बुढ़ापे की अचूक दवा मिलने पर भी अमर नहीं हो सकता इंसान, वैज्ञानिकों ने बताई जीने की अधिकतम उम्र
क्या आपने कभी सोचा है कि अगर भविष्य में विज्ञान इतनी तरक्की कर ले कि बुढ़ापे को पूरी तरह रोकने की दवा बन जाए, तब भी क्या इंसान हमेशा के लिए अमर हो पाएगा? अगर आपके मन में भी यही सवाल आता है, तो वैज्ञानिकों ने इस पर से बड़ा पर्दा उठा दिया है। हाल ही में सामने आई एक दिलचस्प वैज्ञानिक रिसर्च में यह खुलासा किया गया है कि यदि इंसान बुढ़ापे की सभी वजहों और बीमारियों का इलाज ढूंढ़ भी ले, तब भी वह अनंत काल तक जीवित नहीं रह सकता। वैज्ञानिकों के मुताबिक, तमाम मेडिकल एडवांसेज के बावजूद एक इंसान की अधिकतम उम्र की सीमा 150 से 190 साल के बीच ही हो सकती है।डीएनए के बदलाव तय करते हैं जिंदगी की आखिरी सीमारूस के प्रतिष्ठित स्कोल्कोवो इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने इस विषय पर एक खास और नया मॉडल तैयार किया है। इस वैज्ञानिक मॉडल के अनुसार, इंसान की जीने की उम्र की सीमा तय करने के पीछे सबसे बड़ा कारण हमारे शरीर के भीतर मौजूद डीएनए में समय के साथ होने वाले छोटे-छोटे बदलाव हैं। इन प्राकृतिक बदलावों को विज्ञान की भाषा में 'सोमैटिक म्यूटेशन' (Somatic Mutation) कहा जाता है। रिसर्च करने वाले वैज्ञानिकों का स्पष्ट रूप से यह मानना है कि इन सूक्ष्म डीएनए बदलावों को पूरी तरह से रोकना या टालना नामुमकिन है, और यही वजह है कि बुढ़ापे के हर संभावित कारण का इलाज मिल जाने के बावजूद इंसान कभी भी अमर नहीं हो सकता।उम्र बढ़ने के साथ शरीर के भीतर क्यों आते हैं बदलावजैसे-जैसे मनुष्य की उम्र बढ़ती जाती है, उसके शरीर की आंतरिक कोशिकाओं और अंगों की कार्य करने की क्षमता लगातार कमजोर होने लगती है। जब शरीर की पुरानी कोशिकाएं डीएक्टिवेट होने लगती हैं, तो वे अपने अंदर जमा होने वाले टॉक्सिन्स यानी जहरीले तत्वों और वेस्ट को ठीक से साफ नहीं कर पाती हैं। इसकी वजह से शरीर के अंदर हानिकारक टॉक्सिन्स लगातार जमा होते रहते हैं, जो शरीर के नेचुरल फंक्शंस को धीमा कर देते हैं। इसके अलावा जब शरीर पुरानी कोशिकाओं की जगह नई सेल्स बनाने के लिए डीएनए को कॉपी करता है, तो प्रक्रिया के दौरान अक्सर छोटी-छोटी गलतियां हो जाती हैं, जिससे नए सेल के डीएनए में बदलाव आ जाता है और यही प्रक्रिया बुढ़ापे की मुख्य वजह बनती है।मेडिकल साइंस सिर्फ कम कर सकता है बुढ़ापे की रफ्तारइन सभी वैज्ञानिक तथ्यों और तर्कों के आधार पर शोधकर्ताओं का यह निष्कर्ष है कि भले ही आने वाले समय में मेडिकल साइंस कितनी भी आधुनिक प्रगति क्यों न कर ले, वह केवल बुढ़ापे की आने की रफ्तार को कुछ हद तक धीमा या कम जरूर कर सकता है। हमारे शरीर के डीएनए में लगातार हो रहे इन प्राकृतिक बदलावों को पूरी तरह से रोक पाना किसी भी तकनीक के लिए संभव नहीं है, इसलिए इंसान के लिए मौत को हमेशा के लिए मात देना केवल एक कल्पना ही बनकर रह जाएगा।

