शोएब अख्तर के बड़े भाई के जनाजे में शामिल हुआ लश्कर आतंकी सैफुल्लाह कसूरी, भारत को दे चुका है धमकी
इस्लामाबाद में पाकिस्तान के पूर्व तेज गेंदबाज शोएब अख्तर के बड़े भाई शाहिद अख्तर के जनाजे पर विवाद खड़ा हो गया है। अंतिम संस्कार में पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के उपप्रमुख सैफुल्लाह कसूरी समेत संगठन के कई वरिष्ठ सदस्यों की मौजूदगी सामने आने के बाद यह मामला चर्चा में आ गया है।
पीएम मोदी 27 जून को सेशेल्स दौरे पर गए। दर्जनों खबरें चलीं- ‘मोदी यहां दुनिया के सबसे बुजुर्ग जानवर जोनाथन से मिलेंगे।’ पीएम मोदी कछुओं से मिले भी, लेकिन उनमें जोनाथन नहीं था। दरअसल, जोनाथन सेशेल्स में है ही नहीं। वो तो 7 हजार किमी दूर एक ब्रिटिश टापू सेंट हेलेना में है। पीएम मोदी से मुलाकात हो, या ना हो, लेकिन इस बुजुर्ग कछुए की कहानी बेहद रोचक है; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: कौन है जोनाथन, जिसका नाम गिनीज बुक में दर्ज?जवाब: जोनाथन जमीन पर रहने वाले विशालकाय कछुओं की प्रजाति का सबसे उम्रदराज कछुआ है। इन्हें ‘सेशेल्स जाइंट टॉर्टोइस’ कहते हैं। सेशेल्स 151 द्वीपों का देश है। 1832 ईस्वी में यहीं जोनाथन का जन्म हुआ। हालांकि पिछले 144 सालों से जोनाथन दक्षिण अटलांटिक महासागर के द्वीप सेंट हेलेना में रहता है। 1882 में जोनाथन को अन्य 3 बड़े कछुओं के साथ सेशेल्स से सेंट हेलेना भेजा गया। तब सेशेल्स ब्रिटिश उपनिवेश मॉरिशस का हिस्सा हुआ करता था। उस वक्त गवर्नर थे विलियम ग्रे-विल्सन। तब से अब तक सेंट हेलेना के 31 गवर्नर बदल चुके हैं। सेंट हेलेना आज भी ब्रिटेन के नियंत्रण वाला एक विदेशी इलाका है। यहां के गवर्नर के घर को ‘प्लांटेशन हाउस’ कहते हैं। जोनाथन इसी घर के लॉन में रहता है। लोग उसे प्यार से ‘जोनो’ कहते हैं। सेंट हेलेना की सरकार उसकी देखभाल का जिम्मा उठाती है। उसे राष्ट्रीय प्रतीक का दर्जा मिला है। 5 पेंस के सिक्के पर जोनाथन की तस्वीर छपी है। 2022 से पहले तक सबसे उम्रदराज कछुए का खिताब तुई-मलिला नाम के कछुए के पास था, जो 1777 से 1965 तक यानी 188 साल जीवित रहा। इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर, यानी IUCN के मुताबिक, जोनाथन की प्रजाति यानी 'सेशेल्स जाइंट टॉर्टोइस' के कुल 37 कछुओं की जानकारी है। ये सेशेल्स के ही अलग-अलग द्वीपों पर रहते हैं। सेशेल्स पार्क्स एंड गार्डंस अथॉरिटी की वेबसाइट के मुताबिक, यहां के ‘नेशनल बोटैनिकल गार्डन’ में जोनाथन की तरह ही कुछ बड़े सेशेल्स कछुए मौजूद हैं। विजिटर्स इन्हें देख सकते हैं। सेशेल्स कछुओं में करीब 27 नर कछुओं पर एक मादा कछुए का अनुपात है। इसीलिए ये प्रजाति अति दुर्लभ है। हालांकि ये कछुए औसतन 150 साल या उससे ज्यादा भी जीवित रह सकते हैं। सवाल-2: क्या वाकई जोनाथन 194 साल का है?जवाब: ये तस्वीर देखिए… 1886 की इस तस्वीर है, जिसमें जोनाथन पूरी तरह वयस्क हो चुका है। 2008 में ब्रिटिश अखबार ‘द इंडिपेंडेंट’ में ये तस्वीर छपी, तो चर्चा छिड़ी कि ये द्वीप पर मौजूद 150 साल से ज्यादा उम्र का कछुआ है। फिर 2015 में सेंट हेलेना के जानवरों के डॉक्टर जो हॉलिन्स ने कहा, 'हमारे पास रिकॉर्ड है कि उसे 1882 में पूरी तरह डेवेलप कंडीशन में यहां लाया गया था। ये उम्र कम से कम 50 साल की होती है और इसी आधार पर हमारा अनुमान है कि उसकी पैदाइश 1832 और अभी उसकी आयु 183 साल (यानी 2026 में 194 साल) है।' गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने भी कहा, ‘जोनाथन जब सेशेल्स से सेंट हेलेना पहुंचा, तो पूरी तरह एडल्ट हो चुका था। पूरी संभावना है कि जोनाथन की उम्र हमारे इस अनुमान से भी ज्यादा है।' हालांकि जोनाथन की उम्र को लेकर एक बड़ा दावा और है… दरअसल, 1903 से 1911 तक ईस्ट इंडिया कंपनी की तरफ से सेंट हेलेना के गवर्नर रहे हेनरी लियोनेल गैलवे ने 1941 में रॉयल अफ्रीकन सोसाइटी के जर्नल में एक आर्टिकल लिखा था। उन्होंने दावा किया था- ‘1776 में एक समुद्री जहाज के कप्तान ने तब के गवर्नर को दो कछुए गिफ्ट किए थे। मैंने जब 1911 में द्वीप छोड़ा, तो दोनों ठीक थे। फिर एक की कुछ साल बाद मौत हो गई। दूसरा अभी भी जीवित है।’ अभी सेंट हेलेना पर जोनाथन के साथ 3 कछुए और हैं, लेकिन ये सभी उससे बहुत छोटे हैं। यानी अगर गैलवे के मुताबिक 1776 में आया दूसरा जीवित कछुआ जोनाथन ही है, तो फिर जोनाथन की उम्र कम से कम 250 साल है। 1815 में वाटरलू की हार के बाद नेपोलियन बोनापार्ट को यहीं कैद किया गया था। कहा जाता है कि तब नेपोलियन, जोनाथन से मिला था। हालांकि इस किस्से की पुष्टि नहीं होती। सवाल-3: अभी जोनाथन किस हाल में है, उसकी देखरेख कैसे होती है?जवाब: लाइव साइंस मैगजीन के मुताबिक, 2009 में जोनाथन की तबीयत काफी बिगड़ गई थी। वो दुबला हो गया था और उसका मुंह कमजोर हो गया था। वह खुद से खाना नहीं खा पा रहा था। जोनाथन का ध्यान रखने वाले डॉक्टर जो हॉलिन्स के मुताबिक, ‘मैंने तब उसे सप्ताह में एक बार फल, सब्जियां खिलाना शुरू किया। धीरे-धीरे उसकी चोंच दोबारा फिर से तेज, घातक और घास वगैरह चरने लायक हो गई थी। मुझे समझ आया कि पोषण की कमी के चलते जोनाथन में मिनरल्स और विटामिन वगैरह की कमी थी।’ 2015 में हॉलिन्स ने बताया था, ‘जोनाथन बिल्कुल ठीक है! मैं उसे रोज अपने हाथों से खाना खिला रहा हूं। उसे खूब भूख लगती है। मोतियाबिंद के चलते वह अंधा है। उसकी सूंघने की शक्ति भी चली गई है, इसलिए वह खाने का पता नहीं लगा सकता। हालांकि वह अभी भी सुन सकता है और वो मेरी आवाज सुनकर खाने के लिए हवा में मुंह चलाने लगता है। मैं खाना रख देता हूं और वह काटकर खा लेता है।’ जो हॉलिन्स ने ये भी बताया था कि जोनाथन की यौन इच्छा प्रबल है। वो अपनी 55 साल की पार्टरन एम्मा के साथ संभोग करने की कोशिश करता है। उन दोनों के साथ फ्रेडरिक नाम का एक और कछुआ रहता है। 1991 में जब फ्रेडरिक को सेंट हेलेना लाया गया, तब उसे मादा समझकर ‘फ्रेडरिका’ नाम रखा गया था। हालांकि 25 साल से ज्यादा समय तक जोनाथन के साथ रहने पर भी दोनों के बच्चा नहीं हुई। जांच की गई, तब पता चला कि फ्रेडरिक एक नर कछुआ है। सवाल-4: कछुए इतनी लंबी उम्र तक जिंदा कैसे रहते हैं?जवाब: कछुओं के वयस्क होने के साथ ही उनके शरीर का बाहरी खोल बेहद मजबूत हो जाता है। जंगल के शिकारी जानवरों के लिए इसे तोड़ पाना लगभग मुश्किल होता है। इससे कछुओं की मृत्यु दर बेहद कम हो जाती है। साइंस इनसाइट्स ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक, शिकार के चलते कम मृत्यु देर की वजह से कछुओं पर ज्यादा प्रजनन का दबाव नहीं रहता। वे धीमी रफ्तार से बढ़ते हैं और संभोग के लिए देर से यानी करीब 30 साल की उम्र में तैयार होते हैं। इसीलिए कछुए तेजी से न जीते हैं और न तेजी से मरते हैं और उनमें उम्र बढ़ने से रोकने का एक पूरा तंत्र तैयार हो जाता है। इस तंत्र की 3 खासियत हैं… 1. कम एनर्जी की जरूरत, बाहरी धूप से काम चल जाता है 2. एनर्जी प्रोसेस कम होने से हानिकारक तत्व कम बनते हैं 3. कछुओं में एंटी-एजिंग और एंटी-कैंसर जीन ये खबर भी पढ़ें… मंडे मेगा स्टोरी: बिना संबंध बनाए भी बच्चे पैदा कर लेती है कॉकरोच:सिर कटने पर भी कैसे जिंदा रहते हैं, डायनासोर से भी सीनियर; कॉकरोच के किस्से कॉकरोच जनता पार्टी की वेबसाइट, X अकाउंट और इंस्टाग्राम अकाउंट सभी हैक और डाउन हो गए, तो फाउंडर अभिजीत दीपके ने लिखा- ‘कॉकरोच कभी मरते नहीं।’ बात सच भी है। कॉकरोच इस दुनिया में डायनासोर से भी पहले आए। सिर कट जाए, हफ्तों खाना न मिले फिर भी जिंदा रहते हैं। बिना नर के भी बच्चा पैदा कर सकते हैं। पूरी खबर पढ़ें…
एम्स्टर्डम/इंटरनेशनल डेस्क: यूरोपीय देश नीदरलैंड में एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक मामला सामने आया है। वहां पहली बार 12 साल से कम उम्र के एक लाइलाज और गंभीर बीमारी से पीड़ित बच्चे को कानूनी तौर पर इच्छामृत्यु (Euthanasia) दी गई है। साल 2024 में देश के इच्छामृत्यु कानून में किए गए बड़े बदलाव के बाद यह अपनी तरह का पहला मामला है। नए नियमों के तहत अब 1 से 12 साल की उम्र के उन बच्चों को भी इच्छामृत्यु देने का प्रावधान है, जो किसी ऐसी लाइलाज बीमारी से जूझ रहे हों जहां दर्द असहनीय हो चुका हो और मेडिकल साइंस में उनके ठीक होने की कोई उम्मीद न बची हो।संसद में हुआ खुलासा, सरकारी वकील करेंगे पूरे मामले की कानूनी जांचनीदरलैंड की स्वास्थ्य मंत्री सोफी हरमंस ने संसद में सरकार की सालाना रिपोर्ट पेश करते हुए इस बात की आधिकारिक पुष्टि की। उन्होंने बताया कि इस बच्चे ने इच्छामृत्यु के जरिए दुनिया को अलविदा कह दिया है। हालांकि, गोपनीयता और संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए सरकार ने बच्चे की सही उम्र, पहचान, लिंग या उसकी बीमारी के बारे में कोई भी जानकारी सार्वजनिक नहीं की है। स्वास्थ्य मंत्री ने यह भी साफ किया कि देश के नियमों के मुताबिक अब इस पूरे मामले की स्क्रूटनी (जांच) सरकारी वकीलों द्वारा की जाएगी। वे यह सुनिश्चित करेंगे कि प्रक्रिया को अंजाम देने वाले डॉक्टर ने कानून में लिखी सभी सख्त गाइडलाइंस का पूरी तरह पालन किया है या नहीं।सिर्फ 'जीने का मन न होना' आधार नहीं, 2024 में इसी शर्त पर बदला था कानूननीदरलैंड सरकार ने साल 2024 में अपने दशकों पुराने कानून में संशोधन किया था, जिसके बाद 1 से 12 साल तक के मासूम बच्चों को भी कुछ बेहद विशेष और गंभीर परिस्थितियों में इच्छामृत्यु का अधिकार मिल गया। हालांकि, सरकार ने अपने नियमों में पूरी कड़ाई रखी है। कानून के मुताबिक, इच्छामृत्यु केवल और केवल बेहद गंभीर व अंतिम चरण की मेडिकल कंडीशन (Medical Condition) के आधार पर ही दी जा सकती है। कोई व्यक्ति या किशोर सिर्फ यह महसूस करके कि 'उसका जीवन पूरा हो चुका है' या 'अब उसका जीने का मन नहीं है', इस कानून के तहत अनुमति नहीं पा सकता।डॉक्टरों के लिए तय हैं बेहद कड़े नियम; माता-पिता की सहमति अनिवार्यनीदरलैंड में किसी भी मरीज को इच्छामृत्यु देने से पहले मेडिकल टीम और डॉक्टरों को एक बेहद लंबी और जटिल कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है:डॉक्टरों को अकाट्य रूप से प्रमाणित करना होता है कि मरीज का शारीरिक या मानसिक दर्द पूरी तरह असहनीय है।यह साबित होना जरूरी है कि बीमारी लाइलाज है और भविष्य में सुधार की जीरो संभावना है।मरीज और उसके परिवार को बीमारी के हर पहलू की पूरी तकनीकी जानकारी दी जा चुकी हो।यह पूरी तरह स्पष्ट हो कि दर्द से राहत देने वाला कोई भी दूसरा इलाज या थेरेपी अब बची नहीं है।इसके अलावा, मुख्य डॉक्टर को किसी दूसरे स्वतंत्र मेडिकल एक्सपर्ट (Independent Doctor) की लिखित राय लेनी होती है।12 साल से कम उम्र के बच्चों के मामलों में उनके माता-पिता या कानूनी अभिभावकों (Parents or Guardians) की लिखित सहमति होना सबसे अनिवार्य शर्त है। जब यह कानून पास हुआ था, तब सरकार ने अनुमान लगाया था कि देश में हर साल ऐसे केवल 5 से 10 मामले ही सामने आ सकते हैं।पहले क्या थे नियम और उल्लंघन पर कितनी है सजा?नीदरलैंड में साल 2024 से पहले तक केवल 1 साल से कम उम्र के गंभीर रूप से बीमार शिशुओं और 12 साल से अधिक उम्र के किशोरों/वयस्कों के लिए ही इच्छामृत्यु की कानूनी अनुमति थी। 1 से 12 साल के बीच की उम्र के बच्चों के लिए ऐसा कोई अधिकार नहीं था; उन्हें केवल दर्द कम करने वाली 'पैलिएटिव केयर' दी जाती थी या प्राकृतिक मौत का इंतजार करना पड़ता था।वर्तमान नियमों के अनुसार, 12 से 15 साल के बच्चों के लिए इच्छामृत्यु में माता-पिता की मंजूरी जरूरी होती है। वहीं, 16 और 17 साल के किशोर इस पर खुद स्वतंत्र फैसला ले सकते हैं, हालांकि प्रक्रिया में उनके पैरेंट्स को शामिल करना जरूरी होता है। यदि कोई भी डॉक्टर इन कड़े नियमों के बाहर जाकर या बिना उचित मंजूरी के किसी को इच्छामृत्यु देता है, तो देश के कानून के तहत उसे 12 साल तक की जेल और भारी जुर्माने की सजा हो सकती है।यूथेनेशिया को वैध बनाने वाला दुनिया का सबसे पहला देश है नीदरलैंडवैश्विक स्तर पर देखा जाए तो नीदरलैंड साल 2002 में इच्छामृत्यु (Euthanasia) को कानूनी मान्यता देने वाला दुनिया का सबसे पहला देश बना था। यहां होने वाले हर एक केस की समीक्षा एक विशेष मेडिकल जांच समिति करती है। नीदरलैंड के बाद पड़ोसी देश बेल्जियम ने भी साल 2014 में एक बड़ा कदम उठाते हुए बिना किसी उम्र सीमा के, सभी उम्र के बच्चों के लिए इच्छामृत्यु को कानूनी मंजूरी दे दी थी। इस संवेदनशील मुद्दे पर दुनिया भर के चिकित्सा और कानूनी विशेषज्ञों के बीच आज भी एक बड़ी बहस जारी है।
मुजफ्फराबाद/इंटरनेशनल डेस्क: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में भड़की विद्रोह की आग अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुकी है। पाकिस्तानी हुकूमत के जुल्म और सौतेले व्यवहार के खिलाफ PoK की आवाम ने अब आर-पार की जंग छेड़ दी है। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि आंदोलन को कुचलने और स्थानीय लोगों की आवाज दबाने के लिए इस्लामाबाद सरकार ने कई इलाकों में खाद्यान्न (राशन), डीजल-पेट्रोल और अन्य बेहद जरूरी चीजों की सप्लाई रोक दी है। प्रदर्शनकारियों का गंभीर आरोप है कि शहबाज शरीफ सरकार इस कड़कड़ाती किल्लत के जरिए आम नागरिकों पर मानसिक और शारीरिक दबाव बना रही है ताकि आंदोलन को अंदर से कमजोर किया जा सके।सड़कों पर उतरे हजारों लोग; सस्ती बिजली और सब्सिडी की मांगPoK के इतिहास में यह अब तक का सबसे बड़ा जन-आंदोलन बनता जा रहा है, जहां हजारों की संख्या में महिलाएं, युवा और बुजुर्ग सड़कों पर डेरा डाले हुए हैं। प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांगों में भारत की तर्ज पर सस्ती बिजली देना, आटे-दाल जैसे बुनियादी खाद्यान्न पर सरकारी सब्सिडी बहाल करना, अस्पतालों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, बुनियादी राजनीतिक अधिकार और भ्रष्ट प्रशासनिक ढांचे में बड़े सुधार शामिल हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि उनकी जायज मांगों को सुनने और उनका हक देने के बजाय पाकिस्तान सरकार ने पूरे क्षेत्र को सेना और अर्धसैनिक बलों के हवाले कर दिया है। कई इलाकों में इंटरनेट सेवाओं को पूरी तरह ब्लॉक कर दिया गया है ताकि PoK में हो रहे जुल्म की तस्वीरें दुनिया के सामने न आ सकें।सरकारी कर्मचारियों पर गिरी गाज, रिटायर्ड फौजियों को पेंशन रोकने की धमकीआंदोलन को दबाने के लिए पाकिस्तानी प्रशासन अब बेहद क्रूर और दमनकारी नीतियों पर उतर आया है। विरोध प्रदर्शनों का समर्थन करने और उनमें शामिल होने के आरोप में अब तक 128 सरकारी कर्मचारियों को नौकरी से बर्खास्त (टर्मिनेट) किया जा चुका है। यही नहीं, आंदोलन के शीर्ष नेताओं ने खुलासा किया है कि PoK के रहने वाले जिन पूर्व सैनिकों (रिटायर्ड फौजियों) ने इस प्रदर्शन में हिस्सा लिया या जनता का साथ दिया, उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनियां दी जा रही हैं। प्रशासन द्वारा उनके परिवारों की पेंशन तक रोकने की धमकी दी जा रही है, जिससे लोगों में गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया है।हिंसक झड़पों में दर्जनों मौतें, जेलों में ठूंसे जा रहे कश्मीरी एक्टिविस्टपाकिस्तानी सुरक्षा बलों और पुलिस की बर्बरता के कारण पूरे क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हिंसा भड़क उठी है। हिंसक कार्रवाई और अंधाधुंध गोलीबारी के दौरान अब तक दर्जनों स्थानीय लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि सैकड़ों लोग गंभीर रूप से घायल हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, प्रदर्शन के अगुआकारों और समर्थकों को जबरन हिरासत में लेकर जेलों में ठूंसा जा रहा है और उन पर देशद्रोह जैसी गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं। दूसरी तरफ, पाकिस्तानी प्रशासन अपनी सफाई में दावा कर रहा है कि वे सिर्फ उन लोगों के खिलाफ एक्शन ले रहे हैं जो 'गैर-कानूनी' गतिविधियों और तोड़फोड़ में शामिल हैं।ठप पड़ा कारोबार, भुखमरी की कगार पर PoK की जनतासरकार द्वारा जानबूझकर पैदा की गई आवश्यक वस्तुओं की इस भारी किल्लत ने स्थानीय समुदायों का जीना मुहाल कर दिया है। PoK के प्रमुख बाजारों में व्यापार पूरी तरह ठप हो चुका है, गाड़ियों और एम्बुलेंस के लिए ईंधन खत्म हो रहा है, और सबसे बड़ी मार दैनिक मजदूरी करने वाले गरीब परिवारों पर पड़ी है जिनके सामने अब दो वक्त की रोटी का संकट खड़ा हो गया है। इस अमानवीय नाकाबंदी के बावजूद PoK की जनता पीछे हटने को तैयार नहीं है। प्रदर्शनकारियों ने साफ कर दिया है कि जब तक पाकिस्तान सरकार घुटने नहीं टेकती और उनकी मांगें पूरी नहीं करती, तब तक यह आंदोलन और तेज होता जाएगा।
गुवाहाटी/नेशनल डेस्क: राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने भारत के खिलाफ साजिश रचने वाले प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन जमात-उल-मुजाहिद्दीन बांग्लादेश (JMB) के मॉड्यूल पर एक और बड़ा प्रहार किया है। एनआईए ने गुवाहाटी की विशेष अदालत में जेएमबी से जुड़े 11 कथित आतंकवादियों के खिलाफ एक व्यापक चार्जशीट (आरोप पत्र) दाखिल की है। इन सभी आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS 2023) और यूए(पी) एक्ट 1967 (UAPA) की विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।'इमाम महमूदर कफीला' विंग के जरिए रची जा रही थी खूनी साजिशएनआईए की जांच में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि इन सभी 11 आरोपियों ने जमात-उल-मुजाहिद्दीन की एक सीक्रेट विंग 'इमाम महमूदर कफीला' (IMK) में सक्रिय भूमिका निभाई थी। ये आरोपी देश के भीतर गुप्त बैठकें आयोजित करने, युवाओं को मजहबी तौर पर गुमराह करने (रेडिकलाइज करने), चरमपंथी साहित्य बांटने और सोशल मीडिया व डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए भारत-विरोधी जहरीला प्रचार फैलाने में जुटे थे। जांच एजेंसी के मुताबिक, इनका मुख्य मकसद पूर्वोत्तर के राज्यों (असम, त्रिपुरा आदि) में अशांति फैलाना और उत्तर प्रदेश, बिहार व झारखंड जैसे घनी आबादी वाले राज्यों में बड़े आतंकी हमलों को अंजाम देना था।लोकतंत्र को खत्म कर शरिया शासन लाना है जेएमबी का मकसदजमात-उल-मुजाहिद्दीन बांग्लादेश (JMB) एक बेहद कट्टरपंथी संगठन है, जो पूरी तरह से सलाफी विचारधारा से प्रभावित है। इसका मुख्य उद्देश्य बांग्लादेश और उसके आसपास के क्षेत्रों में लोकतांत्रिक तथा धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था को जड़ से उखाड़कर शरीयत आधारित इस्लामी शासन स्थापित करना है। इसकी स्थापना कुख्यात आतंकियों शेख अब्दुर रहमान और सिद्दीकुल इस्लाम ने की थी। आतंकी गलियारों में सिद्दीकुल इस्लाम को 'बांग्ला भाई' के नाम से भी जाना जाता था। जेएमबी ने अपनी स्थापना के बाद से ही गैर-सरकारी संगठनों और आम नागरिकों को निशाना बनाना शुरू कर दिया था, जिसके चलते फरवरी 2005 में बांग्लादेश सरकार ने इस पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया था।आधे घंटे में 500 बम धमाके: जब दहल उठा था पूरा बांग्लादेशप्रतिबंध के ठीक छह महीने बाद, इस संगठन ने जो किया उसने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया। 17 अगस्त 2005 को जेएमबी ने एक अन्य कट्टरपंथी संगठन 'हरकत-उल-जिहाद अल-इस्लामी' की मदद से बांग्लादेश के 64 में से 63 जिलों में एक साथ सिलसिलेवार बम धमाके किए। महज 30 मिनट के भीतर पूरे देश में 500 से अधिक बम फोड़े गए थे। इन धमाकों का मुख्य मकसद देश के जजों, वकीलों और न्यायिक प्रणाली को खत्म कर वहां जबरन शरिया कानून लागू करना था। बाद में साल 2006 में सिद्दीकुल इस्लाम उर्फ बांग्ला भाई को पुलिस ने धरदबोचा और कानूनी प्रक्रिया के बाद 2007 में उसे फांसी पर लटका दिया गया।सिद्दीकुल इस्लाम ने 2005 में की थी भारत में एंट्री, बंगाल से फैला जालबांग्लादेश में तबाही मचाने के दौरान ही जेएमबी ने भारत में पैर पसारने शुरू कर दिए थे। साल 2005 में सिद्दीकुल इस्लाम ने भारत में प्रवेश किया और 'हाटकाटा नसीरुल्लाह' (एक खूंखार आईईडी बम विशेषज्ञ) के साथ मिलकर पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में जेएमबी की पहली भारतीय यूनिट (65वीं यूनिट) खड़ी की। इसके बाद यह नेटवर्क नदिया, बीरभूम और बर्दवान जैसे सीमावर्ती जिलों में तेजी से फैल गया।इस भारतीय नेटवर्क का सबसे बड़ा पर्दाफाश साल 2014 में हुआ, जब पश्चिम बंगाल के बर्दवान (खगरागढ़) में एक घर के भीतर अचानक बम बनाते समय धमाका हो गया, जिसमें दो आतंकवादियों की मौत हो गई थी। एनआईए की जांच से साफ हुआ कि जेएमबी ने बंगाल के रास्ते असम, बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश तक अपने स्लीपर सेल और मॉड्यूल का एक बड़ा जाल बिछा लिया था।आईएसआईएस (ISIS) से जुड़ाव और ढाका कैफे अटैक का 'नियो-जेएमबी' कनेक्शनअंतरराष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों की रिपोर्ट्स के मुताबिक, जेएमबी का संबंध लश्कर-ए-तैयबा, अल-कायदा और सिमी (SIMI) जैसे वैश्विक आतंकी संगठनों से रहा है। हाल के वर्षों में इस संगठन के भीतर एक नया धड़ा पैदा हुआ, जिसे 'नियो-जेएमबी' (Neo-JMB) कहा जाता है। यह धड़ा कुख्यात वैश्विक आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (ISIS) की विचारधारा पर चलता है। यह गुट 'लोन-वोल्फ' हमलों (अकेले दम पर हमला करना) और आत्मघाती हमलों के लिए कुख्यात है। साल 2016 में बांग्लादेश के ढाका में स्थित 'होली आर्टिसन कैफे' पर जो भीषण आतंकी हमला हुआ था, जिसमें कई विदेशी नागरिकों की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी, उसे इसी नियो-जेएमबी गुट ने अंजाम दिया था।डकैती, तस्करी और हवाला: जानिए कहां से आता है टेरर फंड?एनआईए की जांच के अनुसार, जेएमबी भारत और बांग्लादेश में अपनी आतंकी गतिविधियों को चलाने के लिए मुख्य रूप से अवैध रास्तों से फंडिंग जुटाता है। इसके फंड के प्रमुख स्रोतों में शामिल हैं:सीमावर्ती इलाकों में डकैती, लूटपाट और जबरन उगाही।भारत-बांग्लादेश सीमा पर हथियारों, नशीले पदार्थों और मवेशियों की तस्करी।जाली भारतीय मुद्रा (फेक करेंसी) का धंधा।खाड़ी देशों और विदेशों में बैठे समर्थकों के जरिए हवाला नेटवर्क से मिलने वाली गुप्त वित्तीय मदद।भारत में पूरी तरह प्रतिबंधित है जेएमबी, सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट पर2014 के बर्दवान ब्लास्ट और 2018 में बिहार के बोधगया में हुए बम धमाकों में जेएमबी का सीधा हाथ सामने आने के बाद, भारत सरकार ने 23 मई 2019 को यूएपीए (UAPA) के तहत जमात-उल-मुजाहिद्दीन बांग्लादेश और इसके सभी स्वरूपों (नियो-जेएमबी सहित) को पूरी तरह से बैन और आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया था। वर्तमान में एनआईए, उत्तर प्रदेश एटीएस (ATS), और विभिन्न राज्यों की एसटीएफ (STF) इसके बचे-खुचे स्लीपर सेल्स, ऑनलाइन हैंडलर्स और फंडिंग नेटवर्क को नेस्तनाबूद करने के लिए लगातार धरपकड़ अभियान चला रही हैं। गुवाहाटी कोर्ट में दाखिल यह नई चार्जशीट इसी कड़े प्रहार का हिस्सा है।
ट्रंप ने दोहराया ईरानी सेना के कमजोर होने का दावा, कहा- अब कोई ईरान का लीडर बनना नहीं चाहता
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फेथ एंड फ्रीडम कोएलिशन' के 'रोड टू मेजॉरिटी' कॉन्फ्रेंस में ईरानी सेना के कमजोर होने के अपने दावे को फिर को दोहराया।
क्या मेहरंग बलोच की सजा, बलोचिस्तान में अहिंसक आंदोलनों के प्रति भरोसा खत्म कर देगी?
डॉक्टर से एक्टिविस्ट बनीं मेहरंग बलोच को पाकिस्तान की अदालत ने आजीवन कैद की सजा दी है. क्या यह सजा, अहिंसक आंदोलनों पर भरोसा खत्म कर देगी
इजरायल-लेबनान शांति की दिशा में अहम पहल, वाशिंगटन में फ्रेमवर्क समझौते पर हस्ताक्षर
कई दिनों तक चली बातचीत के बाद यह फ्रेमवर्क तैयार किया गया। वाशिंगटन स्थित अमेरिकी विदेश मंत्रालय में आयोजित कार्यक्रम में अमेरिका में लेबनान की राजदूत नाडा हमादेह मोवाद और उनके इजरायली समकक्ष येचियल लिटर ने अमेरिकी प्रतिनिधियों की मौजूदगी में इस त्रिपक्षीय दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए।
पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में शांति स्थापित करने की तमाम वैश्विक कोशिशों और हाल ही में हुए सीजफायर समझौते को एक बहुत बड़ा और जानलेवा झटका लगा है। वाशिंगटन और तेहरान के बीच युद्ध को पूरी तरह खत्म करने के लिए अभी बातचीत का दौर चल ही रहा था कि अमेरिकी फाइटर जेट्स ने ईरान के कई अहम सैन्य ठिकानों पर भीषण बमबारी (Airstrike) कर पूरे क्षेत्र को दहला दिया।इस अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के बाद ईरान आगबबूला हो उठा है। ईरानी संसद के राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग के प्रमुख इब्राहिम अजीजी ने शनिवार को अमेरिका को बेहद सख्त और सीधे लहजे में चेतावनी दी है कि इस दुस्साहस के बाद वाशिंगटन को सिर्फ 'पीछे हटना और पछताना' पड़ेगा। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर तीखा हमला बोलते हुए साफ कहा कि अब अमेरिका का यह 'ब्लेम गेम' यानी खुद हमला करके दूसरों पर दोष मढ़ने का खेल बिल्कुल नहीं चलेगा। आइए जानते हैं कि शांति समझौते के बीच अचानक भड़के इस महाविवाद की असल वजह क्या है।क्यों भड़का विवाद? जानिए अमेरिकी सेना के ताबड़तोड़ हवाई हमलों की वजहयह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के लड़ाकू विमानों ने शुक्रवार को ईरान के भीतर मौजूद मिसाइल और ड्रोन स्टोरेज लोकेशन्स के साथ-साथ उनकी तटीय रडार साइटों पर ताबड़तोड़ मिसाइलें बरसा दीं। व्हाइट हाउस और अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने इस कार्रवाई को पूरी तरह जायज ठहराते हुए साफ किया कि यह हमला ईरान द्वारा अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग में एक कमर्शियल जहाज पर किए गए कायरतापूर्ण हमले का सीधा और कड़ा जवाब है।अमेरिकी सेना द्वारा जारी आधिकारिक टाइमलाइन के मुताबिक, बीते 25 जून को ईरान ने ओमान के तट के पास जलडमरूमध्य से गुजर रहे सिंगापुर के झंडे वाले एक विशाल मालवाहक जहाज 'एम/वी एवर लवली' (M/V Ever Lovely) पर वन-वे सुसाइड अटैक ड्रोन से हमला किया था। यह हमला रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य के पास हुआ था, जो पूरी दुनिया के कुल ऊर्जा और कच्चे तेल के व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा (20%) संभालता है। अमेरिका ने इसी अंतरराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा के उल्लंघन को आधार बनाकर ईरान के खिलाफ यह बड़ा सैन्य एक्शन लिया है।ईरान का पलटवार: 'अमेरिका ने बातचीत के बीच में पीठ पर छुरा घोंपा'अमेरिकी बमबारी से भड़के ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के पूर्व शीर्ष कमांडर और वर्तमान सांसद इब्राहिम अजीजी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर अमेरिका को आड़े हाथों लेते हुए एक लंबी पोस्ट लिखी। अजीजी ने कहा, 'सफेदपोश अमेरिका ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उसकी कथनी और करनी में कितना फर्क है। उसने शांति वार्ता के बीच में ही हमारे देश पर हमला करके पीठ पर छुरा घोंपा है। नाकाम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया को दिखा दिया है कि वे किसी भी अंतरराष्ट्रीय कानून, बातचीत या सीजफायर के सिद्धांतों को नहीं मानते हैं।'अजीजी ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि सीजफायर का यह लापरवाह उल्लंघन अमेरिका के लिए आत्मघाती साबित होगा। ईरानी सांसद के इस तीखे बयान के ठीक कुछ घंटों बाद IRGC के मुख्यालय से भी एक बड़ा और डराने वाला ऐलान कर दिया गया। ईरानी सेना ने कहा कि उसने देश के दक्षिणी हिस्से पर हुए अमेरिकी हमलों के प्रतिशोध में पूरे मिडिल ईस्ट क्षेत्र में फैले अमेरिकी सैन्य ठिकानों और उनके दूतावासों को सीधे अपने मिसाइल निशाने पर लेना शुरू कर दिया है।'हिंसा का जवाब सिर्फ हिंसा' - अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस की दोटूकईरानी धमकियों के बीच अमेरिका ने भी झुकने से साफ इनकार कर दिया है। अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस (JD Vance) ने ईरान को आड़े हाथों लेते हुए 'X' पर दोटूक शब्दों में चेतावनी दी। वेंस ने लिखा, 'ईरान ने खुद टेबल पर बैठकर सीजफायर समझौते पर दस्तखत किए थे और हमारी सेना ने उस समझौते का पूरा सम्मान किया। अगर ईरानी प्रशासन को एमओयू (MOU) के नियमों या उसे लागू करने के तरीके को लेकर कोई भी आपत्ति या असहमति थी, तो वे राजनयिक चैनलों के जरिए बात कर सकते थे। लेकिन उन्होंने हथियारों का रास्ता चुना, और याद रहे कि हमारे देश के खिलाफ की गई हिंसा का जवाब हमेशा दोगुनी हिंसा से ही दिया जाएगा।' इसके साथ ही वेंस ने ईरान से आखिरी अपील करते हुए कहा कि वे आगे की तबाही को रोकने के लिए तुरंत हिंसा रोककर बातचीत की मेज पर आएं।नाजुक मोड़ पर शांति वार्ता: क्या तीसरे विश्व युद्ध की ओर बढ़ रही दुनिया?यह पूरा सैन्य टकराव एक ऐसे नाजुक और ऐतिहासिक मोड़ पर हुआ है जब दोनों देशों के बीच दशकों पुराने तनाव को खत्म करने के लिए पर्दे के पीछे से बड़ी डिप्लोमैटिक बातचीत चल रही थी। पिछले हफ्ते ही दोनों पक्षों के बीच एक अस्थाई सीजफायर का औपचारिक ऐलान हुआ था, जिसके तहत एक व्यापक फ्रेमवर्क को अंतिम रूप देने के लिए दोनों देशों को 60 दिनों का समय दिया गया था। लेकिन इन ताजा हवाई हमलों और पलटवार के बाद दुनिया भर के शेयर बाजारों और कच्चे तेल की कीमतों में भारी उथल-पुथल शुरू हो गई है। शांति की सभी उम्मीदों को गहरा झटका लगा है और मिडिल ईस्ट एक बार फिर भयंकर क्षेत्रीय युद्ध (Regional War) की आग में झुलसने की कगार पर आ खड़ा हुआ है।
मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) के अशांत मोर्चे से इस वक्त की सबसे सनसनीखेज और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को हिला देने वाली खबर सामने आ रही है। लंबे समय से जारी भीषण सैन्य टकराव के बीच अमेरिका की मध्यस्थता में इजरायल और लेबनान के बीच एक बेहद महत्वपूर्ण और चौंकाने वाले समझौते पर सहमति बनी है। लेकिन इस डील के सार्वजनिक होते ही लेबनान का सबसे शक्तिशाली अर्धसैनिक संगठन हिजबुल्लाह पूरी तरह आगबबूला हो गया है। हिजबुल्लाह के शीर्ष नेतृत्व ने इस अमेरिकी समझौते को पूरी तरह खारिज करते हुए बेहद आक्रामक अंदाज में खुली चेतावनी दी है कि यदि इस डील को जबरन थोपा गया, तो लेबनान में भयानक 'गृहयुद्ध' (Civil War) छिड़ जाएगा।अमेरिकी मध्यस्थता में हुआ सीक्रेट समझौता और हिजबुल्लाह की नाराजगीवाशिंगटन और यरूशलेम से आ रही रणनीतिक रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी राजनयिकों ने पर्दे के पीछे रहकर इजरायल और लेबनान की सरकार के बीच सीमा विवाद और सुरक्षा गारंटी को लेकर एक कड़ा ड्राफ्ट तैयार कराया था। इस डील का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों की सीमाओं पर जारी गोलाबारी को स्थायी रूप से रोकना और विस्थापित नागरिकों को उनके घरों तक वापस लाना है। हालांकि, हिजबुल्लाह का आरोप है कि लेबनान सरकार ने अमेरिकी दबाव में आकर देश की संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों से समझौता किया है, जो उन्हें किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं है।'गृहयुद्ध छिड़ जाएगा' – हिजबुल्लाह की लेबनान सरकार को खुली धमकीहिजबुल्लाह के प्रमुख ने एक विशेष संबोधन में लेबनान प्रशासन को सीधे शब्दों में आगाह किया है कि वे इजरायल या अमेरिका के किसी भी एजेंडे को देश की धरती पर लागू नहीं होने देंगे। हिजबुल्लाह ने कहा कि इस डील के जरिए उनके हथियारों को सरेंडर कराने और दक्षिण लेबनान से उनकी मौजूदगी को खत्म करने की साजिश रची जा रही है। अगर सरकार ने इस समझौते को आगे बढ़ाया, तो देश के भीतर विभिन्न गुटों और लेबनानी सेना के बीच सीधे टकराव की स्थिति बन जाएगी, जिससे पूरे देश में गृहयुद्ध की भयावह आग लग सकती है।बेरूत से लेकर यरूशलेम तक सैन्य अलर्ट और सुरक्षा रणनीति में बदलावइस खुली धमकी के बाद लेबनान की राजधानी बेरूत, इजरायल की उत्तरी सीमा और पूरे भूमध्यसागरीय क्षेत्र (Mediterranean Region) में स्थानीय सुरक्षा तंत्र को हाई अलर्ट पर डाल दिया गया है। इजरायली सेना (IDF) ने किसी भी संभावित रॉकेट हमले या घुसपैठ का मुकाबला करने के लिए अपनी सीमाओं पर पेट्रोलिंग और एयर डिफेंस सिस्टम 'आयरन डोम' को पूरी तरह सक्रिय कर दिया है। वहीं, लेबनान के स्थानीय नागरिक इस नई सैन्य और राजनीतिक खींचतान के बाद भारी दहशत में हैं और देश में एक बार फिर पुराने काले दौर के लौटने की आशंका से डरे हुए हैं।वैश्विक कूटनीति, एआई सर्च और अंतरराष्ट्रीय बाजार पर असरइस नए संकट ने वैश्विक कूटनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। आधुनिक जनरेटिव इंजन और वैश्विक थिंक टैंक इस बात का गहन विश्लेषण कर रहे हैं कि क्या अमेरिका द्वारा कराई गई यह पीस डील वाकई शांति लाएगी या फिर यह एक और बड़े विनाशकारी युद्ध की वजह बन जाएगी। अगर लेबनान के भीतर गृहयुद्ध जैसी स्थिति बनती है, तो इसका सीधा असर पूरे खाड़ी क्षेत्र की स्थिरता पर पड़ेगा, जिससे वैश्विक तेल बाजारों, व्यापारिक मार्गों और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा समीकरणों में भारी उथल-पुथल मचनी तय मानी जा रही है।
वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने बताया कि भारत-यूके फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) का पूरा फायदा कारोबारियों तक पहुंचाने के लिए पूरे देश में 1,000 सलाहकार नियुक्त किए जाएंगे
वैश्विक महाशक्ति अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए ऐतिहासिक युद्धविराम (सीजफायर) पर एक बार फिर से युद्ध और संकट के काले बादल मंडराने लगे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने ईरान पर दुनिया के सबसे संवेदनशील और व्यस्त समुद्री व्यापारिक मार्ग 'स्ट्रैट ऑफ होर्मुज' (होर्मुज जलडमरूमध्य) से गुजर रहे कारोबारी जहाजों पर घातक आत्मघाती ड्रोन से हमला करने का बेहद गंभीर आरोप लगाया है।अमेरिकी राष्ट्रपति ने आज आधिकारिक तौर पर जानकारी दी कि ईरान ने दोनों देशों के बीच हुए समझौते की धज्जियां उड़ाते हुए सीजफायर तोड़ दिया है। ट्रंप के मुताबिक, ईरानी सेना ने होर्मुज से गुजर रहे एक बड़े मालवाहक जहाज पर ड्रोन से हमला किया, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई में अमेरिकी सेना ने भी तगड़ा पलटवार किया और ईरान के तीन घातक ड्रोनों को हवा में ही नेस्तनाबूद कर दिया। राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान की इस सैन्य कार्रवाई को एक बेहद 'मूर्खतापूर्ण कृत्य' करार दिया है।डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा दावा: ट्रुथ सोशल पर दी हमले की पूरी जानकारीअमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस पूरी अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम की जानकारी अपने आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' (Truth Social) पर एक पोस्ट के जरिए साझा की। ट्रंप ने दावा किया कि ईरान ने इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील समुद्री मार्ग से गुजर रहे अंतरराष्ट्रीय जहाजों को निशाना बनाने के लिए कम से कम चार सुसाइड (आत्मघाती) ड्रोन भेजे थे, जो दोनों देशों के बीच पिछले सप्ताह ही हुए युद्धविराम समझौते का खुला और सीधे तौर पर उल्लंघन है।ट्रंप का यह संगीन आरोप और अमेरिकी सेना का पलटवार ऐसे समय में सामने आया है, जब दोनों परमाणु संपन्न देशों के बीच वैश्विक मध्यस्थता के बाद तनाव कम करने की गंभीर कोशिशें की गई थीं। लेकिन इस ताजा हमले के बाद खाड़ी क्षेत्र (Gulf Region) में हालात एक बार फिर नियंत्रण से बाहर और बेहद विस्फोटक होते दिख रहे हैं।एक मालवाहक जहाज से टकराया ड्रोन, अमेरिकी सेना ने हवा में ही मार गिराए 3 विमानराष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आधिकारिक बयान के मुताबिक, ईरान द्वारा दागे गए चार ड्रोनों में से एक ड्रोन वहां से गुजर रहे एक बड़े मालवाहक जहाज के ऊपरी हिस्से (Deck) से जाकर टकरा गया। इस जबरदस्त धमाके के कारण जहाज को काफी भौतिक नुकसान पहुंचा है, लेकिन गनीमत यह रही कि भारी नुकसान के बावजूद वह जहाज समुद्र में डूबने से बच गया और अपना आगे का सफर जारी रखने में सफल रहा।ट्रंप ने बताया कि जैसे ही इस हमले की भनक अमेरिकी नौसेना के कमांडरों को लगी, अमेरिकी वायुसेना और युद्धपोतों ने त्वरित एक्शन लेते हुए बाकी बचे तीन ड्रोनों को उनके निशाने पर पहुंचने से ठीक पहले हवा में ही मार गिराया। हालांकि, सुरक्षा और रणनीतिक कारणों का हवाला देते हुए ट्रंप ने फिलहाल उस मालवाहक जहाज के नाम और उसके देश का खुलासा सार्वजनिक नहीं किया है जिस पर यह हमला हुआ था। साथ ही, इस हमले में जहाज पर सवार किसी क्रू मेंबर के घायल होने या हताहत होने की भी कोई अतिरिक्त जानकारी अभी सामने नहीं आई है।सिंगापुर के झंडे वाले जहाज पर हुआ हमला, सीजफायर को लगा बड़ा झटकामीडिया और रक्षा गलियारों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच हुए सीजफायर के बाद यह पहली और सबसे बड़ी सैन्य चुनौती तब सामने आई, जब गुरुवार को सिंगापुर के झंडे वाले एक विशाल मालवाहक जहाज पर होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरते समय यह कथित ड्रोन अटैक हुआ। इस हिंसक घटना को दोनों देशों के बीच शांति स्थापित करने और दुनिया के सबसे बड़े तेल और कमोडिटी सप्लाई रूट पर सामान्य आवाजाही बहाल करने के उद्देश्य से किए गए समझौते के लिए एक बहुत बड़ा और जानलेवा झटका माना जा रहा है।अमेरिकी खुफिया और रक्षा अधिकारियों ने दावा किया है कि इस खौफनाक हमले के पीछे सीधे तौर पर ईरान की एलीट मिलिट्री विंग 'इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स' (IRGC) का हाथ है। बताया जा रहा है कि यह घटना ईरान के उस आधिकारिक सैन्य बयान के ठीक कुछ घंटों बाद हुई, जिसमें तेहरान ने चेतावनी दी थी कि बिना उनकी मंजूरी या अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन कर समुद्री मार्गों का इस्तेमाल करने वाले किसी भी जहाज के खिलाफ वे सख्त सैन्य कार्रवाई करेंगे। इस घटना के बाद कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में भी अचानक उछाल आने की आशंका बढ़ गई है।
ईरान की हथियार क्षमताएं क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने में मददगार : इस्माइल बाघेई
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाघेई ने क्षेत्रीय सुरक्षा और आत्मरक्षा के मुद्दे पर देश का रुख स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि ईरान की सैन्य क्षमताएं सुरक्षा और स्थिरता बनाए रखने के लिए हैं
अलास्का वार्ता पर टकराव – रूस और अमेरिका आमने-सामने
रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने कहा कि अमेरिका यूक्रेन संघर्ष को खत्म करने में आखिर क्या भूमिका निभाना चाहता है, इस बारे में साफ तस्वीर सामने आनी चाहिए। उन्होंने यह बात अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के एंकरेज शिखर सम्मेलन को लेकर दिए गए बयान के बाद कही।
ईरान की चेतावनी : होर्मुज में नए समुद्री मार्ग बिना तालमेल के सुरक्षित नहीं
होर्मुज स्ट्रेट को लेकर ईरान ने साफ कर दिया है कि इस क्षेत्र में सुरक्षित समुद्री आवाजाही के लिए उसके साथ सीधा तालमेल जरूरी है। सुरक्षा को नजरअंदाज करके बनाए गए किसी भी वैकल्पिक रास्ते को वह स्वीकार नहीं करेगा।
वियना में भारतीय राजदूत शंभू कुमारन ने की ऑस्ट्रियाई सांसदों के साथ द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा
भारत के ऑस्ट्रिया में राजदूत शंभू एस. कुमारन ने ऑस्ट्रियाई संसद के इंडिया फ्रेंडशिप ग्रुप के सदस्यों से मुलाकात की और दोनों देशों के बीच बढ़ते संबंधों पर चर्चा की।
ट्रंप का यूरोप को अल्टीमेटम – डिजिटल टैक्स लगाया तो लगेगा 100% टैरिफ
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी दी। ट्रंप की यह चेतावनी उन संभावनाओं पर जारी की गई
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के महानिदेशक राफेल ग्रॉसी ने कहा कि परमाणु निगरानी संस्था ने ईरानी अधिकारियों के साथ परमाणु निरीक्षण को लेकर शुरुआती बातचीत की है।
‘पासपोर्ट एक यात्रा दस्तावेज है, न कि नागरिकता का प्रमाणपत्र।’ विदेश मंत्रालय के अधिकारी का ये बयान सुर्खियों में है। सवाल उठ रहे हैं कि अगर पासपोर्ट नहीं, तो भारत के नागरिक होने का सबूत क्या है? क्या सरकार नागरिकता के लिए कुछ नया करने जा रही है; इसी पर आज का एक्सप्लेनर… सवाल-1: क्या आधार, पैन, जन्म प्रमाणपत्र भी नागरिकता साबित नहीं करते?जवाबः पासपोर्ट की तरह ये सरकारी दस्तावेज भी नागरिकता के सबूत नहीं हैं… आधार कार्ड: आधार एक्ट, 2016 के सेक्शन 9 में कहा गया है कि आधार नंबर नागरिकता और निवास का सबूत नहीं है। आधार जारी करने वाली यूनिक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया (UIDAI) ने भी बार-बार कहा है कि आधार सिर्फ पहचान पत्र है। इलेक्शन कमीशन, कलकत्ता और बॉम्बे हाईकोर्ट का भी यही रुख है। मतदाता पहचानपत्र: जनवरी 2026 में इलेक्शन कमीशन ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि वोटर आईडी नागरिकता साबित नहीं करता, यह सिर्फ वोट देने के लिए है। अगस्त 2025 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी कहा कि वोटर आईडी कार्ड पहचान दस्तावेज है, न कि नागरिकता के सबूत। पैन कार्ड: आयकर अधिनियम, 2025 के तहत कोई भी विदेशी नागरिक या कंपनी, जिनका भारत में कारोबार है या जो यहां टैक्स के दायरे में हैं, वह पैन कार्ड बनवा सकते हैं। यह सिर्फ वित्तीय लेन-देन और टैक्स ट्रैकिंग के लिए है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी साफ किया कि पैन कार्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं है। राशन कार्ड: 2019 में गुवाहाटी हाईकोर्ट और 2024 में दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि राशन कार्ड को नागरिकता का सबूत नहीं माना जा सकता। यह सिर्फ पते और वित्तीय स्थिति का प्रमाण है। जुलाई 2025 में इलेक्शन कमीशन ने भी सुप्रीम कोर्ट में दलील दी थी कि वोटर लिस्ट में शामिल होने के लिए राशन कार्ड को सबूत नहीं माना जा सकता और नागरिकता साबित करने के लिए पुख्ता सबूत मांगे। ड्राइविंग लाइसेंस: ड्राइविंग लाइसेंस केवल पहचान पत्र है, जो वाहन चलाने की इजाजत देता है। मोटर व्हीकल्स एक्ट, 1988 के तहत, भारत में वीजा पर आए विदेशियों को भी ड्राइविंग लाइसेंस जारी किया जाता है। इसका नागरिकता से कोई लेना-देना नहीं। जन्म प्रमाण-पत्र: 2013 में बॉम्बे हाईकोर्ट में कहा कि केवल जन्म प्रमाण पत्र नागरिकता के लिए पर्याप्त नहीं है। ये सिर्फ जन्म की तारीख और जगह का सबूत है। नागरिकता कानून के मुताबिक भी सिर्फ इसे नागरिकता का आखिरी सबूत नहीं माना जा सकता। हालांकि जन्म प्रमाण पत्र और पासपोर्ट को लेकर दो विरोधाभासी बातें भी हैं… सवाल-2: तो फिर कैसे साबित होगा कि आप भारत के नागरिक हैं?जवाबः अगस्त 2025 में यही सवाल लोकसभा में CPI (ML) के सांसद सुदामा प्रसाद ने पूछा था। तब गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने लिखित जवाब दिया कि 1955 के नागरिकता अधिनियम के हिसाब से भारतीय नागरिकता तय होती है। दरअसल, भारत में नागरिकता साबित करने के लिए कोई सिंगल यूनिवर्सल डॉक्यूमेंट जारी नहीं किया जाता। नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2003 के मुताबिक, जन्मतिथि के हिसाब से नागरिकता अलग-अलग दस्तावेजों से तय होती है… हालांकि 1955 के नागरिकता कानून के तहत विदेशी लोगों से जुड़े मामलों में कुछ खास नियमों से नागरिकता दी जाती है… धारा 5, रजिस्ट्रेशन: उन्हें जिनका भारत से कोई जुड़ाव हो। जैसे- कोई विदेशी महिला या पुरुष जो किसी भारतीय से शादी करे।धारा 6, नेचुरलाइजेशन: विदेशी नागरिकों के लिए, जो तय वक्त तक भारत में रहे हों। जैसे- पाकिस्तानी मूल के गायक अदनान सामी को भारतीय नागरिकता मिली। सवाल-3: क्या सरकार नागरिकता का कोई रजिस्टर बनाने वाली है? जवाबः नहीं। फिलहाल ऐसी कोई कवायद शुरू होने की जानकारी नहीं है। हालांकि सरकार काफी समय से पूरे देश में ‘नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजनशिप’ यानी NRC लागू करना चाहती है, लेकिन ये अभी सिर्फ असम में लागू हुआ है। इसे समझने के लिए पहले दो चीजें समझिए…पहला, CAA: 2019 में संसद से सिटिजनशिप एमेंडमेंट एक्ट, यानी CAA पास हुआ। इसके तहत 1955 के नागरिकता कानून में ये प्रावधान शामिल हुआ कि 31 दिसंबर 2014 से पहले पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से भारत आने वाले गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यक, यानी हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई भारत के नागरिक बन सकते हैं। इसमें मुस्लिम प्रवासी शामिल नहीं थे। 11 मार्च 2024 को ये कानून लागू हो गया है। दूसरा, NRC: CAA बिल के साथ ही NRC, यानी ‘नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजनशिप’ की चर्चा शुरू हुई थी। यानी एक ऐसा रजिस्टर, जिसमें देश के सारे नागरिकों का लेखा-जोखा हो। केंद्र सरकार का प्लान था कि पहले CAA लागू होगा, उसके बाद पूरे देश में NRC लागू किया जाएगा। 20 नवंबर 2019 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में कहा, ‘मान के चलिए NRC आने वाला है। हम पूरे देश में NRC पेश करेंगे, इस पर सदन में चर्चा कर सकते हैं। नागरिकता बिल को NRC से जोड़ने की कोशिश न करें।’ बीजेपी के 2019 के घोषणापत्र में भी कहा गया था घुसपैठ से प्रभावित राज्यों और फिर चरणबद्ध तरीके से पूरे देश में NRC लागू किया जाएगा। हालांकि अब तक ऐसा नहीं हुआ है। 2019 में सिर्फ असम में NRC के तहत नागरिकता रजिस्टर बनाया गया। इसके चलते असम में 31 अगस्त 2019 को जारी हुई नागरिकता की लिस्ट में से 19 लाख लोग बाहर हो गए। सवाल-4: सरकार ने अभी तक नागरिकता का रजिस्टर क्यों नहीं बनाया?जवाबः इसकी 3 बड़ी वजहें हैं… 1. NRC का विरोध, सरकार ने अपना एजेंडा बदला 2. असम की NRC लिस्ट वैध नहीं, कई गलतियां निकलीं 3. नागरिकता के रजिस्टर के लिए जनसंख्या का रजिस्टर बनना जरूरी 30 मार्च 2026 को भारत के रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त, मृत्युंजय कुमार नारायण ने साफ कहा है कि जनगणना के दौरान NPR का कोई फैसला नहीं लिया गया है, और न ही आगे जनगणना का NPR से कोई लेना-देना होगा। सवाल-5: दुनिया के दूसरे देशों में नागरिकता कैसे तय होती है?जवाबः दुनिया में नागरिकता तय करने के दो ही प्रमुख सिद्धांत हैं… 1. Jus Soli यानी मिट्टी का अधिकार: जहां पैदा हुए, उसी देश की नागरिकता। माता-पिता की नागरिकता से कोई फर्क नहीं पड़ता। जैसे- अमेरिका, कनाडा, मेक्सिको।2. Jus Sanguinis यानी खून का अधिकार: माता-पिता की नागरिकता से नागरिकता तय होती है, चाहे जन्म कहीं भी हो। जैसे- सऊदी अरब, जापान और चीन। हालांकि भारत समेत तमाम देशों में दोनों सिद्धांतों का मिला-जुला सिस्टम अपनाया जाता है, यानी जन्म के साथ-साथ माता-पिता की नागरिकता भी देखी जाती है। नागरिकता साबित करने वाले दस्तावेज भी दुनिया में अलग-अलग हैं। जैसे- ---- ये खबर भी पढ़ें… भास्कर एक्सप्लेनर- 4 साल, 8 एक्सटेंशन बाद CAA लागू:3-4 करोड़ आबादी पर असर; मुसलमान क्यों डरे हैं, क्या फिर विरोध होगा पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को नागरिकता देने वाला कानून आज से पूरे देश में लागू हो गया। 12 दिसंबर 2019 को राष्ट्रपति ने नागरिकता संशोधन कानून को मंजूरी दी थी। पूरी खबर पढ़ें…
वेनेजुएला में बुधवार शाम आए दो शक्तिशाली भूकंपों में मरने वालों की संख्या बढ़कर 235 हो गई है। स्वास्थ्य मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार, मृतकों की संख्या पहले बताए गए 32 से बढ़कर 235 हो गई है।
ताइवान पर अमेरिका का दोहराया भरोसा, हथियार पैकेज समीक्षा में
अमेरिका की ट्रंप सरकार ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि ताइवान को लेकर उसकी लंबे समय से चली आ रही नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है
भूकंप से तबाह वेनेजुएला को IMF का भरोसा
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने वेनेजुएला में आए विनाशकारी भूकंप से प्रभावित लोगों के प्रति दुख और संवेदना जताई
तीस्ता नदी जल प्रबंधन को लेकर एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने भारत की सुरक्षा चिंताओं को फिर से हवा दे दी है। चीन और बांग्लादेश ने आधिकारिक रूप से तीस्ता नदी सहित अन्य प्रमुख जल परियोजनाओं के प्रबंधन में आपसी सहयोग को और अधिक गहराई देने पर सहमति जताई है। यह समझौता तब हुआ जब बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की बीजिंग में चीन के जल संसाधन मंत्री ली गुओयिंग के साथ उच्च-स्तरीय मुलाकात हुई। इस साझेदारी के बाद अब चीन की मौजूदगी भारत के बेहद संवेदनशील 'सिलीगुड़ी कॉरिडोर' (चिकन नेक) के करीब और अधिक सघन होने की आशंका जताई जा रही है।चीन का 'तीस्ता प्लान' और सुरक्षा समीकरणचीन पिछले काफी समय से 'तीस्ता नदी व्यापक प्रबंधन और बहाली परियोजना' (Teesta River Comprehensive Management and Restoration Project) में भारी निवेश करने की इच्छा जाहिर कर रहा है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना केवल जल प्रबंधन तक सीमित नहीं है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जो भारत की मुख्य भूमि को उत्तर-पूर्वी राज्यों से जोड़ने वाली एकमात्र कड़ी है, उसके इतने करीब चीन का तकनीकी और बुनियादी ढांचा विकसित होना भारत के लिए रणनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। बीजिंग की इस रुचि को अक्सर 'डेब्ट ट्रैप' और सैन्य विस्तार के प्रयासों के रूप में देखा जाता है।बांग्लादेश को तकनीक और ट्रेनिंग का वादामुलाकात के दौरान, बांग्लादेशी प्रधानमंत्री ने जल संसाधन प्रबंधन, नदी के कटाव को रोकने, सिंचाई तंत्र को मजबूत करने और जल परिवहन को बढ़ावा देने के लिए चीन से तकनीकी और आर्थिक सहायता की मांग की। चीन ने न केवल इन परियोजनाओं में पूरा सहयोग देने का आश्वासन दिया है, बल्कि बांग्लादेशी अधिकारियों को अपने यहां जल प्रबंधन का विशेष प्रशिक्षण देने के लिए भी आमंत्रित किया है। 2005 के द्विपक्षीय समझौतों की नींव पर खड़ी यह नई साझेदारी चीन के लिए दक्षिण एशिया में अपनी पैठ बढ़ाने का एक बड़ा जरिया बन गई है। भारत के लिए अब यह कूटनीतिक और भू-राजनीतिक स्तर पर एक बड़ी परीक्षा होगी कि वह अपने पड़ोसी के साथ इस संवेदनशील मुद्दे को कैसे संभालता है।
इटली की प्रधानमंत्री जार्जिया मेलोनी का भारत के प्रति लगाव किसी से छिपा नहीं है। हाल ही में उनकी नई पुस्तक 'जार्जिया विजन' (Giorgia Vision) बाजार में आई है, जिसमें मेलोनी ने साल 2023 की अपनी भारत यात्रा के दौरान के ऐसे पलों का जिक्र किया है, जो किसी फिल्म के दृश्य जैसे लगते हैं। मेलोनी ने बताया कि जब वह भारत पहुंचीं, तो नई दिल्ली की सड़कों पर उनके स्वागत में लगे पोस्टरों की बाढ़ देखकर न केवल वह, बल्कि उनका प्रतिनिधिमंडल भी दंग रह गया था।दिल्ली की सड़कों पर लगे पोस्टरों ने बदला मूडअपनी पुस्तक में मेलोनी ने याद करते हुए लिखा कि जैसे ही वह दिल्ली की सड़कों से गुजरीं, उन्होंने हर तरफ अपनी तस्वीरों वाले 'वेलकम' पोस्टर देखे। वापसी के समय भी, उन पोस्टरों को 'यात्रा के लिए धन्यवाद' में बदल दिया गया था। इस दृश्य को देखकर इटली के उपप्रधानमंत्री एंतोनियो तजानी ने मजाकिया लहजे में टिप्पणी की, मेलोनी, अगर आप दिल्ली की किसी भी सीट से चुनाव लड़तीं, तो आपको कम से कम 10 लाख वोट तो मिल ही जाते! यह टिप्पणी उस समय उनके साथ मौजूद पूरे दल के लिए हंसी का सबब बन गई थी।'मेलोडी' जोड़ी और कूटनीति का नया अंदाजजार्जिया मेलोनी 2023 में दो बार भारत आईं—पहली बार रायसीना डायलॉग के लिए और दूसरी बार जी20 शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी केमिस्ट्री ने न केवल राजनीतिक गलियारों में, बल्कि सोशल मीडिया पर भी खूब चर्चा बटोरी। इंटरनेट की दुनिया में लोगों ने इस जोड़ी को प्यार से 'मेलोडी' (Meloni + Modi) नाम दिया था। पुस्तक के अध्याय 'हेड हेल्ड हाई अमंग द वर्ल्ड ग्रेट्स' में मेलोनी ने इस बात पर जोर दिया है कि कूटनीति केवल औपचारिक बैठकों और कागजी समझौतों तक सीमित नहीं है, बल्कि नेताओं के बीच के व्यक्तिगत रिश्ते ही विश्व मंच पर सबसे बड़े बदलाव लाते हैं।सिगरेट वाला वो यादगार लम्हाअपनी किताब में मेलोनी ने सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि अन्य वैश्विक नेताओं के साथ बिताए अपने अनौपचारिक पलों को भी साझा किया है। उन्होंने ट्यूनीशिया के राष्ट्रपति कैस सईद के साथ अपनी मुलाकात का जिक्र करते हुए एक दिलचस्प वाकया बताया। जब दो घंटे की लंबी बातचीत के बाद माहौल थोड़ा सहज हुआ, तो उन्होंने सईद से पूछा कि क्या वह सिगरेट पी सकती हैं? मेलोनी के इस सवाल ने माहौल को पूरी तरह बदल दिया और सईद ने भी अपनी सिगरेट निकाली। यह पल उनकी पुस्तक में एक ऐसे मानवीय रिश्ते के रूप में दर्ज है जो औपचारिक सीमाओं को तोड़ देता है। अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस द्वारा लिखित भूमिका वाली यह पुस्तक अब दुनिया भर में चर्चा का विषय बनी हुई है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए ईरान के साथ चल रहा तनाव अब केवल बाहरी मोर्चे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह उनकी अपनी रिपब्लिकन पार्टी के भीतर एक बड़े राजनीतिक संकट के रूप में उभर रहा है। बुधवार को बंद कमरे में हुई एक बैठक के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप और रिपब्लिकन सीनेटर बिल कैसिडी के बीच हुई तीखी बहस ने पार्टी के भीतर की दरार को सार्वजनिक कर दिया है। इस टकराव का मुख्य केंद्र ट्रंप प्रशासन द्वारा ईरान युद्ध के खर्च के लिए कांग्रेस से मांगी गई 70 अरब डॉलर की भारी-भरकम राशि और तेहरान के साथ हुई हालिया रूपरेखा समझौते की शर्तें हैं।समझौते पर छिड़ा घमासान: क्या सच छिपाया जा रहा है?सीनेटर बिल कैसिडी ने ट्रंप प्रशासन पर तीखे हमले करते हुए ईरान के साथ हुए उस हालिया समझौते पर स्पष्टीकरण मांगा है, जिसमें तेहरान को वित्तीय प्रोत्साहन देने की बात कही गई है। कैसिडी का स्पष्ट मानना है कि यह समझौता उन लक्ष्यों से काफी पीछे है जो युद्ध शुरू होने के समय प्रशासन ने जनता के सामने रखे थे। उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में दो टूक कहा कि अमेरिकी नागरिकों को सच्चाई जानने का पूरा अधिकार है और फिलहाल जमीनी हालात उन दावों से मेल नहीं खाते जो सरकार द्वारा किए जा रहे हैं। नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के मद्देनजर, यह घरेलू असंतोष ट्रंप के लिए एक बड़ी राजनीतिक चुनौती बनता जा रहा है।सीनेट में देर रात तक चली रस्साकशीट्रंप के साथ बैठक के तुरंत बाद, सीनेट में रिपब्लिकन नेतृत्व ने युद्ध को समाप्त करने से जुड़े 'युद्धाधिकार प्रस्ताव' को रोकने के लिए एक बड़ा दांव खेला। देर रात हुए मतदान में 50 मतों के साथ इस प्रस्ताव को आगे बढ़ने से रोक दिया गया, जबकि 47 सीनेटरों ने इसके समर्थन में वोट डाला। हालांकि, ट्रंप प्रशासन के इस प्रयास के बावजूद उनकी अपनी पार्टी की सीनेटर सुसान कोलिन्स और लिसा मर्कोव्स्की जैसे प्रमुख चेहरों ने डेमोक्रेट सांसदों के साथ खड़े होकर ट्रंप की नीतियों पर सवाल उठाए हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया पर इस मतदान को ईरान के लिए एक कड़ा संदेश करार दिया है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह स्पष्ट है कि ईरान युद्ध के मुद्दे पर व्हाइट हाउस को अपने ही घर में कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की वैश्विक लोकप्रियता में भारी गिरावट दर्ज की गई है। प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा जारी एक ताजा सर्वे के नतीजे यह बताते हैं कि दुनिया भर में उनकी नीतियों और उनके नेतृत्व शैली पर भरोसा करने वालों की संख्या बहुत कम हो गई है। सर्वे के आंकड़ों के अनुसार, करीब 76% लोगों ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि उन्हें वैश्विक मामलों को संभालने में ट्रंप के नेतृत्व पर कोई भरोसा नहीं है। यह रिपोर्ट ट्रंप प्रशासन के लिए एक बड़ा कूटनीतिक संकेत है, जो यह दर्शाता है कि उनकी 'अमेरिका फर्स्ट' नीति का असर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी छवि पर पड़ा है।सर्वे में सामने आए चौंकाने वाले आंकड़ेयह व्यापक सर्वे 36 देशों के 42,000 से अधिक लोगों के बीच किया गया, जिसमें ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग में बड़ी कमी देखी गई है। केवल 23% प्रतिभागियों ने ही वैश्विक मामलों के समाधान में ट्रंप पर अपना विश्वास जताया। सर्वे में शामिल 24 देशों में से 16 देशों में ट्रंप के प्रति भरोसा पिछले साल की तुलना में काफी कम हुआ है। खास बात यह है कि किसी भी प्रमुख देश में उनकी लोकप्रियता में बढ़ोतरी दर्ज नहीं की गई है। यूरोप के प्रमुख देशों जैसे जर्मनी, फ्रांस और ग्रीस में भी ट्रंप की रेटिंग अपने निचले स्तर पर पहुंच गई है, जो ट्रांस-अटलांटिक संबंधों में तनाव की ओर इशारा करती है।भारत में ट्रंप का प्रभाव और टैरिफ नीति की असफलताभारत की बात करें तो यहां तस्वीर थोड़ी अलग है, लेकिन गिरावट यहां भी साफ नजर आ रही है। सर्वे में 39% भारतीय प्रतिभागियों ने ट्रंप के नेतृत्व पर भरोसा जताया है, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा 51% था। इसी सर्वे में वैश्विक मामलों पर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के प्रति विश्वास जताने वाले भारतीयों की संख्या 51% रही। ट्रंप प्रशासन की 'टैरिफ नीति' वैश्विक स्तर पर सबसे ज्यादा अलोकप्रिय रही। सर्वे के अनुसार, महज 18% वैश्विक आबादी ने ही इस नीति का समर्थन किया। ब्रिटेन, कनाडा, जापान और जर्मनी जैसे विकसित देशों में तो इस नीति को समर्थन देने वालों का आंकड़ा 20% से भी काफी नीचे रहा। केवल केन्या एक ऐसा देश बनकर उभरा जहां ट्रंप की टैरिफ नीति को बहुसंख्यक लोगों (55%) का समर्थन मिला।
कमरे के फर्श पर एक बच्ची बेजान सी पड़ी है। उम्र 13 साल। वो न सुन सकती है, न बोल सकती है और न देख सकती है। आंखों में कोई चाकू भी घोंप दे, तो पलकें नहीं झपकेंगी। दरअसल, उसकी आंखों में किसी के छूने, कुछ चुभने या जख्म का कोई अहसास नहीं होता। बस, कुछ देर आंसू बहते हैं। ये बच्ची रह-रहकर कराहती है, छटपटाती है। सिर घुमाती है और अपने बाल खींचती है। दोनों हाथों से अपना चेहरा टटोलती है। फिर पूरी ताकत से फर्श पर हाथ-पैर पटकने लगती है। अजीब सी आवाज में चीखती है फिर कुछ देर के लिए एकदम चुप हो जाती है। दिन हो या रात, जानवी ऐसे ही छटपटाती रहती है। दरअसल, जानवी के दिमाग, कान और आंखों की नसें आपस में उलझी हुई हैं। या यूं कहें कि गलत जगह जुड़ी हैं। इसका दुनिया में कोई इलाज नहीं है। जानवी की छोटी बहन यानसी को भी यही बीमारी है। दुर्लभ बीमारियों की सीरीज- ‘ऐ जिंदगी’ में मैं नीरज झा पहुंचा हूं राजस्थान के उदयपुर से 90 किमी दूर वीरवा खुर्द गांव। आज कहानी वहीं से… अरावली की पहाड़ियों के बीच बसे गांव में 2 किलोमीटर चलने पर एक घर नजर आया। दरवाजे पर दस्तक देते ही एक बच्ची सामने आई। चेहरा आम लोगों से काफी अलग, हाथ-पैर सूखी टहनी की तरह। सिर का पिछला हिस्सा चपटा। चेहरे पर आंखें दिखती तो हैं, खुलती हैं या नहीं, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। वह बार-बार कमरे में इधर-से-उधर चक्कर काट रही है। अपने दोनों हाथों को जांघों पर जोर-जोर से मार रही है। वो कब, कहां टकरा जाए, गिर जाए, पता नहीं लगता। अपनी भौहों को जोर देकर ऐसे सिकोड़ती है, जैसे कुछ देखने की कोशिश कर रही हो। तभी नरेश चौबीसा आते हैं। ये बच्चियों के पिता हैं। आते ही बोले- ‘ये मेरी छोटी बेटी यानसी है। बोल नहीं सकती है, सुन नहीं सकती। आंखों में भी थोड़ी सी रोशनी है। डॉक्टर कहते हैं कि दिन के उजाले में 20 परसेंट देख पाती है। बड़ी बेटी जानवी तो बस जिंदा लाश है।’ अभी उनकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि पास के एक कमरे से किसी के कराहने की आवाज आने लगी। नरेश बोले- ‘बड़ी बेटी जानवी की आवाज है। चौबीसों घंटे ऐसे ही तड़पती है।’ फिर वो मुझे उस कमरे की ओर ले गए। कमरे में बेड तो है, लेकिन जानवी फर्श पर बेसुध पड़ी है। नरेश आगे बढ़कर उसके दोनों हाथ पकड़ते हैं और गोद में उठाकर आंगन में ले आते हैं। जैसे-तैसे उसे खाट पर बैठाते हैं, लेकिन जानवी चिढ़कर हाथ-पैर झटक देती है। कुछ पल बैठी रहती है और फिर बेसुध होकर खाट पर लुढ़क जाती है। नरेश कहते हैं- ‘छोटी बेटी यानसी को तो फिर भी थोड़ी समझ है। वह हमारे आसपास खेलती-कूदती है। हमें महसूस करती है, लेकिन जानवी पूरी तरह से बेसुध है। उसकी दोनों आंखों को लकवा मार चुका है।' वो अपनी उंगली से बेटी जानवी की आंखें दबाते हुए कहते हैं- ‘देखिए, इसको कुछ महसूस ही नहीं होता है। पलक भी नहीं झपकाती। ऐसे लगता है जैसे पत्थर हो गई हो। इस दौरान, जानवी को अहसास होता है कि कोई अनजान उसके करीब खड़ा है। वह अचानक पूरी ताकत से हवा में हाथ चलाती है और हमें खुद से दूर धकेलने की कोशिश करती है। उसकी आवाज तो नहीं निकल रही है, लेकिन झल्लाहट में आंसू निकल आते हैं। नरेश भावुक हो जाते हैं। कहते हैं- ‘जानवी 13 साल की है और यानसी 10 की। दोनों में से किसी ने आज तक मुझे पापा या मां को मम्मी नहीं कहा। ये सुनने के लिए हमारे कान तरस गए हैं।' 'काश! ये कभी दूसरे बच्चों की तरह जिद करतीं। कहतीं कि पापा मुझे खिलौने चाहिए, मुझे यह खाना है, लेकिन इनके हिस्से में तो कोई जिद नहीं है। जो खिला दो, खा लेती हैं। जो पहना दो, पहन लेती हैं।’ इतने में किचन में काम कर रही उनकी पत्नी अंजना भी आ जाती हैं। नरेश बताते हैं- ‘जून 2012 में हमारी शादी हुई, लव-मैरिज थी। उन दिनों मैं फोटोग्राफी करता था।' 9 नवंबर 2013 को जानवी का जन्म हुआ। तब वो स्वस्थ थी। वजन भी 3 किलो था। 'जब अंजना ने पहली बार उसे दूध पिलाना चाहा, तो नहीं पिया। डॉक्टरों ने सलाह दी कि अभी चम्मच से दूध पिलाओ, एक-दो महीने बाद वह खुद पीने लगेगी। शुरुआती दिनों में वह बिल्कुल आम बच्चों की तरह हाथ-पैर चलाती और हरकतें करती थी।’ जैसे ही एक महीने की हुई, छह-सात घंटे रोने लगी। उदयपुर में डॉक्टरों को दिखाया, लेकिन उसका रोना बंद नहीं हुआ। ‘घरवाले कहते कि बच्चे तो रोते ही हैं, धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा। हालांकि, उसका रोना आम बच्चों जैसा नहीं था। पेट भरकर दूध पिलाने के बाद भी चीख-चीखकर रोती। किसी तरह थपकियां दे-देकर उसे सुलाते थे। जैसे ही उसकी आंख खुलती, फिर रोने लगती।’ ‘ऐसा करते-करते छह महीने बीत गए। अचानक जानवी की दोनों आंखें सुर्ख लाल रहने लगीं। अंदर की ओर धंसने लगीं, गड्ढे पड़ने लगे। हम दोनों डर गए, क्योंकि ऐसा हमने पहले कभी किसी बच्चे के साथ होते हुए नहीं देखा। उसे लेकर उदयपुर भागे। वहां डॉक्टरों ने अहमदाबाद रेफर कर दिया।’ ‘अहमदाबाद में डॉक्टर ने जब उसे देखा, तो एमआरआई करवाया। पता चला कि हमारी बच्ची न सुन सकती है, न बोल सकती है। तब तक यह अंदाजा नहीं था कि वह देख भी नहीं सकती। डॉक्टरों ने उसकी आंखों का इलाज शुरू किया। पहले दोनों आंखों में टांके लगाए और हर 15 दिन में उसकी सर्जरी की।’ ‘इसी जद्दोजहद में दो महीने और बीत गए। अब डॉक्टर कहने लगे- इसकी आंखों की नसें पूरी तरह पैरालाइज्ड हैं, यह कभी नहीं देख पाएगी। इसे क्रेनियल डिसइनरवेशन सिंड्रोम नाम की बीमारी है। यह दुर्लभ बीमारी है, जिसका दुनिया में कोई इलाज नहीं है।’ 'अस्पताल से लौटने के बाद, डॉक्टरों ने हमें जानवी की आंखों में डालने के लिए एक दवा दी थी। कहा था- इसे रोजाना तय समय पर दिन में दो-चार बार डालना, ताकि आंखों में नमी बनी रहे। लेकिन एक दिन हमसे चूक हो गई और वक्त पर ड्रॉप डालना भूल गए।’ 'इसी दौरान जानवी की आंखों में तेज खुजली उठी। वह अपनी उंगलियों से आंखों को ऐसे नोंच रही थी, जैसे उसे खोदकर बाहर निकाल फेंकेगी। शुक्र है, समय रहते हमने उसे देख लिया नहीं तो वह अपनी आंखें निकाल लेती। उस दिन के बाद चाहे जो हो जाए, उसकी आंखों में दवाई डालना नहीं भूलते।' नरेश कहते हैं- 'एक रोज शाम का वक्त था। जानवी बाहर जमीन पर लेटी हुई थी। तभी हवा के तेज झोंके के साथ उड़कर आई ढेर सारी धूल-मिट्टी उसकी आंखों में चली गई, लेकिन उसने पलकें झपकाई तक नहीं। मैंने अपनी उंगलियों से उसकी आंखों को छूकर देखा। उसके चेहरे पर न कोई दर्द था, न कोई हलचल। उस दिन हमें पहली बार अहसास हुआ कि उसकी दोनों आंखें पूरी तरह बेजान हैं।' मैं एक बड़ी कंपनी में सेल्स मैनेजर था। परिवार के साथ विदेश में रहने का सपना था। मेरे कई दोस्त गए हैं, लेकिन मुझे तो बेटियों की वजह से नौकरी छोड़नी पड़ी। हर हफ्ते इन्हें डॉक्टर के पास ले जाना पड़ता है। मन में बस एक आस रहती थी कि काश, कहीं कोई चमत्कार हो जाए। रिश्तेदार और आसपास के लोग कहते थे- ऐसे बच्चों का इलाज करवाकर क्या फायदा, पैसे बहा रहे हो। आप ही बताइए, अपनी औलाद को कैसे तड़पते हुए छोड़ दूं?’ 2016 की बात है। जानवी 3 साल की हो चुकी थी, लेकिन उसकी जिंदगी एक बिस्तर तक सिमटी हुई थी। जहां इस उम्र के बच्चे दौड़ लगाते हैं, वहीं जानवी के पैरों ने जमीन को छुआ तक नहीं था। हम दूसरे बच्चे के बारे में सोचने लगे। कुछ दिनों बाद अंजना गर्भवती हो गई। सब बहुत खुश थे, लेकिन तभी मेरे बड़े भाई का एक्सीडेंट हो गया। वे दो महीनों तक जिंदगी और मौत के बीच झूलते रहे। परिवार अस्पताल के चक्कर काटता रहा। जब गर्भ चार-साढ़े चार महीने का हो गया, तब हमें होश आया कि पहली संतान इस हाल में है, तो कहीं दूसरी के साथ भी ऐसा न हो जाए। तब दोनों जेनेटिक टेस्ट कराने अस्पताल पहुंचे। डॉक्टरों ने कहा कि रिपोर्ट आने में कम से कम आठ महीने लगेंगे। सोचा कि जब तक रिपोर्ट आएगी, तब तक तो बच्चा दुनिया में आ चुका होगा। और इतने दिनों बाद गर्भ को गिराना भी संभव नहीं था। हम कोख में पल रहे बच्चे को मार नहीं सकते थे। सब ऊपर वाले पर छोड़ दिया कि जो होगा, देखा जाएगा। फिर दूसरी बेटी यानसी का जन्म हुआ। यानसी भी 5-6 महीने ठीक रही, लेकिन बाद में उसकी आंखें भी लाल हो गईं। आंखों के नीचे गड्ढे हो गए। कॉर्निया सूखने लगा। हालांकि यानसी को थोड़ा जल्दी इलाज मिल गया, इसलिए वह 20 प्रतिशत देख पाती है। कमजोर है, इसकी भी पूरी देखभाल बड़ी बेटी की तरह करनी पड़ती है। बच्चे एक-डेढ़ साल में चलना सीख जाते हैं। इसने 8 साल की उम्र में चलना शुरू किया।’ नरेश रुआंसी आवाज में कहते हैं- ‘पहले हमारा घर यहां से 500 मीटर दूर, बीच गांव में था। वहां गांववालों ने हमें बीमारी से भी गहरे जख्म दिए। कोई कहता- तुम्हारे घर पर बुरा साया है। कोई कहता- यह तुम्हारे पिछले जन्मों को पाप है। ओझा-फकीरों के पास भी बच्चों को लेकर गए, लेकिन कुछ नहीं हुआ।’ आखिर, वहां का घर छोड़कर यहां घर बनाया। बैंक से लोन लेना पड़ा। इसी दौरान, दरवाजे की घंटी बजती है। सामने खड़े दो शख्स नरेश को किसी फंक्शन में चलने के लिए कहते हैं। नरेश जवाब देते हैं- नहीं चल पाऊंगा, कुछ काम है, आप चले जाइए। अंदर आकर नरेश बताते हैं- ‘24 घंटे हम दोनों में से किसी एक को घर पर पहरा देना पड़ता है। जब बच्चे छोटे थे, तो गोद में उठाकर कभी-कभी किसी फंक्शन में चले जाते थे। लेकिन अब चौखट पार करने में भी सोचना पड़ता है।' बेटियों को क्या बीमारी है? कहां इलाज करवा रहे हैं? कितनों को इसका जवाब दें। सो जाना ही छोड़ दिया। मेरी बहन की बेटी, जानवी से 2 महीने बड़ी है। वह घर का काम करती है, लेकिन ये अपने हाथ से खाना भी नहीं खा पाती। हाथ चलते नहीं, निगल पाती नहीं, इसलिए पेस्ट बनाकर खिलाना पड़ता है। हम दोनों ने इनके खाने-पानी का समय तय कर रखा है, क्योंकि दोनों तो भूख लगने पर खाना भी नहीं मांग सकतीं। जब भी घर के सामने से स्कूल बस गुजरती है, तो एक आस जागती है कि काश! मैं भी अपने बच्चों को स्कूल छोड़ने जाता।’ बोलते-बोलते नरेश की आंखें भर आती हैं। वे कहते हैं- ‘जानवी सुन सके इसलिए कॉकलियर इम्प्लांट के लिए सोचा, लेकिन डॉक्टरों ने मना कर दिया। यानसी के लिए भी कोशिश की तो डॉक्टर ने कहा कि 10-15 लाख रुपए खर्च होंगे, कोई भी NGO करवा देगा। जब उसके कान का चेकअप हुआ, तो पता चला कि इम्प्लांट नहीं हो सकता।’ डॉक्टरों ने साफ कह दिया- दो ही रास्ते हैं। इन बच्चियों को ऐसे ही स्वीकार कर लें या 'ब्रेन इम्प्लांट' करा लें। लेकिन ऐसे बच्चों में ब्रेन इम्प्लांट का सक्सेस रेट शून्य है। जान का भी खतरा है। 'हमने यह सोचकर मना कर दिया कि कम से कम बेटियां जिंदा तो रहेंगी। वैसे भी 50 लाख का खर्च उठाने की हैसियत कहां है। इलाज में अब तक 10 लाख से ज्यादा खर्च हो चुके हैं। सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर जैसे-तैसे दिव्यांग कार्ड बनवाया, लेकिन पेंशन के नाम पर महीने के सिर्फ 2400 रुपए मिलते हैं।’ तभी खाट पर लेटी जानवी उठने की कोशिश करती है। अंजना, उसे संभालती हैं और वॉशरूम ले जाती हैं। थोड़ी देर बाद वह लौटती हैं। नरेश कहते हैं- ‘कभी-कभी जब सब सो जाते हैं, तो मैं बेटियों के पास बैठ जाता हूं। सोचता हूं कि ये दोनों क्या सोचती होंगी। क्या कहना चाहती होंगी।’ मेरी पत्नी अंजना तीसरी बार गर्भवती है, सात महीने हो चुके हैं। दो बेटियों की हालत देखने के बाद अब यही उम्मीद है कि आने वाली संतान ठीक हो। इसी आस में हर महीने डॉक्टरों के चक्कर काटते हैं, सारे टेस्ट और चेकअप भी करवा रहे हैं। तीसरे बच्चे को इस दुनिया में लाने का फैसला भी सिर्फ इसलिए लिया कि हमारे जाने के बाद कोई हो, जो इन दोनों का ख्याल रख सके। डॉक्टर का कहना है, इस बार 99% उम्मीद है कि बच्चा बिल्कुल ठीक और सामान्य होगा, लेकिन सच कहूं तो बेटियों को देखकर रूह कांप जाती है- अगर इस बार भी पहले जैसा कुछ हुआ तो…!’ जानवी और यानसी को देखने के बाद बतौर रिपोर्टर मेरे मन में कई सवाल उठने लगे। जवाब पाने के लिए अहमदाबाद स्थित ‘इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन जेनेटिक्स’ पहुंचा। यहां असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. हर्ष शेठ से मुलाकात हुई। उनसे जानवी और यानसी की बीमारी का जिक्र किया। डॉ. हर्ष बताते हैं- 'दोनों बच्चियां क्रेनियल डिसइनरवेंशन सिंड्रोम से पीड़ित हैं। यह भारत का पहला और दुनिया का चौथा मामला है। इसमें बच्चे के दिमाग से चेहरे, आंख, कान और गले तक जाने वाली नस ठीक से विकसित नहीं हो पातीं या गलत जुड़ जाती हैं। GJB2 नाम के जीन की खराबी से ये बीमारी होती है। इसका कोई इलाज नहीं है।' बच्चा जन्म से ही सुन और बोल नहीं पाता। दिमाग का विकास रुक जाता है। चेहरे की नसें इतनी कमजोर होती हैं खाने का पेस्ट बनाकर देना पड़ता है। आंखें अंदर धंस जाती हैं और बच्चा सिर झुकाकर या चीजों को आंख के बेहद करीब लाकर देखता है। लेकिन जानवी-यानसी का केस इससे भी एक स्टेप आगे है। वो तो देख भी नहीं सकती। क्या गर्भ के समय ही इस बीमारी का पता लगाया जा सकता है? डॉ. हर्ष कहते हैं- ‘गर्भावस्था में इसका पता लगाया जा सकता है। यह जेनेटिक और नसों की बीमारी है। इसके लिए एडवांस जेनेटिक टेस्ट कराना पड़ता है। इसे CVS या एमिनियोसेंटेसिस टेस्ट के नाम से जाना जाता है। इससे GJB2 जीन की खराबी को पकड़ा जा सकता है।’ इसके अलावा, गर्भावस्था के दौरान हाई-रिजोल्यूशन फीटल MRI से गर्भ में शिशु की क्रेनियल नसों की गलत बनावट का पता चल सकता है। ------------------------------------- ऐ जिंदगी सीरीज की यह खबर भी पड़ें… 1- उम्र-29, हाइट 3 फीट, खांसने से टूटती हैं हड्डियां:भगवान से हर रोज कहती हूं- मुझसे पहले मेरी बेटी को उठा लेना तखत पर एक लड़की करवट लिए लेटी है। बाल छोटे-छोटे। लंबाई बमुश्किल 3 फीट, लेकिन उम्र 29 बरस। इस लड़की ने आज तक आइसक्रीम नहीं खाई। जानते हैं क्यों? पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- 14 की उम्र में शरीर बना 'पेड़ की छाल’: उठो या बैठो फटने लगती है चमड़ी, मन करता है छीलकर फेंक दूं; देश का अकेला केस दोपहर के 1 बजे हैं। जंगल के ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर कार हिचकोले खा रही है। तेज गर्मी से गला लगातार सूख रहा है। करीब 2 घंटे बाद जंगलों में कुछ झोपड़ियां नजर आती हैं। इन्हीं झोपड़ियों में से एक के सामने हमारी कार रुकी। झोपड़ी के बाहर एक लड़की बेजान सी खड़ी नजर आई। उसकी मटमैली शर्ट और हाफ पैंट के बाहर जितना भी शरीर दिख रहा है, वह बेहद डरावना है। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें…
उइगर मुद्दे पर ट्रंप की चुप्पी, शी जिनपिंग संग बैठक बेनतीजा
हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके चीनी समकक्ष शी जिनपिंग के बीच हुई बैठक ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया है
सिर्फ शेयर ही क्यों? गोल्ड और डेट का ये कॉम्बो बनाएगा आपको अमीर
आज के दौर में जब शेयर मार्केट कभी रॉकेट बन जाता है तो कभी अचानक धड़ाम से नीचे गिर जाता है, ऐसे में अपने पूरे पैसे को सिर्फ एक ही जगह लगाना समझदारी नहीं है। समझदार निवेशक अब एक नया और सुरक्षित रास्ता चुन रहे हैं, जिसे Multi-Asset Investing कहा जाता है। अगर आप भी अपने निवेश पर बिना बड़ा जोखिम लिए बंपर रिटर्न कमाना चाहते हैं, तो यह स्मार्ट पोर्टफोलियो स्ट्रेटेजी आपके बहुत काम आने वाली है।क्या है मल्टी-एसेट इन्वेस्टिंग का असली गेम?मल्टी-एसेट इन्वेस्टिंग का सीधा सा मतलब है अपने पैसे को किसी एक टोकरी में रखने के बजाय अलग-अलग एसेट क्लास जैसे—इक्विटी (शेयर), डेट (फिक्स्ड इनकम/बॉन्ड्स) और गोल्ड (सोना) में बांट देना। जब शेयर मार्केट में गिरावट आती है, तो अक्सर सोना चमकने लगता है, और डेट फंड्स आपके पोर्टफोलियो को स्थिरता देते हैं। यह कॉम्बिनेशन आपके नुकसान के रिस्क को लगभग ना के बराबर कर देता है और लंबी अवधि में तगड़ा मुनाफा कमा कर देता है।इक्विटी, डेट और गोल्ड का परफेक्ट कॉम्बिनेशन कैसे बनाएं?एक आइडियल और स्मार्ट पोर्टफोलियो बनाने के लिए आपको अपनी उम्र और रिस्क लेने की क्षमता के हिसाब से एसेट्स का चुनाव करना चाहिए। एसेट एलोकेशन के इस नियम को आप आसानी से समझ सकते हैं:इक्विटी (शेयर बाजार): अपने पोर्टफोलियो का 50 से 60 फीसदी हिस्सा अच्छे शेयर्स या म्यूचुअल फंड्स में लगाएं, जो आपको लंबी अवधि में वेल्थ क्रिएशन (तगड़ा रिटर्न) करके देगा।डेट फंड्स (सुरक्षित निवेश): पोर्टफोलियो का 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा डेट या सरकारी बॉन्ड्स में रखें। यह मार्केट के उतार-चढ़ाव के समय आपके पैसों को सुरक्षा देगा और रेगुलर इनकम का जरिया बनेगा।गोल्ड (सोना): कम से कम 10 से 15 फीसदी निवेश सोने (Digital Gold या SGB) में जरूर करें। संकट के समय सोना हमेशा सबसे बेहतरीन ढाल साबित होता है।रीबैलेंसिंग है सबसे जरूरी कदममल्टी-एसेट पोर्टफोलियो बनाने के बाद उसे भूलना नहीं है। साल में कम से कम एक बार अपने पोर्टफोलियो की समीक्षा यानी 'रीबैलेंसिंग' जरूर करें। उदाहरण के लिए, अगर शेयर मार्केट बहुत ज्यादा बढ़ गया है और आपके पोर्टफोलियो में इक्विटी का हिस्सा तय सीमा से ज्यादा हो गया है, तो मुनाफे का कुछ हिस्सा निकालकर उसे गोल्ड या डेट में शिफ्ट कर दें। यही स्मार्ट इन्वेस्टिंग का सबसे बड़ा सीक्रेट है।
24 जून की शाम 6 बजकर 4 मिनट। वेनेजुएला की धरती अचानक जोर से कांप उठी। ये रिक्टर स्केल पर 7.2 तीव्रता का भूकंप था। लोग संभलते, तब तक महज 38 सेकेंड बाद 7.5 तीव्रता का एक और भूकंप आ गया। ये Earthquake Doublet यानी जुड़वा भूकंप था। 26 मिनट बाद 15 हजार किमी दूर जापान में भी 6.9 तीव्रता का भूकंप आया। आखिर वेनेजुएला में क्यों आया ‘जुड़वा भूकंप’, क्या धरती के नीचे कोई चेन रिएक्शन चल रही और आगे क्या होगा; आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: ‘जुड़वा भूकंप’ क्या है और ये ज्यादा घातक क्यों होता है?जवाबः पहले जानिए कि भूकंप क्या है… अब बात Earthquake Doublet यानी जुड़वा भूकंप की… कभी-कभी एक ही फॉल्ट लाइन पर दो बार प्लेटों के टूटने से एनर्जी निकलती है और दोनों बार बड़े भूकंप आते हैं। इनका एपिसेंटर यानी उद्गम केंद्र एक-दूसरे के बहुत करीब होता है। किसी बड़े भूकंप के बाद एनर्जी की छोटी-छोटी लहरें उठना, यानी आफ्टरशॉक सामान्य है, लेकिन जुड़वा भूकंप कम देखने को मिलते हैं। क्योंकि एक बार एक फॉल्ट लाइन से एनर्जी रिलीज होने के बाद वहां दबाव कम हो जाता है। दोबारा उसी फॉल्ट लाइन से इतनी तेज एनर्जी नहीं निकलती। जुड़वा भूकंपों के बीच कुछ सेकेंड से लेकर कई सालों का अंतर हो सकता है। वेनेजुएला में ये महज 38 सेकेंड के भीतर आ गया। जुड़वा भूकंपों की रिक्टर स्केल पर तीव्रता लगभग बराबर होती है। आमतौर पर दोनों भूकंपों के बीच 0.2 से 0.5 पॉइंट्स का अंतर होता है। भूकंप वैज्ञानिक जूडिथ हबर्ड और काइल ब्रैडली कहते हैं कि 7.5 तीव्रता का भूकंप 7.2 तीव्रता के भूकंप की तुलना में लगभग तीन गुना ज्यादा एनर्जी रिलीज करता है। सवाल-2: वेनेजुएला में जुड़वा भूकंप क्यों आया? जवाबः वेनेजुएला के नीचे की बनावट समझिए... 25 जून को जो दोहरा भूकंप आया, उसका सेंटर ठीक उसी जगह था जहां वेनेजुएला की तीन बड़ी फॉल्ट लाइनें- ओका-अनकोन, एल पिलार और बोकोनो फॉल्ट आपस में मिलती हैं। भूकंप वैज्ञानिक जूडिथ हबर्ड और काइल ब्रैडली के मुताबिक, पहला भूकंप 7.2 तीव्रता का था। इसका झटका पूरी तरह खत्म होने में ही कई सेकेंड लग गए। इस दौरान फॉल्ट लाइन के साथ-साथ दरार दो डायरेक्शन में फैलती चली गई। पहले भूकंप की एनर्जी ने आसपास की चट्टानों में दबाव को फैलाया, जिससे फॉल्ट सिस्टम का एक और हिस्सा टूट गया और महज 38 सेकेंड बाद 7.5 तीव्रता का दूसरा भूकंप आ गया। दोनों वैज्ञानिकों का कहना है कि इन दो भूकंपों को एक ही बड़े भूकंप के दो 'पल्स' यानी झटकों की तरह भी देखा जा सकता है, जिनकी कुल एनर्जी मिलाकर करीब 7.6 तीव्रता के एक भूकंप के बराबर थी। सवाल-3: क्या वेनेजुएला में ये सदी का सबसे ताकतवर भूकंप है? जवाबः हां। अमेरिकी भूगर्भ सर्वेक्षण संस्था USGS के मुताबिक, 1900 के बाद से वेनेजुएला में आया यह सबसे ताकतवर भूकंप है। 29 अक्टूबर 1900 की सुबह वेनेजुएला के तट के पास 7.7 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया था। चूंकि उस दौर में आधुनिक उपकरण मौजूद नहीं थे, इसलिए यह तीव्रता नुकसान और असर की रिपोर्टों के आधार पर आंकी गई है। USGS की इम्पैक्ट रिपोर्ट के अनुसार, तब 21 लोगों की मौत हुई, 50 घायल हुए और पूरे शहर में गिरजाघर, विश्वविद्यालय, मीनारें और घर समेत ३०० इमारतें ढह गईं। 126 साल बाद आया भूकंप रिक्टर स्केल पर भले कुछ कम (7.2 और 7.5) लगे, लेकिन जान और माल का कई गुना ज्यादा नुकसान होने की आशंका है। सवाल-4: इस बार वेनेजुएला भूकंप में कितनी मौतों की आशंका है? जवाबः अमेरिकी भूगर्भ सर्वेक्षण यानी USGS का शुरुआती अनुमान है कि वेनेजुएला में 10 हजार से 1 लाख मौतों हो सकती हैं। हालांकि यह कोई पक्का आंकड़ा नहीं है। सूचनाओं के आधार पर ये अपडेट होता रहेगा। इस अनुमान के लिए USGS ने PAGER नाम के एक खास सिस्टम का इस्तेमाल किया। यह सिस्टम कई चीजें देखता है- भूकंप की तीव्रता, भूकंप के केंद्र की गहराई, उस इलाके की आबादी और पहले आ चुके ऐसे ही भूकंपों से तुलना करके यह अनुमान तैयार करता है। वेनेजुएला की ही तरह 6 फरवरी 2023 को तुर्किए में सीरियाई सीमा के पास जुड़वा भूकंप आया था। पहला सुबह करीब 4:17 बजे और फिर दूसरा भूकंप पहले एपिसेंटर से करीब 100 किमी दूर करीब 9 घंटे बाद आया। इसमें 60 हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे। अगस्त 2021 में दक्षिण अटलांटिक महासागर के साउथ सैंडविच आइलैंड में भी जुड़वा भूकंप आया था। तब 7.5 तीव्रता के भूकंप के करीब ढाई मिनट बाद 8.1 तीव्रता का दूसरा भूकंप आया था। हालांकि वो आबादी वाला इलाका नहीं था, इसलिए जान-माल का नुकसान कम हुआ। सवाल-5: क्या जापान में आए भूकंप का वेनेजुएला से कोई कनेक्शन है?जवाबः वेनेजुएला के तुरंत बाद करीब 15 हजार किमी दूर जापान में आए भूकंप का कोई सीधा संबंध नहीं है। इंडोनेशियन डिजास्टर एक्सपर्ट्स एसोसिएशन के मेंबर डॉ. डारियोनो के मुताबिक, धरती के भीतर रोजाना हजारों भूकंप आते हैं, जिनमें से कुछ ही महसूस होते हैं। खास बात ये है कि हर भूकंप का स्रोत अलग और दूर होता है। कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी की रिसर्च एसोसिएट और भूकंपविज्ञानी डॉ. लूसी जोन्स मानती हैं कि वेनेजुएला और जापान में आए भूकंपों के पीछे कोई 'चेन रिएक्शन' या एक-दूसरे को ट्रिगर करने वाली वजह नहीं है। ऐसा न होने के दो और फैक्टर जानिए… सवाल-6: वेनेजुएला में आगे क्या हो सकता है? जवाबः वेनेजुएला में लगातार 2 भूकंप आने के बाद 20 से ज्यादा आफ्टरशॉक्स दर्ज किए गए हैं। USGS ने आशंका जताई है कि वेनेजुएला में २५ जून की शाम ६.३० बजे तक 4 या उससे ज्यादा तीव्रता के करीब 26 भूकंप आ सकते हैं। इनमें से कम से कम एक की तीव्रता 5 या उससे ज्यादा होने की 89% संभावना है। भूकंपविज्ञान के 'ओमोरी लॉ' के मुताबिक, शुरुआती 24 से 48 घंटों में आफ्टरशॉक्स की संख्या और उनकी तीव्रता सबसे ज्यादा होती हैं। हां, एक आशंका है। लगातार 2 बड़े भूकंप झेलने के बाद जमीन के नीचे की टेक्टोनिक प्लेटों को पूरी तरह शांत और सेट होने में हफ्तों से लेकर कई महीनों तक का समय लग सकता है। अगर इस दौरान 5 तीव्रता के अफ्टरशॉक्स आए, तो वेनेजुएला को और ज्यादा तबाही झेलनी पड़ सकती है। क्योंकि वहां की इमारतें, इंफ्रास्ट्रक्चर पहले से ही कमजोर हो चुके हैं।------------- भूकंप से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए… वेनेजुएला में 39 सेकेंड में भूकंप के 2 बड़े झटके: 60 सेकेंड तक शहर हिलता रहा, अब तक 164 की मौत, 971 घायल वेनेजुएला में 39 सेकेंड में दो ताकतवर भूकंप से तबाही मच गई है। दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला में बुधवार शाम 6.04 बजे 7.2 और 6.05 बजे 7.5 तीव्रता के दो झटके आए। उस समय भारत में गुरुवार तड़के 3.34 और 3.35 बजे थे। भूकंप के बाद 60 सेकेंड तक शहर हिलता रहा। पूरी खबर पढ़िए…
वेनेजुएला के इतिहास में 24 जून 2026 की रात एक ऐसे काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गई है, जिसने इस देश को दशकों पीछे धकेल दिया है। रात करीब 10 बजे यारकुय प्रांत की राजधानी सैन फेलिपे के पास रिक्टर स्केल पर 7.2 तीव्रता का पहला शक्तिशाली भूकंप आया। इस भयानक झटके से लोग संभल भी नहीं पाए थे कि महज 40 सेकंड बाद युमारे शहर के पास 7.5 तीव्रता का दूसरा और उससे भी अधिक विनाशकारी भूकंप आया।इन दोनों लगातार आए भूकंपों का केंद्र राजधानी कराकस से लगभग 284 से 293 किलोमीटर पश्चिम में था। इन झटकों ने पूरे वेनेजुएला को मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया है। राजधानी कराकस में कई गगनचुंबी इमारतें और एक प्रमुख बैंक की बिल्डिंग ताश के पत्तों की तरह ढह गई। देश के मुख्य सिमोन बोलिवर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को भारी नुकसान पहुंचा है, जिसके कारण सभी उड़ानें रद्द करनी पड़ी हैं। इसके अलावा ट्रुजिल्लो, काराबोबो, अरागुआ, मिरांडा और ला गुएरा जैसे राज्यों से भी बड़े पैमाने पर तबाही की खबरें आ रही हैं।अमेरिकी जियोलॉजिकल सर्वे (USGS) की शुरुआती और डरावनी चेतावनी के मुताबिक, इस आपदा में 10 हजार से लेकर 1 लाख लोगों की मौत होने की आशंका जताई गई है। लेकिन वेनेजुएला के लिए सिर्फ इंसानी जानों का नुकसान ही एकमात्र संकट नहीं है। सालों से गंभीर आर्थिक तंगहाली झेल रहे इस देश के लिए यह भूकंप एक ऐसा 'तीसरा झटका' है, जिससे बाहर निकलने में देश को कई दशक लग सकते हैं।दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार, फिर भी कंगाल है देशवेनेजुएला का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि इसके पास 303 अरब बैरल तेल का रिजर्व है, जो दुनिया में सबसे बड़ा है और अमेरिका के कुल तेल भंडार से करीब पांच गुना अधिक है। इसके बावजूद गलत नीतियों और प्रतिबंधों के कारण देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह वेंटिलेटर पर है।GDP में ऐतिहासिक गिरावट: साल 2013 से 2025 के बीच वेनेजुएला की जीडीपी (GDP) में लगभग 80% की ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई, जो सोवियत संघ के विघटन के समय आए संकट से भी बदतर है।उत्पादन ठप: जो देश 1998 में हर दिन 35 लाख बैरल तेल निकालता था, उसका उत्पादन 2020 तक गिरकर महज 3.92 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया था।रिकॉर्ड तोड़ महंगाई: साल 2025 में वेनेजुएला में महंगाई दर (Inflation Rate) 475% के पार पहुंच गई, जो दुनिया में सबसे ज्यादा थी। यहां आम आदमी की औसत मासिक आय केवल 100 से 300 डॉलर के बीच है। संयुक्त राष्ट्र (UN) के अनुसार, साल 2025 तक देश की एक-तिहाई आबादी (लगभग 80 लाख लोग) पूरी तरह से मानवीय सहायता पर निर्भर हो चुकी थी।राजनीतिक बदलाव से लौटी थी उम्मीदें, पर किस्मत को कुछ और मंजूर थाइसी साल जनवरी 2026 में वेनेजुएला में एक बहुत बड़ा राजनीतिक यू-टर्न आया था। 3 जनवरी को अमेरिकी सेना द्वारा पूर्व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार किए जाने के बाद, देश की कमान उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज को कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में सौंपी गई। रोड्रिगेज ने कड़े आर्थिक सुधार लागू किए, सरकारी तेल कंपनी PDVSA के एकाधिकार को खत्म किया और विदेशी निवेश के दरवाजे खोल दिए।अमेरिका की शेवरॉन (Chevron), स्पेन की रेप्सोल (Repsol) और इटली की एनी (Eni) जैसी वैश्विक कंपनियों के साथ नए तेल समझौते किए गए, जिससे देश का तेल उत्पादन दोबारा बढ़कर 10 लाख बैरल प्रतिदिन के पार पहुंच गया था। अर्थशास्त्रियों को पूरी उम्मीद थी कि साल 2026 में वेनेजुएला 12.1% की शानदार जीडीपी ग्रोथ दर्ज करेगा। लेकिन इस भीषण भूकंप ने इन सभी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।100 अरब डॉलर के नुकसान की आशंका: अर्थव्यवस्था के बराबर है तबाहीUSGS की PAGER (प्रॉम्प्ट असेसमेंट ऑफ ग्लोबल अर्थक्वेक्स फॉर रिस्पांस) सिस्टम के शुरुआती अनुमानों के अनुसार, इस भूकंप से वेनेजुएला को 10 अरब डॉलर से लेकर 100 अरब डॉलर से भी ज्यादा का आर्थिक नुकसान हो सकता है, जिसकी संभावना 39% तक है। यह विनाशकारी राशि वेनेजुएला की कुल वर्तमान अर्थव्यवस्था के आकार के बराबर है।सबसे बड़ी चुनौती यह है कि देश के पास पुनर्निर्माण (Reconstruction) के लिए फूटी कौड़ी भी नहीं है। वेनेजुएला पहले से ही 170 अरब डॉलर के भारी-भरकम विदेशी कर्ज के नीचे दबा हुआ है। इसके अलावा, तेल की बिक्री से मिलने वाला अधिकांश राजस्व कानूनी दांव-पेच के कारण अमेरिका की निगरानी वाले एस्क्रो खातों में जमा होता है, ताकि कर्जदाता उसे जब्त न कर सकें। ऐसे में कार्यवाहक सरकार के पास राहत कार्यों के लिए वित्तीय संसाधन बेहद सीमित हैं।विशेषज्ञों की बड़ी चिंता: तेल रिफाइनरियों और गैस लाइनों में आग का खतराकैलटेक की प्रसिद्ध भूकंप वैज्ञानिक डॉ. लूसी जोन्स के अनुसार, ऐसे बड़े भूकंपों के बाद केवल इमारतों का गिरना ही एकमात्र खतरा नहीं होता। असली तबाही तब शुरू होती है जब जमीन के नीचे बिछी मुख्य गैस पाइपलाइनें और बिजली के ग्रिड टूट जाते हैं, जिससे पूरे शहर में भीषण आग लग जाती है।चूंकि भूकंप के कारण पानी की सप्लाई लाइनें भी टूट जाती हैं, इसलिए दमकल विभागों के लिए इस आग पर काबू पाना असंभव हो जाता है। इसके अलावा, वेनेजुएला का हेल्थ सिस्टम (अस्पताल और दवाएं) पहले से ही बदहाल है, जिससे हजारों घायलों का इलाज करना एक बड़ी चुनौती होगी। यदि इस आपदा में देश की तेल रिफाइनरियों और ऑयल इन्फ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचता है, तो देश की आय का मुख्य स्रोत (जो कुल राजस्व का 50-60% और जीडीपी का 20% है) पूरी तरह ठप हो जाएगा।अंतिम निष्कर्ष: सामान्य होने में लग जाएंगे 10 से 15 सालआर्थिक और आपदा प्रबंधन विशेषज्ञ इस संकट की तुलना साल 2010 में हैती में आए 7.0 तीव्रता के भूकंप से कर रहे हैं, जिसके 16 साल बीत जाने के बाद भी हैती आज तक पूरी तरह उबर नहीं पाया है।विशेषज्ञों का मानना है कि इस भूकंप के कारण वेनेजुएला की जीडीपी को सीधे 2% से 20% तक का सीधा झटका लगेगा। जब तक वैश्विक समुदाय आगे आकर वेनेजुएला का कर्ज माफ या पुनर्गठित (Debt Restructuring) नहीं करता, बड़े पैमाने पर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहायता नहीं मिलती और देश में राजनीतिक स्थिरता नहीं रहती, तब तक वेनेजुएला को इस महा-संकट से पूरी तरह उबरने और पटरी पर लौटने में कम से कम 10 साल या उससे भी अधिक का समय लग सकता है।
नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (नाटो) के महासचिव मार्क रूटे ने ईरान के खिलाफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीति और कार्रवाई का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका के कदम ने ईरान को परमाणु हथियार क्षमता हासिल करने से रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। साथ ही, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रंप नाटो और ट्रांस-अटलांटिक गठबंधन के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।
जापान में 6.9 तीव्रता का भूकंप, वेनेजुएला में दोहरे झटकों से बढ़ी तबाही की आशंका
जापान और वेनेजुएला के कुछ हिस्से गुरुवार सुबह भूकंप के तेज झटकों से दहल गए। जापान के उत्तर-पूर्वी हिस्से में गुरुवार सुबह 6.9 तीव्रता का जबरदस्त भूकंप महसूस किया गया, जबकि वेनेजुएला में कुछ मिनटों के भीतर दो बड़े भूकंप आए।
वेनेजुएला में एक के बाद एक दो शक्तिशाली भूकंप आए, जिससे राजधानी काराकस में तेज झटके महसूस किए गए। वेनेजुएला में लगातार आए दो भूकंप ने भारी तबाही मचाई है। अधिकारियों ने पुष्टि की है कि कई लोगों की जानें गई हैं, लेकिन उन्होंने मरने वालों की आधिकारिक संख्या जारी नहीं की है। संयुक्त राज्य भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने अनुमान लगाया है कि जिस तीव्रता से भूकंप आया है, उसमें हजारों की संख्या में मौत का आंकड़ा सामने आ सकता है।
वेनेजुएला में कुदरत का भीषण तांडव, 7.5 तीव्रता के भूकंप से मची भारी तबाही
दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला से इस वक्त की बेहद दुखद और बड़ी खबर सामने आ रही है। वेनेजुएला में आज तड़के आए एक बेहद शक्तिशाली और विनाशकारी भूकंप ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई है। रिक्टर स्केल पर इस भूकंप की तीव्रता 7.5 मापी गई है, जो बेहद खतरनाक मानी जाती है। भूकंप के तेज और भीषण झटकों के कारण देश के कई हिस्सों में पल भर में गगनचुंबी इमारतें और रिहायशी मकान ताश के पत्तों की तरह जमींदोज हो गए हैं। अचानक आई इस प्राकृतिक आपदा के बाद पूरे देश में हाहाकार मच गया है और हजारों मौतों की गंभीर आशंका जताई जा रही है।पल भर में मलबे के ढेर में तब्दील हुए कई शहरचश्मदीदों और स्थानीय प्रशासन से मिल रही शुरुआती जानकारी के अनुसार, भूकंप के झटके इतने तेज थे कि लोगों को संभलने तक का मौका नहीं मिला। राजधानी काराकास सहित कई प्रमुख शहरों और कस्बों में सड़कें फट गई हैं, बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा है और बिजली-इंटरनेट जैसी जरूरी सेवाएं पूरी तरह ठप हो गई हैं। कई बहुमंजिला इमारतों के ढहने के कारण उनके मलबे के नीचे बड़ी संख्या में लोगों के दबे होने की खबर है, जिससे स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है।राहत और बचाव कार्य जारी, मलबे से अपनों को तलाश रहे लोगभूकंप की खबर मिलते ही स्थानीय आपदा प्रबंधन टीमें, सेना और राहत कर्मी युद्ध स्तर पर रेस्क्यू ऑपरेशन में जुट गए हैं। मलबे को हटाने और फंसे हुए लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए भारी मशीनरी का इस्तेमाल किया जा रहा है। अस्पतालों में इमरजेंसी घोषित कर दी गई है और घायलों के इलाज के लिए विशेष टीमें तैनात की गई हैं। हालांकि, प्रभावित इलाकों में बार-बार आ रहे आफ्टरशॉक्स (भूकंप के बाद के हल्के झटके) और बिजली गुल होने के कारण बचाव कार्य में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।भौगोलिक और लोकल स्तर पर नुकसान की भयावह स्थितिइस शक्तिशाली भूकंप का केंद्र जिस इलाके में था, वहां के स्थानीय गांवों और कस्बों में सबसे ज्यादा तबाही देखने को मिल रही है। पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन (Landslide) होने से कई संपर्क मार्ग पूरी तरह बंद हो गए हैं, जिससे दूरदराज के क्षेत्रों तक राहत सामग्री और मेडिकल टीमें पहुंचाना एक बड़ी चुनौती बन गया है। अंतरराष्ट्रीय संगठनों और पड़ोसी देशों ने भी इस संकट की घड़ी में वेनेजुएला की मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाए हैं और जल्द ही इंटरनेशनल रेस्क्यू टीमें भी वहां पहुंच सकती हैं।एआई और ग्लोबल सर्च पर दुनिया भर की नजरेंदुनिया भर के आधुनिक एआई सर्च इंजन और जनरेटिव प्लेटफॉर्म्स इस समय वेनेजुएला भूकंप से जुड़ी पल-पल की लाइव अपडेट्स और सुरक्षित ठिकानों की जानकारी यूजर्स तक पहुंचा रहे हैं। ग्लोबल एक्सपर्ट्स का कहना है कि 7.5 तीव्रता का भूकंप आना किसी भी देश के लिए बेहद विनाशकारी होता है। सरकार की ओर से नागरिकों को खुले मैदानों में रहने और जर्जर इमारतों से दूर रहने की सख्त हिदायत दी गई है। आने वाले कुछ घंटे वेनेजुएला के लिए बेहद नाजुक और चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं।
दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला (Venezuela) से प्रकृति के एक बेहद दुर्लभ और खौफनाक रूप की खबर सामने आ रही है। वेनेजुएला में बुधवार को 'डबलट अर्थक्वेक' (Doublet Earthquake) जैसी एक अत्यंत दुर्लभ और जटिल भूकंपीय घटना दर्ज की गई है। इस घटना में एक ही भौगोलिक क्षेत्र के भीतर कुछ ही सेकंड के अंतराल पर एक के बाद एक दो विनाशकारी और शक्तिशाली भूकंप आए, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया।यूनाइटेड स्टेट्स जियोलॉजिकल सर्वे (USGS) के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस दोहरे संकट के चलते वेनेजुएला की राजधानी काराकास (Caracas) सहित कई प्रमुख शहरों में बहुमंजिला इमारतें ताश के पत्तों की तरह हिलने लगीं। भूकंप के इन भीषण झटकों के कारण घबराए हुए लाखों लोग अपनी जान बचाने के लिए घरों और दफ्तरों से निकलकर सड़कों की तरफ भागने लगे।महज 39 सेकंड का फासला और दो महा-विनाशकारी झटकेयूएसजीएस (USGS) की सीस्मिक रिपोर्ट के मुताबिक, वेनेजुएला में आए इस दोहरे भूकंप की टाइमलाइन और तीव्रता बेहद हैरान करने वाली थी:पहला झटका (फोरशॉक): यह भूकंप रिक्टर स्केल पर 7.2 की भीषण तीव्रता का था, जो अंतरराष्ट्रीय समयानुसार 2204 GMT पर आया। इसका मुख्य केंद्र वेनेजुएला के प्रसिद्ध तटीय शहर मोरॉन (Morn) से लगभग 21 किलोमीटर पश्चिम में ज़मीन के भीतर था।दूसरा झटका (मेनशॉक): पहले झटके के ठीक 39 सेकंड बाद, पहले केंद्र से महज 45 किलोमीटर की दूरी पर 7.5 तीव्रता का दूसरा और पहले से भी कहीं अधिक शक्तिशाली मुख्य भूकंप आया।अमेरिकी भूवैज्ञानिकों ने इस पूरी श्रृंखला को डबलट (Doublet) के रूप में वर्गीकृत किया है, जहां 7.5 तीव्रता वाले मुख्य विनाशकारी झटके से एक मिनट से भी कम समय पहले 7.2 तीव्रता का एक अत्यंत शक्तिशाली शुरुआती झटका आया था।गैस सप्लाई बंद; गृह मंत्री बोले- बड़ा हादसा टालने के लिए उठाए कड़े कदमहालांकि राहत की बात यह है कि आपदा प्रबंधन और स्थानीय अधिकारियों ने तुरंत किसी भी नागरिक की मौत की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है, लेकिन कई इलाकों में बुनियादी ढांचे और इमारतों को व्यापक नुकसान पहुंचा है।वेनेजुएला के गृह मंत्री डियोसडाडो कैबेलो ने स्थिति की समीक्षा करने के बाद मीडिया को बताया, देश के कई राज्यों में इमारतें और रिहायशी ढांचे गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हुए हैं। भूकंप के कारण कई जगहों पर अंडरग्राउंड यूटिलिटी लाइन्स प्रभावित हुई हैं। हम नहीं चाहते कि भूकंप के बाद शहरों में गैस रिसाव से जुड़ा कोई दूसरा बड़ा और जानलेवा हादसा हो। उन्होंने जानकारी दी कि एहतियात और सुरक्षा के तौर पर प्रभावित वाले सभी रिहायशी और कमर्शियल इलाकों की मुख्य गैस सप्लाई को तुरंत काट (ब्लाक) दिया गया है।विज्ञान की नज़र से समझें: क्या होता है यह 'डबलट भूकंप'?आम तौर पर जब कोई बड़ा भूकंप आता है, तो उसके बाद छोटे-छोटे झटके आते हैं जिन्हें हम 'आफ्टरशॉक' (Aftershocks) कहते हैं। लेकिन 'डबलट भूकंप' इससे पूरी तरह अलग और कहीं अधिक खतरनाक होता है। भूकंप विज्ञान (Seismology) के अनुसार:समान तीव्रता के दो मुख्य झटके: जब एक ही इलाके या एक ही फॉल्ट सिस्टम के भीतर बेहद कम समय के अंतराल पर दो बड़े भूकंप आते हैं, जिनकी तीव्रता (Magnitude) लगभग एक जैसी या बराबर होती है, तो उसे 'डबलट भूकंप' कहा जाता है।आधुनिक परिभाषा: शुरुआत में वैज्ञानिक केवल उन भूकंपों को डबलट मानते थे जिनकी उत्पत्ति बिल्कुल एक ही पॉइंट (Focus) से होती थी और जिनसे निकलने वाली भूकंपीय तरंगें (Seismic Waves) ग्राफ पर हूबहू एक जैसी दिखती थीं। लेकिन आज, आधुनिक विज्ञान में लगभग एक जैसी क्षमता वाले दो या उससे अधिक मुख्य झटकों के कम समय के अंतराल पर आने को 'डबलट' कहा जाता है।आफ्टरशॉक बनाम डबलट: क्यों यह घटना है ज्यादा खतरनाक?विशेषताआफ्टरशॉक (Aftershocks)डबलट भूकंप (Doublet Earthquake)तीव्रता (Magnitude)मुख्य भूकंप की तुलना में हमेशा बहुत कमजोर और छोटे होते हैं।दोनों या तीनों झटके लगभग समान रूप से शक्तिशाली (जैसे 7.2 और 7.5) होते हैं।समय का अंतरालमुख्य झटके के बाद दिनों, हफ्तों या महीनों तक आ सकते हैं।ये झटके एक-दूसरे के कुछ सेकंड, मिनट या कुछ घंटों के भीतर ही आ जाते हैं।नुकसान की क्षमताकमजोर हो चुकी इमारतों को गिरा सकते हैं, लेकिन क्षमता सीमित होती है।पहले झटके से हिली हुई इमारतें दूसरे समान शक्तिशाली झटके को झेल नहीं पातीं और पूरी तरह जमींदोज हो जाती हैं।वेनेजुएला में आई यह भूकंपीय श्रृंखला 'डबलट' का सबसे सटीक और जीवंत उदाहरण है। यहाँ 7.2 तीव्रता वाले शुरुआती झटके ने पहले जमीन को हिलाया और इससे पहले कि ऊर्जा शांत हो पाती, ठीक 39 सेकंड बाद आए 7.5 तीव्रता के मुख्य झटके ने तबाही को दोगुना कर दिया। भौगोलिक रूप से वेनेजुएला कैरेबियन और साउथ अमेरिकन टेक्टोनिक प्लेटों के जोड़ पर बसा है, जिससे यहाँ इस प्रकार के दुर्लभ फॉल्ट मूवमेंट देखने को मिलते हैं।
मोदी-पाशिन्यान वार्ता – भारत-आर्मेनिया रिश्तों को नई मजबूती
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आर्मेनिया के प्रधानमंत्री निकोल पाशिन्यान और उनकी पार्टी को संसदीय चुनावों में जीत की बधाई दी
7 फरवरी, 2026 की बात है। मणिपुर के उखरुल जिले के लिटान सरईखोंग गांव में एक नगा टीचर स्कूल से घर जा रहे थे। उन्होंने कुछ लड़कों को सड़क पर बैठकर शराब पीते देखा। टीचर ने स्कूल के पास शराब पीने से मना किया। आरोप है ये लड़के कुकी समुदाय से थे। उन्होंने टीचर को पीटा और धमकी दी कि जिंदा रहना है, तो उखरुल छोड़ दो। इस मारपीट ने जातीय रंग ले लिया। 8 और 9 फरवरी की रात भीड़ ने लिटान सरईखोंग के आसपास के नगा गांवों में 20 से ज्यादा घर जला दिए। माहौल बिगड़ता देख सरकार ने 10 फरवरी को उखरुल और कांगपोकपी जिलों में इंटरनेट सर्विस सस्पेंड कर दी। दोनों जिलों की सीमाओं पर अब भी सेना का पहरा है। मणिपुर में मई 2023 से मैतेई और कुकी समुदाय के बीच जातीय हिंसा शुरू हुई थी। बीते 3 साल में ज्यादातर वक्त हिंसा के बीच ही गुजरा। मणिपुर में राष्ट्रपति शासन हटने के बाद मैतेई-कुकी के बीच लड़ाई थम गई, लेकिन अब कुकी और नगा समुदायों के बीच शुरू हुई हिंसा ने राज्य में तीसरी दरार पैदा कर दी है। 4 महीने से मणिपुर फिर जल रहा है। फरवरी से जून तक 48 लोग किडनैप किए गए, 20 की हत्या कर दी और 50 से ज्यादा घर जला दिए गए। ऐसा ही डर 1992 में था, जब 5 साल चले संघर्ष में एक हजार लोग मारे गए थे। ‘कुकी पति को गाड़ी से उठा ले गए, 27वें दिन डेडबॉडी मिली’ 10 जून को कुकी-नगा समुदायों के बीच तनाव बढ़ गया, जब खारम वैफेई गांव के पास 6 नगा लोगों के अधकटे शव मिले। इन लोगों को 13 मई को कांगपोकपी से अगवा किया गया था। इनमें दिलीप थियूमई भी थे। दिलीप की पत्नी विनीलियू ने बताया, ‘मैं और दिलीप बच्चे के लिए दवा लेने कांगपोकपी बाजार गए थे। लौटते वक्त कुकी लोगों के ग्रुप ने हमारी गाड़ी रोक ली। उन्होंने सभी सवारियों को बाहर निकाला, आंखों पर पट्टी बांधी और अलग-अलग गाड़ियों में बैठाकर ले गए। अगले दिन सारी महिलाओं को छोड़ दिया, लेकिन पुरुषों को नहीं छोड़ा।' ‘मैंने बंदूक लिए लोगों से पति के बारे में पूछा, तो उन्होंने गुस्से में कहा कि तुम लोगों ने हमारे 3 पादरियों को मारा है। हम इसका बदला लेंगे। 26 दिन तक मेरे पति का कुछ पता नहीं चला। 10 जून को 6 शव मिले। हमें बॉडी की पहचान के लिए इंफाल अस्पताल बुलाया गया। लाशों पर हर जगह चोट के निशान थे। चेहरा पहचान में नहीं आ रहा था। मैंने कपड़ों से दिलीप की डेडबॉडी को पहचाना।’ जॉइंट ट्राइब्स काउंसिल (JTC) और यूनाइटेड नगा काउंसिल (UNC) मणिपुर में नगा समुदाय के सबसे बड़े संगठन हैं। हमने JTC के प्रमुख सदस्य मेराचाओ इंका से बात की। वे बताते हैं कि पुलिस ने 6 लोगों के शव सौंपे थे। हमारे भाइयों को बंधक बनाकर यातनाएं दी गईं। शव लेने से पहले हमने सरकार के सामने तीन मांगें रखी हैं। 1. अपहरण में शामिल लोगों, खासकर कुकी नेशनल फ्रंट के कैडर पर सख्त कार्रवाई हो, उन पर प्रतिबंध लगे। 2. महिला संगठन की प्रमुख लालबाई वैफेई और मणिपुर पुलिस के कर्मी थांग्गिलियन ने हमारे लोगों के अपहरण का आदेश दिया। उन्हें गिरफ्तार किया जाए। 3. मारे गए लोगों के परिवार को आर्थिक मदद मिले, उनके बच्चों की पढ़ाई फ्री की जाए। 1992 का कुकी-नगा टकराव याद आया, तब 1 हजार लोग मारे गए थे मणिपुर की आबादी में करीब 24% नगा हैं। ये ज्यादातर पहाड़ी जिलों उखरुल, सेनापति, चंदेल, तेंगनौपाल और तमेंगलोंग में बसे हैं। मैतेई-कुकी संघर्ष से ये समुदाय दूर ही रहा। शांति बहाली के बाद 4 फरवरी को मणिपुर में राष्ट्रपति शासन खत्म हुआ और नई सरकार बनी। युमनाम खेमचंद सिंह CM बने। तीन दिन बाद, यानी 7 फरवरी से मणिपुर में नगा-कुकी समुदायों के बीच हिंसा भड़क गई। असम राइफल्स से जुड़े सीनियर अधिकारी ने भास्कर को बताया, ‘बीते 40 दिनों में हुईं हिंसक घटनाओं को देखते हुए हमारी चिंता मैतेई-कुकी संघर्ष से हटकर नगा-कुकी की नई लड़ाई की तरफ मुड़ गई है।’ फ्रंटियर मणिपुर के संपादक धीरेन सदोकपम इस पर कहते हैं, ‘मणिपुर में नगा और कुकी के बीच संघर्ष का लंबा इतिहास रहा है। दोनों समुदायों के बीच आखिरी टकराव 1992 में हुआ था। ये 5 साल तक चला। लगभग 1 हजार लोग मारे गए थे। हजारों लोगों को बेघर होना पड़ा था। हिंसा नहीं रुकी, तो उससे भी बदतर हालात हो सकते हैं।’ वजह पूछने पर धीरेन कहते हैं, ‘बड़ी वजह स्थानीय घुसपैठ है। घाटी से विस्थापन के बाद कुकी समुदाय के कई लोग पहाड़ियों पर चले गए। वहां पहले से नगा बहुल गांव थे। कुकी के पास अपने ग्रुप और हथियार हैं। इससे पहाड़ों पर उनका प्रभाव बढ़ रहा है। ये देखकर नगा समुदाय में चिंता बढ़ गई है। इसलिए छोटे विवाद भी बड़े टकराव में बदलने लगे हैं।’ कुकी लीडर बोले- हमारे खाने की सप्लाई रोकी, नगा-मैतेई हालात और बिगाड़ेंगे कांगपोकपी जिले में बिगड़ते हालात पर कुकी लीडर महंगाई और खाने-पीने की किल्लत को बड़ा फैक्टर मानते हैं। एक लीडर ने पहचान उजागर न करने की शर्त पर बात की। वे बताते हैं कि कांगपोकपी और चुराचांदपुर में जरूरी चीजें बहुत महंगी हो गई हैं। गैस और पेट्रोल नहीं मिल रहा। गैस सिलेंडर 5 हजार रुपए तक बिक रहा है। तंगखुल समुदाय के लोगों ने कुकी इलाकों में जाने वाले खाने-पीने के सामान की सप्लाई रोक दी है। इससे लोगों को बहुत मुश्किल हो गई। उधर, कुकी स्टूडेंट ऑर्गेनाइजेशन के लीडर रूबोल मणिपुर के विवाद में नगा और मैतेई समुदाय के साथ होने का दावा करते हैं। वे कहते हैं- दोनों समुदाय पहले से मिले हुए हैं। नगा और मैतेई की वजह से हालात और खराब हो सकते हैं। हम अपना बचाव करके चल रहे हैं। सरकार से मदद की उम्मीद है, लेकिन अब तक हमारे लिए कुछ किया नहीं गया। नगा समुदाय का आरोप है कि सुरक्षाबल कुकी लोगों को बचा रहे हैं? रूबोल जवाब देते हैं, ’ सेना किसी एक का पक्ष नहीं ले रही। वो बस बीच-बचाव करने की कोशिश कर रही है। हमें सुरक्षा बलों से ही रिपोर्ट मिली है कि खोपूम घाटी में 200 से 300 लोग कुकी इलाकों पर हमला करने की तैयारी में हैं।’ अब तक 10 गिरफ्तारी, कांगपोकपी, इंफाल और चुराचांदपुर में NIA एक्टिव कुकी-नगा समुदायों के बीच हिंसा पर मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह ने यूनाइटेड नागा काउंसिल और कुकी समुदाय के डेलिगेशन के साथ बैठक की। उन्होंने 6 नगा और मई 2026 में कांगपोकपी में 3 पादरियों की हत्या की जांच NIA को सौंपी दी। उखरुल और कांगपोकपी जिलों में सेना के सर्च ऑपरेशन का हिस्सा रहे CRPF के सीनियर अधिकारी कहते हैं, ‘डेडबॉडी मिलने के बाद मणिपुर पुलिस, असम राइफल्स और CRPF ने कांगपोकपी, इंफाल और चुराचांदपुर में जॉइंट ऑपरेशन चलाया। 10 लोगों को गिरफ्तार किया गया है।’ NIA के मुताबिक, ये गिरफ्तारियां इंफाल ईस्ट, इंफाल वेस्ट, बिष्णुपुर, चुराचांदपुर, उखरुल, चंदेल और फेरजॉल जिलों से की गई हैं। नवंबर 2024 में जिरीबाम में एक महिला की हत्या, जून 2024 में इंफाल से जिरीबाम जाते समय पूर्व CM एन बीरेन सिंह के काफिले पर हमले और नवंबर 2023 में उखरुल में बैंक डकैती के मामले में भी अरेस्टिंग की गई है। ये रिपोर्ट भी पढ़ें10 मंदिर उड़ाने की धमकी, कौन है खालिस्तान नेशनल आर्मी 4 जून की सुबह 9:54 बजे पंचकूला के मेयर श्यामलाल बंसल को धमकी भरा ई-मेल मिला। इसमें दिल्ली-हरियाणा के 6 बड़े मंदिरों में ब्लास्ट करने की धमकी थी। मेल मिलते ही लोकल पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट हो गईं। डॉग स्क्वाड और एंटी-बम स्क्वाड बुलाई गईं। मंदिर खाली कराए गए, लेकिन कुछ नहीं मिला। जांच आगे बढ़ी, तो पता चला कि धमकी के पीछे पाकिस्तान में एक्टिव खालिस्तान नेशनल आर्मी है। पढ़ें पूरी खबर…
प्रतिबंध खत्म करके और वादों को पूरा करने के बाद ही तय होगी परमाणु मुद्दे की दिशा: गरीबाबादी
ईरान ने अपने परमाणु ठिकानों को लेकर रुख स्पष्ट करते हुए बताया कि अंतिम समझौते और दूसरे पक्ष के ठोस कदमों के बाद ही परमाणु केंद्रों तक पहुंच तय की जाएगी।
ईरान शांति वार्ता: कतर और पाकिस्तान की भूमिका पर अमेरिका में उठे सवाल, सीनेटरों ने जताई चिंता
अमेरिकी रिपब्लिकन पार्टी के दो सीनेटरों ने ईरान के साथ युद्धविराम बातचीत में कतर और पाकिस्तान की मध्यस्थ भूमिका पर सवाल उठाए
पाकिस्तान: बलूच कार्यकर्ताओं को उम्रकैद की सजा के विरोध में बलूचिस्तान बंद
बलूच यकजेहती कमेटी (बीवाईसी) की नेता माहरंग बलूच समेत कार्यकर्ताओं को उम्रकैद की सजा के विरोध में बुधवार को बलूचिस्तान के कई इलाकों को पूरी तरह बंद रखा गया
पुणे शहर से 64 किमी दूर लोहागढ़ किला। 18 जून 2026 की सुबह करीब 10 बजे किले की चोटी से एक चीख गूंजी। गार्ड्स पहुंचे, तो वहां मौजूद 20 साल की सिया ने बताया- मेरा मंगेतर केतन फिसलकर खाई में गिर गया है। सिया ने ही घरवालों को भी फोन किया। अगले दिन इंस्टाग्राम पर लिखा- ‘केतन तुम मुझे मेरे जन्मदिन पर अकेला छोड़ गए। वापस आ जाओ।’ अब पुणे पुलिस ने खुलासा किया है कि केतन की मौत कोई हादसा नहीं, मर्डर था। इसे खुद सिया ने अपने बॉयफ्रेंड के साथ मिलकर अंजाम दिया, क्योंकि वो शादी नहीं करना चाहती थी। आज के एक्सप्लेनर में इस केस की सभी बिखरी कड़ियां जोड़ेंगे, साथ ही जानेंगे कि सिया ने शादी से मना करने की जगह सीधे हत्या क्यों कर दी… पुणे पुलिस को घटना के अगले दिन, यानी 19 जून को 340 फीट गहरी खाई से केतन का शव मिला। लोनावला ग्रामीण पुलिस स्टेशन में एक्सीडेंटल डेथ की रिपोर्ट दर्ज की गई। 20 जून को केतन का अंतिम संस्कार हो गया, लेकिन आगे के घटनाक्रम में पुलिस को 4 बड़े सुराग मिले… पहला सुरागः सिया के हावभाव से केतन की बहन को शक हुआ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 21 जून को सिया केतन के घर पहुंची। केतन की बहन ने पूछा- केतन कैसे गिरा? इस सवाल पर सिया के हावभाव अचानक बदल गए। वो ठीक से जवाब नहीं दे पा रही थी। केतन की बहन को शक हुआ और उसने पिता विशाल अग्रवाल से कहा- भाई अच्छा ट्रेकर है, उसकी मौत एक्सीडेंट नहीं हो सकती। सिया ठीक से जवाब नहीं दे रही। विशाल को भी पहले से शक था कि कुछ तो ठीक नहीं है। इसके बाद विशाल दोबारा पुणे पुलिस से मिले और सिया पर शक जताया। उन्होंने ये भी कहा कि सिया किसी लड़के से बात करती है, उसकी भी जांच की जानी चाहिए। दूसरा सुरागः किले के CCTV फुटेज में गर्मी में हुडी पहने लड़का दिखा पुलिस ने लोहागढ़ किले के सीसीटीवी फुटेज निकाले। इनमें 18 जून के दिन वहां पहुंचे केतन और सिया के आसपास कई बार एक शख्स दिखा। गर्मी का मौसम, ऊपर से किले की चढ़ाई, उसके बावजूद किले की सीढ़ियों के फुटेज में दिखा कि वो हुडी पहने था। पुलिस के मुताबिक, लड़का अपना चेहरा छिपाने की कोशिश कर रहा था। तीसरा सुरागः सिया की एक नंबर पर 2000 से ज्यादा कॉल्स पुलिस ने सिया के कॉल-रिकॉर्ड खंगाले। इनमें एक मोबाइल नंबर पर जनवरी से केतन की हत्या वाले दिन सुबह 7 बजे तक सिया ने 2004 कॉल में करीब 338 घंटे की बातचीत की थी। यानी दोनों रोजाना करीब 11 कॉल्स में 2 घंटे बात करते थे। ये नंबर पुणे के ही एक और व्यापारी परिवार के लड़के चेतन चौधरी का था। चेतन का घर पुणे के उसी इलाके में था, जहां सिया के पिता का ऑफिस है। चौथा सुरागः हत्या वाले दिन चेतन का इंटरनेट पूरे दिन बंद पुलिस को शक था कि किले के CCTV फुटेज में हुडी वाला लड़का चेतन है। हालांकि 18 जून के दिन चेतन के फोन की लोकेशन निकाली गई, तो वो पुणे में उसके ऑफिस की मिली। चेतन के फोन रिकॉर्ड में पुलिस को एक और अजीब चीज मिली। 18 जून को उसके फोन पर कॉल्स तो आ रहे थे, लेकिन उसका इंटरनेट पूरे दिन बंद था। पुलिस पूछताछ के लिए चेतन के ऑफिस पहुंची, तो उसने कहा कि 18 जून को वो ऑफिस में ही था। हालांकि पूछताछ में ऑफिस के एक कमर्चारी ने बताया कि चेतन 18 जून को उसका फोन लेकर गया था। इस नंबर की लोकेशन खंगाली गई, तो पता चला 18 जून को कर्मचारी वाला फोन लोहागढ़ किले में ही था। इससे तस्वीर साफ होने लगी। 22 जून को पुलिस ने चेतन को गिरफ्तार कर लिया। अगले दिन सिया को भी गिरफ्तार कर लिया। पुलिस के मुताबिक, पूछताछ के बाद दोनों ने अपना जुर्म कबूल लिया। पुलिस और केतन के पिता विशाल अग्रवाल के मुताबिक, सिया ने 18 जून के पहले भी दो बार केतन को पहाड़ी पर ले जाकर उसकी हत्या करने का प्लान बनाया था। तीसरी बार में वो कामयाब हो गई। ये पूरी कहानी 11 फरवरी 2026 को केतन और सिया की सगाई के बाद शुरू हुई… 31 मई: सिया को केतन की हत्या का प्लान सूझा 5 जून: किले पर जाने की जिद की, केतन नहीं गया 14 जून: दूसरी कोशिश, धक्का दिया, लेकिन केतन बच गया 18 जून: तीसरी कोशिश में बॉयफ्रेंड के साथ मिलकर धक्का दे दिया पुलिस के मुताबिक, केतन की हत्या के पीछे सिया का मोटिव उससे शादी से बचना था। दरअसल, विशाल अग्रवाल की पुणे में ‘सक्सेस ग्रुप’ नाम से रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन कंपनी है। केतन ने 2023 में अमेरिका के बैबसन कॉलेज से एंटरप्रेन्योरियल स्टडीज में 'मास्टर ऑफ साइंस' किया। उसके बाद सक्सेस ग्रुप में डायरेक्टर के बतौर काम शुरू कर दिया। वहीं सिया कॉमर्स की स्टूडेंट है। पिता पुणे के बड़े मसाला कारोबारी हैं। सिया और केतन के पिता 35 साल से एक-दूसरे को जानते थे। इसलिए दोनों परिवारों ने केतन और सिया की शादी तय कर दी। 11 फरवरी को सगाई हुई और 25 नवंबर को जयपुर के एक पैलेस में 17 करोड़ रुपए के खर्च से दोनों की शादी होनी थी। दोनों परिवारों के पहुंचने के लिए 2 चार्टर्ड प्लेन भी बुक थे। इधर सिया 4 साल से चेतन के संपर्क में थी। चेतन के पिता बाबू लाल चौधरी भी पुणे के बड़े कारोबारी हैं। संदीप सिंह गिल के मुताबिक, दोनों के बीच एक साल से प्रेम संबंध था। इसलिए सिया केतन के साथ शादी से बचना चाहती थी। इसी पैटर्न पर पिछले दिनों 2 और हत्याएं भी हुईं... पार्टनर से पीछा छुड़ाने के लिए सीधे हत्या पर आमादा हो जाने का ये पैटर्न जितना सीधा दिखता है, उतना है नहीं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इसके पीछे 3 अहम साइकोलॉजिकल वजहें हैं… 1. कोई और आसान रास्ता न दिखना: दिल्ली के सर गंगाराम हॉस्पिटल की कंसल्टेंट साइकोलॉजिस्ट डॉ. रोमा कहती हैं कि समाज में समग्र रूप से आपराधिकता बढ़ रही है। युवा बिना परिणाम सोचे एक घातक प्लान बना लेते हैं। उन्हें लगता है कि यही अकेला और आसान रास्ता है। अपने तय टारगेट्स को पूरा करने के लिए वो सही-गलत सोचे बिना अपराध कर जाते हैं। क्राइम के समय वो खुद को सेफ करने का प्लान तो बनाते हैं, लेकिन ये नहीं सोचते कि वो दूसरे का भी बुरा कर रहे हैं। 2. पुराना और अनसुलझा ट्रॉमा: दिल्ली के मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट राशि सहाय के मुताबिक, ‘ऐसी हत्याएं अक्सर किसी पुराने अनसुलझे ट्रॉमा, यानी मानसिक आघात, किसी अधूरी भावनात्मक जरूरत के लिए या खुद की वैल्यू और पहचान न होने की सोच के चलते होती हैं। ये सोच अचानक नहीं, धीरे-धीरे पनपती है।’ 3. तुरंत सजा देने का इरादा: क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. कृति भार्गव के मुताबिक, लोगों को लगता है कि वे हत्या करके अपने दुश्मन को तुरंत सजा दे रहे हैं और इससे उन्हें तुरंत संतुष्टि मिल जाएगी। हिंसा से दूर रहने के लिए इमोशनल मैच्योरिटी की जरूरत होती है और ज्यादातर लोगों में ये नहीं होती। डॉ. कृति भार्गव के मुताबिक, ‘महिलाओं और पुरुषों में हत्या के मोटिव अलग हो सकते हैं। हमेशा नहीं लेकिन आमतौर पर पुरुष ताकत दिखाने, हक जताने या अपमान का बदला लेने के लिए हत्या करते हैं। वहीं महिलाएं खतरा महसूस होने पर, हताश होने पर या लंबे समय से अत्याचार सहने पर हत्याएं करती हैं।’ --------- ये खबर भी पढ़िए… CM विजय, गृहमंत्री शाह से मुलाकात, सैन्य कमांड का दौरा; ट्रम्प के दूत सर्जियो गोर आखिर भारत में कर क्या रहे हैं अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर 22 जून को तमिलनाडु के सीएम विजय थलापति से मिलने चेन्नई पहुंच गए। उससे 4 दिन पहले, 18 जून को गृहमंत्री अमित शाह से दिल्ली में मुलाकात की। 6 महीने में 6 मुख्यमंत्रियों से मिले। दिल्ली के उपराज्यपाल और राजस्थान की डिप्टी सीएम तक से मीटिंग की। भारतीय सेना के पश्चिमी कमान हेडक्वार्टर के दौरे पर तो हंगामा भी हुआ था। पूरी खबर पढ़िए…
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि वार्ता के दौरान ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम से संबंधित जांच के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनिश्चितकाल तक निरीक्षण की अनुमति देने पर सहमति जताई है। उनके अनुसार, यह समझौता क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
वीजा, मास्टरकार्ड, एप्पल पे और गूगल पे जैसे अमेरिकी पेमेंट सिस्टम को चुनौती देगा ईयू
वीजा, मास्टरकार्ड, एप्पल पे और गूगल पे, इन भुगतान प्रणालियों अमेरिकी टेक कंपनियां नियंत्रित करती हैं. यूरोपीय संघ, अपने डिजिटल यूरो से इस सिस्टम को चुनौती देने जा रहा है
यूएन महासचिव ने कहा, AI कंपनियां दें बिजली, पानी और जमीन का हिसाब
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेष ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंपनियों से अपने कार्बन उत्सर्जन से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करने की अपील की है
ट्रंप का दावा, ईरान ने परमाणु हथियार न बनाने पर दी सहमति
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान परमाणु हथियार न बनाने पर सहमत हो गया है

