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आरजी कर केस: सोशल मीडिया अभियान पर पीड़िता की मां की सफाई, बोलीं- हम शामिल नहीं

आरजी कर केस: सोशल मीडिया अभियान पर पीड़िता की मां की सफाई, बोलीं- हम शामिल नहीं

समाचार नामा 26 Oct 2026 8:32 pm

लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन निजी हमले स्वीकार्य नहीं : रोहन गुप्ता

लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन निजी हमले स्वीकार्य नहीं : रोहन गुप्ता

समाचार नामा 26 Oct 2026 8:18 pm

सऊदी में फंसे हज और उमरा यात्रियों को सरकार अपने खर्च पर वापस लाए : नसीम सिद्दीकी

सऊदी में फंसे हज और उमरा यात्रियों को सरकार अपने खर्च पर वापस लाए : नसीम सिद्दीकी

समाचार नामा 26 Oct 2026 7:33 pm

मल्लिकार्जुन खड़गे के बचाव में उतरे प्रियांक खड़गे, बोले- भाजपा चुनिंदा मुद्दों को लेकर राजनीति कर रही है

मल्लिकार्जुन खड़गे के बचाव में उतरे प्रियांक खड़गे, बोले- भाजपा चुनिंदा मुद्दों को लेकर राजनीति कर रही है

समाचार नामा 26 Oct 2026 6:37 pm

तमिलनाडु: कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर 31 अक्टूबर को प्रदर्शन करेगी डीएमके महिला विंग

तमिलनाडु: कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर 31 अक्टूबर को प्रदर्शन करेगी डीएमके महिला विंग

समाचार नामा 26 Oct 2026 6:27 pm

Chai Par Sameeksha: Rahul Gandhi Vietnam Visit और भारत में चल रहे प्रदर्शनों का क्या कनेक्शन है?

प्रभासक्षी के साप्ताहिक कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में इस सप्ताह हमने प्रदर्शनों को लेकर चर्चा की। हमेशा की तरह इस कार्यक्रम में मौजूद रहे प्रभासाक्षी के संपादक नीरज कुमार दुबे। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि 13 देशों में लगातार प्रदर्शनों का दौर है और इन सभी देशों में एक कुछ खास संगठन के लोग ही इन प्रदर्शनों को संचालित कर रहे हैं। नेपाल और बांग्लादेश में इन्हें सफलता मिली जिसके बाद से इनका हौसला बढ़ा हुआ है और यह लगातार उन देशों को टारगेट कर रहे हैं जो तेजी से तरक्की कर रहे हैं। नीरज दुबे ने साफ तौर पर कहा कि ज्यादातर देशों में हमने देखा कि विद्यार्थियों के प्रदर्शन से इस तरह की चीज शुरू होती है जो लगातार अलग-अलग मुद्दों पर बढ़ती जा रही है और फिर सत्ता परिवर्तन होता है। नीरज दुबे ने साफ तौर पर कहा कि जो तार सभी प्रदर्शनों से मिलते हुए नजर आ रहे हैं उस पर मंथन करने की जरूरत है। जिस तरह की कोर्ट में टिप्पणियां की जा रही है, उस पर भी गौर करने की जरूरत है। नीरज दुबे ने यह भी कहा कि इस देश में पहले शुरू हुआ, किस देश में बाद में शुरू हुआ यह चर्चा का विषय नहीं है। चर्चा इस बात पर होनी चाहिए कि यह आंदोलन शुरू कैसे हुए और जहां इस पर गौर करेंगे वही आपको पता चल जाएगा कि आखिर प्रदर्शनकारियों के मकसद क्या है। उन्होंने कहा कि हमारी दिल्ली पुलिस, हमारे सुरक्षा बलों ने धैर्य और संयम रखा जिसका नतीजा हम सब देख रहे हैं। विश्व के कई देशों में आगजनी जैसा माहौल है लेकिन भारत में जोर-जोर से दुर्गा पूजा मनाया गया और अब दिवाली की तैयारी चल रही है। इसे भी पढ़ें: PM Modi पर बयान के बाद देशभर में BJP का विरोध, Rahul Gandhi और Kharge से माफी की मांग की राहुल गांधी पर बोलते हुए नीरज दुबे ने साफ तौर पर कहा कि हाल के दिनों में वह चौथी बार वियतनाम गए हैं। उन्होंने कहा कि निजी जीवन सबका होता है लेकिन जब आप सार्वजनिक जीवन में है और आप नेता प्रतिपक्ष हैं तब आपको देश को बताना चाहिए कि आप कहां जा रहे हैं। आपका मकसद क्या है। उन्होंने कहा कि सरकार के पास बहुत सारी चीजें जानकारी में रहती हैं लेकिन आपकी जानकारी को सरकार सार्वजनिक नहीं कर सकती है। लेकिन आप एलओपी हैं, ऐसे में आपको अगर एक ही देश का दौरा बार-बार करना पड़ रहा है तो आप उसे देशवासियों को बता सकते हैं। नीरज दुबे ने कहा कि जब आपको देश में दुर्गा पूजा उत्सव और विजयदशमी में शामिल होना चाहिए था तब आप विदेश चले गए। इसके अलावा अब जब व्यापारियों के लिए बिजनेस का माहौल आ रहा है तब आप रामलीला मैदान में आंदोलन करने की तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में व्यापारी को नुकसान हो रहा है। इंडिया ब्लॉक के ऑनलाइन मीटिंग कैंसिल होने पर नीरज दुबे ने कहा कि आप दिल्ली में इतने बड़े रैली का कॉल दे चुके हैं लेकिन आप खुद विदेश चले गए। त्यौहार का मौसम है और आप जिन नेताओं पर लोगों को लाने के लिए कह रहे हैं उनके ऊपर भी प्रेशर है और ऐसे में वह लोग कहां से लाएं यह बड़ी चुनौती रहने वाली है। क्योंकि त्योहारों का मौसम है और रैली के लिए लोग इतनी दूर घर छोड़कर कैसे आएंगे। यह बड़ा सवाल है। यही कारण है कि इंडिया ब्लॉक को अपनी ऑनलाइन मीटिंग कैंसिल करनी पड़ी। उत्तर प्रदेश में सीट बंटवारे का पेंच भी फंसा हुआ है। इस पर नीरज दुबे ने साफ तौर पर कहा कि दोनों दल एक दूसरे के साथ लड़ना तो चाहते हैं। लेकिन एक दूसरे को किस तरीके से कमजोर किया जाए इसकी भी कोशिश जारी है।

प्रभासाक्षी 26 Oct 2026 5:37 pm

खड़गे की टिप्पणी पर आर. अशोक का पलटवार, बोले- यह कांग्रेस की हताशा का प्रतीक

खड़गे की टिप्पणी पर आर. अशोक का पलटवार, बोले- यह कांग्रेस की हताशा का प्रतीक

समाचार नामा 26 Oct 2026 4:39 pm

पंजाब में कानून-व्यवस्था ध्वस्त, खुलेआम हो रही हत्याएं और लूटपाट: वीरेंद्र सचदेवा

पंजाब में कानून-व्यवस्था ध्वस्त, खुलेआम हो रही हत्याएं और लूटपाट: वीरेंद्र सचदेवा

समाचार नामा 26 Oct 2026 4:36 pm

ब्रह्माकुमारीज संस्था के 'नशा-मुक्त भारत' अभियान को पूरा समर्थन देगी सरकारः नितिन नवीन

ब्रह्माकुमारीज संस्था के 'नशा-मुक्त भारत' अभियान को पूरा समर्थन देगी सरकारः नितिन नवीन

समाचार नामा 26 Oct 2026 2:27 pm

मल्लिकार्जुन खड़गे को अपने बयान के लिए माफी मांगनी चाहिए : दानिश अंसारी

मल्लिकार्जुन खड़गे को अपने बयान के लिए माफी मांगनी चाहिए : दानिश अंसारी

समाचार नामा 26 Oct 2026 2:23 pm

फारूक अब्दुल्ला पर भाजपा नेता ने बोला हमला, कहा- 'पाकिस्तान से इतना प्रेम है तो वहीं चले जाएं'

फारूक अब्दुल्ला पर भाजपा नेता ने बोला हमला, कहा- 'पाकिस्तान से इतना प्रेम है तो वहीं चले जाएं'

समाचार नामा 26 Oct 2026 2:10 pm

मोदी का नाम लेकर 193 देशों के सामने ट्रंप की बेइज्जती करने वाले ने कैसे ब्राजील में पलट दी बाजी, लैटिन अमेरिका की राजनीति पर क्या पड़ेगा इस जीत का असर?

लैटिन अमेरिका के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश ब्राजील में जहां राष्ट्रपति चुनाव के बेहद कांटे के मुकाबले में मौजूदा राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा ने ऐतिहासिक जीत दर्ज कर ली है। लेकिन इस जीत के साथ ही ब्राजील में एक सियासी बवंडर भी शुरू हो गया है। पूर्व राष्ट्रपति जायर बोलसुनारो के बेटे और विपक्षी उम्मीदवार फ्लेवियो बोलसुनारो ने नतीजों को मानने से साफ इंकार कर दिया है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और चुनाव प्रक्रिया पर सीधे तौर पर धांधली और नियमों से छेड़छाड़ का गंभीर आरोप लगाते हुए चुनावों को रद्द करने की मांग कर दी है। पहले राउंड में पिछड़े फिर पलटीबाजी और अब ऐसी जीत की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की दक्षिणपंथी राजनीति के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया। ब्राजील में 80 साल के लुईस इनासियो लूला दा सिल्वा ने राष्ट्रपति चुनाव जीतकर इतिहास रच दिया। उन्होंने फ्लावियो बोलसनारो को हराकर चौथी बार राष्ट्रपति पद हासिल किया है। लेकिन इस जीत की सबसे बड़ी बात सिर्फ इतनी नहीं कि लूला फिर सत्ता में लौटे हैं। असली कहानी है उनकी चुनावी वापसी। ब्राजील की संप्रभुता और अमेरिका के साथ रिश्तों का भविष्य। क्योंकि लूला खुले तौर पर ट्रंप की कई नीतियों की आलोचना करते रहे हैं। वहीं उनके प्रतिद्वंदी फ्लावियो बालसुनारो दक्षिणपंथी नेता और पूर्व राष्ट्रपति जार बोलसुनारो के बेटे हैं। ऐसे में लूला की जीत को ट्रंप की राजनीति के लिए झटके के तौर पर देखा जा रहा है। लेकिन क्या यह वाकई ट्रंप की हार है? क्या ब्राजील ने अमेरिका को साफ संदेश दे दिया है? कि वो किसी के दबाव में नहीं आएगा और पहले दौर में पीछे रहने के बाद लूला ने आखिर में जो है बाजी कैसे पलट दी। इसने ट्रंप के घमंड और दादागिरी को कैसे चूरचूर कर डाला और लूला का चौथी बार ब्राजील का राष्ट्रपति बनना लैटिन अमेरिका की राजनीति पर कैसा संभावित असर डालने वाला है। कैसे लूला ने सेंकेड राउंड में पलट दी बाजी ब्राजील के राष्ट्रपति चुनाव का पहला दौर लूला के लिए चुनौती लेकर आया था। दक्षिणपंथी सेनेटर फ्लावियो बोलसनारो पहले दौर में आगे रहे जबकि लूला दूसरे स्थान पर थे। ऐसा लग रहा था कि ब्राजील में सत्ता का समीकरण बदल सकता है। लेकिन दूसरे दौर में तस्वीर पलट गई। ब्राजील के सुपीरियर इलेक्टोरल कोर्ट यानी टीएसई की तरफ से जारी आधिकारिक नतीजों के मुताबिक वोटों की गिनती पूरी हो चुकी है। अगर नतीजों के आंकड़ों पर नजर डालें तो सत्ताधारी वर्कर्स पार्टी के नेता लूला डसिलवा को 51.78% वैध वोट मिले हैं। वहीं लिबरल पार्टी के उम्मीदवार फ्लेवियो को 48.23% वोट हासिल हुए हैं। यानी कि जीत और हार का अंतर महज 3.5% का है। यह अंतर दिखाता है कि ब्राजील की जनता वैचारिक रूप से दो फाड़ हो चुकी है और मुकाबला आखिरी वोट तक कितना करीबी था। इस चुनाव की सबसे दिलचस्प बात यह रही कि पहले दौर में लूला दसिलवा पीछे चल रहे थे। 4 अक्टूबर को हुए पहले राउंड के मतदान में फ्लेवियो बोलसनारो 47.03% वोटों के साथ बढ़त बनाए हुए थे। जबकि लूला को 45% 16% वोट मिले थे। उस वक्त ऐसा लग रहा था कि दक्षिणपंथी लहर लूला की सत्ता को उखाड़ फेंकेगी। लेकिन इसके बाद लैटिन अमेरिका में तीन हफ्तों तक चला आक्रामक चुनाव प्रचार। लूला ने अपने मजदूर वर्ग के जनाधार पूर्वोत्तर के गढ़ और आम जनता के बीच जमीन नापी। दूसरे दौर यानी रन ऑफ में शानदार वापसी करते हुए लूला ने बाजी पलट दी। इसे भी पढ़ें: ट्रंप के मुखर आलोचक Lula Da Silva ब्राजील में फिर जीते; 44 लाख वोटों से Flavio Bolsonaro हारे, चुनाव नतीजे रद्द करने की मांग की नतीजों पर प्रतिद्वंद्वी बोलसनारो ने क्या कहा अब बात करते हैं उस विवाद की जिसने ब्राजील को एक बार फिर राजनीतिक अस्थिरता के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। हार के बाद ब्राज़लिया से फ्लेवियो बोलसनारो ने तीखा बयान जारी करते हुए कहा कि जिन परिस्थितियों में यह सब हुआ उसके बाद नतीजों को स्वीकार करना असंभव है। हम कानूनी कारवाई करेंगे और चुनाव को रद्द करने की मांग करेंगे। रविवार की दोपहर क्रिस्टियानो जानी ने मतदान केंद्रों को 2 घंटे अतिरिक्त खुला रखने का आदेश दे दिया। फ्लेवियो बल्सनारो का आरोप है कि जस्टिस जानिन को लूला ने ही सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किया था और वह पहले लूला के निजी वकील रह चुके हैं। एंड वक्त पर वोटिंग का समय बढ़ाकर सुप्रीम कोर्ट ने खेल के नियम बदल दिए जिससे लूला को फायदा पहुंचाया गया है। हालांकि इस पूरे विवाद पर एक पेच यह भी है कि खुद बालसुनारो के कैंप ने भी खराब मौसम के चलते कुछ राज्यों में समय बढ़ाने की मांग की थी। इलेक्ट्रोरल कोर्ट के चीफ कांसियो नून्स मारकेस ने दोनों उम्मीदवारों से बात की और लूला की जीत की औपचारिक पुष्टि कर दी। दिलचस्प बात यह भी है कि मार्केस को पूर्व राष्ट्रपति जायर व्सेसारो के कार्यकाल में नियुक्त किया गया था। मार्केस ने साफ किया कि आखिरी पलों में समय बढ़ाने के फैसले से काउंटिंग पर असर जरूर पड़ा है। लेकिन अंतिम नतीजों में कोई बाहरी दखल नहीं था और चुनाव निष्पक्ष रहा है। लेकिन दुनिया की चिंताएं इसलिए बढ़ गई है क्योंकि यह पूरा घटनाक्रम साल 2022 के चुनाव की याद दिलाता है। उस समय जाहिर बोलसुनारो ने भी लूला से मिली करीबी हार को स्वीकार नहीं किया था। जिसके बाद उनके समर्थकों ने संसद और सरकारी इमारतों पर धावा बोल दिया था। इसे भी पढ़ें: ''White House ऐसा लगता है जैसे Saddam Hussein ने Cheesecake Factory खोल ली हो'', Obama के तंज पर बुरी तरह भड़के Trump लूला की वापसी और वाशिंगटन के लिए संदेश यह जीत 80 वर्षीय लूला की एक और राजनीतिक वापसी है। उन्हें 2018 से 2019 के बीच भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल हुई थी, लेकिन बाद में ये आरोप खारिज कर दिए गए। 2022 में जायर बोल्सोनारो को हराकर वे फिर से सत्ता में लौटे। लूला की यह जीत ऐसे समय में हुई है, जब लैटिन अमेरिका के कुछ हिस्सों में दक्षिणपंथी सरकारों की ओर झुकाव बढ़ रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान, उन्होंने बोल्सोनारो के खेमे पर ब्राजील की संप्रभुता के लिए खतरा पैदा करने का आरोप लगाया। साथ ही, उन्होंने ऐसी नीतियों के खिलाफ चेतावनी दी जो सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों को कमजोर कर सकती हैं, और गरीबी कम करने तथा पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में हुई प्रगति को उलट सकती हैं। यह नतीजा ट्रम्प के लिए एक झटका है, जिनके प्रशासन ने बोल्सोनारो परिवार को फिर से सत्ता में लाने की कोशिशों का समर्थन किया था। लूला का लगातार नेतृत्व इस क्षेत्र में वाशिंगटन के प्रभाव को संतुलित करने का काम कर सकता है। लूला के कार्यकाल में विदेश मंत्री रहे सेल्सो अमोरिम ने रॉयटर्स को बताया कि लैटिन अमेरिका में संतुलन बनाए रखने में ब्राज़ील के राष्ट्रपति की भूमिका अहम होगी। इसे भी पढ़ें: Iran ने कहा America के साथ कूटनीति के रास्ते खुले, मध्यस्थों से भेजे जा रहे संदेश इस जीत ने कैसे ट्रंप को हरा दिया? लूला डसिलवा वही शख्सियत हैं जिन्होंने ना सिर्फ डोनाल्ड ट्रंप को उंगलियां दिखाई, तेवर दिखाया और यह भी जता दिया कि ब्राजील जो है अमेरिका का कोई गुलाम बनने वाला देश नहीं है। उसके प्रभाव से जो है मुक्त रहने वाला देश है। उसने साफ-साफ कह दिया था कि अगर हमारे ऊपर किसी भी तरह से व्यापारिक दबाव बढ़ाने की कोशिश की जाती है तो हमारे पास और भी बहुत सारे रास्ते खुले हुए हैं। डोनाल्ड ट्रंप को यह बातें जो है अपने ईगो से ज्यादा बड़ी दिखाई दी। उनका ईगो कहीं ना कहीं इससे हर्ट होता हुआ दिखाई दिया था। ऐसी अपेक्षाएं रही होंगी उनको कि लूरा डसिलवा जो है सत्ता से अब बेदखल हो जाए। लेकिन इस चुनाव ने कहीं ना कहीं उनकी उम्मीदों पर पानी फेर कर रख दिया है। कंजेर्वेटिव कांग्रेस लूला के लिए पेश कर रही है चुनौती अपनी जीत के बावजूद, लूला को अपने चौथे कार्यकाल के दौरान बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ब्राज़ील ने 1980 के दशक में लोकतंत्र की बहाली के बाद से अपनी सबसे रूढ़िवादी कांग्रेस चुनी है, जहाँ बोल्सोनारो की लिबरल पार्टी और उसके सहयोगियों का दोनों सदनों में गहरा प्रभाव रहने की उम्मीद है। यह राजनीतिक संतुलन लूला के लिए नए कानून पारित कराने और बजट संबंधी निर्णयों पर नियंत्रण बनाए रखने में मुश्किलें खड़ी कर सकता है। आर्थिक दबाव भी एक और बड़ी चिंता का विषय है। सरकार ने अगले वर्ष 2.3% की आर्थिक वृद्धि का अनुमान लगाया है, जबकि सार्वजनिक ऋण बढ़कर सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 82% से अधिक हो गया है। ऊँची ब्याज दरें, घरेलू कर्ज़ और सरकारी खर्च को नियंत्रित करने का दबाव प्रशासन पर भारी पड़ने के आसार हैं। इसलिए लूला को सामाजिक कार्यक्रमों और राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा के अपने वादे को पूरा करने के साथ-साथ एक रूढ़िवादी विधायिका के साथ तालमेल बिठाकर काम करना होगा। उनकी इस जीत ने एक और कार्यकाल तो सुरक्षित कर लिया है, लेकिन बोल्सोनारो खेमे द्वारा चुनावी नतीजों को स्वीकार करने से इनकार करने के कारण आने वाले हफ्तों में राजनीतिक तनाव और बढ़ सकता है।

प्रभासाक्षी 26 Oct 2026 1:27 pm

प्रधानमंत्री मोदी को ऐसी टिप्पणियों से विचलित नहीं किया जा सकताः राजनाथ सिंह

प्रधानमंत्री मोदी को ऐसी टिप्पणियों से विचलित नहीं किया जा सकताः राजनाथ सिंह

समाचार नामा 26 Oct 2026 12:43 pm

खड़गे के खिलाफ दिल्ली पुलिस में शिकायत, हिंदू सेना ने कहा- 'पीएम मोदी पर अपमानजनक टिप्पणी अस्वीकार्य'

खड़गे के खिलाफ दिल्ली पुलिस में शिकायत, हिंदू सेना ने कहा- 'पीएम मोदी पर अपमानजनक टिप्पणी अस्वीकार्य'

समाचार नामा 26 Oct 2026 12:39 pm

एकांगी दृष्टिकोण के असर में मानवाधिकार संगठन

यह कोई पहला मौका नहीं है, जब भारतीय सुरक्षा बलों और सरकार पर उसकी कार्रवाई को लेकर मानवाधिकार संगठनों ने सवाल उठाया हो। कश्मीर घाटी में आतंकी मासूम खून बहाते रहे, तब मानवाधिकार संगठनों ने कोई सवाल नहीं उठाया, लेकिन जब भी इन आतंकियों के खिलाफ भारतीय बलों ने कड़ी कार्रवाई की, उनके समर्थकों को सीखचों के पीछे डालना शुरू किया, मानवाधिकार संगठनों को उनके मानवाधिकार की चिंता होने लगी। ऐसे में हालिया आंदोलनों के दौरान भारत सरकार की कार्रवाई को लेकर मानवाधिकार संगठन सवाल नहीं उठाते तो ही हैरत होती। नीट परीक्षा के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी के बीस जुलाई के संसद मार्च के दौरान जो हिंसा हुई, उसके खिलाफ अगर सुरक्षा बल, ताकत का इस्तेमाल नहीं करते तो बाद में वे ही सवालों के घेरे में होते। संसद से महज दो सौ मीटर की दूरी पर जिस तरह आंदोलन में शामिल असामाजिक और अराजक तत्व उकसाऊ कार्रवाई कर रहे थे, उसमें पुलिस और प्रशासन के पास बल प्रयोग के अलावा कोई दूसरा चारा भी नहीं था। दुनिया की उदार से उदार समझी जाने वाली शायद ही कोई सरकार होती, जो अपनी संसद में उपद्रवियों को घुसने की राह देती। सोचिए अगर, उस दिन उपद्रवी संसद में घुस जाते और भारतीय संसद के साथ कुछ वैसी ही अनहोनी होती, जैसा अभी हालिया प्रदर्शन के दौरान अल्बानिया में हुआ है तो क्या भारतीय लोकतांत्रिक समाज उसे स्वीकार कर पाता? निश्चित तौर पर इन सवालों का जवाब सिर्फ ना है। इसे भी पढ़ें: आखिर क्यों धधक रहा है फ्रांस और अन्य यूरोपीय देश? पुलिस प्रशासन के सामने क्या हैं चुनौतियाँ? भारत में हालिया आंदोलनों की शुरूआत नीट परीक्षा में धांधली के विरोध में हुई। इसी दौरान अचानक से एक नई पार्टी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ बनी और उसके बैनर तले देशभर के युवाओं ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर डेरा डाल दिया। लोकतांत्रिक व्यवस्था में आंदोलनों को शॉक ऑब्जर्बर के रूप में देखा जाता है। मर्यादित आंदोलनों और धरना-प्रदर्शनों के जरिए लोकतांत्रिक समाज अपने गुस्से का इजहार करता रहा है। समझदार सरकारें भी सीमित और मर्यादित आंदोलनों को लोगों के गुस्से की अभिव्यक्ति के प्रतीक के रूप में लेती रही हैं। मर्यादित आंदोलनों के जरिए लोक अपना गुस्सा निकालकर शांत हो जाता है। लेकिन ध्यान रखना चाहिए कि लोक में अराजक तत्व भी होते हैं और वे आंदोलनों की ताक में रहते हैं। लोकतांत्रिक आंदोलनों में वे मौका पाते ही घुस जाते हैं और अराजकता को बढ़ावा देते हैं। कॉकरोच जनता पार्टी के बीस जुलाई के संसद में मार्च में ऐसा ही हुआ। सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकने में जेनुइन छात्रों की संख्या कम, अराजक और असामाजिक तत्वों की संख्या ज्यादा रही। इस तथ्य को सुरक्षा बलों ने भी स्वीकार किया है। बीस जुलाई के संसद मार्च के पहले तक नीट और दूसरी परीक्षाओं में धांधली रोकने की मांग वाला आंदोलन मर्यादित दायरे में था। हालांकि इस दौरान भी शांत खड़े सुरक्षा बलों के साथ बदसलूकी हुई, प्रधानमंत्री को गंदी-गंदी गालियां देते हुए पोस्टर सार्वजनिक रूप से लहराये गए। इन्हें सोशल मीडिया पर उत्तेजित अंदाज में प्रस्तुत भी किया गया। फिर भी सरकारी तंत्र संयमित रहा। सुरक्षा बलों के नरम रूख के पीछे आंदोलन में शामिल युवा रहे। सुरक्षा बलों और प्रशासन को लगता था कि अगर युवाओं के खिलाफ कार्रवाई हुई तो मामला बिगड़ सकता है। लेकिन जैसे ही यह आंदोलन एसआईआर के खिलाफ और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की ओर बढ़ा, इसने राजनीतिक रंग ले लिया। निश्चित तौर पर इस पूरे आंदोलन में छात्र कहीं नेपथ्य में जाते हुए दिखे और मोर्चे पर कांग्रेस की अगुआई में विपक्षी दल दिखे। लेकिन सुरक्षा बलों ने अपना संयम बनाए रखा। चुनाव आयोग पर प्रदर्शन के लिए संसद से निकले विपक्षी सांसदों और उनके समर्थकों को एहतियातन हिरासत में लिया गया। लोगों को जुटने से रोका गया। हो सकता है कि इस दौरान कुछ लोगों के साथ हाथापाई भी हुई हो, किसी को चोट लगी हो। आंदोलन में ऐसा होना स्वाभाविक भी है। दुनिया की कोई भी सरकार आंदोलनकारियों का फूलों से स्वागत नहीं करती। सरकार और सुरक्षा बलों ने जिस तरह संयम दिखाकर सिर्फ हिरासत में लेकर आंदोलन को हिंसक होने से रोकने में सफलता पाई, उसका समाज के एक बड़े हिस्से ने स्वागत भी किया है। आंदोलनकारियों के खिलाफ सड़कों पर उतरी जनता को आसानी से भाजपा का एजेंट कहा जा सकता है। लेकिन त्योहारी मौसम में कारोबारी नुकसान पहुंचा रहे कनॉट प्लेस के कारोबारियों का आंदोलन के विरोध में खड़ा होना मामूली बात नहीं है। इससे साफ हुआ कि जनता भी ऐसे आंदोलनों को पसंद नहीं कर रही। दुर्भाग्य यह है कि चाहे एमनेस्टी इंटरनेशनल हो या फिर ह्यूमनराइट वाच, या संयुक्त राष्ट्र संघ की समिति, उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम, सुरक्षा बलों के संयम, प्रधानमंत्री को दी गई गालियों की ओर ध्यान नहीं दिया। एसआईआर और नीट परीक्षा में धांधली के खिलाफ हुए आंदोलनों के दौरान पुलिस कार्रवाई पर एमनेस्टी इंटरनेशनल और संयुक्त राष्ट्र संघ की समिति एवं विशेषज्ञों का चिंता जताना दरअसल मामले का एक तरफा संज्ञान लेना है। ह्यूमन राइट्स वॉच और संयुक्त राष्ट्र की नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति यानी यूएनसीईआरडी ने अपनी रिपोर्टों में, देश में धार्मिक अल्पसंख्यकोंके खिलाफ भेदभावपूर्ण नीतियां अपनाने और उनके खिलाफ नफरती भाषण आदि का आरोप लगाया है। ये संगठन विदेशी अंशदान नियमन अधिनियम यानी एफसीआरए और कड़े आतंकवाद-विरोधी कानूनों, मसलन यूएपीए के दुरुपयोग का भी भारत पर आरोप लगाते रहे हैं। उनका कहना है कि इन नियमों-कानूनों के जरिए मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, एनजीओ और आलोचकों की आवाज दबाई जा रही है। साथ ही, सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को निशाना बनाया जा रहा है, जिससे स्वतंत्र पत्रकारिता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दायरा सिकुड़ रहा है। मानवाधिकार संगठन चाहे जो भी कहें, लेकिन विशेषकर राजधानी दिल्ली में जिस तरह सुरक्षा बलों ने खुद पर हुए हमलों के बावजूद जवाबी कार्रवाई में संयम दिखाया, उसकी तारीफ होनी चाहिए। दरअसल श्रेष्ठताबोध से ग्रस्त पश्चिमी समाज और उसके कथित मानवाधिकार संगठनों का नजरिया विशेषकर तीसरी दुनिया के देशों के लिए एकतरफा ही रहा है। बेशक भारत आर्थिक रूप से दुनिया की चौथी बड़ी शक्ति बन चुका है, लेकिन अब भी भारत को लेकर उनकी सोच पुरानी ही है। जिसे अब देश की अधिसंख्य जनता समझने लगी है, इसीलिए अब ऐसे आरोपों और पर्यवेक्षणों से भारतीय मानस उस तरह प्रभावित नहीं होता, जैसा अतीत में होता रहा है। - उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक हैं.

प्रभासाक्षी 26 Oct 2026 11:26 am

'महर्षि वाल्मीकि ने समाज को दिखाया सत्य, न्याय, करुणा और समरसता का मार्ग', जयंती पर खड़गे और राहुल ने दी शुभकामनाएं

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समाचार नामा 26 Oct 2026 10:30 am

सर्बिया संसदीय चुनाव: छात्र आंदोलन ने पलटी बाजी, अलेक्जेंडर वुसिच ने स्वीकारी हार

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समाचार नामा 26 Oct 2026 10:28 am

कर्नाटक के सीएम शिवकुमार मिल मालिकों और विरोध कर रहे गन्ना किसानों के साथ करेंगे बातचीत

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समाचार नामा 26 Oct 2026 10:13 am

महर्षि वाल्मीकि जयंती पर सीएम योगी बिठूर-बिल्हौर को देंगे 411 करोड़ रुपये की 48 विकास परियोजनाओं की सौगात

महर्षि वाल्मीकि जयंती पर सीएम योगी बिठूर-बिल्हौर को देंगे 411 करोड़ रुपये की 48 विकास परियोजनाओं की सौगात

समाचार नामा 26 Oct 2026 8:44 am

मल्लिकार्जुन खड़गे के बयान पर भड़के भाजपा नेता, कांग्रेस ने कहा- केंद्र सरकार को जाना ही पड़ेगा

मल्लिकार्जुन खड़गे के बयान पर भड़के भाजपा नेता, कांग्रेस ने कहा- केंद्र सरकार को जाना ही पड़ेगा

समाचार नामा 26 Oct 2026 8:42 am

Political Controversy: खरगे की टिप्पणी पर बिहार से दिल्ली तक सियासी घमासान, अमित शाह ने कांग्रेस को घेरा

Political Controversy: खरगे की टिप्पणी पर बिहार से दिल्ली तक सियासी घमासान, अमित शाह ने कांग्रेस को घेरा

समाचार नामा 26 Oct 2026 8:40 am

5 नवंबर को करनाल में अमित शाह की हुंकार, लोकतंत्र बचाओ पदयात्रा में होंगे शामिल

हरियाणा भाजपा अध्यक्ष अर्चना गुप्ता ने बताया कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 5 नवंबर को करनाल में आयोजित होने वाली 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ' पदयात्रा में शामिल होंगे

देशबन्धु 26 Oct 2026 7:30 am

बांग्लादेश में डेंगू का कहर, 24 घंटे में 2249 नए मामले और सात मौतें

ढाका, 25 अक्टूबर (आईएएनएस)। बांग्लादेश में डेंगू के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। रविवार सुबह तक बीते 24 घंटों में 2,249 नए डेंगू मामलों की पुष्टि हुई, जो वर्ष 2026 में अब तक का सबसे अधिक एक दिन में सामने आए आंकड़ा है।

समाचार नामा 25 Oct 2026 10:44 pm

पीएम मोदी के पिता पर टिप्पणी को लेकर खड़गे के खिलाफ पटना में शिकायत दर्ज

पीएम मोदी के पिता पर टिप्पणी को लेकर खड़गे के खिलाफ पटना में शिकायत दर्ज

समाचार नामा 25 Oct 2026 10:33 pm

खड़गे के विवादित बयान पर भड़के भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री, कांग्रेस अध्यक्ष से की माफी की मांग

खड़गे के विवादित बयान पर भड़के भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री, कांग्रेस अध्यक्ष से की माफी की मांग

समाचार नामा 25 Oct 2026 8:32 pm

फारूक अब्दुल्ला के बयान पर बोले हुसैन दलवई, कहा- पाकिस्तान के पक्ष में बयान देना गलत

फारूक अब्दुल्ला के बयान पर बोले हुसैन दलवई, कहा- पाकिस्तान के पक्ष में बयान देना गलत

समाचार नामा 25 Oct 2026 8:22 pm

राजीव गांधी की दूरदृष्टि ने रखी आधुनिक भारत की मजबूत नींव : केशव महतो कमलेश

राजीव गांधी की दूरदृष्टि ने रखी आधुनिक भारत की मजबूत नींव : केशव महतो कमलेश

समाचार नामा 25 Oct 2026 6:33 pm

'मोदी का बाप भी जाएगा': बिहार में टोका-टाकी करने वाले को खड़गे का जवाब; BJP बौखलाई

पटना में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के भाषण के दौरान किसी ने टिप्पणी की कि पीएम मोदी कहीं नहीं जाएँगे। इस पर खड़गे ने कहा, 'मोदी का बाप भी जाएगा।' इस पर बीजेपी बौखला गई। अमित शाह जैसे बीजेपी नेताओं ने उन पर सीमा लांघने का आरोप लगाया।

सत्य हिंदी 25 Oct 2026 3:40 pm

आंध्र प्रदेश की गठबंधन सरकार चुनावी प्रक्रिया का उड़ा रही मजाक: वाईएसआर कांग्रेस

आंध्र प्रदेश की गठबंधन सरकार चुनावी प्रक्रिया का उड़ा रही मजाक: वाईएसआर कांग्रेस

समाचार नामा 25 Oct 2026 2:37 pm

‘मन की बात’ से आत्मनिर्भर भारत, स्वदेशी उत्पादों और स्वस्थ जीवन का संदेश; भाजपा नेताओं ने की पीएम मोदी की सराहना

‘मन की बात’ से आत्मनिर्भर भारत, स्वदेशी उत्पादों और स्वस्थ जीवन का संदेश; भाजपा नेताओं ने की पीएम मोदी की सराहना

समाचार नामा 25 Oct 2026 2:29 pm

जामिया मिलिया इस्लामिया में 14वें दिन प्रदर्शन जारी, छात्र संघ की बहाली समेत 3 मांगों पर अड़े छात्र

जामिया मिलिया इस्लामिया में 14वें दिन प्रदर्शन जारी, छात्र संघ की बहाली समेत 3 मांगों पर अड़े छात्र

समाचार नामा 25 Oct 2026 2:22 pm

भगवान वाल्मीकि: जिन्होंने श्रीराम के आदर्शों को शब्दों में ढाला

रामलीला का मंच सजने से पहले हर साल एक परंपरा निभाई जाती है। कई रामलीला समितियां पंजाब के अमृतसर में बने भगवान वाल्मीकि तीर्थ स्थल (राम तीर्थ) जाती हैं और वहां से पवित्र जल व अखंड ज्योति लेकर लौटती हैं। यह भगवान वाल्मीकि का आश्रम था, जहां माता सीता ने निवास किया और लव-कुश का जन्म हुआ। राम के चरित्र का मंचन उस भूमि के आशीर्वाद से शुरू होता है, जहां से राम कथा निकली। आश्विन पूर्णिमा को आने वाली वाल्मीकि जयंती इसी स्मरण का दिन है। ऋषिपुत्र, जिन्होंने साधना से पहचान बनाई भगवान वाल्मीकि ऋषि प्रचेता के पुत्र हैं। ऋषि के घर जन्म लेने भर से उनका मार्ग आसान नहीं हुआ। उन्होंने इतनी कठोर तपस्या की कि उनके शरीर पर दीमक की बांबी, यानी वल्मीक, बन गई। इसी से वे वाल्मीकि कहलाए। उनका जीवन बताता है कि साधना और संकल्प से मनुष्य अपनी पहली पहचान से आगे बढ़ सकता है। राम जी को संसार तक पहुंचाने वाली लेखनी आज घर-घर में भगवान श्रीराम का नाम है, तो इसकी नींव वाल्मीकि की रामायण ने रखी। उन्होंने केवल घटनाएं नहीं दर्ज कीं। उन्होंने श्रीराम के जीवन को आदर्शों के रूप में सामने रखा: •पिता के वचन के लिए राजपाट छोड़ देने का त्याग •वनवास के कष्टों में धैर्य •शबरी के जूठे बेर स्वीकार करने की विनम्रता •शत्रु के प्रति भी मर्यादा •प्रजा के विश्वास को अपने सुख से ऊपर रखने की भावना बाद में कई भाषाओं के कवियों ने राम को अपने ढंग से गाया, पर सबकी जड़ में वही आदिकाव्य है। इसीलिए भगवान वाल्मीकि को आदिकवि कहा जाता है। उन्होंने राम के जीवन आदर्शों को काव्य का रूप दिया। सीता के संबल और लव-कुश के गुरु वाल्मीकि केवल कथाकार नहीं थे। जब लोकापवाद के कारण माता सीता को वन जाना पड़ा, तब उन्हें आश्रय उनके आश्रम में मिला। जिस घड़ी में अपने भी दूर हो गए, उस घड़ी में एक ऋषि बिना किसी शर्त के सहारा बने। वहीं लव और कुश का जन्म हुआ। भगवान वाल्मीकि ने दोनों को शिक्षा, संस्कार और शस्त्र-विद्या दी। यही बालक आगे चलकर रामकथा का गान करते हुए अयोध्या पहुंचे। रचयिता का सिखाया गायन उन्हीं के शिष्यों के स्वर में लौटकर राम के दरबार तक पहुंचा। समरस जीवन और सबकी सहभागिता उनके आश्रम में ऊंच-नीच का कोई भेद नहीं था। राजपुत्र और वनवासी बालक एक ही गुरु से सीखते थे। आज वाल्मीकि जयंती पर निकलने वाली शोभायात्राओं, पूजन, भजन-कीर्तन और रामकथा के आयोजनों में सभी वर्गों के लोग साथ दिखते हैं। यह उसी समरसता की झलक है, जो उनके आश्रम की पहचान थी। आज हमारे लिए संदेश जयंती केवल जयकारे लगाने और झांकियां निकालने का दिन नहीं है। भगवान वाल्मीकि ने श्रीराम के आदर्श इसलिए लिखे कि समाज उन्हें अपनाए। इसलिए हमें अपने आसपास देखना चाहिए कि कोई उपेक्षित तो नहीं, किसी के साथ भेदभाव तो नहीं हो रहा, किसी को सहारे की आवश्यकता तो नहीं। जिस परंपरा ने सीता को आश्रय दिया, उसे मानने वाले को दूसरों के लिए आश्रय बनना आना चाहिए। भगवान वाल्मीकि को इससे बड़ी श्रद्धांजलि कोई नहीं हो सकती।

प्रभासाक्षी 25 Oct 2026 1:22 pm

मन की बात : पीएम मोदी ने चेन्नई के युवाओं और वैज्ञानिक नरिंदर का किया जिक्र, कहा-देश में प्रतिभाओं की कभी कमी नहीं रही

मन की बात : पीएम मोदी ने चेन्नई के युवाओं और वैज्ञानिक नरिंदर का किया जिक्र, कहा-देश में प्रतिभाओं की कभी कमी नहीं रही

समाचार नामा 25 Oct 2026 12:37 pm

'मन की बात' में पीएम मोदी ने किया ई-संजीवनी का जिक्र, बताया कैसे दूर-दराज के लोगों को मिल रहा फायदा

'मन की बात' में पीएम मोदी ने किया ई-संजीवनी का जिक्र, बताया कैसे दूर-दराज के लोगों को मिल रहा फायदा

समाचार नामा 25 Oct 2026 12:24 pm

पूर्व पीएम पीवी नरसिम्हा राव के पोते सुभाष ने राहुल गांधी के कार्यों को बताया 'राष्ट्र-विरोधी'

पूर्व पीएम पीवी नरसिम्हा राव के पोते सुभाष ने राहुल गांधी के कार्यों को बताया 'राष्ट्र-विरोधी'

समाचार नामा 25 Oct 2026 12:17 pm

मन की बात में पीएम मोदी ने महर्षि वाल्मीकि और भाई परमानंद को किया याद, बोले- 'इनका जीवन आज भी देता है प्रेरणा'

मन की बात में पीएम मोदी ने महर्षि वाल्मीकि और भाई परमानंद को किया याद, बोले- 'इनका जीवन आज भी देता है प्रेरणा'

समाचार नामा 25 Oct 2026 12:08 pm

देश को अराजकता और अलगाववाद की भट्टी में झोंकने का षड्यंत्र रच रहीं कुछ राजनीतिक ताकतें: सीएम योगी

देश को अराजकता और अलगाववाद की भट्टी में झोंकने का षड्यंत्र रच रहीं कुछ राजनीतिक ताकतें: सीएम योगी

समाचार नामा 25 Oct 2026 8:24 am

'रैली होकर रहेगी!' अलका लांबा का ऐलान, BJP पर लगाए बड़े आरोप

कांग्रेस नेता अलका लांबा ने व्यापारियों की ओर से इंडिया ब्लॉक की रैली को दीपवाली के बाद तक टालने की अपील पर कहा कि एक नवंबर को दिल्ली में रैली होकर रहेगी

देशबन्धु 25 Oct 2026 7:30 am

जामिया में छात्र आंदोलन तेज, गेट बंद करने के फैसले पर फूटा गुस्सा

जामिया मिलिया इस्लामिया में छात्र संघ की मांग को लेकर पिछले 14-15 दिनों से चल रहा छात्रों का विरोध प्रदर्शन तेज हो गया है

देशबन्धु 25 Oct 2026 12:09 am

हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री ने प्राकृतिक खेती से उगाए गए पांगी सेबों का शुभारंभ किया

हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री ने प्राकृतिक खेती से उगाए गए पांगी सेबों का शुभारंभ किया

समाचार नामा 24 Oct 2026 6:24 pm

दिल्ली की सीएम रेखा गुप्ता ने छठ घाटों के विकास, सौंदर्यीकरण और निर्माण कार्यों का निरीक्षण किया

दिल्ली की सीएम रेखा गुप्ता ने छठ घाटों के विकास, सौंदर्यीकरण और निर्माण कार्यों का निरीक्षण किया

समाचार नामा 24 Oct 2026 4:37 pm

पटियाला में युवक की हत्या का मामला: थाने में एफआईआर दर्ज, आरोपियों की तलाश में छापेमारी

पटियाला में युवक की हत्या का मामला: थाने में एफआईआर दर्ज, आरोपियों की तलाश में छापेमारी

समाचार नामा 24 Oct 2026 4:33 pm

Trump ने मस्क-CIA को ही कर दिया एक्सपोज? राहुल की वियतनाम यात्रा की पोल भी खुल गई!

इस वक्त अमेरिका के अंदर एक अजीब सी जंग छिड़ी हुई है। एक तरफ दुनिया के सबसे ताकतवर राष्ट्र के राष्ट्रपति हैं डोनाल्ड ट्रंप तो दूसरी तरफ हैं दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति एलन मस्क। दोनों एक ही देश के हैं। दोनों मतलब एलन मस्क ट्रंप की पार्टी का समर्थन करते हैं और ट्रंप के समर्थक भी हैं एलन मस्क। 2024 के चुनाव में भी अच्छी खासी फंडिंग की थी और इस वाले चुनाव में भी हजारों करोड़ रुपए की फंडिंग की है और इन दोनों के बीच में फंसा हुआ है यूक्रेन। अमेरिका के भीतर महंगाई बढ़ रही है क्योंकि डीजल पेट्रोल नहीं मिल पा रहा है। स्टेट ऑफ होर्मुज बंद है। बाब अल मंदेब बंद है। जिसकी वजह से रूस के सामने गिड़गिड़ाना पड़ा और वहां से तेल मंगाना पड़ा। अब रूस की रिफाइनरीज के ऊपर यूक्रेन हमले कर रहा है। यूक्रेन हमले कर रहा है। जिन ड्रोन से उन ड्रोन पर स्टार्लिंग की डिवाइस लगी हुई है। उस डिवाइस की मदद से ही यूक्रेन के ड्रोन रशिया को छेद पा रहे हैं। उसकी रिफाइनरी पर हमला कर पा रहे हैं। ऐसे में आपने पिछले दिनों खबर सुनी कि किस तरीके से स्टार लिंक ने यूक्रेन की स्पीड कम कर दी। आप जो समझते हैं ना डाउनलोडिंग करने की स्पीड इंटरनेट की या फिर कुछ सर्च करने की स्पीड सिर्फ वही स्पीड इंटरनेट की नहीं होती है। हथियारों की एक अलग तरीके की स्पीड होती है। 100 किमी प्रति घंटा 150 किमी प्रति घंटा 200 किमी प्रति घंटा तक की स्पीड होती है। जितनी ज्यादा स्पीड होगी उतनी ही ज्यादा दिक्कत सामने वाले देश को उस ड्रोन को इंटरसेप्ट करने में आएंगी। यहां स्टार्लिंग की स्पीड बहुत ज्यादा थी। लगभग 200 कि.मी. प्रति घंटा के आसपास थी। तो रशिया के इंटरसेप्टर उन्हें पकड़ नहीं पाते थे और ये ड्रोंस जाकर रिफाइनरीज को हिट कर रहे थे। ट्रंप को रूस के साथडील करनी थी। ऐसे में अब उन्होंने आदेश दिया या नहीं दिया। ऐसे में अचानक से यूक्रेन की स्पीड इंटरनेट वाली कम हो गई। आरोप लगा कि मस्क ने यूक्रेन के मिलिट्री स्टार्लिंग की स्पीड को 100 मील प्रति घंटा पर कैप कर दिया। मतलब 100 मील प्रति घंटा का मान लीजिए कि 160 किमी प्रति घंटे के हिसाब से कैप कर दिया। कैप करने का मतलब है अगर वो ड्रोन 160 कि.मी. प्रति घंटा की स्पीड से ऊपर जाएगा तो वो उसकी जो वीडियो रिकॉर्डिंग है वो बंद हो जाएगी। उसका इंटरनेट कनेक्शन जो है वो टूट जाएगा। जाएगा। अब जब इंटरनेट कनेक्शन टूट जाएगा तो उसे पता नहीं चलेगा कि कहां हिट करना है, कहां हिट नहीं करना है। और जो उसे ऑपरेट कर रहे हैं लोग उनके पास तक वीडियो जब नहीं पहुंचेगा तब वो लोग भी एक तरीके से अंधे हो जाएंगे। तो ये पूरा गेम किया गया। इसे भी पढ़ें: SP MP Ramashankar Rajbhar का दावा, INDIA bloc में सीट बंटवारा तय, जल्द आएगा Manifesto सीआईए का क्या रोल है इससे यूक्रेन के हमलावर ड्रोन रूस के सामने फेल होने लगे और अब वॉल स्ट्रीट जनरल की ब्रेकिंग रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्रंप ने खुद मस्क को फोन करके कहा कि यह पाबंदी हटा लो। ट्रंप का कहना है कि मेरा इसमें कोई रोल नहीं है। एलन मस्क का कहना है कि मेरा भी उसमें कोई रोल नहीं है। रोल सामने आया सीआईए का। स्टार लिंक से डायरेक्ट इंटरनेट नहीं लेता है यूक्रेन। ये लेता है स्टार शील्ड से। स्टार शील्ड के ऊपर मतलब कौन नजर रखता है या फिर किसके हाथ में स्टार शील्ड है। स्टार शील्ड हाथ में है सीआईए के। अब पूरा गेम आपको समझ आया आ गया होगा कि किस तरीके से सिर्फ एक खबर बाहर आने से कि ट्रंप ने खुद मस्क को फोन करके कहा कि यह पाबंदी हटा लो। यहां सीआईए का भी जो पर्दाफाश हो गया और एलन मस्क भी एक्सपोज हो गए। वॉल स्ट्रीट जनरल के मुताबिक यह फोन बुधवार को किया गया। ट्रंप ने मस्क से कहा कि वो इस स्पीड लिमिट से नाराज हैं। यह लिमिट 14 अक्टूबर को स्पेस एक्स ने लगाई थी। इसे भी पढ़ें: देश और दुनिया के प्रमुख घटनाक्रम: 24 October के दोपहर तक के बड़े अपडेट्स मस्क और वाइट हाउस की कहानी अलग-अलग है यूक्रेन को शक है कि ट्रंप ने रूस की तरफ झुकाव का हिस्सा था। क्योंकि पिछले हफ्ते ही ट्रंप ने मॉस्को से तेल खरीदने और जेलस्की को हटाने की बात कही थी। कारनेगी एंडोमेंट के एक्सपर्ट माइकल कॉफमैन का कहना है कि अगर यह थ्रटल नहीं हटा तो रूस का फ्रंट लाइन पर आगे बढ़ना फिर तेज हो जाएगा। मतलब यूक्रेन की जंग का रिमोट कंट्रोल आज भी एक प्राइवेट कंपनी और दो लोगों के फोन कॉल पर टिका हुआ है। ट्रंप अब कतई नहीं चाहते कि जेलस्की यूक्रेन के राष्ट्रपति रहे और वो उन्हें हटाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। राहुल की वियतनाम यात्रा पर क्या झूठ पकड़ा गया? दो हफ्ते पहले तक राहुल गांधी देश में चुनाव चोरी, वोट चोरी, ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा इन सब की मांग कर रहे थे। संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जा करने के आरोप बीजेपी और सरकार पर वह लगा रहे थे। पूरा विपक्ष एक साथ आ गया था। सिर्फ आरोप नहीं लगाया जा रहा था। दिल्ली में आकाशवाणी से लेकर राजघाट तक, राष्ट्रपति भवन से लेकर जंतरमंतर तक जमकर प्रदर्शन हुए। सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकालकर सरकार और पूरे संवैधानिक सिस्टम पर सवाल खड़े करने की कोशिश हुई। वैसे तो आप ये कह सकते हैं कि सरकार को कटघरे में खड़ा करना हर विपक्षी का अधिकार है। सरकार ट्रैक पर रहे यह याद दिलाना विपक्ष का काम है। लेकिन संवैधानिक संस्थाओं को इस तरीके से डिसक्रेडिट कर देना कहां तक जायज है? राहुल गांधी ने देश में बड़ा नैरेटिव खड़ा कर दिया था। सरकार पर सवालों की झड़ी लगा दी। राहुल गांधी फ्रंट फुट पर खेल रहे थे। बीजेपी, सरकार और बाकी तमाम को आकर बकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस करके जवाब देना पड़ रहा था हर चीज पर। लेकिन जैसे ही इस पूरे सियासी गेम में पीएम मोदी की एंट्री हुई पूरा समीकरण 360 डिग्री चेंज हो गया। पूरा सिस्टम ऐसे पलटा कि अब बीजेपी के सवालों पर कांग्रेस को सफाई देनी पड़ रही है। यह सब बदला है। 18 अक्टूबर को राहुल गांधी के वियतनाम जाने की खबर सामने आने के बाद। राहुल गांधी जैसे ही विदेश पहुंचे, बीजेपी को उनकी विदेश यात्रा और विदेशों में मुलाकातों पर सवालों की झड़ी लगाने का मौका मिल गया। राहुल की विदेश यात्रा का सेम पैटर्न 2020 हो, 22 हो, 24 हो, 25 हो, 26 हो, हर बार एक बड़ा मुद्दा राहुल गांधी लेकर आते हैं। भारत यात्रा पर निकलते हैं। छात्रों की गूंज करते हैं। ज्ञानेश कुमार के खिलाफ पीएम मोदी के घर के बाहर चले जाते हैं। लेकिन जैसे ही चीज मोमेंटम पकड़ती है, वो चले जाते हैं। जनता को जुटाते हैं और फिर वर्क फ्रॉम विदेश पर निकल जाते हैं। अगर वोट चोरी गंभीर मुद्दा है तो राहुल गांधी खुद कितने गंभीर हैं? क्या 140 करोड़ की आबादी वाले देश में पार्ट टाइम पॉलिटिक्स की कोई जगह है?

प्रभासाक्षी 24 Oct 2026 4:14 pm

अखिलेश यादव के 'घुसपैठिए' वाले बयान पर भड़के उत्तराखंड के सीएम, बताया देवभूमि का अपमान

अखिलेश यादव के 'घुसपैठिए' वाले बयान पर भड़के उत्तराखंड के सीएम, बताया देवभूमि का अपमान

समाचार नामा 24 Oct 2026 2:35 pm

कांग्रेस ने पांच राज्यों के लिए वॉर रूम चेयरपर्सन नियुक्त किए, विधानसभा चुनाव की तैयारी तेज

कांग्रेस ने पांच राज्यों के लिए वॉर रूम चेयरपर्सन नियुक्त किए, विधानसभा चुनाव की तैयारी तेज

समाचार नामा 24 Oct 2026 2:30 pm

Azerbaijan ने मारी गजब की पलटी, Operation Sindoor के दौरान Pakistan का साथ देने वाला देश India के साथ आ खड़ा हुआ

पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जिस तरह अजरबैजान ने तुर्की के साथ मिलकर पाकिस्तान का साथ दिया था उसे देखकर भारत हैरान था। लेकिन जल्द ही समय ने करवट ली। अब दक्षिण काकेशस की राजनीति में भारत ने पाकिस्तान को एक बड़ा कूटनीतिक झटका दे दिया है। हम आपको बता दें कि कभी पाकिस्तान के साथ खड़े नजर आने वाले अजरबैजान के साथ अब भारत के रिश्ते नई गर्माहट लेते दिख रहे हैं। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर की बाकू यात्रा और राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव व विदेश मंत्री जेहुन बायरामोव के साथ उनकी मुलाकात ने साफ कर दिया है कि भारत और अजरबैजान पुराने मतभेदों को पीछे छोड़कर सहयोग के नए रास्ते तलाश रहे हैं। आतंकवाद से मुकाबले, क्षेत्रीय सुरक्षा, व्यापार, ऊर्जा और संपर्क बढ़ाने जैसे मुद्दों पर हुई बातचीत भारत की कूटनीतिक सक्रियता का संकेत है। पाकिस्तान के लिए यह घटनाक्रम इसलिए अहम है, क्योंकि जिस अजरबैजान को वह अपना करीबी सहयोगी मानता रहा है, वही अब भारत के साथ रिश्ते मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, जयशंकर ने राष्ट्रपति अलीयेव से मुलाकात के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शुभकामनाएं पहुंचाईं। दोनों पक्षों ने द्विपक्षीय संबंधों की वर्तमान स्थिति और उन्हें आगे बढ़ाने की संभावनाओं पर चर्चा की। विदेश मंत्री बायरामोव के साथ वार्ता में व्यापार, निवेश और ऊर्जा सहयोग के विस्तार पर जोर दिया गया। हम आपको बता दें कि भारत और अजरबैजान अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) में भी रुचि रखते हैं और इसके तहत बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर सहमत हुए। हवाई संपर्क बढ़ाने तथा पर्यटन, कारोबार और लोगों के बीच आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करने पर भी चर्चा हुई। जयशंकर ने पश्चिम एशिया में संघर्ष के दौरान ईरान से भारतीय नागरिकों, विशेषकर विद्यार्थियों, को निकालने में अजरबैजान की सहायता के लिए आभार जताया। इसे भी पढ़ें: आखिर क्यों धधक रहा है फ्रांस और अन्य यूरोपीय देश? पुलिस प्रशासन के सामने क्या हैं चुनौतियाँ? इस यात्रा का सबसे संवेदनशील पहलू आतंकवाद और सुरक्षा से जुड़ा रहा। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट किया कि दोनों देशों के बीच सुरक्षा संबंधी मुद्दों, आतंकवाद और साझा खतरों पर चर्चा हुई। जयशंकर ने भी कहा कि आतंकवाद, संघर्ष और अस्थिरता दोनों देशों के साझा शत्रु हैं। देखा जाये तो भारत और अजरबैजान के बीच हुई बातचीत के आधिकारिक दायरे में आतंकवाद और साझा सुरक्षा चुनौतियों को स्थान मिलना क्षेत्रीय राजनीति में बड़ा घटनाक्रम है। यह घटनाक्रम इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत और अजरबैजान के संबंधों में तनाव आया था। अजरबैजान ने पाकिस्तान में आतंकवादी ढांचे के विरुद्ध भारत की सैन्य कार्रवाई की आलोचना की थी। दूसरी ओर, पाकिस्तान और तुर्किये के साथ बाकू के बढ़ते सामरिक संबंध भारत की चिंताओं का कारण रहे हैं। ऐसे में राष्ट्रपति अलीयेव से सीधी बातचीत और विदेश मंत्रियों की विस्तृत वार्ता यह दिखाती है कि दोनों देश मतभेदों को स्थायी बाधा नहीं बनने देना चाहते। वहीं अजरबैजान के मीडिया ने भी जयशंकर की यात्रा को प्रमुखता दी है। समाचार एजेंसी ट्रेंड ने राष्ट्रपति अलीयेव की जयशंकर से मुलाकात और विदेश मंत्री बायरामोव के उस बयान को प्रकाशित किया जिसमें उन्होंने स्वीकार किया कि पिछले वर्षों के मतभेदों ने द्विपक्षीय संबंधों तथा अंतरराष्ट्रीय संगठनों में सहयोग की संभावनाओं को प्रभावित किया था। बायरामोव ने कहा कि मुद्दों पर खुले और रचनात्मक ढंग से चर्चा हुई है और इससे संबंधों को अगले स्तर तक ले जाने का आधार तैयार होगा। एपीए और रिपोर्ट.az ने भी व्यापार, निवेश, सांस्कृतिक संबंधों तथा दोनों देशों की स्वतंत्र विदेश नीति पर जयशंकर की टिप्पणियों को प्रमुखता दी। इससे संकेत मिलता है कि बाकू इस संपर्क को केवल औपचारिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि संबंधों को नए सिरे से व्यवस्थित करने के अवसर के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। हम आपको यह भी बता दें कि इससे पहले अक्टूबर महीने में ही विदेश राज्य मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह ने बाकू में एशिया में बातचीत और विश्वास-निर्माण उपायों के सम्मेलन (CICA) के सातवें शिखर सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया था। उन्होंने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना, समावेशी सहयोग और आतंकवाद के विरुद्ध साझा कार्रवाई पर जोर दिया था। उन्होंने यह भी रेखांकित किया था कि क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाएं सभी देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करें। इस यात्रा ने उच्चस्तरीय राजनीतिक संवाद के लिए जमीन तैयार की, जिसे जयशंकर की यात्रा ने आगे बढ़ाया। साथ ही भारत और अजरबैजान के बीच बढ़ती नजदीकी की एक अहम वजह संकट के समय मिला सहयोग भी है। हाल ही में ईरान में संघर्ष के दौरान जब भारतीय नागरिकों, खासकर वहां पढ़ रहे विद्यार्थियों को सुरक्षित निकालने की चुनौती सामने आई, तब अजरबैजान ने भारत की मदद की। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अपनी बाकू यात्रा के दौरान इस सहयोग के लिए अजरबैजान का आभार जताया। यह घटनाक्रम बताता है कि दोनों देशों के रिश्ते अब केवल कूटनीतिक मुलाकातों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि जरूरत के समय एक-दूसरे की मदद करने की दिशा में भी आगे बढ़ रहे हैं। भारत के लिए यह सहयोग इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि क्षेत्रीय संकट के बीच अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में अजरबैजान जैसे देश का साथ मिलना उसकी कूटनीतिक पहुंच और आपसी विश्वास को मजबूत करता है। हम आपको यह भी बता दें कि अजरबैजान शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में भागीदारी चाहता है और इसके लिए भारत की सहमति जरूरी है। इसलिए भी दोनों देशों के बीच लगातार वार्ताएं होती दिख रही हैं। सितंबर में बिश्केक में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति अलीयेव की मुलाकात तथा उसके बाद जयशंकर की यात्रा ने राजनीतिक संपर्क को गति दी। लेकिन अजरबैजान को SCO की पूर्ण सदस्यता दी जानी चाहिए या नहीं, इस पर भारत ने अभी तक कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिया है। भारत को इस विषय पर आतंकवाद के विरुद्ध ठोस सहयोग, सदस्य देशों के बीच सहमति और क्षेत्रीय संतुलन जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखना है। रणनीतिक दृष्टि से देखा जाये तो भारत के लिए अजरबैजान ऊर्जा सुरक्षा, यूरोप और मध्य एशिया तक संपर्क, व्यापार तथा क्षेत्रीय संवाद का उपयोगी साझेदार बन सकता है। वहीं बाकू के लिए भारत एक बड़ा बाजार, निवेश का स्रोत और एशिया की प्रमुख शक्ति है। प्रधानमंत्री मोदी की पहल और जयशंकर की सक्रिय कूटनीति ने बातचीत का नया अवसर बनाया है। उधर, पाकिस्तान के लिए यह असहज संकेत है कि उससे निकट संबंध रखने वाला देश भारत के साथ भी अपने हितों के आधार पर सहयोग बढ़ा रहा है। बहरहाल, यदि आतंकवाद के विरुद्ध संवाद नियमित होता है, व्यापार और निवेश बढ़ते हैं तथा परिवहन गलियारों पर समन्वय मजबूत होता है, तो भारत-अजरबैजान संबंधों का यह नया अध्याय दक्षिण काकेशस में भारत की रणनीतिक पहुंच को विस्तार दे सकता है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 24 Oct 2026 1:30 pm

आर्थिक मोर्चे पर विकास के सकारात्मक संकेत

विपरीत वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद दुनिया भर की रेटिंग संस्थाओं ने भारतीय अर्थव्यवस्था को गतिमान स्वीकार करते हुए वैश्विक औसत से लगभग दो गुणी विकास दर रहने की संभावना जताई है। यह इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है कि वैश्विक परिस्थितियों में कहीं और किसी तरह का सुधार नहीं दिखाई दे रहा है। ईरान-अमेरिका युद्ध हो या रूस-यूक्रेन युद्ध हो या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के तानाशाही पूर्ण तुगलकी निर्णय हो या कच्चे तेल के भावों में बेतहासा बढ़ोतरी और हार्मुज का संकट हालात समूचे विश्व में विकट से विकटतर बने हुए हैं। अब तो फ्रांस के हालात भी बिगड़ते जा रहे हैं तो उसका असर जहां योरोप में दिखाई देगा वहीं भारत में भी हालात को प्रभावित करने के कतिपय प्रयास जारी है। अच्छी बात यह है कि देश-दुनिया के गंभीर हालातों के बावजूद आर्थिक क्षेत्र की दुनिया की लगभग सभी रेटिंग संस्थाओं ने इंडियन इकोनोमी की ग्रोथ रेट को लेकर आशा से भी अधिक विश्वास जताया है। रेटिंग संस्थाओं की ही माने तो 2026 की वैश्विक औसत आर्थिक विकास दर 3 दशमलव 1 फीसदी रहने की संभावना व्यक्त की जा रही है वहीं दुनिया की रेटिंग संस्थाओं ने भारत के आर्थिक परिणामों को देखते हुए जुलाई की तुलना में अक्टूबर आते आते ग्रोथ को 6 दशमलव 9 से लेकर 7 दशमलव 1 रहने की उम्मीद जताई है। खास बात यह है कि विश्व रेटिंग संस्थाओं में से किसी भी संस्था ने जुलाई की रेटिंग की तुलना में नकारात्मक ग्रोथ नहीं दिखा कर ग्रोथ रेट में इजाफा ही जाहिर किया है। दरअसल देश में मांग और आपूर्ति से लेकर निर्यात तक में लगातार विकास देखा जा रहा है। देश में मांग और आपूर्ति की बेहतर हालात है तो निर्यात में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। यह भी तब जब वैश्विक मांग कमजोर देखी जा रही है। भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सबसे सकारात्मक बात यह है कि एमएसएमई सेक्टर में लगातार अच्छा काम हो रहा है तो दूसरी और सर्विस सेक्टर में तो एक तरह से लगातार उछाल ही आ रहा है। कच्चे तेल के भावों में तो जैसे आग ही लग रही है और उपलब्धता को लेकर भी लाख झंझट के बावजूद हकोनोमी को बूस्टअप रखने में खास बाधा नहीं आ रही है। देश में देसी-विदेशी निवेश में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। महंगाई के बावजूद बाजार मेंं मांग बरकरार है। बाजार में मांग से यह साफ है कि लोगों की क्रय शक्ति बनी हुई है। सर्विस सेक्टर में टूरिज्म, बैंकिंग, आईटी, और इसी तरह के अन्य क्षेत्र उल्लेखनीय परिणाम दे रहे हैं। नवंबर में दीपावली के त्यौहार के चलते बाजार और अधिक गतिशील हो जाएगा क्योंकि दीपावली पर बाजार में तेजी आती ही आती है। जानकारों की माने तो नवंबर माह में दीपावली पर 7 लाख करोड़ का कारोबार अनुमानित किया जा रहा है। इसे भी पढ़ें: अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने बढ़ाई भारत की विकास दर यह पिछली दीपावली की तुलना में 15 प्रतिशत से 18 प्रतिशत तक अधिक रहने की संभावना है। इसी तरह से सेवा क्षेत्र में भी अच्छी ग्रोथ जारी रहने का अनुमान है। इसके अलावा विपरीत हालातों के बावजूद निर्यात में लगातार बढ़ोतरी जारी है। देश की इकोनोमिक ग्रोथ के कारण देसी-विदेशी निवेश के बेहतर हालात दिखाई दे रहे हैं। यही कारण है कि चाहे आईएमएफ हो या मूडीज, ओईसीडी हो या वर्ल्ड बैंक, एशियन डब्लपमेंट बैंक हो या एसएण्डपी या फिच सभी ने भारत की इकोनोमी की ग्रोथ को लेकर सकारात्मक संकेत दिए हैं। भारत का आरबीआई का आंकलन तो पहले से ही सबके सामने हैं। एकमात्र फिच रेटिंग संस्था ऐसी है जिसने इंडियन इकोनोमी की ग्रोथ रेट 6.9 प्रतिशत आंकी है जोकि हांलाकि पूर्व की फिच की ही पूर्व की रेटिंग 6.5 प्रतिशत से ही अधिक है। मूडीज सहित कुछ रेटिंग संस्थाओं ने जहां अब 7 प्रतिशत विकास दर आंक रहे हैं तो वर्ल्ड बैंक, ओईसीडी आदि संस्थाओं को भरोसा है कि भारत की आर्थिक विकास दर 7 प्रतिशत से अधिक यानी की 7.1 प्रतिशत रहने की संभावना है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नित नए निर्णयों से दुनिया की अर्थ व्यवस्था पर पड़ रहे असर, युद्ध और तनाव के हालातों में सुधार नहीं होने, हार्मुज जैसी समस्या का समाधान नहीं होने, वैश्विक राजनीतिक अस्थिरता के दौर के बावजूद एक ही सधी हुई नीति का ही परिणाम है कि देश की अर्थ व्यवस्था विकास की गति को ना केवल बनाए हुए हैं अपितु उसकी विकास का ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा है। इसके लिए समग्र और समन्वित प्रयासों को श्रेय जाता है। जहां घरेलू मांग में कमी नहीं आई है वहीं निवेश का बेहतर माहौल बना हुआ है। एमएसएमई को उत्पादन लिंक प्रोत्साहन योजना का लाभ सीधे इकोनोमी का मिल रहा है वहीं रणनीतिक क्षेत्रों सेमीकण्डक्टर, डिफेंस, इलेक्ट्रोनिक्स, आईटी आदि आदि क्षेत्रों में योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ा जा रहा है। यही कारण है कि आज इंडियन इकोनोमी और उसकी ग्रोथ पर वैश्विक रेटिंग संस्थाएं अपना विश्वास व्यक्त कर रही है। - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

प्रभासाक्षी 24 Oct 2026 1:22 pm

आखिर क्यों धधक रहा है फ्रांस और अन्य यूरोपीय देश? पुलिस प्रशासन के सामने क्या हैं चुनौतियाँ?

यूरोप में हिंसक विरोध-प्रदर्शनों, दंगों, आगजनी और पुलिस के साथ टकराव को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर नहीं समझा जा सकता। चूंकि इसके पीछे आर्थिक असंतोष, सामाजिक विभाजन, आव्रजन और एकीकरण की बहस, राजनीतिक ध्रुवीकरण, युवाओं में भविष्य को लेकर चिंता तथा पुलिस और नागरिकों के बीच विश्वास का संकट जैसे कई कारक हो सकते हैं। लेकिन एक बुनियादी अंतर समझना जरूरी है, वह यह कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतांत्रिक अधिकार है, जबकि आगजनी, लूटपाट, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान और लोगों पर हमले अपराध हैं। किसी प्रदर्शन में हिंसा होने का अर्थ यह नहीं कि उसमें शामिल हर व्यक्ति हिंसक है या पूरा समुदाय उसके लिए जिम्मेदार है। शायद इसी भ्रम में देश के देश जल रहे हैं और पुलिस तत्काल बहुत कुछ कर नहीं पाती। इससे आत्ताइयों के हौसले बुलंद हैं और लोकतांत्रिक सोच अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रही है। इसे भी पढ़ें: Vishwakhabram : France में Macron के खिलाफ विद्रोह जैसे हालात, पूरे यूरोप में फैल सकती है जनाक्रोश की आग! भले ही फ्रांस और अन्य यूरोपीय देशों की परिस्थितियाँ भी एक जैसी नहीं हैं। इसलिए यह देखना आवश्यक है कि अशांति किन कारणों से भड़कती है, पुलिस की कार्रवाई कहाँ कठिन हो जाती है और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करते हुए हिंसा रोकने के लिए कौन-से उपाय प्रभावी हो सकते हैं। # सवाल है कि अक्टूबर 2026 में फ्रांस में वास्तव में क्या हो रहा है? तो जवाब होगा कि फ्रांस में सितंबर के अंत से शुरू हुआ छात्र आंदोलन अक्टूबर में व्यापक अशांति में बदल गया। प्रारंभिक असंतोष स्कूलों की खराब सुविधाओं, शिक्षकों की कमी और शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी शिकायतों को लेकर था। बाद में महँगाई, जीवन-यापन की बढ़ती लागत और सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति जैसे मुद्दे भी आंदोलन से जुड़ गए। आखिर पेरिस सहित कई शहरों में लूटपाट, तोड़फोड़ और पुलिस से टकराव हुए। सरकार को बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी तैनात करने पड़े और कुछ क्षेत्रों में रात्रिकालीन कर्फ्यू प्रतिबंध लगाए गए। फ्रांसीसी अधिकारियों ने सुरक्षा व्यवस्था की तैयारियों और हिंसा के पूर्वानुमान में कमियों को भी स्वीकार किया। इसी समय इटली में भी जीवन-यापन की लागत, कम वेतन और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ी शिकायतों के बीच प्रदर्शन हिंसक हुए। स्पेन और पुर्तगाल में आवास की समस्या को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए हैं। हालांकि, इन सभी घटनाओं के कारण और उनका स्वरूप अलग-अलग हैं। # सवाल है कि आखिर यूरोप में असंतोष बार-बार क्यों भड़कता है? तो इसके कुछ कारण हैं जो निम्नलिखित हैं:- पहला, महँगाई, आवास और आर्थिक असुरक्षा: जब किराया, ऊर्जा, परिवहन और रोजमर्रा के खर्च बढ़ते हैं, लेकिन आय और रोजगार के अवसर उसी गति से नहीं बढ़ते, तो लोगों में व्यवस्था के प्रति नाराजगी बढ़ सकती है। युवाओं के लिए अच्छी शिक्षा, रोजगार और स्वतंत्र जीवन की संभावनाएँ सीमित महसूस होना इस असंतोष को और बढ़ा सकता है। दूसरा, सार्वजनिक सेवाओं पर दबाव: स्कूलों में शिक्षकों की कमी, जर्जर सुविधाएँ और स्थानीय सेवाओं की कमजोर स्थिति नागरिकों को यह महसूस करा सकती है कि उनकी समस्याओं को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं मिल रही। फ्रांस के हालिया आंदोलन में शिक्षा से जुड़ी शिकायतें शुरुआती मुद्दों में शामिल थीं। तीसरा, सामाजिक अलगाव और अवसरों में असमानता: कुछ शहरी और वंचित इलाकों में रोजगार, शिक्षा और सामाजिक उन्नति के अवसरों की कमी असंतोष को गहरा सकती है। यदि नागरिकों को लगता है कि संस्थाएँ उनकी बात नहीं सुनतीं या उनके साथ भेदभाव होता है, तो राज्य पर भरोसा कमजोर पड़ सकता है। लेकिन इसे हर उपद्रव का एकमात्र कारण मानना उचित नहीं होगा। चौथा, राजनीतिक ध्रुवीकरण और आंदोलन का हिंसक हो जाना: किसी जायज मांग के साथ बड़ी संख्या में लोग शांतिपूर्वक जुट सकते हैं, लेकिन कुछ समूह उसी भीड़ का इस्तेमाल तोड़फोड़, लूटपाट या पुलिस को उकसाने के लिए कर सकते हैं। सोशल मीडिया पर तेजी से फैलने वाली तस्वीरें और संदेश भी तनाव बढ़ा सकते हैं। आंदोलन की मांगों और हिंसा करने वाले व्यक्तियों की जिम्मेदारी को अलग-अलग समझना जरूरी है। पाँचवाँ, आव्रजन और राष्ट्रीय पहचान पर विवाद: यूरोप के अनेक देशों में आव्रजन, शरणार्थियों के एकीकरण, राष्ट्रीय पहचान और सार्वजनिक संसाधनों के वितरण पर राजनीतिक बहस चलती रही है। ये विवाद ध्रुवीकरण बढ़ा सकते हैं, लेकिन फ्रांस की अक्टूबर 2026 की हिंसा के लिए किसी विशेष धार्मिक या प्रवासी समुदाय को जिम्मेदार ठहराने के पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि आर्थिक असंतोष हिंसा की पृष्ठभूमि तैयार कर सकता है, लेकिन वह हिंसा को उचित नहीं ठहराता। इसी प्रकार, किसी अपराधी की पहचान या पृष्ठभूमि के आधार पर पूरे समुदाय को दोषी ठहराना भी तथ्यपरक समाधान नहीं है। # सवाल है कि उत्पाती और हिंसक भीड़ पर नियंत्रण में पुलिस क्यों पिछड़ जाती है? तो जवाब होगा कि यह इस पूरे संकट का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू है। अक्टूबर 2026 की फ्रांसीसी घटनाओं में पुलिस की विफलता के कुछ ठोस कारण सामने आए हैं। इन्हें केवल पुलिस की कमजोरी या इच्छाशक्ति की कमी कह देना अधूरा विश्लेषण होगा। एक, खुफिया आकलन और तैयारी में चूक: फ्रांस में 17 अक्टूबर के प्रदर्शनों के लिए भीड़ का अनुमान वास्तविक संख्या से काफी कम रहा। आंतरिक मंत्रालय के शुरुआती अनुमान लगभग 60,000–110,000 प्रदर्शनकारियों के थे, जबकि बाद में संशोधित अनुमान 200,000 तक पहुँचे और मंत्रालय ने वास्तविक उपस्थिति लगभग 550,000 बताई। यह सरकारी अनुमान है, स्वतंत्र रूप से सत्यापित अंतिम गणना नहीं। इतनी बड़ी भीड़ के बीच हिंसा करने वाले छोटे समूहों की पहचान और सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा कठिन हो जाती है। दो, पुलिस बल की तैनाती और संसाधनों का असंतुलन: यदि कई शहरों में एक साथ हिंसा फैलती है, तो पुलिस को लोगों की सुरक्षा, दुकानों की रक्षा, यातायात नियंत्रण और हिंसक घटनाओं पर कार्रवाई जैसे अनेक काम करने पड़ते हैं। फ्रांस की हालिया घटनाओं में पुलिसकर्मियों की संख्या और तैनाती के समय को लेकर भी सवाल उठे। तीन, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी और हिंसा करने वाले एक ही भीड़ में:पुलिस के सामने यह कठिन चुनौती रहती है कि हिंसा करने वालों पर कार्रवाई करते हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और आसपास के आम नागरिकों को नुकसान से कैसे बचाया जाए। जल्दबाजी में की गई कार्रवाई तनाव बढ़ा सकती है, जबकि देर करने पर तोड़फोड़ और लूटपाट का दायरा बढ़ सकता है। चार, पुलिस की कठोर कार्रवाई के कानूनी और सामाजिक परिणाम: फ्रांस में प्रदर्शन के दौरान बल प्रयोग की आवश्यकता, उसकी आनुपातिकता और कुछ पुलिसकर्मियों के आचरण को लेकर जाँच चलती रही है। अक्टूबर में छात्र प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में पुलिस के कथित अनुचित आचरण की 18 आंतरिक जाँचें शुरू होने की खबर आई। इसका अर्थ यह नहीं कि हर पुलिस कार्रवाई गलत थी। लेकिन बल का अनुचित प्रयोग नागरिकों का भरोसा घटा सकता है और तनाव बढ़ा सकता है। पांच, पुलिस थकान, समन्वय और बदलती परिस्थितियाँ: लगातार कई दिनों तक आंदोलन चलने पर पुलिसकर्मियों की उपलब्धता, स्थानीय इकाइयों और विशेष प्रशिक्षित बलों के बीच समन्वय तथा बदलती परिस्थितियों के अनुसार रणनीति बदलने की क्षमता महत्त्वपूर्ण हो जाती है। फ्रांस की घटनाओं में इन पहलुओं पर भी सवाल उठे हैं। # सवाल है कि क्या पुलिस को और अधिक कठोर बना देना ही समाधान है? तो जवाब होगा कि नहीं, सवाल केवल कठोरता का नहीं बल्कि समय पर कार्रवाई, निश्चित जवाबदेही, कानून का समान अनुपालन और सही रणनीति का है। यूरोप की परिषद की संसदीय सभा की 2025 की रिपोर्ट में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच संवाद, मध्यस्थता, विशेष प्रशिक्षण, नागरिकों के भरोसे और बल के सीमित व आनुपातिक उपयोग पर जोर दिया गया था। रिपोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि कुछ आंदोलनों में संगठित हिंसक समूह शांतिपूर्ण विरोध को बिगाड़ सकते हैं। पुलिस प्रशासन को तीन परिस्थितियों में अंतर करना चाहिए: एक, उपयुक्त प्रशासनिक दृष्टिकोण: शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा, संवाद और प्रदर्शन के अधिकार की रक्षा। दो, तनावपूर्ण भीड़, हिंसा का जोखिम: प्रशिक्षित बल, समन्वय, स्पष्ट चेतावनी और तनाव कम करने के उपाय। तीन, आगजनी, लूटपाट या लोगों पर हमला: त्वरित एवं लक्षित कानूनी कार्रवाई, साक्ष्य जुटाना और दोषियों की जवाबदेही। लिहाजा लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस को न तो हिंसा के सामने निष्क्रिय रहना चाहिए, न ही पूरी भीड़ को अपराधी मान लेना चाहिए। # आखिर हिंसक भीड़ से निपटने का ठोस और दीर्घकालिक इलाज क्या है? पहला, बेहतर पूर्वानुमान और खुफिया समन्वय: बड़े प्रदर्शनों के संभावित आकार, संवेदनशील स्थानों और हिंसा के जोखिम का समय रहते आकलन किया जाए। वैध प्रदर्शन और हिंसा की तैयारी में अंतर रखा जाए; केवल राजनीतिक विचारों के आधार पर लोगों को संदिग्ध न माना जाए। दूसरा, प्रशिक्षित पुलिस और स्पष्ट कमान: भीड़ प्रबंधन के लिए विशेष प्रशिक्षण, एकीकृत कमान, पर्याप्त संसाधन और नागरिकों को सुरक्षित रखने की स्पष्ट जिम्मेदारी हो। बल का प्रयोग कानून के अनुसार आवश्यक और आनुपातिक होना चाहिए। तीसरा, अपराधियों की पहचान और शीघ्र न्याय: जहाँ कानूनी रूप से अनुमत हो, वहाँ उपलब्ध वीडियो, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और अन्य विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय की जाए। गिरफ्तारी, अभियोजन और न्यायिक प्रक्रिया कानून के अनुरूप हो; निर्दोष लोगों को सामूहिक दंड न दिया जाए। चौथा, पुलिस की जवाबदेही भी सुनिश्चित हो: कार्रवाई की स्वतंत्र समीक्षा, शिकायतों की निष्पक्ष जाँच और गलत आचरण पर उचित दंड आवश्यक हैं। इससे पुलिस का अधिकार कमजोर नहीं, बल्कि उसकी वैधता और नागरिकों का विश्वास मजबूत होता है। पाँचवाँ, सामाजिक असंतोष के मूल कारणों पर काम: शिक्षा, रोजगार, आवास, सार्वजनिक सेवाओं और भेदभाव से जुड़ी शिकायतों को गंभीरता से सुना जाए। केवल पुलिस बल बढ़ाकर उन समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता जो लगातार नई अशांति को जन्म देती हैं। # आखिर भारत के लिए इसमें क्या सबक निहित है? फ्रांस का अनुभव भारत के लिए भी प्रासंगिक है, क्योंकि भारत में भी बड़े जनसमूह, राजनीतिक रैलियाँ, धार्मिक आयोजन, छात्र आंदोलन और स्थानीय विरोध-प्रदर्शन पुलिस प्रशासन के सामने अलग-अलग चुनौतियाँ पैदा कर सकते हैं। भारत के संदर्भ में पाँच सबक महत्त्वपूर्ण हैं: एक, कानून का समान पालन: राजनीतिक समर्थन, विरोध या सामाजिक पहचान के आधार पर कार्रवाई का मानक नहीं बदलना चाहिए। दो, भीड़ से पहले तैयारी: आयोजकों, स्थानीय प्रशासन, आपातकालीन सेवाओं और पुलिस के बीच समन्वय हो। तीन, हिंसा पर लक्षित कार्रवाई: शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और हिंसा करने वालों को अलग-अलग देखा जाए। चार, डिजिटल साक्ष्य और जवाबदेही: अफवाहों की जाँच हो, साक्ष्य सुरक्षित रखे जाएँ और गलत सूचना फैलाने वालों पर भी कानून के अनुसार कार्रवाई हो। पांच, नागरिक विश्वास: पुलिस की निष्पक्षता, पारदर्शिता और शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई को प्राथमिकता मिले। इन उपायों का उद्देश्य केवल भीड़ को तितर-बितर करना नहीं, बल्कि हिंसा को रोकना और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है। # वस्तुत: समस्या पुलिस की ताकत से बड़ी है: फ्रांस की अक्टूबर 2026 की घटनाएँ दिखाती हैं कि बड़े पैमाने की अशांति में खुफिया आकलन की चूक, अपर्याप्त या असंतुलित तैनाती, पुलिस थकान और आंदोलन के भीतर हिंसक समूहों की मौजूदगी मिलकर गंभीर संकट पैदा कर सकते हैं। दूसरी ओर, बल का अनुचित प्रयोग और सामाजिक शिकायतों की उपेक्षा भी संस्थाओं के प्रति अविश्वास बढ़ा सकती है। लोकतांत्रिक राज्य की असली परीक्षा यह है कि वह शांतिपूर्ण विरोध की रक्षा करे, हिंसक अपराधों को रोके और दोनों काम कानून की मर्यादा में रहते हुए करे। केवल दमन से असंतोष समाप्त नहीं होता और केवल संवाद से तत्काल हिंसा नहीं रुकती। प्रभावी व्यवस्था को दोनों की जरूरत है—अपराध पर निष्पक्ष कानूनी कार्रवाई और असंतोष के कारणों का गंभीर समाधान। यही दृष्टिकोण पुलिस प्रशासन को प्रभावी तथा लोकतंत्र को अधिक सुरक्षित बना सकता है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 24 Oct 2026 1:19 pm

Election Commission को घेरने चले थे SY Quraishi, Kanwal Sibal ने दिखा दिया आईना तो खेलने लगे Victim Card

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी इन दिनों चुनाव आयोग और मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर लगातार सवाल उठा रहे हैं। अब इस मुद्दे पर उनकी भिड़ंत पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल से हो गई है। कंवल सिब्बल ने कुरैशी के हमलावर रुख पर सवाल उठाते हुए इसे व्यक्तिगत रंजिश जैसा बताया है। वहीं इस टकराव ने कुरैशी को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल यह है कि जिस चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और मजबूती का कभी कुरैशी खुद बचाव करते थे, आज उसी संस्था पर उनके लगातार हमलों के पीछे आखिर वजह क्या है? हम आपको याद दिला दें कि जुलाई 2026 में एक साक्षात्कार के दौरान कुरैशी ने अपने कार्यकाल का हवाला देते हुए कहा था कि तत्कालीन यूपीए सरकार के दौरान चुनाव आयोग पर कोई दबाव नहीं था। उन्होंने आयोग की स्वतंत्रता और साख का जिक्र करते हुए कहा था कि उसकी स्थिति ऐसी थी कि कोई उस पर दबाव डालने की हिम्मत नहीं करता था और चुनाव की तारीखों की जानकारी भी सरकार को घोषणा के समय ही मिलती थी। लेकिन सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और मजबूती को केवल कुरैशी के कार्यकाल से जोड़कर देखा जाना चाहिए? आयोग आज भी एक संवैधानिक संस्था है और उसकी कार्यप्रणाली को लेकर उठाए जा रहे सवालों का जवाब तथ्यों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर दिया जाना चाहिए, न कि लगातार आरोप लगाकर उसकी साख पर संदेह पैदा करके। आखिर कुरैशी जिस संस्थागत स्वतंत्रता को कभी अपनी उपलब्धि बताते थे, आज उसी संस्था के प्रति उनका रवैया किस आधार पर बदल गया है? इसे भी पढ़ें: भारतीय मूल की Navi Pillay को Nobel Peace Prize मिलने पर India क्यों नहीं दे रहा बधाई? कारण जानकर चौंक जाएँगे! सुप्रीम कोर्ट में मामला, फिर भी सोशल मीडिया पर फैसला सुनाने की जल्दबाजी! कंवल सिब्बल ने इसी बिंदु पर कुरैशी को घेरा है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा है कि कुरैशी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ लगातार हमलावर हैं और उनका रवैया व्यक्तिगत हिसाब-किताब चुकाने जैसा लगता है। सिब्बल ने साफ कहा कि मामला जब सुप्रीम कोर्ट के सामने विचाराधीन है, तब अपनी तरफ से अंतिम निष्कर्ष निकालकर उसे प्रचारित करना उचित नहीं है। उन्होंने कुरैशी को आगाह किया कि ऐसा करके वह अपनी ही प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा रहे हैं। सिब्बल ने लिखा है कि उनका मकसद ट्रोलिंग नहीं, बल्कि भारतीय चुनाव व्यवस्था को बदनाम करने की कोशिश पर सवाल उठाना है। लेकिन कुरैशी ने जवाब में मुद्दे का सामना करने के बजाय ट्रोलिंग का कार्ड खेल दिया। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि वह वर्षों से दो रुपये वाले ट्रोल्स का सामना कर रहे हैं, तो क्या अब किसी पूर्व विदेश सचिव की ट्रोलिंग को विशेष सम्मान समझें? यहां सवाल यह है कि क्या किसी वरिष्ठ राजनयिक की आलोचना को ट्रोलिंग बताकर खारिज कर देना पर्याप्त जवाब है? देखा जाये तो कंवल सिब्बल ने उनके तर्कों पर सवाल उठाए थे, लेकिन कुरैशी ने बहस को व्यक्तिगत कटाक्ष की दिशा में मोड़ दिया। अपने कार्यकाल का हिसाब देने से क्यों बच रहे हैं कुरैशी? हम आपको यह भी बता दें कि सोशल मीडिया पर कुरैशी को घेरने वाले यूजर्स ने एक और असहज सवाल उठाया है। एक यूजर ने लिखा है कि जब वह खुद मुख्य चुनाव आयुक्त थे, तब मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर जैसी कवायद क्यों नहीं हुई? क्या मतदाता सूची को साफ-सुथरा रखना जरूरी नहीं था? क्या मृत, स्थानांतरित और अन्य अयोग्य श्रेणियों में आने वाले नामों की जांच नहीं होनी चाहिए? और क्या मतदाता सूची में केवल भारतीय नागरिकों को शामिल करने की कानूनी शर्त का पालन नहीं होना चाहिए? देखा जाये तो ये सवाल अपने आप में विचारणीय हैं। मतदाता सूची की शुद्धता और किसी पात्र नागरिक का वोट न छिनना, दोनों ही चुनावी व्यवस्था की बुनियादी जरूरतें हैं। इसलिए एसआईआर पर कुरैशी की मौजूदा आपत्तियों का मूल्यांकन करते समय उनके अपने कार्यकाल के रिकॉर्ड को सामने रखना भी जरूरी है। साथ ही यह विवाद इसलिए भी दिलचस्प है कि कुरैशी का पुराना रिकॉर्ड पूरी तरह सवालों से परे नहीं रहा। फरवरी 2020 में चुनाव आयोग ने उनके एक लेख पर जवाब देते हुए कहा था कि उनके कार्यकाल में आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के कुछ मामलों में जनप्रतिनिधित्व कानून और भारतीय दंड संहिता के संबंधित प्रावधानों के तहत कार्रवाई नहीं हुई थी। हम आपको यह भी बता दें कि सोशल मीडिया पर कुछ यूजर्स ने कुरैशी के दृष्टिकोण, वैचारिक झुकाव और पाकिस्तान के चुनावों को कथित रूप से निष्पक्ष बताने संबंधी उनके पुराने बयानों पर सवाल उठाए हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि किसी भी संवैधानिक संस्था की आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन आलोचना करने वाले की अपनी कसौटियां भी जांच के दायरे में आती हैं। यदि कुरैशी का मानना है कि एसआईआर गलत है, तो उन्हें ठोस आंकड़ों, कानूनी तर्कों और प्रमाणों के साथ अपनी बात रखनी चाहिए। केवल तीखे आरोपों और सार्वजनिक अभियानों से किसी संस्था की विश्वसनीयता पर सवाल तो उठाया जा सकता है लेकिन आरोपों को प्रमाणित करना भी जरूरी होता है। कंवल सिब्बल की आपत्ति का कारण भी यही है। कुरैशी कभी उस संस्था के मुखिया थे, जिसकी स्वतंत्रता और साख पर उन्हें गर्व था। आज वही संस्था उनके निशाने पर है। उनके रुख में यह बदलाव किन तथ्यों और अनुभवों के कारण आया, इसका जवाब उन्हें देना चाहिए। बहरहाल, सवाल उठता है कि क्या कुरैशी वास्तव में चुनावी सुधारों की लड़ाई लड़ रहे हैं, या मौजूदा आयोग के खिलाफ राजनीतिक अविश्वास की मुहिम में अपनी पूर्व संवैधानिक हैसियत का इस्तेमाल कर रहे हैं? उनकी मंशा पर अंतिम फैसला तथ्यों के आधार पर ही होगा, लेकिन उनके पुराने बयानों और मौजूदा आक्रामकता के बीच का अंतर इतना बड़ा है कि जवाब मांगना जरूरी हो गया है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 24 Oct 2026 1:14 pm

बदलती दुनिया में अप्रासंगिक होता संयुक्त राष्ट्र

दुनिया के 50 देशों ने वर्ष 1945 में मिलकर संयुक्त राष्ट्र अधिकार पत्र पर हस्ताक्षर कर संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन किया था, जिसके बाद से प्रतिवर्ष 24 अक्तूबर को संयुक्त राष्ट्र दिवस मनाया जाता है। दरअसल द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को अधिक समतापूर्ण और न्यायोचित बनाने के लिए एक नए संगठन की स्थापना का विचार उभरा था, जो पांच राष्ट्रमंडल सदस्यों तथा आठ यूरोपीय निर्वासित सरकारों द्वारा 12 जून 1941 को लंदन में हस्ताक्षरित अंतर-मैत्री उद्घोषणा में पहली बार सार्वजनिक रूप से अभिव्यक्त हुआ था। उस उद्घोषणा के अंतर्गत एक स्वतंत्र विश्व के निर्माण हेतु कार्य करने का आव्हान किया गया था, जिसमें लोग शांति और सुरक्षा के साथ भयमुक्त वातावरण में रह सकें तथा निजीकरण एवं आर्थिक सहयोग के मार्ग की खोज कर सकें। उसके बाद 1944 में सोवियत संघ, अमेरिका, चीन तथा ब्रिटेन के प्रतिनिधियों द्वारा वाशिंगटन के डम्बर्टन ओक्स एस्टेट में कई बैठकों के आयोजन के बाद एक शांतिरक्षक वैश्विक संस्था बनाने की रूपरेखा तैयार की गई, जिसके आधार पर 50 देशों के प्रतिनिधियों के बीच 1945 में बातचीत हुई और 26 जून 1945 को सभी 50 देशों द्वारा चार्टर पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद यह चार्टर 24 अक्तूबर 1945 से प्रभावी हो गया। तभी से प्रतिवर्ष 24 अक्तूबर को ‘संयुक्त राष्ट्र दिवस’ मनाया जाने लगा। अंतर्राष्ट्रीय संघर्षों में हस्तक्षेप करने के उद्देश्य से स्थापित करते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ को इतनी शक्तियां प्रदान की गई कि वह अपने सदस्य देशों की सेनाओं को विश्व शांति के लिए कहीं भी तैनात कर सकता है। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के बाद से ही दुनिया के अनेक देश इसके साथ जुड़ते गए और 50 सदस्यों के साथ शुरू हुए इस वैश्विक संघ के सदस्य देशों की संख्या अब 193 हो चुकी है। संयुक्त राष्ट्र की संरचना में सुरक्षा परिषद वाले सबसे शक्तिशाली देश थे अमेरिका, फ्रांस, रूस तथा यूनाइटेड किंगडम, जिनकी द्वितीय विश्वयुद्ध में अहम भूमिका थी। संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्य उद्देश्यों में युद्ध रोकना, मानवाधिकारों की रक्षा करना, सभी देशों के बीच मित्रवत संबंध कायम करना, अंतर्राष्ट्रीय कानूनों को निभाने की प्रक्रिया जुटाना, सामाजिक एवं आर्थिक विकास, निर्धन तथा भूखे लोगों की सहायता करना, उनका जीवन स्तर सुधारना, बीमारियों से लड़ना इत्यादि शामिल हैं और इन उद्देश्यों को निभाने के लिए 1948 में मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा प्रमाणित की गई। हालांकि विड़म्बना है कि संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के इन 81 वर्षों में यह वैश्विक संस्था अब धीरे-धीरे अपनी प्रासंगिकता खोने लगी है। दरअसल बीते 81 वर्षों से अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, अर्थव्यवस्था, हथियार, मीडिया, समाज, मुद्रा तथा समाज से संबंधित तमाम नीतियां इसके पांच स्थायी सदस्य देशों ब्रिटेन, अमेरिका, चीन, रूस तथा फ्रांस के राष्ट्रीय हितों के अनुरूप ही निर्धारित की जाती रही हैं, जिस कारण ऐसी नीतियों का खामियाजा भारत के अलावा जापान, जर्मनी, आस्ट्रेलिया, इजरायल, दक्षिण कोरिया, ब्राजील, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात जैसे कई अन्य देशों को भुगतना पड़ा है, जो संयुक्त राष्ट्र महासभा की स्थायी सदस्यता के लिए तमाम मानदंडों को पूरा करने के बाद भी दशकों से सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य बनने के लिए प्रयासरत हैं। इसे भी पढ़ें: United Nations Day 2026: संयुक्त राष्ट्र की साख पर सवाल, सुधार से ही बचेगी प्रतिष्ठा संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के आठ दशकों में विश्व के सामरिक और आर्थिक समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं लेकिन इतना लंबा समय बीत जाने और तमाम वैश्विक समीकरण पूर्ण रूप से बदल जाने के बावजूद वीटो अधिकार वाले पांचों स्थायी सदस्यों में से कोई भी अपने वीटो अधिकार और स्थायी सीट को छोड़ने को तैयार नहीं है। हालांकि स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने पर संयुक्त राष्ट्र में आम सहमति है लेकिन चीन को खासकर एशिया से वीटो अधिकार वाले सदस्यों की संख्या बढ़ाना किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं है, जहां स्थायी सदस्यता के दोनों दावेदारों (भारत और जापान) पर वह विभिन्न कारणों से संदेह करता है। भारत ने जिस चीन को मान्यता देने में पहल की थी और सुरक्षा परिषद में उसकी स्थायी सीट को सिद्धांत के तौर पर लेने से मना कर दिया था, आज वही चीन भारत की स्थायी सदस्यता के मार्ग में रोड़े अटका रहा है। भारत चीन के वीटो पावर के कारण ही सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य नहीं बन पा रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा पारित किए जाने वाले प्रस्ताव बाध्यकारी प्रकृति के नहीं होते। आश्चर्य की बात है कि महासभा में 193 सदस्य देशों द्वारा पारित किए जाने वाले प्रस्ताव भी सुरक्षा परिषद के 5 स्थायी सदस्यों की सहमति पर ही निर्भर करते हैं। इसीलिए अनेक देशों द्वारा इसमें सुधार किए जाने की मांग बीते कई वर्षों से निरंतर की जा रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए भारत की दावेदारी की वकालत करते हुए कह चुके हैं कि नई ताकतों को केन्द्रीय भूमिका में लाए बिना दुनिया की यह सबसे बड़ी पंचायत स्वयं से की जाने वाली अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पाएगी। दुनिया के कई देश बार-बार कहते रहे हैं कि संयुक्त राष्ट्र का ढ़ांचा अब पुराना पड़ चुका है और इसकी स्थापना के समय जो परिस्थितियां थी, वे अब बहुत पुरानी हो चुकी हैं। इसलिए यदि यह वैश्विक संस्था अपने भीतर समयानुकूल सुधार नहीं लाती है तो कालांतर में यह महत्वहीन होती चली जाएगी। रूस-यूक्रेन युद्ध हो या इजरायल-फिलस्तीन अथवा अमेरिका-ईरान युद्ध, इन संघर्षों में दोनों ही पक्षों के हजारों बेगुनाह लोग मारे जा रहे हैं, हजारों परिवार उजड़ चुके हैं, लाखों की आबादी पलायन की त्रासदी से जूझ रही है, शहर के शहर मलबे में तब्दील हो रहे हैं लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ इन संघर्षों को रोकने के लिए कुछ नहीं कर सका है। इसीलिए दुनिया में जगह-जगह युद्ध टालने के लिए संयुक्त राष्ट्र की ओर से ठोस योजनाओं पर अमल किए जाने की जरूरत महसूस होती रही है क्योंकि इस वैश्विक संस्था का गठन ही दुनिया में अमन-चैन कायम रखने के उद्देश्य के साथ किया गया था लेकिन चिंता की बात है कि इन युद्धों में उसकी निष्क्रियता समूची मानव सभ्यता पर भारी पड़ रही है। भीषण होते इन युद्धों के कारण दुनिया अब दो धड़ों में बंटती जा रही है और संयुक्त राष्ट्र के अधिकांश सदस्य देश भी अब केवल बयान जारी करने से आगे नहीं बढ़ रहे। बहरहाल, यदि अभी भी संयुक्त राष्ट्र के पुनर्गठन की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती है तो यह संस्था आने वाले समय में अपना महत्व खो देगी। सही मायनों में दुनिया की इस सबसे बड़ी पंचायत को अब गंभीर आत्ममंथन की जरूरत के साथ पर्याप्त सुधारों की सख्त दरकार है। - योगेश कुमार गोयल (लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और हिन्दी अकादमी दिल्ली के सौजन्य से प्रकाशित ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ पुस्तक के लेखक हैं)

प्रभासाक्षी 24 Oct 2026 12:55 pm

महाराष्ट्र: मनोज जरांगे से जुड़े वायरल ऑडियो पर शिवसेना का पलटवार, कहा- 'शिंदे की छवि खराब करना बर्दाश्त नहीं'

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समाचार नामा 24 Oct 2026 12:24 pm

Jio IPO: जियो प्लेटफार्म्स के IPO ने बनाया विश्व रिकॉर्ड, 1.38 करोड़ से ज्यादा आवेदन; 22 गुना हुआ सब्सक्राइब

जियो प्लेटफार्म्स के आईपीओ में संस्थागत निवेशकों की ओर से भी जबरदस्त मांग देखने को मिली। योग्य संस्थागत खरीदारों (QIB) की कैटेगरी 70.55 गुना सब्सक्राइब हुई। वहीं, गैर-संस्थागत निवेशकों (NII) की कैटेगरी में करीब 14 गुना सब्सक्रिप्शन दर्ज किया गया।

देशबन्धु 24 Oct 2026 11:55 am

बिहार में एमएलसी चुनाव में एनडीए की सभी सीटों पर जीत तय : रामकृपाल यादव

बिहार में एमएलसी चुनाव में एनडीए की सभी सीटों पर जीत तय : रामकृपाल यादव

समाचार नामा 24 Oct 2026 10:42 am

हिमाचल प्रदेश को केंद्र सरकार की बड़ी सौगात, 320 नई पीजी मेडिकल सीटों को मंजूरी

हिमाचल प्रदेश को केंद्र सरकार की बड़ी सौगात, 320 नई पीजी मेडिकल सीटों को मंजूरी

समाचार नामा 24 Oct 2026 10:30 am

Jamia University: दीवारों पर ‘फ्री कश्मीर’ और ‘फ्री शरजील इमाम’ के नारे मिलने का दावा, परिसर के बाहर पुलिस तैनात

Jamia University: दीवारों पर ‘फ्री कश्मीर’ और ‘फ्री शरजील इमाम’ के नारे मिलने का दावा, परिसर के बाहर पुलिस तैनात

समाचार नामा 24 Oct 2026 8:41 am

ओडिशा को 'इंडिया केम 2026' में 53,893 करोड़ रुपए के निवेश प्रस्ताव मिले

ओडिशा को 'इंडिया केम 2026' में 53,893 करोड़ रुपए के निवेश प्रस्ताव मिले

समाचार नामा 23 Oct 2026 11:44 pm

केरल लोक भवन के शाकाहारी किचन विवाद पर यासर जिलानी ने कांग्रेस को घेरा, बताया तुष्टिकरण की राजनीति

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समाचार नामा 23 Oct 2026 10:28 pm

जामिया यूनिवर्सिटी में बवाल के बीच इमरान मसूद हिरासत में, 'फ्री कश्मीर' नारों पर सियासत तेज

छात्रसंघ चुनाव की मांग को लेकर जारी आंदोलन के बीच विवादित नारों ने बढ़ाया तनाव, एबीवीपी ने FIR और जांच की मांग उठाई

देशबन्धु 23 Oct 2026 10:12 pm

उत्तर प्रदेश: युवती को गोली मारने के मामले में एनसीडब्ल्यू सख्त, डीजीपी से मांगी रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश: युवती को गोली मारने के मामले में एनसीडब्ल्यू सख्त, डीजीपी से मांगी रिपोर्ट

समाचार नामा 23 Oct 2026 8:31 pm

अब समय आ गया है सत्ताधारी भाजपा लोगों की बढ़ती नाराजगी पर ध्यान दे : शशि थरूर

अब समय आ गया है सत्ताधारी भाजपा लोगों की बढ़ती नाराजगी पर ध्यान दे : शशि थरूर

समाचार नामा 23 Oct 2026 6:32 pm

यूपी चुनाव 2027: ओवैसी पर नसीम सिद्दीकी का निशाना, बोले- जनता को सावधान रहने की जरूरत

यूपी चुनाव 2027: ओवैसी पर नसीम सिद्दीकी का निशाना, बोले- जनता को सावधान रहने की जरूरत

समाचार नामा 23 Oct 2026 6:24 pm

पावर कट के बीच 'संकटमोचक' बनी हरियाणा पुलिस, हड़ताल के बीच बहाल कराई बिजली आपूर्ति

पावर कट के बीच 'संकटमोचक' बनी हरियाणा पुलिस, हड़ताल के बीच बहाल कराई बिजली आपूर्ति

समाचार नामा 23 Oct 2026 6:05 pm

महाराष्ट्र: मंत्री गिरीश महाजन ने राज्यपाल को दिया सिंहस्थ कुंभ मेला ध्वजारोहण समारोह का निमंत्रण, राष्ट्रपति भी रहेंगी मौजूद

महाराष्ट्र: मंत्री गिरीश महाजन ने राज्यपाल को दिया सिंहस्थ कुंभ मेला ध्वजारोहण समारोह का निमंत्रण, राष्ट्रपति भी रहेंगी मौजूद

समाचार नामा 23 Oct 2026 5:33 pm

मांझे से मौत: कर्नाटक के डिप्टी सीएम की चेतावनी, लापरवाही से इस्तेमाल पर लग सकते हैं आपराधिक आरोप

मांझे से मौत: कर्नाटक के डिप्टी सीएम की चेतावनी, लापरवाही से इस्तेमाल पर लग सकते हैं आपराधिक आरोप

समाचार नामा 23 Oct 2026 4:37 pm

प्रशासनिक सुधारों और क्षमता विकास में उत्तर प्रदेश देश के लिए रोल मॉडल : डॉ. जितेंद्र सिंह

प्रशासनिक सुधारों और क्षमता विकास में उत्तर प्रदेश देश के लिए रोल मॉडल : डॉ. जितेंद्र सिंह

समाचार नामा 23 Oct 2026 4:35 pm

केरल : शपथ के एक घंटे बाद ही विवादों में घिरे राज्यपाल माथुर, कांग्रेस ने खाद्य निर्देशों का किया विरोध

केरल : शपथ के एक घंटे बाद ही विवादों में घिरे राज्यपाल माथुर, कांग्रेस ने खाद्य निर्देशों का किया विरोध

समाचार नामा 23 Oct 2026 4:33 pm

प्रियंका चतुर्वेदी ने रेहान वाड्रा की फोटो प्रदर्शनी से तस्वीरें हटाने के फैसले पर उठाए सवाल, आनंद दुबे ने बताया सही

प्रियंका चतुर्वेदी ने रेहान वाड्रा की फोटो प्रदर्शनी से तस्वीरें हटाने के फैसले पर उठाए सवाल, आनंद दुबे ने बताया सही

समाचार नामा 23 Oct 2026 4:15 pm

'ये गांधी का देश है, उनके तरीकों से ही सब होगा', पीएम मोदी के बयान पर बोले मनोज झा

'ये गांधी का देश है, उनके तरीकों से ही सब होगा', पीएम मोदी के बयान पर बोले मनोज झा

समाचार नामा 23 Oct 2026 2:53 pm

महाराष्ट्र एमएलसी चुनाव : पांच सीटों के लिए मतदान, महायुति और एमवीए ने जीत का दावा किया

महाराष्ट्र एमएलसी चुनाव : पांच सीटों के लिए मतदान, महायुति और एमवीए ने जीत का दावा किया

समाचार नामा 23 Oct 2026 2:44 pm

इलाहाबाद-झांसी स्नातक एमएलसी चुनाव के लिए मतदान जारी, 152 बूथों पर कड़ी सुरक्षा

इलाहाबाद-झांसी स्नातक एमएलसी चुनाव के लिए मतदान जारी, 152 बूथों पर कड़ी सुरक्षा

समाचार नामा 23 Oct 2026 2:41 pm

'स्टिंग ऑपरेशन' को हल्के में ले रही कर्नाटक सरकार : एचडी कुमारस्वामी

'स्टिंग ऑपरेशन' को हल्के में ले रही कर्नाटक सरकार : एचडी कुमारस्वामी

समाचार नामा 23 Oct 2026 2:37 pm

सीएम शिवकुमार ने पोलैंड के पीएम टस्क से की मुलाकात, 'ग्लोबल इन्वेस्टर्स मीट 2027' के लिए साझेदार बनने का दिया निमंत्रण

बेंगलुरु, 23 अक्टूबर (आईएएनएस)। कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने शुक्रवार को बेंगलुरु के एक निजी होटल में पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क के साथ द्विपक्षीय बातचीत की। पोलैंड के प्रधानमंत्री टस्क और उनका प्रतिनिधिमंडल गुरुवार रात दिल्ली से बेंगलुरु पहुंचे, जहां वे कई कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे।

समाचार नामा 23 Oct 2026 2:37 pm

अक्टूबर में भारत की कारोबारी गतिविधियां 4 महीने के उच्च स्तर पर पहुंची: पीएमआई डेटा

नई दिल्ली, अक्टूबर में भारत के निजी क्षेत्र की कारोबारी गतिविधियों (बिजनेस एक्टिविटी) में जोरदार तेजी दर्ज की गई और यह चार महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई।

देशबन्धु 23 Oct 2026 1:33 pm

सपा की सियासत में आजम की ताकत और रामपुर जेल का सियासी फलसफा

उत्तर प्रदेश की राजनीति में रामपुर की जेल सिर्फ एक चारदीवारी नहीं, बल्कि वर्तमान में समाजवादी पार्टी के भविष्य और मुस्लिम सियासत के नए ध्रुवीकरण का केंद्र बन चुकी है। 22 अक्टूबर 2026 को सपा प्रमुख अखिलेश यादव और पार्टी के सबसे कद्दावर मुस्लिम चेहरे आजम खान के बीच रामपुर जिला जेल में हुई लगभग एक घंटे की मुलाकात केवल दो नेताओं की शिष्टाचार भेंट नहीं थी। यह उत्तर प्रदेश के आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात पर चली गई एक ऐसी चाल है, जिसके दूरगामी परिणाम न केवल समाजवादी पार्टी के भीतर, बल्कि पूरे राज्य के सामाजिक-राजनीतिक ताने-बाने पर दिखाई देंगे। कानूनी शिकंजे में फंसे और चुनावी राजनीति से तकनीकी रूप से दूर हो चुके आजम खान की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके एक इशारे पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की दर्जनों सीटों का गणित बदल सकता है। यही कारण है कि अखिलेश यादव को खुद रामपुर जेल पहुंचकर यह संदेश देना पड़ा कि समाजवादी पार्टी में आजम खान की हैसियत न तो कम हुई है और न ही उन्हें हाशिए पर धकेला जा सकता है। यह मुलाकात इस बात का जीवंत प्रमाण है कि सत्ता और कानूनी मुकदमों के उतार-चढ़ाव के बावजूद, सपा की सियासत में आजम की ताकत का सूरज पूरी तरह अस्त नहीं हुआ है, बल्कि रामपुर जेल की सलाखों के पीछे से वह एक नई ऊर्जा के साथ उभर रहा है। यह घटनाक्रम यह भी दर्शाता है कि जब-जब उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन या बड़े राजनैतिक उलटफेर की नींव रखी जाती है, तब-तब रामपुर का किला और वहां का नेतृत्व स्वतः ही मुख्यधारा की चर्चा के केंद्र में आ जाता है। इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए समाजवादी पार्टी के अंतर्विरोधों और उत्तर प्रदेश के बदलते मुस्लिम नेतृत्व के संकट को देखना जरूरी है। पिछले कुछ समय से यह चर्चा आम थी कि आजम खान के जेल जाने और उनके परिवार पर आए कानूनी संकट के दौरान समाजवादी पार्टी ने उस आक्रामकता के साथ उनका साथ नहीं दिया, जिसकी उम्मीद एक संस्थापक सदस्य को होती है। पार्टी के भीतर और बाहर इस बात को लेकर सुगबुगाहट थी कि अखिलेश यादव अपनी छवि को एक नए, आधुनिक और गैर-विवादास्पद रूप में ढालने के लिए 'माई' (मुस्लिम-यादव) समीकरण से थोड़ा इतर 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नारा दे रहे हैं। इस नए विमर्श में आजम खान जैसे पुराने समाजवादी दिग्गजों की कट्टर छवि फिट नहीं बैठ रही थी। इसी बीच, असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम और अन्य क्षेत्रीय दलों ने इस खालीपन को भरने की कोशिश शुरू कर दी। ओवैसी लगातार यह आरोप लगाते रहे कि सपा मुस्लिमों के वोट तो लेती है, लेकिन जब उनके बड़े नेताओं पर संकट आता है, तो नेतृत्व चुप्पी साध लेता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जो कभी आजम खान का अभेद्य किला माना जाता था, वहां मुस्लिम मतदाताओं के बीच उपजे इस असमंजस को अखिलेश यादव भांप चुके थे। रामपुर लोकसभा उपचुनाव और उसके बाद के घटनाक्रमों में जिस तरह से अंदरूनी गुटबाजी सामने आई, उसने पार्टी आलाकमान को सचेत कर दिया कि आजम खान को नजरअंदाज करने की कीमत २०२७ में बेहद भारी पड़ सकती है। इसलिए, अखिलेश यादव का रामपुर जेल जाना राजनीतिक मजबूरी भी था और एक सोची-समझी रणनीति भी, जिसके जरिए उन्होंने एक ही झटके में ओवैसी के नैरेटिव को ध्वस्त करने और अपने कोर वोटर को यह भरोसा दिलाने का प्रयास किया कि 'नेताजी' (मुलायम सिंह यादव) के दौर के स्तंभ आज भी उतने ही आदरणीय हैं। यह कदम यह भी स्पष्ट करता है कि सपा अपने पारंपरिक और वफादार वोट बैंक को किसी भी अन्य वैचारिक प्रयोग की वेदी पर होम करने के लिए तैयार नहीं है। इसे भी पढ़ें: SP सच में मुसलमानों की हितैषी है तो Muslim CM का चेहरा घोषित करे: अखिलेश को OP राजभर की सीधी चुनौती जेल की इस मुलाकात ने न केवल सपा के कार्यकर्ताओं में नया जोश भरा है, बल्कि पार्टी के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान पर भी एक तरह से विराम लगाने का काम किया है। हाल के दिनों में रामपुर के वर्तमान सांसद मोहिबुल्लाह नदवी और आजम खान के समर्थकों के बीच की दूरी जगजाहिर रही है। स्थानीय स्तर पर संगठन दो धड़ों में बंटा नजर आ रहा था। अखिलेश यादव ने जेल से बाहर आकर जिस तरह आजम थे, आजम हैं और आजम रहेंगे का हुंकार भरा, उससे उन्होंने यह साफ कर दिया कि रामपुर और पूरे रूहेलखंड क्षेत्र में समाजवादी पार्टी का चेहरा और कमान आज भी परोक्ष रूप से आजम खान के पास ही रहेगी। खबरों के मुताबिक, इस मुलाकात के दौरान आजम खान की पत्नी तंजीन फातिमा ने अखिलेश यादव को संभावित उम्मीदवारों और रणनीतिक बदलावों की एक सूची भी सौंपी। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि २०२७ के विधानसभा चुनावों में टिकटों के बंटवारे से लेकर गठबंधन के स्वरूप तक, आजम खान की राय को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी। भले ही आजम खान खुद चुनावी मैदान में न उतर सकें, लेकिन उनका 'रिमोट कंट्रोल' यूपी की सियासत में बेहद प्रभावी रहने वाला है। उनका यही प्रभाव अखिलेश यादव को उनके पास खींच लाया, क्योंकि वे जानते हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुस्लिम समाज में आजम खान की आवाज आज भी एक भावनात्मक अपील रखती है, जिसे कोई दूसरा नेता रिप्लेस नहीं कर पाया है। यह प्रभाव केवल रामपुर तक सीमित नहीं है, बल्कि मुरादाबाद, बिजनौर, बरेली और अमरोहा जैसे पूरे मुस्लिम बहुल बेल्ट में आजम खान की राजनीतिक छत्रछाया आज भी टिकटार्थियों के भाग्य का फैसला करने की क्षमता रखती है। दूसरी तरफ, इस मुलाकात ने विपक्षी खेमे, विशेषकर भारतीय जनता पार्टी को एक बार फिर सपा पर हमलावर होने का मौका दे दिया है। भाजपा ने इसे तुष्टिकरण की राजनीति का नया अध्याय और अपराधियों को संरक्षण देने की कोशिश करार दिया है। सत्ताधारी दल का तर्क है कि कानून सम्मत कार्रवाई के तहत जेल में बंद एक सजायाफ्ता नेता से राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री की यह मुलाकात यह दर्शाती है कि सपा आज भी अपने पुराने ढर्रे और तुष्टिकरण की नीति से बाहर नहीं निकल पाई है। भाजपा के रणनीतिकार इस मुलाकात को बहुसंख्यक मतदाताओं के बीच भुनाने की कोशिश करेंगे, ताकि सपा के खिलाफ एक बार फिर ध्रुवीकरण का माहौल बनाया जा सके। भाजपा के लिए यह मुलाकात एक ऐसा हथियार है जिसके जरिए वे यह साबित करने की कोशिश करेंगे कि अखिलेश यादव का 'पीडीए' सिर्फ एक मुखौटा है, और असलियत में वे उसी पुरानी राजनीति की ओर लौट रहे हैं जिसे जनता ने नकारा था। सुभासपा और अन्य छोटे दलों ने भी इसे केवल एक 'चुनावी नौटंकी' बताया है। विपक्ष का यह तीखा हमला दिखाता है कि वे भी अच्छी तरह जानते हैं कि आजम और अखिलेश का यह पुनर्मिलन अगर जमीन पर रंग लाया, तो विपक्षी दलों के लिए मुस्लिम वोटों में सेंध लगाना नामुमकिन हो जाएगा। भाजपा की ओर से आने वाले तीखे बयान इस बात का भी संकेत हैं कि वे आने वाले समय में कानून-व्यवस्था के मुद्दे को एक बार फिर चुनाव के केंद्र में लाएंगे और आजम खान का नाम लेकर सपा को घेरने की हरसंभव कोशिश करेंगे। इस पूरे परिदृश्य में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि क्या रामपुर जेल की यह मुलाकात समाजवादी पार्टी को 2027 की सत्ता के सिंहासन तक पहुंचा पाएगी? उत्तर प्रदेश की सियासत अब 2012 या 2017 जैसी नहीं रह गई है। मतदाता बेहद जागरूक हैं और केवल भावनात्मक अपीलों पर वोट नहीं करते। आजम खान की ताकत का एक पहलू अगर उनका भारी जनसमर्थन है, तो दूसरा पहलू उनकी छवि को लेकर होने वाला काउंटर-ध्रुवीकरण भी है। अखिलेश यादव के सामने चुनौती यह होगी कि वे आजम खान की ताकत का इस्तेमाल मुस्लिम वोटों को एकजुट करने में तो करें, लेकिन इसके साथ ही बहुसंख्यक और गैर-यादव ओबीसी मतदाताओं को छिटकने न दें। पीडीए का जो गुलदस्ता अखिलेश ने तैयार किया है, उसमें आजम खान की हिस्सेदारी को इस तरह पिरोना होगा कि वह समावेशी दिखे, न कि केवल एक वर्ग विशेष की राजनीति। पश्चिमी उत्तर प्रदेश का जो जाट-मुस्लिम-दलित गठबंधन सपा बनाने का प्रयास कर रही है, उसमें आजम खान की स्वीकार्यता को संतुलित रखना एक बेहद बारीक राजनीतिक कला होगी। यदि सपा इस संतुलन को साधने में सफल रही, तो रामपुर जेल से शुरू हुआ यह सफर २०२७ में लखनऊ के सचिवालय तक पहुंच सकता है, अन्यथा ध्रुवीकरण की तेज हवा इस पूरी रणनीति को बिखेर भी सकती है। बहरहाल, रामपुर जेल के बंद कमरों से निकला यह सियासी संदेश उत्तर प्रदेश की वादियों में गूंजने लगा है। इसने यह तय कर दिया है कि आने वाले दिनों में रामपुर की धरती एक बार फिर सूबे की राजनीति का कुरुक्षेत्र बनेगी। आजम खान जेल की सलाखों के पीछे रहकर भी सपा की सियासत के सबसे बड़े खिलाड़ियों में से एक बने हुए हैं, और अखिलेश यादव के इस कदम ने यह साबित कर दिया है कि उत्तर प्रदेश की सत्ता का रास्ता आज भी रामपुर के सियासी गलियारों से होकर ही गुजरता है। अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार

प्रभासाक्षी 23 Oct 2026 1:31 pm

आखिर कब थमेगा धार्मिक आयोजनों में मौत का सिलसिला?

धर्म, आस्था और विश्वास के केंद्रों पर इंसान सुकून, शांति और सुख-समृद्धि की कामना लेकर पहुंचता है लेकिन जब वही स्थान चीख-पुकार, दमघोंटू भीड़ और मौत के मंजर में तब्दील हो जाएं तो यह हमारी व्यवस्था की संवेदनहीनता और सुरक्षा संबंधी तैयारियों की विफलता का भयावह प्रमाण है। कोलकाता के चोरबागान दुर्गा पूजा पंडाल में 17 अक्तूबर की शाम भगदड़ जैसी स्थिति में 19 लोगों की मौत और दो दर्जन से अधिक लोगों के घायल होने की खबर ने एक बार फिर देश को झकझोर दिया। सप्तमी की शाम मां दुर्गा के दर्शन की लालसा लेकर निकले श्रद्धालुओं को क्या पता था कि घर लौटने के बजाय कई परिवारों को अपने प्रियजनों के शव मिलेंगे? जिस उत्सव में जीवन, शक्ति और विजय का संदेश गूंजना चाहिए था, वहां मातम पसरा था। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर हमारी आस्था के स्थलों पर इंसानी जिंदगी इतनी सस्ती क्यों हो जाती है? चोरबागान की घटना को केवल अचानक उमड़ी भीड़ या दुर्भाग्यपूर्ण हादसा बताकर जिम्मेदारी से बचना आसान है लेकिन ऐसा करना त्रासदी के वास्तविक कारणों से आंखें मूंदना होगा। बारिश के बीच पंडाल में प्रवेश और निकास के रास्तों पर भीड़ का दबाव बढ़ा और अफरा-तफरी की स्थिति पैदा हुई। घटनास्थल की संकरी गलियों, लोगों की आवाजाही तथा सुरक्षा प्रबंधों को लेकर भी सवाल उठे हैं। हालांकि, दुर्घटना के वास्तविक कारणों और जिम्मेदारी का निर्धारण निष्पक्ष जांच से ही होना चाहिए। फिर भी, यदि भारी भीड़ और खराब मौसम के बावजूद आवाजाही को सुरक्षित रखने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी तो यह गंभीर प्रशासनिक और आयोजन संबंधी विफलता का मामला है। जब किसी आयोजन में हजारों लोगों के जुटने की संभावना पहले से मालूम हो, तब संभावित खतरे का अनुमान लगाने के लिए दुर्घटना होने की प्रतीक्षा क्यों की जाती है? भारत में धार्मिक स्थलों और सार्वजनिक आयोजनों में भगदड़ कोई नई समस्या नहीं है। मंदिरों, तीर्थस्थलों, धार्मिक मेलों, जुलूसों और पर्व-समारोहों में भीड़ का बेकाबू होना बार-बार जानलेवा साबित होता रहा है। वर्ष 2005 में महाराष्ट्र के मांढरदेवी मंदिर में भगदड़ से 300 से अधिक लोगों की मौत हुई थी। 2011 में केरल के सबरीमाला में भगदड़ ने 100 से अधिक लोगों की जान ले ली थी। 2013 में मध्य प्रदेश के रतनगढ़ मंदिर में 100 से अधिक लोगों की मौत हुई। 2022 में जम्मू स्थित वैष्णो देवी मंदिर में भगदड़ से 12 श्रद्धालुओं की जान गई। 2024 में हाथरस में धार्मिक सत्संग के बाद मची भगदड़ में 121 लोगों की मौत ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। 2025 में प्रयागराज महाकुंभ और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भी भीड़ से जुड़ी जानलेवा घटनाओं ने सार्वजनिक सुरक्षा की तैयारियों पर गंभीर प्रश्न खड़े किए थे। हालांकि अलग-अलग घटनाओं के कारण और परिस्थितियां भिन्न थी लेकिन इनके बीच एक चिंताजनक समानता रही, भीड़ के दबाव में इंसानी जीवन की असुरक्षा। इसे भी पढ़ें: आस्था के सैलाब में कब तक गुम होती रहेगी जिंदगियां? हर त्रासदी के बाद शोक संदेश जारी होते हैं, मुआवजे की घोषणाएं होती हैं, जांच समितियां गठित की जाती हैं और इसके बाद व्यवस्था फिर पुराने ढ़र्रे पर लौट जाती है। यही हमारी सबसे बड़ी विफलता है। यदि पिछली दुर्घटनाओं से सबक लेकर प्रभावी सुरक्षा तंत्र विकसित किया गया होता तो बार-बार ऐसी मौतों का सामना नहीं करना पड़ता। जांच का उद्देश्य केवल दोषियों की पहचान करना नहीं, उन खामियों को दूर करना भी होना चाहिए, जिनके कारण एक ही प्रकार की त्रासदियां बार-बार सामने आती हैं। सवाल यह नहीं कि अगला हादसा कहां होगा बल्कि यह है कि उसे रोकने के लिए हमने अब तक क्या किया है? यह समझना जरूरी है कि भगदड़ केवल लोगों के अचानक दौड़ने से नहीं होती। जब किसी सीमित स्थान में भीड़ की संख्या उसकी क्षमता से अधिक हो जाती है, प्रवेश और निकास का प्रवाह बाधित होता है, लोग एक-दूसरे को धक्का देने लगते हैं या अफवाह के कारण एक साथ आगे बढ़ते हैं, तब स्थिति तेजी से जानलेवा बन सकती है। भीड़ के अत्यधिक दबाव में व्यक्ति के लिए सांस लेना और स्वयं को संभालना कठिन हो जाता है। गिरने वाला व्यक्ति दूसरों के लिए भी गंभीर खतरा पैदा कर सकता है। ऐसे हालात में कुछ क्षणों की अव्यवस्था भी अनेक जिंदगियां लील सकती है। इसलिए भीड़ प्रबंधन का अर्थ केवल पुलिसकर्मियों की तैनाती, बैरिकेडिंग या लाउडस्पीकर से घोषणाएं करना नहीं है। इसके लिए भीड़ की क्षमता का वैज्ञानिक आकलन, आवाजाही की सतत निगरानी, प्रशिक्षित कर्मियों और स्पष्ट आपातकालीन योजना की आवश्यकता होती है। धार्मिक आयोजनों में सुरक्षा को अक्सर आस्था के उत्साह और आयोजन की भव्यता के पीछे गौण कर दिया जाता है। ऊंचे-ऊंचे पंडाल, आकर्षक सजावट, रोशनी, प्रचार और प्रायोजकों की प्रतिस्पर्धा पर भरपूर ध्यान दिया जाता है लेकिन प्रवेश द्वार कितने हैं, निकास कितना चौड़ा है, आपातकालीन रास्ते खुले हैं या नहीं, पर्याप्त रोशनी है या नहीं और भीड़ बढ़ने पर क्या किया जाएगा, इन बुनियादी सवालों की अनदेखी कर दी जाती है। लोकप्रियता के नाम पर भीड़ को आमंत्रित करना और फिर उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी से बचना किसी भी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं हो सकता। आयोजकों को समझना होगा कि किसी पूजा पंडाल की सफलता श्रद्धालुओं की संख्या से नहीं बल्कि इस बात से तय होती है कि प्रत्येक श्रद्धालु सुरक्षित घर लौटे। सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी भी आयोजन स्थल पर पुलिस तैनात कर देने तक सीमित नहीं हो सकती। अनुमति देने से पहले स्थल की क्षमता, प्रवेश-निकास मार्गों, अग्नि सुरक्षा, संरचनात्मक मजबूती और आपातकालीन निकासी की व्यवस्था का वास्तविक निरीक्षण होना चाहिए। कोई भी तकनीक तभी कारगर होगी, जब उसके आधार पर समय रहते निर्णय लेने वाले जिम्मेदार लोग मौजूद हों। जवाबदेही तय करने में किसी प्रकार का पक्षपात नहीं होना चाहिए। यदि आयोजकों, अधिकारियों या अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों की लापरवाही प्रमाणित होती है तो कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। केवल कुछ गिरफ्तारियों या इस्तीफों को न्याय की पूर्णता नहीं माना जा सकता। साथ ही, जांच निष्पक्ष होनी चाहिए और दोष का निर्धारण राजनीतिक बयानबाजी के बजाय साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए। श्रद्धालुओं की भी अपनी जिम्मेदारी है। धक्का-मुक्की से बचना, अफवाहों पर विश्वास न करना, सुरक्षा निर्देशों का पालन करना और अत्यधिक भीड़ दिखाई देने पर प्रवेश करने की जिद न करना आवश्यक है। आयोजकों को भीड़ को आकर्षित करने के लिए सोशल मीडिया पर प्रचार करते समय सुरक्षा क्षमता का ध्यान रखना चाहिए। हालांकि, नागरिकों से सावधानी की अपेक्षा प्रशासनिक लापरवाही का विकल्प नहीं हो सकती। सुरक्षा की प्राथमिक जिम्मेदारी उन लोगों की है, जो आयोजन की योजना बनाते हैं, अनुमति देते हैं और व्यवस्था संचालित करते हैं। बहरहाल, चोरबागान की त्रासदी हमें चेतावनी दे रही है कि आस्था का सम्मान केवल पूजा-अर्चना, भव्य पंडालों और धार्मिक नारों से नहीं होता। उसका वास्तविक सम्मान मानव जीवन की रक्षा से होता है। मां दुर्गा की आराधना शक्ति, विवेक और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा देती है। यदि उनके दर्शन के लिए उमड़े श्रद्धालु अव्यवस्था के कारण अपनी जान गंवा दें तो हमें अपनी व्यवस्थाओं का कठोर आत्ममंथन करना ही होगा। अब वक्त शोक जताकर आगे बढ़ जाने का नहीं बल्कि व्यवस्था बदलने का है। हर धार्मिक स्थल, हर पूजा पंडाल और हर बड़े सार्वजनिक आयोजन में सुरक्षा को सर्वाेच्च प्राथमिकता देनी होगी। जब तक लापरवाही पर जवाबदेही तय नहीं होगी, सुरक्षा नियमों का कठोरता से पालन नहीं होगा और पिछली दुर्घटनाओं से मिले सबक जमीन पर नहीं उतरेंगे, तब तक श्रद्धालुओं की जान पर मंडराता खतरा समाप्त नहीं होगा। आस्था के नाम पर मौत को नियति मान लेना सबसे बड़ी भूल है। भगवान के दरबार में इंसान जिंदगी की दुआ मांगने जाता है, जान गंवाने नहीं। किसी भी सभ्य समाज और संवेदनशील शासन व्यवस्था की असली परीक्षा यही है कि श्रद्धालु विश्वास के साथ घर से निकलें और सुरक्षित अपने घर लौटें। - योगेश कुमार गोयल (लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और हिन्दी अकादमी दिल्ली के सौजन्य से प्रकाशित ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ पुस्तक के लेखक हैं)

प्रभासाक्षी 23 Oct 2026 12:51 pm

अगर भारत में हो रहे प्रदर्शनों के पीछे विदेशी शक्तियों का हाथ, तो अमित शाह क्या कर रहे हैं : उदित राज

अगर भारत में हो रहे प्रदर्शनों के पीछे विदेशी शक्तियों का हाथ, तो अमित शाह क्या कर रहे हैं : उदित राज

समाचार नामा 23 Oct 2026 12:24 pm

Driving Licence New Rules सामने आये, DL पर नागरिकता भी होगी दर्ज, जानिये अब क्या-क्या Documents देने पड़ेंगे?

देश में अब ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने के नियम बदलने की तैयारी है। नए नियम लागू हुए तो लाइसेंस पर न सिर्फ आपका ब्लड ग्रुप, मोबाइल नंबर और इमरजेंसी कॉन्टैक्ट दर्ज होगा, बल्कि आपकी नागरिकता की पहचान भी साफ होगी। भारतीय और विदेशी नागरिकों के ड्राइविंग लाइसेंस के रंग भी अलग-अलग हो सकते हैं। इतना ही नहीं, फर्जी पते और जन्मतिथि के सहारे लाइसेंस बनवाने वालों पर लगाम कसने के लिए उम्र और पते के प्रमाण के रूप में शपथपत्र और जीवन बीमा पॉलिसी की मान्यता खत्म करने का प्रस्ताव है। हम आपको बता दें कि सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने मोटर वाहन नियमों में इन बड़े बदलावों का मसौदा जारी किया है, जिसमें लाइसेंस बनवाने से लेकर उसमें संशोधन कराने तक की प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और आसान बनाने की तैयारी है। लाइसेंस पर दर्ज होंगे ब्लड ग्रुप और इमरजेंसी कॉन्टैक्ट प्रस्तावित बदलावों के अनुसार, ड्राइविंग लाइसेंस पर धारक का ब्लड ग्रुप, मोबाइल नंबर और आपातकालीन संपर्क विवरण दर्ज करना अनिवार्य किया जा सकता है। किसी दुर्घटना या आपात स्थिति में ये जानकारियां उपयोगी साबित हो सकती हैं और जरूरत पड़ने पर संबंधित व्यक्ति या उसके परिजनों से संपर्क करना आसान होगा। इसके अलावा, भारतीय और विदेशी नागरिकों की पहचान स्पष्ट करने के लिए दोनों श्रेणियों के लाइसेंस के रंग अलग-अलग रखने का प्रस्ताव भी किया गया है। लाइसेंस पर राष्ट्रीयता का उल्लेख होने से संबंधित अधिकारियों को धारक की नागरिकता की पहचान करने में भी सुविधा मिल सकती है। इसे भी पढ़ें: Prabhasakshi NewsRoom: Saudi Arabia में हालात बिगड़ते ही भारतीय जायरीनों को सुरक्षित निकालने के लिए एक्शन में आई मोदी सरकार, अब तक 13 हजार से ज्यादा लौटे फर्जी दस्तावेजों पर रोक लगाने की तैयारी हम आपको बता दें कि मौजूदा व्यवस्था में निर्धारित 12 दस्तावेजों में से कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने पर लाइसेंसिंग प्राधिकरण कार्यपालक मजिस्ट्रेट, न्यायिक मजिस्ट्रेट या नोटरी पब्लिक के समक्ष शपथपत्र को उम्र और पते के प्रमाण के रूप में स्वीकार कर सकता है। लेकिन इस सुविधा का दुरुपयोग कर गलत पता और जन्मतिथि दर्ज कराने की आशंकाएं सामने आती रही हैं। इसलिए शपथपत्र के जरिए गलत जानकारी देने की घटनाओं के मद्देनजर अब सत्यापन योग्य दस्तावेजों पर जोर दिया जा रहा है। मसौदे में उम्र, पता और पहचान प्रमाण के लिए अलग-अलग दस्तावेजों की सूची निर्धारित की गई है। पते के प्रमाण के तौर पर आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, ई-राशन कार्ड और पिछले तीन महीनों के बिजली या गैस बिल स्वीकार किए जा सकेंगे। विदेशी नागरिकों को भारत में वैध रूप से रहने से संबंधित प्रमाण देना होगा। उम्र के प्रमाण के लिए पासपोर्ट, स्कूल बोर्ड की अंकतालिका, जन्म प्रमाणपत्र और सरकारी विभागों द्वारा जारी पहचान पत्र शामिल किए गए हैं। वहीं, आधार कार्ड, पासपोर्ट, ई-राशन कार्ड और पैन कार्ड को पहचान प्रमाण के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। जीवन बीमा पॉलिसी को भी प्रमाण के तौर पर स्वीकार नहीं करने का प्रस्ताव है। ऑनलाइन ड्राइविंग टेस्ट होगा और सख्त मोदी सरकार ने सुरक्षित ड्राइविंग से जुड़े ऑनलाइन ट्यूटोरियल के आकलन की न्यूनतम उत्तीर्ण सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव रखा है। फिलहाल इस परीक्षा में 60 प्रतिशत अंक हासिल करना जरूरी है, जिसे बढ़ाकर 75 प्रतिशत किया जा सकता है। इसके अलावा, सुरक्षित ड्राइविंग ट्यूटोरियल की अवधि कम से कम 30 मिनट निर्धारित करने का प्रस्ताव है। इससे लाइसेंस आवेदकों के लिए सड़क सुरक्षा संबंधी जानकारी हासिल करना और उसका आकलन पास करना अधिक गंभीर प्रक्रिया बन सकता है। ऑनलाइन सेवाओं के लिए शुल्क में राहत साथ ही प्रस्तावित बदलावों में लाइसेंस से संबंधित सेवाओं को अधिक सुविधाजनक बनाने पर भी जोर दिया गया है। यदि आवेदक आधार प्रमाणीकरण के जरिए ऑनलाइन आवेदन करते हैं, तो पता, नाम और संपर्क नंबर में बदलाव जैसी निर्धारित सेवाओं के लिए शुल्क माफ करने का प्रस्ताव है। इससे लोगों को छोटे-छोटे संशोधनों के लिए बार-बार कार्यालय जाने की जरूरत कम हो सकती है और प्रक्रिया अधिक किफायती बन सकती है। 15 दिन में आवेदन पर फैसला, देरी पर भी प्रावधान हम आपको यह भी बता दें कि मसौदे के अनुसार, लाइसेंस में नाम, पता या अन्य विवरण बदलने के लिए ऑनलाइन किए गए आवेदन को संबंधित लाइसेंसिंग प्राधिकरण को 15 दिनों के भीतर मंजूर या खारिज करना होगा। आवेदन खारिज करने की स्थिति में कारण बताना भी अनिवार्य होगा। पते में बदलाव का आवेदन यदि 30 दिनों तक लंबित रहता है, तो उसे स्वतः स्वीकृत मानने का प्रस्ताव किया गया है। इससे आवेदकों को अनिश्चितकाल तक फैसले का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। इसके अलावा, ड्राइविंग लाइसेंस के नवीनीकरण, डुप्लीकेट लाइसेंस जारी करने, लाइसेंस में वाहन की नई श्रेणी जोड़ने और व्यक्तिगत विवरण बदलने जैसी सेवाओं के लिए एक संयुक्त आवेदन फॉर्म लाने की योजना है। जहां उपलब्ध होगा, वहां आवेदक का संबंधित विवरण सारथी पोर्टल से इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्राप्त किया जाएगा। बहरहाल, प्रस्तावित संशोधनों का उद्देश्य ड्राइविंग लाइसेंस व्यवस्था में फर्जीवाड़े पर अंकुश लगाना, सड़क सुरक्षा संबंधी आकलन को मजबूत करना और ऑनलाइन सेवाओं को अधिक तेज एवं पारदर्शी बनाना है। हालांकि, ये बदलाव फिलहाल मसौदा प्रस्ताव हैं। इनके अंतिम नियमों और लागू होने की तारीख की पुष्टि संबंधित अधिसूचना के अंतिम रूप के बाद ही होगी। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 23 Oct 2026 11:40 am

जर्मन कंपनियों के लिए भारत में बड़े अवसर: पीयूष गोयल

नई दिल्ली, केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने शुक्रवार को जर्मनी की राजधानी बर्लिन में कई प्रमुख उद्योगपतियों और कारोबारी नेताओं के साथ बैठकों के दौरान कहा कि भारत जर्मन कंपनियों के लिए निवेश, विनिर्माण और नवाचार के क्षेत्र में अपार अवसर प्रदान करता है।

देशबन्धु 23 Oct 2026 11:17 am

Delhi Protest: सौरव दास और आशुतोष रांका को फिर नोटिस भेज सकती है क्राइम ब्रांच, आज नेहा बोरा की याचिका पर फैसला

Delhi Protest: सौरव दास और आशुतोष रांका को फिर नोटिस भेज सकती है क्राइम ब्रांच, आज नेहा बोरा की याचिका पर फैसला

समाचार नामा 23 Oct 2026 10:39 am

कित्तूर की वीरांगना रानी चेन्नम्मा की जयंती पर केंद्रीय मंत्री गडकरी समेत कई नेताओं ने किया नमन

कित्तूर की वीरांगना रानी चेन्नम्मा की जयंती पर केंद्रीय मंत्री गडकरी समेत कई नेताओं ने किया नमन

समाचार नामा 23 Oct 2026 8:25 am

कोटिया पर फिर गरमाई राजनीति! नवीन पटनायक ने भेजी BJD की बड़ी टीम

ओडिशा में बीजू जनता दल (बीजेडी) का एक प्रतिनिधिमंडल 23 अक्टूबर को कोटिया पंचायत का दौरा करेगा। यह दौरा ओडिशा के कोरापुट जिले के पोटांगी ब्लॉक में स्थित कोटिया के कुछ गांवों में आंध्र प्रदेश द्वारा कथित तौर पर चुनाव से जुड़ी गतिविधियां चलाए जाने के विरोध में किया जा रहा है।

देशबन्धु 23 Oct 2026 7:40 am

नाबालिगों के कथित नशे का वीडियो सामने आते ही मचा बवाल, बिट्टू ने सरकार को घेरा

पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता रवनीत सिंह बिट्टू ने एक कथित वीडियो साझा कर पंजाब में नशे की समस्या को लेकर राज्य की आम आदमी पार्टी (आप) सरकार पर तीखा हमला बोला है

देशबन्धु 23 Oct 2026 7:18 am

दिलजीत दोसांझ शो पर सियासी संग्राम! BJP-AAP आमने-सामने

दिल्ली भाजपा अध्यक्ष हर्ष मल्होत्रा ने गुरुवार को गायक दिलजीत दोसांझ के 30 अक्टूबर को प्रस्तावित दिल्ली शो को अनुमति नहीं दिए जाने के मुद्दे पर आम आदमी पार्टी (आप) की आलोचना की

देशबन्धु 23 Oct 2026 12:11 am

तमिलनाडु में बारिश का संकट गहराया, राहुल गांधी ने कांग्रेस को दिया 'राहत मिशन' का आदेश

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने तमिलनाडु, पुडुचेरी, कराईकल, केरल और लक्षद्वीप के लिए भारी से बहुत भारी बारिश का अलर्ट जारी किया है

देशबन्धु 22 Oct 2026 11:38 pm