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कांग्रेस की शक्ति योजना ने कर्नाटक की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की रीढ़ तोड़ दी : भाजपा

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समाचार नामा 2 Sep 2026 12:16 pm

यूपी के उत्पाद अब जर्मनी में मचाएंगे धूम, निवेश को भी मिलेगा नया विस्तार : केशव प्रसाद मौर्य

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समाचार नामा 2 Sep 2026 12:10 pm

बंगाल में बिना लाइसेंस सरकारी जमीन पर चल रहे कई होटल-रेस्टोरेंट : दिलीप घोष

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समाचार नामा 2 Sep 2026 11:59 am

नितेश राणे ने राहुल गांधी पर साधा निशाना, कहा-'ये लोग हिंदुत्व के खिलाफ कर रहे काम' (आईएएनएस इंटरव्यू)

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समाचार नामा 2 Sep 2026 11:51 am

जीतू पटवारी का सीएम मोहन यादव को पत्र-'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम के लिए नेहरू स्टेडियम की मांग

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समाचार नामा 2 Sep 2026 11:49 am

सुर्खियों में रहने के लिए विवादित बयान देने वालीं Swara Bhasker को Jauhar पर टिप्पणी करना भारी पड़ा, Priyanka Chaturvedi ने दिया करारा जवाब

फिल्म पद्मावत के जौहर दृश्य को लेकर अभिनेत्री स्वरा भास्कर एक बार फिर विवादों के केंद्र में हैं। दिल्ली में आयोजित ‘Woman, Life, Freedom’ कार्यक्रम में उनकी टिप्पणियों का वीडियो वायरल हुआ, जिसके बाद उन पर रानी पद्मावती और जौहर करने वाली महिलाओं को अपमानित करने के आरोप लगे। विवाद बढ़ा तो स्वरा सामने आईं और कहा कि उनकी बात को “पूरी तरह गलत तरीके से अनुवादित और प्रसारित” किया गया है। लेकिन सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि स्वरा ने वास्तव में क्या कहा। बड़ा सवाल यह भी है कि आखिर उनकी सार्वजनिक टिप्पणियां बार-बार ऐसे विवादों का रूप क्यों ले लेती हैं, जिनके बाद उन्हें सफाई देनी पड़ती है कि “मेरा मतलब वह नहीं था”? हम आपको बता दें कि 31 अगस्त को दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित चर्चा के दौरान स्वरा भास्कर ने पद्मावत के क्लाइमैक्स का जिक्र करते हुए कहा कि सैकड़ों महिलाओं को जौहर करते देख उन्होंने सोचा कि यदि वह स्वयं कभी यौन हिंसा की शिकार होतीं तो फिल्म का संदेश उन्हें क्या महसूस कराता। स्वरा का तर्क था कि ऐसी प्रस्तुति किसी बलात्कार पीड़िता को यह महसूस करा सकती है कि जीवित रहना कम सम्मानजनक है और मृत्यु को चुनना अधिक “बहादुरी” है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या ऐसे समाज में, जहां यौन हिंसा गंभीर समस्या है, फिल्मों को महिलाओं की “पवित्रता” को उनके जीवन से अधिक मूल्यवान दिखाना चाहिए। उन्होंने जौहर दृश्य में एक गर्भवती महिला के शॉट पर भी आपत्ति जताई और इसे लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी। इसे भी पढ़ें: GDP वृद्धि के आंकड़ों पर Mallikarjun Kharge का हमला, बेरोजगारी और महंगाई पर सरकार को घेरा विवाद तब बढ़ा जब सोशल मीडिया पर यह आरोप लगाया गया कि स्वरा ने रानी पद्मावती और जौहर करने वाली महिलाओं को “कायर” कहा है। इसके बाद स्वरा ने इंस्टाग्राम पर वीडियो जारी कर स्पष्ट किया कि उन्होंने न तो रानी पद्मावती को कायर कहा और न ही जौहर करने वाली अन्य महिलाओं को। स्वरा ने कहा कि उनका मूल आशय यह था कि फिल्म का दृश्य आधुनिक दौर के यौन हिंसा पीड़ितों तक कौन-सा संदेश पहुंचा सकता है। उन्होंने कहा कि यदि कोई महिला बलात्कार के बाद जीवित रहती है, तो उसे कभी यह महसूस नहीं कराया जाना चाहिए कि उसके जीवन या सम्मान का मूल्य कम हो गया है। यहां सवाल उठता है कि क्या स्वरा इतिहास के सबसे कठिन संदर्भ को नजरअंदाज कर रही हैं? स्वरा भास्कर का यह कहना कि बलात्कार या यौन हिंसा के बाद भी महिला का जीवन, सम्मान और अस्तित्व पूरी तरह मूल्यवान है, अपने आप में एक महत्वपूर्ण और आधुनिक मानवीय तर्क है। किसी भी पीड़िता को आत्महत्या, आत्मदाह या मृत्यु के लिए प्रेरित करना न तो स्वीकार्य है और न ही उसका महिमामंडन किया जाना चाहिए। लेकिन पद्मावत के जौहर प्रसंग और आधुनिक बलात्कार पीड़िताओं की परिस्थितियों को एक ही पैमाने पर रख देना इतिहास की जटिलताओं को अत्यधिक सरल बना देता है। जौहर की ऐतिहासिक चर्चा युद्ध, पराजय, सामूहिक हिंसा, दासता और विजेता की सत्ता के भयावह संदर्भ में होती है। उस समय महिलाओं के सामने सिर्फ यौन हिंसा का खतरा नहीं, बल्कि बंदी बनाए जाने, दासता, जबरन हरम में भेजे जाने और जीवन भर विजेता की संपत्ति बनकर रहने जैसी परिस्थितियों का भय भी मौजूद बताया जाता है। ऐसे में जौहर को केवल “महिलाओं को अपनी पवित्रता बचाने के लिए मरने का संदेश” कहकर खारिज कर देना क्या उस ऐतिहासिक त्रासदी को पर्याप्त रूप से समझना है? शिवसेना (यूबीटी) की राज्यसभा सांसद रहीं प्रियंका चतुर्वेदी ने भी स्वरा भास्कर के तर्क का विरोध करते हुए बहस में एक महत्वपूर्ण आयाम जोड़ा है। उनका कहना था कि युद्ध और आक्रमण जैसी चरम परिस्थितियों में मृत्यु, दासता या विजेता के हरम में जबरन जीवन बिताने के बीच महिलाओं द्वारा लिया गया निर्णय उनकी व्यक्तिगत राय के रूप में भी देखा जाना चाहिए। प्रियंका चतुर्वेदी का तर्क मूलतः यह है कि उस निर्णय से असहमति हो सकती है, उसके ऐतिहासिक विवरणों पर बहस हो सकती है, लेकिन उन महिलाओं के सामने मौजूद परिस्थितियों को नजरअंदाज कर उनके फैसले को हल्के ढंग से देखना उचित नहीं है। देखा जाये तो यही इस विवाद का केंद्रीय प्रश्न है कि क्या आज की सुरक्षित, आधुनिक और संवैधानिक दृष्टि से सदियों पुराने युद्धकालीन निर्णयों का मूल्यांकन करना पर्याप्त है? इतिहास का अध्ययन करते समय यह याद रखना आवश्यक है कि अतीत के लोगों के पास वे विकल्प नहीं थे जो आज हमारे पास हैं। आधुनिक समाज में आत्मदाह का समर्थन नहीं किया जा सकता। लेकिन जौहर की ऐतिहासिक व्याख्या करते समय उसके संदर्भ को समझना आवश्यक है। जौहर को केवल “पवित्रता बचाने के लिए आत्महत्या” के रूप में देखना अधूरा दृष्टिकोण है। युद्धकालीन परिस्थितियों में यह सामूहिक रूप से विजेता के सामने समर्पण न करने और दासता को स्वीकार न करने की त्रासद प्रतिक्रिया के रूप में भी देखा जाता है। इसलिए यह कहना कि जौहर करने वाली महिलाएं “जीना नहीं चाहती थीं” या उनका निर्णय केवल स्त्री-विरोधी सामाजिक मानसिकता का परिणाम था, यह उस समय के हालात की वास्तविकता को नकारना है। हम आपको यह भी बता दें कि स्वरा भास्कर का पद्मावत से विवाद नया नहीं है। जनवरी 2018 में फिल्म की रिलीज के बाद उन्होंने निर्देशक संजय लीला भंसाली को एक खुला पत्र लिखा था। उस पत्र में भी उन्होंने फिल्म के जौहर दृश्य और महिलाओं की गरिमा को यौन शुचिता से जोड़ने पर सवाल उठाए थे। पद्मावत में दीपिका पादुकोण ने रानी पद्मावती की भूमिका निभाई थी, जबकि शाहिद कपूर और रणवीर सिंह भी फिल्म के प्रमुख कलाकार थे। फिल्म मलिक मोहम्मद जायसी की 16वीं शताब्दी की रचना पद्मावत से प्रेरित थी और रिलीज से पहले ही बड़े विवादों में घिर चुकी थी। फिल्म का जौहर दृश्य उसके सबसे चर्चित दृश्यों में शामिल रहा और आज, वर्षों बाद भी, वही दृश्य बहस का केंद्र बना हुआ है। वहीं स्वरा भास्कर के बयान के बाद उनके आलोचकों ने उन्हें निशाने पर ले लिया है। स्वरा भास्कर के आलोचकों का कहना है कि उनके साथ समस्या केवल विचारों की नहीं, बल्कि विचार व्यक्त करने की शैली की भी है। दरअसल, उनके बयान अक्सर इतने तीखे और उत्तेजक अंदाज में सामने आते हैं कि सोशल मीडिया पर तूफान खड़ा हो जाता है। फिर विवाद बढ़ने पर स्वरा का स्पष्टीकरण आता है कि उनकी बात का अर्थ कुछ और था। इस बार भी स्वरा ने कहा कि उन्होंने रानी पद्मावती को “कायर” नहीं कहा। स्वरा भास्कर के आलोचक एक और असहज सवाल भी उठा रहे हैं कि क्या लगातार सार्वजनिक चर्चा में बने रहने की इच्छा उनकी बयानबाजी को प्रभावित करती है? यहां एक और गंभीर प्रश्न उठता है कि क्या हम इतिहास को उसके अपने समय और परिस्थितियों में समझेंगे, या आज के नैतिक मानदंडों से उसका तत्काल फैसला करेंगे? स्वरा भास्कर और उन जैसी सोच रखने वालों को यह समझना होगा कि हर बार विवाद पैदा होने के बाद यह कहना कि “मेरा मतलब यह नहीं था”, सार्वजनिक संवाद की समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। अगर बात बार-बार गलत समझी जा रही है, तो केवल श्रोताओं और आलोचकों को दोष देने की बजाय वक्ता को भी अपनी भाषा, उदाहरणों और प्रस्तुति पर विचार करना चाहिए। बहरहाल, पद्मावत और जौहर पर बहस जारी रह सकती है और जारी रहनी भी चाहिए। लेकिन बहस का आधार न तो इतिहास का अंध-महिमामंडन होना चाहिए और न ही आधुनिक दृष्टि के नाम पर अतीत की जटिल परिस्थितियों को खारिज कर देना चाहिए। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 2 Sep 2026 11:38 am

पीएम मोदी समेत कई नेताओं ने आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण को दी जन्मदिन की बधाई

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समाचार नामा 2 Sep 2026 11:12 am

तमिलनाडु भाजपा नेता तिरुचि में होने वाली बैठक में स्थानीय चुनावों और उपचुनावों पर करेंगे चर्चा

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समाचार नामा 2 Sep 2026 10:33 am

नितेश राणे का हिजाब-बुर्के पर सख्त रुख, बोले-जरूरत पड़ी तो प्रतिबंध पर विचार करेगी महाराष्ट्र सरकार (आईएएनएस इंटरव्यू)

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समाचार नामा 2 Sep 2026 10:19 am

आरक्षण पर तेजस्वी यादव का BJP-NDA पर हमला, बोले- बड़े पदों पर SC-ST-OBC की हिस्सेदारी इतनी कम क्यों?

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समाचार नामा 2 Sep 2026 8:30 am

'निर्माण स्थलों पर सुरक्षा में लापरवाही बर्दाश्त नहीं', केरल मंत्री पीके बशीर का सख्त संदेश

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समाचार नामा 1 Sep 2026 11:27 pm

एलजी टीएस संधू ने 'वेस्ट-टू-वेल्थ' मॉडल अपनाने का आह्वान किया

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समाचार नामा 1 Sep 2026 9:19 pm

राम मंदिर ट्रस्ट विवाद पर विहिप की डैमेज कंट्रोल की कवायद, केंद्रीय सलाहकार ने संतों से की मुलाकात,

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समाचार नामा 1 Sep 2026 8:25 pm

'डेड इकोनॉमी' विवाद पर कांग्रेस नेता राकेश सिन्हा का पलटवार, बोले-जीडीपी आंकड़ों से नहीं छिपेगी जमीनी हकीकत

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समाचार नामा 1 Sep 2026 8:10 pm

7.8 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ देश की तरक्की को दिखाती है: सीएम देवेंद्र फडणवीस

7.8 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ देश की तरक्की को दिखाती है: सीएम देवेंद्र फडणवीस

समाचार नामा 1 Sep 2026 7:22 pm

भाजपा का 'बल्लारी चलो' मार्च: येदियुरप्पा ने कर्नाटक सरकार को उखाड़ फेंकने का लिया संकल्प

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समाचार नामा 1 Sep 2026 6:21 pm

'शुक्र है हम बिना वीजा के गोरखपुर जा सकते हैं', रवि किशन के 'स्पेन' वाले बयान पर चंद्रशेखर का तंज

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समाचार नामा 1 Sep 2026 6:11 pm

SCO के मंच से चीन और पाकिस्तान को एक साथ धोकर मोदी ने दुनिया की वाहवाही लूट ली

एससीओ शिखर सम्मेलन में वैसे तो सभी सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने अपने अपने संबोधन में तमाम तरह के मुद्दे उठाये लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन में शामिल मुद्दों की विविधता और सबको साथ लेकर चलने के जज्बे ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। साथ ही तमाम अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक भी यह देखकर हैरान हैं कि कैसे मोदी ने मंच पर साथ मौजूद चीन के राष्ट्रपति और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को जबरदस्त तरीके से घेर लिया। हम आपको बता दें कि शहबाज शरीफ के सामने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को कठघरे में खड़ा किया तो वहीं संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सवाल पर चीन को भी आड़े हाथ लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आतंकवाद पर मोदी ने दो टूक कहा कि जो देश आतंकियों को पनाह देते हैं और आतंकवाद को अपनी नीति के औजार के रूप में इस्तेमाल करते हैं, उन्हें स्पष्ट संदेश दिया जाना चाहिए कि आतंक कभी किसी की रणनीतिक संपत्ति नहीं बन सकता। वहीं कनेक्टिविटी के नाम पर संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से समझौते को अस्वीकार करते हुए उन्होंने चीन को भी साफ संदेश दिया। किर्गिज गणराज्य की राजधानी बिश्केक में 31 अगस्त से 1 सितंबर तक आयोजित 26वें शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन में भारत ने अपनी मौजूदगी को महज औपचारिक भागीदारी तक सीमित नहीं रखा। प्रधानमंत्री मोदी ने एससीओ के 25 वर्षों की यात्रा को अगले 25 वर्षों की दिशा तय करने के अवसर में बदलते हुए भारत का स्पष्ट एजेंडा सामने रखा। सिक्योरिटी, कनेक्टिविटी और अपॉर्च्युनिटी के जरिये मोदी का संदेश था कि अब केवल घोषणाओं और संवाद से काम नहीं चलेगा, बल्कि सहयोग को ठोस परिणामों में बदलना होगा। इसे भी पढ़ें: BRICS 2026: क्या विस्तार के बाद Global Economy की दिशा बदल पाएगा भारत? 11 देशों के Leaders पर टिकी नजरें प्रधानमंत्री के भाषण का सबसे धारदार हिस्सा आतंकवाद पर था। उन्होंने कहा कि आतंकवाद मानवता के लिए गंभीर चुनौती है और इसके खिलाफ कार्रवाई केवल घटना के बाद प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। आतंकवादी वित्तपोषण, भर्ती, कट्टरपंथ, सुरक्षित ठिकानों और पूरे आतंकी तंत्र को ध्वस्त करना होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि मोदी ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में किसी भी प्रकार के दोहरे मापदंड को स्वीकार करने से साफ इंकार किया। यह संदेश ऐसे मंच से आया, जहां पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ स्वयं मौजूद थे। भारत की कूटनीतिक उपलब्धि यहीं समाप्त नहीं हुई। एससीओ के 25 वर्ष पूरे होने पर स्वीकार की गई बिश्केक डिक्लेरेशन ने क्षेत्रीय सुरक्षा और आतंकवाद जैसे मुद्दों पर भारत की प्राथमिकताओं को मजबूती दी। घोषणा और शिखर सम्मेलन के अन्य फैसलों में आतंकवाद, उग्रवाद, संगठित अपराध तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय खतरों से निपटने के लिए सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया गया। सुरक्षा चुनौतियों और खतरों से निपटने के लिए यूनिवर्सल सेंटर संबंधी नियमों को मंजूरी देना सदस्य देशों के बीच समन्वय और सूचना आदान-प्रदान को मजबूत करने वाला कदम है। भारत के लिए विशेष महत्व की बात यह भी रही कि अंग्रेजी को एससीओ के संस्थागत ढांचे में शामिल करने की दिशा में प्रगति हुई। साथ ही भारत द्वारा आगे बढ़ाई गई कई पहलों जैसे- एससीओ सिविलाइजेशन डायलॉग फोरम, यंग साइंटिस्ट फोरम और यंग ऑथर्स कॉन्क्लेव को भी बिश्केक डिक्लेरेशन में स्थान मिला। यह संकेत है कि भारत अब एससीओ में केवल सुरक्षा संबंधी चिंताएं उठाने वाला देश नहीं, बल्कि संगठन के बौद्धिक, सांस्कृतिक और संस्थागत भविष्य को आकार देने वाला सक्रिय साझेदार बन रहा है। मोदी ने अपनी विदेश नीति की व्यापक सोच को भी भाषण में स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि यूरेशिया की सुरक्षा और शांति का संबंध अफगानिस्तान की स्थिरता से जुड़ा है और भारत वहां विकास तथा मानवीय सहायता जारी रखेगा। पश्चिम एशिया के संघर्षों का उदाहरण देते हुए उन्होंने आगाह किया कि आज की दुनिया में किसी एक क्षेत्र का युद्ध उसी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। उसका असर ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर पड़ता है, जिसका सबसे अधिक बोझ ग्लोबल साउथ को उठाना पड़ता है। इसलिए भारत का स्पष्ट मत है कि युद्धों और तनावों का समाधान रणभूमि पर नहीं, बल्कि संवाद और कूटनीति से होना चाहिए। प्रधानमंत्री ने नशे के कारोबार को भी क्षेत्रीय सुरक्षा का गंभीर खतरा बताया। उन्होंने कहा कि मादक पदार्थों की तस्करी केवल अपराध नहीं, बल्कि युवा पीढ़ी और क्षेत्रीय स्थिरता पर हमला है। इस संदर्भ में एससीओ के तहत सुरक्षा, संगठित अपराध, सूचना सुरक्षा और नारकोटिक्स से निपटने के लिए बनाए जा रहे केंद्रों को प्रभावी और त्वरित कार्रवाई का माध्यम बनाने पर जोर दिया गया। इस तरह आतंकवाद और नार्को-टेररिज्म के खिलाफ भारत की चिंता को व्यापक एससीओ एजेंडे से जोड़ने में सफलता मिली। कनेक्टिविटी पर भी मोदी का संदेश उतना ही स्पष्ट और कूटनीतिक रूप से अहम था। भारत बाजारों को जोड़ने, व्यापार बढ़ाने और विकास के नए रास्ते खोलने वाली सभी पहल का समर्थन करता है, लेकिन ऐसी किसी भी परियोजना के लिए सदस्य देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान अनिवार्य है। प्रधानमंत्री का यह संदेश चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड पहल और विशेष रूप से चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिसका एक हिस्सा पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (पीओके) से होकर गुजरता है। भारत लंबे समय से इस परियोजना का विरोध करता रहा है और इसे अपनी संप्रभुता का उल्लंघन मानता है। ऐसे में मोदी ने बिना किसी देश या परियोजना का नाम लिए एससीओ मंच से साफ कर दिया कि कनेक्टिविटी और विकास के नाम पर किसी देश की क्षेत्रीय अखंडता से समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता। साथ ही उन्होंने सड़क, रेल और हवाई संपर्क बढ़ाने के अलावा कस्टम प्रक्रियाओं को सरल बनाने, डिजिटल दस्तावेजीकरण को बढ़ावा देने और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। तीसरे स्तंभ यानि अपॉर्च्युनिटी के जरिए मोदी ने एससीओ सहयोग को आम लोगों से जोड़ने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि सफलता का वास्तविक पैमाना यह होना चाहिए कि युवाओं के लिए कितने अवसर बने, उद्यमियों के लिए कितने नए बाजार खुले, किसानों को तकनीक से कितना लाभ मिला और नागरिकों का जीवन कितना बेहतर हुआ। मोदी ने जोर दिया कि एससीओ सहयोग केवल सरकारों तक सीमित नहीं, बल्कि पीपुल-ड्रिवन पार्टनरशिप बनना चाहिए। इसी दिशा में भारत इस वर्ष पहले एससीओ सिविलाइजेशन डायलॉग फोरम की मेजबानी करेगा। इसके अलावा, शिखर सम्मेलन के इतर प्रधानमंत्री की द्विपक्षीय मुलाकातों ने भी भारत की सक्रिय कूटनीति को मजबूत किया। ताजिकिस्तान के राष्ट्रपति इमोमाली रहमोन के साथ विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा हुई, जबकि लाओस के राष्ट्रपति थोंगलून सिसौलिथ के साथ द्विपक्षीय संबंधों और संपर्क को मजबूत करने पर बातचीत हुई। ये मुलाकातें बताती हैं कि बहुपक्षीय मंचों पर भारत की रणनीति केवल भाषण देने की नहीं, बल्कि समानांतर रूप से द्विपक्षीय संबंधों का नेटवर्क मजबूत करने की भी है। बहरहाल, बिश्केक एससीओ समिट में मोदी ने आतंकवाद पर पाकिस्तान को घेरा, दोहरे मापदंडों को चुनौती दी, संप्रभुता आधारित कनेक्टिविटी का सिद्धांत दोहराया और भारत की सांस्कृतिक व युवा-केंद्रित पहलों को एससीओ के एजेंडे में स्थापित किया। उनका संदेश साफ था कि “शेयर्ड जियोग्राफी” को “शेयर्ड अपॉर्च्युनिटीज” में बदलना होगा, विजन को परिणामों में और सरकार-केंद्रित सहयोग को जन-केंद्रित साझेदारी में परिवर्तित करना होगा। कुल मिलाकर, बिश्केक से भारत ने यही संकेत दिया है कि बदलते यूरेशियाई समीकरणों में वह एजेंडा तय करने वाला देश बन चुका है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 1 Sep 2026 6:09 pm

केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान को जान से मारने की धमकी, गृह मंत्रालय से सुरक्षा बढ़ाने की मांग

केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान को जान से मारने की धमकी, गृह मंत्रालय से सुरक्षा बढ़ाने की मांग

समाचार नामा 1 Sep 2026 5:58 pm

न्यूयॉर्क में मोहन भागवत का संदेश- “E Pluribus Unum” से “वसुधैव कुटुम्बकम्” तक

न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का भाषण सुनकर अमेरिका की एक प्रचलित कहावत स्मरण हो आई “E Pluribus Unum”, “ई प्लूरिबस यूनम” अर्थात् ‘अनेक से एक’। भागवत जी ने अनेक ऐसे बिंदु चिह्नित किए जहाँ, “वसुधैव कुटुम्बकम्” और अमेरिकी “E Pluribus Unum” परस्पर पूरक और पर्याय सिद्ध होते हैं। सबसे बड़ी बात, उनका संदेश केवल अमेरिका में बसे भारतीयों के लिए नहीं था; उसमें भारत, भारतीयता, विविधता, सह-अस्तित्व और विश्व-मानवता के प्रति एक व्यापक दृष्टि का विकास क्रम था। भागवत जी ने अपने प्रबोधन में विविधता को भारत की शक्ति बताया। उन्होंने कहा कि भारत की एकता विविधताओं से सजती है और विविधता में केवल परस्पर एडजस्ट करना पर्याप्त नहीं है, विविधता को स्वीकार कर उसे सम्मान और संरक्षण भी देना होगा। यही भारतीय दर्शन है। धार्मिक, नस्लीय और सांस्कृतिक ध्रुवीकरण के चक्र फँसे वर्तमान विश्व हेतु यही आवश्यक है। मोहनराव जी के न्यूयॉर्क उद्बोधन से निकला सबसे महत्वपूर्ण संदेश हिंदू-मुस्लिम संबंधों पर स्पष्ट वक्तव्य था। उन्होंने दो टूक उस सोच को नकारा कि भारत में मुसलमानों के लिए कोई स्थान नहीं है। उन्होंने हिंदू और मुस्लिम समाज को साझा पूर्वजों से जोड़ते हुए “same DNA” की बात भी दोहराई। इसे भी पढ़ें: मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा: भारतीय चिंतन की सार्थक प्रस्तुति भारतीय-अमेरिकी समुदाय आज अमेरिका के सर्वाधिक सफल और प्रभावी प्रवासी समुदाय में से एक है। उसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध और अनेक भाषाई-सांस्कृतिक समूह शामिल हैं। यदि भारतीय मूल के लोग अपनी भारतीय पहचान को किसी एक धार्मिक पहचान तक सीमित न करके एक साझा सभ्यतागत पहचान के रूप में देखते हैं, तो अमेरिकी समाज में भारतीय समुदाय की एकता और प्रभाव दोनों बढ़ सकते हैं। भागवत का संदेश अमेरिका में भारतीय मूल की नई पीढ़ी के लिए विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है। पहली पीढ़ी के प्रवासी प्रायः भारत से भावनात्मक रूप से जुड़े रहते हैं, जबकि दूसरी और तीसरी पीढ़ी अमेरिकी सामाजिक परिवेश में पली-बढ़ी है। उनके सामने प्रश्न रहता है कि वे अपनी भारतीय सांस्कृतिक पहचान को अमेरिकी नागरिकता के साथ किस प्रकार संतुलित करें। भागवत का दृष्टिकोण इस प्रश्न का सकारात्मक उत्तर देता है, अमेरिका के प्रति पूर्ण निष्ठा और भारत की सभ्यतागत विरासत के प्रति सम्मान एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। ‘अपनी कर्मभूमि के प्रति निष्ठावान रहो’ विदेशी भूमि पर जाकर अपनों से यह कहने का सामर्थ्य, साहस और सहजता एक स्वयंसेवक या ‘संघ विचार’ के पास ही हो सकती है। यह विचार भारतीय-अमेरिकी समुदाय को “Hyphenated Identity” की समस्या से मुक्ति देकर एक आत्मविश्वासी नागरिक की पहचान देता है। मोहन भागवत जी के कहे पर चलें तो अमेरिकी भारतीय युवा श्रेष्ठ अमेरिकी होते हुए भी अपनी भारतीय जड़ों पर गर्व कर सकते हैं। भागवतजी ने भारतीयता को केवल धार्मिक आग्रह के रूप में नहीं बल्कि साझा सांस्कृतिक और मानवीय विरासत के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया। विश्व में अमेरिका अब एक सर्वाधिक विविधता भरा समाज बन गया है। अमेरीका को सौजन्यशाली विविधता देने में भारत का सबसे बड़ा योगदान है। अमेरिका में बसे अनेक प्रकार के भारतीय समुदाय आज अमेरिकी समाज को एक इंद्रधनुष का रूप देते हैं। यह हमारे लिए गौरान्वित करने वाला विषय है। भारतीय-अमेरिकी समुदाय अमेरिका की अर्थव्यवस्था, तकनीक, चिकित्सा, शिक्षा, उद्यमिता और सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण योगदान देता है। यदि इस समुदाय में सांस्कृतिक आत्मविश्वास और सामाजिक समरसता बढ़ती है तो उसका लाभ अमेरिकी समाज को भी मिलेगा। संघ प्रमुख ने भारतीय संस्कृति के प्रत्येक के रूप में तीन शब्द कहे “Acceptance, Respect and Protection”। उनके भाषण से यह पुनः सिद्ध हुआ कि ‘सहिष्णुता’ ‘Tolerance’ भारतीय शब्द है ही नहीं। भारतीयता का मूल स्वर है स्वीकार्यता। ‘सहिष्णुता’ ‘Tolerance’ से तो अहम् व्यक्त होता है। ‘सहिष्णुता’ शब्द से स्वर आता है कि “तुम मुझे पसंद नहीं किंतु फिर भी तुम यहाँ रह लो”। Acceptance और Respect का अर्थ है, सभी समुदाय को स्वीकारता हूँ और उनका सम्मान करता हूँ। सरसंघचालक के न्यूयार्क प्रवास के विषय में जोहरान ममदानी तो मध्ययुगीन मुस्लिम सिद्ध हो गए हैं। जोहरान ममदानी ने अप्रासंगिक बातें करके न्यूयार्क के मेयर पद की गरिमा को ही ध्वस्त कर दिया। ममदानी को पता ही नहीं कि भारत का दृष्टिकोण “Pluralistic” और “Secular republic” से बहुत आगे बढ़कर “वयं राष्ट्रे जागृयाम” का है। जिस प्रकार के शब्द ममदानी ने कहे हैं, उससे तो लगता है वे अपनी दिमागी हालत की चिंता करें, भारत की नहीं। यदि ममदानी के मूल्य लोकतांत्रिक नहीं हैं। वे इस कार्यक्रम के निजी स्थान, सार्वजनिक स्थान, कार्यक्रम रोकने जैसे शब्दों को प्रयोग करके ‘फासिस्ट’ और ‘मध्ययुगीन मुस्लिम’ सिद्ध हो गए हैं। जोहरान ममदानी ने अमेरिका के नागरिक और न्यूयार्क के मेयर की गरिमा के विरुद्ध जाकर यह व्यक्त किया कि यदि उनके पास अधिकार होते तो वे संघ प्रमुख को न्यूयार्क में भाषण ही नहीं देने देते। इससे अधिक शर्मनाक और वैचारिक निर्धनता भला और क्या हो सकती है। सरसंघचालक जी के भाषण के पूर्व ही “Exclusionary” जैसे शब्दों का प्रयोग करने वाले ममदानी इस भाषण के बाद अब वैचारिक रूप से कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रह गए हैं। न्यूयॉर्क के मेयर से नहीं किंतु ममदानी के घर जाकर आज उनसे प्रश्न किया जाना चाहिए कि वे अमेरिकी लोकतांत्रिक विचारों से इतने भिन्न क्यों हैं? और यदि वे न्यूयार्क नगर की सभ्यता, संस्कृति और सहजता को आत्मसात नहीं कर पा रहें हैं तो वे मेयर पद पर टिके ही क्यों हैं? जोहरान ममदानी ने तो न्यूयार्क में “Free Speech” के अधिकार पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया है। भागवत जी के न्यूयॉर्क भाषण ने हिंदुत्व, हिंदू संस्कृति, भारतीय सभ्यता, भारतीय सर्वसमावेशिकता, सर्व स्पर्शिता को बड़ी सहजता से स्थापित किया है। यद्यपि यह पहले भी स्थापित ही थी किंतु अब इसे एक नया आयाम मिल गया है। भारत के संदर्भ में अमेरिका में एक नए विमर्श का आरम्भ है, भागवत जी का यह वैचारिक प्रबोधन। “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति”, “वसुधैव कुटुम्बकम्” और विविधता में एकता की परंपरा को मैडिसन स्क्वेयर से पुनर्परिभाषित करने हेतु मोहन राव जी का अभिनंदन कर रहा है ‘अमेरिकी भारतीय’ समुदाय। अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करने का अर्थ दूसरे की पहचान से घृणा करना नहीं है, यह सिद्ध करने हेतु भी वे अभिनन्दनीय हैं। अमेरिका कहावत “E Pluribus Unum”, अर्थात् ‘अनेक से एक’, को स्थापित करता और भारतीयता के मूल से जोड़ता यह संघ संवाद एक अद्भुत सार्थकता, स्वीकार्यता, सहजता व सामुदायिकता के भाव को जन्म देता है। कहना ही होगा कि यदि शिकागो से अमेरिका और समूचे विश्व को स्वामी विवेकानंद जी ने एक वैचारिक माला दी थी तो मोहन राव जी भागवत ने इस ‘विवेकानंद माला’ का पुनर्जाप ही किया है। - डॉ. प्रवीण दाताराम

प्रभासाक्षी 1 Sep 2026 5:56 pm

सपाट बंद हुआ शेयर बाजार, आईटी शेयरों में दिखी खरीदी

मुंबई, भारतीय शेयर बाजार मंगलवार के कारोबारी सत्र में करीब सपाट बंद हुआ। दिन के अंत में सेंसेक्स 12.99 अंक या 0.02 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 76,944.28 और निफ्टी 24.60 अंक या 0.10 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 24,055.80 पर था।

देशबन्धु 1 Sep 2026 5:14 pm

वित्तीय वर्ष 2026-27 की प्रथम तिमाही में आर्थिक विकास दर ने चौंकाया

दिनांक 31 अगस्त 2026 को सायंकाल में केंद्र सरकार ने भारत के वित्तीय वर्ष 2026-27 की प्रथम तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर के आंकड़े जारी किए हैं। विश्व बैंक एवं अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष सहित अन्य वैश्विक संस्थानों, एसोचेम, भारतीय रिजर्व बैंक आदि के अनुमानों को धत्ता बताते हुए अप्रेल-जून 2026 की तिमाही में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है। जबकि, उक्त संस्थानों ने उक्त अवधि में 6.5 प्रतिशत से 7 प्रतिशत के बीच की वृद्धि दर का अनुमान लगाया था। उक्त वृद्धि दर वैश्विक स्तर पर विभिन्न प्रकार की आर्थिक समस्याओं के बीच हासिल हुई है, इसलिए भारत के लिए यह एक मील का पत्थर साबित होगी। रूस-यूक्रेन युद्ध तो बहुत लम्बे समय से चल रहा है, ईरान-अमेरिका/इजराईल युद्ध भी इस तिमाही में जारी रहा, जिसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि देखने को मिली थी। एक समय तो कच्चे तेल की कीमतें 120 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गई थीं। ज्ञातव्य हो कि भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। ईरान द्वारा स्ट्रेट ओफ होर्मुज को बंद करने के पश्चात इस मार्ग से गुजरने वाले तेल के जहाजों को रोक दिया गया था एवं कच्चे तेल की आपूर्ति पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ा था। परंतु, भारत ने इस दयनीय स्थिति को बहुत ही सूझ बूझ के साथ सम्भाला और अन्य कई देशों से तेल एवं गैस का आयात जारी रखा, जिससे भारत में न तो तेल की आपूर्ति कम हुई और न ही भारत में पेट्रोल एवं डीजल की कीमतों में भारी वृद्धि हुई। जबकि अन्य कई देशों में तो पेट्रोल एवं डीजल की कीमतों में 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज हुई है। भारत के युवाओं (जेन-जी) को इस बात को समझना होगा कि भारत आज आर्थिक विकास के जिस दौर से गुजर रहा है, वह बहुत ही संवेदनशील है। यदि देश में किसी भी प्रकार की अराजकता फैलायी जाती है तो आर्थिक विकास की पटरी से भारत डीरेल हो सकता है। आगे आने वाले 10 वर्षों तक भारत यदि विकास दर की इसी ट्रेजेक्टरी में अपने आप को बनाए रखने में सफल होता है तो भारत के वर्ष 1947 में विकसित राष्ट्र बनने के सपने को साकार होने से कोई रोक नहीं सकता है। अर्थ के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में अप्रेल-जून 2026 तिमाही में सराहनीय वृद्धि दर हासिल की गई है। सकल मूल्य संवर्धन में वृद्धि दर 8.2 प्रतिशत की रही है जो अप्रेल-जून 2025 की तिमाही में 7 प्रतिशत की रही थी। विनिर्माण के क्षेत्र में वृद्धि दर पिछले वर्ष की तिमाही में 8.3 प्रतिशत की रही थी जो इस वर्ष की तिमाही में बढ़कर 9.2 प्रतिशत की हो गई है। इसी प्रकार सेवा के क्षेत्र में भी आर्थिक विकास दर इस वर्ष की प्रथम तिमाही में बढ़कर 10 प्रतिशत पर पहुंच गई जो पिछले वर्ष इसी अवधि में 8 प्रतिशत रही थी। भारत की अर्थव्यवस्था उपभोग आधारित है, अतः निजी उपभोग में इस वर्ष की तिमाही में 7.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है जो पिछले वर्ष इसी अवधि में 6.8 प्रतिशत रही थी। सकल स्थिर पूंजी निर्माण में भी अतुलनीय 11.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है जो पिछले वर्ष की इसी अवधि में केवल 5.8 प्रतिशत की रही थी। इसी प्रकार, रोजगार निर्मित करने वाले क्षेत्रों में भी विकास दर प्रभावशाली रही है। वित्तीय क्षेत्र में वृद्धि दर 12.1 प्रतिशत की दर्ज हुई है तो व्यापार, होटल, यातायात एवं संचार के क्षेत्र में 8.5 प्रतिशत की विकास दर हासिल की गई है। साथ ही गैस एवं विजली उत्पादन में भी वृद्धि दर 8.9 प्रतिशत की रही है। इसे भी पढ़ें: UPA के 'Fragile Five' से 7.8% GDP ग्रोथ तक: Ravi Shankar Prasad ने PM Modi के आर्थिक प्रबंधन को सराहा वित्तीय वर्ष 2026-27 की प्रथम तिमाही में सराहनीय विकास दर हासिल करने को केंद्र सरकार की योजनाओं की सफलता के रूप में भी देखा जा सकता है। केंद्र सरकार ने मेक इन इंडिया नामक योजना को तेजी से आगे बढ़ाया है और इसने भारत को कई क्षेत्रों में आत्म निर्भर बनाने का कार्य सफलतापूर्वक किया है। विशेष रूप से सूचना प्रौद्योगिकी, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट, डिजिटल भुगतान, फिन टेक, इंजिनीयरिंग डिजाइन, व्यापार परामर्श, वैश्विक ग्लोबल योग्यता सेंटर, आदि क्षेत्रों में भारत आज पूरे विश्व में लीड कर रहा है। मेक इन इंडिया योजना ने भारतीय नागरिकों में जोश भरा और भारत की प्रतिभा का डंका पूरे विश्व में बज गया है। दूसरे, भारत में उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना को भी लागू किया गया। इस योजना ने भारत को उपभोक्ता बाजार से निकालकर मजबूत वैश्विक विनिर्माण हब में बदल दिया है। उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना के अंतर्गत 14 प्रमुख क्षेत्रों में करीब 2.3 लाख करोड़ रुपए का निवेश हुआ है, 16.5 लाख करोड़ रुपए से अधिक का कुल उत्पादन हुआ है एवं 12 लाख से अधिक रोजगार के नए अवसर निर्मित हुए। इसके उपरांत प्रारम्भ हुई प्रधानमंत्री गति शक्ति योजना के अंतर्गत सड़क, रेल, बंदरगाह, एयरपोर्ट और लाजिस्टिक को पहली बार इंटीग्रेटेड तरीके से जोड़ने की कोशिश की गई। समर्पित मालवाहक गलियारों का निर्माण तो इस दृष्टि से मील का पत्थर साबित हुए हैं। नए एक्स्प्रेस वे ने माल ढुलाई का समय घटाया। लागत को कम किया और भारतीय उत्पादों को वैश्विक बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बनाया। 86,300 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निर्यात इस सफलता की कहानी को दर्शाता है। निर्यात में अतुलनीय वृद्धि दर उस समय पर हासिल की गई है जब अमेरिका की टैरिफ नीति ने पूरे विश्व को परेशान किया हुआ है। साथ ही, रूस यूक्रेन युद्ध, ईरान इजराईल-अमेरिका युद्ध, इजराईल हमास युद्ध एवं वैश्विक स्तर पर अस्थिरता का बने रहना भी शामिल है। इन परिस्थितियों के बीच भारत ने उत्पादों एवं सेवा के क्षेत्र में निर्यात का रिकार्ड बनाया है। जबकि कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं में सुस्ती बनी हुई है। भारत के कुल निर्यात में सेवा क्षेत्र की कुल हिस्सेदारी तेजी से बढ़ रही है। यदि भारत को चीन जैसी विनिर्माण क्षेत्र की ताकत बनाना है तो भारत को हाई वैल्यू मैन्युफेक्चरिंग, सेमीकंडक्टर, मशीनरी, और सूक्षम, लघु एवं मध्यम उद्योग के क्षेत्र को और अधिक मजबूत करना होगा। घरेलू उत्पाद बढ़ाकर न केवल उत्पादों के आयात को कम किये जाने का प्रयास किया जा रहा है बल्कि वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेसरी भी बढ़ाई जा रही है। भारत में हाल ही में आई मोबाइल एवं इलेक्ट्रॉनिक क्रांति का भी इसमें बहुत बड़ा योगदान है। वर्ष 2014 में भारत में केवल 2 मोबाइल उत्पादन इकाईयां कार्यरत थीं। आज भारत मोबाइल निर्माण के क्षेत्र में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा निर्माता देश बन गया है। ऐपल की फ्लेगशिप कम्पनी अब मैन्युफेक्चरिंग इन इंडिया की ओर आगे बढ़ रही हैं। इलेक्ट्रॉनिक उत्पादन 2014-15 के 1.9 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 2025-26 में 13.11 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। रक्षा के क्षेत्र में भी उत्पादन एवं निर्यात तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है। रक्षा के क्षेत्र में भारत अपनी छोटी मोटी जरूरतों के लिए अन्य देशों की ओर देखता था आज वह फिलिपींस को ब्रह्मोस मिसाईल का निर्यात कर रहा है। कई अफ्रीकी देशों को मेड इन इंडिया हेलिकोप्टर निर्यात कर रहा है। अब देश की कुल जरूरत का लगभा 65 प्रतिशत रक्षा उत्पाद देश में ही निर्मित हो रहा हैं। जो रक्षा उत्पादन वर्ष 2014-15 में 46,429 करोड़ रुपए का था वह 2025-26 में बढ़कर 1.78 लाख करोड़ रुपए के रिकार्ड स्तर पर पहुंच चुका है। रक्षा निर्यात 38,424 करोड़ रुपए के उच्चत्तम स्तर पर पहुंच चुका है। आज रक्षा के क्षेत्र में विभिन्न उत्पादों का निर्यात 100 से अधिक देशों को किया जा रहा है। ऑटोमोबाइल के क्षेत्र में उत्पादन में अतुलनीय वृद्धि दर्ज हुई है एवं फार्मा क्षेत्र में तो भारत को फार्मेसी आफ द वर्ल्ड कहा जा रहा है। भारत की एक्स्पोर्ट बास्केट भी बढ़ रही है - पेट्रोलीयम उत्पाद, इंजिनीयरिंग उत्पाद, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा, ऑटोमोबाइल, टेक्स्टायल जैसे कई क्षेत्रों में विकास दर तेजी से बढ़ रही है। भारत किसी एक सेक्टर पर निर्भर नहीं है। कई क्षेत्रों में एक साथ आगे बढ़ रहा है। दुनिया की सप्लाई चैन में भारत की नई भूमिका तय हो रही है। भारत एक लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का निर्यात करने की ओर आगे बढ़ रहा है। - प्रहलाद सबनानी सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक, भारतीय स्टेट बैंक के-8, चेतकपुरी कालोनी, झांसी रोड, लश्कर, ग्वालियर - 474 009

प्रभासाक्षी 1 Sep 2026 4:23 pm

तेलंगाना भाजपा अध्यक्ष रामचंदर राव हैदराबाद में गिरफ्तार, नलगोंडा जाने से रोका

तेलंगाना भाजपा अध्यक्ष रामचंदर राव हैदराबाद में गिरफ्तार, नलगोंडा जाने से रोका

समाचार नामा 1 Sep 2026 3:24 pm

सीएम भूपेंद्र पटेल ने 7.8 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ की तारीफ की, पीएम मोदी ने 'स्वदेशी' को बढ़ावा देने पर दिया जोर

सीएम भूपेंद्र पटेल ने 7.8 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ की तारीफ की, पीएम मोदी ने 'स्वदेशी' को बढ़ावा देने पर दिया जोर

समाचार नामा 1 Sep 2026 2:38 pm

भारत- जीएसटी संग्रह अगस्त में बढ़कर 2 लाख करोड़ रुपए रहा

नई दिल्ली, भारत का सकल वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह अगस्त 2026 में सालाना आधार पर 14.8 प्रतिशत बढ़कर 1,99,853 करोड़ रुपए हो गया है, जो कि पिछले साल समान अवधि में 1,74,116 करोड़ रुपए था। यह जानकारी मंगलवार को जारी किए गए सरकारी डेटा में दी गई।

देशबन्धु 1 Sep 2026 2:38 pm

BRICS 2026: क्या विस्तार के बाद Global Economy की दिशा बदल पाएगा भारत? 11 देशों के Leaders पर टिकी नजरें

12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली का भारत मंडपम 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है। वर्ष 2006 में बने इस समूह के 20 साल पूरे होने के मौके पर आयोजित यह बैठक बेहद अहम है। दुनिया की 45 प्रतिशत से ज्यादा आबादी और करीब 30 फीसदी वैश्विक अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व करने वाला यह मंच आज एक ताकतवर गुट बन चुका है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब वैश्विक नेताओं की मेजबानी करेंगे, तो भारत के सामने कई कूटनीतिक चुनौतियां होंगी। बदलते वैश्विक व्यापार नियमों और पश्चिम एशिया के संकट के बीच नई दिल्ली के लिए यह अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखने, 'ग्लोबल साउथ' की आवाज बनने और ब्रिक्स को पश्चिमी-विरोधी धड़े में तब्दील होने से बचाने का एक बड़ा इम्तिहान होगा। इसे भी पढ़ें: ब्रिक्स सम्मेलन के कारकेड रिहर्सल से दिल्ली की 35 से अधिक सड़कों पर मंगलवार को बदलेगा ट्रैफिक ब्रिक्स 2026 क्यों ऐतिहासिक है? भारत ने इस साल 1 जनवरी को ब्राज़ील से ब्रिक्स की बारी-बारी से मिलने वाली अध्यक्षता औपचारिक रूप से संभाली। अध्यक्षता की आधिकारिक थीम - मज़बूती, इनोवेशन, सहयोग और सस्टेनेबिलिटी के लिए निर्माण से प्रेरित होकर, नई दिल्ली ने अपनी अध्यक्षता को मानवता सर्वोपरि की भावना पर आधारित, इंसान-केंद्रित नज़रिए के इर्द-गिर्द तैयार किया है। नेताओं का यह दो-दिन का शिखर सम्मेलन, साल भर चले एक बड़े डिप्लोमैटिक अभियान का नतीजा है। भारत की अध्यक्षता में, देश भर के 25 शहरों में 350 से ज़्यादा मंत्री-स्तरीय, वर्किंग-ग्रुप और ट्रैक-टू बैठकें हुईं। इन तैयारियों में तीन मुख्य पहलू शामिल थे: राजनीतिक और सुरक्षा सहयोग, आर्थिक और वित्तीय गवर्नेंस, और सांस्कृतिक व लोगों के बीच आपसी आदान-प्रदान। इनसे पहले हुई अहम बैठकों में मई में नई दिल्ली में ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक और अगस्त में पुणे में ब्रिक्स इन्फॉर्मेशन एंड कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजीज़ (ICT) ट्रैक की बैठक शामिल हैं। नई दिल्ली का यह शिखर सम्मेलन इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि यह इस ग्रुप के औपचारिक रूप से ब्रिक्स+ में विस्तार के बाद नेताओं का पहला पूर्ण-स्तरीय शिखर सम्मेलन है। ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ़्रीका जैसे संस्थापक सदस्यों के अलावा, अब मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया भी इसके सदस्य बन गए हैं। सम्मेलन के विस्तारित सत्रों में कई आमंत्रित सदस्य और क्षेत्रीय अध्यक्ष भी हिस्सा लेंगे जिनमें BIMSTEC, ASEAN, अफ़्रीकी संघ और खाड़ी सहयोग परिषद के नेता शामिल हैं। इसे भी पढ़ें: Sleeper Bus में Teenager से Gangrape! Rahul Gandhi का सरकारों पर वार, कहा- पर्दे बस में नहीं, नाकामियों पर हैं गैर-पश्चिमी, पश्चिमी-विरोधी नहीं: भारत की रणनीतिक पहचान जब भारतीय राजनयिक शिखर सम्मेलन के घोषणा-पत्र को अंतिम रूप दे रहे हैं, तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती वैचारिक है। 11 सदस्यों वाले इस बड़े समूह में इस बात को लेकर बुनियादी मतभेद हैं कि ब्रिक्स को कैसा होना चाहिए। मॉस्को और बीजिंग ब्रिक्स को पश्चिमी दबदबे को चुनौती देने, G7 के प्रभुत्व का मुकाबला करने और पश्चिमी प्रभाव से मुक्त एक वैकल्पिक आर्थिक ढांचा तैयार करने के लिए एक मुख्य भू-राजनीतिक साधन के रूप में देखते हैं। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग लगातार इस बात पर ज़ोर देते रहे हैं कि इस समूह में पश्चिमी प्रतिबंधों और सुरक्षा गठबंधनों का मुकाबला करने की क्षमता है। इसके विपरीत, भारत इस बात को नहीं मानता कि ब्रिक्स को पश्चिमी-विरोधी टकराव वाले गठबंधन के तौर पर काम करना चाहिए। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बार-बार नई दिल्ली का रुख स्पष्ट किया है: ब्रिक्स गैर-पश्चिमी है, पश्चिमी-विरोधी नहीं। भारत का रणनीतिक हित इस बात में है कि वह ब्रिक्स (BRICS) का इस्तेमाल मौजूदा ग्लोबल संस्थाओं जैसे यूनाइटेड नेशंस, इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड और वर्ल्ड बैंक — में सुधार लाने के लिए करे, न कि उन्हें खत्म करके ध्रुवीकृत और कोल्ड-वॉर जैसे गुटों में बंटी दुनिया बनाए। संतुलन बनाने की इस कोशिश में भारत की एक खास स्थिति है: वह अकेला ऐसा देश है जो ब्रिक्स और क्वाड्रिलैटरल सिक्योरिटी डायलॉग (Quad) जिसमें अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया भी शामिल हैं दोनों का सक्रिय सदस्य है। एक तरफ भारत इंडो-पैसिफिक समुद्री सुरक्षा, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और डिफेंस सप्लाई चेन के मामलों में वॉशिंगटन और यूरोप की राजधानियों के साथ मिलकर काम करता है, तो दूसरी तरफ वह नई दिल्ली में रूस, चीन और ईरान के साथ भी एक ही मेज पर बैठता है। बड़ी ताकतों के बीच संतुलन: बीजिंग, मॉस्को और वॉशिंगटन इस समिट की मेज़बानी करने के लिए नई दिल्ली को दुनिया की बड़ी ताकतों के साथ जटिल द्विपक्षीय मतभेदों को संभालना होगा और साथ ही बहुपक्षीय नतीजों की दिशा में भी आगे बढ़ना होगा। चीन के साथ समीकरण सैन्य बातचीत के बाद 'लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल' (LAC) पर धीरे-धीरे सेना पीछे हटने के बावजूद, भारत और चीन के बीच बुनियादी तनाव अभी भी बना हुआ है। आर्थिक प्रतिस्पर्धा, सीमा सुरक्षा और दक्षिण एशिया में बीजिंग का बढ़ता प्रभाव, दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित कर रहे हैं। ब्रिक्स (BRICS) के संदर्भ में, भारत इस बात को लेकर सतर्क है कि चीन इस बड़े हुए समूह का इस्तेमाल अपनी क्षेत्रीय पहलों को आगे बढ़ाने या ब्रिक्स को बीजिंग की विदेश नीति के लक्ष्यों का समर्थन करने वाला मंच बनाने के लिए न करे।

प्रभासाक्षी 1 Sep 2026 1:54 pm

Jan Gan Man: Manusmriti को पढ़े बिना ही उसके पीछे क्यों पड़ गये हैं Rahul Gandhi? हर मुद्दे में जाति का कोण क्यों ढूँढ़ने लगी है Congress?

कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार ऐसे मुद्दों को उठा रहे हैं, जिनके जरिए वह दलितों, पिछड़ों, महिलाओं और युवाओं के बीच एक नया सामाजिक गठजोड़ तैयार करना चाहते हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या देश को आगे ले जाने की राजनीति अतीत के विवादों को लगातार कुरेदकर होगी, या भविष्य के भारत की चुनौतियों का समाधान खोजकर? राहुल गांधी के हालिया बयानों और राजनीतिक गतिविधियों से यह संकेत मिलता है कि कांग्रेस अब एक नए सामाजिक समीकरण पर काम कर रही है। उनकी राजनीति का निशाना दलित, ओबीसी, महिलाएं, जेन-जी और अल्पसंख्यक हैं। पुणे के कार्यक्रम में महिलाओं के अधिकारों पर बात करते हुए राहुल गांधी ने पितृसत्ता को चुनौती देने की बात की और आरएसएस तथा भाजपा पर “मनुस्मृति की मानसिकता” रखने का आरोप लगाया। इसे भी पढ़ें: PM Modi Instagram New Reel | 'झूठ की गूंज' 7.8% की इकोनॉमिक ग्रोथ को नहीं छिपा सकती, इंस्टाग्राम पर PM मोदी का राहुल गांधी पर तंज देखा जाये तो महिलाओं की सुरक्षा, शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता और निर्णय लेने की क्षमता जैसे मुद्दे निस्संदेह महत्वपूर्ण हैं। इन पर जितनी गंभीर चर्चा हो, उतना बेहतर है। लेकिन सवाल यह है कि महिलाओं के आधुनिक अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए क्या हर बार हजारों वर्ष पुराने ग्रंथों को राजनीतिक कठघरे में खड़ा करना आवश्यक है? राहुल गांधी ने पुणे में महिलाओं से संवाद किया। उन्होंने महिलाओं की सुरक्षा, शिक्षा, आर्थिक कठिनाइयों और स्वतंत्र निर्णय लेने की समस्याओं को सुना। यह लोकतांत्रिक राजनीति का स्वाभाविक और स्वागतयोग्य हिस्सा है। लेकिन इसी विमर्श में मनुस्मृति को प्रमुख राजनीतिक हथियार बनाना एक अलग राजनीतिक संदेश देता है। साथ ही ऐसा लगता है कि राहुल गांधी मनुस्मृति का मुद्दा उठाकर दलित समाज तक भी पहुंच बनाना चाहते हैं। इसका ऐतिहासिक कारण भी है। 1927 में डॉ. बीआर आंबेडकर ने मनुस्मृति का दहन किया था और जातिगत भेदभाव तथा असमानता के विरुद्ध संघर्ष को एक मजबूत वैचारिक आधार दिया था। राहुल गांधी संभवतः इसी ऐतिहासिक स्मृति और वर्तमान के कथित असंतोष को एक साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। यानी महिला अधिकारों का मुद्दा, दलित अस्मिता का प्रश्न और जातिगत न्याय की राजनीति, तीनों को एक साझा राजनीतिक नैरेटिव में पिरोने का प्रयास हो रहा है। लेकिन यहां राहुल गांधी की राजनीति पर गंभीर सवाल उठता है। क्या हर सामाजिक समस्या का समाधान जाति के चश्मे से ही खोजा जाएगा? भारत आज 21वीं सदी की तीसरे दशक में है। देश कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष तकनीक, डिजिटल अर्थव्यवस्था, आधुनिक शिक्षा, रोजगार, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे समय में राजनीति का मुख्य प्रश्न यह होना चाहिए कि भारत अगले 25 वर्षों में दुनिया की अग्रणी शक्ति कैसे बनेगा? लेकिन राहुल गांधी की राजनीति बार-बार समाज को उसके पुराने जातीय खांचों में वापस ले जाती दिखाई देती है। ऐसे में कानूनविद और भारत के विधि आयोग के पूर्व सदस्य तहिर महमूद की टिप्पणी महत्वपूर्ण हो जाती है। महमूद का कहना है कि मनुस्मृति जैसे प्राचीन ग्रंथों को उनके ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए। केवल औपनिवेशिक काल में किए गए अंग्रेजी अनुवादों के आधार पर उनकी अंतिम व्याख्या कर देना उचित नहीं है। हम आपको बता दें कि महिलाओं के संबंध में मनुस्मृति के उस प्रसिद्ध श्लोक को अक्सर उद्धृत किया जाता है, जिसमें बचपन में पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र द्वारा महिला की “रक्षा” की बात कही गई है। आधुनिक दृष्टि से यह व्यवस्था निश्चित रूप से महिलाओं की पूर्ण व्यक्तिगत स्वतंत्रता के विचार से मेल नहीं खाती। लेकिन तहिर महमूद का तर्क है कि इसमें प्रयुक्त संस्कृत शब्दों और उनके अनुवाद को लेकर गंभीर मतभेद हैं। उनके अनुसार, “रक्षा” का अर्थ केवल नियंत्रण नहीं, बल्कि सुरक्षा और संरक्षण भी हो सकता है। दरअसल, औपनिवेशिक दौर के कुछ शाब्दिक अनुवादों ने यह धारणा मजबूत की कि मनुस्मृति महिलाओं को स्वतंत्रता के योग्य ही नहीं मानती। महमूद का तर्क है कि इसे दूसरे दृष्टिकोण से भी समझा जा सकता है कि महिला को जीवन के किसी भी चरण में असुरक्षित या बेसहारा नहीं छोड़ा जाना चाहिए। इस व्याख्या से सहमत होना या असहमत होना अलग बात है, लेकिन एक तथ्य महत्वपूर्ण है कि प्राचीन संस्कृत ग्रंथों की व्याख्या कोई टीवी डिबेट की तात्कालिक राजनीतिक बहस नहीं है। यह भाषा, इतिहास, समाज और विधि की गंभीर विशेषज्ञता का विषय है। किसी एक श्लोक को संदर्भ से काटकर पूरे ग्रंथ का अंतिम फैसला सुना देना बौद्धिक दृष्टि से भी उचित नहीं है। हम आपको बता दें कि तहिर महमूद ने एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है। उनके अनुसार, मनुस्मृति और अन्य धर्मशास्त्रों को सामान्य रूप से “हिंदू कानून” कहना भी काफी हद तक ब्रिटिश शासनकाल की वर्गीकरण पद्धति का परिणाम है। जिस दौर में ये ग्रंथ लिखे गए, उस समय आज जैसी आधुनिक धार्मिक पहचान और कानूनी व्यवस्था मौजूद नहीं थी। महमूद का तर्क है कि जिस प्रकार रोमन कानून को केवल “ईसाई कानून” नहीं कहा जाता, उसी तरह प्राचीन भारतीय कानूनी और सामाजिक ग्रंथों को भी केवल आधुनिक धार्मिक पहचान के संकीर्ण दायरे में नहीं बांधा जाना चाहिए। यह दृष्टिकोण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि औपनिवेशिक शासन ने भारत को समझने के लिए कई कठोर श्रेणियां बनाई थीं। अंग्रेजों ने हिंदू, मुस्लिम, जाति, कानून और समुदाय की ऐसी परिभाषाएं बनाईं, जिन्हें बाद में भारतीय राजनीति ने भी अपना लिया। विडंबना यह है कि आज भी कई राजनीतिक बहसें उन्हीं औपनिवेशिक व्याख्याओं के आधार पर चल रही हैं। यहां कोई भ्रम नहीं होना चाहिए कि भारत, भारतीय संविधान से चलता है। संविधान सर्वोपरि है। समानता, स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और महिलाओं के अधिकार आधुनिक भारत की मूल संवैधानिक प्रतिबद्धताएं हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि संविधान की सर्वोच्चता सिद्ध करने के लिए भारत के हर प्राचीन ग्रंथ और पूरी ऐतिहासिक विरासत को राजनीतिक खलनायक बना दिया जाए। प्राचीन ग्रंथों में ऐसी अनेक बातें हो सकती हैं जो आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं हैं। उन्हें आधुनिक कानून नहीं बनाया जा सकता और न ही बनाया जाना चाहिए। समाज बदलता है, कानून बदलते हैं और मूल्यों की व्याख्या भी बदलती है। लेकिन किसी प्राचीन ग्रंथ की आलोचना और उस ग्रंथ को राजनीतिक हथियार बनाकर वर्तमान समाज में विभाजन पैदा करने में अंतर है। देखा जाये तो राहुल गांधी की सबसे बड़ी राजनीतिक समस्या शायद यही है कि वह हर महत्वपूर्ण प्रश्न में जातिगत कोण खोजने लगते हैं। जाति जनगणना हो, आरक्षण हो, दलित प्रतिनिधित्व हो या अब मनुस्मृति, उनकी राजनीति का केंद्रीय संदेश लगभग एक ही है कि भारत की हर समस्या का मूल जाति व्यवस्था में खोजिए। इसमें कोई दो राय नहीं कि जातिगत भेदभाव भारत की एक वास्तविक और गंभीर सामाजिक समस्या रही है और जहां भी भेदभाव है, उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन जातिगत अन्याय को समाप्त करने का रास्ता क्या जाति की राजनीतिक पहचान को लगातार और मजबूत करना है? राहुल गांधी को यह समझना होगा कि पुराने घावों की चर्चा और इतिहास की आलोचना जरूरी हो सकती है, लेकिन देश का भविष्य केवल अतीत के मुकदमे लड़कर नहीं बनाया जा सकता। मनुस्मृति पर बहस हो सकती है। उसके विवादित प्रावधानों की आलोचना भी हो सकती है। लेकिन उसकी व्याख्या इतिहास, भाषा और सामाजिक संदर्भ की गंभीर समझ के साथ होनी चाहिए, न कि हर चुनावी मौसम में उसे जातीय और धार्मिक ध्रुवीकरण के राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाए। भारत का संविधान सर्वोपरि है। लेकिन संविधान की भावना यही भी है कि देश समानता और आधुनिकता की ओर बढ़े, न कि लगातार जातियों और ऐतिहासिक विवादों के बीच उलझा रहे। देश को आगे बढ़ाने के लिए पुराने सामाजिक बंधनों से मुक्त होना होगा। सवाल यह है कि राहुल गांधी भारत को उस दिशा में ले जाना चाहते हैं या फिर हर मुद्दे में जाति, मनुस्मृति और अतीत का कोण खोजकर देश को उसी राजनीतिक बहस में उलझाए रखना चाहते हैं। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 1 Sep 2026 12:57 pm

FSSAI की सख्त कार्रवाई के बाद Zomato का बड़ा कदम: 'एनालॉग डेयरी' उत्पादों से बने खान-पान की बिक्री पर लगाई रोक

फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म जोमैटो ने सोमवार को कहा कि उसने अपने प्लेटफॉर्म पर लिस्टेड रेस्टोरेंट द्वारा एनालॉग डेयरी उत्पादों से बनी डिश बेचने के मामले में 'जीरो-टॉलरेंस' पॉलिसी अपनाई है और ऐसे सभी खाद्य पदार्थों को प्लेटफॉर्म से हटा दिया है।

देशबन्धु 1 Sep 2026 12:31 pm

भारत की जीडीपी ग्रोथ पर एनडीए नेता बोले- 'मोदी सरकार जो कहती है, वो करके दिखाती है'

भारत की जीडीपी ग्रोथ पर एनडीए नेता बोले- 'मोदी सरकार जो कहती है, वो करके दिखाती है'

समाचार नामा 1 Sep 2026 12:25 pm

Mecca Defence Alliance की पहली बैठक में हुए बड़े फैसले, Pakistan को मिली अहम जिम्मेदारी, भारत पर इसका क्या होगा असर?

मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के तहत गठित स्ट्रैटेजिक पॉलिटिकल एंड डिफेंस कमेटी की पहली बैठक ने पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब के उभरते सुरक्षा समीकरण को नया और अधिक संगठित रूप दे दिया है। इस्तांबुल में हुई इस अहम बैठक में केवल रक्षा सहयोग बढ़ाने की बात नहीं हुई, बल्कि ‘मक्का डिफेंस अलायंस’ को संस्थागत ढांचा देने, सऊदी अरब में स्थायी सचिवालय स्थापित करने और उसके शुरुआती तीन वर्षों के नेतृत्व की जिम्मेदारी पाकिस्तान को सौंपने जैसे बड़े फैसले लिए गए। यही वह मोड़ है, जहां अब यह समझौता महज एक राजनीतिक घोषणा से आगे बढ़कर संभावित क्षेत्रीय सुरक्षा संरचना का रूप लेता दिखाई दे रहा है। हम आपको याद दिला दें कि 7 अगस्त को तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगान, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सऊदी क्राउन प्रिंस एवं प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन सलमान ने मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसकी सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्था यह है कि तीनों में से किसी एक देश पर सशस्त्र हमला तीनों के खिलाफ हमला माना जाएगा। तुर्किये के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने इसकी तुलना नाटो के अनुच्छेद-5 जैसी सामूहिक रक्षा अवधारणा से की है, हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि यह गठबंधन किसी विशेष देश के खिलाफ नहीं है और मौजूदा अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का स्थान भी नहीं लेगा। इसे भी पढ़ें: Uzbekistan ने क्या India को धोखा दे दिया? जब Modi से हाथ मिला रहे थे Mirziyoyev, उसी समय Tashkent में क्यों उतर रहे थे China के J-10 Fighter Jet? बैठक के बाद सबसे महत्वपूर्ण घोषणा यह रही कि रियाद में मक्का डिफेंस अलायंस का स्थायी सचिवालय स्थापित किया जाएगा। इस सचिवालय का नेतृत्व महासचिव करेगा और शुरुआती तीन वर्षों के लिए पहला महासचिव पाकिस्तान से होगा। यह फैसला पाकिस्तान के लिए कूटनीतिक उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है। तुर्किये के विदेश मंत्री हाकान फिदान के अनुसार, तीनों देशों ने गठबंधन के संस्थागत ढांचे की स्थापना की प्रक्रिया शुरू कर दी है। भविष्य में इसकी कार्यप्रणाली, बैठकों की व्यवस्था, राजनीतिक और सैन्य समन्वय तथा अन्य देशों की सदस्यता के नियमों पर भी रूपरेखा तैयार की जाएगी। हम आपको बता दें कि इस्तांबुल बैठक का एजेंडा बेहद व्यापक था। इसमें रक्षा क्षमताओं का विस्तार, तीनों सेनाओं के बीच इंटरऑपरेबिलिटी यानी संचालनात्मक तालमेल, संयुक्त सैन्य उत्पादन, अनुसंधान एवं विकास, तकनीकी सहयोग, लॉजिस्टिक्स, प्रशिक्षण, खुफिया साझेदारी और आतंकवाद विरोधी सहयोग जैसे मुद्दे शामिल रहे। यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि तुर्किये का रक्षा उद्योग तेजी से उभर रहा है, पाकिस्तान परमाणु हथियार संपन्न मुस्लिम देश होने के साथ रक्षा उत्पादन और सैन्य सहयोग का लंबा अनुभव रखता है, जबकि सऊदी अरब अपनी घरेलू रक्षा औद्योगिक क्षमता बढ़ाने में भारी निवेश कर रहा है। यदि यह त्रिकोण संयुक्त अनुसंधान और उत्पादन तक पहुंचता है तो इसके परिणाम केवल सैन्य अभ्यासों तक सीमित नहीं रहेंगे। देखा जाये तो यह बैठक ऐसे समय हुई जब पश्चिम एशिया और उसके आसपास का सुरक्षा वातावरण अत्यंत अस्थिर है। ईरान-अमेरिका तनाव, होरमुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा, लाल सागर में हूती हमले, समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा और गाजा शांति समझौते के दूसरे चरण से जुड़ी चुनौतियां भी चर्चा के प्रमुख विषयों में शामिल रहीं। हम आपको बता दें कि तुर्किये और पाकिस्तान को सऊदी अरब के नेतृत्व वाली लाल सागर सुरक्षा पहलों में रचनात्मक भूमिका निभाने वाले देशों के रूप में देखा जा रहा है। इससे स्पष्ट है कि गठबंधन की सोच केवल सदस्य देशों की सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि समुद्री सुरक्षा और व्यापक क्षेत्रीय संकटों तक फैल सकती है। साथ ही मक्का डिफेंस अलायंस के भविष्य का दूसरा बड़ा सवाल इसके विस्तार का है। फिलहाल मिस्र सबसे संभावित उम्मीदवार माना जा रहा है। मिस्र पहले से तुर्किये, पाकिस्तान और सऊदी अरब के साथ क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े आर-4 तंत्र का हिस्सा है और हाकान फिदान भी मिस्र की भागीदारी की इच्छा जता चुके हैं। बांग्लादेश का नाम भी संभावित भविष्य के संदर्भ में सामने आया है, हालांकि उसकी सदस्यता फिलहाल एजेंडे में नहीं दिखती। तुर्किये और पाकिस्तान सहित संस्थापक देशों की प्राथमिकता पहले तीन-सदस्यीय ढांचे को प्रभावी बनाना है। इसके बाद विस्तार का प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है। उधर, भारत के लिए इस घटनाक्रम को केवल एक और इस्लामी देशों के मंच के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब का रक्षा सहयोग यदि संस्थागत, तकनीकी और सैन्य स्तर पर गहरा होता है, तो यह दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया के बीच एक नए रणनीतिक संपर्क का निर्माण कर सकता है। पहला महत्वपूर्ण पहलू पाकिस्तान की भूमिका है। सचिवालय के शुरुआती नेतृत्व और पहले महासचिव का पद पाकिस्तान को मिलने से उसे गठबंधन की संस्थागत दिशा तय करने में प्रभाव मिल सकता है। साथ ही, तुर्किये की उन्नत रक्षा तकनीक और पाकिस्तान की सैन्य क्षमता का संयोजन भविष्य में रक्षा उत्पादन और तकनीकी सहयोग के नए रास्ते खोल सकता है। हालांकि भारत के लिए सबसे जटिल स्थिति तब बन सकती है, जब गठबंधन का विस्तार होगा। मिस्र भारत का महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है, इसलिए काहिरा की संभावित सदस्यता नई दिल्ली के लिए विशेष ध्यान का विषय होगी। दूसरी ओर, यदि भविष्य में बांग्लादेश जैसे दक्षिण एशियाई देश भी किसी व्यापक सुरक्षा ढांचे से जुड़ते हैं, तो क्षेत्रीय समीकरण और अधिक संवेदनशील हो सकते हैं। बहरहाल, इस्तांबुल की पहली बैठक ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मक्का समझौता अब केवल हस्ताक्षरित दस्तावेज नहीं रहना चाहता। रियाद में सचिवालय, पाकिस्तान का प्रारंभिक नेतृत्व, संयुक्त रक्षा उत्पादन, सैन्य तालमेल और विस्तार की संभावना, ये सभी संकेत एक नए क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे की ओर इशारा करते हैं। फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि मक्का डिफेंस अलायंस नाटो जैसी प्रभावी सैन्य संरचना बन जाएगा क्योंकि इसके वास्तविक सैन्य दायित्व और संचालनात्मक व्यवस्था अभी स्पष्ट नहीं हैं। लेकिन एक बात तय है कि पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब ने अब एक ऐसा संस्थागत मंच बनाना शुरू कर दिया है, जिसकी दिशा और विस्तार आने वाले वर्षों में पूरे क्षेत्र के रणनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 1 Sep 2026 11:30 am

बिश्केक में पीएम मोदी की 'कार डिप्लोमेसी': राष्ट्रपति पुतिन के साथ एक ही गाड़ी में किया सफर

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से बिश्केक में मुलाकात की। इस मुलाकात के दौरान दोनों नेताओं के बीच द्विपक्षीय बैठक हुई, जहां भारत-रूस संबंधों, यूक्रेन युद्ध और विश्व में शांति स्थापित करने को लेकर चर्चा हुई। इस बीच पीएम मोदी की 'कार डिप्लोमेसी' भी देखने को मिली।

देशबन्धु 1 Sep 2026 7:30 am

नीट प्रदर्शनकारियों पर दर्ज FIR रद्द करने की मांग, सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई आज

सुप्रीम कोर्ट आज उस याचिका पर सुनवाई करेगा जिसमें दिल्ली पुलिस ने नीट पेपर लीक के विरोध प्रदर्शनों में शामिल छात्रों के खिलाफ दर्ज 13 एफआईआर को रद्द करने की अनुमति मांगी है

देशबन्धु 1 Sep 2026 7:07 am

जर्मन मानते हैं, देश पर अमेरिकी प्रभाव बढ़ा

जर्मनी में किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार 67 प्रतिशत नागरिकों का मानना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के बाद अमेरिकी राजनीतिक घटनाक्रमों का जर्मनी पर प्रभाव बढ़ गया है

देशबन्धु 1 Sep 2026 12:28 am

8.86 एकड़ जमीन घोटाले में हेमंत सोरेन ने हाई कोर्ट में दायर की क्रिमिनल रिवीजन याचिका, ईडी कोर्ट के आदेश को दी चुनौती

8.86 एकड़ जमीन घोटाले में हेमंत सोरेन ने हाई कोर्ट में दायर की क्रिमिनल रिवीजन याचिका, ईडी कोर्ट के आदेश को दी चुनौती

समाचार नामा 31 Aug 2026 11:56 pm

पंजाब के भूजल स्तर में बढ़ोतरी, भाखड़ा बांध पूरी तरह सुरक्षित: मंत्री बरिंदर गोयल

पंजाब के भूजल स्तर में बढ़ोतरी, भाखड़ा बांध पूरी तरह सुरक्षित: मंत्री बरिंदर गोयल

समाचार नामा 31 Aug 2026 11:33 pm

पीएम के 'मन की बात' में जिक्र के बाद चिकमगलूर में तेजी से बढ़ रही एवोकाडो की खेती

पीएम के 'मन की बात' में जिक्र के बाद चिकमगलूर में तेजी से बढ़ रही एवोकाडो की खेती

समाचार नामा 31 Aug 2026 11:30 pm

दिल्ली में झंडेवालान फ्लैटेड फैक्ट्री कॉम्प्लेक्स बनेगी स्मार्ट इंडस्ट्रियल हब, मंत्री मनजिंदर सिरसा ने की समीक्षा बैठक

दिल्ली में झंडेवालान फ्लैटेड फैक्ट्री कॉम्प्लेक्स बनेगी स्मार्ट इंडस्ट्रियल हब, मंत्री मनजिंदर सिरसा ने की समीक्षा बैठक

समाचार नामा 31 Aug 2026 9:44 pm

कर्नाटक के मंत्री बसवराज रायरेड्डी इस्लाम वाले बयान पर माफी क्यों मांगें: एसटी हसन

कर्नाटक के मंत्री बसवराज रायरेड्डी इस्लाम वाले बयान पर माफी क्यों मांगें: एसटी हसन

समाचार नामा 31 Aug 2026 8:17 pm

Chai Par Sameeksha: UP में किसे मिलेगा जाटों का साथ? Rahul Gandhi की 2024 वाली रणनीति!

प्रभासाक्षी की साप्ताहिक कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में इस सप्ताह हमने भाजपा की सोशल मीडिया पर सक्रियता और राहुल गांधी द्वारा लगाए गए आरोपों पर चर्चा की। साथ ही साथ उत्तर प्रदेश की जाट पॉलिटिक्स पर भी हमने प्रभासाक्षी के संपादक नीरज कुमार दुबे से सवाल पूछे। भाजपा में हुए बदलाव और सोशल मीडिया पर सक्रियता को लेकर नीरज कुमार दुबे ने कहा कि हाल में ही देखे तो दिल्ली में जो प्रोटेस्ट हुआ, अगर वह इतना कामयाब हुआ तो उसमें सोशल मीडिया का बड़ा हाथ था। यही कारण है कि भाजपा ने भी अपने सोशल मीडिया टीम में बड़े बदलाव किए हैं और उसका असर अब हमें लगातार देखने को मिल रहा है। उन्होंने कहा कि बीजेपी सोशल मीडिया के जरिए युवाओं तक अपनी पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है ताकि उन्हें बताया जा सके कि मोदी सरकार में क्या काम हुए हैं और उससे पहले क्या स्थितियां थी। नीरज दुबे ने कहा कि हाल के दिनों में देखें तो भाजपा सोशल मीडिया पर पिछड़ती हुई दिखाई दे रही थी जिसका फायदा विपक्षी दल भी खूब उठा रहे थे। लेकिन अब भाजपा ने समय को ध्यान में रखते हुए बड़े बदलाव को करने के बाद एक आक्रामक नीति अपनाने की ओर बढ़ रही है। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में सिंगर अंकित बालियान के मर्डर के बाद से जारी जाट राजनीति पर भी नीरज दुबे से सवाल पूछा। नीरज दुबे ने कहा कि अखिलेश यादव हर कीमत पर उत्तर प्रदेश चुनाव को जाति पर ले जाना चाहते हैं जबकि भाजपा इसे हिंदुत्व पर रखना चाहती हैं। इसे भी पढ़ें: 22000 करोड़ का कर्ज लिया और सिर्फ 6.5 करोड़ की वापसी? लोन माफी के आरोपों के बीच Essel Group के Subhash Chandra ने खुद खोला पूरा राज नीरज दुबे ने कहा कि यह सभी को पता है कि उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार की सबसे बड़ी कामयाबी वहां की कानून व्यवस्था है। यही कारण है कि अंकित बालियान मर्डर केस को उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था को जोड़ा जा रहा है। साथ ही साथ अखिलेश यादव जाट वोटो को साधने की कोशिश कर रही कर रहे हैं। उन्हें पता है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनका कुछ खास जनाधार नहीं है। मुसलमान वोट उनको मिल जाएंगे लेकिन जब तक मुसलमान के साथ किसी और समुदाय का वोट उन्हें ना मिले, तब तक वह कामयाब नहीं हो सकते हैं और इसीलिए वह जाट समुदाय को साधने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जयंत चौधरी जाट समुदाय के बड़े नेता है और उन पर निशाना साधकर अखिलेश यादव ने बड़ी गलती कर दी थी। शायद इस वजह से अब इस मुद्दे को वह जाट समाज से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि किसी की अगर हत्या होती है वह दुखद है और सरकार आरोपियों को हर हाल में सामने लाएगी और न्याय के कटघरे में खड़ा करेगी। राहुल गांधी के द्वारा शुद्धिकरण को लेकर लगाए जा रहे आरोपों पर नीरज दुबे ने कहा कि राहुल गांधी काफी दिनों के बाद यह मुद्दा उठा रहे हैं। सवाल यह भी है कि वह इतने दिनों तक क्या कर रहे थे। उन्होंने कहा कि आरोप लगाना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन अगर उनके आरोप में दम है तो उनके कार्यकर्ता खुद क्यों नहीं गए एफआईआर दर्ज कराने। नीरज दुबे ने कहा कि विपक्ष को फिलहाल कोई बड़ा मुद्दा नहीं मिल रहा है इसलिए वह हर मामले को जाति का रंग देना चाहती है ताकि चुनाव में फायदा हो सके। उत्तर प्रदेश उत्तराखंड में चुनाव होने हैं। इसी को लेकर राहुल गांधी 2024 वाला माहौल बना रहे हैं। लेकिन इस बार वह कामयाब होंगे इसकी संभावना बेहद कम है।

प्रभासाक्षी 31 Aug 2026 6:16 pm

बिहार के ‘सहयोग मॉडल’ से बाकि राज्यों को भी सीखने की जरूरत

क्या किसी सरकारी स्कूल या हॉस्टल में गंदा पानी, खराब खाना या बिजली की किल्लत जैसी रोजमर्रा की समस्याओं का समाधान 30 दिन के भीतर पाना संभव है?...जहां देश के अधिकांश राज्यों में छात्र ऐसी बुनियादी सुविधाओं के लिए महीनों प्रशासनिक चक्कर काटने या सड़कों पर उतरने को मजबूर होते हैं, वहीं बिहार सरकार ने एक पारदर्शी ऑनलाइन व्यवस्था से इस धारणा को बदलने की कोशिश की है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी द्वारा शुरू की गई इस नई पहल ने छात्र शिकायतों के निपटारे का एक ऐसा मॉडल पेश किया है, जिसकी गूंज अब देश भर में सुनाई दे रही है। छात्रों की शिकायतें अक्सर लंबे समय तक अनसुलझी रहती हैं, इसकी बड़ी वजह प्रशासनिक प्रक्रिया की जटिलता है। किसी छात्र को हॉस्टल की सफाई, भोजन की गुणवत्ता, बिजली-पानी या फीस से जुड़ी दिक्कत होने पर पहले वार्डन, फिर प्रिंसिपल और जरूरत पड़ने पर जिला शिक्षा कार्यालय तक जाना पड़ता है। इस प्रक्रिया में न तो कोई तय समयसीमा होती है और न ही स्पष्ट जवाबदेही तय होती है, जिस वजह से छोटी शिकायतें भी हफ्तों-महीनों तक लंबित रह जाती हैं। इसे भी पढ़ें: “मखाना: भारत के पारंपरिक उत्पाद से वैश्विक सुपरफूड बनने का स्वर्णिम सफर” बिहार सरकार के विद्यार्थी सहयोग पोर्टल की खासियत यह है कि शिकायत दर्ज कराने के लिए दो अलग कैटेगरी बनाई गई हैं — पहली, शैक्षणिक संस्थान यानी विद्यालय, महाविद्यालय या विश्वविद्यालय से संबंधित विद्यार्थियों के लिए, और दूसरी, छात्रावास यानी हॉस्टल में रहने वाले विद्यार्थियों के लिए। पोर्टल के होमपेज पर ही यह दोनों विकल्प दिए गए हैं, जिससे छात्र सही कैटेगरी चुनकर सीधे संबंधित फॉर्म तक पहुंच जाता है। कैटेगरी चुनने के बाद छात्र के सामने एक सीधा-सादा फॉर्म खुलता है, जिसमें नाम, लिंग, पिता का नाम, जन्म तिथि और मोबाइल नंबर जैसी बुनियादी जानकारी भरनी होती है। ईमेल आईडी को वैकल्पिक रखा गया है, ताकि जिन छात्रों के पास ईमेल नहीं है वे भी शिकायत दर्ज करा सकें, जबकि मोबाइल नंबर को ओटीपी से वेरिफाई किया जाता है ताकि हर शिकायत असली छात्र की ओर से ही दर्ज हो। पोर्टल पर छात्रों के लिए तीन सुविधाएं दी गई हैं। शिकायत दर्ज कराने का विकल्प हॉस्टल सुविधाओं, भोजन, स्वच्छता, सुरक्षा और बिजली से जुड़ी समस्याओं के लिए है। इसके अलावा छात्र व्यवस्था सुधारने से जुड़े अपने सुझाव भी साझा कर सकते हैं, और सबसे अहम बात यह कि एक बार शिकायत दर्ज करने के बाद छात्र उसकी मौजूदा स्थिति और उस पर हुई कार्रवाई को ट्रैक भी कर सकता है। पोर्टल पर सबसे ज्यादा दर्ज होने वाली शिकायतों को भोजन, पेयजल, बिजली, शौचालय-सफाई, सुरक्षा, बुनियादी ढांचे और इंटरनेट जैसी कैटेगरी में पहले से बांटा गया है, जिससे शिकायत सीधे संबंधित विभाग तक पहुंचती है और निपटारे में देरी नहीं होती। पोर्टल पर दर्ज हर शिकायत का 30 दिनों के भीतर निपटारा सुनिश्चित करने की व्यवस्था की गई है। समाधान के बाद संबंधित छात्र को लिखित रूप से इसकी सूचना भी दी जाती है, ताकि यह साफ रहे कि उसकी शिकायत पर वाकई कार्रवाई हुई है। जिला प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि शिकायतकर्ता छात्र-छात्राओं की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखी जाएगी, जिससे छात्र बिना किसी डर के अपनी बात रख सकें। जिन छात्रों के पास ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराने की सुविधा नहीं है, उनके लिए टोल-फ्री हेल्पलाइन नंबर 1100 भी उपलब्ध कराया गया है। पोर्टल का मकसद छात्रों की शैक्षणिक, परीक्षा, छात्रावास, छात्रवृत्ति और अन्य संस्थागत समस्याओं का पारदर्शी और जवाबदेह तरीके से समाधान करना है। सरकारी पोर्टल और हेल्पलाइन की घोषणाएं आमतौर पर होती रहती हैं, लेकिन इनमें से ज्यादातर व्यवहार में उतनी असरदार साबित नहीं होतीं। लेकिन बिहार सरकार की अब तक की कोशिशों को देखें तो ऐसा लगता है कि सरकार गंभीरता से छात्रों की समस्याओं को सुनने की ओर अग्रसर है। इस पोर्टल की खासियत है कि इसमें एक जवाबदेही तंत्र भी जोड़ा गया है — तय समयसीमा में शिकायत का समाधान न होने पर संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई का भी प्रावधान रखा गया है, जिससे यह सिर्फ कागजी व्यवस्था बनकर नहीं रह जाती। पोर्टल के साथ-साथ सरकार ने हर महीने सहयोग शिविर आयोजित करने की व्यवस्था भी बनाई है, जिनमें मंत्री, विधायक, सांसद और संबंधित अधिकारी सीधे स्कूल-कॉलेजों में जाकर छात्रों से बातचीत करेंगे। इन शिविरों में मिलने वाली शिकायतों और सुझावों को भी उसी पोर्टल पर दर्ज कर ट्रैक किया जाता है, जिससे पूरा सिस्टम एक जगह जुड़ा रहता है। यह व्यवस्था खासकर उन इलाकों में उपयोगी मानी जा रही है, जहां छात्र ऑनलाइन माध्यम के बजाय सीधी बातचीत में ज्यादा सहज महसूस करते हैं। जिन राज्यों में छात्र आंदोलन और कैंपस में असंतोष की घटनाएं सामने आती रही हैं, उनके लिए बिहार का यह मॉडल कुछ स्पष्ट संकेत देता है। शिकायत निवारण तंत्र तभी प्रभावी होता है जब उसमें तय समयसीमा और जवाबदेही दोनों शामिल हों। शिकायत और छात्रावास की समस्याओं को अलग-अलग कैटेगरी में बांटने और फॉर्म को आसान रखने से समाधान की रफ्तार तेज होती है, जबकि स्टेटस ट्रैक करने की सुविधा से छात्रों को भरोसा रहता है कि उनकी बात पर वाकई काम हो रहा है। साथ ही, सिर्फ डिजिटल पोर्टल पर निर्भर रहने के बजाय हेल्पलाइन और जमीनी शिविर जैसे विकल्प भी जरूरी हैं, ताकि हर वर्ग का छात्र इस व्यवस्था से जुड़ सके। शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए बड़ी घोषणाओं के साथ-साथ जमीनी क्रियान्वयन भी उतना ही जरूरी है। बिहार का अनुभव यह दिखाता है कि अगर शिकायत निवारण तंत्र में पारदर्शिता, आसान प्रोसेस और जवाबदेही तय की जाए, तो नतीजे भी सामने आते हैं। अब देखना यह होगा कि अन्य राज्य इस मॉडल से कितना सीखते हैं और अपने यहां इसे किस रूप में लागू करते हैं। - संजीव कुमार मिश्र

प्रभासाक्षी 31 Aug 2026 6:02 pm

“मखाना: भारत के पारंपरिक उत्पाद से वैश्विक सुपरफूड बनने का स्वर्णिम सफर”

भारत में सदियों से व्रत-त्योहारों और पारंपरिक खान-पान का हिस्सा रहा मखाना अब महज एक साधारण खाद्य पदार्थ नहीं रह गया है, बल्कि यह दुनिया भर में स्वास्थ्य और पोषण के प्रति जागरूक लोगों की पहली पसंद बनकर एक वैश्विक सुपरफूड के रूप में उभर रहा है। फॉक्स नट्स, कमल गट्टा या वैज्ञानिक नाम युरीअल फेरोक्स (Euryale ferox) के नाम से जाना जाने वाला यह प्राकृतिक उपहार अपनी अद्वितीय न्यूट्रिशनल प्रोफाइल, कम कैलोरी और समृद्ध स्वास्थ्य लाभों के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजारों में धूम मचा रहा है। भारतीय कृषि एवं बागवानी क्षेत्र में मखाने ने हाल के वर्षों में जो छलांग लगाई है, वह न केवल भारत की पारंपरिक कृषि शक्ति को दर्शाती है बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, किसान कल्याण और निर्यात संवर्धन के क्षेत्र में भी एक नए स्वर्णिम युग का सूत्रपात कर रही है। भारत दुनिया भर में मखाना उत्पादन में एकछत्र वर्चस्व रखता है और वैश्विक आपूर्ति का अधिकांश हिस्सा अकेले भारत से आता है। देश में मखाने के उत्पादन में लगातार ऐतिहासिक वृद्धि देखने को मिल रही है। उत्पादन में इस उल्लेखनीय उछाल के साथ-साथ उत्पादकता के मोर्चे पर भी देश ने अभूतपूर्व प्रगति की है। प्रति हेक्टेयर उपज में हुई यह वृद्धि वैज्ञानिक खेती, उन्नत किस्म के बीजों और किसानों की कड़ी मेहनत का प्रत्यक्ष परिणाम है। भारत में मखाने के इस विशाल साम्राज्य का मुख्य केंद्र बिहार राज्य है, जो देश के कुल मखाना उत्पादन में सबसे बड़ा योगदान देता है। उत्तर बिहार के दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, कटिहार, पूर्णिया और सहरसा जैसे मिथिलांचल के जिले मखाना खेती के गढ़ माने जाते हैं। यहाँ की भौगोलिक परिस्थितियाँ, उथले पानी के तालाब, दलदली भूमि और अनुकूल आर्द्र जलवायु मखाने के पौधे के विकास के लिए अत्यंत आदर्श वातावरण प्रदान करती हैं। बिहार के अलावा पश्चिम बंगाल, असम और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में भी मखाने की खेती का दायरा तेजी से फैल रहा है। मखाने का भौगोलिक महत्व इस बात से भी सिद्ध होता है कि बिहार के मखाने को भौगोलिक संकेत यानी जीआई टैग प्राप्त हो चुका है, जिसने इसकी अंतरराष्ट्रीय प्रामाणिकता और पहचान को एक नया आयाम दिया है। इसे भी पढ़ें: फरक्का समझौता को बिहार-झारखंड के लिए अभिशाप नहीं वरदान बनाइए, समझिए कैसे बनेगा? आधुनिक दुनिया में जब स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता चरम पर है और लोग प्रसंस्कृत अथवा जंक फूड के विकल्पों की तलाश कर रहे हैं, तब मखाना एक बेहतरीन प्राकृतिक और पौष्टिक विकल्प बनकर उभरा है। मखाने में प्रचुर मात्रा में उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन, घुलनशील और अघुलनशील फाइबर तथा जटिल कार्बोहाइड्रेट्स पाए जाते हैं। इसके साथ ही यह मैग्नीशियम, पोटैशियम, फास्फोरस, कैल्शियम और आयरन जैसे आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर होता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें सोडियम की मात्रा बेहद कम होती है, यह पूरी तरह से वसा-मुक्त और कोलेस्ट्रॉल-मुक्त होता है, तथा इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स भी काफी कम होता है। इन विशेषताओं के कारण यह मधुमेह रोगियों, हृदय रोगियों, उच्च रक्तचाप से पीड़ित व्यक्तियों और वजन कम करने की इच्छा रखने वालों के लिए एक आदर्श आहार माना जाता है। इसमें मौजूद शक्तिशाली एंटी-ऑक्सीडेंट्स असमय बुढ़ापे को रोकने और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने में सहायक होते हैं। शाकाहारी और वीगन जीवनशैली अपनाने वाले लोगों के लिए मखाना प्रोटीन का एक अत्यंत सुलभ और स्वस्थ स्रोत बनकर उभरा है। मखाने की यात्रा खेत के दलदल से निकलकर डाइनिंग टेबल तक पहुँचने में कई जटिल और श्रमसाध्य चरणों से होकर गुजरती है, जो इसकी संपूर्ण मूल्य श्रृंखला का निर्माण करती है। इसकी प्रक्रिया प्राथमिक और द्वितीयक दो स्तरों पर होती है। प्राथमिक स्तर पर किसान और मजदूर बेहद विषम परिस्थितियों में पानी के भीतर उतरकर तालाब की तलहटी से मखाने के कटीले बीजों की कटाई और संग्रहण करते हैं। इसके बाद इन बीजों को साफ किया जाता है और धूप में सुखाया जाता है। इसके पश्चात द्वितीयक प्रसंस्करण शुरू होता है, जिसमें सूखे बीजों को मिट्टी या लोहे की कड़ाही में उच्च तापमान पर भुना जाता है। भुनाई के तुरंत बाद लकड़ी के हथौड़ों से मारकर बीजों को फोड़ा जाता है, जिससे उनके भीतर का सफेद और हल्का गुदा बाहर आ जाता है और हमें हमारा परिचित पॉप्ड मखाना प्राप्त होता है। इसके बाद मखाने की ग्रेडिंग, साइजिंग, पॉलिशिंग और पैकेजिंग की जाती है। मखाने के आकार और सफेदी के आधार पर उसकी बाजार कीमत तय होती है, जहाँ बड़े आकार के मखाने को प्रीमियम श्रेणी में रखा जाता है। वैश्विक बाजार में भारत का मखाना अपनी गुणवत्ता और विशिष्टता के बल पर तेजी से अपनी पैठ बना रहा है। भारत हर वर्ष अपने कुल मखाना उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा दुनिया के विभिन्न देशों में निर्यात करता है। भारत के मखाना निर्यात का एक बड़ा हिस्सा विकसित देशों में जाता है, जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश प्रमुख हैं। ये देश भारत से बड़े पैमाने पर मखाना आयात करते हैं। इसके अतिरिक्त यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और मध्य पूर्व के देशों में भी 'क्लीन-लेबल' और 'प्लांट-बेस्ड सुपरफूड' के रूप में भारतीय मखाने की मांग दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। फ्लेवर्ड मखाना, जैसे चीज़ी, रोस्टेड, पेरी-पेरी और मखाना पाउडर के रूप में मूल्य संवर्धित उत्पाद अंतरराष्ट्रीय उपभोक्ताओं को अत्यधिक आकर्षित कर रहे हैं। मखाना क्षेत्र के इस विशाल सामर्थ्य और रणनीतिक महत्व को पहचानते हुए भारत सरकार ने इसके सर्वांगीण विकास के लिए कई दूरगामी और संरचनात्मक पहल की हैं। मखाने के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने, आधुनिक प्रसंस्करण तकनीक लाने और किसानों की आय में बढ़ोतरी करने के उद्देश्य से सरकार ने विशेष योजनाओं को स्वीकृति प्रदान की है। यह महत्वाकांक्षी प्रयास वैज्ञानिक अनुसंधान, उच्च गुणवत्ता वाले बीजों की सुलभता, किसानों के कौशल विकास, कटाई के बाद के नुकसान को रोकने, स्वचालित पॉपिंग और ग्रेडिंग मशीनों की स्थापना, ब्रांडिंग, विपणन और निर्यात संवर्धन पर विशेष रूप से केंद्रित हैं। इन योजनाओं के माध्यम से देश भर के हजारों किसान सीधे तौर पर लाभान्वित हो रहे हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय स्तर पर मखाना बोर्ड के गठन की घोषणा ने इस क्षेत्र को संस्थागत मजबूती प्रदान करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। जैसे-जैसे वैश्विक स्तर पर मखाने की मांग बढ़ रही है, घरेलू बाजार में भी इसके मूल्य और व्यावसायिक परिदृश्य में क्रांतिकारी बदलाव देखे जा रहे हैं। घरेलू स्तर पर मखाना बाजार अत्यंत तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है और आने वाले समय में भारत का मखाना उद्योग एक विशाल वित्तीय आकार ले लेगा। इस बढ़ती मांग के चलते मखाने की कीमतों में भी भारी उछाल आया है, जिससे किसानों और व्यापारियों के लिए यह फसल अत्यधिक लाभदायक सिद्ध हो रही है। पारंपरिक रूप से उपेक्षित रहने वाला यह क्षेत्र अब एफएमसीजी कंपनियों, स्टार्टअप्स और कृषि-उद्यमियों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है। आधुनिक पैकेजिंग, संगठित खुदरा श्रृंखलाओं और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स ने मखाने को दूर-दराज के इलाकों तक पहुँचा दिया है। हालाँकि इस अपार सफलता के बावजूद मखाना क्षेत्र के सामने कई चुनौतियाँ भी विद्यमान हैं। पारंपरिक तालाब आधारित खेती में शारीरिक श्रम की अत्यधिक आवश्यकता होती है और पानी के अंदर से बीज निकालना बेहद कठिन काम है, जिससे श्रम की कमी एक बड़ी बाधा बनती जा रही है। इसके अलावा प्राथमिक प्रसंस्करण का पारंपरिक और अमशीनीकृत होना, भंडारण की अपर्याप्त सुविधा और मूल्य श्रृंखला में बिचौलियों का प्रभाव किसानों के मुनाफे को प्रभावित करता है। इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए कृषि अनुसंधान संस्थानों द्वारा मखाने की खेत आधारित वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। पारंपरिक गहराई वाले तालाबों के बजाय समतल खेतों में निश्चित मात्रा में पानी भरकर मखाने की खेती करने की तकनीक विकसित की गई है, जिससे उत्पादकता में अभूतपूर्व वृद्धि की जा सकती है। संक्षेप में, मखाना भारत की कृषि-संस्कृति, पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक बाजार की आवश्यकताओं का एक अनूठा और सफल संगम बन चुका है। तालाबों के कीचड़ से निकलकर दुनिया भर के सुपरमार्केट्स और अंतरराष्ट्रीय डाइनिंग टेबल्स तक पहुँचने की मखाने की यह यात्रा भारत की कृषि-समृद्धि की एक नई गाथा लिख रही है। रिकॉर्ड उत्पादन और बढ़ती उत्पादकता यह सिद्ध करती है कि भारत न केवल उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर है, बल्कि दुनिया की पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम है। सरकारी योजनाओं के समर्थन, वैज्ञानिक तकनीकों के समावेश, बुनियादी ढाँचे के सुदृढ़ीकरण और निर्यात के नए अवसरों के साथ मखाना क्षेत्र भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने और भारतीय उत्पादों को वैश्विक पटल पर स्थापित करने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। - डॉ. दीपक कोहली, पर्यावरणविद ,वरिष्ठ विज्ञान लेखक, विशेष सचिव, उत्तर प्रदेश सचिवालय 5/104, विपुल खंड, गोमती नगर, लखनऊ- 226010

प्रभासाक्षी 31 Aug 2026 5:57 pm

नेपाल की त्रासदी से भारत को सबक लेने की जरूरत

नेपाल में 26 अगस्त 2026 को आई विनाशकारी बाढ़ और हिमस्खलन ने एक बार फिर यह कठोर सत्य सामने ला दिया है कि प्रकृति के साथ खिलवाड़ और पहाड़ों की संवेदनशीलता की अनदेखी मानव सभ्यता के लिए कितनी भारी पड़ सकती है। भोटेकोशी नदी तंत्र में ग्लेशियर के बड़े हिस्से के टूटने, बर्फ-पत्थरों के विशाल मलबे के नीचे आने और नदी के प्रवाह में अस्थायी अवरोध बनने के बाद अचानक बाढ़ का जो रौद्र एवं भयावह रूप सामने आया, उसने नेपाल और चीन के तिब्बती क्षेत्र में भारी तबाही मचाई। 29 अगस्त तक उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार नेपाल में 579 और तिब्बत में 5 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है तथा लगभग 2,482 लोग लापता बताए जा रहे हैं। हजारों लोगों को बचाया गया है, लेकिन दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों और लगातार बने नए खतरे के कारण राहत एवं बचाव कार्य अभी भी चुनौतीपूर्ण हैं। यह घटना केवल नेपाल की प्राकृतिक त्रासदी नहीं है, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए भविष्य का भयावह संकेत है। प्रारंभिक वैज्ञानिक आकलन बताते हैं कि ग्लेशियर का हिस्सा टूटकर नीचे गिरा, जिससे बर्फ, चट्टान, मिट्टी और मलबे का विशाल प्रवाह पैदा हुआ। इसने नदी के प्रवाह को अवरुद्ध किया और बाद में जमा पानी तथा मलबे के दबाव से अचानक विनाशकारी बाढ़ आई। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे घटनाक्रम को केवल सामान्य बाढ़ कहना भूल होगी, यह ग्लेशियर, भूस्खलन, मलबा-प्रवाह और नदी-बाढ़ जैसे अनेक खतरों के एक साथ सक्रिय होने वाली ‘बहु-आपदा’ का उदाहरण है। इस त्रासदी का सबसे बड़ा संदेश जलवायु परिवर्तन से जुड़ा है। हिमालय केवल बर्फ से ढकी पर्वतमाला नहीं, बल्कि एशिया की जल-सुरक्षा का आधार है। तापमान बढ़ने के साथ ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं और अनेक नई ग्लेशियर झीलें बन रही हैं। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट के अनुसार हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में लगभग 25,000 ग्लेशियर झीलें हैं और बढ़ता तापमान ग्लेशियर झीलों के फटने यानी (जीएलओएफ) के जोखिम को बढ़ा रहा है। नेपाल में 1920 के दशक से अब तक 90 से अधिक ग्लेशियर झील विस्फोट बाढ़ दर्ज की जा चुकी हैं। इसलिए यह मान लेना उचित नहीं होगा कि नेपाल की घटना का एकमात्र कारण ग्लोबल वार्मिंग ही है। भूकंपीय गतिविधियां, भूगर्भीय अस्थिरता, अत्यधिक वर्षा, हिमस्खलन और प्राकृतिक ढलानों की कमजोरी भी महत्वपूर्ण कारक हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन इन जोखिमों को बढ़ाने वाली पृष्ठभूमि अवश्य तैयार कर रहा है। गर्म होता हिमालय ग्लेशियरों और पर्वतीय भूभाग को अस्थिर कर रहा है, जिससे ऐसी घटनाओं की संभावित तीव्रता और व्यापकता बढ़ सकती है। वैज्ञानिकों ने भी इस बात पर सावधानी बरती है कि किसी एक घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन का परिणाम घोषित करने के बजाय दीर्घकालिक जलवायु और भूगर्भीय बदलावों को साथ देखकर समझना चाहिए। इसे भी पढ़ें: तबाही से 90 दिन पहले चीन-नेपाल के बीच क्या हुआ था? जलप्रलय का मिनट-दर-मिनट का पूरा घटनाक्रम नेपाल की घटना भारत के लिए भी गहरी चेतावनी है। इस चेतावनी से सीख लेने की जरूरत है। उत्तराखंड की केदारनाथ त्रासदी, 2021 की ऋषिगंगा आपदा और हिमालयी राज्यों में बार-बार आने वाली बाढ़, भूस्खलन एवं बादल फटने की घटनाएं पहले ही बता चुकी हैं कि पहाड़ों की सहनशीलता असीमित नहीं है। हिमालय में सड़कें, सुरंगें, जलविद्युत परियोजनाएं, होटल, बस्तियां और अन्य निर्माण आवश्यकताओं को पूरा करने के नाम पर तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या इनके लिए पर्वतीय पर्यावरण की वहन क्षमता का पर्याप्त आकलन हो रहा है? विकास जरूरी है, मगर ऐसा विकास जो पहाड़ों को खोखला करके ही संभव हो, अंततः मानव जीवन और स्वयं विकास दोनों के लिए संकट बन सकता है। आज सबसे बड़ी आवश्यकता ‘आपदा के बाद राहत’ से आगे बढ़कर ‘आपदा से पहले तैयारी’ की है। अत्याधुनिक सैटेलाइट निगरानी, ड्रोन, रडार, नदी सेंसर, ग्लेशियर और ग्लेशियर झीलों की निरंतर निगरानी तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित पूर्वानुमान प्रणालियों को हिमालयी क्षेत्र में व्यापक स्तर पर विकसित करना होगा। शुरुआती चेतावनी प्रणाली केवल राजधानी या प्रशासनिक केंद्र तक सीमित न रहे, बल्कि पहाड़ के अंतिम गांव तक मोबाइल संदेश, सायरन, रेडियो और स्थानीय स्वयंसेवी तंत्र के माध्यम से पहुंचे। नेपाल में वर्तमान त्रासदी के बाद भी एक और संभावित झील के फटने की आशंका ने स्पष्ट कर दिया है कि एक आपदा समाप्त होते ही दूसरी आपदा का खतरा पैदा हो सकता है। नदियां राजनीतिक सीमाओं को नहीं पहचानतीं। भोटेकोशी जैसी सीमापार नदी प्रणालियों के लिए नेपाल, चीन, भारत और अन्य हिमालयी देशों के बीच वास्तविक समय में जल-प्रवाह, वर्षा, भूस्खलन, ग्लेशियर झील और हिमस्खलन संबंधी सूचनाओं का आदान-प्रदान आवश्यक है। किसी एक देश के पास उपलब्ध महत्वपूर्ण चेतावनी दूसरे देश के नागरिकों की जान बचा सकती है। अतः हिमालय के लिए एक साझा क्षेत्रीय आपदा-पूर्व चेतावनी नेटवर्क विकसित किया जाना चाहिए। भारत को इस दिशा में अपने हिमालयी राज्यों के लिए अलग ‘माउंटेन सेफ्टी पॉलिसी’ पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क या सुरंग बनाने से पहले भूगर्भीय जोखिम, जलधाराओं के प्राकृतिक मार्ग, भूस्खलन की संभावना और स्थानीय पारिस्थितिकी का वैज्ञानिक मूल्यांकन अनिवार्य होना चाहिए। अंधाधुंध वृक्ष कटाई, नदी किनारे अनियोजित निर्माण, पहाड़ों की अनावश्यक कटाई और पर्यटन के नाम पर अत्यधिक दबाव को नियंत्रित करना होगा। स्थानीय समुदायों को आपदा प्रबंधन की पहली पंक्ति बनाना होगा, क्योंकि किसी भी संकट में सबसे पहले वही लोग प्रभावित होते हैं और वही सबसे पहले सहायता भी कर सकते हैं। दुनिया को जापान, स्विट्जरलैंड और अन्य पर्वतीय देशों से आपदा-प्रबंधन, भवन सुरक्षा, पूर्व चेतावनी और स्थानीय प्रशिक्षण की तकनीक सीखनी चाहिए। हिमालय को केवल पर्यटन और आर्थिक विकास का क्षेत्र मानना अब पर्याप्त नहीं है इसे एक जीवित, संवेदनशील और अत्यंत नाजुक पारिस्थितिक तंत्र के रूप में देखना होगा। प्रकृति को नियंत्रित करने की मनुष्य की महत्वाकांक्षा जितनी बढ़ेगी, प्रकृति का प्रतिरोध भी उतना ही भयावह हो सकता है। नेपाल की त्रासदी इसलिए केवल शोक मनाने का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का क्षण है। हमें यह समझना होगा कि पहाड़ों को जीतना नहीं, उनके साथ जीना सीखना होगा। विकास की गति को प्रकृति की क्षमता के अनुरूप करना, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करना, वैज्ञानिक चेतावनियों को गंभीरता से लेना और सीमापार सहयोग बढ़ाना ही भविष्य की राह है। यदि इस त्रासदी से भारत और दुनिया ने समय रहते सबक ले लिया, तो नेपाल में बहा हुआ पानी केवल विनाश की कहानी नहीं रहेगा, वह आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित रखने की चेतावनी और नई पर्यावरणीय चेतना का संदेश भी बनेगा। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

प्रभासाक्षी 31 Aug 2026 5:51 pm

हिंदू ध्रुवीकरण के मुकाबले ‘सम्मान की राजनीति’ को Congress बना रही नया हथियार

हिंदू ध्रुवीकरण के मुकाबले ‘सम्मान की राजनीति’ को Congress बना रही नया हथियार

समाचार नामा 31 Aug 2026 4:44 pm

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के ''अमेरिकी सम्बोधन' के अंतर्राष्ट्रीय सामाजिक कूटनीतिक मायने

आधुनिक भारत का सामाजिक चाणक्य समझे जाने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत एक असाधारण व्यक्तित्व के स्वामी हैं, क्योंकि उन्होंने भाजपा के 'गाबाज' नेतृत्व को बदलवाकर कांग्रेसियों/समाजवादियों को उनके ही राजनीतिक पीच पर 2014 में जो सियासी शिकस्त दिलवाई, उससे आम भारतीयों की राजनीतिक सोच ही बदल गई। फलसफा यह निकला कि आज भारत के जर्रे-जर्रे में भगवा ध्वज शान से लहरा रहा है और आरएसएस-भाजपा खुद SC-ST-OBC-EWS का हिमायती बन चुकी है, ताकि देशद्रोही सियासत के लिए कोई सामाजिक स्पेस ही न छोड़ी जाए। इससे सवर्ण बुद्धिजीवियों में हलचल जरूर है, लेकिन जो व्यक्ति भगवान परशुराम को 'लकड़हारा यानी 'बढ़ई जाति' से जोड़कर एक नया 'ओबीसी ब्राह्मण दर्शन' पैदा कर चुका हो, उसकी 'चाणक्य नीति' और 'श्रीरामजी आदर्श नीति' का आप सहज ही अंदाजा लगा सकते हैं। इसे भी पढ़ें: 'हमने किसी देश पर कब्ज़ा नहीं किया, न ही धर्म बदला', टोरंटो में मोहन भागवत ने भारत के 'यूनिवर्सल DNA' पर की बात | Mohan Bhagwat Toronto Speech पूरी दुनिया ने देखा कि एक मुस्लिम अमेरिकी महापौर (न्यूयॉर्क) ममदानी के विरोध के बावजूद मोहन भागवत सात समंदर पार अमेरिका पहुंचे और 29 अगस्त 2026 को न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में जो संबोधन दिया, वह केवल प्रवासी भारतीयों को संबोधित भाषण नहीं था, बल्कि इसे RSS के शताब्दी-वर्ष में हिंदुत्व की वैश्विक प्रस्तुति और भारत की सांस्कृतिक कूटनीति (वसुधैव कुटुम्बकम) के एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में पढ़ा जा सकता है। जिस प्रकार से मोहन भागवत ने वहां “एक विश्व–एक मानवता”, विविधता में एकता, मानवता और प्रवासी भारतीयों की जिम्मेदारी पर जो जोर दिया, वह यदि अगले 100 सालों में विश्व का सांस्कृतिक नक्शा बदल दे तो आपको हैरत में नहीं पड़ना चाहिए। क्योंकि कहा ही गया है कि अग्रसोचि सदा सुखी। इससे 100 साल पहले के आरएसएस और 100 बाद के आरएसएस की जो झलक उनकी इस यात्रा गत सम्बोधन में मिलती है, वह इस प्रकार है:- पहला, सबसे बड़ा संदेश है हिंदुत्व की वैश्विक री-ब्रांडिंग: भागवत ने अमेरिका में यह रेखांकित किया कि हिंदुत्व मुस्लिम-विरोधी विचार नहीं है और यदि कोई हिंदू यह मानता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए तो वह वास्तविक अर्थ में हिंदू नहीं है। अंतरराष्ट्रीय श्रोता के लिए इसका महत्व बहुत बड़ा है। RSS की पश्चिमी छवि लंबे समय से Hindu nationalism, majoritarianism और minority rights की बहस से जुड़ी रही है। ऐसे में भागवत ने उसी विचारधारा को pluralism, diversity और universal humanity की भाषा में प्रस्तुत करने का प्रयास किया। इसे एक तरह की वैचारिक कूटनीति (ideological diplomacy) कहा जा सकता है। दूसरा, अमेरिका को दिया गया दूसरा संदेश है “भारतीय बनो, लेकिन अमेरिकी भी रहो”: भागवत ने भारतीय-अमेरिकी समुदाय से अपनी karmabhoomi यानी अमेरिका के प्रति निष्ठा और योगदान की बात कही। इसका अर्थ है कि RSS की वैश्विक परियोजना केवल भारत के बाहर बसे हिंदुओं को संगठित करना नहीं, बल्कि उन्हें स्थानीय समाज में प्रभावशाली और जिम्मेदार नागरिक रहते हुए भारतीय सभ्यतागत पहचान से जोड़ना भी है। यह मॉडल भविष्य में अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और अन्य पश्चिमी देशों में भारतीय diaspora की राजनीतिक-सामाजिक शक्ति को बढ़ा सकता है। तीसरा, “भारत की विविधता” को अमेरिका में प्रस्तुत करना—बहुत सोचा-समझा संदेश: अमेरिका स्वयं को pluralistic society मानता है। भागवत ने इसी अमेरिकी संवेदनशीलता से संवाद करते हुए कहा कि America = pluralism and, Bharat = unity in diversity. उन्होंने कहा कि विविधता भारत के DNA में है और उसे स्वीकारना व सम्मानित करना चाहिए। यह महज सांस्कृतिक कथन नहीं है। यह भारत की soft power narrative को अमेरिका के राजनीतिक-सांस्कृतिक विमर्श के अनुरूप ढालने का प्रयास भी है। चौथा, लेकिन अमेरिका ने इसे एकतरफा स्वीकार नहीं किया: यहीं इस यात्रा का दूसरा और अधिक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय पहलू सामने आता है। भागवत के कार्यक्रम से पहले ही New York Mayor Zohran Mamdani ने RSS की विचारधारा को लेकर आपत्ति जताई थी। अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग USCIRF ने तो RSS से जुड़े लोगों पर targeted sanctions और भागवत का visa revoke करने जैसी सिफारिशें तक की थीं। भारत ने इन आरोपों को पक्षपातपूर्ण बताया है। यानी भागवत अमेरिका में जिस “inclusive Hinduism” को प्रस्तुत कर रहे थे, अमेरिकी आलोचकों का एक वर्ग RSS के भारतीय रिकॉर्ड और minority rights को उसके ठीक विपरीत देखता है। इससे उनकी अमेरिकी यात्रा का एक अनपेक्षित परिणाम भी हुआ: वह यह कि RSS अब केवल भारतीय राजनीति का विषय नहीं रहा; वह अमेरिकी public discourse में भी India, religion, democracy और minority rights की बहस का हिस्सा बन गया है। पांचवां, भारत-अमेरिका संबंधों के लिए क्या अर्थ?: सरकार-से-सरकार कूटनीति से अलग एक नया people-to-people / diaspora-to-politics channel मजबूत होता दिख रहा है। अमेरिका में भारतीय मूल की आबादी आर्थिक, तकनीकी और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली है। यदि RSS इस समुदाय में अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक स्वीकार्यता बढ़ाता है तो उसका असर भविष्य मेंअमेरिकी राजनीति में India-related lobbying, भारत की image-building, Hindu-American organisations, भारत-अमेरिका strategic relationship, धार्मिक स्वतंत्रता और minority-rights debates पर पड़ सकता है। छठा, सबसे दिलचस्प बदलाव: “हिंदू राष्ट्र” से “विश्व मानवता” तक: आपके पिछले सवाल से इसे जोड़ें तो सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यही है। भागवत की वैचारिक भाषा में एक trajectory दिखाई देती है: हिंदू संगठन → हिंदू राष्ट्र → सामाजिक समरसता → विश्वगुरु → “One World, One Humanity” न्यूयॉर्क में उन्होंने कहा कि RSS की दृष्टि दुनिया को एक परिवार/एक मानवता के रूप में देखने की है। इसलिए इसे “विश्व विजय” कहना शायद अतिशयोक्ति होगा; लेकिन भारतीय सभ्यतागत विचार को वैश्विक वैचारिक प्रभाव में बदलने की कोशिश कहना अधिक सटीक है। सातवां, और यही सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है: भागवत के अमेरिकी भाषण ने RSS के सामने एक नई कसौटी खड़ी कर दी है: यदि हिंदुत्व वास्तव में विविधता, मानव-एकता और मुसलमानों सहित सभी समुदायों की बराबर जगह को स्वीकार करता है, तो क्या यही सिद्धांत भारत के घरेलू सामाजिक-राजनीतिक व्यवहार में भी उसी स्पष्टता से दिखाई देगा? इसी प्रश्न को लेकर भारत में विपक्ष ने उनके अमेरिकी वक्तव्य पर सवाल उठाए हैं—आलोचकों ने इसे “doublespeak” तक कहा है। मेरे आकलन में अमेरिकी भाषण का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय मायना यही है: RSS पहली बार इतने बड़े वैश्विक मंच पर अपने को केवल Hindu organisation के रूप में नहीं, बल्कि मानवता, विविधता और वैश्विक सामाजिक व्यवस्था के बारे में एक वैकल्पिक सभ्यतागत विचार देने वाली संस्था के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। और यदि यह रणनीति आगे ब्रिटेन, कनाडा और अन्य देशों में भी जारी रहती है, तो RSS की शताब्दी के बाद का दशक भारत के भीतर वैचारिक प्रभाव से आगे बढ़कर वैश्विक वैचारिक प्रभाव की प्रतिस्पर्धा का दशक बन सकता है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 31 Aug 2026 4:44 pm

‘विजय फॉर पीएम’ कैंपेन से तमिलनाडु में गठबंधन की सियासत गरम, कांग्रेस की दो टूक- राहुल गांधी का समर्थन नहीं तो छोड़ देंगे कैबिनेट

कांग्रेस कोटे से पर्यटन मंत्री राजेश कुमार ने साफ शब्दों में कहा है कि अगर TVK ने 2029 में राहुल गांधी के प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी का समर्थन नहीं किया तो कांग्रेस के मंत्री सरकार से बाहर हो सकते हैं।

देशबन्धु 31 Aug 2026 4:37 pm

वित्त वर्ष 27 में भारत की रियल जीडीपी वृद्धि दर 7-7.2 प्रतिशत रहने की उम्मीद

नई दिल्ली, भारत की रियल जीडीपी वृद्धि दर वित्त वर्ष 27 में 7-7.2 प्रतिशत के बीच रहने की उम्मीद है।

देशबन्धु 31 Aug 2026 4:28 pm

Uzbekistan ने क्या India को धोखा दे दिया? जब Modi से हाथ मिला रहे थे Mirziyoyev, उसी समय Tashkent में क्यों उतर रहे थे China के J-10 Fighter Jet?

एक तरफ उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शौकत मिर्जियोयेव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ गले मिल रहे थे, भारत के साथ दीर्घकालिक यूरेनियम आपूर्ति का ऐलान हो रहा था और दूसरी तरफ उसी उज्बेकिस्तान की धरती पर चीन के J-10CE लड़ाकू विमान उतर रहे थे। यही है नई दुनिया की राजनीति, जहां मुस्कुराहटों के पीछे हित हैं, समझौतों के पीछे शक्ति है और दोस्ती की असली कीमत रणनीतिक क्षमता से तय होती है। भारत को इस तस्वीर को सिर्फ एक रक्षा सौदे के रूप में देखने की भूल नहीं करनी चाहिए। मध्य एशिया में चीन अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए सिर्फ सड़कें और निवेश नहीं, अब लड़ाकू विमान भी भेज रहा है। हम आपको बता दें कि उज्बेक वायुसेना ने चीन के चेंगदू एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन के J-10CE मल्टीरोल लड़ाकू विमानों की पहली खेप हासिल कर ली है। पाकिस्तान के बाद उज्बेकिस्तान इस चीनी लड़ाकू विमान को संचालित करने वाला दूसरा विदेशी देश बन गया है। रिपोर्टों के अनुसार उज्बेकिस्तान ने 24 J-10CE विमानों का ऑर्डर दिया है और इसमें कम से कम छह विमान देश को मिल चुके हैं। ये विमान उज्बेकिस्तान के 35वें स्वतंत्रता दिवस से ठीक पहले पहुंचे। सवाल उठता है कि चीन आखिर मध्य एशिया के आसमान में अपनी सैन्य मौजूदगी क्यों बढ़ाना चाहता है? इसे भी पढ़ें: Modi-Putin ने दुनिया को दिया बड़ा संदेश, भारत के आसमान को मिलेंगी 5 और S-400 Triumf, जमीन पर Indo-Russian AK-203 Sher Rifles मचाएंगी तहलका उल्लेखनीय है कि J-10CE कोई साधारण विमान नहीं है। चीन इसे अपनी एयरोस्पेस ताकत के प्रतीक के रूप में पेश करता है। ‘विगोरस ड्रैगन’ नाम वाला यह लड़ाकू विमान आधुनिक AESA रडार, इन्फ्रारेड सर्च एंड ट्रैक सिस्टम और उन्नत एवियोनिक्स से लैस है। इसके पास लंबी दूरी की हवा से हवा में मार करने वाली PL-15 मिसाइल है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तानी विमानों द्वारा इस्तेमाल की गई ऐसी मिसाइलों से जुड़े अवशेष पंजाब के खेतों में मिलने की खबरों ने भारतीय सुरक्षा प्रतिष्ठान का ध्यान इस चीनी हथियार प्रणाली की ओर खींचा था। साथ ही चीनी संस्करणों में PL-17 जैसी अत्यंत लंबी दूरी की मिसाइल भी शामिल है, जिसकी घोषित रेंज 400 किलोमीटर से अधिक है। ऐसी मिसाइलों का उद्देश्य लड़ाकू विमानों के पीछे छिपे बड़े रणनीतिक प्लेटफॉर्म जैसे AEW&CS और हवाई ईंधन भरने वाले विमान, आदि को निशाना बनाना होता है। यानी चीन केवल फाइटर जेट नहीं बेच रहा। वह हथियार, सेंसर, प्रशिक्षण, रखरखाव और भविष्य की सैन्य निर्भरता का पूरा पैकेज बेच रहा है। यही चीन की असली रणनीति है। वैसे J-10CE चीन का सबसे आधुनिक लड़ाकू विमान नहीं है। वह भूमिका J-20 जैसे स्टील्थ विमानों की है। लेकिन निर्यात बाजार में J-10CE कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हथियार साबित हो सकता है। एक इंजन वाला यह विमान अपेक्षाकृत कम लागत में आधुनिक रडार, मिसाइल और एवियोनिक्स उपलब्ध कराता है। हालांकि इसकी सीमाएं भी हैं। ट्विन-इंजन विमानों की तुलना में कम रेंज, सिंगल-इंजन सर्वाइवलिटी का जोखिम, रूसी इंजनों पर पुरानी निर्भरता और रडार पर अधिक दृश्यता इसे अत्याधुनिक विमानों की अपेक्षा कमजोर बनाती हैं। लेकिन सस्ता और आधुनिक विकल्प तलाश रहे देशों के लिए ये कमियां ज्यादा मायने नहीं रखतीं। हम आपको बता दें कि पाकिस्तान के पास करीब 20 J-10 विमान हैं, जबकि चीनी वायुसेना के पास 600 से अधिक बताए जाते हैं। अब उज्बेकिस्तान भी इस क्लब में शामिल हो गया है। बांग्लादेश भी इस विमान को हासिल करने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। अगर बांग्लादेश भी J-10CE खरीदता है, तो भारत के आसपास और व्यापक क्षेत्र में चीनी लड़ाकू विमानों की मौजूदगी बढ़ सकती है। इसलिए यह भारत के लिए चिंता की बात भी है। हालांकि रिपोर्टें यह भी कहती हैं कि चीन के रक्षा निर्यात में वैश्विक स्तर पर गिरावट आई है। SIPRI के अनुसार वैश्विक हथियार खरीद बढ़ने के बावजूद चीन की बाजार हिस्सेदारी घटी है। यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप में हथियारों की मांग विस्फोटक रूप से बढ़ी, लेकिन चीन इस बाजार का बड़ा लाभ नहीं उठा पाया। चीन के रक्षा निर्यात का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान पर केंद्रित रहा है। ऐसे में उज्बेकिस्तान का सौदा चीन के लिए व्यापार के साथ-साथ मध्य एशिया में सैन्य दरवाजा खोलने का मौका है। उधर, भारत-उज्बेकिस्तान के संबंधों की बात करें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उज्बेक राष्ट्रपति मिर्जियोयेव ने दीर्घकालिक यूरेनियम आपूर्ति व्यवस्था स्थापित करने की घोषणा की है। देखा जाये तो भारत के लिए यह मामूली समझौता नहीं है। भारत अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता का विस्तार कर रहा है और इसके लिए विश्वसनीय यूरेनियम आपूर्ति बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए उज्बेकिस्तान के साथ यह व्यवस्था सीधे भारत की ऊर्जा सुरक्षा और दीर्घकालिक रणनीतिक स्वायत्तता से जुड़ती है। प्रधानमंत्री मोदी की उज्बेकिस्तान यात्रा के दौरान उन्हें देश के सर्वोच्च राजकीय सम्मान ‘ओली दर्जाली दोस्तलिक’ से भी सम्मानित किया गया। दोनों नेताओं का गर्मजोशी से मिलना और गले लगना भारत-उज्बेकिस्तान संबंधों की बढ़ती निकटता का स्पष्ट संदेश था। लेकिन राष्ट्रहित की राजनीति में भावनाओं के लिए कोई जगह नहीं होती। उज्बेकिस्तान भारत का साझेदार हो सकता है, लेकिन वह चीन से हथियार भी खरीदेगा। क्योंकि ताशकंद अपनी विदेश नीति अपने राष्ट्रीय हित के हिसाब से चलाएगा। भारत भी यही कर रहा है मगर अब और भी ज्यादा आक्रामक तरीके से इसे करना होगा। देखा जाये तो भारत दशकों तक मध्य एशिया के साथ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों की बात करता रहा है। लेकिन अब मुकाबला इतिहास का नहीं, हार्ड पावर का है। चीन निवेश लेकर आता है, इंफ्रास्ट्रक्चर लेकर आता है और अब आधुनिक हथियार लेकर भी पहुंच रहा है। नई दिल्ली को समझना होगा कि केवल दोस्ती, सम्मेलन और सांस्कृतिक रिश्ते पर्याप्त नहीं हैं। जहां चीन फाइटर जेट बेच रहा है, वहां भारत को भी अपनी रक्षा क्षमता लेकर पहुंचना होगा। भारत के पास ब्रह्मोस जैसी मिसाइलें हैं, तेजस जैसे लड़ाकू विमान हैं, आकाश जैसी वायु रक्षा प्रणाली है और तेजी से विकसित होता रक्षा उद्योग है। भारत को मध्य एशिया में रक्षा निर्यात, संयुक्त उत्पादन, सैन्य प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग को अपनी विदेश नीति का केंद्रीय हथियार बनाना होगा। भारत को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि मध्य एशिया पूरी तरह चीनी सैन्य उपकरणों, स्पेयर पार्ट्स और तकनीकी सहायता पर निर्भर न हो जाए। क्योंकि एक बार कोई देश किसी रक्षा प्लेटफॉर्म के इकोसिस्टम में फंसता है तो उसके साथ दशकों की निर्भरता जुड़ जाती है। यही चीन की सबसे खतरनाक रणनीतिक ताकत है। आज विमान बिकता है, कल मिसाइल बिकती है। फिर प्रशिक्षण आता है, रखरखाव आता है, स्पेयर पार्ट्स आते हैं और अंततः सैन्य रिश्तों की ऐसी जंजीर बन जाती है जिसे तोड़ना आसान नहीं होता। देखा जाये तो उज्बेकिस्तान का J-10CE सौदा भारत के खिलाफ कोई सीधा सैन्य मोर्चा नहीं है। लेकिन इसे नजरअंदाज करना रणनीतिक भूल होगी। चीन मध्य एशिया में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है और भारत को इसका जवाब केवल बयानबाजी से नहीं, बल्कि आर्थिक, तकनीकी और सैन्य शक्ति से देना होगा। ताशकंद का यह पूरा घटनाक्रम भारत के सामने नई सच्चाई रखता है। एक तरफ मोदी के साथ यूरेनियम की साझेदारी है। दूसरी तरफ चीन के साथ फाइटर जेट की डील है। यानी मैदान खुला है और मुकाबला जारी है। भारत के लिए संदेश साफ है कि मध्य एशिया में जगह किसी की विरासत से तय नहीं होगी, बल्कि उसकी ताकत से तय होगी। चीन वहां पहुंच चुका है। अब भारत को सिर्फ पहुंचना नहीं है, भारत को अपनी मौजूदगी इतनी मजबूत करनी होगी कि मध्य एशिया की रणनीतिक राजनीति में नई दिल्ली को नजरअंदाज करना किसी भी देश के लिए संभव न रहे। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 31 Aug 2026 3:21 pm

राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर पर बोले राम कृपाल यादव, कहा-परेशान हैं राहुल, भविष्य नहीं दिख रहा

राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर पर बोले राम कृपाल यादव, कहा-परेशान हैं राहुल, भविष्य नहीं दिख रहा

समाचार नामा 31 Aug 2026 1:28 pm

3 लैंडफिल साइटों से 2.16 करोड़ टन कचरा साफ, 100 एकड़ जमीन मुक्त: सीएम रेखा गुप्ता

3 लैंडफिल साइटों से 2.16 करोड़ टन कचरा साफ, 100 एकड़ जमीन मुक्त: सीएम रेखा गुप्ता

समाचार नामा 30 Aug 2026 10:11 pm

'वेलिगोंडा प्रोजेक्ट का विजन और विकास वाईएसआर का था', वाईएसआरसीपी का सीएम नायडू पर हमला

'वेलिगोंडा प्रोजेक्ट का विजन और विकास वाईएसआर का था', वाईएसआरसीपी का सीएम नायडू पर हमला

समाचार नामा 30 Aug 2026 8:40 pm

'2028 में कांग्रेस की सरकार बनी तो खत्म कर देंगे यूसीसी', मध्य प्रदेश में विपक्ष के नेता उमंग सिंघार

'2028 में कांग्रेस की सरकार बनी तो खत्म कर देंगे यूसीसी', मध्य प्रदेश में विपक्ष के नेता उमंग सिंघार

समाचार नामा 30 Aug 2026 7:25 pm

‘शुद्धिकरण’ विवाद पर प्रकाश आंबेडकर का राहुल गांधी पर निशाना, पूछा- ‘एक्शन’ कब होगा?

‘शुद्धिकरण’ विवाद पर प्रकाश आंबेडकर का राहुल गांधी पर निशाना, पूछा- ‘एक्शन’ कब होगा?

समाचार नामा 30 Aug 2026 6:37 pm

विजया रहाटकर ने महिलाओं को ‘जीरो एफआईआर’ दर्ज कराने के अधिकार के बारे में बताया

विजया रहाटकर ने महिलाओं को ‘जीरो एफआईआर’ दर्ज कराने के अधिकार के बारे में बताया

समाचार नामा 30 Aug 2026 6:31 pm

तमिलनाडु में जल्द सस्ता मिलेगा प्याज

चेन्नई, खुदरा कीमतों में वृद्धि के कारण राज्य भर में आम लोगों के बजट पर दबाव पड़ने के बाद, तमिलनाडु का सहकारी क्षेत्र राशन की दुकानों के माध्यम से रियायती कीमतों पर प्याज बेचने की तैयारी कर रहा है।

देशबन्धु 30 Aug 2026 5:17 pm

अखिलेश यादव का बड़ा एलान, भाजपा राज में बंद 26 हजार स्कूलों को फिर खोलेगी सपा सरकार

अखिलेश यादव ने ऐलान किया कि सपा सरकार बनने पर भाजपा शासन में बंद किए गए करीब 26 हजार स्कूलों को फिर खोला जाएगा। उन्होंने रोजगार, भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था को लेकर भाजपा पर निशाना साधा।

देशबन्धु 30 Aug 2026 5:07 pm

'बहुत ही सुखद', सीएम सुवेंदु अधिकारी ने 'मन की बात' में उत्तम कुमार का जिक्र करने के लिए पीएम मोदी का किया धन्यवाद

'बहुत ही सुखद', सीएम सुवेंदु अधिकारी ने 'मन की बात' में उत्तम कुमार का जिक्र करने के लिए पीएम मोदी का किया धन्यवाद

समाचार नामा 30 Aug 2026 4:26 pm

लखनऊ में राजनाथ सिंह बोले, अंतरराष्ट्रीय मंच पर अब भारत की बात पूरी दुनिया कान खोलकर सुनती है

लखनऊ में राजनाथ सिंह बोले, अंतरराष्ट्रीय मंच पर अब भारत की बात पूरी दुनिया कान खोलकर सुनती है

समाचार नामा 30 Aug 2026 2:26 pm

मोहन भागवत के 'हिंदू-मुस्लिम' वाले बयान का भाजपा नेताओं ने किया समर्थन, कहा- यही भारत की असली पहचान

मोहन भागवत के 'हिंदू-मुस्लिम' वाले बयान का भाजपा नेताओं ने किया समर्थन, कहा- यही भारत की असली पहचान

समाचार नामा 30 Aug 2026 2:16 pm

सीएम योगी बोले- लखनऊ छावनी बनेगी ‘मॉडल छावनी', राजधानी में विरासत के साथ आधुनिकता का संगम

सीएम योगी बोले- लखनऊ छावनी बनेगी ‘मॉडल छावनी', राजधानी में विरासत के साथ आधुनिकता का संगम

समाचार नामा 30 Aug 2026 2:07 pm

मन की बात: पीएम मोदी ने एवोकाडो की खेती का किया जिक्र, कहा - 'इनोवेटिव किसानों ने कमाई की ढूंढ ली नई रेसिपी'

मन की बात: पीएम मोदी ने एवोकाडो की खेती का किया जिक्र, कहा - 'इनोवेटिव किसानों ने कमाई की ढूंढ ली नई रेसिपी'

समाचार नामा 30 Aug 2026 12:22 pm

तारीख पर तारीख की प्रवृत्ति में बदलनी होगी, 5 साल से पुराने राजस्व मामलों का हो निस्तारण: सीएम योगी

तारीख पर तारीख की प्रवृत्ति में बदलनी होगी, 5 साल से पुराने राजस्व मामलों का हो निस्तारण: सीएम योगी

समाचार नामा 29 Aug 2026 11:25 pm

मसाला ब्रांड्स पर FSSAI का बड़ा एक्शन! एवरेस्ट और बांधानी हींग की बिक्री पर लगा बैन, गरम और चिकन मसाले में भी मिली गड़बड़ी।

भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने गुणवत्ता मानकों का उल्लंघन पाए जाने पर एवरेस्ट फ़ूड प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड की सभी वैरिएंट वाली कंपाउंडेड हींग की बिक्री पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगा दिया है। यह कार्रवाई खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 के तहत जारी निषेध आदेश के माध्यम से की गई है। एफएसएसएआई ने इसी मामले में मेसर्स लालजी गोधू एंड कंपनी के खिलाफ भी कार्रवाई करते हुए उसकी कंपाउंडेड हींग के निर्माण और बिक्री पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है।

देशबन्धु 29 Aug 2026 7:09 pm

राहुल गांधी राजनीतिक फायदे के लिए जातीय उन्माद फैलाने की कोशिश कर रहे: सुबोध उनियाल

राहुल गांधी राजनीतिक फायदे के लिए जातीय उन्माद फैलाने की कोशिश कर रहे: सुबोध उनियाल

समाचार नामा 29 Aug 2026 6:27 pm

बंगाल: एंटाली पुलिस स्टेशन पर विरोध प्रदर्शन के लिए भाजपा ने सुदीप राम को निलंबित किया

बंगाल: एंटाली पुलिस स्टेशन पर विरोध प्रदर्शन के लिए भाजपा ने सुदीप राम को निलंबित किया

समाचार नामा 29 Aug 2026 6:24 pm

डोभाल की कूटनीति और भारत-चीन संबंधों की नई करवट

भारत और चीन के संबंधों में पिछले कुछ वर्षों की तल्खी के बाद अब संवाद, संयम और व्यावहारिक सहयोग का एक नया दौर दिखाई दे रहा है। इसे किसी अचानक आए परिवर्तन के रूप में नहीं, बल्कि सुरक्षा, कूटनीति और राष्ट्रीय हितों को साथ लेकर चलने वाली एक दीर्घकालिक प्रक्रिया के रूप में देखना चाहिए। इस बदलते परिदृश्य में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण बनकर सामने आई है। 25 अगस्त को बीजिंग में चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ हुई 25वें दौर की विशेष प्रतिनिधि वार्ता ने इस प्रक्रिया को ठोस आधार दिया है। दोनों पक्षों ने सीमा पर शांति बनाए रखने, सीमा निर्धारण की दिशा में शीघ्र एवं सार्थक प्रगति करने तथा सैन्य-द्विपक्षीय संपर्क व्यवस्था को मजबूत करने पर सहमति बनाई है। डोभाल की बीजिंग यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह केवल सीमा विवाद पर बातचीत नहीं थी। यह उस व्यापक प्रश्न पर विमर्श था कि क्या भारत और चीन प्रतिस्पर्धा के बावजूद सह-अस्तित्व, स्थिरता और पारस्परिक हितों का रास्ता तलाश सकते हैं। दोनों देशों ने दो अतिरिक्त सैन्य संपर्क-बिंदु और पूर्वी तथा मध्य क्षेत्रों में दो अतिरिक्त सैन्य दूरभाष संपर्क स्थापित करने पर सहमति जताई है। सीमा व्यापार, कैलाश-मानसरोवर यात्रा और सीमा-पार सहयोग को भी आगे बढ़ाने का निर्णय हुआ है। अजीत डोभाल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे सुरक्षा और कूटनीति को परस्पर विरोधी नहीं मानते। उनका दृष्टिकोण स्पष्ट है-मजबूत सुरक्षा-व्यवस्था ही प्रभावी कूटनीति की आधारभूमि बन सकती है। चीन के संदर्भ में भी भारत का संदेश यही रहा है कि सीमा पर शांति और स्थिरता के बिना द्विपक्षीय संबंधों का पूर्ण सामान्यीकरण संभव नहीं है। 25वें दौर की वार्ता में यही भारतीय दृष्टिकोण प्रमुखता से सामने आया। डोभाल का व्यक्तित्व केवल वार्ताकार का नहीं, बल्कि सुरक्षा रणनीतिकार का है। वे लंबे समय तक खुफिया तंत्र में रहे, विभिन्न संवेदनशील क्षेत्रों में काम किया और बाद में खुफिया ब्यूरो के प्रमुख बने। भारत सरकार के अनुसार, उन्होंने पूर्वोत्तर, सिक्किम, जम्मू-कश्मीर, पंजाब और पाकिस्तान से जुड़े सुरक्षा मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे देश के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं। उनकी कार्यशैली में एक उल्लेखनीय संतुलन दिखाई देता है-जहां आवश्यक हो वहां कठोरता और जहां अवसर हो वहां संवाद। उड़ी के बाद की सर्जिकल कार्रवाई, बालाकोट की कार्रवाई, डोकलाम संकट के दौरान कूटनीतिक प्रयास और आंतरिक सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने में उनकी भूमिका इसी व्यापक दृष्टिकोण के उदाहरण माने जाते हैं। 2026 में उन्हें लोकमान्य तिलक राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने में उनके योगदान को विशेष रूप से रेखांकित किया। इसे भी पढ़ें: जयशंकर और डोभाल की रूस-चीन यात्रा के कूटनीतिक संदेश को ऐसे समझिए भारत-चीन संबंधों का सबसे कठिन दौर वर्ष 2020 में गलवान घाटी की हिंसक झड़प के बाद आया। चार वर्षों तक सीमा पर सैन्य तनाव बना रहा। अक्टूबर 2024 में दोनों देशों के बीच सैनिकों की पूर्ण वापसी और संबंधित विवादों के समाधान के बाद संबंधों को धीरे-धीरे पटरी पर लाने की प्रक्रिया शुरू हुई। उसी वर्ष कजान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात में दोनों नेताओं ने सीमा पर शांति तथा मतभेदों को संबंधों की समग्र दिशा को प्रभावित न करने देने पर जोर दिया था। यही वह बिंदु था जहां डोभाल की भूमिका और महत्वपूर्ण हो गई। दिसंबर 2024 में विशेष प्रतिनिधि स्तर की बातचीत से शुरू हुई प्रक्रिया अब 25वें दौर तक पहुंची है। इस बार आठ बिंदुओं पर बनी सहमति संकेत देती है कि बातचीत केवल औपचारिकता नहीं रह गई है। सीमा निर्धारण और सीमा प्रबंधन के लिए विशेषज्ञ तथा कार्य समूहों को सक्रिय करना, वास्तविक नियंत्रण रेखा पर गलतफहमी रोकने के लिए मौजूदा सैन्य एवं कूटनीतिक माध्यमों का उपयोग और नए संपर्क तंत्र बनाना व्यावहारिक विश्वास निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। भारत-चीन संबंध केवल सैनिक चौकियों और राजनयिक बैठकों तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच सभ्यतागत संपर्क भी रहा है। कैलाश-मानसरोवर यात्रा की पुनर्बहाली और विस्तार, सीमा व्यापार मार्गों को फिर खोलना तथा लोगों के बीच संपर्क बढ़ाना इसी व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा है। 2026 में कैलाश-मानसरोवर यात्रा लिपुलेख और नाथू ला, दोनों मार्गों से संचालित हुई है। 25वें दौर की वार्ता में तीन निर्धारित सीमा व्यापार केंद्रों को फिर खोलने की प्रगति का स्वागत किया गया तथा व्यापार और तीर्थयात्रा को और मजबूत करने पर सहमति बनी। यह छोटा कदम नहीं है। सीमा पर सैनिकों की संख्या घटाना एक सुरक्षा उपाय है, लेकिन सीमा के दोनों ओर रहने वाले लोगों के लिए व्यापार और सांस्कृतिक संपर्क बढ़ाना दीर्घकालिक शांति की सामाजिक नींव तैयार करता है। शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा एक अवसर भी है, परीक्षा भी है। इसी पृष्ठभूमि में 12-13 सितंबर, 2026 को नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन पर पूरी दुनिया की नजर है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा की संभावना जताई जा रही है। यदि यह यात्रा होती है तो यह सात वर्षों में उनकी पहली भारत यात्रा होगी। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार उनके साथ लगभग चार सौ अधिकारियों का बड़ा प्रतिनिधिमंडल भी आ सकता है। हालांकि 27 अगस्त तक चीन की ओर से उनकी यात्रा की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए शी की संभावित यात्रा को केवल एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भागीदारी नहीं माना जाना चाहिए। यह भारत-चीन संबंधों की वास्तविक दिशा को परखने का अवसर हो सकती है। वर्ष 2019 का चेन्नई संवाद अपेक्षाकृत सौहार्दपूर्ण वातावरण में हुआ था, लेकिन उसके एक वर्ष बाद गलवान ने संबंधों को गहरे संकट में डाल दिया। अब यदि शी नई दिल्ली आते हैं तो दोनों देशों के पास उस टूटे हुए विश्वास को सावधानी से जोड़ने का अवसर होगा। लेकिन भारत को उत्साह में अपनी मूल सुरक्षा चिंताओं को पीछे नहीं छोड़ना चाहिए। अरुणाचल प्रदेश पर चीन के दावे, सीमा निर्धारण का लंबित प्रश्न और वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पारदर्शिता जैसी चुनौतियां अभी समाप्त नहीं हुई हैं। इसलिए भारत की नीति मित्रता की आकांक्षा, लेकिन राष्ट्रीय हितों पर कोई समझौता नहीं होनी चाहिए। डोभाल की विशेषता यही है कि वे संवाद को कमजोरी नहीं बनने देते और शक्ति को टकराव का पर्याय भी नहीं बनाते। उनकी कूटनीति में संदेश स्पष्ट है-भारत शांति चाहता है, लेकिन अपनी सुरक्षा कीमत पर नहीं, सहयोग चाहता है, लेकिन समानता के आधार परय संबंध सुधारना चाहता है, लेकिन सीमा की वास्तविकताओं को भुलाकर नहीं। आज भारत-चीन संबंध जिस मोड़ पर खड़े हैं, वहां डोभाल की भूमिका संकटमोचक से आगे बढ़कर विश्वास-निर्माता और सुरक्षा-आधारित कूटनीति के सूत्रधार की बनती दिखाई देती है। 25वें दौर की वार्ता में हुई आठ सूत्रीय सहमति इसका प्रमाण है कि कठिनतम मतभेदों के बीच भी संवाद के रास्ते खुले रखे जा सकते हैं। शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा इस प्रक्रिया को शीर्ष नेतृत्व की राजनीतिक दिशा दे सकती है। किंतु असली सफलता किसी एक शिखर बैठक की तस्वीर में नहीं, बल्कि सीमा पर स्थायी शांति, पारस्परिक विश्वास, व्यापारिक संपर्क और विवादों के न्यायसंगत समाधान में होगी। भारत को चीन से संबंध सुधारने हैं, लेकिन अपनी सामरिक स्वायत्तता और सुरक्षा-सजगता के साथ। डोभाल की कूटनीति का सार भी यही है-संवाद के दरवाजे खुले रहें, पर राष्ट्रीय हितों की चौखट कभी कमजोर न हो। यही दृष्टिकोण भारत-चीन संबंधों को टकराव से प्रतिस्पर्धी सह-अस्तित्व और अंततः स्थायी शांति की ओर ले जाने की सबसे व्यावहारिक राह बन सकता है। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

प्रभासाक्षी 29 Aug 2026 5:30 pm

संकट में Nepal के काम India ही आया, Kathmandu को China की 'दोस्ती' का सच आखिरकार समझ आया

नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ ने सिर्फ सैकड़ों जिंदगियां नहीं लील लीं, बल्कि हिमालयी क्षेत्र की राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा और पड़ोसी देशों के रिश्तों का एक बेहद महत्वपूर्ण आईना भी सामने रख दिया है। बुधवार को नेपाल-तिब्बत सीमा के आसपास ग्लेशियर के ढहने और उसके बाद मलबे के साथ आए भयावह जलप्रवाह ने रसुवा, नुवाकोट और आसपास के इलाकों में भारी तबाही मचाई। सड़कें, पुल, मकान और जलविद्युत परियोजनाएं बह गईं। इस आपदा ने नेपाल की बिजली व्यवस्था को भी ऐसा झटका दिया कि अब वही नेपाल, जो मानसून में भारत को बिजली बेचता है, जरूरत पड़ने पर भारत से बिजली मांग सकता है। यही इस त्रासदी का सबसे बड़ा विडंबनापूर्ण पहलू है। नेपाल की करीब 4,300 मेगावाट की स्थापित बिजली क्षमता में 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी जलविद्युत की है। बाढ़ ने करीब 13 जलविद्युत संयंत्रों और एक सौर परियोजना को प्रभावित किया और लगभग 360 मेगावाट उत्पादन क्षमता पर असर पड़ा। भारत को बिजली देने वाला 14 मेगावाट का देविघाट संयंत्र भी इसकी चपेट में आया। 26 अगस्त को बाढ़ के दिन भारत नेपाल से एक समय में 963.4 मेगावाट तक बिजली ले रहा था, लेकिन अगले ही दिन बिजली आपूर्ति लगभग आधी रह गई। इसे भी पढ़ें: Nepal Flood में 600 से ज्यादा मौतें, जीवित बचे लोगों ने सुनाई आपदा से जंग की दास्तान और अब तस्वीर उलट सकती है। आमतौर पर गर्मियों में भारत नेपाल से बिजली खरीदता है और सर्दियों में, जब नेपाल की जलविद्युत उत्पादन क्षमता घटती है, भारत नेपाल को बिजली देता है। लेकिन इस बार आपदा ने परिस्थितियां ऐसी बना दी हैं कि मानसून के इसी मौसम में भारत को नेपाल की मदद के लिए बिजली निर्यात करनी पड़ सकती है। दोनों देशों के बीच पहले से ही 1,000 मेगावाट की आयात-निर्यात क्षमता है, जिसे बढ़ाकर 1,400 मेगावाट से अधिक करने पर सहमति भी बन चुकी है। लेकिन बिजली से बड़ी कहानी भरोसे की है। आपदा तिब्बत से लगे इलाके में शुरू हुई। उपलब्ध वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार इसका संबंध ग्लेशियर के ढहने और भारी मलबे के नदी में आने से है। चीन ने यह आपदा पैदा की या नहीं, इसका जवाब तो वैज्ञानिक ही देंगे लेकिन आम लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि हिमालय के इस संवेदनशील भूभाग में सीमा के दोनों ओर होने वाली गतिविधियों, बुनियादी ढांचे और आपदा-प्रबंधन को लेकर भारत, नेपाल और चीन के बीच पारदर्शिता कितनी है? हालात इतने गंभीर थे कि तिब्बत की ओर एक नए ‘बैरियर लेक’ के बनने और उसके टूटने की आशंका ने नेपाल में फिर खतरे की घंटी बजा दी। इसी संकट में भारत और चीन के रवैये का फर्क नेपाल के सामने साफ दिखाई देता है। बाढ़ के कुछ ही घंटों के भीतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह से बात की और हरसंभव मानवीय सहायता का भरोसा दिया। उसी रात भारतीय वायुसेना का C-130J विमान हिंडन से काठमांडू पहुंचा और 10 टन राहत सामग्री तथा जरूरी दवाइयां भेजी गईं। इसके बाद राहत सामग्री की कुल मात्रा 47 टन से अधिक हो गई। भारत ने 24 घंटे काम करने वाला नियंत्रण कक्ष और हेल्पलाइन भी सक्रिय की। नेपाल के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और जनता जिस तरह भारत का शुक्रिया कर रहे हैं उससे उनका भारत के प्रति विश्वास भी परिलक्षित हो रहा है। देखा जाये तो यही अंतर है, मुसीबत में कौन आपके साथ खड़ा होता है और कौन सिर्फ सीमा के उस पार मौजूद रहता है। नेपाल के लिए यह समय किसी देश के पक्ष में राजनीतिक नारा लगाने का नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हित को ठंडे दिमाग से देखने का है। भारत से नेपाल का रिश्ता सिर्फ बिजली खरीदने-बेचने का नहीं है। खुली सीमा, गहरे सामाजिक रिश्ते, व्यापार, रोजगार, धार्मिक यात्राएं और रोजमर्रा की मानवीय आवाजाही दोनों देशों को असाधारण रूप से जोड़ती है। जब नेपाल में संकट आया तो भारत ने इन रिश्तों को कागज पर नहीं, जमीन और आसमान पर साबित किया। शायद नेपाल को इस संकट में एक पुरानी बात नए सिरे से समझ आई होगी, दोस्त वही नहीं जो सामान्य दिनों में साथ दिखे, दोस्त वह है जो आपदा में सबसे पहले पहुंच जाए। और चीन के साथ संबंधों को लेकर भी काठमांडू को यह तय करना होगा कि रणनीतिक साझेदारी का अर्थ केवल बड़े-बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट और निवेश नहीं है। असली साझेदारी संकट के समय दिखाई देती है। भारत और चीन के बीच नेपाल को किसी एक को चुनने की मजबूरी नहीं होनी चाहिए, लेकिन नेपाल यह जरूर देख सकता है कि उसके लिए कौन-सा पड़ोसी भरोसे का स्थायी आधार है। बहरहाल, इस बाढ़ ने नेपाल की बिजली व्यवस्था को झकझोर दिया है, लेकिन शायद इससे भी बड़ा संदेश उसकी विदेश नीति के लिए आया है। हिमालय ने एक बार फिर याद दिलाया है कि नक्शे पर सबसे नजदीक पड़ोसी ही संकट की घड़ी में सबसे उपयोगी पड़ोसी भी साबित हो सकता है। नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 29 Aug 2026 5:00 pm

निकाय चुनाव से ठीक पहले BJP में बगावत! पूर्व जिला महामंत्री राकेश भाटी ने थामा हाथ का साथ!

निकाय चुनाव से ठीक पहले BJP में बगावत! पूर्व जिला महामंत्री राकेश भाटी ने थामा हाथ का साथ!

समाचार नामा 29 Aug 2026 4:36 pm

वैश्विक तनावों के बीच बाजार में गिरावट

मुंबई, वैश्विक ब्याज दरों की दिशा को लेकर बनी अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव और निवेशकों की सतर्कता के बीच भारतीय शेयर बाजार ने लगातार तीसरे सप्ताह गिरावट दर्ज की।

देशबन्धु 29 Aug 2026 4:13 pm

सरकार ने शुरू की केंद्रीय बजट की तैयारियां

नई दिल्ली, केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2027-28 के केंद्रीय बजट की तैयारियां औपचारिक रूप से शुरू कर दी हैं।

देशबन्धु 29 Aug 2026 4:06 pm

भारत के हाथ आया Javelin हथियार, अब दुश्मनों के टैंकों की खैर नहीं! America से हुआ बड़ा रक्षा सौदा

भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग अब सिर्फ हथियार खरीदने तक सीमित नहीं रह गया है। भारतीय सेना द्वारा अमेरिकी Javelin एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल सिस्टम की खरीद के लिए Letter of Offer and Acceptance (LOA) पर हस्ताक्षर इस बदलते रिश्ते का एक महत्वपूर्ण संकेत है। अमेरिकी दूतावास ने इसे भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी को अधिक गहरा, सक्षम और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाने वाला कदम बताया है। खास बात यह है कि इस समझौते के साथ भविष्य में दोनों देशों के रक्षा उद्योगों के बीच सह-उत्पादन यानी co-production की संभावनाओं का रास्ता भी खुला है। Javelin की खासियत केवल यह नहीं है कि वह एक आधुनिक एंटी-टैंक मिसाइल है। यह एक man-portable, fire-and-forget प्रणाली है, यानी सैनिक मिसाइल दागने के बाद लक्ष्य पर लगातार नजर बनाए रखने के लिए उसी स्थान पर मौजूद रहने को मजबूर नहीं होता। यही क्षमता युद्धक्षेत्र में सैनिकों की survivability बढ़ाती है। अमेरिकी दूतावास के मुताबिक Javelin भारी बख्तरबंद वाहनों के अलावा कई दूसरे battlefield targets को भी निशाना बना सकती है और अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों में इस्तेमाल की जा सकती है। तेज engagement और उसके बाद तुरंत position बदलने की क्षमता इसे infantry के लिए खास तौर पर उपयोगी बनाती है। इसे भी पढ़ें: Shaurya Path: Kirana Hills और Skardu को लेकर पूर्व CDS Anil Chauhan के खुलासों से चौंकी दुनिया, Pakistan बात करना चाह रहा था, मगर India... भारत के लिए यह जरूरत अचानक पैदा नहीं हुई है। भारतीय सेना करीब 2009 से ही आधुनिक तीसरी पीढ़ी की anti-tank guided missile प्रणाली की तलाश में रही है। जरूरत ऐसी मिसाइल की थी जो हल्की हो, सटीक हो और fire-and-forget क्षमता से लैस हो, ताकि पुरानी wire-guided प्रणालियों की सीमाओं से बाहर निकला जा सके। लेकिन तकनीक हस्तांतरण, लागत, खरीद प्रक्रिया और बाद में स्वदेशी विकास पर जोर जैसी वजहों से आधुनिक ATGM की तलाश लंबे समय तक खिंचती रही। यही वजह है कि Javelin का मौजूदा सौदा केवल एक और विदेशी हथियार खरीद के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह भारतीय सेना की तत्काल operational जरूरत और दीर्घकालिक रक्षा औद्योगिक रणनीति के बीच एक पुल बन सकता है। अमेरिकी दूतावास ने साफ तौर पर कहा है कि LOA पर हस्ताक्षर के बाद भारत Javelin system का ग्राहक बन गया है और यह समझौता दोनों देशों के रक्षा उद्योगों के बीच भविष्य के सहयोग के लिए दरवाजा खोलता है। यानी असली रणनीतिक महत्व मिसाइलों की संख्या से कहीं आगे है। देखा जाये तो इस सौदे का सामरिक महत्व भी बेहद स्पष्ट है। भारत को ऐसे युद्धक्षेत्र में अपनी infantry की anti-armour क्षमता मजबूत करनी है जहां बख्तरबंद वाहनों के खिलाफ तेजी से प्रतिक्रिया और सटीक प्रहार महत्वपूर्ण हो जाते हैं। Javelin की portability का अर्थ है कि इसे अग्रिम मोर्चे पर तैनात सैनिक अपेक्षाकृत लचीले ढंग से इस्तेमाल कर सकते हैं। Fire-and-forget क्षमता सैनिक को launch के बाद तुरंत reposition करने की सुविधा देती है। ऐसे में missile केवल दुश्मन के armour को निशाना बनाने का साधन नहीं रहती, बल्कि छोटे infantry units की tactical flexibility बढ़ाने वाला हथियार बन जाती है। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों की दिशा का है। अमेरिकी राजदूत Sergio Gor ने कहा है कि यह समझौता अमेरिकी समर्थन की गहराई को दिखाता है और दोनों देशों के रक्षा उद्योगों के लिए नए अवसर पैदा करता है। वॉशिंगटन की नजर में भारत केवल हथियारों का खरीदार नहीं, बल्कि भविष्य के defence industrial cooperation का साझेदार भी बन सकता है। अमेरिकी दूतावास ने दोनों देशों के defence industrial bases को मजबूत करने की संभावना पर विशेष जोर दिया है। देखा जाये तो यहीं से इस सौदे का रणनीतिक महत्व बढ़ जाता है। भारत एक ओर अपनी सैन्य क्षमता को तेजी से आधुनिक बनाना चाहता है, वहीं दूसरी ओर रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में यदि Javelin के क्षेत्र में co-production की संभावना वास्तविक औद्योगिक साझेदारी में बदलती है, तो भारत को केवल तैयार हथियार हासिल करने की बजाय अमेरिकी defence technology और manufacturing ecosystem के साथ अधिक गहरा जुड़ाव मिल सकता है। यह भारत के लिए लंबी अवधि में अधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी। हालांकि एक बात अभी साफ नहीं है कि भारत कितने Javelin systems खरीद रहा है और इस खरीद की कुल कीमत कितनी है। अमेरिकी दूतावास और रक्षा मंत्रालय ने इन विवरणों को सार्वजनिक नहीं किया है। इसलिए इस सौदे को तत्काल बड़े पैमाने की anti-tank क्षमता में बदलाव मानना जल्दबाजी होगी। फिलहाल इसकी सबसे बड़ी अहमियत यह है कि भारत ने Javelin को अपने सैन्य विकल्पों में शामिल कर लिया है और साथ ही अमेरिका के साथ रक्षा औद्योगिक सहयोग का एक और दरवाजा खोल दिया है। बहरहाल, Javelin सौदे का संदेश दो स्तरों पर है। युद्धक्षेत्र के लिए भारत अपनी infantry को ज्यादा सटीक, मोबाइल और survivable anti-armour क्षमता देना चाहता है; और रणनीतिक स्तर पर वॉशिंगटन के साथ रक्षा संबंध को खरीददार-विक्रेता के रिश्ते से आगे ले जाना चाहता है। अगर co-production की बात जमीन पर उतरती है, तो यही सौदा आने वाले वर्षों में भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी के अगले चरण की शुरुआत साबित हो सकता है। नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 29 Aug 2026 4:02 pm

'यह संस्मरण है या उसका सियासीकरण', सोनिया गांधी की किताब पर विवाद को लेकर बोले मुख्तार अब्बास नकवी

'यह संस्मरण है या उसका सियासीकरण', सोनिया गांधी की किताब पर विवाद को लेकर बोले मुख्तार अब्बास नकवी

समाचार नामा 29 Aug 2026 2:27 pm

दिल्ली-एनसीआर में महंगी हुई CNG: ₹3.89 प्रति किग्रा बढ़े दाम, जानें नई दरें

दिल्ली-एनसीआर में सीएनजी की कीमतों में 3.89 रुपये प्रति किलोग्राम की वृद्धि के बाद शनिवार को लोगों ने इस वृद्धि के प्रभाव पर चिंता व्यक्त की और इसे बढ़ती मुद्रास्फीति के बीच मध्यम वर्ग पर एक अतिरिक्त बोझ बताया है।

देशबन्धु 29 Aug 2026 1:34 pm

भाजपा में घमासान, जुएल ओराम का बड़ा आरोप- मुझे केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटाने की रच रहे साजिश

केंद्रीय मंत्री जुएल ओराम ने भाजपा के कुछ नेताओं पर उन्हें मंत्रिमंडल से हटाने और बदनाम करने की साजिश का आरोप लगाया। उनके ‘हाथ काटने’ वाले बयान पर विपक्ष ने निशाना साधा।

देशबन्धु 29 Aug 2026 12:06 pm

Jadavpur University में Azadi के नारे लगाने वालों पर भड़के Suvendu Adhikari, बोले इस बीमारी की दवा और इलाज जानता हूं

पश्चिम बंगाल का जादवपुर विश्वविद्यालय एक समय देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में गिना जाता था, लेकिन आज कैंपस से ज्ञान, शोध और अकादमिक विमर्श की बजाय ‘आजादी’ के नारे और विवादित राजनीतिक गतिविधियों की खबरें सुर्खियां बन रही हैं। यहां सवाल उस मानसिकता का है जो भारत में रहते हुए भारत से ही ‘आजादी’ की मांग करने तक पहुंच जाती है। देखा जाए तो ‘कश्मीर मांगे आजादी’ जैसे उद्घोष और माओवादी नेता किशनजी के समर्थन में लिखे नारों ने एक बेहद असहज सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर विश्वविद्यालय के भीतर किस तरह की राजनीति और किस तरह की मानसिकता को जगह दी जा रही है? ऐसे लोगों को लेकर पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का रुख बिल्कुल स्पष्ट और सख्त है। उन्होंने दो टूक अंदाज में कहा है कि वे इस ‘बीमारी’ को जानते हैं और इसकी ‘दवा और इलाज’ भी जानते हैं। इसे भी पढ़ें: Suvendu Adhikari ने फुटपाथ वाली महिला को दिया आवास का भरोसा, TMC पर साधा निशाना देखा जाए तो जादवपुर की घटना ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि विश्वविद्यालयों को वैचारिक स्वतंत्रता का केंद्र बनाए रखा जाए या ऐसी राजनीति का अखाड़ा बनने दिया जाए, जो धीरे-धीरे पूरे अकादमिक माहौल को विषाक्त कर देती है। यह सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि ‘आजादी’ शब्द अपने आप में समस्या नहीं है। लोकतंत्र में हर नागरिक को अपनी बात कहने, असहमति जताने और सरकार की आलोचना करने का अधिकार है। लेकिन जब ‘आजादी’ का नारा भारत की संप्रभुता और अखंडता पर सवाल उठाने वाले नारों के साथ जुड़ता है, तब उसे महज छात्र राजनीति या वैचारिक असहमति कहकर टाल देना भी उचित नहीं होगा। जादवपुर में उठे नारों के संदर्भ में यही सबसे बड़ा प्रश्न है कि आखिर किससे और किस चीज से आजादी मांगी जा रही है? शुभेंदु अधिकारी ने इसी सवाल को बेहद तीखे अंदाज में उठाया है। विश्वविद्यालय के बाहर करीब दस हजार लोगों की मौजूदगी में ‘वंदे मातरम्’ कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि शिक्षा परिसरों में इस तरह के नारे बंद होने चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि जिस आजादी के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस, खुदीराम बोस, भगत सिंह, मातंगिनी हाजरा और अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना जीवन बलिदान कर दिया, उस आजादी को हासिल किए दशकों बीत चुके हैं। शुभेंदु अधिकारी के इस कड़े रुख की तारीफ इसलिए होनी चाहिए कि उन्होंने उस असहज सवाल को उठाने का साहस किया है जिसे अक्सर राजनीतिक शुद्धता के नाम पर दबा दिया जाता है। विश्वविद्यालय विचारों की प्रयोगशाला हो सकता है, लेकिन वह राष्ट्र-विरोधी हिंसक विचारधाराओं का सुरक्षित अड्डा नहीं बन सकता। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और देश की अखंडता को चुनौती देने के बीच एक स्पष्ट रेखा है। उस रेखा को जानबूझकर धुंधला करना लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा नहीं, बल्कि उनका दुरुपयोग है। सबसे चिंता की बात यह है कि जादवपुर की घटना को अलग-थलग घटना मानकर छोड़ देना वास्तविक समस्या से आंखें मूंदना होगा। देश के कई विश्वविद्यालयों में पिछले वर्षों में ऐसे नारे और ऐसी राजनीति कैंपस के अकादमिक वातावरण पर भारी पड़ी है। जेएनयू हो, हैदराबाद विश्वविद्यालय हो या दूसरे परिसरों में उभरे अतिवादी छात्र राजनीतिक संघर्ष हों, जब विश्वविद्यालय में पढ़ाई से ज्यादा पहचान की राजनीति, वैचारिक ध्रुवीकरण, हिंसक टकराव और उकसाऊ नारों को महत्व मिलने लगता है तो अंततः सबसे बड़ा नुकसान छात्रों की शिक्षा और संस्थान की प्रतिष्ठा को होता है। जादवपुर को लेकर शुभेंदु अधिकारी ने इसी संदर्भ में जेएनयू और उस्मानिया विश्वविद्यालय का उदाहरण देते हुए कैंपस को ‘सुधारने’ की बात कही है। यहां एक और सवाल पूछा जाना चाहिए। जो लोग हर मुद्दे पर ‘आजादी’ का नारा लगाते हैं, क्या वे देश के संविधान, लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों को भी उसी गंभीरता से स्वीकार करते हैं? क्या उन्हें उन सैनिकों की चिंता है जो देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए शहीद हो जाते हैं? क्या उन्हें उन नागरिकों की चिंता है जो आतंकवाद का शिकार होते हैं? और यदि उनकी लड़ाई अन्याय के खिलाफ है तो वह लड़ाई विश्वविद्यालय की कक्षाओं, शोध और लोकतांत्रिक बहस के जरिए क्यों नहीं लड़ी जाती? बेशक, सरकार या मुख्यमंत्री को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि वैध असहमति को दबाया न जाए। किसी छात्र को केवल विचार रखने के कारण देशद्रोही करार देना भी लोकतांत्रिक रास्ता नहीं है। लेकिन यही सिद्धांत दूसरी तरफ भी लागू होना चाहिए कि विचारधारा के नाम पर देश की संप्रभुता और अखंडता को चुनौती देने वाले नारों को भी ‘छात्र अधिकार’ का कवच नहीं मिल सकता। देखा जाए तो जादवपुर का सवाल इसलिए सिर्फ एक विश्वविद्यालय का सवाल नहीं है। यह उस दिशा का सवाल है जिसमें देश के विश्वविद्यालय आगे बढ़ेंगे। क्या वे ज्ञान, शोध, तर्क और राष्ट्रनिर्माण के केंद्र बनेंगे या राजनीतिक कट्टरता के अखाड़े? शुभेंदु अधिकारी ने कम से कम इस बहस को सामने लाने का काम किया है। अब जरूरत है कि विश्वविद्यालय प्रशासन भी साफ करे कि कैंपस में विचारों की आजादी होगी, लेकिन हिंसा, धमकी और देश की अखंडता के खिलाफ उकसावे के लिए कोई आजादी नहीं होगी। बहरहाल, आखिर विश्वविद्यालय वह जगह है जहां आने वाली पीढ़ियां देश का भविष्य लिखती हैं। वहां अगर ‘आजादी’ का अर्थ भारत से आजादी तक पहुंचने लगे, तो सवाल नारे लगाने वालों से पूछा ही जाना चाहिए कि जिस देश ने आपको बोलने की आजादी दी, आखिर उसी देश से आपको किस आजादी की तलाश है?

प्रभासाक्षी 29 Aug 2026 11:43 am

अखिलेश यादव ने मुस्लिम महिलाओं से बंधवाई राखी तो 'घर वापसी' हो गई : नंदकिशोर गुर्जर

अखिलेश यादव ने मुस्लिम महिलाओं से बंधवाई राखी तो 'घर वापसी' हो गई : नंदकिशोर गुर्जर

समाचार नामा 28 Aug 2026 10:27 pm

आंध्र प्रदेश: वाईएसआरसीपी ने मुख्यमंत्री नायडू पर वेलिगोंडा परियोजना का श्रेय 'हड़पने' का आरोप लगाया

आंध्र प्रदेश: वाईएसआरसीपी ने मुख्यमंत्री नायडू पर वेलिगोंडा परियोजना का श्रेय 'हड़पने' का आरोप लगाया

समाचार नामा 28 Aug 2026 9:49 pm

भाजपा की ज्यादतियों से बंगाल में तृणमूल की वापसी सुनिश्चित होगी: ममता बनर्जी

भाजपा की ज्यादतियों से बंगाल में तृणमूल की वापसी सुनिश्चित होगी: ममता बनर्जी

समाचार नामा 28 Aug 2026 8:21 pm

पंजाब यूनिवर्सिटी छात्रसंध चुनाव को लेकर घमासान: एबीवीपी ने 'आप' पर लगाया गंभीर आरोप

पंजाब यूनिवर्सिटी छात्रसंध चुनाव को लेकर घमासान: एबीवीपी ने 'आप' पर लगाया गंभीर आरोप

समाचार नामा 28 Aug 2026 8:17 pm

कर्नाटक : आंतरिक आरक्षण लागू करने को लेकर बीजेपी का सिद्धारमैया पर हमला, 'मगरमच्छ के आंसू' बहाने का आरोप

कर्नाटक : आंतरिक आरक्षण लागू करने को लेकर बीजेपी का सिद्धारमैया पर हमला, 'मगरमच्छ के आंसू' बहाने का आरोप

समाचार नामा 28 Aug 2026 7:21 pm

उपराष्ट्रपति ने बच्चों संग तो ओम बिरला ने लाड़ली बहनों संग मनाया त्योहार, नितिन नवीन को महिला कार्यकर्ताओं ने बांधी राखी

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समाचार नामा 28 Aug 2026 4:19 pm