ब्रिक्स वेव्स बाजार 2026 हुआ शुरू
मुंबई, भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के तहत मुंबई में गुरुवार से ब्रिक्स वेव्स बाजार 2026 का शुभारंभ हुआ।
मोहन भागवत का युवाओं से संवाद राष्ट्र निर्माण की दिशा में अहम कदम: सतीश महाना
मोहन भागवत का युवाओं से संवाद राष्ट्र निर्माण की दिशा में अहम कदम: सतीश महाना
पंजाब में 2027 का विधानसभा चुनाव बेहद दिलचस्प होने की संभावना है। राज्य में आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, भाजपा और शिरोमणि अकाली दल प्रमुख राजनीतिक ताकतों के रूप में चुनाव मैदान में उतर सकते हैं। यदि भाजपा और अकाली दल के बीच दोबारा गठबंधन होता है, तो इसका असर चुनावी गणित पर पड़ सकता है।
FCRA Bill पर हल्ला मचा रहे विपक्षी दलों और ईसाई संगठनों को मार्को रुबियो का बयान सुनना चाहिए
केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) संशोधन विधेयक को लेकर देश में तो इस समय व्यापक बहस छिड़ी ही हुई है, साथ ही इसकी गूंज अमेरिका तक सुनाई दे रही है। दिलचस्प बात यह है कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो पहले स्वयं यह कह चुके हैं कि किसी भी देश में विदेशी फंड से संचालित संस्थाओं को वहां की संप्रभु सरकार के समानांतर व्यवस्था नहीं चलानी चाहिए और उन्हें मेजबान देश के कानूनों का सम्मान करना चाहिए। इसके बावजूद अमेरिकी सांसद राइली मूर भारत के प्रस्तावित कानून की आलोचना कर रहे हैं। दूसरी ओर, मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात के बाद स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार ने उन्हें आश्वस्त किया है कि प्रस्तावित संशोधन को पूर्व प्रभाव (रेट्रोस्पेक्टिव) से लागू नहीं किया जाएगा। इन घटनाक्रमों के बीच मोदी सरकार का स्पष्ट संदेश है कि विदेशी धन प्राप्त करने वाले संगठनों के संचालन में पारदर्शिता, जवाबदेही और भारतीय कानूनों का पालन सर्वोच्च प्राथमिकता रहेगा। हम आपको बता दें कि केंद्र सरकार के आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में एफसीआरए के तहत पंजीकृत सक्रिय संगठनों की संख्या घटी है, लेकिन विदेशी चंदे का प्रवाह बना हुआ है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2024-25 में 16,200 संगठनों को लगभग 22,963 करोड़ रुपये का विदेशी योगदान प्राप्त हुआ। वहीं बड़ी संख्या में ऐसे संगठनों के एफसीआरए लाइसेंस निरस्त या समाप्त भी किए गए हैं। सरकार का कहना है कि केवल वैध पंजीकरण रखने वाले संगठनों को ही विदेशी धन प्राप्त करने और उसका उपयोग करने का अधिकार होना चाहिए। इसे भी पढ़ें: संसद में सत्ता-विपक्ष की टकरार! Kharge के दावे पर Kiren Rijiju का तीखा वार हम आपको बता दें कि सरकार द्वारा लाए गए संशोधन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यदि किसी संस्था का एफसीआरए पंजीकरण समाप्त हो जाता है, रद्द हो जाता है, नवीनीकृत नहीं होता या संस्था स्वयं उसे छोड़ देती है, तो विदेशी धन से निर्मित परिसंपत्तियों के प्रबंधन के लिए एक नामित प्राधिकरण की व्यवस्था की जाएगी। यदि बाद में संस्था का पंजीकरण बहाल हो जाता है तो संबंधित संपत्तियां और अप्रयुक्त विदेशी योगदान वापस कर दिए जाएंगे। यदि ऐसा नहीं होता, तो कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी। केंद्र सरकार का तर्क है कि यह व्यवस्था किसी नए अधिकार का सृजन नहीं, बल्कि पहले से मौजूद प्रावधानों को अधिक स्पष्ट और व्यवस्थित बनाने का प्रयास है। वहीं प्रस्तावित संशोधन को लेकर कुछ चर्च संगठनों ने आशंकाएं भी व्यक्त की हैं। उनका कहना है कि कानून की कुछ धाराएं अत्यधिक कठोर हैं और उन्हें संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजा जाना चाहिए। इसी उद्देश्य से विभिन्न चर्च संगठनों के प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की और अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं। वहीं मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने अमित शाह के साथ बैठक के बाद कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री ने स्पष्ट आश्वासन दिया है कि प्रस्तावित संशोधन को पूर्व प्रभाव से लागू नहीं किया जाएगा। हम आपको यह भी बता दें कि केंद्र सरकार ने इन आशंकाओं का विस्तार से जवाब भी दिया है। सरकार का कहना है कि प्रस्तावित कानून किसी विशेष धर्म, समुदाय या विचारधारा को निशाना नहीं बनाता। एफसीआरए के प्रावधान सभी विदेशी चंदा प्राप्त करने वाले संगठनों पर समान रूप से लागू होते हैं। केंद्र सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि किसी धार्मिक स्थल से जुड़ी संपत्ति का मामला आता है तो उसके धार्मिक स्वरूप को कानूनन सुरक्षित रखा जाएगा। साथ ही, नामित प्राधिकरण के आदेश अंतिम नहीं होंगे और उनके विरुद्ध न्यायालय में अपील का अधिकार भी उपलब्ध रहेगा। उधर, इस पूरे विवाद का अंतरराष्ट्रीय पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। अमेरिकी सांसद राइली मूर ने आरोप लगाया कि यह कानून चर्चों और ईसाई संस्थाओं के खिलाफ है। हालांकि स्वयं अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने पिछले वर्ष यह कहा था कि विदेशी सहायता कार्यक्रम मेजबान देशों की सरकारों के समानांतर नहीं चलने चाहिए और विदेशी वित्तपोषित संस्थाओं को संबंधित देश की नीतियों और कानूनों के अनुरूप काम करना चाहिए। यही कारण है कि भारत के संदर्भ में उठ रही आलोचना पर दोहरे मापदंड का प्रश्न भी सामने आया है। देखा जाये तो लोकतंत्र में किसी भी कानून पर बहस और समीक्षा का अधिकार सभी को है, लेकिन भारत की संप्रभुता और राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हैं। यदि कोई संगठन विदेशी चंदे के सहारे पूरी पारदर्शिता और भारतीय कानूनों का पालन करते हुए जनकल्याण का कार्य करता है, तो उसके लिए इस कानून से घबराने का कोई कारण नहीं होना चाहिए। इसके विपरीत, जिन संस्थाओं या तत्वों ने विदेशी धन का उपयोग नियमों से इतर गतिविधियों, अपारदर्शी वित्तीय लेन-देन या भारत में अस्थिरता और अशांति फैलाने के प्रयासों के लिए किया है, उनके लिए स्वाभाविक रूप से चिंता की स्थिति पैदा हो सकती है क्योंकि प्रस्तावित संशोधन निगरानी, जवाबदेही और कानूनी अनुपालन को और मजबूत करने का प्रयास करता है। मोदी सरकार का कहना है कि यह कानून किसी धर्म या समुदाय को लक्षित नहीं करता, बल्कि विदेशी अंशदान के नियमन और पारदर्शिता के लिए समान रूप से लागू होगा। ऐसे में यदि विदेशी फंडिंग के नाम पर नियमों की अनदेखी करने वालों की मुश्किलें बढ़ती हैं, तो इसे कानून के दायरे में जवाबदेही सुनिश्चित करने की प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए। बहरहाल, संसद में होने वाली चर्चा के बाद कानून का अंतिम स्वरूप तय होगा, लेकिन यह स्पष्ट है कि विदेशी धन के उपयोग पर प्रभावी निगरानी और राष्ट्रीय हितों की रक्षा किसी भी संप्रभु राष्ट्र की वैध जिम्मेदारी है। -नीरज कुमार दुबे
ड्रग्स-रोधी सहयोग को बढ़ावा देने के लिए एनसीबी ने की भारत-अमेरिका काउंटर नारकोटिक्स वर्किंग ग्रुप की बैठक
'ब्राह्मणों के नाम पर वोट चाहिए, सत्ता सिर्फ परिवार के लिए', ब्रजेश पाठक का सपा पर हमला
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मध्य प्रदेश में शुरू होगा 6 महीने का जन विश्वास अभियान, जनता के बीच जाएंगे मंत्री-अधिकारी
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राजेंद्र माथुर- विचारों की पत्रकारिता के नायक
राजेंद्र माथुर की पूरी जीवन यात्रा एक साधारण आम आदमी की कथा है। वे इतने साधारण हैं कि असाधारण लगने लगते हैं। उन्होंने जो कुछ पाया, एकाएक नहीं पाया; संघर्ष से पाया, नियमित लेखन से पाया और अपनी रचनाशीलता से पाया। इसी संघर्ष की वृत्ति ने उन्हें असाधारण पत्रकार और संपादक बना दिया। राजेंद्र माथुर का पत्रकारीय व्यक्तित्व इस बात से तय होता है कि आखिर उनके लेखन में विचारों की गहराई कितनी है। अपने अखबार को ऊंचाइयों पर ले जाने का उनका संकल्प कितना गहरा है और हमारे समय के प्रश्नों के जवाब तलाशने तथा नए सवाल खड़े करने की कितनी प्रश्नाकुलता संबंधित व्यक्ति में है। राजेंद्र माथुर का संपादकीय और पत्रकारीय व्यक्तित्व इस बात की गवाही देता है कि वे असहज प्रश्नों से मुंह नहीं चुराते, बल्कि उनसे दो-दो हाथ करते हैं। वे सवालों से जूझते हैं और उनके सही एवं प्रासंगिक उत्तर तलाशने की कोशिश करते हैं। वे सही मायने में पत्रकारिता में विचारों के एक ऐसे प्रतीक पुरुष बनकर सामने आए, जिन्होंने अपने लेखन के माध्यम से एक बौद्धिक उत्तेजना का सृजन किया और हिंदी को एक ऐसी भाषा तथा विराट अनुभव-संसार दिया, जिसकी प्रतीक्षा में वह सालो से खड़ी थी। इस मायने में राजेंद्र माथुर की उपस्थिति अपने समय में एक कद्दावर पत्रकार-संपादक की मौजूदगी है। वरिष्ठ पत्रकार श्री सूर्यकांत बाली के मुताबिक,“माथुर साहब जैसा बोलते थे, वैसा ही लिखते थे। वे धाराप्रवाह, विचार-परिपूर्ण और रूपक-अलंकृत बोलते थे, तो धाराप्रवाह, विचार-परिपूर्ण और रूपक-अलंकृत लिखते भी थे।” ऐसे में कहा जा सकता है कि राजेंद्र माथुर के पत्रकारीय एवं संपादकीय व्यक्तित्व में एक बौद्धिक आकर्षण दिखता है। उनके लेखन में भारत-जिज्ञासा, भारत-अनुराग और भारत-स्वप्न पूरी समग्रता में प्रकट होते हैं। वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने लिखा है कि “राजेंद्र माथुर में बौद्धिकता और सच्चरित्रता का असाधारण संगम था, इसीलिए वे हिंदी पत्रकारिता में शिखर स्थान पा सके। वे असाधारण शैलीकार थे। अंग्रेजी साहित्य के प्राध्यापक होने के बावजूद उनकी हिंदी लेखन शैली बिंब-प्रधान थी। उनके मुहावरे अपने होते थे। उनमें अभिव्यंजना की अद्भुत शक्ति थी। हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में वे एक शैलीकार के रूप में याद किए जाएंगे।” इसे भी पढ़ें: अब शिवाजी, चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह जैसे लोग क्यों नहीं मिलते? राजेंद्र माथुर एक श्रेष्ठ संपादक थे। उनकी उपस्थिति ही 'नईदुनिया' और 'नवभारत टाइम्स' को एक ऐसा समाचार पत्र बनाने में सफल हुई, जिस पर हिंदी पत्रकारिता को नाज है। 'नवभारत टाइम्स' में श्री माथुर के सहयोगी रहे श्री विष्णु खरे ने लिखा है कि, “राजेंद्र माथुर महान संपादक होने का अभिनय करने की कोई जरूरत महसूस नहीं करते थे। दरअसल, लिबास से लेकर बोलचाल तक उनकी कोई बनावटी शैली या लहजा नहीं था; वे अपने मामूलीकरण में विश्वास करते थे, वैशिष्ट्य में नहीं। उनकी संपादकीय आदेशों या हुक्मों से नहीं, एक गुणात्मक तथा नैतिक विकिरण से चलती” राजेंद्र माथुर का पत्रकारीय व्यक्तित्व बेहद प्रेरक था। आज की पत्रकारिता और मीडिया संस्थानों में घुस आई तमाम बुराइयों से उनका व्यक्तित्व एकदम अलग था। संपादक की जैसी शास्त्रीय परिभाषाएं बताई गई हैं, श्री माथुर उन पर पूरी तरह फिट बैठते हैं। उनके समकक्ष पत्रकारों की राय में, जिस समय वे दिल्ली में 'नवभारत टाइम्स' जैसे बड़े अखबार के संपादक थे, वे सत्ता के लाभ उठा सकते थे। आज की पत्रकारिता में जिस तरह पत्रकार एवं संपादक सत्ता से लाभ लेकर मंत्री से लेकर राज्यसभा की सीटें ले रहे हैं, श्री माथुर भी ऐसे प्रलोभनों के पास जा सकते थे। किंतु उन्होंने तमाम चर्चाओं के बीच इससे खुद को बचाया। पत्रकार विष्णु खरे अपने लेख में इस बात की पुष्टि भी करते हैं। सही मायने में राजेंद्र माथुर एक ऐसे संपादक के रूप में सामने आते हैं, जिन्होंने अपने पत्रकारीय व्यक्तित्व को वह ऊंचाई दी जिसके लिए पीढ़ियां उन्हें याद कर रही हैं। उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खूबी हिंदी पत्रकारिता को लेकर उनकी चिंताएं हैं। वे हिंदी पत्रकारिता के एक ऐसे संपादक थे, जो लगातार यह सोचते रहे कि हिंदी पत्रकारिता का विचार-दारिद्र्य कैसे दूर किया जाए और कैसे हिंदी में एक संपूर्ण अखबार निकले तथा उसे व्यापक लोकस्वीकृति भी मिल सके। 'नवभारत टाइम्स' के कार्यकारी संपादक रहे स्व. सुरेंद्र प्रताप सिंह ने उनकी इन चिंताओं को निकटता से देखा था। वे लिखते हैं, “माथुर साहब का गहन इतिहास-बोध, शुद्ध श्रद्धा और उससे उत्पन्न गरिमामय अतीत की मरीचिका पर आधारित हिंदी पत्रकारिता की कमजोर आधारभूमि के बारे में उन्हें बार-बार सचेत करता रहता था। वे भूतकाल के वायवीय स्वर्णिम अतीत में जीने वाले नहीं थे। वे स्वप्नदर्शी थे और अपने सपनों की उदात्तता के साथ उन्होंने कभी किसी प्रकार का समझौता नहीं किया। हिंदी पत्रकारिता का वर्तमान परिदृश्य उन्हें बार-बार विचलित तो कर देता था, लेकिन एक कुशल अभियात्री की तरह उन्होंने अपने जहाज की दिशा को क्षणिक प्रलोभनों के लिए किसी अन्य रास्ते पर डालने के बारे में क्षणिक विचार भी नहीं किया।” उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व की विशिष्टता यह भी है कि वे अंग्रेजी के प्राध्यापक और विद्वान होने के बावजूद अपने लेखन की भाषा के नाते हिंदी को चुनते हैं। हिंदी उनकी सांसों में बसती थी। हिंदी पत्रकारिता को नई जमीन तोड़ने के लिए प्रेरित करने और हिंदी लेखकों एवं पत्रकारों की एक पूरी पीढ़ी का निर्माण करने का काम श्री माथुर जीवन भर करते रहे। इंदौर से लेकर दिल्ली तक उनकी पूरी यात्रा में एक भारत-प्रेम, भारत-बोध और हिंदी-प्रेम साफ नजर आता है। शायद इसी के चलते वे देश की पत्रकारिता को एक नई और सही दिशा देने में सफल रहे। श्री मधुसूदन आनंद लिखते हैं, “माथुर साहब ने अंग्रेजी में एम.ए. किया था और अंग्रेजी भाषा पर उनकी पकड़ अंग्रेजी पत्रकारों को भी विस्मय में डालती थी। लेकिन उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को चुना, तो शायद इसलिए कि वे अपनी बात अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना चाहते थे। अगर यह कहा जाए कि हिंदी पत्रकारों की एक पीढ़ी माथुर साहब को पढ़कर पली और बढ़ी है, तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। उनके असामयिक निधन के बाद 'नवभारत टाइम्स' को देश के दूर-दूर के इलाकों से हजारों पत्र प्राप्त हुए थे। ये वे पाठक थे, जो उनके उत्कट राष्ट्र-प्रेम, समाज के प्रति उनके सरोकारों, इतिहास की अतल गहराइयों से अनमोल तथ्य ढूंढ कर लाने के उनके सामर्थ्य और शालीन भाषा में राजनेताओं की खिंचाई करने के उनके साहस पर मुग्ध थे।” उनके व्यक्तित्व की एक बड़ी विशेषता थी, जिसे उनके सहयोगी रहे सूर्यकांत बाली इन शब्दों में रेखांकित करते हैं,“हमारे प्रधान संपादक को कोई पांचवां काम आता है, इस पर तो मुझे पूरा शक है: बस सोचना, पढ़ना, बतियाना और लिखना, उनकी सारी दुनिया इन चार कामों में सिमट चुकी थी।” श्री माथुर के व्यक्तित्व पर यह एक मुकम्मल टिप्पणी है, जो बताती है कि वे किस तरह के पत्रकार-संपादक थे। उनका पत्रकारीय व्यक्तित्व इसीलिए एक अलग किस्म की आभा के साथ सामने आता है, जिसमें एक बौद्धिक तेज और आकर्षण निरंतर दिखता है। उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे एक ऐसे लेखक-संपादक के तौर पर सामने आते हैं, जो पूर्णकालिक पत्रकार थे। वे किसी साहित्य की परंपरा से आने वाले संपादक नहीं थे। अतः उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को साहित्यकार-संपादकों द्वारा दी गई भाषा और उसके मुहावरों से अलग एक अनूठी पत्रकारीय भाषा का अनुभव दिया। हिंदी को संवाद, संचार और सूचना की भाषा बनाने में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। सही मायने में वे एक ऐसे संपादक और लेखक के रूप में सामने आते हैं, जिन्होंने बहुत से अनछुए विषयों को हिंदी के अनुभव का विषय बनाया, जिन पर पहले अंग्रेजी के पत्रकारों का एकाधिकार माना जाता था। उन्होंने भावनाओं से ऊपर विचार और बौद्धिकता को महत्व दिया। इसके चलते हिंदी को एक नई भाषा, एक नया अनुभव और अभिव्यक्ति का एक नया संबल मिला। उनकी बौद्धिकता ने हिंदी पत्रकारिता को अंग्रेजी अखबारों के सामने सम्मान से खड़े होने लायक बनाया, जिससे हिंदी पत्रकारिता ने एक नया आत्मविश्वास और नई ऊर्जा हासिल की। आज हिंदी पत्रकारिता पर जिस तरह बाजारवादी ताकतों का दबाव गहरा रहा है, ऐसे समय में राजेंद्र माथुर के बहाने हिंदी पत्रकारिता की पड़ताल एक आवश्यक विमर्श बन गई है। शायद उनकी स्मृति के बहाने हम कुछ ऐसे रास्ते तलाश पाएं, जो हमें इस कठिन समय में अपने मूल्यों के साथ काम करने का हौसला दे सकें। - प्रो.संजय द्विवेदी (लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)
'Gen Z के लिए आप...' PM मोदी से अब क्या चाहते है दीपके ? NDA के सामने रख दी ये बड़ी डिमांड
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असम के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा ने छात्रों से की अपील, कहा- डिग्री के साथ स्किल भी जरूरी, तभी मिलेंगे रोजगार के मौके
‘अगर हम सड़कों पर उतर आए तो दिल्ली ठप हो जाएगी,' बीसी आरक्षण बिल पर बोलीं के. कविता
‘अगर हम सड़कों पर उतर आए तो दिल्ली ठप हो जाएगी,' बीसी आरक्षण बिल पर बोलीं के. कविता
भाजपा नेता ने मौलाना रशीदी की मानसिकता पर उठाए सवाल, भागवत की जेन-जी से बातचीत की सराहना की
भाजपा नेता ने मौलाना रशीदी की मानसिकता पर उठाए सवाल, भागवत की जेन-जी से बातचीत की सराहना की
तमिलनाडु: सीएम विजय ने 8 अगस्त को परिसीमन पर सांसदों की बुलाई बैठक
तमिलनाडु: सीएम विजय ने 8 अगस्त को परिसीमन पर सांसदों की बुलाई बैठक
पंजाब में ऋण चुकाने की लागत कुल राजस्व के 23 प्रतिशत से अधिक: मनीष तिवारी
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'कर्मों का फल भुगतना पड़ता है', अतीक अहमद के बेटे की मौत पर बोले भाजपा विधायक
'कर्मों का फल भुगतना पड़ता है', अतीक अहमद के बेटे की मौत पर बोले भाजपा विधायक
रांची : जेपीएससी-जेएसएससी आंदोलन 13वें दिन भी जारी, 13 साल के छात्र जैद ने पेपर लीक और रद्द होने पर जताई पीड़ा
'भाखड़ा बांध पूरी तरह सुरक्षित है', पंजाब के मंत्री ने विधानसभा को बताया
'भाखड़ा बांध पूरी तरह सुरक्षित है', पंजाब के मंत्री ने विधानसभा को बताया
1 लाख से अधिक गैर-मराठी चालकों ने व्यावहारिक मराठी सीखी: मंत्री प्रताप सरनाइक
1 लाख से अधिक गैर-मराठी चालकों ने व्यावहारिक मराठी सीखी: मंत्री प्रताप सरनाइक
राज्यसभामेंनीरजडांगीकोबड़ीजिम्मेदारी, राजस्थानकांग्रेसकीराजनीतिमेंबढ़ाकदसंगठनमेंबदलेसमीकरण
नईदिल्ली/जयपुर. कांग्रेसनेतृत्वनेराज्यसभासांसदनीरजडांगीकोराज्यसभामेंपार्टीकासचेतक (व्हिप) नियुक्तकरनकेवलसंसदमेंउन्हेंमहत्वपूर्णजिम्मेदारीसौंपीहै, बल्किइसफैसलेकोराजस्थानकांग्रेसकीराजनीतिकेलिहाजसेभीएकबड़ेसंदेशकेरूपमेंदेखाजारहाहै. कांग्रेससंसदीयदलकीअध्यक्षसोनियागांधीकेनिर्देशपरजारीइसनियुक्तिनेयहसंकेतदियाहैकिपार्टीकाशीर्षनेतृत्वनीरजडांगीपरलगातारभरोसाजतारहाहै. राजनीतिकविश्लेषकोंकामाननाहैकियहफैसलाराजस्थानकांग्रेसमेंडांगीकीसंगठनात्मकऔरराजनीतिकभूमिकाकोऔरमजबूतकरेगा. राज्यसभामेंव्हिपकेरूपमेंनीरजडांगीअबपार्टीसांसदोंकेबीचसमन्वयस्थापितकरने, सदनमेंउनकीउपस्थितिसुनिश्चितकरने, महत्वपूर्णविधेयकोंपरपार्टीलाइनकेअनुरूपमतदानकरानेऔरसंसदीयरणनीतिकोप्रभावीढंगसेलागूकरानेकीजिम्मेदारीनिभाएंगे. संसदमेंयहपदसंगठनात्मकदृष्टिसेअत्यंतमहत्वपूर्णमानाजाताहैऔरआमतौरपरयहजिम्मेदारीउन्हींनेताओंकोदीजातीहै, जिनपरपार्टीनेतृत्वकोपूर्णविश्वासहोताहै. डांगीकीनियुक्तिऐसेसमयहुईहैजबकांग्रेसआगामीविधानसभाचुनावोंकीतैयारियोंकेसाथसंगठनकोमजबूतकरनेकीरणनीतिपरकामकररहीहै. ऐसेमेंराजस्थानसेजुड़ेएकनेताकोसंसदमेंअहमजिम्मेदारीमिलनाप्रदेशकीराजनीतिमेंभीविशेषमहत्वरखताहै. इसेकांग्रेसहाईकमानद्वाराराजस्थानइकाईकोदियागयाएकसकारात्मकराजनीतिकसंकेतमानाजारहाहै. राजनीतिकविश्लेषकोंकाकहनाहैकिनीरजडांगीलंबेसमयसेपूर्वमुख्यमंत्रीअशोकगहलोतकेविश्वस्तसहयोगीमानेजातेहैं. हालांकिउनकीनईजिम्मेदारीकोकेवलकिसीएकगुटसेजोड़करदेखनाउचितनहींहोगा. इसेकांग्रेसनेतृत्वद्वारासंगठनात्मकअनुभवऔरसंसदीयक्षमताकेआधारपरकियागयानिर्णयमानाजारहाहै. इससेयहसंकेतभीमिलताहैकिपार्टीराजस्थानकेअनुभवीनेताओंकोराष्ट्रीयस्तरपरअधिकजिम्मेदारियांदेनेकीनीतिपरआगेबढ़रहीहै. डांगीकीनियुक्तिकाअसरराजस्थानकांग्रेसकेभीतरउनकेराजनीतिकप्रभावकोबढ़ानेवालामानाजारहाहै. संगठनात्मकबैठकों, उम्मीदवारचयनऔरसंसदीयमामलोंमेंउनकीरायपहलेकीतुलनामेंअधिकमहत्वपूर्णहोसकतीहै. साथहीकार्यकर्ताओंकेबीचभीउनकाराजनीतिककदमजबूतहोनेकीसंभावनाजताईजारहीहै. हालांकिइससेप्रदेशकांग्रेसकेअंदरकिसीतत्कालराजनीतिकबदलावयाशक्तिसंतुलनमेंपरिवर्तनकानिष्कर्षनिकालनाअभीजल्दबाजीहोगी. नीरजडांगीकाराजनीतिकसफरसंघर्षऔरसंगठनात्मकसक्रियतासेजुड़ारहाहै. वर्ष 2004 से 2009 तकउन्होंनेराजस्थानयुवाकांग्रेसकेप्रदेशअध्यक्षकेरूपमेंसंगठनकोमजबूतकिया. विधानसभाचुनावोंमेंहारकेबावजूदउन्होंनेपार्टीनहींछोड़ीऔरलगातारसंगठनकेलिएकार्यकरतेरहे. इसीनिष्ठाऔरअनुभवकेआधारपरकांग्रेसनेउन्हेंवर्ष 2020 मेंपहलीबारराज्यसभाभेजाऔरवर्ष 2026 मेंलगातारदूसरीबारराज्यसभासदस्यबनाया. अबव्हिपकीजिम्मेदारीदेकरपार्टीनेउनकेप्रतिअपनाविश्वासऔरमजबूतकरदियाहै. राजनीतिकजानकारोंकामाननाहैकिसंसदमेंसक्रियभूमिकानिभानेवालेनेताओंकोभविष्यमेंसंगठनऔरसरकारसेजुड़ेबड़ेदायित्वभीमिलसकतेहैं. हालांकियहभविष्यकीराजनीतिकपरिस्थितियोंऔरपार्टीकेनिर्णयोंपरनिर्भरकरेगा. फिलहालइतनास्पष्टहैकिराज्यसभामेंव्हिपबनाएजानेकेबादनीरजडांगीकाराष्ट्रीयस्तरपरराजनीतिकमहत्वबढ़ाहैऔरराजस्थानकांग्रेसमेंभीउनकीभूमिकापहलेसेअधिकप्रभावशालीमानीजाएगी. कांग्रेसकीयहनियुक्तिकेवलसंसदीयव्यवस्थातकसीमितनहींमानीजारही, बल्किइसेराजस्थानमेंपार्टीसंगठनकोमजबूतकरनेऔरअनुभवीनेतृत्वकोराष्ट्रीयस्तरपरआगेलानेकीरणनीतिकाहिस्साभीमानाजारहाहै. आनेवालेसमयमेंयहदेखनामहत्वपूर्णहोगाकिसंसदऔरसंगठनदोनोंस्तरोंपरनीरजडांगीइसनईजिम्मेदारीकाकिसतरहनिर्वहनकरतेहैंऔरइसकाराजस्थानकांग्रेसकीराजनीतिपरकितनाव्यापकप्रभावपड़ताहै.
सीएम सुवेंदु अधिकारी ने कोलकाता में 27 अवैध इमारतों के मामले में लाइव पूछताछ की चेतावनी दी
सीएम सुवेंदु अधिकारी ने कोलकाता में 27 अवैध इमारतों के मामले में लाइव पूछताछ की चेतावनी दी
बिहार सरकार ने एमएसएमई के लिए अलग निदेशालय बनाया, पहली बार छोटे उद्योगों की चिंता : श्याम सुंदर भीमसरिया
तमिलनाडु: उदयनिधि ने सीएम विजय को कावेरी विवाद पर विपक्ष के सवालों का जवाब देने की चुनौती दी
तमिलनाडु: उदयनिधि ने सीएम विजय को कावेरी विवाद पर विपक्ष के सवालों का जवाब देने की चुनौती दी
सरकार हर मुद्दे पर चर्चा को तैयार, विपक्ष सिर्फ बयानबाजी कर रहा: भाजपा सांसद नरेश बंसल
सरकार हर मुद्दे पर चर्चा को तैयार, विपक्ष सिर्फ बयानबाजी कर रहा: भाजपा सांसद नरेश बंसल
एफसीआरए संशोधन बिल 2014 में ही लाना चाहिए था : पूर्व राज्यपाल तथागत रॉय
एफसीआरए संशोधन बिल 2014 में ही लाना चाहिए था : पूर्व राज्यपाल तथागत रॉय
सीबीआई की कार्रवाई, 2021 बंगाल चुनाव के बाद हिंसा में हुई हत्या के मामले में घोषित अपराधी गिरफ्तार
सीबीआई की कार्रवाई, 2021 बंगाल चुनाव के बाद हिंसा में हुई हत्या के मामले में घोषित अपराधी गिरफ्तार
सदन का वॉकआउट करके कांग्रेस खुद को पहुंचा रही नुकसान, सरकार चर्चा के लिए तैयार : किरेन रिजिजू
सदन का वॉकआउट करके कांग्रेस खुद को पहुंचा रही नुकसान, सरकार चर्चा के लिए तैयार : किरेन रिजिजू
वाईएसआरसीपी सांसदों ने केंद्र सरकार से वाईएस जगन की सुरक्षा पर दखल देने की मांग की
वाईएसआरसीपी सांसदों ने केंद्र सरकार से वाईएस जगन की सुरक्षा पर दखल देने की मांग की
पश्चिम बंगाल में मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने पर सियासत, इमाम बोले- बनाया जा रहा दबाव
पश्चिम बंगाल में मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने पर सियासत, इमाम बोले- बनाया जा रहा दबाव
बिहार में राहुल गांधी और अन्य विपक्षी सांसदों के खिलाफ अदालत में शिकायत दर्ज
बिहार में राहुल गांधी और अन्य विपक्षी सांसदों के खिलाफ अदालत में शिकायत दर्ज
दिल्ली विधानसभा स्पीकर ने मानसून सत्र से पहले सुरक्षा व्यवस्था का लिया जायजा
दिल्ली विधानसभा स्पीकर ने मानसून सत्र से पहले सुरक्षा व्यवस्था का लिया जायजा
राजस्थान के मुख्यमंत्री विधानसभा सत्र से पहले दिल्ली पहुंचे, गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की
राजस्थान के मुख्यमंत्री विधानसभा सत्र से पहले दिल्ली पहुंचे, गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की
प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री की अनुपस्थिति से सदन का संचालन बाधित हो रहा : कांग्रेस
प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री की अनुपस्थिति से सदन का संचालन बाधित हो रहा : कांग्रेस
नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश में भूस्खलन: राहुल गांधी, प्रियंका-खड़गे ने घायलों के जल्द स्वस्थ होने की कामना की
तमिलनाडु ने धान किसानों की सुरक्षा के लिए 34.72 करोड़ रुपए की बीज सब्सिडी शुरू की
तमिलनाडु ने धान किसानों की सुरक्षा के लिए 34.72 करोड़ रुपए की बीज सब्सिडी शुरू की
बृजभूषण शरण सिंह के समर्थन में उमड़ी भीड़ जनता के विश्वास का प्रतीक: प्रतीक भूषण सिंह
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लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे पर दरारें: परियोजना निदेशक बर्खास्त, निर्माण एजेंसी को कारण बताओ नोटिस जारी
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14 अगस्त को इस्तीफा देंगे कर्नाटक विधान परिषद के सभापति बसवराज होरट्टी, कांग्रेस के फैसले पर जताई नाराजगी
कॉकरोच जनता पार्टी ने 'क्या बोलती जनता?' राष्ट्रव्यापी अभियान की घोषणा की
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गोंडा में बृजभूषण शरण सिंह की 'सत्यमेव जयते रैली', बोले- साजिश के तहत बदनाम किया गया
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कलकत्ता हाई कोर्ट ने सीबीआई को आरजी कर केस में नई जांच में तेजी लाने का निर्देश दिया
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भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों का आरोप, मिनी यूनिट्स की प्रमुख सेवाओं में कटौती कर रहा बीएमएचआरसी
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नाराज कर्नाटक विधान परिषद अध्यक्ष होरट्टी 14 अगस्त को पद से इस्तीफा देंगे
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भाजपा ने संसद में व्यवधान उत्पन्न करने के लिए खड़गे और राहुल गांधी की आलोचना की
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Cockroach Janata Party का बड़ा ऐलान! 11 सदस्यीय नेशनल वर्किंग कमिटी का गठन, जिम्मेदारियों का हुआ बंटवारा
'एनसीपीआई में सभी एकजुट, देशहित में करेंगे काम', एनडीए की बैठक पर बोले यूसुफ पठान
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महाराष्ट्र: मनोज जरांगे ने कुनबी प्रमाणपत्र रद्द करने को लेकर राज्य सरकार पर साजिश का आरोप लगाया
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केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू की राहुल गांधी से बात, परिसीमन विधेयक के लिए मांगा समर्थन
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अमरावती, 6 अगस्त (आईएएनएस)। जनसेना के राज्यसभा सांसद लिंगमनेनी रमेश ने आंध्र प्रदेश में दो नए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) स्तर के संस्थानों की स्थापना की मांग की है। उन्होंने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को पत्र लिखकर राज्य में तृतीयक स्वास्थ्य सेवाओं के ढांचे को मजबूत करने के लिए हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया।
इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल में भारत का प्रदर्शन उम्मीद से कहीं बेहतर रहा। भारत ने 13 स्वर्ण, 17 रजत और 9 कांस्य सहित कुल 39 पदक जीते। वह पदक तालिका में चौथे नंबर पर रहा। पहली नजर में यह प्रदर्शन बर्मिंघम 2022 के 61 पदक से कमजोर दिख सकता है, लेकिन आंकड़े अलग कहानी बताते हैं। इस बार ग्लासगो में सिर्फ 10 खेल शामिल थे, जबकि बर्मिंघम में 19 खेल खेले गए थे। बैडमिंटन, कुश्ती, शूटिंग, हॉकी, टेबल टेनिस और क्रिकेट जैसे खेल ग्लासगो गेम्स का हिस्सा नहीं थे, जिनसे 2022 में भारत को 30 पदक मिले थे। इसके अलावा भारत ने 210 खिलाड़ियों की जगह सिर्फ 123 खिलाड़ियों का दल भेजा। इनमें से 38 खिलाड़ी पदक जीतकर लौटे, यानी सफलता की दर 31 प्रतिशत रही। बर्मिंघम में यह आंकड़ा 29 प्रतिशत था। ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल शुरू होने से पहले भारतीय ओलंपिक संघ और विभिन्न खेल महासंघों की आंतरिक रिपोर्ट में भारत को 6 स्वर्ण समेत 31 पदक मिलने का अनुमान लगाया गया था। भारतीय खिलाड़ियों ने अनुमान से दोगुना से भी ज्यादा स्वर्ण जीते। कुल पदक में भी आगे निकल गए। ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल में भारत का सबसे सफल खेल बॉक्सिंग रहा। 14 मुक्केबाजों के दल में से 10 खिलाड़ी पदक जीतकर लौटे। इसमें 7 स्वर्ण और 3 रजत शामिल रहे। यानी 71 प्रतिशत मेडल कन्वर्जन रेट। बर्मिंघम 2022 में यह आंकड़ा 58 प्रतिशत था। पदक वितरण समारोह के दौरान सात बार भारत का राष्ट्रगान बजना न सिर्फ ग्लासगो में मौजूद भारतीय दर्शकों के लिए गर्व का पल था, बल्कि इस बात का सबूत भी था कि इस गैर-पारंपरिक खेल को गांवों और छोटे कस्बों तक ले जाने की पहल काफी हद तक सफल रही है। भारतीय बॉक्सरों के प्रदर्शन की जितनी भी प्रशंसा की जाए वो कम है। इसे भी पढ़ें: राष्ट्रमंडल खेल 2026: चुनौतियों के बीच चमका भारत जूडो में भारत ने पहली बार राष्ट्रमंडल खेल इतिहास में स्वर्ण जीता। अस्मिता डे और हर्ष सिंह ने स्वर्ण जीता। यामिनी मौर्य ने रजत और उन्नति शर्मा ने कांस्य जीतकर कुल चार पदक भारत की झोली में डाले। हालांकि 14 सदस्यीय भारतीय टीम के दो खिलाड़ी अरुण कुमार और तुलिका मान डोपिंग के कारण बाहर हो गए। इसी तरह, एथलीटों और पैरा-एथलीटों ने 16 पदक जीते। इनमें से कुछ ने तो नए राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी बनाए। वेटलिफ्टर्स ने आठ और पदक जीते। इन पदकों में ओलंपियन मीराबाई चानू का जीता हुआ एक स्वर्ण पदक भी शामिल था, जिससे उन्होंने स्वर्ण पदकों की हैट्रिक पूरी की; मणिपुर की इस एथलीट ने इससे पहले 2018 गोल्ड कोस्ट और 2022 बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेल में भी स्वर्ण पदक जीता था। असल में, मीराबाई चानू की शानदार कामयाबी के बावजूद, भारतीय वेटलिफ्टरों का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा। इस निराशा की एक वजह यह है कि डोपिंग के आरोपों के कारण कम से कम दो भारतीय वेटलिफ्टरों की एंट्री वापस लेनी पड़ी। छह अन्य खिलाड़ी—कड़ी टक्कर न होने के बावजूद—लड़ने के जज़्बे की कमी या तकनीकी गलतियों की वजह से स्वर्ण पदक जीतने का मौका चूक गए। एथलेटिक्स ने भारत को 10 पदक दिलाए, लेकिन एक भी स्वर्ण नहीं आया। नीरज चोपड़ा रजत जीत सके। उनके साथ डेब्यू कर रहे यशवीर सिंह ने कांस्य जीता। गुलवीर सिंह ने 10 हजार मीटर में सिल्वर और 5 हजार मीटर रेस में कांस्य जीतकर इतिहास रचा। गुलवीर एक ही कॉमनवेल्थ गेम्स में एथलेटिक्स में दो पदक जीतने वाले वह भारत के पहले खिलाड़ी भी बनें। तेजस्विन शंकर ने डेकाथलन में भारत का पहला राष्ट्रमंडल पदक दिलाया। सरवेश कुशारे, श्रीशंकर, प्रवीण चित्रावेल और सीमा कालीरामना भी पदक जीतने में सफल रहे। हालांकि स्प्रिंट और रिले टीम से बड़ी उम्मीदें थीं, वह खाली हाथ रही। इसमें कोई दो राय नहीं है कि मोदी सरकार के 12 वर्षों के शासन में देश में खेलों का संस्थागत विकास तेजी से हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बार यह दोहराया है कि खेल देश में एकता बढ़ाने, युवाओं को प्रेरित करने और भारत को एक आत्मविश्वासी और उभरती हुई वैश्विक ताकत के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। उनकी यह सोच कार्यों में भी दिखाई देती है, जैसे कि ‘खेलो इंडिया’और ‘टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम यानी टॉप्स’ जैसे प्रमुख कार्यक्रमों के माध्यम से। इन पहलों ने देश में खेलों की पूरी व्यवस्था को नया रूप दिया है और भारत को खेलकूद के प्रति समर्पित एक राष्ट्र बना दिया है। इन योजनाओं के कारण भारतीय खिलाड़ियों को बेहतर वित्तीय सहायता, आधुनिक प्रशिक्षण और अंतरराष्ट्रीय स्तर का एक्सपोजर मिला है, जिसके परिणामस्वरूप ओलंपिक, पैरालंपिक, कॉमनवेल्थ और एशियाई खेलों में भारत का प्रदर्शन लगातार सुधरा है। नई प्रतिभाओं को पदक जीतने वाले खिलाड़ी में बदलने में 'खेलो इंडिया' कार्यक्रम की अहम भूमिका रही है। इस कार्यक्रम के तहत अब तक 2781 से अधिक खिलाड़ियों को प्रशिक्षण, उपकरण, चिकित्सा देखभाल और वित्तीय सहायता दी गई है। सरकार ने खेलो इंडिया योजना पर 36,441 करोड़ रुपये का भारी निवेश मंजूर किया है। वर्ष 2026-31 के लिए संशोधित खेलो इंडिया योजना को मंजूरी दी है। राष्ट्रीय खेल महासंघों को मजबूत बनाने के लिए बड़े पैमाने पर वित्तीय सहायता दी जा रही है। देश के दूर-दराज और ग्रामीण इलाकों से भी उभरती प्रतिभाओं को खोजा जा रहा है। स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण और मार्गदर्शन की सुविधाएं देने के लिए देशभर में 1041 खेलो इंडिया केंद्र स्थापित किए गए हैं। इसके साथ ही, 32 खेलो इंडिया सेंटर ऑफ एक्सीलेंस और 301 खेल अकादमियों को मान्यता दी गई है, जिससे खेलों का पूरा इकोसिस्टम और मजबूत हुआ है। खेलो इंडिया सीओई में खिलाड़ियों को विशेषज्ञ कोचिंग, पोषण और उच्चस्तरीय प्रशिक्षण की सुविधा दी जा रही है। मोदी सरकार की इन पहलों का जमीन पर जबरदस्त असर भी दिख रहा है। 2022 एशियाई खेलों में भारत के 42 पदकों में से 124 पदक विजेता 'खेलो इंडिया' से प्रशिक्षित खिलाड़ी थे। वहीं पेरिस 2024 ओलंपिक में खेलो इंडिया के 28 खिलाड़ियों ने देश का प्रतिनिधित्व किया था। 'खेलो इंडिया' के खिलाड़ियों ने अब तक करीब 6000 राष्ट्रीय रिकॉर्ड और 1400 अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाए हैं, जो भारत के जमीनी स्तर के खेलकूद के कार्यक्रमों की प्रगति को दर्शाता है। कोच और खेल विशेषज्ञ मानते हैं कि कॉन्टिनेंटल या ग्लोबल इवेंट्स में प्रतियोगिता का स्तर कहीं ज्यादा होता है। ऐसे में किसी एथलीट या खिलाड़ी की काबिलियत और कड़ी मेहनत की असली परीक्षा एशियन गेम्स या ओलंपिक्स में होती है। हालांकि कॉमनवेल्थ गेम्स में जीते गए मेडल का महत्व कम नहीं आंका जाना चाहिए। इस बार युवा खिलाड़ियों ने दिखाया है कि भारत का खेल भविष्य पहले से कहीं ज्यादा उज्ज्वल दिख रहा है, कई खेलों में नई पीढ़ी के टैलेंटेड एथलीट सुर्खियां बटोर रहे हैं। राष्ट्रमंडल खेल जैसी प्रतियोगिता में किए गए प्रदर्शन को आम तौर पर भविष्य में सुधार के पैमाने और अपनी खूबियों व कमियों के आकलन के तौर पर देखा जाता है। राष्ट्रमंडल खेल के बाद अब भारतीय खिलाड़ियों की नजर एशियन गेम्स में दमदार प्रदर्शन करने पर है। 20 वें एशियाई खेल का आगाज 19 सितंबर से जापान के नागोया में होग। भारत इस बार हांग्जो 2022 के अपने ऐतिहासिक 107 पदकों के रिकॉर्ड को तोड़ने के इरादे से मैदान में उतरेगा। इसीलिए भारतीय खिलाड़ियों को राष्ट्रमंडल खेल में अपने प्रदर्शन पर गर्व करते हुए एशियन गेम्स में पेश आने वाली चुनौतियों के हिसाब से बिना एक भी पल गवाएं तैयारियां शुरू कर देनी चाहिए। क्योंकि जब विदेशी धरती पर तिरंगा लहराता है और जन-गण-मन गूंजता है, तो वह पल केवल एक खिलाड़ी की जीत नहीं, बल्कि पूरे देश का गौरव बन जाता है। - डॉ. आशीष वशिष्ठ (स्वतंत्र पत्रकार) लखनऊ, उत्तर प्रदेश (भारत)
अमित शाह से मिले TMC के बागी मुस्लिम सांसद, मस्जिद में अजान को लेकर उठाया बड़ा मुद्दा, जाने क्या है पूरा मामला
भारत को क्लीन एनर्जी टेक्नोलॉजी का ग्लोबल प्रोड्यूसर बनना चाहिए: एचडी कुमारस्वामी
नई दिल्ली, 6 अगस्त (आईएएनएस)। केंद्रीय इस्पात और भारी उद्योग मंत्री एचडी कुमारस्वामी ने गुरुवार को कहा कि भारत को क्लीन एनर्जी टेक्नोलॉजी का ग्लोबल प्रोड्यूसर बनना चाहिए। ऐसा इसलिए है, क्योंकि तेजी से बदलती दुनिया में किसी देश की ताकत सिर्फ एनर्जी रिसोर्स तक पहुंच से तय नहीं होती, बल्कि भविष्य को चलाने वाली टेक्नोलॉजी के लिए मैन्युफैक्चरिंग, इनोवेशन और मजबूत सप्लाई चेन बनाने की उसकी क्षमता से तय होती है।
कैबिनेट ने एनएच-15 के गुवाहाटी-तेजपुर कॉरिडोर को मंजूरी दी: प्रधानमंत्री मोदी
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'चुनाव आयोग ने शक्तियों का उल्लंघन कर फैसला दिया', सुप्रीम कोर्ट में 'शिवसेना विवाद' पर सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल की दलील
जेनजी के साथ आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का संवाद स्वागतयोग्य: संजय निरुपम
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सीबीआई ने गुवाहाटी से आरोपी अरूप दास को किया गिरफ्तार, अभिजीत सरकार हत्याकांड में था फरार
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एआईएसए प्रमुख नेहा 7 अगस्त से शुरू होने वाले 'जेनजी राइजिंग' अभियान का नेतृत्व करेंगी
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पंजाब: विधानसभा में अवैध खनन के मुद्दे पर हंगामा, हाउस कमेटी बनाने की मांग
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बीटीसी प्रमुख मोहिलारी ने बाढ़ प्रभावित शिवसागर में राहत अभियान का नेतृत्व किया, सहायता सामग्री भी बांटी
कैबिनेट ने असम में 8,970 करोड़ रुपए की गुवाहाटी-तेजपुर 4-लेन हाईवे परियोजना को दी मंजूरी
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राज्यसभा में राघव चड्ढा ने उठाया डॉक्टरों-डायग्नोस्टिक सेंटरों के 'कट मनी' का मुद्दा, कहा- मरीजों पर पड़ता है बोझ
महिलाओं का सम्मान हमारे संस्कार, शब्द से ठेस पहुंची तो खेद है: अश्वनी शर्मा
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दो दिन में दूसरी बार राहुल गांधी से मिले किरेन रिजिजू, क्या मानसून सत्र में लौटेगी बहस और कामकाज की रफ्तार?
अरुणाचल प्रदेश: जेपी नड्डा ने बाढ़ प्रभावित इलाकों का किया दौरा, समीक्षा बैठक की
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अपहरण मामले में आंध्र प्रदेश की अदालत ने वाईएसआरसीपी नेता मुस्तफा को न्यायिक हिरासत में भेजा
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'वेट्री वानमगल' योजना: तमिलनाडु सरकार महिला किसानों को देगी ड्रोन चलाने का प्रशिक्षण
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कोलकाता : इलियट पार्क से हटाए गए 'व्यू-ब्लॉकर', सीएम अधिकारी ने पूर्व सरकार पर कसा तंज
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कोर कमेटी को लेकर सीजेपी में बवाल, अभिजीत दिपके के घर के बाहर दो युवाओं ने दिया धरना
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सीएम विजय ने टीवीके सरकार के पहले बजटों को बताया समावेशी विकास का रोडमैप
सीएम विजय ने टीवीके सरकार के पहले बजटों को बताया समावेशी विकास का रोडमैप
अभिजीत दीपके का बड़ा ऐलान! सितंबर से शुरू होगा 'क्या बोलती पब्लिक' मूवमेंट, जानिए किन मुद्दों पर होगी चर्चा
राहुल गांधी के प्रयागराज कार्यक्रम की अनुमति रद्द होने पर विपक्षी सांसदों ने सरकार पर लगाया आरोप
राहुल गांधी के प्रयागराज कार्यक्रम की अनुमति रद्द होने पर विपक्षी सांसदों ने सरकार पर लगाया आरोप
'ये मेरा अधिकार है....'संसद में फिर बढ़ा सियासी पारा, जानिए किस बात पर भिड़ेरिजिजू और मल्लिकार्जुन खरगे
संसद में सरकारी कंपनियों की परफॉर्मेंस पर संसदीय समिति की छह रिपोर्टें पेश
संसद में सरकारी कंपनियों की परफॉर्मेंस पर संसदीय समिति की छह रिपोर्टें पेश
जनप्रतिनिधि एआई का अधिक उपयोग करें, योजनाओं की निगरानी होगी बेहतर: सम्राट चौधरी
जनप्रतिनिधि एआई का अधिक उपयोग करें, योजनाओं की निगरानी होगी बेहतर: सम्राट चौधरी
MP में कुशवाहा वोट बैंक की ताकत के आगे झुकी BJP, 'गुलाटी' बयान के लिए तोमर को मांगनी पड़ी माफी
मध्य प्रदेश की राजनीति में दतिया विधानसभा उपचुनाव के नतीजे ने भारतीय जनता पार्टी को ऐसा राजनीतिक संदेश दिया है, जिसकी गूंज अब पूरे प्रदेश में सुनाई दे रही है। विधानसभा अध्यक्ष और भाजपा के वरिष्ठ नेता नरेंद्र सिंह तोमर के एक विवादित बयान से शुरू हुआ विवाद आखिरकार सार्वजनिक माफी तक पहुंच गया। भाजपा की आंतरिक समीक्षा में यह संकेत मिलने के बाद कि कुशवाहा समाज की नाराजगी पार्टी की हार का बड़ा कारण बनी, तोमर ने स्वयं आगे आकर अपने शब्द वापस लिए और कहा कि उन्होंने कभी सपने में भी इस समाज का अपमान करने की नहीं सोचा। पूरा विवाद उस समय शुरू हुआ जब 31 जुलाई को मुरैना में भाजपा के जिला अध्यक्ष कमलेश कुशवाहा के निवास पर आयोजित एक कार्यक्रम में नरेंद्र सिंह तोमर ने कुशवाहा समाज को संबोधित करते हुए कहा कि यह समाज बीच-बीच में गुलाटी खाता रहा और इसी कारण उसने अपनी विश्वसनीयता को खंडित किया। उन्होंने यह भी कहा कि एक समय ऐसा था जब कुशवाहा समाज भाजपा का मजबूत समर्थक माना जाता था और भाजपा ने उस दौर में भी समाज को सम्मान दिया, जब अन्य राजनीतिक दल उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने की स्थिति में नहीं थे। उन्होंने पूर्व नेता कालीचरण कुशवाहा को टिकट दिए जाने का उदाहरण भी प्रस्तुत किया। इसे भी पढ़ें: Article 370 पर बदजुबानी कर रहे थे जरदारी और शहबाज शरीफ, मोदी ने खुद आगे आकर दिया करारा जवाब हालांकि, कार्यक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते ही राजनीतिक भूचाल आ गया। कुशवाहा समाज के विभिन्न संगठनों और प्रतिनिधियों ने इस टिप्पणी को पूरे समाज की राजनीतिक निष्ठा पर सवाल बताकर तीखी आपत्ति जताई। कांग्रेस ने भी इसे तुरंत बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना दिया। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इसे अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का अपमान बताते हुए कहा कि संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को इस तरह की भाषा शोभा नहीं देती और उन्होंने नरेंद्र सिंह तोमर से सार्वजनिक माफी की मांग की। इस बीच, दतिया विधानसभा उपचुनाव के परिणाम ने भाजपा की मुश्किलें और बढ़ा दीं। कांग्रेस उम्मीदवार कुंवर घनश्याम सिंह ने भाजपा प्रत्याशी आशीष तिवारी को 6,016 वोटों के अंतर से पराजित कर दिया। भाजपा की आंतरिक समीक्षा में यह बात सामने आई कि दतिया के लगभग 12 प्रतिशत मतदाता रहे कुशवाहा समाज का एक बड़ा हिस्सा कांग्रेस की ओर खिसक गया, जिसने चुनावी परिणाम को निर्णायक रूप से प्रभावित किया। इसके बाद भाजपा संगठन ने हार की व्यापक समीक्षा शुरू की। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने वरिष्ठ नेताओं और चुनाव प्रभारियों के साथ बैठक की, दतिया जिला इकाई को भंग किया गया, समीक्षा समितियां गठित की गईं और संगठनात्मक कमजोरियों के साथ-साथ संभावित अंदरूनी असंतोष की भी जांच शुरू हुई। इसी राजनीतिक आत्ममंथन के बीच नरेंद्र सिंह तोमर ने कुशवाहा समाज के नाम हस्ताक्षरित पत्र जारी कर अपने बयान पर खेद व्यक्त किया। उन्होंने लिखा कि कमलेश कुशवाहा के घर आयोजित कार्यक्रम पारिवारिक वातावरण में था और उसी संदर्भ में बातचीत हुई थी। उन्होंने कहा कि उनका और कुशवाहा समाज का रिश्ता परस्पर पूरक है तथा उन्होंने जीवनभर इस समाज का सम्मान किया है और आगे भी करते रहेंगे। यदि उनके शब्दों से किसी की भावना आहत हुई है तो वह अपने शब्द वापस लेते हैं और इसके लिए खेद प्रकट करते हैं। उनका यह बयान भाजपा के भीतर बढ़ी राजनीतिक बेचैनी और सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। दरअसल, यह पूरा घटनाक्रम केवल एक बयान और माफी तक सीमित नहीं है, बल्कि मध्य प्रदेश की बदलती सामाजिक-राजनीतिक राजनीति का संकेत भी देता है। राज्य की कुल आबादी में अन्य पिछड़ा वर्ग लगभग आधी हिस्सेदारी रखता है और कुशवाहा समाज इस वर्ग का एक प्रभावशाली हिस्सा माना जाता है। ग्वालियर-चंबल अंचल के मुरैना, दतिया, भिंड और ग्वालियर जैसे जिलों से लेकर बुंदेलखंड और विंध्य क्षेत्र तक इस समाज की उल्लेखनीय उपस्थिति है। कई विधानसभा सीटों पर यह समाज जीत-हार तय करने की क्षमता रखता है। विशेष रूप से दतिया जैसी सीट पर, जहां कुशवाहा मतदाता लगभग 12 प्रतिशत हैं, किसी भी दल के लिए इस समाज की अनदेखी राजनीतिक जोखिम बन सकती है। यही कारण है कि भाजपा ने पिछले दो दशकों में ओबीसी सामाजिक समीकरणों के केंद्र में कुशवाहा समाज को महत्वपूर्ण स्थान दिया। दूसरी ओर कांग्रेस भी अब इस वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर तेजी से काम कर रही है। पार्टी ने सतना विधायक सिद्धार्थ कुशवाहा के नेतृत्व में बूथ स्तर तक व्यापक अभियान चलाया, जिसका असर दतिया उपचुनाव में दिखाई दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कुशवाहा समाज मध्य प्रदेश में केवल एक बड़ा वोट बैंक नहीं, बल्कि एक प्रभावी स्विंग फैक्टर भी है। यदि समाज को सम्मान, पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व और भागीदारी का संदेश मिलता है तो वह किसी भी दल के साथ मजबूती से खड़ा हो सकता है। लेकिन उपेक्षा या अपमान की भावना पैदा होने पर उसका रुख तेजी से बदलने की क्षमता भी रखता है। यही वजह है कि नरेंद्र सिंह तोमर के गुलाटी वाले बयान के बाद भाजपा को सार्वजनिक रूप से डैमेज कंट्रोल करना पड़ा। बहरहाल, दतिया उपचुनाव ने भाजपा और कांग्रेस दोनों को स्पष्ट संकेत दे दिया है कि मध्य प्रदेश की आगामी राजनीतिक लड़ाई केवल नेताओं के भाषणों या चुनावी नारों से नहीं जीती जाएगी। सामाजिक सम्मान, प्रतिनिधित्व और ओबीसी वर्गों के साथ मजबूत संवाद आने वाले चुनावों की दिशा तय करेगा। नरेंद्र सिंह तोमर की सार्वजनिक माफी इस बात का प्रमाण है कि मध्य प्रदेश की राजनीति में कुशवाहा समाज अब केवल एक वोट बैंक नहीं, बल्कि सत्ता का समीकरण बदलने वाली निर्णायक राजनीतिक ताकत बन चुका है। -नीरज कुमार दुबे
राहुल गांधी के द्वारा छात्रों की आवाज के नाम पर छात्र-प्रपंच का खेल खेला जा रहा है: मुख्तार अब्बास नकवी
अब शिवाजी, चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह जैसे लोग क्यों नहीं मिलते?
आज के एक-दूसरे पर निर्भर समाज में युवाओं, खासकर जेनरेशन जेड (जेन ज़ी) का व्यवहार समाज के लिए बहुत चिंता का विषय बनता जा रहा है। उन्हें अक्सर बेसब्री, बिना सोचे-समझे सोचने की आदत और कुछ मामलों में, बुरे बर्ताव वाला माना जाता है। यह सोच, हालांकि आम हो सकती है, और हर व्यक्ति में अलग-अलग भी हो सकती है। लेकिन यह इसके अंदरूनी कारणों और समाज की संभावित प्रतिक्रियाओं की एक ज़रूरी जांच को बढ़ावा देती है। इन उभरते हुए पैटर्न को समझने के लिए एक बहुआयामी नज़रिए की ज़रूरत है, जिसमें टेक्नोलॉजी में तरक्की, पढ़ाई के बदलते तरीकों, पेरेंटिंग स्टाइल में बदलाव और बड़े सामाजिक-सांस्कृतिक माहौल के गहरे असर को माना जाए। यह आवश्यक है कि जेन ज़ी में इन आदतों के पीछे के संभावित कारणों पर गहराई से चर्चा हो, जिसमें डिजिटल इमर्शन, तुरंत मिलने वाले फ़ायदे का असर, जानकारी लेने का बदलता तरीका और उनके विकास को आकार देने वाले बदलते सामाजिक ढाँचों पर विचार किया जाए। तदनुसार, समाज ऐसे सुधार करें जिनसे इस पीढ़ी में ज़्यादा सब्र रखने, ज़्यादा तार्किक सोच विकसित करने और सम्मानजनक बातचीत को बढ़ावा मिलें। डिजिटल बाढ़ और बेसब्री की खेती जेन ज़ी को बनाने वाले सबसे बड़े और असरदार कारणों में से एक है, हाइपर-कनेक्टेड डिजिटल दुनिया में उनकी परवरिश। कम उम्र से ही, यह पीढ़ी ऐसे माहौल में रही है जहाँ जानकारी, मनोरंजन और बातचीत उनकी उंगलियों पर आसानी से मिल जाती है। स्मार्टफ़ोन, सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म और हाई-स्पीड इंटरनेट ने तुरंत मिलने वाले फ़ायदे का एक इकोसिस्टम बनाया है। अपडेट के साथ नोटिफ़िकेशन आते हैं, न्यूज़ साइकिल मिनटों में रिफ़्रेश हो जाती हैं, और मनोरंजन ऑन डिमांड उपलब्ध होता है। तुरंत फ़ीडबैक और आसानी से मिलने वाले कंटेंट की यह लगातार स्ट्रीम अनजाने में ही डेवलप हो रहे दिमाग को जल्दी नतीजे और तुरंत इनाम की उम्मीद करने के लिए ट्रेन कर सकती है। इसलिए, जिन हालात में सब्र की ज़रूरत होती है, जैसे जवाब का इंतज़ार करना, कोई लंबा काम पूरा करना, या धीरे-धीरे, सोच-समझकर सीखना, वे फ्रस्ट्रेटिंग और अनचाही लग सकती हैं। ऑनलाइन बातचीत का तेज़ नेचर, जहाँ छोटे मैसेज और थोड़ी देर का कंटेंट ज़्यादा होता है, लगातार ध्यान और गहरी बातचीत के लिए कम टॉलरेंस में भी योगदान दे सकता है, जिससे बेसब्री का कल्चर बढ़ता है। उदाहरण के लिए, मैसेजिंग ऐप पर तुरंत जवाब की उम्मीद या सोशल मीडिया फ़ीड पर तेज़ी से स्क्रॉल करने से लोग तुरंत संतुष्टि की उम्मीद करने लगते हैं, जिससे असल दुनिया की बातचीत की धीमी रफ़्तार मुश्किल लगने लगती है। नई चीज़ों और तेज़ी से जानकारी के इस लगातार संपर्क से बोरियत की क्षमता भी कम हो सकती है, एक ऐसी स्थिति जो अक्सर सोचने और क्रिएटिव प्रॉब्लम-सॉल्विंग स्किल्स के विकास को बढ़ावा देती है। जब डिजिटल ध्यान भटकाने वाली चीज़ों से बोरियत तुरंत दूर हो जाती है, तो सब्र और सेल्फ-रेगुलेशन विकसित करने के मौके कम हो जाते हैं। इसे भी पढ़ें: Jharkhand JPSC Protest: सरकार से बातचीत को तैयार छात्र, Video Recording की रखी शर्त इन्फॉर्मेशन ओवरलोड और लॉजिकल रीजनिंग का खत्म होना डिजिटल युग ने जानकारी को डेमोक्रेटाइज़ कर दिया है, जिससे यह पहले से कहीं ज़्यादा आसानी से मिलने वाली हो गई है। लेकिन, इस एक्सेसिबिलिटी के साथ एक बड़ी चुनौती आती है: उपलब्ध जानकारी की बहुत ज़्यादा मात्रा और अक्सर अनवेरिफाइड नेचर। जेन ज़ी, जो इस बहुतायत के साथ बड़ा हुआ है, अक्सर शॉर्ट-फॉर्म कंटेंट, सोशल मीडिया फीड्स और वायरल ट्रेंड्स के ज़रिए जानकारी लेता है। इस्तेमाल का यह तरीका क्रिटिकल इवैल्यूएशन और लॉजिकल एनालिसिस के बजाय इमोशनल रेजोनेंस और तुरंत एंगेजमेंट को प्रायोरिटी दे सकता है। कई डिजिटल प्लेटफॉर्म को कंट्रोल करने वाले एल्गोरिदम यूज़र्स को एंगेज रखने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं, अक्सर ऐसा कंटेंट दिखाकर जो उनके मौजूदा बायस से मेल खाता है या मज़बूत इमोशनल रिस्पॉन्स को उकसाता है। इससे इको चैंबर बन सकते हैं, जहाँ लोग मुख्य रूप से उन नज़रियों के संपर्क में आते हैं जो उनके अपने नज़रियों को कन्फर्म करती हैं, जिससे अलग-अलग नज़रियों से जुड़ने और बारीक समझ डेवलप करने की उनकी क्षमता में रुकावट आती है। नतीजतन, भरोसेमंद सोर्स और गलत जानकारी के बीच अंतर करना एक मुश्किल काम बन जाता है। फेक न्यूज़ और सेंसेशनलाइज़्ड कंटेंट के फैलने से युवाओं के लिए मज़बूत क्रिटिकल थिंकिंग स्किल्स डेवलप करना मुश्किल हो सकता है। इसके अलावा, कम जानकारी के आधार पर जल्दी से राय बनाने का दबाव, जो अक्सर ऑनलाइन बहस और तेज़ी से की जाने वाली कमेंट्री से और बढ़ जाता है, बेतुके तर्कों को अपनाने या बिना सबूत वाले दावों को मानने की ओर ले जा सकता है। उदाहरण के लिए, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कॉन्सपिरेसी थ्योरी की लोकप्रियता, जिनमें अक्सर अनुभव के सबूत नहीं होते लेकिन वे भावनात्मक रूप से मज़बूत होती हैं, यह दिखाती है कि बिना वेरिफ़ाई की गई जानकारी कैसे लोगों का ध्यान खींच सकती है और तर्क पर असर डाल सकती है। उन्हें कैसे जांचा जाए, इस बारे में पूरी गाइडेंस के बिना विभिन्न नज़रिया के लगातार संपर्क में रहने से कन्फ्यूजन हो सकता है और सिस्टमैटिक, लॉजिकल तरीकों के बजाय ह्यूरिस्टिक्स या भावनात्मक अपील पर भरोसा हो सकता है। बदलते सोशल नॉर्म्स और बुरे मैनर्स की सोच मैनर्स की परिभाषा खुद एक जैसी नहीं है; यह सोशल नॉर्म्स और टेक्नोलॉजी में बदलाव के साथ बदलती रहती है। जेन ज़ी की बातचीत काफी हद तक डिजिटल कम्युनिकेशन पर निर्भर करती है। टेक्स्टिंग, डायरेक्ट मैसेजिंग और ऑनलाइन कमेंट्स में अक्सर बिना बोले इशारे, आवाज़ का टोन और सोशल कॉन्टेक्स्ट की कमी होती है जो आमने-सामने की बातचीत के लिए ज़रूरी हैं। उदाहरण के लिए, एक साफ-साफ टेक्स्ट मैसेज भेजने वाले के लिए एक अच्छी बातचीत हो सकती है, लेकिन पाने वाला इसे खारिज करने वाला या बदतमीज़ी समझ सकता है, खासकर अगर उसमें ग्रीटिंग या आखिर में बात करने जैसी आम तमीज़ न हो। इसके अलावा, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से मिलने वाली गुमनामी या दूरी से हिचकिचाहट कम हो सकती है, जिससे ज़्यादा गुस्सैल या बेपरवाह व्यवहार हो सकता है जो शायद सीधे, आमने-सामने की मुलाकातों में न हो। इसके अलावा, पेरेंटिंग स्टाइल में बदलाव, कुछ स्टडीज़ में ज़्यादा छूट देने वाली पेरेंटिंग का ट्रेंड बताया गया है, अनजाने में बच्चों के लिए ज़रूरी सोशल दक्षता, जैसे हमदर्दी, झगड़े सुलझाना, और अथॉरिटी वाले लोगों या अलग राय का सम्मान करने के मौके कम कर सकता है। जब बच्चों को नतीजों से बचाया जाता है या सही सोशल बिहेवियर के लिए लगातार गाइड नहीं किया जाता है, तो उन्हें तमीज़ से बातचीत के लिए ज़रूरी सेल्फ-डिसिप्लिन और दूसरों के लिए सोच-विचार डेवलप करने में मुश्किल हो सकती है। समाज के लिए सुधार के कदम आज शिवाजी, चंद्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह जैसे लोग क्यों नहीं मिलते? क्योंकि जीजाबाई (शिवाजी की माँ) जैसी माँ नहीं हैं। एक बच्चे की अच्छी परवरिश उसे देशभक्त और भविष्य का नागरिक बनाने के लिए बहुत ज़रूरी है। जेन ज़ी में कही जा रही अनुशासनहीनता को ठीक करने के लिए पूरे समाज को एक साथ और कई तरह के तरीके अपनाने की ज़रूरत है। सिर्फ़ बुराई करने से आगे बढ़कर ऐसे रचनात्मक दखल पर ध्यान देना ज़रूरी है जो सकारात्मक विकास को बढ़ावा दें। डिजिटल लिटरेसी और क्रिटिकल थिंकिंग को बढ़ावा देना इन चुनौतियों से निपटने का एक तरीका डिजिटल साक्षरता और क्रिटिकल सोचने-समझने के कौशल को बढ़ाना है। एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन्स को स्टूडेंट्स को डिजिटल दुनिया में ज़िम्मेदारी से संचालन करना सिखाने को प्राथमिकता देनी चाहिए। इसमें गलत जानकारी की पहचान करने, एल्गोरिदमिक बायस को समझने और ऑनलाइन सोर्स की क्रेडिबिलिटी को एवैल्यूएट करने के बारे में साफ इंस्ट्रक्शन शामिल हैं। क्रिटिकल थिंकिंग स्किल्स को डेवलप करना सिर्फ़ एक एकेडमिक कोशिश नहीं है; इसके लिए अलग-अलग कॉन्टेक्स्ट में लगातार प्रैक्टिस की ज़रूरत होती है। डिबेट्स, रिसर्च प्रोजेक्ट्स जिनमें कई सोर्स से जानकारी को सिंथेसाइज़ करने की ज़रूरत होती है, और ऐसी डिस्कशन्स जिनमें कॉम्प्लेक्स एथिकल डिलेमाज़ को एक्सप्लोर किया जाता है, ये सभी ज़्यादा लॉजिकल रीज़निंग डेवलप करने में मदद कर सकते हैं। माता-पिता और शिक्षक खुलकर इस पर चर्चा करके क्रिटिकल थिंकिंग का मॉडल बना सकते हैं कि वे जानकारी को कैसे एवैल्यूएट करते हैं और राय कैसे बनाते हैं। पेशेंस और डिलेड ग्रैटिफिकेशन को कल्टिवेट करना पेशेंस को बढ़ावा देने के लिए ऐसा एनवायरनमेंट बनाने के लिए सोच-समझकर कोशिश करने की ज़रूरत होती है जो इसे बढ़ावा दे। यह घर और स्कूल दोनों जगह से शुरू हो सकता है। स्क्रीन टाइम कम करना और ऐसी एक्टिविटीज़ को बढ़ावा देना जिनमें लगातार फोकस की ज़रूरत होती है, जैसे किताबें पढ़ना, हॉबीज़ में शामिल होना, बोर्ड गेम खेलना, या स्ट्रक्चर्ड स्पोर्ट्स में हिस्सा लेना, देर से मिलने वाली खुशी को सहने की क्षमता बढ़ाने में मदद कर सकता है। स्कूल ऐसे असाइनमेंट डिज़ाइन कर सकते हैं जिनमें लंबे समय तक कमिटमेंट और लगन की ज़रूरत हो, जिससे स्टूडेंट्स को मेहनत की कीमत और लगातार काम करके लक्ष्य हासिल करने की संतुष्टि सिखाई जा सके। सिर्फ़ नतीजों को ही नहीं, बल्कि कोशिश और प्रोसेस को भी सेलिब्रेट करने से फोकस तुरंत नतीजों से हटकर सीखने और डेवलपमेंट की यात्रा पर जा सकता है। उदाहरण के लिए, किसी मुश्किल काम के लिए स्टूडेंट्स के डेडिकेशन को पहचानना और इनाम देना, चाहे तुरंत सफलता मिले या न मिले, लगन की अहमियत को और मज़बूत कर सकता है। एम्पैथी और सोशल-इमोशनल इंटेलिजेंस को बढ़ावा देना मैनर्स और आपसी व्यवहार को बेहतर बनाने के लिए सोशल-इमोशनल लर्निंग पर फोकस करना ज़रूरी है। स्कूलों और परिवारों को एक्टिवली एम्पैथी, सम्मान और असरदार कम्युनिकेशन सिखाना और उसका उदाहरण देना चाहिए। सोशल-इमोशनल लर्निंग प्रोग्राम को एजुकेशनल फ्रेमवर्क में शामिल किया जाना चाहिए, जिससे स्टूडेंट्स को अपनी भावनाओं को समझने और मैनेज करने, अच्छे रिश्ते बनाने और ज़िम्मेदार फ़ैसले लेने के लिए टूल्स मिलें। कम्युनिटी सर्विस या वॉलंटियर एक्टिविटीज़ में हिस्सा लेने के लिए बढ़ावा देने से युवाओं को अलग-अलग तरह के अनुभव मिल सकते हैं और उनमें ज़्यादा समझदारी बढ़ सकती है। सहानुभूति और सामाजिक ज़िम्मेदारी की भावना रोल-प्लेइंग (भूमिका निभाने वाले) सीन और ग्रुप डिस्कशन, जो सामाजिक स्थितियों और उनके नतीजों को समझते हैं, सही व्यवहार सिखाने और सामाजिक जागरूकता बढ़ाने में बहुत असरदार हो सकते हैं। माता-पिता अपने बच्चों और दूसरों के साथ बातचीत में सम्मानजनक व्यवहार का उदाहरण पेश करके अहम भूमिका निभा सकते हैं। अनुशासनहीन व्यवहार के लिए सिर्फ़ सज़ा देने के बजाय, यह समझाना कि वह व्यवहार क्यों गलत है और उसे सुधारना, लंबे समय में व्यवहार बदलने में ज़्यादा असरदार हो सकता है। संतुलित डिजिटल जुड़ाव को बढ़ावा देना इसका मकसद टेक्नोलॉजी को बुरा बताना नहीं है, बल्कि इसके इस्तेमाल के लिए एक संतुलित और सोच-समझकर अपनाया जाने वाला नज़रिया विकसित करना है। इसमें स्क्रीन टाइम के लिए सही सीमाएँ तय करना, डिजिटल डिटॉक्स (कुछ समय के लिए डिजिटल डिवाइस से दूर रहना) को बढ़ावा देना और इस बात के प्रति जागरूकता पैदा करना शामिल है कि टेक्नोलॉजी किसी व्यक्ति की सोच और भावनाओं पर कैसे असर डालती है। माता-पिता अपने बच्चों के साथ मिलकर स्क्रीन टाइम की उचित सीमाएँ तय कर सकते हैं और घर में टेक्नोलॉजी-फ़्री ज़ोन या समय बना सकते हैं। ऑनलाइन अनुभवों के बारे में खुलकर बातचीत को बढ़ावा देना - जिसमें सोशल मीडिया से जुड़े दबाव और चुनौतियाँ भी शामिल हैं - युवाओं को अपनी डिजिटल ज़िंदगी के साथ ज़्यादा समझदारी भरा और जागरूक रिश्ता बनाने में मदद कर सकता है। निष्कर्ष जेन जी में देखी जाने वाली बेसब्री, तर्कहीन सोच और कभी-कभी अनुशासनहीनता भरा व्यवहार जटिल घटनाएँ हैं, जिनकी जड़ें डिजिटल युग के गहरे सामाजिक और तकनीकी बदलावों में हैं। इन चुनौतियों का सामना करने के लिए आवश्यकता है -सही और लक्षित उपाय करके, समाज जेन जी को धैर्य रखने, तार्किक सोच को बेहतर बनाने और सम्मानजनक व सहानुभूति पूर्ण बातचीत को बढ़ावा देने में असरदार ढंग से मदद कर सकता है। शिक्षकों, माता-पिता, समुदायों और खुद युवाओं के सामूहिक प्रयासों से इन चुनौतियों का सामना करना और एक ऐसी पीढ़ी को तैयार करना संभव है जो न केवल टेक्नोलॉजी में माहिर हो, बल्कि उसमें सोच-समझकर काम करने, धैर्य रखने और दूसरों का ख्याल रखने जैसे ज़रूरी गुण भी हों, ताकि वे समाज में सकारात्मक योगदान दे सकें। - प्रोफ़ेसर (डॉ.) डी.के. पांडे विज़िटिंग सीनियर फ़ेलो, सेंटर फ़ॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज़, एडजंक्ट प्रोफ़ेसर, राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय, सलाहकार, एकेडमिक काउंसिल, फ़ॉरेन पॉलिसी स्कूल और GNOIT, पूर्व एसोसिएट डीन, SoB, गलगोटिया विश्वविद्यालय।
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