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तिरंगा यात्रा या राजनीतिक प्रदर्शन? भाजपा ने विपक्ष को घेरा

भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता आरपी सिंह ने तिरंगा यात्रा के नाम पर सियासी प्रदर्शन और जंतर-मंतर पर अड़े विपक्ष को कानून का आइना दिखाया।

देशबन्धु 15 Oct 2026 7:20 am

SIR विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में आज बड़ी सुनवाई, राहुल गांधी की याचिका पर टिकी नजरें

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चल रहे विवाद के बीच आज सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई होने जा रही है

देशबन्धु 15 Oct 2026 7:09 am

कांग्रेस और 'आप' की नूरा-कुश्ती सब जानते हैं, प्रॉक्सी टीम से देश के कानून को तोड़ने की कोशिश: शाजिया इल्मी

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के विरोध प्रदर्शन के तरीके पर भाजपा नेता शाजिया इल्मी ने निशाना साधा। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी और कांग्रेस एवं कॉकरोच जनता पार्टी यानी आम आदमी पार्टी के बीच चल रही नूरा-कुश्ती किसी से छिपी नहीं है, लेकिन प्रोटेस्ट के नाम पर तिरंगे का इस्तेमाल कर कानून तोड़ने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती।

देशबन्धु 15 Oct 2026 5:54 am

बागी विधायकों पर अखिलेश का तंज, बोले सदस्यता की पर्ची से ज्यादा कुछ नहीं मिला

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) के तीन बागी विधायकों के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने के बाद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने उन पर तीखा तंज कसा

देशबन्धु 14 Oct 2026 11:10 pm

जेएनयू यौन उत्पीड़न मामला: एनसीडब्ल्यू प्रमुख से मिला भाजपा का प्रतिनिधिमंडल, सांसद के खिलाफ कार्रवाई की मांग

जेएनयू यौन उत्पीड़न मामला: एनसीडब्ल्यू प्रमुख से मिला भाजपा का प्रतिनिधिमंडल, सांसद के खिलाफ कार्रवाई की मांग

समाचार नामा 14 Oct 2026 8:23 pm

उत्तर प्रदेश में नामांकन की चुनौतियां, 'अयोध्या चैलेंज' और राजनैतिक भविष्य का शंखनाद

भारतीय राजनीति का यह एक सर्वमान्य और समय-सिद्ध सिद्धांत है कि दिल्ली का रास्ता लखनऊ के गलियारों से होकर ही गुजरता है। उत्तर प्रदेश न केवल देश का सबसे बड़ा राज्य है, बल्कि यह वह राजनैतिक कुरुक्षेत्र भी है जहां राष्ट्रीय स्तर के बड़े-बड़े सियासी सूरमाओं का भाग्य तय होता है। वर्ष 2026 के इस उत्तरार्ध में कदम रखते ही प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर सरगर्मियां अपने चरम पर पहुंच चुकी हैं और संपूर्ण राज्य एक बार फिर एक बड़े लोकतांत्रिक उत्सव और उसकी जटिलताओं के मुहाने पर खड़ा है। किसी भी चुनाव प्रक्रिया का सबसे पहला, महत्वपूर्ण और प्रशासनिक रूप से संवेदनशील पड़ाव नामांकन होता है, जो केवल एक कानूनी या प्रशासनिक औपचारिकता मात्र नहीं है, बल्कि यह किसी भी राजनैतिक दल की सांगठनिक शक्ति, आंतरिक अनुशासन और जमीनी रणनीति का लिटमस टेस्ट है। इस प्रक्रिया में आने वाली चुनौतियां न केवल चुनाव आयोग और प्रशासन के धैर्य की परीक्षा लेती हैं, बल्कि यह विभिन्न राजनैतिक दलों के अस्तित्व और उनकी साख से भी जुड़ी होती हैं। इस बार, यह नामांकन प्रक्रिया सिर्फ कागजी कार्यवाहियों तक सीमित नहीं है, बल्कि सूबे के दो सबसे बड़े दिग्गजों—मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव—के बीच सीधे 'नामांकन चैलेंज' के रूप में तब्दील हो चुकी है, जिसने उत्तर प्रदेश की सियासत में एक अभूतपूर्व भूचाल ला दिया है। इस राजनैतिक रस्साकशी की शुरुआत तब हुई जब समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अयोध्या का दौरा किया और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी पर तीखा तंज कसते हुए दावा किया कि सपा द्वारा उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद भाजपा सर्वे पर सर्वे करा रही है और उसे अयोध्या में खड़ा करने के लिए कोई उपयुक्त प्रत्याशी ही नहीं मिल रहा है। अखिलेश ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सीधे चुनौती दे डाली कि अगर उन्हें अपनी लोकप्रियता और विकास कार्यों पर इतना ही भरोसा है, तो वे खुद आगामी विधानसभा चुनाव में अयोध्या सीट से मैदान में उतरकर दिखाएं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस चुनौती को न सिर्फ स्वीकार किया, बल्कि इसे एक कदम आगे बढ़ाते हुए अखिलेश यादव को ही कटघरे में खड़ा कर दिया और एक सार्वजनिक कार्यक्रम में साफ शब्दों में कहा कि अगर दम है तो अखिलेश भी अयोध्या से चुनाव लड़ें और वे भी लड़ेंगे, दोनों आमने-सामने नामांकन दाखिल कर एक बार अपनी किस्मत आजमा लें ताकि मामला हमेशा के लिए तय हो जाए। योगी के इस सीधे प्रहार पर अखिलेश यादव ने भी तुरंत प्रतिक्रिया दी और इस सीधे मुकाबले को यह कहते हुए टालने की कोशिश की कि भाजपा को हराने के लिए उनका एक युवा 'पीडीए' प्रहरी ही काफी है। इस जुबानी जंग ने यह साफ कर दिया है कि आगामी चुनावों में नामांकन का दौर कितना हाई-वोल्टेज होने वाला है और दोनों खेमों द्वारा एक-दूसरे की घेराबंदी का यह सबसे आक्रामक रूप है। इसे भी पढ़ें: UP Congress में कुर्सी की लड़ाई जूते-चप्पल तक आई, Ajay Rai ने BJP में वापसी की टिकट कटाई! किसी भी राजनैतिक दल के लिए चुनाव की घोषणा के बाद नामांकन का चरण सबसे अधिक तनावपूर्ण और आंतरिक संघर्षों से भरा होता है क्योंकि टिकटों की घोषणा से लेकर नामांकन पत्र दाखिल करने के अंतिम मिनट तक दलों के भीतर जो उथल-पुथल मचती है, वह सांगठनिक ढांचे को हिलाकर रख देती है। टिकट न मिलने से नाराज कार्यकर्ताओं और नेताओं का विद्रोह उत्तर प्रदेश की राजनीति का एक कड़वा और अपरिवर्तनीय सच है, जहां नामांकन के ठीक पहले पाला बदलना, रातों-रात प्रतिद्वंद्वी पार्टी की सदस्यता ले लेना, निर्दलीय पर्चा दाखिल कर देना या अपनी ही पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार का खेल बिगाड़ने के लिए किसी डमी प्रत्याशी को खड़ा कर देना सबसे बड़ा सांगठनिक चैलेंज बन जाता है। भारतीय जनता पार्टी जैसी कैडर-आधारित पार्टी हो या समाजवादी पार्टी जैसी मजबूत क्षेत्रीय ताकत, आंतरिक असंतोष को दबाना और रूठे हुए नेताओं को मनाना इस समय दोनों ही खेमों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है, और जब बड़े नेता एक-दूसरे को सीधे नामांकन की चुनौती दे रहे हों, तो जमीनी कार्यकर्ताओं को अनुशासित रखना और अधिक मुश्किल हो जाता है। इसके साथ ही, चुनाव आयोग ने हाल के वर्षों में नामांकन पत्रों की स्क्रूटनी और हलफनामों की समीक्षा को अत्यधिक कड़ा कर दिया है, जिसके तहत शपथ पत्र में अपनी संपत्ति, आपराधिक इतिहास, शैक्षणिक योग्यता और वित्तीय देनदारियों का रत्ती भर भी गलत विवरण देना पूरे नामांकन को निरस्त करा सकता है, जैसा कि हाल ही में संपन्न हुए राज्यसभा और विधान परिषद द्विवार्षिक चुनावों के दौरान कुछ निर्दलीय व छोटे दलों के उम्मीदवारों के पर्चे खारिज होने से साबित भी हो चुका है। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल, सघन आबादी और राजनैतिक रूप से संवेदनशील राज्य में नामांकन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखना जिला प्रशासनों और police महकमे के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होता क्योंकि कलेक्ट्रेट और कमिश्नरी कार्यालयों के बाहर का दृश्य अक्सर राजनैतिक शक्ति प्रदर्शन का अखाड़ा बन जाता है। नामांकन दाखिल करने जाते समय उम्मीदवारों द्वारा भारी भीड़ जुटाना, अपनी ताकत का अहसास कराना और गाड़ियों के लंबे काफिले ले जाना एक आम चलन बन चुका है, जिसके कारण चुनाव आयोग के कड़े नियमों के बावजूद कलेक्ट्रेट परिसर के बाहर समर्थकों का हुजूम नियंत्रित करना पुलिस के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द साबित होता है और इस दौरान आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के मामले सबसे ज्यादा दर्ज होते हैं। उत्तर प्रदेश के कई जिले राजनैतिक और सामाजिक रूप से अत्यधिक संवेदनशील माने जाते हैं, जहां नामांकन के दौरान प्रतिद्वंद्वी गुटों के बीच झड़प, नारेबाजी और कभी-कभी हिंसक टकराव की आशंका बनी रहती है, जिससे निपटने के लिए प्रशासन को चप्पे-चप्पे पर सीसीटीवी कैमरों, ड्रोन कैमरों और भारी संख्या में प्रांतीय सशस्त्र कांस्टेबुलरी तथा अर्धसैनिक बलों की तैनाती करनी पड़ती है ताकि पूरी नामांकन प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो सके। इस चुनावी माहौल में डिजिटल तकनीक जहां एक वरदान है, वहीं यह प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती भी बनकर उभरी है क्योंकि हाल के हफ्तों में सोशल मीडिया पर उत्तर प्रदेश में पंचायत और स्थानीय निकायों के चुनावों के नामांकन और तारीखों को लेकर कई फर्जी और भ्रामक खबरें प्रसारित की गईं, जिनका खंडन करना और जनता के बीच सही सूचना पहुंचाना राज्य निर्वाचन आयोग के लिए एक अतिरिक्त प्रशासनिक चुनौती बन गया है। वास्तव में, योगी और अखिलेश के बीच छिड़ा यह नामांकन युद्ध आगामी महासमर की नींव रख रहा है और वर्तमान में जो भी सांगठनिक फेरबदल या राजनैतिक बयानबाजी हो रही है, वह मुख्य चुनाव के मद्देनजर ही की जा रही है, जिसमें सभी प्रमुख दलों के सामने अपनी-अपनी विशिष्ट चुनौतियां हैं। लगातार दो बार राज्य की सत्ता पर काबिज रहने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा के सामने सत्ता विरोधी लहर को कम करने और नए चेहरों को मौका देने की चुनौती होगी, और जब विधानसभा चुनाव के वास्तविक नामांकन शुरू होंगे, तब मौजूदा विधायकों के टिकट काटने या बदलने पर जो आंतरिक असंतोष पैदा होगा, उसे संभालना पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और योगी आदित्यनाथ के लिए सबसे बड़ा इम्तिहान होगा। दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी पिछले कुछ समय से अपने 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के साथ खुद को री-ब्रांड कर रही है, और अखिलेश यादव के लिए चुनौती यह होगी कि वे टिकट वितरण और नामांकन के समय इस सामाजिक समीकरण को जमीन पर कैसे उतारते हैं तथा अयोध्या जैसी प्रतीकात्मक और हाई-प्रोफाइल सीट पर योगी आदित्यनाथ की सीधी चुनौती का सामना करने के लिए वे अपने मौजूदा घोषित प्रत्याशी पर भरोसा बनाए रखते हैं या खुद मैदान में उतरकर इस राजनैतिक जुए को खेलने का साहस दिखाते हैं। नामांकन की प्रक्रिया लोकतंत्र के भव्य भवन की वह पहली ईंट है, जिस पर पूरे चुनाव की शुचिता, विश्वसनीयता और पारदर्शिता टिकी होती है और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में, जहां की राजनीति जाति, धर्म, क्षेत्रीयता, बाहुबल और धनबल के अत्यधिक जटिल ताने-बाने से बुनी गई है, वहां नामांकन को निर्विघ्न और निष्पक्ष बनाना एक युगांतकारी कार्य है। योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव के बीच का 'अयोध्या नामांकन चैलेंज' यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि उत्तर प्रदेश का आगामी चुनाव किसी भी सामान्य चुनाव से अलग, एक वैचारिक और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की लड़ाई बनने जा रहा है। चुनौतियां चाहे राजनैतिक दलों के भीतर टिकटों को लेकर मचे घमासान की हों, कलेक्ट्रेट के बाहर कानून-व्यवस्था की हों, या फिर दोनों शीर्ष नेताओं के बीच आमने-सामने के मुकाबले की हों—इन सबका समाधान केवल और केवल सख्त प्रशासनिक इच्छाशक्ति, चुनाव आयोग की निष्पक्षता और राजनैतिक दलों की लोकतांत्रिक परिपक्वता में ही निहित है। उत्तर प्रदेश की जागरूक जनता नामांकन के इस शोर-शराबे, रैलियों के शक्ति प्रदर्शन और शीर्ष नेताओं की इस राजनैतिक जंग के बीच हर उम्मीदवार के हलफनामे, उसके आचरण और उसकी पार्टी की नीति का बहुत सूक्ष्मता से मूल्यांकन कर रही है और आने वाले महीनों में यह देखना अत्यंत दिलचस्प होगा कि देश का यह सबसे बड़ा राजनैतिक सूबा इन चुनौतियों से पार पाकर किस तरह एक नए राजनैतिक भविष्य की इबारत लिखता है और क्या 'अयोध्या' वास्तव में इस महामुकाबले का मुख्य केंद्र बिंदु बनती है। - अशोक भाटिया वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार

प्रभासाक्षी 14 Oct 2026 6:01 pm

Kejriwal की हरी झंडी के बाद Congress-CJP में हुई दोस्ती! क्या पंजाब चुनाव मिलकर लड़ेंगे कांग्रेस और AAP?

दिल्ली के जंतर-मंतर पर तिरंगा लहराने, छात्रों की गिरफ्तारी और विरोध-प्रदर्शन के अधिकार को लेकर छिड़ा विवाद अब महज कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रह गया है। इसके मंच पर देश की सियासत का एक नया नाटक भी आकार लेने लगा है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं की गिरफ्तारी पर जिस अंदाज में आवाज बुलंद की है, उससे साफ है कि विपक्ष अब इस आंदोलन को अपने बड़े राजनीतिक अभियान से जोड़ने की कोशिश में है। सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी को अचानक CJP के आंदोलन में लोकतंत्र की नई उम्मीद दिखाई देने लगी है, या फिर इसके पीछे चुनाव आयोग, मतदाता सूची और भाजपा के खिलाफ विपक्षी मोर्चे को मजबूत करने की रणनीति काम कर रही है? हम आपको बता दें कि राहुल गांधी ने सोशल मीडिया मंच X पर कहा कि जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान तिरंगा लहराना कोई अपराध नहीं है और ऐसा करने पर युवाओं को जेल में डालना कायरता है। उन्होंने छात्रों, युवाओं, पत्रकारों और INDIA गठबंधन का जिक्र करते हुए दावा किया कि अलग-अलग बैनर के बावजूद सबकी लड़ाई संवैधानिक अधिकारों की मांग करना ही है। उनका संदेश था कि जंतर-मंतर जनता का है और उसे वापस हासिल किया जाएगा। इसे भी पढ़ें: अनियंत्रित भीड़ को 'शिव बारात' की उपमा देकर राहुल गांधी ने हिंदू भावनाओं को पहुँचाई ठेस! देखा जाये तो बात सुनने में दमदार है। आखिर लोकतंत्र में विरोध की आवाज को जगह मिलनी ही चाहिए। लेकिन राजनीति में केवल भाषण नहीं, उसके पीछे की टाइमिंग भी बहुत कुछ कहती है। राहुल गांधी का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि CJP के आंदोलन को लेकर कांग्रेस का रुख अब तक इतना खुला और स्पष्ट नहीं था। सवाल उठता है कि पहले दूरी, अब दोस्ती क्यों? हम आपको याद दिला दें कि परीक्षाओं में गड़बड़ी और पेपर लीक के खिलाफ जुलाई में CJP ने जंतर-मंतर पर 17 दिनों तक प्रदर्शन किया था। सोशल मीडिया पर इस संगठन की चर्चा बढ़ी, लेकिन कांग्रेस के बड़े नेताओं ने शुरुआत में उससे दूरी बनाए रखी। पार्टी का जोर अपने अभियानों ‘छात्रों की गूंज’ और ‘वोट चोरी' पर रहा। संदेश साफ था कि पेपर लीक और मतदाता सूची की कथित अनियमितताओं जैसे मुद्दों पर कांग्रेस पहले से लड़ाई लड़ रही है। यानी आंदोलन का मुद्दा वही था, लेकिन मंच अलग-अलग थे। कांग्रेस अपनी राजनीतिक जमीन पर किसी दूसरे संगठन को ज्यादा जगह देने के मूड में नहीं दिख रही थी। देखा जाये तो विपक्ष की राजनीति में मुद्दों से ज्यादा महत्वपूर्ण कई बार यह हो जाता है कि मुद्दे का श्रेय किसे मिलेगा। इसके बाद, 10 अक्टूबर को CJP ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े मुद्दों पर प्रदर्शन का आह्वान किया, लेकिन कांग्रेस उससे दूर रही। 12 अक्टूबर को जब विपक्षी दलों ने अपना मार्च निकाला, तब CJP भी उस कार्यक्रम से अलग रही। एक ही मुद्दे पर अलग-अलग प्रदर्शन विपक्ष की एकजुटता के दावों पर सवाल खड़े कर रहे थे। अब राहुल गांधी का कहना है कि कोई समानांतर प्रदर्शन नहीं है, बल्कि लड़ाई एक ही है। यही वह राजनीतिक मोड़ है, जहां कांग्रेस ने CJP के आंदोलन को अपने व्यापक विपक्षी अभियान से जोड़ने का संकेत दिया है। CJP के नेताओं सौरव दास और अभिषेक रांका को जंतर-मंतर में अनधिकृत प्रवेश के आरोप में गिरफ्तार किए जाने और पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के बाद विपक्ष ने सरकार पर हमला तेज कर दिया है। पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के सांसद अभिषेक बनर्जी ने तिरंगा लहराने पर भारतीयों की गिरफ्तारी को लेकर भाजपा पर निशाना साधा और भारत को ‘पाकिस्तानाइज्ड’ करने का आरोप लगाया। वहीं, CPI(ML) के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने जंतर-मंतर को जनता का प्रदर्शन स्थल बताते हुए गिरफ्तारी और हिरासत को अनुचित करार दिया। विपक्ष का तर्क है कि जब नागरिक अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन करना चाहते हैं, तो उन्हें पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। दूसरी तरफ, किसी भी प्रदर्शन के मामले में प्रशासन को प्रवेश, सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़े नियमों का हवाला देने का अधिकार होता है। साथ ही इस विवाद का एक और अहम पहलू है। सरकार के जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल के रूप में समाप्त करने के फैसले के बाद विपक्ष इसे जनता के विरोध के अधिकार से जोड़ रहा है। ऐसे में जंतर-मंतर अब राजनीतिक प्रतीक बनता जा रहा है। इसके अलावा, राहुल गांधी की राजनीति में एक बड़ी चुनौती लंबे समय से यही रही है कि अलग-अलग मुद्दों पर उठने वाली आवाजों को एक साझा राजनीतिक अभियान में कैसे बदला जाए? CJP के साथ खड़े होने का उनका फैसला इसी दिशा में एक कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है। छात्रों का असंतोष, पेपर लीक का मुद्दा, मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों के आरोप और प्रदर्शन के अधिकार का सवाल, इन सबको एक सूत्र में पिरोकर कांग्रेस भाजपा के खिलाफ व्यापक मोर्चा तैयार करना चाहती है। लेकिन यहां एक पेचीदा सवाल भी है। यदि कांग्रेस पहले से इन मुद्दों पर आंदोलन कर रही थी, तो CJP के साथ खड़े होने में इतनी देर क्यों हुई? और अगर लड़ाई वास्तव में एक ही है, तो 10 और 12 अक्टूबर को अलग-अलग प्रदर्शन क्यों हुए? इन सवालों का जवाब केवल बयानबाजी से नहीं मिलेगा। विपक्ष को यह साबित करना होगा कि उसकी एकजुटता केवल राजनीतिक सुविधा का गठजोड़ नहीं, बल्कि मुद्दों पर आधारित साझा प्रतिबद्धता है। दूसरी ओर, सरकार को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रदर्शन स्थलों और प्रशासनिक नियमों के नाम पर नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकार अनावश्यक रूप से बाधित न हों। इस पूरे सियासी घटनाक्रम में एक दिलचस्प पहलू आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल का भी है। CJP को अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक उपज माना जाता रहा है और आम आदमी पार्टी का उसके आंदोलनों के प्रति समर्थन भी इस चर्चा को हवा देता है। ऐसे में राहुल गांधी का अचानक CJP के साथ खुलकर खड़ा होना कई सियासी सवाल पैदा करता है। क्या यह महज लोकतांत्रिक अधिकारों के समर्थन का मामला है, या इसके पीछे विपक्षी राजनीति की कोई बड़ी बिसात बिछाई जा रही है? क्या CJP के बहाने कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच जमी सियासी बर्फ पिघलाने की कोशिश हो रही है? और क्या इसे अरविंद केजरीवाल की INDIA गठबंधन में संभावित वापसी के संकेत के तौर पर भी देखा जाना चाहिए? सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि पंजाब में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी एक-दूसरे के प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं। ऐसे में अगर दिल्ली के राजनीतिक मंच पर दोनों के बीच नजदीकी बढ़ती है, तो पंजाब की सियासत में इसका क्या असर पड़ेगा? क्या दोनों दल एक तरफ राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ साझा रणनीति बनाने और दूसरी तरफ पंजाब में एक-दूसरे को चुनौती देने का दोहरा खेल खेलेंगे? देखा जाये तो भारतीय राजनीति में अक्सर सार्वजनिक मंचों पर दिखने वाली एकजुटता भविष्य के राजनीतिक समीकरणों की जमीन भी तैयार करती है। ऐसे में राहुल गांधी का CJP के समर्थन में उतरना केवल एक आंदोलन के पक्ष में दिया गया बयान है या कांग्रेस और केजरीवाल के बीच नए सियासी संवाद की शुरुआत, इस पर निगाहें बनी रहेंगी। बहरहाल, राहुल गांधी का CJP के समर्थन में उतरना कांग्रेस की रणनीति में बदलाव का संकेत है। यह कदम विपक्ष को एक साझा मंच देने की कोशिश भी हो सकता है और भाजपा के खिलाफ राजनीतिक बढ़त हासिल करने का अवसर भी क्योंकि भारतीय राजनीति में दोनों संभावनाएं एक साथ मौजूद रहती हैं। साथ ही तिरंगा किसी एक पार्टी की जागीर नहीं, संविधान किसी एक गठबंधन की संपत्ति नहीं और जंतर-मंतर किसी एक संगठन की निजी जमीन नहीं है। यदि विपक्ष सचमुच जनता के अधिकारों की लड़ाई लड़ना चाहता है, तो उसे विश्वसनीय संघर्ष करना होगा। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 14 Oct 2026 5:47 pm

चिप उद्योग के भविष्य पर भारत में होगी वैश्विक चर्चा: आईएसआईजी समिट

नई दिल्ली, इंटरनेशनल सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री ग्रुप (आईएसआईजी) 3-4 नवंबर को राष्ट्रीय राजधानी में 'आईएसआईजी एग्जीक्यूटिव समिट इंडिया 2026' का आयोजन करेगा।

देशबन्धु 14 Oct 2026 4:56 pm

पॉलीकैब इंडिया में शेयर 5 प्रतिशत तक लुढ़के

नई दिल्ली, पॉलीकैब इंडिया के शेयरों में बुधवार को गिरावट देखने को मिली और यह 5 प्रतिशत तक फिसल गया।

देशबन्धु 14 Oct 2026 2:30 pm

ईरान जैसा 'अंडरग्राउंड चक्रव्यूह', जिसके आगे बंकर-बस्टर भी फेल, भारत के इस फैसले ने मचाया चीन पाकिस्तान में तांडव,देखती रह गई दुनिया

भारत अब चीन पाकिस्तान की नकेल कस रहा है। इस बार सिर्फ सीमा पर नहीं बल्कि समुद्र मिसाइल और वैश्विक व्यापार तीनों मोर्चों पर एक ऐसा खेल शुरू हो चुका है जिसकी गूंज बीजिंग से लेकर इस्लामाबाद तक साफ सुनाई दे रही है। भारतीय सीमाओं पर अगले तीन साल में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के लिए बड़े स्तर पर तैयारियां की जा रही हैं। वहीं, चीन और पाकिस्तान से लगी सीमाओं पर अब जमीन के नीचे सैन्य अड्‌डे बनाने की तैयारी है। भारतीय सेना चीन (लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल) और पाकिस्तान (लाइन ऑफ़ कंट्रोल) के साथ अपनी संवेदनशील सीमाओं पर ज़मीन के नीचे बने शेल्टर, गहरी सुरंगों और मज़बूत स्टोरेज साइट्स का एक बड़ा नेटवर्क बना रही है। इसका मुख्य मकसद फ्रंटलाइन पर तैनात सैनिकों, भारी गोला-बारूद, ईंधन के भंडार और अहम हथियारों जैसे आर्टिलरी गन, एयर डिफेंस सिस्टम और मिसाइल बैटरी को दुश्मन की सटीक मिसाइलों, लोइटरिंग म्यूनिशन (कामिकेज़ ड्रोन) और भारी हवाई हमलों से सुरक्षित रखना है। सेना इस रणनीति को फ़ोर्स-प्रिज़र्वेशन (सेना को सुरक्षित रखने) की मुख्य योजना मानती है। ऑपरेशन सिंदूर, यूक्रेन-रूस और अमेरिका-ईरान युद्ध में मिसाइलों, ड्रोन और बंकर बस्टर बमों के इस्तेमाल को देखते हुए यह फैसला किया गया है। आधुनिक, टेक्नोलॉजी पर आधारित युद्ध में आगे की चौकियों को दुश्मन के शुरुआती ज़बरदस्त हमले के लिए खुला छोड़ने के बजाय, यह तरीका यह पक्का करता है कि लड़ाई के लिए ज़रूरी अहम साधन सुरक्षित रहें। इस युद्ध-क्षमता को सुरक्षित रखने से ज़मीनी टुकड़ियों को दुश्मन के भारी हमलों की शुरुआती लहर से बचने, उस झटके को सहने और तुरंत निर्णायक जवाबी हमला करने की क्षमता बनाए रखने में मदद मिलती है। इसे भी पढ़ें: Nepal Flood: गोरखा में सेना ने 200 से अधिक लोगों को सुरक्षित निकाला उत्तर में 19 प्रोजेक्ट सेना की नॉर्दर्न कमांड, जो जम्मू-कश्मीर और लद्दाख की देखरेख करती है, ने अपने इलाके में सुरक्षित अंडरग्राउंड (ज़मीन के नीचे) सुविधाएं बनाने के लिए 19 अलग-अलग प्रोजेक्ट शुरू किए हैं। हर साइट को वहां की ज़मीन की स्थिति और उसके काम के हिसाब से डिज़ाइन किया जाएगा। इसे भी पढ़ें: Delhi CAPF Deployment | दिल्ली में बड़े बवाल की आशंका! दिल्ली पुलिस ने की 20 अक्टूबर तक CAPF की तैनाती बढ़ाने की मांग, छावनी में तब्दील होगी राजधानी इन सुविधाओं का इस्तेमाल इन कामों के लिए किया जाएगा मिलिट्री इक्विपमेंट स्टोर करना: ज़रूरी हथियारों और सामान को दुश्मन की गोलीबारी से सुरक्षित रखना। गोला-बारूद स्टोर करना: गोला-बारूद के स्टॉक को मिसाइल और ड्रोन हमलों से बचाना। ट्रेनिंग की ज़रूरतें: सुरक्षित माहौल में ट्रेनिंग गतिविधियों में मदद करना। कमांड ने अगस्त में इन प्रोजेक्ट्स के लिए टेंडर जारी किए थे। जो कंपनियां इस काम में दिलचस्पी रखती हैं, वे 7 नवंबर तक अपनी बोलियां (बिड) भेज सकती हैं। इसे भी पढ़ें: एक से बढ़कर एक हथियार से भारत को लैस कर रहा रूस, SU-57 के बाद अब T-72 टैंक की बारी आर्मी कमांडर ने क्या कहा नॉर्दर्न कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ, लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा ने 9 अक्टूबर को सोसाइटी ऑफ़ इंडियन डिफेंस मैन्युफैक्चरर्स (SIDM) के सालाना सेशन में इस प्लान के बारे में बात की। उन्होंने कहा कि इन प्रोजेक्ट्स के लिए खरीद की प्रक्रिया पारदर्शी और सभी के लिए निष्पक्ष होगी। उन्होंने यह भी कहा कि सेना चाहती है कि ज़्यादा से ज़्यादा कंपनियाँ इसमें हिस्सा लें, जिनमें माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइज़ेज़ (MSMEs) भी शामिल हों। सेना ज़मीन के नीचे क्यों जा रही है? आधुनिक युद्ध तेज़ी से बदल रहे हैं। लंबी दूरी की मिसाइलें और सटीक निशाना लगाने वाले हथियार अब ज़मीन पर मौजूद लक्ष्यों को बहुत सटीकता से निशाना बना सकते हैं। इससे खुले बेस, गोला-बारूद के भंडार और खड़े किए गए उपकरण आसानी से निशाने पर आ सकते हैं। ज़मीन के नीचे बनी जगहें कहीं बेहतर सुरक्षा देती हैं। ये सेना को तब भी काम करते रहने में मदद कर सकती हैं जब दुश्मन लंबे समय तक और ज़ोरदार हमले करे। भारतीय सेना की ज़मीन के नीचे बनी नई सुविधाओं को मिसाइल हमलों, मोर्टार की गोलाबारी और हवाई हमलों से सुरक्षित रहने के लिए बनाया गया है। सेना ने पश्चिम एशिया में हाल के युद्धों और 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान अपने अनुभव से सबक सीखा है। यह मई 2025 में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर में आतंकी ठिकानों के ख़िलाफ़ भारत की सैन्य कार्रवाई थी। योजना बनाने वालों ने ईरान के ज़मीन के नीचे बनी सुरंगों और मिसाइल शहरों के बड़े नेटवर्क का भी अध्ययन किया है, जिसने लंबे हवाई हमलों के दौरान उसे अपने हथियारों को सुरक्षित रखने में मदद की थी। सबसे ज़बरदस्त हमलों का सामना करने के लिए तैयारी आर्मी ने एक्सपर्ट्स से बातचीत करने और आज के दौर के युद्धक्षेत्र की ज़रूरतों को समझने के बाद इन शेल्टर (सुरक्षित ठिकानों) के लिए अलग-अलग डिज़ाइन तैयार किए हैं। इन विकल्पों में शामिल हैं: प्री-फ़ैब्रिकेटेड स्ट्रक्चर: पहले से तैयार यूनिट जिन्हें तेज़ी से लगाया जा सकता है। ज़मीन के नीचे बनी सुविधाएँ: सामान रखने और सुरक्षा के लिए ज़मीन के नीचे बनाए गए शेल्टर। बहुत गहरी गुफ़ाएँ: चट्टानों को काटकर बनाई गई बहुत गहरी जगहें जो सबसे ज़बरदस्त हमलों को भी झेल सकती हैं। ये स्ट्रक्चर भारी बमबारी, तोपखाने की गोलाबारी और यहाँ तक कि बंकर-बस्टर हथियारों का भी सामना करने के लिए बनाए गए हैं। बंकर-बस्टर को इस तरह डिज़ाइन किया गया है कि फटने से पहले यह ज़मीन में गहराई तक जा सके। पूर्व में भी काम चल रहा है सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा के लिए पूर्व में भी इसी तरह की कोशिशें चल रही हैं। पश्चिम बंगाल में ज़मीन की इस संकरी पट्टी को अक्सर चिकन नेक कहा जाता है; यह अपनी सबसे संकरी जगह पर सिर्फ़ 20 से 22 किलोमीटर चौड़ी है। यह भारत के बाकी हिस्सों और पूर्वोत्तर राज्यों के बीच ज़मीन का मुख्य संपर्क मार्ग है, जो इसे देश के सबसे संवेदनशील इलाकों में से एक बनाता है। यहाँ बनाई जा रही ज़मीन के नीचे की सुविधाओं का इस्तेमाल कमांड और कंट्रोल, लॉजिस्टिक्स और सुरक्षित स्टोरेज के लिए किया जा सकता है। इससे सेना को इस इलाके में अहम ऑपरेशन जारी रखने में मदद मिलेगी, भले ही उस पर हमला हो जाए। BRO ड्रोन बंकर बना रहा है बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइज़ेशन (BRO) कुछ अग्रिम ठिकानों पर ज़मीन के नीचे बंकर भी बना रहा है। ये बंकर कॉम्बैट ड्रोन और दूसरे कीमती उपकरणों की सुरक्षा करेंगे। सुरक्षा कारणों से इन जगहों की जानकारी साझा नहीं की गई है। युद्ध लड़ने के तरीके में बदलाव यह कदम सैन्य सोच में एक बड़े बदलाव को दिखाता है। आज सेनाएँ न सिर्फ़ हमले पर, बल्कि बचाव और सुरक्षा पर भी ध्यान देती हैं। ज़मीन के नीचे अच्छी तरह से बनाए गए ठिकाने दुश्मन की गोलाबारी से जोखिम कम कर सकते हैं, लड़ने की क्षमता को सुरक्षित रख सकते हैं और सैनिकों को लंबे समय तक डटे रहने में मदद कर सकते हैं। भारत की सीमाएँ उत्तर और पूर्व दोनों तरफ़ लंबी और मुश्किल हैं। ज़मीन के नीचे बने शेल्टर का यह नया नेटवर्क भविष्य के किसी भी संघर्ष में सेना को सुरक्षित और तैयार रखने में अहम भूमिका निभा सकता है। जम्मू-कश्मीर में तीन साल में बनेंगे 5,000 अतिरिक्त बंकर जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती इलाकों में पिछले आठ वर्षों के दौरान नागरिकों की सुरक्षा के लिए करीब 10,000 बंकर बनाए गए हैं। अब सरकार ने अगले तीन वर्षों में 5,000 और बंकर बनाने की योजना तैयार की है। इसकी प्रक्रिया शुरू हो गई है। लंबी लड़ाई में सेना को दुश्मन पर मिलेगी बढ़त आधुनिक युद्ध में सैन्य ठिकानों को बचाए रखना दुश्मन पर हमला करने जितना ही जरूरी है। अग्रिम मोचों के पास सुरक्षित रसद भंडार होने से लंबी लड़ाई में सेना की आपूर्ति और जवाबी कार्रवाई की क्षमता भी बनी रहेगी। इससे दुश्मन के लिए एक ही हमले में भारत की सैन्य क्षमता को नुकसान पहुंचाना मुश्किल होगा। हालांकि, हिमालय में निर्माण की ऊंची लागत, भौगोलिक चुनौतियां और भारी उपकरणों की ढुलाई बड़ी मुश्किलें हैं। चीन के इलाके में पठारी जमीन अपेक्षाकृत समतल होने से उसे निर्माण में बढ़त मिलती है। भारत को प्रीफैब्रिकेटेड स्टील बंकर जैसी आधुनिक तकनीकों पर ध्यान देना होगा, ताकि दुर्गम इलाकों में भी कम समय में मजबूत और सुरक्षित ठिकाने तैयार किए जा सकें।

प्रभासाक्षी 14 Oct 2026 2:29 pm

'प्रधानमंत्री से लेकर सिपाही तक को दिलाएंगे सजा', प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोले राहुल गांधी

'प्रधानमंत्री से लेकर सिपाही तक को दिलाएंगे सजा', प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोले राहुल गांधी

समाचार नामा 14 Oct 2026 2:18 pm

पीएम मोदी के जनसेवा के 25 साल पूरे होने पर अभिनंदन प्रस्ताव, महाराष्ट्र कैबिनेट ने किसानों के लिए भी बड़ी घोषणा

पीएम मोदी के जनसेवा के 25 साल पूरे होने पर अभिनंदन प्रस्ताव, महाराष्ट्र कैबिनेट ने किसानों के लिए भी बड़ी घोषणा

समाचार नामा 14 Oct 2026 2:13 pm

108 मुफ्त एम्बुलेंस कर्मचारियों की हड़ताल की चेतावनी प्रशासनिक विफलता : भाजपा

108 मुफ्त एम्बुलेंस कर्मचारियों की हड़ताल की चेतावनी प्रशासनिक विफलता : भाजपा

समाचार नामा 14 Oct 2026 1:25 pm

Narendra Modi की सियासत के 25 साल: Indian Politics में कैसे स्थापित हुआ 'मोदी मार्ग'?

सात अक्टूबर 2001 को नरेंद्र मोदी ने जब गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, तब कोई नहीं सोच रहा था कि मोदी एक साल का भी कार्यकाल पूरा कर पाएंगे। राजनीतिक जानकारों और गुजरात के लोगों की इस सोच के पीछे कुछ खास वजहें भी थीं। मोदी के गुजरात का सरदार बनने से पहले के पांच वर्षों में राज्य में एक-एक करके चार मुख्यमंत्री आए और चले गए थे। मोदी राज्य के किसी ताकतवर जाति समुदाय से भी नहीं हैं और सबसे बड़ी बात कि मुख्यमंत्री बनने से पहले उन्होंने कोई चुनाव भी नहीं लड़ा था। हां, पर्दे के पीछे की राजनीति के मंजे हुए खिलाड़ी के तौर पर वे स्थापित थे। इतना ही नहीं, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर राज्यों के बीजेपी प्रभारी के रूप में भी अपनी सियासी समझ का भी वे लोहा मनवा चुके थे। लेकिन वक्त के साथ, मोदी ने सभी आशंकाओं को ना सिर्फ खारिज कर दिया है, बल्कि चौथाई सदी तक लगातार सत्ता का केंद्र बिंदु रहने वाले वाली शख्सियत भी बन चुके हैं। इसके पहले मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता ज्योति बसु के नाम देश में सबसे लंबे समय यानी करीब 23 साल सत्ता संभालने का रिकॉर्ड था। मोदी उस रिकॉर्ड से भी काफी आगे बढ़ चुके हैं। हाल के दिनों में एक वरिष्ठ हिंदी पत्रकार मोदी मार्ग की अवधारणा देकर आलोचनाओं के केंद्र में हैं। मोदी मार्ग की चर्चा हो तो वामपंथी तो सांड़ की तरह भड़केंगे ही, वे समाजवादी भी वरिष्ठ पत्रकार के आलोचक हो गए हैं, जो कभी उनके सहयोगी रहे या वे उनके साथी रहे। बेशक मोदी मार्ग की इन दिनों आलोचना हो रही है, लेकिन आने वाले दिनों में जब नरेंद्र मोदी का अपना और उनके दौर के भारत का इतिहास लिखा जाएगा, निश्चित तौर पर मोदी मार्ग या मोदीत्व की अवधारणा को भी स्वीकार किया जाएगा। किसी शख्सियत के जरिए शुरू पंथ या वैचारिक धारा को उसके जीवन काल में सर्व मान्यता और स्वीकार्यता कम ही मिल पाती है। लेकिन जब वही शख्सियत इतिहास की धारा में विलीन हो जाती है, तो उसकी दिखाई राहों को पंथ का दर्जा मिलने लगता है। गांधी बेशक अपनी जिंदगी में ही महात्मा के रूप में स्थापित हो चुके थे, लेकिन उनके कई प्रयोगों की उसी तरह आलोचनाएं होती रहीं, जैसे आज मोदी के वैचारिक विरोधी उनके तमाम कदमों की कटु आलोचनामें लीन रहते हैं। वैसे भी लोकतांत्रिकक दौर के भारतीय समाज की एक धारा रही है। शुरू में वह पदधारकों का शुरू में स्वागत करता है, बाद में उसका विरोधी हो जाता है। लेकिन वही शख्सियत जब इतिहास में समाहित हो जाती है, कुछ अपवादों को छोड़ समाज उसका घोर प्रशंसक हो जाता है। बीजेपी की ही राजनीति का उदाहरण इस संदर्भ में ले सकते हैं। एक दौर में बीजेपी विरोधियों की नजर में अटल उदार थे, जबकि आडवाणी कट्टर। लिहाजा आडवाणी लगातार विरोधियों के निशाने पर रहे। लेकिन जैसे ही अटल युग की समाप्ति हुई और मोदी युग की ओर बीजेपी बढ़ चली, आडवाणी उन्हीं विरोधियों की नजर में आदर के पात्र होते गए और मोदी के कटु आलोचकों की संख्या बढ़ती गई। कुछ इसी अंदाज में कह सकते हैं कि आने वाले दिनों में भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में कोई अन्य नेता उभरा तो हो सकता है कि मोदी बीजेपी विरोधियों की नजर में ही प्रशंसा का पात्र बन जाएं और बीजेपी का भावी नेता आडवाणी और मोदी की तरह आलोचनाओं के केंद्र में आ जाए। सत्ता की राजनीति में मोदी की यात्रा पर निगाह डालते हैं तो उनकी सबसे बड़ी चुनौती खुद की स्वीकार्यता बढ़ाना रही। जिस तरह चौथाई सदी से वे सत्ता के केंद्र में हैं, उसे देख कह सकते हैं कि इसमें वे कामयाब रहे हैं। इतना ही नहीं, वे सबसे ज्यादा समय तक सत्ता को खुद के इर्द-गिर्द केंद्रीकृत करने में भी सफल रहे हैं। आज भारत की केंद्रीय सत्ता ही नहीं, भारतीय जनता पार्टी का संगठन भी उन्हीं के इर्द-गिर्द केंद्रित है और उन्हीं से शक्ति ग्रहण करता है। इसे भी पढ़ें: ढ़ाई दशक के सख्त फैसलों ने बनाया मोदी को मोदी यह मोदी का दुर्भाग्य रहा कि उनके गुजरात की सत्ता संभालने के महज छह महीने बाद ही राज्य को गोधरा कांड के चलते भयानक सांप्रदायिक दंगों का सामना करना पड़ा। गुजरात सरकार की रिपोर्ट के अनुसार इन दंगों में 1044 लोगों के मारे गए , जबकि 2548 लोग घायल हुए थे। इसके अलावा 223 लोग लापता बताए गए। दंगों के सात साल बीतने के बाद सरकार के ही अनुसार, लापता लोगों की संख्या कुछ बढ़ गई। इन दंगों के बाद नरेंद्र मोदी विशेषकर कांग्रेस और वामपंथी दलों के निशाने पर आ गए। देश के वामपंथी सोच से प्रभावित स्वयंसेवी संगठनों ने उनके खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर मोर्चा खोल दिया। एक तरह से मोदी को राजनीतिक घृणा का पात्र बनाने की कोशिश की गई। उनके चरित्र हनन तक की कोशिशें हुईं। गुजरात दंगों के साथ ही इशरत जहां मुठभेड़ कांड को लेकर उनके खिलाफ सीबीआई जांच हुई। सीबीआई के समक्ष बतौर मुख्यमंत्री पूछताछ के लिए उन्हें कई बार घंटों तक उपस्थिति जतानी पड़ी और बतौर मुख्यमंत्री उन्हें घंटों तक सीबीआई के अच्छे-बुरे सवालों का सामना करना पड़ा। गुजरात दंगों के दाग के चलते एक दौर में उन्हें अमेरिका ने वीजा देने से इनकार कर दिया। इस बिंदु पर देखें तो मोदी का जीवट व्यक्तित्व उभरता है। कह सकते हैं कि तिरस्कार और आलोचनाओं से वे ताकत ग्रहण करते हैं, कुछ-कुछ मिथकीय पात्र बालि की तरह। जिस तरह बालि के सामने आए उसके विरोधियों की आधी ताकत बालि में ही समाहित हो जाती थी, मोदी कुछ उसी तरह विरोधियों की आलोचनाओं से ताकत ग्रहण करते हैं और अपनी राह बनाते रहते हैं। तीखे और अपमानजनक विरोध से जीवट से जीवट वाली शख्सियतें टूट जाती हैं, मोदी की ना सिर्फ कटु आलोचना हुई या हो रही है, उन्हें सार्वजनिक मंचों से घटिया, अश्लील और फूहड़ गालियां दी जा रही हैं। अतीत में उन्हें चरित्र हनन की सीमा तक बदनाम करने की कोशिशें हुईं। लेकिन मोदी रूके नहीं। कभी पर्दे के पीछे से राजनीति करने वाले मोदी लगातार आगे बढ़ते रहे। गुजरात में जब चीजें पटरी पर आनी शुरू हुईं तो उन्होंने राज्य के विकास को लेकर अपना मॉडल पेश किया। जिसे कालांतर में देश ने उसे ‘गुजरात मॉडल’ के नाम से जाना। ‘गुजरात मॉडल’ के विकास और इस विकास की गति को बनाए रखने के लिए प्रवासियों और निवेशकर्ताओं को लुभाने के लिए उन्होंने ‘वायव्रेंट गुजरात’ नाम से आयोजन शुरू किए। जिसे देखते ही देखते राज्य की जनता ने तो अपनाया ही, प्रवासियों ने भी हाथोंहाथ लिया। इसी का असर रहा कि जिस राज्य में महज पांच साल में चार मुख्यमंत्री आए और गए, उसी राज्य में मोदी ने साढ़े बारह साल से अधिक वक्त तक सत्ता संभालने का रिकॉर्ड बनाया। 2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान उनकी ख्याति राज्य से बाहर की सीमाओं तक पैठ बना चुकी थी या बना रही थी। इसका ही नतीजा रहा कि 2012 के गुजरात विधानसभा चुनावों के वक्त राष्ट्रीय मीडिया के एक हिस्से ने मोदी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार कर लिया। तब कहा जा रहा था कि गुजरात इस बार सिर्फ अपने मुख्यमंत्री का ही नहीं, बल्कि देश के भावी प्रधानमंत्री का भी चुनाव कर रहा है। मोदी की राजनीतिक यात्रा जातिवादी राजनीति का जवाब भी है। कांग्रेस के प्रथम परिवार, नीतीश कुमार और ममता बनर्जी को छोड़ दें तो आज के ज्यादातर बड़े राजनेता कहीं न कहीं सिर्फ अपनी जातियों के नेता हैं या उनकी राजनीतिक बुनियाद का आधार उनकी जाति है। लेकिन मोदी की लोकप्रियता में उनकी जाति का कोई आधार नहीं है। मोदी ने अपने लंबे शासन काल में ढरों उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन मोटे तौर पर देखें तो उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि भारत की वैश्विक मंच पर बदली छवि। उनके शासनकाल में भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि में सुधार हुआ है। मोदी ने आर्थिक मोर्चे पर देश को बहुत गति दी है। मोदी कहते हैं कि उनकी नजर में सिर्फ चार जातियां हैं, महिला, युवा, गरीब और किसान। मोदी के लंबे शासन काल में इन चारों ही वर्गों का ध्यान ठीक से रखने की कोशिशें बढ़ी हैं। भारत दुनिया की चौथी बड़ी आर्थिक महाशक्ति अगर बन चुका है, तो इसके पीछे उनका नजरिया भी है। कृषि में साढ़े चार प्रतिशत सालाना की विकास दर हासिल की जा चुकी है, बीजेपी के एजेंडे के तहत अयोध्या में राममंदिर बन चुका है, कश्मीर को अलग-थलग करने वाले संविधान के विशेष अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाया जा चुका है। मोदी के शासनकाल की उपलब्धियों को गिनाने बैठें तो पूरी रात गुजर जाएगी। बस मोटे तौर पर कह सकते हैं कि मोदी राज में देश ने अपना खोया गौरव हासिल करने की दिशा में एक मजबूत कदम जरूर बढ़ाया है। उमेश चतुर्वेदी लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक हैं..

प्रभासाक्षी 14 Oct 2026 12:57 pm

एसआईआर को लेकर विपक्ष पर शायना एनसी का तंज, कहा-2029 की हार का बहाना अभी से तलाश रहे राहुल गांधी

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समाचार नामा 14 Oct 2026 12:35 pm

CJP Members Arrested: दिल्ली पुलिस ने कॉकरोच जनता पार्टी के 3 सदस्यों को किया गिरफ्तार, जंतर-मंतर प्रदर्शन से जुड़ा मामला

CJP Members Arrested: दिल्ली पुलिस ने कॉकरोच जनता पार्टी के 3 सदस्यों को किया गिरफ्तार, जंतर-मंतर प्रदर्शन से जुड़ा मामला

समाचार नामा 14 Oct 2026 7:45 am

जागरण मंच और किसान संघ के संस्थापक दत्तोपंत ठेंगड़ी की पुण्यतिथि पर गडकरी समेत कई बड़े नेताओं ने दी श्रद्धांजलि

जागरण मंच और किसान संघ के संस्थापक दत्तोपंत ठेंगड़ी की पुण्यतिथि पर गडकरी समेत कई बड़े नेताओं ने दी श्रद्धांजलि

समाचार नामा 14 Oct 2026 7:38 am

तिरंगा लहराने पर हिरासत? CJP ने दिल्ली पुलिस पर लगाए गंभीर आरोप

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट के जरिए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं

देशबन्धु 14 Oct 2026 7:37 am

भारत-कनाडा रिश्तों को नई उड़ान, एयर इंडिया और कनाडा के बीच बड़ी चर्चा

भारतीय मूल के कनाडाई अंतरराष्ट्रीय व्यापार मंत्री मनिंदर सिद्धू ने दिल्ली में एयर इंडिया के चीफ कमर्शियल ऑफिसर (सीसीओ) निपुण अग्रवाल से मुलाकात की

देशबन्धु 14 Oct 2026 7:20 am

मध्य प्रदेश: सीएम मोहन यादव कल लाडली बहना योजना की 41वीं किस्त हस्तांतरित करेंगे

मध्य प्रदेश: सीएम मोहन यादव कल लाडली बहना योजना की 41वीं किस्त हस्तांतरित करेंगे

समाचार नामा 13 Oct 2026 11:41 pm

कांग्रेस मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन के दौरान भाजपा महिला कार्यकर्ताओं के साथ बदसलूकी: बांसुरी स्वराज

कांग्रेस मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन के दौरान भाजपा महिला कार्यकर्ताओं के साथ बदसलूकी: बांसुरी स्वराज

समाचार नामा 13 Oct 2026 10:26 pm

बंगाल में तृणमूल के पूर्व विधायक को बड़ी राहत, जबरन वसूली मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने दी सशर्त अंतरिम जमानत

बंगाल में तृणमूल के पूर्व विधायक को बड़ी राहत, जबरन वसूली मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने दी सशर्त अंतरिम जमानत

समाचार नामा 13 Oct 2026 10:19 pm

एलडीएफ और यूडीएफ ने सुगाथन के खिलाफ मिला लिया हाथ: केरल भाजपा

एलडीएफ और यूडीएफ ने सुगाथन के खिलाफ मिला लिया हाथ: केरल भाजपा

समाचार नामा 13 Oct 2026 10:18 pm

दिल्ली के एलजी टीएस संधू ने विश्वविद्यालयों को दिया सुझाव, बेहतर नतीजों के लिए पीपीपी मॉडल अपनाएं

दिल्ली के एलजी टीएस संधू ने विश्वविद्यालयों को दिया सुझाव, बेहतर नतीजों के लिए पीपीपी मॉडल अपनाएं

समाचार नामा 13 Oct 2026 8:40 pm

गांधीनगर नगर निगम चुनाव: बीजेपी का दबदबा कायम, कांग्रेस का प्रदर्शन सुधरा, 'आप' का नहीं खुला खाता

गांधीनगर नगर निगम चुनाव: बीजेपी का दबदबा कायम, कांग्रेस का प्रदर्शन सुधरा, 'आप' का नहीं खुला खाता

समाचार नामा 13 Oct 2026 6:23 pm

'दंगे और डर फैलाना ही एकमात्र उपलब्धि', पार्टी की योजनाओं का श्रेय लेने पर भाजपा ने सपा को घेरा

'दंगे और डर फैलाना ही एकमात्र उपलब्धि', पार्टी की योजनाओं का श्रेय लेने पर भाजपा ने सपा को घेरा

समाचार नामा 13 Oct 2026 6:14 pm

चुनाव आयोग के अधिकारियों को नहीं, मतदाता सूची की नीति बदलिए

किसी भी लोकतंत्र की मजबूती के लिए पारदर्शी, विश्वसनीय और समावेशी मतदाता सूची जरूरी है। लेकिन भारत के नेताओं और नौकरशाहों के गठजोड़ ने इसे एक हास्यास्पद विषय बना दिया है। यदि प्रत्येक व्यक्ति के जन्मभूमि पर ही मतदाता पहचान पत्र बना दिया जाए, और उसके पलायन के बावजूद उसका स्थाई नंबर नहीं बदलने दिया जाए, तो इससे बहुत सारे गड़बड़ झाले को रोका जा सकता है। इसे आधार कार्ड से लिंक करने पर व्यक्ति की वास्तविक पहचान भी सुनिश्चित होती है। लेकिन हमारी नौकरशाही ऐसा कभी नहीं होने देगी। भारत में राजनीतिक कारणों से जितने पाकिस्तानियों और बांग्लादेशियों के मतदाता पहचान पत्र बनाए गए, उसके लिए तत्कालीन बीएलओ, एसडीएम और डीएम के अलावा राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि जिम्मेदार नहीं हैं, तो कौन है? क्या कभी इस लापरवाही की जिम्मेदारी सुनिश्चित करने की कोशिश की गई? इनकी जमीनी लापरवाहियों या राजनीतिक पक्षपात के लिए इन्हें कड़ी सजा मिलनी चाहिए, न कि राज्य के मुख्य चुनाव आयुक्त और केंद्रीय मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ अनर्गल आरोप लगाए जाने चाहिए। इसे भी पढ़ें: सुप्रीम कटघरे में अब CEC को मुकदमों से बचाने वाला 'अभयदान', क्या है धारा-16 का 'कवच' जिस पर SC करेगा सुनवाई? एडॉल्फ हिटलर ने कहा था कि यदि तुम एक झूठ को सौ बार दोहराओगे तो वह लोगों को सच लगने लगेगा। जिन नेताओं ने अल्पसंख्यकों की आड़ में, झुग्गी-झोपड़ियों की आड़ में गलत मतदाता पहचान पत्र बनवा लिए, जब एसआईआर में ये पकड़ में आने लगे तो विपक्ष का बेचैन होना स्वाभाविक है। चाहे कांग्रेस हो भाजपा हो या क्षेत्रीय दल, अब इस खेल में सभी पारंगत दिख रहे हैं। यदि नौकरशाही तभी इस खेल को पकड़ लेती तो आज चुनाव आयोग को इतनी कड़ी मशक्कत नहीं करनी पड़ती। इस पूरे खेल में ग्राम पंचायत, नगर पंचायत, नगरपालिका, नगर निगम, विधानसभा और लोकसभा की मतदाता सूची में जो गड़बड़झाला है, उसे भी यदि समय रहते नहीं रोका गया, तो मतदाताओं को न्याय मिल पाएगा, इस बात की कोई गारंटी नहीं है। क्योंकि हर चुनाव में मतदाता सूची बदल जाना राजनीतिक व प्रशासनिक खेल नहीं तो क्या है? हर चुनाव के वक्त कुछ ऐसे वास्तविक लोग मिल जाएंगे, जिनके नाम ही मतदाता सूची से गायब मिलेंगे। आखिर इस लापरवाही के लिए सरकारी अधिकारियों की जिम्मेदारी कौन सुनिश्चित करेगा। इस बात में कोई दो राय नहीं कि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति मतदाता के मताधिकार में निहित है। यह अधिकार तभी सार्थक है, जब प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में दर्ज हो और कोई अपात्र व्यक्ति गलत तरीके से उसमें शामिल न रहे। इसलिए मतदाता सूची तैयार करने, उसमें संशोधन करने और उसकी शुद्धता सुनिश्चित करने की प्रक्रिया लोकतांत्रिक व्यवस्था का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि कोई अधिकारी इसमें लापरवाही बरतता पाया जाता है तो उसके लिए भी सख्त सजा का प्रावधान हो। जब भी मतदाता सूची में गड़बड़ियों, नाम कटने, दोहरी प्रविष्टियों अथवा पात्र मतदाताओं के छूट जाने की शिकायतें सामने आती हैं, तो चुनाव आयोग के अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका पर सवाल उठने लगते हैं। लेकिन क्या हर समस्या के लिए मैदानी स्तर पर काम करने वाले अधिकारियों व राजनीतिक कार्यकर्ताओं को जिम्मेदार ठहराना उचित है? या हमें उन नीतियों, नियमों और प्रक्रियाओं की समीक्षा करनी चाहिए, जिनके तहत मतदाता सूची तैयार की जाती है? नए मतदाताओं के नाम जोड़ना और मृतकों के नाम डिलीट करना चुनाव आयोग की वार्षिक जिम्मेदारी है। इस हेतु हर वर्ष अभियान चलाया जाता है। सवाल है कि अधिकारियों की जवाबदेही के साथ नीतिगत सुधार भी जरूरी है। इसके लिए संसद को भी सचेष्ट होना पड़ेगा। मतदाता सूची तैयार करने का काम व्यापक और संवेदनशील है। इसमें करोड़ों नागरिकों के विवरण का सत्यापन, नए मतदाताओं का पंजीकरण, मृत व्यक्तियों के नाम हटाना, स्थानांतरित नागरिकों के विवरण का अद्यतन और दोहरी प्रविष्टियों की पहचान जैसे अनेक कार्य शामिल होते हैं। यदि इन प्रक्रियाओं में त्रुटियां होती हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। जानबूझकर लापरवाही, पक्षपात या नियमों के उल्लंघन के प्रमाण मिलने पर संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए। लेकिन प्रत्येक प्रशासनिक त्रुटि को केवल कर्मचारियों की विफलता मान लेना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। यह भी देखना होगा कि निर्धारित समयसीमा व्यावहारिक है या नहीं, उपलब्ध संसाधन पर्याप्त हैं या नहीं, सत्यापन की प्रक्रिया कितनी सरल है और नागरिकों को अपनी शिकायतों के समाधान के लिए कितनी आसानी से अवसर मिलता है। सवाल है कि मतदाता सूची की नीति में किन बदलावों की जरूरत है? पहला, प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम जोड़ने की प्राथमिकता। मतदाता सूची की शुद्धता का अर्थ केवल गलत नाम हटाना नहीं, बल्कि प्रत्येक पात्र नागरिक को सूची में शामिल करना भी है। किसी पात्र मतदाता का नाम हटने या दर्ज न होने से उसके मताधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए नाम हटाने की प्रक्रिया में उचित सूचना, सत्यापन और अपना पक्ष रखने का अवसर सुनिश्चित किया जाना चाहिए। दूसरा, नाम काटने की प्रक्रिया पारदर्शी हो। किसी मतदाता का नाम सूची से हटाने के लिए स्पष्ट नियम, सत्यापन योग्य आधार और निर्धारित प्रक्रिया होनी चाहिए। नागरिक को, जहां नियमों के तहत आवश्यक हो, प्रस्तावित कार्रवाई की सूचना और आपत्ति दर्ज कराने का अवसर मिलना चाहिए। केवल तकनीकी रिकॉर्ड या अपूर्ण जानकारी के आधार पर किसी पात्र मतदाता का अधिकार प्रभावित नहीं होना चाहिए। तीसरा, मृत और स्थानांतरित मतदाताओं के मामलों में सावधानी जरूरी है। मृत व्यक्तियों के नाम हटाना और स्थायी रूप से स्थानांतरित मतदाताओं के रिकॉर्ड को अद्यतन करना आवश्यक है। लेकिन एक ही नाम, समान आयु या मिलते-जुलते पते के आधार पर किसी व्यक्ति को गलत तरीके से सूची से बाहर नहीं किया जाना चाहिए। पहचान और निवास के सत्यापन के लिए विश्वसनीय प्रक्रिया जरूरी है। चौथा, तकनीक का उपयोग हो, लेकिन मानवीय सत्यापन के साथ जरूरी है। डिजिटल डेटाबेस, ऑनलाइन आवेदन और स्वचालित प्रणाली मतदाता सूची को बेहतर बनाने में सहायक हो सकते हैं। हालांकि, तकनीकी गड़बड़ी, डेटा में विसंगति या गलत मिलान की स्थिति में मानवीय समीक्षा और सुधार का अवसर उपलब्ध होना चाहिए। तकनीक नागरिकों की सुविधा बढ़ाए, उनके अधिकारों में बाधा न बने। पांचवां, शिकायत निवारण की प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित हो। नाम जुड़वाने, संशोधन कराने या गलत तरीके से नाम हटाए जाने की शिकायतों के लिए सरल और समयबद्ध व्यवस्था होनी चाहिए। नागरिकों को आवेदन की स्थिति जानने, निर्णय का कारण समझने और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अपील करने की सुविधा मिलनी चाहिए। छठा, अधिकारियों को पर्याप्त संसाधन और प्रशिक्षण मिलना चाहिए। मतदाता सूची तैयार करने वाले कर्मचारियों पर यदि सीमित समय में अत्यधिक काम का दबाव है, तो त्रुटियों की आशंका बढ़ सकती है। इसलिए पर्याप्त कर्मचारी, व्यावहारिक समयसीमा, स्पष्ट दिशा-निर्देश और उचित प्रशिक्षण भी नीतिगत सुधार का हिस्सा होने चाहिए। सबसे बड़ी बात यह कि राजनीतिक विवाद से ऊपर उठकर समीक्षा हो। मतदाता सूची का मुद्दा अक्सर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय बन जाता है। एक पक्ष नामों को हटाए जाने पर सवाल उठाता है, तो दूसरा पक्ष सूची की शुद्धता और दोहरी प्रविष्टियों को समाप्त करने की आवश्यकता पर जोर देता है। इन दोनों चिंताओं की निष्पक्ष जांच जरूरी है। न तो हर नाम हटाए जाने को गलत मानना उचित है और न ही प्रत्येक कार्रवाई को स्वतः सही मान लेना। महत्वपूर्ण यह है कि हर निर्णय के पीछे स्पष्ट आधार हो, नियम सभी पर समान रूप से लागू हों और शिकायतों का समाधान प्रमाणों के आधार पर किया जाए। मतदाता सूची की विश्वसनीयता केवल चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं है। यह नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों और चुनावी प्रक्रिया पर जनता के भरोसे से जुड़ा विषय है। सवाल है कि अब आगे का रास्ता क्या है? तो जवाब यही होगा कि मतदाता सूची की नीति की नियमित समीक्षा की जानी चाहिए। इसमें राजनीतिक दलों, नागरिक समाज, चुनाव संबंधी विशेषज्ञों और आम मतदाताओं से सुझाव लिए जा सकते हैं। नाम जोड़ने और हटाने के आंकड़े, शिकायतों की स्थिति तथा उनके निस्तारण की जानकारी उचित गोपनीयता और कानूनी सीमाओं के भीतर सार्वजनिक की जानी चाहिए। साथ ही, मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए कि कोई पात्र नागरिक अनावश्यक प्रशासनिक बाधाओं के कारण अपने मताधिकार से वंचित न हो और सूची की शुद्धता भी बनी रहे। यदि किसी के पास वैध मतदाता पहचान पत्र है, लेकिन मतदाता सूची से उनका नाम नदारत है तो ऐसे व्यक्तियों को वोट डालने का अधिकार मिलना चाहिए। वस्तुतः चुनाव आयोग के अधिकारियों की जवाबदेही जरूरी है, लेकिन जवाबदेही का अर्थ केवल दोष तय करना नहीं, बल्कि व्यवस्था की कमियों को दूर करना भी है। यदि नियम जटिल हैं, प्रक्रियाएं अस्पष्ट हैं या संसाधन अपर्याप्त हैं, तो केवल अधिकारियों को बदलने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए ऐसी मतदाता सूची चाहिए, जिसमें प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम हो, प्रत्येक गलत प्रविष्टि को निष्पक्ष प्रक्रिया से सुधारा जाए और किसी का मताधिकार मनमाने ढंग से प्रभावित न हो। इसलिए मूल प्रश्न यही है—क्या हम हर विवाद के बाद अधिकारियों पर कार्रवाई तक सीमित रहेंगे, या ऐसी पारदर्शी, जवाबदेह और नागरिक-अनुकूल नीति बनाएंगे, जिससे गलतियों की संभावना ही कम हो जाए? मतदाता सूची की नीति में सुधार लोकतंत्र के प्रति जनता का विश्वास मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। - कमलेश पांडेय वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

प्रभासाक्षी 13 Oct 2026 4:33 pm

राहुल के सुरक्षाकर्मियों ने सीएम शिवकुमार को मारा धक्का, भाजपा बोली-'वरिष्ठों का कोई सम्मान नहीं'

राहुल के सुरक्षाकर्मियों ने सीएम शिवकुमार को मारा धक्का, भाजपा बोली-'वरिष्ठों का कोई सम्मान नहीं'

समाचार नामा 13 Oct 2026 4:26 pm

कर्नाटक स्टिंग ऑपरेशन विवाद: सिद्दारमैया ने खटखटाया कोर्ट का दरवाजा, भाजपा का कांग्रेस पर धोखा देने का आरोप

कर्नाटक स्टिंग ऑपरेशन विवाद: सिद्दारमैया ने खटखटाया कोर्ट का दरवाजा, भाजपा का कांग्रेस पर धोखा देने का आरोप

समाचार नामा 13 Oct 2026 4:03 pm

UP Congress में कुर्सी की लड़ाई जूते-चप्पल तक आई, Ajay Rai ने BJP में वापसी की टिकट कटाई!

उत्तर प्रदेश की राजनीति में कब कौन किस पाले में चला जाए, इसकी गारंटी न दिल्ली दे सकती है, न लखनऊ का कोई सियासी पंडित। अब कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अजय राय को लेकर भी यही सवाल उठने लगा है कि क्या वह एक बार फिर भाजपा का दामन थाम सकते हैं? सवाल उठ रहा है कि जिस नेता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वाराणसी में बार-बार चुनौती दी, क्या वही नेता अब कांग्रेस में अपनी सियासी जमीन खिसकती देख पुराने घर की ओर लौटने का रास्ता तलाश रहे हैं? फिलहाल यह अटकल है। लेकिन प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी छिनने, नए नेतृत्व से तनातनी और लखनऊ कांग्रेस दफ्तर में जूते-चप्पल चलने के बाद इन चर्चाओं को हवा जरूर मिल गई है। वैसे कहावत है कि घर का भेदी लंका ढाए, लेकिन यूपी कांग्रेस का हाल देखिए, यहां लंका ढहाने के लिए विपक्ष को मशक्कत करने की जरूरत ही क्या है, जब अपने ही लोग एक-दूसरे से दो-दो हाथ करने को तैयार बैठे हों! हम आपको बता दें कि अजय राय को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाकर आराधना मिश्रा 'मोना' को जिम्मेदारी सौंप दी गई। नई व्यवस्था में इमरान मसूद को भी कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली। मगर संगठन में बदलाव का यह फैसला पुराने नेतृत्व और उसके समर्थकों के बीच सहज रूप से स्वीकार नहीं हुआ। अजय राय की नाराजगी की एक वजह यह भी बताई जा रही है कि उन्हें हटाने के तरीके से वह असहज थे। उन्हें लगता है कि उनकी भूमिका और राजनीतिक हैसियत को नजरअंदाज किया गया। इसे भी पढ़ें: 'यादवों की गुलामी छोड़ो', Asaduddin Owaisi ने Akhilesh Yadav पर सीधा हमला बोलते हुए UP के Muslims से कर दिया बड़ा आह्वान देखा जाये तो यूपी की राजनीति में पद केवल नाम के आगे लगने वाला तमगा नहीं होता। उसके साथ समर्थकों की फौज, टिकट की दावेदारी, संगठन पर पकड़ और भविष्य की सियासी संभावनाएं भी जुड़ी होती हैं। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी से उतरना किसी नेता के लिए महज जिम्मेदारी बदलना नहीं, अपने प्रभाव का हिसाब-किताब भी होता है। यही वजह है कि अब चर्चा चल रही है कि कांग्रेस उन्हें गुजरात जैसे किसी दूसरे राज्य में संगठनात्मक जिम्मेदारी देकर मनाने की कोशिश कर सकती है। दूसरी तरफ भाजपा में वापसी की संभावना भी सियासी गलियारों में तैर रही है। उल्लेखनीय है कि अजय राय 1996 से 2009 तक भाजपा में रहे और उसके टिकट पर तीन बार विधायक चुने गए थे। दूसरी ओर, लखनऊ के कांग्रेस मुख्यालय में जो हुआ, वह महज दो नेताओं के समर्थकों की कहासुनी मानकर टाल देने वाला मामला नहीं है। आराधना मिश्रा के पदभार ग्रहण समारोह के दौरान अजय राय और ममता चौधरी से जुड़े गुट आमने-सामने आ गए। विवाद रास्ता देने और अध्यक्ष को लेकर हुई टिप्पणी से शुरू हुआ बताया गया, लेकिन देखते ही देखते मामला धक्का-मुक्की और जूते-चप्पल तक पहुंच गया था। देखा जाये तो इस घटना ने यूपी कांग्रेस की एक पुरानी बीमारी को फिर उजागर कर दिया है। पार्टी में कार्यकर्ताओं से ज्यादा नेताओं की फौज दिखाई देती है। हर नेता को अपना खेमा चाहिए, हर खेमे को अपनी हैसियत चाहिए और हर हैसियत को संगठन में अपनी हिस्सेदारी चाहिए। सवाल यह है कि जब पार्टी कार्यालय में ही नेतृत्व की इज्जत और अनुशासन की हिफाजत नहीं हो पा रही, तो गांव-कस्बों में संगठन खड़ा करने की जिम्मेदारी कौन निभाएगा? एक ओर चुनाव सामने हैं दूसरी ओर ऐसे वक्त पर अगर पदभार ग्रहण समारोह में जूते चल रहे हैं, तो टिकट बंटवारे, जिला अध्यक्षों की नियुक्ति और चुनावी गठबंधन के वक्त यह खींचतान किस मुकाम पर पहुंचेगी इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है। यह आशंका निराधार नहीं है कि जैसे-जैसे 2027 का विधानसभा चुनाव नजदीक आएगा, कांग्रेस की गुटबाजी और जूतम-पैजार बढ़ सकती है। आने वाले दिनों में टिकट के दावेदार बढ़ेंगे, पदों की खींचतान तेज होगी और हर नेता अपने समर्थकों के साथ ताकत दिखाने की कोशिश करेगा। अगर कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने अभी से अनुशासन की स्पष्ट लक्ष्मण रेखा नहीं खींची, तो चुनावी तैयारी से ज्यादा ऊर्जा आपसी हिसाब चुकता करने में खर्च हो सकती है। साथ ही इस पूरे विवाद को केवल अजय राय बनाम नए नेतृत्व की लड़ाई बताकर खत्म नहीं किया जा सकता। ममता चौधरी ने आरोप लगाया है कि उनके साथ अभद्रता हुई और उन्हें धमकाया गया। उन्होंने अजय राय पर दलित विरोधी व्यवहार का आरोप भी लगाया है। दूसरी ओर, अजय राय ने भी ममता चौधरी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने पांच सदस्यीय जांच समिति बनाई है। इसकी कमान पूर्व प्रदेश अध्यक्ष बृजलाल खाबरी को दी गई है। समिति में अभिषेक दत्त, अब्दुल हन्नान, रवि वर्मा और शमीना शफीक भी शामिल हैं। देखा जाये तो यहां कांग्रेस नेतृत्व के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ पार्टी को नेताओं के बीच अनुशासन कायम करना है, दूसरी तरफ महिला और दलित कार्यकर्ताओं की शिकायतों को निष्पक्षता से सुनना है। यदि किसी नेता के प्रभाव के कारण शिकायत दबती है, तो संगठन के भीतर बराबरी और सम्मान के दावों पर सवाल उठेंगे। और यदि जांच से पहले ही किसी को दोषी ठहरा दिया जाता है, तो निष्पक्ष प्रक्रिया पर सवाल खड़े होंगे। साथ ही अजय राय की नाराजगी का एक पहलू समाजवादी पार्टी के साथ कांग्रेस के रिश्तों से भी जुड़ा बताया जा रहा है। पार्टी के भीतर ऐसी चर्चा है कि अखिलेश यादव के साथ बेहतर तालमेल बैठाने की कवायद में प्रदेश नेतृत्व बदलने का फैसला लिया गया। अजय राय के समाजवादी पार्टी के साथ रिश्ते सहज नहीं रहे, जबकि प्रमोद तिवारी और आराधना मिश्रा को गठबंधन के लिहाज से अपेक्षाकृत सुविधाजनक माना जाता है। इसके अलावा, सोमवार को दिल्ली में राहुल गांधी के आह्वान पर निकले कांग्रेस के विरोध मार्च में अजय राय की गैरमौजूदगी ने भी अटकलों को हवा दी। जब प्रदेश में संगठनात्मक बदलाव के बाद नाराजगी खुलकर सामने आ रही हो और पूर्व अध्यक्ष राष्ट्रीय कार्यक्रम से दूर रहें, तो सवाल उठना लाजिमी है कि मामला सिर्फ पद का है या राजनीतिक भविष्य का भी। हालांकि अजय राय के सामने पिंडरा विधानसभा सीट का अपना सियासी हिसाब भी है। वह वहां से अपनी दावेदारी को लेकर सक्रिय रहना चाहते हैं। ऐसे में गुजरात की जिम्मेदारी स्वीकार करना, यूपी में अपनी जमीन पर ध्यान देना या किसी दूसरे राजनीतिक विकल्प पर विचार करना, इन संभावनाओं के बीच उनकी अगली चाल पर सबकी नजर रहेगी। साथ ही यूपी कांग्रेस के सामने संकट केवल अजय राय की नाराजगी का नहीं है। संकट उस संगठनात्मक संस्कृति का है, जिसमें पद बदलते ही पुराने और नए नेतृत्व के बीच अविश्वास सिर उठाने लगता है। यदि हर बदलाव को प्रतिष्ठा की लड़ाई बना दिया जाएगा, तो संगठन का विस्तार कैसे होगा? और यदि हर असहमति समर्थकों की भिड़ंत में बदल जाएगी, तो आम कार्यकर्ता अपनी जगह कहां तलाशेगा? उत्तर प्रदेश में चुनावी राजनीति केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस, बयानबाजी और बड़े नेताओं की तस्वीरों से नहीं चलती। बूथ पर कार्यकर्ता चाहिए, गांव में भरोसा चाहिए और टिकट न मिलने पर भी संगठन के साथ खड़े रहने की राजनीतिक संस्कृति चाहिए। पार्टी कार्यालय में जूते-चप्पल चलना इसी कसौटी पर कांग्रेस के सामने असहज सवाल खड़ा करता है। बहरहाल, अजय राय भाजपा में लौटेंगे या कांग्रेस उन्हें कोई नई जिम्मेदारी देकर रोक लेगी, इसका जवाब आने वाला वक्त देगा। लेकिन कांग्रेस नेतृत्व के लिए इससे भी बड़ा सवाल है कि क्या वह नेताओं की महत्वाकांक्षाओं के बीच संगठन को बचा पाएगा? क्योंकि यूपी की सियासत में चुनाव से पहले नाराजगी कोई नई बात नहीं। नई बात तब होगी, जब कोई पार्टी अपने नेताओं को यह समझा सके कि संगठन की कुर्सी निजी जागीर नहीं और पार्टी कार्यालय अखाड़ा नहीं होता। कांग्रेस ने अगर अनुशासन को कायम करने के लिए तत्काल कदम नहीं उठाये तो 2027 की चुनावी बिसात बिछने तक कांग्रेस में विरोधियों से मुकाबले की तैयारी कम और अपनों से हिसाब बराबर करने की कवायद ज्यादा दिखाई दे सकती है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 13 Oct 2026 4:03 pm

राहुल गांधी के आरोपों पर बोले पीयूष गोयल, कांग्रेस ने तो CEC को मंत्री-राज्यपाल बनाया था

गोयल ने कहा कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने से पहले कांग्रेस को अपने शासनकाल के रिकॉर्ड पर नजर डालनी चाहिए। उनके मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने चुनाव आयोग को स्वतंत्र और स्वायत्त तरीके से काम करने का अवसर दिया है।

देशबन्धु 13 Oct 2026 3:48 pm

सुप्रीम कटघरे में अब CEC को मुकदमों से बचाने वाला 'अभयदान', क्या है धारा-16 का 'कवच' जिस पर SC करेगा सुनवाई?

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और भारत के चुनाव आयोग (ECI) को नोटिस जारी किया है। यह नोटिस एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की उस याचिका पर जारी किया गया है जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के पालन के दौरान किए गए कार्यों के लिए दी गई कानूनी छूट (सिविल और आपराधिक कार्यवाही से सुरक्षा) को चुनौती दी गई है। इस मामले को कोर्ट में पहले से लंबित याचिकाओं के साथ जोड़ दिया गया है और 29 अक्टूबर को उन याचिकाओं के साथ ही इस पर भी सुनवाई होनी है। इस चुनौती का मुख्य आधार 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' की धारा 16 है। इस प्रावधान के अनुसार, अदालतें किसी मौजूदा या पूर्व CEC या चुनाव आयुक्त के खिलाफ़ उनके आधिकारिक कर्तव्यों के पालन (या पालन करने के दावे) के दौरान किए गए किसी काम या कही गई किसी बात के लिए दीवानी या आपराधिक कार्यवाही शुरू या जारी नहीं रख सकतीं। इस चुनौती से देश के शीर्ष चुनाव अधिकारियों को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा के दायरे पर सवाल उठते हैं और यह भी कि क्या ऐसी छूट जवाबदेही और कानून के शासन के संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप है। विरोध से संशोधन तक: कैसे बनी धारा 16? जब सरकार ने 10 अगस्त 2023 को राज्यसभा में 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) विधेयक, 2023' पेश किया, तो इस कानून की चारों ओर आलोचना हुई। इस विधेयक से नियुक्तियों के मामले में सरकार को जो बेहिसाब दबदबा मिलने वाला था, उसके अलावा एक बात पर ज़ोरदार बहस हुई: यह विधेयक CEC और ECs को वेतन, भत्ते और सेवा की अन्य शर्तों के मामले में कैबिनेट सेक्रेटरी के बराबर लाने की कोशिश कर रहा था; जबकि पहले वे सुप्रीम कोर्ट के जजों के बराबर के स्तर पर थे। विपक्षी दलों ने उस बराबरी के दर्जे का मुद्दा उठाया जो CEC और ECs को सुप्रीम कोर्ट के जजों के बराबर मिला हुआ था, और जिसे प्रस्तावित कानून खत्म करना चाहता था। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों ने 16 सितंबर 2023 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक संयुक्त पत्र लिखकर चिंता जताई कि इस कदम से EC की प्रतिष्ठा और अधिकार कम होंगे और यह संकेत जाएगा कि CEC और ECs सिर्फ़ नौकरशाहों के बराबर हैं, उनसे बेहतर नहीं, जिससे नौकरशाही से उनके स्वतंत्र होने की धारणा पर बुरा असर पड़ेगा। आलोचना के बाद, सरकार ने बिल को कुछ समय के लिए रोक दिया और 2023 के शीतकालीन सत्र में कुछ अहम बदलावों के साथ इसे चर्चा और पास कराने के लिए पेश किया। 12 दिसंबर 2023 को, केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने राज्यसभा में बिल पर बहस शुरू करते हुए कहा कि सरकार बिल की धारा 15 में एक संशोधन ला रही है। इसका मकसद CEC और ECs को सैलरी और सर्विस की शर्तों के मामले में सुप्रीम कोर्ट के जजों के बराबर लाना है। उन्होंने सदन को बिल में एक और संशोधन के बारे में भी बताया, जो धारा 15A को जोड़ना था। इससे उन्हें बिना किसी रुकावट और आज़ादी से अपने काम करने में मदद मिलेगी। यह बिल 12 दिसंबर 2023 को राज्यसभा से और 21 दिसंबर 2023 को लोकसभा से पास हुआ। इसे 28 दिसंबर 2023 को राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिली। धारा 15A, 2023 के कानून में धारा 16 के तौर पर शामिल हुई। यह धारा अभी चर्चा में है, खासकर उस बड़े विवाद की वजह से जो CEC ज्ञानेश कुमार के कथित तौर पर एकतरफा फैसलों को लेकर खड़ा हुआ है। ये फैसले चुनावी रोल के बहुत विवादित 'स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न' (SIR) को कराने से जुड़े थे। 1. CEC एक्ट की धारा 16 ज्ञानेश कुमार को क्या सुरक्षा देती है? धारा 16 मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक काम करते समय किए गए, या कथित तौर पर किए गए कामों के लिए सिविल और आपराधिक कार्यवाही से सुरक्षा देती है। यह सुरक्षा उनके पद छोड़ने के बाद भी बनी रहती है। 2. क्या CEC के तौर पर लिए गए फैसलों के लिए ज्ञानेश कुमार पर मुकदमा चलाया जा सकता है? धारा 16 अदालतों को किसी सरकारी काम से जुड़ी सिविल या आपराधिक कार्यवाही पर विचार करने या उसे जारी रखने से रोकती है। सुप्रीम कोर्ट इस सुरक्षा के दायरे पर विचार कर रहा था; इस लेख में इस बात पर कोई अंतिम फैसला नहीं बताया गया है कि क्या कुमार पर मुकदमा चलाया जा सकता है। 3. विपक्षी पार्टियां ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई क्यों चाहती हैं? विपक्षी पार्टियों का आरोप है कि उन्होंने मतदाता सूची के 'स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न' (विशेष गहन संशोधन) के संबंध में एकतरफा फैसले लिए। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अन्य चुनाव आयुक्तों ने उन फैसलों और आदेशों पर आपत्ति जताई थी, जिनके बारे में उन्हें जानकारी नहीं थी। 4. क्या CEC एक्ट चुनाव आयुक्तों को जजों की तुलना में ज़्यादा सुरक्षा देता है? सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि धारा 16 के तहत जजों को मिलने वाली सुरक्षा से ज़्यादा कानूनी सुरक्षा मिल सकती है। लेख में बताया गया है कि जजेज़ (प्रोटेक्शन) एक्ट के तहत सरकार या कोर्ट के पास जजों के खिलाफ़ कुछ कार्रवाई करने का अधिकार सुरक्षित रहता है, जबकि CEC एक्ट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। 5. क्या सुप्रीम कोर्ट ने धारा 16 की वैधता पर कोई फ़ैसला सुनाया है? कोर्ट ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, CEC और दूसरे चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी किया है। इसमें धारा 16 पर किसी अंतिम फ़ैसले की बात नहीं कही गई है। इससे पहले 5 अक्तूबर 2026 को सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने 2023 के कानून के तहत चुनाव आयुक्तों की मिली कानूनी सुरक्षा को लेकर कहा कि यह तो संवैधानिक कोर्ट के जजों को भी प्राप्त नहीं है। सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर)को लेकर कथित मनमाने फैसले को लेकर डाली गई याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच की तरफ से ये गंभीर मौखिक टिप्पणी की गई थी। न्यायाधीश (संरक्षण) अधिनियम, 1985 (The Judges (Protection) Act, 1985) क्या है? केंद्र सरकार, राज्य सरकार, भारत के सर्वोच्च न्यायालय, किसी उच्च न्यायालय या किसी अन्य सक्षम प्राधिकारी को उस समय लागू किसी भी कानून के तहत किसी व्यक्ति (जो न्यायाधीश रहा हो या वर्तमान में न्यायाधीश हो) के खिलाफ उचित कार्रवाई (चाहे वह दीवानी, आपराधिक, विभागीय कार्यवाही या किसी अन्य रूप में हो) करने का अधिकार बना रहेगा। यह प्रावधान (कार्रवाई की छूट देने वाली यह धारा) CEC अधिनियम (मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम) में मौजूद नहीं है। इसे भी पढ़ें: 'फ़ोन ज़ब्त, वकील से मिलने की इजाज़त नहीं': दास और रांका को हिरासत में लिए जाने के बाद दिल्ली पुलिस पर CJP के आरोप CEC और ECs की नियुक्ति कैसे होती है? संविधान का अनुच्छेद 324 चुनावों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण की ज़िम्मेदारी भारत के चुनाव आयोग (ECI) को सौंपता है। अनुच्छेद 324(2) के अनुसार, संसद द्वारा बनाए गए किसी भी कानून के अधीन रहते हुए, राष्ट्रपति CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करते हैं। कई दशकों तक, संसद ने इन नियुक्तियों की प्रक्रिया तय करने वाला कोई कानून नहीं बनाया था। इसके कारण सुप्रीम कोर्ट के सामने यह सवाल उठा कि जब ECI के सदस्यों की नियुक्ति कार्यपालिका (सरकार) करती है, तो ECI की आज़ादी को कैसे बचाया जा सकता है। मार्च 2023 में, सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की संविधान पीठ ने 'अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ' मामले में अपना फ़ैसला सुनाया। अनूप बरनवाल मामला क्या था? जनवरी 2015 में अनूप बरनवाल ने एक जनहित याचिका (PIL) दायर की। उनका तर्क था कि ECI के सदस्यों की नियुक्ति की व्यवस्था असंवैधानिक है। उस समय, नियुक्तियाँ करने का अधिकार कार्यपालिका के पास था। PIL में कहा गया था कि समय के साथ ECI की आज़ादी कम हुई है। इसमें कोर्ट से अपील की गई कि वह ECI में नियुक्तियों के लिए एक स्वतंत्र, कॉलेजियम जैसी व्यवस्था बनाने का निर्देश दे। संविधान पीठ ने कहा कि जब तक संसद अनुच्छेद 324(2) के तहत कोई कानून नहीं बनाती, तब तक चुनाव आयोग में नियुक्तियां तीन सदस्यों वाली एक समिति की सिफारिश पर की जाएंगी। इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल होंगे। अदालत ने कहा कि यह व्यवस्था तब तक लागू रहेगी जब तक संसद इस विषय पर कोई कानून नहीं बना लेती। CEC को कैसे हटाया जा सकता है? संविधान CEC को पद से हटाने के मामले में काफी सुरक्षा देता है। अनुच्छेद 324(5) के अनुसार, CEC को पद से उसी तरह और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है। इसका मतलब है कि CEC को केवल साबित हो चुके दुर्व्यवहार या अक्षमता के आधार पर और सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने के लिए तय संसदीय प्रक्रिया के ज़रिए ही हटाया जा सकता है। संसद के दोनों सदनों में ज़रूरी विशेष बहुमत से पास होना चाहिए। संसद द्वारा प्रस्ताव पास किए जाने के बाद ही राष्ट्रपति CEC को हटाने का आदेश जारी कर सकते हैं। इसकी प्रक्रिया 'जजेज़ (इन्क्वायरी) एक्ट, 1968' में बताई गई है। दूसरे चुनाव आयुक्तों को मिलने वाली सुरक्षा अलग है। आर्टिकल 324(5) के तहत, किसी चुनाव आयुक्त या क्षेत्रीय आयुक्त को CEC की सिफ़ारिश के बिना उनके पद से नहीं हटाया जा सकता। इसे भी पढ़ें: Piyush Goyal ने Rahul Gandhi से पूछे 10 सवाल, वोट चोरी पर सबूत देने की दी चुनौती क्या CEC को गिरफ़्तार किया जा सकता है? इससे संबंधित प्रावधान 2023 के अधिनियम की धारा 16 है। यह धारा किसी भी ऐसे व्यक्ति को अदालत में दीवानी या आपराधिक कार्यवाहियों से सुरक्षा प्रदान करती है, जो CEC या चुनाव आयुक्त रहा हो या वर्तमान में हो। बशर्ते वह कृत्य, बात या शब्द उसने अपने आधिकारिक कर्तव्य या कार्य के निर्वहन के दौरान किया या कहा हो। यह प्रावधान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सुरक्षा उन व्यक्तियों तक भी बढ़ाता है जो CEC या चुनाव आयुक्त हैं या कभी रहे थे। हालांकि, धारा 16 स्पष्ट रूप से यह नहीं कहती कि CEC को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। यह केवल यह कहती है कि अदालतें इस धारा के दायरे में आने वाले आचरण के संबंध में कोई दीवानी या आपराधिक कार्यवाही स्वीकार या जारी नहीं रखेंगी। इस धारा में गिरफ्तारी (Arrest), जांच (Investigation) या पुलिस हिरासत (Police Custody) जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया गया है। इसलिए, इसे गिरफ्तारी से सीधी या पूर्ण छूट नहीं कहा जा सकता। इसके अलावा, यह सुरक्षा केवल उन्हीं कृत्यों से जुड़ी है जो आधिकारिक कर्तव्यों या कार्यों के निर्वहन के दौरान किए गए हों। 2023 से पहले क्या व्यवस्था थी? पुराना कानून (1991 का एक्ट): 2023 से पहले चुनाव आयोग Act, 1991 से संचालित होता था। इस 1991 के कानून में आयुक्तों के खिलाफ कोर्ट केस या आपराधिक कार्रवाई पर रोक लगाने वाली ऐसी कोई 'धारा 16' या कोई इम्युनिटी क्लॉज नहीं था। सामान्य लोक सेवकों वाला नियम (CrPC धारा 197): पहले चुनाव आयुक्तों को अन्य सरकारी अफसरों की तरह ही माना जाता था।उन पर आधिकारिक ड्यूटी से जुड़े मामले में केस चलाने के लिए CrPC की धारा 197 के तहत सरकार की पूर्व अनुमति की जरूरत होती थी। यानी कोर्ट जाने पर पूरी तरह कानूनी रोक नहीं थी, सिर्फ सरकार की मंजूरी की शर्त थी। संविधान (अनुच्छेद 324):सविधान ने CEC को केवल पद से हटाने की सुरक्षा दी थी कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह महाभियोग जैसी प्रक्रिया से ही हटाया जा सकता है। लेकिन संविधान के तहत उन्हें राष्ट्रपति या राज्यपाल (अनुच्छेद 361) की तरह मुकदमों से कानूनी छूट नहीं दी गई थी। 2023 के कानून ने क्या बदल दिया? 2023 के नए एक्ट की धारा 16 में साफ लिख दिया गया कि CEC या ECs द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्य के दौरान किए गए किसी भी काम या फैसले के खिलाफ अदालत कोई भी सिविल या क्रिमिनल केस स्वीकार ही नहीं करेगी।

प्रभासाक्षी 13 Oct 2026 3:40 pm

छत्तीसगढ़ दौरे के दौरान बस्तर के दशहरा उत्सव में शामिल होंगी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु

छत्तीसगढ़ दौरे के दौरान बस्तर के दशहरा उत्सव में शामिल होंगी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु

समाचार नामा 13 Oct 2026 3:14 pm

एआई बूम ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को बांटा: आईएमएफ

वॉशिंगटन, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने मंगलवार को कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) में तेजी से बढ़ रहे निवेश और मध्य पूर्व में जारी युद्ध के कारण दुनिया की अर्थव्यवस्था दो हिस्सों में बंटती नजर आ रही है।

देशबन्धु 13 Oct 2026 2:20 pm

'संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाना राहुल गांधी की आदत', इंडिया ब्लॉक के प्रदर्शन पर एनडीए नेताओं का पलटवार

'संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाना राहुल गांधी की आदत', इंडिया ब्लॉक के प्रदर्शन पर एनडीए नेताओं का पलटवार

समाचार नामा 13 Oct 2026 2:16 pm

'बिमोल अकोइजम संसद में रहने लायक नहीं', जेएनयू कांड को लेकर राष्ट्रपति से मिलेंगी भाजपा की महिला सांसद

'बिमोल अकोइजम संसद में रहने लायक नहीं', जेएनयू कांड को लेकर राष्ट्रपति से मिलेंगी भाजपा की महिला सांसद

समाचार नामा 13 Oct 2026 2:04 pm

राहुल गांधी को महादेव के बारे में कुछ नहीं पता, इसी कारण राजनीतिक तमाशे को 'शिव तांडव' से जोड़ा : राम कदम

राहुल गांधी को महादेव के बारे में कुछ नहीं पता, इसी कारण राजनीतिक तमाशे को 'शिव तांडव' से जोड़ा : राम कदम

समाचार नामा 13 Oct 2026 2:00 pm

चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्ष की याचिका पर कांग्रेस नेता बोले-'लोकतंत्र की रक्षा के लिए जारी रहेगा संघर्ष'

चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्ष की याचिका पर कांग्रेस नेता बोले-'लोकतंत्र की रक्षा के लिए जारी रहेगा संघर्ष'

समाचार नामा 13 Oct 2026 1:53 pm

आन्दोलन वही, जो सार्थक मुद्दा, दिशा एवं भरोसे से जुड़ा हो

लोकतंत्र में असहमति उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी जीवंतता का प्रमाण है। सरकार से सवाल पूछना, नीतियों का विरोध करना और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाना नागरिक स्वतंत्रता का अनिवार्य हिस्सा है। लेकिन लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा केवल इस बात से नहीं होती कि विरोध करने की कितनी स्वतंत्रता है, बल्कि इससे भी होती है कि उस स्वतंत्रता का उपयोग किस उद्देश्य, किस भाषा और किस पद्धति से किया जा रहा है। किसी आंदोलन का मुद्दा कितना ही महत्त्वपूर्ण क्यों न हो, यदि उसका नेतृत्व दिशाहीन हो जाए, भाषा उत्तेजक बन जाए और पद्धति हिंसा अथवा अराजकता की ओर बढ़ने लगे, तो उसका नैतिक आधार कमजोर पड़ने लगता है। इसलिए आज देश के सामने प्रश्न केवल आंदोलनों का नहीं, बल्कि उनके चरित्र, विश्वसनीयता और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व का भी है। दिल्ली में हाल के विरोध प्रदर्शनों और उन पर प्रशासन की सख्ती के बाद सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप ने एक बार फिर लोकतंत्र की सीमाओं और संभावनाओं पर बहस छेड़ दी है। एक ओर शांतिपूर्ण विरोध नागरिकों का अधिकार है, तो दूसरी ओर सार्वजनिक व्यवस्था, नागरिक सुरक्षा और कानून का पालन सुनिश्चित करना शासन का दायित्व है। इन दोनों के बीच संतुलन ही संवैधानिक लोकतंत्र की पहचान है। न तो सरकार को कानून-व्यवस्था के नाम पर नागरिक स्वतंत्रताओं के अनावश्यक दमन की छूट दी जा सकती है और न ही आंदोलनकारियों को लोकतांत्रिक अधिकारों की आड़ में सार्वजनिक जीवन को बाधित करने का असीमित अधिकार प्राप्त है। संविधान अधिकार देता है, लेकिन उन अधिकारों के साथ उत्तरदायित्व भी जोड़ता है। आज सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि जनांदोलनों की दिशा कौन तय कर रहा है? क्या आंदोलन वास्तव में जनसमस्याओं के समाधान के लिए खड़े हो रहे हैं, अथवा जनता के असंतोष को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का साधन बनाया जा रहा है? यह प्रश्न किसी एक दल या संगठन तक सीमित नहीं है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, सामाजिक संगठन हों या जनसमूह, सभी को अपने आचरण की कसौटी संविधान, नैतिकता और जनहित को बनाना चाहिए। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। वह सरकार की नीतियों पर सवाल उठाता है, कमियों को सामने लाता है और जनहित के मुद्दों को राजनीतिक विमर्श में स्थान देता है। लेकिन विपक्ष का दायित्व केवल विरोध करना नहीं, बल्कि वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत करना भी है। यदि हर असहमति को सत्ता के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष में बदलने का प्रयास किया जाए, हर प्रशासनिक निर्णय को राजनीतिक षड्यंत्र बताया जाए और प्रत्येक जनसमस्या को व्यापक अव्यवस्था का प्रतीक बना दिया जाए, तो वास्तविक मुद्दे शोर में खोने लगते हैं। इसी तरह सरकार भी यदि आलोचना को शत्रुता समझने लगे, तो लोकतांत्रिक संवाद की संभावनाएं संकुचित हो जाती हैं। इसे भी पढ़ें: प्रदर्शन भी होगा, आवाजाही भी चलेगी! Delhi Protest Case में Supreme Court के अहम निर्देश आंदोलन की साख उसके मूल उद्देश्य एवं भरोसे से बनती है। जिस मुद्दे को लेकर लोग एकत्र होते हैं, उसकी स्पष्टता, तथ्यात्मक प्रामाणिकता और समाधान की दिशा आंदोलन की विश्वसनीयता निर्धारित करती है। जब मूल प्रश्न पीछे छूट जाता है और राजनीतिक दलों की प्रतिस्पर्धा, व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाएं अथवा वैचारिक टकराव केंद्र में आ जाते हैं, तब आंदोलन की ऊर्जा बिखरने लगती है। जनसमर्थन जुटाना और जनविश्वास अर्जित करना दो अलग-अलग बातें हैं। भीड़ किसी क्षणिक आक्रोश का परिणाम हो सकती है, लेकिन जनविश्वास निरंतर नैतिक आचरण और रचनात्मक कार्यों से अर्जित होता है। भारत का लोकतांत्रिक इतिहास इस संदर्भ में अनेक महत्त्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है। वर्ष 1974 का छात्र आंदोलन और लोकनायक जयप्रकाश नारायण का नेतृत्व बताता है कि जनाक्रोश को रचनात्मक परिवर्तन की शक्ति में कैसे बदला जा सकता है। बिहार के छात्रों ने भ्रष्टाचार, महंगाई और शासन संबंधी समस्याओं के विरुद्ध आवाज उठाई थी। जयप्रकाश नारायण ने इस असंतोष को व्यापक सामाजिक और राजनीतिक सुधारों की दिशा देने का प्रयास किया। आज के आंदोलनों को इस ऐतिहासिक अनुभव से सीखना चाहिए। किसी भी आंदोलन की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितनी सड़कें बंद हुईं, कितने लोग एकत्र हुए या कितने दिनों तक विरोध चला। उसकी सफलता का वास्तविक पैमाना यह होना चाहिए कि उसने किस समस्या का समाधान प्रस्तुत किया, जनजीवन में क्या सकारात्मक परिवर्तन लाया और समाज में संवैधानिक चेतना को कितना मजबूत किया। वर्तमान समय में इंटरनेट मीडिया ने जनमत निर्माण की प्रक्रिया को पूरी तरह बदल दिया है। अब कोई घटना कुछ ही मिनटों में व्यापक बहस का विषय बन सकती है। यह लोकतंत्र के लिए एक महत्त्वपूर्ण अवसर है, क्योंकि इससे आम नागरिकों को अपनी बात रखने और प्रशासन से जवाब मांगने का मंच मिला है। लेकिन यही माध्यम भ्रामक सूचनाओं, अधूरे तथ्यों, भावनात्मक अभियानों और अपुष्ट आरोपों को भी तेजी से प्रसारित कर सकता है। हैशटैग, वायरल वीडियो और ऑनलाइन समर्थन अपने आप में किसी आंदोलन की नैतिक प्रामाणिकता का प्रमाण नहीं हैं। किसी आरोप की गंभीरता का निर्धारण उसके प्रमाणों से होना चाहिए, उसकी लोकप्रियता से नहीं। यदि आंदोलनकारी तथ्यों की पुष्टि किए बिना आरोप लगाते हैं, तो वे अपने ही उद्देश्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसी प्रकार प्रशासन का दायित्व है कि वह आलोचनात्मक आवाजों को केवल इसलिए संदिग्ध न माने कि वे सरकार के विरुद्ध हैं। पारदर्शिता, तथ्यपरक संवाद और निष्पक्ष जांच ही अविश्वास को दूर करने के प्रभावी उपाय हैं। आज युवाओं के पास डिजिटल तकनीक, नवाचार, उद्यमिता और सामाजिक सहभागिता के अनेक अवसर हैं। उनकी ऊर्जा केवल विरोध तक सीमित न रहे, बल्कि समाधान निर्माण में भी लगे। भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन हो तो पारदर्शिता के व्यावहारिक उपाय सामने आएं, चुनावी सुधारों की मांग हो तो प्रमाण आधारित सुझाव प्रस्तुत किए जाएं, प्रशासनिक अन्याय का प्रश्न हो तो कानूनी और संस्थागत रास्तों को मजबूत किया जाए। विरोध की सार्थकता तब बढ़ती है, जब वह किसी बेहतर व्यवस्था की कल्पना और निर्माण का आधार बनता है। जनांदोलनों के संदर्भ में विदेशी शक्तियों की भूमिका पर भी चर्चा होती रही है। यह स्वाभाविक है कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में राष्ट्रीय हितों, बाहरी प्रभावों और सूचना के प्रवाह को लेकर सतर्कता बरती जाए। लेकिन इस विषय पर भी भावनाओं अथवा आशंकाओं के बजाय प्रमाणों के आधार पर बात होनी चाहिए। किसी आंदोलन में सरकार की आलोचना होने मात्र से उसे विदेशी षड्यंत्र का हिस्सा नहीं कहा जा सकता। उसी प्रकार यदि किसी गतिविधि में विदेशी वित्तपोषण, भ्रामक प्रचार अथवा अनुचित हस्तक्षेप के विश्वसनीय प्रमाण मिलते हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। राष्ट्रीय एकता और अखंडता की रक्षा केवल कठोर प्रशासनिक कार्रवाई से नहीं होती। वह नागरिकों के विश्वास, संस्थाओं की निष्पक्षता, न्याय की उपलब्धता और शासन की पारदर्शिता से मजबूत होती है। देश की आलोचना और देश के प्रति शत्रुता में अंतर समझना आवश्यक है। सरकार की किसी नीति का विरोध करना राष्ट्रविरोध नहीं है, जैसे राष्ट्रीय हित की चिंता करना किसी नागरिक की लोकतांत्रिक स्वतंत्रता को सीमित करने का औचित्य नहीं बन सकता। अंततः लोकतंत्र की शक्ति न तो केवल सत्ता में निहित है और न ही केवल सड़क पर उतरने वाली भीड़ में। उसकी वास्तविक शक्ति नागरिक विवेक, संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और समाज की संवाद करने की क्षमता में है। किसी भी आंदोलन को स्वयं से तीन प्रश्न अवश्य पूछने चाहिए-क्या हमारा मुद्दा तथ्यपरक और जनहितकारी है? क्या हमारी पद्धति लोकतांत्रिक और अहिंसक है? क्या हमारे प्रयास से समस्या का समाधान निकलेगा या समाज में विभाजन और अविश्वास बढ़ेगा? केवल मुद्दा सही होना पर्याप्त नहीं है, उसके लिए सही नेतृत्व, सही भाषा, सही पद्धति और सही लक्ष्य भी आवश्यक हैं। आंदोलन का उद्देश्य केवल किसी व्यवस्था को चुनौती देना नहीं, बल्कि उससे बेहतर व्यवस्था के निर्माण में योगदान करना होना चाहिए। जो आंदोलन समाज को विवेक, अनुशासन, न्याय और रचनात्मकता की दिशा देता है, वही इतिहास में स्थायी स्थान प्राप्त करता है। भारत का भविष्य ऐसे ही लोकतांत्रिक चिंतन में सुरक्षित है, जहां असहमति को सम्मान मिले, सत्ता जवाबदेह रहे, विपक्ष रचनात्मक बने और राष्ट्रहित का अर्थ नागरिक स्वतंत्रता तथा संवैधानिक मर्यादा के समन्वय में खोजा जाए। - ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

प्रभासाक्षी 13 Oct 2026 1:22 pm

IMF का अनुमान: भारत की GDP ग्रोथ 7% रहेगी, दुनिया की आर्थिक रफ्तार से दोगुने से ज्यादा

IMF ने भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान वित्त वर्ष 2026-27 के लिए बढ़ाकर 7% किया। जानिए वैश्विक विकास दर, AI निवेश और अर्थव्यवस्था के सामने मौजूद चुनौतियां।

देशबन्धु 13 Oct 2026 10:30 am

संजय सिंह की कोर्ट में बढ़ी टेंशन! गवाही पूरी, अब 17 अक्टूबर को होगी आर-पार की बहस

उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर जिले में आदर्श आचार संहिता उल्लंघन के मामले में आम आदमी पार्टी (आप) सांसद संजय सिंह समेत 12 आरोपियों के खिलाफ विचाराधीन केस में गवाही पूरी हो गई है

देशबन्धु 13 Oct 2026 7:40 am

दुर्गा पूजा से पहले पश्चिम बंगाल में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल, 4 आईएएस अधिकारियों का तबादला

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समाचार नामा 13 Oct 2026 12:00 am

'EVM खराब है तो सरकार भी छोड़ो'... राहुल गांधी पर हिमंता बिस्वा सरमा का बड़ा हमला

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को चुनौती दी कि अगर उन्हें वाकई लगता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव सुनिश्चित नहीं कर सकते, तो वे विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों की सरकारों से इस्तीफा मांगें और चुनाव बहिष्कार की घोषणा करें।

देशबन्धु 12 Oct 2026 11:13 pm

SIR पर महासंग्राम! राहुल गांधी विपक्षी फौज के साथ Supreme Court पहुंचे, चुनाव आयोग पर बड़ा हमला

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है

देशबन्धु 12 Oct 2026 11:01 pm

'सीजेआई के पास इंडिया गठबंधन से मिलने का समय नहीं', सपा प्रवक्ता अमीक जामेई का दावा

'सीजेआई के पास इंडिया गठबंधन से मिलने का समय नहीं', सपा प्रवक्ता अमीक जामेई का दावा

समाचार नामा 12 Oct 2026 10:24 pm

'देश में अराजकता फैलाना विपक्ष का लक्ष्य', राहुल गांधी के मार्च पर भाजपा नेता का आरोप

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समाचार नामा 12 Oct 2026 9:58 pm

'देश को टकराव नहीं, विवेक और समाधान चाहिए', सीजेपी के प्रदर्शन पर स्वामी चिदानंद सरस्वती

'देश को टकराव नहीं, विवेक और समाधान चाहिए', सीजेपी के प्रदर्शन पर स्वामी चिदानंद सरस्वती

समाचार नामा 12 Oct 2026 6:56 pm

ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर गांधी मैदान से राजभवन तक मार्च: संदीप सौरव

ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर गांधी मैदान से राजभवन तक मार्च: संदीप सौरव

समाचार नामा 12 Oct 2026 6:27 pm

मध्य प्रदेश: मुख्यमंत्री मोहन यादव का स्कूली बच्चों से संवाद

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समाचार नामा 12 Oct 2026 6:12 pm

भाजपा सांसद ने खुले पत्र के जरिए सपा प्रमुख से पूछे सवाल, समाजवादी आंदोलन के कार्यकर्ताओं को हिस्सेदारी देने पर मांगा जवाब

भाजपा सांसद ने खुले पत्र के जरिए सपा प्रमुख से पूछे सवाल, समाजवादी आंदोलन के कार्यकर्ताओं को हिस्सेदारी देने पर मांगा जवाब

समाचार नामा 12 Oct 2026 5:24 pm

भारत में सितंबर में खुदरा महंगाई 5.54 प्रतिशत रही

नई दिल्ली, भारत में सितंबर 2026 में खुदरा महंगाई सालाना आधार पर बढ़कर 5.54 प्रतिशत (प्रोविजनल) हो गई है।

देशबन्धु 12 Oct 2026 4:45 pm

'ये लोग अब संवैधानिक संस्थाओं से लड़ रहे हैं', भाजपा नेता ने कांग्रेस पर साधा निशाना

'ये लोग अब संवैधानिक संस्थाओं से लड़ रहे हैं', भाजपा नेता ने कांग्रेस पर साधा निशाना

समाचार नामा 12 Oct 2026 4:27 pm

वैश्विक अस्थिरता बढ़ने से भारतीय शेयर बाजार लाल निशान में बंद

मुंबई, भारतीय शेयर बाजार सोमवार के कारोबारी सत्र में लाल निशान में बंद हुआ।

देशबन्धु 12 Oct 2026 4:26 pm

अपनी ही पार्टी की मध्य प्रदेश सरकार के खिलाफ Shivraj Singh Chouhan ने क्यों खोला मोर्चा? Madhya Pradesh BJP में सब ठीक है?

विपक्षी नेता किसी सरकार पर हमला बोलें तो समझ आता है, लेकिन मध्य प्रदेश में तो राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपनी ही पार्टी की सरकार के मुख्यमंत्री मोहन यादव को घेरकर पूरी भाजपा को सकते में डाल दिया है। हम आपको बता दें कि आदिवासियों के घरों पर बुलडोजर चलाए जाने के मुद्दे पर शिवराज की नाराजगी ने मध्य प्रदेश की सियासत में एक नई बहस छेड़ दी है। सवाल सिर्फ आदिवासी परिवारों के घरों को तोड़े जाने का नहीं है, बल्कि यह भी है कि क्या भारतीय जनता पार्टी के भीतर सत्ता और नेतृत्व को लेकर कोई ऐसी खींचतान चल रही है, जिसकी झलक अब सार्वजनिक रूप से दिखाई देने लगी है? मुख्यमंत्री मोहन यादव और शिवराज सिंह चौहान के बीच कथित मतभेदों की चर्चाओं के बीच इस घटनाक्रम के राजनीतिक मायने तलाशे जा रहे हैं। हम आपको बता दें कि मामला सीहोर जिले के कोसमी गांव का है, जहां 11 अक्टूबर को वन विभाग और वन विकास निगम की कार्रवाई में बारेला आदिवासी समुदाय के 12 परिवारों के घर तोड़े जाने की खबर सामने आई। आरोप है कि इस कार्रवाई में खेतों में खड़ी मक्का और अरहर की फसलें भी नष्ट हुईं और पानी के लिए इस्तेमाल होने वाले कुएं को मिट्टी से भर दिया गया। अधिकारियों की दलील वन भूमि पर कथित अतिक्रमण हटाने की है, लेकिन कार्रवाई के तरीके ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इसे भी पढ़ें: Rahul Gandhi के आरोपों पर Shivraj का पलटवार, अराजकता से सत्ता पाना चाहती है Congress शिवराज सिंह चौहान को इसकी जानकारी मिली तो वह सीधे गांव पहुंच गए। पीड़ित परिवारों से मुलाकात की, उनके साथ धरने पर बैठे और मौके से ही मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल तथा भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल से बात की। शिवराज ने प्रभावित परिवारों को नए मकान बनवाने और तब तक रहने-खाने की व्यवस्था कराने का भरोसा दिया। उन्होंने अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि गरीब आदिवासियों के साथ हुआ अन्याय बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। लेकिन शिवराज के बयान का सबसे अहम हिस्सा वह था, जिसमें उन्होंने सवाल उठाया कि जिन लोगों के वोट से भाजपा को जीत मिलती है, उन्हीं के घर क्यों उजाड़े जा रहे हैं? उन्होंने यह आशंका भी जताई कि कुछ अधिकारी मुख्यमंत्री मोहन यादव की छवि खराब करने की साजिश कर रहे हो सकते हैं। यानी शिवराज ने एक तरफ मुख्यमंत्री के प्रति अपनी चिंता जताई, तो दूसरी तरफ उनके अधीन काम करने वाले प्रशासनिक तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया। सवाल उठता है कि क्या यह शिवराज बनाम मोहन यादव की लड़ाई है? देखा जाये तो राजनीतिक गलियारों में इस घटनाक्रम को सिर्फ प्रशासनिक कार्रवाई के विरोध तक सीमित करके नहीं देखा जा रहा है। दिसंबर 2023 में शिवराज सिंह चौहान की जगह मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद से ही दोनों नेताओं की राजनीतिक भूमिका और उनके बीच संबंधों को लेकर समय-समय पर चर्चाएं होती रही हैं। शिवराज लंबे समय तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं और बुधनी उनकी पुरानी राजनीतिक कर्मभूमि रही है। ऐसे क्षेत्र में आदिवासी परिवारों के घर उजड़ना और फिर उनका खुद मौके पर पहुंचकर प्रशासन के खिलाफ खड़ा होना, उनकी स्थानीय राजनीतिक पकड़ और जननेता की छवि से भी जुड़ा है। ऐसे में उनकी प्रतिक्रिया को जनहित की चिंता और अपने राजनीतिक प्रभाव को बनाए रखने, दोनों संभावित संदर्भों में भी देखा जा सकता है। उधर, कांग्रेस ने इस प्रकरण को भाजपा के अंदरूनी मतभेदों से जोड़ते हुए मुख्यमंत्री पर निशाना साधा है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने आरोप लगाया कि भाजपा की अंदरूनी खींचतान का खामियाजा आदिवासी परिवारों को भुगतना पड़ रहा है। हालांकि, भाजपा के लिए असली चुनौती विपक्ष के आरोपों से ज्यादा इस सवाल का जवाब देना है कि कथित अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई में प्रभावित परिवारों के पुनर्वास, आजीविका और बुनियादी जरूरतों का ध्यान रखा गया या नहीं। अगर केंद्रीय मंत्री को अपनी ही राज्य सरकार के अधिकारियों के खिलाफ सार्वजनिक रूप से हस्तक्षेप करना पड़ रहा है, तो प्रशासनिक समन्वय और जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है। वैसे यह पहली बार नहीं है जब शिवराज ने मध्य प्रदेश सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हों। उन्होंने पहले भी आदिवासियों से जुड़े मामलों और मूंग की खरीद के मुद्दे पर हस्तक्षेप किया था। अब निगाहें मुख्यमंत्री मोहन यादव की प्रतिक्रिया और प्रभावित परिवारों को मिलने वाली राहत पर हैं। शिवराज का कहना है कि वह मुख्यमंत्री के सामने पूरा मामला उठाएंगे। यदि दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई होती है और परिवारों का पुनर्वास सुनिश्चित किया जाता है, तो विवाद का प्रशासनिक समाधान निकल सकता है। लेकिन यदि मामला लंबा खिंचता है, तो भाजपा के भीतर समन्वय और नेतृत्व की कार्यशैली पर बहस और तेज हो सकती है। बहरहाल, कोसमी की घटना को शिवराज और मोहन यादव के बीच टकराव कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना स्पष्ट है कि केंद्रीय मंत्री का सार्वजनिक विरोध राज्य सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा करता है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 12 Oct 2026 4:23 pm

सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इंडिया ब्लॉक का सुप्रीम कोर्ट मार्च, राहुल-खड़गे समेत कई नेता शामिल

सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इंडिया ब्लॉक का सुप्रीम कोर्ट मार्च, राहुल-खड़गे समेत कई नेता शामिल

समाचार नामा 12 Oct 2026 4:02 pm

वित्तीय सेवा क्षेत्र में 2026 की तीसरी तिमाही में दोगुने से अधिक बढ़कर 7.3 अरब डॉलर रहा

नई दिल्ली, भारत के वित्तीय सेवा क्षेत्र में 2026 की तीसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर) में 7.3 अरब डॉलर के 67 सौदे दर्ज किए गए।

देशबन्धु 12 Oct 2026 3:48 pm

गोल्ड ईटीएफ में निवेश 71 प्रतिशत से अधिक बढ़कर 4,451 करोड़ रुपए हुआ

नई दिल्ली, एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया (एम्फी) की ओर से सोमवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, सितंबर में गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) में शुद्ध निवेश अगस्त के 2,597 करोड़ रुपए से महीने-दर-महीने आधार पर 71.4 प्रतिशत बढ़कर सितंबर में 4,451 करोड़ रुपए हो गया है। यह दिखाता है कि सोने की ओर लोगों का रुझान बढ़ रहा है।

देशबन्धु 12 Oct 2026 3:24 pm

जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन पर रोक को लेकर सौरव दास और आशुतोष रांका बोले-'यह अस्वीकार्य, पीछे नहीं हटेंगे'

जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन पर रोक को लेकर सौरव दास और आशुतोष रांका बोले-'यह अस्वीकार्य, पीछे नहीं हटेंगे'

समाचार नामा 12 Oct 2026 3:15 pm

कांग्रेस के सुप्रीम कोर्ट तक मार्च पर भाजपा नेता बोले-'इनके खिलाफ अवमानना का केस चलना चाहिए'

कांग्रेस के सुप्रीम कोर्ट तक मार्च पर भाजपा नेता बोले-'इनके खिलाफ अवमानना का केस चलना चाहिए'

समाचार नामा 12 Oct 2026 3:11 pm

Jio IPO को नुकसान पहुँचाने के लिए Elon Musk ने चला बड़ा दाँव, Mukesh Ambani का पलटवार Starlink को पड़ सकता है भारी

स्टारलिंक के मालिक एलन मस्क का दुस्साहस बढ़ता ही चला जा रहा है। भारतीय उद्योगपति और रिलायंस इंडस्ट्रीज के मालिक मुकेश अंबानी पर सोशल मीडिया के जरिये निशाना साधने के बाद अब जियो के प्रस्तावित आईपीओ से ठीक पहले एलन मस्क ने तीखे बयान दिये हैं। जिन्हें भारतीय बाजार में अपनी एंट्री के लिए दबाव बनाने और रिलायंस के खिलाफ माहौल तैयार करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। गौरतलब है कि एलन मस्क ने आरोप लगाया है कि भारत में कुछ प्रभावशाली कारोबारी हित उनकी कंपनी स्टारलिंक का रास्ता रोक रहे हैं। साथ ही, उन्होंने भारत में सस्ती सैटेलाइट इंटरनेट सेवा देने का वादा किया है। हालांकि, सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि जियो और भारती समर्थित वनवेब भी जरूरी मंजूरियों के लिए लंबे समय से इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मस्क के आरोप तथ्यों पर आधारित हैं या जियो के आईपीओ से पहले प्रतिस्पर्धा को लेकर एकतरफा नैरेटिव बनाने की कोशिश की जा रही है? उल्लेखनीय है कि मस्क ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर दावा किया कि भारत में कुछ प्रभावशाली कारोबारी हित स्टारलिंक की एंट्री रोककर अपने एकाधिकार को बचाना चाहते हैं। उन्होंने अंबानी पर भी निशाना साधते हुए प्रतिस्पर्धा की अनुमति देने की बात कही। साथ ही वादा किया कि भारत में स्टारलिंक की सेवा सस्ती रखी जाएगी, क्योंकि महंगी सेवा होने पर ग्राहक उसे नहीं अपनाएंगे। मस्क का तर्क है कि प्रतिस्पर्धा से भारतीय उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प मिलेंगे, भले ही इससे अंबानी के मुनाफे पर दबाव पड़े। इसे भी पढ़ें: एलन मस्क प्रकरण, विदेशी मुख के शंख न बनें राहुल गांधी लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत में स्टारलिंक की व्यावसायिक शुरुआत में देरी के लिए वास्तव में जियो या अंबानी जिम्मेदार हैं? दूरसंचार विभाग (DoT) के रिकॉर्ड पर आधारित रिपोर्ट इस दावे की दूसरी तस्वीर पेश करती है। रिपोर्ट के मुताबिक, जियो सैटेलाइट कम्युनिकेशंस और भारती समर्थित वनवेब ने स्टारलिंक से पहले अपनी सुरक्षा और तकनीकी अनुपालन संबंधी प्रक्रियाएं पूरी कर ली थीं। जियो ने 20 मार्च 2025 को अपना सुरक्षा एवं तकनीकी प्रदर्शन पूरा किया, जबकि वनवेब ने 2025 की दूसरी छमाही में यह प्रक्रिया पूरी की। स्टारलिंक का प्रदर्शन 2026 की शुरुआत में हुआ। ऐसे में यह कहना कि केवल भारतीय प्रतिस्पर्धियों के प्रभाव के कारण स्टारलिंक को रोका जा रहा है, यह सरासर गलत है। देखा जाये तो लाइसेंस और मंजूरी की समयरेखा भी इस बहस को समझने में मदद करती है। वनवेब को अगस्त 2021 में दूरसंचार विभाग से आशय-पत्र मिला और अप्रैल 2022 में उसे जीएमपीसीएस लाइसेंस मिला। जियो ने नवंबर 2021 में लाइसेंस के लिए आवेदन किया और अक्टूबर 2022 में प्राधिकरण हासिल किया। इसके विपरीत, स्टारलिंक को जीएमपीसीएस लाइसेंस 6 जून 2025 को मिला। यानी भारतीय कंपनियां इस प्रक्रिया में पहले से मौजूद थीं, फिर भी उनकी सेवाएं व्यावसायिक रूप से शुरू नहीं हो सकी हैं। तीनों कंपनियों को अंतिम सुरक्षा मंजूरी और स्पेक्ट्रम आवंटन की प्रतीक्षा है। यदि जियो और वनवेब को बाजार में स्टारलिंक को रोकने के लिए विशेष सुविधा मिल रही होती, तो सवाल उठाए जा सकते थे। इसके अलावा, सैटेलाइट इंटरनेट का मामला सामान्य दूरसंचार सेवा से अलग है। इसके नेटवर्क की पहुंच सीमाओं से परे हो सकती है, इसलिए नेटवर्क की निगरानी, वैध अवरोधन और भारतीय कानूनों के अनुपालन जैसे विषय महत्वपूर्ण हैं। सुरक्षा संबंधी शर्तें पूरी होने के बाद ही स्पेक्ट्रम आवंटन और व्यावसायिक परिचालन का रास्ता साफ हो सकता है। हम आपको यह भी बता दें कि केंद्र सरकार ने मस्क के भेदभाव के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि नियामकीय ढांचा निष्पक्ष और गैर-भेदभावपूर्ण है। दूरसंचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी स्पष्ट किया है कि कंपनियां जरूरी सुरक्षा और नियामकीय शर्तें पूरी करने के बाद ही सेवाएं शुरू कर सकती हैं। देखा जाये तो भारत के लिए इस मामले में प्राथमिकता किसी कारोबारी घराने के हितों की रक्षा करना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा का वातावरण तैयार करना होना चाहिए। स्टारलिंक को भी अन्य कंपनियों की तरह समान नियमों का पालन करना होगा। केवल वैश्विक प्रतिष्ठा, तकनीकी क्षमता या बाजार में निवेश की इच्छा के आधार पर सुरक्षा संबंधी शर्तों में छूट नहीं दी जा सकती। अब सवाल उठता है कि जियो के आईपीओ पर कितना असर पड़ेगा? हम आपको बता दें कि जियो प्लेटफॉर्म्स 106 अरब डॉलर के मूल्यांकन को लक्ष्य बनाकर अपना आईपीओ लाने की तैयारी में है। ऐसे समय में मस्क का अंबानी पर सार्वजनिक हमला और सस्ती स्टारलिंक सेवा का वादा बाजार में चर्चा पैदा कर रहा है। लेकिन निवेशकों के लिए एलन मस्क के बयान की बजाय जियो कंपनी की वित्तीय स्थिति, विकास की संभावनाएं, प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति और नियामकीय जोखिम जैसे कई कारक महत्वपूर्ण होंगे। इसी तरह, स्टारलिंक की भारतीय बाजार में वास्तविक चुनौती उसकी कीमत, कवरेज, सेवा की गुणवत्ता और आवश्यक मंजूरियां मिलने पर निर्भर करेगी। बहरहाल, भारत में कारोबार करने की इच्छा रखने वाली किसी भी विदेशी कंपनी का स्वागत प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ता हितों के आधार पर होना चाहिए, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा की शर्तों के साथ। मस्क की बयानबाजी से मंजूरी की प्रक्रिया तेज हो या न हो, उसका फैसला नियमों और तथ्यों के आधार पर ही होना चाहिए। जियो और वनवेब के इंतजार का रिकॉर्ड यह भी बताता है कि मामला केवल स्टारलिंक बनाम अंबानी का नहीं, बल्कि भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के लिए सुरक्षा, नियमन और समान अवसर सुनिश्चित करने का है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 12 Oct 2026 2:31 pm

संतोष मूरत की 'साहब, मैं ज़िंदा हूँ' वाली तख्ती से गृह मंत्रालय के ताले तक, जंतर-मंतर की अनकही कहानी

कागज़ पर मरा हुआ एक इंसान जब खुद के ज़िंदा होने की सनद मांगने देश की चौखट पर आया, तो उसने जंतर मंतर के फुटपाथ को अपना ठिकाना बनाया। हाथों में मैं जिंदा हूं साहब वाली तख्ती और कड़कड़ाती ठंड में सीने से चिपका हुआ एक लावारिस भूरा कुत्ता। मानो मुंशी प्रेमचंद की पूस की रात का हल्कू और जबरा, दिल्ली के दिल में सालों तक इंसाफ की पहरेदारी करते रहे। नाम संतोष मूरत सिंह। यह वही सड़क है, जहाँ सिर्फ संतोष नहीं, बल्कि मुल्क के हर उस कोने की आवाज़ पहुँची, जिसे अपनी ही ज़मीन पर बेगाना कर दिया गया था। सवाई जयसिंह ने सदियों पहले पत्थरों के इस अजूबे को ग्रहों और तारों की चाल नापने के लिए तराशा था। इन्हें भला इस बात का क्या इल्म होगा कि आदाज हिंदुस्तान में ये खगोलीय वेधशाला एक दिन मुल्क के दर्द का थर्मामीटर बन जाएगा। दशक दर दशक बदलते रहे। लेकिन लाल-बलुआ पत्थर और ईंटों से बना जंतर-मंतर महज स्माक नहीं अपितु 140 करोड़ हिंदुस्तानियों की असहमति की सबसे बड़ी पनाहगाह बन गया। एक ऐसा ठिकाना जहां लोकतंत्र के हाशिए पर खड़ा सबसे कमजोर इंसान भी तख्त पर बैठे हुक्मरानों की आंखों में आंखे डालकर सवाल कर सके। लेकिन अब पत्थरों की यह सड़क खामोश हो जाएगी। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक बड़ा फैसला लेते हुए जंतर मंतर को आधिकारिक प्रोटेस्ट साइट्स की सूची से डिनोटिफाई कर दिया है। यानी लोकतंत्र का वह मशहूर कोना, जहाँ तख्तियों की इबारतें हुकूमतों की नींद उड़ा दिया करती थीं, अब हमेशा के लिए खाली करा लिया गया है। वाल सिर्फ एक जगह के बंद होने का नहीं है। सवाल यह है कि जब असहमति की सबसे पहचानी जाने वाली चौखट ही मिटा दी जाए, तो वो संतोष मूरत सिंह, वो किसान, वो छात्र और वो मजदूर ब अपनी फरियाद लेकर किस देहरी पर दस्तक देंगे? इसे भी पढ़ें: Jantar Mantar नहीं रहा अब 'प्रोटेस्ट साइट', गृह मंत्रालय का बड़ा फैसला, तय किए ये 3 नए स्थान क्या है नया फैसला दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन के लिए तय जगह की सूची से हटा दिया है और ऐसी सभाओं के लिए तीन दूसरी जगहों के नाम बताए हैं। यह कदम 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के साथ शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन की इजाज़त को लेकर चल रहे विवाद और 'इंडिया ब्लॉक' के सुप्रीम कोर्ट तक प्रस्तावित मार्च से पहले राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी किए जाने के बीच उठाया गया है। 1 अक्टूबर, 2026 के एक आदेश के मुताबिक, नई तय की गई तीन जगहें हैं। पुरानी दिल्ली में रामलीला मैदान, पूर्वी दिल्ली में CBD ग्राउंड और उत्तरी दिल्ली में बुराड़ी ग्राउंड। गौरतलब है कि ये तीनों जगहें मध्य दिल्ली में स्थित जंतर-मंतर से क्रमशः 3 किमी, 13.5 किमी और 44 किमी दूर हैं। दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार के हस्ताक्षर वाले इस आदेश में 28 अप्रैल, 2022 के उस पुराने आदेश में कुछ बदलाव किए गए हैं, जिसके तहत जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन की जगह के तौर पर तय किया गया था। पुलिस ने कहा कि तीन नई जगहों पर विरोध-प्रदर्शन और रैलियों के आयोजन से जुड़े विस्तृत और संशोधित स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) अलग से जारी किए जाएंगे। इसे भी पढ़ें: Jantar Mantar बंद होने के खिलाफ याचिका, 13 अक्टूबर को सुनवाई करने को तैयार दिल्ली HC हाई कोर्ट जंतर-मंतर बंद करने के मामले में याचिका पर सुनवाई करेगा दिल्ली हाई कोर्ट 13 अक्टूबर को उस याचिका पर सुनवाई करेगा जिसमें शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के लिए जंतर-मंतर को बंद करने के फैसले को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया था कि प्रदर्शनों के लिए कोई वैकल्पिक जगह तय नहीं की गई है। कोर्ट ने 10 और 11 अक्टूबर को दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी एक अलग याचिका को भी मंगलवार के लिए सूचीबद्ध किया, लेकिन तत्काल सुनवाई करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले से ही इस मामले को देख रहा है और उसने केंद्र सरकार से हलफनामा मांगा है। इसे भी पढ़ें: Delhi Police को अल्टीमेटम: Jantar Mantar पर Peaceful Protest के लिए CJP ने दी 24 घंटे की डेडलाइन महाराजा जय सिंह द्वितीय की सोच महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय न केवल एक शासक थे, बल्कि गणित और खगोल विज्ञान में गहरी रुचि रखने वाले विद्वान भी थे। 18वीं सदी की शुरुआत में, उन्होंने खगोलीय घटनाओं के बारे में ज़्यादा सटीक जानकारी की ज़रूरत को समझा और पूरे भारत में कई वेधशालाएँ बनवाईं। दिल्ली का जंतर-मंतर उनके द्वारा बनाई गई पाँच वेधशालाओं में से एक था; बाकी वेधशालाएँ जयपुर, उज्जैन, वाराणसी और मथुरा में स्थित थीं। इन वेधशालाओं को खगोलीय तालिकाओं को बेहतर बनाने और आकाशीय गतिविधियों की ज़्यादा सटीक माप करने के लिए डिज़ाइन किया गया था। जय सिंह द्वितीय के प्रयासों से वैज्ञानिक आदान-प्रदान के एक दौर की झलक मिलती है, जिसमें भारतीय खगोलीय परंपराओं का फ़ारसी, इस्लामी और यूरोपीय स्रोतों के ज्ञान से मेल हुआ। उनकी वेधशालाएँ अवलोकन और गणना के केंद्र बन गईं, जहाँ वैज्ञानिक तरीकों और वास्तुकला के नए प्रयोगों का संगम हुआ। जहाँ वास्तुकला और खगोल विज्ञान का मिलन होता है रहने या पूजा-पाठ के लिए बनाई जाने वाली पारंपरिक इमारतों से अलग, जंतर-मंतर को एक विशाल वैज्ञानिक उपकरण के तौर पर बनाया गया था। हर संरचना का एक खास मकसद था। आकाशीय पिंडों की गति को देखने के लिए इनके कोण और माप बहुत सावधानी से तय किए गए थे। दिल्ली वेधशाला की सबसे खास संरचना 'सम्राट यंत्र' है। यह एक विशाल धूप-घड़ी है, जिसका इस्तेमाल सूरज की परछाई की गति को ट्रैक करके स्थानीय समय का पता लगाने के लिए किया जाता था। इसके विशाल आकार की वजह से खगोलविद ज़्यादा सटीकता के साथ अवलोकन कर पाते थे। एक और ज़रूरी यंत्र 'जय प्रकाश यंत्र' है, जिसमें कटोरे के आकार के दो हिस्से होते हैं। इनकी मदद से खगोलशास्त्री आकाशीय पिंडों की स्थिति का पता लगाते थे। बेलनाकार आकृतियों से बने 'राम यंत्र' का इस्तेमाल तारों और दूसरे खगोलीय पिंडों की ऊंचाई और दिशा मापने के लिए किया जाता था। ये सभी यंत्र मिलकर यह दिखाते हैं कि किस तरह वैज्ञानिक जानकारी को ऐसी भौतिक संरचनाओं में बदला गया, जिनका अध्ययन और इस्तेमाल किया जा सकता था। 18वीं सदी में आसमान को समझना आधुनिक टेलीस्कोप और डिजिटल टेक्नोलॉजी के आने से पहले के दौर में जंतर-मंतर जैसी वेधशालाओं ने ब्रह्मांड को समझने में अहम भूमिका निभाई। खगोलशास्त्री आकाशीय गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए गणितीय गणनाओं और सावधानी से बनाए गए उपकरणों पर निर्भर रहते थे। ऐसी जगहों पर की गई खोजों और अवलोकनों से ज़्यादा सटीक कैलेंडर बनाने और ग्रहों की चाल के बारे में जानकारी बेहतर करने में मदद मिली। खगोल विज्ञान को रोज़मर्रा की ज़िंदगी से अलग नहीं माना जाता था; इसने खेती, त्योहारों, समुद्री यात्रा और समय बताने के तरीकों को प्रभावित किया।स जंतर-मंतर वैज्ञानिक अवलोकन और समाज के बीच इसी संबंध को दिखाता है और बताता है कि कैसे आसमान के अध्ययन ने इंसानी समझ को आकार दिया। जैसे-जैसे दिल्ली देश का राजनीतिक और प्रशासनिक केंद्र बनी, जंतर-मंतर धीरे-धीरे लोगों की आवाज़ उठाने की जगह के तौर पर पहचाना जाने लगा। इसकी खुली बनावट की वजह से लोग यहाँ व्यवस्थित ढंग से इकट्ठा हो सकते थे, और इसके ऐतिहासिक माहौल ने इस जगह को एक खास पहचान दी। जंतर-मंतर में आया यह बदलाव दिखाता है कि कैसे ऐतिहासिक जगहों का मतलब पीढ़ियों के साथ बदलता रहता है। मूल रूप से खगोलीय पिंडों की गति के अध्ययन के लिए बनाया गया यह स्मारक नागरिक भागीदारी से जुड़ गया, जिससे इसके सांस्कृतिक महत्व में एक और आयाम जुड़ गया। 33 साल से धरने देख रहा था जंतर-मंतर 1988 में किसान आंदोलन के बाद बोट क्लब पर प्रदर्शन रोक दिए गए थे। इसके बाद 1993 में जंतर-मंतर पर पहला प्रदर्शन हुआ था। जंतर-मंतर को धरना स्थल बनाने संबंधी किसी आदेश का रिकॉर्ड नहीं है। यह पुलिस की प्रशासनिक व्यवस्था के रूप में विकसित हुआ। स्थानीय लोगों की शोर, प्रदूषण जैसी शिकायतों पर एनजीटी ने 2017 में यहां प्रदर्शन रोक दिए। धरने-प्रदर्शन रामलीला मैदान में करने को कहा। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा- शांतिपूर्ण प्रदर्शन संवैधानिक अधिकार है। कोर्ट ने प्रतिबंध हटाकर नियंत्रित प्रदर्शन की व्यवस्था बनाने को कहा। अब सुप्रीम कोर्ट में फिर वैकल्पिक प्रदर्शन स्थल की मांग लंबित है।

प्रभासाक्षी 12 Oct 2026 2:29 pm

उच्च शिक्षा का दशक और गुणवत्ता की परीक्षा

समावेशी विकास के हिमायती अर्थशास्त्री मानव पूंजी सिद्धांत के तहत शिक्षा को महज सामाजिक कल्याण या व्यक्तिगत उन्नति का माध्यम नहीं, बल्कि उत्पादकता, नवाचार और दीर्घकालिक आर्थिक विकास की बुनियादी पूंजी के रूप में देखते हैं। इस लिहाज से कह सकते हैं कि किसी देश की युवा आबादी अपने आप में विकास की गारंटी नहीं होती। उसकी वास्तविक आर्थिक और सामाजिक क्षमता इस बात से निर्धारित होती है कि उसे उपलब्ध शिक्षा ज्ञान, कौशल और निर्णय क्षमता में कितना रूपांतरित कर पाती है। भारत आज इसी द्वंद्व के बीच खड़ा है। एक ओर विशाल युवा आबादी जनसांख्यिकीय लाभांश की संभावना प्रस्तुत करती है, दूसरी ओर कृत्रिम बुद्धिमत्ता, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और वैश्विक श्रम बाजार में आते बदलाव मानव पूंजी निर्माण की पारंपरिक धारणाओं को चुनौती दे रहे हैं। ह्यूमनिटीज एंड सोशल साइंसेज कम्युनिकेशंस में 2025 में प्रकाशित एक अध्ययन ने भी रेखांकित किया कि भारत में जनसांख्यिकीय बदलाव का आर्थिक लाभ अनुकूल नीतिगत वातावरण, बेहतर स्वास्थ्य, सम्मानजनक रोजगार और लैंगिक सशक्तीकरण पर निर्भर करता है। इसलिए पिछले एक दशक में उच्च शिक्षा के विस्तार और सुधारों का मूल्यांकन केवल संस्थानों तथा नामांकन की बढ़ती संख्या से नहीं, बल्कि इस कसौटी पर किया जाना चाहिए कि भारत अपनी युवा आबादी को ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की सक्षम मानवीय शक्ति में कितना बदल पाया है। इसे भी पढ़ें: Gen Z Revolt: मोदी के दोस्त के देश में भी वही हो रहा,जो भारत में हुआ था? भयंकर साज़िश का पर्दाफ़ाश! इस दशक में भारतीय उच्च शिक्षा का सामाजिक आधार उल्लेखनीय रूप से विस्तृत हुआ है। अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण के अनुसार, कुल नामांकन 2014 से 15 के लगभग 3.42 करोड़ से बढ़कर 2023 से 24 में करीब 4.50 करोड़ हो गया। महिलाओं के साथ अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के विद्यार्थियों की भागीदारी भी बढ़ी है, जो उच्च शिक्षा के व्यापक सामाजिक विस्तार का संकेत है। हालांकि, नामांकन वृद्धि अपने आप में पर्याप्त नहीं है। वास्तविक लोकतंत्रीकरण के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, पर्याप्त संसाधन और रोजगारपरक अवसरों तक समान पहुंच जरूरी है। महानगरों और छोटे शहरों के संस्थानों के बीच गुणवत्ता का अंतर अब प्रमुख चुनौती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने उच्च शिक्षा सुधार के लिए व्यापक वैचारिक ढांचा प्रस्तुत किया। बहुविषयक अध्ययन, लचीली पाठ्यचर्या, शोध उन्मुख शिक्षा, कौशल विकास और अकादमिक क्रेडिट की हस्तांतरणीयता इसके प्रमुख प्रावधान हैं। अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट विद्यार्थियों को शैक्षणिक यात्रा में अधिक लचीलापन देता है, जबकि समर्थ जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म प्रवेश, परीक्षा और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को व्यवस्थित करने की क्षमता रखते हैं। इन पहलों का महत्व संस्थागत विस्तार से आगे बढ़कर सीखने की गुणवत्ता, शैक्षणिक गतिशीलता और प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने में है। फिर भी नीतिगत महत्वाकांक्षा और संस्थागत वास्तविकता के बीच की दूरी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बहुविषयक शिक्षा के लिए विभिन्न विषयों के सक्षम विभाग, प्रशिक्षित शिक्षक और पर्याप्त अकादमिक संसाधन चाहिए। शोध आधारित शिक्षा के लिए प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, शोध अनुदान और मार्गदर्शन की व्यवस्था आवश्यक है। डिजिटल प्लेटफॉर्म प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल बना सकते हैं, लेकिन वे कमजोर शिक्षण व्यवस्था की भरपाई नहीं कर सकते। इसलिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति का वास्तविक मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि उसके प्रावधानों ने कक्षाओं में शिक्षण, विद्यार्थियों के सीखने के स्तर और विश्वविद्यालयों की अकादमिक संस्कृति में कितना बदलाव पैदा किया है। उच्च शिक्षा सुधार की केंद्रीय कसौटी शिक्षक व्यवस्था और शोध क्षमता है। शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा करने वाले कर्मचारी नहीं, बल्कि ज्ञान सृजन, आलोचनात्मक विवेक और बौद्धिक स्वतंत्रता के वाहक हैं। अनेक संस्थानों में रिक्त पदों, संविदा नियुक्तियों और गैर शैक्षणिक दायित्वों का दबाव शिक्षण, शोध निर्देशन और विद्यार्थियों से संवाद को प्रभावित करता है। इसलिए पारदर्शी नियुक्ति, अकादमिक स्वतंत्रता और निरंतर प्रशिक्षण को दीर्घकालिक निवेश के रूप में देखना आवश्यक है। गौरतलब है कि विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता शोध और नवाचार में उनके योगदान से भी निर्धारित होती है। भारत ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन व्यापक विश्वविद्यालय व्यवस्था में शोध संस्कृति को और मजबूत करने की आवश्यकता है। कृषि, जलवायु परिवर्तन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, शहरीकरण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे क्षेत्र भारतीय संदर्भ में महत्वपूर्ण शोध अवसर प्रस्तुत करते हैं। इसके लिए शोध वित्तपोषण बढ़ाने, उद्योग और अकादमिक संस्थानों के सहयोग तथा युवा शोधकर्ताओं को स्वतंत्र अवसर देने की जरूरत है। विश्वविद्यालयों को ज्ञान के उपभोक्ता नहीं, बल्कि उसके उत्पादक केंद्र बनाना होगा। इसी तरह रोजगार और उच्च शिक्षा के संबंध को भी अधिक सूक्ष्मता से समझने की जरूरत है। डिग्री और रोजगार के बीच बढ़ती दूरी पाठ्यक्रमों की प्रासंगिकता, व्यावहारिक प्रशिक्षण और उद्योग की बदलती मांगों पर प्रश्न उठाती है। तकनीकी दक्षता, डिजिटल साक्षरता, संचार क्षमता और समस्या समाधान जैसे कौशल अब अनेक क्षेत्रों में आवश्यक हो गए हैं। फिर भी, रोजगारोन्मुखी शिक्षा का अर्थ विश्वविद्यालयों को उद्योग की तात्कालिक जरूरतों के अधीन कर देना नहीं है। मानविकी और सामाजिक विज्ञान विषय विद्यार्थियों में ऐतिहासिक चेतना, नैतिक विवेक, लोकतांत्रिक समझ और समाज के जटिल प्रश्नों का विश्लेषण करने की क्षमता विकसित करते हैं। एक सक्षम उच्च शिक्षा व्यवस्था को आर्थिक उपयोगिता और बौद्धिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन कायम करना होगा। उसका उद्देश्य केवल रोजगार पाने योग्य व्यक्ति तैयार करना नहीं, बल्कि ज्ञानवान, विवेकशील और उत्तरदायी नागरिक बनाना भी है। हाल में बिहार में 211 नए सरकारी डिग्री कॉलेजों की शुरुआत, 2,451 संविदा सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति तथा विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक और डिजिटल सुधारों की पहल इसी राष्ट्रीय चुनौती का एक प्रासंगिक उदाहरण है। इन प्रयासों से उच्च शिक्षा की भौगोलिक पहुंच और संस्थागत क्षमता बढ़ाने की संभावना बनती है। लेकिन इनकी दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कॉलेजों में नियमित शिक्षण, पर्याप्त संसाधन, अकादमिक नेतृत्व और गुणवत्तापूर्ण अध्ययन का वातावरण कितना विकसित होता है। बिहार का अनुभव इस व्यापक तथ्य को रेखांकित करता है कि संस्थानों की संख्या बढ़ाना सुधार का प्रारंभिक चरण है, उसकी परिणति गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में ही हो सकती है। ये पूरा दशक भारतीय उच्च शिक्षा में विस्तार और संस्थागत परिवर्तन का दौर रहा है, लेकिन अगली चुनौती कहीं अधिक जटिल है। बढ़ता नामांकन, महिलाओं और वंचित समूहों की भागीदारी तथा डिजिटल प्रशासन सकारात्मक आधार तैयार करते हैं, पर गुणवत्ता, शिक्षक उपलब्धता, शोध क्षमता और रोजगारपरकता की चुनौतियां अभी बनी हुई हैं। इसलिए उच्च शिक्षा नीति का केंद्र अब मात्र विस्तार नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण और समान अवसरों का निर्माण होना चाहिए। भारत की युवा आबादी तभी वास्तविक जनसांख्यिकीय लाभांश में बदल सकती है, जब शिक्षा उसे ज्ञान, कौशल और नवाचार की क्षमता प्रदान करे। आने वाले दशक की अग्निपरीक्षा इसी रूपांतरण में निहित है। - संजीव कुमार मिश्र

प्रभासाक्षी 12 Oct 2026 2:08 pm

Rahul Gandhi को दोटूक जवाब देकर CJI Surya Kant ने न्यायिक मर्यादा की लाज रख ली

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी और INDIA गठबंधन के नेताओं को मिलने का समय देने से इनकार कर दिया है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), कथित ‘वोट चोरी’ और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्ष सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को ज्ञापन सौंपना चाहता था। लेकिन CJI ने साफ कर दिया कि जिन विषयों पर विपक्ष हस्तक्षेप चाहता है, वे न्यायालय में पहले से विचाराधीन हैं। ऐसे मामलों में प्रशासनिक स्तर पर निर्देश देने के बजाय विपक्ष को न्यायिक प्रक्रिया के तहत याचिका दायर करनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि मौलिक अधिकारों के संरक्षण के लिए सर्वोच्च न्यायालय के दरवाजे सभी नागरिकों के लिए चौबीसों घंटे खुले हैं। मुख्य न्यायाधीश का यह रुख ऐसे समय सामने आया है, जब राहुल गांधी और INDIA गठबंधन चुनावी प्रक्रिया से जुड़े आरोपों को लेकर सरकार तथा चुनाव आयोग पर दबाव बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। विपक्ष की मांग थी कि SIR की प्रक्रिया रोकी जाए, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें और कथित चुनावी अनियमितताओं की जांच हो। राहुल गांधी ने 12 अक्टूबर को सर्वोच्च न्यायालय तक मार्च करने का आह्वान करते हुए इसे लोकतंत्र और संविधान की रक्षा की लड़ाई बताया। विपक्ष का कहना है कि मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों से पात्र नागरिकों के मतदान के अधिकार पर असर पड़ रहा है। इसे भी पढ़ें: जब जब देश के साथ खड़े होने की बात आती है, तब तब Rahul Gandhi की राह अलग क्यों हो जाती है? देखा जाये तो इस घटनाक्रम को समझने के लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से विपक्ष की हालिया मुलाकात भी महत्वपूर्ण है। विपक्षी नेताओं ने राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं पर चिंता जताई थी। मुलाकात के बाद राहुल गांधी ने कहा कि राष्ट्रपति ने उनसे आरोपों के समर्थन में सबूत मांगे हैं और विपक्ष प्रमाण प्रस्तुत करने को तैयार है। राहुल गांधी ने संकेत दिया था कि राष्ट्रपति ने वोट चोरी के आरोप को एक तरह से सही माना है। हालांकि बाद में सूत्रों के हवाले से आई खबर के अनुसार राष्ट्रपति कार्यालय ने राहुल गांधी के बयान और दावे पर अप्रसन्नता जताई। दूसरी ओर, राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद मुख्य न्यायाधीश से मिलने की कोशिश और फिर उनका इनकार विपक्ष की रणनीति के लिए एक अहम घटनाक्रम है। राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे चाहते थे कि वे अपनी चिंताओं को सीधे CJI के सामने रखें। लेकिन न्यायपालिका का काम राजनीतिक प्रतिनिधिमंडलों के ज्ञापन पर प्रशासनिक निर्देश देना नहीं, बल्कि विधिसम्मत याचिकाओं पर सुनवाई करना और कानून के अनुसार फैसला देना है। CJI के रुख का यही संस्थागत अर्थ है। लेकिन फिर भी राहुल गांधी का सर्वोच्च अदालत तक मार्च निकालने का फैसला सीधे सीधे अराजकता फैलाने का प्रयास है। राहुल गांधी बार बार संविधान का हवाला देते हैं लेकिन संविधान की संरक्षक राष्ट्रपति के बारे में झूठ बोलते हैं, संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण स्थल सर्वोच्च न्यायालय की बात नहीं मानते, ऐसे में सवाल उठेगा ही कि उनकी असल मंशा क्या है? यही नहीं, ईवीएम पर बार बार सवाल उठाने वाले कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों को हाल में असम और हिमाचल प्रदेश में बैलट पेपर से कराए गए नगर निगम चुनाव में भी करारा झटका लगा है। इसलिए राहुल गांधी समेत अन्य विपक्षी नेताओं को समझना होगा कि गड़बड़ चुनावी व्यवस्था में नहीं विपक्षी पार्टियों की नीतियों और नीयत पर है, उनकी विश्वसनीयता पर है। देखा जाये तो SIR का विवाद केवल राजनीतिक दलों के बीच टकराव नहीं है। मतदाता सूची की शुद्धता चुनाव की विश्वसनीयता के लिए जरूरी है। चुनाव आयोग का पक्ष है कि पुनरीक्षण का उद्देश्य सूची को दुरुस्त करना है। विपक्ष इस प्रक्रिया की पारदर्शिता और संभावित प्रभाव पर सवाल उठा रहा है। विपक्ष चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता को राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का केंद्र बनाने की कोशिश कर रहा है, जबकि मोदी सरकार आर्थिक विकास और अपने नीतिगत प्रदर्शन को सामने रख कर विकसित भारत के संकल्प को सिद्ध करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। बहरहाल, CJI का इनकार इस पूरे विवाद में एक महत्वपूर्ण संस्थागत घटनाक्रम है। विपक्ष को समझना होगा कि अंतिम फैसला राजनीतिक नारों या मुलाकातों से नहीं, बल्कि अदालत के सामने प्रस्तुत तथ्यों और प्रमाणों से तय होगा। साथ ही मुख्य न्यायाधीश का विपक्षी नेताओं को मुलाकात का समय देने से इनकार करना संस्थागत मर्यादा बनाए रखने के लिहाज से उचित कदम माना जा सकता है। यदि राजनीतिक दल अपनी मांगों और आरोपों के आधार पर सीधे CJI से मुलाकात कर न्यायिक हस्तक्षेप की अपेक्षा करने लगें, तो भविष्य में दूसरे दल भी इसी परंपरा का सहारा ले सकते हैं। इससे न्यायपालिका पर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिशों को बढ़ावा मिलने और निष्पक्षता को लेकर अनावश्यक सवाल उठने की आशंका रहेगी। न्यायपालिका की स्वतंत्रता केवल उसके फैसलों में ही नहीं, बल्कि उसकी प्रक्रियाओं और राजनीतिक दलों से समान दूरी बनाए रखने में भी निहित है। इसलिए किसी भी पक्ष को विशेष राजनीतिक हैसियत के आधार पर अलग सुविधा देने के बजाय सभी के लिए निर्धारित न्यायिक प्रक्रिया का पालन करना अधिक उचित है। -नीरज कुमार दुबे

प्रभासाक्षी 12 Oct 2026 1:58 pm

एलन मस्क प्रकरण, विदेशी मुख के शंख न बनें राहुल गांधी

शंख का यह दुर्भाग्य है कि ईश्वर ने उसे मजबूत खोल तो दिया है पर कोमल मस्तिष्क नहीं, तो बेचारा पराई फूक से बजने को मजबूर है। शंख की इसी मजबूरी के खतरे भी अनेक है, चाहते न चाहते हुए भी वह दूसरों की हावर्ड को आवाज दे देता है और वो भी कई गुना बढ़ा कर। आजकल देश के प्रतिपक्षी नेता राहुल गांधी हर विदेशी मुंह का शंख बनने के प्रयास में दिख रहे हैं। दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति और स्टारलिंक के मालिक एलन मस्क का भारत सरकार पर किया गया हमला अनेक तरह के खतरनाक संकेत समेटे हुए हैं और इस हमले में किसी विदेशी शक्ति को देश के किसी संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति का एक स्वर होना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। राहुल गांधी को विदेशी फूक से बजने वाला शंख बनने से गुरेज करना चाहिए। जैसा कि सभी जानते हैं कि, सूचना प्रौद्योगिकी जिस तेजी से विकसित हो रही है उसी तेजी से इसके खतरे भी बढ़ रहे हैं। यह तकनीक जहां बड़ी आबादी को लाभ पहुंचा रही है, वहीं इसे नियंत्रित करने वाली चंद कंपनियों को बेशुमार ताकत भी सौंप रही है। इतनी कि ये कंपनियां राजनीतिक शक्तियों को भी बौना समझने लगी हैं। जहां बात नहीं बनती, वहां वे राष्ट्रीय नेतृत्व की साख बिगाडऩे में लग जाती हैं। कुछ देशों में सरकारें बनाने-गिराने के खेल में सक्रिय रहकर स्वार्थ साधना तो उनका पुराना नुस्खा है। दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति और स्टारलिंक के मालिक एलन मस्क का भारत सरकार पर किया गया अपनी तरह का 'पहला हमला' इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। इसे भी पढ़ें: जब जब देश के साथ खड़े होने की बात आती है, तब तब Rahul Gandhi की राह अलग क्यों हो जाती है? अपने सोशल मीडिया मंच 'एक्स' पर मस्क ने कहा कि स्टारलिंक को 165 से ज्यादा देशों में लाइसेंस मिल चुका है और उसने पांच वर्षों तक भारत के हर कानून का पालन किया, फिर भी लाइसेंस क्यों नहीं मिला? क्या अंबानी ही भारत के असली बॉस हैं? यह बात पूरी तरह सच नहीं है। सरकार ने साफ किया कि स्टारलिंक को मई 2025 में ही लाइसेंस मिल चुका है। सिर्फ स्पेक्ट्रम आवंटन अटका है, क्योंकि विदेशी निवेश की मंजूरी और सुरक्षा शर्तों का परीक्षण बाकी है। स्टारलिंक ने जमीनी ढांचा विकसित करने के लिए जियो और भारती एयरटेल से साझेदारी भी की है और जियो के मालिक मुकेश अंबानी ही हैं। तो अंबानी पर कटाक्ष का अर्थ क्या है? सीधा अर्थ है कि मस्क सुरक्षा शर्तों में ढील चाहते हैं और यह भी कि सैटेलाइट फोन के क्षेत्र में कोई भारतीय कंपनी उनके मुकाबले आगे न बढ़े, क्योंकि अंबानी भी यह महत्वाकांक्षा रखते हैं। ऐसे समय, जब केंद्र सरकार नीट और एसआइआर पर घरेलू राजनीति में घिरी है, मस्क की टिप्पणी मौके का फायदा उठाने की चाल है। ऐसा लगता है कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस सोची-समझी चाल पर बिना सोचे प्रतिक्रिया दे दी- 'भारत में स्वागत है एलन, जब तक दूसरा शख्स न मिले इंतजार करें।' जबकि, स्टारलिंक के जियो और एयरटेल से समझौते पर तब कांग्रेस ने राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर चिंता जताई थी। घरेलू मोर्चे पर सरकार को घेरना एक बात है और अंतरराष्ट्रीय दांव-पेचों में शामिल होना दूसरी। क्या सुरक्षा की चिंता किए बिना किसी सैटेलाइट कंपनी को इसलिए मंजूरी दे देनी चाहिए कि उसके मालिक अंबानी-अदाणी नहीं, मस्क हैं? दूसरी बात यह है कि विदेशी कंपनी के आगे भारतीय कंपनी को तरजीह क्यों नहीं मिलनी चाहिए, भले ही वह अंबानी या अदाणी की ही क्यों न हो, जिनकी मोनोपॉली विपक्ष के लिए घरेलू मुद्दा है? मस्क जैसे लोग नई तकनीकों से मानवता की भलाई के लिए भले ही ढेरों काम कर रहे हों, पर इससे शायद ही कोई इनकार करे कि आर्थिक और राष्ट्रीय हितों के टकराव में उनका व्यवहार पराया ही रहेगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के युग में ऐसे तकनीकी महारथियों से सावधान रहना होगा, न सिर्फ सत्ता पक्ष को बल्कि विपक्ष को भी। माना कि शंख मस्तिष्क विहीन होते हैं पर शंख से जुड़े किसी न किसी को तो यह जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी कि कोई विदेशी फूक शंख के माध्यम से देश का वातावरण बिगाड़ न पाए। - राकेश सैन 32, खंडाला फार्म कॉलोनी जालंधर।

प्रभासाक्षी 12 Oct 2026 1:53 pm

सीईसी के खिलाफ इंडिया गठबंधन का सुप्रीम कोर्ट तक मार्च, कांग्रेस बोली-देश बचाने के लिए जरूरी

सीईसी के खिलाफ इंडिया गठबंधन का सुप्रीम कोर्ट तक मार्च, कांग्रेस बोली-देश बचाने के लिए जरूरी

समाचार नामा 12 Oct 2026 12:26 pm

Goa Politics: रेवंत रेड्डी ने भाजपा को बताया ‘रावण’ और कांग्रेस को ‘राम’, 2027 चुनाव से पहले वोटर्स से की अपील

Goa Politics: रेवंत रेड्डी ने भाजपा को बताया ‘रावण’ और कांग्रेस को ‘राम’, 2027 चुनाव से पहले वोटर्स से की अपील

समाचार नामा 12 Oct 2026 10:40 am

'राजमाता विजयाराजे सिंधिया का राष्ट्रसेवा के प्रति त्याग और समर्पण प्रेरणास्रोत', पीएम मोदी समेत नेताओं ने किया नमन

'राजमाता विजयाराजे सिंधिया का राष्ट्रसेवा के प्रति त्याग और समर्पण प्रेरणास्रोत', पीएम मोदी समेत नेताओं ने किया नमन

समाचार नामा 12 Oct 2026 10:39 am

दिल्ली में हाई अलर्ट! विपक्ष के सुप्रीम कोर्ट मार्च से पहले 6 मेट्रो स्टेशनों पर एंट्री-एग्जिट बंद

राजधानी दिल्ली में सोमवार को प्रस्तावित विपक्षी मार्च को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था सख्त कर दी गई है

देशबन्धु 12 Oct 2026 7:16 am

सड़क से सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई, राहुल गांधी ने भरी हुंकार

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने ऐलान किया कि विपक्षी दल, युवा, सिविल सोसाइटी और लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले लोग सोमवार, 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट तक मार्च करेंगे

देशबन्धु 11 Oct 2026 10:45 pm

दिल्ली की सीएम रेखा पर सुप्रिया श्रीनेत के निशाना साधने पर सिरसा बोले-'कांग्रेस का यही असली चेहरा'

दिल्ली की सीएम रेखा पर सुप्रिया श्रीनेत के निशाना साधने पर सिरसा बोले-'कांग्रेस का यही असली चेहरा'

समाचार नामा 11 Oct 2026 2:26 pm

इंफोसिस: पीईआरएम निलंबन से कारोबार पर नहीं पड़ेगा बड़ा असर

नई दिल्ली, आईटी क्षेत्र की प्रमुख कंपनी इंफोसिस ने कहा है कि अमेरिकी सरकार द्वारा परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन (पीईआरएम) कार्यक्रम के तहत कुछ नई और लंबित आवेदन प्रक्रियाओं पर लगाए गए निलंबन का उसके कारोबार पर कोई महत्वपूर्ण असर पड़ने की उम्मीद नहीं है।

देशबन्धु 11 Oct 2026 2:01 pm

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में मेट्रो, रेल और इंटरनेट सेवाएं सामान्य रखने के दिए निर्देश, शांतिपूर्ण विरोध को बताया मौलिक अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में मेट्रो, रेल और इंटरनेट सेवाएं सामान्य रखने के दिए निर्देश, शांतिपूर्ण विरोध को बताया मौलिक अधिकार

समाचार नामा 11 Oct 2026 1:57 pm

एनडीए नेताओं का सीजेपी पर तंज, कहा-'मां दुर्गा सीजेपी और विपक्ष को दें सद्बुद्धि'

एनडीए नेताओं का सीजेपी पर तंज, कहा-'मां दुर्गा सीजेपी और विपक्ष को दें सद्बुद्धि'

समाचार नामा 11 Oct 2026 12:15 pm

शेयर बाजार : महंगाई डेटा, कच्चा तेल और बॉल्ड यील्ड से बाजार की चाल बदली

मुंबई, भारतीय शेयर बाजार के लिए अगला हफ्ता काफी अहम होने वाला है। कच्चे तेल की कीमत, बॉन्ड यील्ड और महंगाई डेटा के साथ अन्य अंतरराष्ट्रीय और घरेलू आर्थिक आंकड़े बाजार की चाल निर्धारित करेंगे।

देशबन्धु 11 Oct 2026 11:28 am

'उनके महान विचार सदैव प्रेरणापुंज बने रहेंगे', जयंती पर महाराजा अग्रसेन को प्रधानमंत्री मोदी ने किया नमन

'उनके महान विचार सदैव प्रेरणापुंज बने रहेंगे', जयंती पर महाराजा अग्रसेन को प्रधानमंत्री मोदी ने किया नमन

समाचार नामा 11 Oct 2026 10:23 am

पीएम मोदी ने लोकनायक जयप्रकाश नारायण को किया नमन, बोले- 'हम उनके आदर्शों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध'

पीएम मोदी ने लोकनायक जयप्रकाश नारायण को किया नमन, बोले- 'हम उनके आदर्शों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध'

समाचार नामा 11 Oct 2026 8:28 am

'सदैव मां का आशीर्वाद बना रहे', नवरात्र के पावन अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी ने दी देशवासियों को शुभकामनाएं

'सदैव मां का आशीर्वाद बना रहे', नवरात्र के पावन अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी ने दी देशवासियों को शुभकामनाएं

समाचार नामा 11 Oct 2026 8:21 am

महाराजा अग्रसेन की जयंती पर केंद्रीय मंत्री गडकरी और सीएम योगी समेत कई नेताओं ने दी शुभकामनाएं

महाराजा अग्रसेन की जयंती पर केंद्रीय मंत्री गडकरी और सीएम योगी समेत कई नेताओं ने दी शुभकामनाएं

समाचार नामा 11 Oct 2026 8:08 am

सीईसी विवाद पर आज फिर सड़कों पर उतरेगी CJP,दिल्ली में सुरक्षा कड़ी

मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने अपना आंदोलन जारी रखने का ऐलान किया है

देशबन्धु 11 Oct 2026 7:30 am

सीजेपी के प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई से भड़के अरविंद सावंत, बोले- ये अघोषित इमरजेंसी है

सीजेपी के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान नेताओं को डिटेन किए जाने पर शिवसेना (यूबीटी) सांसद अरविंद सावंत ने केंद्र सरकार और पुलिस पर तीखा हमला बोला। सावंत ने कहा कि शांतिपूर्ण आंदोलन संविधान का अधिकार है। हवाई जहाज से लोगों को पकड़कर डिटेन करना आतंकवादियों जैसा व्यवहार है और यह अघोषित इमरजेंसी है। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया।

देशबन्धु 11 Oct 2026 7:21 am

पुलिस हिरासत में केजरीवाल का देश से अपील, ‘‘सब लोग दिल्ली चलो’’

देश की राजधानी में शनिवार को हर तरफ पीएम मोदी की दिल्ली पुलिस का तांडव देखने को मिला

देशबन्धु 11 Oct 2026 2:16 am

दिल्ली प्रदर्शन पर सियासी संग्राम: BJP ने साधा निशाना, कांग्रेस ने सरकार को घेरा

दिल्ली में सीजेपी के विरोध-प्रदर्शन और अभिजीत दिपके की गिरफ्तारी को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। पश्चिम बंगाल के नदिया में भाजपा सांसद जगन्नाथ सरकार ने प्रदर्शनकारियों पर देश को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करने का आरोप लगाया। वहीं, मुंबई में कांग्रेस नेता भाई जगताप और विधायक असलम शेख ने केंद्र सरकार की आलोचना करते हुए विरोध-प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार और लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़े सवाल उठाए।

देशबन्धु 10 Oct 2026 11:28 pm

CJP प्रदर्शन के बाद हालात सामान्य होने लगे, अधिकांश लोग रिहा, मेट्रो सेवाएं बहाल

राजधानी दिल्ली में CJP के प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर लागू की गई सख्त सुरक्षा व्यवस्था के बीच अब हालात धीरे-धीरे सामान्य होने लगे हैं

देशबन्धु 10 Oct 2026 11:19 pm

दिल्ली में सीजेपी के प्रदर्शन को लेकर घमासान, भाजपा और कांग्रेस नेताओं ने दी प्रतिक्रिया

दिल्ली में सीजेपी के प्रदर्शन को लेकर घमासान, भाजपा और कांग्रेस नेताओं ने दी प्रतिक्रिया

समाचार नामा 10 Oct 2026 8:10 pm