अलीरेजा तंगसीरी IRGC की नौसैनिक शाखा के प्रमुख थे और उन्हें ईरान की आक्रामक समुद्री रणनीति का मुख्य सूत्रधार माना जाता था। सूत्रों के अनुसार, वे होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर निगरानी और नियंत्रण की जिम्मेदारी संभाल रहे थे।
ईरान जंग खत्म करने के लिए 3 दिन के अंदर पाकिस्तान जा सकते हैं अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस
रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान के प्रतिनिधियों ने ट्रंप प्रशासन को संकेत दिया है कि वे अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ और जारेड कुशनर के साथ दोबारा बातचीत करने के इच्छुक नहीं हैं।
ईरान का बड़ा ऐलान: भारत समेत 5 देशों को होर्मुज जलमार्ग से छूट
पश्चिम एशिया संघर्ष के बीच ईरान ने ऐलान किया है कि वह भारत समेत पांच मित्र देशों से संबंधित जहाजों पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाएगा
ट्रंप का दावा: मिडटर्म चुनाव में ‘ऐतिहासिक जीत’ तय
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आगामी मिडटर्म चुनावों को लेकर बड़ा दावा करते हुए रिपब्लिकन पार्टी की ऐतिहासिक जीत का भरोसा जताया
ईरान युद्ध अपने लक्ष्यों के करीब, बातचीत जारी : अमेरिका
व्हाइट हाउस ने कहा है कि ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियान “निर्धारित समय से आगे” चल रहे हैं और अपने मुख्य उद्देश्यों के करीब पहुँच रहे हैं
जब मेलानिया ट्रंप से रोबोट बोला, व्हाइट हाउस में मुझे आमंत्रित करने के लिए धन्यवाद
व्हाइट हाउस में सबसे ज्यादा ध्यान किसी अतिथि नेता, हस्ती, खेल सितारे या वरिष्ठ अधिकारी ने नहीं, बल्कि एक रोबोट ने खींचा
नेपाल जेनजी आंदोलन : केपी शर्मा ओली सहित तीन शीर्ष अधिकारियों पर आपराधिक मुकदमे की सिफारिश
नेपाल में पिछले वर्ष हुए जेनजी आंदोलन के दौरान हुई घटनाओं की जांच के लिए गठित एक उच्च-स्तरीय जांच आयोग ने पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली, पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक और तत्कालीन पुलिस प्रमुख चंद्र कुबेर खापुंग के खिलाफ आपराधिक जांच और मुकदमा चलाने की सिफारिश की है
बांग्लादेश: फरवरी चुनाव में गड़बड़ी के आरोप, जमात ने कानूनी रास्ता अपनाया
बांग्लादेश की कट्टरपंथी इस्लामी पार्टी बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी ने 12 फरवरी को हुए राष्ट्रीय चुनावों में गंभीर अनियमितताओं का आरोप लगाया है
पश्चिम बंगाल के आसनसोल में रामनवमी की तैयारियां चल रही हैं। रामनवमी 27 मार्च को है, लेकिन यहां 5 दिन तक कार्यक्रम होंगे। BJP का प्लान है कि इस दौरान हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार का मुद्दा उठाए। इसमें बांग्लादेश में दीपू दास, मुर्शिदाबाद में हरिगोबिंद दास और उनके बेटे चंदन की हत्या भी शामिल है। TMC भी कार्यक्रम करेगी। पार्टी हुगली में ‘अस्त्रहीन संकीर्तन रैली’ निकालेगी। उसका कहना है कि जयश्री राम कहने से राम सिर्फ BJP के नहीं हो जाते। रामनवमी की तैयारियां पूरे बंगाल में हो रही हैं, लेकिन आसनसोल का जिक्र इसलिए क्योंकि यहां 2018 में रामनवमी पर हिंसा भड़की थी। रानीगंज और आसनसोल के बाजारों में 100 से ज्यादा दुकानें और घर जला दिए गए थे। तीन मौतें हुईं और कर्फ्यू लगाना पड़ा। पश्चिम बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को विधानसभा चुनाव के लिए वोटिंग होनी है। रामनवमी BJP और TMC दोनों के लिए बड़ी परीक्षा है। अनुमान है कि राज्य में करीब 20 हजार शोभा यात्राएं और जुलूस निकाले जाएंगे। पहले हिंदू संगठनों की तैयारी…पश्चिम बंगाल में हिंदू संगठन रामनवमी पर 12 साल से रैलियां निकाल रहे हैं। इनमें RSS, बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के लोग शामिल होते हैं। अब इनमें पॉलिटिकल पार्टियां भी शामिल होने लगी हैं। हालांकि जुलूसों में पार्टी का झंडा नहीं होता। रामनवमी पर ज्यादातर कार्यक्रम हिंदी भाषी इलाकों में होते हैं। इसमें आसनसोल भी है। हमने आसनसोल साउथ की विधायक और BJP की वाइस प्रेसिडेंट अग्निमित्रा पाल से तैयारियों के बारे में पूछा। वे कहती हैं, ‘इस बार बर्नपुर, चित्रा मोड़, राधानगर, बल्लावपुर, मोशिला, काली पहाड़ी और एगरा में रैलियां निकालेंगे। इनमें 10 हजार से ज्यादा लोग शामिल होंगे।’ रैलियों पर चुनाव का असर भी होगा? अग्निमित्रा कहती हैं, ’चुनाव की तो नहीं, लेकिन लोगों पर हो रहे अत्याचार पर बात होगी। बांग्लादेश से लेकर बंगाल तक हिंदुओं को मार दिया जाता है, लेकिन सरकार कुछ नहीं करती।’ हथियारों के प्रदर्शन पर रोक, BJP नेता बोले- हथियार लेकर जाएंगे हम पुरुलिया पहुंचे। यहां करीब 82% आबादी हिंदू है। यहां की रघुनाथपुर सीट BJP के पास है। रामनवमी की तैयारियों पर BJP के संयोजक शांतनु चटर्जी बताते हैं, ‘2005 से यहां रामनवमी का जुलूस निकल रहा है। इसमें पार्टियों के लोग शामिल होते हैं, लेकिन लीड BJP करती है। हमने जुलूस के लिए पुलिस को बता दिया है। हमारा अखाड़ा रजिस्टर्ड है, इसलिए जुलूस तो निकालेंगे।‘ रैली के खर्च पर वे कहते हैं, ‘हमने घरों से चंदा लिया है। इस बार तैयारियों में काफी खर्च हुआ है।‘ शांतनु थोड़े गुस्से में कहते हैं, हमें हथियार की परमिशन नहीं मिल रही है। हमारे सभी देवी-देवता हथियार लिए हुए हैं, इसलिए हम लोग हथियार के साथ रैली निकालेंगे। 5 से 6 घंटे का कार्यक्रम होगा। करीब 10 हजार लोग शामिल होंगे। दरअसल, पिछले साल कलकत्ता हाईकोर्ट ने रामनवमी में जुलूस के दौरान हथियारों के प्रदर्शन पर रोक लगाई थी। इसके बावजूद पूर्वी मेदिनीपुर जिले के तामलुक में निकले जुलूस में लोग हथियार लहराते देखे गए थे। इसमें BJP नेता दिलीप घोष भी मौजूद थे। इस बार भी हाईकोर्ट ने हावड़ा में राम नवमी जुलूस की अनुमति देते हुए हथियारों पर प्रतिबंध लगाया है। अंजनी पुत्र सेना नाम के संगठन ने कोर्ट में याचिका लगाई थी कि पुलिस जुलूस निकालने की परमिशन नहीं दे रही है। कोर्ट ने संगठन को 26 मार्च को सुबह 8:30 बजे से दोपहर 1 बजे के बीच जुलूस निकालने की परमिशन दे दी। रामनवमी से पहले पुलिस ने सभी समितियों के साथ मीटिंग की हैं। पुलिस के एक अधिकारी बताते हैं कि हमने कहा है कि समितियां शांति से रैलियां निकालें। अगर कोई कानून तोड़ेगा, तो कार्रवाई की जाएगी। मालदा में 52 संगठन मिलकर रैली निकालेंगेहम नॉर्थ बंगाल के मालदा जिले पहुंचे। यहां 10 साल से रामनवमी पर प्रोग्राम हो रहे हैं। मालदा में BJP की वाइस प्रेसिडेंट तंद्रा राय चौधरी बताती हैं, ‘पिछले साल 12 जगह छोटी-बड़ी रैलियां निकाली गई थीं। सिर्फ इंग्लिश बाजार में करीब 6 हजार लोग जुटे थे। इस बार इससे भी ज्यादा आएंगे।‘ ‘रामनवमी के लिए हमने दो बार मीटिंग की है। इसमें 52 संगठन शामिल हुए। साफ है कि इस बार ज्यादा भीड़ जुटेगी। 5 किमी लंबी रैली होगी। पहले थाने में लेटर देना पड़ता था, अब सारा प्रोसेस ऑनलाइन हो चुका है। रैली का रूट, लोगों की संख्या और लाउडस्पीकर की जानकारी सब ऑनलाइन दी जाती है।‘ परमिशन के बारे में हिंदू जागरण मंच के स्टेट प्रेसिडेंट अमित सरकार कहते हैं, ‘हमें रामनवमी के लिए परमिशन नहीं लेनी पड़ती, सिर्फ जानकारी देनी होती है। 2024-2025 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने सशर्त परमिशन दी है। इस बार बिना डीजे और हथियार के रैली निकाली जाएगी।‘ नॉर्थ बंगाल के 8 जिलों में 150 से ज्यादा जुलूस निकलेंगेसिलीगुड़ी में 92% आबादी हिंदू है। श्रीरामनवमी जिला समिति के सचिव लक्ष्मण बंसल कहते हैं, ‘नॉर्थ बंगाल के सभी आठ जिलों में 150 शोभा यात्राएं निकाली जा रही हैं। 27 मार्च को सिलीगुड़ी में यात्रा निकलेगी, जिसमें साध्वी प्राची भी होंगी। पिछले साल यहां जुलूस में 6 लाख से ज्यादा लोग आए थे। इस बार आंकड़ा 7 लाख के पार होगा।‘ ‘रैली में करीब 150 झाकियां होंगी। इसमें वंदे मातरम् का सफर, संघ के 100 साल, हिंदुओं पर अत्याचार को दिखाएंगे। नॉर्थ बंगाल के 8 जिलों में करीब 35 लाख लोग शोभा यात्रा का हिस्सा बनेंगे।‘ TMC और BJP के नेताओं की भागीदारी पर वे कहते हैं, ‘यहां राम भक्तों का जमावड़ा होगा। इस बार चुनाव हैं, इसलिए TMC के लोकल नेता जरूर शामिल होंगे।’ TMC की तैयारी‘जुलूस हमेशा निकलता है, बस पार्टी का झंडा नहीं होता’पश्चिम बंगाल में पिछले कुछ साल से रामनवमी पर होने वाले कार्यक्रमों में TMC भी शामिल हो रही है। हमने आसनसोल में पार्टी के एक लीडर ने बात की। वे पहचान उजागर नहीं करना चाहते। वे कहते हैं, ‘पार्टी किसी भी कीमत पर वोट नहीं खोना चाहती। हिंदी भाषी इलाकों में रामनवमी आस्था और शौर्य का विषय है। अब ये सियासी हो चुका है। इसलिए TMC भी जुलूस निकालेगी। ये पहली बार नहीं है। पहले भी पार्टी नेताओं ने जुलूस निकाले हैं, बस उसमें पार्टी का झंडा नहीं होता है। ऐसा ज्यादातर हिंदी भाषी इलाकों में ही करते हैं।‘ ‘BJP नेता जितेंद्र तिवारी पहले TMC से विधायक थे। आसनसोल के मेयर रह चुके हैं। वे खुद TMC के जुलूस का प्रतिनिधित्व करते थे और भगवा पगड़ी के साथ अखाड़े में शामिल होते थे। इस बार पार्टी के नाम पर न सही, लेकिन पार्टी के लीडर जरूर रैली निकालेंगे।‘ ‘राम सबके, जय श्रीराम कहने से सिर्फ BJP के नहीं’आसनसोल में TMC पार्षद रंजीत सिंह इसे बेहतर तरीके से समझाते हैं। वे कहते हैं, ‘रामनवमी पर हमारे इलाके में कई जगहों से रैली निकलती है। मंदिरों से होते हुए सब एक जगह इकट्ठा होते हैं। इसमें BJP और TMC का कोई मामला नहीं है। सिर्फ जय श्रीराम कह देने से राम BJP के नहीं हो गए, वे तो सबके हैं।‘ ‘इन रैलियों में नेता सीधे शामिल नहीं होते, लेकिन ज्यादातर कामकाज पार्टी के कार्यकर्ता ही देखते हैं। हमारे वार्ड में भी कई जगह रैली निकलती है। इसे हिंदू उत्सव की तरह मनाया जाता है।‘ ऐसी रैलियां कब से निकल रही हैं, कौन फंड करता है? जवाब में रंजीत कहते हैं, ‘2014 से रैलियां निकाल रहे हैं। फंड के लिए लोगों से चंदा लेते है। लोकल नेता भी मदद करते हैं।‘ एक्सपर्ट बोले- चुनाव की वजह से रामनवमी पर ज्यादा फोकससीनियर जर्नलिस्ट विनोद जायसवाल कहते हैं, 'आसनसोल और दुर्गापुर में ज्यादातर विश्व हिंदू परिषद रैली निकालती है। कुछ अखाड़ों को TMC के लोग लीड करते हैं, ताकि ये मैसेज न जाए कि TMC हिंदू विरोधी है। इस बार चुनाव का माहौल है, इसलिए पार्टियां ज्यादा फोकस कर रही हैं।’ एक और सीनियर जर्नलिस्ट नाम न देने की शर्त पर कहते हैं, ‘पिछले कुछ साल में रामनवमी मनाने के तरीके में बहुत अंतर आ गया है। लेफ्ट की सरकार के वक्त भी RSS के लोग जुलूस निकालते थे। तब इसका राजनीतिकरण नहीं हुआ था।’ ‘लोग घरों पर हनुमान जी का झंडा चढ़ाते थे। कुछ लोग ही जुलूस का हिस्सा बनते थे। जैसे-जैसे हिंदुत्व का प्रचार हुआ, रामनवमी में झंडे का रंग बदलने लगा। उसमें बजरंग बली के फोटो भी बदल गई। पिछले 10 साल में पश्चिम बंगाल में रामनवमी का ज्यादा क्रेज बढ़ा है।’ 8 साल में कैसे बढ़ती गई BJP2018 में रामनवमी के जुलूस के दौरान पश्चिम बंगाल के रानीगंज, आसनसोल और पुरुलिया सहित कई इलाकों में हिंसक झड़पें और दंगे हुए। इसके बाद राज्य में पंचायत चुनाव हुए। BJP दूसरी बड़ी पार्टी बनकर उभरी। TMC ने 38,118 ग्राम पंचायत सीटों पर कब्जा किया। BJP ने 5,779 सीटें जीतीं। 2019 में लोकसभा चुनाव से पहले रामनवमी पर फिर हिंसा भड़की। चुनाव में राज्य की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठा। इन घटनाओं ने राज्य में ध्रुवीकरण तेज कर दिया। 2014 में 34 सीटें जीतने वाली TMC 22 सीटों पर सिमट गई। वहीं, 2 सीटें जीतने वाली BJP ने 18 सीटें जीतीं। रामनवमी से पहले मूर्ति तोड़ने का विरोधनंदीग्राम के रेयापाड़ा में 22 मार्च को रामनवमी से पहले भगवान की मूर्ति तोड़ दी गई। पश्चिम बंगाल के नेता प्रतिपक्ष और BJP लीडर शुभेंदु अधिकारी ने इसके विरोध में प्रदर्शन किया। उनका आरोप है कि ये सब तृणमूल कांग्रेस के इशारों पर हो रहा है। शुभेंदु ने कहा, ’मूर्ति तोड़ने के पीछे जिहादियों का हाथ है। बंगाल में चुनाव की तारीख जैसे-जैसे करीब आ रही हैं, ये घटनाएं तनाव बढ़ा रही हैं। अगर ऐसे लोगों की पहचान करके उन्हें जल्द गिरफ्तार नहीं किया गया, तो हालात बेकाबू हो सकते हैं।’ ……………..ये खबर भी पढ़ें… क्या साउथ बंगाल से निकलेगा BJP की जीत का रास्ता 7 मार्च को पश्चिम बंगाल के पुरुलिया में BJP की परिवर्तन यात्रा पहुंची। यहां रघुनाथपुर इंडस्ट्रियल एरिया है इसलिए हिंदी भाषी और आदिवासी आबादी ज्यादा है। यहां से BJP के ही विधायक हैं, फिर भी रैली में भीड़ कम पहुंची। यहीं रास्ते में अवधेश राम मिले। वो रैली में नहीं आए लेकिन चाहते हैं कि राज्य में सरकार जरुर बदले। पढ़िए पूरी खबर…
पंजाब में बठिंडा का एक गांव- जज्जल। 55 बरस की बीरपाल कौर एक मातम से लौटी हैं। लेकिन, उनके हाथों में तस्वीर है पति दौलतराम की। मैंने आहिस्ता से पूछा- क्या हो गया? बीरपाल पंजाबी में बोलीं- ननद की बहू मर गई। उसके मातम से लौंटी हूं। इस बातचीत से पहले मैं बीरपाल के घर की एक दीवार पर टंगी दौलतराम की तस्वीर देख चुका था। सो थोड़ी सी हैरानी भरे लहजे में मैंने फिर पूछा, 'आपके हाथ में तो पति की फोटो है… ऐसा क्यों? जवाब मिला, ‘जहां से आ रहीं हूं वो भी कैंसर से मर गई और मेरा आदमी भी कैंसर से मरा था। ये जो गली है न, इसके हर घर में कोई न कोई कैंसर से मरा है। किसी को ब्लड कैंसर हुआ तो किसी मुंह का। किसी के फेफड़ों में कैंसर था तो किसी को आंतों का। यहां मौत माने कैंसर है। हालात ऐसे हैं कि यहां शादी से पहले लड़के और लड़की की कैंसर रिपोर्ट देखी जाती है।’ मैं नीरज झा, दैनिक भास्कर की सीरीज ब्लैकबोर्ड में लाया हूं बठिंडा के लोगो की स्याह कहानी, जहां तकरीबन हर घर में कैंसर के मरीज हैं। हजारों लोग मर चुके हैं और हजारों पल-पल मौत का इंतजार कर रहे हैं- पंजाब के बठिंडा से करीब 50 किलोमीटर दूर जज्जल गांव में घुसते ही मैं गाड़ी रोक देता हूं। यहीं बीरपाल का घर है, जहां कैंसर से अपने लोगों को खो चुके आधा दर्जन परिवार मिल जाते हैं और पहुंचते ही बीरपाल अपने रिश्तेदार के घर से मातम मना कर लौटीं मिल जाती हैं। मैं पूछता हूं- बहू की मौत कैसे हुई? नजर फेरते हुए वह पंजाबी में बोलती हैं, 'कैंसर से… और कैसे? उसके दो छोटे-छोटे बच्चे हैं। पति की दो-तीन साल पहले ही मौत हो गई थी। बेचारे उन बच्चों का अब क्या होगा? पहले बाप की और अब मां की मौत हो गई। बच्चे अनाथ हो गए। ऐसे ही पिछले साल मेरे पति की भी कैंसर से मौत हो गई। यह कहते हुए… बीरपाल की आंखों से आंसू बहने लगते हैं। वह बार-बार अपने पति की फोटो निहारती हैं। कहती हैं, ‘दिन में जितनी बार दीवार पर नजर जाती है, आंखें भर आती हैं। कैंसर ने हमारा हंसता-खेलता परिवार खत्म कर दिया। हॉस्पिटल के चक्कर काटते-काटते लाखों रुपए बर्बाद हो गए। जमींदारों के यहां मेहनत-मजदूरी की, लेकिन न हमारे पति बचे और न पैसा। आजकल बुढ़ापे में बच्चे किसे देखते हैं? बीरपाल कहती हैं, ‘जिस गली में आप घुसे हैं, यह ‘विधवाओं की गली’ कही जाती है। यहां आधे दर्जन से ज्यादा घर हैं, लेकिन एक भी घर में मर्द नहीं बचे हैं। कुछ मर्दों की कैंसर से मौत हो गई, …तो कुछ का पता ही नहीं चला कि उन्हें कौन-सी बीमारी थी।' आपके पति को किस तरह का कैंसर था? ‘उन्हें ब्लड कैंसर यानी खून का कैंसर था। पहले पास के रामा मंडी गांव के एक हॉस्पिटल में दिखाया, फिर बठिंडा लेकर गई। वहां से डॉक्टर ने पीजीआई चंडीगढ़ में रेफर कर दिया। तब पता चला कि मेरे पति को कैंसर है। डॉक्टर ने ये बात मेरे पति को भी बता दी। उसके बाद वह दिन-रात उसी सोच में डूबे रहने लगे। 3 महीने में ही गुजर गए। घर में कोई कमाने वाला नहीं बचा। मैं जमींदारों के यहां काम करने लगी। पति के इलाज में 2 लाख से ज्यादा रुपए खर्च हो गए। एक दिन के इलाज में 10-10 हजार रुपए लग जाते थे। गरीब औरत हूं, इतने पैसे कहां से लाती? फिर भी पैसे की फिक्र नहीं थी… अगर वह बच जाते, तो कलेजे को ठंडक मिलती। अब न पति बचे, न पैसा। बीरपाल कौर अपने आंगन में बैठी रजनी राणा की ओर इशारा करते हुए कहती हैं, ‘इनके ससुर की भी कुछ साल पहले कैंसर से मौत हुई थी। अभी कुछ दिन पहले सास भी गुजर गईं। तेरहवीं बाकी है।’ इस पर रजनी कहती हैं, ‘7 साल पहले की बात है। मेरी नई-नई शादी हुई थी। कुछ महीने बाद ससुर को जीभ के नीचे छेद जैसा महसूस होने लगा। उन्हें शहर ले जाकर चेकअप कराया, तो पता चला कि चौथे स्टेज का मुंह का कैंसर था। डॉक्टर ने कहा- घर ले जाकर सेवा करो, अब इलाज का कोई फायदा नहीं। फिर भी सास बोलीं- चूल्हा-चौका करके भी पति का इलाज कराऊंगी। वह जमींदारों के यहां गोबर उठाने लगीं। वहां इतना काम करने लगीं कि सिर पर टोकरी उठाते-उठाते उनके बाल घिस गए, लेकिन ससुर जी नहीं बचे। दो साल ही जिंदा रहे, फिर उनकी मौत हो गई। धीरे-धीरे दुख के कारण सास भी कमजोर होने लगीं। अभी एक हफ्ते पहले उनकी भी मौत हो गई। 50-55 साल की उम्र क्या जाने होती है? अब किस्मत ही ऐसी है, तो क्या करें?’ बीरपाल के आंगन में एक पानी की टंकी रखी है। रजनी कहती हैं, ‘इसमें जो गंदा पानी दिख रहा है, वही हम लोग पीते हैं। जब ससुर को डॉक्टर के पास दिखाने ले गई थी, तो डॉक्टर ने कहा था- पानी की खराबी की वजह से मुंह का कैंसर हुआ था। क्या करें, मौत से डर लगता है, लेकिन फिर भी यही पानी पीते हैं।’ रजनी के पास ही 17 साल की निशु बैठी हमारी बातें सुन रही थी। धीरे से बोलती है, ‘जब मैं 7वीं में थी, तो मेरी मां की भी कैंसर से मौत हो गई थी। मां का चेहरा आज भी याद आता है, तो रोने लगती हूं।’ यह कहते हुए वह मुझे कुछ ही कदम दूर अपने घर ले जाती है। दीवार पर उसकी मां रानी कौर की तस्वीर टंगी है। वह कहती है, ‘पापा दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। हम दो बहनें और एक भाई हैं। दादी ने किसी तरह हमें पाल-पोसा। 10वीं के बाद मैंने पढ़ाई छोड़ दी। बिना मां के बच्चों की क्या ही जिंदगी होती है। मुझे थोड़ा-थोड़ा याद है। मां के पेट में अक्सर दर्द रहता था। एक दिन पापा उन्हें साइकिल से बठिंडा चेकअप कराने डॉक्टर के पास ले गए। टेस्ट हुआ, तो पता चला कि बच्चेदानी का कैंसर था। पापा ने पैसे के लिए दो कनाल जमीन बेच दी। हर हफ्ते पापा, मां के इलाज के लिए शहर जाने लगे, लेकिन सालभर के भीतर मां की मौत हो गई। बोलते-बोलते निशु ठहर जाती है। उधर पीछे से बीरपाल कौर कहती हैं, ‘मेरी बहन की ननद के यहां जाएंगे क्या?’ हां कहते हुए मैं एक लोकल आदमी की मदद से जज्जल गांव से निकल पड़ता हूं। बीरपाल की बहन की ननद 12 किलोमीटर दूर रामा मंडी गांव में रहती हैं। यह गांव गुरु गोविंद सिंह रिफाइनरी प्लांट से सटा हुआ है। बीरपाल की बहन की ननद आशा रानी अपनी जेठानी बेड़वंती के साथ घर के बरामदे में शोक में बैठी हैं। मेरे पहुंचते ही सहम जाती हैं। थोड़ी बातचीत के बाद कहती हैं, ‘गुद्दा में इंफेक्शन की वजह से बेटे की तीन साल पहले ही मौत हो गई थी। फिर बहू कमलेश के पेट के निचले हिस्से में पस बनने लगी। सिर के बाल भी धीरे-धीरे झड़ने लगे। हमें लगा कमजोरी की वजह से बाल झड़ रहे हैं। जब वह कहने लगी कि उसके मल के रास्ते बहुत खून आ रहा है, तब मैं उसे शहर लेकर गई। डॉक्टर ने बताया कि रेक्टम कैंसर था। अब इसका कुछ नहीं हो सकता। रोती-बिलखती उसे घर लेकर आ गई। धीरे-धीरे उसके पेट के निचले हिस्से में कई घाव हो गए। अभी तीन दिन पहले ही उसकी मौत हो गई। दो बच्चे हैं। कैसे पालूंगी, क्या करूंगी- कुछ समझ नहीं आता। तीन बेटों में से दो बेटों की पहले ही मौत हो चुकी है। अब एक बहू और बेटा ही बचे हैं। आगे की जिंदगी के बारे में सोच-सोचकर मरी जा रही हूं।' जेठानी बेड़वंती कहती हैं, ‘15 साल पहले मेरे पति की भी ब्लड कैंसर के कारण मौत हो गई थी। एक साल चंडीगढ़ और एक साल बीकानेर में उनका इलाज करवाती रही, लेकिन उन्हें नहीं बचा पाई। घर-द्वार, जमीन… सब बिक गया। अब बेटा है, वही काम-धंधा करके घर चला रहा है।’ इन लोगों की कहानी सुनकर मैं दंग होता जा रहा हूं। मन-ही-मन सोच रहा हूं कि ये कैसा कैंसर है- एक परिवार, एक गली, एक गांव… हर दूसरे घर में इससे मौत हुई है। कई परिवारों में तो तीन-चार से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। मेरा एक स्थानीय साथी 30 किलोमीटर दूर चट्ठेवाला गांव के ऐसे ही हालात के बारे में बताता है। मैं वहां के लिए निकल पड़ता हूं। आधे घंटे बाद गांव में गाड़ी रुकते ही 10 घरों में से 6-7 में कैंसर से हुई मौतों के मामले मिल जाते हैं। यहीं एक घर में महिंदर सिंह पिछले एक साल से बिस्तर पर पड़े हैं। उन्हें मुंह का कैंसर है। पत्नी मंजीत कौर जमींदार के यहां चूल्हा-चौका करने गई हुई हैं। उनकी बेटी बीरपाल एक दिन पहले ही ससुराल से मायके आई हैं। पिता के बारे में पूछते ही फूट-फूटकर रोने लगती हैं। काफी देर बाद कहती है, ‘हर वक्त डर रहता है- इस बार पिता से मिलकर जा रही हूं… अगली बार पता नहीं, कब मौत की खबर आ जाए।’ वह थोड़ी देर रुकती हैं, फिर धीमी आवाज में कहती हैं, ‘अब कोई भी बीमारी होती है, तो लगता है- कहीं कैंसर तो नहीं। तुरंत चेकअप के लिए शहर भागती हूं। लोग कहते हैं कि अगर माता-पिता को कैंसर हो, तो बच्चों में भी होने का खतरा रहता है। डर बस यही रहता है- कहीं हमें या हमारे बच्चों को कैंसर न हो जाए।’ इतनी ही देर में महिंदर सिंह की पत्नी मंजीत कौर आ जाती हैं। हल्की मुस्कान में अपने आंसू छुपाने की कोशिश करती हैं। कहती हैं, ‘पिछले एक साल से हर हफ्ते 6 हजार रुपए कीमोथेरेपी में जा रहे हैं। बरसात में घर की छत टपकती है। इलाज के लिए पैसे नहीं बचते, तो घर की मरम्मत कहां से कराऊं। अब बस यही देख रही हूं- कितनी जिंदगी बची है।’ वह एक पल के लिए चुप होती हैं, फिर कहती हैं, ‘पति ठीक हो जाए, तो सब ठीक… नहीं तो, सब खत्म। और क्या ही बोलूं…। इस चट्ठेवाला गांव में जिधर देखिए, उधर कैंसर के दो-चार मामले मिल जाएंगे। मेरी सास को भी रेक्टम कैंसर था। 10 साल पहले उनकी मौत हो गई थी।’ मैं महिंदर सिंह की गली से आगे गांव की तरफ बढ़ता हूं। तभी जालौर सिंह मिलते हैं। उनके भाई बलौर सिंह की भी कुछ साल पहले कैंसर से मौत हो चुकी है। पूछते ही वह अपने भाई की तस्वीर दिखाने लगते हैं। कहते हैं, 'वह हू-ब-हू मेरी तरह दिखता था। अभी घर में मेरी 100 साल की मां जिंदा हैं, लेकिन भाई चला गया। जहां-जहां लोगों ने बताया, वहां-वहां उसका इलाज कराया। मैं बिजली विभाग में नौकरी करता था, ठीक-ठाक कमाई थी, फिर भी उसे नहीं बचा पाया। लोग कहते हैं कि गुटखा-तंबाकू खाने से मुंह का कैंसर होता है, लेकिन मेरा भाई तो कुछ भी नहीं खाता था। दो साल बिस्तर पर पड़ा रहा, फिर उसकी मौत हो गई। अब उसकी पत्नी और बच्चे गांव से दूर खेत में जाकर रहने लगे हैं। वहीं मजदूरी करके गुजारा कर रहे हैं। आप मेरे घर के सामने, दाएं-बाएं कहीं भी चले जाइए- हर घर में कैंसर से मौत हुई है। मेरी चचेरी चाची की भी कुछ साल पहले कैंसर से मौत हो गई थी। इलाज के लिए पैसे नहीं थे, तो मैंने उनका घर खरीद लिया। कैंसर के इलाज में लाखों रुपए खर्च होते हैं, फिर भी कोई नहीं बचता। अब तो डर लगा रहता है कि कहीं मुझे या मेरे बच्चों को कुछ न हो जाए। बच्चे कहते हैं कि शहर चलकर बस जाएं, लेकिन घर-द्वार और खेती-बाड़ी छोड़कर कहां जाएं? जहां जन्म लिया, वहीं मर जाएंगे। ये बातें बताते हुए जालौर सिंह आवाज देकर दो-तीन लोगों को बुला लेते हैं। उनमें से एक गरिंदरजीत कौर हैं। उनकी सास की 7 साल पहले मुंह के कैंसर से मौत हो गई थी। वह मुझे अपने घर ले जाती हैं। कहती हैं, 'सास की जीभ के निचले हिस्से में छाला पड़ा था, जो धीरे-धीरे बड़ा छेद बन गया। वह कुछ खा नहीं पाती थीं। चम्मच से बच्चे की तरह पानी और जूस पिलाना पड़ता था। उनकी हालत देखकर हमारा भी खाना छूट जाता था- हम कैसे खाते? सास जूस-पानी पर रहती थीं और हम पकवान खाएं… ये कैसे होता? करीब डेढ़ साल इलाज चला, फिर उनकी मौत हो गई। डॉक्टर ने कहा था कि यहां का पानी ही इसकी वजह है। उसके बाद हमने घर में RO लगवा लिया।' गरिंदरजीत के घर के ठीक सामने जसविंदर कौर का घर है। 8 साल पहले उनके जेठ जग्गा सिंह की ब्लड कैंसर से मौत हो गई थी। जसविंदर, जो हरियाणा की रहने वाली हैं, कहती हैं, 'हम पांच बहनें थीं। पापा ने तीन बार में दो-दो बहनों की एक साथ शादी की। इस घर में भी हम दो बहनें ब्याहकर आईं। पहले मेरी बहन की मौत हुई, फिर जेठ की ब्लड कैंसर से। उनके तीन बच्चे हैं- दो बेटियां और एक बेटा। जॉइंट फैमिली है, तो हम ही उन्हें पाल-पोस रहे हैं। कैंसर का ऐसा डर है कि हमारी बेटियों से कोई शादी नहीं करना चाहता। रिश्ता लेकर आने वाले पहले ही पूछते हैं- घर में किसी को कैंसर तो नहीं? यहां का पानी पीने से भी डरते हैं। हम लोग बस जी रहे हैं… कब कैंसर हो जाए, कब मौत आ जाए- कुछ पता नहीं।' जज्जल, रामा मंडी और चट्ठेवाला गांव के बाद मैं 20 किलोमीटर दूर गियाना गांव की ओर निकलता हूं। शाम हो चुकी है। मुझे वापस बठिंडा लौटना है। गांव में सब्जी बेचने वाले पवन कुमार मिलते हैं। कैंसर का जिक्र करते ही कहते हैं, 'क्या बताऊं… मेरे मां-बाप, दोनों की कैंसर से मौत हो गई। 2008 के आसपास की बात है। हमारी परचून की दुकान थी। अचानक पापा को तेज बुखार आने लगा। उस वक्त बठिंडा में इलाज की सुविधा नहीं थी, इसलिए उन्हें बीकानेर लेकर गया। वहां पता चला- ब्लड कैंसर है। 6 महीने बाद मां भी बीमार रहने लगीं। उनका चेकअप कराया, तो बोन कैंसर निकला। धीरे-धीरे उनका शरीर इतना कमजोर हो गया कि जहां से पकड़ता, वहीं से हड्डी टूटने लगती। महीने में तीन बार बीकानेर कीमोथेरेपी के लिए जाना पड़ता था। दुकान बंद करनी पड़ी। दुकान में सामान नहीं रहेगा, तो चलेगी कैसे? आखिर में सब्जी की रेहड़ी लगानी शुरू की। 6 साल के अंदर दोनों की एक-एक करके मौत हो गई। अब पानी ही खराब है… क्या करें? जीना तो है, लेकिन जिंदगी कब तक है- कुछ पता नहीं।' मैं इन सब कहानियों को समेटते हुए वापस बठिंडा लौट आता हूं। एम्स बठिंडा में कैंसर विशेषज्ञ डॉ. सपना भट्टी से मुलाकात होती है। वह कहती हैं, 'इन गांवों की स्थिति गंभीर है, लेकिन अब धीरे-धीरे सुधार हो रहा है। बठिंडा में ही चार कैंसर अस्पताल हैं और एम्स में हर दिन 120 से ज्यादा मरीज इलाज के लिए आते हैं। पहले यहां सुविधाएं नहीं थीं, तो लोग बीकानेर जाते थे। यहां से एक ट्रेन चलती थी, जिसे लोग ‘कैंसर एक्सप्रेस’ कहते थे। अब वही मरीज इलाज के लिए बठिंडा आ रहे हैं। यहां बढ़ते कैंसर का सबसे बड़ा कारण पानी है। पानी बेहद खराब है। जिस मिट्टी में उगा अनाज लोग खाते हैं, वह भी प्रभावित है। फसलों में रासायनिक खाद और कीटनाशकों का ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है, जिससे मिट्टी और पानी दोनों जहरीले हो गए हैं। पानी में आर्सेनिक, सेलेनियम और यूरेनियम जैसे तत्व खतरनाक स्तर पर पाए जा रहे हैं, जो कैंसर के खतरे को बढ़ाते हैं। इसके अलावा, रिफाइनरी प्लांट से निकलने वाला जहरीला कचरा भी हालात को और बिगाड़ रहा है। यहां तंबाकू, बीड़ी, सिगरेट और शराब का सेवन भी ज्यादा होता है, जो कैंसर के जोखिम को बढ़ाता है। अगर किसी एक व्यक्ति को कैंसर होता है, तो परिवार के बाकी लोगों में भी खतरा बढ़ जाता है। गांवों में लोग शर्म और डर की वजह से कैंसर से हुई मौतों के बारे में खुलकर बात नहीं करते। उन्हें बदनामी का डर रहता है। हालांकि, हम लगातार जागरूकता अभियान चला रहे हैं। स्कूलों और कॉलेजों में जाकर लोगों को इसके प्रति सचेत कर रहे हैं।' ------------------------------------ 1- ब्लैकबोर्ड- सिर्फ पीरियड्स में नहा पाती हैं महिलाएं:कम खाती हैं, ताकि शौच न जाना पड़े; बोलीं- नमक के खेत में ही पैदा हुए, इसी में मर जाएंगे चिलचिलाती धूप में दूर तक फैला नमक का मैदान इतनी तेज चमक रहा है कि आंखों में चुभ रहा है। दूर तक कहीं छांव नहीं। अचानक एक महिला, रमिला, काम छोड़कर धीरे से कहती हैं- ‘दिन में हम शौच नहीं जाते… लोग देख लेंगे। इसलिए खाना भी कम खाते हैं… ताकि बार-बार जाना न पड़े…पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- ब्लैकबोर्ड- भूख के बजाय, दवाओं के ट्रायल से मरना अच्छा:बच्चों को तो 25 लाख मिल जाएंगे; उन्हें रिसर्च के लिए खून चाहिए, हमें पैसा ‘किसे अच्छा लगता है कि वह पैसे के लिए अपनी जान की बाजी लगाए, लेकिन मुझे लगानी पड़ती है। अगर मर भी गई तो बच्चों को 20-25 लाख मिलेंगे। कम से कम उनकी जिंदगी तो बेहतर हो जाएगी। अभी तक खुद पर दवाओं के ट्रायल में 4 बार पास हुई हूं।’ पूरी स्टोरी यहां पढ़ें
'ना अभी, ना कभी ', ट्रंप पर ईरान का तिलमिला देने वाला तंज, क्या अब उतरेगी अमेरिकी सेना
सरकारी टेलीविजन पर प्रसारित एक बयान में ज़ुल्फिकारी ने कहा कि ईरान की नीति शुरुआत से स्पष्ट रही है और इसमें कोई बदलाव नहीं होगा। उन्होंने अमेरिकी नेतृत्व पर कटाक्ष करते हुए कहा कि ईरान का रुख साफ है और वह ऐसे किसी प्रस्ताव या समझौते का हिस्सा नहीं बनेगा, जो उसकी संप्रभुता या रणनीतिक हितों को प्रभावित करता हो।
ईरान-अमेरिका तनाव कम करने की कोशिशें तेज, पाकिस्तान ने वार्ता स्थल बनने की पेशकश की
टनीतिक सूत्रों के अनुसार, अमेरिका ने पाकिस्तान में वार्ता के प्रस्ताव को “सैद्धांतिक रूप से” स्वीकार कर लिया है। हालांकि, अब तक ईरान की ओर से इस प्रस्ताव पर अंतिम सहमति नहीं मिली है।
अमेरिका ने मध्य पूर्व के लिए 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के सैनिकों को किया तैयार
पेंटागन अमेरिकी सेना की 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के हजारों सैनिकों को मध्य पूर्व में तैनात करने की तैयारी कर रहा है, जो ईरान संघर्ष में संभावित बढ़ोतरी का संकेत देता है
अमेरिका का बड़ा दांव: ईरान को 15-सूत्रीय प्लान
अमेरिका ने ईरान को युद्ध खत्म करने और उसके परमाणु कार्यक्रम को समाप्त करने के लिए एक व्यापक 15-सूत्रीय प्लान भेजा है
27 फरवरी 2026, सुबह करीब 8 बजे। गाजियाबाद के लोनी में यूट्यूबर सलीम वास्तिक अपने स्टूडियो में बेफिक्र सोफे पर लेटे थे। तभी दो लोग अंदर आए। सलीम कुछ समझते, उससे पहले दोनों ने चाकुओं से हमला कर दिया। सीने, पेट, कंधे और गले पर 14 बार चाकू मारा। सांस की नली कट गई। 25 दिन बाद भी सलीम ICU में हैं। हमलावर इस्लाम के समर्थक थे और निशाना बने सलीम आलोचक। उनके दोस्त और एक्स मुस्लिम समीर कहते हैं, ‘सलीम भाई पर हमले के दो दिन बाद मुझे भी धमकी मिली है। शायद मैं कट्टरपंथियों का अगला निशाना बन सकता हूं। इसीलिए धमकी वाली ऑडियो क्लिप सोशल मीडिया पर शेयर की। सलीम भाई को भी दो दिन पहले धमकी मिली, फिर अटैक हुआ था।‘ सलीम या उनके जैसे और लोग इस्लाम छोड़कर एक्स-मुस्लिम क्यों बन गए, ये कौन सा धर्म मानते हैं और क्या करते हैं? दैनिक भास्कर ने समीर से बात कर उनकी और सलीम की कहानी जानी। पहले सलीम वास्तिक की बात…मौलवी थे, पैसे लेकर दो बार तलाकशुदा औरतों का हलाला करायासलीम का हाल पूछने पर समीर कहते हैं, ‘अभी ठीक हैं, बोल नहीं पा रहे। उनसे मिलने गया था, तो बस इशारों में बातें कीं।‘ इलाज में और कितना वक्त लगेगा? समीर बोले, ‘4-5 फ्रैक्चर हैं। 3 सर्जरी हो गई हैं, दो बाकी हैं।‘ समीर कहते हैं, ‘सभी एक्स मुस्लिम पहले इस्लाम के समर्थक जरूर रहे होंगे। सलीम भी थे। वे हरियाणा के पानीपत में खेलन गांव में मौलवी थे। वक्फ बोर्ड ने तैनात किया था। 10 साल मजार की देखरेख और झाड़-फूंक करते रहे। 11-11 हजार रुपए लेकर दो तलाकशुदा औरतों का हलाला किया।’ पैसे लेकर हलाला करते हैं? समीर जवाब देते हैं- हां। पाकिस्तान में तो खुलेआम हलाला सेंटर हैं। फीस दीजिए और मौलवी से तलाक दी पत्नी का हलाला करवाइए। भारत में ये सर्विस खुलेआम नहीं चल रही, लेकिन छिपकर करने वाले एक्टिव हैं। समीर आगे बताते हैं, ’इस्लाम कहता है कि अगर आपने बीवी को तीन बार तलाक बोल दिया, तो बिना हलाला किए उसके शौहर नहीं बन सकते। बीवी किसी और से निकाह करे, फिर उसके साथ एक रात गुजारे। अगले दिन वो शख्स महिला को तलाक दे देगा, तभी उससे दोबारा निकाह कर सकते हैं।’ ‘मौलवी और हाफिज इस मौके को भुनाते हैं। पैसा लेते हैं, दूसरे की बीवी से फिजिकल भी होते हैं। आप पूछ रही थीं न कि किस चीज ने उन्हें ट्रिगर किया। ये हलाला ही था, जिसने सलीम भाई को इस्लाम का आलोचक बना दिया। उन्होंने इस्लाम छोड़ दिया।’ ‘मौलवी कहते हैं- कुरान बस पढ़ो, समझो मत’समीर कहते हैं, ‘सलीम भाई ने 12 साल पहले इस्लाम छोड़ा। उन्होंने कुरान और हदीस ट्रांसलेशन के साथ पढ़ी है। मैं ट्रांसलेशन के साथ किताबें पढ़ने को इसीलिए बोलता हूं, ताकि मतलब समझ आए। मौलवी हमेशा कुरान, हदीस बिना ट्रांसलेशन पढ़ने की हिदायत देते हैं। कहते हैं जिस भाषा में लिखी है, उसी में पढ़ो, समझने की जरूरत नहीं।‘ ‘सर्वे कर लीजिए, जिसने भी इस्लाम छोड़ा, उसने ये किताबें ट्रांसलेशन के साथ पढ़ी होंगी, क्योंकि जैसे ही मतलब समझ आता है, इस्लाम की सच्चाई सामने आ जाती है। यही सलीम भाई और मेरे साथ हुआ।‘ हमले से पहले क्या सलीम ने इस्लाम पर कुछ कहा था? जवाब में समीर कहते हैं, ‘हमले के दो दिन पहले सलीम ने पैगंबर मोहम्मद और कुरान पर पॉडकास्ट किया था। इसके ऑन एयर होने के कुछ घंटों बाद पाकिस्तानी यूट्यूबर मोहम्मद हमाद बरकती ने वीडियो जारी किया। उसने हत्या की धमकी दी। फिर गाजियाबाद में सलीम के लोनी वाले ऑफिस और घर का पता पब्लिक कर दिया।‘ ‘हमाद बरकती ग्रुप ने हमले के तुरंत बाद इसकी पुष्टि की और कहा कि काम हो गया, किसी को पूरा वीडियो चाहिए तो बताओ।‘ पॉडकास्ट में क्या था? सलीम बताते हैं, ‘पैगंबर मोहम्मद और कुरान पर कमेंट किया था।‘ अब समीर की कहानी…अपनी कहानी सुनाने से पहले समीर कहते हैं, ‘साफ कर दूं, इस्लाम कोई धर्म नहीं। ये रीलिजियस लॉ है। मैं जिस देश में रहता हूं, वहां संविधान है। इसलिए वही मेरा लॉ है। मैं किसी और कानून को क्यों मानूं। मुझे नमाज पढ़ने, हज और जकात (दान) करने वाले मुसलमानों से दिक्कत नहीं।‘ ‘इस्लाम कहता है कि अगर दीन-ए-इस्लाम में हो, तो ये करना होगा। कुरान और हदीस दोनों कहते हैं कि इस्लाम मानना है। दूसरे धर्म वालों को इस्लाम में कन्वर्ट करना सच्चे मुसलमान का धर्म है।’ क्या इस्लाम में धर्म परिवर्तन का आदेश भी है?, ‘हां, कुरान में कहा गया है कि इस्लाम सबसे बेहतरीन उम्मत यानी कौम है। इससे बाहर वाले खराब कौम में हैं, इसलिए सबको कन्वर्ट करो।‘ धर्म परिवर्तन कैसे कराया जाता है, समीर 3 पॉइंट में बताते हैं… 1. दावत: दूसरे धर्म वालों को दावत दो, उन्हें कन्वर्ट करो। 2. टैक्स: कन्वर्ट न हों, तो ताकत का इस्तेमाल करो, काफिरों से टैक्स या जजिया लो।3. जंग लड़ो, मारो या गुलाम बनाओ: टैक्स भी न दें, तो जंग करो। उन्हें खत्म करो या उनकी प्रॉपर्टी लो। औरतोंं, बच्चों को गुलाम बनाओ, ये तुम्हारे युद्ध बंदी हैं। मुंह बोली बहन और दोस्त को इस्लाम कबूल करवायासमीर बताते हैं, ‘दसवीं में तबलीगी जमात से जुड़ा। धीरे-धीरे वहां ज्यादा जाने लगा। इस्लाम को इतना मानने लगा कि दाढ़ी बढ़ा ली, टोपी और अरबियों की तरह सफेद लिबास पहनता। मैं मॉडर्न मुस्लिम फैमिली से था, लेकिन कट्टर मुस्लिम बन चुका था। मां बुर्का नहीं पहनती थीं, लेकिन मैं उन्हें बिना बुर्का पहने बाहर नहीं जाने देता था। मोबाइल-टीवी को हराम मानता था। अजान के वक्त कोई नमाज पर न जाए, तो हंगामा कर देता था।‘ ‘मैंने अपने दोस्त कपिल और मुंह बोली बहन जया का धर्म बदलवाया। इससे मेरा हौसला इतना बढ़ गया कि लगा ये करना बहुत आसान है। मैंने धर्म परिवर्तन का काम चुना था, तो कुरान, हदीस और पैगंबरों को पढ़ने लगा। अच्छा यही हुआ कि सब ट्रांसलेशन के साथ पढ़ा, इसलिए इस्लाम की सच्चाई जान गया।‘ पहली बार एतबार कब उठा? समीर बताते हैं, ‘हजरत मोहम्मद साहेब और दूसरे पैगंबरों के साथ बंदियों का जिक्र बार-बार मिलता है। मैंने तबलीगी जमात के मौलवी से पूछा कि बंदी क्या होता है। जवाब मिला- घर में काम करने वाली नौकरानी बंदी है। कुरान पढ़ी तो पता चला कि बंदी युद्ध में कैद की गई औरतें हैं। कुरान में इनके साथ संबंध बनाने और बाजार में बेचने का हुक्म दिया गया है।’ ’कुरान में कहा गया है कि शौहर वाली औरतें, मुसलमान मर्द के लिए हराम हैं। फिर वही कुरान कहती है कि युद्ध में बंदी बनाई गईं औरतें चाहे शौहर वाली हों या बिना शौहर वाली, उनके साथ जो चाहो वो करो। चाहे फिजिकल रिलेशन बनाओ या मंडी में बेच दो।’ ‘दाढ़ी कटवाई और इस्लामी लिबास उतारा, तो डराया गया’समीर कहते हैं, ‘2014 से 2018 तक मैंने बहुत स्टडी की। 300-400 लोगों से मिला, ताकि हर सवाल का जवाब मिल सके। किसी ने भगाया, कोई बोला कि तुम्हें शैतान ने बहका दिया है। मुझे समझ आ गया कि जो मैं समझा हूं, इस्लाम वही है, इसलिए छोड़ दिया। इस्लाम छोड़ते ही सबसे पहले दाढ़ी कटवाई, सुरमा हटाया। जींस-टीशर्ट पर आ गया। मैं अब आम इंसान हूं, यही मेरी पहचान और स्टेटस है।‘ ‘मैंने रुड़की में घर छोड़ दिया और दिल्ली आ गया। फिर भारत ही नहीं, पाकिस्तान से भी कट्टरपंथियों की धमकियां मिलने लगी। 2022 में एक्स मुस्लिम समीर नाम से यूट्यूब चैनल बनाया। अब भी धमकियां मिलती हैं। रुड़की में मुझ पर 10 लाख का इनाम है।‘ जिन्हें कन्वर्ट किया था, कभी उनसे दोबारा मिले? समीर बताते हैं, ‘जया हिंदू धर्म में लौट आई है, लेकिन कपिल नहीं मिला। अगर वो मिला तो उससे माफी मांगूगा और दोबारा हिंदू बनाऊंगा।’ कट्टरपंथियों का अगला निशाना मैं हूं…समीर जान का खतरा बताते हुए कहते हैं, ‘दो ग्रुप हम जैसे एक्स-मुस्लिम की सुपारी लेते हैं। सलीम भाई को मारने के लिए भी पब्लिकली इसी ग्रुप को कहा गया था। उनका एड्रेस पब्लिक किया गया। दोनों ग्रुप में मेरे बारे में जानकारी शेयर की गई है। अगला निशाना मैं ही हूं।‘ ये दो ग्रुप हैं: 1. मुस्लिम आर्मी ऑफिशियल मेहंदी2. अल सैयद आर्मी सलीम की तरह पहले भी शिकार हुए लोगसमीर ने बताया, ’2017 में तमिलनाडु के कोयंबटूर में एच. फारुख की हत्या हुई। ये चर्चित केस है। इसके बाद भी कई हत्याएं हुईं। मेरे पास 2017 से लेकर अब तक 40 लोगों के मर्डर की लिस्ट है लेकिन ये मामले हाईलाइट नहीं होते। प्रशासन ज्यादातर मामलों में दूसरी वजहे बताकर पल्ला झाड़ लेता है।’ मुस्लिम क्यों छोड़ रहे इस्लाम केरल में ‘एक्स मुस्लिम ऑफ केरल‘ संगठन के कोफाउंडर आरिफ थिरुवट इस्लाम छोड़ने की कई वजहें बताते हैं। वे कहते हैं, ‘सबसे बड़ी बुराई गुलाम प्रथा है। कुरान में साफ कहा गया है कि जो मुसलमान नहीं, वो गुलाम है। इसमें औरतों से नफरत करना सिखाते हैं। उन्हें कमतर माना जाता है। मुसलमान रहते हुए मैं भी अपनी वाइफ से ऐसा बर्ताव करता था।‘ आरिफ का दावा है कि केरल में हर 4 में से एक व्यक्ति एक्स मुस्लिम हैं। वे कहते हैं कि ये सिर्फ मेरा दावा नहीं, डेटा है कि यहां मुसलमानों की 30% आबादी इस्लाम छोड़ चुकी है। ………………….. ये खबर भी पढ़ें… पूरी तरह बदलने वाला है RSS 40 लाख सदस्य और 83 हजार से ज्यादा शाखाओं वाला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने स्ट्रक्चर में बड़ा बदलाव करने वाला है। इसके मुताबिक अब अलग-अलग प्रांत प्रचारकों की जगह एक राज्य प्रचारक होगा। क्षेत्र प्रचारकों की संख्या भी कम होगी। जिला, तहसील, ब्लॉक और गांवों तक कार्यकर्ताओं को ज्यादा अधिकार मिलेंगे। इस बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी? पढ़िए पूरी खबर…
चीन में प्रतिदिन इस्तेमाल होने वाले टोकनों की संख्या 1,400 खरब से अधिक
चीनी राष्ट्रीय डेटा प्राधिकरण के महानिदेशक ल्यू ल्येहोंग ने मंगलवार को एक संवाददाता सम्मेलन में जानकारी दी कि इस मार्च तक चीन में प्रतिदिन टोकनों के इस्तेमाल की संख्या 1,400 खरब से अधिक हो गई है
दक्षिण कोरिया: पांच-दिन के व्हीकल रोटेशन सिस्टम को सख्ती से लागू करेगी सरकार
मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच दक्षिण कोरिया ने व्हीकल रोटेशन सिस्टम (वाहन रोटेशन प्रणाली) को सख्ती से लागू करने का फैसला किया है
धमकी से संवाद तक: ट्रंप का अचानक यू-टर्न
पश्चिम एशिया में युद्ध के कोलाहल के बीच शनिवार से सोमवार के दौरान दुनिया अचानक दहशत से राहत की ओर मुड़ गई
डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा खुलासा, रक्षा मंत्री हेगसेथ को बताया ईरान युद्ध का असली 'मास्टरमाइंड'
डोनाल्ड ट्रंप का एक बड़ा बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने खुलासा किया है कि ईरान पर सैन्य कार्रवाई का फैसला किस तरह लिया गया। इस बयान ने न सिर्फ अमेरिकी राजनीति में हलचल मचा दी है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नई बहस छेड़ दी है।
ईरान-अमेरिका-इजरायल तनाव के बीच सीजफायर की हलचल, बैकडोर डिप्लोमेसी में जुटे बड़े चेहरे
इस कूटनीतिक प्रयास में तीन नाम खास तौर पर चर्चा में हैं स्टीव विटकॉफ, जेरेड कुशनर और ईरान के वरिष्ठ नेता मोहम्मद बगेर गलीबाफ। बताया जा रहा है कि विटकॉफ और कुशनर अमेरिकी हितों के साथ-साथ इजरायल के साथ तालमेल बिठाते हुए बातचीत को आगे बढ़ा रहे हैं। वहीं, ईरान की ओर से गलीबाफ बातचीत की मेज पर अपनी शर्तें रख रहे हैं।
नेपाल ने बदले ट्रैकिंग के नियम, यात्रा के लिए अब साथी ढूंढने की जरूरत नहीं
नेपाल ने विदेशी ट्रैकर्स को कुछ खास प्रतिबंधित इलाकों में अकेले जाने की अनुमति देने का फैसला किया है। इस फैसले के साथ ही वह मौजूदा परमिट सिस्टम खत्म हो गया
ईरान से समझौता मध्य पूर्व में ला सकता है स्थिरता, असफलता पर जारी रहेगा हमला: ट्रंप
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को कहा कि ईरान के साथ चल रही बातचीत मध्य पूर्व में दीर्घकालिक स्थिरता ला सकती है। यह क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बहुत महत्वपूर्ण है और लाखों प्रवासियों का घर भी है
सुबह की हल्की धुंध अभी पहाड़ियों से हटी नहीं है। घास पर जमी ओस चमक रही है। मैदान के किनारे जंगल में एक पुराने पेड़ के नीचे लोग जमा हुए हैं। इसी पेड़ के नीचे एक बड़ा इम्तिहान होने वाला है। जमीन पर 100 किलो का एक पत्थर रखा है। सामने 6 फीट लंबा हट्टा-कट्टा लड़का खड़ा है। नाम है कारन। थोड़ी दूर पर एक लड़की परिवार के साथ खड़ी है। नाम है मुथी। सबकी नजरें कारन पर टिकी हुई हैं। एक बुजुर्ग कारन से कहते हैं, ‘आज तुमने ये पत्थर उठा लिया, तो हम मान लेंगे कि तुम लड़की की जिम्मेदारी भी उठा सकते हो।’ कारन झुकता है। दोनों हाथ पत्थर के नीचे लगाता है। जोर लगाता है- लेकिन पत्थर टस से मस नहीं होता। भीड़ में हल्की हंसी गूंजती है। ‘अरे, नहीं उठा पाएगा…’ कारन एक पल के लिए रुकता है। सांस भरता है। दोबारा झुकता है- इस बार थोड़ा और जोर, थोड़ी और जिद के साथ। पत्थर धीरे-धीरे जमीन से ऊपर उठने लगता है। मुथी मुस्कुराकर बुजुर्गों की तरफ देखने लगती है। वो आंखों से इशारा करते हुए हां में सिर हिला देते हैं। वहां खड़े लोग वाह-वाह करने लगते हैं। कारन पत्थर छोड़कर मुथी की तरफ बढ़ता है। मुथी कहती है- ‘तुमसे करूंगी शादी।’ कारन एक थैले से 100 रुपए और एक साड़ी निकालकर मुथी को देता है। वो प्यार भरी नजरों से कारन को देखती हुई सामान लेने के लिए हाथ आगे बढ़ा देती है। कारन, मुथी का हाथ पकड़ता है और अपने साथ लेकर चला जाता है। इस तरह मुथी और कारन की शादी हो जाती है। यह अनोखी परंपरा है नीलगिरि पर्वत पर बसे टोडा समुदाय की है। दैनिक भास्कर अपनी नई सीरीज ‘हम लोग’ में हर मंगलवार लाएगा ऐसे ही अनोखे लोगों की कहानियां। पहली कहानी के लिए मैं मनीषा भल्ला तमिलनाडु में 2200 मीटर की ऊंचाई पर बसे टोडा लोगों की एक बस्ती में पहुंची… मेरे साथ राम भी थे, जो कि हमारी मदद कर रहे थे। हम मार्लिमंथ गांव पहुंचे तो वहां मीनराज कुट्टन हमारा इंतजार कर रहे थे। राम ने तमिल में उनसे परिचय कराया। मीनराज ने बताया कि टोडा समुदाय में केवल 1800 लोग बचे हैं। सब इसी पहाड़ी के पास बसे गांव में रहते हैं। फिर वो हमें अपने घर ले गए और चाय पिलाई। इत्तफाकन आज उनका एक खास त्योहार भी है। वे अपने साथ मुझे एक मैदान में ले गए। मैदान में इंद्रधनुष के आकार की एक झोपड़ी है, जिसके आस-पास काफी मर्द इकट्ठा हुए हैं। ऊंचे कद, चेहरे पर तेज। सभी लाल-काली कढ़ाई वाली सफेद शॉल और इसी रंग की लुंगी पहने हैं। इनके पैर में चप्पल नहीं है। मैदान से करीब 15-20 किलोमीटर एरिया में बसे सभी गांव के टोडा लोग यहां आ रहे हैं। उनके कंधे पर भी वही शॉल है। इनका पारंपरिक त्योहार शुरू होने वाला है- एक ऐसा त्योहार जो 15 साल में एक बार आता है। इस दिन वे अपने मंदिर को उजाड़कर फिर से बनाते हैं। इस त्योहार को पिरितुकटुवदु कहते हैं। सभी मर्द मिलकर इस झोपड़ी की फूस की छत उजाड़ने में जुटे हुए हैं। पता चला कि ये झोपड़ी टोडा लोगों का मंदिर है। इनके घर भी इंद्रधनुष आकार के होते हैं। इनका कहना है कि इनके देवता ने औसे घर और मंदिर बनाने के लिए कहा था। मैं इन दृश्यों को कैमरे में कैद कर ही रही थी कि एक टोडा युवक मेरे पास आया। उसने विनम्रता से कहा, ‘मैदान में जूते पहनकर नहीं आ सकते।’ मैंने तुरंत जूते उतार दिए और ओस से भीगी घास पर आगे बढ़ने लगी। तभी ऊपर खड़े कुछ लोगों ने रुकने का इशारा किया। एक युवक तेजी से मेरी तरफ आया और हल्की मुस्कान के साथ अंग्रेजी में बोला, ‘वुमेन आर नॉट अलाउड’ मैंने तुरंत कैमरा बंद किया। अपने साथी राम को मोबाइल थमाया और कहा- ‘तुम ही जाकर वीडियो शूट कर लो।’ फिर वहां से गांव लौट आई और मीनराज कुट्टन के घर में बैठ गई। सभी टोडा औरतें घर पर ही हैं। कुछ देर बातचीत के बाद उन्होंने खाने के लिए उबला आलू और घी दिया। कहने लगीं कि 'आज के दिन हम लोग यही खाते हैं। आलू में घी लगाकर खाइए, आपको भी पसंद आएगा। ये घी हमारी भैंसों का ही है' सच कहूं तो इतना स्वादिष्ट आलू-घी मैंने पहले कभी नहीं खाया था। लोगों में भैंस के घी के बिना कोई आयोजन पूरा नहीं होता। शाम तक राम वीडियो शूट करके लौटे। साथ में मीनराज भी थे। मैंने एक-एक करके वीडियो देखना शुरू किया। पहले वीडियो में दिख रहा है कि सभी मर्द दोपहर 11:45 बजे का इंतजार रहे हैं। समय होते ही वे सभी झोपड़ीनुमा मंदिर के सामने इकट्ठा होते हैं। दाहिना हाथ नाक की सीध में करते हैं और मंत्र पढ़ने लगते हैं। थोड़ी देर बाद काले रंग की लुंगी पहने दो शख्स सुरंग जैसे मंदिर के छोटे दरवाजे से रेंगकर अंदर जाते हैं। पता चलता है कि ये दोनों पुजारी हैं। दोनों ने एक-एक कर घी से भरी 10 मटकियां बाहर निकालीं और पास में बनी दूसरी झोपड़ी में लाकर रख दीं। ये दूसरी झोपड़ी भी इनका पवित्र स्थान है, जहां इनकी भैंसों का घी रखा जाता है। जब सारी मटकियां बाहर आ गईं, तो पुरुषों ने मंदिर की छत और बांस की डंडियां उखाड़नी शुरू कर दीं। करीब आधे घंटे में मंदिर की छत हट गई। अंदर कोई मूर्ति नहीं। सिर्फ एक जलता हुआ दीया दिख रहा है। टोडा लोगों के लिए यही दीया ईश्वर है। यह भैंस के घी से जलता है, इसलिए उनके जीवन में भैंस का पवित्र स्थान है। मीनराज बताते हैं कि नया मंदिर बनाने के लिए करीब 40 किलोमीटर दूर से हम बांस और खास तरह की घास लेकर आते हैं। यह घास करीब 15 साल तक खराब नहीं होती। बांस की डंडियों से दीवारें बनाई जाती हैं और घास-पुआल से छत। इस मंदिर की नींव पत्थर की होती है और खाली जगह मिट्टी से लीपकर भरी जाती है। करीब 18 से 20 दिन में यह मंदिर बनकर तैयार होता है। जब मंदिर बनकर तैयार हो जाएगा तब ये लोग अपना पारंपरिक नृत्य ‘ओड़िथ’ करेंगे। मंदिर को उजड़े हुए 20 दिन बीत चुके हैं। एक बार फिर सभी लोग उसी जगह पर इकट्ठा हुए हैं। जैसा कि मैं पहले बता चुकी हूं कि मंदिर से जुड़े किसी भी रीति-रिवाज में 'वुमेन आर नॉट अलाउड' इसलिए मेरे साथी राम वहां गए हैं। मैं गांव की एक महिला रेवती के घर में उनका इंतजार कर रही हूं। कई घंटे बाद जब वो लौटे तो मैं वीडियो में देख पा रही हूं कि सभी टोडा मर्द अपना पारंपरिक नृत्य ‘ओड़िथ’ कर रहे हैं। नया मंदिर बनकर तैयार हो चुका है। कुछ देर बाद सभी मर्द एक साथ खड़े हुए। उनके बीच खड़े हैं कोरन, जिन्हें नया पुजारी चुना गया है। उनके शरीर पर सिर्फ काली धोती है। वो मंदिर के छोटे दरवाजे से रेंगकर अंदर जाता हैं। सबसे पहले वह भैंस के घी का दीपक जलाते हैं। अब डेढ़ महीने तक पुजारी इसी अंधेरे मंदिर में रहेंगे। इस दौरान वह न तो किसी से बात करेंगे, न गांव जाएंगे और न ही अनाज या सब्जियां खाएंगे। केवल शहद और भैंस का घी खाएंगे। डेढ़ महीने में पुजारी, शहद लेने के लिए केवल जंगल जा सकते हैं। पुजारी के लिए नियम बहुत सख्त हैं। अगर वो इन नियमों को तोड़ते हैं, तो उसे तुरंत हटा जाएगा। फिर नया पुजारी चुन लिया जाएगा। टोडा लोग मानते हैं- इन्हीं कठोर नियमों की वजह से उनकी परंपराएं आज तक बची हुई हैं। इसके अलावा ये लोग साल में एक बार पर्वत की भी पूजा करते हैं। वहां प्रार्थना करते हैं कि- 'समय पर बारिश हो, भैंसों के लिए घास मिले, हमारे पशु भूखे न रहें।' अभी मैं जिस घर में हूं उस घर की महिला रेवती जल्दी-जल्दी रसोईं के काम निपटा रही हैं। चूल्हे पर खाना बन रहा है। घड़ी में शाम के 6 बजते ही वह काम रोक देती हैं। एक छोटा दीपक जलाती हैं और उसे घर के कोने में रख देती हैं। इसे ‘दीपम’ कहते हैं। रेवती उसके सामने प्रार्थना करती हैं, लेकिन दोनों हाथ जोड़कर नहीं। सिर्फ एक हाथ उठाती हैं। प्रार्थना के बाद वो मुस्कुराकर कहती हैं, ‘हमारे यहां हर टोडा महिला को शाम तक घर लौटना होता है। चाहे वह खेत में हो, रिश्तेदार के यहां या कहीं और। उसे 6 बजे घर आकर ‘दीपम’ जलाना ही होता है। अगर कोई महिला दीपम जलाना भूल जाए, तो अच्छा नहीं माना जाता। बुजुर्ग कहते हैं- ‘इससे बुरी शक्तियों का असर बढ़ सकता है। घर की समृद्धि घट सकती है।’ टोडा लोगों की शादी भी अनोखे तरीके से होती है। 100 किलो का पत्थर उठाने के बाद कारन नाम के युवक की शादी तय होने का किस्सा हम आपको ऊपर बता चुके हैं। रिश्ता तय होने के बाद शादी के एक दिन पहले लड़के के परिवार वाले फिर से जंगल जाते हैं। वहां उसी पुराने पेड़ के नीचे सब इकट्ठा होते हैं। इस पेड़ को वे नावलमरम कहते हैं। दूल्हे की मां पेड़ के नीचे दीये में भैंस का घी डालती है, जिसे दुल्हन जलाती है। फिर दूल्हे की मां उसी जलती हुई बाती से दुल्हन की हथेली के पिछले हिस्से पर हल्का-सा निशान बनाती है। उसे आशीर्वाद माना जाता है। इसके बाद सब घर लौट आते हैं और दुल्हा और दुल्हन साथ रहने लगते हैं। गर्भ के 6 महीने बाद होती है शादी की आखिरी रस्म शादी की सभी रस्में तब पूरी होती हैं, जब लड़की गर्भवती हो जाती है। गर्भवती होने के छठे महीने में पूरा कुल फिर उसी नावलमरम पेड़ के नीचे जाता है। फिर एक दीया जलाया जाता है। जंगल की एक बड़ी और मजबूत घास से, जिसे भइजन या पुरस कहते हैं- दुल्हन तीर-कमान बनाती है। फिर दूल्हे से पूछती है- ‘तुम्हारा कुल कौन-सा है?’ दूल्हा तीन बार अपने कुल का नाम बताता है। तब दुल्हन वो तीर-कमान दूल्हे को दे देती है। इस तरह कुल तय होने के बाद दोनों पूरी तरह पति-पत्नी घोषित कर दिए जाते हैं। इस रस्म में दुल्हन के मायके वाले दुल्हे को पांच भैंस देते हैं। उसके बाद सभी अपना पारंपरिक नृत्य ‘ओड़िथ’ करते हैं। इस दौरान बड़े-बुजुर्ग जोड़े को आशीर्वाद देते हैं, लेकिन ये आशीर्वाद हाथ से नहीं, पैर से दिया जाता है। इसी रस्म को लेकर कहा जाता है कि टोडा महिलाओं की शादी गर्भवती होने के 6 महीने बाद होती है। हालांकि, टोडा लोग इसे भ्रामक बताते हैं। टोडा महिला वस्समली बताती हैं- ‘लोग कहते हैं प्रेग्नेंसी के 6 महीने बाद हमारे यहां लड़की की शादी होती है, लेकिन यह सही नहीं है। यह रस्म सिर्फ बच्चे के कुल का निर्धारण करने के लिए होती है।’ वहां मौजूद कारिकुट्टन कहते हैं कि ‘हमारे यहां शादी से पहले एक और रस्म होती है- ‘निच्यदारतम’। इसमें लड़का-लड़की के जवान होने से पहले ही रिश्ता तय कर दिया जाता है।’ बच्चे के जन्म के 13 दिन बाद घर में लौटती है मांबच्चा होने पर भी एक खास रस्म होती है। बच्चे के जन्म के बाद 13 दिनों तक मां और बच्चे दोनों को पास के किसी घर या बस्ती में रखा जाता है। जब मां ‘पवित्र’ हो जाती है, तब वापसी की रस्में शुरू होती हैं। छठी के बाद आने वाली पूर्णिमा की रात बच्चे को लेकर मां जंगल में जाती है। साथ में दूसरे रिश्तेदार भी होते हैं। वहां मां ‘पोली’ नाम के पौधे की जड़ निकालती है। उसे पत्थर पर मां के दूध के साथ रगड़ा जाता है। उससे बना घोल बच्चे को चटाया जाता है। माना जाता है कि इससे बच्चा प्रकृति से जुड़ता है। फिर मां, बच्चे को आसमान की ओर उठाकर चमकते तारे दिखाती है। उसी समय मामा तीन बार बच्चे के कान में नाम पुकारता है। यही से उसका नामकरण हो जाता है। इनके नाम भी प्रकृति से जुड़े होते हैं। लड़कों के नाम अक्सर पत्थर, पहाड़, पेड़ या सूरज पर रखे जाते हैं। लड़कियों के नाम धरती, फूल, पौधे, चांद या आभूषणों पर। टोडा महिलाओं के होते थे एक से ज्यादा पति 15 साल पहले तक टोडा महिलाओं के पांच-पांच पति होते थे। इसे बहुपति प्रथा कहा जाता था। हालांकि, अब यह प्रथा लगभग खत्म हो चुकी है। वस्समली बताती हैं- 'करीब 15-20 साल पहले तक हमारे समाज में बहुपति प्रथा थी। तब पुरुषों को महीनों जंगल में रहना पड़ता था- कभी शहद इकट्ठा करने, तो कभी दूसरी चीजों के लिए। ऐसे में भैंसों की देखभाल के लिए, घर संभालने के लिए महिला को पुरुषों की जरूरत होती थी। इसलिए उसे कई पुरुषों से शादी करनी पड़ती थी। जरूरत पड़ने पर आज भी महिलाएं ऐसा कर सकती हैं' एक खास अनुष्ठान के बाद हो जाती है बुजुर्गों की मृत्यु पता चला कि टोडा लोगों में अंतिम संस्कार का तरीका भी बेहद अलग है। जब कोई बुजुर्ग जीवन के बिल्कुल आखिरी दौर में हो, तो एक अलग रस्म होती है। सुबह करीब 5 बजे परिवार और समुदाय के लोग ‘एन वड़ा’ और ‘एकेज वड़ा’ नाम का अनुष्ठान करते हैं। इसमें वो लोग पूर्वजों को याद करते हुए प्रार्थना करते हैं- ‘अगर इनका समय आ गया है, तो इन्हें अपने साथ ले जाओ।’ लोग मानते हैं कि इससे बुजुर्ग को लंबे कष्ट से मुक्ति मिल जाती है। कई बार इस अनुष्ठान के कुछ समय बाद ही बुजुर्ग की मृत्यु हो जाती है, जिसे वे पुरखों की कृपा मानते हैं। कुछ देर बाद मैं एक बुजुर्ग के अंतिम संस्कार में पहुंची। नीलगिरि की पहाड़ियों में एक चिता जलाने की तैयारी चल रही है। पास खड़े लोग चुप हैं। चिता पर लेटे मृतक कन्नन के माथे पर एक चांदी का सिक्का रखा जाता है। उनके पैरों के अंगूठों को सटाकर काले धागे से बांधा जाता है। उसके बाद चिता में आग लगाई जाती है। कुछ देर बाद उनके करीबी रिश्तेदार आगे बढ़ते हैं। वे मृतक की पसंद का सामान चिता में डालते हैं। उसके बाद अपने बालों का एक छोटा-सा हिस्सा काटकर जलती चिता में फेंकते हैं। टोडा समुदाय में यह मृतक से खास रिश्ता जाहिर करने का तरीका है। आस-पास खड़े लोग बीच-बीच में आसमान की ओर भी देखते रहते हैं। अचानक ऊपर एक खास तरह की चील, जिसे वे इजीप्टियन चील कहते हैं, अगर वह दिख जाए तो मानते हैं कि उनके पूर्वज आत्मा को लेने आए हैं। लोग धीरे से कहते हैं, ‘पूर्वज आ गए… आत्मा को ले जाने।’ टोडा समाज पुनर्जन्म में यकीन नहीं करता। वस्समली कहती हैं कि- हमारे यहां पहली मृत्यु इनके देवता तिलकिश के पिता की हुई थी। इस दुनिया से स्वर्ग जाने के लिए उन्होंने वेस्टर्न घाट के तिरमुस्कुल पर्वत से एक रास्ता चुना। हमारे समुदाय में जब कोई मरता है तो वो भी उसी रास्ते स्वर्ग जाता है, लेकिन मृत्यु हो जाने के बाद पुनर्जन्म नहीं होता। इसलिए हम मानते हैं कि हमें इस दुनिया में एक अच्छा बनकर इंसान जीना चाहिए। कुछ देर बाद मैं वहां से फिर गांव की तरफ आ गई। मेरे साथ मीनराज भी हैं। एक घर के बाहर एक महिला बैठी है- लक्ष्मी। गोद में सफेद कपड़ा फैलाए लाल और काले रंग के धागे से कढ़ाई कर रही हैं। ये बिलकुल वैसी ही है जैसी शॉल टोडा मर्दों ने ओढ़ी थी। लक्ष्मी ने बताया कि ये उनकी पारंपरिक शॉल पुतुकुली है। जिस पर वो कढ़ाई कर रही हैं। शॉल पर सूरज, चांद और पहाड़ जैसी आकृतियां कढ़ी गई हैं। वो शॉल पर छोटे ज्यामितीय डिजाइन बन रही हैं। इसे महिलाओं की पुतुकुली कहते हैं। एक पुतुकुली बनाने में चार से छह महीने लग जाते हैं। बच्चों की पुतुकुली लगभग एक महीने में तैयार होती है। इस पर की गई कढ़ाई को ‘टोडा कढ़ाई’ कहते हैं। जो दुनियाभर में मशहूर है। कई कलाकारों को इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान भी मिल चुका है। इस शॉल की कीमत 14 से 16 हजार होती है। टोडा महिलाओं के आभूषण भी उनकी संस्कृति की तरह अलग और सादे होते हैं। वे आमतौर पर सोना नहीं पहनतीं। उनके ज्यादातर गहने चांदी या मोतियों के होते हैं। चुकंदर, आलू और बींस की खेती मीनराज कहते हैं, ‘अब हम पहले की तरह जंगल नहीं जा पाते। वहां जंगली जानवरों का खतरा रहता है। इसलिए सड़क किनारे घर बनाने लगे हैं। खेती भी शुरू कर दी है। अब तो हमारे बच्चे स्कूल भी जाने लगे हैं। शॉल के अलावा आज कई परिवार अपनी जमीन पर गाजर, चुकंदर, आलू, बींस और गोभी उगाते हैं, जिसे बाजार में बेचकर पैसे कमाते हैं।' मीनराज आगे बताते हैं ‘आज हमारे समुदाय में करीब 700 भैंसें हैं। हमारे लिए भैंस केवल पशु नहीं, बल्कि हमारा धर्म, भोजन का आधार और अर्थव्यवस्था है। एक परिवार के पास लगभग 15 से 20 भैंसें होती हैं। दूध, दही और घी ही हमारा मुख्य भोजन है। हम इन्हें पवित्र मानते हैं, इसलिए बाजार में नहीं बेचते। जरूरत पड़ने पर ये लोग आस-पास के आदिवासी समुदायों- जैसे बडगा और कोटा से दूध या घी के बदले अनाज ले लेते हैं।’ मीनराज बताते हैं कि ‘हमारे यहां झगड़े थाने में नहीं, मुखिया सुलझाते हैं। हर कबीले का एक मुखिया होता है। दो लोगों के बीच विवाद हो, तो मामला सीधे मुखिया के पास जाता है। वो दोनों पक्ष की बात सुनते हैं। फिर परंपराओं के आधार पर फैसला देते हैं।’ अगर विवाद दो कबीले के बीच हो, तो तीसरे कबीले का मुखिया फैसला करता है। सजा के तौर पर गलती करने वाला, पीड़ित को एक भैंस देता है। ये लोग पुलिस के पास कम ही जाते हैं। कई बार दोषी को सबके सामने माफी भी मांगनी पड़ती है। अगर पीड़ित व्यक्ति बुजुर्ग हो, तो उनके पैरों में गिरकर माफी मांगनी पड़ती है। नीलगिरी की पहाड़ियों में जंगल ही टोडा लोगों का पहला अस्पताल है। यहां बीमार होने पर सबसे पहले जड़ी-बूटियों का सहारा लिया जाता है। इसे लोग ‘ऊत प्रैक्टिस’ कहते हैं। यह ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी आता है। कुछ बुजुर्गों को पौधों के औषधीय इस्तेमाल की गहरी समझ है। जंगल में रहने के कारण यहा सांप के काटने की घटनाएं भी होती हैं। टोडा लोग खास जड़ी-बूटियों से उसका भी इलाज करते हैं। मीनराज कहते हैं, ‘अब नई पीढ़ी जरूरत पड़ने पर अस्पताल जाने लगी है। फिर भी जड़ी-बूटियों का यह ज्ञान समुदाय में जिंदा है।’ इस सीरीज में अगले हफ्ते पढ़िए ऐसे ही अनोखे बोंडा लोगों की कहानी….
ट्रंप का हमला टला, बाजारों में उछाल
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से ईरान पर हमले टालने के फैसले के बाद तेल की कीमतों में गिरावट आई और बाजारों में तेजी देखी गई। भारत की नजर इस घटनाक्रम पर बनी हुई है
मोजतबा खामेनेई का सुराग पाने में छूट रहे CIA और मोसाद के पसीने, बना हुआ है सस्पेंस
ईरान में नवरोज के मौके पर उम्मीद जताई जा रही थी कि मोजतबा खामेनेई अपने पिता की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए जनता के सामने आएंगे और संबोधन देंगे। हालांकि ऐसा नहीं हुआ। पूरे दिन के इंतजार के बाद केवल उनका एक आधिकारिक संदेश जारी किया गया, जिससे उनकी मौजूदगी तो पुष्टि हुई, लेकिन स्थान को लेकर रहस्य और गहरा गया।
डिमोना शहर इजरायल के सबसे संवेदनशील इलाकों में से एक माना जाता है। यह शिमोन पेरेस नेगेव परमाणु केंद्र से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इजरायल इस केंद्र को एक अनुसंधान सुविधा बताता है, हालांकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे लेकर कई तरह की आशंकाएं जताई जाती रही हैं।
तिब्बतियों के लिए पहचान का सवाल है चीन का 'जातीय एकता कानून'
चीन के नए कानून को लेकर तिब्बती समुदाय में डर है कि उनकी भाषा, संस्कृति और पहचान को धीरे‑धीरे हाशिये पर धकेला जा रहा है. चीन की ऐसी ही नीतियों का विरोध करने पर डॉ. ज्याल लो को तिब्बत छोड़कर कनाडा में निर्वासित होना पड़ा
क्या यूरोप में सेंटर-राइट और फार-राइट के बीच मिट रही है दूरियां?
यूरोपीय संसद में सेंटर-राइट पार्टी अब धुर-दक्षिणपंथी पार्टी के साथ हाथ मिला रही है. इससे यूरोपीय संघ की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है
क्यूबा में फिर ब्लैकआउट, मार्च में तीसरी बार पूरा देश अंधेरे में
क्यूबा में शनिवार को बिजली ग्रिड ढहने से तीसरी बार मार्च में देशभर में ब्लैकआउट हुआ. नुएवितास थर्मोइलेक्ट्रिक प्लांट की इकाई में अचानक खराबी और ईंधन संकट ने बिजली तंत्र को फिर अस्थिर कर दिया
35 साल बाद राइनलैंड पैलेटिनेट में बदलेगी सरकार
एएफडी ने पश्चिमी राज्य में राइनलैंड पैलेटिनेट में रिकॉर्ड बढ़त दर्ज की है और लगभग 20 प्रतिशत मतों के साथ पश्चिमी जर्मनी में अब तक का अपना सबसे बड़ा प्रदर्शन करने जा रही है
ईरान पर हमलों के खिलाफ यूरोप में गूंजा विरोध
अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर किए गए सैन्य हमलों के खिलाफ पूरे यूरोप में बढ़ते विरोध प्रदर्शनों के तहत हजारों प्रदर्शनकारी लंदन की सड़कों पर उतर आए और जमकर नारेबाजी की
ईरान की मुख्य सैन्य कमान ‘खातम अल-अनबिया सेंट्रल हेडक्वार्टर’ ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका ईरान के पावर प्लांट्स पर हमला करता है
डीएचएस शटडाउन से हवाई अड्डों पर हाहाकार, लंबी कतारों से यात्री परेशान
ट्रंप प्रशासन द्वारा इमीग्रेशन एंड कस्टम इंफोर्समेंट (ईसीई) के एजेंटों को तैनात करने के फैसले के बीच परिवहन सुरक्षा प्रशासन पर बढ़ते दबाव को कम करने की कोशिश की जा रही है
ईरान की लंबी दूरी की मिसाइल क्षमता क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती : इजरायली राष्ट्रपति
ईरान के जवाबी मिसाइल हमलों में इजरायल के दक्षिणी शहर अराद में भारी तबाही के बाद राष्ट्रपति इसहाक हर्ज़ोग ने क्षेत्र का दौरा किया
28 फरवरी 2026 यानी ईरान जंग का पहला दिन। अमेरिका और इजराइल ने ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई समेत दर्जनों टॉप लीडर्स को मार दिया। शुरुआती 100 घंटे में ही 50 हजार करोड़ रुपए के बम बरसाए गए। ट्रम्प और नेतन्याहू को जल्द से जल्द जीत की उम्मीद थी। 22 मार्च 2026 यानी ईरान जंग का 23वां दिन। ईरान ने इजराइल के डिमोना और अराद शहर पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। इसमें 300 से ज्यादा लोग घायल हुए। यानी अब भी ईरान पूरी ताकत से पलटवार कर रहा है। जंग के शुरुआती 23 दिनों में किसका-कितना नुकसान, आखिर कौन जीत रहा और आगे क्या सिनैरियो बन रहे; मंडे मेगा स्टोरी में पूरी कहानी… ***** ग्राफिक्स: अंकुर बंसल और अजीत सिंह -------- ये खबर भी पढ़िए…क्या पूरे मिडिल ईस्ट पर नेतन्याहू की नजर:'ग्रेटर इजराइल' क्या है, जिसके लिए ईरान जंग के बीच लेबनान पर कब्जा कर रहा इजराइल पूरी दुनिया की नजर ईरान जंग पर टिकी है। उधर इजराइल तेजी से लेबनान पर जमीनी कब्जा करने में जुटा है। इजराइल का कहना है कि वो हिजबुल्ला के सैन्य ढांचे और हथियारों को खत्म करना चाहता है। कई विश्लेषकों का मानना है कि नेतन्याहू ‘ग्रेटर इजराइल’ को हकीकत बनाने में जुटे हैं। पूरी खबर पढ़िए…
‘जंग के बीच गुजरता हर दिन पहले से ज्यादा भारी है। न चैन से सो पा रहे हैं, न जी पा रहे हैं। हमें तो रोज के खाने के लिए भी जद्दोजहद करनी पड़ रही है। हमारी मेंटल हेल्थ दिन ब दिन बिगड़ती जा रही है। अब बिल्कुल लाचार महसूस कर रहे हैं। ये भी नहीं जानते कि आगे क्या होने वाला है।‘ ईरान में मेडिकल की पढ़ाई कर रहीं कश्मीर की फलक घर नहीं लौट पा रहीं। वो तेहरान से तो सुरक्षित निकल गईं, लेकिन ईरान और अजरबैजान बॉर्डर पर अस्तारा चौकी के पास फंसी हुई हैं। बॉर्डर पर वो अकेली नहीं हैं। उनके साथ ही 180 भारतीय स्टूडेंट्स फंसे हुए हैं। इनकी शिकायत है कि एंबेसी ने टिकिट और वीजा कराने को कहा था, जिसके बाद कोम शहर से इवैकुएशन शुरू हुआ लेकिन अजरबैजान के बॉर्डर पर आकर फंस गए। न कंट्री कोड मिला और न घर लौट सके। बुक कराए फ्लाइट टिकिट भी बर्बाद हो गए लेकिन एंबेसी से कोई जवाब नहीं मिला।‘ ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच चल रही जंग में अब तक 2565 लोगों की मौतें हो चुकी है। अभी जंग थमने के आसार नहीं दिख रहे हैं। वहीं ईरान में करीब 1200 भारतीय स्टूडेंट फंसे हैं, जिनमें 900 जम्मू-कश्मीर के हैं। दैनिक भास्कर ने जंग के बीच बॉर्डर पर फंसे स्टूडेंट्स और उनकी फैमिली से बातचीत की। ‘1 से 1.5 लाख की टिकिट खरीदी, लेकिन घर नहीं लौट सके‘श्रीनगर की रहने वाली फलक तेहरान यूनिवर्सिटी से मेडिकल की पढ़ाई कर रही हैं। वे बताती हैं, ‘भारत सरकार अब तक हमें इवेक्युएट नहीं कर सकी है। हमसे यही कहा जा रहा है कि खुद के खर्च पर लौटना होगा। इससे पहले जब तेहरान से रेस्क्यू कर हमें कोम शहर लाया गया था, तब भी हम वहां भी 10 दिन फंसे रहे। एंबेसी से कोई जवाब नहीं मिल रहा था।‘ ‘फिर बताया गया कि हमें अजरबैजान के रास्ते भारत भेजा जा सकता है लेकिन पूरा खर्च हमें खुद उठाना होगा। हम भी अब और रिस्क नहीं लेना चाहते थे इसलिए हामी भर दी। हमसे कहा गया था कि PNR नंबर और कंफर्म टिकिट देने के बाद ही हमें कोम शहर से आगे भेजा जाएगा।‘ ‘हमने 1 से 1.5 लाख रुपए खर्च कर टिकिट कराया, बाकी इंतजाम भी कर लिए। सारे डॉक्यूमेंट्स जमा करने के बाद हमें ईरान-अजरबैजान बॉर्डर पर अस्तारा पोस्ट के पास लाया गया लेकिन भारत लौटने के लिए क्लीयरेंस नहीं मिला। हम करीब 180 स्टूडेंट्स यहीं फंसे हुए हैं।' ‘हमें भरोसा दिलाया गया था कि हर दिन 50 स्टूडेंट्स को बॉर्डर क्रॉस करने की परमिशन दी जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अब हमें टिकिट कैंसिल कराने और नुकसान उठाने को कहा जा रहा है। हमें एंबेसी से भी कोई मदद नहीं मिल रही है।‘ 20 दिन से एक से दूसरे शहर में घूम रहे, अब बॉर्डर पर फंसेफलक आगे कहती हैं, ‘हम पिछले 20 दिनों से यहां फंसे हुए हैं। अब तो चैन से नींद भी नहीं आ रही है। खाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। हमारी मानसिक स्थिति बिगड़ती जा रही है। हमें बताया गया है कि हमारे लिए होटल में ठहरने का इंतजाम है, लेकिन यहां कुछ नहीं मिला। खाने-पीने और बाकी जरूरतों के इंतजाम खुद करने पड़ रहे हैं।‘ ‘बस एक काम जो हम नहीं कर सकते, वो ईरान से बाहर निकलने का है। हमें अजरबैजान से बॉर्डर क्रॉस करने का क्लीयरेंस नहीं मिल रहा है।‘ ‘हम दूर-दराज वाले ऐसे इलाके में फंसे हैं, जहां नेटवर्क लगभग ना के बराबर है। फैमिली से भी बात नहीं हो पा रही है। कई स्टूडेंट्स के पास पैसे खत्म हो रहे हैं, कार्ड काम नहीं कर रहे और बैंकिंग सिस्टम साथ नहीं दे रहा है। हम इतना लाचार महसूस कर रहे हैं कि समझ नहीं पा रहे, आगे क्या करें।‘ ‘ईरान में हालात अभी अस्थिर हैं। हमें बार-बार एक जगह से दूसरी जगह शिफ्ट किया जा रहा है। इस खौफ और अनिश्चितता के माहौल में हम मेंटली बिल्कुल थक चुके हैं। हमारी बस यही गुजारिश हैं कि कुछ भी करके हमें यहां से जल्द निकालें। अगर अपने पैसे खर्च करने के बाद भी हम यहां से नहीं निकल पा रहे, तो अब हमारे पास रास्ता ही क्या बचता है।‘ स्टूडेंट बोले- ये जंग पहले से ज्यादा भयानक ईरान में फंसे श्रीनगर के एक स्टूडेंट ने पहचान जाहिर न करने की शर्त पर हमसे बात की। वो कहते हैं, ‘अभी ईरान में फंसा हूं। पिछले एक साल में ये तीसरी बार है, जब हमें जंग के कारण देश लौटने के लिए कहा जा रहा है। ‘पहली बार तब कहा गया, जब करीब 10-12 दिनों तक जंग के हालात रहे थे। तब भी हम डरे हुए थे, लेकिन अब के हालात पहले से कहीं ज्यादा भयानक है। पहले ये सिर्फ दो देशों की लड़ाई थी लेकिन अब इसमें कई देश शामिल हो गए हैं। अबकी हालात कंट्रोल से बाहर लग रहे हैं।‘ ‘हमें लगातार हवाई हमलों, ड्रोन और ब्लास्ट की आवाजें सुनाई देती हैं। कई बार धमाके बहुत करीब से महसूस होते हैं। रात काटनी मुश्किल हो जाती है, हम सो नहीं पाते और हर वक्त खौफ में जीते हैं। हमें रीलोकेट कर दिया गया है। तेहरान के हाई रिस्क इलाकों से निकालकर सेफ जगहों पर लाया गया है, लेकिन खतरा कम नहीं हुआ है।‘ ‘हमारे साथ कई स्टूडेंट्स को इवैक्यूएशन के लिए आर्मेनिया और अजरबैजान जैसे बॉर्डर इलाकों में शिफ्ट किया गया है। कुछ आर्मेनिया के रास्ते भारत लौटने में कामयाब रहे, लेकिन हम सब कई दिनों से अजरबैजान में फंसे हुए हैं। हमने महंगे टिकिट बुक करा लिए, सभी डॉक्यूमेंट्स जमा कर दिए और हर गाइडलाइन फॉलो की लेकिन फिर भी कोई क्लियर जवाब नहीं मिला।‘ ‘हमारे पैसे खत्म हो रहे हैं। कुछ स्टूडेंट्स बीमार पड़ रहे हैं। टेंशन बहुत बढ़ चुकी है। हमारे साथ-साथ घर वाले भी परेशान हैं। बार-बार इवैक्यूएशन के स्थिति ने पढ़ाई-लिखाई चौपट कर दी है। MBBS का कोर्स, जो 5–6 साल में पूरा हो जाना चाहिए। अब वो 7 साल या उससे ज्यादा भी खिंच सकता है। क्योंकि जंग की वजह से एग्जाम टलेंगे, इसका असर करियर पर पड़ेगा।‘ पेरेंट्स परेशान, बोले- बस बच्चे सुरक्षित लौट आएंश्रीनगर की रहने वाली शाहीन अख्तर का बेटा ईरान से मेडिकल की पढ़ाई कर रहा है। वे कहती हैं, ‘जंग में बेटा भी फंसा है। बाकी पेरेंट्स की तरह हम भी उसकी सलामती को लेकर परेशान हैं।‘ ‘ईरान से कई स्टूडेंट्स को आर्मेनिया के रास्ते पहले ही निकाला जा चुका है, लेकिन अब भी बड़ी संख्या में स्टूडेंट्स क्लीयरेंस न मिलने के कारण अजरबैजान बॉर्डर पर फंसे हैं। इनमें मेरा बेटा भी है।‘ ‘हम लगातार ऑफिशियल चैनल के जरिए अथॉरिटीज के संपर्क में थे। मीटिंग्स भी हुईं। हमसे बच्चों के लिए टिकिट और वीजा करने के लिए कहा गया। भरोसा दिलाया गया कि उन्हें सुरक्षित रास्तों से बॉर्डर तक पहुंचाया जाएगा और फिर भारत इवैकुएट कर लिया जाएगा।‘ ‘स्टूडेंट्स को लगभग 50-50 के ग्रुप में भेजने के लिए कहा गया था। इस पर यकीन करते हुए तय तारीखों पर हमने टिकिट भी बुक कर दी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कई पेरेंट्स ने तो पहली टिकिट कैंसिल होने के बाद दोबारा भी टिकिट बुक कराई, लेकिन अब तक बच्चे नहीं लौटे।‘ ‘स्टू़डेंट्स से कुछ ग्रुप्स निकाले गए, कई अब भी फंसे‘शाहीन आगे बताती हैं, ‘जिन स्टूडेंट्स के निकलने के लिए 18, 19 और 21 तारीख तय की गई थी, वो अब भी ईरान-अजरबैजान के बॉर्डर पर फंसे हैं। उनके पास वैलिड टिकिट भी है, लेकिन मौजूदा पाबंदियों के कारण उन्हें बॉर्डर क्रॉस करने की परमिशन नहीं मिल रही है।‘ ‘कुछ स्टूडेंट 15-16 दिनों से इंतजार कर रहे हैं। बॉर्डर बंद होने की वजह से उनमें कुछ के टिकिट पहले ही कैंसिल हो चुके हैं। स्टूडेंट्स और उनके परिवार दोनों परेशान हैं। मेरी भारत सरकार, खासकर विदेश मंत्रालय से अपील है कि ये मुद्दा तुरंत अजरबैजान सरकार के सामने उठाया जाए ताकि बॉर्डर क्लीयरेंस मिल सके और बच्चे घर लौट सकें।’ हम मिडिल क्लास परिवार, हमारे पैसे बर्बाद-बच्चे भी नहीं लौटेइसके बाद हमने श्रीनगर में रहने वाले मोहम्मद अनवर से बात की। उनकी बेटी भी अजरबैजान में फंसी है। वे कहते हैं, ’हम सब मिडिल क्लास परिवारों से हैं, कोई भी हाईफाई फैमिली से नहीं है। हमने पहले जो टिकिट बुक की, वो एग्जिट कोड न मिलने से बेकार हो गई। इसके बाद दोबारा टिकिट बुक करनी पड़ी। इस बार कीमत लगभग तीन गुना ज्यादा थी।’ ’टिकिट और वीजा का इंतजाम करना हमारी जिम्मेदारी थी, हमने पूरी की। अब एग्जिट कोड जारी करना हमारे हाथ में नहीं है, ये तो अधिकारियों की जिम्मेदारी है। अब हमारे बच्चे भाग-भागकर सिर्फ शारीरिक तौर पर ही नहीं, मेंटली भी बहुत परेशान हो चुके हैं। घबराहट और तनाव में बीमार भी पड़ रहे हैं। सरकार से यही गुजारिश है कि इस मुश्किल वक्त में दखल देकर हमारी मदद करें।’ ये खराब मैनेजमेंट और कोऑर्डिनेशन का नतीजाबडगाम के रहने वाले सुहैल मुजम्मिल का बेटा भी अजरबैजान बॉर्डर पर फंसा है। उनका मानना है कि इवैकुएशन में आ रही दिक्कत की सबसे बड़ी वजह खराब कोऑर्डिनेशन है। वे कहते हैं, ‘अजरबैजान बॉर्डर पर बच्चे इसलिए फंसे हैं क्योंकि उनके इवैक्यूएशन की जिम्मेदारी संभालने वालों का तरीका सही नहीं है। जिन स्टूडेंट्स को बाद की तारीख मिली थी, वो पहले बॉर्डर क्रॉस कर चुके हैं, जबकि जिनकी बुकिंग पहले की थी, वे अब भी फंसे हुए हैं।‘ ‘यही खराब मैनेजमेंट पूरे संकट की जड़ है। एंबेसी से कॉन्टैक्ट करने का भी कोई सही जरिया नहीं है। पेरेंट्स की बच्चों से भी बात नहीं हो पा रही है, जब उनमें से कोई कॉल करता है तभी बात हो पाती है।‘ ये सिर्फ इवैक्यूएशन नहीं, उनके फ्यूचर का सवालजेकेएसए कंवीनर नासिर खुएहामी का कहना है कि पिछले तीन हफ्तों में ईरान और इजराइल के बीच जारी संघर्ष ने भारतीय स्टूडेंट्स, खासकर कश्मीर के बच्चों के लिए मुश्किल हालात पैदा कर दिए हैं। कश्मीर घाटी से करीब 2,000 स्टूडेंट्स ईरान के मशहद, शिराज, अराक और तेहरान जैसे शहरों में पढ़ रहे हैं। ‘पिछले एक साल में ये तीसरी बार है, जब जंग के चलते स्टूडेंट्स को इवैक्यूएशन का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि मौजूदा स्थिति पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक है। बड़ी संख्या में स्टूडेंट्स बाकी औपचारिकताएं पूरी करने के बावजूद अजरबैजान बॉर्डर पर फंसे हुए हैं।‘ ‘स्टूडेंट्स की सेफ्टी तो मसला है ही। साथ ही बार-बार होने वाले इवैक्यूएशन ने उनका एकेडमिक फ्यूचर बर्बाद कर दिया है। MBBS जैसा कोर्स अब 7-7.5 साल तक खिंच सकता है। इससे उनका आगे का करियर भी प्रभावित हो सकता है। इसलिए ये सिर्फ इवैक्यूएशन का मुद्दा नहीं है, बल्कि हजारों स्टूडेंट्स के फ्यूचर और उनके परिवारों से जुड़ा बड़ा सवाल है। इस वक्त तत्काल और सख्त एक्शन की जरूरत है।‘ ……………….ये खबर भी पढ़िए ‘हॉस्टल के पास मिसाइलें गिरीं, पता नहीं बचूंगी या नहीं’ कश्मीर के अनंतनाग में रहने वाले बिलाल अहमद भट्ट की बेटी ईरान की राजधानी तेहरान में MBBS की पढ़ाई कर रही है। 9 मार्च की रात 3 बजे बिलाल के पास उसका फोन आया। वो रो रही थी। बिलखते हुए बोली- ‘अब्बू, मेरे हॉस्टल के पास मिसाइलें गिरने की आवाज आ रही हैं, बमबारी हो रही है। पता नहीं आज रात बचूंगी या नहीं। मुझे बचा लो।’ पढ़िए पूरी खबर…
हमने होर्मुज को नहीं किया बंद, अगर तेहरान के इंफ्रास्ट्रक्चर पर हुआ हमला तो मिलेगी सजा: ईरान
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 48 घंटे वाले अल्टीमेटम का ईरान के सबसे बड़े मिलिट्री कमांड यूनिट खातम-अल-अंबिया ने जवाब दिया है
ईरान रणनीति पर रिपब्लिकन सीनेटर की नाराज़गी: ट्रंप प्रशासन पर सवाल
एक प्रभावशाली रिपब्लिकन सीनेटर ने ईरान संघर्ष में ट्रंप प्रशासन के उद्देश्यों की अस्पष्टता पर चिंता जताई है। उन्होंने चेतावनी दी कि यह रुख प्रमुख सहयोगियों के साथ संबंधों को कमजोर कर सकता है

