स्विट्जरलैंड, फ्रांस, जर्मनी… ये नाम सुनते ही दिमाग में एक तस्वीर बनती है। उस तस्वीर में अकसर साफ-सुथरी सड़कें, बर्फीले पहाड़ और मौसम का लुत्फ उठाते लोग होते हैं। लेकिन इस वक्त हकीकत कुछ और है। यूरोप के ये देश रिकॉर्ड गर्मी में जल रहे हैं। सड़कें पिघल रहीं, पटरियां उखड़ रहीं। पिछले 7 दिनों में हीटवेव ने 1300 से ज्यादा लोगों की जान ले ली। गर्मी से बचने को लोग नदियों-तालाबों में कूद रहे, जिससे फ्रांस में 55 लोग डूब गए। आखिर यूरोप में ऐसा क्यों हो रहा और ये गर्मी भारत से अलग कैसे है, आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: यूरोप के देशों में कैसी गर्मी पड़ रही है? जवाबः पहले 3 तस्वीरों में हीटवेव का मंजर… यूरोप की कुल आबादी करीब 74 करोड़ है। इनमें से 19 करोड़ लोग 35 डिग्री से ज्यादा तापमान झेल रहे हैं। देखिए यूरोप के शहरों में गर्मी का हाल… सवाल-2: भारत में इतना तापमान सामान्य गर्मी माना जाता है, फिर यूरोप में हाहाकार क्यों? जवाबः यूरोप दुनिया के ठंडे रिहायशी महाद्वीप में से एक हैं। यहां पूरा सिस्टम ठंड के हिसाब से बना है, न कि जानलेवा गर्मी के लिए। यूरोप का मौजूदा ढांचा इतनी गर्मी झेलने के लिए तैयार नहीं है… 1. पुराने घर गर्मी अंदर सोख लेते हैं 2. एयर कंडीशनर की कमी 3. ज्यादा बुजुर्ग आबादी एनर्जी एंड क्लाइमेट पॉलिसी एक्सपर्ट सिद्धांत सिंह बताते हैं कि भारत की तुलना में यूरोप में सूरज की रोशनी ज्यादा देर तक रहती है। इससे गर्मी की तीव्रता बढ़ जाती है। इस वक्त यूरोप में 16 घंटे सूरज रहता है, जबकि भारत में 12-13 घंटे। यूरोप की मौजूदा गर्मी ज्यादा सूखी है और हवाएं भी नहीं चल रही। लोगों को ऐसी गर्मी की आदत भी नहीं है। इसलिए लोग ज्यादा घुटन महसूस कर रहे हैं। सवाल-3: यूरोप में इस रिकॉर्ड गर्मी की वजह क्या है? जवाबः 3 बड़ी वजहें हैं… 1. ओमेगा ब्लॉक से रुकी मौसमी हवाएं 2. हीट डोम से यूरोप में गर्मी का गुबार बना 3. ग्लोबल वॉर्मिंग से हालात और ज्यादा खराब सवाल-4: इस गर्मी से यूरोप को कब तक राहत मिलेगी? जवाब: मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक हीट डोम धीरे-धीरे पश्चिम यूरोप से पूर्व की तरफ खिसकेगा। अंटार्कटिक की तरफ से सर्द हवाएं आएंगी, जो राहत देंगी। फ्रांस के पश्चिमी हिस्से में इस हफ्ते से राहत मिलनी शुरू होगी। बाकी हिस्सों में 1 जुलाई तक मौसम गर्म ही रहेगा। जर्मनी, इटली और ब्रिटेन में भी 30 जून तक तापमान कम होगा। हालांकि यह राहत कुछ दिनों की ही रहेगी। मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक जुलाई में यूरोप के ऊपर एक और हीट डोम एक्टिव हो सकता है। इसका असर पश्चिम और मध्य यूरोप में रहेगा। स्पेन, पुर्तगाल, फ्रांस, जर्मनी, दक्षिण इंग्लैंड, उत्तर इटली में 6 से 9 दिन ज्यादा गर्मी और हीटवेव पड़ेगी। 7 से 10 जुलाई के बीच यह हीट डोम एक्टिव हो सकता है। यह अभी की गर्मी से ज्यादा खतरनाक हो सकता है। पहली हीटवेव ने मिट्टी को सुखा दिया है। सड़कों और इमारतों को गर्म कर दिया है। शहरों में नमी वैसे ही कम हो गई है। ऐसे में लगातार दूसरी हीटवेव शहरों को और ज्यादा गर्म करेगी। अमेरिका की क्लाइमेट इम्पैक्ट कंपनी के मुताबिक अगस्त तक यूरोप में गर्म मौसम बना रहेगा। उस पर इस साल एल-नीनो की वजह से यूरोप में सूखा पड़ने की भी आशंका है। -------- ये खबर भी पढ़िए… आज का एक्सप्लेनर: 194 साल के ‘जोनाथन’ की कहानी, पीएम मोदी के दौरे से सुर्खियों में; 39 अमेरिकी राष्ट्रपति देख चुका, 140 साल छोटी गर्लफ्रेंड पीएम मोदी 27 जून को सेशेल्स दौरे पर गए। दर्जनों खबरें चलीं- ‘मोदी यहां दुनिया के सबसे बुजुर्ग जानवर जोनाथन से मिलेंगे।’ पीएम मोदी कछुओं से मिले भी, लेकिन उनमें जोनाथन नहीं था। दरअसल, जोनाथन सेशेल्स में है ही नहीं। वो तो 7 हजार किमी दूर एक ब्रिटिश टापू सेंट हेलेना में है। पूरी खबर पढ़िए…
वैश्विक राजनीति के मंच पर भारत का मान लगातार बढ़ रहा है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अब तक दुनिया के 34 देश अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाज चुके हैं. लेकिन देश के भीतर अक्सर घरेलू राजनीति में प्रधानमंत्री पद की गरिमा और मर्यादा को तार-तार करने वाले बयान सामने आते रहते हैं. इस बीच, भारत के संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्षी नेताओं के इस आचरण को लेकर ब्रिटेन (UK) के वेस्टमिंस्टर संसदीय मॉडल का एक ऐसा उदाहरण पेश किया है, जिसने देश के राजनीतिक गलियारों और सोशल मीडिया पर एक नई कानूनी बहस छेड़ दी है. किरेन रिजिजू ने ब्रिटिश संसद का एक वीडियो साझा करते हुए सवाल उठाया है कि क्या भारत को भी पीएम पद की संवैधानिक मर्यादा बनाए रखने के लिए अंग्रेजों के कड़े नियमों को अपनाना चाहिए?ब्रिटिश संसद में क्या हुआ था? जानिए पाकिस्तानी मूल की सांसद के सस्पेंशन की इनसाइड स्टोरीयह पूरा मामला इसी साल अप्रैल महीने का है, जब ब्रिटेन की संसद (House of Commons) में अमेरिका के राजदूत के रूप में पीटर मैंडेलसन की नियुक्ति को लेकर गरमागरम बहस चल रही थी. इसी दौरान लेबर पार्टी की सांसद और पाकिस्तानी मूल की ब्रिटिश नागरिक जारा सुल्ताना (Zarah Sultana) ने तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर पर तीखा व्यक्तिगत हमला बोल दिया. उन्होंने पीएम कीर स्टार्मर को 'बेयर-फेस्ड लायर' यानी सीधे तौर पर 'निर्लज्ज झूठा' कह दिया. जारा सुल्ताना ने सदन में कहा था कि प्रधानमंत्री पीटर मैंडेलसन का बचाव इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वे उनके निजी हितों के लिए काम करते हैं और ऐसा करके प्रधानमंत्री पूरे देश को धोखा दे रहे हैं.जैसे ही जारा सुल्ताना के मुंह से 'झूठा' शब्द निकला, ब्रिटिश संसद के स्पीकर सर लिंडसे हॉयल ने तुरंत दखल दिया. उन्होंने जारा सुल्ताना को आदेश दिया कि वे अपने इस असंसदीय शब्द को तुरंत वापस लें और मर्यादा में रहें. लेकिन जब जारा सुल्ताना ने अपना बयान वापस लेने से साफ इनकार कर दिया, तो स्पीकर ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा—'बैठ जाओ और तुरंत सदन से बाहर जाओ.' नियमों की अवहेलना करने पर जारा सुल्ताना को तत्काल प्रभाव से 5 दिनों के लिए संसद से निलंबित (Suspend) कर दिया गया. इसी दिन रिफॉर्म यूके के एक अन्य सांसद ली एंडरसन को भी प्रधानमंत्री को 'झूठा' कहने के कारण सदन से बाहर का रास्ता दिखाया गया था.आखिर क्यों ब्रिटेन में पीएम के अपमान पर तुरंत होती है जेल और सस्पेंशन जैसी कार्रवाई?ब्रिटेन का वेस्टमिंस्टर मॉडल अपनी संसदीय परंपराओं और भाषा की शुचिता के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है. वहां की रूलबुक के अनुसार, संसद के भीतर कुछ खास शब्दों के इस्तेमाल पर पूरी तरह से कानूनी पाबंदी है. ब्रिटिश संसदीय नियमों के तहत:प्रतिबंधित शब्द: सदन के अंदर किसी भी सदस्य को 'लायर' (झूठा) या 'डिसऑनेस्ट' (बेईमान) कहना पूरी तरह वर्जित है.नीतियों बनाम व्यक्तिगत टिप्पणी: कोई भी सांसद सरकार की नीतियों, फैसलों और बजट की कितनी भी कड़ी आलोचना कर सकता है, लेकिन वह देश के प्रधानमंत्री पर किसी भी प्रकार की व्यक्तिगत या अमर्यादित टिप्पणी नहीं कर सकता.स्पीकर के असीमित अधिकार: यदि कोई सांसद इन नियमों को तोड़ता है, तो स्पीकर के पास उसे बिना किसी देरी के तुरंत सदन से निष्कासित करने का पूर्ण अधिकार होता है.भारत के नियम क्या कहते हैं और यहाँ कार्रवाई क्यों नहीं होती?ब्रिटेन के इस कड़े एक्शन की तुलना अगर भारतीय संसद से की जाए, तो तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आती है. भारत में भी लोकसभा और राज्यसभा की रूलबुक के नियम 380 और 381 के तहत सदन में असंसदीय भाषा (Unparliamentary Language) के इस्तेमाल पर पूरी तरह प्रतिबंध है. इसके अलावा नियम 222 के तहत विशेषाधिकार हनन (Breach of Privilege) की कार्रवाई का भी प्रावधान है. भारत में राहुल गांधी से लेकर मल्लिकार्जुन खरगे और अधीर रंजन चौधरी जैसे कई बड़े नेता समय-समय पर प्रधानमंत्री के खिलाफ 'चोर' या 'कायर' जैसे शब्दों का प्रयोग कर चुके हैं.लेकिन भारत में राजनीतिक और दलीय दबाव के कारण अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल होने पर सदन में सिर्फ भारी हंगामा और नारेबाजी होती है, मगर सांसदों के खिलाफ वैसी त्वरित और कड़ी निलंबन की कार्रवाई देखने को नहीं मिलती जैसी ब्रिटेन में हुई. भारतीय संसद में ज्यादा से ज्यादा यह होता है कि स्पीकर के आदेश पर उन विवादित शब्दों को सदन की आधिकारिक कार्यवाही के रिकॉर्ड (Expunged from Records) से हटा दिया जाता है, लेकिन अपराधी सांसद पर कोई बड़ा एक्शन नहीं हो पाता. यही वजह है कि संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू अब भारत में एक ऐसा मजबूत स्वदेशी संसदीय ढांचा बनाने की वकालत कर रहे हैं, जो प्रधानमंत्री के संवैधानिक पद की गरिमा की रक्षा करे और नेताओं को जनता के प्रति अधिक जिम्मेदार बनाए.
बलोचिस्तान में पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी ISI के खिलाफ बलोच नागरिकों का गुस्सा एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है. बलोच विद्रोह और आजादी की आवाज को दबाने के लिए पाकिस्तानी सेना द्वारा निर्दयता के साथ किए जा रहे अपहरण, जबरन गुमशुदगी (Enforced Disappearances) और 'किल एंड डंप' नीति के खिलाफ प्रमुख बलोच मानवाधिकार कार्यकर्ता सम्मी दीन बलोच (Sammi Deen Baloch) ने एक दिल दहला देने वाला खुला पत्र लिखा है.अपने इस पत्र के जरिए उन्होंने सीधे तौर पर पाकिस्तान सरकार और सेना से अपने लापता पिता को लेकर कड़े सवाल पूछे हैं. सम्मी दीन बलोच ने अपनी भावुक और रोंगटे खड़े कर देने वाली अपील में लिखा है, अगर मेरे अब्बा जिंदा हैं तो उन्हें वापस लौटा दो और अगर आपने उन्हें मार दिया है, तो हमें और तड़पाने के बजाय उनका डेथ सर्टिफिकेट दे दो. इस खुले पत्र ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान में हो रहे मानवाधिकारों के हनन और बलोच नरसंहार को बेनकाब कर दिया है.17 साल का अंतहीन इंतजार: डॉ. दीन मोहम्मद बलोच की गुमशुदगी की दर्दनाक कहानीबलोच एक्टिविस्ट सम्मी दीन बलोच ने अपने पिता डॉ. दीन मोहम्मद बलोच के जबरन अपहरण और लापता होने की 17वीं बरसी पर रविवार (28 जून 2026) को यह खुला पत्र जारी किया. अपनी मार्मिक अपील में सम्मी दीन ने लिखा कि पिछले दो दशकों से चल रही इस अनिश्चितता के बाद अब उनके परिवार को यह जानने का पूरा कानूनी और मानवीय हक है कि उनके पिता किस हाल में हैं.पेशा से सरकारी चिकित्सक डॉ. दीन मोहम्मद बलोच को 28 जून 2009 की रात बलोचिस्तान के खुजदार जिले से पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों और सेना के अधिकारियों ने जबरन हिरासत में लिया था. उस काली रात के बाद से आज तक, यानी पिछले 17 सालों में डॉ. दीन मोहम्मद का कोई अता-पता नहीं है. उनका परिवार आज भी उनकी सुरक्षित वापसी की आस में जी रहा है.'याचिकाएं, लाठियां और आंसू गैस ही मेरी विरासत बन गईं'अपने पिता के लापता होने के गहरे दुख और दर्द को बयां करते हुए सम्मी दीन बताती हैं कि वह अपने पिता के जीवित या मृत होने के सच से अनजान रहते हुए ही बड़ी हुईं. उन्होंने अपने पत्र में लिखा, बचपन में मुझे सिर्फ गुमशुदगी दी गई. जब भी मैंने स्कूल या समाज में अपने पिता के बारे में पूछा, तो मुझे सिर्फ इनकार, दुत्कार और अपमान मिला. मेरे पिता को यह जालिम राज्य उठा ले गया और उनका अंतहीन इंतजार करने की सजा मुझे आजीवन कारावास की तरह दे दी गई.उन्होंने आगे लिखा, दुनिया के बाकी बच्चे अपने पिता की उंगली थामकर और उनकी खूबसूरत यादों के साथ बड़े होते हैं. लेकिन मुझे बचपन से ही अदालतों की याचिकाएं, पुलिस की लाठियां, आंसू गैस के गोले और हाथों में पिता के पोस्टर्स लेकर सड़कों पर घूमने की विरासत मिली है. मेरे अब्बा कोई सरकारी फाइल या कोई कोरी अफवाह नहीं थे. वे डॉ. दीन मोहम्मद थे—एक डॉक्टर, एक जिम्मेदार पति और एक बेहद प्यारे पिता, जिन्हें हमसे हमेशा के लिए छीन लिया गया.अंतरराष्ट्रीय मंच पर गूंजी आवाज: जर्मनी के संगठन ने पाकिस्तान को घेरासम्मी दीन बलोच आज बलोचिस्तान में पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों के खिलाफ लड़ने वाली प्रमुख संस्था 'वॉयस फॉर बलोच मिसिंग पर्सन्स' (VBMP) की महासचिव हैं. वह बलोचिस्तान में जबरन गायब किए गए हजारों युवाओं और नागरिकों के इंसाफ की लड़ाई का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय चेहरा बन चुकी हैं. उनके इस शांतिपूर्ण आंदोलन और अदालतों में दायर की जा रही याचिकाओं से बौखलाई पाकिस्तानी सेना और पुलिस कई बार उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज चुकी है और उन पर हिंसक हमले भी करवा चुकी है.सम्मी दीन के इस खुले पत्र के बाद अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने भी पाकिस्तान सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. जर्मनी के डबलिन में स्थित प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन 'फ्रंट लाइन डिफेंडर्स' (Front Line Defenders) ने सम्मी दीन बलोच के प्रति अपना पूर्ण समर्थन दोहराया है. संगठन ने पाकिस्तानी हुक्मरानों से मांग की है कि वे डॉ. दीन मोहम्मद बलोच के ठिकाने का तुरंत और आधिकारिक तौर पर खुलासा करें और बलोचिस्तान में चल रहे जबरन गुमशुदगी के सभी मामलों की स्वतंत्र निष्पक्ष जांच कराएं.पाकिस्तानी सेना का ढिठाई भरा रुख: आरोपों को सिरे से किया खारिजहमेशा की तरह, इस बार भी पाकिस्तानी सरकार और उसकी सेना ने राजनीतिक उत्पीड़न और बलोच नागरिकों को गायब करने के इन गंभीर आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है. पाकिस्तानी सेना का दावा है कि बलोच कार्यकर्ताओं के खिलाफ की जा रही कार्रवाई पूरी तरह से देश के कानून के दायरे में है.सेना ने ढिठाई से बयान जारी करते हुए कहा कि आम नागरिकों को गायब करने की उनकी कोई आधिकारिक नीति नहीं है. पाकिस्तानी अधिकारियों का दावा है कि जो लोग लापता बताए जा रहे हैं, उनमें से अधिकांश लोग या तो प्रतिबंधित उग्रवादी और आतंकवादी संगठनों में शामिल हो गए हैं, या वे कानून से बचने के लिए भूमिगत (Underground) हो गए हैं या फिर अपनी मर्जी से देश छोड़कर विदेश चले गए हैं. लेकिन बलोच मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि सेना का यह बयान सिर्फ उनके खूनी गुनाहों को छिपाने का एक भद्दा बहाना है.
27 जून 2026 की दोपहर को राजस्थान के उदयपुर रनवे पर इंडिगो (IndiGo) के एयरबस A320 विमान ने जब अपने कदम रखे, तो खिड़की से बाहर खूबसूरत अरावली की पहाड़ियों को देख रहे यात्रियों को सब कुछ बिल्कुल सामान्य लगा. लेकिन बैकस्टेज भारतीय उड्डयन और विज्ञान के इतिहास में एक बहुत बड़ा कीर्तिमान रचा जा चुका था. इस विशाल पैसेंजर जेट को रनवे पर मौजूद पारंपरिक ग्राउंड रेडियो सिग्नल की मदद से नहीं, बल्कि भारत के ऊपर हजारों किलोमीटर दूर अंतरिक्ष में चौबीसों घंटे तैनात स्वदेशी सैटेलाइट्स की मदद से सुरक्षित उतारा गया था.डायरेक्टरेट जनरल ऑफ सिविल एविऐशन (DGCA) की कड़ी निगरानी और गाइडलाइंस के तहत, भारत के अपने स्वदेशी सैटेलाइट आधारित नेविगेशन सिस्टम 'गगन' (GAGAN) का इस्तेमाल करके कॉमर्शियल लैंडिंग करने वाला यह देश का पहला बड़ा पैसेंजर जेट बन गया है. आइए एक एक्सपर्ट रिपोर्टर की नजर से इस पूरी तकनीक को आसान भाषा में समझते हैं कि यह कैसे काम करती है और भारत के लिए यह ऐतिहासिक मील का पत्थर क्यों बेहद खास है.क्या है 'गगन' (GAGAN) सिस्टम और अंतरिक्ष से कैसे मिलती है पायलट को मदद?गगन (GAGAN) का पूरा नाम 'जीपीएस एडेड जियो ऑगमेंटेड नेविगेशन' (GPS Aided GEO Augmented Navigation) है. इस बेहद आधुनिक और जटिल सिस्टम को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और भारतीय विमानन प्राधिकरण (AAI) ने सालों की रिसर्च के बाद संयुक्त रूप से मिलकर तैयार किया है. गगन का शक्तिशाली सिग्नल अंतरिक्ष में मौजूद इसरो के GSAT-8 और GSAT-10 कम्युनिकेशन सैटेलाइट्स के जरिए सीधे विमानों के कॉकपिट तक पहुंचता है.इसे आप बेहद आसान शब्दों में एक ऐसे 'सुपर क्लास टीचर' या 'गाइड' की तरह समझ सकते हैं जो आसमान में बैठकर अमेरिकी जीपीएस (GPS) के काम को हर सेकंड चेक करता है. जीपीएस के सिग्नलों में आने वाली मामूली से मामूली खराबी या दूरी की गलतियों को तुरंत सुधारकर यह पायलट के रिसीवर तक बिल्कुल सटीक और एरर-फ्री जानकारी पहुंचाता है. जब कोई विमान घने कोहरे या खराब मौसम में लैंड कर रहा होता है, तो गगन उसे रनवे का बिल्कुल सुई की नोंक जैसा सटीक रास्ता दिखाता है.पारंपरिक रेडियो नेटवर्क बनाम गगन: छोटे शहरों के हवाई अड्डों के लिए वरदानआमतौर पर दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर विमानों को सुरक्षित उतारने के लिए जमीन पर आधारित 'इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम' (ILS) यानी ग्राउंड रेडियो बीम नेटवर्क का इस्तेमाल किया जाता है. यह सिस्टम जमीन से अदृश्य तरंगें (रेडियो सिग्नल) भेजकर पायलट को सीधा आने और रनवे पर टचडाउन करने का रास्ता बताता है. लेकिन यह पारंपरिक ग्राउंड सिस्टम बेहद महंगा होता है और हर छोटे या पहाड़ी इलाकों के रीजनल एयरपोर्ट (जैसे शिमला, कुल्लू या पूर्वोत्तर के राज्य) पर इसे लगाना और मेंटेन करना मुमकिन नहीं है.इसके विपरीत, गगन सिस्टम के लिए जमीन पर किसी करोड़ो रुपये के महंगे तामझाम या टावरों की बिल्कुल जरूरत नहीं होती. यह सीधे अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट्स की मदद से पायलट को बाएं-दाएं (Horizontal) और ऊपर-नीचे (Vertical) दोनों तरह की सटीक गाइडेंस दे देता है, जिससे छोटे शहरों के एयरपोर्ट्स पर भी बड़े विमानों की नाइट लैंडिंग और खराब मौसम में लैंडिंग बेहद आसान हो जाएगी.GAGAN और NavIC में क्या अंतर है? अक्सर लोग हो जाते हैं कंफ्यूजअक्सर लोग गगन (GAGAN) और नाविक (NavIC) को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन विज्ञान के नजरिए से ये दोनों एक-दूसरे से बिल्कुल अलग और अलग उद्देश्यों के लिए काम करते हैं. नाविक (Navigation with Indian Constellation) भारत का एक पूरी तरह स्वतंत्र और स्वदेशी पोजीशनिंग नेटवर्क है, जो खुद रास्ता ढूंढता है—ठीक वैसे ही जैसे अमेरिका का GPS या रूस का ग्लोनास काम करता है.वहीं दूसरी तरफ, गगन खुद कोई नया नेविगेशन नेटवर्क नहीं है और न ही नया रास्ता बनाता है. गगन का मुख्य काम केवल और केवल जीपीएस (GPS) से मिलने वाले सिग्नलों की बारीकी से जांच करना, उनकी तकनीकी कमियों को दूर करना और नागरिक उड्डयन (Civil Aviation) की सुरक्षा के लिए उन्हें ज्यादा से ज्यादा विश्वसनीय और अचूक बनाना है.70 टन के हवाई जहाज के लिए जीपीएस की कमियों को कैसे दूर करता है गगन?हमारे स्मार्टफोन में मौजूद सामान्य जीपीएस कुछ मीटर (5 से 10 मीटर) तक की चूक या एरर कर सकता है, जो सड़क पर गाड़ी चलाने या कोई रेस्टोरेंट ढूंढने के लिए तो ठीक है; लेकिन 70 टन के भारी-भरकम हवाई जहाज को जीरो विजिबिलिटी और घने बादलों के बीच से रनवे पर उतारने के लिए यह बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं है. भारत के ऊपर मौजूद पृथ्वी की ऊपरी वायुमंडलीय परत (Ionosphere) के कारण जीपीएस के सिग्नल अक्सर सुस्त पड़ जाते हैं या मुड़ जाते हैं, जिससे गलत लोकेशन दिखने का खतरा रहता है.इसे पूरी तरह फिक्स करने के लिए इसरो ने भारतभर में 15 अत्यधिक संवेदनशील ग्राउंड रेफरेंस स्टेशन (INRES) बनाए हैं, जिनकी भौगोलिक लोकेशन सेंटीमीटर तक फिक्स है. ये स्टेशन जीपीएस की त्रुटि को रियल-टाइम में पकड़ते हैं, इंडियन मास्टर कंट्रोल सेंटर (INMCC) उसे ठीक करने का गणितीय फॉर्मूला बनाता है और सैटेलाइट्स के जरिए तुरंत प्लेन के रिसीवर को भेज देता है. सबसे खास बात यह है कि अगर किसी तकनीकी खराबी के कारण सिग्नल पर भरोसा नहीं किया जा सकता, तो यह सिस्टम पायलट को महज 6 सेकंड के भीतर वॉर्निंग अलर्ट (Time-to-Alert) भी दे देता है.अमेरिका-यूरोप के क्लब में शामिल हुआ भारत: क्यों दुनिया का सबसे एडवांस सिस्टम है 'गगन'?उदयपुर की इस ऐतिहासिक सफल लैंडिंग के साथ ही भारत दुनिया के उन चुनिंदा और गिने-चुने देशों के एलीट क्लब में शामिल हो गया है, जिसके पास अपना खुद का सैटेलाइट आधारित ऑगमेंटेशन सिस्टम (SBAS) मौजूद है. वर्तमान में अमेरिका इसके लिए WAAS (Wide Area Augmentation System) का इस्तेमाल करता है, यूरोप के पास अपना EGNOS है और जापान MSAS तकनीक का उपयोग करता है.लेकिन इन सबके बीच भारत का गगन सिस्टम इसलिए दुनिया में सबसे अनोखा और एडवांस माना जा रहा है क्योंकि यह भूमध्यरेखीय (Equatorial Zone) क्षेत्र के बेहद कठिन, अशांत और तेजी से बदलते आसमान में भी सौ फीसदी सटीक काम करने वाला दुनिया का इकलौता प्रमाणित सिस्टम बन गया है. गगन के आने से भारतीय नागरिक उड्डयन सेक्टर में सुरक्षा के मायने पूरी तरह बदल गए हैं.
Russia Fuel Crisis 2026 : पूरी दुनिया के भू-राजनीतिक (Geopolitical) परिदृश्य में एक ऐसा अप्रत्याशित और चौंकाने वाला फेरबदल हुआ है, जिसने अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों को भी हैरान कर दिया है. वैश्विक ऊर्जा बाजार का 'सिकंदर' और महाशक्ति कहलाने वाला रूस, जिसके पास 80 अरब बैरल से अधिक कच्चे तेल (Crude Oil) का असीमित भंडार है, आज खुद अपने ही देश में एक अभूतपूर्व और गंभीर तेल संकट (Fuel Crisis) से जूझ रहा है. रूस के बड़े-बड़े शहरों में पेट्रोल पंपों के बाहर गाड़ियों की किलोमीटर लंबी लाइनें और ईंधन की राशनिंग (सप्लाई पर सीमा) देखी जा रही है. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया है कि उनका देश इस समय इतिहास के सबसे बुरे गैसोलीन (पेट्रोल) संकट का सामना कर रहा है और उन्होंने इस विकट परिस्थिति से उबरने के लिए भारत और कजाकिस्तान जैसे मित्र देशों से आपातकालीन मदद की गुहार लगाई है.यूक्रेन के 'ड्रोन हंटर्स' ने तोड़ी रूस की कमर: रिफाइनिंग क्षमता 25% तक ठपयह संकट कच्चे तेल की कमी के कारण नहीं, बल्कि उसे इस्तेमाल के योग्य (रिफाइन) बनाने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर के तबाह होने से पैदा हुआ है. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एक इंटरव्यू में माना कि यूक्रेन के साथ पिछले चार साल से चल रहे भीषण युद्ध के दौरान रूसी तेल और गैस रिफाइनरियों पर लगातार किए गए एडवांस ड्रोन हमलों ने देश को गहरी चोट दी है.अकेले मई और जून 2026 में यूक्रेन ने रूस की 20 से अधिक मुख्य रिफाइनरियों को निशाना बनाकर उन्हें मलबे में तब्दील कर दिया है, जिसमें विशाल मॉस्को रिफाइनरी भी शामिल है. इन सटीक और घातक हमलों के चलते रूस की तेल प्रसंस्करण (Crude Processing) क्षमता पिछले दो दशकों के सबसे निचले स्तर पर गिर गई है और देश का कुल पेट्रोल उत्पादन 25 प्रतिशत तक घट गया है. मॉस्को का गैसोलीन रिजर्व घटकर बेहद खतरनाक स्तर (सिर्फ 1.7 मिलियन मीट्रिक टन) पर आ चुका है, जिसे देखते हुए रूस ने पहले ही घरेलू बाजार को संभालने के लिए पेट्रोल-डीजल के निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है.कजाकिस्तान के सामने बड़ी धर्मसंकट: 'हां' कहें तो यूक्रेन का डर, 'ना' कहें तो पुतिन का दबावइस गहरे ऊर्जा संकट से निपटने के लिए क्रेमलिन (रूस) ने अपने पड़ोसी देश कजाकिस्तान से तत्काल 50,000 टन AI-92 ग्रेड पेट्रोल की मांग की है. हालांकि, रूस की इस मांग ने कजाकिस्तान की सरकार को एक बेहद जटिल कूटनीतिक और आर्थिक धर्मसंकट (Matrix of Pressure) में डाल दिया है.कजाकिस्तान को सबसे बड़ा डर यह है कि अगर वह खुलेआम रूस को ईंधन की सप्लाई करता है, तो यूक्रेन के खतरनाक लॉन्ग-रेंज ड्रोन उसकी अपनी रिफाइनरियों को भी निशाना बनाना शुरू कर देंगे. दूसरी ओर, कजाकिस्तान के कच्चे तेल के निर्यात का एक बहुत बड़ा हिस्सा रूसी पाइपलाइनों और बंदरगाहों के माध्यम से ही वैश्विक बाजारों तक पहुंचता है. ऐसे में कजाकिस्तान के ऊर्जा मंत्रालय के लिए रूस की इस मांग पर 'हां' या 'ना' कहना सांप-छछूंदर की गति जैसा हो गया है. वहीं, कजाकिस्तान खुद भी जुलाई में एविएशन फ्यूल (हवाई ईंधन) की कमी का सामना कर रहा है, इसलिए वह रूस के सामने ईंधन के बदले ईंधन (Barter) की शर्त रखने पर विचार कर रहा है.भारत बना ग्लोबल रिफाइनिंग का 'पावरहाउस': पुतिन ने पेट्रोल के लिए खोला खजानाइस पूरे संकट में वैश्विक राजनीति का पासा पूरी तरह पलट चुका है. जो रूस अब तक भारत को भारी डिस्काउंट पर कच्चा तेल बेच रहा था, वही रूस अब भारत से रिफाइंड पेट्रोल (गैसोलीन) खरीदने के लिए मजबूर हो गया है. भारत और रूस के बीच ऊर्जा संबंध साल 2026 में एक नए ऐतिहासिक शिखर पर पहुंच गए हैं. जून 2026 में भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल का आयात बढ़कर रिकॉर्ड 2.66 मिलियन बैरल प्रति दिन हो गया है. भारत इस कच्चे तेल को अपनी अत्याधुनिक रिफाइनरियों (जैसे रिलायंस, नायरा एनर्जी, IOCL) में प्रोसेस करता है और इसे पेट्रोल-डीजल में बदलता है.अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स (रॉयटर्स और RBC) के अनुसार, रूसी रिफाइनरियों के तबाह होने के बाद वहां रोजाना करीब 25,000 टन पेट्रोल की भारी किल्लत हो रही है. रूस की घरेलू मांग रोजाना 1,11,000 टन है, जबकि उसकी बची हुई रिफाइनरियां सिर्फ 85,000 टन ही बना पा रही हैं. इस भारी गैप को भरने के लिए रूस ने भारत से बड़े पैमाने पर समुद्री रास्तों (Seaborne Imports) के जरिए पेट्रोल आयात करने के लिए अपने टैक्स कोड (Tax Code) में संशोधन किया है. इसके तहत विदेशी पेट्रोल खरीदने वाली रूसी तेल कंपनियों को सरकार भारी बजट सब्सिडी देगी.इथेनॉल ब्लेंडिंग का पेंच: क्या भारतीय पेट्रोल अपनाएगा रूस?भारत से बड़े पैमाने पर पेट्रोल आयात करने के सामने एक तकनीकी पेंच भी फंसा हुआ है. दरअसल, भारत ग्लोबल वार्मिंग को कम करने के लिए अपने पेट्रोल में 20 फीसदी इथेनॉल (Ethanol Blend) मिलाता है, जो कि रूस के सामान्य राष्ट्रीय मानक (Standard) से दोगुना है. रूस में अधिकतम 10 फीसदी इथेनॉल मिश्रित ईंधन की ही अनुमति है. हालांकि, मौजूदा संकट और पेट्रोल पंपों पर मची हाहाकार को देखते हुए रूसी स्टेट ड्यूमा (संसद) ने नियमों में ढील देने और भारतीय ईंधन को तुरंत स्वीकार करने की हरी झंडी दे दी है. यह पूरी स्थिति साबित करती है कि भारत आज दुनिया के लिए रिफाइनिंग का सबसे बड़ा और अनिवार्य पावरहाउस बन चुका है.
शेख हसीना ने किया बांग्लादेश लौटने का ऐलान
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने मौत की सजा के बावजूद इस साल देश लौटने का ऐलान किया है. वह करीब दो साल से भारत में रह रही हैं.
पूरी दुनिया को बड़ी राहत देते हुए मिडल ईस्ट के सबसे संवेदनशील समुद्री रास्ते— स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) में जारी भीषण सैन्य तनाव पर फिलहाल पूरी तरह से ब्रेक लग गया है। पिछले कई दिनों से युद्ध की कगार पर खड़े अमेरिका और ईरान आखिरकार बातचीत की मेज पर आने के लिए राजी हो गए हैं। दोनों महाशक्तियों के बीच कूटनीतिक गतिरोध को सुलझाने के लिए अब कतर (Qatar Peace Talks) की मध्यस्थता में एक हाई-लेवल बैठक होने जा रही है। इस बड़ी और सकारात्मक खबर के सामने आते ही अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक गलियारों और ग्लोबल मार्केट ने राहत की सांस ली है, क्योंकि अब इस रूट से दुनिया भर के मालवाहक और तेल टैंकर जहाज बिना किसी डर के सुरक्षित गुजर सकेंगे।कतर बना संकटमोचक: जानिए कैसे बनी अमेरिका और ईरान के बीच बात?रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण खाड़ी देश कतर ने एक बार फिर वैश्विक शांति के लिए संकटमोचक की भूमिका निभाई है। सूत्रों के मुताबिक, कतर के अमीर और शीर्ष राजनयिकों ने पर्दे के पीछे से दोनों देशों के विदेश मंत्रालयों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा था। पिछले दिनों शांति समझौते के मसौदे में शामिल 'आर्टिकल-5' की एक लाइन के लीक होने के बाद जो बात पूरी तरह बिगड़ गई थी, उसे कतर ने एक नए न्यूट्रल ड्राफ्ट के जरिए फिर से पटरी पर ला दिया है। अमेरिका और ईरान दोनों ने ही इस बात पर सहमति जताई है कि वे कतर की राजधानी दोहा में बैठकर विवादित मुद्दों का शांतिपूर्ण समाधान निकालेंगे और तब तक कोई भी देश होर्मुज में कोई आक्रामक सैन्य कार्रवाई नहीं करेगा।वैश्विक बाजार में आई रौनक: कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट की उम्मीदइस ऐतिहासिक शांति वार्ता की खबर जैसे ही दलाल स्ट्रीट (Dalal Street) और वैश्विक वायदा बाजारों (Wall Street) तक पहुंची, वैसे ही चौतरफा राहत देखने को मिली। पिछले कई दिनों से कच्चे तेल (Crude Oil) की सप्लाई चेन बाधित होने के डर से जो पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छूने की आशंका बनी हुई थी, वह अब काफी हद तक टल गई है। कमोडिटी एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस सीजफायर के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में गिरावट दर्ज की जाएगी। इसका सीधा और सबसे बड़ा फायदा भारत जैसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था को मिलेगा, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इसी समुद्री मार्ग पर सबसे ज्यादा निर्भर है।जहाजों के लिए खुला सुरक्षित रास्ता: भारतीय शिपिंग कंपनियों ने ली राहत की सांसहोर्मुज जलडमरूमध्य से हर दिन गुजरने वाले दर्जनों भारतीय कमर्शियल जहाजों और वैश्विक कार्गो शिपिंग कंपनियों के लिए यह खबर किसी वरदान से कम नहीं है। पिछले कुछ दिनों से इस रूट पर ईरानी नौसेना और अमेरिकी युद्धपोतों के आमने-सामने होने की वजह से जहाजों का इंश्योरेंस प्रीमियम काफी बढ़ गया था और कई रूट डायवर्ट करने पड़ रहे थे। अब कतर में बातचीत शुरू होने की आधिकारिक घोषणा के बाद इस समुद्री क्षेत्र में अलर्ट लेवल को घटा दिया गया है। स्थानीय बंदरगाहों और अंतरराष्ट्रीय मैरीटाइम सिक्योरिटी एजेंसियों ने भी पुष्टि की है कि जहाजों का आवागमन अब पूरी तरह सामान्य और बेखौफ तरीके से शुरू हो गया है।
मिडल ईस्ट और दक्षिण एशिया के इस हिस्से में तनाव अब अपने सबसे खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच सीमाई इलाकों में लंबे समय से जारी तनातनी ने बीती रात एक बेहद खौफनाक रूप अख्तियार कर लिया। पाकिस्तानी वायुसेना और सुरक्षाबलों ने अफगानिस्तान के सीमावर्ती इलाकों में आधी रात को अचानक चौतरफा हवाई हमले (Air Strikes) शुरू कर दिए। इस भीषण बमबारी में महिलाओं और बच्चों समेत कम से कम 35 बेकसूर लोगों की दर्दनाक मौत हो गई है, जबकि दर्जनों लोग गंभीर रूप से घायल बताए जा रहे हैं। स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, दोनों देशों के बीच बढ़ा यह सैन्य गतिरोध पिछले एक महीने के भीतर चौथा बड़ा हमला है, जिसने पूरे क्षेत्र को बारूद के ढेर पर ला खड़ा किया है।रात के अंधेरे में पाकिस्तानी लड़ाकू विमानों का कहर: आखिर क्यों हुआ यह हमला?प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, जब लोग अपने घरों में सो रहे थे, तभी पाकिस्तानी लड़ाकू विमानों ने अफगानिस्तान के खोस्त और कुनार प्रांतों के रिहायशी इलाकों को निशाना बनाकर मिसाइलें दागनी शुरू कर दीं। पाकिस्तान सरकार और सैन्य कमांडरों का दावा है कि यह हमला सीमा पार से सक्रिय प्रतिबंधित आतंकी संगठनों (TTP - तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान) के सुरक्षित ठिकानों को तबाह करने के लिए किया गया था। हालांकि, अफगान अधिकारियों और स्थानीय नागरिकों ने इस दावे को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा है कि मारे गए सभी लोग आम नागरिक थे, जिनका किसी भी उग्रवादी गुट से कोई लेना-देना नहीं था।काबुल और इस्लामाबाद में भारी तनाव: अफगान सीमा पर अलर्ट जारीइस भीषण खूनखराबे के बाद अफगानिस्तान की कार्यवाहक तालिबान सरकार ने कड़ा रुख अपना लिया है। काबुल से जारी एक आधिकारिक बयान में पाकिस्तान को इस कायरतापूर्ण हरकत के गंभीर परिणाम भुगतने की सीधी चेतावनी दी गई है। सीमावर्ती इलाकों जैसे डूरंड लाइन (Durand Line) के आसपास अफगान सेना की टुकड़ियों को भारी हथियारों के साथ हाई अलर्ट पर रख दिया गया है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों परमाणु और सैन्य ताकत संपन्न पड़ोसियों के बीच लगातार होते ये हमले किसी बड़े क्षेत्रीय युद्ध की चिंगारी बन सकते हैं, जिससे दक्षिण एशिया की सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी।भारत और वैश्विक समुदाय की नजर: क्या संयुक्त राष्ट्र करेगा हस्तक्षेप?एक महीने के भीतर चौथे बड़े हमले ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिज्ञों को भी चिंता में डाल दिया है। भारत समेत दुनिया भर की खुफिया एजेंसियां और विदेश मंत्रालय इस नाजुक स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र (UN) और वैश्विक मानवाधिकार संगठनों से इस मामले में तुरंत दखल देने और दोनों देशों को बातचीत की मेज पर लाने की मांग की जा रही है। अगर यह सीमाई विवाद जल्द नहीं थमा, तो शरणार्थियों का एक नया संकट खड़ा हो सकता है, जिसका सीधा असर भारत और आसपास के पड़ोसी देशों की आंतरिक सुरक्षा और भौगोलिक स्थिरता पर पड़ना लाजिमी है।
मिडल ईस्ट (Middle East) से इस वक्त बेहद चौंकाने वाली और डराने वाली खबर सामने आ रही है। पूरी दुनिया को लग रहा था कि अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चल रहा विवाद अब एक शांति समझौते (MoU) के जरिए सुलझने की कगार पर है, लेकिन ऐन वक्त पर सिर्फ एक सिंगल लाइन ने पूरे खेल को पूरी तरह से बिगाड़ कर रख दिया है। इस शांति समझौते के मसौदे में शामिल 'आर्टिकल-5' (Article 5 of MoU) अब दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री व्यापारिक मार्ग— स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) में युद्ध की नई चिंगारी भड़काने की सबसे बड़ी वजह बन चुका है। इसके चलते अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था में एक बार फिर भारी हड़कंप मच गया है।क्या है समझौता ज्ञापन (MoU) का वो रहस्यमयी आर्टिकल-5?अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों और शीर्ष राजनयिकों के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम और आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने के लिए जो खुफिया बातचीत चल रही थी, उसकी बुनियाद इस 'आर्टिकल-5' पर आकर टिक गई थी। इस आर्टिकल में साफ तौर पर लिखा था कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय तेल टैंकरों और मालवाहक जहाजों की सुरक्षा की जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ ईरानी नौसेना की होगी, जबकि पश्चिमी देशों की सेनाओं को वहां से तुरंत हटना होगा। अमेरिका ने इस लाइन को अपने और अपने मित्र देशों के हितों के खिलाफ मानते हुए इस पर हस्ताक्षर करने से साफ मना कर दिया, जिसके बाद शांति की उम्मीदें पल भर में स्वाहा हो गईं।होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) क्यों बन गया है बारूद का ढेर?भौगोलिक और आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण लाइफलाइन है। दुनिया के कुल कच्चे तेल (Crude Oil) का लगभग 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा इसी संकरे समुद्री रास्ते से होकर भारत, चीन, जापान और यूरोपीय देशों तक पहुंचता है। समझौते की यह लाइन लीक होते ही इस पूरे समुद्री इलाके में दोनों देशों की नौसेनाएं (US Navy and Iranian Navy) पूरी तरह से आमने-सामने आ गई हैं। ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य के पास अपनी मिसाइल डिफेंस प्रणालियों को तैनात करना शुरू कर दिया है, जिसके चलते इस पूरे क्षेत्र में युद्ध के बादल मंडराने लगे हैं।भारत और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इस कूटनीतिक विफलता का क्या होगा असर?इस एक लाइन की वजह से बिगड़ी बात का सीधा खामियाजा भारत समेत पूरी दुनिया को भुगतना पड़ सकता है। यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण जहाजों की आवाजाही थोड़ी देर के लिए भी प्रभावित होती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अचानक आसमान छू सकती हैं। भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा इसी रूट से आयात करता है, जिससे घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने और महंगाई अनियंत्रित होने का खतरा बढ़ गया है। दुनिया भर की खुफिया एजेंसियां अब इस बात पर नजर गड़ाए हुए हैं कि क्या अमेरिका और ईरान बातचीत की मेज पर वापस लौटेंगे या यह विवाद किसी बड़े युद्ध में तब्दील हो जाएगा।
ईरान पर भरोसा नहीं: अमेरिकी सीनेटर टिलिस का बड़ा बयान
अमेरिकी रिपब्लिकन सीनेटर थॉम टिलिस ने रविवार को कहा कि उन्हें इस बात पर संदेह है कि ईरान अमेरिका के साथ हुए युद्धविराम समझौते का पालन करेगा
हैती और सीरिया के नागरिकों का टीपीएस खत्म करने के ट्रंप के फैसले से रिपब्लिकन पार्टी में मतभेद
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा हैती और सीरिया के हजारों प्रवासियों का टेम्परेरी प्रोटेक्टेड स्टेटस (टीपीएस) समाप्त करने के फैसले को लेकर रिपब्लिकन पार्टी में मतभेद उभरकर सामने आए हैं
'पवित्र रक्त' और मां के अतीत का विरोधाभास उत्तर कोरिया की सत्ता 'माउंट पेक्टू रक्तसमूह' (Mount Paektu Bloodline) के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसे देश पर शासन करने के लिए सबसे शुद्ध और वीर माना जाता है। लेकिन किम जोंग उन की मां, को योंग-ही का इतिहास इस सरकारी दावे के बिल्कुल उलट है। रिपोर्ट्स के अनुसार, को योंग-ही का जन्म 1952 में जापान के ओसाका में हुआ था। उनका परिवार एक पुनर्वास कार्यक्रम के तहत उत्तर कोरिया आया था, लेकिन उस समय वहां के समाज में जापान से आए लोगों को हेय दृष्टि से देखा जाता था। यही कारण है कि किम जोंग उन की मां की सामाजिक पृष्ठभूमि को उनके 'पवित्र' परिवारिक इतिहास के लिए एक बड़ी बाधा माना जाता है, जिसे प्योंगयांग का प्रोपेगेंडा हमेशा छिपाने की कोशिश करता है।डांस, खूबसूरती और प्रेम कहानी का सफर को योंग-ही एक प्रतिभाशाली डांसर थीं और सरकारी आर्ट ट्रूप से जुड़ी हुई थीं। उनकी खूबसूरती और नृत्य ने तत्कालीन तानाशाह किम जोंग इल को अपनी ओर आकर्षित किया। उस समय किम जोंग इल पहले से ही विवाहित थे, लेकिन को योंग-ही के साथ उनके संबंधों ने एक नया मोड़ लिया। चूंकि उनकी शादी आधिकारिक नहीं थी, इसलिए को योंग-ही और उनके बच्चे राजधानी प्योंगयांग से दूर वोनसान शहर में रहने लगे। 2004 में स्तन कैंसर से उनकी मौत के बाद भी उत्तर कोरियाई मीडिया ने इसे कोई तवज्जो नहीं दी, क्योंकि उनका जापानी जन्म किम परिवार की 'शुद्धता' की छवि को कमजोर कर सकता था।सत्ता का खेल: कैसे बनीं किंगमेकर? किम जोंग उन के सत्ता तक पहुँचने के पीछे उनकी मां को योंग-ही का सबसे बड़ा हाथ माना जाता है। तानाशाह बनने की दौड़ में कई नाम थे—किम जोंग इल के बड़े बेटे किम जोंग नम, जो सुधारों की वकालत के कारण पिता का भरोसा खो चुके थे और बाद में जिनकी मलेशिया में हत्या कर दी गई; और दूसरे भाई किम जोंग चुल, जो कथित रूप से निजी जीवन में व्यस्त थे। विशेषज्ञ मानते हैं कि को योंग-ही ने ही पर्दे के पीछे से यह सुनिश्चित किया कि उनका बेटा किम जोंग उन ही अगला उत्तराधिकारी बने। अन्य दावेदारों के बाहर होने के बाद, मां की इस राजनीतिक बिसात ने किम जोंग उन को दुनिया के सबसे रहस्यमय और क्रूर तानाशाह की कुर्सी तक पहुँचा दिया। आज भी को योंग-ही का नाम उत्तर कोरिया की आधिकारिक गाथाओं में एक बड़ा 'ब्लैकआउट' है, क्योंकि उनका सच शासन की नींव पर उठने वाले सवालों को जन्म देता है।
पुतिन का बड़ा कबूलनामा: रूस के सामने खड़ी हैं बड़ी चुनौतियां यूक्रेन के साथ जारी युद्ध और पश्चिमी देशों के कड़े आर्थिक प्रतिबंधों के बीच रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि रूस फिलहाल एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है। सत्तारूढ़ 'यूनाइटेड रूस पार्टी' के सम्मेलन को संबोधित करते हुए पुतिन ने कहा कि इन कठिनाइयों ने देश को कमजोर नहीं, बल्कि पहले से कहीं अधिक मजबूत और अनुभवी बनाया है। उनका यह बयान तब आया है जब रूसी क्षेत्रों पर ड्रोन और मिसाइल हमलों में तेजी देखी जा रही है, जिससे बुनियादी ढांचों को काफी नुकसान पहुँचा है।हमलों का जवाब देने की दो-टूक तैयारी पुतिन ने देशवासियों को आश्वस्त करते हुए कहा कि सरकार वर्तमान में उत्पन्न हर समस्या से पूरी तरह वाकिफ है और उन्हें सुलझाने के लिए ठोस रणनीतियां अपनाई जा रही हैं। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि रूस अपनी सीमाओं की अखंडता और नागरिकों की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं करेगा। बुनियादी ढांचा सुविधाओं पर हो रहे हमलों का जिक्र करते हुए राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि रूस की सुरक्षा एजेंसियां और सशस्त्र बल हर तरह के खतरों से निपटने के लिए पूरी तरह मुस्तैद हैं। उन्होंने देश की संप्रभुता को अटूट बताते हुए कहा कि रूस किसी भी बाहरी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है।विकास और सुरक्षा का 'पुतिन फॉर्मूला' सितंबर में होने वाले संसदीय चुनावों से पहले पुतिन का यह संदेश पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए एक बड़ी लामबंदी का हिस्सा माना जा रहा है। अपने भाषण में उन्होंने न केवल सैन्य और रक्षा क्षमताओं पर ध्यान केंद्रित किया, बल्कि आर्थिक स्थिरता और सामाजिक सुरक्षा को भी प्राथमिकता दी। पुतिन ने जोर देकर कहा कि वैश्विक स्तर पर डाले जा रहे दबावों के बावजूद रूस अपनी स्वतंत्र नीतियों पर अडिग है और विकास के पथ पर आगे बढ़ रहा है। यह सम्मेलन स्पष्ट करता है कि आगामी चुनावों में पुतिन की पार्टी जनता के बीच 'विकास, सुरक्षा और स्थिरता' के तीन स्तंभों के साथ अपने वोट बैंक को और मजबूत करना चाहती है।
गैस के लिए ईरान की ओर ताक रहा पाकिस्तान: क्या अमेरिका से मिली छूट के बाद खत्म होगा ऊर्जा संकट
ऊर्जा संकट की मार: बेहाल है पाकिस्तान का पंजाब पाकिस्तान इन दिनों एक गंभीर ऊर्जा संकट के दौर से गुजर रहा है। अर्थशास्त्री महमूद रसूल के अनुसार, देश के अधिकांश हिस्सों, विशेषकर पंजाब प्रांत में गैस की भीषण कमी है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि उपभोक्ताओं को दिन भर में केवल कुछ घंटों के लिए ही गैस मिल पा रही है, जिससे घरेलू और औद्योगिक कामकाज पूरी तरह ठप पड़ गया है। आम जनता इस महंगाई और आपूर्ति की कमी से त्रस्त है, जिसके चलते सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा है।ईरान-अमेरिका शांति समझौता: पाकिस्तान के लिए नई उम्मीद पाकिस्तान की नजरें अब ईरान के साथ होने वाले संभावित ऊर्जा सौदों पर टिकी हैं। अमेरिका द्वारा ईरान पर लगे प्रतिबंधों में दी गई अस्थायी (60 दिन की) ढील ने पाकिस्तान को एक उम्मीद की किरण दिखाई है। चूँकि अमेरिका ने ईरान को विशिष्ट शर्तों के साथ तेल और गैस निर्यात की छूट दी है, इसलिए पाकिस्तान अब इस कूटनीतिक अवसर का फायदा उठाने की फिराक में है। पेट्रोलियम मंत्री अली परवेज मलिक ने स्पष्ट किया है कि खाड़ी क्षेत्र में शांति बहाल होने से वैश्विक स्तर पर पेट्रोलियम कीमतों में आई गिरावट का लाभ सीधे जनता तक पहुँचाने की कोशिश की जा रही है।कीमतों में राहत की उम्मीद और सरकार की चुनौती पिछले दिनों जब अमेरिका-ईरान के बीच संघर्ष चरम पर था, तब पाकिस्तान में पेट्रोल की कीमतें रिकॉर्ड 414 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई थीं। वर्तमान में यह 300 रुपये प्रति लीटर पर है, लेकिन जनता अभी भी और राहत की उम्मीद लगाए बैठी है। पेट्रोलियम मंत्री ने दावा किया है कि सरकार अंतरराष्ट्रीय समझौतों और नियमों के दायरे में रहकर ईरान से सस्ते तेल और गैस आयात के विकल्पों को तलाश रही है। हालांकि, यह छूट अस्थायी है और अमेरिका-ईरान वार्ताओं के भविष्य पर निर्भर करेगी। अब देखने वाली बात यह होगी कि शाहबाज शरीफ सरकार इस अल्पकालिक अवसर का लाभ उठाकर आम जनता को महंगाई से कितनी राहत दिला पाती है।
धर्मेंद्र प्रधान और हरदीप सिंह पुरी की मोदी कैबिनेट से छुट्टी हो सकती है। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण का मंत्रालय बदले जाने और RBI के पूर्व गवर्नर शक्तिकांत दास को नया वित्तमंत्री बनाए जाने की सुगबुगाहट है। सूत्रों के मुताबिक, मोदी मंत्रिमंडल में ये बड़ा फेरबदल अगले कुछ हफ्ते में हो सकता है। 1. धर्मेंद्र प्रधान, शिक्षा मंत्री ये हैं कौनः संघ और विद्यार्थी परिषद के बैकग्राउंड वाले धर्मेंद्र प्रधान 2 बार राज्यसभा सांसद रह चुके हैं। अभी ओडिशा के संबलपुर से लोकसभा सांसद और पिछले 12 साल से मोदी सरकार में मंत्री। जुलाई 2021 से शिक्षा मंत्री हैं। क्यों हटाए जा सकते हैं: धर्मेंद्र प्रधान के शिक्षामंत्री रहते 5 बड़ी लापरवाहियां हुईं- 2026 में NEET पेपर लीक, CBSE बोर्ड की कॉपी चेकिंग में गड़बड़ी, UGC इक्विटी गाइडलाइन्स, 2024 में UGC-NET पेपर लीक और 2020 में आई नई शिक्षा नीति के लागू होने में देरी। इसके चलते केंद्र सरकार बार-बार बैकफुट पर दिखी। 2. हरदीप सिंह पुरी, पेट्रोलियम मंत्री ये हैं कौनः 1974 बैच के रिटायर्ड IFS अफसर हरदीप सिंह पुरी 2014 में बीजेपी से जुड़े। 2 बार राज्यसभा सांसद बने। सितंबर 2017 से केंद्रीय मंत्री हैं। अभी इनके पास पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय है। क्यों हटाए जा सकते हैं: सेक्स स्कैंडल 'एपस्टीन फाइल्स' में पुरी का नाम जुड़ा। फरवरी में कांग्रेस ने दावा किया कि 2014-17 के बीच पुरी ने जेफरी एपस्टीन से 62 ईमेल एक्सचेंज किए और 14 मीटिंग्स कीं। उन्हें हटाने की एक वजह उनकी उम्र भी हो सकती है। 74 साल के पुरी पिछले 9 साल से मंत्री हैं। 3. रवनीत सिंह बिट्टू, रेल राज्यमंत्री ये हैं कौनः पंजाब के पूर्व सीएम बेअंत सिंह के पोते रवनीत सिंह बिट्टू कांग्रेस में 3 बार लोकसभा सांसद बने। मार्च 2024 में बीजेपी से जुड़े। फिर राज्यमंत्री बने। अगस्त 2024 में राजस्थान से राज्यसभा पहुंचे। क्यों हटाए जा सकते हैं: 3 जून को बिट्टू ने अगले साल होने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव में उतरने की इच्छा जाहिर की। उन्होंने कहा, 'मैंने लोकसभा और राज्यसभा में 17 साल पूरे कर लिए हैं। मैंने अपना सामान पैक कर लिया है और पंजाब जाने के लिए पूरी तरह तैयार हूं।' 4 जून को बीजेपी ने राज्यसभा के लिए 11 उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की। इसमें बिट्टू का नाम नहीं था। 21 जून 2026 को उनका राज्यसभा कार्यकाल खत्म हो गया। बिट्टू बीजेपी को पंजाब की सत्ता तक पहुंचने में मदद कर सकते हैं। लुधियाना की किसी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ सकते हैं। 4. पंकज चौधरी, वित्त राज्यमंत्री ये हैं कौनः उत्तर प्रदेश की महाराजगंज सीट से 7 बार के लोकसभा सांसद पंकज चौधरी जुलाई 2021 से वित्त राज्यमंत्री हैं। दिसंबर 2025 में बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। क्यों हटाए जा सकते हैं: बीजेपी की इंटरनल पॉलिसी ‘एक व्यक्ति, एक पद’ के चलते चौधरी को मोदी कैबिनेट से मुक्त किया जा सकता है, ताकि 2027 यूपी विधानसभा और 2029 लोकसभा चुनाव के लिए उनका पूरा फोकस संगठन और इलेक्शन मैनेजमेंट पर रहे। 5. हर्ष मल्होत्रा, सहकारिता राज्यमंत्री ये हैं कौनः 2015-16 में पूर्वी दिल्ली नगर निगम के महापौर बने। 2024 में पूर्वी दिल्ली से सांसद और मोदी कैबिनेट में राज्यमंत्री बने। मई 2026 में दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष बने। क्यों हटाए जा सकते हैंः बीजेपी की 'एक व्यक्ति, एक पद' की नीति के तहत 62 साल के मल्होत्रा को कैबिनेट से हटाया जा सकता है। 6. जॉर्ज कुरियन, अल्पसंख्यक मामलों के राज्य मंत्री ये हैं कौनः सुप्रीम कोर्ट में वकील रहे। जून 2024 में मोदी सरकार में राज्य मंत्री बने। अल्पसंख्यक कार्य और मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय का जिम्मा संभाला। अगस्त 2024 में मध्यप्रदेश से राज्यसभा पहुंचे। क्यों इस्तीफा दिया: 23 जून को मोदी कैबिनेट के इकलौते ईसाई मंत्री कुरियन ने इस्तीफा दे दिया। इसकी एक वजह अप्रैल-मई में हुआ केरलम विधानसभा चुनाव भी है। बीजेपी को उम्मीद से कमतर नतीजे मिले। 65 साल के कुरियन ने भी चुनाव लड़ा, लेकिन ‘कंजिराप्पल्ली’ सीट पर वे तीसरे नंबर पर रहे। 1. शक्तिकांत दास ये हैं कौनः तमिलनाडु कैडर के 1980 बैच के रिटायर्ड IAS अफसर शक्तिकांत दास पीएम मोदी के प्रधान सचिव-2 हैं। आर्थिक मामलों के सचिव, राजस्व सचिव, 15वें वित्त आयोग के सदस्य, G20 शेरपा और 2018 से 2024 तक RBI के गवर्नर रह चुके हैं। एंट्री क्यों हो सकती है: मोदी सरकार के बड़े आर्थिक फैसले- नोटबंदी और GST लागू करने में दास की अहम भूमिका रही। बतौर RBI गवर्नर 3 बार कार्यकाल विस्तार मिलना उन पर मोदी सरकार के भरोसे का सबूत है। इस दौरान दास ने भारतीय अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखा, डिजिटल पेमेंट्स को बढ़ावा दिया और बैंकिंग रेगुलेशन मजबूत किया। सरकार को उम्मीद है कि प्रशासनिक और आर्थिक समझ रखने वाले दास वित्तीय स्थिति को मजबूत करेंगे। 2. अनुराग ठाकुर ये हैं कौनः हिमाचल प्रदेश के पूर्व सीएम प्रेम कुमार धूमल के बेटे हैं। BCCI के अध्यक्ष रहे। हमीरपुर लोकसभा सीट से लगातार 5वीं बार सांसद बने। एंट्री क्यों हो सकती है: मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में अनुराग राज्यमंत्री और कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं। तब बतौर सूचना एवं प्रसारण मंत्री उनका रिपोर्ट कार्ड अच्छा था। अगले साल हिमाचल में विधानसभा चुनाव है। बीजेपी चाहती है कि अनुराग के बूते युवा वोटर्स को लामबंद करके मौजूदा कांग्रेस सरकार हटाए और सत्ता में आए। 3. वीडी शर्मा ये हैं कौनः मध्यप्रदेश से आने वाले वीडी शर्मा पुराने स्वयंसेवक माने जाते हैं। 3 दशकों तक RSS और ABVP में काम किया। 2013 में बीजेपी में एक्टिव हुए। 2020 से 2025 तक बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष रहे। अभी खजुराहो से लगातार दूसरी बार सांसद हैं। एंट्री क्यों हो सकती है: मध्यप्रदेश के ज्यादातर राष्ट्रीय नेताओं को राज्य की राजनीति तक सीमित कर दिया गया है। जैसे- नरेंद्र सिंह तोमर, कैलाश विजयवर्गीय, प्रह्लाद सिंह पटेल। 55 साल के वीडी शर्मा को केंद्र में मंत्री पद देकर बीजेपी मध्यप्रदेश से अगली पीढ़ी के राष्ट्रीय नेता तैयार करना चाहती है। पार्टी में वीडी की छवि मजबूत संगठनकारी नेता की है। उनके अध्यक्ष रहते बीजेपी ने 2024 में मध्यप्रदेश की सभी 29 लोकसभा सीटें जीतीं। 4. तरुण चुग ये हैं कौनः पंजाब के अमृतसर से आते हैं। RSS का बैकग्राउंड है। 2 बार विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं, लेकिन जीते नहीं। 2018 से वे बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव हैं। एंट्री क्यों हो सकती है: हाल ही में हुए राज्यसभा चुनाव में बीजेपी ने पंजाब के कोटे से चुग को मध्यप्रदेश से उतारा और वे जीते भी। चुग को रवनीत सिंह बिट्टू की जगह राज्यसभा सीट मिली और अब मंत्री पद भी मिल सकता है। 5. राघव चड्ढा ये हैं कौनः चार्टर्ड अकाउंटेंट से नेता बने। अरविंद केजरीवाल के करीबी रहे। 2020 में दिल्ली के राजेंद्र नगर से विधायक और दिल्ली जल बोर्ड के उपाध्यक्ष बने। 2022 में पंजाब से राज्यसभा पहुंचे। एंट्री क्यों हो सकती है: अप्रैल में राघव ने AAP के 6 अन्य राज्यसभा सांसदों के साथ बीजेपी जॉइन कर ली। बीजेपी की कोशिश है- अगले साल पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनाव में राघव के बूते AAP को हराना। दरअसल, पंजाब के पिछले विधानसभा चुनाव में राघव ने AAP के लिए ग्राउंड वर्किंग और इलेक्शन मैनेजमेंट किया था। उन्हें AAP की अंदरूनी बातें पता हैं। राघव बीजेपी के लिए पंजाब में एग्रेसिव कैम्पेन कर सकते हैं। शहरी इलाकों और जेन-G वोटर्स में बीजेपी के लिए पैठ बना सकते हैं। 6. श्रीकांत शिंदे ये हैं कौनः महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे के बेटे हैं। कल्याण सीट से लगातार तीसरी बार सांसद। एंट्री क्यों हो सकती है: शिवसेना (उद्धव गुट) के 6 लोकसभा सांसदों तोड़ने के लिए हुए ‘ऑपरेशन टाइगर’ में श्रीकांत ने अहम भूमिका निभाई। इनाम के तौर पर मंत्री पद मिल सकता है। 7. संजय दीना पाटिल ये हैं कौनः NCP से राजनीति शुरू की। मुंबई की भांडुप से विधायक रहे। 2009 में उत्तर-पूर्वी मुंबई से लोकसभा सांसद बने। 2022 में शिवसेना (उद्धव) से जुड़े और 2024 में दोबारा लोकसभा सांसद बने। एंट्री क्यों हो सकती है: ‘ऑपरेशन टाइगर’ के चलते पाटिल शिवसेना (शिंदे) में आए हैं। बागी होने के इनाम के तौर पर संजय को भी मंत्री पद मिल सकता है। इसके पीछे स्ट्रैटजी है- शिवसेना (उद्धव) को और कमजोर करना, बीजेपी वाले ‘महायुति गठबंधन’ को मजबूत करना। 8. काकोली घोष दस्तीदार ये हैं कौनः डॉक्टर से नेता बनीं काकोली पश्चिम बंगाल की बारासात सीट से लगातार चौथी बार सांसद हैं। TMC की संस्थापक सदस्य और पूर्व सीएम ममता बनर्जी की करीबी रहीं। एंट्री क्यों हो सकती है: काकोली नेतृत्व में 20 TMC सांसद बागी हो गए। बाद में NCPI से जुड़े और बीजेपी को सपोर्ट दिया। इस टूट के इनाम के तौर पर काकोली को मंत्री बनाया जा सकता है। 9. अरुण गोविल ये हैं कौनः 'रामायण' सीरियल में भगवान राम का किरदार निभाने वाले अरुण गोविल। 2021 में वे बीजेपी से जुड़े। 2024 में उत्तर प्रदेश की मेरठ लोकसभा सीट से सांसद बने। एंट्री क्यों हो सकती है: अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव हैं। सोशल इंजीनियरिंग के तहत गोविल को मंत्री बनाया जा सकता है। गोविल पश्चिमी यूपी के वैश्य समाज से आते हैं। उनके बूते बीजेपी हिंदुत्व और सांस्कृतिक मुद्दे को भुना सकती है। 1. निर्मला सीतारमण, वित्त मंत्री ये हैं कौनः कर्नाटक से आने वाली निर्मला सीतारमण 2014 से राज्यसभा सांसद हैं। 2017 में वे रक्षा मंत्री बनीं। 2019 से वित्त और कॉर्पोरेट मामलों की मंत्री हैं। मंत्रालय क्यों बदल सकता है: सरकार और भारत की माली हालात कुछ महीनों से ठीक नहीं है। महंगाई पिछले 16 महीने के ऊंचे स्तर पर 3.9% पर पहुंच गई है। जबकि पीएम मोदी का लक्ष्य है- भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी और ग्लोबल मैन्युफेक्चरिंग हब बनाना। सरकार को लग रहा है कि किसी टेक्नोक्रेट को वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी दी जाए। ऐसे में निर्मला की जगह RBI गवर्नर रहे शक्तिकांत दास को लाया जा सकता है। निर्मला को शिक्षा मंत्रालय मिल सकता है। 2. ज्योतिरादित्य सिंधिया, पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्री ये हैं कौनः मध्यप्रदेश के कद्दावर नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया 2020 में कांग्रेस से बीजेपी में आए। जुलाई 2021 में मोदी सरकार में मंत्री बने। नागरिक उड्डयन और दूरसंचार जैसे मंत्रालय संभाले। अभी उनके पास पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास और संचार मंत्रालय का जिम्मा है। मंत्रालय क्यों बदल सकता है: सिंधिया 'हाई-परफॉर्मिंग' और डिलीवर करने वाले नेता माने जाते हैं। उनकी क्षमता और प्रभाव को देखते हुए उन्हें प्रमोट करने की तैयारी है। उन्हें रेल, वाणिज्य, उद्योग जैसा कोई अहम मंत्रालय मिल सकता है। 3. प्रह्लाद जोशी, नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री ये हैं कौनः कर्नाटक बीजेपी के अध्यक्ष रहे प्रहलाद जोशी धारवाड़ से लगातार 5वीं बार सांसद हैं। मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में संसदीय कार्य, कोयला और खनन मंत्री रहे। अभी वे नवीकरणीय ऊर्जा और उपभोक्ता मामलों के मंत्री हैं। मंत्रालय क्यों बदल सकता है: जोशी के सांगठनिक और संसदीय अनुभव के मद्देनजर उन्हें किसी बड़े या ज्यादा राजनीतिक प्रभाव वाले मंत्रालय का जिम्मा मिल सकता है। 2028 में जोशी के गृह राज्य कर्नाटक में विधानसभा चुनाव हैं, जहां बीजेपी को उम्मीदें हैं। 2014 से केंद्र में काबिज बीजेपी की मोदी सरकार में अब तक 4 बड़े फेरबदल हो चुके हैं। मोदी कैबिनेट में हुए फेरबदल में कुछ ट्रेंड नजर आते हैं… 1. परफॉर्मेंस नहीं तो छुट्टी तय कॉर्पोरेट कंपनियों की तरह मोदी सरकार में भी अगर कोई मंत्री उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता या उसके मंत्रालय से जुड़ा कोई विवाद खड़ा हुआ, तो बिना किसी हिचकिचाहट के उसकी छुट्टी कर दी जाती है। #MeToo मामले में घिरे विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर ने 2018 में इस्तीफा दिया था। 2021 में कोरोना महामारी के मिस-मैनेजमेंट के बाद तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन को हटाया गया था। बतौर आईटी मिनिस्टर रविशंकर प्रसाद, शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक और पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को अच्छा प्रदर्शन न होने के कारण कैबिनेट से बाहर कर दिया गया था। 2. नौकरशाहों और एक्सपर्ट्स पर भरोसा मोदी सरकार में सिर्फ पारंपरिक नेता ही मंत्री नहीं बनते, बल्कि जटिल और अहम मंत्रालयों का जिम्मा पूर्व IAS, IFS अफसर या डोमेन एक्सपर्ट्स (टेक्नोक्रेट्स) को देने का चलन भी है। जैसे- पूर्व विदेश सचिव एस. जयशंकर को विदेश मंत्री बनाना, पूर्व IAS अफसर अश्विनी वैष्णव को रेल और आईटी मंत्रालय सौंपना, पूर्व IAS अफसर अर्जुन राम मेघवाल और रिटायर्ड IFS अफसर हरदीप सिंह पुरी को केंद्रीय मंत्री बनाना। 3. चुनावी राज्यों की इंजीनियरिंग मोदी सरकार में ये पैटर्न रहा है कि हर कैबिनेट फेरबदल में अगले विधानसभा चुनावों की सोशल और इलेक्टोरल इंजीनियरिंग को सेट किया जाता है। जुलाई 2021 में मोदी कैबिनेट का सबसे बड़ा फेरबदल हुआ। तब उत्तर प्रदेश के पंकज चौधरी, अजय मिश्रा टेनी, अनुप्रिया सिंह पटेल, एसपी सिंह बघेल, भानु प्रताप सिंह वर्मा, कौशल किशोर; गुजरात के महेंद्र मुंजापारा, दर्शना जरदोश, देवूसिंह चौहान जैसे नेताओं को मंत्री बनाया गया था। इसके पीछे 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव थे। 4. ‘एक व्यक्ति, एक पद’ की पॉलिसी बीजेपी बार-बार ये बात दोहराती है कि वे ‘एक व्यक्ति, एक पद’ की नीति अपनाती है। यानी कोई नेता सरकार और संगठन दोनों में एक साथ बड़े पद नहीं पा सकता। जैसे- 2014 में राजनाथ सिंह गृहमंत्री बने, तो 2 महीने बाद बीजेपी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। 2019 में जब अमित शाह गृहमंत्री बने, तो अगले ही महीने जगत प्रकाश नड्डा को कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया गया और 8 महीने बाद शाह ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। जनवरी 2026 में जब नितिन नबीन पार्टी अध्यक्ष बने, तो उन्हें बिहार सरकार में मंत्री पद छोड़ना पड़ा। --------------------- ये भी खबर पढ़िए… मोदी सरकार को क्यों चाहिए 362 सांसद; TMC के 20, शिवसेना UBT के 6 सांसद टूटे; बाकी 44 कहां से जुटाएंगे 14 जून को TMC के 28 में से 20 लोकसभा सांसदों ने गुमनाम सी पार्टी NCPI में विलय कर लिया। आज शिवसेना (उद्धव गुट) के 9 से 6 लोकसभा सांसदों ने भी बगावत कर दी। इससे पहले 24 अप्रैल को आम आदमी पार्टी के 10 में से 7 राज्यसभा सांसदों ने भी बगावत कर दी थी। ये सभी बागी BJP या NDA में शामिल हुए हैं। पूरी खबर पढ़िए…
चल रहे फीफा वर्ल्ड कप के 18 दिन हो चुके हैं। 48 टीमों के 72 मैच में 215 गोल हो चुके हैं। ईनाम की रकम है 8 हजार करोड़ रुपए। पर ये फुटबॉल बला है क्या जो इंसानी हाथों से ज्यादा कदमों को तरजीह देता है। कब पैदा हुआ, क्यों पैदा हुआ, कायदे-कानून कैसे और किसने बनाए, साथ में कुछ खास किस्से। 4 चैप्टर और 14 ग्राफिक्स में यही बातें हैं… ----------- **** ग्राफिक्स: द्रगचंद्र भुर्जी, अंकलेश विश्वकर्मा और अंकुर बंसल ---------- यह खबर भी पढ़िए… क्या IPL का डाउनफॉल शुरू:टीवी दर्शक 26% घटे, विदेशी खिलाड़ी आधा सीजन ही खेल रहे; टॉप एक्सपर्ट्स ने बताईं वजहें और समाधान इस साल IPL के फर्स्ट हाफ में टीवी व्यूअरशिप 26% गिरी है। स्पॉन्सर 65 से 45 रह गए हैं। ईडन गार्डन जैसे स्टेडियम भी कुछ मैचों में आधे ही भर पाए। कई विदेशी खिलाड़ियों ने भी आधे सीजन बाद टीम को जॉइन किया। पूरी खबर पढ़िए…
कतर में बनी सहमति: अमेरिका-ईरान अब नहीं करेंगे हमले
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के पास हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े सैन्य तनाव के बाद अब दोनों देशों ने हमले रोकने पर सहमति जताई है
22 से 26 जून 2026 तक बांग्लादेशी पीएम तारिक रहमान चीन में थे। इसी दौरान बांग्लादेश ने अपने मोंगला पोर्ट का प्रोजेक्ट भारत से छीनकर चीन को दे दिया। यानी हमारे तट से महज 80 किमी दूर मोंगला पोर्ट पर चीन बैठेगा। भारत की ‘चिकन नेक’ से 100 किमी दूर तीस्ता नदी को भी चीन मैनेज करेगा। आखिर चीन इन इलाकों में क्या करने वाला है और ये भारत की सुरक्षा के लिए कितना बड़ा खतरा; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: बांग्लादेश ने भारत से मोंगला प्रोजेक्ट छीनकर चीन को क्यों दिया? जवाब: 2015 में बांग्लादेश ने भारत से दो इकॉनमिक जोन बनाने के लिए समझौता किया था। इनमें एक मोंगला पोर्ट और दूसरा चटगांव का इलाका था। बांग्लादेशी अखबार द बिजनेस स्टैंडर्ड के मुताबिक, मोंगला प्रोजेक्ट की शुरुआत में भारत के पैसे से मोंगला पोर्ट से खुलना के बीच एक नई रेलवे लाइन बनी। 2018 में भारत सरकार ने मोंगला प्रोजेक्ट का थका हीरानंदानी ग्रुप को दिया। मार्च 2022 में बांग्लादेश इकॉनोमिक जोन अथॉरिटी यानी BEZA और हीरानंदानी ग्रुप की कंपनी एविटा कंस्ट्रक्शंस प्राइवेट लिमिटेड के साथ समझौता किया। हालांकि अगस्त 2024 में बांग्लादेश में शेख हसीना का तख्तापलट होने के चलते ये प्रोजेक्ट रुक गया। शेख हसीना भारत आ गईं। शेख हसीना तब भारत आ गई थीं और बांग्लादेश के अंतरिम राष्ट्रपति बने मुहम्मद यूनुस के दौर में इस प्रोजेक्ट पर बात आगे नहीं बढ़ी। हसीना के बाद एंटी इंडियन मानी जाने वाली खालिदा जिया की पार्टी BNP सत्ता में आई और फरवरी 2026 में उनके बेटे तारिक रहमान पीएम बने। BEZA के मुताबिक, भारतीय कंपनी तय शर्त के मुताबिक दो साल के भीतर काम शुरू नहीं कर पाई। इसी बीच जून 2025 में बांग्लादेश में तैनात चीनी दूतावास के ऑफिसर्स ने मोंगला पोर्ट पर एक चीनी इकॉनमिक जोन बनाने का प्रस्ताव दिया था। इसके बाद अक्टूबर 2025 में बांग्लादेश सरकार ने भारत के साथ प्रोजेक्ट रद्द कर दिया। 25 जून 2026 को तारिक रहमान के चीन दौरे के बीच BEZA और चीन की सरकारी कंपनी चाइना सिविल इंजीनियरिंग कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन (CCECC) के बीच पोर्ट के डेवेलपमेंट के अलावा आसपास की 110 एकड़ जमीन पर इकनोमिक जोन बनाने का समझौता हुआ है। इसके अलावा 25 मार्च 2025 को मोंगला पोर्ट अथॉरिटी (MPA) और CCECC के बीच मोंगला पोर्ट के डेवेलपमेंट के लिए 370 मिलियन डॉलर के एक अलग प्रोजेक्ट पर भी समझौता हुआ था। हालांकि इस पर अब तक काम नहीं शुरू हुआ है। सवाल-2: अब चीन मोंगला पोर्ट पर क्या करने जा रहा है? जवाब: चीन मोंगला पोर्ट पर 2 काम करेगा... 1. पोर्ट का डेवेलपमेंट 2. पोर्ट के पास इकॉनोमिक जोन 26 जून को बांग्लादेश-चीन के जॉइंट स्टेटमेंट में 2 और प्रोजेक्ट चीन को देने की बात कही गई है। इसमें लिखा है कि दोनों देश चटगांव में चीन के इकॉनोमिक एंड इंडस्ट्रियल जोन को डेवेलपमेंट करेंगे। साथ ही चीन तीस्ता नदी के प्रबंधन में हर संभव मदद करेगा। सवाल-3: ये प्रोजेक्ट चीन को मिलना भारत के लिए चिंता की बात क्यों?जवाब: भारत के लिए 4 बड़ी दिक्कतें हैं... 1. चीन के मुकाबले में कूटनीतिक हार 2. बंगाल की खाड़ी में भारत के लिए नया खतरा 3. तीस्ता नदी प्रोजेक्ट से 'चिकन नेक' पर खतरा 4. भारत की बिजनेस कनेक्टिविटी को नुकसान सवाल-4: चीन के बढ़ते दबदबे से कैसे निपटेगा भारत?जवाब: हिंद महासागर को भारत का 'आंगन' कहा जाता है, लेकिन यहां चीन अपनी ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल’ कही जाने वाली स्ट्रैटजी के तहत बंदरगाह, हवाई पट्टी और नेवल बेस बना रहा है। चीनी कंपनियां हिंद महासागर में 17 बंदरगाहों में से 13 का डेवेलपमेंट कर रही हैं, जबकि बाकी प्रोजेक्ट्स में उनकी हिस्सेदारी हैं। हिंद महासागर में चीन की हरकतें भारत के लिए बड़ी चुनौती हैं। इसके जवाब में भारत भी उल्टा जाल बुन रहा है। भारत की स्ट्रैटजी का नाम है- ‘नेकलेस ऑफ डायमंड’। हालांकि ये भारत सरकार का कोई घोषित प्रोजेक्ट या डॉक्ट्रिन नहीं है। ‘नेकलेस ऑफ डायमंड’ के तहत 4 बड़े काम हो रहे हैं… ---- ये खबर भी पढ़ें… भास्कर एक्सप्लेनर- शेख हसीना भारत से कहां जाएंगी:बांग्लादेश की सत्ता अब कौन संभालेगा; 8 सवालों में आगे की कहानी पड़ोसी देश बांग्लादेश की कहानी हर गुजरते घंटे के साथ बदल रही है। करीब 2 महीने से चल रहे आरक्षण विरोधी आंदोलन हिंसक होने के बाद प्रधानमंत्री शेख हसीना को बांग्लादेश छोड़ना पड़ा है। वो सेना के हेलिकॉप्टर से पहले अगरतला पहुंचीं और वहां से C-130J मिलिट्री विमान से गाजियाबाद के हिंडन मिलिट्री एयरबेस पर लैंड हुईं। पूरी खबर पढ़ें…
फ्रांस में बड़ा विमान हादसा: पैराशूट प्रशिक्षण विमान क्रैश, 11 लोगों की दर्दनाक मौत
फ्रांस के उत्तर-पूर्वी शहर टॉम्बलेन में रविवार को एक नागरिक विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें सवार 11 लोगों की मौत हो गई। स्थानीय अधिकारियों ने इसकी पुष्टि की है। वहीं सऊदी अरब में भी एक हेलिकॉप्टर हादसे की खबर है। इसमें 14 लोगों की मौत हो गई है।
कौन हैं डॉ. महरंग बलोच और क्यों बनीं 'बलूचिस्तान की शेरनी'? बलूचिस्तान की आवाज बनकर उभरीं डॉ. महरंग बलोच को पाकिस्तान की एक आतंकवाद-रोधी अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई है। 33 वर्षीय महरंग का संघर्ष तब शुरू हुआ था, जब वे महज 16 साल की थीं और उनके पिता अब्दुल गफ्फार लैंगोव लापता हो गए थे। बाद में उनके पिता का शव बरामद हुआ, जो प्रताड़ना के गहरे निशान लिए हुए था। इस घटना ने एक साधारण डॉक्टर को बलूचिस्तान के सबसे बड़े मानवाधिकार आंदोलन का चेहरा बना दिया। उन्हें अब 'बलूचिस्तान की शेरनी' के नाम से जाना जाता है, जो जबरन गायब किए गए (Enforced Disappearances) हजारों लोगों के हक के लिए आवाज उठाती रही हैं।उम्रकैद के पीछे का विवाद: क्या है आरोप? अदालत ने महरंग और उनके सहयोगी सिबगतुल्लाह शाह को 2024 में ग्वादर में हुए एक विरोध प्रदर्शन के दौरान एक पैरामिलिट्री सैनिक की मौत के मामले में दोषी ठहराया है। उन पर आतंकवाद, देशद्रोह और हत्या जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। हालांकि, महरंग का परिवार और उनके समर्थक इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हैं। उनका कहना है कि यह बलूचिस्तान में असहमति की आवाज को दबाने और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित करने की एक सोची-समझी साजिश है। महरंग की कानूनी टीम ने घोषणा की है कि वे इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती देंगे।लापता लोगों का दर्द और पाकिस्तान का 'सौतेला' रुख बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा और प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध प्रांत है, लेकिन लंबे समय से उपेक्षा और हिंसा का दंश झेल रहा है। मानवाधिकार समूहों का आरोप है कि पिछले दो दशकों में हजारों बलूच लोग सुरक्षा बलों द्वारा बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के हिरासत में ले लिए गए। सरकार इन दावों को खारिज करती है और लापता लोगों को उग्रवादी गुटों से जोड़ने की कोशिश करती है। बलूच कार्यकर्ताओं का मानना है कि 'जबरन गायब करना' इस्लामाबाद की वह रणनीति है, जिसका उद्देश्य विद्रोह को कुचलना और स्वतंत्र बलूचिस्तान की मांग को कमजोर करना है।अदम्य साहस: धमकियों और पाबंदियों के बावजूद जारी संघर्ष महरंग बलोच का एक्टिविज्म केवल बयानों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने 2023 के अंत में सैकड़ों महिलाओं के साथ 1,600 किलोमीटर की लंबी पदयात्रा (Long March) का नेतृत्व किया ताकि लापता लोगों के ठिकाने का पता चल सके। जान से मारने की धमकियों और बार-बार गिरफ्तारी के बावजूद वे पीछे नहीं हटीं। मार्च 2025 में क्वेटा में विरोध प्रदर्शन के दौरान उनकी गिरफ्तारी हुई थी। अब उम्रकैद की यह सजा उनके दशकों पुराने संघर्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। महरंग का परिवार और मानवाधिकार संगठन इस मुकदमे को निष्पक्ष मानने से इनकार कर रहे हैं और इसे असहमति को कुचलने का माध्यम बता रहे हैं।
विनाशकारी भूकंप: मातम के बीच प्रशासनिक संवेदनहीनता वेनेजुएला इन दिनों 7.2 और 7.5 तीव्रता के विनाशकारी भूकंप के कारण भीषण त्रासदी झेल रहा है। ला गुआइरा राज्य इस आपदा का केंद्र बना हुआ है, जहां मलबे के नीचे दबे शवों की दुर्गंध ने पूरे इलाके को नरक बना दिया है। अब तक 1,430 मौतें और 3,200 घायलों की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 50,000 लोग अभी भी लापता हैं। लेकिन सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि जहां हजारों परिवार अपने प्रियजनों को खोकर बिलख रहे हैं, वहां राहत कार्य के लिए पहुंचे सरकारी कर्मचारी आपदा का 'लुत्फ' उठाते नजर आए। ध्वस्त इमारतों के सामने खड़े होकर अधिकारियों द्वारा ली जा रही सेल्फी ने पूरी दुनिया में वेनेजुएला सरकार के खिलाफ आक्रोश पैदा कर दिया है।राहत कार्यों में ढिलाई और 'पास' का नया ड्रामा संकट के इस दौर में सरकार की ओर से जो सहायता मिलनी चाहिए थी, उसके बजाय प्रशासन ने बाधाएं खड़ी कर दी हैं। सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में आम लोगों का प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया गया है। स्वयंसेवकों, जो अपने स्तर पर लोगों की जान बचाने के लिए मलबे हटा रहे थे, उन्हें भी 'सुरक्षित प्रवेश पास' लेने के लिए मजबूर किया गया है। स्थानीय लोगों का गुस्सा तब सातवें आसमान पर पहुंच गया जब उन्होंने अधिकारियों को मदद छोड़कर तस्वीरें खिंचवाने में व्यस्त देखा। पीड़ितों का कहना है कि प्रशासन न केवल मदद करने में विफल रहा, बल्कि बचाव कार्य में जुटने वालों के लिए भी मुश्किलें पैदा कर रहा है।सड़ती लाशें और अपनों की तलाश में जुड़ा हर हाथ भीषण गर्मी के कारण मलबे में दबे शवों के तेजी से सड़ने से स्वास्थ्य संबंधी खतरा भी बढ़ गया है। ला गुआइरा में हालात इतने भयावह हैं कि लोग मास्क पहनने को मजबूर हैं। दिल दहला देने वाली कहानियों के बीच, पीड़ितों का दर्द साफ झलकता है कि उन्होंने अपने परिजनों को खुद मलबे से बाहर निकाला है, जबकि सरकारी मदद नदारद रही। कैराबलेडा में अपनों को तलाश रही माइलेडी रोमेरो जैसी कई मांएं हैं जिनकी आंखों में आंसू और जुबां पर एक ही सवाल है—कल रात तक मलबे के नीचे से लोगों की चिल्लाने की आवाजें आ रही थीं, लेकिन प्रशासन ने बचाने की कोशिश तक नहीं की। आखिर वे किस बात का इंतजार कर रहे हैं? फिलहाल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 21 देशों की राहत टीमें जुटी हुई हैं, लेकिन स्थानीय प्रशासन की उदासीनता इस आपदा को और भी दर्दनाक बना रही है।
रिकॉर्ड तोड़ गर्मी से फ्रांस में हाहाकार पश्चिमी यूरोप इन दिनों भीषण गर्मी की चपेट में है, जिसका सबसे बुरा असर फ्रांस पर पड़ा है। पब्लिक हेल्थ फ्रांस के ताजा आंकड़ों के अनुसार, रिकॉर्ड तोड़ हीटवेव के कारण देश में लगभग 1,000 अतिरिक्त मौतें दर्ज की गई हैं। यह गर्मी न केवल इंसानी सहनशक्ति की परीक्षा ले रही है, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए भी बड़ी चुनौती बन गई है। एजेंसी ने स्पष्ट किया है कि ये आंकड़े अभी शुरुआती हैं और जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी, यह संख्या और अधिक बढ़ सकती है।बुजुर्गों और अकेले रहने वालों के लिए बनी काल इस हीटवेव की सबसे दुखद बात यह है कि इसका 85 प्रतिशत शिकार 65 वर्ष या उससे अधिक आयु के बुजुर्ग हुए हैं। सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, पेरिस और उसके आसपास के 'इले-डी-फ्रांस' (le-de-France) इलाके में घरों के अंदर मरने वालों की संख्या में चिंताजनक बढ़ोतरी देखी गई है। स्वास्थ्य अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि जो बुजुर्ग अकेले रहते हैं, वे गर्मी का मुकाबला करने में सबसे ज्यादा कमजोर साबित हो रहे हैं। यह स्थिति समाज में अकेलेपन की समस्या और हीटवेव के दौरान बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत को रेखांकित करती है।रेड अलर्ट और राहत की उम्मीद फ्रांस के कई इलाकों में पिछले कई दिनों से तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया था, जिसके चलते प्रशासन को 'रेड अलर्ट' जारी करना पड़ा। हालांकि, रविवार को तापमान में थोड़ी गिरावट दर्ज की गई है, जिससे आम जनता को भीषण गर्मी से हल्की राहत मिली है। सरकार ने नागरिकों से अपील की है कि वे अकेले रहने वाले पड़ोसियों, विशेषकर बुजुर्गों का ध्यान रखें और हीटवेव के दौरान सावधानी बरतें। फिलहाल फ्रांस का स्वास्थ्य विभाग प्रभावित इलाकों में स्थिति पर कड़ी नजर रखे हुए है ताकि मौतों के इन बढ़ते आंकड़ों को नियंत्रित किया जा सके।
ईरान और अमेरिका में फिर शुरू हुआ तनाव, ताजा हमलों के बीच राष्ट्रपति ट्रंप ने दी चेतावनी
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अमेरिका ने ईरानी सैन्य ठिकानों पर नए एयर स्ट्राइक किए हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने तेहरान पर होर्मुज स्ट्रेट के पास एक कमर्शियल तेल टैंकर पर हमला करके सीजफायर समझौते को फिर से तोड़ने का आरोप लगाया है
ईरान का पलटवार: कुवैत और बहरीन पर मिसाइल-ड्रोन हमला
इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) की नौसेना और एयरोस्पेस फोर्स ने अमेरिका के हमलों के जवाब में कुवैत और बहरीन में मिसाइल और ड्रोन ऑपरेशन शुरू किए
होर्मुज़ जलडमरूमध्य में धमाका: अमेरिका ने ईरान के 10 सैन्य ठिकाने उड़ाए
अमेरिका की सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम ) ने कहा कि अमेरिका की सेना ने शनिवार रात होर्मुज़ जलडमरूमध्य और उसके आस-पास ईरान के 10 सैन्य ठिकानों पर हमला किया
ट्रंप का संभावित भारत दौरा: रिश्ते सुधारने का सुनहरा मौका!
अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो के इस बयान के बाद कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अगले साल की शुरुआत में भारत आ सकते हैं
ख्वाजा आसिफ के 'असली कश्मीरी नहीं' वाले बयान पर बवाल, मानवाधिकार परिषद ने जताई नाराजगी
पाकिस्तान के मानवाधिकार परिषद (एचआरसी) ने पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के उस बयान की कड़ी आलोचना की
भास्कर सीरीज ‘स्पाई फाइल्स’ में आप पढ़ रहे हैं जासूस सहमत की कहानी। पार्ट-1 में आपने पढ़ा कि कश्मीर के कपड़ा कारोबारी हिदायत खान भारत की खुफिया एजेंसी RAW के जासूस थे। पाकिस्तानी सेना के अफसरों में उनकी गहरी पैठ थी। उन्हें कैंसर हो गया। मौत से पहले उन्होंने RAW के कहने पर बेटी सहमत की शादी पाकिस्तानी सेना के कैप्टन इकबाल से करवा दी। सहमत के ससुर सईद पाक सेना में ब्रिगेडियर और जेठ महबूब मेजर थे। सहमत ने परिवार का इतना दिल जीत लिया कि ब्रिगेडियर सईद सेना के मामलों में भी उसकी सलाह लेने लगे। सहमत ने चालाकी से ब्रिगेडियर के बॉस लेफ्टिनेंट जनरल अमीर खान को भी अपने प्रभाव में ले लिया। इस तरह RAW को पाक सेना की गोपनीय खबरें मिलने लगीं। पार्ट-2 में आगे की कहानी… सहमत को पाकिस्तान में रहते हुए दो साल बीत गए थे। अभी तक कोई बड़ी जानकारी उसके हाथ नहीं लगी थी। वो समझ गई कि उसे कुछ बड़ा करना होगा। एक रोज उसने ससुर सईद से बताया कि वो स्कूल में संगीत सिखाना चाहती है। सईद नाराज हो गए। उन्होंने कहा- ‘हमारे घर की औरतें नौकरी नहीं करतीं। तुम्हें किसी चीज की कमी है क्या?’ सहमत धीरे से बोली- ‘किसी चीज की कमी नहीं है, पर खाली वक्त नहीं कटता। घर में बैठे-बैठे परेशान हो गई हूं।’ तभी इकबाल वहां आ गया। उसने कहा- 'सहमत ठीक कह रही है अब्बू। संगीत में इसकी दिलचस्पी है। स्कूल के बहाने इसका मन भी लगने लगेगा।' कुछ देर सोचने के बाद ब्रिगेडियर ने कहा- ‘जैसा तुम लोगों को ठीक लगे करो, पर खानदान का नाम खराब नहीं होना चाहिए।’ सहमत ने मुस्कुराते हुए कहा- 'जी अब्बू।' कुछ दिनों बाद सहमत ने एक स्कूल में संगीत सिखाना शुरू कर दिया। यह कोई आम स्कूल नहीं था, यहां पाकिस्तान के रईसों और सेना के आला अफसरों के बच्चे पढ़ते थे। जल्द ही सहमत की खोजी नजरों ने अपना शिकार ढूंढ निकाला- ‘अनवर खान।’ अनवर, पाकिस्तानी सेना के ताकतवर अफसर, लेफ्टिनेंट जनरल इम्तियाज खान का पोता था। संगीत में उसकी दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन सहमत ने उसे म्यूजिक क्लास का ग्रुप लीडर बना दिया। खास तौर पर ट्रेनिंग की व्यवस्था की। हर दिन अलग से उसे घंटों रियाज कराती। धीरे-धीरे संगीत में अनवर की दिलचस्पी बढ़ने लगी। कुछ महीने बाद स्कूल का एनुअल फंक्शन होना तय हुआ। सहमत ने लेफ्टिनेंट जनरल इम्तियाज खान और उनकी बेगम को इनवाइट किया। दोनों शामिल भी हुए। अनवर की परफॉर्मेंस देखकर ऑडिटोरियम की अगली कतार में बैठे लेफ्टिनेंट जनरल इम्तियाज और उनकी बेगम बेहद खुश हुए। पोते की परफॉर्मेंस के पीछे उन्हें एक ही चेहरा नजर आ रहा था- लेडी टीचर सहमत। इस शाम ने सहमत के लिए जनरल इम्तियाज के आलीशान बंगले के दरवाजे खोल दिए। धीरे-धीरे वह जनरल के परिवार की इतनी करीबी बन गई कि उनका उठना-बैठना और पारिवारिक मशविरे सहमत के बिना अधूरे होने लगे। इसका फायदा सहमत के पाकिस्तानी परिवार को भी मिला। ब्रिगेडियर सईद पाकिस्तान की ताकतवर खुफिया एजेंसी ISI के डिप्टी चीफ बन गए। यानी अब सहमत, ससुर के बहाने ISI की देहरी तक पहुंच चुकी थी। सहमत की बायोग्राफी लिखने वाले पूर्व नेवी अफसर हरिंदर सिक्का बताते हैं- ‘एक शाम हवेली के स्टडी रूम में सन्नाटा पसरा था। सहमत, ब्रिगेडियर की फाइलें पलट रही थी। अचानक उसके माथे पर पसीने की बूंदें तैरने लगीं। एक पन्ने पर लिखा था- पाकिस्तानी पनडुब्बियां बंगाल की खाड़ी की तरफ कूच करने वाली हैं। INS विक्रांत को तबाह करना है। भारत के सबसे बड़े युद्धपोत INS विक्रांत की तस्वीरें वहां चस्पा थीं, जिसमें उसके क्रू मेंबर्स की तादाद से लेकर हथियारों की तैनाती तक का पूरा ब्योरा था। इत्तेफाक से उस वक्त सहमत की जेठानी मुनीरा मायके गई हुई थी। शौहर कैप्टन इकबाल और जेठ मेजर महबूब अपने कामों में मशरूफ थे। सहमत ने उस फाइल को कपड़ों में छुपाया और दबे पांव अपने वॉशरूम में चली गई।' अचानक... 'थाप! थाप! थाप!' वॉशरूम का दरवाजा जोर-जोर से बजा। बाहर नौकर अब्दुल खड़ा था, जो बुरी तरह किवाड़ पीट रहा था। सहमत घबरा गई। कुछ सेकेंड तक उसने अपनी सांसें रोकीं, खुद को संभाला और फिर रोबीली आवाज में चिल्लाई, ‘बाहर इंतजार करो अब्दुल, मैं आ ही रही हूं!’ अब्दुल बाहर चला गया। अब सहमत ने वॉशरूम में लगे खुफिया ट्रांसमीटर से RAW को मैसेज भेजा। फिर दबे पांव अपने कमरे में पहुंची। खुद को संभाला और चुपचाप स्टडी रूम जाकर अनगिनत फाइलों में उस सीक्रेट कागज को वापस रखा और बाहर निकल गई। गलियारे में ससुर ब्रिगेडियर सईद बदहवास से खड़े थे। ‘तुम कहां थी सहमत? मैं कब से एक फाइल ढूंढ रहा हूं…’ ‘अब्बू जान, परेशान मत होइए। आप कमरे में चलकर आराम कीजिए, मैं अभी ढूंढकर लाती हूं।’ सहमत जानती थी कि ब्रिगेडियर का ब्लड प्रेशर किस फाइल के लिए बढ़ा हुआ था। चंद मिनटों बाद, सहमत वही फाइल हाथ में लिए ब्रिगेडियर के सामने खड़ी थी। सईद ने बिना कुछ कहे फाइल ली और तेज कदमों से दफ्तर की तरफ चल पड़ा। ब्रिगेडियर के जाते ही सहमत अपने कमरे में लौटी। वॉशरूम का दरवाजा खुला हुआ था। मैसेज भेजने वाली खुफिया मशीन उखाड़ दी गई थी। ‘अब्दुल सब देख चुका है!’ मन में बुदबुदाते हुए सहमत उल्टे पैर बाहर की तरफ भागी। उसने देखा कि रसोई के पिछले रास्ते से एक जानी-पहचानी परछाई हवेली के गेट की तरफ जा रही थी। वह अब्दुल ही था। हवेली के दरवाजे पर सेना का राशन सप्लाई ट्रक खड़ा था, जिसका ड्राइवर कहीं आसपास गया हुआ था। सहमत बिजली की फुर्ती से ड्राइविंग सीट पर बैठी, चाबी घुमाई और एक्सीलेटर पर पैर रख दिया। कुछ ही दूरी पर उसे अब्दुल भागता हुआ मिल गया। वह ब्रिगेडियर सईद के दफ्तर की तरफ जा रहा था। सेना का ट्रक आता देख अब्दुल ने दोनों हाथ हवा में लहराए- ‘रोको! रोको!’ सहमत ने ब्रेक की जगह एक्सीलेटर को पूरी ताकत से दबा दिया। पलक झपकते ही... ट्रक के भारी-भरकम टायर अब्दुल को रौंदते हुए आगे निकल गए। सड़क किनारे ट्रक को छोड़ सहमत नीचे उतरी। एक घर के बाहर तार पर टंगे बुर्के को उसने झपटकर पहना और लगभग दौड़ती हुई हवेली पहुंची। सबसे पहले वॉशरूम का रूख किया। वहां मौजूद हर सबूत को मिटाया। उधर, लहूलुहान अब्दुल को किसी ने अस्पताल पहुंचा दिया था। खबर मिलते ही सहमत का जेठ, मेजर महबूब भी अस्पताल पहुंच गया। अब्दुल, महबूब को देखकर कुछ बोलना चाह रहा था, लेकिन हलक से सिर्फ घड़घड़ाहट की आवाज निकल रही थी। उसने भारी मशक्कत के साथ कंबल के नीचे से अपना हाथ बाहर निकाला और मेजर की हथेली पर मेटल के दो टुकड़े रख दिए। महबूब ने अब्दुल का चेहरा थामकर चीखते हुए पूछा, ‘बताओ अब्दुल! क्या हुआ है? किसने किया यह?’ उसने बस इतना ही कहा- ‘हहहह... मत... मत…’ और उसकी आंखें हमेशा के लिए बंद हो गईं। रात को मेजर महबूब घर लौटा, तो उसके चेहरे पर गहरा तनाव था। उसने परिवार को अब्दुल की मौत की खबर दी और जेब से मेटल के वे दो टुकड़े निकालकर मेज पर रख दिए। दूर कोने में खड़ी सहमत का दिल तेजी से धड़क रहा था। वह समझ चुकी थी कि महबूब शातिर फौजी अफसर है। वह इन दो टुकड़ों के पीछे छिपे राज को ढूंढने के लिए जमीन-आसमान एक कर देगा। सहमत को अब बहुत जल्द, कुछ और बड़ा करना था। एक रोज सहमत ने बुर्का पहना और कार में बैठकर नजदीक की एक मस्जिद के लिए निकल पड़ी। मस्जिद के बाहर चिलचिलाती धूप के बीच एक फटेहाल महिला छाते बेच रही थी। सहमत को देखते ही वह मिन्नतें करने लगी, ‘मेम साहब, खुदा के लिए एक छतरी खरीद लो। बच्चे सुबह से भूखे हैं, कुछ पैसे आ जाएंगे तो उनके निवाले का इंतजाम हो जाएगा।’ ड्राइवर चिढ़ गया, लेकिन सहमत ने सौ के दो नोट पर्स से निकाले और छाता ले लिया। घर लौटकर सहमत ने कमरे का दरवाजा बंद किया। छतरी के हैंडल को आहिस्ता से घुमाया। हैंडल से कांच की एक छोटी शीशी बाहर निकली। उस पर हाथ से लिखी एक पर्ची चिपकी थी- ‘इसके पीछे लगे बटन को दबाकर आप एक खास केमिकल की कुछ बूंदें सीधे इंसान के जिस्म में उतार सकती हैं। शिकार को दर्द का एहसास भी नहीं होगा और कुछ ही घंटों के भीतर वह दम तोड़ देगा।’ कुछ देर बाद सहमत ने उस छतरी को अपने पर्स में छिपाया और बाजार जाने का बहाना बनाकर पाकिस्तान सेना के 'ब्यूरो ऑफ इंस्पेक्शन' की तरफ निकल पड़ी। इसी दफ्तर में उसका जेठ महबूब काम करता था। वहां पहुंचने के बाद वो पहली मंजिल के एक कोने में खड़ी हो गई। करीब 20 मिनट तक इंतजार किया। नीचे एक फौजी गाड़ी आकर रुकी। गहरे हरे रंग की वर्दी पहने एक अफसर कार से निकला। सहमत ने पहचान लिया- ‘वो मेजर महबूब है।’ वो तेजी से सीढ़ियां चढ़ता हुआ ऊपर आ रहा था। तभी सहमत लड़खड़ाकर गिर पड़ी। ‘ओह! संभालिए…’ महबूब उसे बचाने के लिए तेजी से आगे बढ़ा। दोनों एक पल के लिए टकराए और उसी पल बुर्के के भीतर से सहमत ने छतरी का बटन दबा दिया। छतरी की नोक से वो केमिकल महबूब के शरीर में चला गया। सहमत संभलकर खड़ी हुई, उसने शुक्रिया कहा और आगे बढ़ गई। उसने पलटकर देखा कि मेजर सीढ़ियां चढ़ते हुए हल्के-हल्के अपनी बांह सहला रहा था। सहमत मन ही मन मुस्कुराई- ‘काम हो गया।’ कुछ ही घंटों बाद, ब्यूरो ऑफ इंस्पेक्शन के दफ्तर में तहलका मच गया। मेजर महबूब अपनी छाती थामकर फर्श पर गिर पड़ा था। उसे आनन-फानन में मिलिट्री अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने पूरी कोशिश की पर महबूब को बचा नहीं पाए। मौत की वजह हार्ट अटैक बताई गई। सहमत के घर में मातम पसर गया। हर कोई बिलख रहा था, लेकिन महबूब की बेवा मुनीरा की आंखों में एक गहरा शक तैर रहा था। पहले वफादार नौकर अब्दुल का कत्ल, उसका मरते-मरते महबूब के हाथ में मेटल के टुकड़े सौंपना और फिर महबूब का इस तरह अचानक दुनिया से चले जाना... मुनीरा समझ चुकी थी कि इन दोनों मौतों के पीछे कोई तो कड़ी है। इधर, ब्रिगेडियर की जिंदगी दो पाटों के बीच पिस रही थी। एक तरफ परिवार में हुई दो मौतों का मातम था, तो दूसरी तरफ जंग की तैयारियां। इसी आपाधापी के बीच, उन्हें प्रधानमंत्री से एक जरूरी मुलाकात करनी थी, जिसके लिए 'टॉप सीक्रेट' फाइलें तैयार की गई थीं। हमेशा की तरह, सहमत ने ब्रिगेडियर का ब्रीफकेस तैयार किया और मौका पाकर फाइलों के पन्ने भी याद कर ली। उन पन्नों में जंग की रणनीतियों के साथ-साथ दिल्ली में बैठे ISI के एजेंटों की फेहरिस्त थी। सहमत को यह पैगाम हर हाल में सरहद पार पहुंचाना था। सख्त पहरे के बीच बाहर निकलने के लिए सहमत ने जेठानी मुनीरा को अपने साथ मस्जिद चलने के लिए राजी कर लिया। जैसे ही दोनों मस्जिद पहुंचीं, सहमत बोल पड़ी, ‘आप यहीं मेरा इंतजार कीजिए, मैं मेजर साहब की मजार के लिए कुछ ताजे फूल लेकर आती हूं।’ सहमत ने एक बड़ी टोकरी फूलों का ऑर्डर दिया और नजरें बचाकर पास ही के एक फोन बूथ की तरफ भागी। फोन खराब था। आसपास कोई दूसरा बूथ नजर नहीं आ रहा था। अब उसकी नजर पान की दुकान पर पड़ी। सहमत ने पान वाले के फोन का इस्तेमाल किया और हांफती हुई आवाज में पूरा खुफिया मैसेज बता दिया। जब सहमत घर लौटी, तो हवेली के बाहर फौज की गाड़ियां खड़ी थीं। अंदर दो ISI के अफसर खड़े थे। कमरे की मेज पर खून से सने मेटल के वे टुकड़े रखे थे, जिन्हें देखकर सहमत के भीतर सिहरन दौड़ गई। ISI ने उस फूलवाले और पान वाले को धर-दबोचा था। अगले कई दिनों तक हवेली में ISI के अफसरों का आना-जाना लगा रहा। एक दोपहर, तंग आकर सहमत ने कड़े लहजे में अफसरों से कह दिया, ‘सईद साहब इस वक्त आराम कर रहे हैं। आप लोग या तो यहीं इंतजार कीजिए, या फिर बाद में तशरीफ लाइए।’ अफसरों ने एक-दूसरे को देखा और सहमत के हाथ में एक सीलबंद लिफाफा थमाते हुए कहा, ‘ठीक है बेगम साहिबा, यह फाइल ब्रिगेडियर साहब को दे दीजिएगा।’ जैसे ही अफसर बाहर गए, सहमत ने उस लिफाफे को खोला। लिखा था- ‘हवेली की सुरक्षा में बहुत बड़ी सेंध लगी है। हिंदुस्तान को खुफिया खबरें भेजी जा रही हैं। गद्दार घर के भीतर ही है।’ अपनी घबराहट छुपाने के लिए सहमत वॉशरूम चली गई। थोड़ी देर बाद जैसे ही उसने दरवाजा खोला सामने खड़े शख्स को देखकर वह ठिठक गई। उसका शौहर, कैप्टन इकबाल खड़ा था। उसने सहमत को घूरते हुए कहा, ‘क्या मैं तुम्हारे वॉशरूम का इस्तेमाल कर सकता हूं?’ सहमत समझ गई कि इकबाल को उस खुफिया ट्रांसमीटर का अंदाजा हो चुका है। उसने बस सिर हिलाया और एक तरफ हट गई। इकबाल अंदर दाखिल हुआ। सहमत ने मेज पर रखे इकबाल के बटुए को जल्दी से उठाकर देखा। करारे नोटों के बीच एक छोटा सा कागज रखा था। सहमत ने उसे पढ़ा और वापस रख दिया। 5 मिनट बाद इकबाल ने दरवाजा खोला, तो देखा सहमत एक चमचमाती हुई रिवॉल्वर लेकर खड़ी थी। उंगली ट्रिगर पर कसी हुई थी और निशाने पर इकबाल। सहमत ने सख्त लहजे में कहा- ‘इकबाल, मैं इस चौखट पर तुम्हारी सेज सजाने और तुम्हारी बीवी बनकर जिंदगी गुजारने नहीं आई हूं। मैं अपने मुल्क हिंदुस्तान के लिए आई हूं। कान खोलकर सुन लो, मेरे इस रास्ते में जो भी रोड़ा बनेगा, उसे कुचल दूंगी… फिर चाहे वो शख्स तुम ही क्यों न हो।’ इकबाल ने वॉशरूम में जो कुछ देखा और सहमत के मुंह से उसके कानों ने जो कुछ सुना…वह किसी सदमे से कम नहीं था। उसके दिल में अभी भी सहमत थी। उसने सहमत की तरफ बेबसी से देखते हुए कहा- ‘ये सब छोड़ दो, पकड़ी जाओगी। ISI वाले मुनीरा को पूछताछ के लिए ले गए हैं और अब्बा हुजूर को भी हेडक्वार्टर ना छोड़ने को कहा गया है।’ सहमत मुस्कुराती रही…हंसते हुए इकबाल से बोली- ‘मियां बहुत भोले हो आप… जो लड़की अपना मुल्क छोड़कर यहां तक आई है, उसे डराकर आप रोक लोगे? बेहतर होगा मैं जैसा कह रही हूं करो, इसी में आपका और परिवार का भला है। मुझे आपके खानदान से कोई दुश्मनी नहीं है।’ उसने पास पड़ी एक कुर्सी पर इकबाल को बैठाया और रस्सी से बांध दिया। काफी देर इकबाल छटपटाता रहा। फिर सहमत ने उसकी हथकड़ी खोली और धमकाते हुए कहा- ‘तुम हर पल मेरे निशाने पर हो। जरा भी चालाकी की, तो समझो तुम्हारे साथ तुम्हारा खानदान भी खत्म।’ अगले दिन छावनी के मेन गेट पर फौज के झंडे वाली एक चमचमाती कार आकर रुकी। गार्ड जैसे ही तलाशी और पहचान पत्र के लिए आगे बढ़ा, कार की पिछली खिड़की का शीशा सरसराता हुआ नीचे उतरा। अंदर से कड़क आवाज गूंजी- ‘मैं जीओसी बशीर हूं, जनरल सईद की हवेली के लिए कौन सा रास्ता जाता है?’ घबराए गार्ड ने बिना कोई सवाल किए हवेली की तरफ इशारा कर दिया- ‘जनाब, सीधे हाथ पर।’ गाड़ी आगे बढ़ गई। हवेली के बैठकखाने में कुछ देर इंतजार करने के बाद, जनरल बशीर के भेष में आए उस शख्स का सामना मेजर इकबाल से हुआ। जनरल ने कहा, ‘मेजर, तुम्हारी बेगम साहिबा इस शहर के सबसे बेहतरीन और ऊंचे रसूख वाले स्कूल में संगीत सिखाती हैं, उनकी बड़ी तारीफ सुनी है। मैंने सोचा क्यों न उनसे मिल लिया जाए।’ इकबाल ने कुछ नहीं कहा। उसी वक्त सहमत हॉल में दाखिल हुई। उसने अपने काले पर्स में एक लोडेड रिवॉल्वर छुपा रखी थी। औपचारिक बातचीत के बीच, जनरल ने जेब से मुड़ा हुआ कागज निकाला और सहमत की तरफ बढ़ाते हुए कहा, ‘बेगम साहिबा, इस खत में आपके परिवार के लिए ताजीयत (शोक संदेश) है।’ सहमत ने खत खोला। ऊपर सांत्वना के शब्द थे, लेकिन लाइनों के बीच छुपा असली संदेश था- 'ठीक तीन घंटे बाद, पुरानी वादियों के पास।' सहमत ने खत वापस जनरल को सौंपा और खुदाहाफिज कहकर अंदर चली गई। जनरल ने भी मेजर इकबाल से विदा लिया। उसी रोज रात करीब 8 बजे। स्थानीय पठानी लिबास में RAW का वो अफसर रावलपिंडी के एक मशहूर रेस्तरां के कोने वाली मेज पर बैठा चाय की चुस्कियां ले रहा था। तय वक्त पर, रेस्तरां के बाहर बुर्के में लिपटी एक औरत दाखिल हुई। उसके पीछे बेहद डरा और सहमा हुआ मेजर इकबाल चल रहा था। इसी बीच RAW अधिकारी को भनक लग गई कि बाहर गाड़ियों के पीछे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI के शार्पशूटर मुस्तैद हैं। उनकी उंगलियां ट्रिगर पर थीं और सीधा निशाना बुर्के वाली औरत और इकबाल पर। RAW अधिकारी के माथे पर पसीना छलक आया। 'सहमत पकड़ी जा चुकी है! अगर ISI ने उसे जिंदा दबोच लिया, तो टॉर्चर सेल में वह टूट सकती है। भारत का पूरा नेटवर्क, दर्जनों स्लीपर सेल और सालों की मेहनत तबाह हो जाएगी।' यहीं सोचते हुए उसने भारी मन से अपना दाहिना हाथ जैकेट की अंदरूनी जेब में डाला और एक छोटे से इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमीटर का बटन तीन बार दबाया। 'सूंss...!' सन्नाटे को चीरता हुआ एक जहरीला तीर बुर्के वाली औरत की गर्दन में जा धंसा। वह वहीं फर्श पर ढह गई। पाकिस्तानी एजेंट कुछ समझ पाते, रेस्तरां के पिछले हिस्से में एक जोरदार धमाका हुआ। चारों तरफ चीख-पुकार मच गई। भगदड़ का फायदा उठाकर RAW अधिकारी और उसके साथी वहां से फरार हो गए। वे शहर से दूर एक सुरक्षित और बंद कमरे में पहुंचे। सब खामोश थे। RAW अधिकारी अपनी हथेलियों में सिर छुपाए बैठा था। उसकी आत्मा कचोट रही थी-’भारत लौटकर वह सहमत की बूढ़ी मां को क्या जवाब देगा? कैसे कहेगा कि उसने देश को बचाने के लिए अपनी ही सबसे बेहतरीन एजेंट की जान ले ली?’ 'ट्रीन-ट्रीन...' अचानक सन्नाटे को चीरती हुई दरवाजे की घंटी बजी। कमरे में मौजूद एजेंटों के बदन में बिजली दौड़ गई। अधिकारी ने अपनी रिवॉल्वर का सेफ्टी कैच हटाते हुए बेहद सख्त लहजे में हुक्म दिया, कोई भी जिंदा हाथ नहीं आएगा। जितने दुश्मनों को मार सकते हो मारो, या खुद को गोली मार लो।’ घंटी दोबारा बजी। अधिकारी दरवाजे की तरफ बढ़ा और 'पीप-होल' से बाहर झांका। अब उसकी उंगलियां ढीली पड़ गईं और भारी पिस्तौल फर्श पर जा गिरी। उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। उसने कांपते हाथों से दरवाजे की कुंडी खोली। बाहर सहमत जिंदा सलामत खड़ी थी। कमरे में मौजूद हर शख्स मानो काठ का हो गया। किसी को अपनी आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था। अधिकारी ने हैरान होकर पूछा- ‘जिंदा कैसे बच निकली?’ सहमत के चेहरे पर एक मुस्कान उभर आई। ‘रेस्तरां में इकबाल के साथ मैं नहीं थी। मैंने मुनीरा को अपनी जगह बुर्का पहनाकर इकबाल के साथ भेज दिया था।’ सहमत का मिशन अब मुकम्मल हो चुका था। RAW की टीम सहमत को गोपनीय तरीके से सरहद पार कराकर वापस भारत ले आई। अपनी सरजमीं पर कदम रखते ही सहमत को महसूस हुआ कि वह सिर्फ यादें लेकर नहीं लौटी है। मेडिकल चेकअप में पता चला कि उसके पेट में मेजर इकबाल का बच्चा पल रहा है। कुछ महीने बाद सहमत ने एक बेटे को जन्म दिया। आगे चलकर उस बच्चे ने इंडियन आर्मी की वर्दी पहनी और देश की हिफाजत की कसम खाई। सहमत के बेटे ने ही अपनी मां की कहानी लेखक हरिंदर सिंह सिक्का को बताई थी। हरिंदर सिक्का का दावा है कि वे सहमत से मिले हैं और कई बार पाकिस्तान भी गए हैं। 8 साल की रिसर्च के बाद उन्होंने ‘सहमत कॉलिंग’ किताब लिखी है।
कराची में धमाका: सिंध रेंजर्स के तीन जवान शहीद
पाकिस्तान के कराची शहर में एक बड़े धमाके के बाद दहशत मच गई। रिपोर्ट के अनुसार, यह आतंकी हमला बताया जा रहा है
बांग्लादेश ने पलटा पासा, मोंगला पोर्ट चीन को सौंपा, कोलकाता और हल्दिया पर मंडराया बड़ा खतरा!
पड़ोसी देश बांग्लादेश से एक ऐसी बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है, जिसने भारतीय सुरक्षा एजेंसियों और रणनीतिक विशेषज्ञों की नींद उड़ा दी है। भू-राजनीतिक मोर्चे पर भारत को एक बड़ा झटका देते हुए बांग्लादेश ने अपने रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण 'मोंगला पोर्ट' (Mongla Port) के एक बड़े हिस्से का मैनेजमेंट और टर्मिनल ऑपरेशन भारत के बजाय चीन को सौंप दिया है। इस कदम के बाद भारत के पूर्वी समुद्री तट, विशेष रूप से पश्चिम बंगाल के कोलकाता और हल्दिया बंदरगाहों की सुरक्षा को लेकर बेहद गंभीर और चिंताजनक सवाल खड़े हो गए हैं। चीन की भारतीय उपमहाद्वीप में बढ़ती यह मौजूदगी भारत के लिए एक नए चक्रव्यूह जैसी साबित हो सकती है।भारत के हाथ से कैसे निकला मोंगला पोर्ट का नियंत्रणलंबे समय से भारत यह उम्मीद कर रहा था कि मोंगला बंदरगाह के विकास और संचालन की जिम्मेदारी उसे मिलेगी, क्योंकि भारत और बांग्लादेश के बीच कनेक्टिविटी को मजबूत करने के लिए यह पोर्ट बेहद जरूरी था। भारतीय कंपनियां इस रेस में आगे मानी जा रही थीं। लेकिन हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों और बीजिंग के भारी-भरकम आर्थिक प्रभाव के चलते बांग्लादेश ने यह प्रोजेक्ट चीन की कम्युनिस्ट सरकार के नियंत्रण वाली कंपनी को सौंप दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन ने अपनी पुरानी 'डेट-ट्रैप डिप्लोमेसी' (कर्ज के जाल की नीति) और भारी निवेश का लालच देकर बांग्लादेश को अपनी तरफ झुका लिया है, जिसके परिणाम अब सतह पर दिखने लगे हैं।कोलकाता और हल्दिया पोर्ट के लिए क्यों बढ़ गया है बड़ा खतरामोंगला पोर्ट की भौगोलिक स्थिति को देखें तो यह भारत के पश्चिम बंगाल में स्थित कोलकाता पोर्ट और हल्दिया डॉक कॉम्प्लेक्स के बेहद करीब है। चीन को इस पोर्ट का नियंत्रण मिलने का सीधा मतलब है कि अब चीनी ड्रैगन की सीधी पहुंच भारतीय समुद्री सीमा और सुंदरबन के संवेदनशील इलाकों के बिल्कुल मुहाने तक हो गई है। सुरक्षा विश्लेषकों के मुताबिक, इस पोर्ट की आड़ में चीन अब भारतीय नौसेना (Indian Navy) की गतिविधियों, कोलकाता-हल्दिया पोर्ट के व्यापारिक रूट और बंगाल की खाड़ी में भारत के मिसाइल टेस्टिंग जोन पर बेहद आसानी से नजर रख सकेगा। यह स्थिति भारत की संप्रभुता और समुद्री सुरक्षा के लिए एक परमानेंट सिरदर्द बन सकती है।'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' नीति के तहत भारत को घेरने की चीनी चालचीन पिछले कई सालों से भारत को चारों तरफ से समुद्र में घेरने की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' (String of Pearls) रणनीति पर काम कर रहा है। पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट, श्रीलंका के हम्बनटोटा पोर्ट और म्यांमार के क्याुकफ्यू पोर्ट के बाद अब बांग्लादेश का मोंगला पोर्ट भी इसी कड़ी का हिस्सा बनता दिख रहा है। हालांकि, बांग्लादेश इसे महज एक व्यापारिक समझौता बता रहा है, लेकिन इतिहास गवाह है कि चीन जहां भी कमर्शियल पोर्ट बनाता है, वहां धीरे-धीरे उसकी नौसेना और युद्धपोत डेरा डाल लेते हैं। नई दिल्ली के गलियारों में अब इस बात को लेकर गहन मंथन शुरू हो गया है कि कैसे चीन के इस नए आक्रामक कदम का मुकाबला किया जाए और अपनी पूर्वी समुद्री सीमा को सुरक्षित रखा जाए।
पीएम मोदी 27 जून को सेशेल्स दौरे पर गए। दर्जनों खबरें चलीं- ‘मोदी यहां दुनिया के सबसे बुजुर्ग जानवर जोनाथन से मिलेंगे।’ पीएम मोदी कछुओं से मिले भी, लेकिन उनमें जोनाथन नहीं था। दरअसल, जोनाथन सेशेल्स में है ही नहीं। वो तो 7 हजार किमी दूर एक ब्रिटिश टापू सेंट हेलेना में है। पीएम मोदी से मुलाकात हो, या ना हो, लेकिन इस बुजुर्ग कछुए की कहानी बेहद रोचक है; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: कौन है जोनाथन, जिसका नाम गिनीज बुक में दर्ज?जवाब: जोनाथन जमीन पर रहने वाले विशालकाय कछुओं की प्रजाति का सबसे उम्रदराज कछुआ है। इन्हें ‘सेशेल्स जाइंट टॉर्टोइस’ कहते हैं। सेशेल्स 151 द्वीपों का देश है। 1832 ईस्वी में यहीं जोनाथन का जन्म हुआ। हालांकि पिछले 144 सालों से जोनाथन दक्षिण अटलांटिक महासागर के द्वीप सेंट हेलेना में रहता है। 1882 में जोनाथन को अन्य 3 बड़े कछुओं के साथ सेशेल्स से सेंट हेलेना भेजा गया। तब सेशेल्स ब्रिटिश उपनिवेश मॉरिशस का हिस्सा हुआ करता था। उस वक्त गवर्नर थे विलियम ग्रे-विल्सन। तब से अब तक सेंट हेलेना के 31 गवर्नर बदल चुके हैं। सेंट हेलेना आज भी ब्रिटेन के नियंत्रण वाला एक विदेशी इलाका है। यहां के गवर्नर के घर को ‘प्लांटेशन हाउस’ कहते हैं। जोनाथन इसी घर के लॉन में रहता है। लोग उसे प्यार से ‘जोनो’ कहते हैं। सेंट हेलेना की सरकार उसकी देखभाल का जिम्मा उठाती है। उसे राष्ट्रीय प्रतीक का दर्जा मिला है। 5 पेंस के सिक्के पर जोनाथन की तस्वीर छपी है। 2022 से पहले तक सबसे उम्रदराज कछुए का खिताब तुई-मलिला नाम के कछुए के पास था, जो 1777 से 1965 तक यानी 188 साल जीवित रहा। इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर, यानी IUCN के मुताबिक, जोनाथन की प्रजाति यानी 'सेशेल्स जाइंट टॉर्टोइस' के कुल 37 कछुओं की जानकारी है। ये सेशेल्स के ही अलग-अलग द्वीपों पर रहते हैं। सेशेल्स पार्क्स एंड गार्डंस अथॉरिटी की वेबसाइट के मुताबिक, यहां के ‘नेशनल बोटैनिकल गार्डन’ में जोनाथन की तरह ही कुछ बड़े सेशेल्स कछुए मौजूद हैं। विजिटर्स इन्हें देख सकते हैं। सेशेल्स कछुओं में करीब 27 नर कछुओं पर एक मादा कछुए का अनुपात है। इसीलिए ये प्रजाति अति दुर्लभ है। हालांकि ये कछुए औसतन 150 साल या उससे ज्यादा भी जीवित रह सकते हैं। सवाल-2: क्या वाकई जोनाथन 194 साल का है?जवाब: ये तस्वीर देखिए… 1886 की इस तस्वीर है, जिसमें जोनाथन पूरी तरह वयस्क हो चुका है। 2008 में ब्रिटिश अखबार ‘द इंडिपेंडेंट’ में ये तस्वीर छपी, तो चर्चा छिड़ी कि ये द्वीप पर मौजूद 150 साल से ज्यादा उम्र का कछुआ है। फिर 2015 में सेंट हेलेना के जानवरों के डॉक्टर जो हॉलिन्स ने कहा, 'हमारे पास रिकॉर्ड है कि उसे 1882 में पूरी तरह डेवेलप कंडीशन में यहां लाया गया था। ये उम्र कम से कम 50 साल की होती है और इसी आधार पर हमारा अनुमान है कि उसकी पैदाइश 1832 और अभी उसकी आयु 183 साल (यानी 2026 में 194 साल) है।' गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने भी कहा, ‘जोनाथन जब सेशेल्स से सेंट हेलेना पहुंचा, तो पूरी तरह एडल्ट हो चुका था। पूरी संभावना है कि जोनाथन की उम्र हमारे इस अनुमान से भी ज्यादा है।' हालांकि जोनाथन की उम्र को लेकर एक बड़ा दावा और है… दरअसल, 1903 से 1911 तक ईस्ट इंडिया कंपनी की तरफ से सेंट हेलेना के गवर्नर रहे हेनरी लियोनेल गैलवे ने 1941 में रॉयल अफ्रीकन सोसाइटी के जर्नल में एक आर्टिकल लिखा था। उन्होंने दावा किया था- ‘1776 में एक समुद्री जहाज के कप्तान ने तब के गवर्नर को दो कछुए गिफ्ट किए थे। मैंने जब 1911 में द्वीप छोड़ा, तो दोनों ठीक थे। फिर एक की कुछ साल बाद मौत हो गई। दूसरा अभी भी जीवित है।’ अभी सेंट हेलेना पर जोनाथन के साथ 3 कछुए और हैं, लेकिन ये सभी उससे बहुत छोटे हैं। यानी अगर गैलवे के मुताबिक 1776 में आया दूसरा जीवित कछुआ जोनाथन ही है, तो फिर जोनाथन की उम्र कम से कम 250 साल है। 1815 में वाटरलू की हार के बाद नेपोलियन बोनापार्ट को यहीं कैद किया गया था। कहा जाता है कि तब नेपोलियन, जोनाथन से मिला था। हालांकि इस किस्से की पुष्टि नहीं होती। सवाल-3: अभी जोनाथन किस हाल में है, उसकी देखरेख कैसे होती है?जवाब: लाइव साइंस मैगजीन के मुताबिक, 2009 में जोनाथन की तबीयत काफी बिगड़ गई थी। वो दुबला हो गया था और उसका मुंह कमजोर हो गया था। वह खुद से खाना नहीं खा पा रहा था। जोनाथन का ध्यान रखने वाले डॉक्टर जो हॉलिन्स के मुताबिक, ‘मैंने तब उसे सप्ताह में एक बार फल, सब्जियां खिलाना शुरू किया। धीरे-धीरे उसकी चोंच दोबारा फिर से तेज, घातक और घास वगैरह चरने लायक हो गई थी। मुझे समझ आया कि पोषण की कमी के चलते जोनाथन में मिनरल्स और विटामिन वगैरह की कमी थी।’ 2015 में हॉलिन्स ने बताया था, ‘जोनाथन बिल्कुल ठीक है! मैं उसे रोज अपने हाथों से खाना खिला रहा हूं। उसे खूब भूख लगती है। मोतियाबिंद के चलते वह अंधा है। उसकी सूंघने की शक्ति भी चली गई है, इसलिए वह खाने का पता नहीं लगा सकता। हालांकि वह अभी भी सुन सकता है और वो मेरी आवाज सुनकर खाने के लिए हवा में मुंह चलाने लगता है। मैं खाना रख देता हूं और वह काटकर खा लेता है।’ जो हॉलिन्स ने ये भी बताया था कि जोनाथन की यौन इच्छा प्रबल है। वो अपनी 55 साल की पार्टरन एम्मा के साथ संभोग करने की कोशिश करता है। उन दोनों के साथ फ्रेडरिक नाम का एक और कछुआ रहता है। 1991 में जब फ्रेडरिक को सेंट हेलेना लाया गया, तब उसे मादा समझकर ‘फ्रेडरिका’ नाम रखा गया था। हालांकि 25 साल से ज्यादा समय तक जोनाथन के साथ रहने पर भी दोनों के बच्चा नहीं हुई। जांच की गई, तब पता चला कि फ्रेडरिक एक नर कछुआ है। सवाल-4: कछुए इतनी लंबी उम्र तक जिंदा कैसे रहते हैं?जवाब: कछुओं के वयस्क होने के साथ ही उनके शरीर का बाहरी खोल बेहद मजबूत हो जाता है। जंगल के शिकारी जानवरों के लिए इसे तोड़ पाना लगभग मुश्किल होता है। इससे कछुओं की मृत्यु दर बेहद कम हो जाती है। साइंस इनसाइट्स ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक, शिकार के चलते कम मृत्यु देर की वजह से कछुओं पर ज्यादा प्रजनन का दबाव नहीं रहता। वे धीमी रफ्तार से बढ़ते हैं और संभोग के लिए देर से यानी करीब 30 साल की उम्र में तैयार होते हैं। इसीलिए कछुए तेजी से न जीते हैं और न तेजी से मरते हैं और उनमें उम्र बढ़ने से रोकने का एक पूरा तंत्र तैयार हो जाता है। इस तंत्र की 3 खासियत हैं… 1. कम एनर्जी की जरूरत, बाहरी धूप से काम चल जाता है 2. एनर्जी प्रोसेस कम होने से हानिकारक तत्व कम बनते हैं 3. कछुओं में एंटी-एजिंग और एंटी-कैंसर जीन ये खबर भी पढ़ें… मंडे मेगा स्टोरी: बिना संबंध बनाए भी बच्चे पैदा कर लेती है कॉकरोच:सिर कटने पर भी कैसे जिंदा रहते हैं, डायनासोर से भी सीनियर; कॉकरोच के किस्से कॉकरोच जनता पार्टी की वेबसाइट, X अकाउंट और इंस्टाग्राम अकाउंट सभी हैक और डाउन हो गए, तो फाउंडर अभिजीत दीपके ने लिखा- ‘कॉकरोच कभी मरते नहीं।’ बात सच भी है। कॉकरोच इस दुनिया में डायनासोर से भी पहले आए। सिर कट जाए, हफ्तों खाना न मिले फिर भी जिंदा रहते हैं। बिना नर के भी बच्चा पैदा कर सकते हैं। पूरी खबर पढ़ें…
एम्स्टर्डम/इंटरनेशनल डेस्क: यूरोपीय देश नीदरलैंड में एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक मामला सामने आया है। वहां पहली बार 12 साल से कम उम्र के एक लाइलाज और गंभीर बीमारी से पीड़ित बच्चे को कानूनी तौर पर इच्छामृत्यु (Euthanasia) दी गई है। साल 2024 में देश के इच्छामृत्यु कानून में किए गए बड़े बदलाव के बाद यह अपनी तरह का पहला मामला है। नए नियमों के तहत अब 1 से 12 साल की उम्र के उन बच्चों को भी इच्छामृत्यु देने का प्रावधान है, जो किसी ऐसी लाइलाज बीमारी से जूझ रहे हों जहां दर्द असहनीय हो चुका हो और मेडिकल साइंस में उनके ठीक होने की कोई उम्मीद न बची हो।संसद में हुआ खुलासा, सरकारी वकील करेंगे पूरे मामले की कानूनी जांचनीदरलैंड की स्वास्थ्य मंत्री सोफी हरमंस ने संसद में सरकार की सालाना रिपोर्ट पेश करते हुए इस बात की आधिकारिक पुष्टि की। उन्होंने बताया कि इस बच्चे ने इच्छामृत्यु के जरिए दुनिया को अलविदा कह दिया है। हालांकि, गोपनीयता और संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए सरकार ने बच्चे की सही उम्र, पहचान, लिंग या उसकी बीमारी के बारे में कोई भी जानकारी सार्वजनिक नहीं की है। स्वास्थ्य मंत्री ने यह भी साफ किया कि देश के नियमों के मुताबिक अब इस पूरे मामले की स्क्रूटनी (जांच) सरकारी वकीलों द्वारा की जाएगी। वे यह सुनिश्चित करेंगे कि प्रक्रिया को अंजाम देने वाले डॉक्टर ने कानून में लिखी सभी सख्त गाइडलाइंस का पूरी तरह पालन किया है या नहीं।सिर्फ 'जीने का मन न होना' आधार नहीं, 2024 में इसी शर्त पर बदला था कानूननीदरलैंड सरकार ने साल 2024 में अपने दशकों पुराने कानून में संशोधन किया था, जिसके बाद 1 से 12 साल तक के मासूम बच्चों को भी कुछ बेहद विशेष और गंभीर परिस्थितियों में इच्छामृत्यु का अधिकार मिल गया। हालांकि, सरकार ने अपने नियमों में पूरी कड़ाई रखी है। कानून के मुताबिक, इच्छामृत्यु केवल और केवल बेहद गंभीर व अंतिम चरण की मेडिकल कंडीशन (Medical Condition) के आधार पर ही दी जा सकती है। कोई व्यक्ति या किशोर सिर्फ यह महसूस करके कि 'उसका जीवन पूरा हो चुका है' या 'अब उसका जीने का मन नहीं है', इस कानून के तहत अनुमति नहीं पा सकता।डॉक्टरों के लिए तय हैं बेहद कड़े नियम; माता-पिता की सहमति अनिवार्यनीदरलैंड में किसी भी मरीज को इच्छामृत्यु देने से पहले मेडिकल टीम और डॉक्टरों को एक बेहद लंबी और जटिल कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है:डॉक्टरों को अकाट्य रूप से प्रमाणित करना होता है कि मरीज का शारीरिक या मानसिक दर्द पूरी तरह असहनीय है।यह साबित होना जरूरी है कि बीमारी लाइलाज है और भविष्य में सुधार की जीरो संभावना है।मरीज और उसके परिवार को बीमारी के हर पहलू की पूरी तकनीकी जानकारी दी जा चुकी हो।यह पूरी तरह स्पष्ट हो कि दर्द से राहत देने वाला कोई भी दूसरा इलाज या थेरेपी अब बची नहीं है।इसके अलावा, मुख्य डॉक्टर को किसी दूसरे स्वतंत्र मेडिकल एक्सपर्ट (Independent Doctor) की लिखित राय लेनी होती है।12 साल से कम उम्र के बच्चों के मामलों में उनके माता-पिता या कानूनी अभिभावकों (Parents or Guardians) की लिखित सहमति होना सबसे अनिवार्य शर्त है। जब यह कानून पास हुआ था, तब सरकार ने अनुमान लगाया था कि देश में हर साल ऐसे केवल 5 से 10 मामले ही सामने आ सकते हैं।पहले क्या थे नियम और उल्लंघन पर कितनी है सजा?नीदरलैंड में साल 2024 से पहले तक केवल 1 साल से कम उम्र के गंभीर रूप से बीमार शिशुओं और 12 साल से अधिक उम्र के किशोरों/वयस्कों के लिए ही इच्छामृत्यु की कानूनी अनुमति थी। 1 से 12 साल के बीच की उम्र के बच्चों के लिए ऐसा कोई अधिकार नहीं था; उन्हें केवल दर्द कम करने वाली 'पैलिएटिव केयर' दी जाती थी या प्राकृतिक मौत का इंतजार करना पड़ता था।वर्तमान नियमों के अनुसार, 12 से 15 साल के बच्चों के लिए इच्छामृत्यु में माता-पिता की मंजूरी जरूरी होती है। वहीं, 16 और 17 साल के किशोर इस पर खुद स्वतंत्र फैसला ले सकते हैं, हालांकि प्रक्रिया में उनके पैरेंट्स को शामिल करना जरूरी होता है। यदि कोई भी डॉक्टर इन कड़े नियमों के बाहर जाकर या बिना उचित मंजूरी के किसी को इच्छामृत्यु देता है, तो देश के कानून के तहत उसे 12 साल तक की जेल और भारी जुर्माने की सजा हो सकती है।यूथेनेशिया को वैध बनाने वाला दुनिया का सबसे पहला देश है नीदरलैंडवैश्विक स्तर पर देखा जाए तो नीदरलैंड साल 2002 में इच्छामृत्यु (Euthanasia) को कानूनी मान्यता देने वाला दुनिया का सबसे पहला देश बना था। यहां होने वाले हर एक केस की समीक्षा एक विशेष मेडिकल जांच समिति करती है। नीदरलैंड के बाद पड़ोसी देश बेल्जियम ने भी साल 2014 में एक बड़ा कदम उठाते हुए बिना किसी उम्र सीमा के, सभी उम्र के बच्चों के लिए इच्छामृत्यु को कानूनी मंजूरी दे दी थी। इस संवेदनशील मुद्दे पर दुनिया भर के चिकित्सा और कानूनी विशेषज्ञों के बीच आज भी एक बड़ी बहस जारी है।
मुजफ्फराबाद/इंटरनेशनल डेस्क: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में भड़की विद्रोह की आग अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुकी है। पाकिस्तानी हुकूमत के जुल्म और सौतेले व्यवहार के खिलाफ PoK की आवाम ने अब आर-पार की जंग छेड़ दी है। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि आंदोलन को कुचलने और स्थानीय लोगों की आवाज दबाने के लिए इस्लामाबाद सरकार ने कई इलाकों में खाद्यान्न (राशन), डीजल-पेट्रोल और अन्य बेहद जरूरी चीजों की सप्लाई रोक दी है। प्रदर्शनकारियों का गंभीर आरोप है कि शहबाज शरीफ सरकार इस कड़कड़ाती किल्लत के जरिए आम नागरिकों पर मानसिक और शारीरिक दबाव बना रही है ताकि आंदोलन को अंदर से कमजोर किया जा सके।सड़कों पर उतरे हजारों लोग; सस्ती बिजली और सब्सिडी की मांगPoK के इतिहास में यह अब तक का सबसे बड़ा जन-आंदोलन बनता जा रहा है, जहां हजारों की संख्या में महिलाएं, युवा और बुजुर्ग सड़कों पर डेरा डाले हुए हैं। प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांगों में भारत की तर्ज पर सस्ती बिजली देना, आटे-दाल जैसे बुनियादी खाद्यान्न पर सरकारी सब्सिडी बहाल करना, अस्पतालों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, बुनियादी राजनीतिक अधिकार और भ्रष्ट प्रशासनिक ढांचे में बड़े सुधार शामिल हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि उनकी जायज मांगों को सुनने और उनका हक देने के बजाय पाकिस्तान सरकार ने पूरे क्षेत्र को सेना और अर्धसैनिक बलों के हवाले कर दिया है। कई इलाकों में इंटरनेट सेवाओं को पूरी तरह ब्लॉक कर दिया गया है ताकि PoK में हो रहे जुल्म की तस्वीरें दुनिया के सामने न आ सकें।सरकारी कर्मचारियों पर गिरी गाज, रिटायर्ड फौजियों को पेंशन रोकने की धमकीआंदोलन को दबाने के लिए पाकिस्तानी प्रशासन अब बेहद क्रूर और दमनकारी नीतियों पर उतर आया है। विरोध प्रदर्शनों का समर्थन करने और उनमें शामिल होने के आरोप में अब तक 128 सरकारी कर्मचारियों को नौकरी से बर्खास्त (टर्मिनेट) किया जा चुका है। यही नहीं, आंदोलन के शीर्ष नेताओं ने खुलासा किया है कि PoK के रहने वाले जिन पूर्व सैनिकों (रिटायर्ड फौजियों) ने इस प्रदर्शन में हिस्सा लिया या जनता का साथ दिया, उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनियां दी जा रही हैं। प्रशासन द्वारा उनके परिवारों की पेंशन तक रोकने की धमकी दी जा रही है, जिससे लोगों में गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया है।हिंसक झड़पों में दर्जनों मौतें, जेलों में ठूंसे जा रहे कश्मीरी एक्टिविस्टपाकिस्तानी सुरक्षा बलों और पुलिस की बर्बरता के कारण पूरे क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हिंसा भड़क उठी है। हिंसक कार्रवाई और अंधाधुंध गोलीबारी के दौरान अब तक दर्जनों स्थानीय लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि सैकड़ों लोग गंभीर रूप से घायल हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, प्रदर्शन के अगुआकारों और समर्थकों को जबरन हिरासत में लेकर जेलों में ठूंसा जा रहा है और उन पर देशद्रोह जैसी गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं। दूसरी तरफ, पाकिस्तानी प्रशासन अपनी सफाई में दावा कर रहा है कि वे सिर्फ उन लोगों के खिलाफ एक्शन ले रहे हैं जो 'गैर-कानूनी' गतिविधियों और तोड़फोड़ में शामिल हैं।ठप पड़ा कारोबार, भुखमरी की कगार पर PoK की जनतासरकार द्वारा जानबूझकर पैदा की गई आवश्यक वस्तुओं की इस भारी किल्लत ने स्थानीय समुदायों का जीना मुहाल कर दिया है। PoK के प्रमुख बाजारों में व्यापार पूरी तरह ठप हो चुका है, गाड़ियों और एम्बुलेंस के लिए ईंधन खत्म हो रहा है, और सबसे बड़ी मार दैनिक मजदूरी करने वाले गरीब परिवारों पर पड़ी है जिनके सामने अब दो वक्त की रोटी का संकट खड़ा हो गया है। इस अमानवीय नाकाबंदी के बावजूद PoK की जनता पीछे हटने को तैयार नहीं है। प्रदर्शनकारियों ने साफ कर दिया है कि जब तक पाकिस्तान सरकार घुटने नहीं टेकती और उनकी मांगें पूरी नहीं करती, तब तक यह आंदोलन और तेज होता जाएगा।
गुवाहाटी/नेशनल डेस्क: राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने भारत के खिलाफ साजिश रचने वाले प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन जमात-उल-मुजाहिद्दीन बांग्लादेश (JMB) के मॉड्यूल पर एक और बड़ा प्रहार किया है। एनआईए ने गुवाहाटी की विशेष अदालत में जेएमबी से जुड़े 11 कथित आतंकवादियों के खिलाफ एक व्यापक चार्जशीट (आरोप पत्र) दाखिल की है। इन सभी आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS 2023) और यूए(पी) एक्ट 1967 (UAPA) की विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।'इमाम महमूदर कफीला' विंग के जरिए रची जा रही थी खूनी साजिशएनआईए की जांच में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि इन सभी 11 आरोपियों ने जमात-उल-मुजाहिद्दीन की एक सीक्रेट विंग 'इमाम महमूदर कफीला' (IMK) में सक्रिय भूमिका निभाई थी। ये आरोपी देश के भीतर गुप्त बैठकें आयोजित करने, युवाओं को मजहबी तौर पर गुमराह करने (रेडिकलाइज करने), चरमपंथी साहित्य बांटने और सोशल मीडिया व डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए भारत-विरोधी जहरीला प्रचार फैलाने में जुटे थे। जांच एजेंसी के मुताबिक, इनका मुख्य मकसद पूर्वोत्तर के राज्यों (असम, त्रिपुरा आदि) में अशांति फैलाना और उत्तर प्रदेश, बिहार व झारखंड जैसे घनी आबादी वाले राज्यों में बड़े आतंकी हमलों को अंजाम देना था।लोकतंत्र को खत्म कर शरिया शासन लाना है जेएमबी का मकसदजमात-उल-मुजाहिद्दीन बांग्लादेश (JMB) एक बेहद कट्टरपंथी संगठन है, जो पूरी तरह से सलाफी विचारधारा से प्रभावित है। इसका मुख्य उद्देश्य बांग्लादेश और उसके आसपास के क्षेत्रों में लोकतांत्रिक तथा धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था को जड़ से उखाड़कर शरीयत आधारित इस्लामी शासन स्थापित करना है। इसकी स्थापना कुख्यात आतंकियों शेख अब्दुर रहमान और सिद्दीकुल इस्लाम ने की थी। आतंकी गलियारों में सिद्दीकुल इस्लाम को 'बांग्ला भाई' के नाम से भी जाना जाता था। जेएमबी ने अपनी स्थापना के बाद से ही गैर-सरकारी संगठनों और आम नागरिकों को निशाना बनाना शुरू कर दिया था, जिसके चलते फरवरी 2005 में बांग्लादेश सरकार ने इस पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया था।आधे घंटे में 500 बम धमाके: जब दहल उठा था पूरा बांग्लादेशप्रतिबंध के ठीक छह महीने बाद, इस संगठन ने जो किया उसने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया। 17 अगस्त 2005 को जेएमबी ने एक अन्य कट्टरपंथी संगठन 'हरकत-उल-जिहाद अल-इस्लामी' की मदद से बांग्लादेश के 64 में से 63 जिलों में एक साथ सिलसिलेवार बम धमाके किए। महज 30 मिनट के भीतर पूरे देश में 500 से अधिक बम फोड़े गए थे। इन धमाकों का मुख्य मकसद देश के जजों, वकीलों और न्यायिक प्रणाली को खत्म कर वहां जबरन शरिया कानून लागू करना था। बाद में साल 2006 में सिद्दीकुल इस्लाम उर्फ बांग्ला भाई को पुलिस ने धरदबोचा और कानूनी प्रक्रिया के बाद 2007 में उसे फांसी पर लटका दिया गया।सिद्दीकुल इस्लाम ने 2005 में की थी भारत में एंट्री, बंगाल से फैला जालबांग्लादेश में तबाही मचाने के दौरान ही जेएमबी ने भारत में पैर पसारने शुरू कर दिए थे। साल 2005 में सिद्दीकुल इस्लाम ने भारत में प्रवेश किया और 'हाटकाटा नसीरुल्लाह' (एक खूंखार आईईडी बम विशेषज्ञ) के साथ मिलकर पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में जेएमबी की पहली भारतीय यूनिट (65वीं यूनिट) खड़ी की। इसके बाद यह नेटवर्क नदिया, बीरभूम और बर्दवान जैसे सीमावर्ती जिलों में तेजी से फैल गया।इस भारतीय नेटवर्क का सबसे बड़ा पर्दाफाश साल 2014 में हुआ, जब पश्चिम बंगाल के बर्दवान (खगरागढ़) में एक घर के भीतर अचानक बम बनाते समय धमाका हो गया, जिसमें दो आतंकवादियों की मौत हो गई थी। एनआईए की जांच से साफ हुआ कि जेएमबी ने बंगाल के रास्ते असम, बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश तक अपने स्लीपर सेल और मॉड्यूल का एक बड़ा जाल बिछा लिया था।आईएसआईएस (ISIS) से जुड़ाव और ढाका कैफे अटैक का 'नियो-जेएमबी' कनेक्शनअंतरराष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों की रिपोर्ट्स के मुताबिक, जेएमबी का संबंध लश्कर-ए-तैयबा, अल-कायदा और सिमी (SIMI) जैसे वैश्विक आतंकी संगठनों से रहा है। हाल के वर्षों में इस संगठन के भीतर एक नया धड़ा पैदा हुआ, जिसे 'नियो-जेएमबी' (Neo-JMB) कहा जाता है। यह धड़ा कुख्यात वैश्विक आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (ISIS) की विचारधारा पर चलता है। यह गुट 'लोन-वोल्फ' हमलों (अकेले दम पर हमला करना) और आत्मघाती हमलों के लिए कुख्यात है। साल 2016 में बांग्लादेश के ढाका में स्थित 'होली आर्टिसन कैफे' पर जो भीषण आतंकी हमला हुआ था, जिसमें कई विदेशी नागरिकों की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी, उसे इसी नियो-जेएमबी गुट ने अंजाम दिया था।डकैती, तस्करी और हवाला: जानिए कहां से आता है टेरर फंड?एनआईए की जांच के अनुसार, जेएमबी भारत और बांग्लादेश में अपनी आतंकी गतिविधियों को चलाने के लिए मुख्य रूप से अवैध रास्तों से फंडिंग जुटाता है। इसके फंड के प्रमुख स्रोतों में शामिल हैं:सीमावर्ती इलाकों में डकैती, लूटपाट और जबरन उगाही।भारत-बांग्लादेश सीमा पर हथियारों, नशीले पदार्थों और मवेशियों की तस्करी।जाली भारतीय मुद्रा (फेक करेंसी) का धंधा।खाड़ी देशों और विदेशों में बैठे समर्थकों के जरिए हवाला नेटवर्क से मिलने वाली गुप्त वित्तीय मदद।भारत में पूरी तरह प्रतिबंधित है जेएमबी, सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट पर2014 के बर्दवान ब्लास्ट और 2018 में बिहार के बोधगया में हुए बम धमाकों में जेएमबी का सीधा हाथ सामने आने के बाद, भारत सरकार ने 23 मई 2019 को यूएपीए (UAPA) के तहत जमात-उल-मुजाहिद्दीन बांग्लादेश और इसके सभी स्वरूपों (नियो-जेएमबी सहित) को पूरी तरह से बैन और आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया था। वर्तमान में एनआईए, उत्तर प्रदेश एटीएस (ATS), और विभिन्न राज्यों की एसटीएफ (STF) इसके बचे-खुचे स्लीपर सेल्स, ऑनलाइन हैंडलर्स और फंडिंग नेटवर्क को नेस्तनाबूद करने के लिए लगातार धरपकड़ अभियान चला रही हैं। गुवाहाटी कोर्ट में दाखिल यह नई चार्जशीट इसी कड़े प्रहार का हिस्सा है।
ट्रंप ने दोहराया ईरानी सेना के कमजोर होने का दावा, कहा- अब कोई ईरान का लीडर बनना नहीं चाहता
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फेथ एंड फ्रीडम कोएलिशन' के 'रोड टू मेजॉरिटी' कॉन्फ्रेंस में ईरानी सेना के कमजोर होने के अपने दावे को फिर को दोहराया।
भारत आ सकते हैं डोनाल्ड ट्रंप व्यापार, रक्षा और AI सहयोग पर हो सकती है बड़ी बातचीत
मीडिया से बातचीत के दौरान अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने कहा कि ट्रम्प प्रशासन अगले वर्ष की शुरुआत में राष्ट्रपति ट्रम्प के भारत दौरे की तैयारियों पर काम कर रहा है।
क्या मेहरंग बलोच की सजा, बलोचिस्तान में अहिंसक आंदोलनों के प्रति भरोसा खत्म कर देगी?
डॉक्टर से एक्टिविस्ट बनीं मेहरंग बलोच को पाकिस्तान की अदालत ने आजीवन कैद की सजा दी है. क्या यह सजा, अहिंसक आंदोलनों पर भरोसा खत्म कर देगी
इजरायल-लेबनान शांति की दिशा में अहम पहल, वाशिंगटन में फ्रेमवर्क समझौते पर हस्ताक्षर
कई दिनों तक चली बातचीत के बाद यह फ्रेमवर्क तैयार किया गया। वाशिंगटन स्थित अमेरिकी विदेश मंत्रालय में आयोजित कार्यक्रम में अमेरिका में लेबनान की राजदूत नाडा हमादेह मोवाद और उनके इजरायली समकक्ष येचियल लिटर ने अमेरिकी प्रतिनिधियों की मौजूदगी में इस त्रिपक्षीय दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए।
मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) के अशांत मोर्चे से इस वक्त की सबसे सनसनीखेज और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को हिला देने वाली खबर सामने आ रही है। लंबे समय से जारी भीषण सैन्य टकराव के बीच अमेरिका की मध्यस्थता में इजरायल और लेबनान के बीच एक बेहद महत्वपूर्ण और चौंकाने वाले समझौते पर सहमति बनी है। लेकिन इस डील के सार्वजनिक होते ही लेबनान का सबसे शक्तिशाली अर्धसैनिक संगठन हिजबुल्लाह पूरी तरह आगबबूला हो गया है। हिजबुल्लाह के शीर्ष नेतृत्व ने इस अमेरिकी समझौते को पूरी तरह खारिज करते हुए बेहद आक्रामक अंदाज में खुली चेतावनी दी है कि यदि इस डील को जबरन थोपा गया, तो लेबनान में भयानक 'गृहयुद्ध' (Civil War) छिड़ जाएगा।अमेरिकी मध्यस्थता में हुआ सीक्रेट समझौता और हिजबुल्लाह की नाराजगीवाशिंगटन और यरूशलेम से आ रही रणनीतिक रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी राजनयिकों ने पर्दे के पीछे रहकर इजरायल और लेबनान की सरकार के बीच सीमा विवाद और सुरक्षा गारंटी को लेकर एक कड़ा ड्राफ्ट तैयार कराया था। इस डील का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों की सीमाओं पर जारी गोलाबारी को स्थायी रूप से रोकना और विस्थापित नागरिकों को उनके घरों तक वापस लाना है। हालांकि, हिजबुल्लाह का आरोप है कि लेबनान सरकार ने अमेरिकी दबाव में आकर देश की संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों से समझौता किया है, जो उन्हें किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं है।'गृहयुद्ध छिड़ जाएगा' – हिजबुल्लाह की लेबनान सरकार को खुली धमकीहिजबुल्लाह के प्रमुख ने एक विशेष संबोधन में लेबनान प्रशासन को सीधे शब्दों में आगाह किया है कि वे इजरायल या अमेरिका के किसी भी एजेंडे को देश की धरती पर लागू नहीं होने देंगे। हिजबुल्लाह ने कहा कि इस डील के जरिए उनके हथियारों को सरेंडर कराने और दक्षिण लेबनान से उनकी मौजूदगी को खत्म करने की साजिश रची जा रही है। अगर सरकार ने इस समझौते को आगे बढ़ाया, तो देश के भीतर विभिन्न गुटों और लेबनानी सेना के बीच सीधे टकराव की स्थिति बन जाएगी, जिससे पूरे देश में गृहयुद्ध की भयावह आग लग सकती है।बेरूत से लेकर यरूशलेम तक सैन्य अलर्ट और सुरक्षा रणनीति में बदलावइस खुली धमकी के बाद लेबनान की राजधानी बेरूत, इजरायल की उत्तरी सीमा और पूरे भूमध्यसागरीय क्षेत्र (Mediterranean Region) में स्थानीय सुरक्षा तंत्र को हाई अलर्ट पर डाल दिया गया है। इजरायली सेना (IDF) ने किसी भी संभावित रॉकेट हमले या घुसपैठ का मुकाबला करने के लिए अपनी सीमाओं पर पेट्रोलिंग और एयर डिफेंस सिस्टम 'आयरन डोम' को पूरी तरह सक्रिय कर दिया है। वहीं, लेबनान के स्थानीय नागरिक इस नई सैन्य और राजनीतिक खींचतान के बाद भारी दहशत में हैं और देश में एक बार फिर पुराने काले दौर के लौटने की आशंका से डरे हुए हैं।वैश्विक कूटनीति, एआई सर्च और अंतरराष्ट्रीय बाजार पर असरइस नए संकट ने वैश्विक कूटनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। आधुनिक जनरेटिव इंजन और वैश्विक थिंक टैंक इस बात का गहन विश्लेषण कर रहे हैं कि क्या अमेरिका द्वारा कराई गई यह पीस डील वाकई शांति लाएगी या फिर यह एक और बड़े विनाशकारी युद्ध की वजह बन जाएगी। अगर लेबनान के भीतर गृहयुद्ध जैसी स्थिति बनती है, तो इसका सीधा असर पूरे खाड़ी क्षेत्र की स्थिरता पर पड़ेगा, जिससे वैश्विक तेल बाजारों, व्यापारिक मार्गों और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा समीकरणों में भारी उथल-पुथल मचनी तय मानी जा रही है।
वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने बताया कि भारत-यूके फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) का पूरा फायदा कारोबारियों तक पहुंचाने के लिए पूरे देश में 1,000 सलाहकार नियुक्त किए जाएंगे
वैश्विक महाशक्ति अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए ऐतिहासिक युद्धविराम (सीजफायर) पर एक बार फिर से युद्ध और संकट के काले बादल मंडराने लगे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने ईरान पर दुनिया के सबसे संवेदनशील और व्यस्त समुद्री व्यापारिक मार्ग 'स्ट्रैट ऑफ होर्मुज' (होर्मुज जलडमरूमध्य) से गुजर रहे कारोबारी जहाजों पर घातक आत्मघाती ड्रोन से हमला करने का बेहद गंभीर आरोप लगाया है।अमेरिकी राष्ट्रपति ने आज आधिकारिक तौर पर जानकारी दी कि ईरान ने दोनों देशों के बीच हुए समझौते की धज्जियां उड़ाते हुए सीजफायर तोड़ दिया है। ट्रंप के मुताबिक, ईरानी सेना ने होर्मुज से गुजर रहे एक बड़े मालवाहक जहाज पर ड्रोन से हमला किया, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई में अमेरिकी सेना ने भी तगड़ा पलटवार किया और ईरान के तीन घातक ड्रोनों को हवा में ही नेस्तनाबूद कर दिया। राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान की इस सैन्य कार्रवाई को एक बेहद 'मूर्खतापूर्ण कृत्य' करार दिया है।डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा दावा: ट्रुथ सोशल पर दी हमले की पूरी जानकारीअमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस पूरी अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम की जानकारी अपने आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' (Truth Social) पर एक पोस्ट के जरिए साझा की। ट्रंप ने दावा किया कि ईरान ने इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील समुद्री मार्ग से गुजर रहे अंतरराष्ट्रीय जहाजों को निशाना बनाने के लिए कम से कम चार सुसाइड (आत्मघाती) ड्रोन भेजे थे, जो दोनों देशों के बीच पिछले सप्ताह ही हुए युद्धविराम समझौते का खुला और सीधे तौर पर उल्लंघन है।ट्रंप का यह संगीन आरोप और अमेरिकी सेना का पलटवार ऐसे समय में सामने आया है, जब दोनों परमाणु संपन्न देशों के बीच वैश्विक मध्यस्थता के बाद तनाव कम करने की गंभीर कोशिशें की गई थीं। लेकिन इस ताजा हमले के बाद खाड़ी क्षेत्र (Gulf Region) में हालात एक बार फिर नियंत्रण से बाहर और बेहद विस्फोटक होते दिख रहे हैं।एक मालवाहक जहाज से टकराया ड्रोन, अमेरिकी सेना ने हवा में ही मार गिराए 3 विमानराष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आधिकारिक बयान के मुताबिक, ईरान द्वारा दागे गए चार ड्रोनों में से एक ड्रोन वहां से गुजर रहे एक बड़े मालवाहक जहाज के ऊपरी हिस्से (Deck) से जाकर टकरा गया। इस जबरदस्त धमाके के कारण जहाज को काफी भौतिक नुकसान पहुंचा है, लेकिन गनीमत यह रही कि भारी नुकसान के बावजूद वह जहाज समुद्र में डूबने से बच गया और अपना आगे का सफर जारी रखने में सफल रहा।ट्रंप ने बताया कि जैसे ही इस हमले की भनक अमेरिकी नौसेना के कमांडरों को लगी, अमेरिकी वायुसेना और युद्धपोतों ने त्वरित एक्शन लेते हुए बाकी बचे तीन ड्रोनों को उनके निशाने पर पहुंचने से ठीक पहले हवा में ही मार गिराया। हालांकि, सुरक्षा और रणनीतिक कारणों का हवाला देते हुए ट्रंप ने फिलहाल उस मालवाहक जहाज के नाम और उसके देश का खुलासा सार्वजनिक नहीं किया है जिस पर यह हमला हुआ था। साथ ही, इस हमले में जहाज पर सवार किसी क्रू मेंबर के घायल होने या हताहत होने की भी कोई अतिरिक्त जानकारी अभी सामने नहीं आई है।सिंगापुर के झंडे वाले जहाज पर हुआ हमला, सीजफायर को लगा बड़ा झटकामीडिया और रक्षा गलियारों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच हुए सीजफायर के बाद यह पहली और सबसे बड़ी सैन्य चुनौती तब सामने आई, जब गुरुवार को सिंगापुर के झंडे वाले एक विशाल मालवाहक जहाज पर होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरते समय यह कथित ड्रोन अटैक हुआ। इस हिंसक घटना को दोनों देशों के बीच शांति स्थापित करने और दुनिया के सबसे बड़े तेल और कमोडिटी सप्लाई रूट पर सामान्य आवाजाही बहाल करने के उद्देश्य से किए गए समझौते के लिए एक बहुत बड़ा और जानलेवा झटका माना जा रहा है।अमेरिकी खुफिया और रक्षा अधिकारियों ने दावा किया है कि इस खौफनाक हमले के पीछे सीधे तौर पर ईरान की एलीट मिलिट्री विंग 'इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स' (IRGC) का हाथ है। बताया जा रहा है कि यह घटना ईरान के उस आधिकारिक सैन्य बयान के ठीक कुछ घंटों बाद हुई, जिसमें तेहरान ने चेतावनी दी थी कि बिना उनकी मंजूरी या अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन कर समुद्री मार्गों का इस्तेमाल करने वाले किसी भी जहाज के खिलाफ वे सख्त सैन्य कार्रवाई करेंगे। इस घटना के बाद कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में भी अचानक उछाल आने की आशंका बढ़ गई है।
ईरान की हथियार क्षमताएं क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने में मददगार : इस्माइल बाघेई
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाघेई ने क्षेत्रीय सुरक्षा और आत्मरक्षा के मुद्दे पर देश का रुख स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि ईरान की सैन्य क्षमताएं सुरक्षा और स्थिरता बनाए रखने के लिए हैं
अलास्का वार्ता पर टकराव – रूस और अमेरिका आमने-सामने
रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने कहा कि अमेरिका यूक्रेन संघर्ष को खत्म करने में आखिर क्या भूमिका निभाना चाहता है, इस बारे में साफ तस्वीर सामने आनी चाहिए। उन्होंने यह बात अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के एंकरेज शिखर सम्मेलन को लेकर दिए गए बयान के बाद कही।
दैनिक भास्कर की नई सीरीज ‘स्पाई फाइल्स’ में आज कहानी उस लड़की की, जिसने जासूसी के लिए पाकिस्तानी आर्मी अफसर से शादी की, फिर पति का कत्ल कर दिया… नवंबर 1971, दोपहर का वक्त। दिल्ली के लोधी रोड पर भारत की खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग यानी RAW का दफ्तर। बाहर सर्दियों की हल्की धूप थी, लेकिन अंदर का माहौल किसी सुलगते ज्वालामुखी सा था। अचानक वहां लगे एक खुफिया ट्रांसमीटर पर अजीब सी गड़गड़ाहट हुई। अफसरों की उंगलियां तेजी से डिकोडर पर दौड़ने लगीं। जैसे ही आखिरी शब्द डिकोड हुआ, कमरे में मौजूद अफसर हैरान रह गए। मैसेज था- ‘पाकिस्तान, INS विक्रांत को डुबाने की साजिश रच रहा है। उसकी सबसे खतरनाक पनडुब्बियां बंगाल की खाड़ी की तरफ निकलने वाली हैं।’ INS विक्रांत, भारतीय नेवी का वो तैरता हुआ विमान वाहक पोत है, जिसपर 30 लड़ाकू विमान और करीब 1600 सैनिक तैनात हो सकते हैं। 1943 में इसे ब्रिटिश रॉयल नेवी के लिए तैयार किया गया था, जिसे 1957 में भारत ने खरीद लिया। इसी INS विक्रांत के बूते भारत ने पश्चिमी पाकिस्तान से पूर्वी पाकिस्तान जाने वाले समुद्री रास्ते की नाकेबंदी कर रखी थी। पाकिस्तान छटपटा रहा था। वह किसी भी कीमत पर विक्रांत को डुबाना चाहता था, ताकि वो पूर्वी पाकिस्तान तक आसानी से रसद और सैनिक भेज सके। 8 नवंबर 1971, दिल्ली से करीब एक हजार किलोमीटर दूर कराची का एक आलीशान गोल्फ कोर्स। पाकिस्तान नेवी के सबसे काबिल पनडुब्बी कमांडर, जफर खान, शॉट लगाने ही वाले थे कि एक रनर हांफता हुआ आया। ‘सर, हेडक्वार्टर से बुलावा आया है। फौरन चलिए।’ हेडक्वार्टर पहुंचते ही कमांडर जफर के सामने नक्शा फैला दिया गया। एक एडमिरल ऑफिसर ने कहा- ‘INS विक्रांत को तबाह करना है। सबकी छुट्टियां कैंसिल। 10 दिन के भीतर कूच कर जाओ।’ 14 नवंबर को कमांडर जफर पाकिस्तान की सबसे घातक पनडुब्बी PNS गाजी को लेकर कराची से निकले। 18 नवंबर को श्रीलंका में डीजल भरवाया। 20 नवंबर को वे चेन्नई के तट की तरफ बढ़ने ही वाले थे कि कराची से नया संदेश आ गया- ‘अब विक्रांत मद्रास में नहीं है।’ इसी दौरान, विशाखापट्टनम के बाजारों में अजीब हलचल शुरू हो गई। अचानक भारी मात्रा में राशन, टनों मांस और सब्जियां खरीदी जाने लगीं। ‘इतनी बड़ी रसद तो INS विक्रांत के लिए ही मांगा जा सकता है।’ पाकिस्तानी जासूसों के कान खड़े हो गए। उन्होंने फौरन कराची मैसेज भेजा- ‘विक्रांत विशाखापट्टनम में है।’ अब पाकिस्तान से कमांडर जफर को नया हुक्म मिला- ‘फौरन रुख बदलो, विक्रांत विशाखापट्टनम में है।’ 1 दिसंबर 1971, घड़ी में रात के 11 बजकर 45 मिनट हुए थे। पाकिस्तानी पनडुब्बी गाजी विशाखापट्टनम बंदरगाह के मुहाने पर आकर गहरे समंदर में छुप गई। कमांडर ने तय किया कि जब तक उन्हें विक्रांत नजर नहीं आता, वो सतह पर नहीं आएंगे। 48 घंटे बीत गए। गाजी में डीजल से बैटरियां चार्ज की जा रही थीं, जिसकी वजह से खतरनाक हाइड्रोजन गैस रिलीज हो रही थी। पनडुब्बी के अंदर हाइड्रोजन जमा होता जा रहा था। मेडिकल अफसर गुहार लगा रहे थे कि हाइड्रोजन बाहर निकालने के लिए सतह पर जाना होगा, पर जफर के सिर पर मिशन का भूत सवार था। उन्होंने चीखते हुए कहा, ‘गाजी जैसी विशाल पनडुब्बी दिन के उजाले में ऊपर आई, तो हिंदुस्तानी हमें जिंदा चबा जाएंगे।’ वक्त गुजरता गया। फिर आई 3 दिसंबर 1971 की रात। करीब 12 बजे ऑल इंडिया रेडियो पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की आवाज गूंजी- ‘पाकिस्तान ने भारत पर हमला कर दिया है।’ उनका भाषण चल ही रहा था कि 12 बजकर 15 मिनट पर विशाखापट्टनम समंदर में जोरदार धमाका हुआ। आस-पास के मकानों की खिड़कियों के शीशे चकनाचूर हो गए। लोग सहम गए कि पाकिस्तान ने बमबारी कर दी है। लेकिन, अगली सुबह पता चला कि PNS गाजी खुद ही विस्फोट होकर तबाह हो गई है। मछुआरों को उसका मलबा मिला था। इस तरह भारत ने ना सिर्फ INS विक्रांत को बचाया बल्कि पाकिस्तानी नेवी के कई ठिकानों को तबाह कर दिया। पश्चिमी पाकिस्तान से पूर्वी पाकिस्तान के समुद्री रास्ते पर भारत की नाकेबंदी के आगे पाक की एक न चली। 16 दिसंबर 1971, 90 हजार सैनिकों के साथ पाकिस्तान ने भारत के आगे सरेंडर कर दिया। पाकिस्तान के दो टुकड़े हुए और दुनिया के नक्शे पर एक नया देश जन्मा- 'बांग्लादेश।' यह सबकुछ हुआ उस खुफिया मैसेज की बदौलत जिसे कश्मीर की एक लड़की सहमत ने जानपर खेलकर पाकिस्तान से भेजा था। सहमत ने जासूसी के लिए पाकिस्तानी फौजी से शादी की थी। आज कहानी उसी सहमत की… कश्मीर के रहने वाले हिदायत खान और पंजाब की रहने वाली सिख परिवार की तेज ने प्रेम विवाह किया। परिवार से बगावत करके। दो साल बाद उनको बेटी हुई। नाम रखा- सहमत। हिदायत बिजनेसमैन थे। उनका कपड़ों का कारोबार पाकिस्तान तक फैला था। उन दिनों पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में आना-जाना, कारोबार और शादी-ब्याह आम था। हिदायत कश्मीरी पश्मीना शॉल भी बेचते थे, जो रईस फौजियों की पहली पसंद थी। लिहाजा फौज में हिदायत की ठीक-ठाक पैठ बन गई थी। बड़े अफसरों तक गुपचुप शराब पहुंचाना और उनके साथ उठना-बैठना, हिदायत की इसी पैठ का हिस्सा था। उधर, 1965 की जंग में मात खाने के बाद पाकिस्तान भारत से बदला लेने की योजना बना रहा था। RAW को भनक लग चुकी थी। उसे सरहद पार ऐसे शख्स की तलाश थी, जो पाकिस्तानी फौज की गतिविधियों से आगाह कर सके। RAW की नजर जाकर टिकी- हिदायत खान पर। RAW के अफसर पहले से उनके काम पर नजर रखे हुए थे। एक शाम RAW के कुछ अफसर हिदायत के घर पहुंचे। हिदायत से देश की सुरक्षा का वास्ता देकर मदद मांगी। शुरुआत में हिदायत हिचकिचाए, पर बाद में हामी भर दी। उन्हें ट्रेनिंग दी गई। जल्द ही, हिदायत ने लाहौर, इस्लामाबाद और मुल्तान में अपना जाल बिछा दिया। RAW को सटीक और अहम इनपुट्स मिलने लगे। पत्नी तेज भी इस खतरनाक मिशन में शौहर के साथ खड़ी रहीं। सब कुछ ठीक चल रहा था, फिर एक रोज पता चला कि हिदायत को कैंसर हो गया है। परिवार के साथ-साथ RAW के लिए भी यह बहुत बड़ा सेटबैक था। पूर्व नेवी ऑफिसर हरिंदर सिंह सिक्का अपनी किताब ‘कॉलिंग सहमत’ में लिखते हैं- 'एक रोज RAW के कुछ अफसर हिदायत के घर पहुंचे। कमरे में तेज भी मौजूद थीं। एक अफसर ने हिदायत के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ‘अमेरिका में एक बड़े डॉक्टर से बात की है। तुम वहां जाओ और इलाज कराओ।’ हिदायत ने थकी हुई मुस्कान के साथ सिर हिलाया, ‘मेरा बचना मुश्किल है साहब... अब हमें कोई ऐसा भरोसेमंद इंसान चाहिए, जो मेरी जगह ले सके।’ थोड़ी देर बाद… हिदायत ने आंखें घुमाईं। भारी, कांपती हुई आवाज में तेज की तरफ देखा। ‘हमारी सहमत इस काम के लिए कैसी रहेगी?’ हिदायत के मुंह से अपनी जवान बेटी का नाम सुनते ही तेज सिसकने लगीं। RAW के अफसर बुत बने यह सब देख रहे थे। हिदायत ने तेज के बहते आंसूओं को देखा, लेकिन इरादा नहीं बदला। उन्होंने जोर देकर कहा- 'सहमत मेरा खून है। पाकिस्तान के लोग आसानी से मान लेंगे कि हिदायत की तबीयत बिगड़ने के बाद बेटी कारोबार संभाल रही है। किसी को शक भी नहीं होगा।’ तेज इस फैसले के खिलाफ थी... लेकिन हिदायत की आखिरी इच्छा के सामने, अपना विरोध जता नहीं पाई। इधर, सहमत दिल्ली में अपनी दुनिया में मगन थी। कॉलेज के एक नाटक में उसने मीराबाई का रोल किया था। उसका किरदार सबकी जुबान पर था। अभिनव नाम के एक लड़के को वो पसंद करने लगी थी। दोनों प्यार का इजहार भी कर चुके थे। उस रोज सहमत का आखिरी पेपर था। वह हॉल से निकली ही थी कि एक आदमी उसके पास आया और सीलबंद लिफाफा देकर चला गया। सहमत ने मुस्कुराकर सोचा- ‘अभिनव ने कोई हरकत की होगी, मगर जैसे ही उसकी निगाह लिफाफे पर लिखे भेजने वाले के पते पर गई, वह घबरा गई। कांपते हाथों से उसने लिफाफा खोला। अंदर हवाई जहाज का टिकट था और एक पर्ची, जिस पर लिखा था- ‘जल्द श्रीनगर पहुंचो।’ दिल में एक अनजाना खौफ लिए वह उसी वक्त रवाना हो गई। जब वो श्रीनगर पहुंची, तो मालूम हुआ कि पिता बीमार हैं। बचने की उम्मीद ना के बराबर है। सहमत गुमसुम एक कुर्सी पर सिर झुकाए बैठी थी। अचानक मां की आवाज गूंजी- ‘तुम्हें पाकिस्तान जाना है।’ सहमत का खून जम गया। वह हकलाते हुए बोली, ‘पाकिस्तान… पाकिस्तान क्यों, अम्मी?’ तेज ने आगे बढ़कर सहमत के कांपते हुए कांधे पर हाथ रखा। धीरे से कहा- ‘तुम्हारे पापा पाकिस्तान में बिजनेस के साथ-साथ देश के लिए भी काम करते थे। खुफिया जानकारियां RAW को भेजते थे। अब उनका काम तुम्हें संभालना होगा।' 'पापा का इतना खतरनाक काम मैं कैसे संभाल सकती हूं?' सहमत ने झिककते हुए मां से पूछा। तेज ने समझाते हुए कहा- ‘RAW वाले तुम्हें ट्रेनिंग दे देंगे।’ सहमत खामोश रही। उसके दिल के अंदर एक तरफ अभिनव का चेहरा था, तो दूसरी तरफ पिता का गिरता हुआ साया। उसने लंबी सांस भरी और हिम्मत जुटाकर कहा- ‘मां… मुझे दिल्ली में एक लड़के से मोहब्बत हो गई है। हम एक-दूसरे को जुबान दे चुके हैं। मैं इस तरह पाकिस्तान नहीं जा सकती।’ सहमत को लगा कि मां का दिल पसीज जाएगा, पर तेज का जवाब सुनकर वो बेजुबान सी पड़ गई। तेज ने कहा- ‘बेटा, तुम्हारे बाप ने देश के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया… और तुम इश्क-मोहब्बत के फेर में पड़ी हो। मोहब्बत ही करनी है, तो इस पाक मिट्टी से करो, मुल्क से करो।’ हरिंदर सिंह सिक्का लिखते हैं- ‘सहमत के लिए एक साथ पिता और प्यार, दोनों को खोना किसी सदमे से कम नहीं था, पर वो मां के फैसले का विरोध नहीं कर पाई। वह आखिरी बार अभिनव से मिली। यह जानते हुए भी कि वो जिस मिशन पर जा रही है, उसकी सीक्रेसी ही सबकुछ है, उसने अभिनव को सब बता दिया। एक महीने बाद हिदायत की मौत हो गई। अगला महीना सहमत ने दिल्ली के लाल किले में बिताया। जहां हर रोज उसे 12 घंटे ट्रेनिंग दी जाती थी। ट्रेनिंग पूरी होने के बाद उसकी शादी पाकिस्तान के लाइट इनफेंट्री में कैप्टन इकबाल से कर दी गई। दरअसल, रावलपिंडी के रहने वाले कैप्टन इकबाल के पिता ब्रिगेडियर सईद बंटवारे से पहले हिदायत के क्लासमेट रह चुके थे। दोनों दोस्त थे। ब्रिगेडियर सईद भी इस शादी से खुश थे। उनकी नजर हिदायत की बनाई संपत्ति पर थी, जिसकी इकलौती वारिस सहमत थी।’ वक्त गुजरता गया। अपने कामों से सहमत सईद परिवार पर अपनी छाप छोड़ रही थी। एक बार कराची बंदरगाह पर किसी इंपोर्टर का माल जब्त हो गया। उस पर इतना जुर्माना लगा कि व्यापारी ने उसे लेने से मना कर दिया। सहमत ने कुछ खरीदारों के साथ मिलकर सारा माल खरीद लिया। इस सौदे से सईद के परिवार को मोटा मुनाफा हुआ। इसके बाद ब्रिगेडियर अहम मसलों पर सहमत की सलाह लेने लगे। धीरे-धीरे इन मसलों में पाकिस्तानी सेना के मामले भी शामिल हो गए, लेकिन ब्रिगेडियर का नौकर अब्दुल, शुरुआत से ही सहमत पर शक करता था। उस पर नजर भी रखता था। सहमत अपनी चाल चलना शुरू कर चुकी थी। अब उसे तलाश थी एक ऐसे महफूज ठिकाने की, जहां वो खुफिया ट्रांसमीटर लगा सके। ट्रांसमीटर पर मोर्स कोड के जरिए मैसेज भेजे जाते हैं, जो बीप से चलते हैं। तभी सहमत की नजर ब्रिगेडियर के कमरे में रखे दो बड़े फोटो फ्रेम पर पड़ी। उसने फ्रेम में ट्रांसमीटर सेट कर दिया और वॉशरूम से उसे कंट्रोल करने लगी। उसने वॉशरूम को ऑपरेशन रूम जैसा बना दिया था। वहां से खुफिया जानकारी भेजने के साथ वो इमरजेंसी कॉल भी कर सकती थी। एक रोज की बात है। सूरज ढलने को था। स्टडी रूम में ब्रिगेडियर सईद परेशान हाल में कुर्सी पर बैठे थे। माथे की लकीरें उनकी अंदरूनी घबराहट को साफ बयां कर रही थीं। तभी सहमत चाय की प्याली लेकर कमरे में पहुंची, तो ससुर के चेहरे पर छाई बेबसी को भांप गई। सहमत ने आहिस्ता से प्याली मेज पर रखते हुए पूछा, ‘अब्बू जान, सब खैरियत तो है? आप काफी परेशान लग रहे हैं।’ ‘क्या बताऊं बेटी... यूनिट का एनुअल इंस्पेक्शन सिर पर है। इस बार खुद जनरल कमांडिंग ऑफिसर, यानी जीओसी लेफ्टिनेंट जनरल अमीर खान मुआयना करने आ रहे हैं। बेहद सख्त और क्रूर मिजाज के अफसर हैं। जरा सी चूक हुई कि पूरा करियर तबाह।’ सहमत ने ढांढस बंधाते हुए बड़े भरोसे से कहा, ‘मायूस मत होइए अब्बू जान, मैं कुछ करती हूं। सब ठीक हो जाएगा।’ अगली सुबह, सहमत ने काले रंग का बुर्का ओढ़ा और घर से यह कहकर निकली कि वह नमाज के लिए जामा मस्जिद जा रही है, लेकिन उसकी मंजिल हवेली की नजरों से दूर शहर के एक कोने में बना टेलीफोन बूथ था। सड़क पर नजरें दौड़ाते हुए वह बूथ के भीतर दाखिल हुई, रिसीवर उठाया और दिल्ली का एक खुफिया नंबर घुमा दिया- ‘मुझे जीओसी लेफ्टिनेंट जनरल अमीर खान का पूरा ब्योरा चाहिए। परिवार, शौक, कमजोरियां... मुझे सबकुछ जानना है। कल ठीक इसी वक्त दूसरे बूथ से फोन करूंगी।’ अगले दिन, सहमत एक दूसरे इलाके के टेलीफोन बूथ पर पहुंची। उसने जैसे ही संपर्क साधा, सरहद पार बैठे उसके हैंडलर ने पूरी फाइल तैयार रखी थी। RAW की सीक्रेट फाइलों को खंगालने के बाद जो कड़ियां जोड़ी गई थीं, उनमें जनरल अमीर खान की एक दिलचस्प कमजोरी सामने आई। हैंडलर ने कोड वर्ड में बताया- ‘जनरल खान मछलियों के दीवाने हैं।’ सहमत ने रिसीवर क्रेडल पर रखा और बुर्के के भीतर ही मुस्कुरा दी। अगले दिन सहमत पति के दफ्तर पहुंची। कैप्टन इकबाल ने देखा कि वो दीवार पर लगे नक्शे पर लाल स्याही से घेरे बना रही है। उसने चिल्लाते हुए कहा- इस नक्शे को क्यों बिगाड़ रही हो। अब्बा हुजूर को पता चला, तो नाराज होंगे।’ सहमत बोली- ‘अब्बा हुजूर से ही मिलने आई हूं। आप मुझे वहां ले चलोगे?’ इकबाल कुछ बोल पाता, उससे पहले ही सहमत दफ्तर से निकलकर गाड़ी में बैठ गई। ड्राइवर से कहा- 'मुझे ब्रिगेडियर सईद साहब के दफ्तर ले चलो।' ‘अब्बा हुजूर क्या मैं अंदर आ सकती हूं…’ दरवाजे पर खड़ी सहमत को देखकर ब्रिगेडियर चौंक गए। उन्होंने उसे अंदर बुलाया। सहमत, ब्रिगेडियर को एक दीवार की तरफ ले गई, जिस पर सेना का नक्शा टंगा था। उसने उंगली से इशारा किया कि इंस्पेक्शन यहां से शुरू होगा और यहां खत्म होगा। अगले आधे घंटे तक ब्रिगेडियर उसकी बातों को चुपचाप सुनते रहे। फिर सोचने लगे कि सहमत ठीक ही कह रही है। ऐसा ही करना चाहिए। इंस्पेक्शन वाले दिन ब्रिगेडियर ने जीओसी से कहा- ‘सर हमने ड्रिल में बदलाव किया है। अफसरों के साथ टी ब्रेक झील के पास होगा।’ ‘ ऐसा क्यों किया?’ जीओसी ने गुस्से से पूछा.... ‘सर, इस झील में मछलियां भरी पड़ी हैं। आप खाली वक्त मछली पकड़ने में बिता सकते हैं।’ ब्रिगेडियर ने जवाब दिया। तय दिन पर ड्रिल शुरू हुई। जनरल अमीर खान की नजरें जवानों की परेड से ज्यादा उस झील पर टिकी थीं। जैसे ही उन्होंने पानी में तैरती रंग-बिरंगी मछलियों का झुंड देखा, किसी बच्चे की तरह चहक उठे। उन्होंने तुरंत ब्रिगेडियर सईद की तरफ मुड़कर कहा, ‘सईद साहब! अब कोई इंस्पेक्शन-विंस्पेक्शन नहीं होगा। बस, कुछ जिंदा मछलियां मेरे घर भिजवा दीजिए और बाकी का इंतजाम आज रात के डिनर के लिए रखिए!’ रात ढलते ही जनरल के सम्मान में एक शानदार दावत रखी गई। पूरे डिनर की कमान सहमत ने अपने हाथों में ले रखी थी। उसने शेफ से लेकर परोसने वाले तक, हर चीज पर खुद नजर रखी। मेज पर सजी हर डिश में जनरल की पसंद का ख्याल रखा। स्टार्टर से लेकर मेन कोर्स तक, हर एक निवाले में मछली का लाजवाब जायका था कि जनरल अमीर खान उंगलियां चाटने पर मजबूर हो गए। सहमत की मेहमाननवाजी ने जनरल का दिल जीत लिया था। डिनर के बाद, जनरल अमीर खान सहमत के पास आए। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, ‘माशाल्लाह! तुम्हारी इस आवाभगत ने दिल खुश कर दिया। तुम्हारे परिवार को एक शानदार इनाम मिलना चाहिए।’ सहमत की धड़कनें तेज हो गईं। वह चाहती थी कि उसका कोई अपना, जनरल के बेहद करीब पहुंच जाए, ताकि सेना की सीक्रेट फाइलों तक पहुंच आसान हो सके, लेकिन एक मंझी हुई खिलाड़ी की तरह उसने चेहरे पर कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई और खामोश रही। जनरल ने दोबारा पूछा, ‘संकोच मत करो। जो भी दिल में है, साफ-साफ कह दो। भरोसा रखो, मैं तुम्हें मायूस नहीं करूंगा।’ सहमत ने पलकें झुकाईं, आवाज को बेहद धीमा और संजीदा किया, और बस दो लफ्ज कहे- ‘कैप्टन इकबाल।’ कैप्टन इकबाल यानी सहमत के शौहर। जनरल अमीर खान ने गर्मजोशी से सहमत का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा, ‘बस इतनी सी बात? समझो काम हो गया।’ कैप्टन इकबाल का प्रमोशन हो गया। अब जनरल के दफ्तर की हर हरकत, हर फाइल और हर हलचल अनजाने में ही सही, कैप्टन इकबाल के जरिए सहमत के बेडरूम तक पहुंचने लगी। ***** पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI को भनक लग चुकी थी कि गद्दार ब्रिगेडियर सईद की हवेली में ही है। सहमत जान गई थी कि उसका राज कभी भी खुल सकता है। नौकर अब्दुल को वो रास्ते से हटा चुकी थी। एक रोज उसका सामना शौहर इकबाल से हुआ। इकबाल कुछ कह पाता उससे पहले ही सहमत ने रिवॉल्वर की नोक उसके माथे पर टिका दी। पूरी कहानी कल यानी रविवार को पढ़िए 'जासूस सहमत' पार्ट-2…
ईरान की चेतावनी : होर्मुज में नए समुद्री मार्ग बिना तालमेल के सुरक्षित नहीं
होर्मुज स्ट्रेट को लेकर ईरान ने साफ कर दिया है कि इस क्षेत्र में सुरक्षित समुद्री आवाजाही के लिए उसके साथ सीधा तालमेल जरूरी है। सुरक्षा को नजरअंदाज करके बनाए गए किसी भी वैकल्पिक रास्ते को वह स्वीकार नहीं करेगा।
वियना में भारतीय राजदूत शंभू कुमारन ने की ऑस्ट्रियाई सांसदों के साथ द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा
भारत के ऑस्ट्रिया में राजदूत शंभू एस. कुमारन ने ऑस्ट्रियाई संसद के इंडिया फ्रेंडशिप ग्रुप के सदस्यों से मुलाकात की और दोनों देशों के बीच बढ़ते संबंधों पर चर्चा की।
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के महानिदेशक राफेल ग्रॉसी ने कहा कि परमाणु निगरानी संस्था ने ईरानी अधिकारियों के साथ परमाणु निरीक्षण को लेकर शुरुआती बातचीत की है।
‘पासपोर्ट एक यात्रा दस्तावेज है, न कि नागरिकता का प्रमाणपत्र।’ विदेश मंत्रालय के अधिकारी का ये बयान सुर्खियों में है। सवाल उठ रहे हैं कि अगर पासपोर्ट नहीं, तो भारत के नागरिक होने का सबूत क्या है? क्या सरकार नागरिकता के लिए कुछ नया करने जा रही है; इसी पर आज का एक्सप्लेनर… सवाल-1: क्या आधार, पैन, जन्म प्रमाणपत्र भी नागरिकता साबित नहीं करते?जवाबः पासपोर्ट की तरह ये सरकारी दस्तावेज भी नागरिकता के सबूत नहीं हैं… आधार कार्ड: आधार एक्ट, 2016 के सेक्शन 9 में कहा गया है कि आधार नंबर नागरिकता और निवास का सबूत नहीं है। आधार जारी करने वाली यूनिक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया (UIDAI) ने भी बार-बार कहा है कि आधार सिर्फ पहचान पत्र है। इलेक्शन कमीशन, कलकत्ता और बॉम्बे हाईकोर्ट का भी यही रुख है। मतदाता पहचानपत्र: जनवरी 2026 में इलेक्शन कमीशन ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि वोटर आईडी नागरिकता साबित नहीं करता, यह सिर्फ वोट देने के लिए है। अगस्त 2025 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी कहा कि वोटर आईडी कार्ड पहचान दस्तावेज है, न कि नागरिकता के सबूत। पैन कार्ड: आयकर अधिनियम, 2025 के तहत कोई भी विदेशी नागरिक या कंपनी, जिनका भारत में कारोबार है या जो यहां टैक्स के दायरे में हैं, वह पैन कार्ड बनवा सकते हैं। यह सिर्फ वित्तीय लेन-देन और टैक्स ट्रैकिंग के लिए है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी साफ किया कि पैन कार्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं है। राशन कार्ड: 2019 में गुवाहाटी हाईकोर्ट और 2024 में दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि राशन कार्ड को नागरिकता का सबूत नहीं माना जा सकता। यह सिर्फ पते और वित्तीय स्थिति का प्रमाण है। जुलाई 2025 में इलेक्शन कमीशन ने भी सुप्रीम कोर्ट में दलील दी थी कि वोटर लिस्ट में शामिल होने के लिए राशन कार्ड को सबूत नहीं माना जा सकता और नागरिकता साबित करने के लिए पुख्ता सबूत मांगे। ड्राइविंग लाइसेंस: ड्राइविंग लाइसेंस केवल पहचान पत्र है, जो वाहन चलाने की इजाजत देता है। मोटर व्हीकल्स एक्ट, 1988 के तहत, भारत में वीजा पर आए विदेशियों को भी ड्राइविंग लाइसेंस जारी किया जाता है। इसका नागरिकता से कोई लेना-देना नहीं। जन्म प्रमाण-पत्र: 2013 में बॉम्बे हाईकोर्ट में कहा कि केवल जन्म प्रमाण पत्र नागरिकता के लिए पर्याप्त नहीं है। ये सिर्फ जन्म की तारीख और जगह का सबूत है। नागरिकता कानून के मुताबिक भी सिर्फ इसे नागरिकता का आखिरी सबूत नहीं माना जा सकता। हालांकि जन्म प्रमाण पत्र और पासपोर्ट को लेकर दो विरोधाभासी बातें भी हैं… सवाल-2: तो फिर कैसे साबित होगा कि आप भारत के नागरिक हैं?जवाबः अगस्त 2025 में यही सवाल लोकसभा में CPI (ML) के सांसद सुदामा प्रसाद ने पूछा था। तब गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने लिखित जवाब दिया कि 1955 के नागरिकता अधिनियम के हिसाब से भारतीय नागरिकता तय होती है। दरअसल, भारत में नागरिकता साबित करने के लिए कोई सिंगल यूनिवर्सल डॉक्यूमेंट जारी नहीं किया जाता। नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2003 के मुताबिक, जन्मतिथि के हिसाब से नागरिकता अलग-अलग दस्तावेजों से तय होती है… हालांकि 1955 के नागरिकता कानून के तहत विदेशी लोगों से जुड़े मामलों में कुछ खास नियमों से नागरिकता दी जाती है… धारा 5, रजिस्ट्रेशन: उन्हें जिनका भारत से कोई जुड़ाव हो। जैसे- कोई विदेशी महिला या पुरुष जो किसी भारतीय से शादी करे।धारा 6, नेचुरलाइजेशन: विदेशी नागरिकों के लिए, जो तय वक्त तक भारत में रहे हों। जैसे- पाकिस्तानी मूल के गायक अदनान सामी को भारतीय नागरिकता मिली। सवाल-3: क्या सरकार नागरिकता का कोई रजिस्टर बनाने वाली है? जवाबः नहीं। फिलहाल ऐसी कोई कवायद शुरू होने की जानकारी नहीं है। हालांकि सरकार काफी समय से पूरे देश में ‘नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजनशिप’ यानी NRC लागू करना चाहती है, लेकिन ये अभी सिर्फ असम में लागू हुआ है। इसे समझने के लिए पहले दो चीजें समझिए…पहला, CAA: 2019 में संसद से सिटिजनशिप एमेंडमेंट एक्ट, यानी CAA पास हुआ। इसके तहत 1955 के नागरिकता कानून में ये प्रावधान शामिल हुआ कि 31 दिसंबर 2014 से पहले पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से भारत आने वाले गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यक, यानी हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई भारत के नागरिक बन सकते हैं। इसमें मुस्लिम प्रवासी शामिल नहीं थे। 11 मार्च 2024 को ये कानून लागू हो गया है। दूसरा, NRC: CAA बिल के साथ ही NRC, यानी ‘नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजनशिप’ की चर्चा शुरू हुई थी। यानी एक ऐसा रजिस्टर, जिसमें देश के सारे नागरिकों का लेखा-जोखा हो। केंद्र सरकार का प्लान था कि पहले CAA लागू होगा, उसके बाद पूरे देश में NRC लागू किया जाएगा। 20 नवंबर 2019 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में कहा, ‘मान के चलिए NRC आने वाला है। हम पूरे देश में NRC पेश करेंगे, इस पर सदन में चर्चा कर सकते हैं। नागरिकता बिल को NRC से जोड़ने की कोशिश न करें।’ बीजेपी के 2019 के घोषणापत्र में भी कहा गया था घुसपैठ से प्रभावित राज्यों और फिर चरणबद्ध तरीके से पूरे देश में NRC लागू किया जाएगा। हालांकि अब तक ऐसा नहीं हुआ है। 2019 में सिर्फ असम में NRC के तहत नागरिकता रजिस्टर बनाया गया। इसके चलते असम में 31 अगस्त 2019 को जारी हुई नागरिकता की लिस्ट में से 19 लाख लोग बाहर हो गए। सवाल-4: सरकार ने अभी तक नागरिकता का रजिस्टर क्यों नहीं बनाया?जवाबः इसकी 3 बड़ी वजहें हैं… 1. NRC का विरोध, सरकार ने अपना एजेंडा बदला 2. असम की NRC लिस्ट वैध नहीं, कई गलतियां निकलीं 3. नागरिकता के रजिस्टर के लिए जनसंख्या का रजिस्टर बनना जरूरी 30 मार्च 2026 को भारत के रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त, मृत्युंजय कुमार नारायण ने साफ कहा है कि जनगणना के दौरान NPR का कोई फैसला नहीं लिया गया है, और न ही आगे जनगणना का NPR से कोई लेना-देना होगा। सवाल-5: दुनिया के दूसरे देशों में नागरिकता कैसे तय होती है?जवाबः दुनिया में नागरिकता तय करने के दो ही प्रमुख सिद्धांत हैं… 1. Jus Soli यानी मिट्टी का अधिकार: जहां पैदा हुए, उसी देश की नागरिकता। माता-पिता की नागरिकता से कोई फर्क नहीं पड़ता। जैसे- अमेरिका, कनाडा, मेक्सिको।2. Jus Sanguinis यानी खून का अधिकार: माता-पिता की नागरिकता से नागरिकता तय होती है, चाहे जन्म कहीं भी हो। जैसे- सऊदी अरब, जापान और चीन। हालांकि भारत समेत तमाम देशों में दोनों सिद्धांतों का मिला-जुला सिस्टम अपनाया जाता है, यानी जन्म के साथ-साथ माता-पिता की नागरिकता भी देखी जाती है। नागरिकता साबित करने वाले दस्तावेज भी दुनिया में अलग-अलग हैं। जैसे- ---- ये खबर भी पढ़ें… भास्कर एक्सप्लेनर- 4 साल, 8 एक्सटेंशन बाद CAA लागू:3-4 करोड़ आबादी पर असर; मुसलमान क्यों डरे हैं, क्या फिर विरोध होगा पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को नागरिकता देने वाला कानून आज से पूरे देश में लागू हो गया। 12 दिसंबर 2019 को राष्ट्रपति ने नागरिकता संशोधन कानून को मंजूरी दी थी। पूरी खबर पढ़ें…
वेनेजुएला में बुधवार शाम आए दो शक्तिशाली भूकंपों में मरने वालों की संख्या बढ़कर 235 हो गई है। स्वास्थ्य मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार, मृतकों की संख्या पहले बताए गए 32 से बढ़कर 235 हो गई है।
ताइवान पर अमेरिका का दोहराया भरोसा, हथियार पैकेज समीक्षा में
अमेरिका की ट्रंप सरकार ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि ताइवान को लेकर उसकी लंबे समय से चली आ रही नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है
भूकंप से तबाह वेनेजुएला को IMF का भरोसा
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने वेनेजुएला में आए विनाशकारी भूकंप से प्रभावित लोगों के प्रति दुख और संवेदना जताई
जापान में भारत की राजदूत नगमा मलिक की सीनेट अध्यक्ष से मुलाकात, द्विपक्षीय संबंधों पर हुई चर्चा
भारत की जापान में राजदूत नगमा मलिक ने नेशनल डाइट भवन में सीनेट प्रेसिडेंट सेकिगुची मसाकाजू से शिष्टाचार मुलाकात की। इस वार्ता के दौरान दोनों देशों के बीच संबंधों को और आगे बढ़ाने के तरीकों पर विचार-विमर्श किया गया।
तीस्ता नदी जल प्रबंधन को लेकर एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने भारत की सुरक्षा चिंताओं को फिर से हवा दे दी है। चीन और बांग्लादेश ने आधिकारिक रूप से तीस्ता नदी सहित अन्य प्रमुख जल परियोजनाओं के प्रबंधन में आपसी सहयोग को और अधिक गहराई देने पर सहमति जताई है। यह समझौता तब हुआ जब बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की बीजिंग में चीन के जल संसाधन मंत्री ली गुओयिंग के साथ उच्च-स्तरीय मुलाकात हुई। इस साझेदारी के बाद अब चीन की मौजूदगी भारत के बेहद संवेदनशील 'सिलीगुड़ी कॉरिडोर' (चिकन नेक) के करीब और अधिक सघन होने की आशंका जताई जा रही है।चीन का 'तीस्ता प्लान' और सुरक्षा समीकरणचीन पिछले काफी समय से 'तीस्ता नदी व्यापक प्रबंधन और बहाली परियोजना' (Teesta River Comprehensive Management and Restoration Project) में भारी निवेश करने की इच्छा जाहिर कर रहा है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना केवल जल प्रबंधन तक सीमित नहीं है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जो भारत की मुख्य भूमि को उत्तर-पूर्वी राज्यों से जोड़ने वाली एकमात्र कड़ी है, उसके इतने करीब चीन का तकनीकी और बुनियादी ढांचा विकसित होना भारत के लिए रणनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। बीजिंग की इस रुचि को अक्सर 'डेब्ट ट्रैप' और सैन्य विस्तार के प्रयासों के रूप में देखा जाता है।बांग्लादेश को तकनीक और ट्रेनिंग का वादामुलाकात के दौरान, बांग्लादेशी प्रधानमंत्री ने जल संसाधन प्रबंधन, नदी के कटाव को रोकने, सिंचाई तंत्र को मजबूत करने और जल परिवहन को बढ़ावा देने के लिए चीन से तकनीकी और आर्थिक सहायता की मांग की। चीन ने न केवल इन परियोजनाओं में पूरा सहयोग देने का आश्वासन दिया है, बल्कि बांग्लादेशी अधिकारियों को अपने यहां जल प्रबंधन का विशेष प्रशिक्षण देने के लिए भी आमंत्रित किया है। 2005 के द्विपक्षीय समझौतों की नींव पर खड़ी यह नई साझेदारी चीन के लिए दक्षिण एशिया में अपनी पैठ बढ़ाने का एक बड़ा जरिया बन गई है। भारत के लिए अब यह कूटनीतिक और भू-राजनीतिक स्तर पर एक बड़ी परीक्षा होगी कि वह अपने पड़ोसी के साथ इस संवेदनशील मुद्दे को कैसे संभालता है।
इटली की प्रधानमंत्री जार्जिया मेलोनी का भारत के प्रति लगाव किसी से छिपा नहीं है। हाल ही में उनकी नई पुस्तक 'जार्जिया विजन' (Giorgia Vision) बाजार में आई है, जिसमें मेलोनी ने साल 2023 की अपनी भारत यात्रा के दौरान के ऐसे पलों का जिक्र किया है, जो किसी फिल्म के दृश्य जैसे लगते हैं। मेलोनी ने बताया कि जब वह भारत पहुंचीं, तो नई दिल्ली की सड़कों पर उनके स्वागत में लगे पोस्टरों की बाढ़ देखकर न केवल वह, बल्कि उनका प्रतिनिधिमंडल भी दंग रह गया था।दिल्ली की सड़कों पर लगे पोस्टरों ने बदला मूडअपनी पुस्तक में मेलोनी ने याद करते हुए लिखा कि जैसे ही वह दिल्ली की सड़कों से गुजरीं, उन्होंने हर तरफ अपनी तस्वीरों वाले 'वेलकम' पोस्टर देखे। वापसी के समय भी, उन पोस्टरों को 'यात्रा के लिए धन्यवाद' में बदल दिया गया था। इस दृश्य को देखकर इटली के उपप्रधानमंत्री एंतोनियो तजानी ने मजाकिया लहजे में टिप्पणी की, मेलोनी, अगर आप दिल्ली की किसी भी सीट से चुनाव लड़तीं, तो आपको कम से कम 10 लाख वोट तो मिल ही जाते! यह टिप्पणी उस समय उनके साथ मौजूद पूरे दल के लिए हंसी का सबब बन गई थी।'मेलोडी' जोड़ी और कूटनीति का नया अंदाजजार्जिया मेलोनी 2023 में दो बार भारत आईं—पहली बार रायसीना डायलॉग के लिए और दूसरी बार जी20 शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी केमिस्ट्री ने न केवल राजनीतिक गलियारों में, बल्कि सोशल मीडिया पर भी खूब चर्चा बटोरी। इंटरनेट की दुनिया में लोगों ने इस जोड़ी को प्यार से 'मेलोडी' (Meloni + Modi) नाम दिया था। पुस्तक के अध्याय 'हेड हेल्ड हाई अमंग द वर्ल्ड ग्रेट्स' में मेलोनी ने इस बात पर जोर दिया है कि कूटनीति केवल औपचारिक बैठकों और कागजी समझौतों तक सीमित नहीं है, बल्कि नेताओं के बीच के व्यक्तिगत रिश्ते ही विश्व मंच पर सबसे बड़े बदलाव लाते हैं।सिगरेट वाला वो यादगार लम्हाअपनी किताब में मेलोनी ने सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि अन्य वैश्विक नेताओं के साथ बिताए अपने अनौपचारिक पलों को भी साझा किया है। उन्होंने ट्यूनीशिया के राष्ट्रपति कैस सईद के साथ अपनी मुलाकात का जिक्र करते हुए एक दिलचस्प वाकया बताया। जब दो घंटे की लंबी बातचीत के बाद माहौल थोड़ा सहज हुआ, तो उन्होंने सईद से पूछा कि क्या वह सिगरेट पी सकती हैं? मेलोनी के इस सवाल ने माहौल को पूरी तरह बदल दिया और सईद ने भी अपनी सिगरेट निकाली। यह पल उनकी पुस्तक में एक ऐसे मानवीय रिश्ते के रूप में दर्ज है जो औपचारिक सीमाओं को तोड़ देता है। अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस द्वारा लिखित भूमिका वाली यह पुस्तक अब दुनिया भर में चर्चा का विषय बनी हुई है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की वैश्विक लोकप्रियता में भारी गिरावट दर्ज की गई है। प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा जारी एक ताजा सर्वे के नतीजे यह बताते हैं कि दुनिया भर में उनकी नीतियों और उनके नेतृत्व शैली पर भरोसा करने वालों की संख्या बहुत कम हो गई है। सर्वे के आंकड़ों के अनुसार, करीब 76% लोगों ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि उन्हें वैश्विक मामलों को संभालने में ट्रंप के नेतृत्व पर कोई भरोसा नहीं है। यह रिपोर्ट ट्रंप प्रशासन के लिए एक बड़ा कूटनीतिक संकेत है, जो यह दर्शाता है कि उनकी 'अमेरिका फर्स्ट' नीति का असर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी छवि पर पड़ा है।सर्वे में सामने आए चौंकाने वाले आंकड़ेयह व्यापक सर्वे 36 देशों के 42,000 से अधिक लोगों के बीच किया गया, जिसमें ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग में बड़ी कमी देखी गई है। केवल 23% प्रतिभागियों ने ही वैश्विक मामलों के समाधान में ट्रंप पर अपना विश्वास जताया। सर्वे में शामिल 24 देशों में से 16 देशों में ट्रंप के प्रति भरोसा पिछले साल की तुलना में काफी कम हुआ है। खास बात यह है कि किसी भी प्रमुख देश में उनकी लोकप्रियता में बढ़ोतरी दर्ज नहीं की गई है। यूरोप के प्रमुख देशों जैसे जर्मनी, फ्रांस और ग्रीस में भी ट्रंप की रेटिंग अपने निचले स्तर पर पहुंच गई है, जो ट्रांस-अटलांटिक संबंधों में तनाव की ओर इशारा करती है।भारत में ट्रंप का प्रभाव और टैरिफ नीति की असफलताभारत की बात करें तो यहां तस्वीर थोड़ी अलग है, लेकिन गिरावट यहां भी साफ नजर आ रही है। सर्वे में 39% भारतीय प्रतिभागियों ने ट्रंप के नेतृत्व पर भरोसा जताया है, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा 51% था। इसी सर्वे में वैश्विक मामलों पर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के प्रति विश्वास जताने वाले भारतीयों की संख्या 51% रही। ट्रंप प्रशासन की 'टैरिफ नीति' वैश्विक स्तर पर सबसे ज्यादा अलोकप्रिय रही। सर्वे के अनुसार, महज 18% वैश्विक आबादी ने ही इस नीति का समर्थन किया। ब्रिटेन, कनाडा, जापान और जर्मनी जैसे विकसित देशों में तो इस नीति को समर्थन देने वालों का आंकड़ा 20% से भी काफी नीचे रहा। केवल केन्या एक ऐसा देश बनकर उभरा जहां ट्रंप की टैरिफ नीति को बहुसंख्यक लोगों (55%) का समर्थन मिला।

