कांग्रेस ने चीनी राष्ट्रपति के साथ बैठक को लेकर प्रधानमंत्री से पूछे सवाल
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असम के सीएम ने जोरहाट में किया रेलवे ओवरब्रिज का उद्घाटन, बोले-बेहतर कनेक्टिविटी बनेगी विकास का आधार
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बिहार : 'जदयू मतलब नीतीश कुमार’ से गरमाई बिहार की सियासत
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बिना रजिस्ट्रेशन वाले प्राइवेट रिहैब सेंटरों को नोटिस जारी: मेंटल हेल्थ अथॉरिटी
अगरतला, त्रिपुरा के स्टेट मेंटल हेल्थ अथॉरिटी की ओर से 19 अनधिकृत प्राइवेट रिहैबिलिटेशन सेंटरों को 'शो-कॉज नोटिस' जारी किए गए हैं।
90 प्रतिशत आपराधिक घटनाओं में सामने आता है सपा कनेक्शन: अनिल राजभर
लखनऊ, उत्तर प्रदेश के जौनपुर में विशाल यादव की हत्या को लेकर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री अनिल राजभर ने समाजवादी पार्टी पर तीखा हमला बोला है।
आतंकवाद के खिलाफ भारत की बात को मिला वैश्विक समर्थन: मंत्री प्रफुल्ल पानसेरिया
सूरत, दिल्ली में आयोजित 'ब्रिक्स' शिखर सम्मेलन में पहलगाम आतंकी हमले समेत दुनिया के किसी भी हिस्से में होने वाली आतंकवादी घटनाओं और टेरर फंडिंग की निंदा को भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता माना जा रहा है।
तृणमूल नेता शाहिदुल शेख चेन्नई से गिरफ्तार: पश्चिम बंगाल
कोलकाता, व्यवसायी पर हमले के आरोप में फरार पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के हिंगलगंज में बिशपुर पंचायत के उप प्रमुख और तृणमूल कांग्रेस नेता शाहिदुल शेख को चेन्नई से गिरफ्तार किया गया है।
ड्रैगन फ्रूट की खेती से खुली तरक्की की राह: बिहार
कटिहार, कभी खेती रीना देवी के परिवार के लिए सिर्फ पेट भरने का साधन थी। खेत में दिन-रात मेहनत करने के बाद भी हाथ में बचता कुछ नहीं था।
ए. राजा ने अपनी टिप्पणी ली वापस
चेन्नई, डीएमके सांसद ए. राजा ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के खिलाफ अपनी विवादित टिप्पणी वापस ले ली है।
केरल में बिजली संकट को लेकर सियासी जंग तेज, केएसईबी के पूर्व अध्यक्ष ने पिनाराई विजयन पर साधा निशाना
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राजस्थान निकाय चुनाव : जयपुर के वार्ड 62 में इस बूथ पर दोबारा मतदान का आदेश
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'मोहनलाल और विजय से बेहतर डांस कर रहा था', वायरल एआई वीडियो पर बोले सीएम सतीशन
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विकास कार्यों के लिए धन की कोई कमी नहीं, कोई परियोजना नहीं रुकेगी: सीएम भूपेंद्र पटेल
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BRICS Declaration: Modi सरकार की बड़ी कामयाबी Pahalgam हमले की निंदा, Pakistan का नाम क्यों नहीं?
क्या अमेरिका, रूस और चीन के साथ मिलकर जी-3 बना सकता है? समझिए इसके पीछे की बदलती कूटनीति!
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रणनीतिक स्वायत्तता वाली कूटनीति से जहां अमेरिका, चीन, रूस तीनों बड़े देश घबराए हुए हैं, वहीं फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और ब्राजील जैसे देश इसमें ही अपना कूटनीतिक भविष्य देख रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिज्ञों का भी मानना है कि यदि भारत अपने मिशन में कामयाब हो जाता है तो इससे न केवल बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था को बल मिलेगा, बल्कि अमेरिका, रूस और चीन के हथियारों के सौदागरों के हाथ-पांव भी ठिठक जाएंगे। चूंकि समसामयिक वैश्विक परिदृश्य में अरब-खाड़ी देशों में अमेरिका-यूरोप की इज्जत दांव पर पड़ी हुई है, क्योंकि रूस-चीन का शह ईरान को हासिल है। इससे पहले यूक्रेन में रूस-चीन-उत्तर कोरिया की सैन्य साख दांव पर पड़ी हुई है, क्योंकि अमेरिका-यूरोप मिलकर यूक्रेन को भड़काए हुए हैं। वैसे तो चीन को ताइवान में और भारत को पीओके में उलझाने की साजिश पश्चिमी-पूर्वी देशों के इशारे पर रचाई गई, लेकिन भारत और चीन के सूझबूझ वाले नेतृत्व ने समय रहते ही स्थिति को संभाल लिया। इससे हथियारों के वैश्विक सौदागरों और ड्रग्स सप्लायर्स का भारत-चीन से खफा होना स्वाभाविक है। इससे होने वाले घाटे की भरपाई के लिए ही तो अमेरिका ने दोनों देशों के खिलाफ टैरिफ युद्ध छेड़ दिया। # मोदी डॉक्ट्रिन के चक्रव्यूह में हर ओर से घिरा महसूस करने लगा है अमेरिका और जब इसमें भी अमेरिका विफल हो गया और मोदी डॉक्ट्रिन के चक्रव्यूह में हर ओर से घिरा महसूस करने लगा तब उसने ग्रुप-तीन (G-3) का नया पैंतरा बदला। प्राप्त जानकारी के मुताबिक, अमेरिका के व्हाइट हाउस के जी तीन प्लान पर रूस के क्रेमलिन ने भी रजामंदी जताई है और बताया है कि पुतिन और जिनपिंग ने नवंबर में शेनजेन में होने वाले APEC सम्मेलन के दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप के साथ G3 बैठक करने पर चर्चा की है। अगर अमेरिका, रूस और चीन एक साथ बातचीत की मेज पर बैठ जाते हैं और किसी सहमति तक पहुंचते हैं, तो ये दूसरे विश्व युद्ध के बाद बने उस ‘याल्टा सिस्टम’ का अंत होगा, जिसने यूएन सुरक्षा परिषद को बनाया था। इसे भी पढ़ें: ईरान, सऊदी अरब और UAE के मतभेदों के बीच भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत, BRICS में साझा बयान पर बनी आम सहमति कहने का तात्पर्य यह कि अब अमेरिका, रूस और चीन परस्पर मिलकर दुनिया के अन्य मजबूत देशों भारत, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और ब्राजील आदि को अपने अंतर्राष्ट्रीय एजेंडे पर चलाएंगे और इनसे मुनाफा कमाएंगे। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग्लोबल साउथ की जो वैश्विक चाल चली है, उसमें भारत विरोधी महारथियों का उलझना और छटपटाना तय है। वहीं, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और ब्राजील जैसे देशों को ये त्रिपक्षीय पहल नागवार गुजरी तो फिर दुनियावी कश्मकश और दिलचस्प हो जाएगी। # वर्तमान भू-राजनीतिक तनावों और कूटनीतिक विरोध के हल की कुंजी है अमेरिका, रूस और चीन के ही पास यूं तो वर्तमान भू-राजनीतिक तनावों और कूटनीतिक विरोध के कारण अमेरिका, रूस और चीन का मिलकर 'जी-3' (G-3) बनाना वर्तमान परिदृश्य में अत्यधिक असंभावित चिंतन है। लेकिन जब मुख्य षड्यंत्रकारी राष्ट्र अमेरिका और उसके मनमौजी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंफ ही रूस-चीन युगलबंदी के समक्ष घुटने टेकते हुए ऐसा आकर्षक प्रस्ताव दे रहे हैं तो रूस-चीन दोनों के लिए भी यह आकर्षक डील होगी। चूंकि अमेरिका ने ही भारत-रूस की दोस्ती के मुकाबले चीन की तरक्की में योगदान दिया है तो चीन के लिए भी तो यह और अधिक फायदे का सौदा होगा। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि अमेरिका-रूस में तनावपूर्ण संबंध हैं, और अमेरिका ने रूस पर कई प्रतिबंध भी लगा रखे हैं। रूस-यूक्रेन संघर्ष और अन्य क्षेत्रीय मुद्दों के कारण अमेरिका और रूस के संबंध बहुत खराब हैं, ऐसे में बात कहां तक बढ़ेगी नवंबर 2006 तक इंतजार करना होगा। जहां तक अमेरिका और चीन की बात है तो दोनों देशों में रणनीतिक प्रतिस्पर्धा जारी है। अमेरिका और चीन आर्थिक और सैन्य मामलों में दुनिया के मुख्य प्रतिद्वंद्वी देश हैं। खास बात यह कि अमेरिका, रूस और चीन में विचारधारा का अंतर है। अमेरिका एक लोकतांत्रिक व्यवस्था का समर्थन करता है, जबकि रूस और चीन की शासन प्रणालियां उससे अलग हैं। ऐसे में जी-तीन की छतरी के नीचे आने के लिए तीनों देशों को भारी कीमत चुकानी होंगी और किसी सर्वमान्य निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले कई तरह के कूटनीतिक पापड़ बेलने पड़ेंगे। # दुनिया के लगभग सभी प्रगतिशील देश समझ चुके हैं अमेरिकी चतुराई देखा जाए तो पहले अमेरिका और सोवियत संघ की वैश्विक प्रतिस्पर्धा में, फिर अमेरिका और चीन की अंतर्राष्ट्रीय तनातनी में और रूस के साथ चीन के खड़े होने और भारत द्वारा भी रूस की इज्जत करने से अमेरिका बेचैन है। वहीं यूरोप भी अमेरिका की चतुराई समझ चुका है। इससे जी-7 (G-7) और नाटो जैसे उसके पुराने हथियार अब एशियाई- यूरोपीय मामलों में भोथरे साबित हो चुके है। फिर उसने जी-20 (G-20) की चाल चली लेकिन यहां भी भारत ने ग्लोबल साउथ की आवाज बुलंद कर अमेरिकी अरमानों पर पानी फेर दिया। इधर, भारत की रूसी सहभागिता, चीन की मौजूदगी, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, ईरान आदि की मौजूदगी वाले एससीओ (SCO) और ब्रिक्स (BRICS) में बढ़ती दिलचस्पी से अमेरिकी चौधराहट को एक नया खतरा उत्पन्न हो गया है। वैसे तो अमेरिकी डीप स्टेट ने भारत-चीन संबंधों को बिगाड़ने की पूरी चाल चली, लेकिन परिपक्व भारतीय कूटनीति के सामने अकसर वह लाचार दिखा। वहीं, भारत के पड़ोसी देशों को भड़काकर भी वह अपना उल्लू सीधा नहीं कर सका। यही वजह है कि भारत में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन की सफलता से पहले रूस-चीन के लिए उसने जी-तीन का नया चारा डाल दिया। # रूस के राष्ट्रपति पुतिन के पास भी अमेरिका से हाथ मिलाने की हैं कई बड़ी वजहें ऐसे में जहां रूस के राष्ट्रपति पुतिन के पास भी अमेरिका से हाथ मिलाने की अपनी बड़ी वजहें हैं। वास्तव में पुतिन की मजबूरी है कि करीब साढ़े चार साल से चल रहे यूक्रेन युद्ध में वो उलझे हुए हैं, जिसने रूस की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है और मोर्चे पर भी कोई साफ जीत नजर नहीं आ रही है। वहीं दूसरी तरफ, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग काफी मजबूत स्थिति में हैं। तभी तो वो बिश्केक, काहिरा और दिल्ली का दौरा खत्म करने के बाद सीधे व्हाइट हाउस, अमेरिका जाने की तैयारी कर रहे हैं। चूंकि शी जिनपिंग की स्थिति मजबूत है और वह हर मामले में सधी हुई चाल चलते हैं। इसलिए ट्रंप उनके मुरीद हैं। मुंह में राम, बगल में छुरी वाले अंदाज में। # भारत अपनी अर्थव्यवस्था और औद्योगिक विकास दर की रफ्तार बढ़ाकर G-3 के वैश्विक कुचक्रों का कर सकता है मुकाबला हालांकि, भारत अपनी अर्थव्यवस्था और औद्योगिक विकास दर की रफ्तार बढ़ाकर खुद को इतना मजबूत बना सकता है कि G-3 का कोई भी देश भारत को नजरअंदाज करने की स्थिति में न रहे। यानी भारत अपनी आर्थिक ताकत में इजाफा करके स्थिति को कभी भी अपने पक्ष में कर लेगा। वहीं, जिस तरह रूस और चीन ब्रिक्स का इस्तेमाल करते हुए भी अमेरिका से सीधा फायदा निकालते आए हैं, ठीक वैसे ही भारत भी सभी बड़े देशों से अपने हितों के हिसाब से सीधे रिश्ते साधकर वैश्विक मेज पर अपनी जगह मजबूत रखेगा। इसके दृष्टिगत भारत स्मार्ट और व्यवहारिक कूटनीतिक का सहारा लेगा। इसके अलावा, भारत फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और ब्राजील जैसे देशों के साथ मिलकर एक नया मजबूत मोर्चा खड़ा कर सकता है और इस प्रकार जो मिडिल पावर्स का नया फ्रंट बनेगा, उससे भारत लाभांवित होगा। दरअसल, ये वो देश हैं जो दुनिया की कमान सिर्फ तीन देशों के हाथों में सिमटे, ऐसा नहीं होने देना चाहते, इसलिए परस्पर एकजूट हैं। # अमेरिका, रूस और चीन का जी-3 (G-3) महज एक परिकल्पना, जमीनी हकीकत से दूर है यह त्रिकोणीय तालमेल यह बात दीगर है कि भू-राजनीतिक स्तर पर अमेरिका, रूस और चीन के बीच एक संभावित जी-3 (G-3) त्रिकोणीय तालमेल या महान शक्ति समझौते की जो चर्चाएँ सामने आ रही हैं, वह अभी कोई औपचारिक और स्थायी गठबंधन नहीं है। चूंकि तीनों देशों के शीर्ष नेताओं की सीधी बातचीत होगी, इसलिए अमेरिकी नेतृत्व बहुपक्षीय संगठनों के बजाय सीधे रूस और चीन के राष्ट्र प्रमुखों से व्यक्तिगत स्तर पर संपर्क साधने की नीति को प्राथमिकता पर रखता है। विश्लेषकों का भी मानना है कि दुनिया की ये तीन सबसे बड़ी महाशक्तियाँ आपस में मिलकर वैश्विक व्यवस्था के नियमों को तय करने के लिए एक त्रिकोणीय ढांचा बना सकती हैं, ताकि वैश्विक सत्ता का संतुलन बरकरार रहे। चूंकि इन तीनों देशों के पास विशाल सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक ताकत है, जिसके बल पर वे बड़े भू-राजनीतिक सौदे कर सकते हैं। यह एक प्रकार की रणनीतिक सौदेबाजी होगी, उससे ज्यादा कुछ नहीं। # रूस और चीन के पारस्परिक सहयोग से अमेरिका को टेकने पड़ेंगे घुटने चूंकि रूस और चीन अपने पारंपरिक सहयोग या ब्रिक्स (BRICS) जैसे मंचों को छोड़कर अमेरिका के पाले में पूरी तरह नहीं आ रहे हैं; बल्कि वे इन मंचों के साथ-साथ वाशिंगटन से भी सीधे संवाद की गुंजाइश तलाश रहे हैं। ताकि ब्रिक्स का अंत नहीं हो और अमेरिका से रणनीतिक लाभ भी मिलता रहे। गौर करने वाली बात यह है कि तीनों देशों के बीच बुनियादी मतभेद हैं। खासकर व्यापार, तकनीक, सुरक्षा और क्षेत्रीय आधिपत्य जैसे गंभीर मुद्दों पर तीनों देशों के हित एक-दूसरे के विपरीत हैं। इसलिए क्या जी-3 एक पक्का गठबंधन बनेगा, इसमें संदेह है। जब इसे लेकर कोई औपचारिक संधि होगी, या कोई लिखित समझौता होगा या फिर नाटो जैसा कोई नया सैन्य गुट बनेगा, तब यह समझा जाएगा कि अमेरिका, चीन और रूस अब एक दूसरे के करीब जा चुके हैं। चूंकि, यह नया राग अलापना अमेरिका की मजबूरी है, क्योंकि वह अरब-खाड़ी देशों में रूसी-चीनी चक्रव्यूह में घिर चुका है और निकलने का कोई रास्ता उसे नजर नहीं आ रहा है। वर्तमान में रूस और चीन बहुत अच्छे रणनीतिक और आर्थिक साझेदार हैं, जिन्हें अक्सर 'दोस्त' या 'जिगरी दोस्त' कहा जाता है। इस दोस्ती का मुख्य कारण भी अमेरिका विरोध है, क्योंकि दोनों देश अमेरिका और पश्चिमी देशों के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करना चाहते हैं। चीन रूस का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। रूस चीन को तेल और प्राकृतिक गैस बेचता है, जबकि चीन से उसे औद्योगिक वस्तुएं मिलती हैं। वहीं यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के दृष्टिगत रूस का चीन पर आर्थिक और राजनीतिक रूप से भरोसा और निर्भरता दोनों बढ़ी है। यद्यपि 1960 और 1970 के दशक में दोनों कम्युनिस्ट देशों के बीच वैचारिक मतभेद और सीमा विवाद भी रहे हैं, जिसे उन्होंने समझदारी पूर्वक दूर कर लिया है। इसे औपचारिक सैन्य गठबंधन नहीं कहा जाता है, बल्कि यह साझा हितों पर आधारित एक मजबूत रणनीतिक तालमेल यानी रणनीतिक साझेदारी है। # अमेरिका ने कस रखी है चीन की व्यापारिक नकेल वहीं, अमेरिका ने चीन पर विभिन्न व्यापारिक नीतियों और उत्पादों के तहत अलग-अलग दर से टैरिफ लगाए हैं, जिसमें अक्टूबर 2025 में घोषित 100% अतिरिक्त टैरिफ और पहले से चले आ रहे धारा 301 (Section 301) के शुल्क शामिल हैं। इसकी प्रमुख बातें निम्नलिखित हैं:- पहला, अतिरिक्त टैरिफ: अक्टूबर 2025 में अमेरिका ने चीन पर चीनी सामानों की डंपिंग और रेयर अर्थ मिनरल्स के विवाद के कारण 100% अतिरिक्त टैरिफ लगाने का आदेश दिया था। दूसरा, पुराने शुल्क: साल 2018 से चले आ रहे धारा 301 (Section 301) के तहत लगाए गए बुनियादी शुल्क अभी भी कई चीनी उत्पादों पर लागू हैं। तीसरा, विशेष उत्पाद: कुछ खास उत्पादों (जैसे बैटरी सामग्री) पर यह दरें 205% तक भी पहुंच चुकी हैं। चौथा, कानूनी फेरबदल: साल 2026 की शुरुआत में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने कुछ आपातकालीन टैरिफ को अमान्य भी करार दिया था, जिसके बाद दोनों देशों के बीच व्यापारिक बातचीत जारी है। # सैन्य और आर्थिक ताकत के मामले में संयुक्त राज्य अमेरिका रूस से है काफी आगे यह ठीक है कि सैन्य और आर्थिक ताकत के मामले में संयुक्त राज्य अमेरिका रूस से आगे और दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश है। जहां तक सैन्य रैंकिंग (Military Ranking) की बात है तो यह इस प्रकार है:- पहला, ग्लोबल फायरपावर रैंकिंग: रक्षा और सैन्य ताकत की सूची में अमेरिका पहले स्थान पर है और रूस दूसरे स्थान पर आता है। दूसरा, रक्षा बजट: अमेरिका का रक्षा बजट लगभग 850 बिलियन डॉलर है, जो रूस के बजट (लगभग 135 बिलियन डॉलर) से काफी अधिक है। तीसरा, अमेरिका की ताकत वायुसेना: अमेरिका के पास लगभग 13,000 विमान और 1,790 से ज्यादा फाइटर प्लेन हैं, जो इसे दुनिया की सबसे ताकतवर वायुसेना बनाते हैं। चौथा, वैश्विक पहुंच: अमेरिका के पास उन्नत तकनीक, विशाल नौसेना और दुनिया भर में फैले सैन्य ठिकाने हैं। जहां तक रूस की ताकत की बात है तो वह निम्नलिखित है:- पहला, परमाणु हथियार: परमाणु हथियारों के मामले में रूस सबसे आगे है। उसके पास करीब 6,000 परमाणु बम और खतरनाक मिसाइलें मौजूद हैं। दूसरा, जमीनी ताकत: रूस के पास जमीन पर मुकाबला करने के लिए 10,000 से अधिक टैंक और एस-400 व एस-500 जैसे उन्नत एयर डिफेंस सिस्टम हैं। निष्कर्ष यह है कि कुल मिलाकर अमेरिका अधिक शक्तिशाली और व्यापक रूप से सक्षम है, जबकि रूस के पास परमाणु और रणनीतिक रक्षा बल बहुत मजबूत हैं। इसलिए यदि तीनों देश एक साथ आएंगे तो वह मध्यम दर्जे वाले देशों के उभार में कितना बाधक बनेंगे यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। # आखिर ब्रिक्स की बैठक शुरू होने से पहले ही अमेरिका ने क्यों अलापा नया राग? राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि दिल्ली में ब्रिक्स सम्मेलन होने से ठीक पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और चीन के साथ मिलकर एक नया 'G-3' गुट बनाने की घोषणा करना, अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति की एक जबरदस्त बिसात समझी जा सकती है। क्योंकि अमेरिका अब यह मान चुका है कि बिना चीन और रूस की मदद के वह भारत पर लगाम नहीं लगा सकता है और ऐसा किए बिना वह अपना मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय अस्तित्व भी नहीं बचा पाएगा। इसलिए अब ट्रंप सीधे पुतिन और शी जिनपिंग से हाथ मिलाकर वैश्विक शक्ति प्रतिस्पर्धा को बदलना चाहते हैं। चूंकि भारत की राजधानी नई दिल्ली में आयोजित BRICS सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान जैसे वैश्विक नेता एक छत के नीचे होंगे और एग्रीकल्चर, हेल्थ सेक्टर और डिजिटल दुनिया में आपसी सहयोग बढ़ाएंगे, साथ ही बहुध्रुवीय दुनिया की वकालत करेंगे। ऐसे में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और चीन के साथ मिलकर G-3 गुट बनाने का जो ऐलान किया है, वह दुनिया के मध्यम दर्जे के उन देशों को खुली चुनौती है, जो इन तीनों देशों के अंतर्विरोध का फायदा उठाकर लाभ पीट रहे हैं। चूंकि वर्ष 2019 के बाद पहली बार चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत आ रहे हैं, इसलिए पूरी दुनिया की नजरें पीएम मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात पर टिकी हुई हैं। चूंकि दोनों देश पिछले कुछ सालों से बॉर्डर टेंशन और ट्रेड खींचतान से जूझ रहे हैं, ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि दिल्ली का ये मंच दोनों पड़ोसी देशों के बीच की कड़वाहट कम करेगा और व्यापारिक रिश्तों को फिर से पटरी पर लाएगा। इसके अलावा ईरान के नए राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान के आने से भी इस सम्मेलन की हलचल काफी बढ़ गई है। चूंकि ब्रिक्स हमेशा से खुद को अमेरिका और पश्चिमी देशों के दबदबे के खिलाफ एक बड़े विकल्प के तौर पर दिखाता आया है. लेकिन जैसे-जैसे इस संगठन का विस्तार हुआ है, इसके अंदरूनी मतभेद और गुटबाजी भी खुलकर सामने आने लगी है। इस वक्त ईरान और UAE के बीच तनातनी चल रही है। जहां ईरान चाहता है कि ब्रिक्स का ये मंच अमेरिका और इजरायल के सैन्य हमलों के खिलाफ खुलकर बोले और सख्त बयान दे, वहीं दूसरी तरफ यूएई इस विवाद में पड़ने के बजाय अपनी समुद्री सीमा और होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा को ज्यादा अहमियत दे रहा है। दोनों देशों की इसी खींचतान की वजह से मई में दिल्ली में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में कोई साझा बयान तक जारी नहीं हो सका था। चूंकि एक तरफ ब्रिक्स अपने अंदरूनी झगड़ों में उलझा हुआ है तो दूसरी तरफ वाशिंगटन, बीजिंग और मॉस्को के बीच एक नया समीकरण बन रहा है। वैसे भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हमेशा से ये मानते रहे हैं कि अगर वो पुतिन और शी जिनपिंग से सीधे बातचीत करें, तो दुनिया के बड़े-बड़े विवाद पलक झपकते ही सुलझ सकते हैं। लेकिन ट्रंप की इस पर्सनल कूटनीति से अमेरिका का अपना विदेश मंत्रालय, वहां की दूरदर्शी संसद और यूरोपीय सहयोगी देश काफी घबराए हुए हैं। वहीं, यूरोप को भय है कि ट्रंप यूक्रेन और यूरोप की सुरक्षा को दांव पर लगाकर रूस से हाथ मिला लेंगे। वहीं एशियाई देशों को चिंता है कि चीन के साथ कोई बड़ी डील करने के चक्कर में अमेरिका इस इलाके की सुरक्षा का अपना वादा कहीं तोड़ न दे। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
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पेजेश्कियान का अमेरिका-इजराइल को दो टूक संदेश, बोले- दबाव और दादागीरी के आगे नहीं झुकेगा ईरान
ईरानी राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कहा कि उनका देश अत्याचार के आगे नहीं झुकेगा। उन्होंने अमेरिका और इजराइल को निशाने पर लेते हुए कहा कि ईरान डराने-धमकाने की राजनीति स्वीकार नहीं करेगा।
BRICS में Modi-Xi Jinping मुलाकात: क्या China पर भरोसा कर भारत कर रहा गलती? | India Foreign Policy
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शशि थरूर ने चिदंबरम के ब्रिक्स वाले बयान से असहमति जताई, तो एनडीए ने 'नाराज फूफा' बताया
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भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन 18 सितंबर को पठानकोट से 'नशा मुक्त पंजाब यात्रा' को हरी झंडी दिखाएंगे
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कावेरी जल बंटवारे पर कर्नाटक की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 14 सितंबर को करेगा सुनवाई
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समझिए आखिर जब नई दिल्ली में मोदी से जिनपिंग मिलेंगे तो दुनिया में क्या कूटनीतिक संदेश जाएगा?
अगर 12–13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की द्विपक्षीय मुलाकात होती है, तो इसका कूटनीतिक संदेश केवल भारत-चीन संबंधों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह एशिया और वैश्विक शक्ति-संतुलन के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत होगा। ऐसा इसलिए कि चीनी राष्ट्रपति शी की यह भारत यात्रा सात वर्षों बाद हो रही है। लिहाजा उम्मीद बंधी है कि जब मोदी-शी मुलाकात होगी तो सीमा पर तनाव से लेकर रणनीतिक संवाद तक, खुलकर बात होगी और फिर दोनों नेताओं के मूड से पता चलेगा कि क्या भारत-चीन संबंधों में कोई नया अध्याय खुलेगा या यथास्थिति बनी रहेगी? देखा जाए तो इस द्विपक्षीय मुलाकात के 8 बड़े कूटनीतिक संदेश होंगे, जो इस प्रकार हैं:- पहला, सीमा विवाद के बावजूद संवाद बंद नहीं होगा: सबसे बड़ा संदेश यह होगा कि गलवान झड़प (2020) के बाद पैदा हुआ अविश्वास अब पूर्ण टकराव की नीति में नहीं बदल रहा, बल्कि अगस्त में अजित डोभाल और वांग यी की 25वीं विशेष प्रतिनिधि वार्ता में सीमा-प्रबंधन, सैन्य हॉटलाइन और सीमा व्यापार जैसे मुद्दों पर आगे बढ़ने के संकेत मिले हैं, जो इस मुलाकात के बाद और आगे बढ़ सकते हैं। दूसरा, मोदी का साफ संदेश, “सीमा पर शांति, तभी व्यापक संबंध”: भारत के लिए मुलाकात का अर्थ यह नहीं होगा कि सीमा विवाद समाप्त हो गया, बल्कि नई दिल्ली यह संदेश दे सकती है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर शांति और स्थिरता भारत-चीन संबंधों के सामान्यीकरण की बुनियादी शर्त है। 2025 की मोदी-शी बैठक में भी मोदी ने सीमा क्षेत्रों में शांति को द्विपक्षीय संबंधों के विकास के लिए महत्वपूर्ण बताया था। स्वाभाविक है कि इस बार भी मोदी वही बात दोहराएंगे, ताकि तरक्की का माहौल बने। इसे भी पढ़ें: ब्रिक्स शक्ति-संघर्ष का अखाड़ा नहीं, सहयोग का सेतु बने तीसरा, चीन को अमेरिका-भारत समीकरण का संकेत: दिलचस्प बात यह है कि शी की भारत यात्रा ऐसे समय हो रही है जब अमेरिका और चीन के बीच भी उच्चस्तरीय बातचीत चल रही है। इसलिए बीजिंग यह समझना चाहेगा कि भारत को केवल अमेरिकी रणनीतिक खेमे के हिस्से के रूप में नहीं देखा जा सकता। लिहाजा भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (strategic autonomy) बनाए रखना चाहता है। चौथा, ब्रिक्स (BRICS) में भारत की नेतृत्वकारी भूमिका मजबूत होगी: नई दिल्ली में शी का आना अपने आप में भारत की कूटनीतिक क्षमता का प्रदर्शन है। भारत एक ही मंच पर चीन, रूस, ईरान और अन्य प्रमुख वैश्विक दक्षिण (Global South) देशों को साथ ला रहा है। ऐसे समय मोदी-शी बातचीत का संदेश होगा कि भारत पश्चिम और चीन—दोनों से संवाद करने की क्षमता रखता है। इससे भारत का महत्व हर जगह बढ़ेगा। पांचवां, व्यापार और आर्थिक संबंधों को “नियंत्रित सामान्यीकरण” मिल सकता है: भारत-चीन व्यापार बड़ा है, लेकिन सुरक्षा और भरोसे की समस्याएं बनी हुई हैं। इसलिए संभावित बातचीत में व्यापार, निवेश, वीजा, उड़ानों और कारोबारी बाधाओं को कम करने की दिशा में संकेत महत्वपूर्ण होंगे। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार दोनों देशों के आर्थिक संबंधों में सुधार के बावजूद रणनीतिक अविश्वास अभी भी बड़ी बाधा है, जो आगे भी नहीं रह सकती है, जबतक चीन अपनी ओछी हरकतें बंद नहीं कर देता। छठा, पाकिस्तान के लिए भी स्पष्ट संदेश जाएगा: पाकिस्तान अभी चीन-अमेरिका-अरब तीनों को उल्लू बना रहा है। इस लिहाज से भारत-चीन के सुधरते संबंध उसे बेचैन कर सकते हैं। मोदी-शी की प्रत्यक्ष बातचीत से पाकिस्तान को संकेत मिल सकता है कि भारत-चीन संबंधों को केवल भारत-पाकिस्तान समीकरण के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। भारत चीन से प्रतिस्पर्धा भी कर सकता है और अपने हितों के अनुसार बातचीत भी। यह बहुत महत्वपूर्ण पहलू है। सातवां, सबसे बड़ा संदेश- “प्रतिद्वंद्वी, लेकिन अनिवार्य संवाद साझेदार”: यही इस मुलाकात का सबसे सटीक कूटनीतिक सार होगा। भारत और चीन के बीच सीमा, व्यापार, तकनीक, इंडो-पैसिफिक और सुरक्षा को लेकर गंभीर मतभेद हैं; लेकिन दोनों एक-दूसरे को नजरअंदाज भी नहीं कर सकते। हालिया घटनाक्रम को कुछ विश्लेषक सीधा मुकाबला (confrontation) से प्रतिस्पर्धी सह-अस्तित्व (competitive coexistence) की ओर सावधान बदलाव के रूप में देख रहे हैं। आठवां, असली परीक्षा फोटो नहीं, परिणाम होगा: देखा जाए तो मोदी-शी की मुलाकात की सफलता को हाथ मिलाने या गर्मजोशी भरी तस्वीर से नहीं मापा जाना चाहिए, बल्कि असली सवाल होंगे— क्या LAC पर स्थायी शांति की दिशा में ठोस कदम निकलता है? क्या सीमा विवाद के समाधान की राजनीतिक प्रक्रिया तेज होती है? क्या व्यापार असंतुलन पर कोई व्यावहारिक पहल होती है? क्या सीधी उड़ानें और वीजा व्यवस्था और सामान्य होती है? क्या दोनों देश एक-दूसरे के खिलाफ रणनीतिक अविश्वास कम करने के लिए कोई नया तंत्र बनाते हैं? इसलिए शीर्षक की भाषा में कहें तो “मोदी-शी मुलाकात: सीमा पर तनाव से रणनीतिक संवाद तक, क्या भारत-चीन संबंधों में खुलेगा नया अध्याय?” और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत का चीन के सामने झुकना नहीं, बल्कि अपनी शक्ति और रणनीतिक स्वायत्तता के आधार पर चीन से बातचीत करने का संकेत होगा। साथ ही, यदि सीमा पर वास्तविक प्रगति नहीं होती, तो केवल शिखर बैठक को “भारत-चीन संबंधों में बड़ा बदलाव” मानना जल्दबाजी होगी। फिर अगले मौके तक इंतजार करना होगा। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
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भारत पहुंचे पुतिन, PM मोदी के साथ शुरू हुई अहम बैठक; रक्षा-ऊर्जा और व्यापार पर होगी चर्चा
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BRICS से मोदी का बड़ा धमाका, हिल गए ट्रंप, क्या Critical Minerals बदलेंगे दुनिया की चाल?
लगातार बदलते हुए वैश्विक हालातों में जहां पल-पल अनिश्चितता और अराजकता के बादल मंडरा रहे हैं। ऐसे में हाल ही में जहां किर्गिस्तान की राजधानी बिकेक पे एससीओ का समिट खत्म हुआ। जहां दुनिया की तीन बड़ी महाशक्तियों जिनमें चीन, रूस और भारत शामिल है जो कि तीनों एशिया में हैं। उनके बड़े नेता वहां पर मौजूद रहे। चाहे चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग हो, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन हो या भारत के प्रधानमंत्री मोदी हो। ऐसे में अब बारी है एक और समिट की जो कि दिल्ली में चल रही है। 18वां ब्रिक्स सम्मेलन जिसमें शामिल होने के लिए रूस के राष्ट्रपति शी जिनपिंग दिल्ली पहुंच चुके हैं। वहीं चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भी भारत आने की तैयारियां जोर शोर से चल रही है। बैक चैनल से भी, डिप्लोमेटिक चैनल से भी। अगर ऐसा होता है तो फिर यह ऐतिहासिक होगा। क्योंकि अगर जिनपिंग भी भारत आते हैं तो यह करीब 7 साल के बाद उनकी भारत की पहली यात्रा होगी। इसे भी पढ़ें: Strait of Hormuz का नाम बदलकर Trump Strait रखने की तैयारी, Iran पर US का कड़ा रुख दुनिया में टेंशन का माहौल इस साल यानी कि 2026 में ब्रिक्स का जो कमान है, जो अध्यक्षता है वो भारत के पास है। ब्रिक्स दुनिया की बड़ी अभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं का समूह है। इसमें भारत के अलावा रूस, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका कोर मेंबर्स तो है ही। इनके साथ ही मिस्र यानी कि इजिप्ट, ईरान, इथियोपिया, यूएई यानी कि संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया भी शामिल है। ध्यान रखिए कि इसमें ईरान और यूएई दोनों शामिल है। जिनके बीच इस समय जंग के कारण ठनी हुई है। भारत की अध्यक्षता में पूरे साल अलग-अलग शहरों में बैठकें, मंत्री स्तरीय सम्मेलन और कई स्तर की चर्चाएं हो रही हैं। भारत का भी मुख्य फोकस ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत करने, आर्थिक सहयोग को बढ़ाने, ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करने, डिजिटल तकनीक को शेयर करने और उसका इजाद करने, आतंकवाद से निपटने और सप्लाई चेन को मजबूत करने पर है। यानी कि ब्रिक्स को सिर्फ राजनीतिक मंच नहीं बल्कि व्यापार, निवेश और विकास के बड़े मंच के तौर पर आगे बढ़ाने की तमाम देशों की कोशिश है। क्या है ब्रिक्स ब्रिक्स दुनिया की प्रमुख उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं और विकासशील देशों का एक प्रभावशाली अंतर सरकारी संगठन है। इसके सदस्य शुरुआत में तो ब्राजील, रूस, भारत और चीन रहे यानी कि ब्रिक। लेकिन बाद में एक साल के बाद ही 2010 में दक्षिण अफ्रीका भी शामिल हुआ और इसे ब्रिक्स कहा जाने लगा। इसके बाद हाल ही के वर्षों में कई अन्य देश भी इसके साथ जुड़े। जिसमें इसकी कुल संख्या 10 प्रमुख देशों की हो चुकी है। नए सदस्य देशों में मिस्र, इथियोपिया, ईरान और यूएई शामिल है। इसका मकसद वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद यानी कि जीडीपी और व्यापार में अपनी हिस्सेदारी को मजबूत करना है। न्यू डेवलपमेंट बैंक यानी कि एनडीबी के माध्यम से बुनियादी ढांचा और विकास परियोजनाओं को बढ़ावा देना है। और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों जैसे कि विश्व बैंक यानी कि वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ जैसे तमाम जो संगठन है संस्थान हैं वहां पर विकासशील देशों की बेहतर आवाज और सुधार सुनिश्चित करना है। इसे भी पढ़ें: ईरान ने Marco Rubio के 'Proxy' दावे को किया खारिज, Houthis को बताया स्वतंत्र यमनी गुट क्या ब्रिक्स से बढ़ेगा भारत का कद? अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का स्थान लगातार बढ़ रहा है। वजह साफ है। जब भी दुनिया पर संकट आया हमेशा भारत ने मदद का हाथ बढ़ाया। खास बात यह भी है कि भारत सिर्फ अपने लिए आवाज नहीं उठाता बल्कि भारत तो विकासशील देशों यानी कि ग्लोबल साउथ की मजबूत आवाज भी बन गया है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे देश भारत को अपने हितों के पैरोकार के तौर पर देखते हैं क्योंकि भारत एक ही समय में अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ यानी कि जैसे क्वाड जैसे संगठन है जिसमें जापान, ऑस्ट्रेलिया भी शामिल है या फिर G7 में भी आमंत्रित देशों के तौर पर सही। लेकिन लगभग हर बार शामिल होता आ रहा है। वहां पर यूरोप के देश भी मौजूद रहते हैं। फ्रांस, जर्मनी, इटली जबकि ब्रिक्स और एससीओ जैसे मंचों पर रूस और चीन के साथ संबंध निभा रहा है भारत। यह संतुलित कूटनीति ही साबित करती है कि भारत स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करता है। साथ ही भारत वैश्विक व्यापार और वित्तीय सुधारों में भी अपनी डिजिटल ताकत का लोहा मनवा रहा है। भारत का यूपीआई डिजिटल भुगतान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लेनदेन को आसान बनाने में बड़ी अहम भूमिका निभा रहा है। क्या चीन से सुलझेगा सीमा विवाद? भारत और चीन दोनों के बीच सीमा विवाद आज का नहीं है बल्कि दशकों पुराना है। दोनों के बीच एक बार जंग भी हो चुकी है 1962 में और दोनों के सैनिकों के बीच कई बार झड़पें भी हुई। डोकलाम गलवान इसका ताजा उदाहरण है। फिर भी चीन के साथ हमारा व्यापार बढ़ता जा रहा है। लेकिन इसमें ज्यादा फायदा चीन को है। भारत को नुकसान है। ऐसे में अगर राष्ट्रपति शनिपिंग भारत आते हैं तो उसमें एलएसी पर शांति और सीमा विवाद सबसे मुख्य मुद्दा हो सकता है। दोनों देश सीमा पर ऐसी व्यवस्था बनाने पर बात कर रहे हैं जिससे किसी सैन्य घटना या तनाव का असर द्विपक्षीय रिश्तों पर ना पड़े। जिनपिंग की संभावित यात्रा से पहले एनएसए अजीत डोभाल सीमा मुद्दे पर 25वें दौर की विशेष प्रतिनिधि वार्ता के लिए बीजिंग जा चुके हैं। वहां पर उनकी चीन के विदेश मंत्री वांग ही से मुलाकात भी हुई और चीन के उपराष्ट्रपति से भी मुलाकात हुई। दोनों देश वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी कि एलएसी पर चीन निर्धारण की प्रक्रिया में जो सीमा का निर्धारण है उसमें तेजी लाने और ठोस नतीजे पाने के लिए सहमत हुए हैं। साथ ही सीमा पर किसी भी तनाव को बढ़ने से रोकने के लिए नए सैन्य संपर्क चैनल और हॉट लाइन स्थापित करने का भी फैसला लिया गया है। हालांकि वर्ष 2020 की गलवान घाटी की घटनाओं के बाद से रिश्तों में खटास आई है। अविश्वास पैदा हुआ है। उसे पूरी तरीके से खत्म करने में भी समय लगेगा। ब्रिक्स (BRICS) के एजेंडे में अहम मिनरल्स (critical minerals) इतने अहम क्यों हो गए हैं? ब्रिक (BRIC) की शुरुआत 2009 में ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन के एक अनौपचारिक समूह के तौर पर हुई थी। यह समूह वित्तीय व्यवस्था में सुधार के मकसद से बना था, जिसे ज़्यादातर लोग पश्चिमी देशों के पक्ष में झुका हुआ मानते थे। 2010 में दक्षिण अफ़्रीका इस समूह में शामिल हुआ, जिसके बाद इसका नाम बदलकर ब्रिक्स (BRICS) कर दिया गया। शुरुआती सालों में, यह समूह मुख्य रूप से मैक्रो-इकोनॉमिक और डेवलपमेंट फ़ाइनेंस से जुड़े मुद्दों पर तालमेल बिठाने वाले मंच के तौर पर काम करता था। इस दिशा में इसकी सबसे ठोस उपलब्धि 2014 में 'न्यू डेवलपमेंट बैंक' की स्थापना थी। 2024 में, ब्रिक्स ने चार नए पूर्ण सदस्य देशों — मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) — को शामिल किया और 2025 में इंडोनेशिया इसका पूर्ण सदस्य बना। ब्रिक्स के सहयोगी देशों में बेलारूस, बोलीविया, क्यूबा, कजाकिस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम शामिल हैं। सऊदी अरब को इस समूह का पूर्ण सदस्य माना जाता है; हालाँकि, देश ने अभी तक इसमें शामिल होने के अपने इरादे की औपचारिक घोषणा नहीं की है, जिससे उसकी स्थिति स्पष्ट नहीं है। अफ्रीका, दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया, पश्चिम एशिया, मध्य एशिया और लैटिन अमेरिका तक फैले इस समूह में दुनिया की 49.5 प्रतिशत आबादी रहती है, और यह वैश्विक जीडीपी का 40 प्रतिशत तथा वैश्विक व्यापार का 26 प्रतिशत हिस्सा है। अगले कुछ सालों में, जैसे-जैसे ब्रिक्स का विस्तार हुआ, इसका एजेंडा भी बढ़ा। इसमें आतंकवाद-रोधी सहयोग, टेलीकम्युनिकेशन, कृषि, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, श्रम, और बहुपक्षीय संगठनों व वित्तीय प्रणालियों में सुधार जैसे मुद्दे शामिल किए गए। रूस की अध्यक्षता में हुए 2024 कज़ान शिखर सम्मेलन में 'क्रिटिकल मिनरल्स' (महत्वपूर्ण खनिज) औपचारिक रूप से ब्रिक्स के एजेंडे का हिस्सा बने। कज़ान शिखर सम्मेलन में जियोलॉजिकल प्लेटफॉर्म बनाने को भी मंज़ूरी दी गई, हालाँकि इसे अभी तक पूरी तरह से लागू नहीं किया गया है। ब्रिक्स सदस्य देशों की 'क्रिटिकल मिनरल वैल्यू चेन' में क्या भूमिका है? ब्रिक्स सदस्य देशों के पास 'क्रिटिकल मिनरल वैल्यू चेन' में खास खूबियां हैं। इनमें एनर्जी ट्रांज़िशन, डिफेंस अपग्रेडेशन, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और डिजिटलाइज़ेशन के लिए ज़रूरी अनछुए भंडार से लेकर मिडस्ट्रीम प्रोसेसिंग, कैपिटल एक्सपेंडिचर और बड़े कंज्यूमर मार्केट तक शामिल हैं। अगर इन खूबियों को एक साथ लाया जाए, तो यह ब्लॉक वैल्यू चेन को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। अभी यह चेन बिखरी हुई है; जिन देशों के पास अनछुए भंडार हैं, उनके पास प्रोसेसिंग की क्षमता नहीं है, जबकि जिन देशों में कंज्यूमर डिमांड और कैपिटल है, उनके पास रिसोर्स की कमी है। ब्रिक्स सदस्य देशों के पास रेयर अर्थ एलिमेंट्स (REE) के बड़े भंडार हैं। इनमें चीन के पास सबसे बड़ा और ब्राज़ील के पास दूसरा सबसे बड़ा भंडार है। साथ ही, इनके पास ग्रेफाइट के भी बड़े भंडार हैं। ब्राज़ील के पास लिथियम और कॉपर के भी काफी भंडार हैं। अकेले इंडोनेशिया दुनिया के निकेल उत्पादन का आधे से ज़्यादा हिस्सा पैदा करता है और कोबाल्ट का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। भारत में REE और ग्रेफाइट का काफ़ी भंडार है। रूस और दक्षिण अफ़्रीका प्लेटिनम ग्रुप की धातुओं के मुख्य उत्पादक हैं। रूस के पास निकेल और तांबे का भी बड़ा भंडार है। ब्रिक्स (BRICS) के सहयोगी देशों के पास भी खनिजों का बड़ा भंडार है। बोलीविया 'लिथियम ट्राएंगल' का हिस्सा है, जिसके पास दुनिया का आधे से ज़्यादा लिथियम भंडार है। साथ ही, कजाकिस्तान में यूरेनियम का सबसे बड़ा भंडार है और वह यूरेनियम का प्रमुख उत्पादक है; इसके अलावा, वह तांबे का भी एक महत्वपूर्ण उत्पादक है। वियतनाम में भी REE और ग्रेफाइट का काफ़ी भंडार है। भारत ज़रूरी मिनरल सप्लाई चेन में कमियों को कैसे दूर कर सकता है? एक भरोसेमंद पार्टनर के तौर पर भारत की पहचान कोई नई बात नहीं है। गुटनिरपेक्ष रहने की परंपरा, 'ग्लोबल साउथ' की आवाज़ बनने का लंबा इतिहास और चीन के उलट, छोटे या गरीब देशों के खिलाफ़ संसाधनों पर निर्भरता का इस्तेमाल कूटनीतिक हथियार के तौर पर न करने का रिकॉर्ड — इन सब वजहों से नई दिल्ली को सिर्फ़ संसाधन निकालने वाली ताकत के बजाय एक डेवलपमेंट पार्टनर के तौर पर देखा जाता है।भारत विकासशील और विकसित दुनिया के बीच एक ईमानदार बातचीत करने वाले देश के तौर पर उभरा है, और यह भूमिका भरोसे पर टिकी है। भारत ने अपनी इस स्थिति का इस्तेमाल जयपुर में ब्रिक्स 2026 ट्रेड मिनिस्टर्स की मीटिंग और नई दिल्ली में ब्रिक्स एनवायरनमेंट मिनिस्टर्स की 12वीं मीटिंग में ज़रूरी मिनरल्स को सहयोग का ज़रिया बनाने के लिए किया है। मंत्रियों की मीटिंग से आगे बढ़कर, भारत लंबे समय से ज़रूरी मिनरल्स को सहयोग का ज़रिया बनाने की वकालत करता रहा है। उसने जियोलॉजिकल प्लेटफ़ॉर्म को पूरी तरह से चालू करने की भी पैरवी की है, जिसके ज़रिए ब्रिक्स देशों के बीच डेटा-शेयरिंग, निकालने की टेक्नोलॉजी और जियोलॉजिकल रिसर्च में सहयोग हो सके।
'अपने कार्यकर्ताओं और जनता को जेल में डलवाना चाहती है कांग्रेस', वंदे मातरम के विरोध पर बोले वीएचपी नेता
BRICS Summit में Modi का शक्ति प्रदर्शन देखकर Pakistan में मची है जबरदस्त खलबली
नई दिल्ली में आयोजित हो रहे 18वें ब्रक्स शिखर सम्मेलन की गूंज वैसे तो पूरी दुनिया में सुनाई दे रही है लेकिन पाकिस्तान के सत्ता और रक्षा प्रतिष्ठान में इसे लेकर जबरदस्त सन्नाटा छाया हुआ है। सन्नाटा इसलिए है क्योंकि शहबाज शरीफ से लेकर असीम मुनीर तक, आसिफ अली जरदारी से लेकर ख्वाजा आसिफ तक और इशाक डार से लेकर पाकिस्तान के अन्य बड़बोले नेताओं तक की नजरें टीवी चैनलों पर लगी हुई हैं और जैसे जैसे वैश्विक नेता एक एक कर दिल्ली की धरती पर उतर रहे हैं वैसे वैसे पाकिस्तान हुक्मरानों का गला सूखता जा रहा है। हम आपको बता दें कि इस्लामाबाद के लिए दिल्ली का यह सम्मेलन इसलिए असहज करने वाला है क्योंकि यहां चीन, ईरान और सऊदी अरब जैसे उसके अपने रणनीतिक साझेदार भी मौजूद हैं। पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्टें दर्शा रही हैं कि इस्लामाबाद की कुटिल नजर भारत-चीन संबंधों के संभावित सुधार पर टिकी हुई हैं। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय से भी बाकायदा चीन-भारत बढ़ती नजदीकी पर सवाल पूछा गया, जिस पर उसने कहा कि चीन के साथ उसकी “all-weather” साझेदारी किसी तीसरे देश के साथ चीन के संबंधों से प्रभावित नहीं होगी। लेकिन यही स्पष्टीकरण बताता है कि सवाल कितना महत्वपूर्ण हो चुका है। इसे भी पढ़ें: ब्रिक्स@20: सपने बड़े, चुनौतियां उससे बड़ी, ब्रिक्स की ‘ब्रिक’ कितनी मजबूत? पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा झटका मोदी-शी जिनपिंग की मुलाकात होने वाली है। सात साल बाद शी जिनपिंग का भारत आना अपने आप में बड़ा संकेत है। सीमा विवाद के बाद दोनों देशों ने धीरे-धीरे संवाद बहाल किया है और अब व्यापार, निवेश, सीमा प्रबंधन तथा रणनीतिक संवाद पर आगे बढ़ने की कोशिश हो रही है। पाकिस्तान के लिए समस्या यह है कि उसकी सुरक्षा रणनीति लंबे समय से इस धारणा पर टिकी रही है कि भारत को दो मोर्चों पर एक साथ दबाव में रखा जा सकता है। लेकिन अगर बीजिंग और नई दिल्ली टकराव से प्रतिस्पर्धी सह-अस्तित्व की ओर बढ़ते हैं, तो इस्लामाबाद का वह रणनीतिक गणित कमजोर पड़ सकता है। साथ ही पाकिस्तान इसलिए भी परेशान है कि यदि भारत और चीन के संबंध सुधरे तो भविष्य के भारत-पाक संघर्ष में बिना बीजिंग के सहयोग के इस्लामाबाद के लिए मैदान में कुछ घंटे टिक पाना भी मुश्किल हो जायेगा। दूसरा मोर्चा मोदी-पुतिन समीकरण है। दोनों नेताओं की बैठक में S-400 की अंतिम यूनिट की डिलीवरी और अगली पीढ़ी के BrahMos पर चर्चा हो रही है। भारत को चार S-400 रेजिमेंट मिल चुकी हैं और पांचवीं की डिलीवरी पर रूस ने अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। पाकिस्तान के लिए यह इसलिए चिंता का विषय है क्योंकि भारत की वायु-रक्षा और लंबी दूरी की मारक क्षमता में रूसी सहयोग उसकी सैन्य गणना को और कठिन बनाता है। आने वाले समय में BrahMos के उन्नत संस्करण और संयुक्त उत्पादन पर बातचीत इस तस्वीर को और गंभीर बना सकती है। हम आपको याद दिला दें कि पिछले साल हुए भारत-पाक सैन्य संघर्ष के दौरान रूस की एस-400 ने पाकिस्तान के लगभग सभी हमलों को निष्क्रिय कर दिया था। उस समय पाकिस्तान ने चीन और तुर्की से रक्षा उपकरण लेकर भारत पर निशाने साधे थे लेकिन एस-400 के आगे कोई नहीं टिक पाया था। ऐसे में पाकिस्तान की नजरें इस बात पर बनी हुई हैं कि भारत और रूस के बीच क्या नये रक्षा समझौते होने जा रहे हैं। पाकिस्तान की तीसरी चिंता सऊदी अरब और चौथी ईरान को लेकर है। BRICS की मेज पर सऊदी अरब और ईरान दोनों हैं, जबकि पश्चिम एशिया अब भी संघर्ष की आग में झुलस रहा है। पाकिस्तान के लिए यह बेहद असहज परिस्थिति है क्योंकि एक तरफ वह सऊदी अरब के साथ अपने सुरक्षा संबंधों को महत्वपूर्ण मानता है, दूसरी तरफ भारत के खाड़ी देशों के साथ रिश्ते लगातार गहरे हो रहे हैं। इसी बीच ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन भारत पहुंचे हैं और मोदी के साथ उनकी द्विपक्षीय वार्ता भी हो रही है। पाकिस्तान की चिंता यहां यह है कि सऊदी अरब के साथ वह हाल ही में मक्का पैक्ट में शामिल हुआ है। ऐसे में यदि भारत और सऊदी अरब के संबंध और मजबूत होते हैं तो मक्का पैक्ट के पैकेट की हवा पूरी तरह निकल जायेगी। साथ ही ईरानी राष्ट्रपति से मोदी की बातचीत के बाद यदि पश्चिम एशिया के हालात में सुधार होता है तो पाकिस्तान की उस पूरी कूटनीतिक कवायद पर पानी फिर जायेगा जिसके तहत कभी अमेरिका और ईरान को इस्लामाबाद बुलाकर वार्ता कराई गयी तो कभी शहबाज शरीफ और असीम मुनीर भागे भागे तेहरान और वाशिंगटन के चक्कर लगाते रहे। साथ ही पाकिस्तान को एक और कारण से बेचैनी हो रही है। दरअसल जिस BRICS में पाकिस्तान सदस्यता चाहता है, उसी मंच की मेजबानी भारत कर रहा है और विस्तार के लिए सर्वसम्मति जरूरी होने के कारण पाकिस्तान की सदस्यता की राह में भारत की आपत्ति निर्णायक बाधा है। हम आपको यह भी बता दें कि इस समय पाकिस्तान के टीवी चैनलों और सोशल मीडिया मंचों पर चल रही डिबेटस में मोदी की सफल कूटनीति का विश्लेषण करने के साथ-साथ शहबाज और मुनीर की जोड़ी की कूटनीतिक विफलताओं पर भी खुलकर चर्चा की जा रही है। बहरहाल, कुल मिलाकर देखें तो दिल्ली का BRICS सम्मेलन इस्लामाबाद को इसलिए भी बहुत ज्यादा असहज कर रहा है क्योंकि यह बदलते दक्षिण एशियाई शक्ति-संतुलन का आईना बनकर उभर रहा है। -नीरज कुमार दुबे
'आकाश आनंद ढूंढ रहे राजनीतिक ठिकाना तो समाजवादी पार्टी में उनका स्वागत', बसपा से निष्कासन पर बोले सपा नेता
ब्रिक्स@20: सपने बड़े, चुनौतियां उससे बड़ी, ब्रिक्स की ‘ब्रिक’ कितनी मजबूत?
कभी चार उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए गढ़ा गया ‘ब्रिक’ आज 11 देशों की बड़ी इमारत बन चुका है। हालांकि किसी भी इमारत की मजबूती उसके आकार से नहीं, नींव से तय होती है। यही सवाल अब ब्रिक्स के सामने है कि क्या यह समूह केवल पश्चिमी प्रभुत्व के विकल्प की तलाश करता राजनीतिक मंच बनेगा या वैश्विक दक्षिण की आर्थिक और विकास संबंधी आकांक्षाओं को ठोस शक्ति में बदल सकेगा? नई दिल्ली में 12-13 सितंबर को भारत मंडपम में हो रहा 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन इस सवाल के लिहाज से महत्वपूर्ण है। भारत की अध्यक्षता में हो रहा यह सम्मेलन ब्रिक्स की स्थापना के 20 वर्ष पूरे होने का भी साक्षी है। इसलिए यह केवल वार्षिक बैठक नहीं बल्कि दो दशक की यात्रा के मूल्यांकन और अगले चरण की दिशा तय करने का अवसर है। ब्रिक्स की शुरुआत मूलतः एक आर्थिक अवधारणा के रूप में हुई थी। 2001 में गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने ब्राजील, रूस, भारत और चीन की आर्थिक संभावनाओं को रेखांकित करते हुए ‘BRIC’ शब्द गढ़ा। तब यह निवेश विश्लेषण की शब्दावली थी लेकिन जल्द ही इन देशों ने महसूस किया कि उनकी समानता केवल तेज आर्थिक वृद्धि तक सीमित नहीं है बल्कि वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व और अंतरराष्ट्रीय शासन व्यवस्था में असंतुलन भी उनकी साझा चिंता है। 2006 में चारों देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक और 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में पहला शिखर सम्मेलन इस अवधारणा को औपचारिक अंतर-सरकारी मंच में बदलने की निर्णायक कड़ियां बने। 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट ने इस प्रक्रिया को और बल दिया। पश्चिमी वित्तीय व्यवस्था की कमजोरियों ने उभरती अर्थव्यवस्थाओं को यह सवाल उठाने का अवसर दिया कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ते योगदान के अनुरूप वैश्विक संस्थाओं में उनकी हिस्सेदारी क्यों न बढ़े। इसे भी पढ़ें: एक या दो नहीं, चारों दिशाओं में अपनी पहुंच मजबूत कर रहा है भारत, Global Politics के भी जबरदस्त खिलाड़ी बने Modi दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद 2011 में ‘BRIC’ का ‘BRICS’ बनना इसके विस्तार का पहला बड़ा पड़ाव था। इसके बाद 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात तथा 2025 में इंडोनेशिया के पूर्ण सदस्य बनने से समूह 11 देशों तक पहुंच गया। साझेदार देशों की बढ़ती संख्या ने इसका दायरा और व्यापक कर दिया है। अब ब्रिक्स एशिया, अफ्रीका, मध्य-पूर्व और दक्षिण अमेरिका की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं को एक मंच पर लाता है। यह विस्तार केवल संख्या नहीं है, इसके साथ बाजार, ऊर्जा, संसाधन, जनसंख्या और रणनीतिक प्रभाव भी बढ़ा है लेकिन यही विस्तार ब्रिक्स की सबसे बड़ी चुनौती भी है। अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं, आर्थिक संरचनाओं और विदेश नीति की प्राथमिकताओं वाले 11 देशों के बीच साझा एजेंडा बनाना पहले की तुलना में कहीं कठिन है। भारत-चीन की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा, रूस की भू-राजनीतिक स्थिति और पश्चिम एशिया के तनाव इसके सामने जटिल समीकरण पैदा करते हैं यानी ब्रिक्स की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता है और यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी बन सकती है। भारत ने 2026 की अध्यक्षता के लिए ‘लचीलापन, नवाचार, सहयोग और सततता के लिए निर्माण’ की थीम चुनकर इसी चुनौती का व्यावहारिक उत्तर देने की कोशिश की है। ‘मानवता प्रथम’ की भावना से जुड़ा यह दृष्टिकोण ब्रिक्स को भू-राजनीतिक नारों से निकालकर विकास के ठोस एजेंडे से जोड़ता है। भारत की अध्यक्षता में 25 से अधिक शहरों में 350 से अधिक बैठकें और उच्चस्तरीय कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। राजनीतिक एवं सुरक्षा, आर्थिक एवं वित्तीय तथा सांस्कृतिक एवं जन-से-जन संपर्क इसके तीन प्रमुख स्तंभ रहे हैं। अब असली परीक्षा यह है कि इन बैठकों के निष्कर्ष कितने ठोस परिणामों में बदलते हैं। ब्रिक्स की आर्थिक प्रासंगिकता का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा-पार भुगतान है। डॉलर की भूमिका कम करने की चर्चा लंबे समय से होती रही है लेकिन साझा ब्रिक्स मुद्रा निकट भविष्य में व्यावहारिक लक्ष्य नहीं दिखती। सदस्य देशों की मौद्रिक नीतियां, आर्थिक संरचनाएं और वित्तीय बाजार काफी अलग हैं। इसलिए अधिक यथार्थवादी रास्ता यह है कि स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़े, भुगतान प्रणालियां आपस में जुड़ें और सीमा-पार लेन-देन की लागत घटे। यहीं भारत का डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का अनुभव महत्वपूर्ण हो जाता है। यूपीआई, डिजिटल पहचान और खुले डिजिटल ढ़ांचे ने भारत में कम लागत पर बड़े पैमाने पर वित्तीय समावेशन को संभव बनाया है। यदि ऐसे मॉडलों को ब्रिक्स देशों के बीच सुरक्षित और अंतर-संचालनीय तरीके से जोड़ा जा सके तो यह केवल तकनीकी सहयोग नहीं होगा बल्कि विकासशील देशों के लिए व्यापार और वित्त का नया आधार तैयार कर सकता है। न्यू डेवलपमेंट बैंक इस दिशा में ब्रिक्स की सबसे ठोस संस्थागत उपलब्धियों में है। 2014 में स्थापित इस बैंक ने यह दिखाया कि ब्रिक्स केवल वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में सुधार की मांग करने वाला समूह नहीं, विकासशील देशों की जरूरतों के लिए वैकल्पिक वित्तीय क्षमता बनाने वाला मंच भी हो सकता है। आगे स्थानीय मुद्रा वित्तपोषण, बुनियादी ढ़ांचे और सतत विकास में इसकी भूमिका और महत्वपूर्ण हो सकती है। ब्रिक्स का एजेंडा अब वित्त तक सीमित नहीं है। खाद्य, ऊर्जा और स्वास्थ्य सुरक्षा भी इसकी प्राथमिकताओं में हैं। महामारी ने चिकित्सा आपूर्ति श्रृंखलाओं की कमजोरियां उजागर की जबकि युद्धों और भू-राजनीतिक तनावों ने ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा के जोखिम बढ़ाए हैं। महत्वपूर्ण खनिजों, ऊर्जा, उर्वरक, दवाओं और कृषि तकनीक की विश्वसनीय आपूर्ति श्रृंखलाएं बनाने में सहयोग ब्रिक्स को वास्तविक आर्थिक ताकत दे सकता है। प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता इसका अगला निर्णायक क्षेत्र है। डिजिटल कृषि, भू-स्थानिक तकनीक और एआई का इस्तेमाल छोटे किसानों की उत्पादकता और खाद्य सुरक्षा बढ़ाने में किया जा सकता है। इसी तरह स्टार्टअप, एमएसएमई और डिजिटल कौशल के क्षेत्र में सहयोग उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच नई आर्थिक कड़ियां बना सकता है। लेकिन ब्रिक्स की असली पहचान आर्थिक परियोजनाओं से भी आगे तय होगी। सवाल यह है कि क्या यह पश्चिम-विरोधी गठबंधन बनेगा? ब्रिक्स की ताकत किसी दूसरे शक्ति-गुट का प्रतिरूप बनने में नहीं, बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को अधिक प्रतिनिधिक बनाने में है। वैश्विक दक्षिण की आवाज को प्रभावी बनाने का अर्थ पश्चिम से टकराव नहीं, वैश्विक निर्णय-प्रक्रिया में अधिक संतुलित भागीदारी सुनिश्चित करना है। यहीं भारत की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत एक ओर अमेरिका, यूरोप और जापान के साथ अपने रणनीतिक एवं आर्थिक संबंध मजबूत कर रहा है तो दूसरी ओर रूस, चीन और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ ब्रिक्स में सक्रिय है। यह विरोधाभास नहीं, भारत की बहु-संरेखीय कूटनीति की वास्तविकता है। ब्रिक्स भारत को चीन के साथ मतभेदों के बावजूद संवाद का मंच देता है और साथ ही वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ अपनी नेतृत्वकारी भूमिका मजबूत करने का अवसर भी। इसलिए नई दिल्ली शिखर सम्मेलन की सफलता घोषणापत्र की लंबाई से नहीं, उसके क्रियान्वयन से मापी जानी चाहिए। क्या सीमा-पार भुगतान सस्ता और आसान होगा? क्या व्यापारिक बाधाएं घटेंगी? क्या एमएसएमई को नए बाजार और वित्त मिलेगा? क्या डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना साझा होगी? क्या ऊर्जा, खाद्य और स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए भरोसेमंद तंत्र बनेंगे? और क्या ब्रिक्स वैश्विक वित्तीय एवं राजनीतिक संस्थाओं में सुधार के लिए साझा और प्रभावी आवाज बन सकेगा? दो दशक पहले ‘ब्रिक’ एक आर्थिक अनुमान था। आज ‘ब्रिक्स’ बदलती विश्व व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण वास्तविकता है। मगर आर्थिक भार अपने आप सामूहिक शक्ति में नहीं बदलता, उसके लिए संस्थागत क्षमता, आपसी विश्वास, व्यावहारिक सहयोग और साझा हितों की पहचान जरूरी है। इसलिए ब्रिक्स की ‘ब्रिक’ कितनी मजबूत है, इसका उत्तर उसके 11 सदस्यों की संख्या में नहीं, उनके बीच बनने वाली परस्पर निर्भरता में छिपा है। यदि यह समूह व्यापार को आसान बनाता है, विकास के लिए वित्त उपलब्ध कराता है, तकनीकी समाधान साझा करता है और वैश्विक दक्षिण को निर्णय-निर्माण में अधिक प्रभावी आवाज देता है तो इसकी नींव मजबूत मानी जाएगी। भारत के सामने इस अवसर को आकार देने की बड़ी जिम्मेदारी है। उसे ब्रिक्स को किसी देश या शक्ति के विरुद्ध खड़ा करने के बजाय विकास, सहयोग और बहुधु्रवीयता का व्यावहारिक मंच बनाना होगा। तब ब्रिक्स केवल 11 देशों की इमारत नहीं रहेगा बल्कि ऐसी विश्व व्यवस्था की आधारशिला बन सकता है, जिसमें वैश्विक दक्षिण दर्शक नहीं, बल्कि निर्णय का सक्रिय भागीदार हो। - योगेश कुमार गोयल (लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)
दिल्ली इस समय दुनिया की कूटनीति का नया केंद्र बन गई है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए एक के बाद एक दुनिया के प्रमुख नेता भारत पहुंच रहे हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी द्विपक्षीय मुलाकातों का लंबा सिलसिला यह बताने के लिए काफी है कि भारत की वैश्विक भूमिका अब कितनी तेजी से बढ़ रही है। रूस से लेकर चीन, ईरान से लेकर खाड़ी देशों और अफ्रीका से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक, इन मुलाकातों के जरिए भारत एक साथ कई मोर्चों पर अपने रिश्तों को मजबूत कर रहा है। यह केवल नेताओं की मुलाकात नहीं, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की बढ़ती ताकत, उसकी स्वतंत्र विदेश नीति और अपनी शर्तों पर सभी प्रमुख शक्तियों के साथ संबंध बनाए रखने की रणनीति का स्पष्ट संकेत है। इन मुलाकातों की शुरुआत 11 सितंबर यानि आज रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ होगी। रूस भारत का पुराना और भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार है। ऐसे समय में जब रूस और पश्चिम के बीच तनाव बना हुआ है, पुतिन के साथ मोदी की बातचीत का महत्व और बढ़ जाता है। रक्षा सहयोग, ऊर्जा, परमाणु क्षेत्र, अंतरिक्ष और यूरेशियाई भू-राजनीति जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के रिश्ते भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का महत्वपूर्ण आधार हैं। इसे भी पढ़ें: रूस-भारत संबंध नई ऊंचाइयों पर इसके बाद ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस से मुलाकातें होंगी। ईरान के साथ संवाद पश्चिम एशिया में भारत के हितों, ऊर्जा सुरक्षा और चाबहार बंदरगाह जैसे संपर्क-साधनों के लिहाज से अहम है। वहीं गुटेरेस के साथ बातचीत यह संकेत देती है कि भारत वैश्विक संस्थाओं में सुधार और विकासशील देशों की आवाज को मजबूत करने के सवाल पर अपनी भूमिका को और मुखर करना चाहता है। 12 सितंबर का कार्यक्रम भारत की ‘एक साथ कई मोर्चों पर साझेदारी’ वाली रणनीति को स्पष्ट करता है। इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबीय अहमद अली, मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम, अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान और वियतनाम के प्रधानमंत्री ले मिन्ह हंग के साथ बैठकें भारत के लिए अफ्रीका, आसियान, खाड़ी और हिंद-प्रशांत, चारों दिशाओं में अपनी पहुंच मजबूत करने का अवसर हैं। खासकर वियतनाम और मलेशिया के साथ संबंध हिंद-प्रशांत में भारत की सक्रियता तथा समुद्री सुरक्षा के संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं। इसी दिन राष्ट्रपति पेजेशकियन की राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति से मुलाकात भी भारत-ईरान संबंधों की व्यापकता को रेखांकित करती है। लेकिन सबसे अधिक निगाहें शाम को होने वाली प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बैठक पर रहेंगी। भारत-चीन संबंधों में सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच शीर्ष स्तर की बातचीत यह संदेश देती है कि भारत प्रतिस्पर्धा के बावजूद संवाद के रास्ते बंद नहीं करना चाहता। यह ‘प्रतिस्पर्धा के साथ सह-अस्तित्व और संवाद’ वाली व्यावहारिक कूटनीति का संकेत है। 13 सितंबर को कजाखस्तान, फिलीपींस, मिस्र और दक्षिण अफ्रीका के नेताओं के साथ बातचीत इस रणनीति को और व्यापक बनाती है। कजाखस्तान भारत के लिए मध्य एशिया तक पहुंच का महत्वपूर्ण द्वार है, फिलीपींस हिंद-प्रशांत में समुद्री साझेदारी की दृष्टि से अहम है, जबकि मिस्र स्वेज नहर और पश्चिम एशिया-अफ्रीका के बीच भारत की कनेक्टिविटी के लिए महत्वपूर्ण है। दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा के साथ संवाद भारत-अफ्रीका साझेदारी और ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने के लिहाज से विशेष महत्व रखता है। बुरुंडी, नाइजीरिया और युगांडा के शीर्ष नेतृत्व के साथ मुलाकातें भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। ये बैठकें बताती हैं कि भारत अफ्रीका को केवल व्यापारिक बाजार के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य की वैश्विक राजनीति में एक महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में देख रहा है। देखा जाये तो इन द्विपक्षीय बैठकों का सबसे बड़ा संदेश यही है कि भारत किसी एक शक्ति-गुट के साथ खड़े होने के बजाय सभी प्रमुख शक्ति केंद्रों के साथ अपने हितों के आधार पर संबंधों को संतुलित करने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है। रूस से रक्षा और ऊर्जा, ईरान से कनेक्टिविटी, खाड़ी से निवेश और ऊर्जा, चीन से संवाद, आसियान से हिंद-प्रशांत सहयोग और अफ्रीका से ग्लोबल साउथ की साझेदारी, इन सभी को एक साथ साधने की कोशिश दिखाई देती है। यही भारत की सामरिक स्वायत्तता का नया रूप है। दिल्ली में होने वाली ये मुलाकातें दुनिया को यह संदेश देंगी कि भारत अब केवल वैश्विक व्यवस्था का सहभागी नहीं, बल्कि उसके स्वरूप और दिशा को प्रभावित करने वाली एक निर्णायक शक्ति बनने की ओर बढ़ रहा है। -नीरज कुमार दुबे
कांग्रेस फैला रही 'ब्रिक्स' को लेकर नकारात्मकता: संबित पात्रा
नई दिल्ली, भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और लोकसभा सांसद संबित पात्रा ने ब्रिक्स समिट को लेकर कांग्रेस समेत विपक्षी दलों पर निशाना साधा है।
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ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए दिल्ली में 15,000 पुलिसकर्मी तैनात
राजधानी दिल्ली में आगामी 12 और 13 सितंबर को आयोजित होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को ध्यान में रखते हुए सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं
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ब्रिक्स 2026 समिट पूर्व रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भारत आगामी दौरे से काफी उम्मीदें हैं, और इस पर तेज़ी से काम चल रहा है। भारत अपनी 2026 की अध्यक्षता के तहत 18वें ब्रिक्स समिट की मेज़बानी कर रहा है। यह समिट 12-13 सितंबर, 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में होना तय है। राष्ट्रपति पुतिन के मुख्य समिट से एक दिन पहले, 11 सितंबर को नई दिल्ली पहुँचने की उम्मीद है। उनके दौरे में हैदराबाद हाउस में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक खास द्विपक्षीय बैठक होगी, जिसमें कई रणनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर चर्चा की जाएगी। यह एक साल से भी कम समय में पुतिन का दूसरा दौरा होगा- पिछला दौरा दिसंबर 2025 में 23वें भारत-रूस वार्षिक समिट के लिए हुआ था। भारत ‘अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय’ (आईसीसी) का सदस्य नहीं है; इसलिए गिरफ्तारी वारंट का मुद्दा, जैसा कि 2023 में दक्षिण अफ्रीका में हुआ था, यहाँ लागू नहीं होता। द्विपक्षीय एजेंडा में कई अहम क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किए जाने की उम्मीद है: रक्षा और परमाणु ऊर्जा: क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने पुष्टि की: भारत को एडवांस्ड सू-57 फाइटर जेट्स की बिक्री एजेंडा में सबसे ऊपर होगी। पेस्कोव ने मंगलवार को नई दिल्ली में ब्रिक्स नेताओं के समिट से पहले भारतीय पत्रकारों के साथ एक वर्चुअल बातचीत में यह बात कही। अमका में देरी के बाद भारतीय वायु सेना दो स्क्वाड्रन पर विचार कर रहा है। चर्चा में भारत को 5वीं पीढ़ी के सू-57 फाइटर एयरक्राफ्ट के अलावा एस-500 सिस्टम की संभावित बिक्री भी शामिल होने की उम्मीद है। इसके अलावा, रूस नए परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने पर भारत के साथ बातचीत का इंतज़ार कर रहा है। इसे भी पढ़ें: हालिया टकराव के बाद Iran और खाड़ी देशों का BRICS में होगा आमना-सामना, अब मोदी की कूटनीति देखेगी दुनिया व्यापार और वित्तीय सहयोग: दोनों देशों के पश्चिमी प्रतिबंधों के असर को कम करने के लिए राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने पर ज़ोर देने की उम्मीद है। रूसी अधिकारियों ने बताया है कि ब्रिक्स देशों के साथ उनके 90 प्रतिशत तक लेन-देन अब राष्ट्रीय मुद्राओं में किए जाते हैं, जो वित्तीय मज़बूती की दिशा में एक कदम है। द्विपक्षीय व्यापार का लक्ष्य $100 बिलियन है। रेयर अर्थ (दुर्लभ खनिजों) की खोज में सहयोग भी एजेंडा में शामिल है। भारत को सेमीकंडक्टर के लिए इनकी ज़रूरत है। रूस के पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा भंडार है, जबकि भारत के पास वैश्विक भंडार का लगभग सात प्रतिशत हिस्सा है। रूस रेयर अर्थ खनिजों की खोज में भारत की मदद कर सकता है। टेक्नोलॉजी और मैन्युफैक्चरिंग: पेमेंट की दिक्कतों के कारण भारत-रूस व्यापार $65 बिलियन पर अटका हुआ है, क्योंकि रूस को डॉलर इम्पोर्ट करने की इजाज़त नहीं है। रूस और ब्रिक्स के बीच अब लगभग 90% लेन-देन नेशनल करेंसी में हो रहा है, और रुपये के सरप्लस (अतिरिक्त) का मुद्दा धीरे-धीरे सुलझाया जा रहा है। रुपये का वह ढेर - रूस के पास भारतीय बैंकों में लगभग $8 बिलियन अतिरिक्त रुपये पड़े हैं जिनका वह इस्तेमाल नहीं कर सकता - मुख्य मुद्दों में से एक होगा। समिट से पहले, भारतीय इंडस्ट्रियल एजेंसियां मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में गहरे संबंधों के लिए माहौल तैयार कर रही हैं। समिट के दौरान, भारत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग, क्वांटम टेक्नोलॉजी और सेमीकंडक्टर रिसर्च में सरकार और रिसर्च के स्तर पर करीबी सहयोग को बढ़ावा देने की उम्मीद कर रहा है। भू-राजनीतिक पहलू भू-राजनीतिक नज़रिए से, यह दौरा भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के प्रति प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है। नई दिल्ली रूस पर अपनी पारंपरिक रक्षा और ऊर्जा निर्भरता को संतुलित करते हुए अमेरिका के साथ सहयोग को गहरा कर रही है और व्यापक क्षेत्रीय स्थितियों को भी संभाल रही है। इसके अलावा, राष्ट्रपति पुतिन मोदी को यूक्रेन युद्ध की मौजूदा स्थिति के बारे में जानकारी देंगे - भारत को फिर से एक संभावित मध्यस्थ के रूप में देखा जा रहा है। मॉस्को ने यूक्रेन संघर्ष का शांतिपूर्ण समाधान खोजने के प्रयासों में योगदान देने की भारत की इच्छा का सार्वजनिक रूप से स्वागत किया है, जिससे राजनयिक बातचीत में एक सकारात्मक माहौल बना है। ट्रंप प्रशासन ने भारत को रूसी तेल खरीदने (50% टैरिफ की धमकी) के बारे में चेतावनी दी है, लेकिन भारत की ऊर्जा ज़रूरतें ज़्यादा अहम हैं। अमेरिका इस समिट पर बारीकी से नज़र रखेगा क्योंकि इसमें डी-डॉलराइज़ेशन पर चर्चा हो सकती है - पेस्कोव पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं: रूस डी-डॉलराइज़ेशन नहीं चाहता; अमेरिका ने खुद डॉलर को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया है। भारत की 2026 ब्रिक्स अध्यक्षता की थीम, मज़बूती, इनोवेशन, सहयोग और सस्टेनेबिलिटी के लिए निर्माण के तहत, समिट 11-सदस्यीय समूह में व्यावहारिक सहयोग को बढ़ाने पर भी ध्यान केंद्रित करेगा। इसमें डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को आगे बढ़ाना, क्लाइमेट एक्शन और प्रस्तावित ग्लोबल रिसर्च एडवांस्ड इंफ्रास्ट्रक्चर नेटवर्क (GRAIN) जैसी मल्टीलेटरल पहल शामिल हैं, जो सदस्य देशों के बीच हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग संसाधनों को साझा करेंगी। निष्कर्ष राष्ट्रपति पुतिन का आगामी दौरा रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, जिसका उद्देश्य रक्षा, ऊर्जा और उभरती टेक्नोलॉजी के क्षेत्रों में भारत-रूस साझेदारी को मज़बूत करना है, और यह सब मज़बूत और विस्तारित होते ब्रिक्स गठबंधन के व्यापक ढांचे के भीतर हो रहा है। यह सिर्फ ब्रिक्स का एक औपचारिक दौरा नहीं है; यह ब्रिक्स के भीतर एक छोटा भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन है। 11 तारीख को ही बड़ी घोषणाओं की उम्मीद की जा सकती है। - प्रोफ़ेसर (डॉ.) डी.के. पांडेय विज़िटिंग सीनियर फ़ेलो, सेंटर फ़ॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज़, एडजंक्ट प्रोफ़ेसर, राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय, सलाहकार, एकेडमिक काउंसिल, फ़ॉरेन पॉलिसी स्कूल और GNOIT, पूर्व एसोसिएट डीन, SoB, गलगोटिया विश्वविद्यालय।
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मौत का इंतजार करती इमारतें और गहरी नींद सोता प्रशासन
दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के सत्य निकेतन में जो हृदयविदारक घटना घटित हुई है, वह केवल एक पांच मंजिला इमारत के भरभराकर गिरने की घटना नहीं बल्कि राजधानी की उस व्यवस्था का ढ़हना है, जिसकी नींव नागरिकों की सुरक्षा, कानून के शासन और प्रशासनिक जवाबदेही पर टिकी होनी चाहिए थी। जिस इमारत में कुछ घंटे पहले तक देश के अलग-अलग हिस्सों से आए युवा अपने भविष्य के सपने बुन रहे थे, देखते ही देखते वह ईंट, सीमेंट और लोहे के मलबे में बदल गई। धूल का गुबार तो छंट जाएगा, मलबा भी हट जाएगा, सड़कें फिर सामान्य हो जाएंगी लेकिन उन परिवारों के जीवन में जो शून्य पैदा हुआ है, वह कभी नहीं भर सकेगा। ‘हॉस्टल डेज’ नामक लड़कों के लिए बने पीजी की इस पांच मंजिला इमारत में हादसे के वक्त कई छात्र अपने कमरों में थे, जिनके मलबे में दबे होने की आशंका है। बताया जा रहा है कि इमारत लगभग 40-50 वर्ष पुरानी थी और हादसे के समय बेसमेंट में मरम्मत तथा खुदाई का काम चल रहा था। यही तथ्य इस त्रासदी को और भयावह बना देता है। सवाल केवल यह नहीं है कि इमारत क्यों गिरी बल्कि असली सवाल यह है कि इतनी पुरानी और संवेदनशील इमारत में बेसमेंट की खुदाई और निर्माण संबंधी गतिविधियां आखिर चल कैसे रही थी? हर बड़े भवन हादसे के बाद एक ही कहानी दोहराई जाती है। प्रशासन कहता है कि जांच होगी, कुछ छोटे अधिकारियों पर कार्रवाई होती है और कुछ दिनों बाद पूरा मामला फाइलों के नीचे दब जाता है। फिर किसी दूसरे इलाके में कोई और इमारत गिरती है, कहीं आग लगती है, कोई बेसमेंट मौत का कुआं बन जाता है और हम फिर वही प्रश्न पूछते रह जाते हैं कि आखिर जिम्मेदार कौन है? सच तो यह है कि भारत के शहरों में कोई बहुमंजिला अवैध निर्माण रातों-रात खड़ा नहीं होता। जमीन का उपयोग बदलता है, नक्शा बनता है, निर्माण शुरू होता है, मंजिलें बढ़ती हैं, बिजली-पानी के कनेक्शन मिलते हैं और अंततः उस इमारत में व्यावसायिक गतिविधियां शुरू हो जाती हैं। इस पूरी प्रक्रिया में अनेक विभागों और अधिकारियों की भूमिका होती है। ऐसे में यह कहना कि प्रशासन को कुछ पता ही नहीं था, जिम्मेदारी से बचने का सबसे आसान बहाना है। इसे भी पढ़ें: सत्य निकेतन हादसा: जिम्मेदार अधिकारियों पर हो ठोस कार्रवाई यदि कोई इमारत नियमों के विरुद्ध बन रही थी तो निर्माण के दौरान संबंधित नगर निगम अधिकारी कहां थे? यदि वहां व्यावसायिक गतिविधियां चल रही थी तो फायर विभाग ने सुरक्षा का आकलन क्यों नहीं किया? बिजली और पानी के कनेक्शन किस आधार पर मिले? पुलिस और स्थानीय प्रशासन की नजर उस भवन पर क्यों नहीं पड़ी? और यदि सब कुछ नियमों के अनुसार था तो फिर हादसा हुआ कैसे? यही वे प्रश्न हैं, जिनका जवाब केवल ठेकेदार या किसी छोटे कर्मचारी को दोषी ठहराकर नहीं दिया जा सकता। सत्य निकेतन की त्रासदी इसलिए भी गंभीर है क्योंकि दिल्ली में पीजी संस्कृति तेजी से बढ़ी है। देशभर से राजधानी में पढ़ने, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने और रोजगार तलाशने आने वाले हजारों युवा ऐसी इमारतों में रहते हैं, जहां कमरे छोटे हैं, गलियां संकरी हैं, सीढ़ियां संकरी हैं और सुरक्षा मानकों की स्थिति अक्सर संदिग्ध रहती है। मकान मालिक के लिए कमरों की संख्या बढ़ाना कारोबार है लेकिन उस कमरे में रहने वाला छात्र अपने सपने लेकर वहां आता है। जब छह कमरों की अनुमति वाली इमारत में 25 से अधिक कमरे बना दिए जाते हैं, जब बेसमेंट को पार्किंग के बजाय व्यावसायिक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जब एक ही निकास मार्ग पर सैंकड़ों लोगों की सुरक्षा निर्भर कर दी जाती है, तब यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं रहता, यह मानव जीवन के साथ खिलवाड़ बन जाता है। दिल्ली में अतीत की त्रासदियां भी हमें बार-बार चेताती रही हैं। 1997 का उपहार सिनेमा अग्निकांड हो या हाल के वर्षों में सामने आए बेसमेंट, कोचिंग सेंटर और व्यावसायिक इमारतों से जुड़े हादसे, हर घटना के बाद सुरक्षा मानकों पर सवाल उठे। बंद दरवाजे, अवरुद्ध निकास, अवैध निर्माण, अग्निशमन उपकरणों की अनुपलब्धता और प्रशासनिक उदासीनता बार-बार त्रासदियों की पृष्ठभूमि में दिखाई देती रही है। फिर भी व्यवस्था की स्मृति इतनी कमजोर है कि कुछ दिनों बाद सब कुछ फिर पुराने ढ़र्रे पर लौट आता है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि सस्पेंशन हमेशा छोटे कर्मचारी का ही क्यों होता है? यदि किसी इलाके में वर्षों तक अवैध निर्माण चलता रहा, यदि नियमों के विपरीत इमारतें खड़ी होती रही और उनमें पीजी, कोचिंग सेंटर, दुकानें या अन्य व्यावसायिक गतिविधियां चलती रही तो उस पूरे प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही तय होनी चाहिए, जिसने इसे होने दिया। तत्कालीन अवैध निर्माण प्रभारी, संबंधित वरिष्ठ अधिकारी, जोनल स्तर के जिम्मेदार अधिकारी और संबंधित विभागों की भूमिका की निष्पक्ष जांच क्यों न हो? यदि मिलीभगत प्रमाणित होती है तो कार्रवाई भी उसी अनुपात में कठोर क्यों न हो? समस्या किसी एक इमारत की नहीं है। दिल्ली और देश के तमाम शहरों में हजारों ऐसी इमारतें हैं, जो बाहर से सामान्य दिखाई देती हैं लेकिन भीतर से मौत के जाल में बदल चुकी हैं। कहीं बेसमेंट में अवैध निर्माण है, कहीं बिना वेंटिलेशन के कोचिंग सेंटर, कहीं संकरी सीढ़ियां, कहीं बंद खिड़कियां, कहीं लोहे की ग्रिलें और कहीं एक ही प्रवेश-निकास द्वार। अग्निशमन उपकरण कई जगह केवल निरीक्षण के समय दिखाने के लिए रखे जाते हैं और आपातकालीन निकास कागजों पर मौजूद रहते हैं, वास्तविकता में नहीं। ऐसी स्थिति में हादसा होने पर दमकल की गाड़ियां भी संकरी गलियों में फंस जाती हैं। बचाव दल के पास पहुंचने का रास्ता नहीं होता और अंदर फंसे लोगों के पास बाहर निकलने का रास्ता नहीं होता। फिर कुछ ही मिनटों में एक इमारत कब्रिस्तान में बदल जाती है। अब जरूरत केवल दोषी खोजने की नहीं, व्यवस्था बदलने की है। दिल्ली की सभी पुरानी बहुमंजिला और व्यावसायिक इमारतों का व्यापक सुरक्षा ऑडिट होना चाहिए। पीजी, हॉस्टल, कोचिंग सेंटर और बेसमेंट में संचालित व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की अनिवार्य जांच होनी चाहिए। फायर एनओसी की प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल, पारदर्शी और समयबद्ध हो। अवैध निर्माण पर केवल जुर्माना लगाकर उसे वैध बनाने की प्रवृत्ति समाप्त होनी चाहिए। गंभीर उल्लंघन वाली इमारतों को तत्काल सील और आवश्यकतानुसार ध्वस्त किया जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण यह कि जिम्मेदारी ऊपर तक जानी चाहिए। किसी दुर्घटना के बाद दो-चार छोटे कर्मचारियों को निलंबित कर देना प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, अक्सर जिम्मेदारी से बचने का तरीका बन जाता है। यदि किसी अधिकारी की लापरवाही, मिलीभगत या भ्रष्ट आचरण के कारण लोगों की जान जोखिम में पड़ी है तो उसके विरुद्ध कठोर आपराधिक कार्रवाई होनी चाहिए। पद जितना बड़ा हो, जवाबदेही भी उतनी ही बड़ी होनी चाहिए। सत्य निकेतन का मलबा केवल ईंट-पत्थरों का ढ़ेर नहीं है। उसके नीचे प्रशासनिक दावों की विश्वसनीयता, भवन सुरक्षा के नियमों और नागरिकों के भरोसे की भी परीक्षा हो रही है। इस त्रासदी को ‘हादसा’ कहकर आगे बढ़ जाना सबसे बड़ा अपराध होगा। हादसा वह होता है, जिसे रोका न जा सके लेकिन जिस दुर्घटना की जमीन अवैध निर्माण, नियमों की अनदेखी, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही से तैयार होती है, उसे केवल हादसा कहना सच्चाई को छोटा करना है। यदि इस बार भी जांच के नाम पर खानापूर्ति हुई, छोटे कर्मचारियों पर गाज गिराकर बड़े जिम्मेदार बच निकले और कुछ लाख रुपये के मुआवजे को न्याय का विकल्प बना दिया गया तो अगली त्रासदी केवल समय की प्रतीक्षा करेगी। तब फिर कोई इमारत गिरेगी, कोई परिवार उजड़ेगा, कोई बच्चा मलबे में दबेगा और हम फिर पूछेंगे कि आखिर असली गुनहगार कौन है? जबकि सच हम सभी जानते होंगे। गुनहगार केवल वह व्यक्ति नहीं होगा, जिसने अवैध निर्माण किया बल्कि गुनहगार वह पूरा तंत्र होगा, जिसने उसे बनने दिया, चलने दिया और तब तक आंखें बंद रखी, जब तक मलबे ने चीखना शुरू नहीं कर दिया। अब समय चीख सुनने का नहीं, व्यवस्था को जवाबदेह बनाने का है। - योगेश कुमार गोयल (लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)
जानबूझकर विपक्ष खराब कर रहा देश की छवि
पश्चिमी एशिया और रूस-यूक्रेन की लड़ाई के चलते दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाएं हिचकोले खा रहीं हैं। ऐसे में जब यह आंकड़ा आए कि देश की जीडीपी की विकासदर 7.8 प्रतिशत रही है तो अव्वल तो खुशी का माहौल होना चाहिए था। लेकिन इसे लेकर विवाद खड़ा हो गया है। विवाद की बुनियाद बना है पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग का दावा। उनका कहना है कि जीडीपी आधार को 86 लाख करोड़ से घटाकर 80 लाख करोड़ कर दिया है। इस लिहाज से यह दर शून्य से लेकर 2.6 प्रतिशत तक ही बैठती है। सरकार के आंकड़ों की कोई पूर्व रसूखदार अधिकारी खिल्ली उड़ाए और उसे विपक्ष न ले उड़ता तो हैरत ही होती। लेकिन ऐसा हो रहा है। इसकी वजह यह है कि मौजूदा राजनीतिक माहौल में सरकार और विपक्ष के बीच बढ़ी वैचारिक खाई निजी खुन्नस और दुश्मनी तक पहुंच गई है। इस वजह से दोनों ही पक्षों में एक-दूसरे को लेकर भरोसे का रिश्ता नहीं रह गया है। यही वजह है कि देश को जोड़ने और आगे बढ़ाने वाले जब भी कोई मुद्दा या आंकड़ा सामने आता है, विपक्ष उसकी विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़े करने लगता है। ऐसा नहीं कि अतीत में विपक्ष सरकार को नहीं घेरता रहा है। लेकिन तब भी यह ध्यान रखा जाता था कि राष्ट्रीय हितों और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को लेकर ऐसे कदम न उठाए जाएं या ऐसे बयान न दिए जाएं, जिससे देश की छवि पर आंच पहुंचे। अगर ऐसा नहीं होता तो मानवाधिकार के मामले पर नेता प्रतिपक्ष पाकिस्तान की मुखालफत करने के लिए जेनेवा जाने वाले सरकारी दल की अगुआई नहीं करता। पीवी नरसिंह राव की सरकार ने तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष अटल बिहारी वाजपेयी को ना सिर्फ भारतीय प्रतिनिधिमंडल दल का नेता बनाकर भेजा था, बल्कि पाकिस्तान के इरादे को नेस्तनाबूद करके लौटे प्रतिनिधिमंडल का प्रोटोकाल तोड़कर दिल्ली के हवाई अड्डे पर स्वागत भी किया था। भारत ने जब-जब परमाणु परीक्षण किया, तत्कालीन विपक्ष उसके साथ रहा। वाजपेयी के पोखरण परीक्षण के बाद तो अमेरिका ने भारत पर कई प्रतिबंध लगा दिए थे, लेकिन कांग्रेस ने तब भी वाजपेयी सरकार पर सवालिया निशान नहीं लगाए थे। लेकिन आज के दौर में अगर मोदी सरकार ऐसा कोई परीक्षण करती है तो उससे आज का विपक्ष सबूत मांगेगा। यह भी हो सकता है कि विदेशी धरती पर जाकर राहुल गांधी इसका प्रत्यक्ष सबूत और परीक्षण की पूरी प्रक्रिया की जानकारी मांग दें। इसे भी पढ़ें: BJP President Nitin Nabin ने वंदे मातरम् पर Congress के रुख को भारत विरोधी बताया ठीक इसी तरह जीडीपी के आंकड़ों को लेकर भी मोदी सरकार को झूठा ठहराने की कोशिश हो रही है। चीन गलवान कांड के दौरान भारतीय सीमावर्ती कमांड के चीफ रहे जनरल को बर्खास्त कर देता है, फिर भी राहुल गांधी की अगुआई में विपक्ष अब भी प्रचारित करने से परहेज नहीं कर रहा है कि गलवान घाटी में भारतीय सेना को चीन ने हराया और चीन भारत की जमीन पर कब्जा कर लिया है। ऐसी बयानबाजी अगर एक-दो बार होती तो उसे अनदेखा भी किया जा सकता था। लेकिन विपक्ष, विशेषकर राहुल गांधी की ओर से बार-बार ऐसे बयान दिए जाते हैं, जिसका संकेत तो यही लगता है कि वे भारत की छवि को खराब कर रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी विपक्ष की इस प्रवृत्ति को राष्ट्रीयता बनाम राजनीति के बहस के दायरे में लाकर राहुल गांधी पर सवालों की बौछार करती रहती है। यह बात और है कि ऐसे ही बयान देने या उनका समर्थन करने वाले अखिलेश यादव और चंद्रशेखर रावण जैसे नेताओं के बयानों को नोटिस तक नहीं लेती। वैसे विदेशों में भारतीय व्यवस्था पर बार-बार सवाल उठाया गया है। मसलन राहुल गांधी ने बोस्टन में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए थे। तब उन्होंने कहा था कि चुनाव आयोग 'कंप्रोमाइज्ड' है और इसके सिस्टम में 'बहुत गलत' है। हालांकि चुनाव आयोग ऐसे आरोपों का जवाब देता रहा, लेकिन विपक्ष की जुबान नहीं रूकी। इसी तरह बीते लोकसभा चुनाव के बाद अमेरिका के नेशनल प्रेस क्लब में राहुल ने कहा था, 'भारत में लोकतंत्र पिछले 10 सालों से टूटा हुआ है, अब यह लड़ रहा है। ‘ इसी तरह सितंबर 2023 में राहुल ने यूरोपीय यूनियन को संबोधित करते हुए ब्रसेल्स में कहा था कि भारत में भेदभाव और हिंसा बढ़ रही है। इस तरह के बयानों से राहुल जहां भारत के आंतरिक मामलों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जाते रहे हैं, वहीं इसके जरिए वे भारतीय संस्थाओं को खुद ही बदनाम करते हैं। इसी तरह मई 2022 में लंदन में 'आइडियाज फॉर इंडिया' सम्मेलन में राहुल ने कहा था कि भारतीय संस्थाएं 'परजीवी' बन गई हैं। तब उन्होंने भारतीय संस्थाओं मसलन सीबीआई और ईडी को 'डीप स्टेट' कह दिया था। इतना ही नहीं, उन्होंने भारत की तुलना पाकिस्तान से भी कर दी। राहुल ने 2018 में सिंगापुर के ली कुआन यू स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी में कहा था कि भारत में 'डर और नफरत' का माहौल है और बहुलता की विचारधारा खतरे में है। इसी तरह जनवरी 2018 में बहरीन में प्रवासी भारतीयों के सम्मेलन में राहुल ने कहा था कि सरकार बेरोजगारी से निपटने में नाकाम रही है। जिसका असर गुस्से और नफरत के रूप में दिख रहा है। इसी तरह 2017 में उन्होंने अमेरिका में कहा था कि भारत अब वह नहीं रहा, जहां हर कोई कुछ भी कह सकता है। ऐसे बयानों से अक्सर वे भारत को ही सवालों के घेरे में रखते हैं और इस तरह देश की छवि को नुकसान पहुंचाते हैं। उनके ऐसे बयानों को बाद में समूचा विपक्ष और ले उड़ता है और जगह-जगह भारतीय छवि को नुकसान पहुंचाता है। कुछ ऐसा ही इस बार जीडीपी को लेकर हो रहा है। 1991 के बाद के दौर इस वक्त याद आना लाजमी है। राजीव गांधी की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति के बावजूद कांग्रेस को आम चुनाव में बहुमत नहीं मिला। तब नरसिंह राव की अगुआई में कांग्रेस की अल्पमत की सरकार चलती रही। उस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को 120 सीटें मिलीं थीं। इतनी ताकत के बावजूद बीजेपी ने आर्थिक सुधार के मोर्चे पर कांग्रेस की सरकार को बहुत सहयोग किया। सहयोग करने के लिए बीजेपी ने संसद की कार्यवाही से बहिर्गमन करने का रास्ता चुना था। मुद्दों पर वह सरकार को सदन में घेरती थी, लेकिन जब भी मतदान की नौबत आती, बीजेपी बाहर निकल जाती थी। इस तरह बीजेपी विरोध भी करती थी और सरकार का परोक्ष साथ भी देती थी। लेकिन आज की स्थिति देखिए। सत्ता पक्ष और विपक्ष में भरोसे का रिश्ता ही नहीं रहा। विपक्ष सिर्फ तीर साधे रहता है और उसकी अगुआई अक्सर राहुल गांधी करते हैं। बाकी विपक्ष उनके साथ कोरस गान में शामिल हो जाता है। वाजपेयी की अगुआई वाली सरकार ने जब परमाणु परीक्षण किया था, तब कांग्रेस ने भी कमोबेश साथ दिया था। जबकि आज की तुलना में अमेरिका ने भारत विरोध में कहीं ज्यादा कड़े कदम उठाए थे। कई तरह की आर्थिक पाबंदियां भी लगाई थीं। तब चाहती तो कांग्रेस वाजपेयी सरकार को रोज कठघरे में खड़ा करती। तब कह सकते हैं कि कांग्रेस के नेतृत्व में ऐसे लोगों का वर्चस्व जरूर था, जो राष्ट्रीय हितों और तकाजों को समझते थे। सवाल यह है कि क्या ऐसी सोच आज की राजनीति विकसित नहीं कर सकती ? विपक्ष को भूलना नहीं चाहिए कि ऐसे सवाल उठाकर वह भारतीय सरकार को नहीं, भारत की छवि को खराब कर रहा है। उसे देखना होगा कि भारत के आंकड़ों को विश्व बैंक ने भी मान्यता दे दी है। ऐसे में सवाल विपक्षी सोच पर भी उठता है। उसे भी सोचना होगा कि राष्ट्रीय विकास और हित में उसकी भी अपनी सकारात्मक भूमिका है और उसे निभाना होगा। - उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं..
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मेल लिखवाना हो, 80 के दशक वाली फोटो बनवानी हो, किसी कंपनी का कारोबार खंगालना हो या एक लाइन के आईडिया से पूरी फिल्म की स्क्रिप्ट लिखनी हो, एआई सब कुछ एक सांस में कर सकता है। यह भी कह देता है कि आप चाहे तो मैं इसका वो वाला वर्जन बना दूं जो बिल्कुल ऐसा लगे कि इंसान ने बनाया है। लेकिन क्या एआई इंसान के अस्तित्व के लिए भी भविष्य में कभी खतरा बन सकता है। खतरे की बात गाहे बगाहे कही जाती रही है। लेकिन अब एक बड़ा डेवलपमेंट हुआ। एआई बनाने वाली दुनिया की एक बड़ी कंपनी एंथ्रोपिक के रिसर्चर जैकब कॉक्सन ने कंपनी छोड़ दी है। एंथ्रोपिक कंपनी के रिसर्च स्कॉलर जेकब कॉक्सन ने अपने इस्तीफे की जानकारी सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर दी। अपने पोस्ट में उन्होंने लिखा एंथ्रोपिक और ओपन एi जैसी कंपनियां तेजी से इंसानों से भी ज्यादा समझदार एआई यानी कि सुपर इंटेलिजेंस बनाने की होड़ में लगी हुई हैं और यह लापरवाही लोगों की जिंदगी को खतरे में डाल रही है। ऐसा क्या हुआ जिसने एंथ्रोपी के कर्मचारी को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया। जैकब कॉक्सन ने एक्स पर एक लंबा थ्रेड पोस्ट करते हुए इसका कारण बताया है। कॉक्सन का दावा यह था कि एआई लैब के अंदर लोग इस खतरे को अच्छी तरह समझते हैं। फिर भी काम चलता जा रहा है। एआई बनाने वाले भी यह मानते हैं कि एआई हम सभी को खत्म कर देगा। कॉक्सन ने आगे यह भी लिखा कि बड़ी-बड़ी कंपनियों के अधिकारी और रिस्चरर्स मीडिया के सामने तो बहुत सोच समझकर और जिम्मेदारी से भरी बातें करते हैं। लेकिन मैंने उन्हें लोगों को प्राइवेट में डर जताते हुए सुना है। यह लोग जो सिस्टम बनाए जा रहे हैं वो किसी भी चीज को हैक कर सकता है। रातोंरात किसी भी इलाके में क्रांति ला सकता है और असली ताकत और रिसोर्सेज हासिल कर सकता है और यह ग्रोथ बिल्कुल भी धीमी नहीं पड़ रही है। उन्होंने उन दोनों कंपनियों के बीच का फर्क भी साफ किया जहां उन्होंने काम किया था। उन्होंने लिखा ओपन एआई में कई लोगों ने इस खतरे को गंभीरता और सिविलाइजेशन पर पड़ने वाले असर को गहराई से महसूस नहीं किया। इसे भी पढ़ें: Anthropic के शोधकर्ता Jacob Coxon ने दिया इस्तीफा, Superintelligence पर उठाए सवाल समझ का फर्क एआई को लेकर चेतावनी इसलिए भी गंभीर है क्योंकि जितने शक्तिशाली मॉडल बन रहे हैं, उनके भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया उतनी ही जटिल और कम पारदर्शी होती जा रही है। ऐसा नहीं है कि यह स्थिति अचानक आई। मार्च 2023 में इलॉन मस्क, एपल के को-फाउंडर Steve Wozniak समेत कई हस्तियों ने AI के डिवेलपमेंट को लेकर चेताया था। इसके अलावा, एक बड़ी चिंता पर्यावरण को लेकर है। भारी-भरकम सर्वर और डेटा सेंटर बहुत बड़ी मात्रा में बिजली-पानी की खपत कर रहे हैं। इनकी वजह से कार्बन उत्सर्जन बढ़ रहा है। हालांकि इन सारी बातों का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि तकनीक को यहीं पर रोक दिया जाए। AI ने मेडिकल, एजुकेशन, साइंस, रिसर्च और एग्रो सेक्टर में बड़े बदलाव की क्षमता दिखाई है। आज संसाधनों पर जितना दबाव है और दुनिया के सामने जिस तरह की चुनौतियां हैं, उनमें AI सहयोगी हो सकती है। इसे भी पढ़ें: OpenAI के मुख्य वैज्ञानिक Jakub Pachocki ने दी चेतावनी, AI के तेज विकास के लिए दुनिया तैयार नहीं कड़ी निगरानी की दरकार OpenAI के मुख्य वैज्ञानिक जैकब ने हाल में कहा था कि AI जिस रफ्तार से आगे बढ़ रही है, उसके लिए इंसान तैयार नहीं हैं। आर्टिफिशल इंटेलिजेंस की सुरक्षा और निगरानी पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। सरकारों और दूसरी संस्थाओं को भी इसमें भूमिका निभानी होगी। केवल कंपनियों के भरोसे सब नहीं छोड़ा जा सकता। बेलगाम होड़ के बजाय सिक्योरिटी को प्राथमिकता देनी चाहिए और सबसे जरूरी, इस क्षेत्र से जुड़ी आवाजों को गंभीरता से सुनना चाहिए। एंथ्रोपिक में काम करने वाले साइंटिस्ट ने कौन से 5 प्वाइंट सामने रखे एंथ्रोपिक में काम करने वाले उनके दो साथियों ने भी इस बात का समर्थन किया है। एंथ्रोपिक के अलाइनमेंट साइंस लीड इवान ह्यूमबिगर ने वार्निंग दी है कि आने वाले 10 सालों में एआई की वजह से इंसानों का वजूद खतरे में पड़ने की 10% से ज्यादा आशंका है। उन्होंने साफ कहा कि उनकी कंपनी बेहतर कोशिश तो कर रही है लेकिन एआई को काबू में रखने के लिए अभी तक उनके पास कोई ठोस प्लान नहीं है। यूबिंगर के मुताबिक असली खतरा आज के एआई से नहीं बल्कि उस सुपर एआई से है जो खुद को तेजी से और बेहतर बनाने में लगा हुआ है। इसी एंथ्रोपिक के एक दूसरे एंप्लॉय ने तस्वीर को और ज्यादा क्लियर करने के लिए पांच पॉइंट्स को भी सामने रखा। एंथ्रोपिक के साइंस ग्रुप में कॉग्निटिव ओवरसाइट टीम के हेड सेमुअल मार्क्स ने एक पोस्ट के जरिए पूरी स्थिति को समझाया। उनका पहला पॉइंट यह था कि एआई डेवलपर्स का खुद यह मानना है कि उनकी तकनीक कुछ ही सालों में इंसानी वजूद को पूरी तरह खत्म कर सकती है और यह चिंता सीनियर कर्मचारियों में सबसे ज्यादा है। दूसरा इसके बावजूद भी वो सिर्फ बिजनेस के फायदों और इस सोच की वजह से काम जारी रखे हुए हैं कि वह खुद से कम जिम्मेदार कॉम्पिटिट से आगे निकलने की होड़ में है। तीसरा एआई को आर्म सॉफ्टवेयर की तरह प्रोग्राम नहीं किया जा सकता। यह मिसबिव करने लग जाता है। चौथा पॉइंट मौजूदा तरीका एआई को बेहतर बिहेव करने के लिए कह सकते हैं, लेकिन उन्हें पूरी तरह से सुरक्षित और काबू में नहीं कर सकता। पांचवा कंपनी के कई कर्मचारी एआई को ज्यादा सेफ तरीके से बनाने के लिए रास्ते ढूंढने के लिए रफ्तार को बेहद धीमी करना चाहते हैं। अपना आईपीओ लाने की तैयारी कॉक्सन का इस्तीफा ऐसे समय में आया है जब एंथ्रोपिक अपना आईपीओ लाने की तैयारी कर रही है। खबरें बता रही है कि यह इतिहास के सबसे बड़े आईपीओ में से एक हो सकता है। कंपनी की संभावित वैल्यू्यूएशन करीब 2 ट्रिलियन तक होने की खबरें हैं। जेकब के इतने बड़े आरोप हैं जिसमें यह भी शामिल है कि इसी डेकेड के आखिर तक इंसानियत के लिए एआई खतरा पैदा कर सकता है। एंथ्रोपिक ने फिलहाल इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। लेकिन एंथ्रोपिक में अलाइनमेंट साइंस के लीड इवान गुबिंगर ने जैकब के बयान पर सहमति जताई है। एक्स पर लिखा कि हम सच में मानते हैं कि एआईए सभी इंसानों को मार सकता है। मेरा अनुमान है कि अगले 10 साल में ऐसा होने की संभावना 10% ज्यादा है। मेरा विश्वास है कि एंथ्रोपिक अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहा है। लेकिन सुपर इंटेलिजेंस को पूरी तरह सुरक्षित और नियंत्रित रखने का कोई पक्का प्लान अभी हमारे पास नहीं है और हम उस दिशा में स्पष्ट रूप से आगे भी नहीं बढ़ रहे। और यह चिंताएं लगातार उठाई जा रही हैं।
हरीश द्विवेदी को युवा मोर्चे की जिम्मेदारी दिए जाने को पार्टी के संगठनात्मक विस्तार की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बस्ती से लोकसभा सांसद द्विवेदी लंबे समय से भाजपा संगठन से जुड़े रहे हैं। युवा मोर्चा के जरिए पार्टी युवाओं के बीच अपनी राजनीतिक और संगठनात्मक पहुंच को मजबूत करने पर जोर देती रही है।
Marital Rape मामले पर Supreme Court में जबरदस्त घमासान, Parliament के पाले में आई गेंद!
वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने की मांग पर चल रही बहस अब सुप्रीम कोर्ट के सामने उस बुनियादी सवाल तक पहुंच गई है, जहां अदालत को यह तय करना है कि क्या वह मौजूदा आपराधिक कानून की स्पष्ट सीमा को बदलकर एक नया अपराध लागू कर सकती है। बुधवार को सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इसी सवाल पर गंभीर टिप्पणी की और केंद्र सरकार की इस दलील से सहमति जताई कि इस अत्यंत संवेदनशील और जटिल मुद्दे पर अंतिम फैसला संसद को करना चाहिए। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 20(1) का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि जब मौजूदा कानून किसी कृत्य को अपराध के रूप में परिभाषित ही नहीं करता, तो उसके लिए किसी व्यक्ति को आपराधिक रूप से दंडित कैसे किया जा सकता है। हम आपको बता दें कि अनुच्छेद 20(1) स्पष्ट करता है कि किसी व्यक्ति को उस समय लागू कानून के उल्लंघन के अलावा किसी अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसे भी पढ़ें: Karnataka Case: 'सेक्स स्लेव' फैसले को चुनौती, Supreme Court में Personal Liberty पर बहस मौजूदा कानून में यही सबसे महत्वपूर्ण पेच है। भारतीय दंड संहिता की धारा 375 में Exception 2 के तहत पत्नी के साथ पति द्वारा यौन संबंध को बलात्कार की परिभाषा से बाहर रखा गया था। पत्नी की उम्र को लेकर सुप्रीम कोर्ट के 2017 के फैसले के बाद यह सीमा 18 वर्ष से संबंधित हो गई। अब भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 63(2) में भी इसी प्रकार का अपवाद मौजूद है। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान बेहद अहम सवाल उठाया कि जब कानून ने किसी आचरण को अपराध की श्रेणी में रखा ही नहीं है, तो अदालत उसे अपराध मानकर अभियोजन की अनुमति कैसे दे सकती है? पिछली सुनवाई में भी पीठ ने पूछा था कि क्या संवैधानिक अदालतें खुद आपराधिक कानून को दोबारा लिखकर नया अपराध बना सकती हैं। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मामला सामाजिक, कानूनी और संवैधानिक दृष्टि से अत्यंत जटिल है और इसका समाधान संसद के स्तर पर होना चाहिए। अदालत ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि यदि सरकार को लगता है कि मौजूदा कानून में समस्या है, तो उसे संसद की मंजूरी के साथ कानून को दोबारा तैयार करना चाहिए। यानी सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सीमा रेखा खींच दी है कि कानून की व्याख्या अदालत कर सकती है, लेकिन संसद द्वारा स्पष्ट रूप से बनाए गए आपराधिक प्रावधान को बदलकर नया अपराध बनाना अलग प्रश्न है। हालांकि अदालत ने महिलाओं की पीड़ा को किसी भी तरह कमतर नहीं आंका। पीठ ने साफ कहा कि पति द्वारा उसकी इच्छा के विरुद्ध यौन संबंध के लिए मजबूर की गई महिला “निश्चित रूप से पीड़िता” है। असली सवाल यह है कि ऐसी स्थिति में पति पर बलात्कार का मुकदमा चलाने का कानूनी आधार क्या होगा, जब वर्तमान कानून स्वयं वैवाहिक संबंध के लिए अपवाद प्रदान करता है। हम आपको बता दें कि कर्नाटक से जुड़े एक मामले ने इस बहस को और पेचीदा बना दिया है। वहां हाई कोर्ट ने ऐसे पति के खिलाफ अभियोजन की अनुमति दी थी जिस पर पत्नी के साथ लगभग “सेक्स स्लेव” जैसा व्यवहार करने का आरोप था। सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले को पहले सुनने पर विचार कर रहा है, ताकि यह देखा जा सके कि मौजूदा कानून की व्याख्या के जरिए अभियोजन संभव है या नहीं। दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि विवाह किसी महिला की शारीरिक स्वायत्तता और सहमति के अधिकार को समाप्त नहीं कर सकता। वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नुंडी ने कहा कि अदालत को नया अपराध बनाने की जरूरत नहीं है; बलात्कार पहले से परिभाषित अपराध है और सवाल केवल इतना है कि क्या पतियों को उससे संवैधानिक संरक्षण देना उचित है। उधर, केंद्र सरकार इसके विपरीत विवाह की भारतीय सामाजिक संरचना, आपराधिक कानून के संभावित दुरुपयोग और सबूत जुटाने की कठिनाइयों को प्रमुख आधार मान रही है। सरकार का तर्क है कि पति-पत्नी के बीच बंद दरवाजों के भीतर सहमति या असहमति साबित करना सामान्य यौन अपराधों की तुलना में अधिक जटिल होगा। वैवाहिक विवादों में गंभीर आपराधिक धाराओं के इस्तेमाल की आशंका भी सरकार की चिंता का हिस्सा है। केंद्र सरकार का यह भी कहना है कि पश्चिमी देशों के कानूनी मॉडल को भारत की सामाजिक और पारिवारिक परिस्थितियों पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता। भारत में विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं, बल्कि व्यापक पारिवारिक और सामाजिक ढांचे से जुड़ी संस्था है। इसी आधार पर सरकार “पश्चिमी मॉडल की अंधी नकल” से बचने की बात करती है। वहीं बहस का एक वैचारिक पक्ष भी है। दरअसल वैवाहिक बलात्कार की पश्चिमी अवधारणा को भारतीय पारिवारिक व्यवस्था पर उसी रूप में लागू करने की कोशिश भारतीय विवाह संस्था को कमजोर कर सकती है। देखा जाये तो ऐसी अवधारणाएं भारतीय सामाजिक व्यवस्था को व्यक्तिगत अधिकारों की अत्यधिक कानूनी व्याख्या के जरिए छिन्न-भिन्न कर सकती हैं। दूसरी ओर, वैवाहिक बलात्कार को अपराध मानने की मांग के पीछे भारतीय महिलाओं के अधिकार और शारीरिक स्वायत्तता से जुड़े तर्क भी हैं। फिलहाल केंद्र का रुख स्पष्ट है कि घरेलू हिंसा, क्रूरता और शारीरिक हमले जैसी मौजूदा कानूनी धाराओं के तहत पीड़ित पत्नी को संरक्षण उपलब्ध है; बलात्कार की कानूनी परिभाषा में बदलाव करना हो तो वह व्यापक सामाजिक विमर्श, विशेषज्ञों से परामर्श और संसद में बहस के बाद होना चाहिए। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई तीन सप्ताह बाद अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध की है। इसलिए अब असली लड़ाई केवल “वैवाहिक बलात्कार अपराध है या नहीं” की नहीं, बल्कि इस बड़े संवैधानिक प्रश्न की है कि भारत में आपराधिक कानून की नई सीमा कौन तय करेगा, न्यायपालिका या संसद? -नीरज कुमार दुबे
चेन्नई में 19 सितंबर को ऑटो चालकों का प्रदर्शन, किराया बढ़ाने की मांग तेज
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नंदीग्राम से ममता बनर्जी के चुनाव लड़ने की अटकलों पर दिलीप घोष बोले-‘सच समय आने पर पता चलेगा’
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100 दिन तो सिर्फ शुरुआत है, कर्नाटक के विकास की यात्रा अभी शुरू हुई : सीएम शिवकुमार
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सीईसी ज्ञानेश कुमार का गुजरात दौरा, 'रोल से पोल तक पारदर्शिता' पर होगा संवाद
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Modi-Putin Meeting: Su-57 से लेकर तेल कारोबार तक, भारत-रूस के बीच इन मुद्दों पर होगी बड़ी चर्चा
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जगन मोहन रेड्डी 2027 में पदयात्रा शुरू करेंगे
वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष और आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी ने घोषणा की कि वे 2029 के चुनावों से पहले लोगों के मुद्दों को उठाने और जमीनी स्तर पर लोगों से जुड़ाव मजबूत करने के लिए सितंबर या अक्टूबर 2027 में राज्यव्यापी पदयात्रा शुरू करेंगे।
बीएसपी में परिवार की कलह बढ़ीः मायावती ने भतीजे आकाश आनंद को पार्टी से निकाला
Mayawati expels Akash Anand from BSP- बीएसपी का संकट बढ़ता जा रहा है। मायावती ने 9 सितंबर को कहा था कि आकाश आनंद के ससुर अशोक सिद्धार्थ राजनीति से संन्यास की घोषणा करें। लेकिन अशोक ने आज राजनीति से संन्यास लिया। मायावती ने कहा- बहुत देर हो गई है।
राजस्थान को 'लव जिहाद' से मुक्त कराया : सीएम भजनलाल शर्मा
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अमरावती अस्पताल अग्निकांड: तीन नवजातों की मौत पर पांच वरिष्ठ स्वास्थ्य अधिकारी निलंबित
मुंबई, 9 सितंबर (आईएएनएस)। महाराष्ट्र सरकार ने अमरावती जिला महिला अस्पताल की विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाई (एसएनसीयू) में 24 अगस्त को लगी आग में तीन नवजात शिशुओं की मौत के मामले में स्वास्थ्य विभाग के पांच वरिष्ठ अधिकारियों और कर्मचारियों को निलंबित करने का आदेश दिया है।
'समर्पित सेवा के 25 साल': भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन ने पीएम मोदी के बदलाव लाने वाले नेतृत्व को सलाम किया
भाजपा लोकतंत्र की दुश्मन, भ्रष्टाचार और नफरत को सफलता का पैमाना बनाया : अखिलेश यादव
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भाजपा पर निशाना साधते हुए उसे लोकतंत्र का दुश्मन करार दिया
चिराग दिल्ली में जर्जर हॉस्टल बिल्डिंग में दरार, सरकार ने छात्रों को सुरक्षित निकाला, मंत्री आशीष सूद ने 'आप' पर साधा निशाना
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'हनुमान अंश' फिल्म 'टॉक्सिक' के जमाने में इंसान की आत्मा को डीटॉक्स करने वाली है : ज्योति वाघमारे
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'जारकीहोली पर ईडी की छापेमारी को बेवजह राजनीतिक रंग दिया जा रहा', कर्नाटक भाजपा का कांग्रेस पर हमला
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दिल्ली हाईकोर्ट ने एनआईए से पूछा, 'क्या कड़ी शर्तों के साथ इंजीनियर राशिद को जमानत दी जा सकती है?'
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38 साल बाद Sri Lanka की यात्रा पर गये भारतीय रक्षा मंत्री, पहुँचते ही China का सारा खेल पलट दिया
करीब 38 साल बाद किसी भारतीय रक्षा मंत्री का श्रीलंका पहुंचना हिंद महासागर की बदलती भू-राजनीति में भारत की उस रणनीतिक वापसी का संकेत है, जिसमें सुरक्षा, समुद्री शक्ति, आर्थिक साझेदारी और जनविश्वास, चारों मोर्चों को एक साथ साधा जा रहा है। इससे पहले 1988 में तत्कालीन रक्षा मंत्री केसी पंत श्रीलंका गए थे और अब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह कोलंबो की तीन दिवसीय यात्रा पर हैं। राजनाथ सिंह ने कोलंबो में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए जिस बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया, उसका रणनीतिक संदेश बेहद स्पष्ट था, “पड़ोसी बदले नहीं जा सकते।” उन्होंने कहा कि भारत श्रीलंका को अपना बेहद करीबी मित्र मानता है और संकट की किसी भी घड़ी में उसके साथ मजबूती से खड़ा रहेगा। यह केवल भावनात्मक बयान नहीं, बल्कि 2022 के आर्थिक संकट और 2025 में चक्रवात दित्वाह के बाद भारत की त्वरित सहायता से जुड़ी उस विश्वसनीयता का राजनीतिक विस्तार है, जिसे श्रीलंका में चीन के मुकाबले भारत की सबसे बड़ी ताकत माना जा सकता है। चीन के मुकाबले भारत की बढ़त क्यों अहम? श्रीलंका हिंद महासागर के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों के बीच स्थित है। कोलंबो, हंबनटोटा और अन्य बंदरगाहों की भौगोलिक स्थिति इसे भारत की समुद्री सुरक्षा के लिए असाधारण महत्व देती है। पिछले वर्षों में चीन की आर्थिक और बंदरगाह परियोजनाओं ने श्रीलंका को बीजिंग के रणनीतिक प्रभाव के केंद्र में ला दिया था। लेकिन मौजूदा घटनाक्रम संकेत देता है कि कोलंबो अब एकतरफा चीनी निर्भरता की बजाय संतुलित साझेदारी को प्राथमिकता दे रहा है। खुद श्रीलंका के Sunday Times ने राजनाथ सिंह के दौरे से पहले लिखा कि भारत चाहता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पिछली यात्रा के दौरान हुए समझौतों को तेजी से लागू किया जाए। अखबार ने यह भी रेखांकित किया कि सिंह की यात्रा ऐसे समय हो रही है जब श्रीलंका को अपने अंतरराष्ट्रीय संबंधों को अधिक सक्रियता से संचालित करना होगा। इसी अखबार के संपादकीय ने इससे भी बड़ा संकेत दिया। उसने हिंद महासागर में बढ़ती सैन्य गतिविधियों, समुद्री मार्गों और बंदरगाहों की भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच श्रीलंका को फिर से “geopolitical vortex” में बताया और चीन के संदर्भ में पहले सामने आए संदिग्ध शोध-पोतों के मुद्दे को याद किया। यानी श्रीलंका की अपनी मीडिया बहस भी यह स्वीकार कर रही है कि द्वीप की सुरक्षा और संप्रभुता अब सीधे हिंद महासागर की महाशक्ति प्रतिस्पर्धा से जुड़ी है। रक्षा सहयोग अब कागज से जमीन पर इस यात्रा का सबसे ठोस परिणाम तीन महत्वपूर्ण रक्षा समझौतों के रूप में सामने आ रहा है। इनमें दोनों देशों के National Cadet Corps के बीच सहयोग, भारत और श्रीलंका के National Defence Colleges के बीच साझेदारी तथा श्रीलंकाई वायुसेना के भारतीय मूल के L70 एंटी-एयरक्राफ्ट हथियारों के रखरखाव में भारत की सहायता शामिल है। भारत पहले ही 24 ऐसे हथियार श्रीलंका को दे चुका है और अब शेष छह की भी मुफ्त में मेंटेनेंस सहायता करेगा। यहां असली महत्व हथियारों से ज्यादा दीर्घकालिक सैन्य इंटरऑपरेबिलिटी और संस्थागत संबंधों का है। प्रशिक्षण, रक्षा शिक्षा और उपकरणों का रखरखाव किसी देश को केवल हथियार बेचने से कहीं ज्यादा गहरे सुरक्षा रिश्ते में बांधता है। इसके साथ ही कोलंबो बंदरगाह पर भारतीय नौसेना के INS Udaygiri की मौजूदगी ने यात्रा को स्पष्ट समुद्री आयाम भी दे दिया है। दिल जीतने की कूटनीति राजनाथ सिंह ने केवल रक्षा की भाषा नहीं बोली। उन्होंने भारत की आर्थिक क्षमता, तेजी से बदलती अर्थव्यवस्था और वैश्विक भूमिका को भी सामने रखा। उन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था के करीब 4 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने, 7.8 प्रतिशत तिमाही वृद्धि और वैश्विक विकास में 16 प्रतिशत से अधिक योगदान का उल्लेख किया। यह संदेश श्रीलंका के लिए महत्वपूर्ण है कि भारत अब केवल सुरक्षा प्रदाता नहीं, बल्कि आर्थिक अवसरों का स्रोत भी है। उधर, श्रीलंका के राजनीतिक और सामाजिक हलकों में भी इस रिश्ते की सकारात्मक स्वीकार्यता दिखाई दे रही है। पूर्व ईस्टर्न प्रोविंस गवर्नर और सीलोन वर्कर्स कांग्रेस नेता सेंथिल थोंडामन ने राजनाथ सिंह की यात्रा को दोनों देशों की रक्षा साझेदारी मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण कदम बताया और कहा कि श्रीलंका ने सरकारें बदलने के बावजूद भारत के साथ रक्षा क्षेत्र में सहयोग बनाए रखा है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को श्रीलंका के लोगों द्वारा “बड़े भाई” की तरह स्वीकार किए जाने की बात भी कही। रणनीतिक निष्कर्ष: भारत ने बाजी कैसे पलटी? देखा जाये तो यह स्पष्ट है कि भारत ने श्रीलंका को चीन की एकाधिकारवादी रणनीतिक निर्भरता की ओर जाने से रोकने के लिए एक मजबूत वैकल्पिक सुरक्षा और आर्थिक ढांचा खड़ा कर दिया है। यही इस यात्रा की सबसे बड़ी रणनीतिक जीत है। भारत ने सैन्य शक्ति के साथ विश्वसनीयता, संकट में मदद, सांस्कृतिक निकटता, आर्थिक अवसर और जनसंपर्क को एक पैकेज में बदल दिया है। श्रीलंका को यह संदेश मिल रहा है कि भारत उसके सामने कोई दूर की महाशक्ति नहीं, बल्कि वह पड़ोसी है जो संकट में सबसे पहले पहुंच सकता है। हिंद महासागर के इस निर्णायक भूगोल में यही भारत की सबसे बड़ी बढ़त है। चीन बंदरगाहों और परियोजनाओं के जरिए प्रभाव बनाता है, जबकि भारत अब सुरक्षा, साझेदारी और भरोसे के जरिए अपना प्रभाव गहरा कर रहा है। राजनाथ सिंह की कोलंबो यात्रा केवल रक्षा कूटनीति नहीं; यह हिंद महासागर में भारत की रणनीतिक वापसी और श्रीलंका के दिल-दिमाग दोनों में अपनी जगह मजबूत करने की कवायद है। -नीरज कुमार दुबे
'तुष्टीकरण के आगे कांग्रेस ने किया आत्मसमर्पण', वंदे मातरम विवाद पर ओपी चौधरी
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'वंदे मातरम' के पूर्ण गायन के दौरान एनसी नेताओं के खड़े होने पर भाजपा ने की सराहना, कांग्रेस पर कसा तंज
Modi Vadodara Event: नौजवानों का मोहभंग और Rahul की नकल! क्या Modi का दांव उलटा पड़ गया?
पूर्वी प्रांत ने कैसे लिया राइट टर्न, Germany के सबसे खतरनाक आदमी को मिलने वाली है सत्ता?
किस तरह एक विधानसभा चुनाव ने जर्मनी के भीतर भौगोलिक और वैचारिक दरार को इतना पुख्ता कर दिया है कि इसे देश के आधुनिक दौर का सबसे खतरनाक पल माना जा रहा है और क्यों जर्मनी के एक असेंबली रिजल्ट से पुतिन बहुत खुश होंगे। इस बरस 3 अक्टूबर को जर्मनी अपना 36वां टाक डे डचिन आइनहाइट मनाएगा यानी एकीकरण दिवस। 3 अक्टूबर 1990 को दो हिस्सों में बटे जर्मनी के एक होने की सालगिरह। उसी दिन जर्मन डेमोक्रेटिक रिपब्लिक जीडीआर आधिकारिक रूप से खत्म हो गया। लेकिन जमीन पर जर्मनी के दो हिस्सों का बंटवारा कायम रहा और यह विभाजन लगातार गहराता गया और इसी की एक परिणति हुई इस 6 सितंबर को बैलेट पेपर के जरिए। जर्मनी के 16 राज्यों में से एक आकार में बम मुश्किल भारत के मणिपुर या मिजोरम जितना बड़ा करीब सवा 5 लाख की आबादी। एएफडी यानी अल्टरनेटिव फॉर डचैंड। 2026 में 39 सीट जीतकर सबसे बड़ी पार्टी 2021 के चुनाव में इसे 23 सीटें मिली थी। सीडीयू यानी क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन। जर्मनी में अभी केंद्र में जो सरकार है उसका नेतृत्व इसी के पास है और सेक्सनी अनहल्ट में राज्य सरकार को भी यही इसी यही पार्टी लीड कर रही थी। ताजा चुनाव में उसे मिली 15 सीटें। पिछले चुनाव में मिली थी 40 सीटें। डी लिंकर यानी लेफ्ट पार्टी को अभी मिली आठ, 2021 में 12 सीट, एसपीडी यानी सोशल डेमोक्रेट्स को 2026 में आठ सीट, 2021 में नौ सीट, ग्रीस को अभी आठ, 2021 में छह सीट, बीएसडब्ल्यू यानी ज़ारा वागन क्लिष्ट पार्टी को पांच सीट। इसे भी पढ़ें: दिल्ली की मतदाता सूची में राघव चड्ढा का नाम शामिल, AAP ने उठाए प्रक्रिया पर सवाल 35 साल के उलरिष जीत के हीरो 35 साल के उलरिष जिगमुंड 2016 से सैक्सनी अनहाल्ट की विधानसभा के सदस्य है। सोशल मीडिया पर अच्छी पकड़ है। माना जाता है कि उनकी जीत में Gen Z के समर्थन का बड़ा हाथ है। वह अपनी पार्टी के कट्टरपंथी नेताओ के मुकाबले ज्यादा नरम माने जाते है। जिगमुंड ने कहा कि लोगों ने साफ कर दिया है कि वे राजनीतिक बदलाव चाहते हैं। प्रवासियों पर कड़े AfD का जोर अवैध प्रवास रोकने, प्रवासियों को मिलने वाली सुविधाओं में कटौती और बड़ी संख्या में लोगों को वापस भेजने की नीति पर है। चुनाव में यह बहस का मुद्दा बना। इसे भी पढ़ें: Satya Niketan हादसे में AAP नेता Saurabh Bhardwaj का गंभीर आरोप, बचाव कार्य में Mobile Jammers का हुआ इस्तेमाल चांसलर को झटका जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ल्स और उनकी पार्टी क्रिश्चियन डेमोक्रेट्स (सीडीयू) के लिए बड़ा झटका है, जिसे महज 17.2% वोट मिले है। CDU 24 साल से इस प्रांत में सत्ता में थी। AfD की जीत से जुड़े सवाल पूर्वी जर्मनी के एक छोटे राज्य में धुर-दक्षिणपंथी पार्टी AfD की जीत से पूरे यूरोप में खलबली मची है। जर्मनी में जिन वजहों से पार्टी को जीत मिली, वैसे मुद्दे ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, स्पेन में भी उठाए जाते रहे है। अगले साल फ्रांस, इटली, स्पेन में चुनाव है, जहां धुर-दक्षिणपंथी नेता मजबूत हो रहे है। ये AfD के तरीकों का इस्तेमाल कर चुनाव जीतने की कोशिश कर सकते है। पर इन नेताओं का सत्ता में आना उदारवादी लोकतंत्र के लिए बुरी खबर है। रूस ने इस जीत को ऐतिहासिक बताया है। फ्रांस ने इसे पूरे यूरोप के लिए गंभीर समय बताया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया पर नतीजे की तस्वीर साझा की। इनकी छवि कैसी है? एक प्रतिष्ठित जर्मन पत्रिका है डे एश पीगल। 14-15 अगस्त को आई मैगज़ीन की कवर स्टोरी पर उलश की तस्वीर थी। शीर्षक था जर्मनी में सबसे खतरनाक इंसान ना उलरिश और ना उनके समर्थकों को इस विशेषण से कोई फर्क पड़ा बल्कि वो इसे कॉम्प्लीमेंट की तरह सराते दिखे। इलेक्शन कैंपेन से यह तस्वीरें आई कि किस तरह सपोर्टर टीशर्ट पर शपीगल कवर स्टोरी की फोटो छपवाकर घूम रहे थे। यहां तक कि शपीगल के उस एडिशन पर उलश से दस्तखत की फरमाइश भी हो रही थी। क्या है परिचय उलश का?
Kashmir Valley में फिर बिगड़े हालात! Modi Govt में Kashmiri Pandits पर नया खतरा क्यों ?
सोने में तेजी, चांदी 2.40 लाख के पार
मुंबई, वैश्विक स्तर पर अस्थिरता से सुरक्षित निवेश की मांग बढ़ने से सोना और चांदी में बुधवार को तेजी देखी गई।
तेलंगाना विधानसभा से बीआरएस के 21 विधायक मानसून सत्र की बाकी अवधि के लिए निलंबित
तेलंगाना विधानसभा से बीआरएस के 21 विधायक मानसून सत्र की बाकी अवधि के लिए निलंबित
दिल्ली में मणिपुर के संगीतकार पर 4-5 युवकों ने किया था लात-घूसों से हमला, बेटे ने दर्ज कराई एफआईआर
दिल्ली में मणिपुर के संगीतकार पर 4-5 युवकों ने किया था लात-घूसों से हमला, बेटे ने दर्ज कराई एफआईआर
समाजवादी छात्रसभा का ड्रेस कोड बदलने पर सपा सांसद बोले- 'यह समतामूलक समाज बनाने का संदेश'
समाजवादी छात्रसभा का ड्रेस कोड बदलने पर सपा सांसद बोले- 'यह समतामूलक समाज बनाने का संदेश'
पहली ही परीक्षा में फेल हो गया Makkah Pact, Saudi पर Houthi Attack होते ही छिप गयी Munir की सेना
मक्का पैक्ट को बने अभी ज्यादा वक्त नहीं बीता, लेकिन उसकी पहली बड़ी परीक्षा ने ही इस रक्षा समझौते की असली ताकत पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सऊदी अरब पर हूती मिसाइलों और ड्रोन की बारिश हुई, दक्षिणी शहरों में नागरिक और आर्थिक प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया, ऊर्जा प्रतिष्ठानों में आग लगी और 73 लोग घायल हुए, लेकिन मैदान में दिखाई दी तो सिर्फ निंदा। पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ “पूरी एकजुटता” जताई, उसकी संप्रभुता की रक्षा के अधिकार का समर्थन किया और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हमलों की कड़ी निंदा की। मगर सवाल यह है कि जिस समझौते की बुनियाद ही इस सिद्धांत पर रखी गई है कि एक सदस्य पर हमला तीनों पर हमला माना जाएगा और मिलकर उसका जवाब दिया जाएगा, उसकी पहली अग्निपरीक्षा में बाकी दो साझेदारों की सामूहिक ताकत आखिर नजर क्यों नहीं आ रही? दुनिया देख रही है कि एक मंच पर बैठे तीन देशों में से एक पर संकट आया तो असीम मुनीर की सेना दुबक गयी। दुनिया देख रही है कि बड़े बड़े बिल्ले सीने पर टांग कर घूमने वाले मुनीर निंदा वाला बयान देने के लिए भी सामने नहीं आये और इस काम के लिए शहबाज शरीफ को आगे कर दिया। उल्लेखनीय है कि मक्का में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने जिस संयुक्त रक्षा समझौते को औपचारिक रूप दिया था, उसका मूल सिद्धांत यही बताया गया था कि किसी एक सदस्य के खिलाफ आक्रामकता को तीनों की सुरक्षा के लिए खतरे के तौर पर देखा जाएगा। समझौते में सैन्य समन्वय, खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान, रणनीतिक परामर्श और रक्षा योजना जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की बात है। लेकिन अब असली सवाल कागज पर लिखे सिद्धांतों का नहीं, उनके अमल का है। सऊदी अरब के अबहा, खमिस मुशैत, जाजान और नजरान में हूतियों के हमलों ने इस सवाल को और तीखा कर दिया है। सऊदी अधिकारियों के अनुसार हमलों में 73 लोग घायल हुए और महिलाओं तथा बच्चों के भी घायल होने की बात सामने आई। कई ऊर्जा प्रतिष्ठानों में आग लगी और कुछ जगहों पर संचालन अस्थायी रूप से रोकना पड़ा। हूतियों ने हमलों की जिम्मेदारी लेते हुए दावा किया कि उन्होंने अबहा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे, किंग खालिद एयर बेस और अरामको से जुड़े प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया। रियाद ने इसे खतरनाक और गैर-जिम्मेदाराना उकसावे वाली कार्रवाई बताते हुए जवाब देने की चेतावनी दी है। सऊदी नेतृत्व का कहना है कि देश की संप्रभुता, नागरिकों और राष्ट्रीय संपत्तियों की रक्षा के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जाएंगे। दूसरी ओर हूती इन हमलों को यमन में सऊदी समर्थित बलों की कार्रवाई का जवाब बता रहे हैं। उनका दावा है कि पिछले दिनों यमन के कई इलाकों में 120 से ज्यादा हवाई हमले हुए और एक जेल पर हमले में 11 लोगों की मौत हुई। यानी यह सिर्फ एकतरफा हमला नहीं, बल्कि तेजी से बढ़ता प्रतिशोध का चक्र है। यहीं पाकिस्तान पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। इस्लामाबाद ने कहा कि वह सऊदी अरब की संप्रभुता और सुरक्षा के साथ खड़ा है। लेकिन क्या “निंदा” और “समर्थन” ही उस रक्षा समझौते की पूरी सीमा है, जिसके बारे में सामूहिक सुरक्षा और सामूहिक प्रतिरोध की बातें की गई थीं? अगर नहीं, तो पाकिस्तान की वास्तविक भूमिका क्या होगी? क्या वह सैन्य सहयोग करेगा, खुफिया सहायता देगा, हवाई सुरक्षा में मदद करेगा या केवल बयान जारी करता रहेगा? साथ ही सवाल सिर्फ पाकिस्तान का नहीं है। तुर्किये कहां है? जिस त्रिपक्षीय ढांचे को क्षेत्रीय स्थिरता और सामूहिक सुरक्षा का माध्यम बताया गया था, उसकी विश्वसनीयता तभी साबित होगी जब संकट के समय उसके सदस्य अपनी प्रतिबद्धताओं को व्यवहार में बदलें। सवाल उठता है कि अगर संकट के वक्त भी सैन्य गठबंधन केवल बयानबाजी तक सीमित रहे, तो उसकी विश्वसनीयता कितनी है? देखा जाये तो खतरा इसलिए भी बड़ा है क्योंकि हूती-सऊदी टकराव अकेला मोर्चा नहीं है। हूती लाल सागर और बाब-अल-मंदेब के आसपास समुद्री यातायात को निशाना बनाने की क्षमता पहले ही दिखा चुके हैं। जुलाई में उन्होंने सऊदी तेल टैंकरों पर हमले और रियाद के खिलाफ समुद्री नाकाबंदी की घोषणा की थी। दूसरी तरफ सऊदी समर्थित यमनी बल हूतियों के खिलाफ जवाबी अभियान चला रहे हैं। दक्षिण-पश्चिमी यमन में लड़ाई तेज होने से सैकड़ों लोगों के मारे जाने और हजारों के विस्थापित होने की खबरें हैं। सबसे खतरनाक बात यह है कि यह संघर्ष उस समय भड़क रहा है जब अमेरिका और ईरान के बीच रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर तनाव अलग मोर्चे पर चल रहा है। एक तरफ फारस की खाड़ी और होर्मुज, दूसरी तरफ लाल सागर और बाब-अल-मंदेब, दोनों समुद्री गलियारों पर संकट एक साथ गहराया तो इसका असर सिर्फ मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा। सऊदी ऊर्जा ढांचे पर लगातार हमले वैश्विक तेल बाजार के लिए बड़ा झटका बन सकते हैं। शुरुआती हमलों के बाद ही कच्चे तेल की कीमतों में उछाल दर्ज किया गया है। यदि रिफाइनरी, पाइपलाइन, प्रसंस्करण केंद्र या निर्यात ढांचा लगातार निशाने पर आया तो बाजार में वास्तविक सप्लाई पर असर हो सकता है। इसका असर पेट्रोल-डीजल से लेकर परिवहन, विनिर्माण और महंगाई तक पहुंच सकता है। भारत के लिए खतरा और सीधा है। खाड़ी से ऊर्जा आयात और लाल सागर से जुड़ा समुद्री व्यापार दोनों क्षेत्रीय स्थिरता पर निर्भर हैं। होर्मुज और लाल सागर दोनों बाधित हुए तो तेल आयात महंगा होगा, जहाजों को लंबा रास्ता अपनाना पड़ सकता है, बीमा और माल ढुलाई की लागत बढ़ सकती है और इसका असर भारतीय अर्थव्यवस्था तथा आम उपभोक्ता तक पहुंच सकता है। यहां एक सवाल और उठता है कि क्या यह एक और मध्य-पूर्वी युद्ध की शुरुआत हो सकती है? देखा जाये तो एक संभावना यह है कि सऊदी अरब सीमित जवाबी कार्रवाई करे और कूटनीति के जरिए स्थिति को नियंत्रित किया जाए। दूसरी संभावना है कि यमन का युद्ध फिर अपने पुराने खूनी दौर में लौट जाए। लेकिन सबसे भयावह स्थिति तब होगी जब ये अलग-अलग संघर्ष एक-दूसरे में मिल जाएं। अगर हूती सऊदी अरब पर हमले बढ़ाते हैं, रियाद बड़े सैन्य अभियान की ओर जाता है, अमेरिका-ईरान टकराव तेज होता है और लाल सागर में जहाजों पर हमले बढ़ते हैं, तो यमन, सऊदी अरब, ईरान और अमेरिका के अलग-अलग मोर्चे एक ही युद्धक्षेत्र में बदल सकते हैं। तब मक्का पैक्ट की असली परीक्षा भी होगी और उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी सामने आएगी। देखा जाये तो रक्षा समझौते की विश्वसनीयता केवल इस बात से तय नहीं होती कि संकट के बाद किसने कितनी कड़ी भाषा में बयान दिया। वह इस बात से तय होती है कि संकट आने पर कौन कितना आगे खड़ा हुआ। फिलहाल सऊदी अरब पर हमले जारी हैं, हूती जवाबी कार्रवाई की धमकी दे रहे हैं और रियाद भी पीछे हटने के संकेत नहीं दे रहा। ऐसे में पाकिस्तान के सामने भी साफ सवाल है। क्या वह सिर्फ सऊदी अरब के लिए “हम आपके साथ हैं” कहेगा, या मक्का में किए गए सामूहिक सुरक्षा के वादे को किसी ठोस रणनीतिक कार्रवाई में बदलेगा? अगर जवाब सिर्फ निंदा है, तो फिर सवाल उठना स्वाभाविक है कि मक्का पैक्ट आखिर रक्षा समझौता है या निंदा का नया मंच? -नीरज कुमार दुबे
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