...

ममता के दिल्ली दौरे पर दिलीप घोष का तंज, बोले-याचिकाओं से बंगाल पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा

ममता के दिल्ली दौरे पर दिलीप घोष का तंज, बोले-याचिकाओं से बंगाल पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा

समाचार नामा 8 Oct 2026 10:29 am

'भारतीय सिनेमा ने खोया बेमिसाल अभिनेता', नाना पाटेकर के निधन पर कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों और दिग्गज नेताओं ने जताया शोक

नई दिल्ली, 8 अक्टूबर (आईएएनएस)। दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का गुरुवार सुबह गोवा स्थित उनके आवास पर निधन हो गया। 75 वर्षीय अभिनेता के निधन पर कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों और नेताओं ने शोक व्यक्त किया है। सभी ने ईश्वर से प्रार्थना की कि दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान और शोकाकुल परिजनों व प्रशंसकों को यह दुख सहने की शक्ति प्रदान करें।

समाचार नामा 8 Oct 2026 8:41 am

Bihar Politics: SIR के खिलाफ महागठबंधन का बड़ा प्रदर्शन, पटना में राजभवन मार्च आज

Bihar Politics: SIR के खिलाफ महागठबंधन का बड़ा प्रदर्शन, पटना में राजभवन मार्च आज

समाचार नामा 8 Oct 2026 8:30 am

राहुल-प्रियंका के साथ कथित पुलिस कार्रवाई के खिलाफ आज कांग्रेस का विरोध प्रदर्शन

मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने बुधवार को पार्टी कार्यकर्ताओं से 8 अक्टूबर को राज्यभर में प्रदर्शन करने की अपील की। उन्होंने कहा कि नई दिल्ली में विरोध मार्च के दौरान लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अन्य इंडिया गठबंधन सांसदों के साथ हुई कथित पुलिस कार्रवाई के विरोध में ये प्रदर्शन किए जाएंगे।

देशबन्धु 8 Oct 2026 8:00 am

ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर आज देशभर में विपक्ष का प्रदर्शन, दिल्ली में सुरक्षा बढ़ाई गई

मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को लेकर जारी राजनीतिक विवाद के बीच कांग्रेस और INDIA गठबंधन ने शुक्रवार को देशभर में विरोध प्रदर्शन करने का फैसला किया है

देशबन्धु 8 Oct 2026 7:44 am

राहुल की हुंकार, लोकतांत्रिक आवाज दबेगी नहीं

मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर कांग्रेस और INDIA गठबंधन का विरोध प्रदर्शन लगातार दूसरे दिन भी जारी रहा

देशबन्धु 7 Oct 2026 11:39 pm

आंध्र प्रदेश के राज्यपाल एस. अब्दुल नजीर ने लोक भवन में 77वें टीबी सील बिक्री अभियान की शुरुआत की

आंध्र प्रदेश के राज्यपाल एस. अब्दुल नजीर ने लोक भवन में 77वें टीबी सील बिक्री अभियान की शुरुआत की

समाचार नामा 7 Oct 2026 11:24 pm

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने गृह मंत्री अमित शाह को सूखे की स्थिति से अवगत कराया, केंद्र से सहायता मांगी

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने गृह मंत्री अमित शाह को सूखे की स्थिति से अवगत कराया, केंद्र से सहायता मांगी

समाचार नामा 7 Oct 2026 11:17 pm

'विशाखापत्तनम मेट्रो और बीच कॉरिडोर प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दे केंद्र', सीएम नायडू का पीएम मोदी से आग्रह

'विशाखापत्तनम मेट्रो और बीच कॉरिडोर प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दे केंद्र', सीएम नायडू का पीएम मोदी से आग्रह

समाचार नामा 7 Oct 2026 8:18 pm

दुनिया पर छाया भोजन का संकट, 140+ करोड़ भारतीयों का पेट भरने के लिए क्या कदम उठा रही मोदी सरकार: जानिए सब कुछ

वैश्विक खाद्य संकट के काले बादलों के बावजूद भारत की स्थिति दुनिया के अन्य देशों की तुलना में काफी मजबूत और सुरक्षित है।

ऑप इंडिया 7 Oct 2026 6:42 pm

एसआईआर पर हंगामा, हकीकत से ज्यादा फसाना

विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर सियासी पारा लगातार चढ़ा हुआ है। विशेषकर विपक्षी दल जिस तरह से इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं, उससे माहौल में एक भ्रम फैल रहा है। विपक्षी हंगामे और सवालों के चलते ऐसे लोगों की संख्या बढ़ी है, जो मानने लगे हैं कि मतदाता सूची की जांच एक तरह से नागरिकता की जांच हो गई है। लोग एक बारगी वोटर न होने को बर्दाश्त कर भी लें, लेकिन कोई नहीं चाहेगा कि उसकी जन्मजात नागरिकता पर सवाल उठे या वह खतरे में पड़े। कहना न होगा कि विशेषकर पश्चिम बंगाल में हुए एसआईआर के बहाने विपक्ष यह भ्रम और डर-दोनों फैलाने में किंचित सफल रहा है। हालांकि यह भी सच है कि ऐसा भ्रम और डर सिर्फ पश्चिम बंगाल और बिहार के ही कुछ इलाकों में ही दिख रहा है। एसआईआर उत्तर प्रदेश में भी हुआ है और दिल्ली में भी जारी है। एसआईआर तमिलनाडु में भी हुआ है। लेकिन यहां के मतदाताओं के बीच ऐसा भ्रम और डर न के बराबर दिखा है। इसे भी पढ़ें: Voter List विवाद पर पूर्व जज SN Dhingra का बयान, ECI की SIR प्रक्रिया को बताया जरूरी ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर बिहार और पश्चिम बंगाल में ऐसा डर क्यों दिख रहा है? इसकी वजह है, वहां पिछले कुछ दशकों में बांग्लादेश से बढ़ी घुसपैठ। पश्चिम बंगाल में जब सत्ता में वाममोर्चा था, तब यही ममता बनर्जी वहां घुसपैठ के मुद्दे को उछालती रहती थीं और वाममोर्चे पर आरोप लगाती रहती थीं कि वह इसे बढ़ावा दे रहा है। ममता बनर्जी इस बहाने परोक्ष रूप से वाममोर्चा पर आरोप लगाती थीं कि मतदाता बने घुसपैठियों के ही सहारे वह पश्चिम बंगाल की सत्ता में काबिज है। बाद के दिनों में ये मतदाता ममता के समर्थक हो गए और ममता की सत्ता के आधार बनने लगे तो उन्हें भी यह मामला फिजूल का लगने लगा। बिहार का सीमांचल इलाका भी बांग्लादेशी घुसपैठ से प्रभावित रहा है। इसलिए वहां भी ऐसे सवाल और भ्रम उठ रहे हैं। चूंकि एसआईआर में ऐसे अवैध मतदाता ज्यादा सवालों के घेरे में हैं या फिर उनके नाम कट रहे हैं, इस वजह से इन्हीं राज्यों में यह मुद्दा कुछ ज्यादा तुर्श दिख रहा है। मतदाता सूची में सुधार और उसमें चुनाव आयोग एवं मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर भी बड़े सवाल उठे हैं। सवाल यह भी है कि क्या एसआईआर को लेकर उठाए जा रहे सवाल असल में प्रक्रियात्मक और कानूनी हैं या इनके जरिए सिर्फ राजनीति हो रही है? पहले ही कहा जा चुका है कि एसआईआर को लेकर विपक्षी दलों की सबसे ज्यादा आपत्तियां बिहार और पश्चिम बंगाल से जुड़ी बताई जा रही हैं। कुछ राजनेताओं और दलों ने एसआईआर के आधार पर इन राज्यों के चुनावी परिणामों और मतदाता सूची की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। यहां ध्यान रखने की बात है कि एसआईआर केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी हुआ, लेकिन वहां बिहार या पश्चिम बंगाल की तरह इस पर सियासी विवाद नहीं हुआ। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि यदि कुछ राज्यों में एसआईआर को लेकर गंभीर आपत्ति नहीं है तो फिर एक या दो राज्यों में गंभीर आपत्तियां क्या राजनीतिक एजेंडे की वजह से तो नहीं उठाई जा रहीं? एसआईआर को देखने और समझने की एक ही कसौटी हर राज्य में क्यों नहीं लागू की जा रही है? इससे तो यही संकेत जाता है कि इसका सियासी विरोध सेलेक्टिव है और दोहरे मापदंड से भरा हुआ है। क्या है एसआईआर की मानक प्रक्रिया? एसआईआर को लेकर जारी बहस में बड़े पैमाने पर नाम हटाने, तकनीकी प्रणाली के इस्तेमाल और पारदर्शिता जैसे सवाल उठाए गए हैं। मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया निर्धारित कानूनी और प्रशासनिक चरणों के तहत होती है। नाम हटाने से पहले मतदाता को नोटिस जारी करने और उसकी आपत्तियों और तर्कों की सुनवाई की जाती है। इसके बाद आखिरी निर्णय संबंधित निर्वाचन अधिकारी के स्तर पर होता है। इसलिए ड्राफ्ट मतदाता सूची में किसी मतदाता का नाम नहीं होना और अंतिम मतदाता सूची से नाम हट जाना, एक ही बात नहीं है। इसलिए जरूरी है कि दावे, ड्राफ्ट आंकड़े, आपत्तियों और अंतिम निर्णय, इन सभी चरणों को अलग-अलग समझा जाए। हर स्तर पर चूंकि आयोग ने पारदर्शी व्यवस्था अपना रखी है, इसे समझना हो तो अभी दिल्ली के किसी बीएलओ केंद्र का दौरा किया जा सकता है। दिल्ली में खूब नोटिस जारी किए गए हैं, उनके जवाब में लोग बीएलओ यानी बूथ स्तर के अधिकारी के पास पहुंच रहे हैं। लेकिन अफरातफरी, घबराहट या दहशत नहीं दिख रही। बीएलओ लोगों से जरूरी फॉर्म और प्रमाण ले रहे हैं। ज्यादातर नोटिस की वजह पूरा नाम ना होना, नाम की वर्तनी गलत होना, पिता या पति के नाम का पूरा न होना या फिर उनके नाम की वर्तनी में गड़बड़ी या कमी होना है। अधिकारियों का कहना है कि ईसीआईनेट का सॉफ्टवेयर मतदाता सूची के पहले से जारी नाम और आवेदन में कुछ ही गड़बड़ी पाता है तो वह नोटिस जेनरेट कर देता है। उदाहरण के लिए, पहले से किसी का नाम मतदाता सूची में सिर्फ रमेश दर्ज है, जबकि उसका पूरा नाम रमेश शर्मा है, या इसी तरह उसके पिता का पूरा नाम दर्ज नहीं है। लेकिन पहचान के दूसरे दस्तावेजों में उसका पूरा नाम दर्ज है। जब आयोग के अधिकारी ईसीआईनेट पर इसे लोड करते हैं तो सॉफ्टवेयर इस गड़बड़ी या बेमेल तथ्य को पकड़ता है। इसी तरह किसी का पता बदल गया है, जो पहले से दर्ज रिकॉर्ड से अलग है तो उसे भी नोटिस जा रही है। बस इन्हें प्रमाणित करना भर है। लेकिन राजनीतिक दल इसे या तो समझ नहीं रहे या फिर जानबूझकर नासमझी दिखा रहे हैं। वैसे भी इन प्रमाणों को घुसपैठिए या अवैध मतदाता साबित नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए उनके नाम कट रहे हैं या काटे जाने की संभावना बन रही है। एसआईआर को लेकर जारी मौजूदा बहस में नागरिकों के लिए कुछ प्रश्न बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं, क्या पुनरीक्षण निर्धारित संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया के तहत हुआ? क्या किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया? यदि ऐसा हुआ, तो क्या दावा और आपत्ति की प्रक्रिया के जरिए उसे सुधारा गया? क्या अलग-अलग राज्यों में समान प्रक्रियाओं को समान कसौटी पर देखा जा रहा है? इसे भी पढ़ें: आकाशवाणी भवन में जबरन घुसने का आरोप! Rahul Gandhi और Priyanka Gandhi के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने दर्ज की FIR संस्थाओं पर बहस हो, लेकिन तथ्यों के आधार पर एसआईआर, निर्वाचन आयोग और न्यायपालिका पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक तो है, लेकिन आरोप और प्रमाण, ड्राफ्ट सूची और अंतिम सूची, याचिका और न्यायिक आदेश तथा राजनीतिक मांग और कानूनी कार्रवाई, के बीच समझदारी से अंतर बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है। अव्वल तो मतदाता सूची की शुद्धता और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर बहस तथ्यों, कानून और निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर होनी चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। चुनाव आयोग बार-बार यह भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहा है कि एसआईआर मतदाताओं को बेहतर सुविधा देने की व्यवस्था है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य है, कोई भी वैध और योग्य मतदाता छूटे नहीं। मोटे तौर पर एसआईआर का एक ही मकसद है, हर योग्य और वैध मतदाता को सूची में जोड़ना, दिए गए पते पर न रहे मतदाताओं और मृतकों का नाम सूची से हटाना। इसके साथ ही विदेशी और घुसपैठियों को मतदाता सूची से बाहर करना है। एक आरोप यह लग रहा है कि मतदाता सूची तैयार करने में ईसीआईनेट सॉफ्टवेयर की भूमिका बीएलओ और ईआरओ की तुलना में बढ़ गई है, जिसकी वजह से मतदाता सूची को फाइनल करने के ईआरओ के अधिकार दरकिनार हो गए हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। ईसीआईनेट सिर्फ तकनीकी मंच है, जिसकी बुनियाद अधिकारियों द्वारा घर-घर से जुटाए आंकड़े हैं। नहीं भूलना चाहिए कि मतदाता सूची में किसी नाम को जोड़ने या उससे हटाने का निर्णय सिर्फ ईआरओ ही ले सकता है और वह भी जनप्रतिनिधित्व कानून 1950 और मतदाता सूची पंजीयन नियम 1960 के तहत, नोटिस और सुनवाई के बाद ही ऐसा कर सकता है। कहना न होगा कि ऐसा ही हो रहा है। लेकिन राजनीति इसे देखने की बजाय अपने हिसाब से घटनाओं और कार्यों की व्याख्या कर रही है। उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

प्रभासाक्षी 7 Oct 2026 6:33 pm

'सुवेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री रहते विधानसभा नहीं जाऊंगा', हुमायूं कबीर का ऐलान

'सुवेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री रहते विधानसभा नहीं जाऊंगा', हुमायूं कबीर का ऐलान

समाचार नामा 7 Oct 2026 6:14 pm

भारतीय शेयर बाजार लाल निशान में बंद

मुंबई, भारतीय शेयर बाजार बुधवार के कारोबारी सत्र में गिरावट के साथ बंद हुआ।

देशबन्धु 7 Oct 2026 4:23 pm

EVM पर बार-बार सवाल उठाने वालों ने Ballot Paper के जरिये हुए चुनावों के एक दिन पहले आये परिणाम देखे क्या?

भारतीय चुनावी राजनीति में इन दिनों EVM बनाम बैलेट पेपर की बहस फिर तेज है। विपक्षी दलों का एक वर्ग लगातार मांग कर रहा है कि देश में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की जगह पुराने बैलेट पेपर से चुनाव कराए जाएं। हाल में INDIA ब्लॉक ने भी बैलेट पेपर की वापसी की मांग दोहराई है और चुनाव आयोग के खिलाफ राजनीतिक अभियान तेज किया है। लेकिन इस बहस के बीच एक असहज सवाल विपक्ष से भी पूछा जाना चाहिए कि अगर बैलेट पेपर ही चुनावी निष्पक्षता की गारंटी है, तो हाल में बैलेट पेपर से हुए चुनावों के नतीजों की व्याख्या विपक्ष किस तरह करेगा? हम आपको बता दें कि असम के सिलचर में 3 अक्टूबर को नगर निगम के पहले चुनाव में बैलेट पेपर से मतदान हुआ। परिणाम में भाजपा ने 42 में से 32 सीटें जीतीं और उसकी सहयोगी असम गण परिषद ने दो सीटें हासिल कीं। कांग्रेस को केवल दो सीटें मिलीं, जबकि छह सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवार विजयी रहे। यानी बैलेट पेपर वाले चुनाव में भी भाजपा-नीत NDA ने दो-तिहाई से अधिक सीटें जीत लीं। यह परिणाम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि EVM पर सवाल उठाने वाली राजनीति में अक्सर यह धारणा बनाई जाती है कि यदि चुनाव बैलेट पेपर से हो तो परिणाम अलग होगा। सिलचर का परिणाम कम-से-कम इतना जरूर बताता है कि बैलेट पेपर अपने आप किसी पार्टी के पक्ष या विपक्ष में परिणाम नहीं बदल देता। मतदाता जिस राजनीतिक दल को समर्थन देना चाहता है, वह अपना समर्थन मतदान की किसी भी व्यवस्था में व्यक्त कर सकता है। इसी संदर्भ में इस साल हुए पांच विधानसभा चुनावों यानि असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के पोस्टल बैलेट आंकड़ों की भी चर्चा होनी जरूरी है। निर्वाचन आयोग के चुनाव नतीजों वाले पोर्टल पर प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में EVM वोटों के साथ पोस्टल वोटों का भी अलग विवरण दर्ज है। आप इनका विश्लेषण करेंगे तो पाएंगे कि भाजपा और एनडीए को अच्छी खासी संख्या में पोस्टल बैलेट के जरिये भी मत मिला था। असम में तो कई निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा उम्मीदवारों को पोस्टल बैलेट में मजबूत समर्थन मिला था। पश्चिम बंगाल में भी कई ऐसे निर्वाचन क्षेत्र रहे जहां भाजपा उम्मीदवारों को सैकड़ों पोस्टल वोट मिले और वे परिणाम तय करने में महत्वपूर्ण साबित हुए। हम आपको बता दें कि पोस्टल बैलेट मुख्यतः चुनाव ड्यूटी पर तैनात कर्मचारियों और कानून के तहत पात्र अन्य श्रेणियों के मतदाताओं से जुड़े होते हैं। इसलिए इनके आधार पर पूरे राज्य की जनता की राजनीतिक पसंद का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। लेकिन ये आंकड़े एक महत्वपूर्ण राजनीतिक सवाल जरूर खड़ा करते हैं। सवाल उठता है कि यदि किसी दल का तर्क है कि मतदान की मशीन यानि ईवीएम ही उसकी हार का कारण है, तो उसे उन चुनावों और निर्वाचन क्षेत्रों को भी देखना चाहिए जहां कागज पर वोट पड़े और फिर भी परिणाम उसके पक्ष में नहीं आया। देखा जाये तो विपक्ष के सामने वास्तविक राजनीतिक चुनौती केवल EVM पर सवाल उठाना नहीं, बल्कि यह समझना भी है कि मतदाता लगातार किन मुद्दों, नेतृत्व और संगठनात्मक विकल्पों को प्राथमिकता दे रहा है। चुनाव आयोग या किसी संवैधानिक संस्था की आलोचना करने का लोकतांत्रिक अधिकार विपक्ष के पास है। यदि कहीं चुनावी प्रक्रिया में ठोस अनियमितता का प्रमाण है, तो उसकी जांच और सुधार की मांग भी पूरी तरह जायज है। लेकिन हार के हर परिणाम को पहले से ही संस्थागत साजिश मान लेना और संगठन, उम्मीदवार, जनसंपर्क, स्थानीय मुद्दों तथा राजनीतिक रणनीति की समीक्षा से बचना लोकतांत्रिक राजनीति के लिए स्वस्थ रास्ता नहीं है। ईवीएम और चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहे दलों को समझना होगा कि भारत का लोकतंत्र किसी एक मशीन से बड़ा है। जनता का फैसला EVM, बैलेट पेपर और पोस्टल बैलेट, हर माध्यम से सामने आता है। इसलिए राजनीतिक दलों के लिए सबसे कठिन, लेकिन सबसे जरूरी सवाल यही है कि क्या वे चुनावी व्यवस्था बदलने की मांग से पहले अपने मतदाताओं के बदलते मिजाज को समझने की कोशिश कर रहे हैं?

प्रभासाक्षी 7 Oct 2026 3:56 pm

पीएम मोदी 'विकसित भारत' के लक्ष्य के साथ देश को आगे बढ़ाने के लिए लगातार कर रहे काम: रेखा गुप्ता

पीएम मोदी 'विकसित भारत' के लक्ष्य के साथ देश को आगे बढ़ाने के लिए लगातार कर रहे काम: रेखा गुप्ता

समाचार नामा 7 Oct 2026 3:18 pm

मल्लिकार्जुन खड़गे ने बुलाई इंडिया गठबंधन के नेताओं की लंच बैठक, धरना प्रदर्शन के बाद अगली रणनीति पर चर्चा

मल्लिकार्जुन खड़गे ने बुलाई इंडिया गठबंधन के नेताओं की लंच बैठक, धरना प्रदर्शन के बाद अगली रणनीति पर चर्चा

समाचार नामा 7 Oct 2026 2:35 pm

मध्य प्रदेश में कांग्रेस की जमीनी लड़ाई की तैयारी, रीवा संभाग की बैठक में हुआ मंथन

मध्य प्रदेश में कांग्रेस की जमीनी लड़ाई की तैयारी, रीवा संभाग की बैठक में हुआ मंथन

समाचार नामा 7 Oct 2026 2:20 pm

2 महीने, 3 सरप्राइज एलीमेंट: बीजेपी हैरान, पुलिस परेशान, क्या है राहुल गांधी की 'धप्पा' पॉलिटिक्स!

संसद से चुनाव आयोग तक का रास्ता छावनी में तब्दील था, चप्पे-चप्पे पर भारी बैरिकेडिंग और अलर्ट मोड में खड़ी पुलिस… लेकिन राहुल गांधी ने एक बार फिर सबको 'धप्पा' दे दिया! मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कांग्रेस का मोर्चा खोलते हुए, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने अचानक आकाशवाणी भवन की ओर रुख किया और सीधे 8 घंटे की नाकाबंदी कर डाली। प्रशासन देखता ही रह गया और राहुल का यह सरप्राइज अटैक पूरी तरह कामयाब रहा। पिछले दो महीनों में यह तीसरी बार है जब राहुल गांधी के इस फ्लैश प्रोटेस्ट ने दिल्ली पुलिस ही नहीं, खुद अपनी पार्टी के नेताओं तक के होश उड़ा दिए हैं। पिछले दो महीनों में यह तीसरी बार है जब राहुल ने अचानक धरना देकर पुलिस और कुछ हद तक कांग्रेस नेताओं को भी चौंका दिया है। जुलाई में, कांग्रेस सांसद ने प्रधानमंत्री आवास के बाहर अचानक विरोध प्रदर्शन किया। पिछले महीने, उनकी नई रणनीति का दूसरा चरण तब देखने को मिला जब वह अचानक संसद मार्ग पुलिस स्टेशन में एक छात्र प्रदर्शनकारी के साथ घुस गए; इस छात्र को 20 जुलाई की हिंसा के दौरान पैलेट गन से चोट लगी थी और राहुल ने FIR दर्ज करने की मांग की। राहुल का यह नया सियासी 'प्लेबुक' अब विरोधियों के लिए बिल्कुल अप्रत्याशित सिरदर्द बन चुका है! इसे भी पढ़ें: Rahul Gandhi और Priyanka Gandhi हिरासत में, CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कर रहे थे प्रदर्शन CEC के विरोध-प्रदर्शन के दौरान राहुल का नया दांव सड़कों पर अचानक होने वाले ऐसे विरोध-प्रदर्शन राहुल के राजनीतिक हथियारों में एक नया हथियार बन गए हैं। मंगलवार को इसका तीसरा चरण देखने को मिला। ऐसा लग रहा था कि दिल्ली पुलिस को विपक्ष के निर्वाचन सदन तक मार्च करने की हर चाल का पहले से अंदाज़ा था। जब विपक्ष का मार्च ECI हेडक्वार्टर से कुछ सौ मीटर दूर नीति आयोग के दफ़्तर के पास पहुँचा, तो प्रदर्शनकारियों का सामना पुलिस से हुआ। इस गहमागहमी के बीच, राहुल ने कैमरों को तस्वीर लेने का मौका दिया। जब कांग्रेस नेता आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे थे, तब वह पुलिस बैरिकेड के ऊपर चढ़ गए और तिरंगा लहराया। हालांकि, पुलिस का सब्र जवाब दे गया। इसके बाद वही जाना-पहचाना नज़ारा देखने को मिला; पुलिस ने नेताओं को हिरासत में लेना और उन्हें बसों में भरना शुरू कर दिया। प्रियंका गांधी एक बस में सवार हुईं, जो आकाशवाणी भवन के पास खड़ी थी। राहुल भी बस में चढ़ने ही वाले थे। तभी हालात बदल गए। TOI और इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, जैसे ही राहुल बस में चढ़ने वाले थे, उन्होंने प्रियंका को कोई इशारा किया। जल्द ही, वायनाड के सांसद नीचे उतरे और गांधी भाई-बहन तेज़ी से आकाशवाणी भवन की ओर दौड़ पड़े। इस अचानक उठाए गए कदम से न सिर्फ़ पुलिस, बल्कि कांग्रेस नेता भी हैरान रह गए। आकाशवाणी भवन के गेट के पास कोई पुलिसकर्मी नहीं था। सुरक्षा गार्डों ने गांधी भाई-बहन को रोकने की कोशिश की, जिससे तनावपूर्ण स्थिति पैदा हो गई, लेकिन आखिरकार दोनों परिसर में दाखिल हो गए। पुलिस को उम्मीद थी कि लोगों को हिरासत में लेने से विरोध प्रदर्शन खत्म हो जाएगा, लेकिन अचानक बदले हालात ने एक नया धरना शुरू कर दिया। इस अफरातफरी के बीच राहुल ने पत्रकारों से कहा कि देश के साथ जो किया गया है, वह देशद्रोह है। इसे भी पढ़ें: CEC नियुक्ति में PM, LoP के साथ CJI भी हों शामिल, Owaisi ने मौजूदा चयन प्रक्रिया पर उठाए सवाल एक पेड़ के नीचे बैठ गए राहुल चाहे पीएम मोदी हों, अमित शाह हों या ज्ञानेश कुमार, किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा। यह पता नहीं चल पाया है कि गांधी भाई-बहन ने अचानक आकाशवाणी भवन में घुसने का फ़ैसला क्यों किया। हो सकता है कि राहुल निर्वाचन सदन जाने के लिए शॉर्टकट के तौर पर इस जगह का इस्तेमाल करना चाहते हों, क्योंकि निर्वाचन सदन आकाशवाणी भवन के पिछले गेट के पास ही है। हालाँकि, पुलिस ने तुरंत पिछला गेट बंद कर दिया, जिसके बाद कांग्रेस सांसदों को आकाशवाणी भवन के परिसर में ही घंटों तक धरना देना पड़ा। राहुल और प्रियंका ब्रॉडकास्टिंग हाउस के अंदर एक पेड़ के नीचे बैठ गए। केसी वेणुगोपाल, पवन खेड़ा और इमरान प्रतापगढ़ी समेत कांग्रेस के दूसरे नेता भी आकाशवाणी के गेट से अंदर घुसने में कामयाब रहे, जबकि पुलिस बल को तैनात करने की कोशिश कर रही थी। बाकी लोगों को बाउंड्री वॉल पर चढ़ते और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग करते हुए नारे लगाते देखा गया। कांग्रेस ने इस मौके का फ़ायदा उठाने में ज़रा भी देर नहीं की। पार्टी ने एक्स पर राहुल के अचानक रास्ते से हटकर कहीं और जाने का एक वीडियो शेयर किया, जिसके साथ मज़ाकिया अंदाज़ में धप्पा कैप्शन लिखा था। यह ड्रामा सूरज डूबने के काफी देर बाद तक चलता रहा। जब कांग्रेस नेताओं ने चुनाव आयुक्तों से मिले बिना वहां से हटने से इनकार कर दिया, तो उनके लिए रोल और एनर्जी ड्रिंक्स मंगवाए गए। इससे एक और विवाद खड़ा हो गया। आप इसके बारे में यहां पढ़ सकते हैं। रात करीब 8 बजे, पुलिस ने आखिरकार आकाशवाणी भवन परिसर को खाली कराना शुरू किया। तस्वीरों में राहुल को परिसर से खींचकर बस की ओर ले जाते हुए देखा गया। नेताओं को किंग्सवे कैंप पुलिस स्टेशन ले जाया गया और हिरासत में रखा गया, जिसके बाद रात 10 बजे उन्हें रिहा कर दिया गया। राहुल का सरप्राइज एलीमेंट वाला प्लेबुक यह पहली बार नहीं था जब राहुल गांधी ने प्रशासन को चकमा दिया हो। 21 जुलाई को संसद की ओर मार्च कर रहे प्रदर्शनकारी छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के ठीक एक दिन बाद, राहुल गांधी और कांग्रेस सांसदों का एक दल अचानक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास के पास पहुंच गया और बिना किसी पूर्व सूचना के धरने पर बैठ गया।इस अचानक हुए प्रदर्शन से पहले खुद कांग्रेस सांसदों को भी अंधेरे में रखा गया था। उन्हें शुरुआत में केवल यह कहकर बुलाया गया था कि वे कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर उनका जन्मदिन मनाने के लिए इकट्ठा हों। जैसे ही सभी नेता एकत्र हुए, उन्हें असल योजना की जानकारी दी गई और उन्होंने 7, लोक कल्याण मार्ग की ओर मार्च करना शुरू कर दिया, जो वहां से महज 2 किलोमीटर दूर है। इस अप्रत्याशित कदम ने पुलिस को पूरी तरह चौंका दिया। यह धरना तब जाकर समाप्त हुआ जब पुलिस ने राहुल गांधी को वहां से हटाया, और इस छीना-झपटी के दौरान उनकी नाक पर चोट भी लग गई थी। अगला घटनाक्रम एक महीने बाद, 21 अगस्त को हुआ। इसे भी पढ़ें: CEC विरोध पर CM Devendra Fadnavis बोले, संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने की है साजिश पैलेट गन पीड़ित को लेकर थाने के बाहर धरने पर बैठे राहुल पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में सब कुछ सामान्य चल रहा था, तभी राहुल वहाँ साहिल लोचब के साथ पहुँचे। साहिल 19 साल का छात्र है, जिसे कथित तौर पर 20 जुलाई के विरोध प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन से चोट लगी थी। राहुल ने मांग की कि इस मामले में तुरंत FIR दर्ज की जाए। जब पुलिस ने टाल-मटोल की, तो राहुल अपनी बात पर अड़े रहे और पुलिस स्टेशन के बाहर धरने पर बैठ गए। जल्द ही, प्रियंका गांधी, कांग्रेस के अन्य नेता और विपक्ष के बड़े नेता भी उनके साथ शामिल हो गए। पुलिस स्टेशन के बाहर सुरक्षा बढ़ा दी गई और वही जाना-पहचाना ड्रामा देखने को मिला। राहुल ने साफ कर दिया कि जब तक FIR दर्ज नहीं हो जाती, वे वहाँ से नहीं हटेंगे, चाहे इसमें कितने भी घंटे क्यों न लगें। सात घंटे बाद यह गतिरोध खत्म हुआ, जब दिल्ली पुलिस ने आखिरकार पैलेट फायरिंग के मामले में FIR दर्ज कर ली। ये घटनाक्रम सरकार के खिलाफ अहम मुद्दों से निपटने के राहुल के तौर-तरीकों में आए बड़े बदलाव का संकेत देते हैं। अब वे किसी मुद्दे पर सिर्फ़ सोशल मीडिया पर बात नहीं करते, बल्कि ऐसे अचानक किए गए विरोध प्रदर्शनों के ज़रिए ज़मीन पर भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं। Dhappa https://t.co/IMP0mIK2NV — Congress (@INCIndia) October 6, 2026

प्रभासाक्षी 7 Oct 2026 2:05 pm

पटना में 'संकल्प सभा': सीएम सम्राट बोले- 'विकसित भारत’ के लिए समृद्ध बिहार जरूरी

पटना में 'संकल्प सभा': सीएम सम्राट बोले- 'विकसित भारत’ के लिए समृद्ध बिहार जरूरी

समाचार नामा 7 Oct 2026 1:13 pm

Jantar Mantar Protest वाली FIRs वापस लेने का गलत असर पड़ा, प्रदर्शनकारियों के मन से खत्म हो रहा Delhi Police का डर

दिल्ली की सड़कों पर इन दिनों जो कुछ दिखाई दे रहा है, उसमें केवल प्रदर्शनकारी और पुलिस आमने-सामने नहीं हैं। उनके बीच अब मोबाइल कैमरा भी खड़ा है, सोशल मीडिया भी खड़ा है और कुछ सेकंड में किसी घटना को देशभर में पहुंचा देने वाली तकनीक भी खड़ी है। शायद इसीलिए दिल्ली पुलिस के लिए आज किसी प्रदर्शन को नियंत्रित करना केवल बैरिकेड लगाने, भीड़ को रोकने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने का मामला नहीं रह गया है। पुलिस को कानून लागू भी करना है, स्वयं को उकसावे से बचाना भी है और साथ-साथ यह सुनिश्चित भी करना है कि अगले कुछ सेकंड में उसकी कोई प्रतिक्रिया काट-छांटकर वायरल वीडियो न बन जाए। दो अक्टूबर से नई दिल्ली क्षेत्र में शुरू हुए प्रदर्शनों ने कुछ ही दिनों में पुलिस के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। अलग-अलग राजनीतिक दलों, छात्र संगठनों, कार्यकर्ताओं और दूसरे समूहों के प्रदर्शन तथा प्रतिबंधित क्षेत्रों की तरफ बढ़ने की कोशिशों के कारण पुलिस को लगातार अपनी रणनीति बदलनी पड़ रही है। केवल एक स्थान पर खड़ी भीड़ के बजाय अलग-अलग दिशाओं में आगे बढ़ते समूहों को संभालना पुलिस के लिए नई चुनौती बन गया है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक असहज सवाल भी उठता है। सवाल यह है कि क्या जुलाई में जंतर-मंतर के प्रदर्शन से जुड़े मामलों में प्राथमिकी निरस्त किए जाने के चलते ही प्रदर्शनकारियों के बीच यह संदेश गया कि पुलिस के साथ टकराव का कानूनी परिणाम गंभीर नहीं होगा? क्या इसी कारण प्रदर्शनकारियों के मन में पुलिस का डर कम हो गया है? क्या इसी कारण कुछ लोग अब पुलिसकर्मियों से आक्रामक भाषा में बात करने, उन्हें चुनौती देने, धक्का-मुक्की करने या जानबूझकर उकसाने का जोखिम अधिक आसानी से उठा रहे हैं? हम आपको याद दिला दें कि जुलाई में हुए प्रदर्शनों के बाद दिल्ली पुलिस ने कई मामले दर्ज किए थे। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने प्राथमिकियों को निरस्त कर दिया था। साथ ही अदालती आदेश में यह भी कहा गया था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन में केवल भागीदारी अपने आप में अपराध नहीं मानी जा सकती। ऐसे में जब महिला पुलिसकर्मियों के साथ बदसलूकी और शारीरिक खींचतान के मामले सामने आ रहे हैं और पुरुष पुलिसकर्मियों पर दुर्व्यवहार के झूठे आरोप तक लगाये जा रहे हैं तब यह सवाल प्रमुखता से उठता है कि क्या एफआईआर निरस्त कर प्रदर्शनकारियों को सुधरने का जो मौका दिया गया था उसका उन्होंने गलत फायदा उठाया? दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस भी आरोप प्रत्यारोप के इस दौर में तकनीक के सहारे अपना बचाव कर रही है। नई दिल्ली क्षेत्र में तैनात पुलिसकर्मियों की वर्दी पर बॉडी-वॉर्न कैमरे लगाए गए हैं। संसद मार्ग पर प्रदर्शन से निपटने के लिए तैयार पुलिसकर्मियों की वर्दी पर ये छोटे कैमरे साफ दिखाई दे रहे हैं। पुलिस की रणनीति में सार्वजनिक उद्घोषणा के लिए लाउडस्पीकर का इस्तेमाल बढ़ाया गया है और कई पुलिसकर्मी डंडों के बिना तैनात दिखाई दिए। देखा जाये तो बॉडीकैम का अर्थ केवल पुलिस को आरोपों से बचाना नहीं है। यदि कोई पुलिसकर्मी सीमा पार करता है तो वही कैमरा उसके खिलाफ भी प्रमाण बन सकता है। यदि कोई प्रदर्शनकारी पुलिस को जानबूझकर उकसाता है, बैरिकेड तोड़ता है, हमला करता है या बाद में घटनाक्रम का अधूरा वीडियो प्रस्तुत करता है तो पुलिस के पास पूरी घटना का अपना दृश्य रिकॉर्ड मौजूद रहेगा। इसके अलावा, सुरक्षा व्यवस्था में दूसरा बड़ा परिवर्तन बहुस्तरीय बैरिकेडिंग है। प्रदर्शनकारियों को प्रतिबंधित क्षेत्रों की ओर बढ़ने से रोकने के लिए कई स्तरों पर अवरोध लगाए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि जुलाई की घटनाओं के बाद दिल्ली पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों ने अपनी तैयारियों की व्यापक समीक्षा की। ताजा प्रदर्शनों से पहले उन स्थानों तक की पहचान की गई जहाँ टूटा हुआ फुटपाथ, पत्थर अथवा दीवार का हिस्सा तनाव बढ़ने पर हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। जुलाई के अनुभवों के बाद सुरक्षा व्यवस्था की इस तरह समीक्षा बताती है कि अब भीड़ प्रबंधन में केवल पुलिस बल की संख्या नहीं, बल्कि प्रदर्शन-स्थल के भौतिक वातावरण को भी सुरक्षा का हिस्सा माना जा रहा है। एक और समस्या सोशल मीडिया की है। पुलिसकर्मी के चेहरे के बिल्कुल सामने कैमरा रख देना, लगातार सवाल करना, नारे लगाना अथवा ऐसी परिस्थिति बनाना जिसमें उससे कोई तीखी प्रतिक्रिया निकल जाए, ऐसे माहौल में पुलिसकर्मी के कुछ सेकंड के नियंत्रण खोने का परिणाम लाखों लोगों तक पहुंचने वाला वीडियो हो सकता है। इसीलिए नई पुलिस रणनीति में आत्मसंयम स्वयं एक सुरक्षा उपकरण बन गया है। इस चुनौती की गंभीरता तब और बढ़ जाती है जब तकनीक के जरिये फर्जी दृश्य भी बनाए जाने लगें। दिल्ली पुलिस ने हाल में एक ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार किया है जिसने एआई की मदद से ऐसा वीडियो बनाया जिसमें एक पुलिसकर्मी को महिला के साथ दुर्व्यवहार करते दिखाया गया था। बहरहाल, इसमें कोई दो राय नहीं कि दिल्ली पुलिस के सामने इस समय बेहद कठिन चुनौती है। उसे प्रदर्शन के लोकतांत्रिक अधिकार की रक्षा करनी है। उसे प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा करनी है। अपने जवानों विशेषकर महिला पुलिसकर्मियों की सुरक्षा करनी है। उसे आरोप लगने पर जवाबदेह भी होना है। साथ ही बैरिकेड टूटने, प्रतिबंधित क्षेत्र में भीड़ घुसने अथवा हिंसा होने की स्थिति में कानून भी लागू करना है। शायद इसीलिए राजधानी की पुलिसिंग तेजी से बदल रही है। वर्दी पर बॉडीकैम, बहुस्तरीय बैरिकेड, लाउडस्पीकर से लगातार चेतावनी और सूचना, अतिरिक्त पुलिस तथा अर्धसैनिक बल, संवेदनशील रास्तों की पहले से पहचान, मोबाइल वीडियो के समानांतर पुलिस की अपनी रिकॉर्डिंग और सोशल मीडिया पर फैलने वाली संदिग्ध सामग्री की डिजिटल जांच। लेकिन तकनीक चाहे जितनी बढ़ जाए, अंततः सबसे बड़ी परीक्षा सड़क पर खड़े पुलिसकर्मी के धैर्य की ही है। जनता भी पुलिस की दिक्कतों को समझ रही है और उसका हौसला बढ़ाने के लिए सड़कों पर उतर रही है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 7 Oct 2026 1:06 pm

पीएम मोदी के नेतृत्व के 25 साल पूरे, भाजपा नेताओं ने कहा- हर क्षेत्र में व्यापक बदलाव और विकास हुआ

पीएम मोदी के नेतृत्व के 25 साल पूरे, भाजपा नेताओं ने कहा- हर क्षेत्र में व्यापक बदलाव और विकास हुआ

समाचार नामा 7 Oct 2026 12:51 pm

'7 अक्टूबर भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में स्वर्णिम दिन', पीएम मोदी के जनसेवा के 25 वर्ष पर अमित शाह ने की प्रशंसा

'7 अक्टूबर भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में स्वर्णिम दिन', पीएम मोदी के जनसेवा के 25 वर्ष पर अमित शाह ने की प्रशंसा

समाचार नामा 7 Oct 2026 12:24 pm

गुजरात से आई 'सेवा संकल्प बाइक यात्रा' के प्रतिभागियों का काशी में हुआ भव्य स्वागत

गुजरात से आई 'सेवा संकल्प बाइक यात्रा' के प्रतिभागियों का काशी में हुआ भव्य स्वागत

समाचार नामा 7 Oct 2026 12:23 pm

क्या देश में मोदी विरोधी लहर शुरू हो चुकी है? अगर आज चुनाव हुए तो क्या परिणाम हो सकते हैं?

आज जब नरेंद्र मोदी सरकार के मुखिया के रूप में लगातार पच्चीस साल पूरे कर रहे हैं, तब भारतीय राजनीति की एक बेहद दिलचस्प और महत्वपूर्ण तस्वीर सामने आ रही है। सात अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में सरकार की कमान संभालने वाले नरेंद्र मोदी ने पहले गुजरात और फिर देश की सत्ता का नेतृत्व करते हुए बिना किसी लंबे अंतराल के पच्चीस वर्ष पूरे कर लिए हैं। यह अपने आप में भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की असाधारण राजनीतिक यात्रा है। इस अवसर पर सत्ता पक्ष इसे नेतृत्व, सेवा, विकास और निरंतर जनविश्वास की उपलब्धि के रूप में देख रहा है, तो दूसरी ओर विपक्ष ठीक इसी समय चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता, मतदाता सूची और लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर सरकार और चुनाव आयोग को घेर रहा है। यानी नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा के पच्चीसवें वर्ष का यह पड़ाव उस समय आया है जब सत्ता के सामने सबसे बड़ा सवाल शायद विपक्ष की ताकत का नहीं, बल्कि संस्थाओं और जनविश्वास का है। देखा जाये तो सरकार और भारतीय जनता पार्टी के लिए आज का दिन स्वाभाविक रूप से उपलब्धियों को गिनाने का दिन है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने नरेंद्र मोदी के पच्चीस वर्ष के शासन को ऐतिहासिक उपलब्धि बताते हुए उनके गुजरात के मुख्यमंत्रित्व और केंद्र की तीन लगातार सरकारों को सार्वजनिक विश्वास का प्रमाण बताया है। सरकार की ओर से कल्याणकारी योजनाओं, बुनियादी ढांचे, डिजिटल व्यवस्था, आर्थिक सुधार, राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और तकनीकी उपलब्धियों को इस लंबे सफर की प्रमुख उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। प्रधानमंत्री ने भी इस अवसर को सेवा और राष्ट्रहित के भाव से जोड़ा है। लेकिन राजनीति सिर्फ उपलब्धियों की सूची से नहीं चलती। देश की राजनीति का दूसरा चेहरा भी उतनी ही ताकत से दिखाई दे रहा है। छह अक्टूबर को राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के विरोध में प्रदर्शन किया। संसद से चुनाव आयोग की ओर बढ़ते विपक्षी सांसदों को पुलिस ने रोका, जिसके बाद धरना, हिरासत और राजनीतिक टकराव की तस्वीरें सामने आईं। राहुल गांधी का बैरिकेड पर चढ़ना और “ज्ञानेश, इट्स डन ब्रो” जैसी युवा शैली की भाषा सोशल मीडिया पर तेजी से फैली। इस पूरे घटनाक्रम ने चुनाव आयोग और मतदाता सूची के विवाद को अचानक देश की राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया। विपक्ष इस पूरे विवाद को केवल मतदाता सूची की तकनीकी प्रक्रिया नहीं मान रहा। उसके लिए यह लोकतंत्र, मताधिकार और चुनावी निष्पक्षता का सवाल है। कांग्रेस और उसके सहयोगी आरोप लगा रहे हैं कि मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने से नागरिकों के मतदान अधिकार पर असर पड़ सकता है। विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग कर रहा है और इस पूरे मामले को व्यापक राजनीतिक आंदोलन में बदलने की कोशिश कर रहा है। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि कांग्रेस लगातार चुनाव हारने के बाद चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ा कर रही है और उसे अपनी राजनीतिक कमजोरी का जिम्मेदार संस्थाओं को बनाने के बजाय जनता का विश्वास जीतने की कोशिश करनी चाहिए। भाजपा का यह भी सवाल है कि जिस चुनावी व्यवस्था के माध्यम से विपक्ष कई राज्यों में जीत हासिल करता रहा, उसी व्यवस्था को अपनी हार के बाद अविश्वसनीय कैसे कहा जा सकता है। यहीं से इस समय की राजनीति का सबसे बड़ा द्वंद्व सामने आता है। विपक्ष का सवाल है कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर प्रश्न उठे तो लोकतंत्र कैसे सुरक्षित रहेगा? सत्ता पक्ष का सवाल है कि बिना निर्णायक प्रमाण के चुनावी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करने से क्या लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा ही कमजोर नहीं होगा? दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क रख रहे हैं, लेकिन एक तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर बहस अब महज विपक्षी भाषण नहीं रह गई है। हालांकि इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि विपक्ष के सारे आरोप सिद्ध हो चुके हैं। चुनाव आयोग पर गंभीर सवाल उठना एक बात है और “चुनाव चोरी सिद्ध हो जाना” दूसरी बात है। शायद यही वह बिंदु है जहां से आम जनता और राजनीतिक विमर्श के बीच अंतर दिखाई देता है। राजनीति की दुनिया में इस समय SIR, चुनाव आयोग और ज्ञानेश कुमार सबसे बड़ा मुद्दा दिखाई दे रहे हैं। समाचार चैनलों और सोशल मीडिया पर भी यही सबसे अधिक दिखाई दे रहा है। लेकिन जब हम व्यापक जनमत संकेतकों को देखते हैं तो तस्वीर कुछ अलग है। सितंबर 2026 के ताजा इप्सॉस सर्वेक्षण में सात में से लगभग सात भारतीयों ने माना कि देश सही दिशा में जा रहा है और करीब आठ में से आठ ने वर्तमान आर्थिक स्थिति को सकारात्मक माना है। लेकिन उसी सर्वेक्षण में बेरोजगारी भारत की सबसे बड़ी चिंता बनी हुई है। यानी देश के भविष्य को लेकर आशावाद मौजूद है, मगर नौकरी और अवसर को लेकर बेचैनी भी उतनी ही वास्तविक है। यही भारतीय जनमत की वर्तमान जटिलता है। जनता का एक बड़ा हिस्सा यह मान सकता है कि देश आगे बढ़ रहा है, अर्थव्यवस्था टिकाऊ है, बुनियादी ढांचे में बदलाव आया है और भारत की वैश्विक स्थिति मजबूत हुई है, लेकिन उसी व्यक्ति के घर में नौकरी, आमदनी, महंगाई और भविष्य की सुरक्षा की चिंता भी हो सकती है। सितंबर में शहरी उपभोक्ता विश्वास में भी सुधार आया और भारत का उपभोक्ता विश्वास सूचकांक बढ़ा। इसका मतलब यह हुआ कि आर्थिक तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है; फिर भी रोजगार सबसे बड़ा चिंता का विषय बना हुआ है। इससे नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के सामने असली राजनीतिक प्रश्न भी स्पष्ट होता है। चुनौती केवल यह नहीं है कि विपक्ष कितना आक्रामक है। चुनौती यह है कि सरकार आर्थिक उपलब्धियों और बड़े राष्ट्रीय लक्ष्यों की कथा को आम नागरिक की रोजमर्रा की जिंदगी से कितना जोड़ पाती है। जब विकास का अर्थ सड़क, रेल, डिजिटल भुगतान और वैश्विक प्रतिष्ठा से आगे बढ़कर नौकरी, स्थिर आय और युवा के भविष्य में दिखाई देने लगेगा, तभी सरकारी उपलब्धियों का राजनीतिक असर और गहरा होगा। साथ ही नरेंद्र मोदी के व्यक्तिगत नेतृत्व को लेकर तस्वीर अभी भी पूरी तरह बदलती हुई नहीं दिखती। अगस्त 2026 के इंडिया टुडे-सी वोटर सर्वेक्षण में 48.7 प्रतिशत लोगों ने मोदी को अगले प्रधानमंत्री के लिए सबसे पसंदीदा विकल्प माना। हालांकि जनवरी के मुकाबले उनके समर्थन में कुछ कमी आई है। इस गिरावट को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन इसे सीधे मोदी विरोधी लहर भी नहीं कहा जा सकता। दूसरी ओर, राहुल गांधी अभी तक उस राजनीतिक बढ़त को हासिल नहीं कर पाए हैं, जो मोदी के समर्थन में कमी आने पर उन्हें स्वाभाविक रूप से मिल सकती थी। यानी मोदी की राजनीतिक ताकत अभी भी बनी हुई है, लेकिन उसमें एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई दे रहा है। पहले मोदी को लेकर बहस अक्सर इस बात पर केंद्रित रहती थी कि उनके मुकाबले कौन है? अब बहस का एक हिस्सा इस बात पर भी केंद्रित होने लगा है कि सरकार और संवैधानिक संस्थाएं जनता का विश्वास कितना कायम रख पा रही हैं? यही बदलाव आगे चलकर महत्वपूर्ण हो सकता है। सोशल मीडिया पर भी इस समय राजनीति का यही दोहरा चेहरा दिखाई दे रहा है। राहुल गांधी के प्रदर्शन के वीडियो और उनके अंदाज को उनके समर्थक पसंद कर रहे हैं, जबकि विरोधी इसे राजनीतिक दिखावा बता रहे हैं। भाजपा भी सोशल मीडिया के जरिए इसका जवाब दे रही है। यानी सोशल मीडिया ने राजनीतिक बहस को जरूर ज्यादा तेज और आक्रामक बना दिया है, लेकिन वहां दिखाई देने वाली प्रतिक्रियाओं को पूरे देश की राय मान लेना ठीक नहीं होगा। सोशल मीडिया पर वही आवाज ज्यादा सुनाई देती है, जिसके पीछे बड़ी संख्या में सक्रिय और भावनात्मक समर्थक हों। इसलिए सोशल मीडिया का शोर यह तो बताता है कि किसी मुद्दे पर बहस कितनी तेज है, लेकिन यह नहीं बताता कि जनता का बड़ा हिस्सा वास्तव में क्या सोच रहा है। इस पूरे परिदृश्य में युवाओं की बेचैनी को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कॉकरोच जनता पार्टी जैसे युवा केंद्रित आंदोलनों और उनसे जुड़ी डिजिटल राजनीति ने यह दिखाया है कि एक नया राजनीतिक असंतोष उभर रहा है जो जरूरी नहीं कि सीधे कांग्रेस या भाजपा की पारंपरिक राजनीति में समा जाए। रोजगार, परीक्षा व्यवस्था, अवसर और संस्थागत निष्पक्षता जैसे मुद्दे इस नई पीढ़ी को प्रभावित कर रहे हैं। यह नाराज़गी अभी किसी एक पार्टी के पक्ष में संगठित नहीं हुई है, लेकिन इसे हल्के में लेना भी उचित नहीं होगा। इसलिए आज की भारतीय राजनीति को अगर एक वाक्य में समझना हो तो तस्वीर यह है कि नरेंद्र मोदी का जनाधार टूटा नहीं है, मगर उनके नेतृत्व के इर्द-गिर्द सवालों की प्रकृति बदल रही है। व्यक्तिगत लोकप्रियता अभी मजबूत है, सरकार की उपलब्धियों का नैरेटिव अभी जीवित और प्रभावी है, देश की आर्थिक दिशा को लेकर आशावाद भी मौजूद है; लेकिन रोजगार की चिंता, युवा असंतोष और चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता पर उठते सवाल एक नया दबाव पैदा कर रहे हैं। मोदी के लिए असली चुनौती विपक्ष की किसी एक रैली से नहीं, बल्कि इन अलग-अलग चिंताओं के एक साथ जुड़ जाने से पैदा हो सकती है। फिलहाल स्थिति को “मोदी विरोधी लहर” कहना अतिशयोक्ति होगी। लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि जनता के भीतर कोई बेचैनी नहीं है। बेचैनी है, सवाल हैं, संस्थाओं को लेकर आशंका है और युवाओं में अवसर को लेकर अधीरता है। साथ ही देश के बड़े हिस्से में स्थिरता, आर्थिक दिशा और प्रधानमंत्री के नेतृत्व को लेकर भरोसा भी कायम है। दूसरे शब्दों में कहें तो भारतीय मतदाता इस समय न तो पूरी तरह नाराज़ होकर सत्ता से विमुख दिखाई दे रहा है और न ही आंखें बंद करके संतुष्ट है। यही नरेंद्र मोदी के पच्चीसवें वर्ष की सबसे बड़ी राजनीतिक सच्चाई है। यहां यह भी सवाल उठता है कि देश में आज चुनाव हों तो क्या होगा? उपलब्ध ताजा राष्ट्रीय जनमत संकेतक सरकार के लिए चेतावनी जरूर देते हैं लेकिन उसके लिए खतरे का संकेत नहीं दे रहे। अगस्त 2026 के इंडिया टुडे-सी वोटर सर्वेक्षण के मुताबिक आज लोकसभा चुनाव होने पर भाजपा को 261 और एनडीए को 326 सीटें मिल सकती हैं, जबकि इंडिया गठबंधन 185 सीटों तक पहुंच सकता है। यानी भाजपा अपने दम पर बहुमत से नीचे रहेगी, लेकिन एनडीए फिर भी आराम से सरकार बनाने की स्थिति में रहेगा। बहरहाल, मोदी की सबसे बड़ी ताकत आज भी उनका व्यक्तिगत नेतृत्व और जनता के एक बड़े हिस्से से बना सीधा राजनीतिक जुड़ाव है। लेकिन आने वाले वर्षों में उनकी सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि विकास, लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता, रोजगार और युवाओं के भविष्य को लेकर उठ रहे सवालों का सरकार कितना ठोस और भरोसेमंद जवाब दे पाती है। सरकार के मुखिया के रूप में 25 वर्ष पूरे होने पर नरेंद्र मोदी ने 2047 तक आत्मनिर्भर भारत बनाने का संकल्प दोहराते हुए कहा है, “वी विल डू इट।” यह नारा आने वाले भारत के लिए उनके बड़े लक्ष्य और राजनीतिक आत्मविश्वास को दर्शाता है। लेकिन इस लक्ष्य को जमीन पर उतारने के लिए सिर्फ संकल्प नहीं, बल्कि जनता के भरोसे को लगातार मजबूत करना भी जरूरी होगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि 25 वर्षों तक सरकार के मुखिया के रूप में बने रहना इतिहास है, लेकिन इतिहास की असली पहचान इस बात से होती है कि वह भविष्य को किस दिशा में ले जाता है। अब मोदी के सामने चुनौती इसी भविष्य को उपलब्धियों के साथ-साथ जनता के भरोसे का भविष्य बनाने की है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 7 Oct 2026 12:08 pm

आज दुनिया भारत के पायलट की बात कर रही, कल 'मेड इन इंडिया' विमान की बात करेगी : पीएम मोदी

आज दुनिया भारत के पायलट की बात कर रही, कल 'मेड इन इंडिया' विमान की बात करेगी : पीएम मोदी

समाचार नामा 7 Oct 2026 11:56 am

RBI का बड़ा फैसला: 44 महीने बाद रेपो रेट बढ़कर 5.50% हुआ, महंगे होंगे लोन

आरबीआई का यह फैसला ऐसे समय आया है जब घरेलू महंगाई के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर भी कीमतों को लेकर दबाव बना हुआ है। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के कारण वैश्विक आर्थिक माहौल चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।

देशबन्धु 7 Oct 2026 10:49 am

Opposition Protest: SIR के विरोध में विपक्ष का मार्च, राहुल-प्रियंका समेत नेताओं ने घंटों दिया धरना

Opposition Protest: SIR के विरोध में विपक्ष का मार्च, राहुल-प्रियंका समेत नेताओं ने घंटों दिया धरना

समाचार नामा 7 Oct 2026 8:40 am

Seva Yatra: वाराणसी से वडनगर पहुंची सेवा यात्रा, 500 बाइकर्स की मौजूदगी में आज होगा समापन समारोह

Seva Yatra: वाराणसी से वडनगर पहुंची सेवा यात्रा, 500 बाइकर्स की मौजूदगी में आज होगा समापन समारोह

समाचार नामा 7 Oct 2026 8:33 am

दिल्ली में आज विपक्ष का शक्ति प्रदर्शन, CEO कार्यालय पर जुटेंगे AAP-कांग्रेस और लेफ्ट के नेता

वोट चोरी के आरोपों को लेकर आम आदमी पार्टी (आप) समेत विपक्षी दलों ने दिल्ली में सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करने का ऐलान किया है

देशबन्धु 7 Oct 2026 7:40 am

नितिन नवीन दो दिवसीय वाराणसी दौरे पर, 'सेवा यात्रियों' की जनसभा को करेंगे संबोधित

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अध्यक्ष नितिन नवीन सात और आठ अक्टूबर को उत्तर प्रदेश के दो दिवसीय दौरे पर वाराणसी में रहेंगे

देशबन्धु 7 Oct 2026 7:30 am

साइबर फ्रॉड पर PM मोदी का बड़ा जोर, टेक्नोलॉजी से मजबूत समाधान विकसित करने की अपील

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ग्लोबल सिस्टम फॉर मोबाइल कम्युनिकेशंस एसोसिएशन (जीएसएमए) के संचालन मंडल के सदस्यों के साथ बातचीत की और मोबाइल संचार उद्योग से साइबर धोखाधड़ी से निपटने के लिए टेक्नोलॉजी आधारित मजबूत समाधानों की आवश्यकता पर बल दिया

देशबन्धु 7 Oct 2026 7:20 am

दिल्ली में आज विपक्ष का बड़ा मार्च, कांग्रेस-AAP और लेफ्ट 1 बजे CEO कार्यालय तक जाएंगे

कांग्रेस, आम आदमी पार्टी (आप) और वामपंथी दल दोपहर 1 बजे दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) के कार्यालय तक विरोध मार्च निकालेंगे।

देशबन्धु 7 Oct 2026 7:10 am

'चुनाव आयोग से बिना अपॉइंटमेंट मिलना चाहते थे 240 सांसद, प्रोटोकॉल के खिलाफ प्रस्ताव,' ईसीआई ने जारी किया प्रेस नोट

भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने मंगलवार को विपक्षी सांसदों के मार्च और मुलाकात को लेकर स्थिति स्पष्ट करते हुए प्रेस नोट जारी किया है

देशबन्धु 7 Oct 2026 6:20 am

राहुल-प्रियंका हिरासत से रिहा, चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन पर गरमाई सियासत

लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी समेत कांग्रेस नेताओं को किंग्सवे कैंप से रिहा कर दिया गया है। इसके बाद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा किंग्सवे कैंप स्थित न्यू पुलिस लाइन से रवाना हो गए हैं।

देशबन्धु 7 Oct 2026 1:41 am

ओडिशा राज्य निर्वाचन आयोग ने 2027 पंचायत एवं नगर निगम चुनाव की तैयारियों पर सर्वदलीय बैठक की

ओडिशा राज्य निर्वाचन आयोग ने 2027 पंचायत एवं नगर निगम चुनाव की तैयारियों पर सर्वदलीय बैठक की

समाचार नामा 6 Oct 2026 11:23 pm

देशव्यापी आंदोलन को 'आप' का समर्थन, केजरीवाल बोले- ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देना चाहिए

देशव्यापी आंदोलन को 'आप' का समर्थन, केजरीवाल बोले- ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देना चाहिए

समाचार नामा 6 Oct 2026 10:14 pm

चंडीगढ़ सीबीआई रेड को लेकर विपक्ष आक्रामक, अकाली दल और कांग्रेस ने 'आप' सरकार को घेरा

चंडीगढ़ सीबीआई रेड को लेकर विपक्ष आक्रामक, अकाली दल और कांग्रेस ने 'आप' सरकार को घेरा

समाचार नामा 6 Oct 2026 9:00 pm

ओवैसी का आरोप- 'फॉर्म 7' के जरिए मुस्लिम वोटरों के नाम हटाने की रची जा रही साजिश

ओवैसी का आरोप- 'फॉर्म 7' के जरिए मुस्लिम वोटरों के नाम हटाने की रची जा रही साजिश

समाचार नामा 6 Oct 2026 8:50 pm

दिल्ली: ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर हंगामा, विरोध मार्च के दौरान राहुल-प्रियंका हिरासत में

दिल्ली: ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर हंगामा, विरोध मार्च के दौरान राहुल-प्रियंका हिरासत में

समाचार नामा 6 Oct 2026 8:49 pm

चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट पर हमला बंद करे कांग्रेस, 2014 से चल रहा है यही नाटक: रिजिजू

चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट पर हमला बंद करे कांग्रेस, 2014 से चल रहा है यही नाटक: रिजिजू

समाचार नामा 6 Oct 2026 8:48 pm

मुंबई के विकास में जनभागीदारी बढ़ाने के लिए ‘पार्टिसिपेट मुंबई’ लॉन्च, सीएम फडणवीस बोले-परियोजनाओं को मिलेगा बढ़ावा

मुंबई के विकास में जनभागीदारी बढ़ाने के लिए ‘पार्टिसिपेट मुंबई’ लॉन्च, सीएम फडणवीस बोले-परियोजनाओं को मिलेगा बढ़ावा

समाचार नामा 6 Oct 2026 8:40 pm

वाराणसी में 'नमो बुक फेस्ट' का आयोजन, एक छत के नीचे पीएम मोदी पर लिखी किताबों का संग्रह

वाराणसी में 'नमो बुक फेस्ट' का आयोजन, एक छत के नीचे पीएम मोदी पर लिखी किताबों का संग्रह

समाचार नामा 6 Oct 2026 8:08 pm

6,500 छात्रों ने बनाई ‘ह्यूमन रंगोली’, गुजरात सीएम भूपेंद्र पटेल ने किया निरीक्षण

6,500 छात्रों ने बनाई ‘ह्यूमन रंगोली’, गुजरात सीएम भूपेंद्र पटेल ने किया निरीक्षण

समाचार नामा 6 Oct 2026 5:59 pm

वडनगर और वाराणसी में बुधवार को होगा भाजपा की 'सेवा संकल्प यात्रा' का भव्य समापन

वडनगर और वाराणसी में बुधवार को होगा भाजपा की 'सेवा संकल्प यात्रा' का भव्य समापन

समाचार नामा 6 Oct 2026 5:49 pm

खुले बोरवेल पर सख्त कार्रवाई की तैयारी, कर्नाटक शुरू करेगा 'बोरवेल सुरक्षा अभियान'

खुले बोरवेल पर सख्त कार्रवाई की तैयारी, कर्नाटक शुरू करेगा 'बोरवेल सुरक्षा अभियान'

समाचार नामा 6 Oct 2026 5:06 pm

सीईसी ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें, नहीं तो पूरा देश बनेगा जंतर-मंतर: अभिजीत दिपके

सीईसी ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें, नहीं तो पूरा देश बनेगा जंतर-मंतर: अभिजीत दिपके

समाचार नामा 6 Oct 2026 4:24 pm

पहाड़ों की राजनीति लेने लगी करवट! Uttarakhand Congress में छिड़ी महाभारत और Harish Rawat के 'तेवर' बड़े सियासी तूफान के संकेत दे रहे हैं

पहाड़ की राजनीति में वैसे तो मौसम कब करवट ले ले, कहा नहीं जा सकता, लेकिन इस बार कांग्रेस के भीतर का मौसम कुछ ज्यादा ही बिगड़ा हुआ नजर आ रहा है। एक तरफ भाजपा लगातार संगठन को चुनावी मोड में ले जा रही है, दूसरी तरफ कांग्रेस अपने ही घर की उठापटक से बाहर निकलने का रास्ता तलाश रही है। इस पूरी कहानी के केंद्र में एक बार फिर वही पुराने चेहरे हरीश रावत हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार सवाल यह है कि लगातार चुनावी पराजयों के बाद भी कांग्रेस आखिर बार-बार उन्हीं पर दांव क्यों लगाये? और क्या अब भी उनके पास उत्तराखंड की राजनीति को निर्णायक रूप से प्रभावित करने की उतनी ही ताकत बची है? हम आपको बता दें कि कांग्रेस हाईकमान ने हरीश रावत की ‘धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा’ को लेकर साफ संदेश दिया है कि चुनावी राज्य में किसी एक नेता का समानांतर अभियान नहीं चल सकता और पार्टी को सामूहिक रूप से चुनाव लड़ना होगा। लेकिन हरीश रावत पीछे हटने की बजाय अपनी यात्रा पर आगे बढ़े। उनका कहना है कि वे कांग्रेस को सत्ता में वापस लाने के लिए जनता के बीच जा रहे हैं। सुनने में यह बात बिल्कुल कांग्रेस के हित में लगती है, लेकिन राजनीति में सिर्फ इरादा नहीं, नतीजे भी देखे जाते हैं और यहीं से हरीश रावत की मौजूदा राजनीतिक हैसियत पर सवाल उठने शुरू होते हैं। हरीश रावत उत्तराखंड के बड़े नेताओं में रहे हैं, इसमें कोई दो राय नहीं। उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली, केंद्र की राजनीति में लंबी पारी खेली और उत्तराखंड कांग्रेस को कई मुश्किल दौर में संभाला। लेकिन राजनीति में किसी नेता का कद सिर्फ उसके पुराने पदों से नहीं मापा जाता। चुनावी राजनीति में जनता का फैसला सबसे बड़ा पैमाना होता है और अगर इसी पैमाने पर हरीश रावत के पिछले कुछ चुनावों को देखा जाए तो तस्वीर बहुत चमकदार नहीं दिखाई देती। 2017 का विधानसभा चुनाव शायद इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। मुख्यमंत्री रहते हुए हरीश रावत ने दो विधानसभा सीटों से चुनाव लड़ने का फैसला किया। हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा, दोनों सीटों पर वह मैदान में उतरे, लेकिन दोनों जगह हार गए। हरिद्वार ग्रामीण में भाजपा के यतीश्वरानंद ने उन्हें 12 हजार से ज्यादा वोटों से हराया, जबकि किच्छा में भाजपा के राजेश शुक्ला ने उन्हें शिकस्त दी। यानी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा उत्तराखंड का सबसे बड़ा कांग्रेसी चेहरा विधानसभा तक नहीं पहुंच सका। उस चुनाव में कांग्रेस की हालत इतनी खराब हुई कि पार्टी 70 में से सिर्फ 11 सीटों पर सिमट गई और भाजपा ने 57 सीटें जीतकर सत्ता पर कब्जा कर लिया। वैसे राजनीति में हार के बाद वापसी संभव होती है और हरीश रावत ने भी कोशिश जारी रखी। 2019 में वे नैनीताल-ऊधमसिंह नगर लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में उतरे, लेकिन भाजपा के अजय भट्ट के सामने टिक नहीं सके। अजय भट्ट को 7.72 लाख से ज्यादा वोट मिले और हरीश रावत करीब 4.33 लाख वोट पर रुक गए। हार का अंतर तीन लाख से ज्यादा रहा। इसके बाद 2022 में विधानसभा चुनाव आया तो रावत ने लालकुआं को अपना रणक्षेत्र बनाया। इस बार भी भाजपा के मोहन सिंह बिष्ट ने उन्हें 17,527 वोटों के अंतर से हरा दिया। यानी 2017 में दो विधानसभा सीटों पर हार, 2019 में लोकसभा की हार और 2022 में विधानसभा की हार, लगातार चुनावी पराजय का यह सिलसिला किसी भी नेता के राजनीतिक भविष्य पर सवाल खड़ा करने के लिए काफी है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। 2024 के लोकसभा चुनाव में हरिद्वार से कांग्रेस ने हरीश रावत के बेटे वीरेंद्र रावत को मैदान में उतारा। मुकाबला भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत से था। नतीजा फिर कांग्रेस के खिलाफ गया। त्रिवेंद्र सिंह रावत ने वीरेंद्र रावत को करीब 1.64 लाख वोटों से हरा दिया। यानी जिस परिवार को कांग्रेस लंबे समय से उत्तराखंड की राजनीति में एक मजबूत आधार मानती रही है, उसके सामने भी चुनावी जमीन उतनी मजबूत दिखाई नहीं दी, जितनी पार्टी शायद मानती रही है। यहीं से सवाल पैदा होता है कि बार-बार हरीश रावत पर ही दांव क्यों लगाया जाये? क्या कांग्रेस के पास उत्तराखंड में कोई नया चेहरा नहीं है? क्या पार्टी ने नई पीढ़ी का नेतृत्व तैयार नहीं किया? क्या संगठन के भीतर ऐसा कोई नेता नहीं है जो हरीश रावत के बिना कांग्रेस को चुनावी मुकाबले में खड़ा कर सके? या फिर कांग्रेस हाईकमान को अब भी लगता है कि चुनाव जीतने की क्षमता भले कम हुई हो, लेकिन हरीश रावत के पास वह राजनीतिक अनुभव, जनसंपर्क और संगठनात्मक पकड़ है जिसे नजरअंदाज करना पार्टी के लिए नुकसानदेह होगा? देखा जाये तो हरीश रावत की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वे उत्तराखंड की राजनीति को बेहद करीब से जानते हैं। वे पहाड़ की भाषा समझते हैं, मैदान की राजनीति को समझते हैं और कांग्रेस के पुराने कार्यकर्ताओं के बीच उनकी पकड़ भी है। वे राजनीतिक मुद्दों को जनता की भाषा में बदलने की कला जानते हैं। लेकिन उनकी सबसे बड़ी कमजोरी भी अब सामने है। उनकी व्यक्तिगत चुनावी विश्वसनीयता पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। जब कोई नेता खुद लगातार चुनाव हार रहा हो तो उसके समर्थकों के लिए यह कहना आसान नहीं होता कि वही नेता पार्टी को सत्ता तक पहुंचा देगा। यही वजह है कि कांग्रेस के भीतर हरीश रावत की भूमिका को लेकर असमंजस दिखाई देता है। पार्टी उन्हें पूरी तरह किनारे नहीं कर सकती, क्योंकि उनका अनुभव और जनाधार अब भी उपयोगी है। लेकिन पार्टी उन्हें पूरी तरह आगे भी नहीं कर सकती, क्योंकि तब बाकी नेताओं और गुटों के बीच असंतोष बढ़ने का खतरा है। अगर हरीश रावत अपनी अलग राजनीतिक गतिविधियां जारी रखते हैं तो हाईकमान को डर है कि चुनाव से पहले ही कांग्रेस का मंच अलग-अलग हिस्सों में बंट जाएगा। देखा जाये तो उत्तराखंड कांग्रेस की असली समस्या यही है। उसके पास नेता बहुत हैं, लेकिन नेतृत्व का सर्वमान्य चेहरा नहीं है। हर नेता अपने समर्थकों के साथ खड़ा है, हर गुट अपनी राजनीतिक जगह चाहता है और दिल्ली चाहती है कि चुनाव आते-आते सभी एक मंच पर दिखाई दें। लेकिन पहाड़ की राजनीति में जितनी ऊंचाई होती है, उतने ही मोड़ भी होते हैं। कांग्रेस के सामने इस समय सबसे बड़ा मोड़ नेतृत्व का ही है। उधर भाजपा की कहानी बिल्कुल अलग दिखाई दे रही है। 2017 में भाजपा ने 70 में से 57 सीटें जीतकर कांग्रेस को सत्ता से बाहर किया था। 2022 में भाजपा का आंकड़ा घटकर 47 जरूर हुआ, लेकिन सत्ता उसके हाथ से नहीं निकली। कांग्रेस 19 सीटों तक पहुंची, लेकिन सरकार बनाने से काफी दूर रही। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उत्तराखंड की पांचों सीटें जीतकर कांग्रेस का खाता तक नहीं खुलने दिया। यानी विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के पास लगातार चुनावी जीत की मनोवैज्ञानिक बढ़त भी है और मजबूत संगठन की ताकत भी। भाजपा की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह पिछली जीत के भरोसे बैठी दिखाई नहीं देती। वह उन सीटों पर भी संगठन मजबूत करने में जुटी है जहां उसे विधानसभा चुनाव में हार मिली थी। पार्टी की तैयारी बूथ स्तर तक दिखाई देती है और उसके सामने चुनाव सिर्फ सरकार बचाने का नहीं, बल्कि उत्तराखंड में अपने राजनीतिक वर्चस्व को और मजबूत करने का है। इसके उलट कांग्रेस के पास सरकार के खिलाफ मुद्दों की कोई कमी नहीं है। बेरोजगारी है, भर्ती परीक्षाओं के सवाल हैं, पलायन है, पहाड़ के गांवों का खाली होना है, जमीन और जंगल के सवाल हैं, युवाओं की नाराजगी है और स्थानीय अस्मिता से जुड़े मुद्दे हैं। लेकिन इन मुद्दों को एक बड़े राजनीतिक अभियान में बदलने से पहले कांग्रेस को अपने भीतर की लड़ाई खत्म करनी होगी। यही वह जगह है जहां भाजपा को सबसे बड़ा फायदा मिल रहा है। हालांकि कांग्रेस के लिए उम्मीद पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। 2024 में बद्रीनाथ और मंगलौर विधानसभा उपचुनाव जीतना यह दिखाता है कि भाजपा अजेय नहीं है। लेकिन केदारनाथ उपचुनाव में भाजपा की जीत ने यह भी साफ कर दिया कि कांग्रेस के सामने चुनौती छोटी नहीं है। उसे सिर्फ भाजपा के खिलाफ माहौल बनाने से काम नहीं चलेगा, उसे अपना संगठन, अपना नेतृत्व और अपना चुनावी संदेश तीनों मजबूत करने होंगे। इसी मोड़ पर हरीश रावत का सवाल सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है। अगर रावत पार्टी को मजबूत करने के लिए जनता के बीच जाना चाहते हैं तो कांग्रेस को उनके अनुभव का इस्तेमाल जरूर करना चाहिए। लेकिन अगर उनकी सक्रियता कांग्रेस के भीतर एक और ध्रुवीकरण पैदा करती है तो वही सक्रियता पार्टी के लिए बोझ बन सकती है। कांग्रेस को यह तय करना होगा कि हरीश रावत उसके लिए एक वरिष्ठ मार्गदर्शक और स्टार प्रचारक हैं या फिर एक बार फिर पूरा चुनाव उन्हीं के इर्द-गिर्द लड़ा जाएगा। क्योंकि इन दोनों रास्तों में जमीन-आसमान का फर्क है। देखा जाये तो उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत का अध्याय अभी खत्म नहीं हुआ है, लेकिन यह भी सच है कि उनका सबसे मजबूत दौर पीछे छूट चुका है। उनकी राजनीतिक प्रासंगिकता अब सिर्फ इस बात से तय नहीं होगी कि वे कितनी बड़ी रैलियां करते हैं या कितने जिलों में यात्रा निकालते हैं। असली सवाल यह होगा कि क्या वे कांग्रेस के भीतर बिखरे हुए नेताओं और कार्यकर्ताओं को एक मंच पर ला सकते हैं और क्या उनकी मौजूदगी पार्टी के वोट में बदल सकती है? वहीं कांग्रेस को भी यह समझना होगा कि उत्तराखंड की जनता सिर्फ पुराने चेहरों की यादों पर वोट नहीं करती। पहाड़ की जनता अपने नेताओं से हिसाब मांगती है। वह पूछती है कि पांच साल में क्या हुआ, रोजगार कहां है, गांव क्यों खाली हो रहे हैं, सड़क और स्वास्थ्य की हालत क्या है और आने वाली पीढ़ी के लिए राज्य में क्या बचा है। इसलिए 2027 का चुनाव अगर कांग्रेस सिर्फ हरीश रावत बनाम भाजपा बनाकर लड़ती है तो यह उसकी रणनीतिक भूल होगी। उसे हरीश रावत के अनुभव को इस्तेमाल करते हुए एक नई राजनीतिक टीम और नया नेतृत्व सामने लाना होगा। वरना खतरा यह है कि कांग्रेस हर बार पुराने चेहरे को देखकर पहाड़ की चढ़ाई शुरू तो कर दे, लेकिन चुनाव की चोटी तक पहुंचने से पहले ही फिर किसी पुराने मोड़ पर लौट आए। क्योंकि सवाल अब सिर्फ हरीश रावत के सियासी वजूद का नहीं है। सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड कांग्रेस अपने पुराने सियासी चेहरे से आगे निकलकर नया नेतृत्व पैदा कर पाएगी, या फिर 2027 में भी पहाड़ वही पुराना सवाल पूछेगा कि कांग्रेस के पास आखिर नया क्या है? -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 6 Oct 2026 3:29 pm

यूपी राज्यसभा चुनाव : भाजपा ने जमीनी कार्यकर्ताओं पर जताया भरोसा, सपा बोली- छवि सुधारने की कोशिश

यूपी राज्यसभा चुनाव : भाजपा ने जमीनी कार्यकर्ताओं पर जताया भरोसा, सपा बोली- छवि सुधारने की कोशिश

समाचार नामा 6 Oct 2026 3:16 pm

पश्चिम बंगाल का नाम बदलकर होगा 'पश्चिम बंग', विधानसभा में आएगा बिल; अग्निमित्रा पॉल ने विपक्ष पर साधा निशाना

पश्चिम बंगाल का नाम बदलकर होगा 'पश्चिम बंग', विधानसभा में आएगा बिल; अग्निमित्रा पॉल ने विपक्ष पर साधा निशाना

समाचार नामा 6 Oct 2026 2:20 pm

मशीनरी से लेकर कर्मचारी बीमा तक, रिफॉर्म या फिर आने वाला है कोई स्टॉर्म! GST 2.0 में अब क्या बदलाव करने जा रही है सरकार?

देश में व्यापार को आसान बनाने और टैक्सपेयर्स की सहूलियत के लिए सरकार GST 2.0 में बदलाव की तैयारी कर रही है। 8 अक्टूबर को होने वाली GST काउंसिल की बैठक में ई-वे बिल के नियमों को ढीला करने, गिरफ्तारी के डर को खत्म करने और सालों से फंसे हजारों करोड़ रुपये के इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) को जारी करने जैसे बढ़े बढ़े प्रस्तावों पर मुहर लग सकती है। GST काउंसिल बुधवार को होने वाली अपनी बैठक में कई ऐसे प्रस्तावों पर विचार करेगी, जिनमें ई-वे बिल की ज़रूरतों से जुड़े नियमों को आसान बनाना और GST कानून के तहत गिरफ़्तार करने की शक्तियों को हटाना शामिल है। मामले की जानकारी रखने वाले लोगों ने ET को बताया कि ये प्रस्ताव टैक्सपेयर से जुड़े सभी पहलुओं - जैसे रजिस्ट्रेशन, रिटर्न और रिफ़ंड से लेकर इनपुट टैक्स क्रेडिट और कानूनी विवाद - को कवर करते हैं। ये प्रस्ताव ज़्यादा कागज़ी कार्रवाई वाले अनुपालन (compliance) से हटकर ऑटोमेटेड, डेटा-आधारित और जोखिम-आधारित प्रशासन की ओर बढ़ने का संकेत देते हैं। क्या अहम बदलाव ? अगर जीएसटी काउंसिल इस प्रस्ताव को मंजूरी दे देती है, तो गिरफ्तारी का फैसला अफसरों के हाथ में रहने के बजाय अदालत के अधीन हो जाएगा। वहीं, आपराधिक केस सिर्फ उन्हीं मामलों में दर्ज होंगे जो गंभीर और जानबूझकर की गई टैक्स चोरी से जुड़े होंगे। सबसे मुख्य प्रस्ताव इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) को आसान बनाने से जुड़ा है। इससे कंपनियों की फंसी हुई पूंजी छूटेगी और उद्योग जगत को एक अप्रत्यक्ष बढ़ावा मिलेगा। प्रस्तावों में कई ऐसे व्यापारिक इनपुट्स पर भी क्रेडिट देने की बात कही गई है जो अब तक ब्लॉक रोककर रखे गए थे। कारोबार में आसानी पिछले सितंबर में जीएसटी दरों के व्यापक युक्तिकरण (rate rationalisation) के साथ इस बड़े सुधार की शुरुआत हुई थी, जिसने कारोबारियों और जीएसटी प्रणाली के बीच के तालमेल को पूरी तरह बदल दिया। इस कड़ी में सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) को आसान बनाने का है, जिससे कंपनियों की फंसी हुई पूंजी मुक्त होगी और उद्योग जगत को एक अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन मिलेगा। जीएसटी काउंसिल प्लांट, मशीनरी और इनपुट सेवाओं पर चुकाए गए टैक्स को 5 वर्षों में मासिक किस्तों के रूप में वापस (रिफंड) करने पर विचार करेगी। वर्तमान में कंपनियां आईटीसी के तहत इस पूरी रकम की भरपाई नहीं कर पाती थीं। पहले जिन व्यावसायिक इनपुट पर क्रेडिट ब्लॉक था, अब उसका दायरा बढ़ाने का प्रस्ताव है। इनमें शामिल हैं: कर्मचारियों का स्वास्थ्य और जीवन बीमा। आउटडोर कैटरिंग। दूरसंचार (टेलीकॉम) टावर और कारखानों के बाहर बिछाई गई पाइपलाइन। नष्ट किए जाने वाले एक्सपायर्ड उत्पाद और कुछ मुफ्त नमूने (free samples)। 13 सीटों तक के वाहन, उनका बीमा, रखरखाव और वाहनों की लीजिंग या हायरिंग। इसे भी पढ़ें: GST Council कर अधिकारियों की समितियों को तीन निकायों में समेटने की तैयारी में इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर और फंसी पूंजी 5% टैक्स स्लैब में आने वाले कई उत्पाद (जैसे खाद्य पदार्थ, फार्मा, कपड़ा और इलेक्ट्रिक वाहन) इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर (कच्चे माल पर ज्यादा टैक्स और तैयार माल पर कम टैक्स) का सामना कर रहे हैं। इसके कारण हजारों करोड़ रुपये का आईटीसी अटका हुआ है। इस पूंजी के जारी होने से उद्योग इसे फिर से पूंजीगत व्यय (Capex) के रूप में निवेश कर सकेंगे। टेलीकॉम टावरों और पाइपलाइनों पर क्रेडिट मिलने से दूरसंचार, रिफाइनिंग, पेट्रोकेमिकल, उर्वरक, गैस वितरण और बुनियादी ढांचा (इन्फ्रास्ट्रक्चर) क्षेत्रों के भारी खर्च में बड़ी राहत मिलेगी। इसे भी पढ़ें: GST Council: कई राज्यों में कारोबार के लिए एक ही पंजीकरण आवेदन पर होगा विचार सप्लायर डिफॉल्ट और खरीदार की सुरक्षा पहले यदि कोई सप्लायर टैक्स जमा नहीं करता था, तो उसका खामियाजा वास्तविक खरीदार (genuine buyer) को अपना क्रेडिट गंवाकर भुगतना पड़ता था। यह जीएसटी में विवादों का सबसे बड़ा कारण रहा है। अब यदि सौदा वैध (bona fide) है, तो खरीदार को आईटीसी रखने की अनुमति दी जाएगी और टैक्स वसूली सीधे डिफॉल्ट करने वाले सप्लायर से की जाएगी। चूंकि अब इनवॉइस-टू-इनवॉइस मिलान से खरीदार और विक्रेता का डेटा जुड़ा हुआ है, इसलिए सिस्टम फर्जी या बेमेल क्रेडिट को उसके स्रोत पर ही पकड़ सकता है। ऑटोमेटेड और सरल रिफंड प्रक्रिया अब टैक्सपेयर्स को अधिकारियों द्वारा मैन्युअल जांच के लिए अलग से दस्तावेज अपलोड करने की आवश्यकता नहीं होगी। कस्टम्स, आरबीआई (RBI) के एक्सपोर्ट मॉनिटरिंग सिस्टम और अन्य सरकारी प्रणालियों पर पहले से उपलब्ध डेटा को सीधे रिफंड प्रक्रिया में शामिल कर लिया जाएगा। सेक्टर के लिए राहत IT/ITeS सेक्टर को बड़ी राहत मिल सकती है; काउंसिल विदेशी ब्रांच ऑफिस को की गई सप्लाई को एक्सपोर्ट मानने पर विचार करेगी, जिससे ऐसे ट्रांज़ैक्शन ITC के लिए योग्य हो जाएंगे। विदेशी खरीदारों को बेचे गए लेकिन यहीं किसी स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (SEZ) में डिलीवर किए गए सामान को भी एक्सपोर्ट माना जा सकता है, अगर पेमेंट विदेशी मुद्रा में किया जाए। GST नियमों को एक्सपोर्ट के पेमेंट मिलने से जुड़े RBI के नियमों के साथ भी मिलाने का प्रस्ताव है। प्रस्तावित सुधारों का मकसद कम वैल्यू वाले मामलों में कंप्लायंस और कानूनी विवाद को कम करना भी है। सूत्रों ने बताया कि ₹10,000 से कम रकम वाले मामलों में कोई 'शो-कॉज़ नोटिस' जारी नहीं किया जाएगा और यह बदलाव पेंडिंग मामलों पर भी लागू होगा। उन्होंने बताया कि रिटर्न में अंतर के कारण हर साल लगभग 95,000 नोटिस जारी होते हैं, जबकि ऐसे नोटिस से होने वाली रिकवरी कुल रकम का सिर्फ़ 0.08% होती है। ₹5 करोड़ तक के टर्नओवर वाले और सिर्फ़ अनरजिस्टर्ड ग्राहकों को सप्लाई करने वाले छोटे बिज़नेस को सालाना रिटर्न फाइल करने और तिमाही टैक्स पेमेंट करने की इजाज़त दी जा सकती है। रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को आसान बनाने का प्रस्ताव है, जिसके तहत ऑटोमेटेड रूट के लिए योग्य आवेदकों का रजिस्ट्रेशन तीन वर्किंग दिनों के भीतर हो जाएगा; इस प्रक्रिया में पहले से ही 61% रजिस्ट्रेशन शामिल हैं। ट्रेड नेम, डायरेक्टर या पार्टनर और अतिरिक्त बिज़नेस एड्रेस में बदलाव भी ऑटोमैटिक प्रोसेसिंग के दायरे में आ सकते हैं। इसे भी पढ़ें: GST Council की बैठक में छोटे ई-कॉमर्स विक्रेताओं और टैक्सपेयर्स को मिल सकती है बड़ी राहत कारोबारियों को मिलेगी राहत ? 10,000 रुपये से कम के मामलो में कोई कारण बताओ नोटिस जारी नहीं किया जाएगा। यह नया नियम पेंडिंग मामलों पर भी लागू करने का प्रस्ताव है। जिन छोटे कारोबारियों का सालाना टर्नओवर 5 करोड़ रुपये तक है और वे सिर्फ बिना-रजिस्टर्ड ग्राहकों को ही सामान बेचते है, उन्हें अब सालाना रिटर्न भरने और हर तिमाही टैक्स जमा करने की छूट मिल सकती है। कारोबार का रजिस्ट्रेशन आसान करने का भी प्रस्ताव है। ट्रेड नेम में बदलाव, नए बिजनेस एड्रेस जोड़ने जैसे बदलाव ऑटोमैटिक मंजूर हो सकते हैं

प्रभासाक्षी 6 Oct 2026 2:02 pm

ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें, एसआईआर रद्द हो और बैलेट पेपर से चुनाव हों : इंडिया ब्लॉक

ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें, एसआईआर रद्द हो और बैलेट पेपर से चुनाव हों : इंडिया ब्लॉक

समाचार नामा 6 Oct 2026 12:17 pm

नंदीग्राम पहले से ही भाजपा की जीती हुई सीट, पहली बार रेजीनगर में भी हो सकता है बदलाव : दिलीप घोष

नंदीग्राम पहले से ही भाजपा की जीती हुई सीट, पहली बार रेजीनगर में भी हो सकता है बदलाव : दिलीप घोष

समाचार नामा 6 Oct 2026 10:28 am

SIR Protest: दिल्ली में चुनाव आयोग तक विपक्ष का मार्च आज, 19 दलों के सांसद उठाएंगे 3 बड़े मुद्दे

SIR Protest: दिल्ली में चुनाव आयोग तक विपक्ष का मार्च आज, 19 दलों के सांसद उठाएंगे 3 बड़े मुद्दे

समाचार नामा 6 Oct 2026 8:40 am

'ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा हो', सीपीआईएम महासचिव एमए बेबी बोले- नहीं हटे तो करेंगे मजबूर

मतदाता सूची से 13 करोड़ नाम हटाने और 'वोट चोरी' के आरोपों को लेकर चुनाव आयोग और विपक्ष के बीच टकराव अब सड़क पर आने की तैयारी में है

देशबन्धु 6 Oct 2026 6:34 am

'एक वोट की ताकत': बोंगईगांव मेडिकल कॉलेज का वादा पूरा करने पर बोले सीएम सरमा

'एक वोट की ताकत': बोंगईगांव मेडिकल कॉलेज का वादा पूरा करने पर बोले सीएम सरमा

समाचार नामा 5 Oct 2026 11:58 pm

Chai Par Sameeksha: Misra-Masood क्या बचा पाएंगे UP Congress का वजूद? CJP Protest का क्या असर होगा?

प्रभासाक्षी की साप्ताहिक कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में इस सप्ताह हमने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर हो रही राजनीति पर चर्चा की। साथ-साथ उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने जो बदलाव किए हैं उससे भी संबंधित सवाल पूछे। हमेशा की तरह इस कार्यक्रम में मौजूद रहे प्रभासाक्षी के संपादक नीरज दुबे। नीरज दुबे ने साफ तौर पर कहा कि राजनीति के लिए फिलहाल संवैधानिक संस्थाओं को भी विपक्ष की ओर से नहीं छोड़ा जा रहा है। उन्होंने कहा कि मामला सुप्रीम कोर्ट में है और ऐसे में सुप्रीम कोर्ट पर हर किसी को भरोसा रखना चाहिए। नीरज दुबे ने कहा कि चुनाव आयोग ने कई सुधार हाल के दिनों में किए हैं। यह अच्छी बात है कि विपक्ष ने इसको लेकर दबाव बनाया और चुनाव आयोग ने वह सुधार किए हैं। उन्होंने कहा कि सुधार की गुंजाइश हमेशा रहती है और चुनाव आयोग भी वही कर रहा है। उन्होंने कहा कि जब से जंतर मंतर का आंदोलन हुआ है तब से विपक्ष को भी लगने लगा है कि यह सरकार झुक सकती है और हमें लगातार इसको लेकर झुकाने की तैयारी करनी चाहिए। हालांकि नीरज कुमार दुबे ने साफ तौर पर कहा कि डूसू चुनाव या पंजाब विश्वविद्यालय के चुनाव को हम देखें तो वहां भाजपा समर्थित संगठन को जीत मिली। विपक्ष के जो विद्यार्थी संगठन है, उसे हार का सामना करना पड़ा जिसका मतलब साफ है कि अभी भी देश के युवा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ खड़े हैं। ऐसे में विपक्ष को युवाओं के बीच भ्रम फैलाने से बचना चाहिए। इसे भी पढ़ें: Seat Sharing पर Congress सीधे SP चीफ Akhilesh Yadav से करे बात, Dharmendra Yadav ने दी नसीहत नीरज कुमार दुबे ने कहा कि देश तरक्की कर रहा है। लेकिन विपक्ष लगातार भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहा है। जो राजक तत्व है, जो आंदोलनजीवी हैं, वह हमेशा इसी तरीके की बातें करते रहेंगे ताकि देश के लोगों में भ्रम रहे। उन्होंने कहा कि कॉकरोच जनता पार्टी को एक सफलता मिली जिसके बाद उसका आत्मविश्वास बढ़ा हुआ है। लेकिन ऐसा नहीं है कि हर बार उसे सफलता मिल जाए। कांग्रेस को भी यही लगता है कि जब सीजेपी को समर्थन मिल गया तो हम क्यों पीछे रहे? इसलिए कांग्रेस भी इस तरह की चीज कर रही है। फिलहाल सीजेपी और कांग्रेस के बीच ही लड़ाई साफ तौर पर देखने को मिल रही है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के भीतर हुए बदलाव पर हमने नीरज कुमार दुबे से सवाल पूछा। नीरज दुबे ने कहा कि कांग्रेस घूम फिर कर एक परिवार पर ही आ जाती है और उत्तर प्रदेश में भी हमने देखा कि वह एक परिवार के ही व्यक्ति को पार्टी की कमान सौंप दी है। जिस व्यक्ति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी उनके क्षेत्र में मजबूत चुनौती दी थी, उसे चुनाव से 4 महीने पहले हटाने का क्या मतलब है? आप किसी दूसरे पार्टी से नेता को लेकर आते हैं और उसे प्रभारी बनाते हैं। प्रभारी के जरिए आप रिपोर्ट लेते हैं और तब फैसला आप लेते हैं। ऐसे में आप खुद अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के भरोसे पर खड़े नहीं उतर रहे हैं। इमरान मसूद के बयान की वजह से आपके गठबंधन के सहयोगी अखिलेश यादव आपसे नाराज है। बावजूद इसके आप इमरान मसूद को आगे बढ़ाने की कोशिश में लगे हैं।

प्रभासाक्षी 5 Oct 2026 7:44 pm

चीन-पाकिस्तान रक्षा गठजोड़ और भारत की रणनीतिक विवशता

दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक परिदृश्य में शक्ति संतुलन तेजी से करवट बदल रहा है। पिछले कुछ समय में चीन और पाकिस्तान के बीच रक्षा और सामरिक सहयोग जिस आक्रामकता के साथ आगे बढ़ा है, उसने नई दिल्ली के सुरक्षा गलियारों में खतरे की घंटी बजा दी है। हाल ही में चीन द्वारा पाकिस्तान को पांचवीं पीढ़ी के अत्याधुनिक स्टेल्थ लड़ाकू विमान, विशेष रूप से जे-35 और जे-31 की आपूर्ति करने की खबरें और पाकिस्तानी पायलटों की चीनी वायुसेना के साथ बढ़ती संयुक्त ट्रेनिंग महज एक द्विपक्षीय सैन्य सौदा नहीं है। यह भारत की संप्रभुता, हवाई श्रेष्ठता और दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए एक सीधी और गंभीर चुनौती है। भारतीय वायुसेना के नेतृत्व ने भी इस उभरते खतरे को खुले तौर पर स्वीकार किया है। आज भारत के सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि वह एक तरफ घटती हुई लड़ाकू विमानों की स्क्वाड्रन क्षमता और दूसरी तरफ टू-फ्रंट वॉर (दो मोर्चों पर युद्ध) की वास्तविक होती आशंका के बीच अपनी सैन्य संप्रभुता को कैसे अक्षुण्ण बनाए रखे। यह संपादकीय इस रक्षा सौदे के गहरे रणनीतिक निहितार्थों, भारत की वर्तमान वायुसैनिक कमजोरियों और इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने के व्यावहारिक रास्तों का एक विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है। ऐतिहासिक रूप से, भारत ने पारंपरिक सैन्य मोर्चे पर हमेशा पाकिस्तान के खिलाफ एक गुणात्मक और संख्यात्मक बढ़त बनाए रखी है। १९६५, १९७१ और १९९९ के युद्धों में भारतीय वायुसेना की तकनीकी और रणनीतिक श्रेष्ठता ने निर्णयकारी भूमिका निभाई थी। यहाँ तक कि हाल के वर्षों में फ्रांस से मिले ४.५ पीढ़ी के राफेल विमानों ने पाकिस्तान की वायुसेना के अमेरिकी एफ-16 विमानों पर भारत को एक स्पष्ट मनोवैज्ञानिक और तकनीकी बढ़त दे दी थी। लेकिन चीन द्वारा पाकिस्तान को पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट सौंपने की यह नई डील इस स्थापित संतुलन को पूरी तरह से बिगाड़ने की क्षमता रखती है। इसे भी पढ़ें: Prabhasakshi NewsRoom: Jaishankar की बात एकदम सही निकली, Pakistan के साथ नई Defence Deal कर America ने India के लिए बढ़ाया खतरा! पांचवीं पीढ़ी के विमानों की सबसे बड़ी खासियत उनका 'स्टेल्थ' होना होता है, यानी वे दुश्मन के रडार की नजरों से बचकर बेहद करीब तक हमला करने में सक्षम होते हैं। यदि पाकिस्तान इन विमानों को अपनी वायुसेना में सफलतापूर्वक शामिल और संचालित कर लेता है, तो भारत की मौजूदा हवाई रक्षा प्रणालियों और राफेल जैसे ४.५ पीढ़ी के विमानों की प्रभावशीलता पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न लग जाएगा। चीन इस सौदे के जरिए न केवल भारत को अपने पड़ोस में उलझाए रखना चाहता है, बल्कि वह भारतीय उपमहाद्वीप में अमेरिकी प्रभाव और भारत की बढ़ती वैश्विक महत्वाकांक्षाओं को भी सीमित करना चाहता है। यह सौदा साफ तौर पर दर्शाता है कि पाकिस्तान अब चीनी सेना के एक 'प्रॉक्सी' के रूप में काम कर रहा है, जिसका एकमात्र उद्देश्य भारत की सैन्य ऊर्जा को निरंतर सोखना है। इस बाहरी खतरे के बीच, भारत की सबसे बड़ी चिंता उसकी आंतरिक रक्षा तैयारियों की धीमी रफ्तार है। भारतीय वायुसेना को किसी भी दोहरे मोर्चे (चीन और पाकिस्तान) की चुनौती से निपटने के लिए कम से कम ४२ लड़ाकू विमानों की स्क्वाड्रन की आवश्यकता स्वीकृत है। इसके विपरीत, वर्तमान में यह संख्या खतरनाक रूप से घटकर महज २९ स्क्वाड्रन पर आ गई है। मिग-२१ जैसे पुराने सोवियत कालीन विमानों के चरणबद्ध तरीके से बाहर होने और नए विमानों के शामिल होने की बेहद धीमी दर ने इस खाई को और चौड़ा कर दिया है। इस संकट को और गहरा करने में हमारे स्वदेशी रक्षा उत्पादन की कछुआ चाल ने बड़ी भूमिका निभाई है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड द्वारा विकसित किए जा रहे तेजस मार्क-१ए लड़ाकू विमानों की डिलीवरी में लगातार हो रही देरी ने वायुसेना के आधुनिकीकरण के पहियों को जाम कर दिया है। स्वदेशीकरण और 'आत्मनिर्भर भारत' का नारा अपनी जगह बेहद सराहनीय और आवश्यक है, लेकिन जब वास्तविक युद्ध की रणनीतियों की बात आती है, तो नारों से ज्यादा जमीन पर विमानों की उपलब्धता मायने रखती है। भारत अपने लड़ाकू विमानों की संख्या को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है, जबकि उसके दोनों पड़ोसी देश अपनी फ्लीट को न केवल आधुनिक बना रहे हैं, बल्कि उनकी संख्या में भी भारी इजाफा कर रहे हैं। वायुसेना प्रमुख के अनुसार, यदि भारत को अपनी खोई हुई हवाई श्रेष्ठता वापस पानी है, तो उसे हर साल अपनी फ्लीट में कम से कम ३६ से ४० नए फाइटर जेट शामिल करने होंगे, जो कि वर्तमान उत्पादन क्षमता को देखते हुए एक बेहद कठिन लक्ष्य प्रतीत होता है। हालांकि स्थिति चिंताजनक है, लेकिन सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को तुरंत किसी घबराहट या पैनिक में आने की आवश्यकता नहीं है। किसी भी लड़ाकू विमान की क्षमता महज उसकी कागजी विशिष्टताओं या उसकी पीढ़ी से तय नहीं होती। युद्ध में सबसे महत्वपूर्ण होता है 'सिस्टम इंटीग्रेशन' । पाकिस्तान को चीन से विमान तो मिल सकते हैं, लेकिन उन्हें अपने मौजूदा पश्चिमी और चीनी रडार नेटवर्क, मिसाइल प्रणालियों और कमांड-एंड-कंट्रोल इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ पूरी तरह से एकीकृत करने में वर्षों का समय लगेगा। चीनी तकनीक की विश्वसनीयता और वास्तविक युद्ध स्थितियों में उसका प्रदर्शन हमेशा से संदेह के घेरे में रहा है। इसके अतिरिक्त, वायु रक्षा केवल लड़ाकू विमानों के भरोसे नहीं लड़ी जाती। भारत ने हाल के वर्षों में अपनी जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणालियों को बेहद मजबूत किया है। रूस से मिली एस-४०० ट्रिम्फ वायु रक्षा प्रणाली और भारत के अपने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन तथा भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड ( द्वारा विकसित किए जा रहे आधुनिक एंटी-स्टेल्थ रडार नेटवर्क इस खतरे को काफी हद तक कम कर सकते हैं। एंटी-स्टेल्थ रडार कम तरंग दैर्ध्य का उपयोग करके स्टेल्थ विमानों की अदृश्यता को बेअसर करने की क्षमता रखते हैं। इसलिए, चीनी विमानों का पाकिस्तान की फ्लीट में आना भारत के लिए चुनौती जरूर है, लेकिन यह कोई ऐसी अभेद्य दीवार नहीं है जिसे तोड़ा न जा सके। इस सामरिक गतिरोध को तोड़ने के लिए भारत को एक बहुआयामी और त्वरित रणनीति पर काम करना होगा। पहली प्राथमिकता तात्कालिक आवश्यकताओं को पूरा करने की होनी चाहिए। भारत पिछले कई वर्षों से ११४ मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट की खरीद प्रक्रिया को अटकाए हुए है। नौकरशाही की लालफीताशाही और बजटीय सीमाओं के कारण इस सौदे पर अंतिम निर्णय नहीं हो पाया है। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए, भारत सरकार को इसी वित्तीय वर्ष के भीतर फ्रांस के साथ राफेल या किसी अन्य समकक्ष विमान के लिए MRFA डील को अंतिम रूप देना होगा। यह वायुसेना के घटते स्क्वाड्रन को तुरंत ऑक्सीजन देने जैसा होगा। दूसरी रणनीति दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता की होनी चाहिए। भारत का अपना पांचवीं पीढ़ी का विमान कार्यक्रम, जिसे 'एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट' कहा जाता है, अभी भी डिजाइन और शुरुआती विकास के चरणों में है। सरकार को इस परियोजना को 'मिशन मोड' में डालना होगा और निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देकर इसकी समयसीमा को आधा करना होगा। लेकिन यदि AMCA के निर्माण में उम्मीद से ज्यादा देरी होती है, तो भारत को व्यावहारिक रुख अपनाते हुए विदेशी विकल्पों को खुला रखना होगा। रूस द्वारा पेश किए गए सुखोई-५७ स्टेल्थ फाइटर के प्रस्ताव या अमेरिका के अत्याधुनिक विमानों की तकनीक हस्तांतरण की संभावनाओं पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में रणनीतिक जिद से ज्यादा व्यावहारिक निर्णय मायने रखते हैं। चीन-पाकिस्तान रक्षा सौदा भारतीय रक्षा योजनाकारों के लिए एक स्पष्ट और कड़ा 'वेक-अप कॉल' है। अब वह समय बीत चुका है जब भारत अपने दुश्मनों पर केवल अपनी संख्या बल या पुराने युद्धों के अनुभवों के आधार पर बढ़त बनाए रख सकता था। आज का युद्ध तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्टेल्थ और इलेक्ट्रॉनिक विंग्स का है। यदि भारत को उपमहाद्वीप में एक शुद्ध सुरक्षा प्रदाता और एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में अपनी स्थिति बनाए रखनी है, तो उसे अपनी रक्षा खरीद प्रक्रियाओं में क्रांतिकारी बदलाव करने होंगे।घटती हुई स्क्वाड्रन संख्या और पड़ोसियों की बढ़ती ताकत के बीच का यह अंतर भारत को रक्षा खर्च बढ़ाने और त्वरित निर्णय लेने के लिए विवश करता है। हमें यह समझना होगा कि शांति की रक्षा केवल तभी की जा सकती है जब आप युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार हों। चीन और पाकिस्तान की इस जुगलबंदी का जवाब देने के लिए भारत को आर्थिक, कूटनीतिक और सैन्य मोर्चे पर एक नए विज़न की आवश्यकता है। समय तेजी से निकल रहा है, और आसमान में अपनी संप्रभुता को बनाए रखने के लिए नई दिल्ली को अब कड़े, त्वरित और दूरगामी फैसले लेने ही होंगे। - अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार

प्रभासाक्षी 5 Oct 2026 7:05 pm

भरोसे पर भी खरे उतरे सेलिब्रिटिज

विज्ञापनों के प्रति सेलिब्रिटिज की जवाबदेही को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की हालिया टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है कि अपने उत्पादों को बेचने के लिए सेलिब्रिटिज का उपयोग सबसे अधिक किया जाता रहा है। विज्ञापनदाता जानते हैं कि लक्षित उपभोक्ता तक पहुंचने में सेलिब्रिटिज की भागीदारी महत्वपूर्ण हो जाती हैं। लोग सेलिब्रिटिज पर विष्वास करते हैं और विज्ञापनदाता कंपनियां इसी का लाभ अपने उत्पादों को बाजार दिलाने में करते आये हैं। इसीलिए राष्ट्र्पति द्रौपदी मुर्मु की टिप्पणी कि सच्चा सितारा रोशनी फैलाता है, अंधेरापन नहीं, आज के संदर्भ में महत्वपूर्ण होने के साथ ही सितारों और सेलिब्रिटिज को समाज के प्रति जवाबदेही समझने का संकेत भी है। दर असल हो रहा है कि पैसे की चकाचोंध में सेलिब्रिटिज समाज के प्रति जवाबदेही से मुहं मोड़ते दिखाई देते हैं। जब आम जन का सेलेब्रिटिज का भरोसा है तो सेलिब्रिटिज की भी इस भरोसे को बनाए रखने की नैतिक जिम्मेदारी हो जाती है। दरअसल सेलिब्रिटिज को उत्पाद के साथ देखकर आमआदमी आंख मींच कर भरोसे के सहारे खरीदारी करता है। वह उस उत्पाद और सेलिब्रिटिज द्वारा किये जा रहे वादे को सत्य समझता है। ऐसे में सेलिब्रिटी का समाज या लक्षित वर्ग के प्रति और अधिक जिम्मेदारी बन जाती है। विकेता या निर्माता अपने उत्पाद को बेचने पर ध्यान देता है। इसलिए वह अपने उत्पाद के गुणगान अधिक ही करने लगता है तो सेलिब्रिटी के विज्ञापन के सहारे अतिशयोक्तिपूर्ण दावें करने लग जाते हैं। यहां तक कि कई विज्ञापन के दावें तो सत्य के आसपास भी नहीं होते जैसा कि अक्षय कुमार का डॉबर च्यवनप्राश को लेकर विज्ञापन। यह तो एक उदाहरण मात्र है। आज तो सेरोगेट विज्ञापनों का दौर भी चल निकला है। शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्राप का इलायची का विज्ञापन सबके सामने है जिसके माध्यम से छद्म रुप से प्रतिबंधित पान मसाला का विज्ञापन किया जा रहा था। इसी तरह के अनेक विज्ञापन हमारे सामने हैं। हांलाकि इसमें कोई दो राय नहीं कि निर्माता अपने उत्पाद का विज्ञापन करने के लिए सेलिब्रिटिज को बहुत अधिक पेमेंट किया जाता है और इस पेमेंट के चक्कर में सेलिब्रिटिज समाज के प्रति अपने दायित्व और कानूनी प्रावधानों को भी दरकिनार कर देते हैं। यही कारण है कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने दुखती रग पर हाथ रखते हुए 72 वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में पिछले माह सितंबर में आयोजित समारोह में आमआदमी का दर्द सामने रखा। विवादित विज्ञापनों का दौर लंबे समय से चला आता रहा है। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि अपने उत्पाद को बेचने के लिए सेलिब्रिटिज, महिलाओं और बच्चों को केन्द्र में रखा जाता है। दरअसल लक्ष्यित वर्ग को सम्मोहित करना इन विज्ञापनों का खास उद्देश्य हो जाता है। विज्ञापन करते समय कई बार तो सांप्रदायिकता तक सामने आ जाती है। 2020 का तनिष्क का विज्ञापन इसका उदाहरण है तो 2026 का कृति सेनन का गीवा ज्वेलरी का विज्ञापन सामने हैं। विमल इलायची का फिल्म कलाकर त्रय का विज्ञापन सर्वविदित है जिसमें इलायची के नाम पर छद्म रुप से पान मसाला तंबाकू का ही विज्ञापन था। इस तरह के सेरेगेट विज्ञापन आम होते जा रहे हैं। लेविस 501 जिंस का अक्षय कुमार का विज्ञापन, 2021 का आलिया भट्ट का कन्यादान के बहाने कन्यामान विज्ञापन यह फिर 1995 में अजगर से जिस्म को लपेटे मिलिंद सोयन और मधु सप्रे का टफ जूते का विज्ञापन का विवाद आज तक चर्चा में है। 2026 का विक्की कौशल-रश्मिका संधाना का माचो अंडरवियर का विज्ञापन भी विवादों में रहा है। इसे भी पढ़ें: Switzerland के साथ रिश्तों को नई ऊंचाई देकर Modi ने Europe में चली बड़ी कूटनीतिक चाल विज्ञापनों को लेकर सरकार भी गंभीर रही है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 द्वारा जवाबदेही तय की गई है। 10 लाख से 50 लाख तक के जुर्माने के प्रावधान के साथ ही ऐसे विज्ञापनकर्ताओं पर एक साल से तीन साल तक प्रतिबंध के प्रावधान भी है। भ्रामक विज्ञापनों को लेकर माननीय सर्वोच्च न्यायालय भी गंभीर रहा है और समय समय पर टिप्पणियां की गई है। इस दायरें में चार लाख से अधिक कमाई वाले व 5 लाख फालोवर्स वाले सेलिब्रिटिज को रखा गया है। हालात की गंभीरता को इसी से समझना होगा कि फिल्म कलाकारों के समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को इस तरह का संदेश देना पड़ा। वैसे भी जिस पर भरोसा होता है या किया जाता है तो भरोसे वाले व्यक्ति पर भी भरोसे को बनाये रखने का दायित्व हो जाता है। विज्ञापननिर्माताओं को भी समाज के प्रति दायित्व को समझना होगा तभी सभी अपने भरोसे पर खरे उतर सकते हैं। - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

प्रभासाक्षी 5 Oct 2026 7:02 pm

बैंक ऑफ बड़ौदा में ह्यूमन रिसोर्स पदों पर आवेदन की अंतिम तिथि 16 अक्तूबर तक बढ़ी

नई दिल्ली, बैंक ऑफ बड़ौदा (बीओबी) में नौकरी करने की इच्छा रखने वालों के लिए एक सुनहरा मौका सामने आया है।

देशबन्धु 5 Oct 2026 5:30 pm

भारतीय शेयर बाजार ने लगातार 4 दिन की गिरावट का तोड़ा सिलसिला

मुंबई, अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में तेजी से बढ़ोतरी की आशंकाओं में कमी आने के कारण वैश्विक शेयर बाजारों में तेजी आने से भारतीय शेयर बाजार ने लगातार चार दिनों की गिरावट का सिलसिला तोड़ते हुए हरे निशान में बंद हुआ।

देशबन्धु 5 Oct 2026 4:53 pm

मुंबई में इस साल के पहले नौ महीने में बिके 72,804 घर: रिपोर्ट

मुंबई, मुंबई के आवासीय बाजार में जनवरी-सितंबर के दौरान 2018 के बाद सबसे अधिक बिक्री दर्ज की गई है।

देशबन्धु 5 Oct 2026 4:43 pm

महाराष्ट्र एमएलसी चुनाव पर सभी पांचों सीटों पर जीत दर्ज करेगी महायुति: मुरलीधर मोहोल

महाराष्ट्र एमएलसी चुनाव पर सभी पांचों सीटों पर जीत दर्ज करेगी महायुति: मुरलीधर मोहोल

समाचार नामा 5 Oct 2026 4:23 pm

ब्राजील: राष्ट्रपति चुनाव के पहले दौर में लूला पर बढ़त बनाने वाले बोल्सोनारो कौन?

ब्राजील: राष्ट्रपति चुनाव के पहले दौर में लूला पर बढ़त बनाने वाले बोल्सोनारो कौन?

समाचार नामा 5 Oct 2026 2:24 pm

Gen Z Revolt: मोदी के दोस्त के देश में भी वही हो रहा,जो भारत में हुआ था? भयंकर साज़िश का पर्दाफ़ाश!

पहले विश्व युद्ध के पहले फ्रांस को एक सुपर पावर कह ले या फिर एक प्रमुख ताकत दुनिया की कहा जाता था। आज भी फ्रांस को दुनिया भर में शिक्षा, लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों के लिए, मानव अधिकारों के लिए जाना जाता है। लेकिन आज उसी फ्रांस के स्कूलों के बाहर आग लगी है। बल्कि पेरिस जैसे शहर पूरी तरीके से छात्रों की चपेट में है। स्कूलों के गेट बंद हैं। सड़कों पर आगजनी है। पुलिस और छात्रों के बीच सीधा टकराव है । शुरुआत स्कूल की समस्याओं से हुई थी। लेकिन अब आंदोलन का दायरा बढ़ चुका है। शिक्षक नहीं क्लासरूम में भीड़ है। स्कूलों की इमारतें जर्जर होने का दावा है। लंबे स्कूल के घंटे और युवाओं को लग रहा है कि उनके भविष्य के साथ समझौता किया जा रहा है। 2 अक्टूबर तक करीब 400 हाई स्कूल बंद थे और 1000 से ज़्यादा संस्थानों में किसी ना किसी रूप में प्रोटेस्ट या डिस्ट्रप्शन दर्ज हुआ और फिर आई सबसे चौंकाने वाली तस्वीर सामने कि करीब 2000 गिरफ्तारियां। पुलिस के साथ झड़प, आगजनी, स्कूलों के बाहर बैरिकेड्स और सरकार अब कह रही कि आंदोलन के एक हिस्से पर हिंसक तत्वों का कब्जा हो गया है। लेकिन कहानी सिर्फ इतनी नहीं क्योंकि इन बच्चों के हाथ में सिर्फ पत्थर नहीं इनके हाथ में एक शिकायत भी है कि हमारा भविष्य कहां है। स्कूल के गेट से शुरू हुआ विस्फोट। फ्रांस में मौजूदा आंदोलन की शुरुआत पेरिस रीजन के हाई स्कूलों से हुई। पहले छात्रों ने स्कूल के गेट ब्लॉक किए। फिर दूसरे शहर जुड़े और फिर प्रोटेस्ट फैलता चला गया और कुछ ही दिनों में मामला नेशनल अनरेस्ट में बदलने लगा। 1 अक्टूबर तक फ्रांस के 1000 से ज्यादा हाई स्कूल प्रोटेस्ट या डिस्क्रिप्शन से प्रभावित बताए गए। एजुकेशन मिनिस्ट्री के आंकड़ों के अनुसार 222 स्कूल्स में ब्लॉकेड्स दर्ज हुए हैं। 2 अक्टूबर को करीब 400 स्कूल बंद रखने पड़े। हालात अभी भी वैसे ही हैं। यानी जिस समस्या की शुरुआत एक स्कूल के गेट से हुई थी, अब पूरे फ्रांस की एजुकेशन सिस्टम की वह परीक्षा बन गई है। बच्चों की शिकायत आखिर क्या है जिस पर बात नहीं बन पा रही। अब इस आंदोलन के पीछे की जमीन समझिए। इसे भी पढ़ें: France में छात्रों के उग्र प्रदर्शन से 400 High School बंद, पुलिस पर पथराव और आगजनी छात्रों की सबसे बड़ी शिकायत है टीचर्स की कमी कई जगह क्लासेस में स्टूडेंट्स की संख्या बहुत ज्यादा है। कुछ छात्रों का कहना है कि एक क्लास रूम में 30 से ज्यादा बच्चे हैं। कई स्कूलों में टीचर्स की अनुपस्थिति के कारण क्लासेस कैंसिल हो रही हैं। फ्रांस के एजुकेशन मिनिस्ट्री के आंकड़े कहते हैं कि 2024-25 स्कूल ईयर में पब्लिक सेकेंडरी स्कूल्स में करीब 10% टीचिंग आवर्स पढ़ाए ही नहीं गए। इनमें लगभग 7.5 मिस्ड आवर्स सब्स्टट्यूट टीचर्स ना मिलने के कारण थे। यानी छात्रों की शिकायत सिर्फ सोशल मीडिया का गुस्सा नहीं। इसके पीछे एजुकेशन सिस्टम में वास्तविक स्टाफिंग प्रॉब्लम भी है। स्कूलों के हालत ने गुस्सा और बढ़ाया है। अब दूसरी बड़ी शिकायत है इंफ्रास्ट्रक्चर। कई स्कूलों की इमारतें पुरानी होने का दावा है। क्लासरूम ओवर क्राउडेड है। हीट वेव के दौरान कई क्लासरूम्स में तापमान बेहद ज्यादा रहा। स्टूडेंट्स का कहना है कि अगर उन्हें घंटों ऐसे कमरों में बैठना पड़ता है जहां बेसिक कंफर्ट तक पर्याप्त नहीं है। कई जगह स्टाफ शॉर्टेज के कारण एडमिनिस्ट्रेटिव और टीचिंग वर्क लोड भी बढ़ा हुआ है। यानी छात्र कह रहे हैं कि हमें सिर्फ परीक्षा पास करने के लिए नहीं कहा जा सकता। हमें पढ़ने के लिए सही स्कूल भी चाहिए। इसे भी पढ़ें: G20 Meet: Piyush Goyal ने फ्रांस, कनाडा, सऊदी अरब और दक्षिण कोरिया संग Trade पर की चर्चा स्कूल की दीवारों से बाहर निकला जेन जी का गुस्सा जेनजी का गुस्सा स्कूल की दीवारों से बाहर निकल चुका है और यही इस आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बनता है। प्रदर्शनकारी सिर्फ क्लासरूम कंडीशंस की बात नहीं कर रहे। उनकी चिंता है आगे की जिंदगी, यूनिवर्सिटी एडमिशन, एंप्लॉयमेंट, इकोनॉमिक सिक्योरिटी, स्टूडेंट सपोर्ट और एक ऐसा फ्यूचर जहां उन्हें लग रहा कि कंपटीशन बढ़ रहा है लेकिन अपॉर्चुनिटीज उसी अनुपात में नहीं बढ़ रही। कई छात्रों के लिए स्कूल सिर्फ स्कूल नहीं वो उनके सोशल मोबिलिटी का रास्ता है। अगर पब्लिक एजुकेशन कमजोर होती है तो गरीब और मिडिल क्लास परिवार के बच्चों के लिए आगे बढ़ने के अवसर भी प्रभावित हो सकते हैं। इसीलिए आंदोलन में एजुकेशन फंडिंग के साथ-साथ बॉर्डर इकोनॉमिक कंसर्न्स भी दिखाई दे रहे हैं। फिर आंदोलन हिंसक क्यों हो गया और कैसे हो गया? शांतिपूर्ण प्रोटेस्ट लोकतंत्र का हिस्सा हो सकता है। लेकिन फ्रांस में कई जगह प्रोटेस्ट ने वायलेंट टर्म ले लिया। 2 अक्टूबर तक करीब 400 हाई स्कूल बंद थे और 1000 से ज़्यादा संस्थानों में किसी ना किसी रूप में प्रोटेस्ट या डिस्ट्रप्शन दर्ज हुआ और फिर आई सबसे चौंकाने वाली तस्वीर सामने कि करीब 2000 गिरफ्तारियां। पुलिस के साथ झड़प, आगजनी, स्कूलों के बाहर बैरिकेड्स और सरकार अब कह रही कि आंदोलन के एक हिस्से पर हिंसक तत्वों का कब्जा हो गया है। लेकिन कहानी सिर्फ इतनी नहीं क्योंकि इन बच्चों के हाथ में सिर्फ पत्थर नहीं इनके हाथ में एक शिकायत भी है कि हमारा भविष्य कहां है। स्कूल के गेट से शुरू हुआ विस्फोट। फ्रांस में मौजूदा आंदोलन की शुरुआत पेरिस रीजन के हाई स्कूलों से हुई। पहले छात्रों ने स्कूल के गेट ब्लॉक किए। 3 अक्टूबर तक इस आंदोलन में करीब 5000 से ज्यादा लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। इनमें बड़ी संख्या 15, 16, 14, 12 साल के बच्चों की बताई गई है। 600 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हो चुके हैं और सरकारी संपत्ति को नुकसान लगातार हो रहा है। करोड़ों यूरो में उसकी कीमत पहुंच चुकी है। पुलिस के साथ-साथ शिक्षकों और आम लोगों पर हमले की घटनाएं भी सामने आई है। यहां का जो स्टॉक एक्सचेंज है उसमें भी भीड़ घुस गई है। उसे भी अपने कब्जे में ले लिया है। 3 अक्टूबर की अह राइटर्स की यह रिपोर्ट बताती है कि 1200 से ज़्यादा स्कूल इस आंदोलन से प्रभावित हो चुके थे। यानी जो विरोध कुछ दिन पहले पेरिस के आसपास के इलाकों से शुरू हुआ था वो अब देशव्यापी आंदोलन का रूप ले चुका है। कई शहरों में आग लगाई गई। पुलिस पर पत्थर फेंके गए, बोतलें फेंकी गई। पुलिस वालों को धक्का दिया गया। पुलिसवालों के साथ मारपीट की गई। एक महिला पुलिस वाली को महिला पुलिसकर्मी को लातों से पीटा गया। एक शिक्षक पर पेट्रोल फेंकने की घटना सामने आई। नातेश में एक स्कूल में आगजनी के बाद इमारत को लंबे समय तक बंद रखना पड़ा। कई जगहों पर पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए आंसू गैस के गोले भी छोड़े। इसे भी पढ़ें: भारत को Veto पॉवर दिलाने के लिए रूस ने UN में किया बड़ा धमाका, हिले अमेरिका, चीन समेत दुनिया के बड़े-बड़े देश 1968 में भी एक बड़े छात्र आंदोलन से रूबरू हुआ फ्रांस अब मामला सिर्फ स्कूलों की हालत सुधारों की मांग तक सीमित नहीं रह गया है। यही वजह है कि फ्रांस की सरकार अब इसे सिर्फ छात्र आंदोलन के तौर पर नहीं देख रही है। ऐसा नहीं है कि फ्रांस में छात्रों का आंदोलन ये कोई पहली बार हुआ है। 1968 में भी एक बहुत बड़ा आंदोलन छात्रों का फ्रांस में हुआ था। उसके बाद भी छात्रों के लगातार आंदोलन प्रदर्शन फ्रांस में होते रहे हैं। लेकिन इतना हिंसक कोई भी प्रदर्शन आज तक नहीं हुआ। फ्रांस के प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लिकार्नू ने संकट की के लिए इसमें बैठक बुलाई और मंत्रियों के जितने भी कार्यक्रम थे वह रद्द कर दिए। सरकार का कहना है कि छात्रों की समस्याओं पर बातचीत हो सकती है। हो सकती है। ऐसा नहीं है कि मतलब तुरंत छात्रों की मांगों को मान लिया जाए। लेकिन हिंसा और आगजनी को किसी भी हालत में स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह होना भी नहीं चाहिए। क्योंकि अगले साल फ्रांस में राष्ट्रपति के चुनाव भी होने वाले हैं और पूर्व राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रो दोबारा चुनाव लड़ सकते हैं। ऐसे समय में युवाओं का गुस्सा राजनीतिक पार्टियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। सरकार ने आरोप लगाया कि कट्टर वामपंथी पार्टी एलएफआई छात्रों के गुस्से को राजनीतिक आंदोलन में बदलने की कोशिश कर रही है। और यहां कल एक आपके सामने ही एक्स फॉरेन एक्सपर्ट से मैं बात कर रहा था। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ फ्रांस के छात्रों ने किया हो ऐसा मुमकिन नहीं है। यहां हो सकता है कि कुछ जो इस्लामिक लोग हैं फ्रांस में लगभग 10% मुस्लिम आबादी फ्रांस में है वो लोग भी इसमें शामिल हैं। अबाया पहनने की वो मांग कर रहे हैं। बांग्लादेश-नेपाल या भारत जैसा पैटर्न? बांग्लादेश और नेपाल में हाल ही के यूथ लेड प्रोटेस्ट ने पॉलिटिकल सिस्टम को बड़ा झटका दिया। भारत में भी एजुकेशन मिनिस्टर को इस्तीफा देना पड़ा। अब फ्रांस में भी जेनजी सड़क पर है। लेकिन दोनों परिस्थितियों को एक जैसा बताना अभी जल्दबाजी होगी। फ्रांस एक एस्टैब्लिश यूरोपियन डेमोक्रेसी है। यहां इंस्टिट्यूशनल स्ट्रक्चर मजबूत है और मौजूदा फ्रेंच प्रोटेस्ट का डॉक्यूमेंटेड इमीडिएटेड ट्रिगर एजुकेशन कंडीशंस है। इसलिए फ्रांस में प्रोटेस्ट जरूर है। जेनजी मोबिलाइजेशन भी है। वायलेंस भी बढ़ी है। लेकिन इसे अभी बांग्लादेश या नेपाल जैसी सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया कहना उपलब्ध एविडेंस नहीं है। फिर एक कॉमन फैक्टर जरूर यहां पर दिखाई देता है। नई पीढ़ी का पॉलिटिकल एस्टैब्लिशमेंट और पब्लिक इंस्टिट्यूशन से बढ़ता फ्रस्ट्रेशन। जेनजी की सबसे बड़ी ताकत सोशल मीडिया है। आज के युवाओं का आंदोलन सिर्फ सड़क पर नहीं चलता। वो स्मार्टफोन पर भी चलता है। एक स्कूल में पुलिस क्लैश, दूसरे शहर में बर्निंग, बैरिकेड और तीसरे शहर में स्टूडेंट्स की स्पीच और कुछ ही घंटों में पूरा देश उसे देख सुन सकता है। यही सोशल मीडिया मोबिलाइजेशन को बेहद तेज बनाता है। एक लोकल ग्रिवेंस कुछ घंटों में नेशनल मूवमेंट बन जाता है। और यही चीज सरकारों के लिए आजकल सबसे बड़ी चुनौती है। क्योंकि ट्रेडिशनल पॉलिटिकल ऑर्गेनाइजेशंस की तरह जजी मोबिलाइजेशन को हमेशा एक सिंगल लीडरशिप स्ट्रक्चर की जरूरत नहीं होती। फ्रांस की कहानी में सबसे बड़ा वार्निंग सिग्नल क्या है? इस पूरे घटनाक्रम को सिर्फ बच्चे हिंसा कर रहे हैं कहकर खत्म कर देना आसान नहीं है। उससे अंडरलाइन प्रॉब्लम खत्म ही होगी। दूसरी तरफ सरकार गलत है इसलिए हिंसा जायज है। कहना भी उतना ही खतरनाक होगा। क्योंकि स्कूल, बिल्डिंग्स जलाने, टीचर्स और पुलिस पर हमला करने, पब्लिक प्रॉपर्टी को नष्ट करने से स्टूडेंट्स की लेजिटमेट डिमांड्स कमजोर पड़ सकती हैं। यानी एक आंदोलन को दो अलग तस्वीरों में देखिए। एक तस्वीर बेहतर एजुकेशन की डिमांड करती है जिंजी। दूसरी तस्वीर आगजनी और पुलिस क्लैशेस की है। सरकार को पहली तस्वीर का जवाब पॉलिसी से देना है और दूसरी तस्वीर का जवाब लॉ इनफोर्समेंट से। तो फ्रांस की सड़कों पर इस वक्त सिर्फ छात्र नहीं है। वहां एक पूरी जनरेशन अपनी स्थिति दर्ज करा रही है। उनका मैसेज साफ है। टीचर चाहिए, बेहतर क्लासरूम चाहिए, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए, फ्यूचर चाहिए। किसी भयंकर साजिश की ओर इशारा तो नहीं दिलचस्प बात यह है कि सरकार ने छात्रों की कुछ मांगों पर कदम उठाने की कोशिश भी की। शिक्षा मंत्री ने बातचीत का रास्ता खोलने की बात कही हो और शिक्षा के क्षेत्र में सरकार के बजट को लेकर भी बदलावों की चर्चा हुई है। यह बवाल इसलिए भी फ्रांस में ज्यादा हुआ क्योंकि इस बार जो बजट पेश हुआ उसमें शिक्षा का जो बजट था वो केवल 1.7% ही बढ़ाया गया था। बाकी जमीन पर तनाव कम नहीं हुआ है। छात्र संगठनों ने आने वाले मंगलवार को एक बड़े प्रदर्शन का आह्वान किया है। इसका मतलब साफ है कि फ्रांस की सरकार के सामने अब सिर्फ स्कूलों को खोलने की चुनौती चुनौती नहीं है। उसे तय करना है कि जायज छात्र मांगों को कैसे सुना जाए। उन्हें कैसे पूरा किया जाए और कैसे फ्रांस को जलने से रोका जाए। हिंसा को कैसे रोका जाए और इस पूरे आंदोलन को चुनावी राजनीतिक हथियार बनने से भी रोकना जरूरी है क्योंकि इतिहास बताता है कि फ्रांस में छात्र आंदोलनों की ताकत को कम करके आंकना भारी पड़ सकता है। 1968 का छात्र आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जिसने फ्रांसीसी राजनीति और समाज को हिला कर रख दिया था। आज 2026 में हालात अलग हैं। लेकिन सवाल फिर वही है। क्या यह सिर्फ बेहतर शिक्षा के लिए छात्रों की आवाज है? या फिर छात्रों के गुस्से के पीछे अब राजनीति और हिंसक तत्व भी पूरी तरीके से घुस चुके हैं। शायद 2 साल पहली बात है वो आपको याद होगा किस तरीके से इस्लामिक कट्टरपंथियों ने फ्रांस को जलाया था। हफ्ते भर तक फ्रांस वहां जलता रहा था और आज भी तस्वीर कुछ वैसी ही है।

प्रभासाक्षी 5 Oct 2026 2:22 pm

भारत में आर्थिक विकास की गति तेज रहने के बावजूद क्यों गिर रहा है शेयर बाजार

हाल ही के समय में भारत के शेयर बाजार में लगातार तेज गिरावट दर्ज हुई है, इससे देश में इस तरह का माहौल बनाने का प्रयास किया जा रहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर भारी संकट आने वाला है और भारतीय नागरिकों पर इसका अत्यधिक कष्टकारी असर पड़ने वाला है। यह आंकलन किसी भी प्रकार से उचित नहीं कहा जा सकता है क्योंकि शेयर बाजार में गिरावट विदेशी संस्थागत निवेशकों के मन में बैठ रहे डर के आधार पर देखी जा रही है, जबकि भारतीय संस्थागत निवेशक तो लगातार अपना निवेश भारतीय शेयर बाजार में बढ़ा रहे हैं एवं म्यूचुअल फंडस द्वारा प्रति माह 30,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि का लगातार निवेश शेयर बाजार हो रहा है। यह सही है कि भारतीय शेयर बाजार का सेन्सेक्स 1 अक्टूबर 2025 के 80,983 बिंदुओं के स्तर से 1 अक्टोबर 2026 को 71,910 बिंदुओं के स्तर पर नीचे आ गया है। इसी प्रकार, निफ्टी इंडेक्स भी 1 अक्टूबर 2025 के 24,836 बंदुओं के स्तर से नीचे गिरकर 1 अक्टूबर 2026 को 22,422 बिंदुओं के स्तर पर आ गया है। पिछले एक वर्ष की अवधि में 10 से 11 प्रतिशत के बीच की गिरावट दर्ज हुई है। जबकि, इस बीच भारत में अर्थ के विभिन्न क्षेत्रों में आर्थिक विकास दर लगातार उच्च स्तर की बनी हुई है। फिर, ऐसे क्या कारण हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था का चमकता चेहरा होने के बावजूद, भारतीय शेयर बाजार लगातार गिरावट दर्ज कर रहा है। दरअसल किसी भी देश का शेयर बाजार, स्टॉक एक्सचेंज पर दर्ज कम्पनियों की आगे आने वाले वर्षों में होने वाली अनुमानित आय के आधार पर, घटता अथवा बढ़ता रहता है। दूसरे, आजकल जब समस्त देश एक तरह से आपस में जुड़ से गए हैं और हम एक वैश्विक गांव में निवास कर रहे हैं तब एक देश में होने वाली घटनाओं का प्रभाव दूसरे देश के शेयर बाजार पर भी पड़ता हुआ दिखाई देता है। जैसे, रूस-यूक्रेन युद्ध, इजराईल-हम्मास युद्ध, अमेरिका-ईरान युद्ध, सऊदी अरब-हूथी युद्ध एवं खाड़ी के देशों का आपसी युद्द, आदि कुछ ऐसे उदाहरण हैं, जिनके चलते भारतीय शेयर बाजार भी सहमा हुआ दिखाई दे रहा है, हालांकि भारत किसी भी प्रकार से, अप्रत्यक्ष अथवा प्रत्यक्ष रूप से, इन युद्धों से नहीं जुड़ा है । तीसरे, विदेशी निवेशक भारी मात्रा में कुछ देशों के शेयर बाजार में अपनी पूंजी का निवेश करते हैं, क्योंकि उन्हें इन देशों में किए गए निवेश से अच्छे रिटर्न की सम्भावना दिखाई देती है। परंतु, जब इन विदेशी निवेशकों द्वारा अपना निवेश शेयर बाजार से निकाला जाता है तब उस देश का शेयर बाजार तेजी से गिरने लगता है। इसे भी पढ़ें: प्रधानमंत्री लगातार कर रहे हैं विदेशी मुद्रा बचाने की अपील उक्त वर्णित युद्धों के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं और यह 100 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गए हैं, एक वर्ष पूर्व यह 65 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर थे, अर्थात इस एक वर्ष के दौरान कच्चे तेल की कीमतों में 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज हुई है। भारत कच्चे तेल की कुल खपत का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात करता है, अतः भारत के उक्त युद्धों से किसी भी प्रकार से नहीं जुड़े होने के बावजूद, भारतीय अर्थव्यवस्था पर कुछ विपरीत प्रभाव पड़ सकता है, ऐसा माहौल बनाए जाने के चलते विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयर बाजार से अपना निवेश भारी मात्रा में निकाल रहे हैं। हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि के बावजूद भारत में मुद्रा स्फीति की दर को नियंत्रण में बनाए रखने के प्रयास अभी तक तो सफल ही रहे हैं। फिर भी, केलेंडर वर्ष 2026 में अभी तक विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से 2.8 लाख करोड़ रुपए की भारी भरकम राशि निकाल ली है। सितम्बर 2024 तक के 24 माह में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में 38,600 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निवेश किया था जबकि सितम्बर 2026 तक के 24 माह में 56,300 करोड़ अमेरिकी डॉलर की निकासी की गई हैं। विदेशी संस्थागत निवेशक इतनी भारी मात्रा में अपना निवेश भारत से निकालकर अमेरिकी बांडस, अमेरिका के शेयर बाजार, वियतनाम एवं दक्षिणी कोरिया के शेयर बाजार एवं चीन के शेयर बाजार में कर रहे हैं। क्योंकि, अमेरिका में ब्याज दरों (यूएस फेड दर) में वृद्धि के चलते, बांडस की यील्ड पिछले लगभग 24-25 वर्षों के उच्चत्तम स्तर 5.60 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गई है। साथ ही, अमेरिकी शेयर बाजार में अभी भी तेजी बनी हुई है क्योंकि वहां की कम्पनियों द्वारा उच्च तकनीकी के नवाचार करने के चलते उनकी उत्पादकता एवं लाभप्रदता में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। इसी प्रकार, वियतनाम एवं दक्षिणी कोरिया में आरटीफिशीयल इंटेलीजेंस के क्षेत्र की कम्पनियों में उच्च स्तर की लाभप्रदता दर्ज होने की सम्भावनाएं दिखाई दे रही है, इसलिए विदेशी निवेशक अमेरिका, वियतनाम एवं दक्षिणी कोरिया जैसे देशों की ओर आकर्षित हो रहे है एवं अपना निवेश इन देशों में बढ़ा रहे हैं। चीन का शेयर बाजार बहुत ही तेजी से नीचे गिरा था जिसके कारण वहां पर कम्पनियों के शेयरों का (Price to Earning - PE Ratio) कीमत/आय रेशो भारतीय कंपनियों के कीमत/आय रेशो की तुलना में अत्यधिक आकर्षक हो गया है। चीन में औसतन यह रेशो 12 प्रतिशत के नीचे है जबकि भारत में यह रेशो औसतन 20 प्रतिशत से अधिक है। अतः विदेशी संस्थागत निवेशकों को भारतीय कम्पनियों के शेयर, चीनी कम्पनियों के शेयर की तुलना में महंगे दिखाई दे रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिकी डॉलर के लगातार मजबूत होने चलते भारतीय रुपया लगातार कमजोर हो रहा है, इस कारण से भी विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयर बाजार से अपना निवेश निकाल रहे है। आज भारतीय रुपए की कीमत 96 रुपए प्रति अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच गई है। साथ ही, डॉलर इंडेक्स जो 1 अक्टोबर 2025 को 97.71 के स्तर पर था वह 1 अक्टोबर 2026 को बढ़कर 101.80 के स्तर पर आ गया है। स्वर्ण की कीमतें भी 3,871 अमेरिकी डॉलर प्रति ओंस से बढ़कर 4,170 अमेरिकी डॉलर प्रति ओंस पर पहुंच गई है। भारत स्वर्ण का भारी मात्रा में (कुल खपत का 90 प्रतिशत से अधिक) आयात करता है, स्वर्ण के आयात का भुगतान अमेरिकी डॉलर में ही करना होता है, अतः भारतीय रुपए पर इससे अतिरिक्त दबाव बनता हुआ दिखाई दे रहा है। उक्त संदर्भों को यदि भारतीय अर्थव्यवस्था से जोड़कर देखा जाय तो स्थिति कुछ अलग ही दिखाई देती है। भारत में सकल घरेलू उत्पाद में वित्तीय वर्ष 2026-27 की प्रथम तिमाही में 7.8 प्रतिशत की आकर्षक वृद्धि दर्ज हुई है, जबकि वैश्विक स्तर पर यह वृद्धि केवल 3 प्रतिशत एवं तेजी से आर्थिक विकास कर रही अर्थव्यवस्थाओं में यह 3.8 प्रतिशत रहने की सम्भावना व्यक्त की गई है। जब भारत में आर्थिक विकास दर तुलनात्मक रूप से अधिक तेज गति से आगे बढ़ेगी तो भारतीय कम्पनियों की आय एवं लाभप्रदता में भी तेज गति से वृद्धि सम्भव होगी। इसी प्रकार, अगस्त 2026 माह में भारत की औद्योगिक विकास दर भी 8 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई है जो कि अगस्त 2025 में 4.7 प्रतिशत के स्तर पर थी। विभिन्न उत्पादों के भारत से निर्यात अगस्त 2026 में 4,380 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार कर गए हैं जो अगस्त 2025 में 3,480 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर थे। 15 सितम्बर 2026 को समाप्त पखवाड़े में समस्त बैंकों के ऋणों में 18.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह वृद्धि दर 10.4 प्रतिशत की रही थी। इसी प्रकार, बैंकों की जमाराशि में वृद्धि दर भी पिछले वर्ष की 9.5 प्रतिशत की तुलना में इस वर्ष 17.3 प्रतिशत की रही है। बैंकों का ऋण:जमा अनुपात लगभग 81 प्रतिशत के पास पहुंच गया है। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत में अर्थ के विभिन्न क्षेत्रों में अतुलनीय वृद्धि दर आंकी जा रही है। बैंकों की सकल गैर निष्पादनकारी आस्तियों में भी कमी दर्ज हुई है और यह जुलाई 2025 के 2.2 प्रतिशत की तुलना में जुलाई 2026 में घटकर 1.68 प्रतिशत के स्तर पर नीचे आ गई है। शुद्ध गैर निष्पादनकारी आस्तियां तो पिछले वर्ष के 0.5 प्रतिशत की तुलना में 0.4 प्रतिशत ही रही है। अर्थात, बैंकों द्वारा प्रदत्त किए जा रहे ऋणों की अदायगी समय पर हो रही है। भारतीय बैंकों का पूंजी पर्याप्तता अनुपात तो आज विकसित देशों की बैंकों से भी अधिक हो गया है, जो जुलाई 2025 के 17.5 प्रतिशत से बढ़कर जुलाई 2026 में 17.8 प्रतिशत के स्तर को पार कर गया है। इससे भारतीय बैंकों की मजबूत स्थिति झलकती है। उद्योगों द्वारा अपनी उत्पादन क्षमता का 75 प्रतिशत से अधिक उपयोग किया जा रहा है, यह ऐसी स्थिति है जब सम्बंधित उद्योग को अपनी उत्पादन क्षमता में वृद्धि करने के बारे में विचार प्रारम्भ करना होता है। उक्त जानकारी की सत्यता की गवाही वस्तु एवं सेवा कर के संग्रहण में हो रही लगातार वृद्धि से भी ध्यान में आती है। सितम्बर 2026 माह में 14.5 प्रतिशत की वृद्धि के साथ वस्तु एवं सेवा कर का संग्रहण 2.04 लाख करोड़ से अधिक की राशि का रहा है और यह लगातार तीसरा महीना है जब यह संग्रहण 2 लाख करोड़ रुपए से अधिक का रहा है। भारत में सितम्बर 2026 माह के दौरान Unified Payments Interface (एकीकृत भुगतान अन्तरापृष्ठ) सिस्टम के अंतर्गत प्रतिदिन औसतन 80 करोड़ से अधिक के व्यवहार दर्ज हो रहे हैं, जो पूरे विश्व में किसी भी देश में सबसे अधिक व्यवहार हैं। अगस्त 2026 माह के दौरान उक्त व्यवहार 79 करोड़ के रहे थे और सितम्बर 2025 में 65 करोड़ से अधिक व्यवहार प्रतिदिन के रहे थे। कुल मिलाकर भारत में अर्थ के विभिन्न क्षेत्रों में दर्ज हो रही विकास दर की कहानी स्पष्ट तौर पर कह रही है कि भारत का भविष्य बहुत सुरक्षित है। और, यह झूठा विमर्श खड़ा किया जाना कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर भारी संकट आने वाला है और भारतीय नागरिकों पर इसका कष्टकारी प्रभाव पड़ने वाला है, पूर्णत: असत्य है। घबराहट में विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा शेयर बाजार से निकाले जा रहे निवेश को आधार बनाकर उक्त झूठे विमर्श को खड़ा करने का प्रयास हो रहा है। - प्रहलाद सबनानी सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक, भारतीय स्टेट बैंक के-8, चेतकपुरी कालोनी, झांसी रोड, लश्कर, ग्वालियर - 474 009

प्रभासाक्षी 5 Oct 2026 1:04 pm

सोना 0.5 प्रतिशत गिरा, चांदी 2.27 लाख रुपए प्रति किलो के पार

मुंबई, सोने और चांदी की कीमतों में सोमवार को मिलाजुला कारोबार देखा गया। शुरुआत सत्र में सोने में 0.48 प्रतिशत की गिरावट और चांदी में 0.53 प्रतिशत की तेजी देखी गई।

देशबन्धु 5 Oct 2026 12:59 pm

सेवा संकल्प अभियान: सीएम धामी ने स्वच्छता कार्यक्रम में लिया हिस्सा, गुरुद्वारा श्री नानकमत्ता साहिब में टेका माथा

सेवा संकल्प अभियान: सीएम धामी ने स्वच्छता कार्यक्रम में लिया हिस्सा, गुरुद्वारा श्री नानकमत्ता साहिब में टेका माथा

समाचार नामा 5 Oct 2026 11:52 am

पाकिस्तानियों से ज्यादा लंबी जिंदगी जीते हैं भारतीय, मगर Indians से भी ज्यादा जीते हैं Bangladeshis: WHO

पाकिस्तानियों से ज्यादा जीते हैं भारतीय, मगर भारतीयों से भी ज्यादा जीते हैं बांग्लादेशी। विश्व स्वास्थ्य संगठन के ताजा आंकड़े भारत की जीवन-प्रत्याशा की एक दिलचस्प तस्वीर सामने रखते हैं। वर्ष 2023 में एक भारतीय की औसत जीवन-प्रत्याशा 71 वर्ष रही, जबकि पाकिस्तान में यह 68.2 वर्ष थी। लेकिन बांग्लादेश 72.7 वर्ष के साथ भारत से आगे निकल गया। अमेरिका और कनाडा तो इससे भी काफी आगे हैं। यानी भारत ने पाकिस्तान को पीछे जरूर छोड़ा है, लेकिन लंबी जिंदगी के मामले में अभी बांग्लादेश से भी पिछड़ रहा है। कहानी यहीं खत्म नहीं होती। भारतीयों की बढ़ती उम्र के साथ सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस जिंदगी में स्वस्थ रहने के कितने साल शामिल हैं। हम आपको बता दें कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के ताजा वैश्विक स्वास्थ्य आकलन ने भारत की सेहत की ऐसी तस्वीर सामने रखी है, जिसमें एक तरफ महामारी के बाद जीवन-प्रत्याशा तेजी से संभली है, तो दूसरी तरफ हृदय रोग, मधुमेह, पक्षाघात और फेफड़ों की पुरानी बीमारियां मौत की सबसे बड़ी वजह बनती जा रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में स्वस्थ जीवन-प्रत्याशा वर्ष 2023 में केवल 60.6 वर्ष रही। यानी औसतन जीवन के अंतिम करीब दस वर्ष किसी न किसी बीमारी, अक्षमता या स्वास्थ्य संबंधी परेशानी के साथ गुजरने की आशंका बनी रहती है। वर्ष 2019 में यही आंकड़ा 60.5 वर्ष था। महामारी के दौरान यह 2021 में घटकर 58.4 वर्ष रह गया और फिर 2022 में 60.2 तथा 2023 में 60.6 वर्ष तक पहुंचा। इसे भी पढ़ें: Prabhasakshi NewsRoom: Jaishankar की बात एकदम सही निकली, Pakistan के साथ नई Defence Deal कर America ने India के लिए बढ़ाया खतरा! रिपोर्ट के मुताबिक, महामारी के बाद भारत ने जीवन-प्रत्याशा में उल्लेखनीय वापसी की है। वर्ष 2019 में यह 70.5 वर्ष थी, जो 2021 में गिरकर 68.1 वर्ष हो गई। इसके बाद 2022 में यह फिर 70.5 वर्ष और 2023 में 71 वर्ष पहुंच गई। यानी महज दो वर्षों में भारत ने अनुमानित जीवन के 2.9 वर्ष वापस हासिल कर लिए। लेकिन स्वस्थ जीवन-प्रत्याशा की वापसी केवल 2.2 वर्ष रही। यही अंतर भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने सबसे गंभीर चुनौती को उजागर करता है। बुजुर्गों के मामले में भी तस्वीर कुछ बेहतर हुई है। वर्ष 2023 में 60 वर्ष की उम्र तक पहुंच चुके व्यक्ति के औसतन 18.8 वर्ष और जीने की उम्मीद थी, जबकि 2019 में यह 18.4 वर्ष थी। लेकिन इनमें पूरी तरह स्वस्थ रहने वाले वर्षों की संख्या 13.7 वर्ष ही थी। साफ है कि उम्र बढ़ रही है, मगर स्वस्थ उम्र उतनी तेजी से नहीं बढ़ रही। इसके अलावा, भारत की बीमारियों की तस्वीर भी पिछले दो दशकों में पूरी तरह बदल गई है। वर्ष 2000 में देश में मौत के दस प्रमुख कारणों में संक्रामक बीमारियों की हिस्सेदारी करीब 62 प्रतिशत थी, जबकि गैर-संचारी बीमारियों की हिस्सेदारी 34 प्रतिशत थी। वर्ष 2023 तक तस्वीर उलट गई। गैर-संचारी बीमारियां करीब 75 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ मौत की सबसे बड़ी वजह बन गईं, जबकि संक्रामक बीमारियों की हिस्सेदारी घटकर करीब 16 प्रतिशत रह गई। बाकी हिस्सेदारी चोट और दुर्घटनाओं जैसी वजहों की रही। बीमारियों की बदलती तस्वीर को मौत के आंकड़ों से आसानी से समझा जा सकता है। वर्ष 2000 में भारत में क्षय रोग और दस्त जैसी संक्रामक बीमारियां मौत की बड़ी वजह थीं। तब प्रति एक लाख आबादी पर क्षय रोग से 92.4 और दस्त से 87.8 मौतें होती थीं। लेकिन वर्ष 2023 तक तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी थी। अब हृदय रोग सबसे बड़ा जानलेवा कारण बन गया, जिससे प्रति एक लाख आबादी पर 138.5 मौतें दर्ज हुईं। इसके बाद फेफड़ों की पुरानी बीमारी से 83.19, पक्षाघात से 74.8 और मधुमेह से 49.01 मौतें प्रति एक लाख आबादी पर हुईं। यानी भारत अब केवल संक्रमण से नहीं, बल्कि दिल, फेफड़ों, मधुमेह और पक्षाघात जैसी लंबी बीमारियों से भी बड़ी जंग लड़ रहा है। फिर भी संक्रामक बीमारियों को समाप्त मान लेना बड़ी भूल होगी। दस्त, क्षय रोग और निचले श्वसन तंत्र के संक्रमण अब भी भारत में मौत के दस प्रमुख कारणों में शामिल हैं। यानी भारत को एक साथ पुरानी बीमारियों और नई जीवनशैली वाली बीमारियों, दोनों मोर्चों पर लड़ना पड़ रहा है। दूसरी ओर, दुनिया की तस्वीर भी भारत से बहुत अलग नहीं है। वर्ष 2023 में वैश्विक जीवन-प्रत्याशा 73.3 वर्ष पहुंच गई, जो 2019 के 73.4 वर्ष के लगभग बराबर है। लेकिन वैश्विक स्वस्थ जीवन-प्रत्याशा 62.8 वर्ष ही रही, जो 2019 से अब भी 0.4 वर्ष कम है। दुनिया में होने वाली कुल मौतों में गैर-संचारी बीमारियों की हिस्सेदारी 2000 के 58 प्रतिशत से बढ़कर 2023 में 74 प्रतिशत हो गई। दुनिया की दस प्रमुख जानलेवा वजहों में आठ अब गैर-संचारी बीमारियां हैं। बहरहाल, विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक महामारी से स्वास्थ्य संकेतकों को लगा झटका अब काफी हद तक संभल चुका है, लेकिन असली अगली चुनौती लंबी जिंदगी नहीं, स्वस्थ जिंदगी सुनिश्चित करना है। इस तरह भारत के लिए संदेश बिल्कुल साफ है कि सिर्फ लोगों की औसत उम्र बढ़ना स्वास्थ्य क्षेत्र की सफलता का अंतिम पैमाना नहीं हो सकता। अगर बढ़ती उम्र के साथ हृदय रोग, मधुमेह, पक्षाघात और फेफड़ों की बीमारियां भी बढ़ती रहीं, तो देश लंबी जिंदगी तो पाएगा, लेकिन स्वस्थ जिंदगी नहीं। यही वह मोर्चा है, जहां आने वाले वर्षों में भारत की स्वास्थ्य नीतियों की असली परीक्षा होगी।

प्रभासाक्षी 5 Oct 2026 11:48 am

जदयू नेताओं का विपक्ष पर तंज, कहा-'एमएलसी चुनाव में जदयू की 23 अक्टूबर को जीत तय'

जदयू नेताओं का विपक्ष पर तंज, कहा-'एमएलसी चुनाव में जदयू की 23 अक्टूबर को जीत तय'

समाचार नामा 5 Oct 2026 11:47 am

राजभर का अखिलेश पर हमला-पहले अपने नेताओं को अनुशासन सिखाइए, चुनाव बाद में हमसे लड़िए

राजभर का अखिलेश पर हमला-पहले अपने नेताओं को अनुशासन सिखाइए, चुनाव बाद में हमसे लड़िए

समाचार नामा 5 Oct 2026 10:33 am

'आरएसएस भारत माता के लिए संगठित होकर काम करने वाला संगठन', भाजपा नेता का दिग्विजय सिंह पर पलटवार

'आरएसएस भारत माता के लिए संगठित होकर काम करने वाला संगठन', भाजपा नेता का दिग्विजय सिंह पर पलटवार

समाचार नामा 5 Oct 2026 10:11 am

ज्योति-ज्योत दिवस पर श्री गुरु नानक देव को ओम बिड़ला सहित कई नेताओं ने किया नमन

ज्योति-ज्योत दिवस पर श्री गुरु नानक देव को ओम बिड़ला सहित कई नेताओं ने किया नमन

समाचार नामा 5 Oct 2026 8:31 am

18 दिनों की सेवा के बाद, बीजेवाईएम की 'सेवा संकल्प यात्रा' मध्य प्रदेश में प्रवेश कर गई

18 दिनों की सेवा के बाद, बीजेवाईएम की 'सेवा संकल्प यात्रा' मध्य प्रदेश में प्रवेश कर गई

समाचार नामा 4 Oct 2026 11:15 pm

तमिलनाडु: मदुरंतकम और धरपुरम उपचुनावों के लिए प्रचार समाप्त, सीएम विजय ने किया अंतिम रोड शो

तमिलनाडु: मदुरंतकम और धरपुरम उपचुनावों के लिए प्रचार समाप्त, सीएम विजय ने किया अंतिम रोड शो

समाचार नामा 4 Oct 2026 10:36 pm

भाजपा का कांग्रेस को करारा जवाब, एसआईआर पर स्पष्टीकरण किया साझा

भाजपा का कांग्रेस को करारा जवाब, एसआईआर पर स्पष्टीकरण किया साझा

समाचार नामा 4 Oct 2026 8:33 pm

दो हफ़्तों में पवित्र शहरों पर दूसरा हमला: धार्मिक स्थलों पर हमलों को रोकने की तत्काल ज़रूरत

पवित्र धार्मिक शहरों पर दूसरा हमला, 2017 के बाद से सबसे गंभीर हमला, मंगलवार, 29 सितंबर 2026 को स्थानीय समयानुसार सुबह 5:11 बजे हुआ। हूतियों ने मदीना में तैबा पावर डिस्ट्रिब्यूशन स्टेशन को निशाना बनाया, जो इस्लाम के दूसरे सबसे पवित्र स्थल 'अल-मस्जिद अन-नबवी' को बिजली सप्लाई करने वाली एक नागरिक सुविधा है। एक वन-वे अटैक ड्रोन ने एक ट्रांसफ़ॉर्मर को बेकार कर दिया। सऊदी गठबंधन ने बताया कि बड़े ग्रिड पर कोई असर नहीं पड़ा और मस्जिद में बिजली गुल नहीं हुई। गठबंधन के प्रवक्ता मेजर जनरल तुर्की अल-माल्की ने पुष्टि की कि मलबे को बरामद कर लिया गया है और ऑपरेशनल रिव्यू से हूतियों की संलिप्तता की पुष्टि हुई है। मक्का पर हमला दो हफ़्ते पहले, मंगलवार, 15 सितंबर 2026 को स्थानीय समयानुसार शाम 6:50 बजे, सऊदी अरब ने मक्का के दक्षिण में एक हूती ड्रोन को ग्रैंड मस्जिद के ऊपर प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र में घुसने से पहले ही रोककर नष्ट कर दिया। 2017 के बाद मक्का पर यह पहली कोशिश थी। सऊदी अधिकारियों ने इस हमले के लिए यमन के हूती विद्रोहियों को ज़िम्मेदार ठहराया; बढ़ते तनाव के बीच इस्लाम के सबसे पवित्र शहर पर यह अपनी तरह की पहली घटना थी। सऊदी एयर डिफेंस ने जेद्दा से लगभग 70 किलोमीटर अंदर ड्रोन को रोक दिया, जिससे वह अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाया। सऊदी-नेतृत्व वाले गठबंधन के प्रवक्ता कर्नल तुर्की अल-मलिकी ने बताया कि मक्का के प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र में घुसने से पहले ही ड्रोन को रोक दिया गया था। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि दो पवित्र मस्जिदों और तीर्थयात्रियों की सुरक्षा एक 'रेड लाइन' (अति-संवेदनशील सीमा) है। उन्होंने इस हमले की निंदा करते हुए इसे 'शर्मनाक हरकत' बताया, जिसका मकसद इबादत करने वालों में डर पैदा करना और आम नागरिकों को नुकसान पहुँचाना था। सऊदी विदेश मंत्रालय ने इसे 'कायरतापूर्ण आतंकवादी हमला' करार दिया। हूथी आंदोलन (अंसार अल्लाह) ने तुरंत और स्पष्ट रूप से इसकी ज़िम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया। 57 मुस्लिम-बहुल देशों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन 'ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन' (ओ आई सी) ने मक्का पर हुए हमले की कड़ी निंदा करते हुए इसे 'घिनौना' बताया। ओ आई सी ने यमन के हूथी आंदोलन को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराया और पवित्र स्थलों की सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय एकजुटता का आह्वान किया। साथ ही, संगठन ने वैश्विक समुदाय से ऐसी हिंसा को रोकने के लिए कदम उठाने का आग्रह किया, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता और धार्मिक सद्भाव को खतरा हो सकता है। सऊदी अरब और जी सी सी ने कहा कि इन हमलों ने 'सभी रेड लाइन्स पार कर ली हैं' और यह 'हालात को गंभीर रूप से बिगाड़ने' (ग्रेव एस्केलेशन) जैसा है। मक्का और मदीना को निशाना बनाकर दुनिया भर के लाखों मुसलमानों को जान-बूझकर उकसाया गया है। यू ए ई, बहरीन, कुवैत, जॉर्डन और तुर्की ने भी एकजुटता दिखाते हुए बयान जारी किए। हूथियों ने ज़िम्मेदारी से इनकार करते हुए कहा कि उन्होंने किसी भी पवित्र स्थल को निशाना नहीं बनाया। उन्होंने सऊदी अरब पर आरोप लगाया कि वह मक्का के बारे में पहले किए गए दावे को साबित न कर पाने की अपनी नाकामी को छिपाने की कोशिश कर रहा है। अब मदीना क्यों? हूथियों ने जुलाई 2026 में सऊदी अरब की समुद्री नाकेबंदी की घोषणा की थी और 2022 में संयुक्त राष्ट्र संघ की युद्धविराम संधि के टूटने के बाद सीमा-पार हमले फिर से शुरू कर दिए थे। सना और लाल सागर के तट पर उनके नियंत्रण की वजह से वे 900 किलोमीटर से ज़्यादा दूरी तक ड्रोन भेजकर मदीना तक पहुँच सकते हैं। पवित्र मस्जिद के पास बिजलीघर पर हमला करने का मकसद धार्मिक आक्रोश को भड़काना, सऊदी अरब पर दबाव बढ़ाना और ईरान-समर्थित क्षमताओं का प्रदर्शन करना है, ताकि यह दिखाया जा सके कि वे ईरान-अमेरिका-इज़राइल के बीच चल रहे संघर्ष के दौरान भी सऊदी अरब के अंदरूनी इलाकों तक हमला कर सकते हैं। इसमें किसी के हताहत होने की खबर नहीं है, लेकिन इसका प्रतीकात्मक असर बहुत बड़ा है। इस्लामी दुनिया में, पैगंबर की मस्जिद (मस्जिद-ए-नबवी) को सेवा देने वाले बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने को पवित्रता पर ही हमला माना जाता है। धार्मिक स्थलों पर हमलों को रोकने वाले अंतरराष्ट्रीय नियम टकराव के दौरान धार्मिक स्थलों को निशाना बनाना युद्ध का एक पुराना और दुखद पहलू रहा है। अंतरराष्ट्रीय कानून में इस मुद्दे पर स्पष्ट नियम हैं, जो सीधे तौर पर ऊपर बताए गए हमलों जैसे मामलों को संबोधित करते हैं। नीचे इन स्थलों के लिए ऐतिहासिक उदाहरण और मुख्य कानूनी सुरक्षा उपाय दिए गए हैं। अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून (आई एच एल) सशस्त्र संघर्षों के दौरान कई तरह से धार्मिक स्थलों की सुरक्षा करता है। इसका मुख्य सिद्धांत यह है कि ये स्थल नागरिकों की संपत्ति हैं और इन पर तब तक हमला नहीं किया जाना चाहिए जब तक कि ये सैन्य लक्ष्य न बन जाएं। 1907 के हेग नियमों का अनुच्छेद 27 कहता है कि घेराबंदी और बमबारी के दौरान, 'धर्म, कला, विज्ञान या धर्मार्थ कार्यों के लिए समर्पित इमारतों, ऐतिहासिक स्मारकों, अस्पतालों... को यथासंभव बचाने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए', बशर्ते कि उनका उपयोग सैन्य उद्देश्यों के लिए न किया जा रहा हो। अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आई सी सी) के रोम स्टैच्यूट के आर्टिकल 8(2)(बी)(ix) और 8(2)(ई)(iv) के तहत, 'धर्म, शिक्षा, कला, विज्ञान या चैरिटी के कामों के लिए बनी इमारतों, ऐतिहासिक स्मारकों या अस्पतालों पर जान-बूझकर हमला करना' इंटरनेशनल और नॉन-इंटरनेशनल आर्म्ड कॉन्फ्लिक्ट (सशस्त्र संघर्ष) में वॉर क्राइम माना जाता है, बशर्ते वे मिलिट्री टारगेट न हों। कस्टमरी इंटरनेशनल लॉ (प्रचलित अंतरराष्ट्रीय कानून) सभी देशों के लिए अनिवार्य नियम के तौर पर धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों की सुरक्षा करता है, चाहे किसी संधि को मंज़ूरी दी गई हो या नहीं। आई सी आर सी और दूसरे संगठन लगातार इस बात पर ज़ोर देते हैं कि इन स्थलों की सुरक्षा करना 'इंटरनेशनल ह्यूमैनिटेरियन लॉ (अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून) के तहत एक अनिवार्य दायित्व और एक बहुत बड़ी नैतिक ज़िम्मेदारी है।' हालांकि धार्मिक स्थलों पर हमलों को रोकने वाला कानूनी ढांचा मज़बूत है, लेकिन जवाबदेही हमेशा सुनिश्चित नहीं हो पाती। मुख्य चुनौती कड़े कानूनी नियमों और कमज़ोर लागूकरण के बीच संतुलन बनाने की है। न्यायिक कार्रवाई अक्सर अंतरराष्ट्रीय अदालतों के अधिकार क्षेत्र या मामलों को आगे बढ़ाने की देशों की इच्छा पर निर्भर करती है। प्रतिबंध जैसे राजनीतिक उपाय असरदार हो सकते हैं, लेकिन भू-राजनीतिक कारणों से अक्सर उन्हें चुनिंदा तौर पर लागू किया जाता है। निष्कर्ष धार्मिक स्थलों पर कई ऐतिहासिक हमलों के बावजूद, अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने ऐसे कामों को स्पष्ट रूप से रोकने के लिए एक मज़बूत कानूनी ढांचा बनाया है। चुनौती नियमों की कमी में नहीं, बल्कि लागूकरण, अधिकार क्षेत्र और राजनीतिक बाधाओं के बीच संतुलन बनाने में है। यही संतुलन तय करता है कि क्या ऊपर बताए गए हमलों के मामलों में इन सुरक्षा उपायों को असरदार ढंग से लागू किया जा सकता है या नहीं।

प्रभासाक्षी 4 Oct 2026 6:20 pm

'दोहरा मापदंड और पब्लिसिटी स्टंट', ठाकरे बंधुओं के 'गर्जना मोर्चा' पर भाजपा-शिवसेना का तंज

'दोहरा मापदंड और पब्लिसिटी स्टंट', ठाकरे बंधुओं के 'गर्जना मोर्चा' पर भाजपा-शिवसेना का तंज

समाचार नामा 4 Oct 2026 4:38 pm

सीपीआई(एम) ने बंगाल के कूचबिहार में पार्टी कार्यालय में तोड़फोड़ का भाजपा पर लगाया आरोप

सीपीआई(एम) ने बंगाल के कूचबिहार में पार्टी कार्यालय में तोड़फोड़ का भाजपा पर लगाया आरोप

समाचार नामा 4 Oct 2026 4:36 pm

एआईएडीएमके छोड़ टीवीके में शामिल हुए पूर्व विधायक मुरुगुमारन, नेतृत्व पर लगाए गंभीर आरोप

एआईएडीएमके छोड़ टीवीके में शामिल हुए पूर्व विधायक मुरुगुमारन, नेतृत्व पर लगाए गंभीर आरोप

समाचार नामा 4 Oct 2026 4:35 pm

राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और अखिलेश यादव कर रहे वोट बैंक की राजनीति: गिरिराज सिंह

राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और अखिलेश यादव कर रहे वोट बैंक की राजनीति: गिरिराज सिंह

समाचार नामा 4 Oct 2026 4:24 pm

'वोट की चोरी हो रही है', तेजस्वी ने चुनाव आयोग से लेकर केंद्र सरकार को घेरा

'वोट की चोरी हो रही है', तेजस्वी ने चुनाव आयोग से लेकर केंद्र सरकार को घेरा

समाचार नामा 4 Oct 2026 2:31 pm

2027 गोवा चुनाव से पहले 'आप' ने कसी कमर; नई गोवा कोर कमेटी का ऐलान, वाल्मीकि नाइक को मिली कमान

2027 गोवा चुनाव से पहले 'आप' ने कसी कमर; नई गोवा कोर कमेटी का ऐलान, वाल्मीकि नाइक को मिली कमान

समाचार नामा 4 Oct 2026 2:28 pm

'तानाशाही और चुनाव चोरी के खिलाफ 1857 जैसा विद्रोह', सीईसी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन पर बोले संजय राउत

'तानाशाही और चुनाव चोरी के खिलाफ 1857 जैसा विद्रोह', सीईसी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन पर बोले संजय राउत

समाचार नामा 4 Oct 2026 2:22 pm

पश्चिम एशिया : तनाव मार्केट आउटलुक अगले हफ्ते आरबीआई पॉलिसी

मुंबई, छुट्टियों के कारण छोटे रहे कारोबारी सप्ताह में भारतीय शेयर बाजार पर वैश्विक दबाव हावी रहा और प्रमुख सूचकांक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक स्तरों से नीचे फिसल गए। अब अगले सप्ताह निवेशकों की निगाहें आरबीआई की मौद्रिक नीति समीक्षा, दूसरी तिमाही (क्यू2) के कॉरपोरेट नतीजों और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव पर रहेंगी, जो बाजार की अगली दिशा तय कर सकते हैं।

देशबन्धु 4 Oct 2026 1:14 pm

सोनिया गांधी की आंखों में बाटला हाउस एनकाउंटर के आरोपियों के लिए थे आंसू, कैप्टन स्मित के लिए करुणा का भाव नहीं : सुधांशु त्रिवेदी

सोनिया गांधी की आंखों में बाटला हाउस एनकाउंटर के आरोपियों के लिए थे आंसू, कैप्टन स्मित के लिए करुणा का भाव नहीं : सुधांशु त्रिवेदी

समाचार नामा 4 Oct 2026 12:40 pm

'मतभेद मामूली, सब कुछ सुलझा लिया जाएगा', अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच विवाद पर बोले एनडीए के नेता

'मतभेद मामूली, सब कुछ सुलझा लिया जाएगा', अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच विवाद पर बोले एनडीए के नेता

समाचार नामा 4 Oct 2026 10:27 am