इज़राइल के नेशनल हीरो: भाई की याद में बदला गया ऑपरेशन का नामयोनातन नेतन्याहू इस ऐतिहासिक मिशन में शहीद होने वाले एकमात्र इज़राइली सैनिक थे। उनकी इस शहादत और अदम्य साहस के सम्मान में इज़राइल सरकार ने इस मिशन का नाम बदलकर 'ऑपरेशन योनातन' रख दिया था। आज भी इज़राइल में उन्हें एक महान राष्ट्रीय नायक (National Hero) के रूप में पूजा जाता है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक जीवन और उनकी सख्त रणनीतियों पर उनके बड़े भाई योनातन की इस जांबाज विरासत का बहुत गहरा असर माना जाता है।
Supreme Leader Khamenei's final journey: Iran's major show of strength amidst tensions.
अमेरिका और इजरायल के साथ जारी भीषण संघर्ष के बीच ईरान अपने सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की अंतिम यात्रा के जरिए दुनिया के सामने अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रहा है। एक ऐतिहासिक और चौंकाने वाले फैसले के तहत खामेनेई के पार्थिव शरीर को पड़ोसी देश इराक की सरजमीं पर भी ले जाया जाएगा
चीन में कुदरत का रौद्र रूप: 'बावी' और 'मेसक' तूफान का भीषण कहर
चीन इस समय प्रकृति के सबसे विनाशकारी रूप का सामना कर रहा है। देश के कई हिस्सों में मानसूनी बारिश, चक्रवाती बवंडर और 'बावी' व 'मेसक' तूफानों ने ऐसा हाहाकार मचाया है कि हंसते-खेलते इलाके मलबे और पानी के समंदर में तब्दील हो चुके हैं। उत्तर-पश्चिमी चीन से लेकर दक्षिणी हिस्सों तक हर तरफ सिर्फ तबाही का मंजर दिखाई दे रहा है। हालात की गंभीरता को देखते हुए चीनी सरकार ने रेस्क्यू ऑपरेशन के लिए सेना और हाई-टेक ड्रोनों को मैदान में उतारा है।
पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद अंतिम यात्रा में शामिल होते हुए दिखाई दिए। हालिया संघर्ष के दौरान कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया था कि वह इजराइली हमले में मारे गए हैं। उस समय इन दावों पर ईरान की ओर से विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई थी।
भारत और जापान ने रक्षा क्षेत्र में संयुक्त रूप से उपकरण विकसित करने के लिए अपना पहला द्विपक्षीय समझौता किया है, जिसे दोनों देशों के बीच तेजी से मजबूत हो रही रणनीतिक और सुरक्षा साझेदारी की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
30 अरब रुपये की रिश्वत लेने वाले पूर्व अधिकारी को मौत की सजा, 30 साल तक पद का किया दुरुपयोग
चीन के जियांग्सू प्रांत के चांगझोउ इंटरमीडिएट पीपुल्स कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यांग यौलिन ने वर्ष 1993 से 2023 के बीच करीब 2.21 अरब युआन (लगभग 325 मिलियन अमेरिकी डॉलर या करीब 30 अरब रुपये) की रिश्वत और अवैध लाभ हासिल किए।
मिस्र के रेगिस्तान में मिला बाइजेन्टाइन युग का एक शहर
मिस्र के पुरातत्विदों ने दो बेहद अहम खोज की हैं. इसमें पूरा का पूरा प्राचीन शहर और एक जगह कई कब्रें मिली हैं. मिस्र को उम्मीद है कि इन नई खोजों से उसके पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा
इंटरसेप्टर मिसाइलों की कमी से बढ़ी यूक्रेन की मुश्किलें, कीव पर रूसी बैलिस्टिक हमले में 28 की मौत
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने बताया कि रूस ने इस हमले के दौरान कुल 68 मिसाइलें और 351 अटैक ड्रोन लॉन्च किए। यूक्रेनी वायुसेना ने 37 मिसाइलों और 326 ड्रोन को मार गिराने या उनके रास्ते से भटकाने का दावा किया, लेकिन बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने में सफलता नहीं मिली।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने दौरे के पहले चरण में जकार्ता पहुंच चुके हैं। जकार्ता में पीएम मोदी का गर्मजोशी से स्वागत किया गया
पड़ोसी देश बांग्लादेश में तख्तापलट और भारी राजनीतिक उथल-पुथल के बाद भी जमीनी हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हो सके हैं। देश के कई हिस्सों से अब भी लगातार हिंसा और अराजकता की खबरें सामने आ रही हैं। इसी बीच एक बड़ी घटना में, राजधानी ढाका के नजदीक सावर (Savar) इलाके में नवगठित 'नेशनल सिटिजन पार्टी' (NCP) की एक जनसभा के दौरान जोरदार बम धमाका हुआ है। इस बम विस्फोट की चपेट में आने से कम से कम तीन लोग गंभीर रूप से घायल हो गए हैं। गौरतलब है कि इस नई राजनीतिक पार्टी का नेतृत्व मुख्य रूप से वही छात्र नेता कर रहे हैं, जिन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार के खिलाफ देशव्यापी हिंसक आंदोलन की अगुवाई की थी।ईदगाह मैदान में चल रही रैली को आतंकवादियों ने बनाया निशानानेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) द्वारा जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, आतंकवादियों ने सावर थाना स्टैंड स्थित ईदगाह मैदान को निशाना बनाकर इस बम ब्लास्ट को अंजाम दिया। यह हमला उस समय हुआ जब मैदान में पार्टी की 'पोस्ट-मार्च रैली' (Post-March Rally) चल रही थी। यह रैली 'जुलाई मार्च' के पहले दिन आयोजित की गई थी, जिसका उद्देश्य देश में जनमत संग्रह (Referendum) लागू करने, युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा करने, देश के गंभीर बिजली संकट का स्थायी समाधान निकालने, दैनिक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण पाने और सीमाओं की सुरक्षा को मजबूत करने जैसी बड़ी मांगों को लेकर जनता का समर्थन जुटाना था।शेख हसीना के खिलाफ छात्र आंदोलन की दूसरी बरसी पर निकाला जा रहा मार्चपार्टी पदाधिकारियों के मुताबिक, पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के खिलाफ हुए ऐतिहासिक छात्र आंदोलन की दूसरी बरसी के मौके पर इस देशव्यापी मार्च की रूपरेखा तैयार की गई थी। इसके तहत पूरे जुलाई महीने में अलग-अलग राज्यों में मार्च निकालने का ऐलान किया गया है। याद दिला दें कि व्यापक विरोध प्रदर्शनों और हिंसा के बाद 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना अचानक बांग्लादेश छोड़कर भारत आ गई थीं, जिसके बाद से ही वहां उनके और उनकी पार्टी अवामी लीग के खिलाफ लगातार उग्र प्रदर्शन किए जा रहे हैं।पूर्व पीएम शेख हसीना के प्रत्यर्पण (Extradition) रिक्वेस्ट पर भारत का बड़ा कदमबांग्लादेश में मचे इस सियासी घमासान के बीच भारत सरकार के रुख पर भी पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं। इस संबंध में भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने एक बेहद महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है। विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक तौर पर पुष्टि की है कि वह बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण के लिए ढाका की नई सरकार द्वारा भेजे गए औपचारिक अनुरोध (Note Verbale) की तय कानूनी और न्यायिक प्रक्रियाओं के तहत समीक्षा कर रहा है।विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने नई दिल्ली में आयोजित साप्ताहिक प्रेस ब्रीफिंग में स्पष्ट किया कि यह पूरी प्रक्रिया पूरी तरह से आंतरिक कानूनी प्रोटोकॉल और न्यायिक ढांचे के दायरे में चल रही है। भारत सरकार का यह बड़ा बयान ऐसे नाजुक समय पर आया है जब नई दिल्ली 'जुलाई क्रांति' के बाद ढाका में बनी नई अंतरिम व्यवस्था के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों, व्यापार, ऊर्जा साझेदारी और क्षेत्रीय सुरक्षा को स्थिर व मजबूत बनाए रखना चाहती है। विदेश मंत्रालय ने साफ किया है कि भारत इस पूरे मामले में बांग्लादेश की जनता के सर्वोत्तम हितों और लोकतांत्रिक स्थिरता को सर्वोपरि रखते हुए ही कोई अंतिम फैसला लेगा।
ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों को लेकर एक बार फिर बड़ी हलचल शुरू हो गई है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी अस्थायी युद्धविराम और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर बनी सहमति के बाद तेल की कीमतें $115 से गिरकर $70 प्रति बैरल के नीचे आ गई थीं। लेकिन आज यानी 07 जुलाई 2026 को बाजार का रुख एक बार फिर बदल गया है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में अचानक तेजी लौट आई है। भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tension) दोबारा बढ़ने से कच्चे तेल के दाम फिर से चढ़ने लगे हैं।ब्रेंट क्रूड और WTI क्रूड के दामों में आई तेजीआज सुबह के कारोबारी सत्र में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़त दर्ज की गई है:ब्रेंट क्रूड (Brent Crude): ग्लोबल बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड का भाव 0.76 फीसदी की तेजी के साथ $72.77 प्रति बैरल पर पहुंच गया है।WTI क्रूड (WTI Crude): अमेरिकी क्रूड यानी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट के दाम में आज $0.71 का उछाल आया है, जिससे एक बैरल तेल की कीमत $69.28 पर पहुंच गई है।होर्मुज स्ट्रेट में कमर्शियल जहाजों पर मिसाइल हमला बनी वजहकच्चे तेल की कीमतों में आज आई इस अचानक तेजी की मुख्य वजह होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहे दो कमर्शियल तेल टैंकरों पर हुए मिसाइल हमले हैं। इस घटना के बाद ओमान तट के पास सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। दरअसल, ईरान की ओर से लगातार यह चेतावनी दी जा रही थी कि विदेशी जहाज केवल उनके द्वारा तय किए गए समुद्री रास्तों का ही इस्तेमाल करें और ओमान तट के पास के उन रास्तों से गुजरना बंद कर दें जिन्हें अमेरिका ने सुरक्षित घोषित किया है। इस नए हमले के बाद होर्मुज में तनाव चरम पर पहुंच गया है, जिसका सीधा असर तेल की कीमतों पर दिख रहा है।डोनाल्ड ट्रंप की नई धमकी से भड़का युद्ध का खतराइस तनाव को और हवा तब मिली जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के प्रति एक बार फिर बेहद कड़ा और आक्रामक रुख अपनाया। ट्रंप ने खुले तौर पर चेतावनी दी है कि या तो ईरान तय शर्तों पर अमेरिका के साथ समझौता करे, अन्यथा अमेरिका ईरान को पूरी तरह तबाह कर देगा। अमेरिकी राष्ट्रपति की इस सीधी धमकी के बाद खाड़ी देशों में एक बार फिर से पूर्ण युद्ध भड़कने का खतरा मंडराने लगा है, क्योंकि ईरान भी किसी भी कीमत पर पीछे हटने या झुकने को तैयार नहीं दिख रहा है।UAE और ओपेक प्लस (OPEC+) की बढ़ी सप्लाई भी पड़ सकती है फीकीबाजार के विशेषज्ञों और कमोडिटी जानकारों का कहना है कि वर्तमान में ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की आपूर्ति (Supply) काफी बेहतर स्थिति में है, जिसने कीमतों को एक सीमित दायरे में बांध रखा था। ओपेक प्लस देशों के साथ मिलकर संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने जून महीने में अपना कच्चे तेल का उत्पादन बढ़ाकर 38 लाख बैरल प्रतिदिन करने का बड़ा फैसला लिया था।बाजार में इस अतिरिक्त सप्लाई के आने से तेल के दाम कुछ हद तक नियंत्रित थे और आम उपभोक्ताओं को राहत मिल रही थी, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच यह तल्खी और बढ़ती है और होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा ब्लॉक किया जाता है, तो ओपेक की यह सप्लाई भी कीमतों को बढ़ने से नहीं रोक पाएगी। आने वाले दिनों में कच्चे तेल का ग्राफ एक बार फिर $80 के पार जा सकता है, जिसके संकेत आज के बाजार से मिलने शुरू हो गए हैं।
होर्मुज स्ट्रेट में फिर भड़का तनाव, ईरानी मिसाइलों ने दो कारोबारी जहाजों को बनाया निशाना
अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि दोनों कारोबारी जहाजों पर ईरानी मिसाइलों से हमला किया गया, जिससे उन्हें गंभीर नुकसान पहुंचा। हालांकि शुरुआती जानकारी के अनुसार, दोनों जहाजों पर सवार चालक दल के सभी सदस्य सुरक्षित हैं और किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है।
NATO बैठक से पहले ट्रंप का बड़ा दावा! बोले- पुतिन और जेलेंस्की दोनों चाहते हैं युद्ध का अंत
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि उनका मानना है कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की, दोनों ही यूक्रेन युद्ध खत्म करना चाहते हैं
हमास ने गाजा की इमरजेंसी सरकार भंग की, प्रशासन नेशनल कमेटी को सौंपने का ऐलान
हमास ने गाजा में बनी इमरजेंसी गवर्नमेंट कमेटी को भंग कर दिया है और गाजा पट्टी का एडमिनिस्ट्रेशन नेशनल कमेटी को ट्रांसफर करने की घोषणा की।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपनी महत्वाकांक्षी योजनाओं को लेकर सुर्खियों में हैं। हाल ही में उन्होंने कतर (Qatar) द्वारा अमेरिका को उपहार में दिए गए अत्याधुनिक बोइंग 747-8 (Boeing 747-8) विमान से अपनी आधिकारिक यात्राएं शुरू कर दी हैं। जरूरी बदलावों और कड़ी टेस्टिंग के बाद इस विशाल विमान को अमेरिकी राष्ट्रपति के 'एयर फोर्स वन' बेड़े में शामिल कर लिया गया है। लेकिन, ट्रंप की योजना सिर्फ इस विमान में सफर करने तक सीमित नहीं है; वह इसे अपने एक खास ड्रीम प्रोजेक्ट का हिस्सा बनाना चाहते हैं।मियामी की प्रेसिडेंशियल लाइब्रेरी में विमान प्रदर्शित करने का प्लानप्रसिद्ध अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल (WSJ) की एक ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रंप की दिली ख्वाहिश है कि कतर से मिले इस बोइंग विमान को रिटायरमेंट के बाद मियामी (Miami) में बनने वाली उनकी अपकमिंग 'प्रेसिडेंशियल लाइब्रेरी' में प्रदर्शित किया जाए। ट्रंप चाहते हैं कि यह विमान उनकी विरासत के एक शानदार प्रतीक के तौर पर मियामी में रखा जाए, जिसे लोग करीब से देख सकें।राह में खड़ी हैं राजनीतिक और सैन्य चुनौतियांहालांकि, ट्रंप का यह सपना जितना भव्य है, इसे हकीकत में बदलना उतना ही जटिल है। वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट बताती है कि एक विशालकाय बोइंग विमान को मियामी के किसी सिविलियन या लाइब्रेरी एरिया में शिफ्ट करना और उसे स्थायी तौर पर प्रदर्शित करना आसान नहीं है। इस योजना के रास्ते में कई गंभीर राजनीतिक (Political), सैन्य (Military) और लॉजिस्टिकल (Logistical) चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं। फिलहाल, यह विमान अमेरिका के अस्थायी 'एयर फोर्स वन' के रूप में अपनी सेवाएं दे रहा है और सुरक्षा कारणों से सेना इसे इतनी आसानी से किसी सार्वजनिक प्रदर्शनी के लिए नहीं सौंप सकती।नए बोइंग प्रोजेक्ट में क्यों हो रही है देरी?यह पूरा मामला इसलिए भी पेचीदा हो गया है क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए तैयार हो रहे नए विमानों के प्रोजेक्ट में भारी देरी चल रही है। डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान ही, साल 2017 में पुराने एयर फोर्स वन बेड़े को बदलने की कवायद शुरू कर दी थी। उन्होंने इसके लिए बोइंग को अगली पीढ़ी के दो नए प्रेसिडेंशियल विमानों का ऑर्डर दिया था।कार्यकाल के अंत तक ही मिल पाएंगे नए विमानशुरुआती योजना के विपरीत, बोइंग के इस अति-सुरक्षित प्रोजेक्ट में काफी विलंब हो चुका है। अब इन दोनों नए विमानों के मध्य 2028 तक ही अमेरिकी वायुसेना को सौंपे जाने की उम्मीद है। तकनीकी और लॉजिस्टिक दिक्कतों के चलते ट्रंप को मजबूरी में कतर से मिले इसी बोइंग 747-8 का इस्तेमाल एक अस्थायी एयर फोर्स वन के रूप में करना पड़ रहा है। विडंबना यह है कि जब 2028 में नए विमान बनकर पूरी तरह तैयार होंगे, तब तक राष्ट्रपति ट्रंप का मौजूदा कार्यकाल अपने अंतिम चरण में होगा।
वैश्विक राजनीति के लिहाज से एक बेहद अहम खबर सामने आई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने घोषणा की है कि चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग इस साल सितंबर के आखिर में अमेरिका का दौरा करेंगे। ट्रंप ने सिर्फ इस हाई-प्रोफाइल दौरे का ऐलान ही नहीं किया, बल्कि व्हाइट हाउस के कायाकल्प का एक बड़ा 'मास्टरप्लान' भी दुनिया के सामने रखा। उन्होंने बताया कि विदेशी मेहमानों की मेजबानी के लिए व्हाइट हाउस में एक बेहद भव्य और अभेद्य नया 'स्टेट बॉलरूम' (State Ballroom) बनाया जाएगा।24 सितंबर को वाशिंगटन पहुंच सकते हैं चिनफिंगरोज गार्डन में आयोजित एक लंच कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने दुनिया के दो सबसे ताकतवर नेताओं की मुलाकात का एजेंडा साफ किया। ट्रंप ने बताया कि चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग 24 सितंबर के आसपास वाशिंगटन पहुंच रहे हैं। उन्होंने कहा कि चिनफिंग जैसे बड़े वैश्विक नेता को देखने के लिए हजारों लोगों की भीड़ उमड़ेगी। ऐसे बड़े आयोजनों को सुरक्षित और शानदार तरीके से होस्ट करने के लिए ही हमें एक विशाल और अत्याधुनिक बॉलरूम की सख्त जरूरत है।150 साल पुरानी मांग होगी पूरी, अमेरिका दिखाएगा अपनी शानव्हाइट हाउस में जगह की कमी का जिक्र करते हुए ट्रंप ने कहा कि अमेरिका पिछले कई दशकों से बड़े राजकीय आयोजनों (State Dinners) की मेजबानी के लिए संघर्ष कर रहा है। उन्होंने हैरानी जताते हुए कहा कि पिछले 150 सालों से व्हाइट हाउस में एक डेडिकेटेड बॉलरूम बनाने की मांग हो रही थी, जो अब तक पूरी नहीं हुई। किंग चार्ल्स से लेकर दुनिया के तमाम राष्ट्राध्यक्ष यहां आते हैं, ऐसे में अमेरिका के पास एक ऐसी जगह होनी चाहिए जो दुनिया के किसी भी अन्य देश के पास न हो।चीन और ब्रिटेन से भी शानदार होगा व्हाइट हाउस का नया 'बॉलरूम'राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने अंदाज में इस नए प्रोजेक्ट की तुलना चीन और ब्रिटेन की ऐतिहासिक इमारतों से की। चीन के अपने हालिया दौरे का जिक्र करते हुए ट्रंप ने कहा, मैं हाल ही में चीन के 'ग्रेट हॉल' में था। उनका बॉलरूम बेहद विशाल और खूबसूरत है। हमारे पास अभी वैसा कुछ नहीं है, लेकिन अब हम जो बॉलरूम बनाने जा रहे हैं, वह दुनिया के बाकी सभी स्थानों पर भारी पड़ेगा। उन्होंने ब्रिटेन के विंडसर कैसल की भव्यता का भी जिक्र किया और कहा कि अमेरिका का नया बॉलरूम इन सबसे कहीं ज्यादा आधुनिक होगा।मिसाइल और ड्रोन से भी रहेगा सुरक्षित, 2028 में होगा तैयारसुरक्षा के मोर्चे पर यह नया बॉलरूम एक अभेद्य किले की तरह होगा। ट्रंप ने इसे वाशिंगटन की सबसे खूबसूरत और ऐतिहासिक इमारत करार दिया। उन्होंने दावा किया कि यह नया स्ट्रक्चर पूरी तरह से मिसाइल-प्रूफ, बुलेटप्रूफ और ड्रोन-प्रूफ होगा। राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए इस प्रोजेक्ट की डिजाइनिंग में शीर्ष सैन्य अधिकारियों और जनरलों की सलाह ली जा रही है।इस मेगा-प्रोजेक्ट के साल 2028 के मध्य तक पूरा होने की उम्मीद है। अपने आलोचकों को करारा जवाब देते हुए ट्रंप ने स्पष्ट किया, कुछ लोग कह रहे हैं कि मैं यह अपने लिए बना रहा हूं, लेकिन असलियत यह है कि मैं इसे अमेरिका के भविष्य के राष्ट्रपतियों के लिए तैयार करवा रहा हूं, ताकि वे शपथ ग्रहण और राजकीय समारोहों को एक सुरक्षित माहौल में आयोजित कर सकें।
जयशंकर का बहरीन दौरा: राजा हमद से खास मुलाकात, भारत-बहरीन संबंधों को मिलेगी नई उड़ान
भारत की कूटनीतिक पहुंच को मध्य पूर्व में और अधिक मजबूत करने की दिशा में विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर इस समय खाड़ी देशों के एक बेहद महत्वपूर्ण दौरे पर हैं। इसी कड़ी में सोमवार को उन्होंने बहरीन की राजधानी मनामा में बहरीन के राजा हमद बिन ईसा अल खलीफा से एक खास मुलाकात की। इस उच्च स्तरीय बैठक का मुख्य एजेंडा दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक और द्विपक्षीय साझेदारी को नई ऊंचाइयों पर ले जाना था।क्राउन प्रिंस को दिए राष्ट्रपति और पीएम के संदेशबहरीन के राजा से चर्चा के अलावा, भारतीय विदेश मंत्री ने क्राउन प्रिंस और प्रधानमंत्री सलमान बिन हमद अल खलीफा से भी शिष्टाचार भेंट की। इस दौरान जयशंकर ने भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से बहरीन के नेतृत्व को शुभकामनाएं प्रेषित कीं। दोनों नेताओं के बीच बातचीत में व्यापार, निवेश और रणनीतिक सहयोग को और अधिक गहरा करने पर जोर दिया गया।भारतीय समुदाय को बताया 'जीवंत सेतु'बहरीन में एक बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी रहते हैं जो वहां की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान दे रहे हैं। जयशंकर ने बहरीन के नेतृत्व और राजा हमद का विशेष रूप से आभार जताया कि उन्होंने भारतीय समुदाय की सुरक्षा, कल्याण और हितों का हमेशा ध्यान रखा है। जयशंकर ने कहा कि बहरीन के राजा का कुशल मार्गदर्शन भारत और बहरीन के रिश्तों को लगातार आगे बढ़ा रहा है। अपने दौरे में विदेश मंत्री ने प्रवासी भारतीयों के प्रतिनिधियों से भी सीधा संवाद किया और उन्हें दोनों देशों को जोड़ने वाला एक 'जीवंत सेतु' करार दिया।क्षेत्रीय सुरक्षा और व्यापार पर विदेश मंत्री से मंथनशीर्ष नेतृत्व से मुलाकात से ठीक पहले, डॉ. जयशंकर ने अपने बहरीन के समकक्ष, विदेश मंत्री अब्दुल्लातिफ बिन राशिद अल जायदानी के साथ एक विस्तृत और अहम बैठक की। इस दौरान दोनों नेताओं ने केवल द्विपक्षीय सहयोग पर ही नहीं, बल्कि तेजी से बदलते क्षेत्रीय घटनाक्रमों (Regional Developments) और आपसी हितों से जुड़े कई वैश्विक मुद्दों पर भी विचार-विमर्श किया।चार खाड़ी देशों की अहम रणनीतिक यात्राआपको बता दें कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर 5 से 10 जुलाई 2026 तक चार प्रमुख खाड़ी देशों—कतर, बहरीन, कुवैत और ओमान—की अहम रणनीतिक यात्रा पर हैं। भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा, विदेशी निवेश और व्यापार के लिहाज से यह क्षेत्र बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण है। जयशंकर अपने इस बहुआयामी दौरे में क्षेत्रीय नेताओं से मिलकर ऊर्जा आपूर्ति, व्यापारिक साझेदारी और क्षेत्रीय सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने की दिशा में लगातार काम कर रहे हैं।
भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों पुराने सिंधु जल समझौते (Indus Water Treaty) को लेकर तनाव अपने चरम पर पहुंच गया है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत सरकार द्वारा उठाए गए सख्त कदम से पाकिस्तान में हड़कंप मच गया है। भारत ने कड़ा रुख अपनाते हुए सिंधु नदी का जो पानी पाकिस्तान की तरफ जाता था, उसे रोक दिया है। भारत के इस मास्टरस्ट्रोक से तिलमिलाई पाकिस्तानी सेना अब खुलेआम धमकियों पर उतर आई है।आसिम मुनीर की अध्यक्षता में कोर कमांडरों की आपात बैठकसोमवार को पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की अध्यक्षता में रावलपिंडी स्थित जनरल हेडक्वार्टर (GHQ) में कोर कमांडरों की एक हाई-लेवल बैठक हुई। इस बैठक में सीधे तौर पर सिंधु जल समझौते का मुद्दा गूंजा। पाकिस्तानी सेना ने एक भड़काऊ बयान जारी करते हुए कहा है कि वह पाकिस्तान को सिंधु नदी के पानी का 'जायज हिस्सा' दिलाने के लिए हर संभव कदम उठाने के लिए पूरी तरह से संकल्पबद्ध है।इस बैठक में 24 अप्रैल, 2025 को पाकिस्तान की नेशनल सिक्योरिटी कमेटी (NSC) की बैठक में लिए गए निर्णयों का भी हवाला दिया गया। सेना ने साफ तौर पर कहा कि वह सरकार के निर्देश और अवाम की प्रेरणा से इस मुद्दे पर भारत के खिलाफ कोई भी एक्शन लेने से पीछे नहीं हटेगी।भारत ने क्यों उठाया पानी रोकने का सख्त कदम?दरअसल, इस पूरे विवाद की जड़ पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद है। पिछले साल 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए भीषण आतंकी हमले के बाद भारत सरकार का सब्र टूट गया था। आतंक और बातचीत (या समझौते) एक साथ नहीं चल सकते, इसी नीति के तहत भारत ने ऐतिहासिक फैसला लेते हुए सिंधु नदी का वह पानी रोक दिया जो समझौते के तहत पाकिस्तान को जा रहा था।पाकिस्तान में गहराया सिंचाई और पीने के पानी का संकटसिंधु नदी का उद्गम हिमालय से होता है और यह भारत से होकर पाकिस्तान के बड़े हिस्से की प्यास बुझाती है। भारत के पानी रोकने के फैसले के बाद से ही पूरे पाकिस्तान में हाहाकार मचा हुआ है। वहां के पंजाब और सिंध प्रांतों में भयानक सिंचाई संकट खड़ा हो गया है, साथ ही पीने के पानी की भारी किल्लत महसूस की जा रही है। बता दें कि भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी जल बंटवारे का यह ऐतिहासिक समझौता साल 1960 में विश्व बैंक (World Bank) की मध्यस्थता में हुआ था।अपनी नाकामियां छिपाने के लिए गीदड़भभकी!रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तानी सेना की यह धमकी अपनी आंतरिक नाकामियों से अवाम का ध्यान भटकाने की एक कोशिश मात्र है। कोर कमांडरों की बैठक में पाकिस्तानी सेना ने अपनी तैयारियों पर तो संतोष जताया, लेकिन साथ ही अफगानिस्तान की ज़मीन से पाकिस्तान के खिलाफ हो रहे आतंकी हमलों (TTP के हमले) पर गहरी चिंता भी व्यक्त की। पाकिस्तान एक तरफ खुद आतंक को पालता है और दूसरी तरफ अपने ही पाले हुए आतंकियों से त्रस्त होकर भारत पर दबाव बनाने की नाकाम कोशिश कर रहा है।
दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला (Venezuela) में आए भयंकर भूकंप ने जो गहरे जख्म दिए हैं, वे हर गुजरते दिन के साथ और दर्दनाक होते जा रहे हैं। 24 जून को आई इस प्राकृतिक आपदा ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। सोमवार को जारी किए गए ताजा सरकारी आंकड़ों ने दुनिया को सन्न कर दिया है—इस विनाशकारी जलजले में अब तक 3,535 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि 16,740 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल अस्पतालों में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे हैं।ला गुएरा में मलबे का ढेर बने पूरे मोहल्लेइस भीषण तबाही का सबसे ज्यादा असर राजधानी काराकास (Caracas) के उत्तर में स्थित ला गुएरा (La Guaira) राज्य में देखने को मिला है। बैक-टू-बैक आए शक्तिशाली झटकों ने गगनचुंबी इमारतों को ताश के पत्तों की तरह ढहा दिया। ग्राउंड जीरो से आ रही तस्वीरें बेहद विचलित करने वाली हैं, जहां कल तक आबाद रहने वाले पूरे के पूरे मोहल्ले आज कंक्रीट और सरियों के मलबे में तब्दील हो चुके हैं।50 हजार लोग लापता, मलबे में अपनों की तलाशइस त्रासदी का सबसे डरावना पहलू वे लोग हैं जिनका अब तक कोई सुराग नहीं मिल सका है। वेनेजुएला सरकार ने अभी तक मलबे में फंसे लोगों का कोई सटीक आधिकारिक आंकड़ा जारी नहीं किया है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र (United Nations) के अनुमान ने वैश्विक चिंता बढ़ा दी है। यूएन के मुताबिक, ला गुएरा और आसपास के प्रभावित इलाकों में मलबे के विशाल पहाड़ों के नीचे अभी भी करीब 50,000 लोग दबे या लापता हो सकते हैं। रेस्क्यू टीमें दिन-रात भारी मशीनों और खोजी कुत्तों की मदद से मलबे में जिंदगियां तलाशने में जुटी हुई हैं।सड़कों और पार्किंग एरिया में रहने को मजबूर 17 हजार सर्वाइवर्सइस प्रलयकारी भूकंप ने 17,000 से अधिक लोगों के सिर से छत छीनकर उन्हें रातों-रात सड़क पर ला दिया है। जिन सर्वाइवर्स की जान बच गई, उनका संघर्ष भी कम नहीं हुआ है। अपना सबकुछ गंवा चुके हजारों परिवार अब खुले आसमान के नीचे, सार्वजनिक पार्कों, सड़कों के किनारे और कार पार्किंग एरिया में बनाए गए अस्थायी कैंपों में शरण लेने को मजबूर हैं।बुनियादी सुविधाओं—जैसे पीने का साफ पानी, खाना और दवाइयों—की भारी कमी के चलते इन कैंपों में जीवन बेहद अमानवीय और कठिन हो गया है। हालांकि स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय राहत एजेंसियां लगातार प्रभावित इलाकों में सहायता पहुंचाने का प्रयास कर रही हैं, लेकिन तबाही का दायरा इतना विशाल है कि स्थिति को काबू में आने में अभी लंबा वक्त लगेगा।
सूडान में हिंसा की कीमत चुका रहे मासूम, छह महीने में 330 बच्चे ड्रोन हमले का हुए शिकार: यूनिसेफ
साल 2026 के पहले छह महीनों में सूडान में कम से कम 330 बच्चे या तो मारे गए या घायल हुए। यूनाइटेड नेशंस चिल्ड्रन्स फंड (यूनिसेफ) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दारफुर और कोर्डोफान राज्यों में बच्चों के हताहत होने की सबसे ज्यादा घटनाएं सामने आई हैं।
ईरान को ट्रंप की खुली धमकी! बोले- 'या समझौता करो, वरना काम तमाम कर देंगे'
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की अपनी धमकी को फिर से दोहराया और कहा कि अमेरिका या तो ईरान के साथ कोई समझौता करेगा या फिर 'काम तमाम' कर देगा
चीन के मिसाइल परीक्षण से बढ़ी क्षेत्रीय चिंता, जापान और ताइवान समेत कई देशों ने जताई आपत्ति
चीन की सेना ने सोमवार को परमाणु ऊर्जा से चलने वाली एक पनडुब्बी से सफलतापूर्वक प्रशांत महासागर की ओर एक मिसाइल का परीक्षण किया
5 जुलाई को इजराइली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा- अमेरिका ही नहीं, बल्कि हमारे कुछ और दोस्त भी हैं। जैसे- 1.4 अरब आबादी वाला भारत। नेतन्याहू का ये बयान अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को जवाब था। वेंस ने पिछले महीने कहा था कि ट्रम्प दुनिया के इकलौते ताकतवर देश के नेता हैं, जो इजराइल से सहानुभूति रखते हैं। आखिर नेतन्याहू ने इकलौते भारत का ही जिक्र क्यों किया, दोनों देशों की ‘पक्की दोस्ती’ के पीछे की कहानी, 4 चैप्टर्स में… भारत-इजराइल में औपचारिक राजनयिक संबंध 1992 में बने, लेकिन उससे काफी पहले से इजराइल मुसीबत में भारत की गुपचुप तरीके से मदद करने लगा था… 1962: जब इजराइली झंडे लगे जहाज हथियार लेकर भारत पहुंचे 1965 और 1971: पाकिस्तान के खिलाफ मोर्टारों की खेप भेजी 1999: कारगिल में इजराइली तकनीक से उड़ाए पाकिस्तानी बंकर इजराइल को 14 मई 1948 को आजादी मिली। संयुक्त राष्ट्र में इजराइल और फिलिस्तीन को बांटकर दो देश बनाने का प्रस्ताव पेश हुआ, तो भारत ने इसके खिलाफ वोट किया था। हालांकि, अगले ही साल 17 सितंबर, 1950 को भारत ने आधिकारिक रूप से इजराइल को एक संप्रभु राष्ट्र के बतौर मान्यता दी। 'इंडिया इजराइल पॉलिसी' नाम की किताब लिखने वाले भारत के फॉरेन एक्सपर्ट पी.आर. कुमारस्वामी कहते हैं कि भारत और इजराइल के बीच 1950 से 1992 तक बिना रिश्तों के मान्यता वाला संबंध रहा।' 1971 की जंग में इजराइल ने विदेशी मंचों पर भी भारत का समर्थन किया और पाकिस्तानी सेना के पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में नरसंहार की आलोचना की थी। इजराइली पीएम गोल्डा मीर चाहती थीं कि इसके बदले इंदिरा गांधी इजराइल को पूर्ण राजनयिक मान्यता दें और औपचारिक राजनयिक संबंध कायम हों। हालांकि तब भारत ने मान्यता नहीं दी। उलटा 1988 में जब फिलिस्तीन देश की घोषणा हुई, तो भारत इसे मान्यता देने वाला पहला गैर-अरब देश था। हालांकि 4 साल बाद स्थिति तब बदलनी शुरू हुई, जब पीएम नरसिम्हा राव ने इजराइल से राजनयिक संबंध बनाए और दोनों देशों में पहली बार दूतावास खोले गए। पीएम मोदी के सत्ता में आने के बाद भारत-इजराइल रिश्तों का एक नया दौर शुरू हुआ। 2015 में इतिहास में पहली बार संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में भारत ने फिलिस्तीन में इजराइली हमलों की निंदा करने वाले एक प्रस्ताव पर वोटिंग से परहेज किया। जबकि इसे 45 देशों ने पारित किया था। पीएम मोदी के दौर में इजराइल को खुला समर्थन दिया इजराइली हथियारों की खरीद में भारत की एक-तिहाई हिस्सेदारी भारत-इजराइल के बीच 1 लाख करोड़ का कारोबार 1992 में भारत और इजराइल के बीच द्विपक्षीय रिश्तों की शुरुआत हुई, तब दोनों देशों का व्यापार 202 मिलियन डॉलर का था। 2022-23 तक बढ़कर यह 10.77 बिलियन डॉलर, यानी १ लाख करोड़ पहुंच गया। हालांकि बीते 2 सालों में द्विपक्षीय व्यापार में कमी आई है। इसकी वजह इजराइल-हमास जंग और इसकी वजह से समुद्री रास्ते में आई अड़चने हैं। टाटा, अडाणी जैसी कंपनियों के इजराइल में निवेश नेतन्याहू के बयान के 3 मायने हैं… 1. अकेला पड़ गया है इजराइल: स्ट्रैटजिक एक्सपर्ट ब्रह्म चेलानी के मुताबिक युद्ध के समय नेतन्याहू सरकार के तौर-तरीकों के चलते इजराइल दुनिया में अलग-थलग पड़ गया है। यह लंबे समय में इजराइल के लिए खतरनाक है। वो दूसरे देशों का समर्थन जुटाना चाहता है, इसीलिए भारत का जिक्र किया। भारत और इजराइल के संबंध अहम हैं, लेकिन भारत में इजराइल के लोगों के प्रति सद्भावना है, न कि नेतन्याहू की सरकार के लिए। 2. नेतन्याहू घरेलू राजनीति साध रहे: भारतीय थिंकटैंक ORF में नॉन-रेसिडेंट फेलो और मिडिल ईस्ट मामलों के जानकार कबीर तनेजा कहते हैं, ‘नेतन्याहू के भारत को दोस्त बताने वाले बयान को उनकी घरेलू राजनीति से जोड़कर देखा जाना चाहिए। उन पर मुकदमे चल रहे हैं और चुनाव आने हैं। घरेलू समर्थन कम न हो, इसलिए वे दिखा रहे हैं कि इजराइल अलग-थलग नहीं पड़ा है।' कबीर तनेजा कहते हैं कि इजराइल-भारत की स्ट्रैटजिक पार्टनरशिप खास तौर पर डिफेंस सेक्टर में है। इजराइल भारत को एडवांस हथियार देता है। ये साझेदारी नेतन्याहू के पहले भी थी और उनके बाद भी रहेगी। 3. भारत की संतुलन की पॉलिसी के लिए मुश्किल: जॉर्डन, लीबिया और रूस में भारत के राजदूत रहे अनिल त्रिगुणायत बताते हैं, ‘नेतन्याहू का का यह बयान भारत को गलत ब्रैकेट में डाल रहा है। भारत ने कभी भी इजराइल को बिना शर्त समर्थन नहीं दिया है। इस बयान के बाद भारत, इजराइल के साथ अपने संबंधों का पुनर्मूल्यांकन कर सकता है।’ दरअसल, भारत बाकी देशों से भी अपने रिश्ते संतुलित रखने की कोशिश करता है। मिसाल के लिए जून 2025 में SCO समिट के दौरान भारत ने ईरान पर इजराइल और अमेरिका के हमलों की निंदा वाले प्रस्ताव से दूरी बनाई। हालांकि सितंबर में दोबारा इसी प्रस्ताव की घोषणा पर भारत ने साइन कर दिए थे। -------- ये खबर भी पढ़िए… आज का एक्सप्लेनर:दर्जनभर लोगों से गुजरकर मुजतबा तक पहुंचती है कोई चिट्ठी; पिता को कंधा देने पर सस्पेंस, क्या इजराइल वाकई मार देगा रान के सुप्रीम लीडर रहे आयतुल्लाह अली खामेनेई के अंतिम संस्कार की रस्में जारी हैं। 100 से ज्यादा देशों के नेता पहुंच रहे हैं। काले कपड़ों में रोते-बिलखते लाखों ईरानी अपने ‘रहबर’ का आखिरी दीदार करना चाहते हैं। इन सबके बीच ईरान के नए सुप्रीम लीडर मुजतबा खामेनेई गायब हैं। पिता के जनाजे को कंधा देंगे या नहीं, इस पर भी सस्पेंस है। क्या वो जिंदा भी हैं, अगर हां तो किस हाल में, पूरी खबर पढ़ें…
चीन में तख्तापलट का डर? शी चिनफिंग ने अचानक हटाए 101 टॉप सैन्य कमांडर, सेना में लागू किया 'माओ मॉडल'
चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के भीतर इस समय इतिहास की सबसे बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल मची है। राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने अपनी सत्ता और सेना पर पकड़ मजबूत करने के लिए एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए 101 शीर्ष सैन्य अधिकारियों को पद से बर्खास्त या गायब कर दिया है। चीन की सबसे शक्तिशाली सैन्य संस्था 'केंद्रीय सैन्य आयोग' (CMC) के लगभग खाली होने के बाद, चिनफिंग ने सेना की कमान पूरी तरह अपने दो सबसे भरोसेमंद वफादारों— झांग शुगुआंग और वांग गैंग को सौंप दी है।क्या है खतरनाक 'माओ मॉडल' और बंदूक पर चिनफिंग का कब्जा?शी चिनफिंग के इस आक्रामक कदम को चीन के संस्थापक माओ जेदोंग के ऐतिहासिक 'माओ मॉडल' से जोड़कर देखा जा रहा है। इस रणनीति का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि देश की कम्युनिस्ट पार्टी और 20 लाख सैनिकों वाली दुनिया की सबसे बड़ी सेना का हर बड़ा अधिकारी सिर्फ और सिर्फ राष्ट्रपति के प्रति वफादार रहे। साल 2024 में खुद चिनफिंग ने खुलेआम कहा था कि बंदूक सिर्फ वफादार हाथों में ही रहनी चाहिए। सात सदस्यीय टॉप कमांड सेंटर (CMC) में अब प्रभावी रूप से केवल चिनफिंग और उपाध्यक्ष झांग शेंगमिन ही बचे हैं, बाकी सभी सीटें भ्रष्टाचार जांच और अचानक गायब होने के कारण खाली हो चुकी हैं।भारत और ताइवान सीमा पर नई नियुक्तियों का क्या होगा असर?चिनफिंग द्वारा प्रमोट किए गए दोनों जनरलों की भूमिका बेहद संवेदनशील है:वायुसेना प्रमुख वांग गैंग: 61 वर्षीय वांग गैंग एक पूर्व स्टंट पायलट रहे हैं। भारत के साथ लगी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) और ताइवान मोर्चे पर चीनी हवाई तैनाती, लड़ाकू विमानों, ड्रोन, मिसाइल सपोर्ट और हाई-एल्टीट्यूड सैन्य ऑपरेशन्स के सभी बड़े फैसले अब सीधे वांग गैंग के हाथों में होंगे।भ्रष्टाचार जांच प्रमुख झांग शुगुआंग: 67 वर्षीय झांग शुगुआंग को CMC की भ्रष्टाचार निरोधक इकाई का नया बॉस बनाया गया है। इसका सीधा मतलब है कि चिनफिंग की 'सेना-सफाई' मुहिम के तहत अगले दौर की गिरफ्तारियां और जांच अब शुगुआंग के इशारे पर ही होंगी।सेना में खालीपन से कमजोर पड़ा चीन का युद्ध तंत्रथिंक टैंक सीएसआईएस (CSIS) की रिपोर्ट के अनुसार, चीनी सेना के शीर्ष 176 अहम पदों में से 101 अधिकारियों के हटने से सेना का आंतरिक तालमेल बेहद कमजोर हुआ है। इसका असर चीन की युद्ध तैयारियों पर भी दिखने लगा है। साल 2024 में जहां चीन ताइवान के खिलाफ महज 3 से 4 दिनों में बड़े सैन्य अभ्यास शुरू कर देता था, वहीं साल 2025 और 2026 में शीर्ष कमान में खालीपन के कारण चीन को प्रतिक्रिया देने और युद्धाभ्यास शुरू करने में 12 से 19 दिनों का लंबा वक्त लग गया। अमेरिका के बाद दुनिया में सबसे ज्यादा रक्षा बजट खर्च करने वाले चीन में इस आंतरिक कलह से उसकी लड़ाकू क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
पंजाब नेशनल बैंक (PNB) को अरबों रुपये का चूना लगाकर देश से भागे हीरा कारोबारी नीरव मोदी की मुश्किलें अब अंतिम पड़ाव पर पहुंच गई हैं। नीरव मोदी यूरोपियन कोर्ट ऑफ ह्यूमन राइट्स (ECHR) में अपनी आखिरी कानूनी लड़ाई भी पूरी तरह हार गया है। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद अब ब्रिटेन से उसकी भारत वापसी और प्रत्यर्पण का रास्ता पूरी तरह साफ हो चुका है। कानूनी दस्तावेजों के अनुसार, नीरव मोदी के पास मौजूद सभी अंतरराष्ट्रीय और स्थानीय कानूनी विकल्प अब पूरी तरह खत्म हो गए हैं और ब्रिटिश सरकार उसे किसी भी वक्त भारत को सौंप सकती है।अप्रैल में गुपचुप लगाई थी गुहार, मानवाधिकार अदालत से भी लगा बड़ा झटकाब्रिटेन की निचली अदालतों और हाई कोर्ट से तगड़ा झटका लगने के बाद नीरव मोदी ने अप्रैल 2026 में यूरोपियन कोर्ट ऑफ ह्यूमन राइट्स (ECHR) का दरवाजा खटखटाया था। इस याचिका को अदालत ने शुरुआत में पूरी तरह गुप्त रखा था। नीरव मोदी ने ब्रिटेन की अदालतों में खुद को बचाने के लिए मशहूर 'भंडारी जजमेंट' का हवाला दिया था, जिसमें रक्षा दलाल संजय भंडारी के मामले में भारत की जेलों में प्रताड़ना के डर को आधार मानकर प्रत्यर्पण से इनकार किया गया था। नीरव ने भी यही दलील दी कि भारत की जेलों में उसकी जान को खतरा हो सकता है और उसे प्रताड़ित किया जा सकता है। हालांकि, भारतीय जांच एजेंसी सीबीआई (CBI) के अधिकारियों ने कोर्ट में जेल की स्थितियों को लेकर पुख्ता सबूत और सरकारी आश्वासन पेश किए, जिसके बाद ब्रिटेन के हाई कोर्ट और अब ECHR ने नीरव मोदी के इन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया।मार्च 2019 से लंदन की वैंड्सवर्थ जेल में बंद है पीएनबी घोटाले का मास्टरमाइंडनीरव मोदी मार्च 2019 में लंदन में हुई अपनी गिरफ्तारी के बाद से लगातार वहां की कुख्यात 'वैंड्सवर्थ जेल' (Wandsworth Prison) में बंद है। भारत में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) को पंजाब नेशनल बैंक (PNB) के महाघोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों में उसकी लंबे समय से तलाश है। ब्रिटेन की अदालत ने अपनी अंतिम टिप्पणी में साफ कहा कि नीरव मोदी का मामला कोई असाधारण या मानवाधिकार उल्लंघन का मामला नहीं है और इस केस को दोबारा खोलने का कोई ठोस आधार नहीं बचता है।कूटनीतिक औपचारिकताएं शुरू, भारतीय जांच एजेंसियां लाने को तैयारराजनयिक और कूटनीतिक सूत्रों के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय अदालत से हरी झंडी मिलने के बाद ब्रिटेन के गृह मंत्रालय और प्रशासनिक अधिकारियों ने नीरव मोदी को भारतीय अधिकारियों को सौंपने की अंतिम प्रक्रिया तेज कर दी है। इस हाई-प्रोफाइल मामले में अब सिर्फ कुछ कागजी और प्रशासनिक औपचारिकताएं ही शेष रह गई हैं। भारतीय सुरक्षा और जांच एजेंसियां किसी भी समय लंदन के लिए उड़ान भर सकती हैं और नीरव मोदी को मुंबई या दिल्ली लाकर कानून के शिकंजे में खड़ा किया जा सकता है।
अंतरराष्ट्रीय रक्षा सौदों और खुफिया एजेंसियों के नाम पर धोखाधड़ी का एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है जिसने जकार्ता से लेकर वॉशिंगटन तक हड़कंप मचा दिया है। भारतीय मूल के बिजनेसमैन गौरव श्रीवास्तव पर आरोप लगा है कि उन्होंने खुद को अमेरिकी खुफिया एजेंसी सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (CIA) का गुप्त एजेंट बताकर इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्राबोवो सुबियांतो से नजदीकियां बढ़ाईं। ऑर्गनाइज्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट (OCCRP) की एक खोजी रिपोर्ट के अनुसार, श्रीवास्तव ने इस फर्जी पहचान का इस्तेमाल इंडोनेशियाई सरकार से फाइटर जेट और अत्याधुनिक सैन्य उपकरणों की अरबों डॉलर की डिफेंस डील हासिल करने के लिए किया था।फोन कॉल से हुआ पर्दाफाश और अदालती मुकदमों में बड़े खुलासेइस पूरी अंतरराष्ट्रीय साजिश की पोल तब खुली जब गौरव श्रीवास्तव के पूर्व बिजनेस पार्टनर नील्स ट्रोस्ट ने कैलिफोर्निया और न्यूयॉर्क के दक्षिणी जिले की अदालतों में मुकदमे दायर किए। इन मुकदमों और रिकॉर्ड की गई फोन कॉलों के आधार पर दावा किया गया है कि श्रीवास्तव ने खुद को रसूखदार CIA ऑपरेटिव बताकर इंडोनेशिया के वरिष्ठ अधिकारियों और तत्कालीन रक्षा मंत्री (अब राष्ट्रपति) प्राबोवो सुबियांतो तक सीधी पहुंच बनाई। वे वर्ष 2020 में वॉशिंगटन डीसी और जकार्ता में हुई हाई-लेवल डिफेंस मीटिंग्स में भी शामिल होने में कामयाब रहे, जहां सैन्य साजो-सामान की खरीद पर बड़ी चर्चाएं हुई थीं।शेल कंपनियों के जरिए 13.9 बिलियन डॉलर के F-15 फाइटर जेट्स का जालअपनी इस फर्जी साख के दम पर श्रीवास्तव ने साल 2020 से 2022 के बीच अपनी चार कंपनियों के जरिए इंडोनेशिया के रक्षा मंत्रालय से पांच शुरुआती रक्षा समझौते, 'लेटर ऑफ इंटेंशन' और एक MoU हासिल कर लिए। इन प्रस्तावित सौदों में 36 F-15 फाइटर जेट, UH-60 ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर, C-130 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और एक जॉइंट कमांड सेंटर की आपूर्ति शामिल थी, जिसकी कुल अनुमानित कीमत करीब 13.9 बिलियन डॉलर (लगभग 1.15 लाख करोड़ रुपये) थी। हालांकि, बाद में कॉर्पोरेट जांच में खुलासा हुआ कि ये चारों कंपनियां महज 'शेल एंटिटीज' (कागजी कंपनियां) थीं, जिन्हें डिफेंस सेक्टर का कोई अनुभव नहीं था और टैक्स न भरने के कारण इनका रजिस्ट्रेशन भी रद्द कर दिया गया था। राहत की बात यह रही कि इंडोनेशियाई सरकार ने इनके तहत कोई वास्तविक भुगतान या खरीद नहीं की।राष्ट्रपति के भाई से नजदीकी और 51 मिलियन डॉलर के लोन का खेलअदालती शिकायतों के मुताबिक, गौरव श्रीवास्तव ने केवल सरकारी अधिकारियों को ही नहीं, बल्कि इंडोनेशिया के सबसे प्रभावशाली व्यापारियों को भी अपने जाल में फंसाया। उन्होंने राष्ट्रपति प्राबोवो के भाई और अरसारी ग्रुप के चेयरमैन हाशिम जोजोहादिकुसुमो से गहरी नजदीकियां बनाईं। श्रीवास्तव के कथित रसूख के झांसे में आकर उनके पार्टनर ट्रोस्ट ने अपनी कंपनी की 50% हिस्सेदारी उनके नाम कर दी, जिसके बाद श्रीवास्तव ने उस कंपनी से अरसारी ग्रुप को 51 मिलियन डॉलर का लोन भी दिलवा दिया। दूसरी तरफ, गौरव श्रीवास्तव ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे अपने पूर्व पार्टनर द्वारा मनगढ़ंत कहानी बताया है।
पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में आटे, बिजली और बुनियादी अधिकारों के लिए लगी गदर की आग अब सात समंदर पार ब्रिटेन की राजधानी लंदन तक पहुंच गई है। पीओके में पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों और मानवाधिकारों के हनन के विरोध में लंदन की सड़कों पर भारी संख्या में कश्मीरी समुदाय के लोग उतर आए हैं। प्रदर्शनकारियों ने पाकिस्तानी दूतावास के बाहर और मध्य लंदन के प्रमुख इलाकों में पाकिस्तानी फौज के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इस गंभीर संकट में दखल देने की अपील की।लंदन में पाकिस्तानी दूतावास के बाहर भारी आक्रोश, सेना को पीछे हटने की मांगब्रिटेन में रह रहे मूल रूप से पीओके के निवासियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया। प्रदर्शनकारियों के हाथों में बैनर और तख्तियां थीं, जिन पर पाकिस्तानी सेना द्वारा निर्दोष नागरिकों पर किए जा रहे बल प्रयोग को रोकने की मांग की गई थी। प्रदर्शन के दौरान पाकिस्तानी फौज पीओके खाली करो और कश्मीरियों को इंसाफ दो जैसे नारे गूंजते रहे। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि इस्लामाबाद की सरकार पीओके के प्राकृतिक संसाधनों को लूट रही है और वहां के स्थानीय लोगों को बुनियादी सहूलियतें भी नहीं मिल पा रही हैं।क्यों भड़की है पीओके में गदर की आग?दरअसल, पीओके में पिछले लंबे समय से महंगाई, भारी बिजली बिल, आटे की किल्लत और बेरोजगारी को लेकर आम जनता सड़कों पर है। जब स्थानीय लोगों ने शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन शुरू किया, तो पाकिस्तानी रेंजरों और पुलिस ने उन पर बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े, जिसमें कई नागरिकों की जान चली गई। इसी दमनकारी नीति के विरोध में अब दुनिया भर में रह रहे कश्मीरी एकजुट हो रहे हैं और पाकिस्तानी हुकूमत के दोहरे रवैये को वैश्विक मंच पर बेनकाब कर रहे हैं।वैश्विक मंच पर पाकिस्तान को घेरने की बड़ी तैयारीलंदन में हुए इस बड़े प्रदर्शन को राजनीतिक विश्लेषक पाकिस्तान के लिए एक बड़ा राजनयिक झटका मान रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने ब्रिटिश सरकार और संयुक्त राष्ट्र (UN) को एक ज्ञापन भी सौंपा है, जिसमें पीओके में हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की गई है। कश्मीरियों का कहना है कि वे चुप नहीं बैठेंगे और पाकिस्तान के इस दमन चक्र के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी आवाज बुलंद करते रहेंगे ताकि वहां रह रहे उनके भाई-बहनों को पाकिस्तानी सेना के खौफ से आजादी मिल सके।
सुपर टाइफून का रौद्र रूप: 290 किमी की रफ्तार से टकराई तबाही, समंदर की लहरों ने मचाया हाहाकार
समुद्र में उठे सुपर टाइफून ने भीषण रूप धारण कर लिया है। 290 किलोमीटर प्रति घंटे की तूफानी रफ्तार से तटों से टकराई इस प्राकृतिक आपदा ने हर तरफ तबाही के निशान छोड़ दिए हैं। तेज हवाओं और ऊंची उठती लहरों ने जनजीवन को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है, जिससे तटीय इलाकों के लोग दहशत में हैं।प्रशासन अलर्ट और बचाव कार्य जारीखतरनाक तूफानी हवाओं के कारण घरों और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा है। स्थानीय प्रशासन ने हाई अलर्ट जारी कर बचाव अभियान तेज कर दिए हैं। समंदर की उफनती लहरें अभी भी संकट का संकेत दे रही हैं, जिससे प्रभावित क्षेत्रों में हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं।
नाटो समिट से पहले ट्रंप का मेलोनी पर बड़ा पोस्ट, पुरानी फोटो वायरल होने से मचा सियासी घमासान
नाटो शिखर सम्मेलन शुरू होने से ठीक पहले डोनाल्ड ट्रंप ने इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के साथ अपनी एक पुरानी तस्वीर साझा कर हलचल पैदा कर दी है। ट्रंप के इस पोस्ट ने सोशल मीडिया पर भारी हंगामा खड़ा कर दिया है। राजनीतिक गलियारों में इस अचानक आई पोस्ट के मायने तलाशे जा रहे हैं, जिसे कुछ लोग नाटो की एकजुटता के लिए एक संदेश के रूप में देख रहे हैं।क्यों हो रही है चर्चा?यह पोस्ट ऐसे समय पर आई है जब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक तनाव गहराया हुआ है। ट्रंप और मेलोनी के बीच के रिश्तों को लेकर दुनिया भर के मीडिया में नई बहस छिड़ गई है, जिससे नाटो समिट की गंभीरता और भी बढ़ गई है।
इंडोनेशिया में पीएम मोदी: 90% मुस्लिम आबादी के बीच कैसे जीवित हैं राम-महाभारत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा भारत की 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' को नई ऊंचाई देने के लिए अहम है। इंडोनेशिया दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम बहुल देश है, लेकिन यहाँ की संस्कृति में भारतीय जड़ों की गहरी छाप है। रामायण और महाभारत यहाँ के लोगों के लिए सिर्फ धर्मग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने का दर्शन हैं, जो कला और लोक-परंपराओं में आज भी रचे-बसे हैं।सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासतइंडोनेशियाई संस्कृति में राम और कृष्ण की गाथाओं का इतना गहरा प्रभाव है कि वे इस्लाम के साथ पूरी तरह से एकीकृत हो चुकी हैं। राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के साथ पीएम मोदी का प्रंबनन मंदिर दौरा दोनों देशों के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंधों को नई मजबूती प्रदान करेगा।
अमेरिका और इजरायल के बीच ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंध जगजाहिर हैं, लेकिन अमेरिकी प्रशासन अक्सर यह जताने से बाज नहीं आता कि इजरायल का अस्तित्व केवल उसकी बदौलत है. हाल ही में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस (JD Vance) ने एक इंटरव्यू के दौरान इजरायल पर तंज कसते हुए कहा था कि इस वक्त दुनिया में डोनाल्ड ट्रंप ही इजरायल के प्रति सहानुभूति रखने वाले एकमात्र राष्ट्राध्यक्ष हैं और अमेरिका की मदद के बिना इजरायल दुश्मनों से नहीं बच सकता. इस पर इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी दावे की हवा निकालते हुए भारत का नाम लेकर ऐसा करारा जवाब दिया है कि वाशिंगटन में हड़कंप मच गया है.जेडी वेंस ने इजरायल को दी नसीहत, सैन्य सहायता की दिलाई याददरअसल, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए एक साक्षात्कार में इजरायली नेताओं से अमेरिका-ईरान शांति समझौते की सार्वजनिक आलोचना बंद करने को कहा था. वेंस ने इजरायल को चेतावनी भरे लहजे में कहा, आप केवल 90 लाख की आबादी वाला देश हैं और हर राष्ट्रीय सुरक्षा समस्या को सिर्फ जंग से हल नहीं कर सकते. उन्होंने याद दिलाया कि इजरायल के दो-तिहाई सुरक्षात्मक हथियार अमेरिकी करदाताओं के पैसे से बने हैं. वेंस ने हिजबुल्लाह पर हुए हमलों की भी आलोचना की थी, जिससे अमेरिका-तेहरान वार्ताओं पर बुरा असर पड़ रहा था.140 करोड़ आबादी वाले भारत से मिलता है अगाध प्रेम: नेतन्याहूफॉक्स न्यूज (Fox News) को दिए एक तीखे इंटरव्यू में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने जेडी वेंस के 'अकेले दोस्त' वाले दावे को सिरे से खारिज कर दिया. नेतन्याहू ने कहा, मैं जेडी वेंस का सम्मान करता हूं, लेकिन मैं उनकी हर बात से सहमत नहीं हूं. डोनाल्ड ट्रंप जरूर हमारे सबसे अच्छे दोस्त हैं, लेकिन दुनिया में हमारे कई और मित्र भी हैं. उदाहरण के लिए 'भारत' नाम का एक महान देश है, जिसकी आबादी 1.4 अरब है और वहां से हमें जो जबरदस्त और अटूट समर्थन मिलता है, उसे कोई नकार नहीं सकता.मेरा फेसबुक अकाउंट भारतीयों के प्यार से भरा पड़ा है: इजरायली पीएमनेतन्याहू ने सोशल मीडिया पर मिल रहे जनसमर्थन का जिक्र करते हुए गर्व से कहा, मेरा फेसबुक अकाउंट (Facebook) देखें, वह भारतीय यूजर्स के अपार और भावनात्मक समर्थन से पूरी तरह से भरा रहता है. उन्होंने आगे कहा कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया और कुछ चुनिंदा वर्गों में इजरायल की चाहे जितनी आलोचना हो, लेकिन जमीनी हकीकत अलग है. दुनिया के कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष मुझे व्यक्तिगत तौर पर फोन करते हैं और कहते हैं कि भले ही उनके यहां पब्लिक ओपिनियन की दिक्कत हो, लेकिन वे इजरायल का पूरा सम्मान करते हैं.एआई (AI) और साइबर सुरक्षा में इजरायल का लोहा मानती है दुनियापीएम नेतन्याहू ने साफ किया कि आज पूरी दुनिया इज़राइल के साथ रणनीतिक और तकनीकी साझेदारी करना चाहती है. उन्होंने कहा, वैश्विक नेता हमसे सैन्य रणनीतियों को सीखने की इच्छा जताते हैं. वे हमारी उन्नत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और साइबर विशेषज्ञता का लाभ उठाना चाहते हैं. इजरायल साइबर सुरक्षा के मामले में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है और हमारी तकनीक बेहद एडवांस है। इस बीच, सूत्रों के अनुसार अमेरिकी राष्ट्रपति के नाटो शिखर सम्मेलन से लौटने के बाद अगले हफ्ते डोनाल्ड ट्रंप और नेतन्याहू के बीच एक बड़ी बैठक प्रस्तावित है, जिसमें दोनों देशों के बीच उपजे हालिया मतभेदों को सुलझाया जाएगा.
ताइवान ने चीन की समुद्री गश्त को बताया अवैध, क्षेत्रीय शांति पर जताई चिंता
ताइवान ने चीन के कोस्ट गार्ड (सीसीजी) के पूर्वी समुद्री क्षेत्र में गश्त करने की आलोचना की है। ताइवान ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ अधिकार का अवैध विस्तार बताया है और कहा है कि इससे क्षेत्रीय स्थिरता को खतरा पैदा हो रहा है।
4 जुलाई से ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की अंतिम विदाई की रस्में शुरू हुईं। उनका जनाजा तेहरान, कोम, नजफ और इराक के कर्बला शहर होते हुए, 9 जुलाई को मशहद पहुंचेगा, जहां उन्हें दफन किया जाएगा। इस दौरान 100 से ज्यादा देशों के नेता और 3 करोड़ से ज्यादा लोग ‘शियाओं के रहबर’ का आखिरी दीदार करेंगे। शिया मुसलमानों में मातम इतना अहम क्यों है, खामेनेई की हत्या को कर्बला की शहादत से क्यों जोड़ा जा रहा और इस बड़े जलसे के पीछे असली वजह क्या है; मंडे मेगा स्टोरी में पूरी कहानी… **** ग्राफिक्स: द्रगचंद्र भुर्जी और महेंद्र वर्मा --------- यह खबर भी पढ़िए… दर्जनभर लोगों से गुजरकर मुजतबा तक पहुंचती है कोई चिट्ठी; पिता को कंधा देने पर सस्पेंस, क्या इजराइल वाकई मार देगा ईरान के सुप्रीम लीडर रहे आयतुल्लाह अली खामेनेई के अंतिम संस्कार की रस्में जारी हैं। 100 से ज्यादा देशों के नेता पहुंच रहे हैं। काले कपड़ों में रोते-बिलखते लाखों ईरानी अपने ‘रहबर’ का आखिरी दीदार करना चाहते हैं। इन सबके बीच ईरान के नए सुप्रीम लीडर मुजतबा खामेनेई गायब हैं। पिता के जनाजे को कंधा देंगे या नहीं, इस पर भी सस्पेंस है। पूरी खबर पढ़िए…
नाटो शिखर सम्मेलन से पहले अंकारा में कड़ी सुरक्षा, 46 संदिग्ध हिरासत में लिए गए
तुर्की की राजधानी अंकारा में पुलिस ने 46 लोगों को हिरासत में लिया है। यह कार्रवाई 7-8 जुलाई को होने वाले नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (नाटो) शिखर सम्मेलन से पहले सुरक्षा व्यवस्था के तहत की गई। यह जानकारी रविवार को तुर्की के मीडिया ने दी।
पाकिस्तान एयर फोर्स ग्रुप कैप्टन की गोली मारकर हत्या, महिला की मदद के दौरान हुआ हमला
इस्लामाबाद में शाहीन चौक के पास पाकिस्तान एयरफोर्स (पीएएफ) के ग्रुप कैप्टन की अज्ञात हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी।
इटली के रक्षा मंत्री बोले-रक्षा खर्च पर नहीं कोई टकराव, सहयोग और सुरक्षा पर जोर
इटली के रक्षा मंत्री गुइडो क्रोसेटो ने रविवार को अंकारा में होने वाले नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (नाटो) समिट को लेकर उम्मीद जताते हुए कहा कि अंकारा शिखर सम्मेलन को इस तरह तैयार किया गया है कि सब कुछ ठीक से चले, सभी वादों का पालन हो और हर देश यह दिखाए कि उसने अपना हिस्सा पूरा किया है
फ्रांस-स्पेन सीमा पर आग का कहर – 1,500 हेक्टेयर जंगल राख
फ्रांस-स्पेन सीमा क्षेत्र में जंगल की आग भी जारी रही। पूर्वी पाइरेनीज इलाके में ट्रेविलाच के पास शनिवार रात शुरू हुई भीषण आग तेज हवा और भीषण गर्मी के कारण फिर से भड़क उठी
दुनिया भर के देशों को कच्चा तेल बेचने वाला रूस अब दूसरे देशों से पेट्रोल मंगवाने को मजबूर है। भारत से भी पेट्रोल के कई टैंकर भेजे जाने की खबरें हैं। रूसी पेट्रोल पंपों पर पहली बार लंबी-लंबी कतारें लगी हैं। पेट्रोल खरीदने पर पाबंदियां लागू हैं। इसकी वजह है- यूक्रेन के हमले। आखिर यूक्रेन ने रूस में पेट्रोल की किल्लत कैसे पैदा कर दी, क्या वाकई भारत, रूस को पेट्रोल बेच रहा; और रूस, यूक्रेन के हमले क्यों नहीं रोक पा रहा, जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में... सवाल-1: दुनिया को तेल बेचने वाले रूस में तेल की कमी कैसे हो गई है? जवाब: रूस-यूक्रेन जंग शुरू होने के बाद से यूक्रेन लगातार रूसी ऑइल इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बना रहा है। मार्च 2026 से अब तक रूस की ऑयल रिफाइनरी पर 50 से ज्यादा हमले किए हैं। 4 जुलाई को यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने बताया कि यूक्रेन की सीमा से करीब 850 किमी अंदर रूस के सेंट पीटर्सबर्ग की रिफाइनरी पर ड्रोन अटैक किया है। इस रिफाइनरी से हर साल 1.25 करोड़ टन पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स बनते हैं। 3 जून को भी इस रिफाइनरी पर हमला हुआ था। इसके अलावा 18 जून को मॉस्को के बाहरी इलाकों में स्थित रिफाइनरी पर हमला हुआ। यूक्रेनी मीडिया के मुताबिक, रूस की टॉप-10 रिफाइनरियों में से 8 पर यूक्रेन हमले कर चुका है। रिफाइनरियों पर हुए हमले से रूस में पेट्रोल की भारी कमी हो गई है… सवाल-2: क्या इस स्थिति से निपटने में भारत रूस की मदद कर रहा है? जवाब: रॉयटर्स के मुताबिक, भारतीय तेल कंपनी नायरा एनर्जी ने 1 जुलाई को पेट्रोल के 2 टैंकर रूस भेजे हैं। इन टैंकरों में करीब 60,000 मीट्रिक टन पेट्रोल है। नायरा एनर्जी में रूस की सरकारी तेल कंपनी रोसनेफ्ट की 49% हिस्सेदारी है। हालांकि नायरा ने टैंकर भेजने की पुष्टि नहीं की है। रूसी सरकार के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा है कि रूस कई दशकों बाद ईंधन आयात करने की तैयारी में है। दूसरे देशों के संपर्क से ईंधन खरीदने की बातचीत चल रही है। हालांकि भारतीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी का कहना है, 'भारतीय सरकारी या प्राइवेट कंपनियां सीधे रूस को ईंधन नहीं बेच रही हैं। हो सकता है कि रूस अंतरराष्ट्रीय व्यापारियों के जरिए भारतीय मूल का ईंधन खरीद रहा हो।' दरअसल, सीधे व्यापार के बजाय अंतरराष्ट्रीय व्यापारियों के जरिए भी तेल खरीदने का एक विकल्प होता है। ये व्यापारी कई देशों की तेल कंपनियों से तेल खरीदकर उसका पेमेंट करते हैं। फिर ये सारा तेल सिंगापुर, UAE के फुजैरा या यूरोप के रोटरडैम जैसे बड़े बंदरगाहों पर ले जाते हैं। यहां कई बार अलग-अलग देशों का तेल मिक्स भी किया जाता है। फिर जब रूस या किसी अन्य देश को तेल की जरूरत पड़ती है, तो ये व्यापारी उसे तेल के टैंकर बेच देते हैं। सवाल-3: तेल की जरूरत पूरी करने के लिए रूस और क्या कर रहा है? जवाब: रूस 2 मुख्य तरीके अपना रहा है- 1. दूसरे देशों से खरीद 2. पेट्रोल एक्सपोर्ट और बिक्री पर पाबंदी रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने कहा है, ‘रिफाइनरी पर हमलों से ईंधन की कमी तो हुई है, लेकिन यह गंभीर नहीं है। पेट्रोल भंडार में पिछले साल के मुकाबले सिर्फ 4% की कमी आई है।’ सवाल-4: रूस तेल की कमी से कब तक निपट पाएगा? जवाब: ग्लोबल बिजनेस कंसल्टेंसी फर्म मैक्रो-एडवाइजरी लिमिटेड के CEO और एनालिस्ट क्रिस वेफर कहते हैं, ‘रूस में फ्यूल का स्टोरेज पर्याप्त है, लेकिन दिक्कत ये है कि ये गलत जगह पर है। जिन इलाकों में फ्यूल की कमी है, वहां सप्लाई रातोंरात नहीं हो सकती। इस बड़े लॉजिस्टिक्स कई हफ्ते लग सकते हैं। ये एक बड़ा लॉजिस्टिक्स ऑपरेशन है।’ जिन रूसी रिफाइनरीज को यूक्रेनी हमलों में नुकसान पहुंचा है, उनको रिपेयर करना भी मुश्किल है। इनमें कुछ मशीनरी और इक्विपमेंट ऐसी हैं, जिसे विदेशों से इम्पोर्ट किया जाता है, लेकिन रूस पर विदेशी व्यापार को लेकर कई तरह के बैन लगे हैं। वेफर के मुताबिक, मॉस्को रिफाइनरी की मरम्मत में कम से कम 3 महीने लग जाएंगे। इसी से मॉस्को और आसपास के इलाके में जरूरत के 40% फ्यूल की सप्लाई होती है। वहीं ऑयल मार्केट एनालिस्ट गैरी पीच कहते हैं कि मरम्मत के बावजूद रिफाइनरीज पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रही हैं। इनमें इतना ज्यादा नुकसान हुआ है कि गर्मियों के दौरान, यानी अगस्त तक रिफाइनिंग दोबारा पूरी तरह शुरू नहीं हो पाएगी। पीच के मुताबिक, जब तक यूक्रेन-रूस सीजफायर या कोई समझौता नहीं हो पाए, तब तक कई रिफाइनरीज की मरम्मत करने से कोई फायदा नहीं है, क्योंकि इन पर दोबारा हमला कर दिया जाएगा। वेफर कहते हैं कि अगर ऑयल इन्फ्रास्ट्रक्चर को और नुकसान न पहुंचे, तो भी सितंबर तक फ्यूल की कमी बनी रहेगी, क्योंकि इसी दौरान खेती के लिए सबसे ज्यादा तेल की जरूरत होती है। सवाल-5: आखिर रूस यूक्रेन के हमलों का सामना क्यों नहीं कर पा रहा? जवाब: यूक्रेन और रूस के बीच जंग का पांचवां साल चल रहा है। यूक्रेन, रूसी रिफाइनरीज पर ज्यादातर ड्रोन अटैक ही करता है। 3 बड़ी वजहों से रूस इन्हें रोक नहीं पा रहा... 1. यूक्रेन के लॉन्ग-रेंज ड्रोन ट्रैक करना मुश्किल 2. सैकड़ों सस्ते ड्रोन रोकना महंगा 3. रूस का बड़ा इलाका ही उसका दुश्मन --------- यह खबर भी पढ़िए… दर्जनभर लोगों से गुजरकर मुजतबा तक पहुंचती है कोई चिट्ठी; पिता को कंधा देने पर सस्पेंस, क्या इजराइल वाकई मार देगा ईरान के सुप्रीम लीडर रहे आयतुल्लाह अली खामेनेई के अंतिम संस्कार की रस्में जारी हैं। 100 से ज्यादा देशों के नेता पहुंच रहे हैं। काले कपड़ों में रोते-बिलखते लाखों ईरानी अपने ‘रहबर’ का आखिरी दीदार करना चाहते हैं। इन सबके बीच ईरान के नए सुप्रीम लीडर मुजतबा खामेनेई गायब हैं। पिता के जनाजे को कंधा देंगे या नहीं, इस पर भी सस्पेंस है। पूरी खबर पढ़िए…
यह जवाब उस समय सामने आया जब अमेरिकी जिला न्यायाधीश निकोलस गरौफिस ने न्याय विभाग से पूछा कि वह इस मामले को स्थायी रूप से समाप्त करने की मांग क्यों कर रहा है। इससे पहले विभाग ने केस समाप्त करने के लिए आवेदन तो दिया था, लेकिन उसमें निर्णय के पीछे के कारणों का विस्तार से उल्लेख नहीं किया गया था।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चेतावनी के बाद पलटवार करते हुए ईरान ने कहा है कि हॉर्मुज स्ट्रेट बाहरी ताकतों के लिए सैन्य शक्ति प्रदर्शन का मंच नहीं है। ईरान के एक वरिष्ठ राजनयिक ने आगाह किया कि इस रणनीतिक समुद्री मार्ग का इस्तेमाल सैन्य ताकत दिखाने के बजाय क्षेत्रीय स्थिरता और सुरक्षित नौवहन सुनिश्चित करने के लिए किया जाना चाहिए।
अपने संबोधन में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सराहना करते हुए कम्युनिज्म की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि अमेरिका में कम्युनिस्ट विचारधारा के लिए कोई स्थान नहीं है।
‘फर्जी आंसू’ का तंज: खामेनेई के अंतिम संस्कार पर ट्रंप का हमला
तेहरान में दिवंगत सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार कार्यक्रमों के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नया विवादित बयान दिया है
ईरान के दिवंगत सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के अंतिम संस्कार को लेकर वैश्विक राजनीति में एक नया उबाल आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस कार्यक्रम को लेकर बेहद तीखी और विवादास्पद टिप्पणी की है। ट्रंप ने दावा किया कि ईरान की बची हुई पूरी लीडरशिप इस अंतिम संस्कार में एक साथ मौजूद है और यदि वे चाहें, तो एक हमले में पूरी लीडरशिप का सफाया कर सकते हैं। हालांकि, उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि वे ऐसा नहीं करेंगे, क्योंकि उन्हें ईरान के साथ बातचीत का रास्ता खुला रखना है।'फर्जी आंसू' और ट्रंप का तंजईरान में खामेनेई के अंतिम संस्कार के दौरान उमड़ी भारी भीड़ और लोगों को रोते हुए देखकर ट्रंप ने उन पर तंज कसा है। ट्रंप ने कहा, मुझे लगता था कि लोग खामेनेई से नफरत करते हैं, शायद ये आंसू फर्जी हैं। ट्रंप के इस बयान पर ईरान ने कड़ा रुख अपनाते हुए अर्मेनिया स्थित ईरानी दूतावास के जरिए सोशल मीडिया पर जवाब दिया। ईरान ने कहा, ट्रंप इन संवेदनाओं को नहीं समझ सकते, क्योंकि उनके पास न तो सभ्यता है, न इतिहास और न ही सम्मान।सुरक्षा के घेरे में अंतिम संस्कार, ईरान की सख्त चेतावनीखामेनेई के अंतिम संस्कार में दुनिया भर से शिया समुदाय के लोग जुट रहे हैं, जिससे करोड़ों की भीड़ का अनुमान है। भीड़ को संभालने में संभावित चूक और सुरक्षा खतरों के बीच, ईरान को अमेरिका और इजरायल द्वारा हमले का डर सता रहा है। इसी के मद्देनजर ईरानी सरकार ने एक सख्त चेतावनी जारी करते हुए कहा कि यदि इस दौरान किसी भी तरह का हमला हुआ, तो इसका 'तीखा जवाब' दिया जाएगा। सरकारी मीडिया के अनुसार, इतनी बड़ी भीड़ के कारण भगदड़ जैसी स्थिति में हजारों लोगों के हताहत होने की भी आशंका जताई जा रही है।कूटनीति बनाम सैन्य शक्तिट्रंप ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि उनके पास ईरान के शीर्ष नेतृत्व को एक झटके में खत्म करने की क्षमता है, लेकिन वे वार्ता का विकल्प चुन रहे हैं। ट्रंप का तर्क है, अगर मैं उन्हें खत्म कर देता हूं, तो मैं बात किससे करूंगा? यह बयान ऐसे समय आया है जब दोनों देशों के बीच शांति समझौते के आसार बढ़ रहे हैं। गौरतलब है कि खामेनेई का अंतिम संस्कार चार दिनों तक चलेगा और 9 जुलाई को उन्हें उनके गृहनगर मशहद में सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा। ईरान के लिए यह न केवल एक शोक का समय है, बल्कि अपने अस्तित्व और सुरक्षा को साबित करने की एक बड़ी चुनौती भी है।
अमेरिकी कांग्रेस की सुनवाई में सीआईए ने विश्वविद्यालयों, अस्पतालों और जेलों के इस्तेमाल की जांच की
इस हफ्ते हुई कांग्रेस की एक सुनवाई में अमेरिकी खुफिया एजेंसी (सीआईए) के कोल्ड वॉर के दौर के एमके-अल्ट्रा प्रोग्राम की फिर से जांच शुरू हुई
राष्ट्रपति ट्रम्प ने अमेरिकी आजादी की 250वीं सालगिरह पर एक टाइम कैप्सूल दफनाया है। भारत की आजादी के 25 साल बाद भी ऐसा ही टाइम कैप्सूल दफनाया गया था। आज उसी की कहानी… *** 15 अगस्त 1973, आजादी की 26वीं सालगिरह। तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सुबह-सुबह लाल किला पहुंचीं। रस्मन तिरंगा फहराया, भाषण दिया और नेता-अधिकारियों के साथ लाहोरी दरवाजे की तरफ चल दीं। वहां पहले से 32 फीट गहरा एक कुआं खोदा गया था। इंदिरा ने उस कुएं में तांबे और स्टील से बना एक वैक्यूम-सील्ड, भारी-भरकम टाइम कैप्सूल दफना दिया। कहा गया- ‘काल पत्र’ नाम के इस कैप्सूल को 1 हजार साल बाद निकाला जाएगा। हालांकि, सत्ता बदली और 4 साल बाद ही इसे खुदवा लिया गया। 1970 का दशक। देश में कांग्रेस सरकार की कमान संभाल रही थीं इंदिरा गांधी। 1971 की जंग में पाकिस्तान को शिकस्त देकर वो अपने राजनीतिक करियर के चरम पर थीं। उन्हें ख्याल आया कि भविष्य की पीढ़ी को मौजूदा भारत के बारे में बताना चाहिए। यहीं से तय हुआ कि भारत की आजादी के 25 साल पूरे होने पर एक ‘टाइम कैप्सूल’ दफनाया जाएगा। इसमें देश की आजादी और उसके 25 साल बाद के भारत के बारे में बताने वाले दस्तावेज रखे जाएंगे। इसे तैयार करने की जिम्मेदारी मिली इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च, यानी ICHR को। ICHR ने ऐतिहासिक दस्तावेज तैयार करने का काम मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज में इतिहास के प्रोफेसर एस. कृष्णस्वामी को सौंपा। प्रो. कृष्णस्वामी ने दस्तावेज तो बना दिए, लेकिन उन पर कुछ सलाह चाहते थे। उन्होंने दस्तावेजों की एक कॉपी उस दौर के जाने-माने इतिहासकार और तमिलनाडु के आर्काइव्स कमिश्नर टी. बद्रीनाथ को भेजी। बद्रीनाथ ने मसौदा पढ़ा, तो भड़क गए। उनका मानना था कि ऐतिहासिक तथ्यों को गलत ढंग से पेश किया गया है। उन्होंने मद्रास के प्रेसिडेंसी कॉलेज में छात्रों को संबोधित करते हुए कहा, 'आजादी के 25 साल बाद अकाल का खतरा खत्म हो गया है? दावा किया गया है कि भूमि सुधारों को लागू करने से कृषि क्रांति पूरी हो गई है, क्या ये सच है?' यहीं से इंदिरा गांधी की इस पहल का विरोध शुरू हुआ। आरोप लगा कि वो टाइम कैप्सूल के जरिए खुद की और अपने परिवार की वाहवाही कराने की कोशिश कर रही हैं। इंदिरा गांधी को कहना पड़ा- मुझे टाइम कैप्सूल से जुड़ी चीजों के बारे में कोई जानकारी नहीं है। वहीं, ICHR ने प्रो. कृष्णस्वामी को नोटिस जारी कर दिया। इसके बावजूद प्रोजेक्ट नहीं रुका। इस पूरे वाकये का खुलासा इकोनॉमिस्ट वीके रामचंद्रन के आर्टिकल से होता है। 1974 में 'सोशल साइंटिस्ट' जर्नल में छपे इस लेख का शीर्षक था- 'प्रोजेक्ट टाइम कैप्सूल एंड द इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च'। 15 अगस्त 1973 को इंदिरा ने लाल किले के लाहौरी गेट के पास ये टाइम कैप्सूल दफनाया। १ हजार साल तक सुरक्षित रखने के लिए कई इंतजाम किए गए। मसलन- इसे तांबे और स्टील से बनाया गया, जिससे जंग और नमी का असर न पड़े। वैक्यूम-पैक्ड बनाया गया, ताकि हवा, गैस या धूल का असर न हो। उस वक्त इस पूरे प्रोजेक्ट पर 8 हजार रुपए खर्च हुए थे। हालांकि, टाइम कैप्सूल को लेकर इंदिरा का विरोध जारी रहा। 2 महीने बाद, यानी 15 अक्टूबर को CPI (M) के पोलित ब्यूरो मेंबर पी. राममूर्ति ने इस दस्तावेज का ड्राफ्ट जारी कर दिया। उन्होंने इसे भारतीयों की बेइज्जती बताते हुए कहा- ‘यह भारत का इतिहास नहीं है, बल्कि सत्ता में मौजूद कांग्रेस पार्टी की तथाकथित उपलब्धियों की जानकारी देने वाली कांग्रेस के महासचिव की रिपोर्ट जैसा दिखता है।’ 1975-77 की इमरजेंसी के बाद देश का सियासी माहौल पूरी तरह बदल गया। 1977 में चुनाव हुए और इंदिरा गांधी की सरकार चली गई। उनके धुर विरोधी मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी। उन्होंने चुनावी कैम्पेन में कहा था कि सरकार बनी तो टाइम कैप्सूल निकलवाएंगे और सच सबके सामने लाएंगे। नवंबर 1977 के आखिर में टाइम कैप्सूल की जांच के लिए एक संसदीय समिति बनाई गई। इसकी कमान जनता पार्टी के पंजाब से सांसद यज्ञदत्त शर्मा को मिली। शर्मा ने कहा- सच्चाई उजागर करना और इतिहास से लीपापोती को रोकना जरूरी है। दिसंबर 1977 में कड़ी सुरक्षा के बीच टाइम कैप्सूल की खुदाई शुरू हुई। 8 दिसंबर 1977 को कैप्सूल निकाला गया। इसे निकालने में 58 हजार रुपए खर्च हुए, यानी दफनाने से 7 गुना ज्यादा। रिपोर्ट्स हैं कि मोरारजी देसाई और उनके कुछ मंत्रियों ने कैप्सूल के दस्तावेज देखे थे। टाइम कैप्सूल समिति के अध्यक्ष यज्ञदत्त शर्मा ने घोषणा की थी कि 20 दिसंबर 1977 को इन्हें संसद में पेश किया जाएगा। कैप्सूल से निकाले गए दस्तावेजों को संसद की लाइब्रेरी में रखा गया। इस पर कई बार चर्चा भी हुई, लेकिन उसमें क्या लिखा था, ये बात कभी जनता के सामने नहीं आई। दिसंबर 1973 में इंदिरा गांधी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि टाइम कैप्सूल में संविधान की कई माइक्रोफिल्म्स, इवेंट कैलेंडर और लिखित दस्तावेज हैं। असली विवाद दस्तावेज को लेकर है। 2012 में सीनियर जर्नलिस्ट मधु किश्वर ने टाइम कैप्सूल को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में एक RTI लगाई। PMO ने कहा कि उसके पास इंदिरा गांधी सरकार द्वारा 1973 में दफनाए गए कैप्सूल की चीजों के बारे में कोई जानकारी नहीं है। बाद में मधु किश्वर ने केंद्रीय सूचना आयोग के सामने ये मुद्दा उठाया। फरवरी 2013 में आयोग ने PMO को निर्देश दिया कि वे इस बारे में जानकारी जुटाएं, लेकिन PMO की ओर से कोई ठोस जवाब नहीं आया। 12 साल बाद ये मुद्दा राज्यसभा में भी उठा। 16 दिसंबर 2024 को वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने राज्यसभा में कहा कि इसे 5 हजार साल के लिए दफनाया गया और संसद को नहीं बताया गया। सीतारमण ने कहा कि कैप्सूल के दस्तावेजों में अटल बिहारी वाजपेयी के जनसंघ को सेक्युलर देश का विरोध करने वाली एक उग्रवादी रूढ़िवादी हिंदू पार्टी बताया था। इसमें सी. राजगोपालाचारी, राजेंद्र प्रसाद, डॉ. राधाकृष्णन, जाकिर हुसैन और लाल बहादुर शास्त्री का कोई जिक्र नहीं था। लेखक कनैलाल बसु अपनी किताब 'नेताजी: रीडिस्कवर्ड' में लिखते हैं, 'इंदिरा गांधी और उनके कुछ करीबी लोगों के अलावा किसी को भी इस बात की जानकारी नहीं थी कि उस टाइम कैप्सूल में क्या-क्या है। यहां तक कि सांसदों को भी कुछ पता नहीं था। जब भी सवाल उठाए गए, सरकार ने मामूली या टालने वाले जवाब देकर चुप करा दिया।' मार्च 2010 में तब की राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने IIT कानपुर के कैंपस में एक टाइम कैप्सूल दफनाया। कैप्सूल में IIT कानपुर के रिसर्च पेपर और वहां के शिक्षकों से जुड़ी जानकारियां रखी गई थीं, ताकि दुनिया में कोई बड़ी उथल-पुथल हो जाए तब भी संस्थान का इतिहास सुरक्षित रहे। मई 2010 में तब के गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी ने गांधीनगर में बन रहे महात्मा मंदिर की नींव में एक टाइम कैप्सूल दफनाया। सरकार का दावा था कि 3 फीट लंबे और ढाई फीट चौड़े स्टील के सिलेंडर में गुजरात के 50 साल के इतिहास को संजोया गया है। अंग्रेजी अखबार द टेलीग्राफ के मुताबिक, 90 किलो वजनी कैप्सूल में 14 लिखे दस्तावेज और 29 ऑडिया-वीडियो कॉम्पैक्ट डिस्क रखे हुए हैं, जिसमें 90% चीजें मोदी से जुड़ी हुई हैं। कांग्रेस ने इसका कड़ा विरोध किया और आरोप लगाया कि मोदी खुद का महिमामंडन करा रहे हैं। कहा कि सत्ता में आते ही कैप्सूल निकलवाएंगे, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हो सका है। फिर जनवरी 2019 में 106वीं भारतीय विज्ञान सम्मेलन के दौरान पंजाब के जालंधर की लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी में भी एक टाइम कैप्सूल गाड़ा गया था। इसमें लैपटॉप, स्मार्टफोन, ड्रोन और वीआर चश्मे समेत 100 चीजें दफनाई गईं, जो 100 साल तक सहेजी जा सकती हैं। इसे 3 जनवरी 2119 को निकाला जाएगा। पिछले साल सिक्किम को पूर्ण राज्य का दर्जा मिले 50 साल पूरे होने पर 21 अगस्त 2025 को राजधानी गंगटोक के ताशीलिंग सचिवालय परिसर में मौजूद रुस्तमजी डियर पार्क में सीएम प्रेम सिंह तमांग ने एक टाइम कैप्सूल दफनाया। 32 किलो वजनी गुलाबी-सुनहरे रंग के इस स्टील सिलेंडर में राज्य की 13 आधिकारिक भाषाओं में दस्तावेज, धान और औषधीय पौधों के बीज, पारंपरिक वाद्य यंत्र, नक्शे, मिट्टी, स्मार्टफोन-गैजेट वगैरह रखे गए। इसे 2075 तक के लिए दफनाया गया है। अब आखिर में- अमेरिका की आजादी की 250वीं सालगिरह पर दफनाए गए टाइम कैप्सूल की कहानी… ------------- टाइम कैप्सूल से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए… अमेरिका 250 साल के लिए टाइम कैप्सूल दफन करेगा: 408 किलो वजन, इसमें व्हेल की हड्डी से AI की भविष्यवाणी तक; आखिर इसकी जरूरत क्यों 4 जुलाई को अमेरिका की आजादी के 250 साल पूरे होने के मौके पर 408 किलो का एक टाइम कैप्सूल जमीन में दफनाया जाएगा। इसे फिलाडेल्फिया के इंडिपेंडेंस नेशनल हिस्टोरिकल पार्क में दफनाया जाएगा और 250 साल बाद यानी 2276 में खोला जाएगा। पूरी खबर पढ़िए…
व्हाइट हाउस में धमाका: ट्रंप बोले– नेतन्याहू जानते हैं बॉस कौन है!
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है कि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू जल्द ही व्हाइट हाउस का दौरा कर सकते हैं
चीनी तटरक्षक बल ने थाईवान द्वीप के पूर्व में स्थित समुद्री क्षेत्र में कानून प्रवर्तन गश्ती की
चीनी तटरक्षक बल के प्रवक्ता च्यांग लुए ने कहा कि चीनी तटरक्षक बल के श्यूशान जहाज बेड़े ने 4 जुलाई को ताईशान जहाज बेड़े का स्थान लेकर चीन के थाईवान द्वीप के पूर्व में स्थित समुद्री क्षेत्र में कानून प्रवर्तन गश्ती की।
मेकांग नदी पर चीन-लाओस-म्यांमार-थाईलैंड की 166वीं संयुक्त गश्ती कार्रवाई संपन्न
मेकांग नदी पर चीन-लाओस-म्यांमार-थाईलैंड की 166वीं संयुक्त गश्ती श्रृंखलाबद्ध कानून प्रवर्तन कार्रवाई सफलतापूर्वक संपन्न हुई।
ईरान के सुप्रीम लीडर रहे आयतुल्लाह अली खामेनेई के अंतिम संस्कार की रस्में जारी हैं। 100 से ज्यादा देशों के नेता पहुंच रहे हैं। काले कपड़ों में रोते-बिलखते लाखों ईरानी अपने ‘रहबर’ का आखिरी दीदार करना चाहते हैं। इन सबके बीच ईरान के नए सुप्रीम लीडर मुजतबा खामेनेई गायब हैं। पिता के जनाजे को कंधा देंगे या नहीं, इस पर भी सस्पेंस है। क्या वो जिंदा भी हैं, अगर हां तो किस हाल में, क्या उनकी जान को अब भी खतरा; आज का एक्सप्लेनर इसी बात पर… सवाल-1: मुजतबा खामेनेई जिंदा भी हैं या नहीं? जवाब: मुजतबा खामेनेई घायल हुए थे, लेकिन जिंदा हैं… सवाल-2: जिंदा हैं, तो किस हाल में हैं मुजतबा? जवाब: कोई पुख्ता जानकारी नहीं, 3 तरह के दावे हैं… 1. ब्रिटिश अखबार ‘द टाइम्स’ ने अप्रैल में रिपोर्ट की थी कि मुजतबा होश में नहीं हैं और वे कोमा में भी हो सकते हैं। उन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि ईरान में क्या हो रहा है। अन्य ब्रिटिश अखबार 'द सन' के मुताबिक वेंटिलेटर पर हैं। वो बिना सपोर्ट के सांस भी नहीं ले पा रहे हैं। 2. अमेरिकी अखबार ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ के मुताबिक बुरी तरह से घायल हैं, लेकिन दिमाग सक्रिय है और वे फैसले ले रहे हैं। उनके पैर की 3 बार सर्जरी हो चुकी है। उन्हें प्रोस्थेटिक, यानी कृत्रिम पैर लगाया जाना है। उनका चेहरा और होंठ बुरी तरह जल गए हैं। उनके हाथ में भी चोट लगी है। 3. सुप्रीम लीडर के दफ्तर में प्रोटोकॉल महानिदेशक मजाहेर होसैनी के मुताबिक, सुप्रीम लीडर के कान के पीछे छोटी खरोंच है। ईरान के स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि सुप्रीम लीडर के घाव में कुछ टांके लगे, लेकिन उन्हें कोई गंभीर चोट नहीं आई है। सवाल-3: क्या मुजतबा फिलहाल ईरान में नहीं हैं? जवाब: कुवैत के अखबार अल-जरीदा ने रिपोर्ट किया था कि मुजतबा रूस की राजधानी मॉस्को में इलाज करवा रहे हैं। उन्हें राष्ट्रपति पुतिन के सुझाव पर रूसी प्लेन से मॉस्को ले जाया गया है। यहीं उनकी सर्जरी हुई है और वे रिकवर हो रहे हैं। पुतिन के ही किसी घर में उन्हें ठहराया गया है। अल-जरीदा के मुताबिक, मुजतबा की गंभीर चोटों को विशेष इलाज और देखरेख की जरूरत थी, जो ईरान में जंग के बीच मुमकिन नहीं था। इजराइल की धमकी के बाद ईरान में उनकी सुरक्षा को खतरा हो सकता था। हालांकि, मॉस्को में ईरान के राजदूत काजेम जलाली ने इन दावों को खारिज कर दिया। अमेरिकी मीडिया के मुताबिक भी मुजतबा ईरान में ही किसी सीक्रेट लोकेशन पर हैं। अमेरिकी न्यूज चैनल CBS ने अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से बताया है कि ईरान के बड़े अधिकारियों को भी नहीं पता है कि मुजतबा कहां हैं। लोकेशन लीक न हो, इसलिए ईरान के सीनियर नेता और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के अधिकारी मिलने या हाल-चाल पूछने भी नहीं जाते हैं। सवाल-4: तो फिर सुप्रीम लीडर तक सूचनाएं कैसे पहुंचती हैं? जवाब: किसी भी डिजिटल ट्रैकिंग से बचकर मुजतबा तक मैसेज पहुंचाने के लिए पुराने जमाने का तरीका अपनाया जाता है। अमेरिकी अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स और इजराइली अखबार इजराइल हायोम की रिपोर्ट्स के मुताबिक… अमेरिकी खुफिया अधिकारियों ने इसे 'कोरियरों का भूलभुलैया' बताया है। इसी वजह से अमेरिका-ईरान की बातचीत या फैसलों में देरी हुई है। एक ईरानी अधिकारी ने इजराइली अखबार 'द जेरूसलम पोस्ट' को बताया कि जब तक सुप्रीम लीडर की मंजूरी मिलती है, तब तक वो शर्त या सूचना पुरानी हो चुकी होती है। क्योंकि जवाब आने में काफी वक्त लगता है। न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, कुछ मामलों में सीक्रेट ऑडियो लिंक के जरिए भी मुजतबा बैठकों में शामिल होते हैं। सवाल-5: ऐसे में ईरान चला कौन रहा है? जवाब: न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, 1979 की क्रांति के बाद, पहली बार ईरान के पास कोई एक ऐसा धार्मिक नेता नहीं है जो हर फैसले पर आखिरी मुहर लगाए। कागजी तौर पर भले मुजतबा सुप्रीम लीडर हैं, लेकिन हकीकत ये है कि ईरान को IRGC के टॉप कमांडर्स और मुजतबा के वफादार सलाहकारों का ग्रुप चला रहा है। दरअसल, आयतुल्लाह खामेनेई ने मरने से पहले ही अपनी गैरमौजूदगी को भरने के लिए अलग-अलग स्तर पर जिम्मेदारियां बांट दी थी। न्यू यॉर्क टाइम्स के मुताबिक बड़े सैन्य और सरकारी पदों पर 4 स्तर के विकल्प तैयार किए गए थे, जिससे किसी की मृत्यु होने पर अगला व्यक्ति तुरंत जिम्मेदारी संभाल ले। इसके अलावा उन्होंने पहले ही IRGC को कई अधिकार दे दिए थे। ब्रिटिश थिंकटैंक चाथम हाउस में मिडिल ईस्ट प्रोग्राम के डायरेक्टर सनम वकील के मुताबिक, 'ईरान में अभी कोई एक कमांडर नहीं है। यहां एक सिस्टम चल रहा है, जहां बहुत सारे लोग कमांड कर रहे हैं। हर कोई अपने लिए लड़ रहा है।' अमेरिका की इंडियाना यूनिवर्सिटी ऑफ ब्लूमिंगटन में ईरानी राजनीति के प्रोफेसर हुसैन बनाई के मुताबिक, 'ईरान में सुप्रीम लीडर की शक्तियां कम होने के कई सबूत हैं। राष्ट्रपति जो चाहते हैं, कहते हैं। स्पीकर को जो ठीक लगता है, वो कह देते हैं। किसी में कोई सामंजस्य नहीं है।' रॉयटर्स ने सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट किया है कि अब मुजतबा की भूमिका सहमति की मुहर लगाने भर की रह गई है। बड़े फैसले जनरल लेते हैं और मुजतबा उन्हें अपनी धार्मिक-संवैधानिक वैधता देते हैं। ईरान मामलों के जानकार आरश अजीजी के मुताबिक, जरूरी मसौदे शायद मुजतबा से होकर गुजरते होंगे, लेकिन यह मुश्किल है कि वे नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के फैसले पलट सकें। यहां तक कि राष्ट्रपति पजशकियान भी कई बड़े फैसलों से बाहर रखे गए हैं। सवाल-6: जंग खत्म हो गई, क्या अब भी मुजतबा की जान को खतरा है? जवाब: 4 मार्च, 2026 को इजराइल के रक्षा मंत्री काट्ज ने धमकी दी- ‘जो भी ईरान का लीडर बनेगा, वो इजराइल का टारगेट होगा।’ उन्होंने 1 जुलाई को फिर दोहराया कि ईरान के सुप्रीम लीडर मुजतबा को मारना हमारा टारगेट है। इजराइल टारगेट किलिंग में एक्सपर्ट है। उसने दशकों की मेहनत के बाद ईरान में अपना खुफिया नेटवर्क बहुत मजबूत कर लिया है। करीब ३ महीने की जंग में इजराइल ने ईरान में 250 से ज्यादा टारगेट किलिंग की हैं। स्वीडन की उप्साला यूनिवर्सिटी में इस्लामी धर्मशास्त्र के प्रोफेसर मोहम्मद फजलहाशमी के मुताबिक, 'इजराइल और अमेरिका का खुफिया तंत्र ईरान से मजबूत है। ईरान में इजराइल के एजेंट तैनात हैं। मुजतबा जैसे ही सामने आएंगे, अमेरिका और इजराइल उन्हें अपना निशाना बना लेंगे।' इजराइल पहले भी सार्वजनिक कार्यक्रमों में बड़े हमले कर चुका है। 2024 में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजशकियान के शपथ ग्रहण में पहुंचे हमास प्रमुख इस्माइल हानिया को इजराइल ने मिसाइल हमले में मार दिया था। 1992 में हिज्बुल्लाह के महासचिव अब्बास अल-मुसावी पर लेबनान में एक रैली से लौटते हुए हमला किया था। सवाल-7: क्या वाकई पिता के जनाजे में नहीं पहुंचेंगे मुजतबा?जवाब: भारत में मुजतबा खामेनेई के प्रतिनिधि आयतुल्लाह हाकिम इलाही ने 3 जुलाई को बताया कि सुप्रीम लीडर जनाजे में शामिल होना चाहते थे। वो अपने लोगों से मिलना चाहते थे। लेकिन सुरक्षाबलों ने उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया। ईरान के आंतरिक सुरक्षा मामलों के डिप्टी मिनिस्टर और समारोहों की देखरेख करने वाली समिति के सचिव अली अकबर पोरजमशीदियन ने कहा कि सुप्रीम लीडर के जनाजे में शामिल होने का फैसला उनके कार्यालय के हाथों में है। आयोजकों को इस बारे में कोई जानकारी नहीं मिली है कि वे शामिल होंगे या नहीं। अगर मुजतबा शामिल नहीं होंगे, तो उनकी जगह जनाजे की नमाज कौन अदा करेगा, इसकी घोषणा भी अभी नहीं हुई है। ------------ ये खबर भी पढ़िए…खामेनेई के जनाजे में न पीएम मोदी जाएंगे, न विदेश मंत्री; राज्यपाल और राज्यमंत्री क्यों भेज रहे, भारत की स्ट्रैटेजी क्या अयातुल्लाह अली खामेनेई को हत्या के 131 दिन बाद सुपुर्द-ए-खाक किया जाना है। 6 दिन के राजकीय जनाजे में ईरान दुनियाभर से नेताओं को बुला रहा है। 23 जून को राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने पीएम मोदी को भी न्योता दिया। लेकिन पीएम मोदी नहीं पहुंचे। पूरी खबर पढ़िए…
सुप्रीम लीडर को अंतिम विदाई देने के लिए ईरान को दी एक हफ्ते की मोहलत: ट्रंप
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने स्वतंत्रता दिवस संबोधन में ईरान को लेकर एक बार फिर विवादित और तीखा बयान दिया है। ट्रंप ने दक्षिण डकोटा में दावा किया कि उन्होंने मानवता के नाते सुप्रीम लीडर के अंतिम संस्कार की रस्में अदा करने के लिए ईरान को 'वीक ऑफ' (एक हफ्ते की राहत) दिया है।
बलूचिस्तान में BLA का खूनी तांडव: ग्वादर में 30 से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों की मौत, मचा हाहाकार
पाकिस्तान के अशांत प्रांत बलूचिस्तान में बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) ने एक बार फिर अपनी ताकत का खौफनाक प्रदर्शन किया है। ग्वादर में हुए इस बड़े हमले में 30 से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों के मारे जाने की खबर से सुरक्षा प्रतिष्ठानों में हड़कंप मच गया है। पिछले कुछ महीनों में यह सुरक्षा बलों पर हुआ अब तक का सबसे बड़ा और घातक हमला माना जा रहा है। ग्वादर, जो चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का केंद्र है, वहां हुए इस हमले ने पाकिस्तान की सुरक्षा नीतियों और बलूचिस्तान के बिगड़ते हालातों पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।ग्वादर में BLA का 'ऑपरेशन' और हताहतों की संख्याप्राप्त जानकारी के अनुसार, बलूच लिबरेशन आर्मी के लड़ाकों ने ग्वादर के कई सैन्य चौकियों को एक साथ निशाना बनाया। यह हमला इतना सुनियोजित था कि पाकिस्तानी सेना को संभलने का मौका तक नहीं मिला। स्थानीय सूत्रों और बलूच संगठनों के दावों के अनुसार, इस मुठभेड़ में 30 से ज्यादा सैनिक मारे गए हैं और कई अन्य गंभीर रूप से घायल बताए जा रहे हैं। BLA ने इस हमले की जिम्मेदारी लेते हुए इसे 'बलूच भूमि की आजादी' की लड़ाई का हिस्सा बताया है। हमले के बाद पूरे इलाके में कर्फ्यू जैसे हालात हैं और सेना ने घेराबंदी तेज कर दी है।CPEC के गढ़ में सुरक्षा पर सवालग्वादर का इलाका सामरिक और आर्थिक दृष्टि से पाकिस्तान और चीन के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। ऐसे में यहां सुरक्षा बलों पर इतने बड़े हमले ने पाकिस्तान की 'अजेय' होने की छवि को चकनाचूर कर दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि BLA अपनी रणनीति बदल रहा है और अब सीधे तौर पर सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर सरकार पर दबाव बना रहा है। बलूचिस्तान में जारी इस विद्रोह ने न केवल स्थानीय प्रशासन को पंगु बना दिया है, बल्कि चीन के निवेश और वहां काम करने वाले विदेशी नागरिकों की सुरक्षा के लिए भी एक बड़ा खतरा उत्पन्न कर दिया है।क्या है बलूचिस्तान में जारी तनाव की असल जड़?बलूचिस्तान में अलगाववादी लंबे समय से बलूच संसाधनों के दोहन और सेना के कथित अत्याचारों का विरोध कर रहे हैं। BLA का दावा है कि पाकिस्तान सरकार बलूचिस्तान की प्राकृतिक संपदा को लूटकर अन्य प्रांतों में भेज रही है। इस हमले के बाद पाकिस्तान सरकार ने भारी सैन्य बल की तैनाती की घोषणा की है, लेकिन सवाल यही उठता है कि क्या केवल सैन्य कार्रवाई से इस विद्रोह को दबाया जा सकता है? बलूच नेताओं का मानना है कि जब तक राजनीतिक बातचीत और उनके अधिकारों का सम्मान नहीं किया जाता, तब तक इस तरह के खूनी संघर्ष रुकने वाले नहीं हैं। ग्वादर में हुआ यह हमला पाकिस्तान के लिए एक बड़ी चेतावनी है कि बलूचिस्तान की आग अब और भी भड़क चुकी है।
खमेनेई का पार्थिव शरीर आते ही टूटा कालिबाफ का सब्र, 40 साल के साथी को देख बिलख-बिलख कर रोए स्पीकर
ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खमेनेई का पार्थिव शरीर जैसे ही अंतिम दर्शन के लिए जनता के बीच लाया गया, पूरा माहौल गमगीन हो गया। इस भावुक कर देने वाले दृश्य ने न केवल ईरान बल्कि पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है। ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बाकर कालिबाफ, जो दशकों से खमेनेई के सबसे भरोसेमंद और करीबी सहयोगियों में से एक रहे हैं, अपने आंसू नहीं रोक पाए। ताबूत को देखते ही कालिबाफ की बेबसी और उनका बिलख-बिलख कर रोना एक 40 साल लंबे अटूट साथ के अंत का प्रतीक बन गया है।चार दशक का अटूट बंधन और आखिरी विदाईमोहम्मद बाकर कालिबाफ और अयातुल्ला खमेनेई का रिश्ता केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि गहरा व्यक्तिगत और वैचारिक रहा है। कालिबाफ ने अपनी युवावस्था से लेकर राजनीति के शीर्ष शिखर तक खमेनेई के मार्गदर्शन में काम किया है। जब ताबूत को मंच पर रखा गया, तो कालिबाफ पूरी तरह टूट गए। उनके आंसुओं में न केवल एक नेता को खोने का दर्द था, बल्कि उस दौर की यादें भी थीं, जिसमें उन्होंने खमेनेई के साथ मिलकर ईरान की इस्लामी क्रांति और सैन्य रणनीतियों को आकार दिया था। यह विदाई उन तमाम पुराने साथियों के लिए भी एक झटके की तरह है जिन्होंने दशकों तक खमेनेई के विजन पर काम किया है।कालिबाफ का शोक और ईरान की बदलती तस्वीरकालिबाफ का सार्वजनिक रूप से इस तरह रोना ईरान की राजनीति में एक बड़े भावनात्मक बदलाव का संकेत है। जहां एक ओर ईरान के कट्टरपंथी धड़े देश को 'बदले' की आग में झोंकने की बात कर रहे हैं, वहीं कालिबाफ जैसे नेताओं का दुख यह दर्शाता है कि खमेनेई के जाने के बाद ईरान के सत्ता गलियारों में एक गहरा शून्य पैदा हो गया है। विश्लेषकों का मानना है कि कालिबाफ की यह प्रतिक्रिया ईरान के भीतर खमेनेई के प्रति आम जनमानस और सैन्य नेतृत्व के गहरे सम्मान और जुड़ाव को बयां करती है। यह दृश्य दुनिया को यह भी बताता है कि खमेनेई केवल एक सर्वोच्च नेता नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए एक अभिभावक भी थे जो लंबे समय से उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे।अंत्येष्टि में उमड़ा जनसैलाबतेहरान के सड़कों पर उमड़ी लाखों की भीड़ और उस पर कालिबाफ का यह विलाप, ईरान के वर्तमान संकटपूर्ण समय की एक बड़ी तस्वीर पेश करता है। खमेनेई के ताबूत के चारों ओर जमा हुए ईरान के शीर्ष सैन्य अधिकारी और राजनीतिक दिग्गज अब एक ऐसे भविष्य की ओर देख रहे हैं जो अनिश्चितताओं से भरा हुआ है। कालिबाफ की यह बेबसी उन करोड़ों लोगों की भावनाओं का प्रतिबिंब है जो एक युग के अंत को देख रहे हैं। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या खमेनेई का उत्तराधिकारी कालिबाफ जैसे वफादार साथियों को विश्वास में लेकर ईरान को इन चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों से बाहर निकाल पाएगा, या देश का आंतरिक कलह और गहराएगा।
इन दिनों दुनिया के दो बड़े छोर भीषण गर्मी की चपेट में हैं। एक ओर यूरोप का पारा 43 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है, तो दूसरी ओर चीन का तापमान 50 डिग्री के जादुई और खतरनाक आंकड़े को छू रहा है। सोशल मीडिया पर एक बड़ी बहस छिड़ी है—क्या कारण है कि एक जगह लोग मोम की तरह पिघल रहे हैं, जबकि दूसरी जगह तापमान अधिक होने के बावजूद हालात थोड़े अलग हैं? विज्ञान की भाषा में इसका जवाब सिर्फ तापमान में नहीं, बल्कि 'हीट इंडेक्स' और वहां की भौगोलिक स्थिति में छिपा है।आद्रता (Humidity) ही है असली विलेनयूरोप में पड़ रही गर्मी और चीन की गर्मी में सबसे बड़ा अंतर 'ह्यूमिडिटी' का है। यूरोप में हवा में नमी का स्तर अधिक होने के कारण वहां का 'फील लाइक' तापमान (Feel-like Temperature) बहुत ज्यादा हो जाता है। जब तापमान 43 डिग्री होता है और हवा में नमी अधिक हो, तो शरीर का पसीना सूख नहीं पाता, जिससे शरीर की कूलिंग प्रक्रिया ठप हो जाती है। यही कारण है कि लोग वहां ज्यादा बेहाल हैं। इसके विपरीत, चीन के कई हिस्सों में गर्मी 'ड्राई हीट' (शुष्क गर्मी) वाली होती है। वहां तापमान 50 डिग्री होने के बावजूद हवा में नमी कम होने से पसीना तेजी से वाष्पित (evaporate) होता है, जिससे शरीर को थोड़ी राहत महसूस होती है।भौगोलिक स्थितियां और कंक्रीट का असरयूरोप के अधिकांश शहर सदियों पुराने हैं, जो पत्थर और ऐसे मटेरियल से बने हैं जो गर्मी को सोखकर उसे देर रात तक छोड़ते हैं, जिसे 'अर्बन हीट आइलैंड' इफेक्ट कहा जाता है। वहां के घरों में एसी (AC) का चलन भी कम है, जिससे अंदर का तापमान बाहर से भी अधिक महसूस होता है। वहीं चीन के आधुनिक महानगरों में कंक्रीट के ऊंचे-ऊंचे स्ट्रक्चर और आधुनिक कूलिंग सिस्टम के चलते हीट मैनेजमेंट थोड़ा बेहतर हो पाता है। इसके अलावा, यूरोप का वातावरण ठंडे मौसम का आदी है, जिससे वहां की वनस्पति और मानव शरीर दोनों ही इस अचानक आए 'हीट वेव' के लिए तैयार नहीं होते, जो इसे एक आपदा में बदल देता है।साइंस क्या कहता है?वैज्ञानिकों के अनुसार, शरीर को ठंडा रखने के लिए हमारे पसीने का वाष्पित होना जरूरी है। अगर वातावरण में आर्द्रता 60% से ऊपर हो, तो 40 डिग्री तापमान भी जानलेवा साबित हो सकता है। यूरोप में 'ह्यूमिड हीट' ने लोगों को शारीरिक रूप से ज्यादा प्रभावित किया है, जबकि चीन में 'एक्सट्रीम टेंपरेचर' बुनियादी ढांचे की परीक्षा ले रहा है। यह ग्लोबल वार्मिंग का वह नया चेहरा है, जहां तापमान की संख्या से ज्यादा यह मायने रखता है कि आप किस तरह के क्लाइमेट जोन में रह रहे हैं। बढ़ते तापमान के साथ अब हमें सिर्फ डिग्री नहीं, बल्कि 'हीट इंडेक्स' को गंभीरता से समझने की जरूरत है, क्योंकि आने वाले समय में ये हीट वेव और भी घातक हो सकती हैं।
पुतिन ने यूक्रेन का शांति प्रस्ताव ठुकराया, कहा- लक्ष्य पूरे होने तक जारी रहेगा युद्ध
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन की ओर से आए युद्धविराम प्रस्ताव को खारिज करते हुए कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में सैन्य अभियान रोकने का कोई सवाल नहीं उठता। उनके अनुसार, रूस अपने रणनीतिक और सुरक्षा संबंधी लक्ष्यों को हासिल किए बिना पीछे नहीं हटेगा।
रूस का बड़ा दावा: पूर्वी यूक्रेन के कोंस्तांतिनोवका पर कब्जा
रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के प्रयासों के बीच क्रेमलिन ने बड़ा दावा किया है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने कहा कि रूसी सेना ने पूर्वी यूक्रेन के कोंस्तांतिनोवका शहर पर पूरा नियंत्रण स्थापित कर लिया है
स्पेन में जंगल की आग: 2,300 हेक्टेयर वन क्षेत्र राख
स्पेन के उत्तरपूर्वी क्षेत्र कैटालोनिया में भीषण आग लग गई, जिससे 2,300 हेक्टेयर वन क्षेत्र जलकर राख हो गया
गाजा में स्वास्थ्य व्यवस्था ढहने की कगार पर, 11,000 से ज्यादा सर्जरी टलीं : फिलिस्तीनी राजदूत
भारत में फिलिस्तीनी राजदूत अब्दुल्ला एम. अबू शावेश ने गाजा की स्थिति को 'बहुत खराब' बताया। उन्होंने कहा कि वहां का स्वास्थ्य सिस्टम लगभग पूरी तरह से टूटने की कगार पर है और 11,000 से ज्यादा सर्जरी टाल दी गई हैं।

