रूस और यूक्रेन के बीच लंबे समय से जारी युद्ध का दायरा अब पूरी दुनिया के लिए खतरनाक और बेहद चिंताजनक बनता जा रहा है। काला सागर (Black Sea) में यूक्रेन के ओडेसा (Odesa) बंदरगाह के पास गश्त कर रहे एक वाणिज्यिक व्यापारिक जहाज (Commercial Vessel) पर हुए अचानक मिसाइल हमले ने भारत को गहरा झटका दिया है। इस भयावह हमले में जहाज पर सवार 4 भारतीय नाविकों (Indian Seafarers) की दर्दनाक मौत हो गई है, जबकि कई अन्य चालक दल के सदस्य गंभीर रूप से घायल बताए जा रहे हैं। एक रिपोर्टर के नजरिए से देखें तो निर्दोष भारतीय नागरिकों की इस जानलेवा घटना पर भारत सरकार और विदेश मंत्रालय (MEA) ने कड़ा रुख अपनाया है।विदेश मंत्रालय (MEA) का सख्त बयान: निष्पक्ष जांच की मांगभारतीय विदेश मंत्रालय (Ministry of External Affairs) ने इस घटना पर गहरा दुख और कड़ा ऐतराज जताते हुए एक आधिकारिक बयान जारी किया है:कड़ी निंदा: विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र और व्यापारिक समुद्री रास्तों (Commercial Shipping Lanes) में निर्दोष नागरिकों और मालवाहक जहाजों को निशाना बनाना अंतरराष्ट्रीय कानूनों का गंभीर उल्लंघन है।अंतरराष्ट्रीय जांच की मांग: भारत ने मामले की पूरी निष्पक्ष जांच कराने और हमला करने वाले जिम्मेदार पक्षों पर कानूनी व राजनयिक दबाव बनाने की मांग की है, ताकि भविष्य में व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।दूतावास अलर्ट पर, पार्थिव शरीर भारत लाने की कवायद शुरूविदेश मंत्रालय और यूक्रेन व पोलैंड स्थित भारतीय दूतावास (Indian Embassies) लगातार स्थानीय अधिकारियों और शिपिंग कंपनी के संपर्क में बने हुए हैं:मृतकों की पहचान: मारे गए चारों भारतीय नाविकों के परिवारों को सूचित किया जा रहा है और उनकी पहचान की प्रक्रिया पूरी की जा रही है।पार्थिव शरीर वापसी: भारतीय दूतावास की टीम घायलों को तुरंत बेहतर इलाज मुहैया कराने और मृत नाविकों के पार्थिव शरीरों को जल्द से जल्द सम्मानपूर्वक भारत वापस लाने की कागजी व कूटनीतिक कार्रवाई में जुटी हुई है।ब्लैक सी में बढ़ा समुद्री व्यापार का खतरायूक्रेन-रूस संघर्ष के बीच ओडेसा और ब्लैक सी का समुद्री रास्ता वैश्विक अनाज और ईंधन आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इस ताजा मिसाइल हमले के बाद से वाणिज्यिक जहाजों (Merchant Ships) के चालक दल में दहशत का माहौल है। समुद्री सुरक्षा एजेंसियों ने इस मार्ग से गुजरने वाले सभी जहाजों के लिए अलर्ट स्तर बढ़ा दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि व्यापारिक जहाजों पर लगातार हो रहे इन हमलों से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Global Supply Chain) पर और बुरा असर पड़ सकता है।
अमेरिकी सैनिक को नुकसान पहुंचाया तो ईरान को भुगतना होगा कई गुना अंजाम: ट्रंप
'ऑपरेशन इनहेरेंट रिजॉल्व' में तैनात अमेरिकी सेना के दो सक्रिय सैनिकों की जॉर्डन में मौत के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को सख्त चेतावनी जारी की है
पीओके में जेएएसी का आंदोलन जारी, 23 जुलाई को बड़े प्रदर्शन का ऐलान
संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) ने कहा कि पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में स्वैच्छिक बंद और चक्का जाम जारी रहेगा। समिति ने बताया कि बड़ी संख्या में लोग धरना-प्रदर्शनों में शामिल हैं और आंदोलन लगातार जारी है
अमेरिका की ओर से जारी हमले और बयानबाजी पर ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि अमेरिकियों ने शायद हमारी समझ को अपनी बुद्धि की तरह ही कमजोर मान रखा है
पंजाब के अमृतसर से करीब 115 किमी दूर फिरोजपुर का चक मारन गांव। रात करीब 9 बजे का वक्त। एक गुरुद्वारे के बाहर चप्पलों का ढेर लगा दिखा। गेट खोला तो अंदर बरामदे की दीवार पर बड़ा सा प्रोजेक्टर लगा था, जिस पर फिल्म चल रही थी। फिल्म के सीन में लोगों के हाथों में 'स्टॉप फेक किलिंग' का पोस्टर था और आसपास पुलिस खड़ी थी। लोग चिल्ला रहे थे- ‘पंजाब पुलिस जवाब दो। CBI जांच शुरू करो। सुरजीत सिंह सुग्गा हाय हाय।‘ सीन फिल्म सतलुज का है, जो मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की जिंदगी पर बनी है। उन्होंने पंजाब में 1990 के दशक में हुई 2 हजार से ज्यादा हत्याओं को फेक एनकाउंटर बताया और उसके खिलाफ लड़ाई लड़ी। 3 जुलाई को सतलुज OTT प्लेटफॉर्म पर रिलीज की गई, लेकिन 48 घंटे बाद ही हटा ली गई। तब से लगातार पंजाब के गांव-गांव में ये लोगों को बड़ी स्क्रीन लगाकर दिखाई जा रही है। सबसे पहले लोगों की बात…‘पुरखों से किस्से सुने थे, अब फिल्म में देखा- कैसे बेगुनाह मारे गए’ चक मारन गांव में फिल्म की स्क्रीनिंग के दौरान मिले 19 साल के गुरमेल सिंह कॉलेज स्टूडेंट हैं। वे कहते हैं, ‘पुरखों से इन किलिंग के बारे में सुना था। फिल्म में पहली बार देखा। इसे देखकर पता चला कि कैसे बेगुनाहों को मारा गया। सिर्फ सिख ही नहीं, हिंदुओं का भी कत्ल हुआ।‘ गुरुद्वारे में फिल्म देखने आने वालों में ज्यादातर महिलाएं हैं। इन्हीं में से एक बलजीत कौर कहती हैं, ‘फिल्म देखकर पता चला कि 1995 के आस-पास तरनतारन जिले में कैसे परिवार के परिवार उजाड़ दिए गए। किसी का पिता, पति, भाई और बेटा कहां गया, कोई नहीं जानता। इनके लिए लड़ने जसवंत सिंह खालड़ा की कुर्बानी नई पीढ़ी को जाननी चाहिए और उसे याद रखना चाहिए।’ पीड़ित परिवारों की बात…‘3 की उम्र में पिता को खोया, आज फिल्म से दरिंदगी पता चली‘ फिरोजपुर के कई गांवों में पिछले 10 दिनों में 100 से ज्यादा जगहों पर सतलुज की दिखाई गई। फिरोजपुर से करीब 12 किमी दूर वालिके गांव में रंजीत सिंह मिले। उनका दावा है कि 1990 से 1992 के बीच पंजाब पुलिस ने पिता और चाचा दोनों को फेक एनकाउंटर में मार दिया। हमने रंजीत से पूछा कि क्या आपने सतलुज फिल्म देखी। उसमें कितना सच है। इस पर वे कहते हैं, ‘फिल्म में हकीकत तो महज 20 फीसदी ही है, बाकी सब तो काट दिया गया। हालांकि इतनी फिल्म से ही पंजाब पुलिस की सच्चाई सामने आ गई है।‘ ‘चार बार कोशिश की, लेकिन पूरी फिल्म नहीं देख सका। रो-रोकर बुरा हाल हो जाता। किसी तरह पांचवीं बार में पूरी फिल्म देखी। मां तो देख ही नहीं सकीं। वो कई बार बेहोश हुईं, तो मैंने ही उन्हें रोक दिया।‘ हड्डियां तोड़ीं-नाखून उखाड़े, न लाश मिली, न मौत का सर्टिफिकेट पिता के बारे पूछने पर रंजीत कहते हैं, ‘हम किसान परिवार से हैं। 1991-92 की बात है। पुलिस ने पहले चाचा सरदार परमात्मा सिंह को उठाया और उन्हें मार डाला। पुलिस को शक था कि हमारे घर उग्रवादी आते हैं। हम ही नहीं, उस वक्त हर सिख को टारगेट किया, जैसा फिल्म में दिखाया गया है।‘ ‘चाचा के बाद पुलिस ने पापा (आत्मा सिंह) को उठा लिया। तब मैं 3 साल का था और बड़ी बहन 5 की। पुलिस ने पापा के केश (बाल) खोले और खुली जिप्सी के दो हिस्सों में बांध दिए। इसी हाल में उन्हें गांव में 3-4 किमी घुमाया गया। फिर पुलिस सुल्तानपुर लोदी थाने ले गई, जहां उन्हें जानवरों की तरह पीटा गया।‘ ‘तीन दिन बाद दादा जी किसी तरह उनसे मिल सके। पुलिस की पिटाई में पापा का दाहिना हाथ दो जगह से टूटा था। एक आंख बाहर आ चुकी थी। जांघ से खून रिस रहा था। दोनों हाथों के नाखून उखाड़ दिए गए थे। दादा को देखकर पापा ने उठने की कोशिश की, लेकिन खड़े नहीं हो सके।‘ ‘पापा को छुड़ाने के लिए दादा कई पुलिस अफसरों से मिले, लेकिन सबने पैसे मांगे। उन्हें 24 घंटे का समय दिया और 4 लाख रुपए की डिमांड की। तय समय में दादा जितने पैसे जोड़ सके लेकर थाने पहुंचे, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। पापा को भी मार दिया गया था। उनकी लाश भी उसी हरिके कैनाल में बहा दी गई, जहां जसवंत सिंह खालड़ा को फेंका गया था। उस वक्त न किसी ने हमारी शिकायत सुनी और न रिपोर्ट लिखी।‘ ‘सतलुज देखकर महसूस हुआ- पापा के साथ क्या हुआ था‘ इसके बाद हम हरिके कैनाल पहुंचे। जहां 90 के दशक में हुए फर्जी पुलिस एनकाउंटर के बाद लाशें फेंकी गईं। यहां कई पीड़ित परिवार इंसाफ की मांग लेकर जुटे थे। यहीं बैसाखी के सहारे आईं गुरप्रीत कौर बताती हैं, ‘1993 में जब पुलिस ने पापा को घर से उठाया, तब छोटी बहन मां के पेट में थी और मैं 3 साल की थी।‘ ‘मां ने बचपन में कुछ नहीं बताया। बड़े हुए तो पता चला कि पापा फेक पुलिस एनकाउंटर में मारे गए थे। अब सतलुज फिल्म देखकर महसूस हो रहा है कि पापा के साथ क्या हुआ होगा।‘ ‘फिल्म ने पिता की शहादत समझाई, बेटियां वर्दी देख सहम जाती हैं’ हरिके कैनाल के पास ही मिले रविंद्र सिंह तरनतारन जिले के नागो गांव के रहने वाले हैं। उनके पिता बिजली बोर्ड में कैशियर थे। 2 जुलाई 1989 को फेक एनकाउंटर में उन्हें मार दिया गया। रविंद्र बताते हैं, ‘तब मैं 3 साल का था। मां से पिता के बारे में पूछता, तो कहतीं- बाबा के पास गए हैं। बड़ा हुआ, तो सच पता चला।‘ ‘मैंने सतलुज के OTT पर रिलीज होते ही देख ली थी। फिल्म से ही पिता की शहादत समझ आई। मेरी दोनों बेटियों को भी इसी से अपने दादा के फर्जी पुलिस एनकाउंटर का पता चला। अब बेटियां पुलिस की वर्दी देखकर भी डर जाती हैं।’ ’हमारे गांव में भी सतलुज दिखाई गई। फिल्म देखकर सबकी आंखें नम थीं। बच्चों को भी पंजाब का ये काला इतिहास पता चलना चाहिए।’ फेक एनकाउंटर के चश्मदीद बोले…’फिल्म में पूरा सच नहीं, असलियत में इससे ज्यादा दरिंदगी हुई’ फिरोजपुर में सतलुज फिल्म देखने पहुंचे सतवंत सिंह मानक एनकाउंटर के कई केस में गवाह हैं। गांवों में फिल्म दिखाने को जरूरी बताते हुए कहते हैं, ‘90 के दशक में बहुत झूठे एनकाउंटर किए गए। हम खुद 15 केस से जुड़े रहे हैं। फिल्म में जितना दिखाया, वो पूरा सच नहीं। असल में इससे कहीं ज्यादा दरिंदगी हुई थी।‘ ‘हमारे गांव में रहने वाले चरण सिंह को पुलिस सबके सामने उठा ले गई थी। उनके दोनों पैरों को रस्सी के जरिए दो गाड़ियों में बांधा गया और सड़क पर खींचकर मार डाला गया। फिर लाश नहर में फेंक दी। तब पुलिस एनकाउंटर करने के बाद लाश के पेट चीरकर नहर में फेंक देती थी, ताकि लाश तैरकर पानी के ऊपर न आ जाए। पेट काटने से अंदर पानी भर जाता और लाश नहर की गहराई में चली जाती। फिर तेज धार के साथ बह जाती।‘ अब फिल्म की स्क्रीनिंग कराने वालों से बात…500 से ज्यादा स्क्रीनिंग कराई, जब प्रोपेगेंडा फिल्मों पर रोक नहीं तो इस पर क्यों पंजाब में कुछ राजनीतिक पार्टियां, सामाजिक संस्थाएं और आम लोग गांवों में बड़ी स्क्रीन लगाकर फिल्म दिखा रहे हैं। इनमें सांसद अमृतपाल की पार्टी वारिस पंजाब दे, सामाजिक संस्था मिसल सतलुज और कुछ पार्टियां शामिल हैं। इसे फिरोजपुर, गुरदासपुर, रूपनगर, बठिंडा, तरनतारन और मोगा समेत उन इलाकों में दिखाया जा रहा है, जो 90 के दशक में ऐसे मामलों से ज्यादा प्रभावित थे। हम मिसल सतलुज संस्था के जनरल सेक्रेटरी देवेंद्र सिंह बताते हैं कि वे अब तक 400-500 जगहों पर सतलुज की स्क्रीनिंग करा चुके हैं। वे कहते हैं, ‘इसके लिए हमें फिल्म प्रोड्यूसर या हीरो ने कोई मैसेज नहीं भेजा। हम चाहते हैं कि 90 के दशक में हुई किलिंग की जानकारी बच्चों तक पहुंचे।’ मिसल सतलुज और सतलुज फिल्म के बीच संबंध पूछने पर कहते हैं, ’हमारी संस्था का इस फिल्म से कोई लेना-देना नहीं है। सतलुज नदी पंजाब की पहचान है, इसलिए हमने संस्था का नाम सतलुज रखा। फिल्म का नाम सतलुज इसलिए रखा गया, क्योंकि एक्स्ट्रा जुडिशियल किलिंग में ज्यादातर लाशें सतलुज में बहाई गई थी।’ हमने पूछा क्या स्क्रीनिंग को लेकर पुलिस-प्रशासन ने कोई रोक-टोक की। इस पर देवेंद्र कहते हैं, अगर रोक-टोक करेगा भी, तब भी लोग नहीं रुकेंगे। जब धुरंधर जैसी प्रोपेगेंडा फिल्म दिखाई जा सकती है, फिर ये तो पंजाब की हकीकत बयां कर रही है। इसे कैसे रोका जा सकता है। फिल्म दिखाने के पीछे राजनीतिक मंशा या पंजाब में चुनाव की बात वो सिरे से नकारते हैं। ‘युवाओं को फिल्म दिखाना जरूरी, ताकि खालड़ा की कुर्बानी जान सकें’ फिरोजपुर के जीरा इलाके में सतलुज की स्क्रीनिंग करा रहे जसनूर सिंह बराड़ मिले। वे कहते हैं, ‘ये फिल्म दिखाना जरूरी है। हमारे युवा इमोशनली और मेंटली 1990 के दौर से जुड़ रहे हैं। हमें जसवंत सिंह खालड़ा की कुर्बानी जाननी चाहिए।‘ हमने पूछा क्या आने वाले चुनाव की वजह से फिल्म दिखा रहे या सतलुज की टीम ने अप्रोच किया है। जवाब में जसनूर कहते हैं, ‘चुनाव तो यहां की जनता तय करेगी। हमें एक्टर दिलजीत सिंह दोसांज या फिल्म मेकर्स से कोई मैसेज नहीं आया। न किसी ने अप्रोच किया। ये गांव के लोगों का फैसला है।‘ फिल्म स्क्रीनिंग गैरकानूनी, हाईकोर्ट से FIR कराने की मांग सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट विनीत जिंदल ने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में एक याचिका लगाई है। इसमें फिल्म सतलुज की स्क्रीनिंग, स्ट्रीमिंग और सार्वजनिक प्रसारण पर रोक लगाने की मांग की गई है। इन्होंने पिटीशन में दावा किया है कि सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) ने फिल्म में करीब 127 कट सुझाए थे, लेकिन फिल्म मेकर्स ने थिएटर रिलीज के बजाय नाम बदलकर इसे ZEE5 पर रिलीज कर दिया। उनका ये भी दावा है कि फिल्म में कथित रूप से खालिस्तानी उग्रवादियों के प्रति सहानुभूति दिखाई गई है। ……………… ये खबर भी पढ़ें… सतलुज फिल्म रिलीज होते ही भारत से क्यों गायब साल 1995, पंजाब का अमृतसर। जसवंत सिंह खालड़ा ने दावा किया कि पुलिस ने 25 हजार से ज्यादा लोगों की हत्या करके लावारिस की तरह उनकी लाशें जला दीं। इसके 7 महीने बाद जसवंत को भी घर से अगवा करके मार दिया गया। उनकी लाश आज तक नहीं मिली। पढ़िए पूरी खबर…
रूस-यूक्रेन के बीच जारी घातक हमलों में रविवार को चार भारतीय नागरिकों की मौत की खबर सामने आई। ओडेसा बंदरगाह से रवाना हुए व्यावसायिक जहाज 'एमवी गोल्डन लियो' पर यह हमला हुआ
मानसून सत्र के पहले ही दिन सोमवार को संसद में हंगामा देखने को मिला। जंतर-मंतर पर 'कॉकरोच जनता पार्टी' के प्रदर्शन की गूंज सीधे संसद तक पहुंची। नीट परीक्षा में गड़बड़ी, जंतर-मंतर पर लाठीचार्ज और राम मंदिर चंदा चोरी जैसे मुद्दों पर विपक्ष ने संसद के दोनों सदनों में नारेबाजी की। हंगामे के कारण लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही बार-बार स्थगित करनी पड़ी। सुबह 11 बजे लोकसभा की कार्यवाही शुरू होते ही विपक्ष ने हंगामा शुरू कर दिया। विपक्षी सांसद नारेबाजी करते हुए और 'चंदा चोरी' के पोस्टर्स लेकर वेल में आ गए। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सांसदों से शांत रहने की अपील की, लेकिन नारेबाजी जारी रही। हंगामे के कारण प्रश्नकाल नहीं चल सका। लोकसभा की कार्यवाही सुबह 11 बजे शुरू हुई। सदन करीब 7-8 मिनट ही चला। विपक्ष के हंगामे के चलते स्पीकर ने कार्यवाही 12 बजे तक स्थगित कर दी। इसके बाद पांच बार और स्थगित करनी पड़ी। राज्यसभा में भी इन मुद्दों पर तीखी बहस देखने को मिली। यहां कार्यवाही सुबह 11 बजे शुरू हुई। नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने नीट एग्जाम और जंतर-मंतर प्रदर्शन के मुद्दे को उठाया। खड़गे ने सरकार पर हमला बोलते हुए कहा- जंतर-मंतर पर बच्चे इकट्ठा हुए थे। सरकार उनकी आवाज दबा रही है और उन पर लाठियां चला रही है। खड़गे के तीखे तेवरों से सदन में हंगामा हुआ, जिसके बाद राज्यसभा की कार्यवाही भी बार-बार स्थगित करनी पड़ी। इधर, सत्र शुरू होने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मीडिया को संबोधित किया। पीएम मोदी ने कहा कि आज वक्त की मांग है कि संसद में मिल-जुलकर देश को आगे बढ़ाने पर चर्चा हो। सभी दलों को तथ्यों और तर्कों के साथ सदन की चर्चा को मजबूत करना चाहिए। उन्होंने कहा कि मानसून हो या मानसून सत्र, अगर दोनों प्रो-एक्टिव हों तो बेहद प्रोडक्टिव होते हैं। इससे देश का कल्याण होता है। पीएम मोदी ने कहा- भारत के युवाओं ने अंतरिक्ष में नई उड़ान भरी है। ये जो स्काईरूट स्टार्टअप है, उसमें जो युवा काम कर रहे हैं, उनकी औसत उम्र 28 साल है। उन्होंने राहुल गांधी का नाम लिए बिना कहा- मैं किसी 56 साल के नौजवान की बात नहीं कर रहा। इसके बाद उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया के युद्ध और पेट्रोल, डीजल व फर्टिलाइजर्स के वैश्विक संकट के बीच भी भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत रही है। भारत 7.7% की विकास दर हासिल करने वाला देश बना है। वीडियो देखने के लिए ऊपर थंबनेल पर क्लिक करिए…
सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल, कॉकरोच पार्टी का संसद मार्च, रोकने के लिए आंसू गैस के गोले, लाठियां, अफरा-तफरी…। लेकिन धर्मेंद्र प्रधान अब भी शिक्षा मंत्री की कुर्सी पर जमे हैं। सवाल उठ रहे कि आखिर पीएम मोदी धर्मेंद्र प्रधान से हटाकर आंदोलन खत्म क्यों नहीं करा देते? धर्मेंद्र प्रधान को अब तक न हटाए जाने के पीछे 4 बड़े फैक्टर्स हैं… *** सवाल-1: तो क्या धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो ही नहीं सकता?जवाबः 20 जुलाई के प्रोटेस्ट के बाद सरकार पर दबाव बढ़ा है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने कॉकरोच पार्टी के दो राष्ट्रीय प्रवक्ताओं को मिलने बुलाया। कॉकरोच पार्टी ने तीन मांगे रखीं, जिनमें धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भी है। जेपी नड्डा ने इन मांगों पर लीडरशिप से चर्चा करने का आश्वासन दिया है। सरकार राजनीतिक नुकसान का कैलकुलेशन करके ही कोई अगला कदम उठाएगी। 2020-21 में किसान आंदोलन एक बड़ा उदाहरण है। तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसान धरने पर बैठ गए। सरकार ने महीनों तक ‘कृषि कानून’ वापस नहीं लिए। आखिरकार नवंबर 2021 में उसे झुकना पड़ा और पीएम मोदी ने खुद कानून वापसी का ऐलान करते हुए कहा- हमारी तपस्या में ही कोई कमी रह गई होगी। चर्चा है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल और बीजेपी के संगठन में बदलाव होने वाला है। सरकार के सामने 2 विकल्प हैं… ऐसा पहले भी हो चुका है… नवंबर 2014 में सुरेश प्रभु को केंद्रीय रेल मंत्री बनाया गया। उनके कार्यकाल में कई रेल हादसे हुए, जिनको लेकर विपक्ष ने उनके इस्तीफे की मांग की। अगस्त 2017 में प्रभु ने इस्तीफे पेशकश भी की। हालांकि सरकार ने इस्तीफा मंजूर नहीं किया। एक महीने बाद उन्हें कॉमर्स मिनिस्ट्री में शिफ्ट कर दिया गया। वे 2 साल तक मंत्री रहे। 2019 के बाद वे केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह नहीं बना पाए। सवाल-2: प्रधान ने इस्तीफा नहीं दिया, तो क्या CJP का प्रोटेस्ट फेल माना जाएगा? जवाब: CJP ने अपना पूरा आंदोलन धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के इर्ग-गिर्द भुनाया था। आज जेपी नड्डा से बातचीत के बाद भी प्रधान इस्तीफा नहीं देते हैं, तो दिल्ली पहुंचे हजारों प्रदर्शनकारियों में निराशा आएगी। वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष CJP के भविष्य को लेकर आश्वस्त नहीं है। उनके मुताबिक, 'इस आंदोलन में प्लानिंग और लीडरशिप की कमी दिखी है। जब कोई इतना बड़ा आंदोलन शुरू करता है, भूख हड़ताल करता है तो पहले इसे खत्म करने का एग्जिट रूट भी होना चाहिए। लेकिन CJP के पास ऐसा नहीं था। जो मोदी सरकार को समझता है, उसे पता होना चाहिए कि वे दबाव में फैसले नहीं लेते।' हालांकि विजय त्रिवेदी कहते हैं, 'आंदोलनों की कामयाबी दो तरीकों से देख जा सकती है। एक तो अपनी बात जनता तक पहुंचा पाए या नहीं पहुंचा पाए और सरकार को बात सुननी पड़ी या नहीं। इस हिसाब से यह आंदोलन आधा सफल रहा है।' ----------- ये खबर भी पढ़िए… क्या कॉकरोच पार्टी का सरकार से 'समझौता':सोनम वांगचुक की 3 शर्तों में धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा गायब, जेपी नड्डा से मिलने पहुंचे CJP प्रवक्ता अनशन खत्म करने के लिए सोनम वांगचुक ने जो 3 ताजा शर्तें रखी हैं, उनमें धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का सीधा जिक्र नहीं है। इसे एक बड़ा U-टर्न माना जा रहा है। वांगचुक ने 28 जून को धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर ही भूख हड़ताल शुरू की थी। प्रोटेस्ट के बैनर्स से लेकर ज्यादातर बयानों में इसी मांग का जिक्र होता था। पूरी खबर पढ़िए…
मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच भड़के सीधे युद्ध के बीच ईरान के नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई की मौजूदगी को लेकर रहस्य और गहरा गया है। 28 फरवरी को अमेरिकी सैन्य हमलों में तत्कालीन सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद मोजतबा को ईरान की कमान सौंपी गई थी। हालांकि, मोजतबा का कोई भी सार्वजनिक वीडियो या प्रत्यक्ष बयान सामने नहीं आने से वैश्विक स्तर पर अटकलें तेज हो गई हैं। अब ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची के ताजा और चौंकाने वाले बयान ने इस सस्पेंस को चरम पर पहुंचा दिया है, जिसमें उन्होंने स्वीकार किया है कि वे खुद भी नए सुप्रीम लीडर से अब तक नहीं मिल सके हैं।विदेश मंत्री अब्बास अराघची का बड़ा खुलासा: सुप्रीम लीडर बनने के बाद चंद लोग ही मिल पाए मोजतबा सेईरानी समाचार एजेंसी मेहर (Mehr News Agency) के साथ हुई खास बातचीत में विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने बेहद संवेदनशील जानकारी साझा की है। अराघची ने कहा कि सर्वोच्च पद संभालने के बाद से अब तक मोजतबा खामेनेई से केवल कुछ बेहद खास और चुनिंदा लोग ही व्यक्तिगत रूप से मिल पाए हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें खुद भी नए सुप्रीम लीडर से आमने-सामने की मुलाकात का इंतजार है। अराघची ने अल अरबिया को दिए एक अन्य इंटरव्यू में माना था कि सुरक्षा व्यवस्था में हुई भारी चूक के कारण ही पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की सटीक लोकेशन लीक हुई थी और वे अमेरिकी हमले का शिकार हुए थे, और उस सुरक्षा खामी को पूरी तरह से ठीक किया जाना अभी बाकी है।आम जनता और मीडिया की नजरों से पूरी तरह गायब हैं मोजतबा: क्या अमेरिकी हमले में हुए थे गंभीर रूप से घायल?मोजतबा खामेनेई लंबे समय से सार्वजनिक मंचों से नदारद हैं। 28 फरवरी को अपने पिता अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत और उसके बाद हुए अंतिम संस्कार में भी उनका शामिल न होना कई गंभीर सवाल खड़े करता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, जब तक अमेरिका के साथ भीषण सैन्य टकराव और हवाई हमले जारी रहेंगे, मोजतबा पूरी तरह से गुप्त और अज्ञात स्थान पर ही रहेंगे। खुफिया और मीडिया रिपोर्टों में यह अंदेशा जताया जा रहा है कि अमेरिका द्वारा किए गए शुरुआती हमलों में मोजतबा गंभीर रूप से घायल हो गए थे और फिलहाल वे किसी सुरक्षित बंकर में अपना इलाज करा रहे हैं।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा दावा: ईरान का शीर्ष नेतृत्व और सैन्य ढांचा तबाहइस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फॉक्स न्यूज के साथ एक इंटरव्यू में ईरान की मौजूदा सैन्य क्षमता और शीर्ष नेतृत्व पर कड़ा हमला बोला है। ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिकी एयरस्ट्राइक में ईरान की नौसेना, वायुसेना, एयर डिफेंस सिस्टम और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के प्रमुख कमांडर पूरी तरह खत्म हो चुके हैं। अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत की पुष्टि करते हुए ट्रंप ने मोजतबा का जिक्र करते हुए बड़ा दावा किया कि उनका बेटा भी हमले में 90 प्रतिशत तक खत्म हो चुका है। ट्रंप के इस बयान ने मोजतबा की शारीरिक स्थिति को लेकर चल रही अटकलों को और हवा दे दी है।होर्मुज जलडमरूमध्य से फैला युद्ध: अमेरिका और ईरान के बीच दूसरे हफ्ते भी ताबड़तोड़ हमले जारीअस्थायी सीजफायर टूटने के बाद अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य संघर्ष अब अपने दूसरे सप्ताह में प्रवेश कर चुका है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर नियंत्रण को लेकर शुरू हुई यह जंग अब भीषण रूप ले चुकी है। अमेरिकी वायुसेना और टॉमहॉक मिसाइलों ने ईरान के पावर प्लांट, बुनियादी ढांचों, पुलों और रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) के गुप्त ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचाया है। जवाब में ईरान ने जॉर्डन में स्थित अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइलें दागी हैं, जिससे इजरायल समेत पूरे खाड़ी क्षेत्र में युद्ध व्यापक होने का गंभीर खतरा पैदा हो गया है।
अमेरिका-ईरान जंग में फंसा पाकिस्तान: 'मध्यस्थ' बनने चला था इस्लामाबाद, अब 'बलि का बकरा' बनने की नौबत
अमेरिका और ईरान के बीच पश्चिम एशिया में जंग छिड़ने के बाद पाकिस्तान की 'चीफ मीडिएटर' यानी मुख्य मध्यस्थ वाली छवि पूरी तरह से ध्वस्त हो गई है। हफ्तों की भारी कूटनीतिक दौड़-धूप और दिखावे के बाद भी नाजुक सीजफायर टूट चुका है, जिससे पाकिस्तान को गहरा धक्का लगा है। बहरीन और कुवैत में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर तेहरान के हमलों और वॉशिंगटन के खौफनाक पलटावर के बीच प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख असीम मुनीर का तंत्र असहाय नजर आ रहा है। इस्लामाबाद अब कूटनीति के ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां वह मध्यस्थ बनने के बजाय दोनों तरफ से घिरकर 'फॉल गाई' यानी बलि का बकरा बनने की स्थिति में पहुंच गया है।कागजी शेर साबित हुआ इस्लामाबाद MoU: दोनों महाशक्तियों ने समझौतों को किया खारिजतनाव को कम करने के लिए पाकिस्तान द्वारा तैयार कराया गया तथाकथित 'इस्लामाबाद MoU' अब महज कागजी शेर साबित हो रहा है। ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब पर किए गए हमलों की पाकिस्तान ने निंदा जरूर की, लेकिन वॉशिंगटन और तेहरान के आक्रामक रुख के आगे उसकी एक न चली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ शब्दों में स्पष्ट कर दिया है कि वे अब ईरान के साथ किसी भी प्रकार की बातचीत या समझौते के मूड में नहीं हैं। इस कड़े रुख के बाद पाकिस्तान की शांति वार्ता आयोजित करने की सभी कोशिशें पूरी तरह बेअसर हो चुकी हैं।विशेषज्ञों की चेतावनी: शांति वार्ता विफल होने पर पाकिस्तान के सिर फूटेगा ठीकराअमेरिका स्थित अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ माइकल कुगेलमैन ने आगाह किया है कि अगर अमेरिका-ईरान शांति वार्ता पूरी तरह नाकाम होती है, तो इसका सारा दोष पाकिस्तान के सिर मढ़ दिया जाएगा। कुगेलमैन के अनुसार, पाकिस्तान पर अनुभवहीनता और बिना किसी ठोस आधार के विफल वार्ताओं को बढ़ावा देने का आरोप लग सकता है। सीजफायर टूटने के महज एक महीने के भीतर इस्लामाबाद की वैश्विक स्थिति बेहद कमजोर हो गई है, जिससे उसे क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर गंभीर कूटनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।रणनीतिक गफलत में फंसा इस्लामाबाद: होर्मुज स्ट्रेट पर टिका ईरान का कड़ा रुखतेहरान के सेंटर फॉर साइंटिफिक रिसर्च के निदेशक जावेद हेरान-निया का मानना है कि 'इस्लामाबाद MoU' कभी भी मुख्य विवादों को सुलझाने के लिए नहीं बना था। यह केवल होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को अस्थायी रूप से खोलने और युद्ध टालने का एक तात्कालिक जरिया था। ईरान होर्मुज पर अपने रणनीतिक नियंत्रण को बेहद अहम मानता है और वह इसे किसी भी कीमत पर गंवाना नहीं चाहता। जब तक वाशिंगटन और तेहरान के बीच रणनीतिक शक्ति संतुलन खुद नहीं बदलता, तब तक पाकिस्तान जैसे मध्यस्थ देश की भूमिका बिल्कुल सीमित रहेगी।शहबाज और असीम मुनीर के पास विकल्प खत्म: अमेरिका और ईरान दोनों पर निर्भरता बनी मजबूरीगल्फ इंटरनेशनल फोरम की कार्यकारी निदेशक दानिया थाफर के अनुसार, हालिया मिसाइल हमलों और आक्रामक कार्रवाई के बाद पाकिस्तान के पास कूटनीतिक पैंतरेबाज़ी की गुंजाइश खत्म हो चुकी है। पाकिस्तान अपनी आर्थिक और राजनीतिक जरूरतों के लिए अमेरिका और खाड़ी देशों दोनों पर अत्यधिक निर्भर है। लेकिन इस समय चूंकि ईरान और अमेरिका दोनों ही एक-दूसरे को नष्ट करने वाले दौर (Escalation Phase) में पहुंच चुके हैं, इसलिए तनाव कम करने या दोनों को बातचीत की टेबल पर लाने में पाकिस्तान पूरी तरह नाकाम और लाचार साबित हो रहा है।
अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष अब तक के सबसे खतरनाक और चरम स्तर पर पहुंच गया है। जॉर्डन में बने अमेरिकी सैन्य अड्डे पर हुए घातक हमले में एक और अमेरिकी सैनिक की मौत की पुष्टि के बाद वॉशिंगटन ने ईरान के खिलाफ सीधा मोर्चा खोल दिया है। अमेरिकी सेना की सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने सोमवार, 20 जुलाई की सुबह ईरान के कई रणनीतिक ठिकानों पर टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों और लड़ाकू विमानों से ताबड़तोड़ बमबारी की। इस भीषण अमेरिकी हमले में कम से कम 50 लोगों की मौत हो गई है, जबकि 517 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल बताए जा रहे हैं।अमेरिकी एयरस्ट्राइक से दहला ईरान: परमाणु अड्डे और आईआरजीसी के सैन्य ठिकाने तबाहअमेरिकी सेना द्वारा जारी की गई फुटेज के अनुसार, यह हमला समुद्र और हवा दोनों ओर से बेहद सटीक रणनीति के तहत किया गया। सेंट्रल कमांड ने बयान जारी कर बताया कि हमले का मुख्य लक्ष्य ईरान के तटीय निगरानी केंद्रों, एयर डिफेंस सिस्टम, मिसाइल व ड्रोन भंडारण परिसरों और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) के ठिकानों को पूरी तरह ध्वस्त करना था। ईरान ने आरोप लगाया है कि अमेरिका ने उसके एक निर्माणाधीन परमाणु प्रतिष्ठान को भी निशाना बनाया है, जिसके बाद तेहरान ने अमेरिका को इसके बेहद गंभीर अंजाम भुगतने की सीधी धमकी दी है।रणनीतिक जलमार्ग होर्मुज फिर से ठप: वैश्विक ऊर्जा संकट का बड़ा खतरा मंडरायादोनों देशों के बीच पिछले महीने हुई अंतरिम शांति डील अब पूरी तरह से निष्प्रभावी हो चुकी है और दोनों ही पक्षों ने समझौतों को मानने से इनकार कर दिया है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (होर्मुज जलडमरूमध्य) में दो वाणिज्यिक जहाजों पर हमले और आगजनी के बाद इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से आवाजाही पूरी तरह से रोक दी गई है। ईरान ने दावा किया कि अमेरिका ने जहाजों को बारूदी सुरंग वाले रास्ते पर धकेला। दुनिया के प्रमुख तेल आपूर्ति मार्ग के बंद होने से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर एक बार फिर भारी ऊर्जा संकट का खतरा गहरा गया है।खाड़ी देशों में रेड अलर्ट: कुवैत, बहरीन और इजरायल में एयर डिफेंस सिस्टम एक्टिवअमेरिका और ईरान की इस सीधी जंग की चपेट में खाड़ी देश भी आ गए हैं। ईरान की ओर से खाड़ी में मौजूद अमेरिकी सहयोगी देशों पर मिसाइलें और ड्रोन दागे जा रहे हैं। कुवैत के एक महत्वपूर्ण पावर जनरेशन और वॉटर डिजैलिनेशन प्लांट को निशाना बनाया गया है, जिसके बाद कुवैत, बहरीन और जॉर्डन ने अपने एयर डिफेंस सिस्टम को पूरी तरह एक्टिवेट कर दिया है। उधर इजरायल ने भी चेतावनी जारी की है कि जॉर्डन की दिशा से दागी गई ईरानी मिसाइलें उसके क्षेत्र को भी प्रभावित कर सकती हैं।युद्ध में अब तक 17 अमेरिकी सैनिकों की मौत, जंग और भीषण होने के आसारअमेरिकी रक्षा मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार, जॉर्डन में हुए हालिया हमले के बाद अब तक इस संघर्ष में कुल 17 अमेरिकी सैनिकों की जान जा चुकी है, जबकि 430 से ज्यादा जवान घायल हुए हैं। अमेरिकी सेना का कहना है कि यह बड़ी सैन्य कार्रवाई जॉर्डन में मारे गए अपने जवानों का बदला लेने और होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान की आक्रामक पकड़ को कमजोर करने के लिए की गई है। खाड़ी क्षेत्र में तेजी से बदलते इस घटनाक्रम से विश्व स्तर पर कूटनीतिक तनाव उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है।
अमेरिकी राजनीति और व्हाइट हाउस के गलियारों से एक बेहद सुखद और ऐतिहासिक खबर सामने आई है। संयुक्त राज्य अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और भारतीय मूल की सेकंड लेडी उषा वेंस के घर रविवार को एक बार फिर नन्हें मेहमान की किलकारियां गूंजी हैं। वेंस दंपति ने सोशल मीडिया के माध्यम से अपने चौथे बच्चे के जन्म की खुशखबरी साझा की है। इस नवजात शिशु के आगमन के साथ ही अमेरिकी इतिहास में 156 साल पुराना एक दुर्लभ और ऐतिहासिक कीर्तिमान भी दोहराया गया है।156 साल बाद पद पर रहते हुए पिता बने अमेरिकी उपराष्ट्रपति, बना अनोखा रिकॉर्डजेडी वेंस वर्तमान पद पर रहते हुए पिता बनने वाले पिछले 156 वर्षों में पहले अमेरिकी उपराष्ट्रपति बन गए हैं। अमेरिका के राजनीतिक इतिहास में इससे पहले यह अद्भुत संयोग साल 1870 में देखने को मिला था, जब तत्कालीन उपराष्ट्रपति स्कायरलर कोलफैक्स और उनकी पत्नी एलेन वेड कोलफैक्स के घर बेटे का जन्म हुआ था। उससे भी पूर्व, वर्ष 1829 में उपराष्ट्रपति जॉन सी. कैलहून के कार्यकाल के दौरान उनके बेटे विलियम का जन्म हुआ था। इस तरह जेडी वेंस अमेरिकी इतिहास के ऐसे महज तीसरे उपराष्ट्रपति बन गए हैं जिनके कार्यकाल के दौरान संतान का जन्म हुआ है।बेटे का नाम रखा 'ऐलेक नील वेंस', मेडिकल टीम का जताया आभारवेंस दंपति ने अपने नवजात बेटे का नाम ऐलेक नील वेंस (Alec Neal Vance) रखा है। सोशल मीडिया पर एक संयुक्त बयान जारी करते हुए जेडी वेंस और उषा वेंस ने अपनी खुशी व्यक्त की और लिखा कि वे अपने बेटे ऐलेक के आगमन से बेहद उत्साहित हैं। उन्होंने जानकारी दी कि उषा और नवजात शिशु दोनों पूरी तरह से स्वस्थ हैं और उनके तीनों बड़े बच्चे अपने छोटे भाई का स्वागत करने के लिए बहुत उत्सुक हैं। दंपति ने वाशिंगटन स्थित वॉल्टर रीड नेशनल मिलिट्री मेडिकल सेंटर के डॉक्टरों, चिकित्सा कर्मियों और व्हाइट हाउस की मेडिकल टीम का विशेष आभार व्यक्त किया।अमेरिका में बढ़ती जन्म दर के समर्थक रहे हैं जेडी वेंस41 वर्षीय जेडी वेंस लंबे समय से अमेरिका में घटती जन्म दर पर अपनी चिंता व्यक्त करते आए हैं और वे लगातार अमेरिकी नागरिकों को अधिक बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित करते रहे हैं। वाशिंगटन में आयोजित एक सार्वजनिक रैली के दौरान भी वेंस ने खुलकर कहा था कि वे अमेरिका में अधिक से अधिक बच्चों का जन्म देखना चाहते हैं। वेंस दंपति के इससे पहले तीन बच्चे हैं और अब परिवार में चौथे बच्चे ऐलेक नील वेंस के आने से उनका परिवार और भी समृद्ध हो गया है।भारतीय मूल से जुड़ाव: आंध्र प्रदेश से कैलिफोर्निया और फिर व्हाइट हाउस तक का सफरअमेरिका की सेकंड लेडी उषा वेंस का मूल नाता भारत के आंध्र प्रदेश राज्य से है। उषा के माता-पिता 1980 के दशक में भारत छोड़कर अमेरिका में बस गए थे, जिसके बाद वर्ष 1986 में कैलिफोर्निया के सैन डिएगो में उषा का जन्म हुआ। उषा के पिता पेशे से एक मैकेनिकल इंजीनियर और मां जीवविज्ञानी हैं। जेडी वेंस और उषा की पहली मुलाकात येल लॉ स्कूल में पढ़ाई के दौरान एक राइटिंग प्रोजेक्ट पर काम करते समय हुई थी, जो आगे चलकर गहरे प्रेम में बदल गई। वर्ष 2014 में केंटकी में परिणय सूत्र में बंधे इस जोड़े के लिए यह नया अध्याय बेहद खास है।
यूक्रेन ने रूस के आसमान को कर दिया धुआं-धुआं, मॉस्को की ओर दागे 400 सुसाइड ड्रोन; और फिर...
रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध ने सोमवार, 20 जुलाई को बेहद भयानक रूप ले लिया। यूक्रेन ने रूसी राजधानी मॉस्को को निशाना बनाते हुए अब तक का सबसे बड़ा और विनाशकारी ड्रोन हमला बोल दिया। रविवार देर रात से शुरू होकर सोमवार सुबह तक यूक्रेनी सेना ने मॉस्को की दिशा में 400 से अधिक आत्मघाती (सुसाइड) ड्रोन दागे, जिससे पूरे रूस में हड़कंप मच गया। मॉस्को के मेयर सर्गेई सोब्यानिन ने इस हमले की आधिकारिक पुष्टि करते हुए बताया कि रूसी वायु रक्षा प्रणाली (Air Defence System) ने अधिकांश ड्रोनों को हवा में ही नष्ट कर दिया, जबकि 85 ड्रोनों को मॉस्को के हवाई क्षेत्र में ही इंटरसेप्ट कर गिराया गया।मॉस्को के पास इंडस्ट्रियल पार्क और तेल डिपो में लगी भीषण आग, 10 लोग घायलयूक्रेन के इस अचानक हमले से मॉस्को के आसपास के इलाकों में अफरातफरी मच गई। मॉस्को क्षेत्र के गवर्नर आंद्रेई वोरोब्योव के अनुसार, ड्रोन हमलों के कारण कई आवासीय भवनों और नागरिक बुनियादी ढांचों को नुकसान पहुंचा है और कम से कम 10 लोग घायल हुए हैं। डोमोडेडोवो जिले की प्रशासनिक प्रमुख येवगेनिया ख्रुस्तलेवा ने बताया कि मॉस्को से लगभग 30 किलोमीटर दक्षिण में स्थित 'युज्नी व्राटा इंडस्ट्रियल पार्क' में आग लग गई। इसके अलावा, पोडोल्स्क स्थित एक महत्वपूर्ण तेल डिपो (Oil Depot) में भी आग लगने की खबरें सामने आई हैं। यह बड़ा हमला रूस द्वारा यूक्रेन की राजधानी कीव पर दागी गई बैलिस्टिक मिसाइलों के जवाब में किया गया माना जा रहा है।ड्रोन युद्ध में यूक्रेन की बढ़ती मारक क्षमता: रूसी ईंधन सप्लाई चेन पर सीधा प्रहारयूक्रेन युद्ध के इस दौर में अपनी लंबी दूरी की स्वदेशी ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल काफी बढ़ा चुका है। यूक्रेनी सेना रणनीतिक रूप से रूस की ऊर्जा संपत्तियों और तेल सुविधाओं को लगातार निशाना बना रही है ताकि रूसी सेना की ईंधन आपूर्ति को बाधित किया जा सके। रूस का रक्षा मंत्रालय दावा करता रहा है कि उसकी वायु रक्षा प्रणाली सैकड़ों ड्रोनों को मार गिरा रही है, लेकिन यूक्रेन के सटीक हमलों ने रूस की सुरक्षा चिंताएं बढ़ा दी हैं। दूसरी ओर, यूक्रेन अपने पश्चिमी सहयोगी देशों से उन्नत इंटरसेप्टर मिसाइलों की लगातार मांग कर रहा है ताकि रूसी बैलिस्टिक मिसाइलों के घातक हमलों का मुकाबला किया जा सके।रूस का खौफनाक पलटवार: ओडेसा पोर्ट और बैलिस्टिक मिसाइलों से तबाहीयूक्रेनी हमलों के जवाब में रूस ने भी अपनी सैन्य कार्रवाई काफी तेज कर दी है। रूसी रक्षा मंत्रालय के अनुसार, उसकी सेना ने दक्षिणी यूक्रेन के रणनीतिक ओडेसा बंदरगाह (Odesa Port) पर स्थित विशाल ईंधन टैंकों को मिसाइल हमलों से तबाह कर दिया है। यूक्रेनी वायुसेना ने पुष्टि की है कि रूस ने रातभर में दो घातक बैलिस्टिक मिसाइलें और 94 लंबी दूरी के ड्रोन दागे। हालांकि यूक्रेनी रक्षा तंत्र ने 81 ड्रोनों को निष्क्रिय कर दिया, लेकिन कई मिसाइलों और ड्रोनों ने यूक्रेन के बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया है। विशेषज्ञों का कहना है कि जुलाई महीने में रूस ने मिसाइलों का अभूतपूर्व इस्तेमाल किया है।राष्ट्रपति जेलेंस्की के सामने दोहरा संकट: मोर्चे पर युद्ध और देश में राजनीतिक बवंडरमॉस्को पर बड़े हमले के बीच, यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की को अपने ही देश में गंभीर आंतरिक राजनीतिक संकट का सामना करना पड़ रहा है। पिछले सप्ताह यूक्रेनी कैबिनेट और शीर्ष सैन्य नेतृत्व में किए गए व्यापक फेरबदल के बाद देश की राजनीति में भूचाल आ गया है। 35 वर्षीय मिखाइलो फेडोरोव को रक्षा मंत्रालय की कमान सौंपने और 60 वर्षीय जनरल ओलेक्सांद्र सिरस्की को सशस्त्र बलों का प्रमुख बनाए रखने के फैसले का व्यापक विरोध हो रहा है। कीव की सड़कों पर सिरस्की के विरोध में प्रदर्शन हुए हैं। अब जेलेंस्की के सामने जनता और सेना में विश्वास बहाल करने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
अनशन खत्म करने के लिए सोनम वांगचुक ने जो 3 ताजा शर्तें रखी हैं, उनमें धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का सीधा जिक्र नहीं है। इसे एक बड़ा U-टर्न माना जा रहा है। वांगचुक ने 28 जून को धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर ही भूख हड़ताल शुरू की थी। प्रोटेस्ट के बैनर्स से लेकर ज्यादातर बयानों में इसी मांग का जिक्र होता था। क्या सोनम वांगचुक और CJP का रुख वाकई नरम पड़ा, अगर हां तो क्यों; समझेंगे भास्कर एक्सप्लेनर में… सवाल-1: अनशन खत्म करने के लिए सोनम वांगचुक की ताजा शर्तें क्या हैं?जवाबः 20 जुलाई की सुबह सोनम वांगचुक के X हैंडल पर हाथ से लिखा नोट शेयर हुआ। इसमें सोनम वांगचुक ने 3 शर्तें लिखीं और कहा है कि जब तक इन तीनों में से कोई एक पूरी नहीं हो जाती, वो अनशन नहीं तोड़ेंगे… पहली शर्तः अगर सरकार शिक्षा व्यवस्था में बीते दिनों हुई चूक, जैसे- पेपर लीक वगैरह की जिम्मेदारी ले। दूसरी शर्तः अगर CJP के लीडर्स और मैं संसद भवन तक पहुंच जाएं और सांसद हमें आश्वासन दें कि शिक्षा का मुद्दा संसद में उठाया जाएगा।तीसरी शर्तः अगर मेरी तबीयत और खराब हुई और पार्टियों के सांसद, नेता मुझसे मिलने आए। मुझे ऊपर कही बातों का आश्वासन दें, तो मैं अपनी भूख हड़ताल खत्म कर दूंगा। अनशन के 22वें दिन, यानी 19 जुलाई की रात में सोनम वांगचुक की पत्नी डॉ. गीतांजलि जे अंगमो ने भी कहा था कि अगर राजनीतिक दलों के नेता अस्पताल में उनसे बात करने आएं और शिक्षा और जवाबदेही के मुद्दे को संसद में जोर-शोर से उठाने का आश्वासन दें, तो सोनम भूख हड़ताल खत्म कर देंगे। सवाल-2: क्या सोनम वांगचुक ने वाकई U-टर्न मार लिया है?जवाबः कॉकरोच जनता पार्टी की शुरुआत से एक ही मांग थी- शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा। 6 जून के पहले प्रोटेस्ट में धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग वाला बैनर सबसे आगे था। इसमें सोनम वांगचुक भी कंधे पर झोला टांगे और हाथों में गुलाब लेकर जंतर-मंतर पहुंचे थे। फिर 20 जून को CJP ने जंतर-मंतर पर दोबारा प्रोटेस्ट शुरू किया। सोनम ने केंद्र सरकार से 2 मांगें रखीं- धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा और केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करके पूर्ण राज्य का दर्जा देना। सोनम ने कहा कि इन दोनों मांगों पर 27 जून तक सरकार के जवाब का इंतजार करेंगे, फिर अनशन शुरू करेंगे। सरकार की तरफ से कोई जवाब नहीं आया, तो 28 जून को सोनम ने अनशन शुरू कर दिया। हालांकि 13 जून को सोनम ने पत्रकारों से कहा कि अभी वह शिक्षा के मुद्दे को लेकर अनशन पर हैं। लद्दाख के मुद्दे पर सरकार से बातचीत जारी है। कुछ सहमति भी बनी है। सोनम की बिगड़ती तबीयत का हवाला देकर दिल्ली पुलिस 18 जुलाई को सफदरगंज अस्पताल ले गई। अब 20 जुलाई को सामने आईं अनशन तोड़ने की 3 शर्तें कई सवाल खड़े करती हैं। सोनम वांगचुक की शर्तों में न कही धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग है न उनके जिम्मेदारी लेने का कोई जिक्र। उन्होंने कहा है कि सांसद और राजनीतिक दल अगर उन्हें आश्वासन देते हैं, तो वे अनशन खत्म कर देंगे। इसमें भी सरकार या BJP सांसदों या नेताओं का कोई जिक्र नहीं है। वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने X पर लिखा- ‘अस्पताल में पॉलिटिकल लीडर के मिलने और संसद सत्र में चर्चा की बात जंतर-मंतर के आंदोलन के स्टैंड में बड़ा बदलाव है। सोनम वांगचुक ने मंत्री के इस्तीफे की मांग छोड़ दी है। क्या उनका अकेले का फैसला है या आंदोलन का? यह सरकार की बड़ी जीत है।’ वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम लिखते हैं, 'विपक्ष के सांसद तो बिना अनशन के भी संसद में सवाल उठा सकते थे, फिर 21 दिन के अनशन के बाद ये कहने का क्या मतलब है? कांग्रेस तो पहले से इस मुद्दे को लेकर आक्रामक है और दर्जनों प्रदर्शन कर चुकी है। क्या सोनम के साथ ही उनकी जगह मंच पर भूख हड़ताल शुरू कर चुके अभिजीत दीपके भी अनशन खत्म करेंगे?’ सवाल-3: क्या कॉकरोच पार्टी ने भी प्रधान के इस्तीफे की मांग छोड़ दी?जवाबः कॉकरोच पार्टी के फाउंडर अभिजीत दीपके ने रविवार को बताया, ‘हम हजारों की संख्या में 9 बजे संसद के लिए निकलेंगे। हम कोशिश करेंगे कि डेलिगेशन को अंदर जाने दिया जाए ताकि हम अपनी मांग वहां रख सकें।’ इस बीच, सोमवार सुबह ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन, यानी AISA के तीनों स्टूडेंड लीडर्स नेहा, आमीन और मनीष ने 23 दिनों तक चली भूख हड़ताल खत्म कर दी है। सोमवार की सुबह 11 बजे कॉकरोच जनता पार्टी के मुख्य प्रवक्ता सौरव दास को डिप्टी कमिश्नर के दफ्तर ले जाया गया। उन्होने बताया कि सरकार हमसे बातचीत शुरू करने की कोशिश कर रही है। इन सभी डेवलपमेंट में धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की बात सामने नहीं आई। यानी अब ये प्रोटेस्ट संसद मार्च की सफलता तक सीमित हुआ दिखता है। सवाल-4: सोनम वांगचुक और कॉकरोच पार्टी के नरम रुख की वजह क्या हो सकती है? जवाबः अभी कोई साफ वजह सामने नहीं आई है। अलग-अलग तरह की थ्योरीज चल रही हैं… 23 दिन बाद भी समाधान नहीं दिख रहा थाः सोनम पिछले 22 दिनों से अनशन पर है। उनका 10 किलो के करीब वजन घट गया है। इतने समय भूखे रहने पर शरीर की मासपेशियां प्रोटीन खोने लगती है। उस पर पुलिस ने जंतर-मंतर से उठाकर सफदरगंज अस्पताल ले गई। उनकी पत्नी ने सोनम को प्राइवेट हॉस्पिटल शिफ्ट करने की हाईकोर्ट में अर्जी लगाई थी, जो खारिज हो गई। इसके बाद ही उनकी पत्नी ने पहली बार अनशन खत्म करने का जिक्र किया। ये मौजूदा हालात देखते हुए लिया फैसला लगता है। सरकार ने अंदरखाने कोई आश्वासन दे दियाः वरिष्ठ पत्रकार उमाशंकर सिंह लिखते हैं, 'सरकार ने अंदरखाने ये तय कर लिया होगा कि किसी नेता या मंत्री को भेजकर जूस पिला आएंगे। इससे सरकार के रवैये पर उठते सवाल को झुठलाने में भी मदद मिलेगी।' लद्दाख वाले मुद्दे पर सरकार के किसी आश्वासन की वजह से भी हो सकता है सोनम ने धर्मेंद्र प्रधान के मुद्दे पर रुख नरम किया हो। CJP के मुख्य प्रवक्ता सौरव दास ने भी X पर पोस्ट किया है, 'मैं और आशुतोष रांका कॉकरोच जनता पार्टी की तरफ से जे पी नड्डा से मिलने जा रहे हैं। आज सुबह ही सरकार ने हमसे बात करने की पहल की है।' इससे भी संकेत मिल रहा है कि सरकार और प्रदर्शनकारी समझौते की तरफ बढ़ रहे हैं। ---------------- ये खबर भी पढ़िए… जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज, कई के सिर फूटे:बैरिकेडिंग तोड़कर पार्लियामेंट थाने तक पहुंचे; दीपके बोले- हमें संसद जाने से कोई नहीं रोक सकता पुलिस ने सोमवार को जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया। इससे कई लोगों को चोटें आई हैं और कई लोगों के सिर भी फूट गए हैं। हालांकि, पुलिस ने इससे इनकार किया है। पूरी खबर पढ़िए…
मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) में युद्ध के गहराते बादलों और तेजी से बिगड़ते सुरक्षा हालातों के बीच भारत सरकार ने एक बहुत बड़ा कदम उठाया है। विदेश मंत्रालय (MEA) ने ईरान में रह रहे और वहां की यात्रा करने वाले सभी भारतीय नागरिकों के लिए एक बेहद अर्जेंट और महत्वपूर्ण सुरक्षा एडवाइजरी जारी की है। सरकार ने ईरान में मौजूद सभी भारतीयों को सख्त हिदायत दी है कि वे बिना किसी देरी के उपलब्ध कमर्शियल उड़ानों (फ्लाइट्स) का विकल्प चुनकर तुरंत देश छोड़ दें और भारत लौट आएं। एक रिपोर्टर के नजरिए से देखें तो यह कदम साफ तौर पर संकेत देता है कि क्षेत्र में जमीनी हालात बेहद गंभीर हो चुके हैं और किसी भी समय स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है।विदेश मंत्रालय की दो टूक: ईरान की यात्रा करने से पूरी तरह बचेंभारत सरकार की तरफ से जारी की गई इस नई एडवाइजरी में न केवल वहां रह रहे लोगों को वापस आने को कहा गया है, बल्कि नए यात्रियों के लिए भी कड़े निर्देश जारी किए गए हैं। विदेश मंत्रालय ने साफ शब्दों में कहा है कि भारतीय नागरिक अगले आदेश तक ईरान की किसी भी प्रकार की गैर-जरूरी या व्यावसायिक यात्रा करने से पूरी तरह परहेज करें। जो लोग पहले से ही वहां मौजूद हैं, उन्हें अपनी सुरक्षा को लेकर सर्वोच्च प्राथमिकता बरतने की सलाह दी गई है।दूतावास के संपर्क में रहें नागरिक, जारी हुए हेल्पलाइन नंबरतेजी से बदलते घटनाक्रम को देखते हुए तेहरान में स्थित भारतीय दूतावास (Indian Embassy in Tehran) पूरी तरह मुस्तैद हो गया है। एडवाइजरी में कहा गया है कि:पंजीकरण अनिवार्य: ईरान के अलग-अलग शहरों में रह रहे सभी भारतीय नागरिक, चाहे वे छात्र हों, नौकरीपेशा हों या कारोबारी, तुरंत तेहरान स्थित भारतीय दूतावास में अपना रजिस्ट्रेशन (पंजीकरण) करवाएं।लगातार संपर्क: किसी भी आपातकालीन स्थिति (इमरजेंसी) से निपटने के लिए नागरिक दूतावास के अधिकारियों के साथ निरंतर संपर्क बनाए रखें ताकि जरूरत पड़ने पर उन्हें तुरंत सुरक्षित निकाला जा सके।क्यों अचानक बढ़ गया है मिडिल ईस्ट में इतना बड़ा तनाव?दरअसल, पिछले कुछ समय से ईरान और उसके पड़ोसी देशों के बीच सैन्य तनातनी चरम पर पहुंच गई है। खुफिया रिपोर्टों और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों के अनुसार, इस क्षेत्र में किसी भी समय एक बड़े हवाई हमले या सैन्य संघर्ष की शुरुआत हो सकती है। कई अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंस ने पहले ही ईरान की हवाई सीमा का उपयोग बंद कर दिया है और अपनी उड़ानें रद्द कर दी हैं। यही वजह है कि भारत सरकार अपने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर कोई भी जोखिम नहीं उठाना चाहती और समय रहते सभी को सुरक्षित वतन वापस लौटने की अपील कर रही है।
अमेरिकी सेना ने लगातार नौवीं रात किया ईरान पर हमला : सेंट्रल कमांड
ईरान के खिलाफ अमेरिकी की सैन्य कार्रवाई लगातार 9वें दिन जारी रही है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) ने बताया कि ईरान के खिलाफ सैन्य हमलों का एक नया दौर शुरू हुआ है
कैमरून में अपहरण का खौफ़: नॉर्थवेस्ट में सात यात्री बंधक
कैमरून के नॉर्थवेस्ट क्षेत्र में शनिवार देर रात सात यात्रियों का अपहरण कर लिया गया। रविवार को सुरक्षा सूत्रों ने यह जानकारी दी
ट्रंप का बयान: ईरान के एमओयू से हटने पर बोले- ‘मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता’
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के उस फ़ैसले को नज़रअंदाज़ कर दिया जिसमें उसने अमेरिका के साथ हुए अंतरिम समझौते से हटने की बात कही थी
कतर में इराकी पीएम से मिले अमीर, अमेरिका-ईरान समझौते को आगे बढ़ाने पर जोर
कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल थानी ने इराक के प्रधानमंत्री अली फलीह अल-जैदी से मुलाकात की। उन्होंने अमेरिका और ईरान के बीच हुए शांति समझौता ज्ञापन (एमओयू) को लागू करने की अपील की
23 अगस्त 2025, राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस पर पीएम ने मोदी गर्व से कहा था- भारत जल्द ही गगनयान की उड़ान भरेगा, अपना स्पेस स्टेशन बनाएगा और चांद-मंगल के भी पार जाएगा। 11 महीने भी नहीं बीते कि बड़े पैमाने पर वैज्ञानिकों के ISRO छोड़ने की खबरें आ रही हैं। इससे गगनयान जैसे कई बड़े स्पेस मिशन भी अटक सकते हैं। घबराए अंतरिक्ष विभाग ने इस्तीफों की मंजूरी का नियम और सख्त कर दिया है। दुनिया की सबसे सफल स्पेस एजेंसियों में शुमार भारत की ISRO में अंदरखाने क्या चल रहा; मंडे मेगा स्टोरी में पूरी कहानी… **** ग्राफिक्स: द्रगचंद्र भुर्जी और विपुल शर्मा ------- ये खबर भी पढ़िए… क्या यूक्रेन से हारने वाला है रूस: क्रीमिया फिसल रहा, तेल के लिए लंबी कतारें, पुतिन बोले- मुश्किल दौर; यूक्रेन ने कैसे बाजी पलटी 24 फरवरी 2022 को रूस ने यूक्रेन पर हमला किया। दुनियाभर के मिलिट्री एक्सपर्ट्स बोले- रूस 24 घंटे के भीतर यूक्रेन को घुटनों पर ला देगा। लेकिन 4 साल, 4 महीने और 18 दिन की जंग के बाद रूस खुद बेहाल दिख रहा है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने जंग के दौरान पहली बार माना कि देश मुश्किल में है। पूरी खबर पढ़िए…
लगातार आठवीं रात ईरान के सैन्य ठिकानों पर हमले, हाई अलर्ट पर 50 हजार से ज्यादा अमेरिकी सैनिक
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) ने कहा कि मध्य पूर्व में तैनात 50,000 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक पूरी तरह सतर्क हैं। अमेरिकी सेना ने ईरान पर हमलों का एक और दौर पूरा कर लिया है।
यरुशलम/लखनऊ। पश्चिम एशिया (West Asia War 2026) में जारी भीषण जंग अब और अधिक खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुकी है। ताजा घटनाक्रम में ईरान ने इजरायली सीमा से सटे जॉर्डन के प्रमुख तटीय शहर अकाबा (Aqaba) को निशाना बनाकर धड़ाधड़ कई मिसाइलें दाग दी हैं। मिसाइल हमले की भनक लगते ही पूरे जॉर्डन में हवाई हमले के सायरन (Sirens Sounded) गूंज उठे, जिससे स्थानीय नागरिकों में भारी दहशत फैल गई।मनीकंट्रोल हिंदी (Moneycontrol Hindi) की एक विशेष रिपोर्ट के मुताबिक, इस हमले के तुरंत बाद इजरायल डिफेंस फोर्सेज (IDF) और जॉर्डन की वायुसेना ने मिलकर एक बड़ा रक्षात्मक अभियान चलाया और ईरान की तरफ से आ रही मिसाइलों को बीच हवा में ही सफलतापूर्वक इंटरसेप्ट (नष्ट) कर दिया। इजरायली सेना के प्रवक्ता ने पुष्टि की है कि इन मिसाइलों के मलबे से संभावित नुकसान को रोकने के लिए दोनों देशों की सेनाओं ने त्वरित जवाबी कार्रवाई की।अकाबा एयरपोर्ट के पास धमाके, इजरायल के इलियट शहर तक दिखा असरअंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान द्वारा दागी गई मिसाइलों का मुख्य निशाना अकाबा शहर था, जो इजरायल के सीमावर्ती शहर इलियट (Eilat) के बिल्कुल नजदीक स्थित है:एयरपोर्ट के पास धमाका: कुछ शुरुआती खबरों में दावा किया गया कि एक ईरानी मिसाइल अकाबा एयरपोर्ट के पास जाकर गिरी, जिससे जोरदार धमाका हुआ। इस धमाके की चमक और धुएं का गुबार इजरायल के इलियट शहर से भी साफ तौर पर देखा गया।जॉर्डन सरकार का खंडन: हालांकि, बढ़ते तनाव के बीच जॉर्डन सरकार के आधिकारिक प्रवक्ता ने उन खबरों को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें दावा किया जा रहा था कि सुरक्षा खतरों के चलते अकाबा के हवाई अड्डे (Airport) और समुद्री बंदरगाह (Seaport) को खाली करा लिया गया है।अमरीकी सैनिकों की मौत का बदला: US ने ईरान पर किए ताबड़तोड़ हवाई हमलेजॉर्डन पर हुए इस मिसाइल अटैक के पीछे की मुख्य वजह पिछले दिनों क्षेत्र में हुई सैन्य कार्रवाई को माना जा रहा है। अमेरिकी सेना के सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने रविवार को बयान जारी कर बताया कि उन्होंने ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) के ठिकानों पर 'कड़ी और त्वरित सजा' देने के लिए ताबड़तोड़ हवाई हमले शुरू कर दिए हैं।दरअसल, जॉर्डन में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकाने पर हुए एक हालिया हमले में दो अमेरिकी सैनिक मारे गए थे, एक लापता हो गया था और चार गंभीर रूप से घायल हुए थे। अमेरिका ने इसी का बदला लेने और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज (Strait of Hormuz) में तेल टैंकरों के आवागमन को सुरक्षित रखने के लिए ईरान के खिलाफ यह जवाबी मोर्चा खोला है।परमाणु संयंत्र पर हमले के बाद बढ़ा तनाव, UN ने जताई चिंताइस बीच ईरान के परमाणु ऊर्जा संगठन (AEOI) ने अमेरिका पर बेहद गंभीर आरोप लगाया है। ईरान का दावा है कि अमेरिकी वायुसेना ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करते हुए देश के दक्षिण-पश्चिम हिस्से में बन रहे 'दारखोविन परमाणु ऊर्जा संयंत्र' (Darkhovin Nuclear Power Plant) पर बर्बरतापूर्वक हवाई हमला किया है। इस घटना के बाद संयुक्त राष्ट्र (UN) की परमाणु निगरानी संस्था ने दोनों देशों से अत्यधिक संयम बरतने की अपील की है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच यह सीधी गोलाबारी नहीं रुकी, तो पूरा मिडिल ईस्ट एक भीषण क्षेत्रीय युद्ध की आग में झुलस सकता है, जिसका सीधा असर वैश्विक तेल कीमतों और शेयर बाजारों पर पड़ेगा।
18 जुलाई को सोनम वांगचुक के आमरण अनशन का 21 वां दिन था। सुबह करीब 7 बजे दिल्ली पुलिस के कई जवान सादे कपड़ों में आए, सोनम के मंच पर चढ़े, चारों तरफ सफेद चादरें लगाईं और महज 1 मिनट के अंदर सोनम को उठाकर ले गए। जबकि 20 दिन से सरकार ने कोई बयान तक नहीं दिया था। आखिर सरकार को इतनी जल्दबाजी क्यों थी? अचानक अकेले वांगचुक को इस तरह उठाने के पीछे 3 फैक्टर्स जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में… 20 जून को कॉकरोच जनता पार्टी, CJP ने जंतर-मंतर पर प्रोटेस्ट शुरू किया। सोनम ने भी 28 जून को समर्थन में भूख-हड़ताल शुरू कर दी। 21वें दिन वांगचुक को उठाकर अस्पताल ले जाने के पीछे 2 बड़ी राजनीतिक वजहें हैं… 1. संसद सत्र के पहले दिन तीन-तरफा दबाव की आशंका सीनियर पत्रकार अरुण दीक्षित कहते हैं कि 20 जुलाई को संसद सत्र के दिन केंद्र सरकार और प्रशासन के लिए उमर अब्दुल्ला, CJP और सोनम, तीन तरफ से दबाव की स्थिति बन सकती थी। सरकार किसी तरह इस दबाव को कम करना चाहती थी। 2. विपक्षी नेता सोनम के साथ एकजुट होने लगे सोनम के पक्ष में विपक्षी नेताओं के एकजुट होने और उमर अब्दुल्ला की 17 जुलाई की घोषणा के मद्देनजर आनन-फानन में सोनम को उठाने का फैसला लिया गया।रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसीलिए 17 जुलाई को दिल्ली कमिश्नर सतीश गोलचा को अचानक हटाकर उनकी जगह खुफिया एजेंसी ‘IB’ के स्पेशल डायरेक्टर रहे अनुराग कुमार लाए गए। 17-18 जुलाई की रात डेढ़ बजे सोनम को हटाने के निर्देश मिले। फिर मंदिर मार्ग थाने में रणनीति बनी। सुबह 5 बजे अधिकारी जंतर-मंतर पहुंचे, आखिरी ब्रीफिंग दी। फिर उसी हिसाब से एक्शन हुआ। सोनम से CJP को मिला ‘डिजिटल मोमेंटम’ सोनम की तबीयत बिगड़ने की चर्चा से बढ़ा मीडिया कवरेज सेलेब्रिटीज सोनम के सपोर्ट में आए 14 जुलाई से सोशल मीडिया पर हैशटैग के साथ सोनम के सपोर्ट वाली पोस्ट्स की बाढ़ आ गई… दरअसल, भुखमरी से जुड़ी कई रिसर्च के मुताबिक, कोई दुबला-पतला व्यक्ति खाना न खाए, तो उसके शरीर के वजन का करीब 18% तक कम होने पर भूख से मरने की नौबत आ जाती है। ऐसा औसतन 30 से 50 दिनों के बाद होता है। कोई स्वस्थ व्यक्ति है या पानी और नमक वगैरह ले रहा है, तो कुछ ज्यादा दिन चला जा सकता है। उत्तर प्रदेश बेस्ड डॉक्टर ऑफ मेडिसिन (MD) अजय सिंह कहते हैं कि सोनम के हेल्थ पैरामीटर्स देखते हुए ये नहीं कहा जा सकता कि तत्काल उनकी जान को कोई खतरा था। वे हाइड्रेटेड थे। हालांकि 20 दिन के अनशन के बाद लगातार निगरानी की जरूरत तो थी, क्योंकि उनकी उम्र 59 साल है।19 जुलाई की सुबह गीतांजलि ने X पर पोस्ट सफदरजंग हॉस्पिटल पर आरोप लगाया कि वह सोनम के हेल्थ पैरामीटर्स की सही जानकारी नहीं दे रहा है। उन्होंने सोनम को दूसरे अस्पताल में शिफ्ट करने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की। इस पर कोर्ट ने केंद्र और दिल्ली सरकार को 3 दिन में जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है। मामले में अगली सुनवाई 24 जुलाई को होगी। कोर्ट ने ये भी कहा कि सरकार का उन्हें सफदरजंग अस्पताल ले जाने का फैसला मनमाना नहीं कहा जा सकता। सवाल-1: सोनम वांगचुक को उठाकर क्या सरकार से मिस-कैलकुलेशन हो गई?जवाबः राजनीतिक मोर्चे पर इसे 'मिस-कैलकुलेशन' माना जा रहा है, क्योंकि वांगचुक को हटाने के बाद से आंदोलन खत्म होने के बजाय प्रोटेस्ट मजबूत होता दिखा है। अब धर्मेंद्र प्रधान के साथ पीएम नरेंद्र मोदी का इस्तीफा मांगा जा रहा है। सीनियर जर्नलिस्ट नीरजा चौधरी का मानना है, ‘सोनम वांगचुक को जबरन उठाकर अस्पताल ले जाना मोदी सरकार की चूक हो सकती है। वांगचुक की छवि एक बेदाग, देशप्रेमी और पर्यावरण कार्यकर्ता की है। जब सरकार ऐसे किसी चेहरे पर हाथ डालती है, तो जनता में मैसेज गलत जाता है।’ 18 जुलाई को अभिजीत खुद भूख हड़ताल पर बैठ गए और उन्होंने रात का पहरा शुरू किया, ताकि पुलिस वहां से उन्हें पूरी तरह न खदेड़ दे। इसके चलते पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा लोग जुटे। पॉलिटिकल एक्टिविस्ट योगेंद्र यादव, RJD सांसद मनोज झा, AAP नेता गोपाल राय, आजाद समाज पार्टी के नेता चन्द्रशेखर आजाद जैसे तमाम नेता भी जंतर-मंतर पहुंचे। सोशल एक्टिविस्ट अन्ना हजारे ने भी सरकार से बातचीत की अपील की। लोकसभा में विपक्षी के नेता राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे, अखिलेश यादव, केजरीवाल, डिंपल यादव, संजय सिंह, किसान नेता राकेश टिकैत जैसे लोगों ने भी पुलिस एक्शन का विरोध किया है। वहीं वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंग्मो खुलकर सामने आ गई हैं। उन्हें भी सपोर्ट मिल रहा है। सवाल-2: कॉकरोच पार्टी का प्रोटेस्ट किधर जाता दिख रहा है?जवाबः CJP 20 जुलाई को ‘संसद मार्च’ की तैयारी कर रही है। सोनम वांगचुक की तरफ से भी उनके सोशल मीडिया पर अपील की गई- ‘20 जुलाई को आजादी का दूसरा आंदोलन। भयमुक्त भारत, अन्यायमुक्त भारत। संसद मार्च को सफल बनाएं।’ CJP प्रवक्ता सौरभ दास ने कहा कि अस्पताल में जबरन डिटेंशन में रखे गए सोनम सर जंतर-मंतर पर वापस आकर इस संघर्ष को जारी रखना चाहते हैं। वहीं गीतांजलि ने कहा है कि अगर सोनम 20 जुलाई के मार्च में शामिल नहीं हो पाते हैं, तो मैं उनकी तरफ से मार्च को लीड करूंगी। हालांकि 20 जुलाई को संसद के मानसून सत्र के पहले दिन प्रदर्शनकारियों ने मार्च किया, तो पुलिस से टकराव होना तय है। दिल्ली पुलिस ने साफ कहा है कि CJP को संसद तक मार्च की अनुमति नहीं दी जाएगी, क्योंकि इससे दिल्ली के संवेदनशील इलाके में कानून-व्यवस्था बिगड़ सकती है। अगर प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षा घेरा तोड़ने की कोशिश की, तो उन्हें हिरासत में लिया जा सकता है। सवाल-3: क्या धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की कोई संभावना है?जवाबः पहले सुगबुगाहट थी कि मानसून सत्र से पहले कैबिनेट में बदलाव होगा। धर्मेंद्र प्रधान का मंत्रालय बदल सकता है या फिर बीजेपी संगठन में भेजा जा सकता है। हालांकि बीते कुछ दिनों से ऐसी कोई चर्चा नहीं है। 18 जुलाई को जंतर-मंतर पर पुलिस एक्शन हुआ, तो प्रधान के घर की सुरक्षा बढ़ा दी गई है। मोदी सरकार का एक अनकहा नियम है कि इसमें मंत्रियों के इस्तीफे नहीं होते। पिछले 12 साल में अकेले एमजे अकबर को #MeToo आरोप के चलते विदेश राज्यमंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा था। मोदी सरकार जानती है कि अगर किसी दबाव में कोई इस्तीफा हुआ, तो ये नजीर बन जाएगी और फिर बार-बार ऐसी मांगे होंगी। -------------------------------- ये खबर भी पढ़िए… क्या सोनम वांगचुक को जबरन खाना खिलाना गैरकानूनी, सुप्रीम कोर्ट के फैसले और एक्सपर्ट्स से समझिए; अब आंदोलन का क्या होगा जंतर-मंतर पर 21 दिन से भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक को शनिवार सुबह पुलिस उठा ले गई। अभिजीत दीपके ने कहा- ‘पुलिस ने सोनम सर को गालियां दीं और घसीटकर जबरन ले गए।’ पूरी खबर पढ़िए…
'ऑपरेशन सिंदूर' पर इमरान खान की बहन का सनसनीखेज दावा, इजरायल को मान्यता देने की शर्त पर रुकी थी जंग
भारत और पाकिस्तान के बीच हाल ही में हुए भीषण सैन्य टकराव और भारतीय सेना के गुप्त 'ऑपरेशन सिंदूर' (Operation Sindhoor) को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला अंतरराष्ट्रीय खुलासा सामने आया है। पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की सगी बहन नूरीन नियाजी (Noureen Niazi) ने एक इंटरव्यू के दौरान पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान और शहबाज शरीफ सरकार पर देश की संप्रभुता को गिरवी रखने का बेहद गंभीर आरोप लगाया है। नूरीन नियाजी का दावा है कि भारतीय वायुसेना और थलसेना के भीषण मिसाइल व ड्रोन हमलों के सामने पाकिस्तानी फौज पूरी तरह पस्त हो चुकी थी और भारत की आक्रामक सैन्य कार्रवाई को रुकवाने के लिए पाकिस्तान का शीर्ष नेतृत्व गिड़गिड़ाते हुए वैश्विक शक्तियों के पास पहुंचा था। भारत के खौफ से बौखलाया रावलपिंडी का सैन्य मुख्यालय युद्ध रोकने के एवज में इजरायल को एक संप्रभु देश के रूप में मान्यता देने तक के लिए राजी हो गया था।रावलपिंडी मुख्यालय में मची थी हड़बड़ी: पाकिस्तान का 'मारका-ए-हक' अभियान हुआ था पूरी तरह फेलनूरीन नियाजी ने पाकिस्तान के आंतरिक हालातों पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि भारतीय सेना के विनाशकारी हमलों के सामने पाकिस्तानी फौजी ताकतों की हालत बद से बदतर हो गई थी। पाकिस्तान ने अपनी तरफ से भारतीय जवाबी कार्रवाई को रोकने की हरसंभव कोशिश की, लेकिन वे हर मोर्चे पर नाकाम रहे। पाकिस्तानी सेना इस भारी दबाव को संभालने में पूरी तरह विफल साबित हुई। स्थिति यह थी कि रावलपिंडी स्थित पाकिस्तानी सैन्य मुख्यालय (GHQ) में पूरी तरह अफरा-तफरी और हड़बड़ी का माहौल था। जिस सैन्य अभियान को पाकिस्तानी जनरलों ने बड़े तामझाम के साथ ‘मारका-ए-हक’ (Maarka-e-Haq) के नाम से शुरू किया था, वह भारतीय मिसाइलों की गड़गड़ाहट के बीच ताश के पत्तों की तरह ढह गया। इसके बाद लाचार होकर पाकिस्तानी नेतृत्व ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) प्रशासन के सामने भारत के साथ किसी भी तरह समझौता कराने की गुहार लगाई।डोनाल्ड ट्रंप की वो सीक्रेट शर्त: इजरायल को मान्यता और अब्राहम अकोर्ड पर झुक गया था पाकिस्तानइमरान खान की बहन के मुताबिक, अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप शुरुआत में इस दक्षिण एशियाई सैन्य संघर्ष से दूरी बनाए हुए थे, लेकिन पाकिस्तान की लाचारी देखकर वे मध्यस्थता के लिए तैयार हुए, जिसके पीछे एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक शर्त थी। चूंकि भारत के इजरायल (Israel) के साथ बेहद मजबूत और रणनीतिक संबंध हैं, इसलिए ट्रंप प्रशासन ने पाकिस्तान के सामने इजरायल को आधिकारिक मान्यता देने और ऐतिहासिक 'अब्राहम अकोर्ड' (Abraham Accords) में शामिल होने की कड़ी शर्त रख दी। भारतीय हमलों की तीव्रता और तबाही से बुरी तरह डरे सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर (General Asim Munir) और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ इस शर्त को मानने के लिए तुरंत तैयार हो गए। दूसरी ओर, भारत ने भी दक्षिण एशिया में अपनी रणनीतिक बढ़त और शक्ति संतुलन (Power Balance) को मजबूत होते देख हमलों की गति को नियंत्रित किया।नूर खान एयरबेस की तबाही छिपाई: आवाम को जीत की झूठी कहानियां सुना रहे हैं आसिम मुनीर और शहबाजनूरीन नियाजी ने आरोप लगाया कि युद्ध विराम होते ही सेना प्रमुख आसिम मुनीर और पीएम शहबाज शरीफ (Shehbaz Sharif) ने अपनी गर्दन बचाने के लिए पाकिस्तानी जनता के बीच इसे अपनी 'झूठी जीत' बताकर प्रचारित करना शुरू कर दिया। सैन्य प्रशासन का प्लान था कि इस तथाकथित जीत के जश्न की आड़ में इजरायल को मान्यता देने के फैसले से देश के भीतर उठने वाले संभावित जन-आक्रोश और मजहबी गुस्से को आसानी से दबा दिया जाएगा। हालांकि, इससे पहले कि पाकिस्तान इस सीक्रेट डील को सार्वजनिक करता, पश्चिम एशिया में ईरान का नया मोर्चा खुल गया और यह मुद्दा ठंडे बस्ते में चला गया। खुफिया अधिकारियों के अनुसार, नूरीन नियाजी का यह बयान कोई साधारण राजनीतिक आरोप नहीं है, बल्कि यह परोक्ष रूप से भारतीय सेना के 'ऑपरेशन सिंदूर' की 100% सफलता की पुष्टि करता है।क्या था भारतीय सेना का 'ऑपरेशन सिंदूर': 9 आतंकी कैंपों को नेस्तनाबूद कर नूर खान एयरबेस को किया था टारगेटगौरलतब है कि जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए कायरतापूर्ण आतंकवादी हमले (Pahalgham Terror Attack) का करारा बदला लेने के लिए भारतीय सशस्त्र बलों ने 'ऑपरेशन सिंदूर' लॉन्च किया था। इस हाई-प्रिसिजन ऑपरेशन के तहत भारतीय वायुसेना और मिसाइल रेजिमेंट ने पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में सक्रिय करीब 9 प्रमुख लॉन्च पैड और आतंकवादी कैंपों को पूरी तरह नेस्तनाबूद कर दिया था। इसके जवाब में जब पाकिस्तान की एयरफोर्स ने भारतीय हवाई क्षेत्र का उल्लंघन करने की कोशिश की, तो भारत के आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम (Air Defense System) ने उनके मंसूबों को हवा में ही क्रैश कर दिया। भारत ने दोबारा आक्रामक रुख अपनाते हुए ड्रोन और गाइडेड मिसाइलों की झड़ी लगा दी, जिसने पाकिस्तान के मुख्य 'नूर खान एयरबेस' (Noor Khan Airbase) सहित कई सामरिक ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचाया, जिसके बाद पाकिस्तान पूरी तरह घुटनों पर आ गया था।
मार्को रुबियो बोले- 'खत्म हुआ जिहादी खतरा', भड़के भारत ने दिया मुंहतोड़ जवाब
आतंकवाद और वैश्विक सुरक्षा को लेकर अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डीसी में आयोजित एक बेहद संवेदनशील और हाई-प्रोफाइल मंत्रिस्तरीय बैठक में भारत सहित दुनिया के 67 देशों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इस महाबैठक में अमेरिका के नवनियुक्त विदेश मंत्री मार्को रुबियो (Marco Rubio) ने वैश्विक मंच से दुनिया भर के देशों को वामपंथी आतंकवाद और चरमपंथ के खिलाफ एकजुट होने का खुला आह्वान किया। हालांकि, बैठक के दौरान उस समय एक बड़ा राजनयिक विरोधाभास खड़ा हो गया, जब अमेरिकी विदेश मंत्री ने अपने संबोधन में यह विवादास्पद दावा कर दिया कि वैश्विक स्तर पर अब जिहादी या इस्लामिक आतंकवाद (Jihadist Terrorism) का खतरा काफी हद तक कम हो चुका है। अमेरिका के इस जमीनी हकीकत से परे बयान पर बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे अमेरिका में भारतीय राजदूत विनय क्वात्रा (Vinay Kwatra) ने तुरंत कड़ा रुख अख्तियार करते हुए नई दिल्ली की तीव्र आपत्ति दर्ज कराई।भारत का दोटूक जवाब: आतंकवाद के सभी रूपों के खिलाफ अपनानी होगी जीरो टॉलरेंस की नीतिअमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के इस एकतरफा बयान के तुरंत बाद भारतीय राजदूत विनय क्वात्रा ने आतंकवाद के प्रति भारत के पारंपरिक, कड़े और बेहद स्पष्ट रुख को वैश्विक मंच पर दोबारा दोहराया। राजदूत क्वात्रा ने भारत के भीतर वामपंथी उग्रवाद यानी नक्सलवाद (Naxalism) से निपटने के देश के दशकों पुराने और लंबे रणनीतिक अनुभवों को साझा किया, लेकिन साथ ही अमेरिका को आईना दिखाते हुए साफ कर दिया कि आतंकवाद को अच्छी या बुरी श्रेणियों में नहीं बांटा जा सकता। भारत ने दोटूक शब्दों में कहा कि दुनिया को आतंकवाद के सभी रूपों के खिलाफ बिना किसी भेदभाव के 'जीरो टॉलरेंस' (Zero Tolerance) की नीति अपनानी होगी। क्वात्रा ने विशेष रूप से भारत को अस्थिर करने वाले सीमा पार आतंकवाद (Cross-Border Terrorism) और अलगाववादी एजेंडे को हवा देने वाले आतंकी समूहों का मुद्दा प्रमुखता से उठाया, जो भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बने हुए हैं।67 देशों की बैठक में जूनियर डिप्लोमैट्स का पहुंचना: अमेरिका के एजेंडे से कई देश असहमतइस हाई-लेवल बैठक में भले ही कागजों पर 67 देशों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, लेकिन अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक कई प्रमुख देशों ने इस बैठक में अपने मुख्य मंत्रियों को भेजने के बजाय जूनियर राजनयिकों (Junior Diplomats) को भेजना ही बेहतर समझा। इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि अमेरिका ने इस अंतरराष्ट्रीय बैठक के पूरे एजेंडे को केवल वामपंथी उग्रवाद के खतरे पर ही केंद्रित कर रखा था। भारत सहित दुनिया के कई अन्य देश इस अमेरिकी आकलन से पूरी तरह असहमत थे कि इस्लामिक चरमपंथ की तुलना में केवल वामपंथी हिंसा को ही दुनिया का सबसे बड़ा खतरा मान लिया जाए। विदेश मंत्री एस. जयशंकर (S. Jaishankar) को भी इस बैठक के लिए व्यक्तिगत आमंत्रण मिला था, लेकिन उनके पहले से तय अन्य यात्राओं पर होने के कारण राजदूत विनय क्वात्रा ने इस मंच पर भारत का मोर्चा संभाला और देश का पक्ष मजबूती से रखा।मार्को रुबियो ने समझाया आधुनिक आतंकवाद का ग्लोबल नेटवर्क: सीमाओं के पार सहयोग ही एकमात्र रास्ताअमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने दुनिया भर में बढ़ रही वामपंथी हिंसा पर चिंता जताते हुए कहा कि अब इस हिंसक दौर का अंत होना बेहद जरूरी है। उन्होंने दावा किया कि व्यापार, आप्रवासन (Immigration) और ऊर्जा जैसे मुद्दों पर अमेरिका के साथ गंभीर वैचारिक मतभेद होने के बावजूद 60 से अधिक देशों के नेताओं, आतंकवाद-विरोधी विशेषज्ञों और कानून प्रवर्तन अधिकारियों का यहां जुटना यह साबित करता है कि वैश्विक स्तर पर इस खतरे को लेकर चिंताएं गहरी हैं। आतंकवाद के आधुनिक और बदलते स्वरूप की व्याख्या करते हुए रुबियो ने कहा, आज के दौर में धुर-वामपंथी आतंकवादी एक देश से अवैध रूप से फंड जुटाते हैं, दूसरे देश के सुरक्षित सर्वर पर अपनी गोपनीय बातचीत होस्ट करते हैं, तीसरे देश के कैंपों में हथियारों की ट्रेनिंग लेते हैं, चौथे देश से नए लड़ाकों की भर्ती करते हैं और इन सब के नेटवर्क से किसी पांचवें देश में बड़ा हमला अंजाम देते हैं। उन्होंने जोर दिया कि इस खतरनाक सीमा-पार नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए सभी देशों को अपनी कानूनी सीमाओं से बाहर निकलकर खुफिया सहयोग बढ़ाना होगा।अमेरिका और भारत की सोच में बड़ा विरोधाभास: पहलगाम हमले का जिक्र कर भारत ने चेतायावाशिंगटन की इस बैठक में भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता और असहमति का विषय मार्को रुबियो का वह आकलन रहा, जिसमें उन्होंने कहा कि अमेरिका और यूरोपीय देशों द्वारा अपनाई गई सफल काउंटर-टेररिज्म रणनीतियों के कारण वैश्विक जिहादी आतंकवाद का खतरा अब काफी हद तक सिमट कर रह गया है। अमेरिका की यह सोच भारत की सुरक्षा वास्तविकताओं के बिल्कुल विपरीत है। भारत के लिए सीमा पार से प्रायोजित जिहादी आतंकवाद आज भी उतना ही बड़ा, क्रूर और घातक खतरा बना हुआ है जितना एक दशक पहले था, जिसका सबसे ताजा और दुखद उदाहरण 2025 में जम्मू-कश्मीर में हुआ भीषण पहलगाम आतंकवादी हमला (Pahalgan Terror Attack) है। भारत ने स्पष्ट संदेश दिया कि जब तक पाकिस्तान जैसे देशों से मिलने वाले सीमा पार आतंकी बुनियादी ढांचे और फंडिंग को पूरी तरह नष्ट नहीं किया जाता, तब तक किसी भी वैश्विक आतंकवाद-विरोधी अभियान को सफल नहीं माना जा सकता।
रूस ने यूक्रेन को हिला दिया: बैलिस्टिक मिसाइलों से दहला कीव; जेलेंस्की बोले- सबसे बड़ा हमला
रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध (Russia Ukraine War) ने अब तक का सबसे खौफनाक और विनाशकारी रूप अख्तियार कर लिया है। शनिवार की देर रात रूसी सेना ने यूक्रेन की राजधानी कीव (Kyiv) पर चौतरफा और बेहद शक्तिशाली हवाई हमला बोलकर पूरे शहर को हिला कर रख दिया। रूस द्वारा एक साथ दागी गईं कई घातक बैलिस्टिक मिसाइलों और आधुनिक हथियारों के इस हमले में कम से कम एक नागरिक की दर्दनाक मौत हो गई, जबकि आठ अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हो गए हैं। स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार, आधी रात के बाद शुरू हुआ यह मिसाइल अटैक कई घंटों तक लगातार जारी रहा, जिससे राजधानी के पांच प्रमुख जिले आग की लपटों में घिर गए और कई आवासीय व औद्योगिक इमारतों को भारी नुकसान पहुंचा। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने इस हमले की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए इसे अब तक का सबसे बड़ा और क्रूर हमला करार दिया है।आधी रात को धमाकों से गूंजी राजधानी कीव: 5 जिलों में मची भयंकर तबाही और तख्तापलट जैसे हालातस्थानीय समयानुसार शनिवार रात करीब 1:30 बजे जब पूरा शहर सो रहा था, तभी आसमान से रूसी मिसाइलों ने कहर बरपाना शुरू कर दिया। राजधानी कीव की रक्षा प्रणाली एक्टिव होने से पहले ही शहर के पांच बड़े जिलों में बार-बार भीषण धमाकों की आवाजें गूंजती रहीं। यूक्रेन की आपातकालीन सेवा (Ukrainian Emergency Services) के मुताबिक, इस भारी बमबारी के कारण रिहायशी इलाकों, कॉर्पोरेट कार्यालयों, औद्योगिक प्रतिष्ठानों, एक छात्र छात्रावास (Hostel) और दर्जनों वाहनों में भीषण आग लग गई। स्वियातोशिन्स्की जिले में रेस्क्यू टीम ने जलते हुए एक निजी मकान की खिड़कियां तोड़कर चार लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला, जबकि शेवचेंकिव्स्की जिले में एक तीन मंजिला जलती हुई इमारत से दर्जनों लोगों का रेस्क्यू किया गया। वहीं सोलोमियांस्की, देस्नियांस्की और निप्रो जिलों में भी दमकल कर्मी सुबह तक आग बुझाने की जद्दोजहद में जुटे रहे, जहां एक गैर-आवासीय मलबे से एक व्यक्ति का शव बरामद हुआ है।पैट्रियॉट मिसाइलों की भारी कमी से जूझ रहा यूक्रेन: ट्रंप के नए ऐलान पर टिकीं जेलेंस्की की नजरेंयूक्रेन पर यह भीषणतम हवाई हमला ऐसे नाजुक समय में हुआ है जब कीव प्रशासन अपनी हवाई रक्षा प्रणाली (Air Defense System) की गंभीर किल्लत से जूझ रहा है। सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिकी पैट्रियॉट मिसाइलें (Patriot Missiles) ही रूसी बैलिस्टिक मिसाइलों को हवा में मार गिराने वाली सबसे सटीक और प्रभावी व्यवस्था मानी जाती हैं, लेकिन इस समय यूक्रेन के पास इनका स्टॉक लगभग खत्म होने की कगार पर है। हाल के हफ्तों में रूस ने यूक्रेन की इसी कमजोरी का फायदा उठाकर हमलों की रफ्तार कई गुना तेज कर दी है। इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने एक बड़ा बयान देते हुए कहा है कि वे यूक्रेन को पैट्रियॉट इंटरसेप्टर मिसाइलों के घरेलू उत्पादन का लाइसेंस देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं, जिससे भविष्य में कीव की सैन्य ताकत बढ़ सकती है। हालांकि, व्हाइट हाउस की ओर से इस फैसले को लागू करने की सटीक समयसीमा अभी स्पष्ट नहीं की गई है।रूस का भी बड़ा पलटवार: रात भर में मार गिराए 140 यूक्रेनी आत्मघाती ड्रोनक्रेमलिन और रूसी रक्षा मंत्रालय ने भी रविवार सुबह एक आधिकारिक बयान जारी कर यूक्रेन द्वारा किए गए बड़े ड्रोन हमलों को नाकाम करने का दावा किया है। रूसी सेना के मुताबिक, उनकी अत्याधुनिक एयर डिफेंस यूनिट्स ने शनिवार शाम 8 बजे से रविवार सुबह 8 बजे के बीच रूस की सीमा के भीतर घुसने का प्रयास कर रहे कुल 140 यूक्रेनी आत्मघाती ड्रोनों (Kamikaze Drones) को हवा में ही मार गिराया। रूस ने दावा किया है कि ये ड्रोन मुख्य रूप से बेलगोरोद, ब्रियांस्क, वोरोनिश, कलुगा, कुर्स्क, रोस्तोव, मॉस्को क्षेत्र, क्रास्नोडार क्राई के साथ-साथ रणनीतिक रूप से संवेदनशील क्रीमिया, अजोव सागर और काला सागर (Black Sea) के ऊपर नष्ट किए गए हैं। इस जवाबी कार्रवाई से साफ है कि दोनों देशों के बीच तनाव अब पूरी तरह अनियंत्रित हो चुका है और राष्ट्रपति जेलेंस्की ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से रूस पर आर्थिक व सैन्य दबाव बढ़ाने की वैश्विक अपील की है।
'मोजतबा खामेनेई ईरान में नहीं हैं', तो फिर कहां हैं? ताजा दावे को लेकर बढ़ी हलचल
मध्य पूर्व (Middle East) की राजनीति से इस समय की एक बेहद हैरान करने वाली और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा को हिला देने वाली खबर सामने आ रही है। सऊदी अरब के प्रतिष्ठित समाचार चैनल 'अल-हदथ' ने एक शीर्ष इजरायली सुरक्षा सूत्र के हवाले से एक बेहद सनसनीखेज दावा किया है कि ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई (Mojtaba Khamenei) इस समय अपने देश ईरान में मौजूद ही नहीं हैं। इस खुफिया रिपोर्ट ने पूरी दुनिया के रणनीतिकारों को चौंका दिया है। रिपोर्ट में यहां तक कहा गया है कि मोजतबा खामेनेई के नाम से इस समय जो भी आधिकारिक आदेश और संदेश जारी किए जा रहे हैं, वे सीधे उनकी ओर से नहीं आ रहे हैं, बल्कि इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के नए प्रमुख अहमद वहीदी खुद इन संदेशों को तैयार कर रहे हैं। हालांकि, ईरान सरकार की तरफ से इन दावों पर अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि या खंडन नहीं किया गया है।तेहरान के सत्ता गलियारों में भयानक अंदरूनी कलह: अमेरिका से सीक्रेट डील के बाद भड़के कट्टरपंथीइस खुफिया रिपोर्ट के सामने आने के बाद ईरान के भीतर चल रहे गहरे राजनीतिक मतभेद और सत्ता संघर्ष की परतें पूरी तरह खुल गई हैं, जो IRGC की आंतरिक एकता और देश की पूरी इस्लामिक शासन व्यवस्था के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बन गई हैं। इजरायली सूत्रों का दावा है कि अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में एक गोपनीय 14 सूत्रीय समझौता हुआ है, जिसके बाद से तेहरान में सत्ता के भीतर का गृहयुद्ध चरम पर पहुंच गया है। ईरान का सबसे शक्तिशाली कट्टरपंथी धड़ा मौजूदा सरकार पर परोक्ष रूप से तख्तापलट (Coup) करने का संगीन आरोप लगा रहा है। कट्टरपंथियों का साफ कहना है कि अमेरिका के साथ यह गुप्त समझौता करके मौजूदा सरकार ने देश के राष्ट्रीय हितों और सर्वोच्च नेता के मूल निर्देशों की सरेआम अनदेखी की है, जिससे देश की सेना और जनता में असंतोष की आग भड़क उठी है।विदेश मंत्री पर सरेआम पथराव: पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में फूटा गुस्साईरान की जनता और कट्टरपंथी गुटों में पनप रही यह भयानक नाराजगी उस समय दुनिया के सामने खुलकर आ गई, जब ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार का कार्यक्रम चल रहा था। वहां मौजूद आक्रोशित भीड़ ने ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची (Abbas Araghchi) पर सरेआम पथराव कर दिया। बता दें कि अब्बास अराघची ने ही अमेरिका के साथ पर्दे के पीछे चल रही युद्धविराम वार्ता में सबसे अहम और मुख्य भूमिका निभाई थी। अंतिम संस्कार के दौरान प्रदर्शनकारियों ने विदेश मंत्री को 'अमेरिका का दलाल' और देश से गद्दारी करने वाला बताते हुए उनके खिलाफ जमकर आक्रामक नारेबाजी की। रिपोर्ट में इस बात को रेखांकित किया गया है कि मोजतबा खामेनेई पिछले काफी लंबे समय से किसी भी सार्वजनिक मंच पर या कैमरे के सामने बिल्कुल नहीं देखे गए हैं।तीन नेताओं के हाथ में आई ईरान की कमान: मोजतबा खामेनेई की रहस्यमयी अनुपस्थिति का बड़ा खेलसर्वोच्च नेता की लगातार रहस्यमयी गैरमौजूदगी के बीच अब ईरान के सभी बड़े रणनीतिक और सैन्य फैसले तीन प्रमुख नेताओं की त्रिमूर्ति लेती हुई दिखाई दे रही है। इनमें संसद के पूर्व अध्यक्ष और मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बाघेर गालीबाफ (Mohammad Bagher Ghalibaf), नवनिर्वाचित राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन (Masoud Pezeshkian) और विदेश मंत्री अब्बास अराघची शामिल हैं। अमेरिकी रिसर्चर और ईरान मामलों के विशेषज्ञ अराश अजीजी के अनुसार, मोजतबा खामेनेई के न होने के कारण यही तीन नेता पूरी सरकार और देश का संचालन कर रहे हैं। इस नई व्यवस्था से ईरान का पुराना कट्टरपंथी गुट खुद को सत्ता से पूरी तरह अलग-थलग और बेदखल महसूस कर रहा है, यही वजह है कि वे गालीबाफ और राष्ट्रपति पेजेशकियन पर सत्ता पर अवैध कब्जा करने की गहरी साजिश रचने का खुला आरोप लगा रहे हैं।राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद को सुपर-पावर बनाने की तैयारी: कट्टरपंथी सांसदों ने खोला मोर्चाईरान की संसद के भीतर भी इस प्रशासनिक बदलाव को लेकर विद्रोह के सुर तेज हो गए हैं। ईरान के बेहद प्रभावशाली कट्टरपंथी सांसद महमूद नबावियान और कमरान गजनफारी जैसे बड़े नेताओं ने सार्वजनिक रूप से मंचों से यह आरोप लगाना शुरू कर दिया है कि वर्तमान सरकार जानबूझकर सर्वोच्च नेता और देश की चुनी हुई संसद की संवैधानिक भूमिका व शक्तियों को कमतर कर रही है। उनका दावा है कि सरकार एक सुनियोजित राजनीतिक साजिश के तहत सारी विधायी और सैन्य शक्तियां 'राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद' को सौंपना चाहती है ताकि अमेरिका के साथ हुए समझौतों को बिना किसी रुकावट के देश पर थोपा जा सके। इस आंतरिक टकराव ने ईरान को एक ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां आने वाले दिनों में किसी बड़े आंतरिक सैन्य विद्रोह से इनकार नहीं किया जा सकता।
अमेरिकी कार्रवाई उस हमले के बाद तेज हुई, जिसमें जॉर्डन स्थित अमेरिकी सैन्य बेस को निशाना बनाया गया था। इस हमले में दो अमेरिकी सैनिकों की मौत की पुष्टि की गई है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, यह युद्ध शुरू होने के बाद ईरान की ओर से की गई सीधी कार्रवाई में अमेरिकी सैनिकों की मौत का एक बड़ा मामला है।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, हाल के दिनों में सरकार और कट्टरपंथी गुटों के बीच मतभेद सार्वजनिक रूप से सामने आने लगे हैं, जिससे ईरान की आंतरिक राजनीति में नई उथल-पुथल देखने को मिल रही है।
ईरान के हमले में पहली बार दो अमेरिकी सैनिकों की मौत हो गई। इसके बाद अमेरिकी सेना ने शनिवार को कहा कि उसने सैनिकों के मारे जाने के जवाब में ईरान के खिलाफ नए हवाई हमले शुरू कर दिए हैं।
वाशिंगटन/तेहरान/लखनऊ। मध्य पूर्व (Middle East) में जारी अमेरिका और ईरान का युद्ध अब अपने सबसे खौफनाक और विनाशकारी मोड़ पर पहुंच गया है। जॉर्डन में स्थित एक अमेरिकी सैन्य बेस पर ईरान द्वारा किए गए सीधे ड्रोन और मिसाइल हमले में दो अमेरिकी सैनिकों की मौत हो गई है। युद्ध के शुरुआती दिनों के बाद यह पहला मौका है जब ईरान की सीधी गोलीबारी में अमेरिकी जवानों की जान गई है। इस घटना से बौखलाए अमेरिका ने तेहरान के खिलाफ अपनी सैन्य कार्रवाई को कई गुना तेज कर दिया है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने आधिकारिक बयान जारी कर बताया कि उसने ईरान के कुख्यात 'रिवोल्यूशनरी गार्ड्स' (IRGC) को सजा देने के लिए होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) के पास सिरिक के निकट तड़के 1:30 बजे भीषण हवाई हमले किए हैं। इस कार्रवाई का मुख्य उद्देश्य वैश्विक तेल आपूर्ति के सबसे बड़े मार्ग होर्मुज स्ट्रेट को ब्लॉक करने की ईरान की क्षमता को पूरी तरह ध्वस्त करना है।कुवैत में तबाही: डिसेलिनेशन प्लांट पर हमला, पीने के पानी का संकटअमेरिका के इन हमलों के जवाब में ईरान और उसके सहयोगी विद्रोही गुटों (Axis of Resistance) ने खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी संपत्तियों और बुनियादी ढांचों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। शनिवार को ईरान ने रेगिस्तानी देश कुवैत पर भीषण मिसाइल हमला किया, जिससे वहां के एक प्रमुख ऑयल फैसिलिटी सेंटर और 'वॉटर डिसेलिनेशन प्लांट' (खारे पानी को मीठा बनाने वाला संयंत्र) को भारी नुकसान पहुंचा है। दो दिनों के भीतर कुवैत के पानी के प्लांट पर यह दूसरा बड़ा हमला है। कुवैत अपनी जरूरत का 90% पीने का पानी इसी तकनीक से हासिल करता है। इस हमले के बाद प्लांट में भीषण आग लग गई और कई बिजली उत्पादन इकाइयां ठप हो गईं, जिससे पूरे कुवैत में पीने के पानी और बिजली का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। मिसाइल हमलों के खतरे को देखते हुए कुवैत ने आपातकाल लागू कर कुछ समय के लिए अपना हवाई क्षेत्र (Airspace) पूरी तरह बंद कर दिया था।इराक और जॉर्डन में भी मिसाइल और ड्रोन युद्ध, बहरीन-सऊदी में बजे सायरनइस युद्ध की लपटें अब पूरे मध्य पूर्व में फैल चुकी हैं। इराक के अर्ध-स्वायत्त उत्तरी कुर्द क्षेत्र की राजधानी इरबिल में रविवार तड़के आसमान धमाकों से गूंज उठा। यहां कुर्दिस्तान फ्रीडम पार्टी के बेस पर हुए ड्रोन हमले में 8 सदस्य गंभीर रूप से घायल हो गए, जिसके बाद इराकी एयर डिफेंस ने कई हमलावर ड्रोनों को मार गिराया। वहीं पड़ोसी देश जॉर्डन ने भी मुस्तैदी दिखाते हुए अपनी सीमा में घुस रही कई ईरानी मिसाइलों को हवा में ही नष्ट कर दिया। सऊदी अरब और बहरीन में दिन भर हवाई हमलों के सायरन बजते रहे, जिससे वहां के नागरिकों में दहशत का माहौल है। खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के महासचिव जासेम मोहम्मद अल-बुदैवी ने ईरान की इस हरकत की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए उसे आम नागरिकों और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने के लिए 'युद्ध अपराध' (War Crimes) का दोषी ठहराया है।खामेनेई की 'कभी न भूलने वाले सबक' की चेतावनी, अंतरिम डील टूटीअमेरिकी सेना द्वारा अपने जवानों की मौत की पुष्टि करने से ठीक पहले ईरान के सर्वोच्च नेता (Supreme Leader) अयातुल्ला खामेनेई ने अमेरिका को खुली चेतावनी देते हुए कहा कि यदि इस्लामिक रिपब्लिक पर हमले नहीं रोके गए, तो वाशिंगटन को 'कभी न भूलने वाले सबक' सिखाए जाएंगे। ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने सरकारी टीवी पर घोषणा की है कि अमेरिका द्वारा प्रतिबद्धताओं के उल्लंघन के बाद तेहरान ने एक महीने पहले हुई उस 'अंतरिम डील' को पूरी तरह से सस्पेंड कर दिया है, जिसका मकसद युद्ध को स्थायी रूप से रोकना था। युद्ध की शुरुआत से अब तक कुल 16 अमेरिकी सैनिक मारे जा चुके हैं और 430 से अधिक घायल हुए हैं। बढ़ते खतरे को देखते हुए अमेरिका ने अपने नागरिकों के लिए ग्लोबल ट्रैवल अलर्ट जारी कर दिया है और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर एक बार फिर मंदी के बादल मंडराने लगे हैं।
तेहरान/लखनऊ। अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे भीषण सैन्य संघर्ष के बीच अब ईरान के भीतर एक बहुत बड़ा आंतरिक राजनीतिक तूफान खड़ा हो गया है। वैश्विक मीडिया संस्थान सीएनएन (CNN) की एक ताजा और बेहद चौंकाने वाली रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के भीतर सत्ता पर कब्जे को लेकर गृहयुद्ध और तख्तापलट (Coup) जैसी स्थितियां बनती दिखाई दे रही हैं। ईरान के शक्तिशाली कट्टरपंथी गुटों ने अपनी ही सरकार पर बेहद संगीन आरोप लगाते हुए कहा है कि अमेरिका के साथ बातचीत और समझौता करने वाले उदारवादी नेता इस्लामिक रिपब्लिक के खिलाफ एक 'सॉफ्ट तख्तापलट' (Soft Coup) की साजिश रच रहे हैं। कट्टरपंथियों का दावा है कि नए सुप्रीम लीडर को पूरी तरह दरकिनार कर देश की कमान कुछ चुनिंदा नेताओं ने अपने हाथों में ले ली है।खामेनेई के अंतिम संस्कार में बवाल: विदेश मंत्री पर पथराव, लगे गद्दार के नारेईरान के भीतर सुलग रहा यह आंतरिक असंतोष उस समय सार्वजनिक रूप से हिंसक रूप में सामने आ गया, जब पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की अंतिम यात्रा निकाली जा रही थी। गौरतलब है कि खामेनेई की मौत 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजराइल द्वारा किए गए शुरुआती हवाई हमलों में हो गई थी। अंतिम संस्कार के दौरान जब ईरान के वर्तमान राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन खामेनेई के ताबूत के साथ चल रहे थे, तब कट्टरपंथी समर्थकों ने 'समझौता करने वालों की मौत हो' के उग्र नारे लगाए। हद तो तब हो गई जब भीड़ ने विदेश मंत्री अब्बास अराघची पर पत्थरों से हमला कर दिया और उन्हें 'देश बेचने वाला गद्दार' करार दिया। यही नहीं, ईरानी शासन से जुड़े एक प्रमुख धार्मिक गायक मोहम्मद अली बख्शी ने एक कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति पजशकियान को सीधे तौर पर धमकी देते हुए कहा, राष्ट्रपति महोदय, अगर सुप्रीम लीडर की शर्तें पूरी नहीं हुईं, तो हमारी तलवार होगी और आपका गला होगा। हम आपकी जिंदगी को जहन्नुम बना देंगे।कट्टरपंथी गुटों के गंभीर आरोप: मुज्तबा खामेनेई के नाम पर खेल?ईरान के इन कट्टरपंथी गुटों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि सरकार को अमेरिका से बदला लेना चाहिए था, लेकिन उसने देश के स्वाभिमान को ताक पर रखकर वाशिंगटन से गुप्त समझौता कर लिया। उनका आरोप है कि यह समझौता नए संभावित सुप्रीम लीडर और दिवंगत खामेनेई के बेटे मुज्तबा खामेनेई (Mojtaba Khamenei) की इच्छा के बिल्कुल खिलाफ जाकर किया गया है। रहस्यमयी बात यह है कि मुज्तबा खामेनेई अब तक सार्वजनिक रूप से जनता के सामने नहीं आए हैं, न ही उन्होंने देश को संबोधित किया है। इसके बावजूद, राष्ट्रपति और उनकी टीम उनके नाम का इस्तेमाल कर बड़े फैसले ले रही है। कट्टरपंथियों ने सरकार पर संसद को जबरन निलंबित करने, सुप्रीम लीडर के पुराने निर्देशों की धज्जियां उड़ाने और रात में होने वाली सरकार विरोधी रैलियों को बलपूर्वक रोकने का भी आरोप मढ़ा है। ईरान के सांसद महमूद नबावियन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर साफ लिखा है, ईरान की जनता सावधान रहे, क्या देश में तख्तापलट होने वाला है? हम खामेनेई के खून का बदला लेने और तख्तापलट के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार हैं।क्यों पैदा हुआ यह नेतृत्व का संकट? क्या कहते हैं एक्सपर्ट्सईरान मामलों के अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ और प्रसिद्ध पुस्तक ‘What Iranians Want’ के लेखक अराश अजीजी ने सीएनएन से बातचीत में इस पूरे विवाद की इनसाइड स्टोरी समझाई है। उनके मुताबिक, मुज्तबा खामेनेई के पूरी तरह से पर्दे के पीछे रहने के कारण ईरान में एक पावर वैक्यूम (नेतृत्व शून्यता) पैदा हो गया है। इसके चलते संसद के स्पीकर और मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बघेर गालिबाफ, राष्ट्रपति पेजेशकियन और विदेश मंत्री अराघची ही इस समय ईरानी सरकार के मुख्य चेहरे बन चुके हैं। चूंकि कट्टरपंथी तत्वों की पहुंच मुज्तबा तक सीधे नहीं हो पा रही है, इसलिए वे इन तीन शीर्ष नेताओं को विलेन मान रहे हैं और उन पर अवैध तरीके से सत्ता हथियाने की साजिश का आरोप लगा रहे हैं। इस भयंकर अंदरूनी राजनीतिक खींचतान के बीच सीमा पर अमेरिका और ईरान की सेनाओं के बीच मिसाइल और ड्रोन हमले भी बदस्तूर जारी हैं, जिससे ईरान दोहरे संकट में फंस गया है।
जॉर्डन में ईरानी हमला: दो अमेरिकी सैनिक ढेर, खाड़ी में दहशत
पश्चिम एशिया में चार महीने से जारी संघर्ष और भीषण होता जा रहा है। अमेरिकी सेना ने शनिवार को पुष्टि की कि जॉर्डन में ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन हमलों का मुकाबला करते हुए उनके दो सैनिक मारे गए हैं
दिल्ली की उमस भरी रात, वक्त करीब 3 बजे। जंतर-मंतर के आसपास पुलिस के 30 से 35 जवान जुट गए। साढ़े तीन घंटे इंतजार किया। फिर तेजी से उस जगह पहुंचे, जहां बीते 21 दिन से सोनम वांगचुक भूख हड़ताल पर बैठे थे। टी-शर्ट और ट्रैक पैंट पहने पुलिसवालों ने सोनम को उठाया और कुछ ही मिनटों में सफदरजंग हॉस्पिटल के लिए निकल गए। 18 जुलाई की सुबह हुए इस एक्शन की तैयारी रातभर चली। जंतर-मंतर पर कार्रवाई से करीब 16 घंटे पहले ही गृह मंत्रालय ने 1994 बैच के IPS अधिकारी अनुराग कुमार को दिल्ली का नया पुलिस कमिश्नर बनाया था। सोर्स बताते हैं कि पद संभालते ही उन्होंने रात में मीटिंग की और सुबह सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से हटा दिया गया। ये सब कैसे हुआ सोशल मीडिया से पॉपुलर हुई कॉकरोच जनता पार्टी ने पहली बार 6 जून से जंतर-मंतर पर प्रोटेस्ट किया था। अमेरिका से आए पार्टी के फाउंडर अभिजीत दीपके सीधे धरना देने पहुंचे। धरना चलता रहा, लेकिन लोगों से खास रिस्पॉन्स नहीं मिला। सोनम वांगचुक ने धरने में जान भरनी शुरू की। सोनम 28 जून को भूख हड़ताल पर बैठ गए। कुछ भीड़ बढ़ी। सेलिब्रिटी साथ आने लगे। सोशल मीडिया पर हाई प्रोफाइल पोस्ट और ट्वीट हुए। आम आदमी पार्टी से अरविंद केजरीवाल, समाजवादी पार्टी से डिंपल यादव और कांग्रेस से पवन खेड़ा के अलावा एक्टर नसीरुद्दीन शाह और कुणाल कामरा जैसे सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर भी पहुंचे। केंद्र सरकार के एक मंत्री बताते हैं, ‘इसके बाद ही पहली बार सरकार में प्रोटेस्ट की चर्चा हुई। कहा गया कि नजर रखें। 16 जुलाई को हाईकोर्ट ने आदेश दे दिया कि वांगचुक की सेहत का ध्यान रखा जाए। मैं साफ कहता हूं आदेश कोर्ट का था।’ इसी दौरान इंटेलिजेंस ब्यूरो के स्पेशल डायरेक्टर रहे अनुराग कुमार दिल्ली के पुलिस कमिश्नर बनाए गए। पुलिस के सोर्स बताते हैं कि गृह मंत्रालय ने उन्हें आंदोलन पर नजर रखने के लिए कहा था। उन्होंने आते ही लोकल इंटेलिजेंस यूनिट से आंदोलन की डिटेल ली। शाम को अफसरों के साथ मीटिंग की। इसमें सोनम वांगचुक को हटाने के बारे में कोई बात नहीं हुई। रात में तय हुआ कि उन्हें हटाना है। कुछ देर बाद ही हटाने का आदेश भी दे दिया गया। वांगचुक को हटाने की बड़ी वजह कॉकरोच जनता पार्टी का 20 जुलाई को होने वाला संसद मार्च भी है। 20 जुलाई से ही मानसून सत्र शुरू हो रहा है। दिल्ली पुलिस की दलील है कि इस दिन जंतर-मंतर के आसपास हाई प्रोफाइल मूवमेंट होगा, इसलिए मार्च की इजाजत नहीं दी जाएगी। कॉकरोच जनता पार्टी की संसद चलो मार्च की तैयारी दिल्ली पुलिस बोली- अब तक परमिशन नहीं मांगी, देंगे भी नहीं नई दिल्ली के DCP सचिन शर्मा ने दैनिक भास्कर को बताया- अब तक मार्च की परमिशन नहीं मांगी गई है। अगर CJP प्रदर्शन करती है तो हम लॉ एंड ऑर्डर बनाए रखने के लिए तैयार हैं। वहीं, पुलिस सूत्रों के मुताबिक, अगर CJP मार्च के लिए परमिशन मांगती भी है, तो मानसून सत्र के दौरान सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस इजाजत नहीं देगी। संसद मार्च में शामिल होने पर प्रदर्शन में पहुंचे लोग क्या बोले 59 साल के रविंद्र चतुर्वेदी प्रोटेस्ट में शामिल होने ग्वालियर से दिल्ली आए हैं। वे संसद मार्च के लिए अपने जानने वालों को तैयार कर रहे हैं। रविंद्र कहते हैं, ‘प्रोटेस्ट जब तक चल रहा है, मैं भी तब तक डटा रहूंगा। संसद मार्च में भी शामिल होऊंगा। सरकार रोजगार और शिक्षा के मोर्चे पर फेल रही है और लोगों के बीच नफरत बढ़ा रही है।’ नोएडा की रहने वाली तान्या शर्मा पहली बार जंतर-मंतर आई हैं। वे सोनम वांगचुक के बारे में सुनकर पहुंची थीं। उनका मानना है कि सरकार को उत्तरदायी बनाने की जरूरत है और सोनम इसी की लड़ाई लड़ रहे थे। अब हमारी बारी है कि हम सड़कों पर उतरें। ये लेफ्ट बनाम राइट की बात नहीं है। CJP का दावा: वांगचुक को उठाए जाने से प्रदर्शन 10 गुना बड़ा होगा’CJP प्रवक्ता आशुतोष कहते हैं, ‘सोनम वांगचुक को जबरदस्ती उठाए जाने की वजह से प्रदर्शन 10 गुना बड़ा हो गया है। देश में जगह-जगह प्रदर्शन हो रहे हैं। संसद मार्च के लिए पूरे देश से लोग दिल्ली पहुंच रहे हैं। सोनम को उठाना तानाशाही सरकार की अब तक की सबसे बड़ी गलती है। दिल्ली पुलिस खुद गुंडों की तरह सोनम को उठाकर ले गई।’ ‘अभिजीत दीपके का सुबह फ्रेश होने का रुटीन फिक्स था। वे रोज आधे घंटे के लिए जाते हैं। पुलिस ने इसी वक्त का फायदा उठाया। अभिजीत के साथ भी मारपीट और धक्का मुक्की की गई। अब हमें सोनम वांगुचक से मिलने नहीं दिया जा रहा है। सिर्फ उनकी पत्नी अंदर उनके साथ है।' 'सोनम ने बताया है कि उनकी भूख हड़ताल जारी रहेगी, उन्हें जबरदस्ती खाना खिलाने की कोशिश न की जाए। उन्होेंने हमें भरोसा दिलाया है कि जैसे ही पुलिस छोड़ेगी, वे तुरंत जंतर-मंतर पर वापस आएंगे।’ वहीं विजेता दहिया कहते हैं, ‘पुलिस की छवि काफी खराब है। उन्होंने गुंडों की तरह व्यवहार किया है। सरकार प्रदर्शन को तितर-बितर करने की कोशिश कर रही है, इसलिए अलग-अलग हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। अभिजीत दीपके पर सोनम को हॉस्पिटल ले जाने के बाद स्याही फेंकी गई। सरकार चाहे कुछ कर ले, प्रदर्शन लगातार जारी रहेगा।’ ‘संसद मार्च के बाद भी प्रदर्शन जारी रहेगा। इसकी दशा और दिशा हम बैठक करके तय करेंगे। CJP में सभी वॉलंटियर देख रहे हैं और हम व्यवस्थित रूप से काम कर रहे हैं। एक कोऑर्डिनेटर वॉलंटियर का मैनेजमेंट देख रहा है। प्रोटेस्ट में बच्चे, महिलाएं, युवा, बुजुर्ग सभी वॉलंटियर के तौर पर जुड़ना चाह रहे हैं। सोनम वांगचुक पर पुलिस एक्शन के बाद जुड़ने की चाहत रखने वाले लोगों की तादाद बढ़ी है।’ CJP से जुड़ीं रत्ना सिंह कहती हैं, ‘हमारी सोनम वांगचुक से बात हुई है। वे पूरी तरह स्वस्थ हैं और वापस प्रोटेस्ट में शामिल होना चाहते हैं। 20 तारीख के लिए हम आपस में बैठक करने वाले हैं। उसमें सबकी सलाह लेकर फैसला लिया जाएगा और विस्तार से योजना बनाएंगे। हम दिल्ली पुलिस से निवेदन करते हैं कि वो 20 जुलाई के मार्च में हमें सुरक्षा दें, न कि आज की तरह गुंडागर्दी करें।’ …………………………… CJP के प्रोटेस्ट से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए… सोनम वांगचुक का अस्पताल में दवा लेने से इनकार, ड्रिप चढ़ाने से मना किया दिल्ली के जंतर-मंतर पर 21 दिन से भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक को शनिवार सुबह पुलिस उठाकर सफदरजंग अस्पताल ले गई। अस्पताल प्रशासन ने बुलेटिन जारी करके बताया कि वांगचुक को डिहाइड्रेशन हुआ है, लेकिन उन्होंने दवा या ड्रिप लगवाने से इनकार कर दिया है। पढ़ें पूरी खबर…
भास्कर सीरीज ‘स्पाई फाइल्स’ में आप पढ़ रहे हैं- ‘जासूस माता हारी’ की कहानी। पार्ट-1 में आपने पढ़ा- 15 अक्टूबर 1917 को फ्रांसिसी सैनिकों ने एक साथ 12 गोलियां मारकर एक महिला को मौत की सजा दी। मौत से पहले महिला ने खास श्रृंगार किया। चिट्ठियां लिखीं- बेटी और प्रेमी को। फिर गोली मारने जा रहे सैनिकों को फ्लाइंग किस का इशारा किया। ये महिला थी- माता हारी। दुनिया की वो खूबसूरत जासूस, जो डांस करते-करते निर्वस्त्र हो जाती थी। यूरोप के तमाम फौजी अफसर, सेना के जनरल और नेता इस महिला के दीवाने थे। इसके एक-एक शो का खर्च करोड़ों में था। माता हारी की जासूसी से कैसे फ्रांस के 80 हजार सैनिक मारे गए…जानते हैं पार्ट-2 में… 1905 की एक शाम। फ्रांस की राजधानी पेरिस में एक आलीशान बंगला। हॉल में हल्की रोशनी, हवा में घुली इत्र और शराब की खुशबू। संगीत बज रहा था। माता हारी नृत्य कर रही थी। जैसे-जैसे धुन चढ़ती जा रही थी, वो नाचते हुए एक-एक करके अपने कपड़े उतारती जा रही थी। वहां मौजूद लोग अपनी सांसें रोके ये सब देख रहे थे। डांस के आखिरी क्लाइमेक्स पर पहुंचकर माता हारी ने सारे कपड़े उतार दिए। शरीर पर बस कुछ गहने बचे थे। अब वो थिरकते-थिरकते मंच पर रखी शिव की एक मूर्ति के पास पहुंची। हाथ जोड़े और अपनी एड़ियों के बल बैठ गई। तभी हॉल का दरवाजा खुला। शहर के चार-पांच रसूखदार लोग अंदर दाखिल हुए। उनके चेहरे पर गुस्सा था। एक ने चीखते हुए कहा- ‘बंद करो ये अपना फूहड़ डांस। तुम अश्लीलता फैला रही हो।’ तभी दूसरे शख्स ने कहा- ‘इसे पुलिस के हवाले कर दो।’ माता हारी धबरा गई। उसने फर्श पर गिरा रेशमी कपड़ा उठाया और खुद को ढंकते हुए धीरे से बोली- ‘रुक जाइए, प्लीज। मैं कोई अश्लीलता नहीं फैला रही हूं।’ उस शख्स ने गुस्से में कहा- ‘इस तरह सरेआम कपड़े उतारना अश्लीलता नहीं है, तो क्या है?’ माता हारी धीरे से बोली- ‘यह पवित्र आर्ट है। ईश्वर को खुश करने की कला। मैं खुद को उन्हें समर्पित कर रही हूं।’ वो आदमी जोर से चिल्लाया- ‘नाटक बंद करो। हमने पूरे पेरिस में ऐसा नृत्य नहीं देखा।’ माता हारी फर्श पर घुटनों के बल बैठ गई। हाथ जोड़ लिए। फिर बोली- ‘मेरी छोटी सी कहानी सुन लीजिए, फिर जो चाहे सजा दे दीजिएगा।’ लोग कानाफूसी करने लगे। तभी एक अधेड़ बोल पड़ा- ‘इसकी कहानी सुनने में क्या हर्ज है? सुनाओ।’ माता हारी ने आंसू पोंछे। गहरी सांस लेकर बताना शुरू किया- ‘मेरा जन्म भारत के एक दक्षिणी राज्य में हुआ था। मां एक मंदिर में देवदासी थी। बचपन में उनकी शादी मंदिर के देवता कंडास्वामी से करा दी गई। वो भगवान की सेवा करती और उनके सामने यही नृत्य करती थी। जब वो 14 साल की थी, तब मेरा जन्म हुआ, लेकिन मैं मां का मुंह भी नहीं देख पाई। उसी रोज उनकी मौत हो गई। पुजारियों ने मुझे गोद ले लिया। उन्होंने ही मुझे पाला और मां वाला पवित्र नृत्य सिखाया। 13 साल की उम्र में मैंने पहली बार कंडास्वामी के सामने अपने वस्त्र उतारकर नृत्य किया। उसके बाद से यह मेरी दिनचर्या बन गया।’ अब माता हारी चुपचाप खड़ी हो गई। हॉल में सन्नाटा था। तभी एक शख्स ने पूछा- ‘लेकिन तुम भारत से पेरिस कैसे आ गई?’ माता हारी ने उदासीभर मन से कहा- 'वो मंदिर दुनिया में मशहूर है। उस रोज एक ब्रिटिश अफसर आया था। मंदिर में भीड़ नहीं थी। वह मंदिर के बारे में जानना चाहता था। पुजारी ने भी सहजता से उसे गर्भगृह के पास जाने की इजाजत दे दी। उस वक्त मैं श्रृंगार करके भगवान के सामने नृत्य में कर रही थी। वह चुपचाप आया और एक कोने में बैठकर मुझे देखने लगा। नृत्य खत्म होने के बाद अपने कपड़े समेटकर जैसे ही मैं आगे बढ़ी, वह सामने खड़ा था। उसने कहा- ‘तुम अद्भुत हो। आजतक मैंने ऐसा नृत्य नहीं देखा।’ मैंने उससे कुछ कहा नहीं और अपने कमरे की तरफ चली गई। उस दिन के बाद वह लगातार एक हफ्ते तक आता रहा। धीरे-धीरे हमारे बीच बातें होने लगीं... फिर हमें प्यार हो गया। एक रात... वह मौका पाकर मुझे उस मंदिर से भगा ले गया। हमने शादी कर ली।’ अब माता हारी की आंखों में आंसू थे। वो थोड़ा रुकी और फिर बोलना शुरू किया- ‘मेरी किस्मत खराब थी। शादी के कुछ साल बाद ही वो आदमी मुझे छोड़कर कहीं और चला गया। मैंने कुछ महीने उसका इंतजार किया, लेकिन वो नहीं लौटा। मेरे पास जिंदा रहने का कोई और जरिया नहीं था। तब सोचा... क्यों न मैं अपनी उसी पवित्र कला को दोबारा शुरू करूं।’ माता हारी की कहानी सुनने के बाद वो रसूखदार शख्स आगे बढ़ा। माता हारी को सहारा देकर उठाया और कहा- ‘हम सब आपके साथ हैं। आप इस कला को जारी रखिए।’ यहां से माता हारी का सफर चल पड़ा। वो इतनी मशहूर हो गई कि महंगी सिगरेट के पैकेट और शराब की बोतलों पर उसकी फोटो और नाम छपने लगा। नीदरलैंड्स के फ्राइज म्यूजियम की रिपोर्ट के मुताबिक, उस दौर में माता हारी एक शो के लिए आज के हिसाब से करीब चालीस लाख रुपए लेती थी। एक फ्रांसीसी बैंकर ने तो उसके लिए आलीशान महल और बड़ा विला किराए पर ले रखा था। उसके एक प्रेमी ने विदाई के तोहफे के तौर पर इतनी बड़ी रकम दी, जो आज के 9 करोड़ रुपए के बराबर है। हालांकि, माता हारी पैसे बचा नहीं पाती थी। वह जितना कमाती, उतना ही अपनी विलासिता पर उड़ा भी देती थी। 1907 की बात है। माता हारी जर्मनी की राजधानी बर्लिन में शो कर रही थी। हॉल खचाखच भरा था। तभी बर्लिन पुलिस चीफ हेर वॉन जागो रिवॉल्वर लिए अंदर दाखिल हुए। उनके साथ चार और पुलिस वाले थे। पुलिस चीफ सीधे मंच पर चढ़े। संगीत रुक गया। माता हारी के कदम पीछे की ओर हटने लगे। पुलिस चीफ ने चिल्लाते हुए कहा- ‘जर्मनी में इस तरह के लिबास में डांस करना अपराध है। मुझे तुम्हारे कपड़ों की जांच करनी है।’ पुलिस चीफ के इशारे पर सिपाहियों ने माता हारी को घेर लिया। वे उसे मंच के कोने में बने एक बंद कमरे में ले गए। दरवाजा बंद होते ही माता हारी ने वही पुरानी देवदासी वाली कहानी दोहरानी शुरू कर दी। पुलिस चीफ ने उसे डांटते हुए कहा- ‘बनावटी कहानी मत सुनाओ। तुम्हारा असली ठिकाना जेल है। वहीं पर अपनी परफॉर्मेंस दिखाना।’ माता हारी ने पुलिस चीफ की तरफ देखा। धीरे से उनका हाथ पकड़ा और कान में कुछ फुसफुसाई। पुलिस चीफ मुस्कुराने लगे। उन्होंने पुलिस से कहा- ‘छोड़ दो इसे। सबसे सामने गिरफ्तार करना ठीक नहीं है। हम फिर आएंगे।’ कुछ दिन बाद माता हारी को बर्लिन के सबसे महंगे इलाके में एक अपार्टमेंट मिल गया। इसकी देखरेख, नौकरों की तनख्वाह और रखरखाव का पूरा खर्च जर्मन सरकार का खुफिया विभाग उठाता था। वहां काम करने वाले नौकर जर्मन पुलिस के जासूस थे। एक रोज एक विदेशी जनरल बर्लिन पहुंचा। किसी ने उसे माता हारी के बारे में बताया, तो वो सीधे मिलने पहुंच गया। रात के करीब 10 बज रहे थे। जनरल नशे में धुत था। माता हारी उसका हाथ पकड़कर बेडरूम में ले गई। अपने हाथों से जाम पिलाने लगी। इधर, दो नौकर पर्दे के पीछे छिपकर सबकुछ देख रहे थे। विदेशी जनरल ने लड़खड़ाती जुबान में कहा- ‘तुम सच में एक अप्सरा हो। तुम्हारे लिए मैं सबकुछ दांव पर लगा सकता हूं।’ माता हारी ने धीमे से कहा- ‘जनरल साहब। आप जैसे मर्द जब मोर्चे पर होते हैं, तो हम औरतें सलामती की दुआ करती हैं। वैसे, सुना है आपकी फौज अगले महीने उत्तर की तरफ कूच कर रही है? आप मुझे छोड़ कर चले जाएंगे?’ नशे में डूबे जनरल ने कहा- ‘अरे नहीं… उत्तर तो बस दिखावा है। हमारी असली फौज तो पूरब की तरफ कूच करने वाली है।’ कमरे में लगा सीक्रेट कैमरा, जनरल की हरकतों को कैद कर रहा था। पर्दे के पीछे खड़े नौकर डायरी में उसकी बातें नोट कर रहे थे। माता हारी, जनरल के और करीब आ गई। ग्लास में शराब भरते हुए बोली- ‘तो फिर एक जाम और हो जाए…’ जनरल पहले ही बहुत पी चुका था। एक-दो घूंट बाद वह बेसुध पड़ गया। माता हारी ने उसकी जेब से दस्तावेज निकाले, डायरी पर कुछ नोट किया और फिर सबकुछ जस का तस रखकर वहां से चली गई। धीरे-धीरे माता हारी के लिए यह सब रोज की बात हो गई। जर्मन पुलिस उसके जरिए बड़े-बड़े रसूखदारों और विदेशी मेहमानों की जासूसी करवाने लगी। माता हारी को भी इस काम में मजा आने लगा था। 1910 में जर्मन अफसरों को लगा कि माता हारी को प्रोफेशनल ट्रेनिंग देना चाहिए। पैसों के लिए माता हारी राजी भी हो गई। उसे जर्मनी के लोराख इलाके में भेजा गया, जहां सरकार जासूसों के लिए ट्रेनिंग स्कूल चलाती थी। माता हारी को कोड वर्ड समझना, सीक्रेट मैसेज लिखना, नक्शे पढ़ना और पुरुषों को मनोवैज्ञानिक तरीके से वश में करने का कोर्स करवाया गया। ट्रेनिंग के बाद माता हारी ने कई फौजी अफसरों और नेताओं की जासूसी की। इससे जर्मनी पुलिस को कई अहम डिटेल्स मिलीं। अब तो माता हारी अपने मेहमानों की निजी तस्वीरें और दस्तावेजों की फोटो खींचकर रखने लगी थी। कुछ साल यह सब चलता रहा। माता हारी को पैसे और महंगे-महंगे तोहफे भी मिलते रहे। इसी बीच 28 जून 1914 को कुछ चरमपंथियों ने सर्बिया में ऑस्ट्रिया के राजकुमार और उनकी पत्नी की हत्या कर दी। ऑस्ट्रिया ने इसके लिए सीधे तौर पर सर्बिया को जिम्मेदार माना। जल्द ही दो देशों की ये लड़ाई प्रथम विश्वयुद्ध में बदल गई। एक तरफ फ्रांस, रूस और ब्रिटेन जैसे मित्र राष्ट्र थे, तो दूसरी तरफ जर्मनी, ऑस्ट्रिया और हंगरी जैसी केंद्रीय शक्तियां। इसी दौरान फ्रांस और रूस के बीच एक गोपनीय समझौता हुआ। इस समझौते के मसौदे को बर्लिन से होते हुए पेरिस ले जाना था। एक रूसी एजेंट मसौदा लेकर बर्लिन पहुंचा। वह एक आलीशान होटल में ठहरा हुआ था। वहां मौजूद रूसी एंबेसी के अफसर उसकी सीक्रेसी का खासा ध्यान रखे हुए थे, लेकिन जर्मनी के एजेंटों को इसकी भनक लग गई। जर्मनी के एजेंटों ने उस होटल में माता हारी को डांसर बनाकर भेज दिया। रूसी एजेंट ने माता हारी का नाम और तारीफें सुन रखी थी। उसे जैसे यह बात पता चली, फौरन रिसेप्शन में फोन लगा दिया। उसने कहा- ‘मुझे पूरी रात के लिए माता हारी चाहिए। जितने पैसे चाहिए मिल जाएंगे।’ थोड़ी देर बाद माता हारी उसके साथ कमरे थी। दोनों बैठकर शराब पी रहे थे। तभी वेटर ने दरवाजा खटखटाया। उसने रूसी एजेंट से कहा- ‘मैंने आपका सामान रख दिया है। मुझे कुछ सामानों की लिस्ट बनानी है। क्या आपका पेन मिल सकता है?’ रूसी एजेंट हिचकिचाया, फिर माता हारी की तरफ देखते हुए अपनी जैकेट से पेन निलाकर वेटर को दे दिया। वेटर ने एक पेपर पर कुछ लिखा और पेन रूसी एजेंट को वापस कर दिया। वेटर के जाने के बाद माता हारी ने रूसी एजेंट को इतनी शराब पिलाई गई कि वह अपना होश खो बैठा। जर्मनी के जासूस इसी मौके की तलाश में थे। उन लोगों ने रूसी एजेंट के कपड़ों और सूटकेस में मिले दस्तावेजों की फोट खींची और चुपचाप बाहर निकल गए। सुबह जब रूसी एजेंट की आंख खुली, तो उसका सिर दर्द से फटा जा रहा था। कमरे में सामान बिखरा पड़ा था। घबराकर उसने जेब में हाथ डाला। उसका पेन सुरक्षित था। उसने राहत की सांस ली, पर अंदर से उसे किसी अनहोनी का डर सता रहा था। उसने बैग पैक किया और वहां से निकल गया। इधर, जर्मनी के खुफिया विभाग में हंगामा मचा था। पुलिस चीफ, अफसरों को डांट रहे थे- 'तुम लोगों ने 100 तस्वीरें खींची है, लेकिन कोई भी तस्वीर उस मसौदे से जुड़ी नहीं है। वो मसौदा गया कहां?’ जर्मनी के एजेंटों के पास इसका जवाब नहीं था। अगले दिन रूसी जासूस बेल्जियम पहुंच चुका था। एक रात वो फिल्म देखकर होटल लौट रहा था, तभी गली में एक शख्स ने उसका रास्ता रोक लिया। जासूस ने फौरन पिस्तौल निकाल ली, तभी वो शख्स बोल पड़ा- ‘सर, मैं वो वेटर हूं, जिसने बर्लिन में आपका पेन लिया था। मेरा पेन भी हुबहू वैसा ही है। गलती से मैंने अपना पेन आपको दे दिया।’ रूसी जासूस ने गाली देते हुए कहा- ‘यह क्या बकवास है?’ वेटर ने आराम से कहा- ‘सर, ये पेन लीजिए। इसके निचले हिस्से में सीक्रेट मसौदा अभी भी सुरक्षित है। जर्मनी के जासूसों से मैंने इसे बचा लिया।' रूसी जासूस ने हकलाते हुए कहा- ‘लेकिन... तुम तो जर्मनी के हो?’ वेटर हंसने लगा। असल में वो वेटर फ्रांस का जासूस था। उसने जर्मनी पुलिस के सामने दस्तावेज ढूंढने का नाटक किया, लेकिन चुपके से पूरे दस्तावेज की तस्वीरें खींचकर फ्रांस भेज दिया था। अब तारीख आई 3 अगस्त 1914, जर्मनी ने फ्रांस के खिलाफ जंग का एलान कर दिया। तब माता हारी बर्लिन के एक होटल में पुलिस चीफ हेर वॉन जागो के साथ थी। होटल में बड़े-बड़े फौजी अफसर ठहरे हुए थे। जंग के माहौल में अपने फौजियों की एक झलक पाने के लिए भीड़ ने होटल को बाहर से घेर लिया था। देशभक्ति नारे लग रहे थे। तभी पुलिस चीफ, माता हारी का हाथ पकड़कर होटल से बाहर निकले। भीड़ ने उनका जोरदार स्वागत किया। पुलिस चीफ ने माता हारी को कार में बैठाकर पूरा बर्लिन घूमाया। इसी दौरान फ्रांस के जासूसों की नजर माता हारी पर पड़ी। उन्हें पता चल गया कि यह महिला जर्मनी पुलिस की करीबी है। इधर, युद्ध के कुछ ही महीने के भीतर यूरोप के हालात बदल गए। थिएटरों पर ताले लटक गए। जर्मन सरकार ने माता हारी को शत्रु देश फ्रांस का नागरिक घोषित कर दिया। उसकी सारी संपत्ति और महंगे गहने जब्त कर लिए। माता हारी को धक्का लगा। वह जिस देश के लिए जासूसी कर रही थी, उसी ने उसे रातों-रात कंगाल बना दिया। कुछ दिनों बाद जैसे-तैसे करके वो हॉलैंड पहुंची। वहां फिर से अपना मशहूर नृत्य करना शुरू किया, लेकिन पहले की तरह जादू नहीं रहा। माता हारी की ढलती उम्र इसकी बड़ी वजह थी। उन दिनों हॉलैंड, जर्मनी के खुफिया नेटवर्क का प्रमुख केंद्र था। जर्मनी की खुफिया विभाग को ऐसे मोहरों की जरूरत थी, जो बिना रोक-टोक के मित्र राष्ट्र देशों में आ-जा सकें। माता हारी इसके लिए मुफीद थी, क्योंकि उसके पास हॉलैंड का पासपोर्ट था और पेरिस के ऊंचे हलकों में संबंध। हॉलैंड में तैनात जर्मन खुफिया अफसर कार्ल क्रामर ने एक रोज माता हारी को अपने दफ्तर बुलाया। जब माता हारी, क्रामर के पास पहुंची, तो वह एक नक्शे पर गोल घेरा बना रहा था। उसने माता हारी को कुर्सी पर बैठने का इशारा किया। क्रामर ने कहा- ‘तुम्हें फौरन पेरिस जाना होगा।’ माता हारी- ‘पेरिस? वहां क्यों जाना है?’ क्रामर ने मुस्कुराते हुए कहा- ‘वही काम , जो तुम सबसे बेहतर जानती हो। पेरिस जाओ, वहां के मंत्रियों और फौजी अफसरों से नजदीकियां बढ़ाओ।’ माता हारी झट से बोल पडी- ‘अब मैं जासूसी के बदले सौदा करूंगी। मुझे 10 हजार फ्रैंक चाहिए। बोलो मंजूर है?’ क्रामर ने अपनी दराज खोला और नोटों की एक गड्डी माता हारी की तरफ सरकाते हुए कहा- ‘तुम्हें 20 हजार फ्रैंक मिलेंगे।’ 20 हजार फ्रैंक, यानी आज के हिसाब से करीब 23 लाख रुपए। माता हारी ने क्रामर की तरफ फ्लाइंग किस उछालते हुए कहा- ‘समझो तुम्हारा काम हो गया।’ क्रामर ने माता हारी को अदृश्य स्याही की तीन शीशियां दीं। साथ में एक पर्ची। जिस पर लिखा था- H21. ये कोड वर्ड में माता हारी का नाम था। पहले विश्व युद्ध में कैप्टन व्लादिमीर मौरोव नाम का एक रूसी पायलट फ्रांस की तरफ से लड़ रहा था। एक रोज उसकी मुलाकात माता हारी से हुई। धीरे-धीरे उनका मिलना-जुलना बढ़ने लगा और फिर माता हारी को उससे प्यार हो गया। इसी बीच एक रोज कैप्टन मैरोव का विमान क्रैश हो गया। वह गंभीर रूप से घायल हो गया। फेफड़ों में जहरीली गैस भर गई। उसे विटेल के मिलिट्री अस्पताल में भर्ती करा दिया गया। विटेल प्रतिबंधित इलाका था, लेकिन माता हारी उससे मिलने के लिए बेचैन थी। एक रोज वह परमिशन लेने फ्रांस के खुफिया विभाग पहुंच गई। फ्रांस को पहले से माता हारी पर शक था। वहां मौजूद अफसर ने कहा- ‘हम तुम्हें हॉस्पिटल जाने देंगे, लेकिन बदले में तुम्हें हमारे लिए जासूसी करनी होगी।’ माता हारी ने बिना सोचे समझे कहा- ‘ठीक है, मैं तैयार हूं, लेकिन बदले मुझे दस लाख फ्रैंक चाहिए।' अभी के हिसाब से करीब 11.82 करोड़ रुपए। फ्रांसीसी अफसर इस भारी भरकर रकम पर भी राजी हो गया। इस तरह अब माता हारी डबल एजेंट बन चुकी थी। फ्रांस और जर्मनी दोनों देशों की जासूस। विटेल के उस इलाके में रूसी और फ्रांसीसी पायलटों का आना-जाना आम था। लड़ाई से थक-हारकर आने वाले पायलट माता हारी के साथ वक्त बिताना पसंद करते थे। 1915 के अगस्त महीने की बात है। फ्रांस, जर्मनी पर एक बड़े हमले की तैयारी कर रहा था। माता हारी को इसकी भनक रूसी पायलटों से मिल गई थी, लेकिन तारीख पता नहीं थी। एक रात वेटल के एक होटल में 30-35 साल का रूसी पायलट नशे में धुत्त होकर बेड पर पड़ा था। बगल में लेटी माता हारी चुपचाप बिस्तर से उठी, पायलट की जेब में हाथ डाला। एक छोटा सा कागज मिला, जिस पर कोड वर्ड में कुछ लिखा था। माता हारी ने पायलट की तरफ देखा… वो अब भी गहरी नींद में था। उसने एक पेपर पर वो खुफिया मैसेज नोट किया और लिपस्टिक के डिब्बे के पीछे रखकर ढक्कन बंद कर दिया। 2 दिन बाद… हॉलैंड के एक होटल में जर्मन खुफिया अफसर क्रामर परेशान बैठा था। तभी एक एजेंट हांफते हुए आया। उसने एक सीलबंद लिफाफा देते हुए कहा- ‘इसे H21 ने भेजा है।’ क्रामर ने फौरन लिफाफा खोला। जिस पर लिखा हुआ था- ‘25 सितंबर 1915 को फ्रांस बड़ा हमला करने वाला है।’ क्रामर खुशी से चिल्लाया- ‘फौरन बर्लिन कनेक्ट करो, माता हारी ने अपना काम कर दिया है।’ खुफिया मैसेज के बाद जर्मनी ने चुपचाप उस मोर्चे पर बटालियनों की संख्या 90 से बढ़ाकर 192 कर दी। वहां भारी तोपें और मशीनगनें तैनात कर दी। अब तारीख आई 25 सितंबर 1915, फ्रांसीसी पैदल सेना के हजारों जवान नारा लगाते हुए आगे बढ़े। शुरुआती कुछ चौकियों पर उन्हें कामयाबी मिली, लेकिन जैसे ही वे मुख्य मैदान में पहुंचे, घात लगाकर बैठी जर्मन सेना ने हमला कर दिया। अचानक चारों तरफ से तोपों और मशीनगनों से ऐसा हमला हुआ कि फ्रांसीसी सैनिक संभल नहीं पाए। देखते-देखते लाशों के ढेर लग गए। जंग खत्म हुई तो पता चला कि फ्रांस के 80 हजार सैनिक मारे गए। ये युद्ध बैटल ऑफ लूस नाम से जाना जाता है। हार के बाद फ्रांस का मानना था कि उसके साथ किसी ने गद्दारी की है। 2 साल बाद यानी जनवरी 1917, फ्रांस के जासूसों को एक कोड वर्ड मिला- H21. फ्रांसीसी खुफिया विभाग ने जब कड़ियों को जोड़ा, तो वे दंग रह गए। वह कोड नेम माता हारी का था। 13 फरवरी 1917 को फ्रांस पुलिस ने पेरिस से माता हारी को गिरफ्तार कर लिया। अदालत में पेश किया गया। दोनों तरफ की तमाम दलीलों और जिरहों के बाद कोर्ट ने माता हारी को सरेआम गोली मारकर मृत्युदंड की सजा सुनाई। 15 अक्टूबर 1917 को एक साथ 12 सैनिकों ने गोली मारकर माता हारी को मौत की सजा दे दी। जासूस माता हारी की पहली कड़ी भी पढ़िए : नाचते-नाचते निर्वस्त्र हो जाती थी महिला जासूस:एक साथ 12 गोलियां मारकर मौत की सजा, आखिरी इच्छा में प्रेमी को लिखी चिट्ठी; माता हारी पार्ट-1 रेफरेंस : 1. Mata Hari: Courtesan and Spy : By Major Thomas Coulson 2. Mata Hari's Last Dance: By Michelle Moran 3. Mata Hari, the True Story : By Russell Warren Howe 4. The fatal lover : By Julie Wheelwright 5. The Spy: A Novel of Mata Hari : By Paulo Coelho 6. A Tangled Web: Mata Hari: By Mary W. Craig
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में बुनियादी अधिकारों और खाद्यान्न संकट को लेकर भड़की भीषण जन-अशांति पर अब संयुक्त राष्ट्र (UN) ने बेहद कड़ा संज्ञान लेते हुए पाकिस्तान सरकार की दमनकारी नीतियों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धज्जियां उड़ा दी हैं। जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त (UNHRC) वोल्कर टुर्क ने एक आधिकारिक बयान जारी कर इस विवादित क्षेत्र में आगामी स्थानीय चुनावों से ठीक पहले कानून-व्यवस्था की आड़ में आम नागरिकों पर किए जा रहे अत्याचारों पर गहरी चिंता व्यक्त की है। संयुक्त राष्ट्र ने पाकिस्तान को सख्त हिदायत देते हुए जून महीने से अब तक सुरक्षाबलों की हिंसक कार्रवाई में मारे गए दर्जनों बेगुनाह प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाकर्मियों की मौतों की तत्काल, गहन और पूरी तरह से निष्पक्ष न्यायिक जांच कराने की पुरजोर मांग की है।नागरिक संगठन को आतंकवादी घोषित करने पर भड़के मानवाधिकार उच्चायुक्त: मौलिक अधिकारों के हनन पर जताई चिंताइस पूरे क्षेत्र में लोकतांत्रिक ढंग से जन-आंदोलन का नेतृत्व कर रहे 'ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी' (JAAC) पर पाकिस्तानी हुकूमत द्वारा आतंकवाद-रोधी कानूनों के तहत लगाए गए प्रतिबंध और उसकी संपत्ति कुर्क करने की कार्रवाई पर संयुक्त राष्ट्र ने बेहद तीखा रुख अपनाया है। मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टुर्क ने स्पष्ट तौर पर कहा कि व्यापारी, ट्रांसपोर्टर, छात्र, वकील और सामाजिक कार्यकर्ताओं के इस प्रतिष्ठित नागरिक संगठन को अपराधी घोषित करना और जनसभाओं पर दमनकारी प्रतिबंध लगाना अभिव्यक्ति की आजादी, शांतिपूर्ण सभा करने के अधिकार और लोकतांत्रिक संगठन बनाने की स्वतंत्रता जैसे मूल मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन है। यूएन ने दो टूक शब्दों में मांग की है कि जेलों में बंद किए गए जेएएसी के तमाम शीर्ष नेताओं को तुरंत कानूनी सहायता और उनके परिवारों से मिलने की इजाजत दी जाए तथा उनकी निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित हो।डिजिटल ब्लैकआउट पर पाकिस्तान को अल्टीमेटम: संयुक्त राष्ट्र ने कहा- तुरंत पूरी तरह बहाल करो इंटरनेट सेवाएंपीओके में भड़क रहे जन-विद्रोह की खबरों को बाहरी दुनिया और वैश्विक मीडिया तक पहुंचने से रोकने के लिए पाकिस्तानी एजेंसियों द्वारा पूरे क्षेत्र में लगाए गए डिजिटल प्रतिबंधों पर भी संयुक्त राष्ट्र ने गहरी नाराजगी जाहिर की है। बयान में साफ तौर पर कहा गया है कि क्षेत्र में मोबाइल और ब्रॉडबैंड इंटरनेट सेवाओं पर लगाए गए मनमाने प्रतिबंध अंतरराष्ट्रीय नागरिक नियमों के खिलाफ हैं और इनसे स्थानीय स्वास्थ्य व आपातकालीन सेवाएं भी बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं। मानवाधिकार उच्चायुक्त ने पाकिस्तानी अधिकारियों को तत्काल अल्टीमेटम देते हुए कहा है कि पूरे क्षेत्र में बिना किसी देरी के इंटरनेट सेवाएं पूरी तरह बहाल की जाएं। इसके साथ ही उन्होंने स्थानीय जनता की वास्तविक प्रशासनिक शिकायतों और समस्याओं के तार्किक समाधान के लिए एक सार्थक एवं समावेशी राजनीतिक संवाद (Inclusive Political Dialogue) शुरू करने का भी आह्वान किया।मीरपुर में खूनी झड़प और भारत से मानवीय गुहार: 'राशन की भारी किल्लत, हमारी मदद करे नई दिल्ली'पाकिस्तानी सुरक्षाबलों की बर्बर कार्रवाई के बावजूद पूरे पीओके में विरोध प्रदर्शन और ज्यादा उग्र हो गया है, जहाँ जेएएसी के आह्वान पर मीरपुर जिले समेत कई प्रमुख हिस्सों में पूर्ण बंद के दौरान पुलिस और आम जनता के बीच आमने-सामने की खूनी झड़पें हुई हैं, जिसमें दर्जनों पुलिसकर्मियों समेत सैकड़ों नागरिक लहूलुहान हो गए हैं। इस अशांति के बीच एक रैली को संबोधित करते हुए जेएएसी के वरिष्ठ नेता सरदार अमान खान ने वैश्विक मीडिया के सामने सीधे भारत सरकार से मानवीय सहायता (Humanitarian Aid) भेजने की बड़ी भावुक अपील की है। पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा को पूरी तरह ध्वस्त करते हुए स्थानीय नेताओं ने आरोप लगाया कि इस्लामाबाद सरकार ने जानबूझकर इस क्षेत्र में भोजन, आटे और आवश्यक जीवनरक्षक दवाओं की भारी कृत्रिम किल्लत पैदा कर दी है, जिसके चलते वहां भुखमरी के हालात हैं और अब उन्हें केवल भारत की मदद पर ही भरोसा बचा है।
जंतर-मंतर पर 21 दिन से भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक को शनिवार सुबह पुलिस उठा ले गई। अभिजीत दीपके ने कहा- ‘पुलिस ने सोनम सर को गालियां दीं और घसीटकर जबरन ले गए।’ नई दिल्ली के डीसीपी ने बताया कि दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के मुताबिक सोनम वांगचुक की बिगड़ती सेहत की वजह से उन्हें सफदरजंग हॉस्पिटल में शिफ्ट किया गया है। अस्पताल पहुंची वांगचुक की पत्नी ने कहा है कि हमारी सहमति के बिना उन्हें न तो जबरन मुंह से कुछ खिलाया जाए और न ही नस के जरिए कोई दवा या तरल पदार्थ दिया जाए। क्या बिना मर्जी सोनम वांगचुक को कुछ भी खिलाना गैरकानूनी है और इतने दिन बिना खाए उनके शरीर के भीतर क्या-क्या हुआ होगा; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: क्या सरकार जबरन सोनम का अनशन तुड़वा सकती है?जवाब: भूख-हड़ताल भी अभिव्यक्ति यानी अपनी बात कहने का तरीका है। आर्टिकल 19 के तहत ये एक मूल अधिकार है। यानी सरकार किसी को भूख-हड़ताल करने से रोक नहीं सकती। वहीं, आर्टिकल 21 से जीवन का अधिकार मिलता है और सरकार की ये जिम्मेदारी है कि वह किसी व्यक्ति की जान को बचाए रखे। इसीलिए भारत में आत्महत्या करना या इसके लिए किसी को उकसाना अपराध है। इन दो कानूनों से जुड़ा एक रोचक मामला मणिपुर की इरोम चानू शर्मिला का है, जो 2000 से 2016 तक 16 साल भूख हड़ताल पर रही थीं। उन्हें अनशन के तीसरे दिन ही आत्महत्या के प्रयास के आरोप में IPC की धारा 309 के तहत गिरफ्तार कर लिया गया और 16 साल तक सरकारी अस्पताल में रखकर जबरन फीडिंग ट्यूब से खाना दिया गया। हालांकि 2021 में मद्रास हाई कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में कहा कि भूख-हड़ताल के चलते किसी को आत्महत्या के प्रयास में आरोपी नहीं बनाया जा सकता। सोनम वांगचुक का केस भी इन्हीं दो मूल अधिकारों के बीच झूल रहा है। सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता कहते हैं कि सोनम पर इरोम चानू की तरह आत्महत्या की कोशिश का मामला दर्ज नहीं किया जाएगा। लेकिन सरकार आर्टिकल 21 का हवाला देकर उनका अनशन तुड़वा सकती है। उनकी जान बचाने के लिए फीडिंग ट्यूब से तरल खाना या फिर नसों से जरूरी फ्लूइड दिया जा सकता है। ये गैरकानूनी नहीं होगा। सोनम का अनशन तुड़वाने के लिए दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था, 'डॉक्टरों से उनकी नियमित जांच कराई जाए और जरूरत पड़ने पर उनकी जान बचाने के लिए जरूरी कदम उठाए जाएं। क्योंकि हर नागरिक की जान कीमती है।’ हालांकि भूख हड़ताल को लेकर 1991 में वर्ल्ड मेडिकल एसोसिएशन की ‘माल्टा घोषणा’ के मुताबिक, कोई मानसिक रूप से सक्षम व्यक्ति, यानी जो होश में हो, उसकी दिमागी स्थिति ठीक हो, उसे उसकी मर्जी के बिना खाना खिलाना नैतिक रूप से गलत है। इसे अमानवीय तथा अपमानजनक व्यवहार माना गया है। सवाल-2: जबरन अनशन तुड़वाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट का क्या रुख रहा है?जवाब: सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में साफ तौर पर कहा है कि अनशन तोड़ने के लिए तब तक मजबूर नहीं किया जा सकता, जब तक ये उनकी जिंदगी बचाने के लिए जरूरी न हो। दरअसल, 26 नवंबर 2024 से 70 साल के किसान नेता जगजीत सिंह दल्लेवाल ने विवादित कृषि कानूनों के खिलाफ 20 दिन भूख हड़ताल की। सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने इसी मामले में कहा था, ‘भूख हड़ताल पर बैठे व्यक्ति को कोई नुकसान नहीं होना चाहिए, ये तय करना सरकार का संवैधानिक कर्तव्य और जिम्मेदारी है।’ कोर्ट ने कहा कि केंद्र और पंजाब की राज्य सरकार को उनकी उम्र, बीमारी पर ध्यान देना चाहिए। उनका कर्तव्य है कि वे जगजीत को तत्काल मेडिकल एड देने के लिए सभी जरूरी कोशिश करें। सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा, ‘उन्हें अनशन तोड़ने के लिए तब तक मजबूर न किया जाए, जब तक ये उनकी जिंदगी बचाने के लिए जरूरी न हो।’ 6 अप्रैल 2025 को 133 दिन के बाद केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय रेल राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू की अपील के बाद जगजीत ने अपना अनशन तोड़ दिया था। 2011 में बाबा रामदेव की अनशन की कोशिश पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सरकार को अनशन करने वालों के खिलाफ शत्रुतापूर्ण नजरिया नहीं रखना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि सरकार अभिव्यक्ति के अधिकार को तब तक रोक नहीं सकता, जब तक कि सांप्रदायिक समस्या न हो, सामाजिक व्यवस्था न बिगड़े और कोई शांति भंग का कोई खतरा न हो। भूख हड़ताल, विरोध का ऐसा रूप है, जिसे हमारे संविधान में ऐतिहासिक और कानूनी दोनों तरह से स्वीकार किया गया है। इसकी शुरुआत महात्मा गांधी के सत्याग्रह से हुई है। सवाल-3: तो क्या वाकई सोनम वांगचुक की जान को खतरा था?जवाब: भुखमरी से जुड़ी कई रिसर्च 3 जरूरी बातें बताती हैं.. सोनम का वजन अनशन की शुरुआत में 65.9 किलो था, जो 18 जुलाई तक 9.5 किलो घटकर 56.4 हो गया। यानी करीब 15% की गिरावट। उनका ब्लड प्रेशर और शुगर लेवल भी नॉर्मल से कम चल रहे थे। उत्तर प्रदेश बेस्ड डॉक्टर ऑफ मेडिसिन (MD) अजय सिंह कहते हैं कि ये कहना ठीक नहीं होगा कि तत्काल उनकी जान को कोई खतरा था। वे पानी ले रहे थे। हालांकि 20 दिन के अनशन के बाद मेडिकल जांचों और लगातार निगरानी की जरूरत है, क्योंकि उनकी उम्र 59 साल है। वहीं सफदरजंग अस्पताल ने कहा है कि उपवास और डिहाइड्रेशन के चलते सोनम कमजोर हैं। फिलहाल उनकी स्थिति स्थिर है, लेकिन सारे पैरामीटर्स को सामान्य करने के लिए उन्हें लगातार निगरानी, चिकित्सकीय देखभाल और इलाज की जरूरत है। मध्यप्रदेश मेडिकल साइंस यूनिवर्सिटी, जबलपुर में न्यूरोलॉजिस्ट और मेडिसिन एक्सपर्ट डॉ. टी.एन दुबे कहते हैं, ‘मेडिकल साइंस में इस बात कि साफ पुष्टि नहीं है कि इंसान कितने दिन तक भूख बर्दाश्त कर सकता है। भूख तब तक जानलेवा नहीं होगी, जब तक कीटोसिस न शुरू हो जाए। एक बार ये प्रक्रिया शुरू हो जाए, तो माना जाता है कि व्यक्ति कोमा में जा सकता है। दरअसल, बिना खाने के कुछ दिन बाद कीटोसिस की फेज शुरू हो जाती है। इसके बाद चौथी फेज और फिर व्यक्ति की मृत्यु। आखिर भूखे रहने के दौरान हमारे शरीर में होता क्या है, इसके चारों फेज समझते हैं… सवाल-4: अब आगे कॉकरोच पार्टी के आंदोलन और सोनम के अनशन का क्या होगा?जवाबः आगे 3 सिनैरियो बन सकते हैं...1. सोनम अस्पताल से ही अनशन करें 2. कॉकरोच पार्टी का आंदोलन तेज हो सकता है 3. पुलिस प्रदर्शनकारियों से जंतर-मंतर खाली करवा ले ------------------------ ये खबर भी पढ़ें… आज का एक्सप्लेनर: प्रोटेस्ट कॉकरोच पार्टी का, फिर सोनम वांगचुक आमरण अनशन पर क्यों; क्या सरकार मांगें मानेगी, तबीयत बिगड़ी तो क्या होगा 59 साल के सोनम वांगचुक 17 दिन से भूख हड़ताल पर हैं। सिर्फ नमक का पानी ले रहे हैं। 8.5 किलो वजन गिर चुका है। उनके पीछे बैनर कॉकरोच जनता पार्टी का है, जिसकी मांग है- शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा। पूरी खबर पढ़ें…
आर्थिक बदहाली और वैश्विक मंच पर अलग-थलग पड़ने के संकट से जूझ रहा पाकिस्तान अपनी डूबती अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए नए-नए पैंतरे आजमा रहा है। सऊदी अरब और तुर्की जैसे पुराने सहयोगियों से उम्मीद के मुताबिक वित्तीय मदद और कूटनीतिक समर्थन न मिलने के बाद अब इस्लामाबाद ने अपना रुख एक और अमीर खाड़ी देश कुवैत (Kuwait) की तरफ किया है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर के नेतृत्व में देश का शीर्ष नेतृत्व इन दिनों कुवैत के साथ रणनीतिक और व्यापारिक रिश्तों को मजबूत करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि इस नई नजदीकी के पीछे सिर्फ कर्ज की गुहार नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे मुस्लिम देशों का एक तथाकथित 'इस्लामिक नाटो' खड़ा करने का पुराना पाकिस्तानी एजेंडा भी छिपा हो सकता है।आखिर कुवैत के सामने क्यों हाथ फैला रहा है इस्लामाबाद?पाकिस्तान इस समय विदेशी मुद्रा भंडार की भारी किल्लत और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की कड़ी शर्तों के जाल में फंसा हुआ है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने अब पाकिस्तान को मुफ्त में बेलआउट पैकेज देने के बजाय सीधे तौर पर देश की सरकारी संपत्तियों में निवेश करने की शर्त रख दी है। ऐसे में पाकिस्तान को कुवैत एक सुरक्षित और बड़े निवेशक के रूप में दिखाई दे रहा है। पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल कुवैत को तेल रिफाइनरी, कृषि, माइनिंग और आईटी सेक्टर में भारी निवेश के प्रस्ताव दे रहा है। इसके साथ ही पाकिस्तान अपने लाखों कुशल और अकुशल श्रमिकों को कुवैत भेजने के लिए वीजा नियमों में ढील देने की गुहार लगा रहा है ताकि देश में रेमिटेंस (विदेशी मुद्रा) का प्रवाह बढ़ाया जा सके।मुस्लिम ब्लॉक के जरिए भारत को घेरने की नाकाम कोशिशभू-राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान का कुवैत और तुर्की जैसे देशों के करीब जाना उसकी पुरानी और घिसी-पिटी कूटनीति का हिस्सा है। पाकिस्तान हमेशा से सऊदी अरब की अगुवाई वाले इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) और तुर्की-मलेशिया के साथ मिलकर एक मजबूत मिलिट्री और पॉलिटिकल ब्लॉक यानी 'इस्लामिक नाटो' बनाने का सपना देखता रहा है, ताकि कश्मीर जैसे मुद्दों पर भारत के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाया जा सके। लेकिन पाकिस्तान का यह ख्वाब हमेशा से खोखला साबित हुआ है क्योंकि कुवैत, यूएई और सऊदी अरब जैसे प्रभावशाली खाड़ी देशों के भारत के साथ बेहद मजबूत और गहरे व्यापारिक संबंध हैं, जिन्हें वे पाकिस्तान के कारण दांव पर लगाने के मूड में बिल्कुल नहीं हैं।शहबाज-मुनीर की इस महत्वाकांक्षी चाल में छिपे हैं बड़े खतरेइस समय जब मध्य-पूर्व (Middle East) में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच तनाव चरम पर है, पाकिस्तान की यह कूटनीतिक पैंतरेबाजी उस पर खुद भारी पड़ सकती है। कुवैत और अन्य खाड़ी देश इस समय क्षेत्रीय स्थिरता पर ध्यान दे रहे हैं न कि किसी नए सैन्य या वैचारिक गुटबाजी पर। जानकारों का कहना है कि अगर पाकिस्तान ने खाड़ी देशों को अपने रक्षा एजेंडे या इस्लामिक ब्लॉक की राजनीति में घसीटने की कोशिश की, तो उसे लेने के देने पड़ सकते हैं। लखनऊ और दिल्ली के विदेश नीति विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि पाकिस्तान अपनी आर्थिक प्राथमिकताओं को छोड़कर कूटनीतिक चालबाजियों में उलझा रहा, तो वह कुवैत से मिलने वाले संभावित आर्थिक सहयोग और निवेश से भी हाथ धो बैठेगा।
इस्लामाबाद में महामंथन! पाकिस्तान की बुलाई SCO बैठक में शामिल हुआ भारत, चीन और रूस ने भी दी दस्तक
एशियाई क्षेत्र की भू-राजनीति और कूटनीतिक गलियारों से एक बेहद बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। धुर विरोधी पड़ोसी देश पाकिस्तान की मेजबानी में राजधानी इस्लामाबाद में आयोजित हो रही शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की महत्वपूर्ण बैठक में भारत ने भी अपनी सक्रिय भागीदारी दर्ज कराई है। आतंकवाद, कश्मीर और सीमा पार तनाव जैसे गंभीर मुद्दों के कारण दोनों देशों के बीच लंबे समय से जारी गतिरोध के बीच भारतीय प्रतिनिधिमंडल का इस्लामाबाद पहुंचना अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक बड़ा संदेश माना जा रहा है। इस हाई-प्रोफाइल बैठक में भारत के अलावा रूस, चीन और अन्य मध्य एशियाई सदस्य देशों के शीर्ष राजनयिक और प्रतिनिधि भी हिस्सा लेने के लिए पहुंचे हैं।क्षेत्रीय सुरक्षा और आर्थिक कॉरिडोर पर टिकीं पूरी दुनिया की नजरेंपाकिस्तान द्वारा आयोजित की गई इस एससीओ बैठक का मुख्य एजेंडा सदस्य देशों के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ाना, क्षेत्रीय कनेक्टिविटी में सुधार करना और यूरेशियन क्षेत्र में सुरक्षा चुनौतियों से मिलकर निपटना है। सूत्रों के मुताबिक, बैठक के पहले दौर में व्यापारिक बाधाओं को दूर करने और आतंकवाद के खिलाफ एक साझा रणनीति बनाने पर गहन चर्चा हुई है। भारत ने हमेशा की तरह इस अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी कनेक्टिविटी परियोजनाओं में संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान की बात को पुरजोर तरीके से उठाया है, जिसे चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) और सीपीईसी (CPEC) के संदर्भ में बेहद अहम माना जा रहा है।क्या भारत और पाकिस्तान के बीच बर्फ पिघलने की है यह शुरुआत?अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषकों का मानना है कि इस बहुपक्षीय मंच पर भारत और पाकिस्तान का एक साथ बैठना दोनों देशों के बीच जमी बर्फ को पिघलाने का एक जरिया बन सकता है। हालांकि, भारतीय विदेश मंत्रालय ने पहले ही साफ कर दिया है कि यह एक बहुपक्षीय क्षेत्रीय बैठक है और इसमें हिस्सा लेना किसी भी तरह से पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय वार्ता की बहाली का संकेत नहीं है। इसके बावजूद, इस्लामाबाद, दिल्ली, बीजिंग और मॉस्को के कूटनीतिक हलकों में इस बैठक की इन-कैमरा चर्चाओं और नेताओं की अनौपचारिक मुलाकातों (पुल-असाइड मीटिंग्स) को लेकर अटकलों का बाजार काफी गर्म है।यूरेशिया और दक्षिण एशिया के समीकरणों पर पड़ेगा सीधा असरइस समय जब दुनिया रूस-यूक्रेन संकट और मध्य-पूर्व के तनाव से जूझ रही है, ऐसे में यूरेशिया और दक्षिण एशिया के देशों का यह साझा मंच वैश्विक शक्ति संतुलन के लिहाज से बेहद खास हो जाता है। बैठक में रूस और चीन की जुगलबंदी के बीच भारत ने अपनी स्वतंत्र और मजबूत विदेश नीति का प्रदर्शन किया है। लखनऊ, दिल्ली, मुंबई समेत पूरे देश के रणनीतिक थिंक-टैंक इस बात पर नजर बनाए हुए हैं कि इस बैठक के खत्म होने के बाद जो संयुक्त घोषणापत्र जारी होगा, उसमें आतंकवाद और क्षेत्रीय व्यापार को लेकर क्या नई गाइडलाइंस सामने आती हैं।
आर्थिक कंगाली और चौतरफा संकट से जूझ रहे पाकिस्तान को वैश्विक मंच पर एक और करारा झटका लगा है। जिस महत्त्वाकांक्षी ईरान-पाकिस्तान (IP) गैस पाइपलाइन परियोजना को पूरा करने का दावा कर शहबाज शरीफ और जनरल आसिम मुनीर की सरकार देश-दुनिया में अपनी पीठ थपथपा रही थी, उस पर अब पूरी तरह पानी फिरता नजर आ रहा है। पड़ोसी देश ईरान ने पाकिस्तान के ढुलमुल रवैये और अमेरिकी प्रतिबंधों के बहाने लगातार की जा रही देरी से तंग आकर एक बड़ा कदम उठाया है। ईरान ने इस मामले को अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत (पेरिस इंटरनेशनल कोर्ट) में घसीट लिया है, जिसके बाद पाकिस्तान पर अरबों डॉलर के जुर्माने का खतरा मंडराने लगा है।जानिए क्या है यह गैस पाइपलाइन विवाद और ईरान का कड़ा रुखयह पूरा मामला साल 2009 में हस्ताक्षरित हुए एक ऐतिहासिक द्विपक्षीय समझौते से जुड़ा हुआ है। इस डील के तहत ईरान से पाकिस्तान के रास्ते भारत तक गैस पाइपलाइन बिछाई जानी थी, लेकिन बाद में यह सिर्फ ईरान और पाकिस्तान तक ही सीमित रह गई। समझौते के मुताबिक, पाकिस्तान को अपने हिस्से की पाइपलाइन का निर्माण साल 2014 तक पूरा करना था। ईरान ने अपने क्षेत्र में 900 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन का काम बहुत पहले ही पूरा कर लिया था, लेकिन पाकिस्तान लगातार अमेरिकी प्रतिबंधों (US Sanctions) का डर दिखाकर अपने हिस्से के निर्माण को टालता रहा। अब ईरान ने साफ कर दिया है कि वह अपनी राष्ट्रीय संपदा और समय की बर्बादी को और बर्दाश्त नहीं करेगा।पाकिस्तान पर मंडराया 18 अरब डॉलर के भारी-भरकम जुर्माने का खतराइस्लामाबाद और रावलपिंडी के रणनीतिक हलकों में इस समय हड़कंप मचा हुआ है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यदि पेरिस की अंतरराष्ट्रीय अदालत में ईरान यह केस जीत जाता है, तो पाकिस्तान पर 18 अरब डॉलर (लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपये) से अधिक का हर्जाना या जुर्माना लगाया जा सकता है। पहले से ही आईएमएफ (IMF) के कर्ज और चीन के रीपेमेंट के बोझ तले दबे पाकिस्तान के लिए यह रकम चुका पाना पूरी तरह असंभव है। पाकिस्तानी मीडिया और जानकारों का कहना है कि यह मुनीर-शरीफ प्रशासन की कूटनीतिक और आर्थिक मोर्चे पर अब तक की सबसे शर्मनाक विफलता है, जिसने देश को दिवालियापन की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है।बीजिंग से लेकर वाशिंगटन तक फेल हुई पाकिस्तानी कूटनीतिभू-राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान इस समय एक बेहद गंभीर दुविधा में फंस गया है। एक तरफ जहां उसे अमेरिका को खुश रखना है, वहीं दूसरी तरफ पड़ोसी ईरान की नाराजगी उसे भारी पड़ रही है। पाकिस्तान ने इस संकट से निकलने के लिए चीन और सऊदी अरब जैसे सहयोगियों से भी अनौपचारिक मदद मांगी थी, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानूनी पचड़ों को देखते हुए किसी ने भी खुलकर उसका साथ नहीं दिया। एशिया और मध्य-पूर्व के इस बदलते घटनाक्रम का असर पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र की ऊर्जा सुरक्षा पर भी पड़ सकता है, जिससे आने वाले दिनों में पाकिस्तान की घरेलू मुश्किलें और अधिक बढ़ने वाली हैं।
ईरानी ड्रोन हमले से कुवैत दहला – सैन्य ठिकाने और प्लांट को भारी नुकसान
ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव का असर अब खाड़ी देशों पर भी दिखने लगा है
ईरान के समुद्री निगरानी नेटवर्क पर अमेरिकी अटैक, व्यावसायिक जहाजों की निगरानी में बड़ी बाधा
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) ने दावा किया है कि उसकी सेना ने ईरान के चाबहार स्थित शहीद कलांतरी बंदरगाह के एक निगरानी टावर को नष्ट कर दिया है
एंडी बर्नहैम बने ब्रिटेन की लेबर पार्टी के नए नेता, सोमवार को संभालेंगे प्रधानमंत्री पद
ब्रिटेन की लेबर पार्टी ने घोषणा की कि एंडी बर्नहैम को पार्टी का नया नेता चुन लिया गया है। बर्नहैम, जो पहले ग्रेटर मैनचेस्टर के मेयर रह चुके हैं, सोमवार को प्रधानमंत्री पद संभालने वाले हैं
तारीख थी 15 अक्टूबर 1917, फ्रांस की राजधानी पेरिस की सेंट लाजारे जेल। सर्दभरी सुबह के 4 बजे थे। अचानक भारी बूटों की थाप गूंजी- ठक, ठक, ठक। हाथों में चमचमाती टॉर्च थामे 18 फ्रांसीसी अफसर, सधे हुए कदमों से जेल के दूसरे फ्लोर की तरफ बढ़ रहे थे। वे सीधे कोठरी नंबर 12 के सामने पहुंचे। एक अफसर ने दरवाजा खोलने के लिए जैसे ही हाथ बढ़ाया, वहां खड़ी नन ने उसे रोक दिया। उसने कहा- ‘आप लोग यहीं रुकिए। मैं खुद उसे लेकर आती हूं।’ ये नन उस जेल की जेलर थी। वो कोठरी के भीतर दाखिल हुई। माचिस की तीली निकाली और मेज पर रखे लैंप को जलाया। लोहे की चारपाई पर 40-41 साल की महिला सो रही थी। उसके बिखरे हुए घुंघराले बालों पर हाथ फेरते हुए नन ने आहिस्ता से उसे हिलाया, कोई हरकत नहीं हुई। घबराकर नन ने बाहर खड़ी दूसरी नन को भी बुला लिया। दोनों ने मिलकर जब उसे झकझोरा, तब जाकर उस औरत ने अंगड़ाई ली। उसने अपनी बड़ी-बड़ी, काली आंखों को रगड़ते हुए अलसाए मन से नन की तरफ देखा। नन का गला रूंध गया था, आवाज फंस रही थी। उसने भारी मन से कहा- ‘तुम्हारी दया याचिका खारिज हो चुकी है... डेथ वॉरंट जारी हो गया है। आज... इसी वक्त मौत की सजा मुकर्रर की गई है।’ महिला के चेहरे पर कोई शिकन नहीं। वह आराम से उठी और बिस्तर पर बैठ गई। उसने पूछा, ‘क्या मुझे सीधे ले जाएंगे?’ नन कुछ जवाब देती, इससे पहले ही महिला फिर से बोल पड़ी- ‘कोई बात नहीं। ले चलिए मुझे। तैयार हूं मैं।’ नन ने घड़ी की तरफ देखा और कहा- ‘आपके पास आधा घंटा है। तैयार हो जाइए। अगर किसी के नाम कोई संदेश देना चाहती हैं, तो वो भी लिखकर दे सकती हैं।’ महिला तैयार होने लगी। वह ऐसे सजने लगी जैसे किसी शाही महफिल में जा रही हो। उसने बड़े सलीके से सिल्क की स्टॉकिंग्स पहनी, पैरों में ऊंची एड़ी के जूते पहने, एक लंबा फर वाला कीमती कोट पहना और सिर पर बड़ी हैट लगा ली। फिर बालों को संवारा। उसने पास खड़ी नन की तरफ मुड़कर मुस्कुराते हुए पूछा, ‘कैसी लग रही हूं मैं?’ नन उसे देखती रह गई। 5 फीट 9 इंच हाइट, सांवली त्वचा, बड़ी-बड़ी काली आंखें, घुंघराले बाल और छरहरा बदन… यही तो थी वो महिला जिसका कभी पूरा यूरोप दीवाना था। अब उसने नन से कहकर अपने वकील एडुआर्ड क्लुनेट को बुलावा भेजा। जब क्लुनेट पहुंचे, तो बुरी तरह घबराए हुए थे। आंखों में आंसू और चेहरे पर उसे न बचा पाने का मलाल। महिला समझ गई कि वकील के मन में क्या चल रहा है। उसने कहा- ‘खुद को मत कोसिए। मुझे न तो आपसे कोई गिला है और न ही इस जिंदगी से। बस, मेरे लिए एक सिगार का इंतजाम करवा दीजिए।’ फौरन सिगार मंगवाया गया। महिला ने बेहद तसल्ली से सिगार के कश लिए, जैसे वह किसी बड़े थिएटर के ग्रीन रूम में बैठकर परफॉर्मेंस की तैयारी कर रही हो। घड़ी की सुइयां सरकती रहीं और अब सुबह के 4:45 बज चुके थे। जेलर ने भारी मन से पूछा- ‘कोई आखिरी इच्छा?’ ‘हां, जरा कुछ पन्ने और कलम दे दीजिए। खत लिखना है।’ महिला ने हंसते हुए कहा। एक डायरी और कलम मंगाया गया। उसने दो खत लिखे। पहला खत बेटी लुईस के नाम और दूसरा खत प्रेमी और रूसी कैप्टन व्लादिमीर मैरोव के नाम। जेलर ने दोनों खत लेकर वकील के हाथों में दे दिए। ब्राजील के मशहूर उपन्यासकार पाउलो कोएल्हो अपनी किताब 'द स्पाई' में लिखते हैं- ‘सुबह के 5.15 बज चुके थे। महिला अपनी कोठरी से बाहर निकली। उसे नीचे ले जाकर एक आसमानी रंग की फौजी गाड़ी में बैठा दिया गया। गाड़ी में सिर्फ चार लोग थे। वो महिला, उसका वकील और दो नन। गाड़ी पेरिस की सुनसान और कोहरे से घिरी सड़कों पर रफ्तार पकड़ने लगी। कुछ देर बाद गाड़ी पेरिस के बाहरी इलाके में बने विन्सेन्स फोर्ट पहुंची। वहां फ्रांस की तीनों सेनाओं के 100 से ज्यादा हथियारबंद सैनिक घेरा बनाकर खड़े थे। मैदान के बीचों-बीच एक लकड़ी का खंभा गड़ा हुआ था। महिला को गाड़ी से उतारा गया। वह पैदल ही चलकर उस खंभे तक पहुंच गई। एक फौजी रस्सी लेकर उसे खंभे से बांधने के लिए आगे बढ़ा। महिला ने मना कर दिया। अफसर जब जिद पर अड़ गया, तब महिला ने कहा- ‘ठीक है, एक हाथ बांध दो।’ उसका बायां हाथ खंभे से बांध दिया गया। तभी एक दूसरा फौजी हाथ में काली पट्टी लेकर उसकी आंखों पर बांधने के लिए आगे बढ़ा। महिला ने उसे डांटते हुए कहा- ‘रुक जाओ, मुझे कोई पट्टी-वट्टी नहीं चाहिए। मैं मौत को अपनी खुली आंखों से देखना चाहती हूं।’ फौजी वहां से हट गया। महिला के ठीक सामने, महज 20 कदम की दूरी पर 12 फ्रांसीसी सैनिकों का फायरिंग स्क्वाड राइफल ताने खड़ा था। कमांडर ने अपनी चमचमाती तलवार हवा में लहराई, यह सैनिकों के मुस्तैद होने का इशारा था। ठीक 5 बजकर 30 मिनट पर एक भारी-भरकम घंटा बजा। उसकी गूंज पूरे मैदान में फैल गई। यह मौत का घंटा था, जिसे फ्रांस में डेथ बेल कहा जाता था। उसी आखिरी पल में, महिला ने सामने खड़े सैनिकों और रोते हुए वकील की तरफ देखा, मुस्कुराई और हवा में 'फ्लाइंग किस' उछाल दिया। तभी कमांडर की आवाज गूंजी- ‘फायर…’ महिला को निशाना बनाकर एक साथ 12 गोलियां दागी गईं। गोलियों की गूंज से मैदान दहल उठा। महिला के शरीर में तीन गोलियां लगीं। वह झटके से जमीन पर गिर गई। एक फौजी तेजी से आगे बढ़ा। उसने पिस्तौल निकाली और महिला के करीब जाकर उसके सिर में गोली मार दी। महिला का सिर फट गया। खून से सने हुए मांस के लोथड़े जमीन पर बिखर गए। मौत के बाद महिला की बॉडी को कोई लेने नहीं आया। उसकी बॉडी पेरिस के मेडिकल कॉलेज को दे दी गई, ताकि डॉक्टरी की पढ़ाई में चीरफाड़ के लिए इस्तेमाल की जा सके उसके चेहरे को एनाटॉमी म्यूजियम में रख दिया गया, लेकिन 90 के दशक में एक रोज वो चेहरा भी किसी ने चुरा लिया। यह महिला एक इरोटिक डांसर थी, जो नाचते-नाचते निर्वस्त्र हो जाती थी। 20वीं सदी की शुरुआत में यूरोप के नेता, अभिनेता, सेना के जनरल और बड़े-बड़े बिजनेसमैन उस पर हजारों डॉलर लुटा देते थे। महिला का एक और परिचय था- वो दुनिया की सबसे ग्लैमरस जासूस थी। पहले विश्व यद्ध में हार के बाद फ्रांस उसके खून का प्यासा हो गया था। ये महिला कौन थी और कैसे जासूस बन गई, जानने के लिए फ्लैशबैक में चलते हैं… नीदरलैंड्स का लेउवार्डेन शहर। 7 अगस्त 1876 को यहां एक लड़की का जन्म हुआ। नाम रखा गया- मार्गेटा जेले। चार भाई-बहनों में सबसे बड़ी। पिता एडम कपड़े और सिलाई से जुड़े सामानों की दुकान चलाते थे। कुछ साल बाद एडम ने तेल के कारोबार में हाथ आजमाया। तकदीर ने साथ दिया। जल्द ही वे शहर के रईसों में गिने जाने लगे। बड़ी होने के नाते मार्गेटा को अपने भाई-बहनों में सबसे ज्यादा प्यार मिला। पिता ने शहर के सबसे महंगे स्कूल में पढ़ने के लिए भेजा। उसके कपड़े रेशम के होते थे, खिलौने बेहद कीमती। उसके शौक बाकी बच्चों के मुकाबले बेहद लग्जरी थे। कुछ साल सबकुछ अच्छा चला। फिर वक्त ने करवट ली और 1885 का साल आ गया। मार्गेटा के पिता को कारोबार में घाटा होने लगा। कमाई का ज्यादातर हिस्सा कर्ज उतारने में चला जाता। 1889 आते-आते हालात ऐसे हो गए कि बैंक ने उन्हें दिवालिया घोषित कर दिया। धोखाधड़ी और कर्ज के कई मुकदमों से लद गए। अब परिवार के सामने खाने-पीने तक की किल्लत होने लगी। बच्चों की पढ़ाई छूट गई। परिवार को शहर छोड़कर एक छोटे और तंग अपार्टमेंट में जाकर रहना पड़ा। तंगहाली के बीच मार्गेटा के माता-पिता में अनबन भी होने लगी। मार-पीट और चीखें आम हो गईं। आखिरकार 1890 में दोनों का तलाक हो गया। मार्गेटा ने मां के साथ रहने का फैसला किया, लेकिन ये साथ लंबा नहीं चला। कुछ ही महीने बाद उसकी मां की मौत हो गई। 14 साल की मार्गेटा अब अकेली और बेसहारा थी। कुछ दिनों तक रिश्तेदारों ने साथ रखा, पर जल्द ही उन्होंने भी मुंह फेर लिया। मार्गेटा के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी- ‘पेट के लिए कुछ पैसों का इंतजाम करना।’ मार्गेटा का रूप-रंग आम डच लड़कियों से जुदा था। वह सांवली थी, हाइट करीब 5 फीट 9 इंच हो चुकी थी। उस दौर में नीदरलैंड की आम लड़कियों की लंबाई मुश्किल से पांच फीट हुआ करती थी। वह स्वभाव से बेहद चुलबुली और खूब बोलने वाली लड़की थी। इस वजह से भी रिश्तेदार मार्गेटा से दूरी बनाकर रखते थे। वक्त का पहिया घूमता रहा और साल 1892 आ गया। मार्गेटा 16 साल की हो चुकी थी। वह लीडेन शहर में रहने लगी थी। उन्हीं दिनों एक ट्रेनिंग स्कूल वैकेंसी निकली। छोटे बच्चों को पढ़ाने के लिए कम उम्र के लड़के-लड़कियों की जरूरत थी। मार्गेटा ने फौरन अप्लाई कर दिया। उसका इंटरव्यू हुआ और वह चुन ली गई। बच्चों को पढ़ाने के बाद उसका ज्यादातर वक्त स्कूल की लाइब्रेरी में किताबें पढ़ने में गुजरता। इस दौरान, वह खुद से 35 साल बड़े स्कूल के हेडमास्टर के करीब आ गई। धीरे-धीरे स्कूल का ये रिश्ता बेहद निजी हो गया। ब्रिटिश जर्नलिस्ट मैरी क्रेग अपनी किताब ‘ए टैंगल्ड वेब: माता हारी’ में लिखती हैं- 'मार्गेटा और हेडमास्टर के बीच शारीरिक संबंध तो था, लेकिन यह पता नहीं चल सका कि वह हेडमास्टर को पसंद करती थी या वो उसकी मजबूरी का फायदा उठा रहा था। ये भी हो सकता है कि दोनों एक-दूसरे की जरूरतों के लिए आकर्षित थे।' जल्द ही स्कूल में दोनों के रिश्ते की चर्चाएं होने लगीं। बवाल बढ़ा तो 1893 में मैनेजमेंट ने मार्गेटा को नौकरी से निकाल दिया, लेकिन उस हेडमास्टर पर कोई एक्शन नहीं लिया गया। अब 17 साल की मार्गेटा फंस चुकी थी। एक तरफ पैसों की तंगी और दूसरी तरफ पूरे शहर में बदनामी। इस डर से कोई भी उससे रिश्ता या सरोकार नहीं रखना चाहता था। 1894 की बात है। एक अखबार में विज्ञापन छपा। डच कोलोनियल आर्मी के कैप्टन रुडोल्फ जॉन मैकलियोड को एक पार्टनर की तलाश थी। उसकी पोस्टिंग इंडोनेशिया में थी और वह उन दिनों छुट्टी बिताने नीदरलैंड्स आया हुआ था। मार्गेटा, विज्ञापन देखकर खुद से 20 साल बड़े कैप्टन रुडोल्फ से मिलने पहुंच गई। पहली ही मुलाकात में उस फौजी ने मार्गेटा को पसंद कर लिया। मार्गेटा मन ही मन यह सोचकर खुश थी कि अब उसकी जिंदगी से पैसों की तंगी मिट जाएगी। वह एक फौजी अफसर की शानो-शौकत वाली पत्नी बनकर दुनिया घूम सकेगी। 11 जुलाई 1895 को दोनों ने शादी कर ली। शादी के बाद कैप्टन रुडोल्फ उसे लेकर इंडोनेशिया चले गए। दोनों को दो बच्चे हुए- एक बेटा और एक बेटी। शुरुआत में सबकुछ ठीक रहा, लेकिन फिर हालात बदल गए। मार्गेटा का पति शराबी, बदमिजाज और हिंसक प्रवृत्ति का आदमी था। वह बात-बात पर उसे मारता-पीटता था। उसके दूसरी महिलाओं के साथ भी संबंध थे। एक रोज मार्गेटा के बेटे की अचानक मौत हो गई। बाद में पता चला कि उसे किसी ने जहर दे दिया था। इसके बाद मार्गेटा और उसके पति के बीच रिश्ते और खराब हो गए। आखिरकार 1902 में दोनों अलग हो गए। पति ने पैसे के दम पर बेटी को भी मार्गेटा से छीनकर अपने पास रख लिया। मार्गेटा डिप्रेशन में चली गई। कई महीने इधर-उधर भटकती रही। इसी दौरान, वह इंडोनेशिया की स्थानीय आदिवासी महिलाओं के संपर्क में आई। वह उनसे मेल-जोल बढ़ाने लगी। इंडोनेशिया की मलय भाषा सीखी। पारंपरिक और धार्मिक नृत्यों का अध्ययन किया। उसने देखा कि कैसे वहां की महिलाएं अपनी देह की भंगिमाओं से देवताओं की कथित आराधना करती हैं। 1903 में मार्गेटा इंडोनेशिया से पेरिस आ गई। तब वहां बड़े-बड़े चित्रकार अपनी पेंटिंग्स के लिए मॉडल्स को नग्न या अर्धनग्न अवस्था में सामने बिठाकर उनका स्केच तैयार करते थे। मार्गेटा भी इसी काम में उतर गई। उसने अपना नाम बदलकर 'लेडी मैकलियोड' रख लिया। एक रोज, चित्रकार ने मार्गेटा के चेहरे पर छाई उदासी को भांप लिया। उसने पूछा, तुम इतनी परेशान और गुमसुम क्यों रहती हो? मार्गेटा की आंखें भर आईं। उसने कहा- ‘मुझे पैसों की जरूरत है। इस पेशे में यह सोचकर आई थी कि कुछ कमाई हो जाएगी, पर यहां भी कुछ हो नहीं पा रहा।' फिर थोड़ा रुककर कहा- ‘मैंने सब कुछ खो दिया है। घर, बच्चा, बेटी... और शायद खुद को भी।’ चित्रकार कुर्सी खींचकर उसके सामने बैठ गया। आहिस्ता से बोला, ‘मेरे पास तुम्हारे लिए एक शानदार ऑफर है। अगर तुम तैयार हो जाओ... तो पैसों की बरसात होने लगेगी।’ मार्गेटा ने भी धीरे से पूछा- ‘कैसा ऑफर?’ चित्रकार ने उसकी आंखों में झांकते हुए कहा, ‘तुम कमाल की दिखती हो। अपने शरीर को कपड़ों के बजाय रंग-बिरंगे पंखों और मोतियों से ढंककर मॉडल बन जाओ... पेरिस में रेगुलर काम भी मिलेगा और मुंहमांगे पैसे भी।’ मार्गेटा झटके से उठ खड़ी हुई। ‘अगर तुम्हारे इस प्रस्ताव का मतलब सरेआम कपड़े उतारना है, तो साफ सुन लो, मैं ऐसा घिनौना काम नहीं कर सकती।’ इतना कहकर मार्गेटा वहां से चली गई। चित्रकार ने चिल्लाते हुए कहा- ‘सोच लो मैकलियोड… तुम जितना चाहो उतना पैसे कमा सकती हो।’ मार्गेटा उस रात सो नहीं पाई। काफी देर रोती रही। वह बार-बार सोच रही थी- ‘अगर मैं इस ऑफर को मान लूं, तो मेरी सारी जरूरतें एक झटके में पूरी हो जाएंगी। मैं बेटी की देखरेख भी खुद के दम पर कर लूंगी, लेकिन इसके लिए क्या मैं अपनी इज्जत दांव पर लगा सकती… हरगिज नहीं।’ यूके की सीनियर जर्नलिस्ट जूली व्हीलराइट एक आर्टिकल में लिखती हैं- ‘कुछ दिनों की कश्मकश के बाद मार्गेटा ने हार मान ली। उसने एक परिचित को अपनी बेबसी जाहिर करते हुए लिखा- ‘मैं जानती हूं कि बदनाम जिंदगी का अंत दुखद और दर्दनाक होता है, लेकिन अब मैं मजबूरी के उस मोड़ से आगे निकल चुकी हूं। यह मत समझना कि मैं दिल से बुरी या चरित्रहीन हूं... मैंने यह अंधेरा रास्ता सिर्फ और सिर्फ गरीबी की वजह से चुना है।’ मार्गेटा ने उस चित्रकार का ऑफर मान लिया। कुछ सालों तक उसने पेरिस में बतौर मॉडल काम किया। फिर वो एक नए पेशे से जुड़ गई। काम था घुड़सवारी करते हुए बोल्ड पोज देना। जिसे 'मोलीयर सर्कस' कहा जाता था। घोड़ों पर सवार होकर मार्गेटा के उस बोल्ड, बेबाक और राजसी अंदाज ने पहली बार पेरिस के रईस तबके का ध्यान अपनी तरफ खींचा। 'माता हारी : ट्रू स्टोरी' किताब के मुताबिक- एक रोज शाम का वक्त था। करतब दिखाने के बाद मार्गेटा अपने धूल से सने कपड़ों में हांफती हुई, चेहरे से पसीना पोंछते हुए लौट रही थी। तभी सर्कस के मालिक मोलीयर की आवाज गूंजी- ‘मार्गेटा, जरा इधर आना।’ थकी-हारी मार्गेटा उसके सामने खड़ी हो गई। मोलीयर ने सिगार का धुआं छोड़ते हुए गंभीर आवाज में कहा- ‘तुम ये जानलेवा करतब दिखाकर अपनी जान जोखिम में डाल रही हो। कब तक मौत से खेलती रहोगी?’ मार्गेटा ने मुस्कुराते हुए कहा- ‘और कोई रास्ता भी तो नहीं है, मोलीयर।’ मोलीयर ने पास रखी एक कुर्सी की तरफ इशारा किया- ‘बैठो यहां।’ मार्गेटा चुपचाप बैठ गई। मोलीयर ने धीमी आवाज में बोला- ‘तुमने इंडोनेशिया में जो डांस सीखा है, उसे इन रईसों के सामने नए अंदाज में पेश करो। इन भेड़ियों को हुस्न की भूख है, सर्कस की कलाबाजियों की नहीं।’ मार्गेटा ने चौंककर मोलीयर की तरफ देखा। मार्गेटा ने खुद को संभाला, कुर्सी से उठी और अपनी शॉल ओढ़ते हुए बोली- अभी तो मैं घर जा रही हूं। फिर कभी सोचती हूं इसपर।’ कुछ हफ्ते बाद… मार्गेटा ने एक नई जिंदगी शुरू करने का फैसला किया। उसने नाम बदलकर ‘माता हारी’ रख लिया। इंडोनेशिया की मलय भाषा में इसका मतलब होता है- 'सुबह की पहली किरण'। तारीख 13 मार्च, 1905, पेरिस का मशहूर मुसी गुइमेट म्यूजियम। हॉल को पुराने भारतीय और जावानीस मंदिर की तरह सजाया गया था। दरअसल, इंडोनेशिया के जावा द्वीप में बने हिंदू और बौद्ध मंदिरों को जावानीस मंदिर कहा जाता है। हॉल के भीतर मोमबत्तियों की मद्धम रोशनी। हवा में लोबान और अगरबत्तियों की भीनी-भीनी खुशबू तैर रही थी। कुर्सियों पर पेरिस के बड़े रसूखदार फौजी अफसर, अमीर व्यापारी और बड़े नेता बैठे थे। रात 8 बजे माता हारी हॉल में पहुंची। शरीर पर कपड़े कम और गहने ज्यादा। संगीत की धुन गूंजी और माता हारी उस पर थिरकती हुई मंच के ठीक बीचों-बीच आ गई। जैसे-जैसे संगीत की थाप तेज होती गई, माता हारी डांस करते हुए अपने रंग-बिरंगे कपड़ों को उतारकर एक तरफ फेंकने लगी। हॉल में बैठे लोगों की सांसें थम गईं। लोग पलकें झपकाना भूल गए। डांस के आखिरी क्लाइमेक्स पर पहुंचकर माता हारी ने सारे कपड़े उतार दिए। शरीर पर बस कुछ गहने बचे थे। अब वो थिरकते-थिरकते मंच पर रखी शिव की एक मूर्ति के पास पहुंची। हाथ जोड़े और अपनी एड़ियों के बल बैठ गई। कुछ देर बाद संगीत की थाप मद्धम होते-होते बंद हो गई। माता हारी खड़ी हुई। आंखें बंद कीं और हाथ जोड़ लिए। तभी हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। ‘माता हारी, माता हारी’ का शोर गूंजने लगा। अगली सुबह पेरिस के तमाम बड़े अखबारों में माता हारी का डांस और तस्वीरें छाई रहीं। जल्द ही वो यूरोप की सबसे महंगी, सबसे लोकप्रिय स्टार बन गई। सेना के जनरल, रसूखदार फौजी और नेता उसकी सोहबत में एक शाम बिताने के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार थे…पूरी कहानी कल, यानी रविवार को पढ़िए दूसरे एपिसोड में.. रेफरेंस : 1. Mata Hari: Courtesan and Spy : By Major Thomas Coulson 2. Mata Hari's Last Dance: By Michelle Moran 3. Mata Hari, the True Story : By Russell Warren Howe 4. The fatal lover : By Julie Wheelwright 5. The Spy: A Novel of Mata Hari : By Paulo Coelho 6. A Tangled Web: Mata Hari: By Mary W. Craig
मोदी सरकार ने 20 जुलाई से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र का एजेंडा बता दिया। कुल 7 विधेयकों की सूची में 2 पुराने और 5 नए विधेयक हैं। इसमें ‘परिसीमन विधेयक’ का जिक्र नहीं है, जिसके लिए जरूरी दो-तिहाई सांसदों का समर्थन जुटाने के लिए सरकार ने एड़ी-चोटी का जोर लगा रखा है। क्या दर्जनों विपक्षी सांसद तोड़ने के बावजूद नंबर्स नहीं जुटा पाई सरकार या संसद सत्र के बीच अचानक चौंका देगी; समझेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: परिसीमन विधेयक है क्या और अप्रैल में पारित क्यों नहीं हो सका था?जवाबः आम बोलचाल में जिसे हम परिसीमन विधेयक कह रहे, वो दो विधेयकों का पैकेज है। जिसमें लोकसभा की अधिकतम सीटें 550 से बढ़ाकर 850 करने और लोकसभा क्षेत्रों का आकार दोबारा तय करने (परिसीमन) के प्रावधान हैं।मोदी सरकार ने 16 से 18 अप्रैल 2026 को संसद का विशेष सत्र बुलाकर ये विधेयक पेश किए। तर्क दिया कि 2029 चुनाव तक महिला आरक्षण कानून लागू करने के लिए इन्हें पारित होना जरूरी है।विपक्षी पार्टियां इसके विरोध में एकजुट हो गईं। उनका तर्क था कि महिला आरक्षण की आड़ में बीजेपी अपना एजेंडा पूरा करना चाहती है। परिसीमन विधेयक से ज्यादा जनसंख्या वाले हिन्दी भाषी राज्यों को फायदा मिलेगा, जहां बीजेपी का गढ़ है। जबकि जनसंख्या वृद्धि रोकने वाले राज्यों को नुकसान होगा।संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत जरूरी होता है। यानी वोटिंग में आधे से ज्यादा सदस्य सदन में मौजूद हों और जितने सदस्य मौजूद हैं, उनमें से कम से कम दो-तिहाई सांसद इसके पक्ष में वोट दें… सवाल-2: क्या इसबार भी सरकार जरूरी नंबर्स नहीं जुटा पाई?जवाबः अप्रैल के मुकाबले दोनों सदनों में सरकार का समर्थन बढ़ा है, लेकिन दो-तिहाई बहुमत से अब भी पीछे है… लोकसभा में NDA के साथ 318 सांसद राज्यसभा में NDA के साथ 152 सांसद सवाल-3: तो क्या मानसून सत्र में परिसीमन विधेयक नहीं आएगा?जवाबः संविधान के आर्टिकल 368 के तहत संविधान संशोधन विधेयक पेश करने के लिए राष्ट्रपति की अनुमति नहीं लेनी होती। इसे सरकार का कोई मंत्री या सांसद निजी तौर पर भी संसद सत्र के दौरान पेश कर सकता है। ऐसा भी कोई नियम नहीं है कि सत्र के एजेंडे में बिल के बारे में बताना जरूरी हो। इतिहास में भी कई संविधान संशोधन बिल अचानक लाए जा चुके हैं। कई संकेत हैं कि सरकार सत्र के बीच किसी दिन परिसीमन बिल ला सकती है… सवाल-4: तो फिर बिल पारित कराने के लिए सरकार के पास और क्या रास्ते हैं?जवाब: फिलहाल सरकार लोकसभा में दो-तिहाई के आंकड़े से 41 सीट और राज्यसभा में 11 सीट दूर है। ये कमी कुछ छोटे क्षेत्रीय दलों से पूरी हो सकती है… 1. लोकसभा में शरद पवार की NCP, DMK और JMM के सांसदों पर दांव 2. राज्यसभा में YSR कांग्रेस और बीजू जनता दल की जरूरत सवाल-5: आखिर परिसीमन बिल पारित होने से क्या हो जाएगा, बीजेपी इतना जोर क्यों लगा रही?जवाबः नए परिसीमन के बाद लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में 50% सीटें बढ़ेंगी। गृहमंत्री अमित शाह ने इसका फॉर्मूला बताते हुए कहा था, ‘मान लीजिए कि 100 सीटें हैं, जिसमें 33% आरक्षण देना है, तो इसमें 50 सीटें बढ़ाएंगे। इस हिसाब से 150 सीट होती हैं। लोकसभा में ये राउंड ऑफ फिगर 850 है।' सरकार का कहना था कि सारे राज्यों में सीटें 'आनुपातिक रूप से' बढ़ेंगी। यानी, अगर 543 सीटों की लोकसभा में तमिलनाडु के पास 7.18% हिस्सेदारी, यानी 39 सीटें हैं, तो 850 सीटों की लोकसभा में भी 7.18% हिस्सेदारी यानी 61 सीटें होंगी। हालांकि परिसीमन विधेयक में सीटें 'आनुपातिक रूप से बढ़ाने’ की गारंटी देने वाला कोई प्रावधान नहीं है। इसके उलट संविधान का अनुच्छेद 81(2)(a) कहता है कि सीटें जनसंख्या के अनुपात में मिलेंगी, न कि सभी राज्यों में बराबर प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होगी। इसमें भी सरकार ने कोई बदलाव नहीं किया। यानी 2011 की जनगणना के आधार पर जनसंख्या के अनुपात से ही परिसीमन हो सकता है। ऐसे में ज्यादा जनसंख्या वाले राज्यों को ज्यादा सीटें और कम जनसंख्या वाले राज्यों को कम सीटें मिलेंगी। इससे यूपी, बिहार, राजस्थान, दिल्ली और मध्य प्रदेश सबसे ज्यादा फायदा में होंगे। ये सभी हिंदी बेल्ट के राज्य हैं, जहां बीजेपी का स्ट्रॉन्ग होल्ड है। इससे बीजेपी के पिछले तीन चुनावों के आंकड़ों के आधार पर उसके लिए अच्छे और बुरे दोनों सिनैरियो में फायदा है… 1. बीजेपी के लिए बेस्ट केस सिनैरियोः अगर 2019 का प्रदर्शन दोहराती है 2. बीजेपी के वर्स्ट केस सिनैरियो: अगर 2024 का प्रदर्शन दोहराती है ------ ये खबर भी पढ़ें… आज का एक्सप्लेनर:मोदी सरकार को क्यों चाहिए 362 सांसद; TMC के 20, शिवसेना UBT के 6 सांसद टूटे; बाकी 44 कहां से जुटाएंगे 14 जून को TMC के 28 में से 20 लोकसभा सांसदों ने गुमनाम सी पार्टी NCPI में विलय कर लिया। आज शिवसेना (उद्धव गुट) के 9 से 6 लोकसभा सांसदों ने भी बगावत कर दी। इससे पहले 24 अप्रैल को आम आदमी पार्टी के 10 में से 7 राज्यसभा सांसदों ने भी बगावत कर दी थी। ये सभी बागी BJP या NDA में शामिल हो रहे हैं। पूरी खबर पढ़ें…
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर साइबर हमलों को लेकर एक बड़ा और चौंकाने वाला दावा किया है। ट्रंप का कहना है कि रूस, चीन, ईरान और उत्तर कोरिया जैसी विदेशी ताकतें और कुछ गैर-सरकारी समूह साइबर हमलों के जरिए अमेरिकी चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने की पूरी क्षमता रखते हैं। उन्होंने आशंका जताई है कि देश की डिजिटल चुनाव प्रणाली में सेंध लगाकर नतीजों के साथ छेड़छाड़ की जा सकती है। ट्रंप के इस बयान के बाद वैश्विक पटल पर अमेरिका के चुनावी सिस्टम की सुरक्षा को लेकर बहस छिड़ गई है। हालांकि, 'एसोसिएटेड प्रेस' (AP) की विस्तृत रिपोर्ट और शीर्ष चुनाव विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि अमेरिका की चुनाव व्यवस्था दुनिया की सबसे जटिल, विकेंद्रीकृत और अभेद्य प्रणालियों में से एक है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि अमेरिकी चुनाव प्रणाली काम कैसे करती है और इसमें सुरक्षा के क्या इंतजाम हैं।क्यों हैक करना नामुमकिन है अमेरिका का चुनाव सिस्टम?एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में चुनाव प्रक्रिया भारत या अन्य देशों की तरह किसी एक केंद्रीय निर्वाचन आयोग द्वारा संचालित नहीं की जाती। पूरे अमेरिका में चुनाव किसी एक संस्था के बजाय 10,000 से ज्यादा स्वतंत्र और अलग-अलग स्थानीय चुनाव क्षेत्रों (लोकल ज्यूरिसडिक्शन) में कराए जाते हैं।अमेरिकी संविधान के तहत राज्यों को अपने तरीके से चुनाव कराने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है। हालांकि अमेरिकी कांग्रेस (संसद) कुछ बुनियादी नियम तय कर सकती है, लेकिन वोटिंग मशीनों के चयन से लेकर गिनती तक की पूरी जिम्मेदारी पूरी तरह से राज्यों और स्थानीय चुनाव अधिकारियों के कंधों पर होती है। यही वजह है कि पूरे देश में कोई एक सेंट्रलाइज्ड (केंद्रीय) डिजिटल सिस्टम नहीं है जिसे एक साथ हैक करके नतीजे बदले जा सकें। हर क्षेत्र का अपना अलग और ऑफलाइन ढांचा होता है।वोटर फ्रॉड रोकने के लिए थ्री-लेयर सिक्योरिटी सिस्टमअमेरिकी चुनाव प्रणाली में गड़बड़ी या धोखाधड़ी (वोटर फ्रॉड) की आशंकाएं न के बराबर होती हैं, और यदि कोई ऐसा प्रयास करता भी है, तो वह तुरंत पकड़ में आ जाता है। अमेरिकी कानून के तहत चुनावी नियमों का उल्लंघन करना एक बेहद गंभीर और गैर-जमानती श्रेणी का अपराध माना जाता है।सुरक्षा के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:कठोर कानूनी कार्रवाई: एक से अधिक बार मतदान करना, किसी अन्य मृत या जीवित व्यक्ति के नाम पर फर्जी वोट डालना, बैलेट पेपर से छेड़छाड़ करना या गलत दस्तावेज देना संघीय अपराध है, जिसके लिए भारी आर्थिक जुर्माना और लंबी जेल की सजा का प्रावधान है।पहचान का कड़ा सत्यापन: मतदान केंद्र पर वोट डालते समय अधिकांश राज्यों में वैध फोटो पहचान पत्र (Photo ID) मांगा जाता है।मेल-इन बैलेट सुरक्षा: डाक (Mail-in Ballot) के जरिए होने वाले मतदान में सुरक्षा को दोगुना करने के लिए मतदाता के हस्ताक्षरों का मिलान (Signature Verification), आधिकारिक गवाहों की गवाही या नोटरी जैसी बेहद जटिल और अतिरिक्त कानूनी प्रक्रियाएं अपनाई जाती हैं।2020 चुनाव चोरी के दावों पर क्या कहते हैं आधिकारिक आंकड़े?डोनाल्ड ट्रंप लगातार यह सार्वजनिक दावा करते रहे हैं कि साल 2020 का राष्ट्रपति चुनाव एक बड़ी धांधली के जरिए उनसे चुराया गया था। इस दावे की जमीनी हकीकत जानने के लिए एसोसिएटेड प्रेस ने साल 2021 में ट्रंप द्वारा विवादित ठहराए गए छह सबसे प्रमुख स्विंग स्टेट्स (राज्यों) में वोटर फ्रॉड के हर एक संभावित और संदिग्ध मामले की विस्तृत समीक्षा की थी।इस गहन पड़ताल में पाया गया कि इन राज्यों में कुल मिलाकर 475 से भी कम गड़बड़ी के मामले सामने आए थे, जो कि चुनाव के अंतिम परिणाम को बदलने के लिहाज से तिनके के बराबर भी नहीं थे। बड़े पैमाने पर चुनावी धांधली के ट्रंप के इन तमाम कानूनी आरोपों को अमेरिका की कई प्रांतीय व संघीय अदालतों, राज्य के चुनाव अधिकारियों और यहां तक कि ट्रंप सरकार के खुद के 'होमलैंड सिक्योरिटी विभाग' ने सिरे से खारिज कर दिया था। उस दौरान ट्रंप द्वारा ही नियुक्त किए गए तत्कालीन अमेरिकी अटॉर्नी जनरल विलियम बार ने भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया था कि जांच में ऐसा कोई भी ठोस सबूत नहीं मिला है जो 2020 के चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सके।ट्रंप के आरोपों पर भड़का चीन, कहा- बेबुनियाद और मनगढ़ंतडोनाल्ड ट्रंप द्वारा राष्ट्र के नाम संबोधन में लगाए गए साइबर घुसपैठ के आरोपों पर चीन ने बेहद कड़ी और आक्रामक प्रतिक्रिया दी है। एपी की रिपोर्ट के अनुसार, चीनी विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता लिन जियान ने बीजिंग में आयोजित एक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान साफ कहा कि चीन ने कभी भी अमेरिका के आंतरिक मामलों या उनके चुनावों में किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं किया है और न ही भविष्य में उसकी ऐसी कोई मंशा है।प्रवक्ता लिन जियान ने ट्रंप के दावों को पूरी तरह से मनगढ़ंत, राजनीति से प्रेरित और बेबुनियाद करार दिया। उन्होंने वाशिंगटन को नसीहत देते हुए अपील की कि अमेरिका अपनी घरेलू राजनीति और चुनावी खींचतान में चीन का नाम घसीटना तुरंत बंद करे और इसके बजाय दोनों महाशक्तियों के द्विपक्षीय रिश्तों को रचनात्मक तरीके से बेहतर बनाने की दिशा में काम करे।
अमेरिका की राजनीति में एक बार फिर भूचाल आ गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक प्राइम-टाइम संबोधन में चीन पर 2020 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में अब तक की सबसे बड़ी 'डेटा सेंधमारी' (Data Breach) का गंभीर आरोप लगाया है। ट्रंप का दावा है कि चीन ने करीब 22 करोड़ अमेरिकी मतदाताओं का निजी डेटा अवैध रूप से हासिल किया था। इस खुलासे के साथ ही ट्रंप ने अपनी ही खुफिया एजेंसियों के शीर्ष अधिकारियों को 'डीप स्टेट' करार देते हुए उन पर इस जानकारी को सालों तक छिपाने का आरोप लगाया है।ट्रंप का दावा: 'चुनावी सुरक्षा में सबसे बड़ी सेंध'ट्रंप ने व्हाइट हाउस से देश को संबोधित करते हुए दावा किया कि चीन ने 2020 के चुनाव चक्र के दौरान बड़ी योजना के तहत अमेरिकी मतदाताओं के नाम, पते, फोन नंबर और राजनीतिक पसंद जैसी संवेदनशील जानकारी चुराई। राष्ट्रपति का आरोप है कि चीन ने इस डेटा का इस्तेमाल चुनाव को प्रभावित करने और अमेरिकी जनता को गुमराह करने के लिए एक 'डेटा एक्सप्लॉयटेशन यूनिट' बनाई थी। उन्होंने इसे अमेरिकी चुनाव प्रणाली की 'चौंकाने वाली कमजोरियां' (Shocking Vulnerabilities) करार दिया और कहा कि अब वे इससे जुड़े खुफिया दस्तावेजों को सार्वजनिक कर रहे हैं ताकि चुनाव प्रणाली की खामियों को सुधारा जा सके।खुफिया एजेंसियों पर भड़के राष्ट्रपतिट्रंप के बयानों का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा उनकी अपनी खुफिया एजेंसियों के प्रति अविश्वास है। उन्होंने आरोप लगाया कि सीआईए (CIA), एफबीआई (FBI) और अन्य इंटेलिजेंस विभागों के 'रॉग ब्यूरोक्रेट्स' (Rogue Bureaucrats) ने जानबूझकर चीन की इस दखलंदाजी को राष्ट्रपति और अमेरिकी जनता से छिपाए रखा। ट्रंप ने मांग की है कि इस 'कवर-अप' में शामिल अधिकारियों की जांच हो, उन्हें बर्खास्त किया जाए और उन पर आपराधिक मुकदमे चलाए जाएं। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि उन्हें उन संस्थानों पर भरोसा नहीं है जिन्होंने देश की सुरक्षा से जुड़ी इस बड़ी जानकारी को दबाया।क्या ये आरोप राजनीति से प्रेरित हैं?ट्रंप के इन दावों को अमेरिका में आगामी नवंबर में होने वाले मिड-टर्म चुनावों से जोड़कर देखा जा रहा है। आलोचकों और डेमोक्रेटिक नेताओं का आरोप है कि ट्रंप इन 'संदेह पैदा करने वाले' बयानों के जरिए अपनी हार के पुराने दावों को फिर से जिंदा कर रहे हैं और मतदाताओं के मन में चुनाव प्रक्रिया के प्रति अविश्वास पैदा करना चाहते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि 2021 की खुफिया रिपोर्ट में ऐसी कोई ठोस पुष्टि नहीं हुई थी कि किसी विदेशी शक्ति ने चुनाव नतीजों या वोटिंग मशीनों को प्रभावित किया हो। चीन ने भी इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि वह कभी भी अमेरिका के आंतरिक मामलों या चुनावों में दखल नहीं देता।नया चुनावी कानून: 'SAVE America Act' की वकालतअपने संबोधन में ट्रंप ने 'SAVE America Act' को तुरंत पास करने की अपील की। इस प्रस्तावित कानून का उद्देश्य मतदान प्रक्रिया को और अधिक कड़ा बनाना है, जिसमें फोटो आईडी और नागरिकता संबंधी सख्त नियम शामिल हैं। राष्ट्रपति का कहना है कि ये कदम चुनावी अखंडता को बहाल करने के लिए अनिवार्य हैं। हालांकि, जानकारों का मानना है कि यह सब चुनावी लाभ उठाने की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा हो सकता है ताकि आने वाले चुनावों में जनता का एक वर्ग सिस्टम की पारदर्शिता पर सवाल उठाए
रणनीतिक रूप से दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री मार्ग 'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' पर तनाव एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है। फारस की खाड़ी में अमेरिकी नौसेना ने अपनी ताकत का प्रदर्शन करते हुए ईरान की ओर बढ़ रहे तीन मालवाहक जहाजों को बीच रास्ते में ही रोक दिया है। इस चौंकाने वाली कार्रवाई के दौरान अमेरिकी मरीन कमांडो का एक दस्ता सीधे एक जहाज पर उतरा, जिससे इलाके में हड़कंप मच गया। यह कदम ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच एक बड़े सैन्य संदेश के रूप में देखा जा रहा है।क्या है 'ऑपरेशन शिकंजा'?अमेरिकी केंद्रीय कमान (CENTCOM) के सूत्रों के अनुसार, यह कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा बनाए रखने और ईरान द्वारा की जाने वाली संभावित गतिविधियों पर नजर रखने के लिए की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी युद्धपोतों ने ईरान की तरफ जा रहे तीन जहाजों को घेरा और उनकी तलाशी ली। इस दौरान एक जहाज पर अमेरिकी मरीन कमांडो के उतरने की तस्वीरें सामने आई हैं, जिसमें वे पूरी तरह से हथियारों से लैस नजर आ रहे हैं। अमेरिकी नौसेना का दावा है कि ये जहाज संदिग्ध गतिविधियों में शामिल हो सकते थे, जिसके कारण यह कड़ा कदम उठाना पड़ा।स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज क्यों है इतना अहम?स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज दुनिया के तेल व्यापार की लाइफलाइन माना जाता है। वैश्विक तेल आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा इसी संकीर्ण रास्ते से गुजरता है। पिछले कुछ महीनों में ईरान ने इस क्षेत्र में कई विदेशी तेल टैंकरों को जब्त करने या परेशान करने का प्रयास किया है, जिसके जवाब में अमेरिका ने इस इलाके में अपनी तैनाती को कई गुना बढ़ा दिया है। अब अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी सैन्य मौजूदगी के जरिए इस समुद्री गलियारे को किसी भी तरह की दखलअंदाजी से मुक्त रखने के लिए प्रतिबद्ध है।ईरान की प्रतिक्रिया और भविष्य के हालातइस घटना के बाद तेहरान की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन विशेषज्ञ इसे एक बड़े सैन्य टकराव की आहट के तौर पर देख रहे हैं। ईरान पहले ही अमेरिका के इस 'शक्ति प्रदर्शन' को अपने समुद्री क्षेत्र की संप्रभुता का उल्लंघन बता चुका है। उधर, अमेरिका के इस कदम से कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव की आशंका बढ़ गई है। आने वाले दिनों में हॉर्मुज के जलडमरूमध्य में अमेरिका और ईरान के बीच यह 'बिल्ली-चूहे' का खेल अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।
सिंधु जल संधि (Indus Water Treaty) को लेकर पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की चालें उसी पर भारी पड़ रही हैं। सालों से भारत को पानी के विवाद में फंसाने की कोशिश कर रहा पाकिस्तान अब खुद उसी जाल में फंस गया है। ताजा जानकारी के अनुसार, स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (Permanent Court of Arbitration) में चल रही कानूनी लड़ाई का खर्च अब पाकिस्तान को खुद ही उठाना पड़ रहा है, जिसमें भारत की ओर से होने वाला कानूनी खर्च भी शामिल है। यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की एक बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जा रही है।पाकिस्तान की 'जालसाजी' का उल्टा असरदरअसल, सिंधु जल संधि के तहत किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। पाकिस्तान की मंशा भारत के प्रोजेक्ट्स में रुकावट पैदा करने की थी, लेकिन भारत ने शुरू से ही स्पष्ट कर दिया था कि वह संधि के नियमों के भीतर रहकर ही काम कर रहा है। पाकिस्तान द्वारा एकतरफा मध्यस्थता की मांग करने के बाद कानूनी प्रक्रिया शुरू हुई, जिसका पूरा वित्तीय बोझ अब पाकिस्तान की ही तिजोरी पर पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय कानूनी जानकारों का कहना है कि यह पाकिस्तान के लिए एक बड़ा सबक है कि बिना ठोस आधार के अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को घेरने की कोशिश करना उसे कितना महंगा पड़ रहा है।भारत का रुख रहा स्पष्ट और अडिगभारत ने हमेशा से यह स्पष्ट किया है कि किशनगंगा और रतले प्रोजेक्ट्स पूरी तरह से सिंधु जल समझौते के प्रावधानों के अनुरूप हैं। भारत ने इन मंचों के साथ जुड़ने में हमेशा सावधानी बरती है क्योंकि भारत का मानना रहा है कि इन विवादों का समाधान आपसी बातचीत या संधि में वर्णित तटस्थ विशेषज्ञ (Neutral Expert) के माध्यम से होना चाहिए। पाकिस्तान ने जब इस प्रक्रिया को दरकिनार कर कोर्ट का रुख किया, तो कानूनी प्रक्रियाओं के तहत खर्चे का भुगतान करने की जिम्मेदारी भी उसी की बन गई।रणनीतिक जीत और भविष्य का रास्तायह घटनाक्रम न केवल भारत की कूटनीतिक और कानूनी मजबूती को दर्शाता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का पक्ष कितना सशक्त है। पाकिस्तान की इस हरकत ने उसे दुनिया के सामने एक ऐसा देश बना दिया है जो केवल भारत के विकास को रोकने के लिए अपनी आर्थिक स्थिति खराब कर रहा है। अब देखने वाली बात यह होगी कि इस कानूनी फजीहत के बाद क्या पाकिस्तान सिंधु जल संधि के प्रति अपने रवैये में कोई बदलाव लाता है या नहीं। फिलहाल, भारत अपनी जल परियोजनाओं को लेकर पूरी तरह आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है और किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद राष्ट्रहित को सर्वोपरि रख रहा है।
पश्चिम एशिया (Mid-East) में जारी भीषण तनाव के बीच अमेरिका और उसके सबसे भरोसेमंद सहयोगी देश इजरायल के बीच अंदरूनी खींचतान अब खुलकर दुनिया के सामने आ गई है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ईरान के साथ पिछले महीने हुए शांति समझौते का विरोध करने वाले और इसे सोशल मीडिया पर बदनाम करने की कोशिश करने वाले इजरायली तत्वों को सीधे और बेहद तल्ख शब्दों में 'भाड़ में जाओ' (Go to Hell) कहकर कूटनीतिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। बेहद लोकप्रिय पोडकास्ट 'द जो रोगन एक्सपीरियंस' (The Joe Rogan Experience) पर एक विस्तृत तीन घंटे की बातचीत के दौरान उपराष्ट्रपति वेंस ने इजरायल के कड़े रुख पर सवाल उठाते हुए गंभीर आरोप लगाए कि कुछ इजरायली ताकतें किसी स्पष्ट रणनीतिक लक्ष्य के बिना ईरान के साथ इस सैन्य संघर्ष को अनिश्चितकाल के लिए खींचना चाहती हैं।इजरायली सोशल मीडिया कैंपेन पर भड़के वेंस: अमेरिकी जनमत को प्रभावित करने का लगाया आरोपपॉडकास्ट पर खुलकर बात करते हुए अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि अमेरिकी प्रशासन इस बात से पूरी तरह वाकिफ है कि इजरायल के भीतर कुछ ऐसे प्रभावी लोग और समूह सक्रिय हैं जो अमेरिकी जनमत को प्रभावित करने और उसे बदलने के लिए बड़े पैमाने पर गुप्त अभियान चला रहे हैं। वेंस ने आरोप लगाया कि इन अभियानों का एकमात्र मकसद यह सुनिश्चित करना है कि ईरान के साथ अमेरिका की जंग कभी खत्म न हो और यह अनिश्चितकाल तक चलती रहे। वेंस ने खुलासा किया कि इजरायली सरकार के करीबी सूत्रों और उनसे जुड़े व्यक्तियों ने खुद उनके खिलाफ एक बड़ा दुष्प्रचार अभियान चलाया क्योंकि वह ईरान के साथ एक ऐसा कूटनीतिक समझौता स्थापित करने का प्रयास कर रहे थे जो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा निर्धारित राष्ट्रीय और सुरक्षा लक्ष्यों के बिल्कुल अनुकूल था।लीक रिपोर्ट्स और ऑनलाइन हमलों का पर्दाफाश: वेंस बोले- 'मैं अमेरिकी हितों के लिए अडिग रहूंगा'उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इस प्रोपेगैंडा के काम करने के तरीके को बेनकाब करते हुए कहा कि इस अभियान के तहत अमेरिकी पत्रकारों को संवेदनशील और आधी-अधूरी जानकारियां जानबूझकर लीक की गईं ताकि अमेरिकी सरकार की कूटनीतिक कोशिशों को कमजोर किया जा सके। इसके साथ ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर उन पर व्यक्तिगत हमले किए गए। इन साजिशों के पीछे काम करने वाले इजरायली सिंडिकेट का जिक्र करते हुए वेंस ने बेहद तल्ख लहजे में कहा, भाड़ में जाओ। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे विदेशी ताकतों के इस तरह के दबाव के आगे कभी नहीं झुकेंगे और वही करेंगे जो अमेरिकी नागरिकों और अमेरिका के व्यापक राष्ट्रीय हितों के लिए सबसे बेहतर और सही होगा।फंडिंग नेटवर्क का बड़ा खुलासा: पूर्व ट्रंप अधिकारी और इजरायली सरकार के बीच कनेक्शनबातचीत के दौरान उपराष्ट्रपति वेंस ने उन खुफिया रिपोर्ट्स का भी हवाला दिया जिनमें एक बड़े वित्तीय नेक्सस की बात सामने आई थी। इन खबरों के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप के पिछले चुनावी अभियान से जुड़े रहे एक पूर्व अमेरिकी अधिकारी को इजरायली सरकार के करीबियों से भारी-भरकम फंडिंग मिली थी। इस फंड का उपयोग कुछ विशेष सोशल मीडिया प्रभावितों और रणनीतिकारों को भुगतान करने के लिए किया गया था ताकि वे ईरान नीति को लेकर सीधे उपराष्ट्रपति वेंस पर तीखे हमले बोल सकें। वेंस ने साफ किया कि उन्हें वॉशिंगटन की नीतियों को प्रभावित करने वाली विदेशी सरकारों की कोशिशों या अमेरिकी सरकार के भीतर से होने वाली आलोचनाओं से कोई गुरेज नहीं है क्योंकि इजरायल और दुनिया के अन्य देश हमेशा अपने हितों के लिए ऐसा करते आए हैं। लेकिन उन्हें असल आपत्ति तब होती है जब अमेरिकी नीति निर्माता इन बाहरी प्रभावों के दबाव में आकर देश के फैसले बदलने लगते हैं।एकमात्र मजबूत सहयोगी पर निशाना: पिछले महीने के कूटनीतिक तनाव की यादें हुईं ताजाजेडी वेंस द्वारा की गई यह ताजा टिप्पणी ईरान युद्ध और कूटनीति के मुद्दे पर इजरायली अधिकारियों की अब तक की सबसे सीधी और सबसे तीखी अमेरिकी आलोचना मानी जा रही है। इससे पहले पिछले महीने भी तेहरान के साथ वॉशिंगटन के समझौते की सार्वजनिक रूप से निंदा करने वाले इजरायली कैबिनेट के मंत्रियों को वेंस ने कड़ा आड़े हाथों लिया था। तब उन्होंने बेहद गंभीर लहजे में इजरायली नेतृत्व को नसीहत देते हुए कहा था कि अगर वह खुद इजरायली सरकार के मंत्री होते, तो दुनिया में बचे अपने एकमात्र सबसे शक्तिशाली और मजबूत सहयोगी (अमेरिका) पर इस तरह के घटिया और सार्वजनिक हमले कभी नहीं करते।
संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) में उच्च शिक्षा प्राप्त करने और करियर बनाने का सपना देखने वाले भारतीय छात्रों के लिए एक बेहद चिंताजनक और बड़ा झटका देने वाला फैसला सामने आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने विदेशी छात्रों, सांस्कृतिक विनिमय आगंतुकों (Exchange Visitors) और विदेशी पत्रकारों के लिए वीजा नियमों को बेहद कड़ा करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है। होमलैंड सिक्योरिटी डिपार्टमेंट (DHS) द्वारा जारी किए गए इन नए नियमों के तहत अब अंतरराष्ट्रीय छात्रों के रुकने की अधिकतम अवधि को सीमित कर दिया गया है। इस नए आदेश का सीधा और तगड़ा असर अमेरिका में पढ़ाई कर रहे तीन लाख से भी अधिक भारतीय छात्र-छात्राओं पर पड़ने जा रहा है, जिससे उनका भविष्य अब अनिश्चितता के भंवर में फंस गया है।F, J और I वीजा की 'असीमित अवधि' समाप्त: अब तय समय सीमा के भीतर ही रहना होगा अमेरिका मेंवर्तमान व्यवस्था के तहत, अमेरिका में F वीजा (इंटरनेशनल स्टूडेंट्स), J वीजा (सांस्कृतिक और शैक्षणिक एक्सचेंज प्रोग्राम विजिटर्स) और I वीजा (विदेशी मीडिया कर्मी) धारक अपने संबंधित स्टडी प्रोग्राम, रिसर्च वर्क या मीडिया जॉब की पूरी अवधि तक कानूनी रूप से अमेरिका में रहने के हकदार होते थे। इसे 'ड्यूरेशन ऑफ स्टेटस' कहा जाता था। लेकिन ट्रंप सरकार के नए नियम ने इस असीमित प्रावधान को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। अब इन सभी वीजा धारकों के लिए एक 'फिक्स्ड पीरियड' यानी तय समय सीमा निर्धारित कर दी गई है। नए नियम के अनुसार, स्टूडेंट और एक्सचेंज वीजा की अधिकतम अवधि चार साल से ज्यादा की नहीं होगी। यह नया नियम फेडरल रजिस्टर में प्रकाशित होने के 60 दिनों के भीतर लागू हो जाएगा, जो कि अमेरिकी कांग्रेस की समीक्षा के अधीन है।कोर्स बदलने और स्कूल ट्रांसफर पर भी लगी सख्त पाबंदी: देश छोड़ने का ग्रेस पीरियड भी हुआ आधाट्रंप प्रशासन का यह नया नियम केवल समय सीमा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह छात्रों की शैक्षणिक स्वतंत्रता को भी काफी हद तक प्रभावित करता है। नए नियमों के मुताबिक, ग्रेजुएट स्तर के छात्र अब अपनी मर्जी से कभी भी अपना एजुकेशनल मकसद या विषय नहीं बदल सकेंगे। इसके साथ ही, बिना विशेष सरकारी अनुमति के एक स्कूल से दूसरे स्कूल या यूनिवर्सिटी में ट्रांसफर लेने पर भी पूरी तरह रोक लगा दी गई है। सबसे बड़ा झटका कोर्स पूरा होने के बाद मिलने वाले 'ग्रेस पीरियड' पर लगा है। पहले अपनी डिग्री या प्रैक्टिकल ट्रेनिंग पूरी करने के बाद छात्रों को अमेरिका में रहने या नौकरी तलाशने के लिए 60 दिनों का समय मिलता था, जिसे अब घटाकर केवल 30 दिन कर दिया गया है।विदेशी पत्रकारों पर भी चला चाबुक: चीनी पत्रकारों के लिए केवल 90 दिनों की होगी सीमानए नियम का दायरा केवल छात्रों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसने विदेशी मीडिया कर्मियों (I-Visa) को भी अपनी जद में ले लिया है। विदेशी पत्रकारों के लिए जारी होने वाला वीजा, जो पहले सालों तक वैध रहता था, अब अधिकतम 240 दिनों तक के लिए ही वैध होगा। विशेष रूप से चीनी मीडिया घरानों और चीनी नागरिकों के मामले में इसे और कड़ा करते हुए मात्र 90 दिनों तक सीमित कर दिया गया है। हालांकि, नियमों में यह प्रावधान रखा गया है कि विशेष परिस्थितियों में वीजा धारक समय सीमा बढ़ाने (Visa Extension) के लिए आवेदन कर सकते हैं, लेकिन इसकी मंजूरी पूरी तरह से कड़े प्रशासनिक मूल्यांकन पर निर्भर करेगी।इमिग्रेशन विशेषज्ञों और पूर्व अधिकारियों ने उठाए सवाल: 'क्या इन्हें समझ नहीं कि जिंदगी कैसे चलती है?'ट्रंप प्रशासन के इस कड़े कदम की अमेरिका के भीतर ही तीखी आलोचना शुरू हो गई है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, होमलैंड सिक्योरिटी डिपार्टमेंट (DHS) के पूर्व अधिकारी डग रैंड ने इस फैसले की निंदा करते हुए कहा, ज्यादातर अमेरिकी इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि अंतरराष्ट्रीय छात्रों का स्वागत करना और अनावश्यक लालफीताशाही (Red Tape) को खत्म करना देश के विकास के लिए कितना जरूरी है। लेकिन यह नया नियम इसके ठीक उलट काम करेगा और अमेरिका की साख को नुकसान पहुंचाएगा। वहीं कैटो इंस्टीट्यूट में इमिग्रेशन स्टडीज के डायरेक्टर डेविड जे. बियर ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, जो छात्र अपने जीवन के कई साल और लाखों डॉलर यहां खर्च कर चुके हैं, उनके पास अब नौकरी ढूंढने या स्पॉन्सरशिप हासिल करने के लिए केवल 30 दिन होंगे, वरना वे अवैध अप्रवासी घोषित हो जाएंगे। क्या नीति निर्माताओं को यह समझ नहीं है कि एक आम इंसान की जिंदगी कैसे काम करती है?
अमेरिका में आगामी नवंबर में होने वाले बेहद महत्वपूर्ण मिडटर्म इलेक्शंस (Midterm Elections) से ठीक पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर चीन के खिलाफ बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नया भूचाल ला दिया है। गुरुवार 16 जुलाई 2026 को व्हाइट हाउस से दिए गए अपने एक बेहद तीखे और सनसनीखेज 25 मिनट के विशेष संबोधन में राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने कुछ ऐसी अत्यंत संवेदनशील और क्लासिफाइड खुफिया फाइलों को सार्वजनिक किया है, जो अमेरिकी चुनावी व्यवस्था में चीन की सीधी और अवैध दखलअंदाजी का पर्दाफाश करती हैं। हालांकि, राष्ट्रपति ट्रंप का यह नया और गंभीर दावा खुद अमेरिका की ही शीर्ष खुफिया एजेंसियों की उन पुरानी रिपोर्टों के बिल्कुल विपरीत है, जिनमें कहा गया था कि 2020 के चुनावों में चीनी हस्तक्षेप के कोई पुख्ता सबूत नहीं मिले हैं।चीनी हैकर्स के निशाने पर अमेरिकी वोटर: 22 करोड़ मतदाताओं के निजी डेटा में सेंधमारी का गंभीर आरोपराष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए बेहद चौंकाने वाला आरोप लगाया कि उनके द्वारा डीक्लासिफाइड किए गए दस्तावेजों से साफ होता है कि चीनी खुफिया एजेंसियों और हैकर्स ने अवैध रूप से लगभग 22 करोड़ अमेरिकी मतदाताओं की गुप्त फाइलें हासिल कर ली थीं। ट्रंप के अनुसार, इस हैक किए गए डेटाबेस में अमेरिकी नागरिकों के नाम, उनके स्थायी पते, फोन नंबर और वोटर रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाली बेहद संवेदनशील जानकारियां शामिल थीं। ट्रंप यहीं नहीं रुके, उन्होंने अमेरिकी खुफिया तंत्र (Intelligence Community) के ही कुछ अंदरूनी अधिकारियों पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि इन लोगों ने चीन की इस खतरनाक साइबर साजिश की गंभीरता को जानबूझकर छिपाया और दबाया था ताकि जनता को गुमराह किया जा सके।बीजिंग का पलटवार और ट्रेड वॉर की वापसी का खतरा: शी जिनपिंग से सुधरते रिश्ते फिर अधर मेंट्रंप के इस बेहद आक्रामक भाषण के तुरंत बाद चीन ने इन आरोपों पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया दर्ज कराई है। वाशिंगटन स्थित चीनी दूतावास के आधिकारिक प्रवक्ता लियू चांग ने एक बयान जारी कर ट्रंप के दावों को सिरे से खारिज करते हुए कहा, चीन ने अमेरिका के आंतरिक और राष्ट्रपति चुनावों में कभी कोई हस्तक्षेप नहीं किया है और न ही भविष्य में ऐसा करने की हमारी कोई मंशा है। कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप के इस कदम से दोनों महाशक्तियों के बीच हाल ही में पटरी पर लौट रहे व्यापारिक संबंध एक बार फिर पूरी तरह से पटरी से उतर सकते हैं। गौरतलब है कि पिछले साल लंबे चले ट्रेड वॉर के बाद संबंधों को सुधारने के उद्देश्य से खुद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बीजिंग जाकर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से बेहद सकारात्मक मुलाकात की थी, जिस पर अब पानी फिरता नजर आ रहा है।डेमोक्रेट्स ने ट्रंप के दावों को नकारा: खुफिया जानकारियों को 'हथियार' बनाने की दी चेतावनीदूसरी ओर, अमेरिकी विपक्षी दल यानी डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं ने ट्रंप के इन दावों को पूरी तरह चुनावी स्टंट और मनगढ़ंत करार दिया है। हाउस परमानेंट सेलेक्ट कमेटी ऑन इंटेलिजेंस के वरिष्ठ डेमोक्रेटिक सांसदों ने कार्यवाहक राष्ट्रीय खुफिया निदेशक बिल पुल्टे सहित देश की शीर्ष सुरक्षा एजेंसियों एफबीआई (FBI), सीआईए (CIA) और एनएसए (NSA) के प्रमुखों को एक बेहद कड़ा पत्र लिखा है। इस पत्र में उन्होंने अधिकारियों को चेतावनी दी है कि राष्ट्रपति ट्रंप को नवंबर के मिडटर्म चुनावों को प्रभावित करने के लिए चुनावी सुरक्षा से जुड़े झूठे दावों और संवेदनशील खुफिया जानकारियों को एक राजनीतिक हथियार (Weaponizing Intelligence) के रूप में इस्तेमाल करने की इजाजत बिल्कुल न दी जाए। सीनेट में मेजॉरिटी लीडर चक शूमर ने भी ट्रंप पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि वे इन भ्रामक दावों की आड़ में आगामी नवंबर के चुनावों में अपनी पार्टी के पक्ष में हेरफेर करने की जमीन तैयार कर रहे हैं।'सेव अमेरिका एक्ट' के जरिए चुनावी नियमों को बदलने की तैयारी: विपक्ष ने खड़े किए सवालजनवरी 2025 में व्हाइट हाउस में दोबारा ऐतिहासिक वापसी करने के बाद से ही राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार देश की चुनावी प्रक्रिया पर संघीय सरकार का केंद्रीय नियंत्रण मजबूत करने की वकालत कर रहे हैं। ट्रंप इन दिनों सीनेट और कांग्रेस के रिपब्लिकन सदस्यों पर बेहद कड़े प्रावधानों वाले 'सेव अमेरिका एक्ट' (Save America Act) को जल्द से जल्द पारित करने का भारी दबाव बना रहे हैं। इस प्रस्तावित कानून के तहत वोट डालने के लिए सरकार द्वारा जारी वैध फोटो आईडी और वोटर रजिस्ट्रेशन के समय केवल अमेरिकी नागरिकता का प्रमाण (Proof of Citizenship) देना अनिवार्य कर दिया जाएगा। साथ ही, सभी राज्यों को अपने वोटरों का पूरा डेटा अनिवार्य रूप से संघीय सरकार के साथ साझा करना होगा। हालांकि, डेमोक्रेट्स और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस कानून का पुरजोर विरोध करते हुए कहा है कि अमेरिका में वोटर फ्रॉड जैसी घटनाएं बेहद दुर्लभ हैं और इस कानून का असली मकसद गरीब और अल्पसंख्यक मतदाताओं के वैध वोटों को दबाना है।
Nepal Political Crisis: गणेश नेपाली के आत्मदाह से दहला नेपाल, सड़कों पर उतरी आक्रोशित 'Gen Z'
नेपाल की राजधानी काठमांडू इस वक्त एक बड़े और अभूतपूर्व जन-आक्रोश की आग में जल रही है। महज चार महीने पहले देश की युवा आबादी यानी 'जेन-जी' (Gen Z) के बंपर और ऐतिहासिक समर्थन से सत्ता के शीर्ष पर पहुंचे नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह (बालेन शाह) अब अपने कार्यकाल के सबसे बड़े राजनीतिक संकट से घिर गए हैं। कर्ज के भारी दबाव और पुलिस व सिस्टम की बेरुखी से तंग आकर 25 वर्षीय दलित युवक गणेश नेपाली द्वारा सरेआम खुद को आग के हवाले (आत्मदाह) करने की दर्दनाक घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। काठमांडू की सड़कों पर उमड़े युवाओं के इस उग्र सैलाब और बढ़ते बवाल को देखते हुए नेपाल सरकार को चल रहे संसद सत्र तक को आनन-फानन में स्थगित करना पड़ा है। विपक्ष अब पीएम बालेन शाह के सिग्नेचर लुक पर तंज कसते हुए उनका 'काला चश्मा' उतारने की मांग कर रहा है।रोजी-रोटी छीनने पर सिस्टम के खिलाफ आत्मदाह: 60% झुलसे गणेश ने अस्पताल में तोड़ा दमदिल दहला देने वाली यह दुखद घटना 10 जुलाई 2026 की है। नेपाल के बेहद पिछड़े और सीमांत इलाके 'मुगु' का रहने वाला गणेश नेपाली काठमांडू में एक राइड-शेयरिंग ऐप के लिए बाइक चलाकर अपने परिवार का पेट पालता था। काठमांडू में पासपोर्ट विभाग के बाहर कथित तौर पर रास्ता अवरुद्ध करने के आरोप में ट्रैफिक पुलिस ने उसकी मोटरसाइकिल के पहियों पर क्लैंप लगा दिया और गाड़ी जब्त कर ली। मोटरसाइकिल ही गणेश की आजीविका का इकलौता सहारा थी, जिसे उसने भारी कर्ज लेकर खरीदा था और उसकी अगली बैंक किस्त की तारीख बेहद नजदीक थी। गाड़ी छुड़ाने को लेकर उसकी वहां मौजूद अधिकारियों से तीखी बहस और धक्का-मुक्की हुई। पुलिस की इस कठोर कार्रवाई से बुरी तरह टूट चुके गणेश ने मानसिक तनाव में आकर अपनी ही बाइक से पेट्रोल निकाला, खुद पर छिड़का और माचिस लगा ली। 60 प्रतिशत से ज्यादा झुलस चुके गणेश को तुरंत काठमांडू के एक शीर्ष अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां एक दिन तक जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ने के बाद उसने दम तोड़ दिया।सपनों का अंत और गरीबी का दंश: विदेश जाने की चाहत में थमा जीवनगणेश और उसका बड़ा भाई मदन नेपाली दोनों दलित समुदाय से आते हैं। मदन के पास सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा की डिग्री होने के बावजूद काठमांडू की बेरुखी के कारण वह मजदूरी करने पर मजबूर है। उनके बुजुर्ग माता-पिता मुगु गांव में सीमांत किसान हैं और मामूली सरकारी पेंशन पर निर्भर हैं। मदन ने बताया कि गणेश ने इस उम्मीद में बाइक लोन पर ली थी कि वह कुछ पैसे जोड़कर अपने भाई के साथ खाड़ी देशों, जापान या दक्षिण कोरिया जाकर काम कर सकेगा और परिवार को गरीबी से बाहर निकालेगा। लेकिन पुलिस द्वारा उसकी आजीविका के साधन को सीज किए जाने के बाद उसे बैंक की किस्त चुकाने और अपनी गर्भवती पत्नी का खर्च उठाने का कोई रास्ता नजर नहीं आया, जिसने उसे आत्मघाती कदम उठाने पर मजबूर कर दिया।बैकफुट पर आई बालेन शाह सरकार: गृह मंत्री ने खुद जाकर सौंपा नागरिकता प्रमाण पत्रगणेश नेपाली की मौत के बाद काठमांडू का माहौल पूरी तरह बेकाबू हो गया, जिसने पहले से चल रहे सरकार विरोधी आंदोलनों में घी का काम किया। जब गृह मंत्री सुधन गुरुंग ने विपक्ष पर इस दुखद मौत पर ओछी राजनीति करने का आरोप लगाया, तो जनता का गुस्सा और भड़क गया। हालात को हाथ से निकलता देख प्रधानमंत्री बालेन शाह की सरकार तुरंत बैकफुट पर आ गई और भारी डैमेज कंट्रोल शुरू किया। सरकार ने मृतक गणेश की 20 वर्षीय गर्भवती पत्नी एकमाया परियार (जो खुद आईटी में डिप्लोमा धारक हैं) के लिए तत्काल सरकारी नौकरी और उनकी 2 साल की मासूम बेटी की पूरी शिक्षा का खर्च उठाने का आधिकारिक ऐलान किया है। एकमाया के पास नेपाल का 'नागरिकता प्रमाण पत्र' नहीं था, जिसे गृह मंत्री गुरुंग ने खुद उनके घर जाकर सौंपा ताकि उन्हें सरकारी वित्तीय राहत मिल सके। इसके साथ ही, इस पूरी घटना की उच्च स्तरीय जांच के लिए डीआईजी (DIG) स्तर के अधिकारी के नेतृत्व में 5 सदस्यीय विशेष टीम गठित की गई है और सरकार गणेश को शहीद का दर्जा देने पर भी विचार कर रही है।सिर्फ एक मौत नहीं, सरकार के इन तीन फैसलों के खिलाफ उबल रहा था बारूदराजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, गणेश की मौत तो महज एक तात्कालिक चिंगारी थी, असल में नेपाल की जनता और 'Gen Z' वोटर्स के भीतर सरकार के कुछ तानाशाही फैसलों के खिलाफ लंबे समय से बारूद इकट्ठा हो रहा था। पीएम बालेन शाह के तीन मुख्य कदमों ने जनता को सबसे ज्यादा नाराज किया है:ट्रेड यूनियनों और छात्र संगठनों को भंग करना: सरकार ने युवाओं और मजदूरों की आवाज उठाने वाले प्रमुख संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया।अध्यादेश राज: लोकतांत्रिक बहस और संसद को पूरी तरह दरकिनार करते हुए सीधे अध्यादेश (Ordinance) पास करने की नीति अपनाई।अतिक्रमण विरोधी अभियान (Demolition Drive): अप्रैल 2026 में काठमांडू में चलाए गए क्रूर बुलडोजर एक्शन के कारण हजारों गरीब और रेहड़ी-पटरी वाले लोग रातों-रात बेघर हो गए।सोमवार को जब प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर के घाट पर गणेश का अंतिम संस्कार किया गया, तो वहां मुगु से आए उसके रोते बिलखते माता-पिता के साथ-साथ इस डिमोलिशन ड्राइव में बेघर हुए सैकड़ों पीड़ित परिवार भी एकजुट हुए। फिलहाल, सरकार प्रदर्शनकारियों को शांत करने के लिए लगातार बातचीत की मेज पर बुला रही है और प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव ने 50,000 से अधिक संविदा कर्मचारियों से हड़ताल खत्म कर काम पर लौटने की भावुक अपील करते हुए नौकरी सुरक्षा का भरोसा दिया है।
ट्रंप प्रशासन की चेतावनी, अमेरिका में चुनावी डेटा पर साइबर हमले का खतरा
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने हाल ही में सार्वजनिक किए गए गोपनीय खुफिया और साइबर सुरक्षा आकलनों में चेतावनी दी कि देश के मतदाता पंजीकरण डेटाबेस अब भी विदेशी साइबर हमलों के प्रति बेहद संवेदनशील हैं। अगर यह डेटा चोरी होता है तो उसका दुरुपयोग कई वर्षों तक किया जा सकता है।
पूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन को फेडरल रिजर्व की बैलेंस शीट नीति की समीक्षा करने वाले कार्यबल में शामिल किया गया है। यह समूह केंद्रीय बैंक की परिसंपत्तियों और मौद्रिक नीति के संचालन से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं का मूल्यांकन करेगा। राजन को वैश्विक स्तर पर वित्तीय स्थिरता, केंद्रीय बैंकिंग और मौद्रिक नीति के विशेषज्ञ के रूप में जाना जाता है।
ट्रंप प्रशासन ने सख्त किए वीजा नियम
ट्रंप प्रशासन ने एक नया अंतिम नियम जारी किया, जिसके तहत दशकों पुरानी उस व्यवस्था को खत्म कर दिया गया है जिसमें कई विदेशी छात्र और एक्सचेंज विजिटर अमेरिका में बिना किसी तय अंतिम तारीख के रह सकते थे
ईरान का पलटवार: अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइलें
ईरान ने गुरुवार तड़के बहरीन, जॉर्डन और कुवैत जैसे खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर कई मिसाइलें और ड्रोन दागे हैं

