प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लंबे समय से दुनिया को यह संदेश देते रहे हैं कि “यह युद्ध का युग नहीं है।” अब यही संदेश उनकी विदेश नीति की सबसे बड़ी कसौटी बन गया है। एक तरफ रूस-यूक्रेन युद्ध अपने पांचवें वर्ष में प्रवेश कर चुका है, दूसरी ओर पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच टकराव ने खाड़ी देशों को भी सीधे संकट में डाल दिया है। ऐसे समय में दिल्ली में होने वाला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन केवल आर्थिक सहयोग का मंच नहीं, बल्कि भारत की कूटनीतिक क्षमता का बड़ा प्रदर्शन भी बनने जा रहा है। ब्रिक्स में रूस, चीन, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे परस्पर विरोधी हितों वाले देश एक साथ मौजूद होंगे। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भारत आने से एक बार फिर पूरी दुनिया की नजर मोदी-पुतिन मुलाकात पर है। हाल ही में एससीओ सम्मेलन से इतर द्विपक्षीय मुलाकात के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने पुतिन से साफ कहा था कि अब युद्ध को आगे बढ़ाने की बजाय उसे खत्म करने का रास्ता तलाशना चाहिए। भारत और रूस के दशकों पुराने मजबूत रिश्तों के बीच मोदी का यह संदेश काफी महत्वपूर्ण है। अब ब्रिक्स सम्मेलन में मोदी के पास एक और मौका होगा कि वह रूस के साथ अपनी दोस्ती कायम रखते हुए पुतिन को बातचीत और शांति की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें। इसे भी पढ़ें: Prabhasakshi NewsRoom: BRICS Summit का पूरा Schedule जारी, जानिए कब और किन वैश्विक नेताओं से मिलेंगे PM Modi हम आपको यह भी बता दें कि इस दिशा में भारत केवल रूस से बात नहीं कर रहा। विदेश मंत्री एस. जयशंकर हाल में कीव गए और यूक्रेनी नेतृत्व के साथ बातचीत की थी। उन्होंने स्पष्ट किया था कि भारत रूस और यूक्रेन दोनों के संपर्क में है और युद्ध को समाप्त करने में उपयोगी विचारों पर काम करने के लिए तैयार है। यानी मोदी सरकार की रणनीति किसी एक पक्ष को चुनने की नहीं, बल्कि दोनों पक्षों से संवाद बनाए रखकर शांति की गुंजाइश बचाए रखने की है। वहीं पश्चिम एशिया में यही नीति और भी कठिन है। हालिया संघर्ष के दौरान ईरान ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने के क्रम में बहरीन, कुवैत, कतर, ओमान, जॉर्डन और दूसरे देशों को भी अपनी सैन्य कार्रवाई के दायरे में ला दिया। ईरान का तर्क था कि वह अमेरिकी ठिकानों को निशाना बना रहा है, लेकिन मिसाइल और ड्रोन उन देशों की संप्रभु सीमाओं के भीतर पहुंचे जहां ये ठिकाने मौजूद हैं। जुलाई में भी ईरान ने खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने की कार्रवाई जारी रखी। यहीं मोदी की कूटनीति की असली परीक्षा सामने आती है। युद्ध के बीच उन्होंने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान से बातचीत की थी और साफ कहा था कि भारत सभी मुद्दों का समाधान संवाद और कूटनीति से चाहता है। साथ ही उन्होंने ऊर्जा और व्यापार के निर्बाध आवागमन तथा भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को भारत की प्राथमिकता बताया। दूसरी ओर उन्होंने यूएई, बहरीन, सऊदी अरब और कतर के नेताओं से अलग-अलग बातचीत कर उनके खिलाफ हुए हमलों की निंदा भी की थी। बहरीन के मामले में प्रधानमंत्री ने सीधे कहा था कि भारत हमलों की निंदा करता है और वहां के लोगों के साथ खड़ा है; सऊदी अरब और यूएई के संदर्भ में भी उन्होंने संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के उल्लंघन को गंभीरता से लिया था। यही संतुलन मोदी की विदेश नीति की ताकत है। ईरान से संबंध भी चाहिए और खाड़ी अरब देशों का भरोसा भी; रूस से रणनीतिक साझेदारी भी बचानी है और पश्चिम से आर्थिक-तकनीकी रिश्ते भी मजबूत करने हैं। भारत के लिए यह केवल प्रतिष्ठा का सवाल नहीं है। पश्चिम एशिया में करोड़ों भारतीयों के हित, ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा सीधे इससे जुड़ी है। मोदी ने ईरान से बातचीत में भी इसी व्यावहारिक प्राथमिकता को सामने रखा है। साथ ही इस पूरे समीकरण में चीन को अलग करके देखना भी संभव नहीं है। शी जिनपिंग की भारत यात्रा सात वर्ष बाद हो रही है और दोनों देशों के बीच रिश्तों में सावधानी के साथ सुधार की कोशिश दिखाई दे रही है। सीमा पर तनाव कम करना, आर्थिक रिश्तों को नियंत्रित तरीके से आगे बढ़ाना और प्रतिस्पर्धा के बावजूद संवाद बनाए रखना भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के लिए जरूरी है। इसलिए दिल्ली का ब्रिक्स सम्मेलन मोदी के लिए केवल शिखर सम्मेलन नहीं, बल्कि कूटनीतिक संतुलन का मंच है। एक ही मेज पर पुतिन, शी, पेजेश्कियान, सऊदी और यूएई नेतृत्व के बीच भारत यह दिखा सकता है कि रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ किसी खेमे से दूरी नहीं, बल्कि सभी से अपने हितों के आधार पर संवाद करने की क्षमता है। देखा जाये तो दुनिया आज अलग-अलग खेमों में बंटी हुई है। ऐसे समय में मोदी की कूटनीति की सबसे बड़ी ताकत यही है कि भारत किसी एक पक्ष के साथ खड़ा होने की बजाय सभी से संवाद बनाए रखता है। रूस से युद्ध खत्म करने की अपील हो, यूक्रेन से बातचीत, ईरान से संपर्क, खाड़ी देशों के साथ मजबूत रिश्ते, पश्चिम के साथ साझेदारी या चीन से संवाद, भारत हर मोर्चे पर अपने हितों को साधते हुए रिश्ते आगे बढ़ा रहा है। यही संतुलित कूटनीति भारत को इस उथल-पुथल भरी दुनिया में अपनी स्वतंत्र और मजबूत जगह बनाने में मदद कर रही है।
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बीएसपी में परिवार की कलह बढ़ीः मायावती ने भतीजे आकाश आनंद को पार्टी से निकाला
Mayawati expels Akash Anand from BSP- बीएसपी का संकट बढ़ता जा रहा है। मायावती ने 9 सितंबर को कहा था कि आकाश आनंद के ससुर अशोक सिद्धार्थ राजनीति से संन्यास की घोषणा करें। लेकिन अशोक ने आज राजनीति से संन्यास लिया। मायावती ने कहा- बहुत देर हो गई है।
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अमरावती अस्पताल अग्निकांड: तीन नवजातों की मौत पर पांच वरिष्ठ स्वास्थ्य अधिकारी निलंबित
मुंबई, 9 सितंबर (आईएएनएस)। महाराष्ट्र सरकार ने अमरावती जिला महिला अस्पताल की विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाई (एसएनसीयू) में 24 अगस्त को लगी आग में तीन नवजात शिशुओं की मौत के मामले में स्वास्थ्य विभाग के पांच वरिष्ठ अधिकारियों और कर्मचारियों को निलंबित करने का आदेश दिया है।
'समर्पित सेवा के 25 साल': भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन ने पीएम मोदी के बदलाव लाने वाले नेतृत्व को सलाम किया
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दिल्ली हाईकोर्ट ने एनआईए से पूछा, 'क्या कड़ी शर्तों के साथ इंजीनियर राशिद को जमानत दी जा सकती है?'
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Western Dedicated Freight Corridor क्या है? Modi के Infra Model की बड़ी तस्वीर हर कोई हैरान है
भारत के बुनियादी ढांचे में बड़े बदलाव अक्सर दिखाई देने वाली सड़कों और पुलों से नहीं, बल्कि उन नेटवर्कों से मापे जाते हैं जो देश की अर्थव्यवस्था की धड़कन को तेज करते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मंगलवार को वडोदरा में पश्चिमी Dedicated Freight Corridor (WDFC) के अंतिम तीन खंडों का उद्घाटन इसी श्रेणी की परियोजना है। गुजरात और महाराष्ट्र के बीच बने 326 किलोमीटर के इन तीन खंडों पर 20,700 करोड़ रुपये से अधिक खर्च हुए हैं। इनके साथ 1,506 किलोमीटर लंबा Western DFC पूरा हो गया है और Eastern DFC के साथ देश में समर्पित माल ढुलाई गलियारों का नेटवर्क अब 2,843 किलोमीटर तक पहुंच गया है। हम आपको बता दें कि इन अंतिम खंडों में New Sanand (N)-New Makarpura, New Umbergaon-New Saphale और New Saphale-JNPT शामिल हैं। खास महत्व महाराष्ट्र के Vaitarna (Saphale)-JNPT हिस्से का है, क्योंकि अब पश्चिमी गलियारे को जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट से सीधा संपर्क मिल गया है। इससे बंदरगाह से माल की आवाजाही और तेज होने तथा freight loading बढ़ने की उम्मीद है। हम आपको बता दें कि Western DFC मुख्य रूप से गुजरात और महाराष्ट्र के बंदरगाहों से उत्तर भारत की ओर जाने वाले ISO containers को ढोता है। JNPT, Mumbai Port, Pipavav, Mundra और Kandla जैसे बंदरगाहों से निकलने वाला माल Tughlakabad, Dadri, Dhandari Kalan और Khatuwas जैसे Inland Container Depots तक पहुंचता है। आगे चलकर fertiliser, foodgrain, salt, coal, iron, steel और cement जैसे भारी माल की ढुलाई भी इस नेटवर्क की बड़ी भूमिका होगी। दूसरी ओर 1,337 किलोमीटर लंबा Eastern DFC Ludhiana से Sonnagar तक फैला है और मुख्यतः पूर्वी भारत के coal तथा mineral traffic को संभालता है। इसका 936 किलोमीटर हिस्सा Sonnagar-Dadri के बीच electrified double line है, जबकि Sahnewal-Khurja का 401 किलोमीटर हिस्सा electrified single line है। यह गलियारा कई घनी आबादी वाले शहरों से होकर गुजरने के बजाय उन्हें बाईपास करता है, जिससे passenger routes पर दबाव भी कम होता है। इस पूरी परियोजना की असली ताकत केवल इसकी लंबाई नहीं, बल्कि इसकी रफ्तार और क्षमता है। दोनों Dedicated Freight Corridors पर अब लगभग 426 freight trains प्रतिदिन चल रही हैं। DFC पर मालगाड़ियों की औसत गति 50 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक रही है, जो गैर-DFC नेटवर्क की औसत freight speed की तुलना में लगभग दोगुनी है। अप्रैल-मई में EDFC की औसत गति 44.9 और 44.7 kmph, जबकि WDFC की 53.6 और 52.3 kmph दर्ज की गई। यानी अलग freight network ने transit time और लागत घटाने की दिशा में ठोस आधार तैयार किया है। हम आपको बता दें कि इस बदलाव की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि Howrah-Delhi और Mumbai-Delhi जैसे पुराने trunk routes अपनी क्षमता से कहीं अधिक दबाव झेल रहे थे। इन मार्गों पर line utilisation 115 से 150 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। परिणामस्वरूप मालगाड़ियों की आवाजाही प्रभावित हुई और सड़क परिवहन पर निर्भरता बढ़ी। दिलचस्प तथ्य यह है कि इन DFC corridors के समानांतर National Highways देश के कुल road network का केवल लगभग 0.5 प्रतिशत हैं, लेकिन करीब 40 प्रतिशत road freight संभालते हैं। देखा जाये तो यह परियोजना केवल रेलवे की कहानी नहीं है; यह भारत की आर्थिक रणनीति से जुड़ी है। रेलवे की कुल कमाई में freight revenue की हिस्सेदारी 65 प्रतिशत से अधिक है और यही आय passenger services को सब्सिडी देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। राष्ट्रीय रेल योजना का लक्ष्य rail freight share को मौजूदा लगभग 27 प्रतिशत से बढ़ाकर 2030 तक 45 प्रतिशत, यानी करीब 3,000 million tonnes तक ले जाना है। 2025-26 में रेलवे ने रिकॉर्ड 1,670 million tonnes loading दर्ज की। हम आपको बता दें कि इस महत्वाकांक्षी नेटवर्क की नींव हालांकि आज से नहीं, बल्कि अप्रैल 2005 की Japan-India बैठक में पड़ी थी। 2007 में feasibility study हुई और Dedicated Freight Corridor Corporation of India Limited (DFCCIL) को निर्माण, संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी मिली। परियोजना के लिए World Bank से 14,900 करोड़ रुपये और Japan International Cooperation Agency से 38,722 करोड़ रुपये की debt funding मिली, जबकि शेष राशि budgetary support से आई। अब मोदी सरकार की नजर अगले चरण पर है। इस वर्ष के बजट में Dankuni से Surat तक तीसरे Dedicated Freight Corridor की घोषणा की गई है और उसका Detailed Project Report तैयार किया जा रहा है। यह बताता है कि freight infrastructure को एक पूर्ण राष्ट्रीय नेटवर्क के रूप में देखने की सोच आगे बढ़ रही है। देखा जाये तो मोदी सरकार के दौर में जिस execution-oriented infrastructure approach पर जोर दिया गया है, Dedicated Freight Corridor उसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आता है। वर्षों पहले परिकल्पित परियोजना को चरणबद्ध तरीके से पूरा करके बंदरगाह, औद्योगिक केंद्र, माल गलियारे और उत्तर भारतीय बाजारों को एक तेज नेटवर्क से जोड़ना भारत की logistics क्षमता को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम है। आखिरकार, आधुनिक अर्थव्यवस्था में दूरी केवल किलोमीटर से नहीं मापी जाती, समय, लागत और भरोसेमंद कनेक्टिविटी ही वास्तविक दूरी तय करते हैं। 2,843 किलोमीटर का यह freight network उसी दूरी को छोटा करने की कोशिश है। अब चुनौती यह होगी कि इन तेज रेल लाइनों को पर्याप्त terminals, first-mile और last-mile connectivity तथा प्रतिस्पर्धी logistics व्यवस्था से जोड़ा जाए, ताकि रेल की बढ़ी क्षमता सीधे उद्योग, व्यापार और उपभोक्ता तक दिखाई दे। बहरहाल, Dedicated Freight Corridor जैसी परियोजनाएं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस इंफ्रास्ट्रक्चर विजन को रेखांकित करती हैं, जिसमें केवल परियोजनाओं की घोषणा नहीं, बल्कि उनके समयबद्ध क्रियान्वयन और अंतिम चरण तक निगरानी पर जोर दिखाई देता है। एक ही नेतृत्व द्वारा बड़ी परियोजनाओं का शिलान्यास करना और वर्षों बाद उनके तैयार हिस्सों का उद्घाटन करना इस बात का संकेत है कि सरकार बुनियादी ढांचे को महज घोषणाओं का विषय नहीं, बल्कि आर्थिक विकास की रीढ़ मानकर आगे बढ़ रही है। सड़क, रेलवे, बंदरगाह, माल ढुलाई गलियारे और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क, इन सभी क्षेत्रों में क्षमता बढ़ाने का यह प्रयास भारत की आर्थिक गति को मजबूत करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। खास तौर पर DFC जैसे प्रोजेक्ट में समय और परिवहन लागत घटने का सीधा लाभ उद्योग, व्यापार और निर्यात को मिल सकता है। यही वजह है कि आज भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार की चर्चा केवल नई परियोजनाओं की संख्या को लेकर नहीं, बल्कि उनके आकार, आपसी कनेक्टिविटी और जमीन पर उतरने की रफ्तार को लेकर भी हो रही है। -नीरज कुमार दुबे
38 साल बाद Sri Lanka की यात्रा पर गये भारतीय रक्षा मंत्री, पहुँचते ही China का सारा खेल पलट दिया
करीब 38 साल बाद किसी भारतीय रक्षा मंत्री का श्रीलंका पहुंचना हिंद महासागर की बदलती भू-राजनीति में भारत की उस रणनीतिक वापसी का संकेत है, जिसमें सुरक्षा, समुद्री शक्ति, आर्थिक साझेदारी और जनविश्वास, चारों मोर्चों को एक साथ साधा जा रहा है। इससे पहले 1988 में तत्कालीन रक्षा मंत्री केसी पंत श्रीलंका गए थे और अब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह कोलंबो की तीन दिवसीय यात्रा पर हैं। राजनाथ सिंह ने कोलंबो में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए जिस बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया, उसका रणनीतिक संदेश बेहद स्पष्ट था, “पड़ोसी बदले नहीं जा सकते।” उन्होंने कहा कि भारत श्रीलंका को अपना बेहद करीबी मित्र मानता है और संकट की किसी भी घड़ी में उसके साथ मजबूती से खड़ा रहेगा। यह केवल भावनात्मक बयान नहीं, बल्कि 2022 के आर्थिक संकट और 2025 में चक्रवात दित्वाह के बाद भारत की त्वरित सहायता से जुड़ी उस विश्वसनीयता का राजनीतिक विस्तार है, जिसे श्रीलंका में चीन के मुकाबले भारत की सबसे बड़ी ताकत माना जा सकता है। चीन के मुकाबले भारत की बढ़त क्यों अहम? श्रीलंका हिंद महासागर के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों के बीच स्थित है। कोलंबो, हंबनटोटा और अन्य बंदरगाहों की भौगोलिक स्थिति इसे भारत की समुद्री सुरक्षा के लिए असाधारण महत्व देती है। पिछले वर्षों में चीन की आर्थिक और बंदरगाह परियोजनाओं ने श्रीलंका को बीजिंग के रणनीतिक प्रभाव के केंद्र में ला दिया था। लेकिन मौजूदा घटनाक्रम संकेत देता है कि कोलंबो अब एकतरफा चीनी निर्भरता की बजाय संतुलित साझेदारी को प्राथमिकता दे रहा है। खुद श्रीलंका के Sunday Times ने राजनाथ सिंह के दौरे से पहले लिखा कि भारत चाहता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पिछली यात्रा के दौरान हुए समझौतों को तेजी से लागू किया जाए। अखबार ने यह भी रेखांकित किया कि सिंह की यात्रा ऐसे समय हो रही है जब श्रीलंका को अपने अंतरराष्ट्रीय संबंधों को अधिक सक्रियता से संचालित करना होगा। इसी अखबार के संपादकीय ने इससे भी बड़ा संकेत दिया। उसने हिंद महासागर में बढ़ती सैन्य गतिविधियों, समुद्री मार्गों और बंदरगाहों की भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच श्रीलंका को फिर से “geopolitical vortex” में बताया और चीन के संदर्भ में पहले सामने आए संदिग्ध शोध-पोतों के मुद्दे को याद किया। यानी श्रीलंका की अपनी मीडिया बहस भी यह स्वीकार कर रही है कि द्वीप की सुरक्षा और संप्रभुता अब सीधे हिंद महासागर की महाशक्ति प्रतिस्पर्धा से जुड़ी है। रक्षा सहयोग अब कागज से जमीन पर इस यात्रा का सबसे ठोस परिणाम तीन महत्वपूर्ण रक्षा समझौतों के रूप में सामने आ रहा है। इनमें दोनों देशों के National Cadet Corps के बीच सहयोग, भारत और श्रीलंका के National Defence Colleges के बीच साझेदारी तथा श्रीलंकाई वायुसेना के भारतीय मूल के L70 एंटी-एयरक्राफ्ट हथियारों के रखरखाव में भारत की सहायता शामिल है। भारत पहले ही 24 ऐसे हथियार श्रीलंका को दे चुका है और अब शेष छह की भी मुफ्त में मेंटेनेंस सहायता करेगा। यहां असली महत्व हथियारों से ज्यादा दीर्घकालिक सैन्य इंटरऑपरेबिलिटी और संस्थागत संबंधों का है। प्रशिक्षण, रक्षा शिक्षा और उपकरणों का रखरखाव किसी देश को केवल हथियार बेचने से कहीं ज्यादा गहरे सुरक्षा रिश्ते में बांधता है। इसके साथ ही कोलंबो बंदरगाह पर भारतीय नौसेना के INS Udaygiri की मौजूदगी ने यात्रा को स्पष्ट समुद्री आयाम भी दे दिया है। दिल जीतने की कूटनीति राजनाथ सिंह ने केवल रक्षा की भाषा नहीं बोली। उन्होंने भारत की आर्थिक क्षमता, तेजी से बदलती अर्थव्यवस्था और वैश्विक भूमिका को भी सामने रखा। उन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था के करीब 4 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने, 7.8 प्रतिशत तिमाही वृद्धि और वैश्विक विकास में 16 प्रतिशत से अधिक योगदान का उल्लेख किया। यह संदेश श्रीलंका के लिए महत्वपूर्ण है कि भारत अब केवल सुरक्षा प्रदाता नहीं, बल्कि आर्थिक अवसरों का स्रोत भी है। उधर, श्रीलंका के राजनीतिक और सामाजिक हलकों में भी इस रिश्ते की सकारात्मक स्वीकार्यता दिखाई दे रही है। पूर्व ईस्टर्न प्रोविंस गवर्नर और सीलोन वर्कर्स कांग्रेस नेता सेंथिल थोंडामन ने राजनाथ सिंह की यात्रा को दोनों देशों की रक्षा साझेदारी मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण कदम बताया और कहा कि श्रीलंका ने सरकारें बदलने के बावजूद भारत के साथ रक्षा क्षेत्र में सहयोग बनाए रखा है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को श्रीलंका के लोगों द्वारा “बड़े भाई” की तरह स्वीकार किए जाने की बात भी कही। रणनीतिक निष्कर्ष: भारत ने बाजी कैसे पलटी? देखा जाये तो यह स्पष्ट है कि भारत ने श्रीलंका को चीन की एकाधिकारवादी रणनीतिक निर्भरता की ओर जाने से रोकने के लिए एक मजबूत वैकल्पिक सुरक्षा और आर्थिक ढांचा खड़ा कर दिया है। यही इस यात्रा की सबसे बड़ी रणनीतिक जीत है। भारत ने सैन्य शक्ति के साथ विश्वसनीयता, संकट में मदद, सांस्कृतिक निकटता, आर्थिक अवसर और जनसंपर्क को एक पैकेज में बदल दिया है। श्रीलंका को यह संदेश मिल रहा है कि भारत उसके सामने कोई दूर की महाशक्ति नहीं, बल्कि वह पड़ोसी है जो संकट में सबसे पहले पहुंच सकता है। हिंद महासागर के इस निर्णायक भूगोल में यही भारत की सबसे बड़ी बढ़त है। चीन बंदरगाहों और परियोजनाओं के जरिए प्रभाव बनाता है, जबकि भारत अब सुरक्षा, साझेदारी और भरोसे के जरिए अपना प्रभाव गहरा कर रहा है। राजनाथ सिंह की कोलंबो यात्रा केवल रक्षा कूटनीति नहीं; यह हिंद महासागर में भारत की रणनीतिक वापसी और श्रीलंका के दिल-दिमाग दोनों में अपनी जगह मजबूत करने की कवायद है। -नीरज कुमार दुबे
'तुष्टीकरण के आगे कांग्रेस ने किया आत्मसमर्पण', वंदे मातरम विवाद पर ओपी चौधरी
'तुष्टीकरण के आगे कांग्रेस ने किया आत्मसमर्पण', वंदे मातरम विवाद पर ओपी चौधरी
'वंदे मातरम' के पूर्ण गायन के दौरान एनसी नेताओं के खड़े होने पर भाजपा ने की सराहना, कांग्रेस पर कसा तंज
Modi Vadodara Event: नौजवानों का मोहभंग और Rahul की नकल! क्या Modi का दांव उलटा पड़ गया?
पूर्वी प्रांत ने कैसे लिया राइट टर्न, Germany के सबसे खतरनाक आदमी को मिलने वाली है सत्ता?
किस तरह एक विधानसभा चुनाव ने जर्मनी के भीतर भौगोलिक और वैचारिक दरार को इतना पुख्ता कर दिया है कि इसे देश के आधुनिक दौर का सबसे खतरनाक पल माना जा रहा है और क्यों जर्मनी के एक असेंबली रिजल्ट से पुतिन बहुत खुश होंगे। इस बरस 3 अक्टूबर को जर्मनी अपना 36वां टाक डे डचिन आइनहाइट मनाएगा यानी एकीकरण दिवस। 3 अक्टूबर 1990 को दो हिस्सों में बटे जर्मनी के एक होने की सालगिरह। उसी दिन जर्मन डेमोक्रेटिक रिपब्लिक जीडीआर आधिकारिक रूप से खत्म हो गया। लेकिन जमीन पर जर्मनी के दो हिस्सों का बंटवारा कायम रहा और यह विभाजन लगातार गहराता गया और इसी की एक परिणति हुई इस 6 सितंबर को बैलेट पेपर के जरिए। जर्मनी के 16 राज्यों में से एक आकार में बम मुश्किल भारत के मणिपुर या मिजोरम जितना बड़ा करीब सवा 5 लाख की आबादी। एएफडी यानी अल्टरनेटिव फॉर डचैंड। 2026 में 39 सीट जीतकर सबसे बड़ी पार्टी 2021 के चुनाव में इसे 23 सीटें मिली थी। सीडीयू यानी क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन। जर्मनी में अभी केंद्र में जो सरकार है उसका नेतृत्व इसी के पास है और सेक्सनी अनहल्ट में राज्य सरकार को भी यही इसी यही पार्टी लीड कर रही थी। ताजा चुनाव में उसे मिली 15 सीटें। पिछले चुनाव में मिली थी 40 सीटें। डी लिंकर यानी लेफ्ट पार्टी को अभी मिली आठ, 2021 में 12 सीट, एसपीडी यानी सोशल डेमोक्रेट्स को 2026 में आठ सीट, 2021 में नौ सीट, ग्रीस को अभी आठ, 2021 में छह सीट, बीएसडब्ल्यू यानी ज़ारा वागन क्लिष्ट पार्टी को पांच सीट। इसे भी पढ़ें: दिल्ली की मतदाता सूची में राघव चड्ढा का नाम शामिल, AAP ने उठाए प्रक्रिया पर सवाल 35 साल के उलरिष जीत के हीरो 35 साल के उलरिष जिगमुंड 2016 से सैक्सनी अनहाल्ट की विधानसभा के सदस्य है। सोशल मीडिया पर अच्छी पकड़ है। माना जाता है कि उनकी जीत में Gen Z के समर्थन का बड़ा हाथ है। वह अपनी पार्टी के कट्टरपंथी नेताओ के मुकाबले ज्यादा नरम माने जाते है। जिगमुंड ने कहा कि लोगों ने साफ कर दिया है कि वे राजनीतिक बदलाव चाहते हैं। प्रवासियों पर कड़े AfD का जोर अवैध प्रवास रोकने, प्रवासियों को मिलने वाली सुविधाओं में कटौती और बड़ी संख्या में लोगों को वापस भेजने की नीति पर है। चुनाव में यह बहस का मुद्दा बना। इसे भी पढ़ें: Satya Niketan हादसे में AAP नेता Saurabh Bhardwaj का गंभीर आरोप, बचाव कार्य में Mobile Jammers का हुआ इस्तेमाल चांसलर को झटका जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ल्स और उनकी पार्टी क्रिश्चियन डेमोक्रेट्स (सीडीयू) के लिए बड़ा झटका है, जिसे महज 17.2% वोट मिले है। CDU 24 साल से इस प्रांत में सत्ता में थी। AfD की जीत से जुड़े सवाल पूर्वी जर्मनी के एक छोटे राज्य में धुर-दक्षिणपंथी पार्टी AfD की जीत से पूरे यूरोप में खलबली मची है। जर्मनी में जिन वजहों से पार्टी को जीत मिली, वैसे मुद्दे ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, स्पेन में भी उठाए जाते रहे है। अगले साल फ्रांस, इटली, स्पेन में चुनाव है, जहां धुर-दक्षिणपंथी नेता मजबूत हो रहे है। ये AfD के तरीकों का इस्तेमाल कर चुनाव जीतने की कोशिश कर सकते है। पर इन नेताओं का सत्ता में आना उदारवादी लोकतंत्र के लिए बुरी खबर है। रूस ने इस जीत को ऐतिहासिक बताया है। फ्रांस ने इसे पूरे यूरोप के लिए गंभीर समय बताया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया पर नतीजे की तस्वीर साझा की। इनकी छवि कैसी है? एक प्रतिष्ठित जर्मन पत्रिका है डे एश पीगल। 14-15 अगस्त को आई मैगज़ीन की कवर स्टोरी पर उलश की तस्वीर थी। शीर्षक था जर्मनी में सबसे खतरनाक इंसान ना उलरिश और ना उनके समर्थकों को इस विशेषण से कोई फर्क पड़ा बल्कि वो इसे कॉम्प्लीमेंट की तरह सराते दिखे। इलेक्शन कैंपेन से यह तस्वीरें आई कि किस तरह सपोर्टर टीशर्ट पर शपीगल कवर स्टोरी की फोटो छपवाकर घूम रहे थे। यहां तक कि शपीगल के उस एडिशन पर उलश से दस्तखत की फरमाइश भी हो रही थी। क्या है परिचय उलश का?
सोने में तेजी, चांदी 2.40 लाख के पार
मुंबई, वैश्विक स्तर पर अस्थिरता से सुरक्षित निवेश की मांग बढ़ने से सोना और चांदी में बुधवार को तेजी देखी गई।
तेलंगाना विधानसभा से बीआरएस के 21 विधायक मानसून सत्र की बाकी अवधि के लिए निलंबित
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दिल्ली में मणिपुर के संगीतकार पर 4-5 युवकों ने किया था लात-घूसों से हमला, बेटे ने दर्ज कराई एफआईआर
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समाजवादी छात्रसभा का ड्रेस कोड बदलने पर सपा सांसद बोले- 'यह समतामूलक समाज बनाने का संदेश'
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पहली ही परीक्षा में फेल हो गया Makkah Pact, Saudi पर Houthi Attack होते ही छिप गयी Munir की सेना
मक्का पैक्ट को बने अभी ज्यादा वक्त नहीं बीता, लेकिन उसकी पहली बड़ी परीक्षा ने ही इस रक्षा समझौते की असली ताकत पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सऊदी अरब पर हूती मिसाइलों और ड्रोन की बारिश हुई, दक्षिणी शहरों में नागरिक और आर्थिक प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया, ऊर्जा प्रतिष्ठानों में आग लगी और 73 लोग घायल हुए, लेकिन मैदान में दिखाई दी तो सिर्फ निंदा। पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ “पूरी एकजुटता” जताई, उसकी संप्रभुता की रक्षा के अधिकार का समर्थन किया और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हमलों की कड़ी निंदा की। मगर सवाल यह है कि जिस समझौते की बुनियाद ही इस सिद्धांत पर रखी गई है कि एक सदस्य पर हमला तीनों पर हमला माना जाएगा और मिलकर उसका जवाब दिया जाएगा, उसकी पहली अग्निपरीक्षा में बाकी दो साझेदारों की सामूहिक ताकत आखिर नजर क्यों नहीं आ रही? दुनिया देख रही है कि एक मंच पर बैठे तीन देशों में से एक पर संकट आया तो असीम मुनीर की सेना दुबक गयी। दुनिया देख रही है कि बड़े बड़े बिल्ले सीने पर टांग कर घूमने वाले मुनीर निंदा वाला बयान देने के लिए भी सामने नहीं आये और इस काम के लिए शहबाज शरीफ को आगे कर दिया। उल्लेखनीय है कि मक्का में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने जिस संयुक्त रक्षा समझौते को औपचारिक रूप दिया था, उसका मूल सिद्धांत यही बताया गया था कि किसी एक सदस्य के खिलाफ आक्रामकता को तीनों की सुरक्षा के लिए खतरे के तौर पर देखा जाएगा। समझौते में सैन्य समन्वय, खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान, रणनीतिक परामर्श और रक्षा योजना जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की बात है। लेकिन अब असली सवाल कागज पर लिखे सिद्धांतों का नहीं, उनके अमल का है। सऊदी अरब के अबहा, खमिस मुशैत, जाजान और नजरान में हूतियों के हमलों ने इस सवाल को और तीखा कर दिया है। सऊदी अधिकारियों के अनुसार हमलों में 73 लोग घायल हुए और महिलाओं तथा बच्चों के भी घायल होने की बात सामने आई। कई ऊर्जा प्रतिष्ठानों में आग लगी और कुछ जगहों पर संचालन अस्थायी रूप से रोकना पड़ा। हूतियों ने हमलों की जिम्मेदारी लेते हुए दावा किया कि उन्होंने अबहा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे, किंग खालिद एयर बेस और अरामको से जुड़े प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया। रियाद ने इसे खतरनाक और गैर-जिम्मेदाराना उकसावे वाली कार्रवाई बताते हुए जवाब देने की चेतावनी दी है। सऊदी नेतृत्व का कहना है कि देश की संप्रभुता, नागरिकों और राष्ट्रीय संपत्तियों की रक्षा के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जाएंगे। दूसरी ओर हूती इन हमलों को यमन में सऊदी समर्थित बलों की कार्रवाई का जवाब बता रहे हैं। उनका दावा है कि पिछले दिनों यमन के कई इलाकों में 120 से ज्यादा हवाई हमले हुए और एक जेल पर हमले में 11 लोगों की मौत हुई। यानी यह सिर्फ एकतरफा हमला नहीं, बल्कि तेजी से बढ़ता प्रतिशोध का चक्र है। यहीं पाकिस्तान पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। इस्लामाबाद ने कहा कि वह सऊदी अरब की संप्रभुता और सुरक्षा के साथ खड़ा है। लेकिन क्या “निंदा” और “समर्थन” ही उस रक्षा समझौते की पूरी सीमा है, जिसके बारे में सामूहिक सुरक्षा और सामूहिक प्रतिरोध की बातें की गई थीं? अगर नहीं, तो पाकिस्तान की वास्तविक भूमिका क्या होगी? क्या वह सैन्य सहयोग करेगा, खुफिया सहायता देगा, हवाई सुरक्षा में मदद करेगा या केवल बयान जारी करता रहेगा? साथ ही सवाल सिर्फ पाकिस्तान का नहीं है। तुर्किये कहां है? जिस त्रिपक्षीय ढांचे को क्षेत्रीय स्थिरता और सामूहिक सुरक्षा का माध्यम बताया गया था, उसकी विश्वसनीयता तभी साबित होगी जब संकट के समय उसके सदस्य अपनी प्रतिबद्धताओं को व्यवहार में बदलें। सवाल उठता है कि अगर संकट के वक्त भी सैन्य गठबंधन केवल बयानबाजी तक सीमित रहे, तो उसकी विश्वसनीयता कितनी है? देखा जाये तो खतरा इसलिए भी बड़ा है क्योंकि हूती-सऊदी टकराव अकेला मोर्चा नहीं है। हूती लाल सागर और बाब-अल-मंदेब के आसपास समुद्री यातायात को निशाना बनाने की क्षमता पहले ही दिखा चुके हैं। जुलाई में उन्होंने सऊदी तेल टैंकरों पर हमले और रियाद के खिलाफ समुद्री नाकाबंदी की घोषणा की थी। दूसरी तरफ सऊदी समर्थित यमनी बल हूतियों के खिलाफ जवाबी अभियान चला रहे हैं। दक्षिण-पश्चिमी यमन में लड़ाई तेज होने से सैकड़ों लोगों के मारे जाने और हजारों के विस्थापित होने की खबरें हैं। सबसे खतरनाक बात यह है कि यह संघर्ष उस समय भड़क रहा है जब अमेरिका और ईरान के बीच रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर तनाव अलग मोर्चे पर चल रहा है। एक तरफ फारस की खाड़ी और होर्मुज, दूसरी तरफ लाल सागर और बाब-अल-मंदेब, दोनों समुद्री गलियारों पर संकट एक साथ गहराया तो इसका असर सिर्फ मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा। सऊदी ऊर्जा ढांचे पर लगातार हमले वैश्विक तेल बाजार के लिए बड़ा झटका बन सकते हैं। शुरुआती हमलों के बाद ही कच्चे तेल की कीमतों में उछाल दर्ज किया गया है। यदि रिफाइनरी, पाइपलाइन, प्रसंस्करण केंद्र या निर्यात ढांचा लगातार निशाने पर आया तो बाजार में वास्तविक सप्लाई पर असर हो सकता है। इसका असर पेट्रोल-डीजल से लेकर परिवहन, विनिर्माण और महंगाई तक पहुंच सकता है। भारत के लिए खतरा और सीधा है। खाड़ी से ऊर्जा आयात और लाल सागर से जुड़ा समुद्री व्यापार दोनों क्षेत्रीय स्थिरता पर निर्भर हैं। होर्मुज और लाल सागर दोनों बाधित हुए तो तेल आयात महंगा होगा, जहाजों को लंबा रास्ता अपनाना पड़ सकता है, बीमा और माल ढुलाई की लागत बढ़ सकती है और इसका असर भारतीय अर्थव्यवस्था तथा आम उपभोक्ता तक पहुंच सकता है। यहां एक सवाल और उठता है कि क्या यह एक और मध्य-पूर्वी युद्ध की शुरुआत हो सकती है? देखा जाये तो एक संभावना यह है कि सऊदी अरब सीमित जवाबी कार्रवाई करे और कूटनीति के जरिए स्थिति को नियंत्रित किया जाए। दूसरी संभावना है कि यमन का युद्ध फिर अपने पुराने खूनी दौर में लौट जाए। लेकिन सबसे भयावह स्थिति तब होगी जब ये अलग-अलग संघर्ष एक-दूसरे में मिल जाएं। अगर हूती सऊदी अरब पर हमले बढ़ाते हैं, रियाद बड़े सैन्य अभियान की ओर जाता है, अमेरिका-ईरान टकराव तेज होता है और लाल सागर में जहाजों पर हमले बढ़ते हैं, तो यमन, सऊदी अरब, ईरान और अमेरिका के अलग-अलग मोर्चे एक ही युद्धक्षेत्र में बदल सकते हैं। तब मक्का पैक्ट की असली परीक्षा भी होगी और उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी सामने आएगी। देखा जाये तो रक्षा समझौते की विश्वसनीयता केवल इस बात से तय नहीं होती कि संकट के बाद किसने कितनी कड़ी भाषा में बयान दिया। वह इस बात से तय होती है कि संकट आने पर कौन कितना आगे खड़ा हुआ। फिलहाल सऊदी अरब पर हमले जारी हैं, हूती जवाबी कार्रवाई की धमकी दे रहे हैं और रियाद भी पीछे हटने के संकेत नहीं दे रहा। ऐसे में पाकिस्तान के सामने भी साफ सवाल है। क्या वह सिर्फ सऊदी अरब के लिए “हम आपके साथ हैं” कहेगा, या मक्का में किए गए सामूहिक सुरक्षा के वादे को किसी ठोस रणनीतिक कार्रवाई में बदलेगा? अगर जवाब सिर्फ निंदा है, तो फिर सवाल उठना स्वाभाविक है कि मक्का पैक्ट आखिर रक्षा समझौता है या निंदा का नया मंच? -नीरज कुमार दुबे
गृहमंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष सहित कई नेताओं ने भारतेंदु हरिश्चंद्र को जयंती पर किया नमन
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कर्नाटक के लोक निर्माण मंत्री सतीश जारकीहोली के 15 ठिकानों पर ईडी का छापा
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कांग्रेस ने बंगाल में जिंदा होने का सबूत देने के लिए दर्ज कराई धीरेंद्र शास्त्री पर एफआईआर : दिलीप घोष
ओडिशा में भाजपा खनन नीति के खिलाफ इंडिया गठबंधन का आंदोलन
ओडिशा में इंडिया गठबंधन ने राज्य की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार की खनन नीति के खिलाफ मंगलवार को राज्यव्यापी प्रतिरोध आंदोलन का एलान किया
समाजवादी पार्टी की छात्र इकाई के ड्रेस का रंग नीला किए जाने को लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में बयानबाजी तेज हो गई है
दिल्ली के मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने उद्योगों को बढ़ावा देने वाली योजनाओं की समीक्षा की
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भारतीय पत्थर कला की वैश्विक यात्रा
भारत में पत्थर तराशने की परंपरा दुनिया की सबसे समृद्ध परंपराओं में से एक है। सातवीं शताब्दी ईसा पूर्व से यहां राजमिस्त्रियों और शिल्पियों के गिल्ड मौजूद रहे हैं, और यह हुनर पीढ़ी-दर-पीढ़ी सौंपा जाता रहा
हिमाचल ने दुर्लभ रिकॉर्ड के 17 लाख आर्काइव पेजों को डिजिटाइज किया
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1.3 लाख करोड़ की फ्रेट कॉरिडोर परियोजना राष्ट्र को समर्पित, महाराष्ट्र को मिलेगा बड़ा फायदा
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आखिर युवाओं के बीच क्यों नहीं चमक पा रहे हैं भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन?
भाजपा के राजनीतिक गलियारों में एक सवाल सबको बेचैन किए हुए है कि आखिर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन युवाओं के बीच क्यों नहीं चमक पा रहे हैं? क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, सपा मुखिया अखिलेश यादव, राजद सुप्रीमो तेजस्वी यादव, आप नेता अरविंद केजरीवाल, जनसुराज नेता प्रशांत किशोर आदि जैसे राजनीतिक क्षत्रपों को सियासी रूप से निपटाने के लिए नितिन नवीन के रूप में जो राजनीतिक तुरूप का पत्ता चला है, वह अब मनहूसियत की ओर अग्रसर है! कहीं विपक्ष के इशारे पर थिरक रहा जेन-जी भारी पड़ रहा है तो कहीं सवर्ण संगठनों का जनप्रदर्शन भाजपा नेतृत्व की रीति-नीति पर सवालों के गोले बरसा रहा है। वहीं कांग्रेस व उसके समर्थक दल जिस तरह से अपने अपने मुद्दों पर भाजपा को घेर रहे हैं, उससे पार्टी के कट्टर समर्थकों में भी ऊहापोह मची हुई है! पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन उनकी उपलब्धि जरूर है, लेकिन सवाल तो यहां तक उठ रहे हैं कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह पार्टी की कीमत पर उन्हें एक सीमा के बाद युवाओं के बीच चमकने नहीं देना चाहते और पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा की तरह सिर्फ अपना-अपना अनुगामी बनाए रखना चाहते हैं? चूंकि नितिन नवीन के ऊपर पीएम मोदी का ठप्पा लगा हुआ है, इसलिए उनपर एक सीमा के बाद बड़े नेता विश्वास भी नहीं कर पा रहे हैं और अफवाह उड़वा रहे हैं कि नितिन नवीन में नैसर्गिक नेतृत्व क्षमता की कमी है? इससे मोदी-भागवत दोनों परेशान हैं। राजनीतिक विश्लेषक की मानें तो यह सवाल असल में नितिन नवीन की व्यक्तिगत क्षमता से ज्यादा भाजपा के सत्ता-संगठन मॉडल का सवाल है? अभी उपलब्ध घटनाक्रम को देखकर सीधे यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या गृहमंत्री अमित शाह उन्हें “चमकने नहीं देना चाहते”। लेकिन यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या भाजपा में किसी राष्ट्रीय अध्यक्ष को अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाने की पर्याप्त जगह मिलती है? इसे भी पढ़ें: पुरानी 'साइकिल' में सपा ने लगाये नए 'राजनीतिक पुर्जे', अखिलेश की ‘शार्प’ और डिंपल की ‘सॉफ्ट’ राजनीति क्या गुल खिलाएगी? देखा जाए तो अगस्त 2026 में नितिन नवीन ने स्वयं Gen Z outreach की रणनीति पर बड़ी बैठक की, जिसमें करीब 45 नेताओं ने हिस्सा लिया। इस बैठक में पार्टी ने युवाओं के मुद्दों और उनसे संवाद की रणनीति पर जोर दिया है, हालांकि सर जमीन पर ऐसा कुछ होता हुआ दिखाई नहीं पड़ रहा है, क्योंकि इसमें युवा कम दिलचस्पी लेते दिखाई दे रहे हैं। लिहाजा, मेरे आकलन में तीन संभावनाएँ हैं:- पहली, यह “नियंत्रित नेतृत्व” की रणनीति हो सकती है: भाजपा में प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह की राजनीतिक ब्रांड-शक्ति इतनी बड़ी है कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का स्वतंत्र जन-नेता के रूप में उभरना आसान नहीं है। पार्टी अध्यक्ष का प्राथमिक काम संगठन, चुनाव और रणनीति का संचालन रहता है; लेकिन प्रधानमंत्री की लोकप्रियता का समानांतर राष्ट्रीय चेहरा बनना उसका घोषित उद्देश्य नहीं होता। इसलिए नितिन नवीन की दृश्यता कम होना अपने-आप में यह साबित नहीं करता कि उन्हें जानबूझकर रोका जा रहा है। दूसरी, नितिन नवीन अभी “राष्ट्रीय नेता” बनने की प्रक्रिया में हैं: वे भाजपा के सबसे युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और उनकी नई राष्ट्रीय टीम में अनुभव तथा युवा ऊर्जा को मिलाने की कोशिश दिखाई देती है। लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना और राष्ट्रीय जननेता बनना दो अलग चीजें हैं। ऐसा इसलिए कि राष्ट्रीय जननेता बनने के लिए चाहिए: अपनी विशिष्ट राजनीतिक भाषा, युवाओं के बीच स्वतः आकर्षण, लगातार देशव्यापी उपस्थिति, कठिन मुद्दों पर स्वतंत्र विचार, संगठन से बाहर भी व्यक्तिगत जनाधार, मीडिया और सोशल मीडिया में अपनी पहचान, लेकिन इनमें से अधिकांश का मूल्यांकन अभी करना जल्दी होगा। तीसरी, सबसे दिलचस्प संभावना: नितिन नवीन की क्षमता है, लेकिन उनकी “राजनीतिक ब्रांडिंग” अभी विकसित नहीं हुई है: यही वह जगह है जहाँ मैं आपकी पिछली बात से सहमत हूँ कि युवाओं को जोड़ना केवल कार्यक्रमों से नहीं होगा। पार्टी अभी bike yatras, hackathons, marathons, campus activities और social-media outreach जैसी योजनाओं पर विचार कर रही है। लेकिन युवा किसी नेता से केवल यह नहीं सुनना चाहता कि “मोदी सरकार ने यह किया”, बल्कि अब वह पूछता है: “आप स्वयं मेरे लिए क्या सोचते हैं?” यहीं नितिन नवीन को अपनी अलग पहचान बनानी होगी। असली परीक्षा यही है! ऐसे में अगर नितिन नवीन हर भाषण में मोदी सरकार की उपलब्धियों के प्रवक्ता बने रहेंगे, तो वे संगठन के सफल अध्यक्ष हो सकते हैं, लेकिन युवा जननेता बनने में कठिनाई होगी। लेकिन यदि वे कहें—“मोदी जी ने भारत को 2047 का लक्ष्य दिया है; अब मेरी पीढ़ी तय करेगी कि उस भारत की शिक्षा, रोजगार, AI, उद्यमिता और राजनीति कैसी होगी।” तो एक अलग राजनीतिक आवाज पैदा होगी। # सवाल है कि क्या स्वाभाविक उभार से मोदी-शाह उन्हें रोकेंगे? मेरे पास ऐसा कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं है कि मोदी या शाह नितिन नवीन को युवाओं के बीच उभरने से रोक रहे हैं। उलटे, उपलब्ध रिपोर्टों में मोदी और शाह की ओर से युवाओं को केंद्र में रखने की बात तथा नितिन नवीन के नेतृत्व में Gen Z outreach को आगे बढ़ाने की तस्वीर मिलती है। लेकिन भाजपा की राजनीतिक संस्कृति में एक संस्थागत सीमा जरूर है, वह यह कि - मोदी = सर्वोच्च राष्ट्रीय राजनीतिक ब्रांड। शाह = संगठन/रणनीति का शक्तिशाली केंद्र। राष्ट्रीय अध्यक्ष = संगठन का चेहरा और समन्वयक। नितिन नवीन को इस ढाँचे के भीतर रहते हुए “अपनी जगह” बनानी होगी। और अगर प्राकृतिक नेतृत्व क्षमता की बात करें? तो अभी फैसला देना जल्दबाजी होगा, बल्कि मैं नितिन नवीन के लिए अगले 12–18 महीने को नेतृत्व की अग्निपरीक्षा मानूंगा। तब देखना होगा कि क्या वे युवाओं के बीच बिना प्रधानमंत्री के नाम के भी भीड़ आकर्षित कर सकते हैं? बेरोजगारी, परीक्षा, शिक्षा और AI जैसे असुविधाजनक सवालों पर अपनी भाषा विकसित करते हैं? भाजपा के पुराने कार्यकर्ताओं के साथ-साथ नए युवाओं को भी नेतृत्व में ऊपर लाते हैं? सोशल मीडिया पर केवल पार्टी का संदेश दोहराने के बजाय अपना राजनीतिक विचार रखते हैं? किसी संकट में स्वयं आगे आकर समाधान प्रस्तुत करते हैं? राज्यों में जाकर “नितिन नवीन मॉडल” जैसी कोई संगठनात्मक पहचान बनाते हैं? अगर इन छह सवालों का जवाब अगले डेढ़ साल में हाँ होता है, तो यह कहना मुश्किल होगा कि उनमें प्राकृतिक नेतृत्व क्षमता नहीं है। वहीं, नितिन नवीन के सामने सबसे बड़ा खतरा मोदी-शाह से कम और “सिर्फ अध्यक्ष रह जाने” का ज्यादा है। राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में वे सफल हो सकते हैं—बैठकें करें, संगठन विस्तार करें, चुनाव जिताएँ, पदाधिकारी नियुक्त करें। उनकी नई राष्ट्रीय टीम में अनुभवी और युवा नेताओं का मिश्रण भी इसी संगठनात्मक भूमिका की ओर संकेत करता है। लेकिन इतिहास में कुछ अध्यक्ष संगठन के पदाधिकारी बनकर रह जाते हैं और कुछ अपने दौर के राजनीतिक चेहरे बन जाते हैं। लिहाजा, नितिन नवीन को दूसरा रास्ता चुनना होगा। और इसके लिए शायद उन्हें मोदी-शाह से टकराने की जरूरत नहीं है; यह उनका स्वभाव भी नहीं है। इसलिए उन्हें मोदी-शाह की छाया के भीतर अपनी राजनीतिक धूप पैदा करनी होगी। यही उनकी वास्तविक नेतृत्व-परीक्षा है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
'विकसित भारत' संवाद के लिए दौड़ में एक करोड़ युवाओं के शामिल होने की उम्मीद
'विकसित भारत' संवाद के लिए दौड़ में एक करोड़ युवाओं के शामिल होने की उम्मीद
ब्रिक्स 2026: भारत की कूटनीतिक क्षमताओं को चुनौती देता
2026 में ग्लोबल जियो पॉलिटिक्स के मौजूदा माहौल के आधार पर, ब्रिक्स एक इकोनॉमिक इन्वेस्टमेंट के शॉर्ट फॉर्म से बढ़कर एक बड़ी इंस्टीट्यूशनल ताकत बन गया है जो उभरते हुए मल्टीपोलर वर्ल्ड ऑर्डर को आकार दे रहा है। इसके महत्व, उपलब्धियों, चुनौतियों और ब्रिक्स विरोधी बातों को सुलझाने के प्रयासों को समझना आवश्यक है। मल्टीपोलर दुनिया में ब्रिक्स का महत्व ब्रिक्स ग्लोबल साउथ के हितों को बताने और एक ज़्यादा संतुलित बहुध्रुवीय विश्व बनाने के लिए एक बुनियादी प्लेटफ़ॉर्म बन गया है। 2025 तक, ब्रिक्स के सदस्य देश दुनिया की लगभग 48% आबादी और परचेसिंग पावर पैरिटी (पी पी पी) के आधार पर ग्लोबल जीडीपी का 39% हिस्सा थे। भारत की 2026 ब्रिक्स प्रेसीडेंसी के तहत, इस की गाइडिंग थीम बिल्डिंग फॉर रेजिलिएंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन और सस्टेनेबिलिटी है। कमज़ोर ग्लोबल गवर्नेंस, प्रोटेक्शनिस्ट पॉलिसी और बढ़ती जियोपॉलिटिकल अनिश्चितता के दौर में, ब्रिक्स साउथ-साउथ सहयोग के लिए एक सही विकल्प देता है जो पारंपरिक दबदबे और हुक्म से रहित है। यह उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं को अपनी पार्टनरशिप में विविधता लाने और ग्लोबल गवर्नेंस में अपनी आवाज़ बुलंद करने की इजाज़त देता है, बिना कोल्ड वॉर-स्टाइल के बाइनरी अलाइनमेंट में मजबूर हुए। ब्रिक्स की खास उपलब्धियां ब्रिक्स ने कई उपलब्धियां हासिल की हैं। इसका सफ़र आसान नहीं था। कई चुनौतियों के बावजूद यह अपने अनेक लक्ष्यों को हासिल कर सका। कुछ मुख्य उपलब्धियां हैं: स्ट्रेटेजिक विस्तार: ब्रिक्स ने सफलतापूर्वक अपनी पहुंच बढ़ाई है। 2026 तक, इस ब्लॉक में ऑफिशियली 11 सदस्य देश शामिल हैं: ओरिजिनल पांच (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) प्लस मिस्र, इथियोपिया, ईरान, इंडोनेशिया, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब (हालांकि सऊदी अरब अपने फॉर्मल स्टेटस को लेकर कुछ डिप्लोमैटिक अस्पष्टता बनाए हुए है)। पार्टनर देशों का संस्थागतकरण: मुख्य फैसले लेने की क्षमता को कम किए बिना अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए, ब्रिक्स ने एक फॉर्मल पार्टनर देश कैटेगरी शुरू की। 2025 में, दस देश—बेलारूस, बोलीविया, क्यूबा, कज़ाकिस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज़्बेकिस्तान और वियतनाम—ऑफिशियल पार्टनर के तौर पर शामिल हुए, जिससे एंगेजमेंट के लिए एक फ्लेक्सिबल फ्रेमवर्क बना। न्यू डेवलपमेंट बैंक (एन डी बी) की उपलब्धियाँ: एन डी बी ने हाल ही में अपनी 10वीं वर्षगाँठ मनाई, जिसमें क्लीन एनर्जी, ट्रांसपोर्ट और सस्टेनेबल डेवलपमेंट में 120 से ज़्यादा बड़े प्रोजेक्ट्स को फाइनेंस किया गया। इसने ग्लोबल साउथ को पार्टनरशिप, सॉवरेनिटी और शेयर्ड प्रायोरिटीज़ पर बना एक मल्टीलेटरल डेवलपमेंट बैंक सफलतापूर्वक दिया है, न कि वेस्टर्न-लेड फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन्स से जुड़ी कंडीशनैलिटीज़ पर। इंट्रा-ब्रिक्स ट्रेड ग्रोथ: मेंबर्स के बीच दो दशकों के ट्रेड एक्सपेंशन ने डेवलप हो रहे इकोनॉमिक संबंधों को सामने लाया है, जिससे साउथ-साउथ ट्रेड के नए, रेसिलिएंट पैटर्न बने हैं जो बाहरी झटकों से कम वल्नरेबल हैं। कॉमर्स सेक्रेटरी राजेश अग्रवाल ने 5 सितंबर, 2026 को कहा कि इंट्रा-ब्रिक्स मर्चेंडाइज़ ट्रेड अब कई गुना बढ़ गया है, जो मेंबर देशों के बीच गहरे ट्रेड इंटीग्रेशन और मज़बूत इकोनॉमिक कोऑपरेशन के लिए बहुत ज़्यादा अनटैप्ड पोटेंशियल को हाईलाइट करता है। 2003 में $84 बिलियन से 2024 में $1.17 ट्रिलियन तक इंट्रा-ब्रिक्स मर्चेंडाइज़ ट्रेड 13 गुना बढ़ गया, जो 13.3 परसेंट की सालाना एवरेज रेट से बढ़ रहा है, जो इसी समय के दौरान 5.7 परसेंट की ग्लोबल ट्रेड ग्रोथ से काफी ज़्यादा है। भविष्य की चुनौतियाँ भारत के लिए अलग-अलग चुनौतियों के बीच ब्रिक्स को आगे ले जाना आसान नहीं होगा। उनमें से कुछ ये हैं: ब्रिक्स कनेक्ट्स को लागू करना: भारत की 2026 की ब्रिक्स अध्यक्षता की पहल ब्रिक्स कनेक्ट्स का उद्देश्य सदस्य देशों के नागरिकों को लाभ पहुँचाने को प्राथमिकता देना है। इसके मुख्य फ़ोकस एरिया में डिजिटल पेमेंट और फ़ाइनेंशियल इनक्लूज़न (वित्तीय समावेश) को बढ़ाना, एजुकेशनल डिग्री को आपसी मान्यता देना, सस्ता इंटरनेट और इंसानों पर केंद्रित ए आई, एक नया ब्रिक्स स्टार्टअप नॉलेज हब, और बेहतर ट्रेड कॉरिडोर शामिल हैं, जिनसे लॉजिस्टिक्स की लागत कम हो सकती है और सामान सस्ता हो सकता है। अंदरूनी सोच में विभिन्नता: यह ग्रुप एक जैसा ग्रुप नहीं है, जिससे आम सहमति बनाना मुश्किल हो जाता है। इसमें बहुत अलग-अलग जियोपॉलिटिकल सोच वाले देश हैं, जिनमें वे देश शामिल हैं जो पश्चिम का सक्रिय रूप से सामना कर रहे हैं (जैसे, रूस, ईरान) से लेकर वे देश भी शामिल हैं जो पश्चिमी देशों (जैसे, भारत, ब्राज़ील) के साथ मज़बूत स्ट्रेटेजिक और इकोनॉमिक संबंध बनाए हुए हैं। इंस्टीट्यूशनल एकता बनाम विस्तार: ब्रिक्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वह खुद को ज़्यादा बढ़ाए बिना अपनी बढ़ती जियोपॉलिटिकल अहमियत को ठोस इंस्टीट्यूशनल असर में बदले। तेज़ी से विस्तार से इस ग्रुप के बेकाबू होने और निर्णायक रूप से काम करने की इसकी क्षमता कम होने का खतरा है। अलग-अलग इकोनॉमिक प्राथमिकताएँ: फाइनेंशियल इंटीग्रेशन पर सदस्यों के अलग-अलग विचार हैं। जहां कुछ लोग वेस्ट से तेज़ी से फाइनेंशियल डीकपलिंग पर ज़ोर देते हैं, वहीं दूसरे प्रैक्टिकल इकोनॉमिक डेवलपमेंट को प्राथमिकता देते हैं और बड़े फाइनेंशियल बदलावों के नतीजों से डरते हैं। ब्रिक्स विरोधी कोशिशों और बातों पर ध्यान देना ब्रिक्स उस पश्चिमी नैरेटिव को बेअसर करने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहा है जिसके तहत इसे पश्चिम-विरोधी क्लब या एक विघटनकारी ताकत के तौर पर देखा जाता है। इन कोशिशों से निपटने के लिए यह कई रणनीतियाँ अपनाता है: इसे भी पढ़ें: सहयोग, समावेश और समाधान...BRICS में क्या खेला करने भारत आ रहे रूस, चीन और ईरान नैरेटिव को नए सिरे से पेश करना: 2026 में भारत की अध्यक्षता में नेतृत्व ने टकराव वाली छवि को स्पष्ट रूप से खारिज किया है। आधिकारिक राजनयिक रुख इस बात पर ज़ोर देता है कि ब्रिक्स पश्चिम-विरोधी नहीं है; यह संतुलन का पक्षधर है और ब्रिक्स देशों को G7-विरोधी नहीं बनना चाहिए, और G7 को ब्रिक्स -विरोधी नहीं बनना चाहिए। यह समूह खुद को स्वाभाविक रूप से विरोधी के बजाय गैर-पश्चिमी और सुधारवादी के तौर पर पेश करता है। डी-डॉलरलाइज़ेशन पर व्यावहारिक और क्रमिक दृष्टिकोण: गंभीर आर्थिक जवाबी कार्रवाई (जैसे टैरिफ की धमकियाँ) से बचने के लिए, ब्रिक्स ने डी-डॉलरलाइज़ेशन से जुड़ी अपनी बयानबाज़ी को नरम किया है। अमेरिकी डॉलर या ब्रिक्स की साझा मुद्रा को अचानक और पूरी तरह से बदलने के बजाय—जिसका भारत जैसे सदस्यों ने स्पष्ट रूप से विरोध किया है—यह समूह व्यावहारिक और क्रमिक बदलाव पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। इसमें स्थानीय मुद्रा में लेन-देन को बढ़ावा देना, द्विपक्षीय स्वैप समझौते और व्यापार के लिए डिजिटल मुद्रा के ढांचे की संभावनाओं को तलाशना शामिल है। समावेशी बहुपक्षवाद पर ध्यान: ब्रिक्स लगातार व्यापक UN सुधार, बहुपक्षीय व्यापार सुधार और समावेशी वैश्विक शासन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराता है। मौजूदा संस्थानों को पूरी तरह खत्म करने के बजाय उनमें सुधार की वकालत करके, ब्रिक्स कई उदारवादी देशों का समर्थन हासिल करता है। एक्सक्लूसिव ब्लॉक (सीमित समूह) की धारणा को कम करना: पार्टनर कंट्री मॉडल की शुरुआत रणनीतिक रूप से उन देशों को शामिल करती है जो अमेरिका के सहयोगी या साझेदार भी हैं (जैसे थाईलैंड, मलेशिया और कज़ाकिस्तान)। इससे पता चलता है कि ब्रिक्स के साथ जुड़ना पश्चिमी देशों के साथ संबंधों के खिलाफ़ नहीं है, जिससे इस समूह को राजनयिक रूप से अलग-थलग करने की कोशिशें कमज़ोर पड़ती हैं। निष्कर्ष 2026 में ब्रिक्स एक जटिल बदलाव के दौर से गुज़र रहा है। इसकी अहमियत 'ग्लोबल साउथ' को एक व्यवस्थित और संस्थागत आवाज़ देने की क्षमता में निहित है। भारत, जो 2012, 2016 और 2021 के बाद चौथी बार ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है, ने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय और व्यापारिक बुनियादी ढाँचे को मज़बूत करने के अपने प्रयासों को भी प्रदर्शित किया। लेकिन ब्रिक्स की दीर्घकालिक सफलता आंतरिक मतभेदों को सुलझाने, एन डी बी जैसे तंत्रों के माध्यम से ठोस आर्थिक लाभ पहुँचाने और एक व्यावहारिक व सुधार-उन्मुख रुख बनाए रखने पर निर्भर करेगी, जो ब्रिक्स को रोकने की कोशिशों को बेअसर कर सके। - प्रोफ़ेसर (डॉ.) डी.के. पांडेय विज़िटिंग सीनियर फ़ेलो, सेंटर फ़ॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज़, एडजंक्ट प्रोफ़ेसर, राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय, सलाहकार, एकेडमिक काउंसिल, फ़ॉरेन पॉलिसी स्कूल और GNOIT, पूर्व एसोसिएट डीन, SoB, गलगोटिया विश्वविद्यालय।
सत्य निकेतन हादसा: जिम्मेदार अधिकारियों पर हो ठोस कार्रवाई
दिल्ली के सत्य निकेतन में रविवार को पांच मंजिला छात्र-पीजी भवन का भरभराकर गिर जाना केवल एक दर्दनाक हादसा नहीं है। यह उस व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न है, जो भवन बनने देती है, उसमें अनधिकृत निर्माण होने देती है, उसमें विद्यार्थियों को रहने देती है, उसकी कमजोरियों को वर्षों तक नजरअंदाज करती है और फिर उसके ढह जाने के बाद जागती है। इस हादसे में अब तक छह लोगों की मौत की सूचना है और कई लोग घायल हुए हैं। प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार भवन में बेसमेंट और कई ऊपरी मंजिलों में मरम्मत या निर्माण संबंधी काम चल रहा था। प्रशासन ने मजिस्ट्रेट जांच और भवन मालिक के खिलाफ एफआईआर के आदेश दिए हैं। लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि हादसे के बाद किसके खिलाफ एफआईआर होगी? असली सवाल यह है कि हादसे से पहले जिम्मेदार अधिकारी कहां थे? यदि निर्माण नियमों का उल्लंघन था, यदि भवन का स्वीकृत नक्शा नहीं था, यदि अतिरिक्त मंजिलें बनाई गई थीं, यदि बेसमेंट में निर्माण चल रहा था, यदि भवन छात्रों के रहने के लिए इस्तेमाल हो रहा था और यदि वह संरचनात्मक रूप से जोखिमपूर्ण था, तो इन सबका पता प्रशासन को तब क्यों नहीं चला जब वहां निर्माण हो रहा था? सत्य निकेतन दिल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिणी परिसर के आसपास विद्यार्थियों का प्रमुख इलाका है। देश के विभिन्न राज्यों से हजारों युवा यहां अपने भविष्य के सपने लेकर आते हैं। वे छोटे-छोटे कमरों, पीजी और किराये के मकानों में रहकर पढ़ते हैं। उनके माता-पिता अपनी जीवनभर की कमाई का बड़ा हिस्सा बच्चों की शिक्षा पर लगाते हैं और यह विश्वास करते हैं कि राजधानी में उनका बच्चा सुरक्षित रहेगा। लेकिन जब शिक्षा की तलाश में निकला युवा एक ऐसी इमारत में पहुंचता है, जिसकी नींव ही नियमों और सुरक्षा के साथ समझौते पर टिकी हो, तो विकास की हमारी पूरी अवधारणा कटघरे में खड़ी हो जाती है और यह कोई पहली चेतावनी नहीं है। 2022 में भी सत्य निकेतन में निर्माणाधीन चार मंजिला इमारत ढहने से दो मजदूरों की मौत हुई थी और चार लोग घायल हुए थे। उस समय भी निर्माण कार्य, सुरक्षा और भवन की निगरानी पर सवाल उठे थे। लगभग चार साल बाद उसी इलाके में फिर एक बड़ी इमारत ढह गई। इसका अर्थ है कि हमने घटना से सबक लेने के बजाय घटना को एक समाचार की तरह देखा और आगे बढ़ गए। इसे भी पढ़ें: बच्चों की मौत का जिम्मेदार कौन? यहां भ्रष्टाचार की बात करते समय एक सावधानी भी जरूरी है। किसी अधिकारी या व्यवसायी को बिना जांच दोषी ठहराना उचित नहीं। लेकिन यदि जांच में यह सिद्ध होता है कि नियमों के विरुद्ध निर्माण को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया, निरीक्षण में लापरवाही हुई या किसी प्रकार की मिलीभगत रही, तो जिम्मेदारी केवल भवन मालिक तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। जिसने नियम तोड़े और जिसने नियम तोड़ने दिए-दोनों को जवाबदेह बनाना होगा। सत्य निकेतन की त्रासदी को जुलाई 2024 के पुराने राजेंद्र नगर हादसे से अलग करके नहीं देखा जा सकता। वहां राव आईएएस स्टडी सर्किल के बेसमेंट में पानी भर जाने से तीन सिविल सेवा अभ्यर्थियों-तनीया सोनी, श्रेया यादव और नवीन डालविन की मृत्यु हुई थी। सबसे भयावह तथ्य यह था कि बेसमेंट का उपयोग लाइब्रेरी के रूप में हो रहा था, जबकि उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार उसे पार्किंग और स्टोरेज के लिए इस्तेमाल किया जाना था। इससे भी अधिक चिंताजनक बात सामने आई-हादसे से लगभग एक महीने पहले एक विद्यार्थी ने एमसीडी में शिकायत की थी। भारत में भवन निर्माण के लिए नियमों की कमी नहीं है। नक्शा स्वीकृति, भवन उपविधियां, अग्नि सुरक्षा, संरचनात्मक सुरक्षा, अधिभोग प्रमाणपत्र, पार्किंग, बेसमेंट के उपयोग-हर क्षेत्र के लिए नियम हैं। लेकिन समस्या नियमों की संख्या नहीं, उनके पालन की ईमानदारी है। जब किसी भवन में एक मंजिल की अनुमति हो और चार-पांच मंजिलें खड़ी हो जाएं, जब बेसमेंट स्टोरेज के लिए स्वीकृत हो और वहां लाइब्रेरी या व्यावसायिक गतिविधि चलने लगे, जब सड़क की जलनिकासी बाधित हो और फिर भी निर्माण चलता रहे-तो सवाल केवल नागरिक की मनमानी का नहीं है। सवाल उस पूरी निगरानी व्यवस्था का है, जो आंखों के सामने होने वाले बदलाव को देखने के बावजूद समय पर कार्रवाई नहीं करती। भ्रष्टाचार केवल रिश्वत लेने का नाम नहीं है। भ्रष्टाचार वह भी है जब कोई जिम्मेदार व्यक्ति अपने कर्तव्य को जानबूझकर न निभाए। किसी अवैध निर्माण को देखकर आंखें बंद कर लेना भी व्यवस्था के प्रति अपराध है। किसी भवन को जोखिमपूर्ण जानते हुए कार्रवाई न करना भी भ्रष्ट प्रशासनिक संस्कृति का हिस्सा है। सरकारी भवन भी सुरक्षित नहीं तो आम आदमी किस पर भरोसा करे? मई 2024 में दिल्ली के आईटीओ स्थित सेंट्रल रेवेन्यू बिल्डिंग में आग लगी थी। 46 वर्षीय ऑफिस सुपरिंटेंडेंट की धुएं में दम घुटने से मृत्यु हुई थी। रिपोर्टों के अनुसार भवन पुराना था और उसमें आधुनिक फायर-स्प्रिंकलर व्यवस्था भी नहीं थी। यह घटना एक और सवाल सामने रखती है-जब सरकारी भवनों में भी सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त नहीं है, तो निजी और अनधिकृत भवनों की निगरानी की स्थिति क्या होगी? मुंबई, दिल्ली, चेन्नई, बेंगलुरु और देश के अन्य महानगरों में अनियोजित शहरी विस्तार लगातार बढ़ रहा है। जमीन सीमित है, जनसंख्या बढ़ रही है, किराये की मांग बढ़ रही है और व्यावसायिक हित अधिकतम जगह का अधिकतम उपयोग चाहते हैं। ऐसे में यदि शासन मजबूत नियमन और वैज्ञानिक शहरी नियोजन नहीं करेगा तो शहर ऊपर की ओर बढ़ेंगे, लेकिन उनकी सुरक्षा नीचे गिरती जाएगी। दुर्घटना के बाद वही परिचित दृश्य सामने आता है-मंत्री घटनास्थल पर पहुंचते हैं, अधिकारी बैठक करते हैं, मुआवजे की घोषणा होती है, जांच समिति बनती है, कुछ भवन सील होते हैं, कुछ गिरफ्तारियां होती हैं और कुछ दिनों तक प्रशासन सक्रिय दिखाई देता है। फिर धीरे-धीरे सब सामान्य हो जाता है। लेकिन किसी मृत विद्यार्थी के माता-पिता के लिए कुछ भी सामान्य नहीं होता। उनके लिए वह एक जांच समिति नहीं, जीवनभर का खालीपन है। उनके लिए मुआवजे की राशि उनके बेटे या बेटी का विकल्प नहीं है। वे यह जानना चाहते हैं कि उनका बच्चा सुरक्षित क्यों नहीं था? किसने सुरक्षा की गारंटी दी थी? किसने निगरानी की थी? किसने खतरे को नजरअंदाज किया था? इसलिए जांच का उद्देश्य केवल दोषी व्यक्ति ढूंढना नहीं होना चाहिए। जांच को यह भी पता लगाना चाहिए कि किस स्तर पर सिस्टम विफल हुआ। फाइल कहां रुकी? निरीक्षण किसने किया? शिकायत किसने दबाई? नक्शा किस आधार पर स्वीकार हुआ? अवैध निर्माण वर्षों तक कैसे चलता रहा? भवन में रहने वालों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी? और सबसे महत्वपूर्ण-क्या उन अधिकारियों की भी जवाबदेही तय होगी जिनकी जिम्मेदारी ही ऐसे हादसों को रोकना थी? सत्य निकेतन के मलबे से आज देश को केवल छह मौतों का आंकड़ा नहीं देखना चाहिए। वहां दबे हुए सपनों को देखना चाहिए। उन माता-पिताओं की आंखों को देखना चाहिए जिन्होंने अपने बच्चों को दिल्ली भेजते समय यह सोचा होगा कि वे पढ़ेंगे, आगे बढ़ेंगे और परिवार का नाम रोशन करेंगे। उन सपनों की मौत केवल एक इमारत के गिरने से नहीं हुई है, वे उस मानसिकता के नीचे दबे हैं जिसमें नियमों से अधिक प्रभावशाली पैसा, सुविधा और ‘सब चलता है’ की संस्कृति बन जाती है। अब समय है कि सरकारें हादसों के बाद जागने की आदत छोड़ें। भवन गिरने से पहले निरीक्षण हो, पानी भरने से पहले जलनिकासी सुधरे, शिकायत मिलने के बाद कार्रवाई हो और भ्रष्टाचार होने से पहले ही उसकी गुंजाइश बंद हो। क्योंकि देश को केवल नया भारत नहीं बनाना है-उसे सुरक्षित, जिम्मेदार, ईमानदार और संवेदनशील भारत भी बनाना है। सत्य निकेतन का मलबा हमसे यही पूछ रहा है-अगली इमारत गिरने का इंतजार करेंगे या अब व्यवस्था को सचमुच जगाएंगे? - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
'आपको न्याय मिलेगा', गौरव गोगोई ने मणिपुर के म्यूजिशियन की हत्या पर जाहिर किया दुख
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वडोदरा में पीएम मोदी का जेन-जी को संदेश, बोले- देश का हर नौजवान 'सच की हुंकार' के साथ
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निवेश और निर्यात के दम पर वित्त वर्ष 2027 में 7 प्रतिशत का विकास
नई दिल्ली, एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय अर्थव्यवस्था वित्त वर्ष 2026-27 में भी मजबूती बनाए रख सकती है और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर 7 प्रतिशत से ऊपर रह सकती है, क्योंकि निवेश और निर्यात में तेजी अर्थव्यवस्था की प्रमुख विकास शक्ति बनकर उभर रहे हैं, जो खपत में संभावित नरमी और घरेलू नीतिगत प्रोत्साहन के घटते प्रभाव की भरपाई कर सकते हैं।
सहयोग, समावेश और समाधान...BRICS में क्या खेला करने भारत आ रहे रूस, चीन और ईरान
ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत के पास है। बहुत बड़ी बैठक इसी महीने नई दिल्ली में आयोजित होने वाली है। दुनिया की नजरें ब्रिक्स की बैठक पर है। 2026 में भारत ब्रिक्स की अध्यक्षता में बैठक कर रहा है, वो कहां करने वाला है? ये नई दिल्ली में भारत मंडपम में 12 13 सितंबर को ब्रिक्स देशों की बैठक होगी और इसके लिए पहले भी साल भर वर्किंग ग्रुप्स हैं, मंत्रियों स्तर की बैठक है, सीजीआई स्तर की बैठक है, बैंकिंग स्तर की बैठक है, एनएसए लेवल की बैठक है। ये सब कुछ पहले ही भारत में हो चुका है। और अब राष्ट्रीय अध्यक्षों के बीच यह बैठक 12 13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित होने वाली है। इसे भी पढ़ें: BRICS Summit 2026: अपनी Currency और Global Governance में सुधार का एजेंडा, New Delhi से PM Modi देंगे नया मंत्र ब्रिक्स क्या है? ब्रिक्स उभरते हुए बाजारों और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं वाले 11 प्रमुख देशों का एक ग्रुप है जिसमें ब्राजील, चीन, मिस्र, इथोपिया, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त अरब अमीरात है। ये जो ब्रिक्स है इसमें जो सबसे बड़ी बात है वो ये कि ये जो ग्लोबल और क्षेत्रीय मुद्दों के साथ ही अंतरराष्ट्रीय, राजनीतिक और आर्थिक गवर्नेंस से जुड़े मामलों पर लगातार बातचीत करता है। और सहयोग के लिए एक अहम मंच है और यही वजह है कि ब्रिक्स का जब भी नाम आता है तो अमेरिका की धड़कनें बढ़ जाती हैं। क्योंकि अमेरिका को लगता है कि ब्रिक्स के जरिए डॉलर को धराशाई करने का प्लान है और डॉलर को ठेंगा दिखा के अगर ब्रिक्स देश आपस में ही कोई अपनी करेंसी बना ले कोई अपना ट्रांजैक्शन सिस्टम बना ले तो अमेरिका को एक बड़ा झटका लग सकता है। इसे भी पढ़ें: BRICS Economic Partnership Strategy 2030: नई दिल्ली शिखर सम्मेलन से तय होगी भविष्य की ग्लोबल ट्रेड नीति, मजबूती और इनोवेशन' पर टिकी दुनिया की नजर ब्रिक्स की थीम क्या है? इसके लोगो में भारत के राष्ट्रीय फूल कमल है। इसके बीच में नमस्ते की मुद्रा है। इसे एक पब्लिक डिजाइन प्रतियोगिता के जरिए चुना गया। इसमें पंखुड़ियों में ब्रिक्स के सभी सदस्य देशों का रंग है जो इसकी आधिकारिक थीम से जुड़े हुए हैं। मजबूत इनोवेशन, सहयोग और सेंसबिलिटी का निर्माण। कौन-कौन संभावित रूप से इस बैठक में हिस्सा लेने के लिए आ सकता है इसमें जो सबसे पहला नाम है वो रूस के राष्ट्रपति व्लादमीर पुतिन का है जिनका आना लगभग तय माना जा रहा है। चीन के राष्ट्रपति शी जिजिंगपिंग के भी दौरे की जानकारी है कि वो भी इस दौरे पर आ सकते हैं। इसके अलावा ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजिशियान भी भारत में अपनी मौजूदगी दर्ज करा सकते हैं। यानी कि तीन अहम राष्ट्रपति भारत जो हैं वैश्विक नेता जो हैं वह भारत में ब्रिक्स की बैठक में हिस्सा लेने के लिए इस बार नई दिल्ली की यात्रा कर सकते हैं। यह बहुत महत्वपूर्ण शिखर सम्मेलन है। यह सम्मेलन ऐसे वक्त में हो रहा है जब मध्य पूर्व और यूरोप में जो है वो युद्ध के कारण भू राजनीतिक तनाव जो है वो अपने चरम पर है और अमेरिका को लेकर भी बहुत उथल-पुथल है। इसके अलावा माना जा रहा है कि अब जो है समूह का विस्तार जो है वो एशिया, अफ्रीका, मध्यपूर्व और लैटिन अमेरिका तक हो गया है। उम्मीद है कि इस पूरे ब्लॉक के नेता और वरिष्ठ प्रतिनिधि भी आपको एक साथ नजर आएंगे। सम्मेलन के लिए बताया जा रहा है कि नई दिल्ली आने वाले राष्ट्रीय अध्यक्षों में जो है दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा भी शामिल हो सकते हैं। मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल फतेह अलसीसी भी शामिल हो सकते हैं। बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर लुकाशेंको भी आ सकते हैं। कजाकिस्तान के राष्ट्रपति कासिम जोरमाट टोकयो भी और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रोबो सुबानतो भी शामिल हो सकते हैं। मान जानकारी यह भी है कि मलेशिया, थाईलैंड, इथोपिया के भी पीएम जो हैं वह इस शिखर सम्मेलन में शामिल हो सकते हैं। जबकि क्यूबा, नाइजीरिया, उज्बेकिस्तान का प्रतिनिधि जो है उनके राष्ट्रपतियों के द्वारा जो है वो किया जा सकता है। इसके अलावा माना जा रहा है कि कई अहम देशों के मंत्री जो हैं अह वो घरेलू व्यवस्थाओं में जो है लूला डिसिलवा शामिल नहीं हो पाएंगे।इसके अलावा युगांडा का प्रतिनिधित्व मंडल आएगा। वहीं वियतनाम के पीएम भी आ सकते हैं। और संयुक्त अरब अमीरात के प्रतिनिधि जो हैं वो अबू धाबी के क्राउंस प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन ज़द अल नहायन कर सकते हैं।
पीएम मोदी ने आलोचकों को फिर बताया 'नाराज फूफा जी', राहुल पर निशाना- 'झूठ की गूंज' को नकारें
पीएम मोदी ने वडोदरा में युवाओं से कहा कि वे कांग्रेस समेत विपक्षी दलों के 'झूठे दावों' के बहकावे में न आएं। राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि लोग 'झूठ की गूंज' के ज़रिए आपको गुमराह करने की कोशिश करेंगे, लेकिन युवा सच्चाई के साथ खड़े रहेंगे।
बांग्लादेश को दुश्मन खेमे में जाने से रोकने के लिए भारत तेजी से सक्रिय हो गया है। ढाका के संभावित रूप से सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान से जुड़े ‘मक्का ज्वाइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ जैसे सामूहिक सुरक्षा ढांचे में शामिल होने की खबरों ने नई दिल्ली की रणनीतिक चिंताएं बढ़ा दी हैं। भारत ने इस मुद्दे पर तीव्र बैकचैनल कूटनीति शुरू कर दी है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि आखिर बांग्लादेश की असली मंशा क्या है। इसी बीच भारत और बांग्लादेश के बीच वर्षों से बंद पड़ी यात्री रेल सेवाओं को फिर शुरू करने की कवायद भी तेज हो गई है। रिपोर्टों के मुताबिक, बांग्लादेश मक्का ज्वाइंट डिफेंस एग्रीमेंट में शामिल होने की संभावनाओं पर विचार कर रहा है। यह एक ऐसा पारस्परिक रक्षा ढांचा बताया जा रहा है, जिसमें सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान शामिल हैं। शेख हसीना सरकार के पतन के बाद बदले राजनीतिक माहौल में ढाका अपनी विदेश नीति को अधिक विविध बनाने की कोशिश कर रहा है। बांग्लादेशी रणनीतिक हलकों में संभावित सदस्यता को तुर्किये की सैन्य तकनीक, सऊदी अरब की आर्थिक सहायता और पाकिस्तान के साथ सुरक्षा सहयोग हासिल करने के अवसर के रूप में देखा जा रहा है। इसे व्यापक रूप से ‘मुस्लिम फैमिली’ के ढांचे में कूटनीतिक सहयोग बढ़ाने की कोशिश के तौर पर पेश किया जा रहा है। इसे भी पढ़ें: Makkah Defence Pact आग नहीं, धुआं निकला, Modi की Diplomacy ने बिगाड़ दिया Pakistan का खेल लेकिन नई दिल्ली की नजर से तस्वीर कहीं अधिक गंभीर है। भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि पाकिस्तान से जुड़े किसी सामूहिक रक्षा ढांचे का विस्तार सीधे उसके पूर्वी मोर्चे तक हो सकता है। यदि बांग्लादेश औपचारिक रूप से ऐसे किसी सैन्य समझौते में शामिल होता है, तो भारत के आसपास एक नए सामरिक समीकरण का निर्माण हो सकता है। बंगाल की खाड़ी तक फैला सामूहिक सुरक्षा ढांचा भारत की रणनीतिक गणनाओं को बदल सकता है। हम आपको बता दें कि भारत और बांग्लादेश के बीच करीब 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा है। ऐसे में पूर्वी सीमा पर किसी नए सुरक्षा गठबंधन की मौजूदगी नई दिल्ली के लिए साधारण कूटनीतिक घटनाक्रम नहीं होगी। भारत को अपने पड़ोस को केवल द्विपक्षीय रिश्तों के नजरिये से नहीं, बल्कि एक संभावित मल्टी-फ्रंट सिक्योरिटी थिएटर के रूप में देखना पड़ सकता है। यही वजह है कि भारतीय बैकचैनल यह टटोलने में जुटे हैं कि ढाका वास्तव में कोई बाध्यकारी सैन्य प्रतिबद्धता चाहता है या फिर इस तरह की संभावनाओं का इस्तेमाल भारत समेत अन्य शक्तियों से कूटनीतिक लाभ लेने के लिए कर रहा है। इसी रणनीतिक तनाव के बीच भारत-बांग्लादेश संबंधों में एक सकारात्मक संकेत भी उभर रहा है। दोनों देश बंद पड़ी यात्री ट्रेन सेवाओं को फिर शुरू करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। ढाका में आज से दोनों देशों के रेलवे अधिकारियों की बैठक शुरू हुई है, जिसमें मैत्री, बंधन और मिताली एक्सप्रेस को दोबारा पटरी पर लाने पर चर्चा हो रही है। बांग्लादेश रेलवे के अतिरिक्त महानिदेशक (ऑपरेशंस) मोहम्मद नजमुल इस्लाम के अनुसार, दोनों देशों के बीच यात्री रेल संपर्क अगस्त 2024 के बाद से बंद है, जबकि मालगाड़ियां बिना किसी बाधा के लगातार चलती रही हैं। मैत्री एक्सप्रेस ढाका कैंटोनमेंट और कोलकाता के बीच चलती थी, बंधन एक्सप्रेस खुलना और कोलकाता को जोड़ती थी, जबकि मिताली एक्सप्रेस ढाका कैंटोनमेंट से न्यू जलपाईगुड़ी तक संचालित होती थी। इन सेवाओं को जुलाई 2024 में आधिकारिक रूप से निलंबित किया गया था। इसके बाद देशव्यापी अशांति, शेख हसीना सरकार के पतन और 5 अगस्त 2024 को उनके भारत जाने के बाद दोनों देशों के रिश्तों में तनाव बढ़ गया। नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम व्यवस्था के दौरान शेख हसीना की भारत में मौजूदगी और उनके प्रत्यर्पण की मांग जैसे मुद्दों ने संबंधों में खटास पैदा की। हालांकि, बांग्लादेश में 22 फरवरी 2026 को हुए आम चुनाव के बाद एक नया राजनीतिक अध्याय शुरू हुआ। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की जीत के बाद तारिक रहमान के नेतृत्व में नई सरकार बनी और अब दोनों देशों के बीच सामान्य रिश्तों की बहाली की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा महसूस की जा रही है। वर्तमान अंतर-सरकारी रेलवे बैठक यानी IGRM में केवल ट्रेनों को शुरू करने पर ही नहीं, बल्कि वित्तीय हिसाब-किताब, सीमा पार ट्रेन परिचालन, वार्षिक लेखा संतुलन, परिचालन क्षमता, रोलिंग स्टॉक और रेलवे ढांचे के विकास जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हो रही है। बांग्लादेश की योजना राजशाही से कोलकाता के लिए एक नई ट्रेन शुरू करने की भी है। साथ ही, मैत्री एक्सप्रेस को जमुना ब्रिज के बजाय पद्मा ब्रिज के रास्ते चलाने का प्रस्ताव भी सामने आ सकता है। भारत द्वारा 27 जून से बांग्लादेशी नागरिकों के लिए पर्यटक वीजा फिर शुरू किए जाने के बाद आम लोगों के बीच भी रेल सेवाओं की बहाली की मांग तेज हुई है। भारतीय उच्चायुक्त ने भी दोनों देशों के बीच ‘पीपुल-टू-पीपुल रिलेशन’ को बेहद अहम बताया है। दरअसल, यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है। एक तरफ भारत बांग्लादेश के संभावित नए सैन्य समीकरणों को लेकर सतर्क है, दूसरी तरफ वह रेल, वीजा, व्यापार और जनसंपर्क के जरिए रिश्तों को सामान्य बनाने की कोशिश कर रहा है। नई दिल्ली समझती है कि अगर ढाका रणनीतिक रूप से दूर गया, तो भारत की पूर्वी सुरक्षा चुनौती स्थायी रूप से बदल सकती है। इसलिए कूटनीति अब सिर्फ दोस्ती बचाने की नहीं, बल्कि बांग्लादेश को किसी संभावित दुश्मन खेमे की ओर झुकने से रोकने की रणनीतिक लड़ाई बन चुकी है। -नीरज कुमार दुबे
सांप के काटने से मौत के मामलों पर एनएचआरसी सख्त, हर राज्य में एंटी-स्नेक वेनम उपलब्ध कराने के निर्देश
पीएम मोदी के दौरे को लेकर जेन-जी में जबरदस्त उत्साह, कहा-उनका आना सौभाग्य की बात
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पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम उपचुनाव में भाजपा की जीत तय : दिलीप घोष
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'विकसित महाराष्ट्र 2047' के लिए एनबीएफसी बनाने की दिशा में बड़ा कदम, सरकार ने बनाई टेंडर समिति
महाराष्ट्र सरकार ने अपने दीर्घकालिक विकास लक्ष्यों को गति देने के लिए सोमवार को एक विशेष टेंडर समिति का गठन किया है। यह समिति राज्य के लिए एक समर्पित वित्तीय संस्था के गठन और उसके संचालन की प्रक्रिया की निगरानी करेगी।
दिल्ली में सभी PG का होगा सेफ्टी टेस्ट, सत्य निकेतन हादसे के बाद LG ने तय की डेडलाइन
राजधानी दिल्ली में छात्रों के लिए चल रहे पेइंग गेस्ट (PG) आवासों की सुरक्षा को लेकर उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू ने सख्त निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा है कि सभी प्रमुख PG हब में इमारतों का स्ट्रक्चरल ऑडिट एक सप्ताह के भीतर पूरा किया जाए
बिल्डिंग हादसे पर सियासी वार: दिल्ली सरकार ने कहा- 'आप-कांग्रेस कर रही हैं राजनीति'
बिल्डिंग हादसे पर सियासी वार: दिल्ली सरकार ने कहा- 'आप-कांग्रेस कर रही हैं राजनीति'
सीएम सरमा ने असम दौरे के लिए उपराष्ट्रपति को कहा धन्यवाद, तमिलनाडु के साथ संबंधों को मजबूत करने के प्रयासों को सराहा
मणिपुर में 2023 के बाद हुई जातीय हिंसा की होगी जांच, सीएम ने कहा- गैरकानूनी गतिविधियों से जुड़े मामलों की हो रही समीक्षा
बच्चों की मौत का जिम्मेदार कौन?
मानवीय हिमाकतों के चलते दिल्ली में और एक बड़ी दर्दनाक घटना घट गई। सत्य निकेतन के मोतीनगर स्थिति एक सालों पुरानी जर्जर हालत की बिल्डिंग मौत बनकर रिमझिम बारिश में भरभराकर गिर पड़ी। घटना की सूचना पाकर पहुंचे बच्चों के परिजनों की चीखें कलेजा फाड़ रही हैं। परिजन बिलख रहे हैं,मांए बदहवास और बेसुध हैं। स्थानीय पुलिस और हुकुमती अधिकारियों का घटनास्थल पर जमघट लगा है। राहत-बचाव कार्य जारी है। घायल बच्चे एम्स के ट्रामा सेंटर भिजवाए जा रहे हैं। लेकिन वहां से कुछ बच्चों के ना रहने की सूचनाएं हर किसी को झकझोर रही हैं। बिल्डिंग में रहने वाले बच्चे तकरीबन बाहरी प्रदेशों के थे। वह अपना उज्जवल भविष्य बनाने की चाह लेकर शिक्षा ग्रहण करने पहुंचे थे। पर, उन्हें क्या पता हादसों का रूप ले चुकी दिल्ली उनकी जान लील लेगी। पढ़ने वाले बच्चों के साथ दिल्ली में आए दिन कोई न कोई हादसा होता ही रहता है। राजेंद्र नगर स्थिति कोचिंग सेंटर की बेसमेंट में पानी भरने से हुई बच्चों की मौत को शायद ही कोई भूल पाया हो। मुखर्जी नगर की कोचिंग सेंटर में आग लगने की घटना को याद करके भी रोंगटे खड़े होते हैं। इस तरह की प्रत्येक घटनाओं पर जिम्मेदार अधिकारियों और नेताओं का हमेशा से एक ही बयान होता है। दोषी बख्शे नहीं जाएंगे, सख्त कार्रवाई होगी? इसके अलावा मृतकों के परिजनों को मुआवजा और घायलों की इलाज कराकर मामला रफा-दफा कर दिया जाता है और जब तक मीडिया में घटना की चर्चाएं होंगी, कार्रवाई के नाम पर सरकारी डंडा पीटा जाता रहेगा। शोर जैसे ही शांत होगा। जांच-पड़ताल ठंडे बस्ते में चली जाएंगी। जमीदोज हुई बिल्डिंग में ज्यादातर विश्वविधायल में पढ़ने वाले और सिविल सर्विसेज की तैयारी करने वाले मात्र 20-22 आयु के बच्चे रहते थे। मालिक ने बिल्डिंग को करीब 30 सालों से पीजी के लिए किसी अन्य को किराए पर दिया हुआ था। बिल्डिंग मानकों के एकदम विरुद्ध निर्मित हुई थी। क्षेत्रफल मात्र 55 गज का था जिसमें 30 कमरे बना रखे थे। बिल्डिंग 40 से 45 साल पुरानी बताई जाती है। जबकि, देखने में इससे भी कहीं पुरानी लगती थी। मालिक पर मुकदमा हुआ है। एकाध महीने बाद उसे जमानत मिल जाएगी। उसी जगह पर फिर से दूसरी बिल्डिंग तान दी जाएगी। इसे भी पढ़ें: दिल्ली में किस बात से बेबस 'ट्रिपल इंजन' सरकार? Satya Niketan हादसे पर Rahul Gandhi का BJP पर वार दिल्ली विश्वविद्यालय क्षेत्र में बने पीजी को लेकर ‘इंडियन जियोटेक्निकल काॅन्फ्रेस’ ने कुछ वर्ष पहले एक रिसर्च किया था जिसमें पाया था कि 85 फीसदी पीजी बच्चों के रहने के लायक नहीं हैं। इस तरह की रिसर्च रिपोर्ट को भी हुकूमतों ने दरकिनार किया। हादसे का शिकार हुई बिल्डिंग के निर्माण में घोर मानवीय हिमाकत का तांडव किया गया था। दिल्ली नगर निगम से लेकर, पुलिस, फायर ब्रिगेड और सरकार के अधिकारियों ने घूस खाया। घटनास्थल साउथ दिल्ली का सत्य निकेतन क्षेत्र है जिसे डूब या निचला-धरातल क्षेत्र भी कहते हैं। वहां बिल्डिंग बनाने की मात्र ढाई मंजिला इजाजत होती है। पर, अधिकारियों ने घूस खाकर पांच मंजिला तक बनवा दिया। दिल दहला देने वाले हादसे को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि बिल्डिंग में अवैध निर्माण होता रहा और जिम्मेदार लोग आंख मूंदकर तमाशबीन बने रहे। इतना ही नहीं, करीब 40 साल पुरानी इस बिल्डिंग में बारिश के दौरान हर साल बेसमेंट जलमग्न हो जाता था, जिससे इसकी नींव कमजोर होती गई और इस साल बजन नहीं सहन कर पाई जिससे भराभरकर ढह गई। हादसे की जिम्मेदारी शायद ही कोई ले? क्योंकि ऐसे हादसे दिल्ली में समय-समय पर होते रहे हैं। कुछ महीनों पहले ही एक अवैध होटल में आग लगने से विदेशी सहित कई लोग जलकर खाक हुए थे। बिल्डिंगों का गिरना तो दिल्ली में आम हो चुका है। दिल्ली में अवैध कॉलोनियों की भरमार है। कहने को तो अवैध हैं लेकिन अधिकारी घूस लेकर उसे चंद मिनटों में वैध कर देते हैं। दिल्ली में इस समय करीब 1731 अवैध काॅलोनियां और 650 से लेकर 675 झुग्गी झोपड़ियां हैं जिनमें ज्यादातर किराएदार ही रहते हैं। दिल्ली ऐसा शहर है जहां देश के सभी प्रांतों के लोग रोजी रोटी कमाने आते हैं। शिक्षा का हब भी दिल्ली है। जहां सिविल सेवा की तैयारियां करने बच्चे दूर-दराज से पहुंचते हैं। 5 लाख बच्चे सालाना सिविल सर्विसेज परीक्षा की तैयारी करने दिल्ली के मुखर्जी नगर आते हैं, रहने के लिए उन्हें पीजी चाहिए होता है। ऐसे में बच्चे सस्ता पीजी खोजते हैं, लेकिन उन्हें क्या पता सस्ता घर उनकी जान ले लेगा? वहीं, करीब 15 लाख बच्चे अन्य प्रदेशों के दिल्ली के विभिन्न कॉलेजों में अध्ययनरत हैं। जहां हादसा हुआ, उस इलाके में तकरीबन घर पीजी में तब्दील हैं। पीजी के नाम पर बड़ा नेक्सस उस इलाके में चलता है जिसका मकान होता है वह खुद पीजी संचालित नहीं करता, बल्कि वह किसी अन्य को ठेके पर दे देता है। ठेकेदार बच्चों को कमरों में भूसे की तरह ठूस देते हैं। जहां ना कोई सुविधा, न मानकों का इस्तेमाल, सिर्फ उन्हें कमाने से मतलब होता है। हादसे वाली बिल्डिंग गिरने का संकेत कुछ वर्षों से दे रही थी? लेकिन ना मालिक ने गौर किया और ना ही अधिकारियों ने? पिछले साल तीसरे माले की सीढ़ियों की छत का उपरी हिस्सा गिरा था जिसे रिपेयर करवाकर संभावित हादसे पर पर्दा डाल दिया गया। बिल्डिंग में 50 के आसपास बच्चे रहते थे। सभी यूपी-बिहार राज्यों से वास्ता रखते हैं। हादसा रविवार को होता है जिस दिन ज्यादातर बच्चे अपने कमरों में थे क्योंकि उस दिन क्लासें और ट्यूशन की छुट्टी थी। शनिवार रात को बच्चे बेखौफ होकर सोए थे, उन्हें नहीं पता था कि अगले दिन उनके साथ क्या होने वाला है। कुछ बच्चों की जाने चली गई है? कई गंभीर रूप से घायल हैं। घटना निसंदेह दुखदायक है। हादसे की जिम्मेदारी अधिकारियों को लेना चाहिए और सीख लेकर भविष्य में इस तरह की बिल्डिंग को पहले ही जमींदोज करने का संकल्प भी लेना चाहिए। डॉ. रमेश ठाकुर सदस्य, राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान (NIPCCD), भारत सरकार!
पीएम मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 साल: हिमाचल भाजपा चलाएगी 'सेवा समर्पण अभियान'
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'आप' विधायक को गुजरात हाई कोर्ट से राहत, विधानसभा सत्र में हिस्सा लेने के लिए 7 दिन की मिली अंतरिम जमानत
राजस्थान नगर निकाय चुनाव में 125 सीट जीतेगी भाजपा: विधायक बालमुकुंद आचार्य
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पश्चिम बंगाल: मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी की काफू से मुलाकात, दिग्गज फुटबॉलर ने भेंट की 'खास जर्सी'
कोलकाता, 7 सितंबर (आईएएनएस)। ब्राजील के दिग्गज फुटबॉलर और वर्ल्ड कप विजेता काफू ने सोमवार को नबन्ना में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी से मुलाकात की। इस दौरान उनके साथ शताद्रु दत्ता भी मौजूद थे।
उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने गुवाहाटी यूनिवर्सिटी में 110 करोड़ रुपए के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की आधारशिला रखी
मुख्यमंत्री अधिकारी ने बंगाल में 'एबी पीएम-जेएवाई' की उपलब्धियों पर प्रकाश डाला
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हिंद महासागर में भारत की सामरिक क्षमता को नई धार देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल शुरू हुई है। हम आपको बता दें कि भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) के वैज्ञानिक अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह में स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) स्थापित करने की संभावनाओं का आकलन कर रहे हैं। यह कवायद द्वीपों की बढ़ती बिजली जरूरतों को पूरा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे भारत की एक व्यापक रणनीतिक सोच भी दिखाई देती है, जिसके केंद्र में ग्रेट निकोबार, पूर्वी हिंद महासागर और दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में शामिल मलक्का जलडमरूमध्य है। हम आपको बता दें कि परमाणु ऊर्जा विभाग की एक टीम 4 से 8 सितंबर तक अंडमान-निकोबार के दौरे पर है और द्वीपसमूह के तीनों जिलों में संभावित स्थानों का अध्ययन कर रही है। यह सर्वे ऐसे समय हो रहा है, जब यहां बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा परियोजनाएं आकार ले रही हैं और आने वाले वर्षों में बिजली की मांग तेजी से बढ़ने की संभावना है। BARC की टीम ने अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह के उपराज्यपाल एडमिरल डीके जोशी को प्रस्तावित SMR योजना, संभावित स्थलों और इसकी प्रमुख विशेषताओं की जानकारी भी दी है। इससे संकेत मिलता है कि यह योजना केवल तकनीकी विचार-विमर्श तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे द्वीपसमूह के भविष्य के विकास और भारत के सामरिक ढांचे के साथ जोड़कर देखा जा रहा है। इसे भी पढ़ें: ISRO को कमजोर करने की साजिश हो रही या भारत को Space Superpower बनने की रणनीति पर काम चल रहा? बढ़ती बिजली जरूरतों के बीच SMR का विकल्प दरअसल, अंडमान-निकोबार में प्रस्तावित विशाल परियोजनाओं के कारण ऊर्जा की जरूरत आने वाले समय में कई गुना बढ़ सकती है। विशेष रूप से ग्रेट निकोबार में अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, गहरे पानी वाला बहुउद्देशीय बंदरगाह, टाउनशिप और अन्य बिजली एवं बुनियादी ढांचा परियोजनाएं प्रस्तावित हैं। इसी पृष्ठभूमि में स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टरों का विकल्प महत्वपूर्ण बनकर उभरा है। हम आपको बता दें कि SMR अपेक्षाकृत छोटे आकार के परमाणु रिएक्टर होते हैं, जिन्हें स्थानीय और क्षेत्रीय ऊर्जा जरूरतों के अनुरूप विकसित किया जा सकता है। अंडमान-निकोबार जैसे दूरस्थ द्वीपीय क्षेत्रों में स्थिर और दीर्घकालिक बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिहाज से इनकी उपयोगिता महत्वपूर्ण मानी जा रही है। लेकिन इस पूरी कहानी का एक दूसरा और अधिक व्यापक पहलू भी है। परमाणु ऊर्जा के विस्तार के साथ-साथ भविष्य में परमाणु ईंधन की उपलब्धता भी एक महत्वपूर्ण रणनीतिक प्रश्न बनती जा रही है। चीन की समुद्र से यूरेनियम निकालने की नई तकनीक इसी बीच चीन से आई एक नई वैज्ञानिक उपलब्धि ने वैश्विक परमाणु ऊर्जा की बहस को एक नया आयाम दिया है। चीनी शोधकर्ताओं ने एक ऐसी नई सामग्री विकसित करने का दावा किया है, जो समुद्री जल से यूरेनियम निकालने में अमेरिकी ऊर्जा विभाग द्वारा पहले निर्धारित लक्ष्य से आठ गुना अधिक क्षमता दिखाती है। चीन के क़िंगदाओ स्थित चीनी विज्ञान अकादमी से जुड़े शोधकर्ताओं ने प्राकृतिक समुद्री जल के नमूनों से इस सामग्री के प्रति ग्राम से 50.4 मिलीग्राम तक यूरेनियम प्राप्त करने का दावा किया है। इसकी तुलना में अमेरिकी मानक लगभग 6 मिलीग्राम प्रति ग्राम था। इस नई सामग्री को PhosCage नाम दिया गया है। यह स्पंज जैसी आणविक संरचना है, जिसमें फॉस्फेट समूह मौजूद हैं। ये रासायनिक रूप से यूरेनियम को बांधने की क्षमता रखते हैं। शोधकर्ताओं ने बाद में इस सामग्री को मिलीमीटर आकार के छोटे मोतियों या बीड्स में बदल दिया, ताकि इसे प्रयोगशाला के बाहर भी अधिक आसानी से इस्तेमाल और वापस प्राप्त किया जा सके। इन बीड्स ने प्रति ग्राम सामग्री से 22.55 मिलीग्राम तक यूरेनियम निकाला और सात बार दोबारा इस्तेमाल किए जाने के बाद भी प्रभावी बने रहे। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह तकनीक समुद्री जल से यूरेनियम निकालने के लिए एक नया रास्ता खोल सकती है और भविष्य में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाले अधिक प्रभावी अवशोषक पदार्थों के विकास की नींव रख सकती है। समुद्र का यूरेनियम क्यों है इतना महत्वपूर्ण? परमाणु ऊर्जा का विस्तार करने वाले देशों के लिए यूरेनियम की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती है। चीन के मामले में यह चुनौती विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसका परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम घरेलू यूरेनियम उत्पादन की तुलना में कहीं तेजी से बढ़ रहा है। विश्व परमाणु संघ के आंकड़ों के अनुसार, चीन ने 2024 में घरेलू खदानों से लगभग 1,600 टन यूरेनियम का उत्पादन किया, जबकि उसके परमाणु रिएक्टरों की जरूरत लगभग 13,000 टन थी। इस बड़े अंतर के कारण चीन को यूरेनियम के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। यहीं समुद्र एक संभावित वैकल्पिक संसाधन के रूप में सामने आता है। हम आपको बता दें कि दुनिया में जमीन पर ज्ञात यूरेनियम संसाधन लगभग 7.9 मिलियन टन माने जाते हैं, जबकि महासागरों में अनुमानित रूप से करीब 4.5 अरब टन यूरेनियम मौजूद है। भूवैज्ञानिक समय के दौरान चट्टानों से बारिश के पानी द्वारा यूरेनियम बहकर नदियों के माध्यम से समुद्रों तक पहुंचता रहा है, जिसके कारण समुद्री जल में इसकी विशाल मात्रा जमा हो गई। समस्या यह है कि समुद्र में यूरेनियम की सांद्रता बेहद कम है। एक टन समुद्री जल में केवल लगभग 3.3 मिलीग्राम यूरेनियम पाया जाता है। इसका अर्थ है कि व्यावसायिक स्तर पर बड़ी मात्रा में यूरेनियम निकालने के लिए अत्यधिक मात्रा में समुद्री जल को संसाधित करना होगा। इसके अलावा समुद्री जल में यूरेनियम के साथ कई अन्य घुले हुए तत्व भी मौजूद रहते हैं, जिससे इसे अलग करना तकनीकी रूप से मुश्किल हो जाता है। वैनाडियम की चुनौती और चीन की नई सफलता इसके अलावा, समुद्री जल से यूरेनियम निकालने में वैनाडियम एक बड़ी चुनौती माना जाता रहा है। इसका कारण यह है कि वैनाडियम भी उन्हीं रासायनिक स्थानों से जुड़ सकता है, जिनका उपयोग यूरेनियम को पकड़ने के लिए किया जाता है। अमेरिका में इस चुनौती से निपटने के लिए वर्षों तक शोध किया गया। ओक रिज नेशनल लेबोरेटरी ने विशेष प्रकार के फाइबर विकसित किए, जबकि पैसिफिक नॉर्थवेस्ट नेशनल लेबोरेटरी ने प्राकृतिक रूप से बहने वाले समुद्री जल में इन तकनीकों का परीक्षण किया। 2016 तक अमेरिका की सबसे प्रभावी अवशोषक सामग्री समुद्री जल के लंबे संपर्क के बाद प्रति ग्राम लगभग 6 मिलीग्राम यूरेनियम निकालने में सक्षम थी। हालांकि यह तकनीक पारंपरिक यूरेनियम खनन की तुलना में काफी महंगी बनी रही और अमेरिकी ऊर्जा विभाग ने 2018 में कार्यक्रम समाप्त होने के बाद इस दिशा में अपनी सक्रियता काफी हद तक कम कर दी। उधर, चीन के क़िंगदाओ स्थित शोधकर्ताओं का दावा है कि उनकी नई सामग्री ने इस चुनौती के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है। दो अलग-अलग वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया कि बीड्स आधारित यह सामग्री कई धातुओं की मौजूदगी के बावजूद यूरेनियम को प्राथमिकता के साथ पकड़ने में सक्षम रही। विशेष रूप से यह वैनाडियम की तुलना में यूरेनियम को अधिक प्रभावी ढंग से अलग करने में सक्षम बताई गई है। हालांकि इस तकनीक की सीमाएं भी हैं। अभी यह प्रयोगशाला स्तर पर ही है। शोधकर्ताओं ने क़िंगदाओ के तट से समुद्री जल लेकर लगभग 25 लीटर पानी को प्रयोगशाला आधारित फ्लो सिस्टम से गुजारा था। इसका परीक्षण खुले समुद्र में नहीं किया गया है, जहां लहरें, समुद्री धाराएं, जैविक गतिविधियां और बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियां पूरी प्रक्रिया को अधिक जटिल बना सकती हैं। इसके अलावा, अभी तक यह भी स्पष्ट नहीं है कि समुद्र से प्राप्त यूरेनियम की उत्पादन लागत कितनी होगी। शोधकर्ताओं का अगला लक्ष्य इस तकनीक को बड़े स्तर पर विकसित करना और समुद्री जल से यूरेनियम निकालने की कुल लागत कम करना है। ग्रेट निकोबार: विकास परियोजना से कहीं अधिक उधर, भारत के संदर्भ में अंडमान-निकोबार में SMR की संभावनाओं का अध्ययन ऐसे समय हो रहा है, जब ग्रेट निकोबार एक विशाल विकास और रणनीतिक परियोजना के केंद्र के रूप में उभर रहा है। ग्रेट निकोबार परियोजना के तहत गलाथिया बे में एक इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, एक ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, टाउनशिप और उससे जुड़ा ऊर्जा एवं अन्य बुनियादी ढांचा विकसित करने की योजना है। सरकार इस परियोजना को रणनीतिक, रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण बता चुकी है। इसका उद्देश्य केवल व्यापार और कनेक्टिविटी बढ़ाना नहीं है। इसके जरिए भारत अंडमान सागर और दक्षिण-पूर्व एशिया में अपनी उपस्थिति मजबूत करना चाहता है और अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों के निकट एक बड़े समुद्री केंद्र का विकास करना चाहता है। देखा जाये तो ग्रेट निकोबार की भौगोलिक स्थिति इसे एक सामान्य विकास परियोजना से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बना देती है। भारत यहां अपनी आर्थिक पहुंच बढ़ाने के साथ-साथ समुद्री गतिविधियों की निगरानी और पूर्वी हिंद महासागर में अपनी सामरिक क्षमता को भी मजबूत करना चाहता है। यहीं से यह कहानी हिंद महासागर में बदलते शक्ति-संतुलन तक पहुंचती है। दरअसल, पूर्वी हिंद महासागर में चीन की बढ़ती सक्रियता के बीच ग्रेट निकोबार भारत की रणनीतिक तैयारियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनता जा रहा है। एक मजबूत और स्थायी रक्षा उपस्थिति भारत को समुद्री मार्गों की निगरानी और सुरक्षा में मदद कर सकती है तथा हिंद महासागर में विदेशी शक्तियों की बढ़ती मौजूदगी का मुकाबला करने की क्षमता भी बढ़ा सकती है। इस पूरी रणनीति के केंद्र में है मलक्का जलडमरूमध्य। हम आपको बता दें कि दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री चोकपॉइंट्स में शामिल मलक्का जलडमरूमध्य हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के बीच वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति का प्रमुख मार्ग है। भारी मात्रा में अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाज और ऊर्जा संसाधन इसी रास्ते से गुजरते हैं। ग्रेट निकोबार की भौगोलिक स्थिति भारत को मलक्का जलडमरूमध्य के पश्चिमी प्रवेश क्षेत्र के करीब एक महत्वपूर्ण रणनीतिक लाभ प्रदान करती है। ऐसे में यहां विकसित होने वाला बंदरगाह, हवाई अड्डा, ऊर्जा ढांचा और रक्षा उपस्थिति मिलकर भारत की समुद्री क्षमता को नई ताकत दे सकते हैं। INS Baaz और त्रि-सेवा कमान की अहमियत कैंपबेल बे स्थित INS Baaz की सामरिक भूमिका भी इसी संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण है। यह नौसैनिक एयर स्टेशन मलक्का जलडमरूमध्य और सिक्स डिग्री चैनल के महत्वपूर्ण समुद्री क्षेत्रों पर नजर रखने की दृष्टि से अहम माना जाता है। पूरे अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह की सामरिक अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां भारत की एकमात्र एकीकृत त्रि-सेवा कमान यानि अंडमान और निकोबार कमान स्थापित है। थलसेना, नौसेना और वायुसेना की संयुक्त कमान का गठन इस द्वीपसमूह की उस विशेष भौगोलिक स्थिति को देखते हुए किया गया था, जो अंतरराष्ट्रीय समुद्री संपर्क मार्गों के बेहद करीब स्थित है। द्वीपों की भौगोलिक स्थिति भारत को अपने समुद्री हितों की रक्षा करने और संभावित खतरों पर नजर रखने की क्षमता प्रदान करती है। यही कारण है कि अंडमान-निकोबार कमान भारत की व्यापक ‘एक्ट ईस्ट’ रणनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ऊर्जा, यूरेनियम और समुद्री शक्ति का नया समीकरण BARC का SMR सर्वे इस पूरी रणनीतिक तस्वीर में एक नया आयाम जोड़ता है। यदि अंडमान-निकोबार में छोटे मॉड्यूलर परमाणु रिएक्टर स्थापित होते हैं, तो वे तेजी से विकसित हो रहे नागरिक और रणनीतिक ढांचे को एक विश्वसनीय ऊर्जा आधार प्रदान कर सकते हैं। बंदरगाह, हवाई अड्डे, टाउनशिप और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए स्थिर बिजली उपलब्ध कराने के साथ SMR द्वीपों की ऊर्जा आत्मनिर्भरता और लचीलापन भी बढ़ा सकते हैं। वहीं चीन का समुद्री जल से यूरेनियम निकालने का नया प्रयोग यह संकेत देता है कि भविष्य में महासागर केवल व्यापार और सामरिक प्रतिस्पर्धा के केंद्र नहीं रहेंगे, बल्कि परमाणु ऊर्जा के लिए ईंधन संसाधनों की नई होड़ का भी मैदान बन सकते हैं। समुद्रों में अनुमानित 4.5 अरब टन यूरेनियम मौजूद होने का अनुमान परमाणु ऊर्जा के भविष्य के लिए एक बेहद आकर्षक संभावना प्रस्तुत करता है। हालांकि इसे व्यावसायिक रूप से निकालना अभी भी एक कठिन और महंगी तकनीकी चुनौती है। यदि भविष्य में ऐसी तकनीकें आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनती हैं, तो परमाणु ऊर्जा के लिए ईंधन आपूर्ति का वैश्विक समीकरण बदल सकता है। चीन जैसे देशों के लिए इससे आयातित यूरेनियम पर निर्भरता कम करने का रास्ता खुल सकता है। भारत के लिए क्या मायने? भारत के लिए अंडमान-निकोबार में परमाणु ऊर्जा की संभावनाएं और हिंद महासागर की सामरिक स्थिति एक-दूसरे से अलग मुद्दे नहीं हैं। एक तरफ SMR जैसी तकनीकें दूरस्थ द्वीपों को विश्वसनीय ऊर्जा उपलब्ध करा सकती हैं। दूसरी तरफ यही ऊर्जा तेजी से विकसित हो रहे बंदरगाहों, हवाई अड्डों और अन्य महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को मजबूत आधार दे सकती है। ग्रेट निकोबार में बनने वाला समुद्री और हवाई ढांचा भारत की आर्थिक और सामरिक उपस्थिति को मजबूत कर सकता है। मलक्का जलडमरूमध्य के निकट भारत की भौगोलिक स्थिति उसे वैश्विक समुद्री गतिविधियों पर बेहतर निगरानी का अवसर देती है। बहरहाल, अंडमान-निकोबार में SMR की संभावनाओं का यह सर्वे केवल एक परमाणु ऊर्जा परियोजना की शुरुआती कवायद नहीं दिखाई देता। यह उस बड़े भारतीय रणनीतिक नक्शे का हिस्सा है, जिसमें विकास, ऊर्जा, समुद्री व्यापार, राष्ट्रीय सुरक्षा और हिंद महासागर में बदलता शक्ति-संतुलन एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। साथ ही चीन का समुद्री जल से यूरेनियम निकालने का नया शोध यह भी दिखाता है कि परमाणु ऊर्जा की भविष्य की प्रतिस्पर्धा केवल जमीन पर मौजूद खदानों तक सीमित नहीं रह सकती। महासागर भी भविष्य में परमाणु ईंधन के एक संभावित विशाल स्रोत के रूप में उभर सकते हैं। और इस पूरे भू-रणनीतिक नक्शे पर भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बिंदुओं में से एक है ग्रेट निकोबार। यह एक ऐसा द्वीप है, जहां भारत की नजर केवल विकास परियोजनाओं पर नहीं है, बल्कि समुद्र के उस विशाल रास्ते पर भी है, जिससे होकर दुनिया के व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। -नीरज कुमार दुबे
अन्ना हजारे की तबीयत पहले से काफी बेहतर, बॉम्बे हॉस्पिटल के डॉक्टर गौतम भंसाली ने दिया अपडेट
मुंबई, 7 सितंबर (आईएएनएस)। बॉम्बे हॉस्पिटल के डॉक्टर डॉ. गौतम भंसाली ने हॉस्पिटल में भर्ती सोशल एक्टिविस्ट अन्ना हजारे के हेल्थ को लेकर अपडेट दिया है। उन्होंने सोमवार को समाचार एजेंसी आईएएनएस से बात करते हुए कहा कि अन्ना हजारे की तबीयत में पहले से सुधार हो रहा है। उनको बॉम्बे हॉस्पिटल में भर्ती किए लगभग 6 दिन हो गए हैं। ट्रीटमेंट को वह अच्छा रेस्पॉन्स कर रहे हैं।
सहारनपुर मस्जिद का मामला एक कानूनी लड़ाई, न्यायालय पर पूरा भरोसा : इमरान मसूद
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जेएसएससी-सीजीएल मामले में पूर्व डीजीपी की भूमिका संदिग्ध, कार्रवाई से हिचक रही हेमंत सरकार : बाबूलाल मरांडी
ISRO को कमजोर करने की साजिश हो रही या भारत को Space Superpower बनने की रणनीति पर काम चल रहा?
क्या भारत की अंतरिक्ष एजेंसी इसरो को धीरे-धीरे निजी हाथों के हवाले किया जा रहा है, या फिर देश एक ऐसी नई अंतरिक्ष रणनीति की ओर बढ़ रहा है जिसमें इसरो शोध और सामरिक अभियानों का कमांड सेंटर बनेगा और उद्योग उत्पादन की ताकत? यही सवाल पिछले कुछ दिनों से भारतीय अंतरिक्ष जगत के भीतर और बाहर तेज बहस का विषय बना हुआ है। अब इसरो ने स्वयं सामने आकर स्पष्ट किया है कि न तो इसरो का निजीकरण होगा और न ही उसकी भूमिका या महत्व कम किया जाएगा। यह स्पष्टीकरण ऐसे समय आया है जब इसरो के नौ कर्मचारी संगठनों ने 4 सितंबर को इसरो अध्यक्ष वी. नारायणन को पत्र लिखकर अंतरिक्ष क्षेत्र में चल रहे सुधारों, उत्पादन गतिविधियों के निजी कंपनियों और सार्वजनिक उपक्रमों को हस्तांतरण तथा कर्मचारियों के भविष्य पर गंभीर सवाल उठाए थे। उनकी चिंता का केंद्र 21 अगस्त को IN-SPACe के अध्यक्ष पवन गोयनका की वह टिप्पणी थी, जिसमें कहा गया था कि भविष्य में इसरो प्रक्षेपण यानों का निर्माण बंद कर सकता है और उनका उत्पादन उद्योग या पीएसयू संभाल सकते हैं। इसे भी पढ़ें: राष्ट्रीय आत्मविश्वास को मजबूत करता जीएसएलवी-एफ17 का प्रक्षेपण इसरो का जवाब स्पष्ट है कि भूमिका बदल रही है, महत्व नहीं। एजेंसी अब उस दिशा में अपने वैज्ञानिक संसाधन केंद्रित करना चाहती है जहां उसकी विशेषज्ञता सबसे निर्णायक है। यानि फ्रंटियर रिसर्च, उन्नत प्रौद्योगिकी, मानव अंतरिक्ष उड़ान, अगली पीढ़ी के प्रक्षेपण यान, गहरे अंतरिक्ष और ग्रहों के मिशन तथा राष्ट्रीय और सामरिक क्षमताएं। हम आपको बता दें कि संचार, नेविगेशन और पृथ्वी अवलोकन के उन्नत पेलोड, सेंसर, प्रणोदन प्रणालियां और अन्य महत्वपूर्ण तकनीकें इसरो के मूल फोकस में बनी रहेंगी। दूसरी ओर, जिन तकनीकों ने परिपक्वता हासिल कर ली है और जिनका बड़े पैमाने पर नियमित उत्पादन संभव है, उन्हें उद्योग और पीएसयू प्रतिस्पर्धी प्रक्रियाओं के माध्यम से बढ़ा सकते हैं। इसमें परिपक्व लॉन्च व्हीकल, नियमित उपग्रह और स्थापित अंतरिक्ष प्रणालियां शामिल हो सकती हैं। इसरो का तर्क है कि इससे उसके वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों का समय उत्पादन में नहीं, बल्कि भविष्य की जटिल तकनीकों और महत्वाकांक्षी अभियानों में लगेगा। यही इस बदलाव का सबसे बड़ा रणनीतिक अर्थ है। अंतरिक्ष शक्ति बनने के लिए इसरो को “फैक्ट्री” से आगे बढ़कर “टेक्नोलॉजी फ्रंटियर” पर खड़ा होना होगा। भारत ने 2030 तक सालाना 50 प्रक्षेपणों का लक्ष्य रखा है। पवन गोयनका का कहना है कि इतने बड़े पैमाने का लक्ष्य कोई एक संगठन अकेले हासिल नहीं कर सकता। इसके लिए निजी पूंजी, औद्योगिक उत्पादन क्षमता, उद्यमिता और वैश्विक बाजार तक पहुंच जरूरी है। यह पूरी व्यवस्था भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 और एफडीआई नीति के क्रमिक उदारीकरण से जुड़ी है। इसरो इसे निजीकरण नहीं, बल्कि “इकोसिस्टम विस्तार और क्षमता गुणन” बता रहा है। उद्योग, स्टार्ट-अप और अकादमिक संस्थानों को अंतरिक्ष मूल्य श्रृंखला में शामिल कर इसरो की क्षमताओं को प्रतिस्थापित नहीं, बल्कि कई गुना करने की योजना है। नई संरचना में विभागीय भूमिकाएं भी स्पष्ट की गई हैं। डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस नीति दिशा देगा, इसरो उन्नत अनुसंधान, प्रौद्योगिकी विकास और राष्ट्रीय मिशनों का मुख्य केंद्र रहेगा, IN-SPACe गैर-सरकारी संस्थाओं की भागीदारी को सक्षम और अधिकृत करेगा, जबकि NSIL परिपक्व क्षमताओं के व्यावसायीकरण और उद्योग-आधारित उपयोग को आगे बढ़ाएगा। लेकिन इस परिवर्तन पर सवाल खत्म नहीं हुए हैं। कर्मचारी संगठनों ने पूछा है कि नीति का कानूनी और प्रशासनिक आधार क्या है, इसका क्रियान्वयन कब होगा और मौजूदा कर्मचारियों तथा भविष्य की भर्ती पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। उनका सबसे महत्वपूर्ण तर्क है कि दशकों में विकसित इसरो की तकनीक राष्ट्रीय संपत्ति है, इसलिए उसका हस्तांतरण पारदर्शी, जवाबदेह और सामरिक तथा सुरक्षा हितों के अनुरूप होना चाहिए। विपक्ष ने भी इस मुद्दे को राजनीतिक मोर्चे पर उठा लिया है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि स्टार्ट-अप को बढ़ावा देने के नाम पर इसरो की भूमिका सीमित की जा रही है और उसकी दशकों पुरानी क्षमताएं निजी कंपनियों को सौंपी जा सकती हैं। पार्टी नेता जयराम रमेश ने इसे इसरो के “साराभाई-धवन ढांचे” को कमजोर करने की प्रक्रिया बताया। यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाएं अब असाधारण स्तर पर पहुंच चुकी हैं। 2035 तक भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन, 2040 तक भारतीय मानवयुक्त चंद्र मिशन, पुन: प्रयोज्य और अगली पीढ़ी के लॉन्च सिस्टम तथा सतत चंद्र और ग्रह अन्वेषण, ये लक्ष्य साधारण व्यावसायिक विस्तार से हासिल नहीं होंगे। इसरो का कहना है कि ऐसी क्षमताओं को केवल बाजार की ताकतों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। हम आपको बता दें कि भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था फिलहाल लगभग 8.4 अरब डॉलर आंकी गई है और लक्ष्य 2033 तक इसे 44 अरब डॉलर तक पहुंचाने का है। इसलिए असली चुनौती निजी क्षेत्र बनाम इसरो नहीं, बल्कि इसरो-नेतृत्व वाले राष्ट्रीय अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र की सफलता है। रणनीतिक दृष्टि से यह भारत के लिए निर्णायक मोड़ है। अब सवाल यह है कि क्या भारत उत्पादन का विस्तार करते हुए अपनी संवेदनशील तकनीक, सामरिक स्वायत्तता और वैज्ञानिक नेतृत्व को सुरक्षित रख पाएगा। यदि संतुलन सही बैठा, तो निजी उद्योग इसरो की ताकत बढ़ाएगा; यदि पारदर्शिता और संस्थागत नियंत्रण कमजोर पड़े, तो राष्ट्रीय क्षमताओं के हस्तांतरण पर उठ रहे सवाल और गंभीर होंगे। इसरो ने फिलहाल अपना संदेश साफ कर दिया है कि वह पीछे नहीं हट रहा, बल्कि उत्पादन की जिम्मेदारियों से मुक्त होकर अंतरिक्ष की अगली सीमा पर छलांग लगाने की तैयारी कर रहा है। -नीरज कुमार दुबे
उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनाव सिर्फ वोटों की गिनती से नहीं जीते जाते। यहां जाति, जज्बात, चेहरा और संदेश, इन चारों का सही तालमेल सत्ता तक पहुंचने का रास्ता बनाता है। 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर जरूर है, लेकिन सियासी बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव भी अपनी पुरानी साइकिल में नए राजनीतिक पुर्जे लगाने में जुटे हैं। मकसद सपा को उसकी पुरानी छवि से बाहर निकालना है, जिसे विरोधी लंबे समय से एक खास सामाजिक दायरे और सत्ता में कथित तौर पर आक्रामक राजनीति से जोड़ते रहे हैं। अखिलेश की नई रणनीति में जातीय समीकरण भी है, हिंदू प्रतीक भी हैं, पीडीए का विस्तार भी है और सबसे दिलचस्प बात यह है कि डिंपल यादव के रूप में एक नया और अपेक्षाकृत शांत चेहरा भी है। डिंपल की बढ़ती भूमिका और ‘सॉफ्ट पॉलिटिक्स’ देखा जाये तो अब तक डिंपल यादव की राजनीति अपेक्षाकृत संयमित और सीमित सार्वजनिक दायरे में दिखाई देती रही है। लेकिन हाल के समय में उनकी सक्रियता बढ़ी है। संसद से लेकर राजनीतिक मुद्दों तक उनकी मौजूदगी ज्यादा मुखर हुई है। यही बदलाव महज सामान्य राजनीतिक सक्रियता नहीं, बल्कि सपा की व्यापक रणनीति का एक अहम हिस्सा भी माना जा सकता है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में अक्सर आवाज जितनी ऊंची होती है, राजनीति उतनी ही असरदार दिखाई जाती है। आरोप-प्रत्यारोप, तीखे बयान और मंचीय हमले यहां आम बात हैं। ऐसे माहौल में डिंपल की शैली अलग दिखाई देती है। यानि कम शोर, संयमित भाषा, सहज व्यवहार और टकराव की बजाय संवाद का अंदाज। यही वजह है कि सपा के लिए उनका चेहरा राजनीतिक रूप से उपयोगी हो सकता है। कह सकते हैं कि अखिलेश यादव की राजनीति में धार वही है, लेकिन उसके साथ डिंपल की राजनीति का एक ‘सॉफ्ट टच’ जोड़ा जा रहा है। इसे भी पढ़ें: ‘पराये धन’ को अपना बनाना भाजपा से बेहतर कोई नहीं जानता... ‘पीडीए’ तंज पर अखिलेश यादव का तीखा पलटवार क्या डिंपल यादव हो सकती हैं मुख्यमंत्री पद का चेहरा? यहीं से एक बड़ा सियासी सवाल निकलता है कि क्या 2027 के विधानसभा चुनाव में डिंपल यादव समाजवादी पार्टी की मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार हो सकती हैं? फिलहाल सपा की राजनीति का केंद्रीय चेहरा अब भी अखिलेश यादव ही हैं। लेकिन राजनीति में हर बात की शुरुआत घोषणा से नहीं होती। कई बार किसी नेता की बढ़ती सक्रियता, बदलती भूमिका और सार्वजनिक स्वीकार्यता ही भविष्य के संकेत देने लगती है। डिंपल की कार्यशैली अखिलेश से अलग है। अखिलेश जहां सीधे राजनीतिक हमले करने और भाजपा के खिलाफ आक्रामक विपक्षी राजनीति का चेहरा हैं, वहीं डिंपल अपेक्षाकृत शांत और संतुलित दिखाई देती हैं। उनकी यही अलग पहचान भविष्य में सपा के लिए एक अतिरिक्त राजनीतिक पूंजी बन सकती है। इसके अलावा, उत्तर प्रदेश में अब कोई भी पार्टी महिलाओं को नजरअंदाज करने का जोखिम नहीं लेना चाहती। भाजपा अपनी महिला-केंद्रित योजनाओं और लाभार्थी राजनीति के जरिए महिला वोटरों पर लगातार पकड़ मजबूत करने की कोशिश करती रही है। दूसरी तरफ विपक्ष भी समझ चुका है कि सिर्फ जातीय समीकरणों से चुनावी लड़ाई पूरी नहीं होती। ‘आधी आबादी’ अब सिर्फ नारा नहीं, चुनावी समीकरण का बड़ा हिस्सा है। ऐसे में डिंपल यादव सपा के लिए एक प्रभावी महिला चेहरा बन सकती हैं। उनकी शांत और सहज छवि उन महिला मतदाताओं तक पहुंच बनाने में मदद कर सकती है, जो सपा को अब तक मुख्य रूप से पुरुष नेतृत्व वाली पार्टी के रूप में देखती रही हैं। अगर पार्टी महिलाओं के लिए ठोस राजनीतिक कार्यक्रम और भरोसेमंद संदेश के साथ मैदान में उतरती है, तो डिंपल उस अभियान का स्वाभाविक चेहरा बन सकती हैं। वैसे यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि वह मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार बनेंगी, लेकिन इतना जरूर है कि अगर सपा को 2027 में महिला मतदाताओं के बीच अपनी नई जमीन तैयार करनी है, तो डिंपल की भूमिका केवल एक सांसद या स्टार प्रचारक तक सीमित नहीं रह सकती। यूपी की राजनीति में जो नेता धीरे-धीरे अपनी जगह बनाता है, वह कई बार अचानक बड़े समीकरण का केंद्र बन जाता है। डिंपल के मामले में भी यही संभावना राजनीतिक चर्चा को दिलचस्प बनाती है। 2027 और सपा की नई सोशल इंजीनियरिंग अखिलेश यादव अच्छी तरह जानते हैं कि 2024 में बने राजनीतिक माहौल को 2027 की सत्ता तक पहुंचाने के लिए सिर्फ पुराने समीकरण काफी नहीं होंगे। दलित राजनीति की जमीन में बदलाव आया है, पिछड़ों के भीतर भी कई परतें हैं और सवर्ण मतदाताओं को लेकर नई राजनीतिक संभावनाएं तलाशनी पड़ रही हैं। यहीं से सामने आता है पीडीए का विस्तार। पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए सपा की नई राजनीतिक रणनीति का केंद्र रहा है। लेकिन अब अखिलेश ने इस राजनीतिक फार्मूले में एक नया मोड़ दिया है। ‘पी’ की व्याख्या में पंडितों यानी ब्राह्मणों को भी जोड़ने की कोशिश की गई है। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी भले बहुत बड़ी न हो, लेकिन उनका राजनीतिक प्रभाव हमेशा संख्या से ज्यादा रहा है। गांव की चौपाल हो या शहर की राजनीतिक बैठक, कई इलाकों में ब्राह्मण मतदाता चुनावी माहौल और समीकरण दोनों पर असर डालता है। बसपा ने 2007 में दलित-ब्राह्मण सामाजिक समीकरण को मजबूत करके सत्ता का रास्ता बनाया था। बाद में भाजपा के उभार और नरेंद्र मोदी की राजनीति के साथ बड़ी संख्या में ब्राह्मण मतदाता भाजपा के साथ मजबूती से जुड़ गए। अब अखिलेश उसी राजनीतिक जमीन में संभावनाएं तलाश रहे हैं। त्रिशूल, शिव और समाजवाद का नया प्रयोग अखिलेश यादव की राजनीति का एक और महत्वपूर्ण बदलाव हिंदू प्रतीकों को लेकर दिखाई देता है। वह अब केवल पुराने समाजवादी ढांचे में सिमटकर राजनीति नहीं करना चाहते। उन्हें मालूम है कि 2027 का उत्तर प्रदेश 1990 के दशक का उत्तर प्रदेश नहीं है। इसलिए सपा प्रमुख हिंदू धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों से दूरी बनाने की बजाय उन्हें अपनी राजनीतिक भाषा का हिस्सा बना रहे हैं। सनातन धर्म की चर्चा, हनुमान चालीसा का पाठ, ब्राह्मणों तक पहुंच और धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों में सक्रिय भागीदारी, यह सब एक व्यापक राजनीतिक संदेश का हिस्सा है। जनेश्वर मिश्र की जयंती के मौके पर त्रिशूल और शिव स्तुति के बीच ब्राह्मणों तक पहुंचने का संदेश इसी नई राजनीति की तस्वीर है। इटावा में केदारेश्वर महादेव मंदिर के निर्माण को भी इसी बड़े राजनीतिक संदर्भ में देखा जा सकता है। संदेश साफ है कि सपा सामाजिक न्याय की बात भी करेगी और हिंदू समाज के साथ संवाद भी बनाएगी। वैसे यह भाजपा के हिंदुत्व की सीधी नकल नहीं, बल्कि अपने लिए अलग राजनीतिक जगह बनाने की कोशिश है। लेकिन असली पेंच भी यही है। उत्तर प्रदेश में समीकरण बनाना आसान है मगर उन्हें मतदान केंद्र तक पहुंचाना मुश्किल है। अखिलेश यादव की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि ब्राह्मणों को जोड़ने की कोशिश में पीडीए का मूल आधार कमजोर नहीं हो। दूसरी चुनौती सपा की पुरानी राजनीतिक छवि है। भाजपा लगातार सपा के पिछले शासनकाल को कानून-व्यवस्था और कथित दबंग राजनीति के मुद्दे पर घेरती रही है। ऐसे में डिंपल यादव की बढ़ती भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। उनका संयमित और सहज व्यक्तित्व सपा की छवि को नया आयाम दे सकता है। लेकिन यूपी की राजनीति में सिर्फ मुस्कुराहट से चुनाव नहीं जीते जाते। सवाल यह भी है कि क्या ब्राह्मण मतदाता वास्तव में भाजपा से दूर होंगे? क्या दलितों का बड़ा हिस्सा सपा की तरफ आएगा? क्या पिछड़ों के बीच पीडीए की पकड़ और मजबूत होगी? और क्या महिला मतदाता सपा को एक नए नजरिए से देखेंगे? सवाल यह भी है कि क्या समाजवादी पार्टी अपनी पुरानी पहचान से बाहर निकलकर सचमुच एक व्यापक सामाजिक गठबंधन तैयार कर पाएगी? देखा जाये तो अखिलेश के सामने एक और चुनौती विपक्षी राजनीति के भीतर भी है। अगर सपा एक तरफ सवर्णों को जोड़ने की कोशिश करे और दूसरी तरफ उसके राजनीतिक सहयोगियों की भाषा उसी वर्ग को असहज करे, तो समीकरण बनने से पहले ही बिगड़ सकते हैं। यूपी में राजनीति का यही असली गणित है कि एक जाति को जोड़ो तो दूसरी की नाराजगी का डर, एक वर्ग को साधो तो दूसरे को संदेश देने की चुनौती। फिलहाल इतना साफ है कि अखिलेश यादव 2027 के लिए सिर्फ चुनाव नहीं लड़ रहे, बल्कि समाजवादी पार्टी का नया संस्करण तैयार कर रहे हैं। उसमें पुराना समाजवाद है, नया पीडीए है, ब्राह्मणों के लिए जगह है, हिंदू प्रतीकों की स्वीकार्यता है और महिला मतदाताओं तक पहुंचने के लिए डिंपल यादव जैसा एक अलग चेहरा भी है। यहां सवाल उठता है कि क्या ‘शार्प’ अखिलेश और ‘सॉफ्ट’ डिंपल का यह राजनीतिक संतुलन 2027 में सपा के लिए नई ताकत बनेगा? या फिर उत्तर प्रदेश की जातीय राजनीति के पुराने गड्ढे इस नई साइकिल की रफ्तार रोक देंगे? जवाब 2027 देगा, लेकिन इतना तय है कि इस बार साइकिल सिर्फ चलने नहीं, अपना नया रास्ता बनाने की कोशिश में है। -नीरज कुमार दुबे
Delhi Building Collapse: हादसे पर हादसे, Modi-Shah की बेरुखी ने बढ़ाए भ्रष्टाचारियों के हौसले?
पीएम मोदी गुजरात को देंगे 35 हजार करोड़ रुपए की सौगात, मंगलवार को मुंबई में करेंगे ग्लोबल फिनटेक फेस्ट का उद्घाटन
संयुक्त राष्ट्र संघ यानी कि यूनाइटेड नेशंस की जनरल असेंबली में दुनिया का पारंपरिक नक्शा बदलने का प्रस्ताव पारित हो गया है। नक्शे को बदलने के लिए अफ्रीकी देश टोगो की ओर से करेक्ट द मैप मुहिम चलाई गई थी। इसे अफ्रीकन यूनियन यानी कि एयू का समर्थन मिला था। प्रस्ताव में खासतौर पर अफ्रीका का आकार और हिस्सों को ज्यादा सही ढंग से दिखाने की बात कही गई थी। यूएन में इस प्रस्ताव को भारत, फ्रांस और इंग्लैंड समेत 164 देशों का समर्थन मिला है। जबकि एकमात्र अमेरिका ने इसके खिलाफ वोट किया है। इसके अलावा छह देशों स्टोनिया, जॉर्जिया, लिदवानिया, मुलदोवा, सर्बिया और यूक्रेन ने वोटिंग से दूरी बनाकर रखी। यूएन में हुए इस मतदान से दुनिया भर के संस्थानों में इस्तेमाल होने वाले नक्शों में बदलाव आएगा। यह खबर कई सवालों को जन्म देती है। जैसे कि क्या अब दुनिया का नक्शा बदल जाएगा? मरकेटर मैप इक्वल अर्थ मैप में क्या अंतर है? आखिर 450 साल पुराने नक्शे ने दुनिया को इतना अलग क्यों दिखाया और नए नक्शे में अफ्रीका अचानक इतना बड़ा नजर क्यों आया? संयुक्त राष्ट्र महासभा यूएन ने एक नए विश्व मानचित्र को मंजूरी दी है जिसमें महाद्वीपों का आकार एक दूसरे के मुकाबले ज्यादा सही दिखाया गया है। इसे भी पढ़ें: बड़ा दिखेगा अफ्रीका, घटेगा US-यूरोप का आकार...बदल गया दुनिया का 450 साल पुराना नक्शा, UN में पास हुआ ऐसा प्रस्ताव, बौखला गया अमेरिका क्यों लाया गया यह प्रस्ताव? प्रस्ताव में कहा गया कि 16वीं सदी में नौवहन के उद्देश्य से तैयार 'मर्केटर प्रोजेक्शन' उपयोग अब तक धरती पर देशों और महाद्वीपों को दिखाने के लिए किया जाता था। इसमें देशों और महाद्वीपों का आकार उनके असली क्षेत्रफल से बड़ा या छोटा दिखता था। टोगो की पहल और अफ्रीकी देशों की अगुआई में लाए गए इस प्रस्ताव का मकसद खास तौर पर अफ्रीका के आकार को दुनिया के नक्शों में अधिक वास्तविक रूप में दिखाना है। इस फैसले से देशों और महाद्वीपों के क्षेत्रफल पर कोई असर नहीं पड़ेगा। बस आकार में बदलाव हो सकता है। क्योंकि, नया नक्शा सीमाएं नहीं, बल्कि नक्शे पर पृथ्वी को दिखाने का तरीका बदलने वाला है। भारत का नक्शा थोड़ा अलग दिख सकता है, लेकिन बड़ा बदलाव नहीं होगा। मार्केटर क्या चीज है? मान लीजिए आपके हाथ में एक सेब है। सेब एकदम गोल। ठीक हमारी पृथ्वी की तरह। अब अगर आप उस सेब का छिलका उतारकर मेज पर बिल्कुल सपाट रख दें यानी समतल रख दें और फैलाने की कोशिश करेंगे तो वह किनारे से फटेगा या फिर आपको उसे जबरदस्ती खींचना पड़ेगा। यह भी हो सकता है। कुछ ऐसा उदाहरण आप संतरे को भी लेकर देख सकते हैं। जब आप संतरे को छीलते हैं और नीज पर रखते हैं तो शायद वो फैल भी सकता है या टूट भी सकता है। गोल धरती को चौकोर पन्ने पर उतारते वक्त भी बिल्कुल यही परेशानी आती है। करीब 450 साल पहले 1569 में गेराड्स मॉकेटर ने यही नक्शा तैयार किया था। उस दौर में हवाई जहाज नहीं थे। लोग समंदर में जहाजों से महीनों सफर करते। नाविक पानी में भटक ना जाए इसलिए मार्केटर ने नक्शे में रास्तों और दिशाओं को एकदम सीधी रेखाओं में रखा ताकि जहाजों को सही दिशा मिले। दिशाएं सीधी रखने के चक्कर में एक बड़ी भूल हुई। मार्केटर नक्शा समंदर में जहाजों को सही रास्ता दिखाने के लिए तो शानदार था लेकिन उसने दुनिया के देशों का असली आकार खराब कर दिया था। इसे भी पढ़ें: भारत तैयार है...यूक्रेन पहुंचकर जयशंकर ने किया ऐसा धमाका, रूस-अमेरिका दोनों हो जाएंगे हैरान क्या नक्शों को तत्काल मर्केटर से बदलना होगा? यह प्रस्ताव गैर-बाध्यकारी है। मतलब, दुनियाभर में इस्तेमाल होने वाले सभी नक्शों को तत्काल मर्केटर से बदलना अनिवार्य नहीं है। मुख्य उद्देश्य अधिक सटीक और समानुपातिक कार्टोग्राफिक मेथेडोलॉजी को प्रोत्साहित करना है। वोट से पहले UN ने टोगो के विदेश मंत्री रॉबर्ट डूसी के हवाले से कहा, 'मैप दुनिया के बारे में हमारी समझ को आकार देते हैं। वे शिक्षा को गाइड करते है, कल्पना को बढ़ावा देते है और सामूहिक सोच पर असर डालते हैं। द ग्रेट माइग्रेशन धरती पर इंसानी सफर की बुनियाद अफ्रीका की सरजमीं से ही पड़ी, जिसे इतिहास में ‘द ग्रेट माइग्रेशन’ का नाम मिला। वैज्ञानिकों का भी यही मानना है कि इसी महाद्वीप से निकलकर इंसान दुनिया के कोने-कोने में बसे और सभ्यताओं का विस्तार हुआ। मगर वक्त का अजीब फेर देखिए—जिस भूभाग ने पूरी मानव जाति को पहचान दी, वही सदियों तक दुनिया के कागजों पर अपनी सही भौगोलिक पहचान और वास्तविक आकार के लिए संघर्ष करता रहा। अब संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एक अहम प्रस्ताव को हरी झंडी दी है, जो दुनिया के सामने देशों और महाद्वीपों का बिल्कुल सटीक और यथार्थवादी खाका पेश करेगा। दरअसल, गोल घूमती धरती को किसी सपाट कागज पर हूबहू उतार पाना कभी आसान नहीं रहा। 16वीं सदी में जब तकनीक बेहद सीमित थी, तब 1569 में भूगोलवेत्ता गेरार्डस मर्केटर ने समुद्री जहाजों के रास्ते आसान करने के लिए एक नक्शा तैयार किया। उस दौर के व्यापार और नौवहन के लिए तो वह पैमाना कारगर रहा, लेकिन उसने भूगोल की सच्चाई को हमेशा के लिए उलझा दिया। ध्रुवों के पास वाले इलाके विशाल दिखने लगे और भूमध्य रेखा के करीब मौजूद अफ्रीका जैसे विशाल महाद्वीप नक्शे पर सिमट कर रह गए। कारोबार की सहूलियत के लिए बना वही खाका धीरे-धीरे देशों के आत्मसम्मान और उनकी अस्मिता की लड़ाई बन गया। अफ्रीकी मुल्क टोगो ने इस गैर-बराबरी को वैश्विक मंच पर मुखरता से उठाया, क्योंकि किसी भी समाज के लिए नक्शा सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि उसकी पहचान का आईना होता है। किसी भी अनजान मुल्क में पैर रखने से पहले इंसान नक्शे की नजर से ही उससे नाता जोड़ता है, और सही पहचान के साथ इस सफर को महसूस करने का अपना एक अलग गौरव है। भारत ने क्या शर्त लगाई भारत ने इस प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया है। लेकिन भारत ने साथ ही साफ किया है कि इसका मतलब किसी एक खास वर्ल्ड मैप को मंजूरी देना नहीं है। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि इस प्रस्ताव का देशों की सीमाओं, विवादित इलाकों या जगहों के नाम से कोई लेना देना नहीं है। भारत ने यह भी साफ़ किया है कि भारत का क्षेत्र जिसमें जम्मू कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश भी शामिल है, उसे भारत के आधिकारिक नक्शे के मुताबिक ही दिखाया जाना चाहिए। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारत की सीमा या क्षेत्र को गलत या भ्रामक तरीके से दिखाना भारत को मंज़ूर नहीं है। और भारत ने साफ़ कहा है कि अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को लेकर उसका रुख बिल्कुल स्पष्ट है। इस मुद्दे पर भारत ना तो अपना रुख बदलेगा और ना ही कोई समझौता करेगा। तो बेसिकली भारत ने यूएन के इस प्रस्ताव का समर्थन तो किया है लेकिन अपनी सीमा औरसंप्रभुता को लेकर अपना रुख बिल्कुल साफ और गैर समझौतावादी रखा है।
कर्नाटक में सूखाग्रस्त तालुकों की घोषणा में भेदभाव, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ने राज्य सरकार पर लगाया भेदभाव का आरोप
सागर जहरीली शराब कांड: अस्पताल में 84 बीमार लोगों का इलाज जारी, 30 आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज
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जयपुर में गरजे ओवैसी, मस्जिदों पर कार्रवाई से लेकर बुनियादी मुद्दों तक BJP को घेरा; हनुमान बेनीवाल के साथ दिखी नई जुगलबंदी
दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में इमारत गिरने की घटना पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने शोक संतप्त परिवारों के प्रति संवेदना जताई और घायलों के जल्द स्वस्थ होने की कामना की।
शिवसेना प्रवक्ता राजू वाघमारे ने पीएम मोदी के 'नाराज फूफा' वाले बयान का समर्थन करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री की होमियोपैथी वाली टिप्पणी जेन-जी के लिए नहीं, बल्कि विपक्ष के लिए थी। उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी का काम दूसरों के कंधे पर बंदूक रखकर सरकार पर निशाना साधना है और उनकी स्थिति 'मेरी सूरत ही ऐसी है' वाली कहावत जैसी है।
बचपन का सपना हुआ साकार, इंजीनियर आर्यन मलिक बने लेफ्टिनेंट
भारतीय सेना में अधिकारी बनकर आर्यन ने बढ़ाया परिवार, गांव और क्षेत्र का गौरव; बधाई देने के लिए घर पहुंच रहे ग्रामीण
प्रधानमंत्री मोदी करीब 13 साल बाद SRCC पहुंचे। उन्होंने कार्यक्रम स्थल तक पहुंचने के लिए मेट्रो की यात्रा भी की। वर्ष 2013 में वह गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में इसी कॉलेज में आए थे। अपने संबोधन में उन्होंने उस पुराने दौरे को याद करते हुए तब और अब के भारत की आर्थिक स्थिति की तुलना की।
पीएम मोदी के जन्मदिन पर गुजरात में एक महीने तक चलेगा 'सेवा समर्पण' अभियान, रविवार को हुआ कार्यशाला का आयोजन
सोना चार हजार रुपए और चांदी आठ हजार रुपए सस्ती हुई
नई दिल्ली, सोने और चांदी में इस हफ्ते बड़ी गिरावट देखने को मिली, जिससे दोनों कीमती धातुओं का दाम क्रमश: 4,000 रुपए और 8,000 रुपए से अधिक घट गया।
सागर जहरीली शराब कांड: सीएम मोहन यादव ने दिए कार्रवाई के निर्देश, बोले- 'सरकार बर्दाश्त नहीं करेगी ऐसी घटनाएं'
'मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के लिए संकटमोचक थे सुदिव्य सोनू', मंत्री के निधन पर कांग्रेस और झामुमो नेताओं ने जताया दुख
उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन आज से दो दिवसीय असम दौरे पर
उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन रविवार को दो दिवसीय असम दौरे पर जाएंगे, जहां वह एक शैक्षणिक संस्थान के स्वर्ण जयंती समारोह, एक विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह और एक नागरिक अभिनंदन कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे।
हाईकोर्ट में बड़े बदलाव : केंद्र ने 8 राज्यों में नए चीफ जस्टिस नियुक्त किए
केंद्र सरकार ने देश के आठ हाईकोर्ट में नए मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति की है
गुजरात भर के 40 शिक्षकों को 'राज्य के सर्वश्रेष्ठ शिक्षक' पुरस्कार से सम्मानित किया गया
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यूपी: सहारनपुर में मस्जिद गिराए जाने पर विपक्ष का हमला, बोले- कानून सभी के लिए समान होना चाहिए
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उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन 6 सितंबर से दो दिवसीय असम दौरे पर, कई कार्यक्रमों में लेंगे हिस्सा
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कांग्रेस ने शनिवार को बड़ा संगठनात्मक बदलाव करते हुए कई राज्यों के लिए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) के नए प्रभारी नियुक्त किए हैं
'दिमागी नक्सल वो होम्योपैथिक गोली जिसने सबको बाहर निकाल दिया, पीएम मोदी का विपक्ष पर तंज
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