काम नहीं चलेगा, बल्कि सहयोग को ठोस परिणामों में बदलना होगा। इसे भी पढ़ें: BRICS 2026: क्या विस्तार के बाद Global Economy की दिशा बदल पाएगा भारत? 11 देशों के Leaders पर टिकी नजरें प्रधानमंत्री के भाषण का सबसे धारदार हिस्सा आतंकवाद पर था। उन्होंने कहा कि आतंकवाद मानवता के लिए गंभीर चुनौती है और इसके खिलाफ कार्रवाई केवल घटना के बाद प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। आतंकवादी वित्तपोषण, भर्ती, कट्टरपंथ, सुरक्षित ठिकानों और पूरे आतंकी तंत्र को ध्वस्त करना होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि मोदी ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में किसी भी प्रकार के दोहरे मापदंड को स्वीकार करने से साफ इंकार किया। यह संदेश ऐसे मंच से आया, जहां पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ स्वयं मौजूद थे। भारत की कूटनीतिक उपलब्धि यहीं समाप्त नहीं हुई। एससीओ के 25 वर्ष पूरे होने पर स्वीकार की गई बिश्केक डिक्लेरेशन ने क्षेत्रीय सुरक्षा और आतंकवाद जैसे मुद्दों पर भारत की प्राथमिकताओं को मजबूती दी। घोषणा और शिखर सम्मेलन के अन्य फैसलों में आतंकवाद, उग्रवाद, संगठित अपराध तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय खतरों से निपटने के लिए सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया गया। सुरक्षा चुनौतियों और खतरों से निपटने के लिए यूनिवर्सल सेंटर संबंधी नियमों को मंजूरी देना सदस्य देशों के बीच समन्वय और सूचना आदान-प्रदान को मजबूत करने वाला कदम है। भारत के लिए विशेष महत्व की बात यह भी रही कि अंग्रेजी को एससीओ के संस्थागत ढांचे में शामिल करने की दिशा में प्रगति हुई। साथ ही भारत द्वारा आगे बढ़ाई गई कई पहलों जैसे- एससीओ सिविलाइजेशन डायलॉग फोरम, यंग साइंटिस्ट फोरम और यंग ऑथर्स कॉन्क्लेव को भी बिश्केक डिक्लेरेशन में स्थान मिला। यह संकेत है कि भारत अब एससीओ में केवल सुरक्षा संबंधी चिंताएं उठाने वाला देश नहीं, बल्कि संगठन के बौद्धिक, सांस्कृतिक और संस्थागत भविष्य को आकार देने वाला सक्रिय साझेदार बन रहा है। मोदी ने अपनी विदेश नीति की व्यापक सोच को भी भाषण में स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि यूरेशिया की सुरक्षा और शांति का संबंध अफगानिस्तान की स्थिरता से जुड़ा है और भारत वहां विकास तथा मानवीय सहायता जारी रखेगा। पश्चिम एशिया के संघर्षों का उदाहरण देते हुए उन्होंने आगाह किया कि आज की दुनिया में किसी एक क्षेत्र का युद्ध उसी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। उसका असर ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर पड़ता है, जिसका सबसे अधिक बोझ ग्लोबल साउथ को उठाना पड़ता है। इसलिए भारत का स्पष्ट मत है कि युद्धों और तनावों का समाधान रणभूमि पर नहीं, बल्कि संवाद और कूटनीति से होना चाहिए। प्रधानमंत्री ने नशे के कारोबार को भी क्षेत्रीय सुरक्षा का गंभीर खतरा बताया। उन्होंने कहा कि मादक पदार्थों की तस्करी केवल अपराध नहीं, बल्कि युवा पीढ़ी और क्षेत्रीय स्थिरता पर हमला है। इस संदर्भ में एससीओ के तहत सुरक्षा, संगठित अपराध, सूचना सुरक्षा और नारकोटिक्स से निपटने के लिए बनाए जा रहे केंद्रों को प्रभावी और त्वरित कार्रवाई का माध्यम बनाने पर जोर दिया गया। इस तरह आतंकवाद और नार्को-टेररिज्म के खिलाफ भारत की चिंता को व्यापक एससीओ एजेंडे से जोड़ने में सफलता मिली। कनेक्टिविटी पर भी मोदी का संदेश उतना ही स्पष्ट और कूटनीतिक रूप से अहम था। भारत बाजारों को जोड़ने, व्यापार बढ़ाने और विकास के नए रास्ते खोलने वाली सभी पहल का समर्थन करता है, लेकिन ऐसी किसी भी परियोजना के लिए सदस्य देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान अनिवार्य है। प्रधानमंत्री का यह संदेश चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड पहल और विशेष रूप से चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिसका एक हिस्सा पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (पीओके) से होकर गुजरता है। भारत लंबे समय से इस परियोजना का विरोध करता रहा है और इसे अपनी संप्रभुता का उल्लंघन मानता है। ऐसे में मोदी ने बिना किसी देश या परियोजना का नाम लिए एससीओ मंच से साफ कर दिया कि कनेक्टिविटी और विकास के नाम पर किसी देश की क्षेत्रीय अखंडता से समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता। साथ ही उन्होंने सड़क, रेल और हवाई संपर्क बढ़ाने के अलावा कस्टम प्रक्रियाओं को सरल बनाने, डिजिटल दस्तावेजीकरण को बढ़ावा देने और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। तीसरे स्तंभ यानि अपॉर्च्युनिटी के जरिए मोदी ने एससीओ सहयोग को आम लोगों से जोड़ने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि सफलता का वास्तविक पैमाना यह होना चाहिए कि युवाओं के लिए कितने अवसर बने, उद्यमियों के लिए कितने नए बाजार खुले, किसानों को तकनीक से कितना लाभ मिला और नागरिकों का जीवन कितना बेहतर हुआ। मोदी ने जोर दिया कि एससीओ सहयोग केवल सरकारों तक सीमित नहीं, बल्कि पीपुल-ड्रिवन पार्टनरशिप बनना चाहिए। इसी दिशा में भारत इस वर्ष पहले एससीओ सिविलाइजेशन डायलॉग फोरम की मेजबानी करेगा। इसके अलावा, शिखर सम्मेलन के इतर प्रधानमंत्री की द्विपक्षीय मुलाकातों ने भी भारत की सक्रिय कूटनीति को मजबूत किया। ताजिकिस्तान के राष्ट्रपति इमोमाली रहमोन के साथ विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा हुई, जबकि लाओस के राष्ट्रपति थोंगलून सिसौलिथ के साथ द्विपक्षीय संबंधों और संपर्क को मजबूत करने पर बातचीत हुई। ये मुलाकातें बताती हैं कि बहुपक्षीय मंचों पर भारत की रणनीति केवल भाषण देने की नहीं, बल्कि समानांतर रूप से द्विपक्षीय संबंधों का नेटवर्क मजबूत करने की भी है। बहरहाल, बिश्केक एससीओ समिट में मोदी ने आतंकवाद पर पाकिस्तान को घेरा, दोहरे मापदंडों को चुनौती दी, संप्रभुता आधारित कनेक्टिविटी का सिद्धांत दोहराया और भारत की सांस्कृतिक व युवा-केंद्रित पहलों को एससीओ के एजेंडे में स्थापित किया। उनका संदेश साफ था कि “शेयर्ड जियोग्राफी” को “शेयर्ड अपॉर्च्युनिटीज” में बदलना होगा, विजन को परिणामों में और सरकार-केंद्रित सहयोग को जन-केंद्रित साझेदारी में परिवर्तित करना होगा। कुल मिलाकर, बिश्केक से भारत ने यही संकेत दिया है कि बदलते यूरेशियाई समीकरणों में वह एजेंडा तय करने वाला देश बन चुका है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 1 Sep 2026 6:09 pm

न्यूयॉर्क में मोहन भागवत का संदेश- “E Pluribus Unum” से “वसुधैव कुटुम्बकम्” तक

न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का भाषण सुनकर अमेरिका की एक प्रचलित कहावत स्मरण हो आई “E Pluribus Unum”, “ई प्लूरिबस यूनम” अर्थात् ‘अनेक से एक’। भागवत जी ने अनेक ऐसे बिंदु चिह्नित किए जहाँ, “वसुधैव कुटुम्बकम्” और अमेरिकी “E Pluribus Unum” परस्पर पूरक और पर्याय सिद्ध होते हैं। सबसे बड़ी बात, उनका संदेश केवल अमेरिका में बसे भारतीयों के लिए नहीं था; उसमें भारत, भारतीयता, विविधता, सह-अस्तित्व और विश्व-मानवता के प्रति एक व्यापक दृष्टि का विकास क्रम था। भागवत जी ने अपने प्रबोधन में विविधता को भारत की शक्ति बताया। उन्होंने कहा कि भारत की एकता विविधताओं से सजती है और विविधता में केवल परस्पर एडजस्ट करना पर्याप्त नहीं है, विविधता को स्वीकार कर उसे सम्मान और संरक्षण भी देना होगा। यही भारतीय दर्शन है। धार्मिक, नस्लीय और सांस्कृतिक ध्रुवीकरण के चक्र फँसे वर्तमान विश्व हेतु यही आवश्यक है। मोहनराव जी के न्यूयॉर्क उद्बोधन से निकला सबसे महत्वपूर्ण संदेश हिंदू-मुस्लिम संबंधों पर स्पष्ट वक्तव्य था। उन्होंने दो टूक उस सोच को नकारा कि भारत में मुसलमानों के लिए कोई स्थान नहीं है। उन्होंने हिंदू और मुस्लिम समाज को साझा पूर्वजों से जोड़ते हुए “same DNA” की बात भी दोहराई। इसे भी पढ़ें: मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा: भारतीय चिंतन की सार्थक प्रस्तुति भारतीय-अमेरिकी समुदाय आज अमेरिका के सर्वाधिक सफल और प्रभावी प्रवासी समुदाय में से एक है। उसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध और अनेक भाषाई-सांस्कृतिक समूह शामिल हैं। यदि भारतीय मूल के लोग अपनी भारतीय पहचान को किसी एक धार्मिक पहचान तक सीमित न करके एक साझा सभ्यतागत पहचान के रूप में देखते हैं, तो अमेरिकी समाज में भारतीय समुदाय की एकता और प्रभाव दोनों बढ़ सकते हैं। भागवत का संदेश अमेरिका में भारतीय मूल की नई पीढ़ी के लिए विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है। पहली पीढ़ी के प्रवासी प्रायः भारत से भावनात्मक रूप से जुड़े रहते हैं, जबकि दूसरी और तीसरी पीढ़ी अमेरिकी सामाजिक परिवेश में पली-बढ़ी है। उनके सामने प्रश्न रहता है कि वे अपनी भारतीय सांस्कृतिक पहचान को अमेरिकी नागरिकता के साथ किस प्रकार संतुलित करें। भागवत का दृष्टिकोण इस प्रश्न का सकारात्मक उत्तर देता है, अमेरिका के प्रति पूर्ण निष्ठा और भारत की सभ्यतागत विरासत के प्रति सम्मान एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। ‘अपनी कर्मभूमि के प्रति निष्ठावान रहो’ विदेशी भूमि पर जाकर अपनों से यह कहने का सामर्थ्य, साहस और सहजता एक स्वयंसेवक या ‘संघ विचार’ के पास ही हो सकती है। यह विचार भारतीय-अमेरिकी समुदाय को “Hyphenated Identity” की समस्या से मुक्ति देकर एक आत्मविश्वासी नागरिक की पहचान देता है। मोहन भागवत जी के कहे पर चलें तो अमेरिकी भारतीय युवा श्रेष्ठ अमेरिकी होते हुए भी अपनी भारतीय जड़ों पर गर्व कर सकते हैं। भागवतजी ने भारतीयता को केवल धार्मिक आग्रह के रूप में नहीं बल्कि साझा सांस्कृतिक और मानवीय विरासत के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया। विश्व में अमेरिका अब एक सर्वाधिक विविधता भरा समाज बन गया है। अमेरीका को सौजन्यशाली विविधता देने में भारत का सबसे बड़ा योगदान है। अमेरिका में बसे अनेक प्रकार के भारतीय समुदाय आज अमेरिकी समाज को एक इंद्रधनुष का रूप देते हैं। यह हमारे लिए गौरान्वित करने वाला विषय है। भारतीय-अमेरिकी समुदाय अमेरिका की अर्थव्यवस्था, तकनीक, चिकित्सा, शिक्षा, उद्यमिता और सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण योगदान देता है। यदि इस समुदाय में सांस्कृतिक आत्मविश्वास और सामाजिक समरसता बढ़ती है तो उसका लाभ अमेरिकी समाज को भी मिलेगा। संघ प्रमुख ने भारतीय संस्कृति के प्रत्येक के रूप में तीन शब्द कहे “Acceptance, Respect and Protection”। उनके भाषण से यह पुनः सिद्ध हुआ कि ‘सहिष्णुता’ ‘Tolerance’ भारतीय शब्द है ही नहीं। भारतीयता का मूल स्वर है स्वीकार्यता। ‘सहिष्णुता’ ‘Tolerance’ से तो अहम् व्यक्त होता है। ‘सहिष्णुता’ शब्द से स्वर आता है कि “तुम मुझे पसंद नहीं किंतु फिर भी तुम यहाँ रह लो”। Acceptance और Respect का अर्थ है, सभी समुदाय को स्वीकारता हूँ और उनका सम्मान करता हूँ। सरसंघचालक के न्यूयार्क प्रवास के विषय में जोहरान ममदानी तो मध्ययुगीन मुस्लिम सिद्ध हो गए हैं। जोहरान ममदानी ने अप्रासंगिक बातें करके न्यूयार्क के मेयर पद की गरिमा को ही ध्वस्त कर दिया। ममदानी को पता ही नहीं कि भारत का दृष्टिकोण “Pluralistic” और “Secular republic” से बहुत आगे बढ़कर “वयं राष्ट्रे जागृयाम” का है। जिस प्रकार के शब्द ममदानी ने कहे हैं, उससे तो लगता है वे अपनी दिमागी हालत की चिंता करें, भारत की नहीं। यदि ममदानी के मूल्य लोकतांत्रिक नहीं हैं। वे इस कार्यक्रम के निजी स्थान, सार्वजनिक स्थान, कार्यक्रम रोकने जैसे शब्दों को प्रयोग करके ‘फासिस्ट’ और ‘मध्ययुगीन मुस्लिम’ सिद्ध हो गए हैं। जोहरान ममदानी ने अमेरिका के नागरिक और न्यूयार्क के मेयर की गरिमा के विरुद्ध जाकर यह व्यक्त किया कि यदि उनके पास अधिकार होते तो वे संघ प्रमुख को न्यूयार्क में भाषण ही नहीं देने देते। इससे अधिक शर्मनाक और वैचारिक निर्धनता भला और क्या हो सकती है। सरसंघचालक जी के भाषण के पूर्व ही “Exclusionary” जैसे शब्दों का प्रयोग करने वाले ममदानी इस भाषण के बाद अब वैचारिक रूप से कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रह गए हैं। न्यूयॉर्क के मेयर से नहीं किंतु ममदानी के घर जाकर आज उनसे प्रश्न किया जाना चाहिए कि वे अमेरिकी लोकतांत्रिक विचारों से इतने भिन्न क्यों हैं? और यदि वे न्यूयार्क नगर की सभ्यता, संस्कृति और सहजता को आत्मसात नहीं कर पा रहें हैं तो वे मेयर पद पर टिके ही क्यों हैं? जोहरान ममदानी ने तो न्यूयार्क में “Free Speech” के अधिकार पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया है। भागवत जी के न्यूयॉर्क भाषण ने हिंदुत्व, हिंदू संस्कृति, भारतीय सभ्यता, भारतीय सर्वसमावेशिकता, सर्व स्पर्शिता को बड़ी सहजता से स्थापित किया है। यद्यपि यह पहले भी स्थापित ही थी किंतु अब इसे एक नया आयाम मिल गया है। भारत के संदर्भ में अमेरिका में एक नए विमर्श का आरम्भ है, भागवत जी का यह वैचारिक प्रबोधन। “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति”, “वसुधैव कुटुम्बकम्” और विविधता में एकता की परंपरा को मैडिसन स्क्वेयर से पुनर्परिभाषित करने हेतु मोहन राव जी का अभिनंदन कर रहा है ‘अमेरिकी भारतीय’ समुदाय। अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करने का अर्थ दूसरे की पहचान से घृणा करना नहीं है, यह सिद्ध करने हेतु भी वे अभिनन्दनीय हैं। अमेरिका कहावत “E Pluribus Unum”, अर्थात् ‘अनेक से एक’, को स्थापित करता और भारतीयता के मूल से जोड़ता यह संघ संवाद एक अद्भुत सार्थकता, स्वीकार्यता, सहजता व सामुदायिकता के भाव को जन्म देता है। कहना ही होगा कि यदि शिकागो से अमेरिका और समूचे विश्व को स्वामी विवेकानंद जी ने एक वैचारिक माला दी थी तो मोहन राव जी भागवत ने इस ‘विवेकानंद माला’ का पुनर्जाप ही किया है। - डॉ. प्रवीण दाताराम

प्रभासाक्षी 1 Sep 2026 5:56 pm

सपाट बंद हुआ शेयर बाजार, आईटी शेयरों में दिखी खरीदी

मुंबई, भारतीय शेयर बाजार मंगलवार के कारोबारी सत्र में करीब सपाट बंद हुआ। दिन के अंत में सेंसेक्स 12.99 अंक या 0.02 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 76,944.28 और निफ्टी 24.60 अंक या 0.10 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 24,055.80 पर था।

देशबन्धु 1 Sep 2026 5:14 pm

मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा: भारतीय चिंतन की सार्थक प्रस्तुति

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत की अगस्त 2026 की अमेरिका यात्रा को केवल प्रवासी भारतीयों के एक कार्यक्रम तक सीमित करके देखना उसके व्यापक अर्थ को छोटा करना होगा। न्यूयार्क में 29 अगस्त को आयोजित ‘एक विश्व, एक मानवता’ कार्यक्रम में उनका संबोधन ऐसे समय हुआ, जब संघ को लेकर भारत ही नहीं, विदेशों में भी अनेक धारणाएं, आरोप और पूर्वाग्रह सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बने हुए हैं। ऐसे वातावरण में भागवत ने जिस प्रकार विविधता, संवाद, सेवा, सह-अस्तित्व और मानवीय एकात्मता को केंद्र में रखा, उसने संघ की विचारधारा को उसके समर्थकों के लिए ही नहीं, बल्कि वैश्विक समाज के सामने भी एक अलग दृष्टि से प्रस्तुत किया। यह यात्रा इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि संघ अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है और उसके विचार अब भारत की सीमाओं से बाहर भी व्यापक चर्चा का विषय बन रहे हैं। भागवत का अमेरिका जाना वस्तुतः संघ के विचार को प्रत्यक्ष संवाद के माध्यम से समझाने का अवसर बना। संघ के बारे में भारत में लंबे समय से दो विपरीत धारणाएं दिखाई देती रही हैं। एक पक्ष उसे भारतीय संस्कृति, राष्ट्रभावना, सेवा और सामाजिक संगठन की विराट शक्ति मानता है, जबकि दूसरा पक्ष उसके विचारों को संकीर्ण धार्मिक राजनीति से जोड़कर देखता है। कांग्रेस सहित विभिन्न विपक्षी दलों ने समय-समय पर संघ और उसके विचारों पर गंभीर राजनीतिक प्रश्न उठाए हैं। अमेरिका में भी कार्यक्रम से पहले कुछ संगठनों और राजनीतिक व्यक्तियों ने भागवत की यात्रा और संघ की विचारधारा पर आपत्तियां व्यक्त कीं। ऐसे माहौल में किसी संस्था की वास्तविक छवि केवल आरोप-प्रत्यारोप से नहीं बनती, वह संवाद से बनती है। यही इस यात्रा का सबसे बड़ा महत्व है। भागवत ने अपने विचार विरोधियों पर आक्रमण करके नहीं, बल्कि भारतीय चिंतन की व्याख्या करके सामने रखे। इससे संघ को लेकर बनी धारणाओं पर बहस का एक नया आधार तैयार हुआ। न्यूयार्क में भागवत के वक्तव्य का सबसे अधिक चर्चित पक्ष उनका हिंदू-मुस्लिम संबंधों पर स्पष्ट कथन रहा। उन्होंने कहा कि यदि कोई हिंदू यह मानता है कि भारत में मुसलमानों के लिए स्थान नहीं होना चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रह सकता। यह कथन राजनीतिक नारे से अधिक महत्वपूर्ण इसलिए है कि इसमें हिंदुत्व की उनकी व्याख्या को सामाजिक समावेश के साथ जोड़ा गया है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि सत्य एक है और उसे समझने तथा व्यक्त करने के मार्ग अलग-अलग हो सकते हैं। भारतीय परंपरा की यही विशेषता है कि वह मतभिन्नता को अस्तित्व के संकट के रूप में नहीं, बल्कि सत्य की विविध अभिव्यक्तियों के रूप में देखने की क्षमता रखती है। यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है-यदि हिंदुत्व का अर्थ भारत की सांस्कृतिक चेतना है, तो क्या वह किसी समुदाय को भारत से बाहर कर सकता है? भागवत का उत्तर स्पष्ट रूप से नकारात्मक दिखाई देता है। उनका कथन हिंदुत्व की उस व्याख्या को सामने रखता है, जिसमें भारतीयता किसी एक पूजा-पद्धति की बपौती नहीं, बल्कि साझा सांस्कृतिक विरासत है। इसे भी पढ़ें: Prabhasakshi NewsRoom: Muslims पर Bhagwat के बयान के बाद BJP ने Rajasthan में 8 मुसलमानों को थमाए टिकट, UP में भी दिखेगा बदलाव! भागवत ने अमेरिका में भारत की विविधता को उसकी कमजोरी नहीं, शक्ति बताया। उनके अनुसार विविधता और एकता भारत के स्वभाव में ही अंतर्निहित हैं। भारत में भाषा, जाति, पंथ, पूजा-पद्धति और परंपराओं की असंख्य धाराएं हैं, फिर भी इन्हें एक साझा सभ्यतागत चेतना जोड़ती रही है। यह संदेश आज के विश्व के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। अनेक देशों में धार्मिक पहचान, नस्लीय भेद, सांस्कृतिक असहमति और राजनीतिक ध्रुवीकरण सामाजिक तनाव बढ़ा रहे हैं। ऐसे समय भारत का अनुभव यह बताता है कि भिन्नताओं को मिटाना आवश्यक नहीं, उन्हें सम्मान देकर भी एकता स्थापित की जा सकती है। यही विचार भागवत के संबोधन को सामान्य राजनीतिक भाषण से ऊपर उठाता है। उनका आग्रह था कि विविधता को स्वीकार ही नहीं, सम्मान और संरक्षण भी मिलना चाहिए। संघ की सार्वजनिक छवि का एक बड़ा हिस्सा राजनीतिक विमर्श से निर्मित हुआ है, जबकि संघ स्वयं को सामाजिक संगठन और सेवा-आधारित सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। भागवत ने अमेरिका में भी सेवा, सामाजिक समरसता और संवाद को परिवर्तन का आधार बताया। यही वह बिंदु है जहां संघ की छवि को केवल चुनावी राजनीति के चश्मे से देखने की सीमा सामने आती है। किसी संगठन को समझने के लिए उसके राजनीतिक प्रभाव के साथ उसकी सामाजिक गतिविधियों, सेवा-कार्य, संगठनात्मक संस्कृति और वैचारिक आधार को भी देखना आवश्यक है। भागवत की यात्रा ने कम से कम इतना अवसर अवश्य दिया कि संघ को उसके अपने शब्दों और उसके सरसंघचालक की प्रत्यक्ष व्याख्या के आधार पर सुना जाए। अमेरिका में बसे भारतीयों से भागवत ने एक संतुलित संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जिस देश में वे रह रहे हैं, वह उनकी कर्मभूमि है और वहां के प्रति उनकी निष्ठा तथा दायित्व सर्वोपरि हैं। साथ ही भारत उनकी जन्मभूमि है, जिससे उन्हें मानवीय मूल्यों और सांस्कृतिक संस्कारों की विरासत मिली है। यह दृष्टि प्रवासी भारतीयों के सामने पहचान के संघर्ष के बजाय पहचान के समन्वय का मार्ग रखती है। अपनी जड़ों से जुड़े रहना और जिस समाज में रह रहे हैं उसके प्रति पूर्ण निष्ठा रखना-दोनों एक साथ संभव हैं। यही भारतीय संस्कृति की उदारता है। यह भी तथ्य है कि भागवत के कार्यक्रम का अमेरिका में विरोध हुआ और संघ की विचारधारा को लेकर तीखी आलोचनाएं सामने आईं। लेकिन लोकतांत्रिक समाज में किसी विचार का उत्तर उसे दबाकर नहीं, उसके साथ संवाद करके दिया जाता है। इस दृष्टि से यह यात्रा संघ के लिए भी एक परीक्षा थी। भागवत ने विरोध का उत्तर आक्रामक भाषा में देने के बजाय एकात्मता, मानवता और सह-अस्तित्व की बात की। यही इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है। आलोचक उनके शब्दों और संघ के व्यवहार के बीच अंतर का प्रश्न उठा रहे हैं, समर्थक इसे संघ के मूल विचारों की स्पष्ट अभिव्यक्ति मान रहे हैं। इस बहस का अंतिम निर्णय समय और व्यवहार करेगा, लेकिन इतना निश्चित है कि बहस अब अधिक प्रत्यक्ष और वैश्विक हो गई है। मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा को संघ की छवि पर वर्षों से चले आ रहे विवाद का अंतिम उत्तर मानना अतिशयोक्ति होगी। किंतु इसे एक महत्वपूर्ण मोड़ अवश्य कहा जा सकता है। जिन लोगों ने संघ को केवल राजनीतिक आरोपों और विरोधी व्याख्याओं के माध्यम से जाना है, उन्हें पहली बार इतने बड़े वैश्विक मंच पर उसके शीर्ष नेतृत्व की विचार-दृष्टि को सीधे सुनने का अवसर मिला। यह यात्रा संघ के लिए एक उजाला इसलिए बनी है कि इसमें प्रतिरक्षा की भाषा कम और आत्मविश्वास की भाषा अधिक दिखाई दी। इसमें यह कहने का प्रयास था कि भारतीयता किसी के निषेध से नहीं, सबके सम्मान से मजबूत होती है, हिंदुत्व किसी समुदाय के बहिष्कार से नहीं, मानवता की एकात्म दृष्टि से सार्थक होता है और भारत की शक्ति उसकी समानता में नहीं, उसकी विविधताओं के बीच बनी रहने वाली सांस्कृतिक एकता में है। आज विश्व को केवल आर्थिक शक्ति, सैन्य शक्ति और तकनीकी प्रगति की आवश्यकता नहीं है। उसे ऐसा जीवन-दर्शन भी चाहिए जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ सके। भागवत के अमेरिकी संबोधन में भारत की इसी भूमिका की कल्पना दिखाई दी-एक ऐसा भारत जो अपनी परंपरा के बल पर विश्व को सह-अस्तित्व, संवाद और एकात्मता का रास्ता दिखा सके। मोहन भागवत की यह यात्रा इसलिए स्मरणीय रहेगी कि उसने संघ के बारे में चल रही बहस को भारत की सीमाओं से निकालकर विश्व के सार्वजनिक विमर्श में पहुंचा दिया। अब संघ की पहचान केवल उसके विरोधियों के आरोपों या समर्थकों के दावों से नहीं, बल्कि उसके विचार, उसके व्यवहार और समाज के साथ उसके संवाद से तय होगी। अंततः किसी विचारधारा की सबसे बड़ी शक्ति उसका प्रचार नहीं, उसका आचरण होता है। अमेरिका की धरती से भागवत ने जो संदेश दिया है, उसकी वास्तविक कसौटी भारत की धरती पर सामाजिक समरसता, सेवा, संवाद और सह-अस्तित्व के रूप में दिखाई देगी। यदि यह संदेश व्यवहार में उतरता है, तो यह केवल संघ की छवि को नहीं, भारत की वैश्विक सांस्कृतिक प्रतिष्ठा को भी नई ऊंचाई दे सकता है। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

प्रभासाक्षी 1 Sep 2026 4:33 pm

वित्तीय वर्ष 2026-27 की प्रथम तिमाही में आर्थिक विकास दर ने चौंकाया

दिनांक 31 अगस्त 2026 को सायंकाल में केंद्र सरकार ने भारत के वित्तीय वर्ष 2026-27 की प्रथम तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर के आंकड़े जारी किए हैं। विश्व बैंक एवं अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष सहित अन्य वैश्विक संस्थानों, एसोचेम, भारतीय रिजर्व बैंक आदि के अनुमानों को धत्ता बताते हुए अप्रेल-जून 2026 की तिमाही में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है। जबकि, उक्त संस्थानों ने उक्त अवधि में 6.5 प्रतिशत से 7 प्रतिशत के बीच की वृद्धि दर का अनुमान लगाया था। उक्त वृद्धि दर वैश्विक स्तर पर विभिन्न प्रकार की आर्थिक समस्याओं के बीच हासिल हुई है, इसलिए भारत के लिए यह एक मील का पत्थर साबित होगी। रूस-यूक्रेन युद्ध तो बहुत लम्बे समय से चल रहा है, ईरान-अमेरिका/इजराईल युद्ध भी इस तिमाही में जारी रहा, जिसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि देखने को मिली थी। एक समय तो कच्चे तेल की कीमतें 120 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गई थीं। ज्ञातव्य हो कि भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। ईरान द्वारा स्ट्रेट ओफ होर्मुज को बंद करने के पश्चात इस मार्ग से गुजरने वाले तेल के जहाजों को रोक दिया गया था एवं कच्चे तेल की आपूर्ति पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ा था। परंतु, भारत ने इस दयनीय स्थिति को बहुत ही सूझ बूझ के साथ सम्भाला और अन्य कई देशों से तेल एवं गैस का आयात जारी रखा, जिससे भारत में न तो तेल की आपूर्ति कम हुई और न ही भारत में पेट्रोल एवं डीजल की कीमतों में भारी वृद्धि हुई। जबकि अन्य कई देशों में तो पेट्रोल एवं डीजल की कीमतों में 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज हुई है। भारत के युवाओं (जेन-जी) को इस बात को समझना होगा कि भारत आज आर्थिक विकास के जिस दौर से गुजर रहा है, वह बहुत ही संवेदनशील है। यदि देश में किसी भी प्रकार की अराजकता फैलायी जाती है तो आर्थिक विकास की पटरी से भारत डीरेल हो सकता है। आगे आने वाले 10 वर्षों तक भारत यदि विकास दर की इसी ट्रेजेक्टरी में अपने आप को बनाए रखने में सफल होता है तो भारत के वर्ष 1947 में विकसित राष्ट्र बनने के सपने को साकार होने से कोई रोक नहीं सकता है। अर्थ के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में अप्रेल-जून 2026 तिमाही में सराहनीय वृद्धि दर हासिल की गई है। सकल मूल्य संवर्धन में वृद्धि दर 8.2 प्रतिशत की रही है जो अप्रेल-जून 2025 की तिमाही में 7 प्रतिशत की रही थी। विनिर्माण के क्षेत्र में वृद्धि दर पिछले वर्ष की तिमाही में 8.3 प्रतिशत की रही थी जो इस वर्ष की तिमाही में बढ़कर 9.2 प्रतिशत की हो गई है। इसी प्रकार सेवा के क्षेत्र में भी आर्थिक विकास दर इस वर्ष की प्रथम तिमाही में बढ़कर 10 प्रतिशत पर पहुंच गई जो पिछले वर्ष इसी अवधि में 8 प्रतिशत रही थी। भारत की अर्थव्यवस्था उपभोग आधारित है, अतः निजी उपभोग में इस वर्ष की तिमाही में 7.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है जो पिछले वर्ष इसी अवधि में 6.8 प्रतिशत रही थी। सकल स्थिर पूंजी निर्माण में भी अतुलनीय 11.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है जो पिछले वर्ष की इसी अवधि में केवल 5.8 प्रतिशत की रही थी। इसी प्रकार, रोजगार निर्मित करने वाले क्षेत्रों में भी विकास दर प्रभावशाली रही है। वित्तीय क्षेत्र में वृद्धि दर 12.1 प्रतिशत की दर्ज हुई है तो व्यापार, होटल, यातायात एवं संचार के क्षेत्र में 8.5 प्रतिशत की विकास दर हासिल की गई है। साथ ही गैस एवं विजली उत्पादन में भी वृद्धि दर 8.9 प्रतिशत की रही है। इसे भी पढ़ें: UPA के 'Fragile Five' से 7.8% GDP ग्रोथ तक: Ravi Shankar Prasad ने PM Modi के आर्थिक प्रबंधन को सराहा वित्तीय वर्ष 2026-27 की प्रथम तिमाही में सराहनीय विकास दर हासिल करने को केंद्र सरकार की योजनाओं की सफलता के रूप में भी देखा जा सकता है। केंद्र सरकार ने मेक इन इंडिया नामक योजना को तेजी से आगे बढ़ाया है और इसने भारत को कई क्षेत्रों में आत्म निर्भर बनाने का कार्य सफलतापूर्वक किया है। विशेष रूप से सूचना प्रौद्योगिकी, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट, डिजिटल भुगतान, फिन टेक, इंजिनीयरिंग डिजाइन, व्यापार परामर्श, वैश्विक ग्लोबल योग्यता सेंटर, आदि क्षेत्रों में भारत आज पूरे विश्व में लीड कर रहा है। मेक इन इंडिया योजना ने भारतीय नागरिकों में जोश भरा और भारत की प्रतिभा का डंका पूरे विश्व में बज गया है। दूसरे, भारत में उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना को भी लागू किया गया। इस योजना ने भारत को उपभोक्ता बाजार से निकालकर मजबूत वैश्विक विनिर्माण हब में बदल दिया है। उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना के अंतर्गत 14 प्रमुख क्षेत्रों में करीब 2.3 लाख करोड़ रुपए का निवेश हुआ है, 16.5 लाख करोड़ रुपए से अधिक का कुल उत्पादन हुआ है एवं 12 लाख से अधिक रोजगार के नए अवसर निर्मित हुए। इसके उपरांत प्रारम्भ हुई प्रधानमंत्री गति शक्ति योजना के अंतर्गत सड़क, रेल, बंदरगाह, एयरपोर्ट और लाजिस्टिक को पहली बार इंटीग्रेटेड तरीके से जोड़ने की कोशिश की गई। समर्पित मालवाहक गलियारों का निर्माण तो इस दृष्टि से मील का पत्थर साबित हुए हैं। नए एक्स्प्रेस वे ने माल ढुलाई का समय घटाया। लागत को कम किया और भारतीय उत्पादों को वैश्विक बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बनाया। 86,300 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निर्यात इस सफलता की कहानी को दर्शाता है। निर्यात में अतुलनीय वृद्धि दर उस समय पर हासिल की गई है जब अमेरिका की टैरिफ नीति ने पूरे विश्व को परेशान किया हुआ है। साथ ही, रूस यूक्रेन युद्ध, ईरान इजराईल-अमेरिका युद्ध, इजराईल हमास युद्ध एवं वैश्विक स्तर पर अस्थिरता का बने रहना भी शामिल है। इन परिस्थितियों के बीच भारत ने उत्पादों एवं सेवा के क्षेत्र में निर्यात का रिकार्ड बनाया है। जबकि कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं में सुस्ती बनी हुई है। भारत के कुल निर्यात में सेवा क्षेत्र की कुल हिस्सेदारी तेजी से बढ़ रही है। यदि भारत को चीन जैसी विनिर्माण क्षेत्र की ताकत बनाना है तो भारत को हाई वैल्यू मैन्युफेक्चरिंग, सेमीकंडक्टर, मशीनरी, और सूक्षम, लघु एवं मध्यम उद्योग के क्षेत्र को और अधिक मजबूत करना होगा। घरेलू उत्पाद बढ़ाकर न केवल उत्पादों के आयात को कम किये जाने का प्रयास किया जा रहा है बल्कि वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेसरी भी बढ़ाई जा रही है। भारत में हाल ही में आई मोबाइल एवं इलेक्ट्रॉनिक क्रांति का भी इसमें बहुत बड़ा योगदान है। वर्ष 2014 में भारत में केवल 2 मोबाइल उत्पादन इकाईयां कार्यरत थीं। आज भारत मोबाइल निर्माण के क्षेत्र में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा निर्माता देश बन गया है। ऐपल की फ्लेगशिप कम्पनी अब मैन्युफेक्चरिंग इन इंडिया की ओर आगे बढ़ रही हैं। इलेक्ट्रॉनिक उत्पादन 2014-15 के 1.9 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 2025-26 में 13.11 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। रक्षा के क्षेत्र में भी उत्पादन एवं निर्यात तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है। रक्षा के क्षेत्र में भारत अपनी छोटी मोटी जरूरतों के लिए अन्य देशों की ओर देखता था आज वह फिलिपींस को ब्रह्मोस मिसाईल का निर्यात कर रहा है। कई अफ्रीकी देशों को मेड इन इंडिया हेलिकोप्टर निर्यात कर रहा है। अब देश की कुल जरूरत का लगभा 65 प्रतिशत रक्षा उत्पाद देश में ही निर्मित हो रहा हैं। जो रक्षा उत्पादन वर्ष 2014-15 में 46,429 करोड़ रुपए का था वह 2025-26 में बढ़कर 1.78 लाख करोड़ रुपए के रिकार्ड स्तर पर पहुंच चुका है। रक्षा निर्यात 38,424 करोड़ रुपए के उच्चत्तम स्तर पर पहुंच चुका है। आज रक्षा के क्षेत्र में विभिन्न उत्पादों का निर्यात 100 से अधिक देशों को किया जा रहा है। ऑटोमोबाइल के क्षेत्र में उत्पादन में अतुलनीय वृद्धि दर्ज हुई है एवं फार्मा क्षेत्र में तो भारत को फार्मेसी आफ द वर्ल्ड कहा जा रहा है। भारत की एक्स्पोर्ट बास्केट भी बढ़ रही है - पेट्रोलीयम उत्पाद, इंजिनीयरिंग उत्पाद, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा, ऑटोमोबाइल, टेक्स्टायल जैसे कई क्षेत्रों में विकास दर तेजी से बढ़ रही है। भारत किसी एक सेक्टर पर निर्भर नहीं है। कई क्षेत्रों में एक साथ आगे बढ़ रहा है। दुनिया की सप्लाई चैन में भारत की नई भूमिका तय हो रही है। भारत एक लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का निर्यात करने की ओर आगे बढ़ रहा है। - प्रहलाद सबनानी सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक, भारतीय स्टेट बैंक के-8, चेतकपुरी कालोनी, झांसी रोड, लश्कर, ग्वालियर - 474 009

प्रभासाक्षी 1 Sep 2026 4:23 pm

तेलंगाना भाजपा अध्यक्ष रामचंदर राव हैदराबाद में गिरफ्तार, नलगोंडा जाने से रोका

तेलंगाना भाजपा अध्यक्ष रामचंदर राव हैदराबाद में गिरफ्तार, नलगोंडा जाने से रोका

समाचार नामा 1 Sep 2026 3:24 pm

सीएम भूपेंद्र पटेल ने 7.8 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ की तारीफ की, पीएम मोदी ने 'स्वदेशी' को बढ़ावा देने पर दिया जोर

सीएम भूपेंद्र पटेल ने 7.8 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ की तारीफ की, पीएम मोदी ने 'स्वदेशी' को बढ़ावा देने पर दिया जोर

समाचार नामा 1 Sep 2026 2:38 pm

भारत- जीएसटी संग्रह अगस्त में बढ़कर 2 लाख करोड़ रुपए रहा

नई दिल्ली, भारत का सकल वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह अगस्त 2026 में सालाना आधार पर 14.8 प्रतिशत बढ़कर 1,99,853 करोड़ रुपए हो गया है, जो कि पिछले साल समान अवधि में 1,74,116 करोड़ रुपए था। यह जानकारी मंगलवार को जारी किए गए सरकारी डेटा में दी गई।

देशबन्धु 1 Sep 2026 2:38 pm

Jan Gan Man: Manusmriti को पढ़े बिना ही उसके पीछे क्यों पड़ गये हैं Rahul Gandhi? हर मुद्दे में जाति का कोण क्यों ढूँढ़ने लगी है Congress?

कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार ऐसे मुद्दों को उठा रहे हैं, जिनके जरिए वह दलितों, पिछड़ों, महिलाओं और युवाओं के बीच एक नया सामाजिक गठजोड़ तैयार करना चाहते हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या देश को आगे ले जाने की राजनीति अतीत के विवादों को लगातार कुरेदकर होगी, या भविष्य के भारत की चुनौतियों का समाधान खोजकर? राहुल गांधी के हालिया बयानों और राजनीतिक गतिविधियों से यह संकेत मिलता है कि कांग्रेस अब एक नए सामाजिक समीकरण पर काम कर रही है। उनकी राजनीति का निशाना दलित, ओबीसी, महिलाएं, जेन-जी और अल्पसंख्यक हैं। पुणे के कार्यक्रम में महिलाओं के अधिकारों पर बात करते हुए राहुल गांधी ने पितृसत्ता को चुनौती देने की बात की और आरएसएस तथा भाजपा पर “मनुस्मृति की मानसिकता” रखने का आरोप लगाया। इसे भी पढ़ें: PM Modi Instagram New Reel | 'झूठ की गूंज' 7.8% की इकोनॉमिक ग्रोथ को नहीं छिपा सकती, इंस्टाग्राम पर PM मोदी का राहुल गांधी पर तंज देखा जाये तो महिलाओं की सुरक्षा, शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता और निर्णय लेने की क्षमता जैसे मुद्दे निस्संदेह महत्वपूर्ण हैं। इन पर जितनी गंभीर चर्चा हो, उतना बेहतर है। लेकिन सवाल यह है कि महिलाओं के आधुनिक अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए क्या हर बार हजारों वर्ष पुराने ग्रंथों को राजनीतिक कठघरे में खड़ा करना आवश्यक है? राहुल गांधी ने पुणे में महिलाओं से संवाद किया। उन्होंने महिलाओं की सुरक्षा, शिक्षा, आर्थिक कठिनाइयों और स्वतंत्र निर्णय लेने की समस्याओं को सुना। यह लोकतांत्रिक राजनीति का स्वाभाविक और स्वागतयोग्य हिस्सा है। लेकिन इसी विमर्श में मनुस्मृति को प्रमुख राजनीतिक हथियार बनाना एक अलग राजनीतिक संदेश देता है। साथ ही ऐसा लगता है कि राहुल गांधी मनुस्मृति का मुद्दा उठाकर दलित समाज तक भी पहुंच बनाना चाहते हैं। इसका ऐतिहासिक कारण भी है। 1927 में डॉ. बीआर आंबेडकर ने मनुस्मृति का दहन किया था और जातिगत भेदभाव तथा असमानता के विरुद्ध संघर्ष को एक मजबूत वैचारिक आधार दिया था। राहुल गांधी संभवतः इसी ऐतिहासिक स्मृति और वर्तमान के कथित असंतोष को एक साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। यानी महिला अधिकारों का मुद्दा, दलित अस्मिता का प्रश्न और जातिगत न्याय की राजनीति, तीनों को एक साझा राजनीतिक नैरेटिव में पिरोने का प्रयास हो रहा है। लेकिन यहां राहुल गांधी की राजनीति पर गंभीर सवाल उठता है। क्या हर सामाजिक समस्या का समाधान जाति के चश्मे से ही खोजा जाएगा? भारत आज 21वीं सदी की तीसरे दशक में है। देश कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष तकनीक, डिजिटल अर्थव्यवस्था, आधुनिक शिक्षा, रोजगार, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे समय में राजनीति का मुख्य प्रश्न यह होना चाहिए कि भारत अगले 25 वर्षों में दुनिया की अग्रणी शक्ति कैसे बनेगा? लेकिन राहुल गांधी की राजनीति बार-बार समाज को उसके पुराने जातीय खांचों में वापस ले जाती दिखाई देती है। ऐसे में कानूनविद और भारत के विधि आयोग के पूर्व सदस्य तहिर महमूद की टिप्पणी महत्वपूर्ण हो जाती है। महमूद का कहना है कि मनुस्मृति जैसे प्राचीन ग्रंथों को उनके ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए। केवल औपनिवेशिक काल में किए गए अंग्रेजी अनुवादों के आधार पर उनकी अंतिम व्याख्या कर देना उचित नहीं है। हम आपको बता दें कि महिलाओं के संबंध में मनुस्मृति के उस प्रसिद्ध श्लोक को अक्सर उद्धृत किया जाता है, जिसमें बचपन में पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र द्वारा महिला की “रक्षा” की बात कही गई है। आधुनिक दृष्टि से यह व्यवस्था निश्चित रूप से महिलाओं की पूर्ण व्यक्तिगत स्वतंत्रता के विचार से मेल नहीं खाती। लेकिन तहिर महमूद का तर्क है कि इसमें प्रयुक्त संस्कृत शब्दों और उनके अनुवाद को लेकर गंभीर मतभेद हैं। उनके अनुसार, “रक्षा” का अर्थ केवल नियंत्रण नहीं, बल्कि सुरक्षा और संरक्षण भी हो सकता है। दरअसल, औपनिवेशिक दौर के कुछ शाब्दिक अनुवादों ने यह धारणा मजबूत की कि मनुस्मृति महिलाओं को स्वतंत्रता के योग्य ही नहीं मानती। महमूद का तर्क है कि इसे दूसरे दृष्टिकोण से भी समझा जा सकता है कि महिला को जीवन के किसी भी चरण में असुरक्षित या बेसहारा नहीं छोड़ा जाना चाहिए। इस व्याख्या से सहमत होना या असहमत होना अलग बात है, लेकिन एक तथ्य महत्वपूर्ण है कि प्राचीन संस्कृत ग्रंथों की व्याख्या कोई टीवी डिबेट की तात्कालिक राजनीतिक बहस नहीं है। यह भाषा, इतिहास, समाज और विधि की गंभीर विशेषज्ञता का विषय है। किसी एक श्लोक को संदर्भ से काटकर पूरे ग्रंथ का अंतिम फैसला सुना देना बौद्धिक दृष्टि से भी उचित नहीं है। हम आपको बता दें कि तहिर महमूद ने एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है। उनके अनुसार, मनुस्मृति और अन्य धर्मशास्त्रों को सामान्य रूप से “हिंदू कानून” कहना भी काफी हद तक ब्रिटिश शासनकाल की वर्गीकरण पद्धति का परिणाम है। जिस दौर में ये ग्रंथ लिखे गए, उस समय आज जैसी आधुनिक धार्मिक पहचान और कानूनी व्यवस्था मौजूद नहीं थी। महमूद का तर्क है कि जिस प्रकार रोमन कानून को केवल “ईसाई कानून” नहीं कहा जाता, उसी तरह प्राचीन भारतीय कानूनी और सामाजिक ग्रंथों को भी केवल आधुनिक धार्मिक पहचान के संकीर्ण दायरे में नहीं बांधा जाना चाहिए। यह दृष्टिकोण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि औपनिवेशिक शासन ने भारत को समझने के लिए कई कठोर श्रेणियां बनाई थीं। अंग्रेजों ने हिंदू, मुस्लिम, जाति, कानून और समुदाय की ऐसी परिभाषाएं बनाईं, जिन्हें बाद में भारतीय राजनीति ने भी अपना लिया। विडंबना यह है कि आज भी कई राजनीतिक बहसें उन्हीं औपनिवेशिक व्याख्याओं के आधार पर चल रही हैं। यहां कोई भ्रम नहीं होना चाहिए कि भारत, भारतीय संविधान से चलता है। संविधान सर्वोपरि है। समानता, स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और महिलाओं के अधिकार आधुनिक भारत की मूल संवैधानिक प्रतिबद्धताएं हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि संविधान की सर्वोच्चता सिद्ध करने के लिए भारत के हर प्राचीन ग्रंथ और पूरी ऐतिहासिक विरासत को राजनीतिक खलनायक बना दिया जाए। प्राचीन ग्रंथों में ऐसी अनेक बातें हो सकती हैं जो आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं हैं। उन्हें आधुनिक कानून नहीं बनाया जा सकता और न ही बनाया जाना चाहिए। समाज बदलता है, कानून बदलते हैं और मूल्यों की व्याख्या भी बदलती है। लेकिन किसी प्राचीन ग्रंथ की आलोचना और उस ग्रंथ को राजनीतिक हथियार बनाकर वर्तमान समाज में विभाजन पैदा करने में अंतर है। देखा जाये तो राहुल गांधी की सबसे बड़ी राजनीतिक समस्या शायद यही है कि वह हर महत्वपूर्ण प्रश्न में जातिगत कोण खोजने लगते हैं। जाति जनगणना हो, आरक्षण हो, दलित प्रतिनिधित्व हो या अब मनुस्मृति, उनकी राजनीति का केंद्रीय संदेश लगभग एक ही है कि भारत की हर समस्या का मूल जाति व्यवस्था में खोजिए। इसमें कोई दो राय नहीं कि जातिगत भेदभाव भारत की एक वास्तविक और गंभीर सामाजिक समस्या रही है और जहां भी भेदभाव है, उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन जातिगत अन्याय को समाप्त करने का रास्ता क्या जाति की राजनीतिक पहचान को लगातार और मजबूत करना है? राहुल गांधी को यह समझना होगा कि पुराने घावों की चर्चा और इतिहास की आलोचना जरूरी हो सकती है, लेकिन देश का भविष्य केवल अतीत के मुकदमे लड़कर नहीं बनाया जा सकता। मनुस्मृति पर बहस हो सकती है। उसके विवादित प्रावधानों की आलोचना भी हो सकती है। लेकिन उसकी व्याख्या इतिहास, भाषा और सामाजिक संदर्भ की गंभीर समझ के साथ होनी चाहिए, न कि हर चुनावी मौसम में उसे जातीय और धार्मिक ध्रुवीकरण के राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाए। भारत का संविधान सर्वोपरि है। लेकिन संविधान की भावना यही भी है कि देश समानता और आधुनिकता की ओर बढ़े, न कि लगातार जातियों और ऐतिहासिक विवादों के बीच उलझा रहे। देश को आगे बढ़ाने के लिए पुराने सामाजिक बंधनों से मुक्त होना होगा। सवाल यह है कि राहुल गांधी भारत को उस दिशा में ले जाना चाहते हैं या फिर हर मुद्दे में जाति, मनुस्मृति और अतीत का कोण खोजकर देश को उसी राजनीतिक बहस में उलझाए रखना चाहते हैं। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 1 Sep 2026 12:57 pm

FSSAI की सख्त कार्रवाई के बाद Zomato का बड़ा कदम: 'एनालॉग डेयरी' उत्पादों से बने खान-पान की बिक्री पर लगाई रोक

फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म जोमैटो ने सोमवार को कहा कि उसने अपने प्लेटफॉर्म पर लिस्टेड रेस्टोरेंट द्वारा एनालॉग डेयरी उत्पादों से बनी डिश बेचने के मामले में 'जीरो-टॉलरेंस' पॉलिसी अपनाई है और ऐसे सभी खाद्य पदार्थों को प्लेटफॉर्म से हटा दिया है।

देशबन्धु 1 Sep 2026 12:31 pm

भारत की जीडीपी ग्रोथ पर एनडीए नेता बोले- 'मोदी सरकार जो कहती है, वो करके दिखाती है'

भारत की जीडीपी ग्रोथ पर एनडीए नेता बोले- 'मोदी सरकार जो कहती है, वो करके दिखाती है'

समाचार नामा 1 Sep 2026 12:25 pm

राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर को प्रियांक खड़गे ने बताया राजनीति से प्रेरित, भाजपा ने किया पलटवार

राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर को प्रियांक खड़गे ने बताया राजनीति से प्रेरित, भाजपा ने किया पलटवार

समाचार नामा 1 Sep 2026 12:21 pm

Mecca Defence Alliance की पहली बैठक में हुए बड़े फैसले, Pakistan को मिली अहम जिम्मेदारी, भारत पर इसका क्या होगा असर?

मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के तहत गठित स्ट्रैटेजिक पॉलिटिकल एंड डिफेंस कमेटी की पहली बैठक ने पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब के उभरते सुरक्षा समीकरण को नया और अधिक संगठित रूप दे दिया है। इस्तांबुल में हुई इस अहम बैठक में केवल रक्षा सहयोग बढ़ाने की बात नहीं हुई, बल्कि ‘मक्का डिफेंस अलायंस’ को संस्थागत ढांचा देने, सऊदी अरब में स्थायी सचिवालय स्थापित करने और उसके शुरुआती तीन वर्षों के नेतृत्व की जिम्मेदारी पाकिस्तान को सौंपने जैसे बड़े फैसले लिए गए। यही वह मोड़ है, जहां अब यह समझौता महज एक राजनीतिक घोषणा से आगे बढ़कर संभावित क्षेत्रीय सुरक्षा संरचना का रूप लेता दिखाई दे रहा है। हम आपको याद दिला दें कि 7 अगस्त को तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगान, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सऊदी क्राउन प्रिंस एवं प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन सलमान ने मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसकी सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्था यह है कि तीनों में से किसी एक देश पर सशस्त्र हमला तीनों के खिलाफ हमला माना जाएगा। तुर्किये के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने इसकी तुलना नाटो के अनुच्छेद-5 जैसी सामूहिक रक्षा अवधारणा से की है, हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि यह गठबंधन किसी विशेष देश के खिलाफ नहीं है और मौजूदा अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का स्थान भी नहीं लेगा। इसे भी पढ़ें: Uzbekistan ने क्या India को धोखा दे दिया? जब Modi से हाथ मिला रहे थे Mirziyoyev, उसी समय Tashkent में क्यों उतर रहे थे China के J-10 Fighter Jet? बैठक के बाद सबसे महत्वपूर्ण घोषणा यह रही कि रियाद में मक्का डिफेंस अलायंस का स्थायी सचिवालय स्थापित किया जाएगा। इस सचिवालय का नेतृत्व महासचिव करेगा और शुरुआती तीन वर्षों के लिए पहला महासचिव पाकिस्तान से होगा। यह फैसला पाकिस्तान के लिए कूटनीतिक उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है। तुर्किये के विदेश मंत्री हाकान फिदान के अनुसार, तीनों देशों ने गठबंधन के संस्थागत ढांचे की स्थापना की प्रक्रिया शुरू कर दी है। भविष्य में इसकी कार्यप्रणाली, बैठकों की व्यवस्था, राजनीतिक और सैन्य समन्वय तथा अन्य देशों की सदस्यता के नियमों पर भी रूपरेखा तैयार की जाएगी। हम आपको बता दें कि इस्तांबुल बैठक का एजेंडा बेहद व्यापक था। इसमें रक्षा क्षमताओं का विस्तार, तीनों सेनाओं के बीच इंटरऑपरेबिलिटी यानी संचालनात्मक तालमेल, संयुक्त सैन्य उत्पादन, अनुसंधान एवं विकास, तकनीकी सहयोग, लॉजिस्टिक्स, प्रशिक्षण, खुफिया साझेदारी और आतंकवाद विरोधी सहयोग जैसे मुद्दे शामिल रहे। यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि तुर्किये का रक्षा उद्योग तेजी से उभर रहा है, पाकिस्तान परमाणु हथियार संपन्न मुस्लिम देश होने के साथ रक्षा उत्पादन और सैन्य सहयोग का लंबा अनुभव रखता है, जबकि सऊदी अरब अपनी घरेलू रक्षा औद्योगिक क्षमता बढ़ाने में भारी निवेश कर रहा है। यदि यह त्रिकोण संयुक्त अनुसंधान और उत्पादन तक पहुंचता है तो इसके परिणाम केवल सैन्य अभ्यासों तक सीमित नहीं रहेंगे। देखा जाये तो यह बैठक ऐसे समय हुई जब पश्चिम एशिया और उसके आसपास का सुरक्षा वातावरण अत्यंत अस्थिर है। ईरान-अमेरिका तनाव, होरमुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा, लाल सागर में हूती हमले, समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा और गाजा शांति समझौते के दूसरे चरण से जुड़ी चुनौतियां भी चर्चा के प्रमुख विषयों में शामिल रहीं। हम आपको बता दें कि तुर्किये और पाकिस्तान को सऊदी अरब के नेतृत्व वाली लाल सागर सुरक्षा पहलों में रचनात्मक भूमिका निभाने वाले देशों के रूप में देखा जा रहा है। इससे स्पष्ट है कि गठबंधन की सोच केवल सदस्य देशों की सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि समुद्री सुरक्षा और व्यापक क्षेत्रीय संकटों तक फैल सकती है। साथ ही मक्का डिफेंस अलायंस के भविष्य का दूसरा बड़ा सवाल इसके विस्तार का है। फिलहाल मिस्र सबसे संभावित उम्मीदवार माना जा रहा है। मिस्र पहले से तुर्किये, पाकिस्तान और सऊदी अरब के साथ क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े आर-4 तंत्र का हिस्सा है और हाकान फिदान भी मिस्र की भागीदारी की इच्छा जता चुके हैं। बांग्लादेश का नाम भी संभावित भविष्य के संदर्भ में सामने आया है, हालांकि उसकी सदस्यता फिलहाल एजेंडे में नहीं दिखती। तुर्किये और पाकिस्तान सहित संस्थापक देशों की प्राथमिकता पहले तीन-सदस्यीय ढांचे को प्रभावी बनाना है। इसके बाद विस्तार का प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है। उधर, भारत के लिए इस घटनाक्रम को केवल एक और इस्लामी देशों के मंच के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब का रक्षा सहयोग यदि संस्थागत, तकनीकी और सैन्य स्तर पर गहरा होता है, तो यह दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया के बीच एक नए रणनीतिक संपर्क का निर्माण कर सकता है। पहला महत्वपूर्ण पहलू पाकिस्तान की भूमिका है। सचिवालय के शुरुआती नेतृत्व और पहले महासचिव का पद पाकिस्तान को मिलने से उसे गठबंधन की संस्थागत दिशा तय करने में प्रभाव मिल सकता है। साथ ही, तुर्किये की उन्नत रक्षा तकनीक और पाकिस्तान की सैन्य क्षमता का संयोजन भविष्य में रक्षा उत्पादन और तकनीकी सहयोग के नए रास्ते खोल सकता है। हालांकि भारत के लिए सबसे जटिल स्थिति तब बन सकती है, जब गठबंधन का विस्तार होगा। मिस्र भारत का महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है, इसलिए काहिरा की संभावित सदस्यता नई दिल्ली के लिए विशेष ध्यान का विषय होगी। दूसरी ओर, यदि भविष्य में बांग्लादेश जैसे दक्षिण एशियाई देश भी किसी व्यापक सुरक्षा ढांचे से जुड़ते हैं, तो क्षेत्रीय समीकरण और अधिक संवेदनशील हो सकते हैं। बहरहाल, इस्तांबुल की पहली बैठक ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मक्का समझौता अब केवल हस्ताक्षरित दस्तावेज नहीं रहना चाहता। रियाद में सचिवालय, पाकिस्तान का प्रारंभिक नेतृत्व, संयुक्त रक्षा उत्पादन, सैन्य तालमेल और विस्तार की संभावना, ये सभी संकेत एक नए क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे की ओर इशारा करते हैं। फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि मक्का डिफेंस अलायंस नाटो जैसी प्रभावी सैन्य संरचना बन जाएगा क्योंकि इसके वास्तविक सैन्य दायित्व और संचालनात्मक व्यवस्था अभी स्पष्ट नहीं हैं। लेकिन एक बात तय है कि पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब ने अब एक ऐसा संस्थागत मंच बनाना शुरू कर दिया है, जिसकी दिशा और विस्तार आने वाले वर्षों में पूरे क्षेत्र के रणनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 1 Sep 2026 11:30 am

बिश्केक में पीएम मोदी की 'कार डिप्लोमेसी': राष्ट्रपति पुतिन के साथ एक ही गाड़ी में किया सफर

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से बिश्केक में मुलाकात की। इस मुलाकात के दौरान दोनों नेताओं के बीच द्विपक्षीय बैठक हुई, जहां भारत-रूस संबंधों, यूक्रेन युद्ध और विश्व में शांति स्थापित करने को लेकर चर्चा हुई। इस बीच पीएम मोदी की 'कार डिप्लोमेसी' भी देखने को मिली।

देशबन्धु 1 Sep 2026 7:30 am

नीट प्रदर्शनकारियों पर दर्ज FIR रद्द करने की मांग, सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई आज

सुप्रीम कोर्ट आज उस याचिका पर सुनवाई करेगा जिसमें दिल्ली पुलिस ने नीट पेपर लीक के विरोध प्रदर्शनों में शामिल छात्रों के खिलाफ दर्ज 13 एफआईआर को रद्द करने की अनुमति मांगी है

देशबन्धु 1 Sep 2026 7:07 am

8.86 एकड़ जमीन घोटाले में हेमंत सोरेन ने हाई कोर्ट में दायर की क्रिमिनल रिवीजन याचिका, ईडी कोर्ट के आदेश को दी चुनौती

8.86 एकड़ जमीन घोटाले में हेमंत सोरेन ने हाई कोर्ट में दायर की क्रिमिनल रिवीजन याचिका, ईडी कोर्ट के आदेश को दी चुनौती

समाचार नामा 31 Aug 2026 11:56 pm

पंजाब के भूजल स्तर में बढ़ोतरी, भाखड़ा बांध पूरी तरह सुरक्षित: मंत्री बरिंदर गोयल

पंजाब के भूजल स्तर में बढ़ोतरी, भाखड़ा बांध पूरी तरह सुरक्षित: मंत्री बरिंदर गोयल

समाचार नामा 31 Aug 2026 11:33 pm

पीएम के 'मन की बात' में जिक्र के बाद चिकमगलूर में तेजी से बढ़ रही एवोकाडो की खेती

पीएम के 'मन की बात' में जिक्र के बाद चिकमगलूर में तेजी से बढ़ रही एवोकाडो की खेती

समाचार नामा 31 Aug 2026 11:30 pm

अखिलेश यादव के आरोपों पर संजय निषाद का पलटवार, 'अपराधी की कोई जाति नहीं होती'

अखिलेश यादव के आरोपों पर संजय निषाद का पलटवार, 'अपराधी की कोई जाति नहीं होती'

समाचार नामा 31 Aug 2026 11:18 pm

दिल्ली में झंडेवालान फ्लैटेड फैक्ट्री कॉम्प्लेक्स बनेगी स्मार्ट इंडस्ट्रियल हब, मंत्री मनजिंदर सिरसा ने की समीक्षा बैठक

दिल्ली में झंडेवालान फ्लैटेड फैक्ट्री कॉम्प्लेक्स बनेगी स्मार्ट इंडस्ट्रियल हब, मंत्री मनजिंदर सिरसा ने की समीक्षा बैठक

समाचार नामा 31 Aug 2026 9:44 pm

कर्नाटक के मंत्री बसवराज रायरेड्डी इस्लाम वाले बयान पर माफी क्यों मांगें: एसटी हसन

कर्नाटक के मंत्री बसवराज रायरेड्डी इस्लाम वाले बयान पर माफी क्यों मांगें: एसटी हसन

समाचार नामा 31 Aug 2026 8:17 pm

Chai Par Sameeksha: UP में किसे मिलेगा जाटों का साथ? Rahul Gandhi की 2024 वाली रणनीति!

प्रभासाक्षी की साप्ताहिक कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में इस सप्ताह हमने भाजपा की सोशल मीडिया पर सक्रियता और राहुल गांधी द्वारा लगाए गए आरोपों पर चर्चा की। साथ ही साथ उत्तर प्रदेश की जाट पॉलिटिक्स पर भी हमने प्रभासाक्षी के संपादक नीरज कुमार दुबे से सवाल पूछे। भाजपा में हुए बदलाव और सोशल मीडिया पर सक्रियता को लेकर नीरज कुमार दुबे ने कहा कि हाल में ही देखे तो दिल्ली में जो प्रोटेस्ट हुआ, अगर वह इतना कामयाब हुआ तो उसमें सोशल मीडिया का बड़ा हाथ था। यही कारण है कि भाजपा ने भी अपने सोशल मीडिया टीम में बड़े बदलाव किए हैं और उसका असर अब हमें लगातार देखने को मिल रहा है। उन्होंने कहा कि बीजेपी सोशल मीडिया के जरिए युवाओं तक अपनी पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है ताकि उन्हें बताया जा सके कि मोदी सरकार में क्या काम हुए हैं और उससे पहले क्या स्थितियां थी। नीरज दुबे ने कहा कि हाल के दिनों में देखें तो भाजपा सोशल मीडिया पर पिछड़ती हुई दिखाई दे रही थी जिसका फायदा विपक्षी दल भी खूब उठा रहे थे। लेकिन अब भाजपा ने समय को ध्यान में रखते हुए बड़े बदलाव को करने के बाद एक आक्रामक नीति अपनाने की ओर बढ़ रही है। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में सिंगर अंकित बालियान के मर्डर के बाद से जारी जाट राजनीति पर भी नीरज दुबे से सवाल पूछा। नीरज दुबे ने कहा कि अखिलेश यादव हर कीमत पर उत्तर प्रदेश चुनाव को जाति पर ले जाना चाहते हैं जबकि भाजपा इसे हिंदुत्व पर रखना चाहती हैं। इसे भी पढ़ें: 22000 करोड़ का कर्ज लिया और सिर्फ 6.5 करोड़ की वापसी? लोन माफी के आरोपों के बीच Essel Group के Subhash Chandra ने खुद खोला पूरा राज नीरज दुबे ने कहा कि यह सभी को पता है कि उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार की सबसे बड़ी कामयाबी वहां की कानून व्यवस्था है। यही कारण है कि अंकित बालियान मर्डर केस को उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था को जोड़ा जा रहा है। साथ ही साथ अखिलेश यादव जाट वोटो को साधने की कोशिश कर रही कर रहे हैं। उन्हें पता है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनका कुछ खास जनाधार नहीं है। मुसलमान वोट उनको मिल जाएंगे लेकिन जब तक मुसलमान के साथ किसी और समुदाय का वोट उन्हें ना मिले, तब तक वह कामयाब नहीं हो सकते हैं और इसीलिए वह जाट समुदाय को साधने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जयंत चौधरी जाट समुदाय के बड़े नेता है और उन पर निशाना साधकर अखिलेश यादव ने बड़ी गलती कर दी थी। शायद इस वजह से अब इस मुद्दे को वह जाट समाज से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि किसी की अगर हत्या होती है वह दुखद है और सरकार आरोपियों को हर हाल में सामने लाएगी और न्याय के कटघरे में खड़ा करेगी। राहुल गांधी के द्वारा शुद्धिकरण को लेकर लगाए जा रहे आरोपों पर नीरज दुबे ने कहा कि राहुल गांधी काफी दिनों के बाद यह मुद्दा उठा रहे हैं। सवाल यह भी है कि वह इतने दिनों तक क्या कर रहे थे। उन्होंने कहा कि आरोप लगाना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन अगर उनके आरोप में दम है तो उनके कार्यकर्ता खुद क्यों नहीं गए एफआईआर दर्ज कराने। नीरज दुबे ने कहा कि विपक्ष को फिलहाल कोई बड़ा मुद्दा नहीं मिल रहा है इसलिए वह हर मामले को जाति का रंग देना चाहती है ताकि चुनाव में फायदा हो सके। उत्तर प्रदेश उत्तराखंड में चुनाव होने हैं। इसी को लेकर राहुल गांधी 2024 वाला माहौल बना रहे हैं। लेकिन इस बार वह कामयाब होंगे इसकी संभावना बेहद कम है।

प्रभासाक्षी 31 Aug 2026 6:16 pm

बिहार के ‘सहयोग मॉडल’ से बाकि राज्यों को भी सीखने की जरूरत

क्या किसी सरकारी स्कूल या हॉस्टल में गंदा पानी, खराब खाना या बिजली की किल्लत जैसी रोजमर्रा की समस्याओं का समाधान 30 दिन के भीतर पाना संभव है?...जहां देश के अधिकांश राज्यों में छात्र ऐसी बुनियादी सुविधाओं के लिए महीनों प्रशासनिक चक्कर काटने या सड़कों पर उतरने को मजबूर होते हैं, वहीं बिहार सरकार ने एक पारदर्शी ऑनलाइन व्यवस्था से इस धारणा को बदलने की कोशिश की है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी द्वारा शुरू की गई इस नई पहल ने छात्र शिकायतों के निपटारे का एक ऐसा मॉडल पेश किया है, जिसकी गूंज अब देश भर में सुनाई दे रही है। छात्रों की शिकायतें अक्सर लंबे समय तक अनसुलझी रहती हैं, इसकी बड़ी वजह प्रशासनिक प्रक्रिया की जटिलता है। किसी छात्र को हॉस्टल की सफाई, भोजन की गुणवत्ता, बिजली-पानी या फीस से जुड़ी दिक्कत होने पर पहले वार्डन, फिर प्रिंसिपल और जरूरत पड़ने पर जिला शिक्षा कार्यालय तक जाना पड़ता है। इस प्रक्रिया में न तो कोई तय समयसीमा होती है और न ही स्पष्ट जवाबदेही तय होती है, जिस वजह से छोटी शिकायतें भी हफ्तों-महीनों तक लंबित रह जाती हैं। इसे भी पढ़ें: “मखाना: भारत के पारंपरिक उत्पाद से वैश्विक सुपरफूड बनने का स्वर्णिम सफर” बिहार सरकार के विद्यार्थी सहयोग पोर्टल की खासियत यह है कि शिकायत दर्ज कराने के लिए दो अलग कैटेगरी बनाई गई हैं — पहली, शैक्षणिक संस्थान यानी विद्यालय, महाविद्यालय या विश्वविद्यालय से संबंधित विद्यार्थियों के लिए, और दूसरी, छात्रावास यानी हॉस्टल में रहने वाले विद्यार्थियों के लिए। पोर्टल के होमपेज पर ही यह दोनों विकल्प दिए गए हैं, जिससे छात्र सही कैटेगरी चुनकर सीधे संबंधित फॉर्म तक पहुंच जाता है। कैटेगरी चुनने के बाद छात्र के सामने एक सीधा-सादा फॉर्म खुलता है, जिसमें नाम, लिंग, पिता का नाम, जन्म तिथि और मोबाइल नंबर जैसी बुनियादी जानकारी भरनी होती है। ईमेल आईडी को वैकल्पिक रखा गया है, ताकि जिन छात्रों के पास ईमेल नहीं है वे भी शिकायत दर्ज करा सकें, जबकि मोबाइल नंबर को ओटीपी से वेरिफाई किया जाता है ताकि हर शिकायत असली छात्र की ओर से ही दर्ज हो। पोर्टल पर छात्रों के लिए तीन सुविधाएं दी गई हैं। शिकायत दर्ज कराने का विकल्प हॉस्टल सुविधाओं, भोजन, स्वच्छता, सुरक्षा और बिजली से जुड़ी समस्याओं के लिए है। इसके अलावा छात्र व्यवस्था सुधारने से जुड़े अपने सुझाव भी साझा कर सकते हैं, और सबसे अहम बात यह कि एक बार शिकायत दर्ज करने के बाद छात्र उसकी मौजूदा स्थिति और उस पर हुई कार्रवाई को ट्रैक भी कर सकता है। पोर्टल पर सबसे ज्यादा दर्ज होने वाली शिकायतों को भोजन, पेयजल, बिजली, शौचालय-सफाई, सुरक्षा, बुनियादी ढांचे और इंटरनेट जैसी कैटेगरी में पहले से बांटा गया है, जिससे शिकायत सीधे संबंधित विभाग तक पहुंचती है और निपटारे में देरी नहीं होती। पोर्टल पर दर्ज हर शिकायत का 30 दिनों के भीतर निपटारा सुनिश्चित करने की व्यवस्था की गई है। समाधान के बाद संबंधित छात्र को लिखित रूप से इसकी सूचना भी दी जाती है, ताकि यह साफ रहे कि उसकी शिकायत पर वाकई कार्रवाई हुई है। जिला प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि शिकायतकर्ता छात्र-छात्राओं की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखी जाएगी, जिससे छात्र बिना किसी डर के अपनी बात रख सकें। जिन छात्रों के पास ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराने की सुविधा नहीं है, उनके लिए टोल-फ्री हेल्पलाइन नंबर 1100 भी उपलब्ध कराया गया है। पोर्टल का मकसद छात्रों की शैक्षणिक, परीक्षा, छात्रावास, छात्रवृत्ति और अन्य संस्थागत समस्याओं का पारदर्शी और जवाबदेह तरीके से समाधान करना है। सरकारी पोर्टल और हेल्पलाइन की घोषणाएं आमतौर पर होती रहती हैं, लेकिन इनमें से ज्यादातर व्यवहार में उतनी असरदार साबित नहीं होतीं। लेकिन बिहार सरकार की अब तक की कोशिशों को देखें तो ऐसा लगता है कि सरकार गंभीरता से छात्रों की समस्याओं को सुनने की ओर अग्रसर है। इस पोर्टल की खासियत है कि इसमें एक जवाबदेही तंत्र भी जोड़ा गया है — तय समयसीमा में शिकायत का समाधान न होने पर संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई का भी प्रावधान रखा गया है, जिससे यह सिर्फ कागजी व्यवस्था बनकर नहीं रह जाती। पोर्टल के साथ-साथ सरकार ने हर महीने सहयोग शिविर आयोजित करने की व्यवस्था भी बनाई है, जिनमें मंत्री, विधायक, सांसद और संबंधित अधिकारी सीधे स्कूल-कॉलेजों में जाकर छात्रों से बातचीत करेंगे। इन शिविरों में मिलने वाली शिकायतों और सुझावों को भी उसी पोर्टल पर दर्ज कर ट्रैक किया जाता है, जिससे पूरा सिस्टम एक जगह जुड़ा रहता है। यह व्यवस्था खासकर उन इलाकों में उपयोगी मानी जा रही है, जहां छात्र ऑनलाइन माध्यम के बजाय सीधी बातचीत में ज्यादा सहज महसूस करते हैं। जिन राज्यों में छात्र आंदोलन और कैंपस में असंतोष की घटनाएं सामने आती रही हैं, उनके लिए बिहार का यह मॉडल कुछ स्पष्ट संकेत देता है। शिकायत निवारण तंत्र तभी प्रभावी होता है जब उसमें तय समयसीमा और जवाबदेही दोनों शामिल हों। शिकायत और छात्रावास की समस्याओं को अलग-अलग कैटेगरी में बांटने और फॉर्म को आसान रखने से समाधान की रफ्तार तेज होती है, जबकि स्टेटस ट्रैक करने की सुविधा से छात्रों को भरोसा रहता है कि उनकी बात पर वाकई काम हो रहा है। साथ ही, सिर्फ डिजिटल पोर्टल पर निर्भर रहने के बजाय हेल्पलाइन और जमीनी शिविर जैसे विकल्प भी जरूरी हैं, ताकि हर वर्ग का छात्र इस व्यवस्था से जुड़ सके। शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए बड़ी घोषणाओं के साथ-साथ जमीनी क्रियान्वयन भी उतना ही जरूरी है। बिहार का अनुभव यह दिखाता है कि अगर शिकायत निवारण तंत्र में पारदर्शिता, आसान प्रोसेस और जवाबदेही तय की जाए, तो नतीजे भी सामने आते हैं। अब देखना यह होगा कि अन्य राज्य इस मॉडल से कितना सीखते हैं और अपने यहां इसे किस रूप में लागू करते हैं। - संजीव कुमार मिश्र

प्रभासाक्षी 31 Aug 2026 6:02 pm

“मखाना: भारत के पारंपरिक उत्पाद से वैश्विक सुपरफूड बनने का स्वर्णिम सफर”

भारत में सदियों से व्रत-त्योहारों और पारंपरिक खान-पान का हिस्सा रहा मखाना अब महज एक साधारण खाद्य पदार्थ नहीं रह गया है, बल्कि यह दुनिया भर में स्वास्थ्य और पोषण के प्रति जागरूक लोगों की पहली पसंद बनकर एक वैश्विक सुपरफूड के रूप में उभर रहा है। फॉक्स नट्स, कमल गट्टा या वैज्ञानिक नाम युरीअल फेरोक्स (Euryale ferox) के नाम से जाना जाने वाला यह प्राकृतिक उपहार अपनी अद्वितीय न्यूट्रिशनल प्रोफाइल, कम कैलोरी और समृद्ध स्वास्थ्य लाभों के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजारों में धूम मचा रहा है। भारतीय कृषि एवं बागवानी क्षेत्र में मखाने ने हाल के वर्षों में जो छलांग लगाई है, वह न केवल भारत की पारंपरिक कृषि शक्ति को दर्शाती है बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, किसान कल्याण और निर्यात संवर्धन के क्षेत्र में भी एक नए स्वर्णिम युग का सूत्रपात कर रही है। भारत दुनिया भर में मखाना उत्पादन में एकछत्र वर्चस्व रखता है और वैश्विक आपूर्ति का अधिकांश हिस्सा अकेले भारत से आता है। देश में मखाने के उत्पादन में लगातार ऐतिहासिक वृद्धि देखने को मिल रही है। उत्पादन में इस उल्लेखनीय उछाल के साथ-साथ उत्पादकता के मोर्चे पर भी देश ने अभूतपूर्व प्रगति की है। प्रति हेक्टेयर उपज में हुई यह वृद्धि वैज्ञानिक खेती, उन्नत किस्म के बीजों और किसानों की कड़ी मेहनत का प्रत्यक्ष परिणाम है। भारत में मखाने के इस विशाल साम्राज्य का मुख्य केंद्र बिहार राज्य है, जो देश के कुल मखाना उत्पादन में सबसे बड़ा योगदान देता है। उत्तर बिहार के दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, कटिहार, पूर्णिया और सहरसा जैसे मिथिलांचल के जिले मखाना खेती के गढ़ माने जाते हैं। यहाँ की भौगोलिक परिस्थितियाँ, उथले पानी के तालाब, दलदली भूमि और अनुकूल आर्द्र जलवायु मखाने के पौधे के विकास के लिए अत्यंत आदर्श वातावरण प्रदान करती हैं। बिहार के अलावा पश्चिम बंगाल, असम और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में भी मखाने की खेती का दायरा तेजी से फैल रहा है। मखाने का भौगोलिक महत्व इस बात से भी सिद्ध होता है कि बिहार के मखाने को भौगोलिक संकेत यानी जीआई टैग प्राप्त हो चुका है, जिसने इसकी अंतरराष्ट्रीय प्रामाणिकता और पहचान को एक नया आयाम दिया है। इसे भी पढ़ें: फरक्का समझौता को बिहार-झारखंड के लिए अभिशाप नहीं वरदान बनाइए, समझिए कैसे बनेगा? आधुनिक दुनिया में जब स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता चरम पर है और लोग प्रसंस्कृत अथवा जंक फूड के विकल्पों की तलाश कर रहे हैं, तब मखाना एक बेहतरीन प्राकृतिक और पौष्टिक विकल्प बनकर उभरा है। मखाने में प्रचुर मात्रा में उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन, घुलनशील और अघुलनशील फाइबर तथा जटिल कार्बोहाइड्रेट्स पाए जाते हैं। इसके साथ ही यह मैग्नीशियम, पोटैशियम, फास्फोरस, कैल्शियम और आयरन जैसे आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर होता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें सोडियम की मात्रा बेहद कम होती है, यह पूरी तरह से वसा-मुक्त और कोलेस्ट्रॉल-मुक्त होता है, तथा इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स भी काफी कम होता है। इन विशेषताओं के कारण यह मधुमेह रोगियों, हृदय रोगियों, उच्च रक्तचाप से पीड़ित व्यक्तियों और वजन कम करने की इच्छा रखने वालों के लिए एक आदर्श आहार माना जाता है। इसमें मौजूद शक्तिशाली एंटी-ऑक्सीडेंट्स असमय बुढ़ापे को रोकने और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने में सहायक होते हैं। शाकाहारी और वीगन जीवनशैली अपनाने वाले लोगों के लिए मखाना प्रोटीन का एक अत्यंत सुलभ और स्वस्थ स्रोत बनकर उभरा है। मखाने की यात्रा खेत के दलदल से निकलकर डाइनिंग टेबल तक पहुँचने में कई जटिल और श्रमसाध्य चरणों से होकर गुजरती है, जो इसकी संपूर्ण मूल्य श्रृंखला का निर्माण करती है। इसकी प्रक्रिया प्राथमिक और द्वितीयक दो स्तरों पर होती है। प्राथमिक स्तर पर किसान और मजदूर बेहद विषम परिस्थितियों में पानी के भीतर उतरकर तालाब की तलहटी से मखाने के कटीले बीजों की कटाई और संग्रहण करते हैं। इसके बाद इन बीजों को साफ किया जाता है और धूप में सुखाया जाता है। इसके पश्चात द्वितीयक प्रसंस्करण शुरू होता है, जिसमें सूखे बीजों को मिट्टी या लोहे की कड़ाही में उच्च तापमान पर भुना जाता है। भुनाई के तुरंत बाद लकड़ी के हथौड़ों से मारकर बीजों को फोड़ा जाता है, जिससे उनके भीतर का सफेद और हल्का गुदा बाहर आ जाता है और हमें हमारा परिचित पॉप्ड मखाना प्राप्त होता है। इसके बाद मखाने की ग्रेडिंग, साइजिंग, पॉलिशिंग और पैकेजिंग की जाती है। मखाने के आकार और सफेदी के आधार पर उसकी बाजार कीमत तय होती है, जहाँ बड़े आकार के मखाने को प्रीमियम श्रेणी में रखा जाता है। वैश्विक बाजार में भारत का मखाना अपनी गुणवत्ता और विशिष्टता के बल पर तेजी से अपनी पैठ बना रहा है। भारत हर वर्ष अपने कुल मखाना उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा दुनिया के विभिन्न देशों में निर्यात करता है। भारत के मखाना निर्यात का एक बड़ा हिस्सा विकसित देशों में जाता है, जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश प्रमुख हैं। ये देश भारत से बड़े पैमाने पर मखाना आयात करते हैं। इसके अतिरिक्त यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और मध्य पूर्व के देशों में भी 'क्लीन-लेबल' और 'प्लांट-बेस्ड सुपरफूड' के रूप में भारतीय मखाने की मांग दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। फ्लेवर्ड मखाना, जैसे चीज़ी, रोस्टेड, पेरी-पेरी और मखाना पाउडर के रूप में मूल्य संवर्धित उत्पाद अंतरराष्ट्रीय उपभोक्ताओं को अत्यधिक आकर्षित कर रहे हैं। मखाना क्षेत्र के इस विशाल सामर्थ्य और रणनीतिक महत्व को पहचानते हुए भारत सरकार ने इसके सर्वांगीण विकास के लिए कई दूरगामी और संरचनात्मक पहल की हैं। मखाने के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने, आधुनिक प्रसंस्करण तकनीक लाने और किसानों की आय में बढ़ोतरी करने के उद्देश्य से सरकार ने विशेष योजनाओं को स्वीकृति प्रदान की है। यह महत्वाकांक्षी प्रयास वैज्ञानिक अनुसंधान, उच्च गुणवत्ता वाले बीजों की सुलभता, किसानों के कौशल विकास, कटाई के बाद के नुकसान को रोकने, स्वचालित पॉपिंग और ग्रेडिंग मशीनों की स्थापना, ब्रांडिंग, विपणन और निर्यात संवर्धन पर विशेष रूप से केंद्रित हैं। इन योजनाओं के माध्यम से देश भर के हजारों किसान सीधे तौर पर लाभान्वित हो रहे हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय स्तर पर मखाना बोर्ड के गठन की घोषणा ने इस क्षेत्र को संस्थागत मजबूती प्रदान करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। जैसे-जैसे वैश्विक स्तर पर मखाने की मांग बढ़ रही है, घरेलू बाजार में भी इसके मूल्य और व्यावसायिक परिदृश्य में क्रांतिकारी बदलाव देखे जा रहे हैं। घरेलू स्तर पर मखाना बाजार अत्यंत तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है और आने वाले समय में भारत का मखाना उद्योग एक विशाल वित्तीय आकार ले लेगा। इस बढ़ती मांग के चलते मखाने की कीमतों में भी भारी उछाल आया है, जिससे किसानों और व्यापारियों के लिए यह फसल अत्यधिक लाभदायक सिद्ध हो रही है। पारंपरिक रूप से उपेक्षित रहने वाला यह क्षेत्र अब एफएमसीजी कंपनियों, स्टार्टअप्स और कृषि-उद्यमियों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है। आधुनिक पैकेजिंग, संगठित खुदरा श्रृंखलाओं और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स ने मखाने को दूर-दराज के इलाकों तक पहुँचा दिया है। हालाँकि इस अपार सफलता के बावजूद मखाना क्षेत्र के सामने कई चुनौतियाँ भी विद्यमान हैं। पारंपरिक तालाब आधारित खेती में शारीरिक श्रम की अत्यधिक आवश्यकता होती है और पानी के अंदर से बीज निकालना बेहद कठिन काम है, जिससे श्रम की कमी एक बड़ी बाधा बनती जा रही है। इसके अलावा प्राथमिक प्रसंस्करण का पारंपरिक और अमशीनीकृत होना, भंडारण की अपर्याप्त सुविधा और मूल्य श्रृंखला में बिचौलियों का प्रभाव किसानों के मुनाफे को प्रभावित करता है। इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए कृषि अनुसंधान संस्थानों द्वारा मखाने की खेत आधारित वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। पारंपरिक गहराई वाले तालाबों के बजाय समतल खेतों में निश्चित मात्रा में पानी भरकर मखाने की खेती करने की तकनीक विकसित की गई है, जिससे उत्पादकता में अभूतपूर्व वृद्धि की जा सकती है। संक्षेप में, मखाना भारत की कृषि-संस्कृति, पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक बाजार की आवश्यकताओं का एक अनूठा और सफल संगम बन चुका है। तालाबों के कीचड़ से निकलकर दुनिया भर के सुपरमार्केट्स और अंतरराष्ट्रीय डाइनिंग टेबल्स तक पहुँचने की मखाने की यह यात्रा भारत की कृषि-समृद्धि की एक नई गाथा लिख रही है। रिकॉर्ड उत्पादन और बढ़ती उत्पादकता यह सिद्ध करती है कि भारत न केवल उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर है, बल्कि दुनिया की पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम है। सरकारी योजनाओं के समर्थन, वैज्ञानिक तकनीकों के समावेश, बुनियादी ढाँचे के सुदृढ़ीकरण और निर्यात के नए अवसरों के साथ मखाना क्षेत्र भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने और भारतीय उत्पादों को वैश्विक पटल पर स्थापित करने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। - डॉ. दीपक कोहली, पर्यावरणविद ,वरिष्ठ विज्ञान लेखक, विशेष सचिव, उत्तर प्रदेश सचिवालय 5/104, विपुल खंड, गोमती नगर, लखनऊ- 226010

प्रभासाक्षी 31 Aug 2026 5:57 pm

नेपाल की त्रासदी से भारत को सबक लेने की जरूरत

नेपाल में 26 अगस्त 2026 को आई विनाशकारी बाढ़ और हिमस्खलन ने एक बार फिर यह कठोर सत्य सामने ला दिया है कि प्रकृति के साथ खिलवाड़ और पहाड़ों की संवेदनशीलता की अनदेखी मानव सभ्यता के लिए कितनी भारी पड़ सकती है। भोटेकोशी नदी तंत्र में ग्लेशियर के बड़े हिस्से के टूटने, बर्फ-पत्थरों के विशाल मलबे के नीचे आने और नदी के प्रवाह में अस्थायी अवरोध बनने के बाद अचानक बाढ़ का जो रौद्र एवं भयावह रूप सामने आया, उसने नेपाल और चीन के तिब्बती क्षेत्र में भारी तबाही मचाई। 29 अगस्त तक उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार नेपाल में 579 और तिब्बत में 5 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है तथा लगभग 2,482 लोग लापता बताए जा रहे हैं। हजारों लोगों को बचाया गया है, लेकिन दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों और लगातार बने नए खतरे के कारण राहत एवं बचाव कार्य अभी भी चुनौतीपूर्ण हैं। यह घटना केवल नेपाल की प्राकृतिक त्रासदी नहीं है, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए भविष्य का भयावह संकेत है। प्रारंभिक वैज्ञानिक आकलन बताते हैं कि ग्लेशियर का हिस्सा टूटकर नीचे गिरा, जिससे बर्फ, चट्टान, मिट्टी और मलबे का विशाल प्रवाह पैदा हुआ। इसने नदी के प्रवाह को अवरुद्ध किया और बाद में जमा पानी तथा मलबे के दबाव से अचानक विनाशकारी बाढ़ आई। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे घटनाक्रम को केवल सामान्य बाढ़ कहना भूल होगी, यह ग्लेशियर, भूस्खलन, मलबा-प्रवाह और नदी-बाढ़ जैसे अनेक खतरों के एक साथ सक्रिय होने वाली ‘बहु-आपदा’ का उदाहरण है। इस त्रासदी का सबसे बड़ा संदेश जलवायु परिवर्तन से जुड़ा है। हिमालय केवल बर्फ से ढकी पर्वतमाला नहीं, बल्कि एशिया की जल-सुरक्षा का आधार है। तापमान बढ़ने के साथ ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं और अनेक नई ग्लेशियर झीलें बन रही हैं। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट के अनुसार हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में लगभग 25,000 ग्लेशियर झीलें हैं और बढ़ता तापमान ग्लेशियर झीलों के फटने यानी (जीएलओएफ) के जोखिम को बढ़ा रहा है। नेपाल में 1920 के दशक से अब तक 90 से अधिक ग्लेशियर झील विस्फोट बाढ़ दर्ज की जा चुकी हैं। इसलिए यह मान लेना उचित नहीं होगा कि नेपाल की घटना का एकमात्र कारण ग्लोबल वार्मिंग ही है। भूकंपीय गतिविधियां, भूगर्भीय अस्थिरता, अत्यधिक वर्षा, हिमस्खलन और प्राकृतिक ढलानों की कमजोरी भी महत्वपूर्ण कारक हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन इन जोखिमों को बढ़ाने वाली पृष्ठभूमि अवश्य तैयार कर रहा है। गर्म होता हिमालय ग्लेशियरों और पर्वतीय भूभाग को अस्थिर कर रहा है, जिससे ऐसी घटनाओं की संभावित तीव्रता और व्यापकता बढ़ सकती है। वैज्ञानिकों ने भी इस बात पर सावधानी बरती है कि किसी एक घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन का परिणाम घोषित करने के बजाय दीर्घकालिक जलवायु और भूगर्भीय बदलावों को साथ देखकर समझना चाहिए। इसे भी पढ़ें: तबाही से 90 दिन पहले चीन-नेपाल के बीच क्या हुआ था? जलप्रलय का मिनट-दर-मिनट का पूरा घटनाक्रम नेपाल की घटना भारत के लिए भी गहरी चेतावनी है। इस चेतावनी से सीख लेने की जरूरत है। उत्तराखंड की केदारनाथ त्रासदी, 2021 की ऋषिगंगा आपदा और हिमालयी राज्यों में बार-बार आने वाली बाढ़, भूस्खलन एवं बादल फटने की घटनाएं पहले ही बता चुकी हैं कि पहाड़ों की सहनशीलता असीमित नहीं है। हिमालय में सड़कें, सुरंगें, जलविद्युत परियोजनाएं, होटल, बस्तियां और अन्य निर्माण आवश्यकताओं को पूरा करने के नाम पर तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या इनके लिए पर्वतीय पर्यावरण की वहन क्षमता का पर्याप्त आकलन हो रहा है? विकास जरूरी है, मगर ऐसा विकास जो पहाड़ों को खोखला करके ही संभव हो, अंततः मानव जीवन और स्वयं विकास दोनों के लिए संकट बन सकता है। आज सबसे बड़ी आवश्यकता ‘आपदा के बाद राहत’ से आगे बढ़कर ‘आपदा से पहले तैयारी’ की है। अत्याधुनिक सैटेलाइट निगरानी, ड्रोन, रडार, नदी सेंसर, ग्लेशियर और ग्लेशियर झीलों की निरंतर निगरानी तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित पूर्वानुमान प्रणालियों को हिमालयी क्षेत्र में व्यापक स्तर पर विकसित करना होगा। शुरुआती चेतावनी प्रणाली केवल राजधानी या प्रशासनिक केंद्र तक सीमित न रहे, बल्कि पहाड़ के अंतिम गांव तक मोबाइल संदेश, सायरन, रेडियो और स्थानीय स्वयंसेवी तंत्र के माध्यम से पहुंचे। नेपाल में वर्तमान त्रासदी के बाद भी एक और संभावित झील के फटने की आशंका ने स्पष्ट कर दिया है कि एक आपदा समाप्त होते ही दूसरी आपदा का खतरा पैदा हो सकता है। नदियां राजनीतिक सीमाओं को नहीं पहचानतीं। भोटेकोशी जैसी सीमापार नदी प्रणालियों के लिए नेपाल, चीन, भारत और अन्य हिमालयी देशों के बीच वास्तविक समय में जल-प्रवाह, वर्षा, भूस्खलन, ग्लेशियर झील और हिमस्खलन संबंधी सूचनाओं का आदान-प्रदान आवश्यक है। किसी एक देश के पास उपलब्ध महत्वपूर्ण चेतावनी दूसरे देश के नागरिकों की जान बचा सकती है। अतः हिमालय के लिए एक साझा क्षेत्रीय आपदा-पूर्व चेतावनी नेटवर्क विकसित किया जाना चाहिए। भारत को इस दिशा में अपने हिमालयी राज्यों के लिए अलग ‘माउंटेन सेफ्टी पॉलिसी’ पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क या सुरंग बनाने से पहले भूगर्भीय जोखिम, जलधाराओं के प्राकृतिक मार्ग, भूस्खलन की संभावना और स्थानीय पारिस्थितिकी का वैज्ञानिक मूल्यांकन अनिवार्य होना चाहिए। अंधाधुंध वृक्ष कटाई, नदी किनारे अनियोजित निर्माण, पहाड़ों की अनावश्यक कटाई और पर्यटन के नाम पर अत्यधिक दबाव को नियंत्रित करना होगा। स्थानीय समुदायों को आपदा प्रबंधन की पहली पंक्ति बनाना होगा, क्योंकि किसी भी संकट में सबसे पहले वही लोग प्रभावित होते हैं और वही सबसे पहले सहायता भी कर सकते हैं। दुनिया को जापान, स्विट्जरलैंड और अन्य पर्वतीय देशों से आपदा-प्रबंधन, भवन सुरक्षा, पूर्व चेतावनी और स्थानीय प्रशिक्षण की तकनीक सीखनी चाहिए। हिमालय को केवल पर्यटन और आर्थिक विकास का क्षेत्र मानना अब पर्याप्त नहीं है इसे एक जीवित, संवेदनशील और अत्यंत नाजुक पारिस्थितिक तंत्र के रूप में देखना होगा। प्रकृति को नियंत्रित करने की मनुष्य की महत्वाकांक्षा जितनी बढ़ेगी, प्रकृति का प्रतिरोध भी उतना ही भयावह हो सकता है। नेपाल की त्रासदी इसलिए केवल शोक मनाने का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का क्षण है। हमें यह समझना होगा कि पहाड़ों को जीतना नहीं, उनके साथ जीना सीखना होगा। विकास की गति को प्रकृति की क्षमता के अनुरूप करना, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करना, वैज्ञानिक चेतावनियों को गंभीरता से लेना और सीमापार सहयोग बढ़ाना ही भविष्य की राह है। यदि इस त्रासदी से भारत और दुनिया ने समय रहते सबक ले लिया, तो नेपाल में बहा हुआ पानी केवल विनाश की कहानी नहीं रहेगा, वह आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित रखने की चेतावनी और नई पर्यावरणीय चेतना का संदेश भी बनेगा। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

प्रभासाक्षी 31 Aug 2026 5:51 pm

हिंदू ध्रुवीकरण के मुकाबले ‘सम्मान की राजनीति’ को Congress बना रही नया हथियार

हिंदू ध्रुवीकरण के मुकाबले ‘सम्मान की राजनीति’ को Congress बना रही नया हथियार

समाचार नामा 31 Aug 2026 4:44 pm

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के ''अमेरिकी सम्बोधन' के अंतर्राष्ट्रीय सामाजिक कूटनीतिक मायने

आधुनिक भारत का सामाजिक चाणक्य समझे जाने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत एक असाधारण व्यक्तित्व के स्वामी हैं, क्योंकि उन्होंने भाजपा के 'गाबाज' नेतृत्व को बदलवाकर कांग्रेसियों/समाजवादियों को उनके ही राजनीतिक पीच पर 2014 में जो सियासी शिकस्त दिलवाई, उससे आम भारतीयों की राजनीतिक सोच ही बदल गई। फलसफा यह निकला कि आज भारत के जर्रे-जर्रे में भगवा ध्वज शान से लहरा रहा है और आरएसएस-भाजपा खुद SC-ST-OBC-EWS का हिमायती बन चुकी है, ताकि देशद्रोही सियासत के लिए कोई सामाजिक स्पेस ही न छोड़ी जाए। इससे सवर्ण बुद्धिजीवियों में हलचल जरूर है, लेकिन जो व्यक्ति भगवान परशुराम को 'लकड़हारा यानी 'बढ़ई जाति' से जोड़कर एक नया 'ओबीसी ब्राह्मण दर्शन' पैदा कर चुका हो, उसकी 'चाणक्य नीति' और 'श्रीरामजी आदर्श नीति' का आप सहज ही अंदाजा लगा सकते हैं। इसे भी पढ़ें: 'हमने किसी देश पर कब्ज़ा नहीं किया, न ही धर्म बदला', टोरंटो में मोहन भागवत ने भारत के 'यूनिवर्सल DNA' पर की बात | Mohan Bhagwat Toronto Speech पूरी दुनिया ने देखा कि एक मुस्लिम अमेरिकी महापौर (न्यूयॉर्क) ममदानी के विरोध के बावजूद मोहन भागवत सात समंदर पार अमेरिका पहुंचे और 29 अगस्त 2026 को न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में जो संबोधन दिया, वह केवल प्रवासी भारतीयों को संबोधित भाषण नहीं था, बल्कि इसे RSS के शताब्दी-वर्ष में हिंदुत्व की वैश्विक प्रस्तुति और भारत की सांस्कृतिक कूटनीति (वसुधैव कुटुम्बकम) के एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में पढ़ा जा सकता है। जिस प्रकार से मोहन भागवत ने वहां “एक विश्व–एक मानवता”, विविधता में एकता, मानवता और प्रवासी भारतीयों की जिम्मेदारी पर जो जोर दिया, वह यदि अगले 100 सालों में विश्व का सांस्कृतिक नक्शा बदल दे तो आपको हैरत में नहीं पड़ना चाहिए। क्योंकि कहा ही गया है कि अग्रसोचि सदा सुखी। इससे 100 साल पहले के आरएसएस और 100 बाद के आरएसएस की जो झलक उनकी इस यात्रा गत सम्बोधन में मिलती है, वह इस प्रकार है:- पहला, सबसे बड़ा संदेश है हिंदुत्व की वैश्विक री-ब्रांडिंग: भागवत ने अमेरिका में यह रेखांकित किया कि हिंदुत्व मुस्लिम-विरोधी विचार नहीं है और यदि कोई हिंदू यह मानता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए तो वह वास्तविक अर्थ में हिंदू नहीं है। अंतरराष्ट्रीय श्रोता के लिए इसका महत्व बहुत बड़ा है। RSS की पश्चिमी छवि लंबे समय से Hindu nationalism, majoritarianism और minority rights की बहस से जुड़ी रही है। ऐसे में भागवत ने उसी विचारधारा को pluralism, diversity और universal humanity की भाषा में प्रस्तुत करने का प्रयास किया। इसे एक तरह की वैचारिक कूटनीति (ideological diplomacy) कहा जा सकता है। दूसरा, अमेरिका को दिया गया दूसरा संदेश है “भारतीय बनो, लेकिन अमेरिकी भी रहो”: भागवत ने भारतीय-अमेरिकी समुदाय से अपनी karmabhoomi यानी अमेरिका के प्रति निष्ठा और योगदान की बात कही। इसका अर्थ है कि RSS की वैश्विक परियोजना केवल भारत के बाहर बसे हिंदुओं को संगठित करना नहीं, बल्कि उन्हें स्थानीय समाज में प्रभावशाली और जिम्मेदार नागरिक रहते हुए भारतीय सभ्यतागत पहचान से जोड़ना भी है। यह मॉडल भविष्य में अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और अन्य पश्चिमी देशों में भारतीय diaspora की राजनीतिक-सामाजिक शक्ति को बढ़ा सकता है। तीसरा, “भारत की विविधता” को अमेरिका में प्रस्तुत करना—बहुत सोचा-समझा संदेश: अमेरिका स्वयं को pluralistic society मानता है। भागवत ने इसी अमेरिकी संवेदनशीलता से संवाद करते हुए कहा कि America = pluralism and, Bharat = unity in diversity. उन्होंने कहा कि विविधता भारत के DNA में है और उसे स्वीकारना व सम्मानित करना चाहिए। यह महज सांस्कृतिक कथन नहीं है। यह भारत की soft power narrative को अमेरिका के राजनीतिक-सांस्कृतिक विमर्श के अनुरूप ढालने का प्रयास भी है। चौथा, लेकिन अमेरिका ने इसे एकतरफा स्वीकार नहीं किया: यहीं इस यात्रा का दूसरा और अधिक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय पहलू सामने आता है। भागवत के कार्यक्रम से पहले ही New York Mayor Zohran Mamdani ने RSS की विचारधारा को लेकर आपत्ति जताई थी। अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग USCIRF ने तो RSS से जुड़े लोगों पर targeted sanctions और भागवत का visa revoke करने जैसी सिफारिशें तक की थीं। भारत ने इन आरोपों को पक्षपातपूर्ण बताया है। यानी भागवत अमेरिका में जिस “inclusive Hinduism” को प्रस्तुत कर रहे थे, अमेरिकी आलोचकों का एक वर्ग RSS के भारतीय रिकॉर्ड और minority rights को उसके ठीक विपरीत देखता है। इससे उनकी अमेरिकी यात्रा का एक अनपेक्षित परिणाम भी हुआ: वह यह कि RSS अब केवल भारतीय राजनीति का विषय नहीं रहा; वह अमेरिकी public discourse में भी India, religion, democracy और minority rights की बहस का हिस्सा बन गया है। पांचवां, भारत-अमेरिका संबंधों के लिए क्या अर्थ?: सरकार-से-सरकार कूटनीति से अलग एक नया people-to-people / diaspora-to-politics channel मजबूत होता दिख रहा है। अमेरिका में भारतीय मूल की आबादी आर्थिक, तकनीकी और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली है। यदि RSS इस समुदाय में अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक स्वीकार्यता बढ़ाता है तो उसका असर भविष्य मेंअमेरिकी राजनीति में India-related lobbying, भारत की image-building, Hindu-American organisations, भारत-अमेरिका strategic relationship, धार्मिक स्वतंत्रता और minority-rights debates पर पड़ सकता है। छठा, सबसे दिलचस्प बदलाव: “हिंदू राष्ट्र” से “विश्व मानवता” तक: आपके पिछले सवाल से इसे जोड़ें तो सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यही है। भागवत की वैचारिक भाषा में एक trajectory दिखाई देती है: हिंदू संगठन → हिंदू राष्ट्र → सामाजिक समरसता → विश्वगुरु → “One World, One Humanity” न्यूयॉर्क में उन्होंने कहा कि RSS की दृष्टि दुनिया को एक परिवार/एक मानवता के रूप में देखने की है। इसलिए इसे “विश्व विजय” कहना शायद अतिशयोक्ति होगा; लेकिन भारतीय सभ्यतागत विचार को वैश्विक वैचारिक प्रभाव में बदलने की कोशिश कहना अधिक सटीक है। सातवां, और यही सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है: भागवत के अमेरिकी भाषण ने RSS के सामने एक नई कसौटी खड़ी कर दी है: यदि हिंदुत्व वास्तव में विविधता, मानव-एकता और मुसलमानों सहित सभी समुदायों की बराबर जगह को स्वीकार करता है, तो क्या यही सिद्धांत भारत के घरेलू सामाजिक-राजनीतिक व्यवहार में भी उसी स्पष्टता से दिखाई देगा? इसी प्रश्न को लेकर भारत में विपक्ष ने उनके अमेरिकी वक्तव्य पर सवाल उठाए हैं—आलोचकों ने इसे “doublespeak” तक कहा है। मेरे आकलन में अमेरिकी भाषण का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय मायना यही है: RSS पहली बार इतने बड़े वैश्विक मंच पर अपने को केवल Hindu organisation के रूप में नहीं, बल्कि मानवता, विविधता और वैश्विक सामाजिक व्यवस्था के बारे में एक वैकल्पिक सभ्यतागत विचार देने वाली संस्था के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। और यदि यह रणनीति आगे ब्रिटेन, कनाडा और अन्य देशों में भी जारी रहती है, तो RSS की शताब्दी के बाद का दशक भारत के भीतर वैचारिक प्रभाव से आगे बढ़कर वैश्विक वैचारिक प्रभाव की प्रतिस्पर्धा का दशक बन सकता है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 31 Aug 2026 4:44 pm