'राहुल गांधी की उद्दंडता अब विक्षिप्तता में बदलती जा रही है', भाजपा का कांग्रेस सांसद पर गंभीर आरोप
'राहुल गांधी की उद्दंडता अब विक्षिप्तता में बदलती जा रही है', भाजपा का कांग्रेस सांसद पर गंभीर आरोप
आत्मनिर्भरता से विकसित भारत की ओर आजादी की उड़ान
15 अगस्त भारत के राष्ट्रीय जीवन का वह गौरवपूर्ण दिन है, जब हमारी धरती ने पराधीनता की लंबी रात के बाद स्वतंत्रता का सूर्य देखा था। 2026 में हम स्वतंत्रता का 80वां दिवस मना रहे हैं। यह केवल अतीत के गौरव को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि यह आत्ममंथन करने का भी समय है कि जिन सपनों के लिए असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना सर्वस्व न्योछावर किया था, उन सपनों को हमने कितना साकार किया और अब 2047 में स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष तक भारत को कैसा बनाना है। 1947 ने हमें राजनीतिक स्वतंत्रता दी थी, लेकिन 2047 का लक्ष्य हमें आर्थिक, सामाजिक, तकनीकी, सामरिक और नैतिक रूप से आत्मनिर्भर एवं विकसित भारत बनाने का है। स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं है। स्वतंत्रता तब सार्थक होगी, जब प्रत्येक नागरिक भय, अभाव, अशिक्षा, बेरोजगारी, भेदभाव और अवसरों की असमानता से मुक्त हो। जब व्यक्ति अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझे, जब लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने और सरकार बनाने की प्रक्रिया न रहकर जनकल्याण का माध्यम बने, जब राजनीति में सेवा, सार्वजनिक जीवन में शुचिता और समाज में संवेदना प्रतिष्ठित हो। आजादी की पहली पीढ़ी ने देश को गुलामी से मुक्त किया था; आज की पीढ़ी को देश को निर्भरता, पिछड़ेपन और आत्महीनता से मुक्त करना है। पिछले वर्षों में भारत की यात्रा में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से बार-बार देश को आत्मनिर्भरता, नवाचार और युवाशक्ति का मंत्र दिया है। 2025 के स्वतंत्रता दिवस संबोधन में उन्होंने विशेष रूप से युवा वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, प्रतिभाशाली युवाओं और शोधकर्ताओं का आह्वान करते हुए पूछा कि भारत अपने लड़ाकू विमानों के लिए जेट इंजन स्वयं क्यों नहीं बना सकता। उन्होंने सेमीकंडक्टर से लेकर अंतरिक्ष, जैव-प्रौद्योगिकी और रक्षा तक भारतीय प्रतिभा को अपनी क्षमता के बल पर आगे बढ़ने का आग्रह किया। उन्होंने युवाओं के विचारों को रोकने के बजाय उन्हें अवसर देने और उनके नवाचार को राष्ट्रनिर्माण से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। यह बदलाव केवल भाषणों तक सीमित नहीं है। आज छोटे शहरों, कस्बों और गांवों से निकलने वाली प्रतिभाएं स्टार्टअप, अंतरिक्ष, खेल, विज्ञान, डिजिटल तकनीक और विनिर्माण के क्षेत्र में नई पहचान बना रही हैं। प्रधानमंत्री ने लाल किले से यह भी रेखांकित किया है कि भारत के युवाओं ने देश को दुनिया के अग्रणी स्टार्टअप इकोसिस्टम में स्थान दिलाया है और अनेक छोटे शहरों तथा ग्रामीण क्षेत्रों के युवा नई तकनीकी संभावनाओं को जन्म दे रहे हैं। इसे भी पढ़ें: स्वतंत्रता के 79 वर्ष: उपलब्धियों का उत्सव, आत्ममंथन का अवसर आत्मनिर्भर भारत इसी बदलती मानसिकता का परिणाम है। आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से कट जाना नहीं, बल्कि दुनिया के साथ बराबरी से खड़े होकर अपने सामर्थ्य के आधार पर प्रतिस्पर्धा करना है। भारत अब केवल आयात करने वाला विशाल बाजार नहीं रहना चाहता; वह निर्माण करने, नवाचार करने और दुनिया को निर्यात करने वाला देश बन रहा है। मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, फार्मा, रक्षा उपकरण, अंतरिक्ष तकनीक और डिजिटल सेवाओं में भारत की क्षमता लगातार बढ़ी है। गैर-पेट्रोलियम वस्तुओं के निर्यात ने भी नए रिकॉर्ड बनाए हैं, जबकि सेवाओं के क्षेत्र में भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक शक्ति लगातार मजबूत हुई है। आत्मनिर्भरता की सबसे प्रभावशाली तस्वीर रक्षा क्षेत्र में दिखाई देती है। कभी भारत विश्व के बड़े हथियार आयातकों में गिना जाता था, लेकिन अब स्वदेशी उत्पादन और रक्षा निर्यात दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत के रक्षा निर्यात ने 38,424 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड स्तर हासिल किया, जो पिछले वर्ष के 23,622 करोड़ रुपये से 62.66 प्रतिशत अधिक है। यह परिवर्तन बताता है कि भारत अब केवल अपनी सुरक्षा आवश्यकताओं को पूरा करने की दिशा में आगे नहीं बढ़ रहा, बल्कि विश्व के देशों को रक्षा सामग्री उपलब्ध कराने की क्षमता भी अर्जित कर रहा है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत ने गोला-बारूद, हथियार, उप-प्रणालियां, प्रणालियां और महत्वपूर्ण पुर्जे लगभग 80 देशों तक पहुंचाए हैं। 2013-14 में रक्षा निर्यात महज 686 करोड़ रुपये था, जो 2024-25 में 23,622 करोड़ रुपये तक पहुंच गयाकृअर्थात एक दशक में लगभग 34 गुना वृद्धि। यह ‘मेक इन इंडिया’ से ‘मेक फॉर द वर्ल्ड’ की यात्रा का सशक्त प्रमाण है। लेकिन आत्मनिर्भर भारत की असली परीक्षा केवल अर्थव्यवस्था और तकनीक में नहीं है। हमें ऐसा भारत बनाना है जो आत्मनिर्भर होने के साथ आत्मसंयमी भी हो, शक्तिशाली होने के साथ संवेदनशील भी हो और आधुनिक होने के साथ अपनी संस्कृति एवं नैतिक जड़ों से जुड़ा भी हो। महात्मा गांधी, भगवान महावीर और भगवान बुद्ध ने हमें बताया था कि विकास का अंतिम लक्ष्य मनुष्य की गरिमा और समाज में शांति है। यदि तकनीक बढ़ती जाए लेकिन मनुष्यता घटती जाए, यदि संपन्नता बढ़े लेकिन संवेदना कम हो जाए, यदि अधिकारों की मांग बढ़े लेकिन कर्तव्यबोध समाप्त हो जाए तो स्वतंत्रता अधूरी ही रहेगी। हमारे सामने आज भी गरीबी, बेरोजगारी, असमानता, भ्रष्टाचार, सामाजिक तनाव, हिंसा, पर्यावरण संकट और डिजिटल असमानता जैसी चुनौतियां हैं। इसलिए स्वतंत्रता दिवस केवल उपलब्धियों का उत्सव नहीं, बल्कि कमियों को पहचानकर उन्हें दूर करने का संकल्प भी है। हमें ऐसी नागरिक संस्कृति विकसित करनी होगी जिसमें सत्य, शुचिता, सहिष्णुता, अनुशासन, परस्पर सम्मान और राष्ट्रहित सर्वाेपरि हों। लोकतंत्र की मजबूती केवल संसद या सरकार से नहीं होती; वह नागरिक के चरित्र से होती है। लोकतंत्र को मजबूत संसद के साथ मजबूत समाज और जिम्मेदार नागरिक भी चाहिए। आज का भारत विश्व की युवा शक्ति का महत्वपूर्ण केंद्र है। 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य मूलतः युवाओं का लक्ष्य है, क्योंकि आज का युवा ही 2047 के भारत का नेतृत्व करेगा। प्रधानमंत्री ने ‘विकसित भारत/2047 रू वॉइस ऑफ यूथ’ पहल के माध्यम से युवाओं को केवल भविष्य के लाभार्थी नहीं, बल्कि परिवर्तन के एजेंट के रूप में सामने रखा है। इसीलिए 2026 के स्वतंत्रता दिवस अभियान का केंद्र भी युवाओं को एक मजबूत, आत्मनिर्भर, नवाचारी और भविष्य के लिए तैयार भारत के निर्माण से जोड़ना है। सरकारी ‘माय भारत’ पहल में युवाओं की भागीदारी को विशेष महत्व दिया गया है। 2047 की यात्रा में हमें युवाओं से केवल नौकरी पाने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए; उन्हें रोजगार देने वाला, समस्या का समाधान खोजने वाला, नवाचार करने वाला और समाज का नेतृत्व करने वाला बनाना होगा। शिक्षा को डिग्री से कौशल, कौशल से रोजगार और रोजगार से उद्यमिता की ओर ले जाना होगा। गांव का युवा भी अंतरिक्ष में अवसर देखे, छोटे शहर की बेटी भी विज्ञान और तकनीक में विश्वस्तरीय पहचान बनाए, किसान का बेटा भी एग्रीटेक उद्यमी बने और सामान्य परिवार का युवा भी स्टार्टअप के माध्यम से हजारों लोगों के लिए रोजगार पैदा करेकृयही नए भारत की तस्वीर है। आजादी की पहली लड़ाई में युवाओं ने अपने प्राणों की आहुति देकर भारत को स्वतंत्र बनाया था। 2047 के भारत की लड़ाई में युवाओं को ज्ञान, नवाचार, चरित्र, परिश्रम और राष्ट्रभावना को अपना हथियार बनाना होगा। यदि 1947 की पीढ़ी ने पूछा थाकृ‘भारत को आजाद कैसे कराएं?’, तो आज की पीढ़ी को पूछना होगा-‘भारत को दुनिया का विकसित, समर्थ, शांतिपूर्ण और नैतिक नेतृत्व करने वाला राष्ट्र कैसे बनाएं?’स्वतंत्रता की सार्थकता इसी प्रश्न के उत्तर में छिपी है। हमें ऐसा भारत बनाना है जहां विकास की चमक के साथ मानवीयता की रोशनी भी हो; जहां विज्ञान आगे बढ़े तो संस्कार भी साथ चलें; जहां अर्थव्यवस्था मजबूत हो तो समाज भी समरस हो; जहां भारत अपनी सुरक्षा के लिए किसी पर निर्भर न हो और विश्व की शांति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाए। आज जब तिरंगा लाल किले की प्राचीर पर लहराएगा, तब हमें केवल यह नहीं कहना चाहिए कि भारत स्वतंत्र है, बल्कि यह संकल्प भी लेना चाहिए कि हम इस स्वतंत्रता को अधिक सार्थक, अधिक जिम्मेदार और अधिक जनकल्याणकारी बनाएंगे। 2047 का विकसित भारत सरकार का अकेला सपना नहीं, 140 करोड़ भारतीयों का सामूहिक संकल्प होना चाहिए। प्रधानमंत्री ने भी 2047 को नागरिकों के सपनों और संकल्पों से जोड़ते हुए स्पष्ट किया है कि विकसित भारत का निर्माण प्रत्येक भारतीय की भागीदारी से होगा। आजादी के अमृत से लेकर स्वतंत्रता के 80वें पड़ाव तक भारत ने लंबी यात्रा तय की है। अब अगला पड़ाव केवल आर्थिक शक्ति बनना नहीं, बल्कि विश्वास, विवेक, विज्ञान, संस्कार और सामर्थ्य से सम्पन्न भारत बनना है। शहीदों ने हमें स्वतंत्र भारत सौंपा था; अब हमारी जिम्मेदारी है कि हम आने वाली पीढ़ी को एक ऐसा भारत सौंपें जिस पर उसे गर्व हो। ’यही स्वतंत्रता का नया आयाम है, यही 2047 की ओर बढ़ते भारत का संकल्प है और यही हमारे तिरंगे के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।’ - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
स्वतंत्रता के 79 वर्ष: उपलब्धियों का उत्सव, आत्ममंथन का अवसर
15 अगस्त भारत की आत्मा, स्वाभिमान और सामूहिक संकल्प का उत्सव है। यह वह ऐतिहासिक क्षण है, जब सदियों की पराधीनता के बाद भारत ने स्वतंत्रता का अमृत प्राप्त किया और लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित एक नए युग की शुरुआत की। स्वतंत्रता के 79 वर्षों की इस यात्रा में भारत ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं, अनेक चुनौतियों का सामना किया है और अनेक ऐसे कीर्तिमान स्थापित किए हैं, जिन पर प्रत्येक भारतीय गर्व कर सकता है। आज जब पूरा देश तिरंगे के सम्मान में एकजुट होकर स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, तब यह अवसर केवल उपलब्धियों का उत्सव मनाने का ही नहीं बल्कि आत्ममंथन और भविष्य के संकल्प का भी है। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यह अपने आप में एक ऐसी उपलब्धि है, जिसकी मिसाल दुनिया में बहुत कम मिलती है। विविध भाषाओं, संस्कृतियों, धर्मों और परंपराओं से समृद्ध इस देश ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को न केवल सफलतापूर्वक अपनाया बल्कि उसे लगातार सशक्त भी बनाया। करोड़ों मतदाता नियमित रूप से चुनावों में भाग लेते हैं, सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण होता है और संविधान सर्वोच्च मार्गदर्शक के रूप में देश को दिशा देता है। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है। स्वतंत्रता के बाद भारत ने विकास की जिस यात्रा का आरंभ किया था, वह आज वैश्विक स्तर पर एक नई पहचान बना चुकी है। कभी खाद्यान्न संकट से जूझने वाला देश आज दुनिया के सबसे बड़े कृषि उत्पादकों में शामिल है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत ने उल्लेखनीय उपलब्धियां अर्जित की हैं। अंतरिक्ष अनुसंधान में भारतीय वैज्ञानिकों ने सीमित संसाधनों के बावजूद ऐसे कीर्तिमान स्थापित किए हैं, जिन्होंने पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया है। चंद्रयान और आदित्य जैसे मिशनों ने सिद्ध कर दिया है कि भारत केवल उपभोक्ता राष्ट्र नहीं बल्कि ज्ञान और नवाचार का नेतृत्व करने वाला देश बन रहा है। इसे भी पढ़ें: भारत स्वतंत्रता दिवस: रक्षा-उत्पादन विकास की राह पर तेज़ दौड़ डिजिटल क्रांति ने लोकतंत्र को नई शक्ति प्रदान की है। आज सरकारी सेवाएं डिजिटल माध्यम से लोगों तक पहुंच रही हैं। डिजिटल भुगतान, आधार, यूपीआई, ऑनलाइन शिक्षा, टेलीमेडिसिन और ई-गवर्नेंस जैसी व्यवस्थाओं ने शासन को अधिक पारदर्शी, तेज और नागरिक-केंद्रित बनाया है। ग्रामीण भारत भी डिजिटल परिवर्तन का सहभागी बन रहा है। यह परिवर्तन केवल तकनीकी नहीं बल्कि लोकतंत्र को अधिक सहभागी और उत्तरदायी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। भारत की आर्थिक यात्रा भी प्रेरणादायक रही है। आज देश विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। स्टार्टअप संस्कृति, नवाचार, विनिर्माण, हरित ऊर्जा, सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे क्षेत्रों में भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। युवाओं की ऊर्जा, महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और उद्यमिता की नई संस्कृति विकसित भारत की मजबूत नींव तैयार कर रही है। निश्चित रूप से यह भी स्वीकार करना होगा कि लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित नहीं होता। उसकी वास्तविक सफलता तब मानी जाती है, जब संसद, विधानसभाएं, न्यायपालिका, मीडिया और नागरिक समाज अपनी-अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों का पूरी गंभीरता से निर्वहन करें। संसदीय बहसें जितनी सार्थक होंगी, नीतियां उतनी ही प्रभावी बनेंगी। स्वस्थ संवाद, रचनात्मक विपक्ष, जवाबदेह सरकार और जागरूक नागरिक, इन्हीं चार स्तंभों पर लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती निर्भर करती है। आज भारत अनेक नई चुनौतियों का भी सामना कर रहा है। तेजी से बदलती वैश्विक परिस्थितियां, जलवायु परिवर्तन, साइबर सुरक्षा, सामाजिक समरसता, रोजगार, शिक्षा की गुणवत्ता और तकनीकी परिवर्तन जैसे विषय हमारे सामने हैं। इन चुनौतियों का समाधान केवल सरकारों से नहीं बल्कि समाज की सामूहिक भागीदारी से संभव है। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब नागरिक केवल अधिकारों की बात न करें बल्कि अपने कर्तव्यों के प्रति भी समान रूप से सजग रहें। आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक मतभेद लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर रहें। विचारों का संघर्ष लोकतंत्र की शक्ति है लेकिन व्यक्तिगत कटुता और संस्थाओं के प्रति अविश्वास उसकी कमजोरी बन सकते हैं। संसद और विधानसभाएं केवल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के मंच नहीं बल्कि जनहित के सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्थान हैं। इनकी गरिमा बनाए रखना सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की समान जिम्मेदारी है। लोकतंत्र की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण आधार नागरिकों का चरित्र होता है। यदि समाज ईमानदारी, अनुशासन, संवेदनशीलता और राष्ट्रहित को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है तो लोकतांत्रिक संस्थाएं भी स्वतः सुदृढ़ होती हैं। भ्रष्टाचार, हिंसा, सामाजिक वैमनस्य और असहिष्णुता जैसी चुनौतियों का समाधान केवल कानून से नहीं, नैतिक जागरूकता और सामाजिक उत्तरदायित्व से भी संभव है। स्वतंत्रता दिवस हमें उन लाखों ज्ञात-अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों की याद दिलाता है, जिन्होंने बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के अपना सर्वस्व राष्ट्र के लिए समर्पित कर दिया। उनका सपना केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं था बल्कि ऐसा भारत बनाना था, जहां समान अवसर, सामाजिक न्याय, शिक्षा, वैज्ञानिक सोच, आर्थिक समृद्धि और मानवीय गरिमा प्रत्येक नागरिक को उपलब्ध हो। आज विकसित भारत-2047 का संकल्प उसी स्वप्न का आधुनिक विस्तार है। भारत आज दुनिया में शांति, लोकतंत्र, सह-अस्तित्व और वसुधैव कुटुम्बकम के संदेश के साथ आगे बढ़ रहा है। वैश्विक मंचों पर उसकी बढ़ती प्रतिष्ठा, आर्थिक क्षमता, वैज्ञानिक उपलब्धियां और सांस्कृतिक विरासत इस बात का प्रमाण हैं कि भारत केवल अपने लिए नहीं बल्कि पूरी मानवता के लिए सकारात्मक भूमिका निभाने की क्षमता रखता है। स्वतंत्रता के 79 वर्षों की यात्रा हमें यह विश्वास दिलाती है कि चुनौतियां चाहे कितनी भी बड़ी हों, भारत ने हर कठिन दौर को अवसर में बदलने की क्षमता दिखाई है। यही हमारी लोकतांत्रिक शक्ति है और यही हमारी राष्ट्रीय पहचान। आज आवश्यकता केवल इतनी है कि हम संविधान के आदर्शों, लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रहित को अपने व्यक्तिगत हितों से ऊपर रखें। यदि प्रत्येक नागरिक अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करे, प्रत्येक जनप्रतिनिधि जनसेवा को सर्वोच्च प्राथमिकता दे और प्रत्येक संस्था अपनी संवैधानिक मर्यादा का पालन करे तो विकसित, समृद्ध, सुरक्षित और आत्मनिर्भर भारत का सपना निश्चित रूप से साकार होगा। इस स्वतंत्रता दिवस पर आइए, हम केवल आजादी का उत्सव न मनाएं बल्कि एक नए भारत के निर्माण का संकल्प भी लें, ऐसा भारत, जो लोकतांत्रिक मूल्यों में और अधिक मजबूत हो, वैज्ञानिक दृष्टि में अग्रणी हो, सामाजिक समरसता का प्रतीक हो और विश्व समुदाय के लिए प्रेरणा का स्रोत बने। यही स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी और यही आजादी के वास्तविक अर्थ को सार्थक करने का सर्वोत्तम मार्ग भी। - योगेश कुमार गोयल (लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)
भारत स्वतंत्रता दिवस: रक्षा-उत्पादन विकास की राह पर तेज़ दौड़
विकासशील भारत अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, यह राष्ट्रीय स्तर पर आत्मनिरीक्षण और आगे की सोच का प्रतीक है। रक्षा उत्पादन का क्षेत्र इसकी आत्मनिर्भरता और रणनीतिक ऑटोनॉमी का एक अहम स्तंभ बनकर उभरा है। मिलिट्री हार्डवेयर के एक बड़े आयातक से एक भरोसेमंद डिफेंस निर्यातक बनने का सफर भारत की बढ़ती क्षमताओं और रणनीतिक दूरदर्शिता का सबूत है। यह बदलाव सिर्फ एक आर्थिक या टेक्नोलॉजिकल उपलब्धि नहीं है; यह असल में नेशनल सिक्योरिटी, जियोपॉलिटिकल स्टैंडिंग और ग्लोबल स्टेज पर ज़्यादा असरदार भूमिका निभाने की इच्छा से जुड़ा है। पिछले कुछ दशकों में, खासकर हाल के सालों में रक्षा उत्पादन में जो तरक्की हुई है, वह एक मजबूत स्वदेशी डिफेंस इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम बनाने की सोची-समझी कोशिश को दिखाती है। यह लेख भारत के रक्षा-उत्पादन विकास की खास बातों पर गहराई से बात करेगा, क्योंकि यह अपने 80वें स्वतंत्रता दिवस के करीब पहुंच रहा है, इसकी ग्रोथ को आगे बढ़ाने वाले कई वजहों को देखेगा, और उन रुकावटों की बारीकी से जांच करेगा जो इसकी पूरी क्षमता को चुनौती दे रही हैं। रक्षा उत्पादन डेवलपमेंट की खास बातें भारत के रक्षा उत्पादनके माहौल में एक बड़ा बदलाव आया है, जो विदेशी डिजाइनों की असेंबली और लाइसेंस्ड प्रोडक्शन से आगे बढ़कर स्वदेशी इनोवेशन और मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दे रहा है। कई खास बातें इस तरक्की को दिखाती हैं। इसे भी पढ़ें: जानिए, आखिर दिल्ली क्यों रहती है आतंकियों के निशाने पर? वायुसेना के संदर्भ में, एडवांस्ड प्लेटफॉर्म और सिस्टम का विकास स्वदेशी टेक्नोलॉजी में एक बड़ी छलांग दिखाता है। लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एल सी ए) तेजस, एक मल्टी-रोल फाइटर जेट, इसका एक बड़ा उदाहरण है। दशकों के विकास के बाद, तेजस इंडियन एयर फोर्स के साथ स्क्वाड्रन सर्विस में शामिल हो गया है और इसे एक्सपोर्ट करने पर विचार किया जा रहा है, जो भारत की एडवांस्ड फाइटर एयरक्राफ्ट डिजाइन करने, डेवलप करने और बनाने की क्षमता को दिखाता है। इसी तरह, पांचवीं पीढ़ी के फाइटर, एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (ए एम सी ए) का विकास चल रहा है, जिसका मकसद भारत को ऐसी एडवांस क्षमताओं वाले चुनिंदा देशों के ग्रुप में जगह दिलाना है। नेवल डिफेंस के क्षेत्र में काफी तरक्की हुई है। भारत ने आई एन एस विक्रांत जैसे स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर को सफलतापूर्वक डेवलप और डिप्लॉय किया है, जो पहला स्वदेशी रूप से डिजाइन और बनाया गया एयरक्राफ्ट कैरियर है। यह उपलब्धि भारत को दुनिया भर में एक खास जगह दिलाती है, जो इसकी व्यापक नेवल शिपबिल्डिंग क्षमताओं को दिखाती है। इसके अलावा, स्कॉर्पीन क्लास (फ्रांस के नेवल ग्रुप के साथ मिलकर बनाया गया लेकिन इसमें काफी भारतीय कंटेंट है) और एडवांस्ड पारंपरिक पनडुब्बियों पर फोकस करने वाला आने वाला P75I प्रोजेक्ट सहित सबमरीन का स्वदेशी विकास, पानी के नीचे की लड़ाई में बढ़ती आत्मनिर्भरता को दिखाता है। एडवांस्ड स्वदेशी हथियारों और सेंसर से लैस डिस्ट्रॉयर, फ्रिगेट और ऑफशोर पेट्रोल वेसल का कंस्ट्रक्शन, भारतीय नेवी की ऑपरेशनल पहुंच और टेक्नोलॉजिकल बढ़त को और मजबूत करता है। थल सेना के लिए स्वदेशीकरण में काफी बढ़ोतरी देखी गई है। अर्जुन जैसे मेन बैटल टैंक (एम बी टी) का प्रोडक्शन, हालांकि शुरुआती विकास में चुनौतियों का सामना कर रहा था, लेकिन अब एक मज़बूत प्लैटफ़ॉर्म बन गया है। इससे भी ज़्यादा ज़रूरी बात यह है कि मॉडर्न आर्टिलरी सिस्टम, जिसमें धनुष टोड आर्टिलरी गन और के9 वज्र-T (भारत में लाइसेंस के तहत बनाया गया एक साउथ कोरियन डिज़ाइन) शामिल हैं, के लिए ज़ोर ने इंडियन आर्मी की फायरपावर को बेहतर बनाया है। कलाश्निकोव ए के-203 (भारत में बनी) जैसी देसी असॉल्ट राइफलों का विकास, और अगली पीढ़ी के इन्फेंट्री कॉम्बैट व्हीकल और आर्मर्ड पर्सनल कैरियर के लिए भविष्य के प्रोजेक्ट, ज़मीनी सेना को स्टेट-ऑफ़-द-आर्ट हथियारों से लैस करने के कमिटमेंट को दिखाते हैं। मिसाइल और रॉकेट का क्षेत्र भारत के लिए लगातार ताकत का क्षेत्र रहा है। इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (आई सी बी एम) की अग्नि सीरीज़, पृथ्वी शॉर्ट-रेंज बैलिस्टिक मिसाइल, आकाश सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम, और ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल (रूस के साथ एक जॉइंट वेंचर) का विकास और इंडक्शन मिसाइल टेक्नोलॉजी में भारत की एडवांस्ड क्षमताओं को दिखाता है। ये सिस्टम ज़रूरी रणनीतिक रोकथाम और हमला करने की क्षमता देते हैं। वर्टिकल टेक-ऑफ और लैंडिंग (वी टी ओ एल) मिसाइलों और हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी का चल रहा विकास, मिसाइल युद्ध में सबसे आगे रहने की भारत की इच्छा का और संकेत देता है। इलेक्ट्रॉनिक्स और कम्युनिकेशन सेक्टर में स्वदेशीकरण की तरफ़ काफ़ी ज़ोर देखा गया है। रोहिणी और स्वाति जैसे एडवांस्ड रडार सिस्टम से लेकर इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सुइट्स और सुरक्षित कम्युनिकेशन सिस्टम तक, भारतीय कंपनियां तेज़ी से ज़रूरी कंपोनेंट्स और सबसिस्टम डेवलप और प्रोड्यूस कर रही हैं। इससे विदेशी सप्लायर्स पर निर्भरता कम होती है और रक्षा नेटवर्क के अंदर साइबर सिक्योरिटी बढ़ती है। आखिर में, निजी रक्षा क्षेत्र का विकास एक उल्लेखनीय घटनाक्रम है। ऐतिहासिक रूप से सरकारी कंपनियों का दबदबा रहने के बाद, भारत ने अब निजी क्षेत्र की भागीदारी को सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया है। लार्सन एंड टुब्रो, टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड और महिंद्रा रक्षा सिस्टम्स जैसी कंपनियाँ महत्वपूर्ण खिलाड़ी के रूप में उभर रही हैं और विभिन्न रक्षा प्लेटफॉर्म और पुर्जों के डिज़ाइन, विकास और निर्माण में योगदान दे रही हैं। इससे इस क्षेत्र में गतिशीलता, प्रतिस्पर्धा और नवाचार आया है। विकास के कारक भारत के रक्षा उत्पादन की प्रभावशाली प्रगति रणनीतिक, आर्थिक और राजनीतिक कारकों के मेल से प्रेरित है। ये कारक आपस में जुड़े हुए हैं और एक-दूसरे को मज़बूत करते हैं, जिससे निरंतर विकास के लिए अनुकूल माहौल बनता है। (a) सबसे महत्वपूर्ण कारक रणनीतिक स्वायत्तता हासिल करने और विदेशी सैन्य उपकरणों पर निर्भरता कम करने की अटूट प्रतिबद्धता है। तेज़ी से बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य में, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक मज़बूत स्वदेशी रक्षा औद्योगिक आधार का होना बहुत ज़रूरी है। यह सुनिश्चित करता है कि भारत अन्य देशों की नीतियों या रणनीतिक हितों के दबाव में आए बिना अपनी रक्षा ज़रूरतों को पूरा कर सके। आत्मनिर्भरता की यह कोशिश भारत की विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा सिद्धांत का एक मुख्य आधार है। (b) बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण की ज़रूरत ने उन्नत रक्षा उपकरणों की निरंतर माँग पैदा की है। सीमा विवाद, क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियाँ और विश्वसनीय प्रतिरोध बनाए रखने की ज़रूरत के कारण लगातार अपग्रेड और आधुनिक प्लेटफॉर्म खरीदने की आवश्यकता होती है। यह माँग घरेलू उत्पादन के लिए एक शक्तिशाली प्रोत्साहन का काम करती है, जिससे निवेश और तकनीकी विकास को बढ़ावा मिलता है। (c) 'मेक इन इंडिया' पहल और स्वदेशीकरण के लिए सरकार की नीतिगत कोशिशें, जो 'रक्षा उत्पादन और निर्यात प्रोत्साहन नीति' (डी पी ई पी पी) जैसी योजनाओं में शामिल हैं, महत्वपूर्ण गति प्रदान करती हैं। 'रक्षा खरीद प्रक्रिया' (डी ए पी) जैसी नीतियां स्वदेशी डिज़ाइन और निर्मित उत्पादों को प्राथमिकता देती हैं और कुछ श्रेणियों को विशेष रूप से घरेलू खरीद के लिए आरक्षित करती हैं। उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में रक्षा कॉरिडोर की स्थापना समर्पित विनिर्माण केंद्र बनाने की दिशा में एक ठोस कदम है। (d) आर्थिक विकास और रोज़गार सृजन के लिए रक्षा विनिर्माण को एक प्रमुख क्षेत्र के रूप में पहचानना एक और महत्वपूर्ण कारक है। रक्षा उद्योग का उच्च गुणक प्रभाव (मल्टीप्लायर इफ़ेक्ट) होता है, जो डिज़ाइन, इंजीनियरिंग, विनिर्माण और अनुसंधान एवं विकास में कुशल रोज़गार के अवसर पैदा करता है। रक्षा उपकरणों के निर्यात से मूल्यवान विदेशी मुद्रा भी प्राप्त होती है, जिससे अर्थव्यवस्था को और बढ़ावा मिलता है। (e) रक्षा औद्योगिक कॉरिडोर की स्थापना और सार्वजनिक-निजी भागीदारी को बढ़ावा देने से रक्षा विनिर्माण के लिए अधिक अनुकूल इकोसिस्टम तैयार हुआ है। ये कॉरिडोर इंफ्रास्ट्रक्चर, वित्तीय प्रोत्साहन और आसान रेगुलेटरी माहौल देते हैं, जिससे स्थापित कंपनियां और स्टार्टअप दोनों आकर्षित होते हैं। प्राइवेट सेक्टर की बढ़ती भागीदारी से तेज़ी, इनोवेशन और दक्षता आती है, जो डिफेंस पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स (डी पी एस यू) की क्षमताओं को और बेहतर बनाती है। (f) इनोवेशन को बढ़ावा देने के लिए डिफेंस रिसर्च एंड विकास ऑर्गनाइज़ेशन ( डी आर डी ओ ) जैसे संस्थानों और एकेडमिक सहयोग से चल रही रिसर्च और विकास (आर एंड डी ) कोशिशें बहुत ज़रूरी हैं। आर एंड डी में निवेश और साथ ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स और साइबर वॉरफेयर जैसी नई तकनीकों को अपनाने पर ध्यान देने से यह पक्का होता है कि भारत की रक्षा क्षमताएं अत्याधुनिक बनी रहें। रक्षा उत्पादों के लिए बढ़ता एक्सपोर्ट मार्केट विकास का एक बड़ा मौका देता है। भारतीय कंपनियां ग्लोबल मंच पर अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन कर रही हैं और मित्र देशों को पेट्रोल बोट और हल्के लड़ाकू विमानों से लेकर मिसाइल और सर्विलांस ड्रोन तक के सिस्टम एक्सपोर्ट कर रही हैं। यह एक्सपोर्ट अभियान न केवल रेवेन्यू पैदा करता है, बल्कि भारतीय रक्षा उत्पादों की क्वालिटी और कॉम्पिटिटिवनेस को भी साबित करता है। विकास में चुनौतियां काफी प्रगति और मज़बूत प्रेरक कारकों के बावजूद, कई रुकावटें भारत की रक्षा उत्पादन क्षमता को पूरी तरह से हासिल करने में बाधा डाल रही हैं। विकास को तेज़ करने और सही मायने में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए इन चुनौतियों से निपटना ज़रूरी है। (a) सबसे बड़ी रुकावटों में से एक है ज़रूरी कंपोनेंट्स और सब-सिस्टम के लिए आयात पर लगातार निर्भरता। हालांकि भारत ने बड़े प्लेटफॉर्म बनाने में काफी प्रगति की है, लेकिन खास इलेक्ट्रॉनिक्स, सेंसर, इंजन और कुछ कच्चे माल के लिए सप्लाई चेन अक्सर विदेशी स्रोतों पर निर्भर रहती है। यह निर्भरता जियोपॉलिटिकल संकट या सप्लाई में रुकावट के समय कमज़ोरी पैदा कर सकती है और लागत-प्रभावशीलता पर असर डाल सकती है। (b) नौकरशाही की रुकावटें और जटिल रेगुलेटरी माहौल अक्सर खरीद प्रक्रिया और प्रोजेक्ट को पूरा करने में देरी करते हैं। मंज़ूरी की लंबी प्रक्रियाएं, कई स्तरों पर क्लीयरेंस और जोखिम से बचने की संस्कृति इनोवेशन को रोक सकती है और शामिल करने में देरी कर सकती है। नई तकनीकों का असर ग्लोबल मार्केट में भारतीय कंपनियों की कॉम्पिटिटिवनेस पर भी पड़ता है। (c) आर एंड डी के लिए पर्याप्त फंडिंग की कमी और लैब में हुए इनोवेशन को कमर्शियल तौर पर सफल प्रोडक्ट्स में बदलने की चुनौतियां चिंता का विषय बनी हुई हैं। हालांकि डी आर डी ओ अहम भूमिका निभाता है, लेकिन बेसिक रिसर्च के लिए फंडिंग की मात्रा और इंडस्ट्री तक टेक्नोलॉजी को असरदार ढंग से पहुंचाने के तरीकों को मजबूत करने की ज़रूरत है। एक मज़बूत इनोवेशन इकोसिस्टम बनाने के लिए एकेडेमिया, रिसर्च संस्थानों और इंडस्ट्री के बीच बेहतर सहयोग की भी ज़रूरत है। (d) स्किल्ड वर्कफोर्स की कमी, खासकर डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग के खास क्षेत्रों में, एक बड़ी चुनौती है। डिफेंस इंडस्ट्री को खास तकनीकों में माहिर इंजीनियरों, टेक्नीशियनों और रिसर्चर्स की ज़रूरत होती है। इस कमी को पूरा करने और क्वालिफाइड लोगों की लगातार सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए खास एजुकेशनल प्रोग्राम और वोकेशनल ट्रेनिंग पहलों की ज़रूरत है। (e) अच्छी तरह से विकसित स्वदेशी डिफेंस इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम की कमी, खासकर खास मटीरियल, ज़रूरी अलॉय और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग तकनीकों जैसे क्षेत्रों में, एक रुकावट बनी हुई है। ऐसे इकोसिस्टम के विकास के लिए लंबे समय के निवेश और रणनीतिक योजना की ज़रूरत होती है, जिसमें अक्सर बड़े मैन्युफैक्चरर्स और छोटे व मध्यम आकार के उद्यमों (एस एम ई) के बीच आपसी सहयोग शामिल होता है। (f) पूरी इंडस्ट्री में क्वालिटी एश्योरेंस और स्टैंडर्डाइजेशन के मुद्दे पर लगातार ध्यान देने की ज़रूरत है। यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि स्वदेशी रूप से बने कंपोनेंट्स और सिस्टम कड़े इंटरनेशनल क्वालिटी स्टैंडर्ड्स को पूरा करें, ताकि घरेलू ऑपरेशनल प्रभावशीलता और एक्सपोर्ट मार्केट में पैठ बनाई जा सके। (g) स्वदेशी उत्पादन की लागत-प्रभावशीलता कभी-कभी एक चुनौती हो सकती है। नए प्लेटफॉर्म के लिए शुरुआती विकास लागत ज़्यादा हो सकती है, और बड़े पैमाने पर उत्पादन के फायदे हमेशा हासिल नहीं हो पाते, खासकर खास प्रोडक्ट्स के लिए। इससे इम्पोर्टेड विकल्पों की तुलना में यूनिट कॉस्ट ज़्यादा हो सकती है, जिसके लिए सरकारी समर्थन और रणनीतिक दीर्घकालिक खरीद योजनाओं की ज़रूरत होती है। राजनीतिक इच्छाशक्ति और लगातार पॉलिसी लागू करना बहुत ज़रूरी है। हालांकि अक्सर पॉलिसीज़ लाई जाती हैं, लेकिन लंबे समय तक उन्हें लगातार और असरदार ढंग से लागू करना निवेशकों का भरोसा बनाने और डिफेंस इंडस्ट्री के लिए स्थिर विकास की राह बनाने के लिए बहुत ज़रूरी है। निष्कर्ष भारतीय रक्षा उत्पादन में हुई तरक्की आत्मनिर्भरता और रणनीतिक स्वायत्तता की ओर उसकी यात्रा का एक अहम पहलू है। स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर और फाइटर जेट से लेकर एडवांस्ड मिसाइल सिस्टम और तेज़ी से बढ़ते प्राइवेट डिफेंस सेक्टर तक की मुख्य बातें, तकनीकी क्षमता और मैन्युफैक्चरिंग कौशल में एक ज़बरदस्त उछाल को दिखाती हैं। इस विकास के मुख्य कारण राष्ट्रीय सुरक्षा की ज़रूरतें, सरकार का स्वदेशीकरण और आर्थिक विकास पर ज़ोर, और रक्षा उत्पादों की बढ़ती वैश्विक मांग हैं। हालाँकि, अभी भी कई बड़ी चुनौतियाँ हैं, जैसे कि आयातित पुर्ज़ों पर निर्भरता, नौकरशाही की जटिलताएँ, आर एंड डी के लिए फंड की कमी, कुशल कर्मचारियों की कमी, और एक मज़बूत औद्योगिक इकोसिस्टम की ज़रूरत। इन चुनौतियों से निपटने के लिए लगातार नीतिगत प्रतिबद्धता, रिसर्च और इनोवेशन में ज़्यादा निवेश, और सरकार, इंडस्ट्री और एकेडेमिया के बीच बेहतर सहयोग बहुत ज़रूरी होगा। आने वाले कुछ दशक भारत को एक बड़े वैश्विक रक्षा निर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने, उसकी रणनीतिक आज़ादी सुनिश्चित करने और उसकी आर्थिक समृद्धि में बड़ा योगदान देने के लिए बहुत महत्वपूर्ण होंगे। आगे का रास्ता इनोवेशन, क्वालिटी और रणनीतिक साझेदारियों पर लगातार ध्यान देने की मांग करता है, ताकि क्षमता को एक ठोस रक्षा निर्माण पावरहाउस में बदला जा सके। - प्रोफ़ेसर (डॉ.) डी.के. पांडे विज़िटिंग सीनियर फ़ेलो, सेंटर फ़ॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज़, एडजंक्ट प्रोफ़ेसर, राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय, सलाहकार, एकेडमिक काउंसिल, फ़ॉरेन पॉलिसी स्कूल और GNOIT, पूर्व एसोसिएट डीन, SoB, गलगोटिया विश्वविद्यालय।
भारतीय परंपराओं में निहित है संवाद, संवाद से ही होता है समाधान
हाल ही में संघ प्रमुख श्री मोहन भागवत ने जेन जी से बातचीत की पहल की, इस प्रकार का संवाद नया नहीं हैं बल्कि हमारी भारतीय ज्ञान परंपरा का हिस्सा रहा है जो जीवन से जुड़ी सत्य को उजागर करता है। आज की युवा हमारी पीढ़ी जैसी नहीं बल्कि उससे थोड़ी अलग है वह आदेश नहीं, बल्कि तर्क, प्रश्न और संवाद चाहती है। जेन जी तर्क तो करते हैं लेकिन उसके साथ ही ये भारतीय संस्कृति, परिवार, सामाजिक उत्तरदायित्व और वसुधैव कुटुम्बकम् जैसे मूल्यों का भी सम्मान करते हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा में संवाद का सर्वोच्च स्थान है। यहां गुरु शिष्य पर अपनी बात थोपता नहीं, बल्कि प्रश्नों के द्वारा उसकी शंका का समाधान कर उसे निर्णय लेने की स्वतंत्रता प्रदान करता है। इस प्रकार उदाहरणों में नचिकेता–यम संवाद और श्रीकृष्ण–अर्जुन संवाद विशेष रूप से विख्यात है। नेता-छात्र संवाद भारतीय संस्कृति एवं परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण भाग रहा है। हमारी भारतीय ज्ञान परंपरा में देश के नेतृत्वकर्ताओं, सम्राटों, ऋषियों, गुरुओं एवं युवा शिष्यों, छात्रों के मध्य संवाद को समाज के निर्माण का मुख्य आधार माना गया है। इसे भी पढ़ें: भागवत की नजरों में जेन-जी आंदोलन का दृष्टिकोण जेन-जी के साथ डिक्टेशन के बजाय डिस्कशन को प्राथमिकता देते हुए संघ प्रमुख ने संवाद का मार्ग चुना। यह पहल न केवल युवा पीढ़ी के विचारों, प्रश्नों और आकांक्षाओं को समझने की आवश्यकता को रेखांकित करती है, बल्कि भारत की उस प्राचीन संवाद-परंपरा की पुनर्प्रतिष्ठा भी करती है, जिसमें संवाद को सामाजिक जीवन का आधार माना गया है। आज जब भारत विकसित राष्ट्र की दिशा में आगे बढ़ रहा है, युवाओं के साथ संवाद की यह परंपरा उनके ऊर्जा, नवाचार और दृष्टि को राष्ट्र-निर्माण से जोड़ने में महती भूमिका निभा सकती है। भारतीय ज्ञान परंपरा में संवाद केवल वार्तालाप नहीं है, अपितु सत्य की खोज, आपसी मतभेदों का समाधान एवं ज्ञान के आदान-प्रदान का जरिया रहा है। उपनिषदों में वर्णित गुरु-शिष्य के मध्य संवाद, भगवद्गीता में श्रीकृष्ण एवं अर्जुन का संवाद तथा बौद्ध-जैन परंपराओं की शास्त्रार्थ परंपरा इसका अनोखा उदाहरण है जो हमें दो पीढ़ियों की बीच हुए संवाद की महत्ता बताते हैं। हमारी भारतीय परंपरा का मूल मंत्र है वादे वादे जायते तत्त्वबोधः, अर्थात संवाद से ही सत्य का बोध होता है। मोहन भागवत का जेन जी से संवाद इसी परंपरा को वर्तमान में आगे बढ़ाने का प्रयास है, जिसमें युवाओं के साथ सम्मानपूर्ण, तर्कपूर्ण और खुले संवाद के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक मूल्यों को जोड़ने की बात कही गई है। नचिकेता–यम संवाद भारतीय ज्ञान परंपरा में एक प्रमुख संवाद है। नचिकेता की उम्र आज की जेन अल्फा पीढ़ी के बराबर की थी जब बालक नचिकेता एवं यमराज के मध्य संवाद के द्वारा आत्मा, ब्रह्म, मोक्ष और जीवन के सत्य पर विस्तृत बातचीत हुई। इस संवाद की विशेषता यह रही है कि यहां गुरु ने प्रश्न पूछने से नहीं रोका बल्कि जिज्ञासा का सम्मान किया, तर्क एवं विवेचन द्वारा विश्लेषण कर उत्तर दिया। सत्य को कृत्रिम न कर उसे स्वयं समझने का अवसर प्रदान किया। इसी प्रकार करुक्षेत्र की रणभूमि में श्रीकृष्ण एवं अर्जुन का संवाद भारतीय ज्ञान परंपरा में जीवन से जुड़े सत्यों का विश्लेषण करने में विशेष महत्ता रखता है। गीता के उपदेश के उपरांत श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि सभी तथ्यों पर विचार कर अपनी इच्छानुसार सब कुछ करो। यह भारतीय संवाद परंपरा का सर्वोच्च आदर्श है। इसमें श्रीकृष्ण ने निर्णय अर्जुन पर छोड़ दिया। उन्हें ज्ञान दिया, तर्क दिया, मार्गदर्शन दिया, परंतु निर्णय की स्वतंत्रता लेने की स्वतंत्रता नहीं छीनी। इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया। विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥ (गीता 18.63) प्रश्न पूछना दोष नहीं, ज्ञान का प्रारंभ है। गुरु का कार्य आदेश देना नहीं, मार्गदर्शन करना है। संवाद का उद्देश्य किसी पर विचार थोपना नहीं, सत्य का बोध कराना है। अंतिम निर्णय व्यक्ति की विवेकपूर्ण स्वतंत्रता पर छोड़ा जाता है। इसी कारण नचिकेता–यम संवाद और श्रीकृष्ण–अर्जुन संवाद भारतीय ज्ञान परंपरा में आदर्श माने जाते हैं। आज के संदर्भ में भी जब युवाओं से संवाद की बात होती है, तो उसका आशय यही है कि उनकी जिज्ञासाओं का सम्मान किया जाए, तर्कपूर्ण चर्चा हो और उन्हें सोच-समझकर स्वयं निर्णय लेने का अवसर दिया जाए। इसके अलावा चाणक्य एवं चंद्रगुप्त का संवाद भी भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां चाणक्य एक दूरदर्शी शिक्षक और नेता के रूप में युवा छात्र चंद्रगुप्त का मार्गदर्शन कर उन्हें अखंड भारत का सम्राट बनाया। विवेकानंद भी हमेशा युवाओं से सीधा संवाद करते थे ताकि उनमें राष्ट्रप्रेम की भावना जागृत हो और वह राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाए। हमारी भारतीय संस्कृति में संवाद अर्थहीन नहीं है अपितु अपने अंदर महत्वपूर्ण मूल्यों को समाहित किए हुए। इनमें विनय एवं बड़ों के प्रति सम्मान विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। हमारी भारतीय संस्कृति छात्रों को हमेशा विनयशीलता एवं गुरुजनों के प्रति आदर करना सीखाती है। साथ ही अपने गुरुजनों की बातों को धैर्यपूर्वक सुनना छात्रों का गुण माना जाता है। यह संवाद कभी अर्थहीन नहीं होते। इनका उद्देश्य किसी को हराना नहीं, बल्कि सत्य और सही मार्ग को खोजना होता है। भारतीय ज्ञान परंपरा में वर्णित संवादों के अपने लोकतांत्रिक मूल्य हैं। संवाद के परंपरागत मार्ग हमारे लोकतंत्र और जीवंत होता है। वर्तमान के युवा ही भविष्य के नेता होते हैं, यह संवाद उन्हें इस जिम्मेदारी का अहसास कराता है। - प्रज्ञा पाण्डेय
जानिए, आखिर दिल्ली क्यों रहती है आतंकियों के निशाने पर?
आपको पता होगा कि 15 अगस्त और 26 जनवरी के मौके पर यानी राष्ट्रीय पर्वों दिल्ली अक्सर पाक परस्त आतंकियों के निशाने पर रहती है! ऐसा खुफिया जानकारियों से भी पता चलता है। ऐसा इसलिए कि नई दिल्ली सिर्फ भारत की राजधानी नहीं, बल्कि भारत की राजनीतिक, संवैधानिक और प्रतीकात्मक शक्ति का सबसे बड़ा केंद्र है। चूंकि राष्ट्रीय पर्व—15 अगस्त तथा 26 जनवरी—आतंकियों के लिए इसी प्रतीकात्मक महत्व को भुनाने और इसमें भागीदारी जताने वालों के बीच अधिकतम भयावह माहौल पैदा करने का षड्यंत्र रचा जाता है, इसलिए खुफिया व सुरक्षा एजेंसियां चौकस हो जाती हैं। दरअसल, इस अहम मौके पर जगह जगह उमड़ने वाली भीड़ के बीच आतंकियों द्वारा अपने नापाक इरादों को पूरे करने के अवसर के रूप में देखा जाता है और इसी उद्देश्य से वो अमन-चैन के दुश्मन बन जाते हैं। भला हो एनआईए, खुफिया एजेंसियों और दिल्ली पुलिस का जो समय रहते ही उनके नापाक इरादों को ध्वस्त कर देती हैं। इस समय यह सवाल और गंभीर है, क्योंकि 13 अगस्त 2026 को सामने आई संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ने नवंबर 2025 के Red Fort आतंकी हमले को AQIS (Al-Qaeda in the Indian Subcontinent) से आधिकारिक रूप से जोड़ा है। इसे भी पढ़ें: Taliban के 5 साल के राज में कितना बदला Afghanistan? बंदूकधारियों की Diplomacy देखकर दुनिया हैरान आइए, अब उन वजहों की चर्चा करते हैं जिनकी वजह से दिल्ली आतंकियों के निशाने पर रहती है:- पहला, दिल्ली पर हमला यानी पूरे भारत को संदेश: आतंकी संगठन केवल जान-माल का नुकसान नहीं चाहते, बल्कि उनका असली लक्ष्य अक्सर भय, प्रचार और राजनीतिक संदेश पैदा करना होता है। चूंकि दिल्ली में संसद, राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री कार्यालय, सुप्रीम कोर्ट, मंत्रालय, विदेशी दूतावास और राष्ट्रीय स्मारक जैसे संस्थान हैं। इसलिए यहां घटी हुई छोटी सी घटना का भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव बहुत बड़ा हो सकता है। दूसरा, राष्ट्रीय पर्वों पर प्रतीकात्मक मूल्य बढ़ जाता है कई गुना: 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री का राष्ट्र को संबोधन और 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस समारोह—ये दोनों भारत की राजकीय संप्रभुता और राष्ट्रीय एकता के सबसे बड़े सार्वजनिक प्रतीक हैं। इसीलिए सुरक्षा एजेंसियां वर्षों से मानती रही हैं कि Independence Day समारोह आतंकियों और उग्रवादी संगठनों के लिए “attractive target” हो सकते हैं। यानी आतंकियों की गणित कुछ ऐसी होती है: सामान्य दिन का हमला → स्थानीय/क्षेत्रीय खबर, लेकिन राष्ट्रीय पर्व के दिन दिल्ली में हमला → अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां + राष्ट्रीय मनोवैज्ञानिक प्रभाव + सरकार की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल। तीसरा, भीड़ और VVIP मौजूदगी: राष्ट्रीय समारोहों में हजारों लोग, VVIP/VIP, सुरक्षा बल, मीडिया और देश-विदेश के प्रतिनिधि मौजूद होते हैं। 15 अगस्त 2026 के Red Fort समारोह के लिए भी सुरक्षा व्यवस्था बेहद व्यापक है और दिल्ली में प्रवेश, यातायात, मेट्रो तथा संवेदनशील क्षेत्रों पर विशेष प्रतिबंध लगाए गए हैं। आतंकी संगठनों के लिए भीड़ का अर्थ होता है कि एक छोटी कोशिश भी बड़े पैमाने पर अफरा-तफरी पैदा कर सकती है। चौथा, लाल किला स्वयं एक असाधारण प्रतीक है: लाल किला केवल ऐतिहासिक इमारत नहीं है। 15 अगस्त को प्रधानमंत्री का तिरंगा फहराना उसे आधुनिक भारतीय राष्ट्र-राज्य के सबसे शक्तिशाली प्रतीकों में बदल देता है। इसीलिए Red Fort पहले भी आतंकवादी लक्ष्य रहा है। दिसंबर 2000 में वहां आतंकी हमला हुआ था। और नवंबर 2025 का हमला इस खतरे की आधुनिक अभिव्यक्ति था। अब संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में AQIS का नाम सामने आना इस पूरे मामले को और गंभीर बनाता है। पांचवां, दिल्ली की एक और कमजोरी—बहुत बड़ा और खुला महानगरीय क्षेत्र: यह केवल Red Fort की सुरक्षा का प्रश्न नहीं है, बल्कि दिल्ली-NCR में रेलवे स्टेशन, मेट्रो नेटवर्क, बाजार, बस अड्डे, धार्मिक एवं पर्यटन स्थल, सरकारी संस्थान, भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक स्थान और बहुत बड़ी संख्या में हैं। इसलिए किसी आतंकी संगठन के लिए केवल मुख्य समारोह को निशाना बनाना ही जरूरी नहीं होता। समारोह के आसपास किसी दूसरे संवेदनशील स्थान पर घटना करके भी भय का वातावरण बनाया जा सकता है। इसी कारण इस बार रेलवे हब और अन्य महत्वपूर्ण स्थानों पर भी निगरानी बढ़ाई गई है। छठा, राष्ट्रीय पर्व इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि सुरक्षा व्यवस्था पहले से दिखाई देती है: यह एक दिलचस्प विरोधाभास है। 15 अगस्त और 26 जनवरी पर सुरक्षा सबसे ज्यादा होती है—लेकिन उसी कारण सुरक्षा की तैनाती, रास्ते, समारोह का स्थान और समय जैसी बहुत-सी चीजें सार्वजनिक रूप से ज्ञात भी होती हैं। इसलिए सुरक्षा एजेंसियां केवल समारोह स्थल की सुरक्षा नहीं करतीं, बल्कि पूरे शहर में layered security बनाती हैं। इस साल दिल्ली पुलिस ने बड़े पैमाने पर पुलिस बल, CCTV, ड्रोन, वाहन जांच और अन्य निगरानी उपाय बढ़ाए हैं। सातवां, असली खतरा सिर्फ “बड़ा हमला” नहीं है: आज आतंकवाद की रणनीति भी बदल रही है। बड़े संगठित समूहों के बजाय छोटे, बिखरे हुए सेल, स्थानीय मददगार, डिजिटल संपर्क और कम लागत वाले हमले ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। UN की हालिया रिपोर्ट में भी AQIS के बारे में छोटे और बिखरे हुए नेटवर्क तथा क्षेत्रीय लॉजिस्टिक/वित्तीय नेटवर्क की चिंता व्यक्त की गई है। इसका मतलब है कि केवल Red Fort की अभेद्य सुरक्षा पर्याप्त नहीं है। Intelligence + cyber monitoring + financial tracking + border intelligence + local policing + community intelligence—इन सभी को जोड़ना पड़ेगा। लेकिन एक महत्वपूर्ण बात यह है कि अक्सर यह कहना सही नहीं होगा कि “हर 15 अगस्त या 26 जनवरी को दिल्ली पर हमला होने वाला है।” राष्ट्रीय पर्वों के आसपास सुरक्षा एजेंसियों द्वारा खतरे की आशंका को गंभीरता से लेना एक precautionary security doctrine है। 2026 में भी हाई अलर्ट और व्यापक सुरक्षा व्यवस्था इसी सावधानी का हिस्सा है। लेकिन नवंबर 2025 के Red Fort हमले और अब UN की AQIS attribution के बाद यह जरूर कहा जा सकता है कि दिल्ली के प्रतीकात्मक स्थलों को लेकर आतंकवादी संगठनों की रुचि को केवल काल्पनिक खतरा मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। # समझिए सबसे बड़ा सवाल और जानिए जवाब मेरे विचार से असली प्रश्न यह नहीं है कि “आतंकी दिल्ली को क्यों चुनते हैं?” बल्कि असली प्रश्न यह है कि- क्या भारत की राजधानी को केवल राष्ट्रीय पर्वों पर ही नहीं, बल्कि वर्ष के 365 दिनों में ऐसी बहुस्तरीय सुरक्षा मिल रही है जिसमें आतंकियों की योजना बनने से पहले ही उसका पता चल जाए? क्योंकि आतंकवाद के खिलाफ सबसे बड़ी जीत हमला होने के बाद हमलावर पकड़ना नहीं, बल्कि हमला होने से पहले साजिश को तोड़ देना है।0और 2026 में दिल्ली के संदर्भ में यही सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा चुनौती है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
Taliban के 5 साल के राज में कितना बदला Afghanistan? बंदूकधारियों की Diplomacy देखकर दुनिया हैरान
भले ही दुनिया ने तालिबान को औपचारिक मान्यता देने से अब तक परहेज किया हो, लेकिन पांच साल में इस संगठन ने एक बात साबित कर दी है कि सत्ता पर कब्जे के बाद राजनय की ताकत को हथियार की तरह इस्तेमाल करना उसे आता है। 15 अगस्त 2021 को अमेरिकी नेतृत्व वाली नाटो सेनाओं की वापसी के बाद काबुल पर कब्जा करने वाला तालिबान आज उस मुकाम पर है जहां कई देश उसे पसंद नहीं करने के बावजूद उससे बात कर रहे हैं, उसके साथ सौदे कर रहे हैं और क्षेत्रीय सुरक्षा से लेकर व्यापार तक के सवालों पर उसे नजरअंदाज नहीं कर सकते। इस बदलते समीकरण का सबसे बड़ा संकेत भारत है। 15 अगस्त को तालिबान ‘विक्ट्री डे’ मनाने जा रहा है और नई दिल्ली स्थित अफगान दूतावास में होने वाले समारोह में वरिष्ठ भारतीय अधिकारियों की संभावित भागीदारी को लेकर भी संकेत मिले हैं। निमंत्रण अफगानिस्तान के चार्ज द अफेयर्स मुफ्ती नूर अहमद नूर की ओर से भेजा गया है और उस पर ‘इस्लामिक अमीरात ऑफ अफगानिस्तान’ का प्रतीक चिह्न है। भारत ने तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता नहीं दी है, लेकिन उसे अफगान दूतावास संचालित करने की अनुमति देकर और उसके राजनयिकों को काम करने की जगह देकर उसने साफ कर दिया है कि कूटनीति में ‘मान्यता’ और ‘व्यावहारिक संबंध’ दो अलग चीजें हैं। पांच साल में तालिबान राज ने आखिर बदला क्या? देखा जाये तो तालिबान का पांच साल का राज हालात में कोई अहम बदलाव नहीं कर पाया है। आम अफगान की जिंदगी आर्थिक, सामाजिक और मानवीय संकटों से अब भी घिरी है। करीब आधी आबादी गरीबी में है, बेरोजगारी दर बहुत ज्यादा है, निवेश नहीं है और महिलाओं को कामकाज से लगभग बाहर कर दिया गया है। हां, कर संग्रह में सुधार हुआ है, भ्रष्टाचार में कुछ कमी आई है और देश के बड़े हिस्से में हिंसा पहले की तुलना में कम हुई है। लेकिन बदले में मनमानी गिरफ्तारियां, जबरन गुमशुदगियां और प्रतिशोधात्मक कार्रवाई जैसी शिकायतें बनी हुई हैं। इसे भी पढ़ें: Taliban ने Herat से संयुक्त राष्ट्र के दो कर्मचारियों को हिरासत में लिया तालिबान ने आर्थिक मोर्चे पर खनन और सीमा-पार बुनियादी ढांचे पर जोर बढ़ाया है। चीन और दूसरे पड़ोसी देशों की कंपनियां अफगानिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों में संभावनाएं तलाश रही हैं। मध्य एशिया के ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान, उज्बेकिस्तान और कजाखस्तान जैसे देश भी काबुल के साथ व्यापारिक गलियारों को लेकर सक्रिय हैं, क्योंकि समुद्र तक पहुंच बनाने के लिए अफगानिस्तान एक अहम भौगोलिक कड़ी बन सकता है। यही तालिबान की असली कूटनीतिक चाल है। यानि वह विचारधारा की बजाय भूगोल को बेच रहा है। वह कह रहा है कि उसे पसंद करें या न करें, लेकिन अफगानिस्तान की जमीन, खनिज, व्यापार मार्ग और सुरक्षा समीकरण से दुनिया बच नहीं सकती। बिना मान्यता के भी दुनिया से रिश्ते रूस फिलहाल तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता देने वाला अकेला देश है, लेकिन व्यवहार में तस्वीर इससे कहीं बड़ी है। चीन, जापान, तुर्किये, सऊदी अरब और ब्रिटेन समेत अनेक देशों के प्रतिनिधि काबुल पहुंच रहे हैं। यूरोपीय संघ के साथ असफल अफगान शरणार्थियों की वापसी पर बातचीत हो रही है और जर्मनी ने तालिबान की वापसी के बाद पहली बार ऐसे अफगान नागरिक को निर्वासित किया जिसे किसी अपराध में दोषी नहीं ठहराया गया था। साथ ही तालिबान ने समय को अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया है। पांच साल गुजर चुके हैं। दुनिया को धीरे-धीरे यह कठोर वास्तविकता स्वीकार करनी पड़ रही है कि अफगानिस्तान पर वास्तविक नियंत्रण तालिबान का है। संयुक्त राष्ट्र से जुड़े विशेषज्ञों के मुताबिक, क्षेत्रीय देशों में यह सोच मजबूत हुई है कि यह ऐसी वास्तविकता है जिससे निपटना ‘अनिवार्य’ है, चाहे उसे पसंद किया जाए या नहीं। पाकिस्तान को तालिबान ने दिखाया आईना भारत के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक बदलाव तालिबान और पाकिस्तान के रिश्तों में आई दरार है। जिस पाकिस्तान को कभी तालिबान का संरक्षक और रणनीतिक साझेदार माना जाता था, वही आज काबुल के साथ खुले टकराव में है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच संघर्ष इतना बढ़ा कि चीन, कतर, सऊदी अरब, ओमान, ईरान, तुर्किये, उज्बेकिस्तान और मलेशिया तक को हस्तक्षेप करना पड़ा। सैकड़ों नागरिकों की मौत के बाद चीन ने बातचीत की मेजबानी की। यहीं पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा झटका है। तालिबान ने यह दिखा दिया कि काबुल की सत्ता अब इस्लामाबाद की जेब में नहीं है। बल्कि अफगान संप्रभुता और सीमा विवाद पर वह पाकिस्तान से भिड़ने को तैयार है। भारत के लिए यह किसी रणनीतिक बोनस से कम नहीं। पिछले वर्ष भारत और तालिबान के संयुक्त बयान में जम्मू-कश्मीर को भारत में स्थित केंद्रशासित प्रदेश के रूप में संदर्भित किया गया और पहलगाम आतंकी हमले की निंदा की गई। पाकिस्तान के लिए इससे अधिक कड़वा कूटनीतिक संदेश शायद ही कुछ हो सकता था। भारत की चाल: मान्यता नहीं, मगर दूरी भी नहीं भारत ने अफगानिस्तान में अपने ऐतिहासिक और सभ्यतागत संबंधों को कभी पूरी तरह टूटने नहीं दिया। 34 में से सभी प्रांतों में 500 से अधिक विकास परियोजनाओं के जरिए बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि और क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्रों में उसकी मौजूदगी रही है। पिछले वर्ष काबुल में भारतीय दूतावास बहाल हुआ और तालिबान के राजनयिकों को नई दिल्ली स्थित अफगान दूतावास में काम करने की अनुमति मिली। विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी की भारत यात्रा ने इस रिश्ते को और गति दी। जून में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में यह संकेत भी दिया कि मौजूदा तालिबान प्रतिबंध व्यवस्था पर पुनर्विचार की जरूरत है। भारत के संयुक्त राष्ट्र प्रतिनिधि हरीश पार्वतनैनी ने कहा कि पांच वर्षों में अफगानिस्तान की राजनीतिक वास्तविकता बदल चुकी है और प्रतिबंध व्यवस्था को इस बदलाव को ध्यान में रखना चाहिए। लेकिन तालिबान की सबसे बड़ी कीमत अफगान महिलाएं चुका रही हैं इस पूरी कूटनीतिक सफलता के बीच तालिबान शासन का सबसे भयावह चेहरा महिलाओं और लड़कियों की जिंदगी में दिखाई देता है। पांच साल में 160 से अधिक आदेश महिलाओं और लड़कियों की शिक्षा, रोजगार, आवाजाही, पहनावे, बोलने और निर्णय लेने के अधिकारों पर प्रतिबंध लगा चुके हैं। माध्यमिक और उच्च शिक्षा से लड़कियों का बाहर किया जाना अफगानिस्तान के भविष्य पर सीधे हमला है। संयुक्त राष्ट्र की महिला एजेंसी के अनुसार आधुनिक दौर में किसी अन्य देश ने कानून, नीति और व्यवहार के जरिए आधी आबादी के अधिकारों को इस पैमाने पर खत्म नहीं किया। महिलाओं को संयुक्त राष्ट्र परिसर समेत कई जगहों से बाहर रखा गया है। अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय ने तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा और मुख्य न्यायाधीश अब्दुल हकीम हक्कानी के खिलाफ महिलाओं और लड़कियों के उत्पीड़न को मानवता के खिलाफ अपराध बताते हुए गिरफ्तारी वारंट भी जारी किए हैं। यही तालिबान की सबसे बड़ी विडंबना है कि बाहर की दुनिया से वह बातचीत के दरवाजे खोल रहा है, जबकि अपने ही देश की आधी आबादी के लिए दरवाजे बंद कर रहा है। रणनीतिक संदेश साफ है भारत के लिए तालिबान के पांच साल का अर्थ न तो भावनात्मक दोस्ती है और न ही वैचारिक समर्थन। यह कठोर रणनीतिक यथार्थवाद है। भारत को अफगानिस्तान में अपनी सुरक्षा, पाकिस्तान की गतिविधियों, आतंकवाद, मध्य एशिया तक पहुंच, मानवीय सहायता और क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं के लिए काबुल से संवाद बनाए रखना होगा। उधर, तालिबान ने पांच साल में दुनिया को यह दिखाया है कि बिना औपचारिक मान्यता के भी सत्ता प्रभाव पैदा कर सकती है। उसने पाकिस्तान को चुनौती दी, पड़ोसी देशों को अपने साथ बैठाया, यूरोप को वापसी के मुद्दे पर बातचीत के लिए मजबूर किया और भारत जैसे देश को भी व्यावहारिक जुड़ाव बढ़ाने की दिशा में सोचने के लिए प्रेरित किया। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि तालिबान जीत गया है। असली परीक्षा अभी बाकी है। जब तक अफगान लड़कियों के स्कूल नहीं खुलते, महिलाओं को काम और सार्वजनिक जीवन में अधिकार नहीं मिलता और शासन में मनमानी तथा दमन कम नहीं होता, तब तक तालिबान की कूटनीतिक सफलता उसके शासन की नैतिक विफलता को ढक नहीं सकती। बहरहाल, कुल मिलाकर देखें तो पांच साल बाद तस्वीर यह है कि तालिबान को दुनिया ने मान्यता नहीं दी, लेकिन वह उससे बात करने लगी है। साथ ही पाकिस्तान, जिसने कभी काबुल को अपनी रणनीतिक गहराई समझा था, अब उसी काबुल से सीमा पर भिड़ रहा है। यही पिछले पांच वर्षों का सबसे बड़ा भू-राजनीतिक उलटफेर है। -नीरज कुमार दुबे
भक्ति कर दरिया में डाल...7000 मीट्रिक टन कचरा छोड़ किसने हरिद्वार को कूड़ाद्वार बना डाला?
भारत का कैलेंडर 12 महीने उनमें से एक महीना सावन मोटा-मोटी बारिश का महीना तभी तो इस पर गाना भी बना है सावन का महीना पवन करे शोर। सावन का महीना भगवान शिव का महीना माना जाता है इसलिए इस महीने शिवभक्त निकलते हैं एक यात्रा पर। 28 दिन की यात्रा यानि 4 हफ्ते में चार सोमवार सोमवार के व्रत की कोशिश रहती है कि उनकी यात्रा मंडे के दिन शिव मंदिर पहुंचे सावन के सोमवार को कावड़ यात्रा सबसे ज्यादा एक्टिव रहती है। लेकिन इतनी बड़ी धार्मिक यात्रा का असर सिर्फ घाटों और सड़कों पर दिखने वाली भीड़ तक सीमित नहीं रहता। कुछ ही दिनों के लिए किसी भी शहर की पॉपुलेशन अचानक कई गुना बढ़ जाए तो उसके रोड्स, पार्किंग, टॉयलेट, सैनिटेशन और वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम हर चीज की कैपेसिटी टेस्ट होती है। 30 जुलाई 2026 से शुरू हुई इस साल की कावड़ यात्रा 11 अगस्त को खत्म हुई। करीब 14 दिनों तक हरिद्वार में करोड़ों कावड़ यात्री पहुंचे और उनके लौटने के बाद शहर के सामने अब एक नई चुनौती हजारों टन वेस्ट को साफ करना है। सावन में 4 करोड़ शिव भक्त हरिद्वार पहुंचे थे। मतलब एक छोटा सा कुंभ। गंगा जी से जल लेने। घाट पर कमरे बने थे माताओं बहनों के कपड़े बदलने के लिए। जब सफाई की गई तो उसके अंदर जानते हैं क्या निकला? पेशाब भरी बोतलें। अब हरकी पैड़ी पर जो लोग झाड़ू लेकर वहां सफाई कर रहे हैं, कूड़े के पहाड़ को दिखा रहे हैं। हमें उनके दुख दर्द को भी समझना पड़ेगा। हालत यह हो गई कि निगम के अपने कर्मचारी कम पड़ गए। इतना कूड़ा था। हजार कर्मचारी बाहर से बुलाने पड़े। इसे भी पढ़ें: Bareilly में कांवड़ यात्रियों की ट्रैक्टर-ट्रॉली पलटी, 1 की मौत और 24 लोग घायल हुए कावड़ यात्रा की कहानी कुछ मान्यताओं के अनुसार भगवान राम पहले कावड़िया थे उन्होंने बिहार के सुल्तानगंज से कांवड़ में गंगाजल भर बाबाधाम यानि बैजनाथ में शिवलिंग का जलाभिषेक किया था पुराणों में यह कहानी भी आती है कि समुद्र मंथन से निकले विष को जब भगवान शिव अपने कंठ में धारण कर लिया तो उसके प्रभावों को दूर करने के लिए देवताओं ने भगवान शिव पर पवित्र नदियों का जल चढ़ाया तभी से गंगाजल लाकर सावन में शपथ समर्पित करने का ऑपरेशन शुरू हुआ। एक अन्य कहानी ये भी है कि शिव भक्त रावण ने विशेष शिव को राहत देने के लिए कांवड़ में जल भरकर पर जो कि यूपी में है के पुरा महादेव शिवमंदिर में शिवजी का जलाभिषेक किया इसके बाद कावड़ यात्रा की शुरुआत हुई तीसरी कहानी कुछ जगह वाले कहानी रिपीट होती है मगर करता के व्यक्ति के साथ मंदिर और जल चढ़ाना सेम लेकिन रावण की जगह पर उस राम जो जलाभिषेक के लिए गढ़मुक्तेश्वर में बह रही गंगा नदी से जल लाए। एक कहानी त्रेता युग वाली कहानी भगवान राम वाला यह होता है तथा योग उसमें अपने दृष्टिहीन माता-पिता को तीर्थ यात्रा कराने के लिए श्रवण कुमार हिमाचल के ऊना क्षेत्र से मायापुर हरिद्वार में गंगा स्नान करवाने लाइफ है इसके लिए उन्होंने एक कावड़ बनाई और अपने माता-पिता को उसमें बिठाया माता-पिता को स्नान करवाने के बाद वापसी में अपने साथ गंगा जल ले आए यहीं से कावड़ यात्रा की शुरुआत हुई। 7000 से 8000 मेट्रिक टन वेस्ट मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस साल करीब 4.8 करोड़ कावड़ यात्री हरिद्वार पहुंचे। वहीं यात्रा खत्म होने के बाद करीब 7000 से 8000 मेट्रिक टन वेस्ट होने की बात सामने आई है। अब सवाल यह है कि आखिर इतना कचरा आया कहां से? क्या इसका एक बड़ा कारण किसी शहर की कैपेसिटी से कई गुना ज्यादा लोगों का कुछ ही दिनों में वहां पहुंचना है या फिर इसमें लोगों के सिविक सेंस की भी भूमिका है? अगर पिछले कुछ सालों का डाटा देखें तो हरिद्वार में कावड़ यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ी है। 2023 में करीब 4.07 करोड़, 2024 में 4.14 करोड़ और 2025 में करीब 4.52 करोड़ कावड़ यात्री यहां पहुंचे थे। इस साल यह संख्या बढ़कर करीब 4.8 करोड़ बताई जा रही है। यानी फुटफॉल लगातार बढ़ रहा है और जैसे-जैसे फुटफॉल बढ़ता है, वैसे-वैसे शहर के इंफ्रास्ट्रक्चर पर प्रेशर भी बढ़ता है। इस साल के वेस्ट आंकड़े को लेकर मीडिया रिपोर्ट्स में अलग-अलग नंबर्स मिलते हैं। इंडिया टुडे ने म्यनिसिपल ऑफिशियल के हवाले से करीब 7000 मेट्रिक टन वेस्ट कलेक्ट होने की बात कही है। वहीं टाइम्स ऑफ इंडिया ने हरिद्वार म्यनिसिपल कॉरपोरेशन के नंदन कुमार के हवाले से करीब 8000 मेट्रिक टन वेस्ट कलेक्ट होने की रिपोर्ट की है। 8000 मेट्रिक टन कचरा यानी करीब 80 लाख किलो कचरा। नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा यानी एनएमसीजी के वेस्ट मैनेजमेंट फ्रेमवर्क में भी सोर्स सेग्रगेशन, कलेक्शन, ट्रांसपोर्टेशन और डेजिग्नेटेड डिस्पोजेबल पर जोर दिया गया है। लेकिन इस साल की कावड़ यात्रा के दौरान कलेक्ट हुए करीब 7000 से 8000 टन वेस्ट का कितना हिस्सा रिसाइकल हुआ, कितना प्रोसेस हुआ और कितना डिस्पोजल के लिए भेजा गया, इसका डिटेल ब्रेकअप फिलहाल पब्लिक नहीं किया गया है। इसे भी पढ़ें: Delhi Rain: बारिश और कांवड़ यात्रा से कई सड़कों पर लगा जाम, AQI रहा 78 आखिर इतना कचरा आया कहां से? मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक क्लीनअप के दौरान बड़ी मात्रा में प्लास्टिक शीट्स, डिस्कारेड और गंदे कपड़े, प्लास्टिक बॉटल्स, स्लीपर्स और कुछ दूसरे तरह का कचरा मिला। कुछ रिपोर्ट्स में फूड वेस्ट और रोटन फूड का भी जिक्र है। वहीं कुछ चेंजिंग रूम्स में ऐसी बॉटल्स मिलने की बात सामने आई जिन्हें रिपोर्ट्स में यूरिन कंटेनिंग बॉटल्स बताया गया है। यानी यहां सिर्फ प्लास्टिक का कचरा नहीं था। लोगों के इस्तेमाल के बाद छोड़े गए कपड़े, फुटवेयर, बॉटल्स, खानेपीने से जुड़ा वेस्ट और दूसरी डिस्कारेड चीजें भी क्लीन अप का हिस्सा थी। कुछ जगहों पर यह कचरा सिर्फ रोड्स या मार्केट तक सीमित नहीं था। यानी जिस इलाके में इतनी बड़ी संख्या में लोग कुछ दिनों तक लगातार आते-जाते रहे, वहां हर तरफ सैनिटेशन सिस्टम पर प्रेशर पड़ा। हरिद्वार म्यनिसिपल कॉरपोरेशन के मुताबिक इस वेस्ट में प्लास्टिक शीट्स, डिस्कारेड कपड़े और दूसरे मटेरियल शामिल थे और सफाई पूरे कावड़ मेला एरिया में की गई थी। हर साल का रिवाज बन गया हम मां गंगा कहते हैं और उसी के किनारे पन्नी फेंकते, कपड़ा फेंकते, कूड़ा कचरा, खाने, टिफिन, चप्पल। यह भक्ति नहीं हो सकती है। यहां पर फिर यह संदेह उठता है कि यह गलत हरकत क्यों है? और यह हमें सिखाया क्यों नहीं जाता कि हमें अपनी मां गंगा को गंदा नहीं करना है। और यह पहली बार नहीं हुआ है। पिछले साल भी मेले के बाद करीब इतना ही कूड़ा यहां पर था 7000 टन। उसके पहले भी यही था। यानी यह इस बार हुआ हादसा नहीं है। यह हमारे यहां हर साल का रिवाज बन गया है। जापान में मैच के बाद स्टैंड्स में नहीं छोड़ी गंदगी फीफा विश्व कप 2026 में जापान ने अपना पहला मुकाबला नीदरलैंड्स के खिलाफ खेला। ग्रुप एफ का यह मुकाबला 2-2 से ड्रॉ रहा। नीदरलैंड्स के खिलाफ मैच की आखिरी सीटी बजने बाद जापान के फैंस ने स्टैंड्स में मौजूद कचड़ा उठाना शुरू कर दिया। बाहर निकलने से पहले ब्लू बैग में फैंस ने वहां मौजूद कचड़ा उठा लिया। सोशल मीडिया इसका फोटो और वीडियो काफी तेजी से वायरल हो रहा है। इस काम के लिए दुनिया भर में जापान की तारीफ हुई। मतलब जापान में थैली लेकर आते हैं कि अपना कचरा समेटेंगे और वो तो मैच देखने गए थे। कोई पूजा पाठ करने नहीं आते। लेकिन हम और आप मां गंगा से आशीर्वाद लेने आते हैं। उसके बाद भी वहां कचरा फैला कर आते हैं। याद कीजिए 2019 का प्रयागराज कुंभ करोड़ों लोग आए और उसी कुंभ में प्रधानमंत्री ने झुककर सफाई कर्मियों के पैर छुए थे। क्यों? क्योंकि वह सफाई का मतलब समझ रहे थे। यह समझना पड़ेगा कि शिव भी कौन थे भगवान भोलेनाथ कौन थे आप कथा याद कीजिए मां गंगा आसमान से उतरी पूरी की पूरी पूरे वेग से धरती कांप जाती संभाला किसने था भगवान शिव ने जटा में एक बूंद नीचे नहीं गिरने दी समुद्र मंथन में जहर निकला कोई नहीं पी रहा था वह भी भगवान शिव ने संभाला कंठ में रख लिया। यानी भगवान भोलेनाथ की पूरी कहानी संभालने की है। और हम और आप शिव जी के भक्त। हम अपनी पन्नी नहीं संभाल पाते, टिफिन नहीं संभाल पाते, अपने कपड़े नहीं संभाल पाते और पेशाब करके बोतल रख दिए गए। जिस गंगा से करोड़ों लोग आस्था के साथ जल लेने आते हैं, उसके किनारे कचरा ना छोड़ना भी उसी आस्था और जिम्मेदारी का हिस्सा होना चाहिए। क्योंकि इतनी बड़ी गैदरिंग्स को संभालने के लिए सिर्फ ज्यादा रोड्स, ज्यादा टॉयलेट्स या ज्यादा सैनिटेशन वर्कर्स नहीं चाहिए। एक तरफ मजबूत प्लानिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए तो दूसरी तरफ रिस्पांसिबल पब्लिक बिहेवियर। 1000 सफाई कर्मचारी बाहर से बुलाए अब कूड़े को ज्वालापुर स्थित सराय में कूड़ा ट्रीटमेंट प्लांट में रीसाइकिल के लिए भेजा जा रहा है। यहां से कूड़ा अलग-अलग करके आगे प्राइवेट कंपनियों को बेचा जाएगा और कुछ के कपड़े बनाए जाएंगे। नगर निगम दिन-रात अभियान चलाकर सफाई में जुटा है। सफाईकर्मियों का समूह सबसे पहले घाटों पर सफाई कर रहा है। पिछले साल करीब 4 करोड़ 52 लाख कांवड़िए जल लेकर गए थे। तब 8 हजार मीट्रिक टन कूड़ा गंगा घाटों से हटाया गया था। नगर निगम, नगर पालिका, नगर पंचायत, जिला पंचायत और सभी ग्राम पंचायतों के अधिकारियों को अपने-अपने क्षेत्रों में युद्धस्तर पर सफाई अभियान चलाने के आदेश दिए गए हैं। नियमित कर्मचारियों के अलावा 1000 आउटसोर्स सफाई कर्मचारियों और 80 से ज्यादा वाहनों को कूड़ा परिवहन में लगाया गया।
Rahul Gandhi's new move 'रचनात्मक कांग्रेस'! नया दांव या नया विवाद? | Janadesh Charcha
मानसून सत्र पर कांग्रेस का हमला, कहा- विपक्षी एकता से सरकार को बैकफुट पर लाए
जयराम रमेश ने कहा,परिसीमन, एफसीआरए, शिक्षा अधिष्ठान, वन नेशन वन इलेक्शन तथा मंत्रियों की स्वत: बर्खास्तगी बिल रोकना रही विपक्ष की उपलब्धि।
Tata Sons के नए चेयरमैन की तलाश तेज, TV नरेंद्रन सबसे आगे; चयन प्रक्रिया में कानूनी पेंच
चंद्रशेखरन के उत्तराधिकारी का चयन टाटा समूह के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। टाटा संस समूह की प्रमुख कंपनियों और रणनीतिक फैसलों में केंद्रीय भूमिका निभाती है।
महाराष्ट्र में शुरू होगी महा-आईडी व्यवस्था, घर बैठे मिलेगा सरकारी योजनाओं का लाभ
महाराष्ट्र में शुरू होगी महा-आईडी व्यवस्था, घर बैठे मिलेगा सरकारी योजनाओं का लाभ
भोपाल के शौर्य स्मारक की डिजिटल लाइब्रेरी बताएगी स्वतंत्रता का गौरवशाली इतिहास
भोपाल के शौर्य स्मारक की डिजिटल लाइब्रेरी बताएगी स्वतंत्रता का गौरवशाली इतिहास
हर घर तिरंगा अभियान: पूर्व शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भुवनेश्वर में अपने आवास पर फहराया राष्ट्रीय ध्वज
रूस और जापान के बीच दशकों से चला आ रहा कुरिल द्वीप विवाद एक बार फिर भड़क उठा है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के विवादित इतुरुप द्वीप पहुंचते ही टोक्यो भड़क गया। जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने इस यात्रा को “बिल्कुल अस्वीकार्य” बताते हुए कहा कि इससे जापानी जनता की भावनाओं को ठेस पहुंची है। लेकिन मॉस्को के लिए यह सिर्फ एक यात्रा नहीं, बल्कि साफ शक्ति-प्रदर्शन है। पुतिन ने दुनिया को दिखा दिया कि रूस इन विवादित द्वीपों पर अपने नियंत्रण को किसी चुनौती से पीछे हटने वाला नहीं है। हम आपको बता दें कि इतुरुप जिसे जापान एतोरोफु कहता है, वह कुरिल श्रृंखला के उन चार दक्षिणी द्वीपों में शामिल है, जिन पर जापान अपना दावा करता है और जिन्हें टोक्यो ‘नॉर्दर्न टेरिटरीज’ कहता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के अंतिम दिनों में सोवियत संघ ने इन द्वीपों पर कब्जा कर लिया था और करीब 17000 जापानी निवासियों को वहां से विस्थापित कर दिया गया। यही विवाद आज तक रूस और जापान के बीच औपचारिक शांति संधि के रास्ते में सबसे बड़ी अड़चन बना हुआ है। इसे भी पढ़ें: Russia के नोवोरोस्सियस्क नौसैनिक अड्डे पर हमले का Zelenskyy का दावा, बुनियादी ढांचा क्षतिग्रस्त जापानी प्रधानमंत्री ताकाइची ने दो टूक कहा कि ये द्वीप जापान के “ऐतिहासिक और अंतरराष्ट्रीय कानून” के तहत अभिन्न क्षेत्र हैं। विदेश मंत्री तोशिमित्सु मोतेगी ने भी रूस के खिलाफ कड़ा विरोध दर्ज कराया और टोक्यो ने रूसी राजदूत निकोलाई नोजद्रेव को तलब किया। लेकिन मॉस्को ने जापान की आपत्ति को लगभग ठेंगा दिखाते हुए साफ कर दिया कि इतुरुप समेत पूरा कुरिल क्षेत्र रूस का अभिन्न हिस्सा है। रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया जखारोवा ने जापानी प्रतिक्रिया को “अस्वीकार्य” बताया, जबकि रूसी दूतावास ने कहा कि रूसी राष्ट्रपति अपने देश के भीतर जहां चाहें यात्रा कर सकते हैं। यहीं से मामला महज पुराने क्षेत्रीय विवाद से निकलकर शक्ति राजनीति का रूप ले लेता है। पुतिन ने इतुरुप में स्कूल, अस्पताल और मछली प्रसंस्करण संयंत्र का दौरा किया तथा स्थानीय लोगों से बातचीत की। मछली के अंडे का स्वाद लेने और द्वीप के मौसम की तुलना रिसॉर्ट से करने वाली उनकी तस्वीरें और टिप्पणियां भी सामने आईं। लेकिन इन दृश्यों के पीछे संदेश कहीं ज्यादा कठोर है। संदेश यह है कि रूस इन द्वीपों को सिर्फ सैन्य चौकी नहीं, बल्कि सामान्य रूसी भूभाग के रूप में पेश कर रहा है। देखा जाये तो रणनीतिक दृष्टि से कुरिल द्वीपों की अहमियत बेहद बड़ी है। ये द्वीप जापान के होक्काइडो और रूस के कामचात्का प्रायद्वीप के बीच स्थित हैं और प्रशांत महासागर तथा ओखोत्स्क सागर के बीच समुद्री पहुंच को प्रभावित करते हैं। रूस पिछले एक दशक में यहां अपनी सैन्य मौजूदगी लगातार मजबूत करता रहा है। इतुरुप क्षेत्र में उसका प्रमुख सैन्य हवाई अड्डा है और द्वीपों के आसपास नियमित सैन्य अभ्यास होते रहे हैं। और यही वह बिंदु है जहां इस विवाद का असली सामरिक चेहरा सामने आता है। कुरिल रूस के लिए प्रशांत बेड़े, कामचात्का और ओखोत्स्क सागर की सुरक्षा का हिस्सा हैं। जापान के लिए ये उसके उत्तरी समुद्री और हवाई सुरक्षा घेरे के ठीक सामने स्थित संवेदनशील क्षेत्र हैं। ऐसे में पुतिन का इतुरुप पहुंचना केवल संप्रभुता का प्रदर्शन नहीं, बल्कि जापान की बढ़ती सैन्य क्षमता और अमेरिका के साथ उसके गठजोड़ के सामने शक्ति संतुलन का प्रदर्शन भी है। मामला इसलिए भी विस्फोटक है क्योंकि रूस अकेला नहीं है। पिछले महीने रूसी और चीनी युद्धपोतों ने कुरिल द्वीपों के बीच एक जलडमरूमध्य से संयुक्त गश्त की थी। इसी बीच रूसी और चीनी राजदूतों ने द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणामों को बदलने के प्रयासों और एशिया-प्रशांत के पुनःसैन्यीकरण के खिलाफ संयुक्त बयान दिया। यह भाषा सीधे जापान की बढ़ती रक्षा तैयारियों पर निशाना साधती दिखाई देती है। दूसरी तरफ उत्तर कोरिया का हालिया मिसाइल प्रक्षेपण और अमेरिका-दक्षिण कोरिया के बड़े सैन्य अभ्यासों का माहौल इस पूरे घटनाक्रम को और खतरनाक बनाता है। यानी जापान के चारों ओर सुरक्षा दबाव एक साथ बढ़ रहा है। उत्तर कोरिया से मिसाइल खतरा, चीन से समुद्री और सैन्य दबाव और अब रूस की कुरिल में खुली शक्ति प्रदर्शनी। इसका समय भी संयोग नहीं माना जा सकता। पुतिन का दौरा जापान के द्वितीय विश्वयुद्ध में आत्मसमर्पण की 81वीं वर्षगांठ से ठीक पहले हुआ। ऐसे समय में कुरिल की रूसी संप्रभुता का सार्वजनिक प्रदर्शन इतिहास, राष्ट्रवाद और वर्तमान भू-राजनीति, तीनों को एक ही मंच पर ला खड़ा करता है। हम आपको याद दिला दें कि 2022 में यूक्रेन पर रूस के पूर्ण पैमाने के हमले के बाद जापान ने पश्चिमी देशों के साथ मिलकर मॉस्को पर प्रतिबंध लगाए थे। इससे पहले शांति संधि और आर्थिक सहयोग की दिशा में जो भी सीमित उम्मीदें थीं, वे लगभग खत्म हो गईं। पुतिन की यात्रा उस दरवाजे पर भी ताला जड़ती दिखाई देती है। रूस के पूर्व राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने भी बयान को और जहरीला बनाते हुए कहा कि ये द्वीप रूसी जमीन “थे, हैं और रहेंगे”। उन्होंने जापान को समझने की सलाह दी कि इस वास्तविकता को चुनौती देने वालों को “भयानक परिणाम” भुगतने पड़ सकते हैं। अब असल कहानी यही है कि कुरिल द्वीपों पर रूस-जापान का पुराना विवाद अब नए एशियाई शक्ति-संघर्ष का अग्रिम मोर्चा बन रहा है। पुतिन ने इतुरुप पर उतरकर सिर्फ जमीन पर कदम नहीं रखा है। उन्होंने जापान की सुरक्षा नीति, अमेरिका के साथ उसके गठबंधन और एशिया-प्रशांत में बदलते शक्ति-संतुलन को सीधे चुनौती दी है। टोक्यो के लिए अब सवाल केवल चार द्वीपों का नहीं है। सवाल यह है कि क्या वह रूस-चीन-उत्तर कोरिया के बढ़ते दबाव के बीच अपनी उत्तरी सुरक्षा सीमा को कितनी तेजी से मजबूत कर सकता है। बहरहाल, कुरिल का विवाद इसलिए खतरनाक है क्योंकि यहां इतिहास हथियार है, भूगोल मोर्चा है और सैन्य शक्ति संदेश। पुतिन ने अपनी चाल चल दी है। अब जापान के सामने सिर्फ विरोध दर्ज कराने का विकल्प नहीं, बल्कि यह तय करने की चुनौती है कि वह इस नई एशियाई शतरंज में कितनी दूर तक जवाबी चाल चलेगा।
पाकिस्तान आज यानि 14 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, लेकिन प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के सामने सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि वह खुलकर जश्न कैसे मनाएं क्योंकि उनके देश में चारों ओर से चुनौतियां बढ़ती ही जा रही हैं। पाकिस्तान के हालात इस समय ऐसे हैं कि आर्थिक, कूटनीतिक और सामाजिक तौर पर विफल हो चुके देश में आजादी का जश्न सरकार भले मना रही है लेकिन आम जनता त्राहि त्राहि कर रही है। ऐसे में जनता को उम्मीदें देने की बजाय प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने एक बार फिर भारत के खिलाफ खोखली धमकियों का ऐलान कर अवाम का ध्यान भटकाने का प्रयास किया है। हम आपको बता दें कि शहबाज शरीफ ने भारत को निशाना बनाते हुए पानी के मुद्दे पर ‘सीधा जवाब’ देने की धमकी दी है। स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर उनका यह बयान पाकिस्तान की पुरानी भारत विरोधी राजनीति की याद दिलाता है, जहां घर के बिगड़ते हालात से ध्यान हटाने के लिए भारत के खिलाफ बयानबाजी को हथियार बनाया जाता है। शहबाज शरीफ ने कहा कि सिंधु नदी के पानी की ‘हर बूंद’ पाकिस्तान की रेड लाइन है और अगर भारत ‘सही रास्ते’ पर नहीं आया तो उसे सीधा जवाब दिया जाएगा। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि पाकिस्तान की संप्रभुता और सुरक्षा को चुनौती मिली तो मई 2025 की सैन्य झड़प से भी कड़ा जवाब दिया जाएगा। यानी अपने नागरिकों के सवालों का जवाब देने की बजाय इस्लामाबाद फिर दिल्ली को गीदड़ भभकी देकर अपनी ताकत का प्रदर्शन करना चाहता है। इसे भी पढ़ें: Partition Horrors Remembrance Day I 1947 में लिए गये Congress के गलत फैसले की कीमत आज भी चुका रहा है भारत विडंबना देखिए कि जिस पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भारत को ‘शांति का दुश्मन’ बता रहे हैं, उसी पाकिस्तान के भीतर शांति और स्थिरता का संकट गहराता जा रहा है। बलूचिस्तान में पाकिस्तान की सत्ता के खिलाफ असंतोष इतना बढ़ा है कि स्वतंत्रता दिवस को ‘ब्लैक डे’ के रूप में मनाने की अपील तक सामने आई है। बलूच नेताओं ने काले झंडे और काली पट्टियां लगाई हैं। सुराब क्षेत्र में पाकिस्तानी सैन्य कार्रवाई में नागरिकों के हताहत होने से असंतोष और भड़का गया है। बलूच कार्यकर्ताओं के मुताबिक सैन्य कार्रवाई में बच्चों समेत बड़ी संख्या में नागरिक मारे गए या घायल हुए। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने आबादी वाले इलाकों में हवाई हमलों और नागरिकों की मौत पर सवाल उठाए हैं। बलूचिस्तान और इस्लामाबाद के बीच अविश्वास की खाई बेहद गहरी हो चुकी है। जिस देश का एक हिस्सा उसके स्वतंत्रता दिवस को ही ‘ब्लैक डे’ कह रहा हो, उसके प्रधानमंत्री का भारत को धमकाना खोखली ताकत का प्रदर्शन ही अधिक लगता है। यही नहीं, पश्चिमोत्तर पाकिस्तान का हाल भी शरीफ सरकार के दावों की पोल खोलता है। खैबर पख्तूनख्वा में स्वात के कबाल पुलिस स्टेशन के पास आत्मघाती हमले में 17 लोगों की मौत और 27 के घायल होने की खबर सामने आई है। मृतकों में सात पुलिसकर्मी भी शामिल थे। हमला उस समय हुआ जब लोग क्षेत्र की बिगड़ती कानून-व्यवस्था के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। यानी पाकिस्तान अपने ही शहरों में आतंक और असुरक्षा से जूझ रहा है और फिर भी उसकी सत्ता को भारत के खिलाफ बयानबाजी में राजनीतिक लाभ दिखाई देता है। पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर भी बेचैनी से गुजर रहा है। वहां राजनीतिक प्रतिनिधित्व और अन्य मांगों को लेकर विरोध प्रदर्शनों, झड़पों, बल प्रयोग, इंटरनेट बंदी और हालिया विधानसभा चुनावों की निष्पक्षता को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। रावलाकोट में सुरक्षा बलों की गोलीबारी में लोगों के घायल होने की बात भी सामने आई। भारत के विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान पर मानवाधिकार उल्लंघनों के लिए अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही की मांग करते हुए कहा है कि असंतोष का जवाब ‘गोलियों, ब्लैकआउट और दमन’ से दिया गया। वहीं राजनीतिक मोर्चे पर भी पाकिस्तान की हालत कम विस्फोटक नहीं है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान जेल में हैं और उनके बेटों ने आरोप लगाया है कि परिवार, डॉक्टरों और वकीलों को सात महीने से उनसे मिलने की अनुमति नहीं दी गई। इमरान खान और उनके समर्थक लंबे समय से अपने खिलाफ मामलों को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते रहे हैं। विपक्ष के सबसे प्रमुख चेहरे की लगातार कैद और उनकी पार्टी पर कार्रवाई ने पाकिस्तान की लोकतांत्रिक साख पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। ऐसे में शहबाज शरीफ की ‘हर बूंद रेड लाइन’ वाली धमकी पाकिस्तान की शक्ति का प्रमाण कम और उसकी बेचैनी का संकेत ज्यादा है। पाकिस्तान को समझना होगा कि बलूचिस्तान में असंतोष, खैबर पख्तूनख्वा में आतंक, पीओजेके में विरोध, राजनीतिक दमन के आरोप और आर्थिक-सामाजिक दबाव, इन सबका समाधान भारत को धमकी देने से नहीं होगा। उधर, नई दिल्ली का संदेश सीधा है कि आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते। भारत का स्पष्ट रुख है कि सीमा पार आतंकवाद को पाकिस्तान जब तक विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय तरीके से बंद नहीं करता, तब तक संधि अपने पुराने स्वरूप में नहीं चल सकती। पाकिस्तान को यह भी समझना होगा कि धमकियों से भारत की नीति नहीं बदलेगी। पाकिस्तान को पहले अपने घर की आग बुझानी होगी, अपने नागरिकों को सुरक्षा देनी होगी और सीमा पार आतंकवाद पर निर्णायक कार्रवाई करनी होगी। वरना स्वतंत्रता दिवस के मंच से दी गई उसकी दहाड़ इतिहास में ताकत की आवाज नहीं, एक ऐसे देश की खोखली हुंकार के रूप में दर्ज होगी जो अपने भीतर की दरारों से आंखें चुराकर भारत को डराने की कोशिश कर रहा है।
चमोली हादसे में अब तक 7 लोगों की मौत, सीएम धामी आज घटनास्थल का लेंगे जायजा
चमोली हादसे में अब तक 7 लोगों की मौत, सीएम धामी आज घटनास्थल का लेंगे जायजा
'मेलोनी समझकर तो नहीं पकड़ा था?' संदीप दीक्षित के सवाल पर मचा बवाल, राहुल गांधी की मिमिक्री पर BJP ने साधा निशाना
हल्द्वानी में खड़गे के कार्यक्रम के बाद मंच के शुद्धिकरण पर मायावती ने जताई नाराजगी, दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग
क्या Bar Council of India कानून के छात्रों को State Bar Council में enrol होने से रोक सकती है?
18 अगस्त तक अल्टीमेटम, समाधान नहीं तो होगी महापंचायत : भारतीय किसान यूनियन
संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर भारतीय किसान यूनियन के नेतृत्व में ग्रेटर नोएडा में किसानों ने विशाल बाइक तिरंगा यात्रा निकाली
1947 का भारत विभाजन इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक है। लाखों लोग अपने घर-परिवार, जमीन-जायदाद छोड़ने पर मजबूर हुए, लाखों लोगों की हत्या हुई और करोड़ों लोग विस्थापन की त्रासदी से जूझे। यह एक ऐसा स्थायी घाव था, जो आज भी भारत के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक ताने-बाने को प्रभावित करता है। देखा जाये तो कांग्रेस के तत्कालीन नेताओं ने अंग्रेजों द्वारा पेश किए गए विभाजन के प्रस्ताव को स्वीकार कर ऐतिहासिक भूल की थी, जिसकी कीमत देश आज भी चुका रहा है। 14 अगस्त को मनाया जाने वाला विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस इसी त्रासदी की मानवीय कीमत को याद करने का अवसर है। भारत सरकार ने 2021 में इस दिवस की घोषणा की थी। इसका उद्देश्य केवल उन लोगों को श्रद्धांजलि देना नहीं है, जिन्होंने जान गंवाई या अपना घर छोड़ा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह समझाना भी है कि सांप्रदायिक नफरत, हिंसा और राजनीतिक विभाजन किस भयावह परिणाम तक पहुंच सकते हैं। इसे भी पढ़ें: World Organ Donation Day 2026: अंगदान की संस्कृति ही मानवता को नई दिशा दे सकती है हम आपको याद दिला दें कि 1947 में विभाजन के समय पंजाब और बंगाल सबसे बुरी तरह प्रभावित क्षेत्रों में रहे। परिवार बिछड़े, गांव और संपत्तियां सीमा के दो हिस्सों में बंट गईं और लाखों लोगों को अचानक अनिश्चित भविष्य की ओर पलायन करना पड़ा। विभाजन के कारणों को लेकर इतिहास में अलग-अलग व्याख्याएं देखने को मिलती हैं। मुस्लिम लीग की दो-राष्ट्र सिद्धांत की राजनीति, पाकिस्तान नामक अलग देश की मांग, सांप्रदायिक तनाव और ब्रिटिश औपनिवेशिक नीति इसके प्रमुख संदर्भ रहे। 3 जून 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन ने विभाजन योजना की घोषणा की और इसके बाद रैडक्लिफ आयोग ने भारत-पाकिस्तान की सीमा निर्धारित की। सीमाएं इतनी तेजी से खींची गईं कि लाखों लोग अपनी जमीन, पहचान और सुरक्षा को लेकर असमंजस में पड़ गए। यहीं से कांग्रेस नेतृत्व के फैसले पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। कांग्रेस ने मुस्लिम लीग की मांग और ब्रिटिश जल्दबाजी के सामने विभाजन स्वीकार करके उस विचार को अप्रत्यक्ष मान्यता दी कि हिंदू और मुस्लिम एक साथ नहीं रह सकते। वहीं विभाजन समर्थक इतिहासकारों का कहना है कि उस समय व्यापक हिंसा, राजनीतिक गतिरोध और ब्रिटिश सत्ता की वापसी की जल्दबाजी के बीच एकीकृत भारत को बनाए रखना अत्यंत कठिन हो चुका था। इसलिए यह बहस आज भी जारी है कि क्या विभाजन टाला जा सकता था या वह उस समय की परिस्थितियों का लगभग अपरिहार्य परिणाम बन चुका था। विभाजन की राजनीतिक कीमत के साथ इसकी भू-राजनीतिक कीमत भी सामने आई। पाकिस्तान के अस्तित्व ने भारत के पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों में नई सुरक्षा चुनौतियां पैदा कीं। कश्मीर विवाद ने 1947 के बाद भारत-पाकिस्तान संबंधों को स्थायी तनाव में बदल दिया। इसके बाद 1947-48, 1965, 1971 और 1999 के युद्ध हुए तथा सीमा पार आतंकवाद लंबे समय तक राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौती बना रहा। पाकिस्तान के साथ स्थायी सुरक्षा तनाव ने भारत के संसाधनों पर भी अतिरिक्त दबाव डाला और रक्षा व्यय का बड़ा हिस्सा इस चुनौती से निपटने में लगा। महात्मा गांधी का दृष्टिकोण भी इस पूरी कहानी को एक अलग नैतिक आयाम देता है। वह धर्म के आधार पर देश के विभाजन के विरोधी थे और ऐसी स्वतंत्रता चाहते थे, जिसमें शांति, सद्भाव और समानता हो। 15 अगस्त 1947 को उनका दिल्ली के सत्ता-केंद्रित समारोहों में शामिल नहीं होना इसी पीड़ा की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाता है क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि वह मानते थे कि यह वह ‘पूर्ण स्वतंत्रता’ नहीं थी जिसके लिए उन्होंने सत्याग्रह और असहयोग आंदोलनों की अगुवाई की थी। साथ ही, इतिहास गवाह है कि अंग्रेजों ने जिन देशों में विभाजन कराया उनमें भारत का विभाजन ही सबसे रक्तरंजित रहा। लाखों जानें गईं, करोड़ों लोग बेघर हुए और पीढ़ियों तक घाव ताजा रहे। यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब कांग्रेस का तत्कालीन नेतृत्व अंग्रेजों की चाल और उनकी ‘फूट डालो, राज करो’ नीति को भली-भांति समझता था, तब भी उन्होंने विभाजन का खुलकर विरोध क्यों नहीं किया था? क्या यह राजनीतिक थकान थी, साम्प्रदायिक हिंसा के दबाव में लिया गया समझौता था? या फिर सत्ता तक शीघ्र पहुंचने की अधीरता थी? जो भी कारण रहे हों, उनका परिणाम आज भी भारत भुगत रहा है। देखा जाये तो इतिहास के उस मोड़ पर लिया गया निर्णय न केवल तत्कालीन पीढ़ी के लिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी स्थायी संकट का कारण बन गया। बहरहाल, 79 साल बाद भी विभाजन के सवाल खत्म नहीं हुए हैं। कश्मीर, सीमा पार आतंकवाद, रक्षा बोझ, सामाजिक अविश्वास और राजनीतिक ध्रुवीकरण जैसे मुद्दे इस इतिहास की लंबी छाया की याद दिलाते हैं। लेकिन इसका सबसे बड़ा सबक यही है कि राजनीतिक फैसलों के परिणाम केवल तत्कालीन पीढ़ी तक सीमित नहीं रहते। इसलिए 14 अगस्त का विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस केवल शोक का दिन नहीं, बल्कि आत्ममंथन का दिन भी है। साथ ही उन लाखों लोगों को नमन करने का दिन भी है जिन्होंने अपनी जान, घर और पहचान खोई; और यह संकल्प लेने का दिन भी है कि इतिहास की त्रासदियों को दोहराने की बजाय उनसे सीख लेकर भारत की एकता, सामाजिक सद्भाव और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को और मजबूत किया जाए। -नीरज कुमार दुबे
80वां स्वतंत्रता दिवस : पीएम मोदी लाल किले से करेंगे मुख्य कार्यक्रम का नेतृत्व, पहली बार गूंजेगा 'वंदे मातरम'
ऑटो सेक्टर की बिक्री रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंची
नई दिल्ली, भारत में ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री पूरी रफ्तार से भाग रही है और जुलाई में बिक्री अब तक के सबसे उच्चतम स्तर पर रही है।
BJP top leadership's silence in Loksabha, क्या ध्वस्त हुई PM Modi और Shah की Image?
संसद का मॉनसून सत्र पूरी तरह बर्बाद हो गया जिसके चलते कई सवाल उठे हैं। सबसे पहला सवाल यह है कि क्या यही संसदीय लोकतंत्र है, जहां संसद का पूरा सत्र ही हंगामे की भेंट चढ़ जाए? सवाल उठता है कि विपक्ष का काम सरकार को घेरना है या सदन को ही ठप कर देना? 20 जुलाई से शुरू हुआ मानसून सत्र 13 अगस्त को खत्म हो गया, लेकिन सवाल यह है कि इस पूरे सत्र में बहस कितनी हुई और हंगामा कितना? सवाल उठता है कि संसद में नारे लगना ज्यादा जरूरी है या जनता के मुद्दों पर सवाल-जवाब होना जरूरी है? सवाल उठता है कि जब सरकार जवाब देने को तैयार थी, तो विपक्ष ने संसद चलने क्यों नहीं दी? आंकड़ों को देखें तो राज्यसभा की उत्पादकता महज 39.17 प्रतिशत रही और सभापति के अनुसार सदन में कुल 37 घंटे 49 मिनट ही काम हो सका। वहीं लोकसभा की उत्पादकता करीब 19 प्रतिशत रही। क्या यह प्रतिशत किसी परीक्षा के लिहाज से सामान्य पास प्रतिशत भी माना जाएगा? जो Gen Z युवा सड़कों पर उतरकर अपने सवाल और अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे थे, क्या वे यह नहीं देख रहे होंगे कि देश की संसद में कामकाज का स्तर आखिर कैसा है? सवाल उठ रहा है कि सांसदों को जनता ने संसद में बहस, सवाल और जवाब के लिए भेजा था या वेल में नारे लगाने के लिए? इसे भी पढ़ें: संसदीय-गतिरोध से नहीं चलेगा लोकतंत्र, संवाद ही है समाधान सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या विपक्ष यह भूल गया कि संसद सरकार को जवाबदेह बनाने का सबसे बड़ा मंच है? अगर सरकार छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के मुद्दे पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के जवाब के लिए तैयार थी, तो विपक्ष ने सदन को चलने क्यों नहीं दिया? क्या राम मंदिर में कथित चढ़ावा चोरी, छात्रों पर कार्रवाई और प्रधानमंत्री से माफी की मांग को एक साथ जोड़कर सदन को अनिश्चितकाल तक बाधित करना ही लोकतांत्रिक संघर्ष का तरीका है? क्या विपक्ष सरकार को जवाब देने के लिए मजबूर करना चाहता था या सरकार को जवाब देने का मौका ही नहीं देना चाहता था? क्या जनता यह नहीं जानना चाहती थी कि छात्रों पर कार्रवाई क्यों हुई? क्या राम मंदिर से जुड़े आरोपों पर सरकार से जवाब नहीं मांगा जाना चाहिए था? क्या प्रधानमंत्री और गृह मंत्री से सवाल पूछने का अधिकार विपक्ष का नहीं है? लेकिन क्या विपक्ष ने हंगामा करके खुद ही वह मंच नहीं गंवा दिया, जहां उसके सवाल देश के सामने दर्ज हो सकते थे? अगर सरकार जवाब देने को तैयार थी, तो फिर विपक्ष ने सरकार को वॉकओवर क्यों दिया? क्या संसद में बैठे हर सांसद के क्षेत्र की अपनी समस्याएं नहीं हैं? क्या बेरोजगारी, सड़क, रेल, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों और स्थानीय विकास से जुड़े सवाल पूछने का अधिकार सांसदों को नहीं है? जब प्रश्नकाल ही नहीं हुआ, शून्यकाल भी नहीं हो सका, तो क्या हजारों-लाखों मतदाताओं की आवाज सदन के भीतर दब नहीं गई? अपने क्षेत्र की समस्याओं को उठाने की तैयारी के साथ रोज सदन में आने वाले सांसदों से पूछा जाना चाहिए कि उनके संसदीय अधिकारों के इस्तेमाल का अवसर उनसे आखिर किसने छीना? राज्यसभा में 285 तारांकित प्रश्न पूछे जाने थे, शून्यकाल में 380 विषय और विशेष उल्लेख के जरिए 380 मुद्दे उठाए जाने थे, लेकिन क्या यह लोकतंत्र की विडंबना नहीं कि इनमें से केवल 16 प्रश्न, 52 शून्यकाल के विषय और 93 विशेष उल्लेख ही सदन में लिए जा सके? क्या बाकी सवाल पूछने वाले सांसदों और उन सवालों के जवाब की प्रतीक्षा कर रही जनता को इसका हिसाब नहीं मिलना चाहिए? और सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सांसदों के लिए भी ‘नो वर्क, नो पे’ का सिद्धांत नहीं होना चाहिए? अगर कोई कर्मचारी काम नहीं करता तो वेतन और जवाबदेही का सवाल उठता है, ऐसे में जनता के पैसे से चलने वाली संसद में लगातार व्यवधान डालने वालों पर ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं होनी चाहिए? क्या सांसदों को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वे सदन को चलने न दें और फिर भी अपने कार्यकाल का पूरा लाभ लेते रहें? हंगामे के बीच विधेयक पारित हुए, लेकिन क्या विपक्ष खुद से पूछेगा कि अगर वह संसद चलने देता तो इन विधेयकों पर और विस्तृत चर्चा नहीं हो सकती थी? लोक परीक्षा कानून में संशोधन, न्यायाधिकरण सुधार, केरल के नाम परिवर्तन, सहकारी विकास निगम, बैंककार बही साक्ष्य और खान एवं खनिज से जुड़े विधेयकों पर व्यापक बहस होती तो क्या जनता को इनके प्रभाव और प्रावधानों की अधिक स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती? क्या लोकतंत्र में विधेयक पास होना ही पर्याप्त है या यह भी जरूरी नहीं कि विपक्ष अपनी आपत्तियां सदन के रिकॉर्ड पर दर्ज कराए? सरकार कह रही है कि 12 विधेयक पारित हुए, लेकिन बहस और चर्चा के लिहाज से सत्र सफल नहीं रहा, तो क्या यह सत्ता पक्ष के लिए भी आत्ममंथन का विषय नहीं होना चाहिए? क्या सरकार को यह सुनिश्चित नहीं करना चाहिए कि महत्वपूर्ण विधेयक पर्याप्त चर्चा के बाद ही पारित हों? और क्या विपक्ष को यह नहीं समझना चाहिए कि चर्चा रोककर वह सरकार को ही नहीं, खुद को भी कमजोर करता है? एफसीआरए संशोधन विधेयक को विस्तृत समीक्षा और सुझावों के लिए संयुक्त समिति के पास भेजा गया, तो क्या यह प्रमाण नहीं कि संसदीय प्रक्रिया में असहमति के लिए रास्ते मौजूद हैं? फिर हर मुद्दे का रास्ता हंगामा क्यों? क्या विरोध का अर्थ सदन बंद करना है या बहस को और धारदार बनाना? और क्या संसद सत्र से पहले राहुल गांधी के विदेश दौरों को लेकर उठने वाले सवालों का जवाब भी सार्वजनिक विमर्श में नहीं आना चाहिए? क्या विपक्ष के सबसे बड़े नेता की संसद के प्रति उपस्थिति और सक्रियता पर सवाल पूछना गलत है? क्या विपक्ष यह बताएगा कि संसद के महत्वपूर्ण सत्रों से पहले उसकी राजनीतिक रणनीति क्या होती है और क्या जनता को इसका स्पष्ट जवाब नहीं मिलना चाहिए? क्या विपक्ष अराजकता की ऐसी स्थिति की ओर बढ़ रहा है, जहां सरकार को काम ही न करने दिया जाए? क्या सत्ता पक्ष भी इस गतिरोध को तोड़ने के लिए पर्याप्त राजनीतिक पहल नहीं कर सकता था? क्या दोनों पक्षों की जिम्मेदारी नहीं थी कि टकराव के बीच भी संसद को चलाया जाता? और अगर दोनों पक्ष विफल रहे, तो इसकी कीमत कौन चुकाएगा? सांसद या वही जनता, जिसके टैक्स के पैसे से संसद चलती है? क्या लोकतंत्र का अर्थ सिर्फ बहुमत से कानून बनाना है? क्या लोकतंत्र का अर्थ सिर्फ विरोध करना है? क्या लोकतंत्र का असली अर्थ सवाल पूछना, जवाब सुनना, तर्क देना, असहमति दर्ज करना और फिर निर्णय तक पहुंचना नहीं है? अगर प्रश्नकाल नहीं होगा, शून्यकाल नहीं होगा, बहस नहीं होगी और विधेयक हंगामे के बीच पारित होंगे, तो फिर संसद और राजनीतिक अखाड़े में फर्क क्या रह जाएगा? अंत में एक बार फिर सवाल उठता है कि क्या यही संसदीय लोकतंत्र है? और अगर नहीं, तो सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों कब अपनी-अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करेंगे? सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों को मिलकर यह सोचना होगा कि संसदीय लोकतंत्र में जनता का विश्वास कैसे कायम रखा जाए। आखिर संसद की हर बैठक पर देश के लाखों-करोड़ों रुपये खर्च होते हैं और जब जनता अपनी आंखों के सामने सदनों को बार-बार हंगामे और व्यवधान के कारण ठप होते देखती है, तो उसके मन में सवाल उठना स्वाभाविक है कि उसके पैसे और उसके जनादेश का कितना सम्मान हो रहा है। अगर यही तस्वीर लगातार बनी रही, तो कहीं आम जनता का भरोसा संसदीय लोकतंत्र की पूरी व्यवस्था से ही न डिग जाए? -नीरज कुमार दुबे
Shravan Garg Analysis: Rahul Gandhi के हमलों से हिल गई Modi Govt, क्या अगले 3 साल चला पाएंगे सरकार?
राहुल गांधी ने मंच पर की पीएम मोदी की मिमिक्री- 'विदेश नीति जबरन गले मिलने से नहीं चलती'
राहुल गांधी ने कहा, 'पीएम मोदी को यह ख्याल कहां से आया कि विदेश नीति का मतलब जबरदस्ती गले मिलना है।' इसके बाद राहुल संदीप दीक्षित की ओर दौड़े और उन्हें गले लगा लिया। वे शायद पीएम मोदी के चर्चित गले मिलने के अंदाज की नकल कर रहे थे।
भुगतान क्षेत्र में हुआ 5.8 अरब डॉलर का निवेश
नई दिल्ली, भारत के भुगतान क्षेत्र में 2021 से अब तक 371 घोषित इक्विटी फंडिंग राउंड के जरिए करीब 5.8 अरब डॉलर का निवेश आया है।
बोफोर्स कांडः एक झूठ के शापित होने का सच
एक झूठ के बल पर खड़ा हुआ बोफोर्स कांड सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद अब फाइलों में बंद हो गया। केस चालीस साल चला। इस पर 250 करोड़ रूपये व्यय हुए। इतना सब होने और चालीस साल की जीतोड़ कवायद के बाद भी बोफार्स खरीद में रिश्वत लेने की सच्चाई सामने नही आई। केस तो खत्म हो गया किंतु यह ये नहीं हो पाया कि इस प्रकरण में रिश्वत ली गई या नहीं। कोर्ट के केस खारिज करने के बाद भी रिश्वत लेने का आरोप आज भी अपनी जगह खड़ा है। इस कांड का पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी एवं अन्य आरोपियों के माथे पर लगा बेइमानी का दाग कभी खत्म नहीं हो पाएगा? क्या उनके परिवार माथे पर लगे इस कलंक से मुक्त हो पाएंगे? क्या उनके परिवार के सम्मान की हुई क्षति की कभी पूर्ति हो सकेगी? पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह के बार−बार बोले जाने वाले बोफोर्स खारीद में रिश्वत ने जनता के मन में तक जमाये झूठ के कारण राजीव गांधी से जनता दूर हो गई और उन्हें अपनी सरकार तक गंवानी पड़ी। सुप्रीम कोर्ट ने हिंदुजा ब्रदर्स को बरी करने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के 2005 के फैसले के खिलाफ दायर अंतिम अपील को भी खारिज कर दिया है। इसके साथ ही भारत के सबसे चर्चित और लंबे समय तक चलने वाले भ्रष्टाचार के मामलों में से एक बोफोर्स कांड का कानूनी अध्याय हमेशा के लिए बंद हो गया है। मामले में जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस विनोद के. चंद्रन की बेंच ने याचिकाकर्ता अधिवक्ता की स्थगन की मांग को ठुकराते हुए मामले की आखिरी याचिका को खारिज कर दिया। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने भी इस मामले में अपील की थी। इस अपील को भी सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में ही देरी के आधार पर खारिज कर दिया था। 1986 में हुए इस रक्षा सौदे का विवाद लगभग 40 साल तक अदालतों और भारतीय राजनीति के केंद्र में रहा और अंत में समाप्त हो गया। इसे भी पढ़ें: खड़गे की रैली के बाद 'शुद्धिकरण' पर बवाल: Priyanka Gandhi ने पूछा - यह कैसी Politics? पूरा मामला 24 मार्च 1986 को भारत सरकार और स्वीडिश कंपनी एबी बोफोर्स के बीच हुए 1,437 करोड़ रुपये के उस समझौते से जुड़ा है। इसके तहत भारतीय सेना के लिए 400 हॉवित्जर तोपें खरीदी जानी थीं। साल 1987 में स्वीडिश रेडियो ने यह सनसनीखेज खुलासा किया कि इस सौदे को हासिल करने के लिए भारतीय राजनेताओं और रक्षा अधिकारियों को अवैध कमीशन दिए गए थे। इस खुलासे ने भारतीय राजनीति में तहलका मचा दिया था। कांग्रेस छोड़ने के बाद, विश्वनाथ प्रताप (वीपी) सिंह ने खुद को एक 'ईमानदार नेता' (मिस्टर क्लीन) के रूप में स्थापित किया। उन्होंने राष्ट्रीय मोर्चा (जनता दल) का गठन किया। 1989 के लोकसभा चुनाव अभियान के दौरान वीपी सिंह अपनी रैलियों में बेहद आक्रामक रहे। वह अक्सर मंचों से अपनी जेब से एक सफेद पर्ची निकालकर लहराते थे। उनका दावा था कि उस पर्ची पर बोफोर्स घोटाले के पुख्ता सबूत, दलाली की रकम पाने वालों के नाम और राजीव गांधी के कथित स्विस बैंक खातों के नंबर लिखे हैं। कथित स्विस बैंक खातों के नंबर लिखे हैं। इस आक्रामक अभियान ने जनता के बीच राजीव गांधी सरकार के खिलाफ भारी आक्रोश पैदा किया। बोफोर्स घोटाले को मुख्य चुनावी मुद्दा बनाकर वीपी सिंह ने विपक्ष को एकजुट किया। इस आक्रामक अभियान ने जनता के बीच राजीव गांधी सरकार के खिलाफ भारी आक्रोश पैदा किया। उनकी बेइंतहा छवि खराब की। राजीव गांधी सरकार पर गंभीर सवाल उठे और 1989 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी की हार का इसे एक बड़ा कारण माना गया। प्रधानमंत्री बनते ही वीपी सिंह ने बोफोर्स कंपनी पर भारत के साथ भविष्य के किसी भी रक्षा सौदे के लिए प्रतिबंध लगा दिया। उन्होंने मामले की जांच के लिए अधिकारियों की एक विशेष टीम भी गठित की। भारी वादों और दावों के बावजूद, झूठ के बल पर बनी वीपी सिंह की सरकार केवल 11 महीने चली। सकार बनने के बाद वीपी सिंह 11 महीने की आपनी सरकार के कार्यकाल में कोई भी सबेत नही दे सके। स्विस बैंक का खाता भी नही बता पाए। ये सरकार राजीव गांधी के खिलाफ सीधे तौर पर कोई ठोस कानूनी सबूत पेश नहीं कर सकी। आलोचकों का कहना है कि चुनावी रैलियों में जिस पर्ची का दावा किया गया था, उसका सच कभी पूरी तरह सामने नहीं आ सका। स्विस रेडियो की एक घोषणा और वीवी सिंह द्वारा बार−बार रिश्वत खाने के लगाए आरोप ने इस महत्वपूर्ण शस्त्र सौदे को नुकसान पंहुचाया। इस पर प्रतिबंध लगाया। यही बोफोर्स तोप कारगिल युद्ध में सबसे मारक शस्त्र बनी। अगर ये सौदा रद्द न होता तो देश की सेना और ज्यादा मजबूत होतीं। एक बात और इस तरह के आरोप लगाने के बाद अधिकारी और ज्यादा सचेत हो जाते हैं। वे देश और सेना के लिए महत्वपूर्ण और अतिआवश्यक उपकरण भी लेते बचते हैं। इन कांड की सीबीआई ने जांच की। सीबीआई ने जनवरी 1990 में एफआईआर दर्ज की। अक्तूबर 2000 में दायर की गई सप्लीमेंट्री चार्जशीट में हिंदुजा बंधुओं (श्रीचंद, गोपीचंद और प्रकाश हिंदुजा) का नाम भी शामिल किया गया था। दिल्ली हाईकोर्ट ने 31 मई 2005 को अपने फैसले में हिंदुजा ब्रदर्स और स्वीडिश फर्म एबी बोफोर्स के खिलाफ चल रही सभी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया था। साथ ही, हाईकोर्ट ने सीबीआई की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए यह भी टिप्पणी की थी कि इस जांच पर सरकारी खजाने के करीब 250 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस मामले के लंबे खिंचने पर हैरानी जताई। जब याचिकाकर्ता के वकील ने कुछ मृत प्रतिवादियों के नाम हटाने के लिए चार हफ्ते का समय मांगा, तो जस्टिस पारदीवाला ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा, 'हिंदुजा ब्रदर्स और सीबीआई को लेकर यह सब क्या चल रहा है? सभी कार्यवाही रद्द हो चुकी हैं, यह क्या है? कितने साल बीत चुके हैं?' वहीं, वकील द्वारा यह याद दिलाने पर कि यह सौदा 1986 में हुआ था, बेंच ने स्पष्ट कर दिया कि अब इस मामले में और देरी या सुनवाई की कोई गुंजाइश नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के इस अंतिम निर्णय के साथ ही बोफोर्स पे-ऑफ केस से जुड़ी सभी कानूनी लड़ाइयां अब आधिकारिक रूप से समाप्त हो गई हैं। इस विवाद के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार को भारी राजनीतिक नुकसान हुआ। वर्ष 1989 के आम चुनावों में कांग्रेस पार्टी की हार का इसे एक प्रमुख कारण माना गया। इस मामले में ओत्तावियो क्वात्रोची और हिंदुजा बंधुओं जैसे नाम लंबे समय तक कानूनी और राजनीतिक बहसों का केंद्र रहे। लगभग चार दशकों तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद, न्यायालय ने इस मामले से जुड़ी आखिरी याचिकाओं को खारिज कर दिया। स्विस सरकार द्वारा कराई जांच भी आरोप सिद्ध नही कर सकी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अब ये केस सदा−सदा के लिए बंद हो गया। एक आरोप की जांच पर सीबीआई ने 250 करोड़ के आसपास व्यय किए। न्यायालय का लंबा समय बरबाद किया। न्यायालय भी केस का सच नही बता पाया। 40 साल चले केस में भी यह ये नहीं हुआ कि बोफार्स खरीद में रिश्वत ली गई या नहीं। इस सबके बाबजूद आरोप तो आज भी वैसा ही खड़ा है, जैसा पहले था। 40 साल में यह आरोप अखबार और फाइलों के लाखों पन्नों पर छप गया। जनता में मन में यह धारणा इतनी पक्की हो गई, कि ये कभी खत्म नहीं होगी। आने वाली पीढ़ियों तक इसे नहीं भूल पाएंगी। क्या आरोपी परिवारों के भंग हुए सम्मान की भरपाई हो पाएगी। यदि आरोप न आता तो हो सकता था कि राजीव गांधी की सरकार और चलती। बोफार्स कांड बंद हो गया किंतु राजीव गांधी और उनके तथा अन्यों के परिवार के माथे पर एक बार−बार बोले जाने वाले झूठ के बल पर लगा रिश्वतखोरी का कलंक कभी खत्म हो पाएगा? कभी नहीं। हिटलर ने कहा था कि एक झूठ का बार−बार बोलिए, वह सच बन जाएगा। ऐसा ही इस बोफोर्स कांड में हुआ। बोफार्स की खरीद में रिश्वतखोरी का आरोप इतनी बार लगा कि यह हिटलर का सच बन गया। - अशोक मधुप (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
क्या भारत अब वैश्विक टेक कंपनियों के लिए ‘नियम मानो या रास्ता छोड़ो’ वाला संदेश दे रहा है?
भारत सरकार ने इंस्टाग्राम, वाट्सएप और फेसबुक का संचालन करने वाली कंपनी मेटा की मनमानी को अब नियंत्रित करने का निर्णय लिया है। इसी के दृष्टिगत उसे यह चेतावनी भी दी है कि उसे भारतीय कानूनों का पालन करना ही होगा। यही नहीं, सरकार ने मेटा से अपने एल्गोरिदम को लेकर भी जवाब तलब किया है। इसका तात्पर्य है कि अब मेटा को यह सुनिश्चित करना होगा कि इस सरकारी निर्देश का वास्तव में पालन हो, क्योंकि मेटा अथवा अन्य इंटरनेट मीडिया कंपनियां एलगोरिदम का मनमाना उपयोग करती हैं। एआइ के आगमन के बाद उनके लिए ऐसा करना और आसान हो गया है। इसलिए सवाल उठने लगे हैं कि क्या भारत अब वैश्विक टेक कंपनियों के लिए ‘नियम मानो या रास्ता छोड़ो’ वाला संदेश दे रहा है? इसे भी पढ़ें: असामाजिक हो रहे सोशल मीडिया का नियमन जरूरी वस्तुतः वैश्विक इंटरनेट कंपनियां एक विशेष एजेंडे का प्रचार-प्रसार करती हैं। अब इंटरनेट मीडिया कंपनियां यह सुनिश्चित कर रही हैं कि लोग क्या देखें और क्या नहीं? मसलन, ऐसा करके वे लोगों के स्वस्थ चिंतन को प्रभावित कर रही हैं। चिंताजनक पहलू यह है कि यह सब काम प्रायः संकीर्ण अंतर्राष्ट्रीय उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जाता है ताकि भारतीय हित प्रभावित होता रहे और कम्पनियों के लिए लाभदायक स्थिति निर्मित होती रहे। यह एक तथ्य है कि इंटरनेट कंपनियां कई देशों में चुनावों को प्रभावित करने का काम कर चुकी हैं। वे ऐसा भारत में भी कर चुकी हैं और इसका पता कैंब्रिज एनालिटिका मामले से चलता है। वैसे तो इंटरनेट मीडिया कंपनियां अपने को- 'सोशल मीडिया' कहती हैं, लेकिन सच यह है कि वे असामाजिक और अराजक तत्वों को भी प्रोत्साहन प्रदान करती हैं। वे ध्रुवीकरण के साथ ही सामाजिक विभाजन की खाई भी चौड़ी कर रही हैं। अलबत्ता, कई बार वे अपने गलत इरादों की पूर्ति करती हुई पाई गई हैं। पहले हर बार वे माफी मांगकर बच निकलती हैं। लेकिन इस बार भारत सरकार ने उनकी नकेल कसी है। लिहाजा सरकार को अब केवल माफी से संतुष्ट नहीं होना चाहिए, बल्कि यदि कोई इंटरनेट मीडिया कंपनी अनुचित कार्य करती पाई जाए तो उसे वैसे ही कठोर दंड का भागीदार बनाया जाना चाहिए जैसे अनेक पश्चिमी देश समय-समय पर बनाते हैं और उन पर भारी जुर्माना लगाते हैं। अभी हाल में अमेरिका ने मेटा पर भारी जुर्माना लगाया। इसके दृष्टिगत भारत सरकार ने भी, हाल में मेटा ने प्रधानमंत्री मोदी के वीडियो को हटाने को लेकर जो माफी मांगी, उसे खारिज कर उचित ही किया। दरअसल, समस्या केवल यह नहीं कि मेटा ने किसी खास एजेंडे के तहत शरारतपूर्ण ढंग से प्रधानमंत्री के वीडियो को हटाया, बल्कि यह भी है कि उसने यह माना कि उसके प्लेटफार्म पर बाल यौन शोषण से जुड़े कंटेंट के साथ-साथ डीपफेक वीडियो को बढ़ावा दिया गया। यह भी स्वीकारा कि उसने पैसे लेकर हानिकारक सामग्री को बढ़ावा दिया। मसलन, ये सब ऐसी हरकतें हैं, जिनके लिए मेटा अथवा अन्य इंटरनेट कंपनियों को जवाबदेह बनाना अनिवार्य है। अब यह सही समय है कि भारत सरकार मेटा एवं अन्य इंटरनेट मीडिया कंपनियों को जवाबदेह बनाने के साथ ही इस पर भी विचार करे कि आखिर विदेशी इंटरनेट मीडिया कंपनियों पर निर्भर रहना कहां तक उचित है? चूंकि सोशल मीडिया दुनिया भर में लोगों को लती/बीमार भी बना रही हैं, इसलिए इनकी बढ़ती प्रवृत्ति पर पुनर्विचार की जरूरत तो है ही! इसी के मद्देनजर भारत सरकार की ताजा चेतावनी को लिया जाना चाहिए, जिसका का तत्काल कारण Meta/Facebook द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो कुछ समय के लिए Facebook से हटाया जाना है। लिहाजा, सरकार ने Meta की यह सफाई कि वीडियो गलती से हट गया था, स्वीकार नहीं की और कहा कि मामला अभी “सुलझा हुआ” नहीं है। # आखिर सरकार ने Meta को क्यों चेताया? ऐसे में सीधा सवाल है कि आखिर सरकार ने Meta को क्यों चेताया? वस्तुतः इसके मुख्यतः चार कारण सामने आए हैं: पहला, PM मोदी के वीडियो को हटाना — जुलाई 2026 में प्रधानमंत्री का युवाओं से जुड़ा वीडियो अस्थायी रूप से Facebook से हट गया। Meta ने इसे operational error बताया, लेकिन सरकार ने स्पष्टीकरण को संतोषजनक नहीं माना। दूसरा, भारतीय कानून बनाम Meta की global policy — सरकार का स्पष्ट संदेश है कि भारत में काम करने वाली Meta को अपनी वैश्विक नीतियों से ऊपर भारतीय कानूनों और नियामकीय निर्देशों का पालन करना होगा। तीसरा, Deepfake और AI-generated misinformation — सरकार ने Meta से algorithms और content-moderation व्यवस्था मजबूत करने, deepfake/propaganda को तेजी से पहचानने तथा अधिक प्रभावी takedown mechanism बनाने को कहा है। चौथा, Safe-harbour का दबाव — संसदीय IT समिति के अध्यक्ष निशिकांत दुबे ने चेतावनी दी कि नियमों के अनुपालन में गंभीर चूक होने पर Meta को IT Act की धारा 79 के तहत मिलने वाली safe-harbour सुरक्षा पर सवाल उठ सकता है। # इन आधा दर्जन विवादों में सबसे गंभीर मामला कौन-सा है? मेरे आकलन में 2021 WhatsApp Privacy Policy विवाद और उसके परिणामस्वरूप CCI की ₹213.14 करोड़ की कार्रवाई सबसे महत्वपूर्ण नियामकीय मामला है। CCI ने पाया कि WhatsApp ने अपनी dominant position का इस्तेमाल करते हुए यूजर डेटा संग्रह/शेयरिंग के संबंध में प्रतिस्पर्धा कानून का उल्लंघन किया; बाद में मामला न्यायिक चुनौती तक गया। लेकिन 2026 का नया टकराव अलग प्रकृति का है। अब सवाल सिर्फ privacy या competition का नहीं, बल्कि Meta के algorithm, content moderation, AI/deepfake, राजनीतिक सामग्री और भारतीय संप्रभु नियमन का बनता जा रहा है। यही वजह है कि सरकार का संदेश मूलतः यह है: “भारत में कारोबार करना है तो Meta को भारतीय कानून और भारतीय नियामकीय व्यवस्था के अनुसार चलना होगा।” यही वजह है कि भारत में केंद्र सरकार और अमेरिकी टेक कंपनी Meta के बीच टकराव अब केवल सोशल मीडिया कंटेंट या यूजर प्राइवेसी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इससे भी आगे बढ़ चुका है। खासकर 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के Facebook वीडियो को अस्थायी रूप से प्रतिबंधित किए जाने के बाद पैदा हुआ विवाद इस रिश्ते को एक नए और अधिक संवेदनशील दौर में ले गया है, जो भारत-अमेरिका सम्बन्धों में जारी उतार-चढ़ाव की चुगली करने को काफी है। भले ही Meta ने इसे “operational error” बताया और वीडियो बहाल कर दिया। लेकिन भारत सरकार ने इसे केवल तकनीकी गलती मानने से इनकार किया। बाद में Meta के वैश्विक अधिकारियों ने भारत सरकार के सामने माफी भी मांगी। फिर भी यह सवाल इसलिए बड़ा है कि क्या भारत में डिजिटल प्लेटफॉर्म अब केवल निजी कंपनियां हैं या वे सार्वजनिक जीवन और लोकतांत्रिक विमर्श को प्रभावित करने वाली ‘डिजिटल संस्थाएं’ भी बन चुकी हैं? # Meta बनाम भारत सरकार: 2018 से 2026 तक विवादों की पूरी कहानी आइए जानते हैं चरणबद्ध रूप से बढ़े टकराव के बारे में विस्तार से, ताकि आप समझ सकें कि गंगा-यमुना में कितना पानी बह चुका है:- पहला, 2021: WhatsApp Privacy Policy से शुरू हुआ बड़ा टकराव भारत में Meta और केंद्र सरकार के बीच सबसे गंभीर विवादों में एक WhatsApp की 2021 Privacy Policy थी। जिसके मार्फ़त WhatsApp ने अपनी नई नीति के तहत उपयोगकर्ताओं के डेटा को Meta की दूसरी कंपनियों के साथ साझा करने की व्यवस्था को लेकर सुनियोजित विवाद खड़ा किया। तब आलोचना यह हुई थी कि उपयोगकर्ता के पास वास्तविक विकल्प सीमित था—नीति स्वीकार करें या WhatsApp का इस्तेमाल छोड़ दें। यही मामला आगे चलकर Competition Commission of India यानी CCI तक पहुंचा। तब जाकर नवंबर 2024 में CCI ने Meta और WhatsApp पर ₹213.14 करोड़ का भारी भरकम जुर्माना लगाया और डेटा शेयरिंग के संबंध में भी कई कड़े निर्देश दिए। इस मामले में मूल प्रश्न यह था कि— क्या किसी अत्यधिक प्रभावशाली डिजिटल प्लेटफॉर्म को अपनी बाजार-स्थिति का इस्तेमाल करके उपयोगकर्ता से ऐसी शर्तें स्वीकार कराने का अधिकार है जिन्हें वह वास्तविक रूप से अस्वीकार नहीं कर सकता? दूसरा, 2024-26 में यह मामला अदालत तक पहुंचा Meta और WhatsApp ने CCI के आदेश को अदालत में चुनौती दी। मामला NCLAT और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने भी WhatsApp और Meta की डेटा नीति को लेकर कड़े सवाल उठाए और नागरिकों की निजता के अधिकार पर गंभीर चिंता जताई। इससे यह स्पष्ट हुआ कि भारत में Meta के सामने केवल सरकार नहीं, बल्कि नियामकीय और न्यायिक संस्थाओं की संयुक्त निगरानी भी बढ़ रही है। तीसरा, जुलाई 2026: Instagram पर बाल शोषण सामग्री के विज्ञापन जुलाई 2026 में Meta के लिए एक और गंभीर संकट आया। वह यह कि Instagram पर Child Sexual Exploitative and Abuse Material (CSEAM) से संबंधित कथित paid advertisements की रिपोर्ट सामने आई। इसके बाद राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने जांच शुरू की और सरकार ने Meta को सामग्री हटाने तथा स्पष्टीकरण देने को कहा। यह मामला इसलिए अत्यंत गंभीर है क्योंकि यहां सवाल केवल “content moderation” का नहीं, बल्कि Meta के विज्ञापन और algorithmic monitoring तंत्र की विश्वसनीयता का है। चौथा, जुलाई 2026: प्रधानमंत्री मोदी का Facebook वीडियो इसके बाद आया सबसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील विवाद। जिसके अंतर्गत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक Facebook वीडियो, जिसमें वे युवाओं और NEET से जुड़े मुद्दे पर बात कर रहे थे, कुछ समय के लिए Facebook पर उपलब्ध नहीं रहा। हालांकि, जब प्रशासन सक्रिय हुआ तो Meta ने बाद में स्वीकार किया कि वीडियो गलती से हटाया गया था और उसे बहाल कर दिया गया। लेकिन सरकार ने इस स्पष्टीकरण को पर्याप्त नहीं माना। जिसके बाद Meta के अधिकारियों को सरकार के सामने जवाब देना पड़ा और मामला संसदीय IT समिति तक पहुंच गया। समिति ने Meta के शीर्ष नेतृत्व से माफी की मांग तक की और safe-harbour protection पर सवाल उठाए। लिहाजा, यहां से विवाद का स्वरूप ही बदल गया। क्योंकि अब सवाल था कि—अगर Meta का algorithm या moderation system भारत के प्रधानमंत्री की सामग्री को गलती से भी प्रतिबंधित कर सकता है, तो क्या भारत की डिजिटल संप्रभुता वास्तव में विदेशी कंपनियों के algorithm के हाथ में है? पांचवां, Deepfake और AI ने विवाद को और गंभीर बनाया 2026 में सरकार ने Meta से deepfake, misinformation और propaganda से निपटने के लिए अपने algorithms और content-moderation व्यवस्था को मजबूत करने को कहा है। क्योंकि सरकार की चिंता यह है कि AI के दौर में किसी नेता, संस्था या व्यक्ति का नकली वीडियो कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। इसलिए सरकार अब केवल “हटाओ” नहीं कह रही, बल्कि Meta से बेहतर detection system, तेज response और compliance roadmap की अपेक्षा कर रही है। छठा, WhatsApp और डेटा: विवाद अभी खत्म नहीं हुआ WhatsApp का मामला भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। CCI की कार्रवाई के बाद डेटा शेयरिंग और उपयोगकर्ता की सहमति का प्रश्न अभी भी न्यायिक विमर्श का हिस्सा है। सुप्रीम कोर्ट में Meta और WhatsApp की चुनौती पर भी सुनवाई हुई है। इसलिए यह कहना गलत होगा कि 2021 का विवाद केवल अतीत की बात है। वास्तव में वह विवाद आज के डेटा-सॉवरेनिटी और डिजिटल संप्रभुता के विमर्श की नींव बन चुका है। # असली लड़ाई Meta बनाम सरकार से कहीं बड़ी है! इस पूरे विवाद को केवल “मोदी का वीडियो हटाने” तक सीमित करना शायद सही नहीं होगा। असल संघर्ष तीन स्तरों पर है- पहला — डेटा पर नियंत्रण यानी भारतीय नागरिकों का डेटा किसके नियंत्रण में रहेगा? दूसरा — algorithm पर नियंत्रण यानी भारत में क्या दिखेगा, क्या नहीं दिखेगा और कौन-सी सामग्री कितने लोगों तक पहुंचेगी—इसका निर्णय भारतीय कानून करेगा या अमेरिका में बैठे technology teams के algorithms? तीसरा — डिजिटल संप्रभुता यानी क्या भारत अपने लोकतांत्रिक विमर्श की सुरक्षा के लिए विदेशी टेक कंपनियों को अपने नियमों के अनुसार चलने के लिए बाध्य कर सकता है? भारत सरकार का वर्तमान रुख स्पष्ट रूप से इसी तीसरे प्रश्न की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। # Safe Harbour: सरकार का सबसे बड़ा हथियार? भारत में social-media intermediaries को कुछ परिस्थितियों में उपयोगकर्ताओं द्वारा पोस्ट की गई सामग्री के लिए कानूनी सुरक्षा मिलती है। इसे सामान्यतः safe harbour कहा जाता है। यही कारण है कि संसदीय समिति द्वारा Meta की इस सुरक्षा पर सवाल उठाना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि किसी बड़े प्लेटफॉर्म की कानूनी सुरक्षा कमजोर होती है तो उसके ऊपर user-generated content को लेकर कहीं अधिक जिम्मेदारी आ सकती है। इसलिए Meta के लिए भारत सरकार की चेतावनी केवल राजनीतिक बयान नहीं है—यह व्यावसायिक और कानूनी जोखिम भी है। # भारत ने Meta को क्या संदेश दिया? भारत का संदेश मोटे तौर पर यह है: “Global company होने का अर्थ यह नहीं कि भारत में Global rules भारतीय कानून से ऊपर हो जाएंगे।” और यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश है। Meta ने हालिया विवाद में माफी मांगकर तत्काल संकट को टाल दिया है। Reuters के अनुसार Meta के Chief Global Affairs Officer Joel Kaplan ने PM मोदी के वीडियो को प्रतिबंधित किए जाने को operational error बताते हुए भारत से माफी मांगी। लेकिन इससे मूल प्रश्न समाप्त नहीं होता। # सवाल है कि अब आगे क्या? आने वाले वर्षों में भारत और Meta के बीच तीन मुद्दे निर्णायक रहेंगे— डेटा + AI + डिजिटल अभिव्यक्ति। भारत दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल बाजारों में है। WhatsApp और Instagram जैसे प्लेटफॉर्म करोड़ों भारतीयों के रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा हैं। इसलिए सरकार के सामने भी संतुलन की चुनौती है। एक तरफ उसे नागरिकों की निजता, बच्चों की सुरक्षा, चुनावी प्रक्रिया और राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा करनी है। दूसरी तरफ उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि नियमन के नाम पर डिजिटल अभिव्यक्ति और स्वतंत्र विमर्श पर अनावश्यक सरकारी नियंत्रण न बढ़े। यही वह बिंदु है जहां Meta बनाम भारत सरकार का विवाद आने वाले समय में “कंटेंट मॉडरेशन” से आगे बढ़कर “डिजिटल संप्रभुता बनाम वैश्विक टेक शक्ति” का बड़ा राजनीतिक विमर्श बन सकता है। और शायद यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा निहितार्थ है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
Modi and Shah in Parliament for minutes! क्या विपक्ष के सवालों से डर गए?
मैन्युफैक्चरिंग जीवीए वित्त वर्ष 10 प्रतिशत की सीएजीआर से बढ़ा
नई दिल्ली, केंद्र सरकार ने बुधवार को कहा कि संशोधित सीरीज के अनुसार, वित्त वर्ष 2022-23 से वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान स्थिर कीमतों पर मैन्युफैक्चरिंग जीवीए 10.88 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) से बढ़ा है।
मानसून सत्र के दौरान डरी-सहमी थी सरकार- कांग्रेस; राहुल के अहंकार से सत्र बर्बाद: बीजेपी
कांग्रेस ने कहा कि इस मानसून सत्र में 4 बिल नहीं आ पाए, जो विपक्ष की बड़ी उपलब्धि है। बीजेपी ने दो तिहाई बहुमत के लिए बहुत कोशिश की, पर परिसीमन बिल पास नहीं हो पाया। इधर, बीजेपी ने कहा कि राहुल गांधी के अहंकार से सत्र बर्बाद हुआ।
टाटा ग्रुप के शेयरों में भूचाल! एन. चंद्रशेखरन के पद छोड़ने के ऐलान से डूबे ₹68,000 करोड़
टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन के इस्तीफे के बाद बुधवार को टाटा ग्रुप के शेयरों में बड़ी बिकवाली देखने को मिली और इससे समूह की सभी लिस्टेड कंपनियों का मार्केटकैप संयुक्त रूप से 68,000 करोड़ रुपए से अधिक कम हो गया।
अपनी आजादी का जश्न मना रहे बलूचिस्तानियों पर पाकिस्तान ने एयर स्ट्राइक कर दी। इसके जवाब में बलूच लड़ाकों ने बंदूकें उठा लीं और पाकिस्तानी सेना पर कई जगह ताबड़तोड़ हमले शुरू कर दिए। देखते ही देखते सोराब और ग्वादर से लेकर चागाई, खुजदार, वाध, मंगुचर और झाओ तक हिंसा फैल गई और दोनों पक्षों के बीच जबरदस्त संघर्ष छिड़ गया। पाकिस्तान की हवाई कार्रवाई में महिलाओं और बच्चों समेत कम से कम 21 नागरिकों के मारे जाने की खबर है, जबकि जवाबी हमलों में बलूच विद्रोहियों ने पुलिस और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। इस तरह बलूचिस्तान एक बार फिर पाकिस्तान की सैन्य ताकत और बलूचों की आजादी की लड़ाई के बीच सीधे टकराव का मैदान बन गया है। स्थानीय लोगों और कार्यकर्ताओं का आरोप है कि पाकिस्तानी विमानों ने अलग-थलग आतंकी ठिकानों की बजाय आबादी वाले इलाकों को निशाना बनाया। हमलों के बाद सोराब और ग्वादर में विरोध प्रदर्शन हुए और लोगों ने सैन्य कार्रवाई के खिलाफ आवाज उठाते हुए जवाबदेही की मांग की। हम आपको बता दें कि बलूचों को जबरन गायब कर देना, सुरक्षा अभियानों के नाम पर बलूचों से बदसलूकी, बलूच महिलाओं के शोषण, उनकी राजनीतिक अभिव्यक्ति पर पाबंदियों और गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों ने पाकिस्तान के खिलाफ स्थानीय असंतोष को दशकों से लगातार गहरा किया है। इसे भी पढ़ें: Jan Gan Man: 'आजादी' का जश्न मनाते हुए झूम उठा पूरा Balochistan ! बीच-बीच में बाधा डाल रहा है Pakistan देखा जाये तो बलूचिस्तान का संकट अचानक पैदा हुआ कोई सुरक्षा संकट नहीं है। पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत प्राकृतिक संसाधनों जैसे गैस, खनिज, ऊर्जा और रणनीतिक समुद्री क्षेत्र से बेहद समृद्ध है, लेकिन स्थानीय आबादी लंबे समय से खुद को विकास और संसाधनों के लाभ से वंचित मानती रही है। बलूच राष्ट्रवादियों का आरोप है कि इस प्राकृतिक संपदा का फायदा स्थानीय लोगों की बजाय पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान को मिलता है। साथ ही वह पंजाबी प्रभुत्व वाले संघीय ढांचे पर राजनीतिक और जातीय भेदभाव का आरोप लगाते हैं। इसी असंतोष ने आत्मनिर्णय की उस लंबी लड़ाई को जन्म दिया, जिसने बलूचिस्तान को पाकिस्तान के सबसे चुनौतीपूर्ण इलाकों में बदल दिया है। साथ ही बलूच राष्ट्रवादियों का कहना है कि 1947 में ब्रिटिश सत्ता समाप्त होने के समय कलात खानत ने अपनी संप्रभुता का दावा किया था। 11 अगस्त इसी ऐतिहासिक घटना की याद में बलूच राष्ट्रवादियों के लिए प्रतीकात्मक स्वतंत्रता दिवस है। उनका दावा है कि मार्च 1948 में पाकिस्तान में विलय का फैसला स्वतंत्र इच्छा से नहीं, बल्कि दबाव में कराया गया। हालांकि पाकिस्तान इस दावे को स्वीकार नहीं करता और 14 अगस्त को ही बलूचिस्तान समेत पूरे देश का स्वतंत्रता दिवस मानता है। दूसरी ओर, इस बार 11 अगस्त का संदेश केवल प्रतीकात्मक नहीं रहा। बलूच राष्ट्रवादियों ने इसे अपनी राजनीतिक पहचान और स्वतंत्र अस्तित्व की घोषणा के रूप में पेश किया। सोशल मीडिया पर कुछ बलूच समर्थकों ने दावा किया कि भविष्य में अलग ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ के लिए पासपोर्ट, मुद्रा और दूतावास जैसी संस्थाओं की तैयारी की जा रही है। उधर, पाकिस्तान की एयर स्ट्राइक के बाद हालात और विस्फोटक हो गए। बलूच लिबरेशन आर्मी यानी BLA ने इसके समानांतर कई जिलों में समन्वित हमले किए। चागाई में आधी रात को पुलिस स्टेशन पर बम हमला कर उसे नष्ट किए जाने और तीन सुरक्षा कर्मियों के मारे जाने की खबर है। यखमाच में वाणिज्यिक वाहनों पर घात लगाकर हमला और एक ट्रक हाईजैक किए जाने की सूचना सामने आई। खुजदार RCD हाईवे पर सुरक्षा काफिले और बख्तरबंद वाहन को निशाना बनाए जाने, वाध में सैन्य वाहनों पर घात लगाकर हमला करने, मंगुचर बाजार में सुरक्षा चौकी पर विस्फोट और भारी गोलीबारी तथा झाओ में पाकिस्तानी सैन्य शिविर पर रात में हमले की रिपोर्ट है। साथ ही BLA ने इस महीने अलग-अलग हमलों में कम से कम 32 पाकिस्तानी सैनिकों को मारने का दावा भी किया है। दूसरी ओर पाकिस्तान का कहना है कि सुरक्षा बलों ने बलूचिस्तान में मुठभेड़ों के दौरान 10 उग्रवादियों को मार गिराया। एक कार बम के समय से पहले फटने की घटना में आठ आतंकियों और पास के घर में मौजूद तीन लोगों समेत 11 लोगों के मारे जाने की बात भी पाकिस्तानी अधिकारियों ने कही है। देखा जाये तो इन घटनाओं को अलग-अलग हमलों के रूप में देखना बड़ी तस्वीर को नजरअंदाज करना होगा। बलूचिस्तान में अब एक खतरनाक चक्र बनता दिखाई दे रहा है। पाकिस्तानी सैन्य कार्रवाई, नागरिकों में आक्रोश, बलूच विद्रोहियों की जवाबी हिंसा और फिर और कठोर सैन्य अभियान। यही चक्र इस संघर्ष को लगातार गहरा कर रहा है। बलूचिस्तानियों की आजादी की लड़ाई की ‘सफलता’ को फिलहाल पाकिस्तान से वास्तविक राजनीतिक स्वतंत्रता के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना स्पष्ट है कि दशकों के दमन, सैन्य अभियानों और राजनीतिक असंतोष के बावजूद स्वतंत्रता की मांग खत्म नहीं हुई। बल्कि 11 अगस्त जैसे प्रतीक, सड़कों पर विरोध और BLA जैसे सशस्त्र संगठनों की बढ़ती गतिविधियां बताते हैं कि बलूच सवाल अब भी पाकिस्तान के सामने एक गंभीर और जटिल चुनौती है। बहरहाल, पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वह बलूचिस्तान को केवल बंदूक और एयर स्ट्राइक से नियंत्रित कर पाएगा। क्योंकि जिस संघर्ष को दशकों तक सुरक्षा समस्या बताकर दबाने की कोशिश की गई, वह अब राजनीतिक पहचान, संसाधनों पर अधिकार और आत्मनिर्णय की मांग से जुड़ा व्यापक संकट बन चुका है। और जब किसी जमीन पर लोग अपनी आजादी का दिन मनाने के लिए भी डर और गोलियों के साये में खड़े हों, तो यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का सवाल नहीं रहता, यह उस राज्य की वैधता पर उठता एक बेहद गंभीर सवाल बन जाता है।
12 Years में पहली बार Modi Govt बैकफुट पर? Sheetal P Singh Explains Student Protest Impact!
वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह ने जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन और संसद में विपक्ष के आक्रामक रवैये पर बड़ा दावा किया है। उनका कहना है कि पिछले 12 सालों में पहली बार मोदी सरकार पूरी तरह से डरी हुई नजर आ रही है। क्या छात्रों का यह शांतिपूर्ण प्रदर्शन और मानसून सत्र में विपक्ष का भारी दबाव सत्ता के शीर्ष पर बैठे शासक को हिलाने में कामयाब हो गया है?
संसद के मानसून सत्र का आखिरी दिन आज, क्या एनडीए और विपक्ष के बीच खत्म होगी सियासी रार
संसद के मानसून सत्र का आज 13 अगस्त 2026 को आखिरी दिन है। छात्रों के प्रदर्शन, पुलिस कार्रवाई, राम मंदिर चंदा मामले और परिसीमन विधेयक पर सबकी नजर है।
संसद का मानसून सत्र आज होगा खत्म, लेकिन नहीं थमी सियासी जंग! क्या आखिरी दिन दूर होगी सरकार-विपक्ष की रार
गुजरात के डिप्टी सीएम ने लॉन्च की 'शक्तिदूत 2.0' योजना, 500 खिलाड़ियों को सालाना मिलेंगे 50 लाख तक
गांधीनगर, 12 अगस्त (आईएएनएस)। गुजरात के डिप्टी सीएम हर्ष संघवी ने बुधवार को गांधीनगर में नए रूप में तैयार 'शक्तिदूत 2.0' योजना लॉन्च की। इसके तहत खिलाड़ियों को सीधे मदद दी जाएगी और राज्य के खिलाड़ियों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफल होने में मदद करने का 10 साल का लक्ष्य रखा गया है।
तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंद रेड्डी ने डिफॉल्टर राइस मिलर्स पर सख्ती बरती
तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंद रेड्डी ने डिफॉल्टर राइस मिलर्स पर सख्ती बरती
मेघालय : सीएम संगमा ने सभी के लिए सुलभ सार्वजनिक जगह बनाने के लिए वेंडरों से सहयोग की अपील की
मेघालय : सीएम संगमा ने सभी के लिए सुलभ सार्वजनिक जगह बनाने के लिए वेंडरों से सहयोग की अपील की
भाजपा सरकार के 100 दिन पूरे होने पर अमित शाह के पश्चिम बंगाल दौरे की संभावना तेज
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह इस महीने के आखिर में पश्चिम बंगाल का दौरा कर सकते हैं। यह दौरा राज्य में भाजपा सरकार के 100 दिन पूरे होने के मौके पर हो सकता है।
वाईएसआर कांग्रेस संसद में पंचदर्ला माइनिंग का मुद्दा उठाएगी
वाईएसआर कांग्रेस संसद में पंचदर्ला माइनिंग का मुद्दा उठाएगी
सेना के बाद खुफिया एजेंसियों को ताकतवर बनाने में जुटा जर्मनी
जर्मन सरकार ने देश की खुफिया एजेंसियों में बड़े सुधारों की तैयारी की है. विदेशी खतरों के खिलाफ कदम उठाने के लिए उन्हें ज्यादा अधिकार दिए जा रहे हैं.
सेना ने अगरतला एयरपोर्ट पर सीआईएसएफ कर्मियों के लिए ट्रेनिंग आयोजित की
सेना ने अगरतला एयरपोर्ट पर सीआईएसएफ कर्मियों के लिए ट्रेनिंग आयोजित की
भारत में पीएम मोदी और गृह मंत्री के नेतृत्व में बना देशभक्ति का माहौल: नवीन जैन
भारत में पीएम मोदी और गृह मंत्री के नेतृत्व में बना देशभक्ति का माहौल: नवीन जैन
राहुल गांधी का तीखा हमला - बोले, अमित शाह की इमेज का गुब्बारा फट चुका
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने गृह मंत्री अमित शाह पर तीखा हमला करते हुए कहा है कि वह पिछले 20 दिनों से सदन से गायब हैं
जम्मू-कश्मीर: एलजी मनोज सिन्हा ने 21 सितंबर से विधानसभा सत्र बुलाया
जम्मू-कश्मीर: एलजी मनोज सिन्हा ने 21 सितंबर से विधानसभा सत्र बुलाया
श्रीधर बाबू का केटीआर पर निशाना, बोले- झूठे आरोप लगाकर जनता को गुमराह कर रहे
श्रीधर बाबू का केटीआर पर निशाना, बोले- झूठे आरोप लगाकर जनता को गुमराह कर रहे
कर्नाटक: हुबली-वाराणसी ट्रेन सेवा के हफ्ते में 3 दिन चलने की संभावना
कर्नाटक: हुबली-वाराणसी ट्रेन सेवा के हफ्ते में 3 दिन चलने की संभावना
सुष्मिता देव की 'लुंगी वाला' टिप्पणी का विरोध, विपक्ष ने कहा- गैर-हिंदी भाषी राज्यों का अपमान बर्दाश्त नहीं
CM Vijay vs Centre: केंद्र की नीतियों पर विजय सरकार का बड़ा हमला, दो दिन में दो प्रस्तावों से बढ़ी सियासी हलचल
संसदीय समिति की रिपोर्ट से उठते सवाल- प्राइवेट अस्पतालों और स्कूलों की लूट पर कब लगेगी लगाम?
पिछले कुछ वर्षों के दौरान देश में प्राइवेट यानी निजी अस्पतालों, स्कूलों और कॉलेजों की बाढ़ सी आ गई है। देश के राज्य और जिले तो छोड़िए , अब तो छोटे-छोटे शहरों में भी खुलते जा रहे नर्सिंग होम और स्कूल लोगों की जेब काटने का कोई मौका नहीं चूक रहे हैं। देश का गरीब तबका तो छोड़िए, मध्यम आय और उच्च मध्यम आय की कैटेगरी में आने वाले लोग भी इनकी लूट से परेशान होते जा रहे हैं। ऐसे में प्राइवेट अस्पतालों को लेकर आई संसदीय समिति की एक रिपोर्ट ने फिर से इस घाव को ताजा कर दिया है। एक बार फिर से वही पुराना सवाल उठ कर खड़ा हो गया है कि खुली लूट का अड्डा बन चुके प्राइवेट अस्पतालों, स्कूलों और कॉलेजों की मनमानी पर आखिर कब लगाम लगेगी? इसे भी पढ़ें: Modi-Yogi ने 'Mission 2027' को सफल बनाने के लिए कसी कमर, कई BJP MLAs के टिकट पर लटकी तलवार! देश के प्राइवेट अस्पताल, भर्ती होने वाले मरीजों/ उनके परिजनों से कमरे का जो किराया वसूलते है, यह उसी इलाके के महंगे होटलों से भी कई गुना ज्यादा होता है। ध्यान दीजिएगा, इलाज के नाम पर जो बाकी चार्ज लिए जाते हैं वो कमरे के चार्ज में अलग से जोड़ा जाता है। यह सारे खुलासे केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय से जुड़ी संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट से हुए हैं। समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी अस्पतालों में इलाज का खर्च औसतन 6,631 रुपए है जबकि प्राइवेट अस्पतालों में यही खर्च साढ़े सात गुने से भी ज्यादा (50,508 रुपए ) है। इलाज के नाम पर भी अनाप-शनाप वसूली की जाती है। बिल में पारदर्शिता नहीं होती है, गंभीर इलाज या सर्जरी से पहले मरीज को फाइनल खर्च का एस्टिमेट नहीं बताया जाता है। नतीजा प्राइवेट अस्पतालों की मनमानी बेलगाम होती जा रही है और जिसकी जो मर्जी वो वसूल रहा है। मुंबई के नानावटी अस्पताल में कमरे का चार्ज 6 से 12 हजार रुपए प्रतिदिन है जबकि उसी इलाके के 3 स्टार होटल में कमरे कमरे का चार्ज 2500 से लेकर 4500 रुपए के बीच ही है। दिल्ली के साकेत में स्थित मैक्स अस्पताल में भर्ती मरीज से अस्पताल वाले 7-11 हजार रुपए प्रतिदिन कमरे का चार्ज वसूलते है जबकि अस्पताल के पास ही स्थित होटल में आपको 2100 से 3500 रुपए प्रतिदिन के आधार पर बढ़िया कमरा मिल सकता है। यही हाल देश के ज्यादातर शहरों में प्राइवेट अस्पतालों का है। समिति ने सरकार को कुछ सुझाव देते हुए यह सिफारिश की है कि, प्राइवेट अस्पताल के कमरे का किराया 3 स्टार होटल के किराए से अधिक नहीं होनी चाहिए। भर्ती से पहले अस्पताल को इलाज का पूरा खर्च स्पष्ट रूप से बताना चाहिए। सर्जरी और गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए फिक्स रेट तय होना चाहिए और उसमें सभी खर्चे शामिल होने चाहिए। इसके अलावा भी संसदीय समिति ने कई महत्वपूर्ण सिफारिश करते हुए सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठाए है। समिति ने स्पष्ट तौर पर सरकार को सरकारी अस्पतालों में बेड और विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या बढ़ाने को कहा है। हालांकि यह सब जानते हैं कि सरकार ऐसा करेगी नहीं। लेकिन इस बात का भी ध्यान रखना जरूरी है कि स्वास्थ्य मंत्रालय समिति की रिपोर्ट की आड़ लेकर कहीं वैसा ही खेल न कर दें जैसा कि CGHS चार्ज के मामले में किया गया है। सरकार को यह याद दिलाना बेहद जरूरी है कि दिल्ली या मुंबई के महंगे अस्पतालों में इलाज का खर्च इन शहरों के हिसाब से है वहीं देश के दूर-दराज इलाकों में इलाज का खर्च उस इलाके के आधार पर है। डर इस बात का है कि कहीं CGHS में जो गलतियां की गई है,उसी तरह की गलती को इस मामले में दोहराते हुए दिल्ली या मुंबई के आधार पर इलाज़ और सर्जरी का फिक्स रेट पूरे देश के लिए न तय कर दिया जाए। ऐसे हालात में दूर-दराज के इलाकों में चलने वाले प्राइवेट अस्पताल सरकारी आदेश का हवाला देते हुए कई गुना पैसा वसूलना शुरू कर देंगे। सरकार , सरकार के मंत्री और अधिकारियों को इस बात का विशेष ध्यान रखना होगा। जब भी प्राइवेट अस्पतालों की खुली लूट का जिक्र आता है तो आप इससे स्कूलों और कॉलेजों को अलग नहीं कर सकते हैं। क्योंकि जिस तरह से एक छोटे नर्सिंग होम को बड़ा और भव्य अस्पताल बनने में देर नहीं लगती, उसी तरह से स्कूल और कॉलेजों की बिल्डिंग भी साल दर साल भव्य से भव्यतम होती चली जाती है। फीस, किताबें, ड्रेस और बाकी खर्चो की मनमानी के बारे में तो सबको मालूम है। इसलिए यहां पर हम सिर्फ कुछ उदाहरण आपके सामने रखना चाहेंगे। दिल्ली से सटे गाजियाबाद में स्थित एक मेडिकल कॉलेज से MBBS करने की कुल लागत सवा से डेढ़ करोड़ रुपए के बीच आती है। मिडिल क्लास तो छोड़िए , हाई इनकम ग्रुप में आने वाले लोगों के लिए भी अब अपने बच्चों को MBBS करवा पाना आसान नहीं रहा है। आजकल प्राइवेट स्कूलों में लूट का एक जरिया स्मार्ट बोर्ड यानी स्मार्ट क्लासेस भी बन चुका है। एक बार स्मार्ट बोर्ड लगा दिया और फिर उसके बाद सालों तक इसके नाम पर स्कूल वाले वसूली करते हैं। अलग-अलग इलाकों के आधार पर स्मार्ट क्लास के नाम पर प्राइवेट स्कूल वाले 200 रुपए से लेकर 800 रुपए महीने तक वसूलते हैं। पहली कक्षा से बारहवी तक, हर महीने.. हर साल..। हालत इतनी खराब है कि अगर इन स्कूलों में जाकर आप अध्यापकों से स्मार्ट बोर्ड पर पढ़ाने को कहेंगे तो ज्यादातर शिक्षकों को शायद यह चलाना भी नहीं आएगा लेकिन हर महीने वसूली जारी है। संसदीय समिति भले ही कितने भी गंभीर सवाल उठाए या कितने ही अच्छे सुझाव दें लेकिन कड़वी सच्चाई तो यही है कि प्राइवेट अस्पतालों, स्कूलों और कॉलेजों की मनमानी एवं खुली लूट पर लगाम कसने का कोई स्थायी फॉर्मूला सरकारों के पास नहीं है और इसके लिए सभी राजनीतिक दलों के नेता जिम्मेदार हैं क्योंकि पिछले तीन दशकों में देश के तमाम राजनीतिक दल कहीं न कहीं किसी न किसी सरकार में भागीदार/साझीदार रहे हैं इसलिए कोई भी अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता है। संतोष कुमार पाठक लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं
एफसीआरए बिल वापस लिया जाए, सरकार ने इसे जेपीसी को भेजा: केसी वेणुगोपाल
एफसीआरए बिल वापस लिया जाए, सरकार ने इसे जेपीसी को भेजा: केसी वेणुगोपाल
भले ही तुर्किये, सऊदी अरब और पाकिस्तान 7 अगस्त 2026 के मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के बाद इसे अपनी बड़ी रणनीतिक कामयाबी के तौर पर पेश कर रहे हों, लेकिन भारत ने इस बदलते शक्ति-संतुलन का जवाब किसी एक मोर्चे पर नहीं, बल्कि कई दिशाओं में पहले ही तैयार कर लिया था। सिर्फ एक साल के ही घटनाक्रमों को देखें तो फरवरी 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजराइल यात्रा के दौरान दोनों देशों ने अपने संबंधों को “Special Strategic Partnership for Peace, Innovation and Prosperity” के स्तर तक पहुंचाया और रक्षा, सुरक्षा, अंतरिक्ष, साइबर तथा अत्याधुनिक तकनीकों में सहयोग को नई धार दी। उसी फरवरी में फ्रांस के साथ रिश्तों को “Special Global Strategic Partnership” तक पहुँचाया गया, जिसके तहत रक्षा उत्पादन, HAMMER मिसाइलों के भारत में संयुक्त निर्माण और उन्नत सैन्य तकनीक पर सहयोग बढ़ा है। इससे पहले अगस्त 2025 में फिलीपींस के साथ भारत ने Strategic Partnership स्थापित की थी, जिसके केंद्र में रक्षा, समुद्री सुरक्षा और हिंद-प्रशांत सहयोग है। साथ ही अप्रैल 2026 में दक्षिण कोरिया के साथ Special Strategic Partnership को अगले पांच वर्षों के लिए नई रणनीतिक दिशा दी गई, जबकि मई 2026 में वियतनाम के साथ Enhanced Comprehensive Strategic Partnership के तहत रक्षा खरीद, समुद्री सुरक्षा, साइबर सहयोग और हिंद-प्रशांत में समन्वय को और मजबूत किया गया। मई 2026 में ही नीदरलैंड के साथ भी संबंधों को Strategic Partnership तक ले जाने की प्रक्रिया आगे बढ़ी। यानी पाकिस्तान-तुर्किये-सऊदी अरब ने जहां एक त्रिकोण बनाया है, वहीं भारत ने इजराइल, फ्रांस, फिलीपींस, दक्षिण कोरिया, वियतनाम, नीदरलैंड और खाड़ी के महत्वपूर्ण साझेदारों के साथ अलग-अलग लेकिन आपस में जुड़े रणनीतिक रिश्तों का ऐसा व्यापक नेटवर्क खड़ा किया है, जिसमें रक्षा तकनीक, मिसाइलें, समुद्री सुरक्षा, खुफिया सहयोग और रक्षा उत्पादन सभी शामिल हैं। भारत-इजराइल रक्षा सहयोग हम आपको याद दिला दें कि ईरान युद्ध से ठीक पहले हुई प्रधानमंत्री मोदी की इजराइल यात्रा का सबसे बड़ा पहलू आधुनिक रक्षा तकनीक था। करीब 10 अरब डॉलर मूल्य के संभावित रक्षा सौदों में आयरन बीम जैसी लेजर आधारित वायु रक्षा प्रणाली, आयरन डोम, डेविड्स स्लिंग और एरो प्रणालियों की तकनीक, सटीक निर्देशित बम, लोइटरिंग म्यूनिशन, नौसैनिक रक्षा प्रणालियां और अत्याधुनिक ड्रोन शामिल हैं। इससे साफ है कि भारत केवल हथियार खरीदने की दिशा में नहीं, बल्कि अपनी दीर्घकालिक सैन्य वास्तुकला को इजराइली तकनीक के साथ जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसे भी पढ़ें: NEET-UG विवाद के बाद बदला PM Modi का अंदाज़, Gen Z को Influencers और 'Shortcuts' की होड़ से बचने की दी सलाह कहानी यहीं खत्म नहीं होती। भारत-इजराइल सहयोग में “होराइजन स्कैनिंग” जैसी AI आधारित व्यवस्था पर भी काम हो रहा है, जिसके जरिए भविष्य के सुरक्षा जोखिमों, सीमाई चुनौतियों और तकनीकी बदलावों का पहले से आकलन किया जा सकेगा। AI, क्वांटम कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर और साइबर सुरक्षा में संयुक्त शोध का अर्थ है कि भारत अपनी अगली पीढ़ी की सुरक्षा क्षमता केवल आज के युद्ध के लिए नहीं, बल्कि कल के युद्ध की प्रकृति को ध्यान में रखकर तैयार कर रहा है। साथ ही रक्षा उत्पादन में संयुक्त शोध, तकनीकी हस्तांतरण और घरेलू सह-उत्पादन “आत्मनिर्भर भारत” को सैन्य शक्ति से जोड़ते हैं। इसी संदर्भ में इजराइल की प्रस्तावित “Hexagon of Alliances” अवधारणा भी महत्वपूर्ण हो जाती है, जिसमें भारत, इजराइल, ग्रीस, साइप्रस और अन्य साझेदारों के बीच सुरक्षा और आर्थिक सहयोग की परिकल्पना की गई है। इसका रणनीतिक संदेश यह है कि भारत पश्चिम एशिया और भूमध्यसागर में बन रहे नए शक्ति-संतुलन को केवल देख नहीं रहा, बल्कि अपने लिए वैकल्पिक रणनीतिक नेटवर्क भी तैयार कर रहा है। मक्का समझौते से जुड़े सवाल अब आते हैं मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर। सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने सामूहिक प्रतिरोध का संकल्प लेते हुए कहा है कि तीनों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला सभी पर हमला माना जाएगा। आंकड़ों के मुताबिक, तीनों देशों के पास संयुक्त रूप से करीब 14 लाख सक्रिय सैन्यकर्मी, 3,415 विमान, 6,046 टैंक, 344 नौसैनिक परिसंपत्तियां और लगभग 124.4 अरब डॉलर का वार्षिक रक्षा बजट है। सऊदी अरब पूंजी और रणनीतिक भूगोल देता है, तुर्की रक्षा उद्योग, ड्रोन, मिसाइल और नौसैनिक तकनीक देता है, जबकि पाकिस्तान मानवबल, सैन्य अनुभव और परमाणु क्षमता लेकर आता है। लेकिन इस गठजोड़ को “इस्लामिक नाटो” कह देना इसकी वास्तविक क्षमता का अंतिम प्रमाण नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि हमला होने की स्थिति में बाकी सदस्य वास्तव में कितनी और किस प्रकार की सैन्य सहायता देने के लिए बाध्य होंगे। फिलहाल अभी कोई स्थायी केंद्रीय संयुक्त सैन्य कमान स्थापित नहीं हुई है। यानी राजनीतिक घोषणा और वास्तविक संयुक्त युद्ध क्षमता के बीच अभी लंबी दूरी है। रणनीतिक साझेदारियों का नेटवर्क खड़ा कर रहा है हिंदुस्तान साथ ही पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब के बीच बने नए रक्षा समीकरण को समझने के लिए केवल तीन देशों की सैन्य ताकत देखना काफी नहीं है। असली तस्वीर यह है कि पिछले एक साल में भारत ने भी अपनी रणनीतिक साझेदारियों और रक्षा सहयोग का दायरा तेजी से बढ़ाया है। अगस्त 2025 में भारत और फिलीपींस ने अपने संबंधों को औपचारिक रूप से Strategic Partnership यानि रणनीतिक साझेदारी का दर्जा दिया। फरवरी 2026 में भारत-इजराइल संबंधों को Special Strategic Partnership for Peace, Innovation and Prosperity तक पहुँचाया गया। फरवरी में ही भारत और फ्रांस ने अपने रिश्तों को Special Global Strategic Partnership के स्तर तक पहुंचाया। मई 2026 में भारत और वियतनाम ने संबंधों को Enhanced Comprehensive Strategic Partnership में बदल दिया। यूएई के साथ जनवरी 2026 में दोनों देशों ने Strategic Defence Partnership स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया। इन साझेदारियों की खासियत यह है कि ये केवल कागज पर कूटनीतिक घोषणाएं नहीं हैं। इनके पीछे रक्षा, समुद्री सुरक्षा, खुफिया सहयोग, तकनीक, साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष और रक्षा उत्पादन जैसे ठोस क्षेत्र जुड़े हैं। यानी पाकिस्तान-तुर्किये-सऊदी गठजोड़ अगर एक तरफ शक्ति का त्रिकोण बना रहा है, तो भारत दूसरी तरफ अलग-अलग क्षेत्रों में कई मजबूत साझेदारों का नेटवर्क खड़ा कर रहा है। भारत-फिलीपींस रक्षा संबंध सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण फिलीपींस है। भारत पहले ही उसे करीब 375 मिलियन डॉलर की ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली बेच चुका है और फिलीपींस को इसकी अतिरिक्त प्रणालियों में भी रुचि है। इसके अलावा आकाश मिसाइल प्रणाली की संभावित बिक्री पर भी बातचीत हुई है। इसका सामरिक महत्व इसलिए बड़ा है क्योंकि फिलीपींस दक्षिण चीन सागर में चीन के साथ गंभीर समुद्री तनाव का सामना कर रहा है। भारत की मिसाइलें वहां पहुंचकर न केवल भारतीय रक्षा उद्योग की ताकत दिखाती हैं, बल्कि हिंद-प्रशांत में भारत की सुरक्षा भूमिका को भी मजबूत करती हैं। भारत-वियतनाम रक्षा संबंध दूसरी बड़ी सफलता वियतनाम की है। मई 2026 में दोनों देशों ने अपने संबंधों को Enhanced Comprehensive Strategic Partnership तक पहुंचाया और उसी दौरान भारत की ब्रह्मोस मिसाइल के लिए वियतनाम के साथ सौदे की आधिकारिक पुष्टि हुई। यह कदम बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि वियतनाम दक्षिण चीन सागर में चीन के दबाव का सामना कर रहा है। भारत के लिए इसका अर्थ है कि उसकी मिसाइल और रक्षा तकनीक हिंद-प्रशांत के एक और महत्वपूर्ण तटीय देश तक पहुंच रही है। भारत-इंडोनेशिया रक्षा संबंध इसके बाद इंडोनेशिया आता है। जुलाई 2026 में भारत और इंडोनेशिया ने ब्रह्मोस के साथ-साथ अस्त्र एयर-टू-एयर मिसाइल और रक्षा तकनीक से जुड़े कई समझौते किए। रिपोर्टों के अनुसार इंडोनेशिया को दो ब्रह्मोस बैटरियों की आपूर्ति का सौदा करीब 200 मिलियन डॉलर का है। इंडोनेशिया की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए यह केवल हथियार बिक्री नहीं, बल्कि हिंद महासागर और दक्षिण-पूर्व एशिया के समुद्री सुरक्षा ढांचे में भारत की बढ़ती भूमिका का संकेत है। भारत-आर्मेनिया रक्षा संबंध वहीं आर्मेनिया भारत की रणनीतिक रक्षा नीति का एक अलग लेकिन बेहद महत्वपूर्ण मोर्चा है। भारत ने उसे आकाश एयर डिफेंस सिस्टम, पिनाका रॉकेट सिस्टम, स्वाति रडार और अन्य हथियार प्रणालियां उपलब्ध कराई हैं। 2022-24 के दौरान आर्मेनिया के हथियार आयात में भारत की हिस्सेदारी 43 प्रतिशत बताई गई है। यह साझेदारी इसलिए भी अहम है क्योंकि आर्मेनिया अजरबैजान के साथ संघर्ष में है और अजरबैजान के पाकिस्तान तथा तुर्किये के साथ करीबी रक्षा संबंध हैं। इसलिए भारत-आर्मेनिया रक्षा सहयोग सीधे तौर पर उस क्षेत्रीय समीकरण में नई सैन्य धुरी बनाता है, जिसमें तुर्किये और पाकिस्तान पहले से सक्रिय हैं। भारत-यूएई रक्षा समझौता वहीं भारत के लिए दूसरा बड़ा मोर्चा अरब जगत में उसकी बढ़ती रक्षा साझेदारी है। यूएई द्वारा ब्रह्मोस मिसाइल में रुचि इसी रणनीतिक समीकरण को बदल सकती है। यदि सौदा अंतिम रूप लेता है तो यह खाड़ी में भारत की शक्तिशाली उपस्थिति होगी। इससे तुर्की के ड्रोन और मिसाइल निर्यात को चुनौती मिल सकती है तथा यूएई को अपनी रक्षा क्षमता में नया विकल्प मिलेगा। पाकिस्तान के लिए यह बड़ा रणनीतिक झटका बन सकता है। एक तरफ वह तुर्की और सऊदी अरब के साथ मिलकर नया रक्षा मोर्चा मजबूत कर रहा है, तो दूसरी तरफ भारत यूएई के साथ ब्रह्मोस जैसे अत्याधुनिक हथियारों के सहयोग की दिशा में आगे बढ़ रहा है। अगर यह सौदा हुआ, तो अरब सागर और ओमान की खाड़ी में पाकिस्तान की नौसैनिक रणनीति पर दबाव बढ़ सकता है। इतना ही नहीं, यूएई के बाद सऊदी अरब जैसे दूसरे खाड़ी देश भी भारत की रक्षा तकनीक में रुचि ले सकते हैं। साथ ही चूंकि यूएई फारस की खाड़ी, होर्मुज जलडमरूमध्य और अरब सागर के बीच एक अत्यंत महत्वपूर्ण सामरिक स्थिति में है। ऐसे में भारतीय लंबी दूरी की सटीक मारक क्षमता यूएई को तुर्किये या पाकिस्तान पर निर्भर हुए बिना अपनी सुरक्षा क्षमता बढ़ाने का विकल्प दे सकती है। यही वह बिंदु है जहां पाकिस्तान-तुर्किये-सऊदी गठजोड़ की काट साफ दिखाई देती है। सऊदी अरब को पाकिस्तान से सैन्य मानवबल और परमाणु प्रतिरोध की छाया मिलती है, तुर्किये से ड्रोन, मिसाइल और रक्षा उद्योग की ताकत मिलती है। लेकिन भारत यूएई जैसे खाड़ी देश को अलग रक्षा विकल्प दे सकता है। दूसरी तरफ फिलीपींस, वियतनाम और इंडोनेशिया में भारतीय मिसाइलों की मौजूदगी हिंद-प्रशांत में भारत की समुद्री पहुंच बढ़ाती है, जबकि आर्मेनिया के साथ सहयोग तुर्किये-पाकिस्तान समर्थित क्षेत्रीय समीकरण को दूसरी दिशा से चुनौती देता है। इसलिए पाकिस्तान-तुर्किये-सऊदी गठजोड़ का जवाब भारत किसी एक नए सैन्य गठबंधन से देने की बजाय कई दिशाओं में दे रहा है। इजराइल से अत्याधुनिक तकनीक, फ्रांस से उच्चस्तरीय रक्षा औद्योगिक सहयोग, यूएई से खाड़ी में रणनीतिक पहुंच और फिलीपींस-वियतनाम-इंडोनेशिया के जरिए हिंद-प्रशांत में मिसाइल तथा समुद्री सुरक्षा नेटवर्क। यही भारत की असली रणनीतिक बढ़त है। यानि एक गठजोड़ के सामने दूसरा गठजोड़ खड़ा करने की बजाय भारत ने साझेदारियों का ऐसा जाल बिछाना शुरू किया है जिसमें पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब को हर दिशा में अलग-अलग रणनीतिक समीकरणों का सामना करना पड़ेगा। बहरहाल, एक चीज स्पष्ट है कि पाकिस्तान अगर डाल-डाल चलने की कोशिश कर रहा है तो उसे पता होना चाहिए कि भारत पहले से पात-पात पर अपनी रणनीतिक मौजूदगी दर्ज करा रहा है। -नीरज कुमार दुबे
Rahul Gandhi vs Amit Shah: बर्बरता पर शाह मौन, Rahul ने पूछा 'किसने दिया Lathicharge का आदेश?'
क्या था माओ का 5 फिंगर प्लान, जिसे फॉलो करते हुए जिनपिंग बढ़ा सकते हैं भारत की टेंशन
1958 का वो दौर, जब बीजिंग के तियानमेन स्क्वायर से माओ त्से-तुंग ने भारत की सीमाओं पर अपने विस्तारवादी मंसूबों की पहली लकीर खींची थी। माओ ने तिब्बत को चीन के दाहिने हाथ की हथेली बताया और लद्दाख, नेपाल, सिक्किम, भूटान व अरुणाचल प्रदेश को उसकी पाँच उंगलियां। उन्होंने साफ लफ्जों में कहा था कि ये पाँचों इलाके या तो भारत के कब्जे में हैं या उसके सीधे असर मे और इन्हें 'आजाद' कराकर चीन की हथेली से दोबारा जोड़ना बीजिंग का ऐतिहासिक धर्म है। एक ऐसा खतरनाक और अघोषित ब्लूप्रिंट, जिसे चीन ने कभी किसी सरकारी दस्तावेज में दर्ज तो नहीं किया, लेकिन 1962 की जंग से लेकर डोकलाम और गालवान घाटी की हिंसक झड़पों तक भारत को घेरने की हर चीनी चाल के पीछे इसी 'फाइव फिंगर्स ऑफ तिब्बत पॉलिसी' का साया रहा है। आज जब ड्रैगन हमारी सीमाओं पर आँखें दिखा रहा है, तो सवाल उठता है कि क्या चीन आज भी माओ के उसी 68 साल पुराने सपने को पूरा करने की साजिश रच रहा है? आज हम एमआरआई स्कैन करेंगे चीन की उसी सबसे बड़ी और सबसे पुरानी उस गुप्त रणनीति से, जो भारत की संप्रभुता के लिए आज भी सबसे बड़ा खतरा बनी हुई है। इसे भी पढ़ें: भुखमरी, कंगाली और दिवालीयपन के बावजूद पाकिस्तान आया नंबर-1, भारत 13वें नंबर पर, लेकिन किसमें? PPA की रिपोर्ट ने क्या दावा किया अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबनसिरी जिले के ताक्सिंग इलाके से बेहद चिंताजनक खबर सामने आई है। क्षेत्रीय दल पीपल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल (PPA) की एक फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया है कि चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने भारतीय सैनिकों को ताक्सिंग के रणनीतिक और अहम पेट्रोलिंग पॉइंट्स तक जाने से रोक दिया है। इतना ही नहीं, 'द अरुणाचल टाइम्स' की रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्व मंत्री और PPA के मुख्य सलाहकार काहफा बेंगिया की अगुवाई वाली चार सदस्यीय टीम ने जब 10 जुलाई को ताक्सिंग का दौरा किया, तो पाया कि एलएसी (LAC) के पास भारतीय चरवाहों और स्थानीय शिकारियों के पारंपरिक इलाकों पर चीनी सेना धीरे-धीरे अपना अवैध कब्जा बढ़ा रही है। एएनआई की रिपोर्ट के अनुसार, अरुणाचल प्रदेश में चीन की ओर से कोई धीरे-धीरे कब्ज़ा नहीं हो रहा है, जैसा कि कुछ सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया गया है। रिपोर्ट में भारत-चीन सीमा विवाद के इतिहास और 'लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल' (एलएसी) पर गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए उठाए जा रहे कदमों का भी ज़िक्र किया गया है। एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन ऐतिहासिक रूप से अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा करता रहा है और इस इलाके को दक्षिणी तिब्बत कहता है। यह दावा 1960 में भारत-चीन सीमा वार्ता के दौरान किया गया था, जब चीन ने कथित तौर पर मौजूदा राज्य के लगभग 69,000 वर्ग किलोमीटर इलाके पर अपना दावा जताया था। इसे भी पढ़ें: हो गया खेल! भारत को रोककर खुद रूसी तेल खरीद रहा अमेरिका? चीन को भारत ने एक बार फिर दो टुक जवाब दिया अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन को भारत ने एक बार फिर दो टुक जवाब दिया है। भारत ने यह साफ कर दिया है कि अरुणाचल प्रदेश पर उसका रुख बिल्कुल स्पष्ट और साथ ही चीन के किसी भी दावे या आपत्ति से जमीन पर मौजूद हकीकत नहीं बदलने वाली। तो हुआ यह है कि चीन ने अरुणाचल प्रदेश की 27 जगहों को भारत के नक्शे में आधिकारिक तौर पर दिखाने पर आपत्ति जताई थी। लेकिन भारत ने साफ कर दिया है कि चीन की इस आपत्ति से अरुणाचल प्रदेश की स्थिति पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। मंगलवार 11 अगस्त को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न और अटूट हिस्सा है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि इस हकीकत को कोई नहीं बदल सकता। अरुणाचल प्रदेश भारत का एक अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है और यह एक प्रकार से एक स्वय सिद्ध तथ्य भी है और कोई भी चीज इस निर्वाद निर्विवाद वास्तविकता को बदल नहीं सकता। दरअसल विवाद की शुरुआत तब हुई जब भारत ने अरुणाचल प्रदेश के 27 जगहों और दूसरे ज्योग्राफिकल फीचर्स को उनके आधिकारिक नामों के साथ अपने सरकारी नक्शे में दर्ज किया। इसके एक दिन बाद चीन ने अपनी आपत्ति जताई। चीन अरुणाचल प्रदेश को जांगनान यानी कि साउथ तिब्बत कहता है। बीजिंग का दावा है कि यह इलाका चीन का हिस्सा है। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गो जियाकुन ने भारत के इस कदम को गैरकानूनी बताया। उन्होंने अरुणाचल प्रदेश को तथाकथित अरुणाचल प्रदेश कहते हुए कहा कि जगहों के नाम बदलने या तय करने से चीन का दावा नहीं बदलेगा। भारत हमेशा से चीन के इस दावे को खारिज करता रहा है। इस बार भी भारत ने साफ-साफ कहा कि चीन की आपत्ति से अरुणाचल प्रदेश के स्टेटस पर कोई असर नहीं पड़ेगा। अब सवाल यह है कि भारत ने आखिर इन 27 जगहों को आधिकारिक नक्शे में दर्ज क्यों किया है? सरकार की तरफ से कहा गया है कि इसका मकसद बॉर्डर को फिर से तय करना नहीं है। बस इन जगहों की सही पहचान और सही नाम सरकारी नक्शे में दर्ज करना है ताकि लोगों को कभी भी इन जगहों के बारे में सही जानकारी मिल सके। तो क्या भारत और चीन के बीच इस मुद्दे पर सिर्फ बयानबाजी ही चल रही है? ऐसा नहीं है। दोनों देशों के बीच सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए बातचीत भी जारी है। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक 6 अगस्त को नई दिल्ली में भारत चीन सीमा मामलों पर काम करने वाले वर्किंग मैकेनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड कोऑर्डिनेशन यानी कि डब्ल्यूएमसीसी की 36वीं बैठक हुई। इसमें एलएसी यानी कि लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल की स्थिति, बॉर्डर मैनेजमेंट, सीमा के बंटवारे से जुड़े मुद्दों और दोनों देशों के बीच बॉर्डर पर सहयोग पर चर्चा हुई। भारत ने इस बैठक में भी साफ कहा कि सीमा पर शांति और स्थिरता दोनों देशों के रिश्तों को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी है। माओ का फाइव फिंगर प्लान क्या है? 1949 के बाद कम्युनिस्ट पार्टी दुनिया को अलग नजरिए से देखती है। कम्युनिस्ट पार्टी चाइना के जितने भी प्रेसिडेंट बने हैं सब महत्वाकांक्षी रहे हैं। ये महत्वाकांक्षी लोग ये चाहते हैं कि हमारा कब्जा बना रहे। पूरी दुनिया में अलग-अलग क्षेत्रों पर कब्जा करना चाहते हैं तो ठीक उसी वजह से क्या होता है कि संबंध बिगड़ने लग जाते हैं। 1949 में चीनी गणराज्य के फाउंडर नेता माओ से तुंग ने कहा कि हथेली और पांच उंगलियों को चीन को कब्जे में कर लेना चाहिए यहीं से चीन की पड़ोसियों के प्रति नीति बदल गई। दरअसल माओ से तुंग ने कहा था कि हथेली और पांच उंगलियों पर कब्जा कर लेना चाहिए तो इसमें शामिल क्या-क्या है इस पे भी नजर डालनी जरूरी हो जाता है। दरअसल तिब्बत जिसको इसने शुरुआत में ही अपने कब्जे में ले लिया था तो उसे ये कहता है कि ये हमारी हथेली है वहीं इसके आसपास की अलग-अलग ट्रीटज को ये कहता है कि ये हमारी पांच उंगलियां हैं। तो तिब्बत इसकी हथेली हुई इसके अलावा पांच उंगलियों में लद्दाख, नेपाल, सिक्किम, भूटान और अरुणाचल प्रदेश शामिल है। अगर इन पांचों उंगलियों को समझे तो हमें यह भी पता लगता है कि तीन हिस्से भारत की मुख्य भूमि में शामिल है जिनके ऊपर चाइना की सीधी नजर है। लद्दाख में पहले अक्साई चीन बसा हुआ है अब अक्साई चीन के वजह से हम देखते हैं कि पहले ही दिक्कतें हैं और अभी भी वो लद्दाख को लेकर के अपनी मंशा छोड़ता नहीं है। अरुणाचल प्रदेश को पहले ही कहता है कि वो अरुणाचल प्रदेश नहीं है बल्कि जांग नान है और ये चीन का हिस्सा है। तो ये स्थिति है तो इस प्रकार से ये इसकी हथेली और पांच उंगलियां बन जाती है। इन इलाकों को 'आजाद' कराना या उन पर अपना प्रभाव जमाना चीन का रणनीतिक कर्तव्य माना जाता है।
असामाजिक हो रहे सोशल मीडिया का नियमन जरूरी
दिल्ली में बीस जुलाई को काकरोच जनता पार्टी के संसद मार्च के दौरान हुई हिंसा और 23 जुलाई को प्रधानमंत्री मोदी के जेन जी के संबोधन की वीडियो फेसबुक और इंस्टाग्राम से हटाए जाने के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बहुत चर्चा में हैं। चर्चा से ज्यादा उनकी भूमिका कहीं ज्यादा विमर्श के केंद्र में है। इसमें दो राय नहीं कि दुनियाभर में जो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ज्यादा प्रचलन में हैं, उनमें से ज्यादातर विदेशी हैं। जाहिर है कि वे उन जगहों के कानूनों और सांस्कृतिक परंपराओं से ज्यादा संचालित हैं, जहां उनके मुख्यालय हैं। इसलिए अपने व्यापक हितों के लिए वे अपने प्रचलन वाले देशों की परंपराओं और संस्कृतियों को सवालों के घेरे में लाने, उसका उपहास उड़ाने और उन्हें तार-तार करने वाला अलगोरिदम उन्होंने विकसित कर रखा है। जिसका खामियाजा तीसरी दुनिया के देश और वहां की सांस्कृतिक परंपराएं उठा रही हैं। सोशल मीडिया को लोकतंत्र के बड़े मंच के रूप में 17 दिसंबर 2010 को ट्यूनिशिया के सिटी बौजिज शहर में फलों का ठेला लगाने वाले मोहम्मद बोआजीजी की आत्महत्या के बाद हुए उबाल के बाद देखा जाने लगा। म्यूनिसिपल कर्मचारियों की सख्ती के चलते क्षुब्ध बोआजीजी ने खुद पर पेट्रोल डालकर आग लगा ली। किसी ने इस घटना को सोशल मीडिया पर डाल दिया। सोशल मीडिया के तत्कालीन अलगोरिदम ने इस घटना को इस रूप में प्रस्तुत किया कि समूचे अरब जगत में उबाल आ गया। नागरिक अधिकारों की स्थापना और लोकतंत्र की बहाली की मांग को लेकर अरब देशों की जनता सड़कों पर उतर आई। इसका ही नतीजा मिस्र की राजधानी काहिरा के तहरीर चौक पर दिखा। जहां महीनों तक लोग जमे रहे और वहां के राष्ट्रपति को इस्तीफा देना पड़ा। यह आग सीरिया, यमन और लीबिया तक जा पहुंची। वहां के पारंपरिक शासकों के खिलाफ लोगों का दबा हुआ गुस्सा निकला और कई जगह सत्ताएं बदल गईं। भारत में भी इसके ही कुछ महीनों बाद अन्ना हजारे को आगे रखकर एक आंदोलन छेड़ा गया। जिसकी परिणति आम आदमी पार्टी के रूप में हुई और वह दिल्ली की सत्ता पर काबिज हुई। फिर पंजाब में भी उसने पैठ बना ली। इसे भी पढ़ें: NEET-UG विवाद के बाद बदला PM Modi का अंदाज़, Gen Z को Influencers और 'Shortcuts' की होड़ से बचने की दी सलाह इन घटनाओं को याद करना इसलिए जरूरी है कि इन सबके पीछे सोशल मीडिया के जरिए त्वरित गति से फैलाई गई सूचनाओं का हाथ सबसे ज्यादा रहा। तब सोशल मीडिया को लोकतंत्र के लिए जरूरी बताया गया। सोशल मीडिया के बारे में कहा गया कि लोकतंत्र में सबकी आवाज पहुंचाने और उन्हें मौका देने का यह बड़ा माध्यम है। इसे लोकतंत्र के वाजिब और जरूरी औजार के रूप में भी मान्यता मिली। लेकिन बीतते वक्त के साथ पता चल रहा है कि जिसे हम सोशल मीडिया कहते हैं, वह लोकतंत्र के लिए जितना जरूरी है, उससे कहीं ज्यादा अनसोशल यानी असामाजिक भी है। यह ठीक है कि सोशल मीडिया के जरिए व्यवस्था की अंधी सुरंग में खो रही आवाजों को मौका मिलता है। लेकिन यह उतना ही सच है कि इस माध्यम ने लोगों की नजर का पानी उतार दिया है। लोग अब लिहाज करना भूल गए हैं। सोशल मीडिया पर अगर किसी की बात पसंद नहीं आती तो उसे खुलेआम गालियां दी जा सकती हैं। उसके चरित्र पर आक्षेप लगाया जा सकता है। उसका चरित्र हनन किया जा सकता है। चाहे वह व्यक्ति सामाजिक जीवन में कितना ही प्रतिष्ठित क्यों न हो, उसकी उम्र चाहे जितनी भी बड़ी क्यों ना हो। सोशल मीडिया मंचों ने अपना अलगोरिदम भी ऐसा विकसित किया है, जो अच्छी बातों, सामाजिक चिंतन और बेहतर कल की बातों को ज्यादा तवज्जो नहीं देखा। एक तरह से कहें तो वह इसकी अनदेखी ही करता है। लेकिन जैसे ही किसी को कोई गाली देता है, किसी के चरित्र का बेवजह ही हनन करता है, किसी का घटिया कार्टून बनाता है, सोशल मीडिया का अलगोरिदम उसे फैलाने में द्रुत गति से जुट जाता है। सोशल मीडिया ने अब तक पर्दे के पीछे रही नंगई को भी उजागर कर दिया है। आज रील्स के चक्कर में अधनंगे और कई बार करीब-करीब नग्न फोटोग्राफ और वीडियो तक जारी किए जा रहे हैं। भले ही अपने परिवारों में महिलाएँ और युवतियां सलीके से रहती हों, लेकिन सोशल मीडिया पर प्रसिद्धि पाने और उसके जरिए कुछ कमाने के चक्कर में अपने शील और अपनी लज्जा को भी बेपर्दा कर रही हैं। सोशल मीडिया कितना असमाजिक हो चुका है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसका अलगोरिदम अश्लीलता को बढ़ावा देता है, लेकिन शील और लज्जा की बात को अपने मंच के किसी कोने में डाल देता है। कह सकते हैं कि वर्चुअल स्पेस के किसी अंधेरे कोने में उसे गुम कर देता है। तीन साल पहले प्यू रिसर्च सेंटर ने 19 विकसित अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों में सोशल मीडिया को लेकर एक शोध किया था। उसके मुताबिक, आम नागरिकों की नजर में सोशल मीडिया राजनीतिक जीवन के लिए रचनात्मक और विनाशकारी दोनों है। इस अध्ययन में शामिल देशों में, औसतन 57 प्रतिशत लोगों ने माना कि सोशल मीडिया लोकतंत्र के लिए अच्छा है, लेकिन इसे बिनाशकारी मानने वालों की संख्या भी कम नहीं रही। करीब 35 प्रतिशत से ज्यादा लोगों का का कहना था कि सोशल मीडिया विनाशकारी साबित हो रहा है। सिर्फ 34 प्रतिशत अमेरिकियों ने ही सोशल मीडिया को लोकतंत्र के लिए लाभकारी माना, जबकि 64 फीसद का कहना था कि इसने नकारात्मक प्रभाव ज्यादा डाला है। हाल ही में जेन जी से चर्चा के दौरान संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी सोशल मीडिया को लेकर अपने विचार व्यक्त किए। उसमें उन्होंने कहा है कि यदि सोशल मीडिया पर उनके कारण दस लाख लोग कोई गलत निर्णय लेते हैं, तो उसकी जिम्मेदारी मेरी भी है। सोशल मीडिया पर सकारात्मक, उपयोगी और समाजहित की सामग्री साझा करनी चाहिए। सोशल मीडिया पर केवल प्रामाणिक स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर ही विश्वास करना चाहिए। जेन-ज़ी में भी यह विवेक विकसित होना चाहिए कि क्या सही है और क्या नहीं। वरिष्ठ पीढ़ी की भी जिम्मेदारी है कि वह नई पीढ़ी का मार्गदर्शन करे तथा उन्हें सही और गलत के बीच अंतर समझाए। सोशल मीडिया का अनसोशल चेहरा और मंच आर्थिक कमाई का जरिया भी है। नंगई, हिंसा और व्यभिचार-अतिचार की कहानियां, दृश्य, वीडियो और फोटो को वायरल करने में उसका कोई सानी नहीं है। इस बहाने इसे प्रसारित करने वाले को सोशल मीडिया मंच आर्थिक कमाई भी कराते हैं। और तो और, वे खुद भी ऐसी घटनाओं, दृश्यों को प्रसारित-प्रचारित और वायरल करने के लिए बड़ी रकम लेते हैं। संसदीय समिति के सामने फेसबुक और इंस्टाग्राम की संचालक कंपनी मेटा के अधिकारियों ने माना है कि काकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान गाली, हिंसा आदि को बढ़ावा देने के लिए पैसे भी लिए थे। इन कोशिशों का मकसद भारत में व्यापक पैमाने पर लोगों को उत्तेजित करके अराजकता फैलाना था। इस लिहाज से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म राष्ट्रों के अंदरूनी मामलों में लोकतंत्र की रक्षा के मुखौटे के पीछे से दखल भी दे रहे हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती भी दे रहे हैं। वक्त आ गया है कि इनके नियमन के लिए कठोर कानून बनाए जाएं। जिसके तहत उन्हें अभिव्यक्ति के अधिकार को बढ़ावा देने की व्यवस्था तो हो, लेकिन इसकी आड़ में अराजकता फैलाने की छूट नहीं। - उमेश चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार
International Youth Day 2026: युवा शक्ति को मिले दिशा, सपनों को मिले उड़ान
युवा केवल उम्र की एक अवस्था नहीं, बल्कि ऊर्जा, साहस, कल्पना, परिवर्तन और नवसृजन की चेतना का नाम है। जिस समाज की युवा शक्ति जाग्रत, संवेदनशील और रचनात्मक होती है, वह समाज परिवर्तन की नई इबारत लिखता है। इसके विपरीत जब युवा ऊर्जा दिशाहीन हो जाती है तो वही शक्ति हिंसा, नशे, उग्रवाद, अपराध, निराशा और विध्वंस का कारण बन सकती है। इसलिए आज दुनिया के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि युवा क्या कर रहे हैं, बल्कि यह है कि उनकी विराट ऊर्जा को किस दिशा में लगाया जा रहा है। इसी चिंतन को वैश्विक स्तर पर महत्व देने के लिए संयुक्त राष्ट्र प्रतिवर्ष 12 अगस्त को अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस मनाता है। वर्ष 2000 से इस दिवस का आयोजन शुरू हुआ। इस वर्ष का विषय है-‘विभिन्न परिस्थितियाँ, साझा आकांक्षाएँ।’ यह विषय आज की युवा पीढ़ी की वास्तविकता को बहुत गहराई से अभिव्यक्त करता है। दुनिया के युवाओं की परिस्थितियाँ भिन्न हैं। कहीं गरीबी और बेरोजगारी है, कहीं युद्ध और असुरक्षा, कहीं शिक्षा के अवसरों की कमी है, कहीं तकनीकी असमानता और पर्यावरण संकट है, लेकिन इन सबके बीच उनकी आकांक्षाएँ आश्चर्यजनक रूप से समान हैं। वे सम्मानजनक जीवन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सार्थक रोजगार, सुरक्षा, मानसिक सुख-शांति, निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी और बेहतर भविष्य चाहते हैं। दुनिया की सरकारों को यह समझना होगा कि युवा केवल चुनाव के समय याद आने वाला मतदाता नहीं है। वह राष्ट्र की नीति-निर्माण प्रक्रिया का सक्रिय भागीदार है। जिस युवा के जीवन को प्रभावित करने वाले निर्णय लिये जाते हैं, उसकी आवाज उन निर्णयों में कितनी शामिल है, यह लोकतंत्र की गुणवत्ता का भी महत्वपूर्ण पैमाना है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का प्रस्ताव 2250 युवाओं को शांति निर्माण और हिंसा की रोकथाम में महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में स्वीकार करता है। यह स्वीकारोक्ति इस बात का प्रमाण है कि युवा समस्या नहीं, बल्कि समाधान की शक्ति हैं। आज आवश्यकता है कि हर देश में ऐसी प्रभावी व्यवस्था बने, जिसमें विद्यार्थी, उद्यमी, किसान, वैज्ञानिक, कलाकार, खिलाड़ी और सामाजिक कार्यकर्ता युवा सीधे नीति-निर्माताओं से संवाद कर सकें। केवल युवाओं पर योजनाएँ बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि युवाओं के साथ योजनाएँ बनाना आवश्यक है। भारत की सबसे बड़ी शक्तियों में उसकी युवा आबादी भी है। भारत के युवाओं ने अनेक बार सिद्ध किया है कि उनमें केवल नौकरी पाने की आकांक्षा नहीं, बल्कि कुछ नया करने की बेचैनी भी है। विज्ञान, खेल, तकनीक, उद्यमिता, कला, साहित्य और सामाजिक सेवा से लेकर अनेक क्षेत्रों में भारतीय युवा अपनी प्रतिभा का परिचय दे रहे हैं। स्वामी विवेकानन्द ने भारत के पुनर्निर्माण में युवा शक्ति की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण माना था। उनका विश्वास था कि जाग्रत, चरित्रवान और संकल्पवान युवा राष्ट्र की दिशा बदल सकता है। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने भी युवाओं के सपनों को भारत के भविष्य से जोड़ा। उनके चिंतन का मूल संदेश था कि बड़े सपने देखो, ज्ञान अर्जित करो और उन सपनों को कर्म में बदलो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भी भारत के विकास विमर्श में युवा शक्ति, नवाचार, कौशल, उद्यमिता और आत्मनिर्भरता को विशेष महत्व दिया जा रहा है। लेकिन अब अगला चरण इससे आगे जाने का है। युवा को योजनाओं का लाभार्थी नहीं, बल्कि विकास का सह-निर्माता बनाना होगा। इसे भी पढ़ें: International Youth Day 2026: 12 अगस्त को ही क्यों मनाते हैं International Youth Day? जानें इसका History और महत्व युवा दिवस की सार्थकता तब होगी जब 12 अगस्त के बाद भी युवा के जीवन में कोई सकारात्मक परिवर्तन दिखाई दे। क्यों न इस वर्ष प्रत्येक शहर में युवा स्वप्न संवाद आयोजित हों, जिसमें युवा लिखें कि वे अपने देश को अगले दस वर्षों में कैसा देखना चाहते हैं। उन सपनों को केवल कागज पर न रखा जाए, बल्कि सरकार, उद्योग, शिक्षण संस्थान और सामाजिक संस्थाएँ मिलकर उनमें से व्यवहारिक योजनाओं को धरातल पर उतारें। प्रत्येक युवा कोई एक उपयोगी कौशल सीखे और समाज के लिए कोई एक जिम्मेदारी स्वीकार करे। प्रत्येक जिले में ऐसे युवा नवाचार केंद्र स्थापित हों, जहाँ स्थानीय समस्याओं के समाधान के लिए युवा अपनी प्रतिभा और रचनात्मकता का उपयोग कर सकें। आज युवा शक्ति के सामने सबसे गंभीर चुनौतियों में नशा, डिजिटल लत, हिंसक प्रवृत्तियाँ, मानसिक तनाव, बेरोजगारी और उद्देश्यहीनता हैं। नशे का फैलता जाल केवल व्यक्ति को नहीं, परिवार और राष्ट्र की उत्पादक शक्ति को भी कमजोर करता है। युवाओं को केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि नशा मत करो, बल्कि उन्हें जीवन का ऐसा उद्देश्य देना होगा कि नशे की आवश्यकता ही महसूस न हो। खेल, योग, ध्यान, कला, साहित्य, सेवा, उद्यमिता और सामाजिक गतिविधियों से युवाओं को जोड़ना होगा। खाली समय को रचनात्मक समय में बदलना नशामुक्ति की सबसे प्रभावी सामाजिक रणनीति हो सकती है। आज की युवा पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के बीच संवाद की कमी भी एक चुनौती है। बुजुर्ग अनुभव के प्रतीक हैं और युवा ऊर्जा के। अनुभव यदि ऊर्जा से नहीं जुड़ेगा तो वह जड़ हो सकता है और ऊर्जा यदि अनुभव से नहीं जुड़ेगी तो दिशाहीन हो सकती है। इसलिए आवश्यकता है अंतरपीढ़ी संवाद की। परिवारों, संस्थाओं और सरकारों को ऐसा वातावरण बनाना होगा जिसमें युवा नई सोच प्रस्तुत करें और वरिष्ठ पीढ़ी अपने अनुभव से उनका मार्गदर्शन करे। अनुभव और ऊर्जा का यह समन्वय राष्ट्र निर्माण की बड़ी शक्ति बन सकता है। आज दुनिया के अनेक हिस्सों में युवा आंदोलन हो रहे हैं। युवाओं की आवाज सत्ता और व्यवस्था तक पहुँच रही है। भारत में भी समय-समय पर युवाओं ने अपनी आकांक्षाओं और असंतोष को आंदोलन का रूप दिया है। लेकिन युवा आंदोलन की सबसे बड़ी सफलता तब होगी जब वह केवल विरोध की आवाज न रहकर विकल्प की आवाज बने। युवा कहे कि हमें केवल शिकायत नहीं करनी, समाधान भी देना है। हमें केवल रोजगार नहीं चाहिए, रोजगार सृजित करने की क्षमता भी चाहिए। हमें केवल अधिकार नहीं चाहिए, हम जिम्मेदारियाँ भी निभाएँगे। हम केवल सत्ता बदलने नहीं, व्यवस्था को बेहतर बनाने आए हैं। यही युवा आंदोलन की नई परिभाषा हो सकती है। यौवन अपने आप में उपलब्धि नहीं है। युवकत्व चेतना की अवस्था है। चेहरे पर जवानी हो और विचारों में जड़ता हो तो यौवन अधूरा है। ऊर्जा हो लेकिन दिशा न हो तो वही ऊर्जा संकट बन सकती है। इसलिए आज की युवा पीढ़ी को दो चीजों की सबसे अधिक आवश्यकता है-जोश और होश। जोश उसे ऊँचा उड़ाए और होश उसे सही दिशा दे। जोश उसे सपने दिखाए और विवेक उन सपनों को यथार्थ में बदले। जोश उसे संघर्ष करना सिखाए और करुणा उसे मनुष्य से जोड़े। स्वामी विवेकानन्द की प्रेरणा, सुकरात की प्रश्नाकुलता, महात्मा गांधी की करुणा और डॉ. कलाम के सपनों का समन्वय आज के युवा के व्यक्तित्व में होना चाहिए। दुनिया के युवाओं से यह कहना आसान है कि बड़े सपने देखो, लेकिन केवल सपने देखने के लिए कहना पर्याप्त नहीं है। सपनों को आकार देने के लिए अवसरों की संरचना भी करनी होगी। अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस 2026 का विषय हमें एक महत्वपूर्ण सत्य बताता है कि हमारी परिस्थितियाँ अलग हो सकती हैं, लेकिन हमारी आकांक्षाएँ साझा हैं। भारत का युवा अवसर चाहता है, अफ्रीका का युवा शिक्षा और रोजगार चाहता है, युद्धग्रस्त क्षेत्र का युवा शांति चाहता है, द्वीपीय देशों का युवा सुरक्षित पर्यावरण चाहता है और तकनीकी दुनिया का युवा समान अवसर चाहता है। अर्थात दुनिया के युवा अलग-अलग भाषाएँ बोलते हैं, अलग संस्कृतियों में रहते हैं, लेकिन उनके सपनों की भाषा बहुत कुछ समान है। इसलिए आज दुनिया को युवा शक्ति को नियंत्रित करने से अधिक उस पर विश्वास करने की जरूरत है। आइए इस अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस पर हम केवल युवाओं को बधाई न दें, बल्कि उन्हें अवसर दें-अपनी बात कहने का, अपनी प्रतिभा दिखाने का, निर्णय लेने का और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने का। सरकारें युवाओं की सुनें, परिवार उनके सपनों को समझें, शिक्षण संस्थान उनकी प्रतिभा को पहचानें, समाज उनके प्रयोगों को अवसर दे और युवा स्वयं अपने भीतर के सामर्थ्य को पहचानें। क्योंकि राष्ट्र का भविष्य केवल संसदों, सरकारी कार्यालयों या योजनाओं की फाइलों में नहीं लिखा जाता, वह युवाओं की आँखों में पल रहे सपनों में लिखा जाता है। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
प्रियंका गांधी का केंद्र सरकार पर हमला, बोलीं- ‘क्या हम चुपचाप बैठे रहें?’
प्रियंका गांधी ने छात्र प्रदर्शन पर कथित पुलिस कार्रवाई को लेकर सरकार पर निशाना साधा और गृह मंत्री अमित शाह से जवाबदेही की मांग की। संसद में इस मुद्दे पर गतिरोध जारी है।
विपक्ष के विरोध पर अमित शाह की दो टूक, बोले- कल 3 बजे सभी सवालों का दूंगा जवाब
संसद के मानसून सत्र में जारी गतिरोध के बीच गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि वह गुरुवार दोपहर 3 बजे विपक्ष के सभी सवालों का जवाब देंगे।
'महिलाओं की मांग पर लागू हुआ था शराबबंदी कानून', एनसीएईआर की रिपोर्ट पर जदयू का पलटवार
'महिलाओं की मांग पर लागू हुआ था शराबबंदी कानून', एनसीएईआर की रिपोर्ट पर जदयू का पलटवार
सोशल मीडिया इस समय ऐसे वीडियोज से भरा पड़ा है, जिनमें बलूचिस्तान के लोग अपनी आजादी का जश्न मनाते हुए नजर आ रहे हैं। 11 अगस्त को बलूचिस्तान के स्वतंत्रता दिवस के तौर पर मनाए गए कार्यक्रमों के बीच बलूच अलगाववादी नेतृत्व ने अब अपने अभियान को एक नया राजनीतिक मोड़ देने की कोशिश भी की है। बलूच नेता मीर यार बलूच ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से “रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान” को स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने की अपील की है। साथ ही भारत की ओर से पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्रों में मानवाधिकारों के उल्लंघन को लेकर उठाई गई आवाज की खुलकर सराहना की है। मीर यार बलूच ने एक्स पर जारी अपने संदेश में भारतीय मीडिया का विशेष रूप से आभार जताया। उनका कहना था कि भारतीय मीडिया ने 11 अगस्त को बलूचिस्तान में मनाए गए स्वतंत्रता दिवस को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल के उस बयान का भी स्वागत किया, जिसमें पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर और उसके नियंत्रण वाले अन्य क्षेत्रों में गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों के लिए पाकिस्तान को जवाबदेह ठहराने की जरूरत पर जोर दिया गया था। हालांकि जायसवाल ने बलूचिस्तान का सीधे तौर पर उल्लेख नहीं किया था, लेकिन बलूच नेतृत्व ने भारत के इस व्यापक मानवाधिकार रुख को अपने पक्ष में महत्वपूर्ण संकेत के तौर पर पेश किया है। इसे भी पढ़ें: Jan Gan Man: 'आजादी' का जश्न मनाते हुए झूम उठा पूरा Balochistan ! बीच-बीच में बाधा डाल रहा है Pakistan यही वह बिंदु है जो इस पूरे घटनाक्रम को केवल बलूचिस्तान के भीतर चल रहे अलगाववादी आंदोलन से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बना देता है। बलूच नेतृत्व अब अपने आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय वैधता दिलाने की दिशा में ले जाने का दावा कर रहा है। उसके संदेश में संयुक्त राष्ट्र, आसियान, अफ्रीकी संघ, इस्लामिक सहयोग संगठन और यूरोपीय देशों से बलूचिस्तान के पक्ष में आवाज उठाने की अपील की गई है। संगठन का दावा है कि अब लड़ाई केवल स्वतंत्रता दिवस मनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वतंत्रता की कानूनी, राजनीतिक, कूटनीतिक और नैतिक मान्यता हासिल करने की है। बलूच नेतृत्व ने 11 अगस्त की तारीख को भी ऐतिहासिक आधार देने की कोशिश की है। उसका दावा है कि ब्रिटिश शासन के अंत और भारतीय उपमहाद्वीप के विभाजन से ठीक पहले 11 अगस्त 1947 को बलूचिस्तान ने स्वतंत्रता की घोषणा की थी। इसी ऐतिहासिक दावे को आधार बनाकर मौजूदा अभियान को अंतरराष्ट्रीय मान्यता की लड़ाई बताया जा रहा है। हालांकि पाकिस्तान और अंतरराष्ट्रीय समुदाय बलूचिस्तान की स्वतंत्रता के इस दावे को मान्यता नहीं देते और बलूचिस्तान को पाकिस्तान का एक प्रांत माना जाता है। वैसे इस अभियान का अगला चरण और भी महत्वपूर्ण है। बलूच समूह ने दावा किया है कि भविष्य के स्वतंत्र राष्ट्र के लिए विदेश नीति, रक्षा, अर्थव्यवस्था, राजनीति और कूटनीति से जुड़े ढांचे तैयार किए जा रहे हैं। उसने पासपोर्ट, अपनी मुद्रा, मीडिया संस्थानों, व्यापारिक संस्थाओं और विदेशों में राजनयिक मिशनों की तैयारी का भी दावा किया है। साथ ही अलग-अलग बलूच राजनीतिक धाराओं को एकजुट करने की कोशिश की बात कही गई है। बलूच नेतृत्व ने पाकिस्तान पर दमन का भी गंभीर आरोप लगाया है। उसके मुताबिक 50 हजार से अधिक बलूच लोग अब भी यातना केंद्रों में अमानवीय परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं। बलूचों ने जबरन गुमशुदगी, हिरासत और लक्षित हत्याओं जैसे मुद्दों को भी उठाया है। बलूचों के समूह ने यह भी आरोप लगाया कि स्वतंत्रता दिवस समारोह रोकने के लिए मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं बंद की गईं, सैन्य छावनियों और पुलिस प्रतिष्ठानों के आसपास खाइयां खोदी गईं तथा ड्रोन, हेलीकॉप्टर और सैन्य विमानों से निगरानी की गई। रणनीतिक रूप से देखें तो बलूचिस्तान पाकिस्तान के लिए बेहद संवेदनशील भूभाग है। क्षेत्रफल के लिहाज से यह पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है और प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध माना जाता है। बलूच नेतृत्व का दावा है कि स्वतंत्र बलूचिस्तान अपने संसाधनों के जरिये स्वास्थ्य, शिक्षा और मानवीय सहायता के क्षेत्र में योगदान दे सकता है। यही संसाधन, भौगोलिक स्थिति और लंबे समय से जारी विद्रोह इसे पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा के साथ-साथ क्षेत्रीय भू-राजनीति का भी अहम मुद्दा बनाते हैं। भारत के लिए इसका रणनीतिक महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि बलूचिस्तान का मुद्दा पाकिस्तान के उस नैरेटिव को चुनौती देता है, जिसमें वह जम्मू-कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार उठाता रहा है। बलूच नेतृत्व का भारत की मीडिया और विदेश मंत्रालय के बयानों को अपने पक्ष में उद्धृत करना पाकिस्तान पर कूटनीतिक दबाव बढ़ाने की कोशिश है। हालांकि भारत की ओर से बलूचिस्तान की स्वतंत्रता को मान्यता देने की कोई घोषणा इन स्रोतों में नहीं है। बहरहाल, बलूचिस्तान में चल रहा संघर्ष अब केवल बंदूक और सुरक्षा बलों के बीच की लड़ाई नहीं रह गया है। यह इतिहास, मानवाधिकार, संसाधनों, अंतरराष्ट्रीय मान्यता और सूचना युद्ध, इन सभी मोर्चों पर लड़ी जा रही लड़ाई बनता जा रहा है। और जिस तरह बलूच नेतृत्व भारत का सार्वजनिक रूप से आभार जता रहा है, उससे साफ है कि वह इस संघर्ष को पाकिस्तान की सीमाओं से बाहर निकालकर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मैदान में ले जाना चाहता है।
Nepal ने खो दिये Sugauli Treaty के Original Document ! अब भारत के साथ कैसे सुलझायेगा सीमा विवाद?
लो कर लो बात! सीमा विवाद को लेकर भारत पर लगातार सवाल उठाने वाला नेपाल खुद उस ऐतिहासिक दस्तावेज की मूल प्रति नहीं ढूंढ़ पा रहा है, जिसके आधार पर उसकी सीमाओं की बुनियाद तैयार हुई थी। नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने संसद में स्वीकार किया है कि सरकार को यह तक स्पष्ट जानकारी नहीं है कि 1816 की सुगौली संधि की आधिकारिक मूल प्रति उसके पास मौजूद है या नहीं। राष्ट्रीय अभिलेखागार में कुछ संबंधित दस्तावेज होने की जानकारी जरूर है, लेकिन वे वास्तविक आधिकारिक संधियां हैं या उनकी प्रतियां, इसकी पुष्टि नहीं हो सकी है। यह खुलासा ऐसे समय हुआ है जब भारत और नेपाल के बीच लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी को लेकर विवाद फिर सुर्खियों में है। दरअसल, भारत और चीन के बीच लिपुलेख व्यापार मार्ग को फिर खोलने पर सहमति के बाद नेपाल ने इन क्षेत्रों पर अपना दावा दोहराया है। लेकिन अब सवाल यह है कि जिस ऐतिहासिक संधि को सीमा निर्धारण की बुनियादी कड़ी माना जाता है, उसकी मूल प्रति ही नेपाल के रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं है, तो उसके सीमा संबंधी दावों की ऐतिहासिक और दस्तावेजी मजबूती को किस आधार पर परखा जाए? इसे भी पढ़ें: India Neighborhood First policy: बांग्लादेश से लेकर नेपाल तक भारत का बड़ा गेम, पलटा पासा ! क्या है सुगौली संधि? सुगौली संधि नेपाल और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुई वह ऐतिहासिक संधि थी, जिसने 1814-16 के एंग्लो-नेपाल युद्ध का अंत किया और नेपाल की क्षेत्रीय सीमाओं तथा ब्रिटिश भारत के साथ उसके संबंधों को बड़े पैमाने पर निर्धारित किया। यह संधि 2 दिसंबर 1815 को हुई और 4 मार्च 1816 को इसकी औपचारिक पुष्टि हुई। युद्ध में पराजय के बाद नेपाल को बड़े भूभाग से अपने दावे छोड़ने पड़े और उसकी पश्चिमी सीमा के निर्धारण में महाकाली नदी की महत्वपूर्ण भूमिका बनी। इसी संधि को आगे चलकर नेपाल और ब्रिटिश भारत के बीच सीमा-व्यवस्था की आधारभूत कड़ी माना गया। यही कारण है कि सुगौली संधि की मूल प्रति का गायब होना महज किसी पुराने कागज का गुम होना नहीं है। यह एक ऐसा दस्तावेज है, जिसका सीधा संबंध सीमा, संप्रभुता और ऐतिहासिक भूगोल से जुड़ा है। खासकर तब, जब नेपाल आज उसी ऐतिहासिक सीमा-व्यवस्था के आधार पर लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी पर अपना दावा करता है। मामला सिर्फ सुगौली संधि तक सीमित नहीं सबसे गंभीर पहलू यह है कि नेपाल में ऐतिहासिक संधियों के मूल दस्तावेजों की उपलब्धता को लेकर सवाल पहली बार नहीं उठे हैं। 2016 में भारत-नेपाल संबंधों की समीक्षा के लिए गठित प्रबुद्ध व्यक्तियों के समूह की चर्चाओं के दौरान 1950 की भारत-नेपाल शांति एवं मैत्री संधि की मूल प्रति खोजने की कोशिश की गई, लेकिन वह भी नहीं मिली। बाद में संसदीय जांच में सुगौली संधि और 1950 की संधि, दोनों की मूल प्रतियां नेपाल में नहीं मिलने की बात सामने आई। 2019 में तत्कालीन विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञवाली ने भी कहा था कि मंत्रालय के पास दोनों संधियों की प्रतियां हैं, लेकिन यह सुनिश्चित करने के लिए फोरेंसिक जांच जरूरी है कि वे मूल दस्तावेज हैं या नहीं। नेपाल ने भारत और ब्रिटेन में उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेजों और नक्शों को भी तलाशने की बात कही थी। यानी सवाल केवल यह नहीं कि दस्तावेज कहां हैं, बल्कि यह भी है कि नेपाल के पास मौजूद प्रतियां कितनी प्रामाणिक हैं। सीमा दावे की कमजोर कड़ी वैसे इससे यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि नेपाल का हर सीमा दावा स्वतः गलत हो जाता है। सीमा विवादों का निर्धारण केवल किसी एक मूल दस्तावेज से नहीं होता; ऐतिहासिक नक्शे, नदी की वास्तविक धारा, प्रशासनिक नियंत्रण, पुराने सरकारी रिकॉर्ड और अन्य अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज भी महत्वपूर्ण होते हैं। लेकिन नेपाल के लिए समस्या यह है कि जिस ऐतिहासिक संधि को वह अपनी सीमा-व्यवस्था के संदर्भ में महत्वपूर्ण मानता है, उसकी मूल प्रति के अस्तित्व पर ही उसकी सरकार स्पष्ट नहीं है। यही तथ्य उसके आक्रामक सीमा-रुख पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि नेपाल के पास मूल संधि उपलब्ध नहीं है और उसे अपनी प्रतियों की प्रामाणिकता तक फोरेंसिक तरीके से जांचनी पड़ रही है, तो सीमा विवाद पर निर्णायक और एकतरफा ऐतिहासिक दावे करना निश्चित रूप से कठिन हो जाता है। इस पूरे घटनाक्रम का सामरिक महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि लिपुलेख क्षेत्र भारत, नेपाल और चीन, तीनों के लिए संवेदनशील भौगोलिक क्षेत्र है। दिलचस्प बात यह है कि इसी तनाव के बीच नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने भारतीय राजदूत नवीन श्रीवास्तव से मुलाकात कर दोनों देशों के “ऐतिहासिक संबंधों” को मजबूत करने और साझा हितों में सहयोग बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया। वहीं सुगौली संधि की मूल प्रति नहीं मिलने संबंधी नेपाली विदेश मंत्री के बयान पर भारत ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि दोनों देशों के लंबित मुद्दों को मौजूदा राजनयिक माध्यमों से सुलझाया जा सकता है। बहरहाल, नेपाल यदि सीमा विवाद को वास्तव में ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर सुलझाना चाहता है, तो उसे सबसे पहले अपने अभिलेखों की स्थिति साफ करनी होगी। सुगौली संधि की मूल प्रति कहां है, मौजूद है या नहीं, और उसके पास उपलब्ध प्रतियां कितनी प्रामाणिक हैं, इन सवालों का जवाब देना जरूरी होगा। क्योंकि सीमा का फैसला नारों और राजनीतिक दावों से नहीं, प्रमाणित दस्तावेजों और स्थापित तथ्यों से होता है और फिलहाल, सुगौली संधि की मूल प्रति को लेकर नेपाल की अपनी स्वीकारोक्ति उसके दावे की विश्वसनीयता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न जरूर खड़ा करती है।
टीएमसी के बैंक खातों को फ्रीज करने से जुड़ी याचिका पर कलकत्ता हाईकोर्ट करेगा सुनवाई
टीएमसी के बैंक खातों को फ्रीज करने से जुड़ी याचिका पर कलकत्ता हाईकोर्ट करेगा सुनवाई
रांची में धरनास्थल पर अंधेरे में पहुंची पुलिस, भाजपा नेताओं का आरोप- 'छात्रों को जबरन हटाने की हुई कोशिश'
विक्रम साराभाई की जयंती : भाजपा नेताओं की श्रद्धांजलि, विज्ञान और अनुसंधान में योगदान को सराहा
नई दिल्ली, 12 अगस्त (आईएएनएस)। महान भौतिक विज्ञानी, उद्योगपति, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की नींव रखने और देश में परमाणु ऊर्जा के विकास में अहम भूमिका निभाने वाले डॉ. विक्रम अंबालाल साराभाई की जयंती पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला सहित कई भाजपा नेताओं ने याद करते हुए नमन किया है।
'भारत के युवा सिर्फ कल के नेता नहीं, आज के राष्ट्र-निर्माता भी', अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस पर कई नेताओं ने दी शुभकामनाएं
'वंदे मातरम' पर विवाद बेवजह, यह स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणा रहा है : श्रीराज नायर
'वंदे मातरम' पर विवाद बेवजह, यह स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणा रहा है : श्रीराज नायर
शक्तिदूत 2.0’ योजना का शुभारंभ 12 अगस्त को, खिलाड़ियों को मिलने वाली सहायता राशि होगी दोगुनी
शक्तिदूत 2.0’ योजना का शुभारंभ 12 अगस्त को, खिलाड़ियों को मिलने वाली सहायता राशि होगी दोगुनी
फर्जी खबरों के जरिए भाजपा को कमजोर करने की साजिश, नहीं होंगे कामयाब: राजीव चंद्रशेखर
फर्जी खबरों के जरिए भाजपा को कमजोर करने की साजिश, नहीं होंगे कामयाब: राजीव चंद्रशेखर
राहुल गांधी ने छात्रों के मुद्दे पर दिखाया दोहरा रवैया : हेमंत खंडेलवाल
राहुल गांधी ने छात्रों के मुद्दे पर दिखाया दोहरा रवैया : हेमंत खंडेलवाल
फिच ने भारत की ‘बीबीबी-’ रेटिंग को रखा बरकरार
नई दिल्ली, वैश्विक रेटिंग एजेंसी फिच ने मंगलवार को भारत की दीर्घकालिक जारीकर्ता डिफॉल्ट रेटिंग को ‘बीबीबी-’ पर स्थिर आउटलुक के साथ बरकरार रखा और अल्पकालिक जारीकर्ता डिफॉल्ट रेटिंग को ‘एफ3’ पर कायम रखा।
फिर Parliament से गायब Modi-Shah, क्या Rahul Gandhi से डर गई BJP? | Ashutosh
कांग्रेस हाईकमान की बातचीत के बाद जल्द होगा मंत्रालय का बंटवारा : शिवराज तंगदागी
कांग्रेस हाईकमान की बातचीत के बाद जल्द होगा मंत्रालय का बंटवारा : शिवराज तंगदागी
'कॉकरोच' टिप्पणी वाले पीआईएल पर सुप्रीम कोर्ट का नोटिस, 10 सितंबर को होगी सुनवाई
'कॉकरोच' टिप्पणी वाले पीआईएल पर सुप्रीम कोर्ट का नोटिस, 10 सितंबर को होगी सुनवाई
झारखंडः छात्रों पर लाठीचार्ज के विरोध में भाजपा का प्रदर्शन, कहा-सरकार ने पार की जुल्म और बर्बरता की हदें
कीमती धातुओं पर सीमा शुल्क संग्रह
नई दिल्ली, कीमती धातुओं पर आयात शुल्क बढ़ाए जाने के बाद 13 मई से 2 अगस्त के बीच सोने, चांदी और प्लैटिनम के आयात पर सरकार ने 10,463 करोड़ रुपए का सीमा शुल्क संग्रह किया है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जो लोग बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को हल्के में लेकर चल रहे थे, उन्हें अब अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है। बसपा के राष्ट्रीय संयोजक आकाश आनंद चुनावी मैदान में पूरी ताकत के साथ उतर चुके हैं और उनकी सभाओं में उमड़ रही भीड़, खासकर युवाओं की मौजूदगी, पार्टी के लिए नई उम्मीद पैदा कर रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी आकाश आनंद ने बसपा की रैलियों में बड़ी भीड़ आकर्षित की थी, हालांकि इसका चुनावी परिणाम पार्टी के लिए शून्य रहा। लेकिन लोकसभा और विधानसभा चुनावों के मुद्दे अलग होते हैं और इसी अंतर को समझते हुए आकाश आनंद इस बार बसपा के लिए जमीन तैयार करने में जुटे हैं। पिछले दिनों बसपा के भीतर हुई राजनीतिक उठापटक और संगठनात्मक चुनौतियों के बीच आकाश आनंद का यह आक्रामक अभियान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा महज एक सीट पर सिमट गई थी। ऐसे में आगामी विधानसभा चुनाव बसपा और खुद आकाश आनंद के लिए राजनीतिक अस्तित्व तथा प्रभाव की बड़ी परीक्षा माना जा रहा है। इसे भी पढ़ें: ब्राह्मण वोट बैंक के लिए योगी और अखिलेश आमने-सामने, अखिलेश के 'PD मतलब पंडित' वाले बयान ने बिछाई नई सियासी बिसात हम आपको बता दें कि सोमवार को हाथरस के सादाबाद विधानसभा क्षेत्र में पार्टी प्रत्याशी अविन शर्मा के समर्थन में आयोजित कार्यकर्ता सम्मेलन में आकाश आनंद ने योगी आदित्यनाथ सरकार पर रोजगार, शिक्षा और कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर तीखे हमले किए। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार से पिछले दस वर्षों के कामकाज का हिसाब मांगा जाना चाहिए। आनंद का आरोप था कि सरकार ने अपनी कमियों को छिपाने के लिए पिछले एक दशक में विज्ञापनों पर 7,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए। युवाओं के मुद्दे को केंद्र में रखते हुए उन्होंने दावा किया कि राज्य में चार लाख से अधिक सरकारी पद खाली पड़े हैं और कई प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाएं हुई हैं। उनका कहना था कि यदि विज्ञापन पर खर्च होने वाली रकम का इस्तेमाल परीक्षाओं और रोजगार के लिए किया जाता तो बड़ी संख्या में युवाओं को सरकारी नौकरियां मिल सकती थीं। आनंद ने रोजगार के सरकारी आंकड़ों पर भी सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि सप्ताह में एक दिन नाश्ता बेचने या सड़क किनारे ठेला लगाने वाले व्यक्ति को भी रोजगार के आंकड़ों में शामिल कर दिया जाता है। शिक्षा व्यवस्था पर हमला बोलते हुए आनंद ने दावा किया कि प्रदेश में 25 हजार से अधिक सरकारी स्कूल बंद किए गए हैं। उन्होंने झांसी मेडिकल कॉलेज में शिशुओं की मौत का भी जिक्र किया और सरकार से शिक्षा तथा स्वास्थ्य व्यवस्था पर जवाब मांगा। विकास परियोजनाओं की गुणवत्ता पर भी उन्होंने सवाल उठाए। उन्होंने लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि उद्घाटन के एक महीने के भीतर ही उसके कुछ हिस्सों में सड़क धंसने लगी। साथ ही उन्होंने मायावती सरकार के कार्यकाल में बने यमुना एक्सप्रेसवे को भी उदाहरण के तौर पर सामने रखा। कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर आनंद ने अपराध और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सरकार को घेरा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ वाली छवि पर भी उन्होंने तंज कसा और पूछा कि सरकार के दावों के बावजूद अपराध तथा महिला सुरक्षा की वास्तविक स्थिति क्या है। आकाश आनंद का हमला केवल भाजपा तक सीमित नहीं रहा। कांग्रेस पर निशाना साधते हुए उन्होंने भाजपा और कांग्रेस को ‘एक ही सिक्के के दो पहलू’ करार दिया। उनका आरोप था कि कांग्रेस संविधान और डॉ. भीमराव आंबेडकर की विचारधारा की बात करती है, लेकिन जिन राज्यों में वह सत्ता में है, वहां भी कई मामलों में वही नीतियां अपनाती है जिनके लिए वह भाजपा पर हमला करती है। समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव भी उनके निशाने पर रहे। आनंद ने सपा के PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फॉर्मूले पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि यह फॉर्मूला बदलता रहता है। उन्होंने अखिलेश यादव और राहुल गांधी को ‘अंकल’ कहकर सभा में माहौल भी हल्का किया। अखिलेश को लेकर उन्होंने कहा कि वह 30 साल के हैं जबकि अखिलेश 50 के, इसलिए उन्हें ‘भैया’ नहीं बल्कि ‘अंकल’ कहना स्वाभाविक है। हालांकि आनंद के भाषण का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश युवाओं और सत्ता परिवर्तन को लेकर था। दिल्ली समेत देश के विभिन्न हिस्सों में हुए Gen Z के प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि युवाओं का सड़क पर उतरना गलत नहीं है, लेकिन केवल भाषण और प्रदर्शन से व्यवस्था नहीं बदलती। उनके मुताबिक एक व्यक्ति को हटाकर दूसरे व्यक्ति को लाने से न नीति बदलती है, न प्रक्रिया और न ही अधिकारी। आनंद ने कहा कि वास्तविक बदलाव के लिए सरकार और सत्ता में बैठे लोगों को बदलना होगा। उन्होंने इस संदर्भ में कांशीराम और मायावती की राजनीति का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों नेताओं ने हमेशा बहुजन समाज को सत्ता हासिल करने और अपना भविष्य स्वयं लिखने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने युवाओं को आरक्षण के खिलाफ बनाए जा रहे कथित प्रचार से भी सावधान किया। आनंद ने कहा कि आरक्षण गरीबी हटाने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता दूर करने का संवैधानिक माध्यम है। उन्होंने अपने समर्थकों से आगामी विधानसभा चुनाव को अधिकारों की लड़ाई का अवसर मानते हुए सक्रिय होने की अपील की। इसी रणनीति के तहत आनंद ने नया नारा भी दिया, ‘इस बार वोट हाथी को, अपने पुराने साथी को’। साथ ही उन्होंने मतदाताओं से मायावती को पांचवीं बार मुख्यमंत्री बनाने की अपील की। साफ है कि बसपा इस बार चुनावी लड़ाई को केवल सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक आधार की वापसी की लड़ाई बनाना चाहती है। आकाश आनंद की आक्रामकता और युवाओं की भीड़ ने इस लड़ाई में फिलहाल एक नई हलचल जरूर पैदा कर दी है। अब देखना यह होगा कि रैलियों में दिखाई दे रहा यह उत्साह वोटों में कितना बदलता है। -नीरज कुमार दुबे
एम्फी डेटा: म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री में आया शुद्ध निवेश
नई दिल्ली, जुलाई में म्यूचुअल फंड स्कीम्स में 2.35 लाख करोड़ रुपए का शुद्ध निवेश (नेट इन्फ्लो) दर्ज किया गया।
कीमती धातुओं ने पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से पकड़ी रफ्तार
नई दिल्ली, अमेरिका और ईरान के बीच लगातार बढ़ते तनाव के बीच हफ्ते के दूसरे कारोबारी दिन मंगलवार को घरेलू कमोडिटी मार्केट में कीमती धातुओं की कीमतों (सोने-चांदी) में तेजी देखने को मिली।
विपक्षी सांसदों ने चढ़ावा चोर और परीक्षा को लेकर सरकार पर कसा तंज, कहा- परीक्षा और राम मंदिर मुद्दे एक ही सिक्के के दो पहलू
संसद में हंगामा जारी, लोकसभा-राज्यसभा की कार्यवाही स्थगित; अमित शाह पेश करेंगे दो अहम विधेयक
संसद के मानसून सत्र के 17वें दिन हंगामे के कारण लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही स्थगित हो गई। अमित शाह दो अहम विधेयक पेश करेंगे।
रॉ चीफ पराग जैन के ढाका पहुंचने की खबर सुनते ही पाकिस्तानी आईएसआई के पांव तले जमीन खिसक गयी है। हम आपको बता दें कि बांग्लादेश में पाकिस्तान की बढ़ती सक्रियता और ढाका के सैन्य व खुफिया तंत्र से उसके बढ़ते संपर्क के बीच भारत की खुफिया एजेंसी के प्रमुख का वहां पहुंचना बेहद अहम माना जा रहा है। भले ही इस यात्रा को नियमित सुरक्षा संवाद बताया जा रहा हो, लेकिन इसका समय और मौजूदा क्षेत्रीय हालात इसे खास बना देते हैं। भारत साफ तौर पर बांग्लादेश के बदलते राजनीतिक और सुरक्षा समीकरण पर नजर रख रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक रॉ प्रमुख पराग जैन रविवार को चार सदस्यीय भारतीय प्रतिनिधिमंडल के साथ ढाका पहुंचे। यह यात्रा बांग्लादेश की खुफिया एजेंसी डीजीएफआई के निमंत्रण पर हुई। सोमवार को जैन ने प्रधानमंत्री तारिक रहमान के रक्षा मामलों के सलाहकार ब्रिगेडियर जनरल (सेवानिवृत्त) डॉ. एकेएम शम्सुल इस्लाम से मुलाकात की। भारतीय दल ने बांग्लादेश के अन्य कानून-प्रवर्तन एजेंसियों के प्रमुखों और गृह मंत्री सलाहुद्दीन अहमद से भी मुलाकात की। इसे भी पढ़ें: क्या 'इस्लामिक नाटो' से भारत की कूटनीतिक चुनौतियां बढ़ेंगी? कहीं अमेरिका व चीन की इसके पीछे कोई परोक्ष चाल तो नहीं? इस दौरे का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि पिछले करीब डेढ़ साल में पाकिस्तान के सैन्य और खुफिया अधिकारियों ने ढाका के चक्कर तेजी से बढ़ाए हैं। जनवरी 2025 में आईएसआई प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल असीम मलिक की ढाका यात्रा दशकों बाद किसी पाकिस्तानी खुफिया प्रमुख की ऐसी पहली यात्रा बताई गई थी। इसके बाद बांग्लादेशी सैन्य प्रतिनिधिमंडल ने रावलपिंडी जाकर पाकिस्तानी सेना प्रमुख असीम मुनीर समेत वायुसेना और नौसेना के प्रमुखों से मुलाकात की। अक्टूबर 2025 में पाकिस्तान के तत्कालीन ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी प्रमुख जनरल साहिर शमशाद मिर्जा के चार दिवसीय ढाका दौरे के बाद पाकिस्तान हाई कमीशन में आईएसआई की एक विशेष सेल बनाए जाने की रिपोर्ट भी सामने आई। इसी बीच, भारत के नए हाई कमिश्नर दिनेश त्रिवेदी की प्रधानमंत्री तारिक रहमान से मुलाकात भी बेहद अहम है। रहमान ने भारत के साथ रिश्ते सुधारने के लिए ‘अनुकूल माहौल’ बनाने की जरूरत बताई और ढाका ने भारत से पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण की प्रक्रिया तेज करने की मांग दोहराई। हालांकि नई दिल्ली ने कहा है कि वह प्रत्यर्पण अनुरोध को कानूनी और न्यायिक प्रक्रियाओं के तहत देख रहा है। हम आपको बता दें कि यह मुलाकात ऐसे वक्त हुई जब शेख हसीना ने दिल्ली से वर्चुअल माध्यम से सार्वजनिक रूप से अपनी पहली बड़ी राजनीतिक प्रतिक्रिया दी और दिसंबर में बांग्लादेश लौटने का दावा किया। उन्होंने 2024 के सत्ता परिवर्तन को सुनियोजित घटनाक्रम बताया तथा अवामी लीग के नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ हिंसा और दमन के गंभीर आरोप लगाए। जवाब में ढाका ने शेख हसीना को भारत से ऐसा मंच मिलने पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की और इसे बांग्लादेश की संप्रभुता के लिए अपमानजनक बताया। हालांकि भारत ने स्पष्ट किया कि कार्यक्रम एक निजी संस्था ने आयोजित किया था और सरकार की इसमें कोई भूमिका नहीं थी। इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी रणनीतिक चिंता पाकिस्तान की बढ़ती मौजूदगी है। विशेषज्ञों के हवाले से रिपोर्ट में दावा किया गया है कि आईएसआई ने बांग्लादेश में क्षेत्रीय स्तर के कार्यालय जैसी संरचनाएं स्थापित करने की कोशिश की है। साथ ही पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच कराची-चटगांव सीधी समुद्री सेवा बहाल हुई, सीधी वाणिज्यिक उड़ानों का रास्ता खुला और राजनयिकों तथा सैन्य अधिकारियों के लिए वीजा-मुक्त व्यवस्था पर सहमति बनी। भारत के लिए यह इसलिए गंभीर है क्योंकि दोनों देशों के बीच करीब 4,000 किलोमीटर लंबी सीमा है। यदि बांग्लादेश में कट्टरपंथी या विदेशी खुफिया नेटवर्क गहराई से जड़ें जमाते हैं तो इसका सीधा असर पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा, सीमा प्रबंधन, अवैध घुसपैठ, हथियार और आतंकी नेटवर्क पर पड़ सकता है। हालांकि रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि फिलहाल भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की ओर से बांग्लादेश को आतंकवादी खतरे के रूप में लेकर कोई सार्वजनिक ‘रेड फ्लैग’ सामने नहीं आया है। यहीं रॉ प्रमुख की ढाका यात्रा का सामरिक महत्व सामने आता है। भारत संभवतः बांग्लादेश को किसी एक खेमे में धकेलने की बजाय उसके सुरक्षा तंत्र के साथ प्रत्यक्ष संवाद बनाए रखना चाहता है। देखा जाये तो भारत के लिए बांग्लादेश को नजरअंदाज करना संभव भी नहीं है। भौगोलिक निकटता, व्यापार, कनेक्टिविटी, चिकित्सा सुविधाएं और विकास सहयोग दोनों देशों को एक-दूसरे से जोड़े रखते हैं। दिल्ली बांग्लादेश का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और बांग्लादेश भारत से विकास सहायता पाने वाला सबसे बड़ा लाभार्थी भी है। लेकिन चुनौती सिर्फ सुरक्षा की नहीं, बांग्लादेश की आंतरिक दिशा की भी है। रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने सेना और राजनीति में बढ़ते इस्लामी प्रभाव, जमात-ए-इस्लामी की वापसी और पाकिस्तान के साथ बढ़ते संपर्क को लेकर चिंता जताई है। दूसरी ओर, बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था भी उस दौर से गुजर रही है जिसमें शेख हसीना के समय की तेज आर्थिक वृद्धि, मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और बढ़ती प्रति व्यक्ति आय के मुकाबले नई परिस्थितियां अधिक अनिश्चित दिखाई देती हैं। ऐसे में रॉ चीफ का ढाका पहुंचना एक स्पष्ट रणनीतिक संदेश है कि दिल्ली बांग्लादेश के घटनाक्रम को दूर बैठकर नहीं देख रही। पाकिस्तान की आईएसआई हो या कट्टरपंथी नेटवर्क, भारत अपनी पूर्वी सीमा के बदलते सुरक्षा समीकरण पर सीधी नजर रख रहा है। अब असली परीक्षा तारिक रहमान सरकार की है कि वह ढाका को पाकिस्तान का मोहरा बनने देती है या भारत के साथ सुरक्षा, विकास और रणनीतिक हितों का संतुलित रास्ता चुनती है।
बिहार : तेजस्वी यादव ने उर्दू, अरबी-फारसी शिक्षकों के स्थानांतरण पर उठाए सवाल, लंबित वेतन भुगतान की मांग
सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को शांत, सरल और प्रभावशाली प्रधानमंत्रियों में से एक बताते हुए कहा कि इतिहास उन्हें सम्मान के साथ याद करेगा। उन्होंने दावा किया कि पूर्व प्रधानमंत्री के खिलाफ लंबे समय तक एक सुनियोजित अभियान चलाया गया, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उस अभियान का अंत हो गया है।
राजस्थान में हर घर तिरंगा अभियान - मंत्री ओटाराम देवासी आज बारां में होंगे शामिल
राजस्थान के ग्रामीण विकास, पंचायती राज, आपदा प्रबंधन, सहायता एवं नागरिक सुरक्षा विभाग के राज्यमंत्री एवं जिला प्रभारी मंत्री ओटाराम देवासी मंगलवार को बारां जाएंगे
मध्य प्रदेश के राजगढ़ में उफनते नाले में बही वैन, 9 लोगों की मौत
मध्य प्रदेश के राजगढ़ में उफनते नाले में बही वैन, 9 लोगों की मौत
सिर्फ सैलरी देखकर बैंक नहीं देता लोन, इन 4 चीजों की भी होती है जांच; आवेदन से पहले जरूर जानें
अक्सर यह माना जाता है कि अच्छी सैलरी होने पर बैंक आसानी से लोन मंजूर कर देगा। हालांकि, वास्तविकता इससे अलग है। बैंक किसी आवेदक की सिर्फ मासिक आय नहीं देखते, बल्कि उसकी पूरी वित्तीय स्थिति का आकलन करते हैं।

