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इजरायल-लेबनान शांति की दिशा में अहम पहल, वाशिंगटन में फ्रेमवर्क समझौते पर हस्ताक्षर

कई दिनों तक चली बातचीत के बाद यह फ्रेमवर्क तैयार किया गया। वाशिंगटन स्थित अमेरिकी विदेश मंत्रालय में आयोजित कार्यक्रम में अमेरिका में लेबनान की राजदूत नाडा हमादेह मोवाद और उनके इजरायली समकक्ष येचियल लिटर ने अमेरिकी प्रतिनिधियों की मौजूदगी में इस त्रिपक्षीय दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए।

देशबन्धु 27 Jun 2026 10:39 am

मिडिल ईस्ट में फिर छिड़ेगी जंग? अमेरिकी एयरस्ट्राइक के बाद भड़का ईरान, कहा- 'वाशिंगटन को सिर्फ पछताना पड़ेगा'

पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में शांति स्थापित करने की तमाम वैश्विक कोशिशों और हाल ही में हुए सीजफायर समझौते को एक बहुत बड़ा और जानलेवा झटका लगा है। वाशिंगटन और तेहरान के बीच युद्ध को पूरी तरह खत्म करने के लिए अभी बातचीत का दौर चल ही रहा था कि अमेरिकी फाइटर जेट्स ने ईरान के कई अहम सैन्य ठिकानों पर भीषण बमबारी (Airstrike) कर पूरे क्षेत्र को दहला दिया।इस अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के बाद ईरान आगबबूला हो उठा है। ईरानी संसद के राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग के प्रमुख इब्राहिम अजीजी ने शनिवार को अमेरिका को बेहद सख्त और सीधे लहजे में चेतावनी दी है कि इस दुस्साहस के बाद वाशिंगटन को सिर्फ 'पीछे हटना और पछताना' पड़ेगा। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर तीखा हमला बोलते हुए साफ कहा कि अब अमेरिका का यह 'ब्लेम गेम' यानी खुद हमला करके दूसरों पर दोष मढ़ने का खेल बिल्कुल नहीं चलेगा। आइए जानते हैं कि शांति समझौते के बीच अचानक भड़के इस महाविवाद की असल वजह क्या है।क्यों भड़का विवाद? जानिए अमेरिकी सेना के ताबड़तोड़ हवाई हमलों की वजहयह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के लड़ाकू विमानों ने शुक्रवार को ईरान के भीतर मौजूद मिसाइल और ड्रोन स्टोरेज लोकेशन्स के साथ-साथ उनकी तटीय रडार साइटों पर ताबड़तोड़ मिसाइलें बरसा दीं। व्हाइट हाउस और अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने इस कार्रवाई को पूरी तरह जायज ठहराते हुए साफ किया कि यह हमला ईरान द्वारा अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग में एक कमर्शियल जहाज पर किए गए कायरतापूर्ण हमले का सीधा और कड़ा जवाब है।अमेरिकी सेना द्वारा जारी आधिकारिक टाइमलाइन के मुताबिक, बीते 25 जून को ईरान ने ओमान के तट के पास जलडमरूमध्य से गुजर रहे सिंगापुर के झंडे वाले एक विशाल मालवाहक जहाज 'एम/वी एवर लवली' (M/V Ever Lovely) पर वन-वे सुसाइड अटैक ड्रोन से हमला किया था। यह हमला रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य के पास हुआ था, जो पूरी दुनिया के कुल ऊर्जा और कच्चे तेल के व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा (20%) संभालता है। अमेरिका ने इसी अंतरराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा के उल्लंघन को आधार बनाकर ईरान के खिलाफ यह बड़ा सैन्य एक्शन लिया है।ईरान का पलटवार: 'अमेरिका ने बातचीत के बीच में पीठ पर छुरा घोंपा'अमेरिकी बमबारी से भड़के ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के पूर्व शीर्ष कमांडर और वर्तमान सांसद इब्राहिम अजीजी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर अमेरिका को आड़े हाथों लेते हुए एक लंबी पोस्ट लिखी। अजीजी ने कहा, 'सफेदपोश अमेरिका ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उसकी कथनी और करनी में कितना फर्क है। उसने शांति वार्ता के बीच में ही हमारे देश पर हमला करके पीठ पर छुरा घोंपा है। नाकाम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया को दिखा दिया है कि वे किसी भी अंतरराष्ट्रीय कानून, बातचीत या सीजफायर के सिद्धांतों को नहीं मानते हैं।'अजीजी ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि सीजफायर का यह लापरवाह उल्लंघन अमेरिका के लिए आत्मघाती साबित होगा। ईरानी सांसद के इस तीखे बयान के ठीक कुछ घंटों बाद IRGC के मुख्यालय से भी एक बड़ा और डराने वाला ऐलान कर दिया गया। ईरानी सेना ने कहा कि उसने देश के दक्षिणी हिस्से पर हुए अमेरिकी हमलों के प्रतिशोध में पूरे मिडिल ईस्ट क्षेत्र में फैले अमेरिकी सैन्य ठिकानों और उनके दूतावासों को सीधे अपने मिसाइल निशाने पर लेना शुरू कर दिया है।'हिंसा का जवाब सिर्फ हिंसा' - अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस की दोटूकईरानी धमकियों के बीच अमेरिका ने भी झुकने से साफ इनकार कर दिया है। अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस (JD Vance) ने ईरान को आड़े हाथों लेते हुए 'X' पर दोटूक शब्दों में चेतावनी दी। वेंस ने लिखा, 'ईरान ने खुद टेबल पर बैठकर सीजफायर समझौते पर दस्तखत किए थे और हमारी सेना ने उस समझौते का पूरा सम्मान किया। अगर ईरानी प्रशासन को एमओयू (MOU) के नियमों या उसे लागू करने के तरीके को लेकर कोई भी आपत्ति या असहमति थी, तो वे राजनयिक चैनलों के जरिए बात कर सकते थे। लेकिन उन्होंने हथियारों का रास्ता चुना, और याद रहे कि हमारे देश के खिलाफ की गई हिंसा का जवाब हमेशा दोगुनी हिंसा से ही दिया जाएगा।' इसके साथ ही वेंस ने ईरान से आखिरी अपील करते हुए कहा कि वे आगे की तबाही को रोकने के लिए तुरंत हिंसा रोककर बातचीत की मेज पर आएं।नाजुक मोड़ पर शांति वार्ता: क्या तीसरे विश्व युद्ध की ओर बढ़ रही दुनिया?यह पूरा सैन्य टकराव एक ऐसे नाजुक और ऐतिहासिक मोड़ पर हुआ है जब दोनों देशों के बीच दशकों पुराने तनाव को खत्म करने के लिए पर्दे के पीछे से बड़ी डिप्लोमैटिक बातचीत चल रही थी। पिछले हफ्ते ही दोनों पक्षों के बीच एक अस्थाई सीजफायर का औपचारिक ऐलान हुआ था, जिसके तहत एक व्यापक फ्रेमवर्क को अंतिम रूप देने के लिए दोनों देशों को 60 दिनों का समय दिया गया था। लेकिन इन ताजा हवाई हमलों और पलटवार के बाद दुनिया भर के शेयर बाजारों और कच्चे तेल की कीमतों में भारी उथल-पुथल शुरू हो गई है। शांति की सभी उम्मीदों को गहरा झटका लगा है और मिडिल ईस्ट एक बार फिर भयंकर क्षेत्रीय युद्ध (Regional War) की आग में झुलसने की कगार पर आ खड़ा हुआ है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 27 Jun 2026 9:40 am

मिडिल ईस्ट में नया धमाका! अमेरिका ने कराई इजरायल-लेबनान में डील, भड़का हिजबुल्लाह, दी 'गृहयुद्ध' छिड़ने की खुली चेतावनी

मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) के अशांत मोर्चे से इस वक्त की सबसे सनसनीखेज और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को हिला देने वाली खबर सामने आ रही है। लंबे समय से जारी भीषण सैन्य टकराव के बीच अमेरिका की मध्यस्थता में इजरायल और लेबनान के बीच एक बेहद महत्वपूर्ण और चौंकाने वाले समझौते पर सहमति बनी है। लेकिन इस डील के सार्वजनिक होते ही लेबनान का सबसे शक्तिशाली अर्धसैनिक संगठन हिजबुल्लाह पूरी तरह आगबबूला हो गया है। हिजबुल्लाह के शीर्ष नेतृत्व ने इस अमेरिकी समझौते को पूरी तरह खारिज करते हुए बेहद आक्रामक अंदाज में खुली चेतावनी दी है कि यदि इस डील को जबरन थोपा गया, तो लेबनान में भयानक 'गृहयुद्ध' (Civil War) छिड़ जाएगा।अमेरिकी मध्यस्थता में हुआ सीक्रेट समझौता और हिजबुल्लाह की नाराजगीवाशिंगटन और यरूशलेम से आ रही रणनीतिक रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी राजनयिकों ने पर्दे के पीछे रहकर इजरायल और लेबनान की सरकार के बीच सीमा विवाद और सुरक्षा गारंटी को लेकर एक कड़ा ड्राफ्ट तैयार कराया था। इस डील का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों की सीमाओं पर जारी गोलाबारी को स्थायी रूप से रोकना और विस्थापित नागरिकों को उनके घरों तक वापस लाना है। हालांकि, हिजबुल्लाह का आरोप है कि लेबनान सरकार ने अमेरिकी दबाव में आकर देश की संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों से समझौता किया है, जो उन्हें किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं है।'गृहयुद्ध छिड़ जाएगा' – हिजबुल्लाह की लेबनान सरकार को खुली धमकीहिजबुल्लाह के प्रमुख ने एक विशेष संबोधन में लेबनान प्रशासन को सीधे शब्दों में आगाह किया है कि वे इजरायल या अमेरिका के किसी भी एजेंडे को देश की धरती पर लागू नहीं होने देंगे। हिजबुल्लाह ने कहा कि इस डील के जरिए उनके हथियारों को सरेंडर कराने और दक्षिण लेबनान से उनकी मौजूदगी को खत्म करने की साजिश रची जा रही है। अगर सरकार ने इस समझौते को आगे बढ़ाया, तो देश के भीतर विभिन्न गुटों और लेबनानी सेना के बीच सीधे टकराव की स्थिति बन जाएगी, जिससे पूरे देश में गृहयुद्ध की भयावह आग लग सकती है।बेरूत से लेकर यरूशलेम तक सैन्य अलर्ट और सुरक्षा रणनीति में बदलावइस खुली धमकी के बाद लेबनान की राजधानी बेरूत, इजरायल की उत्तरी सीमा और पूरे भूमध्यसागरीय क्षेत्र (Mediterranean Region) में स्थानीय सुरक्षा तंत्र को हाई अलर्ट पर डाल दिया गया है। इजरायली सेना (IDF) ने किसी भी संभावित रॉकेट हमले या घुसपैठ का मुकाबला करने के लिए अपनी सीमाओं पर पेट्रोलिंग और एयर डिफेंस सिस्टम 'आयरन डोम' को पूरी तरह सक्रिय कर दिया है। वहीं, लेबनान के स्थानीय नागरिक इस नई सैन्य और राजनीतिक खींचतान के बाद भारी दहशत में हैं और देश में एक बार फिर पुराने काले दौर के लौटने की आशंका से डरे हुए हैं।वैश्विक कूटनीति, एआई सर्च और अंतरराष्ट्रीय बाजार पर असरइस नए संकट ने वैश्विक कूटनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। आधुनिक जनरेटिव इंजन और वैश्विक थिंक टैंक इस बात का गहन विश्लेषण कर रहे हैं कि क्या अमेरिका द्वारा कराई गई यह पीस डील वाकई शांति लाएगी या फिर यह एक और बड़े विनाशकारी युद्ध की वजह बन जाएगी। अगर लेबनान के भीतर गृहयुद्ध जैसी स्थिति बनती है, तो इसका सीधा असर पूरे खाड़ी क्षेत्र की स्थिरता पर पड़ेगा, जिससे वैश्विक तेल बाजारों, व्यापारिक मार्गों और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा समीकरणों में भारी उथल-पुथल मचनी तय मानी जा रही है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 27 Jun 2026 9:39 am

भारत-यूके एफटीए 15 जुलाई से होगा लागू , कारोबारियों की मदद के लिए 1,000 सलाहकार नियुक्त होंगे : पीयूष गोयल

वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने बताया कि भारत-यूके फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) का पूरा फायदा कारोबारियों तक पहुंचाने के लिए पूरे देश में 1,000 सलाहकार नियुक्त किए जाएंगे

देशबन्धु 27 Jun 2026 8:50 am

होर्मुज में फिर बढ़ा भयंकर तनाव: ट्रंप का दावा, 'ईरान ने तोड़ा सीजफायर, अमेरिकी नौसेना ने मार गिराए 3 आत्मघाती ड्रोन'

वैश्विक महाशक्ति अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए ऐतिहासिक युद्धविराम (सीजफायर) पर एक बार फिर से युद्ध और संकट के काले बादल मंडराने लगे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने ईरान पर दुनिया के सबसे संवेदनशील और व्यस्त समुद्री व्यापारिक मार्ग 'स्ट्रैट ऑफ होर्मुज' (होर्मुज जलडमरूमध्य) से गुजर रहे कारोबारी जहाजों पर घातक आत्मघाती ड्रोन से हमला करने का बेहद गंभीर आरोप लगाया है।अमेरिकी राष्ट्रपति ने आज आधिकारिक तौर पर जानकारी दी कि ईरान ने दोनों देशों के बीच हुए समझौते की धज्जियां उड़ाते हुए सीजफायर तोड़ दिया है। ट्रंप के मुताबिक, ईरानी सेना ने होर्मुज से गुजर रहे एक बड़े मालवाहक जहाज पर ड्रोन से हमला किया, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई में अमेरिकी सेना ने भी तगड़ा पलटवार किया और ईरान के तीन घातक ड्रोनों को हवा में ही नेस्तनाबूद कर दिया। राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान की इस सैन्य कार्रवाई को एक बेहद 'मूर्खतापूर्ण कृत्य' करार दिया है।डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा दावा: ट्रुथ सोशल पर दी हमले की पूरी जानकारीअमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस पूरी अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम की जानकारी अपने आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' (Truth Social) पर एक पोस्ट के जरिए साझा की। ट्रंप ने दावा किया कि ईरान ने इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील समुद्री मार्ग से गुजर रहे अंतरराष्ट्रीय जहाजों को निशाना बनाने के लिए कम से कम चार सुसाइड (आत्मघाती) ड्रोन भेजे थे, जो दोनों देशों के बीच पिछले सप्ताह ही हुए युद्धविराम समझौते का खुला और सीधे तौर पर उल्लंघन है।ट्रंप का यह संगीन आरोप और अमेरिकी सेना का पलटवार ऐसे समय में सामने आया है, जब दोनों परमाणु संपन्न देशों के बीच वैश्विक मध्यस्थता के बाद तनाव कम करने की गंभीर कोशिशें की गई थीं। लेकिन इस ताजा हमले के बाद खाड़ी क्षेत्र (Gulf Region) में हालात एक बार फिर नियंत्रण से बाहर और बेहद विस्फोटक होते दिख रहे हैं।एक मालवाहक जहाज से टकराया ड्रोन, अमेरिकी सेना ने हवा में ही मार गिराए 3 विमानराष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आधिकारिक बयान के मुताबिक, ईरान द्वारा दागे गए चार ड्रोनों में से एक ड्रोन वहां से गुजर रहे एक बड़े मालवाहक जहाज के ऊपरी हिस्से (Deck) से जाकर टकरा गया। इस जबरदस्त धमाके के कारण जहाज को काफी भौतिक नुकसान पहुंचा है, लेकिन गनीमत यह रही कि भारी नुकसान के बावजूद वह जहाज समुद्र में डूबने से बच गया और अपना आगे का सफर जारी रखने में सफल रहा।ट्रंप ने बताया कि जैसे ही इस हमले की भनक अमेरिकी नौसेना के कमांडरों को लगी, अमेरिकी वायुसेना और युद्धपोतों ने त्वरित एक्शन लेते हुए बाकी बचे तीन ड्रोनों को उनके निशाने पर पहुंचने से ठीक पहले हवा में ही मार गिराया। हालांकि, सुरक्षा और रणनीतिक कारणों का हवाला देते हुए ट्रंप ने फिलहाल उस मालवाहक जहाज के नाम और उसके देश का खुलासा सार्वजनिक नहीं किया है जिस पर यह हमला हुआ था। साथ ही, इस हमले में जहाज पर सवार किसी क्रू मेंबर के घायल होने या हताहत होने की भी कोई अतिरिक्त जानकारी अभी सामने नहीं आई है।सिंगापुर के झंडे वाले जहाज पर हुआ हमला, सीजफायर को लगा बड़ा झटकामीडिया और रक्षा गलियारों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच हुए सीजफायर के बाद यह पहली और सबसे बड़ी सैन्य चुनौती तब सामने आई, जब गुरुवार को सिंगापुर के झंडे वाले एक विशाल मालवाहक जहाज पर होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरते समय यह कथित ड्रोन अटैक हुआ। इस हिंसक घटना को दोनों देशों के बीच शांति स्थापित करने और दुनिया के सबसे बड़े तेल और कमोडिटी सप्लाई रूट पर सामान्य आवाजाही बहाल करने के उद्देश्य से किए गए समझौते के लिए एक बहुत बड़ा और जानलेवा झटका माना जा रहा है।अमेरिकी खुफिया और रक्षा अधिकारियों ने दावा किया है कि इस खौफनाक हमले के पीछे सीधे तौर पर ईरान की एलीट मिलिट्री विंग 'इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स' (IRGC) का हाथ है। बताया जा रहा है कि यह घटना ईरान के उस आधिकारिक सैन्य बयान के ठीक कुछ घंटों बाद हुई, जिसमें तेहरान ने चेतावनी दी थी कि बिना उनकी मंजूरी या अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन कर समुद्री मार्गों का इस्तेमाल करने वाले किसी भी जहाज के खिलाफ वे सख्त सैन्य कार्रवाई करेंगे। इस घटना के बाद कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में भी अचानक उछाल आने की आशंका बढ़ गई है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 27 Jun 2026 8:48 am

ईरान की हथियार क्षमताएं क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने में मददगार : इस्माइल बाघेई

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाघेई ने क्षेत्रीय सुरक्षा और आत्मरक्षा के मुद्दे पर देश का रुख स्पष्ट क‍िया। उन्‍होंने कहा क‍ि ईरान की सैन्य क्षमताएं सुरक्षा और स्थिरता बनाए रखने के लिए हैं

देशबन्धु 27 Jun 2026 8:10 am

जासूसी के लिए बॉयफ्रेंड छोड़ा, पाकिस्तानी फौजी से शादी की:वॉशरूम से मैसेज भेजकर INS विक्रांत को डूबने से बचाया; सहमत पार्ट-1

दैनिक भास्कर की नई सीरीज ‘स्पाई फाइल्स’ में आज कहानी उस लड़की की, जिसने जासूसी के लिए पाकिस्तानी आर्मी अफसर से शादी की, फिर पति का कत्ल कर दिया… नवंबर 1971, दोपहर का वक्त। दिल्ली के लोधी रोड पर भारत की खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग यानी RAW का दफ्तर। बाहर सर्दियों की हल्की धूप थी, लेकिन अंदर का माहौल किसी सुलगते ज्वालामुखी सा था। अचानक वहां लगे एक खुफिया ट्रांसमीटर पर अजीब सी गड़गड़ाहट हुई। अफसरों की उंगलियां तेजी से डिकोडर पर दौड़ने लगीं। जैसे ही आखिरी शब्द डिकोड हुआ, कमरे में मौजूद अफसर हैरान रह गए। मैसेज था- ‘पाकिस्तान, INS विक्रांत को डुबाने की साजिश रच रहा है। उसकी सबसे खतरनाक पनडुब्बियां बंगाल की खाड़ी की तरफ निकलने वाली हैं।’ INS विक्रांत, भारतीय नेवी का वो तैरता हुआ विमान वाहक पोत है, जिसपर 30 लड़ाकू विमान और करीब 1600 सैनिक तैनात हो सकते हैं। 1943 में इसे ब्रिटिश रॉयल नेवी के लिए तैयार किया गया था, जिसे 1957 में भारत ने खरीद लिया। इसी INS विक्रांत के बूते भारत ने पश्चिमी पाकिस्तान से पूर्वी पाकिस्तान जाने वाले समुद्री रास्ते की नाकेबंदी कर रखी थी। पाकिस्तान छटपटा रहा था। वह किसी भी कीमत पर विक्रांत को डुबाना चाहता था, ताकि वो पूर्वी पाकिस्तान तक आसानी से रसद और सैनिक भेज सके। 8 नवंबर 1971, दिल्ली से करीब एक हजार किलोमीटर दूर कराची का एक आलीशान गोल्फ कोर्स। पाकिस्तान नेवी के सबसे काबिल पनडुब्बी कमांडर, जफर खान, शॉट लगाने ही वाले थे कि एक रनर हांफता हुआ आया। ‘सर, हेडक्वार्टर से बुलावा आया है। फौरन चलिए।’ हेडक्वार्टर पहुंचते ही कमांडर जफर के सामने नक्शा फैला दिया गया। एक एडमिरल ऑफिसर ने कहा- ‘INS विक्रांत को तबाह करना है। सबकी छुट्टियां कैंसिल। 10 दिन के भीतर कूच कर जाओ।’ 14 नवंबर को कमांडर जफर पाकिस्तान की सबसे घातक पनडुब्बी PNS गाजी को लेकर कराची से निकले। 18 नवंबर को श्रीलंका में डीजल भरवाया। 20 नवंबर को वे चेन्नई के तट की तरफ बढ़ने ही वाले थे कि कराची से नया संदेश आ गया- ‘अब विक्रांत मद्रास में नहीं है।’ इसी दौरान, विशाखापट्टनम के बाजारों में अजीब हलचल शुरू हो गई। अचानक भारी मात्रा में राशन, टनों मांस और सब्जियां खरीदी जाने लगीं। ‘इतनी बड़ी रसद तो INS विक्रांत के लिए ही मांगा जा सकता है।’ पाकिस्तानी जासूसों के कान खड़े हो गए। उन्होंने फौरन कराची मैसेज भेजा- ‘विक्रांत विशाखापट्टनम में है।’ अब पाकिस्तान से कमांडर जफर को नया हुक्म मिला- ‘फौरन रुख बदलो, विक्रांत विशाखापट्टनम में है।’ 1 दिसंबर 1971, घड़ी में रात के 11 बजकर 45 मिनट हुए थे। पाकिस्तानी पनडुब्बी गाजी विशाखापट्टनम बंदरगाह के मुहाने पर आकर गहरे समंदर में छुप गई। कमांडर ने तय किया कि जब तक उन्हें विक्रांत नजर नहीं आता, वो सतह पर नहीं आएंगे। 48 घंटे बीत गए। गाजी में डीजल से बैटरियां चार्ज की जा रही थीं, जिसकी वजह से खतरनाक हाइड्रोजन गैस रिलीज हो रही थी। पनडुब्बी के अंदर हाइड्रोजन जमा होता जा रहा था। मेडिकल अफसर गुहार लगा रहे थे कि हाइड्रोजन बाहर निकालने के लिए सतह पर जाना होगा, पर जफर के सिर पर मिशन का भूत सवार था। उन्होंने चीखते हुए कहा, ‘गाजी जैसी विशाल पनडुब्बी दिन के उजाले में ऊपर आई, तो हिंदुस्तानी हमें जिंदा चबा जाएंगे।’ वक्त गुजरता गया। फिर आई 3 दिसंबर 1971 की रात। करीब 12 बजे ऑल इंडिया रेडियो पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की आवाज गूंजी- ‘पाकिस्तान ने भारत पर हमला कर दिया है।’ उनका भाषण चल ही रहा था कि 12 बजकर 15 मिनट पर विशाखापट्टनम समंदर में जोरदार धमाका हुआ। आस-पास के मकानों की खिड़कियों के शीशे चकनाचूर हो गए। लोग सहम गए कि पाकिस्तान ने बमबारी कर दी है। लेकिन, अगली सुबह पता चला कि PNS गाजी खुद ही विस्फोट होकर तबाह हो गई है। मछुआरों को उसका मलबा मिला था। इस तरह भारत ने ना सिर्फ INS विक्रांत को बचाया बल्कि पाकिस्तानी नेवी के कई ठिकानों को तबाह कर दिया। पश्चिमी पाकिस्तान से पूर्वी पाकिस्तान के समुद्री रास्ते पर भारत की नाकेबंदी के आगे पाक की एक न चली। 16 दिसंबर 1971, 90 हजार सैनिकों के साथ पाकिस्तान ने भारत के आगे सरेंडर कर दिया। पाकिस्तान के दो टुकड़े हुए और दुनिया के नक्शे पर एक नया देश जन्मा- 'बांग्लादेश।' यह सबकुछ हुआ उस खुफिया मैसेज की बदौलत जिसे कश्मीर की एक लड़की सहमत ने जानपर खेलकर पाकिस्तान से भेजा था। सहमत ने जासूसी के लिए पाकिस्तानी फौजी से शादी की थी। आज कहानी उसी सहमत की… कश्मीर के रहने वाले हिदायत खान और पंजाब की रहने वाली सिख परिवार की तेज ने प्रेम विवाह किया। परिवार से बगावत करके। दो साल बाद उनको बेटी हुई। नाम रखा- सहमत। हिदायत बिजनेसमैन थे। उनका कपड़ों का कारोबार पाकिस्तान तक फैला था। उन दिनों पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में आना-जाना, कारोबार और शादी-ब्याह आम था। हिदायत कश्मीरी पश्मीना शॉल भी बेचते थे, जो रईस फौजियों की पहली पसंद थी। लिहाजा फौज में हिदायत की ठीक-ठाक पैठ बन गई थी। बड़े अफसरों तक गुपचुप शराब पहुंचाना और उनके साथ उठना-बैठना, हिदायत की इसी पैठ का हिस्सा था। उधर, 1965 की जंग में मात खाने के बाद पाकिस्तान भारत से बदला लेने की योजना बना रहा था। RAW को भनक लग चुकी थी। उसे सरहद पार ऐसे शख्स की तलाश थी, जो पाकिस्तानी फौज की गतिविधियों से आगाह कर सके। RAW की नजर जाकर टिकी- हिदायत खान पर। RAW के अफसर पहले से उनके काम पर नजर रखे हुए थे। एक शाम RAW के कुछ अफसर हिदायत के घर पहुंचे। हिदायत से देश की सुरक्षा का वास्ता देकर मदद मांगी। शुरुआत में हिदायत हिचकिचाए, पर बाद में हामी भर दी। उन्हें ट्रेनिंग दी गई। जल्द ही, हिदायत ने लाहौर, इस्लामाबाद और मुल्तान में अपना जाल बिछा दिया। RAW को सटीक और अहम इनपुट्स मिलने लगे। पत्नी तेज भी इस खतरनाक मिशन में शौहर के साथ खड़ी रहीं। सब कुछ ठीक चल रहा था, फिर एक रोज पता चला कि हिदायत को कैंसर हो गया है। परिवार के साथ-साथ RAW के लिए भी यह बहुत बड़ा सेटबैक था। पूर्व नेवी ऑफिसर हरिंदर सिंह सिक्का अपनी किताब ‘कॉलिंग सहमत’ में लिखते हैं- 'एक रोज RAW के कुछ अफसर हिदायत के घर पहुंचे। कमरे में तेज भी मौजूद थीं। एक अफसर ने हिदायत के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ‘अमेरिका में एक बड़े डॉक्टर से बात की है। तुम वहां जाओ और इलाज कराओ।’ हिदायत ने थकी हुई मुस्कान के साथ सिर हिलाया, ‘मेरा बचना मुश्किल है साहब... अब हमें कोई ऐसा भरोसेमंद इंसान चाहिए, जो मेरी जगह ले सके।’ थोड़ी देर बाद… हिदायत ने आंखें घुमाईं। भारी, कांपती हुई आवाज में तेज की तरफ देखा। ‘हमारी सहमत इस काम के लिए कैसी रहेगी?’ हिदायत के मुंह से अपनी जवान बेटी का नाम सुनते ही तेज सिसकने लगीं। RAW के अफसर बुत बने यह सब देख रहे थे। हिदायत ने तेज के बहते आंसूओं को देखा, लेकिन इरादा नहीं बदला। उन्होंने जोर देकर कहा- 'सहमत मेरा खून है। पाकिस्तान के लोग आसानी से मान लेंगे कि हिदायत की तबीयत बिगड़ने के बाद बेटी कारोबार संभाल रही है। किसी को शक भी नहीं होगा।’ तेज इस फैसले के खिलाफ थी... लेकिन हिदायत की आखिरी इच्छा के सामने, अपना विरोध जता नहीं पाई। इधर, सहमत दिल्ली में अपनी दुनिया में मगन थी। कॉलेज के एक नाटक में उसने मीराबाई का रोल किया था। उसका किरदार सबकी जुबान पर था। अभिनव नाम के एक लड़के को वो पसंद करने लगी थी। दोनों प्यार का इजहार भी कर चुके थे। उस रोज सहमत का आखिरी पेपर था। वह हॉल से निकली ही थी कि एक आदमी उसके पास आया और सीलबंद लिफाफा देकर चला गया। सहमत ने मुस्कुराकर सोचा- ‘अभिनव ने कोई हरकत की होगी, मगर जैसे ही उसकी निगाह लिफाफे पर लिखे भेजने वाले के पते पर गई, वह घबरा गई। कांपते हाथों से उसने लिफाफा खोला। अंदर हवाई जहाज का टिकट था और एक पर्ची, जिस पर लिखा था- ‘जल्द श्रीनगर पहुंचो।’ दिल में एक अनजाना खौफ लिए वह उसी वक्त रवाना हो गई। जब वो श्रीनगर पहुंची, तो मालूम हुआ कि पिता बीमार हैं। बचने की उम्मीद ना के बराबर है। सहमत गुमसुम एक कुर्सी पर सिर झुकाए बैठी थी। अचानक मां की आवाज गूंजी- ‘तुम्हें पाकिस्तान जाना है।’ सहमत का खून जम गया। वह हकलाते हुए बोली, ‘पाकिस्तान… पाकिस्तान क्यों, अम्मी?’ तेज ने आगे बढ़कर सहमत के कांपते हुए कांधे पर हाथ रखा। धीरे से कहा- ‘तुम्हारे पापा पाकिस्तान में बिजनेस के साथ-साथ देश के लिए भी काम करते थे। खुफिया जानकारियां RAW को भेजते थे। अब उनका काम तुम्हें संभालना होगा।' 'पापा का इतना खतरनाक काम मैं कैसे संभाल सकती हूं?' सहमत ने झिककते हुए मां से पूछा। तेज ने समझाते हुए कहा- ‘RAW वाले तुम्हें ट्रेनिंग दे देंगे।’ सहमत खामोश रही। उसके दिल के अंदर एक तरफ अभिनव का चेहरा था, तो दूसरी तरफ पिता का गिरता हुआ साया। उसने लंबी सांस भरी और हिम्मत जुटाकर कहा- ‘मां… मुझे दिल्ली में एक लड़के से मोहब्बत हो गई है। हम एक-दूसरे को जुबान दे चुके हैं। मैं इस तरह पाकिस्तान नहीं जा सकती।’ सहमत को लगा कि मां का दिल पसीज जाएगा, पर तेज का जवाब सुनकर वो बेजुबान सी पड़ गई। तेज ने कहा- ‘बेटा, तुम्हारे बाप ने देश के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया… और तुम इश्क-मोहब्बत के फेर में पड़ी हो। मोहब्बत ही करनी है, तो इस पाक मिट्टी से करो, मुल्क से करो।’ हरिंदर सिंह सिक्का लिखते हैं- ‘सहमत के लिए एक साथ पिता और प्यार, दोनों को खोना किसी सदमे से कम नहीं था, पर वो मां के फैसले का विरोध नहीं कर पाई। वह आखिरी बार अभिनव से मिली। यह जानते हुए भी कि वो जिस मिशन पर जा रही है, उसकी सीक्रेसी ही सबकुछ है, उसने अभिनव को सब बता दिया। एक महीने बाद हिदायत की मौत हो गई। अगला महीना सहमत ने दिल्ली के लाल किले में बिताया। जहां हर रोज उसे 12 घंटे ट्रेनिंग दी जाती थी। ट्रेनिंग पूरी होने के बाद उसकी शादी पाकिस्तान के लाइट इनफेंट्री में कैप्टन इकबाल से कर दी गई। दरअसल, रावलपिंडी के रहने वाले कैप्टन इकबाल के पिता ब्रिगेडियर सईद बंटवारे से पहले हिदायत के क्लासमेट रह चुके थे। दोनों दोस्त थे। ब्रिगेडियर सईद भी इस शादी से खुश थे। उनकी नजर हिदायत की बनाई संपत्ति पर थी, जिसकी इकलौती वारिस सहमत थी।’ वक्त गुजरता गया। अपने कामों से सहमत सईद परिवार पर अपनी छाप छोड़ रही थी। एक बार कराची बंदरगाह पर किसी इंपोर्टर का माल जब्त हो गया। उस पर इतना जुर्माना लगा कि व्यापारी ने उसे लेने से मना कर दिया। सहमत ने कुछ खरीदारों के साथ मिलकर सारा माल खरीद लिया। इस सौदे से सईद के परिवार को मोटा मुनाफा हुआ। इसके बाद ब्रिगेडियर अहम मसलों पर सहमत की सलाह लेने लगे। धीरे-धीरे इन मसलों में पाकिस्तानी सेना के मामले भी शामिल हो गए, लेकिन ब्रिगेडियर का नौकर अब्दुल, शुरुआत से ही सहमत पर शक करता था। उस पर नजर भी रखता था। सहमत अपनी चाल चलना शुरू कर चुकी थी। अब उसे तलाश थी एक ऐसे महफूज ठिकाने की, जहां वो खुफिया ट्रांसमीटर लगा सके। ट्रांसमीटर पर मोर्स कोड के जरिए मैसेज भेजे जाते हैं, जो बीप से चलते हैं। तभी सहमत की नजर ब्रिगेडियर के कमरे में रखे दो बड़े फोटो फ्रेम पर पड़ी। उसने फ्रेम में ट्रांसमीटर सेट कर दिया और वॉशरूम से उसे कंट्रोल करने लगी। उसने वॉशरूम को ऑपरेशन रूम जैसा बना दिया था। वहां से खुफिया जानकारी भेजने के साथ वो इमरजेंसी कॉल भी कर सकती थी। एक रोज की बात है। सूरज ढलने को था। स्टडी रूम में ब्रिगेडियर सईद परेशान हाल में कुर्सी पर बैठे थे। माथे की लकीरें उनकी अंदरूनी घबराहट को साफ बयां कर रही थीं। तभी सहमत चाय की प्याली लेकर कमरे में पहुंची, तो ससुर के चेहरे पर छाई बेबसी को भांप गई। सहमत ने आहिस्ता से प्याली मेज पर रखते हुए पूछा, ‘अब्बू जान, सब खैरियत तो है? आप काफी परेशान लग रहे हैं।’ ‘क्या बताऊं बेटी... यूनिट का एनुअल इंस्पेक्शन सिर पर है। इस बार खुद जनरल कमांडिंग ऑफिसर, यानी जीओसी लेफ्टिनेंट जनरल अमीर खान मुआयना करने आ रहे हैं। बेहद सख्त और क्रूर मिजाज के अफसर हैं। जरा सी चूक हुई कि पूरा करियर तबाह।’ सहमत ने ढांढस बंधाते हुए बड़े भरोसे से कहा, ‘मायूस मत होइए अब्बू जान, मैं कुछ करती हूं। सब ठीक हो जाएगा।’ अगली सुबह, सहमत ने काले रंग का बुर्का ओढ़ा और घर से यह कहकर निकली कि वह नमाज के लिए जामा मस्जिद जा रही है, लेकिन उसकी मंजिल हवेली की नजरों से दूर शहर के एक कोने में बना टेलीफोन बूथ था। सड़क पर नजरें दौड़ाते हुए वह बूथ के भीतर दाखिल हुई, रिसीवर उठाया और दिल्ली का एक खुफिया नंबर घुमा दिया- ‘मुझे जीओसी लेफ्टिनेंट जनरल अमीर खान का पूरा ब्योरा चाहिए। परिवार, शौक, कमजोरियां... मुझे सबकुछ जानना है। कल ठीक इसी वक्त दूसरे बूथ से फोन करूंगी।’ अगले दिन, सहमत एक दूसरे इलाके के टेलीफोन बूथ पर पहुंची। उसने जैसे ही संपर्क साधा, सरहद पार बैठे उसके हैंडलर ने पूरी फाइल तैयार रखी थी। RAW की सीक्रेट फाइलों को खंगालने के बाद जो कड़ियां जोड़ी गई थीं, उनमें जनरल अमीर खान की एक दिलचस्प कमजोरी सामने आई। हैंडलर ने कोड वर्ड में बताया- ‘जनरल खान मछलियों के दीवाने हैं।’ सहमत ने रिसीवर क्रेडल पर रखा और बुर्के के भीतर ही मुस्कुरा दी। अगले दिन सहमत पति के दफ्तर पहुंची। कैप्टन इकबाल ने देखा कि वो दीवार पर लगे नक्शे पर लाल स्याही से घेरे बना रही है। उसने चिल्लाते हुए कहा- इस नक्शे को क्यों बिगाड़ रही हो। अब्बा हुजूर को पता चला, तो नाराज होंगे।’ सहमत बोली- ‘अब्बा हुजूर से ही मिलने आई हूं। आप मुझे वहां ले चलोगे?’ इकबाल कुछ बोल पाता, उससे पहले ही सहमत दफ्तर से निकलकर गाड़ी में बैठ गई। ड्राइवर से कहा- 'मुझे ब्रिगेडियर सईद साहब के दफ्तर ले चलो।' ‘अब्बा हुजूर क्या मैं अंदर आ सकती हूं…’ दरवाजे पर खड़ी सहमत को देखकर ब्रिगेडियर चौंक गए। उन्होंने उसे अंदर बुलाया। सहमत, ब्रिगेडियर को एक दीवार की तरफ ले गई, जिस पर सेना का नक्शा टंगा था। उसने उंगली से इशारा किया कि इंस्पेक्शन यहां से शुरू होगा और यहां खत्म होगा। अगले आधे घंटे तक ब्रिगेडियर उसकी बातों को चुपचाप सुनते रहे। फिर सोचने लगे कि सहमत ठीक ही कह रही है। ऐसा ही करना चाहिए। इंस्पेक्शन वाले दिन ब्रिगेडियर ने जीओसी से कहा- ‘सर हमने ड्रिल में बदलाव किया है। अफसरों के साथ टी ब्रेक झील के पास होगा।’ ‘ ऐसा क्यों किया?’ जीओसी ने गुस्से से पूछा.... ‘सर, इस झील में मछलियां भरी पड़ी हैं। आप खाली वक्त मछली पकड़ने में बिता सकते हैं।’ ब्रिगेडियर ने जवाब दिया। तय दिन पर ड्रिल शुरू हुई। जनरल अमीर खान की नजरें जवानों की परेड से ज्यादा उस झील पर टिकी थीं। जैसे ही उन्होंने पानी में तैरती रंग-बिरंगी मछलियों का झुंड देखा, किसी बच्चे की तरह चहक उठे। उन्होंने तुरंत ब्रिगेडियर सईद की तरफ मुड़कर कहा, ‘सईद साहब! अब कोई इंस्पेक्शन-विंस्पेक्शन नहीं होगा। बस, कुछ जिंदा मछलियां मेरे घर भिजवा दीजिए और बाकी का इंतजाम आज रात के डिनर के लिए रखिए!’ रात ढलते ही जनरल के सम्मान में एक शानदार दावत रखी गई। पूरे डिनर की कमान सहमत ने अपने हाथों में ले रखी थी। उसने शेफ से लेकर परोसने वाले तक, हर चीज पर खुद नजर रखी। मेज पर सजी हर डिश में जनरल की पसंद का ख्याल रखा। स्टार्टर से लेकर मेन कोर्स तक, हर एक निवाले में मछली का लाजवाब जायका था कि जनरल अमीर खान उंगलियां चाटने पर मजबूर हो गए। सहमत की मेहमाननवाजी ने जनरल का दिल जीत लिया था। डिनर के बाद, जनरल अमीर खान सहमत के पास आए। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, ‘माशाल्लाह! तुम्हारी इस आवाभगत ने दिल खुश कर दिया। तुम्हारे परिवार को एक शानदार इनाम मिलना चाहिए।’ सहमत की धड़कनें तेज हो गईं। वह चाहती थी कि उसका कोई अपना, जनरल के बेहद करीब पहुंच जाए, ताकि सेना की सीक्रेट फाइलों तक पहुंच आसान हो सके, लेकिन एक मंझी हुई खिलाड़ी की तरह उसने चेहरे पर कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई और खामोश रही। जनरल ने दोबारा पूछा, ‘संकोच मत करो। जो भी दिल में है, साफ-साफ कह दो। भरोसा रखो, मैं तुम्हें मायूस नहीं करूंगा।’ सहमत ने पलकें झुकाईं, आवाज को बेहद धीमा और संजीदा किया, और बस दो लफ्ज कहे- ‘कैप्टन इकबाल।’ कैप्टन इकबाल यानी सहमत के शौहर। जनरल अमीर खान ने गर्मजोशी से सहमत का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा, ‘बस इतनी सी बात? समझो काम हो गया।’ कैप्टन इकबाल का प्रमोशन हो गया। अब जनरल के दफ्तर की हर हरकत, हर फाइल और हर हलचल अनजाने में ही सही, कैप्टन इकबाल के जरिए सहमत के बेडरूम तक पहुंचने लगी। ***** पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI को भनक लग चुकी थी कि गद्दार ब्रिगेडियर सईद की हवेली में ही है। सहमत जान गई थी कि उसका राज कभी भी खुल सकता है। नौकर अब्दुल को वो रास्ते से हटा चुकी थी। एक रोज उसका सामना शौहर इकबाल से हुआ। इकबाल कुछ कह पाता उससे पहले ही सहमत ने रिवॉल्वर की नोक उसके माथे पर टिका दी। पूरी कहानी कल यानी रविवार को पढ़िए 'जासूस सहमत' पार्ट-2…

दैनिक भास्कर 27 Jun 2026 4:55 am

ईरान की चेतावनी : होर्मुज में नए समुद्री मार्ग बिना तालमेल के सुरक्षित नहीं

होर्मुज स्‍ट्रेट को लेकर ईरान ने साफ कर दिया है कि इस क्षेत्र में सुरक्षित समुद्री आवाजाही के लिए उसके साथ सीधा तालमेल जरूरी है। सुरक्षा को नजरअंदाज करके बनाए गए किसी भी वैकल्पिक रास्ते को वह स्वीकार नहीं करेगा।

देशबन्धु 27 Jun 2026 4:50 am

वियना में भारतीय राजदूत शंभू कुमारन ने की ऑस्ट्रियाई सांसदों के साथ द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा

भारत के ऑस्ट्रिया में राजदूत शंभू एस. कुमारन ने ऑस्ट्रियाई संसद के इंडिया फ्रेंडशिप ग्रुप के सदस्यों से मुलाकात की और दोनों देशों के बीच बढ़ते संबंधों पर चर्चा की।

देशबन्धु 27 Jun 2026 4:40 am

ट्रंप का यूरोप को अल्टीमेटम – डिजिटल टैक्स लगाया तो लगेगा 100% टैरिफ

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फ‍िर 100 प्रत‍िशत टैर‍िफ लगाने की धमकी दी। ट्रंप की यह चेतावनी उन संभावनाओं पर जारी की गई

देशबन्धु 27 Jun 2026 4:00 am

अमेरिका से समझौते के बाद ईरान के परमाणु निरीक्षण को लेकर आईएईए ने शुरू की शुरुआती वार्ता: राफेल ग्रॉसी

अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के महानिदेशक राफेल ग्रॉसी ने कहा कि परमाणु निगरानी संस्था ने ईरानी अधिकारियों के साथ परमाणु निरीक्षण को लेकर शुरुआती बातचीत की है।

देशबन्धु 27 Jun 2026 3:40 am

आज का एक्सप्लेनर:पासपोर्ट-आधार भी नागरिकता का सबूत नहीं, फिर कैसे तय होगा कि आप भारत के नागरिक; क्या NRC की तैयारी है

‘पासपोर्ट एक यात्रा दस्तावेज है, न कि नागरिकता का प्रमाणपत्र।’ विदेश मंत्रालय के अधिकारी का ये बयान सुर्खियों में है। सवाल उठ रहे हैं कि अगर पासपोर्ट नहीं, तो भारत के नागरिक होने का सबूत क्या है? क्या सरकार नागरिकता के लिए कुछ नया करने जा रही है; इसी पर आज का एक्सप्लेनर… सवाल-1: क्या आधार, पैन, जन्म प्रमाणपत्र भी नागरिकता साबित नहीं करते?जवाबः पासपोर्ट की तरह ये सरकारी दस्तावेज भी नागरिकता के सबूत नहीं हैं… आधार कार्ड: आधार एक्ट, 2016 के सेक्शन 9 में कहा गया है कि आधार नंबर नागरिकता और निवास का सबूत नहीं है। आधार जारी करने वाली यूनिक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया (UIDAI) ने भी बार-बार कहा है कि आधार सिर्फ पहचान पत्र है। इलेक्शन कमीशन, कलकत्ता और बॉम्बे हाईकोर्ट का भी यही रुख है। मतदाता पहचानपत्र: जनवरी 2026 में इलेक्शन कमीशन ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि वोटर आईडी नागरिकता साबित नहीं करता, यह सिर्फ वोट देने के लिए है। अगस्त 2025 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी कहा कि वोटर आईडी कार्ड पहचान दस्तावेज है, न कि नागरिकता के सबूत। पैन कार्ड: आयकर अधिनियम, 2025 के तहत कोई भी विदेशी नागरिक या कंपनी, जिनका भारत में कारोबार है या जो यहां टैक्स के दायरे में हैं, वह पैन कार्ड बनवा सकते हैं। यह सिर्फ वित्तीय लेन-देन और टैक्स ट्रैकिंग के लिए है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी साफ किया कि पैन कार्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं है। राशन कार्ड: 2019 में गुवाहाटी हाईकोर्ट और 2024 में दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि राशन कार्ड को नागरिकता का सबूत नहीं माना जा सकता। यह सिर्फ पते और वित्तीय स्थिति का प्रमाण है। जुलाई 2025 में इलेक्शन कमीशन ने भी सुप्रीम कोर्ट में दलील दी थी कि वोटर लिस्ट में शामिल होने के लिए राशन कार्ड को सबूत नहीं माना जा सकता और नागरिकता साबित करने के लिए पुख्ता सबूत मांगे। ड्राइविंग लाइसेंस: ड्राइविंग लाइसेंस केवल पहचान पत्र है, जो वाहन चलाने की इजाजत देता है। मोटर व्हीकल्स एक्ट, 1988 के तहत, भारत में वीजा पर आए विदेशियों को भी ड्राइविंग लाइसेंस जारी किया जाता है। इसका नागरिकता से कोई लेना-देना नहीं। जन्म प्रमाण-पत्र: 2013 में बॉम्बे हाईकोर्ट में कहा कि केवल जन्म प्रमाण पत्र नागरिकता के लिए पर्याप्त नहीं है। ये सिर्फ जन्म की तारीख और जगह का सबूत है। नागरिकता कानून के मुताबिक भी सिर्फ इसे नागरिकता का आखिरी सबूत नहीं माना जा सकता। हालांकि जन्म प्रमाण पत्र और पासपोर्ट को लेकर दो विरोधाभासी बातें भी हैं… सवाल-2: तो फिर कैसे साबित होगा कि आप भारत के नागरिक हैं?जवाबः अगस्त 2025 में यही सवाल लोकसभा में CPI (ML) के सांसद सुदामा प्रसाद ने पूछा था। तब गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने लिखित जवाब दिया कि 1955 के नागरिकता अधिनियम के हिसाब से भारतीय नागरिकता तय होती है। दरअसल, भारत में नागरिकता साबित करने के लिए कोई सिंगल यूनिवर्सल डॉक्यूमेंट जारी नहीं किया जाता। नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2003 के मुताबिक, जन्मतिथि के हिसाब से नागरिकता अलग-अलग दस्तावेजों से तय होती है… हालांकि 1955 के नागरिकता कानून के तहत विदेशी लोगों से जुड़े मामलों में कुछ खास नियमों से नागरिकता दी जाती है… धारा 5, रजिस्ट्रेशन: उन्हें जिनका भारत से कोई जुड़ाव हो। जैसे- कोई विदेशी महिला या पुरुष जो किसी भारतीय से शादी करे।धारा 6, नेचुरलाइजेशन: विदेशी नागरिकों के लिए, जो तय वक्त तक भारत में रहे हों। जैसे- पाकिस्तानी मूल के गायक अदनान सामी को भारतीय नागरिकता मिली। सवाल-3: क्या सरकार नागरिकता का कोई रजिस्टर बनाने वाली है? जवाबः नहीं। फिलहाल ऐसी कोई कवायद शुरू होने की जानकारी नहीं है। हालांकि सरकार काफी समय से पूरे देश में ‘नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजनशिप’ यानी NRC लागू करना चाहती है, लेकिन ये अभी सिर्फ असम में लागू हुआ है। इसे समझने के लिए पहले दो चीजें समझिए…पहला, CAA: 2019 में संसद से सिटिजनशिप एमेंडमेंट एक्ट, यानी CAA पास हुआ। इसके तहत 1955 के नागरिकता कानून में ये प्रावधान शामिल हुआ कि 31 दिसंबर 2014 से पहले पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से भारत आने वाले गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यक, यानी हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई भारत के नागरिक बन सकते हैं। इसमें मुस्लिम प्रवासी शामिल नहीं थे। 11 मार्च 2024 को ये कानून लागू हो गया है। दूसरा, NRC: CAA बिल के साथ ही NRC, यानी ‘नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजनशिप’ की चर्चा शुरू हुई थी। यानी एक ऐसा रजिस्टर, जिसमें देश के सारे नागरिकों का लेखा-जोखा हो। केंद्र सरकार का प्लान था कि पहले CAA लागू होगा, उसके बाद पूरे देश में NRC लागू किया जाएगा। 20 नवंबर 2019 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में कहा, ‘मान के चलिए NRC आने वाला है। हम पूरे देश में NRC पेश करेंगे, इस पर सदन में चर्चा कर सकते हैं। नागरिकता बिल को NRC से जोड़ने की कोशिश न करें।’ बीजेपी के 2019 के घोषणापत्र में भी कहा गया था घुसपैठ से प्रभावित राज्यों और फिर चरणबद्ध तरीके से पूरे देश में NRC लागू किया जाएगा। हालांकि अब तक ऐसा नहीं हुआ है। 2019 में सिर्फ असम में NRC के तहत नागरिकता रजिस्टर बनाया गया। इसके चलते असम में 31 अगस्त 2019 को जारी हुई नागरिकता की लिस्ट में से 19 लाख लोग बाहर हो गए। सवाल-4: सरकार ने अभी तक नागरिकता का रजिस्टर क्यों नहीं बनाया?जवाबः इसकी 3 बड़ी वजहें हैं… 1. NRC का विरोध, सरकार ने अपना एजेंडा बदला 2. असम की NRC लिस्ट वैध नहीं, कई गलतियां निकलीं 3. नागरिकता के रजिस्टर के लिए जनसंख्या का रजिस्टर बनना जरूरी 30 मार्च 2026 को भारत के रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त, मृत्युंजय कुमार नारायण ने साफ कहा है कि जनगणना के दौरान NPR का कोई फैसला नहीं लिया गया है, और न ही आगे जनगणना का NPR से कोई लेना-देना होगा। सवाल-5: दुनिया के दूसरे देशों में नागरिकता कैसे तय होती है?जवाबः दुनिया में नागरिकता तय करने के दो ही प्रमुख सिद्धांत हैं… 1. Jus Soli यानी मिट्टी का अधिकार: जहां पैदा हुए, उसी देश की नागरिकता। माता-पिता की नागरिकता से कोई फर्क नहीं पड़ता। जैसे- अमेरिका, कनाडा, मेक्सिको।2. Jus Sanguinis यानी खून का अधिकार: माता-पिता की नागरिकता से नागरिकता तय होती है, चाहे जन्म कहीं भी हो। जैसे- सऊदी अरब, जापान और चीन। हालांकि भारत समेत तमाम देशों में दोनों सिद्धांतों का मिला-जुला सिस्टम अपनाया जाता है, यानी जन्म के साथ-साथ माता-पिता की नागरिकता भी देखी जाती है। नागरिकता साबित करने वाले दस्तावेज भी दुनिया में अलग-अलग हैं। जैसे- ---- ये खबर भी पढ़ें… भास्कर एक्सप्लेनर- 4 साल, 8 एक्सटेंशन बाद CAA लागू:3-4 करोड़ आबादी पर असर; मुसलमान क्यों डरे हैं, क्या फिर विरोध होगा पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को नागरिकता देने वाला कानून आज से पूरे देश में लागू हो गया। 12 दिसंबर 2019 को राष्ट्रपति ने नागरिकता संशोधन कानून को मंजूरी दी थी। पूरी खबर पढ़ें…

दैनिक भास्कर 26 Jun 2026 6:35 pm

वेनेजुएला में भूकंप से मरने वालों की संख्या हुई 235, राष्ट्रपति ने बचाव और पुनर्निर्माण के लिए जरूरी कदम उठाने के दिए आदेश

वेनेजुएला में बुधवार शाम आए दो शक्तिशाली भूकंपों में मरने वालों की संख्या बढ़कर 235 हो गई है। स्वास्थ्य मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार, मृतकों की संख्या पहले बताए गए 32 से बढ़कर 235 हो गई है।

देशबन्धु 26 Jun 2026 12:22 pm

ताइवान पर अमेरिका का दोहराया भरोसा, हथियार पैकेज समीक्षा में

अमेरिका की ट्रंप सरकार ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि ताइवान को लेकर उसकी लंबे समय से चली आ रही नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है

देशबन्धु 26 Jun 2026 10:45 am

जापान में भारत की राजदूत नगमा मलिक की सीनेट अध्यक्ष से मुलाकात, द्विपक्षीय संबंधों पर हुई चर्चा

भारत की जापान में राजदूत नगमा मलिक ने नेशनल डाइट भवन में सीनेट प्रेसिडेंट सेकिगुची मसाकाजू से शिष्टाचार मुलाकात की। इस वार्ता के दौरान दोनों देशों के बीच संबंधों को और आगे बढ़ाने के तरीकों पर विचार-विमर्श किया गया।

देशबन्धु 26 Jun 2026 8:20 am

तीस्ता नदी पर चीन-बांग्लादेश का 'मेगा एग्रीमेंट': भारत के लिए बढ़ी रणनीतिक चुनौती, क्या है ड्रैगन का नया दांव

तीस्ता नदी जल प्रबंधन को लेकर एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने भारत की सुरक्षा चिंताओं को फिर से हवा दे दी है। चीन और बांग्लादेश ने आधिकारिक रूप से तीस्ता नदी सहित अन्य प्रमुख जल परियोजनाओं के प्रबंधन में आपसी सहयोग को और अधिक गहराई देने पर सहमति जताई है। यह समझौता तब हुआ जब बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की बीजिंग में चीन के जल संसाधन मंत्री ली गुओयिंग के साथ उच्च-स्तरीय मुलाकात हुई। इस साझेदारी के बाद अब चीन की मौजूदगी भारत के बेहद संवेदनशील 'सिलीगुड़ी कॉरिडोर' (चिकन नेक) के करीब और अधिक सघन होने की आशंका जताई जा रही है।चीन का 'तीस्ता प्लान' और सुरक्षा समीकरणचीन पिछले काफी समय से 'तीस्ता नदी व्यापक प्रबंधन और बहाली परियोजना' (Teesta River Comprehensive Management and Restoration Project) में भारी निवेश करने की इच्छा जाहिर कर रहा है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना केवल जल प्रबंधन तक सीमित नहीं है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जो भारत की मुख्य भूमि को उत्तर-पूर्वी राज्यों से जोड़ने वाली एकमात्र कड़ी है, उसके इतने करीब चीन का तकनीकी और बुनियादी ढांचा विकसित होना भारत के लिए रणनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। बीजिंग की इस रुचि को अक्सर 'डेब्ट ट्रैप' और सैन्य विस्तार के प्रयासों के रूप में देखा जाता है।बांग्लादेश को तकनीक और ट्रेनिंग का वादामुलाकात के दौरान, बांग्लादेशी प्रधानमंत्री ने जल संसाधन प्रबंधन, नदी के कटाव को रोकने, सिंचाई तंत्र को मजबूत करने और जल परिवहन को बढ़ावा देने के लिए चीन से तकनीकी और आर्थिक सहायता की मांग की। चीन ने न केवल इन परियोजनाओं में पूरा सहयोग देने का आश्वासन दिया है, बल्कि बांग्लादेशी अधिकारियों को अपने यहां जल प्रबंधन का विशेष प्रशिक्षण देने के लिए भी आमंत्रित किया है। 2005 के द्विपक्षीय समझौतों की नींव पर खड़ी यह नई साझेदारी चीन के लिए दक्षिण एशिया में अपनी पैठ बढ़ाने का एक बड़ा जरिया बन गई है। भारत के लिए अब यह कूटनीतिक और भू-राजनीतिक स्तर पर एक बड़ी परीक्षा होगी कि वह अपने पड़ोसी के साथ इस संवेदनशील मुद्दे को कैसे संभालता है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 26 Jun 2026 7:04 am

'दिल्ली में चुनाव लड़तीं तो लाखों वोटों से जीततीं...': जार्जिया मेलोनी ने अपनी भारत यात्रा के दिलचस्प किस्से को लेकर किया बड़ा खुलासा

इटली की प्रधानमंत्री जार्जिया मेलोनी का भारत के प्रति लगाव किसी से छिपा नहीं है। हाल ही में उनकी नई पुस्तक 'जार्जिया विजन' (Giorgia Vision) बाजार में आई है, जिसमें मेलोनी ने साल 2023 की अपनी भारत यात्रा के दौरान के ऐसे पलों का जिक्र किया है, जो किसी फिल्म के दृश्य जैसे लगते हैं। मेलोनी ने बताया कि जब वह भारत पहुंचीं, तो नई दिल्ली की सड़कों पर उनके स्वागत में लगे पोस्टरों की बाढ़ देखकर न केवल वह, बल्कि उनका प्रतिनिधिमंडल भी दंग रह गया था।दिल्ली की सड़कों पर लगे पोस्टरों ने बदला मूडअपनी पुस्तक में मेलोनी ने याद करते हुए लिखा कि जैसे ही वह दिल्ली की सड़कों से गुजरीं, उन्होंने हर तरफ अपनी तस्वीरों वाले 'वेलकम' पोस्टर देखे। वापसी के समय भी, उन पोस्टरों को 'यात्रा के लिए धन्यवाद' में बदल दिया गया था। इस दृश्य को देखकर इटली के उपप्रधानमंत्री एंतोनियो तजानी ने मजाकिया लहजे में टिप्पणी की, मेलोनी, अगर आप दिल्ली की किसी भी सीट से चुनाव लड़तीं, तो आपको कम से कम 10 लाख वोट तो मिल ही जाते! यह टिप्पणी उस समय उनके साथ मौजूद पूरे दल के लिए हंसी का सबब बन गई थी।'मेलोडी' जोड़ी और कूटनीति का नया अंदाजजार्जिया मेलोनी 2023 में दो बार भारत आईं—पहली बार रायसीना डायलॉग के लिए और दूसरी बार जी20 शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी केमिस्ट्री ने न केवल राजनीतिक गलियारों में, बल्कि सोशल मीडिया पर भी खूब चर्चा बटोरी। इंटरनेट की दुनिया में लोगों ने इस जोड़ी को प्यार से 'मेलोडी' (Meloni + Modi) नाम दिया था। पुस्तक के अध्याय 'हेड हेल्ड हाई अमंग द वर्ल्ड ग्रेट्स' में मेलोनी ने इस बात पर जोर दिया है कि कूटनीति केवल औपचारिक बैठकों और कागजी समझौतों तक सीमित नहीं है, बल्कि नेताओं के बीच के व्यक्तिगत रिश्ते ही विश्व मंच पर सबसे बड़े बदलाव लाते हैं।सिगरेट वाला वो यादगार लम्हाअपनी किताब में मेलोनी ने सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि अन्य वैश्विक नेताओं के साथ बिताए अपने अनौपचारिक पलों को भी साझा किया है। उन्होंने ट्यूनीशिया के राष्ट्रपति कैस सईद के साथ अपनी मुलाकात का जिक्र करते हुए एक दिलचस्प वाकया बताया। जब दो घंटे की लंबी बातचीत के बाद माहौल थोड़ा सहज हुआ, तो उन्होंने सईद से पूछा कि क्या वह सिगरेट पी सकती हैं? मेलोनी के इस सवाल ने माहौल को पूरी तरह बदल दिया और सईद ने भी अपनी सिगरेट निकाली। यह पल उनकी पुस्तक में एक ऐसे मानवीय रिश्ते के रूप में दर्ज है जो औपचारिक सीमाओं को तोड़ देता है। अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस द्वारा लिखित भूमिका वाली यह पुस्तक अब दुनिया भर में चर्चा का विषय बनी हुई है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 26 Jun 2026 7:03 am

ईरान युद्ध पर अपनी ही पार्टी में घिरे डोनाल्ड ट्रंप: रिपब्लिकन सीनेटरों ने की तीखी बहस, 70 अरब डॉलर की मांग से बढ़ी हलचल

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए ईरान के साथ चल रहा तनाव अब केवल बाहरी मोर्चे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह उनकी अपनी रिपब्लिकन पार्टी के भीतर एक बड़े राजनीतिक संकट के रूप में उभर रहा है। बुधवार को बंद कमरे में हुई एक बैठक के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप और रिपब्लिकन सीनेटर बिल कैसिडी के बीच हुई तीखी बहस ने पार्टी के भीतर की दरार को सार्वजनिक कर दिया है। इस टकराव का मुख्य केंद्र ट्रंप प्रशासन द्वारा ईरान युद्ध के खर्च के लिए कांग्रेस से मांगी गई 70 अरब डॉलर की भारी-भरकम राशि और तेहरान के साथ हुई हालिया रूपरेखा समझौते की शर्तें हैं।समझौते पर छिड़ा घमासान: क्या सच छिपाया जा रहा है?सीनेटर बिल कैसिडी ने ट्रंप प्रशासन पर तीखे हमले करते हुए ईरान के साथ हुए उस हालिया समझौते पर स्पष्टीकरण मांगा है, जिसमें तेहरान को वित्तीय प्रोत्साहन देने की बात कही गई है। कैसिडी का स्पष्ट मानना है कि यह समझौता उन लक्ष्यों से काफी पीछे है जो युद्ध शुरू होने के समय प्रशासन ने जनता के सामने रखे थे। उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में दो टूक कहा कि अमेरिकी नागरिकों को सच्चाई जानने का पूरा अधिकार है और फिलहाल जमीनी हालात उन दावों से मेल नहीं खाते जो सरकार द्वारा किए जा रहे हैं। नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के मद्देनजर, यह घरेलू असंतोष ट्रंप के लिए एक बड़ी राजनीतिक चुनौती बनता जा रहा है।सीनेट में देर रात तक चली रस्साकशीट्रंप के साथ बैठक के तुरंत बाद, सीनेट में रिपब्लिकन नेतृत्व ने युद्ध को समाप्त करने से जुड़े 'युद्धाधिकार प्रस्ताव' को रोकने के लिए एक बड़ा दांव खेला। देर रात हुए मतदान में 50 मतों के साथ इस प्रस्ताव को आगे बढ़ने से रोक दिया गया, जबकि 47 सीनेटरों ने इसके समर्थन में वोट डाला। हालांकि, ट्रंप प्रशासन के इस प्रयास के बावजूद उनकी अपनी पार्टी की सीनेटर सुसान कोलिन्स और लिसा मर्कोव्स्की जैसे प्रमुख चेहरों ने डेमोक्रेट सांसदों के साथ खड़े होकर ट्रंप की नीतियों पर सवाल उठाए हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया पर इस मतदान को ईरान के लिए एक कड़ा संदेश करार दिया है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह स्पष्ट है कि ईरान युद्ध के मुद्दे पर व्हाइट हाउस को अपने ही घर में कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 26 Jun 2026 7:01 am

वैश्विक पटल पर ट्रंप की साख को झटका: 76% लोगों ने नेतृत्व पर जताया अविश्वास, जानें क्या है सर्वे की रिपोर्ट

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की वैश्विक लोकप्रियता में भारी गिरावट दर्ज की गई है। प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा जारी एक ताजा सर्वे के नतीजे यह बताते हैं कि दुनिया भर में उनकी नीतियों और उनके नेतृत्व शैली पर भरोसा करने वालों की संख्या बहुत कम हो गई है। सर्वे के आंकड़ों के अनुसार, करीब 76% लोगों ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि उन्हें वैश्विक मामलों को संभालने में ट्रंप के नेतृत्व पर कोई भरोसा नहीं है। यह रिपोर्ट ट्रंप प्रशासन के लिए एक बड़ा कूटनीतिक संकेत है, जो यह दर्शाता है कि उनकी 'अमेरिका फर्स्ट' नीति का असर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी छवि पर पड़ा है।सर्वे में सामने आए चौंकाने वाले आंकड़ेयह व्यापक सर्वे 36 देशों के 42,000 से अधिक लोगों के बीच किया गया, जिसमें ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग में बड़ी कमी देखी गई है। केवल 23% प्रतिभागियों ने ही वैश्विक मामलों के समाधान में ट्रंप पर अपना विश्वास जताया। सर्वे में शामिल 24 देशों में से 16 देशों में ट्रंप के प्रति भरोसा पिछले साल की तुलना में काफी कम हुआ है। खास बात यह है कि किसी भी प्रमुख देश में उनकी लोकप्रियता में बढ़ोतरी दर्ज नहीं की गई है। यूरोप के प्रमुख देशों जैसे जर्मनी, फ्रांस और ग्रीस में भी ट्रंप की रेटिंग अपने निचले स्तर पर पहुंच गई है, जो ट्रांस-अटलांटिक संबंधों में तनाव की ओर इशारा करती है।भारत में ट्रंप का प्रभाव और टैरिफ नीति की असफलताभारत की बात करें तो यहां तस्वीर थोड़ी अलग है, लेकिन गिरावट यहां भी साफ नजर आ रही है। सर्वे में 39% भारतीय प्रतिभागियों ने ट्रंप के नेतृत्व पर भरोसा जताया है, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा 51% था। इसी सर्वे में वैश्विक मामलों पर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के प्रति विश्वास जताने वाले भारतीयों की संख्या 51% रही। ट्रंप प्रशासन की 'टैरिफ नीति' वैश्विक स्तर पर सबसे ज्यादा अलोकप्रिय रही। सर्वे के अनुसार, महज 18% वैश्विक आबादी ने ही इस नीति का समर्थन किया। ब्रिटेन, कनाडा, जापान और जर्मनी जैसे विकसित देशों में तो इस नीति को समर्थन देने वालों का आंकड़ा 20% से भी काफी नीचे रहा। केवल केन्या एक ऐसा देश बनकर उभरा जहां ट्रंप की टैरिफ नीति को बहुसंख्यक लोगों (55%) का समर्थन मिला।

न्यूज़ इंडिया लाइव 26 Jun 2026 6:59 am

आंखों में चाकू घोंप दो, पता नहीं चलता:13 साल में कभी मम्मी-पापा नहीं कहा, दोनों बेटियों को एक ही बीमारी, भारत का पहला केस

कमरे के फर्श पर एक बच्ची बेजान सी पड़ी है। उम्र 13 साल। वो न सुन सकती है, न बोल सकती है और न देख सकती है। आंखों में कोई चाकू भी घोंप दे, तो पलकें नहीं झपकेंगी। दरअसल, उसकी आंखों में किसी के छूने, कुछ चुभने या जख्म का कोई अहसास नहीं होता। बस, कुछ देर आंसू बहते हैं। ये बच्ची रह-रहकर कराहती है, छटपटाती है। सिर घुमाती है और अपने बाल खींचती है। दोनों हाथों से अपना चेहरा टटोलती है। फिर पूरी ताकत से फर्श पर हाथ-पैर पटकने लगती है। अजीब सी आवाज में चीखती है फिर कुछ देर के लिए एकदम चुप हो जाती है। दिन हो या रात, जानवी ऐसे ही छटपटाती रहती है। दरअसल, जानवी के दिमाग, कान और आंखों की नसें आपस में उलझी हुई हैं। या यूं कहें कि गलत जगह जुड़ी हैं। इसका दुनिया में कोई इलाज नहीं है। जानवी की छोटी बहन यानसी को भी यही बीमारी है। दुर्लभ बीमारियों की सीरीज- ‘ऐ जिंदगी’ में मैं नीरज झा पहुंचा हूं राजस्थान के उदयपुर से 90 किमी दूर वीरवा खुर्द गांव। आज कहानी वहीं से… अरावली की पहाड़ियों के बीच बसे गांव में 2 किलोमीटर चलने पर एक घर नजर आया। दरवाजे पर दस्तक देते ही एक बच्ची सामने आई। चेहरा आम लोगों से काफी अलग, हाथ-पैर सूखी टहनी की तरह। सिर का पिछला हिस्सा चपटा। चेहरे पर आंखें दिखती तो हैं, खुलती हैं या नहीं, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। वह बार-बार कमरे में इधर-से-उधर चक्कर काट रही है। अपने दोनों हाथों को जांघों पर जोर-जोर से मार रही है। वो कब, कहां टकरा जाए, गिर जाए, पता नहीं लगता। अपनी भौहों को जोर देकर ऐसे सिकोड़ती है, जैसे कुछ देखने की कोशिश कर रही हो। तभी नरेश चौबीसा आते हैं। ये बच्चियों के पिता हैं। आते ही बोले- ‘ये मेरी छोटी बेटी यानसी है। बोल नहीं सकती है, सुन नहीं सकती। आंखों में भी थोड़ी सी रोशनी है। डॉक्टर कहते हैं कि दिन के उजाले में 20 परसेंट देख पाती है। बड़ी बेटी जानवी तो बस जिंदा लाश है।’ अभी उनकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि पास के एक कमरे से किसी के कराहने की आवाज आने लगी। नरेश बोले- ‘बड़ी बेटी जानवी की आवाज है। चौबीसों घंटे ऐसे ही तड़पती है।’ फिर वो मुझे उस कमरे की ओर ले गए। कमरे में बेड तो है, लेकिन जानवी फर्श पर बेसुध पड़ी है। नरेश आगे बढ़कर उसके दोनों हाथ पकड़ते हैं और गोद में उठाकर आंगन में ले आते हैं। जैसे-तैसे उसे खाट पर बैठाते हैं, लेकिन जानवी चिढ़कर हाथ-पैर झटक देती है। कुछ पल बैठी रहती है और फिर बेसुध होकर खाट पर लुढ़क जाती है। नरेश कहते हैं- ‘छोटी बेटी यानसी को तो फिर भी थोड़ी समझ है। वह हमारे आसपास खेलती-कूदती है। हमें महसूस करती है, लेकिन जानवी पूरी तरह से बेसुध है। उसकी दोनों आंखों को लकवा मार चुका है।' वो अपनी उंगली से बेटी जानवी की आंखें दबाते हुए कहते हैं- ‘देखिए, इसको कुछ महसूस ही नहीं होता है। पलक भी नहीं झपकाती। ऐसे लगता है जैसे पत्थर हो गई हो। इस दौरान, जानवी को अहसास होता है कि कोई अनजान उसके करीब खड़ा है। वह अचानक पूरी ताकत से हवा में हाथ चलाती है और हमें खुद से दूर धकेलने की कोशिश करती है। उसकी आवाज तो नहीं निकल रही है, लेकिन झल्लाहट में आंसू निकल आते हैं। नरेश भावुक हो जाते हैं। कहते हैं- ‘जानवी 13 साल की है और यानसी 10 की। दोनों में से किसी ने आज तक मुझे पापा या मां को मम्मी नहीं कहा। ये सुनने के लिए हमारे कान तरस गए हैं।' 'काश! ये कभी दूसरे बच्चों की तरह जिद करतीं। कहतीं कि पापा मुझे खिलौने चाहिए, मुझे यह खाना है, लेकिन इनके हिस्से में तो कोई जिद नहीं है। जो खिला दो, खा लेती हैं। जो पहना दो, पहन लेती हैं।’ इतने में किचन में काम कर रही उनकी पत्नी अंजना भी आ जाती हैं। नरेश बताते हैं- ‘जून 2012 में हमारी शादी हुई, लव-मैरिज थी। उन दिनों मैं फोटोग्राफी करता था।' 9 नवंबर 2013 को जानवी का जन्म हुआ। तब वो स्वस्थ थी। वजन भी 3 किलो था। 'जब अंजना ने पहली बार उसे दूध पिलाना चाहा, तो नहीं पिया। डॉक्टरों ने सलाह दी कि अभी चम्मच से दूध पिलाओ, एक-दो महीने बाद वह खुद पीने लगेगी। शुरुआती दिनों में वह बिल्कुल आम बच्चों की तरह हाथ-पैर चलाती और हरकतें करती थी।’ जैसे ही एक महीने की हुई, छह-सात घंटे रोने लगी। उदयपुर में डॉक्टरों को दिखाया, लेकिन उसका रोना बंद नहीं हुआ। ‘घरवाले कहते कि बच्चे तो रोते ही हैं, धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा। हालांकि, उसका रोना आम बच्चों जैसा नहीं था। पेट भरकर दूध पिलाने के बाद भी चीख-चीखकर रोती। किसी तरह थपकियां दे-देकर उसे सुलाते थे। जैसे ही उसकी आंख खुलती, फिर रोने लगती।’ ‘ऐसा करते-करते छह महीने बीत गए। अचानक जानवी की दोनों आंखें सुर्ख लाल रहने लगीं। अंदर की ओर धंसने लगीं, गड्ढे पड़ने लगे। हम दोनों डर गए, क्योंकि ऐसा हमने पहले कभी किसी बच्चे के साथ होते हुए नहीं देखा। उसे लेकर उदयपुर भागे। वहां डॉक्टरों ने अहमदाबाद रेफर कर दिया।’ ‘अहमदाबाद में डॉक्टर ने जब उसे देखा, तो एमआरआई करवाया। पता चला कि हमारी बच्ची न सुन सकती है, न बोल सकती है। तब तक यह अंदाजा नहीं था कि वह देख भी नहीं सकती। डॉक्टरों ने उसकी आंखों का इलाज शुरू किया। पहले दोनों आंखों में टांके लगाए और हर 15 दिन में उसकी सर्जरी की।’ ‘इसी जद्दोजहद में दो महीने और बीत गए। अब डॉक्टर कहने लगे- इसकी आंखों की नसें पूरी तरह पैरालाइज्ड हैं, यह कभी नहीं देख पाएगी। इसे क्रेनियल डिसइनरवेशन सिंड्रोम नाम की बीमारी है। यह दुर्लभ बीमारी है, जिसका दुनिया में कोई इलाज नहीं है।’ 'अस्पताल से लौटने के बाद, डॉक्टरों ने हमें जानवी की आंखों में डालने के लिए एक दवा दी थी। कहा था- इसे रोजाना तय समय पर दिन में दो-चार बार डालना, ताकि आंखों में नमी बनी रहे। लेकिन एक दिन हमसे चूक हो गई और वक्त पर ड्रॉप डालना भूल गए।’ 'इसी दौरान जानवी की आंखों में तेज खुजली उठी। वह अपनी उंगलियों से आंखों को ऐसे नोंच रही थी, जैसे उसे खोदकर बाहर निकाल फेंकेगी। शुक्र है, समय रहते हमने उसे देख लिया नहीं तो वह अपनी आंखें निकाल लेती। उस दिन के बाद चाहे जो हो जाए, उसकी आंखों में दवाई डालना नहीं भूलते।' नरेश कहते हैं- 'एक रोज शाम का वक्त था। जानवी बाहर जमीन पर लेटी हुई थी। तभी हवा के तेज झोंके के साथ उड़कर आई ढेर सारी धूल-मिट्टी उसकी आंखों में चली गई, लेकिन उसने पलकें झपकाई तक नहीं। मैंने अपनी उंगलियों से उसकी आंखों को छूकर देखा। उसके चेहरे पर न कोई दर्द था, न कोई हलचल। उस दिन हमें पहली बार अहसास हुआ कि उसकी दोनों आंखें पूरी तरह बेजान हैं।' मैं एक बड़ी कंपनी में सेल्स मैनेजर था। परिवार के साथ विदेश में रहने का सपना था। मेरे कई दोस्त गए हैं, लेकिन मुझे तो बेटियों की वजह से नौकरी छोड़नी पड़ी। हर हफ्ते इन्हें डॉक्टर के पास ले जाना पड़ता है। मन में बस एक आस रहती थी कि काश, कहीं कोई चमत्कार हो जाए। रिश्तेदार और आसपास के लोग कहते थे- ऐसे बच्चों का इलाज करवाकर क्या फायदा, पैसे बहा रहे हो। आप ही बताइए, अपनी औलाद को कैसे तड़पते हुए छोड़ दूं?’ 2016 की बात है। जानवी 3 साल की हो चुकी थी, लेकिन उसकी जिंदगी एक बिस्तर तक सिमटी हुई थी। जहां इस उम्र के बच्चे दौड़ लगाते हैं, वहीं जानवी के पैरों ने जमीन को छुआ तक नहीं था। हम दूसरे बच्चे के बारे में सोचने लगे। कुछ दिनों बाद अंजना गर्भवती हो गई। सब बहुत खुश थे, लेकिन तभी मेरे बड़े भाई का एक्सीडेंट हो गया। वे दो महीनों तक जिंदगी और मौत के बीच झूलते रहे। परिवार अस्पताल के चक्कर काटता रहा। जब गर्भ चार-साढ़े चार महीने का हो गया, तब हमें होश आया कि पहली संतान इस हाल में है, तो कहीं दूसरी के साथ भी ऐसा न हो जाए। तब दोनों जेनेटिक टेस्ट कराने अस्पताल पहुंचे। डॉक्टरों ने कहा कि रिपोर्ट आने में कम से कम आठ महीने लगेंगे। सोचा कि जब तक रिपोर्ट आएगी, तब तक तो बच्चा दुनिया में आ चुका होगा। और इतने दिनों बाद गर्भ को गिराना भी संभव नहीं था। हम कोख में पल रहे बच्चे को मार नहीं सकते थे। सब ऊपर वाले पर छोड़ दिया कि जो होगा, देखा जाएगा। फिर दूसरी बेटी यानसी का जन्म हुआ। यानसी भी 5-6 महीने ठीक रही, लेकिन बाद में उसकी आंखें भी लाल हो गईं। आंखों के नीचे गड्‌ढे हो गए। कॉर्निया सूखने लगा। हालांकि यानसी को थोड़ा जल्दी इलाज मिल गया, इसलिए वह 20 प्रतिशत देख पाती है। कमजोर है, इसकी भी पूरी देखभाल बड़ी बेटी की तरह करनी पड़ती है। बच्चे एक-डेढ़ साल में चलना सीख जाते हैं। इसने 8 साल की उम्र में चलना शुरू किया।’ नरेश रुआंसी आवाज में कहते हैं- ‘पहले हमारा घर यहां से 500 मीटर दूर, बीच गांव में था। वहां गांववालों ने हमें बीमारी से भी गहरे जख्म दिए। कोई कहता- तुम्हारे घर पर बुरा साया है। कोई कहता- यह तुम्हारे पिछले जन्मों को पाप है। ओझा-फकीरों के पास भी बच्चों को लेकर गए, लेकिन कुछ नहीं हुआ।’ आखिर, वहां का घर छोड़कर यहां घर बनाया। बैंक से लोन लेना पड़ा। इसी दौरान, दरवाजे की घंटी बजती है। सामने खड़े दो शख्स नरेश को किसी फंक्शन में चलने के लिए कहते हैं। नरेश जवाब देते हैं- नहीं चल पाऊंगा, कुछ काम है, आप चले जाइए। अंदर आकर नरेश बताते हैं- ‘24 घंटे हम दोनों में से किसी एक को घर पर पहरा देना पड़ता है। जब बच्चे छोटे थे, तो गोद में उठाकर कभी-कभी किसी फंक्शन में चले जाते थे। लेकिन अब चौखट पार करने में भी सोचना पड़ता है।' बेटियों को क्या बीमारी है? कहां इलाज करवा रहे हैं? कितनों को इसका जवाब दें। सो जाना ही छोड़ दिया। मेरी बहन की बेटी, जानवी से 2 महीने बड़ी है। वह घर का काम करती है, लेकिन ये अपने हाथ से खाना भी नहीं खा पाती। हाथ चलते नहीं, निगल पाती नहीं, इसलिए पेस्ट बनाकर खिलाना पड़ता है। हम दोनों ने इनके खाने-पानी का समय तय कर रखा है, क्योंकि दोनों तो भूख लगने पर खाना भी नहीं मांग सकतीं। जब भी घर के सामने से स्कूल बस गुजरती है, तो एक आस जागती है कि काश! मैं भी अपने बच्चों को स्कूल छोड़ने जाता।’ बोलते-बोलते नरेश की आंखें भर आती हैं। वे कहते हैं- ‘जानवी सुन सके इसलिए कॉकलियर इम्प्लांट के लिए सोचा, लेकिन डॉक्टरों ने मना कर दिया। यानसी के लिए भी कोशिश की तो डॉक्टर ने कहा कि 10-15 लाख रुपए खर्च होंगे, कोई भी NGO करवा देगा। जब उसके कान का चेकअप हुआ, तो पता चला कि इम्प्लांट नहीं हो सकता।’ डॉक्टरों ने साफ कह दिया- दो ही रास्ते हैं। इन बच्चियों को ऐसे ही स्वीकार कर लें या 'ब्रेन इम्प्लांट' करा लें। लेकिन ऐसे बच्चों में ब्रेन इम्प्लांट का सक्सेस रेट शून्य है। जान का भी खतरा है। 'हमने यह सोचकर मना कर दिया कि कम से कम बेटियां जिंदा तो रहेंगी। वैसे भी 50 लाख का खर्च उठाने की हैसियत कहां है। इलाज में अब तक 10 लाख से ज्यादा खर्च हो चुके हैं। सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर जैसे-तैसे दिव्यांग कार्ड बनवाया, लेकिन पेंशन के नाम पर महीने के सिर्फ 2400 रुपए मिलते हैं।’ तभी खाट पर लेटी जानवी उठने की कोशिश करती है। अंजना, उसे संभालती हैं और वॉशरूम ले जाती हैं। थोड़ी देर बाद वह लौटती हैं। नरेश कहते हैं- ‘कभी-कभी जब सब सो जाते हैं, तो मैं बेटियों के पास बैठ जाता हूं। सोचता हूं कि ये दोनों क्या सोचती होंगी। क्या कहना चाहती होंगी।’ मेरी पत्नी अंजना तीसरी बार गर्भवती है, सात महीने हो चुके हैं। दो बेटियों की हालत देखने के बाद अब यही उम्मीद है कि आने वाली संतान ठीक हो। इसी आस में हर महीने डॉक्टरों के चक्कर काटते हैं, सारे टेस्ट और चेकअप भी करवा रहे हैं। तीसरे बच्चे को इस दुनिया में लाने का फैसला भी सिर्फ इसलिए लिया कि हमारे जाने के बाद कोई हो, जो इन दोनों का ख्याल रख सके। डॉक्टर का कहना है, इस बार 99% उम्मीद है कि बच्चा बिल्कुल ठीक और सामान्य होगा, लेकिन सच कहूं तो बेटियों को देखकर रूह कांप जाती है- अगर इस बार भी पहले जैसा कुछ हुआ तो…!’ जानवी और यानसी को देखने के बाद बतौर रिपोर्टर मेरे मन में कई सवाल उठने लगे। जवाब पाने के लिए अहमदाबाद स्थित ‘इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन जेनेटिक्स’ पहुंचा। यहां असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. हर्ष शेठ से मुलाकात हुई। उनसे जानवी और यानसी की बीमारी का जिक्र किया। डॉ. हर्ष बताते हैं- 'दोनों बच्चियां क्रेनियल डिसइनरवेंशन सिंड्रोम से पीड़ित हैं। यह भारत का पहला और दुनिया का चौथा मामला है। इसमें बच्चे के दिमाग से चेहरे, आंख, कान और गले तक जाने वाली नस ठीक से विकसित नहीं हो पातीं या गलत जुड़ जाती हैं। GJB2 नाम के जीन की खराबी से ये बीमारी होती है। इसका कोई इलाज नहीं है।' बच्चा जन्म से ही सुन और बोल नहीं पाता। दिमाग का विकास रुक जाता है। चेहरे की नसें इतनी कमजोर होती हैं खाने का पेस्ट बनाकर देना पड़ता है। आंखें अंदर धंस जाती हैं और बच्चा सिर झुकाकर या चीजों को आंख के बेहद करीब लाकर देखता है। लेकिन जानवी-यानसी का केस इससे भी एक स्टेप आगे है। वो तो देख भी नहीं सकती। क्या गर्भ के समय ही इस बीमारी का पता लगाया जा सकता है? डॉ. हर्ष कहते हैं- ‘गर्भावस्था में इसका पता लगाया जा सकता है। यह जेनेटिक और नसों की बीमारी है। इसके लिए एडवांस जेनेटिक टेस्ट कराना पड़ता है। इसे CVS या एमिनियोसेंटेसिस टेस्ट के नाम से जाना जाता है। इससे GJB2 जीन की खराबी को पकड़ा जा सकता है।’ इसके अलावा, गर्भावस्था के दौरान हाई-रिजोल्यूशन फीटल MRI से गर्भ में शिशु की क्रेनियल नसों की गलत बनावट का पता चल सकता है। ------------------------------------- ऐ जिंदगी सीरीज की यह खबर भी पड़ें… 1- उम्र-29, हाइट 3 फीट, खांसने से टूटती हैं हड्डियां:भगवान से हर रोज कहती हूं- मुझसे पहले मेरी बेटी को उठा लेना तखत पर एक लड़की करवट लिए लेटी है। बाल छोटे-छोटे। लंबाई बमुश्किल 3 फीट, लेकिन उम्र 29 बरस। इस लड़की ने आज तक आइसक्रीम नहीं खाई। जानते हैं क्यों? पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- 14 की उम्र में शरीर बना 'पेड़ की छाल’: उठो या बैठो फटने लगती है चमड़ी, मन करता है छीलकर फेंक दूं; देश का अकेला केस दोपहर के 1 बजे हैं। जंगल के ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर कार हिचकोले खा रही है। तेज गर्मी से गला लगातार सूख रहा है। करीब 2 घंटे बाद जंगलों में कुछ झोपड़ियां नजर आती हैं। इन्हीं झोपड़ियों में से एक के सामने हमारी कार रुकी। झोपड़ी के बाहर एक लड़की बेजान सी खड़ी नजर आई। उसकी मटमैली शर्ट और हाफ पैंट के बाहर जितना भी शरीर दिख रहा है, वह बेहद डरावना है। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें…

दैनिक भास्कर 26 Jun 2026 5:02 am

उइगर मुद्दे पर ट्रंप की चुप्पी, शी जिनपिंग संग बैठक बेनतीजा

हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके चीनी समकक्ष शी जिनपिंग के बीच हुई बैठक ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया है

देशबन्धु 26 Jun 2026 3:46 am

सिर्फ शेयर ही क्यों? गोल्ड और डेट का ये कॉम्बो बनाएगा आपको अमीर

आज के दौर में जब शेयर मार्केट कभी रॉकेट बन जाता है तो कभी अचानक धड़ाम से नीचे गिर जाता है, ऐसे में अपने पूरे पैसे को सिर्फ एक ही जगह लगाना समझदारी नहीं है। समझदार निवेशक अब एक नया और सुरक्षित रास्ता चुन रहे हैं, जिसे Multi-Asset Investing कहा जाता है। अगर आप भी अपने निवेश पर बिना बड़ा जोखिम लिए बंपर रिटर्न कमाना चाहते हैं, तो यह स्मार्ट पोर्टफोलियो स्ट्रेटेजी आपके बहुत काम आने वाली है।क्या है मल्टी-एसेट इन्वेस्टिंग का असली गेम?मल्टी-एसेट इन्वेस्टिंग का सीधा सा मतलब है अपने पैसे को किसी एक टोकरी में रखने के बजाय अलग-अलग एसेट क्लास जैसे—इक्विटी (शेयर), डेट (फिक्स्ड इनकम/बॉन्ड्स) और गोल्ड (सोना) में बांट देना। जब शेयर मार्केट में गिरावट आती है, तो अक्सर सोना चमकने लगता है, और डेट फंड्स आपके पोर्टफोलियो को स्थिरता देते हैं। यह कॉम्बिनेशन आपके नुकसान के रिस्क को लगभग ना के बराबर कर देता है और लंबी अवधि में तगड़ा मुनाफा कमा कर देता है।इक्विटी, डेट और गोल्ड का परफेक्ट कॉम्बिनेशन कैसे बनाएं?एक आइडियल और स्मार्ट पोर्टफोलियो बनाने के लिए आपको अपनी उम्र और रिस्क लेने की क्षमता के हिसाब से एसेट्स का चुनाव करना चाहिए। एसेट एलोकेशन के इस नियम को आप आसानी से समझ सकते हैं:इक्विटी (शेयर बाजार): अपने पोर्टफोलियो का 50 से 60 फीसदी हिस्सा अच्छे शेयर्स या म्यूचुअल फंड्स में लगाएं, जो आपको लंबी अवधि में वेल्थ क्रिएशन (तगड़ा रिटर्न) करके देगा।डेट फंड्स (सुरक्षित निवेश): पोर्टफोलियो का 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा डेट या सरकारी बॉन्ड्स में रखें। यह मार्केट के उतार-चढ़ाव के समय आपके पैसों को सुरक्षा देगा और रेगुलर इनकम का जरिया बनेगा।गोल्ड (सोना): कम से कम 10 से 15 फीसदी निवेश सोने (Digital Gold या SGB) में जरूर करें। संकट के समय सोना हमेशा सबसे बेहतरीन ढाल साबित होता है।रीबैलेंसिंग है सबसे जरूरी कदममल्टी-एसेट पोर्टफोलियो बनाने के बाद उसे भूलना नहीं है। साल में कम से कम एक बार अपने पोर्टफोलियो की समीक्षा यानी 'रीबैलेंसिंग' जरूर करें। उदाहरण के लिए, अगर शेयर मार्केट बहुत ज्यादा बढ़ गया है और आपके पोर्टफोलियो में इक्विटी का हिस्सा तय सीमा से ज्यादा हो गया है, तो मुनाफे का कुछ हिस्सा निकालकर उसे गोल्ड या डेट में शिफ्ट कर दें। यही स्मार्ट इन्वेस्टिंग का सबसे बड़ा सीक्रेट है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 26 Jun 2026 12:18 am

विदेश यात्रा पड़ी भारी तो छिन सकता है स्थायी निवास, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

अगर आप अमेरिका में ग्रीन कार्ड होल्डर हैं और आप पर किसी भी तरह का आपराधिक मामला लंबित है, तो अब आपकी अंतरराष्ट्रीय यात्रा आपको भारी मुसीबत में डाल सकती है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ने ग्रीन कार्ड धारकों के लिए इमिग्रेशन के नियमों को बेहद सख्त बना दिया है। 'ब्लांच बनाम लाउ' (Blanch v. Lau) मामले में आए 6-3 के बहुमत के इस फैसले के बाद, सीमा अधिकारी अब लौटने वाले ग्रीन कार्ड धारकों को 'देश में प्रवेश चाहने वाले व्यक्ति' (Applicant for Admission) के रूप में मान सकते हैं, बजाय उन्हें स्वचालित रूप से प्रवेश देने के।क्या है फैसला और क्यों है यह खतरनाक?इस फैसले ने कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन (CBP) अधिकारियों को व्यापक अधिकार दे दिए हैं। अब अधिकारी केवल किसी लंबित आपराधिक आरोप या संदेह के आधार पर ही किसी ग्रीन कार्ड धारक को रोक सकते हैं, उनका ग्रीन कार्ड जब्त कर सकते हैं और उन पर निष्कासन (Deportation) की कार्यवाही शुरू कर सकते हैं। इमिग्रेशन विशेषज्ञों के अनुसार, इसका मतलब यह है कि आपको अमेरिका में प्रवेश करने के लिए अब वह अधिकार नहीं मिलेगा, जो पहले एक स्थायी निवासी को मिलता था। अब आप पर यह साबित करने का बोझ होगा कि आप अमेरिका में रहने के योग्य हैं।दुकान से चोरी जैसा छोटा अपराध भी बन सकता है 'मुसीबत'न्यूयॉर्क के जाने-माने इमिग्रेशन वकील साइरस डी. मेहता ने चेतावनी दी है कि अब आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे किसी भी व्यक्ति के लिए विदेश यात्रा करना जोखिम भरा है। यहां तक कि दुकान से चोरी (Shop-lifting) जैसे मामूली अपराधों के आरोप भी आपकी स्थायी नागरिकता और रोजगार के अधिकारों को खतरे में डाल सकते हैं। मेहता का स्पष्ट कहना है कि जब तक आपका केस पूरी तरह से सुलझ न जाए और आप दोषमुक्त न हो जाएं, तब तक अंतरराष्ट्रीय यात्रा से बचना ही सबसे सुरक्षित विकल्प है।साबित करना होगा खुद को 'निर्दोष'सिएटल की वकील कृपा उपाध्याय ने इस फैसले को इमिग्रेशन के दृष्टिकोण से 'गेम-चेंजर' बताया है। पहले के नियमों में सरकार को आरोपी के खिलाफ आरोप साबित करने होते थे, लेकिन अब स्थिति उलट गई है। यदि आपको सीमा पर हिरासत में लिया जाता है, तो 'निर्दोष साबित करने का बोझ' (Burden of Proof) अब आप पर होगा। यह स्थिति संवैधानिक सुरक्षा को कमजोर करती है और आपको लंबी कानूनी लड़ाई या हिरासत का सामना करना पड़ सकता है।यात्रा से पहले इमिग्रेशन वकील से सलाह लेंरेखा शर्मा-क्रॉफर्ड जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला 'निर्दोष होने की धारणा' को खत्म करता है। यदि आपके खिलाफ कोई भी पुरानी गिरफ्तारी, दोषसिद्धि या अनसुलझा आपराधिक मामला लंबित है, तो एयरपोर्ट जाने से पहले एक बार इमिग्रेशन वकील से कानूनी परामर्श जरूर लें। अमेरिका से बाहर निकलने से पहले यह जान लेना आवश्यक है कि आपकी यात्रा के दौरान आपकी वापसी की राह सुरक्षित है या नहीं। यह फैसला उन हजारों लोगों के लिए एक बड़ा सबक है जो अपनी पिछली गलतियों या लंबित मामलों को नजरअंदाज करके विदेश यात्रा करते हैं।

न्यूज़ इंडिया लाइव 25 Jun 2026 6:14 pm

महाविनाश: 100 साल के सबसे भीषण भूकंप ने तोड़ी वेनेजुएला की कमर, तेल का सबसे बड़ा भंडार होने के बाद भी उबरने में लगेंगे 10 साल से ज्यादा!

वेनेजुएला के इतिहास में 24 जून 2026 की रात एक ऐसे काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गई है, जिसने इस देश को दशकों पीछे धकेल दिया है। रात करीब 10 बजे यारकुय प्रांत की राजधानी सैन फेलिपे के पास रिक्टर स्केल पर 7.2 तीव्रता का पहला शक्तिशाली भूकंप आया। इस भयानक झटके से लोग संभल भी नहीं पाए थे कि महज 40 सेकंड बाद युमारे शहर के पास 7.5 तीव्रता का दूसरा और उससे भी अधिक विनाशकारी भूकंप आया।इन दोनों लगातार आए भूकंपों का केंद्र राजधानी कराकस से लगभग 284 से 293 किलोमीटर पश्चिम में था। इन झटकों ने पूरे वेनेजुएला को मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया है। राजधानी कराकस में कई गगनचुंबी इमारतें और एक प्रमुख बैंक की बिल्डिंग ताश के पत्तों की तरह ढह गई। देश के मुख्य सिमोन बोलिवर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को भारी नुकसान पहुंचा है, जिसके कारण सभी उड़ानें रद्द करनी पड़ी हैं। इसके अलावा ट्रुजिल्लो, काराबोबो, अरागुआ, मिरांडा और ला गुएरा जैसे राज्यों से भी बड़े पैमाने पर तबाही की खबरें आ रही हैं।अमेरिकी जियोलॉजिकल सर्वे (USGS) की शुरुआती और डरावनी चेतावनी के मुताबिक, इस आपदा में 10 हजार से लेकर 1 लाख लोगों की मौत होने की आशंका जताई गई है। लेकिन वेनेजुएला के लिए सिर्फ इंसानी जानों का नुकसान ही एकमात्र संकट नहीं है। सालों से गंभीर आर्थिक तंगहाली झेल रहे इस देश के लिए यह भूकंप एक ऐसा 'तीसरा झटका' है, जिससे बाहर निकलने में देश को कई दशक लग सकते हैं।दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार, फिर भी कंगाल है देशवेनेजुएला का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि इसके पास 303 अरब बैरल तेल का रिजर्व है, जो दुनिया में सबसे बड़ा है और अमेरिका के कुल तेल भंडार से करीब पांच गुना अधिक है। इसके बावजूद गलत नीतियों और प्रतिबंधों के कारण देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह वेंटिलेटर पर है।GDP में ऐतिहासिक गिरावट: साल 2013 से 2025 के बीच वेनेजुएला की जीडीपी (GDP) में लगभग 80% की ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई, जो सोवियत संघ के विघटन के समय आए संकट से भी बदतर है।उत्पादन ठप: जो देश 1998 में हर दिन 35 लाख बैरल तेल निकालता था, उसका उत्पादन 2020 तक गिरकर महज 3.92 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया था।रिकॉर्ड तोड़ महंगाई: साल 2025 में वेनेजुएला में महंगाई दर (Inflation Rate) 475% के पार पहुंच गई, जो दुनिया में सबसे ज्यादा थी। यहां आम आदमी की औसत मासिक आय केवल 100 से 300 डॉलर के बीच है। संयुक्त राष्ट्र (UN) के अनुसार, साल 2025 तक देश की एक-तिहाई आबादी (लगभग 80 लाख लोग) पूरी तरह से मानवीय सहायता पर निर्भर हो चुकी थी।राजनीतिक बदलाव से लौटी थी उम्मीदें, पर किस्मत को कुछ और मंजूर थाइसी साल जनवरी 2026 में वेनेजुएला में एक बहुत बड़ा राजनीतिक यू-टर्न आया था। 3 जनवरी को अमेरिकी सेना द्वारा पूर्व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार किए जाने के बाद, देश की कमान उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज को कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में सौंपी गई। रोड्रिगेज ने कड़े आर्थिक सुधार लागू किए, सरकारी तेल कंपनी PDVSA के एकाधिकार को खत्म किया और विदेशी निवेश के दरवाजे खोल दिए।अमेरिका की शेवरॉन (Chevron), स्पेन की रेप्सोल (Repsol) और इटली की एनी (Eni) जैसी वैश्विक कंपनियों के साथ नए तेल समझौते किए गए, जिससे देश का तेल उत्पादन दोबारा बढ़कर 10 लाख बैरल प्रतिदिन के पार पहुंच गया था। अर्थशास्त्रियों को पूरी उम्मीद थी कि साल 2026 में वेनेजुएला 12.1% की शानदार जीडीपी ग्रोथ दर्ज करेगा। लेकिन इस भीषण भूकंप ने इन सभी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।100 अरब डॉलर के नुकसान की आशंका: अर्थव्यवस्था के बराबर है तबाहीUSGS की PAGER (प्रॉम्प्ट असेसमेंट ऑफ ग्लोबल अर्थक्वेक्स फॉर रिस्पांस) सिस्टम के शुरुआती अनुमानों के अनुसार, इस भूकंप से वेनेजुएला को 10 अरब डॉलर से लेकर 100 अरब डॉलर से भी ज्यादा का आर्थिक नुकसान हो सकता है, जिसकी संभावना 39% तक है। यह विनाशकारी राशि वेनेजुएला की कुल वर्तमान अर्थव्यवस्था के आकार के बराबर है।सबसे बड़ी चुनौती यह है कि देश के पास पुनर्निर्माण (Reconstruction) के लिए फूटी कौड़ी भी नहीं है। वेनेजुएला पहले से ही 170 अरब डॉलर के भारी-भरकम विदेशी कर्ज के नीचे दबा हुआ है। इसके अलावा, तेल की बिक्री से मिलने वाला अधिकांश राजस्व कानूनी दांव-पेच के कारण अमेरिका की निगरानी वाले एस्क्रो खातों में जमा होता है, ताकि कर्जदाता उसे जब्त न कर सकें। ऐसे में कार्यवाहक सरकार के पास राहत कार्यों के लिए वित्तीय संसाधन बेहद सीमित हैं।विशेषज्ञों की बड़ी चिंता: तेल रिफाइनरियों और गैस लाइनों में आग का खतराकैलटेक की प्रसिद्ध भूकंप वैज्ञानिक डॉ. लूसी जोन्स के अनुसार, ऐसे बड़े भूकंपों के बाद केवल इमारतों का गिरना ही एकमात्र खतरा नहीं होता। असली तबाही तब शुरू होती है जब जमीन के नीचे बिछी मुख्य गैस पाइपलाइनें और बिजली के ग्रिड टूट जाते हैं, जिससे पूरे शहर में भीषण आग लग जाती है।चूंकि भूकंप के कारण पानी की सप्लाई लाइनें भी टूट जाती हैं, इसलिए दमकल विभागों के लिए इस आग पर काबू पाना असंभव हो जाता है। इसके अलावा, वेनेजुएला का हेल्थ सिस्टम (अस्पताल और दवाएं) पहले से ही बदहाल है, जिससे हजारों घायलों का इलाज करना एक बड़ी चुनौती होगी। यदि इस आपदा में देश की तेल रिफाइनरियों और ऑयल इन्फ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचता है, तो देश की आय का मुख्य स्रोत (जो कुल राजस्व का 50-60% और जीडीपी का 20% है) पूरी तरह ठप हो जाएगा।अंतिम निष्कर्ष: सामान्य होने में लग जाएंगे 10 से 15 सालआर्थिक और आपदा प्रबंधन विशेषज्ञ इस संकट की तुलना साल 2010 में हैती में आए 7.0 तीव्रता के भूकंप से कर रहे हैं, जिसके 16 साल बीत जाने के बाद भी हैती आज तक पूरी तरह उबर नहीं पाया है।विशेषज्ञों का मानना है कि इस भूकंप के कारण वेनेजुएला की जीडीपी को सीधे 2% से 20% तक का सीधा झटका लगेगा। जब तक वैश्विक समुदाय आगे आकर वेनेजुएला का कर्ज माफ या पुनर्गठित (Debt Restructuring) नहीं करता, बड़े पैमाने पर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहायता नहीं मिलती और देश में राजनीतिक स्थिरता नहीं रहती, तब तक वेनेजुएला को इस महा-संकट से पूरी तरह उबरने और पटरी पर लौटने में कम से कम 10 साल या उससे भी अधिक का समय लग सकता है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 25 Jun 2026 4:11 pm

ईरान पर ट्रंप के एक्शन के समर्थन में उतरे नाटो प्रमुख, बोले- दुनिया की सुरक्षा की जिम्मेदारी निभा रहे अमेरिकी राष्ट्रपति

नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (नाटो) के महासचिव मार्क रूटे ने ईरान के खिलाफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीति और कार्रवाई का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका के कदम ने ईरान को परमाणु हथियार क्षमता हासिल करने से रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। साथ ही, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रंप नाटो और ट्रांस-अटलांटिक गठबंधन के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।

देशबन्धु 25 Jun 2026 12:59 pm

जापान में 6.9 तीव्रता का भूकंप, वेनेजुएला में दोहरे झटकों से बढ़ी तबाही की आशंका

जापान और वेनेजुएला के कुछ हिस्से गुरुवार सुबह भूकंप के तेज झटकों से दहल गए। जापान के उत्तर-पूर्वी हिस्से में गुरुवार सुबह 6.9 तीव्रता का जबरदस्त भूकंप महसूस किया गया, जबकि वेनेजुएला में कुछ मिनटों के भीतर दो बड़े भूकंप आए।

देशबन्धु 25 Jun 2026 12:23 pm

वेनेजुएला में दो शक्तिशाली भूकंपों ने मचाई भारी तबाही, मरने वालों की संख्या 10 हजार के पार होने का अनुमान

वेनेजुएला में एक के बाद एक दो शक्तिशाली भूकंप आए, जिससे राजधानी काराकस में तेज झटके महसूस किए गए। वेनेजुएला में लगातार आए दो भूकंप ने भारी तबाही मचाई है। अधिकारियों ने पुष्टि की है कि कई लोगों की जानें गई हैं, लेकिन उन्होंने मरने वालों की आधिकारिक संख्या जारी नहीं की है। संयुक्त राज्य भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने अनुमान लगाया है कि जिस तीव्रता से भूकंप आया है, उसमें हजारों की संख्या में मौत का आंकड़ा सामने आ सकता है।

देशबन्धु 25 Jun 2026 12:14 pm

वेनेजुएला में कुदरत का भीषण तांडव, 7.5 तीव्रता के भूकंप से मची भारी तबाही

दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला से इस वक्त की बेहद दुखद और बड़ी खबर सामने आ रही है। वेनेजुएला में आज तड़के आए एक बेहद शक्तिशाली और विनाशकारी भूकंप ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई है। रिक्टर स्केल पर इस भूकंप की तीव्रता 7.5 मापी गई है, जो बेहद खतरनाक मानी जाती है। भूकंप के तेज और भीषण झटकों के कारण देश के कई हिस्सों में पल भर में गगनचुंबी इमारतें और रिहायशी मकान ताश के पत्तों की तरह जमींदोज हो गए हैं। अचानक आई इस प्राकृतिक आपदा के बाद पूरे देश में हाहाकार मच गया है और हजारों मौतों की गंभीर आशंका जताई जा रही है।पल भर में मलबे के ढेर में तब्दील हुए कई शहरचश्मदीदों और स्थानीय प्रशासन से मिल रही शुरुआती जानकारी के अनुसार, भूकंप के झटके इतने तेज थे कि लोगों को संभलने तक का मौका नहीं मिला। राजधानी काराकास सहित कई प्रमुख शहरों और कस्बों में सड़कें फट गई हैं, बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा है और बिजली-इंटरनेट जैसी जरूरी सेवाएं पूरी तरह ठप हो गई हैं। कई बहुमंजिला इमारतों के ढहने के कारण उनके मलबे के नीचे बड़ी संख्या में लोगों के दबे होने की खबर है, जिससे स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है।राहत और बचाव कार्य जारी, मलबे से अपनों को तलाश रहे लोगभूकंप की खबर मिलते ही स्थानीय आपदा प्रबंधन टीमें, सेना और राहत कर्मी युद्ध स्तर पर रेस्क्यू ऑपरेशन में जुट गए हैं। मलबे को हटाने और फंसे हुए लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए भारी मशीनरी का इस्तेमाल किया जा रहा है। अस्पतालों में इमरजेंसी घोषित कर दी गई है और घायलों के इलाज के लिए विशेष टीमें तैनात की गई हैं। हालांकि, प्रभावित इलाकों में बार-बार आ रहे आफ्टरशॉक्स (भूकंप के बाद के हल्के झटके) और बिजली गुल होने के कारण बचाव कार्य में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।भौगोलिक और लोकल स्तर पर नुकसान की भयावह स्थितिइस शक्तिशाली भूकंप का केंद्र जिस इलाके में था, वहां के स्थानीय गांवों और कस्बों में सबसे ज्यादा तबाही देखने को मिल रही है। पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन (Landslide) होने से कई संपर्क मार्ग पूरी तरह बंद हो गए हैं, जिससे दूरदराज के क्षेत्रों तक राहत सामग्री और मेडिकल टीमें पहुंचाना एक बड़ी चुनौती बन गया है। अंतरराष्ट्रीय संगठनों और पड़ोसी देशों ने भी इस संकट की घड़ी में वेनेजुएला की मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाए हैं और जल्द ही इंटरनेशनल रेस्क्यू टीमें भी वहां पहुंच सकती हैं।एआई और ग्लोबल सर्च पर दुनिया भर की नजरेंदुनिया भर के आधुनिक एआई सर्च इंजन और जनरेटिव प्लेटफॉर्म्स इस समय वेनेजुएला भूकंप से जुड़ी पल-पल की लाइव अपडेट्स और सुरक्षित ठिकानों की जानकारी यूजर्स तक पहुंचा रहे हैं। ग्लोबल एक्सपर्ट्स का कहना है कि 7.5 तीव्रता का भूकंप आना किसी भी देश के लिए बेहद विनाशकारी होता है। सरकार की ओर से नागरिकों को खुले मैदानों में रहने और जर्जर इमारतों से दूर रहने की सख्त हिदायत दी गई है। आने वाले कुछ घंटे वेनेजुएला के लिए बेहद नाजुक और चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं।

न्यूज़ इंडिया लाइव 25 Jun 2026 12:05 pm

वेनेजुएला में आया दुर्लभ 'डबलट भूकंप': 39 सेकंड के भीतर 7.1 और 7.5 तीव्रता के दो महा-झटकों से दहली धरती; जानें क्या होती है यह खौफनाक घटना

दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला (Venezuela) से प्रकृति के एक बेहद दुर्लभ और खौफनाक रूप की खबर सामने आ रही है। वेनेजुएला में बुधवार को 'डबलट अर्थक्वेक' (Doublet Earthquake) जैसी एक अत्यंत दुर्लभ और जटिल भूकंपीय घटना दर्ज की गई है। इस घटना में एक ही भौगोलिक क्षेत्र के भीतर कुछ ही सेकंड के अंतराल पर एक के बाद एक दो विनाशकारी और शक्तिशाली भूकंप आए, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया।यूनाइटेड स्टेट्स जियोलॉजिकल सर्वे (USGS) के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस दोहरे संकट के चलते वेनेजुएला की राजधानी काराकास (Caracas) सहित कई प्रमुख शहरों में बहुमंजिला इमारतें ताश के पत्तों की तरह हिलने लगीं। भूकंप के इन भीषण झटकों के कारण घबराए हुए लाखों लोग अपनी जान बचाने के लिए घरों और दफ्तरों से निकलकर सड़कों की तरफ भागने लगे।महज 39 सेकंड का फासला और दो महा-विनाशकारी झटकेयूएसजीएस (USGS) की सीस्मिक रिपोर्ट के मुताबिक, वेनेजुएला में आए इस दोहरे भूकंप की टाइमलाइन और तीव्रता बेहद हैरान करने वाली थी:पहला झटका (फोरशॉक): यह भूकंप रिक्टर स्केल पर 7.2 की भीषण तीव्रता का था, जो अंतरराष्ट्रीय समयानुसार 2204 GMT पर आया। इसका मुख्य केंद्र वेनेजुएला के प्रसिद्ध तटीय शहर मोरॉन (Morn) से लगभग 21 किलोमीटर पश्चिम में ज़मीन के भीतर था।दूसरा झटका (मेनशॉक): पहले झटके के ठीक 39 सेकंड बाद, पहले केंद्र से महज 45 किलोमीटर की दूरी पर 7.5 तीव्रता का दूसरा और पहले से भी कहीं अधिक शक्तिशाली मुख्य भूकंप आया।अमेरिकी भूवैज्ञानिकों ने इस पूरी श्रृंखला को डबलट (Doublet) के रूप में वर्गीकृत किया है, जहां 7.5 तीव्रता वाले मुख्य विनाशकारी झटके से एक मिनट से भी कम समय पहले 7.2 तीव्रता का एक अत्यंत शक्तिशाली शुरुआती झटका आया था।गैस सप्लाई बंद; गृह मंत्री बोले- बड़ा हादसा टालने के लिए उठाए कड़े कदमहालांकि राहत की बात यह है कि आपदा प्रबंधन और स्थानीय अधिकारियों ने तुरंत किसी भी नागरिक की मौत की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है, लेकिन कई इलाकों में बुनियादी ढांचे और इमारतों को व्यापक नुकसान पहुंचा है।वेनेजुएला के गृह मंत्री डियोसडाडो कैबेलो ने स्थिति की समीक्षा करने के बाद मीडिया को बताया, देश के कई राज्यों में इमारतें और रिहायशी ढांचे गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हुए हैं। भूकंप के कारण कई जगहों पर अंडरग्राउंड यूटिलिटी लाइन्स प्रभावित हुई हैं। हम नहीं चाहते कि भूकंप के बाद शहरों में गैस रिसाव से जुड़ा कोई दूसरा बड़ा और जानलेवा हादसा हो। उन्होंने जानकारी दी कि एहतियात और सुरक्षा के तौर पर प्रभावित वाले सभी रिहायशी और कमर्शियल इलाकों की मुख्य गैस सप्लाई को तुरंत काट (ब्लाक) दिया गया है।विज्ञान की नज़र से समझें: क्या होता है यह 'डबलट भूकंप'?आम तौर पर जब कोई बड़ा भूकंप आता है, तो उसके बाद छोटे-छोटे झटके आते हैं जिन्हें हम 'आफ्टरशॉक' (Aftershocks) कहते हैं। लेकिन 'डबलट भूकंप' इससे पूरी तरह अलग और कहीं अधिक खतरनाक होता है। भूकंप विज्ञान (Seismology) के अनुसार:समान तीव्रता के दो मुख्य झटके: जब एक ही इलाके या एक ही फॉल्ट सिस्टम के भीतर बेहद कम समय के अंतराल पर दो बड़े भूकंप आते हैं, जिनकी तीव्रता (Magnitude) लगभग एक जैसी या बराबर होती है, तो उसे 'डबलट भूकंप' कहा जाता है।आधुनिक परिभाषा: शुरुआत में वैज्ञानिक केवल उन भूकंपों को डबलट मानते थे जिनकी उत्पत्ति बिल्कुल एक ही पॉइंट (Focus) से होती थी और जिनसे निकलने वाली भूकंपीय तरंगें (Seismic Waves) ग्राफ पर हूबहू एक जैसी दिखती थीं। लेकिन आज, आधुनिक विज्ञान में लगभग एक जैसी क्षमता वाले दो या उससे अधिक मुख्य झटकों के कम समय के अंतराल पर आने को 'डबलट' कहा जाता है।आफ्टरशॉक बनाम डबलट: क्यों यह घटना है ज्यादा खतरनाक?विशेषताआफ्टरशॉक (Aftershocks)डबलट भूकंप (Doublet Earthquake)तीव्रता (Magnitude)मुख्य भूकंप की तुलना में हमेशा बहुत कमजोर और छोटे होते हैं।दोनों या तीनों झटके लगभग समान रूप से शक्तिशाली (जैसे 7.2 और 7.5) होते हैं।समय का अंतरालमुख्य झटके के बाद दिनों, हफ्तों या महीनों तक आ सकते हैं।ये झटके एक-दूसरे के कुछ सेकंड, मिनट या कुछ घंटों के भीतर ही आ जाते हैं।नुकसान की क्षमताकमजोर हो चुकी इमारतों को गिरा सकते हैं, लेकिन क्षमता सीमित होती है।पहले झटके से हिली हुई इमारतें दूसरे समान शक्तिशाली झटके को झेल नहीं पातीं और पूरी तरह जमींदोज हो जाती हैं।वेनेजुएला में आई यह भूकंपीय श्रृंखला 'डबलट' का सबसे सटीक और जीवंत उदाहरण है। यहाँ 7.2 तीव्रता वाले शुरुआती झटके ने पहले जमीन को हिलाया और इससे पहले कि ऊर्जा शांत हो पाती, ठीक 39 सेकंड बाद आए 7.5 तीव्रता के मुख्य झटके ने तबाही को दोगुना कर दिया। भौगोलिक रूप से वेनेजुएला कैरेबियन और साउथ अमेरिकन टेक्टोनिक प्लेटों के जोड़ पर बसा है, जिससे यहाँ इस प्रकार के दुर्लभ फॉल्ट मूवमेंट देखने को मिलते हैं।

न्यूज़ इंडिया लाइव 25 Jun 2026 9:46 am

मोदी-पाशिन्यान वार्ता – भारत-आर्मेनिया रिश्तों को नई मजबूती

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आर्मेनिया के प्रधानमंत्री निकोल पाशिन्यान और उनकी पार्टी को संसदीय चुनावों में जीत की बधाई दी

देशबन्धु 25 Jun 2026 8:30 am

ब्लैकबोर्ड-दूसरे के बच्चे धोखे से मेरी कोख में डाल दिए:शक्ल-सूरत नहीं मिली तो DNA करवाया, आखिर कहां गए मेरे बच्चे

आज ब्लैकबोर्ड में कहानी ऐसे पति-पत्नी की जिनकी दो बेटियां हैं। इन्होंने एकबार फिर मां-बाप बनने का फैसला किया, लेकिन उम्र आड़े आ गई। डॉक्टर ने सलाह दी- ‘IVF आजमाइए।’ डॉक्टर ने पत्नी के एग्स और पति के स्पर्म को लैब में फर्टिलाइज करके भ्रूण को गर्भाशय में ट्रांसफर कर दिया। रोजाना दर्जनों गोलियां और कैप्सूल खाए। दोनों जांघों पर सैकड़ों इंजेक्शन लगे। आखिरकार 9 महीने तकलीफ झेलने के बाद इनके घर जुड़वां बच्चियों ने जन्म लिया। सब बहुत खुश थे, लेकिन रिश्तेदार सवाल उठाने लगे कि इनकी शक्ल-सूरत मां-बाप से काफी अलग है। जब कई लोगों ने बार-बार ये कहा तो पति को शक हुआ- कहीं IVF में गड़बड़ तो नहीं कर दी गई। उसने बच्चियों का डीएनए टेस्ट करवा लिया। आखिर वही हुआ जिसका उन्हें शक था। बच्चियों का डीएनए न तो मां से मैच हुआ न पिता से। अस्पताल में भ्रूण बदल दिए गए। अब मां ने इन्हें 9 महीने अपनी कोख में रखा है इसलिए बच्चों से लगाव तो हैं, लेकिन इससे भी ज्यादा चिंता इस बात की है कि उनके अपने बच्चे कहां हैं।’ ये कहानी है गुड़गांव में रहने वाले मीनू और राहुल राठौर की। सुबह के 10 बजे हैं। गुड़गांव के पालम विहार की सड़कों पर धूप ऐसी चुभ रही है कि मानो दोपहर के 12 बजे हों। आसमान छू रही इमारत के एक चमकते फ्लैट में रहते हैं मीनू और राहुल राठौर। बिल्डिंग के गेट पर पहुंचते ही मैंने राहुल को फोन किया। वो बोले- आप सोसाइटी के क्लब हाउस में हमारा इंतजार करिए। सॉरी, हम आपको घर नहीं बुला सकते। हमारे घर का माहौल ठीक नहीं है ना। कुछ ही देर में धीमें कदमों से दोनों क्लब हाउस आ गए। सबसे पहले नजर मीनू पर पड़ी। मुझे देखते ही वो बेमन मुस्कुराई। चेहरे पर नई मां वाली थकान साफ झलक रही है। राहुल ने उन्हें सहारा देकर कुर्सी पर बैठाया। दोनों का चेहरा भी इतना मायूस, मानो सबकुछ खो गया हो। राहुल के चेहरे से ये साफ है कि कई रातों से सोए नहीं हैं। मैं कुछ पूछती उससे पहले ही वो हाथ जोड़कर कहने लगे- ‘हमारी मदद कर दीजिए, प्लीज। कोई तो तरीका होगा, जिससे हम अपने बच्चों तक पहुंच पाएं। मुझे बस इतना पता चल जाए कि वो ठीक हैं और सही हाथों में हैं। इतनी बड़ी दुनिया में हम अपने बच्चे कैसे तलाशें, कहां तलाशें। पुलिस, अदालत, हेल्थ डिपार्टमेंट, कहीं सुनवाई नहीं हो रही है।’ ये कहते हुए दोनों सुबकने लगे। खुद को संभालते हुए डबडबाई आंखों से मीनू कहती हैं, ‘मुझे बड़ा परिवार पसंद है। इसलिए दो बेटियां होने के बाद, 39 साल की उम्र में मैंने एकबार फिर मां बनने का फैसला किया। दोनों बेटियों के बीच 10 साल का फर्क है। मुझे लगता था कि दुनिया में मां बनना सबसे अच्छी चीज है। नौ महीने तक बच्चे को कोख में रखने का जो अहसास होता है न, उस खुशी की बराबरी किसी चीज से नहीं की जा सकती। जिस दिन से कंसीव किया, उस दिन से मैं केवल शबद, रामायण और गीता का पाठ करती थी। मां बनने की खुशी इतनी ज्यादा थी कि IVF की तकलीफ भी आसानी से झेल रही थी। दरअसल, IVF शुरू करने से पहले क्लीनिक वाले ये कभी नहीं बताते कि प्रोसेस कितना तकलीफदेह है। बस यही बोलते हैं कि शुरुआत के 10-11 दिन परेशानी होगी। बच्चे की खुशी में हर कोई इंजेक्शन लगवाने की तकलीफ 10 से 11 दिन तक हंसकर झेल जाता है। जब 11 दिन के बाद आपके एग्स कलेक्ट किए जाते हैं तो प्रक्रिया और तकलीफ वाली हो जाती है। इसके बाद आप पीछे भी नहीं हट सकते हैं। कई बार तो मेरी तकलीफ देखकर राहुल ने ये तक कह दिया था कि पता नहीं, क्यों हमने IVF का फैसला लिया। मीनू बताती हैं- ‘हर दिन मैं किलो के हिसाब से दवाएं खाती थी। लगातार 4 महीने तक जांघों पर इंजेक्शन लगे। एक दिन दो, फिर अगले दिन तीन, फिर उसके बाद चार। जांघों में थक्के जम गए थे, खाल नीली पड़ गई थी। इतनी बुरी हालत थी कि नर्स कह देती थी, आइसिंग करो ताकि इंजेक्शन लगाने के लिए मसल्स मिल सके। प्रेग्नेंसी के दौरान मैं न तो बैठ सकती थी और न ही चल सकती थी। जिस दिन कमर पर इंजेक्शन लगते, पीठ दर्द के मारे अकड़ जाती। शरीर सुन्न हो जाता था। ये सब सहन करके भी मैं खुश थी, सिर्फ अपने बच्चों के लिए।’ मीनू की आंखों से आंसू भरभराकर बहने लगते हैं। वो राहुल का हाथ पकड़ कर कहती हैं- डिलीवरी का तीसरा दिन था। मैं बेड पर लेटी थी और परिवार के बाकी लोग सोफे पर बैठकर बात कर रहे थे। अचानक मेरे कानों में आवाज आई कि बच्चों का डीएनए होना है। सुनते ही मैं बेहोश हो गई, ICU पहुंच गई। मुझे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि परिवार ने यह फैसला क्यों लिया। दरअसल, छोटी बेटी को देखते ही मेरी ननद को शक हो गया था। उन्हें लगा कि उसके नैन-नक्श परिवार से मिलते नहीं। हालांकि राहुल ने कहा कि ऐसा नहीं है। फिर ननद ने राहुल और मेरी दोनों बड़ी बेटियों की फोटो से बच्चियों की शक्ल मिलाई। सच में वो बच्चियां थोड़ा अलग दिख रही थीं। फिर सभी ने डीएनए टेस्ट का फैसला लिया। मीनू कहती हैं कि पहली रिपोर्ट में पिता के साथ डीएनए मैच नहीं हुआ। दूसरे दिन जो रिपोर्ट आई उसमें मेरे साथ भी मैच नहीं हुआ। रोते हुए वह कहती हैं कि अगर मेरे अकेले के साथ डीएनए मैच हो जाता, तो वो मेरी आखिरी सांस होती। अस्पताल से डिस्चार्ज होकर घर पहुंची तो एंग्जाइटी होने लगी। घबराहट में दौरे आने लगे। बीस दिन तक मैं बेहोशी की हालत में थी। मुझे केवल परिवार का तनाव दिख रहा था। अपना दर्द बताने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं, नर्क भोगा है हमने। मेरा दिमाग सुन्न हो चुका था। ट्रॉमा की वजह से दूध आना बंद हो गया था। बच्चों ने मां का दूध तक नहीं पीया।’ मीनू कहती हैं- ‘मेरी हालत देखकर भांजी चक्कर खाकर गिर गई। परिवार की ऐसी हालत देखकर मैं पत्थर बन गई। आसान नहीं था अपनी आंखों के सामने परिवार को तड़पते और रोते हुए देखना। आज भी यही हालत है। कोई एक फैमिली मेंबर बच्चों को संभालता है, फिर थकान का बहाना बनाकर बच्चा किसी दूसरे को दे देता। खुद बाहर जाकर रोता है, फिर नॉर्मल होकर अंदर आता है। हम लोग बाथरूम में छिपकर रोते हैं। सब रोते हैं, लेकिन एक दूसरे से सूजी हुई आंखे छिपाते हैं।’ राहुल बताते हैं- ‘14 जनवरी 2026 को हमें पता लगा कि बच्चों का डीएनए हम दोनों से मैच नहीं हुआ। तब से लेकर आज तक मैं परिवार संभाल रहा हूं, नए बच्चों को भी देख रहा हूं। उन्हें उनके हिस्से का प्यार देता हूं। मेरी मां अंदर से टूट गई हैं। पापा एकदम चुप हो गए हैं। मीनू और मेरी बहनों का रो-रोकर बुरा हाल है। 12 भाई बहनों में मैं सबसे छोटा हूं। आज तक सभी मुझे छोटा बच्चा ही समझते हैं। पहली बार लग रहा है कि मैं बड़ा हो गया हूं। नर्क दिखा दिया इस सिस्टम ने हमें। पहले तीन महीने पुलिस स्टेशनों के चक्कर लगाते रहे। फिर एंटी ह्युमन ट्रैफिकिंग डिपार्टमेंट, अदालत, मानवाधिकार, महिला और बाल आयोग सब जगह गए, लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं। यहां तक कि 4 जून को अदालत ने पुलिस को जांच करने और बहुत सारे डॉक्यूमेंट्स सीज करने के लिए कह दिया है। फिर भी कोई टस से मस नहीं हो रहा है। हमें पैसे ऑफर किए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि आपके एंब्रियो बनाकर मल्टीपल लड़कियों में इम्प्लांट कर देंगे। ये तो बच्चों की तस्करी है। बार-बार हाथ जोड़कर, आंसू पोंछ कर बस इतना कहते हैं, हमें इतना पता लग जाए कि हमारे बच्चे किसके पास हैं। बात करते हुए राहुल कांपने लगते हैं। कहते हैं कि कल की ही खबर है कि दिल्ली में डॉक्टर बच्चे बेच रहे हैं। अपने बच्चों का ख्याल आता है तो रूह कांप जाती है। घर में चीख पुकार, रोना धोना देखकर थक चुका हूं। हम इतने बदनसीब हैं कि बच्चों के बारे में पता नहीं लगा तो तड़प-तड़प कर मर जाएंगे। न जाने हमारे बच्चे किस हालात में होंगे। यही सोच-सोच कर जान निकल जाएगी। जिंदगी में पहली बार पुलिस स्टेशन, अदालत देखी है। जब तक अपने बच्चों को अपनी आंखों से देख नहीं लेता, तब तक न थकूंगा, न रूकूंगा। इन्हें बताना होगा कि कि मेरे बच्चे कहां है। मैं तनाव में नए बच्चों के साथ वक्त तक नहीं गुजार पा रहा हूं। क्योंकि यह सिस्टम क्रिमिनल है। सुबह मीडिया, पुलिस स्टेशन, रात को घर आता हूं। छह महीने से हम लड़ रहे हैं। यही किसी बड़े नेता के बच्चे होते तो सिस्टम रातों-रात बदल जाता। राहुल कहते हैं कि- मीनू ने 9 महीने बच्चियों को कोख में पाला है। हम उन्हें अपने बच्चे जैसा ही प्यार करते हैं। पूरा परिवार इनके साथ खेलता है। हर महीने इनका जन्मदिन मनाया जाता है। परियों की तरह इन्हें सजाते हैं। हम वो सब कर रहे हैं, जो अपने बच्चे के लिए सोचा था। रात-रात भर इन्हें गोद में लेकर घूमते हैं। बच्चों को उनके हर रिश्ते का प्यार मिल रहा है, जिसके वे हकदार हैं। मेरी मां ने सख्त हिदायत दी है कि इन बच्चों के लिए तुम्हारे प्यार में जरा भी फर्क नहीं आना चाहिए। प्यार बेशक ज्यादा हो जाए, लेकिन कम नहीं होना चाहिए। एक बेटी का नाम चित्रांगदा और दूसरी का दिव्यांगदा रखा है। राहुल कहते हैं कि जब तक इन बच्चियों के मम्मी-पापा नहीं मिल जाते हम ही इनके सबकुछ हैं। कन्यादान तक इनके माता-पिता लेने आते हैं तो हम इन्हें जाने देंगे। नहीं तो मैं इन दोनों को इतना पढ़ाउंगा कि दुनिया देखेगी। मैं चाहता हूं, मेरे बच्चे भी मिल जाएं और मैं इन्हें भी रखूं। मैं सभी को रख लूंगा। आखिरी में मीनू ये कहते हुए कुर्सी से उठकर चली जाती हैं कि मैम, हमारी मदद कोई नहीं कर रहा है। हमारे बच्चे ढूंढ दो। सारे कागजात बदले जा रहे हैं। सारा सिस्टम अस्पताल को बचाने में लगा है। इस बारे में हॉस्पिटल मालिक डॉ. शिवानी सचदेव से बात करने की कोशिश की गई। मैसेज भी किया गया, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। साउथ दिल्ली के डीसीपी अनंत मित्तल ने बताया कि पुलिस इस मामले की जांच कर रही है। जांच प्रभावित न हो, इसलिए ज्यादा जानकारी साझा नहीं कर सकते। नोट- दोनों बच्चियों का नाम बदला हुआ है। -------------------------------- 1- ब्लैकबोर्ड- तानों से परेशान होकर ब्रेस्ट इम्प्लांट करवाया:ऑडिशन वाले कहते थे- तुम्हारा फिगर ठीक नहीं, अब आधी कमाई सर्जरी की EMI में जा रही एकबार मैं ऑडिशन के लिए गई थी। वहां मुझे ट्रायल के लिए एक बिकिनी दी गई। 10-15 मर्दों के सामने जैसे ही बिकिनी पहनकर बाहर आई, तो सब हंसने लगे। कहने लगे- 'अरे मैडम, ये सब आपके लिए नहीं है। आप तो एकदम फ्लैट हैं।' पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- ब्लैकबोर्ड- भाई का अपहरण किया, जिससे जिंदा साबित हो जाऊं: सिंदूर लगाने वाली पत्नी विधवा पेंशन मांगने पहुंची, लेकिन मुझे जिंदा नहीं माना साल 1975। लाल बिहारी 20 साल के थे। शादी के 10 साल बाद अभी-अभी गौना हुआ था और पत्नी घर आई थी। मां ने कहा- गांव की जमीन गिरवी रखकर बैंक से कुछ लोन ले लो। अपना काम-धंधा शुरू करो, वर्ना आगे बाल-बच्चों को कैसे पालोगे? पूरी स्टोरी यहां पढ़ें

दैनिक भास्कर 25 Jun 2026 5:14 am

प्रतिबंध खत्‍म करके और वादों को पूरा करने के बाद ही तय होगी परमाणु मुद्दे की द‍िशा: गरीबाबादी

ईरान ने अपने परमाणु ठिकानों को लेकर रुख स्‍पष्‍ट करते हुए बताया क‍ि अंतिम समझौते और दूसरे पक्ष के ठोस कदमों के बाद ही परमाणु केंद्रों तक पहुंच तय की जाएगी।

देशबन्धु 25 Jun 2026 2:40 am

ईरान शांति वार्ता: कतर और पाकिस्तान की भूमिका पर अमेरिका में उठे सवाल, सीनेटरों ने जताई चिंता

अमेरिकी रिपब्लिकन पार्टी के दो सीनेटरों ने ईरान के साथ युद्धविराम बातचीत में कतर और पाकिस्तान की मध्यस्थ भूमिका पर सवाल उठाए

देशबन्धु 25 Jun 2026 2:37 am

पाकिस्तान: बलूच कार्यकर्ताओं को उम्रकैद की सजा के विरोध में बलूचिस्तान बंद

बलूच यकजेहती कमेटी (बीवाईसी) की नेता माहरंग बलूच समेत कार्यकर्ताओं को उम्रकैद की सजा के विरोध में बुधवार को बलूचिस्तान के कई इलाकों को पूरी तरह बंद रखा गया

देशबन्धु 25 Jun 2026 2:11 am

आज का एक्सप्लेनर:शादी से बचने के लिए सीधे मंगेतर की हत्या, मना क्यों नहीं कर सकी; रोमांटिक पोस्ट डाले, चार सुराग से सुलझी गुत्थी

पुणे शहर से 64 किमी दूर लोहागढ़ किला। 18 जून 2026 की सुबह करीब 10 बजे किले की चोटी से एक चीख गूंजी। गार्ड्स पहुंचे, तो वहां मौजूद 20 साल की सिया ने बताया- मेरा मंगेतर केतन फिसलकर खाई में गिर गया है। सिया ने ही घरवालों को भी फोन किया। अगले दिन इंस्टाग्राम पर लिखा- ‘केतन तुम मुझे मेरे जन्मदिन पर अकेला छोड़ गए। वापस आ जाओ।’ अब पुणे पुलिस ने खुलासा किया है कि केतन की मौत कोई हादसा नहीं, मर्डर था। इसे खुद सिया ने अपने बॉयफ्रेंड के साथ मिलकर अंजाम दिया, क्योंकि वो शादी नहीं करना चाहती थी। आज के एक्सप्लेनर में इस केस की सभी बिखरी कड़ियां जोड़ेंगे, साथ ही जानेंगे कि सिया ने शादी से मना करने की जगह सीधे हत्या क्यों कर दी… पुणे पुलिस को घटना के अगले दिन, यानी 19 जून को 340 फीट गहरी खाई से केतन का शव मिला। लोनावला ग्रामीण पुलिस स्टेशन में एक्सीडेंटल डेथ की रिपोर्ट दर्ज की गई। 20 जून को केतन का अंतिम संस्कार हो गया, लेकिन आगे के घटनाक्रम में पुलिस को 4 बड़े सुराग मिले… पहला सुरागः सिया के हावभाव से केतन की बहन को शक हुआ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 21 जून को सिया केतन के घर पहुंची। केतन की बहन ने पूछा- केतन कैसे गिरा? इस सवाल पर सिया के हावभाव अचानक बदल गए। वो ठीक से जवाब नहीं दे पा रही थी। केतन की बहन को शक हुआ और उसने पिता विशाल अग्रवाल से कहा- भाई अच्छा ट्रेकर है, उसकी मौत एक्सीडेंट नहीं हो सकती। सिया ठीक से जवाब नहीं दे रही। विशाल को भी पहले से शक था कि कुछ तो ठीक नहीं है। इसके बाद विशाल दोबारा पुणे पुलिस से मिले और सिया पर शक जताया। उन्होंने ये भी कहा कि सिया किसी लड़के से बात करती है, उसकी भी जांच की जानी चाहिए। दूसरा सुरागः किले के CCTV फुटेज में गर्मी में हुडी पहने लड़का दिखा पुलिस ने लोहागढ़ किले के सीसीटीवी फुटेज निकाले। इनमें 18 जून के दिन वहां पहुंचे केतन और सिया के आसपास कई बार एक शख्स दिखा। गर्मी का मौसम, ऊपर से किले की चढ़ाई, उसके बावजूद किले की सीढ़ियों के फुटेज में दिखा कि वो हुडी पहने था। पुलिस के मुताबिक, लड़का अपना चेहरा छिपाने की कोशिश कर रहा था। तीसरा सुरागः सिया की एक नंबर पर 2000 से ज्यादा कॉल्स पुलिस ने सिया के कॉल-रिकॉर्ड खंगाले। इनमें एक मोबाइल नंबर पर जनवरी से केतन की हत्या वाले दिन सुबह 7 बजे तक सिया ने 2004 कॉल में करीब 338 घंटे की बातचीत की थी। यानी दोनों रोजाना करीब 11 कॉल्स में 2 घंटे बात करते थे। ये नंबर पुणे के ही एक और व्यापारी परिवार के लड़के चेतन चौधरी का था। चेतन का घर पुणे के उसी इलाके में था, जहां सिया के पिता का ऑफिस है। चौथा सुरागः हत्या वाले दिन चेतन का इंटरनेट पूरे दिन बंद पुलिस को शक था कि किले के CCTV फुटेज में हुडी वाला लड़का चेतन है। हालांकि 18 जून के दिन चेतन के फोन की लोकेशन निकाली गई, तो वो पुणे में उसके ऑफिस की मिली। चेतन के फोन रिकॉर्ड में पुलिस को एक और अजीब चीज मिली। 18 जून को उसके फोन पर कॉल्स तो आ रहे थे, लेकिन उसका इंटरनेट पूरे दिन बंद था। पुलिस पूछताछ के लिए चेतन के ऑफिस पहुंची, तो उसने कहा कि 18 जून को वो ऑफिस में ही था। हालांकि पूछताछ में ऑफिस के एक कमर्चारी ने बताया कि चेतन 18 जून को उसका फोन लेकर गया था। इस नंबर की लोकेशन खंगाली गई, तो पता चला 18 जून को कर्मचारी वाला फोन लोहागढ़ किले में ही था। इससे तस्वीर साफ होने लगी। 22 जून को पुलिस ने चेतन को गिरफ्तार कर लिया। अगले दिन सिया को भी गिरफ्तार कर लिया। पुलिस के मुताबिक, पूछताछ के बाद दोनों ने अपना जुर्म कबूल लिया। पुलिस और केतन के पिता विशाल अग्रवाल के मुताबिक, सिया ने 18 जून के पहले भी दो बार केतन को पहाड़ी पर ले जाकर उसकी हत्या करने का प्लान बनाया था। तीसरी बार में वो कामयाब हो गई। ये पूरी कहानी 11 फरवरी 2026 को केतन और सिया की सगाई के बाद शुरू हुई… 31 मई: सिया को केतन की हत्या का प्लान सूझा 5 जून: किले पर जाने की जिद की, केतन नहीं गया 14 जून: दूसरी कोशिश, धक्का दिया, लेकिन केतन बच गया 18 जून: तीसरी कोशिश में बॉयफ्रेंड के साथ मिलकर धक्का दे दिया पुलिस के मुताबिक, केतन की हत्या के पीछे सिया का मोटिव उससे शादी से बचना था। दरअसल, विशाल अग्रवाल की पुणे में ‘सक्सेस ग्रुप’ नाम से रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन कंपनी है। केतन ने 2023 में अमेरिका के बैबसन कॉलेज से एंटरप्रेन्योरियल स्टडीज में 'मास्टर ऑफ साइंस' किया। उसके बाद सक्सेस ग्रुप में डायरेक्टर के बतौर काम शुरू कर दिया। वहीं सिया कॉमर्स की स्टूडेंट है। पिता पुणे के बड़े मसाला कारोबारी हैं। सिया और केतन के पिता 35 साल से एक-दूसरे को जानते थे। इसलिए दोनों परिवारों ने केतन और सिया की शादी तय कर दी। 11 फरवरी को सगाई हुई और 25 नवंबर को जयपुर के एक पैलेस में 17 करोड़ रुपए के खर्च से दोनों की शादी होनी थी। दोनों परिवारों के पहुंचने के लिए 2 चार्टर्ड प्लेन भी बुक थे। इधर सिया 4 साल से चेतन के संपर्क में थी। चेतन के पिता बाबू लाल चौधरी भी पुणे के बड़े कारोबारी हैं। संदीप सिंह गिल के मुताबिक, दोनों के बीच एक साल से प्रेम संबंध था। इसलिए सिया केतन के साथ शादी से बचना चाहती थी। इसी पैटर्न पर पिछले दिनों 2 और हत्याएं भी हुईं... पार्टनर से पीछा छुड़ाने के लिए सीधे हत्या पर आमादा हो जाने का ये पैटर्न जितना सीधा दिखता है, उतना है नहीं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इसके पीछे 3 अहम साइकोलॉजिकल वजहें हैं… 1. कोई और आसान रास्ता न दिखना: दिल्ली के सर गंगाराम हॉस्पिटल की कंसल्टेंट साइकोलॉजिस्ट डॉ. रोमा कहती हैं कि समाज में समग्र रूप से आपराधिकता बढ़ रही है। युवा बिना परिणाम सोचे एक घातक प्लान बना लेते हैं। उन्हें लगता है कि यही अकेला और आसान रास्ता है। अपने तय टारगेट्स को पूरा करने के लिए वो सही-गलत सोचे बिना अपराध कर जाते हैं। क्राइम के समय वो खुद को सेफ करने का प्लान तो बनाते हैं, लेकिन ये नहीं सोचते कि वो दूसरे का भी बुरा कर रहे हैं। 2. पुराना और अनसुलझा ट्रॉमा: दिल्ली के मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट राशि सहाय के मुताबिक, ‘ऐसी हत्याएं अक्सर किसी पुराने अनसुलझे ट्रॉमा, यानी मानसिक आघात, किसी अधूरी भावनात्मक जरूरत के लिए या खुद की वैल्यू और पहचान न होने की सोच के चलते होती हैं। ये सोच अचानक नहीं, धीरे-धीरे पनपती है।’ 3. तुरंत सजा देने का इरादा: क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. कृति भार्गव के मुताबिक, लोगों को लगता है कि वे हत्या करके अपने दुश्मन को तुरंत सजा दे रहे हैं और इससे उन्हें तुरंत संतुष्टि मिल जाएगी। हिंसा से दूर रहने के लिए इमोशनल मैच्योरिटी की जरूरत होती है और ज्यादातर लोगों में ये नहीं होती। डॉ. कृति भार्गव के मुताबिक, ‘महिलाओं और पुरुषों में हत्या के मोटिव अलग हो सकते हैं। हमेशा नहीं लेकिन आमतौर पर पुरुष ताकत दिखाने, हक जताने या अपमान का बदला लेने के लिए हत्या करते हैं। वहीं महिलाएं खतरा महसूस होने पर, हताश होने पर या लंबे समय से अत्याचार सहने पर हत्याएं करती हैं।’ --------- ये खबर भी पढ़िए… CM विजय, गृहमंत्री शाह से मुलाकात, सैन्य कमांड का दौरा; ट्रम्प के दूत सर्जियो गोर आखिर भारत में कर क्या रहे हैं अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर 22 जून को तमिलनाडु के सीएम विजय थलापति से मिलने चेन्नई पहुंच गए। उससे 4 दिन पहले, 18 जून को गृहमंत्री अमित शाह से दिल्ली में मुलाकात की। 6 महीने में 6 मुख्यमंत्रियों से मिले। दिल्ली के उपराज्यपाल और राजस्थान की डिप्टी सीएम तक से मीटिंग की। भारतीय सेना के पश्चिमी कमान हेडक्वार्टर के दौरे पर तो हंगामा भी हुआ था। पूरी खबर पढ़िए…

दैनिक भास्कर 24 Jun 2026 6:45 pm

अमेरिका-ईरान वार्ता के बाद भी कई मुद्दों पर मतभेद कायम, परमाणु निरीक्षण और जब्त संपत्तियों पर दावों में टकराव

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि वार्ता के दौरान ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम से संबंधित जांच के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनिश्चितकाल तक निरीक्षण की अनुमति देने पर सहमति जताई है। उनके अनुसार, यह समझौता क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

देशबन्धु 24 Jun 2026 11:36 am

वीजा, मास्टरकार्ड, एप्पल पे और गूगल पे जैसे अमेरिकी पेमेंट सिस्टम को चुनौती देगा ईयू

वीजा, मास्टरकार्ड, एप्पल पे और गूगल पे, इन भुगतान प्रणालियों अमेरिकी टेक कंपनियां नियंत्रित करती हैं. यूरोपीय संघ, अपने डिजिटल यूरो से इस सिस्टम को चुनौती देने जा रहा है

देशबन्धु 24 Jun 2026 11:11 am

यूएन महासचिव ने कहा, AI कंपनियां दें बिजली, पानी और जमीन का हिसाब

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेष ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंपनियों से अपने कार्बन उत्सर्जन से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करने की अपील की है

देशबन्धु 24 Jun 2026 11:04 am

भारत-हंगरी पार्लियामेंट्री फ्रेंडशिप ग्रुप गठन की तैयारी, हंगरी की संसद अध्यक्ष से मिले भारतीय राजदूत

हंगरी में भारत के राजदूत अंशुमन गौर ने मंगलवार को वहां की राष्ट्रीय संसद (नेशनल असेंबली) की स्पीकर एग्नेस फॉर्स्टहोफर से मुलाकात की

देशबन्धु 24 Jun 2026 9:03 am

निर्मला सीतारमण और अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल की अहम बैठक, आर्थिक सहयोग बढ़ाने पर जोर

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने नई दिल्ली में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर के नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात कर द्विपक्षीय व्यापार, निवेश और नए विकास अवसरों पर चर्चा की।

देशबन्धु 23 Jun 2026 10:43 pm

लेबनान से नहीं हटेंगे इजरायली सैनिक, अमेरिका-ईरान शांति समझौते से इजरायल को किस बात का डर

पश्चिम एशिया में शांति की बहाली के लिए अमेरिका और ईरान के बीच हुए नए समझौते ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को गहरी चिंता में डाल दिया है। हाल ही में हुए 14-सूत्रीय समझौते (MoU) के बाद जहां दुनिया उम्मीद कर रही है कि तनाव कम होगा, वहीं इजरायल को लग रहा है कि यह समझौता लेबनान में ईरान और उसके सहयोगी हिजबुल्लाह को नई ताकत दे सकता है। इसी आशंका के चलते नेतन्याहू ने स्पष्ट कर दिया है कि इजरायली सेना तब तक दक्षिणी लेबनान से नहीं हटेगी जब तक उन्हें अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए वहां मौजूदगी जरूरी महसूस होगी।क्या है विवाद की जड़?फरवरी 2026 में अमेरिका-इजरायल के संयुक्त हमलों के साथ शुरू हुआ यह संघर्ष अब एक नए कूटनीतिक मोड़ पर है। अमेरिका और ईरान के बीच हुए ताजा समझौता ज्ञापन (MoU) में युद्ध को स्थायी रूप से खत्म करने और लेबनान की क्षेत्रीय अखंडता सुनिश्चित करने की बात कही गई है। हालांकि, इजरायल इसे एक खतरे के रूप में देख रहा है। इजरायली सरकार को शक है कि इस समझौते की आड़ में वाशिंगटन लेबनान में ईरान के प्रभाव को अनजाने में मजबूत कर रहा है, जो भविष्य में इजरायल की सुरक्षा के लिए घातक हो सकता है।इजरायल को सता रहा है इन तीन बड़े खतरों का डरइजरायली रणनीतिकारों और सरकारी सूत्रों का मानना है कि यह समझौता इजरायल की सैन्य क्षमता को सीमित कर सकता है:सैन्य कार्रवाई पर लगाम: अब तक इजरायल हिजबुल्लाह के ठिकानों पर जब चाहे हमला करने को स्वतंत्र था। उन्हें डर है कि अब वाशिंगटन हर हमले पर आपत्ति दर्ज कराएगा और इजरायल की 'ऑपरेशनल फ्रीडम' खत्म हो जाएगी।सैनिकों की वापसी का दबाव: ऐसी रिपोर्ट्स हैं कि ट्रंप प्रशासन इजरायल पर दक्षिणी लेबनान से अपनी सेना हटाने का दबाव बना सकता है, जिसे नेतन्याहू मानने को तैयार नहीं हैं।हिजबुल्लाह को संजीवनी: इजरायल का मानना है कि यह समझौता हिजबुल्लाह के खिलाफ जारी संयुक्त प्रयासों को कमजोर कर रहा है, जिससे आतंकी संगठन को फिर से संगठित होने का मौका मिल सकता है।'बीबी' की बढ़ती बेचैनीसूत्रों के मुताबिक, नेतन्याहू—जिन्हें इजरायल में प्यार से 'बीबी' कहा जाता है—इस समझौते को लेकर बेहद परेशान हैं। इजरायल का तर्क है कि इस अंतरिम समझौते में ईरान के परमाणु कार्यक्रम से ज्यादा खतरनाक 'लेबनान वाला हिस्सा' है। इजरायली सरकार का मानना है कि अमेरिका और ईरान की यह नजदीकी न केवल सुरक्षा संतुलन को बिगाड़ रही है, बल्कि इससे इजरायल की भविष्य की सुरक्षा रणनीति भी दांव पर लग गई है। अब देखना यह है कि क्या ट्रंप प्रशासन इजरायल के इन संदेहों को दूर कर पाएगा या नेतन्याहू अपनी सुरक्षा नीतियों पर अडिग रहेंगे।

न्यूज़ इंडिया लाइव 23 Jun 2026 7:57 pm

'फाइव आइज' की बड़ी चेतावनी, बोले- महीनों में बदल जाएगा दुनिया का डिजिटल माहौल; साइबर रेजिलिएंस पर जोर

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की बढ़ती रफ्तार ने दुनिया भर की सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। दुनिया के पांच सबसे शक्तिशाली देशों के इंटेलिजेंस गठबंधन 'फाइव आइज' (Five Eyes) ने एक साझा बयान जारी कर चेतावनी दी है कि अगली पीढ़ी के AI सिस्टम साइबर सुरक्षा के पूरे परिदृश्य को सालों के बजाय महज कुछ महीनों में बदलकर रख देंगे। यह गठबंधन ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड, यूके और अमेरिका की खुफिया एजेंसियों का समूह है, जिसने सरकारों और निजी कंपनियों को 'साइबर रेजिलिएंस' को तुरंत प्राथमिकता देने की नसीहत दी है।'फ्रंटियर AI' का बढ़ता हुआ आक्रामक रुखफाइव आइज इंटेलिजेंस ओवरसाइट एंड रिव्यू काउंसिल (FIORC) ने अपने बयान में किसी विशेष कंपनी का नाम तो नहीं लिया, लेकिन 'फ्रंटियर AI सिस्टम्स' को लेकर आगाह किया है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ये नए AI मॉडल न केवल साइबर हमलों की रफ्तार और दायरे को बढ़ा रहे हैं, बल्कि उनकी जटिलता को भी एक अलग स्तर पर ले गए हैं। बयान के मुताबिक, AI अब किसी भी सॉफ्टवेयर या नेटवर्क में मौजूद कमजोरियों (Vulnerabilities) को खोजने और उसका फायदा उठाने के बीच के समय (Time-to-exploit) को तेजी से कम कर रहा है।साइबर खतरा अब सिर्फ 'तकनीकी समस्या' नहींखुफिया एजेंसियों ने साफ कहा है कि साइबर जोखिमों को अब केवल एक तकनीकी या आईटी विभाग की समस्या मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। यह अब सीधे तौर पर 'कॉर्पोरेट रिस्क' और शीर्ष नेतृत्व (Leadership) की जिम्मेदारी बन चुकी है। बयान में स्पष्ट किया गया है कि:AI पहले से ही मौजूद है: यह भविष्य की तकनीक नहीं, बल्कि वर्तमान की हकीकत है।लीडरशिप की भूमिका: बोर्ड के सदस्यों और वरिष्ठ अधिकारियों को साइबर सुरक्षा के उपायों को सिर्फ कागजों तक सीमित न रखकर उन्हें वास्तविक घटनाओं के लिए तैयार करना होगा।पुरानी मान्यताओं का त्याग: बदलती तकनीक के साथ कंपनियों को अपनी सुरक्षा नीतियों में हर महीने बदलाव करने के लिए तैयार रहना चाहिए, क्योंकि पुरानी सुरक्षा रणनीतियां बहुत जल्द पुरानी और बेकार हो सकती हैं।कंपनियों के लिए 'फाइव आइज' की कार्ययोजनागठबंधन ने कॉरपोरेट लीडर्स को साइबर हमलों से निपटने के लिए निम्नलिखित कदम उठाने का सुझाव दिया है:जोखिमों का आकलन: अपने संगठनों में AI से उत्पन्न होने वाले नए और जटिल साइबर जोखिमों की नियमित समीक्षा करें।संसाधनों की तैनाती: साइबर सुरक्षा टीमों को पर्याप्त अधिकार और आधुनिक संसाधन मुहैया कराएं।सक्रिय सुरक्षा: केवल एफिशिएंसी बढ़ाने के लिए AI का उपयोग न करें, बल्कि सुरक्षा को मजबूत करने के लिए इसका रणनीतिक और सोच-समझकर इस्तेमाल करें।

न्यूज़ इंडिया लाइव 23 Jun 2026 7:54 pm

ईरान के विदेश मंत्री ने जेडी वेंस को 'इग्नोर' किया या रची गई थी बड़ी रणनीति, 9 घंटे की 'सीक्रेट' बैठक का सच आया सामने

हाल ही में स्विट्जरलैंड में हुई शांति वार्ता के दौरान एक वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गया। फुटेज में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को नजरअंदाज करते हुए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को गले लगाते दिखे। दुनिया भर में चर्चा छिड़ गई कि ईरान ने अमेरिका का सरेआम अपमान किया है। लेकिन अब खुद जेडी वेंस ने इस वायरल वीडियो का 'इनसाइड स्टोरी' खोलते हुए चुप्पी तोड़ी है।वायरल वीडियो का 'कन्फ्यूजिंग' सचजेडी वेंस ने इस वायरल वीडियो के दावों को खारिज करते हुए कहा कि मीडिया को सोशल मीडिया की सनसनीखेज खबरों से आगे देखना चाहिए। उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि ईरानी राजनयिक बेहद उलझाने वाले वार्ताकार होते हैं। वेंस ने खुलासा किया कि सोशल मीडिया पर चल रहे उस 'अपमान' के विवादित फुटेज के ठीक बाद, अमेरिकी और ईरानी प्रतिनिधिमंडल के बीच लगातार 9 घंटे तक मैराथन बैठक चली। उनके अनुसार, कैमरे की कड़वाहट के पीछे कूटनीति की एक गहरी कहानी छिपी थी।9 घंटे की बैठक: होर्मुज और युद्धविराम पर बड़ी डीलकैमरे के सामने दिखी तल्खी के विपरीत, बंद कमरों में हुई 9 घंटे की यह चर्चा बेहद परिणामोन्मुखी रही। वेंस ने बताया कि इस बैठक में मुख्य रूप से दो बड़े मुद्दों पर सहमति बनी है:होर्मुज जलडमरूमध्य: वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए जीवन रेखा माने जाने वाले इस रास्ते को सुरक्षित और खुला रखने के लिए एक नए सिस्टम पर दोनों देश सहमत हुए हैं।लेबनान युद्धविराम: दक्षिणी लेबनान में जारी हिंसा को रोकने और शांति बनाए रखने के लिए सकारात्मक दिशा में बातचीत हुई है।60 दिनों की 'डेडलाइन' और ट्रंप का रुखअमेरिका और ईरान के बीच हुए इस अंतरिम समझौते के लिए 60 दिनों की डेडलाइन तय की गई है। इस दौरान दोनों देशों की तकनीकी टीमें परमाणु कार्यक्रम और अन्य विवादित बिंदुओं पर अंतिम समाधान ढूंढने के लिए काम करेंगी। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस पूरी कूटनीतिक पहल की सराहना करते हुए स्पष्ट किया है कि शांति का रास्ता 'आपसी सम्मान' से होकर गुजरता है।जबकि वेंस अमेरिका लौट आए हैं, बैक-चैनल कूटनीति अभी भी सक्रिय है। यह 9 घंटे की बैठक संकेत देती है कि ईरान और अमेरिका के बीच चल रहा तनाव अब बातचीत की मेज पर सुलझने की ओर अग्रसर है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 23 Jun 2026 7:52 pm

अमेरिका के स्कूल में शर्मनाक कांड: शिक्षिका के प्राइवेट वीडियो से छात्रों ने किया ब्लैकमेल, मांगे बेहतर ग्रेड्स

अमेरिका के जॉर्जिया राज्य के 'अलेक्जेंडर हाई स्कूल' से एक ऐसी घटना सामने आई है जिसने पूरे शिक्षा जगत को झकझोर कर रख दिया है। स्कूल की 25 वर्षीय बायोलॉजी शिक्षिका मारिस निकोल्स पर एक नाबालिग छात्र के साथ शारीरिक संबंध बनाने का गंभीर आरोप लगा है। इस मामले में पुलिस की नई रिपोर्ट ने कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं, जिसमें शिक्षिका के खिलाफ छात्रों की ब्लैकमेलिंग का एंगल भी सामने आया है।क्लोजेट और कार में बनाए शारीरिक संबंधपुलिस रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षिका मारिस निकोल्स पर आरोप है कि उन्होंने स्कूल के क्लासरूम के एक क्लोजेट (स्टोर रूम) में और बाद में अपनी गाड़ी के अंदर छात्र के साथ आपत्तिजनक हरकतें कीं। निकोल्स स्कूल की फुटबॉल टीम की ऑपरेशंस मैनेजर भी थीं, जिसका फायदा उठाकर उन्होंने कथित तौर पर छात्र से नजदीकियां बढ़ाईं। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि शिक्षिका ने छात्रों को कई आपत्तिजनक संदेश और वीडियो भेजे थे, जो बाद में पूरी तरह से अनियंत्रित हो गए।वीडियो लीक का डर और छात्रों की 'ब्लैकमेलिंग'मामले का सबसे हैरान करने वाला पहलू तब सामने आया जब शिक्षिका का एक प्राइवेट वीडियो छात्रों के बीच वायरल हो गया। इसके बाद स्कूल के कुछ अन्य छात्रों ने निकोल्स को ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया। छात्रों ने शिक्षिका पर दबाव डाला कि यदि उन्हें परीक्षा में बेहतर ग्रेड (नंबर) नहीं दिए गए, तो वे उनके 'ओनलीफैंस' (OnlyFans) अकाउंट के आपत्तिजनक वीडियो लीक कर देंगे। इस ब्लैकमेलिंग के चलते मामला और भी गंभीर हो गया और अंततः पुलिस तक पहुंच गया।कानूनी कार्रवाई और अदालती रोकपुलिस ने इस मामले में अब तक 27 अलग-अलग वारंट जारी किए हैं। मारिस निकोल्स पर सबूतों से छेड़छाड़, बाल शोषण और एक स्कूल कर्मचारी द्वारा अनुचित शारीरिक संबंध बनाने जैसी गंभीर धाराएं लगाई गई हैं। फिलहाल निकोल्स जमानत पर बाहर हैं, लेकिन अदालत ने कड़ी शर्तें लागू की हैं। उन्हें अपनी बेटी के अलावा किसी भी अन्य नाबालिग से मिलने की अनुमति नहीं है। बचाव पक्ष के वकील ने उनके 17 वर्षीय भाई से मिलने की अपील की है, जिस पर अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। पुलिस मामले की जांच जारी रखे हुए है, जिसने स्कूल परिसर में छात्रों की सुरक्षा को लेकर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

न्यूज़ इंडिया लाइव 23 Jun 2026 7:50 pm

हिजबुल्लाह को मिला सुरक्षा कवच, ट्रंप की नई रणनीति से बदलेगा पश्चिम एशिया का समीकरण

पश्चिम एशिया की सियासत में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है। अमेरिका और ईरान के बीच स्विट्जरलैंड में हुई परदे के पीछे की बातचीत और हालिया 'सहमति पत्र' (MoU) ने इजरायल के सुरक्षा तंत्र को हिलाकर रख दिया है। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, जिन्हें दुनिया 'बीबी' के नाम से जानती है, इस नए अमेरिकी-ईरानी समीकरण को अपनी सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा मान रहे हैं।नेतन्याहू की चिंता: क्यों 'सीक्रेट डील' पर मचा है बवाल?इजरायल को डर है कि अमेरिका और ईरान की यह नई दोस्ती लेबनान में हिजबुल्लाह के लिए 'सुरक्षा कवच' का काम करेगी। इजरायली सूत्रों के अनुसार, यह समझौता हिजबुल्लाह के खिलाफ इजरायल की सैन्य कार्रवाई की आजादी पर लगाम लगा सकता है। पहले इजरायल लेबनान में जब चाहे हमले करने को स्वतंत्र था, लेकिन अब वाशिंगटन की निगरानी और कड़े सवालों के चलते नेतन्याहू सरकार के हाथ बंध सकते हैं।पुराना vs नया मैकेनिज्म: रणनीतिक फोकस में बड़ा बदलावनवंबर 2024 के पुराने सुरक्षा ढांचे में इजरायल, लेबनान, अमेरिका और फ्रांस जैसे देश बातचीत में सक्रिय थे और इसका मुख्य लक्ष्य हिजबुल्लाह के बुनियादी ढांचे को खत्म करना था। इसके विपरीत, नए अमेरिकी-ईरानी मैकेनिज्म में इजरायल को दरकिनार कर दिया गया है। नया फोकस हिजबुल्लाह को खत्म करने के बजाय केवल इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच सीधी सैन्य झड़पों को रोकने पर है, जो इजरायल के लिए एक बड़ी रणनीतिक हार जैसा है।क्या 'प्रॉब्लम सॉल्वर' ट्रंप संभाल पाएंगे दोस्ती?डोनाल्ड ट्रंप का दावा है कि वे एक 'प्रॉब्लम सॉल्वर' हैं और नेतन्याहू के साथ भी हर समस्या सुलझा लेंगे। हालांकि, अमेरिका के भीतर ही इस समझौते का विरोध शुरू हो गया है। सीनेटर लिंडसे ग्राहम जैसे कट्टर समर्थक भी इसे ऐतिहासिक गलती मान रहे हैं। एक तरफ ईरान अमेरिका से अपनी शर्तें मनवाने में कामयाब दिख रहा है, तो दूसरी तरफ इजरायल के अक्टूबर चुनावों से पहले नेतन्याहू के लिए यह ढिलाई उनकी राजनीतिक छवि के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन गई है।इजरायल का नया संकट: 'ऑपरेशनल फ्रीडम' पर लगामनए समझौते के तहत गठित 'डी-कॉन्फ्लिक्शन सेल' में पाकिस्तान और कतर जैसे मध्यस्थों को शामिल किया गया है। इजरायल का मानना है कि अब वह तभी हमला कर पाएगा जब खतरा 'सिर पर' होगा, जिससे उभरते हुए खतरों को समय रहते खत्म करने की उसकी क्षमता सीमित हो जाएगी। अमेरिका का तर्क है कि ईरान के साथ सीधा चैनल होने से अंततः इजरायल को ही फायदा होगा, लेकिन तेल अवीव के गलियारों में इस पर भारी अविश्वास का माहौल है।अब सबकी नजरें इस पर टिकी हैं कि क्या ट्रंप अपने सबसे पुराने दोस्त नेतन्याहू को संतुष्ट कर पाएंगे या पश्चिम एशिया में सुरक्षा का यह नया संतुलन इजरायल-लेबनान सीमा पर एक नई जंग का आधार बनेगा।

न्यूज़ इंडिया लाइव 23 Jun 2026 7:48 pm

आज का एक्सप्लेनर:CM विजय, गृहमंत्री शाह से मुलाकात, सैन्य कमांड का दौरा; ट्रम्प के दूत सर्जियो गोर आखिर भारत में कर क्या रहे हैं

अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर 22 जून को तमिलनाडु के सीएम विजय थलापति से मिलने चेन्नई पहुंच गए। उससे 4 दिन पहले, 18 जून को गृहमंत्री अमित शाह से दिल्ली में मुलाकात की। 6 महीने में 6 मुख्यमंत्रियों से मिले। दिल्ली के उपराज्यपाल और राजस्थान की डिप्टी सीएम तक से मीटिंग की। भारतीय सेना के पश्चिमी कमान हेडक्वार्टर के दौरे पर तो हंगामा भी हुआ था। आखिर ट्रम्प के खास दूत इतनी भागदौड़ क्यों कर रहे, घोषित एजेंडे से अलग असली मकसद क्या है और क्या भारत को सतर्क रहना चाहिए; समझेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: सर्जियो गोर ने पिछले दिनों किन नेताओं से मुलाकात की? जवाब: सर्जियो गोर अगस्त 2025 में भारत में अमेरिका के राजदूत बनाए गए। शपथ ग्रहण से पहले ही सर्जियो अक्टूबर में भारत दौर पर आए। तब पीएम मोदी, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, NSA अजित डोभाल से मुलाकात की। नवंबर में ट्रम्प ने सर्जियो को शपथ दिलाई और जनवरी 2026 में उन्होंने भारत आकर कामकाज संभाला… 11 फरवरी को पूर्व विदेश सचिव और राज्यसभा सांसद हर्षवर्धन श्रृंगला ने दिल्ली में सर्जियो गोर के सम्मान में एक डिनर पार्टी रखी थी। इसमें कई सांसद और दिग्गज नेता शामिल हुए। इसकी भी चर्चा रही थी। सवाल-2: सर्जियो के किन संवेदनशील जगहों के दौरे पर विवाद हुआ? जवाबः भारत में सर्जियो के कुछ दौरों पर विवाद हुआ... 1. सेना की पश्चिमी कमान के हेडक्वार्टर का दौरा 2. डिफेंस, स्पेस रिसर्च और एटॉमिक सेंटर का दौरा सर्जियो गोर को भारत में काम-काज संभाले अभी सिर्फ 6 महीने हुए हैं। वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला लिखते हैं, 'गोर को सिर्फ विदेशी राष्ट्रपति का नामित दूत नहीं, बल्कि सत्ता के हर गलियारे में बेरोक-टोक पहुंचने वाला अमेरिकी वायसराय समझा जा सकता है।' सवाल-3: क्या सर्जियो गोर भारत में कुछ ज्यादा ही भागदौड़ मचा रहे हैं? जवाब: 1961 के अंतर्राष्ट्रीय कानून ‘वियना कन्वेंशन ऑन डिप्लोमैटिक रिलेशंस’ के आर्टिकल-3 में राजदूतों के 5 घोषित काम हैं… भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल बताते हैं कि किसी भी राजदूत का काम होता है की अपने देश के हितों को दूसरे देश की लीडरशिप तक पहुंचाए। द्विपक्षीय रिश्तों को मजबूत करे। समझौतों को आगे बढ़ाए। कई बार अपनी लीडरशिप के सख्त संदेशों को आसानी से दूसरे देश तक पहुंचाना होता है। हालांकि वियना कन्वेंशन के आर्टिकल 41 में लिखा है कि राजनयिक इन ड्यूटीज के दौरान दूसरे देश के कानून का सम्मान करेंगे और उसके अंदरूनी मामलों में दखल नहीं देंगे। सर्जियो भारत में जिस तेजी से एक्टिव हैं, वैसा आमतौर पर देखने को नहीं मिलता। उन्होंने द्रौपदी मुर्मु को अपना परिचय पत्र देने से पहले ही अपना कार्यभार संभाल लिया था। प्रभु चावला लिखते हैं, ‘यूरोप, जापान, चीन और रूस के राजदूत दिल्ली में छिपे हुए से रहते हैं। सिर्फ औपचारिक बैठकों और हाथ मिलाने तक ही सीमित रहते हैं। गोर से पहले के अमेरिकी राजदूत एरिक गार्सेटी भी एनर्जेटिक होने के बावजूद, संयमित थे। उनके दौर में राजकीय दौरे तो होते थे, लेकिन गोर की तह सैन्य दौरे, उद्योगपतियों से मेलजोल और सांसदों का मिलना-जुलना कभी नहीं होता था।' अमेरिकी जियो-पॉलिटिकल स्ट्रैटेजिस्ट अल मेसन मानते हैं कि आज इंडो-पेसिफिक रीजन ग्लोबल स्ट्रैटजी तय कर रहा है और भारत इसमें अहम भूमिका में है। ऐसे में ट्रम्प ने अपने खास सिपहसलार सर्जियो को दिल्ली भेजा है। सवाल-4: क्या सर्जियो की इस भागदौड़ के पीछे असली मकसद कुछ और है?जवाबः किसी देश के राजदूत के कुछ अघोषित काम भी होते हैं। मसलन- अमेरिकी दूतावासों पर मेजबान देश की जासूसी के आरोप भी लगते रहे हैं। मैगजीन द डिप्लोमैट के मुताबिक, कई बार तो अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA के एजेंट्स को दूतावासों में तैनात किया जाता है। यहां वे जासूसी करके अपने देश तक संवेदनशील जानकारी पहुंचाते हैं। 11 नवंबर 2025 को जब सर्जियो ने शपथ ली, तब ट्रम्प ने कहा था, ‘मुझे सर्जियो पर पूरा भरोसा है। वे हमारे सबसे अहम इंटरनेशनल रिलेशंस में से एक भारत के साथ रिश्ते को मजबूत करेंगे।’ हालांकि तब अमेरिका के पूर्व NSA जॉन बोल्टन ने भारत से जुड़ा कूटनीतिक अनुभव न होने के चलते सर्जियो को अयोग्य बताया था। कहा था कि सर्जियो ऐसे ठेठ हैं, जो बारीकियां समझने के बजाय वफादारी साबित करने में माहिर हैं। दक्षिण एशियाई मामलों के जानकार माइकल कुगेलमैन ने तो सर्जियो को ट्रम्प प्रशासन में भारत की कानाफूसी करने वाला कहा था। सर्जियो के मकसद को 3 कैटेगरी में बांट सकते हैं… 1. खुद की राजनीतिक साख बढ़ाना 2. भारत में अमेरिकी एजेंडा फैलना 3. सब-डिप्लोमेसी और निवेश बढ़ाने की कोशिश सवाल-5: इसमें भारत के लिए कोई चिंता की बात तो नहीं? जवाब: विवेक मिश्र कहते हैं कि सर्जियो भले ट्रम्प के बेहद करीबी हों, लेकिन बतौर राजदूत उनके अधिकार सीमित हैं। वे भारत की पॉलिटिकल और फॉरेन पॉलिसी में दखल नहीं कर सकते। BHU में यूनेस्को चेयर फॉर पीस के प्रोफेसर और 45 सालों तक अमेरिकी राजदूतों के साथ काम कर चुके प्रो. प्रियंकर उपाध्याय मानते हैं कि सर्जियो गोर की एक्टिविटी को शक की नजर से नहीं देखना चाहिए। उपाध्याय कहते हैं, 'अगर चीन या पाकिस्तान के राजदूत इतना एक्टिव होते, तो शक की बात होती। बीते कुछ दशकों में भारत के पॉलिटिकल और डिप्लोमैटिक गलियारों में ये सामान्य हो चुका है कि अमेरिकी राजदूत नेताओं और अधिकारियों से मिलते हैं। कई बार तो वे खुद जनता के बीच जाना चाहते हैं।' हालांकि प्रभु चावला कहते हैं, ‘सर्जियो ने राजदूत की भूमिका को घुमंतू उप-राजशाही में बदल दिया है। इसका बड़ा खतरा है। इस कल्चर को बढ़ावा देकर, भारतीय पावर स्ट्रक्चर में अपनी पैठ बनाकर सर्जियो इस साख को मजबूत कर रहे हैं कि भारत अमेरिका की धुन पर नाचता है। अगर कोई दूत, उस संस्था से ऊपर हो जाए, जिसकी सेवा करने का वह दिखावा करता है, तो वो मेजबान देश की संप्रभुता से समझौता करने लगता है।’ कंवल सिब्बल मानते हैं कि सर्जियो की हरकतों पर भारत को चिंता करने की जरूरत है। सर्जियो भारत के फैसलों को प्रभावित करने के लिए लामबंदी कर रहे हैं। हाल ही में चर्चा शुरू हुई कि भारत पाकिस्तान से बात करे, इसके पीछे कहीं न कहीं अमेरिकी लॉबी है। --------------- ये भी खबर पढ़िए… अमेरिका-ईरान जंग में कौन जीता, क्या पाकिस्तान नहीं, कतर ने करवाई डील, पेट्रोल-डीजल कब सस्ता होगा; 7 सवालों में पूरी कहानी 107 दिनों की तबाही के बाद आखिरकार अमेरिका और ईरान जंग खत्म करने को राजी हैं। रविवार को ट्रम्प ने लिखा- समझौता हो गया। ईरान ने भी बयान जारी किया। दोनों देश ने MoU पर साइन भी कर दिया। पूरी खबर पढ़िए…

दैनिक भास्कर 23 Jun 2026 7:15 pm

ईरान-अमेरिका डील के बाद भी सुलग रहा गाजा: सीजफायर के बाद भी 3200 से ज्यादा बार खूनी झड़प, 64% इलाके पर इजरायल का कब्जा

पश्चिम एशिया से एक बेहद परेशान करने वाली और बड़ी खबर सामने आ रही है। ईरान और अमेरिका के बीच समझौते के बाद दुनिया ने राहत की सांस जरूर ली थी कि शायद अब महायुद्ध का खतरा टल जाएगा, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। गाजा पट्टी में बेकसूर लोगों और बच्चों की मौतों का सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है। 10 अक्टूबर 2025 को हुए आधिकारिक सीजफायर (युद्धविराम) के ऐलान के बाद भी गाजा में लगभग हर दिन रॉकेट और गोलियां बरस रही हैं। इजरायली सेना और हमास के बीच युद्ध विराम की घोषणा के बावजूद, 9 जून 2026 तक सीजफायर उल्लंघन के 3,201 से अधिक मामले दर्ज किए जा चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया नेटवर्क अल जजीरा की एक खोजी रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायल ने युद्धविराम के पिछले 243 दिनों में से 218 दिनों तक गाजा पर एक्टिव हमले किए हैं। पूरे आठ महीनों में सिर्फ 25 दिन ही ऐसे रहे, जब गाजा से खूनखराबे की खबर नहीं आई।गाजा के सरकारी मीडिया कार्यालय की रिपोर्ट के अनुसार, इजरायली सैनिकों ने तय 'येलो लाइन' को पार कर रिहायशी बस्तियों में 97 बार भीषण छापेमारी की है और इस दौरान 83 फिलिस्तीनियों को बंदी बना लिया। सीजफायर के दौरान ही गाजा पर कुल 1,109 बार हवाई बमबारी और तोपों से गोलाबारी की गई, जिसमें 273 से ज्यादा नागरिकों की निजी संपत्तियां मलबे में तब्दील हो गईं। स्थानीय प्रशासन ने इजरायल पर मानवीय सहायता (भोजन-दवाई) को सीमा पर रोकने और जानबूझकर बुनियादी ढांचे को तबाह करने का गंभीर आरोप लगाया है।ईरान संकट के पीछे छिप गई मासूम बच्चों की मौत की चीखेंजब कुछ महीने पहले इजरायल-अमेरिका का ईरान के साथ सीधे युद्ध का संकट शुरू हुआ, तो पूरी दुनिया के मीडिया का ध्यान गाजा से हट गया। इसी का नतीजा रहा कि गाजा में इजरायली हमलों में मारे जा रहे फिलिस्तीनियों की खबरें अंतरराष्ट्रीय पटल पर कहीं दबकर रह गईं। डेटा के मुताबिक, 10 अक्टूबर से 9 जून के बीच जब दुनिया ईरान-अमेरिका तनाव देख रही थी, तब गाजा में चुपके से 981 लोग मार दिए गए, जिनमें बड़ी संख्या बच्चों की है। हाल ही में 20 जून को हुए एक ताजा हमले में भी 6 लोगों की जान चली गई, जिसमें 2 मासूम बच्चे शामिल थे।तकरीबन दो हफ्ते पहले वेस्ट बैंक के हेब्रोन इलाके के पास इजरायली सैनिकों की ओपन फायरिंग में सैम फहद अबू हैकल नाम के महज 7 महीने के एक नवजात बच्चे की मौत हो गई थी। इसके अलावा गाजा में बोर्ड परीक्षा देने जा रही 18 साल की एक फिलिस्तीनी छात्रा को भी इजरायली सैनिकों द्वारा गोली मारने का संगीन आरोप लगा है।गाजा के दो-तिहाई हिस्से पर इजरायली सेना का कब्जा, मंडराया भुखमरी का सायाईरान और अमेरिका के बीच ऐतिहासिक शांति समझौते की घोषणा के बाद माना जा रहा था कि मिडिल ईस्ट में स्थिरता आएगी, लेकिन इजरायल और हमास की यह जंग खत्म होने का नाम नहीं ले रही। गाजा मीडिया कार्यालय के ताजा और आधिकारिक दावे के मुताबिक, इजरायली सेना ने रणनीतिक तौर पर आगे बढ़ते हुए गाजा के लगभग 64 प्रतिशत हिस्से पर पूरी तरह से अपना सैन्य कब्जा जमा लिया है। इतना ही नहीं, इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की तरफ से सेना को इस घेरे को और ज्यादा बढ़ाने के गुप्त निर्देश भी मिल चुके हैं।मार्च के महीने में जब पूरी दुनिया का फोकस ईरान पर था, तब इजरायली सेना ने फिलिस्तीनियों के लिए काम करने वाली ग्लोबल रिलीफ एजेंसियों को नए नक्शे सौंपे थे। इन नक्शों से साफ पता चलता है कि सेना तय 'येलो लाइन' से 11 फीसदी और आगे घुस चुकी है। इस कब्जे का सबसे भयावह पहलू यह है कि अब गाजा के आम नागरिक अपने ही देश के दो-तिहाई हिस्से में कदम भी नहीं रख सकते। गाजा की सबसे उपजाऊ और खेती योग्य जमीन अब इजरायल के कंट्रोल में है, जिसके कारण आने वाले दिनों में यहां अकाल और भुखमरी की स्थिति बेहद डरावनी होने वाली है।72 हजार से ज्यादा मौतें; आखिर ईरान-अमेरिका डील से फिलिस्तीन को क्या मिला?गाजा में फिलिस्तीनी स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी किए गए ताजा और रूह कंपा देने वाले आंकड़ों के मुताबिक, 7 अक्टूबर 2023 से लेकर 10 जून 2026 तक इस युद्ध में कम से कम 72,991 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। सबसे ज्यादा दुखद बात यह है कि इस कुल आंकड़े में 20,179 केवल छोटे बच्चे शामिल हैं। इसके अलावा 1,73,212 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल या अपंग हो चुके हैं। इस सर्वविनाश के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि ईरान और अमेरिका की इस ग्लोबल डील से फिलिस्तीन के हाथ क्या आया? जवाब है— कुछ भी नहीं। सुपरपावर्स के समझौतों के बाद भी गाजा के लोगों को सिर्फ बारूद और मौतें ही मिल रही हैं।गाजा की राह पर बढ़ा दक्षिणी लेबनान, 12 लाख लोग बेघरइस पूरे विवाद का एक और खतरनाक मोर्चा दक्षिणी लेबनान में खुला हुआ है, जहां इजरायली सेना हमास की ही तरह हिज्बुल्लाह के ठिकानों पर भीषण हमले कर रही है। हालांकि ईरान का दावा है कि उसने अमेरिका के साथ हुए युद्धविराम समझौते में लेबनान सुरक्षा की शर्त को भी शामिल कराया था, लेकिन इजरायल इस अंतरराष्ट्रीय समझौते को पूरी तरह खारिज कर रहा है। इजरायली सेना ने दक्षिणी लेबनान के लगभग पांचवें हिस्से को तुरंत खाली करने का अल्टीमेटम जारी कर दिया है, जिसके चलते रातों-रात 12 लाख से अधिक लेबनानी नागरिक बेघर होकर शरणार्थी शिविरों में रहने को मजबूर हैं। जमीनी हालात को देखकर वैश्विक मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि दक्षिणी लेबनान भी बहुत तेजी से दूसरे 'गाजा' बनने की ओर अग्रसर है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 23 Jun 2026 2:39 pm

खाड़ी युद्ध में बिना लड़े ही भारत को लगा सबसे बड़ा जख्म, इजराइल-अमेरिका से ज्यादा भारतीय नागरिकों की मौत; जानें खौफनाक आंकड़े

ईरान युद्ध में इजराइल और महाशक्ति अमेरिका से भी ज्यादा भारतीय नागरिक अपनी जान गंवा चुके हैं। यह बेहद चौंकाने वाली और दर्दनाक हकीकत तब सामने आई है, जब भारत इस विनाशकारी जंग में किसी भी तरह से शामिल नहीं है। सोमवार (22 जून, 2026) को कतर के रास लाफान पर हुए एक भीषण हमले में 12 भारतीय कामगारों की मौत हो गई, जिसके बाद इस युद्ध की चपेट में आकर मरने वाले बेकसूर भारतीयों की कुल संख्या 25 पर पहुंच गई है। वहीं, अगर जंग में सीधे तौर पर शामिल देशों की बात करें, तो इस लड़ाई में अब तक अमेरिका के 13 और इजराइल के 24 नागरिक मारे गए हैं। इस युद्ध की विभीषिका का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इजराइल के हमलों से अब तक सबसे ज्यादा लेबनान के 4 हजार और ईरान के 3600 लोग मारे जा चुके हैं।इस खाड़ी युद्ध की शुरुआत इसी साल 28 फरवरी को हुई थी। इन चंद महीनों की जंग में ईरान को बहुत बड़े झटके लगे हैं। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई से लेकर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) के प्रमुख मोहम्मद पाकपूर और ईरान सर्वोच्च सुरक्षा परिषद के सचिव अली लारिजानी जैसे शीर्ष नेताओं की इस युद्ध में हत्या की जा चुकी है।कब और कहां कितने भारतीयों ने गंवाई अपनी जान?कतर के रास लाफान में हुए ताजा हमले में 12 भारतीयों की मौत के अलावा, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में भी भारत के 6 नागरिक मारे गए हैं। होर्मुज में हुए एक अमेरिकी हमले में 3 भारतीय नागरिकों की मौत हो गई थी, जिस पर भारत सरकार ने अमेरिका के खिलाफ बेहद कड़ी नाराजगी जाहिर की थी। खुद भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री को फोन कर इस पर कड़ा विरोध और प्रतिरोध दर्ज कराया था। इसके अलावा कतर में ही पिछले दिनों हुए एक अन्य हमले में एक भारतीय की मौत हुई थी, जबकि एक भारतीय की मौत कुवैत में ईरानी हमले के दौरान हुई थी। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में भी भारतीय नागरिक इस युद्ध का शिकार बन चुके हैं। इन सब को मिलाकर अब तक कुल 25 भारतीय नागरिकों की मौत हो चुकी है।युद्ध में इजराइल और अमेरिका से ज्यादा भारतीय क्यों मारे गए?बिना किसी दुश्मनी और बिना युद्ध में शामिल हुए भारतीयों की इतनी बड़ी तादाद में मौत के पीछे तीन सबसे मुख्य और जमीनी कारण हैं:कुवैत और यूएई पर अंधाधुंध हमले और इजराइली बंकर: ईरान ने इस जंग के दौरान इजराइल से कहीं ज्यादा कुवैत और यूएई के इलाकों को निशाना बनाया है। इजराइल पर ईरान ने सिर्फ शुरुआत में ही कुछ बड़े अटैक किए थे, जिसमें कुछ इजराइली नागरिक मारे गए। इसके तुरंत बाद इजराइल ने अपने सभी नागरिकों को बेहद सुरक्षित अंडरग्राउंड बंकरों में शिफ्ट कर दिया, जिसके कारण ईरान इजराइल के नागरिकों को ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचा पाया। दूसरी तरफ, दूरदर्शी अमेरिका ने जंग छिड़ने के संकेत मिलते ही अपने नागरिकों को खाड़ी देशों से वापस बुला लिया था, इसलिए जंग में सिर्फ अमेरिकी सैनिक ही हताहत हुए हैं।खाड़ी देशों में प्रवासियों की भारी तादाद: खाड़ी (Gulf) के देशों में भारतीय मूल के लोगों की आबादी बहुत बड़ी है। आंकड़ों के मुताबिक, सऊदी अरब में करीब 27 लाख और यूएई में 43 लाख भारतीय रहते हैं। इसी तरह कुवैत में 10 लाख और कतर में 8 लाख प्रवासी भारतीय कार्यरत हैं। कतर का रास लाफान जहां सोमवार को हमला हुआ, वह एक बड़ा औद्योगिक क्षेत्र है और वहां भारी संख्या में भारतीय मजदूर और इंजीनियर काम करते हैं, जो सीधे तौर पर इस हमले की चपेट में आ गए।होर्मुज में फंसे जहाजों पर भारतीय क्रू मेंबर्स: होर्मुज की खाड़ी में जो व्यापारिक जहाज फंसे हुए हैं, उनमें काम करने वाले अधिकांश कामगार और नाविक भारतीय ही हैं। हालिया डेटा के अनुसार, इस डेंजर जोन में फंसे लगभग 550 जहाजों पर 18 हजार से ज्यादा भारतीय कामगार मौजूद हैं। जब भी इन जहाजों पर हवाई या मिसाइल हमले होते हैं, तो वहां तैनात भारतीय इसकी चपेट में आ जाते हैं।बेकसूर भारतीयों की इन मौतों के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है?इस खाड़ी युद्ध में मारे गए कुल भारतीयों में से आधे से अधिक लोगों की मौत सीधे तौर पर ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों की वजह से हुई है। वहीं, 3 भारतीयों की मौत अमेरिकी सेना के हमले में हुई। अमेरिका ने इसी महीने की शुरुआत में होर्मुज की नाकाबंदी को पार करने की कोशिश कर रहे एक संदिग्ध वाणिज्यिक जहाज को निशाना बनाया था, जिसमें भारतीय सवार थे। इसके विपरीत रास लाफान, कुवैत और कतर के रिहायशी व औद्योगिक इलाकों में जो भारतीय मारे गए हैं, वो ईरान के हमलों का शिकार हुए हैं। हालांकि, वैश्विक दबाव के बीच दोनों ही देशों (अमेरिका और ईरान) ने सफाई देते हुए कहा है कि ये मौतें सक्रिय युद्ध क्षेत्र (War Zone) में होने के कारण हुई हैं, यानी किसी भी भारतीय को जानबूझकर या टारगेट करके नहीं मारा गया है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 23 Jun 2026 2:12 pm

अमेरिका ने वादा तो कर दिया, पर ईरान को 300 अरब डॉलर देगा कौन? खाड़ी जा रहे मार्को रुबियो देंगे जवाब!

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक वित्तीय बाजारों के गलियारों से इस वक्त एक बेहद हैरान करने वाली खबर सामने आ रही है। वॉशिंगटन से लेकर मध्य पूर्व (Middle East) तक इस बात की जबरदस्त चर्चा है कि क्या अमेरिका ईरान को 300 अरब डॉलर (करीब 25 लाख करोड़ रुपये) का भारी-भरकम फंड सौंपने की तैयारी कर रहा है। व्हाइट हाउस की तरफ से इस सिलसिले में कुछ बड़े संकेत तो दिए गए हैं, लेकिन इस वक्त सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह खड़ा हो गया है कि आर्थिक मोर्चे पर खुद कई चुनौतियों से जूझ रहा अमेरिका आखिर इतनी बड़ी रकम लाएगा कहां से? इस बीच अमेरिकी विदेश नीति के अहम सिपहसालार मार्को रुबियो का अचानक खाड़ी देशों (Gulf Countries) का दौरा करना इस पूरी मिस्ट्री को और गहरा कर रहा है। माना जा रहा है कि इस महा-डील की असली चाबी रुबियो के इसी दौरे में छिपी हुई है।इस सीक्रेट महा-डील के पीछे का पूरा बैकग्राउंड क्या हैएक वरिष्ठ रणनीतिक रिपोर्टर की नजर से अगर इस पूरे घटनाक्रम को देखें, तो यह मामला ईरान पर लगे पुराने प्रतिबंधों, तेल व्यापार और अंतरराष्ट्रीय फ्रीज किए गए एसेट्स (जब्त संपत्तियों) से जुड़ा हुआ है। अमेरिका और पश्चिमी देशों ने लंबे समय से ईरान के अरबों डॉलर विदेशी बैंकों में फ्रीज कर रखे हैं। अब वैश्विक भू-राजनीतिक समीकरणों को साधने और खाड़ी क्षेत्र में शांति स्थापित करने के नाम पर इस फंड को कुछ शर्तों के साथ रिलीज करने का एक खाका तैयार किया जा रहा है। लेकिन इस वादे को जमीन पर उतारना इतना आसान नहीं है। अमेरिकी संसद (Congress) के भीतर ही इस बात को लेकर भारी विरोध शुरू हो गया है कि आतंकवाद को फंड करने के आरोपी देश को इतनी बड़ी वित्तीय राहत कैसे दी जा सकती है।मार्को रुबियो का खाड़ी दौरा और मध्य पूर्व का नया समीकरणइस पूरी गुत्थी को सुलझाने के लिए अमेरिकी सीनेटर और विदेश नीति के दिग्गज मार्को रुबियो इस समय खाड़ी देशों के बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील दौरे पर हैं। सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे अमीर देशों के शीर्ष नेतृत्व के साथ रुबियो की बंद कमरों में होने वाली बैठकों का मुख्य एजेंडा यही है कि ईरान से जुड़ी इस वित्तीय डील की गारंटी कौन लेगा। जानकारों का कहना है कि अमेरिका खुद अपनी जेब से यह पैसा देने के बजाय खाड़ी देशों के जरिए एक ऐसा त्रिकोणीय वित्तीय ढांचा (Triangular Financial Framework) तैयार करना चाहता है, जिससे ईरान को तेल सप्लाई और क्षेत्रीय सुरक्षा के बदले यह रकम किस्तों में मिल सके। मार्को रुबियो इस दौरे में खाड़ी के सुल्तानों को इस बात के लिए राजी करने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं।भारत समेत वैश्विक बाजारों पर इस फैसले का क्या होगा असरअगर यह 300 अरब डॉलर की डील किसी भी तरह से परवान चढ़ती है, तो इसका सीधा और गहरा असर वैश्विक तेल बाजार (Crude Oil Market) पर पड़ने वाला है। ईरान के पास तेल का विशाल भंडार है और वित्तीय पाबंदियां हटने से वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की सप्लाई तेजी से बढ़ेगी, जिससे तेल की कीमतें धड़ाम से गिर सकती हैं। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए यह एक बहुत बड़ी राहत की खबर साबित हो सकती है, क्योंकि इससे घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल की कीमतें कम होने और महंगाई से राहत मिलने का रास्ता साफ होगा। हालांकि, जब तक मार्को रुबियो के इस दौरे का कोई आधिकारिक नतीजा सामने नहीं आता, तब तक अंतरराष्ट्रीय राजनीति के इस सबसे बड़े सस्पेंस पर सट्टेबाजी का दौर जारी रहेगा।

न्यूज़ इंडिया लाइव 23 Jun 2026 1:56 pm

ट्रंप ने फिर चौपट कर दी थी डील, ईरान की अकड़ से बेहोश हो रहा था पाक... खुद कालिबाफ ने सुनाई इनसाइड स्टोरी

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और खाड़ी देशों के भू-राजनीतिक गलियारों से एक बेहद ही चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है, जिसने पाकिस्तान की पूरी रणनीतिक विफलता को दुनिया के सामने लाकर रख दिया है। ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाकर कालिबाफ ने एक बेहद ही सनसनीखेज इनसाइड स्टोरी बयां की है। इस खुलासे के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सख्त नीतियों और ईरान के प्रति उनके कड़े रुख के कारण पाकिस्तान और ईरान के बीच होने वाली एक बेहद महत्वपूर्ण द्विपक्षीय डील पूरी तरह से तबाह हो गई थी। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान ईरान के सख्त तेवरों और अमेरिकी प्रतिबंधों के दोहरे डर से पाकिस्तान की हालत ऐसी हो गई थी कि वह अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी साख बचाने के लिए गिड़गिड़ाने पर मजबूर हो गया था।गैस पाइपलाइन और रणनीतिक समझौते की वो इनसाइड स्टोरीअगर हम इस पूरे मामले की तह में जाएं, तो यह विवाद मुख्य रूप से ईरान-पाकिस्तान (IP) गैस पाइपलाइन परियोजना से जुड़ा हुआ है, जिसे 'पीस पाइपलाइन' के नाम से भी जाना जाता है। ईरान ने अपने हिस्से की पाइपलाइन का निर्माण काफी पहले ही पूरा कर लिया था और वह पाकिस्तान पर अपने हिस्से का काम पूरा करने का लगातार दबाव बना रहा था। ईरान की इस सख्त अकड़ के सामने पाकिस्तान के पसीने छूट रहे थे क्योंकि इस्लामाबाद को डर था कि अगर उसने ईरान के साथ काम आगे बढ़ाया तो अमेरिकी प्रतिबंध उसे पूरी तरह बर्बाद कर देंगे। कालिबाफ के खुलासे ने यह साफ कर दिया है कि ईरान इस सौदे को लेकर किसी भी तरह के समझौते के मूड में नहीं था, जिससे पाकिस्तान पूरी तरह अलग-थलग पड़ गया था।डोनाल्ड ट्रंप की एंट्री और इस्लामाबाद का मास्टर प्लान फेलइस पूरी कहानी में सबसे बड़ा ट्विस्ट तब आया जब डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में रहते हुए ईरान पर अब तक के सबसे कड़े प्रतिबंध (Sanctions) लगा दिए। ट्रंप प्रशासन की इस आक्रामक नीति ने पाकिस्तान के तत्कालीन नेतृत्व को हिलाकर रख दिया। ट्रंप ने साफ चेतावनी दी थी कि जो भी देश ईरान के साथ व्यापारिक या रणनीतिक संबंध रखेगा, उसे अमेरिकी वित्तीय तंत्र से बाहर कर दिया जाएगा। इस एक फैसले ने पाकिस्तान के उस मास्टर प्लान को पूरी तरह चौपट कर दिया जिसके जरिए वह सस्ती ईरानी गैस हासिल करने की उम्मीद लगाए बैठा था। वाशिंगटन के इस कड़े रुख के बाद पाकिस्तान के पास डील से पीछे हटने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था, जिससे ईरान भड़क गया और उसने पाकिस्तान पर अरबों डॉलर के जुर्माने की तलवार लटका दी।कंगाली के दौर में पाकिस्तान के सामने अब क्या है रास्ताईरान की संसद में हुए इस खुलासे ने पाकिस्तान की दोहरी नीति और उसकी लाचारी को एक बार फिर दुनिया के सामने उजागर कर दिया है। आज के समय में जब पाकिस्तान पहले से ही रिकॉर्डतोड़ महंगाई, विदेशी मुद्रा भंडार के संकट और आईएमएफ (IMF) के कड़े कर्ज के जाल में फंसा हुआ है, ईरान के साथ बढ़ता यह कानूनी और रणनीतिक तनाव उसकी मुश्किलें कई गुना बढ़ाने वाला है। ईरान ने साफ कर दिया है कि वह अपनी अंतरराष्ट्रीय अदालतों में इस मामले को ले जाने के अधिकार से पीछे नहीं हटेगा। इस जमीनी रिपोर्टर की मानें तो पाकिस्तान अब एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहां एक तरफ अमेरिका की नाराजगी का कुआं है और दूसरी तरफ ईरान के भारी जुर्माने की खाई, जिससे पार पाना शाहबाज शरीफ सरकार के लिए फिलहाल नामुमकिन नजर आ रहा है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 23 Jun 2026 1:54 pm

ये वतन हमारा है... PoK में कश्मीरियों का महा-गदर, मुनीर की आर्मी को मिला 24 घंटे का खुला अल्टीमेटम

पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) से इस वक्त एक बेहद बड़ी और सनसनीखेज खबर सामने आ रही है। नियंत्रण रेखा (LoC) के उस पार बसे मुजफ्फराबाद, पुंछ और मीरपुर समेत कई इलाकों में कश्मीरी जनता ने पाकिस्तानी हुकूमत और वहां की फौज के खिलाफ खुली बगावत कर दी है। ये वतन हमारा है, इसका फैसला हम करेंगे के नारों के साथ लाखों की तादाद में लोग सड़कों पर उतर आए हैं। इस बड़े जन-आंदोलन का नेतृत्व कर रहे स्थानीय नेताओं ने पाकिस्तान के आर्मी चीफ जनरल असीम मुनीर की सेना को 24 घंटे का सख्त अल्टीमेटम दे दिया है। पीओके में भड़के इस जबरदस्त गदर ने इस्लामाबाद से लेकर रावलपिंडी के सैन्य मुख्यालय तक हड़कंप मचा दिया है।आखिर क्यों सुलग उठा PoK और क्यों भड़की कश्मीरी जनतावरिष्ठ पत्रकारों और अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक मामलों के जानकारों के मुताबिक, पीओके में यह गुस्सा अचानक नहीं भड़का है, बल्कि यह सालों से हो रहे दमन और सौतेले व्यवहार का नतीजा है। स्थानीय कश्मीरी जनता पिछले काफी समय से आटे की किल्लत, आसमान छूती महंगाई, भारी-भरकम बिजली बिलों और बुनियादी अधिकारों के हनन को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रही थी। लेकिन पाकिस्तानी रेंजर्स और फौज ने जब शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर लाठियां भांजी और आंसू गैस के गोले छोड़े, तो यह आंदोलन हिंसक विद्रोह में बदल गया। अब पीओके के नागरिकों का साफ कहना है कि उनके संसाधनों की लूट बहुत हो चुकी, अब वे पाकिस्तान के अवैध कब्जे को और बर्दाश्त नहीं करेंगे।मुनीर की फौज को 24 घंटे का अल्टीमेटम और आर-पार की जंगपीओके की कोर कमेटी और स्थानीय अवामी एक्शन कमेटी ने पाकिस्तानी सुरक्षा बलों को चेतावनी देते हुए साफ कहा है कि अगर अगले 24 घंटों के भीतर गिरफ्तार किए गए स्थानीय युवाओं को रिहा नहीं किया गया और भारी सैन्य तैनाती को वापस नहीं बुलाया गया, तो वे पूरे खित्ते का चक्का जाम कर देंगे। कश्मीरी प्रदर्शनकारियों ने सरकारी दफ्तरों को घेरना शुरू कर दिया है और कई जगहों पर पाकिस्तानी झंडे हटाकर अपनी नाराजगी जाहिर की है। हालात इतने बेकाबू हो चुके हैं कि पाकिस्तानी सेना के जवानों को पीछे हटना पड़ रहा है। इस अल्टीमेटम के बाद पूरे इलाके में तनाव चरम पर पहुंच गया है और किसी बड़े सैन्य टकराव की आशंका बनी हुई है।नई दिल्ली की पैनी नजर और वैश्विक मंच पर पाकिस्तान की किरकिरीपीओके में चल रहे इस गदर पर भारत सरकार और सुरक्षा एजेंसियों की भी पैनी नजर बनी हुई है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि पीओके की जनता अब खुलकर यह समझ चुकी है कि भारत के जम्मू-कश्मीर में जिस तरह से विकास, शांति और खुशहाली लौट रही है, उसके ठीक उलट पाकिस्तान उन्हें सिर्फ भुखमरी और कंगाली दे रहा है। सोशल मीडिया पर भी 'PoK Wants Freedom' ट्रेंड कर रहा है, जिससे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान के उस प्रोपेगैंडा की हवा निकल गई है जो वह कश्मीर को लेकर हमेशा अलापता रहता है। अब देखना यह है कि जनरल असीम मुनीर की आर्मी इस 24 घंटे के अल्टीमेटम का सामना कैसे करती है या फिर पीओके में आजादी की यह चिंगारी कोई नया इतिहास लिख देती है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 23 Jun 2026 1:52 pm

ब्रिटिश पीएम कीर स्टॉर्मर का भावुक इस्तीफा, क्या अब अधर में लटक जाएगा भारत-ब्रिटेन व्यापार समझौता

ब्रिटेन (UK) की राजनीति से इस वक्त की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टॉर्मर ने अपने पद से इस्तीफा देने का एलान कर दिया है। 10 डाउनिंग स्ट्रीट के बाहर देश को संबोधित करते हुए स्टॉर्मर बेहद भावुक नजर आए और उन्होंने अपने इस फैसले से पूरी दुनिया को हैरान कर दिया। ब्रिटेन में चल रहे आंतरिक राजनीतिक घटनाक्रमों और बढ़ते दबाव के बीच आया यह इस्तीफा न सिर्फ ब्रिटिश राजनीति के लिए एक बड़ा मोड़ है, बल्कि इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर भी पड़ने वाला है। इस वक्त नई दिल्ली से लेकर लंदन तक सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि पिछले काफी समय से अधर में लटका भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौता (India-UK FTA) अब किस दिशा में जाएगा।कीर स्टॉर्मर के अचानक विदा होने के पीछे की बड़ी वजहेंएक सीनियर रिपोर्टर के तौर पर अगर हम लंदन के राजनीतिक गलियारों में चल रही हलचलों को देखें, तो कीर स्टॉर्मर का यह फैसला अप्रत्याशित नहीं था, लेकिन इसकी टाइमिंग ने सबको चौंकाया है। पिछले कुछ महीनों से देश की सुस्त अर्थव्यवस्था, लेबर पार्टी के भीतर आंतरिक मतभेद और आव्रजन (Immigration) के मुद्दों पर स्टॉर्मर सरकार लगातार चौतरफा घिरी हुई थी। अपनी ही पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं के असंतोष और देश में घटती लोकप्रियता के बाद स्टॉर्मर ने बेहद भावुक अंदाज में सत्ता की कमान छोड़ने का फैसला किया। उन्होंने कहा कि देश के हित और पार्टी की एकजुटता के लिए उनका पीछे हटना जरूरी हो गया था। इस इस्तीफे के बाद अब ब्रिटेन में नए नेतृत्व को चुनने की कवायद तेज हो गई है।भारत-ब्रिटेन फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर मंडराने लगे अनिश्चितता के बादलइस बड़े राजनीतिक उलटफेर का सबसे गहरा असर भारत और ब्रिटेन के बीच होने वाले महत्वाकांक्षी मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर पड़ने की आशंका है। दोनों देश पिछले कई दौर की वार्ताओं के बाद इस डील को अंतिम रूप देने के बेहद करीब पहुंच चुके थे। कीर स्टॉर्मर और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुई हालिया मुलाकातों में इस समझौते को जल्द से जल्द लागू करने पर सहमति बनी थी। लेकिन अब ब्रिटेन के शीर्ष नेतृत्व में आए इस खालीपन के कारण इस समझौते की रफ्तार एक बार फिर धीमी हो सकती है। जब तक ब्रिटेन में नई सरकार का गठन नहीं हो जाता और नया प्रधानमंत्री कार्यभार नहीं संभाल लेता, तब तक नीतिगत फैसलों पर रोक लग सकती है।क्या नई ब्रिटिश सरकार बदलेगी भारत के प्रति अपना रुखग्लोबल डिप्लोमेसी और आर्थिक जानकारों का मानना है कि ब्रिटेन चाहे जो भी नया प्रधानमंत्री चुने, भारत के साथ व्यापारिक रिश्तों को नजरअंदाज करना उसके लिए मुमकिन नहीं होगा। ब्रिटेन इस वक्त खुद आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है और उसे भारतीय बाजार की सख्त जरूरत है। हालांकि, लेबर पार्टी के भीतर या विपक्ष के नए गुटों की प्राथमिकताओं में थोड़ा बदलाव आ सकता है, जिससे वीजा नियमों, आईटी प्रोफेशल्स की आवाजाही और स्कॉच व्हिस्की जैसी चीजों पर कस्टम ड्यूटी को लेकर चल रही बातचीत में नए सिरे से मोलभाव करना पड़ सकता है। भारतीय वाणिज्य मंत्रालय भी इस पूरे राजनीतिक संकट पर नजर बनाए हुए है और नई सरकार के गठन के बाद दोबारा बातचीत को पटरी पर लाने की उम्मीद कर रहा है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 23 Jun 2026 1:48 pm

कतर के गैस प्लांट में भयंकर विस्फोट! 12 भारतीयों समेत 13 की मौत, 66 गंभीर रूप से घायल

खाड़ी देश कतर से एक बेहद ही दर्दनाक और झकझोर देने वाली खबर सामने आ रही है। यहां के एक प्रमुख गैस प्लांट में अचानक हुए भीषण विस्फोट (Blast) के कारण चारों तरफ चीख-पुकार मच गई। इस भयावह औद्योगिक हादसे में अब तक कुल 13 लोगों की मौत होने की आधिकारिक पुष्टि हो चुकी है, जिनमें से 12 मृतक भारतीय नागरिक बताए जा रहे हैं। धमाका इतना जबरदस्त था कि प्लांट का एक बड़ा हिस्सा पूरी तरह मलबे में तब्दील हो गया। स्थानीय प्रशासन और बचाव दलों ने मलबे से अब तक 66 घायलों को बाहर निकाला है, जिन्हें इलाज के लिए नजदीकी अस्पतालों में भर्ती कराया गया है। इनमें से कई श्रमिकों की हालत बेहद नाजुक बनी हुई है।गैस लीकेज के बाद आसमान में उठा आग का गुबारस्थानीय चश्मदीदों और शुरुआती जांच रिपोर्टों के अनुसार, यह हादसा गैस प्लांट के एक मुख्य प्रोसेसिंग यूनिट में संदिग्ध गैस लीकेज के कारण हुआ। लीकेज के कुछ ही सेकंड के भीतर वहां एक जोरदार धमाका हुआ, जिसकी गूंज कई किलोमीटर दूर तक सुनी गई। धमाके के तुरंत बाद पूरे इलाके में आसमान छूती आग की लपटें और काले धुएं का गुबार छा गया। प्लांट में काम कर रहे सुरक्षाकर्मियों और मजदूरों को संभलने का मौका तक नहीं मिला। कतर के दमकल विभाग और आपदा प्रबंधन की टीमों ने कई घंटों की कड़ी मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया, लेकिन तब तक जान-माल का भारी नुकसान हो चुका था।पीड़ितों में भारतीय प्रवासियों की संख्या सबसे अधिकइस भीषण त्रासदी ने एक बार फिर खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीय मूल के श्रमिकों की सुरक्षा को लेकर बड़ी चिंता खड़ी कर दी है। कतर में मौजूद भारतीय दूतावास इस पूरी स्थिति पर लगातार अपनी पैनी नजर बनाए हुए है। दूतावास के अधिकारियों ने कतरी प्रशासन से संपर्क साधकर मृतकों की पहचान सुनिश्चित करने और घायलों को बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने की मांग की है। भारत में रह रहे प्रभावित परिवारों को सूचित करने और उनके शवों को वापस स्वदेश लाने की कानूनी प्रक्रियाओं को तेज कर दिया गया है। स्थानीय अधिकारियों का कहना है कि मरने वाले अधिकांश भारतीय श्रमिक इसी प्लांट में तकनीकी और मैन्युअल विभागों में कार्यरत थे।सुरक्षा मानकों की जांच के लिए उच्च स्तरीय कमेटी गठितइस बड़े इंडस्ट्रियल एक्सीडेंट के बाद कतर सरकार ने मामले को बेहद गंभीरता से लिया है। गैस कॉर्पोरेशन और स्थानीय मंत्रालय ने इस बात की उच्च स्तरीय जांच के आदेश दे दिए हैं कि क्या प्लांट में अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों (Safety Protocols) की अनदेखी की गई थी। ऑटोमैटिक गैस डिटेक्शन और अलार्म सिस्टम ने समय पर काम क्यों नहीं किया, इसकी भी फॉरेंसिक जांच की जा रही है। इस बीच, कतर में रह रहे भारतीय समुदाय के संगठनों ने भी दुख व्यक्त करते हुए पीड़ितों के परिवारों के लिए मुआवजे और कड़े सुरक्षा नियमों की मांग उठाई है ताकि भविष्य में ऐसी किसी बड़ी लापरवाही से निर्दोष मजदूरों की जान न जाए।

न्यूज़ इंडिया लाइव 23 Jun 2026 1:45 pm

कैलिफोर्निया में जंगल की आग का बढ़ा खतरा, गर्म और सूखे महीनों में इससे निपटने की तैयारी में जुटी फायर ब्रिगेड

कैलिफोर्निया में पारंपरिक जंगल की आग (वाइल्डफायर) का मौसम अपने चरम पर पहुंचने से पहले ही इस साल दमकलकर्मी 2,580 से अधिक वाइल्डफायर की घटनाओं पर प्रतिक्रिया दे चुके हैं। बढ़ते तापमान और तेजी से सूखती वनस्पति के कारण अधिकारियों की चिंता बढ़ गई है। अधिकारी अब इसे केवल मौसमी नहीं बल्कि पूरे साल बने रहने वाले आग के खतरे के रूप में देख रहे हैं।

देशबन्धु 23 Jun 2026 12:39 pm