पेयजल के बिना कैसे पूरा होगा विकसित भारत का सपना
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने सार्वजनिक जीवन के 25 साल पूरे होने पर आयोजित कार्यक्रम को एक घंटे तक संबोधित करते हुए कहा कि जब तक भारत विकसित नहीं होता, तब तक न थकूंगा, न रुकूंगा। इस नारे का 19 बार जिक्र किया। उन्होंने कहा कि भारत को 2047 तक हर हालत में विकसित देश बनाना है। निश्चित तौर पर भारत को विकसित देश बनना ही चाहिए। सवाल यह है कि क्या तब तक भारत के करोड़ों लोग प्यासे रहेंगे। उन्हें पर्याप्त और शुद्ध पानी के लिए क्या भारत के विकसित होने तक इंतजार करना पड़ेगा। क्या देश के लोगों की प्यास और दूषित पेयजल से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं को तब तक के लिए रोका जा सकता है। विकसित भारत का सपना देखने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन इससे पहले केंद्र और राज्यों की सरकारों का यह खुलासा करना चाहिए कि देश के लोगों को गुणवत्तायुक्त पर्याप्त पीने का पानी कब तक उपलब्ध हो जाएगा। इसके लिए देश की राष्ट्रीय नीति क्या है। इस मुद्दे पर कोई बोलने को तैयार नहीं है। इस बारे में चर्चा करते ही देश के विकास और विकसित भारत के सपने पर सवालिया निशान लग जाते हैं। देश के सत्तारुढ़ दलों और विपक्षी दलों के नेता ऐसे जमीनी जरूरतों के मुद्दों से मुंह चुराते हैं। पेयजल जैसी समस्याओं से निपटने के लिए सरकारों के पास दूरदृष्टि और योजनाएं नहीं हैं। यदि लगातार एक या दो बार देश में मानसून मेहरबान न हो तो देश में पीने के पानी का हाहाकार मचने लगता है। इसे भी पढ़ें: Maharashtra Drought: सूखा प्रभावित क्षेत्रों के लिए 8 महीने की योजना बनाएगी सरकार, केंद्र से मांगेगी राहत देश में पेयजल संकट अभी से गहराने लगा, जबकि अभी मानसून की विदाई हुई है। महाराष्ट्र में राज्य सरकार ने 16 अक्टूबर से सभी शहरी और ग्रामीण स्थानीय निकायों में कम से कम 10 प्रतिशत जल कटौती लागू करने का निर्णय लिया है। राज्य के जालना जिले में बांध में केवल 2 प्रतिशत पानी बचा है। नौबत यहां तक आ गई है कि प्रशासन को पानी की चोरी रोकने के लिए पुलिस और राजस्व विभाग की टीमों के साथ रात में भी निगरानी और गश्त करनी पड़ रही है। इस बार मानसून में बारिश की करीब 12—13 प्रतिशत की कमी के कारण देश के दूसरे राज्यों की हालत भी महाराष्ट्र जैसी होने से इंकार नहीं किया जा सकता। देश के कई राज्यों में कम बारिश का असर अब जलाशयों पर दिख रहा है। 1 अक्टूबर तक देश के प्रमुख जलाशयों में 71.84% पानी था। पिछले साल इसी समय यह 90.31% था, जबकि सामान्य स्तर 81.79% है। अर्थात इस बार जलाशयों में पानी पिछले साल के मुकाबले काफी कम है। देशभर में इस बार का मानसून 13वां सबसे सूखा सीजन रहा। पिछले 11 सालों में यह सबसे कम बारिश वाला मानसून रहा है। हालांकि, सीजन खत्म होने से पहले हुई तेज बारिश के कारण बारिश की कमी में 2.5% का सुधार हुआ। मानसून-2026 सीजन सामान्य से 12.6% कम बारिश के साथ खत्म हुआ। देश के 43% जिलों में 20 से 72% तक कम बारिश हुई। सबसे ज्यादा पंजाब में 41% कम बारिश हुई। राजस्थान में करीब 22% कमी दर्ज की गई। इनके अलावा 9 राज्यों में भी औसत से कम बारिश हुई। पूर्वी भारत में ओडिशा में सामान्य से 30% ज्यादा बारिश हुई, जबकि बारिश के लिए प्रसिद्ध पूर्वोत्तर राज्यों में इस साल 1901 के बाद सबसे कम बारिश दर्ज की गई। पानी की कमी का असर महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, राजस्थान और तमिलनाडु में ज्यादा दिख रहा है। कई इलाकों में खेती के लिए पानी कम पड़ रहा है और फसलों को भी नुकसान हो रहा है। आजादी के साठ वर्षो के बाद भी देश की एक तिहाई जनता को पीने के लिए स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है। शायद यही कारण है कि प्रतिवर्ष जल जनित बीमारियों के चलते 15 लाख बच्चे काल के गाल में समा जाते है और काम के अनगिनत घंटों का नुकसान होता है। समस्या यह है कि केंद्र एवं राज्य सरकारें पेयजल संकट को दूर करने के लिए गंभीर नहीं, जबकि वे इससे परिचित है कि आने वाले समय में पानी के लिए युद्ध छिड़ सकते है। भारत में पेयजल संकट बढ़ती आबादी और कृषि की जरूरतों के कारण भी गंभीर होता जा रहा है। करीब 65-70 प्रतिशत जल कृषि कार्यो में खप जाता है। इसके अतिरिक्त उद्योगों के संचालन में भी जल का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। विडंबना यह है कि न तो उद्योग एवं कृषि क्षेत्र को अपनी आवश्यकता भर पानी उपलब्ध हो पा रहा है और न ही आम आदमी को। हमारे देश में जल संकट जब-तब गंभीर रूप ले लेता है। बात चाहे कावेरी जल विवाद के कारण तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच की तनातनी की हो अथवा यमुना जल के बंटवारे को लेकर दिल्ली एवं हरियाणा के बीच की, ऐसे विवाद लगातार बढ़ते जा रहे है। अब तो जल बंटवारे को लेकर राजनीति भी होने लगी है और एक प्रांत के लोगों को दूसरे प्रांत के लोगों के समक्ष खड़ा करने में संकोच नहीं किया जा रहा है। इन दिनों होगेंक्काल पेयजल परियोजना को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच यही हो रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार देश के 60 करोड़ लोग पानी की किल्लत से जूझ रहे हैं जबकि 16 करोड़ लोग गंदा पानी पी रहे हैं। शुद्ध पानी के लिए सरकार करोड़ों-अरबों रुपये खर्च कर रही है, लेकिन हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। देश के करीब 9 राज्यों में पानी की गुणवत्ता खराब है। नीति आयोग की कंपोजिट वॉटर मैनेजमेंट इंडेक्स रिपोर्ट में बताया गया कि भारत में पानी की वजह से हर साल दो लाख लोगों की मौत हो रही है। साल 2030 तक ये स्थिति और विकराल हो जाएगी जब देश की लगभग 40 फीसदी आबादी के सामने पानी का संकट होगा। विकसित भारत के 2047 के लक्ष्य तक देश में पेयजल की हालत का तो आकलन ही नहीं किया गया है। यूनाइटेड स्टेट्स जियोलॉजिकल सर्वे के वैश्विक स्तर पर कुल पानी की सालाना निकासी या खपत के मामले में भारत पहले पायदान नंबर-1 पर है। अत्यधिक आबादी और कृषि (सिंचाई) के कारण सबसे आगे है। वैश्विक जल गुणवत्ता सूचकांक में भारत 122 देशों में से 120वें स्थान पर है। सुरक्षित पेयजल और जल गुणवत्ता के मामले में भारत की गिनती दुनिया के सबसे निचले स्तर के देशों में होती है। पेयजल से लेकर जल संरक्षण की योजनाओं पर अत्यंत शिथिलता बरती जा रही है। दो वर्ष पूर्व आम बजट में ऐसी योजनाओं के लिए तमाम प्रावधान किए गए थे, लेकिन इस बजट में वे सिरे से गायब है। देश को विकसित राष्ट्र बनाने में जल संसाधन का उतना ही महत्व है जितना ऊर्जा और अन्य साधनों का। जब तक ऐसी बुनियादी सुविधाओं का समाधान नहीं होगा, तब तक विकसित राष्ट्र का सपना एक छलावा ही साबित होगा। - योगेन्द्र योगी
भारत में सितंबर में खुदरा महंगाई 5.54 प्रतिशत रही
नई दिल्ली, भारत में सितंबर 2026 में खुदरा महंगाई सालाना आधार पर बढ़कर 5.54 प्रतिशत (प्रोविजनल) हो गई है।
'ये लोग अब संवैधानिक संस्थाओं से लड़ रहे हैं', भाजपा नेता ने कांग्रेस पर साधा निशाना
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वैश्विक अस्थिरता बढ़ने से भारतीय शेयर बाजार लाल निशान में बंद
मुंबई, भारतीय शेयर बाजार सोमवार के कारोबारी सत्र में लाल निशान में बंद हुआ।
विपक्षी नेता किसी सरकार पर हमला बोलें तो समझ आता है, लेकिन मध्य प्रदेश में तो राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपनी ही पार्टी की सरकार के मुख्यमंत्री मोहन यादव को घेरकर पूरी भाजपा को सकते में डाल दिया है। हम आपको बता दें कि आदिवासियों के घरों पर बुलडोजर चलाए जाने के मुद्दे पर शिवराज की नाराजगी ने मध्य प्रदेश की सियासत में एक नई बहस छेड़ दी है। सवाल सिर्फ आदिवासी परिवारों के घरों को तोड़े जाने का नहीं है, बल्कि यह भी है कि क्या भारतीय जनता पार्टी के भीतर सत्ता और नेतृत्व को लेकर कोई ऐसी खींचतान चल रही है, जिसकी झलक अब सार्वजनिक रूप से दिखाई देने लगी है? मुख्यमंत्री मोहन यादव और शिवराज सिंह चौहान के बीच कथित मतभेदों की चर्चाओं के बीच इस घटनाक्रम के राजनीतिक मायने तलाशे जा रहे हैं। हम आपको बता दें कि मामला सीहोर जिले के कोसमी गांव का है, जहां 11 अक्टूबर को वन विभाग और वन विकास निगम की कार्रवाई में बारेला आदिवासी समुदाय के 12 परिवारों के घर तोड़े जाने की खबर सामने आई। आरोप है कि इस कार्रवाई में खेतों में खड़ी मक्का और अरहर की फसलें भी नष्ट हुईं और पानी के लिए इस्तेमाल होने वाले कुएं को मिट्टी से भर दिया गया। अधिकारियों की दलील वन भूमि पर कथित अतिक्रमण हटाने की है, लेकिन कार्रवाई के तरीके ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इसे भी पढ़ें: Rahul Gandhi के आरोपों पर Shivraj का पलटवार, अराजकता से सत्ता पाना चाहती है Congress शिवराज सिंह चौहान को इसकी जानकारी मिली तो वह सीधे गांव पहुंच गए। पीड़ित परिवारों से मुलाकात की, उनके साथ धरने पर बैठे और मौके से ही मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल तथा भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल से बात की। शिवराज ने प्रभावित परिवारों को नए मकान बनवाने और तब तक रहने-खाने की व्यवस्था कराने का भरोसा दिया। उन्होंने अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि गरीब आदिवासियों के साथ हुआ अन्याय बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। लेकिन शिवराज के बयान का सबसे अहम हिस्सा वह था, जिसमें उन्होंने सवाल उठाया कि जिन लोगों के वोट से भाजपा को जीत मिलती है, उन्हीं के घर क्यों उजाड़े जा रहे हैं? उन्होंने यह आशंका भी जताई कि कुछ अधिकारी मुख्यमंत्री मोहन यादव की छवि खराब करने की साजिश कर रहे हो सकते हैं। यानी शिवराज ने एक तरफ मुख्यमंत्री के प्रति अपनी चिंता जताई, तो दूसरी तरफ उनके अधीन काम करने वाले प्रशासनिक तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया। सवाल उठता है कि क्या यह शिवराज बनाम मोहन यादव की लड़ाई है? देखा जाये तो राजनीतिक गलियारों में इस घटनाक्रम को सिर्फ प्रशासनिक कार्रवाई के विरोध तक सीमित करके नहीं देखा जा रहा है। दिसंबर 2023 में शिवराज सिंह चौहान की जगह मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद से ही दोनों नेताओं की राजनीतिक भूमिका और उनके बीच संबंधों को लेकर समय-समय पर चर्चाएं होती रही हैं। शिवराज लंबे समय तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं और बुधनी उनकी पुरानी राजनीतिक कर्मभूमि रही है। ऐसे क्षेत्र में आदिवासी परिवारों के घर उजड़ना और फिर उनका खुद मौके पर पहुंचकर प्रशासन के खिलाफ खड़ा होना, उनकी स्थानीय राजनीतिक पकड़ और जननेता की छवि से भी जुड़ा है। ऐसे में उनकी प्रतिक्रिया को जनहित की चिंता और अपने राजनीतिक प्रभाव को बनाए रखने, दोनों संभावित संदर्भों में भी देखा जा सकता है। उधर, कांग्रेस ने इस प्रकरण को भाजपा के अंदरूनी मतभेदों से जोड़ते हुए मुख्यमंत्री पर निशाना साधा है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने आरोप लगाया कि भाजपा की अंदरूनी खींचतान का खामियाजा आदिवासी परिवारों को भुगतना पड़ रहा है। हालांकि, भाजपा के लिए असली चुनौती विपक्ष के आरोपों से ज्यादा इस सवाल का जवाब देना है कि कथित अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई में प्रभावित परिवारों के पुनर्वास, आजीविका और बुनियादी जरूरतों का ध्यान रखा गया या नहीं। अगर केंद्रीय मंत्री को अपनी ही राज्य सरकार के अधिकारियों के खिलाफ सार्वजनिक रूप से हस्तक्षेप करना पड़ रहा है, तो प्रशासनिक समन्वय और जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है। वैसे यह पहली बार नहीं है जब शिवराज ने मध्य प्रदेश सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हों। उन्होंने पहले भी आदिवासियों से जुड़े मामलों और मूंग की खरीद के मुद्दे पर हस्तक्षेप किया था। अब निगाहें मुख्यमंत्री मोहन यादव की प्रतिक्रिया और प्रभावित परिवारों को मिलने वाली राहत पर हैं। शिवराज का कहना है कि वह मुख्यमंत्री के सामने पूरा मामला उठाएंगे। यदि दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई होती है और परिवारों का पुनर्वास सुनिश्चित किया जाता है, तो विवाद का प्रशासनिक समाधान निकल सकता है। लेकिन यदि मामला लंबा खिंचता है, तो भाजपा के भीतर समन्वय और नेतृत्व की कार्यशैली पर बहस और तेज हो सकती है। बहरहाल, कोसमी की घटना को शिवराज और मोहन यादव के बीच टकराव कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना स्पष्ट है कि केंद्रीय मंत्री का सार्वजनिक विरोध राज्य सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा करता है। -नीरज कुमार दुबे
सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इंडिया ब्लॉक का सुप्रीम कोर्ट मार्च, राहुल-खड़गे समेत कई नेता शामिल
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गोल्ड ईटीएफ में निवेश 71 प्रतिशत से अधिक बढ़कर 4,451 करोड़ रुपए हुआ
नई दिल्ली, एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया (एम्फी) की ओर से सोमवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, सितंबर में गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) में शुद्ध निवेश अगस्त के 2,597 करोड़ रुपए से महीने-दर-महीने आधार पर 71.4 प्रतिशत बढ़कर सितंबर में 4,451 करोड़ रुपए हो गया है। यह दिखाता है कि सोने की ओर लोगों का रुझान बढ़ रहा है।
जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन पर रोक को लेकर सौरव दास और आशुतोष रांका बोले-'यह अस्वीकार्य, पीछे नहीं हटेंगे'
कांग्रेस के सुप्रीम कोर्ट तक मार्च पर भाजपा नेता बोले-'इनके खिलाफ अवमानना का केस चलना चाहिए'
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स्टारलिंक के मालिक एलन मस्क का दुस्साहस बढ़ता ही चला जा रहा है। भारतीय उद्योगपति और रिलायंस इंडस्ट्रीज के मालिक मुकेश अंबानी पर सोशल मीडिया के जरिये निशाना साधने के बाद अब जियो के प्रस्तावित आईपीओ से ठीक पहले एलन मस्क ने तीखे बयान दिये हैं। जिन्हें भारतीय बाजार में अपनी एंट्री के लिए दबाव बनाने और रिलायंस के खिलाफ माहौल तैयार करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। गौरतलब है कि एलन मस्क ने आरोप लगाया है कि भारत में कुछ प्रभावशाली कारोबारी हित उनकी कंपनी स्टारलिंक का रास्ता रोक रहे हैं। साथ ही, उन्होंने भारत में सस्ती सैटेलाइट इंटरनेट सेवा देने का वादा किया है। हालांकि, सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि जियो और भारती समर्थित वनवेब भी जरूरी मंजूरियों के लिए लंबे समय से इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मस्क के आरोप तथ्यों पर आधारित हैं या जियो के आईपीओ से पहले प्रतिस्पर्धा को लेकर एकतरफा नैरेटिव बनाने की कोशिश की जा रही है? उल्लेखनीय है कि मस्क ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर दावा किया कि भारत में कुछ प्रभावशाली कारोबारी हित स्टारलिंक की एंट्री रोककर अपने एकाधिकार को बचाना चाहते हैं। उन्होंने अंबानी पर भी निशाना साधते हुए प्रतिस्पर्धा की अनुमति देने की बात कही। साथ ही वादा किया कि भारत में स्टारलिंक की सेवा सस्ती रखी जाएगी, क्योंकि महंगी सेवा होने पर ग्राहक उसे नहीं अपनाएंगे। मस्क का तर्क है कि प्रतिस्पर्धा से भारतीय उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प मिलेंगे, भले ही इससे अंबानी के मुनाफे पर दबाव पड़े। इसे भी पढ़ें: एलन मस्क प्रकरण, विदेशी मुख के शंख न बनें राहुल गांधी लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत में स्टारलिंक की व्यावसायिक शुरुआत में देरी के लिए वास्तव में जियो या अंबानी जिम्मेदार हैं? दूरसंचार विभाग (DoT) के रिकॉर्ड पर आधारित रिपोर्ट इस दावे की दूसरी तस्वीर पेश करती है। रिपोर्ट के मुताबिक, जियो सैटेलाइट कम्युनिकेशंस और भारती समर्थित वनवेब ने स्टारलिंक से पहले अपनी सुरक्षा और तकनीकी अनुपालन संबंधी प्रक्रियाएं पूरी कर ली थीं। जियो ने 20 मार्च 2025 को अपना सुरक्षा एवं तकनीकी प्रदर्शन पूरा किया, जबकि वनवेब ने 2025 की दूसरी छमाही में यह प्रक्रिया पूरी की। स्टारलिंक का प्रदर्शन 2026 की शुरुआत में हुआ। ऐसे में यह कहना कि केवल भारतीय प्रतिस्पर्धियों के प्रभाव के कारण स्टारलिंक को रोका जा रहा है, यह सरासर गलत है। देखा जाये तो लाइसेंस और मंजूरी की समयरेखा भी इस बहस को समझने में मदद करती है। वनवेब को अगस्त 2021 में दूरसंचार विभाग से आशय-पत्र मिला और अप्रैल 2022 में उसे जीएमपीसीएस लाइसेंस मिला। जियो ने नवंबर 2021 में लाइसेंस के लिए आवेदन किया और अक्टूबर 2022 में प्राधिकरण हासिल किया। इसके विपरीत, स्टारलिंक को जीएमपीसीएस लाइसेंस 6 जून 2025 को मिला। यानी भारतीय कंपनियां इस प्रक्रिया में पहले से मौजूद थीं, फिर भी उनकी सेवाएं व्यावसायिक रूप से शुरू नहीं हो सकी हैं। तीनों कंपनियों को अंतिम सुरक्षा मंजूरी और स्पेक्ट्रम आवंटन की प्रतीक्षा है। यदि जियो और वनवेब को बाजार में स्टारलिंक को रोकने के लिए विशेष सुविधा मिल रही होती, तो सवाल उठाए जा सकते थे। इसके अलावा, सैटेलाइट इंटरनेट का मामला सामान्य दूरसंचार सेवा से अलग है। इसके नेटवर्क की पहुंच सीमाओं से परे हो सकती है, इसलिए नेटवर्क की निगरानी, वैध अवरोधन और भारतीय कानूनों के अनुपालन जैसे विषय महत्वपूर्ण हैं। सुरक्षा संबंधी शर्तें पूरी होने के बाद ही स्पेक्ट्रम आवंटन और व्यावसायिक परिचालन का रास्ता साफ हो सकता है। हम आपको यह भी बता दें कि केंद्र सरकार ने मस्क के भेदभाव के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि नियामकीय ढांचा निष्पक्ष और गैर-भेदभावपूर्ण है। दूरसंचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी स्पष्ट किया है कि कंपनियां जरूरी सुरक्षा और नियामकीय शर्तें पूरी करने के बाद ही सेवाएं शुरू कर सकती हैं। देखा जाये तो भारत के लिए इस मामले में प्राथमिकता किसी कारोबारी घराने के हितों की रक्षा करना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा का वातावरण तैयार करना होना चाहिए। स्टारलिंक को भी अन्य कंपनियों की तरह समान नियमों का पालन करना होगा। केवल वैश्विक प्रतिष्ठा, तकनीकी क्षमता या बाजार में निवेश की इच्छा के आधार पर सुरक्षा संबंधी शर्तों में छूट नहीं दी जा सकती। अब सवाल उठता है कि जियो के आईपीओ पर कितना असर पड़ेगा? हम आपको बता दें कि जियो प्लेटफॉर्म्स 106 अरब डॉलर के मूल्यांकन को लक्ष्य बनाकर अपना आईपीओ लाने की तैयारी में है। ऐसे समय में मस्क का अंबानी पर सार्वजनिक हमला और सस्ती स्टारलिंक सेवा का वादा बाजार में चर्चा पैदा कर रहा है। लेकिन निवेशकों के लिए एलन मस्क के बयान की बजाय जियो कंपनी की वित्तीय स्थिति, विकास की संभावनाएं, प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति और नियामकीय जोखिम जैसे कई कारक महत्वपूर्ण होंगे। इसी तरह, स्टारलिंक की भारतीय बाजार में वास्तविक चुनौती उसकी कीमत, कवरेज, सेवा की गुणवत्ता और आवश्यक मंजूरियां मिलने पर निर्भर करेगी। बहरहाल, भारत में कारोबार करने की इच्छा रखने वाली किसी भी विदेशी कंपनी का स्वागत प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ता हितों के आधार पर होना चाहिए, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा की शर्तों के साथ। मस्क की बयानबाजी से मंजूरी की प्रक्रिया तेज हो या न हो, उसका फैसला नियमों और तथ्यों के आधार पर ही होना चाहिए। जियो और वनवेब के इंतजार का रिकॉर्ड यह भी बताता है कि मामला केवल स्टारलिंक बनाम अंबानी का नहीं, बल्कि भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के लिए सुरक्षा, नियमन और समान अवसर सुनिश्चित करने का है। -नीरज कुमार दुबे
संतोष मूरत की 'साहब, मैं ज़िंदा हूँ' वाली तख्ती से गृह मंत्रालय के ताले तक, जंतर-मंतर की अनकही कहानी
कागज़ पर मरा हुआ एक इंसान जब खुद के ज़िंदा होने की सनद मांगने देश की चौखट पर आया, तो उसने जंतर मंतर के फुटपाथ को अपना ठिकाना बनाया। हाथों में मैं जिंदा हूं साहब वाली तख्ती और कड़कड़ाती ठंड में सीने से चिपका हुआ एक लावारिस भूरा कुत्ता। मानो मुंशी प्रेमचंद की पूस की रात का हल्कू और जबरा, दिल्ली के दिल में सालों तक इंसाफ की पहरेदारी करते रहे। नाम संतोष मूरत सिंह। यह वही सड़क है, जहाँ सिर्फ संतोष नहीं, बल्कि मुल्क के हर उस कोने की आवाज़ पहुँची, जिसे अपनी ही ज़मीन पर बेगाना कर दिया गया था। सवाई जयसिंह ने सदियों पहले पत्थरों के इस अजूबे को ग्रहों और तारों की चाल नापने के लिए तराशा था। इन्हें भला इस बात का क्या इल्म होगा कि आदाज हिंदुस्तान में ये खगोलीय वेधशाला एक दिन मुल्क के दर्द का थर्मामीटर बन जाएगा। दशक दर दशक बदलते रहे। लेकिन लाल-बलुआ पत्थर और ईंटों से बना जंतर-मंतर महज स्माक नहीं अपितु 140 करोड़ हिंदुस्तानियों की असहमति की सबसे बड़ी पनाहगाह बन गया। एक ऐसा ठिकाना जहां लोकतंत्र के हाशिए पर खड़ा सबसे कमजोर इंसान भी तख्त पर बैठे हुक्मरानों की आंखों में आंखे डालकर सवाल कर सके। लेकिन अब पत्थरों की यह सड़क खामोश हो जाएगी। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक बड़ा फैसला लेते हुए जंतर मंतर को आधिकारिक प्रोटेस्ट साइट्स की सूची से डिनोटिफाई कर दिया है। यानी लोकतंत्र का वह मशहूर कोना, जहाँ तख्तियों की इबारतें हुकूमतों की नींद उड़ा दिया करती थीं, अब हमेशा के लिए खाली करा लिया गया है। वाल सिर्फ एक जगह के बंद होने का नहीं है। सवाल यह है कि जब असहमति की सबसे पहचानी जाने वाली चौखट ही मिटा दी जाए, तो वो संतोष मूरत सिंह, वो किसान, वो छात्र और वो मजदूर ब अपनी फरियाद लेकर किस देहरी पर दस्तक देंगे? इसे भी पढ़ें: Jantar Mantar नहीं रहा अब 'प्रोटेस्ट साइट', गृह मंत्रालय का बड़ा फैसला, तय किए ये 3 नए स्थान क्या है नया फैसला दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन के लिए तय जगह की सूची से हटा दिया है और ऐसी सभाओं के लिए तीन दूसरी जगहों के नाम बताए हैं। यह कदम 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के साथ शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन की इजाज़त को लेकर चल रहे विवाद और 'इंडिया ब्लॉक' के सुप्रीम कोर्ट तक प्रस्तावित मार्च से पहले राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी किए जाने के बीच उठाया गया है। 1 अक्टूबर, 2026 के एक आदेश के मुताबिक, नई तय की गई तीन जगहें हैं। पुरानी दिल्ली में रामलीला मैदान, पूर्वी दिल्ली में CBD ग्राउंड और उत्तरी दिल्ली में बुराड़ी ग्राउंड। गौरतलब है कि ये तीनों जगहें मध्य दिल्ली में स्थित जंतर-मंतर से क्रमशः 3 किमी, 13.5 किमी और 44 किमी दूर हैं। दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार के हस्ताक्षर वाले इस आदेश में 28 अप्रैल, 2022 के उस पुराने आदेश में कुछ बदलाव किए गए हैं, जिसके तहत जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन की जगह के तौर पर तय किया गया था। पुलिस ने कहा कि तीन नई जगहों पर विरोध-प्रदर्शन और रैलियों के आयोजन से जुड़े विस्तृत और संशोधित स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) अलग से जारी किए जाएंगे। इसे भी पढ़ें: Jantar Mantar बंद होने के खिलाफ याचिका, 13 अक्टूबर को सुनवाई करने को तैयार दिल्ली HC हाई कोर्ट जंतर-मंतर बंद करने के मामले में याचिका पर सुनवाई करेगा दिल्ली हाई कोर्ट 13 अक्टूबर को उस याचिका पर सुनवाई करेगा जिसमें शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के लिए जंतर-मंतर को बंद करने के फैसले को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया था कि प्रदर्शनों के लिए कोई वैकल्पिक जगह तय नहीं की गई है। कोर्ट ने 10 और 11 अक्टूबर को दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी एक अलग याचिका को भी मंगलवार के लिए सूचीबद्ध किया, लेकिन तत्काल सुनवाई करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले से ही इस मामले को देख रहा है और उसने केंद्र सरकार से हलफनामा मांगा है। इसे भी पढ़ें: Delhi Police को अल्टीमेटम: Jantar Mantar पर Peaceful Protest के लिए CJP ने दी 24 घंटे की डेडलाइन महाराजा जय सिंह द्वितीय की सोच महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय न केवल एक शासक थे, बल्कि गणित और खगोल विज्ञान में गहरी रुचि रखने वाले विद्वान भी थे। 18वीं सदी की शुरुआत में, उन्होंने खगोलीय घटनाओं के बारे में ज़्यादा सटीक जानकारी की ज़रूरत को समझा और पूरे भारत में कई वेधशालाएँ बनवाईं। दिल्ली का जंतर-मंतर उनके द्वारा बनाई गई पाँच वेधशालाओं में से एक था; बाकी वेधशालाएँ जयपुर, उज्जैन, वाराणसी और मथुरा में स्थित थीं। इन वेधशालाओं को खगोलीय तालिकाओं को बेहतर बनाने और आकाशीय गतिविधियों की ज़्यादा सटीक माप करने के लिए डिज़ाइन किया गया था। जय सिंह द्वितीय के प्रयासों से वैज्ञानिक आदान-प्रदान के एक दौर की झलक मिलती है, जिसमें भारतीय खगोलीय परंपराओं का फ़ारसी, इस्लामी और यूरोपीय स्रोतों के ज्ञान से मेल हुआ। उनकी वेधशालाएँ अवलोकन और गणना के केंद्र बन गईं, जहाँ वैज्ञानिक तरीकों और वास्तुकला के नए प्रयोगों का संगम हुआ। जहाँ वास्तुकला और खगोल विज्ञान का मिलन होता है रहने या पूजा-पाठ के लिए बनाई जाने वाली पारंपरिक इमारतों से अलग, जंतर-मंतर को एक विशाल वैज्ञानिक उपकरण के तौर पर बनाया गया था। हर संरचना का एक खास मकसद था। आकाशीय पिंडों की गति को देखने के लिए इनके कोण और माप बहुत सावधानी से तय किए गए थे। दिल्ली वेधशाला की सबसे खास संरचना 'सम्राट यंत्र' है। यह एक विशाल धूप-घड़ी है, जिसका इस्तेमाल सूरज की परछाई की गति को ट्रैक करके स्थानीय समय का पता लगाने के लिए किया जाता था। इसके विशाल आकार की वजह से खगोलविद ज़्यादा सटीकता के साथ अवलोकन कर पाते थे। एक और ज़रूरी यंत्र 'जय प्रकाश यंत्र' है, जिसमें कटोरे के आकार के दो हिस्से होते हैं। इनकी मदद से खगोलशास्त्री आकाशीय पिंडों की स्थिति का पता लगाते थे। बेलनाकार आकृतियों से बने 'राम यंत्र' का इस्तेमाल तारों और दूसरे खगोलीय पिंडों की ऊंचाई और दिशा मापने के लिए किया जाता था। ये सभी यंत्र मिलकर यह दिखाते हैं कि किस तरह वैज्ञानिक जानकारी को ऐसी भौतिक संरचनाओं में बदला गया, जिनका अध्ययन और इस्तेमाल किया जा सकता था। 18वीं सदी में आसमान को समझना आधुनिक टेलीस्कोप और डिजिटल टेक्नोलॉजी के आने से पहले के दौर में जंतर-मंतर जैसी वेधशालाओं ने ब्रह्मांड को समझने में अहम भूमिका निभाई। खगोलशास्त्री आकाशीय गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए गणितीय गणनाओं और सावधानी से बनाए गए उपकरणों पर निर्भर रहते थे। ऐसी जगहों पर की गई खोजों और अवलोकनों से ज़्यादा सटीक कैलेंडर बनाने और ग्रहों की चाल के बारे में जानकारी बेहतर करने में मदद मिली। खगोल विज्ञान को रोज़मर्रा की ज़िंदगी से अलग नहीं माना जाता था; इसने खेती, त्योहारों, समुद्री यात्रा और समय बताने के तरीकों को प्रभावित किया।स जंतर-मंतर वैज्ञानिक अवलोकन और समाज के बीच इसी संबंध को दिखाता है और बताता है कि कैसे आसमान के अध्ययन ने इंसानी समझ को आकार दिया। जैसे-जैसे दिल्ली देश का राजनीतिक और प्रशासनिक केंद्र बनी, जंतर-मंतर धीरे-धीरे लोगों की आवाज़ उठाने की जगह के तौर पर पहचाना जाने लगा। इसकी खुली बनावट की वजह से लोग यहाँ व्यवस्थित ढंग से इकट्ठा हो सकते थे, और इसके ऐतिहासिक माहौल ने इस जगह को एक खास पहचान दी। जंतर-मंतर में आया यह बदलाव दिखाता है कि कैसे ऐतिहासिक जगहों का मतलब पीढ़ियों के साथ बदलता रहता है। मूल रूप से खगोलीय पिंडों की गति के अध्ययन के लिए बनाया गया यह स्मारक नागरिक भागीदारी से जुड़ गया, जिससे इसके सांस्कृतिक महत्व में एक और आयाम जुड़ गया। 33 साल से धरने देख रहा था जंतर-मंतर 1988 में किसान आंदोलन के बाद बोट क्लब पर प्रदर्शन रोक दिए गए थे। इसके बाद 1993 में जंतर-मंतर पर पहला प्रदर्शन हुआ था। जंतर-मंतर को धरना स्थल बनाने संबंधी किसी आदेश का रिकॉर्ड नहीं है। यह पुलिस की प्रशासनिक व्यवस्था के रूप में विकसित हुआ। स्थानीय लोगों की शोर, प्रदूषण जैसी शिकायतों पर एनजीटी ने 2017 में यहां प्रदर्शन रोक दिए। धरने-प्रदर्शन रामलीला मैदान में करने को कहा। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा- शांतिपूर्ण प्रदर्शन संवैधानिक अधिकार है। कोर्ट ने प्रतिबंध हटाकर नियंत्रित प्रदर्शन की व्यवस्था बनाने को कहा। अब सुप्रीम कोर्ट में फिर वैकल्पिक प्रदर्शन स्थल की मांग लंबित है।
उच्च शिक्षा का दशक और गुणवत्ता की परीक्षा
समावेशी विकास के हिमायती अर्थशास्त्री मानव पूंजी सिद्धांत के तहत शिक्षा को महज सामाजिक कल्याण या व्यक्तिगत उन्नति का माध्यम नहीं, बल्कि उत्पादकता, नवाचार और दीर्घकालिक आर्थिक विकास की बुनियादी पूंजी के रूप में देखते हैं। इस लिहाज से कह सकते हैं कि किसी देश की युवा आबादी अपने आप में विकास की गारंटी नहीं होती। उसकी वास्तविक आर्थिक और सामाजिक क्षमता इस बात से निर्धारित होती है कि उसे उपलब्ध शिक्षा ज्ञान, कौशल और निर्णय क्षमता में कितना रूपांतरित कर पाती है। भारत आज इसी द्वंद्व के बीच खड़ा है। एक ओर विशाल युवा आबादी जनसांख्यिकीय लाभांश की संभावना प्रस्तुत करती है, दूसरी ओर कृत्रिम बुद्धिमत्ता, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और वैश्विक श्रम बाजार में आते बदलाव मानव पूंजी निर्माण की पारंपरिक धारणाओं को चुनौती दे रहे हैं। ह्यूमनिटीज एंड सोशल साइंसेज कम्युनिकेशंस में 2025 में प्रकाशित एक अध्ययन ने भी रेखांकित किया कि भारत में जनसांख्यिकीय बदलाव का आर्थिक लाभ अनुकूल नीतिगत वातावरण, बेहतर स्वास्थ्य, सम्मानजनक रोजगार और लैंगिक सशक्तीकरण पर निर्भर करता है। इसलिए पिछले एक दशक में उच्च शिक्षा के विस्तार और सुधारों का मूल्यांकन केवल संस्थानों तथा नामांकन की बढ़ती संख्या से नहीं, बल्कि इस कसौटी पर किया जाना चाहिए कि भारत अपनी युवा आबादी को ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की सक्षम मानवीय शक्ति में कितना बदल पाया है। इसे भी पढ़ें: Gen Z Revolt: मोदी के दोस्त के देश में भी वही हो रहा,जो भारत में हुआ था? भयंकर साज़िश का पर्दाफ़ाश! इस दशक में भारतीय उच्च शिक्षा का सामाजिक आधार उल्लेखनीय रूप से विस्तृत हुआ है। अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण के अनुसार, कुल नामांकन 2014 से 15 के लगभग 3.42 करोड़ से बढ़कर 2023 से 24 में करीब 4.50 करोड़ हो गया। महिलाओं के साथ अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के विद्यार्थियों की भागीदारी भी बढ़ी है, जो उच्च शिक्षा के व्यापक सामाजिक विस्तार का संकेत है। हालांकि, नामांकन वृद्धि अपने आप में पर्याप्त नहीं है। वास्तविक लोकतंत्रीकरण के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, पर्याप्त संसाधन और रोजगारपरक अवसरों तक समान पहुंच जरूरी है। महानगरों और छोटे शहरों के संस्थानों के बीच गुणवत्ता का अंतर अब प्रमुख चुनौती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने उच्च शिक्षा सुधार के लिए व्यापक वैचारिक ढांचा प्रस्तुत किया। बहुविषयक अध्ययन, लचीली पाठ्यचर्या, शोध उन्मुख शिक्षा, कौशल विकास और अकादमिक क्रेडिट की हस्तांतरणीयता इसके प्रमुख प्रावधान हैं। अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट विद्यार्थियों को शैक्षणिक यात्रा में अधिक लचीलापन देता है, जबकि समर्थ जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म प्रवेश, परीक्षा और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को व्यवस्थित करने की क्षमता रखते हैं। इन पहलों का महत्व संस्थागत विस्तार से आगे बढ़कर सीखने की गुणवत्ता, शैक्षणिक गतिशीलता और प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने में है। फिर भी नीतिगत महत्वाकांक्षा और संस्थागत वास्तविकता के बीच की दूरी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बहुविषयक शिक्षा के लिए विभिन्न विषयों के सक्षम विभाग, प्रशिक्षित शिक्षक और पर्याप्त अकादमिक संसाधन चाहिए। शोध आधारित शिक्षा के लिए प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, शोध अनुदान और मार्गदर्शन की व्यवस्था आवश्यक है। डिजिटल प्लेटफॉर्म प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल बना सकते हैं, लेकिन वे कमजोर शिक्षण व्यवस्था की भरपाई नहीं कर सकते। इसलिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति का वास्तविक मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि उसके प्रावधानों ने कक्षाओं में शिक्षण, विद्यार्थियों के सीखने के स्तर और विश्वविद्यालयों की अकादमिक संस्कृति में कितना बदलाव पैदा किया है। उच्च शिक्षा सुधार की केंद्रीय कसौटी शिक्षक व्यवस्था और शोध क्षमता है। शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा करने वाले कर्मचारी नहीं, बल्कि ज्ञान सृजन, आलोचनात्मक विवेक और बौद्धिक स्वतंत्रता के वाहक हैं। अनेक संस्थानों में रिक्त पदों, संविदा नियुक्तियों और गैर शैक्षणिक दायित्वों का दबाव शिक्षण, शोध निर्देशन और विद्यार्थियों से संवाद को प्रभावित करता है। इसलिए पारदर्शी नियुक्ति, अकादमिक स्वतंत्रता और निरंतर प्रशिक्षण को दीर्घकालिक निवेश के रूप में देखना आवश्यक है। गौरतलब है कि विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता शोध और नवाचार में उनके योगदान से भी निर्धारित होती है। भारत ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन व्यापक विश्वविद्यालय व्यवस्था में शोध संस्कृति को और मजबूत करने की आवश्यकता है। कृषि, जलवायु परिवर्तन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, शहरीकरण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे क्षेत्र भारतीय संदर्भ में महत्वपूर्ण शोध अवसर प्रस्तुत करते हैं। इसके लिए शोध वित्तपोषण बढ़ाने, उद्योग और अकादमिक संस्थानों के सहयोग तथा युवा शोधकर्ताओं को स्वतंत्र अवसर देने की जरूरत है। विश्वविद्यालयों को ज्ञान के उपभोक्ता नहीं, बल्कि उसके उत्पादक केंद्र बनाना होगा। इसी तरह रोजगार और उच्च शिक्षा के संबंध को भी अधिक सूक्ष्मता से समझने की जरूरत है। डिग्री और रोजगार के बीच बढ़ती दूरी पाठ्यक्रमों की प्रासंगिकता, व्यावहारिक प्रशिक्षण और उद्योग की बदलती मांगों पर प्रश्न उठाती है। तकनीकी दक्षता, डिजिटल साक्षरता, संचार क्षमता और समस्या समाधान जैसे कौशल अब अनेक क्षेत्रों में आवश्यक हो गए हैं। फिर भी, रोजगारोन्मुखी शिक्षा का अर्थ विश्वविद्यालयों को उद्योग की तात्कालिक जरूरतों के अधीन कर देना नहीं है। मानविकी और सामाजिक विज्ञान विषय विद्यार्थियों में ऐतिहासिक चेतना, नैतिक विवेक, लोकतांत्रिक समझ और समाज के जटिल प्रश्नों का विश्लेषण करने की क्षमता विकसित करते हैं। एक सक्षम उच्च शिक्षा व्यवस्था को आर्थिक उपयोगिता और बौद्धिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन कायम करना होगा। उसका उद्देश्य केवल रोजगार पाने योग्य व्यक्ति तैयार करना नहीं, बल्कि ज्ञानवान, विवेकशील और उत्तरदायी नागरिक बनाना भी है। हाल में बिहार में 211 नए सरकारी डिग्री कॉलेजों की शुरुआत, 2,451 संविदा सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति तथा विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक और डिजिटल सुधारों की पहल इसी राष्ट्रीय चुनौती का एक प्रासंगिक उदाहरण है। इन प्रयासों से उच्च शिक्षा की भौगोलिक पहुंच और संस्थागत क्षमता बढ़ाने की संभावना बनती है। लेकिन इनकी दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कॉलेजों में नियमित शिक्षण, पर्याप्त संसाधन, अकादमिक नेतृत्व और गुणवत्तापूर्ण अध्ययन का वातावरण कितना विकसित होता है। बिहार का अनुभव इस व्यापक तथ्य को रेखांकित करता है कि संस्थानों की संख्या बढ़ाना सुधार का प्रारंभिक चरण है, उसकी परिणति गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में ही हो सकती है। ये पूरा दशक भारतीय उच्च शिक्षा में विस्तार और संस्थागत परिवर्तन का दौर रहा है, लेकिन अगली चुनौती कहीं अधिक जटिल है। बढ़ता नामांकन, महिलाओं और वंचित समूहों की भागीदारी तथा डिजिटल प्रशासन सकारात्मक आधार तैयार करते हैं, पर गुणवत्ता, शिक्षक उपलब्धता, शोध क्षमता और रोजगारपरकता की चुनौतियां अभी बनी हुई हैं। इसलिए उच्च शिक्षा नीति का केंद्र अब मात्र विस्तार नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण और समान अवसरों का निर्माण होना चाहिए। भारत की युवा आबादी तभी वास्तविक जनसांख्यिकीय लाभांश में बदल सकती है, जब शिक्षा उसे ज्ञान, कौशल और नवाचार की क्षमता प्रदान करे। आने वाले दशक की अग्निपरीक्षा इसी रूपांतरण में निहित है। - संजीव कुमार मिश्र
Rahul Gandhi को दोटूक जवाब देकर CJI Surya Kant ने न्यायिक मर्यादा की लाज रख ली
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी और INDIA गठबंधन के नेताओं को मिलने का समय देने से इनकार कर दिया है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), कथित ‘वोट चोरी’ और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्ष सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को ज्ञापन सौंपना चाहता था। लेकिन CJI ने साफ कर दिया कि जिन विषयों पर विपक्ष हस्तक्षेप चाहता है, वे न्यायालय में पहले से विचाराधीन हैं। ऐसे मामलों में प्रशासनिक स्तर पर निर्देश देने के बजाय विपक्ष को न्यायिक प्रक्रिया के तहत याचिका दायर करनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि मौलिक अधिकारों के संरक्षण के लिए सर्वोच्च न्यायालय के दरवाजे सभी नागरिकों के लिए चौबीसों घंटे खुले हैं। मुख्य न्यायाधीश का यह रुख ऐसे समय सामने आया है, जब राहुल गांधी और INDIA गठबंधन चुनावी प्रक्रिया से जुड़े आरोपों को लेकर सरकार तथा चुनाव आयोग पर दबाव बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। विपक्ष की मांग थी कि SIR की प्रक्रिया रोकी जाए, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें और कथित चुनावी अनियमितताओं की जांच हो। राहुल गांधी ने 12 अक्टूबर को सर्वोच्च न्यायालय तक मार्च करने का आह्वान करते हुए इसे लोकतंत्र और संविधान की रक्षा की लड़ाई बताया। विपक्ष का कहना है कि मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों से पात्र नागरिकों के मतदान के अधिकार पर असर पड़ रहा है। इसे भी पढ़ें: जब जब देश के साथ खड़े होने की बात आती है, तब तब Rahul Gandhi की राह अलग क्यों हो जाती है? देखा जाये तो इस घटनाक्रम को समझने के लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से विपक्ष की हालिया मुलाकात भी महत्वपूर्ण है। विपक्षी नेताओं ने राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं पर चिंता जताई थी। मुलाकात के बाद राहुल गांधी ने कहा कि राष्ट्रपति ने उनसे आरोपों के समर्थन में सबूत मांगे हैं और विपक्ष प्रमाण प्रस्तुत करने को तैयार है। राहुल गांधी ने संकेत दिया था कि राष्ट्रपति ने वोट चोरी के आरोप को एक तरह से सही माना है। हालांकि बाद में सूत्रों के हवाले से आई खबर के अनुसार राष्ट्रपति कार्यालय ने राहुल गांधी के बयान और दावे पर अप्रसन्नता जताई। दूसरी ओर, राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद मुख्य न्यायाधीश से मिलने की कोशिश और फिर उनका इनकार विपक्ष की रणनीति के लिए एक अहम घटनाक्रम है। राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे चाहते थे कि वे अपनी चिंताओं को सीधे CJI के सामने रखें। लेकिन न्यायपालिका का काम राजनीतिक प्रतिनिधिमंडलों के ज्ञापन पर प्रशासनिक निर्देश देना नहीं, बल्कि विधिसम्मत याचिकाओं पर सुनवाई करना और कानून के अनुसार फैसला देना है। CJI के रुख का यही संस्थागत अर्थ है। लेकिन फिर भी राहुल गांधी का सर्वोच्च अदालत तक मार्च निकालने का फैसला सीधे सीधे अराजकता फैलाने का प्रयास है। राहुल गांधी बार बार संविधान का हवाला देते हैं लेकिन संविधान की संरक्षक राष्ट्रपति के बारे में झूठ बोलते हैं, संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण स्थल सर्वोच्च न्यायालय की बात नहीं मानते, ऐसे में सवाल उठेगा ही कि उनकी असल मंशा क्या है? यही नहीं, ईवीएम पर बार बार सवाल उठाने वाले कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों को हाल में असम और हिमाचल प्रदेश में बैलट पेपर से कराए गए नगर निगम चुनाव में भी करारा झटका लगा है। इसलिए राहुल गांधी समेत अन्य विपक्षी नेताओं को समझना होगा कि गड़बड़ चुनावी व्यवस्था में नहीं विपक्षी पार्टियों की नीतियों और नीयत पर है, उनकी विश्वसनीयता पर है। देखा जाये तो SIR का विवाद केवल राजनीतिक दलों के बीच टकराव नहीं है। मतदाता सूची की शुद्धता चुनाव की विश्वसनीयता के लिए जरूरी है। चुनाव आयोग का पक्ष है कि पुनरीक्षण का उद्देश्य सूची को दुरुस्त करना है। विपक्ष इस प्रक्रिया की पारदर्शिता और संभावित प्रभाव पर सवाल उठा रहा है। विपक्ष चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता को राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का केंद्र बनाने की कोशिश कर रहा है, जबकि मोदी सरकार आर्थिक विकास और अपने नीतिगत प्रदर्शन को सामने रख कर विकसित भारत के संकल्प को सिद्ध करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। बहरहाल, CJI का इनकार इस पूरे विवाद में एक महत्वपूर्ण संस्थागत घटनाक्रम है। विपक्ष को समझना होगा कि अंतिम फैसला राजनीतिक नारों या मुलाकातों से नहीं, बल्कि अदालत के सामने प्रस्तुत तथ्यों और प्रमाणों से तय होगा। साथ ही मुख्य न्यायाधीश का विपक्षी नेताओं को मुलाकात का समय देने से इनकार करना संस्थागत मर्यादा बनाए रखने के लिहाज से उचित कदम माना जा सकता है। यदि राजनीतिक दल अपनी मांगों और आरोपों के आधार पर सीधे CJI से मुलाकात कर न्यायिक हस्तक्षेप की अपेक्षा करने लगें, तो भविष्य में दूसरे दल भी इसी परंपरा का सहारा ले सकते हैं। इससे न्यायपालिका पर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिशों को बढ़ावा मिलने और निष्पक्षता को लेकर अनावश्यक सवाल उठने की आशंका रहेगी। न्यायपालिका की स्वतंत्रता केवल उसके फैसलों में ही नहीं, बल्कि उसकी प्रक्रियाओं और राजनीतिक दलों से समान दूरी बनाए रखने में भी निहित है। इसलिए किसी भी पक्ष को विशेष राजनीतिक हैसियत के आधार पर अलग सुविधा देने के बजाय सभी के लिए निर्धारित न्यायिक प्रक्रिया का पालन करना अधिक उचित है। -नीरज कुमार दुबे
एलन मस्क प्रकरण, विदेशी मुख के शंख न बनें राहुल गांधी
शंख का यह दुर्भाग्य है कि ईश्वर ने उसे मजबूत खोल तो दिया है पर कोमल मस्तिष्क नहीं, तो बेचारा पराई फूक से बजने को मजबूर है। शंख की इसी मजबूरी के खतरे भी अनेक है, चाहते न चाहते हुए भी वह दूसरों की हावर्ड को आवाज दे देता है और वो भी कई गुना बढ़ा कर। आजकल देश के प्रतिपक्षी नेता राहुल गांधी हर विदेशी मुंह का शंख बनने के प्रयास में दिख रहे हैं। दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति और स्टारलिंक के मालिक एलन मस्क का भारत सरकार पर किया गया हमला अनेक तरह के खतरनाक संकेत समेटे हुए हैं और इस हमले में किसी विदेशी शक्ति को देश के किसी संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति का एक स्वर होना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। राहुल गांधी को विदेशी फूक से बजने वाला शंख बनने से गुरेज करना चाहिए। जैसा कि सभी जानते हैं कि, सूचना प्रौद्योगिकी जिस तेजी से विकसित हो रही है उसी तेजी से इसके खतरे भी बढ़ रहे हैं। यह तकनीक जहां बड़ी आबादी को लाभ पहुंचा रही है, वहीं इसे नियंत्रित करने वाली चंद कंपनियों को बेशुमार ताकत भी सौंप रही है। इतनी कि ये कंपनियां राजनीतिक शक्तियों को भी बौना समझने लगी हैं। जहां बात नहीं बनती, वहां वे राष्ट्रीय नेतृत्व की साख बिगाडऩे में लग जाती हैं। कुछ देशों में सरकारें बनाने-गिराने के खेल में सक्रिय रहकर स्वार्थ साधना तो उनका पुराना नुस्खा है। दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति और स्टारलिंक के मालिक एलन मस्क का भारत सरकार पर किया गया अपनी तरह का 'पहला हमला' इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। इसे भी पढ़ें: जब जब देश के साथ खड़े होने की बात आती है, तब तब Rahul Gandhi की राह अलग क्यों हो जाती है? अपने सोशल मीडिया मंच 'एक्स' पर मस्क ने कहा कि स्टारलिंक को 165 से ज्यादा देशों में लाइसेंस मिल चुका है और उसने पांच वर्षों तक भारत के हर कानून का पालन किया, फिर भी लाइसेंस क्यों नहीं मिला? क्या अंबानी ही भारत के असली बॉस हैं? यह बात पूरी तरह सच नहीं है। सरकार ने साफ किया कि स्टारलिंक को मई 2025 में ही लाइसेंस मिल चुका है। सिर्फ स्पेक्ट्रम आवंटन अटका है, क्योंकि विदेशी निवेश की मंजूरी और सुरक्षा शर्तों का परीक्षण बाकी है। स्टारलिंक ने जमीनी ढांचा विकसित करने के लिए जियो और भारती एयरटेल से साझेदारी भी की है और जियो के मालिक मुकेश अंबानी ही हैं। तो अंबानी पर कटाक्ष का अर्थ क्या है? सीधा अर्थ है कि मस्क सुरक्षा शर्तों में ढील चाहते हैं और यह भी कि सैटेलाइट फोन के क्षेत्र में कोई भारतीय कंपनी उनके मुकाबले आगे न बढ़े, क्योंकि अंबानी भी यह महत्वाकांक्षा रखते हैं। ऐसे समय, जब केंद्र सरकार नीट और एसआइआर पर घरेलू राजनीति में घिरी है, मस्क की टिप्पणी मौके का फायदा उठाने की चाल है। ऐसा लगता है कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस सोची-समझी चाल पर बिना सोचे प्रतिक्रिया दे दी- 'भारत में स्वागत है एलन, जब तक दूसरा शख्स न मिले इंतजार करें।' जबकि, स्टारलिंक के जियो और एयरटेल से समझौते पर तब कांग्रेस ने राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर चिंता जताई थी। घरेलू मोर्चे पर सरकार को घेरना एक बात है और अंतरराष्ट्रीय दांव-पेचों में शामिल होना दूसरी। क्या सुरक्षा की चिंता किए बिना किसी सैटेलाइट कंपनी को इसलिए मंजूरी दे देनी चाहिए कि उसके मालिक अंबानी-अदाणी नहीं, मस्क हैं? दूसरी बात यह है कि विदेशी कंपनी के आगे भारतीय कंपनी को तरजीह क्यों नहीं मिलनी चाहिए, भले ही वह अंबानी या अदाणी की ही क्यों न हो, जिनकी मोनोपॉली विपक्ष के लिए घरेलू मुद्दा है? मस्क जैसे लोग नई तकनीकों से मानवता की भलाई के लिए भले ही ढेरों काम कर रहे हों, पर इससे शायद ही कोई इनकार करे कि आर्थिक और राष्ट्रीय हितों के टकराव में उनका व्यवहार पराया ही रहेगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के युग में ऐसे तकनीकी महारथियों से सावधान रहना होगा, न सिर्फ सत्ता पक्ष को बल्कि विपक्ष को भी। माना कि शंख मस्तिष्क विहीन होते हैं पर शंख से जुड़े किसी न किसी को तो यह जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी कि कोई विदेशी फूक शंख के माध्यम से देश का वातावरण बिगाड़ न पाए। - राकेश सैन 32, खंडाला फार्म कॉलोनी जालंधर।
सीईसी के खिलाफ इंडिया गठबंधन का सुप्रीम कोर्ट तक मार्च, कांग्रेस बोली-देश बचाने के लिए जरूरी
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Goa Politics: रेवंत रेड्डी ने भाजपा को बताया ‘रावण’ और कांग्रेस को ‘राम’, 2027 चुनाव से पहले वोटर्स से की अपील
'राजमाता विजयाराजे सिंधिया का राष्ट्रसेवा के प्रति त्याग और समर्पण प्रेरणास्रोत', पीएम मोदी समेत नेताओं ने किया नमन
दिल्ली में हाई अलर्ट! विपक्ष के सुप्रीम कोर्ट मार्च से पहले 6 मेट्रो स्टेशनों पर एंट्री-एग्जिट बंद
राजधानी दिल्ली में सोमवार को प्रस्तावित विपक्षी मार्च को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था सख्त कर दी गई है
सड़क से सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई, राहुल गांधी ने भरी हुंकार
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने ऐलान किया कि विपक्षी दल, युवा, सिविल सोसाइटी और लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले लोग सोमवार, 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट तक मार्च करेंगे
दिल्ली की सीएम रेखा पर सुप्रिया श्रीनेत के निशाना साधने पर सिरसा बोले-'कांग्रेस का यही असली चेहरा'
दिल्ली की सीएम रेखा पर सुप्रिया श्रीनेत के निशाना साधने पर सिरसा बोले-'कांग्रेस का यही असली चेहरा'
इंफोसिस: पीईआरएम निलंबन से कारोबार पर नहीं पड़ेगा बड़ा असर
नई दिल्ली, आईटी क्षेत्र की प्रमुख कंपनी इंफोसिस ने कहा है कि अमेरिकी सरकार द्वारा परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन (पीईआरएम) कार्यक्रम के तहत कुछ नई और लंबित आवेदन प्रक्रियाओं पर लगाए गए निलंबन का उसके कारोबार पर कोई महत्वपूर्ण असर पड़ने की उम्मीद नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में मेट्रो, रेल और इंटरनेट सेवाएं सामान्य रखने के दिए निर्देश, शांतिपूर्ण विरोध को बताया मौलिक अधिकार
एनडीए नेताओं का सीजेपी पर तंज, कहा-'मां दुर्गा सीजेपी और विपक्ष को दें सद्बुद्धि'
एनडीए नेताओं का सीजेपी पर तंज, कहा-'मां दुर्गा सीजेपी और विपक्ष को दें सद्बुद्धि'
शेयर बाजार : महंगाई डेटा, कच्चा तेल और बॉल्ड यील्ड से बाजार की चाल बदली
मुंबई, भारतीय शेयर बाजार के लिए अगला हफ्ता काफी अहम होने वाला है। कच्चे तेल की कीमत, बॉन्ड यील्ड और महंगाई डेटा के साथ अन्य अंतरराष्ट्रीय और घरेलू आर्थिक आंकड़े बाजार की चाल निर्धारित करेंगे।
'उनके महान विचार सदैव प्रेरणापुंज बने रहेंगे', जयंती पर महाराजा अग्रसेन को प्रधानमंत्री मोदी ने किया नमन
पीएम मोदी ने लोकनायक जयप्रकाश नारायण को किया नमन, बोले- 'हम उनके आदर्शों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध'
'सदैव मां का आशीर्वाद बना रहे', नवरात्र के पावन अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी ने दी देशवासियों को शुभकामनाएं
महाराजा अग्रसेन की जयंती पर केंद्रीय मंत्री गडकरी और सीएम योगी समेत कई नेताओं ने दी शुभकामनाएं
महाराजा अग्रसेन की जयंती पर केंद्रीय मंत्री गडकरी और सीएम योगी समेत कई नेताओं ने दी शुभकामनाएं
सीईसी विवाद पर आज फिर सड़कों पर उतरेगी CJP,दिल्ली में सुरक्षा कड़ी
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने अपना आंदोलन जारी रखने का ऐलान किया है
सीजेपी के प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई से भड़के अरविंद सावंत, बोले- ये अघोषित इमरजेंसी है
सीजेपी के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान नेताओं को डिटेन किए जाने पर शिवसेना (यूबीटी) सांसद अरविंद सावंत ने केंद्र सरकार और पुलिस पर तीखा हमला बोला। सावंत ने कहा कि शांतिपूर्ण आंदोलन संविधान का अधिकार है। हवाई जहाज से लोगों को पकड़कर डिटेन करना आतंकवादियों जैसा व्यवहार है और यह अघोषित इमरजेंसी है। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया।
दिल्ली प्रदर्शन पर सियासी संग्राम: BJP ने साधा निशाना, कांग्रेस ने सरकार को घेरा
दिल्ली में सीजेपी के विरोध-प्रदर्शन और अभिजीत दिपके की गिरफ्तारी को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। पश्चिम बंगाल के नदिया में भाजपा सांसद जगन्नाथ सरकार ने प्रदर्शनकारियों पर देश को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करने का आरोप लगाया। वहीं, मुंबई में कांग्रेस नेता भाई जगताप और विधायक असलम शेख ने केंद्र सरकार की आलोचना करते हुए विरोध-प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार और लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़े सवाल उठाए।
CJP प्रदर्शन के बाद हालात सामान्य होने लगे, अधिकांश लोग रिहा, मेट्रो सेवाएं बहाल
राजधानी दिल्ली में CJP के प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर लागू की गई सख्त सुरक्षा व्यवस्था के बीच अब हालात धीरे-धीरे सामान्य होने लगे हैं
दिल्ली में सीजेपी के प्रदर्शन को लेकर घमासान, भाजपा और कांग्रेस नेताओं ने दी प्रतिक्रिया
दिल्ली में सीजेपी के प्रदर्शन को लेकर घमासान, भाजपा और कांग्रेस नेताओं ने दी प्रतिक्रिया
सीएमआरएल-एक्सालॉजिक मामले में सोमवार को दर्ज होगी एफआईआर: केरल के गृह मंत्री
सीएमआरएल-एक्सालॉजिक मामले में सोमवार को दर्ज होगी एफआईआर: केरल के गृह मंत्री
शक्ति की आराधना: मंत्रों से अधिक भावना का महत्व
भारतवर्ष पर्वों और उत्सवों की पावन भूमि है। यहाँ मनाए जाने वाले सभी त्योहारों का अपना एक विशेष आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। इन सभी पर्वों में शारदीय नवरात्र का स्थान अत्यंत विशिष्ट और पवित्र माना गया है। नव का अर्थ है 9 और रात्रि का अर्थ है रातों का समूह। यह 9 रातों और 10 दिनों का एक ऐसा पावन समय है जब संपूर्ण ब्रह्मांड में आदि शक्ति माँ भगवती की विशेष कृपा बरसती है। नवरात्र केवल एक साधारण व्रत या उत्सव मात्र नहीं है, बल्कि यह मानव मन और आत्मा की शुद्धि तथा दैवीय शक्ति के संचय का एक अत्यंत दुर्लभ अवसर है। यह समय हमें हमारी आंतरिक ऊर्जा को जागृत करने और जीवन में व्याप्त अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त करता है। शारदीय नवरात्र का आगमन वर्षा ऋतु के समापन और शीत ऋतु के आरंभ के समय होता है। प्रकृति भी इस समय एक नए रूप में सजती है और संपूर्ण वातावरण में एक नई ताजगी तथा पवित्रता का वास होता है। इन 9 रातों में माँ दुर्गा के 9 अलग अलग स्वरूपों की उपासना की जाती है। प्रत्येक स्वरूप का अपना एक विशेष संदेश और महत्व है। माता के यह रूप हमें जीवन के विभिन्न चरणों और संघर्षों में साहस, धैर्य, करुणा और विजय की प्रेरणा देते हैं। शक्ति की उपासना का यह पर्व हमें यह सिखाता है कि सत्य और धर्म की रक्षा के लिए शक्ति का होना अत्यंत आवश्यक है। बिना शक्ति के शांति और प्रगति की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। यह शक्ति केवल शारीरिक नहीं है, बल्कि मानसिक और आत्मिक भी है। इसे भी पढ़ें: Shardiya Navratri 2026: 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि की शुरुआत, घटस्थापना और पूजा सामग्री की पूरी लिस्ट अखबार हिन्दी मिलाप में प्रकाशित आराम से नामक स्तंभ में दी गई पूजन विधि के अनुसार, नवरात्र की उपासना अत्यंत सरल, क्रमबद्ध और भावपूर्ण है। किसी भी शुभ और मांगलिक कार्य का आरंभ सदैव विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश के पूजन से ही होता है। नवरात्र की उपासना में भी सबसे पहले भगवान गजानन का स्मरण और पूजन करना अनिवार्य माना गया है। साधक अपने हाथ में पवित्र जल, अक्षत अर्थात बिना टूटे हुए चावल, और पुष्प लेकर संकल्प करता है। संकल्प एक प्रकार की दृढ़ प्रतिज्ञा है। साधक माता से प्रार्थना करता है कि हे जगदम्बे, मैं इस पवित्र पूजन और व्रत के माध्यम से अपने संकल्प को पूर्ण करने के लिए आपका हृदय से आह्वान करता हूँ। संकल्प के पश्चात जल, अक्षत और कुमकुम से विधि विधान के साथ पूजन की शुरुआत होती है। पूजन के मुख्य क्रम में सबसे पहला चरण माता का आह्वान और ध्यान है। साधक अपनी आँखें बंद करके माँ भगवती के उस दिव्य और भव्य स्वरूप का ध्यान करता है, जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में लीन थे और माता ने प्रकट होकर सृष्टि की रक्षा के लिए मधु और कैटभ नामक भयंकर राक्षसों का वध किया था। ध्यान का यह चरण मन को सांसारिक चिंताओं से मुक्त करके पूरी तरह से माता के चरणों में केंद्रित करने का एक माध्यम है। जब मन पूरी तरह से एकाग्र हो जाता है, तब माता की उपस्थिति का अनुभव हृदय में होने लगता है। ध्यान के उपरांत माता को स्नान कराने की प्रक्रिया होती है। सर्वप्रथम शुद्ध और पवित्र जल से माता की प्रतिमा या यंत्र को स्नान कराया जाता है। इसके पश्चात पंचामृत से स्नान कराया जाता है। पंचामृत 5 अत्यंत पवित्र वस्तुओं का मिश्रण होता है जिसमें गाय का दूध, दही, घी, शहद और शर्करा मिलाई जाती है। स्नान कराते समय साधक यह भाव रखता है कि हे महादेवी, दूध, दही, घी, शहद और शर्करा के मिश्रण से तैयार यह उत्तम पंचामृत आपकी सेवा में प्रस्तुत है, कृपया इसे स्वीकार करें। पंचामृत स्नान के पश्चात एक बार फिर से शुद्ध जल से स्नान कराया जाता है ताकि माता का श्री विग्रह पूरी तरह से स्वच्छ हो जाए। स्नान के बाद माता के श्रृंगार का चरण आता है। माँ भगवती को अत्यंत सुंदर और पवित्र वस्त्र अर्पित किए जाते हैं। मुख्य वस्त्र के साथ साथ उपवस्त्र भी चढ़ाया जाता है। इसके बाद मस्तक पर चंदन और सिंदूर का तिलक लगाया जाता है जो सौभाग्य और सुहाग का प्रतीक है। माता को ताजे और सुगंधित पुष्पों की माला पहनाई जाती है। वस्त्र अर्पित करते समय साधक कहता है कि हे देवी, नाना प्रकार के सुंदर बेल बूटों और जरी गोटों से सुसज्जित यह अत्यंत उत्तम और मनमोहक वस्त्र मैं आपको समर्पित कर रहा हूँ। श्रृंगार का यह भाव हमें यह सिखाता है कि हम अपने जीवन में भी सुंदरता, पवित्रता और सदगुणों को धारण करें। श्रृंगार के पश्चात माता को भोग अर्पित किया जाता है और दीप दर्शन कराया जाता है। माता के समक्ष अत्यंत श्रद्धा के साथ विविध प्रकार के उत्तम नैवेद्य, ऋतु फल, और स्वादिष्ट मिष्ठान्न रखे जाते हैं। इसके बाद सुगंधित धूप और दीप जलाकर माता को दिखाया जाता है। दीप का प्रकाश ज्ञान का प्रतीक है और धूप की सुगंध हमारी प्रार्थनाओं की पवित्रता को दर्शाती है। यह प्रकाश अज्ञानता और बुराई के अंधकार को समाप्त करने का संदेश देता है। पूजन के अंतिम चरण में माता की आरती, प्रदक्षिणा और क्षमा प्रार्थना की जाती है। आरती के लिए विशेष रूप से कर्पूर का उपयोग किया जाता है। कर्पूर के साथ भीगे हुए ईंधन को जलाकर उसमें 1, 3, 5, 7 या इससे अधिक संख्या में बत्तियां बनाकर माता की मंगल आरती उतारी जाती है। कर्पूर जलकर पूरी तरह से समाप्त हो जाता है और कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो यह दर्शाता है कि हमारा अहंकार भी माता के समक्ष पूरी तरह से भस्म हो जाना चाहिए। आरती के बाद साधक अपने स्थान पर गोल घूमकर प्रदक्षिणा करता है। अंत में सबसे महत्वपूर्ण भाग होता है क्षमा प्रार्थना। साधक हाथ जोड़कर कहता है कि हे माता, न तो मुझे आपकी भक्ति का कोई गहरा ज्ञान है और न ही मैं पूजा के कठिन मंत्रों को जानता हूँ। मैंने अपनी अल्प बुद्धि और क्षमता के अनुसार जो भी पूजन किया है, आप अपनी उदारता से उसे परिपूर्ण मानकर स्वीकार करें और मेरी सभी भूलों को क्षमा करें। नवरात्र पूजन का सबसे मूल और महत्वपूर्ण भाव यही है कि यदि पूजा के दौरान कोई मंत्र भूल भी जाए, या कोई सामग्री छूट भी जाए, तो साधक की भावना और श्रद्धा में कोई कमी नहीं आनी चाहिए। अज्ञानवश या अधिकता में किए गए पूजन से जगदम्बा सर्वकल्याणी महादेवी संतुष्ट ही होती हैं, क्योंकि वे केवल अपने भक्तों का सच्चा भाव देखती हैं। कर्मकांड से अधिक महत्व हृदय की पवित्रता का है। यह पावन पर्व हमें एक बहुत ही गहरा सामाजिक और आध्यात्मिक संदेश भी देता है। यह हमें सिखाता है कि संसार की हर एक स्त्री में देवी का ही वास है। स्त्री का सम्मान करना, उसकी गरिमा की रक्षा करना और उसे समाज में उचित स्थान देना ही देवी की सच्ची आराधना है। जब तक समाज में नारी का सम्मान नहीं होगा, तब तक कोई भी पूजा या व्रत सफल नहीं हो सकता। शक्ति की इस आराधना से ही हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में फैला हुआ अज्ञानता और बुराइयों का अंधकार दूर होता है। यही कारण है कि दीपावली के महापर्व से ठीक पहले आने वाली यह शारदीय नवरात्र, केवल एक उत्सव नहीं है, बल्कि यह दीपावली के प्रकाश पर्व की तैयारी का एक अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक आरंभ है। नवरात्र में हम अपने भीतर शक्ति और पवित्रता का संचय करते हैं, ताकि दीपावली के दिन हम अपने अंतर्मन के दीयों को सत्य और ज्ञान के प्रकाश से पूरी तरह से प्रज्वलित कर सकें। यह संपूर्ण कालखंड हमें अंधकार से प्रकाश की ओर, असत्य से सत्य की ओर और मृत्यु से अमरता की ओर ले जाने का एक दिव्य मार्ग प्रशस्त करता है। माता की यह आराधना हमारे जीवन को सुख, शांति, समृद्धि और अपार सफलता से भर दे, यही इस पर्व की सच्ची सार्थकता है। - महेन्द्र तिवारी 216 बी, द्वितीय तल, राधिका ज्वेलर्स के पास, गली नंबर-10, साध नगर, पालम कॉलोनी, नई दिल्ली - 110045
ढ़ाई दशक के सख्त फैसलों ने बनाया मोदी को मोदी
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ढ़ाई दशक की अनवरत राजनीतिक नेतृत्व यात्रा के दौरान लिए गए एक से एक चौंकाने वाले फैसलों ने मोदी को मोदी बनाया है। आज मोदी विश्व के सर्वाधिक भरोसेमंद नेताओं में से एक है। सामने वाले को भी यह भय सताये रहता है कि पता नहीं मोदी क्या स्टेंड लेकर क्या का क्या कर ड़ालेंगे। यही कारण है कि चाहे डोनाल्ड ट्रम्प हो, पुतिन हो या फिर शी जिंनपिंग हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को हल्के में नहीं ले पाते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की 100 प्रतिशत टैरिफ की धमकी के आगे भारत नहीं झुका है तो रुस से कच्चे तेल का आयात जारी है। मालदीव का उदाहरण सामने है जब नरेन्द्र मोदी ने भारत के द्वीप पर केवल कुर्सी लगाकर बैठकर ही मालदीव का हिला कर रख दिया। देश में भी गुजरात के मुख्यमंत्री के रुप में करीब 13 साल और देश के प्रधानमंत्री के रुप में 12 साल से कुछ अधिक के समय में लिए गए निर्णयों से समूचे विप़क्ष को धीरे से पर जोर का झटका देते रहे हैं। हो यह रहा है कि नरेन्द्र मोदी पर जो भी वार किया जाता है वही वार नरेन्द्र मोदी की ताकत बन जाता है। चाहे शुरुआत गुजरात मुख्यमंत्री रहते गोदारा कांड की हो या फिर चौकीदार चोर से लेकर वोट चोरी तक की हो, प्रतिपक्ष का हर वार ना केवल खाली गया है अपितु प्रतिपक्ष के लिए सेल्फ गोल बन कर ही रह गया है। देष आज आंतरिक और बाहरी दोनों ही क्षेत्रों में सर्वोपरि होकर उभरा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुजरात मुख्यमंत्री काल में ही अपने दूरगामी निर्णयों से विशिष्ट पहचान बना ली थी। चाहे वह गोदारा कांड हो या फिर गुजरात भूकंप और उसके बाद विनाशकारी भूकंप प्रभावित क्षेत्र में पुनर्निमार्ण के कार्य, नर्मदा के अतिरिक्त पानी को पाइपलाइन के माध्यम से उत्तरी गुजरात और सौराष्ट्र के सूखाग्रस्त क्षेत्रों में पेयजल की व्यवस्था, स्वच्छ भारत का सपना भी गुजरात के रास्ते ही आया है तो कृषि और घरेलू जरुरत की बिजली की व्यवस्था को अलग अलग कर 24 घंटे बिजली उपलब्ध कराना अपने आप में बड़ी बात है। वाईब्रेंट गुजरात समिट को देशी विदेशी निवेश को सिंगल विण्डों सिस्टम के माध्यम से साकार करना किसी दूरगामी सोच का ही परिणाम है। आज देष के अनेक राज्यों में निवेश सम्मेलन होने लगे हैं और ईज ऑफ डूइंग के बावजूद गुजरात समिट को मॉडल समिट माना ही जाता है। आज का मेक इन इंडिया इसी का विस्तार है। इसे भी पढ़ें: जब जब देश के साथ खड़े होने की बात आती है, तब तब Rahul Gandhi की राह अलग क्यों हो जाती है? जहां तक प्रधानमंत्री बनने के बाद के निर्णयों का सवाल है तो कूटनीति और विदेश नीति के मौर्चें पर आज भारत की तूंती बोलती है। सर्जिकल स्ट्राइक, बालाघाट एयर स्ट्राइक और ऑपरेशन सिन्दुर ने समूची दुनिया के सामने भारत के रण कौशल की धाक जमा दी और इसका परिणाम यह रहा कि पाकिस्तान के पक्ष में आवाज उठाने की हिम्मत लगभग अन्य देशों में नहीं ही रही। कहने को तुर्किया पाकिस्तान के पक्ष में गाहे-बेगाहे बोलता रहता है पर उसका असर नगण्य ही है। ब्रिक्स के माध्यम से आज भारत दुनिया के देशों का नेतृत्व कर रहा है तो अमेरिकी डॉलर को चुनौती देने की शुरुआत भारत के नेतृत्व में दुनिया के देश करने लगे हैं। देर सबेर यह हालात होंगे ही। समान नागरिकता कानून और कष्मीर में धारा 370 हटाकर कश्मीर को देश की मुख्य धारा से जोड़ना लगभग असंभव काम हो सका है। आर्थिक क्षेत्र में आज भारत दुनिया की प्रमुख ताकत बनकर उभरा है। एक राष्ट्र एक कर जीएसटी विपक्ष के लाख विरोध के बावजूद आज इकोनोमी का प्रमुख हिस्सा बन चुकी है। नोटबंदी का लाख विरोध हुआ और जनधन, आधार और मोबाइल यानी की जाम का असर साफ दिखाई दे रहा है। आज मोबाइल उत्पादन के क्षेत्र में भारत अग्रणी देष हो गया है। मेक इन इंडिया और वोकल फॉर लोकल ने असर दिखाया है तो सुधार प्रयासों का ही परिणाम है हमारे देश से आज सामरिक महत्व के उत्पादों का निर्यात होने लगा है। उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना ने एमएसएमई को नई ताकत दी है। न्यायिक क्षेत्र के सुधार सामने हैं। पुराने अनावश्यक कानूनों को हटाया गया है तो आज के संदर्भ में नई भारतीय न्याय संहिता लागू की है। चार श्रम कानूनों के माध्यम से श्रमिकों के भविष्य को संवारने का काम किया गया है। विपक्ष के दो प्रमुख हथियार, राममंदिर और धारा 370 हटाने का बीजेपी का सगूफा केवल राजनीतिक लाभ के लिए है पर नरेन्द्र मोदी सरकार ने राममंदिर का निर्माण कराकर स्पष्ट संदेश दे दिया कि बीजेपी के नारे या वादे खयाली पुलाव नहीं होते। बिना किसी विवाद के राममंदिर विवाद का निपटारा बहुत बड़ी उपलब्धी मानी जानी चाहिए। तीन तलाक का बिल पारित कराना अपने आप में मुश्किल भरा काम था। नारी शक्ति बंदन अधिनियम के माध्यम से महिलाओं को राजनीतिक नेत्त्व में 33 प्रतिशत आरक्षण महिला सषक्तिकरण का बड़ा निर्णय माना जाना चाहिए। कोविड 2019 के दौरान भारत द्वारा किये गये प्रबंधन को वैश्विक सहयोग को समूचे देशों द्वारा सराहा गया। आयुष्मान भारत, कृषि और कृषक सम्मान के निर्णय, पीएम गरीब कल्याण योजना या इसी तरह के कार्यक्रमों और निर्णयों की लंबी फेहरिस्त हो जाती है। सवाल यह नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी न 25 साल के अपने राजनीतिक नेतृत्व के दौरान क्या किया और ना ही यह कोई गुणगान का सवाल है। सवाल सीधा सा यह है कि आज भारत दुनिया के देशों का पिछलग्गू ना होकर दुनिया के देष भारत की और देखने लगे हैं। भारत अपने स्तर पर अपनी आवश्यकताओं और संप्रभुता को बनाये रखते हुए निर्णय लेता है और इसके खिलाफ किसी की बोलने की हिम्मत नहीं होती है। नरेन्द्र मोदी द्वारा मुख्यमंत्री व प्रधानमंत्री रहते जो कठोर निर्णय लिए गए हैं उनमें से अधिकांश दुधारी निर्णय रहे हैं और सबसे मजे की बात यह है कि चुनावों में जनता द्वारा उन पर मोहर लगाई जा रही है। इसलिए विपक्ष लाख आलोचना करें पर इसमेंं कोई दो राय नहीं कि 25 साल की यात्रा और विपक्ष के तीखे हमलों के बावजूद नरेन्द्र मोदी जनता के भरोसे पर खरे उतर रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह कि निर्णय करना और खासतौर से कठोर निर्णय जोखिम भरा होता है पर प्रत्येक कठोर निर्णय के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अधिक निखर के आये हैं। - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
Gen Z vs Modi Govt: आंदोलन हुआ तेज! Rahul Gandhi का वार, क्या Gyanesh Kumar को बचा पाएंगे Modi?
जब जब देश के साथ खड़े होने की बात आती है, तब तब Rahul Gandhi की राह अलग क्यों हो जाती है?
स्टारलिंक की भारत में एंट्री का रास्ता साफ होता नहीं दिख रहा, तो एलन मस्क ने मुकेश अंबानी पर हमला करने का नया तरीका खोज लिया है। पहले अंबानी को भारत का ‘असली बॉस’ बताया और अब उन्हें ‘प्राइम मिनिस्टर अंबानी’ कहकर तंज कस दिया। लेकिन मस्क साहब, जरा ठहरिए! यह सिर्फ मुकेश अंबानी पर कटाक्ष नहीं है, बल्कि भारत के प्रधानमंत्री पद को भी एक कारोबारी विवाद में घसीटने की कोशिश है। प्रधानमंत्री का पद किसी उद्योगपति की जागीर नहीं, बल्कि देश के लोकतंत्र और संवैधानिक व्यवस्था का प्रतीक है। ऐसे में अपनी कंपनी के हितों के लिए इस पद पर तंज कसना आखिर किस तरह की कारोबारी शालीनता है? सवाल यह भी है कि भारत में अपनी शर्तें मनवाने के लिए मस्क इतने उतावले क्यों हैं कि उन्हें अब देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था की गरिमा का भी ख्याल नहीं रहा? हम आपको बता दें कि एलन मस्क का आरोप है कि मुकेश अंबानी का प्रभाव स्टारलिंक की भारत में एंट्री में बाधा बन रहा है। जबकि भारत सरकार का रुख स्पष्ट है कि स्टारलिंक, जियो सैटकॉम और वनवेब जैसी कंपनियों को सुरक्षा मंजूरी और स्पेक्ट्रम से जुड़े नियमों का पालन करना होगा। केंद्रीय दूरसंचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया भी मस्क के भेदभाव के आरोपों को खारिज कर चुके हैं। ऐसे में सवाल यह है कि जब नियमों के तहत मंजूरी मिलनी है, तो मस्क बार-बार अंबानी को निशाना बनाकर आखिर साबित क्या करना चाहते हैं? इसे भी पढ़ें: CJP के Jantar Mantar प्रदर्शन पर भड़की BJP, Sambit Patra बोले- राजधानी को बंधक बनाने की साजिश हुई फ्लॉप देखा जाये तो मस्क जिस स्टारलिंक को भारत में जल्द शुरू करने की मांग कर रहे हैं, वह कोई सामान्य इंटरनेट सेवा नहीं है। यह हजारों उपग्रहों के नेटवर्क के जरिए इंटरनेट उपलब्ध कराती है। दूरदराज के गांवों, सीमावर्ती इलाकों और आपदा प्रभावित क्षेत्रों के लिए यह तकनीक उपयोगी हो सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सुरक्षा संबंधी सवालों को नजरअंदाज कर दिया जाए। रूस और चीन समेत दुनिया के तमाम देशों ने स्टारलिंक को अनुमति नहीं दी है। वहीं भारत के लिए महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या विदेशी कंपनी के नियंत्रण वाले नेटवर्क पर निर्भरता राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से जोखिम पैदा कर सकती है? भारत सरकार की चिंताओं में डेटा की सीमा पार आवाजाही, संचार पर नियंत्रण और सुरक्षा एजेंसियों की कानूनी निगरानी जैसे मुद्दे शामिल हैं। यह चिंता काल्पनिक भी नहीं है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने मार्च 2025 में ही स्टारलिंक पर सवाल उठाए थे। उन्होंने पूछा था कि राष्ट्रीय सुरक्षा की जरूरत पड़ने पर संचार बंद करने का अधिकार स्टारलिंक के पास होगा या उसके भारतीय साझेदारों के पास? उन्होंने यह भी पूछा था कि क्या इन समझौतों के पीछे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को खुश करने की कोशिश थी? विडंबना देखिए कि जिस मुद्दे पर कांग्रेस पहले सुरक्षा संबंधी सवाल उठा रही थी, उसी मुद्दे पर आज राहुल गांधी मस्क के आरोपों को राजनीतिक समर्थन देते दिखाई दे रहे हैं। साथ ही एलन मस्क ने रिलायंस पर भाजपा को चुनावी चंदा देने का आरोप लगाया है। लेकिन अगर चुनावी फंडिंग और कारोबारियों के राजनीतिक प्रभाव का प्रश्न उठाया जा रहा है, तो यही कसौटी मस्क पर भी लागू होनी चाहिए। अमेरिकी चुनाव आयोग में दाखिल दस्तावेजों से पता चला था कि मस्क ने 2024 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप का समर्थन करने वाले राजनीतिक समूहों को 25.9 करोड़ डॉलर से अधिक दिए थे। इसमें लगभग 23.9 करोड़ डॉलर अमेरिका पीएसी को दिए गए थे। इसलिए सवाल उठता है कि अगर किसी उद्योगपति की चुनावी फंडिंग राजनीतिक प्रभाव का प्रमाण मानी जा सकती है, तो ट्रंप की जीत के लिए करोड़ों डॉलर खर्च करने वाले मस्क से यह सवाल क्यों नहीं पूछा जाना चाहिए? क्या अमेरिका में किसी पसंदीदा उम्मीदवार की मदद करना लोकतंत्र है, लेकिन भारत में किसी कंपनी की राजनीतिक फंडिंग अपने आप संदेह का विषय बन जाती है? वास्तविकता यह है कि कॉरपोरेट राजनीतिक चंदा अनेक लोकतंत्रों में चुनावी राजनीति का हिस्सा है। साथ ही भारत में इंटरनेट की कीमतों की तुलना भी इस बहस को एक नया आयाम देती है। रिलायंस जियो ने सस्ते मोबाइल डेटा के जरिए करोड़ों भारतीयों को इंटरनेट से जोड़ा है और यह कंपनी पूरी दुनिया में सबसे सस्ता डेटा देने के लिए जानी जाती है जबकि एलन मस्क की ब्रॉडबैंड सेवाएं और उनके उपकरण बेहद महंगे हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि स्टारलिंक बेकार है। दूरदराज के क्षेत्रों में उसकी उपयोगिता वास्तविक हो सकती है। लेकिन मस्क यदि भारतीयों के हितों की बात करते हैं, तो उन्हें यह भी बताना होगा कि उनकी सेवा कितने भारतीयों की पहुंच में होगी। प्रतिस्पर्धा का स्वागत होना चाहिए, मगर राष्ट्रीय सुरक्षा और आम उपभोक्ता की आर्थिक क्षमता की कीमत पर नहीं। इसके अलावा, राहुल गांधी ने मस्क के ‘असली बॉस’ वाले सवाल के जवाब में लिखा, ‘वेलकम टू इंडिया, एलन। दूसरे शख्स से मिलोगे तो हैरान रह जाओगे।’ यह टिप्पणी परोक्ष रूप से गौतम अडानी की ओर संकेत करती दिखाई दी। मस्क ने इसके जवाब में राहुल को धन्यवाद दिया। देखा जाये तो राहुल का उद्योगपतियों और सरकार के संबंधों पर सवाल उठाना गलत नहीं है। लेकिन क्या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे पर किसी विदेशी कारोबारी के साथ सोशल मीडिया पर राजनीतिक तंज कसना पर्याप्त है? विपक्ष का दायित्व सिर्फ सरकार पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि देश की रणनीतिक और डिजिटल सुरक्षा पर कोई समझौता न हो। साथ ही इस बात पर भी सवाल उठ रहे हैं कि जब जब राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल आता है तब तब राहुल गांधी अलग राह क्यों पकड़ लेते हैं? यह सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि कई वरिष्ठ कांग्रेस नेता राहुल गांधी के ट्वीट से नाराज हैं। पूर्व की सरकारों में लंबे समय तक केंद्रीय मंत्री रहे कांग्रेस नेताओं का कहना है कि निवेश और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुडें मुद्दों पर राय सोशल मीडिया पर नहीं रखी जाती। उनका कहना है कि पार्टी स्तर पर देशहित में जो राय बनती है उसके आधार पर ही सबको बोलना चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि जयराम रमेश इस मुद्दे पर पहले ही पार्टी का पक्ष रख चुके थे और स्टारलिंक के संभावित सुरक्षा जोखिमों पर गंभीर सवाल उठाए थे। कांग्रेस नेताओं ने पूछा है कि राहुल गांधी को स्पष्ट करना चाहिए कि क्या वे जयराम रमेश की ओर से उठाये गये सवालों से सहमत हैं या मस्क के समर्थन में उनकी प्राथमिकताएं बदल गई हैं? बहरहाल, एलन मस्क को प्रतिस्पर्धा करने का पूरा अधिकार है, लेकिन भारत को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए शर्तें तय करने और भारतीय जनता को पारदर्शी व्यवस्था की मांग करने का उतना ही अधिकार है। प्रधानमंत्री पद पर तंज कसकर मस्क अगर अपनी कंपनी के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं, तो उन्हें यह भी समझना होगा कि भारत में कारोबार सिर्फ दबाव या सार्वजनिक बयानबाजी के दम पर नहीं, बल्कि नियमों के तहत होता है। उनकी इस टिप्पणी ने उलटे भारत में उनके रवैये पर सवाल खड़े कर दिए हैं और सोशल मीडिया पर कई भारतीयों ने नाराजगी जताई है। राहुल गांधी को भी यह समझना चाहिए कि सरकार का विरोध करना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और देश के हितों को किसी विदेशी कारोबारी और उसकी कंपनी के साथ चल रहे विवाद का हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए। -नीरज कुमार दुबे
दुनियाभर में दोहरेपन और खोखलेपन की सबसे बड़ी मिसाल हैं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से डीजल खरीदने का फैसला कर लिंडसे ग्राहम को मानो श्रद्धांजलि दे दी है! यह कटाक्ष इसलिए है, क्योंकि भारत रूस से तेल खरीदे तो उस पर सौ फीसदी टैरिफ लगा दिया जाता है, लेकिन अमेरिका वही काम करे तो उसे शानदार फैसला बताया जाता है। यही नहीं, नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिला, तो ट्रंप ने अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय पर ही प्रतिबंध लगा दिए। आखिर यह कैसी नीति है? दूसरों को नियमों का पाठ पढ़ाने वाले ट्रंप जब अपने देश के हितों की बात आती है, तो उन्हीं नियमों को भूल जाते हैं। भारत पर रूस से तेल नहीं खरीदने का दबाव बनाने वाले ट्रंप अब खुद रूस से डीजल खरीद रहे हैं, इस फैसले ने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है इसलिए सवाल उठ रहा है कि रूस से तेल खरीदना गलत है, या गलत सिर्फ तब है जब भारत खरीदे? यही है ट्रंप की नीति का दोहरापन और खोखलापन! देखा जाये तो रूसी ऊर्जा खरीद को लेकर भारत पर दबाव बनाने वाले ट्रंप का ताजा फैसला उनकी कथनी और करनी के बीच की खाई को उजागर करता है। उल्लेखनीय है कि ट्रंप ने रूस से तत्काल तीन लाख टन से अधिक डीजल की आपूर्ति के साथ नवंबर में पांच लाख टन, उसके बाद दस लाख टन और फिर कुछ ही समय में तीस लाख टन अतिरिक्त डीजल की आपूर्ति की घोषणा की है। अमेरिकी प्रशासन ने रूसी डीजल की आपूर्ति को सुगम बनाने के लिए अस्थायी सामान्य अनुमति भी जारी की है, जिसके अंतर्गत निर्धारित शर्तों को पूरा करने वाले कुछ माल पर अप्रैल 2027 तक प्रतिबंधों में छूट का प्रावधान किया गया है। इसे भी पढ़ें: Donald Trump ने नोबेल शांति पुरस्कार न मिलने पर Norway पर साधा निशाना, 8 युद्ध रुकवाने का किया दावा गौरतलब है कि यह वही प्रशासन है जिसने रूस की युद्ध अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाने के उद्देश्य से प्रतिबंधों को सख्त करने की नीति अपनाई थी। लेकिन जब अमेरिका में ईंधन की कीमतें बढ़ीं और किसानों, ट्रक चालकों तथा कारोबारियों पर दबाव बढ़ा, तो रूस से ऊर्जा खरीद अचानक स्वीकार्य हो गई। दरअसल अमेरिका में नवंबर की शुरुआत में मध्यावधि चुनाव होने हैं और ट्रंप की नीतियों के चलते वहां महंगाई अप्रत्याशित रूप से बढ़ गयी है जिसके चलते जनता नाराज है। रिपोर्टों के मुताबिक, सितंबर में अमेरिकी डीजल की कीमत 6.52 डॉलर प्रति गैलन के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गयी थी और शुक्रवार को लगभग 6.28 डॉलर प्रति गैलन रही। तीन नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले महंगाई का सवाल ट्रंप के लिए बड़ा सिरदर्द बन चुका है। सर्वेक्षणों के मुताबिक, 78 प्रतिशत अमेरिकी नागरिकों ने बढ़ती जीवन-यापन लागत के लिए ट्रंप की नीतियों को जिम्मेदार माना है। इसलिए जब अमेरिकी मतदाताओं की जेब का सवाल आया, तो रूस से डीजल खरीदना ट्रंप के लिए राष्ट्रीय हित बन गया। लेकिन भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों और आर्थिक हितों के अनुसार रूसी तेल खरीदे, तो उसे टैरिफ का सामना करना पड़ता है। इसलिए सवाल उठता है कि यह कैसी निष्पक्षता है? यह कैसी नियम-आधारित व्यवस्था है, जिसमें नियम दूसरों के लिए हैं और छूट अपने लिए? दूसरी ओर, ट्रंप के इस फैसले ने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की की नाराजगी भी बढ़ा दी है। उन्होंने इसे अनुचित और बेईमानी भरा कदम बताते हुए कहा कि इससे पुतिन को जन्मदिन का उपहार मिलने जैसा संदेश जाता है। जेलेंस्की की आपत्ति इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि यह घोषणा ऐसे समय हुई, जब ट्रंप के प्रतिनिधि यूक्रेनी और यूरोपीय अधिकारियों के साथ युद्ध समाप्त करने के प्रस्तावों पर बातचीत कर रहे थे। जेलेंस्की ने यह भी संकेत दिया कि यदि ऊर्जा प्रतिबंधों में ढील दोनों देशों की ओर से सर्दियों में ऊर्जा ढांचे पर हमले रोकने जैसे पारस्परिक समझौते का हिस्सा होती, तो उसका समर्थन किया जा सकता था। लेकिन बिना ऐसी शर्तों के रियायत देना रूस की युद्ध क्षमता को आर्थिक सहारा देने जैसा दिखाई देता है। वहीं अमेरिकी रिपब्लिकन नेता डॉन बेकन ने भी इस फैसले की आलोचना की। उनका तर्क था कि अमेरिकी किसानों और उपभोक्ताओं के लिए डीजल सस्ता करना जरूरी है, लेकिन इसके लिए रूस से ईंधन खरीदना गलत रास्ता है। उन्होंने पूछा कि जब अमेरिकी संसद ने रूस पर दबाव बढ़ाने के लिए कानून पारित किया और ट्रंप ने स्वयं उस पर हस्ताक्षर किए, तो अब उसी दबाव को कमजोर करने का औचित्य क्या है? इसके अलावा, ट्रंप की राजनीति का दूसरा चिंताजनक पहलू अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के प्रति उनका रवैया है। अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश नवी पिल्लै को नोबेल शांति पुरस्कार मिलने के कुछ ही घंटों बाद ट्रंप प्रशासन ने न्यायालय के विरुद्ध प्रतिबंधों की घोषणा कर दी। नवी पिल्लै को सम्मान ऐसे समय मिला, जब अंतरराष्ट्रीय न्यायिक संस्थाओं पर राजनीतिक दबाव बढ़ने को लेकर चिंताएं व्यक्त की जा रही थीं। नोबेल समिति ने युद्ध अपराधियों को जवाबदेह ठहराने और पीड़ितों को न्याय दिलाने वाली अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था को शांतिपूर्ण विश्व की अनिवार्य शर्त बताया। नवी पिल्लै को नोबेल शांति पुरस्कार मिलते ही ट्रंप जैसे बौखला गये और कुछ घंटों बाद अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि ट्रंप अमेरिकी नागरिकों पर अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय का अभियोजन स्वीकार नहीं करेंगे। अमेरिकी प्रशासन ने न्यायालय के साथ लेन-देन पर रोक लगाने और उसके संसाधनों को बाधित करने की मंशा जाहिर की। वहीं अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय ने इसे कानून के शासन और अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था की बुनियाद पर हमला बताया। देखा जाये तो यहां भी वही पुराना सवाल सामने आता है कि क्या अंतरराष्ट्रीय कानून केवल कमजोर देशों और विरोधियों पर लागू होना चाहिए? क्या अमेरिका को अपने नागरिकों और अधिकारियों को किसी भी अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही से ऊपर रखने का अधिकार मिल जाना चाहिए? ऐसा लगता है कि वाशिंगटन अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही की सीमाएं अपने हिसाब से तय करना चाहता है। ट्रंप की राजनीति में सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि वे राष्ट्रीय हित का इस्तेमाल कभी प्रतिबंधों को उचित ठहराने के लिए करते हैं, तो कभी उन्हीं प्रतिबंधों को कमजोर करने के लिए। भारत के लिए रूसी तेल आर्थिक और ऊर्जा संबंधी जरूरतों का प्रश्न है, लेकिन अमेरिका के लिए वही रूसी ऊर्जा घरेलू महंगाई घटाने और चुनावी नुकसान रोकने का साधन बन जाती है। इसी तरह, अंतरराष्ट्रीय न्याय की बात तब तक स्वीकार्य दिखाई देती है, जब तक वह अमेरिकी सत्ता और उसके सहयोगियों के हितों से न टकराए। जैसे ही जवाबदेही का सवाल उठता है, स्वतंत्र न्यायिक संस्था को ही निशाना बनाया जाने लगता है। यह केवल नीतिगत असंगति नहीं, बल्कि उस नैतिक दावे की कमजोरी है जिसके आधार पर अमेरिका दुनिया को नियमों, लोकतंत्र और न्याय का उपदेश देता रहा है। ट्रंप ने अपने फैसलों से यह धारणा मजबूत की है कि उनके लिए सिद्धांत स्थायी नहीं, बल्कि परिस्थितियों और राजनीतिक लाभ के अनुसार बदलने वाली चीज हैं। बहरहाल, ट्रंप चाहे अपने कदमों को अमेरिकी हितों की रक्षा बताएं, लेकिन जब वही कदम दूसरों पर थोपे गए नैतिक मानदंडों को ध्वस्त करते हैं, तो उनकी राजनीति का खोखलापन उजागर होता है। अमेरिका को रूसी डीजल और भारत पर सौ फीसदी टैरिफ, इससे बड़ा दोहरा मापदंड क्या होगा? साथ ही अंतरराष्ट्रीय न्यायालय पर प्रतिबंध लगाकर यदि कोई देश खुद को कानून से ऊपर समझने लगे, तो दुनिया उसे न्याय का संरक्षक नहीं, बल्कि अपने स्वार्थ का प्रहरी ही मानेगी। -नीरज कुमार दुबे
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सिनेमा और समाज सेवा का अनूठा संगम थे नाना पाटेकर
भारतीय कला जगत ने 8 अक्टूबर 2026 को अपना एक ऐसा अनमोल रत्न खो दिया जिसकी भरपाई करना शायद आने वाले कई दशकों तक संभव नहीं होगा। प्रख्यात अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की आयु में अचानक हृदय गति रुकने से निधन हो गया। यह दुखद समाचार दावानल की तरह पूरे देश में फैल गया और हर कोई स्तब्ध रह गया। नाना केवल एक साधारण अभिनेता नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसी बुलंद आवाज थे जो पर्दे पर आम इंसान की पीड़ा, उसके क्रोध और उसकी लाचारी को बेहद जीवंत रूप में प्रस्तुत करते थे। उनका जाना केवल कला जगत की ही क्षति नहीं है, बल्कि समाज के उस शोषित और वंचित वर्ग की भी बहुत बड़ी क्षति है, जिसके लिए वे हमेशा एक मसीहा बनकर खड़े रहे। उनके निधन से कला, संस्कृति और समाज सेवा के क्षेत्र में जो गहरा सन्नाटा पसरा है, उसे शब्दों में बांधना बेहद कठिन है। नाना पाटेकर का जन्म महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड जंजीरा में हुआ था। उनका बचपन बेहद संघर्षपूर्ण और अभावों में बीता था। उन्होंने अपने जीवन के शुरुआती दिनों में ही जीवन की कठोर वास्तविकताओं का सामना किया। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण उन्होंने छोटी उम्र में ही काम करना शुरू कर दिया था। एक समय ऐसा भी था जब वे सड़कों पर पैदल यात्रियों के सड़क पार करने के लिए सफेद पट्टियां रंगने का काम करते थे और उसी से अपनी आजीविका चलाते थे। यह उनके जीवट और अथक परिश्रम का ही परिणाम था कि उन्होंने कभी परिस्थितियों के सामने घुटने नहीं टेके। इस कठोर संघर्ष ने उन्हें जीवन की उन गहराइयों से परिचित कराया, जो बाद में उनके अभिनय में स्पष्ट रूप से दिखाई देती थीं। उनके भीतर का कलाकार इसी भट्टी में तपकर कुंदन बना था। नाटकों और रंगमंच के प्रति उनका आकर्षण उन्हें धीरे-धीरे अभिनय की दुनिया की ओर ले गया, जहां उन्होंने अपनी एक अलग और अमिट पहचान बनाई। इसे भी पढ़ें: नाना पाटेकर के निधन पर अमिताभ बच्चन ने व्यक्त किया गहरा शोक! कहा- अद्वितीय कलाकार और सच्चे समाजसेवी को नमन रंगमंच से अपने अभिनय की शुरुआत करने वाले नाना पाटेकर ने जब रूपहले पर्दे पर कदम रखा, तो उन्होंने नायक की उस पारंपरिक छवि को पूरी तरह से तोड़ दिया जो उस समय तक सिनेमा में स्थापित थी। उनकी आंखें बोलती थीं और उनकी आवाज में वह कशिश थी जो दर्शकों को अंत तक बांधे रखती थी। उनका संवाद अदायगी का तरीका इतना स्वाभाविक और तेज होता था कि सामने बैठा दर्शक खुद को उस दृश्य का हिस्सा समझने लगता था। उन्होंने क्रांतिवीर, परिंदा, तिरंगा, खामोशी, प्रहार और नटसम्राट जैसी तमाम बेहतरीन रचनाओं में अपने अभिनय का जो उत्कृष्ट प्रदर्शन किया, वह अभिनय की पाठशाला में हमेशा एक मानक के रूप में पढ़ाया जाएगा। चाहे वह एक भ्रष्ट व्यवस्था से लड़ने वाला आम नागरिक हो, एक सख्त सैन्य अधिकारी हो या फिर एक गूंगे बहरे दंपति का संवेदनशील पिता, हर भूमिका में उन्होंने अपने प्राण फूंक दिए। उनके द्वारा बोले गए संवाद आज भी लोगों की जुबान पर हैं और वे मात्र संवाद न होकर समाज की कुरीतियों पर एक गहरा कटाक्ष प्रतीत होते हैं। नाना पाटेकर की एक और बहुत बड़ी विशेषता यह थी कि वे अपनी मातृभाषा मराठी और हिंदी, दोनों ही भाषाओं पर समान अधिकार रखते थे। उन्होंने जितनी सफलता हिंदी सिनेमा में प्राप्त की, उतनी ही ऊंचाई उन्होंने मराठी सिनेमा और रंगमंच में भी हासिल की। उनकी वाणी में एक विशेष प्रकार का ओज था। जब वे अपने संवाद बोलते थे, तो शब्दों के आरोह और अवरोह पर उनका नियंत्रण अद्भुत होता था। उन्होंने कभी भी किसी विदेशी भाषा या पाश्चात्य संस्कृति को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। वे अपनी जड़ों से जुड़े रहे और अपनी भारतीय संस्कृति पर हमेशा गर्व करते रहे। उनकी वेशभूषा, उनके विचार और उनका रहन सहन सब कुछ पूरी तरह से भारतीय था। चकाचौंध के इस दौर में भी उन्होंने अपनी भारतीयता को कभी नहीं छोड़ा। अभिनय की दुनिया में सर्वोच्च शिखर पर पहुंचने के बावजूद नाना पाटेकर ने कभी दिखावे की दुनिया को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। उन्होंने हमेशा एक बेहद सादा और संयमित जीवन व्यतीत किया। जब अन्य कलाकार विलासिता पूर्ण जीवन जी रहे थे, तब नाना अपने गांव में खेती कर रहे थे और एक साधारण इंसान की तरह जीवन बिता रहे थे। उनका यही गुण उन्हें अन्य सभी कलाकारों से अलग और श्रेष्ठ बनाता था। वे हमेशा अपनी जड़ों से जुड़े रहे और उन्होंने कभी अपने अतीत को नहीं भुलाया। यह उनकी महानता ही थी कि उन्होंने अपनी कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा समाज की भलाई के लिए दान कर दिया। विशेषकर महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त क्षेत्रों में किसानों की आत्महत्या की घटनाओं ने उनके हृदय को गहरे तक झकझोर दिया था। किसानों की पीड़ा को उन्होंने अपना दर्द समझा और उनकी सहायता के लिए एक संस्था का निर्माण किया। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने हजारों अनाथ बच्चों, विधवाओं और कर्ज में डूबे किसानों के परिवारों को आर्थिक और मानसिक संबल प्रदान किया। उन्होंने गांव गांव जाकर लोगों की समस्याएं सुनीं और उनके समाधान के लिए जमीनी स्तर पर कार्य किया। उनके इस निस्वार्थ सेवा भाव ने उन्हें जनता के बीच एक भगवान के समान दर्जा दिला दिया था। लोग उन्हें केवल एक कलाकार के रूप में नहीं बल्कि अपने परिवार के एक बड़े बुजुर्ग के रूप में देखते थे जो संकट के समय हमेशा उनके साथ खड़ा रहता था। वर्तमान समय में जहां युवा पीढ़ी बहुत जल्दी मानसिक तनाव का शिकार हो जाती है, नाना पाटेकर का जीवन उनके लिए एक खुला मार्गदर्शन है। उनका जीवन सिखाता है कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि मनुष्य के भीतर इच्छाशक्ति और दृढ़ संकल्प है, तो वह किसी भी बाधा को पार कर सकता है। उन्होंने बिना किसी बाहरी सहारे के अपने दम पर वह मुकाम हासिल किया, जो लाखों लोगों के लिए केवल एक सपना होता है। उनकी यात्रा शून्य से शिखर तक की एक बेहद प्रेरणादायक कहानी है। 8 अक्टूबर 2026 की वह मनहूस सुबह भारतीय कला जगत के लिए एक काला अध्याय लेकर आई। वे गोवा के डोना पाउला स्थित अपने आवास पर थे, जब सुबह के समय उन्हें अचानक गंभीर हृदयघात हुआ। परिजनों द्वारा उन्हें तुरंत समीप के एक बड़े अस्पताल ले जाया गया। वहां मौजूद चिकित्सकों ने करीब 45 मिनट तक उनके हृदय को पुनः सक्रिय करने का हर संभव प्रयास किया, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। सुबह 5 बजकर 20 मिनट पर चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। यह समाचार जैसे ही बाहर आया, पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। जो आंखें उनकी कला को देखकर चमक उठती थीं, वे आंसुओं से नम थीं। चिकित्सकीय और कानूनी प्रक्रियाओं के बाद उनके पार्थिव शरीर को विशेष विमान और वाहन के माध्यम से महाराष्ट्र के पुणे लाया गया। उनका अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव डोंजे में पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ संपन्न हुआ। इस अवसर पर जनसैलाब उमड़ पड़ा था। हर कोई अपने चहेते नायक के अंतिम दर्शन करना चाहता था। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने स्वयं वहां पहुंचकर उनके पार्थिव शरीर को कंधा दिया, जो इस बात का प्रतीक था कि उनका कद राजनीति और कला की सीमाओं से कहीं बहुत ऊपर था। उनके अंतिम सफर में उनके पुराने मित्र, सहकर्मी और हजारों की संख्या में आम लोग शामिल हुए। हर आंख नम थी और हर दिल भारी था। नाना पाटेकर का जाना एक युग का अंत है। उन्होंने अपने अभिनय और अपने कर्मों से जो लकीर खींची है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा स्रोत बनी रहेगी। उनका भौतिक शरीर आज हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनकी कला, उनके विचार और मानवता के लिए किए गए उनके निस्वार्थ कार्य उन्हें हमेशा हमारे दिलों में जीवित रखेंगे। रूपहले पर्दे का वह शेर आज हमेशा के लिए शांत हो गया है, लेकिन उसकी दहाड़ भारतीय सिनेमा और समाज की चेतना में हमेशा गूंजती रहेगी। - महेन्द्र तिवारी
हिमालय की प्रदूषण-मुक्ति भी हो पहाड़ी तीर्थयात्रा का उद्देश्य
हिमालय केवल पर्वतों की एक शृंखला नहीं है, वह भारत की सांस्कृतिक चेतना, आध्यात्मिक आस्था और प्राकृतिक जीवन का आधार है। उसकी चोटियों में तप की स्मृतियां हैं, उसकी नदियों में करोड़ों लोगों की जीवनधारा बहती है और उसकी घाटियों में असंख्य धार्मिक स्थल सदियों से श्रद्धालुओं को आकर्षित करते रहे हैं। हिमाचल प्रदेश सहित पूरे हिमालयी क्षेत्र में हिंदू धर्म के अनेक प्रमुख तीर्थस्थल हैं। इन स्थानों पर पहुंचना श्रद्धालुओं के लिए आस्था का विषय है, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि पिछले कुछ वर्षों में तीर्थयात्रा और पर्यटन के बीच की सीमा धुंधली होती जा रही है। दर्शन और आध्यात्मिक अनुभूति के साथ मनोरंजन, मौज-मस्ती और उपभोक्तावादी जीवनशैली का प्रवेश पहाड़ों की संवेदनशीलता पर भारी पड़ रहा है। हिमालय की सबसे बड़ी विशेषता ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी है। यहां का पर्यावरण अत्यंत नाजुक है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मिट्टी की परत पतली है, वनस्पतियों की पुनरुत्पादन क्षमता सीमित है और कचरे के प्राकृतिक रूप से नष्ट होने की प्रक्रिया मैदानी क्षेत्रों की तुलना में बहुत धीमी है। इसके बावजूद हम हजारों-लाखों लोगों को एक साथ इन क्षेत्रों में पहुंचा रहे हैं। वाहनों की लंबी कतारें, पार्किंग का दबाव, होटल और ढाबों का अनियोजित विस्तार, प्लास्टिक की बोतलें, खाद्य पदार्थों के रैपर, पॉलीथिन और डिस्पोजेबल सामग्री पहाड़ों की प्राकृतिक सुंदरता और पर्यावरण को लगातार चोट पहुंचा रहे हैं। चारधाम यात्रा के दौरान इस वर्ष सितंबर के मध्य तक 800 टन से अधिक कचरा एकत्र होने की सूचना इस संकट की गंभीरता को सामने रखती है। केदारनाथ जैसे अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र में अप्रैल से अगस्त के बीच 50.30 टन कचरा जमा होना विशेष चिंता का विषय है। यह तथ्य इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में फेंकी गई एक प्लास्टिक बोतल केवल एक बोतल नहीं रहती, वह लंबे समय तक पर्यावरण में मौजूद रहकर मिट्टी, जलस्रोतों और वन्यजीवन के लिए खतरा बन सकती है। विडंबना देखिए-जिस स्थान पर मनुष्य आत्मशुद्धि, संयम और त्याग की भावना लेकर जाता है, वहीं वह अपने पीछे कचरे का निशान छोड़ आता है। क्या ऐसी यात्रा को वास्तव में तीर्थयात्रा कहा जा सकता है? तीर्थ का अर्थ केवल किसी मंदिर तक पहुंच जाना नहीं है। तीर्थ मनुष्य के भीतर परिवर्तन की यात्रा है। यदि मंदिर में माथा टेकने के बाद हम उसी पर्वत की गोद में प्लास्टिक फेंक दें, जिसकी पवित्रता के नाम पर वहां पहुंचे हैं, तो हमारी आस्था अधूरी रह जाती है। इसे भी पढ़ें: Delhi Pollution रोकने के लिए Construction Ban, Parking Charges डबल करने और Work From Home की नीति का ऐलान इस संदर्भ में ‘कैरी मी बैक’ अभियान उम्मीद की एक महत्वपूर्ण किरण है। लगभग पांच हजार तीर्थयात्रियों द्वारा करीब 18 किलोमीटर के रास्ते से 12 टन से अधिक कंप्रेस्ड प्लास्टिक वापस नीचे लाना बताता है कि श्रद्धालुओं को सहभागी बनाया जाए तो वे पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यह केवल कचरा उठाने का अभियान नहीं, बल्कि तीर्थयात्रा की मानसिकता बदलने का प्रयास है। ऐसे अभियानों को व्यापक स्वरूप देकर हिमाचल, उत्तराखंड और अन्य हिमालयी तीर्थ क्षेत्रों में लागू किया जाना चाहिए। अमरनाथ यात्रा से मिला अनुभव भी सकारात्मक दिशा दिखाता है। पुनः उपयोग किए जाने वाले बर्तनों और पानी भरने की सुविधाओं के विस्तार के कारण यात्रियों की संख्या में 17 प्रतिशत वृद्धि के बावजूद प्रति यात्री कचरे में 15 प्रतिशत कमी आना इस बात का प्रमाण है कि सुविधाजनक और वैज्ञानिक व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए तो पर्यावरणीय दबाव कम किया जा सकता है। इसलिए केवल श्रद्धालुओं से अपील करना पर्याप्त नहीं है, प्रशासन को ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें पर्यावरण-अनुकूल व्यवहार सबसे सहज विकल्प बने। हिमाचल प्रदेश के धार्मिक एवं पर्यटन स्थलों पर भीड़ का अनियंत्रित बढ़ना इसी व्यापक संकट का हिस्सा है। शिमला, मनाली, धर्मशाला, चामुंडा, ज्वालाजी, चिंतपूर्णी, नैना देवी और अन्य धार्मिक-पर्यटन स्थलों पर मौसम विशेष में बढ़ने वाला दबाव यातायात, जलापूर्ति, सीवेज, ठोस कचरा और स्थानीय संसाधनों पर असर डालता है। पहाड़ों की वहन क्षमता मैदानी शहरों जैसी नहीं है। इसलिए किसी भी तीर्थ या पर्यटन स्थल की लोकप्रियता को केवल अधिकाधिक लोगों को वहां पहुंचाने की सफलता के रूप में नहीं देखा जा सकता। अब समय आ गया है कि ‘जितने अधिक पर्यटक, उतना अधिक विकास’ की सोच को ‘जितना संवेदनशील पर्यावरण, उतना जिम्मेदार पर्यटन’ में बदला जाए। तीर्थस्थलों की वहन क्षमता का वैज्ञानिक अध्ययन हो और उसके आधार पर प्रतिदिन या मौसम के अनुसार आगंतुकों की संख्या निर्धारित की जाए। सिंगल-यूज प्लास्टिक पर प्रभावी नियंत्रण हो, पानी के रिफिल स्टेशन बढ़ाए जाएं, बोतलों और पैकेजिंग के लिए डिपॉजिट-रिटर्न व्यवस्था लागू की जाए तथा कचरे को स्रोत पर ही अलग करने की व्यवस्था हो। दुकानदारों, होटल संचालकों और वेंडरों को उनके द्वारा उत्पन्न कचरे के प्रति जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण है तीर्थयात्री की मानसिकता में परिवर्तन। पहाड़ हमारे मनोरंजन के मैदान नहीं हैं। वे हमारी आने वाली पीढ़ियों की प्राकृतिक विरासत हैं। जिस नदी के किनारे हम पूजा करते हैं, वही नदी नीचे बसे करोड़ों लोगों का जीवन है। जिस जंगल को हम कैमरे में कैद करते हैं, वही जंगल पहाड़ी पारिस्थितिकी को संतुलित करता है। जिस पर्वत को हम देवभूमि कहकर नमन करते हैं, उसकी ढलानों पर प्लास्टिक फेंकना हमारी अपनी श्रद्धा का अपमान है। नेपाल और हिमालयी क्षेत्र में समय-समय पर अत्यधिक वर्षा, बाढ़, भूस्खलन और हिमस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं ने यह चेतावनी दी है कि पर्वतीय पारिस्थितिकी के साथ छेड़छाड़ के परिणाम गंभीर हो सकते हैं। हर आपदा को सीधे पर्यटन या प्रदूषण का परिणाम मानना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा, लेकिन इतना निश्चित है कि अनियोजित निर्माण, अत्यधिक मानवीय दबाव, वन क्षरण और कचरा प्रबंधन की कमजोरी पर्वतीय क्षेत्रों की संवेदनशीलता को बढ़ा सकती है। हिमालय आज चिन्ताओं का हिमालय बन गया है। कुछ दशकों में खासकर हिमालयी क्षेत्र के राज्यों में विकास के नाम पर जहां प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन हुआ है, वहीं धार्मिक पर्यटन के नाम पर व्यापक स्तर पर प्रदूषण फैला है। इतना ही नहीं, प्रकृति से खिलवाड़ कर नियमों के खिलाफ ऐसा निर्माण खड़ा किया जा रहा है, जो बाढ़ और भूस्खलन के साथ बर्बादी लेकर आता रहा है। सवाल यह भी है कि पहाड़ी राज्यों में विकास का क्या पैमाना होना चाहिए? अगर विकास के नाम पर कहीं निर्माण गतिविधियां आवश्यक हों तो वह नियोजन के साथ ही आपदाओं को झेलने में सक्षम होनी चाहिए। आम तौर पर देखा गया है कि इन राज्यों में पर्यटन एवं धार्मिक यात्राओं को बढ़ावा देेने के नाम पर ऐसी बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी हो गईं जो न सिर्फ बाढ़ और भूस्खलन झेलने में अक्षम साबित हुईं, बल्कि पर्यावरण के हिसाब से भी नुकसानदेह रही हैं। ऐसे निर्माण में सरकारी स्तर पर सतर्कता की जो उम्मीद की जाती है, उसे नजरअंदाज किया गया। हिमालय हमें बहुत कुछ देता है-जल, वन, जैव विविधता, जलवायु संतुलन, संस्कृति और आध्यात्मिक ऊर्जा। बदले में हमारी जिम्मेदारी केवल वहां जाकर पूजा करना नहीं, बल्कि उस प्रकृति की रक्षा करना भी है। तीर्थयात्री यदि एक बोतल पानी लेकर पहाड़ पर जा सकता है तो खाली बोतल वापस भी ला सकता है। यह छोटा-सा संकल्प बड़े परिवर्तन का आधार बन सकता है। आस्था और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। धार्मिक यात्रा का वास्तविक संस्कार तभी पूर्ण होगा जब तीर्थयात्री मंदिर से लौटते समय अपने साथ प्रसाद ही नहीं, प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी भी लेकर लौटे। सरकारें व्यवस्था करें, स्थानीय समुदाय भागीदारी निभाएं और श्रद्धालु अपना कचरा वापस लाने का संकल्प लें-तभी हिमालय की पवित्रता सुरक्षित रह सकेगी। हिमालय को केवल देवभूमि कहने से उसकी रक्षा नहीं होगी, उसे देवभूमि की तरह व्यवहार देकर ही उसकी पवित्रता बचाई जा सकती है। यही सच्ची तीर्थयात्रा है, यही प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और यही आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारा नैतिक दायित्व है। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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एलन मस्क के बयान से उठते गंभीर सवाल- भारत की संप्रभुता और सुरक्षा सर्वोपरि
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीबी और दुनिया के मशहूर उद्योगपति एलन मस्क के एक बयान ( सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर किया गया पोस्ट ) ने भारत में कई तरह के गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसका जवाब तलाशना और पूरी गंभीरता से देना बहुत जरूरी हो गया है। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि उदारीकरण और भूमंडलीकरण के इस दौर में प्राइवेट कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा होनी ही चाहिए ताकि लोगों को फायदा भी हो और उनके पास चुनने का विकल्प भी हो। इसी तर्क का हवाला देकर भारत के अंदर भी कई लोग एलन मस्क की पीड़ा को सही बताते हुए सरकार को नसीहतें दे रहे हैं। लेकिन भारत की संप्रभुता और वैश्विक कंपनियों को भारत में कारोबार करने की इजाज़त देने के बीच में एक बहुत ही हल्की सी रेखा आती है, जिसे पार करते ही कई तरह की समस्याएं खड़ी हो सकती है। इसे भी पढ़ें: Elon Musk ने घेरा तो मोदी सरकार ने दिया करारा जवाब! समझिये Starlink का भारत में प्रवेश क्यों अटका हुआ है? भारत के अंदर, हर भारतीय को यह स्वतंत्रता है कि वो अपनी सरकार से सवाल पूछ सके, अपनी सरकार पर सवाल उठा सके लेकिन क्या हम यही स्वतंत्रता किसी विदेशी कारोबारी को दे सकते हैं? कतई नहीं, भारत का असली बॉस कौन है, यह तय करने और बताने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ भारतीयों के पास ही रहना चाहिए। एलन मस्क ने 8 अक्टूबर को अपने ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर लिखा, स्टारलिंक को 165 से ज़्यादा देशों में लाइसेंस मिला हुआ है और कंपनी भारत सरकार के हर नियम और ज़रूरत को पूरा करने में पांच साल से काम कर रही है, फिर भी लाइसेंस क्यों नहीं मिला? क्या अंबानी ही भारत के असली बॉस हैं? जिस अंदाज में और जितनी तेजी से राहुल गांधी ने इस पर कमेंट किया, उसे लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। मस्क के पोस्ट को रिपोस्ट करते हुए राहुल ने लिखा, भारत में आपका स्वागत है, एलन। दूसरे शख्स के मिलने तक इंतजार कीजिए। राहुल गांधी के जवाब से गदगद मस्क ने तुरंत जवाब देते हुए लिखा, धन्यवाद राहुल, यह वाकई परेशान करने वाला है। यहां यह याद रखना भी बहुत जरूरी है कि मस्क पहले भी आरोप लगा चुके हैं कि भारत में इस सेक्टर से जुड़े बड़े कारोबारी स्टारलिंक की एंट्री भारत के बाज़ार में रोककर अपना दबदबा बनाए रखना चाहते हैं। लेकिन इस बार लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के जवाब देने के कारण, मामला बहुत गंभीर हो गया है। पिछले कई दिनों से राहुल, देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं और यह बात स्पष्ट तौर पर नज़र आ रही है केंद्र में सत्तारूढ़ सरकार और विपक्षी दल खासकर राहुल के साथ संवादहीनता की स्थिति आ गई है, जिसे कतई सही नहीं माना जा सकता है। इतने गंभीर मसले पर राहुल की इतनी तेजी से की गई टिप्पणी को कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता है। यहां साफ-साफ नजर आ रहा है कि राहुल ने एक बड़ी गलती कर दी है,जिसका जवाब अब उन्हें लगातार देते रहना पड़ेगा। भारत सरकार ने गुरुवार, 8 अक्टूबर को ही मस्क के आरोपों को खारिज करते हुए यह साफ कर दिया कि, देश में सैटेलाइट कम्युनिकेशन सर्विसेज के लिए तय नियम सभी के लिए एक जैसे हैं। फिलहाल, तीनों कंपनियों के लिए सुरक्षा समीक्षा की प्रोसेस चल रही है। जैसे ही किसी कंपनी की सुरक्षा जांच पूरी हो जाएगी, वह अगली स्टेप यानी स्पेक्ट्रम आवंटन की मांग करने के लिए आगे बढ़ सकती है। सरकार ने आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि, यह कहना बिल्कुल गलत है कि नियमों को किसी के साथ भेदभाव करने के लिए लागू किया जा रहा है। मस्क के अलावा एयरटेल के मालिक सुनील भारती मित्तल की कंपनी यूटेलसैट वनवेब और मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस जियो भी लाइसेंस लेने की होड़ में है। एलन मस्क के आरोप अपनी जगह है लेकिन भारत की कोई भी सरकार देश की सुरक्षा और संप्रभुता से किसी तरह का समझौता नहीं कर सकती है। इस मामले में भारत के महत्वपूर्ण और बड़े राजनीतिक दलों को एक ही पेज पर होना चाहिए। सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह संसद के प्रमुख दलों को इससे जुड़े तथ्यों से अवगत कराएं। सरकार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीबी मित्र एलन मस्क को भी दो टूक शब्दों में यह बता देना चाहिए कि बयानों और सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए भारत की सरकार पर कोई दबाव नहीं डाला जा सकता है। यह मामला बहुत बड़ा है और इसे दुनिया की तमाम बड़ी कंपनियों के लिए एक उदाहरण की तरह पेश किया जाना चाहिए। इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि सब कुछ बिना किसी भेदभाव के होना चाहिए लेकिन ट्रंप प्रशासन जिस तरह से भारत, भारतीय कंपनियों और भारतीयों के खिलाफ लगातार फैसले ले रहा है, उसे भी ध्यान में रखना बहुत जरूरी है। - संतोष कुमार पाठक लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं
दिल्ली में राजनीतिक प्रदर्शनों और सुरक्षा व्यवस्था के चलते यातायात पर लग रही पाबंदियों का असर अब केवल आम यात्रियों तक सीमित नहीं रह गया है। राजधानी के बाजारों में ग्राहकों की आवाजाही घटने, कारोबार प्रभावित होने और दूसरे शहरों से खरीदारी के लिए आने वाले व्यापारियों की संख्या कम होने की शिकायतें सामने आ रही हैं। चिंता इसलिए भी गंभीर है क्योंकि नवरात्रि से दिवाली तक का समय खुदरा कारोबार, थोक खरीदारी, कपड़ों, इलेक्ट्रॉनिक्स, आभूषणों, सजावटी सामान और शादी-ब्याह की खरीदारी के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होता है। दिल्ली के व्यापारिक संगठनों के ताजा दावों के मुताबिक, पिछले कुछ दिनों में बाजारों की कारोबारी गतिविधियां लगभग 70 प्रतिशत तक गिर गई हैं। यह स्थिति बताती है कि सड़कों पर लगने वाली पाबंदियों और मेट्रो सेवाओं में व्यवधान का आर्थिक असर कितना व्यापक हो सकता है। इसे भी पढ़ें: पूरा ट्रांसपोर्ट बंद नहीं कर सकते, मेट्रो और ट्रेन रद्द करने पर दोबारा करें विचार, CJP प्रोटेस्ट से पहले पाबंदियों पर सरकार को SC का निर्देश हम आपको बता दें कि 8 अक्टूबर को दिल्ली में कांग्रेस और विपक्षी दलों के प्रदर्शन के दौरान राजघाट और कनॉट प्लेस के आसपास यातायात बाधित हुआ। इसके चलते, नई दिल्ली रेलवे स्टेशन तक पहुंचने के रास्ते बंद होने और ट्रैफिक प्रतिबंधों के कारण 5,000 से अधिक यात्री अपनी ट्रेनें नहीं पकड़ सके। साथ ही इस घटना का सीधा संबंध व्यापारिक नुकसान से भी है। दिल्ली में दूसरे राज्यों से आने वाले कारोबारी अक्सर ट्रेन से पहुंचते हैं। उन्हें स्टेशन से थोक बाजारों तक जाना होता है, माल खरीदना होता है और फिर निर्धारित समय में वापसी करनी होती है। जब स्टेशन तक पहुंचना ही मुश्किल हो जाए, तो उनकी यात्रा, खरीदारी और माल की ढुलाई तीनों प्रभावित होती हैं। कांग्रेस के प्रदर्शन के ठीक बाद अब 10 अक्टूबर को सीजेपी के प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की जा रही है। देखा जाये तो सुरक्षा व्यवस्था का उद्देश्य कानून-व्यवस्था बनाए रखना है। लेकिन जब बैरिकेडिंग, ट्रैफिक डायवर्जन, मेट्रो स्टेशन के प्रवेश-द्वारों पर प्रतिबंध और वाहनों की आवाजाही पर नियंत्रण जैसे कदम व्यावसायिक इलाकों को प्रभावित करते हैं, तो उनका आर्थिक असर भी होता है। विशेष चिंता यह है कि नई दिल्ली, कनॉट प्लेस, जनपथ और आसपास के बाजारों में ग्राहक पहुंचने से कतराने लगते हैं। ग्राहक यह सोचकर खरीदारी टाल देते हैं कि बाजार पहुंचना और वहां से लौटना मुश्किल होगा। यहां नुकसान केवल उस दिन की बिक्री का नहीं है। दुकानों में काम करने वाले कर्मचारियों की उपस्थिति, माल की डिलीवरी, थोक खरीदारों की यात्राएं, रेस्तरां की बिक्री और पार्किंग पर निर्भर कारोबारी गतिविधियां भी प्रभावित होती हैं। देखा जाये तो दिल्ली के व्यापारियों की चिंता का सबसे बड़ा कारण समय है। 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्र शुरू होने वाले हैं। इसके बाद रामलीला, दशहरा, दिवाली और शादी-ब्याह का सीजन कारोबार को गति देते हैं। इस दौरान कपड़े, साड़ियां, रेडीमेड गारमेंट, जूते, इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल फोन, सजावट के सामान, पूजा सामग्री, आभूषण और उपहारों की मांग बढ़ती है। दिल्ली के बाजार केवल राजधानी के स्थानीय ग्राहकों पर निर्भर नहीं हैं। देश के अनेक शहरों और कस्बों से छोटे व्यापारी थोक खरीदारी करने आते हैं। वे दिल्ली से माल खरीदकर अपने इलाकों में बेचते हैं। इस तरह दिल्ली के थोक बाजारों की गतिविधियां दूसरे राज्यों के खुदरा कारोबार से भी जुड़ी हैं। दूसरी तरफ, खुदरा खरीदारी करने वाले परिवार भी त्योहारों के लिए कपड़े, उपहार, घरेलू सामान और दूसरी जरूरतें खरीदने बाजार पहुंचते हैं। दुकानदार इसी समय के लिए पहले से स्टॉक जुटाते हैं, कर्मचारियों की व्यवस्था करते हैं और ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए छूट तथा विशेष सेल चलाते हैं। ऐसे में यदि बाजारों में ग्राहकों की आवाजाही बाधित होती है, तो माल दुकान में पड़ा रह सकता है। व्यापारी को किराया, कर्मचारियों का वेतन, बिजली, परिवहन और स्टॉक पर लगी पूंजी की लागत फिर भी चुकानी पड़ती है। यहां सवाल उठता है कि प्रदर्शनों के चलते आखिर व्यापारियों को कितना नुकसान हुआ और कितना हो सकता है? इस सवाल का सबसे महत्वपूर्ण आधार चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री (CTI) का 9 अक्टूबर को सामने आया आकलन है। संगठन ने अपने सर्वे के हवाले से कहा है कि पिछले तीन दिनों में दिल्ली के बाजारों की कारोबारी गतिविधियों में करीब 70 प्रतिशत गिरावट आई है। CTI के अनुसार, दिल्ली से बाहर से खरीदारी के लिए आने वाले ग्राहकों की संख्या सामान्य अनुमानित 2 से 3 लाख प्रतिदिन से घटकर करीब 40,000 से 50,000 रह गई। स्थानीय बाजारों में ग्राहकों की आवाजाही भी 50 प्रतिशत से अधिक कम होने का दावा किया गया है। हम आपको यह भी बता दें कि CTI ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में नवरात्रि से दिवाली तक प्रमुख व्यावसायिक इलाकों में बड़े प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगाने या उन्हें नियंत्रित करने की मांग की है। संगठन ने बड़े जमावड़ों के लिए मध्य दिल्ली से बाहर कोई स्थायी प्रदर्शन स्थल निर्धारित करने का सुझाव भी दिया है, जिसमें बुराड़ी या रामलीला मैदान जैसे स्थानों का उल्लेख है। बहरहाल, त्योहारों के इस अहम कारोबारी मौसम में दिल्ली के बाजारों को बार-बार ठप होने से बचाना केवल व्यापारियों का मुद्दा नहीं है। यह रोजगार, छोटे कारोबार, थोक-खुदरा आपूर्ति और उपभोक्ताओं की सुविधा से जुड़ा सवाल है। प्रदर्शन करने वालों को अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए, लेकिन ऐसी व्यवस्था भी जरूरी है कि राजनीतिक गतिविधियों और सुरक्षा प्रबंधों की कीमत आम नागरिकों और कारोबारियों को अपनी रोजी-रोटी गंवाकर न चुकानी पड़े। -नीरज कुमार दुबे
क्या अंबानी भारत के असली बॉस हैं? यह सवाल दुनिया के सबसे अमीर शख्स एलन मस्क ने एक्स पर एक पोस्ट पर पूछा है। इससे पहले 7 अक्टूबर को एलन मस्क ने एक्स पर एक पोस्ट किया था। इसमें मस्क ने लिखा था कि भारत के कुछ बड़े बिजनेसमैन नहीं चाहते कि स्टारलिंक का सेटेलाइट इंटरनेट भारत में आए। क्योंकि ऐसा होने से उनका एक छत्रुराज खत्म हो सकता है। हालांकि तब एलन मस्क ने किसी का नाम नहीं लिया था। लेकिन 8 अक्टूबर को मस्क का एक और पोस्ट आया है और इस बार उन्होंने सीधे अंबानी का नाम लिया। भारत की बढ़ती वैश्विक साख और तेजी से मजबूत होती अर्थव्यवस्था को देखकर अब सिर्फ देश के अंदर बैठे विरोधी ही नहीं बल्कि दुनिया के सबसे अमीर शख्स एलन मस्क के पेट में भी मरोड़ उठने लगी है और वो भी अब मोदी सरकार और अंबानी के खिलाफ खतरनाक खेल खेलने की फिराक में लग गए हैं। दरअसल एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक भारत के सेटेलाइट इंटरनेट मार्केट में पैर पसारने की फिराक में थी। लेकिन जब भारत सरकार ने विदेशी कंपनियों के मनमानी के आगे झुकने से इंकार कर दिया और देश के राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा नियमों से समझौता नहीं किया तो मस्क का असली रूप दुनिया के सामने आ गया। पहले मस्क ने भारत की कमर्शियल प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए। फिर उन्होंने भारतीय उद्योगपतियों के लिए दिलचस्प शब्द का इस्तेमाल किया ऑलिगार्क। ऑलिगार्क का मतलब सिर्फ धन सेट नहीं होता है। कैमब्रिज डिक्शनरी के मुताबिक ऑलिगार्क एक ऐसा धन्ना सेट होता है जो अपने कनेक्शन और अकूत दौलत के बल पर सरकार और समाज को इन्फ्लुएंस करता है। तो ऑलिगार्क एक नेगेटिव कनोटेशन वाला लफ्ज़ है। रूस में पुतिन जिन 10-12 धन्ना सेठों के बल पर पूरे देश को कंट्रोल करते हैं उन्हें रशियन ऑलिगार्क कहा जाता है। पूरी दुनिया जानती है कि किस तरह पुतिन के आशीर्वाद से इन्हें ठेके मिलते हैं और बदले में यह लोग पुतिन के कामों में पैसा लगाते हैं। पुतिन के जो दुश्मन है उनको परेशान करते हैं। सेठ भी खुश, नेता भी खुश और जनता जनता के लिए इस गेम में कोई जगह नहीं है। कुल मिलाकर कहे तो ऑलिगार्क एक नेगेटिव कनोटेशन वाला शब्द है। अकूत पैसा, पावरफुल कनेक्शन और ऐसा कोई शख्स जो ऐसे बिजनेस में हो जहां स्टार्लिंग उसका डायरेक्ट राइवल हो। सोशल मीडिया एक स्वर में मुकेश अंबानी का नाम ले रहा है। हालांकि जब भारत सरकार ने मस्क के तमाम बेबुनियादी आरोपों को खारिज कर दिया तो बौखलाहट में मस्क ने सीधे भारत के स्वाभिमान पर हमला बोलते हुए एक ट्वीट कर दिया और छूटते ही पूछा क्या अंबानी भारत के असली बॉस हैं। तुरंत ही उनके ट्वीट पर राहुल गांधी ने ऐसा रिएक्ट किया कि पूरा देश पूरे खेल को ही समझ गया कि ये दोनों मिलकर भारत में क्या खतरनाक खेल खेलने की कोशिश में लग गए हैं। लेकिन ठहरिए मस्क का यह बयान सिर्फ एक कारोबारी खीज नहीं है बल्कि इसके पीछे एक बहुत खतरनाक क्रोनोलॉजी छिपी है। जैसे ही मस्क ने भारत और भारतीय कारोबारियों के खिलाफ जहर उगला वैसे ही देश के अंदर बैठे राहुल गांधी और उनका पूरा इकोसिस्टम मस्क के समर्थन में पलकें बिछाकर खड़ा हो गया। राहुल गांधी ने तुरंत सोशल मीडिया पर मस्क का स्वागत करते हुए भारतीय उद्योगपतियों और मोदी सरकार के खिलाफ तंज कस डाला। जिस पर मस्क ने भी राहुल को धन्यवाद दे दिया। सोचिए जो राहुल गांधी दिल्ली की सड़कों पर तांडव मचा रहे हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर मोहल भड़का रहे हैं। वही राहुल गांधी अब भारत की संप्रभुता को चुनौती देने वाले विदेशी अरबपति के सुर में सुर मिला रहे हैं। इसे भी पढ़ें: Satcom सेक्टर में नहीं चलेगी Monopoly, सिंधिया ने किया साफ- सुरक्षा जांच और चार्ज तय होने के बाद मिलेगा Spectrum अंबानी का नाम लेकर एलन मस्क ने क्या कहा? मस्क ने लिखा कि स्टारलिंक को 165 से ज्यादा देशों में लाइसेंस मिला हुआ है। कंपनी पिछले 5 साल से भारत सरकार की हर शर्त और कानून मान रही है। फिर भी भारत में स्टारलिंक को अब तक लाइसेंस क्यों नहीं मिला? इसके बाद मस्क ने सीधा सवाल पूछा, क्या अंबानी ही भारत के असली बॉस हैं? इसी पोस्ट को नेता विपक्ष राहुल गांधी ने रीट्वीट किया है। राहुल गांधी ने लिखा भारत में आपका स्वागत है। एलन दूसरे शख्स से मिलने का इंतजार करें। इसके बाद एलन मस्क ने भी इस पोस्ट को रीट्वीट किया है और थैंक यू लिखा है। यानी एलन मस्क के पोस्ट से शुरू हुआ यह विवाद अब बढ़ गया है। मस्क की स्टारलिंक का विवाद है क्या? स्टारलिंक भारत में सेटेलाइट इंटरनेट सेवा शुरू करने के लिए कई सालों से कोशिश कर रहा है। कंपनी को जून 2025 में जीएमपीसीएस लाइसेंस और जुलाई 2025 में आईए स्पेस से अनुमति मिल चुकी है। कंपनी ने भारत में ग्राउंड स्टेशन और जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर भी बना लिया है। लेकिन अभी भी सिक्योरिटी असेसमेंट, विदेशी निवेश की मंजूरी और स्पेक्ट्रम आवंटन बाकी है। आसान भाषा में समझे तो स्टार्लिंग को भारत में काम करने की इजाजत मिल चुकी है। लेकिन सर्विस शुरू करने के लिए जरूरी आखिरी हरी झंडी अभी नहीं मिली है। और इसी देरी को लेकर एलन मस्क अब खुलकर सवाल उठा रहे हैं। स्टार्लिंग ने भारत में अपनी मौजूदगी बढ़ाने के लिए महाराष्ट्र, गुजरात और मेघालय की सरकारों के साथ लेटर ऑफ इंटेंट भी साइन किए हैं। बहरहाल मस्क के इस बयान के बाद भारत सरकार ने भी जवाब दिया है। संचार मंत्रालय ने स्टारलिंग के साथ किसी तरह का भेदभाव किए जाने के आरोप को खारिज किया है। दरअसल सरकार ने तीन कंपनियों को भारत में सेटेलाइट इंटरनेट सर्विस देने का लाइसेंस दिया है। इनमें एलन मस्क की स्टारलिंग, Reliance Jio की Jio सेट और भारती के समर्थन वाली यूटेल सेट वन वेब शामिल है। लेकिन लाइसेंस मिलने के बावजूद यह कंपनियां अभी भारत में अपनी सर्विस शुरू नहीं कर सकती। इसके लिए सुरक्षा से जुड़ी जांच और स्पेक्ट्रम की मंजूरी जरूरी है। इसे भी पढ़ें: भारत Banana Republic नहीं, Ram Madhav बोले- Starlink स्पेक्ट्रम पर नियम से होगा फैसला क्या मस्क स्टारलिंग को जिओपॉलिटिकल वेपन की तरह इस्तेमाल करते हैं? मस्क एक एक्टिव पॉलिटिकल माइंड रखते हैं। दुनिया भर की पॉलिटिक्स को लेकर उनकी एक राय है। उनके दिमाग में स्कीम्स हैं। जर्मनी में चुनाव होते हैं तो वह दक्षिणपंथी एएफडी की तरफदारी करते हैं। ब्रिटेन में एंटी मुस्लिम नैरेटिव को हवा देते हैं। रिस्टोर ब्रिटेन और रिफॉर्म यूके जैसी पार्टियों का समर्थन करते हैं। अपने खुद के देश साउथ अफ्रीका में सरकार को टारगेट करते हैं। वाइट सुप्रीममेसी की बातें करते हैं। अब अगर मस्क सिर्फ़ दक्षिणपंथी ही होते पॉलिटिकली तो कोई कह सकता था कि इस हिसाब से मस्क को भारत में दिक्कत नहीं होनी चाहिए। भारत में भी दक्षिणपंथी सरकार अभी है। लेकिन दिक्कत यह है कि मस्क कब पाला बदलेंगे किसी को आईडिया नहीं है। कभी वो ट्रंप के दफ्तर में नजर आते हैं बच्चों के साथ। तो कभी ऐसे ट्वीट करते हैं कि ट्रंप को बताना पड़ता है कि भले तुमने पैसा लगाया हो कैंपेन में लेकिन राष्ट्रपति मैं हूं। मुझसे डर के रहो। मस्क आज किसी पार्टी का हाथ पकड़ कर दाखिल होंगे। कल उसी के दुश्मन भी बन सकते हैं और इसमें किसी को हैरानी भी नहीं होगी। मस्क की बौखलाहट और राहुल का एलन प्रेम! थोड़ा पीछे चलते हैं, 2024 में चुनाव प्रचार के दौरान दोनों नेता करीब आते हैं। डोनाल्ड ट्रंप की सबसे बड़ी जीत का श्रेय एलन मस्क को ही एक्सपर्ट्स ने तब दिया था। उन्होंने ट्रंप का सिर्फ समर्थन ही नहीं किया बल्कि ट्रंप के प्रचार में लगभग सात करोड़ डॉलर खर्च भी किए। बात जब टाइमिंग की आती है तो राजनीति में कोई भी घटना इत्तेफाक नहीं होती है। एक तरफ जब विपक्ष एसआईआर के खिलाफ ज्ञानेश कुमार को मोहरा बनाकर सड़कों पर गदर काट रहा है। ठीक उसी वक्त एलन मस्क मोदी सरकार और भारतीय उद्योगपतियों को निशाना बना रहे हैं। अंबानी का नाम लेकर ना जाने क्या-क्या दिखाने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं। सवाल यह है कि जो मस्क आज भारत में कानून और नियमों की बात का रोना रो रहे हैं। क्या वो अमेरिका में भी इसी तरह की बयानबाजी करने की हिम्मत रखते हैं? जब ट्रंप प्रशासन ने चीन की दिग्गज इलेक्ट्रिक वाहन कंपनी बीवाईडी पर 100 फीसदी तक भारी भरकम टेरिफ ठोक दिया था। तब तो मस्क की जुबान पर ताला लगा हुआ था। तब तो मस्क ने यह नहीं कहा कि अमेरिका में यह किसी से नहीं पूछा। क्या अमेरिका का बॉस एलन मस्क है? क्योंकि उन्हीं के कंपनियों की वजह से ट्रंप ने यह हरकत की थी। लेकिन जब भारत अपने सुरक्षा कारणों, राष्ट्रीय हितों, कानूनों का पालन करने के लिए निष्पक्ष नियम कानून लागू करता है तो मस्क को भारत में तानाशाही दिखने लगती है। भारत का बॉस अंबानी दिखने लगते हैं। सबसे अफसोसजनक बात तो यह है कि हमारे देश का विपक्ष यानी राहुल गांधी अपनी ही सरकार को घेरने के लिए ऐसे विदेशी कारोबारी के मोहरे बन जाते हैं जो भारत की अर्थव्यवस्था और घरेलू कंपनियों की बढ़त से परेशान है। जबकि मोदी सरकार ने एकदम साफ कर दिया है कि देश का सेटेलाइट कम्युनिकेशन रेगुलेटरी फ्रेमवर्क एकदम निष्पक्ष और गैर भेदभाव वाला है। सरकार ने तीन कंपनियों के सुरक्षा और कागजी गाइडलाइंस पूरे ना करने पर प्रोसेस को रोका है। जिसमें स्टार्लिंग, Jio सेट और यूटिल सेट वनवे तीनों शामिल हैं। तीनों कंपनियां एक ही सुरक्षा जांच के चरण में है। लेकिन मस्क चाहते हैं कि उन्हें बिना सुरक्षा क्लीयरेंस के स्पेशल ट्रीटमेंट मिले। जब ऐसा नहीं हुआ तो उन्होंने भारत को बदनाम करना शुरू कर दिया। मस्क के आरोपों पर टेलीकॉम मिनिस्टर ने क्या जवाब दिया संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि भारत किसी भी क्षेत्र में एकाधिकार की अनुमति नहीं देता। उन्होंने कहा कि एक खास कंपनी की काफी चर्चा हो रही है, लेकिन वास्तविकता यह है कि तीन कंपनियों को उपग्रह संचार (सैटकॉम) लाइसेंस मिल चुके हैं और वे सुरक्षा संबंधी शर्तों तथा निर्धारित लक्ष्यों को अलग-अलग पूरा करने के बाद परिचालन शुरू कर सकती हैं। उपग्रह संचार सेवाओं को लेकर जारी विवाद और अमेरिकी उद्योगपति एलन मस्क के आरोपों के बीच उन्होंने यह टिप्पणी की है। मस्क ने दावा किया है कि कुछ प्रभावशाली कारोबारी समूह उनकी कंपनी स्टारलिंक की उपग्रह संचार सेवाओं को शुरू होने से रोक रहे हैं। मस्क ने आरोप लगाया था कि ये समूह भारतीय लोगों पर अपना एकाधिकार बनाए रखना चाहते हैं। सिंधिया ने कहा कि भारत किसी भी क्षेत्र में एकाधिकार की अनुमति नहीं देता। हमारा काम हर ग्राहक को सेवाओं के व्यापक विकल्प उपलब्ध कराना है। खुले बाजार में ग्राहक को यह चयन करना होगा कि वह कौन-सी सेवा पसंद करता है और उन विकल्पों में से किस कंपनी की सेवा लेना चाहता है। सिंधिया ने कहा कि मस्क की स्टारलिंक, रिलायंस जियो की उपग्रह सेवा इकाई जियो सैटकॉम और भारती समर्थित यूटेलसैट वनवेब को लाइसेंस मिल चुके हैं। वहीं, अमेजन की कुइपर ने इस क्षेत्र में रुचि दिखाई है और उसे निर्धारित प्रक्रिया से गुजरना होगा। मंत्री ने कहा कि एक खास कंपनी को लेकर काफी चर्चा हो रही है, लेकिन सैटकॉम के लाइसेंस तीन सेवा प्रदाताओं को मिले हैं।
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अमेरिका में भारतीय प्रतिभा का लोहा मानने वाले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने अब उसी प्रतिभा के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं, जिसने अमेरिकी तकनीकी उद्योग को वैश्विक ताकत बनाने में अहम भूमिका निभाई है। एक तरफ ट्रंप भारतीय मूल के माइक्रोसॉफ्ट सीईओ सत्य नडेला की तारीफ करते हैं, तो दूसरी तरफ उपराष्ट्रपति जेडी वांस के नेतृत्व में अमेरिकी प्रशासन माइक्रोसॉफ्ट, टीसीएस, इंफोसिस, विप्रो और कॉग्निजेंट समेत आठ प्रमुख प्रौद्योगिकी कंपनियों को ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया से जुड़े PERM कार्यक्रम से निलंबित कर देता है। इस फैसले से हजारों भारतीय आईटी पेशेवरों के भविष्य और अमेरिका में स्थायी निवास पाने की उम्मीदों पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। हालांकि, भारत सरकार ने इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया में स्पष्ट किया है कि PERM कार्यक्रम और एच-1बी वीजा अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं तथा PERM आवेदनों पर रोक लगने से मौजूदा एच-1बी वीजा या उनके धारकों और आश्रितों की स्थिति अपने आप प्रभावित नहीं होती, भले ही पात्र कर्मचारियों की ग्रीन कार्ड प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है। विदेश मंत्रालय ने यह भी दोटूक कहा है कि प्रतिभाओं की आवाजाही भारत और अमेरिका, दोनों की अर्थव्यवस्थाओं के लिए फायदेमंद है। इससे अमेरिकी कंपनियों को उच्च कौशल वाले पेशेवर, नवाचार, अनुसंधान, उत्पादकता, प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता और रोजगार सृजन में मदद मिलती है। मंत्रालय ने वांस की उन टिप्पणियों पर भी आपत्ति जताई है, जिनमें विदेशी कर्मचारियों के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया गया। भारत ने कहा कि अमेरिका में भारतीय पेशेवर उच्च शिक्षित और कुशल योगदानकर्ता हैं तथा उन्हें औपनिवेशिक इतिहास की पीड़ादायक याद दिलाने वाली भाषा से संबोधित करना गहरे तौर पर आपत्तिजनक है। देखा जाये तो भारत का यह बयान महज औपचारिक कूटनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि वाशिंगटन के लिए स्पष्ट संदेश है कि भारतीय प्रतिभा को अपमानित करके और उसके अवसर सीमित करके दोनों देशों की साझा महत्वाकांक्षाओं को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। अब बड़ा सवाल यह है कि ट्रंप प्रशासन का यह कदम अमेरिकी रोजगार की सुरक्षा तक सीमित है या इसके पीछे चुनावी राजनीति, भारत पर आर्थिक दबाव और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ संबंधों के समीकरण भी काम कर रहे हैं? उल्लेखनीय है कि उपराष्ट्रपति जेडी वांस, श्रम सचिव कीथ सॉन्डरलिंग और अटॉर्नी जनरल टॉड ब्लांश ने अमेरिकी एंटी-फ्रॉड टास्क फोर्स पहल के तहत आठ प्रौद्योगिकी कंपनियों को PERM कार्यक्रम से निलंबित करने की घोषणा की। इनमें माइक्रोसॉफ्ट, एडोबी, टीसीएस, इंफोसिस, विप्रो, एचसीएल टेक्नोलॉजीज, कॉग्निजेंट और कैपजेमिनी शामिल हैं। प्रशासन का आरोप है कि कुछ कंपनियों ने विदेशी कर्मचारियों की भर्ती के लिए ऐसी व्यवस्था का इस्तेमाल किया, जिससे अमेरिकी कामगारों के रोजगार और वेतन पर प्रतिकूल असर पड़ा। अब सवाल उठता है कि आखिर PERM है क्या और इस पर रोक से भारतीयों को कितना नुकसान होगा? हम आपको बता दें कि PERM यानी Permanent Labor Certification रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड हासिल करने की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण है। सामान्यतः नियोक्ता को अमेरिकी श्रम विभाग से प्रमाणित कराना होता है कि संबंधित पद के लिए पर्याप्त इच्छुक और योग्य अमेरिकी कर्मचारी उपलब्ध नहीं हैं और विदेशी कर्मचारी की नियुक्ति से अमेरिकी कर्मचारियों के वेतन तथा कामकाजी परिस्थितियों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसके बाद ही नियोक्ता विदेशी कर्मचारी के रोजगार आधारित स्थायी निवास की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकता है। इस कार्यक्रम से आठ कंपनियों को बाहर करने का मतलब यह है कि वे नई PERM अर्जियां दाखिल नहीं कर पाएंगी और उनकी लंबित अर्जियों पर भी प्रक्रिया रुक जाएगी। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि इन कंपनियों में काम कर रहे सभी भारतीयों के एच-1बी वीजा रद्द हो गए हैं या उन्हें तत्काल अमेरिका छोड़ना पड़ेगा। असली खतरा उन कर्मचारियों के लिए है जो छह साल की सामान्य एच-1बी अवधि के करीब पहुंच रहे हैं और अमेरिका में लंबे समय तक बने रहने के लिए ग्रीन कार्ड प्रक्रिया पर निर्भर हैं। कुछ परिस्थितियों में ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया के निर्धारित चरण पूरे होने पर एच-1बी अवधि बढ़ाई जा सकती है। PERM प्रक्रिया रुकने से ऐसे कर्मचारियों के लिए भविष्य की योजना बनाना कहीं अधिक मुश्किल हो सकता है। देखा जाये तो अमेरिकी प्रशासन की इस कार्रवाई ने भारतीय आईटी उद्योग से लेकर अमेरिका में पढ़ाई और नौकरी करने का सपना देखने वाले युवाओं तक अनिश्चितता बढ़ा दी है। जेडी वांस ने माइक्रोसॉफ्ट पर सबसे तीखा हमला करते हुए आरोप लगाया कि कंपनी ने 2025 में करीब 6,000 अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी की, लेकिन साथ ही 6,000 से अधिक एच-1बी वीजा की मंजूरी हासिल की और 3,600 से अधिक PERM आवेदन भी दाखिल किए। उन्होंने विदेशी कर्मचारियों को 'फॉरेन इंडेंचर्ड सर्वेंट्स' और ऐसी कंपनियों को 'वीजा मिल्स' तक कह दिया। श्रम सचिव सॉन्डरलिंग का दावा है कि केवल इन कंपनियों ने 2009 से लगभग 30 लाख विदेशी कर्मचारियों के लिए अनुरोध किए, 2.30 लाख से अधिक एच-1बी वीजा मंजूर कराए और एक लाख से अधिक PERM प्रमाणन हासिल किए। प्रशासन इन आंकड़ों को अमेरिकी कामगारों के अवसर छिनने से जोड़ रहा है। लेकिन आवेदन, मंजूरी, वास्तविक नियुक्ति और अमेरिकी कर्मचारी की जगह विदेशी कर्मचारी रखे जाने के आंकड़े अलग-अलग हैं। माइक्रोसॉफ्ट का पक्ष भी इस बहस में महत्वपूर्ण है। कंपनी ने कहा है कि उसके करीब 6,000 एच-1बी आवेदनों में लगभग 80 प्रतिशत मौजूदा कर्मचारियों के वीजा विस्तार या उनकी स्थिति बदलने से संबंधित थे। इसका अर्थ है कि सभी आवेदनों को नई विदेशी भर्तियों के रूप में नहीं देखा जा सकता। साथ ही नेशनल ऑर्गनाइजेशन फॉर सॉफ्टवेयर एंड टेक्नोलॉजी प्रोफेशनल्स के संस्थापक राजीव दाभाडकर की व्याख्या इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू सामने लाती है। उनके मुताबिक, अमेरिकी प्रशासन अब केवल यह नहीं पूछ रहा कि विदेशी कर्मचारी योग्य है या नहीं, बल्कि यह भी जांच रहा है कि विदेशी श्रम की भर्ती, भुगतान और आपूर्ति का कारोबारी मॉडल किस तरह काम करता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी तकनीकी पद के लिए अमेरिकी कंपनी एक लाख पचास हजार डॉलर खर्च करती है और कोई मध्यस्थ विदेशी कर्मचारी को उसकी वास्तविक आर्थिक कीमत से काफी कम भुगतान करके अंतर अपने मुनाफे के रूप में रखता है, तो सवाल भारतीय कर्मचारी बनाम अमेरिकी कर्मचारी का नहीं, बल्कि पारदर्शी वेतन बनाम श्रम लागत के अनुचित लाभ का बनता है। यह जांच का वैध विषय हो सकता है, लेकिन इसका इस्तेमाल सभी भारतीय पेशेवरों को संदेह के घेरे में रखने के लिए नहीं होना चाहिए। अब सवाल उठता है कि ट्रंप ने सत्य नडेला की तारीफ क्यों की और वांस ने माइक्रोसॉफ्ट पर इतना सख्त रुख क्यों अपनाया? इसका उत्तर अमेरिकी राजनीति की दो प्राथमिकताओं में है। ट्रंप को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड कंप्यूटिंग और तकनीकी निवेश में अमेरिकी नेतृत्व मजबूत करना है। माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनी इस लक्ष्य में महत्वपूर्ण है। दूसरी ओर, वांस और रिपब्लिकन राजनीति का एक प्रमुख संदेश अमेरिकी नागरिकों को प्राथमिकता देना और विदेशी श्रमिकों पर निर्भरता घटाना है। किसी कंपनी के सीईओ की उपलब्धियों की प्रशंसा करना और उसी कंपनी की श्रम नीतियों की जांच करना प्रशासन के लिए विरोधाभासी नहीं है। लेकिन यदि नियमों का इस्तेमाल चुनिंदा कंपनियों को दबाने या राजनीतिक संदेश देने के लिए किया जाता है, तो निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। इस कार्रवाई का चुनावी पहलू भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 3 नवंबर 2026 को होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों से पहले अमेरिकी कामगारों की नौकरियों की रक्षा करने का संदेश रिपब्लिकन पार्टी के लिए राजनीतिक रूप से उपयोगी है। ट्रंप प्रशासन विदेशी श्रम के खिलाफ सख्त रुख दिखाकर अपने मतदाताओं को यह भरोसा देना चाहता है कि वह अमेरिकी रोजगार को प्राथमिकता दे रहा है। इसके साथ ही यह भी माना जा रहा है कि अपने तेवर कड़े दिखाकर जेडी वांस अगला राष्ट्रपति चुनाव लड़ने की तैयारी भी कर रहे हैं। साथ ही भारतीय छात्रों के लिए भी स्थिति चिंताजनक है। पढ़ाई पूरी करने के बाद अमेरिका में काम करने का अवसर देने वाला OPT कार्यक्रम और एच-1बी वीजा व्यवस्था दोनों राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं। अंतरराष्ट्रीय छात्रों से संबंधित OPT प्रस्ताव में पहली बार कार्यक्रम में शामिल होने वाले प्रत्येक छात्र के लिए संस्थानों पर 70,000 डॉलर और नवीनीकरण पर 30,000 डॉलर शुल्क लगाने की बात सामने आई है। यदि यह प्रस्ताव लागू होता है, तो विश्वविद्यालयों और नियोक्ताओं पर लागत बढ़ेगी, जिसका बोझ छात्रों पर भी पड़ सकता है। इसके अलावा, नए एच-1बी आवेदनों से संबंधित 1,00,000 डॉलर भुगतान की शर्त को लेकर भी विवाद है। इस शुल्क की लागू करने की प्रक्रिया संघीय अदालतों के आदेशों से फिलहाल बाधित है और मुकदमे जारी हैं। माना जा रहा है कि भारतीय आईटी कंपनियों के शुरुआती और मध्यम स्तर के इंजीनियरों पर दबाव अधिक पड़ सकता है। वरिष्ठ इंजीनियरों और बड़ी अमेरिकी तकनीकी कंपनियों में स्थापित पदों पर काम करने वाले कुछ पेशेवर अपेक्षाकृत सुरक्षित हो सकते हैं, लेकिन भारतीय कंसल्टिंग कंपनियों के माध्यम से अमेरिका जाने वाले युवाओं के लिए रास्ता कठिन होता जा रहा है। PERM पर रोक, एच-1बी संबंधी शुल्क विवाद और चयन प्रक्रिया में बदलाव मिलकर उस व्यवस्था को कमजोर कर सकते हैं जिसके सहारे पिछले तीन दशकों में बड़ी संख्या में भारतीय इंजीनियर अमेरिकी तकनीकी उद्योग तक पहुंचे। यहां एक सवाल यह भी उठता है कि क्या ट्रंप यह सब इसलिए कर रहे हैं कि भारत पर लगाए गए टैरिफ का अपेक्षित असर नहीं हुआ और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर दबाव बनाने के लिए नया रास्ता अपनाया जा रहा है? देखा जाये तो इन कंपनियों में भारतीय आईटी उद्योग की प्रमुख हिस्सेदारी और प्रभावित पेशेवरों में भारतीयों की बड़ी संख्या के कारण भारत पर असर गंभीर हो सकता है। फिर भी प्रशासन का घोषित आधार अमेरिकी श्रम बाजार और आव्रजन व्यवस्था है। देखा जाए तो ट्रंप प्रशासन की इस कार्रवाई का असर वीजा और ग्रीन कार्ड तक सीमित रहने वाला नहीं है, बल्कि यह भारत-अमेरिका आर्थिक साझेदारी की बुनियाद को भी चुनौती दे सकता है। जिन भारतीय कंपनियों और पेशेवरों ने अमेरिकी तकनीकी उद्योग को अपनी मेहनत, विशेषज्ञता और नवाचार से मजबूत किया, आज उन्हीं के रास्ते में नए अवरोध खड़े किए जा रहे हैं। भारतीय कंपनियों को अमेरिकी बाजार में भर्ती, परियोजनाओं के संचालन और प्रतिभाशाली कर्मचारियों को बनाए रखने की रणनीति बदलने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। लेकिन अमेरिका को भी समझना होगा कि भारतीय प्रतिभा के लिए दरवाजे संकरे करके वह अपनी ही तकनीकी ताकत और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को नुकसान पहुंचाने का जोखिम उठा रहा है। भारत को इस दबाव के आगे झुकने के बजाय वाशिंगटन से दोटूक कहना चाहिए कि भारतीय कंपनियों और पेशेवरों के साथ किसी भी तरह का भेदभाव स्वीकार नहीं किया जाएगा। साथ ही, भारत को अपनी तकनीकी क्षमता, अनुसंधान और उच्च कौशल वाले रोजगार में इतना निवेश करना होगा कि भारतीय प्रतिभा के भविष्य का फैसला केवल अमेरिकी नीतियां न करें। बहरहाल, ट्रंप की नीति भारत के लिए महज एक चेतावनी नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर तकनीकी शक्ति बनने की दिशा में निर्णायक कदम उठाने का संकेत है। अमेरिका एक ओर भारतीय मूल के तकनीकी दिग्गजों की सफलता का गुणगान करता है और दूसरी ओर भारतीय पेशेवरों के लिए अवसर सीमित करने वाली नीतियां अपनाता है। यह दोहरा रवैया उस साझेदारी पर सवाल खड़ा करता है, जिसे दोनों देश लोकतांत्रिक मूल्यों, आर्थिक सहयोग और साझा रणनीतिक हितों पर आधारित बताते हैं। भारत को अमेरिका से संबंध तोड़ने की जरूरत नहीं, लेकिन यह भी स्वीकार नहीं किया जा सकता कि भारतीय इंजीनियरों का भविष्य अमेरिकी घरेलू राजनीति और चुनावी लाभ-हानि का मोहरा बन जाए। अब वक्त है कि भारत अपनी प्रतिभा, तकनीकी क्षमता और विशाल बाजार की ताकत को कूटनीतिक आत्मविश्वास में बदले और स्पष्ट संदेश दे कि भारत अमेरिका के साथ साझेदारी चाहता है, किसी की राजनीतिक मजबूरियों की कीमत पर अपने नागरिकों और कंपनियों के हितों से समझौता नहीं होगा। -नीरज कुमार दुबे
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एमपीएससी छात्रों के आंदोलन की आड़ में विपक्ष अपना करियर चमका रहा है : मनीषा कायंदे
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति और भारत की कनेक्टिविटी रणनीति का असर अब साफ दिखाई देने लगा है। भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा यानी IMEC को लेकर दुनिया के कई देश भारत के साथ जुड़ने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। मिस्र, लेबनान और ओमान ने IMEC के साथ काम करने की इच्छा जताई है, जबकि ग्रीस और साइप्रस इसके पूर्ण सदस्य बनने के इच्छुक हैं। यानी 2023 में भारत की पहल से शुरू हुआ यह गलियारा अब धीरे-धीरे अपना दायरा बढ़ा रहा है और बदलते वैश्विक हालात में भारत की रणनीतिक ताकत का बड़ा केंद्र बनता जा रहा है। फ्रांस के राष्ट्रपति के IMEC विशेष दूत जेरार्ड मेस्त्राले ने नई दिल्ली में साफ कहा है कि IMEC के विस्तार पर फैसला मौजूदा आठ हस्ताक्षरकर्ता सरकारें ही करेंगी। उल्लेखनीय है कि भारत, अमेरिका, सऊदी अरब, यूएई, फ्रांस, जर्मनी, इटली और यूरोपीय संघ इसके मौजूदा हस्ताक्षरकर्ता हैं। वर्ष 2023 में G20 शिखर सम्मेलन के दौरान सामने आया यह प्रोजेक्ट भारत को अरब प्रायद्वीप के रास्ते यूरोप से जोड़ने के लिए समुद्री मार्ग, रेल नेटवर्क, ऊर्जा ढांचे और डिजिटल कनेक्टिविटी को एक साथ जोड़ने की परिकल्पना करता है। सबसे अहम बात यह है कि इस साल के अंत तक IMEC की पहली मंत्रीस्तरीय बैठक होने की उम्मीद है। अब तक इसकी गतिविधियां मुख्यतः स्टीयरिंग कमेटी के स्तर तक सीमित रही हैं। मंत्रीस्तरीय बैठक न केवल परियोजना को राजनीतिक गति दे सकती है, बल्कि इसके भौगोलिक दायरे और सदस्यता विस्तार पर भी बड़ा फैसला संभव है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि जॉर्डन और इजरायल मूल समझौते में उल्लिखित थे, हालांकि वे आठ हस्ताक्षरकर्ताओं में शामिल नहीं हैं। युद्ध ने बदली IMEC की तस्वीर देखा जाये तो पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और तनाव ने IMEC के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है, लेकिन साथ ही इसकी जरूरत भी पहले से कहीं ज्यादा बढ़ा दी है। होर्मुज और बाब-अल-मंदेब जैसे अहम समुद्री रास्तों पर बढ़ते खतरे ने यह साफ कर दिया है कि IMEC को किसी एक संवेदनशील मार्ग पर निर्भर नहीं रहना होगा। सवाल यही है कि जिस कॉरिडोर का मकसद सुरक्षित और वैकल्पिक व्यापार मार्ग देना है, अगर वही कुछ जोखिम भरे रास्तों पर निर्भर रहा तो वह कितना भरोसेमंद साबित होगा? यही कारण है कि 2026 का IMEC, 2023 के IMEC से बिल्कुल अलग दिखाई दे रहा है। अब इसे एक सीधी लाइन वाले कॉरिडोर के बजाय 'नेटवर्क ऑफ कॉरिडोर्स' के रूप में देखने की जरूरत महसूस की जा रही है। अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहयोग और विकास संगठन की मैरी-एस्टेल रे के अनुसार बदलते हालात ने मूल कॉरिडोर की संरचना बदल दी है और अब व्यापारियों के लिए कई वैकल्पिक मार्गों और विकल्पों की जरूरत है। साथ ही इस बदलाव में ओमान की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई है। ओमान अरब प्रायद्वीप के लिए एक वैकल्पिक प्रवेश द्वार बन सकता है और उसके बंदरगाह होर्मुज तथा बाब-अल-मंदेब के जोखिम से बचने वाली व्यवस्था में अहम भूमिका निभा सकते हैं। सोहर और यूएई के फुजैराह के बीच प्रस्तावित रेल संपर्क इसी नई रणनीतिक सोच की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। 'लाइन' नहीं, ऐसा नेटवर्क जिसे दुश्मन तोड़ न सके विशेषज्ञों का मानना है कि एक ही मार्ग पर निर्भर रहने वाला कॉरिडोर युद्ध या भू-राजनीतिक संकट में आसानी से बाधित हो सकता है। इसके विपरीत कई बंदरगाहों, रेल मार्गों और समुद्री विकल्पों वाला नेटवर्क संकट के दौरान अपना रास्ता बदल सकता है। यही IMEC की नई रणनीतिक दिशा बन सकती है। फुजैराह जैसे होर्मुज के बाहर स्थित बंदरगाहों को मजबूत करना, ओमान के सोहर और सलालाह जैसे विकल्पों को जोड़ना तथा मिस्र और अन्य संभावित मार्गों को नेटवर्क में शामिल करना इस परियोजना को ज्यादा प्रभावी बना सकता है। देखा जाये तो इसका अर्थ केवल IMEC की सीमा बढ़ाना नहीं, बल्कि उसकी पूरी भौगोलिक संरचना को फिर से डिजाइन करना है। भारत के हाथ में डिजिटल कमान भी साथ ही भारत केवल भौतिक कनेक्टिविटी पर निर्भर नहीं है। पूर्व बंदरगाह सचिव राजेश कुमार सिन्हा के मुताबिक IMEC की लॉजिस्टिक प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल बनाना आवश्यक है। भारत ने यूएई के साथ मिलकर MAITRI (Master Application for International Trade and Regulatory Interface) विकसित किया है, जो मई में लाइव हुआ। यह डिजिटल ढांचा आगे IMEC के दूसरे हिस्सों में भी दोहराया जा सकता है। IMEC का लक्ष्य सिर्फ सामान पहुंचाना नहीं, बल्कि तेज, सस्ता और सुरक्षित व्यापार तंत्र तैयार करना है। मूल परिकल्पना के अनुसार इससे ट्रांजिट समय में 40 प्रतिशत तक और लॉजिस्टिक लागत में करीब 30 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है। इसके साथ ग्रीन हाइड्रोजन, स्वच्छ ऊर्जा और सुरक्षित डिजिटल कनेक्टिविटी भी इस परियोजना के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। चीन के सामने भारत का रणनीतिक दांव इसके अलावा, IMEC का महत्व केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। यह चीन की Belt and Road Initiative के सामने एक वैकल्पिक वैश्विक कनेक्टिविटी मॉडल भी प्रस्तुत करता है। साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया समर्थन ने इस परियोजना को फिर राजनीतिक ऊर्जा दी है। हालांकि अमेरिकी समर्थन का वित्तीय समर्थन में बदलना अभी निश्चित नहीं माना जा रहा। साथ ही भारत के लिए इसका सामरिक अर्थ और भी बड़ा है। यदि IMEC बहु-मार्गीय नेटवर्क में बदलता है, तो भारत पश्चिम एशिया और यूरोप के बीच व्यापार, ऊर्जा, डिजिटल कनेक्टिविटी और लॉजिस्टिक्स का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है। इसके अलावा, यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को भी मजबूत करेगा। यानी भारत किसी एक शक्ति या किसी एक व्यापारिक मार्ग पर निर्भर हुए बिना कई देशों और कई कॉरिडोरों के साथ समानांतर साझेदारी आगे बढ़ा सकेगा। भारत पहले ही IMEC के साथ-साथ International North-South Transport Corridor और Eastern Maritime Corridor जैसे अन्य संपर्क मार्गों पर काम कर रहा है। यही व्यापक रणनीति भारत को केवल IMEC का हिस्सा नहीं, बल्कि भविष्य के वैश्विक कनेक्टिविटी नेटवर्क का केंद्रीय खिलाड़ी बना सकती है। असली चुनौती: कॉरिडोर को जमीन पर उतारना हालांकि तस्वीर पूरी तरह आसान नहीं है। कई रेल लिंक, बंदरगाह और कनेक्टिविटी परियोजनाएं अभी विकास के दौर में हैं। युद्ध जोखिम, बीमा लागत, पूंजी की लागत और क्षेत्रीय अस्थिरता IMEC को व्यावसायिक रूप से चुनौतीपूर्ण बनाती है। भारत के सामने निर्यात के लिए पर्याप्त कार्गो उपलब्ध कराने की चुनौती भी है। इसके लिए मजबूत प्रशासनिक ढांचे की जरूरत होगी। जैसे कि एक साझा कानूनी या संस्थागत व्यवस्था, बेहतर डिजिटल एकीकरण, देशों के बीच समन्वय और व्यापारियों तथा निजी क्षेत्र की सक्रिय भागीदारी। बहरहाल, पश्चिम एशिया के संकट ने IMEC की जरूरत को कम नहीं किया, बल्कि इसे और बढ़ा दिया है। अब कोशिश इसे एक ही रास्ते तक सीमित रखने की नहीं, बल्कि ऐसे मजबूत नेटवर्क में बदलने की है, जिसमें किसी एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग के बंद होने पर भी व्यापार जारी रह सके। इस पूरी रणनीति में भारत की भूमिका बेहद अहम है। भारत अब केवल दूसरे देशों तक पहुंचने वाले रास्ते का हिस्सा नहीं बनना चाहता, बल्कि ऐसे नए रास्ते तैयार करने में प्रमुख भूमिका निभा रहा है, जो आने वाले समय में वैश्विक व्यापार की दिशा तय कर सकते हैं। -नीरज कुमार दुबे
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भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने छात्र आंदोलनों, नई शिक्षा नीति और CEC ज्ञानेश कुमार को लेकर जारी विवाद पर अपनी राय रखी। उन्होंने लोकतंत्र में निष्पक्ष चुनाव और पारदर्शिता को जरूरी बताया।
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अचूक, अभेद्य और सटीक भारतीय वायु सेना: गर्व के साथ सफलता की ऊंचाइयों को छूते हुए
भारतीय वायु सेना (आई. ए. एफ.) आज (8 अक्टूबर, 2026) अपनी 94वीं वर्षगांठ मना रही है। यह दिन हवाई सुरक्षा, रणनीतिक प्रतिरोध और मानवीय सेवा के लगभग एक सदी के सफल सफर को दर्शाता है। इसे भी पढ़ें: IAF प्रमुख Amar Preet Singh ने 'ऑपरेशन सिंदूर' को किया याद! कहा- दुनिया ने देखी भारत की 'विध्वंसक ताकत', वायु सेना हर चुनौती के लिए पूरी तरह तैयार भारतीय वायु सेना दिवस क्यों मनाया जाता है भारतीय वायु सेना दिवस हर साल 8 अक्टूबर को मनाया जाता है, जो 1932 में हमारी वायु सेना की आधिकारिक स्थापना की याद दिलाता है। ब्रिटिश शासन के दौरान 'रॉयल इंडियन एयर फ़ोर्स' के रूप में स्थापित, वायु सेना ने 1950 में अपने नाम से रॉयल शब्द हटा दिया। यह दिन उन वायु योद्धाओं (सेवानिवृत्त एवं सेवारत) के साहस, पेशेवर रवैये और बलिदान का सम्मान करता है, जो शांति और संघर्ष के समय भारत के हवाई क्षेत्र, सीमाओं और नागरिकों की रक्षा करते हैं। भारतीय वायु सेना दिवस समारोह की खास बातें भारतीय वायु सेना दिवस समारोह भव्यता, सटीकता और टेक्नोलॉजी के प्रदर्शन के लिए जाने जाते हैं। सालाना एयर डिस्प्ले और फ्लाईपास्ट में फाइटर जेट, ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और हेलीकॉप्टर के तालमेल वाले हवाई करतब शामिल होते हैं। एयर-वॉरियर परेड में पुरुष और महिला दोनों तरह के कर्मियों का सटीक तालमेल वाला मार्च होता है, जो अनुशासन और मिलिट्री अंदाज़ को दिखाता है। फ्लाई-पास्ट कार्यक्रम को आम जनता तक पहुँचाने के लिए हर साल जगहें बदली जाती हैं, जैसे हिंडन एयर फ़ोर्स बेस, चंडीगढ़ और प्रयागराज। इस साल वाराणसी में 22, 23 और 25 अक्टूबर को फ्लाई-पास्ट डिस्प्ले होगा। थीम-बेस्ड कैंपेन में प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) और रक्षा मंत्रालय की तरफ़ से ऑफिशियल प्रमोशनल रिलीज़ शामिल हैं, जिनमें डायनामिक वीडियो कंटेंट होता है, जैसे 2026 का कैंपेन जिसकी थीम है, इंडियन एयर फ़ोर्स: अचूक, अभेद्य और सटीक। भारतीय वायु सेना की मुख्य बातें 2022 से लगातार पांचवें साल, भारतीय वायु सेना दुनिया भर में अमेरिका और रूस के बाद तीसरे स्थान पर है। यह युद्ध में खुद को साबित कर चुकी और अनुभवी सेना है। साथ ही, यह इस क्षेत्र की एकमात्र ऐसी वायु सेना है जो लगातार युद्ध अभियानों में शामिल रही है। 2019 में बालाकोट, 2020 से 2025 तक लद्दाख एल ए सी गतिरोध और मई 2025 में 'ऑपरेशन सिंदूर' जैसे अभियानों ने भारतीय वायु सेना की लंबी दूरी तक हमला करने और हवाई सुरक्षा की क्षमताओं को दिखाया है। ऑपरेशन का अनुभव इसकी एक बड़ी ताकत है। भारतीय वायु सेना 250 से ज़्यादा एसयू-30एम के आई एयर-डोमिनेंस फाइटर जेट्स का संचालन करती है। इन्हें एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे रडार और अस्त्र मार्क2 मिसाइलों के साथ 'सुपर सुखोई' मानकों के अनुसार अपग्रेड किया जा रहा है। राफेल 4.5-जेनरेशन फाइटर जेट्स, जो मीटियोर और स्कैल्प मिसाइलों और एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट से लैस हैं, 'ऑपरेशन सिंदूर' में बहुत असरदार साबित हुए। जल्द ही राफेल का एक नया वेरिएंट आने की उम्मीद है। तेजस मार्क-1, अपग्रेडेड मिग-29यूपीजी, मिराज-2000 और जगुआर फाइटर जेट्स जैसे अन्य प्लेटफॉर्म भी अलग-अलग तरह की ऑपरेशनल क्षमताएं प्रदान करते हैं। लेह (10,700 फीट की ऊंचाई) से लेकर कार निकोबार जैसी जगहों से काम करने की भारतीय वायु सेना की क्षमता इसे क्षेत्र की एकमात्र ऐसी वायु सेना बनाती है जो लगातार ऊंचाई वाले इलाकों में ऑपरेशन करने में सक्षम है। भारतीय वायु सेना एस-400 और आकाश सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम के साथ आईएसीसीएस और एएफनेट का इस्तेमाल करके असरदार इंटीग्रेटेड नेट-सेंट्रिक ऑपरेशन करती है। ये प्लेटफ़ॉर्म एक यूनिफाइड नेटवर्क के तौर पर काम करते हैं। एयर वॉरियर्स ने टेक्नोलॉजी-बेस्ड ऑपरेशन के तरीके को सफलतापूर्वक अपना लिया है। भारतीय वायु सेना का ट्रेनिंग का तरीका सबसे अच्छे तरीकों में से एक है और भारतीय वायु सेना के पायलटों ने कई इंटरनेशनल एक्सरसाइज़ जीती हैं। 'आत्मनिर्भर भारत' पहल और देश में ही मॉडर्नाइज़ेशन पर ध्यान देने के अच्छे नतीजे मिल रहे हैं। भारतीय वायु सेना ने 180 तेजस मार्क -1ए एयरक्राफ्ट का ऑर्डर दिया है और आमका (ए एम सी ए), फिफ्थ-जेनरेशन फाइटर, कैटस् टीमिंग ड्रोन और स्वदेशी अस्त्र बी वी आर मिसाइल को मंज़ूरी दी है। ये कदम आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देते हैं, साथ ही बदलाव के दौर में क्षमता की कमियों को दूर करने के लिए लगातार कोशिशें ज़रूरी हैं। इंडियन एयर फ़ोर्स की उपलब्धियाँ कई दशकों के इतिहास में, भारतीय वायु सेना बाइप्लेन के एक छोटे से बेड़े से बढ़कर दुनिया की टॉप पाँच सबसे ताकतवर एयर फ़ोर्स में से एक बन गई है। इसकी मुख्य उपलब्धियों में शामिल हैं: युद्ध के समय बहादुरी: बड़े मिलिट्री ऑपरेशन्स में अहम भूमिका, जिसमें दूसरा विश्व युद्ध; 1948, 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान संघर्ष; 1999 का कारगिल युद्ध शामिल हैं। और 2019 के बालाकोट ऑपरेशन जैसे सटीक क्रॉस-बॉर्डर हमले। सेना का आधुनिकीकरण और स्वदेशी इनोवेशन: पुराने आयातित विमानों से हटकर राफेल और एसयू-30एम के आई जैसे एडवांस्ड मल्टी-रोल फाइटर जेट, तेजस जैसे स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान, सी-17 ग्लोबमास्टर और सी-295 जैसे आधुनिक भारी-भरकम सामान ढोने वाले विमान, और स्वार्म ड्रोन व ड्रोनाथॉन जैसी नई तकनीकों को अपनाना। मानवीय सहायता और आपदा राहत (एच ए डी आर): राष्ट्रीय आपातकाल, बाढ़ और भूकंप के दौरान ज़रूरी बचाव अभियान चलाना, और विदेशों में संघर्ष वाले इलाकों में फँसे नागरिकों और मेडिकल सप्लाई को एयरलिफ्ट करना। आज भारतीय वायु सेना के सामने चुनौतियाँ शानदार क्षमताओं के बावजूद, भारतीय वायु सेना को ऑपरेशन, स्ट्रक्चर और प्लानिंग से जुड़ी अहम चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमानों की संख्या में काफी कमी आ रही है। हालाँकि 42 फाइटर स्क्वाड्रन की मंज़ूरी है, लेकिन अभी संख्या इससे कम है। 2030 के दशक में इनके और कम होने की उम्मीद है क्योंकि मिग-21, मिग-29, जगुआर और मिराज-2000 जैसे पुराने बेड़े तेज़ी से रिटायर हो रहे हैं और उनकी जगह नए विमान उतनी तेज़ी से नहीं आ रहे हैं। यह बढ़ता अंतर भविष्य की तैयारी के लिए सेना के आधुनिकीकरण को बहुत ज़रूरी बनाता है। एयर चीफ मार्शल एयर मार्शल ए.पी. सिंह ने 3 अक्टूबर 2026 को कहा, हमारी संख्या कम है, लेकिन हम कमज़ोर नहीं हैं, जो भारतीय वायु सेना की मौजूदा स्थिति को दर्शाता है। 2021 में ऑर्डर किए गए स्वदेशी तेजस मार्क-1ए का एक स्क्वाड्रन साल के आखिर तक शामिल कर लिया जाएगा। तेजस मार्क-2 की पहली उड़ान सितंबर 2027 तक होने की संभावना है, जबकि आमका (ए एम सी ए) की पहली उड़ान सितंबर 2028 तक होने की उम्मीद है। भारतीय वायु सेना उत्तरी सीमा पर लंबे समय से चल रहे और बहुत अहम सैन्य गतिरोध को संभाल रही है, साथ ही परमाणु हथियार वाले पश्चिमी पड़ोसी के खिलाफ रणनीतिक तैयारी भी बनाए हुए है। इसे भी पढ़ें: Indian Air Force का 94वां स्थापना दिवस, Hindan Air Force Station पर भव्य परेड चीन का सैन्य बुनियादी ढांचे, एयरफील्ड और क्वांटम कंप्यूटिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और स्टील्थ क्षमताओं जैसी अगली पीढ़ी की तकनीकों का तेज़ी से आधुनिकीकरण क्षेत्रीय निर्माण क्षमताओं से कहीं आगे निकल रहा है। इससे प्रभावी 'फोर्स मल्टीप्लायर' (सैन्य क्षमता बढ़ाने वाले साधनों) और लगातार आधुनिकीकरण के ज़रिए सीमित संसाधनों का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल करने की ज़रूरत बढ़ जाती है। इन-फ्लाइट रिफ्यूलर (आई एल-78), एयरबोर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम (अवाक्स), लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल बैटरी और मज़बूत अनमैन्ड एरियल कॉम्बैट सिस्टम (यू ए एस) जैसे अहम 'फोर्स मल्टीप्लायर' की कुल संख्या में अभी भी कमी है, जिससे इन क्षमताओं को बड़े पैमाने पर तैनात करने में सीमाएँ आती हैं। भारतीय वायु सेना की लगातार प्रभावशीलता बनाए रखने के रोडमैप के लिए इन कमियों को दूर करना ज़रूरी है। --- प्रोफेसर (डॉ.) डी. के. पांडेय
नई दिल्ली, 8 अक्टूबर (आईएएनएस)। दवाओं की बिक्री को बढ़ावा देने के लिए फार्मा कंपनियों द्वारा डॉक्टरों को महंगे तोहफे और सुविधाएं देने की प्रथा पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक विशेष कमेटी का गठन करने और उसकी रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने का आदेश दिया है।
भारत में एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स की उपग्रह आधारित इंटरनेट सेवा स्टारलिंक की शुरुआत को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। एलन मस्क ने भारत में अपनी कंपनी की राह में “कुछ प्रभावशाली उद्योगपतियों” के रोड़े अटकाने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि ये कारोबारी भारतीय जनता पर अपना एकाधिकार और नियंत्रण बनाए रखने के लिए स्टारलिंक को भारत में प्रवेश नहीं करने दे रहे हैं। मस्क ने यहां तक कह दिया कि यह “भारत की जनता के खिलाफ अपराध” है। लेकिन मस्क के इस बयान के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत जैसे संप्रभु देश की सुरक्षा और दूरसंचार नीति अब किसी अरबपति के सोशल मीडिया बयान से तय होगी? उधर, भारत सरकार ने मस्क के आरोप को सीधे खारिज कर दिया है। सरकार का कहना है कि भारत में उपग्रह आधारित संचार सेवाओं के लिए बनाए गए नियम निष्पक्ष और किसी भी कंपनी के साथ भेदभाव से मुक्त हैं। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि इन नियमों को किसी कंपनी के खिलाफ भेदभावपूर्ण बताना पूरी तरह बेबुनियाद और गलत समझ पर आधारित है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत सरकार ने साफ किया है कि स्टारलिंक अकेली कंपनी नहीं है जो मंजूरी की प्रक्रिया में है। सुनील भारती मित्तल समर्थित वनवेब, मुकेश अंबानी की रिलायंस जियो और एलन मस्क की स्टारलिंक, तीनों कंपनियों के मामले में सुरक्षा संबंधी जांच चल रही है। सरकार के मुताबिक तीनों कंपनियां फिलहाल लगभग एक ही नियामकीय चरण में हैं। तो फिर मस्क से पहला सवाल यही पूछा जाना चाहिए कि अगर भारत सरकार तीनों कंपनियों की सुरक्षा जांच कर रही है, तो केवल स्टारलिंक को रोकने का आरोप भारत पर क्यों लगाया जा रहा है? इस विवाद का दूसरा और बेहद अहम पहलू इसके समय से जुड़ा है। एलन मस्क का बयान ऐसे समय आया जब भारत दुनिया के सामने अपनी संचार और डिजिटल जगत की तकनीकी क्षमता का प्रदर्शन करने के लिए तैयार था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंडिया मोबाइल कांग्रेस के दसवें संस्करण का उद्घाटन किया। दुनिया के सौ से अधिक देशों की भागीदारी वाले इस आयोजन में भारत की 5जी तकनीक, डिजिटल संपर्क व्यवस्था, दूरसंचार क्षेत्र की उपलब्धियों और भविष्य की संचार तकनीक को दुनिया के सामने रखा जा रहा है। जब पूरी दुनिया भारत की संचार क्रांति और तकनीकी प्रगति को देखने के लिए जुटी थी, उसी समय स्टारलिंक को लेकर मस्क का तीखा बयान सामने आया। इसलिए सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह महज एक कारोबारी असहमति थी या फिर इस बयान के समय ने भारत की तकनीकी उपलब्धियों से दुनिया का ध्यान हटाकर स्टारलिंक विवाद की तरफ मोड़ दिया? यह सवाल उठेगा ही कि भारत के सबसे बड़े दूरसंचार आयोजनों में से एक के दौरान ही इस तरह का सार्वजनिक आरोप लगाने की जरूरत आखिर एलन मस्क को क्यों पड़ी? अब बात उस मुद्दे की, जिस पर भारत सरकार कोई समझौता नहीं करना चाहती है। वह मुद्दा है राष्ट्रीय सुरक्षा। भारत ने स्टारलिंक को देश में आने से पूरी तरह मना नहीं किया है। कंपनी को भारत में उपग्रह आधारित संचार सेवाएं देने का आवश्यक लाइसेंस मिल चुका है। लेकिन लाइसेंस मिलना सेवा शुरू करने की अंतिम अनुमति नहीं है। इसके बाद सुरक्षा मंजूरी, रेडियो तरंगों के आवंटन और अन्य आवश्यक नियमों का पालन करना पड़ता है। यहीं पर मस्क के आरोप की असली परीक्षा होती है। देखा जाये तो उपग्रह आधारित इंटरनेट सामान्य इंटरनेट सेवा से अलग है। यहां केवल तेज इंटरनेट पहुंचाने का सवाल नहीं है। इसके साथ भारतीय नागरिकों के आंकड़ों की सुरक्षा, आंकड़ों को देश के भीतर रखने, संचार की वैध निगरानी, आपातकालीन परिस्थितियों में सरकारी पहुंच और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर प्रश्न जुड़े हैं। भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि भारतीय उपयोगकर्ताओं का आंकड़ा कहां रखा जाएगा, संचार व्यवस्था पर किसका नियंत्रण होगा और राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों को कानून के तहत आवश्यकता पड़ने पर आवश्यक जानकारी और पहुंच किस प्रकार उपलब्ध होगी? वहीं स्टारलिंक ने भारत की सुरक्षा संबंधी चिंताओं को दूर करने की कोशिश करते हुए दावा किया है कि उसने भारत में लगभग 20 जमीन आधारित केंद्र तैयार किए हैं और भारतीय उपयोगकर्ताओं के आंकड़ों को देश के भीतर रखने के लिए विशेष सुरक्षा व्यवस्था विकसित की है। कंपनी की वरिष्ठ अधिकारी लॉरेन ड्रेयर ने इंडिया मोबाइल कांग्रेस में कहा कि भारत से सभी आवश्यक मंजूरियां मिलने के बाद कंपनी सेवा शुरू करने के लिए तैयार है। लेकिन भारत का रुख बिल्कुल स्पष्ट है, पहले सुरक्षा, उसके बाद सेवा। साथ ही भारत के निष्पक्ष रवैये का एक बड़ा उदाहरण खुद एलन मस्क की दूसरी कंपनी टेस्ला है। भारत ने टेस्ला को देश में कारोबार करने से नहीं रोका। टेस्ला ने मुंबई में अपना पहला शोरूम खोला और भारत में अपनी इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री शुरू की। अगर भारत सरकार वास्तव में मस्क की कंपनियों के खिलाफ होती, तो टेस्ला को भारतीय बाजार में प्रवेश की अनुमति क्यों दी जाती? लेकिन क्या कार बेचने और देश की संचार व्यवस्था का हिस्सा बनने को एक ही तराजू में तौला जा सकता है? बिल्कुल नहीं। कार एक उपभोक्ता वस्तु है, जबकि देश की संचार व्यवस्था सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा, आंकड़ों और रणनीतिक संचार से जुड़ी होती है। इसलिए दोनों क्षेत्रों में सुरक्षा के अलग-अलग मानक होना स्वाभाविक है। यही बात मस्क के आरोपों पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा करती है। अगर भारत स्टारलिंक के साथ भेदभाव कर रहा है, तो वनवेब और रिलायंस जियो भी सुरक्षा जांच की प्रक्रिया से क्यों गुजर रहे हैं? और अगर भारत किसी एक कारोबारी समूह को फायदा पहुंचाना चाहता है, तो फिर मस्क की टेस्ला को भारत में कारोबार करने की अनुमति क्यों दी गई? इसमें कोई दो राय नहीं कि एलन मस्क को भारत के फैसले पर सवाल उठाने का अधिकार है। लेकिन किसी संप्रभु देश की नियामकीय प्रक्रिया पर सवाल उठाने के साथ आरोपों के समर्थन में ठोस प्रमाण देना भी जरूरी है। केवल सोशल मीडिया पर “प्रभावशाली उद्योगपतियों” वाला आरोप लगा देना इस बात का प्रमाण नहीं बन जाता कि भारत की व्यवस्था पक्षपातपूर्ण है। भारत को विदेशी निवेश चाहिए, नई तकनीक चाहिए और दुनिया की बड़ी कंपनियों का स्वागत भी है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि किसी विदेशी कंपनी को राष्ट्रीय सुरक्षा से ऊपर रखा जाए। भारत किसी अरबपति की निजी संपत्ति नहीं है और न ही किसी कारोबारी की सोशल मीडिया टिप्पणी भारत की नीतियां तय कर सकती है। भारत अपने फैसले अपनी संप्रभुता, अपने कानून, अपनी सुरक्षा और अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर करेगा। यही किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र का अधिकार है और यही उसकी जिम्मेदारी भी है। एलन मस्क को यह भी समझना होगा कि भारत की सुरक्षा चिंता को केवल आशंका मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। दुनिया के दूसरे देशों में भी Starlink को लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा और नियंत्रण से जुड़े गंभीर सवाल उठे हैं। ऑस्ट्रेलिया के सरकारी सुरक्षा अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि निजी उपग्रह इंटरनेट कंपनियों पर किसी देश का नियंत्रण सीमित हो सकता है। ऐसे में इन कंपनियों पर जरूरत के मुताबिक निगरानी और नियंत्रण न होने से देश की सुरक्षा और संप्रभुता के लिए खतरा पैदा हो सकता है। यूक्रेन में तो Starlink की भूमिका सीधे युद्ध और सुरक्षा से जुड़ चुकी है। अमेरिकी सरकारी जांच में पाया गया कि Starlink दोहरे उपयोग वाली तकनीक है, जिसका इस्तेमाल नागरिक संचार के साथ-साथ युद्धक्षेत्र में ड्रोन संचालन, तोपों के निशाने और सैन्य संचार के लिए भी हुआ। जांच में यह भी सामने आया कि बड़ी संख्या में Starlink उपकरण ऐसे क्षेत्रों में पहुंच गए थे जहां उनके दुरुपयोग या चोरी का जोखिम था। यही नहीं, 2026 में यूक्रेन ने रूसी ड्रोन के लिए Starlink के अवैध इस्तेमाल को रोकने के उद्देश्य से केवल अधिकृत उपकरणों को सेवा देने की व्यवस्था लागू की। म्यांमार में भी Starlink पर गंभीर आरोप लगे हैं। अंतरराष्ट्रीय जांचों में सामने आया कि मानव तस्करी और साइबर ठगी के लिए चलाए जा रहे कुख्यात ठिकानों में Starlink का इस्तेमाल हो रहा था; एक कार्रवाई में ऐसे ही एक परिसर से 30 Starlink उपकरण जब्त किए गए थे। यहां तक कि अमेरिकी सांसदों ने भी दक्षिण-पूर्व एशिया के इन ठगी केंद्रों में Starlink के इस्तेमाल को लेकर कंपनी से जवाब मांगा है। वैसे इन घटनाओं का अर्थ यह नहीं है कि Starlink स्वयं इन अपराधों में शामिल है, लेकिन ये घटनाएं यह जरूर दिखाती हैं कि इतनी शक्तिशाली और सीमापार काम करने वाली उपग्रह इंटरनेट व्यवस्था के इस्तेमाल पर किसी देश की सरकारें नियंत्रण, निगरानी और राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर इतनी सतर्क क्यों हैं? ऐसे में भारत अगर अपने यहां Starlink को पूरी सुरक्षा जांच और स्पष्ट शर्तों के बाद ही अनुमति देना चाहता है, तो इसमें गलत क्या है? बहरहाल, भारत में कारोबार करने के लिए दुनिया की कंपनियों का स्वागत है, लेकिन भारत की जमीन पर कारोबार करने वाली हर कंपनी को भारत के कानून, भारत के नियम और भारत की सुरक्षा शर्तों का पालन करना ही होगा। भारत तकनीक का स्वागत करेगा, निवेश का स्वागत करेगा और प्रतिस्पर्धा का भी स्वागत करेगा, लेकिन अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा की कीमत पर नहीं। -नीरज कुमार दुबे
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नई दिल्ली, 8 अक्टूबर (आईएएनएस)। दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का गुरुवार सुबह गोवा स्थित उनके आवास पर निधन हो गया। 75 वर्षीय अभिनेता के निधन पर कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों और नेताओं ने शोक व्यक्त किया है। सभी ने ईश्वर से प्रार्थना की कि दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान और शोकाकुल परिजनों व प्रशंसकों को यह दुख सहने की शक्ति प्रदान करें।
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