नए ऐतिहासिक मोड़ पर न्यायपालिका
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के बीच हुआ संवाद न्यायिक और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है।
भारत में नोएडा से औद्योगिक अशांति, दिल्ली-एनसीआर के कई राज्यों में फैली
नोएडा के फेज़-2 में प्रदर्शन हिंसक हो गया, और एक पुलिस वैन और दूसरी गाड़ियों में तोड़फोड़ की गई,
यह वह मगध है, जिसे तुम मेरी तरह गंवा चुके हो!
पच्चीस से तीस फिर से नीतीश, यही नारा जदयू के कार्यकर्ताओं ने पिछले साल के बिहार चुनाव में बुलंद किया था।
16 अप्रैल को मासिक शिवरात्रि, अभिजित के साथ विजय मुहूर्त, नोट कर लें राहुकाल
देवाधिदेव महादेव व माता पार्वती को समर्पित मासिक शिवरात्रि गुरुवार यानी 16 अप्रैल को मनाई जाएगी। यह दिन भगवान शिव और माता पार्वती को विशेष रूप से प्रिय माना जाता है
फरीदाबाद में रेप के बाद महिला को कार से फेंकने के दावे से ब्राजील का वीडियो वायरल
बूम ने पाया कि वायरल वीडियो ब्राजील के Macap का है. वीडियो में कैद यह घटना 28 मार्च 2026 की है, जहां एक महिला चलती गाड़ी से कूद गई थी.
BJP पर टिप्पणी करते सम्राट चौधरी का 12 साल पुराना वीडियो भ्रामक दावे से वायरल
बूम ने पाया कि बिहार के नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का यह वीडियो साल 2014 का है. उस समय उन्होंने राजद से अलग होकर जदयू को समर्थन देने की बात कही थी.
सूंघने की क्षमता में गिरावट भी अल्जाइमर्स का शुरुआती संकेत
अल्जाइमर एक ऐसी अवस्था है जिसमें ढलती उम्र के साथ याददाश्त कमजोर होती चली जाती है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, अल्जाइमर डिमेंशिया (मस्तिष्क क्षीणता) का एक प्रकार है
ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित करने में मददगार अर्जुन की छाल
आजकल बढ़ते हृदय रोग और सांस संबंधी समस्याओं के बीच आयुर्वेद में उपयोग होने वाला अर्जुन एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक औषधि माना जाता है
ललित सुरजन की कलम से चुनावों में बदजुबानी
'चुनाव आयोग के सामने तकनीकी सीमाएं हैं। जब मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ रही हो, मतदान का प्रतिशत भी बढ़ रहा हो, चुनाव में घपलेबाजी रोकना हो, नयी तकनीकी का प्रयोग करना हो, मतदाताओं को निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव के प्रति आश्वस्त करना हो तो इतनी व्यवस्थाएं करने में समय तो लगना ही है, किंतु अब चुनाव आयोग को विचार करना होगा कि कीचड़ उछालने के इस खेल को कैसे रोका जाए। कई-कई चरणों में मतदान होने से पार्टियों का अपने विरोधियों पर आक्रमण करने का एक नया अवसर हर दो दिन में मिल जा रहा है, इस पर विराम कैसे लगाया जाए।' 'आज एक नेता एक जगह भाषण देता है, अगले हफ्ते दूसरी जगह जाकर वह उसी बात को दोहरा देता है इस तरह से मर्यादाहीनता लगातार आगे बढ़ती जाती है। चुनाव आयोग ने शिकायत मिलने पर अपनी तरफ से कार्रवाईयां जरूर कीं, लेकिन वे पर्याप्त सिद्ध नहीं हुईं।' (देशबन्धु में 24 अप्रैल 2014 को प्रकाशित) https://lalitsurjan.blogspot.com/2014/04/blog-post_23.html
आंबेडकर के लिए राष्ट्र का भाग्य सर्वोपरि था
आंबेडकर को संविधान निर्माता के तौर पर पहचान मिली है, लेकिन वह प्लानर और अर्थशास्त्री भी थे।
2029 को लेकर अभी से डरे हुए हैं मोदी
कांग्रेस की ओर से पार्टी के संचार विभाग के प्रभारी महासचिव जयराम रमेश ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके परिसीमन के प्रस्ताव पर सवाल उठाया।
मजदूरों के गुस्से का पाकिस्तान और नक्सली लिंक
मई दिवस या अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस आने में अभी एक पखवाड़े का वक्त बचा है, लेकिन जिन वजहों से 140 साल पहले मजदूरों ने अपनी आवाज़ बुलंद की थी, वो वजहें अब कई गुना सघनता के साथ समाज में मौजूद हैं।
आज से ही सब छोड़ दो यह गेंहू की रोटिया खाना, नही तो यारो पहुंचा देगा यह सभी को सफाखाना। खा खाकर जिससे सब लोग आज बढ़ा रहे है तोंद, जीना है तो गेंहू छोड़ दो सब मानो हमारा कहना।। मोटापा-डायबिटीज बढ़ रहा है इससे हृदय के रोग, आज मिक्स अनाज खाकर रहो आप सब ... Read more
मेरे लफ़्ज़ों की आख़िरी बात तू
मेरेलफ़्ज़ोंकीआख़िरीबाततू, मेरीख़ामोशीकाहरराज़तू, तुझसेहीचलतीहैयेधड़कन, मेरेहोनेकाएहसासतू तेरेबिनासबफीकासालगे, जैसेकोईसपनाअधूरालगे, तूजोमिलेतोरंगभरजाएँ, वरनाहरपलबसधुंधलालगे तूपासआएतोदिलयेकहे, अबऔरकुछभीज़रूरीनारहे मेरेलफ़्ज़ोंकीआख़िरीबाततू, मेरीख़ामोशीकाहरराज़तू, तुझसेहीजुड़ीमेरीहरकहानी, मेरेजीनेकीहरवजहतू तेरेख्यालोंमेंबहतारहूँ, तेरेसाथहीठहरतारहूँ, तूजोमिलेतोसबमिलजाए, तेरेबिनाक्योंजीतारहूँ जबतूसाथहैतोकमीक्याहै, तेरेबिनाहरखुशीअधूरीसीहै मेरेलफ़्ज़ोंकीआख़िरीबाततू, मेरीरूहकागहराराज़तू, तुझमेंहीसिमटामेराहरसफर, मेरीदुनिया,मेराआजतू “राहतटीकमगढ़”
सतुआ संक्रांति: देवताओं को प्रिय तो दान से तृप्त होते हैं पूर्वज, जानें सत्तू व घड़े के दान का महत्व
नई दिल्ली, 14 अप्रैल (आईएएनएस)। आज देश भर में सतुआ संक्रांति या सतुआन पर्व मनाया जा रहा है। इस दिन घड़ा, पंखा, सत्तू और ठंडे फलों का दान करने का विधान है। मान्यता है कि ये दान करने से ढेरों पुण्य प्राप्त होते हैं।
हेल्थ टिप्स : गर्मियों में बढ़ जाता है 'फूड पॉइजनिंग' का मामला, ऐसे करें बचाव
गर्मी के मौसम में फूड पॉइजनिंग के मामले बढ़ते दिखते हैं। ऐसे में हेल्थ एक्सपर्ट लोगों को चेतावनी देने के साथ इससे बचाव के उपाय भी बताते हैं
स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने 'स्टार्टअप इंडिया फंड ऑफ फंड्स 2.0' (एफओएफ 2.0) लॉन्च किया
ललित सुरजन की कलम से -सेंसरशिप: प्लेटो से अब तक
यह कहना एक स्थापित सत्य को दोहराना ही होगा कि जनतंत्र की पहिली शर्त अभिव्यक्ति की आजादी है।
क्या चंबल से कुछ सीखेगी दुनिया?
आज जब दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध और संघर्ष की आग भड़कती दिखाई दे रही है—चाहे वह देशों के बीच चल रहे सैन्य टकराव हों या समाजों के भीतर गहराते वैचारिक विभाजन—ऐसे समय में शांति की बातें अक्सर आदर्शवादी लगती हैं,
हिन्दू धर्म त्यागकर बौद्ध धर्म अंगीकार कर मैं बहुत प्रसन्न हूं : डॉ अम्बेडकर
'ईसाई धर्म बुनियादी रूप से गरीबों का धर्म है। इसी तरह बौद्ध धर्म महारों का धर्म है। ब्राह्मण लोग गौतम बुद्ध को 'वो गौतम' कहकर पुकारते थे।
अद्भूत जीवटता की मिसाल आशा भोंसले
फिल्म और संगीत जगत की महान गायिका आशा भोंसले ने 92 साल की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
सूरों की आशा बनकर गूंजती रहेगी आशा भोसले
भारतीय संगीत का आकाश आज कुछ अधिक मौन, कुछ अधिक रिक्त प्रतीत होता है। स्वर की वह चंचल चिड़िया, जन-जन को चमत्कृत करने वाली आवाज जिसने दशकों तक हर हृदय में मधुरता के बीज बोए, आज भले ही भौतिक रूप से हमारे बीच न हो, पर उसकी गूंज अनंत में विलीन होकर भी अमर बनी ... Read more
समानता और न्याय के अग्रदूत: डॉ. अंबेडकर की विचारधारा आज भी प्रासंगिक
14अप्रैल डॉ.भीमराव अंबेडकर जयंती विशेष लेख 14अप्रैल का दिन भारतीय इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसी दिनभीमराव अंबेडकरका जन्म हुआ था,जिन्हें पूरे देश में बाबा साहेब के नाम से जाना जाता है। वे भारतीय संविधान के निर्माता,महान समाज सुधारक,न्यायविद,अर्थशास्त्री और दूरदर्शी नेता थे। उनका जीवन संघर्ष,शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन की प्रेरणादायक गाथा है। डॉ. अंबेडकर ... Read more
प्रतिभा के पुंज —डॉ. भीमराव अंबेडकर
डॉ. अंबेडकर जयंती पर विशेष सन 1930 में लंदन में आयोजित गोलमेज कॉन्फ्रेंस में शेर की तरह दहाड़ते हुए एक युवक ने कहा ‘‘अंग्रेजों पहले तुम भारत छोड़ो‘‘। युवक के मन में देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त करवाने एवं वहां रह रहे दलितों के जीवन स्तर को सुधार कर सभी लोगों को समान ... Read more
बंगाल का आखिरी पड़ाव : मछली की कहानी, लापता वोटर और दो राष्ट्रीय नेता
बनर्जी, जो किसी और को अपनी बातों में मसाला लगाने का मौका देकर आज इस मुकाम तक नहीं पहुंची हैं, ने इस बात को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं किया।
ललित सुरजन की कलम से युद्ध नहीं, शांति चाहिए
जब एक तरफ सिर्फ एक सैनिक की गिरफ्तारी से उपजे भय और रिहाई की घोषणा से मिली राहत है, तब दूसरी तरफ आक्रामक मुद्रा अपनाकर हम क्या हासिल करना चाहते हैं?
नेहरू से मनमोहन सिंह तक एक ही विदेश नीति हम नहीं देश बड़ा!
शकील अख्तर बड़े नेताओं का यह आत्मविश्वास होता है। और वे यह मानते हैं नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक कि बड़ा होना खुद से नहीं है महान भारत के बड़े देश होने से है। यहां तो खुद को बड़ा मानते हैं। इसीलिए स्वकेन्द्रित विदेश नीति चला रहे थे। उसी का परिणाम है पाकिस्तान को बेवजह तवज्जो मिल जाना। भारत में ताकत है फिर 'पुनर्मुषको भव' करने की। समय आएगा। फिलहाल बातचीत खत्म होने से कौन खुश है? इजराइल! और सऊदी अरब एवं इसके साथ के कुछ अरब देश। देखिए कितना मजेदार इक्वेश्न बन रहा है। एक तरफ इजराइल और अरब देशों के बीच कई जंग हो चुकी हैं। दोनों एक दूसरे की शक्ल भी देखना नहीं चाहते। मगर दोनों ईरान को बरबाद होता देखना चाहते हैं। अमेरिका पर दोनों का दबाव है कि ईरान को खत्म कर दो। लेकिन ईरान ने बता दिया कि यह ख्याली पुलाव हैं। पिछले डेढ़ महीने से वह जिस तरह अमेरिका और इजराइल से लड़ा युद्ध इतिहास में वह बहादुरी की नई मिसाल है। यह कुछ नेपोलियन बोनापार्ट की याद दिलाता है कि कहां है पहाड़ (आल्पस)? वैसे ही ईरान की बहादुर जनता और नेतृत्व कह रहा है कि कौन है अमेरिका और इजराइल? जनता जब शहादत पर उतर आए तो कोई उसे हरा नहीं सकता। 'सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है!' भारत की आजादी के लिए जनता ऐसे ही खड़ी हुई थी। और वह अंग्रेज सरकार जिसके राज में सूरज नहीं डूबता था उसे भारत छोड़कर भागना पड़ा। और उसके बाद हर जगह से ऐसी ही दुर्दशा हुई। तत्काल बाद ही उसे स्वेज नहर पर दावा छोड़ना पड़ा। और वह मिस्र की नहर हो गई। उस समय इजराइल ब्रिटेन के साथ आया था। आज के होर्मुज स्ट्रेट (जलडमरूमध्य) की तरह उस समय स्वेज नहर तेल के जहाज लाने का मुख्य जलमार्ग था। 1956 की बात है नेहरू थे। अन्तरराष्ट्रीय नेता। उनके प्रयासों से वह संकट हल हुआ था। लेकिन इस समय हम नेहरू के अन्तरराष्ट्रीय रुतबे की बात करना नहीं चाह रहे। भक्तों, गोदी मीडिया और भाजपा के नेताओं को बहुत दुख होगा। नेहरू को ही तो छोटा बताने के लिए यह सब रात-दिन काम कर रहे हैं। बाकी तो विश्व में हमारी स्थिति नगण्य बना ही दी है। बहरहाल बात हो रही थी कि जनता की बहादुरी की। तो हम बता रहे थे कि एक बार बहादुर जनता से मात खाने के बाद बड़ी से बड़ी विश्व शक्ति के भी हौसले टूट जाते हैं। भारत की जनता से हार कर ग्रेट ब्रिटेन इजराइल मिस्र से भी हारे थे। स्वेज नहर से ब्रिटेन के जहाज को टोल टैक्स देकर निकलना पड़ा था। हार का असर यही होता है। ग्रेट ब्रिटेन भारत की जनता से हारने के बाद मिस्र से भी हारा। ईरान की जनता इस बात को बखूबी समझती है। इसलिए इतनी लंबी लड़ाई, इतने नुकसान के बाद भी वह अपने नेतृत्व से नहीं कह रही कि समझौता करो। निकलो इस से। नहीं वह जानती है कि आज अमेरिका इजराइल की शर्तों पर समझौता उसे हमेशा के लिए वैसा ही गुलाम बना देगा जैसा बाकी अरब देश हैं। हम चाह नहीं रहे नेहरू का लिखना। दोस्तों को तकलीफ पहुंचती है। मगर क्या करें यह नेहरू हैं ही ऐसी चीज की सिर्फ भारत नहीं दुनिया के किसी भी उलझे हुए मुद्दे पर उनकी भूमिका याद आ जाती है। होना तो यह चाहिए था कि देश के सम्मान का ख्याल करके वर्तमान सरकार और उसके समर्थक नेहरू के महान रोल को और दुनिया के सामने पेश करते। लेकिन यहां कहानी उलटी है। नेहरू का कद छोटा करके समझते हैं कि उनका कद बढ़ा हो गया। काश ऐसा हो सकता! तो उनका कद बड़ा करने के लिए हम सब नेहरू के पीछे पड़ जाते। मगर दूसरे की लकीर छोटी करने से आप की लकीर की लंबाई बढ़ती नहीं है। वह उतनी ही रहती है। तो उस समय मिस्र में नेहरू के दोस्त अब्दुल नासिर राष्ट्रपति थे। उनके हौसले ने केवल मिस्र को नहीं सारे अरब देशों को एक बड़ी ताकत बना दिया था। मगर न नेहरू रहे, न नासिर और न ही मिस्र सहित वे अरब देश। आज अमेरिका के गुलाम बन गए हैं। इजराइल उन्हें मारता है। ईरान इजराइल से उन्हें बचाता है। मगर वे अपना नंबर एक दुश्मन ईरान को मानते हैं। और अमेरिका के थ्रू इजराइल की मदद करते हैं। सऊदी अरब युद्धविराम के खिलाफ था। वहां के शासक अमेरिका से डायरेक्ट और इजराइल से उसके माध्यम से कह रहे थे कि मिटा दो ईरान को। खतम कर दो। उसी के बाद प्रेसिडेन्ट ट्रंप ने यह राक्षसी धमकी दी थी कि ईरान की सभ्यता खतम कर देंगे। उसे पाषाण युग में पहुंचा देंगे। मगर फिर भी ईरान की जनता नहीं डरी, नहीं घबराई। अभी इस्लामाबाद में हुई बातचीत विफल है या दोनों पक्षों ने थोड़ा समय और लिया है कोई नहीं जानता। मगर युद्ध के खिलाफ और शांति के पक्षधर यह समझते हैं कि बातचीत फिर होगी। युद्ध वापस शुरू नहीं होना ही बातचीत वापस होने के संकेत हैं। अमेरिका बहुत बुरी तरह फंस गया था। भारी सैनिक, लड़ाकू जहाजों और आर्थिक नुकसान तो हो ही रहा रहा था मगर सबसे बड़ी बात कि उसकी छवि एक युद्ध उन्मादी देश की बन गई थी। सामान्य शब्दों में कटखने कुत्ते, मरखने सांड की। उससे निकलना उसके लिए बहुत जरूरी था। इसलिए वह बातचीत की टेबल पर बैठा। ऐसे में ही गांधी का संदेश कारगर होता है। मगर कोई देने वाला नहीं था। जो हैं वे रात-दिन गांधी की छवि को कलंकित करते रहते हैं। नहीं तो क्या अमेरिका और ईरान बातचीत के लिए पाकिस्तान जाते? 12 साल पहले कोई सोच भी नहीं सकता था। मनमोहन सिंह की सरकार ने उसे एक कोने में लगा दिया था। मगर 2014 में अपने शपथ ग्रहण समारोह में वहां के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को बुलाकर उसका अन्तरराष्ट्रीय अकेलापन खत्म करवा दिया। और फिर जब लगा कि खाली अकेलापन खतम करवाने से काम नहीं चलेगा तो अचानक लाहौर जा पहुंचे। पाकिस्तान को पूरी मान्यता दिलवा दी। मनमोहन सिंह दस साल में एक बार भी नहीं गए थे। उनकी जन्मभूमि था। निमंत्रण था। ऐसे ही निमंत्रण पर आडवानी गए थे। जिन्ना को सर्टिफिकेट दे आए थे। मोदी ने नवाज शरीफ को दिया। नतीजा बातचीत पाकिस्तान में हुई। अब उसके सफल न होने से भक्त और गोदी मीडिया खुश हैं। मतलब अगर सफल हो जाती तो पूरी दुनिया खुश होती और ये दुखी! बहुत छोटे-छोटे दु:ख-सुख पाल रखे हैं। बातचीत पाकिस्तान में होने से कोई उसका रुतबा नहीं बढ़ गया। हुआ केवल यह कि हमारी व्यक्ति केन्द्रित अन्तरराष्ट्रीय नीति से हमारा वजन कम हो गया। मैं दोस्त, और वह मेरा दोस्त से विदेश नीति नहीं चलती। विदेश नीति में धमक आती है आंख से आंख मिलाकर बात करने से। जैसे इन्दिरा गांधी करती थीं। उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन को चुनौती देते हुए पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए। और फिर भुट्टो को भारत शिमला बुलाकर समझौता किया। नरसिम्हा राव ने 1994 में संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव पास करवा के दुनिया को यह संदेश दिया कि जम्मू-कश्मीर तो है ही पाक अधिकृत कश्मीर भी हमारा है। दुनिया भारत का लोहा मानती थी। क्या मजाल कि कोई कह दे कि मैं भारत के प्रधानमंत्री का राजनीतिक कैरियर खतम कर सकता हूं! भारत के प्रधानमंत्री मुझसे सर सर करके बात करते हैं। सर करके बात करने में कोई प्राब्लम नहीं है। समकक्ष लोग करते हैं। समस्या है उसे इस तरह बताने की जिससे अपना रुतबा ऊंचा और दूसरे का नीचा दिखाई दे। सर कहने के आदी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष पूछते थे हम आनरेबल भारत की प्राइमिनिस्टर इन्दिरा गांधी जी को क्या कह कर संबोधित कर सकते हैं। जब विदेश विभाग यह सवाल इन्दिरा जी के सामने लाता था तो वे हंस कर कहती थीं कि कह दो कुछ भी कहें कोई फर्क नहीं पड़ता। बड़े नेताओं का यह आत्मविश्वास होता है। और वे यह मानते हैं नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक कि बड़ा होना खुद से नहीं है महान भारत के बड़े देश होने से है। यहां तो खुद को बड़ा मानते हैं। इसीलिए स्वकेन्द्रित विदेश नीति चला रहे थे। उसी का परिणाम है पाकिस्तान को बेवजह तवज्जो मिल जाना। भारत में ताकत है फिर 'पुनर्मुषको भवÓ करने की। समय आएगा। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)
इस्लामाबाद वार्ता से निकला संदेश
अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध को खत्म करने के लिए पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुई इस्लामाबाद वार्ता बेनतीजा खत्म हो गई।
स्मृति शेषः आशा जी की मधुर और सुरमयी आवाज सदा दिलों में अमर रहेगी
आशा भोंसले जी का नाम भारतीय संगीत इतिहास में अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने अपने करियर में आठ दशकों से भी अधिक समय तक संगीत जगत में अमूल्य योगदान दिया है और लगभग12हजार से अधिक गीतों को अपनी मधुर आवाज से सजाया है। आशा भोंसले जी,जो भारत की महानतम और दिग्गज गायिकाओं ... Read more
कूनो नेशनल पार्क में खुशखबरी: भारतीय मूल की चीता ‘गामिनी’ ने 4 शावकों को दिया जन्म
मध्य प्रदेश में श्योपुर जिले के कूनो नेशनल पार्क से एक बार फिर बड़ी खुशखबरी सामने आई है। यहां 25 माह की भारतीय मूल की चीता गामिनी ने चार शावकों को शनिवार को जन्म दिया है
सुबह के नाश्ते में कहीं आप भी तो नहीं कर रहे ये गलती? ऐसे करें बचाव
सुबह का नाश्ता दिन का सबसे महत्वपूर्ण भोजन है। यह न सिर्फ शरीर को ऊर्जा देता है, बल्कि पूरे दिन के स्वास्थ्य और एक्टिविटी को भी प्रभावित करता है
दिल्ली की 'जहरीली हवा' पर कांग्रेस नेता अजय माकन की चेतावनी
अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के कोषाध्यक्ष और दिल्ली विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष अजय माकन ने राष्ट्रीय राजधानी में बढ़ते वायु प्रदूषण को लेकर गंभीर चिंता जताते हुए इसे “नीतिगत विफलता” करार दिया है
युद्धविराम और हाशिए पर धकेल दिया गया भारत
यह युद्ध स्पष्ट रूप से नेतन्याहू की देन है और ट्रम्प इसके परिणामों के बारे में सोचे-समझे बिना ही इसमें फंस गए।
डिजिटल जनगणना 2027 : भारत की प्रशासनिक क्षमता का नया अध्याय
इस जनगणना के सामाजिक प्रभावों के साथ इसके राजनीतिक परिणाम भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इसके बाद परिसीमन के तहत जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं पुनर्निर्धारित होंगी,
— बाबा मायाराम नर्मदा उसकी कई सहायक नदियों के सूखने के कारण वह बहुत कमजोर हो गई है। लेकिन हम इस सबसे नहीं चेत रहे हैं और पानी का बेहिसाब इस्तेमाल से पानी के स्रोतों को ही खत्म कर रहे हैं, जो शायद फिर पुनर्जीवित न हो सकें। अगर हमें बड़ी नदियों को बचाना है तो छोटी नदियों पर ध्यान देना होगा। छोटी नदियों का संरक्षण जरूरी है। अगर हम इन पर छोटे-छोटे स्टापडेम बनाकर जल संग्रह करें तो नदियां भी बचेंगी और खेती में भी सुधार संभव है। गर्मी शुरू होते ही पानी की किल्लत शुरू हो जाती है। भोजन, पानी और हवा हमारी बुनियादी जरूरतें हैं। इनके बिना जीवन असंभव है। पानी के मामले में हमारी स्थिति बहुत ही अच्छी थी। हमारे अपने जीवन में ही कुएं, तालाब, बावड़ी और नदियां थीं, जो सैकड़ों सालों से सदानीरा थीं। लेकिन ऐसा क्या हुआ कि सब के सब सूखते चले रहे हैं। आज इसी मुद्दे पर बात करना चाहूंगा, जिससे पानी जैसे जरूरी संसाधन के बारे में समझें और इसे बचाने के लिए काम करें। आमतौर जब कभी नदियों पर बात होती है तो ज्यादातर वह बड़ी नदियों पर केंद्रित होती है। लेकिन इन सदानीरा नदियों का पेट भरने वाली छोटी नदियों पर हमारा ध्यान नहीं जाता, जो आज अभूतपूर्व संकट से गुजर रही हैं। अगर हम नजर डालें तो पाएंगे कि कई छोटी-बड़ी नदियां या तो सूख चुकी हैं या फिर बरसाती नाले बनकर रह गई हैं। गांव-समाज के बीच से तालाब, कुएं और बावड़ी जैसे परंपरागत पानी के स्रोत तो पहले से ही खत्म हो गए हैं। अब इन छोटी नदियों पर आए संकट से बड़ी नदियां तो प्रभावित हो ही रही हैं। जनजीवन के साथ पशु, पक्षी और वन्य- जीवों को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। देश-दुनिया में नदियों के किनारे ही सभ्यताएं पल्लवित-पुष्पित हुई है। जहां जल है, वहां जीवन है। लेकिन आज नदियां धीरे-धीरे दम तोड़ रही हैं। नदियों का प्रवाह अवरूद्ध हो रहा है। वर्षों पुरानी नदी संस्कृति खत्म रही है। उनमें पानी नहीं हैं,पानी को स्पंज की तरह सोखकर रखने वाली रेत नहीं है। मध्यप्रदेश के सतपुड़ा अंचल की बारहमासी सदानीरा नदियां या तो सूख गई है या बारिश में ही उनकी जलधारा प्रवाहित होती हैं, फिर टूट जाती है। उनके किनारे लगे हरे-भरे पेड़ और उन पर रहने वाले पक्षी भी अब नजर नहीं आते। यानी पानी बिना सब सून। मध्यप्रदेश में सतपुड़ा पहाड़ और जंगल कई छोटे-बड़े नदी-नालों का उद्गम स्थल है। पहाड़ और जंगलों में पेड़ पानी को जड़ों में संचित करके रखते हैं और धीरे-धीरे वह पानी रिसकर नदियों में जलधाराओं के रूप में प्रवाहित होता है। जंगल कम हो रहे हैं। कुछ वर्षों से बारिश कम हो रही है या बार-बार सूखा पड़ रहा है। सतपुड़ा की दुधी, मछवासा, आंजन, ओल, पलकमती और कोरनी जैसी नदियां धीरे-धीरे दम तोड़ रही हैं। देनवा में अभी पानी नजर आता है लेकिन उसमें भी साल दर साल पानी कम होता जा रहा है। तवा और देनवा में भी पानी कम है। अमरकंटक से निकलकर इस इलाके से गुजरने वाली सबसे बड़ी नर्मदा भी इसी इलाके से गुजरती है। इनमें से ज्यादातर नदियां नर्मदा में मिलती हैं। इनके सूखने से नर्मदा भी प्रभावित हो रही है। अगर हम मध्यप्रदेश के पूर्वी छोर पर नर्मदापुरम और नरसिंहपुर जिले विभक्त करने वाली दुधी नदी की बात करें, तो नदियों के संकट को समझा जा सकता है। यह नदी कुछ वर्ष पहले तक एक बारहमासी सदानीरा नदी थी। दुधी यानी दूध के समान। दुधी नदी के नाम से एक पौराणिक कथा भी जुड़ी हुई है। हनुमान और उनकी माता अंजनी से जुड़ी हुई है। इसका पानी साफ और स्वच्छ। छिंदवाड़ा जिले में महादेव की पहाड़ियों से पतालकोट से दुधी निकलती है और सांडिया से ऊपर सिरसिरी व खैरा नामक स्थान में नर्मदा में आकर मिलती है। यह नर्मदा की सहायक नदी है। पर आज दुधी में एक बूंद भी पानी नहीं ढूंढने से नहीं मिलता। बारिश के दिनों में ही पानी रहता है और अप्रैल-मई माह तक आते-आते पानी की धार टूट जाती है और रेत ही रेत नजर आती है। इन पंक्तियों के लेखक का गांव भी इसी नदी के किनारे है। जहां कभी पानी होने के कारण नदी में जनजीवन की चहल-पहल होती थी, पशु-पक्षी पानी पीते थे। बरौआ- कहार समुदाय के लोग इसकी रेत में डंगरवारी तरबूज-खरबूज की खेती करते थे। धोबी कपड़े धोते थे, मछुआरे मछली पकड़ते थे, केंवट समुदाय के लोग जूट के रेशों से रस्सी बनाते थे। वहां अब सन्नाटा पसरा रहता है। नदी संस्कृति खत्म हो गई है। अब लोग नदी के स्थान पर हैंडपंप और ट्यूबवेल पर आश्रित हो गए हैं, जिनकी अपनी सीमाएं हैं। इसी जिले के पिपरिया कस्बे से गुजरने वाली मछवासा नदी भी सूख चुकी है। सोहागपुर की पलकमती कचरे से पट गई है। इन नदियों में जो पानी दिखता है, वह नदियों का नहीं, शहरों की गंदी नालियों का है। पलकमती से ही पूरे सोहागपुर का निस्तार होता था। सोहागपुर का रंगाई उद्योग और पानी की खेती दूर-दूर तक मशहूर थे। इस नदी के किनारे पान की खेती भी होती थी, अब भी कुछ शेष है। रेल से सफर करते हुए यह पान के बरेजे दिखाई देते हैं। सोहागपुर के दिवंगत शिक्षक ने मुझे बताया था कि पलकमती कभी नदी थी, जो अब नाला दिखाई देती है। यह गहरी थी और इसमें बाढ़ आती थी। मातापुरा का जो क्षेत्र है, वहां से अंग्रेज लोगों का कपड़ा रंगा कर जाता था। बाम्बे, केलकटा सारे बड़े शहरों से रंगाई के काम आते थे। पहले नदी का सहारा था। अब नदी के किनारे हैं तो किस काम के? नदी से न तो पानी मिल रहा है न मिट्टी। रंगाई उद्योग खत्म हो गया है। पान के बरेजे सिमट गए हैं। यहां का बंगला पान फेमस था। यहां की सुराही और मिट्टी के बर्तन का ठेका रेलवे का था। रेलवे स्टेशन पर सुराहियों के ढेर लगे रहते थे। नदियों में पानी कम होने का गहरा असर उन समुदायों पर हो रहा है जिनकी आजीविका सीधे तौर पर नदियों से जुड़ी है। मछली पकड़ने वाले और डंगरवारी (तरबूज-खरबूज की खेती) करने वाले कहार- केंवट समुदाय पूरी तरह इसी पर आश्रित थे। कहार समुदाय के लोग बताते हैं कि नदियों में पानी नहीं रहने से उनकी डंगरवारी की खेती खत्म हो गई है। उनके पास कोई रोजगार नहीं है। यही वे समुदाय हैं, जिन्हें नदियों की प्रकृति व उसकी पारिस्थितिकीय के बारे में अच्छी समझ है। हालांकि नर्मदा उसकी कई सहायक नदियों के सूखने के कारण वह बहुत कमजोर हो गई है। लेकिन हम इस सबसे नहीं चेत रहे हैं और पानी का बेहिसाब इस्तेमाल से पानी के स्रोतों को ही खत्म कर रहे हैं, जो शायद फिर पुनर्जीवित न हो सकें। अगर हमें बड़ी नदियों को बचाना है तो छोटी नदियों पर ध्यान देना होगा। छोटी नदियों का संरक्षण जरूरी है। अगर हम इन पर छोटे-छोटे स्टापडेम बनाकर जल संग्रह करें तो नदियां भी बचेंगी और खेती में भी सुधार संभव है। इस पूरे काम में स्थानीय मछुआरों और उनके परंपरागत ज्ञान और कौशल की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। वे इससे भलीभांति परिचित हैं। क्या हम इस दिशा में आगे बढ़ना चाहेंगे?
बंगाल को बचाने का विकल्प : वाम मोर्चे का घोषणा-पत्र 2026
*केवल वादों की सूची नहीं, बल्कि बंगाल के पुनर्निर्माण का व्यावहारिक खाका है।* – केशव कुमार भट्टड़ कोलकाता। पश्चिम बंगाल के 2026 विधानसभा चुनाव से ठीक पहले वाम-लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष शक्तियों ने “बंगाल को बचाने के लिए” घोषणा-पत्र जारी किया है। यह दस्तावेज़ राज्य में व्याप्त अराजकता, लूट, भ्रष्टाचार और सांप्रदायिक विभाजन की राजनीति का स्पष्ट विकल्प ... Read more
ज्योतिबा फुले जयंती: समानता की अधूरी लड़ाई और हमारी जिम्मेदारी
11 अप्रैल का दिन भारतीय समाज के लिए सिर्फ एक जयंती नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। यह दिन हमें ज्योतिराव गोविंदराव फुले के उस संघर्ष की याद दिलाता है, जिसने सदियों से जकड़े हुए समाज को सवालों के कटघरे में खड़ा किया। ज्योतिबा फुले ने केवल अन्याय का विरोध नहीं किया, बल्कि एक वैकल्पिक, ... Read more
किशोर आक्रामकता एवं हिंसा पर अंकुश लगाने की पहल हो
भारतीय किशोरों में बढ़ रही हिंसक प्रवृत्ति एवं क्रूर मानसिकता चिन्ताजनक है, नये भारत एवं विकसित भारत के भाल पर यह बदनुमा दाग है। पिछले कुछ समय से किशोरों में बढ़ती हिंसा की प्रवृत्ति निश्चित रूप से डरावनी, मर्मांतक एवं खौफनाक है। चिंता का बड़ा कारण इसलिए भी है क्योंकि जिस उम्र में किशोरों के ... Read more
समानता के संघर्ष का ऐतिहासिक प्रतीक: महाड़ सत्याग्रह
इतिहास में कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जो अपने समय की सीमाओं को लाँघकर शाश्वत चेतना का रूप ले लेती हैं। महाड़ सत्याग्रह भी ऐसी ही एक घटना है, जिसने केवल एक स्थानीय समस्या का समाधान करने का प्रयास नहीं किया, बल्कि भारतीय समाज की गहराइयों में जड़ जमा चुकी असमानताओं को चुनौती देने का ... Read more
धुंधली नजर को न करें नजरअंदाज, खतरनाक हो सकते हैं ये लक्षण, ऐसे करें बचाव
अगर आपको या आपके घर के बुजुर्ग को धुंधला दिखाई देने लगा है या बार-बार चश्मे का नंबर बदलना पड़ रहा है तो इसे कभी भी नजरअंदाज न करें
ललित सुरजन की कलम से चलो, लंगर में चलते हैं
'बहुत बात होती है कि आजादी के पैंसठ साल बाद भी यह नहीं हो सका या वह नहीं हो सका।
अमेरिकी कांग्रेस में ट्रंप पर महाभियोग लगाने की मांग तेज
यह केवल विचारधारा की बात भी नहीं है। यह इस बारे में नहीं है कि कोई प्रशासन की व्यापक नीतियों का समर्थन करता है या विरोध।
ज्ञानेश कुमार को गुस्सा क्यों आता है?
पांच राज्यों में चल रहे विधानसभा चुनावों के बीच केन्द्रीय निर्वाचन आयोग एक बार फिर गलत कारणों से सुर्खियों में आया है। बुधवार को चुनाव आयोग की सोशल मीडिया एक्स पर लिखी एक पोस्ट से सवाल उठने लगे कि क्या एक संवैधानिक संस्था की भाषा और लहजा ऐसा होना चाहिए। दरअसल आयोग के आधिकारिक हैंडल पर लिखा था- चुनाव आयोग की तृणमूल कांग्रेस को दो टूक। पश्चिम बंगाल में इस बार चुनाव भयरहित, हिंसारहित, धमकी रहित, प्रलोभन रहित, छापा रहित, बूथ और सोर्स जामिंग रहित होकर ही रहेंगे। पहले तो यह संदेह हुआ कि यह वाकई चुनाव आयोग ने लिखा है या किसी ने आयोग की छवि खराब करने के लिए इस तरह तृणमूल कांग्रेस का नाम लेकर दो टूक बात कही है। क्योंकि पहले चुनाव से लेकर अब तक कभी ऐसा नहीं हुआ जब चुनाव आयोग ने सीधे किसी दल का नाम लेकर उसके लिए इस भाषा में बयान दिया हो। विपक्ष और आयोग के बीच कई बार रस्साकशी हुई है। बीते कुछ सालों में यह तनाव ज्यादा बढ़ गया है। जिसमें विपक्ष बार-बार चुनाव आयोग पर पक्षपात का आरोप लगाता है और इस बार तो मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव लाने की तैयारी भी विपक्ष ने कर ली थी, जो सफल नहीं हुई। लेकिन इन सबके बावजूद चुनाव आयोग में बैठे लोगों ने किसी एक दल का नाम लेकर ऐसी टिप्पणी नहीं की, जो अब की गई है। इसके बाद अब यही बचता है कि चुनाव आयोग विपक्ष के नेताओं का नाम लेकर उन्हें जवाब देने लगे। क्योंकि निष्पक्षता नाम की चिड़िया शायद डाल से उड़ चुकी है। यह पोस्ट चुनाव आयोग ने ही डाली है, इसमें कोई संदेह नहीं रह गया है, क्योंकि इसकी बाकायदा पृष्ठभूमि भी सामने आई है। दरअसल पश्चिम बंगाल में एसआईआर के बाद 90.66 लाख वोटरों के नाम हटाने के विरोध में टीएमसी का प्रतिनिधिमंडल बुधवार को मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार से मिला। डेरेक ओ ब्रायन, सागरिका घोष, साकेत गोखले और मेनका गुरुस्वामी इस प्रतिनिधिमंडल में शामिल थे। टीएमसी के इस दल ने मुख्यत: दो बातों पर चुनाव आयोग से जवाब मांगा कि ममता बनर्जी ने अब तक नौ पत्र चुनाव आयोग को लिखे हैं, लेकिन लंबे समय से आयोग चुप बैठा है, पत्रों का जवाब नहीं दे रहा। और दूसरी शिकायत नंदीग्राम में मुख्य चुनाव अधिकारी और एक वरिष्ठ भाजपा नेता के बीच कथित सांठगांठ को लेकर थी। ये कोई ऐसी शिकायतें नहीं हैं, जिनका जवाब नहीं दिया जा सकता। लेकिन चार लोगों के साथ यह बैठक केवल सात मिनट ही चली। टीएमसी का आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने उनकी बातें नहीं सुनी और सात मिनट की बातचीत के बाद उन्हें गेट आउट कहा। डेरेक ओब्रायन ने कहा, 'चुनाव आयोग ने हमें अपमानित किया और परिसर छोड़ने को कहा। फिर उन्होंने सोशल मीडिया पर झूठी जानकारी फैलाई। यह भाजपा की साजिश है। लोकतंत्र की आत्मा पर हमला है।' आपको बता दें कि चुनाव आयोग की उपरोक्त पोस्ट इस बैठक के बाद ही आई है। आयोग इस बात पर इठला रहा है कि उसने टीएमसी को दो टूक जवाब दे दिया, लेकिन क्या यह शर्मिन्दगी की बात नहीं होनी चाहिए कि एक राजनैतिक दल के सवालों का संतोषजनक जवाब देने की जगह यह ढिंढोरा पीटा जाए कि हमने दो टूक जवाब दे दिया। इसका एक अर्थ यह भी होता है कि चुनाव आयोग विपक्ष के सवालों का जवाब देने के लिए खुद को जिम्मेदार नहीं मानता है। बुधवार की बैठक के बारे में टीएमसी के आरोपों पर निर्वाचन आयोग का कहना है कि टीएमसी सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने मीटिंग ने चिल्लाते हुए कहा कि हम यहां बात सुनने नहीं आए हैं। इसके बाद मीटिंग में माहौल गरमा गया और टीएमसी का प्रतिनिधिमंडल चला गया। हालांकि अब इस दल के सदस्यों ने निर्वाचन आयोग को चुनौती दी है कि वह इस बैठक की ट्रांसक्रिप्ट जारी करे। टीएमसी ने यह भी कहा है कि अगर आयोग इसे जारी नहीं करेगा तो हम इसे जारी करेंगे। अब बैठक किस वजह से पूरी नहीं हुई और किसने पहले आपा खोया, क्यों खोया? और क्या ऐसी तनातनी लोकतंत्र के लिए सही है? इन सारे सवालों के जवाब देश को दिए जाने चाहिए, इसकी पहल चुनाव आयोग से ही होना चाहिए। क्योंकि ऊंगलियां उसी पर उठी हैं। वैसे बैठक में बहस का एक और वाकया प.बंगाल के संदर्भ में ही पेश आया। जहां बुधवार को ही ज्ञानेश कुमार वर्चुअल मीटिंग ले रहे थे और सभी अधिकारियों से बारी-बारी से पूछ रहे थे कि उनके यहां कितने पोलिंग बूथ आदि हैं। जब यूपी कैडर के आईएएस अधिकारी और कूचबिहार के पर्यवेक्षक बनाए गए अनुराग यादव से यही सवाल हुआ तो उन्हें जवाब देने में थोड़ी देरी हुई। जिस पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कोई टिप्पणी कर दी। तो अनुराग यादव ने सख्त ऐतराज जताते हुए कहा कि आप हमसे इस तरह से बात नहीं कर सकते। हमने भी इस सेवा में 25 साल गुजारे हैं। अनुराग यादव के इस तरह से मुख्य चुनाव आयुक्त को जवाब दिए जाने के बाद कुछ देर के लिए बैठक में सन्नाटा छा गया। फिर दूसरे विषयों को लेकर बात शुरू की गई और किसी तरह बैठक को निपटाया गया। इस प्रसंग के बाद अनुराग यादव को पर्यवेक्षक के पद से हटा दिया गया है। हालांकि आयोग के अधिकारियों का कहना है कि उन्हें हटाने की वजह बैठक में हुई बहस नहीं थी। लेकिन यह भी कहा गया कि अगर कई बार के दौरे के बावजूद पर्यवेक्षक को यह नहीं पता कि उसके क्षेत्र में कितने बूथ हैं, तो यह सही बात नहीं है। इन दोनों प्रसंगों में एक चीज सामान्य है कि ज्ञानेश कुमार पर नाराज होने का आरोप लगा है। भले वे इसके लिए सामने वाले पक्ष को जवाबदेह मानें, लेकिन इससे उनकी नाराजगी या भड़कना या आपा खोना जायज नहीं हो जाता। लोकतंत्र में यकीन और चुनाव को एक पर्व की तरह देखने वालों के लिए यह बड़ी दुखद स्थिति है कि चुनाव आयोग जैसी संस्था के सामने विश्वनीयता का संकट उसकी अपनी कारगुजारियों के कारण खड़ा हो चुका है। क्या इस संस्था की साख कभी लौट पाएगी?
जनगणना में प्रवासी मजदूरों की गिनती जरूरी
सिर्फ प्रवासी बन जाने से वहां रहना, खाना, पहनना, ओढ़ना से लेकर पढ़ाई तक का काम कितना मुश्किल हो गया है इसकी कल्पना मुश्किल है।
सामाजिक क्रांति के अग्रदूत –महात्मा ज्योतिराव गोविंदराव फुले
ज्योतिबा फुले जयंती (11अप्रैल) पर विशेष आलेख भारत के सामाजिक इतिहास में अनेक महापुरूष हुए है जिन्होंने समाज में अज्ञानता,जातिवाद और असमानता के घने अंधेरे को चीरकर समानता और शिक्षा का प्रकाश फैलाया । ऐसे ही एक महात्मा ज्योतिराव गोविंदराव फुले (ज्योतिबा फुले) का नाम एक ऐसी मशाल की तरह सदैव याद किया जाता रहेगा। ... Read more
सीजफायर में पाकिस्तान की भूमिका पर आपा खोते न्यूज एंकर का वीडियो AI जनरेटेड है
वीडियो में दिखाई देने वाली विसंगतियां साफ तौर पर संकेत देती हैं कि इसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से तैयार किया गया है.
ईरान का अद़्भुत जज्बा दुनिया के लिए मिसाल
टाइटैनिक फिल्म का एक अद्भुत दृश्य है, जब जहाज टुकड़े-टुकड़े होकर डूबता है, अमीरों में आपाधापी मची रहती है कि बचाने वाली नावों पर वे किसी भी तरह सवार हो जाएं
न्यायपालिका में ए. आई. के उपयोग की संभावनाएं
भारत के संदर्भ में अभी कई चुनौतियां विद्यमान हैं, जिनमें न्यायिक प्रक्रियाओं में औपचारिक ढांचे का अभाव, अत्यधिक निर्भरता का जोखिम और ए.आई.के प्रशिक्षण की कमी प्रमुख हैं
मोदी सरकार की विदेश नीति की बड़ी नाकामी
7 और 8 अप्रैल की आधी रात को जब भारत के लोग सो रहे थे, उस समय वैश्विक व्यवस्था में बदलाव की एक बड़ी करवट ली जा चुकी थी
बिना दवा के शरीर को रखना है निरोग, प्रकृति दिखाएगी स्वस्थ रखने का रास्ता
आज के समय में हर कोई निरोगी काया चाहता है, लेकिन सवाल है कि कैसे निरोगी काया को पाया जा सकता है
मॉनसून पर अल नीनो का असर, जून-जुलाई-अगस्त में कितनी होगी बारिश? मौसम पर आ गया अपडेट
2026 में भारत का मॉनसून सामान्य से करीब 6% कम बारिश के साथ कमजोर रहने की संभावना है। स्काईमेट के अनुसार, जून से सितंबर तक कुल बारिश 94% LPA रहेगी। मध्य और पश्चिम भारत में कम बारिश होगी जबकि पूर्वोत्तर में बेहतर बारिश की उम्मीद है। अल नीनो के प्रभाव से सूखे का खतरा बढ़ सकता है।
सुबह के नाश्ते में क्यों जरूरी है प्रोटीन, जानें प्लेट में क्या करें शामिल?
सुबह का नाश्ता दिन का सबसे महत्वपूर्ण आहार माना जाता है। एक्सपर्ट के अनुसार, अगर नाश्ते में प्रोटीन शामिल किया जाए तो सेहत और ऊर्जा दोनों को बड़ा फायदा पहुंचता है
कम कैलोरी से लेकर दिल और पाचन तक, जानिए कैसे शरीर को अंदर से मजबूत बनाती है लौकी
भारतीय रसोई में कई ऐसी सब्जियां हैं, जिन्हें हम अक्सर साधारण समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। लौकी ऐसी ही एक सब्जी है
ललित सुरजन की कलम से- यात्रा वृतांत : पूर्वोत्तर:कुछ और बातें
इस प्रदेश में अनेक जनजातियां निवास करती हैं, सबकी अपनी-अपनी विशेषताएं हैं, भाषा, भूषा, धार्मिक विश्वास, सामाजिक परंपराएं, हरेक दूसरे से बिल्कुल अलग।
पांच राज्यों में चुनाव के नाम पर हो रहा डरावना नाटक
धार्मिक अथवा जातीय समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने वाले भाषण देने या नारे लगाने का भी आचार संहिता निषेध करती है। इसके बावजूद भाजपा की ओर से धर्म के नाम पर वोट मांगे जा रहे हैं।
गुरुवार 9 अप्रैल को राज्य में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होना है और उससे पहले मंगलवार को असम पुलिस दिल्ली में कांग्रेस नेता पवन खेड़ा के घर गिरफ्तारी के लिए पहुंच गई।
युद्ध के माहौल में विश्व शांति का शंखनाद है विश्व णमोकार दिवस
विश्व णमोकार दिवस- 9 अप्रैल, 2026 विश्व इतिहास के इस संक्रमणकाल में, जब मानवता युद्ध, हिंसा, आतंक, तनाव और असहिष्णुता के बोझ तले कराह रही है, ऐसे समय में 9 अप्रैल 2026 को मनाया जाने वाला विश्व णमोकार मंत्र दिवस एक अद्वितीय आध्यात्मिक ऊर्जा-विस्फोट के रूप में सामने आ रहा है। यह दिवस केवल एक ... Read more
णमोकार महामंत्र: श्रद्धा, समता और आत्मशुद्धि का शाश्वत मंत्र
विश्व नवकार दिवस (9 अप्रैल 2026) आत्मशुद्धि का शाश्वत मंत्र जैन धर्म की आराधना परंपरा में णमोकार महामंत्र को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। यह केवल एक धार्मिक मंत्र नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि, समता और विनय का सार्वभौमिक संदेश है। इसकी महिमा का उल्लेख प्राचीन जैन आगम ग्रंथ भगवती सूत्र के प्रारम्भ में महामंगल वाक्य ... Read more
बंगाल: वोट के लिए धमकाने पर TMC वर्कर की पिटाई के दावे से पुराना वीडियो वायरल
बूम ने पाया कि वायरल वीडियो साल 2022 में वाराणसी में अग्निपथ स्कीम के खिलाफ हुए प्रदर्शन के दौरान का है, जहां स्थानीय दुकानदारों ने बलपूर्वक दुकानों को बंद कराने की कोशिश कर रहे लोगों की पिटाई कर दी थी.
दिल्ली-एनसीआर में बारिश से मौसम हुआ सुहाना, दो दिन होगी बरसात; IMD ने जारी किया यलो अलर्ट
दिल्ली-एनसीआर में मंगलवार सुबह कई इलाकों में बारिश देखने को मिली है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने 7 और 8 अप्रैल के बारिश का यलो अलर्ट जारी किया है।
ललित सुरजन की कलम से स्वाधीनता और जनतंत्र का रिश्ता
आज की दुनिया की यह भयावह सच्चाई है कि पूंजीवाद और साम्राज्यवाद नया बाना धारण करके जगह-जगह अपनी घुसपैठ कर चुके हैं।
केरल- एलडीएफ और यूडीएफ के घोषणापत्र
— पी. श्रीकुमारन जहां एलडीएफ का घोषणापत्र अपने वादों को पूरा करने पर ज़ोर देता है, वहीं यूडीएफ का प्रयास वोट हासिल करने की एक छिपी हुई कोशिश लगती है। दूसरे शब्दों में कहें तो, एलडीएफ सिर्फ वही वादे करता है जिन्हें वह पूरा कर सकता है। पिनाराई-1 और पिनाराई-2, दोनों सरकारों का रिकॉर्ड इस बात को बिना किसी शक के साबित करता है। केरल के लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) के घोषणापत्रों का अध्ययन करना काफ़ी दिलचस्प है। दोनों के बीच का अंतर इतना साफ़ है कि इसे नजऱअंदाज़ नहीं किया जा सकता। जहां एलडीएफ का घोषणापत्र अपने वादों को पूरा करने पर ज़ोर देता है, वहीं यूडीएफ का प्रयास वोट हासिल करने की एक छिपी हुई कोशिश लगती है। दूसरे शब्दों में कहें तो, एलडीएफ सिर्फ वही वादे करता है जिन्हें वह पूरा कर सकता है। पिनाराई-1 और पिनाराई-2, दोनों सरकारों का रिकॉर्ड इस बात को बिना किसी शक के साबित करता है। उदाहरण के लिए, पिनाराई-1 सरकार का रिकॉर्ड काफ़ी शानदार रहा है, जिसने अपने 98 प्रतिशत वादों को पूरा किया। पिनाराई-2 सरकार के घोषणापत्र को लागू करने का रिकॉर्ड भी उतना ही प्रभावशाली है। मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन द्वारा जारी एलडीएफ के घोषणापत्र में एक 60-सूत्री कार्यक्रम की रूपरेखा दी गई है, जिसमें 'नवा केरल' बनाने के लिए 950 प्रस्ताव शामिल हैं। यह फ्रंट चल रहे विकास कार्यों को जारी रखने के लिए लोगों का जनादेश मांग रहा है। एलडीएफ घोषणापत्र की मुख्य बातें ये है: घोर गरीबी को खत्म करने का वादा, केरल को 'बेघर-मुक्त राज्य' बनाने के लिए 'लाइफ़ मिशन 2.0Ó की शुरुआत, कल्याणकारी पेंशन को 2000 रुपये से बढ़ाकर 3000 रुपये करना, पांच सालों में राज्य को एक 'ज्ञान-आधारित समाज' में बदलना, कैंपस प्लेसमेंट के ज़रिए शिक्षित युवाओं के लिए पक्की नौकरी के अवसर, कौशल विकास के लिए 'बैक टू कैंपस' योजना, और उद्यमियों के लिए ब्याज़-मुक्त ऋण। लगभग पांच लाख अत्यंत गरीब परिवारों की पहचान की जाएगी और उन्हें गरीबी से बाहर निकाला जाएगा। महिला सशक्तिकरण के उद्देश्य से शुरू की गई पहलों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत रोजग़ार का वादा और 20 लाख गृहिणियों के लिए नौकरी की गारंटी शामिल है। शिक्षा के क्षेत्र में, जिसने पिछले 10 सालों में ज़बरदस्त प्रगति की है, घोषणापत्र में उच्च शिक्षा को वैश्विक मानकों तक पहुंचाने, सार्वजनिक शिक्षा में सीखने की कमियों को दूर करने और तकनीकी शिक्षा की पहलों का विस्तार करने का वादा किया गया है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में, एक 'सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज योजना' लागू करने और इलाज के असीमित लाभ प्रदान करने का वादा किया गया है। अभी, 42 लाख लाभार्थियों को 'कारुण्य आरोग्य सुरक्षा पद्धति' के तहत 5 लाख रुपये तक का इलाज का लाभ मिल रहा है। बिस्तर पर पड़े सभी मरीज़ों को विशेष इलाज मिलेगा और सभी बुज़ुर्ग नागरिकों के लिए योजनाएं बनाई जाएंगी। जहां तक अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की बात है, जिसे केंद्र सरकार ने देने से मना कर दिया है- जो केरल के साथ भेदभाव का एक उदाहरण है-एलडीएफ का वादा है कि अगर केंद्र सरकार अपना रुख नहीं बदलती है, तो वह लोगों की मदद से एक बेहतर मेडिकल-रिसर्च अस्पताल बनाएगी। एलडीएफ ने कहा कि वे केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम और कोझिकोड, दोनों जगहों पर मेट्रो रेल प्रोजेक्ट शुरू होने वाले हैं; वहीं 'वॉटर मेट्रो' - जिसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तारीफ़ मिली है - का विस्तार अलाप्पुझा, कोल्लम और कोडुंगल्लूर तक किया जाएगा। मुख्यमंत्री ने बाद में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कहा कि 'विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम' (एफसीआरए) में प्रस्तावित संशोधनों को लेकर अल्पसंख्यकों ने जो चिंताएं ज़ाहिर की हैं, वे बिल्कुल सही हैं; क्योंकि ये संशोधन भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ला रही है- जो 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' (आरएसएस) की राजनीतिक शाखा है। पीड़ितों का साथ देने के बजाय, संघ अपराधियों को बचा रहा है। विजयन ने ज़ोर देकर कहा कि यही सच्चाई है, इसलिए अल्पसंख्यकों का डर बेबुनियाद नहीं है। अपनी तरफ से, कांग्रेस के नेतृत्व वाला 'संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा' (यूडीएफ) पांच 'इंदिरा गारंटी' और पांच 'ड्रीम प्रोजेक्ट' का वादा कर रहा है; जिनका मुख्य ज़ोर समुद्री और विमानन क्षेत्रों पर, और वायनाड में एक 'आदिवासी विश्वविद्यालय' बनाने पर होगा। राहुल गांधी ने पहले जिन पांच गारंटियों की घोषणा की थी, वे इस प्रकार हैं: महिलाओं के लिए 'केरल राज्य सड़क परिवहन निगम' (केएसआरटीसी) की बसों में मुफ़्त यात्रा; कॉलेज जाने वाली छात्राओं को हर महीने 1,000 रुपये की आर्थिक मदद; कल्याणकारी पेंशन को बढ़ाकर 3,000 रुपये प्रति माह करना; पूर्व मुख्यमंत्री ओमनचांडी के नाम पर शुरू की गई एक योजना के तहत हर परिवार को 25 लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा कवर देना; और युवाओं को अपना खुद का व्यवसाय शुरू करने के लिए 5 लाख रुपये तक का ब्याज़-मुक्त कज़र् देना। विपक्ष के नेता वी. डी. सतीशन ने, जिन्होंने तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी को घोषणापत्र की एक प्रति सौंपी, कहा कि अगर यूडीएफ सत्ता में आती है, तो बुजुर्गों के सम्मान, देखभाल और उनके कल्याण पर विशेष ध्यान देने के लिए एक अलग मंत्रालय बनाया जाएगा। घोषणापत्र में प्रमुखता से शामिल 'मिशन समुद्र' का उद्देश्य राज्य की 600 किलोमीटर लंबी तटरेखा, 44 नदियों, 34 झीलों, चार अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों और ऊंचे पहाड़ी इलाकों से मिलने वाले अवसरों को एकीकृत करना है, ताकि वैश्विक समुद्री क्षेत्र में केरल की स्थिति को और बेहतर बनाया जा सके। विमानन क्षेत्र में, घोषणापत्र में पायलट और विमानन कर्मचारियों के प्रशिक्षण की आधुनिक सुविधाओं, कोच्चि हवाई अड्डे पर रनवे निर्माण के दूसरे चरण और कन्नूर हवाई अड्डे के समग्र विकास का वादा किया गया है। अन्य प्रमुख आश्वासनों में एक कल्याण पेंशन आयोग की स्थापना, ज़रूरतमंदों के लिए 'आश्रय' परियोजना का दूसरा चरण और जनता को कम दरों पर भोजन उपलब्ध कराने के लिए 'इंदिरा कैंटीन' की शुरुआत शामिल है। स्वास्थ्य क्षेत्र में, वादों में बजट में अधिक आवंटन और मरीजों की जेब से होने वाले खर्चों को कम करने के लिए उठाए जाने वाले कदम शामिल हैं। महिलाओं और बच्चों के लिए 'शी हॉस्पिटल्स', बुज़ुर्ग महिलाओं के लिए 'अम्मावाड़ी' प्रोजेक्ट और आदिवासी स्वास्थ्य क्लस्टर के वादे भी शामिल किये गये हैं। एक और वादा है रैगिंग को रोकने के लिए 'सिद्धार्थन एंटी-रैगिंग और छात्र कल्याण अधिनियम' को लागू करना। सतीसन ने लगभग 1,000 मध्यम, छोटे और सूक्ष्म उद्यम स्थापित करने का भी वादा किया है, जिनका कुल टर्न ओवर 100 करोड़ रुपये होगा। उन्होंने भरोसा दिलाया कि योग्य स्कूलों को सहायता प्राप्त दर्जा दिया जाएगा। इसके अलावा, मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (आशा) की न्यूनतम दैनिक मज़दूरी 700 रुपये तय की जाएगी। इस बीच, भाजपा के घोषणापत्र में एम्स की स्थापना और तिरुवनंतपुरम तथा कन्नूर को जोड़ने वाले एक हाई-स्पीड रेलवे नेटवर्क के विकास का वादा किया गया है। अन्य वादों में लगभग 10 लाख नौकरियों का सृजन, केरल को 'खाद्य अधिशेष राज्य' में बदलना, तथा कम आय वाले परिवारों के लिए कल्याणकारी योजनाएं शामिल हैं। इनमें गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) परिवारों की महिलाओं के लिए 'भक्ष्य आरोग्य सुरक्षा कार्ड' की शुरुआत भी शामिल है, जो किराने के सामान और दवाओं के लिए हर महीने 2,500 रुपये का रिचार्ज प्रदान करेगा। अन्य आश्वासनों में हर घर को हर महीने 20,000 लीटर मुफ्त पानी, ओणम और क्रिसमस के दौरान सालाना दो मुफ्त एलपीजी सिलिंडर, और 70 वर्ष से अधिक उम्र के वरिष्ठ नागरिकों तथा विधवाओं के लिए सामाजिक सुरक्षा पेंशन बढ़ाकर 3,000 रुपये प्रति माह करना शामिल है।
हम नहीं जानते कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस विचार से कितना सहमत हैं। क्योंकि वे अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू दोनों को अपना करीबी मित्र बताते हैं।
देशभर में कई प्राचीन मंदिर हैं, जहां भगवान श्री कृष्ण अलग-अलग अवतारों में भक्तों के कष्टों को हरते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि केरल की धरती पर ऐसा मंदिर मौजूद है
सुबह उठते ही शरीर में रहती है जकड़न, आमवातारि वटी से मिलेगा आराम
आज के समय में कई घंटों तक कुर्सी पर बैठकर काम करना होता है, जिससे मांसपेशियां कमजोर होने के साथ-साथ अकड़ने भी लगती है
कोरियन ड्रामा से भारतीय सीरियल तक : मनोरंजन की दिशा पर पुनर्विचार
विश्व के मनोरंजन जगत में पिछले कुछ वर्षों में यदि किसी देश ने टेलीविजन और वेब सीरीज के माध्यम से पूरी दुनिया को सबसे अधिक प्रभावित किया है तो वह दक्षिण कोरिया है। कोरियन ड्रामा आज केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रभाव, सामाजिक शिक्षा, भावनात्मक परिपक्वता और जीवन मूल्यों के प्रस्तुतीकरण का सशक्त माध्यम बन ... Read more
शरीर के चक्रों और न्यूरॉन्स को एक्टिव करता है 'ओम', जानें इसके पीछे का विज्ञान
सनातन धर्म में ‘ओम’ का बेहद महत्व है। किसी भी मंत्र का जाप हो या ध्यान लगाना, इसका उच्चारण सिर्फ आध्यात्मिक महत्व नहीं रखता, बल्कि यह स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद है
ललित सुरजन की कलम से आरक्षण आयोग की आवश्यकता
'दरअसल विगत तीन-चार दशकों से जो आरक्षण नीति चली आ रही है, उसमेें समय की वास्तविकताओं के साथ जो संशोधन होने चाहिए थे, उन्हें लागू करने से हमारे सत्ताधीश कतराते रहे हैं। इसमें बहुत सारे मुद्दे हैं। सबसे पहले तो इस वास्तविकता का संज्ञान लेना आवश्यक है कि देश में विकास योजनाओं के कारण बड़े पैमाने पर लगातार विस्थापन हो रहा है। एक समय था जब बड़े बांधों और कारखानों के लिए विस्थापन हुआ, जिससे प्रभावित होने वाली जनसंख्या मुख्यत: आदिवासियों की थी। चूंकि नेहरू युग में जनता के मन में एक विश्वास था इसलिए लोगों ने खुशी-खुशी अपनी जमीनें दे दीं, किंतु जिन नौकरशाहों पर मुआवजा और पुनर्वास की जिम्मेदारी थी, उसे उन्होंने ठीक से नहींनिभाया। आज भी ऐसे विस्थापित आदिवासी मिल जाएंगे जो 55-60 साल से खानाबदोश की जिंदगी जी रहे हैं। यह भी ध्यान देने योग्य है कि एक चतुर, संपन्न तबके ने इन विकास योजनाओं का लाभ अपने लिए लेने में कोई कसर बाकी नहींरखी। (देशबन्धु में 05 मई 2016 को प्रकाशित) https://lalitsurjan.blogspot.com/2016/05/blog-post_6.html
भय से विश्वास तक : एक युगांतकारी परिवर्तन
बृजमोहन अग्रवाल जनजातीय समाज को यह समझाया गया कि नक्सल नेतृत्व में स्थानीय छत्तीसगढ़ी आदिवासियों की भागीदारी शून्य है। जल जंगल जमीन के नारों की आड़ में हमारे भोले-भाले आदिवासियों का उपयोग केवल एक साधन के रूप में किया जा रहा था। यह भी सामने आया कि नक्सलियों के द्वारा आदिवासी युवतियों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता था, उन्हें शोषण का शिकार बनाया जाता था। छह दशकों तक भारत की आंतरिक सुरक्षा, लोकतांत्रिक व्यवस्था और विकास यात्रा को चुनौती देता रहा नक्सलवाद आज अपने निर्णायक अवसान की अवस्था में पहुंच चुका है। यह केवल एक सुरक्षा सफलता नहीं, बल्कि उस राष्ट्रीय संकल्प की विजय है, जिसमें स्पष्ट नीति, अटूट राजनीतिक इच्छाशक्तिऔर केंद्र-राज्य के अभूतपूर्व समन्वय ने मिलकर एक जटिल और दीर्घकालिक समस्या का समाधान किया है। नक्सलवाद का यह अवसान इस सत्य को पुन: स्थापित करता है कि भारत में बंदूक की शक्ति अंतत: लोकतंत्र की सामूहिक शक्ति के आगे टिक नहीं सकती। यह परिवर्तन अचानक नहीं आया—इसके पीछे दशकों का संघर्ष, अनगिनत बलिदान और एक ऐसी रणनीतिक निरंतरता रही है, जिसने अंतत: इस चुनौती को निर्णायक रूप से परास्त किया। इस ऐतिहासिक क्षण पर मैं उन सभी वीर जवानों को श्रद्धापूर्वक नमन करता हूं—केंद्रीय अर्धसैनिक बलों, कोबरा कमांडो, छत्तीसगढ़ पुलिस और स्थानीय सुरक्षाबलों के उन रणबांकुरों को—जिन्होंने अपने सर्वोच्च बलिदान से इस संघर्ष को निर्णायक मुकाम तक पहुंचाया। यह विजय उनके अदम्य साहस और राष्ट्र के प्रति अटूट समर्पण की अमिट गाथा है। नक्सलबाड़ी से रेड कॉरिडोर तक : एक वैचारिक आंदोलन का हिंसक विस्तार भारत में नक्सलवाद का उदय वर्ष 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से हुआ, जिसकी वैचारिक जड़ें तत्कालीन सोवियत संघ और चीन की उग्र वामपंथी विचारधारा में थीं। अपनी विकास विरोधी छवि के कारण जब बंगाल में इस विचारधारा के प्रति विरोध पनपने लगा तो अपने विस्तार के लिए नक्सलवाद ने 'सॉफ्ट टारगेट्स' की तलाश शुरू की—ऐसे क्षेत्र जहां शासन की पहुंच सीमित हो, सामाजिक-आर्थिक चुनौतियां अधिक हों और जनजागरूकता कम हो। देश के वनांचल, आदिवासी और खनिज संपदा से समृद्ध क्षेत्र इस दृष्टि से सबसे आसान लक्ष्य थे। नक्सलवाद विस्तार की इसी रणनीति के तहत तथाकथित 'रेड कॉरिडोर' विकसित हुआ, जो तिरुपति से पशुपति तक फैले विशाल भूभाग में फैल गया। तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, झारखंड, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से घिरा छत्तीसगढ़, जिसका लगभग 42 प्रतिशत क्षेत्र वनाच्छादित है, इस रेड कॉरिडोर का रणनीतिक केंद्र बन गया। पड़ोसी राज्यों से अपनी गतिविधियां सीमित रखने का अघोषित समझौता कर नक्सली अबूझमाड़ क्षेत्र में संगठित होते चले गए। अपनी दुर्गम भौगोलिक स्थिति के कारण दशकों तक प्रशासनिक सर्वेक्षण से दूर रहा अबूझमाड़ नक्सलियों का सुरक्षित शेल्टर बन गया। विचारधारा से विचलन: माओवाद से मनीवाद तक समय के साथ नक्सलवाद ने अपनी मूल वैचारिक पहचान खो दी और एक हिंसक आर्थिक उगाही तंत्र में परिवर्तित हो गया। बस्तर और सरगुजा जैसे वनाच्छादित जनजातीय क्षेत्रों में नक्सलियों ने समानांतर सत्ता संरचना स्थापित कर दी, जहां तथाकथित 'जन अदालतों' के माध्यम से भय आधारित नियंत्रण कायम किया गया। छत्तीसगढ़ के खनिज सम्पन्न क्षेत्रों की खदानें, विद्युत परियोजनाएं, तेंदूपत्ता व्यापार—सभी उनके लिए उगाही के स्रोत बन गए। सरकारी कर्मचारियों, व्यापारियों, ठेकेदारों और यहां तक कि पुलिस बलों से भी जबरन वसूली की जाने लगी। यह उगाही धीरे-धीरे इतनी बढ़ी कि छत्तीसगढ़ में इसका वार्षिक आंकड़ा हजारों करोड़ रुपये तक पहुंचने की चर्चा होने लगी। सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस में यह विचारधारा समाप्त हो गई। चीन ने भी माओवाद की सशस्त्र संरचना को छोड़कर आर्थिक सुधारों पर आधारित पूंजीवादी कम्युनिज्म मॉडल को अपना लिया, लेकिन भारत में नक्सलवाद अपने मूल उद्देश्यों से भटककर लेवी वसूली और हिंसा फैलाने का टूल बन गया। नक्सलवाद के झंडाबरदारों ने विचारधारा को त्यागकर इसे अपने आर्थिक हितों की पूर्ति और आतंक फैलाने का साधन बना लिया। नक्सलवाद के वैचारिक समर्थन की राजनीतिक पृष्ठभूमि: दुर्भाग्य से, कांग्रेस-नीत सरकारों के लंबे शासनकाल में नक्सलवाद के प्रति स्पष्ट और कठोर नीति का अभाव रहा क्योंकि उस दौर में केंद्र और कई राज्यों में भी वामपंथी पार्टियां कांग्रेस के सहयोगी की भूमिका में थीं। सत्ता के लिए वामपंथ के साथ कांग्रेस की राजनीतिक निकटता का परिणाम यह हुआ कि नक्सलवाद पर निर्णायक प्रहार करने की बजाय इसे सामाजिक-आर्थिक संघर्ष के रूप में प्रस्तुत कर वैधता प्रदान करने की नीति हावी हो गई। उस दौर में प्रशासनिक तंत्र के भीतर भी यह वैचारिक भ्रम दिखाई देता था। नक्सलवाद को सामाजिक समता पाने का वर्ग संघर्ष ठहराने के दृष्टिकोण से प्रशिक्षित किए गए आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की नीतियां भी नक्सलवाद के विरुद्ध कठोर होने के बजाय सहानुभूतिपूर्ण हो गई थीं। इस ढुलमुल नीति का परिणाम यह हुआ कि नक्सलवाद देश के 12 राज्यों के लगभग 180 जिलों में फैल गया और छत्तीसगढ़ के गठन के बाद से ही प्रदेश के समग्र विकास की राह में सबसे बड़ा रोड़ा बन गया। राष्ट्रीय चेतना का उदय: मेरे प्रारंभिक अनुभव: छात्र जीवन में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े रहते हुए मुझे बस्तर क्षेत्र में काम करने का अवसर मिला जहां नक्सलवाद रूपी दैत्य से मेरा प्रथम साक्षात्कार हुआ और यह आभास भी हुआ कि दंडकारण्य में इस दैत्य का दमन केवल हथियारों से नहीं किया जा सकता। नक्सलवाद के विरुद्ध संघर्ष की भूमि तैयार करने के लिए इस क्षेत्र में वैचारिक जनजागरण की नितांत आवश्यकता थी और इसलिए जनजातीय समाज के बीच राष्ट्रीयता का अलख जगाने के प्रकल्प में मैंने भी अपनी भागीदारी निभाई। 1990 के दशक में स्वर्गीय सुंदरलाल पटवा जी के नेतृत्व में रायपुर के पुराने कमिश्नर कार्यालय के बीटीआई कम्युनिटी परिसर में आयोजित बैठक में पहली बार यह निर्णय लिया गया कि नक्सलवाद के विरुद्ध संघर्ष को राष्ट्रीयता के व्यापक संदर्भ में लड़ा जाएगा। यही वह निर्णायक मोड़ था जब नक्सलवाद की समस्या को केवल कानून-व्यवस्था के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि राष्ट्र की एकता और अखंडता के परिप्रेक्ष्य में देखा गया। जब हुई छत्तीसगढ़ विधानसभा की गोपनीय बैठक: वर्ष 2003 से 2006 के बीच, जब मुझे मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह जी की सरकार में छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री के रूप में कार्य करने का उत्तरदायित्व मिला, तब प्रदेश में पहली बार नक्सलवाद के विरुद्ध एक ठोस, नीतिगत और समन्वित अभियान प्रारंभ किया गया। 'ज्वाइंट एफर्ट, ज्वाइंट कमांड और ज्वाइंट पॉलिसीÓ के सिद्धांत पर केंद्र और राज्य के बीच समन्वय स्थापित करने के प्रयास किए गए। तात्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल जी के साथ इस विषय पर मेरी कई गंभीर और विस्तृत मंत्रणाएं हुई थीं। उस दौर में इस विषय की संवेदनशीलता को देखते हुए देश के इतिहास में पहली बार विधानसभा में गोपनीय बैठकों का आयोजन किया गया, ताकि लोग बिना किसी भय के खुलकर अपनी बात रख सकें। तात्कालीन स्पीकर प्रेम प्रकाश पांडेय जी की अध्यक्षता में आयोजित की जाने वाली इन बैठकों से अधिकारियों और पत्रकार साथियों को भी दूर रखना जरूरी हो गया था। इन मंत्रणाओं के परिणामस्वरूप बनी रणनीति के तहत तात्कालीन डीजीपी ओपी राठौड़ के नेतृत्व में कई अभियान चलाए गए और इसी क्रम में सलवा जुडूम जैसे जनअभियान की शुरुआत हुई। सलवा जुडूम: जनभागीदारी का ऐतिहासिक अध्याय हमारे समक्ष सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि अशिक्षा, अज्ञानता और दुष्प्रचार के कारण स्थानीय समाज का एक बड़ा हिस्सा नक्सलवाद के प्रति सहानुभूति रखता था। इस स्थिति को बदलने के लिए व्यापक जनजागरण अभियान चलाया गया। स्कूलों, महाविद्यालयों और छात्रावासों में पर्चे और साहित्य वितरित किए गए। घर-घर जाकर नक्सलवाद की वास्तविकता को उजागर किया गया। इस अभियान में दिल्ली विश्वविद्यालय और जेएनयू जैसे संस्थानों से जुड़े राष्ट्रवादी विचारकों और छात्रों का भी सहयोग लिया गया। जनजातीय समाज को यह समझाया गया कि नक्सल नेतृत्व में स्थानीय छत्तीसगढ़ी आदिवासियों की भागीदारी शून्य है। जल जंगल जमीन के नारों की आड़ में हमारे भोले-भाले आदिवासियों का उपयोग केवल एक साधन के रूप में किया जा रहा था। यह भी सामने आया कि नक्सलियों के द्वारा आदिवासी युवतियों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता था, उन्हें शोषण का शिकार बनाया जाता था, उन्हें विवाह तक नहीं करने दिया जाता और सामान्य सामाजिक जीवन जीने तक से वंचित रखा जाता था। इन सभी कड़वी सच्चाइयों के उजागर होने से आई जनजागृति का परिणाम यह हुआ कि नक्सलवाद को मिलने वाला सामाजिक समर्थन कमजोर पड़ने लगा। जब नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा बने सलवा जुडूम के अगुआ 'सलवा जुडूमÓ केवल एक सरकारी पहल नहीं थी, बल्कि आदिवासी समाज के भीतर से उठा एक स्वाभाविक जनआंदोलन था, जिसने पहली बार सही मायने में नक्सलवाद को चुनौती दी। तात्कालीन नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा जी ने न केवल इस अभियान को पुरजोर समर्थन दिया बल्कि इसे जमीन पर उतारने में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई। इस संघर्ष से जुड़े रहने के कारण अंतत: उन्हें अपने प्राणों की आहुति तक देनी पड़ी—जो इस आंदोलन की गंभीरता और बलिदान की पराकाष्ठा का साक्षात प्रमाण है। नक्सलवाद ने हमें झीरम जैसे दंश दिए जिसमें प्रदेश के अग्रणी नेता काल-कलवित हो गए। सलवा जुडूम जनआंदोलन को अगर व्यापक संस्थागत समर्थन मिला होता, तो निश्चित ही नक्सलवाद का उन्मूलन उसी दौर में हो जाता, पर वैधानिक संस्थानों में काम करने वाले कई लोगों की सलवा जुडूम के खिलाफ लामबंदी, अर्बन नक्सली बुद्धिजीवियों के वैचारिक विरोध और केंद्र सरकार के नीतिगत असमंजस के कारण यह अवसर पूर्णरूप से साकार नहीं हो सका। समन्वित नेतृत्व से निर्णायक परिवर्तन:वास्तविक परिवर्तन तब आया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह जी और मुख्यमंत्री विष्णु देव साय जी के नेतृत्व में नक्सलवाद के विरुद्ध स्पष्ट, कठोर और समन्वित नीति अपनाई गई। नक्सलवाद को महज कानून-व्यवस्था की समस्या न मानकर, राष्ट्र की एकता, विकास और लोकतांत्रिक ढांचे के लिए गंभीर चुनौती मानते हुए नक्सलवाद के उन्मूलन के लिए समयबद्ध रणनीति तैयार की गई। केंद्र और राज्य सरकारों के सशक्त समन्वय के परिणामस्वरूप दिसंबर 2023 से मार्च 2026 के बीच सुरक्षा बलों ने लगातार सटीक और प्रभावी कार्रवाई करते हुए सैकड़ों कुख्यात नक्सलियों को निष्क्रिय किया, हजारों को आत्मसमर्पण के लिए प्रेरित किया और बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां सुनिश्चित कीं। लैंड माइंस का व्यापक निष्क्रियकरण हुआ और भारी मात्रा में हथियार बरामद किए गए। केंद्र और राज्य के समन्वित दृष्टिकोण और साझे प्रयासों से छह दशक पुराने नक्सलवाद के नासूर को जड़ से समाप्त करने का मार्ग प्रशस्त हुआ। नक्सलमुक्त छत्तीसगढ़ की बुनियाद पर विकसित छत्तीसगढ़ गढ़ने का संकल्प: वर्ष 2047 तक विकसित भारत के संकल्प को साकार करने के लिए अब हमें नक्सलमुक्त छत्तीसगढ़ को विकसित छत्तीसगढ़ में गड़ने के लिए दृढ़ संकल्पित होना पड़ेगा। जिस प्रकार आर्टिकल 370 के उन्मूलन से जम्मू-कश्मीर में स्थायी शांति और राष्ट्रीय एकीकरण का आधार बना, उसी प्रकार नक्सलवाद का समापन छत्तीसगढ़ के लिए एक नए युग का द्वार खोल रहा है। जिन क्षेत्रों में कभी शासन की पहुंच सीमित थी, वहां अब सड़कों का जाल बिछ रहा है, मोबाइल नेटवर्क स्थापित हो रहे हैं, बैंकिंग सेवाएं सुलभ हो रही हैं और शिक्षा-स्वास्थ्य की सुविधाएं तेजी से विस्तार पा रही हैं। बस्तर और आसपास के क्षेत्रों में जो परिवर्तन दिखाई दे रहा है, वह केवल भौतिक नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक भी है। जहां कभी गनतंत्र का साया था, वहां आज जनतंत्र विश्वास और विकास के साथ स्थापित हो रहा है। अब चुनौती इस सफलता को स्थायी बनाने की है—ऐसी सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक संरचना खड़ी करने की, जहां किसी भी प्रकार की हिंसक विचारधारा को पनपने का अवसर ही न मिले। आत्मसमर्पण करने वाले युवाओं के पुनर्वास, कौशल विकास, शिक्षा और रोजगार के अवसरों को प्राथमिकता देना आवश्यक है, ताकि वे पुन: हिंसा के रास्ते पर न लौटें। बुलेट पर बैलेट की निर्णायक विजय: नक्सलवाद पर यह विजय केवल एक आंतरिक सुरक्षा अभियान की सफलता नहीं है, बल्कि यह भारत के लोकतांत्रिक आत्मविश्वास की पुनसर््थापना का प्रतीक है। यह उस निर्णायक परिवर्तन का संकेत है, जहां भय की राजनीति को विश्वास की शक्ति ने प्रतिस्थापित किया है और जहां बंदूक के साये में जी रहे समाज ने विकास और सहभागिता के मार्ग को अपनाया है। जो लोग बंदूक और गोलियों के दम पर भय के माध्यम से छत्तीसगढ़ में छद्म राज्य की कल्पना करते थे उनका अंत हुआ और लोकतंत्र की विजय हुई। बुलेट पर बैलेट की जीत हुई। देश की जनता, छत्तीसगढ़ की जनता और विशेषकर बस्तर की जनता को इस ऐतिहासिक विजय की हृदय से शुभकामनाएं। (लेखक छत्तीसगढ़ के पूर्व गृहमंत्री एवं वर्तमान में रायपुर लोकसभा से सांसद हैं)
कमजोर मोदी को सहारा देते कांग्रेस के नेता
कांग्रेस अपने ऐसे विश्वासघातियों के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लेती है। केवल कहती रहती है। इससे इस तरह के लोगों के हौसले बढ़ते रहते हैं।
दो नए वेस्टर्न डिस्टर्बेंस का असर, दिल्ली-यूपी समेत कई राज्यों में बारिश और ओलावृष्टि का अलर्ट
IMD के अनुसार आने वाले दिनों में दो नए वेस्टर्न डिस्टर्बेंस सक्रिय होंगे, जिससे दिल्ली, यूपी सहित कई राज्यों में बारिश, तेज हवाएं और ओलावृष्टि की संभावना है। मौसम में अचानक बदलाव से जनजीवन और फसलों पर असर पड़ सकता है।
किचन से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक कचकच करती दुनिया में 'चुप कबीरा बोल मत' ही शांति का अंतिम हथियार हो सकता है
चेन की आँखें अपने आप खुल गई थीं, मानो उनके अंदर कोई अलार्म बज रहा हो
दंड से सुधार की ओर विश्वास आधारित न्यायिक यात्रा
भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि व्यवस्था, अनुशासन, सुधार और विश्वास का वातावरण बनाना भी होता है। इसी दृष्टि से भारत सरकार द्वारा लाया गया जन विश्वास विधेयक 2026 पहले लोकसभा के बाद अब राज्यसभा से भी पारित होने से इसके कानून के रूप में अमल का रास्ता ... Read more
क्या हम असभ्य और क्रूर होते जा रहे हैं!
जब कोई घटना दो अलग-अलग संप्रदाय या जाति के लोगों के बीच होती है। सवाल ये भी है बल्कि असल सवाल यही है कि हम इतने संकीर्ण, असंवेदनशील और आक्रामक क्यों हो गये हैं।
विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम: सुरक्षा बनाम स्वतंत्रता
यह विधेयक सकारात्मक कदम है जो किसी भी धार्मिक समुदाय के खिलाफ नहीं है और केवल गैर-कार्यशील संस्थाओं की परिसंपत्तियों के प्रबंधन पर लागू होगा।
एआई 171 विमान दुर्घटना : सच के साथ न हो समझौता
एस रघोत्तम बोइंग के कई व्हिसलब्लोअर्स ने कांग्रेस की गवाही और कोर्ट में दायर दस्तावेजों में बोइंग 787 विमानों में कई मैन्युफैक्चरिंग खामियों का खुलासा किया है। ये खामियां खास तौर पर शुरुआती बैचों में थीं, जिनमें से एक विमान वीटी-एएनबी (विमान एआई171) एयर इंडिया को मिला था। इन खामियों में स्ट्रक्चरल गैप, ज़बरदस्ती फिट करने वाली असेंबली के तरीके और टॉयलेट से रिसकर इलेक्ट्रिकल बे में जाने वाला पानी शामिल है। जून 2025 में अहमदाबाद में हुए एयर इंडिया 171(एआई 171) विमान हादसे की स्वतंत्र, कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग सुप्रीम कोर्ट में अटकी हुई है क्योंकि भारत के सॉलिसिटर जनरल, तुषार मेहता के एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट्स इन्वेस्टिगेशन बोर्ड (एएआईबी) की जांच पर एक प्रोग्रेस रिपोर्ट जमा करने का कोर्ट इंतज़ार कर रहा है। 11 फरवरी को मेहता ने अगली सुनवाई में रिपोर्ट जमा करने का वादा किया था, जिसके बाद कोर्ट ने 24 मार्च की तारीख दी थी। कोर्ट और देश अभी भी इसका इंतज़ार कर रहे हैं। क्या सरकार जान-बूझकर देरी कर रही है, जब तक कि वह एएआईबी की अंतिम रिपोर्ट सार्वजनिक न कर दे और इस तरह ऐसी स्थिति न बना दे कि स्वतंत्र जांच की मांग बेमानी हो जाए? दिलचस्प यह है कि सॉलिसिटर जनरल के आश्वासन से एक दिन पहले एविएशन में विशेषज्ञता रखने वाले पत्रकार लियोनार्ड बर्बेरी की एक दिलचस्प रिपोर्ट इटली के अखबार 'कोरिएरे डेला सेरा' में छपी थी। क्रैश के बाद से बर्बेरी ने 'अनाम पश्चिमी सूत्रों' का हवाला देते हुए लगातार कई खबरें चलाई हैं जिनमें एक ही बात पर ज़ोर दिया गया है- यह क्रैश पायलट की जान-बूझकर की गई कार्रवाई का नतीजा था। बर्बेरी की 10 फरवरी की रिपोर्ट का दावा था कि एएआईबी को दबाव और भारत की एयरलाइंस की सुरक्षा के स्तर के फिर से मूल्यांकन की 'पश्चिमी' धमकियों के चलते उसी राय पर आने के लिए मजबूर होना पड़ा था जिसे उनके सूत्रों के अनुसार 'वांछित मोड़' कहा गया था। बर्बेरी के सूत्रों ने उन्हें बताया कि यह निष्कर्ष भारत में उच्चतम स्तर पर 'राजनीतिक मूल्यांकन' के अधीन होगा। खबरों के मुताबिक एएआईबी अधिकारियों ने अपने अमेरिकी समकक्षों के साथ इस बात पर भी चर्चा की थी कि अंतिम रिपोर्ट को इस तरह कैसे लिखा जाए कि उससे 'राष्ट्रीय विवाद' न खड़े हों। 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' में पहले लीक हुई खबरों के साथ मिलाकर देखें तो साफ़ है कि यह जांच कभी भी सिर्फ यह पता लगाने के बारे में नहीं थी कि एआई 171 के साथ क्या हुआ था। यह अब भारत और अमेरिका के बीच भू-राजनीतिक सत्ता संघर्ष का एक हिस्सा बन गई है। एएआईबी की जुलाई 2025 की शुरुआती रिपोर्ट में इस तनाव की झलक साफ़ दिख रही थी। इसमें एआई 171 क्रैश की पूरी घटना का क्रम बताया गया था- टेक-ऑफ के तीन सेकंड बाद दोनों फ्यूल स्विच एक-दूसरे के एक सेकंड के अंदर ही 'रन' से 'कट-ऑफ़' मोड में चले गए जिससे इंजनों को फ्यूल मिलना बंद हो गया और विमान क्रैश हो गया। इसके बाद रिपोर्ट में बातचीत का एक दिलचस्प हिस्सा भी शामिल किया गया जिसमें एक पायलट दूसरे से पूछता है- 'तुमने फ्यूल क्यों काटा?' और दूसरा जवाब देता है- 'मैंने ऐसा नहीं किया।' रिपोर्ट में फ़्यूल स्विच के बारे में 2018 की अमेरिकी फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन एडवाइज़री का भी ज़िक्र किया गया था जिससे संकेत मिलता था कि इन स्विच में पहले से ही एक जानी-पहचानी, अनसुलझी समस्या मौजूद थी। यह जान-बूझकर किया गया हो या नहीं, पर नतीजा यह हुआ कि सबका ध्यान फ्यूल स्विच और पायलटों के कामों पर चला गया। साथ ही इतना शक भी पैदा कर दिया गया कि किसी ठोस नतीजे पर पहुंचना मुमकिन न हो सके। बोइंग के कई व्हिसलब्लोअर्स ने कांग्रेस की गवाही और कोर्ट में दायर दस्तावेजों में बोइंग 787 विमानों में कई मैन्युफैक्चरिंग खामियों का खुलासा किया है। ये खामियां खास तौर पर शुरुआती बैचों में थीं, जिनमें से एक विमान वीटी-एएनबी (विमान एआई171) एयर इंडिया को मिला था। इन खामियों में स्ट्रक्चरल गैप, ज़बरदस्ती फिट करने वाली असेंबली के तरीके और टॉयलेट से रिसकर इलेक्ट्रिकल बे में जाने वाला पानी शामिल है। इसके अलावा बोइंग 787 से जुड़ी घटनाओं का भी एक इतिहास रहा है : बैटरी में आग लगना, कंट्रोल फेल होना, बिजली की खराबी, ईंधन का रिसाव, बिना किसी निर्देश के आरएटी (रैम एयर टर्बाईन) का खुल जाना, सिस्टम का अपने आप एक्टिवेट हो जाना (जिसमें टीसीएमए भी शामिल है) और यहां तक कि ईंधन स्विच से जुड़ी समस्याएं भी। जनवरी में बोइंग के पूर्व मैनेजर और फाउंडेशन फॉर एविएशन सेफ्टी के संस्थापक एड पियर्सन ने यूएस सीनेट कमेटी को वीटी-एएनबी के फॉल्ट लॉग और मेंटेनेंस हिस्ट्री पर एक स्टडी सौंपी। इससे पता चला कि विमान में पहले दिन से ही इलेक्ट्रॉनिक्स और सॉफ्टवेयर में खराबी, सर्किट ब्रेकर ट्रिप, वायरिंग में नुकसान, शॉर्ट सर्किट, पावर में उतार-चढ़ाव और ओवरहीटिंग जैसी दिक्कतें थीं। 2022 में उड़ान के दौरान आग लगने से इसका एक पावर डिस्ट्रीब्यूशन पैनल पूरी तरह जल गया था। पत्रकार रचेल चित्रा की खोजी रिपोर्टिंग से सामने आया कि क्रैश से 72 घंटे पहले विमान में अनेक तकनीकी खराबियों की शिकायतें मिली थीं। इनमें क्रैश वाले दिन अहमदाबाद में सेंसर में खराबी के कारण हुई 'हार्ड लैंडिंग' की घटना भी शामिल थी। एएआईबी की शुरुआती रिपोर्ट में ज़िक्र है कि विमान चार एक्टिव फॉल्ट के साथ उड़ान भर रहा था जिसमें 'कोर नेटवर्क डिग्रेडेशन' (मुख्य नेटवर्क में खराबी) भी शामिल था। सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाले 'सेफ्टी मैटर्स फाउंडेशन' के कैप्टन अमित सिंह ने अपनी जनहित याचिका में खुलासा किया कि उड़ान भरने से ठीक 15 मिनट पहले विमान की दोनों 'बस पावर कंट्रोल यूनिट्स' में खराबी की शिकायत मिली थी। इसके बावजूद विमान को उड़ान की अनुमति दी गई। सभी पक्षों की ओर से बोइंग के लिए, जो अभी भी बोइंग 737 मैक्स संकट से उबरने के लिए संघर्ष कर रहा है, किसी और 'प्रणालीगत विफलता' का पता चलना विनाशकारी हो सकता है। परिणाम जो हो, एयर इंडिया को नुकसान तो होगा ही- चाहे दुर्घटना प्रणालीगत और रखरखाव की कमियों के कारण हुई हो या पायलट की गलती से। भू-राजनीतिक दृष्टि से बोइंग के खिलाफ कोई भी निष्कर्ष भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव पैदा कर सकता है जो पहले से ही एक नाज़ुक दौर से गुज़र रहे हैं। भारत को डोनाल्ड ट्रम्प से भी निपटना होगा जो खुद को बोइंग का 'सबसे अच्छा सेल्समैन' कहते हैं और जिन्होंने अपने व्यापार समझौतों की बातचीत का इस्तेमाल करके दूसरे देशों को बोइंग खरीदने के लिए मजबूर किया है। लोग खुद ही इस बात पर अपनी राय बनाएंगे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी दबाव का सामना किया या झुक गए। पूरी दुनिया देख रही है कि क्या भारत अपने हितों की रक्षा और अपने नागरिकों के लिए न्याय सुनिश्चित करने में सक्षम है? इसलिए एआई171 मामले में सच्चाई का सामने आना भारत के राष्ट्रीय हित में है। भारत का यह दायित्व उन 260 लोगों और उनके परिवारों के प्रति भी है जिनकी हादसे में मृत्यु हो गई। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। सिंडिकेट : द बिलियन प्रेस)
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