ईरान जंग शुरू होने से एक दिन पहले, यानी 27 फरवरी को भारत में 10 ग्राम सोना 1.60 लाख रुपए का था। जंग खत्म होने के एक दिन बाद, यानी 19 जून को कीमत 1.45 लाख प्रति 10 ग्राम हो गई। यानी करीब 10% की गिरावट। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तो इस दौरान 20% गिरावट हुई। अब अमेरिकी बैंकिंग संस्थान जेपी मॉर्गन का अनुमान है कि 2026 के अंत तक सोने के दाम 40% तक बढ़ जाएंगे। आखिर ईरान जंग के दौरान सोने के दाम क्यों घटे? अब कीमत बढ़ने का अनुमान क्यों लगाया जा रहा? और अभी सोना खरीदना ठीक रहेगा या नहीं; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में... सवाल-1: ईरान जंग के दौरान सोने की कीमत क्यों घटी? जवाब: सोना सुरक्षित निवेश माना जाता है। जंग की सुगबुगाहट भी हो, तो निवेशक सोने का रुख करने लगते हैं। डिमांड बढ़ने से सोने की कीमतें भी बढ़ने लगती हैं। इस ट्रेंड से उलट ईरान जंग के दौरान सोने की कीमतें घटीं। इसकी 3 प्रमुख वजहें हैं… 1. डॉलर की मजबूती के चलते सोने की खरीद घटी 2. पहले से महंगा चल रहा सोना बेचकर प्रॉफिट बुकिंग 3. सोना महंगा होने से घरेलू डिमांड घटी सवाल-2: अगले 6 महीने में सोना कितना महंगा हो सकता है? जवाब: 19 जून को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में सोने के दाम 4,170 डॉलर प्रति औंस हैं। वित्तीय संस्थानों और बैंकों के मुताबिक, अगले 6 महीने में इसकी कीमतें 20% से 40% तक बढ़ने का अनुमान लगाया जा रहा है… जेपी मॉर्गन ग्लोबल रिसर्च: 6,000 डॉलर प्रति औंस। यानी 40% से ज्यादा महंगा होने का अनुमान। जर्मनी का डॉयचे बैंक: 6,000 डॉलर प्रति औंस। अमेरिका बेस्ड इन्वेस्टमेंट बैंक गोल्डमैन सैक्स: 5,400 डॉलर प्रति औंस। स्विस इन्वेस्टमेंट बैंक UBS: 5,500 डॉलर प्रति औंस। अमेरिका का सिटीबैंक: 5,000 डॉलर प्रति औंस। जेपी मॉर्गन ने ये भी कहा है कि 2027 के आखिर तक कीमत 6,300 डॉलर तक पहुंच सकती हैं। अगर सोना 20% बढ़ा, तो भारत में 10 ग्राम सोने की कीमत 1.74 लाख रुपए, 30% बढ़ा तो कीमत 1.88 लाख और अगर 40% बढ़ा तो कीमत 2.03 लाख पहुंच जाएगी। सवाल-3: सोने की कीमतें बढ़ने का अनुमान क्यों लगाया जा रहा? जवाब: सोने के दाम बढ़ने की सबसे बड़ी वजह है सेंट्रल बैंक की खरीदारी। दरअसल, 2022 में जब रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ, तो अमेरिका ने यूरोपीय दोस्तों के साथ मिलकर रूस के 300 बिलियन डॉलर के फॉरेन रिजर्व पर रोक लगा दी थी। माना जाने लगा कि अमेरिका अपनी करेंसी को हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकता है। इसके बाद से दुनियाभर के देशों में डॉलर के प्रति भरोसा कम होने लगा और वो अपना फॉरेन रिजर्व दूसरी करेंसी और खासकर सोने में जमा करने लगे। इस वजह से सोने की डिमांड बढ़ने लगी और कीमतें भी। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक, 2025-26 में दुनियाभर के केंद्रीय बैंकों ने कुल 900 टन से ज्यादा सोना खरीदा, जो ज्यादा खरीद का लगातार चौथा साल है। 2026 की पहली तिमाही में बैंकों ने कागज पर 16 टन खरीद दिखाई। जेपी मॉर्गन का मानना है कि असली खरीदारी कहीं ज्यादा हुई। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल 244 टन खरीद का डेटा दे रहा है। सोने की इस खरीद में सबसे आगे है चीन। ‘पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना’ फरवरी 2026 तक हर महीने 1 टन सोना खरीद रहा था। मार्च में उसने 5 टन और अप्रैल में 8 टन सोना खरीदा।’ अब ग्वाटेमाला, इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों के सेंट्रल बैंकों ने भी सोना खरीदना शुरू किया है। इसी वजह से जेपी मॉर्गन ने अनुमान लगाया कि अब सोने की कीमतें बढ़ेगी। इसके अलावा वो 4 फैक्टर अब भी मौजूद हैं, जो पिछले कुछ सालों से सोने की डिमांड बढ़ा रहे थे- सवाल-4: तो अभी सोना-चांदी खरीदना चाहिए या नहीं? जवाब: एक्सपर्ट्स मानते हैं कि अगले 1 से 3 महीने सोना खरीदने के लिए सही समय है। शेयर बाजार, गोल्ड और कमोडिटीज वगैरह से जुड़ी एनालिसिस देने वाली फर्म ‘केड़िया एडवाइजरी’ के डायरेक्टर अजय केड़िया कहते हैं, ‘अमेरिका के फेडरल रिजर्व ने 17 जून संकेत दिए गए कि आगे ब्याज दरें बढ़ सकती हैं। ऐसे में सोने के बजाय डॉलर और बॉन्ड्स में ज्यादा इन्वेस्टमेंट होता है। इसके चलते सोने के दाम अभी कुछ गिर सकते हैं। हालांकि लॉन्गटर्म में सोने के दाम बढ़ेंगे। अगर सोना खरीदना है, तो अब से एक से तीन महीने के बीच खरीदना ठीक रहेगा।’ HDFC सिक्योरिटीज के रिसर्च एनालिस्ट अनुज गुप्ता कहते हैं कि अभी सोने और चांदी दोनों के दाम घटेंगे। इसलिए फिलहाल कुछ महीने सोना इन्वेस्टमेंट के लिए बहुत अच्छा एसेट नहीं है। साल के आखिर तक सोने की इंटरनेशनल मार्केट में कीमत 5 हजार डॉलर प्रति औंस तक आ सकती है। इसलिए लॉन्ग टर्म के लिहाज से सोना खरीदा जा सकता है। सवाल-5: चांदी की कीमत पर क्या असर पड़ने वाला है? जवाब: 1 जनवरी 2025 को चांदी की कीमत 86,017 रुपए थी। जो भारत में तब का ऑल-टाइम हाई था। 2025 में चांदी सबसे ज्यादा 170% बढ़ी और 30 जनवरी 2026 को 3.39 लाख पर बंद हुई। हालांकि ईरान जंग के दौरान दाम गिरे और 18 जून को ये 2.40 लाख रुपए पर है। गहनों के अलावा चांदी का इंडस्ट्रियल यूज भी होता है। अमेरिकी NGO ‘सिल्वर इंस्टीट्यूट’ के मुताबिक, अगले एक साल में सोलर पैनल, EV, डेटा सेंटर और AI सेक्टर में चांदी की बढ़ती खपत से इसकी मांग और दाम बढ़ सकते हैं। डिस्क्लेमर: यह स्टोरी केवल एजुकेशनल उद्देश्यों से लिखी गई है। इन्वेस्टर्स को हमारी सलाह है कि निवेश से जुड़ा कोई भी फैसला लेने से पहले अपने स्तर पर विशेषज्ञों से परामर्श जरूर लें। *****रिसर्च सहयोग - प्रथमेश व्यास-----------------------------------------------------------ये खबर भी पढ़ें… भारत का रुपया एशिया में सबसे तेज गिर रहा:पाकिस्तानी रुपया मजबूत हुआ; आखिर सरकार से कहां चूक हो रही, टॉप एक्सपर्ट्स से समझिए डॉलर के मुकाबले भारत का रुपया एशिया में सबसे तेजी से गिर रहा है। पिछले 5 महीने में 6% से ज्यादा टूटा। जबकि इसी दौरान पाकिस्तानी रुपया 0.5% और चीनी युआन तो 3% मजबूत हो गया। पढ़ें पूरी खबर…
बांग्लादेश में खसरे जैसे लक्षणों से होने वाली मौतों का सिलसिला जारी है। पिछले 24 घंटों में 5 और बच्चों की मौत दर्ज की गई है।
ईरान के साथ हुए समझौते को लेकर अमेरिका में बहस तेज है, लेकिन जेडी वेंस लगातार इसके पक्ष में खुलकर सामने आ रहे हैं। वे टीवी इंटरव्यू, सार्वजनिक कार्यक्रमों और राजनीतिक मंचों पर इस समझौते का बचाव कर रहे हैं।
भारत और स्विट्जरलैंड के बीच वर्ष 2018 से ‘ऑटोमैटिक एक्सचेंज ऑफ इंफॉर्मेशन’ (एईओआई) व्यवस्था लागू है। इसके तहत दोनों देशों के बीच हर साल बैंक खातों से जुड़ी जरूरी वित्तीय जानकारी साझा की जाती है।
तखत पर एक लड़की करवट लिए लेटी है। बाल छोटे-छोटे। लंबाई बमुश्किल 3 फीट, लेकिन उम्र 29 बरस। इस लड़की ने आज तक आइसक्रीम नहीं खाई। जानते हैं क्यों? वो इसलिए कि अगर आइसक्रीम खाई तो सर्दी हो सकती है। सर्दी हुई तो खांसी आ सकती है और जरा भी जोर से खांसी तो इसकी पसलियां टूट जाएंगी। इस लड़की का हाथ भी कोई कसकर पकड़ ले तो हड्डी चटक जाती है। इसका नाम है गिरिजा। 29 साल की उम्र में इसी तरह 40 से ज्यादा बार हडि्डयां टूट चुकी हैं। हालत यह है गिरिजा के मम्मी-पापा पटि्टयां और प्लास्टर भी घर पर राशन की तरह रखते हैं। उसकी मां नंदा बाई जब भी प्रार्थना करती है, तो भगवान से अपनी बेटी गिरिजा की मौत मांगती हैं। कहती हैं, भगवान मेरी बेटी को मुझसे पहले ही उठा ले। दुर्लभ बीमारियों की सीरीज- ऐ जिंदगी में मैं नीरज झा पहुंचा हूं, गिरिजा से मिलने कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू। आज कहानी वहीं से… दोपहर के 12 बजे हैं। बेंगलुरू के तुंगा नगर इलाके का एक घर। एक महिला ने दरवाजा खोला। बड़ी-सी मैरून बिंदी लगाए, साड़ी पहने हुए है। नाम है- नंदा बाई। उम्र 60 साल। तखत पर लेटी गिरिजा की ओर इशारा करते हुए कहती हैं- ‘यह मेरी बेटी है। देखने में अजीब लग रही होगी, जैसे बिना हड्डी वाली रुई की गुड़िया। दरअसल, गिरिजा का सिर सामान्य से काफी बड़ा है। जबड़ा बाहर की तरफ निकला हुआ। रीढ़ की हड्डी अंग्रेजी के s अक्षर की तरह मुड़ी हुई है। छोटी-छोटी हथेलियां। मुड़े हुए पैर और पंजे भी छोटे–छोटे। छाती से पेट एकदम सटा है। तखत के किनारे रंगों की डिब्बियां रखी हैं। गिरिजा लेटे-लेटे ब्रश पकड़कर कैनवास पर उकेरे गए मोर के पंखों में रंग भर रही हैं। दिन के चौबीसों घंटे, साल के 365 दिन, गिरिजा इसी तरह तखत पर लेटी रहती है। न उठ सकती है, न बैठ सकती है। पीठ के बल लेट भी नहीं सकती। हल्का झटका लगने पर भी हड्डी कांच की तरह टूट जाती है। नंदा बताती हैं- ‘गिरिजा 6 महीने की थी। मैं इसे पलंग पर सुलाकर, किचन में खाना बनाने लगी। ये पलंग से नीचे गिर गई और जोर-जोर से रोने लगी। उसकी हालत देखकर मैं घबरा गई। बिना देर किए इसे उठाया और डॉक्टर के पास भागी। वहां पता चला कि शरीर में कई जगह फ्रैक्चर हैं। शुक्र है सिर बच गया, नहीं तो जान चली जाती। दो महीने तक इलाज चला। बेटी रात-रात भर सो नहीं पाती थी, सिर्फ कराहती रहती थी। उसके दर्द को देखकर कई बार आंसू निकल आते थे। जैसे-तैसे इसकी हडि्डयां जुड़ पाईं।’ ‘वक्त गुजरा, गिरिजा पांच साल की हुई। एक दिन ऑटो से उसे मंदिर ले जा रही थी। वो मेरी गोद में थी, तभी ड्राइवर ने अचानक ब्रेक लगाया। ब्रेक लगाते ही गिरिजा जोर-जोर से रोने लगी। मैं समझ चुकी थी कि इसकी हडि्डयां तड़क गईं। तुरंत अस्पताल भागी। एक्सरे कराया। पता चला हाथ-पैर, कमर और कूल्हे की हड्डियां टूट गई हैं। एक झटके में 4 जगह फ्रैक्चर हुआ। दो महीने तक इलाज चला।’ ‘एक साल पहले की बात है, गिरिजा सोई हुई थी। नींद में वो पीठ के बल लेट गई। अचानक हड्डी टूटी और वो जोर-जोर से चीखने लगी। तुरंत उसे पेनकिलर दी। डॉक्टर को घर बुलाया तो पता चला पसलियां टूट गईं। अब तो हडि्डयां टूटना, न उसके लिए नई बात है, न हमारे लिए।’ तभी गिरिजा तेज आवाज में बोल पड़ती हैं- ‘जैसे टूथपिक होती है न! जरा सा जोर देने पर टूट जाती है, बस वैसी ही मेरे शरीर की हड्डियां हैं।’ वह बताती है- 'इस बीमारी को 'ऑस्टियोजेनेसिस इम्परफेक्टा' यानी 'ब्रिटिल बोन डिजीज' कहते हैं। मैं इसके तीसरे स्टेज की पेशेंट हूं।’ यह कहते हुए आवाज में टीस तो है, लेकिन चेहरे पर कोई भाव नहीं। अमूमन यह खाना खाने का वक्त है, लेकिन गिरिजा कॉफी मांगती है। नंदा मुस्कुराते हुए कहती हैं-‘यह दिनभर बस कॉफी ही पीती है। इसका खाना-पीना सब, लेटे-लेटे ही होता है।’ यह कहते हुए नंदा रसोई में चली जाती हैं। कुछ पूछने से पहले ही गिरिजा मुस्कुराते हुए कहती हैं- ‘जब आपका फोन आया, तो मुझे मां को आवाज देनी पड़ी। मां किचन छोड़कर आपको लेने गईं, सोचिए मैं कितनी बेबस हूं। हर चीज के लिए दूसरों पर निर्भर हूं। मेरा भी तो मन करता है कि कोई मेहमान आए तो खुद उठकर उसका स्वागत करूं। इस उम्र में भी मां-बाप पर बोझ हूं। खाना-पीना, नहाना-धोना… सब कुछ उन्हें ही करना पड़ता है। लोग मुझे बच्ची समझते हैं। भले ही मेरा शरीर नहीं बढ़ा, लेकिन भावनाएं तो बड़ों जैसी ही हैं।’ गिरिजा भावुक होते हुए बताती है- ‘अभी कुछ ही दिन पहले की बात है, मां की तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गई थी। शुगर पेशेंट हैं। मैं यहीं पड़े-पड़े उन्हें तड़पते हुए देख रही थी। अफसोस होता है कि उठकर एक ग्लास पानी भी नहीं दे सकती।’ ‘मेरा वजन 30 किलो है। रोज मुझे उठाकर नहलाने-धुलाने, ब्रश कराने में वो थक जाती हैं। उनकी पीठ अकड़ जाती है। मां की उम्र भी हो चली है।’ इतने में रसोई से नंदा की आवाज आती है। वह कहती हैं- ‘मैं मानती ही नहीं कि मेरी बेटी 29 साल की है। मुझे तो आज भी 5-10 बरस की लगती है। इसलिए सब कर लेती हूं। जिस दिन ये सब सोचूंगी, तो शायद जीना ही छोड़ दूंगी।’ नंदा कहती हैं-‘जब इसके पीरियड्स आते हैं, तो मुझे ही पैड बदलने पड़ते हैं। बाहर भी जाती हूं, तो डायपर पहनाकर जाती हूं। मेरे न रहने पर, अगर इसे बाथरूम जाना हुआ, तो किससे कहेगी। ‘दूसरी लड़कियों की तरह होती, तो ब्याह कर अपने घर चली गई होती। पर इस हाल में इसे कौन ले जाएगा। मैंने तो इसके पैदा होने के बाद से ही दुनियादारी से नाता तोड़ लिया। न किसी रिश्तेदार के घर जाती हूं, न किसी शादी-ब्याह में शामिल होती हूं। जहां मेरी बच्ची नहीं जा सकती, वहां मैं जाकर क्या करूंगी। मन घबराता है, तो इसे मंदिर ले जाती हूं। पहले तो गोद में ही लेकर जाती थी, लेकिन अब ऑटो में सुलाकर ले जाती हूं। वजन बढ़ गया है ना। मंदिर में लोग इसे ऐसे घूरते हैं, जैसे किसी दूसरी दुनिया से आई हो। पूछने लगते हैं- यह चल नहीं सकती है क्या? ऐसी बेटी कैसे पैदा हो गई।’ ‘हर रोज भगवान से यही कहती हूं, मेरे मरने से पहले इसे उठा लेना। अगर मैं पहले मर गई, तो इसका क्या होगा।’ तभी गिरिजा बोल पड़ती है- ‘मां, हम दोनों साथ में मरेंगे। पहले मैं नहीं मरूंगी। मैं मर गई, फिर तुम कैसे रहोगी।’ यह सुनते ही नंदा बाई की आंखें डबडबा जाती हैं। तभी गिरिजा सख्त लहजे में बोल पड़ती है- ‘मैंने आपसे पहले ही कहा था न कि आप मेरी मां को रुलाएंगे नहीं। अगर वह रोएगी, तो आगे बात नहीं करेगी। रही बात लोगों की... तो वो मुझे इंसान नहीं, पिंजरे में बंद चिड़ियाघर का जानवर समझते हैं।’ अरे! अगर मेरा शरीर साथ देता, तो क्या मैं इस तखत पर पड़ी रहती… मुझे जानलेवा बीमारी है। मैं दूसरों से थोड़ी अलग हूं।’ गिरिजा अचानक उदास हो जाती है। अपने सिर को छूते हुए कहती है- ‘मां तो डर के मारे मुझे कभी किसी शादी या फंक्शन में भी नहीं ले जातीं। तैयार होने का भी मौका नहीं मिलता। मां की देखा-देखी माथे पर बिंदी लगा लेती हूं। कभी-कभार मेरा भी मन करता है, तो थोड़ा-बहुत सज-संवर लेती हूं। पर किसके लिए। इस बंद कमरे की दीवारों के लिए। बाहर की दुनिया कैसी दिखती है, वहां लोग कैसे रहते हैं, कैसी है वहां की रौनक... मुझे कुछ नहीं पता। मेरी दुनिया तो बस इस तखत पर ही खत्म हो जाती है।’ बोलते-बोलते गिरिजा की सांस फूलने लगती है। नंदा कहती हैं- ‘इसकी रीढ़ की हड्डी ‘S’ आकार में मुड़ चुकी है। इस वजह से इसका एक तरफ का फेफड़ा दबा ही रह गया, दूसरी तरफ का ज्यादा बढ़ गया। जिससे बार-बार सांस फूलने लगती है। इसी वजह से ये एक ही करवट लेटी रहती है। पीठ सीधी होने पर हड्डियां चटकने का खतरा बढ़ जाता है।’ ‘जब हड्डी टूटती है, ये दर्द से चीख पड़ती है। तुरंत पेनकिलर देती हूं, ताकि नींद आ सके। हमारे यहां हर वक्त प्लास्टर और पट्टियां स्टॉक में रखी रहती हैं। जाने कब कौन सी हड्डी टूट जाए।’ ‘कई बार स्कूल में इसका एडमिशन कराने की कोशिश की, लेकिन टीचर ने कह दिया, पूरे दिन कौन इसका ध्यान रखेगा। इसे घर पर ही पढ़ाइए। यहां बाकी बच्चे परेशान होंगे।’ नंदा बताती हैं- ‘मेरा एक बेटा भी है। वह 34 साल का है। एकदम ठीक है। जब बेटा शादी लायक हुआ तो रिश्तेदार ताने देने लगे कि जिसके घर में ऐसी अपाहिज लड़की हो, वहां कौन अपनी बेटी देगा। काफी मशक्कत के बाद उसकी शादी हो पाई। शादी के बाद मैंने खुद ही बेटे-बहू से कह दिया कि अलग रहो, अपनी दुनिया बसाओ। मेरी और गिरिजा की वजह से अपनी जिंदगी खराब मत करो।’ नंदा बाई कहती हैं- ‘मैंने इसके पापा से लव मैरिज की थी। 7 जुलाई 1996 को गिरिजा का जन्म हुआ। नॉर्मल डिलीवरी हुई। नर्स ने इसे जैसे ही मेरी गोद में रखा, मेरी नजर उसके पैरों पर पड़ी। छोटे-छोटे पैर पेट से चिपके हुए थे। बिल्कुल मेंढक की तरह।’ ‘बेंगलुरू में डॉक्टर को दिखाया, तो वो बोले- कुछ ही दिनों की मेहमान है, जल्दी मर जाएगी। इसे ऑस्टियोजेनेसिस इम्परफेक्टा नाम की हडि्डयों की बीमारी है। इसका कोई इलाज नहीं है। जब तक सांसें चल रही हैं, बस इसे पालो-पोसो।’ दिल्ली, मुंबई के डॉक्टरों को भी दिखाया, सबने एक ही बात कही कि कुछ नहीं हो सकता।’ ‘हम बार-बार डॉक्टरों से कहते कि कुछ तो इलाज होगा, लेकिन हर बार वो कुछ दवाइयां देकर घर भेज देते। मैं और मेरे पति, पिछले 20 साल से अलग-अलग सोते हैं। डॉक्टर ने कहा था- तीसरा बच्चा हुआ, तो वह भी ऐसा ही होगा।’ ‘पहले मैं और इसके पापा, दोनों कपड़े सिलते थे। इसके जन्म के बाद मैंने काम छोड़ दिया। मैं पेंटिंग और हर तरह का आर्ट बनाती थी। अब धीरे-धीरे यह भी सीख गई है। दिनभर बिस्तर पर लेटे-लेटे, सुई-धागा और कैंची से डेकोरेशन का सामान बनाती रहती है।’ नंदा बाई कहती हैं–‘इसके सिर में भी बहुत दर्द होता है। देखिए, सिर कितना बड़ा है। बैठ नहीं सकती है, क्योंकि रीढ़ की हड्डी सिर का वजन नहीं सह पाएगी। व्हीलचेयर पर भी ऐसे ही लिटाकर रखना पड़ता है।’ इसकी तकलीफ को देखते हुए डॉक्टरों ने भी कह दिया है कि बार-बार अस्पताल मत लाया करो। कोई भी दिक्कत हो, फोन करके बताओ, हम यहां से दवा बता देंगे। हर महीने इसके इलाज में 5 हजार रुपए लगते हैं। 8 हजार घर का किराया है। पति की कमाई बमुश्किल 20 हजार रुपए। कई बार सरकारी दफ्तरों में बेटी को लेकर गई, लेकिन कोई मदद नहीं मिली। व्हीलचेयर भी चेन्नई के एक दिव्यांग ने दी है। पेंशन के नाम पर 1400 रुपए मिलते हैं, लेकिन पिछले 3 महीने से वो भी नहीं मिले।’ गिरिजा की बेबसी को करीब से महसूस करने के बाद, मन में कई सवाल उठ रहे हैं। क्या किसी के करवट बदलते ही बदन की हड्डियां खिलौने की तरह टूट जाती हैं। इसी बीमारी को और गहराई से जानने के लिए हैदराबाद निकल पड़ता हूं। यहां निजाम इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के जेनेटिक्स डिपार्टमेंट की एचओडी डॉ. प्रजन्या रंगनाथ से मिला। वो कहती हैं- ‘गिरिजा दुर्लभ जेनेटिक बीमारी से जूझ रही है। मेडिकल की भाषा में इसे ऑस्टियोजेनेसिस इम्परफेक्टा या आम बोलचाल में कांच जैसी हड्डियों की बीमारी कहते हैं। इसे ऐसे समझिए- शरीर में COL1A1 (कोलेजन टाइप 1 अल्फा 1 चेन ) या COL1A2 (कोलेजन टाइप 1 अल्फा 2 चेन) जीन होता है। यह जीन हमारे शरीर में 'कोलेजन' नामक एक मुख्य प्रोटीन बनाता है। इससे हड्डियों में मजबूती और लचीलापन आता है। जब यह जीन गड़बड़ हो जाता है, तो हड्डियों में जरूरी मिनरल्स और प्रोटीन सही तरीके से नहीं बन पाते। नतीजा- हड्डियां भीतर से पूरी तरह खोखली और नाजुक हो जाती हैं। गिरिजा टाइप-3 पेशेंट है। इसमें हड्डियां बहुत ज्यादा टूटती हैं। शारीरिक बनावट बदल जाती है। बचपन में सही देखभाल मिले, संक्रमण से बचाया जाए और सांस की तकलीफ न हो, तो मरीज वयस्क होने तक जी सकते हैं। इसका कोई इलाज है? ‘इसका कोई स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन हड्डियों को मजबूत करने के लिए बिस्फॉस्फोनेट थेरेपी दी जाती है। यह थेरेपी हड्डियों को अंदर से खोखला होने और गलने से रोकती है। इसमें जोलेड्रोनिक एसिड जैसी दवाइयां ड्रिप के जरिए दी जाती हैं। हड्डियों को मुड़ने और टूटने से बचाने के लिए सर्जरी के जरिए उनमें धातु की रॉड डाली जाती है। साथ ही, सुरक्षित फिजियोथेरेपी से मांसपेशियों को सहारा दिया जाता है। लेकिन इसके बाद भी मरीज पूरी तरह ठीक नहीं हो पाता।’ ------------------------------------- ऐ जिंदगी सीरीज की यह खबर भी पड़ें… 1- 13 महीने की बेटी को 2 बार हार्ट अटैक, मौत:दूसरी बेटी को भी यही बीमारी, जिंदा रहने के लिए हर साल चाहिए 72 लाख रुपए 9 जनवरी 2022 की शाम। 13 महीने की आयरा अपने पिता राज की गोद में थी। वो उसे सुलाने की कोशिश कर रहे थे। अचानक उसे सांस लेने में दिक्कत होने लगी। राज उसकी पीठ थपथपाने लगे। आयरा का चेहरा एकदम लाल, आंखों में खून उतर आया। धीरे-धीरे शरीर छटपटाने लगा। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें… 2- 14 की उम्र में शरीर बना 'पेड़ की छाल’: उठो या बैठो फटने लगती है चमड़ी, मन करता है छीलकर फेंक दूं; देश का अकेला केस दोपहर के 1 बजे हैं। जंगल के ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर कार हिचकोले खा रही है। तेज गर्मी से गला लगातार सूख रहा है। करीब 2 घंटे बाद जंगलों में कुछ झोपड़ियां नजर आती हैं। इन्हीं झोपड़ियों में से एक के सामने हमारी कार रुकी। झोपड़ी के बाहर एक लड़की बेजान सी खड़ी नजर आई। उसकी मटमैली शर्ट और हाफ पैंट के बाहर जितना भी शरीर दिख रहा है, वह बेहद डरावना है। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें…
कॉकरोच जनता पार्टी कल, यानी 20 जून को दिल्ली के जंतर-मंतर पर फिर से प्रोटेस्ट करेगी। 6 जून को पहला प्रोटेस्ट भी यहीं किया था। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग के साथ पार्टी दिल्ली, महाराष्ट्र, यूपी, राजस्थान और पंजाब में प्रदर्शन कर चुकी है। पार्टी के प्रवक्ता विजेता दहिया के मुताबिक, स्टूडेंट अब भी सुसाइड कर रहे हैं, इसीलिए हम धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ 20 जून के बाद भी प्रदर्शन करते रहेंगे। हालांकि BJP के सोर्स बताते हैं कि केंद्र सरकार इसे बड़ा खतरा नहीं मान रही है क्योंकि अब तक प्रोटेस्ट में खास भीड़ नहीं जुटी है। विजेता दहिया से पूरी बातचीत… सवाल: अब तक मिले रिस्पॉन्स को पार्टी कैसे देख रही है?जवाब: दिल्ली, पुणे, लखनऊ, अमृतसर, बेंगलुरु, जयपुर और नागपुर में प्रोटेस्ट हो चुके हैं। हमें जनचेतना जगानी है कि यह देश आपका है। आपने राजा नहीं, बल्कि देश चलाने के लिए मैनेजर चुने हैं। अगर वे सही काम नहीं करेंगे, तो उनसे सवाल पूछे जाएंगे, इस्तीफा मांगा जाएगा, उन्हें आपके लिए काम करने पर मजबूर किया जाएगा। सवाल: क्या प्रोटेस्ट में उम्मीद के मुताबिक भीड़ आ रही है, इसे लेकर पार्टी के अंदर क्या बातें हो रही हैं?जवाब: संख्या लगातार बढ़ रही है। शुरुआत में लोगों को लग रहा था कि जंतर-मंतर पर कुछ हजार लोग ही आए, लेकिन हमारे फॉलोअर पूरे भारत में हैं। हम जिस शहर में जा रहे हैं, वहां हजारों लोग आ रहे हैं। दिल्ली वाले प्रोटेस्ट में भी लखनऊ, यमुनानगर और यहां तक कि कश्मीर से भी लोग आए थे। हम इसे लेकर बहुत फिक्रमंद नहीं हैं। सवाल: अभी आपका फोकस नीट पेपर लीक और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे पर है। अगर इस्तीफा नहीं होता है, तो आगे क्या करेंगे?जवाब: फिलहाल हमारा पूरा ध्यान इसी मुद्दे पर है। दो-तीन दिन पहले ही कुछ छात्रों ने आत्महत्या की है। 21 जून को फिर से एग्जाम है। मामला अभी सुलझा नहीं है। सरकार का रवैया देखिए कि वो पेपर लीक रोकने की बजाय टेलीग्राम बैन कर रही है। उन्हें यह समझ नहीं आ रहा कि टेलीग्राम नहीं होगा, तो लोग किसी और ऐप का इस्तेमाल कर लेंगे। अगर धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा देते हैं, तो लोगों को लगेगा कि सरकार में शर्म बाकी है। अगर वे इस्तीफा नहीं देंगे तो अपना ही राजनीतिक नुकसान करेंगे। सवाल: पार्टी के फैसलों में कितने लोग शामिल होते हैं, प्रोटेस्ट कहां और कब होगा, कैसे तय होता है?जवाब: हमारी कोई रजिस्टर्ड पार्टी या कॉरपोरेट स्ट्रक्चर नहीं है। यह एक इनफॉर्मल ग्रुप है। हम फॉर्मल मीटिंग नहीं करते। बस आपस में कॉल्स और चैट्स के जरिए बातचीत होती है। सब लोग सुझाव देते हैं और उसी आधार पर फैसले लिए जाते हैं। सवाल: सब कुछ अभिजीत दीपके तय करते हैं या सबकी सलाह ली जाती है?जवाब: विजन तो अभिजीत का ही है। लोकतंत्र देश चलाने की व्यवस्था है, लेकिन किसी मूवमेंट या संगठन में हर चीज के लिए आप वोटिंग नहीं करा सकते, जैसे कोई फिल्म मेकर हर सीन के लिए सबसे राय नहीं लेता। सवाल: अभी पार्टी के चुनाव लड़ने की बात तो नहीं है, लेकिन क्या संगठन का विस्तार हो रहा है?जवाब: यह सब इंटरनली चल ही रहा है। हम अलग-अलग शहरों में जा रहे हैं। लोग जुड़ रहे हैं। सवाल: आपके आंदोलन में महिलाएं या अल्पसंख्यक नहीं दिख रहे?जवाब: हम कोई दिखावा या टोकनिज्म नहीं करना चाहते। हमारा मूवमेंट ऑर्गेनिक तरीके से आगे बढ़ रहा है। बहुत सी महिलाएं स्टेट लेवल पर जुड़ रही हैं। कोऑर्डिनेटर या डिजाइनर के तौर पर काम कर रही हैं। हमारा मूवमेंट हर धर्म, जाति और जेंडर के लिए खुला है। धीरे-धीरे लोग जुड़ेंगे। हम जबरदस्ती किसी को सिर्फ दिखाने के लिए आगे नहीं लाना चाहते। सवाल: बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका में युवाओं के प्रोटेस्ट हुए। अपने आंदोलन को उससे कैसे जोड़कर देखते हैं?जवाब: मैं बिल्कुल नहीं चाहता कि नेपाल, श्रीलंका या बांग्लादेश में जो हुआ, वो भारत में हो। हमारा देश बुद्ध और गांधी का है। हम शांति, अहिंसा और संवैधानिक दायरे में रहकर सत्याग्रह करना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि लोग अपने अधिकारों के लिए लोकतांत्रिक तरीके से आवाज उठाएं, चाहे किसानों के लिए MSP हो, आदिवासियों के मुद्दे हों, शिक्षा हो या स्वास्थ्य। यह लोकतांत्रिक भावना लोगों के दिमाग में जानी चाहिए। सवाल: पेपर लीक के खिलाफ प्रोटेस्ट कर रहे NSUI और दूसरे संगठन आपके साथ आना चाहें, तो कोई प्लान है?जवाब: हमने पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में ही साफ कर दिया था कि कोई भी आम नागरिक हमारे साथ आ सकता है, चाहे वो विपक्षी पार्टी का हो या BJP का कार्यकर्ता हो। परीक्षाएं तो सबके बच्चे दे रहे हैं। शर्त यह है कि लोग अपनी पार्टी का झंडा छोड़कर सिर्फ तिरंगे के साथ आएं। सवाल: राजस्थान में अभिजीत को थप्पड़ मारा गया। ऐसी घटनाओं से कैसे निपट रहे हैं?जवाब: मैं युवाओं से यही कहूंगा कि इस तरह आतंकी बनना ठीक नहीं है। किसी को उसके विचारों की वजह से डराने की कोशिश करना आतंकवाद ही है। नाथूराम गोडसे का भी इसी तरह ब्रेनवाश हुआ था। आज भी वही साजिशें चल रही हैं। युवाओं के पास जेमिनाई, चैट जीपीटी और यूट्यूब जैसे साधन हैं। उन्हें वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी से बाहर निकलकर खुद रिसर्च करनी चाहिए। हम करोड़ों युवाओं के लिए आवाज उठा रहे हैं, लेकिन जब इंसान का पूरी तरह ब्रेनवाश हो जाता है, तो उसमें कॉमन सेंस नहीं बचती। उधर, BJP बोली- आंदोलन का असर सिर्फ इंटरनेट पर, इसलिए चिंता नहींकॉकरोच जनता पार्टी को BJP कैसे देख रही है, इस पर हमने पार्टी के एक सीनियर लीडर से बात की। वे अपनी पहचान उजागर नहीं करना चाहते। वे बताते हैं, ‘अब तक प्रोटेस्ट में कोई खास भीड़ नहीं जुट पाई है। 6 जून को जंतर-मंतर पर भी मुश्किल से 2 हजार लोग जुटे थे। प्रोटेस्ट को सामाजिक कार्यकर्ताओं से लेकर बाकी संगठनों का भी बहुत साथ नहीं मिला है।’ ‘सरकार को ये पता है कि इस प्रदर्शन से कोई खास नुकसान नहीं हो रहा। CJP का असर इंटरनेट तक रह गया। इसीलिए पार्टी कोई प्लान नहीं कर रही है। पार्टी को लगता है कि समय के साथ खुद ही प्रदर्शन हल्के हो जाएंगे।’ एक्सपर्ट ओपिनियन: ये प्रोटेस्ट बांग्लादेश या नेपाल जैसा नहींदिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर विजेंद्र सिंह चौहान मानते हैं कि कॉकरोच जनता पार्टी के प्रोटेस्ट की नेपाल और बांग्लादेश के आंदोलनों से तुलना नहीं की जा सकती। उनमें जरूरतों के हिसाब से वहां की विविधता को साथ लेकर चलने की क्षमता थी। CJP के आंदोलन में भारत की विविधता को साधने की क्षमता या महत्वाकांक्षा नजर नहीं आई है। कम भीड़ जुटने पर विजेंद्र कहते हैं, ‘इस आंदोलन को पुराने पैमानों से नापने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। आज के समय में जमीन पर कितने लोग आए हैं, यह किसी मूवमेंट को आंकने का उतना बड़ा पैमाना नहीं रह गया है।’ वे आगे कहते हैं, ‘यह आंदोलन मिडिल क्लास, अपर-मिडिल क्लास और जेन जी युवाओं की चिंताओं को सामने ला रहा है। युवाओं में जो हताशा और गुस्सा है, यह आंदोलन उसे जाहिर करने का काम जरूर कर रहा है, लेकिन पूरे भारत के युवाओं को साथ लेकर चलने की क्षमता इसमें अभी नहीं दिख रही है।’ …………………. ये खबर भी पढ़ेंजयपुर में अभिजीत दीपके को थप्पड़ मारे, बोले- RSS के लोगों ने हमला किया 15 जून को जयपुर में प्रदर्शन के दौरान कॉकरोच जनता पार्टी के फाउंडर अभिजीत दीपके को कुछ युवकों ने थप्पड़ मारे थे। अभिजीत ने आरोप लगाया कि हमले में RSS के लोगों का हाथ था। जब भी कोई सरकार या उसकी विचारधारा के खिलाफ बोलता है, तो ऐसा ही होता है। इसमें कुछ नया नहीं है। पढ़ें पूरी खबर…
ईरान-अमेरिका का झगड़ा थमा। ट्रंप ने चिल्लाकर दुनिया को बता दिया- ‘इट्स साइन्ड’, यानी ईरान से समझौता हो गया। तो क्या अब दुनिया भर में तेल की सप्लाई चोक किए बैठा ईरान, होर्मुज पूरी तरह खोल देगा? जहाजों की आवाजाही शुरू हो जाएगी? क्या भारत में पेट्रोल-डीजल कब तक सस्ता होगा? जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: होर्मुज स्ट्रेट खोलने पर अमेरिका-ईरान समझौते में क्या लिखा है?जवाब: अमेरिका और ईरान की 14 पॉइंट वाली डील में कहा गया है कि होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोला जाएगा। इसमें 3 जरूरी बातें कही गई हैं… दरअसल, 28 फरवरी को हमले के बाद ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट ब्लॉक कर दिया था। जहाजों की आवाजाही लगभग पूरी तरह बंद हो गई। ईरान की रजामंदी से कुछ शिप्स निकल रहे थे, लेकिन 13 अप्रैल से अमेरिकी नेवी ने दोहरी नाकेबंदी कर दी थी। सवाल-2: होर्मुज पूरी तरह खुलने में अड़चनें क्या हैं?जवाब: अमेरिका-ईरान की डील में भले होर्मुज तुरंत खोलने की बात है, लेकिन इसमें 4 बड़ी अड़चनें हैं… 1. बारूदी सुरंगें और तकनीकी रुकावटें डेनमार्क के जेस्के बैंक के सीनियर एनालिस्ट हैदर अंजुम कहते हैं, 'होर्मुज खुलने के बावजूद सबसे बड़ा खतरा माइंस का है। माइंस को साफ करके जहाजों के लिए एक सेफ गलियारा बनाने में करीब 2 महीने लग जाएंगे।' 2. सिर्फ 60 दिनों तक मुफ्त आवाजाही, फिर टोल ईरानी-अमेरिकी अर्थशास्त्री नादेर हबीबी कहते हैं, 'अमेरिका, ईरान को कोई फीस वसूलने की अनुमति नहीं देगा। जो जहाज ईरान को टोल देंगे, वो उन पर बैन लगा सकता है।' 3. जहाजों के बीमे के रेट्स अभी भी ज्यादा नादेर हबीबी कहते हैं कि इलाके में हमले बंद होने के बाद भी शिपिंग कंपनियों के लिए चुनौती है। समझौते के बाद भी प्रीमियम के रेट्स बहुत ज्यादा हैं, जो कई हफ्तों तक बने रह सकते हैं। इंश्योरेंस भी मुश्किल से हो रहा है। इससे जहाजों का कार्गो ले जाने का काम रुका रह सकता है। 4. ईरान-अमेरिका के हमले का डर हैदर अंजुम का कहना है कि सिर्फ राजनीतिक समझौता होने से स्थिति सामान्य नहीं हो जाएगी। जहाज मालिकों को जमीन पर सुरक्षा और स्थिरता दिखाई देनी चाहिए। जब तक कई महीनों तक कोई नई घटना या हमला नहीं होता, तब तक जहाज मालिक और बीमा कंपनियां यह नहीं मानेंगी कि खतरा वास्तव में कम हो गया है। आवाजाही सामान्य होने में 4 महीने से ज्यादा लग सकते हैं। सवाल-3: भारत में पेट्रोल-डीजल कब तक सस्ता हो जाएगा?जवाब: पेट्रोल-डीजल की कीमत इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल की कीमत से सीधे जुड़ी होती हैं। जंग शुरू होने से पहले कच्चे तेल की कीमत 72 डॉलर प्रति बैरल थी। ट्रम्प के समझौते के बाद वापस उतनी ही होती दिख रही हैं। हालांकि समझौता होने का मतलब ये नहीं है कि तेल की कीमतें तुरंत घट जाएंगी। ऐसे इसलिए कि जंग के शुरुआती दो महीने में कच्चे तेल के दाम बढ़ने के बावजूद सरकार ने पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढ़ाए। इससे तेल कंपनियों को रोजाना 1,000 करोड़ का नुकसान हुआ। फिर 15 से 25 मई के बीच देश में पेट्रोल-डीजल के दाम 7.5 रुपए प्रति लीटर तक बढ़े, फिर भी कंपनियों को रोजाना करीब 600 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। वेल्थ मैनेजमेंट कंपनी डिजर्व के को-फाउंडर वैभव पोरवाल के मुताबिक, ‘सरकार ने महंगे तेल का भार आम लोगों पर नहीं डाला था। अब तेल सस्ता होने पर भी सरकार तुरंत दाम कम न करके तेल कंपनियों को नुकसान की भरपाई करने देगी।’ आनंद राठी शेयर्स एंड स्टॉक ब्रोकर्स के डायरेक्टर थॉमस स्टीफन के मुताबिक, पेट्रोल डीजल की कीमत में गिरावट तब हो सकती है, जब कच्चा तेल करीब 65 डॉलर प्रति बैरल तक आ जाए और फिर इतना ही बना रहे। इसमें कुछ हफ्तों का समय लग सकता है। JNU में फॉरेन अफेयर्स के प्रोफेसर राजन कुमार कहते हैं, ‘तेल के दाम पहले जैसे होने में 6-9 महीने लग सकते हैं। बड़ी तेल कंपनियां पहले से तय कॉन्ट्रैक्ट पर तेल खरीदती-बेचती हैं। कई बार 6 महीने पहले ही तय हो जाता है कि कितना तेल किस कीमत पर खरीदना है।’ पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय में राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने भी कहा है कि कच्चा तेल सस्ता होने के तुरंत बाद पेट्रोल के दाम कम नहीं किए जा सकते। होर्मुज से सस्ता तेल भारत आने में समय लगेगा। सवाल-4: क्या होर्मुज दोबारा भी बंद हो सकता है? जवाब: एक सीनियर अमेरिकी ऑफिसर ने बताया कि अमेरिकी टीम ईरान के साथ समझौते को लेकर सचेत है। अगर ईरान जो वादे कर रहा है, वो सब करता है, तो ये एक जबरदस्त समझौता होगा। इसे आप आखिरी MoU भी कह सकते हैं, लेकिन जब तक कोई पूरा और बाध्यकारी एग्रीमेंट न हो जाए, तो कोई भी पक्ष किसी भी समय इससे पीछे हट सकता है। इससे होर्मुज को लेकर फिर तनाव पैदा हो सकता है। दरअसल, समझौता होने के बाद भी अभी 3 बड़े मुद्दे हैं, जिन पर 60 दिन के अंदर फैसला लिया जाना है…. ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम से जुड़े सवाल डील से दूर इजराइल अड़ंगा डाल सकता है ईरान को कब और कितना पैसा मिलेगा मीर खान कहते हैं कि समझौते में होर्मुज को फौरन खोलने की बात है, लेकिन ईरान इसको ओमान के साथ मिलकर अस्थायी तौर पर खोलने की बात कर रहा हैं। कागज पर तो ये शर्त मानी जा रही लगती है, लेकिन हकीकत में ये समझौता होर्मुज पर ईरान का कंट्रोल एक हद तक बरकरार रखता है। --- रिसर्च सहयोग- श्रेया नाकाड़े ---- अमेरिका-ईरान जंग की पूरी एनालिसिस पढ़ें.. ईरान के सामने ट्रम्प का ‘सरेंडर’:न सत्ता बदली, न परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह खत्म; 122 लाख करोड़ रुपए बर्बाद, आखिर जंग से मिला क्या 27 फरवरी 2026; ओमान के विदेश मंत्री अल-बुसैदी ने टीवी पर आकर कहा- ईरान अपना पूरा एनरिच्ड यूरेनियम खत्म करने को राजी है। अल-बुसैदी ही अमेरिका और ईरान के बीच न्यूक्लियर डील की मध्यस्थता कर रहे थे। वो बोले- अगर कूटनीति को थोड़ी और जगह दें, तो समझौता हमारी पहुंच में है। आगे पढ़ें..
वाशिंगटन, 18 जून (आईएएनएस)। अमेरिका और ईरान के बीच महीनों से चल रहे संघर्ष और तनाव को खत्म करने के लिए गुरुवार को समझौते पर हस्ताक्षर किया गया। इस समझौते का मकसद दोनों पक्षों के बीच सीजफायर को बढ़ाना और होर्मुज स्ट्रेट से शिपिंग ट्रांजिट फिर से शुरू करना है।
27 फरवरी 2026; ओमान के विदेश मंत्री अल-बुसैदी ने टीवी पर आकर कहा- ईरान अपना पूरा एनरिच्ड यूरेनियम खत्म करने को राजी है। अल-बुसैदी ही अमेरिका और ईरान के बीच न्यूक्लियर डील की मध्यस्थता कर रहे थे। वो बोले- अगर कूटनीति को थोड़ी और जगह दें, तो समझौता हमारी पहुंच में है। लेकिन उसी रात Mar-a-Lago में ट्रम्प का फोन बजा। दूसरी तरफ इजराइली पीएम नेतन्याहू थे। रॉयटर्स ने 3 सूत्रों के हवाले से लिखा- नेतन्याहू के पास ईरानी सुप्रीम लीडर खामेनेई के घर पर मीटिंग का एक मजबूत खुफिया इनपुट था। नेतन्याहू ने कहा- खामेनेई समेत ईरानी लीडरशिप को एक झटके में खत्म करते ही ईरानी जनता खुद 1979 की इस्लामिक सत्ता को उखाड़ फेंकेगी। हमारे लिए ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम, मिसाइल प्रोग्राम और उसके प्रॉक्सीज को खत्म करने का यही मौका है। ट्रम्प राजी हो गए। 28 फरवरी की सुबह ईरान पर बम गिरने लगे। अब 110 दिनों बाद 18 जून को ट्रम्प ने जंग खत्म करने के दस्तावेजों पर दस्तखत कर दिए हैं। अमेरिका के लिए ये डील उससे भी बुरी है, जो जंग शुरू होने के एक दिन पहले उसकी मेज पर थी। इस बीच दुनिया को लाखों करोड़ रुपए की चपत लग गई और 7 हजार से ज्यादा जानें गईं। ट्रम्प ने ईरान जंग के 4 घोषित लक्ष्य बताए थे… 1. ईरान में इस्लामिक सत्ता उखाड़ फेंकना अमेरिका-इजराइल ने अपने पहले ही हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई को मार दिया। उसी दिन ट्रम्प ने कहा- ‘ईरान के महान लोगों, आपकी आजादी का समय आ गया है... जब हम अपना काम पूरा कर लेंगे, तो अपनी सरकार पर कब्जा कर लीजिए।’ लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उल्टा सुप्रीम लीडर की मौत के बाद ईरान के लोग एकजुट हो गए। खामेनेई के बेटे मुजतबा को नया सुप्रीम लीडर बना दिया। इसलिए ईरान अब भी धार्मिक शासन वाला अमेरिका-विरोधी देश बना हुआ है। यानी ट्रम्प का पहला ऑब्जेक्टिव फेल। 2. ईरान का परमाणु कार्यक्रम खत्म करना ट्रम्प ने कहा था, 'अमेरिका की नीति रही है कि इस आतंकवादी रिजीम के पास कोई परमाणु हथियार न हो।' अमेरिका चाहता था कि ईरान अपना न्यूक्लियर प्रोग्राम पूरी तरह बंद कर दे और उसके पास जितना संवर्धित यूरेनियम है, अमेरिका को सौंप दे। ट्रम्प से डील में ईरान ने कहा है कि वह कभी परमाणु हथियार न तो बनाएगा और न ही खरीदेगा। हालांकि यह कोई नई बात नहीं है। ईरान ने पहली बार 1970 में परमाणु अप्रसार संधि (NPT) पर हस्ताक्षर करते समय यही वादा किया था। 2015 में अमेरिका के ओबामा शासन से हुए परमाणु समझौते में भी उसने यही वादा दोहराया था। ट्रम्प के समझौते में ईरान से कहा गया है कि वह अपने पास मौजूद लगभग 11 टन संवर्धित परमाणु सामग्री को ‘डाउन-ब्लेंड’ करे। यानी उसे कम शक्तिशाली बनाए। इसमें करीब 970 पाउंड ऐसा यूरेनियम भी शामिल है, जिसे 60% तक संवर्धित किया जा चुका है। यह परमाणु बम बनाने के स्तर के काफी करीब है। ट्रम्प की डील ईरान को यह संवर्धित यूरेनियम देश से बाहर भेजने या पूरी तरह छोड़ने के लिए मजबूर नहीं करती। हालांकि 2015 के समझौते में उसने अपने लगभग 97% परमाणु भंडार को रूस भेज दिया था। इस वजह से कई सवाल अभी भी अगले दौर की बातचीत के लिए बचे हैं। जैसे-• क्या ईरान यह परमाणु सामग्री अपने पास रख सकेगा?• क्या उसे अपने प्रमुख परमाणु संयंत्र बंद करने होंगे?• क्या उसे नए परमाणु ईंधन को संवर्धित करने की अनुमति होगी? समझौते में ‘ईरान की परमाणु जरूरतों’ का जिक्र है। मसलन- बिजली उत्पादन और ऊर्जा जरूरतों के लिए। यही वह रास्ता है जिससे ईरान भविष्य में अपनी परमाणु क्षमता को पूरी तरह खत्म होने से बचाए रखना चाहता है। यानी ट्रम्प का ये ऑब्जेक्टिव भी पूरी तरह सफल नहीं हुआ। 3. ईरान के प्रॉक्सी संगठनों को खत्म करना इजराइल और अमेरिका लेबनान में हिजबुल्ला, यमन में हूती और फिलिस्तीन में हमास जैसे ईरान के प्रॉक्सी संगठनों को खत्म करना चाहते थे। ईरान-अमेरिका जंग में सबसे ज्यादा मौतें लेबनान में हुई है। इजराइल ने दक्षिण लेबनान में करीब 2,000 वर्ग किमी की जमीन पर कब्जा कर लिया है। इससे हिजबुल्ला काफी कमजोर हो गया, लेकिन खत्म नहीं हुआ। उसके पास अभी भी हथियार, जमीनी नेटवर्क है और शिया मुसलमानों का समर्थन है। ट्रम्प से समझौते में भी लेबनान का तीन बार जिक्र है और कहा गया है कि वहां भी कोई मिलिट्री ऑपरेशन नहीं होगा। ऐसे ही यमन में हूती अब भी सक्रिय हैं। हमास कमजोर हुआ है, पर खत्म नहीं। यानी ट्रम्प और नेतन्याहू का ये ऑब्जेक्टिव भी पूरा नहीं हुआ। 4. ईरान का बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम खत्म करना ट्रम्प ने हमले की वजह बताते हुए कहा था, ‘ईरान के पास हमारे मिलिट्री बेसेस और यूरोप तक पहुंचने वाली मिसाइलें हैं। जल्द ही वो अमेरिका तक पहुंचने वाली मिसाइलें भी बना लेंगे।’ अमेरिका-इजराइल ने ईरान के प्रमुख मिसाइल कॉम्प्लेक्स को निशाना बनाया। जैसे- तेहरान के पास खोजिर मिसाइल कॉम्प्लेक्स, शाहरूद मिसाइल फैसिलिटी, पर्चिन सैन्य परिसर, हकीमीयेह मिसाइल सेंटर जैसे कई ठिकानों पर हमले कर भारी नुकसान किया। 50 से ज्यादा मिलिट्री बेस को निशाना बनाया, ताकी मिसाइल लॉन्च करने की क्षमता खत्म की जा सके। लेकिन 7 जून को इजराइल पर बैलेस्टिक मिसाइल हमले से साफ हो गया कि ईरान की क्षमता खत्म नहीं हुई है। सैटेलाइट तस्वीरों से पता चलता है कि ईरान ने कई ठिकानों पर बैलिस्टिक मिसाइल फैसिलिटी को हुआ नुकसान सुधारना भी शुरू कर दिया है। समझौते में मिसाइल प्रोग्राम का जिक्र तक नहीं है, यानी ये ऑब्जेक्टिव भी पूरा नहीं हुआ। होर्मुज स्ट्रेट खुलने को ट्रम्प बड़ी उपलब्धि बता रहे हैं, जो जंग के पहले खुला ही हुआ था। डील में एक प्रावधान है कि अब ईरान-ओमान के साथ मिलकर होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों से ‘फीस’ वसूल सकता है। इसके अलावा डील में ईरान को हर्जाने के तौर पर 28 लाख करोड़ रुपए दिए जाने का भी प्रावधान है। ईरान: 307 अस्पतालों समेत 1.22 लाख इमारतें ढही इजराइल और खाड़ी देशों ने भी जंग की भारी कीमत चुकाई है… ग्लोबल इकोनॉमी को 122 लाख रुपए का नुकसान इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक एंड पीस यानी IEP के मुताबिक अमेरिका-ईरान जंग से ग्लोबल GDP को 1.3 ट्रिलियन डॉलर, यानी करीब 122 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हो सकता है। ये ग्लोबल GDP का 0.6% है। पहली नजर में यह नुकसान उतना बड़ा नहीं लगता। क्योंकि 2020में कोरोना के दौरान भी ग्लोबल GDP 3.1% सिकुड़ गई थी। हालांकि कोरोना का असर पुरानी दुनिया पर पड़ा था। ईरान जंग की सबसे बड़ी मार कुछ चुनिंदा देशों और उन लोगों पर पड़ेगी, जिनकी आय पहले से कम है और जो ऐसे झटकों को झेलने की स्थिति में नहीं हैं। ऑर्गनाइजेशन ऑफ इकोनॉमिक कॉपरेशन एंड डेवलपमेंट के मुताबिक, 2025 में ग्लोबल इकोनॉमिक ग्रोथ 3.4% थी, जो 2026 में घटकर 2.8% ही रह जाएगी। ईरान जंग से भारत पर 6 बड़े असर पड़े… 1. क्रूड ऑयल महंगा होने से इम्पोर्ट बिल बढ़ा: जंग शुरू होने से पहले कच्चे तेल की कीमत 72 डॉलर प्रति बैरेल थी। होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंची। इससे मार्च में भारत का इम्पोर्ट बिल 15.22% बढ़ गया। भारत में पेट्रोल-डीजल 7.5 रुपए, घरेलू गैस की कीमत 89 रुपए और कमर्शियल गैस 1,350 रुपए महंगा हुआ। 2. विदेशी मुद्रा भंडार घटा, रुपया कमजोरः जंग शुरू होने से पहले भारत का फॉरेन रिजर्व 7.28 लाख डॉलर था, जो जून की शुरुआत में घटकर 6.82 लाख डॉलर रह गया है। फरवरी में 1 डॉलर की कीमत करीब 90 रुपए थी। मई में यह 96.8 के ऑल टाइम हाई पर पहुंच गई। अभी यह 94.5 है। 3. GDP की रफ्तार धीमी हुईः 2025 में जहां GDP 7% बढ़ी थी, 2026 में इसके 6.6% रहने का अनुमान है। 4. थोक महंगाई 43 महीने में सबसे ज्यादाः फरवरी 2026 में भारत में खुदरा महंगाई दर 3.21% थी, जो मई में बढ़कर 3.93% तक पहुंच गई है। थोक महंगाई दर फरवरी में 2.28% से मई में 9.68% पर पहुंच गई है, जो साढ़े तीन साल में सबसे ज्यादा 5. उर्वरकों के उत्पादन में गिरावट: भारत खाड़ी देशों से करीब 40% यूरिया और 60% LNG इम्पोर्ट करता है। फर्टिलाइजर बनाने के लिए यह दोनों जरूरी हैं। इनकी सप्लाई प्रभावित होने से मार्च 2025 की तुलना में मार्च 2026 में फर्टिलाइजर प्रोडक्शन 24.6% गिर गया। 2.5 मिलियन टन प्रति माह रहने वाला घरेलू यूरिया का प्रोडक्शन मार्च 2026 में करीब 1.5 मिलियन टन रह गया, यानी की 40% गिरावट। 6. भारतीय मारे गए, डिप्लोमेटिक नुकसानः ईरान और अमेरिका में सीजफायर कराने में पाकिस्तान, कतर, ओमान जैसे देशों मध्यस्थ की भूमिका निभाई। ईरान रूस और चीन से लगातार संपर्क में रहा। इस पूरे शांति समझौते में भारत की भूमिका कहीं नहीं दिखी। अमेरिका ने भारत के बैकयार्ड में ईरानी जहाज IRIS देना को डुबा दिया। 8 से 11 जून के बीच अमेरिका ने ओमान की खाड़ी में भारतीय क्रू वाले 3 जहाजों पर हमला किया। इसमें 3 भारतीय नाविकों की मौत हो गई। **** ये खबर भी पढ़िए… अमेरिका ने ईरान जंग में हर मिनट ₹6 करोड़ लुटाए:क्या 28 लाख करोड़ हर्जाना और देना पड़ेगा; आखिर ट्रम्प को कितनी महंगी पड़ी ये जंग अमेरिका को ईरान जंग का हर सेकेंड 10 लाख रुपए का पड़ा। रोजाना करीब 9,400 करोड़ रुपए। 107 दिन बाद जंग खत्म करके भी मुसीबत नहीं टली है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान को हर्जाने के तौर पर 28 लाख करोड़ रुपए और देने पड़ सकते हैं। पूरी खबर पढ़िए…
ईरान समझौते पर अमेरिका में सियासी बवाल, ट्रंप को अपनी ही पार्टी में झेलना पड़ रहा विरोध
समझौते की सबसे चर्चित शर्तों में ईरान के लिए 300 अरब डॉलर के संभावित पुनर्निर्माण फंड का प्रावधान शामिल बताया जा रहा है। इसके अलावा ईरान को तेल निर्यात की अनुमति, प्रतिबंधों में ढील और भविष्य में जमे हुए फंड जारी करने की संभावना ने भी आलोचना को जन्म दिया है।
जर्मनी की एयरोस्पेस इंडस्ट्री में युवा बना सकते हैं करियर
बर्लिन में एयरोस्पेस शो ‘आईएलए बर्लिन’ में देश-विदेश से आई कंपनियों ने हाई-टेक ड्रोन और मिसाइलों की नुमाइश की. इस शो की खास बात यह भी रही कि यहां युवाओं के लिए रोजगार के कई मौके दिखे
ईरान युद्ध के लक्ष्यों में डॉनल्ड ट्रंप को क्या हासिल हुआ
ईरान में प्रदर्शन कर रहे लोगों का उत्साह बढ़ाते डॉनल्ड ट्रंप ने ईरान पर हमले के कुछ लक्ष्य तय किए थे. शुरुआती समझौता हो जाने के बाद सवाल पूछे जा रहे हैं कि उन लक्ष्यों में से कितना कुछ हासिल हुआ
ईरान समझौते को ट्रंप ने बताया ऐतिहासिक सफलता, बोले- पीएम मोदी ने भी किया स्वागत
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ हुए समझौते को एक ऐतिहासिक सफलता बताया। उन्होंने कहा कि इस समझौते से मौजूदा संघर्ष खत्म हो गया है, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फिर से खुल गया है और यह सुनिश्चित हो गया है कि ईरान कभी परमाणु हथियार हासिल नहीं कर पाएगा।
भारत पर हमला हुआ तो अमेरिका साथ खड़ा होगा: ट्रंप
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अगर भारत पर कभी हमला होता है तो अमेरिका उसकी मदद करेगा। भारत और अमेरिका एक व्यापार समझौते के काफी करीब पहुंच चुके हैं।
एकबार मैं ऑडिशन के लिए गई थी। वहां मुझे ट्रायल के लिए एक बिकिनी दी गई। 10-15 मर्दों के सामने जैसे ही बिकिनी पहनकर बाहर आई, तो सब हंसने लगे। कहने लगे- 'अरे मैडम, ये सब आपके लिए नहीं है। आप तो एकदम फ्लैट हैं।' वहां बैठे दूसरे शख्स ने कहा कि- ‘ऑडिशन के लिए आने से पहले अपना फिगर देखा नहीं था। पहले अपना फिगर ठीक कराइए, फिर आइएगा।’ ये सब सुनते ही मुझे ऐसा लगा कि मानो ऑडिशन नहीं, तमाशा चल रहा हो। मुंबई आने के बाद मायरा खन्ना एक साल तक ये ताने सुनती रहीं। कास्टिंग एजेंट, फोटोग्राफर, कोऑर्डिनेटर और ऑडिशन लेने वाले लोग उन्हें ये कहकर रिजेक्ट कर देते कि- आप तो फ्लैट हैं। आखिरकार उन्हें कर्ज लेकर 'ब्रेस्ट इम्प्लांट' करवाना पड़ा। आज भी उसकी ईएमआई भर रही हैं। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। अब वही लोग कहने लगे हैं कि- 'नकली शरीर बनवा लिया है।’ ब्लैकबोर्ड में मैं मनीषा भल्ला इस बार लाई हूं मायरा खन्ना की कहानी, जिन्हें बॉडी शेप की वजह से एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में काम मिलना मुश्किल हो गया। तानों से परेशान होकर उन्होंने ब्रेस्ट इम्प्लांट करवाया… चिलचिलाती धूप और उमस के बीच मैं मुंबई के वर्सोवा की गलियों में हूं। इन्हीं गलियों में किसी एक मकान में मायरा खन्ना रहती हैं। भटकते-भटकते एक छोटी-सी दुकान के सामने पहुंची। मायरा ने यहीं इंतजार करने को कहा है। पास में मछली बाजार है। मछलियों की तेज गंध और समुद्र से आती गर्म हवाओं के बीच खड़े रहना आसान नहीं है। कुछ देर बाद मायरा आईं और मुझे अपने घर लेकर चल पड़ीं। मायरा का घर एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के स्ट्रगलिंग एक्टर की तरह है। कमरे में सिर्फ दो कुर्सियां और एक कोने में दीवान रखा है। दीवारों पर सादे सा रंग। न कोई फैंसी वॉलपेपर और न ही कोई सजावट का सामान। यहां तक की घड़ी भी नहीं है। कोने में छोटा-सा मंदिर है, जिसमें भगवान गणेश की मूर्ति रखी है। मैंने मायरा के सामने जैसे ही ब्रेस्ट इंप्लांट का नाम लिया वो फौरन बोल पड़ीं- नहीं करवाती तो क्या करती मैडम। साल भर से काम के लिए दफ्तरों के चक्कर काटकर, ऑडिशन देकर थक चुकी थी। हर जगह बस एक जवाब मिलता- ‘सॉरी, यू आर फ्लैट! आप इस रोल के लिए फिट नहीं हैं।’ मायरा बताती हैं- मैं गुड़गांव में मिस नॉर्थ इंडिया चुनी गई थी। इसके बाद, दोस्तों ने मॉडलिंग में किस्मत आजमाने को कहा। काफी कोशिशों के बाद, गुड़गांव में मुझे मॉडलिंग के छोटे-मोटे मौके मिले। इस इंडस्ट्री में पैर जमाने के लिए मुंबई जाना जरूरी था, सो एक दिन टिकट कटाकर मैं आ गई। हालांकि, यहां रहना आसान नहीं है। शुरुआती दिनों में घर से पैसे मंगवाने पड़े। तब भी पैसे कम पड़ने लगे, तो टेलीकॉलर की नौकरी की। धीरे-धीरे जूनियर आर्टिस्ट के रूप में मौका मिलना शुरू हुआ और यही मेरी पहचान बनने लगा। हालांकि, ये वो काम नहीं था, जिसकी तलाश में मुंबई आई थी। इस काम के नाम पर मैं केवल भीड़ का हिस्सा बनकर रह जाती थी। कभी भीड़ के साथ नारे लगाने का रोल, कभी रेस्तरां में हीरो-हीरोइन के पीछे बैठी बैकग्राउंड ऑडियंस का रोल। कई बार तो किसी फिल्मी सीन में ऑफिस का स्टाफ भी बन जाती थी। इस काम के बदले 700 से 1000 रुपए ही मिलते थे। महीने के हिसाब से देखें तो 30 हजार रुपए। मुंबई जैसे महंगे शहर में इतने पैसों से जिंदगी काटना आसान नहीं था। उसपर भी ये काम रोज नहीं मिलता था। इस तरह के काम से मेरी अपनी कोई पहचान नहीं बन पा रही थी। मैं बड़े बैनर्स के साथ काम करना चाहती थी, वेबसीरीज करना चाहती थी। उसके लिए कई कास्टिंग एजेंट्स, प्रोड्यूसर्स और डायरेक्टर्स के दफ्तरों के चक्कर काटे। आखिरकार मशहूर टीवी शो 'साथ निभाना साथिया' में एक छोटा रोल मिला। तब लगा कि शायद अब राह आसान हो जाएगी। हालांकि ऐसा हुआ नहीं। इसके बाद भी जब किसी प्रोड्यूसर्स से मिलने जाती तो एक्टिंग से ज्यादा मेरे जिस्म पर बात करते। सीधे तौर पर तो नहीं, लेकिन इशारों-इशारों में अक्सर कहते- 'आगे बढ़ना है, तो शरीर ठीक कर लीजिए।’ यहां 'ठीक' करने का मतलब था कि शरीर का पूरा पैकेज इस इंडस्ट्री के स्टैंडर्ड के मुताबिक बनाना। कमर, हिप्स और सबसे जरूरी ब्रेस्ट, एकदं परफेक्ट रखना। मॉडलिंग और एक्टिंग की दुनिया में इसे 'आवरग्लास बॉडी शेप' कहते हैं। यह बताते हुए मायरा अचानक चुप हो जाती हैं। फिर घबराकर पूछती हैं- 'मैडम, आप स्टोरी में मेरा चेहरा तो नहीं दिखाएंगी ना?’ मैंने फौरन जवाब दिया- ‘नहीं, बिल्कुल नहीं। आपकी पहचान किसी हालत में जाहिर नहीं होगी।’ उसके बाद मायरा आगे बताना शुरू करती हैं- इस तरह जहां भी काम मांगने जाती, वहां एक ही बात सुनने को मिलती- ‘मैडम, बड़े काम के लिए आवरग्लास बॉडी शेप बनाना होगा।’ ये सब कहने की बात नहीं है, सुंदरता के तय पैमानों के हिसाब से ही महिलाओं को तवज्जो दी जाती है। यही वजह है कि एक के बाद एक कई प्रोजेक्ट मेरे हाथ से निकलते गए। जब भी कोई ऑफर आता तो अपना एक प्रोफाइल कास्टिंग एजेंट्स को भेजना पड़ता है। इसमें नाम, उम्र और बॉडी मेजरमेंट्स सब लिखना जरूरी होता है। मुझे तो प्रोफाइल देखकर ही रिजेक्ट कर देते थे, क्योंकि मेरा बॉडी शेप उनके तय पैमानों में फिट नहीं बैठता था। खासकर ब्रेस्ट… परखा जाता है कि शरीर पर कोई दाग-धब्बा या स्ट्रेच मार्क तो नहीं है। शरीर पूरी तरह टोंड होना चाहिए। फ्रंट, बैक और साइड, हर एंगल से फिटनेस देखी जाती है। एक्स्ट्रा चर्बी, सैल्यूलाइट या डबल चिन जैसी मामूली चीजों के लिए भी कोई जगह नहीं होती। मायरा अफसोस जाहिर करते हुए कहती हैं- शरीर के दूसरे हिस्सों को वर्कआउट और डाइट की मदद से टोंड किया जा सकता है, लेकिन ब्रेस्ट के लिए कोई वर्कआउट नहीं है। इसके लिए ब्रेस्ट इम्प्लांट ही एकमात्र जरिया है। एकबार मैंने मैगजीन के लिए बिकिनी शूट में किस्मत आजमाने की सोची, लेकिन उसके लिए तो सबसे पहले बॉडी शेप देखा जाता है। लुक टेस्ट होता है। जिसमें कैमरा और मेकर्स की नजरें शरीर के एक-एक हिस्से को बेहद बारीकी से खंगालती हैं। कुछ ऑडिशन और फिटिंग सेशन में तो असहज करने वाले फिजिकल टेस्ट भी किए गए। लोग पूरी बॉडी को छूकर चेक करते हैं कि फिगर परफेक्ट है या नहीं। ऐसे ही एक दूसरे ऑडिशन की बात बताती हूं। वहां मुझे एक कमरे के बीचोबीच खड़ा कर दिया गया। सामने तीन लोग बैठे थे। उनमें से एक ने मेरी प्रोफाइल शीट देखी और फिर मेरी तरफ देखकर कहा- 'यहां तो साइज 28 लिखा है?' दूसरे ने हंसते हुए कहा- ‘जरा कन्फर्म कर लो, कहीं मेजरमेंट गलत न लिख दिया हो।’ इसके बाद, एक महिला स्टाफ मुझे साइड में ले गईं और मेरी फिटिंग चेक करने लगी। कुछ मिनट बाद उन्होंने कहा- 'यह रोल शायद आपके लिए नहीं है।' ब्रेस्ट छूकर कहा- ‘आप हमारे स्टैंडर्ड को पूरा नहीं करतीं’ सबसे ज्यादा दुख तब हुआ, जब दुबई की एक मैगजीन के लिए मिलने वाला बिकिनी शूट मेरे हाथ से निकल गया। वहां ऐसे शूट के अच्छे पैसे मिलते हैं। वहां मेरा बेहद निजी और असहज करने वाला शारीरिक टेस्ट किया गया। एक शख्स ने मुझे गलत तरीके से छूते हुए कहा- ‘आप हमारे स्टैंडर्ड पर फिट नहीं। आपके बारे में क्या ही बात करूं?’ कुछ देर बाद उसने कहा- आप रिजेक्ट हो गई हैं। उस दिन बहुत बुरा लगा। जब मैं वहां से बाहर निकली, तो समझ आ गया था कि मुझे शरीर की वजह से ही बार-बार रिजेक्ट किया जा रहा है। काम न मिलने से गुजारा करना मुश्किल होने लगा था। तब मैंने कुछ लोगों से सलाह ली और ब्रेस्ट इम्प्लांट कराने का फैसला कर लिया। मायरा बताती हैं- ‘मैं ब्रेस्ट सर्जरी कराने एक क्लीनिक पहुंची। वहां पहले ब्लड से जुड़े कई टेस्ट किए गए, फिर हार्ट से जुड़े जरूरी टेस्ट हुए। उसके बाद सर्जरी की गई। सर्जरी वाले दिन ही शाम को मुझे डिस्चार्ज कर दिया गया। डॉक्टर ने तीन महीने आराम की सलाह दी। भारी सामान उठाने और वर्कआउट से मना कर दिया। इस सर्जरी पर करीब दो लाख रुपए का खर्च आया। इतने पैसे मेरे पास नहीं थे। कर्ज लेकर इसे कराया। अब जो भी कमाती हूं ईएमआई भर देती हूं।' मायरा कहती हैं- पहले ही पैसों की तंगी थी, ऊपर से दो नए खर्च और जुड़ गए। पहला- अब खास तरह की स्पोर्ट्स ब्रा पहननी होती थी। यह 5 से 10 हजार रुपए में आती है। दूसरा- हर 6 महीने में मेमोग्राफी यानी जांचा जाता है कि ब्रेस्ट के अंदर डाला गया सिलिकॉन लीक तो नहीं हो रहा या फट तो नहीं गया है। इस काम में 3 से 4 हजार रुपए लग जाते हैं। अब मुझे डाइट का भी खास ख्याल रखना होता है। बॉडी में जरा सा भी फैट बढ़ा तो सारा पैसा पानी में चला जाएगा। इसलिए हाई प्रोटीन डाइट लेती हूं। जिसका खर्च महीने में लगभग 30 हजार के आसपास पड़ता है। हालांकि, ब्रेस्ट इम्प्लांट से मुझे फायदा हुआ। अब काम मिलने लगा। एक हॉरर फिल्म कुछ ही दिनों में रिलीज होने वाली है। उसमें मुझे रोल मिला है। हालांकि, अब कई बार ये भी सुनने को मिलता है कि नकली शरीर है। सिलिकॉन वाला शरीर है। डॉक्टर बोले- शारीरिक बनावट शादी में भी समस्या इससे जुड़ी बातचीत के लिए अब मैं ब्रेस्ट इम्प्लांट सर्जरी के एक्सपर्ट मुंबई के अंधेरी स्थित एसए एस्थेटिक्स क्लीनिक पहुंची। यहां मेरी मुलाकात प्लास्टिक सर्जन और कंसल्टेंट डॉ. समीर अहीरे से हुई। समीर बताते हैं- ‘बीते 10 साल में ब्रेस्ट इम्प्लांट सर्जरी 56 फीसदी बढ़ी है। पहले यह सर्जरी मॉडल और एक्ट्रेस ही करवाती थीं, लेकिन अब मिडिल क्लास परिवारों की महिलाएं भी कराने लगी हैं।' वो दावा करते हैं- कुछ दिन पहले महाराष्ट्र के अकोला की एक 18 साल की लड़की का ब्रेस्ट इम्प्लांट किया था। परिवार का कहना था कि उसके शरीर की वजह से शादी नहीं हो रही थी। वह बताते हैं- हमारे पास तो एक ऐसी महिला आई, जो दूसरी शादी के लिए ब्रेस्ट इंप्लांट करवाना चाहती है। इसके अलावा, कुछ महिलाएं तानों से परेशान होकर ऐसा करती हैं। उन्होंने ये भी बताया कि कुछ महिलाएं हैवी ब्रेस्ट को कम कराने के लिए भी आती हैं। गुड़गांव में आर्टेमिस हॉस्पिटल में कॉस्मेटिक एंड प्लास्टिक सर्जरी के हेड डॉ. प्रदीप कुमार सिंह बताते हैं- ब्रेस्ट इम्प्लांट सर्जरी में इन्फेक्शन के खतरे भी बढ़ जाते हैं। कई बार सूजन की शिकायतें आती हैं। मेरे पास महिलाएं सुंदर दिखने के लिए ब्रेस्ट सर्जरी कराने आती हैं। मेरी एक क्लाइंट के रिश्तेदार उसे तरह-तरह के ताने देते थे। उसका जिंदा रहने का कॉन्फिडेंस ही चला गया था। जबकि वह एक अमीर घर से थी। उसके बाद वह मेरे पास ब्रेस्ट इम्प्लांट कराने आई थी। इस तरह कई महिलाओं को शरीर की बनावट और अपने ब्रेस्ट को लेकर सोशल टैबू झेलना पड़ता है। हालांकि, प्लास्टिक सर्जन और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रेस्ट साइज किसी महिला की सुंदरता, प्रतिभा या आत्मविश्वास का पैमाना नहीं होता। बॉडी इमेज को लेकर सामाजिक दबाव और ऑनलाइन/ऑफलाइन बॉडी शेमिंग कई महिलाओं को कॉस्मेटिक सर्जरी की ओर धकेलती है। नोट- मायरा खन्ना बदला हुआ नाम है।
ग्राम पंचायत: कोटियाराज्य: आंध्र प्रदेश या ओडिशा? जवाब आसान नहीं है। यहां लोगों के पास दोनों राज्यों के राशन कार्ड हैं। वोटर लिस्ट में नाम है। कई लोगों के पास दो-दो आधार कार्ड भी हैं। बिजली ओडिशा से आती है, जबकि मोबाइल नेटवर्क आंध्र प्रदेश का है। इसकी वजह कोटिया ग्राम पंचायत के 21 गांवों को लेकर 70 साल पुराना सीमा विवाद है। इन गांवों में रहने वाले 933 परिवारों और 4,430 लोगों पर ओडिशा और आंध्र प्रदेश, दोनों दावा करते हैं। 26 अप्रैल को ओडिशा के अधिकारी कोटिया के अपर सेंबी गांव में जनगणना के लिए पहुंचे। गांव वालों ने ये कहते हुए विरोध किया कि वे आंध्र प्रदेश के रहने वाले हैं। इसके बाद ओडिशा पुलिस ने दो लोगों को गिरफ्तार कर लिया। आंध्र प्रदेश से आए वकीलों ने उनकी जमानत कराई। ओडिशा ने स्कूल-आंगनवाड़ी बनवाई, पेंशन आंध्र प्रदेश की ज्यादा कोटिया ओडिशा के कोरापुट जिला मुख्यालय से करीब 60 किलोमीटर दूर है। सीमा विवाद के बारे में पूछने पर गांव के लोगों ने लगभग एक सा जवाब दिया, ‘हमारे कागज दोनों राज्यों के हैं।’ ये बात कैमरे पर दोहराने के लिए कहा, तो झिझकने लगे। कैमरा हटाते ही सुनील गमेल बोले, ‘हमें दोनों तरफ की योजनाओं का फायदा चाहिए। इसका नुकसान ये है कि हम खुलकर बोल नहीं सकते। ओडिशा के पक्ष में बोलेंगे, तो आंध्र वाले परेशान करेंगे। आंध्र का साथ दिया, तो ओडिशा प्रशासन परेशान करेगा।‘ कोटिया से करीब 10 किलोमीटर दूर फागुनसिनेरी गांव है। बोर्ड पर गांव का नाम तेलुगु में लिखा है। यहां मिले मालती कागज दिखाते हुए कहते हैं, 'मेरे पास दोनों राज्यों के आधार और राशन कार्ड हैं। पेंशन भी दोनों जगहों से मिलती है, लेकिन आंध्र प्रदेश सरकार हमारा ज्यादा ध्यान रखती है।' ‘आंध्र सरकार से बुजुर्गों को 4 हजार और दिव्यांगों को 6 हजार रुपए पेंशन मिलती है। ओडिशा में ये सिर्फ 1 हजार रुपए है। आंध्र प्रदेश में स्कूल जाने वाले बच्चों की मां को हर साल 13 हजार रुपए मिलते हैं, जबकि ओडिशा में ऐसी कोई योजना नहीं है।’ ‘ओडिशा सरकार पेंशन भले नहीं देती, लेकिन स्कूल-आंगनवाड़ी और अस्पताल उसी ने बनवाया है। आंध्रप्रदेश सरकार के बनवाए स्कूल कुछ ही गांवों में हैं। यहां से कोरापुट काफी दूर है, इसलिए जरूरी सामान खरीदने के लिए सरकी, तिलम या लांडा जाना पड़ता है। वो आंध्र प्रदेश में है और वहां तेलुगु ही बोलते हैं।’ इसी गांव में मिलीं तुलसी पांगी बिना कैमरे पर आए कहती हैं, ’मेरा 4 साल का बेटा ओडिशा की आंगनवाड़ी में जाता है, जबकि बड़ा बेटा तेलुगु मीडियम में पढ़ता है क्योंकि वहां सरकार पैसे देती है।’ ज्यादातर लोग तुलसी पांगी जैसे ही हैं, जो कैमरे पर बात नहीं करते, लेकिन कैमरा बंद करते ही सब बताने को तैयार थे। ‘ओडिशा से नाम कटवाया, आंध्र प्रदेश के साथ रहना चाहते हैं’ बातचीत में पता चला कि अपर सेंबी गांव 10 किलोमीटर दूर है, जहां जनगणना को लेकर विवाद हुआ था। यहीं ताड़िंगी पिलुकु मिले, जिन्हें जनगणना विवाद में गिरफ्तार किया गया था। पिलुकु खुद को आंध्र प्रदेश के पार्वतीपुरम मान्यम जिले का बताते हैं। एक साल पहले तक उनके पास ओडिशा के पोटांगी ब्लॉक और कोरापुट जिले के कागज भी थे। अब वहां से नाम कटवा लिया है। गिरफ्तारी पर पिलुकु कहते हैं, ‘26 अप्रैल को ओडिशा पुलिस के कुछ जवान और तीन अधिकारी यहां जनगणना के लिए आए। हमने कहा कि हमारे ज्यादातर कागज आंध्र प्रदेश के हैं, इसलिए पहले वहां के अधिकारी सर्वे कर लें, फिर ओडिशा की बात करेंगे।’ ‘इसी बात पर हमारे खिलाफ केस दर्ज कर दिया। कहा कि हमने अफसरों के साथ मारपीट और बदसलूकी की, जबकि ऐसा कुछ नहीं हुआ। गांववाले इसके गवाह हैं। अफसरों में सिर्फ पुरुष थे, लेकिन हम पर महिला अधिकारियों को भी परेशान करने का आरोप लगा दिया गया।’ ‘हम आंध्र के साथ जाना चाहते हैं, जबकि ओडिशा वाले उड़िया भाषा सीखने का दबाव बनाते हैं। उड़िया ना आने पर नौकरी नहीं मिलती। गांव के ज्यादातर लोगों ने ओडिशा से नाम कटवा लिया है। जिनका अब भी है, वो सिर्फ राशन के लिए कागज रखे हैं।’ ‘खुद को आंध्र का बताने वाले ओडिशा के अस्पताल में आ रहे’ गांव में हमें रंजीत पांगी मिले। वे कहते हैं, ‘आंध्र की तरफ लोग सिर्फ इसीलिए जाना चाहते हैं, क्योंकि वहां राशन और पेंशन ज्यादा मिलती है। ओडिशा 5 किलो चावल देता है, जबकि आंध्र प्रदेश 35 किलो। इसके अलावा सभी जरूरी काम ओडिशा सरकार ने किए हैं। आंध्र वाले भी उड़िया बोलने वालों को नौकरी नहीं देते और तेलुगु सीखने के लिए मजबूर करते हैं।’ पांगी बताते हैं, ‘कोटिया और आसपास के गांवों में ओडिशा सरकार के 25 स्कूल और 23 आंगनवाड़ी केंद्र हैं, जबकि आंध्र सरकार के इक्का-दुक्का स्कूल हैं। अस्पताल एक भी नहीं है, जबकि ओडिशा सरकार 24 घंटे एंबुलेंस सेवा दे रही है।’ पांगी के साथ बैठे लोगों में एक शख्स ओडिशा सरकार के कर्मचारी हैं। वो कोटिया के अस्पताल में काम करते हैं। नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं, 'खुद को आंध्र प्रदेश का बताने वाले भी इसी अस्पताल में आते हैं।' हालांकि, यहां मिले सभी लोगों के पास दोनों राज्यों के दस्तावेज हैं। ‘चर्च में सो रहे आंध्र के पुलिसकर्मी, ओडिशा का अपना थाना’ इसके बाद हम कोटिया पुलिस स्टेशन पहुंचे। यहां ओडिशा का अपना थाना है। थाना प्रभारी राजकुमार कहते हैं, ‘21 गांव में से 14 का झुकाव आंध्र की तरफ है। वहां के लोग तेलुगु बोलते हैं। आंध्र वालों ने गूगल पर भी कोटिया को अपना हिस्सा बता दिया है, लेकिन ये हमारा हिस्सा है।' वो आगे कुछ बोलते, इससे पहले सिविल ड्रेस में आए एक पुलिसकर्मी ने उड़िया में उनसे कुछ कहा। इसके बाद थाना प्रभारी ने बात करने से मना कर दिया। थाने से बाहर निकलने पर एक पुलिसकर्मी ने ऑफ द रिकॉर्ड बताया कि जनगणना विवाद के बाद आंध्र से कुछ पुलिसकर्मी यहां आए हैं। अभी वे अपर सेंबी के पास रह रहे हैं। हम आंध्र पुलिस को ढूंढते अपर सेंबी पहुंचे। गांव के सामने एक चर्च में दो लोग सोते मिले। पता चला कि ये आंध्र प्रदेश पुलिस से हैं। बिना कैमरे पर आए एक पुलिसकर्मी कैलाश ने बताया, ‘जब से आंध्र के दो लोगों को गिरफ्तार किया गया, तब से हम यहां आए हैं। यहां हमारा कोई थाना नहीं है। ओडिशा वाले बनाने नहीं देते। अपर सेंबी के नीचे जितने गांव हैं, वे सब आंध्र प्रदेश से जुड़ना चाहते हैं।’ हमने पूछा कि यहां आने पर ओडिशा पुलिस ने नहीं रोका? जवाब मिला, ‘दोनों राज्यों के बड़े अधिकारियों के बीच इसे लेकर बातचीत हुई। उसके बाद यहां आए हैं। ओडिशा वालों ने कहा कि हमें सिविल ड्रेस में रहना होगा, इसलिए वर्दी नहीं पहनते। इसी चर्च के आंगन में खाना बनाते हैं और यहीं सो जाते हैं।’ अब जानिए इस सीमा विवाद के पीछे अधिकारी क्या वजह बता रहे… 21 गांवों का औपचारिक सर्वे नहीं, यही विवाद की वजह ओडिशा के प्रशासनिक रिकॉर्ड में कोटिया पोटांगी तहसील का हिस्सा है। यहां के तहसीलदार देवेंद्र धरुआ का कहना है, ‘विवाद की सबसे बड़ी वजह सभी 21 गांवों का औपचारिक सर्वे न होना है। इसकी वजह से गांवों वालों के पास आज तक खाता नंबर या संख्या नहीं है। इससे जमीन की खरीद-बिक्री और मालिकाना हक से जुड़े मामलों में दिक्कत आती है।’ ‘टकराव तब पैदा होता है, जब आंध्र प्रदेश के अधिकारी इन गांवों में आकर सेवाएं देने की कोशिश करते हैं। इस पर ओडिशा के अधिकारी दखल देते हैं। उनका कहना होता है कि ये उनका क्षेत्र है और जरूरी सेवाएं यहां पहले से उपलब्ध हैं।’ वहीं, आंध्र प्रदेश के सालुर के मंडल रेवेन्यू ऑफिसर सुरेश साइविका कहते हैं, ‘कोटिया का विवाद सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि प्रशासनिक और राजनीतिक दावे का भी है। भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के दौरान यहां की सीमा तय नहीं हो सकी। 1956 में आंध्र प्रदेश बनने के बाद से ही हम इन गांवों पर अपना दावा करते रहे हैं।’ ‘ओडिशा का तर्क है कि 1936 तक कोटिया पंचायत जयपुर रियासत का हिस्सा थी, इसलिए ये उसका क्षेत्र है, लेकिन राज्यों का पुनर्गठन भाषाई आधार पर हुआ था। यहां के ज्यादातर लोग तेलुगु बोलते हैं और सांस्कृतिक रूप से भी आंध्र प्रदेश से जुड़े हैं। इसके बावजूद ओडिशा इन गांवों पर दावा करता है।’ दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री मिले, लेकिन नतीजा नहीं निकला सीमा विवाद पर ओडिशा के कोरापुट से सांसद और पोट्टांगी से चार बार विधायक रह चुके जयराम पांगी कहते हैं, ‘विवाद को सुलझाने के लिए कई बार बातचीत हुई, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला। 1968 में दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री भी मिले थे। 2025 में ओडिशा सरकार ने एक समिति बनाई, लेकिन उससे भी कोई खास नतीजा नहीं निकला।‘ आंध्र प्रदेश के अराकू लोकसभा क्षेत्र की सांसद गुम्मा थानूजा रानी के मुताबिक, 9 नवंबर 2021 को भुवनेश्वर में तब ओडिशा के मुख्यमंत्री रहे नवीन पटनायक और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी के बीच बैठक हुई थी। इसमें कोटिया पर भी चर्चा हुई। दोनों राज्यों ने बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने पर सहमति जताई थी। वे बताती हैं, ‘इसके लिए दोनों राज्यों के चीफ सेक्रेटरी और सीनियर अफसरों की टीम बनाने की भी बात हुई थी। जगन मोहन रेड्डी समाधान को लेकर गंभीर थे, लेकिन ओडिशा से कोई जवाब नहीं आया। वहां की सरकार विवाद सुलझाने को लेकर गंभीर नहीं है।‘ केंद्र-ओडिशा में BJP, आंध्र में NDA की सरकार, लेकिन समाधान नहीं कोटिया के लोग दोहरी पहचान के साथ जीना सीख चुके हैं। यहां परजा, गदबा, कोंध और भोट्टाडा समुदाय के लोग हैं, जो खेती करते हैं। सीनियर जर्नलिस्ट भूषित कहते हैं, 'ओडिशा सरकार ने कोटिया का विकास किया है, लेकिन वहां के लोगों का दिल नहीं जीत पाई है।' 'इस वक्त केंद्र और ओडिशा में BJP सरकार है। आंध्र प्रदेश में NDA की सहयोगी TDP की सरकार है। इसे ट्रिपल इंजन सरकार कहा जा सकता है। इसके बावजूद विवाद का कोई ठोस समाधान नहीं निकाला जा रहा है।' ………………….. ये खबर भी पढ़ें… क्यों नसबंदी की रिवर्स सर्जरी करा रहे पूर्व नक्सली छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से करीब 400 किलोमीटर दूर दंतेवाड़ा का जबेली गांव। यहां कभी नक्सली रहे प्रदीप कुंजम का घर है। उन्होंने मुस्कुराते हुए दरवाजा खोला। गोद में 8 महीने की बेटी करिश्मा थी। प्रदीप 2008 में नक्सली बन गए थे। पढ़िए पूरी खबर…
जी-7 सम्मेलन में ट्रंप ने जमकर की पीएम मोदी की तारीफ, बताया- 'दुनिया के सबसे मजबूत वार्ताकार...'
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जमकर तारीफ की। उन्होंने पीएम मोदी को दुनिया के सबसे मजबूत और कड़क बातचीत करने वाले नेताओं में से एक बताया
जी-7 समिट में पीएम मोदी ने कहा, 'साझेदारी, कनेक्टिविटी और समावेशी विकास से नए विश्व का निर्माण संभव'
फ्रांस के एवियन में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समावेशी और टिकाऊ विकास पर जोर दिया
प्रमुख अंतरराष्ट्रीय एडवोकेसी समूह हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन (एचएएफ) ने कैलिफोर्निया में हिंदुओं के खिलाफ बढ़ती नफरत पर चिंता जताई है। एचएएफ ने स्टेट ऑफ हेट कमीशन से राज्य में बढ़ते एंटी-हिंदू गतिविधियों पर ध्यान देने और इसे रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की है।
14 जून को TMC के 28 में से 20 लोकसभा सांसदों ने गुमनाम सी पार्टी NCPI में विलय कर लिया। आज शिवसेना (उद्धव गुट) के 9 से 6 लोकसभा सांसदों ने भी बगावत कर दी। इससे पहले 24 अप्रैल को आम आदमी पार्टी के 10 में से 7 राज्यसभा सांसदों ने भी बगावत कर दी थी। ये सभी बागी BJP या NDA में शामिल हो रहे हैं। विपक्षी सांसदों की इस उछल-कूद के पीछे असली खेल क्या है, मोदी सरकार को और सांसदों का साथ क्यों चाहिए; आज के एक्सप्लेनर में इसी से जुड़े 5 जरूरी सवालों के जवाब… सवाल-1: मोदी सरकार को लोकसभा में दो-तिहाई सांसदों का साथ क्यों चाहिए? जवाबः इसे समझने के लिए 2 महीने पीछे चलना होगा। 16 से 18 अप्रैल 2026। मोदी सरकार लोकसभा में 3 विधेयक लाई। तर्क दिया कि 2029 चुनाव तक महिला आरक्षण कानून लागू करने के लिए ये तीनों विधेयक पारित होने जरूरी हैं। इसमें एक संविधान संशोधन विधेयक था। इसमें लोकसभा की अधिकतम सीटें 550 से बढ़ाकर 850 करने और संविधान के आर्टिकल 81 और 82 में बदलाव करने के प्रावधान थे। संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत जरूरी होता है, यानी वोटिंग में आधे से ज्यादा सदस्य सदन में मौजूद हों और जितने सदस्य मौजूद हैं, उनमें से कम से कम दो-तिहाई सांसद इसके पक्ष में वोट दें। सीनियर जर्नलिस्ट आदेश रावल बताते हैं, ‘लोकसभा सीटें बढ़ाने वाला परिसीमन बिल मानसून सत्र में दोबारा जरूर लाया जाएगा और उसी के लिए सांसदों के समर्थन का आंकड़ा बढ़ाने की कवायद की जा रही है।’ NDA की सहयोगी तेलुगु देशम पार्टी यानी TDP के प्रमुख और आंध्र प्रदेश सीएम चंद्रबाबू नायडू ने भी 15 जून को दावा किया है कि केंद्र सरकार जल्द ही परिसीमन बिल फिर से लाएगी। महिला आरक्षण और परिसीमन साथ-साथ आगे बढ़ेंगे। उन्होंने कहा कि राजनीति में महिला आरक्षण लागू करने के लिए डिलिमिटेशन जरूरी है और वह इसका पूरा समर्थन करते हैं। सवाल-2: अभी दोनों सदनों में मोदी सरकार का आंकड़ा कितना है? जवाबः संसद के दोनों सदनों में NDA का आंकड़ा… लोकसभा में NDA के साथ 318 सांसद राज्यसभा में NDA के साथ 154 सांसद सवाल-3: संसद में दो-तिहाई बहुमत से कितना पीछे है सरकार, बाकी कैसे आएंगे? जवाबः फिलहाल सरकार लोकसभा में दो-तिहाई के आंकड़े से 44 सीट और राज्यसभा में 10 सीट दूर है। ये कमी कुछ छोटे क्षेत्रीय दलों से पूरी हो सकती है… 1. लोकसभा में DMK और JMM के सांसदों पर दांव 2. राज्यसभा में YSR कांग्रेस और बीजू जनता दल की जरूरत BJP परिसीमन बिल को पास कराने के लिए हर संभव प्रयास करेगी। बंगाल और महाराष्ट्र में जो स्थितियां बनीं, वो BJP की एक बड़ी मुहिम का हिस्सा है। आगे तमिलनाडु में DMK, बिहार में RJD और यूपी में सपा या बसपा के सांसदों पर भी दबाव बनाकर उन्हें तोड़ने की कोशिश हो सकती है। पॉलिटिकल एक्सपर्ट और सीनियर पत्रकार रशीद किदवाई भी कहते हैं, ‘फिलहाल, BJP का सबसे बड़ा एजेंडा परिसीमन ही है। लॉन्ग टर्म एजेंडे में उसे विपक्षी क्षेत्रीय पार्टियों को सीमित करना है। देश में 200-250 लोकसभा सीटें ऐसी हैं, जहां कांग्रेस का वोट शेयर महज 4-5% है। ऐसे में 2029 में कांग्रेस को सीटें जीतने के लिए क्षेत्रीय दलों और छोटी पार्टियों की जरूरत पड़ेगी। इसीलिए BJP इन पर अभी से लगाम लगा रही है।’ सवाल-4: आखिर परिसीमन बिल पारित होने से क्या हो जाएगा? जवाबः परिसीमन के बाद लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में सीटें बढ़ेंगी। सरकार जो बिल लाई थी, उसमें लोकसभा सीटों की संख्या 550 से बढ़ाकर 850 करने की बात थी। तब गृहमंत्री अमित शाह ने इसका फॉर्मूला बताते हुए कहा था, ‘मान लीजिए कि 100 सीटें हैं, जिसमें 33% आरक्षण देना है, तो इसमें 50 सीटें बढ़ाएंगे। इस हिसाब से 150 सीट होती हैं। लोकसभा में ये राउंड ऑफ फिगर 850 है।' सरकार का कहना था कि सारे राज्यों में सीटें 'आनुपातिक रूप से' बढ़ेंगी। यानी, अगर 543 सीटों की लोकसभा में तमिलनाडु के पास 7.18% हिस्सेदारी, यानी 39 सीटें हैं, तो 850 सीटों की लोकसभा में भी 7.18% हिस्सेदारी यानी 61 सीटें होंगी। हालांकि परिसीमन विधेयक में सीटें 'आनुपातिक रूप से बढ़ाने’ की गारंटी देने वाला कोई प्रावधान नहीं है। इसके उलट संविधान का अनुच्छेद 81(2)(a) कहता है कि सीटें जनसंख्या के अनुपात में मिलेंगी, न कि सभी राज्यों में बराबर प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होगी। इसमें भी सरकार ने कोई बदलाव नहीं किया। यानी 2011 की जनगणना के आधार पर जनसंख्या के अनुपात से ही परिसीमन होगा। ज्यादा जनसंख्या वाले राज्यों को ज्यादा सीटें और कम जनसंख्या वाले राज्यों को कम सीटें मिलेंगी। इसीलिए दक्षिण के राज्यों को चिंता है कि अगर 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन हुआ, तो सबसे ज्यादा नुकसान उन्हीं को होगा, क्योंकि इन राज्यों की जनसंख्या भारत के होल्ड वाले हिंदी भाषी राज्यों के मुकाबले कम है। तमिलनाडु, केरलम और आंध्र प्रदेश सबसे ज्यादा घाटे में होंगे। देश की पॉलिसीज से जुड़े निर्णयों में इन राज्यों का दबदबा घटेगा। 1976 और 2001 में भी परिसीमन इसीलिए टाला गया था, क्योंकि उत्तर और दक्षिण की जनसंख्या में बड़ा अंतर था। इससे यूपी, बिहार, राजस्थान, दिल्ली और मध्य प्रदेश सबसे ज्यादा फायदा में होंगे। ये सभी हिंदी बेल्ट के राज्य हैं, जहां बीजेपी का स्ट्रॉन्ग होल्ड है। सवाल-5: क्या इससे बीजेपी को चुनावी फायदा भी मिल सकता है? जवाब: बीजेपी के पिछले तीन चुनावों के आंकड़ों के आधार पर बीजेपी के लिए अच्छे और बुरे दोनों सिनैरियो में फायदा है… 1. बीजेपी के लिए बेस्ट केस सिनैरियोः अगर 2019 का प्रदर्शन दोहराती है 2. बीजेपी के वर्स्ट केस सिनैरियो: अगर 2024 का प्रदर्शन दोहराती है *****रिसर्च सहयोग - प्रथमेश व्यास-----------------------------------------------------------ये खबर भी पढ़ें… क्या ममता की राजनीति अब कांग्रेस के सहारे, वापसी क्यों मुश्किल; कैसे बागी हुए 58 विधायक और 20 सांसद TMC के 58 विधायकों की टूट और अब 20 सांसदों के बागी होने का दावा। ममता बनर्जी के पास अब सिर्फ 22 विधायकों और 8 सांसदों का समर्थन बाकी है। खेमे के सांसदों से लेकर पार्टी नेताओं तक पर हमले हो रहे। इस बीच ममता लगातार दो दिन सोनिया गांधी से मिलीं। INDIA ब्लॉक की अगुवाई करने की भी इच्छा जताई। ये तक कहा जा रहा कि ममता ‘अपनी वाली TMC’ का कांग्रेस में विलय कर सकती हैं। पढ़ें पूरी खबर…
होर्मुज में बढ़ी जहाजों की आवाजाही, ईरान के तीन तेल टैंकरों ने अमेरिकी नाकेबंदी को किया पार
होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही बढ़ने लगी है। मैरीटाइम एनालिसिस फर्म विंडवर्ड ने बताया कि मंगलवार को 14 जहाज स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरे, जो इस महीने का सबसे बड़ा दैनिक आंकड़ा है। जो इस महीने का अब तक का सबसे बड़ा दैनिक आंकड़ा है। इस बढ़ोतरी को शिपिंग कंपनियों के बीच धीरे-धीरे लौटते भरोसे के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि होर्मुज स्ट्रेट में समुद्री व्यापार बाधित होने का असर केवल क्षेत्रीय स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक व्यापार की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है और इसकी सुरक्षा अंतरराष्ट्रीय समुदाय की साझा जिम्मेदारी है।
ईरान और अमेरिका के बीच लंबे समय से जारी तनाव और संघर्ष के बाद अब शांति की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल सामने आई है
ट्रंप–मोदी की बड़ी मुलाक़ात! व्यापार, एआई और सुरक्षा पर फोकस
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बुधवार को जी7 नेताओं, आउटरीच पार्टनर्स और प्रमुख टेक्नोलॉजी कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों के साथ आयोजित वर्किंग लंच से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय बैठक करेंगे।
जी-7 समिट में पीएम मोदी-स्टार्मर की मुलाकात, व्यापार से एआई तक कई मुद्दों पर हुई चर्चा
फ्रांस के एवियन में जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के बीच मुलाकात हुई। दोनों नेताओं ने भारत-ब्रिटेन संबंधों को ज्यादा मजबूत बनाने के तरीकों पर चर्चा की
अमेरिका की निगरानी में इजरायल-लेबनान समझौता, बनेंगे विशेष 'पायलट जोन'
मध्य पूर्व में स्थिरता की दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए भारत में इजरायल के राजदूत रूवेन अजार ने बताया कि इजरायल और लेबनान, अमेरिका की निगरानी में पायलट जोन बनाने की प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाने पर सहमत हुए हैं
जी-7 सम्मेलन में पीएम मोदी बोले, साझेदारी सम्मान पर आधारित होनी चाहिए, निर्भरता पर नहीं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि आज के समय में आपसी भरोसा ही सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत है
जी-7 समिट में मार्क कार्नी से मिले पीएम मोदी, जी-20 से पहले एफटीए पूरा करने पर हुई चर्चा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस साल कनाडा का दौरा कर सकते हैं। फ्रांस के एवियन में जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान उन्होंने इसके संकेत दिए
अमेरिका को ईरान जंग का हर सेकेंड 10 लाख रुपए का पड़ा। रोजाना करीब 9,400 करोड़ रुपए। 107 दिन बाद जंग खत्म करके भी मुसीबत नहीं टली है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान को हर्जाने के तौर पर 28 लाख करोड़ रुपए और देने पड़ सकते हैं।ट्रम्प को कितनी महंगी पड़ी ईरान जंग; 8 ग्राफिक्स में देखिए… **** ग्राफिक्स: द्रगचंद्र भुर्जी और अंकलेश विश्वकर्मा -------- ये खबर भी पढ़िए… अमेरिका-ईरान जंग में कौन जीता, क्या पाकिस्तान नहीं, कतर ने करवाई डील, पेट्रोल-डीजल कब सस्ता होगा; 7 सवालों में पूरी कहानी 107 दिनों की तबाही के बाद आखिरकार अमेरिका और ईरान जंग खत्म करने को राजी हैं। रविवार को ट्रम्प ने लिखा- समझौता हो गया। ईरान ने भी बयान जारी किया। अब 19 जून को स्विट्जरलैंड में दोनों देश MoU पर साइन करेंगे। पूरी खबर पढ़िए…
ट्रंप का धमाका! रूस पर फिर से प्रतिबंध की तैयारी
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिये है कि होर्मुज जलडमरूमध्य के दोबारा खुलने और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति सामान्य होने के बाद रूस के तेल निर्यात पर प्रतिबंध फिर से लगाए जा सकते हैं
अमेरिका ने ईरान के बंदरगाहों पर लगा नौसैनिक प्रतिबंध हटाया: ईरान उप विदेश मंत्री
अमेरिका ने ईरान के बंदरगाहों पर लगाया नौसैनिक प्रतिबंध हटा लिया है। तेहरान के उप विदेश मंत्री मजीद तख्त-रवांची ने कहा, “शुरुआत से ही हम इस बात पर जोर दे रहे थे कि प्रतिबंध हटना चाहिए
31 मई को विराट कोहली ने वैभव सूर्यवंशी के कंधे पर हाथ रखकर एक बात कही थी- ‘परवाह मत करो, कौन क्या कहता है।’ 2 हफ्ते बाद ही वैभव ये नसीहत भूल गए। 15 जून को श्रीलंकाई खिलाड़ी ने ताना मारा, तो वैभव भिड़ गए और उसे धक्का दे दिया। पहले भी वैभव मैदान पर गुस्सा करते दिखे हैं। श्रीलंकाई खिलाड़ियों से क्यों हुई धक्का-मुक्की, क्या सजा मिल सकती है और 15 साल के वैभव का गुस्सा क्या करियर पर असर डालेगा; समझेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: वैभव ने श्रीलंका के खिलाड़ी से धक्का-मुक्की क्यों की? जवाबः भारत, श्रीलंका और अफगानिस्तान की क्लास-A टीमों के बीच 50 ओवर की ट्राई सीरीज जारी है। 15 जून को सुपर ओवर तक गए चौथे मैच में श्रीलंका ने भारत को हराया। इसके बाद ये पूरा विवाद हुआ.. दरअसल, इस मैच की शुरुआत से ही स्थितियां तनावपूर्ण होने लगी थीं। भारतीय बैटर विपराज निगम के पिच पर दौड़ने की वजह से अंपायर ने भारत पर 10 रन की पेनाल्टी लगा दी। अंधेरा हो रहा था, इसके बावजूद श्रीलंकाई बल्लेबाज क्रीज पर देरी से आए। एक नो बॉल को लेकर भी विवाद हुआ था। भारतीय स्पिनर आर. अश्विन X पर लिखते हैं, 'इन मैचों में IPL जितने कैमरे नहीं होते। नो-बॉल का फैसला विवादित था और श्रीलंकाई टीम के देर करने से भी भारतीय टीम नाराज थी। श्रीलंका ने भारतीय टीम पर मानसिक दबाव की स्ट्रैटेजी और माइंड गेम के तहत ये किया।' सवाल-2: इस धक्का-मुक्की में किसकी गलती थी, क्या सजा मिल सकती है? जवाबः अब तक श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड या भारतीय क्रिकेट बोर्ड यानी BCCI ने कोई औपचारिक बयान नहीं दिया है। आखिरी फैसला मैच रेफरी प्रदीप जयप्रकाश का होगा। हालांकि, ICC की रूलबुक में ऐसी घटनाओं के लिए स्पष्ट नियम हैं। ICC कोड ऑफ कंडक्ट के आर्टिकल 2.12 के मुताबिक, 'इंटरनेशनल मैच में खिलाड़ी, सपोर्टिंग स्टाफ, अंपायर, रेफरी या किसी दर्शक के साथ अनुचित शारीरिक संपर्क नियमों के खिलाफ है।’ सवाल-3: क्या वैभव पहले भी मैदान पर ऐसा गुस्सा दिखा चुके हैं? जवाब: हां, इससे पहले दो बार वैभव मैदान पर ऐसे गुस्से में दिखे हैं.. 1. ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ गलत आउट से नाराज दिखे वैभव 7 अक्टूबर 2025। ऑस्ट्रेलिया में अंडर-19 यूथ टेस्ट मैच। वैभव 14 गेंदों 20 रन बना चुके थे। ऑस्ट्रेलियाई तेज गेंदबाज चार्ल्स लैचमंड की गेंद वैभव के थाई पैड को छूते हुए कीपर के ग्लव्स तक पहुंची। अंपायर ने कैच की अपील पर बिना वक्त लगाए आउट करार दिया। इस पर नाराज वैभव कुछ देर के लिए विकेट के सामने खड़े अंपायर को देखते रहे और फिर थाईपैड की तरफ इशारा करते हुए कहा कि गेंद बल्ले से नहीं लगी है। वे हाथ में बल्ला घुमाते हुए पवेलियन लौट गए। वीडियो रिप्ले से भी पता चला कि गेंद पैड से लगकर गई है। 2. आउट हुए तो पाकिस्तानी खिलाड़ी को जूता दिखाया 21 दिसंबर 2025. दुबई में भारत-पाकिस्तान के बीच अंडर-19 एशिया कप का फाइनल मुकाबला। वैभव ने 10 गेंदों में 26 रन बना लिए थे। तभी पाकिस्तानी गेंदबाज अली राजा की गेंद पर विकेट के पीछे कैच आउट हो गए। अली ने आक्रामक तरीके से जश्न मनाया। वैभव की तरफ देखकर कुछ कहा भी। इस पर वैभव ने एग्रेसिव रिएक्शन दिया और अली को देखते हुए अपने जूते की तरफ इशारा किया। भारतीय टीम सिर्फ 156 रन बना सकी और मैच हार गई। सवाल-4: तो क्या बड़े मैचों में खराब परफॉरमेंस के चलते आपा खो देते हैं वैभव? जवाब: जब भी वैभव मैचों में कथित ‘गुस्से’ में दिखे, तब उनकी या टीम की परफॉरमेंस अच्छी नहीं चल रही थी... सवाल-5: क्या वैभव का गुस्सा उनके करियर के लिए घातक बन जाएगा? जवाबः कई स्टार खिलाड़ी अपने शुरुआती दौर में एग्रेसिव रहे हैं, लेकिन समय के साथ उन्होंने अपना तरीका बदला। गुस्से को कंट्रोल करके खेल पर फोकस बढ़ाया और खुद को हर मामले में बेस्ट स्पोर्ट्सपर्सन साबित किया। सीनियर क्रिकेट जर्नलिस्ट के. श्रीनिवास राव कहते हैं, ‘ये संभव नहीं है कि मैदान पर हमारी इच्छा के मुताबिक हमारा खिलाड़ी ऑस्ट्रेलियाई टीम को उसी आक्रामक भाषा में जवाब दे और वो संतुलित भी रहे। वैभव बच्चा है, उसने कोई क्राइम नहीं किया है, उसे गलती करने और उससे खुद सीखने का हक है। 15 साल की उम्र में 30 साल वाली परिपक्वता की उम्मीद नहीं की जा सकती।’ हालांकि सीनियर स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट बोरिया मजूमदार भी X पर लिखते हैं, 'वैभव को मैदान पर गुस्सा नहीं करना चाहिए। इससे इंसान अपना नजरिया खो देता है। मुझे यकीन है कि इस घटना से वो सीखेंगे। हम सब गलतियां करते हैं, वो भी अलग नहीं हैं।’ वैभव की पैदाइश 27 मार्च 2011 को बिहार के समस्तीपुर की है। कम उम्र में वैभव ने स्किल और परफॉरमेंस के मामले में विराट और रोजर फेडरर की तरह नई लकीर खींची है। उन्हें ‘वर्ल्ड क्रिकेट का बेबी बॉस’ और ‘वंडर किड’ कहा जाने लगा है। सवाल-6: वैभव में ऐसा क्या खास है कि उन्हें ‘वंडर किड’ कहा जाता है? जवाबः इसकी 4 बड़ी वजहें हैं… 1. सिर्फ पावर हिटिंग नहीं, कम्प्लीट बैटिंग स्किल सेट 2. 15 की उम्र में टीम इंडिया में सिलेक्शन, सचिन का रिकॉर्ड तोड़ा 3. क्रिस गेल, डीविलियर्स, रसल के रिकॉर्ड तोड़े 4. वैभव पर IIM इंदौर रिसर्च करेगा *****रिसर्च सहयोग - प्रथमेश व्यास-----------------------------------------------------------क्रिकेट से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें…क्या IPL का डाउनफॉल शुरू:टीवी दर्शक 26% घटे, विदेशी खिलाड़ी आधा सीजन ही खेल रहे; टॉप एक्सपर्ट्स ने बताईं वजहें और समाधान 29 मई की शाम। फोन पर नोटिफिकेशन आया- राजस्थान रॉयल्स के वैभव सूर्यवंशी सेंचुरी के करीब हैं। मैंने जियो हॉटस्टार खोला, लाइव मैच चला लिया। तभी ध्यान आया कि इस पूरे सीजन में पहला मैच लाइव देख रही हूं। बाकी दो महीने? बस हाइलाइट्स, स्कोर अपडेट्स और कभी-कभी रील्स। पढ़ें पूरी खबर…
G7 Summit से पहले Mark Carney का बड़ा बयान, बोले- दुनिया में बजा India का डंका
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने वैश्विक मंच पर भारत के बढ़ते महत्व पर ज़ोर दिया है। उन्होंने कहा कि G7 शिखर सम्मेलन में भारत की भागीदारी तेज़ी से बदलती अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को दर्शाती है, जहाँ अब बड़े फ़ैसले केवल कुछ ही देश नहीं ले सकते। अपनी छह-दिवसीय यूरोपीय यात्रा के दौरान ट्रिनिटी कॉलेज डबलिन में बातचीत करते हुए कार्नी ने कहा कि दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के बीच चर्चा में भारत जैसे देशों को शामिल करना यह दिखाता है कि जटिल अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों से निपटने के लिए व्यापक वैश्विक सहयोग की ज़रूरत है। फ्रांस में होने वाले शिखर सम्मेलन से पहले कार्नी ने कहा कि यह इस बात की मान्यता है कि G7, अगर कभी दुनिया को चलाता भी था, तो अब वह दुनिया को नहीं चलाता और न ही ऐसा होने का दिखावा करता है। इसे भी पढ़ें: जी-7 शिखर सम्मेलन में अमेरिका दिखा अलग थलग, दुनिया जता रही मोदी पर भरोसा भारत की मौजूदगी बदलती ग्लोबल स्थितियों का संकेत है कार्नी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि ग्लोबल हालात काफ़ी बदल गए हैं, इसलिए G7 के लिए ज़रूरी है कि वह अपने पारंपरिक सदस्यों के अलावा प्रभावशाली देशों के साथ भी जुड़े। उन्होंने कहा कि भारत जैसे देश ऐसे मुद्दों पर अनोखे नज़रिए और व्यावहारिक समाधान लाते हैं जिनका असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। कनाडा के प्रधानमंत्री ने कहा कि आने वाले समिट में न सिर्फ़ G7 के सदस्य बल्कि कई सहयोगी देश भी शामिल होंगे। यह ग्लोबल चर्चाओं को ज़्यादा समावेशी और असरदार बनाने की एक बड़ी कोशिश है। इसे भी पढ़ें: France में G7 Summit से PM Modi का दुनिया को बड़ा संदेश, Sustainable Planet के लिए भारत प्रतिबद्ध समिट में कई उभरती ताक़तों को बुलाया गया है मंगलवार को एवियन में शुरू होने वाले 52वें G7 समिट में बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के नेताओं के साथ-साथ भारत, ब्राज़ील, मिस्र, केन्या और कई खाड़ी देशों जैसे आमंत्रित देशों के नेता भी शामिल होंगे। कार्नी के मुताबिक, इन देशों की भागीदारी से ग्लोबल प्राथमिकताओं पर चर्चा का दायरा बढ़ेगा और राष्ट्रीय सीमाओं से परे की चुनौतियों का समाधान खोजने में मदद मिलेगी। उन्होंने यह भी कहा कि यह बैठक एक उभरती हुई विश्व व्यवस्था को आकार देने में भूमिका निभा सकती है। उन्होंने इस साल की शुरुआत में दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम में भी ऐसी ही बात कही थी, जहाँ उन्होंने बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच मध्यम दर्जे की ताक़तों के बीच ज़्यादा सहयोग का आह्वान किया था।
डील से पलटा ईरान? फिर आने वाली है तबाही!
अमेरिका ईरान समझौते के बारे में यह कहा जा रहा है कि कहीं दस्तखत से पहले यह समझौता टूट तो नहीं जाएगा। डॉनल्ड ट्रंप यह दावा कर रहे हैं कि उन्होंने ईरान के साथ एक बड़ी डील कर ली है। लेकिन एमओयू पर डिजिटल साइन करने के 24 घंटे बाद इस डील के पेच सामने आ रहे हैं। ईरान और अमेरिका के बयानों में भी विरोधाभास साफ-साफ झलक रहा है। ट्रंप यह दावा कर रहे हैं कि शुक्रवार से हॉर्मोस खुलने वाला है। जबकि ईरान का कहना है कि पहले अमेरिका की नियत को परखा जाएगा और उसके बाद ही हॉर्मोस ट्रेड खोला जाएगा। ईरान को 28 अरब के पुनर्निर्माण फंड पर भी मतभेद पैदा हो गए हैं। एमओयू में यह बात लिखी है कि अमेरिका ईरान को 28 अरब का फंड देगा। लेकिन ट्रंप ने इसे निराधार बताया है। इसे भी पढ़ें: डील हो या ना हो, मैं ईरान को...ट्रंप पर फूटा नेतन्याहू का गुस्सा ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर यह साफ-साफ लिखा है कि यह फेक न्यूज़ है। अमेरिका 28 अरब का फंड नहीं देने वाला। इसके अलावा परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी कंफ्यूजन है। ट्रंप यह कह रहे हैं कि ईरान के पास कोई परमाणु बम नहीं होगा। जबकि ईरान का कहना है कि इस पर 60 दिन की वार्ता के दौरान सहमति बनाई जाएगी। मतलब अभी इस पर कुछ हुआ नहीं है। अमेरिका ईरान डील से आईडीएफ मोसाद नाराज है। आईडीएफ और मोसाद ट्रंप की डील को कमजोर मानते हैं। न्यूक्लियर डील से खतरा कम नहीं होगा। द जेरुशसलेलम पोस्ट के हवाले से यह खबर सामने आ रही है। तो देखिए इजराइली डिफेंस फोर्सेस हो या फिर इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद। इसके अफसर मान रहे हैं कि यह डील इजराइल के पक्ष में नहीं है। इसका कहीं ना कहीं फायदा ईरान को होगा। इसे भी पढ़ें: जी-7 शिखर सम्मेलन में अमेरिका दिखा अलग थलग, दुनिया जता रही मोदी पर भरोसा न्यूक्लियर डील से खतरा कम नहीं होगा। यूरेनियम फ्रेमवर्क में कई कमियां हैं। प्रॉक्सी फंडिंग के मुद्दे पर इजराइल दरअसल भड़का हुआ है। हिजबुल्लाह का खात्मा चाहती है आईडीएफ। कमजोर डील से और मजबूत होगी ईरानी रिजीम। यह मानना है लक्ष्यों को हासिल करने में नाकाम है ट्रंप की डील। द जेरुसलम पोस्ट के हवाले से यह अहम खबर सामने आ रही है। लेबनान बारूद से दहलाए। ट्रंप गुस्से से आग बबूला। ट्रंप ने साफ कह दिया कि नेतन्याहू को बिल्कुल भी विवेक नहीं है।
EU-US Trade Deal को European Parliament की हरी झंडी, कई अमेरिकी सामानों पर खत्म होगा टैरिफ
यूरोपीय संसद ने उन दो कानूनों को अंतिम मंज़ूरी दे दी, जिनका मकसद अगस्त 2025 के EU-US संयुक्त बयान के तहत अमेरिका के साथ यूरोपीय संघ के व्यापार समझौते को लागू करना है। इन कानूनों में टैरिफ में कटौती के साथ-साथ यूरोपीय उद्योगों और कृषि क्षेत्र की सुरक्षा के लिए उपाय भी शामिल हैं। यूरोपीय संसद की ओर से जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, यूरोपीय संसद के सदस्यों (MEPs) ने औद्योगिक और कृषि-खाद्य आयात से जुड़े मुख्य नियम का समर्थन किया। इसके पक्ष में 440 और विपक्ष में 151 वोट पड़े, जबकि 50 सदस्य वोटिंग से दूर रहे। यह कानून अमेरिका के सभी औद्योगिक सामानों पर टैरिफ खत्म करता है और अमेरिका के कई तरह के सीफ़ूड और कृषि उत्पादों को बाज़ार में प्राथमिकता के साथ पहुँच प्रदान करता है। एक दूसरे नियम को 444 वोटों के समर्थन और 152 वोटों के विरोध के साथ मंज़ूरी मिली (54 सदस्य वोटिंग से दूर रहे)। यह नियम अमेरिका से लॉबस्टर के टैरिफ-मुक्त आयात की सुविधा को बढ़ाता है और इसमें प्रोसेस्ड लॉबस्टर उत्पादों को भी शामिल करता है। इसे भी पढ़ें: पहले हंसे, फिर पिया पानी और ऐसे अमेरिका-यूरोप को डुबो आए जयशंकर, हिले सारे पत्रकार संसद ने कहा कि दोनों प्रस्तावों पर पहले ही संसद और काउंसिल के वार्ताकारों के बीच सहमति बन चुकी थी, और यूरोपीय आयोग के मूल प्रस्तावों को और मज़बूत करने के लिए उनमें कई संशोधन भी किए गए थे। इस कानून में शामिल मुख्य प्रावधानों में से एक सनसेट क्लॉज़ है, जिसके तहत इंडस्ट्रियल और एग्री-फूड इंपोर्ट से जुड़े नियम 31 दिसंबर, 2029 को खत्म हो जाएंगे, जब तक कि उन्हें रिन्यू न किया जाए। यूरोपीय आयोग को 30 जून, 2029 तक EU के उद्योगों, खेती, छोटे और मध्यम आकार के उद्यमों और तीसरे देशों के साथ व्यापार के तरीकों पर इस नियम के असर का व्यापक मूल्यांकन करना होगा। अगर सही समझा जाए, तो इस समीक्षा के साथ नियम को आगे बढ़ाने का कानूनी प्रस्ताव भी लाया जा सकता है। इसे भी पढ़ें: 2 देशों ने हिंदी में मोदी पर किया बड़ा ऐलान, पूरी दुनिया हैरान! यह कानून स्टील और एल्युमीनियम से बनी चीज़ों पर US के टैरिफ से जुड़ी चिंताओं को भी दूर करता है। यूरोपीय संसद ने ध्यान दिलाया कि अमेरिका ने अगस्त 2025 में टैरिफ के दायरे में आने वाले स्टील और एल्युमीनियम से बनी चीज़ों की लिस्ट में 407 प्रोडक्ट कैटेगरी जोड़ी थीं, जिससे व्यापार में अनिश्चितता पैदा हुई। हाल ही में मंज़ूर किए गए उपायों के तहत, अगर अमेरिका 31 दिसंबर, 2026 तक EU के स्टील और एल्युमीनियम से बनी चीज़ों पर 15 प्रतिशत से ज़्यादा टैरिफ दरें लागू रखता है, तो आयोग के पास टैरिफ में दी गई रियायतों को रोकने का अधिकार होगा। इसे भी पढ़ें: मोदी ने पकड़ी अमेरिका के कई खतरनाक लोगों की गर्दन! दुनिया हैरान आयोग 1 दिसंबर, 2026 तक इन प्रोडक्ट्स पर टैरिफ के तौर-तरीकों के बारे में यूरोपीय संसद और काउंसिल को एक रिपोर्ट भी सौंपेगा। इसके अलावा, अगर अमेरिका उन EU एक्सपोर्ट्स पर टैरिफ से जुड़ी चिंताओं को दूर करने में नाकाम रहता है, जिन्हें 24 फरवरी, 2026 तक 15 प्रतिशत की ऑल-इनक्लूसिव टैरिफ सीमा का फ़ायदा मिल रहा था, तो आयोग टैरिफ रियायतों को रोक सकता है। रिलीज़ में कहा गया है, अगर अमेरिका उन EU एक्सपोर्ट्स पर टैरिफ से जुड़ी चिंताओं को दूर करने में नाकाम रहता है, जिन्हें 24 फरवरी, 2026 तक 15% की ऑल-इनक्लूसिव टैरिफ सीमा का फ़ायदा मिल रहा था, तो आयोग टैरिफ रियायतों को रोक सकेगा।
France में G7 Summit से PM Modi का दुनिया को बड़ा संदेश, Sustainable Planet के लिए भारत प्रतिबद्ध
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को कहा कि वह फ्रांस के एवियन-लेस-बेन्स शहर में G7 शिखर सम्मेलन में दुनिया के नेताओं के साथ बातचीत करने के लिए उत्सुक हैं। दुनिया के सात प्रमुख औद्योगिक देशों (G7) के नेता शिखर सम्मेलन में बातचीत के अपने पहले पूरे दिन की बैठक कर रहे हैं, जिसकी शुरुआत आधिकारिक तौर पर सोमवार को हुई थी। प्रधानमंत्री मोदी ने एक्स पर एक पोस्ट में बताया कि वह G7 शिखर सम्मेलन के लिए फ्रांस के एवियन पहुँच गए हैं। उन्होंने आगे कहा कि भारत एक ज़्यादा टिकाऊ और समृद्ध ग्रह के लिए सामूहिक प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। इससे पहले मंगलवार (स्थानीय समय) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बताया कि स्लोवाकिया की अपनी यात्रा पूरी करने के बाद वे स्विट्ज़रलैंड के जिनेवा पहुँच गए हैं। इसे भी पढ़ें: रिकॉर्ड के मोर्चे पर कौन भारी, कौन कमजोर फ्रांस 15 से 17 जून तक होने वाले 52वें G7 शिखर सम्मेलन का मेज़बान देश है। दुनिया के सात प्रमुख औद्योगिक देशों के समूह 'G7' में फ्रांस, अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन, जापान, इटली और कनाडा शामिल हैं। भारत भी एक सहयोगी देश के तौर पर 13वीं बार G7 शिखर सम्मेलन में हिस्सा ले रहा है और यह सम्मेलन प्रधानमंत्री मोदी की इस बैठक में लगातार सातवीं भागीदारी होगी। स्लोवाकिया की अपनी यात्रा के समापन पर प्रधानमंत्री ने इसे ऐतिहासिक और फलदायी बताया और कहा कि इस यात्रा के नतीजे दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को और मज़बूत करेंगे। भारत-स्लोवाकिया संबंधों की गर्मजोशी को दर्शाते हुए, स्लोवाकिया के प्रधानमंत्री रॉबर्ट फिको ने यात्रा पूरी होने के बाद प्रधानमंत्री मोदी को व्यक्तिगत रूप से विदा किया। इसे भी पढ़ें: France पहुंचे PM Modi, G7 Summit में वैश्विक चुनौतियों पर दुनिया को दिखाएंगे रास्ता अपनी यात्रा के दौरान, प्रधानमंत्री मोदी को स्लोवाकिया के राष्ट्रपति पीटर पेलेग्रिनी ने देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'द ऑर्डर ऑफ़ द व्हाइट डबल क्रॉस (फर्स्ट क्लास)' से सम्मानित किया। यह सम्मान किसी विदेशी देश द्वारा प्रधानमंत्री मोदी को दिया गया 33वां अंतरराष्ट्रीय सम्मान था। पीएम मोदी की यात्रा के दौरान, दोनों देशों ने शिक्षा, रिसर्च, टैलेंट मोबिलिटी और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में कई समझौतों (MoU) पर हस्ताक्षर किए, जिससे उनके संबंध और मजबूत हुए। स्लोवाकिया के प्रधानमंत्री रॉबर्ट फिको के साथ प्रतिनिधिमंडल-स्तर की बातचीत के बाद, ब्रातिस्लावा में प्रधानमंत्री मोदी की राजकीय यात्रा के दौरान जारी एक संयुक्त बयान में इन समझौतों को औपचारिक रूप दिया गया। इन पहलों में मुख्य रूप से टैलेंट मोबिलिटी, प्रोफेशनल सुरक्षा और उच्च शिक्षा व सांस्कृतिक क्षेत्रों में संस्थागत साझेदारी पर ध्यान दिया गया है।
G7 Summit में Japan ने खींची 'रेड लाइन', China की चुनौतियों से निपटने के लिए बनाया खास प्लान!
जापान की प्रधानमंत्री सनाए तकाइची ने मंगलवार को बताया कि G7 देशों के बीच वर्किंग डिनर के दौरान रूस-यूक्रेन संकट, पश्चिम एशिया में सुरक्षा हालात और चीन से जुड़ी चुनौतियों जैसे भू-राजनीतिक घटनाक्रमों पर चर्चा हुई। तकाइची ने बताया कि G7 के अपने समकक्षों के साथ बैठक के दौरान उन्होंने अहम खनिजों (critical minerals) को लेकर G7 की 'जॉइंट स्टॉकपाइलिंग कोलैबोरेशन इनिशिएटिव' (संयुक्त भंडारण सहयोग पहल) का प्रस्ताव रखा। एक्स पर एक पोस्ट में उन्होंने कहा कि कल रात वर्किंग डिनर में हमने कई अहम मुद्दों पर खुलकर चर्चा की, जिनमें मध्य पूर्व के हालात, यूक्रेन की स्थिति, इंडो-पैसिफिक के हालात और अहम खनिजों सहित सप्लाई चेन की मज़बूती शामिल है। तकाइची ने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से बिना किसी रुकावट के समुद्री व्यापार की ज़रूरत पर ज़ोर दिया और कहा कि मैंने फ़ारस की खाड़ी में फँसे सभी जहाजों को होर्मुज जलडमरूमध्य से गुज़रने देने के महत्व पर ज़ोर दिया। साथ ही, युद्ध में परमाणु बमबारी झेलने वाले एकमात्र देश के तौर पर, मैंने IAEA के सहयोग से ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकने का आह्वान किया। उन्होंने आगे कहा इसी क्रम में, होर्मुज़ संकट का ज़िक्र करते हुए, मैंने ज़रूरी खनिजों (critical minerals) के लिए G7 की 'संयुक्त स्टॉकपाइलिंग सहयोग पहल' (Joint Stockpiling Collaboration Initiative) का प्रस्ताव रखा। यह पहला G7 शिखर सम्मेलन है जिसमें तकाइची शामिल हो रही हैं। इसे भी पढ़ें: France पहुंचे PM Modi, G7 Summit में वैश्विक चुनौतियों पर दुनिया को दिखाएंगे रास्ता जापानी प्रधानमंत्री ने उत्तर कोरिया के पूरी तरह परमाणु-मुक्त होने के सिद्धांत के महत्व पर ज़ोर दिया। साथ ही, उन्होंने उत्तर कोरिया के परमाणु और मिसाइल विकास से निपटने और क्रिप्टोकरेंसी की चोरी – जो उसके लिए फंड का ज़रिया है – के ख़िलाफ़ जवाबी उपाय करने की ज़रूरत पर भी बात की। तकाइची ने एक्स पर लिखा, मैंने अपनी तरफ़ से इंडो-पैसिफ़िक क्षेत्र की स्थिति और चीन सहित वहाँ मौजूद विभिन्न चुनौतियों पर जापान की सोच और रुख़ के बारे में बताया। साथ ही, यह भी साफ़ किया कि G7 देश आपसी तालमेल के साथ इस पर प्रतिक्रिया देंगे। इसे भी पढ़ें: Iran Deal पर बोले Trump: दूसरा दौर आसान होगा, तेहरान को पैसा देने की बात 'बकवास' इस बीच, फ्रांस के एक रिसॉर्ट शहर में दुनिया भर के नेताओं के जमा होने के साथ ही, मंगलवार को G7 समिट के पहले सेशन में यूक्रेन में शांति बहाल करने पर ध्यान केंद्रित किया गया। रॉयटर्स के अनुसार, यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर ज़ेलेंस्की ने दिन के पहले सेशन में हिस्सा लिया, जो यूक्रेन में शांति कायम करने पर केंद्रित था। इस बैठक में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी मौजूद थे। रॉयटर्स के मुताबिक, ज़ेलेंस्की ट्रंप से अलग से बातचीत कर सकते हैं। यूक्रेन के राष्ट्रपति अन्य G7 नेताओं से भी अलग-अलग मुलाकात करेंगे। नेताओं के बीच यह बैठक कीव और मॉस्को के बीच बढ़ते तनाव के बीच हो रही है।
Iran Deal पर बोले Trump: दूसरा दौर आसान होगा, तेहरान को पैसा देने की बात 'बकवास'
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ बातचीत के अगले चरण को लेकर उम्मीद जताई। उन्होंने पश्चिम एशिया में तनाव खत्म करने के लिए इस्लामिक रिपब्लिक के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद कहा कि बातचीत का दूसरा चरण असल में आसान होगा। साथ ही, उन्होंने उन खबरों को सिरे से खारिज कर दिया जिनमें कहा गया था कि समझौते के तहत वॉशिंगटन तेहरान को आर्थिक मदद देगा। फ्रांस के एवियन में G7 समिट के दौरान कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल थानी के साथ द्विपक्षीय बैठक में ट्रंप ने दोहराया कि ईरान के साथ समझौता हो चुका है और इसे निष्पक्ष और अच्छा समझौता बताया। इसे भी पढ़ें: Hormuz में ईरान का 'माइन' गेम, US Peace Deal के बावजूद Global Oil Supply पर मंडराया संकट ट्रंप ने कहा, ईरान के साथ हमारा समझौता हो गया है और यह सफल होना चाहिए। अब यह दूसरे चरण में जा रहा है, जो मुझे लगता है कि असल में आसान होगा। अमेरिकी राष्ट्रपति ने बातचीत के पहले चरण के दौरान ईरान के खिलाफ हालिया सैन्य कार्रवाई का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि हालांकि वे हमले करने से बचना चाहते थे, लेकिन हालात ने उनके प्रशासन के सामने सीमित विकल्प ही छोड़े थे। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि मैं पिछले हफ़्ते उन पर हमला नहीं करना चाहता था, लेकिन हमारे पास कोई चारा नहीं था, और असल में हमने दो बार ऐसा किया। हम तीसरी बार ऐसा कर रहे हैं, और हम ऐसा न करने की स्थिति में भी हो सकते थे, लेकिन हमारे पास एक उचित समझौता है। यह एक अच्छा समझौता है। ट्रंप ने उन अटकलों को भी खारिज कर दिया कि वॉशिंगटन किसी समझौते के तहत ईरान में पैसा निवेश करेगा। उन्होंने ऐसी खबरों को बेतुका बताया। उन्होंने कहा कि वैसे, हम ईरान में कोई पैसा निवेश नहीं कर रहे हैं; कल यह अफवाह उड़ी थी, जो बेतुकी थी। अमेरिका का रुख दोहराते हुए ट्रंप ने कहा कि हम कोई पैसा निवेश नहीं कर रहे हैं। ईरान में पैसा निवेश करने की हमारी कोई बाध्यता नहीं है। इसे भी पढ़ें: डील हो या ना हो, मैं ईरान को...ट्रंप पर फूटा नेतन्याहू का गुस्सा CNN के अनुसार, अधिकारियों ने बताया कि बातचीत के अगले चरण में ईरान के परमाणु कार्यक्रम के तकनीकी पहलुओं, तेहरान को आर्थिक राहत देने से जुड़े मुद्दों और होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को फिर से खोलने के तरीकों पर ध्यान केंद्रित किए जाने की उम्मीद है। साथ ही, खाड़ी देशों द्वारा वित्तपोषित 300 बिलियन अमेरिकी डॉलर के प्रस्तावित पुनर्निर्माण कोष पर भी चर्चा होगी। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने CBS के साथ एक साक्षात्कार में कहा कि ईरान को पुनर्निर्माण कोष तक पहुंच मिल सकती है, बशर्ते वह समझौते में उल्लिखित कुछ शर्तों और दायित्वों को पूरा करे। यह देखते हुए कि संयुक्त राज्य अमेरिका मेज पर मौजूद कई विकल्पों के लिए खुला है, वेंस ने उन दावों को खारिज कर दिया कि प्रस्तावित समझौते में ईरान की 24 बिलियन अमेरिकी डॉलर की फ्रीज की गई संपत्ति को जारी करना शामिल है। ट्रम्प ने कहा कि ईरान के साथ समझौता पूरा हो गया है और शुक्रवार को समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद रणनीतिक जलमार्ग फिर से खुल जाएगा। उन्होंने आगे कहा कि इस शानदार समझौते का उद्देश्य पूरे क्षेत्र में शांति और सुरक्षा लाना है।
डील हो या ना हो, मैं ईरान को...ट्रंप पर फूटा नेतन्याहू का गुस्सा
अमेरिका और ईरान के बीच हुए नए समझौते को लेकर जहां वाशिंगटन इसी बड़ी कूटनीतिक सफलता बता रहा। वहीं इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेहू इस डील से पूरी तरह संतुष्ट नजर नहीं आ रहे। नेतन्याहू ने साफ शब्दों में कहा है कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना इजराइल की सबसे बड़ी प्राथमिकता है और इस मुद्दे पर उनकी और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की सोच हमेशा एक जैसी नहीं होती। अमेरिका और ईरान समझौते के सार्वजनिक होने के बाद नेतन्याहू ने कहा कि इजराइल ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर ईरान से पैदा हुए परमाणु खतरे को काफी हद तक कमजोर किया है। लेकिन लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई। समझौता हो या ना हो ईरान को कभी परमाणु हथियार नहीं बनाने दिया जाएगा। इसे भी पढ़ें: Donald Trump की 'शांति डील' को Israel का बड़ा झटका, कहा- ये समझौता हम पर लागू नहीं होता नेतन्याहू ने कहा कि ट्रंप और उनके बीच मजबूत साझेदारी लेकिन कई बार दोनों नेताओं की राय अलग भी हो सकती है। उनके मुताबिक इजराइल अपनी सुरक्षा को लेकर कोई समझौता नहीं करेगा और ईरान के परमाणु कार्यक्रम के खिलाफ कार्रवाई जारी रखेगा। उन्होंने कहा कि दशकों से ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना उनका मिशन रहा है और वह भविष्य में भी इसी नीति पर कायम रहेंगे। इजराइली प्रधानमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि ईरान और उसके सहयोगी संगठन के खिलाफ अभियान अभी जारी रहेगा। उन्होंने लेबनान का जिक्र करते हुए कहा कि इजराइली सेना जरूरत पड़ने तक सुरक्षा क्षेत्रों में मौजूद रहेगी और किसी भी संभावित खतरे को रोकने के लिए कारवाई की पूरी स्वतंत्रता बनाए रखेगी। नेतन्याहू के मुताबिक हाल के सैन अभियानों में इजराइल ने ऐसे कई इलाकों पर नियंत्रण हासिल किया जिनका इस्तेमाल पहले उसके खिलाफ किया जाता था। दरअसल नेतन्याहू का यह बयान ऐसे वक्त पर सामने आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच लंबे तनाव के बाद एक समझौते की रूपरेखा सामने आई। इसे भी पढ़ें: US-Iran Deal से इजरायल बाहर! क्या समझौते का होगा पालन, ट्रंप vs नेतन्याहू अब होने वाला है? वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया कि ईरान ने यह वादा किया है कि वो किसी परमाणु हथियार को नहीं बनाएगा। ट्रंप ने उन खबरों को भी खारिज किया जिनमें कहा गया था कि अमेरिका ईरान को $300 अरब डॉलर की आर्थिक सहायता देगा। उन्होंने इसे पूरी तरह फर्जी बताया। वहीं अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे डी वांस ने भी इस समझौते का समर्थन करते हुए कहा कि ट्रंप की कूटनीति एक बार फिर सफल रही और इस डील का सबसे बड़ा उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ईरान परमाणु हथियार विकसित ना करें। अमेरिकी प्रशासन के अनुसार यह समझौता भविष्य की बातचीत का ढांचा तैयार करता है जिसमें परमाणु निरीक्षण, यूरेनियम एनरचमेंट की निगरानी और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे शामिल थे। वहीं सूत्रों के मुताबिक समझौते के तहत ईरान को कुछ आर्थिक राहत मिल सकती है। लेकिन यह राहत तभी मिलेगी जब तेहरान परमाणु कार्यक्रम पर निगरानी और सत्यापन की शर्तों का पालन करें।
सुंदर पिचाई के भाषण के दौरान स्टैनफोर्ड के 200 ग्रेजुएट्स ने वॉकआउट किया : रिपोर्ट
गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई को स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में भाषण के दौरान करीब 200 छात्रों के वॉकआउट का सामना करना पड़ा। ऐसा तब हुआ, जब उन्होंने छात्रों की नाराजगी से बचने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का जिक्र नहीं किया। यह जानकारी रिपोर्ट में दी गई।
Imran Khan की बहन Aleema Khanum ने PIMS के इलाज पर उठाए गंभीर सवाल, मांगी स्वतंत्र जांच
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के प्रमुख इमरान खान की बहन अलीमा खानम ने जेल में बंद नेता की स्वतंत्र मेडिकल जांच की मांग की है। उन्होंने आरोप लगाया कि खान को फिर से इस्लामाबाद के पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (PIMS) ले जाया गया था और कहा कि परिवार उनकी सेहत या आंखों की रोशनी के बारे में अस्पताल की ओर से जारी किसी भी मेडिकल रिपोर्ट को स्वीकार नहीं करेगा। एक्स पर पोस्ट किए गए एक बयान में अलीमा ने कहा कि परिवार को खबर मिली थी कि खान को 15 जून की सुबह अदियाला जेल से PIMS ले जाया गया था, और उन्हें इस बात का पता उसी दिन सुबह बाद में PTI चेयरमैन बैरिस्टर गोहर की सोशल मीडिया पोस्ट से चला। उन्होंने एक्स पर लिखा कि हमें खबर मिली है कि इमरान खान को 15 जून की सुबह फिर से PIMS ले जाया गया। हमें यह जानकारी 15 जून की सुबह बैरिस्टर गोहर के एक ट्वीट से मिली। अलीमा ने लिखा हम इमरान खान की हालत के बारे में PIMS की ओर से जारी किसी भी मेडिकल रिपोर्ट को नहीं मानते। उन्होंने आरोप लगाया कि संस्थान के पहले के दावों पर बाद में सवाल उठाए गए थे। उन्होंने पहले किए गए उन दावों का ज़िक्र किया जिनमें कहा गया था कि खान की 90 प्रतिशत नज़र वापस आ गई है; उन्होंने बताया कि जब बाद में उनके वकील ने अदियाला जेल में उनसे मुलाक़ात की, तो ख़ुद इमरान खान ने इस दावे को खारिज कर दिया था। इसे भी पढ़ें: Patna Coaching War: रौशन आनंद का Khan Sir पर सनसनीखेज आरोप, 'भाई की हत्या की साज़िश रची' खान के इलाज के आधिकारिक विवरण पर सवाल उठाते हुए अलीमा ने पूछा, इमरान खान को पांचवें इंजेक्शन की क्या ज़रूरत है? उन्होंने कहा कि परिवार सरकार के स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं है और मांग करता है कि क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान खान की जांच और इलाज इस्लामाबाद के शिफा इंटरनेशनल अस्पताल में स्वतंत्र, योग्य विशेषज्ञों द्वारा किया जाए। इसे भी पढ़ें: Patna Police सवालों के घेरे में! Roshan Anand का आरोप - किसके दबाव में Khan Sir को बचाया जा रहा है? इमरान खान की दृष्टि हानि के दावे अलीमा की ये टिप्पणियां 73 वर्षीय पूर्व प्रधानमंत्री के स्वास्थ्य, विशेष रूप से उनकी बिगड़ती दृष्टि को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच आई हैं। फरवरी में खान को रावलपिंडी की अडियाला जेल से कड़ी सुरक्षा के बीच दृष्टि हानि से संबंधित आगे के इलाज के लिए पीआईएमएस ले जाया गया था। पिछली मुलाकातों के बाद जारी किए गए अस्पताल के आधिकारिक बयानों के अनुसार, खान को इंट्राविट्रियल एंटी-वीईजीएफ इंजेक्शन दिए गए थे - यह रेटिना रोग के इलाज और दृष्टि को संरक्षित करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली एक विशेष प्रक्रिया है। एक मेडिकल बोर्ड ने उनका आकलन किया।
IAF का गेम चेंजर Kamikaze Drone: China को सीधी चुनौती, बनेगा आत्मनिर्भर भारत का 'ब्रह्मास्त्र'
भारतीय वायु सेना (IAF) ने घरेलू इंडस्ट्री पार्टनर्स के साथ मिलकर स्वदेशी लंबी दूरी वाले कामिकेज़ ड्रोन विकसित करने का एक प्रोजेक्ट शुरू किया है। इसका मकसद आत्मनिर्भरता बढ़ाना और भविष्य में होने वाले अपग्रेड और बदलावों पर बेहतर कंट्रोल हासिल करना है। IAF ने फिक्स्ड-विंग, वन-वे अटैक अनमैन्ड एरियल सिस्टम (OWA-UAS) – जिन्हें आम तौर पर कामिकेज़ ड्रोन कहा जाता है। उसके विकास के लिए भारतीय कंपनियों को चुनने के वास्ते एक लिमिटेड टेंडर इन्क्वायरी जारी की है। इस प्रोजेक्ट का कोऑर्डिनेशन कोयंबटूर के सुलूर में मौजूद वायु सेना के 5 बेस रिपेयर डिपो (BRD) द्वारा किया जाएगा, जो नोडल एजेंसी के तौर पर काम करेगा। खरीद के आम प्रोग्राम के उलट, जिनमें सेना ज़रूरतें बताती है और इंडस्ट्री प्रोडक्ट बनाती है, IAF डिज़ाइन और डेवलपमेंट प्रोसेस में सीधे तौर पर शामिल होगी। उम्मीद है कि इस कदम से सर्विस को बदलते ऑपरेशनल ज़रूरतों के हिसाब से प्लेटफ़ॉर्म को ढालने में ज़्यादा फ़्लेक्सिबिलिटी मिलेगी। इसे भी पढ़ें: US Iran Peace Treaty | 300 अरब डॉलर का वो 'सीक्रेट' पन्ना, जिसने अमेरिका-ईरान की महाडील पर लगाया ब्रेक! ट्रंप बोले- 'यह झूठ है!' तकनीकी ज़रूरतों के अनुसार, ड्रोन 16,000 फ़ीट तक की ऊंचाई पर काम करने, दिन और रात दोनों स्थितियों में चलने और कम से कम 30 किलोग्राम का मॉड्यूलर पेलोड ले जाने में सक्षम होना चाहिए। इस प्लेटफ़ॉर्म से कई तरह के मिशन कॉन्फ़िगरेशन को सपोर्ट करने की उम्मीद है, जिनमें सटीक हमले (precision-strike), हवाई डेटा रिले और सेंसर-आधारित मिशन शामिल हैं। इस प्रोजेक्ट में एक ऐसे अत्यधिक ऑटोनॉमस सिस्टम की भी परिकल्पना की गई है जो बहुत कम मानवीय हस्तक्षेप के साथ लॉन्च, वे-पॉइंट नेविगेशन, लोइटरिंग (हवा में चक्कर लगाना) और मिशन को पूरा करने में सक्षम हो। ऑपरेशनल ज़रूरतों के आधार पर, ड्रोन में 'रिटर्न-टू-बेस' (बेस पर वापस लौटने) की सुविधा भी शामिल की जा सकती है। इसे भी पढ़ें: Air India Express की Jeddah फ्लाइट में हवा में आई खराबी, Kannur में हुई Emergency Landing इस प्रोग्राम की एक खास बात यह है कि IAF इससे जुड़े इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स (IPR) अपने पास रखना चाहती है। डिफेंस सूत्रों का कहना है कि इससे लंबे समय तक ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी बनी रहेगी और भविष्य में सुधारों के लिए बाहरी वेंडर्स पर निर्भरता कम होगी। प्रोजेक्ट से जुड़े एक सूत्र ने कहा, डिज़ाइन और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी का मालिकाना हक अपने पास रखने से एयर फ़ोर्स को ऑपरेशनल ज़रूरतों के हिसाब से सिस्टम में बदलाव, अपग्रेड और कस्टमाइज़ेशन करने की क्षमता मिलेगी। इससे वेंडर-कंट्रोल्ड टेक्नोलॉजी की पाबंदियों के बिना तेज़ी से क्षमता बढ़ाई जा सकेगी, जिससे एक निर्णायक बढ़त मिलेगी। IAF ने यह भी अनिवार्य किया है कि प्रोजेक्ट का डिज़ाइन, डेवलपमेंट और मैन्युफैक्चरिंग भारत में ही हो और इसमें स्वदेशी कंपोनेंट्स और सिस्टम को प्राथमिकता दी जाए। ड्रोन में चीन की टेक्नोलॉजी, कंपोनेंट्स और मटीरियल का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए; यह सुरक्षित और भरोसेमंद सप्लाई चेन के लिए सेना की लगातार कोशिशों को दिखाता है।
France पहुंचे PM Modi, G7 Summit में वैश्विक चुनौतियों पर दुनिया को दिखाएंगे रास्ता
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के न्योते पर फ्रांस के एवियन-लेस-बेन्स में हो रहे 52वें G7 शिखर सम्मेलन में हिस्सा ले रहे हैं। वे G7 देशों और सहयोगी देशों के नेताओं के साथ मिलकर आर्थिक अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस गवर्नेंस और सस्टेनेबल डेवलपमेंट जैसी अहम वैश्विक चुनौतियों पर चर्चा करेंगे। शिखर सम्मेलन के व्यापक एजेंडे के बीच, सबकी नज़रें बुधवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ मोदी की होने वाली द्विपक्षीय बैठक पर टिकी हैं, जिसमें दोनों नेताओं के बीच व्यापार, वीज़ा, ऊर्जा सहयोग और व्यापक रणनीतिक संबंधों पर चर्चा होने की उम्मीद है। इसे भी पढ़ें: राजनाथ सिंह के घर आधी रात तक BJP-RSS नेताओं ने किया मंथन, पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारियों की नई सूची तैयार G7 समिट के लिए प्रधानमंत्री एवियन पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी G7 समिट में शामिल होने के लिए फ्रांस के एवियन-लेस-बेन्स पहुंचे। बैठक से पहले उन्होंने कहा दुनिया के नेताओं से बातचीत करने और अहम वैश्विक मुद्दों पर विचार-विमर्श करने का बेसब्री से इंतज़ार है। भारत एक ज़्यादा टिकाऊ और समृद्ध दुनिया के लिए सामूहिक प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है। G7 समिट के लिए फ्रांस के एवियन पहुंचा। दुनिया के नेताओं से बातचीत करने और अहम वैश्विक मुद्दों पर विचार-विमर्श करने का बेसब्री से इंतज़ार है। भारत एक ज़्यादा टिकाऊ और समृद्ध दुनिया के लिए सामूहिक प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।
Hormuz में ईरान का 'माइन' गेम, US Peace Deal के बावजूद Global Oil Supply पर मंडराया संकट
अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते के बाद आने वाले दिनों में होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) खुल सकता है; इस समझौते पर 19 जून को स्विट्जरलैंड में हस्ताक्षर होने हैं। हालांकि इस समझौते ने दुनिया के सबसे अहम शिपिंग रूट में से एक के लंबे समय तक बाधित रहने की तत्काल चिंताओं को कम कर दिया है, लेकिन समुद्री मामलों के जानकारों का कहना है कि कामकाज के पूरी तरह सामान्य होने में काफी समय लग सकता है। इंडस्ट्री के अधिकारियों और समुद्री सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि दुनिया के सबसे अहम एनर्जी कॉरिडोर में से एक से होने वाला कमर्शियल ट्रैफिक कई हफ़्तों तक सीमित रह सकता है। समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्हें इस बात की चिंता है कि इस जलमार्ग और इसके आस-पास नेवल माइन्स (समुद्री बारूदी सुरंगें) हो सकती हैं; यह एक ऐसा खतरा है जो लड़ाई खत्म होने के बाद भी शिपिंग पर असर डाल सकता है। इसे भी पढ़ें: US-Iran Deal से इजरायल बाहर! क्या समझौते का होगा पालन, ट्रंप vs नेतन्याहू अब होने वाला है? पश्चिमी समुद्री सुरक्षा सूत्रों के अनुमान के मुताबिक, जलडमरूमध्य (स्ट्रेट) को साफ़ करने और सुरक्षित नेविगेशन रूट बनाने में 40 से 50 दिन लग सकते हैं। इस दौरान, शिपिंग कंपनियों, बीमा कंपनियों और एनर्जी फर्मों का इस रूट पर भरोसा फिर से बहाल होने से पहले, इलाके की जांच और सुरक्षा के लिए माइनस्वीपर और अंडरवाटर ड्रोन तैनात किए जा सकते हैं। इसे भी पढ़ें: Donald Trump का बड़ा बयान- ईरान को नहीं देंगे 300 अरब डॉलर, Peace Deal की खबर 'Fake News' माइन्स (बारूदी सुरंगें) क्यों एक बड़ी चिंता का विषय बनी हुई हैं? संघर्ष से पहले, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से दुनिया की रोज़ाना की तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) सप्लाई का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा गुज़रता था। समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, माइन्स की थोड़ी सी संख्या भी कीमती सामान ले जा रहे बड़े कमर्शियल जहाज़ों के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती है। ईरान ने इस जलमार्ग पर अपना नियंत्रण जमाने की कोशिशों के तहत, संघर्ष के दौरान नेवल माइन्स (समुद्री बारूदी सुरंगों) का इस्तेमाल करने की बार-बार धमकी दी थी। हालांकि तेहरान ने इस बात की पुष्टि नहीं की है कि असल में माइन्स तैनात की गई थीं या नहीं, लेकिन अमेरिका का कहना है कि यह खतरा वास्तविक है और उसने माइन्स बिछाने के काम में शामिल ईरानी जहाजों को निशाना बनाया है। 2 जून को, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने सीनेट की विदेश संबंध समिति की सुनवाई में बताया कि ईरान ने होर्मुज़ के बड़े हिस्से जो अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र है में बारूदी सुरंगें (माइन्स) बिछाई थीं, हालांकि उन्होंने इस बारे में और जानकारी नहीं दी। बाद में जर्मनी की नौसेना ने कहा कि अमेरिकी और ब्रिटिश नौसेनाओं से मिली जानकारी से पता चला है कि जलडमरूमध्य (स्ट्रेट) के आसपास चार जगहों पर बारूदी सुरंगें देखी गई थीं; हालांकि बर्लिन ने यह भी कहा कि उसने इन रिपोर्टों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की है।
ब्रिटेन में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर लग सकती है रोक, सरकार कर रही है विचार
सोशल मीडिया प्रतिबंध का मुद्दा ऐसे समय सामने आया है जब सत्तारूढ़ लेबर पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर चर्चाएं तेज हैं। कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि पार्टी के अंदर प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के नेतृत्व को लेकर असंतोष बढ़ रहा है।
बी-52 बॉम्बर क्रैश: टेकऑफ के तुरंत बाद मौत की उड़ान
कैलिफोर्निया के मोजावे रेगिस्तान में एडवर्ड्स एयर फोर्स बेस से उड़ान भरने के तुरंत बाद अमेरिकी एयर फोर्स का बी-52 स्ट्रैटोफोर्ट्रेस क्रैश हो गया। इस भयानक हादसे में आठ लोगों की मौत हो गई

