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लगातार आठवीं रात ईरान के सैन्य ठिकानों पर हमले, हाई अलर्ट पर 50 हजार से ज्यादा अमेरिकी सैनिक

अमेरिकी सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) ने कहा कि मध्य पूर्व में तैनात 50,000 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक पूरी तरह सतर्क हैं। अमेरिकी सेना ने ईरान पर हमलों का एक और दौर पूरा कर लिया है।

देशबन्धु 20 Jul 2026 12:04 am

West Asia War LIVE: ईरान ने जॉर्डन पर दागीं धड़ाधड़ मिसाइलें, अकाबा में गूंजे हवाई हमले के सायरन; इजरायल-जॉर्डन सेना ने हवा में मार गिराया

यरुशलम/लखनऊ। पश्चिम एशिया (West Asia War 2026) में जारी भीषण जंग अब और अधिक खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुकी है। ताजा घटनाक्रम में ईरान ने इजरायली सीमा से सटे जॉर्डन के प्रमुख तटीय शहर अकाबा (Aqaba) को निशाना बनाकर धड़ाधड़ कई मिसाइलें दाग दी हैं। मिसाइल हमले की भनक लगते ही पूरे जॉर्डन में हवाई हमले के सायरन (Sirens Sounded) गूंज उठे, जिससे स्थानीय नागरिकों में भारी दहशत फैल गई।मनीकंट्रोल हिंदी (Moneycontrol Hindi) की एक विशेष रिपोर्ट के मुताबिक, इस हमले के तुरंत बाद इजरायल डिफेंस फोर्सेज (IDF) और जॉर्डन की वायुसेना ने मिलकर एक बड़ा रक्षात्मक अभियान चलाया और ईरान की तरफ से आ रही मिसाइलों को बीच हवा में ही सफलतापूर्वक इंटरसेप्ट (नष्ट) कर दिया। इजरायली सेना के प्रवक्ता ने पुष्टि की है कि इन मिसाइलों के मलबे से संभावित नुकसान को रोकने के लिए दोनों देशों की सेनाओं ने त्वरित जवाबी कार्रवाई की।अकाबा एयरपोर्ट के पास धमाके, इजरायल के इलियट शहर तक दिखा असरअंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान द्वारा दागी गई मिसाइलों का मुख्य निशाना अकाबा शहर था, जो इजरायल के सीमावर्ती शहर इलियट (Eilat) के बिल्कुल नजदीक स्थित है:एयरपोर्ट के पास धमाका: कुछ शुरुआती खबरों में दावा किया गया कि एक ईरानी मिसाइल अकाबा एयरपोर्ट के पास जाकर गिरी, जिससे जोरदार धमाका हुआ। इस धमाके की चमक और धुएं का गुबार इजरायल के इलियट शहर से भी साफ तौर पर देखा गया।जॉर्डन सरकार का खंडन: हालांकि, बढ़ते तनाव के बीच जॉर्डन सरकार के आधिकारिक प्रवक्ता ने उन खबरों को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें दावा किया जा रहा था कि सुरक्षा खतरों के चलते अकाबा के हवाई अड्डे (Airport) और समुद्री बंदरगाह (Seaport) को खाली करा लिया गया है।अमरीकी सैनिकों की मौत का बदला: US ने ईरान पर किए ताबड़तोड़ हवाई हमलेजॉर्डन पर हुए इस मिसाइल अटैक के पीछे की मुख्य वजह पिछले दिनों क्षेत्र में हुई सैन्य कार्रवाई को माना जा रहा है। अमेरिकी सेना के सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने रविवार को बयान जारी कर बताया कि उन्होंने ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) के ठिकानों पर 'कड़ी और त्वरित सजा' देने के लिए ताबड़तोड़ हवाई हमले शुरू कर दिए हैं।दरअसल, जॉर्डन में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकाने पर हुए एक हालिया हमले में दो अमेरिकी सैनिक मारे गए थे, एक लापता हो गया था और चार गंभीर रूप से घायल हुए थे। अमेरिका ने इसी का बदला लेने और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज (Strait of Hormuz) में तेल टैंकरों के आवागमन को सुरक्षित रखने के लिए ईरान के खिलाफ यह जवाबी मोर्चा खोला है।परमाणु संयंत्र पर हमले के बाद बढ़ा तनाव, UN ने जताई चिंताइस बीच ईरान के परमाणु ऊर्जा संगठन (AEOI) ने अमेरिका पर बेहद गंभीर आरोप लगाया है। ईरान का दावा है कि अमेरिकी वायुसेना ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करते हुए देश के दक्षिण-पश्चिम हिस्से में बन रहे 'दारखोविन परमाणु ऊर्जा संयंत्र' (Darkhovin Nuclear Power Plant) पर बर्बरतापूर्वक हवाई हमला किया है। इस घटना के बाद संयुक्त राष्ट्र (UN) की परमाणु निगरानी संस्था ने दोनों देशों से अत्यधिक संयम बरतने की अपील की है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच यह सीधी गोलाबारी नहीं रुकी, तो पूरा मिडिल ईस्ट एक भीषण क्षेत्रीय युद्ध की आग में झुलस सकता है, जिसका सीधा असर वैश्विक तेल कीमतों और शेयर बाजारों पर पड़ेगा।

न्यूज़ इंडिया लाइव 19 Jul 2026 10:08 pm

यूक्रेन का रूस पर जवाबी हमला, तेल ठिकानों और 'शैडो फ्लीट' को बनाया निशाना

रूस के अब तक के सबसे घातक हमले के जवान में यूक्रेन ने भी जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी है। राष्ट्रपति व्लोदिमिर जेलेंस्की ने कहा है कि यूक्रेन रूस के हमलों का पूरी तरह उचित और सटीक जवाब दे रहा है। उन्होंने दावा किया कि यूक्रेनी बलों ने रूस के कई रणनीतिक ठिकानों और ईंधन केंद्रों को निशाना बनाया है।

देशबन्धु 19 Jul 2026 7:06 pm

आज का एक्सप्लेनर:सरकार ने सोनम वांगचुक को अचानक क्यों उठवाया; 3 बड़े फैक्टर्स, अगर 24 घंटे और लगाते, तो क्या बिगड़ जाता

18 जुलाई को सोनम वांगचुक के आमरण अनशन का 21 वां दिन था। सुबह करीब 7 बजे दिल्ली पुलिस के कई जवान सादे कपड़ों में आए, सोनम के मंच पर चढ़े, चारों तरफ सफेद चादरें लगाईं और महज 1 मिनट के अंदर सोनम को उठाकर ले गए। जबकि 20 दिन से सरकार ने कोई बयान तक नहीं दिया था। आखिर सरकार को इतनी जल्दबाजी क्यों थी? अचानक अकेले वांगचुक को इस तरह उठाने के पीछे 3 फैक्टर्स जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में… 20 जून को कॉकरोच जनता पार्टी, CJP ने जंतर-मंतर पर प्रोटेस्ट शुरू किया। सोनम ने भी 28 जून को समर्थन में भूख-हड़ताल शुरू कर दी। 21वें दिन वांगचुक को उठाकर अस्पताल ले जाने के पीछे 2 बड़ी राजनीतिक वजहें हैं… 1. संसद सत्र के पहले दिन तीन-तरफा दबाव की आशंका सीनियर पत्रकार अरुण दीक्षित कहते हैं कि 20 जुलाई को संसद सत्र के दिन केंद्र सरकार और प्रशासन के लिए उमर अब्दुल्ला, CJP और सोनम, तीन तरफ से दबाव की स्थिति बन सकती थी। सरकार किसी तरह इस दबाव को कम करना चाहती थी। 2. विपक्षी नेता सोनम के साथ एकजुट होने लगे सोनम के पक्ष में विपक्षी नेताओं के एकजुट होने और उमर अब्दुल्ला की 17 जुलाई की घोषणा के मद्देनजर आनन-फानन में सोनम को उठाने का फैसला लिया गया।रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसीलिए 17 जुलाई को दिल्ली कमिश्नर सतीश गोलचा को अचानक हटाकर उनकी जगह खुफिया एजेंसी ‘IB’ के स्पेशल डायरेक्टर रहे अनुराग कुमार लाए गए। 17-18 जुलाई की रात डेढ़ बजे सोनम को हटाने के निर्देश मिले। फिर मंदिर मार्ग थाने में रणनीति बनी। सुबह 5 बजे अधिकारी जंतर-मंतर पहुंचे, आखिरी ब्रीफिंग दी। फिर उसी हिसाब से एक्शन हुआ। सोनम से CJP को मिला ‘डिजिटल मोमेंटम’ सोनम की तबीयत बिगड़ने की चर्चा से बढ़ा मीडिया कवरेज सेलेब्रिटीज सोनम के सपोर्ट में आए 14 जुलाई से सोशल मीडिया पर हैशटैग के साथ सोनम के सपोर्ट वाली पोस्ट्स की बाढ़ आ गई… दरअसल, भुखमरी से जुड़ी कई रिसर्च के मुताबिक, कोई दुबला-पतला व्यक्ति खाना न खाए, तो उसके शरीर के वजन का करीब 18% तक कम होने पर भूख से मरने की नौबत आ जाती है। ऐसा औसतन 30 से 50 दिनों के बाद होता है। कोई स्वस्थ व्यक्ति है या पानी और नमक वगैरह ले रहा है, तो कुछ ज्यादा दिन चला जा सकता है। उत्तर प्रदेश बेस्ड डॉक्टर ऑफ मेडिसिन (MD) अजय सिंह कहते हैं कि सोनम के हेल्थ पैरामीटर्स देखते हुए ये नहीं कहा जा सकता कि तत्काल उनकी जान को कोई खतरा था। वे हाइड्रेटेड थे। हालांकि 20 दिन के अनशन के बाद लगातार निगरानी की जरूरत तो थी, क्योंकि उनकी उम्र 59 साल है।19 जुलाई की सुबह गीतांजलि ने X पर पोस्ट सफदरजंग हॉस्पिटल पर आरोप लगाया कि वह सोनम के हेल्थ पैरामीटर्स की सही जानकारी नहीं दे रहा है। उन्होंने सोनम को दूसरे अस्पताल में शिफ्ट करने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की। इस पर कोर्ट ने केंद्र और दिल्ली सरकार को 3 दिन में जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है। मामले में अगली सुनवाई 24 जुलाई को होगी। कोर्ट ने ये भी कहा कि सरकार का उन्हें सफदरजंग अस्पताल ले जाने का फैसला मनमाना नहीं कहा जा सकता। सवाल-1: सोनम वांगचुक को उठाकर क्या सरकार से मिस-कैलकुलेशन हो गई?जवाबः राजनीतिक मोर्चे पर इसे 'मिस-कैलकुलेशन' माना जा रहा है, क्योंकि वांगचुक को हटाने के बाद से आंदोलन खत्म होने के बजाय प्रोटेस्ट मजबूत होता दिखा है। अब धर्मेंद्र प्रधान के साथ पीएम नरेंद्र मोदी का इस्तीफा मांगा जा रहा है। सीनियर जर्नलिस्ट नीरजा चौधरी का मानना है, ‘सोनम वांगचुक को जबरन उठाकर अस्पताल ले जाना मोदी सरकार की चूक हो सकती है। वांगचुक की छवि एक बेदाग, देशप्रेमी और पर्यावरण कार्यकर्ता की है। जब सरकार ऐसे किसी चेहरे पर हाथ डालती है, तो जनता में मैसेज गलत जाता है।’ 18 जुलाई को अभिजीत खुद भूख हड़ताल पर बैठ गए और उन्होंने रात का पहरा शुरू किया, ताकि पुलिस वहां से उन्हें पूरी तरह न खदेड़ दे। इसके चलते पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा लोग जुटे। पॉलिटिकल एक्टिविस्ट योगेंद्र यादव, RJD सांसद मनोज झा, AAP नेता गोपाल राय, आजाद समाज पार्टी के नेता चन्द्रशेखर आजाद जैसे तमाम नेता भी जंतर-मंतर पहुंचे। सोशल एक्टिविस्ट अन्ना हजारे ने भी सरकार से बातचीत की अपील की। लोकसभा में विपक्षी के नेता राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे, अखिलेश यादव, केजरीवाल, डिंपल यादव, संजय सिंह, किसान नेता राकेश टिकैत जैसे लोगों ने भी पुलिस एक्शन का विरोध किया है। वहीं वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंग्मो खुलकर सामने आ गई हैं। उन्हें भी सपोर्ट मिल रहा है। सवाल-2: कॉकरोच पार्टी का प्रोटेस्ट किधर जाता दिख रहा है?जवाबः CJP 20 जुलाई को ‘संसद मार्च’ की तैयारी कर रही है। सोनम वांगचुक की तरफ से भी उनके सोशल मीडिया पर अपील की गई- ‘20 जुलाई को आजादी का दूसरा आंदोलन। भयमुक्त भारत, अन्यायमुक्त भारत। संसद मार्च को सफल बनाएं।’ CJP प्रवक्ता सौरभ दास ने कहा कि अस्पताल में जबरन डिटेंशन में रखे गए सोनम सर जंतर-मंतर पर वापस आकर इस संघर्ष को जारी रखना चाहते हैं। वहीं गीतांजलि ने कहा है कि अगर सोनम 20 जुलाई के मार्च में शामिल नहीं हो पाते हैं, तो मैं उनकी तरफ से मार्च को लीड करूंगी। हालांकि 20 जुलाई को संसद के मानसून सत्र के पहले दिन प्रदर्शनकारियों ने मार्च किया, तो पुलिस से टकराव होना तय है। दिल्ली पुलिस ने साफ कहा है कि CJP को संसद तक मार्च की अनुमति नहीं दी जाएगी, क्योंकि इससे दिल्ली के संवेदनशील इलाके में कानून-व्यवस्था बिगड़ सकती है। अगर प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षा घेरा तोड़ने की कोशिश की, तो उन्हें हिरासत में लिया जा सकता है। सवाल-3: क्या धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की कोई संभावना है?जवाबः पहले सुगबुगाहट थी कि मानसून सत्र से पहले कैबिनेट में बदलाव होगा। धर्मेंद्र प्रधान का मंत्रालय बदल सकता है या फिर बीजेपी संगठन में भेजा जा सकता है। हालांकि बीते कुछ दिनों से ऐसी कोई चर्चा नहीं है। 18 जुलाई को जंतर-मंतर पर पुलिस एक्शन हुआ, तो प्रधान के घर की सुरक्षा बढ़ा दी गई है। मोदी सरकार का एक अनकहा नियम है कि इसमें मंत्रियों के इस्तीफे नहीं होते। पिछले 12 साल में अकेले एमजे अकबर को #MeToo आरोप के चलते विदेश राज्यमंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा था। मोदी सरकार जानती है कि अगर किसी दबाव में कोई इस्तीफा हुआ, तो ये नजीर बन जाएगी और फिर बार-बार ऐसी मांगे होंगी। -------------------------------- ये खबर भी पढ़िए… क्या सोनम वांगचुक को जबरन खाना खिलाना गैरकानूनी, सुप्रीम कोर्ट के फैसले और एक्सपर्ट्स से समझिए; अब आंदोलन का क्या होगा जंतर-मंतर पर 21 दिन से भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक को शनिवार सुबह पुलिस उठा ले गई। अभिजीत दीपके ने कहा- ‘पुलिस ने सोनम सर को गालियां दीं और घसीटकर जबरन ले गए।’ पूरी खबर पढ़िए…

दैनिक भास्कर 19 Jul 2026 6:27 pm

'ऑपरेशन सिंदूर' पर इमरान खान की बहन का सनसनीखेज दावा, इजरायल को मान्यता देने की शर्त पर रुकी थी जंग

भारत और पाकिस्तान के बीच हाल ही में हुए भीषण सैन्य टकराव और भारतीय सेना के गुप्त 'ऑपरेशन सिंदूर' (Operation Sindhoor) को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला अंतरराष्ट्रीय खुलासा सामने आया है। पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की सगी बहन नूरीन नियाजी (Noureen Niazi) ने एक इंटरव्यू के दौरान पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान और शहबाज शरीफ सरकार पर देश की संप्रभुता को गिरवी रखने का बेहद गंभीर आरोप लगाया है। नूरीन नियाजी का दावा है कि भारतीय वायुसेना और थलसेना के भीषण मिसाइल व ड्रोन हमलों के सामने पाकिस्तानी फौज पूरी तरह पस्त हो चुकी थी और भारत की आक्रामक सैन्य कार्रवाई को रुकवाने के लिए पाकिस्तान का शीर्ष नेतृत्व गिड़गिड़ाते हुए वैश्विक शक्तियों के पास पहुंचा था। भारत के खौफ से बौखलाया रावलपिंडी का सैन्य मुख्यालय युद्ध रोकने के एवज में इजरायल को एक संप्रभु देश के रूप में मान्यता देने तक के लिए राजी हो गया था।रावलपिंडी मुख्यालय में मची थी हड़बड़ी: पाकिस्तान का 'मारका-ए-हक' अभियान हुआ था पूरी तरह फेलनूरीन नियाजी ने पाकिस्तान के आंतरिक हालातों पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि भारतीय सेना के विनाशकारी हमलों के सामने पाकिस्तानी फौजी ताकतों की हालत बद से बदतर हो गई थी। पाकिस्तान ने अपनी तरफ से भारतीय जवाबी कार्रवाई को रोकने की हरसंभव कोशिश की, लेकिन वे हर मोर्चे पर नाकाम रहे। पाकिस्तानी सेना इस भारी दबाव को संभालने में पूरी तरह विफल साबित हुई। स्थिति यह थी कि रावलपिंडी स्थित पाकिस्तानी सैन्य मुख्यालय (GHQ) में पूरी तरह अफरा-तफरी और हड़बड़ी का माहौल था। जिस सैन्य अभियान को पाकिस्तानी जनरलों ने बड़े तामझाम के साथ ‘मारका-ए-हक’ (Maarka-e-Haq) के नाम से शुरू किया था, वह भारतीय मिसाइलों की गड़गड़ाहट के बीच ताश के पत्तों की तरह ढह गया। इसके बाद लाचार होकर पाकिस्तानी नेतृत्व ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) प्रशासन के सामने भारत के साथ किसी भी तरह समझौता कराने की गुहार लगाई।डोनाल्ड ट्रंप की वो सीक्रेट शर्त: इजरायल को मान्यता और अब्राहम अकोर्ड पर झुक गया था पाकिस्तानइमरान खान की बहन के मुताबिक, अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप शुरुआत में इस दक्षिण एशियाई सैन्य संघर्ष से दूरी बनाए हुए थे, लेकिन पाकिस्तान की लाचारी देखकर वे मध्यस्थता के लिए तैयार हुए, जिसके पीछे एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक शर्त थी। चूंकि भारत के इजरायल (Israel) के साथ बेहद मजबूत और रणनीतिक संबंध हैं, इसलिए ट्रंप प्रशासन ने पाकिस्तान के सामने इजरायल को आधिकारिक मान्यता देने और ऐतिहासिक 'अब्राहम अकोर्ड' (Abraham Accords) में शामिल होने की कड़ी शर्त रख दी। भारतीय हमलों की तीव्रता और तबाही से बुरी तरह डरे सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर (General Asim Munir) और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ इस शर्त को मानने के लिए तुरंत तैयार हो गए। दूसरी ओर, भारत ने भी दक्षिण एशिया में अपनी रणनीतिक बढ़त और शक्ति संतुलन (Power Balance) को मजबूत होते देख हमलों की गति को नियंत्रित किया।नूर खान एयरबेस की तबाही छिपाई: आवाम को जीत की झूठी कहानियां सुना रहे हैं आसिम मुनीर और शहबाजनूरीन नियाजी ने आरोप लगाया कि युद्ध विराम होते ही सेना प्रमुख आसिम मुनीर और पीएम शहबाज शरीफ (Shehbaz Sharif) ने अपनी गर्दन बचाने के लिए पाकिस्तानी जनता के बीच इसे अपनी 'झूठी जीत' बताकर प्रचारित करना शुरू कर दिया। सैन्य प्रशासन का प्लान था कि इस तथाकथित जीत के जश्न की आड़ में इजरायल को मान्यता देने के फैसले से देश के भीतर उठने वाले संभावित जन-आक्रोश और मजहबी गुस्से को आसानी से दबा दिया जाएगा। हालांकि, इससे पहले कि पाकिस्तान इस सीक्रेट डील को सार्वजनिक करता, पश्चिम एशिया में ईरान का नया मोर्चा खुल गया और यह मुद्दा ठंडे बस्ते में चला गया। खुफिया अधिकारियों के अनुसार, नूरीन नियाजी का यह बयान कोई साधारण राजनीतिक आरोप नहीं है, बल्कि यह परोक्ष रूप से भारतीय सेना के 'ऑपरेशन सिंदूर' की 100% सफलता की पुष्टि करता है।क्या था भारतीय सेना का 'ऑपरेशन सिंदूर': 9 आतंकी कैंपों को नेस्तनाबूद कर नूर खान एयरबेस को किया था टारगेटगौरलतब है कि जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए कायरतापूर्ण आतंकवादी हमले (Pahalgham Terror Attack) का करारा बदला लेने के लिए भारतीय सशस्त्र बलों ने 'ऑपरेशन सिंदूर' लॉन्च किया था। इस हाई-प्रिसिजन ऑपरेशन के तहत भारतीय वायुसेना और मिसाइल रेजिमेंट ने पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में सक्रिय करीब 9 प्रमुख लॉन्च पैड और आतंकवादी कैंपों को पूरी तरह नेस्तनाबूद कर दिया था। इसके जवाब में जब पाकिस्तान की एयरफोर्स ने भारतीय हवाई क्षेत्र का उल्लंघन करने की कोशिश की, तो भारत के आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम (Air Defense System) ने उनके मंसूबों को हवा में ही क्रैश कर दिया। भारत ने दोबारा आक्रामक रुख अपनाते हुए ड्रोन और गाइडेड मिसाइलों की झड़ी लगा दी, जिसने पाकिस्तान के मुख्य 'नूर खान एयरबेस' (Noor Khan Airbase) सहित कई सामरिक ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचाया, जिसके बाद पाकिस्तान पूरी तरह घुटनों पर आ गया था।

न्यूज़ इंडिया लाइव 19 Jul 2026 3:59 pm

मार्को रुबियो बोले- 'खत्म हुआ जिहादी खतरा', भड़के भारत ने दिया मुंहतोड़ जवाब

आतंकवाद और वैश्विक सुरक्षा को लेकर अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डीसी में आयोजित एक बेहद संवेदनशील और हाई-प्रोफाइल मंत्रिस्तरीय बैठक में भारत सहित दुनिया के 67 देशों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इस महाबैठक में अमेरिका के नवनियुक्त विदेश मंत्री मार्को रुबियो (Marco Rubio) ने वैश्विक मंच से दुनिया भर के देशों को वामपंथी आतंकवाद और चरमपंथ के खिलाफ एकजुट होने का खुला आह्वान किया। हालांकि, बैठक के दौरान उस समय एक बड़ा राजनयिक विरोधाभास खड़ा हो गया, जब अमेरिकी विदेश मंत्री ने अपने संबोधन में यह विवादास्पद दावा कर दिया कि वैश्विक स्तर पर अब जिहादी या इस्लामिक आतंकवाद (Jihadist Terrorism) का खतरा काफी हद तक कम हो चुका है। अमेरिका के इस जमीनी हकीकत से परे बयान पर बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे अमेरिका में भारतीय राजदूत विनय क्वात्रा (Vinay Kwatra) ने तुरंत कड़ा रुख अख्तियार करते हुए नई दिल्ली की तीव्र आपत्ति दर्ज कराई।भारत का दोटूक जवाब: आतंकवाद के सभी रूपों के खिलाफ अपनानी होगी जीरो टॉलरेंस की नीतिअमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के इस एकतरफा बयान के तुरंत बाद भारतीय राजदूत विनय क्वात्रा ने आतंकवाद के प्रति भारत के पारंपरिक, कड़े और बेहद स्पष्ट रुख को वैश्विक मंच पर दोबारा दोहराया। राजदूत क्वात्रा ने भारत के भीतर वामपंथी उग्रवाद यानी नक्सलवाद (Naxalism) से निपटने के देश के दशकों पुराने और लंबे रणनीतिक अनुभवों को साझा किया, लेकिन साथ ही अमेरिका को आईना दिखाते हुए साफ कर दिया कि आतंकवाद को अच्छी या बुरी श्रेणियों में नहीं बांटा जा सकता। भारत ने दोटूक शब्दों में कहा कि दुनिया को आतंकवाद के सभी रूपों के खिलाफ बिना किसी भेदभाव के 'जीरो टॉलरेंस' (Zero Tolerance) की नीति अपनानी होगी। क्वात्रा ने विशेष रूप से भारत को अस्थिर करने वाले सीमा पार आतंकवाद (Cross-Border Terrorism) और अलगाववादी एजेंडे को हवा देने वाले आतंकी समूहों का मुद्दा प्रमुखता से उठाया, जो भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बने हुए हैं।67 देशों की बैठक में जूनियर डिप्लोमैट्स का पहुंचना: अमेरिका के एजेंडे से कई देश असहमतइस हाई-लेवल बैठक में भले ही कागजों पर 67 देशों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, लेकिन अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक कई प्रमुख देशों ने इस बैठक में अपने मुख्य मंत्रियों को भेजने के बजाय जूनियर राजनयिकों (Junior Diplomats) को भेजना ही बेहतर समझा। इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि अमेरिका ने इस अंतरराष्ट्रीय बैठक के पूरे एजेंडे को केवल वामपंथी उग्रवाद के खतरे पर ही केंद्रित कर रखा था। भारत सहित दुनिया के कई अन्य देश इस अमेरिकी आकलन से पूरी तरह असहमत थे कि इस्लामिक चरमपंथ की तुलना में केवल वामपंथी हिंसा को ही दुनिया का सबसे बड़ा खतरा मान लिया जाए। विदेश मंत्री एस. जयशंकर (S. Jaishankar) को भी इस बैठक के लिए व्यक्तिगत आमंत्रण मिला था, लेकिन उनके पहले से तय अन्य यात्राओं पर होने के कारण राजदूत विनय क्वात्रा ने इस मंच पर भारत का मोर्चा संभाला और देश का पक्ष मजबूती से रखा।मार्को रुबियो ने समझाया आधुनिक आतंकवाद का ग्लोबल नेटवर्क: सीमाओं के पार सहयोग ही एकमात्र रास्ताअमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने दुनिया भर में बढ़ रही वामपंथी हिंसा पर चिंता जताते हुए कहा कि अब इस हिंसक दौर का अंत होना बेहद जरूरी है। उन्होंने दावा किया कि व्यापार, आप्रवासन (Immigration) और ऊर्जा जैसे मुद्दों पर अमेरिका के साथ गंभीर वैचारिक मतभेद होने के बावजूद 60 से अधिक देशों के नेताओं, आतंकवाद-विरोधी विशेषज्ञों और कानून प्रवर्तन अधिकारियों का यहां जुटना यह साबित करता है कि वैश्विक स्तर पर इस खतरे को लेकर चिंताएं गहरी हैं। आतंकवाद के आधुनिक और बदलते स्वरूप की व्याख्या करते हुए रुबियो ने कहा, आज के दौर में धुर-वामपंथी आतंकवादी एक देश से अवैध रूप से फंड जुटाते हैं, दूसरे देश के सुरक्षित सर्वर पर अपनी गोपनीय बातचीत होस्ट करते हैं, तीसरे देश के कैंपों में हथियारों की ट्रेनिंग लेते हैं, चौथे देश से नए लड़ाकों की भर्ती करते हैं और इन सब के नेटवर्क से किसी पांचवें देश में बड़ा हमला अंजाम देते हैं। उन्होंने जोर दिया कि इस खतरनाक सीमा-पार नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए सभी देशों को अपनी कानूनी सीमाओं से बाहर निकलकर खुफिया सहयोग बढ़ाना होगा।अमेरिका और भारत की सोच में बड़ा विरोधाभास: पहलगाम हमले का जिक्र कर भारत ने चेतायावाशिंगटन की इस बैठक में भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता और असहमति का विषय मार्को रुबियो का वह आकलन रहा, जिसमें उन्होंने कहा कि अमेरिका और यूरोपीय देशों द्वारा अपनाई गई सफल काउंटर-टेररिज्म रणनीतियों के कारण वैश्विक जिहादी आतंकवाद का खतरा अब काफी हद तक सिमट कर रह गया है। अमेरिका की यह सोच भारत की सुरक्षा वास्तविकताओं के बिल्कुल विपरीत है। भारत के लिए सीमा पार से प्रायोजित जिहादी आतंकवाद आज भी उतना ही बड़ा, क्रूर और घातक खतरा बना हुआ है जितना एक दशक पहले था, जिसका सबसे ताजा और दुखद उदाहरण 2025 में जम्मू-कश्मीर में हुआ भीषण पहलगाम आतंकवादी हमला (Pahalgan Terror Attack) है। भारत ने स्पष्ट संदेश दिया कि जब तक पाकिस्तान जैसे देशों से मिलने वाले सीमा पार आतंकी बुनियादी ढांचे और फंडिंग को पूरी तरह नष्ट नहीं किया जाता, तब तक किसी भी वैश्विक आतंकवाद-विरोधी अभियान को सफल नहीं माना जा सकता।

न्यूज़ इंडिया लाइव 19 Jul 2026 3:57 pm

'मोजतबा खामेनेई ईरान में नहीं हैं', तो फिर कहां हैं? ताजा दावे को लेकर बढ़ी हलचल

मध्य पूर्व (Middle East) की राजनीति से इस समय की एक बेहद हैरान करने वाली और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा को हिला देने वाली खबर सामने आ रही है। सऊदी अरब के प्रतिष्ठित समाचार चैनल 'अल-हदथ' ने एक शीर्ष इजरायली सुरक्षा सूत्र के हवाले से एक बेहद सनसनीखेज दावा किया है कि ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई (Mojtaba Khamenei) इस समय अपने देश ईरान में मौजूद ही नहीं हैं। इस खुफिया रिपोर्ट ने पूरी दुनिया के रणनीतिकारों को चौंका दिया है। रिपोर्ट में यहां तक कहा गया है कि मोजतबा खामेनेई के नाम से इस समय जो भी आधिकारिक आदेश और संदेश जारी किए जा रहे हैं, वे सीधे उनकी ओर से नहीं आ रहे हैं, बल्कि इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के नए प्रमुख अहमद वहीदी खुद इन संदेशों को तैयार कर रहे हैं। हालांकि, ईरान सरकार की तरफ से इन दावों पर अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि या खंडन नहीं किया गया है।तेहरान के सत्ता गलियारों में भयानक अंदरूनी कलह: अमेरिका से सीक्रेट डील के बाद भड़के कट्टरपंथीइस खुफिया रिपोर्ट के सामने आने के बाद ईरान के भीतर चल रहे गहरे राजनीतिक मतभेद और सत्ता संघर्ष की परतें पूरी तरह खुल गई हैं, जो IRGC की आंतरिक एकता और देश की पूरी इस्लामिक शासन व्यवस्था के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बन गई हैं। इजरायली सूत्रों का दावा है कि अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में एक गोपनीय 14 सूत्रीय समझौता हुआ है, जिसके बाद से तेहरान में सत्ता के भीतर का गृहयुद्ध चरम पर पहुंच गया है। ईरान का सबसे शक्तिशाली कट्टरपंथी धड़ा मौजूदा सरकार पर परोक्ष रूप से तख्तापलट (Coup) करने का संगीन आरोप लगा रहा है। कट्टरपंथियों का साफ कहना है कि अमेरिका के साथ यह गुप्त समझौता करके मौजूदा सरकार ने देश के राष्ट्रीय हितों और सर्वोच्च नेता के मूल निर्देशों की सरेआम अनदेखी की है, जिससे देश की सेना और जनता में असंतोष की आग भड़क उठी है।विदेश मंत्री पर सरेआम पथराव: पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में फूटा गुस्साईरान की जनता और कट्टरपंथी गुटों में पनप रही यह भयानक नाराजगी उस समय दुनिया के सामने खुलकर आ गई, जब ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार का कार्यक्रम चल रहा था। वहां मौजूद आक्रोशित भीड़ ने ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची (Abbas Araghchi) पर सरेआम पथराव कर दिया। बता दें कि अब्बास अराघची ने ही अमेरिका के साथ पर्दे के पीछे चल रही युद्धविराम वार्ता में सबसे अहम और मुख्य भूमिका निभाई थी। अंतिम संस्कार के दौरान प्रदर्शनकारियों ने विदेश मंत्री को 'अमेरिका का दलाल' और देश से गद्दारी करने वाला बताते हुए उनके खिलाफ जमकर आक्रामक नारेबाजी की। रिपोर्ट में इस बात को रेखांकित किया गया है कि मोजतबा खामेनेई पिछले काफी लंबे समय से किसी भी सार्वजनिक मंच पर या कैमरे के सामने बिल्कुल नहीं देखे गए हैं।तीन नेताओं के हाथ में आई ईरान की कमान: मोजतबा खामेनेई की रहस्यमयी अनुपस्थिति का बड़ा खेलसर्वोच्च नेता की लगातार रहस्यमयी गैरमौजूदगी के बीच अब ईरान के सभी बड़े रणनीतिक और सैन्य फैसले तीन प्रमुख नेताओं की त्रिमूर्ति लेती हुई दिखाई दे रही है। इनमें संसद के पूर्व अध्यक्ष और मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बाघेर गालीबाफ (Mohammad Bagher Ghalibaf), नवनिर्वाचित राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन (Masoud Pezeshkian) और विदेश मंत्री अब्बास अराघची शामिल हैं। अमेरिकी रिसर्चर और ईरान मामलों के विशेषज्ञ अराश अजीजी के अनुसार, मोजतबा खामेनेई के न होने के कारण यही तीन नेता पूरी सरकार और देश का संचालन कर रहे हैं। इस नई व्यवस्था से ईरान का पुराना कट्टरपंथी गुट खुद को सत्ता से पूरी तरह अलग-थलग और बेदखल महसूस कर रहा है, यही वजह है कि वे गालीबाफ और राष्ट्रपति पेजेशकियन पर सत्ता पर अवैध कब्जा करने की गहरी साजिश रचने का खुला आरोप लगा रहे हैं।राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद को सुपर-पावर बनाने की तैयारी: कट्टरपंथी सांसदों ने खोला मोर्चाईरान की संसद के भीतर भी इस प्रशासनिक बदलाव को लेकर विद्रोह के सुर तेज हो गए हैं। ईरान के बेहद प्रभावशाली कट्टरपंथी सांसद महमूद नबावियान और कमरान गजनफारी जैसे बड़े नेताओं ने सार्वजनिक रूप से मंचों से यह आरोप लगाना शुरू कर दिया है कि वर्तमान सरकार जानबूझकर सर्वोच्च नेता और देश की चुनी हुई संसद की संवैधानिक भूमिका व शक्तियों को कमतर कर रही है। उनका दावा है कि सरकार एक सुनियोजित राजनीतिक साजिश के तहत सारी विधायी और सैन्य शक्तियां 'राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद' को सौंपना चाहती है ताकि अमेरिका के साथ हुए समझौतों को बिना किसी रुकावट के देश पर थोपा जा सके। इस आंतरिक टकराव ने ईरान को एक ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां आने वाले दिनों में किसी बड़े आंतरिक सैन्य विद्रोह से इनकार नहीं किया जा सकता।

न्यूज़ इंडिया लाइव 19 Jul 2026 3:52 pm

ईरान पर अमेरिका के लगातार आठवें दिन हवाई हमले, पश्चिम एशिया में 50 हजार सैनिक हाई अलर्ट पर, भारी तबाही की तैयारी

अमेरिकी कार्रवाई उस हमले के बाद तेज हुई, जिसमें जॉर्डन स्थित अमेरिकी सैन्य बेस को निशाना बनाया गया था। इस हमले में दो अमेरिकी सैनिकों की मौत की पुष्टि की गई है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, यह युद्ध शुरू होने के बाद ईरान की ओर से की गई सीधी कार्रवाई में अमेरिकी सैनिकों की मौत का एक बड़ा मामला है।

देशबन्धु 19 Jul 2026 3:20 pm

ईरान में बढ़ा सत्ता संघर्ष: युद्धविराम के बाद सरकार और कट्टरपंथी आमने-सामने, राष्ट्रपति पर 'सॉफ्ट कूप' के आरोप

अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, हाल के दिनों में सरकार और कट्टरपंथी गुटों के बीच मतभेद सार्वजनिक रूप से सामने आने लगे हैं, जिससे ईरान की आंतरिक राजनीति में नई उथल-पुथल देखने को मिल रही है।

देशबन्धु 19 Jul 2026 1:56 pm

अमेरिकी सैनिकों की मौत के बाद ईरान पर ताबड़तोड़ हमले जारी, बंदर अब्बास और केशम द्वीप में यूएस ने किए कई धमाके

ईरान के हमले में पहली बार दो अमेरिकी सैनिकों की मौत हो गई। इसके बाद अमेरिकी सेना ने शनिवार को कहा कि उसने सैनिकों के मारे जाने के जवाब में ईरान के खिलाफ नए हवाई हमले शुरू कर दिए हैं।

देशबन्धु 19 Jul 2026 1:16 pm

Ramayana Event: रणबीर कपूर की 'रामायण' के इवेंट में ₹36 लाख की घड़ी पहनकर पहुंचे मशहूर सितारवादक, कीमत और डिजाइन जानकर उड़ जाएंगे होश

नई दिल्ली/लखनऊ। फिल्म निर्देशक नितेश तिवारी की मोस्ट एंटीसिपेटेड मेगा-बजट फिल्म ‘रामायण’ (Ramayana Movie) को लेकर दर्शकों और सिनेमा जगत में भारी उत्साह देखा जा रहा है। हाल ही में नई दिल्ली के प्रतिष्ठित भारत मंडपम (Bharat Mandapam) में भव्य ‘रामायण: प्रथम संकल्प’ इवेंट का आयोजन किया गया, जिसमें फिल्म की पूरी स्टारकास्ट—रणबीर कपूर, यश, साई पल्लवी और सनी देओल जैसे दिग्गज कलाकार मौजूद रहे। इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में मशहूर सितारवादक ऋषभ रिखीराम शर्मा (Rishab Rikhiram Sharma) भी शामिल हुए। लेकिन इस बार लोगों का ध्यान उनके लुक या संगीत से ज्यादा उनकी कलाई पर बंधी एक बेहद खास और दुर्लभ लग्जरी घड़ी ने खींचा। ऋषभ ने इस इवेंट में स्विस लग्जरी ब्रांड 'जैकब एंड कंपनी' (Jacob & Co) की विशेष 'राम जन्मभूमि एडिशन' घड़ी पहनी थी, जिसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर आते ही इसकी कीमत टॉक ऑफ द टाउन बन गई है।भगवान राम और हनुमान जी की नक्काशी, कीमत ने उड़ाए होशसितारवादक ऋषभ रिखीराम शर्मा ने इस मेगा इवेंट में शिरकत करने से ठीक पहले अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर कुछ तस्वीरें साझा की थीं, जिसका कैप्शन उन्होंने लिखा था—आज रात मिलते हैं. जय श्री राम. इन तस्वीरों में जहां एक तरफ वे रामायण की पूरी कोर टीम के साथ पोज देते नजर आ रहे हैं, वहीं दूसरी तस्वीर में उनकी कलाई पर बंधी ‘जैकब एंड कंपनी एपिक X राम जन्मभूमि टाइटेनियम एडिशन’ (Jacob & Co Epic X Ram Janmabhoomi Edition) साफ दिखाई दे रही है। 'एथोस वॉच बुटीक' की आधिकारिक लिस्टिंग के मुताबिक, ऋषभ द्वारा पहने गए इस शुरुआती टाइटेनियम वेरिएंट की कीमत ही ₹35.88 लाख है। गौरतलब है कि ऋषभ ने इस फिल्म में प्रभु श्री राम के लिए एक विशेष नया भजन तैयार किया है, जिसे इस इवेंट के दौरान पहली बार दर्शकों के सामने प्ले किया गया।अयोध्या राम मंदिर की झलक और करोड़ों का गोल्ड वेरिएंटअयोध्या की पवित्र राम जन्मभूमि और सनातन संस्कृति से प्रेरित इस लिमिटेड एडिशन लग्जरी घड़ी को कलात्मकता की पराकाष्ठा के साथ डिजाइन किया गया है, जो इसे दुनिया की बाकी घड़ियों से बिल्कुल अलग और बेमिसाल बनाती है:अद्भुत डायल डिजाइन: घड़ी के मुख्य डायल पर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम को उनके चिर-परिचित धनुष-बाण वाले रूप में बेहद सूक्ष्मता से दर्शाया गया है।बारीक कलाकृति: डायल के दूसरी तरफ राम भक्त भगवान हनुमान की प्रार्थना की मुद्रा में एक बेहद खूबसूरत और बारीक नक्काशी की गई है। इसके साथ ही, पृष्ठभूमि में अयोध्या के भव्य राम मंदिर की ऐतिहासिक संरचना को उकेरा गया है।वेरिएंट्स और करोड़ों की कीमत: जैकब एंड कंपनी की यह सुपर-लग्जरी घड़ी कुल तीन अलग-अलग वेरिएंट्स में आती है। इसके बेस टाइटेनियम एडिशन की कीमत जहां ₹35.88 लाख है, वहीं इसके प्रीमियम 'रोज गोल्ड एडिशन' की कीमत ₹78 लाख और सबसे टॉप 'गोल्ड एडिशन' की कीमत ₹83 लाख से शुरू होकर ₹1.08 करोड़ तक जाती है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 19 Jul 2026 10:14 am

US-Iran War Update: जॉर्डन बेस पर ईरानी हमले में 2 अमेरिकी सैनिकों की मौत, बौखलाए अमेरिका का होर्मुज स्ट्रेट पर भीषण हवाई हमला, कुवैत में पानी का संकट

वाशिंगटन/तेहरान/लखनऊ। मध्य पूर्व (Middle East) में जारी अमेरिका और ईरान का युद्ध अब अपने सबसे खौफनाक और विनाशकारी मोड़ पर पहुंच गया है। जॉर्डन में स्थित एक अमेरिकी सैन्य बेस पर ईरान द्वारा किए गए सीधे ड्रोन और मिसाइल हमले में दो अमेरिकी सैनिकों की मौत हो गई है। युद्ध के शुरुआती दिनों के बाद यह पहला मौका है जब ईरान की सीधी गोलीबारी में अमेरिकी जवानों की जान गई है। इस घटना से बौखलाए अमेरिका ने तेहरान के खिलाफ अपनी सैन्य कार्रवाई को कई गुना तेज कर दिया है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने आधिकारिक बयान जारी कर बताया कि उसने ईरान के कुख्यात 'रिवोल्यूशनरी गार्ड्स' (IRGC) को सजा देने के लिए होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) के पास सिरिक के निकट तड़के 1:30 बजे भीषण हवाई हमले किए हैं। इस कार्रवाई का मुख्य उद्देश्य वैश्विक तेल आपूर्ति के सबसे बड़े मार्ग होर्मुज स्ट्रेट को ब्लॉक करने की ईरान की क्षमता को पूरी तरह ध्वस्त करना है।कुवैत में तबाही: डिसेलिनेशन प्लांट पर हमला, पीने के पानी का संकटअमेरिका के इन हमलों के जवाब में ईरान और उसके सहयोगी विद्रोही गुटों (Axis of Resistance) ने खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी संपत्तियों और बुनियादी ढांचों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। शनिवार को ईरान ने रेगिस्तानी देश कुवैत पर भीषण मिसाइल हमला किया, जिससे वहां के एक प्रमुख ऑयल फैसिलिटी सेंटर और 'वॉटर डिसेलिनेशन प्लांट' (खारे पानी को मीठा बनाने वाला संयंत्र) को भारी नुकसान पहुंचा है। दो दिनों के भीतर कुवैत के पानी के प्लांट पर यह दूसरा बड़ा हमला है। कुवैत अपनी जरूरत का 90% पीने का पानी इसी तकनीक से हासिल करता है। इस हमले के बाद प्लांट में भीषण आग लग गई और कई बिजली उत्पादन इकाइयां ठप हो गईं, जिससे पूरे कुवैत में पीने के पानी और बिजली का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। मिसाइल हमलों के खतरे को देखते हुए कुवैत ने आपातकाल लागू कर कुछ समय के लिए अपना हवाई क्षेत्र (Airspace) पूरी तरह बंद कर दिया था।इराक और जॉर्डन में भी मिसाइल और ड्रोन युद्ध, बहरीन-सऊदी में बजे सायरनइस युद्ध की लपटें अब पूरे मध्य पूर्व में फैल चुकी हैं। इराक के अर्ध-स्वायत्त उत्तरी कुर्द क्षेत्र की राजधानी इरबिल में रविवार तड़के आसमान धमाकों से गूंज उठा। यहां कुर्दिस्तान फ्रीडम पार्टी के बेस पर हुए ड्रोन हमले में 8 सदस्य गंभीर रूप से घायल हो गए, जिसके बाद इराकी एयर डिफेंस ने कई हमलावर ड्रोनों को मार गिराया। वहीं पड़ोसी देश जॉर्डन ने भी मुस्तैदी दिखाते हुए अपनी सीमा में घुस रही कई ईरानी मिसाइलों को हवा में ही नष्ट कर दिया। सऊदी अरब और बहरीन में दिन भर हवाई हमलों के सायरन बजते रहे, जिससे वहां के नागरिकों में दहशत का माहौल है। खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के महासचिव जासेम मोहम्मद अल-बुदैवी ने ईरान की इस हरकत की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए उसे आम नागरिकों और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने के लिए 'युद्ध अपराध' (War Crimes) का दोषी ठहराया है।खामेनेई की 'कभी न भूलने वाले सबक' की चेतावनी, अंतरिम डील टूटीअमेरिकी सेना द्वारा अपने जवानों की मौत की पुष्टि करने से ठीक पहले ईरान के सर्वोच्च नेता (Supreme Leader) अयातुल्ला खामेनेई ने अमेरिका को खुली चेतावनी देते हुए कहा कि यदि इस्लामिक रिपब्लिक पर हमले नहीं रोके गए, तो वाशिंगटन को 'कभी न भूलने वाले सबक' सिखाए जाएंगे। ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने सरकारी टीवी पर घोषणा की है कि अमेरिका द्वारा प्रतिबद्धताओं के उल्लंघन के बाद तेहरान ने एक महीने पहले हुई उस 'अंतरिम डील' को पूरी तरह से सस्पेंड कर दिया है, जिसका मकसद युद्ध को स्थायी रूप से रोकना था। युद्ध की शुरुआत से अब तक कुल 16 अमेरिकी सैनिक मारे जा चुके हैं और 430 से अधिक घायल हुए हैं। बढ़ते खतरे को देखते हुए अमेरिका ने अपने नागरिकों के लिए ग्लोबल ट्रैवल अलर्ट जारी कर दिया है और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर एक बार फिर मंदी के बादल मंडराने लगे हैं।

न्यूज़ इंडिया लाइव 19 Jul 2026 9:47 am

Iran Coup Alert: अमेरिका से युद्ध के बीच ईरान में तख्तापलट का खतरा, कट्टरपंथियों ने राष्ट्रपति को दी खुलेआम गला काटने की धमकी, खामेनेई के बेटे पर सस्पेंस!

तेहरान/लखनऊ। अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे भीषण सैन्य संघर्ष के बीच अब ईरान के भीतर एक बहुत बड़ा आंतरिक राजनीतिक तूफान खड़ा हो गया है। वैश्विक मीडिया संस्थान सीएनएन (CNN) की एक ताजा और बेहद चौंकाने वाली रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के भीतर सत्ता पर कब्जे को लेकर गृहयुद्ध और तख्तापलट (Coup) जैसी स्थितियां बनती दिखाई दे रही हैं। ईरान के शक्तिशाली कट्टरपंथी गुटों ने अपनी ही सरकार पर बेहद संगीन आरोप लगाते हुए कहा है कि अमेरिका के साथ बातचीत और समझौता करने वाले उदारवादी नेता इस्लामिक रिपब्लिक के खिलाफ एक 'सॉफ्ट तख्तापलट' (Soft Coup) की साजिश रच रहे हैं। कट्टरपंथियों का दावा है कि नए सुप्रीम लीडर को पूरी तरह दरकिनार कर देश की कमान कुछ चुनिंदा नेताओं ने अपने हाथों में ले ली है।खामेनेई के अंतिम संस्कार में बवाल: विदेश मंत्री पर पथराव, लगे गद्दार के नारेईरान के भीतर सुलग रहा यह आंतरिक असंतोष उस समय सार्वजनिक रूप से हिंसक रूप में सामने आ गया, जब पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की अंतिम यात्रा निकाली जा रही थी। गौरतलब है कि खामेनेई की मौत 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजराइल द्वारा किए गए शुरुआती हवाई हमलों में हो गई थी। अंतिम संस्कार के दौरान जब ईरान के वर्तमान राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन खामेनेई के ताबूत के साथ चल रहे थे, तब कट्टरपंथी समर्थकों ने 'समझौता करने वालों की मौत हो' के उग्र नारे लगाए। हद तो तब हो गई जब भीड़ ने विदेश मंत्री अब्बास अराघची पर पत्थरों से हमला कर दिया और उन्हें 'देश बेचने वाला गद्दार' करार दिया। यही नहीं, ईरानी शासन से जुड़े एक प्रमुख धार्मिक गायक मोहम्मद अली बख्शी ने एक कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति पजशकियान को सीधे तौर पर धमकी देते हुए कहा, राष्ट्रपति महोदय, अगर सुप्रीम लीडर की शर्तें पूरी नहीं हुईं, तो हमारी तलवार होगी और आपका गला होगा। हम आपकी जिंदगी को जहन्नुम बना देंगे।कट्टरपंथी गुटों के गंभीर आरोप: मुज्तबा खामेनेई के नाम पर खेल?ईरान के इन कट्टरपंथी गुटों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि सरकार को अमेरिका से बदला लेना चाहिए था, लेकिन उसने देश के स्वाभिमान को ताक पर रखकर वाशिंगटन से गुप्त समझौता कर लिया। उनका आरोप है कि यह समझौता नए संभावित सुप्रीम लीडर और दिवंगत खामेनेई के बेटे मुज्तबा खामेनेई (Mojtaba Khamenei) की इच्छा के बिल्कुल खिलाफ जाकर किया गया है। रहस्यमयी बात यह है कि मुज्तबा खामेनेई अब तक सार्वजनिक रूप से जनता के सामने नहीं आए हैं, न ही उन्होंने देश को संबोधित किया है। इसके बावजूद, राष्ट्रपति और उनकी टीम उनके नाम का इस्तेमाल कर बड़े फैसले ले रही है। कट्टरपंथियों ने सरकार पर संसद को जबरन निलंबित करने, सुप्रीम लीडर के पुराने निर्देशों की धज्जियां उड़ाने और रात में होने वाली सरकार विरोधी रैलियों को बलपूर्वक रोकने का भी आरोप मढ़ा है। ईरान के सांसद महमूद नबावियन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर साफ लिखा है, ईरान की जनता सावधान रहे, क्या देश में तख्तापलट होने वाला है? हम खामेनेई के खून का बदला लेने और तख्तापलट के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार हैं।क्यों पैदा हुआ यह नेतृत्व का संकट? क्या कहते हैं एक्सपर्ट्सईरान मामलों के अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ और प्रसिद्ध पुस्तक ‘What Iranians Want’ के लेखक अराश अजीजी ने सीएनएन से बातचीत में इस पूरे विवाद की इनसाइड स्टोरी समझाई है। उनके मुताबिक, मुज्तबा खामेनेई के पूरी तरह से पर्दे के पीछे रहने के कारण ईरान में एक पावर वैक्यूम (नेतृत्व शून्यता) पैदा हो गया है। इसके चलते संसद के स्पीकर और मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बघेर गालिबाफ, राष्ट्रपति पेजेशकियन और विदेश मंत्री अराघची ही इस समय ईरानी सरकार के मुख्य चेहरे बन चुके हैं। चूंकि कट्टरपंथी तत्वों की पहुंच मुज्तबा तक सीधे नहीं हो पा रही है, इसलिए वे इन तीन शीर्ष नेताओं को विलेन मान रहे हैं और उन पर अवैध तरीके से सत्ता हथियाने की साजिश का आरोप लगा रहे हैं। इस भयंकर अंदरूनी राजनीतिक खींचतान के बीच सीमा पर अमेरिका और ईरान की सेनाओं के बीच मिसाइल और ड्रोन हमले भी बदस्तूर जारी हैं, जिससे ईरान दोहरे संकट में फंस गया है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 19 Jul 2026 9:45 am

जॉर्डन में ईरानी हमला: दो अमेरिकी सैनिक ढेर, खाड़ी में दहशत

पश्चिम एशिया में चार महीने से जारी संघर्ष और भीषण होता जा रहा है। अमेरिकी सेना ने शनिवार को पुष्टि की कि जॉर्डन में ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन हमलों का मुकाबला करते हुए उनके दो सैनिक मारे गए हैं

देशबन्धु 19 Jul 2026 6:56 am

निर्वस्त्र डांस और शराब पिलाकर फौजी अफसरों की जासूसी:80 हजार सैनिक मारे गए, फ्रांस ने मौत की सजा दी; माता हारी पार्ट-2

भास्कर सीरीज ‘स्पाई फाइल्स’ में आप पढ़ रहे हैं- ‘जासूस माता हारी’ की कहानी। पार्ट-1 में आपने पढ़ा- 15 अक्टूबर 1917 को फ्रांसिसी सैनिकों ने एक साथ 12 गोलियां मारकर एक महिला को मौत की सजा दी। मौत से पहले महिला ने खास श्रृंगार किया। चिट्ठियां लिखीं- बेटी और प्रेमी को। फिर गोली मारने जा रहे सैनिकों को फ्लाइंग किस का इशारा किया। ये महिला थी- माता हारी। दुनिया की वो खूबसूरत जासूस, जो डांस करते-करते निर्वस्त्र हो जाती थी। यूरोप के तमाम फौजी अफसर, सेना के जनरल और नेता इस महिला के दीवाने थे। इसके एक-एक शो का खर्च करोड़ों में था। माता हारी की जासूसी से कैसे फ्रांस के 80 हजार सैनिक मारे गए…जानते हैं पार्ट-2 में… 1905 की एक शाम। फ्रांस की राजधानी पेरिस में एक आलीशान बंगला। हॉल में हल्की रोशनी, हवा में घुली इत्र और शराब की खुशबू। संगीत बज रहा था। माता हारी नृत्य कर रही थी। जैसे-जैसे धुन चढ़ती जा रही थी, वो नाचते हुए एक-एक करके अपने कपड़े उतारती जा रही थी। वहां मौजूद लोग अपनी सांसें रोके ये सब देख रहे थे। डांस के आखिरी क्लाइमेक्स पर पहुंचकर माता हारी ने सारे कपड़े उतार दिए। शरीर पर बस कुछ गहने बचे थे। अब वो थिरकते-थिरकते मंच पर रखी शिव की एक मूर्ति के पास पहुंची। हाथ जोड़े और अपनी एड़ियों के बल बैठ गई। तभी हॉल का दरवाजा खुला। शहर के चार-पांच रसूखदार लोग अंदर दाखिल हुए। उनके चेहरे पर गुस्सा था। एक ने चीखते हुए कहा- ‘बंद करो ये अपना फूहड़ डांस। तुम अश्लीलता फैला रही हो।’ तभी दूसरे शख्स ने कहा- ‘इसे पुलिस के हवाले कर दो।’ माता हारी धबरा गई। उसने फर्श पर गिरा रेशमी कपड़ा उठाया और खुद को ढंकते हुए धीरे से बोली- ‘रुक जाइए, प्लीज। मैं कोई अश्लीलता नहीं फैला रही हूं।’ उस शख्स ने गुस्से में कहा- ‘इस तरह सरेआम कपड़े उतारना अश्लीलता नहीं है, तो क्या है?’ माता हारी धीरे से बोली- ‘यह पवित्र आर्ट है। ईश्वर को खुश करने की कला। मैं खुद को उन्हें समर्पित कर रही हूं।’ वो आदमी जोर से चिल्लाया- ‘नाटक बंद करो। हमने पूरे पेरिस में ऐसा नृत्य नहीं देखा।’ माता हारी फर्श पर घुटनों के बल बैठ गई। हाथ जोड़ लिए। फिर बोली- ‘मेरी छोटी सी कहानी सुन लीजिए, फिर जो चाहे सजा दे दीजिएगा।’ लोग कानाफूसी करने लगे। तभी एक अधेड़ बोल पड़ा- ‘इसकी कहानी सुनने में क्या हर्ज है? सुनाओ।’ माता हारी ने आंसू पोंछे। गहरी सांस लेकर बताना शुरू किया- ‘मेरा जन्म भारत के एक दक्षिणी राज्य में हुआ था। मां एक मंदिर में देवदासी थी। बचपन में उनकी शादी मंदिर के देवता कंडास्वामी से करा दी गई। वो भगवान की सेवा करती और उनके सामने यही नृत्य करती थी। जब वो 14 साल की थी, तब मेरा जन्म हुआ, लेकिन मैं मां का मुंह भी नहीं देख पाई। उसी रोज उनकी मौत हो गई। पुजारियों ने मुझे गोद ले लिया। उन्होंने ही मुझे पाला और मां वाला पवित्र नृत्य सिखाया। 13 साल की उम्र में मैंने पहली बार कंडास्वामी के सामने अपने वस्त्र उतारकर नृत्य किया। उसके बाद से यह मेरी दिनचर्या बन गया।’ अब माता हारी चुपचाप खड़ी हो गई। हॉल में सन्नाटा था। तभी एक शख्स ने पूछा- ‘लेकिन तुम भारत से पेरिस कैसे आ गई?’ माता हारी ने उदासीभर मन से कहा- 'वो मंदिर दुनिया में मशहूर है। उस रोज एक ब्रिटिश अफसर आया था। मंदिर में भीड़ नहीं थी। वह मंदिर के बारे में जानना चाहता था। पुजारी ने भी सहजता से उसे गर्भगृह के पास जाने की इजाजत दे दी। उस वक्त मैं श्रृंगार करके भगवान के सामने नृत्य में कर रही थी। वह चुपचाप आया और एक कोने में बैठकर मुझे देखने लगा। नृत्य खत्म होने के बाद अपने कपड़े समेटकर जैसे ही मैं आगे बढ़ी, वह सामने खड़ा था। उसने कहा- ‘तुम अद्भुत हो। आजतक मैंने ऐसा नृत्य नहीं देखा।’ मैंने उससे कुछ कहा नहीं और अपने कमरे की तरफ चली गई। उस दिन के बाद वह लगातार एक हफ्ते तक आता रहा। धीरे-धीरे हमारे बीच बातें होने लगीं... फिर हमें प्यार हो गया। एक रात... वह मौका पाकर मुझे उस मंदिर से भगा ले गया। हमने शादी कर ली।’ अब माता हारी की आंखों में आंसू थे। वो थोड़ा रुकी और फिर बोलना शुरू किया- ‘मेरी किस्मत खराब थी। शादी के कुछ साल बाद ही वो आदमी मुझे छोड़कर कहीं और चला गया। मैंने कुछ महीने उसका इंतजार किया, लेकिन वो नहीं लौटा। मेरे पास जिंदा रहने का कोई और जरिया नहीं था। तब सोचा... क्यों न मैं अपनी उसी पवित्र कला को दोबारा शुरू करूं।’ माता हारी की कहानी सुनने के बाद वो रसूखदार शख्स आगे बढ़ा। माता हारी को सहारा देकर उठाया और कहा- ‘हम सब आपके साथ हैं। आप इस कला को जारी रखिए।’ यहां से माता हारी का सफर चल पड़ा। वो इतनी मशहूर हो गई कि महंगी सिगरेट के पैकेट और शराब की बोतलों पर उसकी फोटो और नाम छपने लगा। नीदरलैंड्स के फ्राइज म्यूजियम की रिपोर्ट के मुताबिक, उस दौर में माता हारी एक शो के लिए आज के हिसाब से करीब चालीस लाख रुपए लेती थी। एक फ्रांसीसी बैंकर ने तो उसके लिए आलीशान महल और बड़ा विला किराए पर ले रखा था। उसके एक प्रेमी ने विदाई के तोहफे के तौर पर इतनी बड़ी रकम दी, जो आज के 9 करोड़ रुपए के बराबर है। हालांकि, माता हारी पैसे बचा नहीं पाती थी। वह जितना कमाती, उतना ही अपनी विलासिता पर उड़ा भी देती थी। 1907 की बात है। माता हारी जर्मनी की राजधानी बर्लिन में शो कर रही थी। हॉल खचाखच भरा था। तभी बर्लिन पुलिस चीफ हेर वॉन जागो रिवॉल्वर लिए अंदर दाखिल हुए। उनके साथ चार और पुलिस वाले थे। पुलिस चीफ सीधे मंच पर चढ़े। संगीत रुक गया। माता हारी के कदम पीछे की ओर हटने लगे। पुलिस चीफ ने चिल्लाते हुए कहा- ‘जर्मनी में इस तरह के लिबास में डांस करना अपराध है। मुझे तुम्हारे कपड़ों की जांच करनी है।’ पुलिस चीफ के इशारे पर सिपाहियों ने माता हारी को घेर लिया। वे उसे मंच के कोने में बने एक बंद कमरे में ले गए। दरवाजा बंद होते ही माता हारी ने वही पुरानी देवदासी वाली कहानी दोहरानी शुरू कर दी। पुलिस चीफ ने उसे डांटते हुए कहा- ‘बनावटी कहानी मत सुनाओ। तुम्हारा असली ठिकाना जेल है। वहीं पर अपनी परफॉर्मेंस दिखाना।’ माता हारी ने पुलिस चीफ की तरफ देखा। धीरे से उनका हाथ पकड़ा और कान में कुछ फुसफुसाई। पुलिस चीफ मुस्कुराने लगे। उन्होंने पुलिस से कहा- ‘छोड़ दो इसे। सबसे सामने गिरफ्तार करना ठीक नहीं है। हम फिर आएंगे।’ कुछ दिन बाद माता हारी को बर्लिन के सबसे महंगे इलाके में एक अपार्टमेंट मिल गया। इसकी देखरेख, नौकरों की तनख्वाह और रखरखाव का पूरा खर्च जर्मन सरकार का खुफिया विभाग उठाता था। वहां काम करने वाले नौकर जर्मन पुलिस के जासूस थे। एक रोज एक विदेशी जनरल बर्लिन पहुंचा। किसी ने उसे माता हारी के बारे में बताया, तो वो सीधे मिलने पहुंच गया। रात के करीब 10 बज रहे थे। जनरल नशे में धुत था। माता हारी उसका हाथ पकड़कर बेडरूम में ले गई। अपने हाथों से जाम पिलाने लगी। इधर, दो नौकर पर्दे के पीछे छिपकर सबकुछ देख रहे थे। विदेशी जनरल ने लड़खड़ाती जुबान में कहा- ‘तुम सच में एक अप्सरा हो। तुम्हारे लिए मैं सबकुछ दांव पर लगा सकता हूं।’ माता हारी ने धीमे से कहा- ‘जनरल साहब। आप जैसे मर्द जब मोर्चे पर होते हैं, तो हम औरतें सलामती की दुआ करती हैं। वैसे, सुना है आपकी फौज अगले महीने उत्तर की तरफ कूच कर रही है? आप मुझे छोड़ कर चले जाएंगे?’ नशे में डूबे जनरल ने कहा- ‘अरे नहीं… उत्तर तो बस दिखावा है। हमारी असली फौज तो पूरब की तरफ कूच करने वाली है।’ कमरे में लगा सीक्रेट कैमरा, जनरल की हरकतों को कैद कर रहा था। पर्दे के पीछे खड़े नौकर डायरी में उसकी बातें नोट कर रहे थे। माता हारी, जनरल के और करीब आ गई। ग्लास में शराब भरते हुए बोली- ‘तो फिर एक जाम और हो जाए…’ जनरल पहले ही बहुत पी चुका था। एक-दो घूंट बाद वह बेसुध पड़ गया। माता हारी ने उसकी जेब से दस्तावेज निकाले, डायरी पर कुछ नोट किया और फिर सबकुछ जस का तस रखकर वहां से चली गई। धीरे-धीरे माता हारी के लिए यह सब रोज की बात हो गई। जर्मन पुलिस उसके जरिए बड़े-बड़े रसूखदारों और विदेशी मेहमानों की जासूसी करवाने लगी। माता हारी को भी इस काम में मजा आने लगा था। 1910 में जर्मन अफसरों को लगा कि माता हारी को प्रोफेशनल ट्रेनिंग देना चाहिए। पैसों के लिए माता हारी राजी भी हो गई। उसे जर्मनी के लोराख इलाके में भेजा गया, जहां सरकार जासूसों के लिए ट्रेनिंग स्कूल चलाती थी। माता हारी को कोड वर्ड समझना, सीक्रेट मैसेज लिखना, नक्शे पढ़ना और पुरुषों को मनोवैज्ञानिक तरीके से वश में करने का कोर्स करवाया गया। ट्रेनिंग के बाद माता हारी ने कई फौजी अफसरों और नेताओं की जासूसी की। इससे जर्मनी पुलिस को कई अहम डिटेल्स मिलीं। अब तो माता हारी अपने मेहमानों की निजी तस्वीरें और दस्तावेजों की फोटो खींचकर रखने लगी थी। कुछ साल यह सब चलता रहा। माता हारी को पैसे और महंगे-महंगे तोहफे भी मिलते रहे। इसी बीच 28 जून 1914 को कुछ चरमपंथियों ने सर्बिया में ऑस्ट्रिया के राजकुमार और उनकी पत्नी की हत्या कर दी। ऑस्ट्रिया ने इसके लिए सीधे तौर पर सर्बिया को जिम्मेदार माना। जल्द ही दो देशों की ये लड़ाई प्रथम विश्वयुद्ध में बदल गई। एक तरफ फ्रांस, रूस और ब्रिटेन जैसे मित्र राष्ट्र थे, तो दूसरी तरफ जर्मनी, ऑस्ट्रिया और हंगरी जैसी केंद्रीय शक्तियां। इसी दौरान फ्रांस और रूस के बीच एक गोपनीय समझौता हुआ। इस समझौते के मसौदे को बर्लिन से होते हुए पेरिस ले जाना था। एक रूसी एजेंट मसौदा लेकर बर्लिन पहुंचा। वह एक आलीशान होटल में ठहरा हुआ था। वहां मौजूद रूसी एंबेसी के अफसर उसकी सीक्रेसी का खासा ध्यान रखे हुए थे, लेकिन जर्मनी के एजेंटों को इसकी भनक लग गई। जर्मनी के एजेंटों ने उस होटल में माता हारी को डांसर बनाकर भेज दिया। रूसी एजेंट ने माता हारी का नाम और तारीफें सुन रखी थी। उसे जैसे यह बात पता चली, फौरन रिसेप्शन में फोन लगा दिया। उसने कहा- ‘मुझे पूरी रात के लिए माता हारी चाहिए। जितने पैसे चाहिए मिल जाएंगे।’ थोड़ी देर बाद माता हारी उसके साथ कमरे थी। दोनों बैठकर शराब पी रहे थे। तभी वेटर ने दरवाजा खटखटाया। उसने रूसी एजेंट से कहा- ‘मैंने आपका सामान रख दिया है। मुझे कुछ सामानों की लिस्ट बनानी है। क्या आपका पेन मिल सकता है?’ रूसी एजेंट हिचकिचाया, फिर माता हारी की तरफ देखते हुए अपनी जैकेट से पेन निलाकर वेटर को दे दिया। वेटर ने एक पेपर पर कुछ लिखा और पेन रूसी एजेंट को वापस कर दिया। वेटर के जाने के बाद माता हारी ने रूसी एजेंट को इतनी शराब पिलाई गई कि वह अपना होश खो बैठा। जर्मनी के जासूस इसी मौके की तलाश में थे। उन लोगों ने रूसी एजेंट के कपड़ों और सूटकेस में मिले दस्तावेजों की फोट खींची और चुपचाप बाहर निकल गए। सुबह जब रूसी एजेंट की आंख खुली, तो उसका सिर दर्द से फटा जा रहा था। कमरे में सामान बिखरा पड़ा था। घबराकर उसने जेब में हाथ डाला। उसका पेन सुरक्षित था। उसने राहत की सांस ली, पर अंदर से उसे किसी अनहोनी का डर सता रहा था। उसने बैग पैक किया और वहां से निकल गया। इधर, जर्मनी के खुफिया विभाग में हंगामा मचा था। पुलिस चीफ, अफसरों को डांट रहे थे- 'तुम लोगों ने 100 तस्वीरें खींची है, लेकिन कोई भी तस्वीर उस मसौदे से जुड़ी नहीं है। वो मसौदा गया कहां?’ जर्मनी के एजेंटों के पास इसका जवाब नहीं था। अगले दिन रूसी जासूस बेल्जियम पहुंच चुका था। एक रात वो फिल्म देखकर होटल लौट रहा था, तभी गली में एक शख्स ने उसका रास्ता रोक लिया। जासूस ने फौरन पिस्तौल निकाल ली, तभी वो शख्स बोल पड़ा- ‘सर, मैं वो वेटर हूं, जिसने बर्लिन में आपका पेन लिया था। मेरा पेन भी हुबहू वैसा ही है। गलती से मैंने अपना पेन आपको दे दिया।’ रूसी जासूस ने गाली देते हुए कहा- ‘यह क्या बकवास है?’ वेटर ने आराम से कहा- ‘सर, ये पेन लीजिए। इसके निचले हिस्से में सीक्रेट मसौदा अभी भी सुरक्षित है। जर्मनी के जासूसों से मैंने इसे बचा लिया।' रूसी जासूस ने हकलाते हुए कहा- ‘लेकिन... तुम तो जर्मनी के हो?’ वेटर हंसने लगा। असल में वो वेटर फ्रांस का जासूस था। उसने जर्मनी पुलिस के सामने दस्तावेज ढूंढने का नाटक किया, लेकिन चुपके से पूरे दस्तावेज की तस्वीरें खींचकर फ्रांस भेज दिया था। अब तारीख आई 3 अगस्त 1914, जर्मनी ने फ्रांस के खिलाफ जंग का एलान कर दिया। तब माता हारी बर्लिन के एक होटल में पुलिस चीफ हेर वॉन जागो के साथ थी। होटल में बड़े-बड़े फौजी अफसर ठहरे हुए थे। जंग के माहौल में अपने फौजियों की एक झलक पाने के लिए भीड़ ने होटल को बाहर से घेर लिया था। देशभक्ति नारे लग रहे थे। तभी पुलिस चीफ, माता हारी का हाथ पकड़कर होटल से बाहर निकले। भीड़ ने उनका जोरदार स्वागत किया। पुलिस चीफ ने माता हारी को कार में बैठाकर पूरा बर्लिन घूमाया। इसी दौरान फ्रांस के जासूसों की नजर माता हारी पर पड़ी। उन्हें पता चल गया कि यह महिला जर्मनी पुलिस की करीबी है। इधर, युद्ध के कुछ ही महीने के भीतर यूरोप के हालात बदल गए। थिएटरों पर ताले लटक गए। जर्मन सरकार ने माता हारी को शत्रु देश फ्रांस का नागरिक घोषित कर दिया। उसकी सारी संपत्ति और महंगे गहने जब्त कर लिए। माता हारी को धक्का लगा। वह जिस देश के लिए जासूसी कर रही थी, उसी ने उसे रातों-रात कंगाल बना दिया। कुछ दिनों बाद जैसे-तैसे करके वो हॉलैंड पहुंची। वहां फिर से अपना मशहूर नृत्य करना शुरू किया, लेकिन पहले की तरह जादू नहीं रहा। माता हारी की ढलती उम्र इसकी बड़ी वजह थी। उन दिनों हॉलैंड, जर्मनी के खुफिया नेटवर्क का प्रमुख केंद्र था। जर्मनी की खुफिया विभाग को ऐसे मोहरों की जरूरत थी, जो बिना रोक-टोक के मित्र राष्ट्र देशों में आ-जा सकें। माता हारी इसके लिए मुफीद थी, क्योंकि उसके पास हॉलैंड का पासपोर्ट था और पेरिस के ऊंचे हलकों में संबंध। हॉलैंड में तैनात जर्मन खुफिया अफसर कार्ल क्रामर ने एक रोज माता हारी को अपने दफ्तर बुलाया। जब माता हारी, क्रामर के पास पहुंची, तो वह एक नक्शे पर गोल घेरा बना रहा था। उसने माता हारी को कुर्सी पर बैठने का इशारा किया। क्रामर ने कहा- ‘तुम्हें फौरन पेरिस जाना होगा।’ माता हारी- ‘पेरिस? वहां क्यों जाना है?’ क्रामर ने मुस्कुराते हुए कहा- ‘वही काम , जो तुम सबसे बेहतर जानती हो। पेरिस जाओ, वहां के मंत्रियों और फौजी अफसरों से नजदीकियां बढ़ाओ।’ माता हारी झट से बोल पडी- ‘अब मैं जासूसी के बदले सौदा करूंगी। मुझे 10 हजार फ्रैंक चाहिए। बोलो मंजूर है?’ क्रामर ने अपनी दराज खोला और नोटों की एक गड्डी माता हारी की तरफ सरकाते हुए कहा- ‘तुम्हें 20 हजार फ्रैंक मिलेंगे।’ 20 हजार फ्रैंक, यानी आज के हिसाब से करीब 23 लाख रुपए। माता हारी ने क्रामर की तरफ फ्लाइंग किस उछालते हुए कहा- ‘समझो तुम्हारा काम हो गया।’ क्रामर ने माता हारी को अदृश्य स्याही की तीन शीशियां दीं। साथ में एक पर्ची। जिस पर लिखा था- H21. ये कोड वर्ड में माता हारी का नाम था। पहले विश्व युद्ध में कैप्टन व्लादिमीर मौरोव नाम का एक रूसी पायलट फ्रांस की तरफ से लड़ रहा था। एक रोज उसकी मुलाकात माता हारी से हुई। धीरे-धीरे उनका मिलना-जुलना बढ़ने लगा और फिर माता हारी को उससे प्यार हो गया। इसी बीच एक रोज कैप्टन मैरोव का विमान क्रैश हो गया। वह गंभीर रूप से घायल हो गया। फेफड़ों में जहरीली गैस भर गई। उसे विटेल के मिलिट्री अस्पताल में भर्ती करा दिया गया। विटेल प्रतिबंधित इलाका था, लेकिन माता हारी उससे मिलने के लिए बेचैन थी। एक रोज वह परमिशन लेने फ्रांस के खुफिया विभाग पहुंच गई। फ्रांस को पहले से माता हारी पर शक था। वहां मौजूद अफसर ने कहा- ‘हम तुम्हें हॉस्पिटल जाने देंगे, लेकिन बदले में तुम्हें हमारे लिए जासूसी करनी होगी।’ माता हारी ने बिना सोचे समझे कहा- ‘ठीक है, मैं तैयार हूं, लेकिन बदले मुझे दस लाख फ्रैंक चाहिए।' अभी के हिसाब से करीब 11.82 करोड़ रुपए। फ्रांसीसी अफसर इस भारी भरकर रकम पर भी राजी हो गया। इस तरह अब माता हारी डबल एजेंट बन चुकी थी। फ्रांस और जर्मनी दोनों देशों की जासूस। विटेल के उस इलाके में रूसी और फ्रांसीसी पायलटों का आना-जाना आम था। लड़ाई से थक-हारकर आने वाले पायलट माता हारी के साथ वक्त बिताना पसंद करते थे। 1915 के अगस्त महीने की बात है। फ्रांस, जर्मनी पर एक बड़े हमले की तैयारी कर रहा था। माता हारी को इसकी भनक रूसी पायलटों से मिल गई थी, लेकिन तारीख पता नहीं थी। एक रात वेटल के एक होटल में 30-35 साल का रूसी पायलट नशे में धुत्त होकर बेड पर पड़ा था। बगल में लेटी माता हारी चुपचाप बिस्तर से उठी, पायलट की जेब में हाथ डाला। एक छोटा सा कागज मिला, जिस पर कोड वर्ड में कुछ लिखा था। माता हारी ने पायलट की तरफ देखा… वो अब भी गहरी नींद में था। उसने एक पेपर पर वो खुफिया मैसेज नोट किया और लिपस्टिक के डिब्बे के पीछे रखकर ढक्कन बंद कर दिया। 2 दिन बाद… हॉलैंड के एक होटल में जर्मन खुफिया अफसर क्रामर परेशान बैठा था। तभी एक एजेंट हांफते हुए आया। उसने एक सीलबंद लिफाफा देते हुए कहा- ‘इसे H21 ने भेजा है।’ क्रामर ने फौरन लिफाफा खोला। जिस पर लिखा हुआ था- ‘25 सितंबर 1915 को फ्रांस बड़ा हमला करने वाला है।’ क्रामर खुशी से चिल्लाया- ‘फौरन बर्लिन कनेक्ट करो, माता हारी ने अपना काम कर दिया है।’ खुफिया मैसेज के बाद जर्मनी ने चुपचाप उस मोर्चे पर बटालियनों की संख्या 90 से बढ़ाकर 192 कर दी। वहां भारी तोपें और मशीनगनें तैनात कर दी। अब तारीख आई 25 सितंबर 1915, फ्रांसीसी पैदल सेना के हजारों जवान नारा लगाते हुए आगे बढ़े। शुरुआती कुछ चौकियों पर उन्हें कामयाबी मिली, लेकिन जैसे ही वे मुख्य मैदान में पहुंचे, घात लगाकर बैठी जर्मन सेना ने हमला कर दिया। अचानक चारों तरफ से तोपों और मशीनगनों से ऐसा हमला हुआ कि फ्रांसीसी सैनिक संभल नहीं पाए। देखते-देखते लाशों के ढेर लग गए। जंग खत्म हुई तो पता चला कि फ्रांस के 80 हजार सैनिक मारे गए। ये युद्ध बैटल ऑफ लूस नाम से जाना जाता है। हार के बाद फ्रांस का मानना था कि उसके साथ किसी ने गद्दारी की है। 2 साल बाद यानी जनवरी 1917, फ्रांस के जासूसों को एक कोड वर्ड मिला- H21. फ्रांसीसी खुफिया विभाग ने जब कड़ियों को जोड़ा, तो वे दंग रह गए। वह कोड नेम माता हारी का था। 13 फरवरी 1917 को फ्रांस पुलिस ने पेरिस से माता हारी को गिरफ्तार कर लिया। अदालत में पेश किया गया। दोनों तरफ की तमाम दलीलों और जिरहों के बाद कोर्ट ने माता हारी को सरेआम गोली मारकर मृत्युदंड की सजा सुनाई। 15 अक्टूबर 1917 को एक साथ 12 सैनिकों ने गोली मारकर माता हारी को मौत की सजा दे दी। जासूस माता हारी की पहली कड़ी भी पढ़िए : नाचते-नाचते निर्वस्त्र हो जाती थी महिला जासूस:एक साथ 12 गोलियां मारकर मौत की सजा, आखिरी इच्छा में प्रेमी को लिखी चिट्ठी; माता हारी पार्ट-1 रेफरेंस : 1. Mata Hari: Courtesan and Spy : By Major Thomas Coulson 2. Mata Hari's Last Dance: By Michelle Moran 3. Mata Hari, the True Story : By Russell Warren Howe 4. The fatal lover : By Julie Wheelwright 5. The Spy: A Novel of Mata Hari : By Paulo Coelho 6. A Tangled Web: Mata Hari: By Mary W. Craig

दैनिक भास्कर 19 Jul 2026 5:00 am

PoK हिंसा पर भड़का संयुक्त राष्ट्र, UN ने पाकिस्तान को लगाई तगड़ी लताड़, मौतों की निष्पक्ष जांच और JAAC नेताओं की रिहाई की मांग

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में बुनियादी अधिकारों और खाद्यान्न संकट को लेकर भड़की भीषण जन-अशांति पर अब संयुक्त राष्ट्र (UN) ने बेहद कड़ा संज्ञान लेते हुए पाकिस्तान सरकार की दमनकारी नीतियों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धज्जियां उड़ा दी हैं। जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त (UNHRC) वोल्कर टुर्क ने एक आधिकारिक बयान जारी कर इस विवादित क्षेत्र में आगामी स्थानीय चुनावों से ठीक पहले कानून-व्यवस्था की आड़ में आम नागरिकों पर किए जा रहे अत्याचारों पर गहरी चिंता व्यक्त की है। संयुक्त राष्ट्र ने पाकिस्तान को सख्त हिदायत देते हुए जून महीने से अब तक सुरक्षाबलों की हिंसक कार्रवाई में मारे गए दर्जनों बेगुनाह प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाकर्मियों की मौतों की तत्काल, गहन और पूरी तरह से निष्पक्ष न्यायिक जांच कराने की पुरजोर मांग की है।नागरिक संगठन को आतंकवादी घोषित करने पर भड़के मानवाधिकार उच्चायुक्त: मौलिक अधिकारों के हनन पर जताई चिंताइस पूरे क्षेत्र में लोकतांत्रिक ढंग से जन-आंदोलन का नेतृत्व कर रहे 'ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी' (JAAC) पर पाकिस्तानी हुकूमत द्वारा आतंकवाद-रोधी कानूनों के तहत लगाए गए प्रतिबंध और उसकी संपत्ति कुर्क करने की कार्रवाई पर संयुक्त राष्ट्र ने बेहद तीखा रुख अपनाया है। मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टुर्क ने स्पष्ट तौर पर कहा कि व्यापारी, ट्रांसपोर्टर, छात्र, वकील और सामाजिक कार्यकर्ताओं के इस प्रतिष्ठित नागरिक संगठन को अपराधी घोषित करना और जनसभाओं पर दमनकारी प्रतिबंध लगाना अभिव्यक्ति की आजादी, शांतिपूर्ण सभा करने के अधिकार और लोकतांत्रिक संगठन बनाने की स्वतंत्रता जैसे मूल मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन है। यूएन ने दो टूक शब्दों में मांग की है कि जेलों में बंद किए गए जेएएसी के तमाम शीर्ष नेताओं को तुरंत कानूनी सहायता और उनके परिवारों से मिलने की इजाजत दी जाए तथा उनकी निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित हो।डिजिटल ब्लैकआउट पर पाकिस्तान को अल्टीमेटम: संयुक्त राष्ट्र ने कहा- तुरंत पूरी तरह बहाल करो इंटरनेट सेवाएंपीओके में भड़क रहे जन-विद्रोह की खबरों को बाहरी दुनिया और वैश्विक मीडिया तक पहुंचने से रोकने के लिए पाकिस्तानी एजेंसियों द्वारा पूरे क्षेत्र में लगाए गए डिजिटल प्रतिबंधों पर भी संयुक्त राष्ट्र ने गहरी नाराजगी जाहिर की है। बयान में साफ तौर पर कहा गया है कि क्षेत्र में मोबाइल और ब्रॉडबैंड इंटरनेट सेवाओं पर लगाए गए मनमाने प्रतिबंध अंतरराष्ट्रीय नागरिक नियमों के खिलाफ हैं और इनसे स्थानीय स्वास्थ्य व आपातकालीन सेवाएं भी बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं। मानवाधिकार उच्चायुक्त ने पाकिस्तानी अधिकारियों को तत्काल अल्टीमेटम देते हुए कहा है कि पूरे क्षेत्र में बिना किसी देरी के इंटरनेट सेवाएं पूरी तरह बहाल की जाएं। इसके साथ ही उन्होंने स्थानीय जनता की वास्तविक प्रशासनिक शिकायतों और समस्याओं के तार्किक समाधान के लिए एक सार्थक एवं समावेशी राजनीतिक संवाद (Inclusive Political Dialogue) शुरू करने का भी आह्वान किया।मीरपुर में खूनी झड़प और भारत से मानवीय गुहार: 'राशन की भारी किल्लत, हमारी मदद करे नई दिल्ली'पाकिस्तानी सुरक्षाबलों की बर्बर कार्रवाई के बावजूद पूरे पीओके में विरोध प्रदर्शन और ज्यादा उग्र हो गया है, जहाँ जेएएसी के आह्वान पर मीरपुर जिले समेत कई प्रमुख हिस्सों में पूर्ण बंद के दौरान पुलिस और आम जनता के बीच आमने-सामने की खूनी झड़पें हुई हैं, जिसमें दर्जनों पुलिसकर्मियों समेत सैकड़ों नागरिक लहूलुहान हो गए हैं। इस अशांति के बीच एक रैली को संबोधित करते हुए जेएएसी के वरिष्ठ नेता सरदार अमान खान ने वैश्विक मीडिया के सामने सीधे भारत सरकार से मानवीय सहायता (Humanitarian Aid) भेजने की बड़ी भावुक अपील की है। पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा को पूरी तरह ध्वस्त करते हुए स्थानीय नेताओं ने आरोप लगाया कि इस्लामाबाद सरकार ने जानबूझकर इस क्षेत्र में भोजन, आटे और आवश्यक जीवनरक्षक दवाओं की भारी कृत्रिम किल्लत पैदा कर दी है, जिसके चलते वहां भुखमरी के हालात हैं और अब उन्हें केवल भारत की मदद पर ही भरोसा बचा है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 18 Jul 2026 6:23 pm

आज का एक्सप्लेनर:क्या सोनम वांगचुक को जबरन खाना खिलाना गैरकानूनी, सुप्रीम कोर्ट के फैसले और एक्सपर्ट्स से समझिए; अब आंदोलन का क्या होगा

जंतर-मंतर पर 21 दिन से भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक को शनिवार सुबह पुलिस उठा ले गई। अभिजीत दीपके ने कहा- ‘पुलिस ने सोनम सर को गालियां दीं और घसीटकर जबरन ले गए।’ नई दिल्ली के डीसीपी ने बताया कि दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के मुताबिक सोनम वांगचुक की बिगड़ती सेहत की वजह से उन्हें सफदरजंग हॉस्पिटल में शिफ्ट किया गया है। अस्पताल पहुंची वांगचुक की पत्नी ने कहा है कि हमारी सहमति के बिना उन्हें न तो जबरन मुंह से कुछ खिलाया जाए और न ही नस के जरिए कोई दवा या तरल पदार्थ दिया जाए। क्या बिना मर्जी सोनम वांगचुक को कुछ भी खिलाना गैरकानूनी है और इतने दिन बिना खाए उनके शरीर के भीतर क्या-क्या हुआ होगा; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: क्या सरकार जबरन सोनम का अनशन तुड़वा सकती है?जवाब: भूख-हड़ताल भी अभिव्यक्ति यानी अपनी बात कहने का तरीका है। आर्टिकल 19 के तहत ये एक मूल अधिकार है। यानी सरकार किसी को भूख-हड़ताल करने से रोक नहीं सकती। वहीं, आर्टिकल 21 से जीवन का अधिकार मिलता है और सरकार की ये जिम्मेदारी है कि वह किसी व्यक्ति की जान को बचाए रखे। इसीलिए भारत में आत्महत्या करना या इसके लिए किसी को उकसाना अपराध है। इन दो कानूनों से जुड़ा एक रोचक मामला मणिपुर की इरोम चानू शर्मिला का है, जो 2000 से 2016 तक 16 साल भूख हड़ताल पर रही थीं। उन्हें अनशन के तीसरे दिन ही आत्महत्या के प्रयास के आरोप में IPC की धारा 309 के तहत गिरफ्तार कर लिया गया और 16 साल तक सरकारी अस्पताल में रखकर जबरन फीडिंग ट्यूब से खाना दिया गया। हालांकि 2021 में मद्रास हाई कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में कहा कि भूख-हड़ताल के चलते किसी को आत्महत्या के प्रयास में आरोपी नहीं बनाया जा सकता। सोनम वांगचुक का केस भी इन्हीं दो मूल अधिकारों के बीच झूल रहा है। सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता कहते हैं कि सोनम पर इरोम चानू की तरह आत्महत्या की कोशिश का मामला दर्ज नहीं किया जाएगा। लेकिन सरकार आर्टिकल 21 का हवाला देकर उनका अनशन तुड़वा सकती है। उनकी जान बचाने के लिए फीडिंग ट्यूब से तरल खाना या फिर नसों से जरूरी फ्लूइड दिया जा सकता है। ये गैरकानूनी नहीं होगा। सोनम का अनशन तुड़वाने के लिए दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था, 'डॉक्टरों से उनकी नियमित जांच कराई जाए और जरूरत पड़ने पर उनकी जान बचाने के लिए जरूरी कदम उठाए जाएं। क्योंकि हर नागरिक की जान कीमती है।’ हालांकि भूख हड़ताल को लेकर 1991 में वर्ल्ड मेडिकल एसोसिएशन की ‘माल्टा घोषणा’ के मुताबिक, कोई मानसिक रूप से सक्षम व्यक्ति, यानी जो होश में हो, उसकी दिमागी स्थिति ठीक हो, उसे उसकी मर्जी के बिना खाना खिलाना नैतिक रूप से गलत है। इसे अमानवीय तथा अपमानजनक व्यवहार माना गया है। सवाल-2: जबरन अनशन तुड़वाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट का क्या रुख रहा है?जवाब: सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में साफ तौर पर कहा है कि अनशन तोड़ने के लिए तब तक मजबूर नहीं किया जा सकता, जब तक ये उनकी जिंदगी बचाने के लिए जरूरी न हो। दरअसल, 26 नवंबर 2024 से 70 साल के किसान नेता जगजीत सिंह दल्लेवाल ने विवादित कृषि कानूनों के खिलाफ 20 दिन भूख हड़ताल की। सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने इसी मामले में कहा था, ‘भूख हड़ताल पर बैठे व्यक्ति को कोई नुकसान नहीं होना चाहिए, ये तय करना सरकार का संवैधानिक कर्तव्य और जिम्मेदारी है।’ कोर्ट ने कहा कि केंद्र और पंजाब की राज्य सरकार को उनकी उम्र, बीमारी पर ध्यान देना चाहिए। उनका कर्तव्य है कि वे जगजीत को तत्काल मेडिकल एड देने के लिए सभी जरूरी कोशिश करें। सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा, ‘उन्हें अनशन तोड़ने के लिए तब तक मजबूर न किया जाए, जब तक ये उनकी जिंदगी बचाने के लिए जरूरी न हो।’ 6 अप्रैल 2025 को 133 दिन के बाद केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय रेल राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू की अपील के बाद जगजीत ने अपना अनशन तोड़ दिया था। 2011 में बाबा रामदेव की अनशन की कोशिश पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सरकार को अनशन करने वालों के खिलाफ शत्रुतापूर्ण नजरिया नहीं रखना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि सरकार अभिव्यक्ति के अधिकार को तब तक रोक नहीं सकता, जब तक कि सांप्रदायिक समस्या न हो, सामाजिक व्यवस्था न बिगड़े और कोई शांति भंग का कोई खतरा न हो। भूख हड़ताल, विरोध का ऐसा रूप है, जिसे हमारे संविधान में ऐतिहासिक और कानूनी दोनों तरह से स्वीकार किया गया है। इसकी शुरुआत महात्मा गांधी के सत्याग्रह से हुई है। सवाल-3: तो क्या वाकई सोनम वांगचुक की जान को खतरा था?जवाब: भुखमरी से जुड़ी कई रिसर्च 3 जरूरी बातें बताती हैं.. सोनम का वजन अनशन की शुरुआत में 65.9 किलो था, जो 18 जुलाई तक 9.5 किलो घटकर 56.4 हो गया। यानी करीब 15% की गिरावट। उनका ब्लड प्रेशर और शुगर लेवल भी नॉर्मल से कम चल रहे थे। उत्तर प्रदेश बेस्ड डॉक्टर ऑफ मेडिसिन (MD) अजय सिंह कहते हैं कि ये कहना ठीक नहीं होगा कि तत्काल उनकी जान को कोई खतरा था। वे पानी ले रहे थे। हालांकि 20 दिन के अनशन के बाद मेडिकल जांचों और लगातार निगरानी की जरूरत है, क्योंकि उनकी उम्र 59 साल है। वहीं सफदरजंग अस्पताल ने कहा है कि उपवास और डिहाइड्रेशन के चलते सोनम कमजोर हैं। फिलहाल उनकी स्थिति स्थिर है, लेकिन सारे पैरामीटर्स को सामान्य करने के लिए उन्हें लगातार निगरानी, चिकित्सकीय देखभाल और इलाज की जरूरत है। मध्यप्रदेश मेडिकल साइंस यूनिवर्सिटी, जबलपुर में न्यूरोलॉजिस्ट और मेडिसिन एक्सपर्ट डॉ. टी.एन दुबे कहते हैं, ‘मेडिकल साइंस में इस बात कि साफ पुष्टि नहीं है कि इंसान कितने दिन तक भूख बर्दाश्त कर सकता है। भूख तब तक जानलेवा नहीं होगी, जब तक कीटोसिस न शुरू हो जाए। एक बार ये प्रक्रिया शुरू हो जाए, तो माना जाता है कि व्यक्ति कोमा में जा सकता है। दरअसल, बिना खाने के कुछ दिन बाद कीटोसिस की फेज शुरू हो जाती है। इसके बाद चौथी फेज और फिर व्यक्ति की मृत्यु। आखिर भूखे रहने के दौरान हमारे शरीर में होता क्या है, इसके चारों फेज समझते हैं… सवाल-4: अब आगे कॉकरोच पार्टी के आंदोलन और सोनम के अनशन का क्या होगा?जवाबः आगे 3 सिनैरियो बन सकते हैं...1. सोनम अस्पताल से ही अनशन करें 2. कॉकरोच पार्टी का आंदोलन तेज हो सकता है 3. पुलिस प्रदर्शनकारियों से जंतर-मंतर खाली करवा ले ------------------------ ये खबर भी पढ़ें… आज का एक्सप्लेनर: प्रोटेस्ट कॉकरोच पार्टी का, फिर सोनम वांगचुक आमरण अनशन पर क्यों; क्या सरकार मांगें मानेगी, तबीयत बिगड़ी तो क्या होगा 59 साल के सोनम वांगचुक 17 दिन से भूख हड़ताल पर हैं। सिर्फ नमक का पानी ले रहे हैं। 8.5 किलो वजन गिर चुका है। उनके पीछे बैनर कॉकरोच जनता पार्टी का है, जिसकी मांग है- शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा। पूरी खबर पढ़ें…

दैनिक भास्कर 18 Jul 2026 2:52 pm

सऊदी और तुर्की के बाद अब इस खाड़ी देश पर डोरे डाल रहा कंगाल पाकिस्तान, क्या फिर जागेगा 'इस्लामिक नाटो' का ख्वाब

आर्थिक बदहाली और वैश्विक मंच पर अलग-थलग पड़ने के संकट से जूझ रहा पाकिस्तान अपनी डूबती अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए नए-नए पैंतरे आजमा रहा है। सऊदी अरब और तुर्की जैसे पुराने सहयोगियों से उम्मीद के मुताबिक वित्तीय मदद और कूटनीतिक समर्थन न मिलने के बाद अब इस्लामाबाद ने अपना रुख एक और अमीर खाड़ी देश कुवैत (Kuwait) की तरफ किया है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर के नेतृत्व में देश का शीर्ष नेतृत्व इन दिनों कुवैत के साथ रणनीतिक और व्यापारिक रिश्तों को मजबूत करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि इस नई नजदीकी के पीछे सिर्फ कर्ज की गुहार नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे मुस्लिम देशों का एक तथाकथित 'इस्लामिक नाटो' खड़ा करने का पुराना पाकिस्तानी एजेंडा भी छिपा हो सकता है।आखिर कुवैत के सामने क्यों हाथ फैला रहा है इस्लामाबाद?पाकिस्तान इस समय विदेशी मुद्रा भंडार की भारी किल्लत और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की कड़ी शर्तों के जाल में फंसा हुआ है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने अब पाकिस्तान को मुफ्त में बेलआउट पैकेज देने के बजाय सीधे तौर पर देश की सरकारी संपत्तियों में निवेश करने की शर्त रख दी है। ऐसे में पाकिस्तान को कुवैत एक सुरक्षित और बड़े निवेशक के रूप में दिखाई दे रहा है। पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल कुवैत को तेल रिफाइनरी, कृषि, माइनिंग और आईटी सेक्टर में भारी निवेश के प्रस्ताव दे रहा है। इसके साथ ही पाकिस्तान अपने लाखों कुशल और अकुशल श्रमिकों को कुवैत भेजने के लिए वीजा नियमों में ढील देने की गुहार लगा रहा है ताकि देश में रेमिटेंस (विदेशी मुद्रा) का प्रवाह बढ़ाया जा सके।मुस्लिम ब्लॉक के जरिए भारत को घेरने की नाकाम कोशिशभू-राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान का कुवैत और तुर्की जैसे देशों के करीब जाना उसकी पुरानी और घिसी-पिटी कूटनीति का हिस्सा है। पाकिस्तान हमेशा से सऊदी अरब की अगुवाई वाले इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) और तुर्की-मलेशिया के साथ मिलकर एक मजबूत मिलिट्री और पॉलिटिकल ब्लॉक यानी 'इस्लामिक नाटो' बनाने का सपना देखता रहा है, ताकि कश्मीर जैसे मुद्दों पर भारत के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाया जा सके। लेकिन पाकिस्तान का यह ख्वाब हमेशा से खोखला साबित हुआ है क्योंकि कुवैत, यूएई और सऊदी अरब जैसे प्रभावशाली खाड़ी देशों के भारत के साथ बेहद मजबूत और गहरे व्यापारिक संबंध हैं, जिन्हें वे पाकिस्तान के कारण दांव पर लगाने के मूड में बिल्कुल नहीं हैं।शहबाज-मुनीर की इस महत्वाकांक्षी चाल में छिपे हैं बड़े खतरेइस समय जब मध्य-पूर्व (Middle East) में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच तनाव चरम पर है, पाकिस्तान की यह कूटनीतिक पैंतरेबाजी उस पर खुद भारी पड़ सकती है। कुवैत और अन्य खाड़ी देश इस समय क्षेत्रीय स्थिरता पर ध्यान दे रहे हैं न कि किसी नए सैन्य या वैचारिक गुटबाजी पर। जानकारों का कहना है कि अगर पाकिस्तान ने खाड़ी देशों को अपने रक्षा एजेंडे या इस्लामिक ब्लॉक की राजनीति में घसीटने की कोशिश की, तो उसे लेने के देने पड़ सकते हैं। लखनऊ और दिल्ली के विदेश नीति विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि पाकिस्तान अपनी आर्थिक प्राथमिकताओं को छोड़कर कूटनीतिक चालबाजियों में उलझा रहा, तो वह कुवैत से मिलने वाले संभावित आर्थिक सहयोग और निवेश से भी हाथ धो बैठेगा।

न्यूज़ इंडिया लाइव 18 Jul 2026 2:21 pm

अमेरिका में हाहाकार! ईरान से टकराव के बीच कुदरत की मार से झुलसा US, भड़के ट्रंप ने अब कनाडा को दी बड़ी धमकी

वैश्विक महाशक्ति अमेरिका इस समय एक साथ कई मोर्चों पर गंभीर संकटों से घिरा हुआ है। एक तरफ जहां व्हाइट हाउस और पेंटागन में ईरान के खिलाफ सैन्य रणनीति और संभावित युद्ध को लेकर बड़े स्तर पर मंथन चल रहा है, वहीं दूसरी तरफ खुद अमेरिका के भीतर प्रकृति ने भयंकर तबाही मचा रखी है। देश के कई राज्य जहां एक ओर विनाशकारी बाढ़ और मूसलाधार बारिश में पूरी तरह डूब चुके हैं, तो वहीं दूसरी ओर सैकड़ों एकड़ में फैली जंगलों की आग (वाइल्डफायर) ने पूरे आसमान को काले और जहरीले धुएं से पाट दिया है। इस घरेलू आपातकाल और पर्यावरण संकट से बौखलाए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अब अपनी भड़ास पड़ोसी देश कनाडा पर निकाली है और उसे सीधे तौर पर आर्थिक प्रतिबंध यानी एडिशनल टैरिफ लगाने की खुली चेतावनी दे दी है।जहरीले धुएं से घुट रहा है अमेरिकी शहरों का दम, जारी हुआ अलर्टदरअसल, इस समय कनाडा के जंगलों में लगी भीषण आग का खतरनाक और दूषित धुआं तेजी से सीमाओं को पार कर अमेरिका के आसमान पर छा गया है। न्यूयॉर्क, शिकागो, डेट्रॉइट और वाशिंगटन डीसी जैसे अमेरिका के सबसे बड़े और प्रमुख शहरों में हवा की गुणवत्ता (AQI) बेहद खतरनाक और जानलेवा स्तर पर पहुंच चुकी है, जिसके कारण करोड़ों लोगों को घरों के अंदर ही रहने की सख्त हिदायत दी गई है। नासा (NASA) और मौसम विज्ञानियों की रिपोर्ट के मुताबिक, कनाडा की तरफ से आ रहे इस 'प्रदूषण के आक्रमण' ने अमेरिका के 20 से अधिक राज्यों को अपनी चपेट में ले लिया है। न्यूयॉर्क में होने वाले आगामी बड़े आयोजनों और आम जनजीवन पर इसका बहुत बुरा असर पड़ रहा है, जिसने अमेरिकी प्रशासन की रातों की नींद उड़ा दी है।'कनाडा की लापरवाही का हर्जाना भुगतेगा व्यापार' - ट्रंप का बड़ा बयानइस संकट पर बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर कनाडाई सरकार को आड़े हाथों लिया। ट्रंप ने कहा कि कनाडा अपने जंगलों का सही तरीके से रखरखाव करने में पूरी तरह नाकाम रहा है और उसकी इस 'जानबूझकर की गई लापरवाही' के कारण अमेरिकी नागरिकों के फेफड़े इसकी भारी कीमत चुका रहे हैं। ट्रंप ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि इस प्रदूषण के कारण अमेरिका को जो अरबों डॉलर का आर्थिक नुकसान हो रहा है, उसे कनाडा से वसूला जाएगा और इस खर्च को कनाडा से आने वाले सामानों पर लगने वाले मौजूदा टैरिफ में जोड़ दिया जाएगा। ट्रंप के इस बयान के बाद दोनों देशों के बीच व्यापारिक युद्ध (Trade War) छिड़ने के आसार और तेज हो गए हैं।भीषण बाढ़ और जलवायु परिवर्तन की दोहरी मार से बेहाल USकनाडा की ओर से आ रहे धुएं के अलावा अमेरिका खुद आंतरिक रूप से कुदरती कहर का सामना कर रहा है। अमेरिका के कई हिस्सों में अचानक आई फ्लैश फ्लड (Flash Floods) और अत्यधिक बारिश के कारण नदियां उफान पर हैं, जिससे रिहायशी इलाके, सबवे और बेसमेंट पूरी तरह पानी में डूब चुके हैं। इस मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के कारण पूरा उत्तरी अमेरिका इस समय भीषण सूखे, रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और अप्रत्याशित तूफानों का सामना कर रहा है। ऐसे समय में जब राष्ट्रपति का पूरा ध्यान मिडिल ईस्ट और ईरान नीति पर होना चाहिए था, घरेलू मोर्चे पर पैदा हुए इस प्राकृतिक और आर्थिक संकट ने ट्रंप प्रशासन की राजनीतिक प्राथमिकताओं को बदलने पर मजबूर कर दिया है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 18 Jul 2026 2:19 pm

इस्लामाबाद में महामंथन! पाकिस्तान की बुलाई SCO बैठक में शामिल हुआ भारत, चीन और रूस ने भी दी दस्तक

एशियाई क्षेत्र की भू-राजनीति और कूटनीतिक गलियारों से एक बेहद बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। धुर विरोधी पड़ोसी देश पाकिस्तान की मेजबानी में राजधानी इस्लामाबाद में आयोजित हो रही शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की महत्वपूर्ण बैठक में भारत ने भी अपनी सक्रिय भागीदारी दर्ज कराई है। आतंकवाद, कश्मीर और सीमा पार तनाव जैसे गंभीर मुद्दों के कारण दोनों देशों के बीच लंबे समय से जारी गतिरोध के बीच भारतीय प्रतिनिधिमंडल का इस्लामाबाद पहुंचना अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक बड़ा संदेश माना जा रहा है। इस हाई-प्रोफाइल बैठक में भारत के अलावा रूस, चीन और अन्य मध्य एशियाई सदस्य देशों के शीर्ष राजनयिक और प्रतिनिधि भी हिस्सा लेने के लिए पहुंचे हैं।क्षेत्रीय सुरक्षा और आर्थिक कॉरिडोर पर टिकीं पूरी दुनिया की नजरेंपाकिस्तान द्वारा आयोजित की गई इस एससीओ बैठक का मुख्य एजेंडा सदस्य देशों के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ाना, क्षेत्रीय कनेक्टिविटी में सुधार करना और यूरेशियन क्षेत्र में सुरक्षा चुनौतियों से मिलकर निपटना है। सूत्रों के मुताबिक, बैठक के पहले दौर में व्यापारिक बाधाओं को दूर करने और आतंकवाद के खिलाफ एक साझा रणनीति बनाने पर गहन चर्चा हुई है। भारत ने हमेशा की तरह इस अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी कनेक्टिविटी परियोजनाओं में संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान की बात को पुरजोर तरीके से उठाया है, जिसे चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) और सीपीईसी (CPEC) के संदर्भ में बेहद अहम माना जा रहा है।क्या भारत और पाकिस्तान के बीच बर्फ पिघलने की है यह शुरुआत?अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषकों का मानना है कि इस बहुपक्षीय मंच पर भारत और पाकिस्तान का एक साथ बैठना दोनों देशों के बीच जमी बर्फ को पिघलाने का एक जरिया बन सकता है। हालांकि, भारतीय विदेश मंत्रालय ने पहले ही साफ कर दिया है कि यह एक बहुपक्षीय क्षेत्रीय बैठक है और इसमें हिस्सा लेना किसी भी तरह से पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय वार्ता की बहाली का संकेत नहीं है। इसके बावजूद, इस्लामाबाद, दिल्ली, बीजिंग और मॉस्को के कूटनीतिक हलकों में इस बैठक की इन-कैमरा चर्चाओं और नेताओं की अनौपचारिक मुलाकातों (पुल-असाइड मीटिंग्स) को लेकर अटकलों का बाजार काफी गर्म है।यूरेशिया और दक्षिण एशिया के समीकरणों पर पड़ेगा सीधा असरइस समय जब दुनिया रूस-यूक्रेन संकट और मध्य-पूर्व के तनाव से जूझ रही है, ऐसे में यूरेशिया और दक्षिण एशिया के देशों का यह साझा मंच वैश्विक शक्ति संतुलन के लिहाज से बेहद खास हो जाता है। बैठक में रूस और चीन की जुगलबंदी के बीच भारत ने अपनी स्वतंत्र और मजबूत विदेश नीति का प्रदर्शन किया है। लखनऊ, दिल्ली, मुंबई समेत पूरे देश के रणनीतिक थिंक-टैंक इस बात पर नजर बनाए हुए हैं कि इस बैठक के खत्म होने के बाद जो संयुक्त घोषणापत्र जारी होगा, उसमें आतंकवाद और क्षेत्रीय व्यापार को लेकर क्या नई गाइडलाइंस सामने आती हैं।

न्यूज़ इंडिया लाइव 18 Jul 2026 2:07 pm

बड़ा झटका! जिस गैस पाइपलाइन डील पर पाकिस्तान लूट रहा था वाहवाही, ईरान ने पेरिस कोर्ट ले जाकर लगा दिया पलीता

आर्थिक कंगाली और चौतरफा संकट से जूझ रहे पाकिस्तान को वैश्विक मंच पर एक और करारा झटका लगा है। जिस महत्त्वाकांक्षी ईरान-पाकिस्तान (IP) गैस पाइपलाइन परियोजना को पूरा करने का दावा कर शहबाज शरीफ और जनरल आसिम मुनीर की सरकार देश-दुनिया में अपनी पीठ थपथपा रही थी, उस पर अब पूरी तरह पानी फिरता नजर आ रहा है। पड़ोसी देश ईरान ने पाकिस्तान के ढुलमुल रवैये और अमेरिकी प्रतिबंधों के बहाने लगातार की जा रही देरी से तंग आकर एक बड़ा कदम उठाया है। ईरान ने इस मामले को अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत (पेरिस इंटरनेशनल कोर्ट) में घसीट लिया है, जिसके बाद पाकिस्तान पर अरबों डॉलर के जुर्माने का खतरा मंडराने लगा है।जानिए क्या है यह गैस पाइपलाइन विवाद और ईरान का कड़ा रुखयह पूरा मामला साल 2009 में हस्ताक्षरित हुए एक ऐतिहासिक द्विपक्षीय समझौते से जुड़ा हुआ है। इस डील के तहत ईरान से पाकिस्तान के रास्ते भारत तक गैस पाइपलाइन बिछाई जानी थी, लेकिन बाद में यह सिर्फ ईरान और पाकिस्तान तक ही सीमित रह गई। समझौते के मुताबिक, पाकिस्तान को अपने हिस्से की पाइपलाइन का निर्माण साल 2014 तक पूरा करना था। ईरान ने अपने क्षेत्र में 900 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन का काम बहुत पहले ही पूरा कर लिया था, लेकिन पाकिस्तान लगातार अमेरिकी प्रतिबंधों (US Sanctions) का डर दिखाकर अपने हिस्से के निर्माण को टालता रहा। अब ईरान ने साफ कर दिया है कि वह अपनी राष्ट्रीय संपदा और समय की बर्बादी को और बर्दाश्त नहीं करेगा।पाकिस्तान पर मंडराया 18 अरब डॉलर के भारी-भरकम जुर्माने का खतराइस्लामाबाद और रावलपिंडी के रणनीतिक हलकों में इस समय हड़कंप मचा हुआ है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यदि पेरिस की अंतरराष्ट्रीय अदालत में ईरान यह केस जीत जाता है, तो पाकिस्तान पर 18 अरब डॉलर (लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपये) से अधिक का हर्जाना या जुर्माना लगाया जा सकता है। पहले से ही आईएमएफ (IMF) के कर्ज और चीन के रीपेमेंट के बोझ तले दबे पाकिस्तान के लिए यह रकम चुका पाना पूरी तरह असंभव है। पाकिस्तानी मीडिया और जानकारों का कहना है कि यह मुनीर-शरीफ प्रशासन की कूटनीतिक और आर्थिक मोर्चे पर अब तक की सबसे शर्मनाक विफलता है, जिसने देश को दिवालियापन की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है।बीजिंग से लेकर वाशिंगटन तक फेल हुई पाकिस्तानी कूटनीतिभू-राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान इस समय एक बेहद गंभीर दुविधा में फंस गया है। एक तरफ जहां उसे अमेरिका को खुश रखना है, वहीं दूसरी तरफ पड़ोसी ईरान की नाराजगी उसे भारी पड़ रही है। पाकिस्तान ने इस संकट से निकलने के लिए चीन और सऊदी अरब जैसे सहयोगियों से भी अनौपचारिक मदद मांगी थी, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानूनी पचड़ों को देखते हुए किसी ने भी खुलकर उसका साथ नहीं दिया। एशिया और मध्य-पूर्व के इस बदलते घटनाक्रम का असर पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र की ऊर्जा सुरक्षा पर भी पड़ सकता है, जिससे आने वाले दिनों में पाकिस्तान की घरेलू मुश्किलें और अधिक बढ़ने वाली हैं।

न्यूज़ इंडिया लाइव 18 Jul 2026 2:06 pm

ईरानी ड्रोन हमले से कुवैत दहला – सैन्य ठिकाने और प्लांट को भारी नुकसान

ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव का असर अब खाड़ी देशों पर भी दिखने लगा है

देशबन्धु 18 Jul 2026 7:30 am

एंडी बर्नहैम बने ब्रिटेन की लेबर पार्टी के नए नेता, सोमवार को संभालेंगे प्रधानमंत्री पद

ब्रिटेन की लेबर पार्टी ने घोषणा की कि एंडी बर्नहैम को पार्टी का नया नेता चुन लिया गया है। बर्नहैम, जो पहले ग्रेटर मैनचेस्टर के मेयर रह चुके हैं, सोमवार को प्रधानमंत्री पद संभालने वाले हैं

देशबन्धु 18 Jul 2026 7:10 am

नाचते-नाचते निर्वस्त्र हो जाती थी महिला जासूस:एक साथ 12 गोलियां मारकर मौत की सजा, आखिरी इच्छा में प्रेमी को लिखी चिट्ठी; माता हारी पार्ट-1

तारीख थी 15 अक्टूबर 1917, फ्रांस की राजधानी पेरिस की सेंट लाजारे जेल। सर्दभरी सुबह के 4 बजे थे। अचानक भारी बूटों की थाप गूंजी- ठक, ठक, ठक। हाथों में चमचमाती टॉर्च थामे 18 फ्रांसीसी अफसर, सधे हुए कदमों से जेल के दूसरे फ्लोर की तरफ बढ़ रहे थे। वे सीधे कोठरी नंबर 12 के सामने पहुंचे। एक अफसर ने दरवाजा खोलने के लिए जैसे ही हाथ बढ़ाया, वहां खड़ी नन ने उसे रोक दिया। उसने कहा- ‘आप लोग यहीं रुकिए। मैं खुद उसे लेकर आती हूं।’ ये नन उस जेल की जेलर थी। वो कोठरी के भीतर दाखिल हुई। माचिस की तीली निकाली और मेज पर रखे लैंप को जलाया। लोहे की चारपाई पर 40-41 साल की महिला सो रही थी। उसके बिखरे हुए घुंघराले बालों पर हाथ फेरते हुए नन ने आहिस्ता से उसे हिलाया, कोई हरकत नहीं हुई। घबराकर नन ने बाहर खड़ी दूसरी नन को भी बुला लिया। दोनों ने मिलकर जब उसे झकझोरा, तब जाकर उस औरत ने अंगड़ाई ली। उसने अपनी बड़ी-बड़ी, काली आंखों को रगड़ते हुए अलसाए मन से नन की तरफ देखा। नन का गला रूंध गया था, आवाज फंस रही थी। उसने भारी मन से कहा- ‘तुम्हारी दया याचिका खारिज हो चुकी है... डेथ वॉरंट जारी हो गया है। आज... इसी वक्त मौत की सजा मुकर्रर की गई है।’ महिला के चेहरे पर कोई शिकन नहीं। वह आराम से उठी और बिस्तर पर बैठ गई। उसने पूछा, ‘क्या मुझे सीधे ले जाएंगे?’ नन कुछ जवाब देती, इससे पहले ही महिला फिर से बोल पड़ी- ‘कोई बात नहीं। ले चलिए मुझे। तैयार हूं मैं।’ नन ने घड़ी की तरफ देखा और कहा- ‘आपके पास आधा घंटा है। तैयार हो जाइए। अगर किसी के नाम कोई संदेश देना चाहती हैं, तो वो भी लिखकर दे सकती हैं।’ महिला तैयार होने लगी। वह ऐसे सजने लगी जैसे किसी शाही महफिल में जा रही हो। उसने बड़े सलीके से सिल्क की स्टॉकिंग्स पहनी, पैरों में ऊंची एड़ी के जूते पहने, एक लंबा फर वाला कीमती कोट पहना और सिर पर बड़ी हैट लगा ली। फिर बालों को संवारा। उसने पास खड़ी नन की तरफ मुड़कर मुस्कुराते हुए पूछा, ‘कैसी लग रही हूं मैं?’ नन उसे देखती रह गई। 5 फीट 9 इंच हाइट, सांवली त्वचा, बड़ी-बड़ी काली आंखें, घुंघराले बाल और छरहरा बदन… यही तो थी वो महिला जिसका कभी पूरा यूरोप दीवाना था। अब उसने नन से कहकर अपने वकील एडुआर्ड क्लुनेट को बुलावा भेजा। जब क्लुनेट पहुंचे, तो बुरी तरह घबराए हुए थे। आंखों में आंसू और चेहरे पर उसे न बचा पाने का मलाल। महिला समझ गई कि वकील के मन में क्या चल रहा है। उसने कहा- ‘खुद को मत कोसिए। मुझे न तो आपसे कोई गिला है और न ही इस जिंदगी से। बस, मेरे लिए एक सिगार का इंतजाम करवा दीजिए।’ फौरन सिगार मंगवाया गया। महिला ने बेहद तसल्ली से सिगार के कश लिए, जैसे वह किसी बड़े थिएटर के ग्रीन रूम में बैठकर परफॉर्मेंस की तैयारी कर रही हो। घड़ी की सुइयां सरकती रहीं और अब सुबह के 4:45 बज चुके थे। जेलर ने भारी मन से पूछा- ‘कोई आखिरी इच्छा?’ ‘हां, जरा कुछ पन्ने और कलम दे दीजिए। खत लिखना है।’ महिला ने हंसते हुए कहा। एक डायरी और कलम मंगाया गया। उसने दो खत लिखे। पहला खत बेटी लुईस के नाम और दूसरा खत प्रेमी और रूसी कैप्टन व्लादिमीर मैरोव के नाम। जेलर ने दोनों खत लेकर वकील के हाथों में दे दिए। ब्राजील के मशहूर उपन्यासकार पाउलो कोएल्हो अपनी किताब 'द स्पाई' में लिखते हैं- ‘सुबह के 5.15 बज चुके थे। महिला अपनी कोठरी से बाहर निकली। उसे नीचे ले जाकर एक आसमानी रंग की फौजी गाड़ी में बैठा दिया गया। गाड़ी में सिर्फ चार लोग थे। वो महिला, उसका वकील और दो नन। गाड़ी पेरिस की सुनसान और कोहरे से घिरी सड़कों पर रफ्तार पकड़ने लगी। कुछ देर बाद गाड़ी पेरिस के बाहरी इलाके में बने विन्सेन्स फोर्ट पहुंची। वहां फ्रांस की तीनों सेनाओं के 100 से ज्यादा हथियारबंद सैनिक घेरा बनाकर खड़े थे। मैदान के बीचों-बीच एक लकड़ी का खंभा गड़ा हुआ था। महिला को गाड़ी से उतारा गया। वह पैदल ही चलकर उस खंभे तक पहुंच गई। एक फौजी रस्सी लेकर उसे खंभे से बांधने के लिए आगे बढ़ा। महिला ने मना कर दिया। अफसर जब जिद पर अड़ गया, तब महिला ने कहा- ‘ठीक है, एक हाथ बांध दो।’ उसका बायां हाथ खंभे से बांध दिया गया। तभी एक दूसरा फौजी हाथ में काली पट्टी लेकर उसकी आंखों पर बांधने के लिए आगे बढ़ा। महिला ने उसे डांटते हुए कहा- ‘रुक जाओ, मुझे कोई पट्टी-वट्टी नहीं चाहिए। मैं मौत को अपनी खुली आंखों से देखना चाहती हूं।’ फौजी वहां से हट गया। महिला के ठीक सामने, महज 20 कदम की दूरी पर 12 फ्रांसीसी सैनिकों का फायरिंग स्क्वाड राइफल ताने खड़ा था। कमांडर ने अपनी चमचमाती तलवार हवा में लहराई, यह सैनिकों के मुस्तैद होने का इशारा था। ठीक 5 बजकर 30 मिनट पर एक भारी-भरकम घंटा बजा। उसकी गूंज पूरे मैदान में फैल गई। यह मौत का घंटा था, जिसे फ्रांस में डेथ बेल कहा जाता था। उसी आखिरी पल में, महिला ने सामने खड़े सैनिकों और रोते हुए वकील की तरफ देखा, मुस्कुराई और हवा में 'फ्लाइंग किस' उछाल दिया। तभी कमांडर की आवाज गूंजी- ‘फायर…’ महिला को निशाना बनाकर एक साथ 12 गोलियां दागी गईं। गोलियों की गूंज से मैदान दहल उठा। महिला के शरीर में तीन गोलियां लगीं। वह झटके से जमीन पर गिर गई। एक फौजी तेजी से आगे बढ़ा। उसने पिस्तौल निकाली और महिला के करीब जाकर उसके सिर में गोली मार दी। महिला का सिर फट गया। खून से सने हुए मांस के लोथड़े जमीन पर बिखर गए। मौत के बाद महिला की बॉडी को कोई लेने नहीं आया। उसकी बॉडी पेरिस के मेडिकल कॉलेज को दे दी गई, ताकि डॉक्टरी की पढ़ाई में चीरफाड़ के लिए इस्तेमाल की जा सके उसके चेहरे को एनाटॉमी म्यूजियम में रख दिया गया, लेकिन 90 के दशक में एक रोज वो चेहरा भी किसी ने चुरा लिया। यह महिला एक इरोटिक डांसर थी, जो नाचते-नाचते निर्वस्त्र हो जाती थी। 20वीं सदी की शुरुआत में यूरोप के नेता, अभिनेता, सेना के जनरल और बड़े-बड़े बिजनेसमैन उस पर हजारों डॉलर लुटा देते थे। महिला का एक और परिचय था- वो दुनिया की सबसे ग्लैमरस जासूस थी। पहले विश्व यद्ध में हार के बाद फ्रांस उसके खून का प्यासा हो गया था। ये महिला कौन थी और कैसे जासूस बन गई, जानने के लिए फ्लैशबैक में चलते हैं… नीदरलैंड्स का लेउवार्डेन शहर। 7 अगस्त 1876 को यहां एक लड़की का जन्म हुआ। नाम रखा गया- मार्गेटा जेले। चार भाई-बहनों में सबसे बड़ी। पिता एडम कपड़े और सिलाई से जुड़े सामानों की दुकान चलाते थे। कुछ साल बाद एडम ने तेल के कारोबार में हाथ आजमाया। तकदीर ने साथ दिया। जल्द ही वे शहर के रईसों में गिने जाने लगे। बड़ी होने के नाते मार्गेटा को अपने भाई-बहनों में सबसे ज्यादा प्यार मिला। पिता ने शहर के सबसे महंगे स्कूल में पढ़ने के लिए भेजा। उसके कपड़े रेशम के होते थे, खिलौने बेहद कीमती। उसके शौक बाकी बच्चों के मुकाबले बेहद लग्जरी थे। कुछ साल सबकुछ अच्छा चला। फिर वक्त ने करवट ली और 1885 का साल आ गया। मार्गेटा के पिता को कारोबार में घाटा होने लगा। कमाई का ज्यादातर हिस्सा कर्ज उतारने में चला जाता। 1889 आते-आते हालात ऐसे हो गए कि बैंक ने उन्हें दिवालिया घोषित कर दिया। धोखाधड़ी और कर्ज के कई मुकदमों से लद गए। अब परिवार के सामने खाने-पीने तक की किल्लत होने लगी। बच्चों की पढ़ाई छूट गई। परिवार को शहर छोड़कर एक छोटे और तंग अपार्टमेंट में जाकर रहना पड़ा। तंगहाली के बीच मार्गेटा के माता-पिता में अनबन भी होने लगी। मार-पीट और चीखें आम हो गईं। आखिरकार 1890 में दोनों का तलाक हो गया। मार्गेटा ने मां के साथ रहने का फैसला किया, लेकिन ये साथ लंबा नहीं चला। कुछ ही महीने बाद उसकी मां की मौत हो गई। 14 साल की मार्गेटा अब अकेली और बेसहारा थी। कुछ दिनों तक रिश्तेदारों ने साथ रखा, पर जल्द ही उन्होंने भी मुंह फेर लिया। मार्गेटा के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी- ‘पेट के लिए कुछ पैसों का इंतजाम करना।’ मार्गेटा का रूप-रंग आम डच लड़कियों से जुदा था। वह सांवली थी, हाइट करीब 5 फीट 9 इंच हो चुकी थी। उस दौर में नीदरलैंड की आम लड़कियों की लंबाई मुश्किल से पांच फीट हुआ करती थी। वह स्वभाव से बेहद चुलबुली और खूब बोलने वाली लड़की थी। इस वजह से भी रिश्तेदार मार्गेटा से दूरी बनाकर रखते थे। वक्त का पहिया घूमता रहा और साल 1892 आ गया। मार्गेटा 16 साल की हो चुकी थी। वह लीडेन शहर में रहने लगी थी। उन्हीं दिनों एक ट्रेनिंग स्कूल वैकेंसी निकली। छोटे बच्चों को पढ़ाने के लिए कम उम्र के लड़के-लड़कियों की जरूरत थी। मार्गेटा ने फौरन अप्लाई कर दिया। उसका इंटरव्यू हुआ और वह चुन ली गई। बच्चों को पढ़ाने के बाद उसका ज्यादातर वक्त स्कूल की लाइब्रेरी में किताबें पढ़ने में गुजरता। इस दौरान, वह खुद से 35 साल बड़े स्कूल के हेडमास्टर के करीब आ गई। धीरे-धीरे स्कूल का ये रिश्ता बेहद निजी हो गया। ब्रिटिश जर्नलिस्ट मैरी क्रेग अपनी किताब ‘ए टैंगल्ड वेब: माता हारी’ में लिखती हैं- 'मार्गेटा और हेडमास्टर के बीच शारीरिक संबंध तो था, लेकिन यह पता नहीं चल सका कि वह हेडमास्टर को पसंद करती थी या वो उसकी मजबूरी का फायदा उठा रहा था। ये भी हो सकता है कि दोनों एक-दूसरे की जरूरतों के लिए आकर्षित थे।' जल्द ही स्कूल में दोनों के रिश्ते की चर्चाएं होने लगीं। बवाल बढ़ा तो 1893 में मैनेजमेंट ने मार्गेटा को नौकरी से निकाल दिया, लेकिन उस हेडमास्टर पर कोई एक्शन नहीं लिया गया। अब 17 साल की मार्गेटा फंस चुकी थी। एक तरफ पैसों की तंगी और दूसरी तरफ पूरे शहर में बदनामी। इस डर से कोई भी उससे रिश्ता या सरोकार नहीं रखना चाहता था। 1894 की बात है। एक अखबार में विज्ञापन छपा। डच कोलोनियल आर्मी के कैप्टन रुडोल्फ जॉन मैकलियोड को एक पार्टनर की तलाश थी। उसकी पोस्टिंग इंडोनेशिया में थी और वह उन दिनों छुट्टी बिताने नीदरलैंड्स आया हुआ था। मार्गेटा, विज्ञापन देखकर खुद से 20 साल बड़े कैप्टन रुडोल्फ से मिलने पहुंच गई। पहली ही मुलाकात में उस फौजी ने मार्गेटा को पसंद कर लिया। मार्गेटा मन ही मन यह सोचकर खुश थी कि अब उसकी जिंदगी से पैसों की तंगी मिट जाएगी। वह एक फौजी अफसर की शानो-शौकत वाली पत्नी बनकर दुनिया घूम सकेगी। 11 जुलाई 1895 को दोनों ने शादी कर ली। शादी के बाद कैप्टन रुडोल्फ उसे लेकर इंडोनेशिया चले गए। दोनों को दो बच्चे हुए- एक बेटा और एक बेटी। शुरुआत में सबकुछ ठीक रहा, लेकिन फिर हालात बदल गए। मार्गेटा का पति शराबी, बदमिजाज और हिंसक प्रवृत्ति का आदमी था। वह बात-बात पर उसे मारता-पीटता था। उसके दूसरी महिलाओं के साथ भी संबंध थे। एक रोज मार्गेटा के बेटे की अचानक मौत हो गई। बाद में पता चला कि उसे किसी ने जहर दे दिया था। इसके बाद मार्गेटा और उसके पति के बीच रिश्ते और खराब हो गए। आखिरकार 1902 में दोनों अलग हो गए। पति ने पैसे के दम पर बेटी को भी मार्गेटा से छीनकर अपने पास रख लिया। मार्गेटा डिप्रेशन में चली गई। कई महीने इधर-उधर भटकती रही। इसी दौरान, वह इंडोनेशिया की स्थानीय आदिवासी महिलाओं के संपर्क में आई। वह उनसे मेल-जोल बढ़ाने लगी। इंडोनेशिया की मलय भाषा सीखी। पारंपरिक और धार्मिक नृत्यों का अध्ययन किया। उसने देखा कि कैसे वहां की महिलाएं अपनी देह की भंगिमाओं से देवताओं की कथित आराधना करती हैं। 1903 में मार्गेटा इंडोनेशिया से पेरिस आ गई। तब वहां बड़े-बड़े चित्रकार अपनी पेंटिंग्स के लिए मॉडल्स को नग्न या अर्धनग्न अवस्था में सामने बिठाकर उनका स्केच तैयार करते थे। मार्गेटा भी इसी काम में उतर गई। उसने अपना नाम बदलकर 'लेडी मैकलियोड' रख लिया। एक रोज, चित्रकार ने मार्गेटा के चेहरे पर छाई उदासी को भांप लिया। उसने पूछा, तुम इतनी परेशान और गुमसुम क्यों रहती हो? मार्गेटा की आंखें भर आईं। उसने कहा- ‘मुझे पैसों की जरूरत है। इस पेशे में यह सोचकर आई थी कि कुछ कमाई हो जाएगी, पर यहां भी कुछ हो नहीं पा रहा।' फिर थोड़ा रुककर कहा- ‘मैंने सब कुछ खो दिया है। घर, बच्चा, बेटी... और शायद खुद को भी।’ चित्रकार कुर्सी खींचकर उसके सामने बैठ गया। आहिस्ता से बोला, ‘मेरे पास तुम्हारे लिए एक शानदार ऑफर है। अगर तुम तैयार हो जाओ... तो पैसों की बरसात होने लगेगी।’ मार्गेटा ने भी धीरे से पूछा- ‘कैसा ऑफर?’ चित्रकार ने उसकी आंखों में झांकते हुए कहा, ‘तुम कमाल की दिखती हो। अपने शरीर को कपड़ों के बजाय रंग-बिरंगे पंखों और मोतियों से ढंककर मॉडल बन जाओ... पेरिस में रेगुलर काम भी मिलेगा और मुंहमांगे पैसे भी।’ मार्गेटा झटके से उठ खड़ी हुई। ‘अगर तुम्हारे इस प्रस्ताव का मतलब सरेआम कपड़े उतारना है, तो साफ सुन लो, मैं ऐसा घिनौना काम नहीं कर सकती।’ इतना कहकर मार्गेटा वहां से चली गई। चित्रकार ने चिल्लाते हुए कहा- ‘सोच लो मैकलियोड… तुम जितना चाहो उतना पैसे कमा सकती हो।’ मार्गेटा उस रात सो नहीं पाई। काफी देर रोती रही। वह बार-बार सोच रही थी- ‘अगर मैं इस ऑफर को मान लूं, तो मेरी सारी जरूरतें एक झटके में पूरी हो जाएंगी। मैं बेटी की देखरेख भी खुद के दम पर कर लूंगी, लेकिन इसके लिए क्या मैं अपनी इज्जत दांव पर लगा सकती… हरगिज नहीं।’ यूके की सीनियर जर्नलिस्ट जूली व्हीलराइट एक आर्टिकल में लिखती हैं- ‘कुछ दिनों की कश्मकश के बाद मार्गेटा ने हार मान ली। उसने एक परिचित को अपनी बेबसी जाहिर करते हुए लिखा- ‘मैं जानती हूं कि बदनाम जिंदगी का अंत दुखद और दर्दनाक होता है, लेकिन अब मैं मजबूरी के उस मोड़ से आगे निकल चुकी हूं। यह मत समझना कि मैं दिल से बुरी या चरित्रहीन हूं... मैंने यह अंधेरा रास्ता सिर्फ और सिर्फ गरीबी की वजह से चुना है।’ मार्गेटा ने उस चित्रकार का ऑफर मान लिया। कुछ सालों तक उसने पेरिस में बतौर मॉडल काम किया। फिर वो एक नए पेशे से जुड़ गई। काम था घुड़सवारी करते हुए बोल्ड पोज देना। जिसे 'मोलीयर सर्कस' कहा जाता था। घोड़ों पर सवार होकर मार्गेटा के उस बोल्ड, बेबाक और राजसी अंदाज ने पहली बार पेरिस के रईस तबके का ध्यान अपनी तरफ खींचा। 'माता हारी : ट्रू स्टोरी' किताब के मुताबिक- एक रोज शाम का वक्त था। करतब दिखाने के बाद मार्गेटा अपने धूल से सने कपड़ों में हांफती हुई, चेहरे से पसीना पोंछते हुए लौट रही थी। तभी सर्कस के मालिक मोलीयर की आवाज गूंजी- ‘मार्गेटा, जरा इधर आना।’ थकी-हारी मार्गेटा उसके सामने खड़ी हो गई। मोलीयर ने सिगार का धुआं छोड़ते हुए गंभीर आवाज में कहा- ‘तुम ये जानलेवा करतब दिखाकर अपनी जान जोखिम में डाल रही हो। कब तक मौत से खेलती रहोगी?’ मार्गेटा ने मुस्कुराते हुए कहा- ‘और कोई रास्ता भी तो नहीं है, मोलीयर।’ मोलीयर ने पास रखी एक कुर्सी की तरफ इशारा किया- ‘बैठो यहां।’ मार्गेटा चुपचाप बैठ गई। मोलीयर ने धीमी आवाज में बोला- ‘तुमने इंडोनेशिया में जो डांस सीखा है, उसे इन रईसों के सामने नए अंदाज में पेश करो। इन भेड़ियों को हुस्न की भूख है, सर्कस की कलाबाजियों की नहीं।’ मार्गेटा ने चौंककर मोलीयर की तरफ देखा। मार्गेटा ने खुद को संभाला, कुर्सी से उठी और अपनी शॉल ओढ़ते हुए बोली- अभी तो मैं घर जा रही हूं। फिर कभी सोचती हूं इसपर।’ कुछ हफ्ते बाद… मार्गेटा ने एक नई जिंदगी शुरू करने का फैसला किया। उसने नाम बदलकर ‘माता हारी’ रख लिया। इंडोनेशिया की मलय भाषा में इसका मतलब होता है- 'सुबह की पहली किरण'। तारीख 13 मार्च, 1905, पेरिस का मशहूर मुसी गुइमेट म्यूजियम। हॉल को पुराने भारतीय और जावानीस मंदिर की तरह सजाया गया था। दरअसल, इंडोनेशिया के जावा द्वीप में बने हिंदू और बौद्ध मंदिरों को जावानीस मंदिर कहा जाता है। हॉल के भीतर मोमबत्तियों की मद्धम रोशनी। हवा में लोबान और अगरबत्तियों की भीनी-भीनी खुशबू तैर रही थी। कुर्सियों पर पेरिस के बड़े रसूखदार फौजी अफसर, अमीर व्यापारी और बड़े नेता बैठे थे। रात 8 बजे माता हारी हॉल में पहुंची। शरीर पर कपड़े कम और गहने ज्यादा। संगीत की धुन गूंजी और माता हारी उस पर थिरकती हुई मंच के ठीक बीचों-बीच आ गई। जैसे-जैसे संगीत की थाप तेज होती गई, माता हारी डांस करते हुए अपने रंग-बिरंगे कपड़ों को उतारकर एक तरफ फेंकने लगी। हॉल में बैठे लोगों की सांसें थम गईं। लोग पलकें झपकाना भूल गए। डांस के आखिरी क्लाइमेक्स पर पहुंचकर माता हारी ने सारे कपड़े उतार दिए। शरीर पर बस कुछ गहने बचे थे। अब वो थिरकते-थिरकते मंच पर रखी शिव की एक मूर्ति के पास पहुंची। हाथ जोड़े और अपनी एड़ियों के बल बैठ गई। कुछ देर बाद संगीत की थाप मद्धम होते-होते बंद हो गई। माता हारी खड़ी हुई। आंखें बंद कीं और हाथ जोड़ लिए। तभी हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। ‘माता हारी, माता हारी’ का शोर गूंजने लगा। अगली सुबह पेरिस के तमाम बड़े अखबारों में माता हारी का डांस और तस्वीरें छाई रहीं। जल्द ही वो यूरोप की सबसे महंगी, सबसे लोकप्रिय स्टार बन गई। सेना के जनरल, रसूखदार फौजी और नेता उसकी सोहबत में एक शाम बिताने के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार थे…पूरी कहानी कल, यानी रविवार को पढ़िए दूसरे एपिसोड में.. रेफरेंस : 1. Mata Hari: Courtesan and Spy : By Major Thomas Coulson 2. Mata Hari's Last Dance: By Michelle Moran 3. Mata Hari, the True Story : By Russell Warren Howe 4. The fatal lover : By Julie Wheelwright 5. The Spy: A Novel of Mata Hari : By Paulo Coelho 6. A Tangled Web: Mata Hari: By Mary W. Craig

दैनिक भास्कर 18 Jul 2026 5:07 am

आज का एक्सप्लेनर:दर्जनों विपक्षी सांसद टूटे, क्या फिर भी नंबर्स नहीं जुटा पाई मोदी सरकार; संसद सत्र के एजेंडे से गायब क्यों है ‘परिसीमन बिल’

मोदी सरकार ने 20 जुलाई से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र का एजेंडा बता दिया। कुल 7 विधेयकों की सूची में 2 पुराने और 5 नए विधेयक हैं। इसमें ‘परिसीमन विधेयक’ का जिक्र नहीं है, जिसके लिए जरूरी दो-तिहाई सांसदों का समर्थन जुटाने के लिए सरकार ने एड़ी-चोटी का जोर लगा रखा है। क्या दर्जनों विपक्षी सांसद तोड़ने के बावजूद नंबर्स नहीं जुटा पाई सरकार या संसद सत्र के बीच अचानक चौंका देगी; समझेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: परिसीमन विधेयक है क्या और अप्रैल में पारित क्यों नहीं हो सका था?जवाबः आम बोलचाल में जिसे हम परिसीमन विधेयक कह रहे, वो दो विधेयकों का पैकेज है। जिसमें लोकसभा की अधिकतम सीटें 550 से बढ़ाकर 850 करने और लोकसभा क्षेत्रों का आकार दोबारा तय करने (परिसीमन) के प्रावधान हैं।मोदी सरकार ने 16 से 18 अप्रैल 2026 को संसद का विशेष सत्र बुलाकर ये विधेयक पेश किए। तर्क दिया कि 2029 चुनाव तक महिला आरक्षण कानून लागू करने के लिए इन्हें पारित होना जरूरी है।विपक्षी पार्टियां इसके विरोध में एकजुट हो गईं। उनका तर्क था कि महिला आरक्षण की आड़ में बीजेपी अपना एजेंडा पूरा करना चाहती है। परिसीमन विधेयक से ज्यादा जनसंख्या वाले हिन्दी भाषी राज्यों को फायदा मिलेगा, जहां बीजेपी का गढ़ है। जबकि जनसंख्या वृद्धि रोकने वाले राज्यों को नुकसान होगा।संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत जरूरी होता है। यानी वोटिंग में आधे से ज्यादा सदस्य सदन में मौजूद हों और जितने सदस्य मौजूद हैं, उनमें से कम से कम दो-तिहाई सांसद इसके पक्ष में वोट दें… सवाल-2: क्या इसबार भी सरकार जरूरी नंबर्स नहीं जुटा पाई?जवाबः अप्रैल के मुकाबले दोनों सदनों में सरकार का समर्थन बढ़ा है, लेकिन दो-तिहाई बहुमत से अब भी पीछे है… लोकसभा में NDA के साथ 318 सांसद राज्यसभा में NDA के साथ 152 सांसद सवाल-3: तो क्या मानसून सत्र में परिसीमन विधेयक नहीं आएगा?जवाबः संविधान के आर्टिकल 368 के तहत संविधान संशोधन विधेयक पेश करने के लिए राष्ट्रपति की अनुमति नहीं लेनी होती। इसे सरकार का कोई मंत्री या सांसद निजी तौर पर भी संसद सत्र के दौरान पेश कर सकता है। ऐसा भी कोई नियम नहीं है कि सत्र के एजेंडे में बिल के बारे में बताना जरूरी हो। इतिहास में भी कई संविधान संशोधन बिल अचानक लाए जा चुके हैं। कई संकेत हैं कि सरकार सत्र के बीच किसी दिन परिसीमन बिल ला सकती है… सवाल-4: तो फिर बिल पारित कराने के लिए सरकार के पास और क्या रास्ते हैं?जवाब: फिलहाल सरकार लोकसभा में दो-तिहाई के आंकड़े से 41 सीट और राज्यसभा में 11 सीट दूर है। ये कमी कुछ छोटे क्षेत्रीय दलों से पूरी हो सकती है… 1. लोकसभा में शरद पवार की NCP, DMK और JMM के सांसदों पर दांव 2. राज्यसभा में YSR कांग्रेस और बीजू जनता दल की जरूरत सवाल-5: आखिर परिसीमन बिल पारित होने से क्या हो जाएगा, बीजेपी इतना जोर क्यों लगा रही?जवाबः नए परिसीमन के बाद लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में 50% सीटें बढ़ेंगी। गृहमंत्री अमित शाह ने इसका फॉर्मूला बताते हुए कहा था, ‘मान लीजिए कि 100 सीटें हैं, जिसमें 33% आरक्षण देना है, तो इसमें 50 सीटें बढ़ाएंगे। इस हिसाब से 150 सीट होती हैं। लोकसभा में ये राउंड ऑफ फिगर 850 है।' सरकार का कहना था कि सारे राज्यों में सीटें 'आनुपातिक रूप से' बढ़ेंगी। यानी, अगर 543 सीटों की लोकसभा में तमिलनाडु के पास 7.18% हिस्सेदारी, यानी 39 सीटें हैं, तो 850 सीटों की लोकसभा में भी 7.18% हिस्सेदारी यानी 61 सीटें होंगी। हालांकि परिसीमन विधेयक में सीटें 'आनुपातिक रूप से बढ़ाने’ की गारंटी देने वाला कोई प्रावधान नहीं है। इसके उलट संविधान का अनुच्छेद 81(2)(a) कहता है कि सीटें जनसंख्या के अनुपात में मिलेंगी, न कि सभी राज्यों में बराबर प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होगी। इसमें भी सरकार ने कोई बदलाव नहीं किया। यानी 2011 की जनगणना के आधार पर जनसंख्या के अनुपात से ही परिसीमन हो सकता है। ऐसे में ज्यादा जनसंख्या वाले राज्यों को ज्यादा सीटें और कम जनसंख्या वाले राज्यों को कम सीटें मिलेंगी। इससे यूपी, बिहार, राजस्थान, दिल्ली और मध्य प्रदेश सबसे ज्यादा फायदा में होंगे। ये सभी हिंदी बेल्ट के राज्य हैं, जहां बीजेपी का स्ट्रॉन्ग होल्ड है। इससे बीजेपी के पिछले तीन चुनावों के आंकड़ों के आधार पर उसके लिए अच्छे और बुरे दोनों सिनैरियो में फायदा है… 1. बीजेपी के लिए बेस्ट केस सिनैरियोः अगर 2019 का प्रदर्शन दोहराती है 2. बीजेपी के वर्स्ट केस सिनैरियो: अगर 2024 का प्रदर्शन दोहराती है ------ ये खबर भी पढ़ें… आज का एक्सप्लेनर:मोदी सरकार को क्यों चाहिए 362 सांसद; TMC के 20, शिवसेना UBT के 6 सांसद टूटे; बाकी 44 कहां से जुटाएंगे 14 जून को TMC के 28 में से 20 लोकसभा सांसदों ने गुमनाम सी पार्टी NCPI में विलय कर लिया। आज शिवसेना (उद्धव गुट) के 9 से 6 लोकसभा सांसदों ने भी बगावत कर दी। इससे पहले 24 अप्रैल को आम आदमी पार्टी के 10 में से 7 राज्यसभा सांसदों ने भी बगावत कर दी थी। ये सभी बागी BJP या NDA में शामिल हो रहे हैं। पूरी खबर पढ़ें…

दैनिक भास्कर 17 Jul 2026 6:41 pm

US Election Security: क्या वाकई हैक हो सकता है अमेरिकी चुनाव? ट्रंप के दावों के बीच जानें 10 हजार सेंटर्स और मतपत्रों की सुरक्षा का पूरा सच!

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर साइबर हमलों को लेकर एक बड़ा और चौंकाने वाला दावा किया है। ट्रंप का कहना है कि रूस, चीन, ईरान और उत्तर कोरिया जैसी विदेशी ताकतें और कुछ गैर-सरकारी समूह साइबर हमलों के जरिए अमेरिकी चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने की पूरी क्षमता रखते हैं। उन्होंने आशंका जताई है कि देश की डिजिटल चुनाव प्रणाली में सेंध लगाकर नतीजों के साथ छेड़छाड़ की जा सकती है। ट्रंप के इस बयान के बाद वैश्विक पटल पर अमेरिका के चुनावी सिस्टम की सुरक्षा को लेकर बहस छिड़ गई है। हालांकि, 'एसोसिएटेड प्रेस' (AP) की विस्तृत रिपोर्ट और शीर्ष चुनाव विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि अमेरिका की चुनाव व्यवस्था दुनिया की सबसे जटिल, विकेंद्रीकृत और अभेद्य प्रणालियों में से एक है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि अमेरिकी चुनाव प्रणाली काम कैसे करती है और इसमें सुरक्षा के क्या इंतजाम हैं।क्यों हैक करना नामुमकिन है अमेरिका का चुनाव सिस्टम?एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में चुनाव प्रक्रिया भारत या अन्य देशों की तरह किसी एक केंद्रीय निर्वाचन आयोग द्वारा संचालित नहीं की जाती। पूरे अमेरिका में चुनाव किसी एक संस्था के बजाय 10,000 से ज्यादा स्वतंत्र और अलग-अलग स्थानीय चुनाव क्षेत्रों (लोकल ज्यूरिसडिक्शन) में कराए जाते हैं।अमेरिकी संविधान के तहत राज्यों को अपने तरीके से चुनाव कराने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है। हालांकि अमेरिकी कांग्रेस (संसद) कुछ बुनियादी नियम तय कर सकती है, लेकिन वोटिंग मशीनों के चयन से लेकर गिनती तक की पूरी जिम्मेदारी पूरी तरह से राज्यों और स्थानीय चुनाव अधिकारियों के कंधों पर होती है। यही वजह है कि पूरे देश में कोई एक सेंट्रलाइज्ड (केंद्रीय) डिजिटल सिस्टम नहीं है जिसे एक साथ हैक करके नतीजे बदले जा सकें। हर क्षेत्र का अपना अलग और ऑफलाइन ढांचा होता है।वोटर फ्रॉड रोकने के लिए थ्री-लेयर सिक्योरिटी सिस्टमअमेरिकी चुनाव प्रणाली में गड़बड़ी या धोखाधड़ी (वोटर फ्रॉड) की आशंकाएं न के बराबर होती हैं, और यदि कोई ऐसा प्रयास करता भी है, तो वह तुरंत पकड़ में आ जाता है। अमेरिकी कानून के तहत चुनावी नियमों का उल्लंघन करना एक बेहद गंभीर और गैर-जमानती श्रेणी का अपराध माना जाता है।सुरक्षा के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:कठोर कानूनी कार्रवाई: एक से अधिक बार मतदान करना, किसी अन्य मृत या जीवित व्यक्ति के नाम पर फर्जी वोट डालना, बैलेट पेपर से छेड़छाड़ करना या गलत दस्तावेज देना संघीय अपराध है, जिसके लिए भारी आर्थिक जुर्माना और लंबी जेल की सजा का प्रावधान है।पहचान का कड़ा सत्यापन: मतदान केंद्र पर वोट डालते समय अधिकांश राज्यों में वैध फोटो पहचान पत्र (Photo ID) मांगा जाता है।मेल-इन बैलेट सुरक्षा: डाक (Mail-in Ballot) के जरिए होने वाले मतदान में सुरक्षा को दोगुना करने के लिए मतदाता के हस्ताक्षरों का मिलान (Signature Verification), आधिकारिक गवाहों की गवाही या नोटरी जैसी बेहद जटिल और अतिरिक्त कानूनी प्रक्रियाएं अपनाई जाती हैं।2020 चुनाव चोरी के दावों पर क्या कहते हैं आधिकारिक आंकड़े?डोनाल्ड ट्रंप लगातार यह सार्वजनिक दावा करते रहे हैं कि साल 2020 का राष्ट्रपति चुनाव एक बड़ी धांधली के जरिए उनसे चुराया गया था। इस दावे की जमीनी हकीकत जानने के लिए एसोसिएटेड प्रेस ने साल 2021 में ट्रंप द्वारा विवादित ठहराए गए छह सबसे प्रमुख स्विंग स्टेट्स (राज्यों) में वोटर फ्रॉड के हर एक संभावित और संदिग्ध मामले की विस्तृत समीक्षा की थी।इस गहन पड़ताल में पाया गया कि इन राज्यों में कुल मिलाकर 475 से भी कम गड़बड़ी के मामले सामने आए थे, जो कि चुनाव के अंतिम परिणाम को बदलने के लिहाज से तिनके के बराबर भी नहीं थे। बड़े पैमाने पर चुनावी धांधली के ट्रंप के इन तमाम कानूनी आरोपों को अमेरिका की कई प्रांतीय व संघीय अदालतों, राज्य के चुनाव अधिकारियों और यहां तक कि ट्रंप सरकार के खुद के 'होमलैंड सिक्योरिटी विभाग' ने सिरे से खारिज कर दिया था। उस दौरान ट्रंप द्वारा ही नियुक्त किए गए तत्कालीन अमेरिकी अटॉर्नी जनरल विलियम बार ने भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया था कि जांच में ऐसा कोई भी ठोस सबूत नहीं मिला है जो 2020 के चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सके।ट्रंप के आरोपों पर भड़का चीन, कहा- बेबुनियाद और मनगढ़ंतडोनाल्ड ट्रंप द्वारा राष्ट्र के नाम संबोधन में लगाए गए साइबर घुसपैठ के आरोपों पर चीन ने बेहद कड़ी और आक्रामक प्रतिक्रिया दी है। एपी की रिपोर्ट के अनुसार, चीनी विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता लिन जियान ने बीजिंग में आयोजित एक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान साफ कहा कि चीन ने कभी भी अमेरिका के आंतरिक मामलों या उनके चुनावों में किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं किया है और न ही भविष्य में उसकी ऐसी कोई मंशा है।प्रवक्ता लिन जियान ने ट्रंप के दावों को पूरी तरह से मनगढ़ंत, राजनीति से प्रेरित और बेबुनियाद करार दिया। उन्होंने वाशिंगटन को नसीहत देते हुए अपील की कि अमेरिका अपनी घरेलू राजनीति और चुनावी खींचतान में चीन का नाम घसीटना तुरंत बंद करे और इसके बजाय दोनों महाशक्तियों के द्विपक्षीय रिश्तों को रचनात्मक तरीके से बेहतर बनाने की दिशा में काम करे।

न्यूज़ इंडिया लाइव 17 Jul 2026 3:40 pm

सऊदी अरब पर हमला बना 'रेड लाइन', तो फिर ईरान-अमेरिका की मध्यस्थता का ठेका क्यों ले रहा पाकिस्तान? खुद ही फंसा बवंडर में

मिडल ईस्ट की राजनीति में इन दिनों एक अजीब कूटनीतिक पहेली सुलझती नजर नहीं आ रही है। एक तरफ सऊदी अरब ने स्पष्ट कर दिया है कि उसके साम्राज्य की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं होगा और किसी भी प्रकार का हमला उसके लिए 'रेड लाइन' है, तो वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान का ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता का 'ठेकेदार' बनने का प्रयास गले की हड्डी बनता जा रहा है। इस्लामाबाद के इस कदम ने न केवल उसे अपने पुराने दोस्त सऊदी अरब की नजरों में संदिग्ध बना दिया है, बल्कि उसे एक ऐसे कूटनीतिक भंवर में धकेल दिया है जहां से निकलना अब मुश्किल होता जा रहा है।मध्यस्थता का दिखावा या कूटनीतिक मजबूरी?पाकिस्तान लंबे समय से यह दावा करता आया है कि वह ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम करने के लिए एक 'सेतु' (Bridge) का काम कर सकता है। लेकिन जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान का यह रुख उसकी अपनी आर्थिक बदहाली और सऊदी अरब से मिलने वाली वित्तीय मदद के बीच एक बड़ा विरोधाभास पैदा कर रहा है। सऊदी अरब मिडल ईस्ट में अपनी सुरक्षा को लेकर बहुत सतर्क है और वह ईरान को अपना सबसे बड़ा क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी मानता है। ऐसे में, यदि पाकिस्तान ईरान के करीब जाकर अमेरिका से डील कराने का प्रयास करता है, तो रियाद इसे अपनी पीठ में छुरा घोंपने जैसा महसूस करता है। पाकिस्तान का यह दोहरा रुख अब उसे कूटनीतिक रूप से अलग-थलग कर रहा है।सऊदी अरब की 'रेड लाइन' और पाक की मुश्किलेंरियाद ने साफ कर दिया है कि यमन या समुद्री रास्तों से उसकी सुरक्षा को खतरा पहुँचाना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सऊदी अरब की इस सख्त नीति के बीच पाकिस्तान का ईरान के साथ मिलकर अमेरिका से 'डील' की वकालत करना उसके कूटनीतिक समीकरणों को बिगाड़ रहा है। सऊदी अरब से पाकिस्तान को मिलने वाले निवेश और सस्ते तेल पर अब तलवार लटकी हुई है। यदि इस्लामाबाद अपनी मध्यस्थता की नीति को नहीं बदलता, तो उसे रियाद की नाराजगी का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। पाकिस्तान का यह कूटनीतिक प्रयोग अब उसके अपने ही पाले में 'सेल्फ गोल' साबित हो रहा है।क्यों फंसा है पाकिस्तान?पाकिस्तान की यह स्थिति 'धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का' जैसी हो गई है। एक ओर उसे चीन का दबाव झेलना पड़ रहा है, दूसरी ओर अमेरिका के साथ संबंधों को सुधारने की मजबूरी है, और तीसरी ओर सऊदी अरब को नाराज न कर पाने की विवशता है। मध्यस्थता का 'ठेका' लेने के चक्कर में पाकिस्तान ने यह नहीं सोचा कि ईरान-अमेरिका के बीच दशकों से चली आ रही दुश्मनी इतनी आसानी से हल होने वाली नहीं है। अब इस्लामाबाद न तो ईरान को पूरी तरह संतुष्ट कर पा रहा है, न अमेरिका को और न ही सऊदी अरब का भरोसा जीत पा रहा है। अंततः, इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान की विश्वसनीयता अंतरराष्ट्रीय मंच पर गिरती जा रही है, जो उसके भविष्य के लिए बड़े खतरे का संकेत है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 17 Jul 2026 12:11 pm

अमेरिकी चुनाव में 'विदेशी दखल' का शोर: ट्रंप के दावों से मचा सियासी बवाल, खुफिया एजेंसियों पर ही उठाए सवाल

अमेरिका की राजनीति में एक बार फिर भूचाल आ गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक प्राइम-टाइम संबोधन में चीन पर 2020 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में अब तक की सबसे बड़ी 'डेटा सेंधमारी' (Data Breach) का गंभीर आरोप लगाया है। ट्रंप का दावा है कि चीन ने करीब 22 करोड़ अमेरिकी मतदाताओं का निजी डेटा अवैध रूप से हासिल किया था। इस खुलासे के साथ ही ट्रंप ने अपनी ही खुफिया एजेंसियों के शीर्ष अधिकारियों को 'डीप स्टेट' करार देते हुए उन पर इस जानकारी को सालों तक छिपाने का आरोप लगाया है।ट्रंप का दावा: 'चुनावी सुरक्षा में सबसे बड़ी सेंध'ट्रंप ने व्हाइट हाउस से देश को संबोधित करते हुए दावा किया कि चीन ने 2020 के चुनाव चक्र के दौरान बड़ी योजना के तहत अमेरिकी मतदाताओं के नाम, पते, फोन नंबर और राजनीतिक पसंद जैसी संवेदनशील जानकारी चुराई। राष्ट्रपति का आरोप है कि चीन ने इस डेटा का इस्तेमाल चुनाव को प्रभावित करने और अमेरिकी जनता को गुमराह करने के लिए एक 'डेटा एक्सप्लॉयटेशन यूनिट' बनाई थी। उन्होंने इसे अमेरिकी चुनाव प्रणाली की 'चौंकाने वाली कमजोरियां' (Shocking Vulnerabilities) करार दिया और कहा कि अब वे इससे जुड़े खुफिया दस्तावेजों को सार्वजनिक कर रहे हैं ताकि चुनाव प्रणाली की खामियों को सुधारा जा सके।खुफिया एजेंसियों पर भड़के राष्ट्रपतिट्रंप के बयानों का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा उनकी अपनी खुफिया एजेंसियों के प्रति अविश्वास है। उन्होंने आरोप लगाया कि सीआईए (CIA), एफबीआई (FBI) और अन्य इंटेलिजेंस विभागों के 'रॉग ब्यूरोक्रेट्स' (Rogue Bureaucrats) ने जानबूझकर चीन की इस दखलंदाजी को राष्ट्रपति और अमेरिकी जनता से छिपाए रखा। ट्रंप ने मांग की है कि इस 'कवर-अप' में शामिल अधिकारियों की जांच हो, उन्हें बर्खास्त किया जाए और उन पर आपराधिक मुकदमे चलाए जाएं। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि उन्हें उन संस्थानों पर भरोसा नहीं है जिन्होंने देश की सुरक्षा से जुड़ी इस बड़ी जानकारी को दबाया।क्या ये आरोप राजनीति से प्रेरित हैं?ट्रंप के इन दावों को अमेरिका में आगामी नवंबर में होने वाले मिड-टर्म चुनावों से जोड़कर देखा जा रहा है। आलोचकों और डेमोक्रेटिक नेताओं का आरोप है कि ट्रंप इन 'संदेह पैदा करने वाले' बयानों के जरिए अपनी हार के पुराने दावों को फिर से जिंदा कर रहे हैं और मतदाताओं के मन में चुनाव प्रक्रिया के प्रति अविश्वास पैदा करना चाहते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि 2021 की खुफिया रिपोर्ट में ऐसी कोई ठोस पुष्टि नहीं हुई थी कि किसी विदेशी शक्ति ने चुनाव नतीजों या वोटिंग मशीनों को प्रभावित किया हो। चीन ने भी इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि वह कभी भी अमेरिका के आंतरिक मामलों या चुनावों में दखल नहीं देता।नया चुनावी कानून: 'SAVE America Act' की वकालतअपने संबोधन में ट्रंप ने 'SAVE America Act' को तुरंत पास करने की अपील की। इस प्रस्तावित कानून का उद्देश्य मतदान प्रक्रिया को और अधिक कड़ा बनाना है, जिसमें फोटो आईडी और नागरिकता संबंधी सख्त नियम शामिल हैं। राष्ट्रपति का कहना है कि ये कदम चुनावी अखंडता को बहाल करने के लिए अनिवार्य हैं। हालांकि, जानकारों का मानना है कि यह सब चुनावी लाभ उठाने की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा हो सकता है ताकि आने वाले चुनावों में जनता का एक वर्ग सिस्टम की पारदर्शिता पर सवाल उठाए

न्यूज़ इंडिया लाइव 17 Jul 2026 12:10 pm

हॉर्मुज में अमेरिका का 'समुद्री शिकंजा': ईरान की ओर जा रहे 3 जहाजों को रोका, मरीन कमांडर ने संभाली कमान

रणनीतिक रूप से दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री मार्ग 'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' पर तनाव एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है। फारस की खाड़ी में अमेरिकी नौसेना ने अपनी ताकत का प्रदर्शन करते हुए ईरान की ओर बढ़ रहे तीन मालवाहक जहाजों को बीच रास्ते में ही रोक दिया है। इस चौंकाने वाली कार्रवाई के दौरान अमेरिकी मरीन कमांडो का एक दस्ता सीधे एक जहाज पर उतरा, जिससे इलाके में हड़कंप मच गया। यह कदम ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच एक बड़े सैन्य संदेश के रूप में देखा जा रहा है।क्या है 'ऑपरेशन शिकंजा'?अमेरिकी केंद्रीय कमान (CENTCOM) के सूत्रों के अनुसार, यह कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा बनाए रखने और ईरान द्वारा की जाने वाली संभावित गतिविधियों पर नजर रखने के लिए की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी युद्धपोतों ने ईरान की तरफ जा रहे तीन जहाजों को घेरा और उनकी तलाशी ली। इस दौरान एक जहाज पर अमेरिकी मरीन कमांडो के उतरने की तस्वीरें सामने आई हैं, जिसमें वे पूरी तरह से हथियारों से लैस नजर आ रहे हैं। अमेरिकी नौसेना का दावा है कि ये जहाज संदिग्ध गतिविधियों में शामिल हो सकते थे, जिसके कारण यह कड़ा कदम उठाना पड़ा।स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज क्यों है इतना अहम?स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज दुनिया के तेल व्यापार की लाइफलाइन माना जाता है। वैश्विक तेल आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा इसी संकीर्ण रास्ते से गुजरता है। पिछले कुछ महीनों में ईरान ने इस क्षेत्र में कई विदेशी तेल टैंकरों को जब्त करने या परेशान करने का प्रयास किया है, जिसके जवाब में अमेरिका ने इस इलाके में अपनी तैनाती को कई गुना बढ़ा दिया है। अब अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी सैन्य मौजूदगी के जरिए इस समुद्री गलियारे को किसी भी तरह की दखलअंदाजी से मुक्त रखने के लिए प्रतिबद्ध है।ईरान की प्रतिक्रिया और भविष्य के हालातइस घटना के बाद तेहरान की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन विशेषज्ञ इसे एक बड़े सैन्य टकराव की आहट के तौर पर देख रहे हैं। ईरान पहले ही अमेरिका के इस 'शक्ति प्रदर्शन' को अपने समुद्री क्षेत्र की संप्रभुता का उल्लंघन बता चुका है। उधर, अमेरिका के इस कदम से कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव की आशंका बढ़ गई है। आने वाले दिनों में हॉर्मुज के जलडमरूमध्य में अमेरिका और ईरान के बीच यह 'बिल्ली-चूहे' का खेल अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 17 Jul 2026 12:08 pm

सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान को तगड़ा झटका: अब 'कोर्ट' में भारत की फीस भी भर रहा पाक, जानें क्या है पूरा मामला

सिंधु जल संधि (Indus Water Treaty) को लेकर पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की चालें उसी पर भारी पड़ रही हैं। सालों से भारत को पानी के विवाद में फंसाने की कोशिश कर रहा पाकिस्तान अब खुद उसी जाल में फंस गया है। ताजा जानकारी के अनुसार, स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (Permanent Court of Arbitration) में चल रही कानूनी लड़ाई का खर्च अब पाकिस्तान को खुद ही उठाना पड़ रहा है, जिसमें भारत की ओर से होने वाला कानूनी खर्च भी शामिल है। यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की एक बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जा रही है।पाकिस्तान की 'जालसाजी' का उल्टा असरदरअसल, सिंधु जल संधि के तहत किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। पाकिस्तान की मंशा भारत के प्रोजेक्ट्स में रुकावट पैदा करने की थी, लेकिन भारत ने शुरू से ही स्पष्ट कर दिया था कि वह संधि के नियमों के भीतर रहकर ही काम कर रहा है। पाकिस्तान द्वारा एकतरफा मध्यस्थता की मांग करने के बाद कानूनी प्रक्रिया शुरू हुई, जिसका पूरा वित्तीय बोझ अब पाकिस्तान की ही तिजोरी पर पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय कानूनी जानकारों का कहना है कि यह पाकिस्तान के लिए एक बड़ा सबक है कि बिना ठोस आधार के अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को घेरने की कोशिश करना उसे कितना महंगा पड़ रहा है।भारत का रुख रहा स्पष्ट और अडिगभारत ने हमेशा से यह स्पष्ट किया है कि किशनगंगा और रतले प्रोजेक्ट्स पूरी तरह से सिंधु जल समझौते के प्रावधानों के अनुरूप हैं। भारत ने इन मंचों के साथ जुड़ने में हमेशा सावधानी बरती है क्योंकि भारत का मानना रहा है कि इन विवादों का समाधान आपसी बातचीत या संधि में वर्णित तटस्थ विशेषज्ञ (Neutral Expert) के माध्यम से होना चाहिए। पाकिस्तान ने जब इस प्रक्रिया को दरकिनार कर कोर्ट का रुख किया, तो कानूनी प्रक्रियाओं के तहत खर्चे का भुगतान करने की जिम्मेदारी भी उसी की बन गई।रणनीतिक जीत और भविष्य का रास्तायह घटनाक्रम न केवल भारत की कूटनीतिक और कानूनी मजबूती को दर्शाता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का पक्ष कितना सशक्त है। पाकिस्तान की इस हरकत ने उसे दुनिया के सामने एक ऐसा देश बना दिया है जो केवल भारत के विकास को रोकने के लिए अपनी आर्थिक स्थिति खराब कर रहा है। अब देखने वाली बात यह होगी कि इस कानूनी फजीहत के बाद क्या पाकिस्तान सिंधु जल संधि के प्रति अपने रवैये में कोई बदलाव लाता है या नहीं। फिलहाल, भारत अपनी जल परियोजनाओं को लेकर पूरी तरह आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है और किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद राष्ट्रहित को सर्वोपरि रख रहा है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 17 Jul 2026 12:03 pm

US Visa New Rules 2026: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा फैसला, विदेशी छात्रों के रुकने की सीमा हुई अधिकतम 4 साल

संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) में उच्च शिक्षा प्राप्त करने और करियर बनाने का सपना देखने वाले भारतीय छात्रों के लिए एक बेहद चिंताजनक और बड़ा झटका देने वाला फैसला सामने आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने विदेशी छात्रों, सांस्कृतिक विनिमय आगंतुकों (Exchange Visitors) और विदेशी पत्रकारों के लिए वीजा नियमों को बेहद कड़ा करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है। होमलैंड सिक्योरिटी डिपार्टमेंट (DHS) द्वारा जारी किए गए इन नए नियमों के तहत अब अंतरराष्ट्रीय छात्रों के रुकने की अधिकतम अवधि को सीमित कर दिया गया है। इस नए आदेश का सीधा और तगड़ा असर अमेरिका में पढ़ाई कर रहे तीन लाख से भी अधिक भारतीय छात्र-छात्राओं पर पड़ने जा रहा है, जिससे उनका भविष्य अब अनिश्चितता के भंवर में फंस गया है।F, J और I वीजा की 'असीमित अवधि' समाप्त: अब तय समय सीमा के भीतर ही रहना होगा अमेरिका मेंवर्तमान व्यवस्था के तहत, अमेरिका में F वीजा (इंटरनेशनल स्टूडेंट्स), J वीजा (सांस्कृतिक और शैक्षणिक एक्सचेंज प्रोग्राम विजिटर्स) और I वीजा (विदेशी मीडिया कर्मी) धारक अपने संबंधित स्टडी प्रोग्राम, रिसर्च वर्क या मीडिया जॉब की पूरी अवधि तक कानूनी रूप से अमेरिका में रहने के हकदार होते थे। इसे 'ड्यूरेशन ऑफ स्टेटस' कहा जाता था। लेकिन ट्रंप सरकार के नए नियम ने इस असीमित प्रावधान को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। अब इन सभी वीजा धारकों के लिए एक 'फिक्स्ड पीरियड' यानी तय समय सीमा निर्धारित कर दी गई है। नए नियम के अनुसार, स्टूडेंट और एक्सचेंज वीजा की अधिकतम अवधि चार साल से ज्यादा की नहीं होगी। यह नया नियम फेडरल रजिस्टर में प्रकाशित होने के 60 दिनों के भीतर लागू हो जाएगा, जो कि अमेरिकी कांग्रेस की समीक्षा के अधीन है।कोर्स बदलने और स्कूल ट्रांसफर पर भी लगी सख्त पाबंदी: देश छोड़ने का ग्रेस पीरियड भी हुआ आधाट्रंप प्रशासन का यह नया नियम केवल समय सीमा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह छात्रों की शैक्षणिक स्वतंत्रता को भी काफी हद तक प्रभावित करता है। नए नियमों के मुताबिक, ग्रेजुएट स्तर के छात्र अब अपनी मर्जी से कभी भी अपना एजुकेशनल मकसद या विषय नहीं बदल सकेंगे। इसके साथ ही, बिना विशेष सरकारी अनुमति के एक स्कूल से दूसरे स्कूल या यूनिवर्सिटी में ट्रांसफर लेने पर भी पूरी तरह रोक लगा दी गई है। सबसे बड़ा झटका कोर्स पूरा होने के बाद मिलने वाले 'ग्रेस पीरियड' पर लगा है। पहले अपनी डिग्री या प्रैक्टिकल ट्रेनिंग पूरी करने के बाद छात्रों को अमेरिका में रहने या नौकरी तलाशने के लिए 60 दिनों का समय मिलता था, जिसे अब घटाकर केवल 30 दिन कर दिया गया है।विदेशी पत्रकारों पर भी चला चाबुक: चीनी पत्रकारों के लिए केवल 90 दिनों की होगी सीमानए नियम का दायरा केवल छात्रों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसने विदेशी मीडिया कर्मियों (I-Visa) को भी अपनी जद में ले लिया है। विदेशी पत्रकारों के लिए जारी होने वाला वीजा, जो पहले सालों तक वैध रहता था, अब अधिकतम 240 दिनों तक के लिए ही वैध होगा। विशेष रूप से चीनी मीडिया घरानों और चीनी नागरिकों के मामले में इसे और कड़ा करते हुए मात्र 90 दिनों तक सीमित कर दिया गया है। हालांकि, नियमों में यह प्रावधान रखा गया है कि विशेष परिस्थितियों में वीजा धारक समय सीमा बढ़ाने (Visa Extension) के लिए आवेदन कर सकते हैं, लेकिन इसकी मंजूरी पूरी तरह से कड़े प्रशासनिक मूल्यांकन पर निर्भर करेगी।इमिग्रेशन विशेषज्ञों और पूर्व अधिकारियों ने उठाए सवाल: 'क्या इन्हें समझ नहीं कि जिंदगी कैसे चलती है?'ट्रंप प्रशासन के इस कड़े कदम की अमेरिका के भीतर ही तीखी आलोचना शुरू हो गई है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, होमलैंड सिक्योरिटी डिपार्टमेंट (DHS) के पूर्व अधिकारी डग रैंड ने इस फैसले की निंदा करते हुए कहा, ज्यादातर अमेरिकी इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि अंतरराष्ट्रीय छात्रों का स्वागत करना और अनावश्यक लालफीताशाही (Red Tape) को खत्म करना देश के विकास के लिए कितना जरूरी है। लेकिन यह नया नियम इसके ठीक उलट काम करेगा और अमेरिका की साख को नुकसान पहुंचाएगा। वहीं कैटो इंस्टीट्यूट में इमिग्रेशन स्टडीज के डायरेक्टर डेविड जे. बियर ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, जो छात्र अपने जीवन के कई साल और लाखों डॉलर यहां खर्च कर चुके हैं, उनके पास अब नौकरी ढूंढने या स्पॉन्सरशिप हासिल करने के लिए केवल 30 दिन होंगे, वरना वे अवैध अप्रवासी घोषित हो जाएंगे। क्या नीति निर्माताओं को यह समझ नहीं है कि एक आम इंसान की जिंदगी कैसे काम करती है?

न्यूज़ इंडिया लाइव 17 Jul 2026 11:58 am

US Election Integrity: डोनाल्ड ट्रंप का चीन पर महा-धमाका, 22 करोड़ अमेरिकी वोटर्स का डेटा चुराने का लगाया आरोप

अमेरिका में आगामी नवंबर में होने वाले बेहद महत्वपूर्ण मिडटर्म इलेक्शंस (Midterm Elections) से ठीक पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर चीन के खिलाफ बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नया भूचाल ला दिया है। गुरुवार 16 जुलाई 2026 को व्हाइट हाउस से दिए गए अपने एक बेहद तीखे और सनसनीखेज 25 मिनट के विशेष संबोधन में राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने कुछ ऐसी अत्यंत संवेदनशील और क्लासिफाइड खुफिया फाइलों को सार्वजनिक किया है, जो अमेरिकी चुनावी व्यवस्था में चीन की सीधी और अवैध दखलअंदाजी का पर्दाफाश करती हैं। हालांकि, राष्ट्रपति ट्रंप का यह नया और गंभीर दावा खुद अमेरिका की ही शीर्ष खुफिया एजेंसियों की उन पुरानी रिपोर्टों के बिल्कुल विपरीत है, जिनमें कहा गया था कि 2020 के चुनावों में चीनी हस्तक्षेप के कोई पुख्ता सबूत नहीं मिले हैं।चीनी हैकर्स के निशाने पर अमेरिकी वोटर: 22 करोड़ मतदाताओं के निजी डेटा में सेंधमारी का गंभीर आरोपराष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए बेहद चौंकाने वाला आरोप लगाया कि उनके द्वारा डीक्लासिफाइड किए गए दस्तावेजों से साफ होता है कि चीनी खुफिया एजेंसियों और हैकर्स ने अवैध रूप से लगभग 22 करोड़ अमेरिकी मतदाताओं की गुप्त फाइलें हासिल कर ली थीं। ट्रंप के अनुसार, इस हैक किए गए डेटाबेस में अमेरिकी नागरिकों के नाम, उनके स्थायी पते, फोन नंबर और वोटर रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाली बेहद संवेदनशील जानकारियां शामिल थीं। ट्रंप यहीं नहीं रुके, उन्होंने अमेरिकी खुफिया तंत्र (Intelligence Community) के ही कुछ अंदरूनी अधिकारियों पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि इन लोगों ने चीन की इस खतरनाक साइबर साजिश की गंभीरता को जानबूझकर छिपाया और दबाया था ताकि जनता को गुमराह किया जा सके।बीजिंग का पलटवार और ट्रेड वॉर की वापसी का खतरा: शी जिनपिंग से सुधरते रिश्ते फिर अधर मेंट्रंप के इस बेहद आक्रामक भाषण के तुरंत बाद चीन ने इन आरोपों पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया दर्ज कराई है। वाशिंगटन स्थित चीनी दूतावास के आधिकारिक प्रवक्ता लियू चांग ने एक बयान जारी कर ट्रंप के दावों को सिरे से खारिज करते हुए कहा, चीन ने अमेरिका के आंतरिक और राष्ट्रपति चुनावों में कभी कोई हस्तक्षेप नहीं किया है और न ही भविष्य में ऐसा करने की हमारी कोई मंशा है। कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप के इस कदम से दोनों महाशक्तियों के बीच हाल ही में पटरी पर लौट रहे व्यापारिक संबंध एक बार फिर पूरी तरह से पटरी से उतर सकते हैं। गौरतलब है कि पिछले साल लंबे चले ट्रेड वॉर के बाद संबंधों को सुधारने के उद्देश्य से खुद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बीजिंग जाकर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से बेहद सकारात्मक मुलाकात की थी, जिस पर अब पानी फिरता नजर आ रहा है।डेमोक्रेट्स ने ट्रंप के दावों को नकारा: खुफिया जानकारियों को 'हथियार' बनाने की दी चेतावनीदूसरी ओर, अमेरिकी विपक्षी दल यानी डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं ने ट्रंप के इन दावों को पूरी तरह चुनावी स्टंट और मनगढ़ंत करार दिया है। हाउस परमानेंट सेलेक्ट कमेटी ऑन इंटेलिजेंस के वरिष्ठ डेमोक्रेटिक सांसदों ने कार्यवाहक राष्ट्रीय खुफिया निदेशक बिल पुल्टे सहित देश की शीर्ष सुरक्षा एजेंसियों एफबीआई (FBI), सीआईए (CIA) और एनएसए (NSA) के प्रमुखों को एक बेहद कड़ा पत्र लिखा है। इस पत्र में उन्होंने अधिकारियों को चेतावनी दी है कि राष्ट्रपति ट्रंप को नवंबर के मिडटर्म चुनावों को प्रभावित करने के लिए चुनावी सुरक्षा से जुड़े झूठे दावों और संवेदनशील खुफिया जानकारियों को एक राजनीतिक हथियार (Weaponizing Intelligence) के रूप में इस्तेमाल करने की इजाजत बिल्कुल न दी जाए। सीनेट में मेजॉरिटी लीडर चक शूमर ने भी ट्रंप पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि वे इन भ्रामक दावों की आड़ में आगामी नवंबर के चुनावों में अपनी पार्टी के पक्ष में हेरफेर करने की जमीन तैयार कर रहे हैं।'सेव अमेरिका एक्ट' के जरिए चुनावी नियमों को बदलने की तैयारी: विपक्ष ने खड़े किए सवालजनवरी 2025 में व्हाइट हाउस में दोबारा ऐतिहासिक वापसी करने के बाद से ही राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार देश की चुनावी प्रक्रिया पर संघीय सरकार का केंद्रीय नियंत्रण मजबूत करने की वकालत कर रहे हैं। ट्रंप इन दिनों सीनेट और कांग्रेस के रिपब्लिकन सदस्यों पर बेहद कड़े प्रावधानों वाले 'सेव अमेरिका एक्ट' (Save America Act) को जल्द से जल्द पारित करने का भारी दबाव बना रहे हैं। इस प्रस्तावित कानून के तहत वोट डालने के लिए सरकार द्वारा जारी वैध फोटो आईडी और वोटर रजिस्ट्रेशन के समय केवल अमेरिकी नागरिकता का प्रमाण (Proof of Citizenship) देना अनिवार्य कर दिया जाएगा। साथ ही, सभी राज्यों को अपने वोटरों का पूरा डेटा अनिवार्य रूप से संघीय सरकार के साथ साझा करना होगा। हालांकि, डेमोक्रेट्स और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस कानून का पुरजोर विरोध करते हुए कहा है कि अमेरिका में वोटर फ्रॉड जैसी घटनाएं बेहद दुर्लभ हैं और इस कानून का असली मकसद गरीब और अल्पसंख्यक मतदाताओं के वैध वोटों को दबाना है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 17 Jul 2026 11:56 am

Nepal Political Crisis: गणेश नेपाली के आत्मदाह से दहला नेपाल, सड़कों पर उतरी आक्रोशित 'Gen Z'

नेपाल की राजधानी काठमांडू इस वक्त एक बड़े और अभूतपूर्व जन-आक्रोश की आग में जल रही है। महज चार महीने पहले देश की युवा आबादी यानी 'जेन-जी' (Gen Z) के बंपर और ऐतिहासिक समर्थन से सत्ता के शीर्ष पर पहुंचे नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह (बालेन शाह) अब अपने कार्यकाल के सबसे बड़े राजनीतिक संकट से घिर गए हैं। कर्ज के भारी दबाव और पुलिस व सिस्टम की बेरुखी से तंग आकर 25 वर्षीय दलित युवक गणेश नेपाली द्वारा सरेआम खुद को आग के हवाले (आत्मदाह) करने की दर्दनाक घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। काठमांडू की सड़कों पर उमड़े युवाओं के इस उग्र सैलाब और बढ़ते बवाल को देखते हुए नेपाल सरकार को चल रहे संसद सत्र तक को आनन-फानन में स्थगित करना पड़ा है। विपक्ष अब पीएम बालेन शाह के सिग्नेचर लुक पर तंज कसते हुए उनका 'काला चश्मा' उतारने की मांग कर रहा है।रोजी-रोटी छीनने पर सिस्टम के खिलाफ आत्मदाह: 60% झुलसे गणेश ने अस्पताल में तोड़ा दमदिल दहला देने वाली यह दुखद घटना 10 जुलाई 2026 की है। नेपाल के बेहद पिछड़े और सीमांत इलाके 'मुगु' का रहने वाला गणेश नेपाली काठमांडू में एक राइड-शेयरिंग ऐप के लिए बाइक चलाकर अपने परिवार का पेट पालता था। काठमांडू में पासपोर्ट विभाग के बाहर कथित तौर पर रास्ता अवरुद्ध करने के आरोप में ट्रैफिक पुलिस ने उसकी मोटरसाइकिल के पहियों पर क्लैंप लगा दिया और गाड़ी जब्त कर ली। मोटरसाइकिल ही गणेश की आजीविका का इकलौता सहारा थी, जिसे उसने भारी कर्ज लेकर खरीदा था और उसकी अगली बैंक किस्त की तारीख बेहद नजदीक थी। गाड़ी छुड़ाने को लेकर उसकी वहां मौजूद अधिकारियों से तीखी बहस और धक्का-मुक्की हुई। पुलिस की इस कठोर कार्रवाई से बुरी तरह टूट चुके गणेश ने मानसिक तनाव में आकर अपनी ही बाइक से पेट्रोल निकाला, खुद पर छिड़का और माचिस लगा ली। 60 प्रतिशत से ज्यादा झुलस चुके गणेश को तुरंत काठमांडू के एक शीर्ष अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां एक दिन तक जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ने के बाद उसने दम तोड़ दिया।सपनों का अंत और गरीबी का दंश: विदेश जाने की चाहत में थमा जीवनगणेश और उसका बड़ा भाई मदन नेपाली दोनों दलित समुदाय से आते हैं। मदन के पास सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा की डिग्री होने के बावजूद काठमांडू की बेरुखी के कारण वह मजदूरी करने पर मजबूर है। उनके बुजुर्ग माता-पिता मुगु गांव में सीमांत किसान हैं और मामूली सरकारी पेंशन पर निर्भर हैं। मदन ने बताया कि गणेश ने इस उम्मीद में बाइक लोन पर ली थी कि वह कुछ पैसे जोड़कर अपने भाई के साथ खाड़ी देशों, जापान या दक्षिण कोरिया जाकर काम कर सकेगा और परिवार को गरीबी से बाहर निकालेगा। लेकिन पुलिस द्वारा उसकी आजीविका के साधन को सीज किए जाने के बाद उसे बैंक की किस्त चुकाने और अपनी गर्भवती पत्नी का खर्च उठाने का कोई रास्ता नजर नहीं आया, जिसने उसे आत्मघाती कदम उठाने पर मजबूर कर दिया।बैकफुट पर आई बालेन शाह सरकार: गृह मंत्री ने खुद जाकर सौंपा नागरिकता प्रमाण पत्रगणेश नेपाली की मौत के बाद काठमांडू का माहौल पूरी तरह बेकाबू हो गया, जिसने पहले से चल रहे सरकार विरोधी आंदोलनों में घी का काम किया। जब गृह मंत्री सुधन गुरुंग ने विपक्ष पर इस दुखद मौत पर ओछी राजनीति करने का आरोप लगाया, तो जनता का गुस्सा और भड़क गया। हालात को हाथ से निकलता देख प्रधानमंत्री बालेन शाह की सरकार तुरंत बैकफुट पर आ गई और भारी डैमेज कंट्रोल शुरू किया। सरकार ने मृतक गणेश की 20 वर्षीय गर्भवती पत्नी एकमाया परियार (जो खुद आईटी में डिप्लोमा धारक हैं) के लिए तत्काल सरकारी नौकरी और उनकी 2 साल की मासूम बेटी की पूरी शिक्षा का खर्च उठाने का आधिकारिक ऐलान किया है। एकमाया के पास नेपाल का 'नागरिकता प्रमाण पत्र' नहीं था, जिसे गृह मंत्री गुरुंग ने खुद उनके घर जाकर सौंपा ताकि उन्हें सरकारी वित्तीय राहत मिल सके। इसके साथ ही, इस पूरी घटना की उच्च स्तरीय जांच के लिए डीआईजी (DIG) स्तर के अधिकारी के नेतृत्व में 5 सदस्यीय विशेष टीम गठित की गई है और सरकार गणेश को शहीद का दर्जा देने पर भी विचार कर रही है।सिर्फ एक मौत नहीं, सरकार के इन तीन फैसलों के खिलाफ उबल रहा था बारूदराजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, गणेश की मौत तो महज एक तात्कालिक चिंगारी थी, असल में नेपाल की जनता और 'Gen Z' वोटर्स के भीतर सरकार के कुछ तानाशाही फैसलों के खिलाफ लंबे समय से बारूद इकट्ठा हो रहा था। पीएम बालेन शाह के तीन मुख्य कदमों ने जनता को सबसे ज्यादा नाराज किया है:ट्रेड यूनियनों और छात्र संगठनों को भंग करना: सरकार ने युवाओं और मजदूरों की आवाज उठाने वाले प्रमुख संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया।अध्यादेश राज: लोकतांत्रिक बहस और संसद को पूरी तरह दरकिनार करते हुए सीधे अध्यादेश (Ordinance) पास करने की नीति अपनाई।अतिक्रमण विरोधी अभियान (Demolition Drive): अप्रैल 2026 में काठमांडू में चलाए गए क्रूर बुलडोजर एक्शन के कारण हजारों गरीब और रेहड़ी-पटरी वाले लोग रातों-रात बेघर हो गए।सोमवार को जब प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर के घाट पर गणेश का अंतिम संस्कार किया गया, तो वहां मुगु से आए उसके रोते बिलखते माता-पिता के साथ-साथ इस डिमोलिशन ड्राइव में बेघर हुए सैकड़ों पीड़ित परिवार भी एकजुट हुए। फिलहाल, सरकार प्रदर्शनकारियों को शांत करने के लिए लगातार बातचीत की मेज पर बुला रही है और प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव ने 50,000 से अधिक संविदा कर्मचारियों से हड़ताल खत्म कर काम पर लौटने की भावुक अपील करते हुए नौकरी सुरक्षा का भरोसा दिया है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 17 Jul 2026 11:54 am

ट्रंप प्रशासन की चेतावनी, अमेरिका में चुनावी डेटा पर साइबर हमले का खतरा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने हाल ही में सार्वजनिक किए गए गोपनीय खुफिया और साइबर सुरक्षा आकलनों में चेतावनी दी कि देश के मतदाता पंजीकरण डेटाबेस अब भी विदेशी साइबर हमलों के प्रति बेहद संवेदनशील हैं। अगर यह डेटा चोरी होता है तो उसका दुरुपयोग कई वर्षों तक किया जा सकता है।

देशबन्धु 17 Jul 2026 11:29 am

राम मंदिर चढ़ावा चोरी जांच में बड़ा एक्शन, सिफारिश पर नियुक्त करीब 100 कर्मचारियों की नौकरी पर संकट

पुलिस और विशेष जांच दल (SIT) अब तक कई कर्मचारियों से पूछताछ कर चुके हैं। सूत्रों का कहना है कि कुछ कर्मचारियों के जवाब जांच एजेंसियों को संतोषजनक नहीं लगे हैं। ऐसे मामलों में जांच आगे बढ़ाई जा रही है और यदि किसी कर्मचारी की भूमिका संदिग्ध या नियमों के विरुद्ध पाई जाती है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

देशबन्धु 17 Jul 2026 9:36 am

अमेरिकी फेडरल रिजर्व के सुधार अभियान में तीन भारतीय मूल के विशेषज्ञ शामिल, रघुराम राजन को मिली अहम जिम्मेदारी

पूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन को फेडरल रिजर्व की बैलेंस शीट नीति की समीक्षा करने वाले कार्यबल में शामिल किया गया है। यह समूह केंद्रीय बैंक की परिसंपत्तियों और मौद्रिक नीति के संचालन से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं का मूल्यांकन करेगा। राजन को वैश्विक स्तर पर वित्तीय स्थिरता, केंद्रीय बैंकिंग और मौद्रिक नीति के विशेषज्ञ के रूप में जाना जाता है।

देशबन्धु 17 Jul 2026 8:41 am

ट्रंप प्रशासन ने सख्त किए वीजा नियम

ट्रंप प्रशासन ने एक नया अंतिम नियम जारी किया, जिसके तहत दशकों पुरानी उस व्यवस्था को खत्म कर दिया गया है जिसमें कई विदेशी छात्र और एक्सचेंज विजिटर अमेरिका में बिना किसी तय अंतिम तारीख के रह सकते थे

देशबन्धु 17 Jul 2026 7:50 am

ईरान का पलटवार: अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइलें

ईरान ने गुरुवार तड़के बहरीन, जॉर्डन और कुवैत जैसे खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर कई मिसाइलें और ड्रोन दागे हैं

देशबन्धु 17 Jul 2026 7:20 am

आज लॉन्च होगी भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन:चलाने पर धुआं नहीं, सिर्फ पानी निकलता है; क्या पेट्रोलियम-बिजली छोड़ हाइड्रोजन बनेगा अगला ईंधन

17 जुलाई को हरियाणा के जींद स्टेशन से एक अनोखी ट्रेन चलेगी। इसे चलाने के लिए न डीजल चाहिए, न बिजली। चलने पर न धुआं होगा, न राख; निकलेगा सिर्फ पानी। ये भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन है। जींद से सोनीपत के बीच 89 किलोमीटर के सफर में यह ट्रेन 682 यात्रियों को लेकर दौड़ेगी और दुनिया की सबसे ताकतवर हाइड्रोजन ट्रेन में गिनी जाएगी। भारत का यह प्रयोग खास क्यों है? हाइड्रोजन गैस की कहानी क्या है और कभी एयरशिप को आग का गोला बना चुकी हाइड्रोजन क्या भविष्य का ईंधन बनेगी? सिलसिलेवार तरीके से जानेंगे… इस कहानी की शुरुआत होती है आज से करीब ढाई सौ साल पहले, लंदन की एक लैब से… साल 1776, हेनरी कैवेंडिश नाम के वैज्ञानिक जिंक धातु को तेजाब में डालते हैं। अचानक बर्तन से बुलबुले उठने लगते हैं। ये एक ऐसी गैस के बुलबुले थे, जिसे पहले कभी किसी ने पहचाना नहीं था। जब कैवेंडिश ने इस रंगहीन गैस में चिंगारी लगाई, तो हल्की ‘भम्म’ जैसी आवाज के साथ पानी की बूंदें बन गईं। यहीं से यह राज खुला कि पानी कोई एक चीज नहीं, बल्कि दो अलग-अलग गैसों- हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से मिलकर बना है। सोचिए, जिस पानी को हम रोज पीते हैं, उसमें वही गैस है, जिससे ट्रेन चल रही है। गैस तो मिल गई थी, पर उसका नाम क्या रखा जाए? यह काम किया फ्रांस के एक केमिस्ट ने। उन्होंने ग्रीक भाषा के दो शब्द जोड़े- ‘हाइड्रो’ यानी पानी, और ‘जेनस’ यानी जन्मा। हाइड्रोजन का मतलब ‘पानी से जन्मा’। 1800 ईस्वी में दो अंग्रेज वैज्ञानिकों ने उल्टा कमाल कर दिखाया। उन्होंने पानी में बिजली का करेंट दौड़ाकर उसे हाइड्रोजन और ऑक्सीजन गैस में तोड़ दिया। इस तरीके को नाम मिला ‘इलेक्ट्रोलिसिस’। आज इसी तरीके से दुनियाभर में ‘हाइड्रोजन’ बनाई जा रही है। अब बारी थी एक और बड़े सवाल की- क्या हाइड्रोजन गैस ईंधन के तौर पर इस्तेमाल हो सकती है? 1838 में एक केमिस्ट ने पाया कि हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को साथ मिलाने पर सिर्फ पानी ही नहीं, एनर्जी भी पैदा होती है। इंग्लैंड के वैज्ञानिक और जज विलियम ग्रोव ने इसी सिद्धांत पर एक असली मशीन बना डाली, जिसे उन्होंने ‘गैस बैटरी’ कहा। इसमें हाइड्रोजन की एनर्जी को बैटरी में स्टोर किया जा सकता था। यही दुनिया का पहला फ्यूल सेल था। इसी वजह से ग्रोव को ‘फादर ऑफ द फ्यूल सेल’ कहा जाता है। हाइड्रोजन की कहानी में एक बड़ा हादसा भी दर्ज है। 1937 में हाइड्रोजन गैस से भरा हिंडनबर्ग नाम का एक विशालकाय एयरशिप लैंड करते वक्त अचानक आग का गोला बन गया। दरअसल, हाइड्रोजन बेहद हल्की गैस है। हिंडनबर्ग एयरशिप में हाइड्रोजन का इस्तेमाल हवा के गुब्बारे की तरह एयरशिप को ऊपर उठाने के लिए किया जाता था। किसी वजह से एयरशिप की पूंछ में आग सुलगने लगी। चूंकि हाइड्रोजन बेहद ज्वलनशील होती है, इसलिए सेकेंडों में पूरी एयरशिप जल गई। हादसे के बाद पूरा प्रोजेक्ट बंद कर दिया गया और हाइड्रोजन को ‘खतरनाक’ कहा जाने लगा। असली मोड़ आया 1973 में, जब मिडिल ईस्ट के देशों ने अचानक तेल की सप्लाई रोक दी। दुनिया को एहसास हुआ कि हमेशा तेल पर निर्भर रहना रिस्की है। यहीं से हाइड्रोजन को गंभीरता से एक विकल्प के तौर पर देखा जाने लगा। 1998 में आइसलैंड नाम के छोटे से देश ने ऐलान कर दिया कि वो 2030 तक दुनिया की पहली पूरी तरह हाइड्रोजन-आधारित इकोनॉमी बनेगा। जर्मनी ने 2018 में दुनिया की पहली कॉमर्शियल हाइड्रोजन पैसेंजर ट्रेन उतार दी थी। जापान, चीन और अमेरिका ने भी हाइड्रोजन ट्रेनें लॉन्च की हैं। 17 जुलाई 2026 को लॉन्च होने वाली भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन, जर्मनी की मूल हाइड्रोजन ट्रेन से करीब पांच गुना लंबी है। जो सफर ढाई सौ साल पहले लंदन की एक लैब में एक बुलबुले से शुरू हुआ था, वह आज हरियाणा के जींद स्टेशन पर एक नई मंजिल की तरफ बढ़ चला है। 10वीं क्लास में पढ़ी पीरियोडिक टेबल याद है? वही, जिसमें दुनिया के सारे तत्व करीने से सजे हैं। उस टेबल में हाइड्रोजन का नंबर पहला है। इसके न्यूक्लियस में सिर्फ एक प्रोटॉन पाया जाता है, इसलिए यह सबसे हल्का तत्व है। यह पूरे ब्रह्मांड में सबसे ज्यादा पाया जाने वाला तत्व भी है- सूरज और तारों में भी मौजूद। लेकिन हाइड्रोजन के साथ एक पेच है। यह अपने आप में इतना अस्थिर है कि अकेला कभी टिक ही नहीं पाता। हमेशा किसी साथी की जरूरत पड़ती है। यह साथी या तो कोई और हाइड्रोजन परमाणु होता है, या फिर कोई दूसरा तत्व। इसलिए जब भी हाइड्रोजन गैस का नाम सुनेंगे, असल में उसका मतलब H2 अणु होता है, अकेला हाइड्रोजन परमाणु कभी नहीं। ज्यादातर यह पानी में ऑक्सीजन के साथ जुड़ा मिलता है, यानी H2O। अगर हमें शुद्ध हाइड्रोजन चाहिए, तो पहले ऑक्सीजन के साथ जोड़ी को तोड़ना पड़ता है। जोड़ी तोड़ने का तरीका ही इलेक्ट्रोलिसिस कहलाता है। ये प्रोसेस आप खुद भी लैब में कर सकते हैं… लेकिन इस हाइड्रोजन गैस से एनर्जी कैसे बनाई जाए और ट्रेन-कार कैसे चलाई जाएं? इसका सबसे स्मार्ट तरीका है- फ्यूल सेल का इस्तेमाल। फ्यूल सेल असल में एक तरह की बैटरी है। यह हाइड्रोजन और हवा में मौजूद ऑक्सीजन को आपस में मिलाकर बिजली पैदा करती है। इस पूरी प्रक्रिया के बाइप्रोडक्ट हैं- एनर्जी और पानी की भाप। न धुआं, न कार्बन, न कोई प्रदूषण। यही वजह है कि हाइड्रोजन ट्रेन को ‘जीरो एमिशन’ यानी शून्य प्रदूषण वाली ट्रेन कहा जाता है। लेकिन यहां एक ट्विस्ट है। हाइड्रोजन खुद भले प्रदूषण न फैलाए, लेकिन इसे बनाने के तरीके में प्रदूषण होता है। सबसे साफ-सुथरा तरीका तीसरा है, जहां सूरज या हवा से मिली बिजली का इस्तेमाल करके इलेक्ट्रोलिसिस किया जाए और हाइड्रोजन तैयार हो। भारत की हाइड्रोजन ट्रेन का लक्ष्य भी यही ग्रीन हाइड्रोजन है। साधारण इलेक्ट्रिक ट्रेन को चलने के लिए ऊपर लगे तारों (ओवरहेड वायर) से बिजली खींचनी पड़ती है। हाइड्रोजन ट्रेन को इसकी जरूरत ही नहीं। यह अपनी बिजली खुद बनाती है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, यह ट्रेन जींद-सोनीपत के 89 किलोमीटर के रूट पर रोज दो राउंड ट्रिप करेगी। कुल मिलाकर 356 किलोमीटर। इसमें करीब 300 किलोग्राम हाइड्रोजन खर्च होगी। ट्रेन अपने साथ कुल 440 किलोग्राम हाइड्रोजन लेकर चलती है। अब बात उन बड़ी चुनौतियों की, जो हाइड्रोजन को एक आम फ्यूल की तरह इस्तेमाल करने से रोकती है… हाइड्रोजन ट्रेन की टेक्नोलॉजी दुनिया में बहुत नई है। फ्रांस की कंपनी अल्स्टॉम ने सबसे पहले 2016 में बर्लिन की एक प्रदर्शनी में इसे दिखाया था। 2018 में जर्मनी में दुनिया की पहली हाइड्रोजन पैसेंजर ट्रेन चली। 2024 के आखिर तक आते-आते जर्मनी ने अपनी कई हाइड्रोजन ट्रेनें सर्विस से हटा दीं। इनकी जगह बैटरी ट्रेनों को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया, क्योंकि ये ज्यादा सस्ती और सहूलियत भरी होती हैं। जापान ने 2022 में हाइड्रोजन ट्रेन की टेस्टिंग शुरू की थी, लेकिन उसे अभी भी बड़े पैमाने पर नहीं उतार सका है। चीन और अमेरिका में भी अब तक यह टेक्नोलॉजी सिर्फ छोटी दूरी तक सीमित है। हाइड्रोजन को बनाना और चलाना अब भी बैटरी के मुकाबले महंगा साबित हो रहा है। कुल मिलाकर हाइड्रोजन कोई जादू की छड़ी नहीं, बल्कि एक ऐसा फ्यूल है जिसकी अपनी खूबियां और चुनौतियां भी। खूबी यह कि यह जलने पर सिर्फ पानी छोड़ता है, कोई प्रदूषण नहीं। चुनौती यह कि इसे बनाना, स्टोर करना और ढोना आसान नहीं और अभी ज्यादातर हाइड्रोजन साफ भी नहीं होती। तो क्या भारत बड़े पैमाने पर हाइड्रोजन ट्रेनें शुरू करेगा? अगर जींद-सोनीपत रूट पर यह प्रयोग कामयाब रहा, तो आने वाले सालों में देश के कई हेरिटेज और पहाड़ी रूट (जैसे कालका-शिमला) भी हाइड्रोजन की तरफ बढ़ सकते हैं, जहां बिजली की लाइन खींचना मुश्किल है और डीजल इंजन का धुआं आज भी एक बड़ी चिंता का सबब है। अगर सफल नहीं रहा या बहुत महंगा पड़ा, तो जर्मनी की तरह भारत भी इससे दूरी बना सकता है। ------------------- ये स्टोरी भी पढ़ें… आज का एक्सप्लेनर: भारत को तेल बेचने वाला रूस, अब तेल खरीदने पर क्यों मजबूर; क्या यूक्रेन ने सभी रिफाइनरी तबाह कीं दुनिया भर के देशों को कच्चा तेल बेचने वाला रूस अब दूसरे देशों से पेट्रोल मंगवाने को मजबूर है। भारत से भी पेट्रोल के कई टैंकर भेजे जाने की खबरें हैं। पढ़िए पूरी कहानी…

दैनिक भास्कर 17 Jul 2026 5:59 am

सिर से जुड़ीं दो बहनें अब अलग नहीं होना चाहतीं:सलमान खान ने बहन बनाया, इलाज का वादा किया, अब फोन तक नहीं उठाते

ये हैं सबा और फरहा। उम्र 24 साल। दोनों का जन्म एक दिन, एक समय और एक ही मां की कोख से हुआ, सो ये जुड़वां कहलाती हैं। लेकिन… इनके जिस्म अलग-अलग नहीं, सिर से आपस में जुड़े हैं। वो भी इस तरह कि दोनों एक दूसरे को देख नहीं सकतीं। आईने में भी नहीं, अगर एक का रुख आईने की तरफ होता है तो दूसरी का उसके उलट। सबा और फरहा की कहानी लिखने में ‘लेकिन’ शब्द जल्द खत्म नहीं होते… इनके सिर जुड़े हुए हैं, लेकिन ये दोनों अलग-अलग शख्सियतें हैं।इनके दिमाग अलग-अलग हैं, लेकिन उन तक खून पहुंचाने वाली नस एक ही है।इनके सिर को छोड़कर बाकी जिस्म अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों के पास किडनी सिर्फ एक जोड़ी हैं।दोनों सोचती अलग-अलग हैं, लेकिन ज्यादातर काम एक साथ करने होते हैं। फिर चाहे चलना-फिरना हो या सोना-जागना। दोनों के नर्वस सिस्टम अलग-अलग हैं, लेकिन कभी सबा के शरीर को फरहा कंट्रोल करती है तो कभी फरहा के शरीर को सबा। ये दो जिस्म एक जान हैं या दो जान एक जिस्म या फिर दो जिस्म दो जान, कहना मुश्किल है। खैर… मैं नीरज झा दुर्लभ बीमारियों की सीरीज ‘ऐ जिंदगी’ में इस बार इन्हीं दो बहनों की कहानी लाया हूं… दोपहर के करीब 1 बज रहे हैं। पटना के समनपुरा इलाके की मदरसा रोड। यहां एक चार मंजिला मकान है। दस्तक देने पर एक बुजुर्ग महिला ने दरवाजा खोला। बिना कुछ कहे वो मुझे पहली मंजिल पर बने एक कमरे की ओर ले गईं। पूछने पर उन्होंने अपना नाम- रबिया खातून बताया। मुझे सोफे पर बैठने का इशारा करते हुए बोली- यहीं बैठिए, मैं बेटियों को बुलाती हूं। उन्होंने सीढ़ियों पर खड़े होकर आवाज लगाई- ‘सबा... फरहा…’ करीब 5 मिनट के बाद, दो लड़कियां सीढ़ियों की रैलिंग के सहारे लड़खड़ाते, डगमगाते कदमों से आईं। छोटे-छोटे बाल। आंखों के नीचे काले घेरे। पैर की उंगलियां भी तिरछी। कदम बढ़ाते या उठते-बैठते, हर वक्त दोनों इस बात का ध्यान रख रही हैं कि एक-दूसरे का सिर न खिंचे। एक का सिर जरा सा ज्यादा हिलने पर दूसरी कराह उठती है। जैसे-तैसे दोनों सामने वाले सोफे पर आकर बैठीं। थोड़ी देर बाद, एक ने ऊपर की तरफ देखकर कहा- मैं सबा हूं और ये फरहा। सबा कहती हैं- जब आप आए, तब मैं खाना खा रही थी। फरहा को न चाहते हुए भी मेरे साथ बैठना पड़ा... क्या करे, मुझसे चिपकी हुई जो है। 24 सालों में हम दोनों में से कोई भी करवट लेकर सो नहीं सका है। मैं बीमार पडूं या फरहा... अस्पताल दोनों को जाना पड़ता है। अब तो जिंदगी से कोई शिकायत नहीं। अलग हुए तो शायद जिंदा न बचें। जब तक सांसें चल रही हैं, ऐसे ही हम साथ रहेंगी। तभी फरहा कहती हैं- जब छोटे थे, तो आस थी कि डॉक्टर ऑपरेशन करके हमको अलग-अलग कर देंगे। हम एक-दूसरे के गले लग सकेंगे। आमने-सामने बैठकर बातें करेंगे, लेकिन ये सब सपना ही रहा। अब तो हम ऐसे ही रहना चाहते हैं। मैं डॉक्टर बनना चाहती थी और सबा टीचर। जब हम 7-8 साल की हुईं, तो अम्मी-अब्बू स्कूल लेकर गए। टीचर कहने लगीं- ऐसे बच्चों को हम कैसे पढ़ाएंगे। इन्हें कौन संभालेगा। बच्चे इन्हें देखकर डर जाएंगे। बस, उनके शब्दों ने हमारे लिए स्कूल के दरवाजे हमेशा के लिए बंद कर दिए। फरहा कहती हैं- उम्र के साथ हमारा थायराइड बढ़ गया और गठिया भी हो गया। पूरे जिस्म में हर वक्त दर्द रहता है। हम दोनों दिन-रात कराहती रहती हैं। जब भी आसपास के लोगों को हंसते-खेलते देखती हूं, तो खुदा से मन ही मन पूछती हूं- हम बहनों को किस बात की सजा दी। कुछ पल खामोश रहने के बाद फरहा कहती हैं- दर्द कितना भी हो, हम एक-दूसरे से अलग रहने के बारे में सोच नहीं सकतीं। मन करता है कि अम्मी-अब्बू के साथ हज पर जाएं, खुली हवा में सांस लें, दुनिया देखें और बाकी लड़कियों की तरह खुलकर अपनी जिंदगी जीएं, लेकिन मजबूरी है। इस चारदीवारी के बाहर कदम रखने से पहले हमें कई बार सोचना पड़ता है। इसी बीच, सबा कहती हैं- मेरी तो अब एक ही ख्वाहिश है- राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और मुकेश अंकल से मिलना है। जब मिलूंगी, तो मन की बात कहूंगी। सबा यहां उद्योगपति मुकेश अंबानी को मुकेश अंकल कहती है। मैंने पूछा- उनसे क्या कहना चाहती हो? वो राज की बात है। आपको नहीं बता सकती। बस कोई हमें उनसे मिलवा दे। इसी बीच, एक शख्स कमरे में आता है। सबा बताती हैं- ये हमारे बड़े भाई मोहम्मद तमन्ना हैं। यही हमारी देखरेख करते हैं। फिर कहती हैं- हमारे लिए सजने-संवरने का कोई मतलब नहीं है। हम खुद कोई काम नहीं कर पातीं। ब्रश कराने और खाना खिलाने से लेकर नहाने और वॉशरुम ले जाने तक, सब कुछ घरवाले करते हैं। इसी बीच, भाई तमन्ना बोला- ये दोनों ज्यादा बात नहीं कर पातीं। ज्यादा देर तक बैठ भी नहीं सकतीं, दर्द होता है। तमन्ना के इतना कहते ही सबा और फरहा उठती हैं और लड़खड़ाते हुए उसी सीढ़ी के सहारे नीचे चली जाती हैं। तमन्ना बताते हैं- हम 8 भाई-बहन हैं। ये दोनों चौथे और पांचवें नंबर की है। मैं इनसे 13 साल बड़ा हूं। इनकी हर तकलीफ का गवाह हूं। अम्मी-अब्बू पढ़े-लिखे नहीं हैं, इसलिए मदद मांगने में हमेशा झिझकते हैं। नतीजा- पिछले 24 सालों से दोनों घर में कैद हैं। जब ये छोटी थीं, तो हम इन्हें पैदल या ऑटो से कभी-कभार मार्केट ले जाते थे, लेकिन ये जहां भी जातीं, लोग तमाशा बना देते। उल्टे-सीधे सवाल पूछते। तरह-तरह की बातें करते, इसीलिए हमने इन्हें बाहर ले जाना छोड़ दिया। 2002 की बात है। अम्मी पेट से थीं। तब हमारे यहां अल्ट्रासाउंड या एडवांस टेस्ट नहीं होते थे। जब घर पर डिलीवरी की कोशिश नाकाम हो गई। अम्मी की हालत बिगड़ने लगी, तो अब्बू आनन-फानन में उन्हें पटना के त्रिपोलिया हॉस्पिटल लेकर भागे। वहां डॉक्टरों ने बताया- पेट में जुड़वां बच्चे हैं, इसलिए नॉर्मल डिलीवरी मुमकिन नहीं। तुरंत बड़ा ऑपरेशन करना पड़ेगा। जैसे ही इन दोनों का जन्म हुआ, अस्पताल में सन्नाटा छा गया। दोनों के हाथ-पैर और जिस्म तो अलग-अलग थे, लेकिन सिर आपस में जुड़े थे। डॉक्टर से पूछा, क्या इनके सिर अलग हो सकते हैं? उन्होंने कहा- जब दोनों बड़ी होंगी, तो सर्जरी से अलग हो जाएंगे। अम्मी-अब्बू इन्हें लेकर गांव लौट आए। पूरे इलाके में बातें होने लगीं मोहम्मद शकील के घर सिर जुड़ी दो लड़कियां पैदा हुई हैं। तमन्ना कहते हैं कि- बहनों के घर आते ही सर्कस, तमाशे जैसी भीड़ हमारे घर के बाहर लगने लगी। लोग-रिश्तेदार सब इन्हें देखने के लिए आने लगे। कई लोग तो अम्मी-अब्बू को ये सलाह भी दे जाते थे कि ऐसी बेटियों को क्यों पाल रहे हो, कहीं छोड़ आओ। तब मेरे अब्बू ने हिम्मत दिखाई, कहा- जैसी भी हैं, मेरी बेटियां हैं। जब तक जिंदा हैं, देखभाल करेंगे। फिर वे सभी को लेकर पटना आ गए। यहां चाय का ठेला लगाकर गुजारा करने लगे। दरअसल, हम लोगों को लग रहा था कि जब ये बड़ी होंगी, तो सर्जरी करा देंगे। इनके शरीर अलग हो जाएंगे। फिर जैसे बाकी बहनें हैं, वैसे ये दोनों भी हो जाएंगी। इतने पैसे ही नहीं थे कि बड़े डॉक्टर से सलाह ले पाते। इनके जन्म के वक्त डॉक्टर ने जो बता दिया, वही अब्बू ने सच मान लिया। 2005 में उत्तरप्रदेश के किसी शहर से एक शख्स घर आया। उसने बताया कि अबूधाबी के प्रिंस शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान ने सबा-फरहा के बारे में मीडिया में देखा-सुना है। वो हमारी मदद करना चाहते हैं। उसने प्रिंस से हमारी बात कराई। प्रिंस ने वादा किया था कि वह सबा-फरहा के ऑपरेशन का पूरा खर्च उठाएंगे। उनकी पहल पर अमेरिका के मशहूर न्यूरोसर्जन डॉ. बेंजामिन कार्सन भारत आए। उन्होंने दिल्ली के अपोलो अस्पताल में सबा-फरहा की एंजियोग्राफी और कई जटिल जांचें कीं। तब डॉ. कार्सन ने बताया था कि दोनों को अलग करना संभव है, लेकिन ऑपरेशन जोखिम भरा है। जान भी जा सकती है। इसी डर से अम्मी-अब्बू ने सर्जरी कराने से इनकार कर दिया। इसके बाद से प्रिंस की ओर से बातचीत भी बंद हो गई। मो. तमन्ना बताते हैं- साल 2009 में, मीडिया के जरिए अभिनेता सलमान खान को पता चला कि सबा-फरहा उनकी फैन हैं। राखी बांधना चाहती हैं, तो उन्होंने खुद पूरे परिवार के लिए फ्लाइट की टिकटें भेजीं। मुंबई में अपने घर बुलाया और सबा-फरहा से राखी बंधवाई। खूब बातें कीं। सलमान ने वादा किया था दोनों को गोद लेंगे। मदद करेंगे। इलाज कराएंगे। हालांकि, बाद में कोई पूछने नहीं आया। जो शख्स उनसे बात करवाता था, अब वो फोन भी नहीं उठाता। इसके बाद, 2012 में इनके इलाज का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। कोर्ट के निर्देश पर दिल्ली एम्स के डॉक्टरों की टीम बनी। टीम पटना आई। डॉक्टरों ने दोनों की MRI, एंजियोग्राफी समेत तमाम जांचें करवाई। रिपोर्ट देखने के बात डॉक्टरों ने कहा-सबा-फरहा का सिर्फ सिर ही नहीं, बल्कि सिर से गुजरने वाली खून की नली और नसें भी एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। ऐसे में अगर इन्हें सर्जरी के जरिए अलग करने की कोशिश की गई, तो दोनों या फिर किसी एक की जान जाना तय है। सबा के शरीर में किडनी नहीं है। अलग करने के बाद सबा को तुरंत किडनी की जरूरत होगी, जो इस खतरे को कई गुना और बढ़ा देगी। यह सुनते ही अम्मी-अब्बू ने सर्जरी से इनकार कर दिया। इसके बाद, 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को आदेश दिया कि दोनों के इलाज और दवाइयों का पूरा खर्च उठाएं। परिवार की आर्थिक सहायता भी करें। पटना के सिविल सर्जन को आदेश दिया कि हर तीन महीने में दोनों की जांच करें। रिपोर्ट दिल्ली एम्स भेजें, लेकिन चार-पांच साल से कोई पूछने तक नहीं आया। दोनों के लिवर में सूजन है। जोड़ों में दर्द रहता है। आपने तो देख लिया होगा कि दोनों कितनी कमजोर हो गई हैं। जब मैं इन्हें देखता हूं, तो दुख होता है। दूसरी ओर, समाज के ताने रोज हमारी रूह छीलते हैं। कहते हैं- बेटियों के इलाज के नाम पर हमें सलमान खान और अबू धाबी के प्रिंस से करोड़ों रुपये मिले हैं। मीडिया वालों से भी इंटरव्यू और वीडियो बनाने के बदले पैसे वसूलते हो। तुम्हें क्या फिक्र, तुम्हें तो बेटियां कमा कर दे रही हैं। मैं किस-किस का मुंह बंद करूं, किस-किस को सफाई दूं। लोग बस तमाशा देखते हैं। उंगलियां उठाते हैं, लेकिन हमारा दर्द, हम ही जानते हैं। बाकी बहनों की शादी हुई, तो अम्मी कहने लगीं- काश ! सबा-फरहा भी अच्छी होती, तो इनकी भी शादी होती, लेकिन क्या करें। मैं फूड स्टॉल लगाकर बमुश्किल 500-600 रुपए कमाता हूं। जैसे-तैसे इनकी देखभाल करता हूं। इनका आगे क्या होगा, अल्लाह ही जाने। ये कहकर तमन्ना एक गहरी सांस लेते हैं। इसके बाद, मैं सबा-फरहा की अम्मी रबिया खातून से बेटियों के बारे में कुछ पूछने की कोशिश करता हूं। तमन्ना फौरन इनकार कर देते हैं। तस्वीर भी नहीं खींचने देते। कहते हैं- इतनी बातचीत बहुत है। अब आप जाइए। मुझे दुकान के लिए निकलना है। अब एक सेकंड भी बात नहीं कर सकता। सबा-फरहा की जिंदगी को करीब से देखने के बाद बतौर रिपोर्टर मेरे मन में कई सवाल उठ रहे हैं। इनका जवाब जानने के लिए मैं पटना के इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (IGIMS) पहुंचा। जहां मेरी मुलाकात न्यूरो सर्जरी विभाग के प्रमुख डॉ. समरेंद्र कुमार से हुई। सबा-फरहा की जांच के लिए AIIMS दिल्ली से जो टीम आई थी, डॉ. समरेंद्र उस टीम का हिस्सा थे। वो बताते हैं- सबा-फरहा को कोई बीमारी नहीं है, यह एक जैविक चूक है। इसे क्रेनियोपैगस कहते हैं। गर्भधारण के पहले दिन, महिला का अंडाणु और पुरुष का शुक्राणु मिलकर एक जायगोट (एकल कोशिका) बनाते हैं। सामान्यतः इससे एक ही बच्चा विकसित होता है। जब यह एक जायगोट गर्भ में विकसित होना शुरू होता है, तो एक समान जुड़वां बच्चे बनने के लिए इस जायगोट को दो अलग-अलग हिस्सों में बंटना पड़ता है। शुरुआती दो हफ्तों के भीतर, कोशिकाएं बंटकर दो अलग-अलग बच्चों का रूप ले रही होती हैं। लेकिन किसी जैविक चूक के कारण, बंटवारे की यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाती। यह प्रक्रिया जहां रुकती है, शरीर का वह हिस्सा आपस में जुड़ा रह जाता है। सबा और फराह के मामले में यह रुकावट सिर के हिस्से पर हुई। सबा-फरहा का जुड़ाव सिर्फ ऊपरी चमड़ी या हड्डी तक सीमित नहीं है। अगर ऐसा होता, तो सर्जरी आसान होती। उनके दिमाग में ब्लड सप्लाई करने वाली मुख्य नस भी आपस में गुथी हुई है। यही कारण है कि ऑपरेशन करने पर किसी एक या दोनों की जान जाने का खतरा है। दोनों बहनों का नर्वस सिस्टम एक ही जगह से जुड़ा होने के कारण सबा के दिमाग से निकला सिग्नल कभी-कभी फरहा के अंगों तक पहुंच जाता है और फरहा का सिग्नल सबा तक। इससे दोनों के दिमागी सिग्नलों में टकराव हो जाता है। ऐसे समझें- जब फरहा सोती है, तो सबा जाग सकती है क्योंकि सोने और जागने को नियंत्रित करने वाला दिमाग का केंद्र दोनों का अपना-अपना है। अगर सबा कुछ खाती है, तो उसका स्वाद सिर्फ सबा को ही आता है, फरहा को नहीं, क्योंकि दोनों की स्वाद ग्रंथियां और दिमागी सिग्नल अलग हैं। लेकिन जब सबा अपने पैर को आगे बढ़ाने का फैसला करती है, तो उसके दिमाग से निकला सिग्नल उस साझा नस से होकर गुजरता है जो फरहा से भी जुड़ी है। नतीजा-वह सिग्नल आधा सबा के पैर में जाता है और आधा फरहा के। इससे कई बार भ्रम की स्थिति बन जाती है। ऐसे बच्चों की सर्जरी जन्म के कुछ साल बाद ही हो जानी चाहिए, लेकिन सबा-फरहा के मामले में यह कभी मुमकिन नहीं था। उम्र बढ़ने के साथ इनका शरीर कमजोर होता जाएगा। ऐसे बच्चे अधिकतम 30 से 40 वर्ष ही जी पाते हैं। डॉ. समरेंद्र से मिलने के बाद मैं IGIMS के पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग के प्रमुख डॉ. विनित ठाकुर से मिला। उन्हें सबा और फरहा की तस्वीर दिखाई। वे कहते हैं- ऐसे मरीजों का दिमाग दो हिस्सों में विकसित होने के बावजूद आपस में इस कदर घुला-मिला है कि इसे सर्जरी से अलग करना असंभव है। यदि दोनों शरीर लिवर साझा कर रहे होते, तो उसे काटना मुमकिन था, क्योंकि लिवर दोबारा बढ़ जाता है। लेकिन दिमाग का जो हिस्सा एक बार कट गया, वह कभी दोबारा नहीं बढ़ता। सिर की मुख्य नसों के साझा होने के कारण यह सर्जरी जानलेवा है। सामान्य जुड़वां बच्चे 3 साल की उम्र तक अपनी अलग पसंद-नापसंद बना लेते हैं। लेकिन सबा-फरहा के मामले में ऐसा नहीं हो सका। वे एक जैसा ही सोच पाती हैं। चूंकि दोनों के शरीर की 'सप्लाई चेन' एक है, इसलिए एक की बीमारी दोनों को प्रभावित करती है। उनकी सबसे बड़ी पीड़ा उनका रोज का तालमेल है। जहां एक बहन सोना चाहती है तो दूसरी जागना, एक बैठना चाहती है तो दूसरी चलना। एक की शारीरिक जरूरत, दूसरी की मजबूरी है। ------------------------------------- ऐ जिंदगी सीरीज की यह खबर भी पढ़ें… 1- चेहरे पर मांस के लोथड़े देख लोग कहते हैं भूत:शक्ल देखकर 5 लोग गड्ढे में जा गिरे, मां बोली-मरेगा तभी बला टलेगी ऊपर आपने जो तस्वीर देखी, उनका नाम है मिथुन चौहान। उम्र 29 साल। जो भी इन्हें पहली बार देखता है, डर जाता है। भूत कहता है या जानवर। दुर्लभ बीमारियों की सीरीज ‘ऐ जिंदगी’ के लिए इस बार इन्हीं की तलाश है। मैं नीरज झा इसी तलाश में पहुंचा पटना से करीब 150 किलोमीटर दूर नवादा जिले के नारदीगंज ब्लॉक। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें… 2- बेटे की सभी हड्डियां टेढ़ी, 4 करोड़ में होगा इलाज:बिस्तर से उठ नहीं पाता, 3 डॉक्टर बोले- आपसी रिश्तों में शादी का असर 8 साल का जावेद स्कूल के मैदान में क्रिकेट खेलते-खेलते अचानक गिर पड़ा। दोस्तों ने उसे उठाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं उठा। जमीन पर पड़ा कराहने लगा। टीचर भागते हुए आए, उन्होंने भी उठाने की कोशिश की। वो बार-बार कहता रहा- मेरे घुटने और कोहनियों में बहुत दर्द है। पैर मुड़ ही नहीं रहे। मैं उठ नहीं पाऊंगा। अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पाऊंगा। प्लीज, अम्मी-अब्बू को फोन करके बुला दीजिए। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें

दैनिक भास्कर 17 Jul 2026 5:18 am

कतर के पूर्व अमीर शेख हमद के निधन पर भारत ने जताया शोक, राजदूत विपुल ने दी श्रद्धांजलि

कतर में भारत के राजदूत विपुल ने कतर के पूर्व अमीर शेख हमद बिन खलीफा अल थानी के निधन पर आयोजित सामुदायिक शोक सभा में हिस्सा लिया। भारतीय दूतावास, दोहा ने गुरुवार को इसकी जानकारी दी।

देशबन्धु 17 Jul 2026 5:00 am

भारत-थाईलैंड के बीच बढ़ेगा व्यापार और संपर्क, राजदूत पुनीत अग्रवाल ने कई मुद्दों पर की चर्चा

भारत के थाईलैंड में राजदूत पुनीत अग्रवाल ने गुरुवार को थाईलैंड के विदेश मंत्रालय में दक्षिण एशिया, मध्य पूर्व और अफ्रीका मामलों की महानिदेशक (डीजी) उरासा मोंगकोलनाविन से मुलाकात की। दोनों ने भारत और थाईलैंड के स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप को और मजबूत बनाने के लिए कई अहम मुद्दों पर बातचीत की।

देशबन्धु 17 Jul 2026 4:50 am

पाकिस्तान: बलूचिस्तान में सुरक्षा बलों के काफिले पर बड़ा आतंकी हमला, तीन सुरक्षाकर्मियों की मौत

पाकिस्तान के दक्षिण-पश्चिमी प्रांत बलूचिस्तान में आतंकियों ने सुरक्षा बलों के एक काफिले पर समन्वित हमला कर दिया। सुरक्षा सूत्रों के मुताबिक इस हमले में तीन सुरक्षाकर्मियों की मौत हो गई, जबकि 29 अन्य घायल हो गए।

देशबन्धु 17 Jul 2026 4:40 am

एआई प्रौद्योगिकी के लाभों को अधिक देशों तक पहुंचाने की उम्मीद : संयुक्त राष्ट्र

संयुक्त राष्ट्र महासचिव के प्रवक्ता स्टीफन दुजारिक ने 15 जुलाई को न्यूयॉर्क में आयोजित एक नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि संयुक्त राष्ट्र को उम्मीद है कि 2026 के विश्व कृत्रिम बुद्धिमत्ता सम्मेलन (डब्ल्यूएआईसी) के माध्यम से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के जिम्मेदार उपयोग को बढ़ावा मिलेगा और सभी लोगों को लाभ होगा।

देशबन्धु 17 Jul 2026 4:10 am

बाकू में भारत की विश्व धरोहर की झलक, भारतीय दूतावास लगाएगा स्थायी प्रदर्शनी

अजरबैजान की राजधानी बाकू में भारतीय दूतावास जल्द ही भारत के यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों पर एक स्थायी प्रदर्शनी शुरू करने जा रहा है।

देशबन्धु 17 Jul 2026 3:40 am

कीव समेत कई शहरों पर रूस ने दागीं 13 मिसाइलें और 151 ड्रोन, दो की मौत और कई घायल : जेलेंस्की

कीव में बुधवार रात रूसी म‍िसाइल हमले में दो लोगों की मौत हो गई। यूक्रेन के राष्‍ट्रपत‍ि व्‍लोद‍िमिर जेलेंस्‍की ने दावा क‍िया क‍ि रूस ने 13 मिसाइलें दागीं, जिनमें आठ बैलिस्टिक मिसाइलें थीं, और 151 ड्रोन भी इस्तेमाल किए। जेलेंस्‍की ने कहा क‍ि मॉस्को बैलिस्टिक मिसाइलों के जरिए डर फैलाने की कोशिश कर रहा है।

देशबन्धु 16 Jul 2026 6:39 pm

Global Popularity Shock: डोनाल्ड ट्रंप से ज्यादा लोकप्रिय हुए शी जिनपिंग! महासर्वेक्षण में चीन ने अमेरिका को पछाड़ा

भू-राजनीति और वैश्विक महाशक्तियों के बीच वर्चस्व की जंग में एक ऐसा चौंकाने वाला मोड़ आया है जिसने पूरी दुनिया के नीति-नियंताओं को हैरान कर दिया है। प्रतिष्ठित वैश्विक सर्वे एजेंसी 'प्यू रिसर्च सेंटर' (Pew Research Center) द्वारा साल 2026 की शुरुआत में किए गए एक व्यापक वैश्विक सर्वेक्षण के परिणाम सामने आए हैं। इस वैश्विक सर्वे के रणनीतिक आंकड़े यह साफ गवाही दे रहे हैं कि दुनिया भर के कई प्रमुख देशों में अब अमेरिका के मुकाबले चीन की छवि कहीं अधिक सकारात्मक और मजबूत होकर उभरी है। अंतरराष्ट्रीय मामलों में सबसे बड़ा उलटफेर तब देखा गया जब वैश्विक नेतृत्व और निर्णयों पर भरोसे की बात आई, जहां दुनिया के अधिकांश देशों के नागरिकों ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तुलना में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग पर अधिक विश्वास जताया।36 देशों में 42 हजार से ज्यादा लोगों से बातचीत: 25 देशों में चीन की छवि अमेरिका से बेहतरप्यू रिसर्च सेंटर ने इस व्यापक रिसर्च के लिए 8 फरवरी से 13 मई 2026 के बीच दुनिया के 36 महत्वपूर्ण देशों में रहने वाले 42,151 लोगों से सीधे बातचीत की। साल 2002 से लगातार ऐसे वैश्विक सर्वे कर रही इस संस्था के इतिहास में यह पहली बार हुआ है जब 36 में से 25 देशों के नागरिकों ने अमेरिका की तुलना में चीन के प्रति अपनी राय को कहीं अधिक सकारात्मक और बेहतर बताया है। डेटा विश्लेषकों के अनुसार, वैश्विक पटल पर चीन की सॉफ्ट पावर और रणनीतिक छवि में अभूतपूर्व सुधार दर्ज किया गया है, जबकि इसके विपरीत अमेरिका की वैश्विक स्वीकार्यता के ग्राफ में भारी गिरावट आई है।बदलते वैश्विक समीकरण: अमेरिका के पड़ोसी देश भी चीन के पक्ष में, सिर्फ 6 देश बचे सुपरपावर के साथइस सर्वे में सबसे बड़ा झटका अमेरिका को उसके अपने पड़ोसी मुल्कों से लगा है। कनाडा, मेक्सिको, स्पेन, इंडोनेशिया, इटली और ग्रीस जैसे देशों में चीन के प्रति जनभावनाओं में सबसे बड़ा और सकारात्मक सुधार देखा गया है। अब स्थिति यह है कि कनाडा और मेक्सिको जैसे अमेरिकी सीमा से सटे देश भी अमेरिका से ज्यादा चीन को पसंद कर रहे हैं। पूरे सर्वे में केवल 6 देश ऐसे बचे हैं जो आज भी वैश्विक मंच पर चीन के मुकाबले अमेरिका को बेहतर और सर्वोच्च मानते हैं। इन देशों में भारत, पोलैंड, फिलीपींस, दक्षिण कोरिया, जापान और इजरायल शामिल हैं, जो लंबे समय से वाशिंगटन के रणनीतिक और सैन्य सहयोगी रहे हैं। इसके विपरीत, एशिया-पैसिफिक और विकासशील देशों में चीन की लोकप्रियता रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है, जिसमें पाकिस्तान (83%), इंडोनेशिया, मलेशिया, नाइजीरिया और तुर्की सबसे आगे हैं।ट्रंप बनाम शी जिनपिंग: विश्व मामलों में फैसले लेने के मामले में कौन है आगे?जब सर्वे में वैश्विक नागरिकों से यह पूछा गया कि अंतरराष्ट्रीय मामलों में सही कदम उठाने और बेहतर फैसले लेने के मोर्चे पर उन्हें डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग में से किस पर अधिक भरोसा है, तो दोनों ही नेताओं का व्यक्तिगत स्कोर 50 प्रतिशत से नीचे रहा, जो यह दिखाता है कि दुनिया दोनों ही सुपरपावर के प्रमुखों को लेकर संशय में है। इसके बावजूद, व्यक्तिगत तुलना में शी जिनपिंग ने बाजी मार ली। दुनिया के 22 देशों (जिनमें फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, कनाडा और मेक्सिको शामिल हैं) के लोगों ने ट्रंप के मुकाबले शी जिनपिंग की निर्णय क्षमता पर ज्यादा भरोसा जताया। ट्रंप को सबसे ज्यादा 68% समर्थन फिलीपींस में मिला, जबकि वेस्ट बैंक और पूर्वी यरुशलम में उनका समर्थन गिरकर महज 4% रह गया। शोधकर्ताओं का कहना है कि दुनिया में ट्रंप को लेकर राय बेहद चरम पर है (या तो बहुत अच्छी या बहुत खराब), जबकि शी जिनपिंग को लेकर राय उतनी आक्रामक नहीं है।व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आंतरिक हस्तक्षेप का मुद्दा: 75% लोगों ने माना अमेरिका करता है जरूरत से ज्यादा दखलवैश्विक मंच पर व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Individual Liberty) और मानवाधिकारों का सम्मान करने के मामले में अमेरिका हमेशा से चीन से आगे रहा है और पिछले 10 सालों से प्यू के सर्वे में यह ट्रेंड कायम है। लेकिन 2021 के बाद से यह अंतर भी बहुत तेजी से कम हुआ है। स्वीडन, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी और इटली जैसे विकसित देशों में अब 25 प्रतिशत से भी कम लोग यह मानते हैं कि अमेरिकी सरकार स्वतंत्रता का सम्मान करती है। इसके विपरीत, मेक्सिको जैसे देशों में 35% लोग मानते हैं कि चीन स्वतंत्रता का सम्मान करता है, जबकि अमेरिका के लिए यह आंकड़ा केवल 20% है। वहीं, दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में दखल देने (Foreign Interference) के मामले में आज भी दुनिया अमेरिका को सबसे बड़ा दोषी मानती है; 75% उत्तरदाताओं ने कहा कि अमेरिका दूसरे देशों में बहुत ज्यादा दखल देता है, जबकि चीन के लिए यह राय सिर्फ 45% लोगों की है। इसके अतिरिक्त, प्रसिद्ध 'गैलप सर्वे' (Gallup Survey) में भी इसी तरह के परिणाम सामने आए हैं, जिसके अनुसार वैश्विक नेतृत्व रेटिंग में चीन और अमेरिका के बीच का अंतर पिछले 20 वर्षों में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है, जो वैश्विक महाशक्ति के रूप में बदलते समीकरणों का स्पष्ट संकेत है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 16 Jul 2026 4:42 pm

Sheikh Hasina Return Plan: शेख हसीना की ढाका वापसी की घोषणा से बांग्लादेश में खलबली

बांग्लादेश की निर्वासित पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना (Sheikh Hasina) के वतन लौटने के फैसले ने ढाका से लेकर नई दिल्ली तक के राजनीतिक गलियारों में एक नया भूचाल ला दिया है। अगस्त 2024 में छात्रों के हिंसक आंदोलन के बाद देश छोड़कर भारत में शरण लेने वाली अवामी लीग (Awami League) की सुप्रीमो ने जब से अपनी वापसी की योजना का खुलासा किया है, तब से बांग्लादेश की अंतरिम और नई सरकार के तेवर बेहद आक्रामक हो गए हैं। बांग्लादेश प्रशासन ने साफ कर दिया है कि शेख हसीना जैसे ही ढाका के हवाई अड्डे पर कदम रखेंगी, उन्हें बिना किसी कानूनी ढील या आत्मसमर्पण (Surrender) का मौका दिए तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाएगा।गृहमंत्री का सख्त रुख: सरेंडर की कोई गुंजाइश नहीं, कोर्ट के आदेश का होगा शत-प्रतिशत पालनबांग्लादेश के प्रतिष्ठित समाचार पत्र 'द डेली स्टार' के अनुसार, देश के गृहमंत्री सलाहुद्दीन अहमद ने बुधवार 15 जुलाई 2026 को एक उच्च स्तरीय बैठक के बाद मीडिया से बात करते हुए सरकार के इरादे स्पष्ट कर दिए। गृहमंत्री ने दोटूक शब्दों में कहा, शेख हसीना के लिए आत्मसमर्पण करने या किसी प्रकार की राहत पाने की कोई कानूनी गुंजाइश नहीं बची है। जैसे ही अवामी लीग की नेता बांग्लादेश की सीमा में प्रवेश करेंगी, सुरक्षा एजेंसियां उन्हें ऑन-स्पॉट हिरासत में ले लेंगी। उन्होंने आगे जोड़ा कि देश की शीर्ष अदालत द्वारा पूर्व में जारी किए गए सभी आदेशों और गैर-जमानती वारंटों का अक्षरशः पालन किया जाएगा और उन्हें सीधे जेल भेजा जाएगा।मानवता के खिलाफ अपराध: विशेष अदालत सुना चुकी है मौत की सजाशेख हसीना की मुश्किलें सिर्फ गिरफ्तारी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उन पर कानून का सबसे कठोर शिकंजा कसा हुआ है। पिछले वर्ष नवंबर में ढाका की एक विशेष ट्रिब्यूनल अदालत ने साल 2024 के छात्र आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों पर की गई कथित बर्बर कार्रवाई और बल प्रयोग को 'मानवता के खिलाफ अपराध' (Crimes Against Humanity) मानते हुए शेख हसीना को दोषी करार दिया था और उन्हें सजा-ए-मौत (Death Penalty) सुनाई थी। इस ऐतिहासिक न्यायिक फैसले के बाद से ही बांग्लादेश का नया प्रशासन लगातार भारत सरकार से शेख हसीना के आधिकारिक प्रत्यर्पण (Extradition) की मांग कर रहा है ताकि उन पर अदालत के आदेश के मुताबिक कार्रवाई की जा सके।शेख हसीना का भावुक और साहसिक बयान: गिरफ्तार करें या मार दें, अपनी ही धरती पर मरना पसंद करूंगीइस भारी कानूनी और प्रशासनिक दबाव के बीच शेख हसीना ने अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रॉयटर्स (Reuters) को दिए एक विशेष साक्षात्कार में अपने साहसिक इरादे जाहिर किए हैं। उन्होंने पुष्टि की है कि वह दिसंबर 2026 के आसपास अवामी लीग के प्रमुख नेताओं और हजारों वफादार कार्यकर्ताओं के साथ एक बड़े मार्च के रूप में बांग्लादेश वापस जाने की रणनीतिक योजना बना रही हैं। हसीना ने बेहद भावुक होते हुए कहा, मैं जानती हूं कि मेरे वहां पहुंचते ही वे मुझे तुरंत गिरफ्तार कर सकते हैं और मेरी जान भी ले सकते हैं, लेकिन इसके बावजूद मुझे अपने वतन वापस जाना ही होगा। मेरी पार्टी के कार्यकर्ताओं पर भारी दमन हो रहा है। अगर मुझे मौत भी आती है, तो मैं चाहती हूं कि वह मेरी अपनी मातृभूमि की मिट्टी पर आए।बांग्लादेश सरकार की खुली चुनौती: दुनिया के सबसे बेहतरीन वकील ले आएं, न्याय होकर रहेगाशेख हसीना की इस बड़ी घोषणा का स्वागत करते हुए प्रधानमंत्री के सूचना और रणनीति मामलों के मुख्य सलाहकार जाहिद उर रहमान ने एक तीखा बयान जारी किया है। उन्होंने कहा कि देश की जनता और नई सरकार अदालत द्वारा सुनाई गई मौत की सजा को हर हाल में बरकरार रखना चाहती है। रहमान ने तंज कसते हुए कहा, हम हसीना के वापस आने के फैसले का स्वागत करते हैं क्योंकि इससे हमें न्याय सुनिश्चित करने में आसानी होगी। वे अपनी रक्षा के लिए दुनिया के सबसे बड़े और बेहतरीन वकीलों को क्यों न बुला लें, लेकिन देश के कानून और पीड़ित परिवारों की इच्छा के अनुसार उनकी सजा पर अमल होकर रहेगा।भारत का रणनीतिक रुख स्पष्ट: प्रत्यर्पण एक कानूनी प्रक्रिया, कानून के मुताबिक ही होगा फैसलाइस पूरे हाई-प्रोफाइल अंतरराष्ट्रीय विवाद के केंद्र में मौजूद भारत सरकार ने भी शेख हसीना की वापसी की खबरों के बीच अपना आधिकारिक पक्ष दोहराया है। भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने नई दिल्ली में आयोजित एक प्रेस ब्रीफिंग में कहा, शेख हसीना के मामले पर भारत की नीति और रुख में शुरुआत से ही कोई बदलाव नहीं आया है। किसी भी व्यक्ति का प्रत्यर्पण पूरी तरह से एक द्विपक्षीय कानूनी विषय होता है। इस मामले में भी जो भी कदम उठाए जाएंगे, वे स्थापित अंतरराष्ट्रीय कानूनों और दोनों देशों के बीच हुए विधिक समझौतों के दायरे में रहकर ही तय किए जाएंगे। भारत के इस संतुलित बयान के बाद अब दिसंबर में होने वाले इस बड़े राजनीतिक घटनाक्रम पर पूरी दुनिया की नजरें टिक गई हैं।

न्यूज़ इंडिया लाइव 16 Jul 2026 4:39 pm

अमेरिका भेजने के नाम पर करोड़ों का खेल! नेपाल के पूर्व डिप्टी PM को मिली 4 साल की जेल

पड़ोसी देश नेपाल से इस वक्त की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली राजनीतिक खबर सामने आ रही है। नेपाली नागरिकों को अवैध तरीके से अमेरिका भेजने के नाम पर चल रहे करोड़ों रुपये के एक हाई-प्रोफाइल अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट का भंडाफोड़ हुआ है। इस बड़े घोटाले में काठमांडू जिला अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए नेपाल के पूर्व उप प्रधानमंत्री और ऊर्जा मंत्री टोप बहादुर रायमाझी को 4 साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने साफ किया कि इस संगठित धोखाधड़ी ने नेपाल की संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय छवि को गहरी ठेस पहुंचाई है।नेपाली नागरिकों को फर्जी भूटानी शरणार्थी बनाकर रच रहे थे साजिशइस पूरे मामले की तफ्तीश में जो सच सामने आया है, उसने हर किसी को हैरान कर दिया है। दरअसल, यह पूरा रैकेट नेपाली नागरिकों से मोटी रकम वसूल कर उन्हें अमेरिका भेजने का झांसा देता था। इसके लिए आरोपियों ने बकायदा सरकारी सांठगांठ से फर्जी दस्तावेज तैयार किए। इन जाली कागजातों के जरिए मूल नेपाली नागरिकों को कागजों पर 'भूटानी शरणार्थी' (Bhutanese Refugees) घोषित कर दिया जाता था, ताकि वे अमेरिका द्वारा चलाए जा रहे तीसरे देश के पुनर्वास कार्यक्रम का फायदा उठाकर आसानी से वाशिंगटन पहुंच सकें।पूर्व गृहमंत्री समेत 15 से ज्यादा रसूखदार दोषी करारकाठमांडू जिला अदालत के न्यायाधीश तेज बहादुर खड़का की एकल पीठ ने इस मामले में बेहद सख्त रुख अपनाया। पूर्व डिप्टी पीएम टोप बहादुर रायमाझी के अलावा देश के पूर्व गृहमंत्री और नेपाली कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बाल कृष्ण खांड को भी इस साजिश में मददगार होने का दोषी पाया गया है और उन्हें 2 साल जेल की सजा दी गई है। अदालत ने इस पूरे नेटवर्क में शामिल पूर्व गृह सचिव टेक नारायण पांडे और गृहमंत्री के सुरक्षा सलाहकार सहित कुल 15 से ज्यादा आरोपियों को धोखाधड़ी, राज्य के खिलाफ अपराध और संगठित अपराध की विभिन्न धाराओं में दोषी पाते हुए जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया है।कैसे हुआ नेपाल के इस सबसे बड़े 'मानव तस्करी' घोटाले का भंडाफोड़?इस महाघोटाले की शुरुआत साल 2023 में तब हुई, जब सैकड़ों पीड़ितों ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई कि अमेरिका भेजने के नाम पर उनसे लाखों-करोड़ों रुपये ऐंठ लिए गए लेकिन उन्हें विदेश नहीं भेजा गया। पुलिस जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, सरकारी तंत्र में बैठे बड़े-बड़े राजनेताओं और नौकरशाहों के नाम सामने आते गए, जिसके बाद पूर्व डिप्टी पीएम रायमाझी कई दिनों तक फरार भी रहे थे। रक्षा और कानून विशेषज्ञों का मानना है कि दक्षिण एशिया की राजनीति में किसी पूर्व प्रधानमंत्री या उप प्रधानमंत्री स्तर के नेता को मानव तस्करी और धोखाधड़ी जैसे गंभीर मामले में जेल होना एक नजीर पेश करेगा और इससे नेपाल में भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही मुहिम को और मजबूती मिलेगी

न्यूज़ इंडिया लाइव 16 Jul 2026 12:50 pm

जिस रूस से भारत खरीदता था सस्ता कच्चा तेल, अब वही मांग रहा पेट्रोल! जानिए कैसे पलटी बाजी

वैश्विक ऊर्जा बाजार (Global Energy Market) से एक बेहद हैरान करने वाली और भू-राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण खबर सामने आ रही है। पिछले कुछ वर्षों में पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बीच जो रूस भारत को रिकॉर्ड तोड़ मात्रा में बेहद सस्ता कच्चा तेल (Crude Oil) सप्लाई कर रहा था, अब उसी रूस को अपनी घरेलू ईंधन की मांग पूरी करने के लिए भारत से रिफाइंड पेट्रोल की मदद मांगनी पड़ रही है। यह वैश्विक व्यापार के इतिहास में एक ऐसा बड़ा उलटफेर है, जिसने अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर कुछ ही समय में यह पूरी बाजी कैसे पलट गई।कच्चे तेल के बादशाह को क्यों पड़ी रिफाइंड पेट्रोल की जरूरत?दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादकों में से एक होने के बावजूद रूस को यह कदम अपनी रिफाइनरी क्षमता में आई भारी गिरावट के कारण उठाना पड़ा है। दरअसल, यूक्रेन के साथ जारी लंबे संघर्ष के बीच रूसी तेल रिफाइनरियों (Refineries) पर हुए लगातार ड्रोन हमलों ने उसके घरेलू बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया है। इसके अलावा, पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण रूस को अपनी रिफाइनरियों की मरम्मत के लिए जरूरी अत्याधुनिक उपकरणों और स्पेयर पार्ट्स की भारी किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। इसके चलते रूस कच्चे तेल का उत्पादन तो कर पा रहा है, लेकिन उसे पेट्रोल और डीजल जैसे तैयार ईंधन में बदलने की उसकी क्षमता गंभीर रूप से प्रभावित हुई है, जिससे उसके घरेलू बाजार में ईंधन संकट गहराने लगा है।कैसे भारत बना दुनिया का 'ग्लोबल रिफाइनिंग हब'?एक तरफ जहां रूस की रिफाइनरियों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ भारत ने इस पूरे परिदृश्य में खुद को एक ग्लोबल रिफाइनिंग पावरहाउस के रूप में स्थापित कर लिया है। भारत अपनी विशाल और आधुनिक रिफाइनरियों (जैसे जामनगर रिफाइनरी) की बदौलत भारी मात्रा में कच्चे तेल को बेहद कम लागत में उच्च गुणवत्ता वाले पेट्रोल और डीजल में प्रोसेस करने की क्षमता रखता है। भारत ने पिछले समय में रूस से भारी मात्रा में डिस्काउंटेड (सस्ता) क्रूड ऑयल खरीदा और उसे रिफाइंड करके यूरोप और दुनिया के अन्य हिस्सों में बड़े मुनाफे के साथ बेचा है। अब स्थिति यह हो गई है कि रूस खुद अपने ही बेचे गए तेल के रिफाइंड वर्जन को भारत से वापस खरीदने की स्थिति में आ गया है।दोनों देशों के आर्थिक और रणनीतिक संबंधों पर क्या होगा असर?यह नया व्यापारिक मोड़ भारत और रूस के बीच के आर्थिक समीकरणों को एक नया आयाम देने जा रहा है। भारत के लिए यह अवसर न केवल अपने रिफाइंड पेट्रोलियम निर्यात (Petroleum Export) को बढ़ाने का एक बड़ा जरिया बनेगा, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता और क्षमता का लोहा भी मनवाएगा। रूस के लिए भारत से पेट्रोल की यह मांग उसके घरेलू बाजार में कीमतों को स्थिर रखने और आम जनता के बीच ईंधन की किल्लत को रोकने का एक त्वरित समाधान है। इस रणनीतिक उलटफेर ने साबित कर दिया है कि आधुनिक जियोपॉलिटिक्स में व्यापारिक समीकरण कितनी तेजी से बदल सकते हैं, जहां कल का सप्लायर आज खुद खरीदार की कतार में खड़ा नजर आ रहा है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 16 Jul 2026 12:48 pm

300 साल की मेहनत पर पानी: यूक्रेन ने कैसे ब्लॉक किया रूस का 'होर्मुज'? चक्रव्यूह में फंसे पुतिन

रूस और यूक्रेन के बीच चल रहा भीषण युद्ध अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जिसने पूरी दुनिया के रक्षा विशेषज्ञों को हैरान कर दिया है। यूक्रेन ने बेहद आक्रामक और रणनीतिक कदम उठाते हुए रूस के सबसे महत्वपूर्ण लाइफलाइन माने जाने वाले समुद्री मार्ग को पूरी तरह से ठप कर दिया है। इतिहासकार और सैन्य विशेषज्ञ इस मार्ग की तुलना मध्य पूर्व के रणनीतिक 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' से करते हैं, क्योंकि रूस का पूरा व्यापार और नौसैनिक ताकत इसी रास्ते पर टिकी हुई है। इस नाकेबंदी के बाद रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की हालत वैसी ही होती दिख रही है, जैसी कभी भारी राजनीतिक और कानूनी घेराबंदी के दौरान डोनाल्ड ट्रंप की हुई थी।लाखों मजदूरों का पसीना और तीन सदियों का गौरव दांव परजिस समुद्री गलियारे और तटीय बुनियादी ढांचे को यूक्रेन ने निशाना बनाया है, उसका इतिहास बेहद गौरवशाली और संघर्षपूर्ण रहा है। रूसी साम्राज्य के दौर से लेकर सोवियत संघ के काल तक, लगभग 300 वर्षों की कड़ी मेहनत और लाखों मजदूरों के खून-पसीने से इस पूरे नौसैनिक नेटवर्क और व्यापारिक मार्ग को तैयार किया गया था। यह रूस के लिए सिर्फ एक रास्ता नहीं, बल्कि उसकी वैश्विक महाशक्ति वाली छवि का प्रतीक रहा है। यूक्रेन ने आधुनिक तकनीक, सटीक ड्रोन हमलों और एंटी-शिप मिसाइलों के कॉम्बिनेशन से इस अभेद्य माने जाने वाले रूसी चक्रव्यूह को भेदकर इसकी कमर तोड़ दी है।आखिर रूस का 'होर्मुज' क्यों कहा जाता है इसे?वैश्विक भू-राजनीति में जो अहमियत खाड़ी देशों के लिए 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) की है, ठीक वही अहमियत रूस के लिए इस ब्लॉक किए गए समुद्री क्षेत्र की है। रूस के कच्चे तेल का निर्यात, अनाज की सप्लाई और ब्लैक सी (काला सागर) में उसकी नौसैनिक टुकड़ियों का मूवमेंट इसी रास्ते के जरिए नियंत्रित होता था। यूक्रेन ने इस पूरे रूट की घेराबंदी करके रूस की आर्थिक नस पर हाथ रख दिया है। अब रूस के लिए अपने व्यापारिक जहाजों को सुरक्षित निकालना एक बेहद पेचीदा और लगभग नामुमकिन काम बन चुका है।चक्रव्यूह में पुतिन: क्यों हो रही है ट्रंप के हालातों से तुलना?इस अप्रत्याशित नाकेबंदी ने मॉस्को के सत्ता गलियारों में खलबली मचा दी है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इस समय खुद को एक ऐसे चौतरफा दबाव में पा रहे हैं, जो सीधे तौर पर उनकी राजनीतिक साख को चुनौती दे रहा है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग-थलग पड़ना, घरेलू स्तर पर आर्थिक प्रतिबंधों का दबाव और अब इस महत्वपूर्ण मार्ग का बंद होना; पुतिन की यह स्थिति ठीक वैसी ही नजर आ रही है जैसी अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों और उसके बाद की घेराबंदी के दौरान थी, जहां हर कदम पर एक नया संकट खड़ा था। यूक्रेन के इस दांव ने रूस को बातचीत की मेज पर आने या फिर बहुत बड़ा सैन्य जोखिम उठाने के दोहरे संकट में डाल दिया है।

न्यूज़ इंडिया लाइव 16 Jul 2026 12:46 pm

किंग चार्ल्स के डिनर में लहसुन क्यों है पूरी तरह बैन? ब्रिटिश शाही डाइनिंग टेबल के 7 अनोखे नियम

ब्रिटिश राजघराने की भव्यता और उनकी जीवनशैली हमेशा से दुनिया भर के लोगों के लिए कौतूहल का विषय रही है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि बकिंघम पैलेस या ब्रिटेन के शाही महलों में जब किंग चार्ल्स III डिनर के लिए बैठते हैं, तो वहां की डाइनिंग टेबल पर आम घरों से बिल्कुल अलग और बेहद सख्त नियम लागू होते हैं। इन नियमों में सबसे ज्यादा चर्चा खाने में 'लहसुन' के बैन होने की होती है। आइए एक नजर डालते हैं ब्रिटिश शाही परिवार के उन 7 नियमों पर, जो उनके डिनर को बेहद खास और थोड़ा अजीब बनाते हैं।महक नहीं, प्रोटोकॉल है जरूरी: इसलिए बैन है लहसुन और प्याजलहसुन और प्याज लगभग हर भारतीय और वैश्विक व्यंजनों का मुख्य हिस्सा हैं, लेकिन बकिंघम पैलेस की रसोई में इन पर कड़ा प्रतिबंध है। शाही रसोइयों को निर्देश होते हैं कि वे किंग चार्ल्स या शाही परिवार के किसी भी सदस्य के भोजन में लहसुन का इस्तेमाल बिल्कुल न करें। दरअसल, इसके पीछे की वजह कोई अंधविश्वास नहीं बल्कि पूरी तरह से शिष्टाचार (Etiquette) है। शाही परिवार को हर दिन दुनिया भर के राजनेताओं, वीआईपी और आम लोगों से मिलना-जुलना होता है। ऐसे में मुंह से लहसुन की तेज गंध या दुर्गंध न आए, इसलिए क्वीन एलिजाबेथ के समय से चला आ रहा यह नियम किंग चार्ल्स ने भी जारी रखा है।राजा की प्लेट खाली, तो आपका डिनर भी खत्मशाही टेबल पर बैठकर आप आराम से देर तक खाना नहीं खा सकते। नियम के अनुसार, डिनर के दौरान मेहमानों को अपनी नजरें किंग चार्ल्स पर रखनी होती हैं। जैसे ही किंग चार्ल्स अपना चाकू-छुरी (कटलरी) प्लेट पर रखकर खाना समाप्त करने का संकेत देते हैं, टेबल पर मौजूद हर एक मेहमान को तुरंत खाना बंद करना पड़ता है। भले ही आपकी प्लेट में आधा खाना बचा हो या आपका पसंदीदा स्टेक रखा हो, किंग के रुकते ही आपका डिनर भी समाप्त मान लिया जाता है।फूड प्वाइजनिंग से बचने के लिए सी-फूड और कच्चे मांस पर रोकब्रिटिश रॉयल फैमिली जब भी किसी आधिकारिक दौरे, यात्रा या सार्वजनिक कार्यक्रमों में होती है, तो उनके मेन्यू से शेलफिश (जैसे केकड़ा, झींगा, ऑयस्टर) और कच्चा या कम पका हुआ मांस (रेयर मीट) पूरी तरह हटा दिया जाता है। शाही डॉक्टरों और विशेषज्ञों का मानना है कि इन खाद्य पदार्थों से फूड प्वाइजनिंग (भोजन विषाक्तता) होने का खतरा सबसे ज्यादा होता है। व्यस्त शाही शेड्यूल में किसी भी तरह की स्वास्थ्य खराबी से बचने के लिए इस एहतियाती नियम का सख्ती से पालन किया जाता है。खाने में नैतिकता: फॉय ग्रा (Foie Gras) पर किंग चार्ल्स का कड़ा प्रतिबंधकिंग चार्ल्स III पर्यावरण और जीव-जंतुओं के कल्याण को लेकर काफी संवेदनशील माने जाते हैं। यही वजह है कि उन्होंने राजा बनने से पहले ही शाही रसोइयों को फ्रांसीसी व्यंजन 'फॉय ग्रा' खरीदने और परोसने से साफ मना कर दिया था। फॉय ग्रा को बत्तख या बत्तख प्रजाति के जीवों को जबरन अनाज खिलाकर उनके लीवर को बड़ा करके तैयार किया जाता है, जिसे किंग चार्ल्स क्रूर और अनैतिक मानते हैं।फोर्क (कांटे) से खाना उठाने का अजीब और उल्टा तरीकाशाही परिवार में कांटेदार चम्मच (Fork) से खाना खाने का तरीका भी काफी अनोखा है। आम तौर पर लोग कांटे से भोजन को चुभोकर या सीधे तौर पर उठाते हैं。 लेकिन शाही नियमों के मुताबिक, कांटे को हमेशा उल्टा (तगड़ी तरफ नीचे की ओर) पकड़ना होता है। चाकू की मदद से खाने को कांटे के पिछले हिस्से (Rounded Side) पर धीरे से सरकाया जाता है और फिर उसे बेहद सावधानी से बिना चुभाए मुंह तक ले जाया जाता है।बातचीत का सख्त नियम: सिर्फ अगल-बगल वाले से ही बातशाही डिनर के दौरान कोई भी व्यक्ति टेबल के दूसरी तरफ बैठे मेहमान या राजा से सीधे चिल्लाकर बात नहीं कर सकता。 यहां बैठने की व्यवस्था (Seating Arrangement) बेहद सोच-समझकर तय की जाती है। नियम के तहत, डिनर के पहले हिस्से में राजा अपनी दाईं ओर बैठे मुख्य अतिथि से बात करते हैं और फिर दूसरे हिस्से में बाईं ओर मुड़ते हैं। बाकी मेहमानों को भी केवल अपने ठीक दाएं या बाएं बैठे व्यक्ति से ही धीमी और शालीन आवाज में बात करने की अनुमति होती है।नैपकिन को मोड़ने और बाथरूम जाने की घोषणा न करने का शिष्टाचारडिनर टेबल पर यदि आपको बाथरूम जाना है, तो आप कभी भी इसकी घोषणा सबके सामने नहीं कर सकते। आपको बस शालीनता से 'एक्सक्यूज मी' कहकर उठना होता है। इसके अलावा, उपयोग किए गए नैपकिन को हमेशा इस तरह से फोल्ड करके अपनी गोदी (Lap) में रखना होता है ताकि उसका गंदा हिस्सा किसी को दिखाई न दे। जब तक भोजन पूरी तरह समाप्त न हो जाए, नैपकिन को वापस टेबल पर नहीं रखा जाता

न्यूज़ इंडिया लाइव 16 Jul 2026 12:45 pm

पीओके में बढ़ा तनाव: सख्ती के बीच JAAC नेतृत्व पर खतरे की आशंका, मानवाधिकार संगठनों ने जताई चिंता

मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी पाकिस्तान में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों की गिरफ्तारी पर सवाल उठाए हैं। संगठन ने आरोप लगाया है कि शांतिपूर्ण विरोध से जुड़े लोगों के खिलाफ प्रशासनिक कानूनों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

देशबन्धु 16 Jul 2026 10:08 am

ट्रंप ने दी नई धमकी-रूस से तेल खरीदा तो 100 प्रतिशत टैरिफ लगाएंगे

अमेरिकी सांसदों ने ऐसा विधेयक पेश करने का प्रस्ताव दिया है, जिसके तहत रूस से तेल खरीदने वाले कुछ देशों पर 100 प्रतिशत तक आयात शुल्क (टैरिफ) लगाया जा सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस प्रस्ताव का समर्थन करते हुए कहा है कि इसे लागू करने का यही उचित समय है।

देशबन्धु 16 Jul 2026 10:06 am

ईरानी बंदरगाहों पर अमेरिकी नाकाबंदी फिर शुरू

ईरान के खिलाफ अमेरिकी नौसैनिक कार्रवाई तेज हो गई है। सेंटकॉम ने दावा किया है कि नाकाबंदी के बाद दो वाणिज्यिक जहाजों को रोककर उनका रास्ता बदल दिया है

देशबन्धु 16 Jul 2026 7:20 am