पंजाब भाजपा नेताओं ने 'नशा मुक्त यात्राओं' की पर्याप्त सुरक्षा के लिए डीजीपी से मुलाकात की
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'यह मेरी आखिरी मुलाकात हो सकती है', मुंबई मार्च से पहले भावुक हुए मनोज जरांगे पाटिल
मराठा आरक्षण आंदोलन के प्रमुख नेता मनोज जरांगे पाटिल ने अपने अनशन के 17वें दिन बेहद भावुक अपील की। पाटिल ने बताया कि उन्होंने सलाइन और अन्य चिकित्सा सहायता लेना बंद कर दिया है, जिससे उनकी शारीरिक स्थिति लगातार बिगड़ रही है। मुंबई की उनकी आगामी यात्रा महाराष्ट्र के लोगों के साथ उनकी आखिरी मुलाकात भी हो सकती है।
डीएससी घोटाले को लेकर जगन ने चंद्रबाबू पर एक और हमला बोला
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मराठा आरक्षण के लिए सिर्फ छत्रपति परिवार के हस्ताक्षर ही नहीं, बल्कि कानूनी समर्थन की भी जरूरत: महाराष्ट्र के मंत्री
राजस्थान निकाय चुनाव के नतीजे भाजपा के विस्तार का संकेत: सुधांशु त्रिवेदी
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BRICS में भारत की शानदार कूटनीतिक सफलता ने 'Brand Modi' को और मजबूत कर दिया है
दिल्ली में हुई ब्रिक्स शिखर बैठक को अगर केवल एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन मानकर देखा जाएगा तो उसकी असली राजनीतिक अहमियत समझ में नहीं आएगी। देखा जाये तो यह बैठक ऐसे समय में हुई, जब दुनिया कई मोर्चों पर तनाव, युद्ध, अविश्वास और बदलते शक्ति-संतुलन से गुजर रही है। ऐसे माहौल में भारत ने जिस तरह अलग-अलग ध्रुवों के देशों को एक मंच पर बैठाया, संवाद के रास्ते खोले और मतभेदों के बावजूद सहयोग की जमीन तैयार की, वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति के लिए एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि के तौर पर सामने आई है। ब्रिक्स की इस बैठक की सबसे बड़ी सफलता यही रही कि भारत ने उन देशों के बीच भी संवाद की संभावना पैदा की, जिनके बीच गहरे मतभेद हैं। ईरान और खाड़ी के देशों के बीच बातचीत इसका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण है। पश्चिम एशिया लंबे समय से टकराव, अविश्वास और संघर्ष का मैदान बना हुआ है। ऐसे समय में दिल्ली का मंच बातचीत के लिए उपलब्ध होना अपने आप में भारत की बढ़ती स्वीकार्यता का संकेत है। प्रधानमंत्री मोदी ने यह दिखाया कि भारत किसी एक खेमे का हिस्सा बनकर नहीं, बल्कि अलग-अलग पक्षों से संवाद करते हुए अपने लिए स्वतंत्र कूटनीतिक स्थान बना सकता है। इसे भी पढ़ें: 'कमजोर' पटरी पर तेजी से दौड़ने का प्रयास कर रही भारत-चीन 'दोस्ती' की रेल कहीं डिरेल ना हो जाए! भारत और चीन के बीच हुई बातचीत भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। सीमा विवाद और लंबे समय से चले आ रहे तनाव के बावजूद दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व का आमने-सामने बैठना इस बात का प्रमाण है कि भारत अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं से समझौता किए बिना संवाद के दरवाजे बंद नहीं करता। यही वह बिंदु है जहां मोदी की कूटनीति की ताकत दिखाई देती है। अमेरिका से संबंध भी कायम हैं, रूस के साथ रिश्ते भी बने हुए हैं, चीन से संवाद भी हो रहा है और पश्चिम एशिया के अलग-अलग देशों के साथ भारत की स्वीकार्यता लगातार बढ़ रही है। यानी भारत किसी एक शक्ति के पीछे चलने के बजाय अपनी शर्तों पर संबंधों का संतुलन साध रहा है। यही सफलता उस राजनीतिक नैरेटिव को भी कमजोर करती है, जिसमें बार-बार यह सवाल उठाया जाता रहा कि अगर पड़ोसी देश पाकिस्तान ने मक्का समझौता कर लिया, दूसरे देशों के साथ अपने समीकरण बना लिए और क्षेत्रीय स्तर पर भारत के खिलाफ गतिविधियां बढ़ीं तो क्या भारत की विदेश नीति असफल हो गई? विदेश नीति को केवल पड़ोस की तत्काल घटनाओं से मापना वास्तविक तस्वीर को छोटा कर देना है। असली सवाल यह है कि दुनिया की बड़ी शक्तियां भारत को किस नजर से देख रही हैं और संकट के समय कितने देश भारत के साथ बातचीत के लिए तैयार हैं। दिल्ली की बैठक ने इस सवाल का जवाब काफी हद तक दे दिया है। यहां प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिगत कूटनीतिक छवि भी महत्वपूर्ण हो जाती है। नरेंद्र मोदी, व्लादिमीर पुतिन और शी चिनफिंग की तस्वीरें जिस तरह वैश्विक स्तर पर चर्चा में आई हैं, उनका राजनीतिक संदेश तस्वीर से कहीं बड़ा है। यह तस्वीर बताती है कि भारत का नेतृत्व एक साथ दुनिया की अलग-अलग शक्तियों के साथ संवाद करने की स्थिति में है। पश्चिमी देशों के लिए भी यह संदेश महत्वपूर्ण है कि भारत को नजरअंदाज करके वैश्विक राजनीति की कोई बड़ी रणनीति पूरी नहीं हो सकती। इसका घरेलू राजनीतिक असर भी कम नहीं होगा। भाजपा लंबे समय से प्रधानमंत्री मोदी की मजबूत वैश्विक छवि को अपनी राजनीतिक पूंजी के रूप में इस्तेमाल करती रही है। ब्रिक्स की दिल्ली बैठक उस पूंजी को और मजबूत करने का अवसर देती है। विपक्ष यदि यह कहता है कि सरकार की विदेश नीति कमजोर पड़ गई है, तो भाजपा के पास दिल्ली में जुटे वैश्विक नेताओं, भारत की मध्यस्थ भूमिका और अलग-अलग शक्ति केंद्रों के साथ संवाद को सामने रखने का मजबूत राजनीतिक आधार तैयार हो गया है। सबसे बड़ी बात यह है कि दिल्ली में मिली यह कूटनीतिक सफलता केवल एक शिखर सम्मेलन की सफलता बनकर नहीं रहने वाली। इसका सीधा और दीर्घकालिक लाभ भारत की सामरिक स्थिति को मिल सकता है। रूस, चीन, अमेरिका, यूरोप, ईरान और खाड़ी देशों जैसे अलग-अलग शक्ति केंद्रों के साथ एक साथ संवाद कायम रखने की मोदी की क्षमता ने यह संदेश दिया है कि भारत किसी दबाव या धड़े की राजनीति में बंधा हुआ नहीं है, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर दुनिया की बड़ी शक्तियों के साथ संबंध तय करने की स्थिति में है। इसका असर आने वाले समय में व्यापार, निवेश, ऊर्जा सुरक्षा, सामरिक सहयोग और भारत की वैश्विक हैसियत, हर मोर्चे पर दिखाई दे सकता है। साथ ही इस सफलता का एक घरेलू राजनीतिक पहलू भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आगामी पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा इस उपलब्धि को प्रधानमंत्री मोदी के मजबूत नेतृत्व और भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा के प्रमाण के रूप में जनता के सामने रख सकती है। विपक्ष यदि विदेश नीति को लेकर सरकार पर सवाल उठाता है, तो भाजपा के पास दिल्ली में एक साथ जुटे विश्व के बड़े नेताओं और मोदी की सक्रिय कूटनीतिक भूमिका को सामने रखने का अवसर होगा। यानी ब्रिक्स की सफलता सिर्फ दिल्ली की कूटनीतिक मेज पर मोदी की जीत नहीं है; यह आने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा के लिए एक बड़ा राजनीतिक हथियार और मोदी की नेतृत्व छवि को और मजबूत करने वाली उपलब्धि भी बन सकती है। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की सफलता ने घरेलू राजनीति में ब्रांड मोदी को और मजबूत कर दिया है। -नीरज कुमार दुबे
नई दिल्ली में BRICS का मंच इस बार सिर्फ दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्थाओं की बैठक नहीं बल्कि तेजी से बदलती विश्व व्यवस्था का एक जीवंत कूटनीतिक नक्शा नजर आया। इसका सबसे स्पष्ट संकेत रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन की दिल्ली यात्रा में दिखाई देता है। 11 और 12 सितंबर के दौरान पुतिन ने भारत, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, मलेशिया, इथियोपिया और संयुक्त अरब अमीरात के शीर्ष नेतृत्व के साथ अलग-अलग बातचीत की। यानी एक ही मंच पर एशिया, अफ्रीका, अरब जगत और Global South की अलग-अलग रणनीतिक धुरियों को साधने की कोशिश दिखाई दी है। सबसे महत्वपूर्ण बैठक स्वाभाविक रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ रही। यह सिर्फ भारत-रूस संबंधों की समीक्षा नहीं थी, बल्कि ऐसे समय में हुई है जब रूस पश्चिमी प्रतिबंधों के दबाव में है, भारत अपनी strategic autonomy को बनाए रखते हुए अमेरिका, यूरोप और रूस, तीनों के साथ संबंधों को संतुलित कर रहा है और दुनिया ऊर्जा तथा व्यापार के नए संकटों से गुजर रही है। मोदी और पुतिन ने रक्षा, ऊर्जा, व्यापार, अंतरिक्ष, राजनीतिक सहयोग, critical minerals और औद्योगिक साझेदारी जैसे क्षेत्रों की समीक्षा की। दोनों देशों ने व्यापार और औद्योगिक सहयोग को आगे बढ़ाने पर भी जोर दिया। इसे भी पढ़ें: यही तो मोदी की खास बात है...अचानक किया हस्तक्षेप और BRICS को पश्चिम विरोधी मंच बनने से रोक दिया इसके बाद पुतिन की दक्षिण अफ्रीकी राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा के साथ बातचीत हुई। यहां रूस का लक्ष्य साफ दिखाई देता है। अफ्रीका में अपने राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव को लगातार मजबूत करना। रामाफोसा ने रूस-दक्षिण अफ्रीका व्यापार बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया, जबकि पुतिन ने अफ्रीकी देशों के साथ संबंधों को विशेष महत्व देने की बात कही। मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी के साथ बैठक और भी रणनीतिक है। रूस और मिस्र के रिश्तों में ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा और परमाणु सहयोग पहले से महत्वपूर्ण हैं। बातचीत में रूसी अनाज की आपूर्ति और मिस्र में एल-दबाआ परमाणु परियोजना का मुद्दा सामने आया। यानी रूस मध्य पूर्व में सिर्फ राजनीतिक खिलाड़ी नहीं, बल्कि ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा का भी महत्वपूर्ण साझेदार बनकर मौजूद है। मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम के साथ बातचीत रूस की दक्षिण-पूर्व एशिया नीति की ओर इशारा करती है। यह संबंध BRICS से आगे ASEAN और Indo-Pacific की आर्थिक तथा रणनीतिक संभावनाओं तक जाता है। वहीं इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबी अहमद के साथ बातचीत रूस की अफ्रीका नीति का दूसरा महत्वपूर्ण सिरा है। यह एक ऐसा अफ्रीकी देश है जिसके साथ मॉस्को के राजनयिक संबंध 120 वर्ष से भी अधिक पुराने हैं। फिर आता है संयुक्त अरब अमीरात। अबू धाबी के क्राउन प्रिंस खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के साथ पुतिन की बैठक विशेष महत्व रखती है, क्योंकि UAE अरब दुनिया में रूस का एक प्रमुख आर्थिक साझेदार है। साथ ही ईरान और खाड़ी के बीच चल रहे तनाव के दौर में मॉस्को का अबू धाबी से संवाद उसकी मध्यस्थ और संतुलनकारी भूमिका को भी मजबूत करता है। इस पूरी श्रृंखला को एक साथ देखें तो तस्वीर बेहद स्पष्ट है। पुतिन दिल्ली में सिर्फ BRICS Summit में हिस्सा लेने नहीं आए थे, वह BRICS के भीतर रूस की strategic connectivity को मजबूत करने भी आये थे। देखा जाये तो भारत से लेकर दक्षिण अफ्रीका, मिस्र से UAE और मलेशिया से इथियोपिया तक, रूस उन देशों से संवाद बढ़ा रहा है जो अमेरिकी नेतृत्व वाली पश्चिमी व्यवस्था के विकल्प के रूप में किसी न किसी रूप में अधिक बहुध्रुवीय विश्व की वकालत करते हैं। यही दिल्ली BRICS की असली कहानी है। रूस पश्चिम से टकराव के बीच अकेला नहीं दिखना चाहता; वह एशिया, अफ्रीका और मध्य पूर्व में अपने लिए वैकल्पिक आर्थिक, ऊर्जा, व्यापारिक और राजनीतिक नेटवर्क तैयार कर रहा है। दूसरी ओर भारत इस पूरे समीकरण में सबसे महत्वपूर्ण संतुलनकारी शक्ति है। इस तरह BRICS का मंच अब केवल रूस-चीन की धुरी नहीं रह गया है। यह कई शक्तियों के बीच बातचीत का ऐसा मंच बन रहा है जहां मॉस्को को नई साझेदारियां, नई दिल्ली को strategic autonomy और Global South को अपनी सामूहिक bargaining power दिखाई दे रही है। यही वजह है कि दिल्ली में पुतिन की ये छह मुलाकातें उस विश्व व्यवस्था की झलक हैं जिसमें शक्ति का केंद्र धीरे-धीरे एक ध्रुव से निकलकर कई दिशाओं में फैल रहा है। यहां एक बात और काबिलेगौर है कि अमेरिका ने पुतिन को विश्व राजनीति में अलग थलग करने के लिए पूरा जोर लगाया लेकिन पुतिन की शक्ति बढ़ती जा रही है और उन्हें अपनी स्थिति मजबूत बनाये रखने में भारत और चीन भरपूर मदद भी दे रहे हैं। -नीरज कुमार दुबे
यही तो मोदी की खास बात है...अचानक किया हस्तक्षेप और BRICS को पश्चिम विरोधी मंच बनने से रोक दिया
महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति को किसी देश के दबाव का हथियार नहीं बनने देने से लेकर समुद्र में काम करने वाले नाविकों की सुरक्षा तक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़े दो बेहद अहम मुद्दे उठाए। उन्होंने साफ कहा कि दुनिया की आधुनिक अर्थव्यवस्था जिन महत्वपूर्ण खनिजों पर तेजी से निर्भर हो रही है, उनकी आपूर्ति सुरक्षित और भरोसेमंद रहनी चाहिए। साथ ही, उन्होंने संकट के समय नाविकों को मदद पहुंचाने के लिए आपात सहायता तंत्र बनाने का प्रस्ताव रखा। यानी नई दिल्ली में मोदी ने एक तरफ संसाधनों की सुरक्षा का सवाल उठाया, तो दूसरी तरफ वैश्विक व्यापार की उस मानवीय कड़ी पर ध्यान खींचा, जिस पर समुद्र के रास्ते होने वाला पूरा कारोबार टिका है। मोदी ने इसी क्रम में समुद्री व्यापार और नाविकों की सुरक्षा को भी प्रमुखता दी। उन्होंने कहा कि वैश्विक व्यापार तभी सुचारु रूप से आगे बढ़ सकता है, जब समुद्री मार्ग सुरक्षित रहें, आपूर्ति मार्ग खुले रहें और नाविक सुरक्षित रहें। पश्चिम एशिया तथा काला सागर क्षेत्र के संघर्षों का असर समुद्री व्यापार और भारतीय नाविकों की सुरक्षा पर पड़ा है। इससे पहले ईरान और रूस के राष्ट्राध्यक्षों के साथ अपनी अलग-अलग बैठकों में भी मोदी ने समुद्री आवाजाही की स्वतंत्रता, व्यापार की निर्बाध आवाजाही और नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा उठाया था। इसे भी पढ़ें: BRICS Summit 2026 की सफलता पर बोले S Jaishankar, बंटी दुनिया में भारत ने बनाई सहमति शिखर सम्मेलन के दौरान उन्होंने नाविकों के लिए आपात सहायता तंत्र बनाने का प्रस्ताव भी रखा। इसका उद्देश्य संकट के समय समुद्री अधिकारियों और संबंधित देशों के तंत्र को जोड़कर संकट संबंधी सूचनाएं पहुंचाना, चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराना, परिवारों तक सूचना पहुंचाना और जरूरत पड़ने पर बचाव तथा निकासी अभियान में मदद करना है। समुद्री व्यापार पर बढ़ते संघर्षों के असर के बीच यह प्रस्ताव सीधे तौर पर वैश्विक व्यापार की उस कमजोर कड़ी को सामने लाता है, जिस पर करोड़ों टन माल की आवाजाही टिकी हुई है। लेकिन नई दिल्ली शिखर सम्मेलन में मोदी की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक रेखा ब्रिक्स के स्वरूप को लेकर रही। उन्होंने इस धारणा को स्वीकार नहीं किया कि ब्रिक्स पश्चिम के खिलाफ खड़ा कोई राजनीतिक गठबंधन है। मोदी ने कहा कि ब्रिक्स किसी के विरुद्ध नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलने वाला समावेशी मंच है। पिछले दो दशकों में ब्रिक्स ने अपनी अलग पहचान बनाई है और अब उसके सामने चुनौती अपनी एकता तथा सहमति को ठोस परिणामों में बदलने की है। यही वजह रही कि मोदी ने ग्लोबल साउथ को केवल निर्णयों का पालन करने वाला पक्ष बनाए रखने की बजाय नियम बनाने में प्रभावी भूमिका देने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि दुनिया के अनेक देश वैश्विक संकटों की पहली कतार में खड़े हैं, लेकिन निर्णय लेने की व्यवस्था में पीछे हैं। इस असंतुलन को बदलने के लिए वैश्विक शासन व्यवस्था को आज की आर्थिक और राजनीतिक वास्तविकताओं के अनुरूप बनाना होगा। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अधिक प्रतिनिधित्व की मांग भी इसी संदर्भ में सामने आई। मोदी ने ब्रिक्स के भीतर युवाओं, राजनयिकों और नीति-निर्माताओं को बातचीत की कला, व्यावहारिक प्रशिक्षण और कानूनी विशेषज्ञता उपलब्ध कराने की बात भी रखी, ताकि ग्लोबल साउथ केवल बनाए गए नियमों का पालन करने वाला नहीं, बल्कि नियमों को आकार देने वाला समूह बने। उन्होंने ब्रिक्स के भीतर व्यापारिक अड़चनों को घटाने, निवेश बढ़ाने और कारोबारी संबंधों को मजबूत करने पर भी जोर दिया। भारत की अध्यक्षता में कृषि, स्वास्थ्य, कौशल और स्मार्ट बिजली तंत्र जैसे क्षेत्रों में सहयोग के नए ढांचे बनाए गए हैं। ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार बढ़ाने के लिए दस प्रमुख व्यापारिक बाधाओं को हटाने, हर वर्ष सौ नए उद्यमों को सदस्य देशों के बाजारों तक पहुंचाने और एक हजार नई कारोबारी साझेदारियां विकसित करने का लक्ष्य भी सामने रखा गया है। इस पूरे घटनाक्रम में मोदी की रणनीति साफ दिखाई दी। महत्वपूर्ण खनिजों से लेकर समुद्री सुरक्षा, व्यापार से लेकर वैश्विक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व तक, उन्होंने ब्रिक्स को किसी ध्रुव के खिलाफ खड़ा करने के बजाय वैश्विक व्यवस्था में अधिक हिस्सेदारी मांगने वाले मंच के रूप में पेश किया। संदेश यही रहा कि भविष्य साझा है तो उसे आकार देने का अधिकार भी साझा होना चाहिए। नई दिल्ली घोषणा के साथ ब्रिक्स ने इसी दिशा में आगे बढ़ने की साझा प्राथमिकताएं तय कीं। -नीरज कुमार दुबे
नई दिल्ली में संपन्न BRICS शिखर सम्मेलन के बीच भारत ने उस वक्त बड़ी कूटनीतिक कामयाबी हासिल की, जब पश्चिम एशिया के युद्ध को लेकर आमने-सामने खड़े ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) एक साझा BRICS घोषणा पर सहमत हो गए। करीब छह महीने से जारी युद्ध और लगातार बढ़ते क्षेत्रीय तनाव के बीच दोनों देशों के बीच सहमति बनना सिर्फ BRICS के लिए नहीं, बल्कि भारत की कूटनीतिक भूमिका के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है। दरअसल, BRICS के विदेश मंत्रियों की मई में हुई बैठक के दौरान ईरान और UAE के बीच मतभेद इतने गहरे थे कि संयुक्त बयान तक जारी नहीं हो पाया था। पश्चिम एशिया में युद्ध को लेकर दोनों देशों की प्राथमिकताएं और संघर्ष की व्याख्या अलग-अलग थी। ऐसे में दिल्ली शिखर सम्मेलन से पहले सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि ऐसी भाषा तैयार की जाए, जिस पर ईरान और UAE समेत BRICS के सभी सदस्य देश एक साथ खड़े हो सकें। इसे भी पढ़ें: UNSC में India की स्थायी सदस्यता का रास्ता साफ ! US, UK, France, Russia के बाद China भी आ गया साथ भारत की अध्यक्षता में हुई लंबी और बेहद कठिन बातचीत के बाद आखिरकार वह रास्ता निकाला गया। बातचीत आधी रात के बाद तक चलती रही और करीब चार बजे तक सहमति बनाने की कोशिशें जारी रहीं। अंतिम घोषणा में किसी एक देश को सीधे तौर पर युद्ध के लिए जिम्मेदार ठहराने के बजाय पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव पर सामूहिक चिंता जताई गई। सभी पक्षों से अधिकतम संयम बरतने और ऐसे कदमों से बचने की अपील की गई, जो स्थिति को और बिगाड़ सकते हैं। इस पूरी कवायद का सबसे बड़ा राजनीतिक संकेत उस समय सामने आया, जब ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और UAE के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के बीच BRICS सम्मेलन के इतर मुलाकात हुई। युद्ध शुरू होने के बाद दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच यह सबसे महत्वपूर्ण संपर्कों में से एक माना जा रहा है। खास बात यह है कि यह बैठक ऐसे समय हुई, जब क्षेत्रीय संघर्ष ने ईरान और खाड़ी देशों के रिश्तों को बेहद संवेदनशील बना दिया है। हम आपको बता दें कि BRICS की नई दिल्ली घोषणा में पश्चिम एशिया की स्थिति पर चिंता जताते हुए नागरिकों की सुरक्षा, संप्रभुता और क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर दिया गया है। इसके साथ ही वैश्विक व्यापार और समुद्री आवाजाही को सुरक्षित रखने की जरूरत भी रेखांकित की गई। घोषणा का मकसद किसी पक्ष की जीत या हार तय करना नहीं, बल्कि ऐसी न्यूनतम साझा जमीन तैयार करना था, जिस पर अलग-अलग रणनीतिक हित रखने वाले देश भी एक साथ खड़े हो सकें। यहीं भारत की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। BRICS के विस्तार के बाद संगठन के भीतर अब सिर्फ आर्थिक हितों का मेल नहीं है, बल्कि ईरान, UAE और अन्य देशों के बीच गंभीर भू-राजनीतिक मतभेद भी मौजूद हैं। ऐसे माहौल में सर्वसम्मति से घोषणा पारित कराना अपने आप में एक राजनीतिक उपलब्धि है। भारतीय कूटनीति ने पक्ष के साथ खड़े होने की बजाय ऐसी भाषा पर जोर दिया, जिसे विरोधी धड़े भी स्वीकार कर सकें। देखा जाये तो इसका असर BRICS की विश्वसनीयता पर भी पड़ेगा। अगर युद्ध जैसे बेहद संवेदनशील मुद्दे पर ईरान और UAE जैसे विरोधी हितों वाले देश एक ही घोषणा पर हस्ताक्षर कर सकते हैं, तो दिल्ली शिखर सम्मेलन ने यह संदेश जरूर दिया है कि BRICS सिर्फ आर्थिक सहयोग का मंच नहीं रह गया है। अब वह ऐसे भू-राजनीतिक संकटों में भी साझा रुख बनाने की कोशिश कर रहा है, जहां वैश्विक शक्तियों के बीच सीधा टकराव मौजूद है। -नीरज कुमार दुबे
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संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी को अब वह बड़ा रणनीतिक समर्थन मिलता दिखाई दे रहा है, जिस पर लंबे समय से पूरी दुनिया की नजर थी। नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान, संयुक्त राष्ट्र महासचिव अंतोनियो गुतारेस की मौजूदगी में चीन और रूस ने भारत को संयुक्त राष्ट्र, विशेषकर सुरक्षा परिषद में बड़ी भूमिका देने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराकर भारत के दावे को नई ताकत दे दी है। इससे पहले ब्रिटेन, फ्रांस और अमेरिका भी सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन कर चुके हैं, लेकिन हर बार यह मामला चीन की असहमति पर आकर अटक जाता था। अब पहली बार ऐसा संकेत मिल रहा है कि चीन का रुख भी बदल रहा है। रूस के साथ चीन का समर्थन मिलना केवल भारत की कूटनीतिक जीत नहीं, बल्कि सुरक्षा परिषद की दशकों पुरानी शक्ति-संरचना के सामने एक बेहद महत्वपूर्ण रणनीतिक संदेश भी है। इस घटनाक्रम को तमाम अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक भारत के लिए बड़ी जीत बता रहे हैं। अमेरिकी अर्थशास्त्री और कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जेफ्री सैक्स ने तो यहां तक कहा है कि भारत के अलावा कोई दूसरा देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के छठे स्थायी सदस्य बनने का इतना मजबूत दावा नहीं रखता। सैक्स ने भारत की करीब डेढ़ अरब की आबादी, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, वैश्विक प्रभाव और कूटनीतिक क्षमता को इसकी सबसे बड़ी ताकत बताया। उनका कहना है कि भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है, क्रय शक्ति के आधार पर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में लगातार अपनी प्रभावशाली भूमिका साबित कर रहा है। इसे भी पढ़ें: PM Modi और UAE क्राउन प्रिंस की मुलाकात, रणनीतिक और निवेश साझेदारी पर बनी सहमति हम आपको यह भी बता दें कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की नई दिल्ली घोषणा में चीन और रूस ने स्पष्ट रूप से भारत और ब्राजील की संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद में बड़ी भूमिका निभाने की आकांक्षा के प्रति अपना समर्थन दोहराया है। चीन का यह रुख खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह लंबे समय से भारत की स्थायी सदस्यता की मांग का खुलकर समर्थन करने से बचता रहा है। सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता रखने वाला चीन यदि भारत के दावे के समर्थन में खड़ा होता है, तो यह भारत के लिए बड़ी राहत की बात है। उल्लेखनीय है कि सुरक्षा परिषद में फिलहाल पांच स्थायी सदस्य हैं। चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका। इनके पास वीटो पावर है, जिसके जरिये इनमें से कोई भी देश किसी महत्वपूर्ण प्रस्ताव को रोक सकता है। इसके अलावा दस अस्थायी सदस्य होते हैं, जिनका कार्यकाल दो वर्ष का होता है। इसके अलावा, विडंबना देखिए कि 1945 में जिस वैश्विक शक्ति-संतुलन को ध्यान में रखकर यह व्यवस्था बनाई गई थी, वही ढांचा आज भी लगभग उसी रूप में कायम है। जबकि दुनिया की आबादी, अर्थव्यवस्था, शक्ति-संतुलन और राजनीतिक वास्तविकताएं बदल गईं, लेकिन सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का ढांचा नहीं बदला। यही वह बिंदु है जहां संयुक्त राष्ट्र सुधार की जरूरत सबसे ज्यादा दिखाई देती है। जिस संस्था का मूल उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा कायम करना है, वही संस्था जब दुनिया के बड़े हिस्से को निर्णय प्रक्रिया से पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दे पाती, तो उसकी वैधता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की विशाल आबादी और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का ढांचा बेहद असंतुलित है। देखा जाये तो दुनिया के संकटों का असर जिन देशों और समाजों पर सबसे ज्यादा पड़ता है, निर्णय लेने की मेज पर उनकी आवाज उतनी ही कमजोर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसी असमानता को रेखांकित करते हुए वैश्विक निर्णय व्यवस्था को विशेषाधिकारों की पिरामिड जैसी संरचना बताया है। उन्होंने कहा कि ऊपर बैठे शक्तिशाली देश निर्णय लेते हैं और नीचे मौजूद देशों को उन निर्णयों के परिणाम भुगतने पड़ते हैं। उन्होंने इस विशेषाधिकार की पिरामिड को साझेदारी के मंच में बदलने का आह्वान किया है। उनका यह संदेश केवल ब्रिक्स तक सीमित नहीं है, बल्कि मौजूदा वैश्विक व्यवस्था के सामने एक सीधी चुनौती है। प्रधानमंत्री मोदी और संयुक्त राष्ट्र महासचिव अंतोनियो गुतारेस की मुलाकात में भी बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और बहुपक्षीय संस्थाओं, विशेषकर सुरक्षा परिषद में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया गया। दोनों नेताओं ने संघर्षों, समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता, सतत विकास, मानव-केंद्रित कृत्रिम बुद्धिमत्ता, नवीकरणीय ऊर्जा और वैश्विक खाद्य सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा की। यह अपने आप में संकेत है कि आज की वैश्विक समस्याएं इतनी व्यापक हो चुकी हैं कि उन्हें पुराने शक्ति-संतुलन और सीमित प्रतिनिधित्व वाली संस्थाओं के सहारे नहीं संभाला जा सकता। देखा जाये तो भारत की स्थायी सदस्यता का सामरिक महत्व यहीं से सामने आता है। भारत केवल दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश नहीं है; वह एशिया की एक निर्णायक शक्ति, परमाणु शक्ति, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और ग्लोबल साउथ की प्रमुख आवाज है। भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी स्थान मिलने का अर्थ होगा एशिया और विकासशील दुनिया की निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक हिस्सेदारी बढ़ना। रणनीतिक स्तर पर चीन और रूस का समर्थन भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक पूंजी है। इससे यह धारणा कमजोर होती है कि भारत की स्थायी सदस्यता केवल पश्चिमी देशों की इच्छा पर निर्भर है। अब रूस और चीन जैसे स्थायी सदस्य भी इसके समर्थन में खुलकर खड़े दिखाई दे रहे हैं। यह भारत की उस कूटनीति की सफलता है जो एक साथ पश्चिम, रूस, चीन और ग्लोबल साउथ के साथ संवाद बनाए रखते हुए अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ा रही है। बहरहाल, मुद्दा सिर्फ भारत को स्थायी सदस्य बनाने का नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र को 21वीं सदी की वास्तविकताओं के अनुरूप बदलने का है। अगर दुनिया की सबसे बड़ी आबादी और प्रमुख उभरती शक्तियों को निर्णय की मेज पर पर्याप्त जगह नहीं मिलती, तो संयुक्त राष्ट्र वैश्विक समस्याओं का समाधान करने वाली संस्था कम और पुराने शक्ति-संतुलन की संरचना ज्यादा दिखाई देगा। दुनिया बदल चुकी है; अब संयुक्त राष्ट्र को भी बदलना ही होगा। और इस बदलाव की सबसे मजबूत दावेदारी आज भारत के पास है। -नीरज कुमार दुबे
भारत की सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग में बढ़ोतरी
जापान क्रेडिट रेटिंग एजेन्सी (जेसीआरए) ने भारत की सार्वभौम (सावरेन) क्रेडिट रेटिंग में सुधार करते हुए इसे BBB+ से बढ़ाकर A- कर दिया है। भारत की सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग में बढ़ोतरी कई कारणों के चलते की गई है। भारतीय अर्थव्यवस्था लगातार विकास के पथ पर तेजी से दौड़ रही है और भारत के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 8 प्रतिशत की वृद्धि दर बनी हुई है। भारत आज पूरे विश्व में समस्त बड़े देशों के बीच सबसे तेज गति से आगे बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बन गई है एवं भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में अपनी भूमिका का निर्वहन करता हुआ दिखाई दे रहा है। दूसरा, भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, इस देश में नागरिकों को अपने विचार रखने की आजादी है अतः विश्व के अन्य देश भारत की ओर आकर्षित हो रहे हैं और भारत में विदेशी निवेश लगातार बढ़ रहा है। अभी हाल ही में अन्य देशों में निवासरत भारत के मूल नागरिकों ने भारत में 13,600 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि भारतीय बैंकों में जमा की है। यह भारत की शक्ति एवं मजबूती को दर्शाता है। तीसरा, भारत में आर्थिक सुधार कार्यक्रम लगातार चल रहे है। हाल ही में, वस्तु एवं सेवा कर की दरों में कमी की गई थी जिसके चलते भारतीय नागरिकों की जेब में एक लाख करोड़ रुपए से अधिक की राशि पहुंची है, इससे भारतीय नागरिकों की खर्च करने की क्षमता में वृद्धि हुई है। चौथा, भारत में डिजिटल आधारभूत संरचना को मजबूती प्रदान की गई है। भारतीय यूपीआई की मांग अब विश्व के अन्य देशों द्वारा भी की जा रही है। जनधन योजना के अंतर्गत देश के करोड़ों नागरिकों के बैंक खाते खोले गए हैं, जिन्हें आधार से जोड़ दिया गया है और स्मार्ट मोबाइल आज जैसे जेब में बैंक का कार्य करता हुआ दिखाई दे रहा है। डिरेक्ट बेनिफिट ट्रान्स्फर योजना को भी बहुत सरल बना दिया गया है। इससे देश में भ्रष्टाचार में कमी आई है। पांचवां, भारत में हाल ही के समय में वित्तीय क्षेत्र में मजबूती आई है। मार्च 2026 को समाप्त हुए वित्तीय वर्ष में भारतीय बैंकों में सकल गैर निष्पादनकारी आस्तियां 1.8 प्रतिशत से भी नीचे आ गई हैं। यह अपने आप में एक रिकार्ड है। छठा, सरकारी खर्चों के उपयोग में अब सुधार दृष्टिगोचर है और इसकी गुणवत्ता भी सुधरी है। केंद्र सरकार के पूंजीगत खर्च पिछले 5 वर्षों में तीन गुना हो गए हैं। इससे भारत में रेल, रोड एवं पोर्ट की आधारभूत संरचना विकसित हुई है, जो विदेशी निवेशकों को भी भारत में अपना निवेश बढ़ाने के लिए आकर्षित कर रही है। सांतवा, भारत के विदेशी मुद्रा भंडार 68,400 करोड़ अमेरिकी डॉलर के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गए हैं, जो कि भारत के लिए बहुत अच्छा सुरक्षा कवच बन गया है। आंठवां, भारत का वित्तीय घाटा वित्तीय वर्ष 2020-21 में 9.2 प्रतिशत था, जो वित्तीय वर्ष 2025-26 में घटकर 4.4 प्रतिशत के स्तर पर नीचे आ गया है। भारतीय अर्थव्यवस्था में उक्त 8 मानकों पर हुए सुधार के चलते जापान क्रेडिट रेटिंग एजेन्सी ने भारत के सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग में बढ़ौतरी की है। विश्व की क्रेडिट रेटिंग एजेन्सीयों द्वारा विभिन्न देशों की आर्थिक एवं वित्तीय स्थिति के आधार पर इन देशों की क्रेडिट रेटिंग निर्धारित की जाती है। इन देशों द्वारा अथवा इन देशों के बैकों द्वारा एवं इन देशों की कम्पनियों द्वारा वैश्विक बाजार से उधार ली जाने वाली राशि पर ब्याज की दर इस क्रेडिट रेटिंग के आधार पर निर्धारित होती है। यदि क्रेडिट रेटिंग उच्च स्तर की रहती है तो उस देश द्वारा अंतरराष्ट्रीय बाजार में ली जाने वाली ऋणराशि पर ब्याज की दर कम निर्धारित होती है। दूसरे, इससे उस देश में विदेशी निवेश आकर्षित होता है, क्योंकि इन देशों में किया गया विदेशी निवेश सुरक्षित माना जाता है। विभिन्न क्रेडिट रेटिंग एजेन्सी द्वारा निम्न प्रकार की क्रेडिट रेटिंग प्रदान की जाती है। AAA - यह प्राइम क्रेडिट रेटिंग मानी जाती है एवं यह देश निवेश की दृष्टि से इन्वेस्टमेंट ग्रेड का है। AA - क्रेडिट रेटिंग भी हाई ग्रेड की मानी जाती है। A - क्रेडिट रेटिंग अपर मीडीयम ग्रेड की मानी जाती है। BBB - क्रेडिट रेटिंग लोअर मीडीयम ग्रेड को दर्शाती है। BB - क्रेडिट रेटिंग नोन-इन्वेस्टमेंट ग्रेड एवं स्पेक्युलेटिव की श्रेणी में गिनी जाती है। B - क्रेडिट रेटिंग हाइली स्पेक्युलटिव श्रेणी में आती है एवं C - क्रेडिट रेटिंग अधिकतम रिस्क की श्रेणी में गिनी जाती है। भारत की क्रेडिट रेटिंग BBB+ ग्रेड में मानी जा रही थी जो अब सुधरकर A- कर दिया गया है। इसे भी पढ़ें: Western Dedicated Freight Corridor क्या है? Modi के Infra Model की बड़ी तस्वीर हर कोई हैरान है पश्चिमी देशों की क्रेडिट रेटिंग एजेन्सीयों ने भारत की सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग में पिछले कई वर्षों से बदलाव ही नहीं किया है जबकि भारत ने इस दौरान विशेष रूप से आर्थिक एवं वित्तीय क्षेत्र में अतुलनीय सुधार करते हुए विकास दर को बढ़ाने में सफलता प्राप्त की है। फिच नामक क्रेडिट रेटिंग एजेन्सी ने भारत की सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग को अगस्त 2006 के बाद से परिवर्तित ही नहीं किया है, जो BBB- के स्तर पर लगातार बनी हुई है। इसी प्रकार, स्टैंडर्ड एंड पूअर नामक क्रेडिट रेटिंग एजेन्सी द्वारा 18 वर्ष पश्चात भारत की सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग को 27 अगस्त 2026 को अपग्रेड करते हुए इसे BBB के स्तर पर ले आया गया है। एक अन्य क्रेडिट रेटिंग एजेन्सी मूडी ने जून 2020 के पश्चात भारत की सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग में कोई परिवर्तन नहीं किया है और भारत को Baa3 की सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग दी हुई है। उक्त एजेन्सीयां भारत की सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग को उचित तरीके से नहीं दर्शाती हैं। जबकि, भारत के आर्थिक संकेतक बहुत मजबूत बने हुए हैं। हाल ही में, विश्व के चार प्रमुख वित्तीय संस्थानों ने भारत के आर्थिक विकास के संदर्भ में विशेष रिपोर्ट जारी की है। जिसमें भारत की आर्थिक प्रगति की सराहना की गई है। जेफ्रीज नामक वित्तीय संस्थान की रिपोर्ट कहती है कि मोबाइल फोन, स्टील, सीमेंट, सोलर पैनल एवं ट्रक के निर्माण के क्षेत्र में भारत आज दुनिया में दूसरे स्थान पर आ गया है। वर्ष 2014 में स्पेस के क्षेत्र में भारत में केवल एक स्टार्टअप था आज भारत में इस क्षेत्र में 400 से अधिक स्टार्टअप कार्य कर रहे हैं। चिप निर्माण में 12 प्रोजेक्ट पर भारत में काम हो रहा है एवं 2,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निवेश इस क्षेत्र में हो रहा है। साथ ही, 3 विनिर्माण इकाईयों में उत्पादन भी प्रारम्भ हो गया है। जेफ्रीज ने इस रिपोर्ट को नाम दिया है “इंडिया न्यू इंडस्ट्रीयल रेवोल्यूशन”। दूसरी रिपोर्ट आई है बैंक ओफ अमेरिका से, जो कहती है कि भारत में बहुत कुछ बदल रहा है। पिछले 24 माह में भारत में 18 सुधार कार्यक्रम लागू हुए हैं। वस्तु एवं सेवा कर के ढांचे में 5 के स्थान पर मुख्यतः अब 2 दरें लागू कर दी गई हैं एवं इसे बहुत सरल बना दिया गया है। 12 लाख रुपए की कमाई तक, आय कर शून्य कर दिया गया है। नए लेबर कोड्ज भी लागू कर दिए गए हैं एवं सोशल सिक्यरिटी का दायरा भी बढ़ा दिया गया है। तीसरी रिपोर्ट आई है (BERNSTEIN) बॉर्नस्टीन नामक संस्थान से, जो कहती है कि भारत के विकास में कुछ हिस्सा सरकारी सहयोग से आ रहा है। केंद्र सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में अपने पूंजीगत खर्चों में भारी वृद्धि की है। जून 2026 तिमाही में भारत की 200 सबसे बड़ी कम्पनियों की आय 12 प्रतिशत बढ़ी है। वस्तु एवं सेवा कर की दरों में कमी करने से नागरिकों की जेब में करीब 20,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि पहुंची है। भारत के गांवों में कमजोर मानसून के बावजूद उत्पादों की मांग मजबूत बनी हुई है। चौथी रिपोर्ट आई है मोर्गन सटेनली नामक संस्थान से, इसके अनुसार, पिछले वर्ष विश्व के 24 स्टॉक मार्केट में से भारत का मार्केट, रिटर्न देने के मामले में 23वें स्थान पर रहा है। यह कड़वा सच है। परंतु, ऊपर जाने के रास्ता लम्बा है पर यहीं से निकलता है। अभी भारत का सेन्सेक्स 76000 के आसपास हैं, जो जून 27 तक बढ़कर परिस्थिति अनुसार, 89000 अथवा 100000 के स्तर तक पहुंच सकता है। भारतीय कम्पनियों के शेयर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कुछ सस्ते हो गए है। चूंकि भारतीय स्टॉक मार्केट ने पिछले वर्ष अच्छे रिटर्न नहीं दिए हैं अतः मार्केट इस वर्ष इस गलती को सुधारने को तैयार हो रहा है। भारत में निवेश, नागरिकों की बचत से आ रहा है, प्रति माह करोड़ों नागरिक SIP के माध्यम से हजारों करोड़ रुपए का निवेश देश के पूंजी बाजार में कर रहे हैं। भारतीय शेयर बाजार में आज देशी निवेशकों का निवेश विदेशी निवेशकों के निवेश की तुलना में अधिक हो गया है। जब विदेशी निवेशक वापिस भारतीय शेयर बाजार में लौटेंगे तो उन्हें आज की तुलना में महंगे शेयर खरीदने होंगे। अर्थात, भारतीय शेयर बाजार गिरा जरूर है, परंतु इसीलिए आगे का रास्ता लम्बा हो सकता है लेकिन जाना उसे ऊपर की ओर ही है। वैश्विक स्तर की उक्त चार बैंकिंग संस्थानों की रिपोर्ट स्पष्ट कहती हैं कि भारत विकास के राह पर बहुत तेज गति से आगे बढ़ रहा है एवं भारत के आर्थिक एवं वित्तीय क्षेत्र में लगातार सुधार कार्यक्रम लागू किए जा रहे हैं। अब पश्चिमी देशों की क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों द्वारा भी भारत की सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग में सुधार किया जाएगा, ऐसी आशा की जानी चाहिए। - प्रहलाद सबनानी सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक, भारतीय स्टेट बैंक के-8, चेतकपुरी कालोनी, झांसी रोड, लश्कर, ग्वालियर - 474 009
2029 से पहले 21 राज्यों में लागू होगा Uniform Civil Code, मुस्लिमों को फायदा होगा या नुकसान?
समान नागरिक संहिता पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बयान के बाद देश की राजनीति में जैसे भूचाल-सा आ गया है लेकिन हंगामा कर रहे लोगों को समझना चाहिए कि Uniform Civil Code का विचार आज की राजनीतिक बहस की उपज नहीं है। संविधान निर्माताओं ने ही इसकी कल्पना की थी और संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य को पूरे देश में समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करने का निर्देश दिया गया। संविधान सभा में डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने भी स्पष्ट किया था कि विवाह और उत्तराधिकार जैसे क्षेत्रों को समान नागरिक कानून के दायरे में लाने की संवैधानिक मंशा है। यानी UCC संविधान की मूल बहस का हिस्सा था, कोई अचानक सामने आया राजनीतिक एजेंडा नहीं। इसके बावजूद आजादी के बाद लंबे समय तक वोट बैंक की राजनीति और तुष्टिकरण की नीति के चलते कांग्रेस तथा उसके समर्थन वाली सरकारें विभिन्न समुदायों के निजी कानूनों को छूने से बचती रहीं। मगर नरेंद्र मोदी सरकार इस मुद्दे पर चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ रही है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का ताजा बयान इस संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। मुंबई में अमित शाह ने कहा कि 2029 से पहले भाजपा-एनडीए शासित सभी 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू कर दी जाएगी। उन्होंने कहा कि तीन तलाक खत्म कर मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार देने की दिशा में कदम उठाया गया है और कई राज्यों में UCC की प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी है। शाह का संदेश साफ है कि मोदी सरकार UCC को केवल चुनावी घोषणा बनाकर छोड़ने के मूड में नहीं है, बल्कि राज्य सरकारों के जरिए इसे विस्तार देने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। इसे भी पढ़ें: Maharashtra News: गरबा पंडालों में आधार कार्ड और तिलक जरूरी, Nitesh Rane ने Muslim एंट्री पर रोक का किया समर्थन उधर, अमित शाह के इस ऐलान के साथ ही विपक्ष ने इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने में देर नहीं की। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद ने कहा है कि किसी भी विचारधारा को संविधान से ऊपर नहीं रखा जा सकता। उन्होंने उत्तराखंड और दूसरे राज्यों में लागू या प्रस्तावित UCC को उच्च न्यायपालिका की कसौटी पर परखे जाने की बात कही और कहा कि मौलिक अधिकार तथा धार्मिक स्वतंत्रता जैसे सवालों पर अंतिम निर्णय अदालतों को करना होगा। कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने इससे भी आगे बढ़कर सवाल किया कि UCC से बेरोजगारी, महंगाई या पेट्रोल-डीजल की कीमतों जैसी आर्थिक समस्याएं कैसे दूर होंगी। उनका आरोप है कि सरकार इस मुद्दे के जरिए मुसलमानों को निशाना बनाने की राजनीति कर रही है। देखा जाये तो यहीं से UCC की असली राजनीतिक लड़ाई सामने आती है। एक पक्ष इसे समानता, लैंगिक न्याय और एक समान नागरिक अधिकारों की दिशा में संवैधानिक कदम बता रहा है, तो दूसरा पक्ष इसे धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों से जोड़कर देख रहा है। लेकिन राजनीतिक आरोपों से अलग इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि UCC का संवैधानिक आधार मौजूद है और व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े विषयों पर कानून बनाने का अधिकार राज्यों और केंद्र दोनों के पास है। विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और दत्तक ग्रहण जैसे विषय संविधान की सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची में आते हैं। इसलिए केवल संसद से केंद्रीय कानून की प्रतीक्षा करने की बजाय राज्य भी अपने-अपने स्तर पर कानून बना सकते हैं। सबसे अहम बात यह है कि अब UCC को लेकर बहस केवल राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं है। मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 के उन प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा था कि UCC का समय आ गया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने यह भी संकेत दिया था कि अगर मुस्लिम उत्तराधिकार कानून के किसी प्रावधान को रद्द कर दिया गया तो वैधानिक व्यवस्था में खालीपन पैदा हो सकता है। अदालत ने यह सवाल भी उठाया था कि ऐसे व्यापक बदलाव का रास्ता न्यायपालिका की बजाय विधायिका के माध्यम से क्यों न निकले। यानी सुप्रीम कोर्ट ने UCC की संवैधानिक बहस को नकारा नहीं, बल्कि व्यापक कानून बनाने की जिम्मेदारी विधायिका की ओर इंगित की। यही नहीं, विधि आयोग का रिकॉर्ड भी इस बहस को एकतरफा नहीं रहने देता। 21वें विधि आयोग ने 2018 में ‘Reforms of Family Law’ परामर्श पत्र जारी किया था। बाद में 22वें विधि आयोग ने जून 2023 में UCC पर नए सिरे से जनता, धार्मिक संगठनों और दूसरे हितधारकों से सुझाव मांगे। सरकार के अनुसार 21वें आयोग ने अंतिम रिपोर्ट नहीं दी और 22वां आयोग भी UCC पर अपनी रिपोर्ट पूरी नहीं कर सका। इस तरह यह मामला व्यापक परामर्श और विधायी विकल्पों की पड़ताल की प्रक्रिया में रहा है। अब सवाल यह है कि UCC वास्तव में जमीन पर कैसा दिखता है? उत्तराखंड इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। 27 जनवरी 2025 से वहां UCC लागू है और विवाह, तलाक, भरण-पोषण तथा उत्तराधिकार जैसे मामलों के लिए धर्म के आधार पर अलग-अलग व्यवस्था के स्थान पर एक समान ढांचा लागू किया गया है। राज्य का आधिकारिक UCC पोर्टल लगातार विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और अन्य सेवाओं के पंजीकरण के आंकड़े उपलब्ध करा रहा है। यानी यह केवल कागज पर बना कानून नहीं है, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था के स्तर पर काम कर रहा है। इसके बाद गुजरात ने मार्च 2026 में UCC विधेयक पारित किया। करीब आठ घंटे की बहस और विपक्ष के विरोध के बीच पारित इस कानून का उद्देश्य विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और live-in relationships से जुड़े मामलों के लिए समान कानूनी ढांचा तैयार करना है। इसके बाद मई 2026 में असम विधानसभा ने भी UCC विधेयक पारित कर दिया। असम का कानून बहुविवाह पर रोक, विवाह और लिव-इन-रिलेशनशिप के पंजीकरण तथा उत्तराधिकार में समानता जैसे प्रावधानों पर केंद्रित है। अनुसूचित जनजातियों को उनकी संवैधानिक और प्रथागत व्यवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए इसके दायरे से बाहर रखा गया है। गोवा का उदाहरण भी इस बहस में अक्सर निर्णायक रूप से सामने आता है। वहां ऐतिहासिक रूप से पुर्तगाली सिविल कोड से विकसित एक साझा नागरिक कानून व्यवस्था लंबे समय से मौजूद है। इसलिए भारत में यह दावा भी टिकता नहीं कि अलग-अलग समुदायों के लिए समान नागरिक कानून लागू करना अपने आप में असंभव या प्रशासनिक रूप से अव्यावहारिक है। या फिर यह किसी तरह का भेदभाव करता है। इसलिए अमित शाह के 2029 वाले ऐलान को सिर्फ एक चुनावी नारे के रूप में देखना ठीक नहीं होगा। उत्तराखंड में कानून लागू हो चुका है, गुजरात और असम विधायी रास्ते पर आगे बढ़ चुके हैं और गोवा का अपना ऐतिहासिक अनुभव मौजूद है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने UCC की आवश्यकता पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है और विधि आयोग ने भी इस विषय पर व्यापक परामर्श की प्रक्रिया चलाई है। अब देखना होगा कि मोदी सरकार इस मुद्दे पर कैसे आगे बढ़ती है। राज्यों से शुरुआत हो चुकी है इसलिए देखना होगा कि क्या केंद्रीय स्तर पर भी इस संबंध में कोई कानून आता है या नहीं? साथ ही विपक्ष की आपत्तियां यह भी दर्शा रही हैं कि यूसीसी को अदालतों में चुनौतियां दी जाएंगी, राज्यों में प्रावधानों को लेकर बहस होगी और धार्मिक स्वतंत्रता बनाम समान नागरिक अधिकारों का प्रश्न भी उठेगा। यहां विपक्ष को समझना होगा कि UCC कोई असंवैधानिक या अचानक थोपा गया विचार नहीं है। संविधान का अनुच्छेद 44, संविधान सभा की बहस, न्यायपालिका की टिप्पणियां और अब राज्यों में बन रही वास्तविक कानूनी व्यवस्था, इन सभी को साथ रखकर देखें तो साफ है कि UCC पर अब देश बहुत आगे निकल चुका है। -नीरज कुमार दुबे
दोस्त इजरायल को झटका! क्या भारत ने बदल लिया अपना रुख, ईरान के लिए नेतन्याहू को छोड़ा?
क्या ब्रिक्स डिक्लेरेशन भारत की विदेश नीति में किसी बड़े बदलाव की तरफ इशारा है? ब्रिक्स ब्रिक समिट का संयुक्त बयान जारी हो चुका है और इस बयान में पूरे फोरम ने कई मुद्दों पर काफी सख्त रुख अपनाया है। मसलन लेबनन के मुद्दे पर इजराइल का सीधा नाम लेते हुए आलोचना की गई है और लेबनान में सीजफायर का पालन करने पर जोर दिया गया है। लेकिन अमेरिका की एकतरफ़ा पाबंदियों की आलोचना करते समय ट्रंप या अमेरिका का कोई भी नाम का जिक्र नहीं किया गया है। इस संयुक्त बयान पर सभी देशों की सहमति बनवाना भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती थी क्योंकि इस साल ब्रिक्स की अध्यक्षता और सम्मेलन की मेजबानी दोनों भारत ही कर रहा है। अब देखना यह होगा कि इस बयान में इस्तेमाल किए गए शब्दों को बाकी देश किस तरह समझते हैं और भारत की तरफ से दिए गए संकेतों को किस तरह से लिया जाता है। पूरे बयान में बहुत सावधानी से शब्दों का चुनाव किया गया है। मिसाल के तौर पर देखें तो इसमें यूएन के दायरे से बाहर जाकर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों की आलोचना की गई है। लेकिन अमेरिका का नाम नहीं लिया गया है। इसी तरह परमाणु ठिकानों पर हमले की निंदा की गई है। लेकिन ईरान का जिक्र नहीं है। इजराइल यहां जरूर एक अपवाद के तौर पर सामने आया है। गाजा और लेबनान से जुड़े कई हिस्से इजराइल का नाम सीधे तौर पर साझा बयान में शामिल करते हैं। इस संयुक्त बयान को तैयार करना इसलिए भी मुश्किल था क्योंकि ईरान, यूएई और सऊदी अरब मिडिल ईस्ट में चल रही जंग को लेकर अलग-अलग तरह की भाषा चाहते थे। ऐसे में सभी की सहमति से बयान जारी हो जाना भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जा रही है। खासकर इसलिए क्योंकि पहले ऐसी अटकलें थी कि रूस और ईरान अमेरिका के खिलाफ काफी कड़ी भाषा इस्तेमाल करवाना चाहेंगे जिसका भारत और ब्रिक्स के दूसरे देश विरोध कर सकते हैं। लेकिन आखिर में सभी देशों में कंसेंसस बन गया और साझा बयान जारी हो गया। इजराइल को लेकर ब्रिक्स के बयान में गजा में मानवीय मदद पहुंचाने पर जोर दिया गया है। साथ ही फिलिस्तीनियों को जबरन उनके घरों और जमीन से हटाने का विरोध किया गया है। इसे भी पढ़ें: CPI ने BRICS घोषणापत्र का किया स्वागत, वैश्विक व्यवस्था में सुधार की वकालत की अमेरिका का नाम नहीं, लेकिन प्रतिबंधों की आलोचना घोषणापत्र की सबसे अहम बातों में से एक है एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों का मुद्दा। घोषणापत्र में कहा गया हम अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ एकतरफा दबाव वाले कदमों को लागू करने की निंदा करते हैं। हम फिर से कहते हैं कि ऐसे कदमों खासकर एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों और सेकेंडरी प्रतिबंधों के दूरगामी नकारात्मक असर होते हैं। इसमें यह भी कहा गया कि ऐसे कदमों का गरीबों पर बहुत बुरा असर पड़ता है। इसमें अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के खिलाफ एकतरफा दबाव वाले कदमों जिनमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से मंज़ूरी न लेने वाले प्रतिबंध भी शामिल हैं। दोनों ही बयानों में अमेरिका का नाम नहीं लिया गया है। लेकिन यह भाषा रूस और ईरान के लिए अहम है, जो ब्रिक्स के सदस्य हैं और जिन पर अमेरिका ने कई तरह की पाबंदियां लगा रखी हैं। ये दोनों देश लंबे समय से वॉशिंगटन की पाबंदी वाली नीतियों की आलोचना करते रहे हैं। इसलिए, इस भाषा में मॉस्को और तेहरान की एक अहम चिंता का ध्यान रखा गया है, लेकिन साथ ही घोषणापत्र को वॉशिंगटन पर सीधे हमले जैसा भी नहीं बनाया गया है। ब्रिक्स ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों के खिलाफ़ एकतरफ़ा टैरिफ और नॉन-टैरिफ़ उपायों को लेकर भी गहरी चिंता जताई है, और इसमें भी किसी देश का नाम नहीं लिया गया है। डोनाल्ड ट्रंप के व्हाइट हाउस में लौटने के बाद से यह मुद्दा और भी अहम हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने बार-बार ब्रिक्स को अमेरिका-विरोधी कहा है। उन्होंने इस समूह के साथ जुड़ने वाले देशों पर अतिरिक्त 10 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी दी है और डॉलर को कमज़ोर करने की कोशिशों पर 100 प्रतिशत ड्यूटी लगाने की चेतावनी भी दी है। ये तनाव सिर्फ़ ब्रिक्स समूह तक ही सीमित नहीं हैं। भारत को भी रूस से तेल खरीदने के कारण अमेरिकी टैरिफ़ का सामना करना पड़ा है। नई दिल्ली ने इस कदम को अनुचित, गैर-वाजिब और तर्कहीन बताया है और साथ ही अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए ज़रूरी कदम उठाने का संकल्प लिया है। इसे भी पढ़ें: जाते-जाते भारत में बड़ा धमाका कर गए जिनपिंग, पूरी दुनिया हैरान! बिना नाम लिए ईरान के पक्ष का समर्थन कैसे करता है यह घोषणापत्र पश्चिम एशिया के मुद्दे पर आम सहमति बनाना खास तौर पर मुश्किल था, क्योंकि ईरान और UAE इस टकराव को लेकर अलग-अलग राय रख रहे थे। ईरान ने इस बात के लिए भी BRICS की आलोचना की थी कि उसने अमेरिका और इज़राइल के हवाई हमलों के खिलाफ कोई बयान जारी नहीं किया, और वह इस समूह से समर्थन की उम्मीद कर रहा था। आखिरी घोषणापत्र में तेहरान के लिए ऐसी बातें कही गई हैं जिनका वह हवाला दे सकता है, लेकिन इसमें उसका नाम नहीं लिया गया है। BRICS ने नागरिक बुनियादी ढांचे और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की पूरी सुरक्षा-निगरानी वाली शांतिपूर्ण परमाणु सुविधाओं पर जानबूझकर किए गए हमलों पर गहरी चिंता जताई। इस हिस्से में ईरान, अमेरिका या इज़राइल का नाम नहीं लिया गया है। हालांकि, टकराव के संदर्भ में, यह तेहरान के उस तर्क का समर्थन करता हुआ दिखता है कि उसकी सुरक्षित परमाणु सुविधाओं पर हमले अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन थे। BRICS ने देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने का भी आह्वान किया और पश्चिम एशिया में अधिकतम संयम बरतने की अपील की। सबसे अहम बात यह है कि यह हिस्सा सदस्यों के अपने-अपने राष्ट्रीय रुख को याद दिलाता है, जिससे युद्ध के बारे में अलग-अलग राय रखने वाले देश अपनी व्यक्तिगत स्थिति छोड़े बिना एक ही टेक्स्ट पर सहमत हो पाते हैं। इसे भी पढ़ें: अगर तुमने...ब्रिक्स से लौटते ही जिनपिंग ने ट्रंप को क्या धमकी दे डाली? इजरायल पर BRICS का सीधा निशाना, लेबनान से सेना वापस बुलाने की मांग BRICS घोषणापत्र में इजरायल को लेकर स्पष्ट और सख्त रुख अपनाया गया है। गाजा में जारी हिंसा पर चिंता जताते हुए BRICS ने फिलिस्तीनियों के जबरन विस्थापन का विरोध किया है। साथ ही 1967 की सीमाओं के आधार पर पूर्वी यरुशलम को राजधानी बनाकर संप्रभु फिलिस्तीनी राष्ट्र के गठन के समर्थन को दोहराया गया है। घोषणापत्र में दक्षिण अफ्रीका की ओर से इजरायल के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) में चल रही कार्यवाही का भी उल्लेख किया गया। BRICS ने कहा कि गाजा में मानवीय सहायता की आपूर्ति सुनिश्चित करना इजरायल का कानूनी दायित्व है। लेबनान के मुद्दे पर BRICS ने युद्धविराम का स्वागत करते हुए सभी पक्षों से इसकी शर्तों का पालन करने और UNSC प्रस्ताव 1701 को पूरी तरह लागू करने की अपील की। साथ ही युद्धविराम के लगातार उल्लंघन और लेबनान की संप्रभुता एवं क्षेत्रीय अखंडता के उल्लंघन की निंदा की गई। घोषणापत्र में सीधे इजरायल से लेबनान के इलाकों से अपनी सेना वापस बुलाने को कहा गया। BRICS ने इजरायल से लेबनान सरकार के साथ हुए समझौते की शर्तों का सम्मान करने और उन सभी लेबनानी क्षेत्रों से अपनी सेनाएं हटाने का आह्वान किया, जहां वे अभी भी मौजूद हैं। UNSC Resolution 1701 को 2006 में इजरायल-हिजबुल्लाह युद्ध के बाद अपनाया गया था। इसमें इजरायली सेना की वापसी और दक्षिणी लेबनान में लेबनानी सेना तथा संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिकों की तैनाती की बात कही गई थी। BRICS के घोषणापत्र में अमेरिका का नाम लिए बिना एकतरफा प्रतिबंधों की आलोचना की गई है। वहीं परमाणु प्रतिष्ठानों से जुड़े हिस्से में ईरान का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया गया। लेकिन इजरायल का नाम स्पष्ट रूप से लिया गया और लेबनानी क्षेत्र से उसकी सेनाओं की वापसी की मांग की गई। तो, क्या भारत का रुख बदला है? सख्त भाषा के बावजूद, यह घोषणा अपने आप में भारत के रुख में कोई बुनियादी बदलाव नहीं दिखाती। ब्रिक्स (BRICS) घोषणा सभी 11 सदस्यों की सहमति वाला दस्तावेज़ है, न कि सिर्फ़ भारत का बयान। अध्यक्ष के तौर पर भारत का काम ऐसे तरीके खोजना था जिन्हें अलग-अलग हितों वाले देश स्वीकार कर सकें। भारत ने पश्चिम एशिया में बातचीत और कूटनीति की वकालत जारी रखी है, साथ ही फ़िलिस्तीन के लिए 'टू-स्टेट सॉल्यूशन' (दो-देश समाधान) का समर्थन किया है और इज़राइल के साथ करीबी रिश्ते भी बनाए रखे हैं। ब्रिक्स (BRICS) सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन की मुलाक़ात में, नई दिल्ली ने फिर से कहा कि विवादों को बातचीत और कूटनीति से सुलझाया जाना चाहिए। साथ ही, नेविगेशन, व्यापार और समुद्री यात्रियों की सुरक्षा के महत्व पर भी ज़ोर दिया गया। इसी तरह, भारत का व्यापक नज़रिया अलग-अलग गुटों के साथ संबंध बनाए रखने का रहा है। वह रूस और यूक्रेन, दोनों के साथ संपर्क बनाए हुए है, अमेरिका और इज़राइल के साथ भी उसके अहम संबंध हैं और ईरान के साथ भी बातचीत के रास्ते खुले रखे हैं। लेकिन जिस माहौल में भारत यह संतुलन बना रहा है, वह अब बदल गया है। ग्लोबल अनसर्टेनिटी का ही नतीजा है कि भारत चीन तमाम डिफरेंसेस को छोड़ के इस समय आगे बढ़ने के लिए तैयार है। तो मुझे नहीं लगता है भारत के लिए कोई डिप्लोमेटिक एक आप ये कहे कि कोई एम्बरेसमेंट होगा। भारत इससे और सशक्त होगा।
भारत में अगस्त माह में महंगाई 9.92 प्रतिशत रही: सरकार
नई दिल्ली, सरकार द्वारा सोमवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, देश में थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) आधारित महंगाई अगस्त 2026 के लिए 9.92 प्रतिशत रही, जो जुलाई में 9.78 प्रतिशत थी।
सरकार : भारत में अगस्त माह में महंगाई थोक मूल्य सूचकांक 9.92 प्रतिशत रही
नई दिल्ली, सरकार द्वारा सोमवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, देश में थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) आधारित महंगाई अगस्त 2026 के लिए 9.92 प्रतिशत रही, जो जुलाई में 9.78 प्रतिशत थी।
नई दिल्ली, पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है।
चुनाव में हार के लिए विजयन और एमवी गोविंदन पर उठे सवाल: केरल
कोझिकोड, सीपीआई (एम) के मजबूत गढ़ कन्नूर में ही पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की अप्रत्यक्ष रूप से आलोचना हो रही है।
ब्रिक्स की सफलतापूर्वक मेजबानी के लिए पीएम मोदी की सराहना: चंद्रबाबू नायडू
अमरावती, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की सफलतापूर्वक मेजबानी के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सराहना की है।
हिंदी भाषा को सियासी नहीं, जमीनी हकीकत के नजरिए से आंकिए
भारत में हिंदी भाषा को लेकर चलने वाली राजनीति और उसकी जमीनी हकीकत के बीच एक बड़ा अंतर है, जो लगातार गहराता चला गया। हालांकि अब इसे पाटने और इससे लेकर गाहे बगाहे उत्पन्न होते रहने वाले मतभेदों को दूर करने की जरूरत है। एक तरफ जहां हिंदी को राजनीतिक ध्रुवीकरण और भाषाई अस्मिता के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, वहीं व्यावहारिक धरातल पर इसकी स्थिति बिल्कुल अलग नजर आती है। इसलिए जनसामान्य के नजरिए से ही इसका सम्यक समाधान अपेक्षित है। खासकर भारतीय अभिजात्य वर्ग यानी अंग्रेजी दां लोगों के इशारे पर दक्षिण-पश्चिम-पूर्वी भारतीय भाषाओं यथा तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मराठी भाषा-भाषियों में हिंदी के प्रति जो भाषाई सौतियाडाह दिखाई देती है, उससे स्थिति और जटिल हो जाती है। यदि तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मराठी भाषा-भाषी भी पंजाबी, बंग्ला और गुजराती भाषा-भाषियों की तरह हिंदी के प्रति सहज, सहनशील और जागरूक रहें तो भारत के हिंदी व प्रतिस्पर्धी भाषाई विवाद को न्यूनतम किया जा सकता है। इसे भी पढ़ें: Hindi Diwas 2026: विश्व में हिन्दी का बढ़ता प्रभाव # देश में हिंदी भाषा को लेकर जारी सियासत के कुछ मुख्य पहलू इस प्रकार हैं:- पहला, 'एक राष्ट्र, एक भाषा' का नैरेटिव: केंद्र की राजनीति में अक्सर हिंदी को पूरे देश की संपर्क भाषा (Link Language) या राष्ट्रीय पहचान के रूप में पेश करने की कोशिश की जाती है। दूसरा, गैर-हिंदी राज्यों का विरोध: तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में हिंदी को 'थोप जाने' (Hindi Imposition) का मुद्दा बनाकर क्षेत्रीय दल अपनी राजनीति को मजबूत करते हैं। तीसरा, वोट बैंक और ध्रुवीकरण: उत्तर भारत में हिंदी प्रेम का कार्ड खेलकर मतदातों को लुभाया जाता है, जबकि दक्षिण में 'हिंदी विरोध' क्षेत्रीय पहचान और भाषाई स्वाभिमान को बचाने का बड़ा जरिया बन जाता है। # जहां तक संवैधानिक और व्यावहारिक हकीकत की बात है तो इसके विभिन्न आयामों और उनकी वैधानिक व व्यावहारिक स्थिति पर गौर करना लाजिमी है:- पहली, राष्ट्रीय भाषा (National Language) : भारतीय संविधान में हिंदी को 'राजभाषा' (Official Language) का दर्जा प्राप्त है (अनुच्छेद 343), 'राष्ट्रभाषा' का नहीं। भारत की 22 आधिकारिक भाषाएं समान हैं। दूसरी, जनसंख्या और पहुंच : 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 43.6% भारतीयों की मातृभाषा हिंदी (और उसकी बोलियां) है। यह देश की सबसे बड़ी बोली जाने वाली भाषा है। तीसरी, बाजार की हकीकत : राजनीति भले ही विरोध करे, लेकिन बॉलीवुड, ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म, डिजिटल मीडिया और कॉर्पोरेट विज्ञापन दक्षिण और पूर्व के राज्यों में भी हिंदी में ही फल-फूल रहे हैं। चौथी, रोजगार की चुनौती : हिंदी भाषी राज्यों के युवा उच्च शिक्षा, विज्ञान और कॉर्पोरेट नौकरियों के लिए आज भी अंग्रेजी पर ही निर्भर हैं। हिंदी पट्टी में शिक्षा की गुणवत्ता का अभाव एक बड़ी चुनौती है। # हिंदी भाषा से जुड़ी मुख्य जमीनी सच्चाई इस प्रकार है जिन्हें नजरअंदाज करने से नीतिगत उलझने बढ़ेंगी एक, भाषा थोपने से जुड़ा डर: गैर-हिंदी भाषी राज्यों की मुख्य चिंता यह है कि यदि केंद्रीय परीक्षाओं और नौकरियों में हिंदी को प्राथमिकता दी गई, तो उनके युवाओं के अवसर सीमित हो जाएंगे। दो, बोलियों का नुकसान: अवधी, ब्रज, भोजपुरी, मैथिली और गढ़वाली जैसी समृद्ध बोलियों को हिंदी के व्यापक छत्र के नीचे समेटने से उनकी अपनी भाषाई विविधता कमजोर हो रही है। तीन, अंग्रेजी का दबदबा: हिंदी की राजनीति करने वाले नेताओं के अपने बच्चे भी अक्सर अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ते हैं, जिससे आम जनता के लिए रोजगार आधारित शिक्षा का अंतर बना रहता है। सच कहूं तो हिंदी भाषा भारत को जोड़ने का एक सशक्त माध्यम है, लेकिन इसे किसी राजनीतिक एजेंडे या अनिवार्यता के बजाय आपसी संवाद और बाजार की जरूरत के तहत स्वाभाविक रूप से विकसित होने देना ही देश के बहुभाषी ताने-बाने को मजबूत रख सकता है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
श्री गणेश चतुर्थी पर राहुल गांधी और खड़गे समेत विपक्ष के कई नेताओं ने दी शुभकामनाएं
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Hindi Diwas 2026: विश्व में हिन्दी का बढ़ता प्रभाव
वर्तमान में हिन्दी भारत की सीमाओं से बाहर निकलकर विश्व के कई देशों में अपना परचम स्थापित कर रही है। यह हिंदी के अंतर्राष्ट्रीय होने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। आज भारतीय मूल के व्यक्ति हिंदी के विस्तार में अभूतपूर्व योगदान दे रहे हैं। इतना ही नहीं अमेरिका, चीन सहित विश्व के लगभग 11 देशों में हिन्दी के समाचार पत्र प्रकाशित हो रहे हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि हिंदी भारतीय संस्कृति, संवेदना और आत्मीयता का वैश्विक स्वर बनती जा रही है। यह भाषा भारत की मिट्टी से जन्म लेकर आज विश्व के अनेक देशों में संवाद, साहित्य, शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक जुड़ाव का माध्यम बन रही है। हिन्दी की यह यात्रा केवल शब्दों के विस्तार की यात्रा नहीं है, यह भारत की उस सांस्कृतिक चेतना का विस्तार है, जिसने सदियों से सम्पूर्ण विश्व को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश दिया है। हिन्दी की शक्ति उसके विशाल शब्द भंडार और उसकी आत्मीयता में भी है। यह भाषा सहजता से लोगों को जोड़ती है। भारत से बाहर बसे भारतीय समुदायों ने हिन्दी को अपनी जड़ों से जोड़े रखने का महत्वपूर्ण माध्यम बनाया है। मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद और टोबैगो, गुयाना तथा दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में भारतीय मूल के लोगों ने हिन्दी के सांस्कृतिक प्रकाश को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया है। इसे भी पढ़ें: हिंदी का सम्मान ही भारतीय भाषाओं और संस्कृति की असली ताकत मॉरीशस हिन्दी की वैश्विक यात्रा का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। वहाँ हिन्दी का अध्ययन विद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में होता है। साहित्यिक गतिविधियों, सांस्कृतिक आयोजनों और भारतीय परंपराओं से जुड़े कार्यक्रमों में हिन्दी का विशेष स्थान दिखाई देता है। मॉरीशस में हिन्दी का विस्तार यह प्रमाणित करता है कि भाषा भौगोलिक सीमाओं से बाहर निकलकर भावनाओं और संस्कारों की जीवंत धारा है। फिजी में हिन्दी का एक विशिष्ट रूप ‘फिजियन हिन्दी’ के रूप में विकसित हुआ है। भारतीय मूल के लोगों के बीच यह संवाद और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण माध्यम बनी। यह हिन्दी की उस विशेष क्षमता को दर्शाती है, जिसमें वह अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों में पहुँचकर स्थानीय परिवेश के साथ संवाद करते हुए अपना नया स्वरूप ग्रहण कर सकती है। सूरीनाम, गुयाना तथा त्रिनिदाद और टोबैगो में भी भारतीय मूल के समुदायों ने हिन्दी को धार्मिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक परंपराओं के साथ जोड़े रखा। इन देशों में हिन्दी का महत्व भारतीय विरासत की स्मृति के रूप में भी है। भजन, रामायण-पाठ, सांस्कृतिक आयोजन और भारतीय पर्व हिन्दी को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आज के समय में हिन्दी का प्रभाव भारतीय मूल के समुदाय से बाहर निकल रहा है, की आबादी तक सीमित नहीं है। आज यह अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में हिन्दी सीखने और समझने वालों की संख्या लगातार बढ़ी है। भारतीय सिनेमा, टेलीविजन, डिजिटल माध्यम, संगीत और सोशल मीडिया ने हिन्दी को वैश्विक स्तर पर नई दृश्यता प्रदान की है। आज भारत से जुड़ने की इच्छा रखने वाला विश्व का युवा वर्ग हिन्दी के शब्दों और अभिव्यक्तियों से परिचित हो रहा है। विश्व के देशों में हिन्दी के प्रकाशन लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। जिनमें फिजी में शांतिदूत हिन्दी साप्ताहिक, मॉरीशस में आर्योदय, वसंत, इंद्रधनुष आदि, यहाँ हिन्दी पत्रकारिता का इतिहास 1909 से मिलता है। इसी प्रकार अमेरिका में हिन्दी जगत, कर्मभूमि, नवरंग टाइम्स, भारत समाचार, नमस्ते यूएसए, सेतु, विश्वा आदि हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं का उल्लेख मिलता है। कनाडा में सरस्वती पत्र सहित हिन्दी के साहित्यिक, सांस्कृतिक प्रकाशन हो रहे हैं। ब्रिटेन में पुरवाई, न्यूज़ीलैंड में भारत-दर्शन, ऑस्ट्रेलिया में ऑस्ट्रेलियांचल सहित हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन, संयुक्त अरब अमीरात में अभिव्यक्ति, अनुभूति आदि, नेपाल में तरंग को पहला हिन्दी साप्ताहिक और जय नेपाल को पहला हिन्दी दैनिक बताया गया है। आज के डिजिटल युग ने हिन्दी के विस्तार को अभूतपूर्व गति दी है। इंटरनेट और स्मार्टफोन ने भाषा की भौगोलिक सीमाओं को लगभग समाप्त कर दिया है। हिन्दी में समाचार, साहित्य, शिक्षा, मनोरंजन, ज्ञान-विज्ञान और सामाजिक संवाद की सामग्री बड़ी मात्रा में उपलब्ध है। सोशल मीडिया के माध्यम से हिन्दी लिखने और पढ़ने वालों का नया वर्ग सामने आया है। हिन्दी अब केवल मुद्रित पृष्ठों की भाषा न होकर मोबाइल स्क्रीन, डिजिटल मंच और वैश्विक संवाद का भी प्रभावशाली माध्यम बन चुकी है। हिन्दी के वैश्विक विस्तार में भारतीय साहित्य की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। कबीर, तुलसीदास, प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर और हरिवंश राय बच्चन जैसे रचनाकारों ने हिन्दी को ऐसी साहित्यिक ऊँचाई प्रदान की, जिसने भाषा को मानवीय संवेदना की अभिव्यक्ति बना दिया। हिन्दी साहित्य में जीवन, प्रकृति, परिवार, संघर्ष, आध्यात्मिकता और मानवता के विविध रंग मिलते हैं। यही व्यापकता हिन्दी को विश्व के पाठकों से जोड़ने की क्षमता प्रदान करती है। हिन्दी की वैश्विक प्रतिष्ठा में विश्व हिन्दी सम्मेलन जैसी संस्थागत पहल का भी विशेष योगदान है। ऐसे मंच हिन्दी के विद्वानों, साहित्यकारों, शिक्षाविदों और भाषा प्रेमियों को एक साथ लाते हैं। इससे हिन्दी के अध्ययन, अध्यापन, साहित्य और अंतरराष्ट्रीय विस्तार पर गंभीर विमर्श को गति मिलती है। आज आवश्यकता हिन्दी को केवल भावनाओं की भाषा मानने की नहीं, बल्कि ज्ञान, विज्ञान, तकनीक, व्यापार और वैश्विक संवाद की समर्थ भाषा के रूप में विकसित करने की है। नई तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अनुवाद प्रणाली और डिजिटल शिक्षा हिन्दी के लिए नए अवसर लेकर आए हैं। यदि इन क्षेत्रों में हिन्दी की शब्दावली, तकनीकी सामग्री और उच्च स्तरीय शिक्षण संसाधनों का निरंतर विस्तार किया जाए तो हिन्दी की वैश्विक उपयोगिता और बढ़ सकती है। हिन्दी का भविष्य उसके बोलने वालों की संख्या से अधिक उसकी उपयोगिता और गुणवत्ता पर निर्भर करेगा। दुनिया में अनेक भाषाएँ अपनी विशिष्ट पहचान के साथ आगे बढ़ रही हैं। हिन्दी भी अपनी वैज्ञानिक क्षमता, साहित्यिक समृद्धि और सांस्कृतिक शक्ति के आधार पर विश्व की प्रमुख भाषाओं में अपना स्थान और अधिक सुदृढ़ कर सकती है। भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका भी हिन्दी के लिए नए द्वार खोल रही है। आज विश्व भारत को केवल एक बड़े बाजार के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कृति, तकनीक, लोकतंत्र और शांति की महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में देख रहा है। ऐसे समय में हिन्दी भारत की आवाज को दुनिया तक पहुँचाने का सशक्त माध्यम बन सकती है। हिन्दी का वैश्विक विस्तार भाषायी सह अस्तित्व और सांस्कृतिक संवाद का विषय है। भारत की परंपरा सभी भाषाओं और संस्कृतियों का सम्मान करती है। हिन्दी इसी भावना के साथ विश्व की भाषाओं के बीच अपना स्थान बना सकती है। आज हिन्दी भारत की सीमाओं से बाहर निकलकर अनेक महाद्वीपों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है। आने वाला समय हिन्दी के लिए और अधिक संभावनाओं से भरा है। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम हिन्दी को गर्व के साथ अपनाएँ, उसे आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से जोड़ें और दुनिया के साथ संवाद की भाषा बनाएँ। हिन्दी भारत की आवाज है, भारतीय संस्कृति की संवेदना है और विश्व के साथ भारत के आत्मीय संवाद का एक सशक्त माध्यम है। जिस भाषा में करोड़ों लोगों के सपने, संवेदनाएँ और जीवन की धड़कनें व्यक्त होती हैं, उसका वैश्विक आकाश निश्चित रूप से और विस्तृत होगा। - डॉ. वन्दना सेन (लेखिका भारतीय भाषा मंच, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास की प्रान्त संयोजक हैं)
राहुल गांधी को इस्लामिक स्कॉलर का जवाब- 'भारत सनातन की भूमि, इसकी संस्कृति में मांसाहारी भोजन का स्थान नहीं'
हिंदी हमारी पहचान, हमारा स्वाभिमान: ओम बिड़ला और केंद्रीय मंत्रियों ने हिंदी दिवस पर देशवासियों को दी बधाई
कांग्रेस ने चीनी राष्ट्रपति के साथ बैठक को लेकर प्रधानमंत्री से पूछे सवाल
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असम के सीएम ने जोरहाट में किया रेलवे ओवरब्रिज का उद्घाटन, बोले-बेहतर कनेक्टिविटी बनेगी विकास का आधार
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बिहार : 'जदयू मतलब नीतीश कुमार’ से गरमाई बिहार की सियासत
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90 प्रतिशत आपराधिक घटनाओं में सामने आता है सपा कनेक्शन: अनिल राजभर
लखनऊ, उत्तर प्रदेश के जौनपुर में विशाल यादव की हत्या को लेकर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री अनिल राजभर ने समाजवादी पार्टी पर तीखा हमला बोला है।
आतंकवाद के खिलाफ भारत की बात को मिला वैश्विक समर्थन: मंत्री प्रफुल्ल पानसेरिया
सूरत, दिल्ली में आयोजित 'ब्रिक्स' शिखर सम्मेलन में पहलगाम आतंकी हमले समेत दुनिया के किसी भी हिस्से में होने वाली आतंकवादी घटनाओं और टेरर फंडिंग की निंदा को भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता माना जा रहा है।
तृणमूल के नाम और चुनाव चिह्न पर फैसले को लेकर अनिश्चितता: बंगाल उपचुनाव
कोलकाता, चुनाव आयोग की ओर से तृणमूल कांग्रेस के दो विरोधी गुटों के साथ अलग-अलग बैठकें की गईं और पार्टी के नाम व चुनाव चिह्न पर उनके दावों को सुना गया।
तृणमूल नेता शाहिदुल शेख चेन्नई से गिरफ्तार: पश्चिम बंगाल
कोलकाता, व्यवसायी पर हमले के आरोप में फरार पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के हिंगलगंज में बिशपुर पंचायत के उप प्रमुख और तृणमूल कांग्रेस नेता शाहिदुल शेख को चेन्नई से गिरफ्तार किया गया है।
ड्रैगन फ्रूट की खेती से खुली तरक्की की राह: बिहार
कटिहार, कभी खेती रीना देवी के परिवार के लिए सिर्फ पेट भरने का साधन थी। खेत में दिन-रात मेहनत करने के बाद भी हाथ में बचता कुछ नहीं था।
ए. राजा ने अपनी टिप्पणी ली वापस
चेन्नई, डीएमके सांसद ए. राजा ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के खिलाफ अपनी विवादित टिप्पणी वापस ले ली है।
केरल में बिजली संकट को लेकर सियासी जंग तेज, केएसईबी के पूर्व अध्यक्ष ने पिनाराई विजयन पर साधा निशाना
केरल में बिजली संकट को लेकर सियासी जंग तेज, केएसईबी के पूर्व अध्यक्ष ने पिनाराई विजयन पर साधा निशाना
गुजरात में सीएम भूपेंद्र पटेल ने भ्रष्ट अधिकारियों को 'गंगाजल' पिलाया: डिप्टी सीएम संघवी
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'मोहनलाल और विजय से बेहतर डांस कर रहा था', वायरल एआई वीडियो पर बोले सीएम सतीशन
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क्या अमेरिका, रूस और चीन के साथ मिलकर जी-3 बना सकता है? समझिए इसके पीछे की बदलती कूटनीति!
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रणनीतिक स्वायत्तता वाली कूटनीति से जहां अमेरिका, चीन, रूस तीनों बड़े देश घबराए हुए हैं, वहीं फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और ब्राजील जैसे देश इसमें ही अपना कूटनीतिक भविष्य देख रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिज्ञों का भी मानना है कि यदि भारत अपने मिशन में कामयाब हो जाता है तो इससे न केवल बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था को बल मिलेगा, बल्कि अमेरिका, रूस और चीन के हथियारों के सौदागरों के हाथ-पांव भी ठिठक जाएंगे। चूंकि समसामयिक वैश्विक परिदृश्य में अरब-खाड़ी देशों में अमेरिका-यूरोप की इज्जत दांव पर पड़ी हुई है, क्योंकि रूस-चीन का शह ईरान को हासिल है। इससे पहले यूक्रेन में रूस-चीन-उत्तर कोरिया की सैन्य साख दांव पर पड़ी हुई है, क्योंकि अमेरिका-यूरोप मिलकर यूक्रेन को भड़काए हुए हैं। वैसे तो चीन को ताइवान में और भारत को पीओके में उलझाने की साजिश पश्चिमी-पूर्वी देशों के इशारे पर रचाई गई, लेकिन भारत और चीन के सूझबूझ वाले नेतृत्व ने समय रहते ही स्थिति को संभाल लिया। इससे हथियारों के वैश्विक सौदागरों और ड्रग्स सप्लायर्स का भारत-चीन से खफा होना स्वाभाविक है। इससे होने वाले घाटे की भरपाई के लिए ही तो अमेरिका ने दोनों देशों के खिलाफ टैरिफ युद्ध छेड़ दिया। # मोदी डॉक्ट्रिन के चक्रव्यूह में हर ओर से घिरा महसूस करने लगा है अमेरिका और जब इसमें भी अमेरिका विफल हो गया और मोदी डॉक्ट्रिन के चक्रव्यूह में हर ओर से घिरा महसूस करने लगा तब उसने ग्रुप-तीन (G-3) का नया पैंतरा बदला। प्राप्त जानकारी के मुताबिक, अमेरिका के व्हाइट हाउस के जी तीन प्लान पर रूस के क्रेमलिन ने भी रजामंदी जताई है और बताया है कि पुतिन और जिनपिंग ने नवंबर में शेनजेन में होने वाले APEC सम्मेलन के दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप के साथ G3 बैठक करने पर चर्चा की है। अगर अमेरिका, रूस और चीन एक साथ बातचीत की मेज पर बैठ जाते हैं और किसी सहमति तक पहुंचते हैं, तो ये दूसरे विश्व युद्ध के बाद बने उस ‘याल्टा सिस्टम’ का अंत होगा, जिसने यूएन सुरक्षा परिषद को बनाया था। इसे भी पढ़ें: ईरान, सऊदी अरब और UAE के मतभेदों के बीच भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत, BRICS में साझा बयान पर बनी आम सहमति कहने का तात्पर्य यह कि अब अमेरिका, रूस और चीन परस्पर मिलकर दुनिया के अन्य मजबूत देशों भारत, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और ब्राजील आदि को अपने अंतर्राष्ट्रीय एजेंडे पर चलाएंगे और इनसे मुनाफा कमाएंगे। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग्लोबल साउथ की जो वैश्विक चाल चली है, उसमें भारत विरोधी महारथियों का उलझना और छटपटाना तय है। वहीं, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और ब्राजील जैसे देशों को ये त्रिपक्षीय पहल नागवार गुजरी तो फिर दुनियावी कश्मकश और दिलचस्प हो जाएगी। # वर्तमान भू-राजनीतिक तनावों और कूटनीतिक विरोध के हल की कुंजी है अमेरिका, रूस और चीन के ही पास यूं तो वर्तमान भू-राजनीतिक तनावों और कूटनीतिक विरोध के कारण अमेरिका, रूस और चीन का मिलकर 'जी-3' (G-3) बनाना वर्तमान परिदृश्य में अत्यधिक असंभावित चिंतन है। लेकिन जब मुख्य षड्यंत्रकारी राष्ट्र अमेरिका और उसके मनमौजी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंफ ही रूस-चीन युगलबंदी के समक्ष घुटने टेकते हुए ऐसा आकर्षक प्रस्ताव दे रहे हैं तो रूस-चीन दोनों के लिए भी यह आकर्षक डील होगी। चूंकि अमेरिका ने ही भारत-रूस की दोस्ती के मुकाबले चीन की तरक्की में योगदान दिया है तो चीन के लिए भी तो यह और अधिक फायदे का सौदा होगा। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि अमेरिका-रूस में तनावपूर्ण संबंध हैं, और अमेरिका ने रूस पर कई प्रतिबंध भी लगा रखे हैं। रूस-यूक्रेन संघर्ष और अन्य क्षेत्रीय मुद्दों के कारण अमेरिका और रूस के संबंध बहुत खराब हैं, ऐसे में बात कहां तक बढ़ेगी नवंबर 2006 तक इंतजार करना होगा। जहां तक अमेरिका और चीन की बात है तो दोनों देशों में रणनीतिक प्रतिस्पर्धा जारी है। अमेरिका और चीन आर्थिक और सैन्य मामलों में दुनिया के मुख्य प्रतिद्वंद्वी देश हैं। खास बात यह कि अमेरिका, रूस और चीन में विचारधारा का अंतर है। अमेरिका एक लोकतांत्रिक व्यवस्था का समर्थन करता है, जबकि रूस और चीन की शासन प्रणालियां उससे अलग हैं। ऐसे में जी-तीन की छतरी के नीचे आने के लिए तीनों देशों को भारी कीमत चुकानी होंगी और किसी सर्वमान्य निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले कई तरह के कूटनीतिक पापड़ बेलने पड़ेंगे। # दुनिया के लगभग सभी प्रगतिशील देश समझ चुके हैं अमेरिकी चतुराई देखा जाए तो पहले अमेरिका और सोवियत संघ की वैश्विक प्रतिस्पर्धा में, फिर अमेरिका और चीन की अंतर्राष्ट्रीय तनातनी में और रूस के साथ चीन के खड़े होने और भारत द्वारा भी रूस की इज्जत करने से अमेरिका बेचैन है। वहीं यूरोप भी अमेरिका की चतुराई समझ चुका है। इससे जी-7 (G-7) और नाटो जैसे उसके पुराने हथियार अब एशियाई- यूरोपीय मामलों में भोथरे साबित हो चुके है। फिर उसने जी-20 (G-20) की चाल चली लेकिन यहां भी भारत ने ग्लोबल साउथ की आवाज बुलंद कर अमेरिकी अरमानों पर पानी फेर दिया। इधर, भारत की रूसी सहभागिता, चीन की मौजूदगी, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, ईरान आदि की मौजूदगी वाले एससीओ (SCO) और ब्रिक्स (BRICS) में बढ़ती दिलचस्पी से अमेरिकी चौधराहट को एक नया खतरा उत्पन्न हो गया है। वैसे तो अमेरिकी डीप स्टेट ने भारत-चीन संबंधों को बिगाड़ने की पूरी चाल चली, लेकिन परिपक्व भारतीय कूटनीति के सामने अकसर वह लाचार दिखा। वहीं, भारत के पड़ोसी देशों को भड़काकर भी वह अपना उल्लू सीधा नहीं कर सका। यही वजह है कि भारत में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन की सफलता से पहले रूस-चीन के लिए उसने जी-तीन का नया चारा डाल दिया। # रूस के राष्ट्रपति पुतिन के पास भी अमेरिका से हाथ मिलाने की हैं कई बड़ी वजहें ऐसे में जहां रूस के राष्ट्रपति पुतिन के पास भी अमेरिका से हाथ मिलाने की अपनी बड़ी वजहें हैं। वास्तव में पुतिन की मजबूरी है कि करीब साढ़े चार साल से चल रहे यूक्रेन युद्ध में वो उलझे हुए हैं, जिसने रूस की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है और मोर्चे पर भी कोई साफ जीत नजर नहीं आ रही है। वहीं दूसरी तरफ, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग काफी मजबूत स्थिति में हैं। तभी तो वो बिश्केक, काहिरा और दिल्ली का दौरा खत्म करने के बाद सीधे व्हाइट हाउस, अमेरिका जाने की तैयारी कर रहे हैं। चूंकि शी जिनपिंग की स्थिति मजबूत है और वह हर मामले में सधी हुई चाल चलते हैं। इसलिए ट्रंप उनके मुरीद हैं। मुंह में राम, बगल में छुरी वाले अंदाज में। # भारत अपनी अर्थव्यवस्था और औद्योगिक विकास दर की रफ्तार बढ़ाकर G-3 के वैश्विक कुचक्रों का कर सकता है मुकाबला हालांकि, भारत अपनी अर्थव्यवस्था और औद्योगिक विकास दर की रफ्तार बढ़ाकर खुद को इतना मजबूत बना सकता है कि G-3 का कोई भी देश भारत को नजरअंदाज करने की स्थिति में न रहे। यानी भारत अपनी आर्थिक ताकत में इजाफा करके स्थिति को कभी भी अपने पक्ष में कर लेगा। वहीं, जिस तरह रूस और चीन ब्रिक्स का इस्तेमाल करते हुए भी अमेरिका से सीधा फायदा निकालते आए हैं, ठीक वैसे ही भारत भी सभी बड़े देशों से अपने हितों के हिसाब से सीधे रिश्ते साधकर वैश्विक मेज पर अपनी जगह मजबूत रखेगा। इसके दृष्टिगत भारत स्मार्ट और व्यवहारिक कूटनीतिक का सहारा लेगा। इसके अलावा, भारत फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और ब्राजील जैसे देशों के साथ मिलकर एक नया मजबूत मोर्चा खड़ा कर सकता है और इस प्रकार जो मिडिल पावर्स का नया फ्रंट बनेगा, उससे भारत लाभांवित होगा। दरअसल, ये वो देश हैं जो दुनिया की कमान सिर्फ तीन देशों के हाथों में सिमटे, ऐसा नहीं होने देना चाहते, इसलिए परस्पर एकजूट हैं। # अमेरिका, रूस और चीन का जी-3 (G-3) महज एक परिकल्पना, जमीनी हकीकत से दूर है यह त्रिकोणीय तालमेल यह बात दीगर है कि भू-राजनीतिक स्तर पर अमेरिका, रूस और चीन के बीच एक संभावित जी-3 (G-3) त्रिकोणीय तालमेल या महान शक्ति समझौते की जो चर्चाएँ सामने आ रही हैं, वह अभी कोई औपचारिक और स्थायी गठबंधन नहीं है। चूंकि तीनों देशों के शीर्ष नेताओं की सीधी बातचीत होगी, इसलिए अमेरिकी नेतृत्व बहुपक्षीय संगठनों के बजाय सीधे रूस और चीन के राष्ट्र प्रमुखों से व्यक्तिगत स्तर पर संपर्क साधने की नीति को प्राथमिकता पर रखता है। विश्लेषकों का भी मानना है कि दुनिया की ये तीन सबसे बड़ी महाशक्तियाँ आपस में मिलकर वैश्विक व्यवस्था के नियमों को तय करने के लिए एक त्रिकोणीय ढांचा बना सकती हैं, ताकि वैश्विक सत्ता का संतुलन बरकरार रहे। चूंकि इन तीनों देशों के पास विशाल सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक ताकत है, जिसके बल पर वे बड़े भू-राजनीतिक सौदे कर सकते हैं। यह एक प्रकार की रणनीतिक सौदेबाजी होगी, उससे ज्यादा कुछ नहीं। # रूस और चीन के पारस्परिक सहयोग से अमेरिका को टेकने पड़ेंगे घुटने चूंकि रूस और चीन अपने पारंपरिक सहयोग या ब्रिक्स (BRICS) जैसे मंचों को छोड़कर अमेरिका के पाले में पूरी तरह नहीं आ रहे हैं; बल्कि वे इन मंचों के साथ-साथ वाशिंगटन से भी सीधे संवाद की गुंजाइश तलाश रहे हैं। ताकि ब्रिक्स का अंत नहीं हो और अमेरिका से रणनीतिक लाभ भी मिलता रहे। गौर करने वाली बात यह है कि तीनों देशों के बीच बुनियादी मतभेद हैं। खासकर व्यापार, तकनीक, सुरक्षा और क्षेत्रीय आधिपत्य जैसे गंभीर मुद्दों पर तीनों देशों के हित एक-दूसरे के विपरीत हैं। इसलिए क्या जी-3 एक पक्का गठबंधन बनेगा, इसमें संदेह है। जब इसे लेकर कोई औपचारिक संधि होगी, या कोई लिखित समझौता होगा या फिर नाटो जैसा कोई नया सैन्य गुट बनेगा, तब यह समझा जाएगा कि अमेरिका, चीन और रूस अब एक दूसरे के करीब जा चुके हैं। चूंकि, यह नया राग अलापना अमेरिका की मजबूरी है, क्योंकि वह अरब-खाड़ी देशों में रूसी-चीनी चक्रव्यूह में घिर चुका है और निकलने का कोई रास्ता उसे नजर नहीं आ रहा है। वर्तमान में रूस और चीन बहुत अच्छे रणनीतिक और आर्थिक साझेदार हैं, जिन्हें अक्सर 'दोस्त' या 'जिगरी दोस्त' कहा जाता है। इस दोस्ती का मुख्य कारण भी अमेरिका विरोध है, क्योंकि दोनों देश अमेरिका और पश्चिमी देशों के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करना चाहते हैं। चीन रूस का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। रूस चीन को तेल और प्राकृतिक गैस बेचता है, जबकि चीन से उसे औद्योगिक वस्तुएं मिलती हैं। वहीं यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के दृष्टिगत रूस का चीन पर आर्थिक और राजनीतिक रूप से भरोसा और निर्भरता दोनों बढ़ी है। यद्यपि 1960 और 1970 के दशक में दोनों कम्युनिस्ट देशों के बीच वैचारिक मतभेद और सीमा विवाद भी रहे हैं, जिसे उन्होंने समझदारी पूर्वक दूर कर लिया है। इसे औपचारिक सैन्य गठबंधन नहीं कहा जाता है, बल्कि यह साझा हितों पर आधारित एक मजबूत रणनीतिक तालमेल यानी रणनीतिक साझेदारी है। # अमेरिका ने कस रखी है चीन की व्यापारिक नकेल वहीं, अमेरिका ने चीन पर विभिन्न व्यापारिक नीतियों और उत्पादों के तहत अलग-अलग दर से टैरिफ लगाए हैं, जिसमें अक्टूबर 2025 में घोषित 100% अतिरिक्त टैरिफ और पहले से चले आ रहे धारा 301 (Section 301) के शुल्क शामिल हैं। इसकी प्रमुख बातें निम्नलिखित हैं:- पहला, अतिरिक्त टैरिफ: अक्टूबर 2025 में अमेरिका ने चीन पर चीनी सामानों की डंपिंग और रेयर अर्थ मिनरल्स के विवाद के कारण 100% अतिरिक्त टैरिफ लगाने का आदेश दिया था। दूसरा, पुराने शुल्क: साल 2018 से चले आ रहे धारा 301 (Section 301) के तहत लगाए गए बुनियादी शुल्क अभी भी कई चीनी उत्पादों पर लागू हैं। तीसरा, विशेष उत्पाद: कुछ खास उत्पादों (जैसे बैटरी सामग्री) पर यह दरें 205% तक भी पहुंच चुकी हैं। चौथा, कानूनी फेरबदल: साल 2026 की शुरुआत में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने कुछ आपातकालीन टैरिफ को अमान्य भी करार दिया था, जिसके बाद दोनों देशों के बीच व्यापारिक बातचीत जारी है। # सैन्य और आर्थिक ताकत के मामले में संयुक्त राज्य अमेरिका रूस से है काफी आगे यह ठीक है कि सैन्य और आर्थिक ताकत के मामले में संयुक्त राज्य अमेरिका रूस से आगे और दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश है। जहां तक सैन्य रैंकिंग (Military Ranking) की बात है तो यह इस प्रकार है:- पहला, ग्लोबल फायरपावर रैंकिंग: रक्षा और सैन्य ताकत की सूची में अमेरिका पहले स्थान पर है और रूस दूसरे स्थान पर आता है। दूसरा, रक्षा बजट: अमेरिका का रक्षा बजट लगभग 850 बिलियन डॉलर है, जो रूस के बजट (लगभग 135 बिलियन डॉलर) से काफी अधिक है। तीसरा, अमेरिका की ताकत वायुसेना: अमेरिका के पास लगभग 13,000 विमान और 1,790 से ज्यादा फाइटर प्लेन हैं, जो इसे दुनिया की सबसे ताकतवर वायुसेना बनाते हैं। चौथा, वैश्विक पहुंच: अमेरिका के पास उन्नत तकनीक, विशाल नौसेना और दुनिया भर में फैले सैन्य ठिकाने हैं। जहां तक रूस की ताकत की बात है तो वह निम्नलिखित है:- पहला, परमाणु हथियार: परमाणु हथियारों के मामले में रूस सबसे आगे है। उसके पास करीब 6,000 परमाणु बम और खतरनाक मिसाइलें मौजूद हैं। दूसरा, जमीनी ताकत: रूस के पास जमीन पर मुकाबला करने के लिए 10,000 से अधिक टैंक और एस-400 व एस-500 जैसे उन्नत एयर डिफेंस सिस्टम हैं। निष्कर्ष यह है कि कुल मिलाकर अमेरिका अधिक शक्तिशाली और व्यापक रूप से सक्षम है, जबकि रूस के पास परमाणु और रणनीतिक रक्षा बल बहुत मजबूत हैं। इसलिए यदि तीनों देश एक साथ आएंगे तो वह मध्यम दर्जे वाले देशों के उभार में कितना बाधक बनेंगे यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। # आखिर ब्रिक्स की बैठक शुरू होने से पहले ही अमेरिका ने क्यों अलापा नया राग? राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि दिल्ली में ब्रिक्स सम्मेलन होने से ठीक पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और चीन के साथ मिलकर एक नया 'G-3' गुट बनाने की घोषणा करना, अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति की एक जबरदस्त बिसात समझी जा सकती है। क्योंकि अमेरिका अब यह मान चुका है कि बिना चीन और रूस की मदद के वह भारत पर लगाम नहीं लगा सकता है और ऐसा किए बिना वह अपना मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय अस्तित्व भी नहीं बचा पाएगा। इसलिए अब ट्रंप सीधे पुतिन और शी जिनपिंग से हाथ मिलाकर वैश्विक शक्ति प्रतिस्पर्धा को बदलना चाहते हैं। चूंकि भारत की राजधानी नई दिल्ली में आयोजित BRICS सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान जैसे वैश्विक नेता एक छत के नीचे होंगे और एग्रीकल्चर, हेल्थ सेक्टर और डिजिटल दुनिया में आपसी सहयोग बढ़ाएंगे, साथ ही बहुध्रुवीय दुनिया की वकालत करेंगे। ऐसे में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और चीन के साथ मिलकर G-3 गुट बनाने का जो ऐलान किया है, वह दुनिया के मध्यम दर्जे के उन देशों को खुली चुनौती है, जो इन तीनों देशों के अंतर्विरोध का फायदा उठाकर लाभ पीट रहे हैं। चूंकि वर्ष 2019 के बाद पहली बार चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत आ रहे हैं, इसलिए पूरी दुनिया की नजरें पीएम मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात पर टिकी हुई हैं। चूंकि दोनों देश पिछले कुछ सालों से बॉर्डर टेंशन और ट्रेड खींचतान से जूझ रहे हैं, ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि दिल्ली का ये मंच दोनों पड़ोसी देशों के बीच की कड़वाहट कम करेगा और व्यापारिक रिश्तों को फिर से पटरी पर लाएगा। इसके अलावा ईरान के नए राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान के आने से भी इस सम्मेलन की हलचल काफी बढ़ गई है। चूंकि ब्रिक्स हमेशा से खुद को अमेरिका और पश्चिमी देशों के दबदबे के खिलाफ एक बड़े विकल्प के तौर पर दिखाता आया है. लेकिन जैसे-जैसे इस संगठन का विस्तार हुआ है, इसके अंदरूनी मतभेद और गुटबाजी भी खुलकर सामने आने लगी है। इस वक्त ईरान और UAE के बीच तनातनी चल रही है। जहां ईरान चाहता है कि ब्रिक्स का ये मंच अमेरिका और इजरायल के सैन्य हमलों के खिलाफ खुलकर बोले और सख्त बयान दे, वहीं दूसरी तरफ यूएई इस विवाद में पड़ने के बजाय अपनी समुद्री सीमा और होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा को ज्यादा अहमियत दे रहा है। दोनों देशों की इसी खींचतान की वजह से मई में दिल्ली में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में कोई साझा बयान तक जारी नहीं हो सका था। चूंकि एक तरफ ब्रिक्स अपने अंदरूनी झगड़ों में उलझा हुआ है तो दूसरी तरफ वाशिंगटन, बीजिंग और मॉस्को के बीच एक नया समीकरण बन रहा है। वैसे भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हमेशा से ये मानते रहे हैं कि अगर वो पुतिन और शी जिनपिंग से सीधे बातचीत करें, तो दुनिया के बड़े-बड़े विवाद पलक झपकते ही सुलझ सकते हैं। लेकिन ट्रंप की इस पर्सनल कूटनीति से अमेरिका का अपना विदेश मंत्रालय, वहां की दूरदर्शी संसद और यूरोपीय सहयोगी देश काफी घबराए हुए हैं। वहीं, यूरोप को भय है कि ट्रंप यूक्रेन और यूरोप की सुरक्षा को दांव पर लगाकर रूस से हाथ मिला लेंगे। वहीं एशियाई देशों को चिंता है कि चीन के साथ कोई बड़ी डील करने के चक्कर में अमेरिका इस इलाके की सुरक्षा का अपना वादा कहीं तोड़ न दे। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
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ईरानी राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कहा कि उनका देश अत्याचार के आगे नहीं झुकेगा। उन्होंने अमेरिका और इजराइल को निशाने पर लेते हुए कहा कि ईरान डराने-धमकाने की राजनीति स्वीकार नहीं करेगा।
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लगातार बदलते हुए वैश्विक हालातों में जहां पल-पल अनिश्चितता और अराजकता के बादल मंडरा रहे हैं। ऐसे में हाल ही में जहां किर्गिस्तान की राजधानी बिकेक पे एससीओ का समिट खत्म हुआ। जहां दुनिया की तीन बड़ी महाशक्तियों जिनमें चीन, रूस और भारत शामिल है जो कि तीनों एशिया में हैं। उनके बड़े नेता वहां पर मौजूद रहे। चाहे चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग हो, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन हो या भारत के प्रधानमंत्री मोदी हो। ऐसे में अब बारी है एक और समिट की जो कि दिल्ली में चल रही है। 18वां ब्रिक्स सम्मेलन जिसमें शामिल होने के लिए रूस के राष्ट्रपति शी जिनपिंग दिल्ली पहुंच चुके हैं। वहीं चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भी भारत आने की तैयारियां जोर शोर से चल रही है। बैक चैनल से भी, डिप्लोमेटिक चैनल से भी। अगर ऐसा होता है तो फिर यह ऐतिहासिक होगा। क्योंकि अगर जिनपिंग भी भारत आते हैं तो यह करीब 7 साल के बाद उनकी भारत की पहली यात्रा होगी। इसे भी पढ़ें: Strait of Hormuz का नाम बदलकर Trump Strait रखने की तैयारी, Iran पर US का कड़ा रुख दुनिया में टेंशन का माहौल इस साल यानी कि 2026 में ब्रिक्स का जो कमान है, जो अध्यक्षता है वो भारत के पास है। ब्रिक्स दुनिया की बड़ी अभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं का समूह है। इसमें भारत के अलावा रूस, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका कोर मेंबर्स तो है ही। इनके साथ ही मिस्र यानी कि इजिप्ट, ईरान, इथियोपिया, यूएई यानी कि संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया भी शामिल है। ध्यान रखिए कि इसमें ईरान और यूएई दोनों शामिल है। जिनके बीच इस समय जंग के कारण ठनी हुई है। भारत की अध्यक्षता में पूरे साल अलग-अलग शहरों में बैठकें, मंत्री स्तरीय सम्मेलन और कई स्तर की चर्चाएं हो रही हैं। भारत का भी मुख्य फोकस ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत करने, आर्थिक सहयोग को बढ़ाने, ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करने, डिजिटल तकनीक को शेयर करने और उसका इजाद करने, आतंकवाद से निपटने और सप्लाई चेन को मजबूत करने पर है। यानी कि ब्रिक्स को सिर्फ राजनीतिक मंच नहीं बल्कि व्यापार, निवेश और विकास के बड़े मंच के तौर पर आगे बढ़ाने की तमाम देशों की कोशिश है। क्या है ब्रिक्स ब्रिक्स दुनिया की प्रमुख उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं और विकासशील देशों का एक प्रभावशाली अंतर सरकारी संगठन है। इसके सदस्य शुरुआत में तो ब्राजील, रूस, भारत और चीन रहे यानी कि ब्रिक। लेकिन बाद में एक साल के बाद ही 2010 में दक्षिण अफ्रीका भी शामिल हुआ और इसे ब्रिक्स कहा जाने लगा। इसके बाद हाल ही के वर्षों में कई अन्य देश भी इसके साथ जुड़े। जिसमें इसकी कुल संख्या 10 प्रमुख देशों की हो चुकी है। नए सदस्य देशों में मिस्र, इथियोपिया, ईरान और यूएई शामिल है। इसका मकसद वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद यानी कि जीडीपी और व्यापार में अपनी हिस्सेदारी को मजबूत करना है। न्यू डेवलपमेंट बैंक यानी कि एनडीबी के माध्यम से बुनियादी ढांचा और विकास परियोजनाओं को बढ़ावा देना है। और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों जैसे कि विश्व बैंक यानी कि वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ जैसे तमाम जो संगठन है संस्थान हैं वहां पर विकासशील देशों की बेहतर आवाज और सुधार सुनिश्चित करना है। इसे भी पढ़ें: ईरान ने Marco Rubio के 'Proxy' दावे को किया खारिज, Houthis को बताया स्वतंत्र यमनी गुट क्या ब्रिक्स से बढ़ेगा भारत का कद? अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का स्थान लगातार बढ़ रहा है। वजह साफ है। जब भी दुनिया पर संकट आया हमेशा भारत ने मदद का हाथ बढ़ाया। खास बात यह भी है कि भारत सिर्फ अपने लिए आवाज नहीं उठाता बल्कि भारत तो विकासशील देशों यानी कि ग्लोबल साउथ की मजबूत आवाज भी बन गया है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे देश भारत को अपने हितों के पैरोकार के तौर पर देखते हैं क्योंकि भारत एक ही समय में अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ यानी कि जैसे क्वाड जैसे संगठन है जिसमें जापान, ऑस्ट्रेलिया भी शामिल है या फिर G7 में भी आमंत्रित देशों के तौर पर सही। लेकिन लगभग हर बार शामिल होता आ रहा है। वहां पर यूरोप के देश भी मौजूद रहते हैं। फ्रांस, जर्मनी, इटली जबकि ब्रिक्स और एससीओ जैसे मंचों पर रूस और चीन के साथ संबंध निभा रहा है भारत। यह संतुलित कूटनीति ही साबित करती है कि भारत स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करता है। साथ ही भारत वैश्विक व्यापार और वित्तीय सुधारों में भी अपनी डिजिटल ताकत का लोहा मनवा रहा है। भारत का यूपीआई डिजिटल भुगतान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लेनदेन को आसान बनाने में बड़ी अहम भूमिका निभा रहा है। क्या चीन से सुलझेगा सीमा विवाद? भारत और चीन दोनों के बीच सीमा विवाद आज का नहीं है बल्कि दशकों पुराना है। दोनों के बीच एक बार जंग भी हो चुकी है 1962 में और दोनों के सैनिकों के बीच कई बार झड़पें भी हुई। डोकलाम गलवान इसका ताजा उदाहरण है। फिर भी चीन के साथ हमारा व्यापार बढ़ता जा रहा है। लेकिन इसमें ज्यादा फायदा चीन को है। भारत को नुकसान है। ऐसे में अगर राष्ट्रपति शनिपिंग भारत आते हैं तो उसमें एलएसी पर शांति और सीमा विवाद सबसे मुख्य मुद्दा हो सकता है। दोनों देश सीमा पर ऐसी व्यवस्था बनाने पर बात कर रहे हैं जिससे किसी सैन्य घटना या तनाव का असर द्विपक्षीय रिश्तों पर ना पड़े। जिनपिंग की संभावित यात्रा से पहले एनएसए अजीत डोभाल सीमा मुद्दे पर 25वें दौर की विशेष प्रतिनिधि वार्ता के लिए बीजिंग जा चुके हैं। वहां पर उनकी चीन के विदेश मंत्री वांग ही से मुलाकात भी हुई और चीन के उपराष्ट्रपति से भी मुलाकात हुई। दोनों देश वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी कि एलएसी पर चीन निर्धारण की प्रक्रिया में जो सीमा का निर्धारण है उसमें तेजी लाने और ठोस नतीजे पाने के लिए सहमत हुए हैं। साथ ही सीमा पर किसी भी तनाव को बढ़ने से रोकने के लिए नए सैन्य संपर्क चैनल और हॉट लाइन स्थापित करने का भी फैसला लिया गया है। हालांकि वर्ष 2020 की गलवान घाटी की घटनाओं के बाद से रिश्तों में खटास आई है। अविश्वास पैदा हुआ है। उसे पूरी तरीके से खत्म करने में भी समय लगेगा। ब्रिक्स (BRICS) के एजेंडे में अहम मिनरल्स (critical minerals) इतने अहम क्यों हो गए हैं? ब्रिक (BRIC) की शुरुआत 2009 में ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन के एक अनौपचारिक समूह के तौर पर हुई थी। यह समूह वित्तीय व्यवस्था में सुधार के मकसद से बना था, जिसे ज़्यादातर लोग पश्चिमी देशों के पक्ष में झुका हुआ मानते थे। 2010 में दक्षिण अफ़्रीका इस समूह में शामिल हुआ, जिसके बाद इसका नाम बदलकर ब्रिक्स (BRICS) कर दिया गया। शुरुआती सालों में, यह समूह मुख्य रूप से मैक्रो-इकोनॉमिक और डेवलपमेंट फ़ाइनेंस से जुड़े मुद्दों पर तालमेल बिठाने वाले मंच के तौर पर काम करता था। इस दिशा में इसकी सबसे ठोस उपलब्धि 2014 में 'न्यू डेवलपमेंट बैंक' की स्थापना थी। 2024 में, ब्रिक्स ने चार नए पूर्ण सदस्य देशों — मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) — को शामिल किया और 2025 में इंडोनेशिया इसका पूर्ण सदस्य बना। ब्रिक्स के सहयोगी देशों में बेलारूस, बोलीविया, क्यूबा, कजाकिस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम शामिल हैं। सऊदी अरब को इस समूह का पूर्ण सदस्य माना जाता है; हालाँकि, देश ने अभी तक इसमें शामिल होने के अपने इरादे की औपचारिक घोषणा नहीं की है, जिससे उसकी स्थिति स्पष्ट नहीं है। अफ्रीका, दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया, पश्चिम एशिया, मध्य एशिया और लैटिन अमेरिका तक फैले इस समूह में दुनिया की 49.5 प्रतिशत आबादी रहती है, और यह वैश्विक जीडीपी का 40 प्रतिशत तथा वैश्विक व्यापार का 26 प्रतिशत हिस्सा है। अगले कुछ सालों में, जैसे-जैसे ब्रिक्स का विस्तार हुआ, इसका एजेंडा भी बढ़ा। इसमें आतंकवाद-रोधी सहयोग, टेलीकम्युनिकेशन, कृषि, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, श्रम, और बहुपक्षीय संगठनों व वित्तीय प्रणालियों में सुधार जैसे मुद्दे शामिल किए गए। रूस की अध्यक्षता में हुए 2024 कज़ान शिखर सम्मेलन में 'क्रिटिकल मिनरल्स' (महत्वपूर्ण खनिज) औपचारिक रूप से ब्रिक्स के एजेंडे का हिस्सा बने। कज़ान शिखर सम्मेलन में जियोलॉजिकल प्लेटफॉर्म बनाने को भी मंज़ूरी दी गई, हालाँकि इसे अभी तक पूरी तरह से लागू नहीं किया गया है। ब्रिक्स सदस्य देशों की 'क्रिटिकल मिनरल वैल्यू चेन' में क्या भूमिका है? ब्रिक्स सदस्य देशों के पास 'क्रिटिकल मिनरल वैल्यू चेन' में खास खूबियां हैं। इनमें एनर्जी ट्रांज़िशन, डिफेंस अपग्रेडेशन, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और डिजिटलाइज़ेशन के लिए ज़रूरी अनछुए भंडार से लेकर मिडस्ट्रीम प्रोसेसिंग, कैपिटल एक्सपेंडिचर और बड़े कंज्यूमर मार्केट तक शामिल हैं। अगर इन खूबियों को एक साथ लाया जाए, तो यह ब्लॉक वैल्यू चेन को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। अभी यह चेन बिखरी हुई है; जिन देशों के पास अनछुए भंडार हैं, उनके पास प्रोसेसिंग की क्षमता नहीं है, जबकि जिन देशों में कंज्यूमर डिमांड और कैपिटल है, उनके पास रिसोर्स की कमी है। ब्रिक्स सदस्य देशों के पास रेयर अर्थ एलिमेंट्स (REE) के बड़े भंडार हैं। इनमें चीन के पास सबसे बड़ा और ब्राज़ील के पास दूसरा सबसे बड़ा भंडार है। साथ ही, इनके पास ग्रेफाइट के भी बड़े भंडार हैं। ब्राज़ील के पास लिथियम और कॉपर के भी काफी भंडार हैं। अकेले इंडोनेशिया दुनिया के निकेल उत्पादन का आधे से ज़्यादा हिस्सा पैदा करता है और कोबाल्ट का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। भारत में REE और ग्रेफाइट का काफ़ी भंडार है। रूस और दक्षिण अफ़्रीका प्लेटिनम ग्रुप की धातुओं के मुख्य उत्पादक हैं। रूस के पास निकेल और तांबे का भी बड़ा भंडार है। ब्रिक्स (BRICS) के सहयोगी देशों के पास भी खनिजों का बड़ा भंडार है। बोलीविया 'लिथियम ट्राएंगल' का हिस्सा है, जिसके पास दुनिया का आधे से ज़्यादा लिथियम भंडार है। साथ ही, कजाकिस्तान में यूरेनियम का सबसे बड़ा भंडार है और वह यूरेनियम का प्रमुख उत्पादक है; इसके अलावा, वह तांबे का भी एक महत्वपूर्ण उत्पादक है। वियतनाम में भी REE और ग्रेफाइट का काफ़ी भंडार है। भारत ज़रूरी मिनरल सप्लाई चेन में कमियों को कैसे दूर कर सकता है? एक भरोसेमंद पार्टनर के तौर पर भारत की पहचान कोई नई बात नहीं है। गुटनिरपेक्ष रहने की परंपरा, 'ग्लोबल साउथ' की आवाज़ बनने का लंबा इतिहास और चीन के उलट, छोटे या गरीब देशों के खिलाफ़ संसाधनों पर निर्भरता का इस्तेमाल कूटनीतिक हथियार के तौर पर न करने का रिकॉर्ड — इन सब वजहों से नई दिल्ली को सिर्फ़ संसाधन निकालने वाली ताकत के बजाय एक डेवलपमेंट पार्टनर के तौर पर देखा जाता है।भारत विकासशील और विकसित दुनिया के बीच एक ईमानदार बातचीत करने वाले देश के तौर पर उभरा है, और यह भूमिका भरोसे पर टिकी है। भारत ने अपनी इस स्थिति का इस्तेमाल जयपुर में ब्रिक्स 2026 ट्रेड मिनिस्टर्स की मीटिंग और नई दिल्ली में ब्रिक्स एनवायरनमेंट मिनिस्टर्स की 12वीं मीटिंग में ज़रूरी मिनरल्स को सहयोग का ज़रिया बनाने के लिए किया है। मंत्रियों की मीटिंग से आगे बढ़कर, भारत लंबे समय से ज़रूरी मिनरल्स को सहयोग का ज़रिया बनाने की वकालत करता रहा है। उसने जियोलॉजिकल प्लेटफ़ॉर्म को पूरी तरह से चालू करने की भी पैरवी की है, जिसके ज़रिए ब्रिक्स देशों के बीच डेटा-शेयरिंग, निकालने की टेक्नोलॉजी और जियोलॉजिकल रिसर्च में सहयोग हो सके।
'अपने कार्यकर्ताओं और जनता को जेल में डलवाना चाहती है कांग्रेस', वंदे मातरम के विरोध पर बोले वीएचपी नेता
BRICS Summit में Modi का शक्ति प्रदर्शन देखकर Pakistan में मची है जबरदस्त खलबली
नई दिल्ली में आयोजित हो रहे 18वें ब्रक्स शिखर सम्मेलन की गूंज वैसे तो पूरी दुनिया में सुनाई दे रही है लेकिन पाकिस्तान के सत्ता और रक्षा प्रतिष्ठान में इसे लेकर जबरदस्त सन्नाटा छाया हुआ है। सन्नाटा इसलिए है क्योंकि शहबाज शरीफ से लेकर असीम मुनीर तक, आसिफ अली जरदारी से लेकर ख्वाजा आसिफ तक और इशाक डार से लेकर पाकिस्तान के अन्य बड़बोले नेताओं तक की नजरें टीवी चैनलों पर लगी हुई हैं और जैसे जैसे वैश्विक नेता एक एक कर दिल्ली की धरती पर उतर रहे हैं वैसे वैसे पाकिस्तान हुक्मरानों का गला सूखता जा रहा है। हम आपको बता दें कि इस्लामाबाद के लिए दिल्ली का यह सम्मेलन इसलिए असहज करने वाला है क्योंकि यहां चीन, ईरान और सऊदी अरब जैसे उसके अपने रणनीतिक साझेदार भी मौजूद हैं। पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्टें दर्शा रही हैं कि इस्लामाबाद की कुटिल नजर भारत-चीन संबंधों के संभावित सुधार पर टिकी हुई हैं। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय से भी बाकायदा चीन-भारत बढ़ती नजदीकी पर सवाल पूछा गया, जिस पर उसने कहा कि चीन के साथ उसकी “all-weather” साझेदारी किसी तीसरे देश के साथ चीन के संबंधों से प्रभावित नहीं होगी। लेकिन यही स्पष्टीकरण बताता है कि सवाल कितना महत्वपूर्ण हो चुका है। इसे भी पढ़ें: ब्रिक्स@20: सपने बड़े, चुनौतियां उससे बड़ी, ब्रिक्स की ‘ब्रिक’ कितनी मजबूत? पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा झटका मोदी-शी जिनपिंग की मुलाकात होने वाली है। सात साल बाद शी जिनपिंग का भारत आना अपने आप में बड़ा संकेत है। सीमा विवाद के बाद दोनों देशों ने धीरे-धीरे संवाद बहाल किया है और अब व्यापार, निवेश, सीमा प्रबंधन तथा रणनीतिक संवाद पर आगे बढ़ने की कोशिश हो रही है। पाकिस्तान के लिए समस्या यह है कि उसकी सुरक्षा रणनीति लंबे समय से इस धारणा पर टिकी रही है कि भारत को दो मोर्चों पर एक साथ दबाव में रखा जा सकता है। लेकिन अगर बीजिंग और नई दिल्ली टकराव से प्रतिस्पर्धी सह-अस्तित्व की ओर बढ़ते हैं, तो इस्लामाबाद का वह रणनीतिक गणित कमजोर पड़ सकता है। साथ ही पाकिस्तान इसलिए भी परेशान है कि यदि भारत और चीन के संबंध सुधरे तो भविष्य के भारत-पाक संघर्ष में बिना बीजिंग के सहयोग के इस्लामाबाद के लिए मैदान में कुछ घंटे टिक पाना भी मुश्किल हो जायेगा। दूसरा मोर्चा मोदी-पुतिन समीकरण है। दोनों नेताओं की बैठक में S-400 की अंतिम यूनिट की डिलीवरी और अगली पीढ़ी के BrahMos पर चर्चा हो रही है। भारत को चार S-400 रेजिमेंट मिल चुकी हैं और पांचवीं की डिलीवरी पर रूस ने अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। पाकिस्तान के लिए यह इसलिए चिंता का विषय है क्योंकि भारत की वायु-रक्षा और लंबी दूरी की मारक क्षमता में रूसी सहयोग उसकी सैन्य गणना को और कठिन बनाता है। आने वाले समय में BrahMos के उन्नत संस्करण और संयुक्त उत्पादन पर बातचीत इस तस्वीर को और गंभीर बना सकती है। हम आपको याद दिला दें कि पिछले साल हुए भारत-पाक सैन्य संघर्ष के दौरान रूस की एस-400 ने पाकिस्तान के लगभग सभी हमलों को निष्क्रिय कर दिया था। उस समय पाकिस्तान ने चीन और तुर्की से रक्षा उपकरण लेकर भारत पर निशाने साधे थे लेकिन एस-400 के आगे कोई नहीं टिक पाया था। ऐसे में पाकिस्तान की नजरें इस बात पर बनी हुई हैं कि भारत और रूस के बीच क्या नये रक्षा समझौते होने जा रहे हैं। पाकिस्तान की तीसरी चिंता सऊदी अरब और चौथी ईरान को लेकर है। BRICS की मेज पर सऊदी अरब और ईरान दोनों हैं, जबकि पश्चिम एशिया अब भी संघर्ष की आग में झुलस रहा है। पाकिस्तान के लिए यह बेहद असहज परिस्थिति है क्योंकि एक तरफ वह सऊदी अरब के साथ अपने सुरक्षा संबंधों को महत्वपूर्ण मानता है, दूसरी तरफ भारत के खाड़ी देशों के साथ रिश्ते लगातार गहरे हो रहे हैं। इसी बीच ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन भारत पहुंचे हैं और मोदी के साथ उनकी द्विपक्षीय वार्ता भी हो रही है। पाकिस्तान की चिंता यहां यह है कि सऊदी अरब के साथ वह हाल ही में मक्का पैक्ट में शामिल हुआ है। ऐसे में यदि भारत और सऊदी अरब के संबंध और मजबूत होते हैं तो मक्का पैक्ट के पैकेट की हवा पूरी तरह निकल जायेगी। साथ ही ईरानी राष्ट्रपति से मोदी की बातचीत के बाद यदि पश्चिम एशिया के हालात में सुधार होता है तो पाकिस्तान की उस पूरी कूटनीतिक कवायद पर पानी फिर जायेगा जिसके तहत कभी अमेरिका और ईरान को इस्लामाबाद बुलाकर वार्ता कराई गयी तो कभी शहबाज शरीफ और असीम मुनीर भागे भागे तेहरान और वाशिंगटन के चक्कर लगाते रहे। साथ ही पाकिस्तान को एक और कारण से बेचैनी हो रही है। दरअसल जिस BRICS में पाकिस्तान सदस्यता चाहता है, उसी मंच की मेजबानी भारत कर रहा है और विस्तार के लिए सर्वसम्मति जरूरी होने के कारण पाकिस्तान की सदस्यता की राह में भारत की आपत्ति निर्णायक बाधा है। हम आपको यह भी बता दें कि इस समय पाकिस्तान के टीवी चैनलों और सोशल मीडिया मंचों पर चल रही डिबेटस में मोदी की सफल कूटनीति का विश्लेषण करने के साथ-साथ शहबाज और मुनीर की जोड़ी की कूटनीतिक विफलताओं पर भी खुलकर चर्चा की जा रही है। बहरहाल, कुल मिलाकर देखें तो दिल्ली का BRICS सम्मेलन इस्लामाबाद को इसलिए भी बहुत ज्यादा असहज कर रहा है क्योंकि यह बदलते दक्षिण एशियाई शक्ति-संतुलन का आईना बनकर उभर रहा है। -नीरज कुमार दुबे
'आकाश आनंद ढूंढ रहे राजनीतिक ठिकाना तो समाजवादी पार्टी में उनका स्वागत', बसपा से निष्कासन पर बोले सपा नेता
दिल्ली इस समय दुनिया की कूटनीति का नया केंद्र बन गई है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए एक के बाद एक दुनिया के प्रमुख नेता भारत पहुंच रहे हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी द्विपक्षीय मुलाकातों का लंबा सिलसिला यह बताने के लिए काफी है कि भारत की वैश्विक भूमिका अब कितनी तेजी से बढ़ रही है। रूस से लेकर चीन, ईरान से लेकर खाड़ी देशों और अफ्रीका से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक, इन मुलाकातों के जरिए भारत एक साथ कई मोर्चों पर अपने रिश्तों को मजबूत कर रहा है। यह केवल नेताओं की मुलाकात नहीं, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की बढ़ती ताकत, उसकी स्वतंत्र विदेश नीति और अपनी शर्तों पर सभी प्रमुख शक्तियों के साथ संबंध बनाए रखने की रणनीति का स्पष्ट संकेत है। इन मुलाकातों की शुरुआत 11 सितंबर यानि आज रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ होगी। रूस भारत का पुराना और भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार है। ऐसे समय में जब रूस और पश्चिम के बीच तनाव बना हुआ है, पुतिन के साथ मोदी की बातचीत का महत्व और बढ़ जाता है। रक्षा सहयोग, ऊर्जा, परमाणु क्षेत्र, अंतरिक्ष और यूरेशियाई भू-राजनीति जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के रिश्ते भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का महत्वपूर्ण आधार हैं। इसे भी पढ़ें: रूस-भारत संबंध नई ऊंचाइयों पर इसके बाद ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस से मुलाकातें होंगी। ईरान के साथ संवाद पश्चिम एशिया में भारत के हितों, ऊर्जा सुरक्षा और चाबहार बंदरगाह जैसे संपर्क-साधनों के लिहाज से अहम है। वहीं गुटेरेस के साथ बातचीत यह संकेत देती है कि भारत वैश्विक संस्थाओं में सुधार और विकासशील देशों की आवाज को मजबूत करने के सवाल पर अपनी भूमिका को और मुखर करना चाहता है। 12 सितंबर का कार्यक्रम भारत की ‘एक साथ कई मोर्चों पर साझेदारी’ वाली रणनीति को स्पष्ट करता है। इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबीय अहमद अली, मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम, अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान और वियतनाम के प्रधानमंत्री ले मिन्ह हंग के साथ बैठकें भारत के लिए अफ्रीका, आसियान, खाड़ी और हिंद-प्रशांत, चारों दिशाओं में अपनी पहुंच मजबूत करने का अवसर हैं। खासकर वियतनाम और मलेशिया के साथ संबंध हिंद-प्रशांत में भारत की सक्रियता तथा समुद्री सुरक्षा के संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं। इसी दिन राष्ट्रपति पेजेशकियन की राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति से मुलाकात भी भारत-ईरान संबंधों की व्यापकता को रेखांकित करती है। लेकिन सबसे अधिक निगाहें शाम को होने वाली प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बैठक पर रहेंगी। भारत-चीन संबंधों में सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच शीर्ष स्तर की बातचीत यह संदेश देती है कि भारत प्रतिस्पर्धा के बावजूद संवाद के रास्ते बंद नहीं करना चाहता। यह ‘प्रतिस्पर्धा के साथ सह-अस्तित्व और संवाद’ वाली व्यावहारिक कूटनीति का संकेत है। 13 सितंबर को कजाखस्तान, फिलीपींस, मिस्र और दक्षिण अफ्रीका के नेताओं के साथ बातचीत इस रणनीति को और व्यापक बनाती है। कजाखस्तान भारत के लिए मध्य एशिया तक पहुंच का महत्वपूर्ण द्वार है, फिलीपींस हिंद-प्रशांत में समुद्री साझेदारी की दृष्टि से अहम है, जबकि मिस्र स्वेज नहर और पश्चिम एशिया-अफ्रीका के बीच भारत की कनेक्टिविटी के लिए महत्वपूर्ण है। दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा के साथ संवाद भारत-अफ्रीका साझेदारी और ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने के लिहाज से विशेष महत्व रखता है। बुरुंडी, नाइजीरिया और युगांडा के शीर्ष नेतृत्व के साथ मुलाकातें भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। ये बैठकें बताती हैं कि भारत अफ्रीका को केवल व्यापारिक बाजार के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य की वैश्विक राजनीति में एक महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में देख रहा है। देखा जाये तो इन द्विपक्षीय बैठकों का सबसे बड़ा संदेश यही है कि भारत किसी एक शक्ति-गुट के साथ खड़े होने के बजाय सभी प्रमुख शक्ति केंद्रों के साथ अपने हितों के आधार पर संबंधों को संतुलित करने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है। रूस से रक्षा और ऊर्जा, ईरान से कनेक्टिविटी, खाड़ी से निवेश और ऊर्जा, चीन से संवाद, आसियान से हिंद-प्रशांत सहयोग और अफ्रीका से ग्लोबल साउथ की साझेदारी, इन सभी को एक साथ साधने की कोशिश दिखाई देती है। यही भारत की सामरिक स्वायत्तता का नया रूप है। दिल्ली में होने वाली ये मुलाकातें दुनिया को यह संदेश देंगी कि भारत अब केवल वैश्विक व्यवस्था का सहभागी नहीं, बल्कि उसके स्वरूप और दिशा को प्रभावित करने वाली एक निर्णायक शक्ति बनने की ओर बढ़ रहा है। -नीरज कुमार दुबे
कांग्रेस फैला रही 'ब्रिक्स' को लेकर नकारात्मकता: संबित पात्रा
नई दिल्ली, भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और लोकसभा सांसद संबित पात्रा ने ब्रिक्स समिट को लेकर कांग्रेस समेत विपक्षी दलों पर निशाना साधा है।
नीला रंग अपनाने से नहीं बदलेगी जातिवादी सोच: मायावती
लखनऊ, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती ने समाजवादी पार्टी (सपा), कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों पर तीखा हमला बोलते हुए उनके नीले रंग अपनाने को लेकर सवाल उठाए हैं।
'पंजाब में भाजपा और अकाली दल साथ आए तो सत्ता तक पहुंचना मुश्किल नहीं', रामदास आठवले बोले- गठबंधन पर चल रही बातचीत
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ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए दिल्ली में 15,000 पुलिसकर्मी तैनात
राजधानी दिल्ली में आगामी 12 और 13 सितंबर को आयोजित होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को ध्यान में रखते हुए सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं
'एसआईआर के तहत तैयार ड्राफ्ट वोटर लिस्ट अंतिम नहीं,' महाराष्ट्र के सीईओ ने मतदाताओं को दिया भरोसा
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उत्तर प्रदेश विधायकों की पेंशन और भत्तों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, याचिका पर जारी किया नोटिस
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कर्नाटक में सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति उजागर, सीजेपी ने शिक्षकों की कमी पर उठाए सवाल
कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रतिनिधिमंडल ने बेंगलुरु के चार सरकारी स्कूलों का दौरा कर शिक्षकों की कमी, स्कूलों की जर्जर आधारभूत संरचना और स्वच्छता व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंता जताई
'इन दो सवालों का जवाब दें', कांग्रेस विधायक ने सीएमआरएल-एक्सलॉजिक मामले में रियास को चुनौती दी
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ब्रिक्स 2026 समिट पूर्व रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भारत आगामी दौरे से काफी उम्मीदें हैं, और इस पर तेज़ी से काम चल रहा है। भारत अपनी 2026 की अध्यक्षता के तहत 18वें ब्रिक्स समिट की मेज़बानी कर रहा है। यह समिट 12-13 सितंबर, 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में होना तय है। राष्ट्रपति पुतिन के मुख्य समिट से एक दिन पहले, 11 सितंबर को नई दिल्ली पहुँचने की उम्मीद है। उनके दौरे में हैदराबाद हाउस में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक खास द्विपक्षीय बैठक होगी, जिसमें कई रणनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर चर्चा की जाएगी। यह एक साल से भी कम समय में पुतिन का दूसरा दौरा होगा- पिछला दौरा दिसंबर 2025 में 23वें भारत-रूस वार्षिक समिट के लिए हुआ था। भारत ‘अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय’ (आईसीसी) का सदस्य नहीं है; इसलिए गिरफ्तारी वारंट का मुद्दा, जैसा कि 2023 में दक्षिण अफ्रीका में हुआ था, यहाँ लागू नहीं होता। द्विपक्षीय एजेंडा में कई अहम क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किए जाने की उम्मीद है: रक्षा और परमाणु ऊर्जा: क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने पुष्टि की: भारत को एडवांस्ड सू-57 फाइटर जेट्स की बिक्री एजेंडा में सबसे ऊपर होगी। पेस्कोव ने मंगलवार को नई दिल्ली में ब्रिक्स नेताओं के समिट से पहले भारतीय पत्रकारों के साथ एक वर्चुअल बातचीत में यह बात कही। अमका में देरी के बाद भारतीय वायु सेना दो स्क्वाड्रन पर विचार कर रहा है। चर्चा में भारत को 5वीं पीढ़ी के सू-57 फाइटर एयरक्राफ्ट के अलावा एस-500 सिस्टम की संभावित बिक्री भी शामिल होने की उम्मीद है। इसके अलावा, रूस नए परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने पर भारत के साथ बातचीत का इंतज़ार कर रहा है। इसे भी पढ़ें: हालिया टकराव के बाद Iran और खाड़ी देशों का BRICS में होगा आमना-सामना, अब मोदी की कूटनीति देखेगी दुनिया व्यापार और वित्तीय सहयोग: दोनों देशों के पश्चिमी प्रतिबंधों के असर को कम करने के लिए राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने पर ज़ोर देने की उम्मीद है। रूसी अधिकारियों ने बताया है कि ब्रिक्स देशों के साथ उनके 90 प्रतिशत तक लेन-देन अब राष्ट्रीय मुद्राओं में किए जाते हैं, जो वित्तीय मज़बूती की दिशा में एक कदम है। द्विपक्षीय व्यापार का लक्ष्य $100 बिलियन है। रेयर अर्थ (दुर्लभ खनिजों) की खोज में सहयोग भी एजेंडा में शामिल है। भारत को सेमीकंडक्टर के लिए इनकी ज़रूरत है। रूस के पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा भंडार है, जबकि भारत के पास वैश्विक भंडार का लगभग सात प्रतिशत हिस्सा है। रूस रेयर अर्थ खनिजों की खोज में भारत की मदद कर सकता है। टेक्नोलॉजी और मैन्युफैक्चरिंग: पेमेंट की दिक्कतों के कारण भारत-रूस व्यापार $65 बिलियन पर अटका हुआ है, क्योंकि रूस को डॉलर इम्पोर्ट करने की इजाज़त नहीं है। रूस और ब्रिक्स के बीच अब लगभग 90% लेन-देन नेशनल करेंसी में हो रहा है, और रुपये के सरप्लस (अतिरिक्त) का मुद्दा धीरे-धीरे सुलझाया जा रहा है। रुपये का वह ढेर - रूस के पास भारतीय बैंकों में लगभग $8 बिलियन अतिरिक्त रुपये पड़े हैं जिनका वह इस्तेमाल नहीं कर सकता - मुख्य मुद्दों में से एक होगा। समिट से पहले, भारतीय इंडस्ट्रियल एजेंसियां मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में गहरे संबंधों के लिए माहौल तैयार कर रही हैं। समिट के दौरान, भारत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग, क्वांटम टेक्नोलॉजी और सेमीकंडक्टर रिसर्च में सरकार और रिसर्च के स्तर पर करीबी सहयोग को बढ़ावा देने की उम्मीद कर रहा है। भू-राजनीतिक पहलू भू-राजनीतिक नज़रिए से, यह दौरा भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के प्रति प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है। नई दिल्ली रूस पर अपनी पारंपरिक रक्षा और ऊर्जा निर्भरता को संतुलित करते हुए अमेरिका के साथ सहयोग को गहरा कर रही है और व्यापक क्षेत्रीय स्थितियों को भी संभाल रही है। इसके अलावा, राष्ट्रपति पुतिन मोदी को यूक्रेन युद्ध की मौजूदा स्थिति के बारे में जानकारी देंगे - भारत को फिर से एक संभावित मध्यस्थ के रूप में देखा जा रहा है। मॉस्को ने यूक्रेन संघर्ष का शांतिपूर्ण समाधान खोजने के प्रयासों में योगदान देने की भारत की इच्छा का सार्वजनिक रूप से स्वागत किया है, जिससे राजनयिक बातचीत में एक सकारात्मक माहौल बना है। ट्रंप प्रशासन ने भारत को रूसी तेल खरीदने (50% टैरिफ की धमकी) के बारे में चेतावनी दी है, लेकिन भारत की ऊर्जा ज़रूरतें ज़्यादा अहम हैं। अमेरिका इस समिट पर बारीकी से नज़र रखेगा क्योंकि इसमें डी-डॉलराइज़ेशन पर चर्चा हो सकती है - पेस्कोव पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं: रूस डी-डॉलराइज़ेशन नहीं चाहता; अमेरिका ने खुद डॉलर को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया है। भारत की 2026 ब्रिक्स अध्यक्षता की थीम, मज़बूती, इनोवेशन, सहयोग और सस्टेनेबिलिटी के लिए निर्माण के तहत, समिट 11-सदस्यीय समूह में व्यावहारिक सहयोग को बढ़ाने पर भी ध्यान केंद्रित करेगा। इसमें डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को आगे बढ़ाना, क्लाइमेट एक्शन और प्रस्तावित ग्लोबल रिसर्च एडवांस्ड इंफ्रास्ट्रक्चर नेटवर्क (GRAIN) जैसी मल्टीलेटरल पहल शामिल हैं, जो सदस्य देशों के बीच हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग संसाधनों को साझा करेंगी। निष्कर्ष राष्ट्रपति पुतिन का आगामी दौरा रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, जिसका उद्देश्य रक्षा, ऊर्जा और उभरती टेक्नोलॉजी के क्षेत्रों में भारत-रूस साझेदारी को मज़बूत करना है, और यह सब मज़बूत और विस्तारित होते ब्रिक्स गठबंधन के व्यापक ढांचे के भीतर हो रहा है। यह सिर्फ ब्रिक्स का एक औपचारिक दौरा नहीं है; यह ब्रिक्स के भीतर एक छोटा भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन है। 11 तारीख को ही बड़ी घोषणाओं की उम्मीद की जा सकती है। - प्रोफ़ेसर (डॉ.) डी.के. पांडेय विज़िटिंग सीनियर फ़ेलो, सेंटर फ़ॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज़, एडजंक्ट प्रोफ़ेसर, राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय, सलाहकार, एकेडमिक काउंसिल, फ़ॉरेन पॉलिसी स्कूल और GNOIT, पूर्व एसोसिएट डीन, SoB, गलगोटिया विश्वविद्यालय।
787 करोड़ रुपए का पेप्सिको प्लांट खुला, 5000 किसानों के लिए रोजगार और पक्का बाजार बनेगा: सीएम सरमा
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मौत का इंतजार करती इमारतें और गहरी नींद सोता प्रशासन
दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के सत्य निकेतन में जो हृदयविदारक घटना घटित हुई है, वह केवल एक पांच मंजिला इमारत के भरभराकर गिरने की घटना नहीं बल्कि राजधानी की उस व्यवस्था का ढ़हना है, जिसकी नींव नागरिकों की सुरक्षा, कानून के शासन और प्रशासनिक जवाबदेही पर टिकी होनी चाहिए थी। जिस इमारत में कुछ घंटे पहले तक देश के अलग-अलग हिस्सों से आए युवा अपने भविष्य के सपने बुन रहे थे, देखते ही देखते वह ईंट, सीमेंट और लोहे के मलबे में बदल गई। धूल का गुबार तो छंट जाएगा, मलबा भी हट जाएगा, सड़कें फिर सामान्य हो जाएंगी लेकिन उन परिवारों के जीवन में जो शून्य पैदा हुआ है, वह कभी नहीं भर सकेगा। ‘हॉस्टल डेज’ नामक लड़कों के लिए बने पीजी की इस पांच मंजिला इमारत में हादसे के वक्त कई छात्र अपने कमरों में थे, जिनके मलबे में दबे होने की आशंका है। बताया जा रहा है कि इमारत लगभग 40-50 वर्ष पुरानी थी और हादसे के समय बेसमेंट में मरम्मत तथा खुदाई का काम चल रहा था। यही तथ्य इस त्रासदी को और भयावह बना देता है। सवाल केवल यह नहीं है कि इमारत क्यों गिरी बल्कि असली सवाल यह है कि इतनी पुरानी और संवेदनशील इमारत में बेसमेंट की खुदाई और निर्माण संबंधी गतिविधियां आखिर चल कैसे रही थी? हर बड़े भवन हादसे के बाद एक ही कहानी दोहराई जाती है। प्रशासन कहता है कि जांच होगी, कुछ छोटे अधिकारियों पर कार्रवाई होती है और कुछ दिनों बाद पूरा मामला फाइलों के नीचे दब जाता है। फिर किसी दूसरे इलाके में कोई और इमारत गिरती है, कहीं आग लगती है, कोई बेसमेंट मौत का कुआं बन जाता है और हम फिर वही प्रश्न पूछते रह जाते हैं कि आखिर जिम्मेदार कौन है? सच तो यह है कि भारत के शहरों में कोई बहुमंजिला अवैध निर्माण रातों-रात खड़ा नहीं होता। जमीन का उपयोग बदलता है, नक्शा बनता है, निर्माण शुरू होता है, मंजिलें बढ़ती हैं, बिजली-पानी के कनेक्शन मिलते हैं और अंततः उस इमारत में व्यावसायिक गतिविधियां शुरू हो जाती हैं। इस पूरी प्रक्रिया में अनेक विभागों और अधिकारियों की भूमिका होती है। ऐसे में यह कहना कि प्रशासन को कुछ पता ही नहीं था, जिम्मेदारी से बचने का सबसे आसान बहाना है। इसे भी पढ़ें: सत्य निकेतन हादसा: जिम्मेदार अधिकारियों पर हो ठोस कार्रवाई यदि कोई इमारत नियमों के विरुद्ध बन रही थी तो निर्माण के दौरान संबंधित नगर निगम अधिकारी कहां थे? यदि वहां व्यावसायिक गतिविधियां चल रही थी तो फायर विभाग ने सुरक्षा का आकलन क्यों नहीं किया? बिजली और पानी के कनेक्शन किस आधार पर मिले? पुलिस और स्थानीय प्रशासन की नजर उस भवन पर क्यों नहीं पड़ी? और यदि सब कुछ नियमों के अनुसार था तो फिर हादसा हुआ कैसे? यही वे प्रश्न हैं, जिनका जवाब केवल ठेकेदार या किसी छोटे कर्मचारी को दोषी ठहराकर नहीं दिया जा सकता। सत्य निकेतन की त्रासदी इसलिए भी गंभीर है क्योंकि दिल्ली में पीजी संस्कृति तेजी से बढ़ी है। देशभर से राजधानी में पढ़ने, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने और रोजगार तलाशने आने वाले हजारों युवा ऐसी इमारतों में रहते हैं, जहां कमरे छोटे हैं, गलियां संकरी हैं, सीढ़ियां संकरी हैं और सुरक्षा मानकों की स्थिति अक्सर संदिग्ध रहती है। मकान मालिक के लिए कमरों की संख्या बढ़ाना कारोबार है लेकिन उस कमरे में रहने वाला छात्र अपने सपने लेकर वहां आता है। जब छह कमरों की अनुमति वाली इमारत में 25 से अधिक कमरे बना दिए जाते हैं, जब बेसमेंट को पार्किंग के बजाय व्यावसायिक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जब एक ही निकास मार्ग पर सैंकड़ों लोगों की सुरक्षा निर्भर कर दी जाती है, तब यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं रहता, यह मानव जीवन के साथ खिलवाड़ बन जाता है। दिल्ली में अतीत की त्रासदियां भी हमें बार-बार चेताती रही हैं। 1997 का उपहार सिनेमा अग्निकांड हो या हाल के वर्षों में सामने आए बेसमेंट, कोचिंग सेंटर और व्यावसायिक इमारतों से जुड़े हादसे, हर घटना के बाद सुरक्षा मानकों पर सवाल उठे। बंद दरवाजे, अवरुद्ध निकास, अवैध निर्माण, अग्निशमन उपकरणों की अनुपलब्धता और प्रशासनिक उदासीनता बार-बार त्रासदियों की पृष्ठभूमि में दिखाई देती रही है। फिर भी व्यवस्था की स्मृति इतनी कमजोर है कि कुछ दिनों बाद सब कुछ फिर पुराने ढ़र्रे पर लौट आता है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि सस्पेंशन हमेशा छोटे कर्मचारी का ही क्यों होता है? यदि किसी इलाके में वर्षों तक अवैध निर्माण चलता रहा, यदि नियमों के विपरीत इमारतें खड़ी होती रही और उनमें पीजी, कोचिंग सेंटर, दुकानें या अन्य व्यावसायिक गतिविधियां चलती रही तो उस पूरे प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही तय होनी चाहिए, जिसने इसे होने दिया। तत्कालीन अवैध निर्माण प्रभारी, संबंधित वरिष्ठ अधिकारी, जोनल स्तर के जिम्मेदार अधिकारी और संबंधित विभागों की भूमिका की निष्पक्ष जांच क्यों न हो? यदि मिलीभगत प्रमाणित होती है तो कार्रवाई भी उसी अनुपात में कठोर क्यों न हो? समस्या किसी एक इमारत की नहीं है। दिल्ली और देश के तमाम शहरों में हजारों ऐसी इमारतें हैं, जो बाहर से सामान्य दिखाई देती हैं लेकिन भीतर से मौत के जाल में बदल चुकी हैं। कहीं बेसमेंट में अवैध निर्माण है, कहीं बिना वेंटिलेशन के कोचिंग सेंटर, कहीं संकरी सीढ़ियां, कहीं बंद खिड़कियां, कहीं लोहे की ग्रिलें और कहीं एक ही प्रवेश-निकास द्वार। अग्निशमन उपकरण कई जगह केवल निरीक्षण के समय दिखाने के लिए रखे जाते हैं और आपातकालीन निकास कागजों पर मौजूद रहते हैं, वास्तविकता में नहीं। ऐसी स्थिति में हादसा होने पर दमकल की गाड़ियां भी संकरी गलियों में फंस जाती हैं। बचाव दल के पास पहुंचने का रास्ता नहीं होता और अंदर फंसे लोगों के पास बाहर निकलने का रास्ता नहीं होता। फिर कुछ ही मिनटों में एक इमारत कब्रिस्तान में बदल जाती है। अब जरूरत केवल दोषी खोजने की नहीं, व्यवस्था बदलने की है। दिल्ली की सभी पुरानी बहुमंजिला और व्यावसायिक इमारतों का व्यापक सुरक्षा ऑडिट होना चाहिए। पीजी, हॉस्टल, कोचिंग सेंटर और बेसमेंट में संचालित व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की अनिवार्य जांच होनी चाहिए। फायर एनओसी की प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल, पारदर्शी और समयबद्ध हो। अवैध निर्माण पर केवल जुर्माना लगाकर उसे वैध बनाने की प्रवृत्ति समाप्त होनी चाहिए। गंभीर उल्लंघन वाली इमारतों को तत्काल सील और आवश्यकतानुसार ध्वस्त किया जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण यह कि जिम्मेदारी ऊपर तक जानी चाहिए। किसी दुर्घटना के बाद दो-चार छोटे कर्मचारियों को निलंबित कर देना प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, अक्सर जिम्मेदारी से बचने का तरीका बन जाता है। यदि किसी अधिकारी की लापरवाही, मिलीभगत या भ्रष्ट आचरण के कारण लोगों की जान जोखिम में पड़ी है तो उसके विरुद्ध कठोर आपराधिक कार्रवाई होनी चाहिए। पद जितना बड़ा हो, जवाबदेही भी उतनी ही बड़ी होनी चाहिए। सत्य निकेतन का मलबा केवल ईंट-पत्थरों का ढ़ेर नहीं है। उसके नीचे प्रशासनिक दावों की विश्वसनीयता, भवन सुरक्षा के नियमों और नागरिकों के भरोसे की भी परीक्षा हो रही है। इस त्रासदी को ‘हादसा’ कहकर आगे बढ़ जाना सबसे बड़ा अपराध होगा। हादसा वह होता है, जिसे रोका न जा सके लेकिन जिस दुर्घटना की जमीन अवैध निर्माण, नियमों की अनदेखी, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही से तैयार होती है, उसे केवल हादसा कहना सच्चाई को छोटा करना है। यदि इस बार भी जांच के नाम पर खानापूर्ति हुई, छोटे कर्मचारियों पर गाज गिराकर बड़े जिम्मेदार बच निकले और कुछ लाख रुपये के मुआवजे को न्याय का विकल्प बना दिया गया तो अगली त्रासदी केवल समय की प्रतीक्षा करेगी। तब फिर कोई इमारत गिरेगी, कोई परिवार उजड़ेगा, कोई बच्चा मलबे में दबेगा और हम फिर पूछेंगे कि आखिर असली गुनहगार कौन है? जबकि सच हम सभी जानते होंगे। गुनहगार केवल वह व्यक्ति नहीं होगा, जिसने अवैध निर्माण किया बल्कि गुनहगार वह पूरा तंत्र होगा, जिसने उसे बनने दिया, चलने दिया और तब तक आंखें बंद रखी, जब तक मलबे ने चीखना शुरू नहीं कर दिया। अब समय चीख सुनने का नहीं, व्यवस्था को जवाबदेह बनाने का है। - योगेश कुमार गोयल (लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)
जानबूझकर विपक्ष खराब कर रहा देश की छवि
पश्चिमी एशिया और रूस-यूक्रेन की लड़ाई के चलते दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाएं हिचकोले खा रहीं हैं। ऐसे में जब यह आंकड़ा आए कि देश की जीडीपी की विकासदर 7.8 प्रतिशत रही है तो अव्वल तो खुशी का माहौल होना चाहिए था। लेकिन इसे लेकर विवाद खड़ा हो गया है। विवाद की बुनियाद बना है पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग का दावा। उनका कहना है कि जीडीपी आधार को 86 लाख करोड़ से घटाकर 80 लाख करोड़ कर दिया है। इस लिहाज से यह दर शून्य से लेकर 2.6 प्रतिशत तक ही बैठती है। सरकार के आंकड़ों की कोई पूर्व रसूखदार अधिकारी खिल्ली उड़ाए और उसे विपक्ष न ले उड़ता तो हैरत ही होती। लेकिन ऐसा हो रहा है। इसकी वजह यह है कि मौजूदा राजनीतिक माहौल में सरकार और विपक्ष के बीच बढ़ी वैचारिक खाई निजी खुन्नस और दुश्मनी तक पहुंच गई है। इस वजह से दोनों ही पक्षों में एक-दूसरे को लेकर भरोसे का रिश्ता नहीं रह गया है। यही वजह है कि देश को जोड़ने और आगे बढ़ाने वाले जब भी कोई मुद्दा या आंकड़ा सामने आता है, विपक्ष उसकी विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़े करने लगता है। ऐसा नहीं कि अतीत में विपक्ष सरकार को नहीं घेरता रहा है। लेकिन तब भी यह ध्यान रखा जाता था कि राष्ट्रीय हितों और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को लेकर ऐसे कदम न उठाए जाएं या ऐसे बयान न दिए जाएं, जिससे देश की छवि पर आंच पहुंचे। अगर ऐसा नहीं होता तो मानवाधिकार के मामले पर नेता प्रतिपक्ष पाकिस्तान की मुखालफत करने के लिए जेनेवा जाने वाले सरकारी दल की अगुआई नहीं करता। पीवी नरसिंह राव की सरकार ने तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष अटल बिहारी वाजपेयी को ना सिर्फ भारतीय प्रतिनिधिमंडल दल का नेता बनाकर भेजा था, बल्कि पाकिस्तान के इरादे को नेस्तनाबूद करके लौटे प्रतिनिधिमंडल का प्रोटोकाल तोड़कर दिल्ली के हवाई अड्डे पर स्वागत भी किया था। भारत ने जब-जब परमाणु परीक्षण किया, तत्कालीन विपक्ष उसके साथ रहा। वाजपेयी के पोखरण परीक्षण के बाद तो अमेरिका ने भारत पर कई प्रतिबंध लगा दिए थे, लेकिन कांग्रेस ने तब भी वाजपेयी सरकार पर सवालिया निशान नहीं लगाए थे। लेकिन आज के दौर में अगर मोदी सरकार ऐसा कोई परीक्षण करती है तो उससे आज का विपक्ष सबूत मांगेगा। यह भी हो सकता है कि विदेशी धरती पर जाकर राहुल गांधी इसका प्रत्यक्ष सबूत और परीक्षण की पूरी प्रक्रिया की जानकारी मांग दें। इसे भी पढ़ें: BJP President Nitin Nabin ने वंदे मातरम् पर Congress के रुख को भारत विरोधी बताया ठीक इसी तरह जीडीपी के आंकड़ों को लेकर भी मोदी सरकार को झूठा ठहराने की कोशिश हो रही है। चीन गलवान कांड के दौरान भारतीय सीमावर्ती कमांड के चीफ रहे जनरल को बर्खास्त कर देता है, फिर भी राहुल गांधी की अगुआई में विपक्ष अब भी प्रचारित करने से परहेज नहीं कर रहा है कि गलवान घाटी में भारतीय सेना को चीन ने हराया और चीन भारत की जमीन पर कब्जा कर लिया है। ऐसी बयानबाजी अगर एक-दो बार होती तो उसे अनदेखा भी किया जा सकता था। लेकिन विपक्ष, विशेषकर राहुल गांधी की ओर से बार-बार ऐसे बयान दिए जाते हैं, जिसका संकेत तो यही लगता है कि वे भारत की छवि को खराब कर रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी विपक्ष की इस प्रवृत्ति को राष्ट्रीयता बनाम राजनीति के बहस के दायरे में लाकर राहुल गांधी पर सवालों की बौछार करती रहती है। यह बात और है कि ऐसे ही बयान देने या उनका समर्थन करने वाले अखिलेश यादव और चंद्रशेखर रावण जैसे नेताओं के बयानों को नोटिस तक नहीं लेती। वैसे विदेशों में भारतीय व्यवस्था पर बार-बार सवाल उठाया गया है। मसलन राहुल गांधी ने बोस्टन में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए थे। तब उन्होंने कहा था कि चुनाव आयोग 'कंप्रोमाइज्ड' है और इसके सिस्टम में 'बहुत गलत' है। हालांकि चुनाव आयोग ऐसे आरोपों का जवाब देता रहा, लेकिन विपक्ष की जुबान नहीं रूकी। इसी तरह बीते लोकसभा चुनाव के बाद अमेरिका के नेशनल प्रेस क्लब में राहुल ने कहा था, 'भारत में लोकतंत्र पिछले 10 सालों से टूटा हुआ है, अब यह लड़ रहा है। ‘ इसी तरह सितंबर 2023 में राहुल ने यूरोपीय यूनियन को संबोधित करते हुए ब्रसेल्स में कहा था कि भारत में भेदभाव और हिंसा बढ़ रही है। इस तरह के बयानों से राहुल जहां भारत के आंतरिक मामलों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जाते रहे हैं, वहीं इसके जरिए वे भारतीय संस्थाओं को खुद ही बदनाम करते हैं। इसी तरह मई 2022 में लंदन में 'आइडियाज फॉर इंडिया' सम्मेलन में राहुल ने कहा था कि भारतीय संस्थाएं 'परजीवी' बन गई हैं। तब उन्होंने भारतीय संस्थाओं मसलन सीबीआई और ईडी को 'डीप स्टेट' कह दिया था। इतना ही नहीं, उन्होंने भारत की तुलना पाकिस्तान से भी कर दी। राहुल ने 2018 में सिंगापुर के ली कुआन यू स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी में कहा था कि भारत में 'डर और नफरत' का माहौल है और बहुलता की विचारधारा खतरे में है। इसी तरह जनवरी 2018 में बहरीन में प्रवासी भारतीयों के सम्मेलन में राहुल ने कहा था कि सरकार बेरोजगारी से निपटने में नाकाम रही है। जिसका असर गुस्से और नफरत के रूप में दिख रहा है। इसी तरह 2017 में उन्होंने अमेरिका में कहा था कि भारत अब वह नहीं रहा, जहां हर कोई कुछ भी कह सकता है। ऐसे बयानों से अक्सर वे भारत को ही सवालों के घेरे में रखते हैं और इस तरह देश की छवि को नुकसान पहुंचाते हैं। उनके ऐसे बयानों को बाद में समूचा विपक्ष और ले उड़ता है और जगह-जगह भारतीय छवि को नुकसान पहुंचाता है। कुछ ऐसा ही इस बार जीडीपी को लेकर हो रहा है। 1991 के बाद के दौर इस वक्त याद आना लाजमी है। राजीव गांधी की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति के बावजूद कांग्रेस को आम चुनाव में बहुमत नहीं मिला। तब नरसिंह राव की अगुआई में कांग्रेस की अल्पमत की सरकार चलती रही। उस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को 120 सीटें मिलीं थीं। इतनी ताकत के बावजूद बीजेपी ने आर्थिक सुधार के मोर्चे पर कांग्रेस की सरकार को बहुत सहयोग किया। सहयोग करने के लिए बीजेपी ने संसद की कार्यवाही से बहिर्गमन करने का रास्ता चुना था। मुद्दों पर वह सरकार को सदन में घेरती थी, लेकिन जब भी मतदान की नौबत आती, बीजेपी बाहर निकल जाती थी। इस तरह बीजेपी विरोध भी करती थी और सरकार का परोक्ष साथ भी देती थी। लेकिन आज की स्थिति देखिए। सत्ता पक्ष और विपक्ष में भरोसे का रिश्ता ही नहीं रहा। विपक्ष सिर्फ तीर साधे रहता है और उसकी अगुआई अक्सर राहुल गांधी करते हैं। बाकी विपक्ष उनके साथ कोरस गान में शामिल हो जाता है। वाजपेयी की अगुआई वाली सरकार ने जब परमाणु परीक्षण किया था, तब कांग्रेस ने भी कमोबेश साथ दिया था। जबकि आज की तुलना में अमेरिका ने भारत विरोध में कहीं ज्यादा कड़े कदम उठाए थे। कई तरह की आर्थिक पाबंदियां भी लगाई थीं। तब चाहती तो कांग्रेस वाजपेयी सरकार को रोज कठघरे में खड़ा करती। तब कह सकते हैं कि कांग्रेस के नेतृत्व में ऐसे लोगों का वर्चस्व जरूर था, जो राष्ट्रीय हितों और तकाजों को समझते थे। सवाल यह है कि क्या ऐसी सोच आज की राजनीति विकसित नहीं कर सकती ? विपक्ष को भूलना नहीं चाहिए कि ऐसे सवाल उठाकर वह भारतीय सरकार को नहीं, भारत की छवि को खराब कर रहा है। उसे देखना होगा कि भारत के आंकड़ों को विश्व बैंक ने भी मान्यता दे दी है। ऐसे में सवाल विपक्षी सोच पर भी उठता है। उसे भी सोचना होगा कि राष्ट्रीय विकास और हित में उसकी भी अपनी सकारात्मक भूमिका है और उसे निभाना होगा। - उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं..
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Mayawati ने आकाश को क्यों दिखाई 'जमीन' ? BSP के इस फैसले का UP Elections पर क्या होगा असर?
बहुजन समाज पार्टी की सियासत में एक बार फिर ऐसा उलटफेर हुआ है, जिसने पार्टी के साथ-साथ उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में भी हलचल तेज कर दी है। जिस कवायद को आकाश आनंद के सियासी भविष्य की राह साफ करने की कोशिश माना जा रहा था, वही कुछ घंटों में उनके बहुजन समाज पार्टी से पूरी तरह बाहर होने की पटकथा बन गई। हम आपको बता दें कि बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को पार्टी से ‘पूरी तरह आजाद’ कर दिया है। खास बात यह है कि मायावती ने यह फैसला आकाश के ससुर और पूर्व राज्यसभा सांसद अशोक सिद्धार्थ के राजनीति से संन्यास की घोषणा के तत्काल बाद लिया। यानी जिस शर्त को आकाश की वापसी और राजनीतिक सक्रियता के रास्ते की आखिरी बाधा माना जा रहा था, वह शर्त पूरी हुई, लेकिन नतीजा उम्मीद के ठीक उलट निकला। अशोक सिद्धार्थ ने गुरुवार सुबह भावुक संदेश के जरिए राजनीति से संन्यास का ऐलान किया। उन्होंने साफ कहा कि मायावती का आदेश उनके लिए पारिवारिक और राजनीतिक रिश्तों से ऊपर है। उन्होंने यह भी कहा कि आकाश ने करीब दो दशक मायावती की देखरेख और मार्गदर्शन में बिताए हैं और उनके भीतर मायावती का ‘खून’ बहता है। सिद्धार्थ ने खुद पर आकाश को प्रभावित या गुमराह करने के आरोपों को भी खारिज किया और कहा कि उनके जैसे सामान्य कार्यकर्ता की इतनी हैसियत ही कहां कि वह आकाश को गुमराह कर सके। इसे भी पढ़ें: Mayawati ने भतीजे Akash Anand को BSP की सभी जिम्मेदारियों से किया पूरी तरह आजाद लेकिन बसपा सुप्रीमो के तेवर इससे नरम नहीं हुए। मायावती ने अपने दस सूत्रीय संदेश में साफ कर दिया कि मामला केवल संगठनात्मक जिम्मेदारी का नहीं है, बल्कि निष्ठा, परिवार और राजनीतिक प्राथमिकताओं का है। उन्होंने आरोप लगाया कि आकाश आनंद और अशोक सिद्धार्थ पार्टी और बहुजन आंदोलन के हित से ज्यादा पारिवारिक रिश्तों और निजी हितों को महत्व दे रहे हैं। मायावती का सबसे तीखा सवाल आकाश की सोशल मीडिया गतिविधियों को लेकर था। उनका कहना था कि आकाश पहले उनके पोस्ट को लगातार रीपोस्ट करके अपनी राजनीतिक निष्ठा जताते रहे हैं, लेकिन सिद्धार्थ से जुड़े हालिया पोस्ट को उन्होंने रीपोस्ट नहीं किया, जबकि मायावती के मुताबिक वह पोस्ट खुद आकाश के राजनीतिक हित में था। यहीं से बसपा सुप्रीमो ने आकाश की ‘दोहरी मानसिकता’ पर सवाल खड़ा कर दिया। उनका तर्क था कि अगर आकाश के लिए पार्टी और बहुजन आंदोलन से ज्यादा अहम पारिवारिक रिश्ते हैं तो फिर वह पार्टी के लिए प्रभावी ढंग से काम कैसे कर सकते हैं? मायावती ने अशोक सिद्धार्थ के राजनीति छोड़ने के फैसले को सही कदम बताया, लेकिन साथ ही यह भी कह दिया कि फैसला देर से लिया गया। उनका आरोप था कि अगर सिद्धार्थ को अपने दामाद के उज्ज्वल राजनीतिक भविष्य की सचमुच चिंता होती तो वह उसी वक्त राजनीति छोड़ने की घोषणा कर देते। देरी को मायावती ने सिद्धार्थ की महत्वाकांक्षा और नीयत पर सवाल उठाने का आधार बनाया। दरअसल, आकाश आनंद पिछले कुछ वर्षों में बसपा की अगली पीढ़ी के चेहरे के तौर पर तेजी से उभरे थे। मायावती ने उन्हें राष्ट्रीय समन्वयक जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी थी। लेकिन आकाश की राजनीतिक भूमिका बार-बार बदलती रही। तीन सितंबर को उन्हें राष्ट्रीय समन्वयक पद से हटाया गया और अब पार्टी से ही ‘आजाद’ कर दिया गया है। यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है जब उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों की आहट तेज हो चुकी है। बसपा के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि मायावती के बाद पार्टी का चेहरा कौन होगा और संगठन को नई पीढ़ी तक कैसे पहुंचाया जाएगा। आकाश आनंद को इसी संक्रमण का संभावित चेहरा माना जा रहा था। अब उनके बाहर होने से बसपा की उत्तराधिकार की पूरी रणनीति फिर सवालों के घेरे में है। इस बीच मायावती के छोटे भाई के बेटे ईशान आनंद की हाल के महीनों में उनके साथ बढ़ती मौजूदगी भी सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है। इससे बसपा में अगली पीढ़ी की कमान को लेकर अटकलें और तेज हो सकती हैं। देखा जाये तो उत्तर प्रदेश की राजनीति में मायावती का यह फैसला महज एक पारिवारिक विवाद नहीं माना जाएगा। 2027 में मुकाबला बहुकोणीय होने की स्थिति में बसपा का हर फैसला उसके वोट बैंक, संगठन और सोशल इंजीनियरिंग पर असर डालेगा। आकाश जैसे युवा चेहरे की विदाई से पार्टी को जहां नई पीढ़ी से जुड़ने में चुनौती मिल सकती है, वहीं मायावती के सामने अब यह साबित करने की चुनौती होगी कि बसपा किसी एक उत्तराधिकारी के भरोसे नहीं, बल्कि उनके अपने राजनीतिक नियंत्रण और संगठनात्मक ढांचे पर खड़ी है। फिलहाल संदेश साफ है कि ससुर ने राजनीति छोड़ी, लेकिन दामाद की कुर्सी नहीं बची। और मायावती की बसपा में रिश्ते नहीं, राजनीतिक निष्ठा अंतिम कसौटी है। 2027 के रण में इस फैसले की असली कीमत और असर तब सामने आएगा, जब हाथी मैदान में उतरेगा।
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मेल लिखवाना हो, 80 के दशक वाली फोटो बनवानी हो, किसी कंपनी का कारोबार खंगालना हो या एक लाइन के आईडिया से पूरी फिल्म की स्क्रिप्ट लिखनी हो, एआई सब कुछ एक सांस में कर सकता है। यह भी कह देता है कि आप चाहे तो मैं इसका वो वाला वर्जन बना दूं जो बिल्कुल ऐसा लगे कि इंसान ने बनाया है। लेकिन क्या एआई इंसान के अस्तित्व के लिए भी भविष्य में कभी खतरा बन सकता है। खतरे की बात गाहे बगाहे कही जाती रही है। लेकिन अब एक बड़ा डेवलपमेंट हुआ। एआई बनाने वाली दुनिया की एक बड़ी कंपनी एंथ्रोपिक के रिसर्चर जैकब कॉक्सन ने कंपनी छोड़ दी है। एंथ्रोपिक कंपनी के रिसर्च स्कॉलर जेकब कॉक्सन ने अपने इस्तीफे की जानकारी सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर दी। अपने पोस्ट में उन्होंने लिखा एंथ्रोपिक और ओपन एi जैसी कंपनियां तेजी से इंसानों से भी ज्यादा समझदार एआई यानी कि सुपर इंटेलिजेंस बनाने की होड़ में लगी हुई हैं और यह लापरवाही लोगों की जिंदगी को खतरे में डाल रही है। ऐसा क्या हुआ जिसने एंथ्रोपी के कर्मचारी को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया। जैकब कॉक्सन ने एक्स पर एक लंबा थ्रेड पोस्ट करते हुए इसका कारण बताया है। कॉक्सन का दावा यह था कि एआई लैब के अंदर लोग इस खतरे को अच्छी तरह समझते हैं। फिर भी काम चलता जा रहा है। एआई बनाने वाले भी यह मानते हैं कि एआई हम सभी को खत्म कर देगा। कॉक्सन ने आगे यह भी लिखा कि बड़ी-बड़ी कंपनियों के अधिकारी और रिस्चरर्स मीडिया के सामने तो बहुत सोच समझकर और जिम्मेदारी से भरी बातें करते हैं। लेकिन मैंने उन्हें लोगों को प्राइवेट में डर जताते हुए सुना है। यह लोग जो सिस्टम बनाए जा रहे हैं वो किसी भी चीज को हैक कर सकता है। रातोंरात किसी भी इलाके में क्रांति ला सकता है और असली ताकत और रिसोर्सेज हासिल कर सकता है और यह ग्रोथ बिल्कुल भी धीमी नहीं पड़ रही है। उन्होंने उन दोनों कंपनियों के बीच का फर्क भी साफ किया जहां उन्होंने काम किया था। उन्होंने लिखा ओपन एआई में कई लोगों ने इस खतरे को गंभीरता और सिविलाइजेशन पर पड़ने वाले असर को गहराई से महसूस नहीं किया। इसे भी पढ़ें: Anthropic के शोधकर्ता Jacob Coxon ने दिया इस्तीफा, Superintelligence पर उठाए सवाल समझ का फर्क एआई को लेकर चेतावनी इसलिए भी गंभीर है क्योंकि जितने शक्तिशाली मॉडल बन रहे हैं, उनके भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया उतनी ही जटिल और कम पारदर्शी होती जा रही है। ऐसा नहीं है कि यह स्थिति अचानक आई। मार्च 2023 में इलॉन मस्क, एपल के को-फाउंडर Steve Wozniak समेत कई हस्तियों ने AI के डिवेलपमेंट को लेकर चेताया था। इसके अलावा, एक बड़ी चिंता पर्यावरण को लेकर है। भारी-भरकम सर्वर और डेटा सेंटर बहुत बड़ी मात्रा में बिजली-पानी की खपत कर रहे हैं। इनकी वजह से कार्बन उत्सर्जन बढ़ रहा है। हालांकि इन सारी बातों का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि तकनीक को यहीं पर रोक दिया जाए। AI ने मेडिकल, एजुकेशन, साइंस, रिसर्च और एग्रो सेक्टर में बड़े बदलाव की क्षमता दिखाई है। आज संसाधनों पर जितना दबाव है और दुनिया के सामने जिस तरह की चुनौतियां हैं, उनमें AI सहयोगी हो सकती है। इसे भी पढ़ें: OpenAI के मुख्य वैज्ञानिक Jakub Pachocki ने दी चेतावनी, AI के तेज विकास के लिए दुनिया तैयार नहीं कड़ी निगरानी की दरकार OpenAI के मुख्य वैज्ञानिक जैकब ने हाल में कहा था कि AI जिस रफ्तार से आगे बढ़ रही है, उसके लिए इंसान तैयार नहीं हैं। आर्टिफिशल इंटेलिजेंस की सुरक्षा और निगरानी पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। सरकारों और दूसरी संस्थाओं को भी इसमें भूमिका निभानी होगी। केवल कंपनियों के भरोसे सब नहीं छोड़ा जा सकता। बेलगाम होड़ के बजाय सिक्योरिटी को प्राथमिकता देनी चाहिए और सबसे जरूरी, इस क्षेत्र से जुड़ी आवाजों को गंभीरता से सुनना चाहिए। एंथ्रोपिक में काम करने वाले साइंटिस्ट ने कौन से 5 प्वाइंट सामने रखे एंथ्रोपिक में काम करने वाले उनके दो साथियों ने भी इस बात का समर्थन किया है। एंथ्रोपिक के अलाइनमेंट साइंस लीड इवान ह्यूमबिगर ने वार्निंग दी है कि आने वाले 10 सालों में एआई की वजह से इंसानों का वजूद खतरे में पड़ने की 10% से ज्यादा आशंका है। उन्होंने साफ कहा कि उनकी कंपनी बेहतर कोशिश तो कर रही है लेकिन एआई को काबू में रखने के लिए अभी तक उनके पास कोई ठोस प्लान नहीं है। यूबिंगर के मुताबिक असली खतरा आज के एआई से नहीं बल्कि उस सुपर एआई से है जो खुद को तेजी से और बेहतर बनाने में लगा हुआ है। इसी एंथ्रोपिक के एक दूसरे एंप्लॉय ने तस्वीर को और ज्यादा क्लियर करने के लिए पांच पॉइंट्स को भी सामने रखा। एंथ्रोपिक के साइंस ग्रुप में कॉग्निटिव ओवरसाइट टीम के हेड सेमुअल मार्क्स ने एक पोस्ट के जरिए पूरी स्थिति को समझाया। उनका पहला पॉइंट यह था कि एआई डेवलपर्स का खुद यह मानना है कि उनकी तकनीक कुछ ही सालों में इंसानी वजूद को पूरी तरह खत्म कर सकती है और यह चिंता सीनियर कर्मचारियों में सबसे ज्यादा है। दूसरा इसके बावजूद भी वो सिर्फ बिजनेस के फायदों और इस सोच की वजह से काम जारी रखे हुए हैं कि वह खुद से कम जिम्मेदार कॉम्पिटिट से आगे निकलने की होड़ में है। तीसरा एआई को आर्म सॉफ्टवेयर की तरह प्रोग्राम नहीं किया जा सकता। यह मिसबिव करने लग जाता है। चौथा पॉइंट मौजूदा तरीका एआई को बेहतर बिहेव करने के लिए कह सकते हैं, लेकिन उन्हें पूरी तरह से सुरक्षित और काबू में नहीं कर सकता। पांचवा कंपनी के कई कर्मचारी एआई को ज्यादा सेफ तरीके से बनाने के लिए रास्ते ढूंढने के लिए रफ्तार को बेहद धीमी करना चाहते हैं। अपना आईपीओ लाने की तैयारी कॉक्सन का इस्तीफा ऐसे समय में आया है जब एंथ्रोपिक अपना आईपीओ लाने की तैयारी कर रही है। खबरें बता रही है कि यह इतिहास के सबसे बड़े आईपीओ में से एक हो सकता है। कंपनी की संभावित वैल्यू्यूएशन करीब 2 ट्रिलियन तक होने की खबरें हैं। जेकब के इतने बड़े आरोप हैं जिसमें यह भी शामिल है कि इसी डेकेड के आखिर तक इंसानियत के लिए एआई खतरा पैदा कर सकता है। एंथ्रोपिक ने फिलहाल इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। लेकिन एंथ्रोपिक में अलाइनमेंट साइंस के लीड इवान गुबिंगर ने जैकब के बयान पर सहमति जताई है। एक्स पर लिखा कि हम सच में मानते हैं कि एआईए सभी इंसानों को मार सकता है। मेरा अनुमान है कि अगले 10 साल में ऐसा होने की संभावना 10% ज्यादा है। मेरा विश्वास है कि एंथ्रोपिक अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहा है। लेकिन सुपर इंटेलिजेंस को पूरी तरह सुरक्षित और नियंत्रित रखने का कोई पक्का प्लान अभी हमारे पास नहीं है और हम उस दिशा में स्पष्ट रूप से आगे भी नहीं बढ़ रहे। और यह चिंताएं लगातार उठाई जा रही हैं।
हरीश द्विवेदी को युवा मोर्चे की जिम्मेदारी दिए जाने को पार्टी के संगठनात्मक विस्तार की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बस्ती से लोकसभा सांसद द्विवेदी लंबे समय से भाजपा संगठन से जुड़े रहे हैं। युवा मोर्चा के जरिए पार्टी युवाओं के बीच अपनी राजनीतिक और संगठनात्मक पहुंच को मजबूत करने पर जोर देती रही है।
Marital Rape मामले पर Supreme Court में जबरदस्त घमासान, Parliament के पाले में आई गेंद!
वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने की मांग पर चल रही बहस अब सुप्रीम कोर्ट के सामने उस बुनियादी सवाल तक पहुंच गई है, जहां अदालत को यह तय करना है कि क्या वह मौजूदा आपराधिक कानून की स्पष्ट सीमा को बदलकर एक नया अपराध लागू कर सकती है। बुधवार को सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इसी सवाल पर गंभीर टिप्पणी की और केंद्र सरकार की इस दलील से सहमति जताई कि इस अत्यंत संवेदनशील और जटिल मुद्दे पर अंतिम फैसला संसद को करना चाहिए। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 20(1) का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि जब मौजूदा कानून किसी कृत्य को अपराध के रूप में परिभाषित ही नहीं करता, तो उसके लिए किसी व्यक्ति को आपराधिक रूप से दंडित कैसे किया जा सकता है। हम आपको बता दें कि अनुच्छेद 20(1) स्पष्ट करता है कि किसी व्यक्ति को उस समय लागू कानून के उल्लंघन के अलावा किसी अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसे भी पढ़ें: Karnataka Case: 'सेक्स स्लेव' फैसले को चुनौती, Supreme Court में Personal Liberty पर बहस मौजूदा कानून में यही सबसे महत्वपूर्ण पेच है। भारतीय दंड संहिता की धारा 375 में Exception 2 के तहत पत्नी के साथ पति द्वारा यौन संबंध को बलात्कार की परिभाषा से बाहर रखा गया था। पत्नी की उम्र को लेकर सुप्रीम कोर्ट के 2017 के फैसले के बाद यह सीमा 18 वर्ष से संबंधित हो गई। अब भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 63(2) में भी इसी प्रकार का अपवाद मौजूद है। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान बेहद अहम सवाल उठाया कि जब कानून ने किसी आचरण को अपराध की श्रेणी में रखा ही नहीं है, तो अदालत उसे अपराध मानकर अभियोजन की अनुमति कैसे दे सकती है? पिछली सुनवाई में भी पीठ ने पूछा था कि क्या संवैधानिक अदालतें खुद आपराधिक कानून को दोबारा लिखकर नया अपराध बना सकती हैं। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मामला सामाजिक, कानूनी और संवैधानिक दृष्टि से अत्यंत जटिल है और इसका समाधान संसद के स्तर पर होना चाहिए। अदालत ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि यदि सरकार को लगता है कि मौजूदा कानून में समस्या है, तो उसे संसद की मंजूरी के साथ कानून को दोबारा तैयार करना चाहिए। यानी सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सीमा रेखा खींच दी है कि कानून की व्याख्या अदालत कर सकती है, लेकिन संसद द्वारा स्पष्ट रूप से बनाए गए आपराधिक प्रावधान को बदलकर नया अपराध बनाना अलग प्रश्न है। हालांकि अदालत ने महिलाओं की पीड़ा को किसी भी तरह कमतर नहीं आंका। पीठ ने साफ कहा कि पति द्वारा उसकी इच्छा के विरुद्ध यौन संबंध के लिए मजबूर की गई महिला “निश्चित रूप से पीड़िता” है। असली सवाल यह है कि ऐसी स्थिति में पति पर बलात्कार का मुकदमा चलाने का कानूनी आधार क्या होगा, जब वर्तमान कानून स्वयं वैवाहिक संबंध के लिए अपवाद प्रदान करता है। हम आपको बता दें कि कर्नाटक से जुड़े एक मामले ने इस बहस को और पेचीदा बना दिया है। वहां हाई कोर्ट ने ऐसे पति के खिलाफ अभियोजन की अनुमति दी थी जिस पर पत्नी के साथ लगभग “सेक्स स्लेव” जैसा व्यवहार करने का आरोप था। सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले को पहले सुनने पर विचार कर रहा है, ताकि यह देखा जा सके कि मौजूदा कानून की व्याख्या के जरिए अभियोजन संभव है या नहीं। दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि विवाह किसी महिला की शारीरिक स्वायत्तता और सहमति के अधिकार को समाप्त नहीं कर सकता। वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नुंडी ने कहा कि अदालत को नया अपराध बनाने की जरूरत नहीं है; बलात्कार पहले से परिभाषित अपराध है और सवाल केवल इतना है कि क्या पतियों को उससे संवैधानिक संरक्षण देना उचित है। उधर, केंद्र सरकार इसके विपरीत विवाह की भारतीय सामाजिक संरचना, आपराधिक कानून के संभावित दुरुपयोग और सबूत जुटाने की कठिनाइयों को प्रमुख आधार मान रही है। सरकार का तर्क है कि पति-पत्नी के बीच बंद दरवाजों के भीतर सहमति या असहमति साबित करना सामान्य यौन अपराधों की तुलना में अधिक जटिल होगा। वैवाहिक विवादों में गंभीर आपराधिक धाराओं के इस्तेमाल की आशंका भी सरकार की चिंता का हिस्सा है। केंद्र सरकार का यह भी कहना है कि पश्चिमी देशों के कानूनी मॉडल को भारत की सामाजिक और पारिवारिक परिस्थितियों पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता। भारत में विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं, बल्कि व्यापक पारिवारिक और सामाजिक ढांचे से जुड़ी संस्था है। इसी आधार पर सरकार “पश्चिमी मॉडल की अंधी नकल” से बचने की बात करती है। वहीं बहस का एक वैचारिक पक्ष भी है। दरअसल वैवाहिक बलात्कार की पश्चिमी अवधारणा को भारतीय पारिवारिक व्यवस्था पर उसी रूप में लागू करने की कोशिश भारतीय विवाह संस्था को कमजोर कर सकती है। देखा जाये तो ऐसी अवधारणाएं भारतीय सामाजिक व्यवस्था को व्यक्तिगत अधिकारों की अत्यधिक कानूनी व्याख्या के जरिए छिन्न-भिन्न कर सकती हैं। दूसरी ओर, वैवाहिक बलात्कार को अपराध मानने की मांग के पीछे भारतीय महिलाओं के अधिकार और शारीरिक स्वायत्तता से जुड़े तर्क भी हैं। फिलहाल केंद्र का रुख स्पष्ट है कि घरेलू हिंसा, क्रूरता और शारीरिक हमले जैसी मौजूदा कानूनी धाराओं के तहत पीड़ित पत्नी को संरक्षण उपलब्ध है; बलात्कार की कानूनी परिभाषा में बदलाव करना हो तो वह व्यापक सामाजिक विमर्श, विशेषज्ञों से परामर्श और संसद में बहस के बाद होना चाहिए। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई तीन सप्ताह बाद अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध की है। इसलिए अब असली लड़ाई केवल “वैवाहिक बलात्कार अपराध है या नहीं” की नहीं, बल्कि इस बड़े संवैधानिक प्रश्न की है कि भारत में आपराधिक कानून की नई सीमा कौन तय करेगा, न्यायपालिका या संसद? -नीरज कुमार दुबे
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लंबे समय से दुनिया को यह संदेश देते रहे हैं कि “यह युद्ध का युग नहीं है।” अब यही संदेश उनकी विदेश नीति की सबसे बड़ी कसौटी बन गया है। एक तरफ रूस-यूक्रेन युद्ध अपने पांचवें वर्ष में प्रवेश कर चुका है, दूसरी ओर पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच टकराव ने खाड़ी देशों को भी सीधे संकट में डाल दिया है। ऐसे समय में दिल्ली में होने वाला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन केवल आर्थिक सहयोग का मंच नहीं, बल्कि भारत की कूटनीतिक क्षमता का बड़ा प्रदर्शन भी बनने जा रहा है। ब्रिक्स में रूस, चीन, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे परस्पर विरोधी हितों वाले देश एक साथ मौजूद होंगे। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भारत आने से एक बार फिर पूरी दुनिया की नजर मोदी-पुतिन मुलाकात पर है। हाल ही में एससीओ सम्मेलन से इतर द्विपक्षीय मुलाकात के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने पुतिन से साफ कहा था कि अब युद्ध को आगे बढ़ाने की बजाय उसे खत्म करने का रास्ता तलाशना चाहिए। भारत और रूस के दशकों पुराने मजबूत रिश्तों के बीच मोदी का यह संदेश काफी महत्वपूर्ण है। अब ब्रिक्स सम्मेलन में मोदी के पास एक और मौका होगा कि वह रूस के साथ अपनी दोस्ती कायम रखते हुए पुतिन को बातचीत और शांति की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें। इसे भी पढ़ें: Prabhasakshi NewsRoom: BRICS Summit का पूरा Schedule जारी, जानिए कब और किन वैश्विक नेताओं से मिलेंगे PM Modi हम आपको यह भी बता दें कि इस दिशा में भारत केवल रूस से बात नहीं कर रहा। विदेश मंत्री एस. जयशंकर हाल में कीव गए और यूक्रेनी नेतृत्व के साथ बातचीत की थी। उन्होंने स्पष्ट किया था कि भारत रूस और यूक्रेन दोनों के संपर्क में है और युद्ध को समाप्त करने में उपयोगी विचारों पर काम करने के लिए तैयार है। यानी मोदी सरकार की रणनीति किसी एक पक्ष को चुनने की नहीं, बल्कि दोनों पक्षों से संवाद बनाए रखकर शांति की गुंजाइश बचाए रखने की है। वहीं पश्चिम एशिया में यही नीति और भी कठिन है। हालिया संघर्ष के दौरान ईरान ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने के क्रम में बहरीन, कुवैत, कतर, ओमान, जॉर्डन और दूसरे देशों को भी अपनी सैन्य कार्रवाई के दायरे में ला दिया। ईरान का तर्क था कि वह अमेरिकी ठिकानों को निशाना बना रहा है, लेकिन मिसाइल और ड्रोन उन देशों की संप्रभु सीमाओं के भीतर पहुंचे जहां ये ठिकाने मौजूद हैं। जुलाई में भी ईरान ने खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने की कार्रवाई जारी रखी। यहीं मोदी की कूटनीति की असली परीक्षा सामने आती है। युद्ध के बीच उन्होंने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान से बातचीत की थी और साफ कहा था कि भारत सभी मुद्दों का समाधान संवाद और कूटनीति से चाहता है। साथ ही उन्होंने ऊर्जा और व्यापार के निर्बाध आवागमन तथा भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को भारत की प्राथमिकता बताया। दूसरी ओर उन्होंने यूएई, बहरीन, सऊदी अरब और कतर के नेताओं से अलग-अलग बातचीत कर उनके खिलाफ हुए हमलों की निंदा भी की थी। बहरीन के मामले में प्रधानमंत्री ने सीधे कहा था कि भारत हमलों की निंदा करता है और वहां के लोगों के साथ खड़ा है; सऊदी अरब और यूएई के संदर्भ में भी उन्होंने संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के उल्लंघन को गंभीरता से लिया था। यही संतुलन मोदी की विदेश नीति की ताकत है। ईरान से संबंध भी चाहिए और खाड़ी अरब देशों का भरोसा भी; रूस से रणनीतिक साझेदारी भी बचानी है और पश्चिम से आर्थिक-तकनीकी रिश्ते भी मजबूत करने हैं। भारत के लिए यह केवल प्रतिष्ठा का सवाल नहीं है। पश्चिम एशिया में करोड़ों भारतीयों के हित, ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा सीधे इससे जुड़ी है। मोदी ने ईरान से बातचीत में भी इसी व्यावहारिक प्राथमिकता को सामने रखा है। साथ ही इस पूरे समीकरण में चीन को अलग करके देखना भी संभव नहीं है। शी जिनपिंग की भारत यात्रा सात वर्ष बाद हो रही है और दोनों देशों के बीच रिश्तों में सावधानी के साथ सुधार की कोशिश दिखाई दे रही है। सीमा पर तनाव कम करना, आर्थिक रिश्तों को नियंत्रित तरीके से आगे बढ़ाना और प्रतिस्पर्धा के बावजूद संवाद बनाए रखना भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के लिए जरूरी है। इसलिए दिल्ली का ब्रिक्स सम्मेलन मोदी के लिए केवल शिखर सम्मेलन नहीं, बल्कि कूटनीतिक संतुलन का मंच है। एक ही मेज पर पुतिन, शी, पेजेश्कियान, सऊदी और यूएई नेतृत्व के बीच भारत यह दिखा सकता है कि रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ किसी खेमे से दूरी नहीं, बल्कि सभी से अपने हितों के आधार पर संवाद करने की क्षमता है। देखा जाये तो दुनिया आज अलग-अलग खेमों में बंटी हुई है। ऐसे समय में मोदी की कूटनीति की सबसे बड़ी ताकत यही है कि भारत किसी एक पक्ष के साथ खड़ा होने की बजाय सभी से संवाद बनाए रखता है। रूस से युद्ध खत्म करने की अपील हो, यूक्रेन से बातचीत, ईरान से संपर्क, खाड़ी देशों के साथ मजबूत रिश्ते, पश्चिम के साथ साझेदारी या चीन से संवाद, भारत हर मोर्चे पर अपने हितों को साधते हुए रिश्ते आगे बढ़ा रहा है। यही संतुलित कूटनीति भारत को इस उथल-पुथल भरी दुनिया में अपनी स्वतंत्र और मजबूत जगह बनाने में मदद कर रही है।

