1500 साल पुराना रिश्ता रचने जा रहा है नया इतिहास, जानें महाशक्तियों का क्या है महाप्लान
भारत और जापान के बीच के संबंध सिर्फ कूटनीतिक या व्यापारिक नहीं हैं, बल्कि इनकी जड़ें 1500 साल पुराने गहरे ऐतिहासिक और आध्यात्मिक सांस्कृतिक बंधनों से जुड़ी हुई हैं। छठी शताब्दी में जब बौद्ध धर्म भारत से चीन और कोरिया होते हुए जापान पहुंचा, तभी से दोनों देशों के बीच एक अटूट सांस्कृतिक सेतु का निर्माण हो गया था। अब यही प्राचीन और मजबूत ऐतिहासिक रिश्ता एक नई उड़ान भरने के लिए पूरी तरह तैयार है, जो आने वाले समय में वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के भविष्य की एक नई इबारत लिखेगा।सांस्कृतिक विरासत से लेकर आधुनिक साझेदारी तक का सफरसदियों पुराने इस जुड़ाव को आधुनिक युग में एक नई दिशा मिली है। आज भारत और जापान सिर्फ दो मित्र देश नहीं हैं, बल्कि एशिया-प्रशांत (इंडो-पैसिफिक) क्षेत्र में स्थिरता, शांति और समृद्धि के सबसे बड़े स्तंभ बनकर उभरे हैं। बौद्ध धर्म की साझी विरासत से शुरू हुआ यह सफर अब बुलेट ट्रेन, हाई-टेक इंफ्रास्ट्रक्चर, डिफेंस डील और सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन तक पहुंच चुका है। दोनों देशों का यह बढ़ता तालमेल न केवल द्विपक्षीय हितों को साध रहा है, बल्कि वैश्विक मंच पर एक नया शक्ति संतुलन भी पैदा कर रहा है।रणनीतिक और आर्थिक मोर्चे पर भविष्य की नई इबारतमौजूदा वैश्विक परिदृश्य में भारत और जापान की यह रणनीतिक साझेदारी बेहद अहम हो चुकी है। रक्षा, सुरक्षित तकनीक, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा और डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन जैसे क्षेत्रों में दोनों देश मिलकर काम कर रहे हैं। जापान का निवेश और भारत का विशाल बाजार तथा कुशल कार्यबल मिलकर आने वाले कल की तस्वीर बदल रहे हैं। दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व ने यह साफ कर दिया है कि यह दोस्ती आने वाले समय में और अधिक मजबूत होगी, जो न केवल एशिया बल्कि पूरी दुनिया के आर्थिक और रणनीतिक भविष्य को तय करने में बड़ी भूमिका निभाएगी।
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट फैसले से इमिग्रेशन से जुड़ी मुश्किलों में फंसे एच-1बी वर्क वीजा पर रह रहे करीब तीन लाख भारतीयों को बड़ी राहत मिली है। कोर्ट के फैसले में अमेरिका में जन्म लेने वाले सभी बच्चों की नागरिकता के अधिकार को बरकरार रखा गया है।
नेतन्याहू ने कहा कि इजराइल अब आर्थिक रूप से इतना सक्षम हो चुका है कि उसे अमेरिकी आर्थिक सहायता की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने यह भी दोहराया कि यदि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरत पड़ी तो इजराइल ईरान के खिलाफ फिर से सैन्य कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा।
बांग्लादेश की सियासत में एक बड़े घटनाक्रम के तहत, पूर्व सूचना मंत्री और 1971 मुक्ति संग्राम के अनुभवी सेनानी हसनुल हक इनु को 10 साल की जेल की सजा सुनाई गई है। इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल ने इनु को अगस्त 2024 के सरकार विरोधी छात्र आंदोलनों के दौरान पुलिस को घातक बल प्रयोग के लिए उकसाने और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दमनकारी नीति अपनाने का दोषी पाया है। यह फैसला शेख हसीना के कार्यकाल के दौरान हुई हिंसा को लेकर गठित विशेष न्यायाधिकरणों की एक और कड़ी कार्रवाई है।211 पन्नों का ऐतिहासिक फैसला और आरोपट्रिब्यूनल ने 211 पन्नों के अपने विस्तृत फैसले में इनु को जुलाई 2024 के विद्रोह के दौरान कुश्तिया जिले में छह प्रदर्शनकारियों की हत्या से संबंधित अपराधों के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार माना है। अभियोजन पक्ष ने साक्ष्य पेश किए कि 19 जुलाई 2024 को प्रधानमंत्री आवास पर हुई 14-दलीय गठबंधन की उच्च-स्तरीय बैठक में इनु मौजूद थे, जहां सेना की तैनाती और प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने का विवादित निर्णय लिया गया था। इसके अलावा, उन पर पुलिस को प्रदर्शनकारियों की सूची बनाकर उन पर कार्रवाई करने और टीवी इंटरव्यू के जरिए आंदोलनकारियों को 'आतंकवादी' कहकर बदनाम करने का आरोप भी साबित हुआ है।'अग्निपरीक्षा' करार देकर नकारा फैसलासजा सुनाए जाने के बाद इनु ने इस पूरी कानूनी कार्यवाही को महज एक 'नाटक' करार दिया है। अदालत कक्ष से बाहर निकलते हुए उन्होंने संवाददाताओं से कहा कि यह एक फर्जी मुकदमा है और वे इस 'अग्निपरीक्षा' से गुजर रहे हैं। उनकी पत्नी अफरोजा हक रीना ने भी इस फैसले पर कड़ी नाराजगी जाहिर की है और संकेत दिया है कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और अधिवक्ताओं से सलाह लेने के बाद परिवार ऊपरी अदालत में अपील दायर करने पर विचार करेगा।शेख हसीना के शासन में इनु का रसूखहसनुल हक इनु ने 2012 से 2018 तक सूचना मंत्री के रूप में बांग्लादेश की कैबिनेट में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हालांकि, 2024 की अशांति के दौरान उनका राजनीतिक प्रभाव पहले के मुकाबले कम हो गया था, लेकिन अभियोजन पक्ष ने अदालत को यह समझाने में सफलता हासिल की कि हसीना सरकार के गिरने के अंतिम क्षणों तक इनु फैसले लेने वाली कोर टीम का हिस्सा थे। यह सजा इस बात का संकेत है कि अंतरिम सरकार के बाद गठित न्यायाधिकरण, पिछली सरकार के उन मंत्रियों और सलाहकारों के खिलाफ शिकंजा कसने के लिए प्रतिबद्ध हैं, जिनकी भूमिका छात्र आंदोलन को कुचलने में रही थी।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर 'बर्थराइट सिटिजनशिप' (जन्मजात नागरिकता) के मुद्दे पर मुखर हो गए हैं। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा जन्म के आधार पर नागरिकता देने के अधिकार को बरकरार रखने के बाद ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर तंज कसते हुए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को इस फैसले के लिए 'बधाई' दी है। ट्रंप ने इसे अमेरिका के लिए एक दुर्भाग्यपूर्ण दिन बताते हुए कहा कि यह देश के लिए बेहद महंगा और अनुचित कदम है। उन्होंने साफ कर दिया है कि वे हार मानने वाले नहीं हैं और इस व्यवस्था को बदलने के लिए कांग्रेस के जरिए नए कानून लाने की पुरजोर कोशिश करेंगे।कांग्रेस से लगाई कानून बनाने की गुहारट्रंप ने अमेरिकी कांग्रेस से अपील की है कि वे बिना किसी देरी के 'बर्थराइट सिटिजनशिप' को खत्म करने के लिए कानून बनाने की प्रक्रिया शुरू करें। ट्रंप के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि संविधान में बड़े बदलाव के बजाय कानूनी प्रक्रिया अपनाई जाए, तो इसे बदला जा सकता है। उन्होंने कांग्रेस को अपना पूर्ण समर्थन देने का भरोसा दिलाया है। राष्ट्रपति का मानना है कि एक ठोस कानून के माध्यम से इस दशकों पुरानी व्यवस्था को समाप्त कर अमेरिका की सीमाओं की सुरक्षा और प्रवासियों के नियमों को सख्त किया जा सकता है।सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के 14वें संशोधन पर लगाई मुहरअमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने अपने बहुमत के फैसले में संविधान के 14वें संशोधन की व्याख्या करते हुए ट्रंप के उस कार्यकारी आदेश को खारिज कर दिया, जो अवैध या अस्थायी प्रवासियों के बच्चों को नागरिकता देने से रोकता था। चीफ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा, नागरिकता, तब भी और अब भी अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था में शामिल होने का अधिकार है। 14वें संशोधन को बनाने वालों ने इस देश में पैदा हुए हर व्यक्ति से यह वादा किया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जन्मजात नागरिकता का सिद्धांत अमेरिकी लोकतंत्र की नींव का एक हिस्सा है और इसे कानूनी व्याख्याओं के माध्यम से पलटा नहीं जा सकता।क्या था ट्रंप प्रशासन का तर्क?ट्रंप प्रशासन लंबे समय से यह दलील देता रहा है कि 14वें संशोधन का मूल उद्देश्य गृहयुद्ध के बाद पूर्व दासों और उनके वंशजों को अधिकार देना था, न कि अवैध प्रवासियों या अल्पकालिक पर्यटकों और विदेशी छात्रों के बच्चों को नागरिकता प्रदान करना। प्रशासन का कहना था कि यह व्यवस्था गलत इस्तेमाल की जा रही है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को नकारते हुए संवैधानिक वादे को निभाने पर जोर दिया। अब देखना यह होगा कि क्या ट्रंप की अपील पर अमेरिकी कांग्रेस कोई नया विधेयक पेश करती है या यह मामला एक बार फिर लंबी कानूनी और राजनीतिक खींचतान का केंद्र बनता है।
सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान का 'रोता' हुआ नया नाटक: भारत के खौफ से नाम लेने की भी नहीं हुई हिम्मत
पाकिस्तान सिंधु जल समझौते के निलंबन के बाद से पूरी तरह बेदम हो चुका है। वैश्विक मंचों पर बार-बार गुहार लगाने के बावजूद जब उसकी एक न चली, तो अब पाकिस्तान ने इसे लेकर एक 'इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस' का ड्रामा शुरू किया है। इस कॉन्फ्रेंस में पाकिस्तानी नेताओं का रोना-धोना तो जारी रहा, लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि पाकिस्तान का खौफ इतना गहरा है कि उसके नेता मंच से 'भारत' का नाम तक लेने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। भारत की सैन्य ताकत और कड़े फैसलों के डर से पाकिस्तानी नेताओं ने सीधे तौर पर नाम लेने के बजाय 'ताकतवर देश' कहकर अपनी बौखलाहट जाहिर की।भारत के डर से 'ताकतवर देश' का जपा नामपाकिस्तानी सांसद मुसादिक मलिक ने कॉन्फ्रेंस में कहा कि कोई ताकतवर देश अपनी मर्जी से किसी समझौते को रद्द नहीं कर सकता। गौरतलब है कि भारत ने बीते साल जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए उस आतंकी हमले के बाद यह समझौता स्थगित कर दिया था, जिसमें आतंकियों ने पर्यटकों को चुन-चुनकर निशाना बनाया था। उस बर्बर हमले में 26 लोगों की मौत के बाद भारत ने 'ऑपरेशन सिंदूर' चलाकर पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों की कमर तोड़ दी थी। भारत का स्पष्ट रुख रहा है कि 'खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते।'उपप्रधानमंत्री इशाक डार और बिलावल भुट्टो का बेतुका रागकॉन्फ्रेंस में पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री इशाक डार ने बेतुकी बातें करते हुए कहा कि वे भारत के फैसले को खारिज करते हैं और समझौता अभी भी वैध है। वहीं, बिलावल भुट्टो जरदारी ने सिंधु नदी की तुलना 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' और 'स्वेज नहर' जैसे वैश्विक जलमार्गों से कर दी। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे को उठाने की कोशिश की, ताकि भारत पर दबाव बनाया जा सके। बिलावल ने इसे 'हथियार के रूप में इस्तेमाल' होने से बचाने का राग अलापा, लेकिन वे यह भूल गए कि यह कदम पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद का ही सीधा परिणाम है।क्यों दाने-दाने को मोहताज हो रहा पाकिस्तान?पाकिस्तान की बौखलाहट के पीछे की असली वजह उसकी अर्थव्यवस्था और कृषि का पूरी तरह सिंधु नदी पर निर्भर होना है। भारत द्वारा हाइड्रोलॉजिकल डेटा साझा न करने के कारण पाकिस्तान अब पूरी तरह अंधेरे में है। उसे यह नहीं पता चल पाता कि भारतीय नदियों से कितना पानी आ रहा है, जिससे वह बाढ़ या सूखे की स्थिति में समय रहते बचाव नहीं कर पा रहा है। अपनी खुद की गलतियों और आतंक को पालने के कारण आज पाकिस्तान न केवल आर्थिक तंगी से जूझ रहा है, बल्कि भारत के इस कड़े कदम से वह दाने-दाने के लिए भी मोहताज होने की कगार पर आ खड़ा हुआ है।
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने जन्मजात नागरिकता को बरकरार रखा, ट्रंप का कार्यकारी आदेश असंवैधानिक
अदालत ने 6-3 के बहुमत से दिए गए फैसले में स्पष्ट किया कि अमेरिका में जन्म लेने वाला लगभग हर व्यक्ति संविधान के तहत जन्म से ही अमेरिकी नागरिक है।
अयातुल्लाह अली खामेनेई को हत्या के 131 दिन बाद सुपुर्द-ए-खाक किया जाना है। 6 दिन के राजकीय जनाजे में ईरान दुनियाभर से नेताओं को बुला रहा है। 23 जून को राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने पीएम मोदी को भी न्योता दिया। ईरानी और भारतीय सूत्रों के मुताबिक भारत सरकार ने एक डेलीगेशन भेजने का फैसला किया, जिसमें न पीएम शामिल हैं और न विदेश मंत्री। आखिर न्योता मिलने के बावजूद पीएम मोदी खुद क्यों नहीं जा रहे, अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच भारत किस दुविधा में है और क्या संतुलन साध पाएगा; आज के एक्सप्लेनर में... सवाल-1: पीएम मोदी नहीं, तो ईरान कौन जा रहा है? जवाबः खामेनेई के जनाजे में शामिल होने के लिए भारतीय डेलीगेशन में दो प्रमुख शख्सियतें हैं… 1. ले. ज. (रि.) सैयद अता हसनैन, बिहार के राज्यपाल डेलिगेशन में क्यों चुना गया: ईरान शिया बहुल इस्लामिक देश है और अयातुल्ला खामेनेई शियाओं के सर्वोच्च धार्मिक और राजनीतिक नेता थे। सैयद अता हसनैन भी शिया हैं। रिटायर्ड आर्मी अफसर और राज्यपाल जैसा संवैधानिक ओहदा भी रखते हैं। 2. पबित्र मार्गरिटा, केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री डेलिगेशन में क्यों चुना गया: सीधे विदेश मंत्रालय का हिस्सा हैं। हाई प्रोफाइल भी नहीं हैं और न ज्यादा लो-प्रोफाइल। ईरान को लेकर भारत के मौजूदा स्टैंड पर फिट बैठते हैं। सवाल-2: पीएम मोदी का बुलावा था, फिर वो खुद क्यों नहीं गए? जवाबः पहले जाहिर वजहों की बात। पीएम मोदी का शेड्यूल पहले से तय है। 1 से 3 जुलाई तक जापान की पीएम सनाए ताकाइची भारत दौरे पर रहेंगी, जिनसे पीएम मोदी मुलाकात करेंगे। 4 जुलाई को पीएम मोदी राजस्थान के जोधपुर जाएंगे। फिर 6 से 11 जुलाई तक वे इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की यात्रा करेंगे। हालांकि एक्सपर्ट्स पीएम मोदी के ईरान न जाने के पीछे 3 छिपी वजहें भी बताते हैं। JNU में मिडिल-ईस्ट स्टडीज के प्रोफेसर पीआर कुमारस्वामी और इंटरनेशनल स्टडीज के एसोसिएट प्रोफेसर राजन कुमार के मुताबिक… 1. खामेनेई का जनाजा बेहद उग्र हो सकता हैः खामेनेई की मौत एक हमले में हुई है। शिया परंपरा के मुताबिक उनका जनाजा सिर्फ एक शोक सभा नहीं, बल्कि न्याय और प्रतिरोध का धार्मिक और राजनीतिक रूप ले लेगा। 6 दिन के अंतिम संस्कार में लोग मुहर्रम की तरह विलाप करेंगे और खुद को पीटेंगे। ये बहुत ज्यादा उग्र होगा। इसमें शामिल होने का मतलब होता कि पीएम मोदी भी खुलकर ईरान के प्रतिरोध के साथ खड़े हैं। भारत इससे बचना चाहता है। 2. अचानक स्टैंड बदलने से आलोचना का खतरा: खामेनेई की मौत पर भारत ने चुप्पी साध रखी थी। 5 दिन बाद पहली सार्वजनिक प्रतिक्रिया दी, जब विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने ईरानी दूतावास जाकर शोक जताया। अब 4 महीने बाद अचानक पीएम मोदी का खामेनेई के जनाजे में जाना पूरी तरह स्टैंड बदलना होगा। 3. साझेदार देशों को गलत मैसेज जाने की चिंता: खामेनेई के जनाजे में पीएम मोदी की मौजूदगी भारत के साझेदार और ईरान के विरोधी देशों को नाराज कर सकती है। इनमें अमेरिका, इजराइल के अलावा सऊदी अरब, यूएई जैसे सुन्नी बहुल देश भी हैं। सवाल-3: ईरान को लेकर भारत के सामने दुविधा क्या है? जवाबः ईरान से जुड़ा हर फैसला भारत के लिए तीन मोर्चों पर एक साथ संतुलन मांगता है... 1. आर्थिक दुविधा: ईरान की तरफ झुका, अमेरिका से खतरा होर्मुज स्ट्रेट पर अब भी ईरान का कब्जा है। भारत का 40% कच्चा तेल, 50% LNG और 90% LPG इसी रूट से आता है। यहां जरा सी रुकावट भारत में तेल संकट खड़ा कर सकती है। दूसरी तरफ अमेरिका भारत का बड़ा ट्रेड पार्टनर है, और जल्द ही दोनों देशों के बीच बड़ी ट्रेड डील होने वाली है। यानी, ईरान से नाता टूटा तो ऊर्जा संकट, अमेरिका से दूरी बढ़ी तो व्यापार को नुकसान। 2. सांस्कृतिक दुविधा: भारतीय लोगों की हमदर्दी ईरान के साथभारत और ईरान के रिश्ते सदियों पुराने हैं। भाषा, व्यापार और सभ्यता के स्तर पर गहरे जुड़े हैं। यही वजह है कि जंग के दौरान भी भारत ने ईरान की खुलकर निंदा नहीं की। खामेनेई की मौत पर भी भारत ने सीधी चुप्पी नहीं, बल्कि शालीन शोक जताया। 3. रक्षा दुविधा: इजराइल बड़ा डिफेंस पार्टनर, खाड़ी देशों में भारतीयइजराइल भारत का भरोसेमंद रक्षा साझेदार है, जो हर मुश्किल वक्त में खुलकर साथ खड़ा रहा है। वहीं खाड़ी देशों में रह रहे 1 करोड़ से ज्यादा भारतीयों की सुरक्षा भी उतनी ही अहम है। जंग के दौरान भारत ने इजराइल या अमेरिका की आलोचना नहीं की, लेकिन खाड़ी देशों पर हुए हमलों की निंदा जरूर की। पाकिस्तान के ईरान के प्रति सहानुभूति दिखाने के बाद UAE ने कई पाकिस्तानी वर्कर्स को डिपोर्ट कर दिया था। भारत ऐसी कोई गलती दोहराना नहीं चाहता। सवाल-4: क्या भारत अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच संतुलन बना पाएगा? जवाबः 1989 में जब ईरान के सुप्रीम लीडर अली खुमैनी की मृत्यु हुई थी, तो उनके अंतिम संस्कार में भारत ने विदेश मंत्री पी. वी. नरसिंहा राव को भेजा था। 2024 में जब ईरान के राष्ट्रपति अब्राहिम रइसी की हेलिकॉप्टर क्रैश में मौत हुई थी, तो भारत के उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ अंतिम संस्कार में शामिल हुए थे। लेकिन इस बार ईरान के सुप्रीम लीडर के अंतिम संस्कार में किसी मंत्री स्तर के नेता को नहीं भेजा जा रहा है। सवाल-5: खामेनेई के अंतिम संस्कार में क्या-क्या होना है? जवाबः 28 फरवरी को खामेनेई की मौत के बाद, 4 मार्च को उनका अंतिम संस्कार होना था लेकिन लगातार होते हमलों की वजह से यह टल गया। अब 4 जुलाई को अंतिम संस्कार कार्यक्रम की शुरूआत होगी… --------- ये खबर भी पढ़िए… आज का एक्सप्लेनर: CM विजय, गृहमंत्री शाह से मुलाकात, सैन्य कमांड का दौरा; ट्रम्प के दूत सर्जियो गोर आखिर भारत में कर क्या रहे हैं अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर 22 जून को तमिलनाडु के सीएम विजय थलापति से मिलने चेन्नई पहुंच गए। उससे 4 दिन पहले, 18 जून को गृहमंत्री अमित शाह से दिल्ली में मुलाकात की। 6 महीने में 6 मुख्यमंत्रियों से मिले। दिल्ली के उपराज्यपाल और राजस्थान की डिप्टी सीएम तक से मीटिंग की। भारतीय सेना के पश्चिमी कमान हेडक्वार्टर के दौरे पर तो हंगामा भी हुआ था। पूरी खबर पढ़िए
भारत ने एफएटीएफ का किया समर्थन, टेरर फंडिंग रोकने वाली संस्था पर पाक के हमलों को किया खारिज
भारत ने अंतरराष्ट्रीय आतंक-वित्तपोषण निगरानी संस्था पर पाकिस्तान द्वारा किए गए हमलों का बचाव करते हुए कहा है कि ये आलोचनाएं “जांच के डर” से प्रेरित हैं।
पड़ोसी देश पाकिस्तान की ओर से अफगानिस्तान की सीमा के भीतर किए गए औचक हमले के बाद दक्षिण एशिया में भू-राजनीतिक (Geopolitical) तनाव चरम पर पहुंच गया है। बिना किसी ठोस उकसावे के किए गए इस सैन्य एक्शन के बाद पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के निशाने पर आ गया है और हर तरफ उसकी इस आक्रामक नीति की थू-थू हो रही है। इस नाजुक मोड़ पर भारत ने एक बार फिर अपनी मजबूत कूटनीति का परिचय देते हुए अपने पुराने और भरोसेमंद दोस्त अफगानिस्तान के प्रति अटूट समर्थन जताया है। नई दिल्ली की ओर से आए इस रणनीतिक रुख ने अंतरराष्ट्रीय गलियारों में हलचल तेज कर दी है।हवाई और जमीनी हमले के बाद पाकिस्तान की चौतरफा घेराबंदी शुरूस्थानीय और अंतरराष्ट्रीय खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तानी सेना द्वारा सीमा पार किए गए हवाई और जमीनी हमलों में बड़े पैमाने पर नुकसान की खबरें हैं। पाकिस्तान ने इस कार्रवाई को आतंकवाद के खिलाफ कदम बताया है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र (UN) सहित दुनिया के कई बड़े देशों ने इसे संप्रभुता का खुला उल्लंघन माना है। इस सैन्य दुस्साहस के बाद अफगानिस्तान ने भी कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है, जिससे डूरंड लाइन (Durand Line) पर युद्ध जैसे हालात बन गए हैं। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से पाकिस्तान खुद अपने ही बुने जाल में फंस गया है और वह वैश्विक स्तर पर अलग-थलग पड़ता जा रहा है।ऐतिहासिक दोस्ती का फर्ज: संकट की इस घड़ी में क्यों अफगानिस्तान के साथ आया भारतभारत और अफगानिस्तान के संबंध सदियों पुराने और बेहद मजबूत सांस्कृतिक व रणनीतिक बुनियाद पर टिके हैं। भारत ने हमेशा संकट के समय अफगान नागरिकों की मदद की है, चाहे वह बुनियादी ढांचे का विकास हो या मानवीय सहायता। इस सैन्य तनाव के बीच भारतीय विदेश मंत्रालय ने साफ संकेत दिए हैं कि वह क्षेत्र में किसी भी तरह की एकतरफा सैन्य आक्रामकता के खिलाफ है और शांतिपूर्ण संवाद का पक्षधर है। नई दिल्ली का अफगानिस्तान के साथ खड़े होना यह साफ संदेश देता है कि भारत अपने रणनीतिक साझेदारों को किसी भी विपरीत परिस्थिति में अकेला नहीं छोड़ता, जिसने काबुल में भारत के प्रति सम्मान को और बढ़ा दिया है।एआई सर्च और आधुनिक कूटनीति में इस तनाव के दूरगामी परिणामआधुनिक जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन (GEO) और वैश्विक विश्लेषकों के मुताबिक, पाकिस्तान की इस हरकत का असर उसके पहले से ही बदहाल आर्थिक और राजनीतिक हालातों पर बेहद बुरा पड़ने वाला है। अमेरिका, मध्य पूर्व और मध्य एशियाई देशों की नजरें इस पूरे विवाद पर टिकी हुई हैं। भारत की सक्रिय कूटनीति और अफगानिस्तान के प्रति उसके खुले समर्थन ने इस्लामाबाद के रणनीतिक थिंक-टैंक को बैकफुट पर ला दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे झुककर पाकिस्तान अपने कदम पीछे खींचता है या फिर यह सीमाई विवाद किसी बड़े क्षेत्रीय टकराव का रूप ले लेता है।
भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक और कूटनीतिक रिश्ते एक नए और बेहद मजबूत दौर में प्रवेश कर रहे हैं। इसी बीच वैश्विक राजनीतिक गलियारों से एक बेहद बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सबसे खास और भरोसेमंद सिपहसालार सर्जियो गोर ने दावा किया है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगामी दिसंबर महीने में अमेरिका की हाई-प्रोफाइल यात्रा पर जा सकते हैं। इस दावे के बाद से ही नई दिल्ली से लेकर वॉशिंगटन तक राजनीतिक हलचल तेज हो गई है और हर कोई यह जानने को उत्सुक है कि आखिर अमेरिकी प्रशासन की तरफ से पीएम मोदी को बार-बार यह खास न्यौता क्यों भेजा जा रहा है।आखिर क्यों पीएम मोदी को बार-बार न्यौता भेज रहे हैं डोनाल्ड ट्रंपअंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषकों का मानना है कि वॉशिंगटन की तरफ से भारत को मिल रही यह असाधारण प्राथमिकता दोनों देशों के बीच के गहरे आपसी भरोसे को दर्शाती है। डोनाल्ड ट्रंप और पीएम मोदी की निजी केमिस्ट्री जगजाहिर है, लेकिन इस बार का बुलावा सिर्फ दोस्ती तक सीमित नहीं है। अमेरिका इस समय वैश्विक मंच पर कई बड़े भू-राजनीतिक (Geopolitical) बदलावों से गुजर रहा है, जहां उसे एशिया-प्रशांत क्षेत्र और वैश्विक आर्थिक मोर्चे पर भारत के मजबूत साथ की बेहद जरूरत है। यही वजह है कि ट्रंप प्रशासन साल के अंत तक पीएम मोदी के साथ एक बेहद अहम और निर्णायक बैठक करना चाहता है।रक्षा सौदों से लेकर व्यापार तक इन बड़े मुद्दों पर टिकी हैं दुनिया की नजरेंअगर पीएम मोदी की यह दिसंबर यात्रा फाइनल होती है, तो यह कई मायनों में ऐतिहासिक साबित होने वाली है। इस संभावित दौरे के दौरान दोनों महाशक्तियों के बीच कई अरब डॉलर के अत्याधुनिक रक्षा सौदों, क्रिटिकल टेक्नोलॉजी (iCET) की साझेदारी और इंडो-पैसिफिक रीजन में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने जैसे गंभीर मुद्दों पर अंतिम मुहर लग सकती है। इसके साथ ही, अमेरिकी बाजार में भारतीय कंपनियों की पहुंच और दोनों देशों के बीच व्यापारिक बाधाओं को दूर करने के लिए भी इस बैठक को बेहद मील का पत्थर माना जा रहा है, जिसका सीधा असर ग्लोबल मार्केट पर पड़ेगा।नई दिल्ली और वॉशिंगटन की जुगलबंदी से बढ़ी ड्रैगन की बेचैनीसर्जियो गोर के इस बड़े खुलासे और भारत-अमेरिका की इस बढ़ती नजदीकी ने पड़ोसी देश चीन की चिंताएं बढ़ा दी हैं। एआई सर्च और आधुनिक जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन (GEO) के दौर में कूटनीतिक जानकार मान रहे हैं कि दिसंबर का यह संभावित दौरा वैश्विक राजनीति का नया रुख तय करेगा। भारत जिस तरह से वैश्विक सप्लाई चेन का नया केंद्र बनकर उभर रहा है, उसे देखते हुए अमेरिका भारत को अपने सबसे मजबूत और स्थायी साझेदार के रूप में स्थापित करना चाहता है। अब पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि पीएमओ (PMO) की तरफ से इस यात्रा को लेकर आधिकारिक तौर पर क्या तारीखें सामने आती हैं।
पाकिस्तान से अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों को निशाना बनाए जाने की एक बेहद हैरान करने वाली और दर्दनाक खबर सामने आई है। पिछले कुछ समय से 'कृष्ण गली' और 'राम गली' जैसे ऐतिहासिक इलाकों के नाम बदलने को लेकर चल रहे ड्रामे के बीच, अब पाकिस्तानी प्रशासन ने अपना असली रंग दिखा दिया है। सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत को पूरी तरह से दरकिनार करते हुए, वहां करीब 125 साल पुराने एक ऐतिहासिक गुरुद्वारे को जमींदोज कर दिया गया है। इस कार्रवाई के बाद न केवल पाकिस्तान में रहने वाले सिख और हिंदू परिवारों में दहशत का माहौल है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी मानवाधिकार संगठनों ने इस पर गहरी नाराजगी जताई है।रातों-रात मलबे में तब्दील कर दी गई सदियों पुरानी सिख विरासतस्थानीय सूत्रों और सोशल मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक, इस ऐतिहासिक गुरुद्वारे को बिना किसी पूर्व सूचना या कानूनी नोटिस के बेहद गुपचुप तरीके से ढहाया गया। स्थानीय प्रशासन ने भारी सुरक्षा बलों की तैनाती के बीच इस पूरी कार्रवाई को अंजाम दिया, ताकि कोई भी इसका विरोध न कर सके। विभाजन से पहले के बने इस गुरुद्वारे से न केवल सिख समुदाय की धार्मिक भावनाएं जुड़ी थीं, बल्कि यह उस इलाके की ऐतिहासिक पहचान का एक बेहद अहम हिस्सा था। इस प्राचीन ढांचे को मलबे में तब्दील किए जाने की तस्वीरों और वीडियो ने दुनिया भर के सिख और अल्पसंख्यक समुदायों को झकझोर कर रख दिया है।नाम बदलने के विवाद की आड़ में रची गई बड़ी साजिशविशेषज्ञों का मानना है कि पिछले कुछ दिनों से कृष्ण गली और राम गली के नाम बदलने को लेकर जो विवाद खड़ा किया गया था, वह असल में इस ऐतिहासिक ढांचे को हटाने की एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा था। पाकिस्तान में अक्सर अल्पसंख्यकों के प्राचीन और ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों को भू-माफियाओं और स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत से निशाना बनाया जाता रहा है। इस बार भी विकास और अतिक्रमण हटाने के नाम पर इस पूरी कार्रवाई को अंजाम दिया गया है, जिसने पाकिस्तान के धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के दावों की पूरी तरह से पोल खोलकर रख दी है।अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान को घेरने की तैयारी तेजइस क्रूर और दमनकारी कदम के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की चौतरफा थू-थू हो रही है। भारत सहित दुनिया भर के विभिन्न मानवाधिकार और सिख संगठनों ने संयुक्त राष्ट्र (UN) और वैश्विक कूटनीतिक मंचों से पाकिस्तान के इस कदम पर सख्त कार्रवाई करने की मांग की है। विशेषज्ञों के अनुसार, प्राचीन और धार्मिक विरासतों को इस तरह नष्ट करना अंतरराष्ट्रीय नियमों का खुला उल्लंघन है। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि पड़ोसी देश में अल्पसंख्यकों के धार्मिक और नागरिक अधिकार कितने असुरक्षित और गंभीर खतरे में हैं।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के केंद्र में इन दिनों अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा शह और मात का खेल है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को सोशल मीडिया पर एक सनसनीखेज दावा किया कि ईरान ने अमेरिकी अधिकारियों के साथ बैठक का अनुरोध किया है। ट्रंप के इस बयान ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है, लेकिन दूसरी ओर से मिला जवाब इसे एक बड़ी कूटनीतिक गुत्थी बना रहा है। ईरानी अधिकारियों ने ऐसी किसी भी बैठक की योजना से साफ इनकार कर दिया है, जिससे साफ हो गया है कि दोनों देशों के बीच तनाव अभी भी अपने चरम पर है।दोहा वार्ता पर ट्रंप बनाम ईरान: सच क्या है?ट्रंप ने दावा किया था कि ईरान के साथ बातचीत मंगलवार को कतर के दोहा में आयोजित होगी। वहीं, ईरान के वरिष्ठ वार्ताकार काजिम गरीबाबादी ने इसे सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि तकनीकी स्तर पर बातचीत की कोई पुष्टि नहीं हुई है, हालांकि कतर के साथ अन्य मामलों पर संवाद जारी है। विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप का यह दावा घरेलू राजनीति से भी प्रेरित हो सकता है, जहां वे यह दिखाना चाहते हैं कि उनका 'मैक्सिमम प्रेशर' काम कर रहा है और ईरान बातचीत के लिए मजबूर है।6 अरब डॉलर की संपत्ति और पेजेश्कियान का दांवईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने हाल ही में जब्त की गई 6 अरब डॉलर की ईरानी संपत्ति के कतर के माध्यम से जारी होने का जिक्र किया है। यह कदम ईरानी जनता को अंतरिम समझौते के लिए राजी करने की एक कोशिश मानी जा रही है। दिलचस्प यह है कि अमेरिकी अधिकारी लगातार यह दोहरा रहे हैं कि ईरान की किसी भी संपत्ति से रोक अभी नहीं हटाई गई है। होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव के बीच यह वित्तीय मुद्दा दोनों देशों के बीच समझौते की मुख्य कड़ी बना हुआ है।होर्मुज जलडमरूमध्य: दुनिया के लिए क्यों खतरनाक है यह तनाव?होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल गलियारा है, जहां से वैश्विक व्यापार का करीब 20% तेल और गैस गुजरती है। हाल के दिनों में वहां जहाजों पर हुए हमलों और अमेरिकी सैन्य प्रतिक्रिया ने क्षेत्र को युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया है। यदि ईरान और अमेरिका के बीच वार्ता विफल रहती है, तो वैश्विक ऊर्जा संकट गहरा सकता है और तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं। ट्रंप के लिए यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वे अमेरिकी नागरिकों को यह भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि अमेरिका में महंगाई घट रही है, लेकिन होर्मुज का तनाव उनके इस दावे को सीधे चुनौती दे रहा है।
यूरोप में प्रलयकारी गर्मी: सड़कें और ट्रैफिक लाइटें पिघलीं, हाईवे टूटे, 1300 से ज्यादा लोगों की मौत
यूरोप इस समय एक अभूतपूर्व और जानलेवा लू (Heatwave) की चपेट में है, जिसने पूरे महाद्वीप को दहका दिया है। तापमान रिकॉर्ड स्तर पर पहुँचने के कारण स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि वहां का बुनियादी ढांचा (Infrastructure) जवाब देने लगा है। बर्लिन से लेकर इटली तक, सड़कों के डामर पिघल रहे हैं और ट्रैफिक लाइटें प्लास्टिक की तरह पिघलकर झुक रही हैं। लू के कारण अब तक 1300 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जिसने यूरोपीय देशों की चिंता बढ़ा दी है।जर्मनी में हाईवे टूटे, थम गए परिवहन के पहिएजर्मनी में गर्मी का असर सबसे ज्यादा परिवहन नेटवर्क पर पड़ा है। बर्लिन को पश्चिमी जर्मनी से जोड़ने वाला A2 मोटरवे भीषण गर्मी के कारण टूटकर बिखर गया, जिससे कई इंटरचेंज बंद करने पड़े। ब्रैंडनबर्ग के जीसार में हाईवे की हालत इतनी खराब हो गई है कि वहां गाड़ियों का चलना असुरक्षित हो गया है। इसके अलावा, लीपजिग शहर में तापमान इतना अधिक हो गया कि सड़क की डामर सतह पिघलने लगी, जिसके चलते ट्राम सेवाओं को बीच में ही रोकना पड़ा। बर्लिन की सड़कों पर तापमान कम करने के लिए पुलिस को वाटर कैनन का सहारा लेना पड़ रहा है।फ्रांस-इटली में पिघल रही ट्रैफिक लाइटेंफ्रांस और इटली में भी स्थिति विकट है। सोशल मीडिया पर इटली और जर्मनी के कई ऐसे वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिनमें चौराहों पर लगी ट्रैफिक लाइटें तेज धूप और उमस की वजह से पिघलती हुई दिखाई दे रही हैं। ट्रेनें देरी से चल रही हैं और बड़े पैमाने पर बिजली कटौती हो रही है। गर्मी से राहत पाने के लिए जलाशयों की ओर रुख कर रहे लोगों के साथ हादसे भी बढ़ गए हैं। फ्रांस में 18 जून से अब तक डूबने के 74 मामले सामने आए हैं, जबकि पोलैंड में एक ही दिन में 17 लोगों की जान चली गई।युद्धग्रस्त यूक्रेन और डेनमार्क पर दोहरी मारविचित्र बात यह है कि बिजली ग्रिडों के लिए प्रसिद्ध डेनमार्क में भी मांग आपूर्ति से कहीं ज्यादा हो गई है, जिससे वहां के ऊर्जा मंत्रालय को ग्रिड विस्तार पर सोचना पड़ रहा है। उधर, रूस के साथ युद्ध झेल रहे यूक्रेन के लिए यह भीषण गर्मी दोहरी मुसीबत बनकर आई है। इवानो-फ्रैंकिवस्क से लेकर फ्रंटलाइन पर स्थित जापोरीझझिया तक बिजली की खपत पर पाबंदियां लगा दी गई हैं। बिजली कंपनी 'यास्नो' के सीईओ सर्गी कोवलेंको के अनुसार, युद्ध से जर्जर हो चुके बिजली ग्रिडों के लिए यह गर्मी एक बड़ी परीक्षा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यूरोपीय देशों का बुनियादी ढांचा इतनी भीषण गर्मी सहने के लिए नहीं बनाया गया था, और अब यह जलवायु परिवर्तन के खतरों को बयां कर रहा है।
शी चिनफिंग ने लुकाशेंको से भेंट की
चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने सोमवार सुबह राजधानी पेइचिंग में बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर लुकाशेंको से मुलाकात की।
स्विट्जरलैंड, फ्रांस, जर्मनी… ये नाम सुनते ही दिमाग में एक तस्वीर बनती है। उस तस्वीर में अकसर साफ-सुथरी सड़कें, बर्फीले पहाड़ और मौसम का लुत्फ उठाते लोग होते हैं। लेकिन इस वक्त हकीकत कुछ और है। यूरोप के ये देश रिकॉर्ड गर्मी में जल रहे हैं। सड़कें पिघल रहीं, पटरियां उखड़ रहीं। पिछले 7 दिनों में हीटवेव ने 1300 से ज्यादा लोगों की जान ले ली। गर्मी से बचने को लोग नदियों-तालाबों में कूद रहे, जिससे फ्रांस में 55 लोग डूब गए। आखिर यूरोप में ऐसा क्यों हो रहा और ये गर्मी भारत से अलग कैसे है, आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: यूरोप के देशों में कैसी गर्मी पड़ रही है? जवाबः पहले 3 तस्वीरों में हीटवेव का मंजर… यूरोप की कुल आबादी करीब 74 करोड़ है। इनमें से 19 करोड़ लोग 35 डिग्री से ज्यादा तापमान झेल रहे हैं। देखिए यूरोप के शहरों में गर्मी का हाल… सवाल-2: भारत में इतना तापमान सामान्य गर्मी माना जाता है, फिर यूरोप में हाहाकार क्यों? जवाबः यूरोप दुनिया के ठंडे रिहायशी महाद्वीप में से एक हैं। यहां पूरा सिस्टम ठंड के हिसाब से बना है, न कि जानलेवा गर्मी के लिए। यूरोप का मौजूदा ढांचा इतनी गर्मी झेलने के लिए तैयार नहीं है… 1. पुराने घर गर्मी अंदर सोख लेते हैं 2. एयर कंडीशनर की कमी 3. ज्यादा बुजुर्ग आबादी एनर्जी एंड क्लाइमेट पॉलिसी एक्सपर्ट सिद्धांत सिंह बताते हैं कि भारत की तुलना में यूरोप में सूरज की रोशनी ज्यादा देर तक रहती है। इससे गर्मी की तीव्रता बढ़ जाती है। इस वक्त यूरोप में 16 घंटे सूरज रहता है, जबकि भारत में 12-13 घंटे। यूरोप की मौजूदा गर्मी ज्यादा सूखी है और हवाएं भी नहीं चल रही। लोगों को ऐसी गर्मी की आदत भी नहीं है। इसलिए लोग ज्यादा घुटन महसूस कर रहे हैं। सवाल-3: यूरोप में इस रिकॉर्ड गर्मी की वजह क्या है? जवाबः 3 बड़ी वजहें हैं… 1. ओमेगा ब्लॉक से रुकी मौसमी हवाएं 2. हीट डोम से यूरोप में गर्मी का गुबार बना 3. ग्लोबल वॉर्मिंग से हालात और ज्यादा खराब सवाल-4: इस गर्मी से यूरोप को कब तक राहत मिलेगी? जवाब: मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक हीट डोम धीरे-धीरे पश्चिम यूरोप से पूर्व की तरफ खिसकेगा। अंटार्कटिक की तरफ से सर्द हवाएं आएंगी, जो राहत देंगी। फ्रांस के पश्चिमी हिस्से में इस हफ्ते से राहत मिलनी शुरू होगी। बाकी हिस्सों में 1 जुलाई तक मौसम गर्म ही रहेगा। जर्मनी, इटली और ब्रिटेन में भी 30 जून तक तापमान कम होगा। हालांकि यह राहत कुछ दिनों की ही रहेगी। मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक जुलाई में यूरोप के ऊपर एक और हीट डोम एक्टिव हो सकता है। इसका असर पश्चिम और मध्य यूरोप में रहेगा। स्पेन, पुर्तगाल, फ्रांस, जर्मनी, दक्षिण इंग्लैंड, उत्तर इटली में 6 से 9 दिन ज्यादा गर्मी और हीटवेव पड़ेगी। 7 से 10 जुलाई के बीच यह हीट डोम एक्टिव हो सकता है। यह अभी की गर्मी से ज्यादा खतरनाक हो सकता है। पहली हीटवेव ने मिट्टी को सुखा दिया है। सड़कों और इमारतों को गर्म कर दिया है। शहरों में नमी वैसे ही कम हो गई है। ऐसे में लगातार दूसरी हीटवेव शहरों को और ज्यादा गर्म करेगी। अमेरिका की क्लाइमेट इम्पैक्ट कंपनी के मुताबिक अगस्त तक यूरोप में गर्म मौसम बना रहेगा। उस पर इस साल एल-नीनो की वजह से यूरोप में सूखा पड़ने की भी आशंका है। -------- ये खबर भी पढ़िए… आज का एक्सप्लेनर: 194 साल के ‘जोनाथन’ की कहानी, पीएम मोदी के दौरे से सुर्खियों में; 39 अमेरिकी राष्ट्रपति देख चुका, 140 साल छोटी गर्लफ्रेंड पीएम मोदी 27 जून को सेशेल्स दौरे पर गए। दर्जनों खबरें चलीं- ‘मोदी यहां दुनिया के सबसे बुजुर्ग जानवर जोनाथन से मिलेंगे।’ पीएम मोदी कछुओं से मिले भी, लेकिन उनमें जोनाथन नहीं था। दरअसल, जोनाथन सेशेल्स में है ही नहीं। वो तो 7 हजार किमी दूर एक ब्रिटिश टापू सेंट हेलेना में है। पूरी खबर पढ़िए…
वैश्विक राजनीति के मंच पर भारत का मान लगातार बढ़ रहा है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अब तक दुनिया के 34 देश अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाज चुके हैं. लेकिन देश के भीतर अक्सर घरेलू राजनीति में प्रधानमंत्री पद की गरिमा और मर्यादा को तार-तार करने वाले बयान सामने आते रहते हैं. इस बीच, भारत के संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्षी नेताओं के इस आचरण को लेकर ब्रिटेन (UK) के वेस्टमिंस्टर संसदीय मॉडल का एक ऐसा उदाहरण पेश किया है, जिसने देश के राजनीतिक गलियारों और सोशल मीडिया पर एक नई कानूनी बहस छेड़ दी है. किरेन रिजिजू ने ब्रिटिश संसद का एक वीडियो साझा करते हुए सवाल उठाया है कि क्या भारत को भी पीएम पद की संवैधानिक मर्यादा बनाए रखने के लिए अंग्रेजों के कड़े नियमों को अपनाना चाहिए?ब्रिटिश संसद में क्या हुआ था? जानिए पाकिस्तानी मूल की सांसद के सस्पेंशन की इनसाइड स्टोरीयह पूरा मामला इसी साल अप्रैल महीने का है, जब ब्रिटेन की संसद (House of Commons) में अमेरिका के राजदूत के रूप में पीटर मैंडेलसन की नियुक्ति को लेकर गरमागरम बहस चल रही थी. इसी दौरान लेबर पार्टी की सांसद और पाकिस्तानी मूल की ब्रिटिश नागरिक जारा सुल्ताना (Zarah Sultana) ने तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर पर तीखा व्यक्तिगत हमला बोल दिया. उन्होंने पीएम कीर स्टार्मर को 'बेयर-फेस्ड लायर' यानी सीधे तौर पर 'निर्लज्ज झूठा' कह दिया. जारा सुल्ताना ने सदन में कहा था कि प्रधानमंत्री पीटर मैंडेलसन का बचाव इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वे उनके निजी हितों के लिए काम करते हैं और ऐसा करके प्रधानमंत्री पूरे देश को धोखा दे रहे हैं.जैसे ही जारा सुल्ताना के मुंह से 'झूठा' शब्द निकला, ब्रिटिश संसद के स्पीकर सर लिंडसे हॉयल ने तुरंत दखल दिया. उन्होंने जारा सुल्ताना को आदेश दिया कि वे अपने इस असंसदीय शब्द को तुरंत वापस लें और मर्यादा में रहें. लेकिन जब जारा सुल्ताना ने अपना बयान वापस लेने से साफ इनकार कर दिया, तो स्पीकर ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा—'बैठ जाओ और तुरंत सदन से बाहर जाओ.' नियमों की अवहेलना करने पर जारा सुल्ताना को तत्काल प्रभाव से 5 दिनों के लिए संसद से निलंबित (Suspend) कर दिया गया. इसी दिन रिफॉर्म यूके के एक अन्य सांसद ली एंडरसन को भी प्रधानमंत्री को 'झूठा' कहने के कारण सदन से बाहर का रास्ता दिखाया गया था.आखिर क्यों ब्रिटेन में पीएम के अपमान पर तुरंत होती है जेल और सस्पेंशन जैसी कार्रवाई?ब्रिटेन का वेस्टमिंस्टर मॉडल अपनी संसदीय परंपराओं और भाषा की शुचिता के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है. वहां की रूलबुक के अनुसार, संसद के भीतर कुछ खास शब्दों के इस्तेमाल पर पूरी तरह से कानूनी पाबंदी है. ब्रिटिश संसदीय नियमों के तहत:प्रतिबंधित शब्द: सदन के अंदर किसी भी सदस्य को 'लायर' (झूठा) या 'डिसऑनेस्ट' (बेईमान) कहना पूरी तरह वर्जित है.नीतियों बनाम व्यक्तिगत टिप्पणी: कोई भी सांसद सरकार की नीतियों, फैसलों और बजट की कितनी भी कड़ी आलोचना कर सकता है, लेकिन वह देश के प्रधानमंत्री पर किसी भी प्रकार की व्यक्तिगत या अमर्यादित टिप्पणी नहीं कर सकता.स्पीकर के असीमित अधिकार: यदि कोई सांसद इन नियमों को तोड़ता है, तो स्पीकर के पास उसे बिना किसी देरी के तुरंत सदन से निष्कासित करने का पूर्ण अधिकार होता है.भारत के नियम क्या कहते हैं और यहाँ कार्रवाई क्यों नहीं होती?ब्रिटेन के इस कड़े एक्शन की तुलना अगर भारतीय संसद से की जाए, तो तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आती है. भारत में भी लोकसभा और राज्यसभा की रूलबुक के नियम 380 और 381 के तहत सदन में असंसदीय भाषा (Unparliamentary Language) के इस्तेमाल पर पूरी तरह प्रतिबंध है. इसके अलावा नियम 222 के तहत विशेषाधिकार हनन (Breach of Privilege) की कार्रवाई का भी प्रावधान है. भारत में राहुल गांधी से लेकर मल्लिकार्जुन खरगे और अधीर रंजन चौधरी जैसे कई बड़े नेता समय-समय पर प्रधानमंत्री के खिलाफ 'चोर' या 'कायर' जैसे शब्दों का प्रयोग कर चुके हैं.लेकिन भारत में राजनीतिक और दलीय दबाव के कारण अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल होने पर सदन में सिर्फ भारी हंगामा और नारेबाजी होती है, मगर सांसदों के खिलाफ वैसी त्वरित और कड़ी निलंबन की कार्रवाई देखने को नहीं मिलती जैसी ब्रिटेन में हुई. भारतीय संसद में ज्यादा से ज्यादा यह होता है कि स्पीकर के आदेश पर उन विवादित शब्दों को सदन की आधिकारिक कार्यवाही के रिकॉर्ड (Expunged from Records) से हटा दिया जाता है, लेकिन अपराधी सांसद पर कोई बड़ा एक्शन नहीं हो पाता. यही वजह है कि संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू अब भारत में एक ऐसा मजबूत स्वदेशी संसदीय ढांचा बनाने की वकालत कर रहे हैं, जो प्रधानमंत्री के संवैधानिक पद की गरिमा की रक्षा करे और नेताओं को जनता के प्रति अधिक जिम्मेदार बनाए.
बलोचिस्तान में पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी ISI के खिलाफ बलोच नागरिकों का गुस्सा एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है. बलोच विद्रोह और आजादी की आवाज को दबाने के लिए पाकिस्तानी सेना द्वारा निर्दयता के साथ किए जा रहे अपहरण, जबरन गुमशुदगी (Enforced Disappearances) और 'किल एंड डंप' नीति के खिलाफ प्रमुख बलोच मानवाधिकार कार्यकर्ता सम्मी दीन बलोच (Sammi Deen Baloch) ने एक दिल दहला देने वाला खुला पत्र लिखा है.अपने इस पत्र के जरिए उन्होंने सीधे तौर पर पाकिस्तान सरकार और सेना से अपने लापता पिता को लेकर कड़े सवाल पूछे हैं. सम्मी दीन बलोच ने अपनी भावुक और रोंगटे खड़े कर देने वाली अपील में लिखा है, अगर मेरे अब्बा जिंदा हैं तो उन्हें वापस लौटा दो और अगर आपने उन्हें मार दिया है, तो हमें और तड़पाने के बजाय उनका डेथ सर्टिफिकेट दे दो. इस खुले पत्र ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान में हो रहे मानवाधिकारों के हनन और बलोच नरसंहार को बेनकाब कर दिया है.17 साल का अंतहीन इंतजार: डॉ. दीन मोहम्मद बलोच की गुमशुदगी की दर्दनाक कहानीबलोच एक्टिविस्ट सम्मी दीन बलोच ने अपने पिता डॉ. दीन मोहम्मद बलोच के जबरन अपहरण और लापता होने की 17वीं बरसी पर रविवार (28 जून 2026) को यह खुला पत्र जारी किया. अपनी मार्मिक अपील में सम्मी दीन ने लिखा कि पिछले दो दशकों से चल रही इस अनिश्चितता के बाद अब उनके परिवार को यह जानने का पूरा कानूनी और मानवीय हक है कि उनके पिता किस हाल में हैं.पेशा से सरकारी चिकित्सक डॉ. दीन मोहम्मद बलोच को 28 जून 2009 की रात बलोचिस्तान के खुजदार जिले से पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों और सेना के अधिकारियों ने जबरन हिरासत में लिया था. उस काली रात के बाद से आज तक, यानी पिछले 17 सालों में डॉ. दीन मोहम्मद का कोई अता-पता नहीं है. उनका परिवार आज भी उनकी सुरक्षित वापसी की आस में जी रहा है.'याचिकाएं, लाठियां और आंसू गैस ही मेरी विरासत बन गईं'अपने पिता के लापता होने के गहरे दुख और दर्द को बयां करते हुए सम्मी दीन बताती हैं कि वह अपने पिता के जीवित या मृत होने के सच से अनजान रहते हुए ही बड़ी हुईं. उन्होंने अपने पत्र में लिखा, बचपन में मुझे सिर्फ गुमशुदगी दी गई. जब भी मैंने स्कूल या समाज में अपने पिता के बारे में पूछा, तो मुझे सिर्फ इनकार, दुत्कार और अपमान मिला. मेरे पिता को यह जालिम राज्य उठा ले गया और उनका अंतहीन इंतजार करने की सजा मुझे आजीवन कारावास की तरह दे दी गई.उन्होंने आगे लिखा, दुनिया के बाकी बच्चे अपने पिता की उंगली थामकर और उनकी खूबसूरत यादों के साथ बड़े होते हैं. लेकिन मुझे बचपन से ही अदालतों की याचिकाएं, पुलिस की लाठियां, आंसू गैस के गोले और हाथों में पिता के पोस्टर्स लेकर सड़कों पर घूमने की विरासत मिली है. मेरे अब्बा कोई सरकारी फाइल या कोई कोरी अफवाह नहीं थे. वे डॉ. दीन मोहम्मद थे—एक डॉक्टर, एक जिम्मेदार पति और एक बेहद प्यारे पिता, जिन्हें हमसे हमेशा के लिए छीन लिया गया.अंतरराष्ट्रीय मंच पर गूंजी आवाज: जर्मनी के संगठन ने पाकिस्तान को घेरासम्मी दीन बलोच आज बलोचिस्तान में पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों के खिलाफ लड़ने वाली प्रमुख संस्था 'वॉयस फॉर बलोच मिसिंग पर्सन्स' (VBMP) की महासचिव हैं. वह बलोचिस्तान में जबरन गायब किए गए हजारों युवाओं और नागरिकों के इंसाफ की लड़ाई का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय चेहरा बन चुकी हैं. उनके इस शांतिपूर्ण आंदोलन और अदालतों में दायर की जा रही याचिकाओं से बौखलाई पाकिस्तानी सेना और पुलिस कई बार उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज चुकी है और उन पर हिंसक हमले भी करवा चुकी है.सम्मी दीन के इस खुले पत्र के बाद अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने भी पाकिस्तान सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. जर्मनी के डबलिन में स्थित प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन 'फ्रंट लाइन डिफेंडर्स' (Front Line Defenders) ने सम्मी दीन बलोच के प्रति अपना पूर्ण समर्थन दोहराया है. संगठन ने पाकिस्तानी हुक्मरानों से मांग की है कि वे डॉ. दीन मोहम्मद बलोच के ठिकाने का तुरंत और आधिकारिक तौर पर खुलासा करें और बलोचिस्तान में चल रहे जबरन गुमशुदगी के सभी मामलों की स्वतंत्र निष्पक्ष जांच कराएं.पाकिस्तानी सेना का ढिठाई भरा रुख: आरोपों को सिरे से किया खारिजहमेशा की तरह, इस बार भी पाकिस्तानी सरकार और उसकी सेना ने राजनीतिक उत्पीड़न और बलोच नागरिकों को गायब करने के इन गंभीर आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है. पाकिस्तानी सेना का दावा है कि बलोच कार्यकर्ताओं के खिलाफ की जा रही कार्रवाई पूरी तरह से देश के कानून के दायरे में है.सेना ने ढिठाई से बयान जारी करते हुए कहा कि आम नागरिकों को गायब करने की उनकी कोई आधिकारिक नीति नहीं है. पाकिस्तानी अधिकारियों का दावा है कि जो लोग लापता बताए जा रहे हैं, उनमें से अधिकांश लोग या तो प्रतिबंधित उग्रवादी और आतंकवादी संगठनों में शामिल हो गए हैं, या वे कानून से बचने के लिए भूमिगत (Underground) हो गए हैं या फिर अपनी मर्जी से देश छोड़कर विदेश चले गए हैं. लेकिन बलोच मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि सेना का यह बयान सिर्फ उनके खूनी गुनाहों को छिपाने का एक भद्दा बहाना है.
27 जून 2026 की दोपहर को राजस्थान के उदयपुर रनवे पर इंडिगो (IndiGo) के एयरबस A320 विमान ने जब अपने कदम रखे, तो खिड़की से बाहर खूबसूरत अरावली की पहाड़ियों को देख रहे यात्रियों को सब कुछ बिल्कुल सामान्य लगा. लेकिन बैकस्टेज भारतीय उड्डयन और विज्ञान के इतिहास में एक बहुत बड़ा कीर्तिमान रचा जा चुका था. इस विशाल पैसेंजर जेट को रनवे पर मौजूद पारंपरिक ग्राउंड रेडियो सिग्नल की मदद से नहीं, बल्कि भारत के ऊपर हजारों किलोमीटर दूर अंतरिक्ष में चौबीसों घंटे तैनात स्वदेशी सैटेलाइट्स की मदद से सुरक्षित उतारा गया था.डायरेक्टरेट जनरल ऑफ सिविल एविऐशन (DGCA) की कड़ी निगरानी और गाइडलाइंस के तहत, भारत के अपने स्वदेशी सैटेलाइट आधारित नेविगेशन सिस्टम 'गगन' (GAGAN) का इस्तेमाल करके कॉमर्शियल लैंडिंग करने वाला यह देश का पहला बड़ा पैसेंजर जेट बन गया है. आइए एक एक्सपर्ट रिपोर्टर की नजर से इस पूरी तकनीक को आसान भाषा में समझते हैं कि यह कैसे काम करती है और भारत के लिए यह ऐतिहासिक मील का पत्थर क्यों बेहद खास है.क्या है 'गगन' (GAGAN) सिस्टम और अंतरिक्ष से कैसे मिलती है पायलट को मदद?गगन (GAGAN) का पूरा नाम 'जीपीएस एडेड जियो ऑगमेंटेड नेविगेशन' (GPS Aided GEO Augmented Navigation) है. इस बेहद आधुनिक और जटिल सिस्टम को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और भारतीय विमानन प्राधिकरण (AAI) ने सालों की रिसर्च के बाद संयुक्त रूप से मिलकर तैयार किया है. गगन का शक्तिशाली सिग्नल अंतरिक्ष में मौजूद इसरो के GSAT-8 और GSAT-10 कम्युनिकेशन सैटेलाइट्स के जरिए सीधे विमानों के कॉकपिट तक पहुंचता है.इसे आप बेहद आसान शब्दों में एक ऐसे 'सुपर क्लास टीचर' या 'गाइड' की तरह समझ सकते हैं जो आसमान में बैठकर अमेरिकी जीपीएस (GPS) के काम को हर सेकंड चेक करता है. जीपीएस के सिग्नलों में आने वाली मामूली से मामूली खराबी या दूरी की गलतियों को तुरंत सुधारकर यह पायलट के रिसीवर तक बिल्कुल सटीक और एरर-फ्री जानकारी पहुंचाता है. जब कोई विमान घने कोहरे या खराब मौसम में लैंड कर रहा होता है, तो गगन उसे रनवे का बिल्कुल सुई की नोंक जैसा सटीक रास्ता दिखाता है.पारंपरिक रेडियो नेटवर्क बनाम गगन: छोटे शहरों के हवाई अड्डों के लिए वरदानआमतौर पर दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर विमानों को सुरक्षित उतारने के लिए जमीन पर आधारित 'इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम' (ILS) यानी ग्राउंड रेडियो बीम नेटवर्क का इस्तेमाल किया जाता है. यह सिस्टम जमीन से अदृश्य तरंगें (रेडियो सिग्नल) भेजकर पायलट को सीधा आने और रनवे पर टचडाउन करने का रास्ता बताता है. लेकिन यह पारंपरिक ग्राउंड सिस्टम बेहद महंगा होता है और हर छोटे या पहाड़ी इलाकों के रीजनल एयरपोर्ट (जैसे शिमला, कुल्लू या पूर्वोत्तर के राज्य) पर इसे लगाना और मेंटेन करना मुमकिन नहीं है.इसके विपरीत, गगन सिस्टम के लिए जमीन पर किसी करोड़ो रुपये के महंगे तामझाम या टावरों की बिल्कुल जरूरत नहीं होती. यह सीधे अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट्स की मदद से पायलट को बाएं-दाएं (Horizontal) और ऊपर-नीचे (Vertical) दोनों तरह की सटीक गाइडेंस दे देता है, जिससे छोटे शहरों के एयरपोर्ट्स पर भी बड़े विमानों की नाइट लैंडिंग और खराब मौसम में लैंडिंग बेहद आसान हो जाएगी.GAGAN और NavIC में क्या अंतर है? अक्सर लोग हो जाते हैं कंफ्यूजअक्सर लोग गगन (GAGAN) और नाविक (NavIC) को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन विज्ञान के नजरिए से ये दोनों एक-दूसरे से बिल्कुल अलग और अलग उद्देश्यों के लिए काम करते हैं. नाविक (Navigation with Indian Constellation) भारत का एक पूरी तरह स्वतंत्र और स्वदेशी पोजीशनिंग नेटवर्क है, जो खुद रास्ता ढूंढता है—ठीक वैसे ही जैसे अमेरिका का GPS या रूस का ग्लोनास काम करता है.वहीं दूसरी तरफ, गगन खुद कोई नया नेविगेशन नेटवर्क नहीं है और न ही नया रास्ता बनाता है. गगन का मुख्य काम केवल और केवल जीपीएस (GPS) से मिलने वाले सिग्नलों की बारीकी से जांच करना, उनकी तकनीकी कमियों को दूर करना और नागरिक उड्डयन (Civil Aviation) की सुरक्षा के लिए उन्हें ज्यादा से ज्यादा विश्वसनीय और अचूक बनाना है.70 टन के हवाई जहाज के लिए जीपीएस की कमियों को कैसे दूर करता है गगन?हमारे स्मार्टफोन में मौजूद सामान्य जीपीएस कुछ मीटर (5 से 10 मीटर) तक की चूक या एरर कर सकता है, जो सड़क पर गाड़ी चलाने या कोई रेस्टोरेंट ढूंढने के लिए तो ठीक है; लेकिन 70 टन के भारी-भरकम हवाई जहाज को जीरो विजिबिलिटी और घने बादलों के बीच से रनवे पर उतारने के लिए यह बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं है. भारत के ऊपर मौजूद पृथ्वी की ऊपरी वायुमंडलीय परत (Ionosphere) के कारण जीपीएस के सिग्नल अक्सर सुस्त पड़ जाते हैं या मुड़ जाते हैं, जिससे गलत लोकेशन दिखने का खतरा रहता है.इसे पूरी तरह फिक्स करने के लिए इसरो ने भारतभर में 15 अत्यधिक संवेदनशील ग्राउंड रेफरेंस स्टेशन (INRES) बनाए हैं, जिनकी भौगोलिक लोकेशन सेंटीमीटर तक फिक्स है. ये स्टेशन जीपीएस की त्रुटि को रियल-टाइम में पकड़ते हैं, इंडियन मास्टर कंट्रोल सेंटर (INMCC) उसे ठीक करने का गणितीय फॉर्मूला बनाता है और सैटेलाइट्स के जरिए तुरंत प्लेन के रिसीवर को भेज देता है. सबसे खास बात यह है कि अगर किसी तकनीकी खराबी के कारण सिग्नल पर भरोसा नहीं किया जा सकता, तो यह सिस्टम पायलट को महज 6 सेकंड के भीतर वॉर्निंग अलर्ट (Time-to-Alert) भी दे देता है.अमेरिका-यूरोप के क्लब में शामिल हुआ भारत: क्यों दुनिया का सबसे एडवांस सिस्टम है 'गगन'?उदयपुर की इस ऐतिहासिक सफल लैंडिंग के साथ ही भारत दुनिया के उन चुनिंदा और गिने-चुने देशों के एलीट क्लब में शामिल हो गया है, जिसके पास अपना खुद का सैटेलाइट आधारित ऑगमेंटेशन सिस्टम (SBAS) मौजूद है. वर्तमान में अमेरिका इसके लिए WAAS (Wide Area Augmentation System) का इस्तेमाल करता है, यूरोप के पास अपना EGNOS है और जापान MSAS तकनीक का उपयोग करता है.लेकिन इन सबके बीच भारत का गगन सिस्टम इसलिए दुनिया में सबसे अनोखा और एडवांस माना जा रहा है क्योंकि यह भूमध्यरेखीय (Equatorial Zone) क्षेत्र के बेहद कठिन, अशांत और तेजी से बदलते आसमान में भी सौ फीसदी सटीक काम करने वाला दुनिया का इकलौता प्रमाणित सिस्टम बन गया है. गगन के आने से भारतीय नागरिक उड्डयन सेक्टर में सुरक्षा के मायने पूरी तरह बदल गए हैं.
Russia Fuel Crisis 2026 : पूरी दुनिया के भू-राजनीतिक (Geopolitical) परिदृश्य में एक ऐसा अप्रत्याशित और चौंकाने वाला फेरबदल हुआ है, जिसने अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों को भी हैरान कर दिया है. वैश्विक ऊर्जा बाजार का 'सिकंदर' और महाशक्ति कहलाने वाला रूस, जिसके पास 80 अरब बैरल से अधिक कच्चे तेल (Crude Oil) का असीमित भंडार है, आज खुद अपने ही देश में एक अभूतपूर्व और गंभीर तेल संकट (Fuel Crisis) से जूझ रहा है. रूस के बड़े-बड़े शहरों में पेट्रोल पंपों के बाहर गाड़ियों की किलोमीटर लंबी लाइनें और ईंधन की राशनिंग (सप्लाई पर सीमा) देखी जा रही है. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया है कि उनका देश इस समय इतिहास के सबसे बुरे गैसोलीन (पेट्रोल) संकट का सामना कर रहा है और उन्होंने इस विकट परिस्थिति से उबरने के लिए भारत और कजाकिस्तान जैसे मित्र देशों से आपातकालीन मदद की गुहार लगाई है.यूक्रेन के 'ड्रोन हंटर्स' ने तोड़ी रूस की कमर: रिफाइनिंग क्षमता 25% तक ठपयह संकट कच्चे तेल की कमी के कारण नहीं, बल्कि उसे इस्तेमाल के योग्य (रिफाइन) बनाने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर के तबाह होने से पैदा हुआ है. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एक इंटरव्यू में माना कि यूक्रेन के साथ पिछले चार साल से चल रहे भीषण युद्ध के दौरान रूसी तेल और गैस रिफाइनरियों पर लगातार किए गए एडवांस ड्रोन हमलों ने देश को गहरी चोट दी है.अकेले मई और जून 2026 में यूक्रेन ने रूस की 20 से अधिक मुख्य रिफाइनरियों को निशाना बनाकर उन्हें मलबे में तब्दील कर दिया है, जिसमें विशाल मॉस्को रिफाइनरी भी शामिल है. इन सटीक और घातक हमलों के चलते रूस की तेल प्रसंस्करण (Crude Processing) क्षमता पिछले दो दशकों के सबसे निचले स्तर पर गिर गई है और देश का कुल पेट्रोल उत्पादन 25 प्रतिशत तक घट गया है. मॉस्को का गैसोलीन रिजर्व घटकर बेहद खतरनाक स्तर (सिर्फ 1.7 मिलियन मीट्रिक टन) पर आ चुका है, जिसे देखते हुए रूस ने पहले ही घरेलू बाजार को संभालने के लिए पेट्रोल-डीजल के निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है.कजाकिस्तान के सामने बड़ी धर्मसंकट: 'हां' कहें तो यूक्रेन का डर, 'ना' कहें तो पुतिन का दबावइस गहरे ऊर्जा संकट से निपटने के लिए क्रेमलिन (रूस) ने अपने पड़ोसी देश कजाकिस्तान से तत्काल 50,000 टन AI-92 ग्रेड पेट्रोल की मांग की है. हालांकि, रूस की इस मांग ने कजाकिस्तान की सरकार को एक बेहद जटिल कूटनीतिक और आर्थिक धर्मसंकट (Matrix of Pressure) में डाल दिया है.कजाकिस्तान को सबसे बड़ा डर यह है कि अगर वह खुलेआम रूस को ईंधन की सप्लाई करता है, तो यूक्रेन के खतरनाक लॉन्ग-रेंज ड्रोन उसकी अपनी रिफाइनरियों को भी निशाना बनाना शुरू कर देंगे. दूसरी ओर, कजाकिस्तान के कच्चे तेल के निर्यात का एक बहुत बड़ा हिस्सा रूसी पाइपलाइनों और बंदरगाहों के माध्यम से ही वैश्विक बाजारों तक पहुंचता है. ऐसे में कजाकिस्तान के ऊर्जा मंत्रालय के लिए रूस की इस मांग पर 'हां' या 'ना' कहना सांप-छछूंदर की गति जैसा हो गया है. वहीं, कजाकिस्तान खुद भी जुलाई में एविएशन फ्यूल (हवाई ईंधन) की कमी का सामना कर रहा है, इसलिए वह रूस के सामने ईंधन के बदले ईंधन (Barter) की शर्त रखने पर विचार कर रहा है.भारत बना ग्लोबल रिफाइनिंग का 'पावरहाउस': पुतिन ने पेट्रोल के लिए खोला खजानाइस पूरे संकट में वैश्विक राजनीति का पासा पूरी तरह पलट चुका है. जो रूस अब तक भारत को भारी डिस्काउंट पर कच्चा तेल बेच रहा था, वही रूस अब भारत से रिफाइंड पेट्रोल (गैसोलीन) खरीदने के लिए मजबूर हो गया है. भारत और रूस के बीच ऊर्जा संबंध साल 2026 में एक नए ऐतिहासिक शिखर पर पहुंच गए हैं. जून 2026 में भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल का आयात बढ़कर रिकॉर्ड 2.66 मिलियन बैरल प्रति दिन हो गया है. भारत इस कच्चे तेल को अपनी अत्याधुनिक रिफाइनरियों (जैसे रिलायंस, नायरा एनर्जी, IOCL) में प्रोसेस करता है और इसे पेट्रोल-डीजल में बदलता है.अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स (रॉयटर्स और RBC) के अनुसार, रूसी रिफाइनरियों के तबाह होने के बाद वहां रोजाना करीब 25,000 टन पेट्रोल की भारी किल्लत हो रही है. रूस की घरेलू मांग रोजाना 1,11,000 टन है, जबकि उसकी बची हुई रिफाइनरियां सिर्फ 85,000 टन ही बना पा रही हैं. इस भारी गैप को भरने के लिए रूस ने भारत से बड़े पैमाने पर समुद्री रास्तों (Seaborne Imports) के जरिए पेट्रोल आयात करने के लिए अपने टैक्स कोड (Tax Code) में संशोधन किया है. इसके तहत विदेशी पेट्रोल खरीदने वाली रूसी तेल कंपनियों को सरकार भारी बजट सब्सिडी देगी.इथेनॉल ब्लेंडिंग का पेंच: क्या भारतीय पेट्रोल अपनाएगा रूस?भारत से बड़े पैमाने पर पेट्रोल आयात करने के सामने एक तकनीकी पेंच भी फंसा हुआ है. दरअसल, भारत ग्लोबल वार्मिंग को कम करने के लिए अपने पेट्रोल में 20 फीसदी इथेनॉल (Ethanol Blend) मिलाता है, जो कि रूस के सामान्य राष्ट्रीय मानक (Standard) से दोगुना है. रूस में अधिकतम 10 फीसदी इथेनॉल मिश्रित ईंधन की ही अनुमति है. हालांकि, मौजूदा संकट और पेट्रोल पंपों पर मची हाहाकार को देखते हुए रूसी स्टेट ड्यूमा (संसद) ने नियमों में ढील देने और भारतीय ईंधन को तुरंत स्वीकार करने की हरी झंडी दे दी है. यह पूरी स्थिति साबित करती है कि भारत आज दुनिया के लिए रिफाइनिंग का सबसे बड़ा और अनिवार्य पावरहाउस बन चुका है.
शेख हसीना ने किया बांग्लादेश लौटने का ऐलान
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने मौत की सजा के बावजूद इस साल देश लौटने का ऐलान किया है. वह करीब दो साल से भारत में रह रही हैं.
एशियाई महाद्वीप के इस हिस्से में कुदरत का भयंकर कहर देखने को मिला है। भारत के पड़ोसी देश चीन में आधी रात को उस वक्त भारी हड़कंप मच गया, जब लोग अपने घरों में गहरी नींद सो रहे थे। अचानक आए बेहद शक्तिशाली भूकंप के झटकों से धरती बुरी तरह कांप उठी और बहुमंजिला इमारतें ताश के पत्तों की तरह हिलने लगीं। भूकंप का यह झटका इतना जोरदार था कि लोग डर के मारे अपने मासूम बच्चों के साथ घरों से बाहर निकलकर सड़कों और खुले मैदानों की तरफ भागने लगे। स्थानीय समयानुसार देर रात आए इस जलजले ने चीन के कई रिहायशी इलाकों को हिलाकर रख दिया है, जिसके बाद प्रभावित प्रांतों में आपातकाल (Emergency Services) लागू कर दिया गया है।रिक्टर स्केल पर कितनी थी भूकंप की तीव्रता और कहां था इसका केंद्र?सीस्मोलॉजी विभाग (भूकंप विज्ञान केंद्र) से मिली शुरुआती जानकारी के अनुसार, चीन के सुदूर और पहाड़ी क्षेत्र में आए इस भूकंप की तीव्रता रिक्टर स्केल पर बेहद खतरनाक श्रेणी में मापी गई है। जमीन के अंदर कम गहराई पर इसका केंद्र (Epicenter) होने के कारण झटके बहुत ज्यादा महसूस किए गए और इसकी गूंज आसपास के कई किलोमीटर के दायरे तक फैल गई। भूकंपीय लहरों के चलते केंद्र के नजदीक स्थित कई पुराने मकानों और सरकारी इमारतों में दरारें आने की खबरें हैं। चीनी सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग (China Earthquake Networks Center) ने तुरंत राहत और बचाव कार्य शुरू करने के निर्देश जारी कर दिए हैं।भारत के सीमावर्ती इलाकों में भी अलर्ट? भौगोलिक दृष्टि से क्यों बढ़ा खतराचूंकि यह भूकंप भारत के पड़ोसी देश चीन के सीमाई और पहाड़ी हिस्से में आया है, इसलिए भौगोलिक रूप से बेहद संवेदनशील माने जाने वाले भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख व जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों में भी भूवैज्ञानिक हलचल पर पैनी नजर रखी जा रही है। हिमालयन फॉल्ट लाइन (Himalayan Fault Line) पर लगातार बढ़ रहे इस दबाव के कारण टेक्टोनिक प्लेट्स में मची उथल-पुथल से भारतीय मौसम विभाग और भूकंप विशेषज्ञों की चिंताएं बढ़ गई हैं। हालांकि, भारतीय सीमा के भीतर अभी तक किसी भी तरह के नुकसान की कोई खबर सामने नहीं आई है, लेकिन स्थानीय प्रशासन को पूरी तरह सतर्क रहने को कहा गया है।तबाही और नुकसान का आकलन जारी: रात के अंधेरे में रेस्क्यू ऑपरेशन शुरूआधी रात को आए इस भयंकर भूकंप के बाद प्रभावित शहरों की बिजली और संचार व्यवस्था पूरी तरह से ठप हो गई है, जिससे रेस्क्यू ऑपरेशन चलाने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। मलबे में दबे लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए चीनी सेना और स्थानीय आपदा राहत बलों (NDRF जैसी टीमों) को तैनात किया गया है। आने वाले कुछ घंटों में हल्के झटके (Aftershocks) आने की आशंका को देखते हुए प्रशासन ने लोगों से पक्के और जर्जर मकानों के अंदर न जाने की अपील की है। पूरी दुनिया की नजरें इस वक्त चीन से आने वाली पल-पल की तस्वीरों और आधिकारिक बयानों पर टिकी हुई हैं।
मिडल ईस्ट और दक्षिण एशिया के इस हिस्से में तनाव अब अपने सबसे खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच सीमाई इलाकों में लंबे समय से जारी तनातनी ने बीती रात एक बेहद खौफनाक रूप अख्तियार कर लिया। पाकिस्तानी वायुसेना और सुरक्षाबलों ने अफगानिस्तान के सीमावर्ती इलाकों में आधी रात को अचानक चौतरफा हवाई हमले (Air Strikes) शुरू कर दिए। इस भीषण बमबारी में महिलाओं और बच्चों समेत कम से कम 35 बेकसूर लोगों की दर्दनाक मौत हो गई है, जबकि दर्जनों लोग गंभीर रूप से घायल बताए जा रहे हैं। स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, दोनों देशों के बीच बढ़ा यह सैन्य गतिरोध पिछले एक महीने के भीतर चौथा बड़ा हमला है, जिसने पूरे क्षेत्र को बारूद के ढेर पर ला खड़ा किया है।रात के अंधेरे में पाकिस्तानी लड़ाकू विमानों का कहर: आखिर क्यों हुआ यह हमला?प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, जब लोग अपने घरों में सो रहे थे, तभी पाकिस्तानी लड़ाकू विमानों ने अफगानिस्तान के खोस्त और कुनार प्रांतों के रिहायशी इलाकों को निशाना बनाकर मिसाइलें दागनी शुरू कर दीं। पाकिस्तान सरकार और सैन्य कमांडरों का दावा है कि यह हमला सीमा पार से सक्रिय प्रतिबंधित आतंकी संगठनों (TTP - तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान) के सुरक्षित ठिकानों को तबाह करने के लिए किया गया था। हालांकि, अफगान अधिकारियों और स्थानीय नागरिकों ने इस दावे को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा है कि मारे गए सभी लोग आम नागरिक थे, जिनका किसी भी उग्रवादी गुट से कोई लेना-देना नहीं था।काबुल और इस्लामाबाद में भारी तनाव: अफगान सीमा पर अलर्ट जारीइस भीषण खूनखराबे के बाद अफगानिस्तान की कार्यवाहक तालिबान सरकार ने कड़ा रुख अपना लिया है। काबुल से जारी एक आधिकारिक बयान में पाकिस्तान को इस कायरतापूर्ण हरकत के गंभीर परिणाम भुगतने की सीधी चेतावनी दी गई है। सीमावर्ती इलाकों जैसे डूरंड लाइन (Durand Line) के आसपास अफगान सेना की टुकड़ियों को भारी हथियारों के साथ हाई अलर्ट पर रख दिया गया है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों परमाणु और सैन्य ताकत संपन्न पड़ोसियों के बीच लगातार होते ये हमले किसी बड़े क्षेत्रीय युद्ध की चिंगारी बन सकते हैं, जिससे दक्षिण एशिया की सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी।भारत और वैश्विक समुदाय की नजर: क्या संयुक्त राष्ट्र करेगा हस्तक्षेप?एक महीने के भीतर चौथे बड़े हमले ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिज्ञों को भी चिंता में डाल दिया है। भारत समेत दुनिया भर की खुफिया एजेंसियां और विदेश मंत्रालय इस नाजुक स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र (UN) और वैश्विक मानवाधिकार संगठनों से इस मामले में तुरंत दखल देने और दोनों देशों को बातचीत की मेज पर लाने की मांग की जा रही है। अगर यह सीमाई विवाद जल्द नहीं थमा, तो शरणार्थियों का एक नया संकट खड़ा हो सकता है, जिसका सीधा असर भारत और आसपास के पड़ोसी देशों की आंतरिक सुरक्षा और भौगोलिक स्थिरता पर पड़ना लाजिमी है।
मिडल ईस्ट (Middle East) से इस वक्त बेहद चौंकाने वाली और डराने वाली खबर सामने आ रही है। पूरी दुनिया को लग रहा था कि अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चल रहा विवाद अब एक शांति समझौते (MoU) के जरिए सुलझने की कगार पर है, लेकिन ऐन वक्त पर सिर्फ एक सिंगल लाइन ने पूरे खेल को पूरी तरह से बिगाड़ कर रख दिया है। इस शांति समझौते के मसौदे में शामिल 'आर्टिकल-5' (Article 5 of MoU) अब दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री व्यापारिक मार्ग— स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) में युद्ध की नई चिंगारी भड़काने की सबसे बड़ी वजह बन चुका है। इसके चलते अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था में एक बार फिर भारी हड़कंप मच गया है।क्या है समझौता ज्ञापन (MoU) का वो रहस्यमयी आर्टिकल-5?अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों और शीर्ष राजनयिकों के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम और आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने के लिए जो खुफिया बातचीत चल रही थी, उसकी बुनियाद इस 'आर्टिकल-5' पर आकर टिक गई थी। इस आर्टिकल में साफ तौर पर लिखा था कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय तेल टैंकरों और मालवाहक जहाजों की सुरक्षा की जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ ईरानी नौसेना की होगी, जबकि पश्चिमी देशों की सेनाओं को वहां से तुरंत हटना होगा। अमेरिका ने इस लाइन को अपने और अपने मित्र देशों के हितों के खिलाफ मानते हुए इस पर हस्ताक्षर करने से साफ मना कर दिया, जिसके बाद शांति की उम्मीदें पल भर में स्वाहा हो गईं।होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) क्यों बन गया है बारूद का ढेर?भौगोलिक और आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण लाइफलाइन है। दुनिया के कुल कच्चे तेल (Crude Oil) का लगभग 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा इसी संकरे समुद्री रास्ते से होकर भारत, चीन, जापान और यूरोपीय देशों तक पहुंचता है। समझौते की यह लाइन लीक होते ही इस पूरे समुद्री इलाके में दोनों देशों की नौसेनाएं (US Navy and Iranian Navy) पूरी तरह से आमने-सामने आ गई हैं। ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य के पास अपनी मिसाइल डिफेंस प्रणालियों को तैनात करना शुरू कर दिया है, जिसके चलते इस पूरे क्षेत्र में युद्ध के बादल मंडराने लगे हैं।भारत और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इस कूटनीतिक विफलता का क्या होगा असर?इस एक लाइन की वजह से बिगड़ी बात का सीधा खामियाजा भारत समेत पूरी दुनिया को भुगतना पड़ सकता है। यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण जहाजों की आवाजाही थोड़ी देर के लिए भी प्रभावित होती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अचानक आसमान छू सकती हैं। भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा इसी रूट से आयात करता है, जिससे घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने और महंगाई अनियंत्रित होने का खतरा बढ़ गया है। दुनिया भर की खुफिया एजेंसियां अब इस बात पर नजर गड़ाए हुए हैं कि क्या अमेरिका और ईरान बातचीत की मेज पर वापस लौटेंगे या यह विवाद किसी बड़े युद्ध में तब्दील हो जाएगा।
ईरान पर भरोसा नहीं: अमेरिकी सीनेटर टिलिस का बड़ा बयान
अमेरिकी रिपब्लिकन सीनेटर थॉम टिलिस ने रविवार को कहा कि उन्हें इस बात पर संदेह है कि ईरान अमेरिका के साथ हुए युद्धविराम समझौते का पालन करेगा
हैती और सीरिया के नागरिकों का टीपीएस खत्म करने के ट्रंप के फैसले से रिपब्लिकन पार्टी में मतभेद
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा हैती और सीरिया के हजारों प्रवासियों का टेम्परेरी प्रोटेक्टेड स्टेटस (टीपीएस) समाप्त करने के फैसले को लेकर रिपब्लिकन पार्टी में मतभेद उभरकर सामने आए हैं
'पवित्र रक्त' और मां के अतीत का विरोधाभास उत्तर कोरिया की सत्ता 'माउंट पेक्टू रक्तसमूह' (Mount Paektu Bloodline) के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसे देश पर शासन करने के लिए सबसे शुद्ध और वीर माना जाता है। लेकिन किम जोंग उन की मां, को योंग-ही का इतिहास इस सरकारी दावे के बिल्कुल उलट है। रिपोर्ट्स के अनुसार, को योंग-ही का जन्म 1952 में जापान के ओसाका में हुआ था। उनका परिवार एक पुनर्वास कार्यक्रम के तहत उत्तर कोरिया आया था, लेकिन उस समय वहां के समाज में जापान से आए लोगों को हेय दृष्टि से देखा जाता था। यही कारण है कि किम जोंग उन की मां की सामाजिक पृष्ठभूमि को उनके 'पवित्र' परिवारिक इतिहास के लिए एक बड़ी बाधा माना जाता है, जिसे प्योंगयांग का प्रोपेगेंडा हमेशा छिपाने की कोशिश करता है।डांस, खूबसूरती और प्रेम कहानी का सफर को योंग-ही एक प्रतिभाशाली डांसर थीं और सरकारी आर्ट ट्रूप से जुड़ी हुई थीं। उनकी खूबसूरती और नृत्य ने तत्कालीन तानाशाह किम जोंग इल को अपनी ओर आकर्षित किया। उस समय किम जोंग इल पहले से ही विवाहित थे, लेकिन को योंग-ही के साथ उनके संबंधों ने एक नया मोड़ लिया। चूंकि उनकी शादी आधिकारिक नहीं थी, इसलिए को योंग-ही और उनके बच्चे राजधानी प्योंगयांग से दूर वोनसान शहर में रहने लगे। 2004 में स्तन कैंसर से उनकी मौत के बाद भी उत्तर कोरियाई मीडिया ने इसे कोई तवज्जो नहीं दी, क्योंकि उनका जापानी जन्म किम परिवार की 'शुद्धता' की छवि को कमजोर कर सकता था।सत्ता का खेल: कैसे बनीं किंगमेकर? किम जोंग उन के सत्ता तक पहुँचने के पीछे उनकी मां को योंग-ही का सबसे बड़ा हाथ माना जाता है। तानाशाह बनने की दौड़ में कई नाम थे—किम जोंग इल के बड़े बेटे किम जोंग नम, जो सुधारों की वकालत के कारण पिता का भरोसा खो चुके थे और बाद में जिनकी मलेशिया में हत्या कर दी गई; और दूसरे भाई किम जोंग चुल, जो कथित रूप से निजी जीवन में व्यस्त थे। विशेषज्ञ मानते हैं कि को योंग-ही ने ही पर्दे के पीछे से यह सुनिश्चित किया कि उनका बेटा किम जोंग उन ही अगला उत्तराधिकारी बने। अन्य दावेदारों के बाहर होने के बाद, मां की इस राजनीतिक बिसात ने किम जोंग उन को दुनिया के सबसे रहस्यमय और क्रूर तानाशाह की कुर्सी तक पहुँचा दिया। आज भी को योंग-ही का नाम उत्तर कोरिया की आधिकारिक गाथाओं में एक बड़ा 'ब्लैकआउट' है, क्योंकि उनका सच शासन की नींव पर उठने वाले सवालों को जन्म देता है।
पुतिन का बड़ा कबूलनामा: रूस के सामने खड़ी हैं बड़ी चुनौतियां यूक्रेन के साथ जारी युद्ध और पश्चिमी देशों के कड़े आर्थिक प्रतिबंधों के बीच रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि रूस फिलहाल एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है। सत्तारूढ़ 'यूनाइटेड रूस पार्टी' के सम्मेलन को संबोधित करते हुए पुतिन ने कहा कि इन कठिनाइयों ने देश को कमजोर नहीं, बल्कि पहले से कहीं अधिक मजबूत और अनुभवी बनाया है। उनका यह बयान तब आया है जब रूसी क्षेत्रों पर ड्रोन और मिसाइल हमलों में तेजी देखी जा रही है, जिससे बुनियादी ढांचों को काफी नुकसान पहुँचा है।हमलों का जवाब देने की दो-टूक तैयारी पुतिन ने देशवासियों को आश्वस्त करते हुए कहा कि सरकार वर्तमान में उत्पन्न हर समस्या से पूरी तरह वाकिफ है और उन्हें सुलझाने के लिए ठोस रणनीतियां अपनाई जा रही हैं। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि रूस अपनी सीमाओं की अखंडता और नागरिकों की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं करेगा। बुनियादी ढांचा सुविधाओं पर हो रहे हमलों का जिक्र करते हुए राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि रूस की सुरक्षा एजेंसियां और सशस्त्र बल हर तरह के खतरों से निपटने के लिए पूरी तरह मुस्तैद हैं। उन्होंने देश की संप्रभुता को अटूट बताते हुए कहा कि रूस किसी भी बाहरी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है।विकास और सुरक्षा का 'पुतिन फॉर्मूला' सितंबर में होने वाले संसदीय चुनावों से पहले पुतिन का यह संदेश पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए एक बड़ी लामबंदी का हिस्सा माना जा रहा है। अपने भाषण में उन्होंने न केवल सैन्य और रक्षा क्षमताओं पर ध्यान केंद्रित किया, बल्कि आर्थिक स्थिरता और सामाजिक सुरक्षा को भी प्राथमिकता दी। पुतिन ने जोर देकर कहा कि वैश्विक स्तर पर डाले जा रहे दबावों के बावजूद रूस अपनी स्वतंत्र नीतियों पर अडिग है और विकास के पथ पर आगे बढ़ रहा है। यह सम्मेलन स्पष्ट करता है कि आगामी चुनावों में पुतिन की पार्टी जनता के बीच 'विकास, सुरक्षा और स्थिरता' के तीन स्तंभों के साथ अपने वोट बैंक को और मजबूत करना चाहती है।
गैस के लिए ईरान की ओर ताक रहा पाकिस्तान: क्या अमेरिका से मिली छूट के बाद खत्म होगा ऊर्जा संकट
ऊर्जा संकट की मार: बेहाल है पाकिस्तान का पंजाब पाकिस्तान इन दिनों एक गंभीर ऊर्जा संकट के दौर से गुजर रहा है। अर्थशास्त्री महमूद रसूल के अनुसार, देश के अधिकांश हिस्सों, विशेषकर पंजाब प्रांत में गैस की भीषण कमी है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि उपभोक्ताओं को दिन भर में केवल कुछ घंटों के लिए ही गैस मिल पा रही है, जिससे घरेलू और औद्योगिक कामकाज पूरी तरह ठप पड़ गया है। आम जनता इस महंगाई और आपूर्ति की कमी से त्रस्त है, जिसके चलते सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा है।ईरान-अमेरिका शांति समझौता: पाकिस्तान के लिए नई उम्मीद पाकिस्तान की नजरें अब ईरान के साथ होने वाले संभावित ऊर्जा सौदों पर टिकी हैं। अमेरिका द्वारा ईरान पर लगे प्रतिबंधों में दी गई अस्थायी (60 दिन की) ढील ने पाकिस्तान को एक उम्मीद की किरण दिखाई है। चूँकि अमेरिका ने ईरान को विशिष्ट शर्तों के साथ तेल और गैस निर्यात की छूट दी है, इसलिए पाकिस्तान अब इस कूटनीतिक अवसर का फायदा उठाने की फिराक में है। पेट्रोलियम मंत्री अली परवेज मलिक ने स्पष्ट किया है कि खाड़ी क्षेत्र में शांति बहाल होने से वैश्विक स्तर पर पेट्रोलियम कीमतों में आई गिरावट का लाभ सीधे जनता तक पहुँचाने की कोशिश की जा रही है।कीमतों में राहत की उम्मीद और सरकार की चुनौती पिछले दिनों जब अमेरिका-ईरान के बीच संघर्ष चरम पर था, तब पाकिस्तान में पेट्रोल की कीमतें रिकॉर्ड 414 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई थीं। वर्तमान में यह 300 रुपये प्रति लीटर पर है, लेकिन जनता अभी भी और राहत की उम्मीद लगाए बैठी है। पेट्रोलियम मंत्री ने दावा किया है कि सरकार अंतरराष्ट्रीय समझौतों और नियमों के दायरे में रहकर ईरान से सस्ते तेल और गैस आयात के विकल्पों को तलाश रही है। हालांकि, यह छूट अस्थायी है और अमेरिका-ईरान वार्ताओं के भविष्य पर निर्भर करेगी। अब देखने वाली बात यह होगी कि शाहबाज शरीफ सरकार इस अल्पकालिक अवसर का लाभ उठाकर आम जनता को महंगाई से कितनी राहत दिला पाती है।
महरंग बलोच को उम्रकैद पर उठा विवाद, रिपोर्ट में पाकिस्तान की मानवाधिकार स्थिति पर सवाल
बलोच अधिकार कार्यकर्ता महरंग बलोच को सुनाई गई उम्रकैद की सजा पाकिस्तान सरकार और बलोच अधिकार आंदोलन के बीच बढ़ती दूरी को दर्शाती है
चल रहे फीफा वर्ल्ड कप के 18 दिन हो चुके हैं। 48 टीमों के 72 मैच में 215 गोल हो चुके हैं। ईनाम की रकम है 8 हजार करोड़ रुपए। पर ये फुटबॉल बला है क्या जो इंसानी हाथों से ज्यादा कदमों को तरजीह देता है। कब पैदा हुआ, क्यों पैदा हुआ, कायदे-कानून कैसे और किसने बनाए, साथ में कुछ खास किस्से। 4 चैप्टर और 14 ग्राफिक्स में यही बातें हैं… ----------- **** ग्राफिक्स: द्रगचंद्र भुर्जी, अंकलेश विश्वकर्मा और अंकुर बंसल ---------- यह खबर भी पढ़िए… क्या IPL का डाउनफॉल शुरू:टीवी दर्शक 26% घटे, विदेशी खिलाड़ी आधा सीजन ही खेल रहे; टॉप एक्सपर्ट्स ने बताईं वजहें और समाधान इस साल IPL के फर्स्ट हाफ में टीवी व्यूअरशिप 26% गिरी है। स्पॉन्सर 65 से 45 रह गए हैं। ईडन गार्डन जैसे स्टेडियम भी कुछ मैचों में आधे ही भर पाए। कई विदेशी खिलाड़ियों ने भी आधे सीजन बाद टीम को जॉइन किया। पूरी खबर पढ़िए…
कतर में बनी सहमति: अमेरिका-ईरान अब नहीं करेंगे हमले
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के पास हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े सैन्य तनाव के बाद अब दोनों देशों ने हमले रोकने पर सहमति जताई है
22 से 26 जून 2026 तक बांग्लादेशी पीएम तारिक रहमान चीन में थे। इसी दौरान बांग्लादेश ने अपने मोंगला पोर्ट का प्रोजेक्ट भारत से छीनकर चीन को दे दिया। यानी हमारे तट से महज 80 किमी दूर मोंगला पोर्ट पर चीन बैठेगा। भारत की ‘चिकन नेक’ से 100 किमी दूर तीस्ता नदी को भी चीन मैनेज करेगा। आखिर चीन इन इलाकों में क्या करने वाला है और ये भारत की सुरक्षा के लिए कितना बड़ा खतरा; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: बांग्लादेश ने भारत से मोंगला प्रोजेक्ट छीनकर चीन को क्यों दिया? जवाब: 2015 में बांग्लादेश ने भारत से दो इकॉनमिक जोन बनाने के लिए समझौता किया था। इनमें एक मोंगला पोर्ट और दूसरा चटगांव का इलाका था। बांग्लादेशी अखबार द बिजनेस स्टैंडर्ड के मुताबिक, मोंगला प्रोजेक्ट की शुरुआत में भारत के पैसे से मोंगला पोर्ट से खुलना के बीच एक नई रेलवे लाइन बनी। 2018 में भारत सरकार ने मोंगला प्रोजेक्ट का थका हीरानंदानी ग्रुप को दिया। मार्च 2022 में बांग्लादेश इकॉनोमिक जोन अथॉरिटी यानी BEZA और हीरानंदानी ग्रुप की कंपनी एविटा कंस्ट्रक्शंस प्राइवेट लिमिटेड के साथ समझौता किया। हालांकि अगस्त 2024 में बांग्लादेश में शेख हसीना का तख्तापलट होने के चलते ये प्रोजेक्ट रुक गया। शेख हसीना भारत आ गईं। शेख हसीना तब भारत आ गई थीं और बांग्लादेश के अंतरिम राष्ट्रपति बने मुहम्मद यूनुस के दौर में इस प्रोजेक्ट पर बात आगे नहीं बढ़ी। हसीना के बाद एंटी इंडियन मानी जाने वाली खालिदा जिया की पार्टी BNP सत्ता में आई और फरवरी 2026 में उनके बेटे तारिक रहमान पीएम बने। BEZA के मुताबिक, भारतीय कंपनी तय शर्त के मुताबिक दो साल के भीतर काम शुरू नहीं कर पाई। इसी बीच जून 2025 में बांग्लादेश में तैनात चीनी दूतावास के ऑफिसर्स ने मोंगला पोर्ट पर एक चीनी इकॉनमिक जोन बनाने का प्रस्ताव दिया था। इसके बाद अक्टूबर 2025 में बांग्लादेश सरकार ने भारत के साथ प्रोजेक्ट रद्द कर दिया। 25 जून 2026 को तारिक रहमान के चीन दौरे के बीच BEZA और चीन की सरकारी कंपनी चाइना सिविल इंजीनियरिंग कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन (CCECC) के बीच पोर्ट के डेवेलपमेंट के अलावा आसपास की 110 एकड़ जमीन पर इकनोमिक जोन बनाने का समझौता हुआ है। इसके अलावा 25 मार्च 2025 को मोंगला पोर्ट अथॉरिटी (MPA) और CCECC के बीच मोंगला पोर्ट के डेवेलपमेंट के लिए 370 मिलियन डॉलर के एक अलग प्रोजेक्ट पर भी समझौता हुआ था। हालांकि इस पर अब तक काम नहीं शुरू हुआ है। सवाल-2: अब चीन मोंगला पोर्ट पर क्या करने जा रहा है? जवाब: चीन मोंगला पोर्ट पर 2 काम करेगा... 1. पोर्ट का डेवेलपमेंट 2. पोर्ट के पास इकॉनोमिक जोन 26 जून को बांग्लादेश-चीन के जॉइंट स्टेटमेंट में 2 और प्रोजेक्ट चीन को देने की बात कही गई है। इसमें लिखा है कि दोनों देश चटगांव में चीन के इकॉनोमिक एंड इंडस्ट्रियल जोन को डेवेलपमेंट करेंगे। साथ ही चीन तीस्ता नदी के प्रबंधन में हर संभव मदद करेगा। सवाल-3: ये प्रोजेक्ट चीन को मिलना भारत के लिए चिंता की बात क्यों?जवाब: भारत के लिए 4 बड़ी दिक्कतें हैं... 1. चीन के मुकाबले में कूटनीतिक हार 2. बंगाल की खाड़ी में भारत के लिए नया खतरा 3. तीस्ता नदी प्रोजेक्ट से 'चिकन नेक' पर खतरा 4. भारत की बिजनेस कनेक्टिविटी को नुकसान सवाल-4: चीन के बढ़ते दबदबे से कैसे निपटेगा भारत?जवाब: हिंद महासागर को भारत का 'आंगन' कहा जाता है, लेकिन यहां चीन अपनी ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल’ कही जाने वाली स्ट्रैटजी के तहत बंदरगाह, हवाई पट्टी और नेवल बेस बना रहा है। चीनी कंपनियां हिंद महासागर में 17 बंदरगाहों में से 13 का डेवेलपमेंट कर रही हैं, जबकि बाकी प्रोजेक्ट्स में उनकी हिस्सेदारी हैं। हिंद महासागर में चीन की हरकतें भारत के लिए बड़ी चुनौती हैं। इसके जवाब में भारत भी उल्टा जाल बुन रहा है। भारत की स्ट्रैटजी का नाम है- ‘नेकलेस ऑफ डायमंड’। हालांकि ये भारत सरकार का कोई घोषित प्रोजेक्ट या डॉक्ट्रिन नहीं है। ‘नेकलेस ऑफ डायमंड’ के तहत 4 बड़े काम हो रहे हैं… ---- ये खबर भी पढ़ें… भास्कर एक्सप्लेनर- शेख हसीना भारत से कहां जाएंगी:बांग्लादेश की सत्ता अब कौन संभालेगा; 8 सवालों में आगे की कहानी पड़ोसी देश बांग्लादेश की कहानी हर गुजरते घंटे के साथ बदल रही है। करीब 2 महीने से चल रहे आरक्षण विरोधी आंदोलन हिंसक होने के बाद प्रधानमंत्री शेख हसीना को बांग्लादेश छोड़ना पड़ा है। वो सेना के हेलिकॉप्टर से पहले अगरतला पहुंचीं और वहां से C-130J मिलिट्री विमान से गाजियाबाद के हिंडन मिलिट्री एयरबेस पर लैंड हुईं। पूरी खबर पढ़ें…
फ्रांस में बड़ा विमान हादसा: पैराशूट प्रशिक्षण विमान क्रैश, 11 लोगों की दर्दनाक मौत
फ्रांस के उत्तर-पूर्वी शहर टॉम्बलेन में रविवार को एक नागरिक विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें सवार 11 लोगों की मौत हो गई। स्थानीय अधिकारियों ने इसकी पुष्टि की है। वहीं सऊदी अरब में भी एक हेलिकॉप्टर हादसे की खबर है। इसमें 14 लोगों की मौत हो गई है।
कौन हैं डॉ. महरंग बलोच और क्यों बनीं 'बलूचिस्तान की शेरनी'? बलूचिस्तान की आवाज बनकर उभरीं डॉ. महरंग बलोच को पाकिस्तान की एक आतंकवाद-रोधी अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई है। 33 वर्षीय महरंग का संघर्ष तब शुरू हुआ था, जब वे महज 16 साल की थीं और उनके पिता अब्दुल गफ्फार लैंगोव लापता हो गए थे। बाद में उनके पिता का शव बरामद हुआ, जो प्रताड़ना के गहरे निशान लिए हुए था। इस घटना ने एक साधारण डॉक्टर को बलूचिस्तान के सबसे बड़े मानवाधिकार आंदोलन का चेहरा बना दिया। उन्हें अब 'बलूचिस्तान की शेरनी' के नाम से जाना जाता है, जो जबरन गायब किए गए (Enforced Disappearances) हजारों लोगों के हक के लिए आवाज उठाती रही हैं।उम्रकैद के पीछे का विवाद: क्या है आरोप? अदालत ने महरंग और उनके सहयोगी सिबगतुल्लाह शाह को 2024 में ग्वादर में हुए एक विरोध प्रदर्शन के दौरान एक पैरामिलिट्री सैनिक की मौत के मामले में दोषी ठहराया है। उन पर आतंकवाद, देशद्रोह और हत्या जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। हालांकि, महरंग का परिवार और उनके समर्थक इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हैं। उनका कहना है कि यह बलूचिस्तान में असहमति की आवाज को दबाने और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित करने की एक सोची-समझी साजिश है। महरंग की कानूनी टीम ने घोषणा की है कि वे इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती देंगे।लापता लोगों का दर्द और पाकिस्तान का 'सौतेला' रुख बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा और प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध प्रांत है, लेकिन लंबे समय से उपेक्षा और हिंसा का दंश झेल रहा है। मानवाधिकार समूहों का आरोप है कि पिछले दो दशकों में हजारों बलूच लोग सुरक्षा बलों द्वारा बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के हिरासत में ले लिए गए। सरकार इन दावों को खारिज करती है और लापता लोगों को उग्रवादी गुटों से जोड़ने की कोशिश करती है। बलूच कार्यकर्ताओं का मानना है कि 'जबरन गायब करना' इस्लामाबाद की वह रणनीति है, जिसका उद्देश्य विद्रोह को कुचलना और स्वतंत्र बलूचिस्तान की मांग को कमजोर करना है।अदम्य साहस: धमकियों और पाबंदियों के बावजूद जारी संघर्ष महरंग बलोच का एक्टिविज्म केवल बयानों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने 2023 के अंत में सैकड़ों महिलाओं के साथ 1,600 किलोमीटर की लंबी पदयात्रा (Long March) का नेतृत्व किया ताकि लापता लोगों के ठिकाने का पता चल सके। जान से मारने की धमकियों और बार-बार गिरफ्तारी के बावजूद वे पीछे नहीं हटीं। मार्च 2025 में क्वेटा में विरोध प्रदर्शन के दौरान उनकी गिरफ्तारी हुई थी। अब उम्रकैद की यह सजा उनके दशकों पुराने संघर्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। महरंग का परिवार और मानवाधिकार संगठन इस मुकदमे को निष्पक्ष मानने से इनकार कर रहे हैं और इसे असहमति को कुचलने का माध्यम बता रहे हैं।
विनाशकारी भूकंप: मातम के बीच प्रशासनिक संवेदनहीनता वेनेजुएला इन दिनों 7.2 और 7.5 तीव्रता के विनाशकारी भूकंप के कारण भीषण त्रासदी झेल रहा है। ला गुआइरा राज्य इस आपदा का केंद्र बना हुआ है, जहां मलबे के नीचे दबे शवों की दुर्गंध ने पूरे इलाके को नरक बना दिया है। अब तक 1,430 मौतें और 3,200 घायलों की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 50,000 लोग अभी भी लापता हैं। लेकिन सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि जहां हजारों परिवार अपने प्रियजनों को खोकर बिलख रहे हैं, वहां राहत कार्य के लिए पहुंचे सरकारी कर्मचारी आपदा का 'लुत्फ' उठाते नजर आए। ध्वस्त इमारतों के सामने खड़े होकर अधिकारियों द्वारा ली जा रही सेल्फी ने पूरी दुनिया में वेनेजुएला सरकार के खिलाफ आक्रोश पैदा कर दिया है।राहत कार्यों में ढिलाई और 'पास' का नया ड्रामा संकट के इस दौर में सरकार की ओर से जो सहायता मिलनी चाहिए थी, उसके बजाय प्रशासन ने बाधाएं खड़ी कर दी हैं। सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में आम लोगों का प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया गया है। स्वयंसेवकों, जो अपने स्तर पर लोगों की जान बचाने के लिए मलबे हटा रहे थे, उन्हें भी 'सुरक्षित प्रवेश पास' लेने के लिए मजबूर किया गया है। स्थानीय लोगों का गुस्सा तब सातवें आसमान पर पहुंच गया जब उन्होंने अधिकारियों को मदद छोड़कर तस्वीरें खिंचवाने में व्यस्त देखा। पीड़ितों का कहना है कि प्रशासन न केवल मदद करने में विफल रहा, बल्कि बचाव कार्य में जुटने वालों के लिए भी मुश्किलें पैदा कर रहा है।सड़ती लाशें और अपनों की तलाश में जुड़ा हर हाथ भीषण गर्मी के कारण मलबे में दबे शवों के तेजी से सड़ने से स्वास्थ्य संबंधी खतरा भी बढ़ गया है। ला गुआइरा में हालात इतने भयावह हैं कि लोग मास्क पहनने को मजबूर हैं। दिल दहला देने वाली कहानियों के बीच, पीड़ितों का दर्द साफ झलकता है कि उन्होंने अपने परिजनों को खुद मलबे से बाहर निकाला है, जबकि सरकारी मदद नदारद रही। कैराबलेडा में अपनों को तलाश रही माइलेडी रोमेरो जैसी कई मांएं हैं जिनकी आंखों में आंसू और जुबां पर एक ही सवाल है—कल रात तक मलबे के नीचे से लोगों की चिल्लाने की आवाजें आ रही थीं, लेकिन प्रशासन ने बचाने की कोशिश तक नहीं की। आखिर वे किस बात का इंतजार कर रहे हैं? फिलहाल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 21 देशों की राहत टीमें जुटी हुई हैं, लेकिन स्थानीय प्रशासन की उदासीनता इस आपदा को और भी दर्दनाक बना रही है।
रिकॉर्ड तोड़ गर्मी से फ्रांस में हाहाकार पश्चिमी यूरोप इन दिनों भीषण गर्मी की चपेट में है, जिसका सबसे बुरा असर फ्रांस पर पड़ा है। पब्लिक हेल्थ फ्रांस के ताजा आंकड़ों के अनुसार, रिकॉर्ड तोड़ हीटवेव के कारण देश में लगभग 1,000 अतिरिक्त मौतें दर्ज की गई हैं। यह गर्मी न केवल इंसानी सहनशक्ति की परीक्षा ले रही है, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए भी बड़ी चुनौती बन गई है। एजेंसी ने स्पष्ट किया है कि ये आंकड़े अभी शुरुआती हैं और जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी, यह संख्या और अधिक बढ़ सकती है।बुजुर्गों और अकेले रहने वालों के लिए बनी काल इस हीटवेव की सबसे दुखद बात यह है कि इसका 85 प्रतिशत शिकार 65 वर्ष या उससे अधिक आयु के बुजुर्ग हुए हैं। सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, पेरिस और उसके आसपास के 'इले-डी-फ्रांस' (le-de-France) इलाके में घरों के अंदर मरने वालों की संख्या में चिंताजनक बढ़ोतरी देखी गई है। स्वास्थ्य अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि जो बुजुर्ग अकेले रहते हैं, वे गर्मी का मुकाबला करने में सबसे ज्यादा कमजोर साबित हो रहे हैं। यह स्थिति समाज में अकेलेपन की समस्या और हीटवेव के दौरान बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत को रेखांकित करती है।रेड अलर्ट और राहत की उम्मीद फ्रांस के कई इलाकों में पिछले कई दिनों से तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया था, जिसके चलते प्रशासन को 'रेड अलर्ट' जारी करना पड़ा। हालांकि, रविवार को तापमान में थोड़ी गिरावट दर्ज की गई है, जिससे आम जनता को भीषण गर्मी से हल्की राहत मिली है। सरकार ने नागरिकों से अपील की है कि वे अकेले रहने वाले पड़ोसियों, विशेषकर बुजुर्गों का ध्यान रखें और हीटवेव के दौरान सावधानी बरतें। फिलहाल फ्रांस का स्वास्थ्य विभाग प्रभावित इलाकों में स्थिति पर कड़ी नजर रखे हुए है ताकि मौतों के इन बढ़ते आंकड़ों को नियंत्रित किया जा सके।
अमेरिका ने छत्तीसगढ़ की कंपनी और उसके CEO पर लगाया प्रतिबंध, जानें क्या है मामला
अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि इन संस्थाओं और व्यक्तियों ने सूडानी सशस्त्र बलों (SAF) और रैपिड सपोर्ट फोर्सेज (RSF) को हथियार, विस्फोटक सामग्री और अन्य सहायता उपलब्ध कराई, जिससे देश में जारी संघर्ष और अधिक गंभीर हो गया।
ईरान का पलटवार: कुवैत और बहरीन पर मिसाइल-ड्रोन हमला
इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) की नौसेना और एयरोस्पेस फोर्स ने अमेरिका के हमलों के जवाब में कुवैत और बहरीन में मिसाइल और ड्रोन ऑपरेशन शुरू किए
होर्मुज़ जलडमरूमध्य में धमाका: अमेरिका ने ईरान के 10 सैन्य ठिकाने उड़ाए
अमेरिका की सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम ) ने कहा कि अमेरिका की सेना ने शनिवार रात होर्मुज़ जलडमरूमध्य और उसके आस-पास ईरान के 10 सैन्य ठिकानों पर हमला किया
ट्रंप का संभावित भारत दौरा: रिश्ते सुधारने का सुनहरा मौका!
अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो के इस बयान के बाद कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अगले साल की शुरुआत में भारत आ सकते हैं
ख्वाजा आसिफ के 'असली कश्मीरी नहीं' वाले बयान पर बवाल, मानवाधिकार परिषद ने जताई नाराजगी
पाकिस्तान के मानवाधिकार परिषद (एचआरसी) ने पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के उस बयान की कड़ी आलोचना की

