ईरान ने फिर बंद किया होर्मुज स्ट्रेट, अमेरिका और इजरायल पर एमओयू का उल्लंघन का आरोप
ईरान ने शनिवार को एक बार फिर होर्मुज स्ट्रेट को जहाजों की आवाजाही के लिए बंद करने की घोषणा की
पाकिस्तानी नौसेना में एक नाम लौट आया है ‘PNS हैंगोर’। ये है चीन में बनी नई पाकिस्तानी पनडुब्बी। ये 11 जून को कराची पहुंची। पाकिस्तान इसे बंगाल की खाड़ी में तैनात करेगा। इसी हैंगोर नाम की पनडुब्बी ने 1971 की जंग में भारतीय युद्धपोत ‘INS खुखरी’ को डुबो दिया था। जंग के दौरान किसी भारतीय पोत के डूबने की यह इकलौती घटना है। आखिर क्या है 1971 का वो पूरा किस्सा, नई हैंगोर पनडुब्बी कितनी ताकतवर है और भारत इससे कैसे निपटेगा; समझेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: हैंगोर पनडुब्बी ने 55 साल पहले भारतीय युद्धपोत को कैसे डुबोया था? जवाब: 1971 की जंग के दौरान 6 दिसंबर को भारतीय नौसेना का पता चला कि एक पाकिस्तानी पनडुब्बी PNS (Pakistan Naval Ship) हैंगोर दीव के पास मौजूद है। जवाब में भारत ने एंटी सबमरीन युद्धपोत 'INS (Indian Naval Ship) खुखरी' और INS कृपाण' को उस इलाके में भेज दिया। PNS का मतलब पाकिस्तान नेवल शिप और INS का मतलब इंडियन नेवल शिप होता है। 'PNS हैंगोर' में 25 किमी दूर तक के युद्धपोत की टोह लेने की क्षमता थी। जबकि खुखरी सिर्फ 2.5 किमी दूर तक ही दुश्मन के पोत या पनडुब्बी को डिटेक्ट कर सकता था। हैंगोर को खुखरी और कृपाण का पहले से पता चल गया। उसने दोनों के नजदीक आने का इंतजार किया। हैंगोर के कैप्टन लेफ्टिनेंट कमांडर तसनीम अहमद ने बाद में एक इंटरव्यू में बताया, 'हमने कृपाण पर जो टॉरपीडो दागा, वो बिना फटे उसके नीचे से गुजर गया। भारतीय युद्धपोतों को हमारी पोजीशन का पता चल चुका था। इसलिए मैंने तेजी से INS खुखरी पर पीछे से दो फायर और किए।’ टॉरपीडो खुखरी के नीचे फटा था। जिससे 3 मिनट के अंदर जहाज डूबने लगा था। इस हमले में खुखरी के कैप्टन महेंद्रनाथ मुल्ला सहित कुल 18 नेवी ऑफिसर्स, 176 क्रू और बाकी स्टाफ सहित कुल 194 लोग शहीद हुए। 'द सिंकिंग ऑफ INS खुखरी: सर्वाइवर्स स्टोरीज' किताब लिखने वाले मेजर जनरल इयान कारडोजो के मुताबिक, 'अगर किसी इलाके में पनडुब्बी का खतरा हो, तो युद्धपोत टेढ़े-मेढ़े तरीके से चलते हैं। खुखरी भी यही कर रहा था, इसलिए उसकी स्पीड कम थी। उसी समय खुखरी पर एक नए किस्म के सोनार का भी परीक्षण चल रहा था, इससे रफ्तार और धीमी हो गई थी। यही वजह थी कि हैंगोर ने उसे आसानी से निशाना बना लिया।' हालांकि इस हमले से 1971 की जंग का नतीजा नहीं बदला। बंगाल की खाड़ी से पाकिस्तानी नेवी को भी वापस लौटना पड़ा था। अब 55 साल बाद अब हैंगोर के नाम पर एक नई पनडुब्बी फिर सुर्खियों में है। सवाल-2: पाकिस्तान की नई हैंगोर पनडुब्बी कितनी घातक है? जवाबः पाकिस्तान की नई हैंगोर क्लास सबमरीन को चीन की सरकारी कंपनी 'चाइना शिपबिल्डिंग एंड ऑफशोर इंटरनेशनल कॉर्पोरेशन लिमिटेड', यानी CSOC ने बनाया है। ये डीजल और इलेक्ट्रिक बैटरी से चलने वाली अटैक सबमरीन है। 2015 में पाकिस्तान ने चीन से करीब 5 अरब डॉलर में 8 हैंगोर पनडुब्बियों का सौदा किया था। अभी पाकिस्तानी नेवी को पहली हैंगोर पनडुब्बी मिली है। तीन और पनडुब्बियों का समुद्र में ट्रायल चल रहा है। बाकी 4 पनडुब्बियां पाकिस्तान में ही बनाई जाएंगी। सवाल-3: हैंगोर पनडुब्बी बंगाल की खाड़ी में क्यों भेजना चाहता है पाकिस्तान? जवाब: इसकी 2 मुख्य वजहें हैं... 1. बंगाल की खाड़ी में पाकिस्तान की मौजूदगी दोबारा बढ़ाना 1971 की जंग हारने के बाद पाकिस्तानी नेवी बंगाल की खाड़ी से गायब हो गई। इस इलाके में भारतीय नौसेना का वर्चस्व है… हैंगोर को चीन से कराची लाने वाली नेवी फ्लीट के कमांडर उमर फारूक ने कहा, 'ये पनडुब्बी गेमचेंजर है। इसके जरिए पाकिस्तान को बंगाल की खाड़ी में अपनी मौजूदगी बनाए रखने में मदद मिलेगी।' बंगाल की खाड़ी से भारत के अलावा बांग्लादेश, म्यांमार, थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया और श्रीलंका जुड़े हैं। खाड़ी में अपने तट से 22 किमी तक के समुद्र को उस देश का 'टेरिटोरियल सी' कहा जाता है। फिर 200 किमी का 'विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र' यानी EEZ होता है। बाकी समुद्र को 'इंटरनेशनल वाटर जोन' कहते हैं, जहां किसी भी देश के सैन्य जहाज या पनडुब्बी आ सकती हैं। इस मैप में देखिए… 2. बांग्लादेश से शुरू हुए रिश्ते मजबूत करना 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना के तख्तापलट के बाद बांग्लादेश के अंतरिम राष्ट्रपति बने मोहम्मद यूनुस का पाकिस्तान की ओर था। उन्होंने 2 बार पाकिस्तानी पीएम शाहबाज शरीफ से मुलाकात की थी। पाक विदेश मंत्री इशाक डार भी ढाका दौरे पर गए। इसके बाद दोनों देशों में 1971 से बंद समुद्री व्यापार दोबारा खुला। 12 साल बाद जनवरी 2026 में इस्लामाबाद-ढाका के बीच सीधी फ्लाइट शुरू हुई। वीजा रूल्स में भी ढील दी गई। दिसंबर 2025 में पाकिस्तान-बांग्लादेश के बीच कारोबार पिछले साल के मुकाबले 20% बढ़ा। दोनों देशों के बीच 100 करोड़ डॉलर के आर्थिक समझौते हुए। इसलिए इस इलाके में पाकिस्तान अपनी नौसैनिक ताकत बढ़ाना चाहता है। सवाल-4: पाकिस्तानी नेवी को कैसे तेजी से मजबूत बना रहा है चीन? जवाब: पाकिस्तान 80% हथियार चीन से खरीदता है। पाकिस्तानी नौसेना को एडवांस बनाने में भी चीन 3 तरह से मदद कर रहा है… सवाल-5: ये भारत के लिए कितनी चिंता की बात है, कैसे जवाब देगा? जवाब: बंगाल की खाड़ी में पाकिस्तान की नौसैनिक गतिविधियां बढ़ती हैं, तो भारत के लिए 3 बड़े खतरे हैं… 1. निशाने पर भारत के अहम ठिकानेः PNS हैंगोर के 6 हैवीवेट टॉरपीडो ट्यूब में पाकिस्तान की 450 किमी रेंज वाली 'बाबर-3' क्रूज मिसाइल लग सकती है। अगर बाबर-3 के साथ पनडुब्बी बंगाल की खाड़ी में उतरी, तो भारत के अहम ठिकाने जैसे- नेवी की ईस्टर्न कमांड, अंडमान निकोबार कमांड और आंध्र प्रदेश में पनडुब्बी अड्डा ‘INS वर्षा’ और ISRO का सतीश धवन स्पेस सेंटर, वगैरह इसकी जद में आ सकते हैं। 2. खुफिया जानकारी चुराने का खतराः पाकिस्तान समुद्री गश्त बढ़ाकर भारतीय जहाजों, बंदरगाहों और नौसैनिक अड्डों की खुफिया जानकारी जुटा सकता है। इसका जंग की स्थिति में इस्तेमाल करेगा। मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस में रिसर्च एनालिस्ट नमिता बर्थवाल के मुताबिक, चिंता की बात ये है कि पर्दे के पीछे चीन है, जिसे ये खुफिया इन्फॉर्मेशन मिलती रहेंगी। 3. महीनों तक एक्टिव सकती है पनडुब्बी: नवंबर 2025 में पाक युद्धपोत 'PNS सैफ' ने 1971 के बाद पहली बार बांग्लादेश के चटगांव पोर्ट का दौरा किया। अगर हैंगोर को बांग्लादेश के पोर्ट्स पर 'लॉजिस्टिक्स सपोर्ट' जैसे- ईंधन, राशन वगैरह मिलने लगा, तो वह इस इलाके में और देर तक रह सकेगी। हालांकि ऐसी चुनौतियों के लिए भारतीय नौसेना पूरी तरह तैयार है… -------------------- ये खबर भी पढ़िए… भारत ने अचानक 12 परमाणु बम क्यों तैनात किए; 3 साल से जखीरा बढ़ा रहा, चीन-पाक से एकसाथ निपटने को तैयार भारत ने पिछले 3 साल में 26 परमाणु हथियार बढ़ाए। अब परमाणु जखीरा 190 तक पहुंच गया है। भारत ने पहली बार 12 न्यूक्लियर बम मिसाइल्स पर लोड करके तैनात कर दिए हैं। ये खुलासा स्वीडिश थिंकटैंक SIPRI की लेटेस्ट रिपोर्ट में हुआ है। पूरी खबर पढ़िए…
पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच जारी कूटनीतिक और सैन्य तनाव अब एक बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। अफगानिस्तान की सत्तारूढ़ तालिबान सरकार ने एक बेहद चौंकाने वाला और बड़ा दावा करते हुए कहा है कि उसकी वायु सेना (Afghan Air Force) ने पाकिस्तान की सीमा के भीतर घुसकर बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा प्रांतों में स्थित आतंकवादी ठिकानों पर भीषण एयर स्ट्राइक की है। इस सनसनीखेज दावे के बाद पूरे दक्षिण एशिया के रक्षा गलियारों में हड़कंप मच गया है। हालांकि, दूसरी तरफ पाकिस्तान ने इस दावे को पूरी तरह खारिज करते हुए इसे महज एक मनगढ़ंत झूठ बताया है और कहा है कि केवल एक अफगान ड्रोन ने उसके हवाई क्षेत्र का उल्लंघन किया था, जिसे समय रहते रोक दिया गया।खुफिया एजेंसियों के इशारे पर रच रहे थे साजिश, तालिबान ने जारी किया आधिकारिक बयानदरअसल, यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब अफगानिस्तान के रक्षा मंत्रालय ने अपने आधिकारिक 'एक्स' (पहले ट्विटर) हैंडल पर एक पोस्ट साझा की। इस पोस्ट में रक्षा मंत्रालय ने दावा किया कि अफगान वायु सेना के लड़ाकू विमानों ने गुरुवार की देर रात पाकिस्तान के दो अशांत प्रांतों— बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में एक खुफिया ऑपरेशन के तहत आतंकी कैंपों को निशाना बनाया। हालांकि, रक्षा मंत्रालय की ओर से सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए यह साफ नहीं किया गया कि इस हवाई हमले को अंजाम देने के लिए किस तरह के विमानों या सैन्य तकनीक का इस्तेमाल किया गया।अफगान रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, पाकिस्तान स्थित जिन आतंकवादी ठिकानों पर यह हमला किया गया है, वे कथित तौर पर शत्रुतापूर्ण विदेशी खुफिया एजेंसियों के सहयोग से अफगानिस्तान की धरती के खिलाफ लगातार बड़े हमलों की साजिश रच रहे थे। तालिबान सरकार का कहना है कि ये ठिकाने अतीत में भी अफगानिस्तान में हुए कई घातक और आत्मघाती हमलों के मुख्य लॉन्च पैड रहे हैं। तालिबान के अनुसार, उनकी वायु सेना ने अपने सभी पूर्व-निर्धारित लक्ष्यों को सफलतापूर्वक नेस्तनाबूद कर दिया है, हालांकि इस हमले में आतंकियों को हुए जानी-मानी नुकसान या हताहतों का कोई सटीक आंकड़ा अभी जारी नहीं किया गया है।पाकिस्तान का पलटवार: 'कोई हमला नहीं हुआ, हमने अफगान ड्रोन को खदेड़ा'अफगानिस्तान के इस बड़े और आक्रामक दावे के कुछ ही घंटों बाद पाकिस्तान के सूचना मंत्रालय ने भी मोर्चा संभाला और तालिबान के दावों की धज्जियां उड़ाते हुए इसे पूरी तरह से खारिज कर दिया। पाकिस्तानी सरकार ने 'एक्स' पर पलटवार करते हुए लिखा कि पाकिस्तानी सीमा के भीतर किसी भी प्रकार की कोई एयर स्ट्राइक या हवाई हमला नहीं हुआ है। असल हकीकत यह है कि अफगानिस्तान की तरफ से केवल एक मानवरहित ड्रोन (Drone) पाकिस्तानी हवाई क्षेत्र में अवैध रूप से घुस आया था, जिसे पाकिस्तानी वायु सेना ने तुरंत डिटेक्ट कर प्रभावी ढंग से रोक दिया और खदेड़ दिया।पाकिस्तानी सूचना मंत्रालय ने बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि अफगानिस्तान द्वारा किए जा रहे ऐसे दावे हमेशा की तरह पूरी तरह से झूठे और बेबुनियाद हैं। पाकिस्तान ने उल्टा तालिबान शासन पर आरोप लगाते हुए कहा कि हकीकत में आतंकवादी शिविर पाकिस्तान में नहीं, बल्कि खुद अफगान तालिबान शासन के सीधे नियंत्रण वाले क्षेत्रों के भीतर फल-फूल रहे हैं और वहीं से सुरक्षित रूप से संचालित और समर्थित हो रहे हैं। दोनों देशों के बीच शुरू हुए इस नए दावों-प्रतिदावों के दौर ने डूरंड लाइन पर सैन्य हलचल और सीमाई तनाव को एक बार फिर चरम पर पहुंचा दिया है।
ब्रिटेन की राजधानी लंदन के उत्तरी इलाके में स्थित बेडफोर्ड के पास शुक्रवार की शाम दो तेज रफ्तार यात्री ट्रेनों के बीच हुई आमने-सामने की भीषण टक्कर से चारों तरफ कोहराम मच गया। इस दर्दनाक रेल हादसे में एक ट्रेन ड्राइवर की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि 89 यात्री गंभीर रूप से घायल हो गए हैं। अधिकारियों के मुताबिक, घायलों में से 11 की हालत बेहद नाजुक बनी हुई है। टक्कर इतनी जोरदार थी कि दोनों ट्रेनों के कई डिब्बे पटरी से उतर गए और मलबे में तब्दील हो गए। घटना की सूचना मिलते ही एयर एम्बुलेंस और ब्रिटिश विशेषज्ञ बचाव दल (Emergency Rescure Team) तुरंत मौके पर पहुंचे और युद्धस्तर पर राहत कार्य शुरू किया।लंदन सेंट पैनक्रास जा रही थीं दोनों ट्रेनें, पटरी से उतरे कई डिब्बेयह खौफनाक रेल हादसा ब्रिटिश समयानुसार शाम करीब 5:15 बजे बेडफोर्ड और ल्यूटन के बीच हुआ। हादसे का शिकार हुई दोनों ट्रेनें दक्षिण की ओर लंदन के मशहूर सेंट पैनक्रास स्टेशन की तरफ जा रही थीं। आपातकालीन स्वास्थ्य अधिकारियों के अनुसार, इस दुर्घटना में कुल 89 लोग हताहत हुए हैं, जिनमें से 11 लोग आईसीयू में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे हैं। इसके अलावा 22 यात्रियों को गंभीर चोटें आई हैं और 56 अन्य लोगों का प्राथमिक उपचार कर छुट्टी दे दी गई है।चश्मदीदों की जुबानी तबाही का मंजर: कुर्सियां बिखरीं, चेहरे खून से सने और पैर टूटेहादसे के बाद के रोंगटे खड़े कर देने वाले पलों को याद करते हुए ट्रेन में सवार यात्री डॉ. पीट नैप ने बताया कि बिना किसी चेतावनी के अचानक एक जोरदार झटका लगा और हम सब सामने वाली सीट पर जा गिरे। देखते ही देखते चारों तरफ धुआं फैल गया, लोग रो रहे थे और मदद के लिए चिल्ला रहे थे। डॉ. नैप ने इस खौफनाक दृश्य की तुलना किसी बड़े बम धमाके से करते हुए कहा— जब मैं होश में आया, तो कुर्सियां हर तरफ बिखरी पड़ी थीं। मुझे लगा जैसे मैं किसी आतंकी बम धमाके का शिकार हो गया हूं। लोगों के चेहरे खून से सने थे और कई यात्रियों के पैर टूट चुके थे। मैं दुबला होने के कारण दरवाजों के बीच के गैप से किसी तरह बाहर निकलने में सफल रहा।एक अन्य महिला यात्री शोला मेने ने रोते हुए बीबीसी को बताया कि जोरदार धमाके के साथ लोग अपनी सीटों से हवा में उछलकर दूर जा गिरे। एक सह-यात्री हवा में उड़ता हुआ आया और सीधे मेरे पति के चेहरे से टकरा गया, जिससे वह लहूलुहान हो गए। ट्रेन के अंदर हर तरफ केवल खून और चीख-पुकार मची थी।पीएम कीर स्टार्मर ने जताया दुख, आरएमटी यूनियन ने दी मृत ड्राइवर को श्रद्धांजलिइस भीषण दुर्घटना पर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि मेरी पूरी संवेदनाएं उस मृत व्यक्ति के परिवार के साथ हैं जिसने इस दुखद हादसे में अपनी जान गंवाई है, और सरकार गंभीर रूप से घायल सभी लोगों के बेहतर इलाज के लिए प्रतिबद्ध है।नेशनल यूनियन ऑफ रेल, मैरीटाइम एंड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स (RMT) के महासचिव एड्डी डेम्पसी ने पुष्टि की कि हादसे में अपनी जान गंवाने वाला व्यक्ति एक सीनियर ट्रेन ड्राइवर था और आरएमटी का पूर्व प्रतिनिधि भी रह चुका था। ट्रेन ड्राइवर्स यूनियन 'Aslef' के प्रमुख डेव काल्फ ने भी मृत ड्राइवर को अपनी भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की।ईस्ट मिडलैंड्स रेलवे की सभी सेवाएं निलंबित, जांच के आदेशरेल ऑपरेटर ईस्ट मिडलैंड्स रेलवे ने आधिकारिक जानकारी साझा करते हुए बताया कि इस भीषण टक्कर में उसकी शाम 4:40 बजे कॉरबी से लंदन सेंट पैनक्रास जाने वाली ट्रेन और शाम 3:50 बजे नॉटिंघम से उसी गंतव्य को जाने वाली एक्सप्रेस ट्रेन शामिल थी।हादसे के बाद रेलवे प्रशासन ने कड़ा कदम उठाते हुए लंदन सेंट पैनक्रास से आने-जाने वाली सभी मुख्य ट्रेन सेवाओं को अगले आदेश तक के लिए पूरी तरह निलंबित कर दिया है। रेलवे ट्रैक को साफ करने और मरम्मत का काम तेजी से चल रहा है, वहीं ब्रिटिश रेलवे दुर्घटना जांच शाखा (RAIB) ने तकनीकी विफलता या मानवीय चूक के एंगल से दुर्घटना के वास्तविक कारणों की उच्च स्तरीय जांच शुरू कर दी है।
अपनों ने ही खोला मोर्चा, भड़के वेंस ने इजरायल को दी सख्त चेतावनी
ईरान के साथ हुए नए प्रारंभिक शांति समझौते को लेकर अमेरिका में एक बहुत बड़ा राजनीतिक तूफान खड़ा हो गया है। इस समझौते को विपक्ष और नीति आलोचकों द्वारा बेहद कमजोर और तेहरान के सामने 'आत्मसमर्पण' करार दिए जाने के बाद चारों तरफ से घिरे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को खुलकर मोर्चा संभाला। ट्रंप ने इन सभी दावों को सिरे से खारिज करते हुए इस बात से साफ इनकार किया है कि अमेरिका ईरान के सामने झुक गया है या उसे किसी भी तरह की भारी वित्तीय राहत सौंपने जा रहा है।व्हाइट हाउस से बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा— हम किसी बेबसी या लाचारी में ईरान से नहीं मिले थे, बल्कि सच यह है कि ईरान खुद हताश और पूरी तरह खत्म हो चुका था। हम इस 60 दिनों की समीक्षा अवधि को बेहद गंभीरता से देखेंगे। इस समझौते के तहत ईरान को कोई पैसा नहीं मिल रहा है, एक सिंगल सेंट भी नहीं!जी-7 शिखर सम्मेलन (G-7 Summit) में भाग लेने के बाद वर्साय में राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा दूरस्थ रूप से हस्ताक्षरित इस प्रारंभिक समझौते का मुख्य उद्देश्य एक व्यापक और स्थायी शांति स्थापित करने की दिशा में अगले 60 दिनों के भीतर तेज गति से काम शुरू करना था। लेकिन शांति की इस कोशिश ने अमेरिका के भीतर ही एक अभूतपूर्व आंतरिक राजनीतिक युद्ध छेड़ दिया है।रिपब्लिकन खेमे और कैपिटल हिल में खुली बगावत, अपनों ने बताया 'सदी की सबसे बड़ी भूल'इस समझौते ने रिपब्लिकन पार्टी को वैचारिक रूप से दो फाड़ कर दिया है। ट्रंप के सबसे वफादार माने जाने वाले कई रिपब्लिकन सीनेटर अब अपनी ही सरकार के इस कदम के खिलाफ खुलकर खड़े हो गए हैं। रिपब्लिकन सीनेटर बिल कैसिडी उन प्रमुख नेताओं में शामिल हैं जिन्होंने अपनी पार्टी के आधिकारिक रुख से पूरी तरह अलग हटकर इस डील की तीखी आलोचना की है। कैसिडी ने इसे पिछले कई दशकों की सबसे खराब अमेरिकी विदेश नीति की भूल करार दिया है।दूसरी तरफ, यह समझौता लेट-नाइट कॉमेडियन्स और सोशल मीडिया ट्रोल्स के लिए भी एक बड़ा मुद्दा बन गया है। सोशल मीडिया पर लोग इस समझौते का उपहास उड़ाते हुए इसकी तुलना 'एक ऐसा युद्ध जीतने से कर रहे हैं जिसकी जीत की रसीद ही कहीं खो गई हो।' व्हाइट हाउस के लिए सबसे गंभीर और चिंताजनक बात यह है कि इस बार आलोचना की यह धार सिर्फ विरोधी डेमोक्रेट्स तक सीमित नहीं है, बल्कि कैपिटल हिल के वे रिपब्लिकन सांसद भी बगावत पर उतर आए हैं जो आमतौर पर ट्रंप के हर फैसले को पत्थर की लकीर मानते थे।इजरायल-समर्थक गुट हैरान: यूरेनियम संवर्धन पर ट्रंप के बदले सुरराष्ट्रपति ट्रंप ने खुद भी कुछ ऐसे चौंकाने वाले बयान दिए हैं जिससे अमेरिका के भीतर सक्रिय इजरायल-समर्थक (Pro-Israel) लॉबी और गुट पूरी तरह हैरान हैं। ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से ईरान के कुछ बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता रखने के अधिकार का समर्थन कर दिया और तेहरान के संवर्धित यूरेनियम (Enriched Uranium) के भंडार के खतरे को काफी कम करके आंका।अमेरिकी राष्ट्रपति अब अप्रत्यक्ष रूप से ईरान के नागरिक परमाणु कार्यक्रम के अधिकार को भी स्वीकार करते दिख रहे हैं, जो उनके उस पुराने चुनावी वादे से बिल्कुल उलट है जिसमें उन्होंने कसम खाई थी कि अमेरिका, ईरान को यूरेनियम के किसी भी स्तर के संवर्धन की अनुमति कभी नहीं देगा। हालांकि, ट्रंप अब भी इस बात पर मजबूती से अड़े हैं कि ईरान को कभी भी अंतिम रूप से परमाणु हथियार (Nuclear Weapon) बनाने की इजाजत नहीं दी जाएगी।ओबामा की जेसीपीओए बनाम ट्रंप की डील: नीति विशेषज्ञों ने दावों की खोली पोलट्रंप प्रशासन का दावा है कि ईरान के साथ हुआ यह नया समझौता एक कूटनीतिक मास्टरस्ट्रोक है और यह पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के साल 2015 के ऐतिहासिक जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (JCPOA) से कहीं ज्यादा बेहतर और मजबूत है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मामलों के नीति विशेषज्ञ इस सरकारी दावे को खुली चुनौती दे रहे हैं।विशेषज्ञों का साफ कहना है कि जहां ओबामा का परमाणु समझौता कई सौ पन्नों का एक बेहद विस्तृत, जटिल और तकनीकी दस्तावेज था, वहीं ट्रंप का यह नया समझौता महज डेढ़ पन्ने का एक अधूरा मसौदा (Draft) है, जो केवल एक साधारण हाथ मिलाने के बदले तेहरान को सब कुछ सौंप देता है। इसी अधूरेपन के कारण ट्रंप के कोर समर्थक भी इस समझौते को पचा नहीं पा रहे हैं।पाकिस्तान रेस से बाहर, कतर बना अमेरिका-ईरान का नया पसंदीदा बिचौलियाइस महा-समझौते के बीच वेंस की स्विट्जरलैंड यात्रा स्थगित होने से मध्यस्थता करने वाले देशों का क्षेत्रीय भू-राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गया है। पड़ोसी देश पाकिस्तान, जिसने खुद को इस पूरे विवाद में मुख्य राजनयिक मध्यस्थ के रूप में स्थापित किया था और अप्रैल महीने में दोनों देशों के बीच आमने-सामने की वार्ताओं की बड़े गर्व से मेजबानी की थी, वह अचानक इस पूरी रेस से बाहर हो गया है।इस्लामाबाद के शीर्ष अधिकारी इस बड़ी उम्मीद में बैठे थे कि वे अमेरिका और ईरान के बीच इस ऐतिहासिक कूटनीतिक डील को अमली जामा पहनाकर एक बड़ी वैश्विक भू-राजनीतिक जीत हासिल करेंगे। लेकिन कतर (Qatar) के अचानक एक बेहद अमीर, प्रभावशाली और पसंदीदा मध्यस्थ के रूप में उभरने से पाकिस्तान की स्थिति अंतरराष्ट्रीय पटल पर बेहद असहज और अपमानजनक हो गई है। पाकिस्तान की हालत अब उस बिन बुलाए शादी के मेहमान जैसी हो गई है जिसे ऐन वक्त पर पता चला कि शादी का वेन्यू ही बदल चुका है।मागा (MAGA) गठबंधन में दरार: वेंस की यरुशलम को दोटूक, नेतन्याहू का पीछे हटने से इनकारइस कूटनीतिक उथल-पुथल का सबसे बड़ा और वास्तविक नुकसान ट्रंप के अपने 'मागा' (MAGA) गठबंधन की आंतरिक शांति को हुआ है। एक तीखे और बेहद आक्रामक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने पारंपरिक कूटनीतिक शालीनता को ताक पर रखते हुए सीधे यरुशलम पर बड़ा हमला बोला। उन्होंने इजरायली अधिकारियों को दोटूक शब्दों में कहा कि वे गहरी नींद से जागें और जमीनी हकीकत को समझें।वेंस ने इजरायली कैबिनेट को कड़े लहजे में याद दिलाया कि उनके दो-तिहाई रक्षा हथियारों का भारी-भरकम खर्च अमेरिकी टैक्सपेयर्स के पैसों से उठाया जाता है। वेंस ने गुस्से में कहा— अगर मैं आज इजरायल सरकार की कैबिनेट में बैठा होता, तो मैं पूरी दुनिया में बचे अपने इकलौते और सबसे शक्तिशाली सहयोगी (अमेरिका) पर इस तरह के बेतुके हमले नहीं कर रहा होता।यह सार्वजनिक टकराव मागा व्हाइट हाउस और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच संबंधों में आई अचानक और बड़ी गिरावट को साफ उजागर करता है। अपनी ही घरेलू राजनीति में कड़े चुनावों का सामना कर रहे इजरायली पीएम नेतन्याहू ने दक्षिणी लेबनान से अपनी सेना को हटाने से साफ तौर पर इनकार कर दिया है, जो सीधे तौर पर राष्ट्रपति ट्रंप के युद्धविराम (Ceasefire) के प्रस्ताव को खारिज करने जैसा है। इस अभूर्व दरार ने अमेरिका-इजरायल के ऐतिहासिक संबंधों को एक बेहद संवेदनशील और खतरनाक मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है।
खैबर पख्तूनख्वा में यात्री वैन को बनाया निशाना, रेस्क्यू टीम पर भी हमला, 7 लोगों की दर्दनाक मौत
पाकिस्तान का बेहद अशांत और हिंसाग्रस्त इलाका खैबर पख्तूनख्वा प्रांत एक बार फिर भीषण बम धमाकों से दहल उठा है। प्रांत के बन्नू जिले में शनिवार को सड़क किनारे एक के बाद एक हुए दो सिलसिलेवार आईईडी (IED) बम धमाकों में कम से कम सात लोगों की मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई, जबकि तीन अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए हैं। स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने इस खौफनाक आतंकी वारदात की आधिकारिक पुष्टि कर दी है। हालांकि, अभी तक किसी भी सक्रिय आतंकी संगठन या प्रतिबंधित समूह ने इस कायरतापूर्ण आत्मघाती कृत्य की जिम्मेदारी नहीं ली है। घटना के तुरंत बाद भारी संख्या में पहुंचे सुरक्षा बलों ने पूरे इलाके की घेराबंदी कर सर्च ऑपरेशन शुरू कर दिया है।बैक-टू-बैक दो ब्लास्ट: पहले यात्री वैन को उड़ाया, फिर मदद के लिए आए लोगों पर किया हमलापुलिस से मिली शुरुआती जानकारी के अनुसार, आतंकियों ने इस हमले को बेहद सोची-समझी साजिश के तहत अंजाम दिया। पहला रिमोट-कंट्रोल आईईडी विस्फोट बन्नू जिले के मार्का बेरा इलाके में एक आम यात्री वैन को निशाना बनाकर किया गया। यह धमाका इतना जोरदार था कि वैन के परखच्चे उड़ गए और उसमें सवार पांच निर्दोष लोगों की मौके पर ही मौत हो गई।इस घटना के तुरंत बाद जब आस-पास के लोग और राहत व बचाव कार्य (Rescure Team) से जुड़े कर्मी घायलों की मदद के लिए दुर्घटनास्थल पर पहुंचे, तो आतंकियों ने उन्हें निशाना बनाते हुए ठीक उसी जगह पर दूसरा बम धमाका कर दिया। इस दूसरे कायरतापूर्ण ब्लास्ट में दो और लोगों ने अपनी जान गंवा दी और बचाव कार्य में लगी एक गाड़ी भी पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई।हाथी खेल गांव से बन्नू शहर जा रही थी वैन, अस्पताल में पसरा मातमबन्नू के जिला पुलिस अधिकारी (DPO) यासिर अफरीदी ने मीडिया को बताया कि निशाना बनाई गई यात्री वैन हाथी खेल गांव से आम नागरिकों को लेकर बन्नू शहर की तरफ जा रही थी, तभी वह मुख्य सड़क पर लगाए गए इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस की चपेट में आ गई।डीपीओ ने बताया कि सभी मृतकों के शवों और खून से लथपथ घायलों को तुरंत पास के जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां कुछ की हालत नाजुक बनी हुई है। कानून प्रवर्तन एजेंसियों और फॉरेंसिक टीमों ने धमाके वाली जगह से बारूद के सैंपल और अन्य महत्वपूर्ण सबूत इकट्ठा करना शुरू कर दिया है ताकि आतंकियों के सुराग का पता लगाया जा सके।मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी ने की कड़ी निंदा, पुलिस से मांगी विस्तृत रिपोर्टइस भीषण आतंकी हमले के बाद खैबर पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी ने घटना की तीव्र शब्दों में कड़ी निंदा की है। उन्होंने प्रांतीय पुलिस महानिदेशक और संबंधित पुलिस अधिकारियों को मामले की गहनता से जांच करने और इस पर एक विस्तृत विस्तृत रिपोर्ट जल्द से जल्द सौंपने का सख्त निर्देश दिया है।मुख्यमंत्री ने इसे बेहद दुखद और दिल दहला देने वाली घटना बताते हुए पीड़ित परिवारों के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त की। उन्होंने स्थानीय प्रशासन को निर्देश दिया कि घायलों को इलाज में कोई कमी न आए और भरोसा दिलाया कि प्रांतीय सरकार दुख की इस घड़ी में प्रभावित परिवारों की हर संभव आर्थिक और चिकित्सीय मदद करेगी।
सीजफायर के कुछ घंटों बाद ही इजरायल ने लेबनान पर किया हमला , 5 की मौत
दक्षिण लेबनान में इजरायली हमले जारी है। हालिया हमले में 5 लोगों की मौत हो गई है। लेबनान की नेशनल न्यूज एजेंसी (एनएनए) ने शनिवार को बताया कि, हिज्बुल्लाह और इजरायल के बीच युद्धविराम लागू होने के 24 घंटों के भीतर ही दक्षिणी लेबनानी शहर सज्द के निकट स्थित जबल अल-रफी क्षेत्र पर एयर स्ट्राइक की गई।
फैक्ट चेक: क्या जर्मनी का विश्व कप फुटबॉल मैच देखने स्टेडियम में हिटलर का हमशक्ल मौजूद था?
कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक तस्वीर तेजी से वायरल हुई जिसमें दावा किया गया कि जर्मनी की कुरासाओ पर 7-1 की जीत के दौरान स्टेडियम में हिटलर जैसा दिखने वाला एक फुटबॉल फैन मौजूद था. लेकिन क्या यह वायरल तस्वीर असली है? बीते रविवार को फीफा वर्ल्ड कप मैच के दौरान जर्मनी का पूरा ध्यान अपनी राष्ट्रीय टीम की कुरासाओ पर 7-1 की शानदार और एकतरफा जीत पर था. हालांकि, मैदान के बाहर, सोशल मीडिया पर बहुत से लोग एक बिल्कुल अलग चीज पर अटक गए थे. वह था स्टेडियम के अंदर के एक प्रशंसक की तस्वीर, जिसने जर्मनी की जर्सी पहन रखी थी, हाथ में जर्मनी का झंडा थाम रखा था और जिसका चेहरा हूबहू हिटलर से मिल रहा था. यह तस्वीर कई प्लेटफॉर्म पर शेयर की गई और इसे लाखों बार देखा गया. मसलन, एक्स पर इस पोस्ट को 30 लाख से ज्यादा बार देखा गया. जबकि, इंस्टाग्राम पर इस पोस्ट को 4,60,000 से ज्यादा लाइक मिले. यह दावा कई अन्य भाषाओं में भी वायरल हुआ. जैसे, फेसबुक पर स्पेनिश भाषा में और थ्रेड्स पर रूसी भाषा में. कुछ सोशल मीडिया पोस्ट में जर्मन विरोधी भावना का असर भी दिखा. जैसे, रेडिट की एक पोस्ट में ताना मारते हुए लिखा गया था, यह देखना हमेशा ही लाजवाब होता है कि जब प्रशंसक अपनी टीम का हौसला बढ़ाने के लिए इस तरह खुलकर सामने आते हैं!” हालांकि, यह तस्वीर असली नहीं है. डीडब्ल्यू ने फैक्ट चेक में पाया कि यह तस्वीर नकली है और एआई की मदद से छेड़छाड़ करके तैयार की गई है. इस तस्वीर की सच्चाई का पता लगाने के लिए, हमने कई तरीके अपनाए. 1. असली तस्वीर देखें हिटलर जैसे दिखने वाले शख्स की यह कथित तस्वीर मैच के टीवी ब्रॉडकास्ट का एक स्क्रीनशॉट लगती है, जिसमें पहले हाफ के स्टॉपेज टाइम का टाइमस्टैम्प भी है. यह ठीक उसी समय की बात है, जब काई हावेर्त्स ने पेनल्टी को गोल में बदलकर जर्मनी को 3-1 की बढ़त दिला दी थी. उस वक्त स्टेडियम में मौजूद प्रशंसक बेहद खुश थे और जश्न मना रहे थे. जब मैच के असली ब्रॉडकास्ट को दोबारा देखा गया, तो उसमें फैंस का वही समूह हावेर्त्स के गोल के बाद जश्न मनाता हुआ दिखाई देता है, लेकिन उसमें एक अहम अंतर दिखा. हिटलर जैसा दिखने वाला वह कथित शख्स उस पूरी फुटेज में कहीं भी नहीं दिखा. इसके बजाय, असली फुटेज में भूरे बालों वाला एक व्यक्ति दिखता है, जो हिटलर जैसा बिल्कुल नहीं लगता. ऊपर दी गई दोनों तस्वीरों के बीच स्लाइड करके, यह अंतर साफ तौर पर देखा जा सकता है. एक तस्वीर असली ब्रॉडकास्ट की है, जो दाईं ओर जर्मन पब्लिक ब्रॉडकास्टर एआरडी की फुटेज है. जबकि, दूसरी तस्वीर वह है जिससे एआई की मदद से छेड़छाड़ करके तैयार किया गया है. यहां यह समझना जरूरी है कि वर्ल्ड कप जैसे बड़े खेल आयोजनों के लिए, मैच का मुख्य लाइव वीडियो खुद आयोजन करने वाली संस्था तैयार करती है. इस मामले में, फीफा ने तैयार किया है. फिर इसी मुख्य वीडियो फीड को दुनिया भर के पार्टनर चैनलों और ब्रॉडकास्टर्स को सेंट्रल फीड के तौर पर दिया जाता है. इसका मतलब यह है कि सभी चैनलों पर दिखाए जाने वाले मुख्य वीडियो (मैच के दृश्य) बिल्कुल एक जैसे होते हैं. बस, अलग-अलग चैनल अपनी जरूरत के हिसाब से उसमें छोटे-मोटे बदलाव करते हैं, जैसे कि अपना लोगो लगाना या स्कोरबोर्ड का रंग बदलना. लाइव टेलीकास्ट के अलावा, उस फैंस के समूह में कौन-कौन लोग शामिल थे, इसका एक और सुराग उन फोटो एजेंसियों की तस्वीरों को देखकर लगाया जा सकता है जिन्हें इस मैच को कवर करने की आधिकारिक अनुमति मिली हुई थी. उदाहरण के लिए, बर्लिन की एक एजेंसी इमागो की नीचे दी गई तस्वीर देखिए. इमागो अक्सर बड़े खेल आयोजनों को कवर करती है. इस फोटो में प्रशंसकों के उसी समूह को एक अलग एंगल से दिखाया गया है और यहां भी हिटलर जैसा दिखने वाला कोई शख्स मौजूद नहीं है. भले ही, फोटो एजेंसी द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर उस सटीक समय का पता लगाना मुमकिन नहीं था, जब यह तस्वीर खींची गई थी. फिर भी, इसे इस बात का एक और पक्का सबूत माना जा सकता है कि प्रशंसकों के उस समूह में हिटलर जैसा कोई भी आदमी शामिल नहीं था. 2. क्या यह एआई से तैयार की गई तस्वीर है? इस तस्वीर के असली होने की जांच करने का अगला कदम यह पता लगाना है कि क्या इसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का इस्तेमाल करके बनाया गया है या इसमें कोई बदलाव किया गया है. कई एआई चैटबॉट्स अब यह जांच करने की सुविधा भी देते हैं कि क्या उनके सिस्टम का इस्तेमाल किसी तस्वीर को बनाने या उसमें कोई बदलाव करने के लिए किया गया था. यह इसलिए मुमकिन है, क्योंकि ऐसे एआई टूल तस्वीर के अंदर एक डिजिटल वॉटरमार्क छिपा देते हैं. यह वॉटरमार्क हमारी खुली आंखों से दिखाई नहीं देता, लेकिन जब इस तकनीक (टूल) का इस्तेमाल करके तस्वीर की जांच की जाती है, तो इसे आसानी से पकड़ा जा सकता है. चैटजीपीटी बनाने वाली अमेरिकी संस्था ‘ओपनएआई' के जरिए की गई जांच से पता चलता है कि हिटलर जैसे दिखने वाले शख्स की इस तस्वीर को बनाने के लिए वाकई उनके ही एआई टूल का इस्तेमाल किया गया था. ओपनएआई के विश्लेषण में कहा गया कि उसे ‘तस्वीर के भीतर एक सिंथ-आईडी वॉटरमार्क मिला है जो खुद ओपनएआई सिस्टम से ही तैयार हुआ था.” गूगल के जेमिनी टूल की मदद से की गई एक और जांच से कुछ नए सबूत मिलते हैं. इससे पता चलता है कि इमेज में बदलाव करने के लिए, गूगल एआई के किसी सिस्टम का इस्तेमाल नहीं किया गया था, लेकिन इसमें यह भी कहा गया है कि तस्वीर का विश्लेषण करने और उसके संदर्भ की जांच करने से साफ पता चलता है कि इस फोटो में डिजिटल तौर पर बदलाव किया गया है या इसे डिजिटल तरीके से बनाया गया है.” एक तीसरा टूल है, एक्स का ग्रोक. यह टूल इस इमेज को ‘पूरी तरह नकली' बताता है. यह वायरल पोस्ट के नीचे, एक्स पर एक यूजर के सवाल का जवाब देते हुए ऐसा कहता है. इसमें आगे कहा गया है, यह तस्वीर असली नहीं है. इसमें डिजिटल तौर पर बदलाव (एआई या फोटोशॉप) करके, 2026 वर्ल्ड कप की भीड़ में हिटलर को दिखाया गया है. हालांकि, इन टूल का इस्तेमाल हमेशा सावधानी से किया जाना चाहिए, क्योंकि इनसे कभी-कभी गलतियां हो सकती हैं. लेकिन, इस मामले में तीन अलग-अलग टूल एक जैसे नतीजे पर पहुंचे, जिससे ओरिजिनल फुटेज के आधार पर किए गए विश्लेषण की पुष्टि हुई. 3. संदर्भ के बारे में सोचें एक तरफ जहां वर्ल्ड कप को एक बड़े उत्सव के रूप में देखा जाता है जो दुनिया भर के प्रशंसकों और संस्कृतियों को एक साथ लाता है. वहीं, दूसरी तरफ अगर स्टेडियम में सचमुच उस नाजी तानाशाह जैसा कोई प्रशंसक मौजूद होता जिसने दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत की थी और जो होलोकॉस्ट (यहूदियों के नरसंहार) का जिम्मेदार था, तो इससे स्टेडियम में बहुत बड़ा विवाद खड़ा हो जाता. ऐसी घटना पर ब्रॉडकास्टर्स या स्टेडियम के अधिकारियों का ध्यान तुरंत जाता. साथ ही, स्टेडियम में मौजूद कई जर्मन प्रशंसक भी इस पर कड़ा विरोध जताते. इसके अलावा, ध्यान देने वाली बात यह भी है कि इस तस्वीर में हिटलर जैसा दिखने वाला वह कथित शख्स काले, लाल और सुनहरे रंग की जर्मनी की जर्सी पहने हुए दिखाई दे रहा है. ये राष्ट्रीय रंग जर्मनी की लोकतांत्रिक परंपरा और संघीय गणराज्य की पहचान हैं. भले ही, दक्षिणपंथी चरमपंथियों और लोकलुभावन राजनीति करने वाले नेताओं ने लंबे समय से इन रंगों और झंडे को अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश की है, लेकिन काला, लाल और सुनहरा रंग असल में जिन मूल्यों और विचारों का प्रतीक है, वे हिटलर और नाजीवाद की सोच के बिल्कुल खिलाफ हैं. हिटलर की नजर में ये रंग एक कमजोर संसदीय प्रणाली के प्रतीक थे, जिसे उसने आगे चलकर पूरी तरह से खत्म कर दिया था. यह फर्जी तस्वीर झूठी और भ्रामक खबरों के उस बड़े ट्रेंड का हिस्सा है जिसमें से ज्यादातर को एआई की मदद से तैयार किया गया है या बदलाव किया गया है. ऐसी तस्वीरें वर्ल्ड कप शुरू होने से पहले से लेकर मैच खेले जाने के दौरान लगातार इंटरनेट पर वायरल हो रही हैं.
तालिबान के नए कानून से महिलाओं की आजादी पर खतरा, यूएन विशेषज्ञों ने जताई चिंता
संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि पति-पत्नी के अलग होने की शर्तों को तय करने के लिए तालिबान के नए आदेश से न सिर्फ बाल विवाह को बढ़ावा मिल सकता है, बल्कि महिलाओं और लड़कियों के लिए हिंसक और अत्याचार भरे रिश्तों से बाहर निकलना भी बहुत मुश्किल हो सकता है।
इजरायल और हिज्बुल्लाह के बीच संघर्ष में राहत, युद्धविराम पर बनी सहमति
इजरायल और हिज्बुल्लाह के बीच युद्धविराम पर सहमति बन गई है। यह जानकारी शुक्रवार को इजरायली अधिकारियों के हवाले से दी गई।
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस: अमेरिका के लिंकन मेमोरियल पर जुटे सैकड़ों योग प्रेमी
लिंकन मेमोरियल पर शुक्रवार सुबह भारतीय के दूतावास ने 12वें अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का आयोजन किया। इस दौरान सैकड़ों योग प्रेमी एकत्र हुए।
पाकिस्तानी बलों पर नागरिकों की हत्या और गायब करने का आरोप, मानवाधिकार संगठनों ने की जांच की मांग
बलूचिस्तान में आम लोगों के खिलाफ हिंसा लगातार जारी रहने के बीच, प्रमुख मानवाधिकार संगठनों ने यह आरोप लगाया कि पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने दो नागरिकों की बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के हत्या कर दी और दो अन्य लोगों को जबरन गायब कर दिया।
दैनिक भास्कर की नई सीरीज ‘स्पाई फाइल्स’ के पहले एपिसोड में कहानी ऐसे भारतीय जासूस की जिसने खुफिया जानकारी भेजकर भारत के 20 हजार से ज्यादा सैनिकों की जान बचाई… साल 1981 और जगह पाकिस्तानी सेना का रावलपिंडी हेडक्वार्टर। सुबह की धुंध अभी छंटी नहीं थी। वर्दी पहने 29 साल का एक नौजवान तेज कदमों से अपने दफ्तर की ओर बढ़ रहा था। कसरती बदन, तीखे नैन-नक्श और रौबीली शख्सियत- जैसे किसी फिल्म का हीरो हो। उसकी चमकती नेमप्लेट पर नाम लिखा था- 'मेजर नबी अहमद शाकिर'। मेजर नबी अपने केबिन में दाखिल हुआ। कोट उतारकर कुर्सी पर रखते ही उसकी निगाहें बगल की मेज पर पड़ीं। वहां 'मोस्ट सीक्रेट' की लाल मुहर लगी कुछ नई फाइलें रखी थीं। नबी ने इधर-उधर देखा, कोई हलचल नहीं थी। उसने गहरी सांस ली और फाइल उठाकर पन्ने पलटने लगा। अब मेजर के चेहरे की रंगत उड़ने लगी। माथे पर पसीने की बूंदें उभरने लगीं। फाइल में लिखा था- ‘पाकिस्तानी फौज अब राजस्थान बॉर्डर की तरफ कूच करेगी। टैंक, तोपें और भारी असलाह रवाना करने की तैयारी मुकम्मल की जाए।।’ उसने बुदबुदाते हुए फाइल वापस रख दी। शाम को जब नबी घर पहुंचा, तो बीवी अमानत दरवाजे पर खड़ी थी। ‘अस्सलामु अलैकुम नबी साहब! बड़े थके-थके लग रहे हैं, चाय लाऊं क्या?’ नबी ने बिना नजरें मिलाए धीमे से कहा, ‘नहीं अमानत, मन नहीं है। जरा आराम करना चाहता हूं।’ अमानत का चेहरा उतर गया। ‘आज डिनर भी नहीं करेंगे? आपकी पसंद का शोरबा बना है।’‘जी नहीं अमानत, भूख नहीं है,’ कहकर नबी सीधे अपने कमरे में गया और बिस्तर पर लेट गया। रात के दो बजे। रावलपिंडी शहर गहरी नींद सो रहा था। नबी ने धीरे से करवट बदली और अमानत की तरफ देखा। उसकी गहरी सांसें बता रही थीं कि वह सो चुकी है। नबी दबे पांव उठा और स्टडी रूम में दाखिल हुआ। उसने मेज पर रखे एक कागज पर कोड वर्ड में लिखना शुरू किया- ‘राजस्थान बॉर्डर पर हजारों की संख्या में पाकिस्तानी फोर्स भेजी जा रही है। जंगी हथियार और टैंकों की मूवमेंट शुरू हो चुकी है। बड़े-बड़े अफसर सरहद पर डिप्लॉय किए जा रहे हैं। तुरंत अलर्ट होना होगा।’ नबी ने खत मोड़कर फाइलों के बीच छुपाया और चुपचाप बिस्तर पर जाकर लेट गया। अगली सुबह मेजर नबी जल्दी घर से निकला। दफ्तर जाने के बजाय वे पोस्ट ऑफिस पहुंचा। एक लिफाफा निकाला, जिस पर दुबई का एक पता लिखा था। अपना लिखा कागज का टुकड़ा लिफाफे में डाला और उसे अच्छी तरह सील करके पोस्ट कर दिया। फिर नबी दफ्तर चला गया। कुछ दिनों बाद मेजर नबी का यही खत दुबई के बजाय दिल्ली के लोधी रोड में भारत की खुफिया एजेंसी, रिसर्च एंड एनालिसिस विंग यानी RAW के दफ्तर में एक अधिकारी को मिला। भारत की सुरक्षा एजेसियां तत्काल अलर्ट मोड में आ गईं। राजस्थान बॉर्डर पर भारी तादाद में सैनिक और हथियार भेजे जाने लगे। भारत की युद्ध स्तर की तैयारी और सीमा पर बढ़ते दबाव को देख पाकिस्तान के जनरल ठिठक गए। उन्हें अपने कदम पीछे खींचने पड़े। अंग्रेजी अखबार टेलीग्राफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक मेजर नबी ने खुफिया जानकारी भेजकर करीब 20 हजार भारतीय जवानों की जान बचाई थी। तब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मेजर नबी अहमद की तारीफ करते हुए उन्हें ‘ब्लैक टाइगर’ नाम दिया था। आखिर कौन थे मेजर नबी अहमद, जो पाकिस्तान की फौज में होकर भी भारत के लिए काम कर रहे थे… कहानी की शुरुआती होती है 1973 से। यूपी की राजधानी लखनऊ में नेशनल थियेटर फेस्टिवल हो रहा था। 21 साल का एक लड़का फौज की वर्दी में स्टेज पर गिरा हुआ था। एकदम लहूलुहान। 4-5 चीनी सैनिकों ने उसे घेर रखा था। ‘उगल दे! तेरी फौज की अगली हरकत क्या है? बता, वर्ना तेरी खाल उतारकर हम अपनी वर्दी सिलवा लेंगे!’ लड़का दर्द से कराहता है, लेकिन फिर ठहाका मारकर हंसता है। उसकी आंखों में जरा भी खौफ नहीं है। वह पूरा जोर लगाकर कहता है- ‘हिंदुस्तानी सिपाही की जुबान सिर्फ तिरंगे के सामने खुलती है, तुम जैसे भेड़ियों के सामने नहीं! मारो! जितना दम है, मार लो!’ तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा हॉल गूंज उठा। शो के बाद… वो लड़का अपना मेकअप साफ कर रहा था, तभी भारी जूतों की आहट सुनाई पड़ी। आंखों पर बड़े फ्रेम का चश्मा लगाए एक रोबिला शख्स उसके सामने खड़ा था। साथ में उसी कद-काठी के दो और बंदे दीवार से सटकर खड़े हो गए। वो लड़का चौंका… तभी रोबिला शख्स बोल पड़ा- ‘अदाकारी अच्छी थी मियां, एकदम जान डाल दी।’ लड़का- ‘शुक्रिया जनाब। आप?’ रोबिला शख्स (पास आकर, नीची आवाज में) हम वो पारखी हैं जो असली हीरे की पहचान रखते हैं। क्या रियल लाइफ में भी मुल्क के लिए यही जज्बा दिखा सकते हो? ‘उसके लिए क्या करना होगा?’ लड़के ने पूछा। ‘RAW के लिए काम करोगे?’ 'ये RAW क्या है?' रोबिला शख्स- ‘ये भारत की खुफिया एजेंसी है। इसके लिए काम करना मतलब हथेली पर जान रखकर चलना। दूसरे मुल्क की मांद में जाकर जासूसी करना।’ लड़का थोड़ा रुककर बोलता है- ‘माफ कीजिएगा साहब, मैं अपनी मां को छोड़कर इतनी दूर नहीं जा सकता।’ ‘तुम्हारे पापा एयरफोर्स थे। ये देश भी तो तुम्हारी मां है। तुम इसके लिए आगे नहीं आओगे, तो कौन आएगा… सोचकर बताना हम फिर मिलेंगे।’ उसने लड़के को एक कागज दिया, ‘ये लो। इस पर अगली मुलाकात का पता और वक्त लिखा है। सोच लेना... या तो तालियां बटोरने वाले एक्टर बने रहो, या इतिहास बदलने वाला सिपाही बनो। हम फिर मिलेंगे।’ लड़के ने कागज का टुकड़ा अपनी जेब में रखा और रेलवे स्टेशन की तरफ निकल पड़ा। अगले दिन वो राजस्थान में पाकिस्तान बॉर्डर पर बसे श्रीगंगानगर पहुंच गया। वो लड़का इसी जिले का रहने वाला था और एक कॉलेज से बीकॉम कर रहा था। कॉलेज में उसकी टक्कर का कोई नहीं था। दोस्त उसे विनोद खन्ना कहकर बुलाते थे। एक्टिंग का सपना पूरा करने के लिए ही वो लखनऊ में थिएटर करने गया था। उस लड़के का नाम था- रविंद्र कौशिक। वह चार भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर था। पिता एयरफोर्स से रिटायर्ड होने के बाद श्रीगंगानगर में एक कंपनी में सेल्स ऑफिसर थे। मां घर संभालती थीं। लखनऊ में थिएटर के दौरान जो लोग रविंद्र से मिले थे, वे वाकई RAW के लोग थे और पिछले कई दिनों से उस पर निगाह रखे थे। रविंद्र कौशिक पर लिखी किताब ‘ब्लैक टाइगर एक भारतीय जासूस’ के मुताबिक- ‘लखनऊ से श्रीगंगानगर लौटते ही रविंद्र सीधे अपने कमरे में गया। दीवार पर भगत सिंह की फोटो लगी हुई थी। रातभर वह भगत सिंह के बारे में सोचता रहा। 23 साल की उम्र में कोई फांसी के फंदे को कैसे चूम सकता है? रविंद्र ने खुद से सवाल किया। फिर भगत सिंह की उन आंखों में देखते हुए उसे अपना जवाब मिल गया- ‘जुनून। देश के लिए मर-मिटने का जुनून।’ फिर उसकी आंख लग गई। सुबह मां ने आवाज दी- ‘रवि बेटा उठ जाओ... कॉलेज नहीं जाना क्या?’ रविंद्र तैयार होकर घर से कॉलेज के लिए निकला, लेकिन उसके मन में RAW अधिकारी की बात गूंज रही थी। वो कॉलेज के बजाय RAW अफसरों से मिलने निकल पड़ा। श्रीगंगानगर में रेल की पटरियों के पास एक पुराना कमरा था। उसके करीब से ही एक नाला बहता था। रविंद्र उसी जगह बैठकर इंतजार करने लगा। तभी आवाज आई- ‘रोड पर जो गाड़ी खड़ी है, उसमें बैठ जाओ।’ रविंद्र गाड़ी में बैठ गया। कुछ देर बाद वह एक खंडहरनुमा घर में पहुंचा। RAW का एक अफसर दीवार पर रखे पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर यानी पीओके के नक्शे पर कलम से कुछ निशान लगा रहा था। रविंद्र को देखते ही अफसर ने कहा- ‘तुम मिशन के लिए तैयार हो या नहीं, ये पूछकर मैं वक्त बर्बाद नहीं करूंगा। तैयार हो इसलिए ही यहां हो। आज से तुम्हारा सारा रिकॉर्ड जला दिया जाएगा। तुम कौन हो, कहां से आए हो, सब खत्म। आज रात तुम्हें दिल्ली निकलना है। और याद रखना, ये राज किसी को पता न चले... अपनी मां को भी नहीं।’ रविंद्र के जेहन में एक धमाका सा हुआ। 'आज ही? इतनी जल्दी? क्या मैं वाकई ये कर पाऊंगा?' पर, वो अफसरों से कुछ कह नहीं पाया। घर पहुंचते ही रविंद्र अपने कमरे में गया। काफी देर तक सोचता रहा। फिर मां को बताया- ’मुझे आज ही दिल्ली जाना है। मेरी नौकरी लग गई है।’ मां अमला देवी- ‘एक दो दिन बाद जाते तो कुछ तैयार कर देती तुम्हारे लिए।’ ‘नहीं मां... अगर आज नहीं गया तो ये नौकरी हाथ से निकल जाएगी। बहुत बड़ी कंपनी है, ऐसा मौका दोबारा नहीं मिलेगा।’ रविंद्र ने सामान पैक किया और दिल्ली जाने वाली ट्रेन में बैठ गया। दिल्ली पहुंचे ही वह RAW अधिकारियों से मिला। जल्द ही उसकी ट्रेनिंग भी शुरू हो गई।’ रविंद्र कौशिक की बायोग्राफी लिखने वालीं मीनाक्षी अपनी किताब ‘द ब्लैक टाइगर’ में लिखती हैं- ‘सबसे पहले रविंद्र को इस्लाम धर्म की शिक्षा दी गई। उर्दू बोलना सिखाया गया। पाकिस्तान का भूगोल, नक्शा, रहन-सहन और अलग-अलग शहरों के बारे में बताया गया। मौलवी का काम सिर्फ भाषा सिखाना नहीं था, बल्कि रविंद्र के जेहन में पाकिस्तान की रूह को उतारना था।' एक रोज मौलवी ने रविंद्र से कहा - ‘बेटा, उर्दू सिर्फ लफ्जों का मेल नहीं है, ये तहज़ीब है। तुम्हारे लफ़्जों में वो झलकनी चाहिए। तुम्हारी बातचीत में वो खनक होनी चाहिए जो लाहौर की गलियों में सुनाई देती है।’ रविंद्र ने दिन-रात एक कर दिए। कुरान की आयतें जबान पर चढ़ गईं, नमाज का तरीका रगों में बस गया। उसे सिखाया गया कि एक आम पाकिस्तानी कैसे चाय पीता है, कैसे बड़ों को सलाम करता है। बीच-बीच में रविंद्र, दिल्ली से श्रीगंगानगर आता था। भाई-बहनों के लिए कपड़े लाता था। दोस्तों से मिलता, लेकिन किसी को अपनी ट्रेनिंग के बारे में नहीं बताता।’ 1974 में वो फिर से श्रीगंगानगर आया। उसके जिगरी दोस्त राजकुमार गौड़ की शादी थी, जो बाद में कांग्रेस के विधायक बन गए। शादी में रविंद्र ने खूब मस्ती की। अपने अंदाज में डांस किया। ढेर सारी तस्वीरें खिंचाईं, पर राज को राज ही रहने दिया। राजकुमार गौड़ ने कई बार टोका भी तुम थोड़े बदले-बदले लग रहे हो, पर रविंद्र ने हंसकर उनकी बात टाल दी। गौड़ साहब के पास आज भी रविंद्र की वो तस्वीरें हैं। जिसे दिखाते वक्त उनका मलाल भी जुबान पर आ ही जाता है- ‘वो मुझसे कुछ छुपाता नहीं था। पर उसने कुछ भी जाहिर नहीं होने दिया। अफसोस तो है, लेकिन उस पर नाज भी है कि उसने देश को सबसे आगे रखा।’ पाकिस्तान के एक बड़े हिस्से में पंजाबी बोली जाती है। श्रीगंगानगर, पाकिस्तान बॉर्डर से सटा हुआ है। इस वजह से रविंद्र के पंजाबी बोलने का लहजा भी आम पाकिस्तानियों जैसा था। रविंद्र को दिल्ली के अलावा पाकिस्तान से लगे अमृतसर और पठानकोट में भी ट्रेनिंग दी गई। ताकि, वो पाकिस्तान का कल्चर समझ सके। एक रोज RAW के अधिकारी ने उसे सुबह-सुबह दफ्तर बुलाया। कहा- ‘तुमने बहुत कम वक्त में सब सीख भी लिया, लेकिन एक कमी रह गई है। हम शक की जरा भी गुंजाइश नहीं छोड़ सकते।’ ‘क्या कमी साहब…?’ रविंद्र ने पूछा। RAW अधिकारी- ‘तुम्हारी पहचान…। ये कागज लो और लिखे पते पर चले जाओ।’ अगले दिन रविंद्र उस पते पर पहुंचा। एक बंद कमरा। हवा में डिटॉल और सर्जिकल स्पिरिट की तीखी गंध। एक स्ट्रेचर और ऊपर एक तेज सर्जिकल लाइट। पास ही एक ट्रे में सर्जिकल चाकू और कैंची रखी थी। आला लटकाए वहां खड़े डॉक्टर ने कहा- ‘इसपर लेट जाओ।’ रविंद्र समझ गया कि उसका खतना होने वाला है। थोड़ा रुककर उसने कहा- ‘लेट जाऊं पर क्यों?’ डॉक्टर- ‘ये तुम्हारे पुराने वजूद की आखिरी निशानी है। इसे मिटाने का मतलब समझते हो? इसके बाद तुम फिर कभी 'रविंद्र' नहीं बन पाओगे। अब भी वक्त है, पीछे हट सकते हो।’ रविंद्र के दिमाग में पुरानी बातें घूमने लगीं। ‘मां का मुस्कुराता चेहरा, दोस्तों के साथ थियेटर की मस्ती, और फिर दीवार पर टंगी भगत सिंह की तस्वीर।’ रविंद्र ने गहरी सांस लेते हुए कहा- ‘आप अपना काम कीजिए डॉक्टर साहब। मैं पीछे नहीं हटूंगा।’ डॉक्टर ने एनेस्थीसिया का इंजेक्शन तैयार किया। रविंद्र ने अपनी मुट्ठियां भींच लीं। चेहरे की नसें तन गईं, पर उसके मुंह से कोई चीख नहीं निकली। RAW अफसर- (अंधेरे से बाहर आते हुए) शाबाश… आज से तुम्हारी रगों में दौड़ता हुआ खून भी कहेगा कि तुम एक सच्चे मुसलमान हो। वेलकम टू द वर्ल्ड ऑफ शैडोज।’ अब तक 1975 की शुरुआत हो गई थी। रविंद्र ने RAW अफसर से कहा- ‘सर, मैं मिशन पर जाने से पहले एक बार घर जाना चाहता हूं।’ RAW अफसर- पर क्यों?’ रविंद्र ‘नौकरी के बहाने दिल्ली तो आ गया, लेकिन समझ नहीं आ रहा कि पाकिस्तान जाने की बात घर वालों को कैसे बताऊं, क्या बहाना करूं?’ RAW अधिकारी ने कहा- ‘घर पर बता दो कि तुम्हारी दुबई में नौकरी लग गई है। हम दुबई के पते से तुम्हारे खत परिवार तक भिजवा देंगे। किसी को शक भी नहीं होगा।’ अगली सुबह रविंद्र श्रीगंगानगर पहुंचा। घर में अंदर जाते ही उछलकर बोला- ‘मां, दुबई वाली कंपनी का कन्फर्मेशन आ गया है। शानदार सैलरी है, अब तुम्हारे सारे दुख दूर हो जाएंगे।’ मां खुशी से रविंद्र का सिर चूमती है। ‘कब जाना है बेटा?’ रविंद्र मां के कंधे पर हाथ रखते हुए कहता है - ‘बस, कागजी कार्रवाई के लिए अभी दिल्ली निकलना होगा। वहां से फिर दुबई जाना है।’ इसके बाद रविंद्र ने दिल्ली के लिए ट्रेन पकड़ ली। अगली सुबह वो RAW के दफ्तर में था। रविंद्र के पुराने डॉक्यूमेंट नष्ट कर दिए और नया नाम दिया ‘नबी शाकिर अहमद’। ये नाम उसके भीतर इस तरह भर दिया गया कि वह गलती से भी अपनी पुरानी पहचान जाहिर ना कर सके। उसे बताया गया कि वो इस्लामाबाद का रहने वाला है और उसके अम्मी-अब्बू दंगों में मारे जा चुके हैं। इसके बाद एक रोज रविंद्र को पाकिस्तान जाने वाली बस में बैठा दिया गया। ये बस अमृतसर से लाहौर जाती थी। कुछ देर बाद अचानक बस रुकी। पाकिस्तानी चेक पोस्ट पर दस्तावेज जांचे जा रहे थे। आगे की सीट पर बैठा एक आदमी डरा हुआ था। पाकिस्तान आर्मी वालों ने जैसे ही उसका डॉक्यूमेंट देखा, वे आग बबूला हो गए। गाली देते हुए उसके सिर पर बंदूक की बट मारी, खून के छींटे रविंद्र के कपड़ों पर पड़े। रविंद्र थोड़ा पीछे हटा तभी पाकिस्तानी फौजी बोल पड़ा- ‘मियां तुम भी हिंदुस्तानी तो नहीं हो, कागज निकालो।’ पाकिस्तान जाने के बाद रविंद्र को एक लड़की से प्यार हो गया। वह मन ही मन सोचने लगा कि ये प्यार कहीं उसके मिशन में रोड़ा तो नहीं बनेगा। इसी कश्मकश में उसने RAW को चिट्ठी भेजी- ‘मुझे एक लड़की से प्यार हो गया है। मैं उससे शादी करना चाहता हूं।’ रविंद्र की चिट्ठी के जवाब में RAW ने क्या कहा…पूरी कहानी कल यानी रविवार को पढ़िए ‘ब्लैक टाइगर रविंद्र कौशिक’ पार्ट-2 में…
14 जून को उद्धव ठाकरे ने मातोश्री में सांसदों की बैठक बुलाई। 9 में से सिर्फ 4 सांसद पहुंचे। तभी तय हो गया कि पार्टी में बड़ी फूट होने वाली है। 16 जून को 6 सांसद दिल्ली पहुंचे और 17 जून को लोकसभा स्पीकर से मिले। इसी दिन खबरें आईं कि दो सांसद संजय दीना पाटिल और ओमप्रकाश निंबालकर 18 जून को वापस शिवसेना (उद्धव गुट) की संसदीय बैठक में जा सकते हैं, लेकिन शाम को डिप्टी CM एकनाथ शिंदे ने जूम कॉन्फ्रेंस कॉल पर सभी सांसदों से बात की और वे शिवसेना (शिंदे गुट) में विलय के लिए तैयार हो गए। सोर्स बताते हैं कि शिंदे की यही कॉल टर्निंग पॉइंट रही। शिंदे ने 6 सांसदों को अगले लोकसभा चुनाव में टिकट और फ्यूचर सिक्योर करने का भरोसा दिया। सभी सांसद आज, यानी 20 जून को शिंदे से मिलेंगे और लेटर जारी कर बताएंगे कि उन्होंने उद्धव की शिवसेना क्यों छोड़ी। सोर्स बताते हैं कि शिंदे का अगला टारगेट उद्धव गुट के तीन MLC और BMC के 65 पार्षद हैं। 2 बातें, जो उद्धव का साथ छोड़ने की वजह मानी जा रहीं 1. पार्टी में संजय राउत और उद्धव की पत्नी रश्मि ठाकरे की दखलंदाजी। बागी सांसदों के मुताबिक, संजय का नेताओं के साथ बर्ताव सही नहीं है, लेकिन उद्धव उनके खिलाफ कुछ नहीं सुनते। 2. सांसदों को अपने संसदीय क्षेत्र में काम के लिए फंड नहीं मिलता। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को समाधान बैठक करने और क्षेत्रों का दौरा करने के लिए कहा, लेकिन कुछ नहीं हुआ। 40 मिनट की बातचीत, शिंदे का सांसदों को मैसेज- आपके लिए हमेशा खड़ा हूं शिवसेना से जुड़े सोर्स बताते हैं, ‘दिल्ली पहुंचे उद्धव गुट के 6 बागी सांसद लगातार एकनाथ शिंदे के संपर्क में थे। शिंदे ने करीब 40 मिनट उनसे बात की और कहा कि मैं हर फैसले में आपके साथ खड़ा हूं।’ ’सांसदों को संसदीय क्षेत्र में विकास के लिए पर्याप्त बजट के साथ अगले लोकसभा चुनाव में टिकट की गारंटी और Y-श्रेणी सुरक्षा देने का भरोसा दिया गया। शिंदे से वन-टू-वन बात करने के बाद सभी सांसदों का उद्धव गुट छोड़ने का फैसला और मजबूत हो गया।’ क्या संजय राउत और रश्मि ठाकरे की दखलंदाजी से फिर टूटी पार्टी इसके बाद हमने बागी सांसदों से संपर्क करने की कोशिश की। दो से बात हुई। अभी सांसद औपचारिक तौर पर शिंदे गुट में शामिल नहीं हुए, इसलिए नाम सामने नहीं लाना चाहते। हमने दोनों सांसदों से पूछा कि उद्धव की पार्टी से अलग होने की सबसे बड़ी वजह क्या फंड न मिलना है। पहले सांसद ने जवाब दिया, 'फंड हमारा अधिकार है, लेकिन वो भी भीख की तरह मिलता है। जब फंड ही नहीं होगा, तो हम क्या काम करवाएंगे। फंड का हिसाब ऐसे लेते हैं कि जैसे चोर हों।' दूसरे सांसद ने कहा, फंड का ऑडिट करना ठीक है, लेकिन पहले फंड तो जारी करें। दूसरी बात पार्टी हमारी भी है, इसलिए फैसला लेने में हमारी भी भागीदारी होनी चाहिए। कई बार लगता है कि हम बाहरी हैं। पार्टी बस 3 लोगों की है। कौन तीन लोग, क्या उद्धव, रश्मि और संजय राउत? जवाब मिला- ‘सबको पता है, अब नाम लेकर क्या फायदा।‘ हमने पूछा- पार्टी में फैसले कौन लेता है? पहले सांसद जवाब में कहते हैं, ‘सबको पता है, संजय राउत पार्टी में सबसे ताकतवर नेता हैं। उद्धव उनके खिलाफ कुछ नहीं सुनते। संजय कई बार बिना सोचे समझे किसी को कुछ भी बोल देते हैं। अपमानजनक भाषा तो उनकी जुबान पर रहती है।’ ’हमारे पार्टी छोड़ने को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कैसी भाषा इस्तेमाल की, वो सबने देखा। फिर मीडिया से ये भी कहा कि इन शब्दों को काटे बिना चलाएं। जो मीडिया के सामने ऐसा बोल सकता है, वो पार्टी की बैठकों में कैसा बोलता होगा।’ क्या उद्धव की पत्नी रश्मि ठाकरे भी पार्टी के फैसलों में दखल देती हैं? जवाब मिला, ‘हां बिल्कुल, वो हर फैसले में शामिल होती हैं। उद्धव तक पहुंचने के लिए पहले उन्हीं से परमिशन लेनी पड़ती है। रश्मि ठाकरे भले सामना की एडिटर हों, पार्टी में कोई पद न हो, लेकिन पार्टी में उनका दबदबा बराबर है।’ वे आगे कहते हैं, ’ऐसी पार्टी में कोई क्यों रहेगा, जहां अपमान हो, काम करने की आजादी न हो। पार्टी में चेहरा कोई और पार्टी कोई और चला रहा हो?’ MP फंड जारी न होना सांसदों की नाराजगी की वजह शिवसेना (UBT) के सीनियर लीडर भी कंफर्म करते हैं कि महाराष्ट्र में गैर-महायुति सांसदों को खुलकर काम करने नहीं दिया जाता। सांसदों को मिलने वाला 2 करोड़ का फंड सीधा उनके अकाउंट में नहीं जाता। सांसद को क्षेत्र के विकास के लिए कलेक्टर के पास प्रोजेक्ट जमा करना होता है, तब पैसा रिलीज होता है। कलेक्टर के फंड पास किए बिना सांसद क्षेत्र में काम ही नहीं करा पाएगा। जब काम नहीं होगा, तो वोट कैसे मिलेगा। अपना सियासी भविष्य देखते हुए 6 सांसद बागी बन गए। 7वें सांसद के बागी होने का दावा कितना सच उद्धव खेमे (UBT) के सीनियर लीडर अरविंद सावंत बताते हैं कि शिंदे गुट की 6 नहीं 7 सांसदों पर नजर थी। राजाभाऊ प्रकाश वाजे को भी अप्रोच किया गया, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। इसे लेकर हमने राजाभाऊ से भी बात की, तो उन्होंने कहा- ‘मुझे किसी ने अप्रोच नहीं किया। अरविंद साहब के पास ये जानकारी कहां से आई, मुझे नहीं पता नहीं।’ क्या आपको पार्टी में टूट होने का अंदाजा था? राजाभाऊ कहते हैं, ‘14 जून की बैठक में मुझे लेकर सिर्फ तीन सांसद शामिल हुए थे। एक सांसद संजय दीना पाटिल वर्चुअली जुड़े थे। तभी लगा था कि कुछ तो गड़बड़ है क्योंकि इन सांसदों ने न जुड़ने की कोई सूचना नहीं दी थी।' क्या किसी सांसद से बातचीत के दौरान नाराजगी दिखी। इस पर वे कहते हैं, ‘नहीं, मैं पहली बार MP बना हूं, तो किसी सांसद से ऐसे घरेलू संबंध नहीं।’ फिर मान लें कि आप उद्धव गुट में हैं? जवाब मिला- 'हां, अभी तो हूं। वैसे भी अब टूट हो गई है, दोबारा टूटने के लिए दो तिहाई सांसद चाहिए। अब जाना होगा, तो अरविंद जी को भी लेकर ही जा पाऊंगा। पर अभी मैं उद्धव जी के साथ हूं।' संजय राउत और रश्मि ठाकरे का पार्टी में कितना दखल है? जवाब मिला- ‘संजय राउत तो दखल देंगे ही, रश्मि ठाकरे भी देती हैं। कोई बागी होता है, तो उसे जाने के कारण तलाशने पड़ते हैं। मीडिया को जवाब जो देना होता है।‘ उद्धव की शिवसेना में बालासाहेब की विचारधारा नहीं एकनाथ शिंदे के साथ 2023 में पार्टी छोड़ने वाली MLC नीलम गोहरे कहती हैं, ‘पार्टी कौन चला रहा है, ये सवाल नहीं है। सवाल ये है कि पार्टी चल कैसे रही है? मैंने बालासाहेब ठाकरे के साथ काम किया है। भले कुछ मुद्दों पर मतभेद रहा हो, लेकिन वे हिंदुत्व के मुद्दे पर NDA के साथ थे। अब ये हाल है कि हिंदुत्व शिवसेना (UBT) का मुद्दा ही नहीं।’ विधायक, सांसद अब क्या MLC और पार्षद टूटने की बारी 2023 में पहले ही उद्धव की पार्टी से 3 MLC शिंदे के साथ जा चुके हैं। अब उद्धव ठाकरे समेत 4 बचे हैं। सूत्रों की मानें तो 3 और MLC तोड़ने की स्क्रिप्ट लिखी जा चुकी है। इसकी अगुवाई पूर्व शिवसेना नेता और शिंदे की पार्टी में शिवसेना (UBT) से गए MLC करेंगे। सूत्र ने बताया कि शिवसेना (UBT) के 2 MLC शिंदे गुट के संपर्क में हैं। अगले एक-दो महीने में नए समीकरण सामने आ सकते हैं। महाराष्ट्र के सीनियर जर्नलिस्ट बृजमोहन पांडेय कहते हैं, ‘आने वाले समय में ऑपरेशन टाइगर 3.0 के आसार दिख रहे हैं। इसमें शिवसेना (UBT) के 65 पार्षदों में फूट पड़ सकती है। वजह सिर्फ एक है फंड की कमी। महाराष्ट्र में गैर-महायुति पार्षदों को 25 लाख रुपए पार्टी फंड की तरफ से मिलते हैं। वहीं, महायुति से जुड़े पार्षदों को 2 से 3 करोड़ रुपए तक मिलते हैं।‘ उद्धव सेना में बगावत फडणवीस पर पड़ सकती है भारी महाराष्ट्र में लोकसभा की 48 सीटे हैं। 2024 में सबसे ज्यादा 13 सीटें कांग्रेस को मिली। BJP और शिवसेना (UBT) को 9-9, NCP (शरद पवार) को 8 और शिवसेना (शिंदे गुट) को सिर्फ 7 सीटों पर जीत मिली। NCP (अजीत पवार) एक सीट जीत पाई। एक सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार जीता। इस तरह शिंदे की शिवसेना पांचवें नंबर पर है। उद्धव गुट के 6 सांसदों के आने से शिंदे और कांग्रेस के सांसदों की संख्या बराबर हो जाएगी। पॉलिटिकल एनालिस्ट पांडुरंग म्हस्के कहते हैं, ‘NDA में BJP के 240 सांसद हैं। उसके बाद 16 सांसद TDP और 12 सांसद JDU के हैं। बंगाल चुनाव के बाद TMC के 20 सांसदों के आने से शिंदे का दावा थोड़ा कमजोर पड़ा था, लेकिन UBT के 7 सांसदों के आने से शिंदे के सांसदों की संख्या 13 हो जाएगी। इस तरह शिंदे की पार्टी NDA में चौथे नंबर की पार्टी हो जाएगी।’ ………………ये खबर भी पढ़ें… सैनी-शुभेंदु-योगी, BJP का ट्रिपल इंजन पंजाब मिशन पंजाब में सैनी के कार्यक्रम विधानसभा चुनाव के लिए BJP के ‘पंजाब प्लान’ की झलक है। सोर्स बताते हैं कि पिछले 6-7 महीनों में सैनी पंजाब में 45 से ज्यादा दौरे और 65 से ज्यादा कार्यक्रम कर चुके हैं। इनके जरिए राज्य की 33% OBC आबादी पर नजर है। पंजाब में BJP 117 विधानसभा सीटों में से 40 सीटें टागरेट कर रही है। पढ़िए पूरी खबर…
एआई, रिसर्च और व्यापार पर भारत-ब्रिटेन की चर्चा, 15 जुलाई से लागू होगा सीईटीए
भारत और ब्रिटेन ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), नई तकनीकों, रिसर्च और इनोवेशन के क्षेत्र में मिलकर काम आगे बढ़ाने पर चर्चा की
ईरान जंग शुरू होने से एक दिन पहले, यानी 27 फरवरी को भारत में 10 ग्राम सोना 1.60 लाख रुपए का था। जंग खत्म होने के एक दिन बाद, यानी 19 जून को कीमत 1.45 लाख प्रति 10 ग्राम हो गई। यानी करीब 10% की गिरावट। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तो इस दौरान 20% गिरावट हुई। अब अमेरिकी बैंकिंग संस्थान जेपी मॉर्गन का अनुमान है कि 2026 के अंत तक सोने के दाम 40% तक बढ़ जाएंगे। आखिर ईरान जंग के दौरान सोने के दाम क्यों घटे? अब कीमत बढ़ने का अनुमान क्यों लगाया जा रहा? और अभी सोना खरीदना ठीक रहेगा या नहीं; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में... सवाल-1: ईरान जंग के दौरान सोने की कीमत क्यों घटी? जवाब: सोना सुरक्षित निवेश माना जाता है। जंग की सुगबुगाहट भी हो, तो निवेशक सोने का रुख करने लगते हैं। डिमांड बढ़ने से सोने की कीमतें भी बढ़ने लगती हैं। इस ट्रेंड से उलट ईरान जंग के दौरान सोने की कीमतें घटीं। इसकी 3 प्रमुख वजहें हैं… 1. डॉलर की मजबूती के चलते सोने की खरीद घटी 2. पहले से महंगा चल रहा सोना बेचकर प्रॉफिट बुकिंग 3. सोना महंगा होने से घरेलू डिमांड घटी सवाल-2: अगले 6 महीने में सोना कितना महंगा हो सकता है? जवाब: 19 जून को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में सोने के दाम 4,170 डॉलर प्रति औंस हैं। वित्तीय संस्थानों और बैंकों के मुताबिक, अगले 6 महीने में इसकी कीमतें 20% से 40% तक बढ़ने का अनुमान लगाया जा रहा है… जेपी मॉर्गन ग्लोबल रिसर्च: 6,000 डॉलर प्रति औंस। यानी 40% से ज्यादा महंगा होने का अनुमान। जर्मनी का डॉयचे बैंक: 6,000 डॉलर प्रति औंस। अमेरिका बेस्ड इन्वेस्टमेंट बैंक गोल्डमैन सैक्स: 5,400 डॉलर प्रति औंस। स्विस इन्वेस्टमेंट बैंक UBS: 5,500 डॉलर प्रति औंस। अमेरिका का सिटीबैंक: 5,000 डॉलर प्रति औंस। जेपी मॉर्गन ने ये भी कहा है कि 2027 के आखिर तक कीमत 6,300 डॉलर तक पहुंच सकती हैं। अगर सोना 20% बढ़ा, तो भारत में 10 ग्राम सोने की कीमत 1.74 लाख रुपए, 30% बढ़ा तो कीमत 1.88 लाख और अगर 40% बढ़ा तो कीमत 2.03 लाख पहुंच जाएगी। सवाल-3: सोने की कीमतें बढ़ने का अनुमान क्यों लगाया जा रहा? जवाब: सोने के दाम बढ़ने की सबसे बड़ी वजह है सेंट्रल बैंक की खरीदारी। दरअसल, 2022 में जब रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ, तो अमेरिका ने यूरोपीय दोस्तों के साथ मिलकर रूस के 300 बिलियन डॉलर के फॉरेन रिजर्व पर रोक लगा दी थी। माना जाने लगा कि अमेरिका अपनी करेंसी को हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकता है। इसके बाद से दुनियाभर के देशों में डॉलर के प्रति भरोसा कम होने लगा और वो अपना फॉरेन रिजर्व दूसरी करेंसी और खासकर सोने में जमा करने लगे। इस वजह से सोने की डिमांड बढ़ने लगी और कीमतें भी। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक, 2025-26 में दुनियाभर के केंद्रीय बैंकों ने कुल 900 टन से ज्यादा सोना खरीदा, जो ज्यादा खरीद का लगातार चौथा साल है। 2026 की पहली तिमाही में बैंकों ने कागज पर 16 टन खरीद दिखाई। जेपी मॉर्गन का मानना है कि असली खरीदारी कहीं ज्यादा हुई। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल 244 टन खरीद का डेटा दे रहा है। सोने की इस खरीद में सबसे आगे है चीन। ‘पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना’ फरवरी 2026 तक हर महीने 1 टन सोना खरीद रहा था। मार्च में उसने 5 टन और अप्रैल में 8 टन सोना खरीदा।’ अब ग्वाटेमाला, इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों के सेंट्रल बैंकों ने भी सोना खरीदना शुरू किया है। इसी वजह से जेपी मॉर्गन ने अनुमान लगाया कि अब सोने की कीमतें बढ़ेगी। इसके अलावा वो 4 फैक्टर अब भी मौजूद हैं, जो पिछले कुछ सालों से सोने की डिमांड बढ़ा रहे थे- सवाल-4: तो अभी सोना-चांदी खरीदना चाहिए या नहीं? जवाब: एक्सपर्ट्स मानते हैं कि अगले 1 से 3 महीने सोना खरीदने के लिए सही समय है। शेयर बाजार, गोल्ड और कमोडिटीज वगैरह से जुड़ी एनालिसिस देने वाली फर्म ‘केड़िया एडवाइजरी’ के डायरेक्टर अजय केड़िया कहते हैं, ‘अमेरिका के फेडरल रिजर्व ने 17 जून संकेत दिए गए कि आगे ब्याज दरें बढ़ सकती हैं। ऐसे में सोने के बजाय डॉलर और बॉन्ड्स में ज्यादा इन्वेस्टमेंट होता है। इसके चलते सोने के दाम अभी कुछ गिर सकते हैं। हालांकि लॉन्गटर्म में सोने के दाम बढ़ेंगे। अगर सोना खरीदना है, तो अब से एक से तीन महीने के बीच खरीदना ठीक रहेगा।’ HDFC सिक्योरिटीज के रिसर्च एनालिस्ट अनुज गुप्ता कहते हैं कि अभी सोने और चांदी दोनों के दाम घटेंगे। इसलिए फिलहाल कुछ महीने सोना इन्वेस्टमेंट के लिए बहुत अच्छा एसेट नहीं है। साल के आखिर तक सोने की इंटरनेशनल मार्केट में कीमत 5 हजार डॉलर प्रति औंस तक आ सकती है। इसलिए लॉन्ग टर्म के लिहाज से सोना खरीदा जा सकता है। सवाल-5: चांदी की कीमत पर क्या असर पड़ने वाला है? जवाब: 1 जनवरी 2025 को चांदी की कीमत 86,017 रुपए थी। जो भारत में तब का ऑल-टाइम हाई था। 2025 में चांदी सबसे ज्यादा 170% बढ़ी और 30 जनवरी 2026 को 3.39 लाख पर बंद हुई। हालांकि ईरान जंग के दौरान दाम गिरे और 18 जून को ये 2.40 लाख रुपए पर है। गहनों के अलावा चांदी का इंडस्ट्रियल यूज भी होता है। अमेरिकी NGO ‘सिल्वर इंस्टीट्यूट’ के मुताबिक, अगले एक साल में सोलर पैनल, EV, डेटा सेंटर और AI सेक्टर में चांदी की बढ़ती खपत से इसकी मांग और दाम बढ़ सकते हैं। डिस्क्लेमर: यह स्टोरी केवल एजुकेशनल उद्देश्यों से लिखी गई है। इन्वेस्टर्स को हमारी सलाह है कि निवेश से जुड़ा कोई भी फैसला लेने से पहले अपने स्तर पर विशेषज्ञों से परामर्श जरूर लें। *****रिसर्च सहयोग - प्रथमेश व्यास-----------------------------------------------------------ये खबर भी पढ़ें… भारत का रुपया एशिया में सबसे तेज गिर रहा:पाकिस्तानी रुपया मजबूत हुआ; आखिर सरकार से कहां चूक हो रही, टॉप एक्सपर्ट्स से समझिए डॉलर के मुकाबले भारत का रुपया एशिया में सबसे तेजी से गिर रहा है। पिछले 5 महीने में 6% से ज्यादा टूटा। जबकि इसी दौरान पाकिस्तानी रुपया 0.5% और चीनी युआन तो 3% मजबूत हो गया। पढ़ें पूरी खबर…
बांग्लादेश में खसरे जैसे लक्षणों से होने वाली मौतों का सिलसिला जारी है। पिछले 24 घंटों में 5 और बच्चों की मौत दर्ज की गई है।
ईरान के साथ हुए समझौते को लेकर अमेरिका में बहस तेज है, लेकिन जेडी वेंस लगातार इसके पक्ष में खुलकर सामने आ रहे हैं। वे टीवी इंटरव्यू, सार्वजनिक कार्यक्रमों और राजनीतिक मंचों पर इस समझौते का बचाव कर रहे हैं।
भारत और स्विट्जरलैंड के बीच वर्ष 2018 से ‘ऑटोमैटिक एक्सचेंज ऑफ इंफॉर्मेशन’ (एईओआई) व्यवस्था लागू है। इसके तहत दोनों देशों के बीच हर साल बैंक खातों से जुड़ी जरूरी वित्तीय जानकारी साझा की जाती है।
तखत पर एक लड़की करवट लिए लेटी है। बाल छोटे-छोटे। लंबाई बमुश्किल 3 फीट, लेकिन उम्र 29 बरस। इस लड़की ने आज तक आइसक्रीम नहीं खाई। जानते हैं क्यों? वो इसलिए कि अगर आइसक्रीम खाई तो सर्दी हो सकती है। सर्दी हुई तो खांसी आ सकती है और जरा भी जोर से खांसी तो इसकी पसलियां टूट जाएंगी। इस लड़की का हाथ भी कोई कसकर पकड़ ले तो हड्डी चटक जाती है। इसका नाम है गिरिजा। 29 साल की उम्र में इसी तरह 40 से ज्यादा बार हडि्डयां टूट चुकी हैं। हालत यह है गिरिजा के मम्मी-पापा पटि्टयां और प्लास्टर भी घर पर राशन की तरह रखते हैं। उसकी मां नंदा बाई जब भी प्रार्थना करती है, तो भगवान से अपनी बेटी गिरिजा की मौत मांगती हैं। कहती हैं, भगवान मेरी बेटी को मुझसे पहले ही उठा ले। दुर्लभ बीमारियों की सीरीज- ऐ जिंदगी में मैं नीरज झा पहुंचा हूं, गिरिजा से मिलने कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू। आज कहानी वहीं से… दोपहर के 12 बजे हैं। बेंगलुरू के तुंगा नगर इलाके का एक घर। एक महिला ने दरवाजा खोला। बड़ी-सी मैरून बिंदी लगाए, साड़ी पहने हुए है। नाम है- नंदा बाई। उम्र 60 साल। तखत पर लेटी गिरिजा की ओर इशारा करते हुए कहती हैं- ‘यह मेरी बेटी है। देखने में अजीब लग रही होगी, जैसे बिना हड्डी वाली रुई की गुड़िया। दरअसल, गिरिजा का सिर सामान्य से काफी बड़ा है। जबड़ा बाहर की तरफ निकला हुआ। रीढ़ की हड्डी अंग्रेजी के s अक्षर की तरह मुड़ी हुई है। छोटी-छोटी हथेलियां। मुड़े हुए पैर और पंजे भी छोटे–छोटे। छाती से पेट एकदम सटा है। तखत के किनारे रंगों की डिब्बियां रखी हैं। गिरिजा लेटे-लेटे ब्रश पकड़कर कैनवास पर उकेरे गए मोर के पंखों में रंग भर रही हैं। दिन के चौबीसों घंटे, साल के 365 दिन, गिरिजा इसी तरह तखत पर लेटी रहती है। न उठ सकती है, न बैठ सकती है। पीठ के बल लेट भी नहीं सकती। हल्का झटका लगने पर भी हड्डी कांच की तरह टूट जाती है। नंदा बताती हैं- ‘गिरिजा 6 महीने की थी। मैं इसे पलंग पर सुलाकर, किचन में खाना बनाने लगी। ये पलंग से नीचे गिर गई और जोर-जोर से रोने लगी। उसकी हालत देखकर मैं घबरा गई। बिना देर किए इसे उठाया और डॉक्टर के पास भागी। वहां पता चला कि शरीर में कई जगह फ्रैक्चर हैं। शुक्र है सिर बच गया, नहीं तो जान चली जाती। दो महीने तक इलाज चला। बेटी रात-रात भर सो नहीं पाती थी, सिर्फ कराहती रहती थी। उसके दर्द को देखकर कई बार आंसू निकल आते थे। जैसे-तैसे इसकी हडि्डयां जुड़ पाईं।’ ‘वक्त गुजरा, गिरिजा पांच साल की हुई। एक दिन ऑटो से उसे मंदिर ले जा रही थी। वो मेरी गोद में थी, तभी ड्राइवर ने अचानक ब्रेक लगाया। ब्रेक लगाते ही गिरिजा जोर-जोर से रोने लगी। मैं समझ चुकी थी कि इसकी हडि्डयां तड़क गईं। तुरंत अस्पताल भागी। एक्सरे कराया। पता चला हाथ-पैर, कमर और कूल्हे की हड्डियां टूट गई हैं। एक झटके में 4 जगह फ्रैक्चर हुआ। दो महीने तक इलाज चला।’ ‘एक साल पहले की बात है, गिरिजा सोई हुई थी। नींद में वो पीठ के बल लेट गई। अचानक हड्डी टूटी और वो जोर-जोर से चीखने लगी। तुरंत उसे पेनकिलर दी। डॉक्टर को घर बुलाया तो पता चला पसलियां टूट गईं। अब तो हडि्डयां टूटना, न उसके लिए नई बात है, न हमारे लिए।’ तभी गिरिजा तेज आवाज में बोल पड़ती हैं- ‘जैसे टूथपिक होती है न! जरा सा जोर देने पर टूट जाती है, बस वैसी ही मेरे शरीर की हड्डियां हैं।’ वह बताती है- 'इस बीमारी को 'ऑस्टियोजेनेसिस इम्परफेक्टा' यानी 'ब्रिटिल बोन डिजीज' कहते हैं। मैं इसके तीसरे स्टेज की पेशेंट हूं।’ यह कहते हुए आवाज में टीस तो है, लेकिन चेहरे पर कोई भाव नहीं। अमूमन यह खाना खाने का वक्त है, लेकिन गिरिजा कॉफी मांगती है। नंदा मुस्कुराते हुए कहती हैं-‘यह दिनभर बस कॉफी ही पीती है। इसका खाना-पीना सब, लेटे-लेटे ही होता है।’ यह कहते हुए नंदा रसोई में चली जाती हैं। कुछ पूछने से पहले ही गिरिजा मुस्कुराते हुए कहती हैं- ‘जब आपका फोन आया, तो मुझे मां को आवाज देनी पड़ी। मां किचन छोड़कर आपको लेने गईं, सोचिए मैं कितनी बेबस हूं। हर चीज के लिए दूसरों पर निर्भर हूं। मेरा भी तो मन करता है कि कोई मेहमान आए तो खुद उठकर उसका स्वागत करूं। इस उम्र में भी मां-बाप पर बोझ हूं। खाना-पीना, नहाना-धोना… सब कुछ उन्हें ही करना पड़ता है। लोग मुझे बच्ची समझते हैं। भले ही मेरा शरीर नहीं बढ़ा, लेकिन भावनाएं तो बड़ों जैसी ही हैं।’ गिरिजा भावुक होते हुए बताती है- ‘अभी कुछ ही दिन पहले की बात है, मां की तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गई थी। शुगर पेशेंट हैं। मैं यहीं पड़े-पड़े उन्हें तड़पते हुए देख रही थी। अफसोस होता है कि उठकर एक ग्लास पानी भी नहीं दे सकती।’ ‘मेरा वजन 30 किलो है। रोज मुझे उठाकर नहलाने-धुलाने, ब्रश कराने में वो थक जाती हैं। उनकी पीठ अकड़ जाती है। मां की उम्र भी हो चली है।’ इतने में रसोई से नंदा की आवाज आती है। वह कहती हैं- ‘मैं मानती ही नहीं कि मेरी बेटी 29 साल की है। मुझे तो आज भी 5-10 बरस की लगती है। इसलिए सब कर लेती हूं। जिस दिन ये सब सोचूंगी, तो शायद जीना ही छोड़ दूंगी।’ नंदा कहती हैं-‘जब इसके पीरियड्स आते हैं, तो मुझे ही पैड बदलने पड़ते हैं। बाहर भी जाती हूं, तो डायपर पहनाकर जाती हूं। मेरे न रहने पर, अगर इसे बाथरूम जाना हुआ, तो किससे कहेगी। ‘दूसरी लड़कियों की तरह होती, तो ब्याह कर अपने घर चली गई होती। पर इस हाल में इसे कौन ले जाएगा। मैंने तो इसके पैदा होने के बाद से ही दुनियादारी से नाता तोड़ लिया। न किसी रिश्तेदार के घर जाती हूं, न किसी शादी-ब्याह में शामिल होती हूं। जहां मेरी बच्ची नहीं जा सकती, वहां मैं जाकर क्या करूंगी। मन घबराता है, तो इसे मंदिर ले जाती हूं। पहले तो गोद में ही लेकर जाती थी, लेकिन अब ऑटो में सुलाकर ले जाती हूं। वजन बढ़ गया है ना। मंदिर में लोग इसे ऐसे घूरते हैं, जैसे किसी दूसरी दुनिया से आई हो। पूछने लगते हैं- यह चल नहीं सकती है क्या? ऐसी बेटी कैसे पैदा हो गई।’ ‘हर रोज भगवान से यही कहती हूं, मेरे मरने से पहले इसे उठा लेना। अगर मैं पहले मर गई, तो इसका क्या होगा।’ तभी गिरिजा बोल पड़ती है- ‘मां, हम दोनों साथ में मरेंगे। पहले मैं नहीं मरूंगी। मैं मर गई, फिर तुम कैसे रहोगी।’ यह सुनते ही नंदा बाई की आंखें डबडबा जाती हैं। तभी गिरिजा सख्त लहजे में बोल पड़ती है- ‘मैंने आपसे पहले ही कहा था न कि आप मेरी मां को रुलाएंगे नहीं। अगर वह रोएगी, तो आगे बात नहीं करेगी। रही बात लोगों की... तो वो मुझे इंसान नहीं, पिंजरे में बंद चिड़ियाघर का जानवर समझते हैं।’ अरे! अगर मेरा शरीर साथ देता, तो क्या मैं इस तखत पर पड़ी रहती… मुझे जानलेवा बीमारी है। मैं दूसरों से थोड़ी अलग हूं।’ गिरिजा अचानक उदास हो जाती है। अपने सिर को छूते हुए कहती है- ‘मां तो डर के मारे मुझे कभी किसी शादी या फंक्शन में भी नहीं ले जातीं। तैयार होने का भी मौका नहीं मिलता। मां की देखा-देखी माथे पर बिंदी लगा लेती हूं। कभी-कभार मेरा भी मन करता है, तो थोड़ा-बहुत सज-संवर लेती हूं। पर किसके लिए। इस बंद कमरे की दीवारों के लिए। बाहर की दुनिया कैसी दिखती है, वहां लोग कैसे रहते हैं, कैसी है वहां की रौनक... मुझे कुछ नहीं पता। मेरी दुनिया तो बस इस तखत पर ही खत्म हो जाती है।’ बोलते-बोलते गिरिजा की सांस फूलने लगती है। नंदा कहती हैं- ‘इसकी रीढ़ की हड्डी ‘S’ आकार में मुड़ चुकी है। इस वजह से इसका एक तरफ का फेफड़ा दबा ही रह गया, दूसरी तरफ का ज्यादा बढ़ गया। जिससे बार-बार सांस फूलने लगती है। इसी वजह से ये एक ही करवट लेटी रहती है। पीठ सीधी होने पर हड्डियां चटकने का खतरा बढ़ जाता है।’ ‘जब हड्डी टूटती है, ये दर्द से चीख पड़ती है। तुरंत पेनकिलर देती हूं, ताकि नींद आ सके। हमारे यहां हर वक्त प्लास्टर और पट्टियां स्टॉक में रखी रहती हैं। जाने कब कौन सी हड्डी टूट जाए।’ ‘कई बार स्कूल में इसका एडमिशन कराने की कोशिश की, लेकिन टीचर ने कह दिया, पूरे दिन कौन इसका ध्यान रखेगा। इसे घर पर ही पढ़ाइए। यहां बाकी बच्चे परेशान होंगे।’ नंदा बताती हैं- ‘मेरा एक बेटा भी है। वह 34 साल का है। एकदम ठीक है। जब बेटा शादी लायक हुआ तो रिश्तेदार ताने देने लगे कि जिसके घर में ऐसी अपाहिज लड़की हो, वहां कौन अपनी बेटी देगा। काफी मशक्कत के बाद उसकी शादी हो पाई। शादी के बाद मैंने खुद ही बेटे-बहू से कह दिया कि अलग रहो, अपनी दुनिया बसाओ। मेरी और गिरिजा की वजह से अपनी जिंदगी खराब मत करो।’ नंदा बाई कहती हैं- ‘मैंने इसके पापा से लव मैरिज की थी। 7 जुलाई 1996 को गिरिजा का जन्म हुआ। नॉर्मल डिलीवरी हुई। नर्स ने इसे जैसे ही मेरी गोद में रखा, मेरी नजर उसके पैरों पर पड़ी। छोटे-छोटे पैर पेट से चिपके हुए थे। बिल्कुल मेंढक की तरह।’ ‘बेंगलुरू में डॉक्टर को दिखाया, तो वो बोले- कुछ ही दिनों की मेहमान है, जल्दी मर जाएगी। इसे ऑस्टियोजेनेसिस इम्परफेक्टा नाम की हडि्डयों की बीमारी है। इसका कोई इलाज नहीं है। जब तक सांसें चल रही हैं, बस इसे पालो-पोसो।’ दिल्ली, मुंबई के डॉक्टरों को भी दिखाया, सबने एक ही बात कही कि कुछ नहीं हो सकता।’ ‘हम बार-बार डॉक्टरों से कहते कि कुछ तो इलाज होगा, लेकिन हर बार वो कुछ दवाइयां देकर घर भेज देते। मैं और मेरे पति, पिछले 20 साल से अलग-अलग सोते हैं। डॉक्टर ने कहा था- तीसरा बच्चा हुआ, तो वह भी ऐसा ही होगा।’ ‘पहले मैं और इसके पापा, दोनों कपड़े सिलते थे। इसके जन्म के बाद मैंने काम छोड़ दिया। मैं पेंटिंग और हर तरह का आर्ट बनाती थी। अब धीरे-धीरे यह भी सीख गई है। दिनभर बिस्तर पर लेटे-लेटे, सुई-धागा और कैंची से डेकोरेशन का सामान बनाती रहती है।’ नंदा बाई कहती हैं–‘इसके सिर में भी बहुत दर्द होता है। देखिए, सिर कितना बड़ा है। बैठ नहीं सकती है, क्योंकि रीढ़ की हड्डी सिर का वजन नहीं सह पाएगी। व्हीलचेयर पर भी ऐसे ही लिटाकर रखना पड़ता है।’ इसकी तकलीफ को देखते हुए डॉक्टरों ने भी कह दिया है कि बार-बार अस्पताल मत लाया करो। कोई भी दिक्कत हो, फोन करके बताओ, हम यहां से दवा बता देंगे। हर महीने इसके इलाज में 5 हजार रुपए लगते हैं। 8 हजार घर का किराया है। पति की कमाई बमुश्किल 20 हजार रुपए। कई बार सरकारी दफ्तरों में बेटी को लेकर गई, लेकिन कोई मदद नहीं मिली। व्हीलचेयर भी चेन्नई के एक दिव्यांग ने दी है। पेंशन के नाम पर 1400 रुपए मिलते हैं, लेकिन पिछले 3 महीने से वो भी नहीं मिले।’ गिरिजा की बेबसी को करीब से महसूस करने के बाद, मन में कई सवाल उठ रहे हैं। क्या किसी के करवट बदलते ही बदन की हड्डियां खिलौने की तरह टूट जाती हैं। इसी बीमारी को और गहराई से जानने के लिए हैदराबाद निकल पड़ता हूं। यहां निजाम इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के जेनेटिक्स डिपार्टमेंट की एचओडी डॉ. प्रजन्या रंगनाथ से मिला। वो कहती हैं- ‘गिरिजा दुर्लभ जेनेटिक बीमारी से जूझ रही है। मेडिकल की भाषा में इसे ऑस्टियोजेनेसिस इम्परफेक्टा या आम बोलचाल में कांच जैसी हड्डियों की बीमारी कहते हैं। इसे ऐसे समझिए- शरीर में COL1A1 (कोलेजन टाइप 1 अल्फा 1 चेन ) या COL1A2 (कोलेजन टाइप 1 अल्फा 2 चेन) जीन होता है। यह जीन हमारे शरीर में 'कोलेजन' नामक एक मुख्य प्रोटीन बनाता है। इससे हड्डियों में मजबूती और लचीलापन आता है। जब यह जीन गड़बड़ हो जाता है, तो हड्डियों में जरूरी मिनरल्स और प्रोटीन सही तरीके से नहीं बन पाते। नतीजा- हड्डियां भीतर से पूरी तरह खोखली और नाजुक हो जाती हैं। गिरिजा टाइप-3 पेशेंट है। इसमें हड्डियां बहुत ज्यादा टूटती हैं। शारीरिक बनावट बदल जाती है। बचपन में सही देखभाल मिले, संक्रमण से बचाया जाए और सांस की तकलीफ न हो, तो मरीज वयस्क होने तक जी सकते हैं। इसका कोई इलाज है? ‘इसका कोई स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन हड्डियों को मजबूत करने के लिए बिस्फॉस्फोनेट थेरेपी दी जाती है। यह थेरेपी हड्डियों को अंदर से खोखला होने और गलने से रोकती है। इसमें जोलेड्रोनिक एसिड जैसी दवाइयां ड्रिप के जरिए दी जाती हैं। हड्डियों को मुड़ने और टूटने से बचाने के लिए सर्जरी के जरिए उनमें धातु की रॉड डाली जाती है। साथ ही, सुरक्षित फिजियोथेरेपी से मांसपेशियों को सहारा दिया जाता है। लेकिन इसके बाद भी मरीज पूरी तरह ठीक नहीं हो पाता।’ ------------------------------------- ऐ जिंदगी सीरीज की यह खबर भी पड़ें… 1- 13 महीने की बेटी को 2 बार हार्ट अटैक, मौत:दूसरी बेटी को भी यही बीमारी, जिंदा रहने के लिए हर साल चाहिए 72 लाख रुपए 9 जनवरी 2022 की शाम। 13 महीने की आयरा अपने पिता राज की गोद में थी। वो उसे सुलाने की कोशिश कर रहे थे। अचानक उसे सांस लेने में दिक्कत होने लगी। राज उसकी पीठ थपथपाने लगे। आयरा का चेहरा एकदम लाल, आंखों में खून उतर आया। धीरे-धीरे शरीर छटपटाने लगा। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें… 2- 14 की उम्र में शरीर बना 'पेड़ की छाल’: उठो या बैठो फटने लगती है चमड़ी, मन करता है छीलकर फेंक दूं; देश का अकेला केस दोपहर के 1 बजे हैं। जंगल के ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर कार हिचकोले खा रही है। तेज गर्मी से गला लगातार सूख रहा है। करीब 2 घंटे बाद जंगलों में कुछ झोपड़ियां नजर आती हैं। इन्हीं झोपड़ियों में से एक के सामने हमारी कार रुकी। झोपड़ी के बाहर एक लड़की बेजान सी खड़ी नजर आई। उसकी मटमैली शर्ट और हाफ पैंट के बाहर जितना भी शरीर दिख रहा है, वह बेहद डरावना है। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें…
कॉकरोच जनता पार्टी कल, यानी 20 जून को दिल्ली के जंतर-मंतर पर फिर से प्रोटेस्ट करेगी। 6 जून को पहला प्रोटेस्ट भी यहीं किया था। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग के साथ पार्टी दिल्ली, महाराष्ट्र, यूपी, राजस्थान और पंजाब में प्रदर्शन कर चुकी है। पार्टी के प्रवक्ता विजेता दहिया के मुताबिक, स्टूडेंट अब भी सुसाइड कर रहे हैं, इसीलिए हम धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ 20 जून के बाद भी प्रदर्शन करते रहेंगे। हालांकि BJP के सोर्स बताते हैं कि केंद्र सरकार इसे बड़ा खतरा नहीं मान रही है क्योंकि अब तक प्रोटेस्ट में खास भीड़ नहीं जुटी है। विजेता दहिया से पूरी बातचीत… सवाल: अब तक मिले रिस्पॉन्स को पार्टी कैसे देख रही है?जवाब: दिल्ली, पुणे, लखनऊ, अमृतसर, बेंगलुरु, जयपुर और नागपुर में प्रोटेस्ट हो चुके हैं। हमें जनचेतना जगानी है कि यह देश आपका है। आपने राजा नहीं, बल्कि देश चलाने के लिए मैनेजर चुने हैं। अगर वे सही काम नहीं करेंगे, तो उनसे सवाल पूछे जाएंगे, इस्तीफा मांगा जाएगा, उन्हें आपके लिए काम करने पर मजबूर किया जाएगा। सवाल: क्या प्रोटेस्ट में उम्मीद के मुताबिक भीड़ आ रही है, इसे लेकर पार्टी के अंदर क्या बातें हो रही हैं?जवाब: संख्या लगातार बढ़ रही है। शुरुआत में लोगों को लग रहा था कि जंतर-मंतर पर कुछ हजार लोग ही आए, लेकिन हमारे फॉलोअर पूरे भारत में हैं। हम जिस शहर में जा रहे हैं, वहां हजारों लोग आ रहे हैं। दिल्ली वाले प्रोटेस्ट में भी लखनऊ, यमुनानगर और यहां तक कि कश्मीर से भी लोग आए थे। हम इसे लेकर बहुत फिक्रमंद नहीं हैं। सवाल: अभी आपका फोकस नीट पेपर लीक और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे पर है। अगर इस्तीफा नहीं होता है, तो आगे क्या करेंगे?जवाब: फिलहाल हमारा पूरा ध्यान इसी मुद्दे पर है। दो-तीन दिन पहले ही कुछ छात्रों ने आत्महत्या की है। 21 जून को फिर से एग्जाम है। मामला अभी सुलझा नहीं है। सरकार का रवैया देखिए कि वो पेपर लीक रोकने की बजाय टेलीग्राम बैन कर रही है। उन्हें यह समझ नहीं आ रहा कि टेलीग्राम नहीं होगा, तो लोग किसी और ऐप का इस्तेमाल कर लेंगे। अगर धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा देते हैं, तो लोगों को लगेगा कि सरकार में शर्म बाकी है। अगर वे इस्तीफा नहीं देंगे तो अपना ही राजनीतिक नुकसान करेंगे। सवाल: पार्टी के फैसलों में कितने लोग शामिल होते हैं, प्रोटेस्ट कहां और कब होगा, कैसे तय होता है?जवाब: हमारी कोई रजिस्टर्ड पार्टी या कॉरपोरेट स्ट्रक्चर नहीं है। यह एक इनफॉर्मल ग्रुप है। हम फॉर्मल मीटिंग नहीं करते। बस आपस में कॉल्स और चैट्स के जरिए बातचीत होती है। सब लोग सुझाव देते हैं और उसी आधार पर फैसले लिए जाते हैं। सवाल: सब कुछ अभिजीत दीपके तय करते हैं या सबकी सलाह ली जाती है?जवाब: विजन तो अभिजीत का ही है। लोकतंत्र देश चलाने की व्यवस्था है, लेकिन किसी मूवमेंट या संगठन में हर चीज के लिए आप वोटिंग नहीं करा सकते, जैसे कोई फिल्म मेकर हर सीन के लिए सबसे राय नहीं लेता। सवाल: अभी पार्टी के चुनाव लड़ने की बात तो नहीं है, लेकिन क्या संगठन का विस्तार हो रहा है?जवाब: यह सब इंटरनली चल ही रहा है। हम अलग-अलग शहरों में जा रहे हैं। लोग जुड़ रहे हैं। सवाल: आपके आंदोलन में महिलाएं या अल्पसंख्यक नहीं दिख रहे?जवाब: हम कोई दिखावा या टोकनिज्म नहीं करना चाहते। हमारा मूवमेंट ऑर्गेनिक तरीके से आगे बढ़ रहा है। बहुत सी महिलाएं स्टेट लेवल पर जुड़ रही हैं। कोऑर्डिनेटर या डिजाइनर के तौर पर काम कर रही हैं। हमारा मूवमेंट हर धर्म, जाति और जेंडर के लिए खुला है। धीरे-धीरे लोग जुड़ेंगे। हम जबरदस्ती किसी को सिर्फ दिखाने के लिए आगे नहीं लाना चाहते। सवाल: बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका में युवाओं के प्रोटेस्ट हुए। अपने आंदोलन को उससे कैसे जोड़कर देखते हैं?जवाब: मैं बिल्कुल नहीं चाहता कि नेपाल, श्रीलंका या बांग्लादेश में जो हुआ, वो भारत में हो। हमारा देश बुद्ध और गांधी का है। हम शांति, अहिंसा और संवैधानिक दायरे में रहकर सत्याग्रह करना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि लोग अपने अधिकारों के लिए लोकतांत्रिक तरीके से आवाज उठाएं, चाहे किसानों के लिए MSP हो, आदिवासियों के मुद्दे हों, शिक्षा हो या स्वास्थ्य। यह लोकतांत्रिक भावना लोगों के दिमाग में जानी चाहिए। सवाल: पेपर लीक के खिलाफ प्रोटेस्ट कर रहे NSUI और दूसरे संगठन आपके साथ आना चाहें, तो कोई प्लान है?जवाब: हमने पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में ही साफ कर दिया था कि कोई भी आम नागरिक हमारे साथ आ सकता है, चाहे वो विपक्षी पार्टी का हो या BJP का कार्यकर्ता हो। परीक्षाएं तो सबके बच्चे दे रहे हैं। शर्त यह है कि लोग अपनी पार्टी का झंडा छोड़कर सिर्फ तिरंगे के साथ आएं। सवाल: राजस्थान में अभिजीत को थप्पड़ मारा गया। ऐसी घटनाओं से कैसे निपट रहे हैं?जवाब: मैं युवाओं से यही कहूंगा कि इस तरह आतंकी बनना ठीक नहीं है। किसी को उसके विचारों की वजह से डराने की कोशिश करना आतंकवाद ही है। नाथूराम गोडसे का भी इसी तरह ब्रेनवाश हुआ था। आज भी वही साजिशें चल रही हैं। युवाओं के पास जेमिनाई, चैट जीपीटी और यूट्यूब जैसे साधन हैं। उन्हें वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी से बाहर निकलकर खुद रिसर्च करनी चाहिए। हम करोड़ों युवाओं के लिए आवाज उठा रहे हैं, लेकिन जब इंसान का पूरी तरह ब्रेनवाश हो जाता है, तो उसमें कॉमन सेंस नहीं बचती। उधर, BJP बोली- आंदोलन का असर सिर्फ इंटरनेट पर, इसलिए चिंता नहींकॉकरोच जनता पार्टी को BJP कैसे देख रही है, इस पर हमने पार्टी के एक सीनियर लीडर से बात की। वे अपनी पहचान उजागर नहीं करना चाहते। वे बताते हैं, ‘अब तक प्रोटेस्ट में कोई खास भीड़ नहीं जुट पाई है। 6 जून को जंतर-मंतर पर भी मुश्किल से 2 हजार लोग जुटे थे। प्रोटेस्ट को सामाजिक कार्यकर्ताओं से लेकर बाकी संगठनों का भी बहुत साथ नहीं मिला है।’ ‘सरकार को ये पता है कि इस प्रदर्शन से कोई खास नुकसान नहीं हो रहा। CJP का असर इंटरनेट तक रह गया। इसीलिए पार्टी कोई प्लान नहीं कर रही है। पार्टी को लगता है कि समय के साथ खुद ही प्रदर्शन हल्के हो जाएंगे।’ एक्सपर्ट ओपिनियन: ये प्रोटेस्ट बांग्लादेश या नेपाल जैसा नहींदिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर विजेंद्र सिंह चौहान मानते हैं कि कॉकरोच जनता पार्टी के प्रोटेस्ट की नेपाल और बांग्लादेश के आंदोलनों से तुलना नहीं की जा सकती। उनमें जरूरतों के हिसाब से वहां की विविधता को साथ लेकर चलने की क्षमता थी। CJP के आंदोलन में भारत की विविधता को साधने की क्षमता या महत्वाकांक्षा नजर नहीं आई है। कम भीड़ जुटने पर विजेंद्र कहते हैं, ‘इस आंदोलन को पुराने पैमानों से नापने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। आज के समय में जमीन पर कितने लोग आए हैं, यह किसी मूवमेंट को आंकने का उतना बड़ा पैमाना नहीं रह गया है।’ वे आगे कहते हैं, ‘यह आंदोलन मिडिल क्लास, अपर-मिडिल क्लास और जेन जी युवाओं की चिंताओं को सामने ला रहा है। युवाओं में जो हताशा और गुस्सा है, यह आंदोलन उसे जाहिर करने का काम जरूर कर रहा है, लेकिन पूरे भारत के युवाओं को साथ लेकर चलने की क्षमता इसमें अभी नहीं दिख रही है।’ …………………. ये खबर भी पढ़ेंजयपुर में अभिजीत दीपके को थप्पड़ मारे, बोले- RSS के लोगों ने हमला किया 15 जून को जयपुर में प्रदर्शन के दौरान कॉकरोच जनता पार्टी के फाउंडर अभिजीत दीपके को कुछ युवकों ने थप्पड़ मारे थे। अभिजीत ने आरोप लगाया कि हमले में RSS के लोगों का हाथ था। जब भी कोई सरकार या उसकी विचारधारा के खिलाफ बोलता है, तो ऐसा ही होता है। इसमें कुछ नया नहीं है। पढ़ें पूरी खबर…
मॉस्को की तेल रिफाइनरी पर यूक्रेन का हमला, जेलेंस्की बोले- रूस की युद्ध मशीन को बनाया निशाना
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने एक हफ्ते में दूसरी बार मॉस्को की तेल रिफाइनरी को निशाना बनाने का दावा किया।
वाशिंगटन, 18 जून (आईएएनएस)। अमेरिका और ईरान के बीच महीनों से चल रहे संघर्ष और तनाव को खत्म करने के लिए गुरुवार को समझौते पर हस्ताक्षर किया गया। इस समझौते का मकसद दोनों पक्षों के बीच सीजफायर को बढ़ाना और होर्मुज स्ट्रेट से शिपिंग ट्रांजिट फिर से शुरू करना है।
27 फरवरी 2026; ओमान के विदेश मंत्री अल-बुसैदी ने टीवी पर आकर कहा- ईरान अपना पूरा एनरिच्ड यूरेनियम खत्म करने को राजी है। अल-बुसैदी ही अमेरिका और ईरान के बीच न्यूक्लियर डील की मध्यस्थता कर रहे थे। वो बोले- अगर कूटनीति को थोड़ी और जगह दें, तो समझौता हमारी पहुंच में है। लेकिन उसी रात Mar-a-Lago में ट्रम्प का फोन बजा। दूसरी तरफ इजराइली पीएम नेतन्याहू थे। रॉयटर्स ने 3 सूत्रों के हवाले से लिखा- नेतन्याहू के पास ईरानी सुप्रीम लीडर खामेनेई के घर पर मीटिंग का एक मजबूत खुफिया इनपुट था। नेतन्याहू ने कहा- खामेनेई समेत ईरानी लीडरशिप को एक झटके में खत्म करते ही ईरानी जनता खुद 1979 की इस्लामिक सत्ता को उखाड़ फेंकेगी। हमारे लिए ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम, मिसाइल प्रोग्राम और उसके प्रॉक्सीज को खत्म करने का यही मौका है। ट्रम्प राजी हो गए। 28 फरवरी की सुबह ईरान पर बम गिरने लगे। अब 110 दिनों बाद 18 जून को ट्रम्प ने जंग खत्म करने के दस्तावेजों पर दस्तखत कर दिए हैं। अमेरिका के लिए ये डील उससे भी बुरी है, जो जंग शुरू होने के एक दिन पहले उसकी मेज पर थी। इस बीच दुनिया को लाखों करोड़ रुपए की चपत लग गई और 7 हजार से ज्यादा जानें गईं। ट्रम्प ने ईरान जंग के 4 घोषित लक्ष्य बताए थे… 1. ईरान में इस्लामिक सत्ता उखाड़ फेंकना अमेरिका-इजराइल ने अपने पहले ही हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई को मार दिया। उसी दिन ट्रम्प ने कहा- ‘ईरान के महान लोगों, आपकी आजादी का समय आ गया है... जब हम अपना काम पूरा कर लेंगे, तो अपनी सरकार पर कब्जा कर लीजिए।’ लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उल्टा सुप्रीम लीडर की मौत के बाद ईरान के लोग एकजुट हो गए। खामेनेई के बेटे मुजतबा को नया सुप्रीम लीडर बना दिया। इसलिए ईरान अब भी धार्मिक शासन वाला अमेरिका-विरोधी देश बना हुआ है। यानी ट्रम्प का पहला ऑब्जेक्टिव फेल। 2. ईरान का परमाणु कार्यक्रम खत्म करना ट्रम्प ने कहा था, 'अमेरिका की नीति रही है कि इस आतंकवादी रिजीम के पास कोई परमाणु हथियार न हो।' अमेरिका चाहता था कि ईरान अपना न्यूक्लियर प्रोग्राम पूरी तरह बंद कर दे और उसके पास जितना संवर्धित यूरेनियम है, अमेरिका को सौंप दे। ट्रम्प से डील में ईरान ने कहा है कि वह कभी परमाणु हथियार न तो बनाएगा और न ही खरीदेगा। हालांकि यह कोई नई बात नहीं है। ईरान ने पहली बार 1970 में परमाणु अप्रसार संधि (NPT) पर हस्ताक्षर करते समय यही वादा किया था। 2015 में अमेरिका के ओबामा शासन से हुए परमाणु समझौते में भी उसने यही वादा दोहराया था। ट्रम्प के समझौते में ईरान से कहा गया है कि वह अपने पास मौजूद लगभग 11 टन संवर्धित परमाणु सामग्री को ‘डाउन-ब्लेंड’ करे। यानी उसे कम शक्तिशाली बनाए। इसमें करीब 970 पाउंड ऐसा यूरेनियम भी शामिल है, जिसे 60% तक संवर्धित किया जा चुका है। यह परमाणु बम बनाने के स्तर के काफी करीब है। ट्रम्प की डील ईरान को यह संवर्धित यूरेनियम देश से बाहर भेजने या पूरी तरह छोड़ने के लिए मजबूर नहीं करती। हालांकि 2015 के समझौते में उसने अपने लगभग 97% परमाणु भंडार को रूस भेज दिया था। इस वजह से कई सवाल अभी भी अगले दौर की बातचीत के लिए बचे हैं। जैसे-• क्या ईरान यह परमाणु सामग्री अपने पास रख सकेगा?• क्या उसे अपने प्रमुख परमाणु संयंत्र बंद करने होंगे?• क्या उसे नए परमाणु ईंधन को संवर्धित करने की अनुमति होगी? समझौते में ‘ईरान की परमाणु जरूरतों’ का जिक्र है। मसलन- बिजली उत्पादन और ऊर्जा जरूरतों के लिए। यही वह रास्ता है जिससे ईरान भविष्य में अपनी परमाणु क्षमता को पूरी तरह खत्म होने से बचाए रखना चाहता है। यानी ट्रम्प का ये ऑब्जेक्टिव भी पूरी तरह सफल नहीं हुआ। 3. ईरान के प्रॉक्सी संगठनों को खत्म करना इजराइल और अमेरिका लेबनान में हिजबुल्ला, यमन में हूती और फिलिस्तीन में हमास जैसे ईरान के प्रॉक्सी संगठनों को खत्म करना चाहते थे। ईरान-अमेरिका जंग में सबसे ज्यादा मौतें लेबनान में हुई है। इजराइल ने दक्षिण लेबनान में करीब 2,000 वर्ग किमी की जमीन पर कब्जा कर लिया है। इससे हिजबुल्ला काफी कमजोर हो गया, लेकिन खत्म नहीं हुआ। उसके पास अभी भी हथियार, जमीनी नेटवर्क है और शिया मुसलमानों का समर्थन है। ट्रम्प से समझौते में भी लेबनान का तीन बार जिक्र है और कहा गया है कि वहां भी कोई मिलिट्री ऑपरेशन नहीं होगा। ऐसे ही यमन में हूती अब भी सक्रिय हैं। हमास कमजोर हुआ है, पर खत्म नहीं। यानी ट्रम्प और नेतन्याहू का ये ऑब्जेक्टिव भी पूरा नहीं हुआ। 4. ईरान का बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम खत्म करना ट्रम्प ने हमले की वजह बताते हुए कहा था, ‘ईरान के पास हमारे मिलिट्री बेसेस और यूरोप तक पहुंचने वाली मिसाइलें हैं। जल्द ही वो अमेरिका तक पहुंचने वाली मिसाइलें भी बना लेंगे।’ अमेरिका-इजराइल ने ईरान के प्रमुख मिसाइल कॉम्प्लेक्स को निशाना बनाया। जैसे- तेहरान के पास खोजिर मिसाइल कॉम्प्लेक्स, शाहरूद मिसाइल फैसिलिटी, पर्चिन सैन्य परिसर, हकीमीयेह मिसाइल सेंटर जैसे कई ठिकानों पर हमले कर भारी नुकसान किया। 50 से ज्यादा मिलिट्री बेस को निशाना बनाया, ताकी मिसाइल लॉन्च करने की क्षमता खत्म की जा सके। लेकिन 7 जून को इजराइल पर बैलेस्टिक मिसाइल हमले से साफ हो गया कि ईरान की क्षमता खत्म नहीं हुई है। सैटेलाइट तस्वीरों से पता चलता है कि ईरान ने कई ठिकानों पर बैलिस्टिक मिसाइल फैसिलिटी को हुआ नुकसान सुधारना भी शुरू कर दिया है। समझौते में मिसाइल प्रोग्राम का जिक्र तक नहीं है, यानी ये ऑब्जेक्टिव भी पूरा नहीं हुआ। होर्मुज स्ट्रेट खुलने को ट्रम्प बड़ी उपलब्धि बता रहे हैं, जो जंग के पहले खुला ही हुआ था। डील में एक प्रावधान है कि अब ईरान-ओमान के साथ मिलकर होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों से ‘फीस’ वसूल सकता है। इसके अलावा डील में ईरान को हर्जाने के तौर पर 28 लाख करोड़ रुपए दिए जाने का भी प्रावधान है। ईरान: 307 अस्पतालों समेत 1.22 लाख इमारतें ढही इजराइल और खाड़ी देशों ने भी जंग की भारी कीमत चुकाई है… ग्लोबल इकोनॉमी को 122 लाख रुपए का नुकसान इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक एंड पीस यानी IEP के मुताबिक अमेरिका-ईरान जंग से ग्लोबल GDP को 1.3 ट्रिलियन डॉलर, यानी करीब 122 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हो सकता है। ये ग्लोबल GDP का 0.6% है। पहली नजर में यह नुकसान उतना बड़ा नहीं लगता। क्योंकि 2020में कोरोना के दौरान भी ग्लोबल GDP 3.1% सिकुड़ गई थी। हालांकि कोरोना का असर पुरानी दुनिया पर पड़ा था। ईरान जंग की सबसे बड़ी मार कुछ चुनिंदा देशों और उन लोगों पर पड़ेगी, जिनकी आय पहले से कम है और जो ऐसे झटकों को झेलने की स्थिति में नहीं हैं। ऑर्गनाइजेशन ऑफ इकोनॉमिक कॉपरेशन एंड डेवलपमेंट के मुताबिक, 2025 में ग्लोबल इकोनॉमिक ग्रोथ 3.4% थी, जो 2026 में घटकर 2.8% ही रह जाएगी। ईरान जंग से भारत पर 6 बड़े असर पड़े… 1. क्रूड ऑयल महंगा होने से इम्पोर्ट बिल बढ़ा: जंग शुरू होने से पहले कच्चे तेल की कीमत 72 डॉलर प्रति बैरेल थी। होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंची। इससे मार्च में भारत का इम्पोर्ट बिल 15.22% बढ़ गया। भारत में पेट्रोल-डीजल 7.5 रुपए, घरेलू गैस की कीमत 89 रुपए और कमर्शियल गैस 1,350 रुपए महंगा हुआ। 2. विदेशी मुद्रा भंडार घटा, रुपया कमजोरः जंग शुरू होने से पहले भारत का फॉरेन रिजर्व 7.28 लाख डॉलर था, जो जून की शुरुआत में घटकर 6.82 लाख डॉलर रह गया है। फरवरी में 1 डॉलर की कीमत करीब 90 रुपए थी। मई में यह 96.8 के ऑल टाइम हाई पर पहुंच गई। अभी यह 94.5 है। 3. GDP की रफ्तार धीमी हुईः 2025 में जहां GDP 7% बढ़ी थी, 2026 में इसके 6.6% रहने का अनुमान है। 4. थोक महंगाई 43 महीने में सबसे ज्यादाः फरवरी 2026 में भारत में खुदरा महंगाई दर 3.21% थी, जो मई में बढ़कर 3.93% तक पहुंच गई है। थोक महंगाई दर फरवरी में 2.28% से मई में 9.68% पर पहुंच गई है, जो साढ़े तीन साल में सबसे ज्यादा 5. उर्वरकों के उत्पादन में गिरावट: भारत खाड़ी देशों से करीब 40% यूरिया और 60% LNG इम्पोर्ट करता है। फर्टिलाइजर बनाने के लिए यह दोनों जरूरी हैं। इनकी सप्लाई प्रभावित होने से मार्च 2025 की तुलना में मार्च 2026 में फर्टिलाइजर प्रोडक्शन 24.6% गिर गया। 2.5 मिलियन टन प्रति माह रहने वाला घरेलू यूरिया का प्रोडक्शन मार्च 2026 में करीब 1.5 मिलियन टन रह गया, यानी की 40% गिरावट। 6. भारतीय मारे गए, डिप्लोमेटिक नुकसानः ईरान और अमेरिका में सीजफायर कराने में पाकिस्तान, कतर, ओमान जैसे देशों मध्यस्थ की भूमिका निभाई। ईरान रूस और चीन से लगातार संपर्क में रहा। इस पूरे शांति समझौते में भारत की भूमिका कहीं नहीं दिखी। अमेरिका ने भारत के बैकयार्ड में ईरानी जहाज IRIS देना को डुबा दिया। 8 से 11 जून के बीच अमेरिका ने ओमान की खाड़ी में भारतीय क्रू वाले 3 जहाजों पर हमला किया। इसमें 3 भारतीय नाविकों की मौत हो गई। **** ये खबर भी पढ़िए… अमेरिका ने ईरान जंग में हर मिनट ₹6 करोड़ लुटाए:क्या 28 लाख करोड़ हर्जाना और देना पड़ेगा; आखिर ट्रम्प को कितनी महंगी पड़ी ये जंग अमेरिका को ईरान जंग का हर सेकेंड 10 लाख रुपए का पड़ा। रोजाना करीब 9,400 करोड़ रुपए। 107 दिन बाद जंग खत्म करके भी मुसीबत नहीं टली है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान को हर्जाने के तौर पर 28 लाख करोड़ रुपए और देने पड़ सकते हैं। पूरी खबर पढ़िए…
ईरान समझौते पर अमेरिका में सियासी बवाल, ट्रंप को अपनी ही पार्टी में झेलना पड़ रहा विरोध
समझौते की सबसे चर्चित शर्तों में ईरान के लिए 300 अरब डॉलर के संभावित पुनर्निर्माण फंड का प्रावधान शामिल बताया जा रहा है। इसके अलावा ईरान को तेल निर्यात की अनुमति, प्रतिबंधों में ढील और भविष्य में जमे हुए फंड जारी करने की संभावना ने भी आलोचना को जन्म दिया है।
जर्मनी की एयरोस्पेस इंडस्ट्री में युवा बना सकते हैं करियर
बर्लिन में एयरोस्पेस शो ‘आईएलए बर्लिन’ में देश-विदेश से आई कंपनियों ने हाई-टेक ड्रोन और मिसाइलों की नुमाइश की. इस शो की खास बात यह भी रही कि यहां युवाओं के लिए रोजगार के कई मौके दिखे
ईरान युद्ध के लक्ष्यों में डॉनल्ड ट्रंप को क्या हासिल हुआ
ईरान में प्रदर्शन कर रहे लोगों का उत्साह बढ़ाते डॉनल्ड ट्रंप ने ईरान पर हमले के कुछ लक्ष्य तय किए थे. शुरुआती समझौता हो जाने के बाद सवाल पूछे जा रहे हैं कि उन लक्ष्यों में से कितना कुछ हासिल हुआ
ईरान समझौते को ट्रंप ने बताया ऐतिहासिक सफलता, बोले- पीएम मोदी ने भी किया स्वागत
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ हुए समझौते को एक ऐतिहासिक सफलता बताया। उन्होंने कहा कि इस समझौते से मौजूदा संघर्ष खत्म हो गया है, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फिर से खुल गया है और यह सुनिश्चित हो गया है कि ईरान कभी परमाणु हथियार हासिल नहीं कर पाएगा।
भारत पर हमला हुआ तो अमेरिका साथ खड़ा होगा: ट्रंप
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अगर भारत पर कभी हमला होता है तो अमेरिका उसकी मदद करेगा। भारत और अमेरिका एक व्यापार समझौते के काफी करीब पहुंच चुके हैं।
भारतीय बेहद प्रतिभाशाली: ट्रंप ने की खुलकर तारीफ
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप नेअमेरिका में भारतीय कुशल पेशेवरों के लिए अवसरों का समर्थन किया। उन्होंने भारतीयों को 'बहुत प्रतिभाशाली' बताया और कहा कि दोनों देशों के बीच लंबे समय से रोजगार के क्षेत्र में अच्छे संबंध रहे हैं।
ग्राम पंचायत: कोटियाराज्य: आंध्र प्रदेश या ओडिशा? जवाब आसान नहीं है। यहां लोगों के पास दोनों राज्यों के राशन कार्ड हैं। वोटर लिस्ट में नाम है। कई लोगों के पास दो-दो आधार कार्ड भी हैं। बिजली ओडिशा से आती है, जबकि मोबाइल नेटवर्क आंध्र प्रदेश का है। इसकी वजह कोटिया ग्राम पंचायत के 21 गांवों को लेकर 70 साल पुराना सीमा विवाद है। इन गांवों में रहने वाले 933 परिवारों और 4,430 लोगों पर ओडिशा और आंध्र प्रदेश, दोनों दावा करते हैं। 26 अप्रैल को ओडिशा के अधिकारी कोटिया के अपर सेंबी गांव में जनगणना के लिए पहुंचे। गांव वालों ने ये कहते हुए विरोध किया कि वे आंध्र प्रदेश के रहने वाले हैं। इसके बाद ओडिशा पुलिस ने दो लोगों को गिरफ्तार कर लिया। आंध्र प्रदेश से आए वकीलों ने उनकी जमानत कराई। ओडिशा ने स्कूल-आंगनवाड़ी बनवाई, पेंशन आंध्र प्रदेश की ज्यादा कोटिया ओडिशा के कोरापुट जिला मुख्यालय से करीब 60 किलोमीटर दूर है। सीमा विवाद के बारे में पूछने पर गांव के लोगों ने लगभग एक सा जवाब दिया, ‘हमारे कागज दोनों राज्यों के हैं।’ ये बात कैमरे पर दोहराने के लिए कहा, तो झिझकने लगे। कैमरा हटाते ही सुनील गमेल बोले, ‘हमें दोनों तरफ की योजनाओं का फायदा चाहिए। इसका नुकसान ये है कि हम खुलकर बोल नहीं सकते। ओडिशा के पक्ष में बोलेंगे, तो आंध्र वाले परेशान करेंगे। आंध्र का साथ दिया, तो ओडिशा प्रशासन परेशान करेगा।‘ कोटिया से करीब 10 किलोमीटर दूर फागुनसिनेरी गांव है। बोर्ड पर गांव का नाम तेलुगु में लिखा है। यहां मिले मालती कागज दिखाते हुए कहते हैं, 'मेरे पास दोनों राज्यों के आधार और राशन कार्ड हैं। पेंशन भी दोनों जगहों से मिलती है, लेकिन आंध्र प्रदेश सरकार हमारा ज्यादा ध्यान रखती है।' ‘आंध्र सरकार से बुजुर्गों को 4 हजार और दिव्यांगों को 6 हजार रुपए पेंशन मिलती है। ओडिशा में ये सिर्फ 1 हजार रुपए है। आंध्र प्रदेश में स्कूल जाने वाले बच्चों की मां को हर साल 13 हजार रुपए मिलते हैं, जबकि ओडिशा में ऐसी कोई योजना नहीं है।’ ‘ओडिशा सरकार पेंशन भले नहीं देती, लेकिन स्कूल-आंगनवाड़ी और अस्पताल उसी ने बनवाया है। आंध्रप्रदेश सरकार के बनवाए स्कूल कुछ ही गांवों में हैं। यहां से कोरापुट काफी दूर है, इसलिए जरूरी सामान खरीदने के लिए सरकी, तिलम या लांडा जाना पड़ता है। वो आंध्र प्रदेश में है और वहां तेलुगु ही बोलते हैं।’ इसी गांव में मिलीं तुलसी पांगी बिना कैमरे पर आए कहती हैं, ’मेरा 4 साल का बेटा ओडिशा की आंगनवाड़ी में जाता है, जबकि बड़ा बेटा तेलुगु मीडियम में पढ़ता है क्योंकि वहां सरकार पैसे देती है।’ ज्यादातर लोग तुलसी पांगी जैसे ही हैं, जो कैमरे पर बात नहीं करते, लेकिन कैमरा बंद करते ही सब बताने को तैयार थे। ‘ओडिशा से नाम कटवाया, आंध्र प्रदेश के साथ रहना चाहते हैं’ बातचीत में पता चला कि अपर सेंबी गांव 10 किलोमीटर दूर है, जहां जनगणना को लेकर विवाद हुआ था। यहीं ताड़िंगी पिलुकु मिले, जिन्हें जनगणना विवाद में गिरफ्तार किया गया था। पिलुकु खुद को आंध्र प्रदेश के पार्वतीपुरम मान्यम जिले का बताते हैं। एक साल पहले तक उनके पास ओडिशा के पोटांगी ब्लॉक और कोरापुट जिले के कागज भी थे। अब वहां से नाम कटवा लिया है। गिरफ्तारी पर पिलुकु कहते हैं, ‘26 अप्रैल को ओडिशा पुलिस के कुछ जवान और तीन अधिकारी यहां जनगणना के लिए आए। हमने कहा कि हमारे ज्यादातर कागज आंध्र प्रदेश के हैं, इसलिए पहले वहां के अधिकारी सर्वे कर लें, फिर ओडिशा की बात करेंगे।’ ‘इसी बात पर हमारे खिलाफ केस दर्ज कर दिया। कहा कि हमने अफसरों के साथ मारपीट और बदसलूकी की, जबकि ऐसा कुछ नहीं हुआ। गांववाले इसके गवाह हैं। अफसरों में सिर्फ पुरुष थे, लेकिन हम पर महिला अधिकारियों को भी परेशान करने का आरोप लगा दिया गया।’ ‘हम आंध्र के साथ जाना चाहते हैं, जबकि ओडिशा वाले उड़िया भाषा सीखने का दबाव बनाते हैं। उड़िया ना आने पर नौकरी नहीं मिलती। गांव के ज्यादातर लोगों ने ओडिशा से नाम कटवा लिया है। जिनका अब भी है, वो सिर्फ राशन के लिए कागज रखे हैं।’ ‘खुद को आंध्र का बताने वाले ओडिशा के अस्पताल में आ रहे’ गांव में हमें रंजीत पांगी मिले। वे कहते हैं, ‘आंध्र की तरफ लोग सिर्फ इसीलिए जाना चाहते हैं, क्योंकि वहां राशन और पेंशन ज्यादा मिलती है। ओडिशा 5 किलो चावल देता है, जबकि आंध्र प्रदेश 35 किलो। इसके अलावा सभी जरूरी काम ओडिशा सरकार ने किए हैं। आंध्र वाले भी उड़िया बोलने वालों को नौकरी नहीं देते और तेलुगु सीखने के लिए मजबूर करते हैं।’ पांगी बताते हैं, ‘कोटिया और आसपास के गांवों में ओडिशा सरकार के 25 स्कूल और 23 आंगनवाड़ी केंद्र हैं, जबकि आंध्र सरकार के इक्का-दुक्का स्कूल हैं। अस्पताल एक भी नहीं है, जबकि ओडिशा सरकार 24 घंटे एंबुलेंस सेवा दे रही है।’ पांगी के साथ बैठे लोगों में एक शख्स ओडिशा सरकार के कर्मचारी हैं। वो कोटिया के अस्पताल में काम करते हैं। नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं, 'खुद को आंध्र प्रदेश का बताने वाले भी इसी अस्पताल में आते हैं।' हालांकि, यहां मिले सभी लोगों के पास दोनों राज्यों के दस्तावेज हैं। ‘चर्च में सो रहे आंध्र के पुलिसकर्मी, ओडिशा का अपना थाना’ इसके बाद हम कोटिया पुलिस स्टेशन पहुंचे। यहां ओडिशा का अपना थाना है। थाना प्रभारी राजकुमार कहते हैं, ‘21 गांव में से 14 का झुकाव आंध्र की तरफ है। वहां के लोग तेलुगु बोलते हैं। आंध्र वालों ने गूगल पर भी कोटिया को अपना हिस्सा बता दिया है, लेकिन ये हमारा हिस्सा है।' वो आगे कुछ बोलते, इससे पहले सिविल ड्रेस में आए एक पुलिसकर्मी ने उड़िया में उनसे कुछ कहा। इसके बाद थाना प्रभारी ने बात करने से मना कर दिया। थाने से बाहर निकलने पर एक पुलिसकर्मी ने ऑफ द रिकॉर्ड बताया कि जनगणना विवाद के बाद आंध्र से कुछ पुलिसकर्मी यहां आए हैं। अभी वे अपर सेंबी के पास रह रहे हैं। हम आंध्र पुलिस को ढूंढते अपर सेंबी पहुंचे। गांव के सामने एक चर्च में दो लोग सोते मिले। पता चला कि ये आंध्र प्रदेश पुलिस से हैं। बिना कैमरे पर आए एक पुलिसकर्मी कैलाश ने बताया, ‘जब से आंध्र के दो लोगों को गिरफ्तार किया गया, तब से हम यहां आए हैं। यहां हमारा कोई थाना नहीं है। ओडिशा वाले बनाने नहीं देते। अपर सेंबी के नीचे जितने गांव हैं, वे सब आंध्र प्रदेश से जुड़ना चाहते हैं।’ हमने पूछा कि यहां आने पर ओडिशा पुलिस ने नहीं रोका? जवाब मिला, ‘दोनों राज्यों के बड़े अधिकारियों के बीच इसे लेकर बातचीत हुई। उसके बाद यहां आए हैं। ओडिशा वालों ने कहा कि हमें सिविल ड्रेस में रहना होगा, इसलिए वर्दी नहीं पहनते। इसी चर्च के आंगन में खाना बनाते हैं और यहीं सो जाते हैं।’ अब जानिए इस सीमा विवाद के पीछे अधिकारी क्या वजह बता रहे… 21 गांवों का औपचारिक सर्वे नहीं, यही विवाद की वजह ओडिशा के प्रशासनिक रिकॉर्ड में कोटिया पोटांगी तहसील का हिस्सा है। यहां के तहसीलदार देवेंद्र धरुआ का कहना है, ‘विवाद की सबसे बड़ी वजह सभी 21 गांवों का औपचारिक सर्वे न होना है। इसकी वजह से गांवों वालों के पास आज तक खाता नंबर या संख्या नहीं है। इससे जमीन की खरीद-बिक्री और मालिकाना हक से जुड़े मामलों में दिक्कत आती है।’ ‘टकराव तब पैदा होता है, जब आंध्र प्रदेश के अधिकारी इन गांवों में आकर सेवाएं देने की कोशिश करते हैं। इस पर ओडिशा के अधिकारी दखल देते हैं। उनका कहना होता है कि ये उनका क्षेत्र है और जरूरी सेवाएं यहां पहले से उपलब्ध हैं।’ वहीं, आंध्र प्रदेश के सालुर के मंडल रेवेन्यू ऑफिसर सुरेश साइविका कहते हैं, ‘कोटिया का विवाद सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि प्रशासनिक और राजनीतिक दावे का भी है। भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के दौरान यहां की सीमा तय नहीं हो सकी। 1956 में आंध्र प्रदेश बनने के बाद से ही हम इन गांवों पर अपना दावा करते रहे हैं।’ ‘ओडिशा का तर्क है कि 1936 तक कोटिया पंचायत जयपुर रियासत का हिस्सा थी, इसलिए ये उसका क्षेत्र है, लेकिन राज्यों का पुनर्गठन भाषाई आधार पर हुआ था। यहां के ज्यादातर लोग तेलुगु बोलते हैं और सांस्कृतिक रूप से भी आंध्र प्रदेश से जुड़े हैं। इसके बावजूद ओडिशा इन गांवों पर दावा करता है।’ दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री मिले, लेकिन नतीजा नहीं निकला सीमा विवाद पर ओडिशा के कोरापुट से सांसद और पोट्टांगी से चार बार विधायक रह चुके जयराम पांगी कहते हैं, ‘विवाद को सुलझाने के लिए कई बार बातचीत हुई, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला। 1968 में दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री भी मिले थे। 2025 में ओडिशा सरकार ने एक समिति बनाई, लेकिन उससे भी कोई खास नतीजा नहीं निकला।‘ आंध्र प्रदेश के अराकू लोकसभा क्षेत्र की सांसद गुम्मा थानूजा रानी के मुताबिक, 9 नवंबर 2021 को भुवनेश्वर में तब ओडिशा के मुख्यमंत्री रहे नवीन पटनायक और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी के बीच बैठक हुई थी। इसमें कोटिया पर भी चर्चा हुई। दोनों राज्यों ने बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने पर सहमति जताई थी। वे बताती हैं, ‘इसके लिए दोनों राज्यों के चीफ सेक्रेटरी और सीनियर अफसरों की टीम बनाने की भी बात हुई थी। जगन मोहन रेड्डी समाधान को लेकर गंभीर थे, लेकिन ओडिशा से कोई जवाब नहीं आया। वहां की सरकार विवाद सुलझाने को लेकर गंभीर नहीं है।‘ केंद्र-ओडिशा में BJP, आंध्र में NDA की सरकार, लेकिन समाधान नहीं कोटिया के लोग दोहरी पहचान के साथ जीना सीख चुके हैं। यहां परजा, गदबा, कोंध और भोट्टाडा समुदाय के लोग हैं, जो खेती करते हैं। सीनियर जर्नलिस्ट भूषित कहते हैं, 'ओडिशा सरकार ने कोटिया का विकास किया है, लेकिन वहां के लोगों का दिल नहीं जीत पाई है।' 'इस वक्त केंद्र और ओडिशा में BJP सरकार है। आंध्र प्रदेश में NDA की सहयोगी TDP की सरकार है। इसे ट्रिपल इंजन सरकार कहा जा सकता है। इसके बावजूद विवाद का कोई ठोस समाधान नहीं निकाला जा रहा है।' ………………….. ये खबर भी पढ़ें… क्यों नसबंदी की रिवर्स सर्जरी करा रहे पूर्व नक्सली छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से करीब 400 किलोमीटर दूर दंतेवाड़ा का जबेली गांव। यहां कभी नक्सली रहे प्रदीप कुंजम का घर है। उन्होंने मुस्कुराते हुए दरवाजा खोला। गोद में 8 महीने की बेटी करिश्मा थी। प्रदीप 2008 में नक्सली बन गए थे। पढ़िए पूरी खबर…
जी-7 सम्मेलन में ट्रंप ने जमकर की पीएम मोदी की तारीफ, बताया- 'दुनिया के सबसे मजबूत वार्ताकार...'
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जमकर तारीफ की। उन्होंने पीएम मोदी को दुनिया के सबसे मजबूत और कड़क बातचीत करने वाले नेताओं में से एक बताया
जी-7 समिट में पीएम मोदी ने कहा, 'साझेदारी, कनेक्टिविटी और समावेशी विकास से नए विश्व का निर्माण संभव'
फ्रांस के एवियन में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समावेशी और टिकाऊ विकास पर जोर दिया
प्रमुख अंतरराष्ट्रीय एडवोकेसी समूह हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन (एचएएफ) ने कैलिफोर्निया में हिंदुओं के खिलाफ बढ़ती नफरत पर चिंता जताई है। एचएएफ ने स्टेट ऑफ हेट कमीशन से राज्य में बढ़ते एंटी-हिंदू गतिविधियों पर ध्यान देने और इसे रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की है।
14 जून को TMC के 28 में से 20 लोकसभा सांसदों ने गुमनाम सी पार्टी NCPI में विलय कर लिया। आज शिवसेना (उद्धव गुट) के 9 से 6 लोकसभा सांसदों ने भी बगावत कर दी। इससे पहले 24 अप्रैल को आम आदमी पार्टी के 10 में से 7 राज्यसभा सांसदों ने भी बगावत कर दी थी। ये सभी बागी BJP या NDA में शामिल हो रहे हैं। विपक्षी सांसदों की इस उछल-कूद के पीछे असली खेल क्या है, मोदी सरकार को और सांसदों का साथ क्यों चाहिए; आज के एक्सप्लेनर में इसी से जुड़े 5 जरूरी सवालों के जवाब… सवाल-1: मोदी सरकार को लोकसभा में दो-तिहाई सांसदों का साथ क्यों चाहिए? जवाबः इसे समझने के लिए 2 महीने पीछे चलना होगा। 16 से 18 अप्रैल 2026। मोदी सरकार लोकसभा में 3 विधेयक लाई। तर्क दिया कि 2029 चुनाव तक महिला आरक्षण कानून लागू करने के लिए ये तीनों विधेयक पारित होने जरूरी हैं। इसमें एक संविधान संशोधन विधेयक था। इसमें लोकसभा की अधिकतम सीटें 550 से बढ़ाकर 850 करने और संविधान के आर्टिकल 81 और 82 में बदलाव करने के प्रावधान थे। संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत जरूरी होता है, यानी वोटिंग में आधे से ज्यादा सदस्य सदन में मौजूद हों और जितने सदस्य मौजूद हैं, उनमें से कम से कम दो-तिहाई सांसद इसके पक्ष में वोट दें। सीनियर जर्नलिस्ट आदेश रावल बताते हैं, ‘लोकसभा सीटें बढ़ाने वाला परिसीमन बिल मानसून सत्र में दोबारा जरूर लाया जाएगा और उसी के लिए सांसदों के समर्थन का आंकड़ा बढ़ाने की कवायद की जा रही है।’ NDA की सहयोगी तेलुगु देशम पार्टी यानी TDP के प्रमुख और आंध्र प्रदेश सीएम चंद्रबाबू नायडू ने भी 15 जून को दावा किया है कि केंद्र सरकार जल्द ही परिसीमन बिल फिर से लाएगी। महिला आरक्षण और परिसीमन साथ-साथ आगे बढ़ेंगे। उन्होंने कहा कि राजनीति में महिला आरक्षण लागू करने के लिए डिलिमिटेशन जरूरी है और वह इसका पूरा समर्थन करते हैं। सवाल-2: अभी दोनों सदनों में मोदी सरकार का आंकड़ा कितना है? जवाबः संसद के दोनों सदनों में NDA का आंकड़ा… लोकसभा में NDA के साथ 318 सांसद राज्यसभा में NDA के साथ 154 सांसद सवाल-3: संसद में दो-तिहाई बहुमत से कितना पीछे है सरकार, बाकी कैसे आएंगे? जवाबः फिलहाल सरकार लोकसभा में दो-तिहाई के आंकड़े से 44 सीट और राज्यसभा में 10 सीट दूर है। ये कमी कुछ छोटे क्षेत्रीय दलों से पूरी हो सकती है… 1. लोकसभा में DMK और JMM के सांसदों पर दांव 2. राज्यसभा में YSR कांग्रेस और बीजू जनता दल की जरूरत BJP परिसीमन बिल को पास कराने के लिए हर संभव प्रयास करेगी। बंगाल और महाराष्ट्र में जो स्थितियां बनीं, वो BJP की एक बड़ी मुहिम का हिस्सा है। आगे तमिलनाडु में DMK, बिहार में RJD और यूपी में सपा या बसपा के सांसदों पर भी दबाव बनाकर उन्हें तोड़ने की कोशिश हो सकती है। पॉलिटिकल एक्सपर्ट और सीनियर पत्रकार रशीद किदवाई भी कहते हैं, ‘फिलहाल, BJP का सबसे बड़ा एजेंडा परिसीमन ही है। लॉन्ग टर्म एजेंडे में उसे विपक्षी क्षेत्रीय पार्टियों को सीमित करना है। देश में 200-250 लोकसभा सीटें ऐसी हैं, जहां कांग्रेस का वोट शेयर महज 4-5% है। ऐसे में 2029 में कांग्रेस को सीटें जीतने के लिए क्षेत्रीय दलों और छोटी पार्टियों की जरूरत पड़ेगी। इसीलिए BJP इन पर अभी से लगाम लगा रही है।’ सवाल-4: आखिर परिसीमन बिल पारित होने से क्या हो जाएगा? जवाबः परिसीमन के बाद लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में सीटें बढ़ेंगी। सरकार जो बिल लाई थी, उसमें लोकसभा सीटों की संख्या 550 से बढ़ाकर 850 करने की बात थी। तब गृहमंत्री अमित शाह ने इसका फॉर्मूला बताते हुए कहा था, ‘मान लीजिए कि 100 सीटें हैं, जिसमें 33% आरक्षण देना है, तो इसमें 50 सीटें बढ़ाएंगे। इस हिसाब से 150 सीट होती हैं। लोकसभा में ये राउंड ऑफ फिगर 850 है।' सरकार का कहना था कि सारे राज्यों में सीटें 'आनुपातिक रूप से' बढ़ेंगी। यानी, अगर 543 सीटों की लोकसभा में तमिलनाडु के पास 7.18% हिस्सेदारी, यानी 39 सीटें हैं, तो 850 सीटों की लोकसभा में भी 7.18% हिस्सेदारी यानी 61 सीटें होंगी। हालांकि परिसीमन विधेयक में सीटें 'आनुपातिक रूप से बढ़ाने’ की गारंटी देने वाला कोई प्रावधान नहीं है। इसके उलट संविधान का अनुच्छेद 81(2)(a) कहता है कि सीटें जनसंख्या के अनुपात में मिलेंगी, न कि सभी राज्यों में बराबर प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होगी। इसमें भी सरकार ने कोई बदलाव नहीं किया। यानी 2011 की जनगणना के आधार पर जनसंख्या के अनुपात से ही परिसीमन होगा। ज्यादा जनसंख्या वाले राज्यों को ज्यादा सीटें और कम जनसंख्या वाले राज्यों को कम सीटें मिलेंगी। इसीलिए दक्षिण के राज्यों को चिंता है कि अगर 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन हुआ, तो सबसे ज्यादा नुकसान उन्हीं को होगा, क्योंकि इन राज्यों की जनसंख्या भारत के होल्ड वाले हिंदी भाषी राज्यों के मुकाबले कम है। तमिलनाडु, केरलम और आंध्र प्रदेश सबसे ज्यादा घाटे में होंगे। देश की पॉलिसीज से जुड़े निर्णयों में इन राज्यों का दबदबा घटेगा। 1976 और 2001 में भी परिसीमन इसीलिए टाला गया था, क्योंकि उत्तर और दक्षिण की जनसंख्या में बड़ा अंतर था। इससे यूपी, बिहार, राजस्थान, दिल्ली और मध्य प्रदेश सबसे ज्यादा फायदा में होंगे। ये सभी हिंदी बेल्ट के राज्य हैं, जहां बीजेपी का स्ट्रॉन्ग होल्ड है। सवाल-5: क्या इससे बीजेपी को चुनावी फायदा भी मिल सकता है? जवाब: बीजेपी के पिछले तीन चुनावों के आंकड़ों के आधार पर बीजेपी के लिए अच्छे और बुरे दोनों सिनैरियो में फायदा है… 1. बीजेपी के लिए बेस्ट केस सिनैरियोः अगर 2019 का प्रदर्शन दोहराती है 2. बीजेपी के वर्स्ट केस सिनैरियो: अगर 2024 का प्रदर्शन दोहराती है *****रिसर्च सहयोग - प्रथमेश व्यास-----------------------------------------------------------ये खबर भी पढ़ें… क्या ममता की राजनीति अब कांग्रेस के सहारे, वापसी क्यों मुश्किल; कैसे बागी हुए 58 विधायक और 20 सांसद TMC के 58 विधायकों की टूट और अब 20 सांसदों के बागी होने का दावा। ममता बनर्जी के पास अब सिर्फ 22 विधायकों और 8 सांसदों का समर्थन बाकी है। खेमे के सांसदों से लेकर पार्टी नेताओं तक पर हमले हो रहे। इस बीच ममता लगातार दो दिन सोनिया गांधी से मिलीं। INDIA ब्लॉक की अगुवाई करने की भी इच्छा जताई। ये तक कहा जा रहा कि ममता ‘अपनी वाली TMC’ का कांग्रेस में विलय कर सकती हैं। पढ़ें पूरी खबर…
होर्मुज में बढ़ी जहाजों की आवाजाही, ईरान के तीन तेल टैंकरों ने अमेरिकी नाकेबंदी को किया पार
होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही बढ़ने लगी है। मैरीटाइम एनालिसिस फर्म विंडवर्ड ने बताया कि मंगलवार को 14 जहाज स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरे, जो इस महीने का सबसे बड़ा दैनिक आंकड़ा है। जो इस महीने का अब तक का सबसे बड़ा दैनिक आंकड़ा है। इस बढ़ोतरी को शिपिंग कंपनियों के बीच धीरे-धीरे लौटते भरोसे के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि होर्मुज स्ट्रेट में समुद्री व्यापार बाधित होने का असर केवल क्षेत्रीय स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक व्यापार की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है और इसकी सुरक्षा अंतरराष्ट्रीय समुदाय की साझा जिम्मेदारी है।
जी7 के देशों का ध्यान अब यूक्रेन युद्ध रोकने पर
फ्रांस में जी7 की बैठक से दुनिया के ताकतवर देशों के नेताओं ने यूक्रेन युद्ध की ओर ध्यान बढ़ाने के संकेत दिए हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने कहा है कि रूस को समझौता कर लेना चाहिए
ट्रंप–मोदी की बड़ी मुलाक़ात! व्यापार, एआई और सुरक्षा पर फोकस
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बुधवार को जी7 नेताओं, आउटरीच पार्टनर्स और प्रमुख टेक्नोलॉजी कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों के साथ आयोजित वर्किंग लंच से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय बैठक करेंगे।
जी-7 समिट में पीएम मोदी-स्टार्मर की मुलाकात, व्यापार से एआई तक कई मुद्दों पर हुई चर्चा
फ्रांस के एवियन में जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के बीच मुलाकात हुई। दोनों नेताओं ने भारत-ब्रिटेन संबंधों को ज्यादा मजबूत बनाने के तरीकों पर चर्चा की
अमेरिका की निगरानी में इजरायल-लेबनान समझौता, बनेंगे विशेष 'पायलट जोन'
मध्य पूर्व में स्थिरता की दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए भारत में इजरायल के राजदूत रूवेन अजार ने बताया कि इजरायल और लेबनान, अमेरिका की निगरानी में पायलट जोन बनाने की प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाने पर सहमत हुए हैं
जी-7 सम्मेलन में पीएम मोदी बोले, साझेदारी सम्मान पर आधारित होनी चाहिए, निर्भरता पर नहीं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि आज के समय में आपसी भरोसा ही सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत है

